Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 11 गंगा नदी

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 Chapter 11 गंगा नदी Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 11 गंगा नदी

Bihar Board Class 6 Sanskrit गंगा नदी Text Book Questions and Answers

अभ्यासः

मौखिक:

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का शुद्ध उच्चारण करें –

  1. गङ्गायाः – गङ्गायाम् – गङ्गया
  2. लतायाः – लतायाम् – लतया
  3. सीतायाः – सीतायाम् – सीतया
  4. अयोध्यायाः – अयोध्यायाम् – अयोध्यया
  5. गीतायाः – गीतायाम् – गीतया

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 11 गंगा नदी

(ख ) शब्द – द्वितीया – तृतीया – पंचमी

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 11 गंगा नदी 1

लिखितः

प्रश्न 2.
कोष्ठ में दिये गये शब्दों से तृतीया विभक्ति का रूप देकर रिक्त स्थानों को भरें

जैसे -सीता रामेण सह वनम् अगच्छत् (राम)

  1. मोहनः ……………… मह विद्यालय गच्छाति। (सोहन)
  2. लता …………….. सह वाटिकां गच्छति। (सीता)
  3. सीता …………. सह पुस्तक पठति। (गीता)
  4. रमेशः ………….. लिखांता कलम)
  5. मुकेशः …………….. सह खादति। (मित्र)

उत्तर-

  1. मोहनः सोहनेन सह विद्यालयं गच्छाति।
  2. लता सीतया सह वाटिका गच्छति।
  3. सीता गीतया सह पुस्तक पठति।
  4. रमेशः कलमेन लिखति।
  5. मुकेशः मिण सह खादति।

प्रश्न 3.
सुमेलित करें-

  1. कृषकः – (क) प्रवहति।
  2. छात्र – (ख) उपचारं करोति।
  3. चिकित्सकः – (ग) कृषिकार्य करोति।
  4. गङ्गा – (घ) भवनम्।
  5. विद्यालयस्य – (ङ) पठति।

उत्तर-

  1. कृषक: – (ग) कृषिकार्य करोति।
  2. छात्रः – (ङ) पठति।
  3. चिकित्सक – (ख) उपचारं करोति।
  4. गंगा – (क) प्रवहति ।
  5. विद्यालयस्य – (घ) भवनम्।

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प्रश्न 4.
मंजूषा में से सही शब्द चुनकर रिक्त स्थानों को भरें –

(सन्ति, बहूनि, पवित्रतमा, पातयन्ति गंगाजलम्, प्रभवति, गंगाजलेन)

  1. गंगा हिमालयात् ………. ।
  2. नदीषु गंगा …….. अस्ति।
  3. गंगातटे ………. नगराणि …….
  4. ……… जनाः पिबन्ति । ।
  5. ………. कृषि-भूमेः सेचनं भवति।
  6. जनाः मलजलानि गंगायां ………. ।

उत्तर-

  1. गंगा हिमालयात् प्रभवति ।
  2. नदीषु गंगा पवित्रतमा अस्ति।
  3. गंगातटे बहूनि नगराणि सन्ति।
  4. गंगाजलम् जनाः पिबन्ति ।
  5. गंगाजलेन कृषिभूमेः संचन भवति।
  6. जनाः मलजलानि गंगायां पातयन्ति।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों का वर्ण-विच्छेद करें –
जैस – रामः – र् + आ + म् + अः

(गंगा हिमालयः, गोमुखम, नगरम्, भवति)
उत्तर-

  • गंगा- ग् + अं+ ग + आ।
  • हिमालयः-ह + इ + म् + आ + ल् + अ + य् + अः।
  • गोमुखम् – ग् + आ + म् + उ + ख् + अ + म्।
  • नगरम् – न् + अ + ग् + अ + र् + अ + म्। ।
  • भवति – भ् + अ + व् + अ + त् + इ।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित विषयों पर संस्कृत में पाँच-पाँच वाक्य लिखें –
हिमालयः, विद्यालयः, दीपावली
उत्तर-
हिमालयः –

हिमालयः पर्वतेषु उन्नततमः अस्ति। अयं भारतस्य उत्तरदिशायां अस्ति। हिमालयात् गंगा निःसरति। हिमालयः भारतस्य रक्षकः अस्ति। हिमालयस्य रक्षणे भारतस्य रक्षणम्।

विद्यालयः –

विद्यायाः आलयः विद्यालयः कथ्यते। विद्यालये छात्राः पठन्ति। विद्यालये शिक्षकाः पाठयन्ति। विद्यालये छात्रान् अनुशासनस्य पाठं पाठयति। विद्यालयः ज्ञानकेन्द्रः भवति।

दीपावली –

दीपावली हिन्दुनां प्रमुख पर्व भवति। अस्मिन् अवसरे जनाः स्व-स्व गृहं दीपैः सुसज्जितं कुर्वन्ति। जनाः लक्ष्मी-गणेशयोः पूजयन्ति। जनाः मिष्टानं वितरन्ति खादन्ति च। महिलाजनाः अल्पनां कुर्वन्ति।

प्रश्न 7.
उत्तराणि लिखतप्रश्न –

प्रश्न (क)
भारतस्य पवित्रमा नदी का ?
उत्तर-
भारतस्य पवित्रमा नदी गंगा ।

प्रश्न (ख)
गंगा कुतः प्रभवति ?
उत्तर-
गंगा हिमालयात् प्रभवति ।

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प्रश्न (ग)
अस्याः जलं कीदृशं भवति?
उत्तर-
अस्याः जलं पवित्रं भवति।

प्रश्न (घ)
शुभकार्येषु कस्याः जलस्य आवश्यकता भवति?
उत्तर-
शुभकार्येषु गंगायाः जलस्य आवश्यकता भवति ।

प्रश्न (ङ)
अधुना जनाः गंगाजलं किं कुर्वन्ति ?
उत्तर-
अधुना जनाः गंगाजलं प्रदूषितं कुर्वन्ति ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit गंगा नदी Summary

पाठ – गङ्गा भारतवर्षस्य पवित्रतमा नदी वर्तते। इयं हिमालयस्य गोमुख स्थानात् प्रभवति। बंगोपसागरे गंगासागरनामिके स्थाने इयं सागरजले मिलति।

अर्थ – गंगा भारतवर्ष की अत्यन्त पवित्र नदी है। यह हिमालय के गोमुख स्थान से निकलती है। बंगाल की खाडी में गंगा सागर नामक स्थान पर यह समुद्र जल में मिलती है।

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पाठ – गङ्गातटे बहूनि नगराणि सन्ति। अस्माकं बिहारस्य राजधानी पाटलिपुत्रमपि गङ्गायाः तटे स्थितम् अस्ति। गङ्गाजलम् अति पवित्रं भवति। अस्याः जलेन धार्मिक कार्यम् भवति । हिन्दूध विलम्बिनां सर्वेषु शुभकार्येषु गङ्गाजलस्य आवश्यकता

भवति। – गंगा तट पर बहुत नगर हैं। हमारे बिहार की राजधानी पटना भी गंगा के तट पर स्थित है। गंगा का जल बहुत पवित्र होता है। इसके जल से धार्मिक कार्य होता है। हिन्दू धर्म को मानने वालों के सभी शुभ कार्यों में गंगा जल की आवश्यकता होती

पाठ – गङ्गायाम् अनेकाः नद्यः मिलन्ति। तासु यमुना-सरयू गंडकी-कौशिकी प्रभृतयः सन्ति। गङ्गायाः तटे हरिद्वार-प्रयाग-काशी-प्रभृतीनि प्रसिद्ध तीर्थस्थानानि सन्ति। गङ्गाजलेन कृषिभूमेः सेचनं भवति।

अर्थ – गंगा में अनेक नदियाँ मिलती हैं। उनमें यमुना-सरयू-गंडकी, कौशिकी (कोसी) इत्यादि हैं। गंगा के तट पर हरिद्वार-प्रयाग-काशी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल हैं। गंगा जल से कृषि भूमि की सिंचाई होती है।

पाठ – अधुना जनाः गङ्गाजलं प्रदूषितं कुर्वन्ति। गङ्गातटे स्थितानां नगराणां सर्वाणि मलजलानि गङ्गायां पातयन्ति। केचन मनुष्याणां पशूनाञ्च मृतशरीराणि नद्यां प्रवाहयन्ति। इदं न साधु कार्यम् अस्ति। नदीजले मलानां क्षेपणं वैज्ञानिकविचारेण धार्मिकविचारेण च न शोभनम्।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 11 गंगा नदी

अर्थ – आजकल लोग गंगाजल को गन्दा कर रहे हैं। गंगा किनारे स्थित शहरों के सभी गन्दे जल गंगा में गिराये जाते हैं। कुछ मनुष्यों के और पशुओं के मृत शरीरों को नदी में प्रवाहित किये (बहाये)जाते हैं। यह अच्छा काम नहीं है। नदी के जल में गन्दे वस्तुओं को फेंकना वैज्ञानिक-विचार और धार्मिक-विचार से अच्छा काम नहीं है।

शब्दार्थाः-भारतवर्षस्य – भारतवर्ष के। पवित्रतमा – अत्यन्त पवित्र। वर्त्तते – है। हिमालयस्य – हिमालय के। गोमुखस्थानात् – गोमुख स्थान से। प्रभवति – निकलती है/निकलता है। बंगोपसागरे – बंगाल की खाड़ी में। गंगासागरनामके – गंगासागर नामक (स्थान) में। स्थाने – स्थान में। गंगातटे – गंगा के किनारे पर। बहूनि – बहुत(अनेक)। नगराणि – नगरे। सन्ति – हैं। अस्माकम – हमारे। बिहारस्य – बिहार के। पाटलिपुत्रम् – पटना। अपि — भी। गङ्गायाः – गंगा के । तटे – तीर पर। स्थितम् – स्थित। अस्ति -. है। अति – बहुत। पवित्रम् – पवित्र/स्वच्छ। भवति – होता है। अस्याः – इसकी । जलेन – जल से। शास्त्रानुसारेण – शास्त्र के अनुसार।

हिन्दूध र्मावलम्बिना – हिन्दू धर्म के मानने वाले। धर्मावलम्बिनाम् – धर्म को मानने वाले । शुभकार्येषु – शुभ कामों में । सर्वेषु – सभी में। गंगायाम् – गंगा में। अनेकाः – अनेक। नद्यः – नदियाँ। मिलन्ति – मिलते हैं। तासु – उनमें। कौशिकी – कोशी। प्रभृतयः – इत्यादि। प्रभृतीनि – इत्यादि(नपु0 में)। कृषि भूमेः – कृषि भूमि का। सेचनम् – सिंचाई। अधुना – आजकल। प्रदूषितं – गन्दा। कुर्वन्ति – करते हैं। मलजलानि – गन्दे पानी को। पातयन्ति – गिराते हैं। मनुष्याणाम् – मनुष्यों के । पशूनाज्य – और पशुओं के। मृत शरीराणि – मरे शरीर को । प्रवाहयन्ति – प्रवाहित करते हैं/बहाते हैं। साधु -उत्तम। क्षेपणम् – फेंकना । वैज्ञानिक विचारेण – वैज्ञानिक विचार से । शोभनम् – अच्छा। न – नहीं।

व्याकरणम्

पवित्रतमा (स्त्री.), पवित्रतमः (पु.), पवित्रतमम् (नपु०) प्रभवति – प्र + भू + लट् लकार

व्याख्या : ‘भू’ धातु के लट् लकार में “भवति” रूप होता है जिसका अर्थ है- “होता है।” परंतु ‘प्र’ उपसर्ग लगने पर ‘प्रभवति’ शब्द का निर्माण होता है जिसका अर्थ है उत्पन्न होना। इसी प्रकार उपसर्ग लगने पर धातु का अर्थ बदल जाता है। बंग + उपसागरे -बंगोपसागरे । गंगाजलस्य + आवश्यकता – गंगाजलस्यावश्यकता। मिल् + लट् लकार – मिलति। अस् + लट् लकार – अस्ति। अस् + लट् लकार बहुवचन -सन्ति। कृ + लट् लकार, बहुवचन – कुर्वन्ति।

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प्रेरणार्थक क्रिया का प्रयोग 

सामान्य क्रिया और अर्थ – प्रेरणार्थक क्रिया एवं अर्थ एकवचन में बहुवचन में पतति (गिरता है)-पातयति (गिराता है)-पातयन्ति (गिराते हैं) पठति (पढ़ता है)-पाठयति (पढ़ाता है)-पाठयन्ति (पढ़ाते हैं) लिखति (लिखता है) लेखयति (लिखाता है)-लेखयन्ति (लिखवाते हैं) चलति (चलता है)चालयति (चलाता है)-चालयन्ति (चलाते हैं)

वाक्य प्रयोग –

  1. पत्ता गिरता है – पत्रम् पतति।
  2. बालक जल गिराता है – बालकः जलं पातयति।
  3. छात्र पढ़ता है – छात्रः पठति।
  4. शिक्षक पढ़ाते हैं – शिक्षकः पाठयति।
  5. वह लिखता है – सः लिखति।
  6. सीता पत्र लिखवाती है – सीता पत्रं लेखयति।
  7. हाथी चलता है – गजः चलति।
  8. वह साइकिल चलाता है – सः द्विचक्रीम चालयति।

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 4 चुनावी राजनीति

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Political Science राजनीति विज्ञान : लोकतांत्रिक राजनीति भाग 1 Chapter 4 चुनावी राजनीति Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Political Science Solutions Chapter 4 चुनावी राजनीति

Bihar Board Class 9 Political Science चुनावी राजनीति Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चुनाव का मतलब है
(क) पैसा कमाना
(ख) राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
(ग) राजनीतिक खेल
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) राजनीतिक प्रतिस्पर्धा

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 4 चुनावी राजनीति

प्रश्न 2.
लोकतांत्रिक देश में क्या नियमित होता है ?
(क) युद्ध
(ख) आपसी संघर्ष
(ग) चुनाव
(घ) खेती
उत्तर-
(ग) चुनाव

प्रश्न 3.
लोकसभा में सीटों की संख्या निम्नलिखित में से क्या है ?
(क) 500
(ख) 520
(ग) 525
(घ) 543
उत्तर-
(घ) 543

प्रश्न 4.
बिहार विधान सभा में विधायकों की सीटें हैं
(क) 243
(ख) 253
(गे) 250
(घ) 153
उत्तर-
(क) 243

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प्रश्न 5.
लोकसभा में अनुसूचित जन जातियों के लिए कितनी सीटें आरक्षित
(क) 60
(ख) 41
(ग) 40
(घ) 20
उत्तर-
(ख) 41

प्रश्न 6.
लोकसभा एवं विधान सभा के उम्मीदवार होने के लिए न्यूनतम आयु सीमा क्या है ?
(क) 20 वर्ष
(ख) 18 वर्ष
(ग) 21 वर्ष
(घ) 25 वर्ष
उत्तर-
(क) 20 वर्ष

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प्रश्न 7.
चुनावी मतदाता होने के लिए कम से कम आयु कितनी होनी’ चाहिए?
(क) 18 वर्ष
(ख) 21 वर्ष
(ग) 25 वर्ष
(घ) 30 वर्ष
उत्तर-
(क) 18 वर्ष

प्रश्न 8.
1971 ई० में कांग्रेस पार्टी ने चुनाव प्रचार में नारा दिया था.
(क) लोकतंत्र बचाओ
(ख) तेलगू स्वाभिमान
(ग) गरीबी हटाओ
(घ) अमीरी मिटाओ
उत्तर-
(ग) गरीबी हटाओ

प्रश्न 9.
1977 ई. में जनता पार्टी ने देशभर में नारा दिया था
(क) गरीबी मिटाओ
(ख) गरीबी हटाओ
(ग) अमीरी मिटाओ
(घ) लोकतंत्र बचाओ
उत्तर-
(घ) लोकतंत्र बचाओ

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प्रश्न 10.
एक विधान सभा का उम्मीदवार वैधानिक ढंग से अपने चुनाव अभियान में अधिकतम कितनी धनराशि खर्च कर सकता है ?
(क) 5 लाख
(ख) 10 लाख
(ग) 15 लाख
(घ) 20 लाख
उत्तर-
(ख) 10 लाख

प्रश्न 11.
एक लोकसभा का उम्मीदवार वैधानिक ढंग से अपने चुनाव अभियान में अधिकतम कितनी धनराशि खर्च कर सकता है ?
(क) 5 लाख
(ख) 8 लाख
(ग) 20 लाख
(घ) 25 लाख
उत्तर-
(घ) 25 लाख

प्रश्न 12.
लोकसभा के चुनाव हेतु सम्पूर्ण भारत को कितने निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा गया है ?
(क) 250
(ख) 324
(ग) 420
(घ) 543
उत्तर-
(क) 250

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प्रश्न 13.
चुनाव प्रचार में निम्नलिखित में से किस पर प्रतिबंध नहीं है ?
(क) धर्म के नाम पर प्रचार
(ख) सरकारी वाहन का प्रयोग
(ग) सरकार को नीतिगत फैसला करना
(घ) सीधा-सादा प्रचार
उत्तर-
(क) धर्म के नाम पर प्रचार

प्रश्न 14.
लोकसभा में अनुसूचित जातियों के लिए कितनी सीटें आरक्षित हैं ?
(क) 70
(ख) 72
(ग) 75
(घ) 79
उत्तर-
(घ) 79

प्रश्न 15.
बिहार विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए कितनी सीटें आरक्षित हैं ?
(क) 5
(ख) 8
(ग) 0 (शून्य)
(घ) 10
उत्तर-
(घ) 10

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

प्रश्न 1.
राजनीतिक पार्टियों के बीच ………….. होता है।
उत्तर-
प्रतिस्पर्धा

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प्रश्न 2.
अगर प्रतिस्पर्धा नहीं रहे तो चुनाव ………….हो जायेंगे।
उत्तर-
बेमानी

प्रश्न 3.
नियमित अंतराल पर चुनावी मुकाबलों का लाभ ……………………….. और नेताओं को मिलता है।
उत्तर-
राजनीतिक दलों

प्रश्न 4.
लोकतांत्रिक चुनाव की यह विशेषता है कि हर वोट को ……………….. .. का आधार बनाया जाता है। ..
उत्तर-
मूल्य

प्रश्न 5.
निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन के लिए जनसंख्या एवं …………………. …. का आधार बनाया जाता है।
उत्तर-
क्षेत्रफल

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प्रश्न 6.
महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर सिर्फ ………………. . चुनाव लड़ सकती
उत्तर-
महिलाएँ

प्रश्न 7.
भारत में चुनाव प्रचार के लिए आमतौर पर ……………… . का समय दिया जाता है।
उत्तर-
दो सप्ताह

प्रश्न 8.
…………….. में आन्ध्र प्रदेश में तेलगू स्वाभिमान का नारा दिया गया था।
उत्तर-
1983

प्रश्न 9.
……………. में झारखंड में ‘झारखंड बचाओ’ का नारा दिया गया था।
उत्तर-
2000

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प्रश्न 10.
भारतीय संविधान ने चुनावों की निष्पक्षता की जाँच के लिए स्वतंत्र चुनाव ………. का गठन किया है।
उत्तर-
आयोग

प्रश्न 11.
चुनाव आयोग को …………….. कहते हैं उत्तर-भारतीय निर्वाचन आयोग

प्रश्न 12.
चुनाव का स्वतंत्र और निष्पक्ष होने का आखिरी पैमाना उसके …………. हैं।
उत्तर-
नतीजे

प्रश्न 13.
नगर परिषद् से चुने गए प्रतिनिधियों को नगर …………….. कहते हैं।
उत्तर-
पार्षद

प्रश्न 14.
गाँवों में आप कहते सुनेंगे कि …………….. ने हमारे घरों को बाँट दिया है।
उत्तर-
पार्टी-पॉलिटिक्स

प्रश्न 15.
चुनाव के लिए राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के नामों की ……………… करते हैं।
उत्तर-
घोषणा

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मताधिकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-
राज्य की ओर से नागरिकों को जो मत देने का अधिकार दिया गया है उसे मताधिकार कहते हैं।

प्रश्न 2.
मतदान का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
निर्वाचन के समय कोई व्यक्ति उसमें भाग लेकर अपने मत का प्रयोग करते हैं उसे मतदान कहते हैं।

प्रश्न 3.
मतदाता किसे कहते हैं ?
उत्तर-
चुनाव में मतदान करनेवाले व्यक्ति को मतदाता कहते हैं।

प्रश्न 4.
चुनाव का प्रमुख उद्देश्य क्या है ?
उत्तर-
जनता अपनी पसंद के प्रतिनिधियों का चुनाव करे।

प्रश्न 5.
चुनाव नियमित रूप से क्यों होना चाहिए?
उत्तर-
इसलिए ताकि मतदाताओं को अपनी पसंद के अनुसार प्रतिनिधियों का चुनाव करने का अवसर मिलता रहे।

प्रश्न 6.
चुनाव चिह्न का क्या महत्व होता है ? .
उत्तर-
भारत के अधिकांश मतदाता अनपढ़ हैं जिस कारण मतदाता चुनाव चिह्न को पहचान कर अपनी पसंद से मतदान कर सकें।

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प्रश्न 7.
लोकतांत्रिक देश में चुनाव से क्या अभिप्राय है ? ।
उत्तर-
लोकतांत्रिक देश में चुनाव वास्तव में लोकतंत्र का आधार है। चुनाव के द्वारा ही लोकतंत्र में प्रत्याशी चयनित किए जाते हैं।

प्रश्न 8.
मतदान केन्द्रों पर चुनाव सम्पन्न करने का उत्तरदायित्व किस पर होता है ?
उत्तर-
पीठासीन पदाधिकारी पर ।

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प्रश्न 9.
मतदाताओं की अंगुली पर एक अमिट स्याही क्यों लगा दी जाती है?
उत्तर-
ताकि वह दुबारा वोट न दे सके।

प्रश्न 10.
भारतीय चुनाव प्रणाली की एक विशेषता को लिखें।
उत्तर-
नियमित चुनाव प्रणाली ।

प्रश्न 11.
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर-
राष्ट्रपति ।

प्रश्न 12.
भारत का चुनाव आयोग कैसा है ?
उत्तर-
काफी शक्तिशाली और स्वतंत्र ।

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प्रश्न 13.
किन लोगों को मताधिकार नहीं दिया गया है ?
उत्तर-
गंभीर प्रकार के अपराधी, पागल एवं दिवालिया को मताधिकार नहीं दिया गया।

प्रश्न 14.
निर्वाचन क्षेत्र क्या है ?
उत्तर-
एक खास भौगोलिक क्षेत्र जहाँ से मतदाता एक प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं।

प्रश्न 15.
आदर्श चुनाव आचार संहिता क्या है ?
उत्तर-
चुनाव की अधिसूचना के पश्चात् पार्टियाँ और उम्मीदवारों द्वारा अनिवार्य रूप से माने जाने वाले कायदे-कानून और दिशा-निर्देश को आचार संहिता कहते हैं।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में मतदाता की कौन-सी तीन योग्यताएँ होनी चाहिए ?
उत्तर-

  • वह भारत का नागरिक हो ।
  • उसकी आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए।
  • मतदाता सूची में उसका नाम हो ।

प्रश्न 2.
भारत में संसदीय चुनाव के उम्मीदवार की कोई तीन योग्यताएँ बताएँ।
उत्तर-

  • वह भारत का नागरिक हो ।
  • उसकी आयु कम-से-कम 25 वर्ष होनी चाहिए और राज्य सभा का चुनाव लड़ने के लिए कम-से-कम उसकी उम्र 30 वर्ष होनी चाहिए।
  • गंभीर आपराधिक मामले उसके खिलाफ न चल रहे हों।

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प्रश्न 3.
चुनाव प्रणाली क्या है ?
उत्तर-
भारत एक लोकतांत्रिक देश है । यहाँ शासन का संचालन जनता के प्रतिनिधियों के द्वारा होता है। सर्वप्रथम जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है, उसके बाद निर्वाचित प्रतिनिधि देश की संसद या राज्य के विधान मंडलों में पहुँचकर जनता की सेवा करते हैं। प्रतिनिधियों को चुनने के लिए जो संवैधानिक प्रणाली होती है उसे चुनाव प्रणाली कहते हैं।

प्रश्न 4.
चुनाव को आवश्यक क्यों माना गया है ?
उत्तर-
लोकतांत्रिक देश में यह जानने के लिए कि उनका प्रतिनिधि जो शासन चला रहे हैं, वे लोगों के अनुरूप शासन कर रहे हैं अथवा नहीं। ये प्रतिनिधि लोगों को पसंद है कि नहीं। इन्हीं बातों की जानकारी के लिए चुनाव आवश्यक है। इसके लिए ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिससे लोग नियमित अंतराल पर अपने प्रतिनिधियों को चुन सकें और इच्छानुसार उन्हें बदल सकें। इस व्यवस्था का नाम चुनाव है । इसलिए आज के समय में लोकतंत्र में चुनाव को जरूरी माना गया है।

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प्रश्न 5.
राजनैतिक प्रतिस्पर्धा से आमलोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
राजनैतिक प्रतिस्पर्धा नुकसानदायी है। हर गाँव घर में बँटवारे जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। लोग आपस में बातचीत करते हुए कहते हैं कि ‘पार्टी पॉलिटिक्स’ ने हमारे घरों को बाँट दिया है। विभिन्न दलों के लोग एक दूसरे के खिलाफ आरोप लगाते हैं। चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। चुनाव जीतने की होड़ में सही किस्म की राजनीति बलि चढ़ जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि अच्छे लोग जो देश एवं समाज की राजनीति में सेवा भावना से आना चाहते हैं, उन्हें घोर निराशा होती है।

प्रश्न 6.
क्या हमारे देश में चुनाव लोकतांत्रिक है ?
उत्तर-
हमारे देश में चुनाव लोकतांत्रिक हैं। इसके निम्नलिखित प्रमाण हैं-

  • अपने देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव हर पाँच साल बाद होते हैं। इस प्रकार जो प्रतिनिधि चुनकर जाते हैं, उनका कार्यकाल पाँच वर्षों का होता है ।
  • हर पाँच वर्षों बाद लोकसभा और विधान सभाएँ भंग हो जाती हैं ।
  • फिर सभी चुनाव क्षेत्रों में एक ही दिन अथवा एक छोटे अंतराल पर अलग-अलग दिन चुनाव होते हैं । इसे आम चुनाव कहते हैं।

इस प्रकार भारत में चुने हुए प्रतिनिधि ही शासन चलाते हैं और हर पाँच साल पर उन्हें चुनाव जीतना पड़ता है अन्यथा सत्ता हाथ से निकल जाती है। इस तरह यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को सिद्ध करता है।

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प्रश्न 7.
निर्वाचन क्षेत्र क्या है ? इसके निर्माण का क्या आधार है ?
उत्तर-
चुनाव के उद्देश्य से देश को जनसंख्या के हिसाब से कई क्षेत्रोंमें बाँट दिया जाता है। इन्हें निर्वाचन क्षेत्र कहा जाता है। एक क्षेत्र में रहने वाले मतदाता अपने एक प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं। जिस प्रकार बिहार में विधायक चुनने के लिए 243 निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा गया है, उसी प्रकार लोकसभा चुनाव के लिए देश को 543 निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा गया है। निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन के लिए जनसंख्या एवं क्षेत्रफल को आधार बनाया जाता है। इस प्रकार एक खास भौगोलिक क्षेत्र जहाँ से मतदाता एक प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं उसे ही निर्वाचन क्षेत्र कहते हैं।

प्रश्न 8.
संविधान निर्माताओं ने कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित क्षेत्र की बात क्यों सोची?
उत्तर-
हमारे संविधान निर्माताओं ने कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित क्षेत्र की विशेष व्यवस्था करने की बात सोची । हमारे संविधान निर्माता इस बात से चिंतित थे कि इस खुले मुकाबले में सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से कमजोर समूहों के लिए लोकसभा एवं विधान सभाओं में शायद नहीं पहुंच पायें । ऐसा इसलिए कि उनके पास चुनाव लड़ने और जीतने लायक जरूरी संसाधन, शिक्षा एवं संपर्क नहीं हो। यह भी संभव है कि संसाधन सम्पन्न एवं प्रतिभाशाली लोग उनको चुनाव जीतने से रोक भी सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो संसद एवं विधानसभाओं में एक बड़ी आबादी की आवाज पहुँच नहीं पायेगी । इससे हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वरूप कमजोर होगा और यह व्यवस्था कम लोकतांत्रिक होगी। इसलिए संविधान निर्माताओं ने ऐसा किया।

प्रश्न 9.
भारत में कौन ऐसा राज्य है जहाँ स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आधी सीटें आरक्षित कर दी गयीं हैं ?
उत्तर-
सम्पूर्ण भारतवर्ष में बिहार पहला राज्य है जिसने महिलाओं को कमजोर समूह का हिस्सा मानते हुए उनके लिए पंचायतों, नगरपालिकाओं एवं नगर निगमों में आधी सीटें आरक्षित कर दिया है। इन आधी सीटों में कुछ सीटें अनुसूचित जातियों एवं पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर सिर्फ महिलाएँ चुनाव लड़ सकती हैं। इनमें सामान्य एवं पिछड़े वर्ग की सीटों के लिए उसी समूह की महिलाएँ चुनाव में उम्मीदवार हो सकती हैं।

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 4 चुनावी राजनीति

प्रश्न 10.
मतदाता सूची का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर-
लोकतांत्रिक चुनाव में मतदान की योग्यता रखने वालों की सूची चुनाव से काफी पहले तैयार कर ली जाती है और इसे सर्वसुलभ बना दिया जाता है। इस सूची को आधारित रूप से मतदाता सूची कहते हैं, इसे ही ‘वोटर लिस्ट’ भी कहते हैं। मतदाता सूची का निर्माण एक महत्वपूर्ण कार्य है। इसके बिना चुनाव संभव नहीं।

प्रश्न 11.
चुनाव आयोग ने मतदाताओं की सही पहचान के लिए कितने प्रकार के पहचानों को वैध माना है ?
उत्तर-
चुनाव आयोग ने पहचान के तौर पर 14 प्रकार के पहचानों की वैद्यता स्वीकार की है। जैसे मतदाता का राशन कार्ड, बिजली बिल, ड्राइविंग लाइसेंस, टेलीफोन बिल, पैन कार्ड आदि । पिछले कुछ वर्षों से चुनावों में फोटो पहचान पत्र की व्यवस्था लागू की गई है । फोटो पहचान कार्य अभी भी जारी है।

प्रश्न 12.
चुनाव का प्रमुख उद्देश्य क्या है ?
उत्तर-
चुनाव का प्रमुख उद्देश्य यह होता है कि लोग अपनी पसंद के प्रतिनिधियों का चुनाव कर सकें। सरकार बनाने में सहभागी बन सकें। इसके लिए जरूरी है कि लोग जानें कि कौन प्रतिनिधि बेहतर है, कौन पार्टी अच्छी सरकार देगी या किसकी नीति कल्याणकारी है ।

प्रश्न 13.
वे कौन-कौन से ऐसे प्रतिबंधित कार्य हैं जिन्हें चुनाव के समय उम्मीदवार या पार्टी नहीं कर सकती ? अथवा, किस स्थिति में चुनाव रद्द घोषित हो सकता है ?
उत्तर-
निम्नलिखित कार्य प्रतिबंधित हैं

  • मतदाताओं को प्रलोभन देना, घूस देना या धमकी देना।
  • चुनाव अभियान में सरकारी संसाधनों जैसे-सरकारी गाड़ियों का प्रयोग।
  • लोकसभा चुनाव में एक निर्वाचन क्षेत्र में 25 लाख और विधानसभा चुनाव में 10 लाख रुपये से ज्यादा खर्च आदि ।

कोई भी उम्मीदवार इनमें से किसी मामले में दोषी पाए जायेंगे तो उनका चुनाव रद्द घोषित हो सकता है।

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प्रश्न 14.
चुनाव के समय ‘आदर्श-आचार संहिता’ लागू होती है। वह क्या है?
उत्तर-
कुछ कानूनों के अतिरिक्त राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार में ‘आदर्श-आचार संहिता’ लाग होती है जिसे स्वीकार करना पड़ता है। वे निम्नलिखित हैं

  • चुनाव प्रचार के लिए किसी धर्म अथवा धर्मस्थल का उपयोम नहीं करना ।
  • सरकारी वाहन, विमान अथवा सरकारी कर्मियों का चुनाव में उपयोग नहीं करना।
  • चुनाव की अधिसूचना के बाद सरकार के द्वारा किसी बड़ी योजना का शिलान्यास अथवा कोई नीतिगत फैसला, लोगों को सुविधाएँ देने वाले वायदे नहीं किये जा सकते हैं।

प्रश्न 15.
चुनाव घोषणा पत्र क्या है ?
उत्तर-
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि प्रत्येक उम्मीदवार को अपने बारे में कुछ ब्यौरे देते हुए घोषणा करनी होगी। प्रत्येक उम्मीदवार को इन मामलों के सारे विवरण देने होते हैं

  • उम्मीदवार के खिलाफ चल रहे गंभीर आपराधिक मामले ।
  • उम्मीदवार और उसके परिवार के सदस्यों की सम्पत्ति और सभी देनदारियों का ब्यौरा।
  • उम्मीदवार की शैक्षिक योग्यता ।

प्रश्न 16.
चुनाव अभियान पर अपना विचार व्यक्त करें।
उत्तर-
चुनाव अभियान निर्वाचन प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। चुनाव की तिथि की घोषणा हो जाने के साथ ही चुनाव अभियान आरम्भ हो जाता है । अपने देश में चुनाव प्रसार के लिए आम तौर पर दो सप्ताह का समय दिया जाता है। यह समय चुनाव अधिकारी तथा उम्मीदवारों के अंतिम सूची और मतदान के तिथि के बीच का होता है। इस अंतराल में उम्मीदवार लोगों से व्यक्तिगत सम्पर्क करते हैं, छोटी-छोटी सभाएँ करते हैं, अखबारों एवं टी.वी. चैनलों द्वारा विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव प्रचार करते हैं । चुनाव अभियान में राजनीतिक दल किसी-न-किसी मोहक नारे द्वारा लोगों को आकर्षित करते हैं। जैसे 1971 ई. में काँग्रेस पार्टी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था । 1977 ई० में जनता पार्टी ने देश भर में लोकतंत्र बचाओ’ का नारा दिया था। इस तरह उम्मीदवारों का चुनाव अभियान चलता है।

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प्रश्न 17.
चुनाव में प्रयोग होनेवाले मशीन का क्या नाम है ? यह कैसे कार्य करता है?
उत्तर-
मतदान को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए एक मशीन का प्रयोग किया जाता है जिसे ‘इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’ कहा जाता है। मशीन के ऊपर उम्मीदवार के नाम और उनके चुनाव चिह्न बने होते हैं । मतदाता को जिस उम्मीदवार को वोट देना होता है उसके चुनाव चिह्न के आगे बने बटन को एक बार दबा देना होता है।

प्रश्न 18.
मत-पत्र क्या होता है ?
उत्तर-
चुनाव के समय चुनाव केन्द्र पर मतदाताओं को मत देने के लिए एक मतपत्र दिया जाता है जिस पर सभी उम्मीदवारों के नाम के साथ चुनाव चिह्न भी अंकित रहता है जिस पर वे अपनी पसंद के उम्मीदवार को अपना मोहर लगाते हैं । अब मतपत्र के स्थान पर ‘इलेक्ट्रॉनिक वाटिंग मशीन’ का प्रयोग होता है।

प्रश्न 19.
मतदान केन्द्र के चुनाव अधिकारी एवं पीठासीन पदाधिकारी के कार्यों का परिचय दीजिए।
उत्तर-
चुनाव अधिकारी को चुनाव आयुक्त द्वारा नियुक्त किया जाता है । मतदान केन्द्र पर चुनाव को सम्पन्न करने के लिए सरकार द्वारा इनकी नियुक्ति होती है। जब मतदाता केन्द्र पर जाता है तो चुनाव अधिकारी उसे पहचान कर उसकी अंगुली पर एक अमिट स्याही लगा देता है ताकि वह दुबारा मत डालने न आ सके । मतदान की समाप्ति पर सभी बैलेट.बॉक्सों अथवा वोटिंग मशीनों का सील बंद कर चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित एवं सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया

जाता है । फिर एक निश्चित एवं घोषित तारीख को मतों की गिनती शुरु की जाती है।

प्रश्न 20.
भारत में चुनाव परिणामों को स्वीकार करने की बाध्यता है । क्यों ?
उत्तर-
भारत में चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र ढंग से होता है। लोग चुनावी नतीजों को स्वीकार करने की मूल बाध्यता है या मूल पैमाना है। बड़े-बड़े नेता भी चुनाव हार जाते हैं। 2009 में रामविलास पासवान जैसे दिग्गज नेता भी चुनाव हार गए। यही लोकतंत्र का तकाजा है । निर्वाचन आयोग के सशक्त पर्यवेक्षक, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया भी चुनाव परिणामों की वैधता पर कड़ी नजर रखते हैं। यही कारण है कि चुनाव परिणाम घोषित होने पर उम्मीदवार उसे स्वीकार कर लेता है, यह संवैधानिक बाध्यता भी है।

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प्रश्न 21.
‘री-पोलिंग’ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
चुनाव आयोग द्वारा यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अगर चुनाव अधिकारी किसी मतदान केन्द्र पर या पूरे चुनाव क्षेत्र में मतदान ठीक ढंग .. से नहीं होने के पुख्ता प्रमाण देते हैं तो वहाँ ‘री पोलिंग’ का पुनर्मतदान होता है।

प्रश्न 22.
भारतीय चुनाव में भागीदारी पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
चुनाव में लोगों की भागीदारी का पैमाना अक्सर मतदान करनेवालों के आँकड़ों को बनाया जाता है। इससे पता लग जाता है कि मतदान की योग्यता रखनेवाले कितने मतदाताओं ने वास्तविक मतदान किया। पिछले 50 वर्षों में जहाँ यूरोप, उत्तरी अमरीका के लोकतांत्रिक देशों में मतदान का प्रतिशत गिरा है, वही भारत में या तो स्थिर रहा है अथवा ऊपर गया है।
भारत में अमीर एवं बड़े लोगों की तुलना में गरीब, निरक्षर और – कमजोर लोग अधिक संख्या में मतदान करते हैं। जबकि अमरीका में
गरीब लोग, अफ्रीकी मूल के लोग अमीर एवं श्वेत लोगों की तुलना में काफी कम मतदान करते हैं।

प्रश्न 23.
उप चुनाव क्या है ?
उत्तर-
जब किसी सदस्य की मृत्यु या इस्तीफे के कारण संसहीय या विधान सभा क्षेत्र खाली होता है तो उसे भरने के लिए पुनः मतदान होता है। इस प्रकार के चुनाव को उप चुनाव कहते हैं।

प्रश्न 24.
मध्यावधि चुनाव क्या है ?
उत्तर-
कभी-कभी सरकार अल्पमत के कारण लोकसभा या विधानसभा में विश्वासमत हासिल करने में विफल हो जाती हैं, तब वैसी स्थिति में मध्यावधि चुनाव होता है। ऐसी स्थिति में यह मध्यावधि चुनाव आम चुनाव बन जाता है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चुनाव को लोकतांत्रिक मानने के क्या आधार हैं ?
उत्तर-
लोकतांत्रिक चुनावों के लिए कुछ जरूरी न्यूनतम शर्ते हैं। वे निम्नलिखित हैं –

  • सभी को मत देने का अधिकार हो और सभी के मत का समान मूल्य हो।
  • चुनाव में विकल्प की गुंजाइश हो । पार्टियों और उम्मीदवारों को चुनाव में भाग लेने की आजादी हो और वें मतदाताओं के लिए विकल्प पेश करें।
  • चुनाव का अवसर नियमित अंतराल पर मिलता रहे ।
  • चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से सम्पन्न हो ताकि लोग अपनी इच्छा से उम्मीदवार का चुनाव कर सकें।

ये शर्ते सरल लगती हैं, लेकिन दुनिया में ऐसे अनेक देश हैं जहाँ के चुनावों में इन न्यूनतम शर्तों को पूरा नहीं किया जाता । भारत में इन शर्तों को पूरा किया जाता है। अतः यहाँ का चुनाव लोकतांत्रिक है।

प्रश्न 2.
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
चुनाव प्रतिस्पर्धा का खेल है। चुनाव के समय में विभिन्न दलों के उम्मीदवार एवं नेता अपने दल या अपनी सरकार की नीतियों का जमकर प्रचार-प्रसार करते हैं । विभिन्न प्रकार के लुभावने नारे भी देते हैं

ताकि आम जनता प्रभावित हो। जनता उसी को अपना नेता चुनती है जिनसे कल्याण की अपेक्षा की जाती है, जिसमें लोगों की सेवा करने वाले राजनेताओं को जीत मिले तथा ऐसा नहीं करने वालों को हार मिले इस का फैसला जनता करती है। चुनावी प्रतिस्पर्धा का ग्रही वास्तविक अर्थ है । नियमित अंतराल पर चुनावी मुकाबलों का लाभ राजनीतिक दलों को मिलता है। इससे इन्हें यह भी पता चलता है कि अगर नेताओं ने लोगों की समस्याओं के समाधान में रुचि नहीं दिखाई तो लोग उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे और लोग उन्हें पराजित कर देंगे। वैसे नेता चुनाव जीत जाते हैं जो आम समस्या से अधिक व्यक्तियों को खुश रखने में विश्वास रखते हैं।
लेकिन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सिर्फ चुनाव के लिए नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए भी हितकर है।

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प्रश्न 3.
भारत में चुनाव कितना लोकतांत्रिक है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद चुनाव में गड़बड़ियों की सूचना मिलती है। अगर ये गड़बड़ियाँ चुनाव में पाई जाती हैं तो उस चुनाव को लोकतांत्रिक नहीं कहेंगे।
कुछ गड़बड़ियाँ इस प्रकार हैं-

  • मतदाता सूची में फर्जी नाम डालने और वास्तविक नामों को गायब करने का मामला ।
  • मतदाताओं को डराना और फर्जी मतदान करना ।
  • सत्ताधारी दल द्वारा सरकारी सुविधाओं, धन, बल और अधिकारियों के दुरुपयोग।
  • मतदान पूर्व मतदाताओं के बीच जाति व धर्म के नाम पर अफवाहें फैलाना या उनके बीच धन वितरित करना ।

चुनाव लोकतांत्रिक तभी होगा जब उपर्युक्त गड़बड़ियाँ न हों। इसके लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना जरूरी है –

  • प्रत्येक मतदाता का मत बराबर हो ।
  • प्रत्येक वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार हो।
  • चुनाव निश्चित अंतराल पर हो ।
  • चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हो ।

अतः स्पष्ट है कि किसी चुनाव को लोकतांत्रिक तभी कहा जाएगा जब वे उपर्युक्त शर्तों का पालन करें।

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प्रश्न 4.
चुनाव आयोग के महत्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर-
भारतीय संविधान ने चुनावों की निष्पक्षता की जाँच के लिए एक स्वतंत्र चुनाव आयोग का गठन किया है। जिसे ‘भारतीय निर्वाचन आयोग’ कहते हैं। इसके मुख्य चुनाव आयोग की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते हैं। इन्हें कार्यकाल के पहले कोई सरकार हटा नहीं सकती
दुनिया के शायद ही किसी चुनाव आयोग को भारत के चुनाव आयोग जितने अधिकार प्राप्त हैं। इनके अधिकार और कार्य इस प्रकार हैं

  • मतदाता सूचियों को तैयार करना-चुनाव आयोग का महत्वपूर्ण कार्य संसद तथा राज्य विधानमंडलों के चुनाव के लिए मतदाता सूची तैयार करना है।
  • चुनाव के लिए तिथि निश्चित करना-चुनाव आयोग विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में चुनाव करवाने की तिथि निश्चित करता है । नामांकन पत्रों के दाखिले की अंतिम तिथि तथा नामांकन पत्रों की जाँच करने की तिथि घोषित करता है।
  • चुनाव का निरीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण-उपर्युक्त तीनों अधिकार चुनाव आयोग को प्राप्त हैं।
  • चुनाव में तैनात अधिकारी सरकार के नियंत्रण में नहीं होते बल्कि निर्वाचन आयोग के अधीन कार्य करते हैं।
  • चुनाव क्षेत्र में मतदान ठीक ढंग से नहीं होने के पुख्ता प्रमाण देते ही वहाँ पुनर्मतदान होता है, यह अधिकार चुनाव आयोग का हैं।
  • चुनाव आयोग लगातार चुनाव सुधारों के काम में लगा हुआ है और लोगों की कठिनाइयों एवं चुनावी धांधलियों पर नियंत्रण रखने के लिए नये-नये उपाय कर रहा है । अब फोटो पहचान पत्र बनाने का कार्य अनवरत चल रहा है।

प्रश्न 5.
निर्वाचन आयोग ने बिहार विधान सभा के गठन (2005 ई.) की क्या अधिसूचना जारी की थी?
उत्तर-
बिहार में सन् 2005 ई. के आम चुनावों में आयोग काफी सक्रिय था। निर्वाचन आयोग ने बिहार विधान सभा के गठन की निम्नलिखित अधिसूचना जारी की

  • चुनाव में मतदान के लिए फोटो पहचान पत्र अनिवार्य है।
  • चुनाव आयोग ने सरकार के मंत्री को आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के लिए दोषी करार दिया।
  • निर्वाचन आयोग ने चुनाव खर्च पर नकेल कसी।
  • राजनीतिक विज्ञापनों पर सेंसर अथवा रोक ।
  • चुनाव के गुप्त खर्च पर चुनाव आयोग की नजर ।
  • माननीय न्यायालय ने चुनाव आयोग से अपराधी उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर नकेल कसने को कहा।
  • चुनाव आयोग ने चुनाव के ऐन मौके पर जिले के कलेक्टर, एस.पी. को बदला ।

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प्रश्न 6.
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग को कौन-कौन से उचित कदम उठाने चाहिए?
उत्तर-
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयाग का निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए

  • निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग को ईमानदार तथा निष्पक्ष व्यक्तियों की नियुक्ति करनी चाहिए ।
  • आदर्श आचार संहिता को सख्ती से लागू करना चाहिए।
  • शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और सेना की सहायता लेनी चाहिए ताकि मतदाता निडर होकर अपने मत का प्रयोग कर सकें।
  • चुनाव मूचियों की तैयारी व जाँच में सावधानी बरती जानी चाहिए।
  • फर्जी मतदान पत्रों पर रोक लगनी चाहिए।
  • चुनाव आयोग द्वारा जनता में मताधिकार के महत्व का प्रसार किया जाना चाहिए ताकि अधिक-से-अधिक मतदाता मतदान में भाग ले सकें।

Bihar Board Class 9 Economics Solutions Chapter 5 कृषि, खाद्यान सुरक्षा एवं गुणवत्ता

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Economics अर्थशास्त्र : हमारी अर्थव्यवस्था भाग 1 Chapter 5 कृषि, खाद्यान सुरक्षा एवं गुणवत्ता Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Economics Solutions Chapter 5 कृषि, खाद्यान सुरक्षा एवं गुणवत्ता

Bihar Board Class 9 Economics कृषि, खाद्यान सुरक्षा एवं गुणवत्ता Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
बिहारवासियों के जीवन निर्वाह का मुख्य साधन है ?
(क) उद्योग
(ख) व्यापार
(ग) कृषि
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) कृषि

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प्रश्न 2.
राज्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिंचाई साधन हैं ?
(क) कुएँ एवं नलकूप
(ख) नहरें
(ग) तालाब
(घ) नदी
उत्तर-
(क) कुएँ एवं नलकूप

प्रश्न 3.
बाढ़ से राज्य में बर्बादी होती है ?
(क) फसल की
(ख) मनुष्य एवं मवेशी की
(ग) आवास की
(घ) इन सभी की
उत्तर-
(घ) इन सभी की

प्रश्न 4.
अकाल से राज्य में बर्बादी होती है ?
(क) खाद्यान्न फसल
(ख) मनुष्य एवं मवेशी की
(ग) उद्योग
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) खाद्यान्न फसल

Bihar Board Class 9 Economics Solutions Chapter 5 कृषि, खाद्यान सुरक्षा एवं गुणवत्ता

प्रश्न 5.
शीतकालीन कृषि किसे कहा जाता है ?
(क) भदई
(ख) खरीफ या अगहनी
(ग) रबी
(घ) ग़रमा
उत्तर-
(ख) खरीफ या अगहनी

प्रश्न 6.
सन् 1943 ई0 में भारत के किस प्रांत में भयानक अकाल पड़ा?
(क) बिहार
(ख) राजस्थान
(ग) बंगाल
(घ) उड़ीसा
उत्तर-
(ग) बंगाल

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प्रश्न 7.
विगत वर्षों के अंतर्गत भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान?
(क) बढ़ा है
(ख) घटा है
(ग) स्थिर है
(घ) बढ़ता-घटता है
उत्तर-
(ख) घटा है

प्रश्न 8.
निर्धनों में भी निर्धन लोगों के लिए कौन सा कार्ड उपयोगी है ?
(क) बी० पी० एल० कार्ड
(ख) अंत्योदय कार्ड
(ग) ए० पी० एल० कार्ड
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) अंत्योदय कार्ड

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित में कौन खाद्यान्न के स्रोत हैं ?
(क) गहन खेती नीति
(ख)आयात नीति
(ग) भंडारण नीति
(घ) इनमें सभी
उत्तर-
(घ) इनमें सभी

प्रश्न 10.
गैर सरकारी संगठन के रूप में बिहार में कौन-सा डेयरी प्रोजेक्ट कार्य कर रहा है ?
(क) पटना डेयरी
(ख) मदर डेयरी
(ग) अमूल डेयरी
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(क) पटना डेयरी

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रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

1. बिहार राज्य में कृषि …………… जनसंख्या के आजीविका का
साधन है।
2. बिहार में कृषि की ……………….. निम्न है।
3. बिहार की कृषि के लिए सिंचाई …. … महत्व रखती है।
4. राज्य में बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र …………….. है। .
5. बफर स्टॉक का निर्माण ………………. करती है।
6. निर्धनता रेखा से नीचे के लोगों के लिए …………………. कार्ड है।
7. भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ ……………… है।
8. औद्योगिक श्रमिक की दैनिक आवश्यकता ………… कलोरी
9. दिल्ली में ………………. डेयरी कार्य करती है।
10. हरित क्रांति ……………. से प्रभावित होकर भारत में लागू की गयी।
उत्तर-
1. बहुसंख्यक
2. उत्पादकता
3. अत्यधिक
4. काफी अधिक
5. सरकार
6. बी० पी० एल०
7. कृषि
8. 3600
9. मदर
10. मेक्सिको।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बिहार की कृषि के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए चार उपाए बताएँ।
उत्तर-
बिहार की कृषि के पिछड़ेपन को दूर करने के निम्नलिखित उपाय हैं
(क) जनसंख्या को नियंत्रित करना
(ख) सुनिश्चित सिंचाई व्यवस्था
(ग) उन्नत बेहतर कृषि तकनीकों का प्रयोग
(घ) कृषि में संस्थागत वित्त का अधिक प्रवाह ।

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प्रश्न 2.
खाद्य फसल एवं नकदी फसल में अंतर बताएँ।।
उत्तर-
खाद्य फसलें खाने के काम में आती हैं। जैसे-धान. गेहूँ, मक्का आदि।
नकदी फसलें-वैसी फसलें हैं जिन्हें बेच कर किसान नकद रुपया प्राप्त करता है, जैसे-गन्ना, जूट, दलहन, आलू ।

प्रश्न 3.
कौन लोग खाद्य असुरक्षा से अधिक ग्रस्त हो सकते हैं ?
उत्तर-
ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन किसान, खेतीहर मजदूर तथा निध नता से पीड़ित जनता । शहरी क्षेत्रों में श्रमिक, रिक्शा चलाने वाले, मेहनत-मजदूरी करने वाले एवं छोटा-मोटा काम करनेवाले लोग खाद्य असुरक्षा से ग्रसित हैं।

प्रश्न 4.
क्या आप मानते हैं कि हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना दिया है । केसे ?
उत्तर-
हाँ, हरित क्रान्ति ने भारत को आत्म निर्भर बनाया है । भारत के कुछ राज्यों में खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता देखने को मिली है। इन राज्य में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश आदि । यह संभव हुआ अच्छे बीजों, अच्छी सिचाई व्यवस्था एवं कृति के मशीनीकरण के प्रभात्र सं, ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेशर, रासायनिक खाः कीटनाशकों आदि के उपयोग ने कृषि उत्पादन में क्रातिकारी परिवर्तन ला दिया ।

प्रश्न 5.
सरकार बफर स्टॉक क्यों बनाती है ?
उत्तर-
खाद्यान्न की जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार खाद्य के भंडार एकत्रित करती है। उसे वफर स्टाक कहा जाता है। सरकार अपने गोदामों में खाद्यान्नों को जमा करती है । जरूरत या आपदा के समय खाद्यान्न उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है।

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प्रश्न 6.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
भारतीय खाद्य निगम द्वारा अधिप्राप्त अनाज को सरकार .. नियमित राशन दुकानों के माध्यम से समाज के गीत वर्गों में वितरित करती है इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहते हैं .

प्रश्न 7.
राशन कार्ड कितने प्रकार के होते हैं : चर्चा करें।
उत्तर-
राशन कार्ड तीन प्रकार के होते हैं-

  • अंत्योदय कार्ड-जो निर्धन में भी निर्धन को दिया जाता है ।
  • BPL Card-गरीबी रेखा वाला कार्ड-निर्धनता रेखा के नीचे वाले लोगों के लिए।
  • APL Card-गरीबी रेखा के उपर वाले लोगों के लिए।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका की विवेचना करें।
उत्तर-
बिहार राज्य की बहुसंख्यक जनसंख्या जो लगभग 80% से अधिक गाँवों में निवास करती है साथ ही राज्य की अधिकांश जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर आश्रित है। कृषि बिहार के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

(क) खाद्यान्न की आपूर्ति-राज्य में खाद्यान्न फसलें जैसे-धान, गेहूँ, मकई की खेती करना लोगों के लिए खाद्यान की पूर्ति करता है।
(ख) कच्चेमाल की पूर्ति-अपने तथा अन्य राज्यों के उद्योगों के लिए या व्यापार के लिए साधन जुटाता है।
(ग) सरकार की आय का साधन-बचत एवं करों के रूप में साध न का काम करती है।
(घ) विदेशी मुद्रा का अर्जन-बिहार फलों की खेती में अग्रणी राज्य है। यहाँ आम, लीची, गन्ने केले आदि का निर्यात कर बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।

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प्रश्न 2.
बिहार की खाद्यान्न फसलों एवं उनके प्रकार की विस्तार से चर्चा करें।
उत्तर-
बिहार की खाद्यान्न फसलों के प्रकार निम्नलिखित है-

(क) भदई (शरद कालीन)-भदई फसलें मई-जून में बोयी जाती _हैं। जो अगस्त-सितम्बर में तैयार हो जाती है । इसमें मक्का, ज्वार, जूट एवं धान की कुछ खास किस्में, इनकी खेती बिहार के मैदानी भाग में होती

(ख) खरीफ या अगहनी (शीत कालीन)-इसमें मुख्यतः धान की खेती होती है । इसकी बुआई जून में की जाती है और हिन्दी माह अगहन अर्थात दिसम्बर में कटनी होती है। बिहार की कृषि में अगहनी फसल का सर्वोच्य स्थान है।

(ग) रबी (बसंत कालीन)-रबी के अंतर्गत गेहूँ, जौ, चना, खेसारी, मटर, मसूर, अरहर, सरसों आदि तथा अन्य दलहन एवं तेलहन की खेती होती है। राज्य के कुल एक तिहाई भाग में इसकी खेती होती है।

(घ) गरमा (ग्रीष्मकालीन)-सिंचाई वाले स्थानों पर अथवा नमी वाले क्षेत्रों में गरमा फसलों की खेती होती है। इनमें हरी सब्जियाँ तथा विशेष प्रकार के धान एवं मक्का की खेती होती है। बिहार के नालन्दा जिले तथा वैशाली एवं सारण के गंगा तट पर हरी सब्जियाँ उपजाई जाती

प्रश्न 3.
जब कोई आपदा आती हैं तो खाद्य पूर्ति पर क्या प्रभाव होता है ? चर्चा करें।
उत्तर-
जब कोई आपदा जैसे-सूखा, भूकम्प, बाढ़, सुनामी आती है तो फसलों की बर्बादी के कारण अकाल जैसी आपदा हो जाती है। खादय फसलों की बर्बादी के कारण कीमतें बढ़ जाती हैं जिससे खाद्य पूर्ति अधि क कीमतों पर होती है सामान्य जनता को अधिक बोझ बैठ जाता है, कुछ ऐसे भी होते हैं जो खरीद नहीं पाते । अगर यह आपदा अधिक विस्तृत क्षेत्र में आती है या अधिक लंबे समय तक बनी रहती है, तो भुखमरी की स्थिति पैदा हो सकती है। व्यापक भुखमरी से अकाल की स्थिति बन सकती है। अत: किसी भी देश में खादय सुरक्षा आवश्यक होती है ताकि इन विपदाओं का सामना किया जा सके।

Bihar Board Class 9 Economics Solutions Chapter 5 कृषि, खाद्यान सुरक्षा एवं गुणवत्ता

प्रश्न 4.
गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने के लिए सरकार ने क्या किया? सरकार की ओर से शुरू की गई किन्हीं दो योजनाओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने के लिए सरकार ने दो विभिन्न योजनाएं शुरू की हैं जिनमें कम लागत पर खाद्य उपलब्ध करवाये जाते हैं, जो इस प्रकार हैं

(क) सार्वजनिक वितरण प्रणाली-सरकार ने जून, 199? ई० सं सभी क्षेत्रों में गरीबों को लक्षित करने के लिए यह योजना शुरू की। इसमें पहली बार निर्धनों और गैर-निर्धनों के लिए विभेदक कीमत नीति अपनाई गई है। इसमें राशन कार्ड रखने वाला व्यक्ति निर्धारित राशन की सरकारी दुकानों से प्रत्येक परिवार पर एक अनुबंधित मात्रा ने 35 किलोग्राम अनाज, 5 लीटर मिट्टी का तेल, 5 किलोग्राम चीनी खरीद सकता है।

(ख) अन्तयोदय अन्न योजना-यह योजना दिसम्बर, 2001) ई० में शुरू की गई थी। इसमें गरीबी रेखा से नीचे के गरीब परिवारों को 2 रुपये प्रति किलोग्राम गेहूँ और 3 रुपये प्रतिकिलोग्राम की अत्यधिक आर्थिक सहायता प्राप्त दर पर प्रत्येक पात्र परिवार को 25 किलोम्राम अनाज उपलब्ध कराया गया। अगस्त, 2004 में इसमें 50-50 लाख अतिरिक्त B.P.L परिवार को जोड़ दिया गया। इससे इस योजना में आने वाले परिवारों की संख्या 2 करोड़ हो गई।

प्रश्न 5.
खाद्य और संबंधित वस्तुओं को उपलब्ध कराने में गैर सरकारी संगठन की भूमिका पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
भारत में विशेषकर देश के दक्षिणी और पश्चिमी भागों में गैर सरकारी संगठन एवं सहकारी समितियाँ गरीबों को खाद्यान्न की बिक्री के लिए कम कीमत वाली दुकाने खोलती हैं। दिल्ली मदर डेयरी उपभोक्ताओं को दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित नियंत्रित दरों पर दूध और सब्जियाँ उपलब्ध कराने में तेजी से प्रगति कर रही है। तमिलनाडु में जितनी भी राशन की दुकाने हैं उनमें से 94% सहकारी समितियों के माध्यम से चलाई जा रही हैं । गुजरात में दूध और दुग्ध उत्पादकों में अमूल एक और सफल सहकारी समिति का उदाहरण है। बिहार में दूध तथा दूध उत्पादों में पटना डेयरी जो ‘सुधा’ नाम से जानी जाती है, जो सफल सहकारी समिति का उदाहरण है। इन सभी ने देश में श्वेत क्रांति ला दी है। विभिन्न क्षेत्रों में अनाज बैंकों की स्थापना के लिए गैर-सरकारी संगठनों के लिए खाद्य सुरक्षा के विषय में प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम संचालित करती है। ADS (Academy for Developmment Science) अनाज बैंक कार्यक्रम को एक सफल और नए प्रकार के खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के रूप में स्वीकृति मिली है।

Bihar Board Class 9 Economics Solutions Chapter 5 कृषि, खाद्यान सुरक्षा एवं गुणवत्ता

टिप्पणी लिखें

(i) न्यूनतम समर्थित कीमत (ii) सब्सिडी (अनुदान) (iii) बी० पी० एल० कार्ड (iv) बफर स्टॉक (v) जन-वितरण प्रणाली
उत्तर-
(i) न्यूनतम समर्थित कीमत-भारतीय खाद्य निगम अधिशेष . उत्पादन वाले राज्यों में किसानों से गेहूँ और चावल खरीदता है। किसानों
को उनकी फसल के लिए पहले से घोषित कीमतें दी जाती है । इस मूल्य को न्यूनतम समर्थित कीमत कहते हैं।
(ii) सब्सिडी ( अनुदान)-वह भुगतान है जो सरकार द्वारा किसी उत्पादक को बाजार कीमत की अनुपूर्ति के लिए किया जाता है । वही सब्सिडी कहलाती है।
(iii) बी०पी०एल० कार्ड (BPL Card)-निर्धनता रेखा से नीचे के लोगों के लिए यह राशन कार्ड दिया जाता है जो सरकारी राशन की दुकान से निर्धारित सस्ते दर पर खाद्यान्न प्राप्त कर सकता है।
(iv) बफर स्टॉक (Buffer Stock)-भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से सरकार द्वारा अधिप्राप्त अनाज, गेहूँ और चावल का भंडार है जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
(v) जन वितरण प्रणाली-सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत राशन की जिन दुकानों की व्यवस्था की जाती है, ऐसे दुकानों से चीनी, खाद्यान्न और मिट्टी के तेल, कार्ड धारियों को उचित मूल्य पर प्राप्त होते हैं। ऐसी दुकानों को जन वितरण प्रणाली की दुकाने कहते हैं तथा सरकारी इस वितरण प्रणाली को जन वितरण प्रणाली कहते हैं।

Bihar Board Class 6 Sanskrit व्याकरण शब्दरूपाणि

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 व्याकरण शब्दरूपाणि

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit शब्दरूपाणि

अकारान्त -पुंल्लिङ्ग – शब्द

बालक

विभक्तिः – एकवचनम् – द्विवचनम् – बहुवचनम

  1. प्रथमा – बालकः – बालको – बालकाः
  2. द्वितीया – बालकम् – बालको – बालकान्
  3. तृतीया – बालकेन – बालकाभ्याम् – बालकैः
  4. चतुर्थी – बालकाय – बालकाभ्याम् – बालकेभ्यः
  5. पञ्चमी – बालकात् – बालकाभ्याम् – बालकेभ्यः
  6. षष्ठी – बालकस्य – बालकयोः – बालकानाम्
  7. सप्तमी – बालके – बालकयो: – बालकेषु
  8. सम्बोधनम् – हे बालक! हे – बालकौ ! – हे बालकाः !

समान शब्द – राम, कृष्ण, देव, छात्र, शिक्षक, विद्यालय, हिमालय, वृक्ष, पुस्तकालय आदि जिस शब्द का अन्त ‘अ” से हो तथा शब्द पलिङ्ग हो तो. ऊपर के शब्द रूप “बालक” जैसा ही समान रूप सभी शब्दों के चलेंगे।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions शब्दरूपाणि

आकारान्त -स्त्रीलिङ्ग – शब्द

बालिका

विभक्तिः – एकवचनम् – द्विवचनम् – बहुवचनम्

  1. प्रथमा – बालिका – बालिके – बालिकाः
  2. द्वितीया – बालिकाम् – बालिके – बालिकाः
  3. तृतीया – बालिकया – बालिकाभ्याम् – बालिकाभिः
  4. चतर्थी – बालिकायै – बालिकाभ्याम् – बालिकाभ्यः
  5. पञ्चमी – बालिकायाः – बालिकाभ्याम् – बालिकाभ्यः
  6. षष्ठी – बालिकायाः – बालिकयोः – बालिकानाम्
  7. सप्तमी – बालिकायाम् – बालिकयोः – बालिकासु
  8. सम्बोधनम् – हे बालिके! – हे बालिके! – हे बालिकाः

समान शब्द – लता, सीता, रमा, माला, छात्रा, शिक्षिका, अजा (बकरी), अश्वा (घोड़ी) बाटिका(बगीचा), बाला (लड़की, उमा, आदि जिस स्त्रीलिङ्ग शब्द का अन्त आ से होगा उसका रूप बालिका के समान चलेगा।

अकारान्त -नपुंसकलिङ्ग – शब्द

पुष्पे

विभक्तिः – एकवचनम् – द्विवचनम् – बहुवचनम्

  1. प्रथमा – पुष्पम् – पुष्पे – पुष्पाणि
  2. द्वितीया – पुष्पम् – पुष्पैः – पुष्पाणि
  3. तृतीया – पुष्पेण – पुष्पाभ्याम् – पुष्प
  4. चतुर्थी – पुष् – पाभ्याम् – पुष्पेभ्यः
  5. पञ्चमी – पुष्पात् – पुष्पाभ्याम् – पुष्पेभ्यः
  6. षष्ठी – पुष्पस्य – पुष्पयोः – पुष्पाणाम्
  7. सप्तमी – पुष्पे – पुष्पयोः – पुष्पेषु
  8. सम्बोधनम् – हे पुष्प ! – हे पुष्पे – हे पुष्पाणि

समान शब्द – पत्र, फल, पुस्तक, नगर, मित्र, उद्यान,वन (जंगल) अन्न, दुग्ध (दूध) जल आदि अ से अन्त होने वाले नपुंसकलिङ्ग शब्दों के रूप पुष्प के समान ही चलेंगे।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions शब्दरूपाणि

इकारान्त -पुंलिङ्ग – शब्द

हरि (विष्णु अथवा बन्दर)

विभक्ति – एकवचनम् – द्विवचनम् – बहुवचनम्

  1. प्रथमा – हरिः – हरी – हरयः
  2. द्वितीया – हरिम् – हरी – हरीन्
  3. तृतीया – हरिणा – हरिभ्याम् – हरिभिः
  4. चतुर्थी – हरये – हरिभ्याम् – हरिभ्यः
  5. पञ्चमी – हरेः – हरिभ्याम् – हरिभ्यः
  6. षष्ठी – हरेः – हर्योः – हरीणाम्
  7. सप्तमी – हरौ – होः – हरिषु
  8. सम्बोधनम् – हे हरे ! – हे हरी ! – हे हरयः !

समान शब्द – कवि, मुनि, कपि, अग्नि, अतिथि, रवि (सूर्य) गिरि ,ऋषि, जलघि (समुद्र) विधि (ब्रह्मा), भूपति, सेनापति,राष्ट्रपति, नरपति, गृहपति, सुरपति, गणपति, वृहस्पति इत्यादि इ से अन्त होने वाले पुल्लिङ्ग शब्द के रूप हरि के समान ही चलेंगे ।

उकारान्त – पुल्लिङ्ग – शब्द

साधु

कारक – विभक्तिः – एकवचनम् – द्विवचनम् – बहुवचनम्

  1. कर्ता – प्रथमा – साधुः – साधुः – साधवः
  2. कर्म – द्वितीया – साधुम् – साधु – साधुन्
  3. करण – तूंतीया – साधुभ्याम् – साधुभिः
  4. सम्प्रदान – चतुर्थी – साधवे – साधुभ्याम् – साधुभ्यः
  5. आपादान – पञ्चमी – साधो: – साधुभ्याम् – साधुभ्यः
  6. सम्बन्ध – षष्ठी – साधोः – साध्वोः – साधनाम्
  7. अधिकरण – सप्तमी – साधौ – साध्वोः – साधुष
  8. सम्बोधन – सम्बोधनम् – हे साधो! – हे साध ! – हे साधवः !

समान शब्द – शिशु, भानु, गुरु, विष्णु, रिपु, पशु, विमु (चन्द्रमा) बन्धु (मित्र) शम्भु, ऋतु, वायु इत्यादि के शब्द रूप साधु के समान ही चलेंगे।

अस्मद् (-मैं, हम) पुरुषवाचक सर्वनाम-उत्तमपुरुष

Bihar Board Class 6 Sanskrit व्याकरण शब्दरूपाणि 1

(सामान्यतया सर्वनाम में संबोधन का व्यवहार नहीं होता)

युष्मद् (तू, तुम, तुमलोग)-पुरुषवाचक सर्वनाम-मध्यम पुरुष

विभक्तिः – एकवचन – द्विवचन । – बहुवचन

  1. प्रथमा – त्वम् । – युवाम् – यूयम् ।
  2. द्वितीया – त्वाम्, त्वा – युवाम्, वाम् – युष्मान्, वः
  3. तृतीया – त्वया – युवाभ्याम् – युष्माभिः
  4. चतुर्थी – तुभ्यम्, ते – युवाभ्याम्, वाम् युष्मभ्यम्, वा
  5. पंचमी – त्वत्. – युवाभ्याम् – युष्मत्
  6. षष्ठी – तव, ते – युवयोः – वाम् – युष्माकम्, वः
  7. सप्तमी – त्वयि – युवयोः । – युष्मासु

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions शब्दरूपाणि

भवत् (आप, आपलोग) आदरसूचक सर्वनाम-अन्यपुरुष

विभक्तिः – एकवचन – द्विवचन – बहुवचन

  1. प्रथमा – भवान् – भवन्तौ – भवन्तः
  2. द्वितीया – भवन्तम् – भवन्तौ – भवतः
  3. तृतीया – भवता – भवद्भ्याम् – भवद्भिः
  4. चतुर्थी – भवते – भवद्भ्याम् – भवद्भ्यः
  5. पंचमी – भवतः – भवद्भ्याम् – भवद्भ्यः
  6. षष्ठी – भवतः – भवतो: – भवताम्
  7. सप्तमी : – भवति – भवतो: – भवत्सु

तद् (-वह, वे)-निश्चयवाचक सर्वनाम-अन्यपुरुष

Bihar Board Class 6 Sanskrit व्याकरण शब्दरूपाणि 2

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 10 सामाजिकं समत्वम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 Chapter 10 सामाजिकं समत्वम् Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 10 सामाजिकं समत्वम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit सामाजिकं समत्वम् Text Book Questions and Answers

अभ्यासः

मौखिकः

प्रश्न 1.
उच्चारण करें –
Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 10 सामाजिकं समत्वम् 1

लिखितः

प्रश्न 2.
कोष्ठ में दिये गये शब्दों में षष्ठी विभक्ति का रूप देकर रिक्त स्थानों को भरें –

यथा – रामः दशरथस्य पुत्रः आसीत्। (दशरथ)

  1. पाटलिपुत्रः …………………. राजधानी अस्ति। (बिहार)
  2. डाक्टर राजेन्द्र प्रसादः …………. प्रथमः राष्ट्रपतिः आसीत्। (भारत)
  3. सीता ……………….. पत्नी आसीत्। (रामः)
  4. अहं …………………. छात्र: अस्मि । (षष्ठवर्ग)
  5. ………………. जलं क्षारं भवति। (समुद्र)
  6. ……………….. उत्तरदिशायां हिमालयः अस्ति। (भारत)

उत्तर-

  1. पाटलिपुत्रं बिहारस्य. राजधानी अस्ति।
  2. डाक्टर राजेन्द्र प्रसादः भारतस्य प्रथमः राष्ट्रपतिः आसीत्।
  3. सीता रामस्य पत्नी आसीत्।
  4. अहं षष्ठवर्गस्य छात्रः अस्मि ।
  5. समुद्रस्य जलं क्षारं भवति।
  6. भारतस्य उत्तरदिशायां हिमालयः अस्ति।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 10 सामाजिकं समत्वम्

प्रश्न 3.
सुमेलित करें

  1. कुम्भकारः – (क) पाकं करोति।
  2. स्वर्णकारः – (ख) पादत्राणम् रचयति ।
  3. रजक: – (ग) काष्ठसामग्री निर्माति ।
  4. चर्मकार: – (घ) छात्रान् पाठयति।।
  5. काष्ठकारः – (ङ) अलंकारं रचयति ।
  6. पाचक: – (च) कुम्भं करोति ।
  7. शिक्षक: – (छ) वस्त्रं प्रक्षालयति।

उत्तर-

  1. कुम्भकारः – (च) कुम्भं करोति ।
  2. स्वर्णकारः – (ङ) अलंकारं रचयति ।
  3. रजक: – (छ) वस्त्रं प्रक्षालयति।
  4. चर्मकार: – (ख) पादत्राणम् रचयति ।
  5. काष्ठकारः – (ग) काष्ठसामग्री रचयति ।
  6. पाचकः – (क) पाकं करोति ।
  7. शिक्षकः – (घ) छात्रान् पाठयति।

प्रश्न 4.
मंजूषा में से सही शब्द चुनकर रिक्त स्थानों को भरें..

