Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 5 बिहार : कृषि एवं वन संसाधन

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : संसाधन एवं उपयोग Chapter 5 बिहार : कृषि एवं वन संसाधन Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Geography Solutions Chapter 5 बिहार : कृषि एवं वन संसाधन

Bihar Board Class 10 Geography बिहार : कृषि एवं वन संसाधन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

बिहार कृषि एवं वन संसाधन Bihar Board Class 10 प्रश्न 1.
बिहार में कितने प्रतिशत क्षेत्र में खेती की जाती है?
(क) 50
(ख) 60
(ग) 80
(घ) 36.5
उत्तर-
(ख) 60

Bihar Se Odisha Kab Alag Hua Bihar Board Class 10 प्रश्न 2.
राज्य की कितनी प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्य में लगी हुई है ?
(क) 805
(ख) 75
(ग) 65
(घ) 86
उत्तर-
(क) 80

Bihar Board Class 10th Geography Solution प्रश्न 3.
इनमें से कौन गन्ना उत्पादक जिला नहीं है?
(क) दरभंगा
(ख) पश्चिमी चम्पारण
(ग) मुजफ्फरपुर
(घ) रोहतास
उत्तर-
(घ) रोहतास

Geography Class 10 Bihar Board प्रश्न 4.
बिहार के जूट उत्पादन में-
(क) वृद्धि हो रही है
(ख) गिरावट हो रहा है
(ग) स्थिर है
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ख) गिरावट हो रहा है

Bihar Board Class 10th Geography प्रश्न 5.
तम्बाकू उत्पादन क्षेत्र है-
(क) गंगा का उत्तरी मैदान
(ख) गंगा का दक्षिणी मैदान
(ग) हिमालय की तराई
(घ) गंगा का दियारा
उत्तर-
(घ) गंगा का दियारा

Bihar Board Solution Class 10 Social Science प्रश्न 6.
कोसी नदी घाटी परियोजना का आरम्भ हुआ-
(क) 1950 में
(ख) 1948 में
(ग) 1952 में
(घ) 1954 में
उत्तर-
(घ) 1954 में

Bihar Board Class 10 History Solution प्रश्न 7.
गण्डक परियोजना का निर्माण किस स्थान पर हुआ?
(क) बेतिया
(ख) वाल्मीकिनगर
(ग) मोतिहारी
(घ) छपरा
उत्तर-
(ख) वाल्मीकिनगर

Bihar Board Class 10th Social Science Solution प्रश्न 8.
बिहार में नहरों द्वारा सर्वाधिक सिंचाई किस जिले में होती है ?
(क) रोहतास
(ख) सिवान
(ग) गया
(घ) पश्चिमी चम्पारण
उत्तर-
(क) रोहतास

Bihar Board Class 10 History Notes Pdf प्रश्न 9.
बिहार में कुल कितने अधिसूचित क्षेत्र में वन का विस्तार है ?
(क) 6374 किमी०.
(ख) 6370 किमी०.
(ग) 6380 किमी०
(घ) 6350 किमी०.
उत्तर-
(क) 6374 किमी०.

Bihar Board Class 10 Social Science Solution प्रश्न 10.
कुशेश्वर स्थान किस जिला में स्थित है ?
(क) वैशाली में
(ख) दरभंगा में
(ग) बेगुसराय में
(घ) भागलपुर में
उत्तर-
(ख) दरभंगा में

Bihar Board Class 10 History Notes In Hindi प्रश्न 11.
कॉवर झील स्थित है.-
(क) दरभंगा जिला में
(ख) भागलपुर जिला में
(ग) बेगूसराय जिला में
(घ) मुजफ्फरपुर जिला में ।
उत्तर-
(ग) बेगूसराय जिला में

History Class 10 Bihar Board प्रश्न 12.
संजय गांधी जैविक उद्यान किस नगर में स्थित हैं ?
(क) राजगीर
(ख) बोधगया
(ग) बिहारशरीफ
(घ) पटना
उत्तर-
(घ) पटना

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

Bihar Board Social Science Book Class 10 प्रश्न 1.
बिहार में धान की फसल के लिए उपयुक्त भौगोलिक दशाओं का उल्लेख करें।
उत्तर-
(i) 20-27° से. ग्रे. तापमान (ii).75-200 सेमी. वर्षा (iii) जलोढ़ मिट्टी (iv) समतल तथा नीची जमीन।

Bihar Board Class 10 Social Science प्रश्न 2.
बिहार में दलहन के उत्पादन एवं वितरण का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर-
बिहार में दलहन फसलों में चना, मसूर, खेसारी, मटर, मूंग, अरहर, उरद तथा कुरथी प्रमुख हैं।
दलहन उत्पादन में पटना जिला का स्थान सबसे आगे है, जबकि औरंगाबाद और कैमूर क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर है।

Bihar Board History Solution Class 10 प्रश्न 3.
कृषि बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर-
बिहार एक कृषिप्रधान राज्य है। यहाँ की 80 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। झारखंड के अलग हो जाने के बाद बिहार के लोगों के लिए कृषि का महत्व अधिक बढ़ गया है। कृषि के अलावे यहाँ अन्य रोजगार के साधनों का अभाव है। अतः कृषि बिहार की अर्थव्यवस्था का आधार है।

Bihar Board 10th Social Science Solution प्रश्न 4.
नदी घाटी परियोजनाओं के मुख्य उद्देश्यों को लिखें।
उत्तर-

  • पनबिजली का उत्पादन करना।
  • बाढ़ एवं मृदा अपरदन का नियंत्रण करना।
  • सिंचाई की सुविधा का विकास करना।
  • पर्यटन स्थलों का विकास करना।
  • मत्स्य पालन करना।

Bihar Board Geography Solution Class 10 प्रश्न 5.
बिहार के नहरों के विकास से सम्बंधित समस्याओं को लिखिए।
उत्तर-

  • जल का असमान वितरण।
  • पूजी का अभाव।
  • धरातल का स्वरूप।

प्रश्न 6.
बिहार के किस भाग में सिंचाई की आवश्यकता है और क्यों?
उत्तर-
बिहार के दक्षिणी भाग में सिंचाई की आवश्यकता अधिक है क्योंकि यहाँ नहरों का विकास उतना अधिक नहीं हुआ है।

प्रश्न 7.
बिहार में वनों के अभाव के चार कारणों को लिखिए।
उत्तर-

  • विभाजन के बाद अधिकतर वनाच्छादित क्षेत्र का झारखण्ड में चला जाना।
  • कृषि एवं निर्मित क्षेत्रों के विस्तार के कारण वनों का विनाश।
  • वनों के महत्व से संबंधित जागरुकता का अभाव।
  • वनों की अंधाधुंध कटाई।

प्रश्न 8.
संक्षेप में शष्क पतझड़ वन की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
बिहार पूर्वी मध्यवर्ती भाग तथा दक्षिणी-पश्चिमी पहाड़ी भागों में इस प्रकार के वनों का विस्तार है। कैमूर और रोहतास जिले में इसका अधिक विस्तार है। यहाँ के प्रमुख वृक्ष खैर, बहेड़ा, पलास, महुआ, अमलतास, शीशम, नीम, हरे आदि हैं।

प्रश्न 9.
बिहार में ऐसे जिलों का नाम लिखिए जहाँ वन विस्तार एक प्रतिशत से भी कम है।
उत्तर-
सिवान, सारण, भोजपुर, बक्सर, पटना, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, मोतीहारी, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगुसराय, मधेपुरा, खगड़िया, नालन्दा में एक प्रतिशत से भी कम वन मिलते हैं।

प्रश्न 10.
बिहार में स्थित राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्यों की संख्या बतायें और दो अभयारण्यों की चर्चा करें।
उत्तर-
यहाँ 14 अभयारण्य एवं एक एकलौता राष्ट्रीय उद्यान है। संजय गांधी जैविक उद्यान एकलौता राष्ट्रीय उद्यान है।
बेगुसराय जिला अन्तर्गत मंझौल अनुमंडल में 2500 एकड़ पर फैला कांवर झील एक पक्षीविहार है जहाँ 300 प्रजातियों के पक्षियों का अध्ययन एक साथ संभव है। दरभंगा जिला में कुश्वेश्वर स्थान वन्य जीवों के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिहार की कृषि की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा करें।
उत्तर-
बिहार एक कृषिप्रधान राज्य है, यहाँ की 80 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। झारखण्ड के अलग हो जाने के बाद, बिहार के लोगों के लिए कृषि का महत्व अधिक बढ़ गया है, परंतु यहाँ की कृषि निम्नलिखित समस्याओं से जूझ रही है.

  • कृषि का परंपरागत तरीका।
  • किसानों का अशिक्षित होना एवं उनके पास पूँजी का अभाव होना।
  • खेतों का दूर-दूर होना।
  • सिंचाई की समस्या।
  • कृषि का मानसून पर निर्भर होना।
  • उन्नत बीजों एवं उन्नत कृषि तकनीकों का अभाव।
  • उन्नत व्यवस्था के अनुरूप कृषि कार्य न होना।
  • यातायात के साधनों का अभाव।
  • जनसंख्या का कृषि पर बढ़ता बोझा
  • लोगों में एकता का अभाव।

प्रश्न 2.
बिहार में कौन-कौन सी फसलें लगाई जाती हैं ? किसी एक फसल के मुख्य उत्पादनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
बिहार की प्रमुख फसलों में धान, गेहूँ, मकई, जौ, गन्ना, तम्बाकू, मडुआ, ज्वार, दलहन और तेलहन हैं। इसके अतिरिक्त सब्जियों, फल, फूल की भी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

धान- धान बिहार की खाद्यान फसलों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भइर्द, अगहनी तथा गरमा धान की तीन फसलें उगाई जाती हैं। इसकी खेती राज्य के सभी भागों में की जाती हैं। उत्तरी तथा पूर्वी भागों में भदई धान की खेती की जाती है, जबकि अगहनी धान की खेती पूरे राज्य में की जाती है।

धान का सबसे अधिक उत्पादन पश्चिमी चंपारण, रोहतास तथा औरंगाबाद में होता है। इन तीन जिलों में बिहार का 18 प्रतिशत से अधिक धान का उत्पादन होता है। पहले स्थान पर पश्चिमी चम्पारण है जबकि रोहतास और औरंगाबाद का क्रमशः द्वितीय और तृतीय स्थान है। क्षेत्रफल की दृष्टि से रोहतास (5.76%) अव्वल है।

2006-07 में यहाँ 33-54 लाख हेक्टेयर भूमि पर, लगभग 50 लाख टन धान का उत्पादन दर्ज किया गया।

प्रश्न 3.
बिहार की मुख्य नदी घाटी परियोजनाओं का नाम बतायें एवं सोन अथवा कोसी परियोजना के महत्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
बिहार की मुख्य नदी घाटी परियोजनाएँ निम्न हैं.

  • सोन नदी घाटी परियोजना
  • गण्डक नदी घाटी परियोजना
  • कोसी नदी घाटी परियोजना
  • दुर्गावती जलाशय परियोजना
  • चन्दन बहुआ परियोजना
  • बागमती परियोजना
  • बरनार जलाशय परियोजना।

1. सोन नदी घाटी परियोजना- यह बिहार की सबसे पुरानी और पहली नदी घाटी परियोजना है। इसका विकास अंग्रेज सरकार ने 1874 में सिंचाई के लिए किया था।

इससे डेहरी के पास से पूरब एवं पश्चिम की ओर नहरें निकाली गई हैं। इस परियोजना से पटना, गया, औरंगाबाद, भोजपुर, बक्सर, रोहतास इत्यादि जिलों में सिंचाई की जाती है, जिससे इस क्षेत्र में धान की खेती अधिक होती है। इसी कारण इस क्षेत्र को बिहार का ‘चावल का कटोरा’ कहा जाता है।

इस परियोजना के अन्तर्गत जल-विद्युत उत्पादन के लिए शक्ति-गृहों की स्थापना की गई । है, पश्चिमी नहर पर डेहरी के पास 6.6 मेगावाट उत्पादन क्षमता का शक्ति-गृह स्थापित है। इसी प्रकार पूर्वी नहर शाखा पर बारूण नामक स्थान पर 3.3 मेगावाट क्षमता का शक्ति गृह का निर्माण किया गया है। सोन नदी पर इन्द्रपुरी के पास एक बाँध का निर्माण प्रस्तावित है जिससे 450 मेगावाट पनबिजली उत्पादन का लक्ष्य है।

2. कोसी नदी घाटी परियोजना- यह परियोजना नेपाल बिहार और भारत सरकारों के सामूहिक प्रयास का फल है। इसका मुख्य उद्देश्य नदी के बदलते मार्ग को रोकना, उपजाऊ भूमि की बर्बादी पर नियंत्रण, भयानक बाढ़ से क्षति पर रोक, जल से सिंचाई का विकास, पनबिजली उत्पादन, मत्स्य पालन, नौका रोहण एवं पर्यावरण संतुलन है।

इस परियोजना को कई चरणों में पूरा किया गया है। पहले चरण में मार्ग परिवर्तन पर नियंत्रण, बिहार, नेपाल सीमा पर स्थित हनुमाननगर स्थान पर बैराज का निर्माण, बाढ़ नियंत्रण के लिए दोनों ओर तटबंध का निर्माण, पूर्वी एवं पश्चिमी कोसी नहर एवं उसकी शाखाओं का निर्माण सम्मिलित किया गया।

पूर्वी नहर तथा इसकी प्रमुख सहायक नहरों द्वारा 14 लाख एकड़ भूमि में सिंचाई की जाती है। इससे पूर्णिया, सहरसा, मधेपुरा और अररिया जिलों में सिंचाई की जाती है। पश्चिमी नहर से नेपाल एवं बिहार के मधुबनी एवं दरभंगा जिलों में सिंचाई की जाती है।

प्रश्न 4.
बिहार में वन्य जीवों के संरक्षण पर विस्तार से चर्चा करें।
उत्तर-
बिहार में वन एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए आदि काल से कई रीति-रिवाजों का प्रचलन है। कई धार्मिक अनुष्ठान तो वृक्षों के नीचे ही किए जाते हैं। कई ऐसे आंचलिक त्योहार भी हैं जो वृक्षों के नीचे ही किए जाते हैं। इस राज्य में परम्परागत रूप से वट, पीपल, आँवला और तुलंसी के पौधों की पूजा की जाती है। हमारे यहाँ चौंटी से लेकर साँप जैसे विषैले जन्तु को भोजन दिया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। पक्षियों को भी दाने दिए जाने का प्रचलन है। साथ ही वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। यहाँ संजय गाँधी जैविक उद्यान एवं अन्य 14 अभयारण्य हैं जैसे-बेगुसराय जिला अन्तर्गत कांवर झील, दरभंगा जिला अन्तर्गत कुशेश्वर स्थान इत्यादि।

वन एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए कई संस्थाएँ भी कार्यरत हैं जिनमें वन, पर्यावरण एवं जल संसाधन विकास विभाग प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में कई स्वयं सेवी संस्थाएँ भी काम कर रही हैं। जैसे—प्रयास, तरुमित्र और भागलपुर में मंदार नेचर क्लब इत्यादि।

Bihar Board Class 10 Geography बिहार : कृषि एवं वन संसाधन Additional Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिहार राज्य की उत्तरी सीमा के पश्चिमी छोर का अक्षांश क्या है ?
(क) 25°30’N
(ख) 27°31N
(ग) 37°N
(घ) 30°N
उत्तर-
(ख) 27°31N

प्रश्न 2.
सबसे कम वर्षा का जिला कौन है ?
(क) किशनगंज
(ख) पूर्णिया
(ग) बक्सर
(घ) पश्चिमी चम्पारण
उत्तर-
(ग) बक्सर

प्रश्न 3.
संप्रति बिहार में जिलों की संख्या कितनी है ?
(क) 30
(ख) 31
(ग) 35
(घ) 38
उत्तर-
(घ) 38

प्रश्न 4.
बिहार में विद्युत का उत्पादन सबसे अधिक कहाँ होता है ?
(क) बरौनी
(ख) बक्सर
(ग) गोपालगंज
(घ) अररिया
उत्तर-
(ग) गोपालगंज

प्रश्न 5.
बिहार में सबसे बड़ा ताल-क्षेत्र कौन है ?
(क) बड़हिया
(ख) राजगीर
(ग) दरभंगा
(घ) कैमूर
उत्तर-
(क) बड़हिया

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिहार की पूर्वी सीमा पर स्थित राज्य का नाम लिखें।
उत्तर-
प. बंगाल बिहार की पूर्वी सीमा पर स्थित है।

प्रश्न 2.
बिहार के किस भाग में सोमेश्वर की पहाड़ियाँ स्थित हैं ?
उत्तर-
बिहार के गंगा के उत्तरी मैदान में पश्चिमोत्तर कोने पर सोमेश्वर की पहाड़ियाँ स्थित हैं।

प्रश्न 3.
बिहार राज्य से झारखण्ड कब अलग हुआ? सही तिथि का उल्लेख करें।
उत्तर-
15 नवंबर 2000 को झारखण्ड बिहार राज्य से अलग हो गया।

प्रश्न 4.
बिहार में सबसे बड़ा ताल क्षेत्र कहाँ स्थित है ?
उत्तर-
बिहार में सबसे बड़ा ताल क्षेत्र मोकामा में स्थित है।

प्रश्न 5.
बिहार में सिंचाई का सबसे बड़ा साधन क्या है ?
उत्तर-
बिहार में सिंचाई के तीन मुख्य साधन हैं-

  • नहरें
  • कुएं और नलकूप तथा
  • तालाब, आहार और पईन।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिहार में गेहूं के पाँच प्रमुख उत्पादक जिलों के नाम लिखें।
उत्तर-
बिहार में गेहूँ उत्पादन करने वाले पाँच-दरभंगा, रोहतास, गया, सिवान तथा औरंगाबाद इत्यादि प्रमुख जिले हैं।

प्रश्न 2.
बिहार के दक्षिण की ओर बहने वाली नदियों के नाम लिखें।
उत्तर-
बिहार के दक्षिण की ओर बहने वाली नदियों में सोन, पुनपुन, फल्गु, चानन और चीर नदियाँ प्रमुख हैं।

प्रश्न 3.
बिहार राज्य के सबसे अधिक वर्षा वाले दो जिलों के नाम लें।
उत्तर-
बिहार राज्य के सबसे अधिक वर्षा वाले दो जिले किशनगंज जहाँ 200-300 सेमी. या इससे भी अधिक वर्षा होती है तथा कटिहार जहाँ 150-200 सेमी. के बीच वर्षा होती है।

प्रश्न 4.
गंगा के दक्षिण के मैदान की मिट्टी का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर-
गंगा के दक्षिणी मैदान में केवाली मिट्टी पाई जाती है। बक्सर, भोजपुर, रोहतास, औरंगाबाद, जहानाबाद, पटना, नालन्दा, बाढ़, मुंगेर और भागलपुर के मैदानी भाग में बांगर या पुरानी जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है। कुछ स्थानों पर तीन-चार महीने तक बाढ़ का पानी एकत्र हो जाने से विशाल ‘ताल’ का रूप ले लेता है। इसमें बड़हिया ताल सबसे बड़ा है। इसमें पानी सूखने पर दलहन की अच्छी उपज ली जाती है। ताल के ऊपर के क्षेत्र केवाली मिट्टी के हैं। इसमें समुचित वर्षा के अभाव में सिंचाई का सहारा लिया जाता है और अच्छी उपज ली जाती है।

प्रश्न 5.
बिहार राज्य के किस जिले में चूना-पत्थर अधिक मिलता है ?
उत्तर-
बिहार के रोहतास और मुंगेर जिले में चूनापत्थर अधिक मिलता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्राकृतिक संसाधनों का नाम दें। किसी एक का बिहार में वितरण बताएँ।
उत्तर-
बिहार के प्राकृतिक संसाधन निम्नलिखित हैं
(क) मिट्टी
(ख) खनिज
(ग) वन और वन्य प्राणी तथा
(घ) जल या जलशक्ति।

मिटटी का वितरण बिहार के मैदानी भाग में सर्वत्र वाहित मिट्टियाँ पाई जाती हैं। अति प्राचीन काल में उत्तरी मैदान में सागर था, जो नदियों के द्वारा लाई गई और जमा की कई मिट्टियों से भरकर समतल मैदान बन गया। इस वाहित मिट्टी को जलोढ़ मिट्टी के नाम से पुकारा जाता है। इसे कई उपवर्गों में बांटा गया है

(i) तराई या दलदली क्षेत्र की जलोढ़ मिट्टी इसका वितरण सबसे उत्तर में 5 से 10 किलोमीटर चौड़ी पट्टी में मिलता है। हिमालय की तराई होने, घनी वर्षा होने और घने पेड़-पौधों से भरा होने के कारण इस क्षेत्र में बहुत अधिक नमी बनी रहती है। इस मिट्टी में चूने का अंश कम होता है। रंग गाढा भूरा होता है, यह बहुत उपजाऊ नहीं होती है। इसमें धान, जूट, गन्ना आम
और लीची की खेती की जाती है।

(ii) बाँगर या परानी जलोढ मिटटी इसका वितरण गंडक नदी के पूर्वी और पश्चिमी दोनों क्षेत्र में पाया जाता है। इस मिट्टी में चूना-कंकड़ अधिक मिलता है। मिट्टी का रंग भूरा और कालिमा लिए हुए होता है। यह गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसमें मकई, जौ, गेहूँ की भी खेती की जाती है।

(iii) खादर या नई जलोढ मिट्टी इसका वितरण बूढ़ी गंडक के पूरब में है। यह दोमट मिट्टी है। यह क्षेत्र बाढ़ग्रस्त रहा करता है। इसमें जूट की खेती की जाती है। इसके पश्चिमी भाग में गन्ने की खेती की जाती है। धान की भी अच्छी खेती की जाती है।

(iv) गंगा के दक्षिणी मैदान की केवाल मिटटी यहां पश्चिमी भाग में बाँगर मिट्टी मिलती है। पूर्व के निम्न भागों में ताल जैसे बड़हिया का ताल मिलता है, जो दलहन की पैदावर के लिए विख्यात है। यही मिट्टी दोमट और केवाल किस्म की है।

प्रश्न 2.
आर्द्र पर्णपाती और शुष्क पर्णपाती वनों में क्या अन्तर है ? इनके पेड़ों के तीन-तीन उदाहरण दें।
उत्तर-
बिहार के वन मॉनसूनी प्रकार के हैं और पर्णपाती हैं। सामान्यतः 125cm से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में शुष्क पर्णपाती वन पाया जाता है। आई पर्णपाती वनों के वृक्ष सदाबहार होते हैं जैसे आम, जामुन, कटहल, सखुआ, पलास, पीपल सेमल, बरगद, करंग, गंभार आदि। वनों के अतिरिक्त साबेघास भी पाया जाता है। इस प्रकार के वृक्ष मुख्यतः चम्पारण, सहरसा, पूर्णिया एवं अररिया के उत्तर भाग में पाये जाते हैं।

शुष्क पर्णपाती वनों में भी वे सभी पेड़ उगते हैं जो आई पर्णपाती वनों में पाये जाते हैं। परंतु ये आकार में छोटे और कम घने होते हैं और ग्रीष्म काल के प्रारंभ में ही इनके पत्ते गिर जाते हैं। इनमें मुख्यतः शीशम, महुआ, पलास, बबूल, खजूर और बाँस के पेड़ मिलते हैं, आम, अमरूद, कटहल के पेड़ भी पाये जाते हैं। ऐसे वन कृषि कार्य एवं आवास बनाने हेतु तेजी से काटे जा रहे हैं। फिर भी गया, दक्षिणी मुंगेर तथा दक्षिणी भागलपुर में इनकी संघनता पाई जाती है। नेपाल की सीमा से सटे तराई भागों में वर्षा की अधिकता के कारण आर्द्र पर्णपाती वन मिलते हैं जिसमें शीशम, सखुआ, सेमल तथा खैर के पेड़ों की प्रमुखता रहती है। कोसी क्षेत्र में नरकट जाति की झाड़ियाँ भी उगती हैं।

Bihar Board Class 10 Geography बिहार : कृषि एवं वन संसाधन Notes

  • बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है, यहाँ की 80 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है।
  • धान, गेहूँ, मकई, जौ, गन्ना, तम्बाकू, महुआ, ज्वार, दलहन और तेलहन यहाँ की मुख्य फसल हैं।
  • मोटे अनाज के उत्पादन में मधुबनी एवं किशनगंज क्रमशः प्रथम एवं द्वितीय स्थान पर हैं।
  • बिहार देश का तीसरा बड़ा सब्जी उत्पादक राज्य है।
  • सोन, गंडक एवं कोसी यहाँ की मुख्य नदी घाटी परियोजनाएं हैं।
  • बिहार में लगभग 6.87 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में ही वन है।
  • संजय गाँधी जैविक उद्यान, पटना यहाँ का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान है।
  • प्राकृतिक संसाधनों के मामले में बिहार एक परिपूर्ण राज्य है। यहाँ अनेक प्रकार के प्राकृतिक संसाधन पाये जाते हैं।
  • धान, गेहूँ, मकई, जौ, गन्ना, तम्बाकू, महुआ, ज्वार, दलहन और तेलहन यहाँ की मुख्य फसल हैं।
  • बिहार राज्य भारत की उत्तरी सीमा पर नेपाल से सटा हुआ है। इसकी गिनती देश के पूर्वी राज्यों के साथ की जाती है।
  • बिहार का विस्तार चतुर्भुज की भांति है, परन्तु पश्चिमी भाग कुछ चौड़ा है। इसकी उत्तरी सीमा पश्चिम की ओर 27°31 N अक्षांश तथा पूरब की ओर 27°N अक्षांश पर है। इसी प्रकार दक्षिणी सीमा 24°30N अक्षांश को छूती है। पश्चिमी सीमा 83°E देशान्तर पर तथा
  • पूर्वी सीमा उत्तर की ओर 88°8’N देशान्तर पर तथा दक्षिण की ओर 88°N देशान्तर के पास है।
  • हमारे राज्य बिहार की पश्चिम की लंबाई लगभग 483 किमी. है तथा औसत चौड़ाई लगभग 195 किमी. है।
  • हमारे राज्य बिहार का कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किमी. है।
  • बिहार के पड़ोसी राज्य झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश हैं।
  • बिहार के उत्तरी-पश्चिमी सिरेचर सोमेश्वर की पहाड़ियाँ हैं जो दक्षिणी हिमालय (शिवालिक) की सबसे छोटी पहाड़ी है।
  • बिहार के सबसे पश्चिमी सीमा पर सरयू नदी है और उसके पूरब में गंडक तथा बूढ़ी गंडक नदियां हैं। इसके पूरब की ओर बागमती नदी है जो गूढ़ी गंडक की सहायक नदी है। मध्य भाग में प्रमुख नदी कोसी है जिसकी अनेक सहायक नदियाँ हैं।
  • बिहार के कोसी नदी में सात प्रमुख नदियों का जल बहता है। इसीलिए कोसी नदी को सप्तकोसी भी कहा जाता है।
  • उत्तरी बिहार में अनेक छोटी-छोटी सहायक नदियाँ हैं जो नेपाल से बहकर आती हैं।
  • बिहार के मध्य में पश्चिम से पूरब तक बहने वाली मुख्य नदी गंगा है।
  • बिहार की दक्षिणी सीमा पर पश्चिमी भाग में रोहतास, मध्य में राजगीर और पूरब में मंदार की पहाड़ियाँ हैं।
  • बिहार के गंगा के मैदान को उत्तरी और दक्षिणी दो भागों में बाँटा जाता है।
  • गंगा के उत्तरीय मैदान में सोमेश्वर की पहाड़ियाँ इसके पश्चिमोत्तर कोने पर स्थित हैं।

Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 7 सूक्ष्मजीवों का संसार : सूक्ष्मदर्शी द्वारा आँखों देखा

Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 7 सूक्ष्मजीवों का संसार : सूक्ष्मदर्शी द्वारा आँखों देखा Text Book Questions and Answers.

BSEB Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 7 सूक्ष्मजीवों का संसार : सूक्ष्मदर्शी द्वारा आँखों देखा

Bihar Board Class 8 Science सूक्ष्मजीवों का संसार : सूक्ष्मदर्शी द्वारा आँखों देखा Text Book Questions and Answers

अभ्यास

1. सही विकल्प के आगे (✓) का निशान लगाइए।

(क) सूक्ष्मजीव जो परपोषी में गुणन करता है
(i) जीवाणु
(ii) कवक
(iii) प्रोटोजोआ
(iv) विषाणु
उत्तर-
(iv) विषाणु

(ख) दूध को दही में बदलने वाला सूक्ष्मजीव है
(i) प्लैज्मोडियम
(ii) यीस्ट
(iii) शैवाल
(iv) लैक्टोबैसिलस
उत्तर-
(iv) लैक्टोबैसिलस

(ग) मलेरिया रोग का कारण है.
(i) प्रोटोजोआ
(ii) विषाणु
(iii) जीवाणु
(iv) कवक
उत्तर-
(i) प्रोटोजोआ

(घ) चीनी को एल्कोहल में परिवर्तित करनेवाला प्रक्रम है
(i) संदूषण
(ii) किण्वन
(iii) परिरक्षण
(iv) संक्रमण
उत्तर-
(ii) किण्वन

(ङ) पावरोटी या इडली के फूलने का कारण है
(i) नमी
(ii) ऊष्णता
(iii) यीस्ट
(iv) जल
उत्तर-
(i) नमी

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. विशेष यंत्र …………. का उपयोग सूक्ष्मजीवों को देखने के लिए किया जाता है।
  2. दलहनी पौधों की जड़ों में ……….. जीवाणु रहता है।……….
  3. पोलियो ………….. के कारण होता है। ।
  4. मलेरिया परजीवी का वाहक ………….. मच्छर है।
  5. सिरका का उत्पादन ………….. नामक सूक्ष्मजीव की सहायता से किया जाता है।

उत्तर-

  1. सूक्ष्मदर्शी
  2. राइजोबियम
  3. विषाणु
  4. मादा एनोफिलीज
  5. यीस्ट।

3. निम्न. पर (✓) या (×) का निशान लगाइए।

उत्तर-

  1. सूक्ष्मजीव केवल मिट्टी में मिलते हैं। – (×)
  2. सूक्ष्मजीवों को हम नंगी आँखों से देख सकते हैं। – (×)
  3. डेंगू मादा मच्छर एडिस के काटने से होता है। – ()
  4. मादा एनोफिलिस मच्छर मलेरिया परजीवी का वाहक है। – ()
  5. यीस्ट एक शैवाल है। – (×)
  6. चेचक के टीके की खोज एडवर्ड जेनर ने की थी। – ()
  7. वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण से मिट्टी की उर्वरता घटती है। – (×)
  8. टायफाइड विषाणु से होनेवाला रोग है। – (×)

4. मिलान कीजिए

Bihar Board Class 8 Science Book Solutions

उत्तर-

  1. (ग)
  2. (घ)
  3. (क)
  4. (ङ)
  5. (ख)

Bihar Board Class 8 Science Solution प्रश्न 5.
सूक्ष्मजीवों को देखने के लिए विशेष यंत्र सूक्ष्मदर्शी की जरूरत होती है। क्यों?
उत्तर-
हम, आप अपनी नंगी आँखों से, अधिक से अधिक मिली मीटर के दसवें भाग के बराबर तक की वस्तुओं को देख सकते हैं। जबकि सूक्ष्मजीव मिलीमीटर के हजारवें, लाखवें भाग या उससे भी छोटे होते हैं।

अतः इन ‘सक्ष्मजीवों को देखने के लिए एक विशेष प्रकार के यंत्र की जरूरत होती है। जिसे सूक्ष्मदर्शी कहते हैं। सूक्ष्मदर्शी ऐसा यंत्र है जिसकी सहायता से हम सूक्ष्मजीव या वस्तु को उसके वास्तविक आकार से कई गुना बढ़ाकर देख सकते हैं।

Bihar Board Solution Class 8 Science प्रश्न 6.
सूक्ष्मजीव हमारे मित्र हैं कैसे?
उत्तर-
सूक्ष्मजीव हमारे मित्र ही नहीं अति उपयोगी मित्र है। यह हमारे दैनिक जीवन में, घरेलू से लेकर औद्योगिक उत्पादन प्रक्रियाओं में सूक्ष्मजीवों का महत्वपूर्ण स्थान है। औषधि निर्माण, रोग प्रतिरोधक टीका कषि, मिटटी की उर्वरता बढाने, पर्यावरण की साफ-सफाई आदि में सक्ष्मजीवों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रकार सूक्ष्मजीव हमारे जिन्दगी में अति महत्वपूर्ण एवं उपयोगी सहयोगी के रूप में कार्य करता है। इसलिए सूक्ष्मजीव हमारे, आपके तथा मानव जाति के मित्र हैं।

Bihar Board Class 8 Science Solution In Hindi Pdf Download प्रश्न 7.
यीस्ट और चीनी के साथ मैदे को गूंथकर कुछ देर छोड़ देने के बाद, मैदे का आयतन क्यों बढ़ जाता है ?
उत्तर-
यीस्ट कवक वर्ग का सूक्ष्मजीव है। जब हम चीनी तथा मैदा के साथ यीस्ट को गूंथते हैं तो अनुकूल परिस्थिति पाकर वह तेजी से गुणन (जनन) करने लगता है। साथ ही उसके श्वसन के कारण काफी मात्रा में CO2 निकलता है। इसके कारण मैदा में खमीर बनता है और उसका आयतनबढ़ जाता है।

Bihar Board 8th Class Science प्रश्न 8.
सूक्ष्मजीवों द्वारा होनेवाली हानियों का विवरण दीजिए।
उत्तर-
कुछ सूक्ष्मजीव हमारे मित्र हैं यानि हमारे लिए लाभदायक हैं तो कुछ सूक्ष्मजीव ऐसे हैं जो हमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हानि पहुंचाते हैं। ये

मनुष्य, जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों आदि के अनेक रोगों के कारण हैं। ये हमारे भोजन, पानी तथा अन्य उपयोगी वस्तओं को दषित कर देते हैं।

रोगकारक सूक्ष्मजीव हमारे श्वास, भोजन.. पानी आदि के द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं तथा रोग उत्पन्न करते हैं। जल, वायु, भोजन, वस्त्र या शारीरिक संपर्क के फलस्वरूप एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे स्वस्थ व्यक्ति तक सूक्ष्मजीवों के फैलाव के कारण होने वाले रोगों को संचरणीय रोग कहते

मानव में सूक्ष्मजीव जनित रोग-क्षय रोग, खसरा, पोलियो हैजा. टाइफाइड, मलेरिया, चिकन पॉक्स इत्यादि ।

पौधों में सूक्ष्मजीव जनित रोग – गेहूँ का रस्ट, नींबू का कैंसर, भिंडी का पीत रोग इत्यादि।

जानवरों में सूक्ष्मजीव जनित रोग-एंथ्रेक्स, खुर तथा मुंहपका रोग । इत्यादि ।

Science Class 8 Bihar Board प्रश्न 9.
नाइट्रोजन चक्र कैसे संचालित होता है ?
उत्तर-
नाइट्रोजन चक्र के संचालन को भली-भाँति हम नाइट्रोजन चक्र से समझ सकते हैं।

Bihar Board Class 8 Science Solution In Hindi

Class 8 Bihar Board Science प्रश्न 10.
पॉश्चरीकरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
पॉचरीकरण एक प्रक्रिया है जिसकी खोज लुई पॉश्चर ने किया था। उन्हीं के नाम पर इस प्रक्रिया को पॉश्चरीकरण कहते हैं। इस प्रक्रिया में दूध को 70° C पर 15-30 सेकेण्ड के लिए गर्म किया जाता है। इसके अलावे भी दूध

को अनेक स्तरों से गुजारा जाता है ताकि दूध सूक्ष्मजीवों से मुक्त हो जाए। पॉश्चरीकरण एक प्रक्रिया है जिसमें दूध को सूक्ष्मजीवों से मुक्त कराकर सुरक्षित कर दिया जाता है। फिर उस थैलियों में बंद कर आम लोगों के लिए बाजार में उपलब्ध करा दिया जाता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 8 चिंतन

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 8 चिंतन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 8 चिंतन

Bihar Board Class 11 Psychology चिंतन Text Book Questions and Answers

चिंतन के सिद्धांत Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
चिंतन के स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सम्पूर्ण प्राणी जगत में मानव ही एक ऐसा जीवधारी है जिसमें सोचने, निर्णय लेने तथा तर्क करने की विशिष्ट क्षमता होती है। चिंतन प्रतीकात्मक स्वरूप की विचारात्मक प्रक्रिया होती है, जो सभी संज्ञानात्मक गतिविधियों या प्रतिक्रियाओं का आधार होता है। चिंतन में वातावरण से प्राप्त सूचनाओं का प्रहस्तन एवं विश्लेषण सम्मिलित होती है।

किसी शिल्पकार की कृति को सामने पाकर कोई व्यक्ति उसके रंग-रूप, स्वरूप, चमक और चिकनापन के अतिरिक्त कला में सन्निहित भाव एवं उद्देश्य को भी समझना चाहता है। कला के सम्बन्ध में मनन करने के उपरान्त उस व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि होती है। अपने परिवेश की परख से उत्पन्न अनुभूति या संवदेना तथा प्राप्त होनेवाले अनुभव को मानवीय चिंतन का परिणाम माना जाता है। अत: कहा जा सकता है कि चिंतन एक उच्चतर मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम अर्जित अथवा वर्तमान सूचना का प्रहस्तन एवं विश्लेषण करते हैं।

चिंतन को व्यावहारिक स्वरूप देने के क्रम में हमें प्रस्तुत करने, कल्पना करने, तर्क देने तथा किसी समस्या के लिए सही समाधान करने की योग्यता में वृद्धि होती है। हम किसी कार्य को करके वांछित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए योजना बनाते हैं अथवा पूर्व करने का प्रयोग करते हैं। कार्य के सफल सम्पादन में रचना-कौशल का सक्रिय योगदान होता है। अत: चिंतन को प्रायः संगठित और लक्ष्य निर्देशित माना जाता है। ताश अथवा शतरंज का खिलाड़ी खेल में जीत पाने के लिए सदा सोच-सोच कर आगे बढ़ता है।

वह प्रत्येक चाल के लिए संभावित परिणाम या प्रतिक्रिया का सही अनुमान लगाना चाहता है। वह अपनी सोच में नयापन लाकर लगाई गई युक्तियों का मूल्यांकन करना चाहता है। अतः चिंतन को एक मानसिक क्रिया कह सकते हैं। ऊपर वर्णित तथ्यों के आधार पर चिंतन का स्वरूप मानसिक प्रक्रिया, लक्ष्य निर्देशन, संज्ञानात्मक गतिविधियों का आधार, ज्ञान का उपयोग एवं विश्लेषण, कल्पना, तर्क जैसे पदों के समूह के द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।

चिंतन का अर्थ Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
संप्रत्यय क्या है? चिंतन प्रक्रिया में संप्रत्यय की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संप्रत्यय-ज्ञान-परिधान की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई संप्रत्यय है। संप्रत्यय उन वस्तुओं एवं घटनाओं के मानसिक संवर्ग हैं जो कई प्रकार से एक-दूसरे के समान हैं। अर्थात् संप्रत्यय निर्माण हमें अपने ज्ञान को व्यवस्थित या संगठित करने में सहायता करता है।

चिंतन प्रक्रिया में संप्रत्यय की भूमिका:
चिंतन हमारे पूर्व अर्जित ज्ञान पर निर्भर करता है। जब हम एक परिचित अथवा अपरिचित वस्तु या घटना को देखते हैं तो उनके लक्षणों को पूर्व ज्ञान से जोड़कर उन्हें जानना-पहचानना चाहते हैं। यही कारण है कि हमें सेब को फल कहने में कुत्ता को जानवर मानने में, औरत को दया की प्रतिमा कहने में कोई कठिनाई या झिझक नहीं होती है। संप्रत्यय एक संवर्ग का मानस चित्रण है। यह एक समान या उभयनिष्ठ विशेषता रखने वाली वस्तु, विचार या घटना को वर्गीकृत करने में हमारी मदद करता है।

संप्रत्यय के कारण व्यवस्थित एवं संगठित ज्ञान के द्वारा हम अपने ज्ञान का उपयोग ऐच्छिक तौर पर करके कम समय और प्रयास के बल पर अच्छे परिणाम पा लेते हैं। छिपे सामानों को खोजने में संप्रत्यय हमारी मदद करता है। संप्रत्यय के सहयोग से हम अपने ज्ञान और अनुभव को अधिक उपयोगी और दक्ष बना पाते हैं। संप्रत्यय का निर्माण हमें श्रम और समय संबंधी सुविधा प्रदान करता है। अत: चिंतन प्रक्रिया में संप्रत्यय की भूमिका सहयोगी मित्र तथा तकनीकी साधनों के अनुरूप होती है, जो श्रम, ज्ञान, प्रयास तथा समय संबंधी प्रक्रियाओं में अपनी उत्कृष्ट व्यवस्था जैसे गुणों के कारण जिज्ञासु समस्याओं का सही समाधान कम समये में उपलब्ध करा देता है।

चिंतन का महत्व Bihar Board Class 11 प्रश्न 3.
समस्या समाधान की बाधाओं की पहचान कीजिए। अथवा, समस्या समाधान से क्या तात्पर्य है? इसके अवरोधों को वर्णन करें।
उत्तर:
कोई व्यक्ति समस्या समाधान के लिए समस्या की पहचान के साथ-साथ लक्ष्य, कार्य-विधि एवं निरीक्षण को भी महत्त्व देता है। यह भी ज्ञात है कि मानसिक विन्यास को ही समस्या समाधान की सर्वोत्तम प्रवृत्ति मानता है। लेकिन कभी-कभी यह प्रवृति मानसिक दृढ़ता को जिद्द के रूप में बदलकर नए नियमों या युक्तियों के पता लगाने का अवसर ही नहीं देता है। जैसे 5 कलमों का मूल्य 20 रु. जानकर एक कलम का मूल्य जानने के लिए 20 में 5 से भाग देकर उसका पता लगाता है।

किन्तु जब उसे कहा जाता है 5 मजदूर एक गड्ढा को 20 दिनों में खोद सकते हैं तो 1 मजदूर को गड्ढा खोदने में कितना समय लगेगा। उत्तर के लिए यदि पुनः 2015 की क्रिया करके तो 4 दिन के रूप में परिणाम मिलेगा जो बिल्कुल अस्वाभाविक है। इस तरह ज्ञात नियमों में आवश्यक संशोधन किये बिना प्रयोग में लाना गलत परिणाम का कारण बन जाता है। अर्थात् किसी पूर्व ज्ञान के प्रयोग सम्बन्धी हठधर्मिता समस्या समाधान में अवरोधक सिद्ध होता है। समस्या समाधान में प्रकार्यात्मक स्थिरता को अपनाने वाला समाधान प्राप्त करने में विफल हो जाता है।

रेडियो बजाने की विधि का प्रयोग यदि हारमोनियम बजाने में किया जाएगा तो पूर्व अर्जित ज्ञान समाधान पाने में विफल रह जाएगा। किसी विशिष्ट समस्या के समाधान करने में कुशल व्यक्ति भी अभिप्रेरणा के अभाव में अपनी दक्षता एवं योग्यता का सही लाभ उठा नहीं पाता है। कभी ऐसा भी होता काम प्रारम्भ करने के तुरन्त बाद ही कर्ता अपने को असहाय मानकर काम करना छोड़ देता है। यह संदिग्ध सोच समस्या समाधान का बाधक बन जाता है।

सारांशतः माना जा सकता है कि समस्या समाधान के लिए मानसिक विन्यास, कार्यात्मक स्थिरता, अधिप्रेरणा का अभाव तथा दृढ़ता प्रमुख अवरोधक माने जाते हैं। कोई भी कर्ता समस्या समाधान के क्रम में उचित परिणाम का अभाव पाते ही अवरोध के रूप में प्रयुक्त साधनों या विधियों को अवरोधक मान लेता है। अतः समस्या समाधान के दो प्रमुख अवरोधक के रूप में मानसिक विन्यास तथा अभिप्रेरणा का अभाव अपनी पहचान गलत परिणाम के कारण पहचान लिये जाते हैं।

चिन्तन का अर्थ Bihar Board Class 11 प्रश्न 4.
समस्या समाधान में तर्कना किस प्रकार सहायक होती है?
उत्तर:
किसी के घर में आग की लपेटों को देखकर बहू का जलाया जाना सदा सत्य नहीं होता है। आग की लपटें कई कारणों से देखी जा सकती हैं। बहू का जलाया जाना मात्र एक अनुमान है। जब हम यह जान लेते हैं कि उस घर में कोई बहू है ही नहीं तो अपने अनुमान को वहीं लुप्त कर देते हैं। समस्या के लक्षणे के आधार पर अनुमान लगाना और समस्या के सही कारणों का पता लगाना अलग-अलग बात है। हम समस्या जानकर तर्क के आधार पर परिणाम पाने का प्रयास करते हैं जिसमें तर्कना हमारा काफी सहयोग करता है।

तर्कना एक निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए सूचनाओं को एकत्रित एवं विस्तारित करने की एक प्रक्रिया है। अतः तर्कना के माध्यम से कोई व्यक्ति अपने चिन्तन को क्रमबद्ध बनाता है तथा तर्क-वितर्क के आधार पर एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचता है। इस अर्थ में तर्कना समस्या समाधान की एक सफल विधि है। तर्कना के द्वारा ही हम प्राप्त सूचनाओं को सही निष्कर्ष में रूपान्तरित कर सकते हैं। तर्कना की शुरुआत पूर्वज्ञान अथवा अनुभव पर आधारित अनुमान से होती है।

जो तर्कना एक अभिग्रह या पूर्वधारणा से प्रारम्भ होता है उसे निगमनात्मक तर्कना कहते हैं। कुछ तर्कना विशिष्ट तथ्यों एवं प्रेक्षण पर आधारित होता है, उसे आगमनात्मक तर्कना के रूप में पहचानते हैं। तर्कना हमें क्रमबद्ध अनुमानों पर सोचने-समझने का अवसर देता है और सही निष्कर्ष पाने में सहयोग देता है। आग की लपटें देखकर पहला अनुमान किया गया कि लगता है बहू जला दी गई। लेकिन जब पता चला कि घर में कोई बहू नहीं है तो पहला अनुमान प्राप्त सूचना के कारण असत्य माना गया। दूसरा अनुमान किया गया कि कोई अंगीठी जलाया होगा। सूचना मिली कि गर्मी के मौसम में कौन अंगीठी जलायेगा।

फलत: इसका अनुमान भी गलत सिद्ध हो गया। इसी प्रकार खाना बनाने, कच्चा कोयला जलाने, रद्दी कागज को नष्ट करने जैसी कल्पनाएँ की गईं लेकिन तर्क के द्वारा सबके सब अनुमान असत्य निकले। सम्बन्धित घर जाकर पता लगाया गया। सूचना प्राप्त हुई कि आतिशबाजी का खेल खेला जा रहा था। इस प्रकार असंख्य उदाहरण हैं जो इस बात के साक्षी हैं कि समस्या समाधान के लिए अनुमान को तर्क-वितर्क के द्वारा परखने के बाद ही निर्णय लिया जाना चाहिए। काले रंग से कोयला और पूर्ववत वर्ण से तर्क का माना जाना कोरी कल्पना भी हो सकती है। सही निष्कर्ष तर्कना के माध्यम से ही संभव होता है।

चिंतन का स्वरूप Bihar Board Class 11 प्रश्न 5.
क्या निर्णय लेना एवं निर्णयन अंत: संबंधित प्रक्रियाएँ हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निर्णय लेना एवं निर्णयन अंतः संबंधित प्रक्रियाएँ हैं। निर्णय लेने में ज्ञात जानकारियों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है। धारणा स्थापित किये जाते हैं और संबधित वस्तुओं और घटनाओं का मूल्यांकन किए जाते हैं। कुछ निर्णय स्वचालित भी होते हैं। तमाम संभव परिणामों के मूल्यांकन पर अंतिम निर्णय लेना उचित माना जाता है। निर्णयन में पूर्व ज्ञात विभिन्न समाधान या विकल्पों में से एक का चयन कर लिया जाता है। चयनित विकल्प कभी-कभी व्यक्तिगत स्वार्थ, समझ और रुचि पर आधारित होता है। विकल्पों में से. लागत-लाभ के आधार पर किसी एक को चयन करने की विधि प्रचलित है।

निर्णय अस्थायी तथा अस्वाभाविक भी हो सकता है। जैसे, एक सज्जन पुरुष को पहली मुलाकात में पोशाक के आधार पर हमारे होने का गलत निर्णय ले लिया जा सकता है। निर्णयन में भी. विकल्पों के चयन में गलत परामर्श के कारण गलत विकल्प को सही निष्कर्ष माना जा सकता है। अतः निर्णय लेने तथा निर्णयन समस्या समाधान के क्रम में सम्पादित की जाने वाली क्रियाएँ हैं। दोनों के पास कुछ प्रेरक विशेषताएँ होती हैं तो कुछ दोषपूर्ण स्थितियाँ भी दोनों के साथ जुड़ी रहती हैं। फिर भी, दोनों को अंत: संबंधित मानना सही निर्णय है, क्योंकि दोनों विचारों को प्राथमिकता देने या कार्यरूप में परिणत करने का साधन माना जा सकता है।

चिंतन के प्रकार Bihar Board Class 11 प्रश्न 6.
सर्जनात्मक चिंतन प्रक्रिया में अपसारी चिंतन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
दृष्य और साध्य अपनी नवीनता लिए स्वरूप के कारण दर्शनीय बन जाते हैं। तरह-तरह की आकृति, संरचना एवं उपयोगिता के साथ लोग पुराने मोबाइल सेट के बदले नया सेट लेने को उत्सुक हो जाते हैं। यह प्रवृत्ति सृजनात्मक चिंतन के कारण ही उत्पन्न होती है। निर्माता अपनी संरचना में सृजनात्मक चिन्तन का प्रयोग करके उपभोक्ताओं को कुछ नया कमाल दिखाना चाहते हैं। किसी चिंतन को तब सर्जनात्मक माना जाता है जब वास्तविकता की ओर उन्मुख उपयुक्त, रचनात्मक तथा सामाजिक रूप से वांछित हो।

सर्जनात्मकता शोध के अग्रणी जे. पी. जिलफर्ड के मतानुसार सृजनात्मक चिंतन दो प्रकार के होत हैं –

  1. अभिसारी चिंतन तथा
  2. अपसारी चिंतन

1. अभिसारी चिंतन:
अभिसारी चिंतन की आवश्यकता वैसी समस्या को हल करने में पड़ती है जिसका मात्र एक सही उत्तर होता है। जैसे-1,4,9, 16 के बाद 25 ही होगा।

2. अपसारी चिंतन:
अपसारी चिंतन को एक मुक्त चिंतन माना जाता है जिसमें किसी समस्या के समाधान हेतु कई संभावित उत्तर हो सकते हैं। जैसे-नदी से क्या लाभ है के लिए कई सही उत्तर होते हैं। अपसारी चिंतन नवीन एवं मौलिक विचारों को उत्पन्न करने में सहायक होता है। अपसारी चिंतन योग्यता के अन्तर्गत सामान्य तथा –

  • चिंतन प्रवाह
  • लचीलापन और
  • विस्तारण आते है जिन विशेषताओं के कारण अपसारी चिंतन को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

अपसारी चिंतन के महत्त्वपूर्ण कहलाने के कारण:
अपसारी चिंतन में मौलिक विचारों को प्राथमिकता दी जाती है। निम्न वर्णित विशेषताओं के कारण इसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है –

1. चिंतन प्रवाह:
किसी विशिष्ट चिंतन के कारण उत्पन्न समस्याओं के लिए अनेक विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता रहती है। कोई व्यक्ति किसी समस्या के समाधान हेतु अपनी योग्यतानुसार अन्य व्यक्तियों की तुलना में कई संभावनाओं को प्रकट कर सकता है। जैसे-बाढ़ की विभीषिका से बचने के कई उपाय सुझाये जा सकते हैं। विचारों की संख्या के बढ़ने से चिंतन प्रवाह को अधिक होना माना जायेगा।

2. लचीलापन:
किसी एक ही वस्तु, घटना या समस्या के संबंध में अलग-अलग राय प्रकट की जाती है। एक ही फिल्म के दर्शकों में से कोई संगीत को पसन्द करता है तो कोई मार-धाड़ के दृश्यों से प्रभावित होता है। अर्थात् एक ही समस्या के समाधान हेतु विविध विधियों, व्याख्याओं तथा साधनों के संबंध में चिंतन किया जा सकता है।

3. मौलिकता:
परम्परागत विचारों को सम्मान देते हुए नये विचारों की व्याख्या करना अथवा नवीन संबंधों का प्रत्यक्षण, चीचों को भिन्न परिप्रेक्ष्य में देखना आदि मौलिकता को बनाए रखने में सहायक होते हैं। चिंतन की इस विशेषता के द्वारा दुर्लभ या असाधारण विचारों को उत्पन्न किया जा सकता है। कोई व्यक्ति मौलिकता को बनाये रखते हुए जितने अधिक एवं विविध विचार प्रस्तुत करता है, उसमें उतनी ही अधिक योग्यता या क्षमता मानी जाती है।

4. विस्तरण:
अपसारी चिंतन की एक विशेषता विस्तरण भी है जो किसी व्यक्ति को नए विचार को विस्तार (पल्लवित) करने तथा उसके निहितार्थ को स्पष्टतः समझने का अवसर जुटाती है। अर्थात् अपसारी चिंतन में विविध प्रकार के ऐसे विचारों को उत्पन्न करना सुगम हो जाता है जो एक-दूसरे से संबंधित होते हैं।

जैसे, फसल की वृद्धि के लिए आवश्यक साधनों, उपायों एवं पद्धतियों के सम्बन्ध में तरह-तरह के विचारों (खाद, खरपतवार, सिंचाई) को प्रकट करने की क्षमता तथा आवश्यकता उभरकर सामने आती है। अपसारी चिंतन की महत्ता को बचाने के लिए विचारों को स्थिर एवं उपयोगी बनाकर रखना वांछनीय है। अतः अपसारी चिंतन विविध प्रकार के विचार को उत्पन्न करने के लिए अति आवश्यक है।

Pind Meaning In Hindi Bihar Board Class 11 प्रश्न 7.
सर्जनात्मक चिंतन में विभिन्न प्रकार के अवरोधक क्या हैं?
उत्तर:
सामान्य या साधारण मनुष्य भी सृजनात्मक चिंतन करके उपयोगी उपाय, विधि, नियम आदि को प्रस्तुत करने की क्षमता रखता है। व्यक्ति बदलने से अभिव्यक्ति में अंतर आ सकता है। लेकिन उन्हें प्रोत्साहन देने के साथ-साथ अवरोध मुक्त रहने की आवश्यकता होती है। सृजनात्मक चिंतन में अवरोध उत्पन्न करने वाले कारणों को कई भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

  1. आभ्यासिक
  2. प्रात्यक्षिक
  3. अभिप्रेरणात्मक
  4. संवेगात्मक तथा
  5. सांस्कृतिक

1. आभ्यासिक अवरोध:
आदतों के अधीन होकर सोचने की विधि पाने का प्रयास हानिकारक हो सकती है। पूर्व अर्जित ज्ञान के अधिक प्रचलित व्यवहार के कारण नई विधियों की आवश्यकताओं पर कोई चिंतन करना नहीं चाहता है। शीघ्रता से निष्कर्ष पाने की प्रवृत्ति, समस्याओं को नया स्वरूप देने में अरुचि, पुरानी विधि का अत्यधिक कार्य करने के सामान्य एवं घिसे-पिटे तरीके से संतुष्ट हो जाना आदि सृजनात्मक चिंतन के लिए नया रास्ता पाने में अवरोधक का काम करते हैं। हमारी पुरानी धारणाएँ एवं पुरानी कुशलता नये प्रयास के प्रति हमारी रुचि का हनन करने में सक्रिय भूमिका निभाते है।

2. प्रात्यक्षिक अवरोध:
प्रात्यक्षिक अवरोध हमें नए और मौलिक विचारों के प्रति खुला दृष्टिकोण रखने से रोकते हैं। विचारों अथवा विधियों पर प्रतिबन्ध लगाकर सृजनात्मक चिंतन पर रोक लगा दी जाती है। मवेशियों को बिना लाठी का चराना इसी तरह के प्रतिबन्ध का एक उदाहरण है।

3. अभिप्रेरणात्मक अवरोध:
किसी नये काम को पूरा करने से सक्रिय व्यक्ति बाहरी व्यक्ति के परामर्श से परेशान होकर काम करना बन्द कर देते हैं। कोई उसे गड्ढा खोदने से रोकता है, कोई माता-पिता के जानने का काम करता है। इस प्रकार उचित अभिप्रेरणा का अभाव चिंतन के लिए बाधक बन जाता है।

4. संवेगात्मक अवरोध:
किसी काम से जुड़े, व्यक्ति को असफलता की गारंटी बताकर हतोत्साह करना, हँसी का पात्र बन जाने की संभावना बताना, दुर्बल धारणा को जन्म देकर चिंतन क्षमता में कमी लाने का प्रयास है। स्वयं के प्रति नकारात्मक विचार, असमर्थता का बोध, निन्दा की चिन्ता आदि संवेगात्मक अवरोध बनकर सृजनात्मक चिंतन को विराम की स्थिति में ला देते हैं।

5. सांस्कृतिक अवरोध:
सृजनात्मक चिंतन के क्रम में पारस्परिक विधियों का अत्यधिक अनुपालन, अस्वाभाविक अपेक्षाएँ, अनुरूपता दबाव, रूढ़िवादी विचार, साधारण लोगों से भिन्न प्रतीत हो जाने का भय, यथास्थिति बनाये रखने की प्रवृत्ति, सुरक्षा का संचरण, सामाजिक दबाव, दूसरों पर अत्यधिक निर्भरता आदि के प्रभाव में पड़कर सृजनात्मक चिंतन से विमुख हो जाते हैं। अतः सृजनात्मक चिंतन के लिए स्वतंत्र रूप से आशावादी दृष्टिकोण के साथ विचार प्रकट करने की सुविधा मिलनी चाहिए।

प्रश्न 8.
सर्जनात्मक चिंतन को कैसे बढ़ाया जाता है?
उत्तर:
सर्जनात्मक चिंतन को बढ़ाने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण अभिवृत्तियों, प्रवृत्तियों तथा कौशल के प्रति सतर्कता निभाने की आवश्यकता होती है। कुछ प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं –

  1. अपने परिवेश (अनुभूतियों, दृश्यों, ध्वनियों, रचना, गुणों) के प्रति सदा सतकर्ता बरतना चाहिए तथा संवेदनशील बनकर समस्याओं, सूचनाओं, असंगतियों, कमियों, अपूर्णताओं पर जिज्ञासु नजर रखना चाहिए।
  2. विस्तृत अध्ययन, सूचना, संग्रह, आदतों में सुधार, प्रश्नोत्तर विधि से परिस्थितियाँ तथा वस्तुओं के रहस्य को जानकर अपने चिंतन का विकास किया जा सकता है।
  3. योजना, परामर्श, प्रतिक्रिया, प्रबंधन, व्यवस्था सम्बन्धी समस्याओं को चातुर्यपूर्ण तरीके से हल कर लेना चाहिए।
  4. किसी कार्य को बहुविधीय पद्धति से परीक्षण करते रहना चाहिए।
  5. बुरी आदतों, क्रोधी मित्रों, असहाय व्यक्तियों से उत्तम व्यवहार करना चाहिए।
  6. विचारों को मूल्यांकन के बाद ही सार्वजनिक कराना चाहिए।
  7. विचार-प्रवाह के लचीलेपन को कायम रखना चाहिए।
  8. शान्त चित्त से स्वतंत्र अवस्था में रहकर चिंतन करना चाहिए।
  9. विचारों में नए संयोजन को विकसित करना चाहिए।
  10. अभ्यास एवं उपयोग के प्रति निरन्तरता और सावधानी बनाए रखना चाहिए।
  11. जीवन में साहित्य एवं भाषा ज्ञान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  12. सूचनाओं का भंडार बनाकर उपयोगी सूचनाओं के सम्बन्ध में ही चिंतन करना चाहिए।
  13. अपने विचार को उद्भावित होने का अवसर देना चाहिए।
  14. सदा असफलता से सामंजस्य स्थापित करके चिंतन करना चाहिए।
  15. कारणों और परिणामों को परिस्थितियों से जोड़कर पहचानना चाहिए।
  16. समस्या से जुड़े भय या संकट से मुक्ति का सर्वमान्य तरीका अपनाना चाहिए।
  17. आत्मविश्वासी, धैर्यवान, शांत प्रकृति वाला एक योग्य चिंतक बनकर नित्य अभ्यास और चिंतन में लगा रहना चाहिए।