(प्रणमन्ति, विकसन्ति, अस्ति, सन्ति, गुञ्जन्ति, पठामः, पाठयन्ति)

  1. अयम् अस्माकं विद्यालयः ……………..।
  2. वयं विद्यालये ……………….।
  3. विद्यालये सप्त शिक्षका: …………।
  4. ते अस्मान्
  5. सर्वे विद्यार्थिनः अध्यापकान् ……………
  6. उद्याने विविधानि पुष्पाणि ………………….।
  7. पुष्पेषु भ्रमरा: ……………………..।

उत्तर-

  1. अयम् अस्माकं विद्यालयः अस्ति।
  2. वयं विद्यालये पठामः।
  3. विद्यालये सप्त शिक्षकाः सन्ति।
  4. ते अस्मान् पाठयन्ति।
  5. सर्वे विद्यार्थिनः अध्यापकान् प्रणमन्ति।
  6. उद्याने विविधानि पुष्पाणि विकसन्ति।
  7. पुष्पेषु भ्रमरा: गुञ्जन्ति.।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 10 सामाजिकं समत्वम्

प्रश्न 5.
निम्नांकित शब्दों का वर्ण विच्छेद करें-
यथा – विद्यार्थी – व् + इ + द् + य् + आ + र् + थ् + ई
उत्तर – विद्यालय:- + इ + द् + य् + आ + ल् + अ + य् + अ
श्रवणम् – श्र् + अ + व् + अ + ण् + अ + म्
दृश्यम् – द् + ऋ + श् + य् + अ + म्
शिक्षक:- श् + इ + क्ष् + अ + क + अ:
महोत्सवः- म् + अ + ह् + ओ + त् + स् + अ + व् + अः

प्रश्न 6.
निम्नलिखित विषयों पर हिन्दी में पाँच-पाँच वाक्य लिखेंईद, होली, क्रिसमस
उत्तर-
ईद-

मुसलमानों का मुख्य उत्सवों में श्रेष्ठ उत्सव है। ईद के चाँद उगने के दिन से ही मुसलमानों का वर्ष आरम्भ होता है। इस दिन लोग परस्पर एक-दूसरों से मिलकर गले लगते हैं। बच्चे -बूढ़े-जवान सभी लोग ईदगाह जाते हैं। सभी लोग नये-नये कपड़े पहनते हैं। परस्पर सेवई और मिठाई बांटते हैं।

होली-

होली हिन्दुओं का प्रमुख त्योहारों में श्रेष्ठ है। इस रोज से ही नये वर्ष का आरम्भ होता है। लोग नये-नये कपड़े पहनते हैं तथा परस्पर एक-दूसरे को रंग-अबीर देते हैं। हरेक घर में पुआ और मिठाई बनते हैं। लोग इस खुशी के पर्व पर नाचते-गाते दिखाई पड़ते हैं। यह खुशी का त्योहार है।

क्रिसमस-

क्रिसमस ईसाइयों का प्रमुख त्योहार है। इस अवसर पर लोग अपने-अपने घर को सजाते हैं। क्रिसमस -ट्री(पेड़) बनाये जाते हैं। ईसाई लोग चर्च पर जाकर प्रार्थना करते हैं। हरेक ईसाइयों के घर अच्छे-अच्छे भोजन बनते हैं। यह खुशियों का त्योहार है।

प्रश्न 7.
संस्कृते प्रश्नानां उत्तराणि लिखत –

प्रश्न (क)
मनुष्यः कीदृशः प्राणी अस्ति ?
उत्तर-
मनुष्यः समाजिकः प्राणी अस्ति ।

प्रश्न (ख)
कं विना जीवनं कठिनं भवति ?
उत्तर-
समाज विना जीवनं कठिनं भवति ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 10 सामाजिकं समत्वम्

प्रश्न (ग)
अस्माकं देशस्य किं नाम अस्ति ?
उत्तर-
अस्माकं देशस्य भारतं नाम अस्ति ।

प्रश्न (घ)
भारतं प्रबलं राष्ट्रं कथं भवेत् ?
उत्तर-
यदा वयं परस्परं सौहार्दैन निवसामः तदं भारतं प्रबलं राष्ट्रं भवते ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit सामाजिकं समत्वम् Summary

पाठ – मनुष्यः सामाजिकः प्राणी वर्तते। समाजं विना मनुष्याणां जीवनं कठिनं भवति। एकं भवनं जनानां सहयोगेन निर्मितं भवति। केचन जनाः इष्टकानां निर्माणम् अकुर्वन्। केचन अस्य भवनस्य कपाट-गवाक्षयोः निर्माणम् अकुर्वन्। एवमेव सामाजिक-सहयोगेन एवं अनेकानि वस्तूनि निर्मितानि भवन्ति ।

अर्थ – मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज के बिना मनुष्यों का जीवन कठिन हो जाता है। एक मकान लोगों के सहयोग से निर्मित होता है। कुछ लोगों ने ईंटों का निर्माण किया। किसी ने इस भवन के दरवाजा-खिड़की का निर्माण किया। इसी प्रकार सामाजिक-सहयोग से ही अनेकों वस्तुओं के निर्माण होते हैं।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 10 सामाजिकं समत्वम्

पाठ – अस्माक देशे विविधाः जनाः वसन्ति। विविधान् धर्मान् ते आचरन्ति। किन्तु सर्वे भ्रातृभावेन निवसन्ति। वयं परस्परं सौहार्दैन निवसामः। ईद – होलिका – क्रिसमस – प्रभृतीनाम्
उत्सवानाम् अवसरेषु परस्परं सहयोगं कुर्मः।

अर्थ – हमारे देश में अनेकों लोग रहते हैं। अनेकों धर्मों का वे सब आचरण करते हैं।किन्तु सभी भाईचारे की भावना से निवास करते हैं। हमलोग आपस में प्रेम से निवास करते हैं। ईद – होली, क्रिसमस इत्यादि उत्सवों के अवसरों पर पस्पर सहयोग करते हैं।

पाठ – केचन जनाः धर्मकारणात् विवादं कुर्वन्ति। ते स्वधर्म श्रेष्ठ वदन्ति। परधर्म हीनं गणयन्ति। वस्तुतः सर्वे धर्माः समानाः
सन्ति ।

अर्थ – कुछ लोग धर्म के कारण झगड़ा करते हैं। वे लोग अपने ध म को श्रेष्ठ बताते हैं। दूसरे के धर्म को छोटा बताते हैं। वस्तुतः सभी धर्म समान हैं।-

पाठ – एवमेव समाजे केचन संपन्नाः, केचन निर्धनाः सन्ति। सर्वे समाजस्य सदस्याः एव सन्ति। तेषु परस्परं समता भवेत्। यन्त्रस्य प्रत्येकः खण्डः अनिवार्यः अस्ति। तथैव समाजस्य सर्वे जनाः अनिवार्याः सन्ति।

अर्थ – इसी प्रकार समाज में कुछ अमीर कुछ गरीब हैं। सभी समाज के सदस्य ही हैं। उनमें परस्पर एकता होनी चाहिए। मशीन के प्रत्येक भाग की अनिवार्यता है। उसी प्रकार समाज के सभी लोगों की अनिवार्यता है।’

पाठ – यदा भारतीयाः परस्परं सौहार्दैन निवसामः। तदा । भारतवर्ष विश्वस्य प्रबलं राष्ट्रं भवेत् ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 10 सामाजिकं समत्वम्

अर्थ – यदि भारतीय लोग आपस में प्रेम से रहते हैं तो भारतवर्ष । विश्व का प्रबल देश होगा।

शब्दार्थाः – समत्वम् – समता, एकता। वर्त्तते – है। जनानां – लोग। सहयोगेन – सहयोग से । इष्टकानां – ईंटों का। अकुर्वन् – किये । किये थे। केचन – किन्हीं ने / कई लोगों ने। अस्य – इसका / इसकी / इसके। अस्य भवनस्य – इस भवन का । कपाटः – दरवाजा। गवाक्षयोः – खिड़कियों का। एवमेव -इसी प्रकार। एव – ही। वस्तूनि – वस्तुओं। भवन्ति – होते हैं। अस्माकं – हमारे। विविधाः जनाः – अनेक लोग। वसन्ति – रहते हैं। विविधान्-धर्मान् – अनेक धर्मों को। आचरन्ति – आचरण करते हैं । मानते हैं। सर्वे – सभी। भ्रातृभावेन – भाईचारे की भावना / भाई-भाई की भावना से। सौहार्दैन – प्रेम से । प्रभृतीनाम् – इत्यादि का । उत्सवानाम् – उत्सवों के । अवसरेषु – अवसरों पर। कर्मः – करते हैं। धर्मकारणात् – ध र्म के कारण से। स्वधर्मम् – अपने धर्म को। श्रेष्ठम् – श्रेष्ठ (ऊँचा)। परध मम् – दूसरों के धर्म को। हीनम् – नीच। सम्पन्नाः – सम्पन्न लोग। निर्धनाः – गरीब! तेषु – उनसबों में। भवेत – होना चाहिए/होनी चाहिए। यन्त्रस्य -मशीन का। यदा – जब । सदा – तब। एकेकः – प्रत्येक / सभी। खण्डः – टुकड़ा / भाग।

व्याकरणम्

निम्नलिखित व्युत्पन्न अव्यय पदों का बहुधा प्रयोग होता है। इन्हें जानना आवश्यक है:

अत्र – यहाँ, कुत्र – कहाँ, तत्र – वहाँ, यत्र – जहाँ, सर्वत्र – सभी जगह, एकत्र – एक जगह, अन्यत्र – दूसरी जगह(अन्य जगह), यदा – जब, कदा – कब, सदा – हमेशा, एकदा – एकबार, तदा – तब, सर्वदा – हर बार, हमेशा, इतः – यहाँ से, कुतः – कहाँ से, क्यों, यतः – जहाँ से, सर्वतः – सभी जगह से, विद्यालयतः – स्कूल से, गृहतः – घर से।

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 3 संविधान निर्माण

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Political Science राजनीति विज्ञान : लोकतांत्रिक राजनीति भाग 1 Chapter 3 संविधान निर्माण Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Political Science Solutions Chapter 3 संविधान निर्माण

Bihar Board Class 9 Political Science संविधान निर्माण Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
संविधान सभा की पहली बैठक कब हुई ?
(क) दिसम्बर 1940
(ख) दिसम्बर 1942
(ग) दिसम्बर 1945
(घ) दिसम्बर 1946
उत्तर-
(ग) दिसम्बर 1945

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 3 संविधान निर्माण

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष कौन थे?
(क) डा० भीमराव अंबेदकर
(ख) डा. राजेन्द्र प्रसाद
(ग) सरदार पटेल
(घ) पं. जवाहरलाल नेहरू
उत्तर-
(ग) सरदार पटेल

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान सभा के लिए चुनाव कब हुआ था ?
(क) जुलाई 1950
(ख) जुलाई 1946
(ग) जुलाई 1935
(घ) जुलाई 1940
उत्तर-
(ग) जुलाई 1935

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 3 संविधान निर्माण

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान लिखने वाली सभा में कितने सदस्य थे?
(क) 299
(ख) 290
(ग) 295
(घ) 292
उत्तर-
(ग) 295

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान कब तैयार हुआ?
(क) 26 नवंबर 1950 को
(ख) 26 नवंबर 1947 को
(ग) 26 नवंबर 1948 को
(घ) 26 नवंबर 1949 को
उत्तर-
(ग) 26 नवंबर 1948 को

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान कब लागू हुआ?
(क) 26 जनवरी 1948 को
(ख) 26 जनवरी 1949 को
(ग) 26 जनवरी 1950 को
(घ) 26 जनवरी 1951 को
उत्तर-
(ग) 26 जनवरी 1950 को

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 3 संविधान निर्माण

प्रश्न 7.
भारत ब्रिटिश शासन से कब मुक्त हुआ?
(क) 10 जनवरी 1947 को
(ख) 15 अगस्त 1947 को
(ग) 15 फरवरी 1947 को
(घ) 15 दिसम्बर 1947 को
उत्तर-
(ग) 15 फरवरी 1947 को

प्रश्न 8.
सन् 1931 में कांग्रेस का अधिवेशन कहाँ हुआ था ?
(क) इलाहाबाद में
(ख) बम्बई में
(ग) इस्लामाबाद में
(घ) कराची में
उत्तर-
(ग) इस्लामाबाद में

प्रश्न 9.
कांग्रेस के किस अधिवेशन में भारत के संविधान की रूपरेखा रखी गयी थी?
(क) सन् 1919
(ख) सन् 1931
(ग) सन् 1940
(घ) सन् 1950
उत्तर-
(ग) सन् 1940

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प्रश्न 10.
दक्षिण अफ्रीका का प्रधान नेता कौन था ?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) नेल्सन मंडेला
(ग) अबुल कलाम आजाद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) अबुल कलाम आजाद

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान के संशोधनों पर कितनी बार चर्चा हुई ?
(क) 100 बार
(ख) 2000 से ज्यादा
(ग) 50 बार
(घ) 1000 से ज्यादा
उत्तर-
(ग) 50 बार

प्रश्न 12.
इनमें कौन-सा तत्व है, जो भारतीय संविधान की प्रस्तावना में नहीं
(क) स्वतंत्रता
(ख) लोकतंत्रात्मकता
(ग) एकता और अखंडता
(घ) सांप्रदायिकता
उत्तर-
(ग) एकता और अखंडता

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प्रश्न 13.
दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत, रंगीन, चमड़ीवाले और भारतीय मूल के लोगों ने रंगभेद प्रणाली के खिलाफ कब संघर्ष किया ?
(क) 1940 से
(ख) 1945 से
(ग) 1947 से
(घ) 1950 से
उत्तर-
(ग) 1947 से

प्रश्न 14.
नेल्सन मंडेला को कितने वर्षों तक जेल में रखा गया था?
(क). 20 वर्षों तक
(ख) 25 वर्षों तक
(ग) 28 वर्षों तक
(घ) 15 वर्षों तक
उत्तर-
(ग) 28 वर्षों तक

प्रश्न 15.
दक्षिण अफ्रीका को किस वर्ष स्वतंत्रता मिली?
(क) 1964 में
(ख) 1965 में
(ग) 1970 में
(घ) 1975 में
उत्तर-
(ग) 1970 में

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प्रश्न 16.
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति कौन बने ?
(क) जैक्शन मंडेला
(ख) जे. बी. मंडेला
(ग) मि. एक्स
(घ) नेल्सन मंडेला
उत्तर-
(ग) मि. एक्स

प्रश्न 17.
भारतीय संविधान निर्माण करते समय कितने दिनों तक गंभीर चर्चा
(क) 100 दिनों तक
(ख) 114 दिनों तक
(ग) 115 दिनों तक
(घ) 200 दिनों तक
उत्तर-
(ग) 115 दिनों तक

प्रश्न 18.
भारतीय संविधान को कितने खंडों में प्रकाशित किया गया ?
(क) 10
(ख) 15
(ग) 12
(घ) 20
उत्तर-
(ग) 12

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प्रश्न 19.
किस संशोधन के द्वारा वयस्कता की उम्र को 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई?
(क) 55 वें
(ख) 60 वें
(ग) 65 वें
(घ) 66 वें
उत्तर-
(ग) 65 वें

प्रश्न 20.
किसी कानूनी दस्तावेज का प्रारंभिक रूप क्या कहलाता है ?
(क) धारा
(ख) प्रारूप
(ग) संविधान
(घ) प्रस्तावना
उत्तर-
(ग) संविधान

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

प्रश्न 1.
राज्य की कल्पना करना बेमानी है।
उत्तर-
संविधानहीन

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प्रश्न 2.
नियमों के संग्रह को ……………………. कहा जाता है।
उत्तर-
संविधान

प्रश्न 3.
……………………….वर्षों की चर्चा और बहस के बाद दक्षिण अफ्रीका एक बेमिसाल संविधान बनाने में सफल हुआ।
उत्तर-
दो

प्रश्न 4.
दक्षिण अफ्रीका के स्थानीय लोगों की चमड़ी का रंग …………………. होता है।
उत्तर-
काला

प्रश्न 5.
दक्षिण अफ्रीकी संविधान से दुनिया भर के लोकतांत्रिक लोग ………….. लेते हैं।
उत्तर-
प्रेरणा

प्रश्न 6.
संविधान स्पष्ट करती है कि ……………………… कैसे होगा। उत्तर-सरकार का गठन

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प्रश्न 7.
………………….. ई. में महात्मा गाँधी ने यह उद्गार व्यक्त किया कि ‘भारतीय संविधान भारतीयों की इच्छानुसार ही होगा।’
उत्तर-
1922

प्रश्न 8.
1924 ई. में …………………. द्वारा ब्रिटिश सरकार से यह मांग की गयी कि भारतीय संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन किया जाए।
उत्तर-
मोतीलाल नेहरू

प्रश्न 9.
……………………. ई. में मोतीलाल नेहरू और आठ कांग्रेस नेताओं ने भारत का एक संविधान लिखा था ।
उत्तर-
1928

प्रश्न 10.
संविधान सभा के सदस्यों की विचारधारा भी …………. थी।
उत्तर-
अलग-अलग.

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प्रश्न 11.
महात्मा गाँधी के पत्रिका का नाम ……………………… था।
उत्तर-
यंग इंडिया

प्रश्न 12.
हमारे संविधान में …………. वें संविधान संशोधन द्वारा प्रस्तावना में भारत को समाजवादी राज्य घोषित किया गया है।
उत्तर-
42

प्रश्न 13.
42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा प्रस्तावना में भारत को एक ………………. राज्य घोषित किया गया है।
उत्तर-
समाजवादी

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प्रश्न 14.
स्वतंत्र न्यायपालिका प्रजातंत्र की ……………. है।
उत्तर-
आधारशिला

प्रश्न 15.
अब सम्पत्ति का अधिकार एक ………….. अधिकार नहीं है ।
उत्तर-
मौलिक

प्रश्न 16.
शिक्षा के अधिकार को ………….. के रूप में मान्यता प्राप्त है।
उत्तर-
मौलिक अधिकार

प्रश्न 17.
जन-प्रतिनिधियों की वह सभा जो संविधान लिखने का काम करती है उसे ……….. कहते हैं ।
उत्तर-
संविधान सभा

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प्रश्न 18.
किसी सोच और काम को दिशा देने वाले सबसे बुनियादी विचार को ……………… कहते हैं।
उत्तर-
दर्शन

प्रश्न 19.
देश की सरकार को उखाड़ फेंकने की कोशिश करने के अपराध को …………………. कहते हैं।
उत्तर-
देशद्रोह

प्रश्न 20.
संविधान का वह पहला कथन जिसमें कोई अपने संविधान के …………….. बुनियादी मूल्यों और अवधारणाओं को स्पष्ट ढंग से कहता
उत्तर-
प्रस्तावना

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान क्या है?
उत्तर-
किसी देश का शासन जिन नियमों एवं सिद्धान्तों के आधार पर चलता है, उन सिद्धान्तों या नियमों को संविधान कहते हैं।

प्रश्न 2.
अफ्रीकी रंगभेद नीति का विरोध किस संगठन ने किया ?
उत्तर-
अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पार्टी ने।

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प्रश्न 3.
भारत का संविधान किसने बनाया ?
उत्तर-
संविधान सभा ने।।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष कौन थे? ।
उत्तर-
डा. अम्बेदकर।।

प्रश्न 5.
संविधान सभा ने भारत का संविधान बनाने में कितना समय लगाया?
उत्तर-
2 वर्ष, 11 महीने एवं.18 दिन ।

प्रश्न 6.
भारत में संसदीय प्रणाली किस देश से प्रभावित होकर ली गई है ?
उत्तर-
इंग्लैंड से।

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में किस वर्ष ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा गया ?
उत्तर-
1976 में।

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प्रश्न 8.
भारतीय संविधान में कितने अनुच्छेद एवं अनुसूचियाँ हैं?
उत्तर-
कुल 395 अनुच्छेद, 22 भाग एवं 12 अनुसूचियाँ हैं।

प्रश्न 9.
संविधान की आवश्यकता क्यों है ?
उत्तर-
संविधान के बिना लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली की कल्पना बेमानी है।

प्रश्न 10.
संविधान निर्माण में निर्माता फ्रांस के संविधान से किस तरह प्रभावित थे ?
उत्तर-
फ्रांसीसी क्रान्ति के आदर्शों से।

प्रश्न 11.
संविधान निर्माता किसके संसदीय कार्य से प्रभावित थे ?
उत्तर-
ब्रिटेन के संसदीय लोकतंत्र के कामकाज से ।

प्रश्न 12.
संविधान निर्माता अमेरिका के संविधान से किस तरह प्रभावित थे ?
उत्तर-
अमेरिका के अधिकारों की सूची से काफी प्रभावित थे।

प्रश्न 13.
संविधान निर्माता रूस के संविधान से किस तरह प्रभावित थे ?
उत्तर-
रूस की समाजवादी क्रान्ति से प्रभावित थे।

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प्रश्न 14.
स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री कौन थे?
उत्तर-
पं. जवाहरलाल नेहरू ।

प्रश्न 15.
संविधान सभा के लिए कब चुनाव कराए गए ?
उत्तर-
जुलाई 1946 में।

प्रश्न 16.
हम भारतवासी हर वर्ष गणतंत्र दिवस कब मनाते हैं ?
उत्तर-
प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को ।

प्रश्न 17.
संविधान के अनुसार भारत किस प्रकार का राज्य है ?
उत्तर-
भारत एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य है।

प्रश्न 18.
गणराज्य का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
गणराज्य का अर्थ है, शक्ति का संपूर्ण स्रोत ‘गण’ अर्थात् जनता में है।

प्रश्न 19.
भारतीय संविधान के अनुसार संप्रभुता कहाँ निहित है ?
उत्तर-
भारत की जनता में।

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प्रश्न 20.
पता लगाएं, स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति कौन थे ?
उत्तर-
डा. राजेन्द्र प्रसाद ।।

प्रश्न 21.
पता लगाएँ, ब्रिटिश भारत के अंतिम गवर्नर जनरल कौन थे ?
उत्तर-
लार्ड माउंटबेटन ।

प्रश्न 22.
लार्ड माउंटबेटन के बाद स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल
कौन थे?
उत्तर-
श्री सी. राजगोपालाचारी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दक्षिण अफ्रीका में रंगीन चमड़ीवाला किसे कहा गया है ?
उत्तर-
दक्षिण अफ्रीका में मुख्य रूप से काले चमड़ी वाले लोग रहते हैं। आबादी में उनका हिस्सा तीन चौथाई है और उन्हें अश्वेत कहा जाता है। श्वेत गोरे लोग कहलाते हैं। श्वेत और अश्वेत के अलावा वहाँ मिश्रित नस्लों के लोग रहते हैं जिन्हें ‘रंगीन चमड़ी’ वाला कहा जाता है। , इनकी त्वचा का रंग लाल होता है।

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प्रश्न 2.
रंगभेद नीति क्या थी?
उत्तर-
रंगभेद की नीति अश्वेतों के लिए खासतौर से दमनकारी थी। उन्हें गोरों की बस्तियों में रहने-बसने की इजाजत नहीं थी। परमिट होने पर ही वे वहाँ जाकर काम कर सकते थे। रेलगाड़ी, किसी भी सवारी, होटल, अस्पताल, स्कूल और कॉलेज, पुस्तकालय, सिनेमाघर, समुद्रतट, तरणताल तथा अन्य सार्वजनिक शौचालयों तक में गोरों और कालों के लिए एकदम अलग-अलग व्यवस्था थी । इसे पृथककरण या अलग-अलग करने का इंतजाम कहा जाता था । अश्वेतों को संगठन बनाने और इस भेदभावपूर्ण व्यवहार का विरोध करने का अधिकार नहीं था । इस तरह रंगभेद नीति अत्यन्त ही दमनकारी थी।

प्रश्न 3.
रंगभेद नीति के खिलाफ किन लोगों ने संघर्ष किया?
उत्तर-
1950 ई. से ही अश्वेत, रंगीन चमड़ी वाले और भारतीय मूल के लोगों ने रंगभेद प्रणाली के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होंने विरोध प्रदर्शन किए और हड़ताल आयोजित किया अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के झंडे तले एक जुट हुए इनमें कई मजदूर संगठन और कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी। अनेक समझदार और संवेदनशील गोरे नेशनल कांग्रेस के साथ आए और संघर्ष में साथ दिया । लेकिन गोरे सरकार ने रंगभेद में हजारों अश्वेतों और रंगीन चमड़ी वाले लोगों की हत्या और दमन कर डाला

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प्रश्न 4.
नेल्सन मंडेला के विषय में संक्षेप में लिखें।
उत्तर-
नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के महान नेता थे । गोरों की सरकार ने मंडेला पर देशद्रोह का मुकदमा चलाकर जेल में बंद कर दिया ।
मंडेला गोरों की सरकार का विरोध करते थे । नेल्सन को 28 वर्षों तक – जेल में बंद रहने के बाद आजाद कर दिया गया और दक्षिण अफ्रीका
स्वतंत्र हो गया । नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के प्रथम राष्ट्रपति 1994 ई. में बने।

प्रश्न 5.
दक्षिण अफ्रीका के उदय के साथ अश्वेत नेताओं ने अश्वेत समाज से क्या आग्रह किया?
उत्तर-
नए लोकतांत्रिक दक्षिण अफ्रीका के उदय के साथ ही अश्वेत नेताओं ने अश्वेत समाज से आग्रह किया कि सत्ता में रहते हुए गोरे लोगों ने जो जुल्म किये थे उन्हें भूल जाएँ और गोरों को माफ कर दें। यह भी आग्रह किया कि अब सभी नस्लों तथा स्त्री-पुरुष की समानता, लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और “मानवाधिकार पर आधारित नए दक्षिण अफ्रीका का निर्माण करें।

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प्रश्न 6.
दक्षिण अफ्रीका का संविधान बेमिसाल संविधान है। कैसे?
उत्तर-
नए संविधान के निर्माण के लिए सभी साथ-साथ मिलकर बैठें। दो वर्षों की चर्चा और बहस के बाद एक बेमिसाल संविधान बनाने में वे सफल रहे । उनका संविधान अपने इतिहास अर्थात् भूतकाल एवं भविष्यतकाल के सुनहरे दिनों की बात करता है। इस संविधान में नागरिकों
को व्यापक अधिकार दिये गये। अतीत के दुःस्वप्न से बाहर निकलकर – इस बात पर सहमति बनी कि अब से हर समस्या के समाधान में पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सबकी भागीदारी होगी।
दक्षिण अफ्रीकी संविधान ऐसा तैयार हुआ कि दुनिया भर के लोकतांत्रिक देश इससे प्रेरणा लेते हैं।

प्रश्न 7.
संविधान की आवश्यकता क्यों है ? व्याख्या करें।
उत्तर-
लोकतंत्र की सफलता के लिए संविधान जरूरी है। किसी देश का शासन जिन नियमों एवं सिद्धान्तों के आधार पर चलता है, उन सिद्धान्तों या नियमों का संग्रह ही संविधान है। संविधानहीन राज्य की कल्पना करना बेमानी है। संविधान के अभाव में राज्य, राज्य न होकर एक प्रकार की अराजकता होगी। इसके अतिरिक्त संविधान नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं जिससे उनका सर्वांगीण विकास हो सके।

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प्रश्न 8.
संविधान के कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर-
संविधान के निम्नलिखित कार्य हैं-(i) यह स्पष्ट करता है कि सरकार का गठन कैसे होगा और किसे फैसले लेने का अधिकार होगा । (ii) संविधान सरकार के अधिकारों की सीमा तय करता है और हमें बताता है कि नागरिकों के क्या अधिकार हैं । (iii) यह अच्छे समाज के गठन के लिए लोगों की आवश्यकताओं को व्यक्त करता है। (iv) संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जिसे किसी देश के नागरिक स्वाभाविक रूप से मानते हैं । संविधान सर्वोच्च कानून है जिससे किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों के बीच आपसी संबंध तय होने के साथ-साथ लोगों और सरकार के बीच संबंध तय होते हैं।

प्रश्न 9.
‘यंग इंडिया’ में गाँधीजी ने भारत के संविधान के विषय में क्या लिखा था?
उत्तर-
1931 ई. में अपनी पत्रिका ‘यंग इंडिया’ में गाँधीजी ने संविधान में अपनी अपेक्षा के बारे में लिखा था, “मैं भारत के लिए ऐसा संविधान चाहता हूँ जो उसे गुलामी और अधीनता से मुक्त करें। मैं ऐसे भारत के लिए प्रयास करूंगा जिसे सबसे गरीब व्यक्ति भी अपना माने और उसे लगे कि देश को बनाने में उसकी भी भागीदारी है, ऐसा भारत जिसमें लोगों का उच्च वर्ग और निम्न वर्ग न रहे, सभी समुदाय के लोग पूरे मेल-जोल से रहें। जिसमें छुआछूत, शराब और नशीली चीजों के लिए कोई जगह न हो। औरतों को मदों जैसे अधिकार मिले । मैं इससे कम पर संतुष्ट नहीं होऊँगा ।”

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प्रश्न 10.
डॉ. अम्बेडकर ने संविधान के विषय में क्या भाषण दिया था ?
उत्तर-
संविधान सभा में दिए गए अपने अंतिम भाषण में डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट ढंग से कहा था-“26 जनवरी, 1950 को हम विशेषाधिकारों से भरे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं । राजनीति के मामले में यहाँ समानता होगी पर आर्थिक और सामाजिक जीवन असमानताओं से भरा होगा । राजनीति में हम ‘एक व्यक्ति एक वोट’ और ‘हर वोट का समान महत्व’ के सिद्धान्त को मानेंगे।”

प्रश्न 11.
संविधान की प्रस्तावना क्या है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रस्तावना किसी देश के संविधान की कुंजी है। संविधान अपने बुनियादी मूल्यों की एक छोटी-सी उद्देशिका के साथ आरम्भ करता है। इसे ही संविधान की प्रस्तावना या उद्देशिका कहते हैं। अमेरिकी संविधान की प्रस्तावना से प्रेरणा लेकर समकालीन दुनिया के अधिकांश देश अपने संविधान की शुरूआत एक प्रस्तावना से करते हैं। वास्तव में प्रस्तावना में संविधान के स्रोतों, लक्ष्यों, आदर्शों और सरकार के बुनियादी राजनीतिक ढाँचों का संक्षिप्त विवरण होता है।

प्रश्न 12.
संयुक्त राज्य के संविधान की प्रस्तावना के विषय में लिखें।
उत्तर-
संयुक्त राज्य के संविधान की प्रस्तावना कुछ इस प्रकार है’संयुक्त राज्य के हम सभी लोग अधिक अच्छा संघ बनाने, न्याय की स्थापना करने, घरेलू शांति बनाने, साझा सुरक्षा व्यवस्था बनाने, जन कल्याण को बढ़ावा देने, अपने और अपनी समृद्धि में स्वतंत्रता साथ लेने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के इस संविधान को स्थापित करते हैं और इसका अभिषेक करते हैं।

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प्रश्न 13.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर-
भारतीय संविधान की प्रस्तावना लोकतंत्र पर लिखित रूप में खूबसूरत कविता-सी लगती है। इसमें वह दर्शन शामिल है जिस पर पूरे संविधान का निर्माण हुआ है। यह दर्शन सरकार के किसी भी कानून और फैसले के मूल्यांकन और परीक्षण का मानक तय करता है । इसके सहारे परखा जा सकता है कि कौन कानून, कौन फैसला अच्छा या बुरा है। प्रस्तावना में ही भारतीय संविधान की आत्मा बसती है।

प्रश्न 14.
क्या भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है ?
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता है। 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा प्रस्तावना में भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है। धर्मनिरपेक्ष राज्य का तात्पर्य यह है कि राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं और राज्य के द्वारा विभिन्न धर्मावलम्बियों में कोई भेद-भाव नहीं किया जायगा। सभी नागरिक स्वेच्छा से कोई धर्म अपनाने और उपासना करने में स्वतंत्र हैं।

प्रश्न 15.
संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-
संविधान किसी भी देश के उन आधारभूत सिद्धान्तों का समूह होता है । संविधान वहाँ की सरकार के निर्माण, संचालन तथा कार्यपद्धति का ब्यौरा प्रस्तुत करता है । संविधान एक ऐसा लिखित दस्तावेज है जिसे किसी देश के नागरिक स्वाभाविक रूप से मानते हैं । संविधान सर्वोच्च कानून है जिससे किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों के बीच के आपसी संबंध तय होने के साथ-साथ लोगों और सरकार के बीच संबंध भी तय होते हैं।

प्रश्न 16.
भारतीय संविधान जनता का संविधान क्यों माना जाता है ?
उत्तर-
भारतीय संविधान जनता का संविधान है । यह बात सत्य है कि संविधान सभा के सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर ही चुने जाते हैं। संविधान सभा के सदस्य प्रांतीय विधानमंडल द्वारा चुने जाते हैं। वास्तव में देश के सभी महत्वपूर्ण नेता संविधान सभा के सदस्य होते हैं। सभी वर्गों (हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, महिलाएँ) के प्रतिनिधि संविधान सभा में होते हैं । यदि वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव होता तो यही व्यक्ति चुनाव जीतकर आते । अतः हमारा संविधान जनता का संविधान है।

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प्रश्न 17.
संविधान के आधार पर गणतंत्र का अर्थ क्या है ?
अथवा, भारत एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य है ! कैसे ?
उत्तर-
सरकार की स्थापना जनता के प्रतिनिधियों द्वारा होती है और प्रतिनिधियों का चुनाव जनता संविधान द्वारा प्रदत्त वयस्क मताधिकार द्वारा करती है । गणराज्य से तात्पर्य ऐसे राज्य से है, जहाँ शासनाध्यक्ष चंशानुगत न होकर जनता द्वारा निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है । गणराज्य का अर्थ ही यही है कि यहाँ शक्ति का संपूर्ण स्रोत ‘गण’ अर्थात् जनता में है। ‘लोकतंत्रात्मक’ शब्द इस बात का परिचायक है कि सरकार का स्रोत जनता में ही निहित है, लोकतंत्रात्मक सरकार जनता का, जनता के लिए तथा जनता द्वारा स्थापित होती है।

प्रश्न 18.
संसदात्मक शासन प्रणाली क्या है ? भारत में किस प्रकार संसदीय शासन प्रणाली है ?
उत्तर-
संसदात्मक शासन प्रणाली वह शासन प्रणाली है जहाँ कार्यपालिका व विधानपालिका के बीच अटूट संबंध होता है। कार्यपालिका, विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होता है। कार्यपालिका अर्थात् मंत्रिपरिषद् के सदस्य संसद् के प्रति उत्तरदायी होते हैं। सभी मंत्री प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कार्य करते हैं तथा उनका प्रधानमंत्री के प्रति निजी उत्तरदायित्व होता है। भारत में संसदात्मक प्रणाली अपनाई गई है। सभी मंत्रियों का लोकसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व होता है।

प्रश्न 19.
भारत में संघीय प्रणाली होते हुए भी एकल नागरिकता की व्यवस्था है, कैसे?
उत्तर-
हमारे देश में संघीय प्रणाली होते हुए भी एकल नागरिकता की ही व्यवस्था है। भारत का कोई भी निवासी चाहे वह किसी भी राज्य का हो, किसी भी धर्म या संप्रदाय को मानने वाला हो, किसी भी भाषा अथवा क्षेत्र से संबंध रखता है, भारत का नागरिक है। भारत में अखंडता के साथ-साथ मौलिक एकता पर जोर दिया गया है। इसलिए एकल नागरिकता की ही व्यवस्था की गई है।

प्रश्न 20.
संविधान संशोधन प्रक्रिया क्या है, इसे क्यों आवश्यक बनाया गया?
उत्तर-
संविधान सिर्फ मूल्यों और दर्शन का बयान भर नहीं है। यह .एक बहुत ही लम्बा और विस्तृत दस्तावेज है। इसलिए समय-समय पर इसे नया रूप देने के लिए इसमें बदलाव की जरूरत पड़ती है। निर्माताओं को लगा कि इसे भावनाओं के अनुरूप चलना चाहिए और समाज में हो रहे बदलावों से दूर रहना चाहिए। उन्होंने इसे पवित्र स्थायी और न बदले जा सकने वाले कानून के रूप में नहीं देखा था। इसलिए उन्होंने बदलाओं को समय-समय पर शामिल करने का प्रावधान भी रखा । इन बदलावों को ‘संविधान संशोधन’ कहते हैं।

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प्रश्न 21.
संविधान में वर्णित समाजवादी सिद्धान्त क्या है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
भारतीय संविधान में प्रशासन के समाजवादी सिद्धान्त पर बल दिया गया है । जिस राजनीतिक प्रशासनिक सिद्धान्त के अन्तर्गत व्यक्ति की अपेक्षा सम्पूर्ण समाज को विकास का समान अवसर प्रदान किया जाता है, उसे ‘समाजवाद’ कहते हैं। इसका उद्देश्य संपूर्ण समाज में आर्थिक, राजनीतिक और आधिकारिक दृष्टि से समानता स्थापित करना होता है । वास्तव में समाजवाद का तात्पर्य ऐसे सामाजिक नीति या सिद्धान्त से है, जो उत्पादन के साधनों, पूँजी, जमीन, सम्पत्ति आदि का सम्पूर्ण समुदाय द्वारा नियंत्रण तथा स्वामित्व का समर्थन करता है तथा सभी के हित में वितरण और प्रशासन की व्यवस्था करता है।

प्रश्न 22.
संविधान सभा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जनता द्वारा चुने गए वैसे प्रतिनिधियों की सभा जो संविधान निर्माण का कार्य करती है संविधान सभा कहलाती है । भारतीय संविधान सभा ने 9 दिसम्बर, 1946 से अपना कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था । भारत का संविधान 26 नवम्बर,च 1949 ई. को अपना काम पूरा कर . लिया । संविधान 26 जनवरी, 1950 ई. को लागू हुआ ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत का संविधान किस प्रकार बना?
उत्तर-
भारत का संविधान एक संविधान सभा ने निर्माण किया है। इसव निर्माण के तत्व इस प्रकार हैं
(i) संविधान सभा का गठन-भारतीय नेता काफी समय से यह मांग करते आ रहे थे कि भारत का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा बनाई गई। 1946 में हुई संविधान सभा में 299 सदस्य थे। इसमें बड़े-बड़े नेता थे। जैसे- पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी श्रीमती सरोजनी नायडू । डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे।
(ii) प्रारुप समिति की नियक्ति तथा संविधान का निर्माण२ प्रधान का प्रारुप तैयार करने के लिए एक समिति की नियुक्ति की गई। – 7 समिति के प्रधान डॉ. भीमराव अंबेदकर थे।

इस समिति ने विभिन्न देशों के संविधानों का अध्ययन करके बड़े परिश्रम से संविधान की रूप-रेखा बनाई। इसी रूप रेखा के आधार पर ही देश के लिए विशाल संविधान तैयार किया गया । संविधान तैयार करने में 2 वर्ष, 11 मास और 18 दिन का समय लगा। इस दौरान संविधान. सभा की 114 दिनों तक गंभीर चर्चा हुई। सभा में पेश हर प्रस्ताव, हर शब्द ओर वहाँ कही गई हर बात का रिकार्ड किया गया । इन्हें “कांस्टीट्यूट असेम्बली डिबेट्स’ नाम से 12 मोटे खंडों में प्रकाशित किया गया । 26 नवंबर, 1949 ई० को संविधान पूरा हुआ और पारित किया गया । इसे 26 जनवरी 1950 ई. को लागू किया गया। इस प्रकार संविधान का गठन हुआ।

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प्रश्न 2.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना के महत्व की चर्चा करें।
उत्तर-
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारतीय संविधान की आत्मा बसती है । इसलिए इसके बहुत महत्व हैं । वे निम्नलिखित हैं

  • जनता का संविधान-प्रस्तावना का आरंभ ‘हम भारत के लोग’ से किया गया है। इससे स्पष्ट है यह लोगों अर्थात् जनता का संविधान है, जिसका निर्माण जनता ने अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से किया है।
  • आदर्श मूल्यों की चर्चा-प्रस्तावना के अध्ययन से पता चलता है कि भारतीय संविधान में राष्ट्रीय एकता, अखंडता, समानता, स्वतंत्रता, विश्वशांति आदि भारतीय संविधान के मूल आदर्श हैं।
  • धर्मनिरपेक्ष राज्य-संविधान के 42वें संशोधन द्वारा 1976 में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में धर्म-निरपेक्ष शब्द को जोड़ा गया है। अतः धर्म के आधार पर भारत के किसी भी नागरिक के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है। कोई भी नागरिक किसी भी धर्म को मान सकता है।
  • सरकार की अभिव्यक्ति-प्रस्तावना में सरकार के स्वरूप की स्पष्ट झलक मिलती है, कि भारत एक संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य है।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-
भारतीय संविधान की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  • लोकतांत्रिक गणराज्य-भारतीय संविधान की पहली विशेषता है कि यह लोकतांत्रिक गणराज्य है। यह बताता है कि सरकार की वास्तविक शक्ति का संपूर्ण स्रोत ‘गण’ अर्थात् जनता में है।
  • विशाल एवं लिखित संविधान भारतीय संविधान विश्व का सर्वाधिक विशाल संविधान है। इसमें 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 12 अनुसूचियाँ हैं । इसमें संघ और राज्यों की व्यापकता से वर्णन है।
  • समाजवादी राज्य-42वें संविधान संशोधन द्वारा प्रस्तावना में । भारत को समाजवादी राज्य घोषित किया गया । जो सामाजिक नीति पर आधारित है, जो उत्पादन के साधनों पूँजी, जमीन, सम्पत्ति आदि का सम्पूर्ण द्वारा नियंत्रण तथा स्वामित्व का समर्थन करता है।
  • सम्प्रभुता-भारत को सम्प्रभुत्व गणराज्य बनाया गया है। इस पर अब किसी बाहरी शक्ति का नियंत्रण नहीं रहा । यहाँ शासन की शक्ति जनता के हाथ में है; जिसका प्रयोग वह अपने प्रतिनिधियों के द्वारा करता है।
  • धर्मनिरपेक्षता यहाँ राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं और राज्य के द्वारा विभिन्न धर्मावलम्बियों में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  • संसदीय शासन प्रणाली—इस शासन व्यवस्था के अन्तर्गत शासन की वास्तविक सत्ता मंत्रिपरिषद् में निहित होती है और मंत्रिपरिषद् का नियंत्रण व्यवस्थापिका द्वारा होता है। राष्ट्रपति और राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होते हैं।
  • संघीय शासन प्रणाली-भारत राज्यों का एक संघ है । संविधान ने शासन शक्ति एक स्थान पर केन्द्रित न करके केन्द्र और राज्य सरकारों में विभाजित कर दी है। यहाँ भारतीय संविधान का स्वरूप संघात्मक है, तथापि व्यावहारिक रूप में उसकी आत्मा एकात्मक है।
  • स्वतंत्र न्यायपालिका-भारतीय संविधान सारे देश के लिए न्याय प्रशासन की एक व्यवस्था करता है जिसके शिखर पर उच्चतम न्यायालय है। न्यायपालिका को कार्यकारिणी के दबाव और नियंत्रण से स्वतंत्र होना आवश्यक है। स्वतंत्र न्यायपालिका प्रजातंत्र की आधारशिला है ।
  • मौलिक अधिकार एवं मूल कर्त्तव्य-संविधान द्वारा नागरिकों को, मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जैसे–समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षा के अधिकार आदि 42वें संशोधन, 1976 में 10 मूल कर्त्तव्यों की चर्चा है जिनमें वैधानिक व्यवस्थाओं का पालन, राष्ट्रध्वज का सम्मान करना, राष्ट्रगान का सम्मान करना आदि कर्त्तव्य हैं।
  • राज्य के नीति निदेशक तत्व-इसका मुख्य लक्ष्य है लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना ।
  • वयस्क मताधिकार-हर 18 वर्ष से ऊपर पुरुष एवं स्त्री को मत देने का अधिकार प्राप्त है। इसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं
  • एकल नागरिकता-सभी नागरिकों को एक ही नागरिकता प्राप्त है, वह है भारत की नागरिकता।
  • एक राष्ट्रभाषा की व्यवस्था भारतीय संविधान में कई भाषाओं को मान्यता प्राप्त है पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा माना गया है।

प्रश्न 4.
15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि के समय संविधान सभा में दिए पं. जवाहर लाल नेहरू के प्रसिद्ध भाषण का संक्षिप्त रूप प्रस्तुत करें।
उत्तर-
15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि के समय संविधान में पं. जवाहर लाल नेहरू के भाषण कुछ इस प्रकार थे “वर्षों पहले हमने अपनी नियति के साथ साक्षात्कार किया था, और अब वक्त आ गया है कि हम अपने वायदों पर अमल करें-पूरी तरह, या हर तरह से नहीं तो काफी हद तक। 12 बजते ही भारत आजाद होगा। ऐसे पवित्र क्षण में हम अपने आपको भारत और उसके लोगों तथा उससे भी अधिक मानवता की सेवा में समर्पित करें, यही हमारे लिए उचित है। आजादी और सत्ता जिम्मेवारियाँ लाती हैं। भारत के संप्रभु लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस संप्रभुता सम्पन्न सभा के ऊपर अब जिम्मेवारी है। आजादी के जन्म से पूर्व हमने पूरी प्रसव पीडा झेली है और इस क्रम में हुए दुखों से हमारा दिल भारी है। इसमें कुछ दर्द अभी भी बने हुए हैं। फिर भी इतिहास अब बीत चुका है और भविष्य हमें सुनहरे संकेत दे रहा है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

Bihar Board Class 11 Home Science पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है –
(क) अंडा
(ख) दाल
(ग) पालक
(घ) सोयाबीन
उत्तर:
(घ) सोयाबीन

प्रश्न 2.
40% प्रोटीन पाया जाता है।
(क) सोयाबीन
(ख) दाल
(ग) दूध
(घ) मूंगफली
उत्तर:
(क) सोयाबीन

प्रश्न 3.
राइबोप्लोबिन और फॉलिक अम्ल में विटामिन काफी मात्रा में पाया जाता है।
(क) विटामिन ‘A’ में
(ख) विटामिन ‘B’ में
(ग) विटामिन ‘C’ में
(घ) विटामिन ‘D’ में
उत्तर:
(ग) विटामिन ‘C’ में

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प्रश्न 4.
वयस्क पुरुष-शरीर भार होता है –
(क) 50 किग्रा
(ख) 60 किग्रा
(ग) 80 किग्रा
(घ) 90 किग्रा
उत्तर:
(ख) 60 किग्रा

प्रश्न 5.
वयस्क स्त्री भार कि. ग्रा. होता है.
(क) 60 किग्रा
(ख) 50 किग्रा
(ग) 40 किग्रा
(घ) 70 किग्रा
उत्तर:
(ग) 40 किग्रा

प्रश्न 6.
कार्टिलेज से अस्थियों में परिवर्तित होने की क्रिया को कहते हैं। [B.M.2009A]
(क) कैल्सिकरण
(ख) गम्यता
(ग) निर्जलीकरण
(घ) अवशोषण
उत्तर:
(क) कैल्सिकरण

प्रश्न 7.
भाप द्वारा पकाया गया भोजन – [B.M.2009A]
(क) स्वादहीन होता है।
(ख) स्वास्थ्य के लिए उत्तम है
(ग) कच्चा होता है
(घ) हल्का होता है
उत्तर:
(ख) स्वास्थ्य के लिए उत्तम है

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प्रश्न 8.
भोजन पकाने से क्या बदलाव आता है ? [B.M.2009A]
(क) भोजन में भौतिक बदलाव आता है
(ख) भोजन स्वादिष्ट एवं सुपाच्य हो जाता है
(ग) पोषक मूल्य घट जाता है
(घ) सुरक्षित रहता है
उत्तर:
(ख) भोजन स्वादिष्ट एवं सुपाच्य हो जाता है

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शीघ्र नष्ट होने वाले दो पदार्थों के नाम बताएँ।
उत्तर:
1. दूध
2. मांस।

प्रश्न 2.
शीघ्र नष्ट न होने वाले खाद्य पदार्थ कौन-से हैं ?
उत्तर:
अनाज, दालें, तेल, घी, नमक इत्यादि।

प्रश्न 3.
खाद्य पदार्थ खरीदते समय ध्यान रखने योग्य कोई दो बातें बताइए।
उत्तर:
1. खाद्य पदार्थ आवश्यकतानुसार ही खरीदें।
2. संग्रह के लिए उपलब्ध स्थान के अनुसार सामग्री खरीदें।

प्रश्न 4.
शीघ्र नष्ट होने वाले पदार्थ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
सामान्य ताप पर रखे जाने पर इन खाद्य पदार्थों के 3 दिन में ही रंग-रूप में परिवर्तन आने लगता है क्योंकि यह शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

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प्रश्न 5.
खाद्य पदार्थ दूषित कब माना जाता है ?
उत्तर:
जब निम्नलिखित परिवर्तन पाए जाएँ:

  1. रंग
  2. स्वाद
  3. गंध
  4. दिखावट
  5. रचना
  6. सघनता
  7. आकार
  8. पोषण मूल्य।

प्रश्न 6.
खाद्य संदूषण को प्रभावित करने वाले चार कारक बताइए।
उत्तर:

  1. जीवाणु तथा एन्जाइमों की उपस्थिति।
  2. रासायनिक क्रियाएँ।
  3. बाह्य चोट।
  4. चूहों, कीड़ों, झींगुरों द्वारा नुकसान या अजैविक संदूषण।

प्रश्न 7.
खाद्य संदूषण की सहायतार्थ परिस्थितियाँ कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर:

  1. जैविक खाद्य पदार्थ
  2. अनुरूप तापमान
  3. नमी/पानी
  4.  हवा।

प्रश्न 8.
खाद्य परिरक्षण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
जब किसी खाद्य पदार्थ को लम्बे समय तक –
1. रोगवाहक जीवाणुओं व रासायनिक पदार्थों के प्रभाव से मुक्त रखा जा सके।
2. उनके रंग, रचना, स्वाद, सुगंध व पोषण मूल्य बनाये रखा जा सके तो उसे खाद्य परिरक्षण कहते हैं।

प्रश्न 9.
पौष्टिक तत्त्वों के स्तर को बढ़ाने के क्या उपाय हैं ?
उत्तर:
पोषक तत्त्वों का स्तर निम्नलिखित तीन उपायों से बढ़ाया जा सकता है:

  1. अंकुरण (Germination)
  2. खमीरीकरण या किण्वन (Fermentation)
  3. मिला-जुलाकर पकाना (Combination)

प्रश्न 10.
पोषण प्रक्रिया बढ़ाने का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
पोषण को मिलने वाली मात्रा और स्तर में सुधार करना। ये उपाय घर पर या औद्योगिक स्तर पर किए जा सकते हैं।

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प्रश्न 11.
आपने दो महीने पहले 50 किलो चावल खरीदा था। आपको यह कैसे पता चलेगा कि यह खराब हो गया है। इसके खराब होने के दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • चावल में नमी
  • ड्रम में नमी
  • चावल में पहले से ही कीड़ा लगा हो
  •  गर्म अंधेरे वाली जगह पर संगृहीत हो।

प्रश्न 12.
खिचड़ी सादे चावलों से ज्यादा पौष्टिक क्यों है ? एक और व्यंजन का नाम लिखें जिसमें यही सिद्धांत पाया जाता हो।
उत्तर:
खिचड़ी में अच्छी किस्म का प्रोटीन पाया जाता है जिसको मिला जुलाकर खाने वाला सिद्धान्त है। अन्य उदाहरण जैसे –
1. अनाज + दाल
2. अनाज + दूध
3. अनाज + सब्जियाँ।
व्यंजन-दलिया, डोसा, रायता, डोकला, भरवां पराठा।

प्रश्न 13.
दो सुविधाजनक खाद्य पदार्थों के नाम बताएँ। अपने प्रतिदिन के भोजन में इन्हें खाने से एक लाभ व एक हानि लिखें।
उत्तर:
सुविधाजनक खाद्य पदार्थ-बोतलबन्द या डिब्बा बंद सुरक्षित पदार्थ, जैसे-जैम, जैली, अचार, चटनी, फल-चैरी और फलों का रस।

लाभ –

  • समय की बचत
  • ईंधन की बचत
  • आसानी से संगृहीकरण किया जा सकता है
  • मेहनत कम लगती है 5. देर तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

हानियाँ:

  • यह महंगे होते हैं।
  • खाद्य परिरक्षकों तथा रासायनिक पदार्थों का हानिकारक प्रभाव
  • कम पौष्टिक होना।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
खाद्य पदार्थों को उनके नष्ट होने के समय का किन आधारों पर वर्गीकरण किया जा सकता है ?
उत्तर:

  • विकारीय अथवा शीघ्र नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थ (Perishable foods): दूध, दूध से बने पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जियाँ आदि।
  • अविकारीय अथवा नष्ट न होने वाले खाद्य पदार्थ (Non perishable foods): गेहूँ, दालें, चावल, तेल, घी, आदि।
  • अर्ध-विकारीय अथवा नष्ट न होने वाले खाद्य पदार्थ (Semi-perishable foods): मैदा, सूजी, बेसन, मक्खन आदि।
  • सुविधाजनक खाद्य पदार्थ (Convenience foods): दूध पाउडर, जमे हुए खाद्य पदार्थ, डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ, डबल रोटी आदि।

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प्रश्न 2.
सुविधाजनक खाद्य पदार्थ किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सुविधाजनक खाद्य पदार्थ (Convenience Foods): ऐसे पदार्थ जिससे महिला को किसी भी समय परिवार को भोजन देने की सुविधा की सामर्थ्य हो, सुविधाजनक खाद्य-पदार्थ कहलाते हैं। खाद्य पदार्थ को पहले से तैयार, आधे पके या पकाने की आवश्यकता नहीं होती, केवल गर्म करने पड़ते हैं। शीघ्र नष्ट होने वाले पदार्थों को साफ करके बनाकर जमा दिया जाता है तथा इस प्रकार वह सुविधाजनक खाद्य पदार्थ बन जाते हैं।

ये पदार्थ हैं –

  • बोतल बन्द या डिब्बा बंद सुरक्षित पदार्थ, जैसे जैम, जैली, अचार, चटनी, फल, चैरी और फलों का रस।
  • साग, पुलाव, पालक-पनीर, मटर-पनीर इत्यादि।
  • सूखे हुए खाद्य पदार्थ जैसे दूध का पाउडर, खोआ, सूप का सूखा पाउडर, गाढ़े रस के सत्तु इत्यादि।

जमे हुए पदार्थ-मटर, गाजर, टमाटर, भिंडी और फूलगोभी आदि। आज के समय में भिन्न-भिन्न कंपनियाँ कई प्रकार के खाद्य बाजार में ला रही हैं। __तुरत प्रयोगार्थ जमे हुए तैयार खाद्य पदार्थ भी मिलते हैं, जैसे कटलेट, कबाब, सीख, सलामी, चटनियाँ इत्यादि।

प्रश्न 3.
मसाले खरीदते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखेंगे?
उत्तर:

  • जहाँ तक सम्भव हो, साबुत मसाले ही खरीदें।
  • यदि पिसे हुए खरीदने हों तो खुले मसाले न खरीदें, पैकेट बन्द ही खरीदें।
  • विश्वसनीय नाम व साख के मसाले खरीदें।
  • पैकेट पर एगमार्क (Agmark) की मोहर लगे मसाले ही खरीदें।
  • रंग व स्वाद परख कर ही मसाले खरीदें, यदि मसाला पुराना है तो सुगन्ध नहीं आएगी।
  • विश्वसनीय दुकान से ही खरीदें, कम मात्रा में खरीदें ताकि उनकी सुगन्ध बनी रहे।

प्रश्न 4.
सूखे मेवों को खरीदने से पूर्व इनका निरीक्षण कैसे किया जा सकता है ?
उत्तर:

  • सूखे मेवे साफ प्राकृतिक रंग व चमक वाले होने चाहिए।
  • दाग, धब्बे, कीड़े, मिट्टी, पत्थर न हों।
  • सिकुड़े हुए न हों।
  • क्रय करने से पूर्व इन्हें तोड़ कर इनकी गिरी का निरीक्षण कर लेना चाहिए। यदि उनमें किसी प्रकार का जाला अथवा कीड़ा लगा हो तो उन्हें नहीं खरीदना चाहिए।
  • फफूंदी के लिए भी इनका निरीक्षण करना आवश्यक है क्योंकि सूखे मेवों में फफूंदी विषैला पदार्थ उत्पन्न करती है जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक होता है।

प्रश्न 5.
दूध संग्रह (Storage of Milk) करते समय आप किन बातों को ध्यान में रखेंगी?
उत्तर:
दूध एक शीघ्र नष्ट होने वाला खाद्य पदार्थ है। अतः इसे उचित प्रकार से संगृहित किया जाना चाहिए।

  • दूध को उबाल कर ठण्डा करके ठण्डे स्थान पर रखें।
  • यदि फ्रिज नहीं है तो गर्मियों में 5-6 घण्टे पश्चात् दोबारा उबाल कर रखने से दूध खराब नहीं होता।
  • पुराने दूध को ताजे दूध में नहीं मिलाना चाहिए।
  • तेज गन्ध वाले पदार्थों जैसे प्याज, लहसुन, खरबूजा आदि से दूध को दूर रखें क्योंकि यह गन्ध को बहुत जल्द ग्रहण कर लेता है।

प्रश्न 6.
भोजन पकाने के सिद्धांत का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भोजन पकाने के सिद्धांत (Principles of Cooking): प्रतिदिन के पकाने के लिए वैज्ञानिक सिद्धांतों के प्रयोग से परिवार के हर सदस्य का स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जाता है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हम इन सिद्धांतों को बेहतर समझें और उपभोक्ता की जानकारी के लिए अध्ययन करें।

पकाने के सिद्धान्त निम्न हैं –
1. सुगंध को सुरक्षित रखना (To keep ‘Flavour in’): जब आप खाद्य पदार्थों को ढंककर या खुले में वसा माध्यम में पकाते हैं जैसे कि पकौड़े, कटलट, आलू चिप्स आदि तो खाद्य की सुगंध उसकी कड़क परत के अन्दर ही रह जाती है। यह खाद्य पदार्थों को स्वादिष्ट बना देती है तथा पाचक द्रव को सावित होने में सहायता होती है, जिससे पोषक तत्त्वों का बेहतर प्रयोग हो जाता है।

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2. सुगंध को बाहर निकालना (To keep ‘Flavour out’): कभी-कभी खाने को पकाया जाता है ताकि उसकी सुगंध ग्रेवी व तरल में चली जाए, जैसे मीट करी, समग्र सब्जियों व मटन ब्रोध आदि धीमे-धीमे पकाया जाना, खाने के आकार को भी बदल देता है। पानी में घुलनशील पोषक तत्त्व तरी में आ जाते हैं, जो पौष्टिक होने के अतिरिक्त स्वादिष्ट भी होते हैं।

3. उचित पकाने के तरीकों द्वारा अधिक से अधिक पौष्टिक खाना बनाना-प्रोटीन, कार्बोज व वसा जैसे पोषक तत्त्वों पर पकाने के प्रभाव का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 7.
खाद्य परिरक्षण प्रश्न (Food Preservation) के महत्त्व, लाभ बताइए।
उत्तर:
खाद्य परिरक्षण के निम्नलिखित लाभ हैं –

  • ताजे खाद्य पदार्थ अधिक स्थान घेरते हैं, जैसे हरी पत्तेदार सब्जियाँ। इनके भार तथा घनत्व में कमी लाने के लिए इन्हें परिरक्षित करना चाहिए।
  • परिरक्षित खाद्य पदार्थ भोजन में विभिन्नता लाते हैं।
  • परिरक्षित खाद्य पदार्थों के आवागमन में सुविधा होती है।
  • पोषण की दृष्टि से परिरक्षित खाद्य पदार्थों के प्रयोग से भोजन को पूर्णतः संतुलित बनाया जा सकता है।
  • खाद्य पदार्थों के परिरक्षण की विधिया सीखकर बचे हुए खाली समय का सदुपयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
मिलाने-जुलाने से खाद्य पदार्थ पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
पोषक मान में वृद्धि –

  • एक-दूसरे का पूरक होने के कारण सभी पौष्टिक तत्त्वों की प्राप्ति शरीर को हो जाती है।
  • दो अंशतः या पूर्ण प्रोटीनों के सम्मिश्रण से पूर्ण प्रोटीन की प्राप्ति हो जाती है।

उदाहरण के लिए, अनाजों में लाइसिन (आवश्यक अमीनो अम्ल) कम मात्रा में तथा अन्य सभी उपयुक्त मात्रा में होते हैं। दालों में आवश्यक अमीनो अम्ल, मिथायोनिन कम मात्रा में तथा अन्य सभी उपयुक्त मात्रा में होते हैं, अतः इनका मिश्रण खाने से वे एक-दूसरे के पूरक का कार्य करते हुए लाइसिन मिथायोनिन सहित अन्य सभी आवश्यक अमीनो अम्लों की पूर्ति हो जाती है।

प्रश्न 9.
खमीरीकरण से खाद्य पदार्थों पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
पोषक मान में वृद्धि –

  • खाद्य पदार्थों में उपस्थित विटामिन B समूह (विशेष रूप से थायमिन) (B), राइबोफ्लेविन (B) तथा निकोटिनिक अम्ल (B) की मात्रा बढ़ कर दुगनी हो जाती है।
  • लौह तत्त्व अपने संयोजी बंधनों से मुक्त होकर शरीर को सरल रूप में उपलब्ध हो जाता है।
  • विटामिन ‘सी’ की मात्रा में भी वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 10.
अंकुरण की प्रक्रिया से क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
लाभ:

  1. विटामिन बी समूह के विटामिनों की मात्रा दुगनी हो जाती है। नायसिन भी 48 घंटों में 50-100 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
  2. अनाजों तथा दालों में लोहा रासायनिक यौगिक के रूप में होता है तथा शरीर उसे पूर्णतः अवशोषित करने में समर्थ नहीं होता, परन्तु अंकुरण के कारण लोहा अपने यौगिकों से पृथक् होकर स्वतंत्र हो जाता है जिसका शरीर आसानी से उपयोग कर पाता है।
  3. विटामिन ‘सी’ (एस्कॉर्बिक एसिड) जो सूखी दाल में न के बराबर होता है, अंकुरण से 24 घण्टे में 7-8 मिग्रा., 48 घण्टे में 10-12 मिग्रा. तथा 72 घण्टे में 12-14 मिग्रा. प्रति 100 ग्राम तक हो जाता है।
  4. कुछ पॉलीसैक्राइड्स तथा डाइसैक्राइड्स सरलतम रूप (मोनोसैक्राइड्स) में बदल जाते हैं जो खाद्य पदार्थ को पाचनशील बनाते हैं। उदाहरण के लिए स्टार्च का सूक्रोज, फ्रक्टोज तथा ग्लूकोज में बदलना।
  5. अंकुरण के कारण अनाजों व दालों की ऊपरी परत फट जाती है तथा उन्हें पकाना सरल हो जाता है तथा कम समय लगता है।
  6. अंकुरण के द्वारा खाद्य पदार्थों में उपस्थित पोषण विरोधी तत्त्व नष्ट हो जाते हैं तथा पोषक तत्त्वों के उपयोग को बढ़ाते हैं।
  7. भोजन ज्यादा स्वादिष्ट तथा आकर्षक बन जाता है।

प्रश्न 11.
खाद्य पदार्थों को मिला-जुला कर खाने से क्या लाभ है? .
उत्तर:
सभी खाद्य पदार्थों में सभी पौष्टिक तत्त्व उपस्थित नहीं होते हैं परन्तु प्रत्येक में कोई न कोई तत्त्व अवश्य होता है। शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार यदि इन खाद्य पदार्थों का चयन करके मिश्रित रूप से खाया जाए तो न केवल हम पौष्टिक आहार की प्राप्ति कर सकते हैं वरन् धन तथा श्रम भी बचा सकते हैं।

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प्रश्न 12.
डोसे का पौष्टिक मान अधिक होता है। वे विधियाँ बताइए जिसके द्वारा यह पौष्टिक मान बढ़ाया गया है। प्रत्येक का एक पौष्टिक तत्त्व लिखें जो बढ़ा हो।
उत्तर:
डोसा बनाते समय दो विधियाँ –
1. मिला-जुलाकर खाना
2. खमीरीकरण प्रयोग में लाया जाता है जिससे इसका पौष्टिक मान बढ़ता है। मिला-जुला कर खाने से प्रोटीन की किस्म बेहतर हो जाती है तथा खमीरीकरण से विटामिन बी कम्पलेक्स समूह (B-complex) तथा विटामिन सी (Vitamin C) की मात्रा बढ़ जाती है।

प्रश्न 13.
प्रेशर कूकर द्वारा भोजन पकाने की विधियों के चार लाभ लिखें।
उत्तर:
वाष्प के दबाव द्वारा (Pressure Cooking):

  • प्रेशर कूकर में भोजन बनाने से समय, ईंधन व श्रम की बचत होती है।
  • प्रेशर कूकर के साथ मिले सेपरेटर (Separater) से अलग तरह के भोजन एक साथ पकाए जा सकते हैं।
  • प्रेशर कूकर में खाना बनाने से भोजन के पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।
  • कूकर में ताप व भाप भोजन में प्रवेश कर उसे जल्दी पका देते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन पकाने का खाद्य पदार्थों की पौष्टिकता पर क्या प्रभाव पड़ता है ? [B.M. 2009A]
उत्तर:
भोजन में विभिन्नता स्वाद, सुगंध और आकर्षण लाने के लिए तथा भोजन को पाचनशील बनाने के लिए उसे पकाना आवश्यक हो जाता है। भोजन पकाना एक कला है, जो हमारी ‘संस्कृति’ का महत्त्वपूर्ण अंग है। भोजन को विभिन्न विधियों द्वारा पकाया जाता है पकाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसमें उपस्थित पोषक तत्त्व नष्ट न हो। भोजन पकाने पर कुछ पौष्टिक तत्त्व विघटित होकर आसानी से पचने योग्य हो जाते हैं कुछ कड़े होकर अपचित हो जाते हैं तथा कुछ नष्ट हो जाते हैं। खाद्य पदार्थों को पकाने में प्रयुक्त हुए ताप से विभिन्न पौष्टिक तत्त्वों पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है।

1. कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrate): आद्र ताप पर खाद्य पदार्थ में उपस्थित स्टार्च मुलायम हो जाती है, कोशिकाएँ फट जाती हैं और स्टार्च बाहर निकल जाता है जबकि शुष्क ताप पे पकाने पर स्टार्च डेक्सटिन में बदल जाता है और अधिक पाचनशील हो जाता है। चीनी, गुड़ शक्कर आदि गर्म होकर पिघल कर भूरे रंग का हो जाता है।

2. प्रोटीन (Protein): पंकने पर प्रोटीन अधिक पाचनशील हो जाते हैं। ताप से अंडे का प्रोटीन और दूध का प्रोटीन जम जाता है। माँस में उपस्थित प्रोटीन कोलेजन और इलास्टिन अघुलनशील शीघ्र होते है तथा ये शुष्क ताप द्वारा कड़ी हो जाते हैं। दालों में पाई जाने वाली प्रोटीन पकाने पर अधिक पौष्टिक तथा पाचनशील हो जाता है।

3. वसा (Fats): पकने पर वसा पर कोई अधिक प्रभाव न पड़ता है केवल इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वयत्युक पदार्थ को उचित ताप पर रखा जाय एवं सुनहरी रंग होने पर ताप से हटा लिया जाए।

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4. विदामिन्स (Vitamins): पकाने पर विटामिन ‘सी’ सबसे अधिक नष्ट होते हैं अतः विटामिन ‘सी’ युक्त फल एवं सब्जियों को ताजा ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए, विटामिन ‘बी’ समूह पकाने पे ताप द्वारा नष्ट हो जाता है साथ ही विटामिन ‘ए’ ‘डी’ ‘ई’ कुछ मात्रा में वसा में घूल जाते हैं।

5. खनिज लवण (Minerals): सामान्यतः पकने पर खनिज लवण पर प्रभाव नहीं पड़ता है किन्तु यदि भोज्य पदार्थ को पकाने के बाद उनका पानी फेंक दिया जाए तो बहुत से खनिज नष्ट हो जाते हैं। अतः खाद्य पदार्थों को वैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर पकाना चाहिए ताकि पोषण मान उपस्थित रहे और पोषक तत्त्व कम-से-कम बर्बाद हो साथ ही जहाँ तक संभव हो बिना पालीस किया चावल, साबूत दाल, चोकर सहित अनाज का ही प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 2.
खाद्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं ? विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
खाद्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक-जैसा खाओगे अन्य, वैसा होगा मन। कोई भी व्यक्ति अपौष्टिक खुराक पर कुछ समय तक बच जाएगा परन्तु शीघ्र ही उसका स्वास्थ्य गिरना शुरू हो जाता है। इसके परिणाम होंगे, कुपोषण, कमी के रोग, रोगग्रस्तता, शीघ्र व असामयिक मृत्यु।
आपके खाद्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कुछ कारक निम्नलिखित हैं –

1. माध्यम (Media): खाद्य पदार्थों के उत्पादक विज्ञापनों पर काफी पैसा खर्च करते हैं ताकि वह अपने पदार्थों को प्रचार करके उसकी मांग बढ़ा सकें। यह प्रचार जनता को मोहने के लिए व आकर्षित करने के लिए किया जाता है। आपको ऐसे कई विज्ञापनों के बारे में पता होगा जिन्हें दूरदर्शन, रेडियो पर देखते/सुनते हैं।

  • कौन-सा खाद्य-पदार्थ वृद्धि के लिए आवश्यक होगा?
  • ऊर्जा और बल के लिए आपको क्या लेना चाहिए?
  • पकाने के कौन-से तेल में PUFA की मात्रा अधिक होती है ?
  • अपनी चाय/कॉफी के लिए कौन-सा दूध पाउडर प्रयोग करना चाहिए?
  • ऊपर लिखित उदाहरणों की तरह बहुत कुछ और भी हैं।
  • उत्पादक समय व ऊर्जा बचाने की भी बात करते हैं, जैसे-मिनट में तैयार आदि।

2. सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्य (Cultural and family food values): इनका प्रभाव आपके भोजन पर प्रत्यक्ष रूप से होता है। अंडे, दूध, मांस और दूसरे अच्छे पदार्थ जीविका कमाने वाले को तथा परिवार के पुरुष सदस्यों को दिये जाते हैं। परिवार के दूसरे सदस्यों में शेष भाग बाँटा जाता है। कुछ राज्यों में दालें, ताजे फल और सब्जियाँ गर्भवती और स्तनपान करवाने वाली महिलाओं को नहीं दिया जाता।

ऐसे सांस्कृतिक रीति-रिवाज मातृत्व स्तर को नीचे गिरा देते हैं। कई परिवारों में मांसाहारी भोजन को खाने पर अधिक जोर दिया जाता है। सब्जियाँ काफी मात्रा में विटामिन और खनिज लवण देती हैं और इसके अतिरिक्त रूक्षांश भी देती हैं जो शारीरिक प्रक्रिया को नियंत्रित करने में सहायता देता है। यह वांछनीय है कि मूल्यों को भूलकर आगे बढ़ें। मिश्रित, ऋतु के अनुसार खाद्य पदार्थ कम दाम पर अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्चित करते हैं।

3. मित्रसमूह वर्ग (Peer Group): मित्रसमूह का विशेषकर किशोरों की खाने-पीने की आदतों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। विकासशील बच्चों में चॉकलेट, शीतल पेय और पीजा, बर्गर आदि खाने की अधिक इच्छा होती है। अक्सर ये सब खाद्य पदार्थ पौष्टिक नहीं होते हालांकि इन पर काफी पैसे खर्च किए जाते हैं। यह अक्सर देखने में आया है कि बच्चे अपने मित्रों के साथ वह सब कुछ खा लेते हैं जो उनको स्वादिष्ट नहीं लगता। पोषण के अध्ययन से मित्रसमूह में खाने के चयन में बुद्धिमत्ता आती है।

4. आर्थिक कारण (Economical Factors): एक बुद्धिमत्ती गृहस्वामिनी अपने परिवार के लिए किफायती दामों पर संतुलित आहार का चयन करती है। उसे ऋतु के अनुसार खाद्य पदार्थों की उपलब्धि, उनकी पौष्टिक क्षमता के बारे में सब कुछ पता होता है। वह इनके लिए वही पदार्थ चयन करती है जिससे घर के लोगों को फायदा हो।

जैसे-खीर के लिए टूटे चावल और जैम बनाने के लिए सेब। एक बुद्धिमत्ती मां विशेष मौकों के लिए स्वादिष्ट भोजन घर पर बनाना अधिक पसंद करती है बजाय इसके कि बाहरी होटलों से महंगा खाना मंगाकर खाया जाए। कीमत, मात्रा, समय, ऊर्जा और ईंधन, हर ओर किफायत का ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्न 3.
खाना पकाने के कौन-कौन-से कारण हैं ?
उत्तर:
खाना पकाने के कारण (Reasons of Cooking Food) :
1. भौतिक और रासायनिक परिवर्तन-पकाने से मांस में प्राकृतिक (भौतिक) बदलाव आता है जिससे इसे खाना आसान हो जाता है। कच्चा मांस खाया नहीं जाता। पकाने से इसका रंग और आकार भी बदल जाता है। आलू, मांस आदि में रासायनिक बदलाव भी आ जाता है। पकाने के बाद वे अधिक मीठे हो जाते हैं। स्टार्च कोशिकाएं फट जाती हैं और सारी मात्रा खाने के योग्य हो जाती हैं।

2. पाचन शक्ति बढ़ जाती है-सख्त खाद्यान्न जैसे सूखे बीज, मटर इत्यादि को नर्म करने के लिए पकाया जाता है। पाचक रस नर्म बीज के अन्दर पहुंच जाता है। यह प्रोटीन और कार्बोज का पूरा उपयोग सुनिश्चित कर लेता है।

3. स्वाद, सुगंध और रुचि में परिवर्तन-पकाने पर शकरकन्द का स्वाद बदल जाता है। मछली और मांस के गन्ध में बेहद सुधार हो जाता है अर्थात् उसकी सुगंध अच्छी हो जाती है तथा अधिक रुचिकर बन जाती है।

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4. पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है-दालों, फलियाँ और सोयाबीन में रोधक ट्राइपसिन होता है। सूखे या नम पकाने पर यह नष्ट हो जाता है तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है।

5.खाद्य पदार्थ को सुरक्षित बनाता है और भण्डारण समय बढ़ जाता है-कच्चा खाद्य पदार्थ खराब होना शुरू हो जाता है तथा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जैसे टमाटर । अगर आप इसको पका लें तो चटनी के रूप में लम्बी अवधि तक खराब नहीं होता। .. जीवाणु की उपस्थिति के कारण दूध फट जाता है। उबालने से वे जीवाणु मर जाते हैं और दूध के खराब होने की अवधि बढ़ जाती है।

6.भिन्नता के लिए पकाना-एक ही प्रकार का खाना खाते-खाते मन ऊब जाता है। पकाने से एक ही खाद्य पदार्थ को विभिन्न रूपों से खाया जा सकता है। जैसे गेहूँ का दलिया, चपाती, पराठा, पूरी-कचौरी और बिस्कुट आदि के रूप में खाया जाता है। पकाने से एक प्रकार से खाने से छुट्टी मिलती है।

प्रश्न 4.
खाद्य पदार्थों का किस प्रकार चयन, क्रय एवं संग्रह करेंगे?
उत्तर:
1. नष्ट होने वाले भोज्य पदार्थों का चयन, क्रय व संग्रह-इसके अन्तर्गत सब्जी, फल, जन्तुजन्य खाद्य पदार्थ जैसे-दूध, मछली, मीट आदि आते हैं। इन खाद्य पदार्थों से हमें प्रोटीन, विटामिन व खनिज लवण प्राप्त होते हैं।

चयन व क्रय (Selection & Purchase) :
1. दूध (Milk): कई प्रकार के दूध बाजार में उपलब्ध हैं। गर्मी पाकर दूध शीघ्र खराब होता है। ताजा दूध की सुगन्ध व स्वाद उत्तम होते हैं व रंग सफेद होता है। बासी दूध की सुगन्ध व स्वाद घटिया होते हैं। दूध का उपयोग करने से पहले उसे उबाल लेना चाहिए।

2. पनीर (Cheese): पनीर में नमी अधिक होती है। इसे स्वच्छ स्थान से ही खरीदना चाहिए व खरीदने के पश्चात् जल्दी ही उपयोग में ले लेना चाहिए। पनीर को छूकर देखें। यह सख्त व पीला न हो।

3. मक्खन (Butter): मक्खन में 11 से 16% नमी होती है। कमरे के तापक्रम पर यह जल्दी ही खराब हो जाता है। घर में बने मक्खन में नमी और भी ज्यादा होती है। नमक वाला प्रोसेस्ड मक्खन कुछ दिन रखा जा सकता है।

पशुजन्य पदार्थ (Animal Product):
1. अण्डा (Egg): यदि अण्डे को प्रकाश, जैसे जलती मोमबत्ती के सामने रखकर देखें तो उसमें उपस्थित वायु कोष (Air cell) छोटा पाएँगे। अण्डों के व्यापारियों द्वारा वर्गीकरण साइज के अनुसार किया जाता है। पुराने अण्डे में वायुकोष बड़ा होता है।

यदि पानी में डालने पर अण्डा ऊपर तैरने लगता है तो इसका अर्थ. अण्डा अन्दर से खराब है। अण्डा ऐसा खरीदें जो ऊपर से साफ व साबुत हो। टूटे अण्डों में जीवाणु प्रवेश पा जाते हैं। ऊपर लगी गन्दगी में उपस्थित जीवाणु साबुत अण्डे के अन्दर प्रवेश पा जाते हैं।
2. मछली (Fish):

  • ताजा मछली का मांस ठोस हो।
  • ऊपर की पर्त (Scales) कसी हुई व त्वचा भी जुड़ी होनी चाहिए।
  • अगर मछली पर अंगुली से दबाव डालें तो गड्ढा नहीं पड़ता।
  • अगर पानी में मरी मछली डालें तो वह डूब जाती है।
  • खरीदते समय देखें कि मछली का गलफड़ा (Gills) चमकीले लाल रंग का हो।
  • आँखें चमकीली हों।
  • यदि छूने पर लसलसी हो तो इसका अर्थ है कि मछली फ्रिज या बर्फ पर नहीं रखी थी व बासी पड़ने लगी है।
  • मछली में किसी प्रकार की गन्ध नहीं होनी चाहिए।

3. मांस (Meat): मांस का रंग चमकीला लाल रंग का होना चाहिए। स्पर्श करने पर चिकना व रेशे महीन प्रतीत होने चाहिए। उसके ऊपर लगा वसा सफेद एवं दृढ़ होना चाहिए। गहरे रंग का मोटे रेशे वाला, पीली नारंगी रंग के वसे वाला व स्पर्श पर अत्यधिक नर्म मांस उपयोग के लिए अच्छा नहीं होता।

मांस निम्न पशु के हो सकते हैं –
एक साल तक भेड़ का मांस (Lambs Meat)। एक साल के ऊपर वाली भेड़ का मांस (Mutton)। सूअर का मांस (Pork)। गाय का मांस (Beef)। पोर्क मांस में छोटे जानवर के मांस का रंग भूरे से गुलाबी रंग का हो सकता है परन्तु बड़े जानवर के मांस का रंग गहरे लाल रंग का होता है। सूअर के मांस को खाने से उसमें उपस्थित जीवाणु (Round worm) शरीर में प्रवेश पाकर Trichinosis नामक रोग उत्पन्न करता है इसलिए इसे अच्छी तरह पकाना चाहिए क्योंकि ऊँचे तापक्रम पर यह जीवाणु नष्ट हो जाता है। मांस सदैव साफ, स्वच्छ दुकानों से ही खरीदें। खास कर ऐसी दुकानों से जहाँ इसे ठण्डा रखने का साधन हो।

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सब्जियाँ और फल (Vegetebles and Fruit): सब्जियों व फलों से भोजन रंग, बनावट व सुगन्ध के कारण अधिक आकर्षक हो जाता है। फल व सब्जियों से आहार में खनिज लवण व बी समूह के विटामिनों के अतिरिक्त विटामिन ए व सी भी पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है। फल व सब्जियाँ अधिक दिनों तक रखे नहीं जा सकते।

सब्जियाँ (Vegetables):
1. पत्ते वाली सब्जियाँ (Leafy Vegetables): इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के खाद्य आते हैं। जैसे-बथुआ, पालक, सरसों, हरा धनियाँ, मेथी आदि।

  • पत्ते वाली सब्जी का रंग गहरा हरा हो, पीलापन लिये न हो।
  • पत्तियाँ चमकदार व चिकनी हों व मुरझाई न हों।
  • पत्तियाँ कीड़ों द्वारा खाई हुई या कीटाणुयुक्त नहीं होनी चाहिए।
  • पत्तियाँ आधी टूटी या मिट्टी लगी भी नहीं होनी चाहिए।

2. अन्य सब्जियाँ (Other Vegetables): इनके अन्तर्गत बैंगन, खीरा, लौकी, भिण्डी, टमाटर, मटर, फूलगोभी, बन्दगोभी आदि आते हैं।