प्रश्न 9.
क्या चिंतन भाषा के बिना होता है? परिचर्चा कीजिए।
उत्तर:
भाषा के अभाव में चिंतन लगभग असंभव ही होता है, क्योंकि भाषा चिंतन सामग्री को जुटाने में सहायता करता है। भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी इच्छाओं, विचारों आदि को सामाजिक रूप से स्वीकृत मानकों के रूप में अभिव्यक्त करता है। मनुष्य की अभिव्यक्ति के लिए शब्द या भाषा का होना अतिआवश्यक है। चिंतन और भाषा के पारस्परिक संबंधों को तीन विभिन्न दृष्टिकोणों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है जो इस प्रकार हैं –

  1. विचार के निर्धारक के रूप में भाषा
  2. भाषा निर्धारक के रूप में विचार तथा
  3. भाषा एवं चिन्तन के भिन्न उद्गम

1. विचार के निर्धारक के रूप में भाषा:
हमारी चिंतन प्रक्रिया पूर्णता भाषा की समृद्धि पर निर्भर करती है। बेंजामिन ली व्हार्फ का मानना था कि भाषा विचार की अंतर्वस्तु का निर्धारण करती है। इस दृष्टिकोण को ‘भाषाई सापेक्षता प्राक्कल्पना’ के नाम से जाना जाता है। अतः व्यक्ति संभवतः क्या और किस प्रकार सोच सकता है, इसका निर्धारण उस व्यक्ति के द्वारा प्रयुक्त भाषा-भाषाई वर्गों के भाषा ‘नियतित्ववाद’ से होता है। सच तो यह है कि सभी भाषाओं में विचार की गुणवत्ता एवं महत्व का समान स्तर पाया जाना स्वाभाविक होता है। भले किसी भाषा में विचार प्रकट करना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।

2. भाषा निर्धारक के रूप में विचार:
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे का मानना था कि भाषा न केवल विचार का निर्धारण करती है, बल्कि यह इसके पहले भी उत्पन्न होती है। उसके अनुसार बच्चे संसार का आंतरिक निरूपण चिंतन के माध्यम से ही करते हैं। बच्चों में अनुकरण की स्वाभाविक वृत्ति में भाषा के प्रयोग आवश्यक नहीं होता है। बच्चों के व्यवहार में चिंतन का उपयोग संभव होता है। सही है कि चिंतन के साधनों में से भाषा भी एक साधन मात्र होता है। पियाजे का मानना था कि बच्चों को भाषा का ज्ञान दिया जा सकता है, किन्तु ज्ञान का होना भी आवश्यक होता है। भाषा को समझने के लिए विचार (चिंतन) आधारभूत एवं आवश्यक कारक (तत्व) होते हैं।

3. भाषा एवं चिन्तन के भिन्न स्वरूप:
रूसी मनोवैज्ञानिक लेल पायगोत्संकी ने बच्चों की प्रवृत्ति पर विशेष ध्यान करने के उपरान्त बतलाया था कि लगभग दो वर्ष की उम्र तक बच्चों में भाषा और विचार का विकास अलग-अलग स्तरों पर होता है। इस अवस्था में बच्चों को पूर्ववाचिक माना जाता है। बच्चे अपने हाव-भाव के द्वारा अपने विचार को प्रकट किया करते हैं। बच्चे ध्वनिरहित भाषा के माध्यम से अपने विचार को तार्किक रूप से प्रस्तुत करने की क्षमता रखते हैं। जब चिंतन का माध्यम अवाचित होता है तो विचार का उपयोग बिना भाषा के किया जा सकता है।

भाषा का उपयोग बिना चिंतन या विचार के तब किया जाता है जब भावना (खुशी, गम, दिल्लगी) को अभिव्यक्त करना होता है। क्रिया और प्रतिक्रिया एक-दूसरे में व्याप्त होती है। इस दशा में विचार एवं तार्किक भाषा को उत्पन्न करने में वाचक और श्रोता समान रूप से भागीदारी निभाते हैं। अर्थात् दो वर्षों से अधिक उम्र वाले बच्चों में संप्रत्ययात्मक चिंतन का विकास आंतरिक भाषा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, क्योंकि बड़े बच्चे अपने विचार को वाणी के माध्यम से व्यक्त करने लगता हैं।

अतः विभिन्न आयु वाले व्यक्तियों में भाषा अर्जन करने तथा अपने विचारों को व्यक्त करने का तरीका अलग-अलग होता है। भाषा के अभाव में अपनी अनुभूतियों को संप्रेषित करना बहुत ही अस्वाभाविक या कठिन कार्य माना जाता है। दूसरों के विचार को पूर्णत: समझ पाना भी भाषा के माध्यम से ही सरल होता है।

बच्चे, भाषा की जगह प्रतीकों अथवा इशारों का प्रयोग करना सीख जाते हैं। यही कारण है कि छोटे बच्चे (नवजात शिशु) तरह-तरह की ध्वनियों के माध्यम से माता-पिता को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। बच्चों के द्वारा बलबलाना या छोटे शब्दों का प्रयोग करना स्पष्ट करता है कि वे भाषा-ज्ञान की प्राप्ति एवं प्रयोग के लिए बेचैनी महसूस कर रहे हैं। प्रस्तुत परिचर्चा से स्पष्ट हो जाता है कि भाषा और चिंतन जटिल रूप से संबंधित होते हैं।

प्रश्न 10.
मनुष्य में भाषा का अर्जन किस प्रकार होता है?
उत्तर:
मनुष्य में भाषा अर्जन में प्रकृति और परिपोषण का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है। व्यवहारवादी बी. एम. स्किनर के साथ-साथ अनेक विद्वानों का मानना है कि साहचर्य, अनुकरण तथा पुनर्बलन को अपनाकर ही भाषा अर्जन का आरम्भ किया जा सकता है। सामान्य तौर पर भाषा के अर्जन के लिए भाषा में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ जानना, कथन को समझाने की क्षमता बढ़ाना, शब्दावली का निर्माण, वाक्यों की संरचना एवं आशय को पहचानना तथा शुद्ध उच्चारण की कला सीखना आदि शामिल है। दूसरे दृष्टिकोण से यह भी माना जा सकता है कि भाषा अर्जन के लिए उत्तम स्वास्थ्य, उचित बुद्धि का विकास, सामाजिक प्रथाओं अथवा नियमों का ज्ञान, आर्थिक दशायें, सम्पन्नता, परिवेश, जन्म-क्रम, आयु, यौन आदि कारकों पर भी ध्यान रखना अनिवार्य होता है।

भाषा अर्जन का आरम्भ जन्म क्रन्दन से होता है। इसके बाद विस्फोटक ध्वनियाँ, बलबलाना, हाव-भाव के साथ अस्पष्ट ध्वनि के द्वारा विचार प्रकट करना आदि पाये जाते हैं। शिशुओं की मौन अवस्था के पश्चात् एक वर्ष की उम्र में वह पहला शब्द बोलता है। दो वर्ष की उम्र तक भाषा एवं विचार का विकास अलग-अलग स्तर पर होता है।

भाषा अर्जन में अगल-बगल में उत्पन्न ध्वनियों का अनुकरण क्रमिक रूप से वांछित अनुक्रिया के समीप ले आता है। फलतः प्रभाव में आने वाला बच्चा सार्थक वाक्य के रूप में भावना को व्यक्त करना सीख लेता है। बड़े होकर मनुष्य कहानी, साहित्य, नाटक, वार्तालाप, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भाषा सम्बन्धी ज्ञान का अर्जन करता है। किसी विशिष्ट भाषा से सम्बन्धित व्याकरण का ज्ञान, शब्द-युग्मों का प्रयोग, पर्यायवाची शब्द, अलंकार आदि को जानकर कोई व्यक्ति भाषा ज्ञान को समृद्ध बनाता है।

Bihar Board Class 11 Psychology चिंतन Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रचनात्मक चिंतन में प्रमाणीकरण से क्या तात्पर्य हैं?
उत्तर:
प्रमाणीकरण से तात्पर्य समस्या के हल के लिए मिले समाधान के विश्वसनीयता एवं वैधता की जाँच से है।

प्रश्न 2.
चिंतन के क्षेत्र में सबसे पराना सिद्धान्त कौन है?
उत्तर:
चिंतन के क्षेत्र में सबसे पुराना सिद्धान्त केन्द्रीय सिद्धान्त है।

प्रश्न 3.
चिंतन के केन्द्रीय सिद्धान्त के विरोध में किस सिद्धान्त का विकास हुआ है।
उत्तर:
चिंतन के केन्द्रीय सिद्धान्त के विरोध में परिधीय सिद्धान्त का विकास हुआ है।

प्रश्न 4.
चिंतन को किसने संवेदनाजन्य माना है?
उत्तर:
विलहेल्स बुण्ट ने चिंतन को संवेदनाजन्य माना है।

प्रश्न 5.
चिंतन की प्रक्रिया में किसने प्रतिमा को आवश्यक माना है?
उत्तर:
बुण्ट, टिचनर, बर्कले आदि मनोवैज्ञानिकों ने चिंतन की प्रक्रिया में प्रतिमा को आवश्यक माना है।

प्रश्न 6.
किसने कहा कि चिंतन में प्रयास एवं भूल की प्रक्रिया होती है?
उत्तर:
थॉर्नडाइक ने कहा है कि चिंतन में प्रयास एवं भूल की प्रक्रिया होती है।

प्रश्न 7.
किसने चिंतन को विचारात्मक स्वरूप की प्रतीकात्मक प्रक्रिया कहा है?
उत्तर:
बारेन ने चिंतन को विचारात्मक स्वरूप की प्रतिकात्मक प्रक्रिया कहा है।

प्रश्न 8.
चिंतन में भाषा के महत्त्व को किसने स्वीकार किया है?
उत्तर:
जे. बी. वाटसन ने चिंतन में भाषा के महत्त्व को स्वीकार किया है।

प्रश्न 9.
किस मनोवैज्ञानिक ने चिंतन के लिए भाषा को आवश्यक नहीं माना है?
उत्तर:
ब्राउन ने चिंतन के लिए भाषा को आवश्यक नहीं माना है।

प्रश्न 10.
व्यक्ति के चिंतन में कौन-कौन तत्व शामिल होते हैं?
उत्तर:
व्यक्ति के चिंतन में प्रयत्न एवं भूल, पूर्व दृष्टि, अन्तर्दृष्टि, पश्चात् आदि तत्व होते हैं।

प्रश्न 11.
बच्चों में चिंतन की क्रिया किस काल में प्रारम्भ होती है?
उत्तर:
बच्चों में चिंतन की प्रक्रिया बाल्यकाल में प्रारम्भ होती है।

प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिकों ने किस प्रकार के चिंतन को प्रतिमाहीन चिंतन कहा है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने अमूर्त चिंतन को प्रतिमाहीन चिंतन कहा है।

प्रश्न 13.
रचनात्मक चिंतन की सबसे पहली अवस्था क्या है?
उत्तर:
रचनात्मक चिंतन की सबसे पहली अवस्था तथ्यों का संग्रह है।

प्रश्न 14.
रचनात्मक चिंतन की सबसे अन्तिम अवस्था क्या है?
उत्तर:
रचनात्मक चिंतन की सबसे अन्तिम अवस्था गर्भीकरण की जाँच है।

प्रश्न 15.
चिंतन को दिशा देने में महत्त्वपूर्ण योगदान कौन करता है?
उत्तर:
चिंतन को दिशा देने का काम तत्परता करता है।

प्रश्न 16.
तार्किक चिंतन की क्या धारणा है?
उत्तर:
तार्किक चिंतन को चिन्तन का तीसरा रूप माना जाता है। तार्किक चिन्तन की कल्पना उस चिन्तन से है जो तर्कशास्त्र के नियमों पर आधारित है। चिन्तन यदि निगमन होता है तो वह तार्किक चिन्तन कहलाता है।

प्रश्न 17.
रचनात्मक चिन्तन की समुचित परिभाषा दें।
उत्तर:
रचनात्मक चिन्तन की समुचित परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है – रचनात्मक चिन्तन एक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें किसी समस्या को नये ढंग से हल करने के लिये व्यक्ति में नये विचार और नयी अनुक्रिया की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार के चिन्तन के माध्यम से व्यक्ति रचनात्मक कार्यों को करता है।

प्रश्न 18.
चिन्तन क्या है?
उत्तर:
मनोविज्ञान के अनुसार किसी भी समस्या के समाधान के लिए सोचने की प्रक्रिया चिन्तन कहलाती है।

प्रश्न 19.
चिन्तन की धारणा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
चिन्तन की धारणा एक ऐसी जटिल मानसिक प्रक्रिया है जो किसी समस्या के उपस्थित होने पर सोचने की क्रिया शुरू होती है। प्राणी या जीव के सोचने की प्रक्रिया की धारणा ही चिन्तन है। समस्या के समाधान होने पर चिन्तन की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 20.
चिन्तन की समुचित परिभाषा क्या है?
उत्तर:
चिन्तन एक विचारात्मक प्रक्रिया है जो प्रतीकात्मक स्वरूप का होता है और जिसका प्रारम्भ व्यक्ति के सामने उपस्थित किसी समस्या से होता है। इसमें व्यक्ति की समस्या एवं मानसिक वृत्ति से संबंद्ध प्रयल और भूल की क्रिया देखी जाती है और अंत में समस्या का समाधान हो जाता है।

प्रश्न 21.
चिंतन किस प्रकार की प्रक्रिया है?
उत्तर:
चिंतन प्रतीकात्मक स्वरूप की विचारात्मक प्रक्रिया है।

प्रश्न 22.
चिंतन की समस्या का समाधान किस प्रकार होता है?
उत्तर:
चिंतन में समस्या का समाधान प्रयत्न एवं भूल के आधार पर होता है।

प्रश्न 23.
चिंतन में कौन-कौन प्रक्रियाएँ संलग्न होती हैं?
उत्तर:
चिंतन में सबसे पहली प्रक्रिया है समस्या का उपस्थित होना, उसके बाद विभिन्न विचारों का आना, प्रयत्न एवं भूल का होना, सक्रिय रहना, आंतरिक संभाषण होना तथा समस्या समाधान के साथ चिन्तन क्रिया सम्पन्न होती है।

प्रश्न 24.
चिंतन में प्रयत्न एवं भूल क्या है?
उत्तर:
चिंतन के समय व्यक्ति समस्या से सम्बन्धित विभिन्न विचारों को समस्या के निदान के लिए लागू करता है। यदि वह एक विचार से समाधान नहीं कर पाता तो दूसरे विचार की सहायता लेता है। यह क्रम तबतक चलता है जबतक समस्या का समाधान नहीं हो जाता है।

प्रश्न 25.
चिंतन में आंतरिक संभाषण क्या है?
उत्तर:
चिंतन की प्रक्रिया में व्यक्ति मन-ही-मन भाषा एवं प्रतिमा का प्रयोग करता है। उसके कण्ठ में गतियाँ होती हैं। यही आंतरिक संभाषण है।

प्रश्न 26.
रचनात्मक एवं सृजनात्मक चिंतन क्या है?
उत्तर:
रचनात्मक चिंतन एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिससे किसी समस्या को नए ढंग से हल करने के लिए व्यक्ति में नये विचार या नयी अनुक्रिया की उत्पत्ति होती है।

प्रश्न 27.
चिंतन में तत्परता से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तत्परता का अर्थ किसी कार्य विशेष या अनुभव के प्रति प्रारम्भिक आयोजन या तैयारी है।

प्रश्न 28.
चिंतन में उद्भवन या गर्भीकरण की अवस्था क्या है?
उत्तर:
चिंतन में उद्भवन एक विश्राम की अवस्था है। जब व्यक्ति को समाधान नहीं मिलता है तो वह निष्क्रय हो जाता है और समस्या के हल की दिशा में प्रयास करना छोड़ कर किसी अन्य कार्य में लग जाता है।

प्रश्न 29.
रचनात्मक चिंतन में स्फुरण क्या है?
उत्तर:
स्फुरण से तात्पर्य अचानक सफलता से है। यह उद्भवन के तुरन्त बाद होता है। यह व्यक्ति को समस्या का समाधान करने के लिए समर्थ बनाता है।

प्रश्न 30.
समस्या समाधान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समस्या समाधान वह प्रक्रिया है जिसमें प्राथमिक ज्ञानात्मक परिस्थितियों से प्रारम्भ होकर इच्छित लक्ष्य तक पहुँचना अपेक्षित रहता है। समस्या समाधान चिन्तन का एक विशिष्ट रूप है। इसमें मनुष्य चिन्तन करके प्रस्तुत समस्या का समाधान करता है।

प्रश्न 31.
सम्प्रत्यय क्या है?
उत्तर:
सम्प्रत्यय व्यक्ति के मानसिक संगठन में एक प्रकार का चयनात्मक तंत्र है जो पूर्व अनुभूतियों तथा वर्तमान उत्तेजना में एक संबंध स्थापित करता है।

प्रश्न 32.
किस मनोवैज्ञानिक ने भाषा को आन्तरिक रूप में चिंतन कहा है?
उत्तर:
वाटसन ने भाषा को आन्तरिक रूप में चिंतन माना है।

प्रश्न 33.
निर्णय और निर्णयन में अन्तर बतायें।
उत्तर:
निर्णय तमाम संभव परिणामों के मूल्यांकन पर आधारित होती है जबकि निर्णयन में पूर्व ज्ञात विकल्पों में से सही विकल्प का चयन करना होता है।

प्रश्न 34.
वनस्पतिशास्त्री ए. डी. कार्ब को क्यों और कहाँ ऊर्जा पुरस्कार मिला था।
उत्तर:
डॉ. कार्ब को धुआँ रहित चूल्हा बनाने के लिए यू. के. का सर्वोच्च ऊर्जा पुरस्कार दिया गया था।

प्रश्न 35.
आशिष पवार का नाम क्यों प्रसिद्ध हुआ?
उत्तर:
आशिष पवार ने ग्लासगो में आयोजित प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय रोबोटिक ओलम्पियाड में एक पाँच फुट ऊँचा यंत्र मानव (रोबोट) को प्रस्तुत किया था।

प्रश्न 36.
अभिसारी और अपसारी नामक दो रूप किसके हैं?
उत्तर:
जे. पी. गिलफर्ड ने चिंतन को दो रूपों में प्रास्तावित किया था –

  1. अभिसारी और
  2. अपसारी चिंतन।

प्रश्न 37.
अपसारी चिन्तन में सन्निहित प्रमुख तत्व क्या हैं?
उत्तर:
अपसारी चिंतन योग्यताओं के अन्तर्गत सामान्य तथा चिंतन प्रवाह, लचीलापन, मौलिकता एवं विस्तरण आते हैं।

प्रश्न 38.
अपसारी चिंतन से संबंद्ध पाँच विषयों का चुनाव करें जो वैविध्यपूर्ण चिंतन करने योग्य हों।
उत्तर:

  1. यायायात व्यवस्था
  2. भ्रष्टाचार
  3. अशिक्षा
  4. गरीबी तथा
  5. भ्रूण-हत्या

प्रश्न 39.
भाषा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी इच्छाओं, विचारों आदि को एक सामाजिक रूप से स्वीकृत मानकों के रूप में अभिव्यक्त करता है।

प्रश्न 40.
भाषा का क्या महत्व है?
उत्तर:
भाषा मानव संस्कृति की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। भाषा के बिना किसी संस्कृति का अस्तित्व और कार्य नहीं हो सकता है। भाषा के द्वारा मनुष्य अपने संचित ज्ञान को दूसरे मनुष्य तक पहुंचाता है।

प्रश्न 41.
भाषा विकास की कौन-कौन अवस्थाएँ हैं?
उत्तर:
भाषा विकास की अवस्थाओं में दूसरों की भाषा को समझना, शब्दावली का निर्माण, शब्दों द्वारा वाक्यों का गठन, उच्चारण आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 42.
भाषा पर किस तत्व का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
मानव के भाषा विकास पर स्वास्थ्य, बुद्धि, सामाजिक, आर्थिक स्थिति, जन्म-क्रम यौन, उम्र आदि कारकों का प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 43.
नवजात शिशुओं का पहला उच्चारण क्या होता है?
उत्तर:
नवजात शिशुओं द्वारा पहला उच्चारण जन्म-क्रंदन होता है।

प्रश्न 44.
चिंतन का स्वरूप क्या है?
उत्तर:
चिन्तन प्रायः संगठित और लक्ष्य निर्धारित होता है।

प्रश्न 45.
चिंतन के आधारभूत तत्व किसे कहते हैं?
उत्तर:
चिन्तन मानसिक प्रतिमा या शब्द और लक्ष्य प्राप्ति के क्रम में पूर्वज्ञान पर आधारित होता हैं।

प्रश्न 46.
मानसिक प्रतिमा किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानसिक प्रतिमा वैदी अनुभवों का एक मानस चित्रण है।

प्रश्न 47.
मानचित्र में स्थानों का निर्धारण किस आधार पर किया जाता है?
उत्तर:
मस्तिष्क में बने सम्पूर्ण स्थिति की प्रतिमा के आधार पर मानचित्र में स्थानों को न्हित करना संभव होता है।

प्रश्न 48.
संप्रत्यय किस कारण सहायक माना जाता है?
उत्तर:
संप्रत्यय अर्जित ज्ञान को व्यवस्थित या संगठित करने में सहायता करता है।

प्रश्न 49.
संप्रत्यय की व्यावहारिक प्रकृति कैसी होती है?
उत्तर:
अधिकांश संप्रत्यय जिनका उपयोग चिंतन में किया जाता है वे न तो स्पष्ट होते हैं और न ही असंदिग्ध।

प्रश्न 50.
संप्रत्यय निर्माण की आवश्यकता हमें क्यों पड़ती है?
उत्तर:
संप्रत्यय निर्माण हमें व्यवस्थित विचारक के द्वारा एच्छिक तौर पर ज्ञान का प्रयोग करने का अवसर जुटाता है।

प्रश्न 51.
चिंतन के तरीके को प्रभावित करने वाले कारक क्या हैं?
उत्तर:
चिंतन करने के तरीके को विश्वास, मूल्य एवं सामाजिक प्रचलन प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 52.
समग्र चिंतन किसे कहते हैं?
उत्तर:
एशियाई लोग वस्तु एवं पृष्ठभूमि के संबंध के बारे में अधिक सोचते हैं जिसे समग्र चिंतन कहा जाता है।

प्रश्न 53.
चिंतन के आधार के रूप में किसका उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
मानसिक प्रतिमाओं एवं संप्रत्ययों का उपयोग चिंतन के आधार के रूप में होता है।

प्रश्न 54.
समस्या समाधान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
समस्या समाधान ऐसा चिंतन है जो लक्ष्य निर्दिष्ट होता है।

प्रश्न 55.
समस्या का लक्षण क्या होता है?
उत्तर:
समस्या हमेशा व्यक्ति द्वारा सामना किए जाने वाले अवरोध या बाधा के रूप में नहीं आती है। यह एक निश्चित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संपादित कोई सरल कार्य भी हो सकता है।

प्रश्न 56.
समस्या समाधान में अवरोध क्या है?
उत्तर:
समस्या समाधान में मानसिक विन्यास तथा अभिप्रेरणा का अभाव दो प्रमुख अवरो है।

प्रश्न 57.
प्रकार्यात्मक स्थिरता कब उत्पन्न होती है?
उत्तर:
समस्या समाधान में क्रियाशील व्यक्ति जब समाधान पाने में स्वयं को अयोग्य तथा असहाय मान लेता है तो वह काम समाप्त होने के पहले ही काम करना बन्द कर देता है। काम होने की क्रिया में आने वाली स्थिरता को प्रकार्यात्मक स्थिरता कहते हैं।

प्रश्न 58.
तर्कना के दो रूप क्या-क्या हैं?
उत्तर:

  1. निगमनात्मक तर्कना तथा
  2. आगमनात्मक तर्कना।

प्रश्न 59.
तर्कना के किस रूप पर ज्यादा भरोसा किया जाता है?
उत्तर:
वैज्ञानिक तर्कना की अधिकांश स्थितियाँ आगमनात्मक होती हैं। विचारों में उत्पन्न सम या द्वन्द्व को हटाकर व्यक्ति को सक्रिय बनाने का काम भी आगमनात्मक तर्कना से ही संभव होता है।

प्रश्न 60.
बच्चों के भाषा विकास का सबसे पहला स्तर क्या है?
उत्तर:
बच्चों के भाषा विकास का सबसे पहला स्तर भाषा बोध की अवस्था है।

प्रश्न 61.
बच्चों में प्रथम शब्द का उच्चारण किस उम्र में होता है?
उत्तर:
बच्चों में प्रथम शब्द का उच्चारण लगभग एक वर्ष की उम्र में होता है।

प्रश्न 62.
सार्थक भाषा व्यवहार से पूर्व शिशुओं में भाषा अभिव्यक्ति का मुख्य माध्यम क्या है?
उत्तर:
सार्थक भाषा व्यवहार से पूर्व शिशु हाव-भाव, संकेत एवं रुदन के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति करते हैं?

प्रश्न 63.
गुप्त भाषा का विकास कितनी उम्र में होता है?
उत्तर:
गुप्त भाषा का विकास आठ साल से पंद्रह साल की उम्र में होता है। गुप्त भाषा का प्रयोग बच्चों से ज्यादा बच्चियाँ करती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चिंतन में समस्या समाधान की प्रक्रिया का उल्लेख करें।
उत्तर:
चिंतन का प्रारंभ किसी समस्या के साथ ही होता है जो समाधान तक जारी रहता है। अतः समस्या समाधान चिंतन का केन्द्र-बिन्दु है। व्यक्ति के सामने जब कोई समस्या आती है तो वह समाधान खोजने के लिए तत्पर हो जाता है। यदि समस्या आसान है तो समाधान जल्द मिलता है, परन्तु यदि समस्या जटिल होती है तो उसका समाधान अत्यन्त जटिल होता है। समस्या के समाधान के लिए व्यक्ति शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर प्रयास एवं भूल को आधार बनाता है। जब समस्या का समाधान हो जाता है तो चिंतन की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। थॉर्नडाइक ने समस्या समाधान के लिए प्रयास एवं भूल को आवश्यक माना है।

लेकिन गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिक बर्दाइमर ने समस्या समाधान के लिए अन्तर्दृष्टि को महत्त्वपूर्ण माना है। उन्होंने समस्या समाधान का आधार सूझ को माना है। उनका मानना है कि व्यक्ति के सामने जब समस्या उपस्थित होती है तो वह पहले उसका पूरी तरह से निरीक्षण करता है। यदि समस्या समाधान में सफलता नहीं मिलती है तो उसमें तनाव उत्पन्न होता है।

वह तरह-तरह से समस्या को समझने का प्रयास करता है, जिससे समस्या और समाधान के बीच सम्पर्क स्थापित होने लगता है और अचानक समस्या का समाधान मिल जाता है। स्पष्ट है कि इसमें प्रयास एवं भूल नहीं बल्कि अन्तर्दृष्टि का हाथ होता है। कोहलर एवं कोफ्का ने इस बात की पुष्टि के लिए वनमानुष पर प्रयोग किया जिसमें वनमानुष ने छड़ियों को जोड़कर केला प्राप्त कर लिया। इनके प्रयोगों से इस बात की पुष्टि होती है कि समस्या का समाधान प्रयास एवं भूल के माध्यम से नहीं बल्कि सूझ के माध्यम से होता है।

गेस्टाल्टवादियों के विरोध में व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों ने अलग विचार व्यक्त किया है। व्यवहारवादियों ने बताया कि समस्या समाधान में व्यक्ति गतअनुभूतियों का सहारा लेता है तथा प्रयत्न एवं भूल की क्रिया भी देखी जाती है। सबसे पहले उसकी क्रिया लक्ष्य की ओर निर्देशित होती है और सफलता नहीं मिलने पर दूसरे तरह से प्रयास करता है। इस प्रकार समस्या का समाधान एकाएक नहीं बल्कि क्रमिक रूप से होती है।

प्रश्न 2.
तार्किक चिंतन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तार्किकं चिंतन की संकल्पना उस चिंतन से है जो तर्कशास्त्र के नियमों पर आधारित होता है। वह चिंतन का तीसरा रूप है। इन नियमों पर आधारित चिंतन को ही तार्किक चिंतन के नाम से जाना जाता है। इसमें तर्कशास्त्र के नियमों के आधार पर चिंतन करके महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला जाता है। चिंतन यदि निगमन का होता है तो वह तार्किक चिंतन है। तर्कशास्त्र सही निष्कर्ष निकालने के नियमों या तरीकों को निर्धारित करता है।

तर्कशास्त्र में यदि न्याय वाक्य है तो उसके दो आधार वाक्य होते हैं, उन्हीं दोनों आधार वाक्यों के अनुरूप निष्कर्ष निकाले जाते हैं। तर्कशास्त्र में यदि न्याय वाक्य के लिए कुछ निश्चित नियम पहले से बने होते हैं तो उसके आधार पर सही और विश्वसनीय निष्कर्ष निकाला जा सकता है। परन्तु यदि उन नियमों का उल्लंघन कर देते हैं तो निष्कर्ष गलत हो जाता है। उदाहरण के लिए, दो आधार वाक्य को देखें-सभी मुनष्य मरणशील है, रमेश एक मनुष्य है। इन दोनों आधार वाक्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना हो तो कहा जा सकता है कि रमेश मरणशील है। परन्तु यदि आधार वाक्य ही गलत होगा तो निष्कर्ष का गलत होना स्वाभाविक है।

पहले के दार्शनिकों का ऐसा विचार था कि सभी प्रकार के चिंतन तार्किक नियमों पर ही आधारित होते हैं। लेकिन उनके विचार सही नहीं हैं। चिंतन के स्वरूप से स्पष्ट पता चलता है कि दार्शनिकों का विचार गलत था। इस बात को माना जा सकता है कि सही निष्कर्ष प्राप्त करने में तार्किक नियमों से मदद मिलती है, परन्तु सभी प्रकार की चिंतन प्रक्रिया तार्किक नियमों के आधार पर नहीं होती है कि चिंतन के लिए तार्किक नियमों को जानना आवश्यक नहीं है। परन्तु सही निष्कर्ष निकालने के लिए तार्किक नियम का सहारा लेना उचित होता है।

प्रश्न 3.
चिन्तन की परिभाषा दें।
उत्तर:
चिंतन एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है जो उच्च स्तर के प्राणियों में देखा जाता है। यह एक विचारात्मक स्वरूप की मानसिक क्रिया है, जिसकी उत्पत्ति किसी समस्याजन्य परिस्थिति में होती है। व्यक्ति उस समस्या का समाधान प्रतीकों के माध्यम से करता है। उस क्रिया में वह भाषा, प्रयत्न एवं भूल की सहायता लेता है।

चिंतन की क्रिया तबतक चलती है जबतक समस्या का समाधान नहीं हो जाता है। चिंतन की परिभाषा देते हुए कैगन एवं हैवमैन (Kagan and Haverman) ने कहा है-“प्रतिमाओं, प्रतीकों, संप्रत्ययों, नियमों एवं अन्य मध्यस्थ इकाइयों के मानसिक व्यवस्थापन को चिंतन कहा जाता है।” सिलवरमैन (Silverman) के अनुसार, “चिंतन एक ऐसी प्रक्रिया है जो उद्दीपक तथा घटनाओं के प्रतीकात्मक निरूपण के द्वारा किसी समस्या का समाधान करने में हमारी सहायक होती है।

प्रश्न 4.
सृजनात्मक या रचनात्मक चिंतन के संदर्भ में अभिसारी और वैविध्यतापूर्ण चिंतन के बीच क्या अन्तर है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने चिंतन को दो भागों में बाँटा है, जिन्हें अभिसारी और वैविध्यतापूर्ण चिंतन कहते हैं। अभिसारी चिंतन का अर्थ परम्परावादी चिंतन है। इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति पुराने ढंग से अपनी समस्या का समाधान करता है। समस्या का समाधान करते समय उसके विचार रूढिबद्ध होते हैं। मानसिक स्तर पर वह लकीर का फकीर होता है। दूसरी ओर वैविध्यतापूर्ण चिंतन का अर्थ अपरम्परावादी होता है। इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति किसी समस्या का समाधान नए ढंग से करता है। इस तरह के चिंतन का उल्लेख गिलफोर्ड (1967) ने किया है और कहा है कि वैविध्यतापूर्ण चिंतन की मुख्य दो विशेषताएँ होती हैं।

एक विशेषता यह है कि इसके माध्यम से किसी नई चीज का आविष्कार किया जाता है। न्यूटन का चिंतन वास्तव में वैविध्यतापूर्ण चिंतन था, जिसके माध्यम से उसने अपनी समस्या का समाधान करते हुए गुरुत्वाकर्षण के नियम का आविष्कार किया। यह विशेषता अभिसारी चिंतन में नहीं होती है। वैविध्यतापूर्ण चिंतन की दूसरी विशेषता यह है कि इसके माध्यम से व्यक्ति किसी पुरानी समस्या का समाधान नए ढंग से करता है। रात-दिन क्यों होते हैं, इस समस्या का समाधान किसी ने इस आधार पर किया कि इसका कारण पृथ्वी के चारों और सूर्य का गतिशील रहना है।

लेकिन बाद में इस पुरानी समस्या का समाधान किसी दूसरे व्यक्ति ने नए ढंग से किया और कहा कि रात-दिन होने का मुख्य आधार सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का चक्कर काटना है। यह विशेषता भी अभिसारी चिंतन में नहीं पायी जाती है। गिलफोर्ड के अनुसार बुद्धि तथा सृजनात्मकता के लिए अभिसारी चिंतन की तुलना में वैविध्यतापूर्ण चिंतन अधिक आवश्यक है। इनके अनुसार बुद्धि तथा वैविध्यतापूर्ण चिंतन के बीच एवं सृजनात्मक तथा वैविध्यतापूर्ण चिंतन के बीच उच्च धनात्मक सह-सम्बन्ध पाया जाता है।

प्रश्न 5.
भाषा विकास से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भाषा विकास से तात्पर्य एक ऐसी क्षमता से होता है जिसके द्वारा बच्चे अपने भावों, विचारों तथा इच्छाओं को दूसरों तक पहुंचाते हैं तथा दूसरों के भावों एवं इच्छाओं को प्राण करते हैं। बच्चे भाषा विकास के लिए कई तरह के शब्दावली (Vocabulary) विकसित करते हैं। उसके लिए उन्हें माता-पिता से पर्याप्त प्रशिक्षण भी मिलता है। भाषा विकास के लिए अन्य बातों के अलावा यह आवश्यक है कि बालक में श्रवण-शक्ति अर्थात् सुनकर भाषा समझने की शक्ति विकसित हो तथा उसमें सार्थक ढंग से ध्वनि उत्पन्न कर भाषा बोलने की पर्याप्त शक्ति हो।

प्रश्न 6.
प्राक्-भाषा अवस्था में बच्चे द्वारा दिखलाये जाने वाले हाव-भाव का महत्त्व सोदाहरण बतलाएँ।
उत्तर:
प्राक-भाषा अवस्था जो जन्म से प्रथम 15 महीनों का होता है, में बच्चे हाव-भाव द्वारा अपनी आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति करते पाये जाते हैं। हाव-भाव से तात्पर्य शरीर के अंगों द्वारा की गयी उन क्रियाओं से होता है जिसमें कुछ अर्थ निकलता है। इस अवस्था में बच्चे द्वारा किये गये कई तरह के हाव-भाव दिखलाये जाते हैं जिनका कुछ स्पष्ट अर्थ होता है।

जैसे-मुँह से दूध को बाहर आने देना का अर्थ भूखा न होना या भूख की संतुष्टि होना होता है। किसी चीज की और हाथ फैलाना का अर्थ उसे चाहना होता है। जीभ निकालना यां होंठ के सहारे चटकारा भरने का अर्थ भूख व्यक्त करना होता है। नहाने या कपड़ा पहनाने के दौरान फड़फड़ाना या काफी हिलना-डुलना, चिल्लाना का अर्थ शारीरिक क्रियाओं पर प्रतिबंध के प्रति नाराजगी व्यक्त करना आदि होता है।

प्रश्न 7.
एक से अधिक भाषा के उपयोग (Bilingualism) पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
जिस परिवार में दो प्रकार की भाषा बोली जाती है, वहाँ के बच्चों का भाषा-विकास समुचित ढंग का नहीं होता। इस संबंध में अनेक मनोवैज्ञानिकों द्वारा अध्ययन किए गए हैं। स्मिथ (Smith) ने पाया कि दो प्रकार की भाषा बोलने वाले परिवार के बच्चों का भाषा-विकास उस परिवार के बच्चों की अपेक्षा कम होता है, जहाँ एक ही भाषा बोली जाती है। थॉम्पसन ने भी स्मिथ के विचार का समर्थन किया है।

प्रश्न 8.
बलबलाना किसे कहा जाता है? उदाहरण सहित वर्णन करें।
उत्तर:
जब बच्चे की आयु तीन-चार महीने की हो जाती है तो उनका स्वतंत्र इतना अधिक परिपक्व हो जाता है कि वह पहले से अधिक ध्वनियाँ उत्पन्न करने लगता है। इस अवस्था में वह स्वर तथा व्यंजन ध्वनि को एक साथ मिलाकर बोलता है। जैसे-दा, ना, बा, पा, माँ आदि। सात-आठ महीने की आयु में वह इन ध्वनियों को तुरत-तुरत दोहराता है जो सुनने में अर्थपूर्ण लगते हैं, परंतु फिर भी उन्हें भाषा की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, क्योंकि शिशु स्वयं इसका अर्थ नहीं समझता है। जैसे-बा-बा, ना-ना, मा-मा, दा-दा आदि। इसे ही बलबलाना (babbling) कहा जाता है। 10-12 महीने के बच्चे के लिए इस तरह का बलबलाना एक खेल होता है, क्योंकि वे जितना ही बलबलाते हैं उतना ही खुश होते हैं।

प्रश्न 9.
बच्चों के साधारण शब्दावली का अर्थ उदाहरण सहित बतलायें।
उत्तर:
सामान्य शब्दावली में वैसे शब्दों को बच्चे सीखते हैं जिनका प्रयोग बालक भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में सामान्य रूप से करता है। जैसे-कुर्सी, आदमी, हँसना आदि। इस तरह के शब्दावली में बच्चे पहले संज्ञा शब्दों को, फिर क्रिया, विशेषण, क्रिया-विशेषण, संबंध बोधक तथा अन्त में सर्वनाम (pronoun) शब्दों को सीखता है। चूँकि सामान्य शब्दावली के शब्दों का प्रयोग बच्चे अधिक करते हैं, अत: बालक इन शब्दों को पहले सीखते है तथा प्रत्येक उम्र पर सामान्य शब्दावली विशिष्ट शब्दावली से बड़ा होता है।

प्रश्न 10.
बिक्रीकर्ता की नौकरी के सबसे उपयुक्त व्यक्ति का चुनाव किस आधार पर किया जायगा?
उत्तर:
बिक्रीकर्ता के प्रति चयनकर्ता निम्नलिखित धारणा बना लेता है –

  1. अमुक व्यक्ति बहुत वाचाल है।
  2. चयनित व्यक्ति लोगों से मिलना पसंद करता है तथा
  3. अभीष्ट व्यक्ति दूसरों की सरलता से सहमत कर लेता है।

प्रश्न 11.
चिंतन से सम्बंधित सांस्कृतिक अवरोधों का परिचय दें।
उत्तर:
चिंतन के अवरोधकों में सांस्कृतिक अवरोध भी चर्चित है। सांस्कृति अवरोधों का सम्बन्ध परम्परा का अत्यधिक अनुपालन, अपेक्षाएँ, अनुरूपता, दबाव तथा रूढ़ियों से है। परम्परागत संस्कार के कारण व्यक्ति जो सोचना चाहता है वह निम्न स्तरीय अधार्मिक होने के कारण विचार से बाहर कर दिये जाते हैं। दूसरों की सहायता अथवा परामर्श पर आधारित चिन्तक स्वतंत्र होकर कुछ सोच नहीं पाता है। कुछ विचारों पर सामाजिक दबाव बढ़ने से भी सांस्कृतिक अवरोध उत्पन्न हो जाते हैं। चिन्तक को स्वयं की रूढ़िवादिता उसे नये विचार की ओर जाने से रोक लेते हैं।

प्रश्न 12.
सर्जनात्मक चिंतन के विकास के लिए एक स्थिति ऐसी प्रस्तुत करें जिसमें उसे प्रोत्साहन दिया जाए तथा दूसरा जिसमें रोक लगाया जाए।
उत्तर:
अपने दिनचर्या को नियमित रखते हुए शौक, रुचि एवं व्यस्तता का पक्षधर बनकर चिंतन करना चाहिए। घर को सजाना, रद्दी वस्तुओं से सजावट का समान तैयार करना, अधूरे कार्यों को पूरा करना, कहानियों तथा पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप का अध्ययन करना जैसी प्रक्रियाओं पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। प्रथम विचार या समाधान को प्रामाणिक मानने की भूल मत करें। मूर्खतापूर्ण परामर्श पर ध्यान न दें।

प्रश्न 13.
भाषा एवं चिंतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
चिंतन और भाषा-भाषा चिंतन सामग्री को जुटाने में सहायता करती है, क्योंकि प्रत्यास्मरण में इससे आसानी होती है। जिन तथ्यों और सिद्धान्तों का शब्दों के रूप में वर्णन किया जाता है उनको याद करना आसान हो जाता है। एक समस्या को सुलझाने के सिलसिले में जो सिद्धान्त दिया जाता है तो उसी तरह की समस्या के पुनः सामने आने पर आप इस सिद्धान्त को प्रत्यास्मरण बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इसका कारण कुछ तो यह है कि सुन्दर शब्द रचना वाले वाक्यों को रटना और याद करना सरल होता है।

और, कुछ कारण यह है कि यदि किसी सिद्धन्त को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्ति करना है तो पहले उसे स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। एक विद्यार्थी व्याख्यान रटकर सभा-मंच पर बोलने के लिए चला जाता है। वह यह अनुभव नहीं करता कि वह क्या बोल रहा है और रटी हुई सामग्री को शब्दशः उगल देता है। जो मूक वाणी (Silent speech) विचार के साथ रहती है वह सार्थक वाणी होती है। विचार अर्थ के साथ संबंधित होता है, शब्दों के साथ नहीं जबकि सतर्क चिंतन के लिए शब्दों का भी बहुत महत्व हो सकता है।

चिंतन के समय में पेशियों में गतियाँ होने लगती हैं जिनको देखा या सुना नहीं जा सकता। ये गतियाँ केवल जबान की पेशियों में नहीं होतीं अपितु अन्य पेशियों में भी होती हैं। मान लिया एक प्रयोगकर्ता अपकी स्वीकृति से आपके बाहु पर विद्युत वर्ग लगा देता है जिससे आपकी पेशयों से विद्युत की अनुक्रिया की माप की जा सके। आपकी बाहु पर विद्युत वर्ग लगा देता है। जिससे आपकी पेशियों से विद्युत की अनुक्रिया की माप की जा सके।

आपकी बाहु विश्राम की स्थिति में होती है, तब वह आप से कहता है कि आप अपने दाएँ हाथ से दो बार हथौड़ा चलाने का विचार करें। यह कल्पना करने पर उपकरण (Instrument) में आपके दाएँ हाथ की पेशियों से विद्युत् आवेगों के दो विचलन दिखलाई देते हैं। बहरे, गूंगे जो चिन्ह-भाषा का उपयोग करते समय अपनी बाहु पेशियों को काम में लाते हैं, सामान्य विषयों की अपेक्षा स्वप्नावस्था में पेशियों में अधिकतर क्रिया दिखाते हैं।

प्रश्न 14.
भाषा का उपयोग किस प्रकार लाभप्रद माना जाता है?
उत्तर:
भाषा के उपयोग में संप्रेषण के सामाजिक रूप से उपयुक्त तरीकों की जानकारी रखना सम्मिलित है। किसी भाषा के शब्दकोश तथा वाक्य विन्यास का ज्ञान उसे आकर्षक, उपयोगी और कर्णप्रिय बनाता है। अनुरोध, पूछना, परामर्श देना, धन्यवाद ज्ञापन आदि से सम्बन्धित भाषान्तरण और प्रयोग शैली में अन्तर लाकर कुशल वक्ता कहला सकता है।

प्रश्न 15.
बच्चों के विशिष्ट शब्दावली का अर्थ उदाहरण सहित बतलाएँ।
उत्तर:
विशिष्ट शब्दावली में वैसे शब्द आते हैं जिन्हें बच्चे विभिन्न परिस्थितियों में खास-खास वस्तुओं या क्रियाओं के लिए प्रयोग करते हैं। विशिष्ट शब्दावली में बच्चे कई तरह के शब्दावली विकसित करते हैं, जिसमें प्रमुख हैं-रंग-संबंधी शब्दावली (लाल, हरा, पीला आदि), संख्या-संबंधी शब्दावली (दस, बीस, पचास आदि), समय-समय शब्दावली (सुबह, दोपहर, रात, जनवरी आदि), ट्रिक शब्दावली (रोटी, पानी आदि), शिष्टाचार-संबंधी शब्दावली (महाशय, धन्यवाद, नमस्ते आदि), मुद्रा-संबंधी शब्दावली (दस नया पैसा, 25 नया पैसा, पचास पैसा आदि), गँवारुबोली-संबंधी मुद्रा-संबंधी शब्दावली (चोट्टा, साला, खचड़ा, हरामी आदि) गुप्त शब्दावली आदि। इन विभिन्न तरह के शब्दावली के माध्यम से बच्चे अपनी इच्छाओं एवं आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संप्रत्यय की परिभाषा दें। संप्रत्यय का निर्माण किस तरह से होता है?
उत्तर:
संप्रत्यय चिन्तन का एक प्रमुख साधन (tool) है। जब वस्तुओं के एक समूह जिनमें समान विशेषताएं होती हैं, के प्रति व्यक्ति एक ही तरह की अनुक्रिया करता है, तो इसे ही संप्रत्यय कहा जाता है। जैसे, यदि कोई बच्चा अपने घर के कुत्ते, दोस्त के कुत्ते तथा सड़क पर के कुत्ते को देखकर ‘कुत्ता’ शब्द का प्रयोग करता है तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि बच्चे में कुत्ता का संप्रत्यय (concept) विकसित हो गया है। कुछ मनोविज्ञानियों द्वारा संप्रत्यय की दी गई परिभाषा इस प्रकार है –

हुल्स, डीज एवं इगेथ (Hulse, Deese and Egeth) के अनुसार:
“कुछ नियमों द्वारा कई गुणों का आपस में मिलना ही संप्रत्यय कहलाता है।” (A concept is a set of features connected by some rules)

भूटानी तथा उनके सहयोगियों (Bhutaini etal) के अनुसार:
“वस्तुओं या घटनाओं का वर्ग या श्रेणी जिसे एक नियम द्वारा संयोजित किया जाता है जिससे संगत विशेषताओं का उल्लेख होता है, संप्रत्यय कहलाता है।” (A concept is a category or class of objects or events grouped or combined on the basis of a rule which specifies the relevant features) यदि हम इन परिभाषाओं का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि संप्रत्यय में निम्नांकित दो महत्त्वपूर्ण तथ्य सम्मिलित होते हैं –

1. वस्तुओं या घटनाओं के गुण या विशेषताओं का समूह (Set of features of objects or events):
संप्रत्यय के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि वस्तुओं में कुछ विशेषताएँ या गुण हों। इस तरह के गुण या विशेषता के दो लक्ष्य होते हैं-पहला गुण ऐसा होना चाहिए जो समान प्रकार की वस्तुओं की समता दिखा सके तथा दूसरा गुण ऐसा होना चाहिए जो असमान वस्तुओं की विषमता (constrast) दिखलाएँ। जैसे, यदि यह कहा जा सकता है कि घास हरी है तो यहाँ हरापन (greenish) जो विशेषता है, उसमें उक्त दोनों गुण सम्मिलित है। हरापन के गुण को निश्चित रूप से हम अन्य रंगों से पृथक कर पा रहे हैं तथा यह हरापन अन्य दूसरी वस्तुओं के हरापन से भिन्न भी है।

2. नियम (Rule):
संप्रत्यय के निर्माण के लिए यह भी आवश्यक है कि वस्तु या वस्तुओं की उपलब्ध विशेषताएँ या गुण आपस में कुछ विशेष नियम द्वारा संबंधित हों। ऐसे नियम के दो सामान्य प्रकार हैं-गणितीय नियम (Algorithmic rule) तथा स्वतः शोध नियम (Heuristic rule)। गणितीय नियम वैसे नियम को कहा जाता है जिसका उपयोग करने से (feedback) के आलोक में प्रयोज्य अपने मन में जो प्राक्कल्पना विकसित करता है, उसकी संपुष्टि करता है या उसे अस्वीकृत (reject) करता है।

उपर्युक्त दोनों विधियों में चयन विधि द्वारा संप्रत्यय का निर्माण तुलनात्मक रूप से अधिक आसान होता है। विधि चाहे जो भी हो, मनोवैज्ञानिकों का सामान्य निष्कर्ष यह रहा है कि सही उदाहरण (correct examples) से प्रयोज्यों को गलत उदाहरणों (incorrect examples) की तुलना में अधिक संगत सूचनाएँ प्राप्त होती है और संप्रत्यय सीखने में उनसे तीव्रता आती है। निष्कर्ष यह है कि संप्रत्यय-निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जो कुछ नियमों द्वारा निर्धारित होती है। प्रयोगात्मक अध्ययनों से यह पता चलता है कि संप्रत्यय-निर्माण में गुणों या विशेषताओं की खोज तथा उपर्युक्त नियमों की खोज के अलावा यदि चयन विधि का उपयोग होता है तो उससे संप्रत्यय निर्माण में काफी सहूलियत होती है।

प्रश्न 2.
चिन्तन से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चिन्तन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Thinking) मनुष्य विवेकशील प्राणी है। विचारशीलता के गुण के कारण ही मनुष्य विश्व के समस्त प्राणियों में प्रगतिशील और विचारवान माना जाता है। विचार एक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें संवेदना (Sensation), प्रत्यक्षीकरण (Perception), ध्यान (Attention),स्मरण (Memory) एवं कल्पना (Imagination) का समावेश होता है।

विचार की क्रिया का प्रारम्भ व्यक्ति के सम्मुख किसी समस्या के उपस्थित होने के साथ होता है। किन्हीं समस्याओं के उपस्थिति होने पर व्यक्ति उसके समाधान के लिए विचार करना प्रारम्भ कर देता है। कभी-कभी विशेष परिस्थितियाँ ऐसी समस्या उपस्थित करती हैं, जिनके विपरीत व्यक्ति अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर सफलतापूर्वक अभियोजन करने में असमर्थ होता है।

जब व्यक्ति इन्हीं समस्याओं का समाधान करने का विचार करता है तो समाधान करने की क्रिया चिन्तन कहलाती है। इस प्रकार हम कह सकते है कि विचार अथवा चिन्तन व्यक्ति की समस्याओं का समाधान करने की मानसिक क्रिया प्रक्रिया है। इसमें व्यक्ति वस्तुओं के स्थान पर उनके प्रतीकों (Symbols) का मानसिक प्रहस्तन करता है। चिन्तन का सार तत्व का हल निकालता है, इसमें समस्याओं के समाधान के लिए प्रयत्न एवं भूल की विधि का उपयोग किया जाता है।

इसमें समस्याओं के समाधान के लिए प्रयत्न एवं भूल की विधि का उपयोग किया जाता है। आविष्कार में चिन्तन की प्रक्रिया में विश्लेषण एवं संश्लेषण दोनों प्रकार के तत्वों का समावेश किया जा सकता है। अत: यह स्पष्ट है कि चिन्तन की प्रक्रिया है जो किसी समस्या के उपस्थित होने पर उसके समाधान के लिए प्रयुक्त की जाती है। चिन्तन के अर्थ को समझने के पश्चात् इसके लिए प्रस्तुत की गई विभिन्न परिभाषाओं का अवलोकन करना भी आवश्यक है। ‘चिन्तन’ की मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

1. वारेन की परिभाषा:
वारेन के अनुसार, “विचार किसी व्यक्ति के सम्मुख उपस्थित समस्या के समाधान के लिए निर्णायक प्रवृत्ति है जो कुछ अंशों में प्रयत्न एवं भूल से असंयुक्त प्रतीकात्मक स्वरूप की प्रत्ययात्मक प्रक्रिया है।”

2. कौलिन्स एवं ड्रेवर (Collins and Drever) की परिभाषा:
“विचार को जीव के वातारण के प्रति चैतन्य समायोजन कहा जाता है।” इस प्रकार विचार समस्त. मानसिक स्तर पर हो सकता है, जैसे प्रत्यक्षानुभव एवं प्रत्ययानुभव।

3. डीवी (Dewey) के अनुसार:
“विचार या चिन्तन क्रियाशील, यत्नशील और सावध नीपूर्वक की गई समस्या की विवेचना है जिसके द्वारा उपस्थित समस्या का समाधान है।”

4. बी0 एन0 झा (B.N. Jha) की परिभाषा:
“विचार सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें मस्तिष्क विचार की गति का नियंत्रण एवं नियमन एक सप्रयोजित ढंग से करता है।”

5. रॉस के अनुसार:
“चिन्तन ज्ञानात्मक रूप में एक मानसिक प्रक्रिया है।”

6. वुडवर्थ (Woodworth) के अनुसार:
“चिन्तन का ढंग है जिसके द्वारा किसी बाधा पर विजय पाई जाती है।”

7. एल. मन (L. Munn) के शब्दों में:
“चिन्तन प्रत्यात्मक अनुक्रमिक जागृति है।”

चिन्तन के तत्व (Factors of Thinking):
चिन्तन की उपरोक्त परिभाषाओं के अनुसार चिन्तन की प्रक्रिया में निम्नलिखित तत्व होते हैं –

1. समस्या का उपस्थित होना:
विचार की प्रक्रिया का प्रारम्भ किसी भी समस्या की उपस्थिति से होता है। अतः चिन्तन का प्रथम तत्व ‘समस्या’ है अर्थात् चिन्तन की प्रक्रिया तभी आरम्भ होती है जब व्यक्ति के सम्मुख वातावरण से अभियोजन संबंधी कोई समस्या उपस्थित होती है।

2. समस्या समाधान हेतु अनेक विकल्प:
समस्या के उपस्थित होने पर व्यक्ति की चिन्तन प्रक्रिया प्रारम्भ होती है तथा उस समस्या के समाधान के अनेक तरीके उसके सामने आ जाते हैं जिनमें से उसे विचारपूर्वक एक का चुनाव करना होता है।

3. विकल्पों का एक लक्ष्य की ओर निर्देशन:
जब समस्या के समाधान के अनेक तरीके सम्मुख होते हैं तब व्यक्ति उन सभी तरीकों को एक लक्ष्य की ओर निर्देशित करता है। ताकि उन सबको एक ही लक्ष्य की ओर मोड़ देने से समस्या का समाधान हो सके।

4. प्रयत्न एवं भूल विधि का प्रयोग:
चिन्तन की प्रक्रिया में प्रयत्न एवं भूल विधि का प्रयोग एक महत्वपूर्ण तत्व है। समस्या समाधान करने के लिए व्यक्ति अनेक विकल्पों में से सही हल प्राप्त करने के लिए ‘प्रयत्न एवं भूल’ के कारण प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ही वह अपनी समस्या को सुलझाने के लिए अनेक प्रकार के सम्भावित साधन खोज निकालता है।

5. सम्भावित निर्णय प्राप्त करना:
चिन्तन प्रक्रिया समस्या की उपस्थिति से प्रारम्भ होती है। उसके समाधान के सम्भावित हल के निर्णय के साथ इसका समापन होता है। व्यक्ति प्रयत्न एवं भूल विधि का प्रयोग करके उसमें की गई भूलों पर मन ही मन कुछ बातचीत करता है तथा समस्या के समाधान का सम्भावित निर्णय ले लेता है।

वुडवर्थ द्वारा प्रतिपादित चिन्तन के तत्व-उपरोक्त चिन्तन के तत्वों के अतिरिक्त प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ने निम्नलिखित चिन्तन के तत्वों का उल्लेख किया है –

  • किसी उद्देश्य की ओर उन्मुख होना (Orientation towards a goal)।
  • उद्देश्य प्राप्ति के लिए इधर-उधर मार्ग खोजना (Seeking this way or that for realising the goal)।
  • पूर्व निरीक्षित किय हुए तत्वों का पुनः स्मरण करना (Recell of previously observed facts)।
  • स्मृति तथ्यों को नवीन नमूने में बाँधनी (Grouping these recalled facts in new pattern)।
  • मन ही मन बातचीत करना तथा हरकत करना (Inner speech movements and gestures)।

अतः संक्षेप में हम कह सकते हैं कि विचार एक मानसिक प्रक्रिया है, जिसमें किसी समस्या का समाधान किया जाता है। इसके मुख्य तत्व हैं समस्या की उपस्थिति, समस्या के समाधान के मार्ग खोजना, पूर्व निरीक्षित तत्वों का पुनः स्मरण, प्रयत्न एवं भूल विधि का प्रयोग तथा सम्भावित निर्णय लेना।

चिन्तन के प्रकार (Kinds of Thinking):
साधारणतः मानव-प्रयत्नों द्वारा चलने वाली मानसिक क्रिया को चिन्तन कहा जाता है। किन्तु मनोवैज्ञानिकों ने चेतना के स्तर पर होनेवाली क्रिया से भिन्न भी चिंतन की सम्भावना को माना है। उन्होंने ‘चिन्तन’ के चार प्रकार बताये, जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार है –

(i) प्रत्यक्षात्मक विचार (Perceptual Thinking):
प्रत्यक्षात्मक चिन्तन एक निम्न कोटि का चिन्तन होता है। इसमें व्यक्ति की संवेदना और प्रत्यक्षीकरण ज्ञान के काम में आते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इसमें भी पूर्व अनुभवों का उपयोग किया जाता है, क्योंकि उन्हीं के आधार पर व्यक्ति कुछ निश्चय करता है। पशुओं का चिन्तन केवल प्रत्यक्षात्मक चिन्तन तक ही सीमित होता है।

उदाहरणार्थ-एक कुत्ता रोटी पाने के लिए घर में घुसता है, किन्तु घर के स्वामी को हाथ में डण्डा लेकर आता देखकर भाग खड़ा होता है। कुत्ते के भागने के कारण उसका प्रत्यक्षात्मक चिन्तन ही है जिसमें उसका पूर्व अनुभव भी सम्मिलित होता है। उसी के आधार पर कुत्ता यह निश्चय करता है कि घर के स्वामी ने इसी प्रकार से उसके घर में घुसने पर पूर्व समय में भी डण्डा मारा था, इसलिए आज भी मारेगा और वह भाग खड़ा होता है। पशुओं के अतिरिक्त बच्चों का चिन्तन भी प्रत्यक्षात्मक होता है।

(ii) कल्पनात्मक विचार (Imaginative Thinking):
कल्पनात्मक विचार अनुभवों के द्वारा मस्तिष्क में अंकित प्रतिमाओं के आधार पर किये जाते हैं। इस प्रकार के चिंतन में प्रत्यक्ष अनुभव का अभाव रहता है। यह चिन्तन बालकों द्वारा भी किया जाता है। इस प्रकार के चिंतन में प्रत्यक्षीकरण एवं प्रत्ययों का अभाव रहता है। इसमें केवल स्मृति का ही सहयोग रहता है।

(iii) प्रत्ययात्म विचार (Conceptual Thinking):
यह विचार प्रत्ययों के सहारे चलता है। इस प्रकार के विचार में कल्पनाओं का स्थान प्रत्यय ग्रहण कर लेते हैं। पदार्थों की साक्षात् अनुभूति, विश्लेषण, वर्गीकरण तथा नामकरण द्वारा प्रत्यय का ज्ञान सम्भव होता है। इस प्रकार पुराने अनुभवों के आधार पर भविष्य पर ध्यान रखते हुए किसी निश्चय पर पहुँचना प्रत्ययात्मक चिन्तन कहलाता है।

(iv) तार्किक विचार (Logical Thinking):
किसी जटिल समस्या के उपस्थित होने पर अपने अनुभवों के आधार पर तर्क-वितर्क द्वारा समस्या का समाधान करना तार्किक चिन्तन होता है।

प्रश्न 3.
मैस्लो के आत्म-सिद्धि सिद्धांत की व्याख्या करें।
उत्तर:
मैस्लों ने मानव व्यवहार को चित्रित करने के लिए आवश्यकताओं को एक पदानुक्रम में व्यवस्थित किया है जिसे उन्होंने ‘आत्म-सिद्धि’ का सिद्धांत कहा है मैस्लो का मॉडल एक पिरामिड के रूप में संप्रत्यायित किया जा सकता है जिसमें पदानुक्रम के तल में समूह में जैविक आवश्यकताएँ है जो कि जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक है-जैसे भूख जब इन आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती हैं तभी व्यक्ति में खतरे से सुरक्षा की आवश्यकता उत्पन्न होती है इसके पश्चात दूसरों का उनसे प्रेम करना तथा उनका प्रेम प्राप्त करना आता है जब व्यक्ति इस आवश्यकता को पूरा करने में सफल हो जाता है तब हम स्वयं आत्म-सम्मान तथा दूसरे से सम्मान प्राप्त करने की ओर बढ़ते हैं।