  • ठोस, नमकीले रंग की हों।
  • कीड़े या चोट नहीं लगे हों।
  • जरूरत से ज्यादा न पकी हों।
  • सूखी, मुरझाई, बेरंगी सब्जियाँ न खरीदें।
  • फल वाली सब्जियाँ रसदार होनी चाहिए।

सब्जी के आकार देखकर सबसे बड़ी सब्जी न उठाएँ। मध्यम आकार की सब्जी अच्छी रहती है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार की विधि से बनानी है उस पर भी चयन निर्भर करेगा। टमाटर सलाद के लिए बड़े व ठोस होने चाहिए, परन्तु सब्जी में डालने के लिए छोटे आकार के भी चलेंगे।

3. फल (Fruits): कई फल सब्जियों की तरह उपयोग में आते हैं, जैसे टमाटर। गहरे पीले-नारंगी फलों में विटामिन ए अधिक होता है। आंवला, अमरूद, अनानास में विटामिन सी की मात्रा अधिक है।

  • फल ताजे, पके, भारी, ठोस तथा चमकदार होने चाहिए।
  • वे अत्यधिक पके न हों तथा फफूंदी आदि न लगी हो।
  • सड़े व दागी फल न खरीदें।
  • फल हरे व अधिक कच्चे भी न हों।

खट्टे रसदार फल जैसे संतरा, मौसमी आदि पतले छिलके वाले तथा मध्य आकार के अनुपात में हों तो ऐसे फल अधिक रसदार होते हैं। अन्य फलों में सेब, अनानास, अंगूर आदि आते हैं। केले पीले, थोड़े सख्त खरीदें व कमरे के तापक्रम पर पकने दें। पकने के पश्चात् केले बहुत जल्दी सड़ने लगते हैं। सेब अब पूरे साल ही उपलब्ध होते हैं। अच्छे सेब दृढ, चमकीले रंग के व भारी होते हैं। सेब को लम्बे समय तक रखने से वे बेस्वाद, सुगन्धरहित व भार में हल्के हो जाते हैं। अंगूर रस से भरे, मोटे, चमकीले, टहनी से लगे व लम्बे होने चाहिए।

अनानास अच्छे आकार का, सुगन्ध से भरपूर, पीले रंग का पका हुआ होना चाहिए। पके होने की जाँच करने के लिए उसके ऊपर की पत्तियों को खींच कर देखें। यदि पत्तियाँ आसानी से खिंच जाए तो समझें कि अनानास पका हुआ है। फल हमेशा मौसम में ही खरीदें। बेमौसम के फलों का स्वाद अच्छा नहीं होता तथा शीतगृहों में पड़े रहने के कारण पौष्टिकता भी कम हो जाती है। संग्रह (Storage) खाद्य पदार्थ एन्जाइम व जीवाणुओं के कारण खराब होता है। एक खराब खाद्य पदार्थ को उसकी खट्टी दुर्गन्ध, ऊपर उगी सफेद पर्त तथा लिसलिसे स्पर्श से पहचाना जा सकता है। निम्न तापक्रम खराब होने की क्रिया को कम कर देता है।

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1. दूध (Milk): दूध को उबाल कर ठण्डा करके बर्तन को ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए। गर्मी पाकर दूध शीघ्र खराब हो जाता है। गर्मी के कुप्रभाव से बचने के लिए दूध के बर्तन को पानी से भरी परात में रखना चाहिए। ढक्कन पर गीला रूमाल डाल दें। रेफ्रीजरेटर व आइस बाक्स में भी दूध सुरक्षित रहता है। उबला दूध 12 – 24 घण्टे कमरे के तापक्रम पर रखा जा सकता है।

2. पनीर: पनीर सख्त न हो जाए इसलिए उसे चिकनाई का असर न होने वाले कागज में रखना चाहिए। यह भी जल्दी खराब हो जाता है। इसलिए बर्फ या फ्रिज में दो सप्ताह तक रख सकते हैं।

3. मक्खन: इसे भी मक्खन के कागज या बर्तन में ढंककर ठण्डे स्थान पर दो सप्ताह तक बिना खराब हुए रखा जा सकता है।

4. पशु जन्य खाद्य पदार्थ जैसे मांस, मछली, कीमा आदि शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। इन्हें जमाव बिन्दु से कुछ कम तापक्रम पर थोड़े समय के लिए रखा जा सकता है। मांस खरीदते समय यह देखें कि दुकान पर

  • मांस लटका हो ताकि उसे हवा लगती रहे।
  • मक्खियों से बचाने की व्यवस्था हो। मलमल के थैले में लटकाना उचित होगा। थैला मांस से स्पर्श करता हुआ नहीं हो।
  • घरों में रेफ्रीजरेटर में ही रखें।

अण्डों को भी ठण्डे स्थान पर फ्रिज में ही रखें।
फल एवं सब्जियाँ: फल और सब्जियाँ ताजा ही प्रयोग में लाना चाहिए। उन्हें टोकरियों में पृथक् फैलाकर रखें। जिस स्थान पर रखें, वह हवादार हो । आलू, प्याज जैसी जड़दार सब्जियाँ ठण्डे तथा अंधेरे स्थान पर रखें जिससे अंकुर न फूटे। फ्रिज में यदि सब्जियाँ खुली रखी जाती हैं तो वह आकार में छोटी होकर झुरियोंदार हो जाती हैं । फ्रिज में क्रिसपर (Crisper) वाले भाग में सब्जियों व फल को सुखाकर थैलियों में डालकर रखें।

II अर्द्ध नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थ (Semi-Perishable Foods): इसके अन्तर्गत निम्नलिखित भोज्य पदार्थ आते हैं :
1. अनाज-अनाज के अन्तर्गत गेहूँ व उससे बने अन्य पदार्थ आते हैं, जैसे-मैदा, सूजी, आटा, दलिया आदि। यह सब गेहूँ को पीसकर बनाया जाता है। गेहूँ पीसने से उसकी ऊपरी सतह का ज्यादा क्षेत्र वातावरण के संपर्क में आता है। पकाने में समय कम लगता है और संग्रह कम समय के लिए कर सकते हैं।

साबुत गेहूँ को एक साल या अधिक समय तक संग्रह कर सकते हैं परन्तु उससे बने पदार्थ, जैसे-रवा, मैदा आदि को दो सप्ताह से कुछ महीनों तक ही रखा जा सकता है। दलिया एक पौष्टिक आहार है। एक अच्छा गुण (Quality) वाला दलिया स्वाद में मीठा, फफूंदी व दुर्गन्धरहित होता है परन्तु रखने पर इसमें जल्दी कीड़े पड़ जाते हैं।

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सूजी के कण कई प्रकार के होते हैं। बहुत ही महीन कण वाली सूजी हलवा बनाने के उपयोग में लाई जाती है। थोड़े मोटे कण वाली सूजी उपमा, चिड़वा बनाने के काम में आती है। चयन करते समय कणों की एकरूपता, कणों का जाले से बंधना, पत्थर व गेहूँ के छिलके की अनुपस्थिति देखनी चाहिए। मैदे में कम प्रोटीन, लोहा, व बी समूह के विटामिन पाए जाते हैं। इसे सूजी से भी कम समय के लिए संग्रह कर सकते हैं। अच्छे गुण वाला मैदा सफेद, कीड़े रहित होता है। इसके कण आपस में जुड़कर ढीले नहीं बन जाने चाहिए।

चावल से चिड़वा व फूलिया (Rice fibres, rice puffs) बनाए जाते हैं। फूलिया काफी समय तक रखी जा सकती है। यह कुरमुरी, कंकड़ रहित, मिट्टी रहित होनी चाहिए। चिड़वा सफेद, कुरकुरा, कीड़े रहित व गन्दगी रहित होना चाहिए। अनाज में बहुधा कीड़े लग जाते हैं जो इन्हें काट देते हैं और पोषक तत्त्व को बिल्कुल नष्ट कर देते हैं।

कीड़े लग जाने से अनाज का भार भी कम हो जाता है। हमारे देश में अनाज का प्रमुख स्थान है। चावलों के लिए तो यह प्रसिद्ध है कि वह जितना पुराना होता है, उतना ही स्वादिष्ट तथा अच्छा बनता है। भारतीय ऐसा चावल पसंद करते हैं जो पकने के पश्चात् दाना-दाना अलग दिखाई दे। गेहूँ बहुत पुराना बढ़िया नहीं माना जाता। मार्च और अप्रैल के महीनों में जब गेहूँ की फसल होती है, तब बहुत से घरों में एक साल तक के लिए गेहूँ जमा कर लिया जाता है।

अनाज चुनाव करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें –

  1. दिखावट।
  2. छूकर अनुभव करना।
  3. रंग।
  4. विभिन्न जाति या प्रकार।
  5. सुगन्ध।
  6. मिलावट, मिट्टी आदि।
  7. कीड़े।
  8. कीमत।

अनाज के कणों में एकरूपता होनी चाहिए। साफ, टूटे टुकड़ों की अनुपस्थिति, कीड़ेरहित, मिट्टी, कंकड़, रेत, तिनकेरहित अनाज के कुछ दाने मुँह में डाल कर चबाने से यदि दाना सख्त तथा मीठा है तो अनाज की किस्म अच्छी है। नमीयुक्त एवं कड़वे स्वाद के अनाज को नहीं खरीदना चाहिए। सूजी, मैदा आदि अधिक मात्रा में नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि इनमें कीड़े पड़ जाते हैं।

2. दाल (Pulse): दालों में अरहर, चना, उड़द आदि दालें आती हैं। इन्हें भी अनाजों के समान देखकर चयन करना चाहिए। दालें साबुत और दली आती हैं। सूखे डिब्बों में भर कर रखें। नमी में बहुत जल्दी खराब हो जाती हैं।

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3. वसा व तेल-घी का उपयोग हलवा, तड़का आदि के लिए किया जाता है। मक्खन, डबल रोटी या बेकिंग में उपयोग होता है। तेल सब्जियों के पकाने, तलने आदि के काम में आता है। हर प्रान्त में भिन्न प्रकार का चिकना पदार्थ पकाने के काम में आता है। बंगाल में सरसों का तेल, केरल में नारियल का तेल, गुजरात में मूंगफली का तेल उपयोग में ज्यादा आता है।
वसा या तेल खरीदते समय

  • सुगन्ध
  • वास्तविक रंग
  • अन्य किसी तेल का मिश्रण
  • गन्दगी
  • दुकान पर सफाई से रखा देखकर ही लेना चाहिए।

तेल, घी खुला न लेकर बन्द डिब्बे में ही खरीदना चाहिए क्योंकि खुली चीजों में मिलावट आसानी से की जा सकती है।

संग्रह (Storage): कई घरों में एक भण्डार गृह होता है।

भण्डार (Store Room): घर में संग्रहीकरण हेतु एक भण्डार गृह का होना आवश्यक है। इसमें नमी नहीं होनी चाहिए अन्यथा वस्तुएँ खराब हो जाएँगी। दीवारों पर यदा-कदा सफेदी कराते रहना चाहिए। भण्डार गृह में वायु तथा धूप आने का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। फर्श पक्का होना चाहिए। कच्चे फर्श पर ईंटें या लकड़ी के तख्ने रखकर उस पर डिब्बे, कनस्तर आदि रखने चाहिए।

उसमें अलमारियाँ, एक मेज, तराजू तथा एक हिसाब लिखने की पुस्तिका भी होनी चाहिए। दाल के लिए ऐसे डिब्बें हों जिनमें वायु प्रवेश न कर सके। आटे के लिए कनस्तर तथा गेहूँ के लिए टंकी होनी चाहिए। डिब्बों, कनस्तरों व टंकियों पर पेण्ट कर देना चाहिए तथा उनमें रखी वस्तु के नाम का लेबिल लगाना चाहिए ताकि इन्हें निकालने में सुविधा रहे।

1. अनाज (Cereals): गेहूँ को सुरक्षित रखने के लिए सर्वप्रथम धूप में भली-भाँति सुखा लेना चाहिए तथा ड्रम में भरते समय छाया में सूखी हुई नीम की पत्तियाँ डाल देनी चाहिए। इससे गेहूँ में घुन नहीं लगता। नीम की पत्तियाँ कीटाणुनाशक एवं नि:संक्रामक होती हैं। यदि नीम की पत्ती न हो तो कीटाणुनाशक औषधि डाल कर सुरक्षित रखा जा सकता है परन्तु प्रयोग में लाने से पूर्व धोकर सुखा लेना चाहिए जिससे कीटाणुनाशक औषधि का असर न हो।

आटा अधिक नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि अधिक रहने पर उसमें सीलन आ जाती है और कीड़े पड़ जाते हैं। आटे को सदैव ढककर सूखे स्थान पर रखना चाहिए। नया आटा लाने से पूर्व पुराने को काम में ले लेना चाहिए। चावल इल्लियों द्वारा नष्ट होता है। इनमें गुच्छियाँ बंध जाती हैं। सुरक्षा के लिए हल्दी व तेल का प्रयोग किया जाता है। ऐसा करने से कीड़े चावल को खराब नहीं करते । चावल को धूप में नहीं सुखाना चाहिए। इससे यह टूट जाता है।

2. दाल (Pulse): प्राय: दालों को भी पूरे मास की आवश्यकतानुसार खरीदा जाता है। साबुत दाल को दलने से पूर्व साफ करके तेल और पानी लगाकर रात भर बोरी या अन्य कपड़े में रख देना चाहिए। दूसरे दिन 3-4 घण्टे तक धूप में सुखाकर दल लेना चाहिए। दाल को संग्रह करने से पूर्व छाँट, फटककर दिन भर तेज धूप में सुखाना चाहिए ताकि नमी न रहे। कीड़ों से बचाने के लिए हींग के टुकड़े रख देने चाहिए। फिर इन्हें सूखे डिब्बों में भली प्रकार बन्द करके रखना चाहिए। डिब्बा हवा बन्द (Air tight) हो व नमी वाले स्थान पर न रखें। समय-समय पर दालों का निरीक्षण करते रहें।

3. शक्कर (Sugar): शक्कर शीघ्रता से खराब नहीं होती । इसलिए इसे पर्याप्त मात्रा में खरीद सकते हैं। इसे नमी से दूर रखना चाहिए । इसे इस प्रकार सुरक्षित बर्तन में रखना चाहिए कि चींटियाँ व कीड़े-मकोड़े प्रवेश न कर सकें।

4. चाय तथा कॉफी (Tea and Coffee): इसके लिए किसी ऐसे बर्तन की आवश्यकता है जिसमें वायु प्रवेश नहीं कर सके । इसे नमी से बचाने के लिए टिन या प्लास्टिक के डिब्बे में रखना चाहिए।

5. घी (Ghee): घी को अधिक दिनों तक सुरक्षित रखने के लिए उसे खूब गरम करके छान कर छाछ निकाल दें। तत्पश्चात् उसमें थोड़ा-सा नमक का ढेला डालकर किसी बर्तन में संगृहीत कर सकते हैं। इसे शीतल हवादार स्थान पर रखना चाहिए। अधिक गर्मी से इसका स्वाद बिगड़ जाता है।

6. मसाले (Spices): साधारणतः हल्दी, धनिया, लाल मिर्च आदि मसाले घर में प्रयुक्त किए जाते हैं। सभी मसालों को बाजार से खरीदने के बाद भली प्रकार साफ करना चाहिए । इसके बाद उन्हें आवश्यकतानुसार तब तक कड़ी धूप में सुखाना चाहिए जब तक कि उनमें से नमी पूर्णतः न निकल जाए। तत्पश्चात् उन्हें कूटकर सूखे व ढक्कनदार बर्तनों में रखना चाहिए । धनिया को सुरक्षित रखने के लिए उसमें हींग की डेली डाल देनी चाहिए। मिर्च को जाले से सुरक्षित करने के लिए एक किलो पीसी मिर्च में 100 ग्राम पीसा नमक मिला दें। हल्दी समय-समय पर सुखाते रहें। मसालों को नमी से हमेशा बचाते रहें।

III. अनाशवान भोज्य पदार्थ (Non-Perishable Foods): डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ के लिए ISI: FPO अथवा Agmark वाले खाद्य पदार्थों पर दिए गए पैकिग की तारीख देखकर ही खरीदना चाहिए। सुविधा वाले खाद्य-पदार्थों का क्रय-इन खाद्य पदार्थों का सोच-विचार कर चयन करने के पश्चात् इन्हें क्रय करना होता है। क्रय करते समय कई बातों का ध्यान रखना आवश्यक है जिनका उल्लेख नीचे किया गया है:

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1. डबल रोटी तथा अन्य सेंके हुए पदार्थ (Bakery Products): इन्हें हमेशा साफ, विश्वसनीय दुकानों से खरीदना चाहिए। क्रय करने से. पूर्व उनकी ताजगी का निरीक्षण कर लेना चाहिए। बासी सेंके हुए पदार्थ कदापि नहीं खरीदने चाहिए क्योंकि एक या दो दिन के भीतर अनुचित परिस्थितियों में फफूंदी इन पर उगने लगती है। प्रारम्भ में यह फफूंदी बहुत कम मात्रा में होने के कारण स्पष्ट दिखाई नहीं देती परन्तु खाने पर शरीर के स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है। यदि डबल रोटी को फ्रीज में रखना हो तो एक दिन की पुरानी डबल रोटी लेनी चाहिए क्योंकि ताजी डबल रोटी फ्रिज में रखने से गीली-गीली (Soggy) हो जाती है।

2. डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ (Canned foods): डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ, जैसे-जैम, जैली, मांस, फल, सब्जियाँ आदि क्रय करते समय डिब्बे का निरीक्षण करना चाहिए। यदि डिब्बा कहीं से फूला हुआ या पिचका हुआ हो तो उसे कभी भी नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि वह डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ के खराब होने का सूचक है। डिब्बे पर दी हुई खराब होने की सम्भावित तिथि को अवश्य पढ़ना चाहिए। जिन पदार्थों की तिथि निकल चुकी हो या निकट भविष्य में हो उन्हें क्रय नहीं करना चाहिए। शीशे, प्लास्टिक एवं पालीथिन में पैक किए गए खाद्य पदार्थों को बाहर से देखा जा सकता है। अतः इनका निरीक्षण करने के पश्चात् इन्हें खरीदना चाहिए।

3. पापड़, चिप्स अथवा सूप, डोसा आदि के तैयार पाउडर-इन खाद्य पदार्थों को खरीदने से पूर्व इनके लेबल पर दिए गए निर्देशों से भली प्रकार परिचित हो जाना चाहिए । इनकी खराब होने की सम्भावित तिथि को पढ़कर ही इन्हें खरीदना चाहिए। क्रय करने से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि इनके पैकेट अच्छी तरह से बन्द हैं या नहीं। फटे हुए, पुराने पैकेटों को खरीदना उचित नहीं है क्योंकि इनके शीघ्र खराब होने का भय रहता है।

4. जमे हुए खाद्य पदार्थ (Frozen foods): जमे हुए खाद्य पदार्थ केवल उतनी ही मात्रा में खरीदने चाहिए जितनी मात्रा में उन्हें घर पर सुरक्षित फ्रीज में रखा जा सके। इन्हें अधिक समय तक नहीं रखना चाहिए। क्रय करने के तुरत बाद ही प्रयोग में लाने तक इन्हें इसी जमी हुई दशा में रखनी चाहिए। एक बार जमे हए पदार्थ को बाहर निकालने पर प्रयोग कर लेना चाहिए क्योंकि यह कमरे के तापमान पर शीघ्र ही नष्ट होने लगते हैं। हमारे देश में कम साधनों की उपलब्धि के कारण इनका प्रचलन बहुत कम है।

सुविधा वाले खाद्य पदार्थों का संग्रह (Storage): सुविधा वाले खाद्य पदार्थों को खरीदने के पश्चात् उनका संग्रह करना भी आवश्यक है। डबल रोटी तथा सेंके हुए पदार्थों को अधिक समय के लिए संग्रह नहीं करना चाहिए क्योंकि इनमें उपस्थित नमी के कारण इनके खराब होने का भय बना रहता है। जहाँ तक सम्भव हो इन्हें ताजा खरीदकर ही प्रयोग करना चाहिए। यदि इन्हें संग्रह करना पड़े तो किसी चीज में भली प्रकार लपेट कर किसी ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए। डबल रोटी का मिट्टी या चीनी-मिट्टी के बर्तन में रखना चाहिए। धातु के बर्तन में रखने से रोटी पसीजकर धातु की दुर्गन्ध से युक्त हो जाती है।

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बर्तन के ऊपर हवादार ढक्कन होना चाहिए. ताकि उसे मक्खियों से बचाया जा सके। पापड़, चिप्स तथा अन्य सूखे हुए पदार्थों या मिश्रणों को पालीथिन के पैकेटों में किसी साफ स्थान पर रखना चाहिए। इन्हें आवश्यकता से बहुत अधिक मात्रा में नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि इनके खराब होने का भय रहता है। डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थों को फ्रिज में रखना चाहिए तथा एक बार खोलने के पश्चात् इन्हें शीघ्र ही प्रयोग कर लेना चाहिए। जमे हुए खाद्य पदार्थों को जमे हुए रूप में ही संगृहीत करना चाहिए। यदि इन्हें जमी हुई स्थिति में न रखा जा सके तो शीघ्र ही इनका प्रयोग कर लेना आवश्यक है। इन खाद्य पदार्थों को खरीदने की तिथि इन पर लिख देनी चाहिए तथा इनका निरीक्षण करते रहना चाहिए। खराब होने से पूर्व इनका उपयोग कर लेना चाहिए।

प्रश्न 5.
खाद्य संदूषण को प्रभावित करने वाले कारकों को विस्तारपूर्वक समझाइए। [B.M.2009A]
उत्तर:
खाद्य पदार्थ जीवाणुओं तथा उनमें उपस्थित एन्जाइमों के कारण संदूषित होते हैं। खाद्य पदार्थ में तथा उसके आस-पास के वातावरण में होने वाले रासायनिक परिवर्तन उसे दूषित करते हैं। खाद्य पदार्थों को बाह्य चोट भी उनके खराब होने का एक कारण है। खाद्य पदार्थों : को संदूषित करने वाले कारकों की सूची बना सकते है सूची निम्न है –

  • जीवाणु तथा एन्जाइमों की उपस्थिति।
  • रासायनिक क्रियाएँ।
  • बाह्य चोट।
  • चूहों, कीड़ों, झींगुरों द्वारा नुकसान या अजैविक संदूषण।

1. जीवाणु तथा एन्जाइमों द्वारा संदूषण (Bacterial / Enzymatic Spoilage): कुछ जावाण तो खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूस से ही पाये जाते हैं और कुछ फसल कटने, यातायात, सग्रहण, हम्तन व पकाने के समय खाद्य पदार्थों में प्रवेश कर जाते हैं। ये जीवाणु हैं बैक्टीरिया, उत्प्रेरक, खमीर, फफूंदी आदि। जैव प्रक्रियाओं में कुछ मात्रा में एन्जाइम की उत्पत्ति होती है।

कुछ बैक्टीरिया औरों की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ते हैं। जल्द ही इनकी संख्या भोज्य पदार्थ में अत्यधिक बढ़ जाती है। अधिकतर बैक्टीरिया कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों में ही अपने नए वातावरण में पूर्ण रूप से ढल जाते हैं। इसलिए आपको यह निश्चित कर लेना चाहिए कि खरीदे हुए खाद्य पदार्थ को चार घंटों में ही खाने से पहले गर्म करना है या ठंडा।

एन्जाइम खाद्य पदार्थों का अभिन्न अंग है। हम जानते हैं कि टमाटर/आम का पकना एन्जाइम के कारण ही होता है। एन्जाइम क्रियाशील होने पर खाद्य पदार्थ के रंग, स्वाद, सुगंध व रचना में परिवर्तन आने लगते हैं। इनके अधिक समय तक क्रियाशील रहने पर खाद्य पदार्थ अत्यधिक पक कर सड़ने लगते हैं। एन्जाइम क्रिया द्वारा लाए गए इच्छित परिवर्तन ‘सकारात्मक’ कहलाते हैं जबकि अनैच्छिक परिवर्तन जिससे भोज्य पदार्थ सड़ने लगते हैं ‘नकारात्मक’ कहलाते हैं।

2. रासायनिक व जैव-रासायनिक संदूषण (Chemical/Biochemical Spoilage): कीटनाशकों, रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से भी खाद्य पदार्थों में संदूषण हो सकता है। जबकि जैव-रासायनिक संदूषण; जीवाणुओं द्वारा उत्पादित विष तथा उनकी जैव-क्रियाओं के अवशेषों द्वारा उत्पन्न होता है।

3. बाह्य चोट द्वारा खाद्य पदार्थों में संदूषण-प्रकृति ने खाद्य पदार्थों को सुरक्षा कवच प्रदान किए हैं। ये हमारी त्वचा की भाँति ही कार्य करते हैं। आहार हस्तन के गलत तरीकों से ये कवच खराब हो जाते हैं। साथ ही बाह्य चोट खाद्य पदार्थ की रचना तथा दिखावट पर भी प्रभाव डालती है। इससे खाद्य पदार्थ जल्दी खराब होते हैं तथा उनका क्रय मूल्य भी कम होता जाता है।

4. चूहों, कीड़ों, झींगुरों द्वारा अजैविक खाद्य संदूषण (Rats, Insects, Non Biological Spoilage of food): चूहे फसलों को अत्यधिक नुकसान पहुंचाते हैं। चूहों के मल-मूत्र से होने वाले संक्रमण को “स्पाइरोचीटल संक्रमण” कहते हैं। कीड़े अनाज में छेद करके उसके कार्बोज को खा जाते हैं। इन छेद वाले दानों में से बदबू-सी आने लगती है और यह खाने के योग्य नहीं होते। झींगुरों के लार से अनाज के दाने चिपके हुए-से दिखाई देते हैं। इनसे अनाज में बदबू पैदा हो जाती है। चूहे, कीड़े व झींगुर खाद्य फसलों को प्रति वर्ष काफी नुकसान पहुंचाते हैं।

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प्रश्न 6.
संदूषण को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ (Situations helping in food spoilage) कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर:
संदूषण को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ इस प्रकार हैं –
1. जैविक खाद्य पदार्थ
2. अनुरूप तापमान
3. नमी/पानी
4. हवा और
5. अनुरूप pH

1. जैविक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता (Availability of Biological Foods): सभी जीवित प्राणियों की भाँति जीवाणुओं को भी जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। बैक्टीरिया सूक्ष्म-जीव होते हैं, इसलिए उन्हें बहुत थोड़ा भोजन चाहिए। थोड़ा-बहुत प्रोटीन, वसा तथा कार्बोहाइड्रेट, चाकू के किनारे पर लगा खाद्य पदार्थ, सब्जी काटने के बोर्ड पर अथवा डिब्बों के किनारों पर थोड़ा बहुत लगा खाद्य पदार्थ उनके लिए दावत के समान हैं। इसलिए खाद्यं पदार्थों के संपर्क में आने वाले सभी उपकरण अच्छी तरह से साफ होने चाहिए। साथ ही खाद्य संग्रहण तथा खाद्य हस्तन स्वच्छता के नियमों के अनुसार ही करना चाहिए।

2. अनुरूप तापमान (Favourable Temperature): विभिन्न बैक्टीरिया की वृद्धि के लिए अलग-अलग तापमान की आवश्यकता होती है। साइक्रोफिलिक (Psychrophilic) बैक्टीरिया शीतल तापमान पर बढ़ते हैं। माइक्रोफिलिक (Microphilic) बैक्टीरिया हमारे सामान्य तापमान पर बढ़ते हैं। गर्मी पसंद करने वाले बैक्टीरिया को थर्मोफिलिक (Thermophilic) कहते हैं, क्योंकि ये अत्यधिक गर्म तापमान लगभग 140°F तक सह सकते हैं, खाद्य पदार्थों को संदूषित करने वाले बैक्टीरिया अधिकतर 70°F-80°F में वृद्धि करते हैं। यदि खाद्य पदार्थ में बैक्टीरिया की. संख्या व तापमान कम है तो वह अधिक समय तक रखा जा सकता है। खाद्य पदार्थ जितने समय के लिए स्वादिष्ट व खाने योग्य (फसल कटने के समय से लेकर, सुरक्षित करने के बाद खाने तक) रहते हैं, उसे उसकी ‘शैल्फ लाइफ’ कहते हैं।

3. नमी, पानी की उपलब्धता (Moist/Water Availability): सभी जीवित पदार्थों के जीवन के लिए पानी की आवश्यकता होती है। ताजे खाद्य पदार्थों में अधिक नमी होती है जो जीवाणुओं की वृद्धि में सहायता करती है। जीवाणु में एन्जाइम उसकी कोशिका से निकलकर खाद्य पदार्थ से मिलकर फिर वापस कोशिका में आ जाते हैं।

यह प्रक्रिया निरन्तर जीवाणुओं की वृद्धि के साथ-साथ चलती रहती है। दुग्ध पाउडर, सूप-पाउडर, व सूखे अनाज देर तक खाने योग्य रहते हैं क्योंकि उनमें कुछ सूक्ष्म जीव तो हैं किन्तु उनमें नमी जो कि इसे सूक्ष्म जीवों की वृद्धि में सहायक है, नहीं होती। इसी प्रकार अचार व जैम में नमक व चीनी डालने से सूक्ष्मजीवियों को नमी नहीं मिल पाती और उनकी वृद्धि नहीं होती।

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4. हवा की उपलब्धता (Availability of Air): हवा सभी जीवों के जीवन का अभिन्न अंग है। सूक्ष्म जीवों को अपनी वृद्धि के लिए वायु की आवश्यकता होती है। यदि उन्हें हवा न मिले तो उनकी प्रक्रिया धीमी हो जाती है। बोतल बंद, डिब्बा बंद व बाँधे हुए खाद्य पदार्थों में हवा प्रवेश नहीं कर पाती, किंतु कुछ अत्यधिक विषाक्त जीवाणु बिना हवा के भी जीवित रह सकते और इनके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

5. अनुरूप खाद्य pH की उपलब्धता (Availability of Required pH): खाद्य पदार्थों में pH खाद्य संदूषण को प्रभावित करती है। pH पदार्थों की अम्लता व क्षारता को बताती है। pH-7 होने का तात्पर्य है कि खाद्य पदार्थ उदासीन है। अधिक जीवाणु उन खाद्य पदार्थों को संदूषित करते हैं जिनके माध्यम pH-7 के आसपास हो, जैसे प्रोटीन व मांसाहारी खाद्य पदार्थ, नींबू का रस, सिरका, खटाई इत्यादि खाद्य पदार्थ pH को कम करते हैं तथा उन खाद्य पदार्थों को संदूषण से बचाते हैं। खमीर कम pH वाले खाद्य पदार्थों पर हमला करते हैं जिनमें चीनी होती है, जैसे जैम आदि। ये चीनी से जीवित रहने के लिए ऊर्जा प्राप्त करते हैं और उसे एल्कोहल व.CO2 में बदल देते हैं। खमीर के इस गुण को शराब बनाने के उद्योग में भरपूर प्रयोग में लाया जाता है।

प्रश्न 7.
भोजन पकाने की विधियों का उल्लेख करते हुए उनके लाभ-हानि बताइए।
उत्तर:
भोजन पकाने की विधियाँ (Methods of food preparation): भोजन पकाने के लिए कई विभिन्न प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु सभी विधियों में ताप की आवश्यकता होती है।
पकाने के माध्यम के आधार पर इन विधियों को हम दो मुख्य भागों में बांटते है –

  1. आई ताप द्वारा पकाना (Moist Heat)।
  2. शुष्क ताप द्वारा पकाना (Dry Heat)।

1.आर्द्र ताप द्वारा पकाना-आई ताप द्वारा पकाने के लिए माध्यम के रूप में जल का प्रयोग किया जाता है। इस वर्ग के अन्तर्गत निम्न विधियाँ आती हैं
(a) उबालना (Boiling)
(b) भाप से पकाना (Steaming)।
(c) धीमी आग पर पकाना या स्टूयिंग (Stewing)

(a) उबालना-इस विधि में खाद्य पदार्थ को जल के सीधे सम्पर्क में लाकर पकाया जाता है। यह भोजन पकाने की सरल विधि है। पकाने की विधि-किसी बर्तन में जल लेकर उसमें खाद्य पदार्थ डालकर, आग पर रखकर तब तक उबाला जाता है, जब तक गल न जाए। उबालने की विधि में ताप 100° सेंटीग्रेड या 212° फारेनहाइट होना चाहिए। पानी गर्म होने पर जब उसकी सतह पर बुलबुले उठने लगे तो समझना चाहिए कि पानी में उबाल आने लगा है। जब पानी उबलने लगे तो आग धीमी कर देनी चाहिए और खाद्य पदार्थ के गलने पर आग बन्द कर देनी चाहिए।

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उबालने के लाभ (Advantages of Boiling): खाद्य पदार्थ को उबाल कर पकाने से निम्न लाभ हैं –
1. खाद्य पदार्थ सुपाच्य होना (Easy to digest): पानी में उबाला गया खाद्य पदार्थ गलने पर सुपाच्य हो जाता है। यह आसानी से पक जाता है तथा रोगियों के लिए विशेषकर श्रेष्ठ समझा जाता है।
2. खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना (Making the food Nutritious): यदि उबालने की विधि का ठीक ढंग से प्रयोग किया जाए तो खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनी रहती है।

उबालने से हानियाँ (Losses due to Boiling):
खाद्य पदार्थों को जहाँ उबालकर पकाने से लाभ हैं, वहाँ कुछ हानियाँ भी हैं –

1. खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता में कमी होना (Loss of nutritive value of foods): खाद्य पदार्थों को उबालने से उनके कुछ पोषक तत्त्व, स्वाद एवं सुगन्ध जल में आ जाते हैं जिससे खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनाए रखने के लिए उन्हें छिलकों सहित पर्याप्त जल में ही उबालना चाहिए तथा जिस जल में यह उबाले जाएँ उसे सूप बनाने, आटा गूंथने आदि के काम में लाना चाहिए।

उबालने की विधि से खाद्य पदार्थ में उपस्थित जल में घुलनशील विटामिन जैसे बी समूह के विटामिन और विटामिन सी तथा कुछ खनिज लवपानी में आ जाते हैं तथा इस पानी को फेंक देने से ये पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता को बनाए रखने के लिए उबालते समय उसे ढंककर रखना चाहिए। ढंककर पकाने से उबालने की विधि में कम समय लगता है तथा पानी कम सूखता है।

2. खाद्य पदार्थ का रंग नष्ट होना (Loss of colour of food): उबालने की विधि में कुछ मात्रा में खाद्य पदार्थों का रंग भी नष्ट हो जाता है। विशेषकर हरी पत्तेदार सब्जियों को ढंककर पर्याप्त जल में पकाने से उनका रंग कम नष्ट होता है। उबालने की विधि द्वारा चावल, दालें, सब्जियाँ, सूप आदि बनाए जाते हैं।

(b) भाप से पकाना (Steaming): इस विधि में जल के स्थान पर पकाने का कार्य भाप के माध्यम से किया जाता है। इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ को पकाने में समय अधिक लगता है परन्तु खाद्य पदार्थ अधिक सुपाच्य एवं हल्का हो जाता है तथा उसमें उपस्थित पोषक तत्त्व कम मात्रा में नष्ट होते हैं । इस विधि द्वारा पकाया हुआ भोजन रोगियों के लिए भी श्रेष्ठ माना जाता है। भाप द्वारा पकाने की विधि में खाद्य पदार्थ को भाप के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्पर्क में लाकर पकाया जाता है। भाप द्वारा खाद्य पदार्थों को तीन विधियों द्वारा पकाया जाता है

  1. प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Direct Steaming)
  2. अप्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Indirect Steaming)
  3. 9474 o Gala GRT 400191 (Pressure Steaming)

1. प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Direct Steaming): इस विधि में खाद्य पदार्थ को भाप के सीधे सम्पर्क से पकाया जाता है। विधि-किसी बर्तन में पानी उबाला जाता है तथा उस पर छलनी में खाद्य पदार्थों को रखकर बर्तन को ढक्कन से ढंक देते हैं। पानी से भाप निकलकर छलनी के छिद्रों द्वारा खाद्य पदार्थ के सम्पर्क में आती है और वह खाद्य पदार्थ पक जाता है। यदि जाली न हो तो किसी पतले कपड़े में खाद्य पदार्थों को बाँधकर बर्तन में लटकाया जा सकता है।

बाजार में कुछ विशेष प्रकार के स्टीमर भी मिलते हैं। इसमें ढक्कनदार बर्तन होता है तथा ढक्कन में जालीदार थाली सी लगी होती है। जिस पर खाद्य पदार्थों को रखकर पकाया जाता है। कई स्टीमर में दो या अधिक जाली भी होती है जिससे उनमें एक ही समय में एक साथ दो या तीन खाद्य पदार्थों को.पकाया जा सकता है। भाप के सीधे सम्पर्क में आने के कारण इन खाद्य पदार्थों में से जल में घुलनशील विटामिन बी तथा सी नष्ट हो जाते हैं।

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2. अप्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Indirect Steaming): इस विधि में खाद्य पदार्थ को भाप के सीधे सम्पर्क में नहीं लाया जाता है। विधि-किसी बर्तन में पानी को उबालने के लिए आग पर रखते हैं। किसी अन्य छोटे बर्तन में खाद्य पदार्थ को रखकर उस बड़े बर्तन में रख दिया जाता है तथा ढक्कन बन्द कर देते हैं। पानी द्वारा बनी भाप छोटे बर्तन में रखे पदार्थों को गर्म करती है तथा पदार्थ अपने जलांश द्वारा पक जाते हैं।

उदाहरण के लिए कस्टर्ड या पुडिंग बनाते समय दूध, अण्डे आदि के मिश्रण को छोटे बर्तन में रखकर इस बर्तन का मुंह ढक्कन या बटर पेपर (Butter Paper) से भली प्रकार बन्द करके किसी पानी से भरे बर्तन में रख देते हैं तथा इस पानी को उबालते हैं और दूध का मिश्रण पक जाता है। इस विधि में क्योंकि खाद्य पदार्थ केवल अपने जलांश द्वारा ही पकता है तथा पानी या भाप के सम्पर्क में नहीं आता है, अतः इनमें से विटामिन और खनिज लवण बहुत कम मात्रा में नष्ट होते हैं।

3. भाप के दबाव द्वारा पकाना (Pressure Steaming): इस विधि में भाप द्वारा बने दबाव की सहायता से खाद्य पदार्थ को पकाया जाता है। दबाव में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ ताप में भी बढ़ोतरी आ जाती है। कई बार किसी खाद्य पदार्थ को जल्दी उबालने के लिए बर्तन के ढक्कन पर कोई भारी वस्तु रखकर दबाव को अधिक किया जाता है जिससे पानी से बनी भाप बाहर न निकलने के कारण अन्दर दबाव अधिक कर देती है जिससे ताप अधिक हो जाता है और वह खाद्य पदार्थ जल्दी पक जाता है।

आजकल भाप के दबाव द्वारा पकाने के लिए प्रेशर कूकर (Pressure Cooker): का प्रयोग किया जाता है। प्रेशर कूकर का ढक्कन बाहर नहीं निकला होता है जिससे भाप अन्दर दबाव को बढ़ाती है जिससे खाद्य पदार्थ जल्दी पक जाता है। प्रेशर कूकर में विभिन्न खाद्य पदार्थों को उनकी क्षमता के अनुसार भिन्न-भिन्न दबाव पर पकाया जाता है।

इसमें 5, 10 और 15 पौंड दबाव किया जा सकता है। 15 पौंड के दबाव पर प्रेशर कूकर के अन्दर का ताप लगभग 250° फारेनहाइट होता है। यह देखा गया है कि प्रत्येक 20 फारेनहाइट ताप की वृद्धि करने पर खाद्य पदार्थ पकाने का समय लगभग आधा हो जाता है। इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते हैं।

भाप द्वारा पकाने के लाभ (Advantages of Boiling):
भाप द्वारा पकाने के कई लाभ हैं:
1. खाद्य पदार्थ सुपाच्य होना (Making the food easy to digest): भाप द्वारा पकाया गया भोजन हल्का एवं सुपाच्य होता है। यही कारण है कि रोगियों एवं वृद्धों के लिए भोजन पकाने की इस विधि का प्रयोग किया जाता है।
2. खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना (Making the food stuff Nutritious): इस विधि द्वारा पकाए गए भोजन के पोषक तन्व नष्ट नहीं होते और खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनी रहती है विशेषकर अप्रत्यक्ष भाप द्वारा पकाने एवं भाप के दबाव द्वारा पकाने की विधि सर्वोत्तम मानी जाती है।
3. ईंधन की बचत (Saving of fuel): भाप के दबाव द्वारा पकाने से भोजन शीघ्र बन जाता है तथा ईंधन की बचत होती है।
4. खाद्य पदार्थ के रंग व रूप में परिवर्तन न होना: खाद्य पदार्थ का रंग व रूप वैसा ही बना रहता है।

(C) धीमी आग पर पकाना या स्टूयिंग (Cooking slow heat or stewing): इस विधि में खाद्य पदार्थ को जल के सीधे सम्पर्क से पकाया जाता है।

विधि: जिस खाद्य पदार्थ को स्टूय बनाना हो, उसे छीलकर उसके बारीक-बारीक टुकड़े करके किसी बर्तन में लेकर इतना पानी डालें कि खाद्य पदार्थ भली प्रकार पक जाए । फिर इसे धीमी-धीमी आग पर खाद्य पदार्थ को गलने तक पकाते रहें। उदाहरण के लिए सेब का स्ट्रय बनाने के लिए सेब को छीलकर उसके बारीक-बारीक टुकड़े काट कर उसमें पर्याप्त मात्रा में पानी डाल कर और थोड़ी-सी चीनी डालकर धीमी-धीमी आग पर पकाते रहें। जब सेब गल जाए तो उसे उसमें उपस्थित पानी-रसे के साथ ही परोसें।

स्टूयिंग करने से लाभ (Advantages of Stewing):

  1. खाद्य पदार्थ सुपाच्य होना-इस विधि से चूँकि खाद्य पदार्थ धीमी-धीमी आग पर अधिक समय के लिए पकाते हैं, अतः वह सुपाच्य हो जाता है।
  2. खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना-खाद्य पदार्थ जिस पानी में पकाया जाता है, उसे साथ ही परोस देते हैं। अत: खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनी रहती है।
  3. श्रम की बचत-इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ पकाने से श्रम कम लगता है तथा खाद्य पदार्थ के जलने का भय नहीं होता है।
  4. ईंधन की बचत-धीमी-धीमी आग पर पकाने के कारण ईंधन की बचत होती है।

स्टूयिंग से हानियाँ (Disadvantages of Stewing) :
1. अधिक समय लगना-इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ बहुत धीमी-धीमी आग पर पकाया जाता है जिससे समय अधिक लगता है।
2. दाँतों का कम कार्य-इस विधि द्वारा पकाए गए भोजन को खाने के लिए दाँतों को कम कार्य करना पड़ता है। अतः दाँतों के काटने की क्रिया एवं लार रस द्वारा आशिक पाचन की कमी रहती है।

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2. शुष्क ताप द्वारा पकाना (Dry Heat): शुष्क ताप द्वारा पकाने के लिए माध्यम के रूप में वायु एवं चिकनाई का प्रयोग किया जाता है। इस वर्ग के अन्तर्गत निम्न विधियाँ आती हैं
(क) वायु को माध्यम के रूप में प्रयोग करके निम्न विधियों का प्रयोग करते हैं –

  • भूनना (Roasting)
  • अंगीठी पर भूनना (Grilling)
  • सेंकना (Baking)

(ख) चिकनाई को माध्यम के रूप में प्रयोग करके निम्न विधियों का प्रयोग करते हैं
तलना (Frying):
यह दो प्रकार की होती है:

  • उथली विधि (Shallow frying)
  • गहरी विधि (Deep frying)

(क) वायु को माध्यम के रूप में प्रयोग करना :
1. भूनना (Roasting): इस विधि में खाद्य पदार्थ सीधा आग के सम्पर्क में नहीं आता है, शुष्क गर्म वायु माध्यम का कार्य करती है। भूनने की विधि में खाद्य पदार्थ को गर्म रेत या राख में दबा दिया जाता है। इस विधि द्वारा आलू, शकरकंद, मूंगफली, अरबी आदि भूने जाते हैं। रेत को भट्टी में गर्म करके या अंगीठी के नीचे जो गर्म-गर्म राख निकलती है उसमें खाद्य पदार्थ को दबाकर भूना जाता है। इस विधि द्वारा भोजन छिलकों सहित पकाना चाहिए तथा भूनने के पश्चात् उसे साफ करके छिलका अलग कर देना चाहिए।

भूनने से लाभ (Advantages of Roasting) :
खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना-जब खाद्य पदार्थ छिलके सहित भूना जाता है तो उसकी पौष्टिकता बनी रहती है और कोई भी पोषक तत्त्व बाहर नहीं निकलता है।

भूनने से हानियाँ-(Disadvantage of Roasting):

  1. कई बार खाद्य पदार्थ अधिक गर्म रेत या राख के कारण जल जाता है।
  2. यदि रेत या राख गर्म न हो तो खाद्य पदार्थ कच्चे रहने की सम्भावना रहती है।
  3. यदि खाद्य पदार्थ को बराबर उल्टा-पुल्टा न जाए तो वह कहीं से कच्चा और कहीं से पक जाता है।

2. अंगीठी पर भूनना (Grilling): इस विधि में खाद्य पदार्थ को आग के सीधे सम्पर्क में लाकर पकाया जाता है तथा शुष्क वायु ही माध्यम का कार्य करती है। जिस खाद्य पदार्थ को ग्रिलिंग द्वारा पकाना हो उसे आग पर रख दिया जाता है तथा उसे थोड़े-थोड़े समय के बाद उलटते-पलटते रहते हैं जिससे वह चारों ओर से बराबर-बराबर पक जाए।

साबुत खाद्य पदार्थों को ग्रिल करने के लिए उन पर थोड़ा सा घी या तेल लगा देते हैं जिससे वह एकदम जले नहीं और उनका रंग बना रहे। ग्रिलिंग करने के लिए एक विशेष प्रकार का उपकरण जिसे ग्रिल कहते हैं, का प्रयोग किया जाता है। ग्रिल में खाद्य पदार्थ रखने से पहले इसके चारों ओर चिकनाई लगा देते हैं जिससे खाद्य पदार्थ इन पर नहीं चिपके। ग्रिल को उलटने-पलटने के लिए इन पर हत्थे लगे होते हैं।

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बैंगन, मछली, मुर्गी आदि खुली आग पर भूने जाते हैं। सींक कबाब बनाने के लिए मांस के तैयार मिश्रण को सींक में पिरोकर घी लगाकर खुली आग पर भूना जाता है। खुली आग पर भूनने के लिए भी खाद्य पदार्थ को छिलका सहित भूनना चाहिए अन्यथा पौष्टिक तत्त्व काफी मात्रा में नष्ट हो जाते हैं। इस विधि द्वारा पकाने से लाभ और हानियाँ भूनने की विधि से होने वाले लाभ और हानियों जैसी हैं।

3. सेंकना (Baking): इस विधि से भी पकाने के लिए माध्यम के रूप में शुष्क वायु का प्रयोग किया जाता है। सेंकने के लिए तन्दूर या भट्टी का प्रयोग किया जाता है। इस विधि में गर्म वायु से पूरी भट्टी का तापक्रम एक-सा हो जाता है। किसी भी पदार्थ को लेकर उसे गर्म भट्टी में रख देते हैं और भट्टी का मुँह बन्द कर देते हैं। वायु गर्म होकर खाद्य पदार्थ के चारों ओर घूमती है और उसे पका देती है।

इस विधि द्वारा केक, पेस्ट्री, बिस्कुट, नानखटाई, डबल रोटी आदि बनाये जाते हैं। साधारणतया भट्टी का तापमान 250° फारेनहाइट से लेकर 500° फारेनहाइट का होता है तथा प्रत्येक खाद्य पदार्थ को पकाने के लिए अलग-अलग ताप उचित रहता है। आजकल बिजली की भट्टी (Electric Oven) भी बाजार में उपलब्ध हैं जिनमें तापमान को आवश्यकतानुसार नियन्त्रित किया जा सकता है।

सेंकने के लाभ (Advantages of Baking) :
1. भोजन हल्का व सुपाच्य हो जाता है।
2. इस विधि द्वारा पकाए गए भोजन स्वादिष्ट होते हैं।

सेंकने से हानियाँ (Disadvantages of Baking): कई बार भट्टी का तापमान बहुत अधिक होने पर खाद्य पदार्थ ऊपर से तो बना हुआ प्रतीत होता है परन्तु अन्दर से कच्चा रह जाता है।

(ख) चिकनाई को माध्यम के रूप में प्रयोग करना :
तलना-तलने की विधि से खाद्य पदार्थ के पकाने का प्रमुख माध्यम कोई भी स्निग्ध पदार्थ होता है। अधिकतर घी या तेल का प्रयोग किया जाता है। इससे भोजन अन्य विधियों की अपेक्षा शीघ्रता से बनता है। स्निग्ध पदार्थ को गर्म करके उसमें खाद्य पदार्थ डाला जाता है जिससे खाद्य पदार्थ की ऊपरी परतें कड़ी हो जाती हैं और ताप के कारण वह भीतर से भी पक जाता है।

तलने के लिए मुख्यतः दो विधियों का प्रयोग करते हैं –
1. उथली विधि
2.  गहरी विधि।

1. उथली विधि (Shallow frying): इस विधि में खाद्य पदार्थ को कम घी या तेल में तला जाता है। किसी भी गहरे बर्तन जैसे तवे, फ्राइंग पैन (Frying pan) आदि में घी या तेल गर्म करके उनमें खाद्य पदार्थ डालकर पकाते हैं। जब खाद्य पदार्थ एक तरफ से पक जाता है तो उसे पलट कर दूसरी तरफ से पकाते हैं। इसमें घी या तेल उतनी ही मात्रा में प्रयोग किए जाते हैं जितना कि आसानी से सोख सकें। घी व चिकनाई के कारण खाद्य पदार्थ बर्तन से चिपकता नहीं है। इस विधि द्वारा पराठे, पूड़ी डोसा आदि पकाये जाते हैं।

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2. गहरी विधि (Deep-frying): इस विधि में पर्याप्त मात्रा में घी या तेल का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए प्रायः कड़ाही का प्रयोग किया जाता है। जब वह एक तरफ से पक जाता है तो झरनी या पोनी की सहायता से उले पलट देते हैं और दूसरी तरफ से भी पका लेते हैं। तलने के लिए घी का उचित ताप होना आवश्यक है क्योंकि कम ताप पर तलने से, खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में वसा सोख लेता है और देर में पकता है तथा अधिक ताप पर तलने से पदार्थ जल जाता है और वसा भी जल जाती है।

तलने के लाभ (Advantages of frying) :

  • खाद्य पदार्थ बहुत शीघ्र पक जाता है।
  • खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट हो जाता है।
  • खाद्य पदार्थ से पोषक तत्त्व कम मात्रा में बाहर निकलते हैं।

तलने से हानियाँ (Disadvantages of frying):

  • खाद्य पदार्थ में वसा होने के कारण वह शीघ्र नहीं पचता अर्थात् भारी हो जाता है।
  • खाद्य पदार्थ की ऊपरी परत कड़ी हो जाती है।
  • तले खाद्य पदार्थ रोगियों एवं बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।
  • इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ महंगे पड़ते हैं।

प्रश्न 8.
खाद्य परिरक्षण की विधियाँ कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर:
परिरक्षण की घरेलू विधियों द्वारा खाद्य पदार्थों को छोटे पैमाने पर परिवार में प्रयोग के लिए परिरक्षित किया जा सकता है। गृह विज्ञान के छात्र प्रयोगशाला में इन विधियों को सीख सकते हैं। व्यावसायिक पैमाने पर खाद्य पदार्थों की बड़ी मात्रा को सुव्यवस्थित व उचित उपकरणों से लैस फैक्ट्रियों में परिरक्षित किया जा सकता है। व्यावसायिक तौर पर परिरक्षण का प्रयोग मुनाफा पाने के लिए किया जाता है। वह उद्योग/फैक्ट्रियाँ खाद्य कानूनों व योग्य संस्थाओं के नियमों से . बाध्य होती हैं। – परिरक्षण के नियम घरेलू व व्यावसायिक क्षेत्र में एक समान रहते हैं।

1. विसंक्रमण (Asepsis): विसंक्रमण का अर्थ है उन परिस्थितियों को हटाना जो खाद्य पदार्थ के संदूषण में सहायता करती हैं। यह अत्यावश्यक है कि खाद्य पदार्थ को फसल काटने से लेकर, एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने, संग्रह करने, पकाने तथा अंततः खाने तक सुरक्षित रखा जाए। स्वच्छ वातावरण तथा साफ-सुथरे खाद्य हस्तन से खाद्य संदूषण को न्यूनतम किया जा सकता है। जीवाणु संख्या में कमी लाकर खाद्य पदार्थ को लंबे समय तक परिरक्षित किया जा सकता है। इस संदर्भ में प्रयुक्त परिरक्षण का नियम निम्नलिखित है-सूक्ष्मजीवियों को हटाना।

2. छीलना, पकाना तथा कीटाणु हनन (Peeking, Cooling & Disinsecting): खाद्य पदार्थ को उबलते पानी में थोड़ी देर तक रखकर उनके एन्जाइम निष्क्रिय किये जाते हैं। इससे एन्जाइमों की क्रियाशीलता को कम करके खाद्य पदार्थ को खराब होने से बचाया जाता है। इस. प्रक्रिया में ‘एन्जाइमों की निष्क्रियता’ का नियम प्रयोग में लाया जाता है। खाना पकाने की सूखी व गीली विधियों से कुछ जीवाणु को नष्ट किया जा सकता है। पके हुए खाद्य पदार्थ की सुरक्षा उन्हें पकाते समय के तापमान व पकाने की अवधि पर निर्भर करती है। अधिक तापमान पर लम्बे समय तक पकाने से जीवाणु संख्या में काफी कमी लाई जा सकती है।

यह परिरक्षण की ‘जीवाणुनाशक’ विधि है। कीटाणु हनन का अर्थ है सभी एन्जाइमों, सूक्ष्मजीवियों व उनके अंडों का हनन। यह घर में प्रेशर कूकर में भोजन पकाने से संभव हो सकती है। क्या आप प्रेशर कूकर में पकाने की विधि जानती हैं ? व्यावसायिक स्तर पर आवों के प्रयोग से कीटाणु हनन किया जाता है। इस प्रकार के खाद्य पदार्थ सूक्ष्मजीवियों से पूर्णतः मुक्त होते हैं।

3. स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्धक खाद्य हस्तन (Handling of clean & healthy food): यह परिरक्षण की एक प्रक्रिया ही नहीं अपितु खाद्य हस्तन की आवश्यकता भी है। खाद्य पदार्थ से संबंधित व्यक्तिगत स्वच्छता. रसोईघर एवं सभी उपकरण साफ एवं स्वच्छ होने चाहि ताकि सूक्ष्मजीवी आदि भोजन के संपर्क में आकर उसे संदूषित न कर पाएँ। हम जानते हैं कि विसंक्रमित परिस्थितियाँ खाद्य परिरक्षण की नीव हैं।

4. ठंडा करना (Refrigeration): यह खाद्य पदार्थों को कम तापमान पर रखकर परिरक्षित करने की प्रक्रिया है। जीवाणु एवं एन्जाइमों की क्रियाशीलता कम तापमान पर धीमी होती है। यह खाद्य परिरक्षण में ऊष्मा कम करने का नियम है जो क्रियाशीलता में आवश्यक है। विभिन्न प्रकार के रेफ्रीजरेटर व गहरे फ्रीजर जो तापमान को निश्चित करते हैं, बाजार में उपलब्ध हैं। शीघ्र नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थ फ्रीजर में रखने चाहिए। पकाया हुआ खाना सदैव ढंककर फ्रिज की ऊपरी शेल्फों पर रखना चाहिए।

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ताजे फल एवं सब्जियाँ ‘फ्रिज बैग’ में रखने चाहिए जो उनकी नमी व ताजगी बनाए रखते हैं। फ्रिज में अत्यधिक सामान नहीं रखना चाहिए। ठंडी शीतल हवा यदि फ्रिज में घूमती है तो खाद्य पदार्थ लम्बे समय तक ताजा रखा जा सकता है। गाँवों में लोग खाद्य पदार्थों को लम्बे समय तक परिरक्षित रखने के लिए वे खाद्य पदार्थों को गीले कट्टों में या बर्फ की पेटी में तथा ठंडे स्थान पर रखकर थोड़े समय के लिए परिरक्षित रखते हैं।

5. सुखाना (Drying): इस प्रक्रिया में खाद्य पदार्थ की नमी को हटाया जाता है। सदियों से खाद्य पदार्थों को धूप में रखकर परिरक्षित किया जाता रहा है। विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ जैसे हरी पत्तेदार सब्जियाँ, मटर, मछली, टमाटर, आडू आदि को वर्षों से सुखाया जाता रहा है, किन्तु आजकल हम खाद्य पदार्थों को कम समय में निश्चित परिस्थितियों व नवीनतम तकनीकों से सुखा सकते हैं।

इस प्रकार सुखाए गए खाद्य पदार्थ का रंग, स्वाद, सुगंध व पोषण मूल्य नष्ट नहीं होते। खाद्य पदार्थों को अपूर्ण रूप से भी सुखाया जा सकता है, जैसे खोआ, कंडेंस्ड दूध, टमाटर की प्यूरी आदि। अपूर्ण रूप से सुखाये गए खाद्य पदार्थों में नमक/चीनी की मात्रा अधिक होगी। इस माध्यम से सूक्ष्मजीवी क्रियाशील नहीं हो पाते। इस प्रक्रिया में प्रयुक्त परिरक्षण का यह नियम है, नमी/पानी को हटाना।

6. पैकिंग, डिब्बा बंद व बोतल बंद करना (Packing and Canning): इन प्रक्रियाओं से सूक्ष्मजीवियों को हवा उपलब्ध नहीं होती। घरेलू तौर पर हवा बंद डिब्बों में रखे खाद्य पदार्थों का संदूषण न्यूनतम होता है। व्यावसायिक पैमाने पर हवा की उपलब्धता कम करने के अनेक उपाय हैं। किन्तु हवा के बिना जीवित रहने वाले जीवाणुओं से डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ विषाक्त हो सकते हैं। नई तकनीकों द्वारा पैक किए गए खाद्य पदार्थों में हवा के स्थान पर अप्रवृत गैसें भरी जाती हैं।

7. pH को बदलने के लिए रसायनों का प्रयोग:

1. अचार बनाना (Pickles): खट्टे-मीठे स्वाद के अचार व चटनियाँ बनाना भारतीय घरों में प्रचलित है। अचार तेल या तेल के बिना भी बनाए जा सकते हैं। खाद्य पदार्थ पर तेल की सतह उसमें हवा का आवागमन रोक देती है। अम्लीय खाद्य पदार्थों, जैसे आम, नीबू आदि के अचार बनाए जा सकते हैं। सिरका, नींबू का रस, सिट्रिक एसिड व एसिटिक एसिड का प्रयोग सब्जियों का अचार बनाने में किया जाता है।

अचार बनाते समय, पिसी हुई राई के प्रयोग से, खमीरीकरण की प्रक्रिया से अम्लता बढ़ जाती है। अम्लीय खाद्य पदार्थों की pH कम होने के कारण ये देर तक खराब नहीं होते। अचार व चटनियों में नमक प्रचुर मात्रा में प्रयुक्त होता है। यह जीवाणुओं तक नहीं पहुंचने देता। अचार व चटनियों में मसालों के प्रयोग से विसंक्रमण किया जाता है। अचार खाद्य पदार्थ को लम्बे समय तक परिरक्षित रख सकते हैं, क्योंकि इसमें परिरक्षण के विभिन्न नियमों का प्रयोग करते हैं। ये नियम हैं

(क) नमक का प्रयोग – आर्द्रता हटाना
(ख) अम्लीय पदार्थ मिलाना – pH में बदलाव लाना
(ग) तेल का प्रयोग – हवा उपलब्ध न होने देना
(घ) मसालों का प्रयोग – संक्रमण के कारक हटाना।

2. जैम, जैली व मारमलेड बनाना (Zam, Zelly, Marmalade): इसमें चीनी का प्रयोग किया जाता है। अधिक चीनी नमी को सोखकर जीवाणुओं तक नमी नहीं पहुँचने देती। अम्लीय पदार्थ pH को कम करके जैम आदि को जीवाणुओं से उत्पन्न संदूषण से बचाया जा सकता है। मीठे माध्यम में कभी-कभी फफूंदी आदि से संदूषण हो सकता है। अतः सभी जैम इत्यादि संक्रमित हवा बंद बोतलों में ही संगृहीत किये जाने चाहिए। आप प्रयोगशाला में कुछ घरेलू खाद्य परिरक्षण की विधियाँ सीखें। खाद्य परिरक्षण की कुछ नवीनतम तकनीकें हैं : डीहाइड्रोफ्रीजिंग, प्रकाशमान करना, फ्रीजड्राइंग तथा एंटीबाइटिक के प्रयोग द्वारा।

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प्रश्न 9.
पाक क्रियाओं का भोजन घटकों पर क्या प्रभाव होता है ?
उत्तर:
“बहुत-से भोज्य पदार्थ अपनी स्वाभाविक स्थिति में मनुष्य के खाने के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं। उन्हें खाने के योग्य बनाने के लिए जो क्रिया अपनायी जाती है, वह पाक क्रिया कहलाती है।” प्रत्येक खाद्य-पदार्थ की ताप-ग्रहणता अलग-अलग होती है। अनेक आन्तरिक गुणों पर ताप का पृथक्-पृथक् प्रभाव पड़ता है। ताप की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही भोज्य पदार्थों के स्वाद में वृद्धि होती है तथा उसके स्वरूप में परिवर्तन होता है। भोज्य तत्त्वों अर्थात् वसा, प्रोटीन, श्वेतसार, खनिज लवण, विटामिन आदि पर ताप का निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है :

(क) खाद्य पदार्थों के रंग में परिवर्तन (Colour changes)।
(ख) खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में परिवर्तन (Flavour changes)।
(ग) खाद्य पदार्थों की प्रकृति में परिवर्तन (Texture changes)।

(क) खाद्य पदार्थों के रंग में परिवर्तन-खाद्य पदार्थों को पकाने पर उनके रंग में कई परिवर्तन आते हैं। कुछ परिवर्तन ऐसे होते हैं जिनसे वह पकने के पश्चात् अधिक आकर्षित हो जाते हैं तथा कुछ खाद्य पदार्थों में ऐसे परिवर्तन आते हैं कि उनका प्राकृतिक रंग नष्ट हो जाता है और वह पहले की भाँति आँचों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाते हैं। उदाहरण के लिए फलों और सब्जियों के चमकीले आकर्षक रंग पकने के पश्चात् कुछ मात्रा में नष्ट हो जाते हैं तथा चमकहीन हो जाते हैं। इसके विपरीत राजमा आदि पकने के पश्चात् लाल रंग के हो जाते हैं और उनका रंग पहले की अपेक्षा अधिक आकर्षक हो जाता है।

(क) खाद्य पदार्थों के रंग में परिवर्तन-खाद्य पदार्थों के रंगों पर निम्न प्रकार से प्रभाव पड़ता है :
1. क्लोरोफिल (Chlorophyll): सब्जियों तथा फलों में हरा रंग उनमें उपस्थित क्लोरोफिल के कारण होता है। पकाने के ताप एवं माध्यम के pH के कारण इस हरे रंग में विशेषकर हरी पत्तेदार सब्जियों में परिवर्तन आते हैं। इनका रंग पकाने पर पहले कुछ गहरा तथा अधिक पकाने पर भूरा हो जाता है। यदि हरी सब्जियों को पकाते समय माध्यम अम्लीय हो तो इनका रंग जल्दी ही भूरा हो जाता है परन्तु क्षारीय माध्यम में इनके रंग में अधिक परिवर्तन नहीं होता और गहरा हरा ही रहता है।

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यही कारण है कि हरी सब्जियों के रंग को बनाए रखने के लिए कई बार पकाते समय उनमें कुछ खाने वाला सोडा डाल देते हैं जिससे माध्यम क्षारीय हो जाए और उनके रंग में परिवर्तन न हो, परन्तु खाने वाले सोडे या बेकिंग सोडे के प्रयोग से खाद्य पदार्थ में उपस्थित थायमिन और विटामिन सी की काफी मात्रा नष्ट हो जाती है। हरी पत्तेदार सब्जियों के उत्तम रंग को बनाए रखने के लिए पहले कुछ मिनटों के लिए उन्हें ढकना नहीं चाहिए और खुले बर्तन में ही पकाना चाहिए।

2. कैरोटीनॉयड्स (Carotenoids): सब्जियों या फलों का लाल रंग कैरोटीनॉयड्स के कारण होता है। जब लाल सब्जियाँ या फल जैसे गाजर, आडू आदि को पकाया जाता है तो इनका लाल रंग पानी में बाहर आ जाता है और यह स्वयं पीले रंग के हो जाते हैं। अम्लीय माध्यम में इनका लाल रंग वैसा ही रहता है तथा क्षारीय माध्यम में इनका रंग नीलेपन पर आ जाता है। अतः लाल रंग की गाजर, आडू आदि को पकाते समय थोड़ा सा नींबू डालकर माध्यम को अम्लीय करने से उनका रंग वैसा का वैसा ही बना रहता है।

3. फ्लेवोनॉयड्स (Flevonoids): सब्जियों या फलों का पीला रंग फ्लेवोनॉयड्स के कारण होता है। जब हल्के पीले रंग वाले फल या सब्जियों जैसे प्याज, सेब आदि को क्षारीय पानी में धोते हैं और पकाते हैं तो उनका रंग गहरा पीला या भूरा हो जाता है, अतः इसके क्षारीय माध्यम के प्रभाव को हटाने के लिए इसमें थोड़ा-सा नींबू का रस या टाटरी डाल दी जाती है।
कई बार पानी क्षारीय होने के कारण उसमें पकाए गए चावल पीले हो जाते हैं। इस पीलेपन को चावल पकाते समय उसमें थोड़ा-सा नीबू का रस या टाटरी डालकर रोका जा सकता है।

4. मायोग्लोबिन एवं हीमोग्लोबिन (Mayoglobin and Haemoglobin): मांस का लाल रंग उसमें उपस्थित मायोग्लोबिन एवं हीमोग्लोबिन के कारण होता है। पकाने के ताप द्वारा यह लाल रंग भूरे रंग में बदल जाता है। यही कारण है कि पके हुए मांस का रंग भूरा होता है।

(ख) खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में परिवर्तन (Changes in flavour of foods): पकाने पर खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में काफी परिवर्तन आता है तथा यह परिवर्तन उस खाद्य पदार्थ की प्राकृतिक सुगन्ध, उसमें डाले गए मिर्च-मसालों या अन्य पदार्थों पर निर्भर करती है। अच्छी सुगन्ध वाले खाद्य पदार्थ हमारी ज्ञानेन्द्रियों को उत्तेजित करते हैं तथा मुँह में लार रस स्रावित होने लार रस भोजन में उपस्थित कार्बोज के पाचन में सहायता करता है। पकाने पर खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में परिवर्तन उनमें हुए कई भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तनों के कारण होता है।

कच्चे मांस, मछली एवं मुर्गे की गन्ध अच्छी नहीं लगती परन्तु पकने के पश्चात् मिर्च-मसालों की सुगन्ध के कारण उसमें जो सुगन्ध उत्पन्न होती है, उसके कारण वही मांस अच्छा लगने लगता है। कॉफी की विशेष सुगन्ध, कॉफी के बीजों को भूनने और पीसने पर ही उत्पन्न होती है अन्यथा कच्चे कॉफी के बीजों में कोई सुगन्ध नहीं होती है।

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खाद्य पदार्थों की प्राकृतिक सुगन्ध को बनाए रखने के लिए उन्हें आवश्यकता से अधिक नहीं पकाना चाहिए, ठीक ताप पर पकाना चाहिए तथा जहाँ तक सम्भव हो, मिर्च-मसाले खाद्य पदार्थ के पकने के पश्चात् ही डालने चाहिए। यदि मिर्च-मसाले जल्दी डाल दिए जाएँ तो खाद्य पदार्थ की प्राकृतिक सुगन्ध पर कुप्रभाव पड़ता है।

(ग) खाद्य पदार्थों की प्रकृति में परिवर्तन (Changes in nature of foods): पकाने से खाद्य पदार्थ की प्रकृति पर बहुत प्रभाव पड़ता है। कुछ खाद्य पदार्थ पकाने के ताप द्वारा मुलायम हो जाते हैं तो कुछ खाद्य पदार्थ ताप द्वारा कड़े हो जाते हैं। प्रत्येक खाद्य पदार्थ अपनी एक विशेष प्रकृति के कारण ही अच्छा लगता है।

1. कार्बोज (Carbohydrates): कार्बोज स्टार्च एवं शर्करा के रूप में ग्रहण की जाती है। जब कच्ची अवस्था में स्टार्च को ग्रहण किया जाता है तो वह आसानी से नहीं पचता । शुष्क ताप या बेकिंग की विधि को डेक्सट्रीन में परिवर्तित करती है जो कि शीघ्र व सरलता से पचने वाला होता है। उबलने की क्रिया द्वारा श्वेतसार के कण अधिक मुलायम होकर फूल जाते हैं। द्रवणांक बिन्दु (Boiling Point) पर पहुँचने पर सेल्यूलोज का आवरण फट जाता है तथा श्वेतसार निकलकर द्रव पदार्थ में मिल जाता है।

द्रव पदार्थ गाढ़ा हो जाता है। यही कारण है कि किसी तरल खाद्य पदार्थ को गाढ़ा करने के लिए मैदे या किसी अन्य स्टार्च का प्रयोग किया जाता है। शुष्क उष्णता से शक्कर जलकर भूरे रंग की शक्कर (Caramel Sugar) बन जाती है तथा और अधिक गर्म होने पर जल जाती है। आर्द्र विधि में गन्ने की शक्कर द्वारा मुरब्बे इत्यादि बनाए जाते हैं।

2. प्रोटीन (Protein): ताप द्वारा कुछ वानस्पतिक प्रोटीन के पौष्टिक मूल्य में वृद्धि होती है तथा भोज्य पदार्थों को पकाने से अधिक पाचनशील बन जाते हैं । उबला दूध कच्चे दूध की अपेक्षा अधिक पाचनशील है। इसका कारण उबले हुए दूध पर रेनिन की क्रिया से जठर में वह सरल प्रकार के दही के कणों के रूप में फटती है और इस क्रिया द्वारा वह शीघ्र पच जाता है।

प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं –
(अ) घुलनशील
(ब) मांसपेशीय

(अ) घुलनशील प्रोटीन दूध, रक्त प्लाज्मा और अण्डे की सफेदी में पाया जाता है। जब इन्हें गर्म करते हैं तो उनकी रचना में अन्तर आ जाता है। ताप में घुलनशील प्रोटीन जमकर ठोस (Coagulate) हो जाता है। जब अण्डे को अधिक. उबाला जाता है तो उसकी सफेदी का ऐल्ब्यूमिन घुलनशीलता के गुण को त्याग कर सख्त अघुलनशील ठोस पदार्थ का रूप धारण कर लेता है। इसलिए अण्डा चाहे उबाला जाए या फेंटकर घी में पकाया जाए परन्तु पकाने की क्रिया में तापक्रम कम ही होना चाहिए नहीं तो उसका प्रोटीन कड़ा हो जाएगा।

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(ब) मांसपेशियों का प्रोटीन लचीले (elastic) रेशों से बना होता है। पकाने से ये रेशे सिकुड़ जाते हैं। यह आम धारणा है कि पकाने से मांस के प्रोटीन का अभिपचन अधिक सरल हो जाता है। परन्तु ऐसा नहीं है, पकाने से केवल मांसपेशियों के रेशों को घेरे हुए संयोजक ऊतकों (Connective tissues) के मजबूत रेशे नरम व कमजोर हो जाते हैं जिससे पाचक रस प्रोटीनों तक सरलता से पहुँच सकता है। मछली मांस की भाँति पकाने से अधिक पाचनशील हो जाती है। इसके संयोजक ऊतक ताप से छिन्न-भिन्न हो जाते हैं जिससे वह नरम हो जाते हैं। ताप से एक और लाभ होता है कि पकाने में मछली में वह एन्जाइम नष्ट हो जाता है जो थायमिन को नष्ट करता है।

3. वसा (Fats): साधारण पकाने में वसा की रासायनिक रचना और उसके पोषक मूल्य में कोई परिवर्तन नहीं होता। जमा हुआ वसा पिघल जाता है और जलांश बुलबुले को आवाज के साथ बाहर निकल जाता है। अधिक गर्म करने पर उसमें से अधिक धुआँ निकलता है और वह जलने लगता है। अत्यधिक ताप पर गर्म करने पर ग्लिसरॉल और स्निग्ध अम्ल तत्त्व विभक्त हो जाते हैं तथा उसमें से एकरोलीन (Acrolein) नामक तत्त्व धुएँ के रूप में निकलता है जो गले. में खरखराहट व अपच उत्पन्न करता है। एकरोलीन अश्रु गैस का कार्य करती है जिससे नेत्रों में कष्ट होता है। जब वसा को बहुत समय तक गर्म किया जाता है तो उसका ऑक्सीकरण हो जाता है। इससे वसा का स्वाद बिगड़ जाता है। ऑक्सीकृत वसा में विटामिन ई नष्ट हो जाता है।

4. खनिज लवण (Mineral Salts): यदि भोज्य पदार्थों को पकाने के बाद उसके पानी को फेंक दिया जाता है तो बहुत से खनिज लवण (मैग्नीशियम, पोटैशियम और सोडियम) नष्ट हो जाते हैं। यदि कठोर जल में सब्जी को उबाला जाता है तो उसका कैल्शियम सब्जी में भी आ जाएगा। पकाने की क्रिया द्वारा लौह लवण आसानी से प्राप्त किया जाता है।

यदि पकाई जाने वाली वस्तु को लोहे की कढ़ाई में पकायी जाए तो लौह लवण की मात्रा में और अधिक वृद्धि हो जाती है। जड़दार तरकारियों को छिलके सहित उबालने से उसमें भोज्य तत्त्वों की मात्रा नष्ट नहीं होती क्योंकि तरकारियों के छिलके ऐसे तत्त्वों से बने होते हैं जिनमें से तत्त्वों का आदान-प्रदान नहीं हो पाता।

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5. विटामिन (Vitamins): विटामिन-ए और डी वसा में घुलनशील तथा जल में अघुलनशील हैं इसलिए सब्जियों को उबालकर पकाने से यह नष्ट नहीं होते, परन्तु घी में तलकर भोज्य पदार्थ बनाने से विटामिन ए नष्ट हो जाता है। विटामिन डी आँच तथा रोशनी के प्रति स्थिर होने के कारण उष्णता से प्रभावित नहीं होता। विटामिन बी जल में अत्यधिक घुलनशील – होता है इसलिए जल में पकाए हुए भोजन में विटामिन बी का बहुत बड़ा भाग जल में ही घुल जाता है।

ऊँचे तापक्रम पर भोज्य पदार्थ पकाने से विटामिन बी अधिक मात्रा में नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त बेकिंग पाउडर में क्षार के कारण भी यह विटामिन शीघ्र नष्ट हो जाता है। धूप में दूध को खुला रखने से राइबोफ्लेविन का कुछ अंश नष्ट हो जाता है। विटामिन सी जल में घुलनशील है और ऊँचे ताप पर नष्ट हो जाता है। भोज्य पदार्थ को जल में घोलकर पकाने से यह घुले हुए जल में घुल जाता है। भोज्य पदार्थ उबालने पर उसके जल को फेंकने से इसकी हानि होती है। हरी पत्तेदार सब्जियों में एक एन्जाइम होता है। जो विटामिन सी को नष्ट कर देता है। इस विटामिन का तनिक से ताँबे की उपस्थिति में भी नाश हो जाता है।

भोजन पकाते समय कुछ सब्जियों में विटामिन की हानि –
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प्रश्न 10.
खाद्य पदार्थों को पकाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए?
अथवा
खाना पकाते समय पौष्टिक तत्त्वों का ह्रास न हो तथा उन्हें बचाया जा सके, कोई आठ तरीके सुझाएँ।
उत्तर:
खाद्य पदार्थों को पकाते समय हमें निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए –
1. अनाज एवं दालें (Cereals & pulses):
(i) आटे को चोकर सहित प्रयोग करना चाहिए क्योंकि चोकर गेहूँ के दाने की ऊपरी परत होती है और इसमें बी समूह के विटामिन उपस्थित होते हैं। चोकर का प्रयोग न करने से यह विटामिन व्यर्थ हो जाते हैं।

(ii) चावल को कम-से-कम पानी में धोना चाहिए तथा पर्याप्त पानी में भिंगो कर उसी पानी में पकाना चाहिए । बी समूह के विटामिन जो चावल की ऊपरी परत में होते हैं, जल में घुल जाते हैं और यदि इस पानी को फेंक दिया जाए तो यह विटामिन भी व्यर्थ हो जाते हैं।