इसके ऊपर आत्म-सिद्धि की आवश्यकता है जो एक व्यक्ति की अपनी सम्भाव्यताओं को पूर्ण रूप से विकसित करने के अभिप्रेरण में लक्षित होती है। आत्म-सिद्ध व्यक्ति आत्म-जागरूक नवीनता एवं चुनौती के प्रति मुनत होता हैं ऐसे व्यक्ति में हास्य-भावना होती है तथा गहरे अंतवैयक्ति संबंध बनाने की क्षमता होती है। पदानुक्रम में निम्न स्तर की आवश्यकताएं जब तक संतुष्ट नहीं हो जाती तब तक प्रभावी रहती हैं एकबार जब वे पर्याप्त रूप में संतुष्ट हो जाती है तब उच्च स्तर की आवश्यकताएँ व्यक्ति के ध्ययन एवं प्रयास में केन्द्रित हो जाती हैं। किंतु यह उल्लेखनीय है कि अधिकांश व्यक्ति निम्न-स्तर की आवश्यकताओं के लिए अत्यधिक सरोकार होने के कारण सर्वोच्य स्तर तक पहुंच ही नहीं पाते।

प्रश्न 4.
तर्कणा के अर्थ एवं स्वरूप का वर्णन करें।
उत्तर:
तर्कणा एक प्रकार का वास्तविक चिन्तन (realistic thinking) है। व्यक्ति तर्कणा के माध्यम से अपने चिन्तन को क्रमबद्ध (systematic) बनाता है तथा तर्क-वितर्क के आधार पर एक निश्चित निष्कर्ष पर है पहुँचता है। रेबर (Reber) ने तर्कणा के दो अर्थ बताए हैं – सामान्य अर्थ में, तर्कणा एक प्रकार का चिन्तन है जिसकी प्रक्रिया तार्किक (logical) तथा संगत (coherent) होती है। विशिष्ट अर्थ में (specifically) तर्कणा समस्या समाधान व्यवहार है जहाँ अच्छी तरह से निर्मित प्राक्कल्पनाओं की क्रमबद्ध रूप से जांच की जाती है तथा समाधान तार्किक ढंग से निगमित (deduce) किया जाता है।

रेबर के इस विचार से यह स्पष्ट हो जाता है कि तर्कणा में व्यक्ति किसी घटना या विषय के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क करते हुए एक परिणाम पर पहुँचता है। उदाहरणार्थ, मान लिया जाए कि कोई छात्र कमरे में टेबुल लैम्प की रोशनी में पढ़ रहा है। अचानक रोशनी बुझ जाती है। अब छात्र के सामने वह समस्या उठ खड़ी होती है कि रोशनी कहाँ से आए कि पढ़ाई जारी रखा जा सके। छात्र अपने मन में कई तरह के तर्क करते हुए चिन्तन कर सकता है। यह सोच सकता है कि संभवतः बिजली मीटर के बगल का फ्यूज तार (Fuse wire) जल गया हो। फिर यह सोच सकता है कि चूंकि बगल के कमरे का बल्ब जल रहा है, अत: जरूर ही लैम्प का बल्ब फ्यूज कर गया है।

अत: छात्र बल्ब की जाँच करेगा और उसके बाद यदि वह यह पाता है कि बल्ब भी ठीक है तो स्पष्टतः वह इस निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि टेबुल लैम्प का स्विच (switch) खराब हो गया है। परन्तु जब वह यह पाता है कि स्विच भी ठीक है तो इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि टेबुल लैम्प का होल्डर (holder) जिसमें बल्ब लगा है, वहीं कुछ खराबी होगी। इस उदाहरण में तर्कणा की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से झलकती है। छात्र क्रमबद्ध रूप से तर्क करते हुए एक खास परिणाम पर पहुँचता है। इससे तर्कणा के स्वरूप (nature) के बारे में हमें निम्नांकित तथ्य प्राप्त होते हैं –

  1. तर्कणा चिन्तन एक प्रक्रिया है।
  2. तर्कणा में क्रमबद्धता (systematization) पाई जाती है।
  3. तर्कणा में व्यक्ति पक्ष-विपक्ष में तर्क करते हुए एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचता है।

तर्कणा के प्रकार (Kinds of reasoning) मनोवैज्ञानिकों ने तर्कणा के निम्नांकित चार प्रकार बताए हैं –

1. निगमनात्मक तर्कणा (Deductive reasoning):
निगमनात्मक तर्कणा वैसी तर्कणा को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति पहले से ज्ञात नियमों एवं तथ्यों के आधार पर एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश करता है। इस ढंग की तर्कणा मानव एवं पशु दोनों ही द्वारा की जाती है। निगमनात्मक तर्कणा इस तरह के न्यायवाक्यों (syllogism) के आधार पर निकाले गए परिणाम में स्पष्ट रूप से झलकता है जहाँ जहाँ धुआँ होता है, आग होती है।

पहाड़ पर धुआँ है।
∴ पहाड़ पर आग है।
सभी मनुष्य मरणशील है।
∴ मोहन एक मनुष्य है।
मोहन मरणशील है।

2. आगमनात्मक तर्कणा (Inductive reasoning):
आगमनात्मक तर्कणा वैसी तर्कणा को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति दिए तथ्यों में अपनी ओर से नये तथ्य जोड़कर एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचता है। जबतक व्यक्ति इन नए तथ्यों को अपनी ओर से उसमें नहीं जोड़ता, अर्थात् इन तथ्यों का सर्जन (create) नहीं करता, समस्या का समाधान नहीं हो पाता है। रूक (Ruch) ने आगमनात्मक चिन्तन को परिभाषित करते हुए कहा है, “आगमनात्मक प्रस्तुत आंकड़ों से सीधे ज्ञात नहीं कर लिया जा सकते थे।” इस तरह की तर्कणा सर्जनात्मक चिन्तक (Creative thinkder) द्वारा अधिक प्रयोग में लाई जाती है।

3. आलोचनात्मक तर्कणा (Inductive reasoning):
इस प्रकार की तर्कणा में व्यक्ति किसी वस्तु, घटना के बारे सोचते समय या किसी समस्या का समाधान करते समय प्रत्येक उपाय के गुण एवं दोष की परख कर लेता है। यह प्रत्येक विचार (idea) की प्रभावशीलता (effectiveness) को ठीक ढंग से जाँच करके ही एक अन्तिम निर्णय लेता है। दूसरों द्वारा किसी तथ्य या विचार को दिए जाने पर भी उसे वह हू-ब-हू स्वीकार नहीं करता। उसके गुण-दोष की परख के बाद ही वह किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचता है।

4. सादृश्यवाची तर्कणा (Analogical reasoning):
इस तरह की तर्कणा में उपमा के आधार पर तर्क-वितर्क करते हुए चिन्तक किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है। जैसे, मान लिया जाय कि शिक्षक छात्र से यह प्रश्न पूछते हैं कि रानी लक्ष्मीबाई राणा प्रताप के समान एक वीरांगना कैसे थी? इस समस्या के समाधान के लिए छात्र यह सोच सकता है कि रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से हार नहीं मानी थी और ठीक उसी तरह राणा प्रताप ने भी सम्राट अकबर से हार स्वीकार करना अपने मान के खिलाफ समझा था।

सचमुच राणा प्रताप जैसे वीर पुरुष के समान ही रानी लक्ष्मीबाई भी एक मशहूर वीरांगना थी। इस तरह के चिन्तन को सादृश्यवाची तर्कणा कहा जाता है। इस तरह हम देखते हैं कि तर्कणा (reasoning) के कई प्रकार हैं शिक्षकों को चाहिए कि वे बालकों में इस ढंग से शिक्षा दें कि उनमें उपर्युक्त तरह की तर्कणा (reasoning) का स्वस्थ विकास (health development) बाल्यावस्था में ही हो जाए।

तर्कणा में महत्त्वपूर्ण कदम या सोपान (Important Steps in Reasoning):
तर्कणा (reasoning) की एक प्रमुख विशेषता यह बताई गई कि इनमें क्रमबद्धता (systematization) होती है। चिन्तक कुछ खास-खास सोपानों या चरणों से होते हुए क्रमबद्ध ढंग से किसी समस्या के समाधान के लिए चिन्तन करता है। अध्ययनों से यह पता चलता है कि तर्कणा में निम्नांकित प्रमुख सोपान (steps) होते हैं –

  • समस्या की पहचान (Recognition of problem)
  • आँकड़ों के संग्रहण (Collection of data)
  • अनुमान पर पहुँचना (Drawing inference)
  • अनुमान के अनुसार प्रयोग करना (To do experiment according to interfer ence)
  • निर्णय करना (Decision making)

प्रश्न 5.
समस्या समाधान की विधियाँ या उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:
किसी समस्या का समाधान करने के लिए व्यक्ति कई तरह की विधियों या उपायों को अपनाता है। इनमें से कुछ विधि ऐसी है जिसमें समय तो अधिक लगता है, परन्तु इससे समाधान निश्चित रूप से होता है। कुछ विधि ऐसी है जिसमें समय तो कम लगता है, परन्तु उनसे समस्या का समाधान होना निश्चित नहीं है। इस क्षेत्र में किये गए अध्ययनों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि समस्या समाधान की निम्नांकित दो विधियाँ हैं जो काफी महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. यदृच्छिक अन्वेषण विधि (radom search method or strategies)
  2. स्वतः शोध अन्वेषण विधि (beuristic search method or strategies)

स्वतः शोध अन्वेषण विधि के तहत निम्नांति तीना प्रविधियों पर सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है –

  1. साधन-साध्य विश्लेषण (means-ends analysis)
  2. पश्चगामी अन्वेषण (backward search)
  3. योजना विधि (planning stragege or methods)

इन सबों का वर्णन निम्नांकित है –

1. यदृच्छिक अन्वेषण विधि (Radom search method or strategies):
इस विधि में व्यक्ति समस्या के समाधान के लिए प्रयल एवं त्रुटि (trial and error) उपायों का सहारा लेता है। दूसरे शब्दों में, समस्या के समाधान के लिए वह एक तरह का यादृच्छिक अन्वेषण (random search) करता है जो दो प्रकार का होता है – अक्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण (unsystematic tandom search) तथा क्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण (syatematicrandom search) अक्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण में व्यक्ति समस्या के समाधान के लिए सभी तरह की संभावित अनुक्रियाओं को करता है, परंतु ऐसा करने में वह कोई निश्चित क्रम (sequence) को नहीं अपनाता है और न ही पहले किये गए प्रयासों का रेकार्ड ही रखता है।

क्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण में व्यक्ति समस्या के समाधान के लिए संभावित अनुक्रियाओं को एक क्रम में करता है तथा पहले की गई अनुक्रियाओं को रेकार्ड भी रखता है ताकि वह पहले की गलत अनुक्रियाओं को पुनः दोहरा न सके। क्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण द्वारा समस्या के समाधान में तुलनात्मक रूप से समय अधिक लगता है, परन्तु यह विधि अक्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण से अधिक प्रभावी (efficient) है।

जैसे, मान लिया जाय कि व्यक्ति को NSO वर्णविपयर्य (anagram) देकर उसके क्रम को ठीक करके सार्थक शब्दं बनाने के लिए कहा जाय, तो क्रमबद्ध अन्वेषण विधि के अनुसार वह ‘NSO’, फिर ‘ONS’ और अन्त में ‘SON’ बना लेगा और इस तरह से समस्या का समाधान कर लेगा। इससे इस बात का अंदाज लग ही जाता है कि यदि कोई लम्बा वर्णविपयर्य (anagram) जैसे सात या उससे भी अधिक अक्षरों का हो, तो क्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण द्वारा उसका समाधान करने में काफी समय लगेगा।

यादृच्छिक अन्वेषण चाहे क्रमबद्ध हो या अक्रमबद्ध हो, यह एल्गोरिथ्य (algorithm) का उदाहरण है। एल्गोरिथ्म एक ऐसी विधि है जो तुरंत या थोड़े समय के बाद किसी समस्या का समाधान पाने की गारंटी दिलाता है। एल्गोरिथ्म में समय तो थोड़ा अवश्य लगता है, परन्तु समस्या का समाधान निश्चित रूप से होता है। गुणा के नियम या कोई गणितीय सूत्र एल्गोरिथ्म के ही उदाहरण हैं जिनसे समस्या का समाधान या तो तुरंत या कुछ समय के बाद ही होता है, परन्तु होता है अवश्य।

2. स्वतः शोध अन्वेषण विधि (Heuristic search strategies or method):
इस विधि में व्यक्ति समस्या का समाधान करने के लिए सभी विकल्पों को नहीं ढूँढ़ता है बल्कि सिर्फ उन्हीं विकल्पों का चयन करके समस्या समाधान करने की कोशिश करता है जो उन्हें संगत (relevant) प्रतीत होते हैं।

रिटमैन (Reitman) के अनुसार ऐसी अन्वेषण विधि एक लघु नियम (short cut rule) के समान होती है जिससे किसी समस्या का समाधान जल्द हो जाता है। एल्गोरिथ्म की तुलना में इसमें कम समय लगता है। परन्तु जहाँ एल्गोरिथ्म में समस्या समाधान की गारंटी होती है, वहाँ स्वतः शोध विधि में समाधान की गारंटी तो नहीं होती है, परन्तु समाधान निकल आने की संभावना अधिक बनी होती है। इसके तहत आनेवाली तीन प्रविधियों का वर्णन निम्नांकित है –

1. साधन-साध्य विश्लेषण (Means-ends analysis):
साधन-साध्य विश्लेषण एक लोकप्रिय उपाय है जिसका उपयोग व्यक्ति किसी समस्या के समाधान में प्रायः करता है। इस तरह की विधि में व्यक्ति समस्या को कई छोटी-छोटी उपसमस्याओं (subproblems) में बाँट देता है। इनमें से प्रत्येक उपसमस्या का समाधान करके समस्या की मौलिक अवस्था (original state) तथा लक्ष्य अवस्था (goal state) के बीच के अंतर को कम कर दिया जाता है अर्थात् समस्या एवं समाधान की दूरी को कम कर दिया जाता है।

इस विधि की उपयोगिता कई क्षेत्रों जैसे शतरंज की समस्या समाधान में, गणितीय समस्याओं के समाधान में एवं कम्प्यूटर द्वारा किसी समस्या का समाधान करने के लिए कार्यक्रम तैयार करने में सिद्ध हो चुकी है। नीवेल एवं साईमन (Newell & Simon) द्वारा साधन-साध्य विश्लेषण का उपयोग कम्प्यूटर अनुरूपण (computer stimulation) उपागम में काफी किया गया है।

2. पश्चगामी अन्वेषण (Backward search):
वह एक ऐसा स्वतः शोध अन्वेषण (heuristic search) है जिसमें समस्या समाधान करने के ख्याल से व्यक्ति लक्ष्य अवस्था (goal sate) से अपना प्रयास प्रारंभ करता है और पश्चगामी दिशा में कार्य करते हुए प्रारंभिक मौलिक अवस्था तक आता है। इस तरह का अन्वेषण निम्नांकित दो परिस्थितियों में अधिक लाभप्रद साबित हुआ हैं –

(a) जब समस्या का स्वरूप कुछ ऐसा होता है जहाँ उसके लक्ष्य अवस्था में मौलिक अवस्था की तुलना में अधिक सूचनाएँ सम्मिलित होती हैं।
(b) जब समस्या का स्वरूप कुछ ऐसा होता है कि उसके समाधान के लिए प्रयास अग्रगामी (forward) तथा पश्चगामी (backward) दोनों ही दिशा में संभव है।

पश्चगामी अन्वेषण शैक्षिक समस्याओं एवं मनोरंजन समस्याओं के समाधानों में अक्सर किया जाता है। जैसे, मान लिया जाए कि कोई व्यक्ति मानव भूल-भुलैया (human maze) में सही पथ की खोज कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में वह लक्ष्य बिन्दु से सही पथ की ओर आगे बढ़ते हुए कुछ दूर तक आने पर वहाँ उसे छोड़कर वह फिर प्रारंभ बिन्दु से सही पथ की ओर आगे बढ़ते हुए उस बिन्दु पर आकर रुक सकता है जहाँ वह लक्ष्य बिन्दु से आगे चलते हुए आकर रुका था। इस तरह से भूल-भूलैया में सही पथ की खोज निकाल सकने में समर्थ हो पायेगा।

3. योजना विधि (Planning strategy or method):
इस विधि द्वारा समस्या के समाधान में व्यक्ति समस्या को मुख्य रूप से दो भागों में बाँट देता है-साधारण पहलू (simple aspect) तथा जटिल पहलू (complex aspect)। पहले व्यक्ति साधारण पहलू का समाधान करता है तथा जटिल पहलू को छोड़ देता है। उसके बाद वह जटिल पहलू की ओर अग्रसर होता है और फिर उसका समाधान करता है। योजना विधि का एक सामान्य प्रकार सादृश्यता (analogy) है। सादृश्यता में पहले की समस्या के समाधान को ही वर्तमान समस्या के समाधान में एक मदद के रूप में उपयोग किया जाता है।

जैसे, मान लिया जाय कि एक शिशु ने अंग्रेजी के शब्द ‘समर्थ’ का उच्चारण करना सीखा है। यदि वह बाद में ‘असमर्थ’ शब्द को कहीं देखता है तो उसे भी वह ‘समर्थ’ ही करता है। स्पष्टतः यहाँ शिशु दूसरी समस्या के समाधान में सादृश्यता (analogy) का उपयोग कर रहा है जो एक तरह की योजना विधि है। कई मनोवैज्ञानिकों ने सादृश्यता की उपयोगिता का प्रयोगात्मक अध्ययन किया है और कहा है कि सादृश्यता की योजना कुछ विशेष अवस्था में ही सफल हो पाती है। स्पष्ट है कि समस्या समाधान की कई विधियाँ हैं जिनका उपयोग करके व्यक्ति समस्या का समाधान करता है तथा समस्या की मौलिक अवस्था तथा लक्ष्य अवस्था के बीच की दूरी को कम करता है।

प्रश्न 6.
चिंतन के स्वरूप का विवेचन करें तथा चिंतन में विन्यास की भूमिका की व्याख्या करें।
उत्तर:
चिंतन का स्वरूप-चिंतन का अर्थ होता है सोचना। जब हमारे सामने कोई समस्या उत्पन्न होती है तो हम उसको हल करने के लिए सोच-विचार करने लगते हैं। किसी समस्या के बारे में सोच-विचार करने की क्रिया को ही चिंतन कहते हैं। एक चालक (Driver) की गाड़ी एकाएक रुक जाती है और गाड़ी स्टार्ट नहीं होती है तो यह घटना उसके लिए एक समस्या बन जाती है। समस्या का अर्थ है उस घटना से या परिस्थिति से जिसका कोई तात्कालिक हल उपलब्ध न हो। (“Generally speaking a problemexists when there is no available answer to some equation”) अब वह गाड़ी के बन्द होने के संभव कारणों तथा इस स्टार्ट करने के उपायों के संबंध में सोचने लगता है।

सोचने की यह क्रिया तबतक चलती है जबतक कि समस्या का समाधान नहीं हो जाता है। जैसे ही गाड़ी स्टार्ट हो जाती है इस संबंध में चालक में सेचने की क्रिया समाप्त हो जाती है और समस्या समाधान के मिल जाने के साथ ही इसका अन्त हो जाता है। इसलिए चिंतन को समस्या समाधान प्रक्रिया (problem solving) भी कहा जाता है। चिंतन या समस्या समाधान में मानसिक तत्परता का बहुत बड़ा हाथ होता है। किसी समस्या के समाधान के पहले व्यक्ति एक मानसिक तैयारी करता है कि वह अपनी समस्या के समाधान के लिए किस प्रकार का व्यवहार करे। उसकी इसी मानसिक प्रक्रिया को तत्परता कहते हैं। चैपलिन (Chaplin, 1975) के अनुसार तत्परता (se.) प्राणी की वह अवस्था अस्थायी है जो उसे एक विशेष ढंग से प्रतिक्रिया करने के लिए तत्पर कर देती है।

इसी प्रकार, हिल्गार्ड आदि के अनुसार तत्परता का अर्थ किसी कार्य-विशेष या अनुभव के प्रति एक प्रारंभिक आयोजन की तैयारी है। तत्परता का व्यवहार दिशा (Direction) के अर्थ में भी किया जाता है। मायर (Maier) ने तत्परता का व्यवहार इसी अर्थ में किया है। उनके अनुसार समस्या का समाधान करते समय सम्भवतः प्राणी अनुमान करता है कि इस समस्या का समाधान अमुक दिशा में व्यवहार करने से हो सकता है। दूसरे शब्दों में, वह अनुमान करता है कि लक्ष्य अमुक दिशा में उपलब्ध हो सकता है। तत्परता की उत्पत्ति कभी तो अभ्यास करने से और कभी प्रयोगकर्ता द्वारा दिये गये अभ्यास से होती है। अधिक समय तक अभ्यास करने से प्राणी में एक विशाल तत्परता उत्पन्न हो जाता है। इसी तरह अध्ययन के समय प्रयोगकर्ता कुछ विशेष निर्देश देता है, जिससे प्रयोज्य में एक खास तरह की तत्परता उत्पन्न हो जाती है।

चिंतन या समस्या समाधान में तत्परता का महत्त्वपूर्ण स्थान देखा जाता है। जब तत्परता सही होती है तो समस्या का समाधान सरल बन जाता है। लेकिन गलत तत्परता (wrong set) के कारण समस्या का समाधान कठिन तथा विलम्बित हो जाता है। अत: तत्परता से एक ओर समस्या समाधान में सहायता मिलती है तो दूसरी ओर इससे हानि भी होती है। हम यहाँ तत्परता के दोनों पक्षों की अलग-अलग व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं, जो इस प्रकार है –

(A) तत्परता के लाभ (Advantage of set):
तत्परता का धनात्मक मूल्य सरलीकरण के रूप में देखा जाता है। समस्या का समाधान करते समय जब प्राणी में सही तत्परता का निर्माण होता है तो प्राणी को सही प्रतिक्रिया करने तथा गलत प्रतिक्रिया से बचने का लाभ होता है। तत्परता के धनात्मक मूल्य को प्रमाणित करने के लिए एक प्रारंभिक अध्ययन वाट ने किया। उन्होंने अपने अध्ययन में देखा कि नियंत्रित समूह की अपेक्षा प्रयोगात्मक समूह के प्रयोज्यों को अपनी समस्या के समाधान में अधिक सुविधा का अनुभव हुआ। इसकी व्याख्या करते हुए वाट ने कहा कि प्रयोगकर्ता समूह के प्रयोज्यों में अभ्यास के कारण सही तत्परता उत्पन्न हुई जिससे समस्या के समाधान में आसानी हुई। मेयर ने भी वाट के प्रयोग को थोड़े परिमार्जन के साथ दोहराया और यह निष्कर्ष निकाला कि समस्या समाधान में सही तत्परता से काफी सुविधा होती है। इन प्रयोगों में अंत:निरीक्षण का व्यवहार किया गया।

मोसर (Moier) ने अपने अध्ययन में देखा कि सही दिशा का ज्ञान हो जाने पर समस्या का समाधान बहुत आसान हो जाता है। लेकिन, यदि प्राणी गलत दिशा का अनुमान लगा लेता है और उसे अपनी दिशा में परिवर्तन लाना पड़ता है और सभी समस्या हल हो जाता है। उन्होंने कई समस्याओं पर अध्ययन करके अपनी इस परिकल्पना को प्रमाणित करने का प्रयास किया। हम यहाँ सिर्फ एक समस्या से संबंधित प्रयोग का उल्लेख करना चाहेंगे। इसे दोलक समस्या कहते हैं। प्रयोज्यों को लड़की की सट्टी (Strips), शिकन्जे, तार, चित्रांकन, एक भारी टेबुल आदि सामाग्रियाँ दी गईं।

प्रयोज्यों से इन सामग्रियों द्वारा दो दोलक बनाने तथा इस प्रकार झुलाने के लिए कहा गया कि वे निश्चित स्थानों पर चिन्ह बना सकें। एक समूह के प्रयोज्यों को सही दिशा का संकेत दे दिया गया। प्रयेगकर्ता ने उनसे कहा कि छत में दो कीलों के सहारे दोलक को लटका सके तो समस्या आसान बन जाएगी। दूसरे समूह के प्रयोज्यों को किसी तरह की दिशा का संकेत नहीं दिया गया। देखा गया कि पहले समूह के लगभग 35% और दूसरे समूह के केवल लगभग 2% प्रयोज्यों ने अपनी समस्या का समाधान किया, हालाँकि दोनों समूहों के प्रयोज्यों को समस्या समाधान के लिए आवश्यक पूर्वअनुभव समान था। इससे स्पष्ट हुआ कि सही तत्परता मिल जाने पर समस्या का समाधान आसान बन जाता है।

वीवर एवं मैडेन (Weaver and Madden, 1949) ने मेयर के प्रयोग को दोहराया और देखा कि कुछ प्रयोज्यों में प्रयेगकर्ता से बिना किसी संकेत मिले भी सही दिशा या तत्परता उत्पन्न हो गई। देखा गया कि किसी खास दिशा में प्रयास करने पर प्रयोज्यों को सफलता की कोई आशा नजर नहीं आई तो वे अपने पहले प्रयास को छोड़कर दूसरी दिशा में प्रयत्नशील हो गये और अंत में सफलता मिल गई। चाहे जो भी हो, इस अध्ययन से भी इतना अवश्य ही स्पष्ट हो जाता है कि सही तत्परता मिल जाने पर समस्या को हल करने में आसानी होती है।

(B) तत्परता की हानि (Disadvantages of set):
गलत तत्परता अथवा गलत दिशा से समस्या समाधान में बड़ी हानि होती है। इसे तत्परता का अवरोधक प्रभाव अथवा नकारात्मक मूल्य कहते हैं। इस प्रकार की तत्परता उत्पन्न होने पर प्राणी गलत दिशा में प्रयास करने लगता है, जिससे समस्या का समाधान कठिन हो जाता है और समस्या तबतक समाप्त नहीं हो पाता है जबतक कि वह उस तत्परता को छोड़कर सही दिशा में सक्रिय नहीं होता है। डंकर ने तत्परता के इस अवरोधक प्रभाव को कार्यात्मक स्थिरता की संज्ञा दी है।

कारण यह है कि गलत तत्परता के उत्पन्न हो जाने पर प्राणी एक ही दिशा में स्थिर होकर व्यवहार करने लगेंगे। वह दूसरी दिशा के प्रति उदासीन बन जाता है। वह समस्या के समाधान के दूसरे उपायों के प्रति मानो अंधा बन जाता है। रेबर (Rebber, 1987) ने भी कहा कि कार्यात्मक स्थिरता के कारण व्यक्ति को समस्या का विकल्पी समाधान सुझायी नहीं देता है। इस तरह गलत तत्परता वास्तव में समस्या के समाधान में बाधा उत्पन्न करने लगती है।

गलत तत्परता के बाधक प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए एडमसन ने एक प्रयोग का उल्लेख इस प्रकार किया है जिसमें प्रयोज्यों को मोमबत्ती, छोटे-छोटे दफ्ती बक्से, पाँच दियासलाई आदि सामग्रियाँ दी गयीं। उन्हें आदेश दिया गया कि वे मोमबत्तियों को उदग्र दीवार की सतह पर जलती हुई अवस्था में लगा दें। समस्या अधिक जटिल नहीं थी। करना था कि मोम के सहारे बक्से पर मोमबत्तियों को मोड़कर टाँगों की मदद से दीवार पर लगा दिया जाए। प्रयोगकर्ता समूह के प्रयोज्यों में कार्यात्मक स्थिरता उत्पन्न की गई। इसके लिए तीनों बक्सों में मोमबत्तियाँ, दियासलाई तथा टाँगों को भरकर प्रयोज्यों को दिया गया।

इससे उनमें यह विचार विकसित किया गया कि बक्से प्रायः पात्र का काम करते हैं, चबूतरा का नहीं। नियंत्रित समूह के प्रयोज्यों में इस तरह की कार्यात्मक स्थिरता उत्पन्न नहीं की गई। उन्हें तीन खाली बक्से आदि दिये गये बाकी सभी सामग्रियों को टेबुल पर रख दिया गया। देखा गया कि प्रयोगात्मक समूह के 29 प्रयोज्यों में से केवल 12(42%) प्रयोज्यों ने और नियंत्रित समूह के 28 प्रयोज्यों में से 24(86%) प्रयोज्यों ने सीमित समय (20 मिनट) के भीतर अपनी समस्या का समाधान किया।

इस अध्ययन से प्रमाणित होता है कि कार्यात्मक स्थिरता समस्या समाधान में बाधक है। तत्परता के अंधकार प्रभाव को और भी स्पष्ट करने के लिए लूचिन्स (Luchins) के प्रयोग का उल्लेख आवश्यक है। उन्होंने छात्रों पर प्रयोग किया। प्रयोज्यों को तीन प्रकार के बर्तन दिये गये और उनकी सहायता से एक निश्चित मात्रा में पानी नापने के लिए कहा गया। इस प्रकार की 11 समस्याएँ दी गईं जो अग्रांकित हैं –

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 8 चिंतन img 1

दो बर्तन वाली पहली समस्या की जानकारी प्रयोज्यों को दे दी गयी। इन्हें आदेश दे दिया गया कि वे 29 क्वार्ट बर्तन को पानी से भर लें और 3 क्वार्ट बर्तन से तीन बार पानी निकाल लें। इस तरह 29 क्वार्ट पानी मिल जाएगा। फिर दूसरी समस्या दी गयी कि तीन मिनट के बाद उसे भी समझा दिया गया। दूसरी समस्या से लेकर अंतिम समस्या तक (समस्या 9 को छोड़कर) का समाधान B, A, 2-C से सूत्र के आधार पर संभव था। परन्तु छठी समस्या के बाद सभी समस्याओं का समाधान सबसे बड़े बर्तन के बिना भी संभव था। देखना यह था कि तीन बर्तन कार्य-प्रणाली से उत्पन्न तत्परता के कारण प्रयोज्यों में दो वर्तन कार्य-प्रणाली के प्रति अंधकार प्रभाव विकसित होता है या नहीं।

देखा गया कि प्रयोगात्मक समूह के अधिकांश प्रयोज्य इस प्रभाव से प्रभावित हुए। दूसरी ओर नियंत्रित समूह को केवल प्रथम दो बर्तन समस्या की जानकारी दी गयी। फिर उन्हें 7 से 11 तक की समस्याओं को हल करने के लिए कहा गया। देखा गया कि उन्होंने केवल दो बर्तनों की सहायता से समस्याओं का समाधान किया। इस तरह स्पष्ट हुआ कि प्रयोगात्मक समूह के प्रयोज्यों में एक ही तत्परता पूरे प्रयोग में दृढ़ता के साथ जारी रही, जिस कारण समस्याओं का समाधान सुझायी नहीं पड़ा। लूचिन्स तथा लूचिन्स के अध्ययन में भी लगभग इसी तरह के निष्कर्ष मिले। इस प्रकार के कई दूसरे प्रयोग भी हूए हैं जिनमें यूज किलर, ग्रीनवर्ग तथा रिचमैन आदि के अध्ययन महत्त्वपूर्ण हैं। इन अध्ययनों से भी गलत तत्परता का अंधकार प्रभाव सिद्ध होता है।

प्रश्न 7.
समस्या समाधान की सैद्धान्तिक व्याख्या करें।
उत्तर:
समस्या समाधान की सैद्धान्तिक व्याख्या तीन दृष्टिकोणों के आधार पर की जा सकती है, जो निम्न प्रकार से है –

1. व्यवहारवादी व्याख्या (Behaviouristic Interpretation):
वाचिक अधिगम और अनुबन्धन संबंधी विवरण में पहले बताया जा चुका है कि अधिगम उद्दीपक और अनुक्रिया के बीच साहचर्य स्थापित होता है। व्यवहारवादियों ने इसी दृष्टिकोण को अपनाकर समस्या समाधान की व्याख्या निम्न चरणों के माध्यम से की है –

(i) अनुक्रिया-पदानुक्रम (Response Hierarchy):
समस्या समाधान की मेकेनिज्म का भाव यह है कि प्रयोज्य की अनेक अनुक्रियाएँ एक उद्दीपक-स्थिति से अनुधित होती हैं। इन अनुक्रियाओं में कोई अनुक्रिया एक ही उद्दीपक स्थिति से अधिक मात्रा में और कोई कम मात्रा में अनुबन्धित होती है। दूसरे शब्दों में, प्रयोज्य की अनेक अनुक्रियाएँ एक ही उद्दीपक स्थिति के साथ भिन्न-भिन्न साहचर्य प्रबलता स्तर पर संबंधित हो सकती हैं। अतः ऐसा माना जा सकता है कि ये अनुक्रियाएँ पदानुक्रम (Hierarchy) में व्यवस्थित होती हैं। इन अनुक्रियाओं को Habit Family Hierarchy भी कहा जाता है। उद्दीपक से संबंधित ये अनुक्रियाएँ समस्या समाधान के समय शीघ्र उत्पन्न होती हैं जिनका उद्दीपक स्थिति के साथ प्रबल साहचर्य रहा है।

(ii) अप्रकट प्रयल और भूल (Impact Trial and Error):
समस्या समाधान संबंधी प्रयोगों में मानव प्रयोज्य भी अप्रकट और भूल अनुक्रियाएँ करते हैं, परन्तु इनकी अनुक्रियाएँ बहुधा प्रतीकात्मक (Symbolic) स्तर पर होती हैं। उदाहरण के लिए, यदि प्रयोजन के सामने यह समस्या है कि डिब्बे और टेप की सहायता से किस प्रकार दीवार पर मोमबती लगा कर जलाये कि दीवार और फर्श पर जलती हुई मोमबत्ती का मोम न गिरे। सर्वप्रथम प्रयोज्य कल्पना और चिन्तन के माध्यम से उपाय सोचेगा और प्रत्येक उपाय की उपयोगिता की जाँच करेगा। उसे जो उपाय त्रुटिपूर्ण लगेगा उसे वह छोड़ देगा फिर चिंतन स्तर पर प्रयत्न करके अगला उपाय सोचेगा। इस तरह अन्त में प्रकट प्रयत्न और भूल के आधार पर चिन्तन करते-करते समस्या समाधान के अन्तिम उपाय पर पहुँच सकता है।

(iii) मध्यस्थताकारी सामान्यीकरण (Mediated Generalization):
व्यवहारवादियों ने समस्या समाधान की व्याख्या के लिए इस प्रक्रिया का भी उपयोग किया है। यह एक प्रकार का प्रत्यक्षपरक प्रक्रिया (Perceptual process) है। यह देखा गया है कि भौतिक उद्दीपक यद्यपि एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, परन्तु इनमें कुछ-न-कुछ मात्रा में अथवा किसी प्रकार की सामान्यता पायी जा सकती है। उदाहरण के लिए, गोभी, टमाटर और बैगन यद्यपि स्वाद, आकृति और रंग में एक-दूसरे से भिन्न हैं फिर भी हम इनका प्रत्यक्षीकरण सब्जी के रूप में करते हैं। यदि इन सब्जियों में से ऐसी सब्जी व्यक्ति के सामने उपस्थित होती है तो उस सब्जी से संबंधित अप्रकट अनुक्रिया दूसरी सब्जी के लिए उद्दीपन संकेत प्रस्तुत कर सकती है और दूसरी सब्जी के प्रति अनुक्रिया उद्दीपन हो सकती है।

(iv) व्यवहार खण्डों का समन्वय (Integration of Behaviour Segments):
समस्या समाधान की इस मेकेनिज्म में यह बताया गया है कि प्रयोज्य समस्या का समाधान विभिन्न अनुक्रियाओं को समन्वित करके भी करता है। प्रश्न यह उठता है कि जो प्रयोज्य इस मेकेनिज्म के आधार पर समस्या समाधान करते हैं तो उनके लिए समस्या क्यों उत्पन्न होती है। समस्या उत्पन्न होने के कारण यही प्रतीत होता है कि जिन व्यवहार खण्डों के समन्वय की सहायता से प्रयोज्य समस्या का समाधान कर रहा है, ऐसे व्यवहार खण्डों का समन्वय पहले कभी नहीं हुआ है। उपरोक्त समस्या समाधान की सैद्धांतिक व्याख्या जो व्यवहारवादियों ने प्रस्तुत की हैं, उनके अध्ययन से स्पष्ट होता है कि समस्या समाधान अधिगम का सरल रूप न होकर जटिल रूप है।

2. गेस्टाल्टवादी व्याख्या (Insight Mechanism):
गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों में कोहलर ने अधिगम के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण अध्ययन किए हैं जिनका संबंध समस्या समाधान से है। गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार प्रत्यक्षपरक पुनर्गठन (Perceptual Re-Organization) का परिणाम ही समस्या समाधान है। जब प्राणी स्थिति का प्रत्यक्षीकरण सही ढंग से नहीं करता है तभी उसके सामने समस्या उत्पन्न होती है। गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि प्राणी समस्यात्मक स्थिति का प्रत्यक्षीकरण अन्त:दृष्टि के आधार पर करता है। समस्या समाधान की व्याख्या गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के अनुसार निम्न प्रकार से है। जब प्राणी किसी लक्ष्य तक पहुँचने में बाधा अनुभव करता है तब समस्या उत्पन्न होती है।

समस्या के कारण व्यक्ति तनाव का अनुभव करता है। व्यक्ति तनाव को दूर करने के लिए कितना सक्रिय होकर लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रयास करता है। व्यक्ति लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कितना सक्रिय होगा अथवा तनाव दूर करने के लिए कितना सक्रिय होगा, इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें तनाव की मात्रा कितनी है और लक्ष्य उसके लिए कितना सार्थक, आवश्यक तथा कितना स्पष्ट है। प्राणी समस्यात्मक स्थिति का संगठन और पुनर्गठन तबतक करता रहता है जबतक प्राप्त कराने वाले समाधान का प्रत्यक्षीकरण की सूझ या अन्तर्दृष्टि (Insight) है। किसी समस्यात्मक स्थिति में प्राणी कितनी और किस प्रकार अन्तर्दृष्टि से समस्या का समाधान करेगा, वह मुख्यतः इस बात पर निर्भर करता है कि वह प्राणी किस जाति का है। क्योंकि भिन्न-भिन्न प्राणियों में तथा भिन्न-भिन्न जाति के प्राणियों में अन्तर्दृष्टि की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है।

3. सूचना-संसाधन सिद्धांत (Information Processing Theory):
सूचना-संसाधन सिद्धांत आधुनिक सिद्धांत है। यह व्याख्या व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों और गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों की समस्या समाधान की व्याख्या से पूर्णत: भिन्न है। इस सिद्धांत के समर्थकों का विचार है कि जिन नियमों के आधार पर इलेक्ट्रोनिक कम्प्यूटर्स कार्य करते हैं ठीक उन्हीं नियमों के आधार पर प्राणी का नाड़ी संस्थान कार्य करता है। विचार यह है कि व्यक्ति में समस्यात्मक स्थिति से सूचना ग्रहण कर सूचना के आधार पर कार्य (Operation) करने की क्षमता होती है।

प्रश्न 8.
चिन्तन के स्वरूप का वर्णन करें। चिन्तन और स्मरण में भेद बताएँ।
उत्तर:
सामान्य रूप से चिन्तन का अभिप्राय है-सोचना या विचार करना, परन्तु मनोविज्ञानवेता चिन्तन को केवल इतना ही नहीं समझते। उनका कथन है कि चिंतन का संबंध किसी न किसी समस्या से रहना चाहिए। इसे एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया जायेगा। हरिश की लड़की सुषमा ने इस वर्ष बी.ए. परीक्षा पास की है। वह विवाह करना चाहता है, परन्तु वर मिल नहीं रहा। ऐसी स्थिति में उसके सामने एक समस्या उपस्थित होती है कि-वह लड़की को एम.ए. में प्रवेश दिलाए या बी. एड. कराए? एम.ए. में दो वर्ष लगेंगे, व्यय भी बहुत होगा और एक समस्या पैदा हो जाएगी-वह यह कि लड़की से अधिक योग्यता का वर खोजना होगा। अतः यही अच्छा है कि लड़की को बी.एड. कराया जाय।

यदि एक वर्ष में वर नहीं मिला तो, वर न मिलने तक नौकरी करती रहेगी। इससे वह अपने दहेज के लिए भी कुछ धन जुटा लेगी। यह सोचकर वह अपनी बेटी सुषमा को बी.एड. में प्रवेश दिला देता है। समस्या समाधान हेतु सोचने की यह प्रक्रिया ‘चिन्तन’ कहलायेगी। भिन्न-भिन्न मनोवैज्ञानिकों ने चिन्तन की परिभाषा इन शब्दों में दी है वारेन-“चिन्तन एक ऐसी प्रत्ययात्मक क्रिया है, जो किसी समस्या से प्रारम्भ होती है और अन्त में समस्या के एक निष्कर्ष के रूप में समाप्त होती है।”

(“Thinking is an ideational activity, initiated by a problem and ultimately leading to a conclusion or solution of the problem.” Warren)

कॉलिन्स तथा ड्रेवर:
“किसी प्राणी या जीव का वातावरण के प्रति जो अचेतन समायोजन होता है, वही चिन्तन है। चिन्तन मानसिक प्रत्ययात्मक तथा प्रत्यक्षात्मक आदि कई स्तरों पर हो सकता है।”

(“Thinking may be described as the conscious adjustment of an organism to a situation. Thinking may obviously take place at all levels of mental, i.e. preceptual and conceptual level.”- Collins and Drever)

डिवी:
“चिन्तन को हम एक विश्वास या अनुमानित ज्ञात कह सकते हैं।”

(“Thinking is an active persistent and careful consideration of any belief or supposed form of knowledge.”- Dewey)

वुडवर्थ:
“चिन्तन करना एक कठिनाई को दूर करने का ढंग है।” (“Thinking is one way of overcoming an abstacle.”- Woodworth)

चिंतन वह जटिल मानसिक प्रक्रिया है जो किसी समस्या के उपस्थित होने पर प्रारम्भ होती है और उसके समाधान होने पर समाप्त हो जाती है। अब प्रश्न यह उठता है कि चिन्तन का स्वरूप क्या है? दूसरे शब्दों में चिन्तन में क्या व्यक्ति ‘प्रयत्न और भूल’ विधि का व्यवहार करता है या अन्तर्दृष्टि विधि का। इस सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों में एकमत का अभाव है। थॉर्नडाइक, पिल्सबरी, मार्गन आदि विद्वानों के अनुसार चिन्तन की क्रिया में व्यक्ति समस्या के समाधान के लिए प्रयत्न और भूल विधि का व्यवहार करता है और कोहलर, डंकन, यर्कस आदि विद्वानों का कहना है कि चिन्तन-क्रिया में व्यक्ति समस्या समाधान के लिए अंत:दृष्टि विधि का व्यवहार करता है।

थॉर्नडाइक का कहना है कि चिन्तन की प्रक्रिया में समस्या समाधान करने के लिए व्यक्ति के मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार आते रहते हैं। व्यक्ति उन विचारों पर क्रमश: सोचता है। जो समाधान गलत प्रतीत होता है उसे व्यक्ति एक-एक कर छोड़ता जाता है और जो समस्या समाधान से सम्बन्धित होता है उसे अपने चेतना केन्द्र में ग्रहण करता जाता है।

इस तरह के सम्भव समाधानों के सहारे समस्या को सुलझाने का क्रम कबतक जारी रहता है जबतक उसे समस्या के सही-सही समाधान करने का तरीका नहीं मिल जाता। उदाहरणार्थ, जब किसी विद्यार्थी के सामने गणित-सम्बन्धी कोई समस्या उपस्थित होती है तब उसके मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार उठते हैं। वह एक सूत्र के असफल होने पर दूसरे और दूसरे के बाद तीसरे का तबतक उपयोग करता है जबतक कि वह उसे हले करने में ठीक-ठीक समर्थ नहीं हो जाता। इस प्रकार स्पष्ट है कि चिन्तन में समस्या समाधान के लिए “प्रयत्न और भूल” को अपनाया जाता है।

परन्तु अन्तर्दृष्टि सिद्धांत के प्रतिपादन में मूलर महोदय का कहना है कि व्यक्ति समस्या समाधान में प्रयत्न और भूल विधि का नहीं, अपितु अन्तर्दृष्टि-विधि का व्यवहार करता है। व्यक्ति चिन्तन क्रिया में समस्या से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर क्रमशः विचार नहीं करता, वरन उन पर सामूहिक रूप से विचार करता है। ऐसा करने में अचानक व्यक्ति में उस परिस्थिति की अन्तर्दृष्टि उत्पन्न होती है और वह तुरन्त सही प्रक्रिया कर डालता है।

उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि व्यक्ति समस्या के समाधान में न सिर्फ प्रयत्न और भूल विधि का उपयोग करता है और न सिर्फ अन्तर्दृष्टि-विधि का, अपितु दोनों का उपयोग करता है। प्राय: व्यक्ति कठिन समस्याओं के उपस्थिति होने पर प्रयत्न और भूल का सहारा लेता है, लेकिन सरल समस्याओं के समाधान में विशेषकर अन्तर्दृष्टि विधि का ही उपयोग करता है। चिन्तन और स्मरण में अन्तर-चिन्तन और स्मरण दोनों ही जटिल ज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ हैं, क्योंकि प्रत्येक का विश्लेषण करने पर अनेक उपक्रियाएँ उपलब्ध होती हैं। फिर भी, दोनों में पर्याप्त भिन्नताएँ हैं जिनका अध्ययन इस प्रकार किया जा सकता है –

1. चिन्तन की क्रिया के लिए किसी समस्या का होना नितान्त आवश्यक है, परन्तु स्मरण में ऐसी बात नहीं है। स्मृति की क्रिया समस्याओं के अभाव में उत्पन्न हो जाती है। उदाहरणार्थ, किसी प्रश्न का उत्तर समझ में न आने पर एक समस्या उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण प्रश्नोत्तर के लिए चिन्तन क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। दूसरी ओर, बिना ऐसी समस्या के किसी दुर्घटना को देखकर हमें उसी प्रकार की अन्य दुर्घटनाओं का स्मरण हो जाता है।

2. चिन्तन की क्रिया में प्रतीकों के सहारे समस्या को सुलझाया जाता है। लेकिन स्मरण की क्रिया में हम अपनी पूर्वानुभूतियों को वर्तमान चेतना का विषय बनाते हैं। यही कारण है कि चिन्तन की क्रिया में समस्या समाधान के लिए अनेक प्रकार की शारीरिक और मानसिक प्रयत्न और भूल की क्रियाएँ होती हैं। परन्तु स्मरण में कोई विशेष प्रयत्न और भूल करने की आवश्यकता नहीं महसूस होती। उदाहरणार्थ, गणित-सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर समझ में न आना एक समस्या है, जिसके समाधान के लिए हम विभिन्न सूत्रों को व्यवहृत करते हुए प्रयत्न और भूल करते हैं। दूसरी ओर किसी पठित पाठ्य-विषय का प्रत्याह्वान करने में कोई विशेष प्रयत्न और भूल करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

3. चिन्तन एक मूल उद्देश्य को लेकर होता है। चिन्तन के क्षेत्र में जो भी हम मानसिक क्रिया करते हैं, वह उद्देश्य को सामने रखकर ही। लेकिन स्मृति के अन्तर्गत कोई उद्देश्य नहीं होता। दूसरी बात यह है कि चिन्तन का अंतिम लक्ष्य किसी समस्या का समाधान करना है जबकि स्मरण का लक्ष्य सीखे गये विषय को सफलतापूर्वक चेतना में लाना है। अतः इन दोनों के लक्ष्य में भी भिन्नता है। उदाहरणार्थ, हिसाब नहीं बनने की समस्या उत्पन्न होने पर जैसे ही हमें उसका उचित हल सूझ जाता है, चिन्तन समाप्त हो जाता है। दूसरी ओर, कविता का स्मरण करते समय हमारा यही लक्ष्य रहता है कि जहाँ तक हो सके पूरी कविता वर्तमान चेतना में चली आये।

4. चिन्तन की क्रिया नियंत्रित ढंग से होती है, परन्तु स्मरण की क्रिया में नियंत्रण का अभाव पाया जाता है। उदाहरणार्थ, जब एक इन्जीनियर पुल निर्माण करने के सम्बन्ध में चिन्तन करता है तो उसका सम्पूर्ण चिन्तन पुल-निर्माण सम्बन्धी विभिन्न अनुभूतियों से ही सम्बन्धित रहता है। दूसरी और स्मरण की क्रिया में हम एक विषय का स्मरण करते समय उससे सम्बन्धित दूसरी-दूसरी घटनाओं और विषयों का भी स्मरण कर लेते हैं।

5. चिन्तन की क्रिया स्मरण की क्रिया पर आश्रित है पर स्मृति की क्रिया चिन्तन की क्रिया पर आश्रित नहीं है। दूसरे शब्दों में, चिन्तन की क्रिया में स्मरण की क्रिया पायी जाती है, परन्तु स्मरण की क्रिया में चिन्तन की क्रिया नहीं पायी जाती। अतः चिन्तन की क्रिया स्मरण की अपेक्षा अधिक जटिल है। इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि चिन्तन और स्मृति दो मानसिक प्रक्रियाएँ हैं जिनमें घनिष्ठता होते हुए भी पर्याप्त भिन्नता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चिंतन का स्वरूप होता है।
(A) संगठित
(B) असंगठित
(C) दिशाहीन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) संगठित

प्रश्न 2.
रेल की पटरी का आपस में मिलना किस भ्रम का उदाहरण है:
(A) व्यक्तिगत
(B) सार्वभौम
(C) आभासी
(D) ज्यामितीय
उत्तर:
(B) सार्वभौम

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 1E शक्ति (ऊर्जा) संसाधन

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : संसाधन एवं उपयोग Chapter 1E शक्ति (ऊर्जा) संसाधन Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Geography Solutions Chapter 1E शक्ति (ऊर्जा) संसाधन

Bihar Board Class 10 Geography शक्ति (ऊर्जा) संसाधन Text Book Questions and Answers

 

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

Bihar Board Class 10 Geography Solutions प्रश्न 1.
किस राज्य में खनिज तेल को विशाल भंडार स्थित है ?
(क) असम
(ख) राजस्थान
(ग) बिहार
(घ) तमिलनाडु
उत्तर-
(क) असम

Class 10 Geography Bihar Board प्रश्न 2.
भारत के किस स्थान पर पहला परमाणु ऊर्जा स्टेशन स्थापित किया गया था ?
(क) कलपक्कम
(ख) नरोरा
(ग) राणाप्रताप सागर
(घ) तारापुर
उत्तर-
(घ) तारापुर

Bihar Board Class 10th Geography Solution प्रश्न 3.
कौन-सा ऊर्जा स्रोत अनवीकरणीय है ?
(क) जल
(ख) सौर
(ग) कोयला
(घ) पवन
उत्तर-
(ग) कोयला

Bihar Board Class 10 Social Science Solution प्रश्न 4.
प्राथमिक ऊर्जा का उदाहरण नहीं है
(क) कोयला
(ख) विद्युत
(ग) पेट्रोलियम
(घ) प्राकृतिक गैस
उत्तर-
(ख) विद्युत

Bihar Board Solution Class 10 Social Science प्रश्न 5.
ऊर्जा का गैर-पारम्परिक स्रोत है
(क) कोयला
(ख) विद्युत
(ग) पेट्रोलियम
(घ) सौर-ऊर्जा
उत्तर-
(घ) सौर-ऊर्जा

Geography Class 10 Bihar Board प्रश्न 6.
गोण्डवाना समूह के कोयले का निर्माण हुआ था
(क) 20 करोड़ वर्ष पूर्व
(ख) 20 लाख वर्ष पूर्व
(ग) 20 हजार वर्ष पूर्व
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) 20 करोड़ वर्ष पूर्व

Bihar Board Class 10th Social Science Solution प्रश्न 7.
भारत में कोयले का सर्वप्रमुख उत्पादक राज्य है
(क) पश्चिम बंगाल
(ख) झारखण्ड
(ग) उड़ीसा
(घ) छत्तीसगढ़
उत्तर-
(ख) झारखण्ड

Bihar Board Class 10 History Notes In Hindi प्रश्न 8.
सर्वोत्तम कोयले का प्रकार कौन-सा है ?
(क) एन्थ्रासाइट
(ख) पीट
(ग) लिग्नाइट
(घ) बिटुमिनस
उत्तर-
(क) एन्थ्रासाइट

Bihar Board Class 10 History Solution प्रश्न 9.
मुम्बई हाई क्यों प्रसिद्ध है?
(क) कोयले के निर्यात हेतु
(ख) तेल शोधक कारखाना हेतु
(ग) खनिज तेल हेतु
(घ) परमाणु शक्ति हेतु
उत्तर-
(ग) खनिज तेल हेतु

History Class 10 Bihar Board प्रश्न 10.
भारत का प्रथम तेल शोधक कारखाना कहाँ स्थित है?
(क) मथुरा
(ख) बरौनी
(ग) डिगबोई
(घ) गुवाहाटी
उत्तर-
(ग) डिगबोई

Bihar Board Class 10 History Notes Pdf प्रश्न 11.
प्राकृतिक गैस किस खनिज के साथ पाया जाता है?
(क) यूरेनियम
(ख) पेट्रोलियम
(ग) चूना पत्थर
(घ) कोयला
उत्तर-
(ख) पेट्रोलियम

Bihar Board Class 10 Sst Solution प्रश्न 12.
भाखड़ा नंगल परियोजना किस नदी पर अवस्थित है ?
(क) नर्मदा
(ख) झेलम
(ग) सतलज
(घ) व्यास
उत्तर-
(ग) सतलज

Bihar Board Class 10 History Book Solution प्रश्न 13.
दक्षिण भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना है।
(क) तुंगभद्रा
(ख) शारवती
(ग) चंबल
(घ) हिराकुण्ड
उत्तर-
(क) तुंगभद्रा

Class 10th Social Science Bihar Board प्रश्न 14.
ताप विद्युत केन्द्र का उदाहरण है
(क) गया
(ख) बरौनी
(ग) समस्तीपुर
(घ) कटिहार
उत्तर-
(ख) बरौनी

प्रश्न 15.
यूरेनियम का प्रमुख उत्पादक स्थल है
(क) डिगबोई
(ख) झरिया
(ग) घाटशिला
(घ) जादूगोड़ा
उत्तर-
(घ) जादूगोड़ा

प्रश्न 16.
एशिया का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत-गृह है।
(क) तारापुर
(ख) कलपक्कम
(ग) नरौरा
(घ) कैगा
उत्तर-
(क) तारापुर

प्रश्न 17.
भारत के किस राज्य में सौर-ऊर्जा के विकास की सर्वाधिक संभावनाएं हैं ?
(क) असम
(ख) अरुणाचलप्रदेश
(ग) राजस्थान
(घ) मेघालय
उत्तर-
(ग) राजस्थान

प्रश्न 18.
ज्वारीय एवं तरंग ऊर्जा उत्पादन हेतु भारत में अधिक अनुकूल परिस्थितियाँ कहाँ पाई जाती हैं ?
(क) मन्नार की खाड़ी में
(ख) खम्भात की खाड़ी में
(ग) गंगा नदी में
(घ) कोसी नदी में
उत्तर-
(ख) खम्भात की खाड़ी में

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पारम्परिक एवं गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के तीन-तीन उदाहरण लिखिए।
उत्तर-
पारम्परिक ऊर्जा स्रोत कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, लकड़ी इत्यादि।
गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोत–बायो गैस, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा ज्वारीय ऊर्जा एवं तरंग ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा एवं जैव ऊर्जा।

प्रश्न 2.
गोण्डवाना समूह के कोयला क्षेत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर-
(i) दामोदर घाटी (ii) सोन घाटी (iii) महानदी घाटी (iv) वर्धा-गोदावरी घाटी।

प्रश्न 3.
झारखण्ड राज्य के मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्रों के नाम अंकित कीजिए।
उत्तर-
झरिया, बोकारो, गिरीडीह, कर्णपुरा, रामगढ़।

प्रश्न 4.
कोयले के विभिन्न प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर-
(i) ऐंथासाइट (ii) बिटुमिनस (iii) लिग्नाइट (iv) पीट।

प्रश्न 5.
पेट्रोलियम से किन-किन वस्तुओं का निर्माण होता है ?
उत्तर-
गैसोलीन, डीजल, किरासन, तेल, स्नेहक, कीटनाशक दवाएँ, पेट्रोल, साबुन, कृत्रिम रेशा, प्लास्टिक आदि।

प्रश्न 6.
सागर सम्राट क्या है ?
उत्तर-
यह एक जलयान है जो पानी के भीतर तेल के कुएँ खोदने का कार्य करता है।

प्रश्न 7.
किन्हीं चार तेल शोधक कारखाने का स्थान निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर-
असम का डिग्बोई, मुम्बई का तारापुर, बिहार का बरौनी, उत्तर प्रदेश का मथुरा।

प्रश्न 8.
जल विद्युत उत्पादन के कौर-कौन से मुख्य कारक हैं ?
उत्तर-

  • नदी में प्रचुर जल की राशि
  • नदी मार्ग में ढाल
  • जल का तीव्र वेग
  • प्राकृतिक जल-प्रपात का होना
  • सघन औद्योगिक, वाणिज्यिक एवं आबाद क्षेत्रों जैसा
  • ऊर्जा के अन्य स्रोतों का अभाव
  • प्रौद्योगिकी ज्ञान।

प्रश्न 9.
नदी घाटी परियोजनाओं को बहु-उद्देशीय क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
क्योंकि इससे एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति होती है, जैसे-

  • सिंचाई के साथ पनबिजली उत्पन्न करना।
  • बाढ़ का नियंत्रण।
  • मृदा अपरदन का नियंत्रण।
  • मत्स्य पालन।
  • पर्यटक स्थल का विकास।
  • नहर निर्माण द्वारा यातायात की सुविधा का विकास।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित नदी घाटी परियोजनाएँ किन-किन राज्यों में अवस्थित हैं हीराकुण्ड, तुंगभद्रा एवं रिहन्द।
उत्तर-
हीराकुण्ड – उड़ीसा में
तुंगभद्रा – आंध्रप्रदेश में
रिहन्द – उत्तर प्रदेश में

प्रश्न 11.
ताप शक्ति क्यों समाप्य संसाधन है ?
उत्तर-
ताप शक्ति संयंत्रों में तापीय विद्युत का उत्पादन करने के लिए कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस का उपयोग होता है। इन सभी का भंडार सीमित है जो समाप्त हो जायेंगे अतः इसे
समाप्य संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 12.
परमाणु शक्ति किन-किन खनिजों से प्राप्त होता है ?
उत्तर-
इल्मेनाइट, बेनेडियम, एंटीमनी, ग्रेफाइट, यूरेनियम इत्यादि।

प्रश्न 13.
मोनाजाइट भारत में कहाँ-कहाँ उपलब्ध है?
उत्तर-
भारत में मोनाजाइट केरल राज्यों में प्रचुरता से पाया जाता है। इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा राज्यों के तटीय क्षेत्रों में यह पाया जाता है।

प्रश्न 14.
सौर ऊर्जा का उत्पादन कैसे होता है?
उत्तर-
जब फोटोवोल्टाइक सेलों में विणाषित सूर्य की किरणों को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है तो सौर ऊर्जा का उत्पादन होता है।

प्रश्न 15.
भारत के किन-किन क्षेत्रों में पवन ऊर्जा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हैं ?
उत्तर-
पवन ऊर्जा के लिए राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में अनुकूल परिस्थितियाँ। विद्यमान हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शक्ति संसाधन का वर्गीकरण विभिन्न आधारों के अनुसार सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
शक्ति संसाधनों का वर्गीकरण निम्नलिखित हैं

1. उपयोग स्तर के आधार पर-
(a) सतत शक्ति- सौर किरणें, भूमिगत ऊष्मा, पवन, प्रवाहित जल इत्यादि।
(b) समापनीय शक्ति-कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस इत्यादि।

2. उपयोगिता के आधार पर
(a) प्राथमिक ऊर्जा- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस एवं रेडियोधर्मी खनिज।
(b) गौण ऊर्जा-विद्युत।

3. स्रोत की स्थिति के आधार पर
(a) क्षयशील- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा आण्विक खनिज।
(b) अक्षयशील-प्रवाही जल, पवन, लहरें, सौर शक्ति इत्यादि।