(iii) दालों को पर्याप्त जल में ही पकाना चाहिए तथा इनको जल्दी गलाने के लिए खाने वाले सोडे का प्रयोग कदाचित् नहीं करना चाहिए क्योंकि सोडे के प्रयोग से माध्यम क्षारीय हो जाने के कारण विटामिन काफी मात्रा में नष्ट हो जाते हैं।

(iv) जहाँ तक सम्भव हो, पकाने के लिए प्रेशर कूकर का प्रयोग करना चाहिए जिससे पौष्टिक तत्त्व नष्ट नहीं होते तथा भोजन जल्दी पक जाता है।

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2. सब्जियाँ (Vegetables):
(i) सब्जियों को काटने, छीलने से पहले धो लेना चाहिए अन्यथा काफी मात्रा में जल में घुलनशील विटामिन नष्ट हो जाते हैं।

(ii) सब्जियों का छिलका पतला-पतला उतारना चाहिए क्योंकि मोटे छिलके के साथ बहुत से खनिज लवण और विटामिन भी व्यर्थ हो जाते हैं।

(iii) सब्जियों को हमेशा बड़े-बड़े टुकड़ों में काटना चाहिए जिससे इनकी कम सतह वायु के सम्पर्क में आए तथा ऑक्सीकरण की क्रिया द्वारा अधिक विटामिन ऑक्सीकृत होकर नष्ट न हों।

(iv) सब्जियों को पकाने से बहुत समय पूर्व काट कर नहीं रखना चाहिए। यदि पकाने से बहुत समय पूर्व इन्हें काट कर रख देंगे तो ऑक्सीकरण अधिक होगा और विटामिन अधिक मात्रा में नष्ट होंगे।

(v) सब्जियों को पकाते समय कम-से-कम पानी का प्रयोग करना चाहिए तथा किसी भी दशा में पकाने के लिए प्रयुक्त किए गए पानी को फेंकना नहीं चाहिए। यदि किसी कारणवश पानी अधिक हो जाए तो उसे किसी अन्य कार्य के लिए प्रयोग में लाना चाहिए।

(vi) हरी पत्तेदार सब्जियों में जलांश काफी होता है। अतः जहाँ तक सम्भव हो, इन्हें बिना पानी के ही पकाना चाहिए।

(vii) सब्जियों को पकाने के लिए उबलते हुए पानी में डालना अधिक उचित है क्योंकि उच्च ताप पर एन्जाइम नष्ट हो जाते हैं और विटामिन ऑक्सीकृत नहीं होते तथा नष्ट होने से बच जाते हैं।

(viii) सब्जियों को सदैव ढंक कर पकाना चाहिए परन्तु हरी पत्तेदार सब्जियों के उत्तम रंग को बनाए रखने के लिए इन्हें केवल कुछ मिनटों तक खुला पकाना चाहिए और फिर ढंक देना चाहिए।

(ix) पकाने के पश्चात् सब्जियों को बार-बार गर्म नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से बहुत से विटामिन नष्ट हो जाते हैं।

(x) कछ मात्रा में सलाद के रूप में कच्ची सब्जियों का अवश्य प्रयोग करना चाहिए जिससे । पोषक तत्त्वों के साथ-साथ भोजन आकर्षक एवं स्वादिष्ट भी लगे।

3. फल (Fruits):

  • फलों को कच्चा ही प्रयोग में लाना चाहिए। केवल रोगियों को या बच्चों को फलों का स्ट्यू बनाकर दिया जाना चाहिए।
  •  जिन फलों के छिलकों को प्रयोग में लाया जा सके, उन्हें छिलकों सहित ही खाना चाहिए या उनके छिलकों को किसी और रूप में प्रयोग में लाना चाहिए।
  • फलों को खाते समय ही काटना चाहिए तथा काटकर नहीं रखना चाहिए।
  • फलों को ताजा ही खा लेना चाहिए क्योंकि बासी फल की पौष्टिकता कम हो जाती है और इसमें उपस्थित पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।

4. दूध (Milk):

  • दूध को धूप के सीधे सम्पर्क में नहीं रखना चाहिए। इसे अंधेरे तथा ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए।
  • दूध को आवश्यकता से अधिक नहीं उबालना चाहिए।

5. अंडे (Eggs):

  • अण्डों को बहत अधिक ताप तथा बहत अधिक समय तक नहीं पकाना चाहिए।
  • अण्डों को पोंछकर ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए।

6. मांस, मछली, मुर्गा आदि (Meat, fish, chicken) :

  • इन्हें पर्याप्त जल में ही पकाना चाहिए तथा पकाने के लिए प्रयुक्त जल को फेंकना नहीं चाहिए ।
  • इन्हें बहुत अधिक ताप पर नहीं पकाना चाहिए क्योंकि अधिक ताप पर प्रोटीन कड़ा होकर अपचय हो जाता है।

7.चाय, कॉफी आदि (Tea, Coffee):

  • इन्हें बनाते समय पानी के साथ उबालना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से कुछ हानिकारक तत्त्व इनमें आ जाते हैं ।
  • पहले से बनी हुई चाय को गर्म करके प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।

प्रश्न 11.
भोजन के पौष्टिक मान बढ़ाने के क्या-क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
लाभ (Advantages): किसी व्यक्ति को पोषण आहार का ज्ञान हो तो वह कम मूल्य में भी पौष्टिक आहार प्राप्त कर सकता है।
1. आहार का मिश्रण-चावल व दालों को समुचित तालमेल में प्रयोग करने से दालों में उपस्थित अधिक लाइसिन चावल में कमी को पूर्ण कर देता है जिससे दोनों खाद्य पदार्थों चावल व दाल की शरीर में उपयोगिता बढ़ जाती है।

2. खाद्य पदार्थों का अधिक सुपाच्य होना-विभिन्न विधियों के प्रयोग से खाद्य पदार्थ अधिक सुमपाच्य हो जाते हैं। खाद्य पदार्थों में उपस्थित पोषक तत्त्वों की रासायनिक संरचना में कुछ ऐसे परिवर्तन आते हैं कि यह पाचक रसों से जल्दी विघटित होकर छोटी आंत से सरलतापूर्वक अवशोषित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए अंकुरण की क्रिया में दालों में उपस्थित कार्बोज में कुछ ऐसे रासायनिक परिवर्तन आते हैं जिससे कार्बोज अधिक पाचनशील हो जाते हैं तथा अंकुरित दाल. कच्ची खाने पर भी पच जाती है।

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3. सीमित व्यय में अधिक पौष्टिक तत्त्व प्राप्त होना-भारतीय जनता की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्हें संतुलित आहार प्राप्ति हेतु सभी खाद्य पदार्थों के सेवन के लिए नहीं कहा जा सकता है। अत: आज के युग की माँग है कि अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार उपलब्ध खाद्य पदार्थों का ही पौष्टिक मान बढ़ाया जाए।

4. खाद्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट होना-पौष्टिक मान बढ़ाने के लिए विभिन्न विधियों के प्रयोग से खाद्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट हो जाते हैं तथा व्यक्ति इन्हें अधिक रुचि से खाते हैं। उदाहरण के लिए चावल और उड़द की दाल से बना डोसा, चावल और दाल की खिचड़ी आदि से अधिक स्वादिष्ट लगता है। इसी प्रकार चने की दाल का बड़ा, चने की दाल से अधिक स्वादिष्ट लगता है।

प्रश्न 12.
खाद्य पदार्थों के पोषण मान बढ़ाने की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं ?
उत्तर:
खाद्य पदार्थों के पोषण मान बढ़ाने की विधि-भोजन का पौष्टिक मान निम्न प्रकार से बढ़ाया जा सकता है:

  • भोज्य पदार्थों के पौष्टिक मूल्य को बढ़ाना (Enchanging the nutritive value of foods)
  • भिन्न प्रकार के भोज्य समूह को मिलाकर (Nutritious Combination of different kind of food stuffs)
  • भोजन पकाते समय पौष्टिक तत्त्वों को बचाकर रखना (Adopting methods of cooking which helps to conserve nutrient losses)
  • भोज्य पदार्थों को खरीदते समय सावधानी (Better buying of Foods)

1. भोजन का पौष्टिक मूल्य बढ़ाना:
अंकुरण (Germination): भोजन का पौष्टिक मूल्य बढ़ाने के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण विधि है। अन्न व दालों दोनों को ही अंकुरित कर सकते हैं। भोजन में अन्न का प्रमुख स्थान है। अन्न से शरीर को ऊर्जा एवं आवश्यक पोषक तत्त्व आसानी से मिल जाते हैं। दालों का उपभोग भी लगभग सभी व्यक्ति करते हैं। यह शाकाहारी लोगों के लिए प्रोटीन प्राप्ति का अच्छा साधन है।

अंकुरण करने की विधि (Method of Sprouting):
1. अनाज या दाल को बीनकर धो लें। अन्दाज से पानी डालकर 10 से 12 घण्टे तक भिंगों दें।

2. भीगे हुए दाल या अनाज को गीले या मलमल के कपड़े में ढीला बाँध दें। 24-28 घण्टे में अंकुर निकल सकते हैं। बीच-बीच में नमी रखने के लिए पानी छिड़कते रहें। नमी व गर्मी के कारण अंकुर निकल आएँगे। अंकुर निकलने का समय वातावरण के तापमान पर निर्भर करता है। गर्म मौसम में अंकुरण जल्दी निकलते हैं। ठण्डे में समय अधिक लगता है। अंकुरित दाल व अन्न को विभिन्न तरीकों से उपयोग करके भोजन को पौष्टिक एवं स्वादिष्ट बना सकते हैं।

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उपयोग:

  1. गेहूँ के आटे में कुछ मात्रा में अंकुरित दालों अथवा बाजरे के आटे को मिला देने से आहार की पौष्टिकता बढ़ जाती है।
  2. अंकुरित गेहूँ को छाया में सुखा कर हल्का भून कर दलिया बना लें। यह बच्चों को दे सकते हैं।
  3. अंकुरित दालों एवं रागी इत्यादि को सुखाकर, हल्का भूनकर पीसकर छान लें। यह आटा दूध व चीनी मिलाकर छोटे बच्चों को खिलाइए।
  4. अंकुरित दालों को नीबू का रस व नमक मिला कर कच्चा भी खाया जा सकता है।

अंकुरण से लाभ (Advantages of Germination) अंकुरित करने से दालों में पाए जाने वाले रासायनिक एन्जाइम्स क्रियाशील हो जाते हैं और दालों की पौष्टिकता को बढ़ा देते हैं।

1. विटामिनों की बढ़ोतरी (Increase in Vitamins): दालों व अनाजों में विटामिन सी लगभग न के बराबर होता है। केवल 24 घण्टे अंकुरित करने से विटामिन सी काफी मात्रा में उत्पन्न हो जाता है। अंकुरण के पश्चात् विटामिन सी दस गुना बढ़ जाता है। यह विटामिन हमारी त्वचा व मसूढ़ों की मजबूती बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है। नायसिन व बी कम्पलेक्स के अन्य विटामिन 2.3 गुना बढ़ जाते हैं।

अंकरित करने से पौष्टिकता पर प्रभाव –
चना 100 ग्राम
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2. खनिज लवणों की अधिक प्राप्ति-यह देखा गया है कि दालों में कुछ ऐसे पदार्थ होते हैं जो पौष्टिक तत्त्वों को ग्रहण करने में बाधा डालते हैं। ऐसे पदार्थ अंकुरित करने पर नष्ट हो जाते हैं। पचने योग्य लोहे खनिज की मात्रा बढ़ जाती हैं।

3. पोषण विरोधी तत्त्वों का नष्ट होना-खाद्य पदार्थों में कुछ पोषण विरोधी तत्त्व होते हैं जो विशेष तत्त्वों के उपभोग में बाधा डालते हैं। अंकुरण की प्रक्रिया के दौरान ये. नष्ट हो जाते हैं। पोषक तत्त्व शरीर में उपयोग हो जाता है।

4. खाद्य पदार्थ अधिक पाचनशील-दालों में उपस्थित प्रोटीन अंकुरण के बाद आसानी से पच जाता है। कठिनाई से पचने वाली दालें जैसे कि सोयाबीन, अंकुरण के बाद आसानी से पच जाती हैं।

5. खाद्य पदार्थों का पकने में कम समय लगना-अंकुरण के दौरान दालों का बाहरी छिलका ढीला पड़ जाता है। परिणामस्वरूप दालें शीघ्र पक जाती हैं।

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6. बच्चों के लिए एक पौष्टिक आहार-अंकुरित दालों को बच्चों के भोजन में निःसंकोच दिया जा सकता है। क्योंकि अंकुरित करने से वायु बनाने वाले पदार्थ कम हो जाते हैं।

7. ईंधन की बचत-अंकुरित दालें शीघ्र पक जाने के कारण ईंधन की बचत भी होती है।

खमीरीकरण (Fermentation): इस विधि द्वारा अनुकूल वातावरण से खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले कुछ विशेष प्रकार के वांछनीय (Desirable) जीवाणु तेजी से बढ़ते हैं। ये जीवाणु सूक्ष्म होते हैं। वायुमण्डल की भाँति यह मिट्टी में विद्यमान रहते हैं। इन्हीं जीवाणुओं के कारण फलों के रस, तरल पदार्थ, शर्करा, आटा आदि में खमीरीकरण की क्रिया होती है।

यह वायु के बुलबुलों के रूप में दिखाई देता है तथा खाद्य पदार्थों के स्वाद में भी अन्तर आ जाता है। जीवाणु उपयुक्त स्थल व तापक्रम पाने से 90°F से 102°F पर) अत्यधिक क्रियाशील हो जाता है। खमीरीकरण में कार्बन डाइऑक्साइड गैस बाहर निकलती है जो कि बुलबुलों के रूप में दिखाई देता है।

खमीरीकरण की विधि (Method of Fermentation):

  • खमीर उठाने के लिए अनाज व दालों को पानी में भिंगों देते हैं।
  • फिर महीन पिट्ठी पीस लें। जितना बारीक खाद्य पदार्थों को पीसा जाएगा, उतना अच्छा खमीर उठेगा।
  • पिट्ठी को एक बड़े बर्तन में डाल कर थोड़ा-सा नमक या चीनी मिलाकर रख दें। नमक व शक्कर खमीर उठाने में सहायता करते हैं। इस क्रिया में जीवाणु कार्बन डाइऑक्साइड बनाते हैं जिससे पिट्ठी साधारण मात्रा में दुगनी या तिगुनी बढ़ जाती है। अतः पिट्ठी को बड़े बर्तन में रखते हैं ताकि बर्तन से बाहर न निकले।
  • पिट्ठी को अच्छी तरह फेंट कर खमीर उठाने के लिए रखें। गर्मी के दिनों में खमीर जल्दी उठता है। सर्दी के मौसम में खमीर जल्द उठाने के लिए पिट्ठी में थोड़ा-सा दही भी मिला सकते हैं। बर्तन को चारों ओर से मोटे कपड़े से लपेट कर रखना चाहिए।
  • अनाज व दालों में प्रायः खमीर उठाया जाता है। कभी-कभी दाल व अनाज को अलग-अलग खमीर उठाते हैं और कभी दोनों को मिलाकर। अनाज व दाल के मिश्रित घोल में खमीर उठायें तो अच्छा रहता है क्योंकि इससे स्वाद बढ़ जाता है।

खमीरीकरण से लाभ (Advantages of Fermentation): खमीर उठाने की क्रिया में भोज्य पदार्थ में कुछ परिवर्तन आ जाते हैं जिनके कारण भोज्य पदार्थ अधिक पौष्टिक हो जाते हैं ।

  • खाद्य पदार्थ का पोषक मान बढ़ता है-इस क्रिया से निकोटिनिक अम्ल तथा राइबोफ्लेविन बढ़ जाते हैं।
  • खाद्य पदार्थ का अधिक पाचनशील होना-खमीर की प्रक्रिया में जीवाणुओं द्वारा एन्जाइम बनाते हैं। इनके द्वारा शर्करा तथा प्रोटीन का आशिक पाचन हो जाता है।
  • अधिक प्रोटीन-खमीर से दालों में उपस्थित, ट्रिपसिन प्रतिरोधक भी खण्डित हो जाता है, जिससे शरीर को अधिक मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध हो जाता है।
  • खनिज लवण, लोहे की अधिक प्राप्ति-खमीरीकरण द्वारा खाद्य पदार्थ में उपस्थित लोहे की सम्पूर्ण मात्रा हमें आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
  • खाद्य पदार्थ का अधिक स्वादिष्ट होना-भोज्य पदार्थ का स्वाद तथा बनावट भी अच्छी हो जाती है। खमीरीकरण द्वारा भोज्य पदार्थ में खटास आ जाती है। उदाहरण भठूरे, इडली, डोसा, कांजी आदि।

खमीर का उपयोग (Uses of Fermentation) :

  • डबल रोटी बनाने में यीस्ट या खमीर का उपयोग होता है।
  • अंकुरित जौ (Barley) से बीयर (Beer) बनाई जाती है। जौ को पानी में भिंगोकर उचित ताप में अंकुरित कराते हैं। इसका स्टार्च विकारों के कारण शक्कर में बदल जाता है
  • अंगूर के रस के यीस्ट द्वारा खमीरीकरण से शराब बनाई जाती है। खमीर घर में बनाया जा सकता है तथा बाजार में भी खमीर के पैकेट मिलते हैं जिनकी सहायता से कई खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं।

II. भोजन का मिश्रण (Combination of Foods): यदि भोजन भोज्य समूहों के खाद्यों से मिलाकर तैयार किया जाए तो वह संतुलित और उत्तम श्रेणी का हो जाता है। उदाहरण के लिए अगर गेहूँ का आटा, दाल का आटा और मूंगफली का आटा मिलाकर भोजन का मिश्रण तैयार किया जाए और उस मिश्रण की रोटियाँ बनाई ज्ञाएँ तो उसका प्रोटीन दूध के प्रोटीन के समान गुणकारी बन जाता है।

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लाभ (Advantages):
1. प्रोटीन की उपयोगिता बढ़ाना-विभिन्न खाद्य पदार्थों को मिला-जुला कर प्रयोग करने से उनमें उपस्थित प्रोटीन की उपयोगिता बढ़ जाती है। हम पिछले अध्यायों में पढ़ चुके हैं कि प्रोटीन की किस्म या उपयोगिता उनमें उपस्थित अनिवार्य अमीनो अम्लों पर निर्भर करती है। जिन खाद्य पदार्थों में अधिक अनिवार्य अमीनो अम्ल पाए जाते हैं वह खाद्य पदार्थ प्रोटीन के उतने ही अच्छे साधन माने जाते हैं। खाद्य पदार्थों विशेषकर वानस्पतिक खाद्य पदार्थों में कोई अमीनो अम्ल अधिक मात्रा में उपस्थित होता है तो कोई दूसरा अमीनो अम्ल बहुत कम मात्रा में या बिल्कुल नहीं होता है।

ऐसी स्थिति में एक खाद्य पदार्थ की कमी को दूसरी खाद्य पदार्थ द्वारा पूरा किया जा सकता है। उदाहरण के लिए अनाजों में अमीनो अम्ल लाइसिन तथा दालों में अमीनो अम्ल मिथायोनिन कम मात्रा में पाए जाते हैं और अनाजों में अमीनो अम्ल मिथायोनिन तथा दालों में अमीनो अम्ल लाइसिन प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। अतः जब अनाजों और दालों के मिश्रण. का प्रयोग करते हैं तो उनमें दोनों ही अनिवार्य अमीनो अम्ल उचित मात्रा में हो जाते हैं।

2. खाद्य पदार्थ का पौष्टिक मान बढ़ाना-इस अनाज और दाल के मिश्रण में यदि सब्जियों का प्रयोग भी किया जाए तो सब्जियों में पाए जाने वाले खनिज लवण और विटामिन भी उचित मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं।

3. पकाने में कम समय लगना-यदि हम खाद्य पदार्थों को अलग-अलग पकाएं तो उन्हें तैयार करने में अधिक समय लगता है। जब गृहिणी नौकरी करती हो या किसी कारणवश उसके पास समय कम हो तो विभिन्न खाद्य पदार्थों को मिला-जुला कर पकाने से समय तो कम लगता ही है, पोषक तत्त्व भी अधिक मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं।

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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 15 व्यवस्थापन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science व्यवस्थापन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन उत्तर श्रेणी का होता है –
(क) चावल
(ख) गेहूँ
(ग) दाल
(घ) खिचड़ी
उत्तर:
(घ) खिचड़ी

प्रश्न 2.
आर्द्र ताप द्वारा भोजन पकाने की मुख्य विधियाँ हैं –
(क) 2
(ख) 4
(ग) 6
(घ) 8
उत्तर:
(ख) 4

प्रश्न 3.
भाप द्वारा भोजन पकाने की विधियाँ हैं –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ख) तीन

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प्रश्न 4.
नमक में मिलाया जाता है –
(क) सोडियम
(ख) आयोडीन
(ग) खनिज लवण
(घ) विटामिन्स
उत्तर:
(ख) आयोडीन

प्रश्न 5.
पोषण मान में वृद्धि के लिए विधियाँ अपनायी जाती हैं –
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(घ) चार

प्रश्न 6.
आयोडीन की कमी से होता है –
(क) अन्धापन
(ख) एनेमिया
(ग) स्कर्वी
(घ) घेघा
उत्तर:
(घ) घेघा

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यवस्था (Management) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
उपलब्ध साधनों का सदुपयोग करते हुए कार्यों को सर्वोत्तम ढंग से करना ताकि अधिकतम लक्ष्यों की पूर्ति हो सके, व्यवस्था कहलाती है।

प्रश्न 2.
व्यवस्था करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
हमारी आवश्यकताएँ असीमित होती हैं और उन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साधन सीमित होते हैं। अत: अधिकाधिक लक्ष्यों और आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सीमित साधनों को समुचित रूप से प्रयोग में लाना आवश्यक है। इसलिए व्यवस्थापन आवश्यक है ताकि अधिकाधिक सन्तुष्टि प्राप्त की जा सके।

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प्रश्न 3.
व्यवस्था (Process of Management) की प्रक्रिया के विभिन्न सोपानों या चरणों के नाम लिखें।
उत्तर:
व्यवस्था की प्रक्रिया एक शृंखला है जिसके विभिन्न चरण निम्नलिखित हैं –

  • आयोजन (Planning)।
  • संयोजन अर्थात् संगठन (Organising)
  • क्रियान्वयन एवं नियंत्रण (Implementary and controlling)
  • मूल्यांकन (Evaluation)।

प्रश्न 4.
मूल्यांकन (Evaluation) की कोई दो विधियाँ लिखें।
उत्तर:
1. निरपेक्ष मूल्यांकन (Absolute Evaluation): जब योजना का मूल्यांकन लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही किया जाता है, उसे निरपेक्ष मूल्यांकन कहते हैं।
2. सापेक्ष मूल्यांकन (Relative Evaluation): जब योजना का मूल्यांकन पहले के अनुभवों या किसी अन्य व्यक्ति की उपलब्धियों की तुलना के आधार पर किया जाता है तो उसे सापेक्ष मूल्यांकन कहते हैं। अधिकतर सापेक्ष मूल्यांकन का ही प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 5.
व्यवस्था की प्रक्रिया की श्रृंखला लिखें।
उत्तर:
व्यवस्था की प्रक्रिया की श्रृंखला (Series of process of management)
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प्रश्न 6.
आयोजन (Planning) के चरण लिखें।
उत्तर:
आयोजन के निम्नलिखित चरण हैं :

  •  सबसे पहले दीर्घकालिक व अल्पकालिक लक्ष्यों को निर्धारित कर परिभाषित कर लें।
  • उन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु उपलब्ध साधनों पर सोच-विचार कर सूची बना लें।
  • सभी उपलब्ध साधनों का प्रयोग कब व किसके द्वारा किया जाएगा, इस पर विचार-विनिमय कर लें।

प्रश्न 7.
मूल्यांकन (Evaluation) से क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
मूल्यांकन से अनेक लाभ हैं –

  • इससे निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति या आपूर्ति का ज्ञान होता है।
  • लक्ष्यों की प्राप्ति की असफलता के कारणों का ज्ञान होता है।
  • भविष्य में बनाई जाने वाली योजनाओं हेतु सहायता मिलती है।
  • उचित मूल्यांकन द्वारा लक्ष्यों की पूर्ति या आपूर्ति से क्रमशः प्राप्त सन्तुष्टि या असन्तुष्टि का अंकन होता है जो नयी सूझ-बूझ एवं कल्पनाओं का आधार ही है।

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प्रश्न 8.
व्यवस्था की प्रक्रिया (Process of Management) के मुख्य सोपान आपस में किस प्रकार सम्बन्धित हैं ?
उत्तर:
व्यवस्था की प्रक्रिया के मुख्य सोपान आयोजन, संगठन, क्रियान्वयन एवं नियंत्रण और मूल्यांकन का पारस्परिक सम्बन्ध होता है। यह चारों सोपान एक-दूसरे पर आश्रित हैं। कोई भी एक सोपान दूसरे के बिना अर्थहीन है। व्यवस्थापन की प्रक्रिया एक श्रृंखला के समान है। अतः जब आयोजन प्रारम्भ होता है तो उसके साथ ही व्यवस्थापन भी आरम्भ होता है तथा जब क्रियान्वन भी हो रहा हो तो साथ-साथ मूल्यांकन भी होता रहता है। इन्हीं सोपानों की सहायता से लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है।

प्रश्न 9.
व्यवस्था की प्रक्रिया से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
गृह व्यवस्था पारिवारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया पारिवारिक साधनों का आयोजन, नियन्त्रण एवं मूल्यांकन है। उपलब्ध साधनों से निर्धारित लक्ष्यों को किस सीमा तक प्राप्त किया जा सकता है, यह अधिकांशतः पति-पत्नी की प्रबन्ध करने की योग्यता, रुचि तथा नेतृत्व करने की क्षमता पर निर्भर करता है। न्यूमैन व समर ने प्रक्रिया शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया है, “क्रियाओं की ऐसी श्रृंखला जो उद्देश्य की ओर अग्रसरित करती है।” इस परिभाषा से स्पष्ट है कि एक प्रक्रिया में दो प्रमुख तत्त्व होते हैं-कुछ लक्ष्यों की उपस्थिति एवं उनका क्रियान्वयन ।।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रबंध की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर:
प्रबंध की आवश्यकता (Need for Management)-प्रबंध आज की मुख्य आवश्यकता बन गई है। सही प्रबंध की अनुपस्थिति में यह असंभव है कि उपलब्ध साधनों का प्रयोग करते हुए हम वांछित लक्ष्य तक पहुँच जाएँ। जैसे-जैसे देश विकास करता है, वैसे-वैसे प्रबंध की आवश्यकता भी बढ़ती चली जाती है। उदाहरण के लिए, औद्योगीकरण के परिणाम से महिलाओं के लिए अधिक व लाभप्रद नौकरियाँ, चुनौतीपूर्ण बाजार, घर के उपकरण, परिवार की अधिक गतिशीलता आदि ने महिलाओं के सामने नए विकल्प खोल दिए हैं।

वे सदा अपने आपको बदलाव व चुनौतीपूर्ण वातावरण में पाती हैं। नए वातावरण के अनुसार, समस्या हल करने के लिए उन्हें कई निर्णय करने पड़ते हैं। केवल प्रबंध के द्वारा ही अच्छा परिवर्तन या विकास लाया जा सकता है। बच्चों को ऊँची शिक्षा दिलाने के लिए माता-पिता को भी प्रबंध करना पड़ता है। लोगों को सामाजिक कारणों के लिए भी प्रबंध की आवश्यकता होती है। कुशल प्रबंध व्यक्ति, परिवार और समाज के कल्याण, प्रसन्नता और ऊँचे स्तर पर आधारित होता है।

प्रश्न 2.
प्रबंध की क्या प्रक्रिया है ?
उत्तर:
प्रबंध की प्रक्रिया (The process of management):
घरेलू प्रबंध निम्नलिखित प्रबंध प्रक्रिया से प्राप्त किया जा सकता है –
यह प्रक्रिया, कई कार्यों के द्वारा सफलता की ओर ले जाने वाली है। ये कार्य भिन्न-भिन्न निर्णयों पर, प्रक्रिया की समझ पर तथा कार्य के प्रकार पर आधारित होते हैं। विभिन्न परिवारों का लक्ष्य भी भिन्न होता है। परिवार को वांछित लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए गृहिणी को प्रबंध की वह प्रक्रिया अपनानी पड़ती है जिसमें परिवार के सदस्यों के विभिन्न कार्यों को इकट्ठा कर एक मंजिल की ओर ले जाना पड़ता है।

प्रबंध प्रक्रिया में निम्नलिखित पांच चरण हैं जो एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं –

  • आयोजन
  • संयोजन
  • क्रियान्वयन
  • नियंत्रण
  • मूल्यांकन।

प्रश्न 3.
क्रियान्वयन (Implementation) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
क्रियान्वयन-क्रियान्वयन का अर्थ है योजना को क्रियाशील बनाना। यह प्रबंध प्रक्रिया का क्रियाक्षेत्र है। जब किसी भी योजना को बना लिया गया है तथा साधन जुटाने का काम आयोजित हो चुका है तो अब इसके क्रियाशील होने का समय है। ऊपर लिखित उदाहरण को लेते हुए विद्यार्थी को समय और पढ़ाई की प्रणाली पूरी करनी होगी। यह भी समीक्षा करनी होगी कि लक्ष्य को पाने के लिए आवश्यक तैयारी हो गई या नहीं।

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प्रश्न 4.
संयोजन का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
संयोजन (Organisation): संयोजन प्रबंध का एक कठिन चरण है। योजना की सफलता या असफलता अधिकतर इसी तथ्य पर आधारित होती है कि संयोजन किस प्रकार है ? साधारण शब्दों में संयोजन का अर्थ कहा जा सकता है, वस्तुओं को ठीक ढंग से व्यवस्थित करना। घर मैं अथवा जहाँ कई योजनाएँ बनाई जाती हैं तथा कई कार्य किए जाते हैं, कार्य को कुशलता से करने के लिए किसी प्रकार की व्यवस्था आवश्यक है।

संयोजन की प्रक्रिया अर्थात् संयोजित करने का अर्थ है परिवार के सभी सदस्यों के कार्य को आवश्यक साधनों के साथ मिलाकर कार्य सम्पन्न करना। उपलब्ध साधनों को मिलाकर लक्ष्य तक पहुंचाना ही संयोजन का कार्य है। ऊपर लिखित उदाहरण में संयोजन का अर्थ होगा आर्किटेक्चरल पद्धति के लिए सम्पूर्ण सूचना व पाठ्यक्रम को एकत्रित करना। आपं अपने परिवार से या अध्यापक से सारी सूचनाएँ ले सकते हैं ताकि प्रवेश निश्चित हो जाए। सारांश में कुशल संयोजन ही बहुत-सी समस्याओं का हल है तथा इसका कोई भी दूसरा विकल्प नहीं है।

प्रश्न 5.
व्यवस्था का अर्थ एवं विशेषताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
व्यवस्था का अर्थ एवं विशेषताएँ (Meaning and Characteristics of Man agement): व्यवस्था की प्रक्रिया को गृह में, लगभग प्रत्येक देश में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रयोग किया जाता है जिसके अंतर्गत मानवीय तथा भौतिक साधनों का प्रयोग करके इच्छित लक्ष्यों तक पहुँचा जाता है। व्यवस्था की प्रक्रिया आयोजन, व्यवस्थापन, क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन का मिश्रण है तथा व्यवस्थापक को इन सभी चरणों से परिचित होना आवश्यक है। गृह व्यवस्था जीवन का प्रशासनिक पक्ष होने के कारण न केवल उपर्युक्त चरणों को बल्कि कार्य को प्रेरित करने वाली, निर्णय करने की प्रक्रिया को भी सम्मिलित करता है।

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प्रश्न 6.
वैकल्पिक समाधानों की खोज का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
वैकल्पिक समाधानों की खोज-व्यवस्थापक को अपने ज्ञान, जानकारियों, अनुभवों तथा सलाहों द्वारा विकल्पों को ढूंढना पड़ता है। जब व्यक्ति विकल्पों की खोज करता है तो सिद्धांततः उसे समस्त संभावनाओं से विज्ञ होना चाहिए, परन्तु अनुभव, समय आदि के सीमित होने के कारण ऐसा बहुत कम होता है। स्थायी व मूल्यवान वस्तुओं को खरीदते समय ही लोग निर्णय करने के इस सोपान की ओर ध्यान देते हैं। चरण (1) में दिए गए छात्रा के उदाहरण को यदि हम आगे बढाएं तो निम्नलिखित कुछ वैकल्पिक हल हो सकते हैं:

  • छात्रा के अभिभावकों को उसकी समस्या से परिचित कराया जाए तथा उसके इलाज के लिए प्रेरित किया जाए।
  • मानवता के नाम पर उसके सहपाठियों से या विद्यालय के विभिन्न छात्र-छात्राओं से चंदा जमा कराया जाए तथा इलाज कराया जाए।
  • छात्रा के निर्धन होने की दशा में प्रधानाध्यापिका द्वारा विद्यालय के छात्रनिधि में से कुछ धन निकलवाकर उसकी सहायता की जाए।
  • इलाज के लिए अध्यापिकाओं द्वारा चंदा एकत्र कर लिया जाए।
  • नजदीक के अस्पताल से स्वयं ही उसका इलाज कराया जाए।

प्रश्न 7.
निर्णय (Decision) क्या है ?
उत्तर:
मनुष्य के जीवन में अनेक समस्याएँ आती हैं। इनका समाधान करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी हो जाता है। ऐसी स्थिति में निर्णय लेना आवश्यक हो जाता है। निकलवडोसी के अनुसार, “निर्णय लेने का अर्थ किसी समस्या के समाधान के लिए या किसी स्थिति से निपटने के लिए कई विकल्पों में से किसी एक का चयन है।” गौसवकँडल के अनुसार “निर्णय लेना कई कार्यविधियों में से किसी एक का चयन है अथवा किसी को भी अंगीकार न करना है।”

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
गृह-व्यवस्था की प्रक्रिया के कौन-से मुख्य तत्त्व हैं ?
उत्तर:
अधिकांश लोग यह समझते हैं कि गृह-प्रबन्ध परिवार की सभी समस्याओं का पका-पकाया हल तैयार कर देता है। यह धारणा गलत है। वस्तुतः वह केवल उस ढाँचे का निर्माण कर देता है जिससे समस्याएँ स्वाभाविक रूप से हल होती चली जाएँ। निकिल तथा जरसी के अनुसार “गृह-प्रबन्ध के अन्तर्गत परिवार के साधनों का नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन आता है, जिसके द्वारा पारिवारिक उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।”
गृह-प्रबन्ध के तीन मुख्यं अंग होते हैं –
1. नियोजन
2. नियन्त्रण
3. मूल्यांकन।
ये तीनों प्रक्रियाएँ परस्पर सम्बद्ध होती हैं और इनका उपयोग परिवार के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता है। ये तीनों मानसिक प्रक्रियाएँ हैं।
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uifraifich gut an unfa (Achievement of family goals) :
(क) नियोजन (Planning): व्यवस्था प्रक्रिया का प्रथम चरण नियोजन है। आज नियोजन से कोई क्षेत्र नहीं बचा है। नियोजन व्यक्तिगत स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक पाया जाता है। घर में गृहिणी सुबह उठते ही दिन भर के कार्यक्रमों की योजना का ध्यान रखती है। वास्तव में “नियोजन किसी भावी कार्य का पर्वानमान है” “किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए क्या विधि हो, आयोजन इसका निश्चय करता है।”

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कून्ज व ओडोनेल के अनुसार “आयोजन किसी व्यक्ति को क्या करना है, उस कार्य को कैसे करना है, उसे कब करना है व उसे कौन करेगा इसका पूर्व निर्धारण है।” नियोजन वर्तमान व भविष्य के बीच की कड़ी है। नियोजन कार्य आरम्भ होने से पहले ही कर लिया जाता है। भविष्य में किए जाने वाले कार्य का यह पूर्वाभ्यास (Mental Rehearsal) है। इससे भावी कार्य की रूपरेखा तैयार हो जाती है।

आयोजन का लक्ष्यों से सीधा सम्बन्ध है। यदि लक्ष्य स्पष्ट हैं तो आयोजन आसान हो जाएगा परन्तु यदि लक्ष्यों को प्राप्त करने के मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ एवं अवरोध होते हैं तो आयोजन करने में अधिक कठिनाई होती है। आयोजन निर्माण करने का ही कार्य है। इसमें योजना बनाने वाले को विचारण, स्मरण, निरीक्षण, तर्कता तथा कल्पना आदि मानसिक शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है।

नियोजन में स्मरण-शक्ति के माध्यम से अतीत के अनुभवों का उपयोग किया जाता है, तर्कता के माध्यम से तथ्यों के मध्य सम्बन्धों को देखा जाता है तथा कल्पना के माध्यम से तथ्यों को नवीन सम्बन्धों के संदर्भ में व्यवस्थित किया जाता है। ये मानसिक शक्तियाँ जितनी अधिक विकसित होती हैं, अयोजन उतना ही अधिक यथार्थ एवं सरल होता जाता है।

आयोजन की विधि (Techniques of Planning):
1. पूर्वानुमान (Forecasting): यह भविष्य में सम्भावित परिस्थितियों पर दृष्टिपात है। इसमें पहले अधिकतम जानकारी एकत्रित की जाती है। यह निश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि भविष्य में कैसी स्थितियाँ रहने की अधिकतम सम्भावना है।

2. लक्ष्य बनाना (Developing objective): पहले लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित कर लिया जाता है। लक्ष्य स्पष्ट होने पर ही अग्रसर हुआ जा सकता है।

3. कार्यक्रम (Programme): लक्ष्य तक क्रमिक अवस्थाओं में कैसे पहुँचा जाए यह निश्चित किया जाता है। कार्यक्रम का अर्थ है कार्यों का वह क्रम जिससे लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। इसमें यह स्पष्ट किया जाता है कि कार्य को करने में समय, शक्ति, धन व अन्य साधनों का कितना उपयोग करना होगा।

4. समय-तालिका (Scheduling): यह कार्यक्रम में निर्धारित क्रियाओं को करने का समय-क्रम है। कार्यक्रम में परिस्थितियों के अनुसार संशोधन किया जा सकता है।

5. बजट बनाना (Budgeting): यह नियोजन का आर्थिक पक्ष है। गृह प्रबन्ध के संदर्भ में यह चरण सभी गतिविधियों में आवश्यक नहीं है परन्तु धन से सम्बन्धित सभी लक्ष्यों के आयोजन का यह महत्त्वपूर्ण अंग है।

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6. कार्यविधि (Developing procedures): कार्यविधि यह निर्धारित करती है कि किसी कार्य को सफलता से सम्पन्न करने के लिए कौन-सी विधि उचित रहेगी। यह कार्य को सबसे कुशलतापूर्वक करने की विधि की खोज है।

7. नीतियों का विकास (Developing policies): नीति किसी कार्य को एक विशिष् प्रकार से करने का निर्देश है । लक्ष्यों का निर्धारण करने के उपरान्त ही नीतियों का निर्धारण सम्भट है. चूँकि नीति उस लक्ष्य तक पहुँचने का माध्यम है। संक्षेप में नियोजन के विभिन्न चरणों को निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया उ सकता है

आयोजन की क्रिया – निश्चित करती है –

  • पूर्वानुमान – सम्भावित स्थितियों का अनुभव
  • लक्ष्य बनाना – प्राप्त किए जाने वाले परिणाम
  • कार्यक्रम बनाना – किए जाने वाले कार्यों का क्रम
  • समय तालिका बनाना – कार्यों का समय क्रम
  • बजट बनाना – आवश्यक आर्थिक साधन
  • कार्यविधि विकसित – करना कार्य सरलीकरण आदि
  • नीतियों का विकास – इस सम्बन्ध में लिए गए निर्णय

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1. लम्बी अवधि की योजनाएँ (Long term Planning): ये स्वभाविक रूप से दीर्घकालिक व अधिक महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए रहती हैं। एक परिवार द्वारा बनाई गई एक दस वर्षीय बचत योजना इसका उदाहरण है। ऐसी योजनाओं में लचीलापन भी होना चाहिए ताकि उनमें आवश्यकतानुसार संशोधन किया जा सके।

2. अल्प अवधि की योजनाएँ (Short term planning): यह अपेक्षाकृत कम महत्त्व व कम अवधि तक चलने वाली क्रियाओं का आयोजन है। इसमें कार्यों की दैनिक, साप्ताहिक अथवा मासिक सूची बनाना सम्मिलित है। ये लघु योजनाएँ दीर्घकालिक योजनाओं के ही अंग हैं। उन्हें क्रमिक रूप से प्राप्त करने का साधन हैं परन्तु सभी लघु योजनाएँ प्रत्यक्ष रूप से लम्बी अवधि की योजनाओं से सम्बन्धित नहीं होती।

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(ख) नियन्त्रण (Controlling): किसी कार्य के सम्बन्ध में योजना बनाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि जब योजना कार्यान्वित की जाए तो यह देखना भी अनिवार्य है कि पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कार्य हो रहा है अथवा नहीं। यदि नहों, तो इस प्रकार के निर्देश अथवा सुझाव दिए जाएँ कि कार्य योजनानुकूल हो सके।

नियन्त्रण की प्रमुख तीन अवस्थाएँ हैं :

(अ) बल देना (Energizing): कार्य को प्रारम्भ करके उसे बनाए रखना व्यवस्थापन की एक महत्त्वपूर्ण अवस्था है। व्यक्तियों में योजना को प्रारम्भ करके कार्य करने की योग्यता व प्रेरणा में भिन्नता पायी जाती है। यदि लक्ष्य अपेक्षाकृत अल्प अवधि के हैं तो उन्हें प्राप्त करने की इच्छा अधिक तीव्र रहती है। इसके अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ व प्रसन्नचित्त है तो वह किसी योजना के क्रियान्वयन में अधिक रुचि लेगा। पारिवारिक योजनाओं में परिवार के सदस्यों को प्रेरित करना भी इस चरण का एक भाग है। उत्प्रेरण वह क्रिया है जिसके द्वारा व्यवस्थापक दूसरे सदस्यों को आवश्यक कार्य में सहयोग करने हेतु प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है।

(ब) निरीक्षण (Checking): समय-समय पर क्रियान्वित योजना का निरीक्षण करते रहने से योजना पर नियन्त्रण-सा बना रहता है। यदि कार्य की प्रगति सन्तोषजनक नहीं है तो कार्य विधि में कुछ परिवर्तन करने पड़ेंगे। नियन्त्रण में लचीला दृष्टिकोण लेकर चलना होता है। इसके अतिरिक्त कार्य के प्रति जागरूकता व अनुशासन के साथ ही लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। कार्य क्रियान्वयन करते समय नेतृत्व देने वाला व्यक्ति नियोजन तथा नियन्त्रण करता है परन्तु हमे परिवार के अन्य सदस्यों के सहयोग से।

निरीक्षण करते समय ध्यान को आकर्षित करने के लिए प्रविधियों (Devices) का होना आवश्यक है। उदाहरण-घड़ी ऐसे व्यक्ति के लिए बिल्कुल ही अनावश्यक सिद्ध होगी जिसे यह ज्ञात नहीं है कि आलू को पकाने के लिए सामान्यतः कितना समय चाहिए।

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(स) समायोजन (Adjusting): यदि आवश्यक हो तो योजना का समायोजन करना पड़ता है। उदाहरण-समय न मिलने पर उबले आलुओं की सब्जी न बनाकर परांठे बना दिए। परिस्थिति बदल जाने पर नवीन निर्णय लेने पड़ते हैं। कभी-कभी स्थितियाँ यथावत् रहती हैं, परन्तु योजना में भी दोष हो सकता है। तब योजना में सुधार कर अपने निर्णयों में परिवर्तन करता पड़ता है।

योजना को व्यावहारिक बनाने में निर्देशन व मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होती है। कुशल निर्देशन द्वारा स्वयं व दूसरों से अपेक्षाओं के अनुरूप काम लिया जाता है। कार्य की प्रकृति को समझना होता है। उसे पूर्ण करने की विधियाँ भी ज्ञात होनी चाहिए। परिवार के सदस्यों में नई स्फूर्ति भी जागृत करनी होती है ताकि कार्य ठीक से हो सके। परिवार के छोटे सदस्यों के लिए मार्ग-दर्शन भी आवश्यक हो जाता है।

नियन्त्रण की सफलता कई बातों पर निर्भर करती है:
1. उपयुक्त निरीक्षण-निरीक्षण दो प्रकार से किया जा सकता है :
(अ) निर्देशन द्वारा (By Direction): सभी प्रकार के आवश्यक निर्देश दिए जाना आवश्यक है ताकि वांछित परिणाम प्राप्त हो सके।
(ब) मार्गदर्शन द्वारा (By Guidance): मार्गदर्शन में कार्य के परिणाम की अपेक्षा व्यक्ति के व्यक्तिगत गुणों के विकास का प्रमुख उद्देश्य होता है।
कुछ स्थितियों में यात्रिक उपकरणों द्वार माप सम्भव है। यदि रसोई में वैज्ञानिक तुला अथवा साधारण तराजू है तो भोज्य विधि में पदार्थ सही मात्रा में लिये जा सकते हैं।
2. निरीक्षण में शीघ्रता।
3. नए निर्णय-निरीक्षण करने पर यदि दोष दिखाई देते हैं तो शीघ्र निर्णय लेकर उन्हें दूर किया जाना चाहिए।
4. नियन्त्रण में लचीलापन-योजना के लक्ष्यों में तथा नियन्त्रण की विधियों में वांछनीय परिवर्तन करने की सम्भावना बनी रहनी चाहिए।
5. अनुशासन।
6. उचित नेतृत्व।

(ग) मूल्यांकन (Evaluation): मूल्यांकन में सम्पूर्ण योजना व उसके कार्यान्वयन का पुनरीक्षण है। यहाँ यह देखा जाता है कि योजना में अपेक्षित सफलता मिली है या नहीं। यदि नहीं मिली है तो उसके कारणों पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।
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  1. आगामी समस्या हेतु-निर्णय
  2. सफलता का मूल्यांकन-लक्ष्य
  3. योजना के क्रियान्वयन का नियन्त्रण-क्रिया
  4. समस्या-आयोजन

लेविन के अनुसार मूल्यांकन के चार प्रयोजन होते हैं –

  1. यह देखना कि कितनी उपलब्धि हो चुकी है।
  2. आगामी योजना हेतु आधार का कार्य करना।
  3. पूरी योजना को संशोधित करने हेतु आधार का कार्य करना।
  4. नवीन सूत्र प्राप्त करना।

मूल्यांकन किसका-मूल्यांकन के दो प्रमुख तत्त्व हैं –

  1. स्वयं का मूल्यांकन (Self evaluation)।
  2. व्यवस्था प्रक्रिया का मूल्यांकन (Evaluation of the process of management)।

1. स्वयं का मूल्यांकन-शिक्षा उद्योग अथवा व्यवसाय में मूल्यांकन अपेक्षाकृत सरल है। यहाँ चूंकि एक समूह रहता है, अत: उपलब्धि के आधार पर तुलनात्मक विवेचना सम्भव है। परिवार में स्थिति भिन्न है। परिवार छोटा समूह है और उसमें भी गहकार्य करने वाली ज्यादा अकेली गृहिणी होती है। गृहिणी को स्वयं ही मूल्यांकन करना होगा। परिवार के सदस्य भी एक-दूसरे की उपलब्धियों का निष्पक्ष विवेचन कर सकते हैं। दूसरी गृहिणियों की कार्यावधि तथा उपलब्धियों का निरीक्षण कर अथवा उनकी चर्चा कर गृहिणी तुलनात्मक मापदण्ड बना सकती है जिसके आधार पर मूल्यांकन सम्भव है।

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2. स्व मूल्यांकन-यहाँ गृहिणी स्वयं से एक प्रश्न पूछ सकती है “यदि मुझे यही कार्य पुनः करना पड़ा तो मैं अधिक सफलता प्राप्त करने के लिए क्या परिवर्तन करूँगा?”

3. एक डायरी रखना-इसमें गृहिणी प्रतिदिन की उपलब्धियों का विवरण लिख सकती है। उसे अपनी उपलब्धियाँ देखकर सन्तोष होगा। साथ ही यह भी ज्ञात होगा कि यहाँ कार्य क्षमता के अनुरूप नहीं हो पाए हैं।

(अ) सापेक्ष मूल्यांकन (Relative Evaluation): सापेक्ष मूल्यांकन में पूरी हो चुकी योजना के प्राप्त लक्ष्यों की तुलना किसी आधार से की जाती है अर्थात् योजना की समाप्ति पर लक्ष्यों की प्राप्ति किस अंश तक हुई है इसकी तुलनात्मक विवेचना की जाती है, जैसे-अन्य परिवारों द्वारा प्राप्त लक्ष्य, पिछली योजनाओं में प्राप्त लक्ष्य आदि।
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(ब) निरपेक्ष मूल्यांकन (Absolute Evaluation): इससे प्राप्त लक्ष्यों की तुलना नहीं. की जाती बिना तुलना के ही यह पता लगाया जाता है कि योजना किस सीमा तक सफल रही परन्तु वास्तव में निरपेक्ष मूल्यांकन असम्भव-सा ही है। जब भी गृह-प्रबन्धकर्ता किसी कार्य को अच्छा अथवा बुरा बताता है तो उसके मस्तिष्क में उस कार्य के परिणाम का चित्र अवश्य होता है। यदि कार्य उस विचार से कम हो तो प्रगति को मन्द तथा यदि कार्य सोचे हुए परिणाम से ज्यादा हो तो उसे लक्ष्य प्राप्ति में सफलता समझा जाता है।

प्रश्न 2.
निर्णय-प्रक्रिया को विस्तार से लिखें।
उत्तर:
निर्णय-प्रक्रिया के निम्नलिखित पाँच प्रमुख सोपान हैं :
1. समस्या की व्याख्या (Definition of Problem):
इसमें किसी समस्या के रूप व उसके महत्त्व को स्पष्टतः समझ लेना चाहिए। कई बार स्थिति को ठीक से समझे बिना ही निर्णय ले लिये जाते हैं। ऐसे निर्णय बाद में हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं। इस समस्या के मूल में निहित तत्त्वों को पहचान लेना सदा आसान नहीं होता है। कई बार ऐसी समस्या पर विचार करना होता है जिसके विषय में उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं होता।

परिणामतः इसमें अस्पष्टता रह जाती है। जिस समस्या को हल करने के लिये निर्णय लिए जाते हैं वह समस्या परिवार के सभी सदस्यों के मस्तिष्क में स्पष्ट होनी चाहिए। समस्या की जड़ तक जाए बिना उसे ठीक से समझा नहीं जा सकता, न ही उचित समाधान खोजा जा सकता है।

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2. विभिन्न सम्भावित हलों की खोज (Search for Altermate Solutions): विभिन्न विकल्प तथा उनके परिणामों का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। विकल्प को ढूँढ़ने की सभी सम्भावनाओं पर विचार करना चाहिए।
उदाहरण-यदि गृहिणी बीमार पड़ जाती है तो घर की देखभाल –

  • या तो पति करेगा।
  • नौकर ढूँढना।
  • महिला सम्बन्धी को कुछ दिन के लिए बुलाना।

इनमें से कौन-सा विकल्प सही है, यह परिस्थिति के अनुसार परिवार को निश्चित करना होगा। अनेक विकल्प होने के कारण निर्णय लेने में गड़बड़ी की सम्भावना भी रहती है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति के पास समय और अनुभव सीमित होते हैं।

3. विभिन्न सम्भावित हलों पर चिन्तन (Thinking about alternate solution): इस विषय पर गहराई से विचार करना चाहिए। प्रत्येक विकल्प के अच्छे-बुरे परिणाम क्या हो सकते हैं, इनको सूचीबद्ध भी किया जा सकता है। अच्छा विकल्प वह है जिससे परिवार के अल्पकालीन लक्ष्य पूरे करने में सहायता मिले व दीर्घकालीन लक्ष्यों पर भी विपरीत प्रभाव न पड़े। ‘प्रत्येक विकल्प के परिणाम अनिश्चित भविष्य के गर्त में निहित होते हैं।

भविष्य आंशिक रूप से इसलिए अनिश्चित होता है क्योंकि उसे बाहरी परिवर्तन प्रभावित करते हैं। उनके सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना प्रायः असम्भव है। इसके अतिरिक्त वह इसलिए भी अनिश्चित होता है क्योंकि भविष्य में विकल्प के प्रति व्यक्ति की भावना में परिवर्तन आ सकता है। इस सोपान को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए कल्पना-शक्ति महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

4. उपयुक्त हल का चयन (Selection of possible solution)-अपने सम्भावित विकल्पों में से एक को चुन लेना चाहिए जिससे सबसे अधिक वांछित परिणामों की आशा हो। इसके अतिरिक्त अपनी आवश्यकताओं, लक्ष्यों एवं उपलब्ध साधनों के आधार पर सर्वोत्तम विकल्प का चयन किया जाता है।

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5. निर्णय के परिणामों का स्वीकारण (Acceptance of results of decisions)-जो निर्णय लिये जाते हैं वे सदा आकर्षक नहीं दिखते । कभी-कभी यह होता है कि न चुने हुए विकल्पों में कुछ तत्त्व बड़े आकर्षक लगते हैं। ऐसी स्थिति में निर्णय लेने वाले व्यक्ति को परेशानी अनुभव हो सकती है परन्तु सभी स्थितियों में निर्णयों के परिणाम जो भी हों, उनका स्वीकारण आवश्यक है।

प्रश्न 3.
टोस्टर खरीदने के लिए निर्णय प्रक्रिया के सोपान विस्तार से लिखें।
उत्तर:
टोस्टर खरीदने के लिए निर्णय प्रक्रिया के सोपान –
1. सूचना एकत्रित करना (Obtain Information):
(क) ब्रांड्स का मिलना (Brands available)
(ख) गारंटी (Guarantee)
(ग) मानकीकरण चिह्न (Standardization mark)
(घ) कीमत (Cost)
(ङ) वोल्टेज (Voltage)
2. धनात्मक व ऋणात्मक प्रभाव-प्रत्येक विकल्प का मूल्यांकन करना तथा विभिन्न सम्भावित हलों की खोज।
3. विभिन्न सम्भावित हलों पर चिन्तन।
4. उपयुक्त हल का चयन।
5. सबसे अच्छी ब्रांड का चयन और खरीदना।

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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 14 साधन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science साधन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
खमीर में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु होते हैं।
(क) एककोशीय
(ख) बहुकोशीय
(ग) द्विकोशीय
(घ) तृ-कोशीय
उत्तर:
(क) एककोशीय

प्रश्न 2.
फफूंदी के जीवाणु तापमान में पनपते हैं।
(क) 20°C – 25°C
(ख) 25°C – 30°C
(ग) 30°C – 35°C
(घ) 35°C – 40°C
उत्तर:
(ख) 25°C – 30°C

प्रश्न 3.
एककोशीय सूक्ष्म जीवाणु के लिए उचित तापमान की आवश्यकता होती है।
(क) 25°C-30°C
(ख) 30°C – 35°C
(ग) 35°C-40°C
(घ) 40°C – 45°C
उत्तर:
(क) 25°C-30°C

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प्रश्न 4.
एकलोटॉक्सिन Aflofoxin कहलाता है।
(क) विषैला पदार्थ
(ख) स्टार्चयुक्त पदार्थ
(ग) क्षारीय पदार्थ
(घ) अम्लीय पदार्थ
उत्तर:
(क) विषैला पदार्थ

प्रश्न 5.
बैक्टीरिया एक प्रकार का जीवाणु है
(क) एककोशीय
(ख) बहुकोशीय
(ग) द्वि-कोशीय
(घ) ती-कोशीय
उत्तर:
(क) एककोशीय

प्रश्न 6.
मानवीय साधन के अंतर्गत आते हैं। [IB.M.2009A]
(क) ज्ञान
(ख) धन
(ग) संपत्ति
(घ) आभूषण
उत्तर:
(क) ज्ञान

प्रश्न 7.
साधनों की व्याख्या करने से -[B.M.2009AL ]
(क) उपलब्ध साधनों को प्रयोग कर लक्ष्य प्राप्त हो सकता हैं
(ख) खर्च कम होता है
(ग) आवश्यकताओं की पूर्ति होती है
(घ) शक्ति का दूर उपयोग नहीं होता
उत्तर:
(क) उपलब्ध साधनों को प्रयोग कर लक्ष्य प्राप्त हो सकता हैं

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
साधन (Resources) शब्द की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
जो वस्तुएँ और क्षमताएँ हमारी आवश्यकता की पूर्ति में सहायता करती हैं व हमारे · लक्ष्यों तक पहुँचाने में सहायक हैं, उन्हें साधन या संसाधन कहते हैं।

प्रश्न 2.
साधन और संतोष (Resources & Satisfaction) में अन्तःसंबंध बताइए।
उत्तर:
साधन और संतोष में गहरा सम्बन्ध है। यदि एक कार्य को करने के लिए कई साधन चाहिए और यदि वे सन्तुलित मात्रा में उपलब्ध हों तो सन्तोष शीघ्र और अवश्य प्राप्त होता है।

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प्रश्न 3.
मानवीय साधन (Human Resources) क्या हैं, उदाहरण दें।
उत्तर:
जो क्षमताएँ व साधन मानव द्वारा प्राप्त होते हैं उन्हें मानवीय साधन कहते हैं।
ये चार हैं-

  • ज्ञान
  • योग्यताएँ एवं कुशलताएँ,
  • शक्ति
  • अभिवृत्तियाँ व अभिरुचियाँ।

प्रश्न 4.
संसाधन कितने प्रकार के होते हैं ? नाम लिखें।
उत्तर:
संसाधन दो प्रकार के होते हैं-
(i) मानवीय संसाधन
(ii) भौतिक संसाधन

प्रश्न 5.
सभी संसाधनों की कोई दो विशेषताएँ (Characteristics) बताएँ।
उत्तर:
सभी संसाधनों की दो विशेषताएँ निम्न हैं-
1. सभी साधन उपयोगी होते हैं।
2. सभी साधन सीमित होते हैं।

प्रश्न 6.
भौतिक साधन (Non Human Resources) किन्हें कहते हैं ? उदाहरण दें।
उत्तर:
जो साधन भौतिक रूप में प्राप्त होते हैं, उन्हें भौतिक साधन या अमानवीय साधन कहा जाता है।
ये निम्न हैं-
1. धन,
2. वस्तुएँ,
3. सम्पत्ति,
समय व सामुदायिक सुविधाएँ।

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प्रश्न 7.
“निर्णय लेना’ (Decision making) से क्या तापलं है?
उत्तर:
अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव ही निर्णय है।

प्रश्न 8.
सार्वजनिक या जन सुविधाएँ क्या हैं ?
उत्तर:
जो सुविधाएं सार्वजनिक उपयोग के लिए होती हैं और सब इसका प्रयोग करते हैं, उन्हें सार्वजनिक या जन सुविधाएँ (Public Conveniences)
कहते हैं।
ये निम्न हैं-

  1. पार्क
  2. सार्वजनिक परिवहन
  3. पुस्तकालय
  4. अस्पताल व डिस्पेन्सरी
  5. स्कूल तथा कॉलेज
  6. सार्वजनिक शौचालय
  7. सार्वजनिक नल
  8. सड़कें तथा गलियाँ
  9. सार्बजनिक इमारतें
  10. बिजली पानी
  11. पेड़ आदि

प्रश्न 9.
“साधन सीमित हैं” (Resources are limited) स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सभी साधन चाहे वे मानवीय हों या अमानवीय एक निश्चित सीमा तक ही प्रयोग में लाये जा सकते हैं। एक परिवार के पास निश्चित आय होती जिसमें उसे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करना पड़ता है। एक विद्यार्थी के पास एक निश्चित कार्य करने के लिए सीमित ही समय होता है जिसमें उसे पढ़ाई सम्बन्धी कार्य करने होते हैं। अतः सभी साधन सीमित होते हैं।

प्रश्न 10.
साधनों को व्यवस्थित (Organisation of Resources) करने से क्या लाभ हैं? अथवा, लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों को व्यवस्थित करना आवश्यक है या नहीं? यदि हाँ, तो क्यों?
उत्तर:
साधनों को व्यवस्थित करने से यह लाभ है कि हम सीमित साधनों से अधिकाधिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं। अधिकतम लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं। यदि हम इनका व्यवस्थित प्रयोग नहीं करेंगे तो ये साधन बेकार जा सकते हैं। व्यवस्थित करने से हम अपने समस्त साधनों से अवगत हो सकते हैं, और अपने दृष्टिकोण एवं अभिवृत्तियों में परिवर्तन लाकर अपने उपलब्ध साधनों में वृद्धि भी कर सकते हैं।

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प्रश्न 11.
साधनों का प्रबन्ध करना (Arrangement of Resources) क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
सभी साधन सीमित होते हैं और उनकी उपलब्धि भी सीमित होती है। हमारी आवश्यकताएँ व लक्ष्य असीमित होते हैं। इन्हीं सीमित साधनों द्वारा हमें असीमित आवश्यकताओं और लक्ष्यों की प्राप्ति करनी होती है। यह तभी सम्भव है जब हम नियोजित ढंग से सोच-विचार कर इनका उपयोग करें ताकि अधिकाधिक आवश्यकताएं पूरी हो सकें व अधिकाधिक लक्ष्यों की प्राप्ति हो सके। इसीलिए साधनों का प्रबंध अति आवश्यक है।

प्रश्न 12.
निर्णय की प्रक्रिया के विभिन्न चरण (Process of decision making) कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव ही निर्णय लेना कहलाता है। निर्णय लेने की प्रक्रिया के पाँच मुख्य सोपान हैं जो निम्नलिखित हैं समस्या को परिभाषित करना। समस्या के समाधान के लिए विभिन्न विकल्पों की खोज करना। विभिन्न विकल्पों पर विचार-विनिमय। सर्वोत्तम विकल्प का चयन करना । अन्तिम निर्णय लेना या निर्णय की स्वीकृति।

प्रश्न 13.
यदि निर्णय प्रक्रिया में एक चरण रह गया है, तो क्या होगा?
उत्तर:
यदि निर्णय प्रक्रिया में एक चरण रह गया है तो सही निर्णय लेने में हम गलत साबित होंगे।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
साधन किसे कहते हैं ? किन दो वर्गों में इन्हें वर्गीकृत किया जाता है ?
उत्तर:
उत्तम गृह व्यवस्था के लिए पारिवारिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु तथा उच्च जीवन स्तर बनाने हेतु साधनों की आवश्यकता होती है। इन्हीं साधनों को गृह व्यवस्था का आधार माना जाता है। पारिवारिक साधनों को मुख्यत: दो वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है –
(क) मानवीय साधन (Human Resources)
(ख) भौतिक साधन (Material Resources)
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प्रश्न 2.
सामुदायिक सुविधाएँ किन्हें कहते हैं ?
उत्तर:
सामुदायिक सुविधाएं (Community Resources): सड़क, पार्क, शैक्षणिक संस्थाएँ, पानी, बिजली की सुविधाएँ, ईंधन, पुलिस संरक्षण, अग्नि शमन सहायता, पुस्तकालय, बाजार, यातायात सेवाएँ आदि सामुदायिक सुविधाएँ हैं जिनकी व्यवस्था सामाजिक समूह के लिए की जाती है। अलग-अलग लक्ष्यों के लिए इनमें से अलग-अलग साधन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3.
“मूल्यांकन (Evaluation) भविष्य की योजनाओं का आधार है” इस कथन की विवेचना करें।
उत्तर:
मूल्यांकन व्यवस्था की प्रक्रिया का अन्तिम चरण है जो भविष्य की योजनाओं के लिए अति महत्त्वपूर्ण है। मूल्यांकन अर्थात् प्राप्त मूल्यों का अंकन करना, यह आंकना कि निर्धारित उद्देश्य कितनी सीमा तक पूरे हुए। लक्ष्य प्राप्ति की सफलता को आंकने के लिए मूल्यांकन अति आवश्यक है। यह आवश्यक नहीं कि मूल्यांकन केवल लक्ष्य प्राप्ति के बाद ही किया जाए।

यह व्यवस्थापन के प्रत्येक चरण पर निर्णय लेने के लिए किया जाता है। इसमें हमें लक्ष्यों की पूर्ति अथवा आपूर्ति के उत्तरदायी कारणों का ज्ञान होता है जिससे भविष्य में बनाई जाने वाली योजनाओं में सहायता मिलती है। पिछली योजनाओं की त्रुटियों में आवश्यक सुधार लाकर सूझ-बूझ से नई योजनाएं बनाई जा सकती हैं। अतः स्पष्ट है कि मूल्यांकन भविष्य की योजनाओं का आधार है।

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प्रश्न 4.
सामुदायिक सुविधाओं का दुरुपयोग क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर:
सामुदायिक सुविधाओं का दुरुपयोग (Misuse of Community Resources)सामुदायिक सुविधाएँ सीमित हैं और इसीलिए उन पर अंकुश लगाना आवश्यक है। उनका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए । चूँकि हम सब उनको मिलकर बाँटकर प्रयोग करते हैं यह हम सबका कर्तव्य हो जाता है कि उनके संरक्षण के लिए उचित उपाय करें। हमें केवल अपने अधिकारों का ही ज्ञान नहीं होना चाहिए अपितु अपने दायित्वों के प्रति भी सजग होना चाहिए।

उदाहरण के लिए, सरकारी जमादार सफाई करने के लिए होता है, परन्तु यह हम सबका कर्त्तव्य है कि किसी को भी सड़कों पर गंदगी फैलाते देखें तो उसे रोकें। सामान्यतः विद्यार्थियों को जेब खर्च के रूप में सीमित धन मिलता है। अगर अपने पैसे को योजनाबद्ध तरीके से खर्च नहीं करेंगे तो क्या होगा? आपके राशन कार्ड पर मिट्टी के तेल की सीमित मात्रा मिलती है।

अगर आप ईंधन को सावधानी से प्रयोग नहीं करेंगे तो आपका खाना नहीं पकेगा। उपजाऊ धरती कम है और उगने वाला चारा भी सीमित है। एक किसान को चारे का प्रबंध सावधानी से करना होगा ताकि उसके पशु स्वस्थ रहें। आपको साधनों का प्रबंध करना आवश्यक है ताकि अपने लक्ष्य तक पहुँचने की खुशी प्राप्त हो।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
साधन क्या हैं ? साधनों को किस प्रकार वर्गीकृत किया जाता है ? विस्तार से समझाइए। [B.M.2009A]
उत्तर:
प्रत्येक परिवार के समक्ष कुछ लक्ष्य रहते हैं। इन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु साधनों का उपयोग करना होता है। ग्रीन व कैंडल के अनुसार “अच्छे गृह-प्रबन्ध का उद्देश्य परिवार को अधिकतम संतुष्टि के लिए पारिवारिक साधनों का उपयोग करना है।”आयरिन ओपनहाइन के मत से “पारिवारिक साधनों का प्रबन्ध गृह-व्यवस्था के सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में से एक है।” गृह-व्यवस्था में पारिवारिक साधनों का प्रयोग ऐसी सफलता के साथ किया जाता है ताकि निर्धारित मूल्यों एवं लक्ष्यों की प्राप्ति हो। पारिवारिक साधनों को कई प्रकार से वर्गीकृत किया गया है।

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गृह विज्ञान की एक परिचर्चा में साधनों को इस प्रकार वर्गीकृत किया गया था –

  1. तकनीकी साधन (Technological resources): इसके अन्तर्गत परिवार के लिए उपयोगी वस्तुएँ व उपकरण आते हैं। ये साधन प्राकृतिक भी हो सकते हैं व मानव निर्मित भी।
  2. सामाजिक साधन (Social resources): इसमें विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ आती हैं जो परिवार के लिए उपयोगी हैं, जैसे-क्लब, बैंक, पुस्तकालय आदि।
  3. मानवीय साधन (Human resources): जैसे भावनाएँ, विचार, अभिरुचि आदि।

आयरिन ओपनहाइन के अनुसार साधनों के निम्नलिखित तीन प्रकार हैं –

  • मानवीय साधन (Human resources)
  • आर्थिक साधन (Economic resources)
  • पर्यावरण सम्बन्धी साधन (Environmental resources)

ग्रीन व कैंडल ने साधनों को दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया है –
(क) मानवीय साधन (Human resources)
(ख) भौतिक साधन (Material or Non-human resources)।
यदि हम तालिका बनाएँ तो इन साधनों का उपविभाजन इस प्रकार से कर सकते हैं-

(क) मानवीय साधन-

  • समय
  • शक्ति
  • अभिरुचियाँ
  • क्षमताएँ व दक्षता
  • ज्ञान
  • अभिवृत्तियाँ

(ख) भौतिक साधन:

  • भौतिक वस्तुएँ
  • धन
  • सामुदायिक सुविधाएँ

(क) मानवीय साधन (Human Resources):
1. समय-समय एक महत्त्वपूर्ण साधन है। इसके अन्तर्गत मिनट, घण्टे, दिन आदि आते . हैं। समय का सही उपयोग निश्चित ही वांछित लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक होता है। घरेलू कार्यों के करने में व्यय होने वाली समयावधि इसके अन्तर्गत आती है, जैसे एक घंटा, एक दिन, एक सप्ताह, अल्प समयावधि, दीर्घ समयावधि आदि। समय का उचित व्यवस्थापन बहुत जरूरी है। यह तो परिवार के सदस्यों पर निर्भर करता है कि वह समय का किस प्रकार सदुपयोग करें।

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2. शक्ति-किसी भी कार्य को सम्पन्न करने में शक्ति का उपयोग करना होता है जैसे वस्त्र धोने, बर्तन व घर की सफाई आदि । काम करने की क्षमता प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग होती है। यदि परिवार के सदस्यों में शक्ति अधिक होगी तो वह उसका उचित व्यवस्थापन करके अन्य साधनों को प्राप्त करने में सहायता करेगी।

3. अभिरुचियाँ-कार्य प्रायः थकान वाला होता है परन्तु अभिरुचि उस कार्य को रोचक बना देती है तथा उसे शीघ्र पूरा करने में सहायक होती है।

4. क्षमताएँ-इसके अन्तर्गत प्रकृति प्रदत्त तथा अर्जित दोनों ही प्रकार की योग्यताएँ सम्मिलित होती हैं। कुशलता से अभिप्राय गृह-सम्बन्धी विभिन्न कार्य करने की कुशलता, जैसे-सीने, काढ़ने, बुनने आदि की कुशलता है। परिवार के सदस्यों के कार्य निपुण होने पर पारिवारिक लक्ष्यों की प्राप्ति और भी सहज हो जाती है। यदि गृहिणी या परिवार का कोई अन्य सदस्य कपड़े सिलने में निपुण हो तो परिवार को दर्जी की सिलाई पर व्यय नहीं करना पड़ता है।

5. ज्ञान-समुचित ज्ञान परिवार के कुशल संचालन में सहायक होता है। उदाहरणार्थ संतुलित आहार का ज्ञान पारिवारिक स्वास्थ्य बनाए रखने में सहायक होगा। बाजार का ज्ञान होने पर गृहिण उत्तम वस्तुएँ सस्ते मूल्य पर क्रय कर सकेगी। बाल विकास का ज्ञान बच्चों के उचित लालन-पालन में सहायक हो सकता है।

6. अभिवृत्तियाँ-वे इच्छाएँ तथा भावनाएँ अभिवृत्ति कहलाती हैं जो किसी कार्य को करने के लिए व्यक्ति को उत्प्रेरित अथवा निरुत्साहित करती हैं। परिवार का दृष्टिकोण सकारात्मक . (Positive) अथवा नकारात्मक (Negative) हो सकता है। सकारात्मक अथवा आशावादी दृष्टिकोण उद्देश्य की प्राप्ति में सहायक होता है। यह विषम परिस्थितियों से जूझने में भी सहायक होता है।

(ख) भौतिक साधन (Material or Non-human Resources):

1. भौतिक वस्तुएँ-परिवार के लिए उपयोगी सभी वस्तुएँ इस श्रेणी में आती हैं, जैसे-खाद्य पदार्थ, वस्त्र, मकान, पुस्तकें, फर्नीचर आदि । ये वस्तुएँ स्थाई (Permanent) अथवा अस्थाई (Perishable) हो सकती हैं। विभिन्न कार्यों के सम्पादन में ये वस्तुएँ सहायक होती हैं, जैसे-आवास के लिए मकान आवश्यक है। यह साधन मानवीय साधनों की भाँति काफी महत्त्वपूर्ण है। इनका प्रयोग अन्य साधनों के क्रय के लिए किया जा सकता है, किन्तु इन साधनों की सहायता से केवल भौतिक वस्तुओं का ही क्रय किया जा सकता है तथा इनके द्वारा मानवीय साधनों को पाना कठिन होता है।

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2. धन-यह साधन भी मानवीय साधनों की भाँति काफी महत्त्वपूर्ण है । धन के बदले वस्तुएँ, सेवाएँ हैं, जिनसे यांत्रिक शक्ति प्राप्त होती है। बचत, विभिन्न प्रकार के विनियोजित आय धन के अन्तर्गत आते हैं। धन के अभाव में परिवार का संचालन असम्भव है।

3. सामुदायिक सुविधाएँ-पुलिस संरक्षण, शैक्षिक सुविधाएँ, सड़क, पार्क, पुस्तकालय, बाजार, यातायात सेवाएँ जिनकी व्यवस्था सामाजिक समूह द्वारा की जाती है, वे इस वर्ग के साधन हैं। समाज द्वारा व्यक्ति अथवा परिवार के लिए प्राप्त सुविधाएँ इस वर्ग में आती हैं।

प्रश्न 2.
साधनों के सामान्य गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
साधनों में निम्नलिखित विशेषताएँ समान रूप से पायी जाती हैं।
1.सभी साधन सीमित हैं (Resources are limited)-साधन सदा सीमित रहते हैं अन्यथा उनके व्यवस्थापन की आवश्यकता ही नहीं रहती। साधन जितने सीमित होते हैं, उसी अनुपात में उनका महत्त्व बढ़ जाता है। गृहिणी को उनके उपयोग करने में उतनी ही दक्षता की आवश्यकता होती है। साधनों की दो प्रकार की सीमाएँ होती हैं-
(अ) संख्यात्मक सीमाएँ
(ब) गुणात्मक सीमाएँ

(अ) संख्यात्मक सीमाएँ (Quantitative): विभिन्न साधनों की सीमा भिन्न-भिन्न होती हैं। समय सर्वाधिक सीमित साधन है। एक दिन में चौबीस घण्टे से अधिक समय नहीं हो सकता। व्यक्ति भी एक सीमित साधन है। हालांकि इसकी सीमाएँ भिन्न व्यक्तियों में भिन्न हो सकती. हैं। प्रत्येक व्यक्ति को दिन में कछ घण्टे आराम की भी आवश्यकता होती है। यदि वह आराम न करे तो उसमें अगले दिन कार्य करने की शक्ति नहीं रहती है। धन भी सीमित है।

इस साधन की मात्रा भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के पास भिन्न-भिन्न होती है तथा एक ही व्यक्ति के पास जीवन के विभिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न होती है परन्तु धन दूसरे साधनों से इस रूप में भिन्न है कि उसे बचाकर भविष्य के लिए रखा जा सकता है। आवश्यकता पड़ने पर धन उधार भी ले सकते हैं। परिवार के सदस्यों की क्षमताएँ भी सीमित हैं। भिन्न व्यक्तियों में जन्मजात क्षमताएँ भिन्न होती हैं। शिक्षा व वातावरण भी सीमाएँ निर्धारित करते हैं। उचित शिक्षा व स्वस्थ वातावरण की क्षमताएँ और भी सीमित हो जाती हैं।

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(ब) गुणात्मक सीमाएँ (Qualitative): गुणात्मक सीमाएँ भी निश्चित हैं। दो परिवारों को एक जैसे आर्थिक साधन उपलब्ध हैं परन्तु यह सम्भव है कि एक की गृह-सज्जा उच्च स्तर की हो, दूसरे की निम्न स्तर की। कार्य निपुणता, ज्ञान आदि कुछ ऐसे मानवीय साधन हैं जिनकी . गुणात्मक सीमाएँ होती हैं। गुणात्मक स्तर हर साधन के उपयोग में देखा जा सकता है।

2. साधनों में घनिष्ठ सम्बन्ध (Resources have close relation): प्रायः एक कार्य को करने में एक से अधिक साधन की आवश्यकता होती है। अध्ययन के लिए समय व शक्ति दोनों ही चाहिए। अधिकांश गृह कार्यों को करने के लिए इन दोनों साधनों की आवश्यकता होती है। एक साधन के अभाव में कई बार वाछित सफलता नहीं मिल पाती।

3. साधन एक बार में एक ही स्थान पर प्रयुक्त होते हैं-एक साधन यदि हम एक स्थान पर प्रयुक्त कर लेते हैं तो अन्यत्र उसका उपयोग सम्भव नहीं ना | गृहिणी यदि एक धनराशि का उपयोग बच्चों की सालाना फीस देने के लिए कर लेती है उसी से उनके लिए वस्त्र नहीं खरीद सकती।