4. संरचनात्मक गुणों के आधार पर
(a) जैविक ऊर्जा-मानव एवं अन्य प्राणी।
(b) अजैविके ऊर्जा- जल शक्ति, पवन शक्ति, सौर शक्ति तथा ईंधन शक्ति।

5. समय के आधार पर
(a) पारम्परिक-कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैसा
(b) गैर-पारम्परिक-सूर्य, पवन, ज्वार, परमाणु ऊर्जा, गर्म झरने इत्यादि।

प्रश्न 2.
भारत में पारम्परिक शक्ति के विभिन्न स्रोतों का विवरण दें।
उत्तर-
पारम्परिक शक्ति स्रोत के अन्तर्गत कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस सम्मिलित हैं।
कोयला – यह शक्ति और ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत है। जनवरी 2008 तक भारत में 1200 मीटर की गहराई तक पाये जानेवाले कोयले का कुल अनुमानित भण्डार 26454 करोड़ टन आँका गया था।
भारत में 96 प्रतिशत गोंडवाना समूह का और 4 प्रतिशत टर्शियरी समूह का कोयला पाया जाता है।

पेट्रोलियम – शक्ति के समस्त साधनों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं व्यापक रूप से उपयोगी संसाधन पेट्रोलियम ही है। आधुनिक युग में कोई भी राष्ट्र इसके बिना अपने अस्तित्व को कायम नहीं रख सकता है। शक्ति स्रोत के साथ-साथ अनेक उद्योग का कच्चा माल भी इससे प्राप्त होता है। इ. गैसोलीन, डीजल, किरासन तेल, स्नेहक, कीटनाशक दवाएँ, पेट्रोल, साबुन, कृत्रिम रेशा, लास्टिक इत्यादि बनाये जाते हैं। भारत विश्व का मात्र एक प्रतिशत पेट्रोलियम पैदा करता है। भारत थम बार 1866 में ऊपरी असम घाटी में तेल के कुएँ खोदे गये।

प्राकृतिक गैस – यह हमारे वर्तमान जीवन में बड़ी तेजी से एक महत्वपूर्ण ईंधन बनती जा । इसका उपयोग विभिन्न उद्योगों में मशीन को चलाने में, विद्युत उत्पादन में, खाना पकाने मोटर गाड़ियां चलाने में किया जा रहा है।

भारत में एक अनुमान के अनुसार प्राकृतिक गैस की संचित मात्रा 700 अरब घन मीटर है। “y: में प्राकृतिक गैस प्राधिकरण की स्थापना देश की प्राकृतिक गैसों के परिवहन, वितरण एवं विपणन हेतु किया गया जो 5340 किलोमीटर गैस पाइप लाइन द्वारा देश भर में फैले उपभोक्ताओं की आवश्यकता पूर्ति करता है।

प्रश्न 3.
गोंडवाना काल के कोयले का भारत में वितरण पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
गोंडवाना समूह में भारत के 96 प्रतिशत कोयले का भण्डार है जो कुल उत्पादन का प्रतिशत भाग उपलब्ध कराता है। यहाँ के कोयले का निर्माण 20 करोड़ वर्ष पूर्व में हुआ था। गंडवाना कोयला क्षेत्र मुख्यतः चार नदी घाटियों में पाये जाते हैं-
(i) दामोदर घाटी क्षेत्र (ii) सोन नदी घाटी क्षेत्र (ii) महानदी घाटी क्षेत्र (iv) वर्धा-गोदावरी बाटो क्षेत्र।

गोंडवाना काल का कोयला निम्न राज्यों में पाया जाता है

झारखण्ड-कोयले के भण्डार एवं उत्पादन की दृष्टि से यह देश का पहला राज्य है। यहाँ के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं-झरिया, बोकारो, गिरिडीह, कर्णपुरा, रामगढ़ इत्यादि।

छत्तीसगढ़- यह भारत का दूसरा कोयला उत्पादक राज्य है। यहाँ का उत्पादक क्षेत्र है चिरिमिरी, कुरसिया, विश्रामपुर, झिलमिली, सोनहाट, लखनपुर, हासदो-अरंड, कोरबा एवं मांड-रायगढ़ इत्यादि।

उड़ीसा-यहाँ देश का एक चौथाई कोयले का भण्डार है। यहाँ का मुख्य उत्पादक क्षेत्र है तालचर।
महाराष्ट्र-यहाँ 3% कोयला सुरक्षित है। यहाँ के मुख्य क्षेत्र–चाँदा-वर्धा, कांपटी तथा बंदेर हैं।

मध्यप्रदेश- यहाँ देश का 7% कोयला है। सिंगरौली, सोहागपुर, जोहिल्ला, उमरिया, सतपुड़ा क्षे. यादि.मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं।
पश्चिम बंगाल- यह देश का सुरक्षित भण्डार की दृष्टि से चौथा एवं उत्पादन में गवां राज्य है। रानीगंज यहाँ का मुख्य उत्पादक क्षेत्र है।

प्रश्न 4.
कोयले का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं का उल्लेख करें।
उत्तर-
कोयले को निम्नलिखित चार भागों में बांटा गया है-

  • एंथासाइट- यह सर्वोच्च कोटि का कोयला है, जिसमें कार्बन की मात्रा 90% से अधिक है। यह जलने पर धुआँ नहीं देता और देर तक अत्यधिक ऊष्मा देता है। इसे कोकिंग कोल भी कहा गया है तथा धातु गलाने के काम आता है।
  • बिटुमिनस- इसमें कार्बन की मात्रा 70-90% होती है। इसे परिष्कृत कर कोकिंग कोल बनाया जा सकता है। भारत का अधिकतर कोयला इसी प्रकार का है।
  • लिग्नाइट- इसमें कार्बन की मात्रा 30-70% होती है यह धुआँ अधिक और ऊष्मा कम देता है। इसे भूरा कोयला भी कहते हैं।
  • पीट- इसमें 30% से कम कार्बन पाया जाता है। यह दलदली क्षेत्र में पा

प्रश्न 5.
भारत में खनिज तेल के वितरण का वर्णन करें।
उत्तर-
भारत में मुख्यतः पाँच खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र हैं –

  • उत्तर- पूर्वी क्षेत्र- यह देश का सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है। इसके अन्तर्गत ऊपरी असम घाटी, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड आदि का विशाल तेलक्षेत्र आता है।
  • गुजरात क्षेत्र- यह खम्भात के बेसिन एवं गुजरात के मैदान में विस्तृत है। यहाँ पहली बार 1958 में तेल का पता चला था। इसके मुख्य उत्पादक अंकलेश्वर, कलोल, नवगाँव, कोसांवा, मेहसाना इत्यादि हैं।
  • मुम्बई हाई क्षेत्र- यह मुम्बई तट से 176 किमी दूर उत्तर-पश्चिम दिशा में अरबसागर में है। यहाँ 1975 से तेल खोजने का कार्य शुरू हुआ।
  • पूर्वी तट क्षेत्र- यह कृष्णा-गोदावरी और कावेरी नदियों की श्रेणियों में फैला हुआ है।
  • बाड़मेर बेसिन- इस बेसिन के मंगला क्षेत्र में सितम्बर 2009 से उत्पादन शुरू हुआ। 2012 तक यह भारत का 20% पेट्रोलियम उत्पन्न करेगा।

प्रश्न 6.
जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों की विवेचना करें।
उत्तर-
जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक दशाएँ निम्न हैं-

  • सन्दावाहिनी नदी में प्रचुर जल की राशि।
  • नदी मार्ग में ढाल
  • जल का तीव्र वेग
  • प्राकृतिक जलप्रपात का होना।

अनुकूल आर्थिक दशाएं निम्न हैं-

  • सघन औद्योगिक एवं वाणिज्यिक एवं आबाद क्षेत्र
  • पर्याप्त पूँजी निवेश
  • परिवहन के साधन
  • प्रौद्योगिकी का ज्ञान
  • ऊर्जा के अन्य साधनों का अभाव।

प्रश्न 7.
संक्षिप्त भौगोलिक टिप्पणी लिखें-भाखड़ा-नंगल परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना, कोसी परियोजना, हीराकुण्ड परियोजना, रिहन्द परियोजना और तुंगभद्रा परियोजना।
उत्तर-
(i) भाखड़ा-नंगल परियोजना- सतलज नदी पर हिमालय प्रदेश में विश्व के सर्वोच्च बाँधों में एक भाखड़ा बांध की ऊंचाई 225 मीटर है। यह भारत की सबसे बड़ी परियोजना है। जहाँ चार शक्ति गृह एक भाखड़ा में, दो गंगुवाल में और एक कोटला में स्थापित होकर 7 लाख किलोवाट विद्युत उत्पन्न कर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरांचल, उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान तथा जम्मू व कश्मीर राज्यों के कृषि एवं उद्योगों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है।

(ii) दामोदर घाटी परियोजना- यह परियोजना दामोदर नदी के भयंकर बाढ़ से झारखण्ड एवं पश्चिम बंगाल को बचाने के साथ-साथ तलैया, मैथन, कोनर और पंचेत पहाड़ी में बाँध बनाकर 1300 मेगावाट जलविद्युत उत्पन्न करने में सहायक है। इसका लाभ बिहार, झारखण्ड एवं प. बंगाल को प्राप्त है।

(ii) कोसी परियोजना- उत्तर बिहार का अभिशाप कोसी नदी पर हनुमाननगर (नेपाल) में बाँध बनाकर 20000 किलोवाट बिजली उत्पन्न किया जा रहा है। जिसकी आधी बिजली नेपाल को तथा शेष बिहार को प्राप्त होती है।

(iv) रिहन्द परियोजना-सोन की सहायक नदी पर रिहन्द उत्तरप्रदेश में 934 मी. लम्बा बाँध और कृत्रिम झील ‘गोविन्द बल्लभ पंत सागर’ का निर्माण कर बिजली उत्पादित की जाती है। इस योजना से 30 लाख किलोवाट विद्युत उत्पादन करने की क्षमता है। यहाँ की बिजली का उपयोग रेणुकूट के अल्युमिनियम उद्योग, चुर्क के सीमेंट उद्योग, मध्य भारत के रेल मार्गों का विद्युतिकरण तथा हजारों नलकूपों के लिए किया जाता है।

(v) हीराकुण्ड परियोजना- महानदी पर विश्व का सबसे लम्बा बाँध (4801) मी. बनाकर 2.7 लाख किलोवाट बिजली उत्पन्न होता है। इससे उड़ीसा एवं आस-पास के कृषि क्षेत्र एवं उद्योग में उपयोग किया जाता है।

(vi) तंगभद्रा परियोजना- यह कृष्णा नदी की सहायक नदी तुंगभद्रा पर आंध्रप्रदेश में स्थित दक्षिण भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना है जो कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश के सहयोग से तैयार हुई है। इसकी बिजली उत्पादन क्षमता 1 लाख किलोवाट है जो सिंचाई के साथ-साथ सैकड़ों छोटे-बड़े उद्योगों को बिजली आपूर्ति करता है।

प्रश्न 8.
भारत के किन्हीं चार परमाणु विद्युत गृह का उल्लेख कीजिए तथा उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
देश के चार परमाणु विद्युत गृह निम्न हैं-

  • तासरापुर परमाणु विद्यत गह यह एशिया का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह है। यहाँ जल उबालने वाली दो परमाणु भट्ठियाँ हैं जिनमें प्रत्येक की उत्पादन क्षमता 200 मेगावाट से अधिक है। अब यहाँ यूरेनियम के स्थान पर प्लूटोनियम बनाकर विद्युत उत्पन्न किए जा रहे हैं, क्योंकि भारत थोरियम के भण्डार में काफी समृद्ध है।
  • कलपक्कम परमाण विद्यत गह-तमिलनाडु में स्थित यह परमाणुगृह स्वदेशी प्रयास से बना है। यहाँ 355 मेगावाट के दो रिएक्टर क्रमश: 1983 एवं 1985 में कार्य करना शुरू कर चुके हैं।
  • नरौरा परमाण विद्यत गह- यह उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर के पास स्थित है। यहाँ भी 235 मेगावाट के दो रिएक्टर हैं।
  • ककरापास परमाणु गह- गुजरात राज्य में समुद्र के किनारे स्थित इस परमाणु गृह में 1992 से विद्युत उत्पादन प्रारम्भ हुआ है।

प्रश्न 9.
संक्षिप्त भौगोलिक टिप्पणी लिखें- सौर-ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, बायो गैस एवं ज्वारीय ऊर्जा।
उत्तर-
सौर ऊर्जा-जब फोटोवोल्टाइक सेलों में विपरित सूर्य की किरणों को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है, तो सौर ऊर्जा का उत्पादन होता है। यह कम लागत वाला पर्यावरण के अनुकूल तथा निर्माण में आसान होने के कारण अन्य ऊर्जा के स्रोतों की अपेक्षा ज्यादा लाभदायक है। यह सामान्यतः हीटरों, कूलर्स, प्रकाश आदि उपकरणों में अधिक उपयोग की जाती है। भारत के पश्चिमी भाग गुजरात, राजस्थान में सौर ऊर्जा की अधिक संभावनाएँ हैं।

पवन ऊर्जा- पवन ऊर्जा पवन चक्कियों की सहायता से प्राप्त की जाती है। पवन चक्की पवन की गति से चलती है और टरबाईन को चलाती है। इससे गतिज ऊर्जा को विद्युत में बदला जाता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक देश है। यहाँ ऊर्जा के स्रोत के रूप में स्थानीय पवनों, स्थलीय एवं समुद्री समीरों को भी विद्युत उत्पादन में प्रयोग किया जा सकता है। पवन ऊर्जा के लिए राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान हैं। दूसरा बड़ा संयंत्र तमिलनाडु के तूतीकरिन में स्थित है।

ज्वारीय ऊर्जा-समुद्री ज्वार तथा तरंग में जल गतिशील रहता है। अतः इसमें अपार ऊर्जा रहती है। अनुमान है कि भारत में 8000-9000 मेगावाट संभाव्य ज्वारीय एवं तरंग ऊर्जा है। खम्भात की खाड़ी से 7000 मेगावाट ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। इसके बाद कच्छ की खाड़ी (1000 मेगावाट) तथा सुन्दरवन (100 मेगावाट) का स्थान है।

भतापीय ऊर्जा- यह ऊर्जा पृथ्वी के उच्च ताप से प्राप्त की जाती है। जब भूगर्भ से मैग्मा निकलता है तो अपार ऊर्जा निर्मुक्त होती है। गीजर कुपों से निकलने वाले गर्म जल तथा गर्म झरनों से भी शक्ति प्राप्त की जाती है। हिमाचल प्रदेश के मनीकरण में भूतापीय ऊर्जा संयंत्र स्थापित है तथा दूसरा लद्दाख के दुर्गाघाटी में स्थित है।

बायोगैस एवं जैव ऊर्जा – ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि अपशिष्ट, पशुओं और मानव जनित अपशिष्ट के उपयोग से घरेलू उपयोग हेतु बायोगैस उत्पन्न की जाती है। पशुओं के गोबर से गैस तैयार करने वाले संयंत्र को भारत में गोबर गैस प्लांट के नाम से जाना जाता है। इससे किसानों को ऊर्जा तथा उर्वरक की प्राप्ति होती है। जैविक पदार्थों से प्राप्त होनेवाली ऊर्जा को जैविक ऊर्जा कहते हैं। कृषि अवशेष, नगर पालिका, औद्योगिक एवं अन्य अपशिष्ट पदार्थ जैविक पदार्थों के उदाहरण हैं। इसे विद्युत ऊर्जा, ताप ऊर्जा या खाना पकाने के लिए गैस में परिवर्तित किया जा सकता है। कचरे को ऊर्जा में बदलने की एक परियोजना दिल्ली के ओखला में शुरू की गई है।

प्रश्न 10.
शक्ति संसाधनों के संरक्षण हेतु कौन-कौन से कदम उठाये जा सकते हैं ? आप उसमें कैसे मदद पहुंचा सकते हैं?
उत्तर-
ऊर्जा संकट एक विश्व-व्यापी समस्या का रूप ले चुका है। इसके समाधान के निम्न उपाए किए जा रहे हैं-

(i) ऊर्जा के प्रयोग में मितव्ययिता ऊर्जा संकट से बचने के लिए प्रथमतः ऊर्जा के उपयोग में मितव्ययिता बरती जाया इसके लिए तकनीकी विकास आवश्यक है। अनावश्यक बिजली का उपयोग रोककर हम ऊर्जा की एक बड़ी मात्रा की बचत कर सकते हैं।

(ii) ऊर्जा के नवीन क्षेत्रों की खोज- ऊर्जा संकट समाधान की दिशा में परम्परागत ऊर्जा के नये क्षेत्रों का अन्वेशन किया जाय। इस दिशा में भारत में 1970 के बाद काफी तेजी आई है तथा अनेक नये-नये पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस के भण्डार का पता लगाया जा चुका है। अरब-सागर, कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र, राजस्थान क्षेत्र आदि में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस दे स्रोत प्राप्त हुए हैं।

(iii) ऊर्जा के नवीन वैकल्पिक साधनों का उपयोग- वैकल्पिक ऊर्जा में पारम्परिक एवं गैर-पारम्परिक दोनों ही ऊर्जा सम्मिलित हैं। इनमें से कुछ तो सतत् नवीकरणीय हैं तो कुछ समापनीय हैं। आज वैकल्पिक ऊर्जा में जल विद्युत, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैव ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा आदि का विकास कर उपयोग करना शक्ति के संसाधनों को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। जीवाश्म ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग से प्रदूषण, स्वास्थ्य एवं जलवायु परिवर्तन की आशंका प्रबल हो गई है।

(iv) अंतर्राष्टीय सहयोग – ऊर्जा संकट से बचने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। विश्व के सभी राष्ट्र ऊर्जा संकट के समाधान हेतु सहमति से नीति निर्धारण करें।

इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र आर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक स्पोर्टिंग कन्ट्रीज विश्व व्यापार संगठन, दक्षिण एशियाई 8 देशों का संगठन (जी-8) जैसे संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते

इन सब के अलावे मैं अपने क्रियाकलाप में परिवर्तन कर इसमें सहायता कर सकता हूँ जैसे-

  • बिजली के बल्बों एवं अन्य उपकरणों का आवश्यकतानुसार प्रयोग करा
  • स्वचालित वाहनों के बजाय पैदल चलकर या साइकिल का अधिक उपयोग कर।
  • गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, बायोगैस इत्यादि का उपयोग कर।
  • लोगों को इस संबंध में अपनी क्षमतानुसार जागरूक कर।

मानचित्र कार्य

भारत के मानचित्र पर निम्नलिखित को दिखाइए और उनके नाम लिखिये :

प्रश्न 1.
कोयला खदानें : घरिया, बोकारो, रानीगंज, कोरबा, तालचर, सिंगरेनी एवं नेवेली।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
तेल क्षेत्र : डिगबोई, कलोल, अंकलेश्वर, बसीन, मुम्बई हाई।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 3.
तेलशोधक कारखाने : भटिंडा, पानीपत, मथुरा, जामनगर, मंगलौ, तातीपाका, हल्दिया, गुवाहाटी, बरौनी
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 4.
परमाणु शक्ति केन्द्र : कैगा कालपक्कम, रावती तट, नरौरा, काकरापारा, तारापुर।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

Bihar Board Class 10 Geography शक्ति (ऊर्जा) संसाधन Additional Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में विद्युत की सबसे अधिक खपत किसमें होती है ?
(क) घरेलू कामों में
(ख) व्यापारिक कामों में
(ग) उद्योगों में
(घ) कृषि में
उत्तर-
(ग) उद्योगों में

प्रश्न 2.
भारत में खनिज तेल का वार्षिक उत्पादन कितना हो रहा है ?
(क) 72 लाख टन
(ख) 7 करोड़ टन
(ग) 3 करोड़ टन
(घ) 9 करोड़ टन
उत्तर-
(ग) 3 करोड़ टन

प्रश्न 3.
पेट्रोलियम किन चट्टानों में मिलता है ?
(क) आग्नेय में
(ख) परतदार में
(ग) रूपांतरित में
(घ) प्रत्येक में
उत्तर-
(ख) परतदार में

प्रश्न 4.
इनमें कहाँ प्राकृतिक गैस के भण्डार मिले हैं ?
(क) छत्तीसगढ़
(ख) कर्नाटक
(ग) त्रिपुरा
(घ) मध्य प्रदेश
उत्तर-
(ग) त्रिपुरा

प्रश्न 5.
भारत में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत कौन-सा है ?
(क) कोयला
(ख) पेट्रोलियम
(ग) प्राकृतिक गैस
(घ) जल विद्युत
उत्तर-
(क) कोयला

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में सबसे बड़ा ऊर्जा संसाधन-कौन है ?
उत्तर-
भारत में सबसे बड़ा ऊर्जा संसाधन कोयला है।

प्रश्न 2.
ग्रेफाइट किस पदार्थ का एक रूप है ?
उत्तर-
ग्रेफाइट कोयले का अपरूप (एक रूप) है।

प्रश्न 3.
पेट्रोलियम की खोज पेनसिलवेनिया में किस व्यक्ति ने की थी?
उत्तर-
1948 ई में सैमूएल एम कियर नामक व्यक्ति ने पेनसिलवेनिया में पेट्रोलियम की खोज की।

प्रश्न 4.
कैम्बे ग्रेवान क्षेत्र किस राज्य में स्थित है?
उत्तर-
कैम्बे ग्रेवान क्षेत्र गुजरात में स्थित है।

प्रश्न 5.
भारत में पहला जल-विद्युत केंद्र कहाँ और कब स्थापित किया गया था?
उत्तर-
भारत में प्रथम जल विद्युत केंद्र कर्नाटक के शिवसमुद्रम में, 1902 में स्थापित किया गया था।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ऊर्जा संसाधन का क्या महत्व है?
उत्तर-
शक्ति ऊर्जा का साधन किसी भी देश के औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक है। शक्ति संसाधन किसी राष्ट्र के उत्थान, विकास तथा प्रभुत्व की कुंजी कहे जाते हैं। आर्थिक महत्त्व के साथ-साथ इनका राजनीतिक एवं सामरिक महत्त्व कम नहीं है। प्राकृतिक शक्ति के साधनों में कोयला, खनिज तेल, जल-शक्ति आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 2.
ऊर्जा संकट दूर करने के लिए ऊर्जा के किन स्रोतों को विकसित करने की आवश्यकता है ? इसके लिए कौन-से प्रयल चल रहे हैं ?
उत्तर-
ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों की मांग कृषि, उद्योग, परिवहन तथा दैनिक जीवन में बढ़ती जा रही है। अतः विद्युत का उत्पादन बढ़ाना आवश्यक हो गया है। इसके लिए ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों को विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए आयोग बनाये गये हैं और गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत विभाग स्थापित किए गए हैं। इस दिशा में अन्य ऊर्जा संसाधनों की खोज की जा रही है। इसमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैविक ऊर्जा तथा अवशिष्ट पदार्थ से उत्पन्न ऊर्जा को विकसित करने पर बल दिया जा रहा है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर गैस प्लांट स्थापित कर ऊर्जा की प्राप्ति की जाती है। आजकल शहरों में भी सड़कों पर रोशनी के लिए बायोगैस का प्रयोग किया जा रहा है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में विभिन्न ऊर्जा संसाधन का सापेक्ष महत्व बताएँ।
उत्तर-
भारत में ऊर्जा के विभिन्न साधन पाये जाते हैं जिनका औद्योगिक और व्यावसायिक उपयोग अधिक है, साथ ही इन संसाधनों के उपयोग से आर्थिक विकास करने में भी सहायता मिलती है। इन संसाधनों का विभिन्न उपयोग होने के कारण ही इनका महत्व अधिक है।

ऊर्जा के विभिन्न संसाधनों के सापेक्षिक महत्व को निम्नलिखित ऊर्जा के संसाधनों के संदर्भ में विभिन्न विचार-बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं –

  • कोयला- यह ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है। कोयले का उपयोग लोहा-इस्पात उद्योग में किया जाता है। शक्ति के साधन के रूप में भी इसका उपयोग किया जाता है। चूल्हा जलाने से लेकर समुद्री जहाज चलाने में भी इसका उपयोग होता है। अतः इसका महत्व बहुत अधिक है।
  • खनिज तेल या पेट्रोलियम इसका उपयोग मोटरगाड़ियों के ईंधन के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग घरों में रोशनी उत्पन्न करने के लिए भी किया जाता है। अतः इसका बहुत अधिक महत्व है। महत्व बतायोगिक और मा सहायता
  • प्राकृतिक गैस-यह ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है। प्राकृतिक गैस जैसे ऑक्सीजन हमारे लिए वरदान है जिससे हम साँस लेते और जीवित रहते हैं। प्राकृतिक गैस जैसे L.P.G. का उपयोग हम अपने भोजन बनाने के लिए भी करते हैं। इसका उपयोग उद्योगों के कच्चे माल के रूप में भी किया जाता है। अतः इसका महत्व बहुत अधिक है। –
  • परमाणु ऊर्जा- यह भी ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है। इसका उपयोग रोशनी उत्पन्न – करने में किया जाता है। इसका उपयोग कर देश में उत्तम कोटि के कोयले और खनिज तेल की  की जा सकती है। अतः इसका महत्व बहुत अधिक है।
  • तापविद्युत ऊर्जा-यह भी ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है। इसका उपयोग बिजली उत्पन्न करने में किया जाता है। अतः यह भी ऊर्जा का एक प्रमुख साधन है। अतः इसका बहुत अधिक महत्व है।
  • जलविद्युत ऊर्जा-यह भी ऊर्जा का एक प्रमुख साधन है। इसका उपयोग भी बिजली को उत्पन्न करने में किया जाता है। इसके उपयोग से उद्योगों का विकेंद्रीकरण किया जा सकता है। अतः इसका बहुत अधिक महत्व है।
  • पवन ऊर्जा-यह भी ऊर्जा का एक प्रमुख साधन है। इसका उपयोग पवन चक्की द्वारा भूमिगत जल निकालकर देहातों में सिंचाई की व्यवस्था करने के अलावा पवन से विद्युत भी उत्पन्न की जा सकती है। अतः इसका बहुत अधिक महत्व है।
  • ज्वारीय ऊर्जा-यह भी ऊर्जा का एक प्रमुख साधन है। टरबाइन की सहायता से इससे बिजली उत्पन्न की जाती है। अतः इसका बहुत अधिक महत्व है।
  • सौर ऊर्जा- यह भी ऊर्जा का एक प्रमुख साधन है। इसकी सहायता से असीम सौर ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। इसका उपयोग हम अपना भोजन बनाने के रूप में भी करते हैं।अतः इसका बहुत अधिक महत्व है।
  • भूतापीय ऊर्जा-यह भी ऊर्जा का एक प्रमुख साधन है। इसका उपयोग से हम अपने घरों के बिजली उपकरणों जैसे-फ्रीज, कूलर इत्यादि चलाने के रूप में कर सकते हैं। अत: इसका बहुत अधिक महत्व है।
  • बायोगैस ऊर्जा—यह भी ऊर्जा उत्पन्न करने का एक प्रमुख साधन है। इसका उपयोग हम विद्युत उत्पादन में करते हैं। अतः इसका बहुत अधिक महत्व है।
  • गोबर और मल-मूत्र से उत्पन्न ऊर्जा-यह भी ऊर्जा का एक प्रमुख साधन है। गोबर गैस संयंत्र लगाकर इससे गोरबगैस उत्पन्न की जा सकती है। इसका उपयोग अधिकतर गाँवों में : पेट्रोमैक्स के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 2.
जल-विद्युत उत्पादन के लिए अनुकल भौगोलिक दशाएँ कौन-कौन हैं ? भारत के किन भागों में वे भौगोलिक दशाएं उपलब्ध हैं ?
उत्तर-
जल विद्युत उत्पादन के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ निम्नांकित हैं

  • पर्याप्त वर्ष भर जलापूर्ति या जल का वर्ष भर बहाव मिलना
  • पहाड़ी भूमि या जलप्रपात का होना
  • विद्युत् की माँग अर्थात् खपत का व्यापक क्षेत्र
  • तकनीकी ज्ञान
  • पूँजी और दूसरे ऊर्जा के स्रोतों का कम मिलना।

भारत में ये सभी दशाएं उपलब्ध हैं। खासकर दक्षिण भारत में जहाँ कोयला और पेट्रोलियम का अभाव है। खनिजों में धनी प्रायद्वीपीय भास्त आर्थिक विकास के लिए सस्ती जल विद्युत् की मांग रखता है। भारत में जल विद्युत का पहला केन्द्र वहीं खुला, जो बाद में ग्रिड प्रणाली के द्वारा अधिक केन्द्र एक-दूसरे से जोड़ दिए गए हैं। ताकि दूर-दूर तक बिजली उपलब्ध करायी जा सके।
जल-विद्युत् अन्य शक्ति के साधनों से सस्ता पड़ता है। इसलिए दक्षिण भारत में जल विद्युत् से उद्योगों को बढ़ाने में बड़ी सहायता मिली है।

भारत की 60% संभावित जल शक्ति हिमाचल क्षेत्र में है जिसका आधा से अधिक भाग ब्रह्मपुत्र क्षेत्र और मणिपुर क्षेत्र में मिलता है। 20% जलशक्ति भारत की पश्चिम की ओर बहनेवाली नदियों से मिलती है।