4. सभी साधन उपयोगी होते हैं-उचित गृह-व्यवस्था के लिए सभी साधन उपयोगी होते हैं। यदि साधनों का उचित उपयोग नहीं किया जाएगा तो वे निरर्थक हो जाते हैं क्योंकि किसी चीज की उपयोगिता ज्ञात होने के पश्चात् ही उसे साधन में सम्मिलित किया जाता है। टेलीविजन, शिक्षा व मनोरंजन दोनों के लिए उपयोगी है।

5. कुछ साधन एक-दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त हो सकते हैं-साधनों को एक-दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त किया जा सकता है। उदाहरण-घर में रहने वाली गृहिणी समय का उपयोग बच्चों के कपड़े घर पर सिलने में कर सकती है, परन्तु यदि वही गृहिणी बाहर काम करने लगे तो समयाभाव में वही कपड़े धन देकर सिलवा लेती है।।

6. सभी साधनों के प्रयोग से लक्ष्य की प्राप्ति-सभी साधनों का प्रयोग लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। यदि साधन लक्ष्यों की प्राप्ति न करें तो वह अर्थहीन एवं निरर्थक हो जाते हैं।

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प्रश्न 3.
साधनों में क्या समानताएँ (Similarities) पायी जाती हैं ?
उत्तर:
समस्त साधनों में प्रायः निम्नलिखित समानताएँ पाई जाती हैं-
1. समस्त साधन लाभप्रद हैं।
2. सभी साधन सीमित हैं।
3. व्यवस्थापन सम्बन्धी प्रक्रिया समस्त साधनों पर लागू होती है।
4. साधनों का प्रयोग करने के परिणामस्वरूप जीवन का जो गु णात्मक स्तर प्राप्त होता है, वह व्यक्ति के इन साधनों के प्रयोग करने के ढंग पर निर्भर करता है।
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प्रश्न 4.
सामुदायिक सुविधाओं का संरक्षण और प्रबन्ध क्यों आवश्यक है? अथवा, चार सामुदायिक सुविधाओं के नाम लिखें तथा विस्तार से बताएं कि इनका प्रबन्ध क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
सामुदायिक सुविधाओं का संरक्षण और प्रबन्ध: सभी साधनों की विशेषताएँ जानने के बाद यह ज्ञात होता है कि साधन सीमित हैं, अत: उनके प्रबंध की आवश्यकता है। साधनों के सर्वोत्तम उपयोग के लिए उनकी व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है।

कुछ साधन निम्नलिखित हैं –
1. ईंधन (Fuel): कोई भी वस्तु जिसमें गर्मी अर्थात् शक्ति पैदा करने की सामर्थ्य है, ईंधन कहलाती है। ईंधन कई प्रकार के होते हैं।

कुछ सामान्य प्रयोग में आने वाले ईंधन निम्नलिखित हैं –
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भोजन पकाने के लिए ईंधन का संरक्षण निम्नलिखित रूप से किया जा सकता है :

  • सारे संघटक एकत्रित करने के बाद ही आग जलाएँ।
  • प्रयोग के तुरत बाद आग बुझा दें।
  • उबलने के बाद आग की लपट धीमी कर दें।
  • कम गहरे व चौड़े बर्तनों से ईंधन की बचत होती है।
  • खाद्य पदार्थों को उबालने के लिए कम से कम पानी का प्रयोग करें।
  • पकाने से पहले खाद्यान्न व दालों को भिंगोकर रखें। इससे पकाने का समय कम हो जाता है।
  • प्रेशर कूकर के प्रयोग से समय और ईंधन की बचत होती है।
  • अच्छी तरह बंद होने वाले ढक्कनों से ताप नष्ट नहीं होता और इस प्रकार पकाते हुए समय तथा ईंधन की बचत होती है।
  • यह सुनिश्चित करें कि आग की लौ तेज और नीली हो। पीले रंग की लौ का अर्थ है कि ईंधन व्यर्थ जा रहा है तथा लौ ठीक तरह नहीं जल रही है।
  • भोजन को बार-बार गर्म न करें। सारे परिवार को एक ही बार गर्म खाना परोसें न कि हर एक को अलग-अलग भोजन दें।
  • फ्रिज में रखे खाने को पकाने से पहले कमरे के ताप पर ले आएँ। इस प्रकार ईंधन की बचत होती है।
  • गंदे बर्तन व बर्नर अधिक ईंधन खर्च करते हैं।

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2. विद्युत (Electricity): यह एक महँगा ईंधन है। यह खाना पकाने, पानी गर्म करने, रोशनी करने, कमरे का ताप बढ़ाने और बिजली के उपकरण चलाने में प्रयोग की जाती है। आपको इस महँगे और सीमित साधन को बहुत सावधानी से प्रयोग करना चाहिए। यह निम्नलिखित ढंग से किया जा सकता है :

  • कमरा छोड़ने पर सारी बत्तियाँ बुझा दें।
  • जब आवश्यकता न हो तो टी.वी., रेडियो बंद कर दें।
  • बिजली के उपकरणों को आपस में मिल-जुल कर प्रयोग करें तथा बिजली की बचत करें।
  • बल्ब के स्थान पर टयब लाइट का प्रयोग करें जिससे रोशनी भी अधिक होती है तथा बिजली भी कम प्रयोग होती है।
  • काम करते समय प्राकृतिक रोशनी का अधिक से अधिक प्रयोग करें। दिन की रोशनी में पढ़ने से बिजली की काफी बचत होती है।
  • जब धीमी रोशनी चाहिए तो छोटे बल्ब प्रयोग करें।
  • बिजली के उचित उपकरणों के प्रयोग से बिजली की बचत होती है।

3. पानी (Water): क्या आप पानीरहित जीवन का विचार कर सकती हैं ? नहीं। पानी मनुष्य की एक मूल आवश्यकता है जो धीरे-धीरे कम हो रहा है।
दिल्ली में 1960 से अब तक पानी का स्तर (मीटर में) कम होता जा रहा है-
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निम्नलिखित सिद्धांतों के पालन से पानी का संरक्षण सुनिश्चित हो सकता है:

  •  पानी का नल अथवा कोई स्रोत प्रयोग के बाद बंद कर दें।
  • पानी को व्यर्थ बहने से रोकें।
  • आवश्यकता के अनुसार पानी का उपयोग करें। अगर आपको आधा गिलास पानी चाहिए तो उसे पूरा मत भरिए।
  • प्रत्येक व्यक्ति के कपड़े अलग धौने की बजाय परिवार के सभी कपड़े एक साथ धोने से पानी की मात्रा में बचत हो सकती है।
  • पृथ्वी की सतह के नीचे अर्थात् भूमिगत पानी का संरक्षण भी आवश्यक है। जहाँ पानी का स्तर ऊँचा हो वहाँ जमीन के नीचे वाला पाखाना नहीं बनाना चाहिए।
  • अगर जल का कोई सामुदायिक स्रोत हो तो उसका प्रबन्ध सुनिश्चित करना चाहिए। पानी लेने के लिए पंक्ति में लगना चाहिए।
  • रसोईघर के व्यर्थ पानी को नाली द्वारा पिछवाड़े की बागवानी में प्रयोग करें। पानी को एक स्थान पर एकत्रित न होने दें।
  • वर्षा के जल को छत पर संग्रह करने का प्रबंध करना चाहिए।

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1. वर्षा के जल का संग्रह (Storage of Rain Water): वर्षा का जो जल छत पर गिरता है उसे छोटे व्यास की पाइपों द्वारा ट्यूबवेल, गड्ढों, पुराने या नए अनुपयोगी कुओं की तरफ मोड़कर सतह के नीचे के जल के संग्रह की प्रक्रिया प्रारंभ की जाती है ताकि यह बाद में आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाया जा सके। यह प्रक्रिया एकजिली तथा कई मंजिली इमारतों में उत्तम परिणामों के साथ प्रयोग की जा रही है।

2. दिल्ली के लिए सर्वोत्तम: 100 वर्ग मी. की छत पर लगभग 65000 लीटर बारिश का पानी पाइपों द्वारा एकत्र किया जा सकता है, जिससे चार व्यक्तियों के परिवार की 160 दिन तक पानी की आपूर्ति की जा सकती है।

3. विशेष सहायता: दिल्ली जल बोर्ड ने इस संदर्भ में सहायता शिविर का गठन किया है जो इस मितव्ययी तथा पर्यावरण सुरक्षित तथ्य को कार्यान्वत करने में सहायता करता है। संकर्प करें-वरिष्ठ अभियंता (योजना जल), कमरा नं. 207, वरुणालय, दूरभाष-3675434, 3678380-82

4. राज्य परिवहन (Public Transport): बसें, गाड़ियाँ, ट्राम और हवाई जहाज परिवहन के कुछ साधन हैं। ये एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने में सहायक होते हैं। परिवहन व्यवस्था एक महँगा साधन है। उचित सेवा न होने पर कई बार विद्यार्थी बसों को तोड़-फोड़ देते हैं। परिणामतः पुनः व्यवस्था बनाने के लिए अधिक व्यय करना पड़ता है जिसके कारण किराये में वृद्धि व करों में वृद्धि होती है। आप सोचें कि क्या यह उचित हैं ? असामाजिक तत्त्व कभी-कभी बसों को बमों से उड़ा देते हैं, जिससे सामाजिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचता है। मनुष्य भी मर जाते हैं। इन असामाजिक कार्यों का परिणाम, समाज पर आर्थिक दबाव पड़ता है।

5. चारा (Fodder): ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को चारे की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ता है। यह जानवरों को खिलाने के काम आता है। बचा हुआ या फालतू चारा फेंक दिया जाता है जिससे सफाई की समस्या बढ़ जाती है। अधिक चारे को अमूल्य साधनों की तरह प्रयोग में लाया जा सकता है। इससे खाद व गोबर गैस निर्मित की जा सकती है। परिवार की दूसरी आवश्यकताएँ जैसे चटाइयाँ, छप्पर आदि भी चारे से बनाई जा सकती हैं। जब ये टूट जाएँ तो इन्हें गोबर के साथ मिलाकर अच्छे उपले व खाद बनाई जा सकती है। इस प्रकार ग्रामीण क्षेत्र में किसान चारे का उपयुक्त प्रयोग कर सकते हैं।

6. पार्क (Parks): शालिनी जिस क्षेत्र में रहती है वहाँ पाँच पार्क हैं। पहले ये पार्क बंजर भूमि लगते थे। इन पार्कों में कोई गतिविधि न थी। पिछले दिनों वहाँ के लोगों ने एक सभा बनाकर चार लोगों को पार्कों के प्रबंध का उत्तरदायित्व सौंप दिया। उन्होंने माली लगाकर सारे पार्क ठीक करवा दिये। अब चहुँ ओर हरियाली है तथा फूल भी खिले हैं। इससे क्षेत्र में रौनकता बढ़ गई है।

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बड़े बच्चे पार्क में पानी देने का काम करते हैं। सभी पार्क एक प्रयोगशाला का काम करते हैं जहाँ बच्चे फूल, पत्तों व पौधे के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं। आस-पड़ोस के लोग सुबह-शाम वहाँ व्यायाम करने भी जाते हैं। इस सुविधा से क्षेत्र में नया जीवन आ गया है। आप भी कुछ ऐसा कर सकती हैं तथा कुछ अन्य सुझाव भी दे सकती हैं।

7.विद्यालय और चिकित्सालय (Schools and Hospitals): विद्यालय और चिकित्सालय वे सामुदायिक सुविधाए हैं जिनके द्वारा बच्चों को शिक्षा दी जाती है और आपके स्वास्थ्य के बारे में ध्यान रखा जाता है। इन दोनों स्थानों पर सफाई का बहुत ध्यान रखना चाहिए। सावधानी रखनी चाहिए कि इन दोनों सुविधाओं को किसी प्रकार की हानि न पहुंचाई जाए। आप सबको विद्यालय के बारे में पता है। उदंडी विद्यार्थियों द्वारा विद्यालय की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है। आप ऐसी हानियों की एक सूची बनाएँ । चिकित्सालय में उचित और बढ़िया ढंग से काम होना चाहिए ताकि सबको अच्छी सुविधाएँ मिलें तथा रोगियों को उनके दुखों से मुक्ति मिले।

8. सड़कें (Roads): घर से विभिन्न स्थानों तक आपकों व आपके परिवार को कौन जोड़ता है। ये सड़कें हैं । यह आपका उत्तरदायित्व है कि आप इस साधन का उचित रूप से प्रयोग करें। सड़कें संचार के माध्यम हैं, यह एक सामुदायिक सुविधा है। आप निजी समारोह के लिए इसे प्रयोग न करें। इससे समाज के दूसरे सदस्यों को परेशानी होती है। सड़कों को साफ तथा सुरक्षित रखें।

प्रश्न 5.
सभी साधनों की व्यवस्था करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
सभी साधनों की व्यवस्था करना (Need to manage the resources): सभी साधनों की चाहे वह भौतिक हों अथवा मानवीय, की व्यवस्था की जा सकती है। इनकी उचित व्यवस्था करके ही हम उत्तम गृह व्यवस्था की कल्पना कर सकते हैं। इन साधनों के प्रयोग के लिए सर्वप्रथम इन्हें आयोजित करने की आवश्यकता होती है, जैसे कौन-सा साधन किस आवश्यकता पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाए।

मौद्रिक आय की व्यवस्था करके हम ज्ञात कर सकते हैं कि कोई परिवार भोजन पर, कपड़ों पर तथा अन्य आवश्यकताओं पर कितना व्यय करे। आयोजन के पश्चात् साधनों का प्रयोग करते समय नियन्त्रण रखना भी अति आवश्यक है जिससे साधनों का दुरुपयोग न हो। सभी साधनों के प्रयोग के पश्चात् हमें मूल्यांकन करना चाहिए जिससे हमें ज्ञान हो जाए कि साधनों के प्रयोग से हमारी आवश्यकता की पूर्ति हुई है या नहीं।

जैसे धन की व्यवस्था करके जब हम आहार पर व्यय करते हैं और इस व्यय को नियन्त्रित भी रखते हैं तो अन्त में हमें देखना होगा कि मुद्रा के उपयोग से हमारी संतुलित आहार पाने की आवश्यकता पूर्ण हुई है अथवा नहीं। यदि हमारी आवश्यकता पूर्ण नहीं हुई है तो उसका क्या कारण है जिससे आगामी मास की व्यवस्था करते समय उन कारणों को दूर किया जा सके।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

Bihar Board Class 11 Psychology मानव स्मृति Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
कूट संकेतन, भंडारण और पुनरुद्धार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
स्मृति एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम सीखे हुए ज्ञान तथा प्राप्त अनुभवों को संचित करके भविष्य के लिए रखते हैं। स्मृति नामक प्रक्रिया में तीन स्वतंत्र किन्तु अन्तः संबंधित अवस्थाएँ होती हैं –
(क) कूट संकेतन
(ख) भंडारण तथा
(ग) पुनरुद्धार

हमारे द्वार ग्रहण की जाने वाली सूचनाएं जो स्मृति बनकर भविष्य में प्रयोग की जाने योग्य अवस्था में आ जाती हैं, उन सभी सूचनाओं को इन तीन प्रमुख अवस्थाओं (चरणों) से होकर अवश्य गुजरना होता है।
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1. कूट संकेतन:
स्मृति का प्रारम्भ इसी पहली अवस्था के रूप में होता है। वांछित सूचनाएँ कूट संकेतन के द्वारा स्मृति तंत्र तक पहुँचता है। तंत्रिका आवेग की उत्पति ज्ञानेन्द्रियों पर बाह्य उद्दीपक के प्रभाव के कारण होती है। उत्पन्न आवेग मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में पुनः प्रक्रमण के लिए ग्रहण कर लिए जाते हैं।

कूट संकेतन के रूप में आनेवाली सूचनाएँ तंत्रिका तंत्र में ली जाती हैं संचित संकेतनों से अभीष्ट अर्थ पाने का प्रयास किया जाता है तथा उसे भविष्य में पुनः प्रक्रमण के लिए सुरक्षित रखा जाता है। अर्थात् कूट संकेतन एक ऐसी विशिष्ट प्रक्रिया है जिसकी सहायता से सूचनाओं को एक ऐसे आकार या रूप में बदल लिया जाता है ताकि वे स्मृति में स्थान पाकर सार्थक रूप में संचित रहे। इस अवस्था को पंजीकरण भी कहा जा सकता है। यह स्मृति की पहली अवस्था है।

2. भंडारण:
सार्थक एवं उपयोगी सूचनाओं को कूट संकेतन के माध्यम से प्राप्त करने के बाद जिस विशेष प्रक्रिया के द्वारा कुछ समय सीमा तक धारण किये रहने की व्यवस्था की जाती है, उस प्रक्रिया को भंडारण कहते हैं। यह स्मृति की द्वितीय अवस्था है। भंडारित सूचना का उपयोग आवश्यकतानुसार आने वाले समय में किया जाता है। इसे ‘याद रखना’ भी कहा जाता है।

3. पुनरुद्धार:
पुनरुद्धार स्मृति की अंतिम एवं तीसरी अवस्था है। इसे ‘याद आना’ भी माना जा सकता है। समस्या समाधान अथवा किसी आवश्यक प्रपत्र को खोजने में हम अपनी चेतना को जगाकर जानना चाहते हैं कि अमुक व्यक्ति का कागज कहाँ मिलेगा और किस तरह इसका अधिक-से-अधिक उपयोग किया जा सकता है। अतः कूट संकेतन से मिली सूचना का भंडारण करने के पश्चात् संचित सूचना को चेतना में लाने (याद करने) की प्रक्रिया को पुनरुद्धार कहा जाता है। इस प्रक्रिया को स्मरण जैसा नाम भी दिया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
संवेदी, अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक स्मृति तंत्र से सूचना का प्रक्रमण किस प्रकार होता है?
उत्तर:
मानव स्मृति को कम्प्यूटर की तरह संवेदनशील बनाने के लिए सूचना का पंजीकरण, भंडारण तथा उसमें आवश्यकतानुसार फेर-बदल करने की क्षमता को आधार बनाकर स्मृति को क्रियाशील स्थिति में लाया जाता है। एटकिंशन तथा शिफ्रिन ने सन् 1968 में स्मृति से संबंधित। एक मॉडल तैयार किया जिसे ‘अवस्था मॉडल’ के रूप में जाना जाता है। ‘अवस्था मॉडल’ के आधार परी स्मृति तंत्र को तीन भागों में बाँट कर अध्ययन किया जाने लगा –
(क) संवेदी स्मृति
(ख) अल्पकालिक स्मृति तथा
(ग) दीर्घकालिक स्मृति
तीनों भागें में से प्रत्येक की अपनी-अपनी विशेषताएँ होती हैं तथा इनके द्वारा संवेदी सूचनाओं के संबंध में भिन्न प्रकार्य निष्पादित किए जाते हैं।

1. संवेदी स्मृति:
देखकर या सुनकर जो भी सूचनाएँ प्राप्त होती हैं उसे सर्वप्रथम संवेदी स्मृति को दिया जाता है। संवेदी स्मृति की संचयी क्षमता तो बहुत अधिक होती है लेकिन धारण अवधि एक सेकेण्ड से भी कम होती है। परिशुद्धता इसकी पहली पसंद होती है। संवेदी स्मृति में संचित सूचनाएँ उद्दीपक की प्रतिकृति की तरह जमा रहती है। उसे चित्रात्मक तथा प्रतिध्वन्यात्मक संवेदी तंत्रिका के रूप में भी अनुभव किया जाता है क्योंकि दृश्य-उत्तर-बिम्ब और ध्वनि-प्रतिध्वनि का अभ्यास कारण स्वयं तंत्रिका ही होती है।

2. अल्पकालिक स्मृति:
प्राप्त सूचनाओं में से कुछ सूचनाओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित हो पाता है। ध्यान दी गई सूचनाओं को अल्पकालिक स्मृति के अन्तर्गत स्थान मिलता है। इस श्रेणी की सूचना सामान्यतः 30 सेकेण्ड से भी कम समय के लिए स्मृति तंत्र में बनी रहती है। एटकिंशन एंव शिफ्रिन के मतानुसार अल्पकालिक स्मृति सूचना का कूट संकेतन मुख्यतः ध्वन्यात्मक होता है।

इसे बनाये रखने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अर्थात् अल्पकालिक स्मृति में व्यक्ति किसी अनुभूति को 30 सेकेण्ड तक ही रख सकता है। इसे प्राथमिक स्मृति भी कहा जाता है। जैसे, किसी अपरिचित व्यक्ति की दूरभाष संख्या को सुनकर उसे भूल जाना लघुकालिक स्मृति के कारण ही होता है।

3. दीर्घकालिक स्मृति:
कुछ अति आवश्यक सूचनाएँ स्थायी तौर पर अनन्त समय तक संचित रह जाती है। ऐसी सूचनाएँ अल्पकालिक स्मृति की क्षमताएँ धारण अवधि की सीमा को पार कर जाती है, वही दीर्घकालिक स्मृति में प्रवेश कर पाती है। इस श्रेणी की स्मृति के लिए धारण क्षमता व्यापक मानी जाती है दीर्घकालिक स्मृति में जगह पाने वाली सूचनाएँ भूलने से बची रहती है। कभी-कभी पुनरुद्धार विफलता के कारण कुछ सूचनाएँ स्मृति की सीमा से बाहर हो जाते हैं अतः हम उसे भूल जाते हैं। चेतना ग्रन्थि की सहायता से कुछ क्षण तक प्रयास करने पर भूली गई सूचनाएँ स्मृति में आ जाती हैं।

दीर्घकालिक स्मृति को गौण स्मृति भी कहा जाता है। अपना नाम, पता, दूरभाष संख्या, शत्रु-मित्रों के नाम आदि दीर्घकालिक स्मृति में होने के कारण सदा याद रहते हैं। इन तीनों भागों का संक्षिप्त अध्ययन के लिए निम्नांकित तालिका की मदद ली जा सकती है –
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति img 2

प्रश्न 3.
अनुरक्षण एवं विस्तृत पूर्वाभ्यास में क्या अंतर है?
उत्तर:
अनुरक्षण एवं विस्तृत पूर्वाभ्यास दोनों स्मृति-तंत्र से सम्बन्धित है। दोनों की विशेषताओं को अलग-अलग अनुच्छेदों के द्वारा सूचित करके उनमें अंतर बताने का प्रयास किया गया है –

(क) अनुरक्षण पूर्वाभ्यास:
अनुरक्षण पूर्वाभ्यास की महत्ता अल्पकालिक स्मृति के लिए नियंत्रक का कार्य करता है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास के द्वारा सूचना को वांछित समय तक धारित बनाने का प्रयास किया जाता है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास सूचना को अनुरक्षित रहने के लिए सूचना को दुहराने का अभ्यास निरंतर करने की सलाह देता है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास जब रुक जाता है तब सूचना की स्मृति मिटने लग जाती है।

(ख) विस्तृत पूर्वाभ्यास:
विस्तृत पूर्वाभ्यास के प्रयोग से कोई सूचना, अल्पकालिक स्मृति से दीर्घकालिक स्मृति में प्रवेश करती है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास पूर्वाभ्यास के विपरीत, जिसमें मूक या वाचिक रूप से दुहराया जाता है। विस्तृत पूर्वाभ्यास के द्वारा दीर्घकालिक स्मृति में पूर्व निहित सूचना के साथ धारिता के लिए अभीष्ट सूचना को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। विस्तृत पूर्वाभ्यास के द्वारा किसी सूचना को उससे उद्वेलित विभिन्न साहचयो के आधार पर कोई व्यक्ति विश्लेषित कर पाता है।

सूचनाओं को संगठित करने, तार्किक ढाँचे में विस्तृत करना तथा समान स्मृतियों के साथ मिलाने, उपयुक्त मानसिक प्रतिमा बनाने जैसी क्रियाओं में विस्तारपरक पूर्वाभ्यास का सक्रिय योगदान होता है। अर्थात् दोनों पूर्वाभ्यास में स्पष्ट अंतर के रूप में कहा जा सकता है कि अनुरक्षण पूर्वाभ्यास जहाँ अल्पकालिक स्मृति के नियंत्रक के रूप में जाना जाता है वहीं दीर्घकालिक स्मृति के विश्लेषण में विस्तारपरक पूर्वाभ्यास का योगदान होता है।

अनुरक्षण पूर्वाभ्यास अल्पकालिक स्मृति की धारिता को विकसित करने का काम करता है वहीं विस्तारपरक पूर्वाभ्यास दीर्घकालिक स्मृति के स्तर को विकसित करता है। अनुरक्षण विधि का विकल्प खंडीयन विधि के रूप में उपलब्ध हो चुका है जबकि विस्तारपरक पूर्वाभ्यास के लिए कोई विकल्प नहीं मिल सका है। सूचना के अवस्था परिवर्तन की व्याख्या करने में अनुरक्षण पूर्वाभ्यास का कोई योगदान नहीं होता है जबकि विस्तारपरक पूर्वाभ्यास अवस्था परिवर्तन की कला को समझता है।

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प्रश्न 4.
घोषणात्मक एवं प्रक्रिया मूलक स्मृतियों में क्या अंतर है?
उत्तर:
दीर्घकालिक स्मृति में अनेक प्रकार की सूचनाएं संचित रहती हैं। समुचित अध्ययन के लिए दीर्घकालिक स्मृति का वर्गीकरण किया गया है। पहला वर्गीकर में दो वर्गों को प्राथमिकता दी गई है –
(क) घोषणात्मक तथा
(ख) प्रक्रियामूलक (या अघोषणात्मक)।

इन दोनों वर्गों में मुख्य अंतर निम्न वर्णित हैं –

1. आधार:
घोषणात्मक स्मृति में वैसी सूचनाओं का रखा जाता है जो तथ्य, नाम आदि से संबंधित होते हैं जबकि प्रक्रिया झलक स्मृति में किसी क्रिया के सम्पादन के लिए वांछनीय कौशल से जुड़ी सूचनाएं ली जाती हैं।

2. वर्णन:
घोषणात्मक स्मृति से जुड़ी सूचनाओं का वर्णन मौखिक अथवा लिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है जबकि प्रक्रिया मूलक स्मृति के अन्तर्गत जो सूचनाएँ होती हैं उन्हें शब्दों में सहजता से वर्णित नहीं किया जा सकता है।

3. उदाहरण:
घोषणात्मक स्मृति के उदाहरण हैं – आपका नाम क्या है? भारत की राजधानी दिल्ली है। मेढ़क उभयचर प्राणी है। समुद्र में जल भरा रहता है। चिड़िया घोंसला बनाकर रहती है। जबकि प्रक्रिया मूलक के उदाहरण हैं-साइकिल चलाना, चाय बनाना, नीम की पत्तियों तथा मिरचाई के तीखापन में अंतर व्यक्त करना इत्यादि।

प्रश्न 5.
दीर्घकालिक स्मृति में श्रेणीबद्ध संगठन क्या है?
उत्तर:
दीर्घकालिक स्मृति में बड़े पैमाने पर सूचनाओं का संग्रह होता है जिनका उपयोग कुशलतापूर्वक किया जाता है। सूचनाओं के संबंध में भेद और लक्षण जानने के लिए उन्हें संगठित करना आवश्यक होता है। दीर्घकालिक स्मृति के संबंध में निम्नलिखित प्रश्नों के सही उत्तर के आधार पर सूचनाओं को संगठित किया जाता है –

  1. सूचना किसके संबंध में हैं?
  2. सूचना में प्रयुक्त मुख्य पद किस श्रेणी या जाति का है।
  3. किस तरह के प्रश्नों के उत्तर हाँ या नहीं में दिये जा सकते हैं।
  4. सूचना सामाजिक, मानसिक, आर्थिक किस प्रकार के कारकों पर आधारित है।
  5. स्मृति पर आधारित प्रश्नों के उत्तर देने में कितना समय लिया जाता है।

दीर्घकालिक स्मृति में ज्ञान-प्रतिनिधान की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई संप्रत्यय है जहाँ संप्रत्यय समान लक्षण वाले वस्तुओं अथवा घटनाओं के मानसिक संवर्ग होते हैं। सूचना प्रात्यधिक रूप में प्रतिमाओं के रूप में संकेतित की जा सकती है। सन् 1969 में एलन कोलिन्स तथा रॉस क्युिलियन ने शोध-पत्र के माध्यम से बताया कि दीर्घकालिक स्मृति में सूचना श्रेणीबद्ध रूप से संगठित होती हैं तथा उसकी एक जालीदार संरचना होती है।Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति img 3

संगठन में सूचनाओं को उनके गुणधर्मों के आधार पर संगठित किया जाता है उन्हें श्रेणी सदस्यता के रूप में व्यक्त करते हैं। उदाहरण के रूप में वाक्य संरचना की व्याख्या करके पता लगाया गया कि जैसे-जैसे विधेय किसी वाक्य में कर्ता से पदानुक्रम में दूर होता गया, लोगों ने सूचना सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर देने में अधिक समय लिया।

अतः सूचनाओं को निम्न स्तर और उच्च स्तर के आधार पर संगठित कर लिया जाता है। अर्थात् दीर्घकालिक स्मृति में सामग्री संप्रत्यय, श्रेणियों एवं प्रतिमाओं के रूप में प्रस्तुत होती है तथा श्रेणीबद्ध रूप से संगठित होती है। श्रेणीबद्ध संगठन का सामान्य अर्थ है कि सूचनाओं को गुण अथवा संरचना अथवा प्रकृति या प्रतिमा के आधार पर निम्न स्तरीय सूचना से उच्च स्तरीय सूचनाओं का क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण।

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प्रश्न 6.
विस्मरण क्यों होता है?
उत्तर:
विस्मरण या भूलना एक मानसिक क्रिया है जिससे स्मृति तंत्र में संचित स्मृति चिह्न मिट जाते हैं तथा हम ज्ञात साधनों या घटनाओं के संबंध में कोई भी सूचना देने में असमर्थ हो . जाते हैं। विस्मरण के कारण परिचितों को पहचानना या गणितीय सूत्र या नियमों को शुद्ध रूप में बतलाना संभव नहीं रह जाता है।

विस्मरण नामक मानसिक विकृति उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं –

1. चिह्न-हास के कारण विस्मरण:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र में स्मृति के द्वारा किये जाने वाले संशोधनों के फलस्वरूप शारीरिक परिवर्तन देखे जाते हैं। शारीरिक विकृति के कारण सूचनाओं को उपयोग से बाहर रहने से स्मृति चिह्न मिट जाते हैं।

2. अवरोध के कारण विस्मरण:
स्मृति भंडार में संचित विभिन्न सामग्री के बीच अवरोध के कारण विस्मरण होता है।

विस्मरण में दो प्रकार के अवरोध उत्पन्न होते हैं –

(क) अग्रलक्षी:
पहले सीखी गई क्रिया विधि आने वाली नई क्रिया विधि के सम्पादन में अवरोध प्रकट करता है।

(ख) पूर्वलक्षी अवरोध:
पूर्वलक्षी अवरोध में पश्चात् अधिगम, पूर्व अधिगम सामग्री के प्रत्यावान में अवरोध पहुंचाता है।

3. पुनरुद्धार असफलता के कारण विस्मरण:
प्रत्याहान के समय पुनरुद्धार के संकेतों के अनुपस्थित रहने या अनुपयुक्त होने के कारण विस्मरण होता है।

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प्रश्न 7.
अवरोध के कारण विस्मरण, पुनरुद्धार से संबंधित विस्मरण से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
(क) अवरोध के कारण विस्मरण का आधार संचित साहचर्यों के बीच उत्पन्न प्रतिद्वंद्विता होती है जबकि पुनरुद्धार से संबंधित विस्मरण प्रत्याहान के समय पुनरुद्धार के संकेतों के अनुपस्थित रहने या अनुपयुक्त होने के कारण होता है।
(ख) अवरोध के कारण विस्मरण में दो प्रकार के अवरोध उत्पन्न होते हैं –

1. अग्रलक्षी:
पहले सीखी गई क्रिया बाद में सीखी जाने वाली क्रिया को याद करने में अवरोध उत्पन्न करती है।

2. पूर्वलक्षी:
पश्चात् अधिगम, पूर्व अधिगम सामग्री के प्रत्याहान में अवरोध पहुँचाता है। पुनरुद्धार से संबंधित विस्मरण को वर्गीकृत नहीं किया जाता है।

(ग)

  • अंग्रेजी सीखने के क्रम में पूर्व में सीखी गई भाषा का ज्ञान अवरोध का काम करता है।
  • इसके साथ यह भी ज्ञात है कि कई लक्षणों वाले शब्दों को निश्चित क्रम में प्रस्तुत करने पर उसे कुछ समय बाद यथावत बतलाना संभव नहीं होता है क्योंकि पुनरुद्धार के संकेत समय बीतने पर लुप्त हो चुके थे।

प्रश्न 8.
‘स्मृति एक रचनात्मक प्रक्रिया है’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
स्मृति एक रचनात्मक प्रक्रिया है जहाँ सूचनाएँ व्यक्ति के पूर्व ज्ञान, समझ एवं प्रत्याशों के अनुसार संकेतित एवं संचित की जाती है। मनोवैज्ञानिक बार्टलेट ने क्रमिक पुनरुत्पादन विधि पर आधारित प्रयोग किया जिसमें प्रतिभागी याद की हुई सामग्री को भिन्न-भिन्न समयांतरालों पर प्रत्याहान करते थे। प्रयोग में पाई जाने वाली को बार्टलेट ने स्मृति की रचनात्मक प्रक्रिया को समझने के लिए उपयोगी माना। उन्होंने गलतियों को वांछनीय संशोधनों तथा समयानुकूल अर्थ प्रकट करने का प्रयास मानकर खुशी व्यक्त की।

बार्टलेट ने बताया कि कोई विशिष्ट स्मृति व्यक्ति के ज्ञान, लक्ष्यों, अभिप्रेरणा; वरीयता तथा अन्य कई मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं से प्रभावित होते हैं। स्मृति के कारण ही हम भूतपूर्व अनुभवों और ज्ञान के आधार पर नयी सूचना के विश्लेषण, भंडारण तथा पुनरुद्धार में सहयोग करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। इस आधार पर स्पष्ट हो जाता है कि स्मृति के कारण विकास के लिए कई उपयोगी प्रक्रियाओं को सफलतापूर्ण पूरा करने में सहयोग मिलता है अर्थात् स्मृति एक रचनात्मक प्रक्रिया है।

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प्रश्न 9.
स्मृति-सहायक संकेत क्या है? अपनी स्मृति सुधार के लिए एक योजना के बारे में सुझाव दीजिए।
उत्तर:
स्मृति को स्थायी, उपयोगी और ऐच्छिक पुनरुद्धार के योग्य बनाने हेतु स्मृति-सुधार संबंधी प्रक्रियाओं का एक संगठन सरल युक्ति पर आधारित होती है। स्मृति सुधार की बहुत सारी युक्तियाँ हैं, जिन्हें स्मृति-सहायक संकेत कहा जाता है। संगठित विधियों की रूप-रेखा पर आधारित ढाँचा बहुत ही उपयोगी होता है। स्मृति सुधार के लिए कई विधियाँ बतलाई गई हैं। जैसे –

1. मुख्य शब्द विधि:
मिलते-जुलते शब्दों का युग्म बनाकर नये शब्दों को अपनी स्मृति में स्थान दिया जा सकता है।

2. स्थान विधि:
स्मृति में रखी जानेवाली सूचनाओं को उनके लिए उपयुक्त स्थानों के साथ याद रखने का प्रयास उपयोगी होता है। जैसे-विद्यालय, अस्पताल, किचेन, बगीचा, दुकान आदि में उपलब्ध सामग्रियों का वर्गीकरण करके नयी सूचना को याद रखना सरल हो जाता है। जैसे, किचन के साथ अंडा, तेल, कड़ाही, ब्रेड, चम्मच आदि नाम सरलता से याद आ जाते हैं।

3. खंडीयन विधि:
यदि सूचना को कई अर्थपूर्ण खण्डों में बाँटकर याद करने का प्रयास किया जाता है तो स्मृति सुगम बन जाती है। जैसे-किसी का दूरभाषा संख्या 186919472004 है तो इसे 1869-1947 तथा 2004 में खंडित करके याद रखना आसान हो जाता है क्योंकि 1869 से गाँधी, 1947 से आजादी तथा 2004 में सुनामी का संबंध है।

4. प्रथम अक्षर तकनीक:
किसी शब्द समूह को याद रखने के लिए प्रत्येक शब्द के पहले अक्षर को लेकर एक नया शब्द बनाकर याद रखना सरल माना जाता है। प्रथम अक्षर तकनीक में शब्द के द्वारा कई शब्दों को स्मृति में रखने की सुविधा मिल जाती है।

जैसे – VIBGYOR से इन्द्रधनुष के सातों रंगों के नाम याद रहते हैं। BISCOMAN से किसी संख्या के सभी लक्षण याद रह जाते हैं। ऊपर वर्णित चार विधियों को स्मृति सहायक-संकेतों पर आधारित माना जाता है जिसे सरल लेकिन जटिल विधियँ मानकर ध्यान से लगभग हटा दिया गया है। स्मृति सुधार के लिए अपेक्षाकृत अधिक बोधगम्य विधियों का प्रचलन प्रारम्भ हो गया है जिसमें स्मृति प्रक्रियाओं में ज्ञान पर बल दिया गया है। नये तकनीकी विधियों से सम्बन्धित सुझाव निम्न वर्णित हैं –

(a) गहन स्तर का प्रक्रमण कीजिए:
मनोवैज्ञानिक कैक एवं लॉकहार्ट के मतानुसार किसी सूचना के सतही गुणों पर ध्यान देने के बजाय उसके अर्थ के रूप में प्रक्रमण किया जाए तो अच्छी स्मृति होती है। सूचना को प्रश्नोत्तर विधि से स्पष्ट करने का प्रयास उपयोगी सिद्ध होता है।

(b) अवरोध घटाइए:
आराम और अभ्यास के बल पर विस्मरण की नौबत आने के पहले ही अवरोध उत्पन्न करने वाले कारकों को निष्क्रिय कर दीजिए।

(c) पर्याप्त पुनरुद्धार संकेत रखिए:
थॉमस और रॉबिन्सन से स्मृति को सुदृढ़ बनाने के लिए PQRST विधि को अपनाने की सलाह दी है। विधि के नाम का प्रत्येक अक्षर एक अर्थपूर्ण संदेश देता है। तो P-Preview-पूर्वअवलोकन, Q-Question-प्रश्न करना, RRead-पढ़ना, S Self-recitation-स्वतः जोर से पढ़ना और T Test-परीक्षण करना।

अर्थात् सम्बन्धित विषय के सम्बन्ध में सभी अर्जित ज्ञान का पूर्वअवलोकन करके विषय से सम्बन्धित सभी संभव प्रश्नों का उत्तर जानिए। प्रश्नोत्तर की खोज के बाद स्वयं ध्वनि के साथ जोर-जोर से पढ़िए तथा उन्हें लिखिए। लिखे गये प्रश्नोत्तरों के आधार पर स्वयं परीक्षण कीजिए कि आप विषय के सम्बन्ध में कितना सही जानकारी रखते हैं। स्मृति सुधार के लिए योजना के बारे में सुझाव प्रस्तुत किया जा सकता है। सुझाव के अनुसार –

  • मात्र विधियों अथवा नियमों की जानकारी रखने से स्मति का विकास नहीं होता है।
  • स्वास्थ्य, रुचि, अभिप्रेरणा, शैक्षणिक प्रसाधनों से परिचय आदि पर पर्याप्त समझ रखकर ही स्मृति को मजबूती प्रदान की जा सकती है।
  • स्मृति सुधार सम्बन्धी युक्तियों के लिए वांछित सामाग्रियों की प्रकृति के अनुसार उनका उपयोग करने की कला का ज्ञान भी अति आवश्यक है।
  • शैक्षणिक योजना बनाते समय ध्यान रखना चाहिए ताकि योजना अवरोध मुक्त रहे, स्मृति के अनुकूल वातावरण मिले तथा पर्याप्त सहयोग की गुंजाइश हो।
  • जहाँ तक युक्तियों के चुनाव का प्रश्न है तो पर्याप्त पुनरुद्धार संकेत रखने वाली युक्ति (PQRST) सर्वोत्तम है।

Bihar Board Class 11 Psychology मानव स्मृति Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दीर्घकालिक स्मृति किने प्रकार की होती है?
उत्तर:
पहला वर्गीकरण –

  1. घोषणात्मक और
  2. प्रक्रिया मूलक

दूसरा वर्गीकरण –

  1. घटनापरक और
  2. आर्थी स्मृति

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प्रश्न 2.
वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं जो मानव स्मृति की जटिल एवं गयात्मक प्रकृति को प्रदर्शित करती हैं?
उत्तर:

  1. क्षणदीय स्मृतियाँ
  2. जीवनचरित स्मृति और
  3. निहित स्मृतियाँ ऐसी स्मृतियाँ हैं जो जटिल एवं गत्यात्मक प्रकृति को बतलाती है।

प्रश्न 3.
आर्थी स्मृति का परिचय क्या हैं?
उत्तर:
आर्थी स्मृति सामान्य ज्ञान एवं जागरुकता की स्मृति है। सभी प्रकार के संप्रत्यय, विचार तथा तर्कसंगत नियम आर्थी स्मृति में संचित होते हैं।

प्रश्न 4.
स्मृति मापन की प्रमुख विधियाँ क्या हैं?
उत्तर:
स्मृति मापन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. मुक्त प्रत्याह्वान (पुनःस्मरण एवं प्रतिभिज्ञान) विधि-इस विधि का उपयोग तथ्य तथा घटना से संबंधित स्मृति के मापन में होता है।
  2. वाक्य सत्यापन कार्य विधि-इस विधि से आर्थी स्मृति का मापन होता है।
  3. प्राथमिक लेप विधि-इसका उपयोग उन सूचनाओं का मापन करने के लिए होता है जिन्हें शाब्दिक रूप में नहीं बताय जा सकता है।

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प्रश्न 5.
स्मृतियों का संगठन क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति में वृहद मात्रा में सूचनाएं होती हैं। सही समय पर सही सूचना की जानकारी पाने के लिए उन्हें संगठित करना उपयोगी होता है।

प्रश्न 6.
स्कीमा शब्द का प्रयोग किस अर्थ में होता है?
उत्तर:
स्कीमा भूतपूर्व अनुभवों और ज्ञान का एक संगठन है जो आनेवाली नयी सूचना के विश्लेषण, भंडारण तथा पुनरुद्धार को प्रभावित करता है। स्कीमा को एक ऐसी मानसिक ढाँचा के रूप में पहचानते हैं जो इस वस्तु जगत के बारे में अर्जित ज्ञान एवं अभिग्रह का प्रतिनिधिान करता है।

प्रश्न 7.
संज्ञानात्मक लाघव का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक लाघव का तात्पर्य यह है कि दीर्घकालिक स्मृति की क्षमता का अधिकाधिक एवं कुशलतापूर्वक तथा कम-से-कम व्यतिरिक्तता में उपयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
बार्टलेट ने स्मृति के सम्बन्ध में क्या बतलाया है?
उत्तर:
बार्टनेट ने स्मृति को रचनात्मक क्रिया माना है।

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प्रश्न 9.
बार्टलेट ने स्मृति समझने के लिए किन अर्थपूर्ण सामग्री का उपयोग किया था?
उत्तर:
बार्टलेट ने अर्थपूर्ण सामग्री के रूप में कहानियाँ, गद्य दंत कथाएँ इत्यादि का उपयोग किया था।

प्रश्न 10.
बार्टलेट ने अपने प्रयोगों से प्राप्त परिणामों की व्याख्या हेतु किस शब्द का उपयोग किया था?
उत्तर:
परिणामों की व्याख्या हेतु बार्टलेट ने स्कीमा शब्द का उपयोग किया था।

प्रश्न 11.
धारण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब व्यक्ति किसी विषय को सीखता है तो उसके मस्तिष्क में स्मृति-चिह्नों का निर्माण होता है। अर्थात स्मृति-चिह्नों के रूप में धारण करता है।

प्रश्न 12.
स्मृति क्या है?
उत्तर:
स्मृति एक सामान्य पद है जिसका अर्थ पूर्व अनुभूतियों को दिमाग में इकट्ठा करके रखने की क्षमता होती है।

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प्रश्न 13.
स्मृति की समुचित परिभाषा क्या है?
उत्तर:
स्मरण वह मानसिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा भूतकाल में सीखी गई बातें या पूर्व अनुभूतियाँ मस्तिष्क में स्मृति-चिह्नों के रूप में धारणा की जाती हैं और वर्तमान या भविष्य में उसका प्रत्याह्वान या प्रतिभिज्ञान हो जाती है।

प्रश्न 14.
स्मृति-चिह्न क्या है?
उत्तर:
व्यक्ति जब किसी विषय को सीखता है तो उसे स्मृति-चिह्नों के रूप में मस्तिष्क में धारण करता है। इबिंगहॉस ने कहा है कि सीखे गए विषय को मस्तिष्क में स्मृति-चिह्न के रूप में सुरक्षित करते हैं।

प्रश्न 15.
अल्पकालीन स्मृति किसे कहते हैं?
उत्तर:
अल्पकालीन स्मृति से तात्पर्य वैसी स्मृति से होता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूति को अधिक से अधिक तीस सेकेण्ड तक याद रखता है।

प्रश्न 16.
दीर्घकालीन स्मृति किसे कहते हैं?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति के अन्तर्गत वैसी स्मृतियाँ आती हैं जो अधिक समय तक मस्तिष्क में वर्तमान रहती हैं।

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प्रश्न 17.
अल्पकालीन और दीर्घकालीन स्मृति में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर:
अल्पकालीन स्मृति की अधिकतम सीमा तीस सेकेण्ड होती है जबकि दीर्घकालीन स्मृति की कोई अधिकतम समय सीमा नहीं होती है।

प्रश्न 18.
स्मृति के तीन तत्वों का नाम बताएँ।
उत्तर:
स्मृति के तीन तत्वों के नाम इस प्रकार हैं –

  1. कूट संकेतन
  2. संचयन
  3. पुनः प्राप्ति

प्रश्न 19.
कूट संकेतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कूट संकेतन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके सहारे सूचनाओं को एक ऐसे आकार या। रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है कि वे स्मृति में प्रवेश पा सके।

प्रश्न 20.
लघुकालीन स्मृति क्या है?
उत्तर:
लंघुकालीन स्मृति का अर्थ वैसी स्मृति संरचना से होता है जिसमें व्यक्ति किसी विषय या पाठ को अधिक से अधिक 30 सेकेण्ड तक ही धारण करके रखता है।

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प्रश्न 21.
दीर्घकालीन स्मृति क्या है?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति का अर्थ वैसे स्मृति संचयन से होता है जिसमें स्मृति चिह्नों को कम से कम 30 सेकेण्ड तक अवश्य धारण किया जाता है, लेकिन इसकी कोई अधिकतम समय सीमा नहीं होती है।

प्रश्न 22.
स्मृति के कार्यकारी आधार क्या है?
उत्तर:
किसी सूचना को एक समय तक धारित करना तथा उसका प्रत्याह्वान करना स्मृति का मुख्य कार्यकारी आधार है जो संज्ञानात्मक कार्य की प्रकृति पर निर्भर होता है।

प्रश्न 23.
स्मृति नामक प्रक्रिया में कौन-सी तीन स्वतंत्र किन्तु अंतः संबंधित अवस्थाएँ होती हैं?
उत्तर:

  1. कूट संकेतन
  2. भंडारण तथा
  3. पुनरुद्धार

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प्रश्न 24.
अवस्था मॉडल कब और किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर:
एटकिंसन एवं शिफ्रिन ने 1968 में अवस्था मॉडल प्रस्तुत किया था?

प्रश्न 25.
किस अवस्था की स्मृति स्थायी होती है?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति स्थायी होती है।

प्रश्न 26.
प्रक्रमण स्तर दृष्टिकोण को कब और किसने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
प्रक्रमण स्तर दृष्टिकोण ऊक एवं लॉकहर्ट द्वारा सन् 1972 में प्रतिपादित किया गया था।

प्रश्न 27.
बार्टलेट ने स्मरण को किस प्रकार की मानसिक प्रक्रिया माना है?
उत्तर:
बार्टलेट ने स्मरण को पुनः रचनात्मक मानसिक प्रक्रिया माना है।

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प्रश्न 28.
इबिंगहाँस के अनुसार स्मरण का स्वरूप कैसा होता है?
उत्तर:
इबिंगहॉस के अनुसार स्मरण का स्वरूप रचनात्मक होता है।

प्रश्न 29.
स्मरण में कौन-कौन प्रक्रिया शामिल होती है?
उत्तर:
स्मरण में मुख्य रूप से चार उपक्रियाएँ शामिल होती हैं-सीखना, धारण करना, प्रत्याह्नान करना तथा प्रतिभिज्ञान करना।

प्रश्न 30.
विस्मरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
विस्मरण (भूलना) एक ऐसी मानसिक क्रिया है जिसमें मस्तिष्क में बने स्मृति चिह्न मिट जाते हैं जिसके कारण प्रत्याह्वन तथा पहचानना शून्य स्तर पर पहुँच जाता है।

प्रश्न 31.
विस्मरण में कितने तरह के अवरोध उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
विस्मरण में दो प्रकार के अवरोध उत्पन्न होते हैं –

  1. अग्रलक्षी तथा
  2. पूर्वलक्षी

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प्रश्न 32.
विस्मरण के सम्बन्ध में अवरोध सिद्धांत क्या कहता है?
उत्तर:
विस्मरण, प्रत्याह्वान के समय स्वतंत्र रूप से संचित साहचर्यों के बीच प्रतिद्वंद्विता के कारण होता है।

प्रश्न 33.
इबिंगहॉस के अनुसार विस्मरण किस प्रकार की मानसिक प्रक्रिया है?
उत्तर:
इबिंगहॉस के अनुसार विस्मरण एक निष्क्रिय मानसिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 34.
इबिंगहॉस के प्रयोग में प्रयोज्य कौन था?
उत्तर:
इबिंगहॉस ने अपना प्रयोग अपने आप पर किया है?

प्रश्न 35.
फ्रायड ने विस्मरण का प्रमुख कारण क्या माना है?
उत्तर:
फ्रायड ने विस्मरण का प्रमुख कारण दमन को माना है।

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प्रश्न 36.
स्मृति सहायक संकेत पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। क्यों?
उत्तर:
स्मृति सहायक संकेतों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है क्योंकि ये बहुत सरल हैं तथा शायद स्मृति कार्यों की जटिलताओं और याद करने में होनेवाली कठिनाइयों का न्यूनानुमान करते हैं। साथ ही साथ अब तकनीकी स्तर पर बोधगम्य उपागम भी उपलब्ध हो चुके हैं।

प्रश्न 37.
थॉमस और रॉबिन्सन के द्वारा बताई गई युक्ति में PQRST का अर्थ क्या है?
उत्तर:
P = Preview (पूर्व अवलोकन), Q = Question (प्रश्न), R = Read (पढ़ना), S = Self recitation (स्वतः जोर से पढ़ना) तथा T = Test (परीक्षण)।

प्रश्न 38.
धारण की जाँच किस आधर पर होती है?
उत्तर:
धारण की जाँच प्रत्याह्वान एवं प्रतिभिज्ञान के आधार पर होती है।

प्रश्न 39.
प्रत्याह्वान क्या है?
उत्तर:
प्रत्याह्वान में व्यक्ति पूर्व में सीखे गए विषयों या पाठों को उसकी अनुपस्थिति में वर्तमान चेतना में लाता है।

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प्रश्न 40.
प्रतिभिज्ञान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रतिभिज्ञान एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति पूर्व में सीखे गए विषय को किसी नए विषय सधे अपनी यादाश्त के आधार पर अलग करता है।

प्रश्न 41.
प्रत्याह्वान एवं प्रतिभिज्ञान में क्या अंतर है?
उत्तर:
प्रत्याहान में पूर्व में सीखे गए विषय को उसकी अनुपस्थिति में वर्तमान चेतना में लाते हैं, जबकि प्रतिभिज्ञान में पूर्व में सीखे गए विषय नए विषयों के साथ उपस्थित होता है जिसे अपनी यादाश्त से अलग करना होता है।

प्रश्न 42.
संचयन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संचयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें संकेतन द्वारा प्राप्त सूचनाओं एवं उत्तेजनाओं को: कुछ समय के लिए सचित करके रखा जाता है।

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प्रश्न 43.
पुनः प्राप्ति का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पुनः प्राप्ति एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आवश्यकता के अनुसार व्यक्ति संचयन में मौजूद सूचनाओं से विशिष्ट सूचना की खोज करता है और उन तक पहुँचने की कोशिश करता है।

प्रश्न 44.
क्रमिक पुनरुत्पादन विधि क्या है?
उत्तर:
क्रमिक पुनरुत्पादन विधि में बार्टलेट ने एक कहानी के प्रयोज्य को सुनाई, प्रयोज्य ने कही कहानी दूसरे को, दूसरे ने तीसरे को क्रम में कहानी सुनाई। इस प्रकार कई प्रयोज्यों के बाद कहानी का रूप बदल गया था।

प्रश्न 45.
उत्तरोत्तर पुनरुत्पादन विधि क्या है?
उत्तर:
इस विधि में एक प्रयोज्य को कहानी सुनाई जाती है और उसका प्रत्याह्वान करवाया जाता है।

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प्रश्न 46.
एकाकी पुनरुत्पादन विधि क्या है?
उत्तर:
एकाकी पुनरुत्पादन विधि में कई प्रयोज्यों को एक साथ एक ही कहानी सुनाई जाती है, फिर सभी प्रयोज्यों को बारी-बारी से प्रत्याह्वान करवाया जाता है।

प्रश्न 47.
बार्टलेट ने अपने स्मरण से संबंधित अध्ययन किस विधि से किया?
उत्तर:
बार्टलेट ने अपना अध्ययन तीन विधियों से किया-क्रमिक पुनरुत्पादन विधि, उत्तरोत्तर पुनरुपादन विधि तथा एकाकी पुनरुत्पादन विधि।

प्रश्न 48.
केनेरी क्या है?
उत्तर:
केनेरी एक पक्षी है।

प्रश्न 49.
निस्पंद बिन्दु तथा नामपत्रित सम्बन्ध क्या है?
उत्तर:
जालीदार संरचना के तत्वों को निस्पंद बिन्दु कहते हैं। निस्पंद बिन्दु संप्रत्यय होते है किन्तु उनके बीच के सम्बन्ध को नाम पत्रित संबंध कहा जाता है जो संप्रत्ययों के गुणधर्म या श्रेणी सदस्यता दर्शाते हैं।

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प्रश्न 50.
बार्टलेट की अध्ययन-सामग्री क्या थी?
उत्तर:
बार्टलेट ने अपने अध्ययन सामग्री के रूप में कहानियों, चित्रों आदि को रखा।

प्रश्न 51.
इबिंगहॉस की अध्ययन-सामग्री क्या थी?
उत्तर:
इबिंगहॉस की अध्ययन-सामग्री निरर्थक पद थी।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अल्पकालीन स्मृति की विशेषता का वर्णन करें।
उत्तर:
अल्पकालीन स्मृति की निम्नलिखित विशेषता है, जो इस प्रकार है –

  1. अल्पकालीन स्मृति में स्मृति चिह्नों को अधिकतम 30 सेकेण्ड तक ही संचित करके रखा जाता है।
  2. इस प्रकार की स्मृति में व्यक्ति विषय या पाठ को मात्र एकाध प्रयास में ही सीख लेता है।
  3. इस प्रकार की स्मृति में स्मृति चिह्नों का नाश बहुत तीव्र गति से होता है, क्योंकि वे कमजोर होते हैं।
  4. इस प्रकार की स्मृति का विस्तार सामान्यतः उसे उद्दीपकों से अधिक का नहीं होता है।

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प्रश्न 2.
लघुकालीन स्मृति की प्रकृति का वर्णन करें।
उत्तर:
लघुकालीन स्मृति जिसे प्राथमिक स्मृति भी कहा जाता है, से तात्पर्य वैसी स्मृति-संरचना से होता है जिसमें व्यक्ति किसी विषय या पाठ को अधिक-से-अधिक 30 सेकेंड तक ही धारण करके रखता है। इस तरह की स्मृति की विशेषता यह है कि इसमें जो स्मृति चिह्न बनते हैं, उन पर यदि व्यक्ति ध्यान नहीं देता है या मानसिक रूप से उसका रिहर्सल नहीं करता है तो वह उसे तुरंत भूल जाता है।

सामान्यतः इसमें उन विषयों या पाठों से बनने वाले स्मृति चिह्न संचित हो पाते हैं जिन्हें व्यक्ति एकाध प्रयास में सीख लिया होता है। किसी अपरिचित व्यक्ति की दूरभाषा संख्या को एक बार सुनकर 4-5 सेकेण्ड के बाद प्रत्याह्वान करने की कोशिश पर सफल न होना, यह बताया है कि उस दूरभाषा संख्या को 4-5 सेकेण्ड से कम समय तक व्यक्ति धारण करके रख सका। इस तरह की स्मृति संचालन लघुकालीन स्मृति का उदाहरण है।

प्रश्न 3.
दीर्घकालीन स्मृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति, जिसे गौण स्मृति (secondeary memory) भी कहा जाता है, से तात्पर्य वैसे स्मृति संचयन (Memory storage) से होता है जिसमें स्मृति चिह्नों को कम-से-कम 30 सेकण्ड तक तो अवश्य धारण किया जाता है। इसकी कोई अधिकतम समय-सीमा नहीं होती है। शायद यही कारण है कि एक वृद्ध व्यक्ति भी अपने बचपन की अनुभूतियों का प्रत्याह्वान (recall) कर लेता है।

दीर्घकालीन स्मृति की विशेषता यह है कि इससे स्मृति चिह्नों का नाश धीरे-धीरे होता है तथा इसमें उन अनुभूतियों का संचयन होता है जो पर्याप्त अभ्यास (practice) के फलस्वरूप मस्तिष्क में बनते हैं। अपनी दूरभाषा संख्या तथा घनिष्ठ संबंधियों की दूरभाषा, संख्या प्रायः दीर्घकालीन स्मृति में ही संचित होती हैं।

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प्रश्न 4.
संचयन क्या है?
उत्तर:
संचयन (Storgae):
स्मृति की दूसरी अवस्था संचयन (storgae) की अवस्था होती है। संचयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें संकेतन द्वारा प्राप्त सूचनाओं एवं उत्तेजनाओं को कुछ समय के लिए संचित कर रखा जाता है। दूसरे शब्दों में, संचयन की अवस्था में स्मृति में प्रवेश पाचकी सूचनाओं एवं उत्तेजनाओं को कुछ समय के लिए धारित (retained) करके रखा जाता अवस्था को धारण (rentention) भी कहा जाता है।

प्रश्न 5.
प्रक्रमण स्तर का सामान्य परिचय संबंधित मनोवैज्ञानिकों के नाम के साथ लिखें।
उत्तर:
सन् 1972 में कैक और लौकहर्ट नामक दो मनोवैज्ञानिकों ने प्रक्रमण स्तर दृष्टिकोण को प्रतिपादित किया था। इस दृष्टिकोण के अनुसार किसी भी नयी सूचना का प्रक्रमण उसके प्रत्यक्षण और विश्लेषण की विधि पर आधारित है। प्रक्रमण का स्तर यह बतलाता है कि सूचना किस सीमा तक धारित की जाएगी। कैक एवं लॉकहर्ट ने बताया कि सूचना का कई स्तरों (भौतिक या संरचनात्मक) पर विश्लेषण संभव है। प्रक्रमण स्तर पर आधारित प्रयोगों से पता चला कि किसी सूचना के अर्थ को समझना तथा उसे दूसरे संप्रत्ययों, तथ्यों एवं अपने जीवन के अनुभवों से जोड़ना दीर्घकालिक धारण का सुनिश्चित उपाय है।

प्रश्न 6.
आर्थी स्मृति का प्रमुख लक्षण बतावें।
उत्तर:
टालबिन ने घोषणात्मक स्मृति के रूप में आर्थी स्मृति को पहचाना। आर्थी स्मृति का सीधा संबंध उन सूचनाओं की ओर होता है जो सामान्य ज्ञान से संबंध रखते हैं। हमारी जागरुकता से जुड़ी सूचनाएँ आर्थी स्मृति के रूप में संचित रहती हैं। सभी प्रकार के संप्रत्यय, विचार तथा तर्कसंगत नियम आर्थी स्मृति की पूँजी बन जाती है। जैसे, अर्थगत स्मृति के कारण हम अहिंसा का अर्थ स्थायी तौर पर याद रखते हैं। सामान्य ज्ञान के अन्तर्गत हम भारत की राजधानी दिल्ली है, चार और दो मिलकर छः होते हैं, पटना का S.T.D. कोड 0612 है तथा किताब लिखने में ई का प्रयोग गलत है आदि सूचनाओं को हम देर तक नहीं भूलते हैं।

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प्रश्न 7.
विस्मरण में अवरोध के जभाव को स्पष्ट करें।
उत्तर:
स्मृति भंडार में संचित तरह-तरह की सूचनाओं के लुप्त हो जाने का प्रमुख कारण अवरोध ही होता है। सीखने और याद करने में विभिन्न पदों के बीच साहचर्य स्थापित हो जाता है। भारी संख्या में जमा हो चुके साहचर्यों में आपसी द्वन्द्व के रूप में प्रतिस्पर्धा होती है जो अवरोधक की तरह कार्य करते हैं। पुनरुद्धार के क्रम में प्रतिस्पर्धा बाधक बनकर स्मृति को क्षति पहुँचाते हैं।

विस्मरण का यह प्रधान कारण है। विस्मरण का यह प्रधान कारण है। अग्रलक्षी अवरोध-पूर्व में प्राप्त की गई सूचना आनेवाली नई सूचना के लिए अवरोधक बन जाता है। अर्थात् पूर्व अधिगम, पश्चात् अधिगम के प्रत्याह्वान में अवरोध पहुंचाता है। इन्हीं अवरोधों के कारण एक भाषा के जानकार को दूसरी भाषा को सीखने में कठिनाई होती है।

प्रश्न 8.
स्मृति वृद्धि के लिए अवरोध को किस प्रकार हटाया जा सकता है?
उत्तर:
अवरोध विस्मरण का प्रमुख कारण है। स्मृति वृद्धि के लिए अवरोधों से मुक्त होना लाभकारी होता है। अवरोध से बचने के लिए अध्ययन के विषयों को इस प्रकार व्यवस्थित की जाती है कि एक विषय के तुरंत बाद लगभग समान लक्षण वाले विषय की बारी न आ जाए। भाषा के बाद गणित के बाद सामाजिक विज्ञान जैसी व्यवस्था करना उपयोगी होता है। असुविधा होने पर अधिगम-अभ्यासों का वितरण करना अच्छा होता है। अर्थात् विषय के बदलने के रूप कुछ देर तक मनोरंजन, खेल या बातचीत में समय व्यतीत कर लेने से पूर्व की स्मृति मजबूत हो जाती है तथा इसका प्रभाव अगले विषय पर नगण्य हो जाता है।

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प्रश्न 9.
स्मृति क्या है?
उत्तर:
स्मृति (memory) एक सामान्य पद है जिससे तात्पर्य पूर्व अनुभूतियों (past experiences) को मस्तिष्क में इकट्ठा करके रखने की क्षमता होती है। संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक जैसे-लेहमैन, लेहमैन एवं बटरफील्ड (Laechman, Laehman & Buterfield) ने स्मृति को परिभाषित करते हुए कहा है कि विशेष समयावधि के लिए सूचनाओं को संपोषित करके रखना ही स्मृति है। समयावधि एक सेकेंड से कम या सम्पूर्ण जीवन काल की भी हो सकती है। मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति के धनात्मक पक्ष से तात्पर्य पूर्व अनुभूतियों को याद करके रखने से माना है। अतः कहा जा सकता है कि स्मृति का धनात्मक पक्ष स्मरण (remembering) है तथा ऋणात्मक पक्ष (negative aspect) विस्मरण (forgetting) है।

प्रश्न 10.
कूट संकेतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कूट संकेतन (Encoding):
कूट संकेतन में किसी सूचना या बाह्य उत्तेजना (external stimulation) का प्रत्यक्ष करण व्यक्ति उसे एक निश्चित रूप (form) या कूटसंकेत (code) के रूप में तंत्रिका तंत्र (nerous system) में ग्रहण करता है। दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि कूट संकेत एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके सहारे सूचनाओं को एक ऐसे आकार या रूप form में परिवर्तित कर दिया जाता है कि वे स्मृति में प्रवेश पा सकें। साधारण बोलचाल की भाषा में स्मृति-चिह्नों (memory traces) का निर्माण होना ही संकेतन कहलाता है। स्मृति की पहली अवस्था कूट संकेतन (encoding) की होती है। इस अवस्था को पंजीकरण (registration) भी कहा जाता है।

प्रश्न 11.
लघुकालीन स्मृति किसे कहा जाता है?
उत्तर:
लघुकालीन स्मृति (short-term momory), जिसे प्राथमिक स्मृति (primary memory) भी कहा जाता है, से तात्पर्य वैसी स्मृति संरचना (memory storage) से होता है जिसमें व्यक्ति किसी विषय या पाठ को अधिक-से-अधिक 30 सेकण्ड तक ही धारण करके रखता है। इस तरह की स्मृति की विशेषता यह है कि इसमें जो स्मृति चिह्न बनते है, उन पर यदि व्यक्ति ध्यान नहीं देता है या मानसिक रूप से उसका रिहर्सल नहीं करता है तो वह उसे तुरंत भूल जाता है।

सामान्यतः इसमें उन विषयों या पाठों से बननेवाले स्मृति चिह्न संचित हो पाते हैं जिन्हें व्यक्ति एकाध प्रयोग में सीख लिया होता है। किसी अपरिचित व्यक्ति की दूरभाष संख्या को एक बार सुनकर 4-5 सेकंड के बाद प्रत्याह्वान करने की कोशिश पर सफल न हो, यह बताय है कि 4-5 सेकण्ड से भी कम समय तक व्यक्ति धारण करके रख सका। इस तरह का स्मृति संचयन (memory storage) लघुकालीन स्मृति का उदाहरण है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्मृति से आप क्या समझते हैं? स्मृति के विभिन्न तत्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्मृति का अर्थ एवं परिभाषायें (Introduction and Definition of Memory):
मानव जीवन में मुख्यत: व्यवहार का आधार स्मृति ही होती है। स्मृति के आधार पर ही सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है तथा अनेक अनुसंधानात्मक कार्य भी स्मृति पर ही आधारित होते हैं। अतः मानव-व्यवहार का अध्ययन करने के लिये स्मृति का अध्ययन करना आवश्यक है। स्मृति शुद्ध मानसिक प्रक्रिया है। जब व्यक्ति कोई व्यवहार करता है तब उसका अनुभव मानव मस्तिष्क में संचित हो जाता है। अनुभवों के अर्द्धचेतन मस्तिष्क में संचित होने के कारण जब उसी व्यवहार से सम्बन्धित कोई व्यवहार सम्मुख आता है तब वह पूर्व अनुभव जागृत हो जाता है।

अर्द्धचेतन में संचित अनुभवों का पुनः जागृत हो जाना ही स्मृति कहलाता है। यह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल मानसिक प्रक्रिया होती है जिसमें अनेक क्रियाओं का समावेश रहता है यथा-सीखना, धारणा, प्रत्यास्मरण तथा प्रत्याभिज्ञा। इन चारों क्रियाओं के सम्मिलित सहयोग को ही स्मृति कहते हैं, इसलिये ये स्मृति के मुख्य तत्व भी कहलाते हैं।

इस प्रकार स्मृति का सामान्य परिचय यह है कि व्यक्ति के अर्द्धचेतन मस्तिष्क में पूर्व अभवों के संचित रूप के पुनः जागृत होने की क्रिया स्मृति कहलाती है किन्तु मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए यह परिभाषा पर्याप्त नहीं है। मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति के स्वरूप को विभिन्न परिभाषाओं द्वारा स्पष्ट किया है जिनका अवलोकन करके स्मृति के मनोवैज्ञानिक स्वरूप को समझने में सरलता. होगी। मनोवैज्ञानिकों द्वारा दी गई स्मृति की कुछ मुख्य परिभाषायें निम्नलिखित हैं –

1. स्टाउट महोदय की परिभाषा:
स्टाउट महोदय के अनुसार, “स्मृति वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से पुराने फिर जागृत हो जाते हैं।”

2. स्पीयरमैन की परिभाषा:
स्पीयरमैन ने स्मृति की परिभाषा इस प्रकार दी है कि, “समझ में आनेवाली घटनाओं द्वारा जो स्थायी प्रभाव मस्तिष्क में छोड़ा जाता है, उसके पुनः जागृत होने की स्मृति कहते हैं।” इन दोनों परिभाषाओं में एक अनुभव का मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव तथा उनका पुनः स्मरण जागृत होने की स्मृति कहा गया है।

3. मैक्टूगल के अनुसार:
“घटनाओं की उसी रूप में कल्पना करना जिस रूप में उन्हें पूर्वकाल में अनुभव किया गया तथा उन्हें अपने उसी अनुभव के रूप में पहचानना ही स्मृति है।” इस परिभाषा के अनुसार किसी घटना के पूर्व संचित अनुभव को पुनः उसी रूप में पहचानना स्मृति है।

4. वुडवर्थ की परिभाषा:
वुडवर्थ ने स्मृति की अति सरल परिभाषा करते हुए कहा कि “पूर्व समय में सीखी गई बातों का याद करना स्मृति है।”

उपरोक्त परिभाषाओं द्वारा स्पष्ट है कि स्मृति वह मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने पूर्व अनुभवों को पुनः अपनी चेतना स्तर पर अनुभव या याद करता है। इस अनुभव अथवा याद करने की प्रक्रिया में व्यक्तियों से स्तर भेद तो हो सकता है किन्तु स्मृति की क्रिया के क्रियान्वयन में कोई भेद नहीं होता। स्मृति के आधार पर ही कल्पना शक्ति की उपज होती है।

यदि स्मरण शक्ति का अभाव हो जाये तो मानव जीवन निष्क्रिय हो जाता है। पागलों में असामान्य व्यवहार का आधर स्मृति का अभाव होना ही होता है। व्यक्तियों के स्तर भेद के अतिरिक्त आयु की दृष्टि से भी स्मृति के स्तर में उतार-चढ़ाव आते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि, “स्मृति वस्तुतः चेतन मन का अंग है और इसी से जीवन व्यापार सम्भव होता है तथा मस्तिष्क चेतन एवं अर्द्धचेतन शक्तियों के माध्यम से इस क्रिया को अपनाता है।”

स्मृति के तत्व (Factors of Memory) जैसा कि स्मृति की परिभाषा से स्पष्ट है कि स्मृति एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है। यह क्रिया अनेक क्रियाओं का सम्मिलित रूप होती है। अतः इसके स्वरूप को समझने के लिये इसके विभिन्न अंगों को समझना भी आवश्यक है। उक्त परिभाषाओं के अनुसार स्मृति की क्रिया के चार मुख्य अंग हैं – सीखना, धारणा, पुनःस्मरण तथा पहचानना। इनका विस्तृत वर्णन निम्न प्रकार है –

1. सीखना (Learning):
जैसा कि वुडवर्थ की स्मृति की परिभाषा मे स्पष्ट होता है कि, “पूर्व में सीखे गये कार्य को पुनः याद करना ही स्मृति है।” अत: सीखना स्मृति का प्रथम प्रमुख अंग है। सीखने के अभाव में अनुभव का संचय सम्भव नहीं और अनुभव के संचय के बिना स्मृति की क्रिया सम्भव नहीं, इस कारण स्मृति की क्रिया के लिये ‘सीखना’ क्रिया अत्यावश्यक है।

2. धारणा (Retention):
धारणा एक मानसिक क्षमता पर आधरित क्रिया है। कुछ बालक किसी बात को जल्दी याद कर लेते हैं, कुछ बहुत देर से याद कर पाते हैं। धारण कर भेद का कारण अनेक तत्व हैं। इन तत्वों के द्वारा ही धारण की क्रिया होती है, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है –

धारणा शक्ति तत्व या आधार (Factors of Retention):
धारणा शक्ति के छः मुख्य तत्व हैं, जिनके द्वारा धारणा शक्ति का स्तर प्रभावित होता है। इनका विवरण निम्न प्रकार है –

(i) मस्तिष्क:
धारणा शक्ति का मस्तिष्क से सीधा सम्बन्ध होता है। जो अनुभव प्राप्त किये जाते हैं उनमें अधिकांश को मस्तिष्क ग्रहण करता है। वे अनुभव अर्द्धचेतन भाग में रहते हैं। मस्तिष्क सीखे हुए अनुभव को क्रमबद्ध करता है। यदि मस्तिष्क प्रबल होता है तब उसमें धारणा शक्ति प्रबल होगी तथा वह प्राप्त अनुभव को अधिक समय तक सुरक्षित रख सकती है। जिनका मस्तिष्क दुर्बल होगा उनकी धारणा शक्ति भी दुर्बल होती है तथा प्राप्त अनुभव को अधिक समय तक संचित नहीं रख सकती। इस प्रकार व्यक्ति की स्मरण शक्ति का स्तर धारणा शक्ति पर ही आधारित होता है तथा धारणा शक्ति का स्तर मस्तिष्क के ऊपर निर्भर है।

(ii) स्वास्थ्य:
स्वस्थ व्यक्ति के नाड़ी तन्तु गतिशील होते हैं और अपना काम उचित रूप से कर सकते हैं। इस प्रकार यदि शरीर स्वस्थ होता है तब उसकी धारणा शक्ति भी प्रबल होती है, इसके विपरीत अस्वस्थता की दशा में व्यक्ति की धारणा शक्ति भी दुर्बल हो जाती है। उदाहरणार्थ, लम्बी बीमारी के कारण व्यक्ति के दुर्बल स्वास्थ्य की स्थिति में उसकी धारणा शक्ति भी दुर्बल भी हो जाती है।

(iii) रुचि और चिन्तन:
धारणा शक्ति का सर्वाधिक सम्बन्ध रुचि और चिन्तन से होता है। रुचिपूर्ण अनुभव को व्यक्ति शीघ्र धारण कर लेता है जबकि अरुचिपूर्ण कार्यों को प्रयत्न के बाद भी धारण नहीं कर पाता और यदि धारण कर भी कर लेता है तो यह धारण करना स्थायी नहीं बन पाता।

(iv) विषय का स्वरूप:
धारण शक्ति सम्बन्धित विषय के स्वरूप पर भी निर्भर करती है। विषय के स्वरूप से अभिप्राय उसकी उद्देश्य पूर्णता एवं सार्थकता से है। विषय जितना उद्देश्यपूर्ण सार्थक होता है उसकी धारणा उतनी ही प्रबल होती है। इसके विपरीत विषय के निरर्थक या उद्देश्यहीन होने पर उसकी धारणा शक्ति भी कमजोर होती है।

(v) सीखने की विधि:
धारणा की प्रबलता सीखने की विधि से भी प्रभावित होती है। यदि किसी कार्य के सीखने की विधि उत्तम है तब उसकी धारणा प्रबल होगी। विषय के स्वरूप के आधार पर सीखने की विधि का निर्धारण करने से सीखे गये कार्य का अनुभव अधिक दिन तक संचित रह सकता है। इसे विपरीत अव्यव-स्थिति पद्धति द्वारा सीखे गये कार्य की धारणा अधिक समय नहीं रह पाती।

(vi) अनुभव:
जिस क्रिया का जितना अधिक अनुभव होता है उसकी धारणा भी उतनी ही प्रबल होती है। अतः अनुभव भी धारणा का महत्त्वपूर्ण अंग है।

3. पुनमरण (Recall):
जब अतीत के अनुभव चेतना में आते हैं, तब उन्हें पुनर्मरण की संज्ञा होती है। पुनः स्मरण की मुख्य विशेषता यह होती है कि इसमें अतीत के अनुभव जैसे वे होते हैं वैसे ही चेतना में नहीं आते। उनमें से अनेक तत्व छूट जाते हैं तथा केवल मुख्य-मुख्य अंश की स्मृति में आते हैं।

कुहलमन ने पुनस्मरण की क्रिया के विषय में कहा कि, “पुनमरण मूल अनुभव की बिल्कुल वैसी की वैसी ही नकल नहीं होती। वस्तुतः वह पुनर्रचना नहीं बल्कि एक रचना मात्र है जो एक ऐसे कल की रचना है, जो मूल वस्तु के पूर्व अनुभव के आधार पर स्वीकृत कर ली जाती है तथा पूर्व प्रत्यक्षीकरण की रचना से बहुत भिन्न होती है।” इस प्रकार पुनमरण पूर्व अनुभवों को याद करने की क्रिया है।

पुनर्मरण के आधार (Factors of Recall):
पुनः स्मरण मुख्य आधार निम्नलिखित हैं –

(i) विचारों का साहचर्य (Association of ideas):
कभी-कभी विचारों के साथ उनसे सम्बद्ध अन्य बातों का भी स्मरण आ जाता है। उदाहरणार्थ ताजमहल के साथ शाहजहाँ का लंका के साथ रावण का तथा महाभारत के साथ श्रीकृष्ण का स्मरण हो जाता है। विचारों के साहचर्य के तीन मुख्य कारण होते हैं –

(अ) समानता:
दो वस्तुओं की पारस्परिक समानता से एक को देखते ही दूसरे का स्मरण हो आता है। जैसे अहिंसा का नाम लेते हैं तो इस सिद्धांत के प्रतिपादक महात्मा गाँधी तथा महावीर जैन का नाम स्मरण आ जाता है।

(ब) विपरीतता:
एक-दूसरे के विपरीत किन्तु परस्पर सम्बन्धित अनुभव भी कुछ स्मरण कराते हैं। जैसे किसी बदमाश को देखकर सज्जन की याद आती है।

(स) सहचारिता:
जब दो विषयों का अनुभव एक साथ हो जाता है तो उसमें से एक का स्मरण होने पर दूसरा भी याद आ जाता है। इसे सहचारिता कहते हैं।

(ii) मानसिक तत्परता:
मानसिक तत्परता से अभिप्राय विचारपूर्वक स्मरण करने से है। जिस अनुभव को पुनः स्मरण करने के लिये व्यक्ति मानसिक रूप से तत्पर होता है वह क्रिया या अनुभव तुरंत पुनः स्मृति में आ जाता है। अतः पुनमरण के लिये मानसिक तत्परता भी प्रभावशाली तत्व है।

(iii) संवेग:
संवेग भी पुनमरण को प्रभावित करते हैं। यदि संवेग अनुकूल होता है तब उसका पुनमरण आसानी से हो जाता है। उदाहरणार्थ, परिवार में किसी की मृत्यु हो जाने पर परिवार के अन्य दिवंगत व्यक्ति का पुनमरण हो जाता है। वह पुनमरण शोक के संवेग के परिणामस्वरूप ही होता है। इसमें विशेष बात यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि संवेग की अनुकूल अनुभूतियों का ही इस अवस्था में पुनः स्मरण होता है, विपरीत का नहीं। जैसे, विवाहादि के समय किसी की मृत्यु का स्मरण नहीं होता है और मृत्यु के समय किसी उत्सव का स्मरण नहीं होता अर्थात् रोमांच के संवेग द्वारा रोमांचक पुनः स्मरण और शोक के संवेग द्वारा शोकायुक्त।

4. पहचानना (Recognition):
स्मृति की प्रक्रिया का समापन पहचान से होता है। स्मृति में याद, धारणा और पुनमरण द्वारा यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि विषय क्या है, जब यह निश्चित हो जाता है कि चेतना में आने वाला विषय यह है तब उसे पहचान कहा जाता है। इस प्रकार स्मृति विभिन्न प्रक्रियाओं से होकर गुजरती हुई पहचान पर अपना वृत्त पूर्ण करती है।

स्मृति की प्रक्रिया द्वारा ‘प्रतिमा’ हमारे मस्तिष्क में बन जाता है। किन्तु जब प्रक्रिया का वृत्त पूर्ण हो जाता है तो प्रतिमा स्पष्ट हो जाती है। उदाहरणार्थ-जब कोई व्यक्ति हमारे सम्मुख आता है तब व्यक्ति की आकृति हमारे मस्तिष्क में बन जाती है, हम सोचने लगते हैं कि इस व्यक्ति को कहीं देखा है या इससे कहीं भेंट हुई है।

हम विभिन्न प्रकार से उसके विषय में घटनाओं का स्मरण करके उस पर विचार करते हैं तब उनका पुनरर्मरण करके अन्त में निश्चित हो जाता है कि उसे कहाँ देखा है या उसकी कहीं भेंट हुई है। व्यवहार के अंदर भी हम देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति काफी समय बाद हमें मिलता है और हम उसकी ओर अनजान से बने देखते हैं तब वह व्यक्ति अनायास ही कह उठता है कि क्या आपने मुझे ‘पहचाना’ नहीं? यह कहने का उसका अभिप्राय उसकी प्रतिमा के स्पष्ट न होने से ही होता है, तब यकायक हम भी कह उठते हैं कि अरे पहचान लिया कि आप अमुक व्यक्ति हैं, यह उनकी स्मृति के लिए पूर्णता का सूचक होता है।

(i) निश्चित पहचान:
जब हम किसी व्यक्ति को निश्चित रूप से पहचान लेते हैं तथा उससे सम्बन्धित. घटनाओं का भी हमें स्पष्ट स्मरण हो आता है तब इसको निश्चित पहचान कहते हैं।

(ii) अनिश्चित पहचान:
जब हमारे सम्मुख कोई व्यक्ति या वस्तु आती है और हम उसके लिये स्पष्ट पहचान नहीं बना पाते अर्थात् यह तो पहचान लेते हैं कि वह व्यक्ति अपना परिचित है किन्तु उसके सम्बन्धित स्मरण हमें स्पष्ट नहीं हो पाता तब यह अनिश्चित पहचान होती है।

(iii) असत्य पहचान:
जब हम किसी व्यक्ति को पहचानने में असत्य निर्णय ले लेते हैं तब वह असत्य पहचान होती है। उदाहरणार्थ, जब कोई व्यक्ति हमारे सामने आता है और हम किसी अन्य व्यक्ति के साथ उसकी स्मृति को जोड़कर उसे वही समझ लेते हैं तब यह असत्य पहचान होती है।

मनोविज्ञान के अध्ययन क्षेत्र में स्मृति के अंग के रूप में होने वाली पहचान निश्चित पहचान होती है, शेष दोनों भ्रम के क्षेत्र में आती हैं। अतः निश्चित पहचान की पहचानना क्रिया का मनोवैज्ञानिक रूप है।

स्मृति को उत्तम बनाने के साधन:
स्मृति के पूर्ण स्वरूप को समझाने के लिए इसके अर्थ, परिभाषा तथा अंगों को जानने के अलावा इसको उत्तम बनाने के विषय में जानना भी महत्त्वपूर्ण होगा। अच्छी स्मृति बनाने के मुख्य साधन निम्न प्रकार हैं –

(i) उत्तम विधि द्वारा सीखना:
स्मृति का प्रथम मुख्य अंग ‘सीखना’ है। यदि उचित पद्धति द्वारा किसी बात को सीखा जाये तो उसकी स्मृति अच्छी प्रकार होती है। उदाहरणार्थ, यदि हम किसी विषय को उसके अध्ययन के नियमों के अनुसार व्यवस्थित ढंग से पढ़ते हैं तो उसकी स्मृति शीघ्र हो जाती है। इसके विपरीत सीखने की पद्धतियों का उपयोग न करके अव्यवस्थित ढंग से सीखा गया कार्य स्मृति में कठिनता से आता है। अतः उत्तम विधि द्वारा सीखना उत्तम स्मृति का एक अच्छा साधन है।

(ii) प्रबल धारणा:
स्मृति का दूसरा महत्त्व अंग धारण शक्ति है। यदि व्यक्ति की धारणा शक्ति उत्तम होती है तो सीखी गई क्रिया अधिक स्थायी रह सकती है। अन्यथा दुर्बल धारण शक्ति में उत्तम सीखने की विधि भी अधिक सार्थक सिद्ध नहीं होती है। अत: उत्तम स्मृति के लिये प्रबल धारणा का होना भी आवश्यक है।

(iii) निरर्थक तत्वों का विस्मरण:
निरर्थक तत्वों के विस्मरण से अभिप्रेरक विषय से सम्बन्धित गौण बातों को भूल जाने से है। केवल विषय से सम्बन्धित मुख्य बातों को ही हमेशा स्मरण रखना चाहिये। उदाहरणार्थ, कक्षा में पढ़ते समय जो विषय पढ़ाया जा रहा है वही मुख्य होता है शेष अध्यापक के हावभाव, विद्यार्थियों की शरारतें या अन्य अनेक सम्बन्धी घटक गौण होते हैं। अतः विद्यार्थी यदि विषय के अतिरिक्त अन्य घटनाओं को भी धारण कर लेता है जो निरर्थक होती है तो वह विषय की अच्छी स्मृति नहीं कर सकता। विषय के निरर्थक तत्वों का विस्मरण ही अच्छी स्मृति में सहायक होता है।

(iv) उपयोगिता:
उपयोगिता-वही विषय सार्थक होता है जो उपयोगी होता है। अतः उपयोगी बातों का धारणा करना अच्छी स्मृति के लिये आवश्यक है क्योंकि उपयोगी बातों की आवश्यकता पड़ने पर चेतना के स्तर पर आ जाना अच्छी स्मृति का एक लक्षण है।

(v) सत्य पुनस्र्मरण:
अच्छी स्मृति वही कहलाती है जिसमें पूर्व अनुभव वैसे के वैसे ही चेतना के स्तर पर आ जाते हैं। इसके लिये आवश्यक है कि स्मृति को अच्छा बनाने के साधनों का उपयोग किया जाये क्योंकि पुनमरण ‘सीखने की विधि’ और धारणा शक्ति पर निर्भर करता है। इन दोनों को सही प्रकार से क्रियान्वित करने पर ही पुनमरण यथार्थ होता है।

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प्रश्न 2.
स्मृति से क्या तात्पर्य है? स्मृति को उन्नत बनाने के उपाय का वर्णन करें।
उत्तर:
स्मृति वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम अपने गत अनुभव को संग्रहित कर उसे वर्तमान चेतना में लाते हैं।

उन्नत बनाने के उपाय:
स्मृति सुथर की बहुत सारी युक्तियाँ हैं जिन्हें स्मृति सहायक संकेत कहा जाता है जो निम्न है –

प्रतिभा के उपयोग से स्मृति सहायक संकेत:
इस प्रकार की स्मृति सुधार विधि में याद की जानेवाली सामग्री तथा उसके इर्द-गिर्द सुस्पष्ट प्रतिभा की रचना की जाती हैं इसमें 2 प्रमुख विधि है –

1. मुख्य शब्द विधि:
इस विधि में से प्रतिभा विकसित करने में परिचित शब्द से सीखे जाने शब्द का संबंध जोड़ना होता है जैसे MAT शब्द परिचित होने से बच्चा CAT शब्द आसानी से सीख लेता है।

2. स्थान-विधि:
किसी वस्तु को याद करने में उसे संबंधित स्थान से जोड़कर उसकी प्रतिभा मन में लाने से विषय याद रहता है।

संगठन के उपयोग से स्मृति सायक संकेत:
संगठन के अर्थ हैं याद की जानेवाली सामग्री में एक क्रम सुनिश्चित करना है संगठित विषय की स्मृति तेज होती है।

1. खंडीयन विधि:
यदि किसी विषय को याद करना है तो उसे खंड में बाँटकर यादकर उसे क्रम में सजाकर स्मृति को उन्नत बनाया जा सकता है।

2. प्रथम अक्षर तकनीक:
इसमें अक्षर तकनीक को प्रयुक्त करने के लिए याद किए जाने वाले प्रत्येक शब्द के अक्षर को लेकर उससे एक वाक्य या शब्द बनाया जाता है। इसके अलावा स्मृति को उन्नत बनाने के अन्य उपाय हैं –

(a) गहन-स्तर पर प्रक्रमण कीजिए:
किसी सूचना को अच्छी तरह से याद करने के लिए गहन-स्तर पर प्रक्रमण करना चाहिए।

(b) अवरोध घटाएँ:
स्मृति उन्नत बनाने के लिए एक विषय को सीखने के बाद दूसरा ऐसा विषय सीखना चाहिए जिसमें विषय साम्य न हो। इसके अलावा अवरोध को कम करने के लिए अध्ययन के दौरान बीच में आराम करना चाहिए।

(c) पर्याप्त पुनरुद्धार संकेत रखिए:
किसी विषय को याद करते समय उस सामग्री में निहित कुछ पुनरुद्धार संकेतों को पहचान से और अपने याद करने की सामग्री के अंशों को इनसे जोड़ने से स्मृति उन्नत होती है। इस प्रकार कई प्रविधि और उपाय जिसकी सहायता से स्मृति को उन्नत बनाया जा सकता है। गत अनुभव का स्मरण न होना विस्मृति कहलाता है। अर्थात् विस्मृति (या धारण की किसी जाँच) की असमर्थता है।

कारण:

1. चिह्न हास के कारण विस्मरण:
जब हम किसी विषय को याद करते हैं तो उसके चिह्न मस्तिष्क में बन जाते हैं जिसे स्मृति-चिह्न कहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है स्मृति-चिह्न कमजोर होते जाते हैं। अतः हम विषय को पूरी तरह से भूल जाते हैं इसे अनुप्रयोग सिद्धांत कहा गया है।

2. अवरोध के कारण विस्मरण:
इसे अवरोध सिद्धांत भी कहते हैं इसके अनुसार स्मृति भंडार में संचित विभिन्न सामग्री के बीच अवरोध के कारण विस्मरण होता है सीखने और याद करने में विभिन्न पदों के बीच साहचर्य स्थापित होता है जिससे विषय स्मृति में अक्षत रहता है पुनरुद्धार के समय इसमें अवरोध उत्पन्न होता है जो 2 प्रकार का होता है।

3. अग्रलक्षी अवरोध:
पहले सीखा गया विषय बाद में सीखी गयी क्रिया को याद करने में अवरोध उत्पन्न करता तो अग्रलक्षी अवरोध कहते हैं।

4. पुर्वलक्षी अवरोध:
इसमें बाद में सीखा गया विषय पहले विषय को याद करने में बाधा डालता है।

5. पुनरुद्धार सफलता के कारण विस्मरण:
विस्मरण का एक कारण प्रत्याह के समय पुनरुद्धार के सति का अनुपस्थित रहना भी है पुनरुद्धार के संकेत वे साधन हैं जो हमें स्मृति में संचित सूचना की पुनः प्राप्त करने में मदद करते हैं टलविंग ने अपने सिद्धांत में इसकी विस्मृत: व्याख्या की है। इसके अलावा विस्मरण के कई कारण हैं जैसे विषय का स्वरूप, सीखने की मात्रा, विषय का भावात्मक मूल्य विषय की लंबाई, सीखने की विधि, विषय में रुचि, मस्तिष्क, अद्यात तथा शारीरिक कष्ट, मानसिक, धक्का एवं चिंता, मानसिक पर्यवेक्षण का अभाव।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 3.
लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति के अर्थ एवं विशेषताओं को बतलाएँ। इन दोनों के अंतर पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
लघुकालीन स्मृति का अर्थ (Meaning of short-term memory of STM):
लघुकालीन स्मृति को विलियम जेम्स (WilliamJames) ने प्राथमिक स्मृति (Primary memory or PM) भी कहा है। लघुकालीन स्मृति वैसी स्मृति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूतियों को मात्र एकाध प्रयास में ही सीख लेता है। शायद यही कारण है कि ऐसी अनुभूतियाँ कमजोर होती हैं। जब व्यक्ति इन अनुभूतियों पर ध्यान देता है या उनका मानसिक रिहर्सल करता है तब उनका विस्मरण नहीं हो पाता है। परंतु, इन तत्वों के अभाव में लघुकालीन स्मृति-चिह्नों का तुरंत लोप हो जाता है जिसके फलस्वरूप विस्मरण विस्मरण होता है।

इस तरह के विस्मरण को चिह्न-आधुत विस्मरण (trace dependent forgetting) कहा जाता है लघुकालीन स्मृति को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझ सकते हैं-मान लिया जाए कि कोई व्यक्ति किसी अपरिचित व्यक्ति से किसी कारणवश दूरभाष पर बातचचीत करने के लिए उसकी दूरभाष-संख्या दूरभाष निर्देशिका से प्राप्त करता है। व्यस्त सिगनल मिलने पर वह 15 सेकण्ड के लिए रुककर पुनः उसे डाइल करने की कोशिश करता है।

संभव है इस बार वह दूरभाष-संख्या भूल जाए या संख्या का सही क्रम भूल जाए। यह लघुकालीन स्मृति का उदाहरण होगा, क्योंकि यहाँ व्यक्ति दूरभाष संख्या को अधिकतम समय-सीमा (20-30 सेकंड) से कम ही समय तक संचित रख पाया। लघुकालीन स्मृति को अन्य नामों जैसे सक्रिय स्मृति (active memory) तात्कालिक स्मृति (immediate memory), चयन स्मृति (working memory) एवं लघुकालीन संचयन (short term storage) आदि से भी जाना जाता है। मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोधों एवं प्रयोगों से STM की कुछ खास विशेषताओं का पता चला है जिनसे इसका अर्थ और अधिक स्पष्ट हो जाता है। अतः इन विशेषताओं का वर्णन यहाँ अपेक्षित है जो इस प्रकार है –

  1. लघुकालीन स्मृति कमजोर (fragile) होती है, परिणामस्वरूप इससे विस्मरण तेजी से होता है।
  2. लघुकालीन स्मृति-उद्दीपनों (stimuli) को हू-ब-हू संचित न करके उन्हें उनकी आवाज (sound) के आधार पर कूटसंकेतीकृत (coding) कर संचित किया जाता है।
  3. मिलर (Miler) के अनुसार STM की संचयनशक्ति (storage capacity) एक समय में 72 अर्थात् अधिकतम 9 तथा न्यूनतम 5 उद्दीपनों की होती है। इसे मनोवैज्ञानिकों ने जादुई संख्या (magic number) कहा है।
  4. लघुकालीन स्मृति की अवधि अधिक-से-अधिक 25-30 सेकण्ड की होती है। पेटरसन एवं पेटरसन (Peterson & Peterson) तथा ब्राउन (Brown) के अध्ययन से इस तथ्य की संतुष्टि होती है। पेटरसन एवं पेटरसन के अध्ययन में तो STM की अधिकतम अवधि 18-20 सेकण्ड की ही पाई गई थी।

दीर्घकालीन स्मृति का अर्थ (Meaning of long term memory or LTM):
दीर्घकालीन स्मृति को विलियम जैम्स (William James) ने गौण स्मृति (secondary memory of SM) भी कहा है। दीर्घकालीन स्मृति से तात्पर्य वैसे स्मृति-संचयन (memory storage) से होता है जिसमें सूचनाओं को व्यक्ति काफी लम्बी अवधि के लिए संचित करता है। इस लम्बी अवधि की न्यूनतम सीमा 20-30 सेकेण्ड तथा अधिकतम सीमा कुछ निश्चित नहीं होती है। संभव है, व्यक्ति किसी सूचना को मात्र 2 घंटे के लिए LTM में संचित रखे या फिर उसे पूरे जीवनकाल के लिए भी संचित रखे। दीर्घकालीन स्मृति की संचय क्षमता (storage capacity) काफी बड़ी होती है और कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसकी क्षमता को असीमित बतलाया है।

इसमें वैसे सूचनाएँ संचित होती हैं जिन्हें व्यक्ति महत्त्वपूर्ण समझता है या जिन्हें वह अभ्यास करके प्राप्त करता है। व्यक्ति की अपनी दूरभाष-संख्या तथा अपने नजदीकी रिश्तेदारों की दूरभाष-संख्या LTM में मुख्य रूप से दो तरह की सूचनाएँ संचित होती हैं। पहली तरह की सूचनाओं का संबंध वैसी सूचनाओं से होता है जो सामयिक घटनाओं (temporal events) के क्रमों (sequences) से संबंधित होते हैं तथा दूसरी तरह की सूचनाओं का स्वरूप कुछ वैसा होता है जो तरह-तरह के संकेतों (symbols) एवं शब्दों के अर्थ आदि से संबंधित होता है। पहली तरह की सूचनाओं को प्रासंगिक स्मृति (episodic memory) तथा दूसरी तरह की सूचनाओं की स्मृति को अर्थगत स्मृति (semantic memory) कहा जाता है। LTM को निष्क्रिय स्मृति (inactive memory) भी कहा जाता है।

LTM के क्षेत्र में किए गए अध्ययनों से इसकी कुछ विशेषताओं (characteristics) का पता चला है जिनसे उसके अर्थ को ठीक ढंग से जाना जा सकता है। ऐसी विशेषताओं में निम्नांकित प्रमुख हैं –

  1. LTM में संचित सूचनाएँ सापेक्ष रूप से (relatively) स्थायी होती हैं जिसके कारण इसे विस्मरण देरी से होता है।
  2. STM में संचित सूचनाएँ मौलिक उद्दीपन से प्राप्त सूचनाओं की कार्बन कॉपी नहीं होती, बल्कि उन्हें अर्थ के आधार पर कूटसंकेतीकृत करके संचित किया जाता है।
  3. LTM में सूचनाएँ संगठित एवं साहचर्यात्मक ढंग से संचित की जाती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जो सूचनाएँ या एकांश आपस में अर्थपूर्ण ढंग से संबंधित होती हैं उन्हें व्यक्ति एक साथ संचित करता है।
  4. LTM में संचित वैसी सूचनाएँ कम सक्रिय होती हैं जो किसी घटना या कार्य के पूरा होने के बाद प्राप्त होती हैं। परंतु वैसी सूचनाएँ जो किसी घटना या कार्य के अधूरा ही रह जाने के फलस्वरूप प्राप्त होती हैं, अधिक सक्रिय होती हैं।

लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति में अंतर (Distinction between short term memory and long-term memory):
STM तथा LTM में प्रमुख अंतर निम्नांकित प्रकार के हैं –

1. STM में सूचनाएँ अधिक-से-अधिक:
20-30 सेकण्ड के लिए संचित करके रखी जाता हैं, परंतु LTM में सूचनाओं के संचयन की अधिकतम अवधि अनश्चित होती है। यह एक बेटे की भी हो सकती है, एक दिन की भी या फिर पूरे जीवन-अवधि के लिए।

2. STM में सक्रिय एवं सतत रिहर्सल (rehearsal) की प्रक्रिया चलती रहती है। म प्रक्रिया के बंद होते ही सूचनाओं का विस्मरण प्रारम्भ हो जाता है। LTM के साथ ऐसी बात नहीं है। LIM में ऐसी सक्रियता की जरूरत नहीं पड़ती है, हालांकि यह बात जरूर है कि प्रारम्भ में LTM में सूचनाओं को संचित करने में व्यक्ति को अधिक प्रयास करना आवश्यक हो जाते है, परंतु बाद में यह एक निष्क्रिय प्रक्रिया हो जाती है।

3. STM की संचयन:
क्षमता (storge capacity) सीमित होती है और मिलर की जादुई संख्या (magic number) के अनुसार यह क्षमता 7 ± 2अर्थात् 5 से 9 तक की (किसी एक समय में) होती है। LTM के साथ ऐसी बात नहीं है। LTM की संचयन-क्षमता असीमित (unlimited) होती है। इसकी न तो कोई न्यूनतम और न ही कोई अधिकतम संख्या निश्चित होती है।

4. STM से हुए विस्मरण का आधार स्मृति:
चिह्नों का नाश या ह्रास होना होता है जबकि LTM में हुए विस्मरण का आधार सामान्यतः पुनः प्राप्ति संकेतों (retrieval clues) का अनुपलब्ध होना है। पहली तरह के विस्मरण को चिह्न-आधृत विस्मरण (trace-dependent forgetting) तथा दूसरी तरह के विस्मरण को संकेत-आधृत विस्मरण (clue-dependent forgetting) कहा जाता है।

5. STM में संचित सूचनाओं का प्रत्याह्वान (recall) काफी आसान होता है। व्यक्ति थोड़ा-सा साधारण प्रयास से ही संचित सूचनाओं का प्रत्याह्वान कर लेता है। परंतु LTM से सूचनाओं का सही प्रत्याह्वान (recall) या प्रत्याभिज्ञान (recognition) कर पाता है।

6. STM ध्वनि-संकेतीकरण (phonological or accustic coding) से अधिक प्रभावित होता है जबकि LTM अर्थगत संकेतीकरण (semantic coding) से अधिक प्रभावित होता है। ध्वनि-संकेतीकरण में व्यक्ति शब्दों को उनकी ध्वनि में समानता (जैसे-CAT, MAT, SAT, BAT आदि) के आधर पर मस्तिष्क से संचित करता है तथा अर्थगत समानता में व्यक्ति शब्दों को उनके अर्थ अर्थात् (LARGE, TALL, BIG आदि) के आधार पर मस्तिष्कम में संचित करता है।

7. STM में नवीनता:
प्रभाव (recency effect) अधिक देखने को मिलता है जबकि LTM पर प्राथमिकी प्रभाव (primacy effect) अधिक देखने को मिलता है। शब्दों या एकांशों की सूची अतिम भागों में किया गया प्रत्याह्वान नवीनता-प्रभाव तथा प्रथम भागों से किया गया प्रत्याह्वान प्राथमिकी प्रभाव कहलाता है।

8. STM तथा LTM को न्यूरोदैहिक सबूतों (neurophysiological evidences) के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न किया गया है। मिलनर (Milner) के अनुसार कुछ ऐसे नैदानिक सबूत (clinical evidences) मिले हैं जिनमें देखा गया है कि व्यक्ति का LTM गंभीर रूप से प्रभावित था, परंतु STM ठीक था। उसी तरह एक अन्य नैदानिक ने इसमें यह देखा कि व्यक्ति का STM बुरी तरह प्रभावित था परंतु LTM बिल्कुल ठीक था। इन सबूतों के आधार पर मनोवैज्ञानिकों ने यह बतलाया है कि STM तथा LTM दो स्मृति तंत्र हैं जो अलग-अलग नियमों एवं सिद्धांतों से निर्देशित होते हैं।

स्पष्ट हुआ कि STM तथा LTM एक-दूसरे से भिन्न हैं। इन अंतरों के बावजूद कुछ मनोवैज्ञानिकों जैसे लॉकहार्ट एवं क्रैक (Lockhart & Craick) ने यह दावा किया है कि इन दोनों का दो अलग-अलग तंत्र (system) न मानकर एक ही स्मृति तंत्र के दो संबंधित पहलू मानकर चलना अधिक उचित होगा। परंतु उनके विचारों को अधिक समर्थन प्राप्त नहीं है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि फिलहाल इन दोनों को एक-दूसरे से भिन्न समझना ही उपयुक्त है।

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प्रश्न 4.
लघुकालीन स्मृति से आप क्या समझते हैं? लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति में अंतर बतावें।
उत्तर:
जब किसी पाठ या विषय को व्यक्ति सीखता है तब उससे उत्पन्न स्मृति चिह्न को मस्तिष्क में धारण करके रखता है। स्मृति चिह्न जितना ही अधिक समय के लिए मस्तिष्क में बना रहता है, धारण भी उतने ही अधिक समय के लिए बना रहता है। स्मृति चिह्नों को धारण करके रखने की अवधि को कसौटी मानकर स्मृति के दो प्रकार बताए गए हैं-(क) लघुकालीन स्मृति (short term memory) (ख) दीर्घकालीन स्मृति (long term memory)।

इन दोनों का वर्णन इस प्रकार है –

(क) लघुकालीन स्मृति (Short term memory):
लघुकालीन स्मृति वैसी स्मृति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूति को अधिकतम 20 से 30 सेकण्ड के लिए संचित करके रख पाता है तथा अनुभूतियों को वह मात्र एकाध प्रयासों में ही सीख लिया जाता है। कोई भी अनुभूति पहले व्यक्ति की लघुकालीन स्मृति में ही प्रवेश करती है। जब व्यक्ति उस अनुभूति पर ध्यान देता है या उसका मानसिक रिहर्सल करता है तब तो उसका विस्मरण नहीं हो पाता है। परंतु, इन दोनों तत्वों के अभाव में लघुकालीन स्मृति से स्मृति चिह्नों का नाश तेजी से होता है। फलस्वरूप, इसे विस्मरण भी काफी तेजी से होता है।

लघुकालीन स्मृति को एक उदारहण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मान लिया जाए कि किसी अपरिचित से दूरभाष पर बातचीत करने के लिए हम उसकी दूरभाष संख्या दूरभाष निर्देशिका से प्राप्त करते हैं। ‘व्यस्त सिंगनल’ (busy signal) मिलने पर 20 सेकण्ड रुककर पुनः उसे डायल करते हैं। संभव है कि हम उसकी दूरभाष संख्या भूल जाएँ या संख्या का सही क्रम भूल जाएँ। यह लघुकालीन स्मृति का उदाहरण होगा क्योंकि इससे दूरभाष संख्या को 20 सेकण्ड से कम ही समय के लिए स्मृति संचयन (memory store) में रखा गया था। विलियम जेम्स (William James) ने इसे प्राथमिक स्मृति (Primary memory) कहा है।

(ख) दीर्घकालीन स्मृति (Long term memory):
दीर्घकालीन स्मृति वैसी स्मृति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूति को. कम-से-कम 30 सेकण्ड से अधिक समय के लिए निश्चित रूप से संचित करके रखता है। इस तरह की स्मृति में अधिकतम कितने समय तक किसी स्मृति चिह्न को सचित रख जाता है, इसकी कोई समय-सीमा नहीं होती है। शायद यही कारण है कि एक वृद्ध व्यक्ति भी अपने बचपन की अनुभूतियों का आसानी से प्रत्याह्वान कर लेता है।

दीर्घकालीन स्मृति में वैसी अनुभूतियाँ संचित होती हैं जिन्हें व्यक्ति एकाध प्रयास में नहीं बल्कि कई प्रयासों में हासिल करता है। व्यक्ति की अपनी दूरभाष संख्या तथा अपने नजदीकी संबंधियों की दूरभाष संख्या दीर्घकालीन स्मृति में संचित होती है। विलियम जेम्स ने इसे गौण स्मृति (secondary memory) भी कहा है। ऐसी स्मृति में स्मृति चिह्नों का नाश धीरे-धीरे होता है।

लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति में अंतर (Distinction between short term memory and long term memory):
इन दोनों तरह की स्मृतियों में मुख्य अंतर निम्नांकित हैं –

  • लघुकालीन स्मृति की संचय अवधि (storage duration) अधिकतम 20 से 30 सेकण्ड की होती है जबकि दीर्घकालीन स्मृति में ऐसी कोई अधिकतम समय-सीमा नहीं होती है।
  • लघुकालीन स्मृति में वैसी अनुभूतियाँ होती हैं जो एकाध बार के प्रयास से उत्पन्न हो जाती हैं। परंतु, दीर्घकालीन स्मृति में केवल वैसी ही अनुभूतियाँ होती हैं जिन्हें व्यक्ति कई प्रयासों में काफी अभिरुचि दिखाकर प्राप्त किए हुए होता है।
  • दीर्घकालीन स्मृति से स्मृति चिह्नों का नाश तेजी से होता है जबकि लघुकालीन स्मृति से स्मृति चिह्नों का नाश धीरे-धीरे होता है। यही कारण है कि दीर्घकालीन स्मृति से विस्मरण की दर काफी धीमी होती है जबकि लघुकालीन स्मृति से विस्मरण की दर काफी तेज होती है।
  • कोई भी अनुभूति पहले लघुकालीन स्मृति में प्रवेश करती है और जब व्यक्ति उसपर ध्यान देता है या उसका मानसिक रिहर्सल करता है तब उसका स्थानांतरण दीर्घकालीन स्मृति में होता है।
  • लघुकालीन स्मृति की संचयन क्षमता (storgae capacity) काफी सीमित होती है जबकि दीर्घकालीन स्मृति की संचयन क्षमता असीमित होती है।

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प्रश्न 5.
क्षणदीय स्मृतियाँ, जीवन चरित स्मृति तथा निहित स्मृतियों का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
मानव स्मृति की जटिल एवं गत्यात्मक प्रकृति के अध्ययन के आधार पर दीर्घकालिक स्मृति को तीन प्रमुख दशाओं से जोड़ा जाता है –

1. क्षणदीप स्मृतियाँ:
आश्चर्यजनक अथवा विस्मयकारी घटनाओं के कारण उत्पन्न उदीप्त करनेवाली सूचनाओं पर आधारित स्मृतियाँ होती हैं। क्षणदीप स्मृतियाँ किसी विशेष स्थान, तिथि एवं समय से जुड़े ऐसे चित्र होते हैं जिसकी स्मृति लगभग स्थिर होती है। क्षणदीप स्मृतियों को बनाने हेतु लगातार प्रयासरत रहते हैं।

2. जीवन-चरित स्मृति:
यह किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़ी स्मृतियाँ होती हैं। प्रथम 4 – 5 वर्षों तक की स्मृतियाँ बताना लगभग कठिन होता है जिसे बाल्यावस्था स्मृतिलेस कहा जाता है। 20 के दशक की स्मृतियों की संख्या बहुत अधिक होती है। वृद्धावस्था की स्मृतियों ताजी और प्रेरणादायक होती हैं।

3. निहित स्मृतियाँ:
ये स्मृतियों जिनके प्रति कोई व्यक्ति अनभिज्ञ होता है तथा जो स्वचालित रूप से पुनरुद्धत होती है। अंधकार में कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर उंगलियों को दौड़ाना निहित स्मृति कहला सकती है क्योंकि यह अनुभव और अभ्यास से प्राप्त ऐसा गुण है जो कब और क्यों उत्पन्न हुआ कोई नहीं बतला सकता है। यह भी पता चला है कि सामान्य स्मृति वाले साधारण लोगों में भी कुछ निहित स्मृतियाँ होती है।

प्रश्न 6.
दमित स्मृतियाँ क्या होती हैं?
उत्तर:
सिगमंड फ्रायड ने बताया है कि लोगों में कुछ अभिधातज अनुभव होते हैं जो संवेगात्मक रूप से दुखदायी होते हैं। धमकी, चोरी, अकाल मृत्यु, धोखा जैसी घटनाओं की याद – भी कष्टदायक होती है। कोई भी व्यक्ति खतरनाक या दुखदायी स्मृति को बनाये रखना नहीं चाहता है। दुखदायी स्मृतियों को लोग अचेतन मन में दमित सामान्य जिन्दगी जीना चाहते हैं।

किसी व्यक्ति के द्वारा कुछ विशेष प्रकार की स्मृति को दबाकर भूल जाने की स्थिति बना लेता है। इस कृत्रिम विस्मरण को दमित स्मृति कहा जा सकता है। दमित स्मृति का कारक भय, आतंक, चिंता, दुख यानी कोई भी भयावह सूचना होती है। यह स्मृति लोप से अलग अवस्था होती है। यह मानसिक विकार भी उत्पन्न कर सकता है। दमित स्मृति की दशा में कोई व्यक्ति जीवन के कठिन यथार्थ के प्रति अपनी आँखें, कान और मन बंद करके, कठिन स्मृति से मानसिक रूप से पालयन कर जाते हैं।

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प्रश्न 7.
कार्यकारी स्मृति को वेर्डले के दृष्टिकोण के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर:
सन् 1986 में मनोवैज्ञानिक बेर्डले ने अल्पकालिक स्मृति का बहुघटकीय दृष्टिकोण का प्रस्ताव रखा था। बेर्डले के अनुसार अल्पकालिक स्मृति निष्क्रिय नहीं होती बल्कि यह एक कार्य-मेज है जिस पर स्मृति अपने विभिन्न रूपों वाली सामग्री को साथ लिए सजी रहती है। जब कभी लोग किसी संज्ञानात्मक कार्यों के लिए आवश्यक मानते हैं तब यह भंडार अपनी स्मृति भंडार से उचित सूचना प्रदान करती है। इस कार्य-मेज का दूसरा नाम कार्यकारी स्मृति है।

कार्यकारी स्मृति के कई घटक होते हैं –

1. स्वनिमिक घेरा:
इसमें ध्वनियों की सीमित संख्या होती है जो अभ्यास के अभाव में दो सेकण्ड के बाद मिटना प्रारम्भ कर देता है।

2. दृष्टि:
स्थानिक स्केच पेड-इसमें चाक्षुष और स्थानिक सूचनाएँ जमा रहती हैं।

3. बेर्डले केन्द्रीय प्रबंधक:
यह सूचनाओं को स्वनिमिक घेरे से, दृष्टि-स्थानिक स्केच पैड से तथा दीर्घकालिक स्मृति संग्रहित करता है। एक सच्चे प्रबंधक के रूप में यह अवधानिक साधनों का निमतन, सूचनाओं का सही वितरण तथा व्यवहार का परिवीक्षण, नियोजन और नियंत्रण करने में अपनी कुशलता का परिचय देता है। अर्थात् कार्यकारी स्मृति के सभी तीनों घटक अपने-अपने कार्यों के द्वारा बेर्डले के दृष्टिकोण का समर्थन करता है।

प्रश्न 8.
विस्मरण या भूलने के स्वरूप एवं कारणों का वर्णन करें। अथवा, भूलना क्या है? भूलने के क्या-क्या कारण हैं?
उत्तर:
भूलना एक ऐसी मानसिक क्रिया है जिसमें मस्तिष्क में बने हुए मृत्यु-चिह्न मिट जाते हैं, जिसके कारण पूर्व सीखे हुए विषय का न प्रत्याह्वान किया जा सकता है और न पहचाना जा सकता है। मनुष्य आजीवन सीखता या भूलता रहता है। वह किसी विषय को चाहे कितनी गहराई से क्यों न सीखे उसे एक दिन अवश्य भूल जाता है। इस प्रकार भूलना मानव जीवन का एक तथ्य माना जाता है।

जब भूलना मानव जीवन का तथ्य है तो उसका स्वरूप क्या है? इसे जानना परमावश्यक है। जब हम किसी विषय को सीखते हैं, तो उसके स्मृति-चिह्न मस्तिष्क में बन जाते हैं। इन्हीं स्मृति-चिह्न के सहारे हम सीखे हुए विषय को याद करते हैं। लेकिन समय के व्यवधान के कारण या मानसिक आघात के कारण ये स्मृति-चिह्न कमजोर होते जाते हैं और मिट जाते हैं। इन्हें मिटने पर सीखे हुए विषय को याद नहीं कर पाते हैं, यानी उसे भूल जाते हैं।

विस्मरण के कारण-विस्मरण के निम्नलिखित प्रधान कारण हैं –

1. पाठ्य-विषय का स्वरूप:
भूलना बहुत अंशों में सीखे गए विषय पर निर्भर करता है। जो विषय अधिक रोचक होता है, उसे व्यक्ति अधिक दिनों तक याद रखता है; क्योंकि उसके स्मृति-चिह्न बहुत दिनों तक बने रहते हैं।

दूसरी ओर, जो विषय निरर्थक या अरोचक होते हैं, उनके स्मृति-चिह्न मस्तिष्क पर दुर्बल बनते हैं और उनका साहचर्य पूर्व अनुभूतियों से मजबूती के साथ स्थापित नहीं हो पाता है। इसका फल यह होता है कि समय-व्यवधान के साथ उन विषयों के स्मृति-चिह्न मस्तिष्क से मिटने लगते हैं और अंत में हम उन्हें भूल जाते हैं। अत: विषय के स्वरूप के कारण सार्थक तथा रोचक विषय की अपेक्षा निरर्थक विषयों को हम जल्दी भूल जाती हैं।

2. शिक्षण की मात्रा:
जिस विषय को पूर्णरूप से नहीं सीखा जाता है, उसे हम शीघ्र भूल जाते हैं। अल्परूप से सीखने के कारण मस्तिष्क में स्मृति-चिह्न अच्छी तरह नहीं बन पाते हैं और शीघ्र ही पुनर्संरचना को (reconstruction) कहा है। चाहे विकृति को या संरचना या पुनसंरचना, इन तीनों प्रतिक्रियाओं से स्मृति में त्रुटि उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिकों ने इस प्रश्न पर काफी गंभीरता पूर्वक विचार किया है कि स्मृति में इस तरह की त्रुटि के क्या कारण हो सकते हैं। इनके द्वारा इस विषय पर किये गये शोधों के आलोक में निम्नांकित चार कारकों को महत्त्वपूर्ण बतलाया गया है –

  • सरल अनुमान (simple inference)
  • रूढ़ियुक्ति (stereotypes)
  • स्कीमा (Schema)
  • विविध कारक (Miscellaneous factors)

इनका वर्णन इस प्रकार है –

1. सरल अनुमान (Simple inference):
व्यक्ति जब किसी एकांश (items) या घटना को पहली बार देखता है या उसके बारे में सुनता है, तो वह उसके आधार पर कुछ अनुमान (inferences) निकालता है और बाद में जब वह उस मौलिक एकांश या घटना का प्रत्याह्वान करता है, तो उसके स्मृति में उस अनुमान के कारण कुछ त्रुटियाँ अर्थात् संरचनात्मक (construtive) या पुरसँरचनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण उस एकांश या घटना या प्रत्याह्वान किया गया अंश पहले से भिन्न हो जाता है।

2. रूढ़ियुक्ति (Stereotypes):
सामाजिक रूढ़ियुक्ति के कारण भी व्यक्ति अपनी स्मृति को नये ढंग से संरचित करता है तथा उसमें विकृति उत्पन्न करता है। रूढ़ियुक्ति से तात्पर्य व्यक्तियों के किसी पूरे समूह या वर्ग के शारीरिक गुणों या शीलगुणों के बारे में लगाये गये अनुमानों से होता हालांकि ऐसा लगाय गया अनुमान शायद ही कभी उस वर्ग के अधिकतर व्यक्तियों के लिए सही होता हो। समाज मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि रूढ़ियुक्ति का प्रभाव सामाजिक अंत:क्रिया पर तो काफी पड़ती है।

3. स्कीमा (Schema):
स्कीमा से तात्पर्य बाह्य वातावरण की वस्तुओं, उद्दीपकों, घटनाओं आदि के बारे में व्यक्ति के ज्ञान तथा उसके पूर्वकल्पनाओं (assumptions) से होता है। अतः स्कीमा का विकास अनुभव (experience) के आधार पर होता है और यह एक तरह का मानसिक ढाँचे के समान होता है जिसके माध्यम से व्यक्ति नयी सूचनाओं को संशोधित कर उसे वर्तमान सूचनाओं से संबंधित करता है एक बार स्कीमा का निर्णय हो जाने पर वे स्मृति में सूचनाओं के कूटसंकेतन (encoding) संचयन (storage) तथा पुनः प्राप्ति (retrieval) को काफी प्रभावित करते हैं और स्मृति में विकृति (distortion) उत्पन्न करते हैं।

4. विविध कारक (Miscellaneous factors):
कुछ मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति में उत्पन्न विकृति का कारण उपर्युक्त कारकों के अलावा कुछ अन्य कारकों को मानते हैं। जैसे, कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि कूटसंकेतन (econding) के समय मौजूद प्रक्रिया स्मृति में विकृति उत्पन्न करता है। जब व्यक्ति पहली बार किसी विषय या तथ्य को गहण करता है, तो संभव है कि वह उसके विस्तृत संदर्भ पर न ध्यान देकर और मात्र एक सूचना (अर्थात् कब और कैसे यह सूचना प्राप्त हुई) के रूप में ग्रहण करें।

इसी तरह से कभी-कभी व्यक्ति में बाह्य दुनिया (external world) के बारे में एक स्पष्ट प्रत्यक्षण एवं बोध (understanding) की तीव्र इच्छा होती है। इसका परिणाम यह है कि व्यक्ति किसी वस्तु या घटना के प्रत्यक्षण की विस्तृत (details) को इस तरह से भर देता है या पूरा करता है कि समग्र पैटर्न काफी अर्थपूर्ण एवं व्याख्या योग्य लगता है।

इसका स्पष्ट परिणाम यह होता है कि व्यक्ति के स्मृति में विकृति उत्पन्न हो जाती है अर्थात् वह कई महत्त्वपूर्ण चीजों को अपनी ओर से मौलिक घटना में जोड़ देता है। स्पष्ट हुआ कि स्मृति में संरचनात्मक तथा पुनर्संरचनात्मक प्रक्रियाएँ (reconstructive processes) होते रहती हैं जिससे उसमें विकृति उत्पन्न हो जाती है। स्मृति में उत्पन्न इस तरह के विकृति का आशय (implication) कानूनी प्रक्रिया खासकर प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य (eyewitness testimony) के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 9.
स्मरण की मुख्य विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्मरण करने के लिए यदि मनमानी पद्धति अपनाई जाये तो उसके परिणामस्वरूप किया गया स्मरण अधिक नहीं रह पाता। मनोवैज्ञानिकों के समक्ष भी स्मृति के सम्बन्ध में यही समस्या उत्पन्न हुई। इस समस्या के समाधान के लिये मनोवैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग किये तथा उनके आधार पर स्मरण के लिये विभिन्न प्रद्धतियों का प्रतिपादन किया। इस समस्त विधियों की अपनी-अपनी विशेषतायें हैं। अतः स्मरण के लिये निम्नलिखित पद्धतियों को अपनाना चाहिये –

1. पुनरावृत्ति स्मरण विधि:
पुनरावृति से अभिप्राय किसी विषय को बार-बार दोहराने से है। अतः इस विधि में एक विषय को बार-बार दोहराकर याद करना पुनरावृति स्मरण विधि कहलाती है। इस प्रद्धति में स्मरण करने केलिये एक विषय को बार-बार दोहराकर याद किया जाता है। उदाहरणार्थ, बच्चे जब किसी कविता को याद करते हैं तो उसे बार-बार दोहराते हैं तथा उस कविता को याद कर लेते हैं।

इस विधि की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें दिये गये विषय को एक दो बार पढ़कर दोहराया जाता है तथा इसके बाद उसे मन में दोराहते हैं। ऐसा करने से विषय का चित्र मस्तिष्क में अंकित हो जाता है। जितनी बार विषय को दोहराया जाता है। उनका चित्र उतना ही स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार वह स्थायी रूप धारण कर लेता है। सार्थक विषयों को स्मरण करने में यह विधि अति उत्तम है। इसके द्वारा दैनिक जीवन के कार्यों को भी बार-बार दोहराकर स्मरण किया जाता है।

2. पूर्ण स्मरण स्मृति:
इस विधि में किसी विषय को एक साथ पूर्ण रूप से याद किया जाता है इसलिये इसको पूर्ण विधि (Whole Method) कहा जाता है। उदाहरणार्थ-यदि किसी बालक को कोई कविता याद करनी होती है तो वह पूरी की पूरी कविता एक साथ पढ़ता है तथा इसी प्रकार अनेक बार उसको पूर्ण रूप से दोहराता है। ऐसा करने से पूरी कविता एक साथ याद हो जाती है।

इस विधि पर मनोवैज्ञानिक श्री लोट्री स्टीफेंस (Lotti Steffens) ने एक प्रयोग किया। उसने एक कविता को पहले पूर्णरूप से अनेक बार पढ़वाया। हर बार पढ़ने पर कविता के स्मरण करने में होने वाली गलतियों को लिखा जाता रहा। इस प्रयोग के परिणामस्वरूप उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि पूर्ण विधि द्वारा स्मरण जल्दी होता है। आशिक विधि द्वारा स्मरण करने से इस विधि द्वारा कम समय लगा।

3. स्मरण की आंशिक विधि:
इस विधि द्वारा स्मरण करने के लिये विषय को विभिन्न भागों में विभक्त कर लिया जाता है तथा एक बार में एक भाग को याद करके बारी-बारी से सभी भागों को कंठस्थ कर लिया जाता है, इस प्रकार यह विधि पूर्ण विधि से एकदम विपरीत है। पेकस्टाइम (Pechstein) नामक मनोवैज्ञानिक ने आशिक विधि और पूर्ण-विधि का एक प्रयोग द्वारा तुलनात्मक परीक्षण किया।

उन्होंने कुछ निरर्थक विषयों को बारह व्यक्तियों को कंठस्थ करने के लिये दिया उनमें से छ: व्यक्तियों को आंशिक पद्धति से तथा छः को पूर्ण विधि से उस सामग्री को कंठस्थ करने के लिये कहा गया। इस प्रयोग के परिणामस्वरूप उसने देखा कि आंशिक विधि से याद करने में पूर्णविधि द्वारा स्मरण की अपेक्षा कम समय लगा। अत: उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि आंशिक विधि द्वारा स्मरण करने में कम समय लगता है।

इस प्रकार कुछ विद्वानों ने आशिक विधि को उत्तम बताया तथा कुछ ने पूर्ण विधि को। किन्तु इन दोनों विधियों को समझने के पश्चात् यह स्पष्ट है कि कुछ विषय सामग्री के लिए आंशिक पद्धति स्मरण के लिए उत्तम है तथा कुछ विषयों के लिए पूर्ण विधि उत्तम है। जैसे निरर्थक तथा अव्यवस्थित सामग्री को स्मरण करने के लिये आशिक पद्धति उत्तम है और व्यवस्थित तथा सार्थक विषय सामग्री पूर्ण विधि द्वारा जल्दी कंठस्थ हो जाती है। इसके अतिरिक्त अधिक लम्बी विषय-सामग्री अंशों में अच्छी याद होती है और छोटी सामग्री पूर्ण विधि से इन दोनों विधियों की उत्तमता व्यक्तिगत भिन्नता से भी प्रभावित होती है। अतः उपरोक्त दोनों ही स्मरण विधियाँ अपने-अपने विषय क्षेत्र के स्मरण के लिए उत्तम हैं।

4. मिश्रित विधि:
मिश्रित विधि आशिक तथा पूर्ण विधि की मिश्रित पद्धति है। इस विधि में दोनों विधियों को अपनाया जाता है। अधिक लम्बे विषयों को कंठस्थ करने के लिये ही इस विधि का प्रयोग किया जाता है। इस विध में एक विषय को पहले पूर्ण विधि द्वारा कंठसी करने का प्रयास किया जाता है तथा बाद में उसे अंशों में विभाजित करके दोहराया जाता है। इस प्रकार अनेक विषयों में यह विधि उत्तम सिद्ध हुई। इस विधि के विषय में मनोवैज्ञानिक काल्पिन ने कहा है, “ये दोनों विधियाँ (आशिक और पूर्ण) एक साथ चलाकर विषय सुगमता से कंठस्थ किया जा सकता है।”

5. क्रमिक तथा समय विभाजन विधि:
इस पद्धति के अनुसार किसी वस्तु को लगातार एक क्रम में याद करने का प्रावधान है। इसमें मानसिक थकान के कारण विश्राम के लिये समय का विभाजन किया जाता है। ऐसा करने से मस्तिष्क की शक्ति शिथिल नहीं होती। प्रयोगों द्वारा यह देखा गया है कि वस्तु याद करते समय यदि विश्राम किया जाये और उस विश्राम के समय में अन्य कोई काम कर लिया जाये तो भी मस्तिष्क की शक्ति नहीं घटती। इस विधि की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें मस्तिष्क तो शिथिल होने से बचा ही रहता है। साथ ही मस्किष्क में याद किये विषय के स्मृति चिह्न स्थायी बन जाते हैं। आजकल इस विधि का अधिक उपयोग किया जाता है।

6. निरंतर स्मरण विधि:
यह विधि क्रमिक विधि के एकदम विपरीत है। इस विधि द्वारा स्मरण करने में पूरे के पूरे समय को लगातार एक ही समय में याद किया जाता है। इसमें बीच-बीच में विश्राम नहीं किया जाता। इस प्रकार यह निरंतर चलने वाली विधि है। जब तक पूरा विषय याद नहीं हो जाता इसमें कोई व्यवधन नहीं डाला जाता। यह विधि सामान्य रूप से छोटी विषय सामग्री को याद करने में अधिक उपयोगी सिद्ध होती है।

7. सक्रिय विधि:
इस विधि में स्मरण के समय शारीरिक सक्रियता पर अधिक बल दिया जाता है। बहुधा इस विधि द्वारा जोर-जोर से बोलकर विषय को याद किया जाता है। इस विधि के विषय में एविंग हाउस और उसके अनुयायिों का मत है कि यह विधि स्मरण की उत्तम विधि है। इसमें याद करते समय एक रोचकता बनी रहती है जिसके कारण विषय जल्दी याद हो जाता है। अधिक रोचक बनाने के लिये कभी-कभी इस विधि को लयात्मक भी बनाया जाता है।

8. मनन विधि:
यह विधि सक्रिय-विधि के एकदम विपरीत है। इसमें याद करते समय विषय को मन ही मन में दोहराया जाता है। इसके साथ शरीर और वाणी दोनों इस विधि में शिथिल होते हैं। यदि विधि एक जटिल विधि है और सामान्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति इसका उपयोग नहीं कर सकता, किन्तु फिर भी कुछ विशेष विषयों के स्मरण में यह विधि अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होती है। अधिकांश गम्भीर विषयों को समझने में यह विधि प्रयोग में लाई जाती है।

9. बौद्धिक विश्लेषण विधि:
जैसा कि इस विधि के नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें विषय को प्रयास करके बौद्धिक विश्लेषण के द्वारा याद किया जाता है। इस विधि द्वारा यह याद किया गया विषय अधिक स्थायी रूप से चेतना स्तर पर अंकित हो जाता है। अतः यह विधि स्मरण की उत्तम विधि मानी जाती है।

10. यांत्रिक विधि:
इस विधि द्वारा याद करने वाले विषय को बिना बौद्धिक विश्लेषण किये सीधे रूप में याद किया जाता है। इस प्रकार यह विधि बौद्धिक विश्लेषण विधि के एकदम विपरीत है, इसमें विषय को बिना विचार के बार-बार दोहराकर याद किया जाता है। यह विधि स्मरण विधियों में अच्छी विधि नहीं मानी जाती क्योंकि इस विधि द्वारा याद किये गये विषय के स्मृति चिह्न अधिक समय तक मस्तिष्क में नहीं टिक पाते। इस विधि को बोध रहित विधि भी कहा जाता है। इसे यांत्रिक विधि इसलिये कहते हैं क्योंकि इसमें व्यक्ति एक यंत्र की भांति काम करता है।

इस प्रकार हमने स्मृति को विभिन्न विधियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करके यह पाया कि स्मरण की कौन-सी विधि सर्वोत्तम है और कौन-सी न्यूनतम है यह निर्णय नहीं किया जा सकता क्योंकि स्मरण की समस्त विधियों की अपनी-अपनी विशेषतायें हैं जिसके आधार पर सभी विधियाँ उत्तम हैं किन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि प्रत्येक विधि का विषय की प्रकृति के आधार पर ही समस्त विधियाँ उत्तम हैं। उदाहरणार्थ-लम्बे विषय के लिये आंशिक विधि तथा छोटे विषय को स्मरण करने के लिए आंशिक और व्यवस्थित, सार्थक एवं लघु विषय-वस्तु के लिये पूर्ण विधि महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार स्मरण विधि की उत्तमता विषय-वस्तु की प्रकृति पर निर्भर करती है। अत: स्मरण स्मृति की विधियाँ उत्तम हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 10.
विस्मरण के व्यवहारवादी या बाधक सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
बाधक सिद्धांत या जिसे हस्तक्षेप सिद्धांत भी कहा जाता है, विस्मरण का एक प्रमुख सिद्धांत है। इस सिद्धांत में विस्मरण की व्याख्या व्यवहारवादियों के नियमों के अनुकूल की गई है। इसलिए इसे विस्मरण का व्यवहारवादी सिद्धांत (behaviourstic theory) भी कहा जाता है। बाधक सिद्धांत का दावा है कि जब किसी पूर्व सीखी गई अनुक्रिया या विषय अर्थात् मौलिक विषय या पाठ का व्यक्ति प्रत्याह्वान (recall) करता है तो उस समय उन सभी अनुक्रियाओं या विषयों, जिन्हें वह मौलिक विषय के पहले तथा बाद में सीख चुका होता है, से उत्पन्न स्मृति-चिह्न आपस में अन्तःक्रिया (interaction) करते हैं।

इस तरह की अंत:क्रिया के दो परिणाम होते हैं-सरलीकरण (facilitation) तथा बाधा (interference)। विस्मरण इसी बाधक परिणाम की अभिव्यक्ति करता है। इस तरह का बाधक प्रभाव जितना अधिक होता है, विस्मरण की मात्रा भी उतनी ही अधिक होती है। बाधक सिद्धांत की इस व्याख्या से यह स्पष्ट है कि इसमें विस्मरण का कारण मौलिक विषय के बाद सीखे गए विषय या पाठ (अग्रलक्षी अवरोध) दोनों को बतलाया गया है। फलतः बाधक सिद्धांत के दो मुख्य पहलू हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. बाधक सिद्धांत-पूर्वलक्षी या पृष्ठोन्मुख अवरोध (Interference theory retroac tive inhibition) और
  2. बाधक सिद्धांत-अग्रलक्षी अंवरोध (Interference theory:proactive inhibition) इन दोनों पहलुओं का वर्णन निम्नांकित है –

बाधक सिद्धांत-पूर्वलक्षी या पृष्ठोन्मुख अवरोध (Interference theory: retro active inhibition):
पृष्ठोन्मुख अवरोध की व्याख्या बाधक सिद्धांत के अनुसार सबसे पहले मैकग्यूश (McGeoch) द्वारा की गई। इन्होंने इसकी व्याख्या करने के लिए एक विशेष प्राक्कल्पना (hyothesis) बनाई जिसे स्वतंत्र प्राक्कल्पना (independence hypothesis) कहा गया। इस प्राक्कल्पना के अनुसार मौलिक विषय के सीखने से उत्पन्न स्मृति-चिह्न तथा अवरोधक विषय से उत्पन्न स्मृति-चिह्न दोनों ही एक साथ स्वतंत्र रूप से बिना एक-दूसरे को प्रभावित किए संचित रहते हैं।

जब व्यक्ति मौलिक पाठ का प्रत्याह्वान करता है तो मौलिक पाठ के स्मृति-चिह्नों एवं अवरोधक पाठ के स्मृति-चिह्नों के बीच एक तरह की प्रतियोगिता उत्पन्न होती है जिसका परिणाम यह होता है कि मौलिक विषय का प्रत्याह्वान कम हो जाता है, यानी उसकी विस्मरण हो जाता है। मैकग्यूश ने यह भी बतलाया है कि जब मौलिक विषय तथा अवरोधक विषय के बीच समानता होती है तो प्रत्याह्वान के समय दोनों विषयों के स्मृति-चिह्नों में प्रतियोगिता अधिक होती है जिससे व्यक्ति मौलिक विषयों या पाठों का प्रत्याह्वान कम कर पाता है और उसका विस्मरण हो जाता है।

चूंकि मैकग्यूश के इस सिद्धांत में विस्मरण की व्याख्या मौलिक पाठ तथा अवरोधक पाठ के स्मृति-चिह्नों के बीच उत्पन्न प्रतियोगिता के आधार पर होती है, इसलिए इसे अनुक्रिया की प्रतियोगिता सिद्धांत (competition of response theory) भी कहा जाता है । इसे स्थानांतरण सिद्धांत (transfer theory) भी कहा जाता है। क्योंकि मैकग्यूश ने यह भी बतलाया है कि इस प्रतियोगिता के कारण एक तरह का नकारात्मक अंतरण (negative transfer) हो जाता है जिससे मौलिक विषय के प्रत्याह्वान में कमी आ जाती है।

मैकग्यूश ने अपने सिद्धांत में यह भी स्पष्ट किया कि मौलिक विषय या पाठ के प्रत्याहह्वान के समय स्मृति-चिह्नों के बीच हुई प्रतियोगिता की अभिव्यक्ति तीन तरह के सूचक (indices) द्वारा होती है-प्रकट अंत:सूची बलप्रवेश (over interlist iotrusion) जिसमें मौलिक पाठ का प्रत्याह्वान करते समय अवरोधक पाठ (interfering task), स्मृति-चिह्न एक तरह से बलप्रवेश (intrusion) कहते हैं तथा प्रकट अंतरासूची बलप्रवेश (over intraclist intrusion) जिसमें मौलिक पाठ या सूची का प्रत्याह्वान करते समय जिस पद का या एकांश का प्रत्याह्वान करना चाहिए था, उसका प्रत्याहह्वान न करके उसकी जगह व्यक्ति एक-दूसरे पद का प्रत्याह्वान करता है।

अप्रकट बलप्रवेश (covert intrusion) में मौलिक विषय या पाठ का प्रत्याह्वान करते समय अवरोधक पाठ का पद या एकांश व्यक्ति के मन में अपने-आप आ जाता है, फिर उसे गलत समझकर वह प्रत्याह्वान न करके चुप रह जाता है। इन तीनों तरह के बलप्रवेश में प्रथम दो तरह के बलप्रदेश से विस्मरण अधिक होता है।

मनोवैज्ञानिकों द्वारा मैकम्यूश के इस सिद्धांत की कुछ आलोचनाएं निम्नांकित बिन्दुओं पर की गई हैं –

1. मैकग्यूश की इस अनुक्रिया की प्रतियोगिता सिद्धांत की आलोचना मेल्टन एवं इर्विन (Melton & Irvin) द्वारा की गई है। इन लोगों ने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर यह बतलाया है कि विस्मरण का कारण मात्र प्रतियोगिता कारक (competition factor) नहीं होता है, बल्कि अन-अधिगम कारक (unlearning factor) भी होता है जिसकी चर्चा तक इस सिद्धांत में नहीं की गई है।

2. मैकग्यूश के इस सिद्धांत के अनुसार अगर मौलिक विषय या पाठ की लम्बाई अधिक है तो छोटा विषय या पाठ की तुलना में उसका विस्मरण अधिक होगा, क्योंकि बड़ा पाठ या सूची होने पर प्रतियोगी पदों या एकांशों की संख्या अधिक हो जाती है जिससे प्रतियोगिता बढ़ जाती है और उसके प्रत्याह्वान में कमी आ जाती है।

3. बाधक सिद्धांत-अग्रलक्षी प्रावरोध या अवरोध (Interference theory : proac tive inhibition):
बाधक सिद्धांत का दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू अग्रलक्षी अवरोध की वख्या करना है। जब मौलिक विषय या सूची के प्रत्याहवान में कमी वैसे विषय या सूची के सीखने से उत्पन्न स्मृति-चिह्नों द्वारा की गई प्रतियोगिता के कारण होती है जिसे व्यक्ति मौलिक विषय या पाठ के पहले सीख चुका होता है तो इसे अग्रलक्षी अवरोध कहा जाता है। ग्रीनवर्ग तथा अंडरवुड (Greenberg & Underwood) ने एक प्रयोग किया 10-10 विषय की चार सूचियाँ तैयार करके प्रयोज्य को एक-एक करके सीखने के लिए दी और एक-एक करके 48-48 घंटे के बाद उसका प्रत्याह्वान 69% किया जबकि अंतिम सूची का प्रत्याह्वान मात्र 25% किया।

इसका मतलब यह हुआ कि पहली सूची का विस्मरण 31% हुआ जबकि दूसरी सूची का विस्मरण 75% हुआ। प्रयोगकर्ताओं के अनुसार चौथी सूची का विस्मरण इसलिए अधिक हुआ, क्योंकि इसके पहले प्रयोज्य तीन और सूचियों को सीख चुका था। अंडरवुड तथा पोस्टमैन (Underwood & Postmen), स्टार्क तथा फ्रेजर ने भी अपने-अपने प्रयोगों के आधार पर बाधक सिद्धांत द्वारा अग्रलक्षी अवरोध की उक्त व्याख्या का समर्थन किया है।

कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बाधक सिद्धांत द्वारा अग्रलक्षी अवरोध (Proactive inhibition) की प्रदत्त व्याख्या द्वारा एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की व्याख्या नहीं होती है। सामान्यतः अवरोधक पाठ विराम अभ्यास (distributed practice) से सीखने पर अविराम अभ्यास (massed practice) से सीखने की अपेक्षा अधिक मजबूत होता है। फलत: ऐसी हालत में अग्रलक्ष्मी अवरोध की मात्रा विराम अभ्यास में अविराम अभ्यास की अपेक्षा अधिक होनी चाहिए। अंडरवुड एवं एक्ट्रैण्ड (Underwood & Ekstrand) ने अपने प्रयोग में इसके विरुद्ध तथ्य पाया है।

दूसरे शब्दों में, इन्होंने प्रयोगात्मक अध्ययन में पाया कि जब अवरोधक सूची को विराम अभ्यास देकर सीखा गया था तो अग्रलक्षी अवरोध की मात्रा कम थी, परंतु जब उसे अविराम अभ्यास देकर सीखा गया तो अग्रलक्षी अवरोध की मात्रा अधिक थी। निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि बाधक सिद्धांत में विस्मरण के दोनों पहलुओं अर्थात् पृष्ठोन्मुख अवरोध तथा अग्रलक्षी अवरोध की जो व्याख्या की गई है वह अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण व्याख्या है। यद्यपि कुछ मनोवैज्ञानिक इस सिद्धांत से कुछ बिन्दुओं पर असंतुष्ट अवश्य रहे हैं, फिर भी उसी इस सिद्धांत का कोई सर्वमान्य एवं संगत विकल्प नहीं है।

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प्रश्न 11.
विस्मरण के अनुप्रयोग सिद्धांत या ह्रास नियम या एबिंगहॉस नियम की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
विस्मरण का यह सिद्धांत सबसे पहला है। जिसका प्रतिपादन जर्मन मनोवैज्ञानिक एबिंगहाँस (Ebbinghaus) द्वारा 1885 में किया गया। इस सिद्धांत का दावा है कि जब व्यक्ति किसी पाठ या विषय को सीखता है तो उससे उसके मस्तिष्क में कुछ दैहिक परिवर्तन (physiological changes) होते हैं जिन्हें ‘स्मृति चिह्न’ (memory traces) कहा जाता है। सीखने के बाद जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, तो इन स्मृति-चिह्नों का मूल कारण बीते हुए समय में मौलिक पाठ या याद किए गए पाठ (विषय) का अनुप्रयोग (disuse) है अर्थात् उसका नहीं दोहराना है। अनुप्रयोग के कारण स्वभावतः स्मृति-चिह्न क्षीण हो जाते हैं जिसके कारण सीखे गए पाठ का विस्मरण हो जाता है।

एबिंगहॉस के इस सिद्धांत की उक्त व्याख्या से यह स्पष्ट है कि इसमें विस्मरण के मुख्य तीन कारण बतलाए गए हैं –

  1. सीखने के बाद समय का बीतने जाना। समय-अंतराल जितना ही अधिक होगा विस्मरण की मात्रा उतनी ही अधिक होगी।
  2. बीते हुए समय में मौलिक पाठ या विषय को नहीं दोहराना अर्थात् उसका अनुप्रयोग (disuse) करना।
  3. समय बीतने और उसमें विषय या पाठ का अनुप्रयोग होने से स्मृति-चिह्नों का ह्रास होना।

यद्यपि यह सिद्धांत अपने समय का एक काफी महत्त्वपूर्ण रहा है, किन्तु आज इसकी मान्यता समाप्त हो गई है। इसकी व्याख्या को पौराणिक व्याख्या माना जाता है। इस सिद्धांत की आलोचना भी काफी हो गई है। इसकी व्याख्या को पौराणिक व्याख्या माना जाता है। इस सिद्धांत की आलोचना भी काफी हो गई है। इसकी प्रमुख आलोचनाओं में निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. कई प्रयोगों से यह स्पष्ट हो गया है कि विस्मरण का कारण मात्र समय का बीतना नहीं होता है बल्कि जब व्यक्ति उस समय-अंतराल में नई-नई अनुभूतियों को सीखता है तो इससे पहले सीखे गए पाठ या विषय के प्रत्याह्वान (recall) में बाधा पहुँचती है जिससे भी विस्मरण होता है। मुलर एवं पिल्जेकर (Muller & Pilzecker) ने तथा जेनकिन्स एवं डैलेनबैक (Jankins & Dallenback) ने भी अपने-अपने प्रयोगों से इस तथ्य की संतुष्टि की है कि विस्मरण का कारण समय का बीतना नहीं होता है बल्कि उस समय अंतराल में कुछ नई अनुभूतियों को प्राप्त करना होता है। दूसरे शब्दों में, विस्मरण का कारण पृष्ठोन्मुख अवरोध (retroactive inhibition) होता है।

2. विलोपन (extinction) से मिले तथ्य भी हास या अनुप्रयोग सिद्धांत के प्रतिकूल माने जाते हैं। विलोपन की प्रक्रिया में व्यक्ति के सामने उद्दीपन (stimulus) दिया जाता है और व्यक्ति उस उद्दीपन के प्रति सही अनुक्रिया भी करता है, परंतु अनुक्रिया देने के बाद मात्र पुनर्बलन (reinforcement) नहीं दिया जाता है। इस तरह से इस अध्ययन में उद्दीपन-अनुक्रिया मजबूत होने के बजाय कमजोर होती चली जाती है।

3. स्वतः पुनर्लाभ (spontaneous recovery) तथा संस्मरण (reminiscence) की घटना से भी अनुप्रयोग सिद्धांत की आलोचना होती है। ये दोनों मनोवैज्ञानिक घटनाएँ कुछ ऐसी हैं जिनमें समय बीतने के साथ ही मौलिक विषय या पाठ में हास होने के बदले वृद्धि होती है, हालांकि इस समय-अंतराल में व्यक्ति उस सीखे गए विषय को कभी दोहराता नहीं है।

ऐसी परिस्थिति में सिद्धांत की व्याख्या के अनुसार सीखे गए विषय या पाठ का विस्मरण होना चाहिए था कि उसकी धारणा में वृद्धि होनी चाहिए थी। उपर्युक्त आलोचनाओं को ध्यान में रखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि विस्मरण का कारण समय का बीतना नहीं होता। अत: अनुप्रयोग सिद्धांत को विस्मरण का एक वैज्ञानिक सिद्धांत न मानकर एक अनुपयुक्त सिद्धांत कहना अधिक उचित होगा।

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प्रश्न 12.
याद करने से संबंधित विधियों तथा नियमों के महत्त्व के अतिरिक्त कर्ता में क्या-क्या अतिरिक्त विशेषताएँ होनी चाहिए?
उत्तर:
स्मृति सहायक संकेत तथा आधुनिक बोधगम्य उपागम के परामर्शों का शत-प्रतिशत पालन करने पर भी कुछ घात अच्छे अंक नहीं प्राप्त कर पाते हैं। सच तो यह है कि ऐसी कोई भी विधि या नियम या शैली या पद्धति नहीं है जो याद करने से संबंधित सारी समस्याओं का समाधान बनकर रातोंरात स्मृति में सुधार ला दे। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि अपनायी जाने वाली विधियाँ निरर्थक एवं बेकार हैं। अच्छी स्मृति के लिए सभी प्रचलित विधियों के अलावे निम्नांकित कारकों पर भी ध्यान देना आवश्यक है –

  1. शारीरिक स्वास्थ्य
  2. सीखने के प्रति रुचि एवं ललक
  3. सीखने के लिए प्रेरक दृष्टांत
  4. कलम, कागज, पुस्तक, प्रकाश, मेज परिवेश आदि का अनुकूल प्रबंधन

अतः स्मृति के विकास के लिए, सिद्धांत साधन के अलावा सुधार सम्बन्धी युक्तियों को समझने तथा साधनों के संचालन का ज्ञान भी आवश्यक है। आज तकनीकी ज्ञान तो सभी के लिए अनिवार्य बनता जा रहा है।

प्रश्न 13.
विस्मरण वक्र पर नोट लिखें।
उत्तर:
विस्मरण के संबंध में किये गये प्रयोग से यह अनुमान लगाया गया कि शिक्षण के ‘बाद पहले 20 मिनट की अवधि में ही 47% सीखे गए निरर्थक नदों का विस्मरण हो गया, 24 घंटों, अर्थात् 1 दिन के अंतर पर 66%, 2 दिनों में 72%,3 दिनों में 79% विस्मरण हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि सीखने के बाद धारण-मध्यांतर काल के प्रारम्भ में विस्मरण बड़ी तेजी के साथ हुआ और धीरे-धीरे जैसे-जैसे समय अंतराल की अवधि बढ़ती गई, विस्मरण की गति भी धीमी होती गई। ऊपर के आँकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सीखने के तीसरे और 31 वें दिन के बीच भूलने की मात्रा 79% – 72% = केवल 7% हुई, जबकि पहले 2 दिनों के अंदर ही वे सीखे गए पदों में 72% पद भूल गए। एबिंगहॉस द्वारा निर्मित उपर्युक्त वक्र की निम्नलिखित कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं –

1. उपर्युक्त विस्मरण:
वक्र को देखने से यह स्पष्ट पता चलता है कि विस्मरण की गति या दर सदा एक-सी नहीं होती। अर्थात् भूलने की गति एक नियमित या स्थिर गत से नहीं बढ़ती। सीखने की क्रिया के तत्काल बाद भूलने की क्रिया बहुत अधिक तीव्र या तेज होती है और जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, सीखे गए विषय के शेष अंश अधिक-से-अधिक दृढ़ या स्थायी (fixed) होते जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति सीखे हुए विषय में से अधिकांश बातों को सीखने के तुरंत बाद ही भूलता है तथा बाद में इसकी (भूलने की) गति धीमी पड़ जाती है, जिससे भूलने की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।

2. विस्मरण वक्र (forfetting curve) से यह भी स्पष्ट होता है कि भूलने का एक प्रधान कारण समय व्यवधान या अन्तराल की अवधि है। एबिंगहॉस के अनुसार जो अनुभव जितना पुराना होता है, उसकी स्मृति भी उतनी ही क्षीण होती जाती है। इसका अर्थ यह है कि सीखने की क्रिया समाप्त होने के तुरंत बाद उनका अधिकांश विस्मृत हो जाता है।

फलस्वरूप, जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, तत्काल भूले हुए अंश उपयोग में नहीं रहते, क्योंकि व्यक्ति न तो उन अंशों को बाद में दुहरा पाता है और न उन्हें मानसिक रूप से पुनर्जीवित ही कर पाता है। फलतः उन अनुभवों का उपयोग नहीं होता। अतः सीखे गए अनुभवों का अनुप्रयोग ही भूलने का कारण है। इस दृष्टिकोण से भूलना एक निश्चेष्ट या निष्क्रिय प्रक्रिया है। अस्तु, सीखना जितना भी पुराना होता जाता है, उसकी स्मृति भी उतनी ही कमजोर पड़ती जाती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विस्मरण के स्वरूप को समझने का सर्वप्रथम क्रमिक प्रयास किसने किया:
(a) एबिंगहास
(b) गिब्सन
(c) बार्टलेट
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) एबिंगहास

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

Bihar Board Class 11 Psychology अधिगम Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधिगम क्या है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
परिचय एवं परिभाषा-अभ्यास और अनुभव के कारण व्यवहार में या व्यवहार की क्षमता में होने वाला अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन को अधिगम कहा जाता है। कभी-कभी मानवीय व्यवहारों में अस्थायी अथवा क्षणिक परिवर्तन देखे जाते हैं। इस श्रेणी का परिवर्तन अधिगम नहीं कहलाता है जैसे, संगीत के प्रति उत्पन्न रुझान को अधिगम मान सकते हैं।

यदि यह परिवर्तन स्थायी हो जाए और प्रभावित व्यक्ति संगीत के सभी कार्यक्रमों में भाग लेने की तत्परता दिखाने लगे, लेकिन बेटे की गलती के कारण माँ का रौद्र रूप अधिगम नहीं माना जाएगा क्योंकि पीटने वाली माँ कुछ ही देर बाद बच्चे को सहलाने लगती है। अर्थात् उत्पन्न गुस्सा से माँ के व्यवहार में आने वाला परिवर्तन बिल्कुल अस्थायी होने के कारण अधिगम नहीं कहला सका।

अधिगम की विशेषताएं-अधिगम की प्रक्रिया से संबंधित कुछ विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. अधिगम में सदैव किसी-न-किसी तरह का अनुभव सम्मिलित रहता है:
उदाहरण के रूप में, एक ऐसे व्यक्ति के व्यवहार पर विचार करते हैं जो चाय पीने वाले को देखकर हँसी उड़ाता था और आज वह चाय पीने का लत का स्वयं शिकार बनकर रोज सात बजे सुबह चाय की दुकान पर पहुंचकर बोलता है कि चाय नहीं पीने से सर दर्द होने लगता है। उस व्यक्ति में चाय की लत स्थायी रूप ले चुकी है।

इसी तरह भींगे हाथ से बिजली का स्विच दबाते ही झटका महसूस करने वाला लड़का स्विच को छूने से डरने लगा है। स्विच के प्रति लड़का के आचरण या व्यवहार में आने वाला अन्तर भी अधिगम माना जाएगा। किन्तु, क्रिकेट में भारत की हार का समाचार सुनते ही मूर्च्छित होकर गिर जाने वाले लड़का के व्यवहार में आने वाला अस्थायी अन्तर अधिगम नहीं माना जाएगा क्योंकि सभी दुखद समाचार के प्रभाव से वह मूर्च्छित नहीं हो पाता है।

2. अधिगम के कारण व्यवहार में होने वाले परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं:
थकान, औषधि, आदत के कारण व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन अस्थायी होने के कारण अधि गम नहीं कहलाते हैं लेकिन नहीं खाने पर कमजोरी महसूस करने वाला परिवर्तन स्थायी होने के कारण अधिगम कहलाने का अधिकार रखते हैं।

3. अधिगम में मनोवैज्ञानिक घटनाओं का एक क्रम होता है:
बच्चे को अंग्रेजी सिखलाने वाला सर्वप्रथम यह जानना चाहता है कि बच्चा कितने बड़े शब्द भंडार या व्याकरण के नियमों की जानकारी रखता है। इसके बाद वह यह जानने का प्रयास करता है कि बच्चा के पास किस प्रकार के शैक्षणिक साधन (किताब, कॉपी, पेन्सिल) उपलब्ध है। तीसरे क्रम में वह पता लगाता है कि बच्चा अंग्रेजी सीखने की ललक रखता है या नहीं।

अंत में वह सभी तरह से संतुष्ट होकर अंग्रेजी पढ़ाने लगता है। कुछ ही दिनों के बाद बच्चा अंग्रेजी में बातचीत करने में गौरव महसूस करने लगता है। अंग्रेजी के प्रति बच्चे के व्यवहार में आनेवाला परिवर्तन मनोवैज्ञानिक घटनाओं का एक निश्चित क्रम का स्थायी परिणाम है। अतः इसे अधिगम की श्रेणी में रखा जा सकता है।

4. अधिगम एक अनुमानित प्रक्रिया है और निष्पादन से भिन्न है:
निष्पादन किसी व्यक्ति का प्रेक्षित व्यवहार या अनुक्रिया है। एक व्यक्ति कार चलाने की कला (ड्राइवरी) सीखने के लिए अपनी माँ से पैसा लेता है। वह कभी प्रशिक्षण में शामिल होता कभी नहीं लेकिन माँ को अच्छी जानकारी का झांसा दिया करता है। समय समाप्त होने पर माँ उसे कार चलाने को कहती है।

वह व्यक्ति कार को शहर के भीड़वाले रास्ते से होकर माँ को मन्दिर तक पहुँचा देता है। कार चला लेना ही प्रशिक्षण का अंतिम पड़ाव था जिसमें वह व्यक्ति सफल रहा। उस व्यक्ति के व्यवहार से माँ प्रयास का सफल निष्पादन मानते हुए लड़के को सफल चालक के रूप में स्वीकार कर लिया। माँ का यह अनुमान कि लड़का कार चलाना सीख चुका है, अधिगम का एक उदाहरण कहलाता है।

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प्रश्न 2.
प्राचीन अनुबंधन किस प्रकार साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है?
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधन में अधिगम की स्थिति में दो उद्दीपकों के बीच साहचर्य स्थापित होता है और एक उद्दीपक दूसरे उद्दीपक के आने की सूचना देने वाला बन जाता है। यहाँ एक उद्दीपक दूसरे उद्दीपक के घटित होने की सम्भावना प्रकट होती है।

भरपेट भोजन करने के उपरान्त मनपसन्द मिठाई से भरी थाली को देखते ही एक व्यक्ति के मुँह में लार का उत्पन्न होना एक अनुबंधित अनुक्रिया का उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्राचीन अनुबंधन कहलाने वाले अधिगम का अध्ययन सर्वप्रथम ईशान पी पावलव ने किया था। उन्होंने कुत्ता को माध्यम बनाकर उद्दीपकों तथा अनुक्रियाओं के पारस्परिक संबंध को पूर्णतः समझना चाहा।

प्रयोग की शुरूआत में उन्होंने एक कुत्ता को एक बॉक्स में बंद कर दिया बॉक्स के अन्दर कुत्ते के लिए भोजन (मांसचूर्ण) वहुँचाया गया। कई दिनों तक भूखा रखने के बाद जब उसे भोजन पाने का अवसर मिला तो कुत्ते के मुँह में लार जमा होने लगा। पाइप और मापक बेलन की सहायता से उत्पन्न लार की माप रखी जाने लगी। कई दिनों तक कुत्ते को भोजन देने के पूर्व घंटी बजाई जाती। एक दिन घंटी के ध्वनि सुनते ही कुत्ते के मुँह में लार जमा होने लगा। घंटी का आवाज भोजन पाने की आशा के बीच साहचर्य संबंध स्थापित हो चुका था।
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सारांशतः प्रयोग से पता चला कि प्रारम्भ में दिया गया भोजन अनुबंधित उद्दीपक (US) जैसा बर्ताव किया और परिणामतः लार का निकलना अननुबंधित अनुक्रिया (UR) का काम किया। प्रयोग के अंत में जब घंटी बजाकर भोजन नहीं दिया गया तो ध्वनि की उपस्थिति में लार निकलने लगता है। इस स्थिति में घंटी को अनुबंधित उद्दीपक (CS) तथा लार स्राव को अनुबंधित अनुक्रिया (CR) जैसा बर्ताव करता हुआ पाया गया। यहाँ एक प्राणी दो उद्दीपकों के मध्य साहचर्य को सीखता है। एक तटस्थ उद्दीपक (अनुबंधित उद्दीपक, एक अननुबंधित उद्दीपक (CS) के आने का संकेत देता है। अनुबंधित उद्दीपक के परिवर्तन होते ही वह अननुबंधित उद्दीपक के आने की प्रत्याशा में अनुबंधित अनुक्रिया (CR) करने लगता है।

एक छोटा बच्चा एक फूले हुए गुब्बारे पर ज्योंहि हाथ लगाता है त्योंहि वह तेज ध्वनि के साथ फट जाता है। बच्चा डर जाता है और अब बच्चा किसी दूसरे गुब्बारे को छूने से डरने लगता है। इस स्थिति में अनुबंधित उद्दीपक (CS) के रूप में गुब्बारे तथा अनुबंधित उद्दीपक के (CS) के रूप में तीव्र ध्वनि की पहचान होती है। इस प्रकार प्रयोग एवं प्रक्षेणों से स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन अनुबंधन साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है।

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प्रश्न 3.
क्रिया प्रसूत अनुबंधन की परिभाषा दीजिए। क्रिया प्रसूत अनुबंधन को प्रभावित करनेवाले कारकों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
क्रिया प्रसूत अनुबंध की परिभाषा-“मानवों अथवा जानवरों द्वारा ऐच्छिक रूप से प्रकट किये जाने वाले व्यवहार या अनुक्रियाओं को जो उनके नियंत्रण में रहती है, क्रिया-प्रसूत माने जाते हैं।” या क्रिया प्रसूत नामक व्यवहार का अनुबंधन ‘क्रिया प्रसूत’ अनुबंधन कहा जाता है। इसमें प्राणी पर्यावरण में सक्रिय रहता है। क्रिया प्रसूत अनुबंधन का अन्वेषण सर्वप्रथम बी. एफ. स्किनर के द्वारा किया गया था जो पर्यावरण में सक्रियता प्राणियों की ऐच्छिक अनुक्रियाओं पर आधारित प्रयोगों द्वारा पूरा किया गया था। क्रिया प्रसूत अनुबंधन को प्रभावित करनेवाले कारक-क्रिया प्रसूत अनुबंधन अधिगम का एक प्रमुख भेद (प्रकार) है जिसमें अनुक्रिया को प्रबलन द्वारा मजबूत बनाया जाता है।

कोई भी घटना या उद्दीपक एक प्रबलक हो सकती है जो किसी वांछित अनुक्रिया को घटित होने की संभावना को बढ़ाता है अर्थात् पूर्वगामी अनुक्रिया को बढ़ाती है। क्रिया प्रसूत अनुबंधन की हर प्रबलन के प्रकार (धनात्मक या ऋणात्मक) प्रबलित प्रयासों की संख्या, गुणवत्ता (उच्च या निम्न) प्रबलन अनुसूची (सतत अथवा आशिक) और प्रबलन में विलम्ब से प्रभावित होती है। अनुबंधित की जाने वाली अनुक्रिया अथवा व्यवहार का स्वरूप’ को भी एक कारक का स्थान दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अनुक्रिया के घटित होने और प्रबलन के बीच का अंतराल भी क्रिया प्रसूत अधिगम को प्रभावित करनेवाला कारक माना जाता है।

प्रबलन के प्रकार:
प्रबलक वे उद्दीपक होते हैं जो पूर्व में घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर या संभावना को बढ़ा देते हैं। प्रबलन का विभाजन दो तरह से किया गया है –

(क) धनात्मक प्रबलक और ऋणात्मक प्रबलक तथा
(ख) प्राथमिक प्रबलक और द्वितीयक प्रबलक

प्रत्येक प्रबलन अनुसूची (व्यवस्था) अनुबंधन की दिशा को अपने – अपने ढंग से बदलती है। अर्जन प्रयास के दिये जाने के क्रम के आधार पर पता चला है कि आंशिक प्रबलन, सतत प्रबलन की अपेक्षा में विलोप के प्रति अधिक विरोध प्रदर्शित करता है। विलंबित प्रबलन-किसी भी प्रबलन की प्रबलनकारी क्षमता विलम्ब के साथ-साथ घटती जाती है। अर्थात् प्रबलन प्रदान करने में बिलम्ब से निष्पादन का स्तर निकृष्ट हो जाता है । जैसे, विलम्ब से मिलने वाले बड़े पुरस्कार की तुलना में शीघ्रता से कार्य कारक के तुरंत बाद मिलने वाला छोटा पुरस्कार अधिक पसन्द किया जाता है।

व्यवहार का स्वरूप:
अधिगम के द्वारा मिलने वाले परिणाम को अच्छा या बुरा, हितकारी या हानिकारक ध्वनि में व्यवहार का स्परूप प्रभावी होता है। अच्छा व्यवहार सुन्दर परिणाम का कारण बन जाता है। प्रबलन का बीच का अंतराल-क्रिया प्रसूत अधिगम को सफलतापूर्वक समाप्त किये जाने में प्रयास के रूप प्रबलन आरोपित करने के क्रम तथा दो प्रबलन के बीच की अवधि में विस्तार प्रबलन के प्रभाव को घटा-बढ़ा सकता है। धनात्मक प्रबलक सुखद परिणाम वाले होते हैं क्योंकि ये भोजन, पानी, धन, प्रतिष्ठा, सूचना-संग्रह आदि के माध्यम से विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ होते हैं। फलतः एक धनात्मक प्रबलन के मिलने के पहले जो अनुक्रिया घटित होती है, उसकी दर बढ़ जाती है।

ऋणात्मक प्रबलन, परिहार अनुक्रिया अथवा पलायन अनुक्रिया सिखाते हैं, जैसे जाड़े से बचने के लिए स्वेटर पहनना, आग के डर से भाग जाना। अतः खतरनांक उद्दीपकों से दूर भागने की प्रवृत्ति को जगाना क्योंकि यह ऋणात्मक प्रबलन से जुड़ा होता है। अर्थात् ऋणात्मक प्रबलक अपने हटने या समापन से पहले घटित होनेवाली अनुक्रिया की दर को बढ़ा देता है। प्राथमिक प्रबलक जैविक रूप से महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है।

द्वितीयक प्रबलक पर्यावरण और प्राणी के बीच संबंध बनाकर प्रबलक की विशेषताओं को स्पष्ट कर देता है। इसके अन्तर्गत धन, प्रशंसा और श्रेणियों का उपयोग जैसी स्वाभाविक वृत्ति को बढ़ावा मिलता है। प्रबलन की संख्या अथवा आवृत्ति-प्रबलन की संख्या अथवा आवृत्ति से उन प्रयासों का बोध होता है जो उद्दीपन की अनुक्रियता को प्रभावित करता है। उचित परिणाम में भोजन-पानी की उपलब्धता की उपस्थिति में बार-बार का प्रयास एक परिणामी निष्कर्ष को पान में समर्थ हो सकता है। अतः क्रिया-प्रसूत की गति आवृत्ति के बढ़ने से समानुपाती तौर पर बढ़ जाती है।

प्रबलन की गुणवत्ता:
आवृत्ति के बढ़ने से समानुपाती तौर पर बढ़ जाती है। क्रिया-प्रसूत अथवा नैमेत्तिक अनुबंधन की गति सामान्यत: जिस अनुपात में उसकी गुणवत्ता बढ़ती है।

प्रबलन अनुसूचियों:
अनुबंधन से सम्बन्धित प्रयासों के क्रम में प्रबलन उपलब्ध कराने की व्यवस्था के रूप में अनुबंधन की दिशा प्रभावित होती है।

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प्रश्न 4.
एक विकसित होते हुए शिशु के लिए एक अच्छा भूमिका-प्रतिरूप अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। अधिगम के उस प्रकार पर विचार-विमर्श कीजिए जो इसका समर्थन करता है।
उत्तर:
बच्चे स्वभाव से नकलची होते है। उनकी सम्पूर्ण क्रिया-विधि पर परिवेशीय क्रियाकलापों की गहरी छाप देखने को मिलती है। बच्चे किसी भी क्रिया के सम्पादन विधि को बड़ी ध्यान से देखते हैं और तुरंत बाद स्वयं उस क्रिया को दुहराने के फिराक में रहते हैं। अर्थात् शिशु अपने घर-परिवार अथवा सामाजिक उत्सवों एवं समारोहों में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं जहाँ उन्हें मनपसन्द दृश्य और प्रेरणादायक क्रिया-विधि देखने को मिलता है। शिशु प्रौढ़ व्यक्तियों के अनेक प्रकार के व्यवहारों को ध्यान से प्रेक्षण करके सब कुछ सीखने का प्रयास करते हैं।

समारोह एवं उत्सव के अवसर समाप्त हो जाने के बाद वे देखे गये क्रियाकलापों को अपने खेल में शामिल कर लेते हैं। विवाह पद्धति, जन्मदिन समारोह, चोर-सिपाही, घर में होनेवाले साफ सफाई का जीवंत वित्रण करने के लिए तरह-तरह के स्वांग रचते हैं। यहाँ तक कि माता-पिता को विवाह करते देखकर वे भी काल्पनिक रूप से माता-पिता का अभिनय करके उन्हीं सब बातों को दुहराते हैं जो वे अपने घर में सुन रखा था। अत: बच्चे अधिकांश सामाजिक व्यवहार प्रौढ़ों को प्रेक्षण तथा उनकी नकल करके सीखते है। वे कपड़ा पहनना, शिक्षक बनकर छात्रों को डाँटना, फोन करना, टी.वी. चलाना, अतिथियों का आदर-सत्कार करना जैसे सभी कार्यों को बड़ों की नकल करके ही सीख लेते हैं।

सच तो यह है कि बढ़ते हुए शिशु में व्यक्तित्व का विकास, आचरण की अच्छाई, व्यवहार में कुशलता, चाय-पानी पीने का तरीका, मनपसन्द भोजन का चयन आदि प्रेक्षणात्मक अधिगम के द्वारा ही संभव होता है। दयालुता, परोपकार, आदर, श्रम-साधना, आलस्य का परित्याग के साथ-साथ तम्बाकू खाना, बीड़ी-सिगरेट पीना, आक्रामक व्यवहार को अपनाना जैसी अच्छी-बुरी आदतों या जानकारियों का मुख्य आधार प्रेरणात्मक अधिगम अथवा भूमिका प्रतिरूप ही होता है। अतः एक विकसित होते हुए शिशु के लिए एक अच्छा भूमिका-प्रतिरूप अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

अधिगम के सभी प्रकारों में सीखने-जानने की विधि भिन्न-भिन्न रूपों में उपलब्ध होती है लेकिन उनमें से प्रेरणात्मक अधिगम शिशुओं के स्वभाव और आवश्यकता के अनुकूल होता है। शिशुओं के द्वारा अनुकरण करने की क्षमता को प्रोत्साहित करने के लिए प्रौढ़ों को अच्छे। भूमिका-प्रतिरूप के प्रदर्शन में संकोच नहीं करना चाहिए। प्रेरणात्मक अधिगम का शिशुओं पर इतना अच्छा प्रभाव पाया गया कि इसे सामाजिक अधिगम भी कहा जाने लगा। शिशु दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों का प्रेक्षण करते हैं और यथासंभव प्रौढ़ों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। व्यवसाय क्षेत्र में महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उपभोक्ता बनाकर पेश करके अपने उत्पादन की खपत को बढ़ाने का प्रयास करते हैं।

मनोवैज्ञानिक बंदूरा और उनके सहयोगियों ने भी अध्ययन एवं प्रयोग के आधार पर प्रेरणात्मक अधिगम को शिशुओं के विकास के लिए अनुकूल बताया है। बंदूरा ने प्रेक्षण का महत्व समझने के लिए शिशुओं पर आधारित एक प्रयोग किया। प्रयोग में शिशुओं की तीन अलग टोलियों को चंद मिनट का फिल्म दिखाया। एक फिल्म में आक्रामक व्यवहार करनेवाले को इनाम एवं प्रशंसा पाते हुए दिखाया गया। दूसरे फिल्म में गलती करने वाले को दण्ड पाते दिखाया गया। तीसरे फिल्म में दिखाया गया कि आक्रामक रुख की कोई खास प्रतिक्रिया नहीं होती है। इसे स्वाभाविक वृत्ति मानकर लोग उस ओर ध्यान नहीं देते है।

प्रयोग के अंत में तीनों टोलियों को एक साथ मिलाकर आक्रामक व्यवहार करने वाले प्रतिरूप (खिलौना) को उनके बीच छोड़ दिया गया। प्रेक्षक छिपकर प्रतिक्रिया का अवलोकन करता रहा। प्रेक्षण के अवलोकन के आधार पर निर्णय किया गया कि जो बच्चा आक्रामक को इनाम पाते देखा था वह शांत रहा और जिसने दंड पाते देखा था वह क्रोध की मुद्रा बनाकर खिलौने को फेंककर उसे आहत करने का प्रयास किया। अतः अनुकरण के पक्ष में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि प्रेक्षण द्वारा अधिगम की प्रक्रिया में प्रेक्षक मॉडल (प्रतिरूप) के व्यवहार का प्रेक्षण करके जानकारी हासिल करता है परन्तु आचरण की दिशा देखे गये दृश्य पर निर्भर करता है।

इसी प्रकार, यदि कागज की नाव बनाने की कला का प्रदर्शन बच्चों के समक्ष किया जाए तो अधिकांश बच्चे कागज उपलब्ध होते ही उसे नाव बनाने में समाप्त कर देंगे। यह भी पाया जाता है कि बच्चे मोबाइल लेकर माता-पिता की भाषा में बात-चीत करने लग जाते हैं। रीमोट का प्रयोग कर माता-पिता के पसन्द का कार्यक्रम देखने का प्रयास करते है। इस प्रकार तय होता है कि विकास करते शिशुओं का भला चाहने वाले सदा प्रेरक कहानियों, सुन्दर आचरण, आधुनिक तकनीकों के प्रयोग आदि से सम्बन्धित अच्छी भूमिका प्रस्तुत करें जिसे शिशुओं का भविष्य उज्जवल हो।

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प्रश्न 5.
वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधियों की व्याख्या कीजिए। या, वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधि का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
मनुष्य अपनी भावना तथा आवश्यकताओं को प्रकट करने में दूसरे के अर्जित झान को अपनाने में तथा संभावित घटनाओं को बतलाने में शब्द को माध्यम बनाता है। मानव बोलकर, सुनकर, लिखकर या पढ़कर शब्दों की महत्ता को बतलाया है। वाचिक अधिगम को अनुबंधन से भिन्न मानते हुए मात्र मनुष्यों तक ही सीमित माना है।

मनोवैज्ञानिक वाचिक अधिगम की प्रक्रिया को समझने तथा प्रयोग में लाने के लिए कई तरह की सामग्रियों का उपयोग करते हैं। जैसे निरर्थक शब्दांश, परिचित शब्द, अपरिचित शब्द, वाक्य तथा अनुच्छेद। इस अधिगम को उपयोग में लाने के लिए कई विधियों का विकास किया गया है जिनमें से निम्नलिखित तीन विधियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं –

(क) युग्मित सहचर अधिगम:
परिचय-प्रस्तुत विधि उद्दीपक-उद्दीपक अनुबंधन और उद्दीपक अनुक्रिया अधिगम के समान होती है।

प्रयोग का उद्देश्य:
अपनी मातृभाषा के शब्दों के पर्याय सीखने में इस विधि का उपयोग किया जाता है।

प्रयोग-क्रम:

  • सर्वप्रथम युग्मित सहचरों की एक सूची बनाई जाती है जिसमें युग्मों का पहला शब्द उद्दीपक तथा दूसरा. शब्द अनुक्रिया के रूप में अपनाया जाता है।
  • उद्दीपक शब्द व्यंजन-स्वर-व्यंजन के रूप में निरर्थक शब्दांश होता है तथा दूसरा शब्द वांछित भाषा के संज्ञा-पद होते हैं।
  • अधिगमकर्ता को उद्दीपक और अनुक्रिया शब्द को एक साथ दिखाया जाता है।
  • दोनों (उद्दीपक और अनुक्रिया) प्रकृति वाले शब्दों को पुनःस्मरण करने का परामर्श दिया जाता है।
  • एक-एक करके उद्दीपक शब्द दिखाकर प्रतिभागी को सही अनुक्रिया शब्द बताने को कहा जाता है।
  • प्रयास में असफल होने की स्थिति में वांछित अनुक्रिया शब्द दिखा दिया जाता है।
  • पहले प्रयास के सभी उद्दीपक पदों को दिखा दिया जाता है।
  • प्रयास का यह क्रम तब तक जारी रखा जाता है जब तक बिना गलती किये सभी अनुक्रिया पद बता दिये जाते हैं।
  • मानक मापदण्ड को पाने के लिए प्रयासों की कुल संख्या को युग्मित सहचर अधिगम मान लिया जाता है।

(ख) क्रमिक अधिगम:
परिचय-उद्दीपक और अनुक्रिया को नियत क्रम में प्रस्तुत करने की यह प्रचलित विधि है।

उद्देश्य:
प्रतिभागी के द्वारा सीखने की प्रक्रिया को जानना इस विधि का उद्देश्य होता है। अर्थात् प्रतिभागी किसी शाब्दिक एकांश की सूची किस तरह सीखता है और सीखने में कौन-कौन सी प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं, जैसे प्रश्नों का सही उत्तर का पता लगाना इस विधि का उपयोग है।

प्रयोग-क्रम:

  • प्रयोग का प्रारम्भ शब्दों की एक सूची को तैयार कर लेने से किया गया जिसमें निरर्थक शब्दांश, अधिक परिचित शब्द, कम परिचित शब्द, परस्पर संबंधित शब्द आदि को जगह दी गई।
  • प्रतिभागी को सूची का पूरा अंश देकर निर्देश दिया गया कि सूची के क्रम को बिना बदले एकांशों को बतलाना है।
  • सूची का मात्र पहला अंश दिखाकर प्रतिभागी से दूसरा एकांश बतलाने को कहा जाता है।
  • प्रतिभागी के असफल हो जाने पर दूसरा एकांश दिखाया जाता है जिससे दूसरा एकांश उद्दीपक बन जाता है।
  • प्रतिभागी तीसरा एकांश (अनुक्रिया शब्द) को ठीक-ठीक बताने का प्रयास करता है।
  • इस बार भी असफल होने की स्थिति में उसे सही एकांश बतला कर उसे चौथा एकांश के लिए उद्दीपक मान लिया जाता है।
  • उद्दीपक-अनुक्रिया के क्रमिक पूर्वाभास विधि क्रम जारी रखा जाता है।
  • अधिगम के प्रयास को तब तक जारी रखा जाता है जब तक प्रतिभागी सभी एकांशों का सही-सही पूर्वाभाव नहीं कर लेता है।

(ग) मुक्त पुनः स्मरण:
परिचय-कुछ निर्धारित शब्दों को स्मरण के द्वारा एक विशिष्ट क्रम में सजाकर बतलाने का प्रयास मुक्त पुनः स्मरण विधि कहलाता है।

उद्देश्य:
प्रतिभागी शब्दों को किस तरह से संगठित करके उन्हें अपनी स्मृति में संचित करते हैं। स्मृति संबंधी इसी उत्सुकता को मिटाने में पुनः स्मरण विधि का उपयोग किया जाता है।

प्रयोग-क्रम:

  • सर्वप्रथम दस से अधिक शब्दों की एक सूची प्रतिभागियों को पढ़ने एवं बोलने के लिए दिया जाता है।
  • निश्चित समय तक प्रतिभागी के पास छोड़ा जाता है।
  • प्रतिभागी को किसी भी क्रम में शब्दों को बतलाने का अवसर दिया जाता है।
  • प्रतिभागी द्वारा बतलाये गये शब्दों के क्रम में एक प्रयास से दूसरे प्रयास में भिन्न पाये जाते हैं।
  • शब्दों को स्मृति में संचित करके उनके संगठन करने की प्रक्रिया अथवा विधि का पता लगाया जाता है।
  • प्रेक्षण के निष्कर्ष के रूप में पाया जाता है कि सूची के आरम्भ और अंत में स्थित शब्दों का पुनः स्मरण सूची के बीच में स्थित शब्दों की तुलना में अधिक सरल होता है।
  • स्मरण और शब्दों के संगठन सम्बन्धी तरह-तरह की जानकारियाँ जमा की जाती हैं।

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प्रश्न 6.
कौशल से आप क्या समझते हैं? किसी कौशल के अधिगम के कौन-कौन से चरण होते हैं?
उत्तर:
कौशल का परिचय:
सामान्य अथवा अटिल, साधारण अथवा तकनीकी किसी भी तरह के कार्य को सरलता से दक्षतापूर्ण विधि के द्वारा त्रुटिहीन परिणाम के साथ पूरा करने की कला या क्षमता को कौशल कहा जाता है। जैसे, हवाई जहाज चलाना, आशुलिपि में लिखना, कार चलाना आदि कौशल के उदाहरण हैं। किसी कौशल में अनुभव और अभ्यास के द्वारा प्रात्यक्षिपेशीय अनुक्रियाओं की एक श्रृंखला अथवा उद्दीपक-अनुक्रिया साहचर्यों की एक श्रेणी प्राप्त की जाती है। अभ्यास एवं प्रयास के द्वारा समय, त्रुटि, अवरोध आदि से बचा जाता है। कौशल प्राप्त हो जाने पर कम समय में उच्चस्तरीय परिणाम मिल जाता है।

कौशल के अधिगम के प्रमुख चरण:
महान मनोवैज्ञानिक फिट्स के अनुसार कौशल अधिगम की प्रक्रिया तीन चरणों में होती हैं –

  1. संज्ञानात्मक
  2. साहचर्यात्मक तथा
  3. स्वायत्त

कौशल अधिगम के विभिन्न चरणों में अलग-अलग तरह की मानसिक क्रियाएँ की जाती हैं लेकिन यह भी माना जाता है कि अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है।

1. संज्ञानात्मक चरण:
अभिकर्ता को प्राप्त होने वाले निर्देशों का पालन करते हुए परिवेश से मिलने वाले सभी संकेतों एवं निर्देशों का माँग तथा अपनी अनुक्रियाओं के परिणामों को सदा अपनी चेतना में रखना होता है। कार्य निष्पादन की एक उत्तम विधि का उपयोग करके यथासंभव अच्छे परिणाम पाने के लिए अपनी समझ का प्रयोग करना होता है।

2. साहचर्यात्मक चरण:
कौशल अधिगम के प्रस्तुत चरण में विभिन्न प्रकार की सांवेगिक सूचनाओं अथवा उद्दीपकों को उपयुक्त अनुक्रियाओं से जोड़ना होता है। अभ्यास, त्रुटियाँ, लागत समय, कार्य निष्पादन के साथ उच्चस्तरीय परिणाम की प्राप्ति के प्रति सदा सतर्क रहना होता है। प्रस्तुत चरण से प्राप्त परिणामों के आधार पर ज्ञात होता है कि अभ्यास की मात्रा बढ़ाने से संभावित त्रुटियों में कमी आती है और निष्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है। अभ्यास के द्वारा किसी अनुक्रिया को करने में लागत समय को घटाया जा सकता है। प्रेक्षण कार्य करने में एकाग्रता रखना वांछनीय हो जाता है।

3. स्वायत्त चरण:
स्वायत्त चरण में निष्पादन संबंधी दो परिवर्तन अधिक प्रमुख माने जाते हैं –
(क) पहला साहचर्यात्मक चरण की अवधानिक माँगें कम हो जाती हैं और
(ख) वाह्य कारकों द्वारा उत्पन्न की गई बाधाएँ घट जाती हैं।
अतः इस चरण में सचेतन प्रयत्न की अल्प माँगों के साथ कौशलपूर्ण निष्पादन स्वचालिता प्राप्त करना प्रमुख उद्देश्य बन जाता है।

निष्कर्ष:

  1. कौशल अधिगम का एक मात्र साधन अभ्यास है।
  2. अधिगम के लिए निरंतर अभ्यास और प्रयोग करते रहने की आवश्यकता होती है।
  3. एकाग्रता, सतर्कता और जिज्ञासा सुन्दर परिणाम के लिए वांछनीय होता है।
  4. त्रुटिहीन निष्पादन की स्वचालित, कौशल का प्रमाणक मानी जाती है।
  5. अभ्यास ही मनुष्य की पूर्ण बनाता है।

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प्रश्न 7.
सामान्यीकरण तथा विभेदन के बीच आप किस तरह अंतर करेंगे?
उत्तर:
सामान्यीकरण और विभेदन की प्रक्रियाएँ प्रायः सभी प्रकार के अधिगम का मुख्य लक्षण होता है। समान उद्दीपकों (घंटी का बजना, आकस्मिक प्रकाश का उत्पन्न होना, टेलीफोन की घंटी का बजना) के प्रति समान अनुक्रिया (लार स्राव, भागना, चौंकना) के गोचर को सामान्यीकरण माना जाता है। माँ के द्वारा छिपाई गई मिठाई को बार-बार खोजने की क्रिया समान अनुक्रिया का बोध कराता है। अत: जब तक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण कहते हैं।

विभेदन को समान्यीकरण का पूरक माना जाता है। समान्यीकरण समानता पर आधारित होती है जबकि विभेदन भिन्नता के प्रति अनुक्रिया मानी जाती है। जैसे यदि कोई बच्चा एक बार मूंछ-दाढ़ी वाले व्यक्ति से डर जाता है तो वह नेक आदमी से भी डरने लगता है यदि वह मूंछ-दाढ़ी वाला हो। दूसरी ओर एक खतरनाक प्रकृतिवाला व्यक्ति भी मूंछ-दाढ़ी साफ कराके सफेद धोती में चश्मा लगाकर प्रकट होता है तो बच्चा उसके चश्मा से खेलने लगता है। यहाँ भय का कारण मूंछ-दाढ़ी को माना जाता है। बच्चे का डरना और नहीं डरना विभेदन का एक उदाहरण बन जाता है। सामान्यीकरण होने का अर्थ विभेदन की विफलता होती है। विभेदन की अनुक्रिया किसी भी प्राणी को विभेदक क्षमता या विभेदन के अधिगम का महत्त्व समझा देता है।

प्रश्न 8.
अधिगम अंतरण कैसे घटित होता है?
उत्तर:
अधिगम अंतरण को प्रशिक्षण अंतरण भी माना जाता है। इसके अंतर्गत नए अधिगम पर पूर्व अधिनियम के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। अधिगम अंतरण पर आधारित एक रोचक प्रयोग दो भाषाओं (माना अंग्रेजी और फ्रांसीसी) के सीखने के लिए दो समूहों का चयन किया जाता है। प्रतिभागियों के एक समूह को प्रायोगिक दशा के लिए तथा दूसरे समूह को नियंत्रित दशा के लिए निर्धारित कर लिया जाता है। प्रायोगिक दशा वाले प्रतिभागियों को एक वर्ष का समय अंग्रेजी सीखने के लिए दिया जा रहा है जबकि दूसरे नियंत्रक समूह वाले प्रतिभागियों को फ्रांसीसी भाषा सीखने का अवसर दिया जाता है।

एक वर्ष की समाप्ति पर दोनों समूहों के द्वारा अर्जित भाषा-ज्ञान की जाँच की जाती है। एक वर्ष के बाद दूसरे वर्ष में प्रायोगिक समूह को फ्रांसीसी तथा नियंत्रक समूह को अंग्रेजी भाषा सीखने को कहा जाता है। दो वर्ष बीत जाने पर दोनों समूहों को दोनों विषयों के लिए समान समय उपलब्ध होने की बात मानी जाती है। दोनों समूहों को पुनः लब्धांक प्राप्त करना होता है। लब्धांक के आधार पर तया किया जाता है कि किस भाषा को सीखना सरल या कठिन है। अतः उद्दीपकों और अनुक्रियाओं में परस्पर अन्तर लाकर अधिगम की विशिष्टता को पहचानना अधिगम अंतरण के घटित होने का आधार होता है। इसमें समय, स्थिति, विषयों के क्रम, अनुभव एवं सुविधा में अन्तर लाकर सीखने या प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर जुटाता है।

प्रश्न 9.
अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का होना क्यों अनिवार्य है?
उत्तर:
अधिगम के लिए अभिप्रेरणा उसे सुगम बनाने वाले कारकों में से एक है। अभिप्रेरणा का सामान्य अर्थ है व्यक्ति को किसी काम के प्रति रुचि जगाना तथा आवश्यक ऊर्जा का संचार करना। प्राणी की एक ऐसी मानसिक एवं शारीरिक अवस्था अभिप्रेरणा के अन्तर्गत आता है जो वांछनीय लक्ष्य या आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए व्यक्ति विशेष को प्रबलता से काम करने की ओर धकेलता है। अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का होना निम्न कारणों से अनिवार्य होता है –

  1. अभिप्रेरणा व्यक्ति के अन्दर क्रियाशीलता को बढ़ाता है।
  2. अभिप्रेरणा हमारे व्यवहार का चयन करने में मदद करता है।
  3. अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति के व्यवहार में सुधार लाता है।
  4. अभिप्रेरणा लक्ष्य की प्राप्ति की ओर व्यक्ति की रुचि जगाता है।
  5. अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति को प्रबलन की महत्ता को सीखाता है।
  6. अभिप्रेरणा से व्यक्ति में श्रम करने की योग्यता तथा कुछ खोजने की प्रवृत्ति जगाता है।

अर्थात् किसी भी व्यक्ति की दक्षता को बढ़ाने के लिए सुरक्षा की समझ देने, लक्ष्य, प्रयास, परिणाम की वास्तविकता को समझना अभिप्रेरणा से संभव है। इसी कारण अभिप्रेरणा एक अनिवार्य कारक के रूप में सर्वप्रिय है।

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प्रश्न 10.
अधिगम के लिए तत्परता के विचार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
तत्परता का साधारण अर्थ इच्छाशक्ति अथवा किसी काम के प्रति अनुराग का प्रदर्शन है। यदि कोई व्यक्ति किसी काम को पूरा कर लेने पर संतोष व्यक्त करता है अथवा अवसर पाकर काम को पूरा करने हेतु तैयार हो जाता है ता माना जाता है कि उस व्यक्ति के द्वारा तत्परता दिखाई जा रही है। प्राणियों की विभिन्न प्रजातियों में अपनी संवेदना क्षमताओं तथा अनुक्रिया करने के लिए परम लक्ष्य होता है वही दूसरों के लिए निरर्थक माना जाता है। प्राणियों के लिए उद्दीपक-उद्दीपक (S-S) अथवा उद्दीपक-अनुक्रिया (S-R) का मान साहचर्य को स्थापित करने की दृष्टि से अलग-अलग होती है।

रुचि, क्षमता, लगन, दक्षता, कुशलता आदि में से प्रत्येक मामले में सभी प्राणियों की दशा अलग-अलग होती है। सीखने की दृष्टि से यदि तत्परता पर ध्यान देने की बात चले तो स्पष्ट होगा कि सीखे जानेवाले वैसे कार्य या विषय तथा अवश्यकता या रुचि के प्रतिकूल कार्य या विषय के बीच व्यवहार में भारी अन्तर प्रकट होता है। इच्छा शक्ति और लक्ष्य के अनुकूल कार्य सरलता से अच्छे परिणाम के साथ पूरे किये जाते हैं जबकि लक्ष्यहीन कार्य कठिनाई से एवं अनियमित ढंग से किसी तरह पूर्णता तक पहुँचा दिये जाते हैं।

ईंट ढोने को यदि उदाहरण माना जाय तो यदि तत्परता के साथ ईंट लाया जाएगा तो वह पूर्व आकार में रहेंगे तथा सजाकर रखे जाएँगे लेकिन यदि तत्परता का अभाव होगा तो टूटी-फूटी ईंटों का एक बेडौल ढेर देखने को मिलेगा। दोनों हालतों में पूर्व स्थान से ईंट को हटाने का कार्य पूरा कर लिया गया प्रतीत होता है। अतः तत्परता किसी व्यक्ति की कार्यकुशलता को बढ़ाती भी है तथा अच्छे परिणाम को पाने के लिए प्रेरित भी करती है। तत्परता के साथ किसी विषय को सीखना भी सरल हो जाता है तथा तत्परता के साथ सीखा गया विषय स्थायी भी होता है।

प्रश्न 11.
संज्ञानात्मक अधिगम के विभिन्न रूपों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम को मनोवैज्ञानिक अधिगम का मूल माना जाता है। इसमें कार्यकलापों की जगह ज्ञान में परिवर्तन लाने का प्रयास शामिल है। संज्ञानात्मक अधिगम को दो विभिन्न रूपों में बाँटकर अध्ययन किया जाता है –
(क) अंतर्दृष्टि अधिगम और
(ख) अव्यक्त अधिगम।

(क) अंतर्दृष्टि अधिगम:
अंतर्दृष्टि से ऐसी प्रक्रिया का बोध होता है जिसके द्वारा किसी समस्या का समाधान एकाएक प्रकट हो जाता है। अंतर्दृष्टि अधिगम की व्याख्या अनुबंधन के आधार पर सरलता से नहीं की जा सकती है किन्तु इसका सामान्योकरण अन्य मिलती हुई समस्याओं की परिस्थितियों में हो सकता है। अंतर्दृष्टि अधिगम में अचानक समाधान प्राप्त होना अनिवार्य है। इसे सत्य प्रमाणित करने के लिए कोहलर ने चिम्पैंजी को माध्यम बनाकर प्रयोग को पूरा किया।

उन्होंने एक भूखे चिम्पैंजी को एक बड़े बंद खेल क्षेत्र में डाल दिया। वह भूखा था लेकिन भोज्य पदार्थ उसकी पहुँच से बाहर रख दी गई थी। बन्द क्षेत्र में बक्सा तथा छड़ी रख दिया गया। भूखा होने के कारण चिम्पैंजी भोज्य पदार्थ प्राप्त करने के लिए प्रयास करने लगा। शीघ्र ही चिम्पैंजी ने बक्सा तथा छड़ी अपने अधीन कर लिया।

वह बक्सा पर चढ़कर छड़ी की सहायता से बार-बार रोटी गिराने का प्रयास करने लगा। चिम्पैंजी अब बक्सा पर चढ़कर छड़ी से रोटी गिराना सीख चुका था। चिम्पैंजी, अब बन्द किये जाने पर तुरंत रोटी को गिरा कर खा लेता था। किसी प्रयोग से परिणाम की प्राप्ति नहीं होने पर अचानक निष्कर्ष को पाकर प्रयोगकर्ता काफी खुश होता है। सिंचाई के लिए परेशान किसान हठात् की वर्षा पाकर खुश हो जाता है। संज्ञानात्मक अधिगम में साधन और साध्य के बीच एक संबंध का होना प्रतीत होता है।

(ख) अव्यक्त अधिगम:
अव्यक्त अधिगम की प्रमुख विशेषता के रूप में माना जाता है कि इसमें एक नया व्यवहार सीख लिया जाता है, किन्तु व्यवहार दर्शाया नहीं जाता है। अपवर्त्य अधिगम से संबंधित एक प्रयोग टॉलमैन के द्वारा किया गया। टॉलमैन ने चूहों के दो समूहों को भूल-भुलैया नामक कक्ष में छोड़ दिया। चूहों के एक समूह को भोज्य पदार्थ की स्थिति ज्ञात थी लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता अज्ञात था। भोजन की लालच में चूहा बहुत भटका। कई अंधपथों में आगे बढ़कर लौट आया।

लेकिन अंत में वह भोज्य पदार्थ तक पहुँच ही गया। बार-बार किये गये प्रयास का फल उसे प्राप्त हो गया। अब वह आसानी से कम समय में द्वार से भोजन तक का रास्ता बिना भटके दौड़कर पूरा कर लेता है। दूसरा चूहा कुछ नहीं जानता था फिर भी वह पहले चूहा की तरह रास्ता तय करने लगा। प्रस्तुत प्रयोग के माध्यम से टॉलमैन अपनी खोज का एक निष्कर्ष निकाला जिसके अनुसार चूहों ने अपने अव्यक्त अधिगम के सहारे भोज्य पदार्थ तक पहुँचने का मार्ग चुन लिया। वह किस प्रकार रास्ता का सही अंदाज लगाया यह अव्यक्त ही रहा। अर्थात् अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उन्हें, जिन दिशाओं और स्थानिक अवस्थितियों की आवश्यकता भी उनका मानस चित्रण किया।

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प्रश्न 12.
अधिगम अशक्तता वाले छात्रों की पहचान हम कैसे करते हैं?
उत्तर:
अधिगम अशक्तता वाले छात्रों की पहचान हम निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर करते हैं –

  1. अधिगम अशक्तता वाले छात्रों को अक्षरों, शब्दों तथा वाक्यांशों को लिखने-पढ़ने में कठिनाई होती है।
  2. इस श्रेणी के बच्चे सीखने के लिए कोई मनपसन्द योजना अथवा तरीका खोजने में लगभग अक्षम होते हैं।
  3. ये किसी एक विषय पर देर तक ध्यान केन्द्रित नहीं रख पाते हैं।
  4. ये विभिन्न आवश्यक सामानों को अनवरत रूप से इधर-उधर हटाते रहते हैं।
  5. इन्हें पेशीय समन्वय तथा हस्तनिपुणता प्रकट करने में कठिनाई होती है।
  6. ये बच्चे काम करने के मौखिक अनुदेशों को समझने और अनुसरण करने में असफल होते हैं।
  7. सामाजिक संबंधों का मूल्यांकन करने में इनसे भूल हो जाया करती है।
  8. भाषा सीखने एवं समझने में भी ये अक्षम होते हैं।
  9. इनमें प्रात्यक्षिक विकार (दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, ध्वनि, गति) भी पाए जाते हैं।
  10. इनमें पठन वैकल्प के लक्षण पाए जाते हैं। अर्थात् ये शब्दों को वाक्यों के रूप में संगठित करने में अपेक्षाकृत अक्षम होते हैं।

अतः अस्वाभाविक स्वभाव तथा शारीरिक गठन की तुलना में मानसिक दुर्बलता का पाया जाना, अधिगम, अशक्तता वाले छात्रों की पहचान है।

Bihar Board Class 11 Psychology अधिगम Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राचीन अनुबंधन का सबसे प्रमुख लक्षण क्या है?
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधन में अधिगम की स्थिति में दो उद्दीपकों के बीच साहचर्य स्थापित होता है।

प्रश्न 2.
सहकालिक अनुबंधन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब अनुबंधन तथा अननुबंधित उद्दीपक साथ-साथ प्रस्तुत किए जाते हैं तो इसे सहकालिक अनुबंधन कहा जाता है।

प्रश्न 3.
दो परिवर्तनों का उदाहरण दीजिए जो अधिगम नहीं माने जाते हैं।
उत्तर:

  1. अत्यधिक शराब पीकर लड़खड़ाते हुए चलना।
  2. आँख में धूलकण के चले जाने से कुछ भी देख पाने में असमर्थता व्यक्त करना।

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प्रश्न 4.
अधिगम की तीन विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:

  1. अधिगम में सदैव किसी-न-किसी तरह का अनुभव सम्मिलित रहता है।
  2. अधिगम के कारण व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं।
  3. अधिगम एक अनुमानित प्रक्रिया है और निष्पादन से भिन्न है।

प्रश्न 5.
युग्मित सहचर अधिगम का उपयोग बतावें।
उत्तर:
युग्मित सहचर अधिगम (वाचिक अधिगम) विधि का उपयोग मातृभाषा (हिन्दी) के शब्दों के किसी विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के पर्याय सीखने में किया जाता है।

प्रश्न 6.
क्रमिक अधिगम का संबंध किस प्रकार की जिज्ञासा से है?
उत्तर:
क्रमिक अधिगम (वाचिक अधिगम) का उपयोग यह जानने के लिए किया जाता है कि प्रतिभागी किसी शाब्दिक एकांशों की सूची को किस तरह सीखता है और सीखने में कौन-कौन-सी प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं।

प्रश्न 7.
वर्ग गुच्छन किसे कहा जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक वॉसफील्ड ने पुनः स्मरण विधि को समझने के लिए साठ शब्दों से चार समूहों में रखा। नाम, पशु, पेशा तथा सब्जी से जुड़े शब्दों को अलग-अलग वर्गों में रखा गया। प्रतिभागियों के द्वारा पुनः स्मरण विधि के क्रम में बतलाये गये शब्द समूहों को वॉसफील्ड ने ‘वर्ग गुच्छन’ कहा।

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प्रश्न 8.
संप्रत्यय क्या है?
उत्तर:
संप्रत्यय एक श्रेणी है, जिसका उपयोग अनेक वस्तुओं अथवा घटनाओं (पशु, फल, भवन, भीड़) के लिए किया जाता है। संप्रत्यय के उदाहरण वे वस्तुएँ, व्यवहार या घटनाएँ होती हैं जिनमें समान विशेषताएँ हों।

प्रश्न 9.
कौशल का सामान्य परिचय क्या है?
उत्तर:
किसी जटिल कार्य को आसानी से और दक्षता से करने की योग्यता कर्ता का कौशल कहलाता है। अभ्यास और अनुभव के आधार पर कौशल की मर्यादा रखी जाती है, जैसे, जहाज, कार चलना, रेडियो बजाना, मोबाइल से संदेश भेजना आदि।

प्रश्न 10.
कौशल अर्जन के प्रमुख चरण क्ग हैं?
उत्तर:
फिट्स के अनुसार संज्ञानात्मक, साहचर्यात्मक तथा स्वायन से सम्बोधिर चरणों में मानसिक क्रिया द्वारा कौशल ग्रहण किया जाता है।

प्रश्न 11.
अधिगम अंतरण का दूसरा नाम क्या हो सकता है?
उत्तर:
अधिगम अंतरण को प्रायः प्रशिक्षण अंतरण या अंतरण प्रभाव कहा जाता है।

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प्रश्न 12.
अधिगम को सुगम बनाने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?
उत्तर:
अधिगम को सुगम बनानेवाले कारकों में अभिप्रेरणा तथा प्राणी की तत्परता प्रमुख है।

प्रश्न 13.
अधिगम शैलियाँ किस प्रकार व्युत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
अधिगम शैलियाँ मुख्यतः प्रात्यक्षिक प्रकारता, सूचना प्रक्रमण तथा व्यक्तित्व प्रतिरूप से व्युत्पन्न होता है।

प्रश्न 14.
संबंधनात्मक शैली और विश्लेषणात्मक शैली में कार्यान्मुख क्षेत्र की दृष्टि से अन्तर बतावें।
उत्तर:
संबंधात्मक शैली अशैक्षणिक क्षेत्रों में अधिक कार्योन्मुख होते हैं जबकि विश्लेषणात्मक शैली शैक्षणिक संदर्भ में अधिक कार्यान्मुख होते हैं।

प्रश्न 15.
अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का उपचार संभव है या नहीं?
उत्तर:
उपचारी अध्ययन विधि के उपयोग से बहुत लाभ होता है। शिक्षा मनोवैज्ञानिकों के शिक्षण विधियों से अधिकांश लक्षणों को हटाया जा सकता है।

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प्रश्न 16.
स्किनर ने अपना प्रयोगात्मक अध्ययन किस पर किया था?
उत्तर:
स्किनर ने अपना प्रयोगात्मक अध्ययन कबूतर और चूहा पर किया था।

प्रश्न 17.
स्किनर के साधनात्मक अनुकूलन में सीखने का आधार क्या है?
उत्तर:
स्किनर के साधनात्मक अनुकूलन में सीखने का आधार प्रवर्तन व्यवहार (Operant behaviour) है।

प्रश्न 18.
अननुबंधित उद्दीपकों के दो प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. प्रवृत्यात्मक तथा
  2. विमुखी।

प्रश्न 19.
नैमित्तिक अनुबंधन के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. माँ के द्वारा छिपाकर रखे गये मिठाई के डिब्बे को खोज लेना।
  2. रेडियो, टी.वी. आदि को चलाना।

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प्रश्न 20.
धनात्मक एवं ऋणात्मक प्रबलन के उपयोगों को बतावें।
उत्तर:
धनात्मक प्रबलन का परिणाम सुखद होता है क्योंकि धनात्मक प्रबलक आवश्यकताओं (भोजन, पानी, प्रशंसा, प्रतिष्ठा) की पूर्ति करता है। ऋणात्मक प्रबलक अप्रिय एवं पीड़ादायक उद्दीपक होते हैं। ऋणात्मक प्रबलक के प्रभाव के रूप में सर्दी, चिन्ता, रोग, दुर्घटना, दण्ड आदि मिलते हैं।

प्रश्न 21.
आंशिक प्रबलन की एक विशेषता बतावें।
उत्तर:
आंशिक प्रबलन. सतत प्रबलन की अपेक्षा में विलोप के प्रति ज्यादा विरोध पैदा करता है।

प्रश्न 22.
निष्पादन पर विलम्ब का केसा प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
विलम्ब स निष्पादन का स्तर निकृष्ट हो जाता है।

प्रश्न 23.
प्रबलक का परिचय दें।
उत्तर:
प्रबलक वे उद्दीपक होते हैं जो अपने पहले घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर या संभावना को बढ़ा देते हैं।

प्रश्न 24.
प्रबलकों के नियमित उपयोग से क्या लाभ मिलता है?
उत्तर:
प्रबलकों के नियमित उपयोग से वांछित अनुक्रिया प्राप्त हो सकती है।

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प्रश्न 25.
अधिगम और विलोप का पारस्परिक आचरण क्या है?
उत्तर:
अधिगम की प्रक्रिया विलोप का प्रतिरोध प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 26.
सामान्यीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब एक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण कहते हैं। सामान्यीकरण होने का तात्पर्य विभेदन की विफलता है।

प्रश्न 27.
प्रेरणात्मक अधिगम को सामाजिक अधिगम कहलाने का कारण क्या है?
उत्तर:
प्रेरणात्मक अधिगम में व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों को सीखता है इसी कारण इसे सामाजिक अधिगम भी कहा जाता है।

प्रश्न 28.
स्वतः पुनः प्राप्ति की स्थिति कब आती है?
उत्तर:
स्वतः पुनः प्राप्ति किसी अधिगत अनुक्रिया के विलोप होने के बाद होती है।

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प्रश्न 29.
संज्ञानात्मक अधिगम की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम में सीखने वाले व्यक्ति के कार्य-कलापों की बजाय उसके ज्ञान में परिवर्तन आता है।

प्रश्न 30.
अंतर्दृष्टि अधिगम किसे कहते हैं?
उत्तर:
अंतर्दृष्टि ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी समस्या का समाधान एकाएक (हठात्) स्पष्ट हो जाता है।

प्रश्न 31.
अव्यक्त अधिगम से संबंधित एक मनोवैज्ञानिक का नाम बतावें जो भूल-भुलैया और चूहा को प्रयोग का आधार बनाया था?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक टॉलमैन ने अव्यक्त अधिगम के संप्रत्यय को अपना प्रारम्भिक योगदान दिया।

प्रश्न 32.
वाचिक अधिगम की प्रक्रिया के अध्ययन में मनोवैज्ञानिक किस प्रकार की सामग्रियों का उपयोग कर रहे हैं?
उत्तर:
निरर्थक शब्दांश, परिचित शब्द, वाक्य, अनुच्छेद आदि।

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प्रश्न 33.
सामाजिक शिक्षण क्या है?
उत्तर:
समाज में रहकर सामाजिक नियमों के अनुसार व्यावहारिक जीवन के नियमों को सीखना ही सामाजिक शिक्षण कहलाता है।

प्रश्न 34.
अनुबंधन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अनुबंधन का अर्थ साहचर्य द्वारा सीखना होता है।

प्रश्न 35.
अधिगम के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग बतावें।
उत्तर:
अधिगम के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग संगठन, कुसमायोजित प्रतिक्रियाओं के उपचार, बच्चों का पालन-पोषण तथा विद्यालय अधिगम के लिए किया जाता है।

प्रश्न 36.
मनोविश्लेषण का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
मनोचिकित्मा की एक विधि जिससे मनोचिकित्सक दमित अचेतन सामग्री को सचेतन स्तर पर लान का प्रयास करता हैं मनोविश्लेषण कहलाता है।

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प्रश्न 37.
पॉवलव ने अपना प्रयोग किस पर किया था?
उत्तर:
पॉवलव ने अपना प्रयोग भूखे कुत्ते पर किया था।

प्रश्न 38.
पॉवलव ने शिक्षण के संबंध में क्या कहा है?
उत्तर:
पॉवलव ने शिक्षण के संबंध में कहा है कि “सीखना और कुछ नहीं बल्कि संबंध प्रत्यावर्तन की एक लम्बी शंखला मात्र है।”

प्रश्न 39.
पॉवलव ने सीखने का आधार क्या बताया?
उत्तर:
पॉवलव ने सीखने का आधार संबंध प्रत्यावर्तन को बताया जिसमें प्राणी अनुबंधित अनुक्रिया करना सीखता है।

प्रश्न 40.
पॉवलव के प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपक क्या था?
उत्तर:
पॉवलव के प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपक मांस था।

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प्रश्न 41.
पॉवलव के सिद्धान्त एवं स्किनर के सिद्धान्त में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
पॉवलव ने प्रत्यार्थी व्यवहार (Respondent behaviour) को सीखने का आधार माना जबकि स्किनर ने प्रवर्तक व्यवहार (Operant behaviour) को सीखने का आधार माना है।

प्रश्न 42.
संबंध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त का प्रतिपादन किस मनोवैज्ञानिक ने किया?
उत्तर:
संबंध प्रत्यावर्तन सिद्धांत का प्रतिपादन रूस के एक महान मनोवैज्ञानिक पॉवलव ने किया।

प्रश्न 43.
अनुबंध या संबंध के सिद्धांत कौन-कौन हैं?
उत्तर:
अनुबंध या संबंध के दो प्रमुख सिद्धांत हैं, जो इस प्रकार हैं –

  1. प्राचीन अनुबंध या संबंध का सिद्धान्त
  2. साधनात्मक अनुबंध या संबंध का सिद्धान्त

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रेक्षणात्मक अधिगम का स्वरूप एवं उपयोग बतायें।
उत्तर:
प्रेक्षणात्मक अधिगम दूसरों के द्वारा किये जाने वाले कार्यों के लिए अपनायी जाने वाली विधियों का प्रेक्षण का व्यावहारिक परिणाम हैं। इसके अन्तर्गत अनुकरण, सामाजिक अधिगम तथा मॉडलिंग की प्राथमिकता मिली हुई है।

1. अनुकरण:
दूसरों की क्रिया-विधियों की नकल करना, अनुकरण माना जाता है। जैसे, आँख बन्द करके चलना एक अंधे का अनुकरण करने का प्रयास है।

2. सामाजिक अधिगम:
प्रेक्षणात्मक अधिगम में व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों (अतिथि सत्कार, पूजा-विधि, विवाह पद्धति) को सरलता से सीखता है। इसी कारण इस अधिगम को सामाजिक अधिगम भी कहा जाता है।

3. मॉडलिंग:
मॉडलिंग को स्वांग भरना भी कह सकते हैं। बुढ़िया की तरह खाँसना झुककर चलना, बन्दरवाला बनकर डमरू बजाना, टैम्पूवाला बनकर एक सवारी एक सवारी चिल्लाना आदि मॉडलिंग के विभिन्न रूप हैं जो किसी अन्य की तरह व्यवहार करने के रूप में प्रकट होता है।

प्रेक्षणात्मक अधिगम की उपयोगिता:

1. सीखना:
समाज में रहनेवाले तरह-तरह के व्यक्तियों की कार्य-विधियों को देखकर हम भी वैसा कार्य करना सीख लेते हैं। जैसे-रीमोट चलाना, रेडियो बजाना, कुएँ से पानी खींचना अदि।

2. व्यवसाय की प्रगति:
विज्ञापन के माध्यम से प्रभावकारी हस्तियों के द्वारा उत्पादन का व्यवहार करते हुए दिखाकर उत्पादन की खपत बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।

3. अच्छी आदतों से परिचय:
बड़ों को टहलते, व्यायाम करते, व्यायाम करते, चबा-चबाकर खाते, देखकर बच्चे भी टहलने, व्यायाम करने, भोजन ग्रहण करने तथा समय पर सोने-जगने की आदत अपनाने लगते हैं।

4. पर्व-त्योहारों का सम्मान:
दीपावली में दीपों को सजाने, होली में रंग-अबीर का प्रयोग करने, आरती करने तथा शिक्षक दिवस पर शिक्षकों का आदर-सम्मान देने संबंधी आचरण का ज्ञान प्रेक्षणात्मक अधिगम से सरल हो जाता है।

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प्रश्न 2.
प्राचीन अनुबंधन के प्रमुख कारकों का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधों के अन्तर्गत समय और कार्य-स्तर की दृष्टि से कई कारकों के द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाये जाते हैं। कुछ प्रमुख कारक निम्न वर्णित हैं –

1. उद्दीपकों के बीच समय-संबंध:
अनुबंधित उद्दीपक और अननुबंधित उद्दीपकों की शुरूआत के बीच समय संबंध पर प्राचीन अनुबंधन प्रक्रियाएँ आधारित होती हैं। प्राचीन अनुबंधन प्रक्रियाएँ मुख्यत: चार प्रकार की होती हैं जिनमें से प्रथम तीन प्रक्रियाएँ अग्रवर्ती अनुबंधन की है तथा चौथी प्रक्रिया पश्चगामी अनुबंधन की है।

(क) सहकालिक अनुबंधक:
जब अननुबंधित तथा अनुबंधित उद्दीपक के साथ-साथ प्रस्तुत किए जाते हैं।

(ख) विलंबित अनुबंधन:
जब अनुबंधित उद्दीपक का प्रारम्भ और अन्त दोनों अननुबंधिक उद्दीपक के पहले होता है।

(ग) अवशेष अनुबंधन:
इस प्रक्रिया में भी अनुबंधित का प्रारम्भ और अंत अननुबंधित उद्दीपक से पहले होता है। किन्तु दोनों के बीच कुछ समय अंतराल होता है।

(घ) पश्चगामी अनुबंधन:
इस प्रक्रिया में अननुबंधित उद्दीपक का प्रारम्भ अनुबंधित उद्दीपक के पहले होता है। इन चारों प्रक्रियाओं में से पश्चगामी अनुबंधन प्रक्रिया प्राप्त होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है।

2. अननुबंधित उद्दीपकों के प्रकार:
अननुबंधित उद्दीपक दो प्रकार के होते हैं –

(क) प्रवृत्यात्मक:
यह स्वतः सुगम्य अनुक्रियाएँ उत्पन्न करती है।

(ख) विमुखी अनुबंधित उद्दीपक:
ये परिहार तथा पापन की अनुक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं जो दुखदायी और क्षतिकारक होते हैं।

3. अनुबंधित उद्दीपकों की तीव्रत:
अनुबंधित उद्दीपक जितना अधिक तीव्र होगा उतने ही कम प्रयासों की आवश्यकता अनुबंधन की प्राप्ति के लिए करना होता है।

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प्रश्न 3.
प्रमुख अधिगम प्रक्रियाओं का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
प्रमुख अधिगम प्रक्रियाएँ निम्न वर्णित हैं –

1. प्रबलन:
किसी प्रयोगकर्ता के द्वारा प्रबलक देने की प्रक्रिया को प्रबलन कहते हैं जहाँ प्रबलक के उद्दीपक अपने पहले घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर को बढ़ा देते हैं। एक धनात्मक प्रबलक प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है। जबकि ऋणात्मक प्रबलक स्वयं को हटाकर अनुक्रियाओं की दर को बढ़ा देते हैं। एक प्राथमिक प्रबल प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है। जबकि द्वितीयक प्रबलक पर्यावरण और प्राणी के बीच के सम्बन्ध को बतलाती है। प्रबलकों के नियमित उपयोग से वांछित अनुक्रिया प्राप्त हो सकती है।

2. विलोम:
प्रबलन को हटा लेने के परिणामस्वरूप अधिगत अनुक्रिया के लुप्त होने को विलोप कहते हैं। इसमें सीखे हुए व्यवहार को भी लुप्त होना देखा जा सकता है। अधिगम की प्रक्रिया विलोप का प्रतिरोध प्रदर्शित करती है। सीखते समय प्रबलित प्रयासों की संख्या बढ़ने के साथ विलोप का प्रतिरोध बढ़ता है।

3. सामान्यीकरण:
समान उद्दीपकों के प्रति समान अनुक्रिया करते सम्बन्धी गोचर को सामान्यीकरण कहते हैं। अतः जब एक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण माना जाता है। सामान्यीकरण होने का तात्पर्य विभेदन की विफलता है।

4. विभेदन:
सामान्यीकरण के पूरक के रूप में विभेदन भिन्नता के प्रति अनुक्रिया होती है। विभेदन की अनुक्रिया प्राणी की विभेदन क्षमता यदि भेदन के अधिगम पर निर्भर करता है।

5. स्वतः पुनः प्राप्ति-स्वतः पुनः
प्राप्ति किसी अधिगत के विलोप होने के बाद होती है। उदाहरण एवं प्रयोग के माध्यम से यह पाया गया है कि काफी समय बीत जाने के बाद सीखी हुई अनुबंधित अनुक्रिया का पुनरुद्धार हो जाता है और वह अनुबंधित उद्दीपक के प्रति घटित होती है। स्वतः पुनः प्राप्ति की मात्रा विलोप के बाद बीती हुई समयावधि पर निर्भर करती है। यह अवधि जितनी ही अधिक होती है, अधिगत अनुक्रिया की पुनः प्राप्ति उतनी ही अधिक होती है। इस प्रकार की पुनः प्राप्ति स्वाभाविक रूप से होती है।

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प्रश्न 4.
कृत्रिम संप्रत्यय की विशेषताओं पर आधारित उदाहरणों को व्यक्त करें।
उत्तर:
कृत्रिम संप्रत्यय वे होती हैं जो सुपरिभाषित होते हैं और विशेषताओं को जोड़ने वाले नियम परिशुद्ध और कठोर होते हैं। संप्रत्ययों में जैविक वस्तुएँ, वास्तविक जीवन के उत्पाद तथा मनुष्यों द्वारा बनाई गई विभिन्न कलाकृतियों, जैसे, औजार, कपड़े, मकान आदि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 5.
संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों की चर्चा करें।
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम में सीखने वाले व्यक्ति के कार्यकलापों की बजाय उसके ज्ञान में परिवर्तन होता है। किसी समस्या का एकाएक समाधान पाना तथा नित्य नया व्यवहार सीखना, कार्य पूरा कर लेने का संकल्प लेना, अनवरत प्रयास के महत्व को समझना आदि संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों से ही संभव हो पाता है। अंतर्दृष्टि अधिगम एवं अव्यक्त अधिगम के द्वारा इसके विस्तृत प्रभावों को समझा जा सकता है। कोहलर के द्वारा चिम्पैंजी पर किये जाने वाले प्रयोग तथा टॉलमैन के द्वारा चूहे और भूल-भुलैया वाले प्रयोग से संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों का प्रायोगिक अध्ययन किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधियों के नाम और परिणाम बतावें।
उत्तर:

  1. युग्मित सहचर अधिगम-मातृभाषा के शब्दों के लिए विदेशी शब्द को पर्याय के रूप में सीखना।
  2. क्रमिक अधिगम-किसी समस्या के समाधान के लिए किए जाने वाले प्रयासों को परिणामी प्रक्रम में सजाकर व्यवहार में लाना।
  3. मुक्त पुनः स्मरण-शब्दों को स्थायी रूप से स्मृति में रखने के लिए उनके क्रम को एक संगठन का रूप देना।

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प्रश्न 7.
अनुबंधित अनुक्रिया तथा स्वाभाविक अनुक्रिया में अंतर करें।
उत्तर:
स्वाभाविक अनुक्रिया वैसी अनुक्रिया को कहा जाता है जो स्वाभाविक उद्दीपन funconditioned stimulus) द्वारा उत्पन्न होता है जैसे भोजन देखकर लारस्राव करन में लारस्राव करना एक स्वाभाविक अनुक्रिया है, जो स्वाभाविक रद्दीपन (भोजन) के प्रति किया जा रहा है। अनुबंधित अनुक्रिया वैसी अनुक्रिया को कहा जाता है जो स्वाभाविक उद्दीपन तथा अनुबंधित उद्दीपन में साहचर्य स्थापित होने के बाद प्राणी अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) के प्रति करता है।

जैसे-पॉवलव के प्रयोग में जब कुत्ता मात्र घंटी की आवाज पर घंटी तथा भोजन में साहचर्य स्थापित करने के बाद लारस्राव करने लगता है तब लारस्राव की यह अनुक्रिया अनुबंधित अनुक्रिया का एक उदाहरण है। परंतु यही लारस्ताव प्रारंभ में जब भोजन को देखकर किया जाता था तब उसे स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response) कहा जाता है।

प्रश्न 8.
पुनर्बलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राणी के आवश्यकता की पूर्ति जिन वस्तुओं से होती है उसे पुनर्बलन (Reinforce ment) कहा जाता है। पॉवलव के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है क्योंकि भोजन से ही भूख मिट सकती है। पुनर्बलन प्राप्त करने के उद्देश्य से ही प्राणी उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया करने के लिए प्रेरित रहता है। वास्तव में अनुबंधन द्वारा किसी अनुक्रिया को सीखने के लिए पुनर्बलन एक आवश्यक शर्त है जिसका पॉवलव ने अपने प्रयोग में स्पष्टीकरण किया है।

प्रश्न 9.
अविशिष्ट अंतरण से क्या स्पष्ट होता है?
उत्तर:
एक कार्य का सीखना अधिगमकर्ता को अगला कार्य ज्यादा सुविधा से सीखने के लिए स्फूर्ति प्रदान करता है। क्रिकेट खिलाड़ी के खड़े होने की स्थिति तथा परीक्षार्थियों को लिखने के लिए बैठने की विधि के आधार पर लिखने की गति में आने वाले अन्तर को स्फूर्ति परिणाम का कारक मानना अविशिष्ट अंतरण का उदाहरण माना जा सकता है। अर्थात् कोई व्यक्ति एक साथ दो या अधिक कार्यों को सीख सकता है।

प्रश्न 10.
अनुबंधन का अर्थ सोदाहरण बतावें।
उत्तर:
अनुबंधन का अर्थ होता है साहचर्य द्वारा सीखना। जब प्राणी के सामने कोई उद्दीपन, जैसे-भोजन तथा उसके ठीक कुछ पहले एक दूसरा उद्दीपन (stimulus), जैसे-रोशीन (light) दी जाती है और यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है तब प्राणी रोशनी जलते ही यह समझ जाएगा कि भोजन आनेवाला है। इस प्रत्याशा (expectation) में वह ठीक वैसी ही अनुक्रिया करना प्रारंभ कर देता है जो भोजन की वास्तविक उपस्थिति में वह आमतौर पर करता है। इस तरह के सीखना को अनुबंधन कहा जाता है जिसके लिए स्पष्टतः अन्य बातों के अलावा अभ्यास, उद्दीपन आदि का होना अनिवार्य है।

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प्रश्न 11.
अनुबंधित उद्दीपन तथा स्वाभाविक उद्दीपन में अंतर बतावें।
उत्तर:
स्वाभाविक उद्दीपक वैसे उद्दीपन को कहा जाता है जो बिना किसी पूर्व प्रशिक्षण के ही प्राणी में एक स्वाभाविक अनुक्रिया उत्पन्न करता है। जैसे-भोजन देखकर भूखे व्यक्ति के मुँह में लार आने की अनुक्रिया में भोजन एक स्वाभाविक उद्दीपन के साथ बार-बार उपस्थित किए जाने पर कुछ प्रयासों के बाद वह अकेले ही वैसी अनुक्रिया उत्पन्न कर लता है जो स्वाभाविक उद्दीपन द्वारा उत्पन्न किया जाता है।

जैसे-भोजन देने के पहले घंटी बजा दी जाए और यह प्रक्रिया कई प्रयासों में दोहराई जाए तो कुछ देर के बाद मात्र घंटी बजते ही प्राणि लारस्राव की अनुक्रिया करने लगेगा। इस तरह के तटस्थ उद्दीपन (neutral stimulus) को अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) कहा जाता है। अत: इन दोनों में मुख्य अंतर यह है कि स्वाभाविक उद्दीपन बिना प्रशिक्षण के ही अनुक्रिया उत्पन्न करता है, परंतु अनुबंधित उद्दीपन प्रशिक्षण के बाद स्वाभाविक उद्धेपन के समान अनुक्रिया करता है।

प्रश्न 12.
सीखना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सीखने से तात्पर्य व्यवहार में परिवर्तन से होता है, परंतु व्यवहार में हुए सभी तरह के परिवर्तनों को सीखना नहीं कहा जाता है। जैसे-व्यक्ति के व्यवहार में परिपक्वता (maturation) के कारण परिवर्तन हो जाता है, औषधि खा लेने से परिवर्तन आ जाता है, थकान होने से परिवर्तन होता है, आदि-आदि। ऐसे सभी परिवर्तनों को सीखने की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। व्यवहार में केवल उन्हीं परिवर्तनों को सीखना कहा जाता है जो अभ्यास (practice) या अनुभूति (experience) के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। व्यवहार में ऐसे परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी (relatively permanent) होते हैं।

प्रश्न 13.
शिक्षण वक्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शिक्षण वक्र एक ऐसा वक्र है जिसके माध्यम से विभिन्न प्रयासों (trials) या अभ्यासों में हुए सीखने की प्रगति या दर को दिखाया जाता है, सामान्यतः सीखने की दर को तीन कसौटियों के रूप में दिखाया जाता है-सीखने की यथार्थता पर परिशुद्धता (accuracy in learning), त्रुटि में कमी (reduction in error) तथा सीखने में लिया गया समय। इससे तीन तरह के शिक्षण वक्रों का निर्माण होता है।

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प्रश्न 14.
शिक्षक वक्र में पठार का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
किसी पाठ या विषय को सीखने की अवधि के बीच में कभी-कभी ऐसा होता है कि अभ्यास जारी रहने के बावजूद सीखने में कोई प्रगति नहीं होती है। फलस्वरूप, ऐसी परिस्थिति में बननेवाला वक्र आधार के समानांतर हो जाता है। शिक्षण वक्र की इस स्थिति को पठार कहा जाता है।

प्रश्न 15.
शाब्दिक सीखना किसे कहा जाता है?
उत्तर:
शाब्दिक सीखना का तात्पर्य शब्दों, अंकों, आकृतियों के. अर्थ को समझकर उसके प्रति विशेष अनुक्रिया करने से होता है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति ‘हाथी’ शब्द लिखता-पढ़ता है, तथा उसका अर्थ समझता है तथा उस शब्द का सही उपयोग भी करता है तो यह शाब्दिक सीखना का एक उदाहरण होगा। इस तरह के सीखना में ज्ञानेन्द्रियों (sense organs) की भूमिका शरीर के पेशीय अंगों (motor organs) की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। कविता याद करना शाब्दिक सीखना का एक उदाहरण है।

प्रश्न 16.
संवेदी-पेशीय सीखना का अर्थ बतावें।
उत्तर:
संवेदी:
पेशीय सीखना से तात्पर्य वैसे सीखना से होता है जिसमें शरीर की ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों (motor organs) का संयुक्त योगदान होता है, परंतु कर्मेन्द्रियों या पेशीय अंगों का तुलनात्मक रूप से अधिक सक्रिय योगदान होता है। जैसे-कार चलाना सीखना, टाइप करना सीखना, तैरना सीखना आदि संवेदी-पेशीय सीखना के कुछ उदाहरण हैं। इस तरह के सीखना में कर्मेन्द्रियों अर्थात् हाथ, पैर आदि का योगदान आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से स्पष्टत: अधिक होता है।

प्रश्न 17.
प्रवर्तन अनुकूलन से आप. क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्किनर (Skineer 1938) ने समस्या बॉक्स जैसे जटिल साधनात्मक अधिगम को इतना सरल रूप दिया कि उसे अनुकूल कोटि में रखा जा सकता है। बक्से में एक लीवर लगा था जिसके दबने से भोजन की एक गोली बाहर आती थी। चूहे को बक्से में रखा गया। इधर-उधर घूमने के क्रम में वह लीवर पर चढ़ा। लीवर दबा और भोजन की एक गोली बाहर आयी। इस परिस्थिति से यह स्पष्ट नहीं है कि अनुकूलन उत्तेजक क्या था, लीवर का दृश्य या भोजन को गंध। लीवर दबाना अनुकूलन उत्तेजक थी, भोजन की गोली अनुकूलन और खाना अनुकूलन उत्तेजक थी। स्किनर ने इसी साधनात्मक अधिगम को प्रवर्तन (operant) अनुकूलन कहा है। साधनात्मक एवं प्रवर्तन अनुकूलन में भी भेद है।

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प्रश्न 18.
अभ्यास नियम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अभ्यास नियम का प्रतिपादन थार्नडाइक द्वारा अपने सीखने के सिद्धांत में किया गया। इस नियम के अनुसार सीखने का आधार अभ्यास (exercise) होता है। इस नियम के दो उपनियम हैं-उपयोग नियम (law of use) तथा अनुपयोग नियम (law of disuse)। उपयोग नियम के अनुसार जब किसी अनुक्रिया को प्राणी बार-बार दोहराता है तब उसे वह करना सीख लेता है। अनुपयोग नियम के अनुसार जब प्राणी किसी अनुक्रिया को बार-बार नहीं दोहराता है तब वह उसे सीख नहीं पाता है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति मात्र एक या दो बार टाइप करने का प्रयास करता है, तो वह टाइप करना नहीं सीख पाएगा।

प्रश्न 19.
प्रभाव नियम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रभाव नियम का प्रतिपादन थार्नडाइक द्वारा अपने सीखने के सिद्धान्त में किया गया। इस नियमं द्वारा यह पता चलता है कि प्राणी किसी अनुक्रिया को उस अनुक्रिया से उत्पन्न प्रभाव के आधार पर सीखता है। अनुक्रिया करने के बाद यदि उसे संतुष्टि (satisfaction) होती है तो वह उस अनुक्रिया को बार-बार दोहराता है और उसे सीख लेता है। परंतु, यदि उसे अनुक्रिया करने के बाद खीझ (annoyance) होती है तो वे उसे दोहराता नहीं है और उसे नहीं सीख पाता है। थार्नडाइक के प्रयोग में भूखी बिल्ली दरवाजा खोलने की अपक्रिया को इसलिए सीख जाती है, क्योंकि दरवाजा खोलने के बाद उसे भोजन मिलता था जिसे खाकर वह संतुष्ट हो जाती थी।

प्रश्न 20.
अधिगम (सीखने) की परिभाषा दें।
उत्तर:
“सीखना” बहुत व्यापक शब्द है, इस मानसिक प्रक्रिया की अभिव्यक्ति व्यवहार के सहारे होती है। सीखने से प्राणी के व्यवहार में परिवर्तन या परिमार्जन होता है। सीखने में व्यवहार में जो परिवर्तन होता है, वह अनुभव या अभ्यास पर आधारित होता है और उससे समायोजन में सहायता मिलती है। मॉर्गन और गिलीलैंड ने सीखने की परिभाषा इस प्रकार दी है-“सीखना अनुभव के परिणाम स्वरूप जीव के व्यवहार में कुछ परिमार्जन है जो कम-से-कम कुछ समय के लिए भी जीव द्वारा धारण किया जाता है।” उपरोक्त परिभाषा में निहित तथ्य इस प्रकार है –

  1. सीखने से व्यवहार में परिवर्तन होता है।
  2. सीखा हुआ व्यवहार कुछ समय तक व्यक्ति के व्यवहार में स्थायी रूप से बना रहता है।
  3. सीखा हुआ व्यवहार अचानक नहीं होता है। यह अनुभव अथवा अभ्यास पर आधारित होता है।
  4. सीखने के पीछे अभिप्रेरण कार्य करता है।
  5. सीखा हुआ व्यवहार का मापन संभव है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सीखने में अनुप्रेरणा (motivation) के प्रभाव का वर्णन करें। अथवा, सीखने में अभिप्रेरणा (motivation) की भूमिका स्पष्ट करें।
उत्तर:
सीखने की क्रिया में तीन तत्व संयुक्त होते हैं, जिन्हें हम इस प्रकार कह सकते हैं –

  1. मनोवैज्ञानिक तत्व
  2. शारीरिक तत्व तथा
  3. वातावरण-सम्बन्धी तत्व। मनोवैज्ञानिक तत्व को हम सीखने में ‘अनुप्रेरणा’ (Motivation) कहते हैं।

सीखना प्राणी की वह क्रिया होती है, जिसके द्वारा वह अपने पर्यावरण से प्रतिक्रिया करता है। सीखने वाले के अन्दर क्रिया को हम प्रेरणा के द्वारा ही उत्पन्न करते हैं। उत्तेजना, रुचि, उद्देश्य इत्यादि अनुप्रेरण के विभिन्न रूपों पर बल देते हैं। ‘प्रेरणा’ ही सीखने की क्रिया का मूल तत्व है। अनुप्रेरणा ही बालक को क्रियाशील बनाती है, प्रतिक्रिया, रुचि, प्रयत्न आदि के परिणाम हैं। जिन्हें शिक्षक पसन्द करता है और यह विद्यार्थियों के लिए भी लाभदायक होते हैं। ये सब अनुप्रेरण से ही जन्म लेते हैं।

शिक्षा में अनुप्रेरणा वह कला है जो बालक के अन्दर रुचि उत्पन्न करती है। जब भी बालक किसी कार्य या वस्तु में रुचि अनुभव नहीं करता, अनुप्रेरणा द्वारा रुचि को उसमें जाग्रत किया जा सकता है। स्वीकृत व्यवहार को जाग्रत करना, बनाये रखना तथा निर्देशन देना विद्यमान की शिक्षा में प्रेरणा का ही कार्य है। व्यक्ति की प्रत्येक क्रिया जो किसी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है, अनुप्रेरणात्मक होती है। चूँकि सभी प्रकार सीखना एक विशेष लक्ष्य रखता है, इसलिए सभी प्रकार का सीखना एक अनुप्रेरित क्रिया होती है।

उत्तेजना की तीव्रता, लक्ष्यों को देखने, विविधता आदि सीखने की क्रिया के प्रभावोत्पादन में अन्तर उत्पन्न करते हैं। अध्यापक का कर्तव्य है कि वह बालकों को अनुप्रेरणा द्वारा सीखने को प्रोत्साहित करें। सीखने की क्रिया के अन्तर्गत अनुप्रेरकों और लक्ष्यों का बुद्धिसंगत योग होता है जो अनुकूल और आनुपातिक वातावरण का निर्माण करता है, संवेगात्मक रुचि उत्पन्न करता है और बालकों के अन्दर संतोष की भावना करता है।

सीखने की क्रिया में अनुप्रेरकों के तीन कार्य (Three functions of Motives in Learming process):
मेटल के मतानुसार, अनुप्रेरक सीखने की क्रिया में तीन कार्य करते हैं। वे इस प्रकार हैं –

1. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार को शक्तिशाली बनाते हैं (Motives Energise Behaviour):
अनुप्रेरक शक्ति का वर्द्धन करते हैं, जिससे हमारे अन्दर क्रियाशीलता उत्पन्न होती है। इस प्रकार भूख तथा प्यास भी हमारे अन्दर मांसपेशिक तथा ग्रन्थिक (Musculars and Glandular) प्रतिक्रिया होती है। प्रशंसा, आरोप, पुरस्कार, दण्ड आदि शक्तिशाली उत्तेजक हैं, जो हमारे बहुत-से कार्य को प्रभावित करते हैं। ये हमें किसी विशेष दिशा की ओर कार्य करने को बाध्य करते हैं और सीखने की क्रिया में सहायक होते हैं।

2. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार को चुनने वाले होते हैं (Motives are selector of behaviour):
प्रेरक व्यक्ति की किसी उत्तेजना-विशेष के प्रति प्रतिक्रिया करने के लिए उत्तेजित करते हैं.और दूसरी वस्तुओं के प्रति अवहेलना। वे यह भी बताते हैं कि किसी अवस्था-विशेष में व्यक्ति किस प्रकार या करेगा। यदि एक समाचार पत्र विभिन्न व्यक्ति को दिया जाय तो हर व्यवि उसी खण्ड को गढ़ेगा जिसके लिए उसे अनुप्रेरणा प्राप्त है। उदाहरण के लिए, बेरोजगा व्यक्ति आवश्यकता पप्बन्धी खण्ड को ध्यान से देखेगा और बहुत-सी आवश्यकताओं को याद कर लेगाः सके विपरीत एक खिलाड़ी खेल के समाचार की ओर अधिक आकृष्ट होगा।

3. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार का संचालन करते हैं (Motive Direct Our Behaviour):
अनुप्रेरक केवल व्यवहार को सुनते ही नहीं वरन् उनका संचालन भी करते हैं। वह व्यवहार का संचालन इस प्रकार करते हैं कि हमारे अन्दर संतुष्टि की भावना जाग्रत हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपने सीखने में उन्नति करने के लिए कार्यशीलता को अपनाये, अपनी संपूर्ण शक्ति को आदर्श ग्रहणीय लक्ष्यों की ओर प्रवाहित करे और उन्हीं में अपनी शक्ति का प्रयोग करे।

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प्रश्न 2.
प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में प्रमुख अन्तर निम्न प्रकार से है –

1. प्राचीन अनुबन्धन में कुत्ते को लार का स्राव उचित समय पर भोजन देकर कराया जा सकता है। इससे प्रयोगकर्ता प्रयोज्य को उपयुक्त समय पर उत्तेजना प्रस्तुत करता है तभी अनुक्रिया नियंत्रित होती है। नैमित्तिक अनुबन्धन में प्रयोगकर्ता के हाथ में ऐसी उत्तेजना नहीं होती जिससे वह अपने प्रयोज्य से छड़ दबाने जैसी प्रतिक्रियाएं करा सके।

2. प्राचीन अनुबन्धन में पुनर्बलनं (US) अनुक्रिया पर निर्भर नहीं करता। जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन में पुनर्बलन अनुक्रिया पर निर्भर करता है। डी-अमेटो के अनुसार नैमित्तिक अनुबन्धन में पुनर्बलन प्रयोज्य को मिलेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रयोज्य उपयुक्त अनुक्रिया करता है अथवा नहीं।

3. अनेक अध्ययनों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि केवल प्राचीन अनुबन्धन प्रक्रियाओं द्वारा स्वतः चालित अनुक्रियाओं का अध्ययन हो सकता है। स्वतः चालित क्रियाएं जैसे लार स्रावित होना, पलक मारना आदि हैं। स्पेन्स और रॉस के कथनानुसार पलक गिरने की क्रिया स्वतः है तथा पलक मारने की क्रिया ऐच्छिक है। दोनों प्रकार की क्रियाओं की प्रकृति तथा अनुक्रिया काल अलग-अलग है। इन मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि पलक गिरने की क्रिया प्राचीन अनुबन्धन का उदाहरण है तथा पलक मारने की क्रिया नैमित्तिक अनुबन्धन के फलस्वरूप होती है।

4. माउरर के अनुसार सैद्धान्तिक दृष्टि से भी प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में अन्तर है। माउरर के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन में अधिगम समीपता के आधार पर होता है। यह देखा गया कि CS तथा Vs की उपस्थिति में जितना की कम अन्तर होगा, CS तथा US में साहचर्य उतनी ही जल्दी स्थापित हो जायेगा। इस प्रकार के अधिगम प्रक्रम में पुनर्बलन आवश्यक नहीं है। दूसरी ओर नैमित्तिक अनुबन्धन में CD तथा US के मध्य पुनर्बलन के आधार पर साहचर्य स्थापित होता है। एक अनुबन्धन में साहचर्य स्थापित होने का आधार समीपता है तो दूसरी जगह पुनर्बलन। इस आधार पर कहा जा सकता है कि दोनों अनुबन्धनों में सैद्धान्तिक दृष्टि से अन्तर है।

5. श्लासवर्ग के अनुसार नैमित्तिक अनुबन्धन में साहचर्य उत्तेजना-अनुक्रिया के मध्य स्थापित होता है। प्राचीन अनुबन्धन में उत्तेजना-उत्तेजना के मध्य साहचर्य स्थापित होता है। प्राचीन अनुबन्धन एक प्रकार से Stimulus Substitution होता है।

6. स्किनर के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन स्वत: है जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन एक प्रतिक्रिया है। प्राचीन अनुबन्धन प्राचीन अनुबन्धन में पुनर्बलन का सम्बन्ध उत्तेजना के साथ होता है जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन में यह स्थिति नहीं होती है। दूसरे प्राचीन अनुबन्धन की कुछ निन्दा करते हुए उसने यह कहा है कि शुद्ध प्राचीन अनुबन्धन में प्रायोगिक प्रमाणों का अभाव है।

नैमित्तिक अनुबन्धन में अनुक्रिया और पुनर्बलन के बीच धनात्मक सम्बन्ध होता है। इसमें पुनर्बलन की प्राप्ति इस बात पर निर्भर करती है कि प्रयोज्य किस प्रकार की अनुक्रिया करता है। स्किनर ने यह भी कहा है कि उद्दीपक प्रकार के अनुबन्धन की सीमा सहज क्रियाओं तक तथा नैमित्तिक अनुबन्धन की सीमा ऐच्छिक पेशीय क्रियाओं तक है।

7. मेडिनिक के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन से सम्बन्धित व्यवहार प्रतिक्रियात्मक (Respondant behaviour) अथवा प्रतिकृत (Elicited) प्रकार का व्यवहार है। इस प्रकार का व्यवहार सहज क्रियात्मक तथा उत्तेजना के नियंत्रण से होता है। दूसरी ओर नैमित्तिक अनुबन्धन से सम्बन्धित व्यवहार प्रवर्तन (operant) व्यवहार कहलाता है। इस प्रकार का व्यवहार ऐच्छिक होता है।

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प्रश्न 3.
साधनात्मक अनुकूलन या नैमित्तिक अनुबंधन का वर्णन करें।
उत्तर:
डी अमेटो (D’Amato, 1970) के अनुसार:
“नैमित्तिक अनुबंधन (Instrumental Conditioning) ऐसा कोई भी सीखना होता है जिसमें अनुक्रिया अवलम्बित पुनर्बलन.पर आधारित हो तथा जिसमें प्रयोगात्मक रूप से परिभाषित विकल्पों का चयन सम्मिलित न हो।” (Instrumental Conditioning is any learning based on response contingent reinforcement that does not involve choice among experimentally defined alternatives)

नैमित्तिक अनुबंधन की मुख्य विशेषता परिभाषा की पहली लाइन में ही दी हुई है जिसका अर्थ है कि प्रयोज्य के लिए पुनर्बलन या पुरस्कार (Reinforcement) की उपलब्धि प्रयोज्य की अनुक्रियाओं पर आश्रित होती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रयोज्य की अनुक्रियाएँ पुनर्बलन (Reinforcement) का Instrument (निमित्त) बन जाती है। नैमित्तिक अनुबंधन उत्तेजना-अनुक्रिया के बीच साहचर्य स्थापित करने की दूसरी विधि है, प्रथम विधि प्राचीन अनुबंधन है।

पुनर्बलन की प्रकृति धनात्मक अथवा निषेधात्मक किसी भी प्रकार की हो सकती है। धनात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement) वह उत्तेजना है जिसे प्रयोज्य प्राप्त करने के लिए चेष्टा और कार्य करता है। निषेधात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement) वह प्रयोज्य है जिसे प्रयोज्य उपेक्षित करने के लिए कार्य करता है अथवा इस उत्तेजना से बचने के लिए कार्य करता है। इस प्रकार के (Reinforcer प्राय: Aversive or Noxious Stmulus) कहे जाते हैं।

ऐसा नैमित्तिक अनुबंधन जिसमें धनात्मक पुनर्बलन का प्रयोग होता है, प्रवृत्यात्मक अनुबंधन (Appetitive Conditioning) तथा निषेधात्मक पुनर्बलन का प्रयोग होता है, उन्हें विमुखी अथवा हानिकारक अनुबंधन (Aversive or Noxiopus Conditioning) कहा जाता है। नैमित्तिक अनुबंधन का वर्गीकरण पुनर्बलन का धनात्मकता (Positiveness) अथवा निषेधात्मक (Negativeness) पर आधारित होने के साथ-साथ अधिगम प्रक्रम की उग्र-गमनता (Forward movement) तथा पृष्ठ-गमनता (Backward-movement) पर भी आधारित है।

कोनोस्र्की (1948) ने साधनात्मक नैमित्तिक अनुबंधन के निम्न तीन प्रकार बतलाए हैं –

1. परिहरण-अनुकूलन (Avoidance conditioning):
यदि घंटी बजे, फिर पाँव में विद्युत-आघात लगे और उसपर.कुत्ता पाँव उठा ले तो कुछ यत्नों के बाद घंटी बजते ही कुत्ता अपना पाँव उठाना सीख लेगा। अधोनुकूलन में पाँव उठा लेने पर भी विद्युत आघात लगेगा। यदि पाँव उठा लेने से वह आघात से बच जाए तो वही साधनात्मक स्वरूप का परिहरण-अनुकूलन कहलाता है।

2. पलायन-अनुकूलन (Escape conditioning):
साधनात्मक अनुकूलन के इस रूप में प्राणी धीरे-धीरे किसी कष्टकर परिस्थिति से बचना सीखता है। मौवरर ने एक प्रयोग में चूहे को पिंजड़े में बन्द किया और उसके फर्श को विद्युत-आवेशित कर दिया फिर धीरे-धीरे विद्युत तीव्रता बढ़ती गई। चूहा विविध प्रकार की क्रियाएँ करने लगा, यहाँ तक कि वह एक लीवर पर चढ़ गया जिससे लीवर दबा और विद्युत-आवेश समाप्त हो गया। यही परिस्थिति फिर दुहरायी गयी। इस बार अपेक्षाकृत शीघ्र ही वह लीवर पर चढ़ गया। एक ऐसी अवस्था भी आ गयी कि जब बिजली का आभास होता था तो चूहा लीवर दबा कर आघात से बचने लगा। यही पलायन-अनुकूलन है।

3. प्रवर्तन अनुकूलन (Operant conditioning):
स्किनर (Skinner 1938) ने समस्या बॉक्स जैसे जटिल साधनात्मक अधिगम को इतना सरल रूप दिया कि उसे अनुकूलन कोटि में रखा जा सकता है। बक्स में एक लीवर लगा था जिसके दबने से भोजन की एक गोली बाहर आती थी। चूहे को बक्स में रखा गया। इधर-उधर घूमने के क्रम में वह लीवर पर चढ़ा, लीवर दबा और भोजन की एक गोली बाहर आयी।

इस परिस्थिति से यह स्पष्ट नहीं है कि अनुकूलन उत्तेजक क्या था, लीवर का दृश्य या भोजन की गंध। लीवर दबाना अनुकूलन उत्तेजक थी, भोजन की गोली अनुकूलन उत्तेजक और खाना अनुकूलन उत्तेजक थी। स्किनर ने इसी साधनात्मक अधिगम को प्रवर्तन (operant) अनुकूलन कहा है। साधनात्मक एवं प्रवर्तन अनुकूलन में भेद भी है।

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प्रश्न 4.
पॉवलव के शिक्षण सिद्धान्त की विवेचना करें।
उत्तर:
सीखने के अनुबंधित-अनुक्रिया सिद्धांत का प्रतिपादन रूसी शरीर क्रिया-विज्ञानी पॉवलव (Pavlov) द्वारा किया गया। पॉवलव के इस सिद्धान्त का आधार अनुबंधन (conditioning) है जिससे तात्पर्य साहचर्य द्वारा सीखना (learning by association) होता है। जैसे-जब किसी अस्वाभाविक उद्दीपन (conditioned stimulus) के प्रति साहचर्य के आधार पर प्राणी स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response) करना सीख लेता है तब इस तरह के सीखना को अनुबंध द्वारा सीखना (conditioning learning) कहा जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मानलिया जाए कि एक भूखा व्यक्ति भोजन को देखता है, तो उसके मुँह में लार आने लगता है। यहाँ भोजन एक स्वभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) है जो व्यक्ति में स्वाभाविक अनुक्रिया (लारस्राव) उत्पन्न कर रहा है। अब थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि एक घंटी बजाकर उसके सामने भोजन दिया जाता है और यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है।

ऐसी परिस्थिति में संभव है कि व्यक्ति घंटी की आवाज को भोजन आने का सूचक मानकर घंटी की आवाज सुनते ही लारस्राव करने लगे। यदि ऐसा होता है तो यह कहा जाएगा कि व्यक्ति घंटी की आवाज (अस्वाभाविक उद्दीपन) के प्रति एक स्वाभाविक अनुक्रिया (लारस्राव) करना सीख लिया है। इस तरह के सीखना को अनुबंध न द्वारा सीखना (learning by conditioning) कहा जाता है। पॉवलव ने इस सिद्धांत की जाँच करने के लिए एक कुत्ते पर प्रयोग किया है तथा वाटसन एवं रेनर (Watson & Raynor) ने एक छोटे शिशु, जिसका नाम अलबर्ट (Albert) था, उसपर एक प्रयोग किया है। इन दोनों प्रयोगों का वर्णन यहाँ अपेक्षित है।

कुत्ते पर पॉवलव द्वारा किया गया प्रयोग (Pavlov’s experiment on dog):
अनुबंधन अनुक्रिया सिद्धांत के तथ्य के समर्थन में पॉवलन ने एक प्रयोग एक भूखे कुत्ता पर किया। कुत्ता को एक ऐसे कमरे में विशेष उपकरण के सहारे खड़ा किया गया जिसमें बाहर से किसी तरह की आवाज नहीं आने पाए।

कुत्ते द्वारा टपकाई गई लार की मात्रा को मापने के लिए उसके गलफड़े में एक खास किस्म का यंत्र लगा दिया गया जिसे चित्र में दिखाया गया है। कुछ प्रयास तक कुत्ते के सामने भोजन दिया और भोजन देखते ही कुत्ते के मुँह में लार आने लगी। कुछ प्रयास के बाद कुत्ते के सामने भोजन उपस्थित करने के चंद सेकंड पहले तक घंटी बजाई जाने लगी। इस प्रक्रिया को कुछ प्रयासों तक दोहराने के बाद घंटी की आवाज सुनते ही बिना भोजन देखे
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चित्र: पॉवलव द्वारा कुत्ते पर किया गया प्रयोग

ही कुत्ते के मुंह में लार आने लगी। इस तरह कुत्ता ने घंटी की आवाज पर लारस्राव करने की अनुक्रिया को सीख लिया। पॉवलव के अनुसार यहाँ कुत्ता घंटी की आवाज तथा लारस्राव में संबंध स्थापित करना सीख लिया जिसे अनुबंधन (conditioned stimulus या CS), भोजन एक स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus या UCS) तथा लार का स्राव (अनुबंधन के बाद) एक अस्वाभाविक अनुक्रिया (conditioned response या CR) का उदाहरण है। भोजन के प्रति की गई अनुक्रिया (अनुबंधन के पहले) एक स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response या UCR) का उदाहरण है।

वाटसन तथा रेनर द्वारा किया गया प्रयोग (Experiment done by Waston & Raynor):
वाटसन (Watson) ने अपनी पत्नी रेनर (Raynor) के साथ मिलकर अलबर्ट नामक एक बच्चे पर प्रयोग किया। प्रयोग इस प्रकार है-अलबर्ट एक उजले चूहे के साथ खेल रहा था। तभी जोरों की तीव्र आवाज उत्पन्न कर दी गई।

आवाज से बच्चा डर जाता था। कुछ दिनों तक यह प्रक्रिया दोहराने के बाद यह देखा गया कि बच्चा उजले चूहे को देखते ही डरकर रोने लगता था। आगे चलकर अलबर्ट में और तीव्र अनुबंधन होता पाया जिसें अलबर्ट केवल उजले चूहे बल्कि उसे मिलती-जुलती अन्य चीजों, जैसे उजला रोएँदार कोट, उजला खरगोश आदि से भी डरने लगा। इस प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) जोरों की आवाज तथा अस्वाभाविक या अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) चूहा है और अनुबंधित अनुक्रिया डर है जो मात्र चूहा देखकर ही उत्पन्न होता था।

उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि अनुबंधन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें स्वाभाविक उद्दीपन तथा अस्वाभाविक या अनुबंधित उद्दीपन में एक विशेष संबंध स्थापित हो जाता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति अस्वाभाविक उद्दीपन के प्रति ठीक वैसी ही अनुक्रिया करता है जैसी स्वाभाविक उद्दीपन के प्रति।

अनुबंधन के लिए कुछ प्रमुख बातें –
अनुबंधन द्वारा किसी प्रक्रिया को सीखने के लिए निम्नलिखित बातों का होना अनिवार्य है –

1. आवश्यकता (Need):
सीखनेवाले प्राणी में आवश्यकता का होना अनिवार्य है। पॉवलव के प्रयोग में कुत्ता भूखा था। अतः उसमें भोजन की अवश्यकता (need) थी। ऐसी आवश्यकता नहीं होती तो वह घंटी की आवाज के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है जिससे कुत्ते की भूख की आवश्यकता की पूर्ति होती थी।

2. पुनर्बलन (Reinforcement):
प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति जिस चीज से होती है, उसे पुनर्बलन की संज्ञा दी जाती है। पॉवलव के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है जिससे कुत्ते की भूख की आवश्यकता की पूर्ति होती थी।

3. अनुबंधित उद्दीपन तथा स्वाभाविक उद्दीपन के बीच का समय-अंतराल (Time interval between conditioned stimulus and unconditioned stimulus):
fortit अनुक्रिया का संबंध अनुबंधित उद्दीपन के स्थापित हो, इसके लिए यह भी आवश्यक है कि अनुबंधित उद्दीपन के तुरंत बाद स्वाभाविक उद्दीपन दिया जाए। शायद यही कारण है कि पॉवलव के प्रयोग में घंटी बजने के तुरंत बाद कुत्ते के सामने भोजन दिया जाता था।

4. व्याघातक उद्दीपनों की अनुपस्थित (Absence of disturbing stimulus):
अनुबंधन द्वारा सीखने के लिए यह आवश्यक है कि प्रयोग करते समय अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) तथा स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) से मिलते-जुलते दूसरे व्याघातक उद्दीपन वहाँ नहीं हों अन्यथा प्राणी अनुबंधित उद्दीपन के साथ स्वाभाविक अनुक्रिया का साहचर्य स्थापित नहीं कर पाएगा।

आलोचनाएं (Criticis):
इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नांकित हैं –

(a) इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के लिए पुनर्बलन (reinforcement) आवश्यक है। परन्तु, टॉलमैन (Tolman) तथा ब्लोजेट (Blodgett) आदि द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि पुनर्बलन की अनुपस्थिति में भी प्राणी किसी अनुक्रिया को सीखता है। पुनर्बलन की आवश्यकता सीखी गई अनुक्रिया की अभिव्यक्ति के लिए होती है।

(b) इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के लिए अभ्यास या पुनरावृत्ति को महत्त्वपूर्ण कारक माना गया है। परन्तु, बहुत अनुक्रियाएं ऐसी होती है जिसे व्यक्ति मात्र एक बार के अनुभव में ही सीख लेता है।

(c) कुंछ आलोचकों का मत है कि अनुबंधन द्वारा प्रतिपादित सीखना स्थायी तथा आशिक रूप से ही प्राणी के व्यवहार में परिवर्तन लाता है। कुत्ता घंटी की आवाज पर तभी तक लार का स्त्राव करता था जबकि घंटी की आवाज के बाद उसे. भोजन दिया जाता था।

(d) कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि अनुबंधन द्वारा सीखी गई अनुक्रिया अस्वाभाविक होती है जिसके आधार पर स्वाभाविक ढंग से सीखने की प्रक्रियाओं की व्याख्या नहीं की जा सकती है। इन अलोचनाओं के बावजूद पॉवलव का सिद्धान्त एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है।

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प्रश्न 5.
अधिगम अन्तरण का क्या स्वरूप है? कुछ प्रायोगिक उदाहरण द्वारा किसी भूत अधिगम के आगामी अधिगम पर प्रभाव की व्याख्या कीजिए। अथवा, अन्तरण के प्रभावों को निर्धारित करने में समानता एक मुख्य परिवर्तनीय है। (अण्डरवुड) अपने उत्तर की पुष्टि में प्रयोगात्मक प्रभाव दीजिए। अथवा, सीखने के स्थानान्तरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शिक्षक बालक को कक्षाओं में ज्ञान देता है। ज्ञान देने की क्रिया के पीछे अध्यापक की यह भावना अवश्य रहती है कि बालक इस ज्ञान अथवा सीखी हुई क्रिया का उपयोग अन्य परिस्थितियों में करेगा। अत: एक क्रिया का दूसरी परिस्थति में उपयोग किया जाना ही सीखने का स्थानान्तरण कहलाता है। उदाहरणार्थ, एक बालक गणित के सभी प्रश्नों को.बिना किसी की सहायता से स्वयं ही हल कर लेता है। गणित के ज्ञान द्वारा वह विज्ञान के विषयों में भी लाभ उठा सकता है।

इस क्रिया को सीखने का स्थानान्तरण कहते हैं। यहाँ तक बात ध्यान देने योग्य है कि यदि समाज में ज्ञान का स्थानान्तरण न होता तो मनुष्य को हर क्रिया को सीखने के लिए नये सिरे से प्रयत्न करना पड़ता। इसलिए क्रो ने स्थानान्तरण की परिभाषा इस प्रकार दी है – “सीखने के स्थानान्तरण से यह अभिप्राय है, जब सीखने में प्राप्त विचार, अनुभव या कार्य, ज्ञान अथवा कौशल का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में उपयोग किया जाय।”

शिक्षा-विश्व-कोष में स्थानान्तरण की व्याख्या इस प्रकार दी गई है-“जब कोई विशेष अनुभव व्यक्ति की योग्यता को दूसरी परिस्थिति में प्रतिक्रिया करने के हेतु प्रभावित करता है और प्राप्त अनुभवों के आधार पर वह नई समस्या को हल करने में उत्तेजना प्रदान करता है।” कॉलसानिक ने भी स्थानान्तरण की परिभाषा इस प्रकार दी है-“स्थानान्तरण पहली स्थिति में अर्जित ज्ञान, कौशल, स्वभाव, मनोवृत्ति अथवा प्रतिक्रयाओं का अन्य परिस्थितियों में प्रयोग करता है।” इन परिभाषाओं से यह ज्ञात होता है कि अर्जित अनुभव का लाभ उठाना ही स्थानान्तरण है। इस प्रकार के विचार सोरेन्स ने भी व्यक्त किये हैं – “स्थानान्तरण के द्वारा व्यक्ति उस सीमा तक सीखता है जहाँ से वह अर्जित योग्याताओं की सहायता दूसरी परिस्थितियों में करता है।

इन परिभाषाओं से प्राप्त निष्कार्षों को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है। एक व्यक्ति ने ट्रैक्टर चलाना सीख लिया है। वह उसके संचालन की हर विधि को अच्छी तरह जान गया है। यदि उसे कार या ट्रक चलाने को कहा जाय तो उसे कार या ट्रक का संचालन करने में परेशानी होगी। ट्रैक्टर चलाने की क्रिया का उपयोग कार या ट्रक चलाने में किया गया, इसलिए यह ट्रैक्टर चलाने की क्रिया स्थानान्तरण है।

स्थानान्तरण के प्रकार (Types of Transfer) यदि पूर्व सीखने का अनुभव दूसरे सीखने पर प्रभाव डालता है तो दूसरे सीखने में कम समय तथा कम शक्ति का प्रयोग हो सकता है। यदि दूसरे कार्य के अधिगम में सुगमता हो जाय या कार्य दुरूह हो जाय अथवा प्रभाव शून्य हो जाय तो उन्हें क्रमश: भावात्मक या विधेयात्मक (Positive), नकारात्मक (Negative) तथा शुन्यात्मक (Zero) स्थानान्तरण के नाम से पुकारेंगे। इस प्रकार स्थानान्तरण के तीन प्रकार बताये गये।

1. भावात्मक या विधेयात्मक (Positive) स्थानान्तरण:
इस अधिगम स्थानान्तरण का तात्पर्य है कि जब एक क्रिया का सीखना दूसरी क्रिया के सीखने में सहायक होता है तो उसे भावात्मक या विधेयात्मक स्थानान्तरण कहते हैं। मार्गन (1956) के अनुसार भावात्मक या विधेयात्मक अन्तरण उस अवस्था में उत्पन्न होता है जब पूर्वानुभव अधिगम में सहायक होता है।

उदाहरणार्थ-दाएँ हाथ से लिखना सीख लेने पर बाएँ हाथ से भी लिखने का कार्य थोड़ा बहुत किया जा सकता है। प्रयोगशालाओं में दर्पण चित्रांकन (Mirror drawing) पर प्रायः धनात्मक या विधेयात्मक अन्तरण पाया जाता है। विधेयात्मक अन्तरण का जीवन में अत्यधिक महत्व है। नवीन परिस्थिति में ऐसा अन्तरण अधिक सहायक होता है। बेबर, फेकनर, डक्कन, ग्रिग एवं किम्मेल, हिलगार्ड आदि ने इस प्रकार विशेष कार्य किया है।

2. निषेधात्मक या नकारात्मक (Negative) स्थानान्तरण:
जब एक क्रिया का सीखना दूसरी क्रिया के सीखने में अवरोध या बाधा उत्पन्न करता है तो उसे नकारात्मक या निषेधात्मक स्थानान्तरण कहते हैं। आसगुड (Osgood) के अनुसार अवरोधक अन्तरण की निषेधात्मक या नकारात्मक अधिगम अन्तरण है। बोरिंग तथा अन्य के अनुसार यदि पूर्व अनुभव नवीन कार्य पर बाधक प्रभाव डालता है तो अन्तरण निषेधात्मक कहलाता है।

यह कई कारणों से हो सकता है। इसमें अनुक्रिया स्पर्धा या विपरीत अनुक्रिया इत्यादि प्रमुख कारण हैं। उदाहरणार्थ-जब हम किसी कार्य को दायें हाथ से करने में अभ्यस्त हो जाते हैं और इसी क्रिया को जब बायें हाथ से करते हैं तो कार्य में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है तथा दुरूहता आ जाती है। यही नकारात्मक या निषेधात्मक अधिगम स्थानान्तरण है।

3. शून्य स्थानान्तरण (Zero Transfer):
कुछ ऐसी परिस्थितियां भी आती हैं जब एक क्रिया का सीखना किसी अन्य क्रिया में न भावात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है और न नकारात्मक, अर्थात् शून्य स्थानान्तरण की अवस्था में न तो पूर्वानुभाव सहायक होता है न बाधक। ऐसी स्थिति में अन्तरण प्रभावशून्य होगा।

अधिगम स्थानान्तरण के सिद्धान्त (Theories of Transfer of Learning):
अधिगम स्थानान्तरण के संदर्भ में निम्नलिखित सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है –

1. औपचारिक अनुशान का सिद्धान्त (Theory of FormalDiscipline):
शिक्षा-शास्त्रियों की विचारधारा काफी वर्षों तक यह थी मनुष्य का मस्तिष्क विभिन्न संकायों (Faculties) का स्वरूप है। इसमें स्मृति, विश्लेषण, निर्णय, इच्छा, कल्पना तथा तर्क आदि माने जाते हैं। इस विचारधारा को मानने वालों का मत था कि जिस प्रकार व्यायाम से शरीर की मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं उसी प्रकार प्रशिक्षण से मानसिक शक्तियाँ भी विकसित हो जाती हैं। उदाहरणार्थ, गणित के ज्ञान से व्यवसाय में तथा कविता के ज्ञान से वाक्य के विभिन्न रूपों के समझने में सहायता मिलती है। स्वयं तर्क करने की शक्ति से समस्या समाधान में सहायता मिलती है। बुडवर्थ तथा विलियम जेम्स ने इसकी आलोचना की।

2. समान अंशों का सिद्धान्त (Theory of Identical Elements):
इसके प्रतिपादक थार्नडाइक (Thorndike) महोदय ने बताया कि एक विषय के संस्कार उसी अनुपात में दूसरे विषय में स्थानान्तरित होते हैं जिस अनुपात में दोनों विषयों में समानता पायी जाती है। विद्यार्थियों को ऐसे विषयों का ज्ञान कराया जाना चाहिए जिसके ज्ञान से जीवन के समान क्षेत्रों में स्थानान्तरण हो सके।

स्पीयरमैन (Spearman) ने भी द्वि-तत्व सिद्धान्त का प्रतिपादन करके यह बताया कि सामान्य बुद्धि हर मनुष्य में एक-सी होती है जिसका उपयोग सामान्य क्रियाओं में होता है। सामान्य बुद्धि ही स्थानान्तरण का आधार है। विशिष्ट बुद्धि को जो मनुष्य में भिन्न होती है उसका उपयोग हर मनुष्य अपने ढंग से करता है। सामान्य विषयों जैसे भूगोल, इतिहास, गणित तथा साहित्य आदि में भी किसी का स्थानान्तरण करने में उसकी मात्रा कम या अधिक होगी।

3. सामान्य अनुभव का सिद्धान्त (Theory of Generalization of Experience):
चार्ल्स जुड (Charles Judd) इस सिद्धान्त के जन्मदाता हैं। इसे “सिद्धान्त द्वारा स्थानान्तरण” कहा जाता है। जिन सिद्धान्तों को व्यक्ति अपने अनुभवों द्वारा सीख लेता है उनका जीवन परिस्थितियों में स्थानान्तरण होता है। जिन सिद्धान्तों काके राइट ब्रदर्स (Wright Brothers) ने पतंग उड़ाने में सीखा था उन्हीं के आधार पर जहाज बनाने में सहायता प्राप्त की।

सीखने में स्थानान्तरण का महत्त्व

  1. स्थानान्तरण के महत्त्व को देखते हुए विद्यालयों में बालकों का पाठ्यक्रम ऐसा बनाया जाना चाहिए कि उनके भविष्य के जीवन से सम्बन्धित हो। पाठ्यक्रम में सामाजिक, शारीरिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, चरित्र-निर्माण आदि जैसे विषयों का समावेश हो सके तो अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।
  2. स्थानान्तरण से एक विषय के बाद दूसरा विषय सरलता से सीख लिया जाता है जिससे अधिक श्रम एवं समय की भविष्य में बचत होती है।
  3. स्थानान्तरण के महत्व को स्वीकार करके विद्यालय के पाठ्यक्रम से ऐसे विषयों को निकाला जा सकता है जिनका विद्यार्थी के जीवन में नकारात्मक स्थानान्तरण होता है।
  4. वातावरण प्रतिकूल है या अनुकूल इसका ध्यान प्रशिक्षण के दौरान महत्त्वपूर्ण होता है। प्रतिकूल वातावरण में स्थानान्तरण नहीं हो पाता है।
  5. शिक्षकों को स्थानान्तरण के महत्त्व को स्वीकार करके पाठ्यक्रम को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करना चाहिए जिससे कि विद्यार्थी की रुचि अध्ययन में लग सके।

विशिष्ट विषय में स्थानान्तरण:
आज की शिक्षा प्रणाली पर एक मुख्य आरोप यह लगाया जाता है कि वह जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करती है। गणित, बीजगणित, रेखागणित या विज्ञान हो, जो हम कक्षा में पढ़ते हैं, वह छात्रों के व्यावहारिक जीवन में अनुपयोगी होती है। थॉर्नडाइक ने विभिन्न विषयों के स्थानान्तरण पर प्रयोग किया। उसने हाईस्कूल के पाठ्यविषयों के आधार पर दसवीं, ग्यारहवीं तथा बारहवीं कक्षा के 13,500 छात्रों पर तर्क (Logic) के परीक्षणों का प्रयोग किया। उसने यह निष्कर्ष निकाला –

  1. विभिन्न विषयों के तुलनात्मक स्थानान्तरण की प्रतिशत में अन्तर कम होता है।
  2. विषय का स्थानान्तरण शिक्षण विधि पर निर्भर करता है।
  3. स्थानान्तरण इस बात पर निर्भर करता है कि प्राप्त ज्ञान का उपयोग किस सीमा तक हुआ है।

थार्नडाइक के इन विषयों से हम निम्नलिखित सुझावों को कार्यरूप में परिणत करके विशिष्ट विषयों में स्थानान्तरण की प्रक्रिया को लागू कर सकते हैं।

  1. बालकों को किसी विषय या समस्या के प्रत्येक अंग की जानकारी देनी चाहिए।
  2. बालकों को समय पर चिंतन तथा तर्क करने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए।
  3. बालकों को समस्या के विश्लेषण का अवसर देना चाहिए और पश्चात् सामान्य सिद्धान्तों के मध्य से स्थानान्तरण का अवसर देना चाहिए।
  4. गणित जैसे विषय को पर्याप्त सहायक सामग्री (Helping Material) के द्वारा पढ़ाया जाना चाहिए।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 6.
अधिगम सिद्धांत के अनुप्रयोग का वर्णन करें।
उत्तर:
1. बच्चों के पालन-पोषण में अनुप्रयोग:
सीखने के सिद्धांत का उपयोग बच्चों के पालन-पोषण में होता है, शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत का उपयोग कर बच्चों को सिखाया जा सकता है कि कौन-सी वस्तु खतरनाक है तथा उससे कैसे बचना चाहिए। नैमित्तिक अनुबंधन का उपयोग कर बच्चों के अनुचित व्यवहार को सुधारा जा सकता है।

2. विद्यालय में अनुप्रयोग:
विद्यालय में बच्चों के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू का विकास किया जाता है इस संबंध में शाब्दिक सीखना, प्रेक्षणात्मक सीखना, कौशल सीखना के नियम बहुत उपयोगी हैं शिक्षक को एक आदर्श परामर्शदाता के रूप आचरण करना पड़ता है जिससे वे विद्यार्थी के आदर्श बन सके। वांछित व्यवहार विकसित करने के लिए पुरस्कार का प्रयोग करना चाहिए। इससे छात्रों में विषय संबंधी पढ़ाई में तेजी आती है तथा उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी उन्नत होती है।

3. संगठन में अनुप्रयोग:
संगठन का अर्थ कार्यालय, उद्योग, संघ से है सीखने के सिद्धांत का प्रयोग कर कर्मचारी के संतोष, मनोबल पारस्परिक संबंध को उन्नत बनाया जाता है, जिससे अनुशासनहीनता घटती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है इसके लिए समय-समय पर प्रबंधन द्वारा आकर्षक पुरस्कार की व्यवस्था की जाती है। सीखने के सिद्धांत विशेषकर प्रोत्साहन एवं प्रवलन का प्रयोग सभी प्रकार के संगठन में स्वस्थ वातावरण एवं उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है।

4. चिकित्सात्मक उपचार में अनुप्रयोग:
सीखने के सिद्धांत का उपयोग मानसिक चिकित्सा के क्षेत्र में किया गया। मनोवैज्ञानिक समायोजन संबंधी समस्या अनावश्यक भय और गलत आदत, सुधारने में व्यवहार सुधार तकनीक का विकास किया।

भय दूर करने के लिए विलोप का, बच्चों और प्रौढ़ों के भय को दूर करने के लिए आदतावन, अत्यधिक भय से पीड़ित व्यक्ति के लिए क्रमिक-विकास, संवेदनीकरण, अवांछित आदत छुड़ाने के लिए विरूचि चिकित्सा, मानसिक रूप से घबराहट और अशांति अनुभव करने वाले के जैव प्रतिपादित दी जाती है। संक्षेप में मनोचिकित्सा की विभिन्न तकनीकों एवं विधियों में सीखने का सिद्धांत के लाभकारी अनुप्रयोग किए जाते हैं। स्पष्ट है कि सीखने के सिद्धांत एवं नियमों का प्रयोग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा है और इसके उत्पादवर्द्धक परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।

प्रश्न 7.
विभेदन के अर्थ एवं स्वरूप को बताएँ। विभेदन सीखने की विभिन्न विधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
अर्थ एवं स्वरूप (Meaning and Nature):
विभेदन (discrimination) सामान्यीकरण (generalization) का विपरीत होता है। अनुबन्धन के क्षेत्र के प्रयोगकर्ताओं ने अपने अध्ययनों में यह देखा है कि प्रशिक्षण की आरंभिक अवस्था में प्राणी CS तथा उससे मिलते-जुलते उद्दीपकों में अन्तर नहीं कर पाता है। फलतः वह CS के समान ही इन सभी उद्दीपकों के प्रति अनुक्रिया करता है जिसे सामान्यीकरण (generalization) कहा जाता है। जैसे-जैसे प्रशिक्षण आगे बढ़ता है, प्राणी में CS को अन्य समान उद्दीपकों से भिन्न करने की क्षमता विकसित हो. जाती है और वह अब सिर्फ CS के प्रति अनुक्रिया करता है अन्य समान उद्दीपकों के प्रति नहीं। इसे ही मनोवैज्ञानिकों ने विभेदन (discrimination) की संज्ञा दी है।

जैसे, मान लिया जाए कि पॉवलोवियन अनुबन्धन में 1000 Hz के आवाज को CS के रूप में उपयोग करके कुत्ता को उस पर लार स्राव करने की अनुक्रिया करना सिखलाया जाता है। इस प्रशिक्षण के प्रारंभिक अवस्था में कुत्ता 800 Hz तथा 1200 Hz पर भी वैसी ही अनुक्रिया करेगा। परंतु प्रशिक्षण की अंतिम अवस्था में वह सिर्फ 1000 Hz के आवाज पर ही लार स्राव की अनुक्रिया करेगा, अन्य उद्दीपकों जैसे 800 Hz एवं 1200 Hz पर नहीं करेगा क्योंकि कुत्ता इस अवस्था में CS तथा उन उद्दीपकों के बीच विभेदन करना सीख लेता है। स्पष्ट है कि विभेदन के स्वरूप के बारे में हमें निम्नांकित तथ्य मुख्य रूप से मिलता है –

  1. विभेदन की प्रक्रिया सामान्यीकरण की प्रक्रिया के विपरीत होती है।
  2. विभेदन में प्राणी CS के प्रति ही अनुक्रिया करता है अन्य किसी भी समान उद्दीपक के प्रति के प्रति नहीं।
  3. विभेदन की अवस्था में CS की विशिष्टता की पहचान स्पष्ट हो जाती है।

विभेदन सीखने की विधियाँ (Methods of Discrimination learning):
विभेदन सीखने का क्रमबद्ध प्रयोगशाला (systematic laboratory) अध्ययन करीब 1900 से प्रारम्भ हुआ है। तब से आज तक किये गये प्रयोगों एवं शोधों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि विभेदन सीखना अध्ययन करने के लिए निम्नांकित तीन तरह की विधियों का प्रतिपादन किया गया हैं –

  1. पृथक प्रयास विधियाँ (discrete trial methods)
  2. स्वचालित विधियाँ (automated methods)
  3. स्वतंत्र-क्रियाप्रसूत विधियाँ (free operant methods)

1. पृथक प्रयास विधियाँ (Discrete trial methods):
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस विधि में प्राणी दिये हुए उद्दीपकों के बीच विभेदन करना प्रत्येक प्रयास में किये गए पृथक अनुक्रियाओं के आधार पर सीखता है।

2. स्वचालित विधियाँ (Automated methods):
स्वचालित विधियों द्वारा भी विभेदन सीखने का अध्ययन किया गया है। इन विधियों की आवश्यकता इसलिए पड़ी, क्योंकि पृथक प्रयास विधि (discrete trial method) द्वारा विभेदन सीखना में काफी समय लगता था और साथ ही इनसे एक प्रयास से दूसरे प्रयास में अनुक्रिया परिवर्तनशीलता (response variability) होने लगती है जिसके कभी-कभी गंभीर परिणाम होते हैं।

स्वचालित विधि में ऐसी कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं। स्वचालित विधि में स्वचालित स्विचिंग उपकरण (automatic switching equipment) होते हैं और पशुओं को पूर्णतः एक पृथक परिस्थिति (isolated condition) में रखा जाता है। जैसे, चूहा को दो खिड़की या दो रास्तों के बीच चुनने के बजाय उसे दो लीवर या दो बटन में से किसी एक लीवर या बटन को दबाकर अनुक्रिया करना होता है।

3. स्वतंत्र-क्रियाप्रसूत विधियाँ (Free operant methods):
इस विधि में प्राणी के सामने उद्दीपकों, जिनके बीच विभेदन करना सीखना होता है, बारी-बारी से (successively) या कभी-कभी एक ही साथ (simultaneously) उपस्थित किया जाता है। प्राणी को उन उद्दीपनों को इधर-उधर करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।

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प्रश्न 8.
स्किनर के प्रवर्तन अनुकूलन या साधनात्मक अनुकूलन सिद्धान्त की आलोचना की व्याख्या करें।
उत्तर:
स्किनर ने सीखने के क्षेत्र में एक नए सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जो पॉवलव के सम्बन्ध प्रत्यावर्तन एवं थॉर्नडाइक के सम्बन्ध पर आधारित था। इस सिद्धान्त को प्रबन्धन अनुकूलन या साधनात्मक अनुकूलन के नाम से जानते हैं। उन्होंने अपने सिद्धान्त में अनुकूलन के बहुत-से ऐसे प्रत्ययों का व्यवहार किया, जो पॉवलव के सिद्धान्त से लिया गया था तथा थॉर्नडाइक के प्रभाव के नियम को अपने सिद्धान्त का आधार माना।

स्किनर ने पॉवलव तथा थॉर्नडाइक के सिद्धान्तं से कुछ कच्चे माल प्राप्त कर एक नए चीज का आविष्कार किया जो एक सफल सिद्धान्त साबित हुआ। उन्होंने क्लासिकल अनुबन्धन का विरोध किया और प्राणी और प्राणी की प्रतिक्रिया के प्रभाव को प्रधानता दी। उन्होंने व्यवहार की संज्ञानात्मक व्याख्या को अस्वीकार किया और व्यवहारवादी व्याख्या पर बल दिया।

स्किनर ने प्रत्यार्थी-व्यवहार और प्रवर्तन-व्यवहार में अन्तर बताया और कहा कि सीखने की परिस्थिति में प्राणी अपनी समस्याओं का समाधान प्रवर्तन व्यवहार के द्वारा सीखता है, प्रत्यार्थी व्यवहार के द्वारा नहीं। उन्होंने बताया कि प्रत्यार्थी-व्यवहार वह है जो उत्तेजना के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। जैसे-पॉवलव के प्रयोग में भोजन या घंटी की आवाज के बाद कुत्ते के मुँह से लार निकलता था। परन्तु प्रवर्तन-व्यवहार उसे कहते हैं, जिसे उत्पन्न किया जाता है, वहाँ उत्तेजना की प्रधानता होती है। परन्तु यहाँ उत्तेजना के साथ-साथ प्राणी की भी प्रधानता होती है। स्किनर ने कहा कि प्रवर्तन-व्यवहार साधनात्मक होता है। प्रभाव को उत्पन्न करने में प्राणी साधन का काम करता है।

स्किनर ने अपने सिद्धान्त की पुष्टि के लिए कई प्रयोगात्मक अध्ययन किया। उनका प्रयोग मुख्य रूप से चूहों और कबूतरों पर किया गया। इसके लिए उन्होंने एक विशेष प्रकार के बक्से का निर्माण किया, जिससे स्किनर बॉक्स के नाम से जानते हैं। स्किनर बॉक्स में एक छोटी-सी पीतल की कुंजी होती है, जिसकों दबाने से खाने की गोली निकल आती है। कुंजी का सम्बन्ध एक यंत्र से होता है, जिससे भूखे चूहे द्वारा किये गये प्रयासों का पता चलता है। स्किनर ने एक भूखे चूहे को स्किनर बॉक्स में बन्द किया।

उन्होंने देखा कि प्रारंभ में चूहा इधर-उधर घूमने लगा। इसी बीच उसका पंजा पीतल की कुंजी पर पड़ गया। कुंजी के दबते ही भोजन की गोली बाहर निकल गयी, जिसे चूहा खाकर संतुष्ट हुआ। इस प्रकार जब भी वह कुंजी को दबाता था, उसे भोजन की गोली मिल जाती थी। कई प्रयासों के बाद चूहे ने कुंजी को. दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया। स्किनर ने एक दूसरा प्रयोग कबूतरों पर किया। उसे भी एक बक्से में बन्द किया। बक्से की बनावट पहले वाले बक्से से भिन्न थी।

इसमें पीतल की कुंजी की जगह रौशन प्लास्टिक की कुंजी थी। उस रौशन प्लास्टिक की कुंजी पर कबूतर द्वारा चोंच मारने से खाने का दाना निकलता था। प्रारंभ में कबूतर ने इधर-उधर चोंच मारी, परन्तु उसे भोजन नहीं मिला। लेकिन प्लास्टिक की कुंजी पर चोंच मारते ही भोजन का दाना निकल आया। इस तरह कई प्रयासों के बाद कबूतर ने उस रौशन प्लास्टिक की कुंजी पर चोंच मारकर दाना प्राप्त करना सीख लिया।

स्किनर के उपर्युक्त प्रयोगों से स्पष्ट होता है कि प्राणी प्रवर्तन अनुकूलन के आधार पर ही सीखता है। उन्होंने प्रवर्तन अनुकूलन की कुछ विशेषताओं की चर्चा की है, जो निम्नलिखित हैं –

1. प्रवर्तन व्यवहार:
स्किनर ने दावा किया है कि सीखने की परिस्थिति में प्राणी का व्यवहार-प्रवर्तन होता है। इस बात की पुष्टि उन्होंने चूहे और कबूतरों के प्रयोग से सिद्ध कर दिया। प्रवर्तन से उस पर प्रभाव पड़ता है और प्राणी इस क्रिया को सीख लेता है।

2. साधनात्मक व्यवहार:
स्किनर ने शिक्षण में साधनात्मक व्यवहार पर भी बल दिया है और कहा है कि प्राणी का व्यवहार प्रबलन प्राप्त करने के लिए साधना का काम करता है। गलत व्यवहार करने पर प्रबलन नहीं मिलता है तथा सही व्यवहार करने पर प्रबलन प्राप्त होता है।

3. प्रबलन:
अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह स्किनर ने भी शिक्षण के लिए प्रबलन को आवश्यक माना है। उन्होंने दो प्रकार के प्रबलन की चर्चा की है, जिसे सकारात्मक प्रबलन तथा नकारात्मक प्रबलन के नाम से जानते हैं। सकारात्मक प्रबलन उसे कहते हैं, जिससे प्राणी की संतुष्टि मिलती है तथा उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है जबकि नकारात्मक प्रबलन से असंतुष्टि मिलती है। प्राणी उससे बचने का प्रयास करता है।

4. व्यवहार-सुसंगठन:
प्रबलन से प्राणी के व्यवहार को सुसंगठित किया जाता है। इस आधार पर पशुओं को जटिल कार्य सिखलाया जाता है। जैसे-स्किनर ने कबूतर को पहले बक्से से परिचय कराया और फिर प्लास्टिक कुंजी पर चोंच मारकर दाना प्राप्त करना सिखाया और अन्त में उस व्यवहार को सुगठित किया। इसलिए कबूतर को बाद में जब भी स्किनर बॉक्स में बन्द किया जाता था, वह तुरंत ही प्लास्टिक कुंजी दबाकर भोजन प्राप्त कर लेता था।

उन्होंने व्यवहार-सुगठन के पक्ष में और भी प्रयोग किये हैं। व्यवहार सुगठन केवल पशुओं के लिए ही उपयोगी नहीं, बल्कि मनुष्यों के लिए भी प्रभावशाली सिद्ध हुआ। ग्रीन स्पून ने मनुष्यों पर प्रयोग करके इसे प्रमाणित करने का प्रयास किया। इसी तरह वरप्लांक ने भी मनुष्य के व्यवहार के सुगठन को मौखिक अनुकूलन द्वारा प्रमाणित किया है।

5. उत्तेजना सामान्यीकरण:
जब कोई तटस्थ उत्तेजना किसी अनुक्रिया को उत्पन्न करने के लिए अनुकूलित हो जाती है, तो वह अनुक्रिया उस उत्तेजना से मिलती-जुलती उत्तेजनाओं के प्रति भी होने लगती है, जिसे उत्तेजना सामान्यीकरण कहते हैं। स्किनर ने अपने अध्ययनों में देखा कि जब चूहा कुंजी दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया, तो उससे कुछ भिन्न दूसरे बक्से में छोड़ा गया। यहाँ भी चूहे ने अपनी उसी प्रतिक्रिया को दुहरायी। ग्राइस एवं राल्ज ने भूल-भुलैया के आधार पर उत्तेजना सामान्यीकरण को सिद्ध किया।

6. उत्तेजना-विभेद:
उत्तेजना-विभेद का अर्थ हुआ कि जब प्राणी एक परिस्थिति में कोई व्यवहार सीख लेता है, तो उस परिस्थिति से भिन्न परिस्थितियों में उसे नहीं दुहराता है। स्किनर ने कबूतर को स्किनर-बॉक्स में दाना प्राप्त करना सिखाया। उसके बाद उस बक्से से भिन्न दूसरे बक्से में कबूतर को रखा तो वहाँ उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। ग्राइस एवं राल्ज के अध्ययन से भी यह बात प्रमाणित हो जाती है।

7. विलोप:
पॉवलव के क्लासिकल अनुबन्धन की तरह इसमें भी विलोप की विशेषता पायी जाती है। विलोप से तात्पर्य यह है कि प्राणी उत्तेजना के प्रति व्यवहार करना सीख ले और उसे प्रबलन नहीं मिले, तो धीरे-धीरे व्यवहार समाप्त हो जाता है। स्किनर ने देखा कि चूहों को कुंजी दबाने के बाद भी कई बार भोजन नहीं मिला, तो उसने कुंजी को दबाना छोड़ दिया, इसे ही विलोप कहते हैं।

8. स्वतः पुनाप्ति:
अनुबन्धन होने के बाद यदि उसे प्रबलन नहीं दिया जाता है, तो धीरे-धीरे अनुबंधित अनुक्रिया को प्राणी भूल जाता है। स्किनर ने देखा कि भोजन के अभाव में चूहे ने कुंजी दबाना छोड़ दिया, लेकिन कुछ समय बाद उसने स्वतः कुंजी को दबाया। इस तरह स्किनर का शिक्षण-सिद्धान्त एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है।

उन्होंने वाटसन तथा गथरी की तरह शिक्षण से सम्बन्धित अमूर्त विषयों के व्यवहारिक पक्ष पर बल दिया है। उन्होंने शिक्षण में प्रवर्तन व्यवहार को आवश्यक माना तथा अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह प्रबलन को भी आवश्यक माना है। बच्चों के समाजीकरण की व्याख्या करने में भी यह सिद्धान्त सफल है। व्यवहार परिमार्जन की दिशा में इस सिद्धान्त का कोई मुकाबला नहीं है। परन्तु इन गुणों के बावजूद स्किनर का सिद्धान्त दोषों से मुक्त नहीं है। इस सिद्धान्त के निम्नलिखित प्रमुख दोष हैं –

दोष (Demerits):

1. स्किनर ने सीखने के लिए प्रबलन को आवश्यक माना है, परन्तु टॉलमैन ने प्रबलन को आवश्यक नहीं माना। उन्होंने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर सिद्ध कर दिया है कि बिना प्रबलन के भी प्राणी सीख सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, जिसे ‘लेटेंट शिक्षण’ कहते हैं।

2. स्किनर ने प्रवर्तन तथा प्रत्यार्थी:
व्यवहारों के बीच अन्तर माना है, परन्तु मिलर और टेरिस उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रवर्तन-व्यवहार और प्रत्यार्थी-व्यवहार के बीच सीमा-रेखा खींचना मुश्किल हैं।

3. इस सिद्धान्त पर एक आरोप यह लगाया जाता है कि इसमें परिधीय यंत्रों पर बल दिया गया है तथा केन्द्रीय यंत्रों को छोड़ दिया गया है, जबकि केन्द्रीय यन्त्रों की शिक्षण में प्रधानता होती है।

4. स्किनर ने सीखने तथा सम्पादन के अन्तर की और ध्यान नहीं दिया है। उन्होंने उत्तेजना प्रतिक्रिया सम्बन्धन को प्रबलन का परिणाम माना, जबकि बन्धुश ने कहा कि सम्भव है कि एक बालक अपने विषय को अच्छी तरह जानता हो, परन्तु प्रबलन के अभाव में उसे सम्पादन के रूप में व्यक्त न कर सके। प्रबलन से सम्पादन प्रभावित होता है, शिक्षण नहीं।

5. कौसकी ने इस सिद्धान्त की समीक्षा करते हुए तीन बातों का उल्लेख किया है और कहा कि स्किनर ने प्राणी की आन्तरिक अवस्था की ओर ध्यान नहीं दिया है, जबकि उत्तेजना प्रतिक्रिया सम्बन्ध में इसका बहुत बड़ा हाथ होता है।

दूसरी बात उन्होंने कहा कि प्रत्ययों का मूल्य सर्जनात्मक निर्देशन पर निर्भर करता है तथा तीसरी की स्किनर ने अपने चूहे को स्किनर बॉक्स के भीतर प्राप्त प्रत्ययों का बहिर्षण करके मानव के मानसिक जीवन की समस्याओं की व्याख्या करने का असफल प्रयास किया है। स्किनर द्वारा प्रस्तुत बहिर्षण या तो गलत है या लाक्षणिक दोषों से पीड़ित है। इस तरह, हम देखते हैं कि स्किनर के सिद्धान्त में बहुत सारे दोष हैं। परन्तु इसके बावजूद इसका व्यावहारिक महत्व कम नहीं हुआ। शिक्षण के क्षेत्र में आज भी इस सिद्धान्त की अलग मान्यता है।

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प्रश्न 9.
सीखना या शिक्षण के प्रयत्न एवं भूल सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रयत्न एवं भूल सिद्धांत सीखने का एक प्रमुख सिद्धांत है जिसका प्रतिपादन ई. एल. थार्नडाइक (E. L. Thorndike) द्वारा किया गया। बिल्लियों, चूहों, मुर्गियों आदि पर प्रयोग करके थार्नडाइक ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धांत का सारतत्त्व यह है कि जब प्राणी किसी कार्य या कौशल को सीखना चाहता है तब वह प्रयत्न करता है और इस क्रम में उससे भूलें (erors) होती हैं।

जैसे-जैसे प्रयत्नों या प्रयासों की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे भूलों या त्रुटियों में कमी आती जाती है। एक ऐसा समय आता है जब बिना कोई त्रुटि या भूल किए ही प्राणी उस कौशल या अनुक्रिया को करना सीख लेता है। थार्नडाइक का यह सिद्धांत उनके द्वारा किए गए कुछ प्रयोगों पर आधृत है। इन प्रयोगों में निम्नांकित दो तरह के प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

1. पहेली बक्स की समस्या-संबंधी प्रयोग (Experiment relating to puzzle-box problem):
यह प्रयोग एक भूखी बिल्ली पर किया गया जिससे पहले बक्से (puzzle box) में रख दिया जाता है। पहेली बक्से के सामने बाहर में एक मछली का टुकड़ा रख दिया गया जिसे बिल्ली देख रही थी।

बिल्ली के सामने यह समस्या थी कि वह किस तरह पहेली बक्से से निकलकर मछली खाकर अपनी भूख मिटा ले। बक्से के अन्दर बंद होते ही बिल्ली बाहर निकलने के लिए प्रयत्न अर्थात् उछल-कूद करने लगी। वह भूख से प्रेरित थी जिसके फलस्वरूप वह पहेली बक्से को दाँत से काटती, कभी अपने पंजे से नोचती-खसोटती थी।
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चित्र: थार्नडाइक का पहेली बॉक्स

इन व्यर्थ प्रयासों के दौरान उसका पंजा बक्से के एक बटन या सिटकिनी पर पड़ जाता है जिससे बक्से का दरवाजा खुल गया और बिल्ली बाहर निकलकर मछली खा गई। फिर बाद में उसी बिल्ली को उसे बक्से में रखा गया तो देखा गया कि इस बारी में भी बिल्ली द्वारा कुछ उछल-कूद की व्यर्थ क्रियाएँ हुईं, परंतु पहले की अपेक्षा कम हुई।

बिल्ली थोड़ी देर तक छल-कूद करने के बाद ही दरवाजा खोल सकने में समर्थ हो गई । इस प्रक्रिया को जब कई दिनों तक दोहराया गया तब देखा गया कि प्रयास बढ़ने के साथ-ही-साथ त्रुटियों में काफी कमी आई और अंत में एक समय ऐसा भी आया कि बिल्ली को जैसे ही बक्से में रखा गया, वह सीधे सिटकिनी या बटन दबाकर दरवाजा खोल लेती थी और बाहर आकर मछली खा लेती थी। इस तरह, बिना कोई त्रुटि किए कम-से-कम समय में बिल्ली दरवाजा खोलना सीख गयी।

2. भूल-भूलैया सीखने की समस्या-संबंधी प्रयोग (Experiment relating to mazeleaming problem):
इस प्रयोग में थार्नडाइक ने एक भूखे चूहे को भूल-भूलैया में रखा। भूल-भूलैया (maze) एक ऐसा उपकरण होता है जिसमें लक्ष्य तक पहुँचने का एक ही रास्ता होता है। परंतु अंधपथ (blind ways) कई होते हैं। भुल-भुलैया के लक्ष्य स्थान पर भोजन रख दिया गया। भूखे चूहे को भूल-भूलैया के प्रवेश द्वार पर छोड़ दिया जाता था।

यह देखा गया कि जब पहली बार भूखे चूहे को भूल-भुलैया में छोड़ा गया तब वह बहुत देर तक अंधपथों में भटकता रहा और काफी देर के बाद संयोग से सही रास्ता अपनाकर लक्ष्य स्थान पर पहुँच गया, लेकिन, जब कई बार उस चूहे को भूलभुलैया में छोड़ा गया तब देखा गया कि अंधपथ में जाने की व्यर्थ क्रियाओं में काफी कमी आती गई और वह धीरे-धीरे अंधपथ का त्याग करके सही मार्ग में जाना सीख लिया।
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चित्र: भूल-भुलैया का प्रयोग चित्र

उपर्युक्त दोनों प्रयोगों से स्पष्ट है कि प्राणी किसी कार्य को सीखने के लिए बार-बार प्रयल करता है, उसमें उससे अनेक भूलें (errors) होती हैं। अभ्यास जारी रहने से भूलने की संख्या में धीरे-धीरे कमी आती है और अंत में वह कार्य को बिना किसी तरह की त्रुटि किए ही करना सीख जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार सीखने की पूरी प्रक्रिया में निम्नांकित छह अवस्थाएँ होती हैं –

(a) प्रणोद (Drive):
सीखने के लिए प्रणोद (drive) आवश्यक है, क्योंकि यह प्राणी को क्रियाशील या प्रयत्नशील बनाता है। उपर्युक्त प्रयोगों में बिल्ली तथा चूहा में भूख प्रणोद का एक उदाहरण है।

(b) प्रणोद की तुष्टि में बाधा (Interference in satisfaction of drive):
प्रणोद की तुष्टि में जब बाधा पहुँचती है तब इससे प्राणी में क्रियाशीलता बढ़ती है और वह समस्या को सुलझाने का प्रयत्न करता है।

(c) यादृच्छिक क्रियाएँ (Random activities):
समस्या को सुलझाने के पहले प्राणी कई तरह की यादृचिछक क्रियाएँ या व्यर्थ क्रियाएँ करता है। बिल्ली द्वारा उछलना, कूदना, नोचना, खसोटना ऐसी ही क्रियाओं के उदाहरण है।

(d) आकस्मिक सफलता (Accidental success):
व्यर्थ की क्रियाएँ या यादृच्छिक क्रियाएँ करते समय मात्र संयोग से ही प्राणी सही अनुक्रिया कर देता है जिसे आकस्मिक सफलता कहा जाता है। बिल्ली द्वारा उछल-कूद करते समय संयोगवश सिटकनी दब जाना एक आकस्मिक सफलता का उदाहरण है।

(e) सही अनुक्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition of correct response):
प्रथम बार सफलता प्राप्त कर लेने के बाद प्राणी धीरे-धीरे यादृच्छिक क्रियाओं का परित्याग करता चला जाता है तथा सही अनुक्रिया को दोहराता जाता है।

(f) सही अनुक्रिया स्थायीकरण (Fixation of correct response):
अंतिम अवस्था में प्राणी में सही अनुक्रिया का स्थायीकरण होता है जिसका परिणाम यह होता है कि प्राणी बिना कोई त्रुटि किए ही सही अनुक्रिया कर पाता है।

आलोचनायें (Criticisms):
इस सिद्धांत की कुछ प्रमुख आलोचनाएँ निम्नांकित हैं –

(a) थार्नडाइक ने सीखने की प्रक्रिया को एक यांत्रिक प्रक्रिया (mechanical process) माना है जिसका मतलब यह हुआ कि प्राणी यदि किसी अनुक्रिया को सीखना प्रारंभ करता है तब शुरू में यह यादृच्छिक क्रियाएँ या व्यर्थ क्रियाएँ करता है। धीरे-धीरे अभ्यास से ऐसी त्रुटियाँ समाप्त हो जाती हैं और वह सही अनुक्रिया को करना सीख लेता है। आलोचकों ने यह स्पष्ट किया है कि प्रत्येक अनुक्रिया को सीखने में इस तरह की निश्चित एवं यांत्रिक क्रियाएँ नहीं होती हैं।

(b) कुछ मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि प्रयत्न तथा भूल के सिद्धान्त के आधार पर सभी प्रकार के सीखना की व्याख्या नहीं की जा सकती। जहाँ तक सरल क्रियाओं जैसे टाइप सीखन, साइकिल चलाना सीखना आदि का प्रश्न है, वह तो अभ्यास एवं प्रभाव के नियमों के सहारे सीखा जा सकता है, लेकिन जटिल क्रियाओं को मात्र अभ्यास द्वारा सीखना संभव नहीं है। इसके लिए सूझ (insight) की आवश्यकता पड़ती है जिसकी चर्चा तक थार्नडाइक ने नहीं की।

(c) यह सिद्धांत मूलतः पशुओं, जैसे-बिल्ली तथा चूहों पर किए गए प्रयोगों पर आधारित है। अत: इसकी बहुत-सी बातें मानव सीखना के लिए उपयुक्त नहीं हैं। बिल्ली भले की पहले बक्से के भीतर से कैसे निकला जाए, नहीं जानती पर मनुष्य तो किसी भी परिस्थिति को अच्छी तरह समझकर की कोई अनुक्रिया करता है। जो भी हो, इन आलोचनाओं के बावजूद थार्नडाइक का यह सिद्धांत अपना एक अलग स्थान रखता है।

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प्रश्न 10.
शिक्षण वक्र क्या है? इसके प्रकार और उसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षण वक्र एक प्रकार का ग्राफ है जो सीखने में हुए विकास को दर्शाता है। इसे एक झलक देखने पर ही सीखने से व्यवहार में हुए परिवर्तनों की झांकी मिलती है। थार्नडाइक ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह बतलाया कि सीखने में जैसे-जैसे प्रयास या अभ्यास की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे अशुद्धियों की संख्या कम होती जाती है। इसमें लगे समय में कमी आती जाती है। अन्त में व्यक्ति कम-से-कम समय में बिना कोई गलती किए सही प्रक्रिया सीख जाता है। जहाँ तक शिक्षण वक्र के विभिन्न प्रकारों का प्रश्न है, इसके निम्नलिखित प्रकारों की व्याख्या की जा सकती है –

(क) भूल वक्र (Error-graph):
किसी भी सीखना-वक्र में दो रेखायें होती हैं-उदग्र रेखा तथा आधार रेखा।
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रेखा पर स्वतंत्र चर लिखा जाता है। स्वतंत्र चर का अर्थ यहाँ अभ्यास या प्रयत्न है। उदग्र रेखा पर आश्रित चर लिखा जाता है। यहाँ आश्रित चर का तात्पर्य भूल, समय या सीखने की मात्रा से है। जब आधार-रेखा पर प्रयत्न तथा उदग्र रेखा पर भूल अंकित करके वक्र बनाया जाता है तो इस वक्र को भूल-वक्र कहा जाता है। यह वक्र उदग्र रेखा के सिरे से शुरू होकर कभी दाहिने तरफ जाता है और कभी आधार रेखा से मिल भी जाता है। ऐसा तब होता है जबकि अंतिम प्रयत्न में भूल शून्य प्रयत्न हो जाता है।

(ख) समय वक्र (Time-graph):
जब आधार रेखा पर अभ्यास यानी प्रयत्न और उदग्र रेखा पर अभ्यास यानी प्रयत्न और उदग्र रेखा पर समय अंकित करने वक्र बनाया जाता है तो इसे समय-वक्र कहा जाता है। यह वक्र भी भूल-वक्र की तरह उदग्र रेखा के सिरे से आरम्भ होकर दाहिने ओर आधार की तरफ जाती है। परन्तु, यह आधार-रेखा से कभी भी नहीं मिलता है। कारण, अभ्यास से समय चाहे जितना भी कम हो जाए, किन्तु शून्य नहीं होता।
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(ग) उत्पादन वक्र:
जब किसी क्रिया को अभ्यास के द्वारा सीखने का प्रयास किया जाता है तो प्रारंभ में काम की मात्रा या उत्पादन कम होता है। जैसे-जैसे अभ्यास की संख्या बढ़ती जाएगी, उत्पादन की गति भी बढ़ती जाएगी। उत्पादन की इस बढ़ती हुई मात्रा को ग्राफ द्वारा दर्शाया जाए तो इससे उत्पादन वक्र प्राप्त होता है। इस प्रकार का वक्र नीचे से दाहिने ऊपर उठता जाता है। यह उठना एक सीमा तक होता है।

इस तरह शिक्षण वक्र के उपर्युक्त प्रकारों का उल्लेख किया जा सकता है। इसी प्रकार इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ भी होती हैं, जो इस प्रकार हैं –

1. प्रारंभिक चढ़ाव:
सीखना प्रारंभ करने के बाद व्यक्ति विषया या क्रिया से पूर्ण परिचित हो जाता है जब उसमें सीखने की प्रेरणा जागृत होती है और वह पूरी लगन, उत्साह, अभिरुचि तथा उत्सुकता के साथ विषय को सीखने लगता है। इससे शिक्षण वक्र में चढ़ाव देखा जाता है। इसे ही प्रारंभिक चढ़ाव कहा जाता है। शिक्षण वक्र की यह पहली विशेषता है।

2. मध्यवर्ती चढ़ाव:
जब प्रारंभिक चढ़ाव के बाद व्यक्ति की अभिरुचि, लगन, उत्साह और उत्सुकता में कमी आने लगती है तब शिक्षण वक्र में उतार आने लगता है। लेकिन व्यक्ति अपना प्रयास जारी रखता है और जब फिर उसमें उत्साह, लगन, उत्सुकता आने लगती है तब शिक्षण वक्र में चढ़ाव आने लगता है इस प्रकार, शिक्षण-वक्र में चढ़ाव ऊपर देखा जाता है। इसे मध्यवर्ती चढ़ाव कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की दूसरी विशेषता हुई।

3. अंतिम चढ़ाव:
जब सीखने वाले व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि अब विषय समाप्त होने वाला है तो वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति और लगन के साथ विषय या क्रिया को समाप्त करने की कोशिश करता है जिससे शिक्षण-वक्र में चढ़ाव. आ जाता है। इसे ही अंतिम चढ़ाव कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की तीसरी विशेषता हुई।

4. पठार:
सीखने की अवधि के बीच कभी-कभी शिक्षण वक्र की यह स्थिति हो जाती है कि व्यक्ति को ऐसा प्रतीत होने लगता है कि सीखने में अब आगे प्रगति नहीं हो पाएगी। शिक्षण-वक्र आधार के समानान्तर हो जाता है यानी उत्पादन वृद्धि रुक जाती है। लेकिन विशेष प्रयास के बाद उसके कार्य में प्रगति देखी जाती है। शिक्षण-वक्र की इस स्थिति को सीखने में पठार कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की चौथी विशेषता है।

5. दैहिक सीमा:
सीखने की अवधि में एक ऐसी भी अवस्था आती है जब वक्र का चढ़ाव बिल्कुल रुक जाता है। लाख कोशिश करने के बाद भी वक्र का चढ़ाव आगे नहीं बढ़ता है, तो इसे दैहिक सीमा कहा जाता है। जैसे- भूल-वक्र में जब अशुद्धियाँ एकदम नहीं होती हैं तब भूल-वक्र में कोई परिवर्तन की गुंजाइश नहीं रह पाती है।

ठीक इसी प्रकार समय-वक्र में जब व्यक्ति ऐसी सीमा पर पहुँच जाता है, जहाँ से आगे तीव्र गति से क्रिया करना संभव नहीं रह जाता है, तो समय-वक्र में भी कोई परिवर्तन नहीं हो पाता है। इसे दैहिक सीमा कहा जाता है। फिर उत्पादन-वक्र में जब व्यक्ति कुशलता की सीमा पर पहुँच जाता है तो वक्र के ऊपर उठने का प्रश्न ही नहीं उठता है। यह दैहिक सीमा का परिचायक है।

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प्रश्न 11.
अधिगम अशक्तता किसे कहते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों का उल्लेख करें। क्या अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का इलाज संभव है? यदि हाँ, तो कैसे?
उत्तर:
परिचय:
केन्द्रीय तंत्रिका में उत्पन्न विसंगतियों के कारण किसी व्यक्ति (खासकर बच्चे) में अक्षमता प्रकट करने से संबंधित विकार अधिगम अशक्तता माने जाते हैं जिसके कारण व्यक्ति को पढ़ने, लिखने, गणित के प्रश्नों को हल करने में बहुत ही कठिनाई होती है। बच्चों में पाई जानेवाली अधिगम अशक्तता के कारण बच्चे श्रेष्ठ बुद्धि वाले बच्चों की तुलना में सीखने की प्रवृत्ति, आत्म सम्मान, पेशा, सामाजिक परिवेश के बारे में समुचित निर्णय क्षमता प्रकट नहीं कर सकते हैं। ऐसे बच्चों के संवेदी प्रेरक तंत्र दोषी माने जाते हैं।

अधिगम अशक्तता के लक्षण-बच्चों में बुद्धि, अभिप्रेरण तथा अधिगम के लिए किया जाने वाला परिश्रम निरर्थक की श्रेणी में आता है। इस तरह के बच्चों में निम्नलिखित लक्षण पाये जाते हैं –

  1. अधिगम अशक्तता वाले बच्चों में अक्षरों या शब्दों का सही ज्ञान नहीं होता है। वे अपनी भावना को लिखकर नहीं बता पाते हैं। वे पढ़कर कुछ बतलाने की स्थिति में भी नहीं होते।
  2. अशक्तता के शिकार बच्चे सीखने के लिए भोजन बनाने या सामान्य व्यवहार करनेवाले बच्चे के रूप में कार्य करने की विधि खोजने में असमर्थ होते हैं।
  3. अधिगम अशक्तता से पीड़ित बच्चे किसी निर्धारित विषय पर देर तक ध्यान केन्द्रित करके चिंतन की अवस्था में नहीं रह पाते हैं।
  4. घरेलू सामग्रियों के स्थान को अनियमित ढंग से बदल देना इन बच्चों का विशिष्ट लक्षण है।
  5. इनमें स्थान और समय की समझदारी का अभाव होता है ये अच्छे अवसर पाकर भी उसका सदुपयोग नहीं कर पाते हैं।
  6. इस श्रेणी के बच्चों का पेशीय समन्वय तथा हस्त निपुणता अपेक्षाकृत निम्न श्रेणी का होता है। ये शारीरिक संतुलन का अभाव, दरवाजे को खोलने की कला से अनभिज्ञ, साइकिल चलाने में अक्षम जैसी जानकारियों से दूर होते हैं।
  7. ये अभिभावकों के मौखिक अनुदेशों को समझने और अनुसरण करने में असफल होते हैं।
  8. इन्हें सामाजिक संबंधों का मूल्याकंन करके उचित व्यवहार करने में कठिनाई होती है।
  9. अधिगम अशक्तता वाले बच्चों में प्रात्यहित विकार पाए जाते हैं जिसके कारण ये सुनने, पढ़ने, छूने तथा गति से संबंधित संकेतों के अर्थ नहीं समझ पाते हैं।
  10. अक्षरों को मिलाकर सार्थक शब्द की रचना करने में ये लाचार होते हैं।
  11. इन्हें अक्षरों को पहचानने में भी कठिनाई होती है क्योंकि ये समान रचना वाले अक्षरों (ट-ठ, प-फ) में अन्तर समझने में लाचार बना देते हैं।

उपचार:
अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का उपचार संभव है। उपचारी अध्यापन विधि तथा मनोवैज्ञानिक शिक्षण प्रणाली के प्रयोग से उनमें पहले जाने अधिकांश लक्षणों को दूर किए जा सकते हैं। इनके साक्ष सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार तथा क्षमता को प्रोत्साहन देते हुए भरपूर प्यार की स्थिति प्रकट करना हितकर परिणाम देते हैं। इस श्रेणी के बच्चे प्यार और प्रोत्साहन के भूखे होते हैं। इन्हें प्रेरक बल के द्वारा ऊँचाई पर पहुँचाया जा सकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अधिक लंबे विषय के अधिगम के लिए कौन विधि अधिक उपयुक्त है?
(a) पावलव
(b) थॉर्नडाइक
(c) कोहलर
(d) स्कीनर
उत्तर:
(a) पावलव

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प्रश्न 2.
अधिगम पर कोहलर ने अपना प्रयोग किस पशु पर किया:
(a) चूहा
(b) खरगोश
(c) चिम्पैंजी
(d) कुत्ता
उत्तर:
(c) चिम्पैंजी

प्रश्न 3.
पावलव महोदय ने अधिगम से सम्बन्धित प्रयोग किस जानवर पर किया था?
(a) बिल्ली
(b) कुत्ता
(c) चूहा
(d) वनमानुष
उत्तर:
(b) कुत्ता

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प्रश्न 4.
अधिगम का अध्ययन सर्वप्रथम किसने आरंभ किया?
(a) पावलव
(b) थॉर्नडाईक
(c) कोहलर
(d) स्कीनर
उत्तर:
(a) पावलव