Bihar Board Class 10 Geography शक्ति (ऊर्जा) संसाधन Notes

  • शक्ति के साधनों का वास्तविक विकास 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के साथ शुरू हुआ।
  • आज शक्ति अथवा ऊर्जा के स्रोत ही विकास एवं औद्योगिकीकरण का आधार है।
  • कोयला, पेट्रोलियम प्राकृतिक गैस, जल विद्युत एवं आण्विक ऊर्जा स्रोतों को “वाणिज्य ऊर्जा स्रोत” कहा जाता है।
  • कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस ऊर्जा के परंपरागत स्रोत हैं जबकि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा ज्वारीय तथा तरंग ऊर्जा, बायोगैस एवं जैव ऊर्जा गैर-परंपरागत स्रोत हैं।
  • गुजरात के कच्छ में ताम्बा का पवन ऊर्जा संयंत्र एशिया का सबसे बड़ा संयंत्र है।
  • भाखड़ा-नंगल परियोजना भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना है।
  • 1901 में भारत का प्रथम तेलशोधक कारखाना असम के डिग्बोई में स्थापित हुआ।
  • तारापुर परमाणु विद्युत गृह एशिया का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह है।
  • शक्ति के साधनों का वास्तविक विकास 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के साथ शुरू हुआ।
  • आज शक्ति अथवा ऊर्जा के स्रोत ही साधन एवं औद्योगिकीकरण का आधार है।
  • परम्परागत ऊर्जा के साधन – कोयला, पेट्रोलियम, जल विद्युत, प्राकृतिक गैस, परमाणु ऊर्जा हैं।
  • गैर-परम्परागत ऊर्जा के साधन-पवन, सूर्य किरण, भूताप, समुद्री ज्वार, जैव पदार्थ हैं।
  • जल विद्युत उद्योगों के विकेंद्रीकरण में सहायक है।
  • जलशक्ति को शक्ति का स्थायी स्रोत माना जाता है।
  • भारत के प्रमुख शक्ति एवं उत्पादक केंद्रों के नाम हैं
    (i) तापीय शक्ति बोकारो, चंद्रपुरा, दुर्गापुर, कहलगाँव, बरौनी, कोरबा, सिंगरौली, रामागुंडम, फरक्का , तालचर, पतरातू, ओवरा, दादरी। (ii) जलविद्युत शक्ति तिलैया, मैथन, पंचेत, कोयना, इडिक्की, पायकारा, मेडुर, मसान जोर, शिवसमुद्रम, उकाई, गाँधी सागर, नागार्जुन सागर। (ii) परमाणु शक्ति–तारापुर, कोटा, कलपक्कम, नरोरा, कैगा।
  • भारत के प्रमुख कोयला क्षेत्र हैं-
  • (i) गोंडवानाकालीन कोयला क्षेत्र-झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र!
    (ii) टर्शियरीकालीन कोयला क्षेत्र असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु।Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 1E शक्ति (ऊर्जा) संसाधन - 1

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 3 चिड़िया

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 1 Chapter 3 चिड़िया Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 3 चिड़िया

Bihar Board Class 6 Hindi चिड़िया Text Book Questions and Answers

प्रश्न-अभ्यास

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solution प्रश्न 1.
चिड़िया पीपल की ऊँची डाली पर बैठकर क्या-क्या संदेश सुनाती है?
उत्तर:
चिड़िया का संदेश है – प्रेम से जीना सीखो। मिल-जुलकर रहो। लोभ का त्याग करो। जो भी मिले आपस में बाँट कर खाओ। संचय की प्रवृत्ति का त्याग करो। दूसरे के हित का ध्यान रखो और स्वछन्द तथा निर्भय होकर जीवन-यापन करो।

Bihar Board Solution Class 6 Hindi प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों के भाव स्पष्ट कीजिए।
(क) सब मिल-जुलकर रहते हैं
सब मिल-जुलकर खाते हैं।
आसमान ही उनका घर है,
जहाँ चाहते जाते हैं।
उत्तर:
कवि यह कहना चाहता है कि मनुष्य भी अपने जीवन में चिड़ियों की जीवन पद्धति का अनुसरण करे। आपसी मेल-जोल से रहे, बाँट-मिलकर भोजन करना यानी सबको भरपेट भोजन मिले, इसका ध्यान रखना और जमीन पर अधिकार के लिये लड़ाई-झगड़े से दूर रहना-मानव का धर्म होना चाहिये।

(ख) जो मिलता है, अपने श्रम से ।
उतना भर ले लेते हैं।
बच जाता तो औरों के हित
उसे छोड़ वे देते हैं।
उत्तर:
मनुष्यों को अपने परिश्रम से अर्जित धन पर ही भरोसा करना चाहिये। दूसरों का धन छीनकर जीना भी क्या जीना है। यह तो एक प्रकार से चोरी और बेइमानी है। एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के हित का भी ध्यान रखना चाहिये।

Bihar Board Class 6 Hindi प्रश्न 3.
निम्नलिखित स्थानों की पूर्ति कीजिए।
(क) उनके मन में लोभ नहीं है।
…………………………………
जग का सारा माल हड़पकर
…………………………………

(ख) वे कहते हैं-मानव, सीखो,
…………………………………
हम स्वच्छन्द और क्यों तुमने,
…………………………………
उत्तर:
(क) पाप नहीं परवाह नहीं।
जीने की भी चाह नहीं।

(ख) तुम हमसे जीना जग में।
डाली है बेड़ी पग में।

पाठ से आगे –

Bihar Board Class 6 Hindi Book प्रश्न 1.
आजकल पक्षियों की संख्या कम होती जा रही है। इसे रोकने के लिये आप क्या सुझाव देना चाहेंगे?
उत्तर:
पशु-पक्षी प्रकृति के आवश्यक अंग हैं। पेड़-पौधे से पर्यावरण का निर्माण होता है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे के बिना धरती पर जीवन की कल्पना ‘नहीं की जा सकती। मनुष्य इन सबका सबसे बड़ा विनाशक है। हम भूल जाते हैं कि हम जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काटे जा रहे हैं। हमें पशु-पक्षियों के जीवन की रक्षा करनी चाहिये तभी हमारा जीवन भी सुरक्षित रहेगा। अगर वृक्ष नहीं काटें और जंगल को नष्ट होने से रोकें तो पक्षियों का वास स्वयं बढ़ेगा _और उनकी संख्या भी बढ़ेगी। उन्हें स्वछन्द होकर जीवन जीने के लिये वृक्ष और पौधे आवश्यक हैं।

Bihar Board Class 6 Hindi Solution In Hindi प्रश्न 2.
कविता में से उन पंक्तियों को छाँटिए जिनमें
(क) चिड़ियों को स्वच्छन्द रूप से खुले आकाश में उड़ने की बात की गयी है –
उत्तर:
आसमान ही उनका घर है, जहाँ चाहते जाते हैं।
सीमाहीन गगन में उड़त, निर्भय विचरण करते हैं।
बैठ घड़ी भर, हमें चकित कर
गाकर फिर उड़ जाती है।

(ख) मनुष्यों को दुश्मनी की भावना छोड़ने की बात कही गयी है –
उत्तर:
चिड़िया बैठी प्रेम-प्रीति की रीत हमें सिखलाती है।
सब मिलजुलकर रहते हैं वे
सब मिलजुलकर खाते हैं।
वे कहते हैं – मानव, सीखो तुम हमसे जीना जग में।
हम स्वच्छन्द और क्यों तुमनं डाली है बेड़ी पग में।

Bihar Board Class 6 Hindi Solution प्रश्न 3.
क्या चिड़िया के संदेशों के अनुसार मानव कार्य करते हैं ? इस पर अपना विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

व्याकरण –

Class 6 Hindi Bihar Board प्रश्न 1.
इन शब्दों से वाक्य बनाइए –
लोभ, गगन, जग, संदेश, पाप।
उत्तर:
लोभ : लोभ जीवन में सबसे बड़ा पाप है।
गगन : पक्षी उन्मुक्त होकर गगन में उड़ते हैं।
जग : इस जग को बनाने वाला ईश्वर है।
सन्देश : चिड़िया अपनी मीठी बोली में प्यार का सन्देश सुनाती है।
पाप : दूसरों को दुःख देना पाप है।

Class 6 Bihar Board Hindi Book प्रश्न 2.
ऊँची डाली, काली चिड़िया । इन वाक्यों में ऊँची डाली की तथा काली चिड़िया की विशेषता बताता है। (संज्ञा और सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द विशेषण कहलाते हैं।) नीचे लिखे संज्ञा शब्दों की विशेषता बताने वाले विशेषण शब्द लिखिए।
………… मानव
…………… पीपल
……………. आसमान पग
…………… जग
……………. हंस
उत्तर:
बंदी मानव। ऊँचा पीपल। नीला आसमान। झूठा जग। तीन पग। सफेद हंस।

Class 6 Hindi Chapter 3 Pdf Question Answer Bihar Board प्रश्न 3.
चिड़ियाघर’ इस शब्द में चिड़िया और घर दो शब्द आए हैं। इस तरह के और शब्द बनाइए।
रसोई, सिनेमा, डाक, अजायब, पार्सल, पूजा। ।
उत्तर:
रसोइ – रसोईघर। सिनेमा -सिनेमाघर। डाक – डाकघर। अजायब – अजायबघर। पार्सल – पार्सलधर। पूजा – पूजाघर।

कुछ करने को –

Class 6 Hindi Ch 3 Question Answer Bihar Board प्रश्न 1.
जंगलों में रहने वाले विभिन्न पक्षियों की सूची बनाइए एवं उनके चित्र बनाकर कक्षा में लगाइए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

Bihar Board Class Six Hindi प्रश्न 2.
यदि संसार में एक भी पक्षी नहीं होते तो आपको कैसा लगेगा? इस पर अपने विचार कक्षा में सुनाइए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

Class 6 Hindi Chapter 3 Bihar Board प्रश्न 3.
इसी प्रकार की कोई और कविता ढूंढ़िए और कक्षा में सुनाइए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

चिड़िया Summary in Hindi

कविता का सार-संक्षेप

कवि कहता है- पीपल के पेड़ की ऊँची डाली पर बैठकर चिड़िया गाती . है और अपनी बोली में हमें सन्देश देती है। वह उस पेड़ की डाली पर मिल-जुलकर एक साथ बैठती है। वे जगह के लिये आपस में नहीं झगड़ती और इस प्रकार हमें भी मेल-भाव से रहने की शिक्षा देती हैं। जंगल में अनेक पक्षी रहते हैं .. वहाँ सुग्गे रहते हैं, कोयल रहती है, कबूतरों की टोली रहती है, कौओं का भी बसरा है, हंस और चातक पक्षी (चकवा) भी जंगल में वास करते हैं। ये सभी अलग-अलग समुदाय एवं जाति के पक्षी हैं। इसकी प्रकृति भिन्न है पर उनमें आपस में झगड़े नहीं होते। ये सभी हिलमिल कर रहते हैं। • सारा आकाश ही उनका घर या बसेरा है अतः वे जहाँ चाहते हैं वहाँ रह जाते

अपने परिश्रम से वे दाने इकट्ठे करते हैं – जो बच जाता है उसे औरों के खाने के लिये छोड़ देते हैं। दूसरों का धन लूटकर अपना घर भरने की चाह उनमें नहीं होती। वे तो निर्भय होकर आकाश में विचरण करते हैं – सीमाहीन आकाश उनका अपना साम्राज्य है। अपनी प्रकृति से पूरे मानव समाज को ये एक सीख दे जाती हैं – हम तो स्वछन्द और स्वतन्त्र हैं – तुम गुलामी में क्यों जीना चाहते हो? तुमने तो अपने पैरों में अनेक प्रकार की बेड़ियाँ (बन्धन) डाल रखी हैं। इन बन्धनों को तोड़ो। तुम (मानव) प्रकृति-पुत्र हो – प्रकृति के संग वास करो।

पीपल की डाली पर बैठकर मीठी बोली में गाकर हमें कुछ सुनाती है और फिर नीले आकाश की ओर उड़-फुर्र हो जाती है।

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

Bihar Board Class 11 Political Science चुनाव और प्रतिनिधित्व Textbook Questions and Answers

चुनाव और प्रतिनिधित्व पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सबसे नजदीक बैठता है?
(क) परिवार की बैठक में हाने वाली चर्चा
(ख) कक्षा-संचालक (क्लास-मॉनीटर) का चुनाव
(ग) किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने उम्मीदवार का चयन
(घ) ग्राम सभा द्वारा निर्णय लिया जाना
(ङ) मीडिया द्वारा करवाये गए जनमत-संग्रह
उत्तर:
उपरोक्त सभी कथनों में से (घ) ग्राम सभा द्वारा निर्णय लिया जाना प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का सर्वोत्तम उदाहरण है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व के प्रश्न-उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
इनमें कौन-सा कार्य चुनाव आयोग नहीं करता?
(क) मतदाता-सूची तैयार करना
(ख) उम्मीदवारों का नामांकन
(ग) मतदान-केन्द्रों की स्थापना
(घ) आचार संहिता लागू करना
(ङ) पंचायत के चुनाव का पर्यवेक्षण
उत्तर:
पंचायत के चुनाव का पर्यवेक्षण चुनाव आयोग नहीं करता।

चुनाव और प्रतिनिधित्व Question Answer Bihar Board Class 11 प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सी राज्य सभा और लोकसभा के सदस्यों के चुनाव की प्रणाली में समान हैं?
(क) 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य हैं।
(ख) विभिन्न प्रत्याशियों के बारे में मतदाता अपनी पंसद को वरीयता क्रम में रख सकता है।
(ग) प्रत्येक मत का सामान्य मूल्य होता है।
(घ) विजयी उम्मीदवार को आधे से अधिक मत प्राप्त होना चाहिए।
उत्तर:
जैसा कि हम जानते हैं राज्य के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष चुनाव की श्रेणी में आता है। इस चुनाव में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। राज्यों की विधान सभाओं के सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं, और वे सदस्य या विधायक राज्य सभा सदस्यों का चुनाव करते हैं। हमारे संविधान में संघीय इकाईयों को राज्य सभा में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर दिया गया है।

जिस संघीय क्षेत्रों में विधान सभाएँ नहीं होती वहाँ पर राज्य सभा के सदस्यों के चुनाव हेतु एक विशेष निर्वाचन मण्डल गठित किया जाता है। इस प्रकार अन्ततः मतदाता भारतीय नागरिक ही है, जो लोकसभा के सदस्यों को प्रत्यक्ष रूप से तथा राज्यसभा सदस्यों को अप्रत्यक्ष रूप से चुनता है। अतः उपरोक्त चारों बातों में से प्रथम अर्थात् (क) भाग वाला कथन सही है, कि राज्य सभा और लोक सभा के चुनाव में यह सामान्य है, कि प्रत्येक नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है वह योग्य मतदाता है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व कक्षा 11 प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ प्रणाली में वही प्रत्याशी विजेता घोषित किया जाता है जो –
(क) सर्वाधिक संख्या में मत अर्जित करता है।
(ख) देश में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले दल का सदस्य हो।
(ग) चुनाव-क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत हासिल करता है।
(घ) 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है।
उत्तर:
सर्वाधिक वोट से जीतने वाला उम्मीदवार विजयी घोषित किया जाता है, जो उस निर्वाचन क्षेत्र में किसी भी दूसरे उम्मीदवार से अधिक मत प्राप्त करता है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व प्रश्न-उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 5.
पृथक निर्वाचन-मंडल और आरक्षित चुनाव-क्षेत्र के बीच क्या अंतर है? संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मंडल को क्यों स्वीकार नहीं किया?
उत्तर:
आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र व्यवस्था से अभिप्राय है, कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में सभी मतदाता वोट डालेंगे लेकिन प्रत्याशी उसी समुदाय या सामाजिक वर्ग का होगा जिसके लिए यह सीट आरक्षित है। पृथक निर्वाचन मण्डल की स्थापना अंग्रेज सरकार ने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को कमजोर करने के लिए की थी। इसका अर्थ यह था, कि किसी समुदाय के प्रतिनिधि के चुनाव में केवल उसी समुदायी के लोग वोट डाल सकेंगे। संविधान सभा में अनेक सदस्यों ने इस व्यवस्था को दोषपूर्ण बताया और कहा कि इससे समाज में एकता नहीं हो पाएगी।

पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था भारत के लिए अभिशाप रही है। भारत का विभाजन कराने में इस व्यवस्था का भी सहयोग रहा है। पृथक निर्वाचन मंडल उम्मीदवार (प्रत्याशी) केवल अपने समुदाय या वर्ग का हित ही सोच पाता है, और एकीकृत समाज के भावों की उपेक्षा करने लगता है। परन्तु आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र व्यवस्था में विजयी प्रत्याशी अपने क्षेत्र के अन्तर्गत समाज के सभी वर्गों के हित की बात सोचने को बाध्य रहता है।

यही कारण है, कि संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन मंडल की पद्धति को अस्वीकार कर दिया। प्रत्येक राज्य में आरक्षण के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का एक कोटा होता है, जो उस राज्य में उसके वर्ग या समुदाय की जनसंख्या के अनुपात में होता है। परिसीमन आयोग इन निर्वाचन क्षेत्रों में परिवर्तन कर सकता है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व के प्रश्न-उत्तर Class 11 Bihar Board प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन गलत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द अथवा पद को बदलकर, जोड़कर अथवा नये क्रम में सजाकर इसे सही करें।
(क) एक फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली (“सबसे आगे वाला जीते प्रणाली’) का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।
(ख) चुनाव आयोग पंचायत और नगर पालिकाओं के चुनाव का पर्यवेक्षण नहीं करता।
(ग) भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता।
(घ) चुनाव आयोग में एक से ज्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य है।
उत्तर:
(क) भारत में सभी चुनाव ‘सर्वाधिक वोट से जीत’ प्रणाली से कराए जाते हैं। भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा और विधान परिषदों के सदस्यों को छोड़कर बाकी सभी चुनाव ‘सर्वाधिक वोट से जीत’ प्रणाली (FPTP) से सम्पन्न कराए जाते हैं।
(ख) निर्वाचन आयोग स्थानीय निकायों के चुनाव का सुपरविजन (पर्यवेक्षण) नहीं करता।
(ग) भारत का राष्ट्रपति निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटा सकता है।
(घ) निर्वाचन आयोग में एक से अधिक निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति विधिक आदेश सूचक है।

चुनाव और प्रतिनिधि पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 7.
भारत की चुनाव-प्रणाली का लक्ष्य समाज के कमजोर तबके की नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना है। लेकिन अभी तक हमारी विधायिका में महिला सदस्यों की संख्या 10 प्रतिशत तक भी नहीं पहुँचती । इस स्थिति में सुधार के लिए आप क्या उपाय सुझाएँगे?
उत्तर:
भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। परन्तु संविधान में इसी प्रकार की आरक्षण व्यवस्था समाज के अन्य कमजोर और उपेक्षित वर्गों के लोगों के लिए नहीं की गई। जैसा कि हम देखते हैं, कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के अन्दर महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण अभी तक नहीं किया गया है।

विभिन्न राजनीतिक दल महिलाओं की सीटों के आरक्षण की बात करते हैं, परन्तु इस प्रकार का विधेयक संसद में लाने का प्रयास किया जाता है, तो कोई दल विचारधारा को तथा कोई दल तकनीकी कमियों को प्रकट करने की कोशिश के आधार पर विधेयक का विरोध करने लगता है। इस प्रकार अभी तक महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पारित नहीं होने दिया गया है, यद्यपि माँग सभी दल करते हैं, कि महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए।

चुनाव और प्रतिनिधित्व Bihar Board Class 11 प्रश्न 8.
एक नये देश के संविधान के बारे में आयोजित किसी संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्मलिखित आशाएँ जतायीं। प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि उनके लिए फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली) उचित होगी या समानुपातिक प्रतिनिधित्व वाली प्रणाली?
(क) लोगों को इस बात की साफ-साफ जानकारी होनी चाहिए कि उनका प्रतिनिधि कौन है, ताकि वे उसे निजी तौर पर जिम्मेदार ठहरा सकें।
(ख) हमारे देश में भाषाई रूप से अल्पसंख्यक छोटे-छोटे समुदाय हैं और देश भर में फैले हैं, हमें इनकी ठीक-ठीक नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना चाहिए।
उत्तर:
(क) EPT.P
(ख) समानुपातिक प्रतिनिधित्व

प्रश्न 9.
एक भूतपूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस मसले पर कई विचार सामने आए। एक विचार यह था कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतन्त्र नागरिक है। उसे किसी राजनीतिक दल में होने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसे विकल्प की संभावना कायम रखने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होगी। इस कारण, भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयोग की निष्पक्षता को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप इसमें किस पक्ष से सहमत हैं, और क्यों?
उत्तर:
किसी भी चुनाव प्रणाली को सही रूप से कार्य करने के लिए यह आवश्यक है, कि स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए। यदि लोकतंत्र को वास्तविक रूप देना है तो यह अत्यावश्यक है, कि चुनाव प्रणाली निष्पक्ष व पारदर्शी हो। भारत के संविधान में अनुच्छेद 324 (1) में यह व्यवस्था की गयी है, कि संसद और प्रत्येक राज्य विधान मण्डल के लिए कराए जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने और उन सभी निर्वाचनों के संचालन अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण एक आयोग में निहित होगा (जिसे इस संविधान में निर्वाचन आयोग कहा गया है) भारत का निर्वाचन आयोग एक सदस्यीय अथवा बहुसदस्यीय हो सकता है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों को ईमानदारी से स्वतन्त्रतापूर्वक अपने कार्यों एवं दायित्वों को निर्वाह करना चाहिए। स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव कराया जाना ही लोकतंत्र की सफलता का सूचक है, और अनिवार्य शर्त भी। यदि लोकतंत्र को वास्तविक रूप देना चाहते हैं, तो यह आवश्यक है, कि चुनाव स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष हो। चुनाव प्रणाली निष्पक्ष और पारदशी होना चाहिए। मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका इस कार्य में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है। यदि शासक दल किसी पक्षपात करने वाले व्यक्ति को मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त्त करे तो निर्वाचन में निष्पक्षता संदिग्ध हो सकती है। अतः आजकल एक धारणा यह भी है कि मुख्य निर्वाचन में विपक्ष के नेता एवं सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाए ताकि निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता बनी रहे।

इस प्रश्न के अनुसार यदि सेवानिवृत्ति के बाद चुनाव आयुक्त के किसी राजनीतिक दल के साथ मिलने और चुनाव लड़ने की छूट होने की संभावना बनती है, तो वह अपने कार्यकाल में उस राजनीतिक दल के पक्ष में निर्वाचन कार्य को प्रभावित करना शुरू कर सकता है। अत: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को रिटायर होने के बाद भी राजनीतिक दल का सदस्य बनने और चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए।

प्रश्न 10.
भारत का लोकतंत्र अब अनगढ़ ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार हो चुका है क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
जब भारत का संविधान बनाया गया तो वहाँ इस बात पर विवाद होने के पश्चात् कि भारत की परिस्थितियों को देखते हुए भारत के चुनाव में ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ अर्थात् सर्वाधिक वोट से जीत वाली प्रणाली को अपनाया गया। केवल राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति तथा राज्यसभा और विधान परिषद के सदस्यों के निर्वाचन में समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाया गया। उस समय सर्वाधिक मत जीत वाली प्रणाली को अपनाने से एक दल का वर्चस्व रहा जिसके साथ-साथ अनेक छोटे दल भी उभर कर आए। 1989 ई. के बाद भारत में बहुदलीय गठबन्धन की कार्यप्रणाली प्रचलन में आई।

यद्यपि सर्वाधिक मत जीत प्रणाली को अपनाने का कारण इसके सरल प्रणाली होने के साथ-साथ इस बात की सम्भावना को भी ध्यान में रखा गया था, कि समानुपातिक प्रणाली में किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिलने में कठिनाई आ सकती है। पर आज जबकि FPTP प्रणाली से ही हम पाते हैं, कि भारत में गठबन्धन सरकारें बनाना अनिवार्य हो गया है। इसके साथ ही जो पार्टी चुनाव के समय लोकसभा में कांग्रेस ने 48% मत प्राप्त करके 415 सीटें प्राप्त की थीं, जबकि भाजपा ने 24% मत प्राप्त किया और केवल दो सीटें प्राप्त की।

इस प्रकार इस प्रणाली में जहाँ मतों के अनुपात में सीटें उपलब्ध नहीं होती वहीं यह भी एक अत्यधिक विचारणीय प्रश्न है कि एक निर्वाचन क्षेत्र में कई उम्मीदवार होने के कारण विजयी उम्मीदवार यदि 30 प्रतिशत मत प्राप्त करता है, तो 70 प्रतिशत मत हारने वाले उम्मीदवारों में बँट जाते हैं। इस प्रकार विजयी उम्मीदवार उस जनता का प्रतिनिधित्व करता है, जो अल्पमत में है।

अतः आज के युग में सही प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के लिए यदि समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाया जाए तो यह अधिक हितकर हो सकता है। भारत जो विविधताओं का देश है, उसमें प्रत्येक वर्ग, समुदाय और विचारधाराओं का उचित प्रतिनिधित्व हो पाएगा और संसद या राज्य विधानमण्डल में प्रत्येक नागरिक को अपने प्रतिनिधित्व दिखाई देगा जिससे वह अपने को असहाय महसूस नहीं करेंगे।

Bihar Board Class 11 Political Science चुनाव और प्रतिनिधित्व Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत में गुप्त मतदान किस प्रकार सुनिश्चित किया जाता है?
उत्तर:
भारत में मतदाता के लिए गुप्त मतदान की व्यवस्था की गयी है। मतदान केन्द्र पर मतदाता को एक मत पत्र (अब कम्प्यूटराइज मशीन) दिया जाता है, जिस पर सभी उम्मीदवारों के नाम अकिंत होते हैं। मतदाता एक ऐसे स्थान पर जाकर, जहाँ वह अकेला ही होता है, और कोई अन्य व्यक्ति उसे देख नहीं सकता, अपनी पसन्द के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगाता है, (अब बटन दबाता है) मत पत्र को मोड़कर मतपेटी में डाला जाता है, उसे (या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को) सील कर दिया जाता है। इस प्रकार किसी को भी यह पता नहीं चल पाता कि मतदाता ने अपना मत किस उम्मीदवार को दिया है।

प्रश्न 2.
भारत में वयस्क मताधिकार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर:
भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 में कहा गया है, कि लोकसभा तथा राज्य विधान सभाओं के सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा। 18 वर्ष की आयु प्राप्त भारत का नागरिक मताधिकार का प्रयोग करेगा। भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को जाति, पंथ, धर्म, लिंग, जन्म स्थान के भेदभाव के बिना समान मतदान का अधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 3.
“सर्वाधिक वोट से जीत’ व्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब पूरे देश को कुल उतने निर्वाचन क्षेत्रो में बाँट जाता है, जितने कि कुल सदस्य चुने जाने हों और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है, तो उस निर्वाचन क्षेत्र में जिस प्रत्याशी को सबसे अधिक वोट प्राप्त होते हैं, उसे विजयी (निर्वाचत) घोषित किया जाता है। विजयी प्रत्याशी के लिए यह जरूरी नहीं कि उसे कुल मतों का बहुमत मिले। इस विधि को सर्वाधिक वोट से जीत कहते हैं। इसे बहुलवादी व्यवस्था भी कहा जाता है।

प्रश्न 4.
समानुपातिक प्रतिनिधित्व से आप क्या समझते है?
उत्तर:
प्रत्येक पार्टी चुनाव से पहले अपने प्रत्याशियों की एक प्राथमिकता सूची जारी कर देती है, और अपने उतने ही प्रत्याशियों को उम्र प्राथमिकता सूची से चुन लेती है, जितनी सीटों का कोटा उसे मिलता है। चुनावों की इस व्यस्था को समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली कहते हैं। इस प्रणाली में किसी पार्टी को उतने ही प्रतिशत सीटें प्राप्त होती हैं जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं। इजरायल में इसी प्रणाली से चुनाव किया जाता है।

प्रश्न 5.
चुनाव घोषणा पत्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्रायः आम चुनाव के समय प्रत्येक राजनीतिक दल लोगों के साथ कुछ ऐसे वायदे करता है कि यदि वह सत्तारूढ़ हो अर्थात् चुनाव में यदि जनता उसके दल को विजय दिलाती है, तो वह दल देश व जनता के हित के लिए क्या-क्या कार्य करेगा। अतः जिस लेख में कोई राजनीतिक दल अपने कार्यक्रमों, नीतियों तथा उद्देश्यों को बतलाता है, उसे चुनाव घोषणा पत्र कहते हैं।

प्रश्न 6.
भारतीय निर्वाचन प्रणाली की किन्हीं दो कमियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय निर्वाचन प्रणाली की दो प्रमुख कमजोरियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारतीय निर्वाचन प्रणाली का एक प्रमुख दोष यह है, कि यहाँ धन तथा बाहुबल का प्रयोग किया जाता है, जिस कारण योग्य तथा ईमानदार व्यक्ति चुनाव में भाग लेने से बचना चाहते हैं।
  2. भारतीय चुनाव व्यवस्था का दूसरा प्रमुख दोष है, कि जाली मतदान, सरकारी तंत्र का दुरुपयोग अथवा अन्य किसी प्रकार की असंवैधानिक गतिविधि द्वारा चुनाव जीतने वाले प्रत्याशी के विरुद्ध चुनाव याचिकाओं का न्यायालय में शीघ्र निपटारा नहीं होता और तब तक नया चुनाव आ जाता है।

प्रश्न 7.
अल्पसंख्यकों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व की किन्हीं दो पद्धतियों के नाम बताओ।
उत्तर:
अल्पसंख्यकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए जो पद्धतियाँ अपनायी जाती हैं, उनमें से दो प्रमुख पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली: जिसमें दो तरीके हैं-एक एकल संक्रमणीय मत प्रणाली तथा दूसरी सूची प्रणाली।
  2. संचित मत प्रणाली: इसके अनुसार मतदाता चाहे तो अपने सारे मत एक ही उम्मीदवार को दे सकता है।

प्रश्न 8.
स्थगित चुनाव से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब किसी चुनाव क्षेत्र में किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार की अचानक मतदान शुरू होने से पूर्व मृत्यु जो जाती है, तो चुनाव आयोग उस क्षेत्र विशेष में चुनाव को स्थगित कर देता है। परन्तु निर्दलीय प्रत्याशी की मृत्यु होने पर चुनाव स्थगित नहीं किया जाएगा।

प्रश्न 9.
निर्वाचन व्यवस्था से क्या अभिप्राय हैं?
उत्तर:
आधुनिक युग में जनता के प्रतिनिधियों द्वारा शासन चलाया जाता है। जनता अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन करती हैं, और वे प्रतिनिधि सरकार का निर्माण करते हैं। ये प्रतिनिधि जनता से शक्ति प्राप्त करके देश में शासन चलाते हैं। भातर के संविधान द्वारा प्रतिनिधियों को चुने जाने का तरीका निश्चित किया गया है, जिसे निर्वाचन प्रणाली या निर्वाचन व्यवस्था कहा जाता है।

प्रश्न 10.
प्राचीन यूनान (ग्रीक) के नगर-राज्यों में प्रचलित प्रत्यक्ष लोकतंत्र के स्वरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन यूनान में प्रचलित लोकतंत्र का स्वरूप लोकतंत्र से भिन्न था। प्राचीन लोकतंत्र का स्वरूप प्रत्यक्ष था; परन्तु इसमें जो वयस्क व्यक्ति भाग लेते थे, वे यूनान की जनसंख्या के 15 प्रतिशत से भी कम होते थे। दासों, स्त्रियों, बच्चों तथा विदेशियों को मताधिकार नहीं था। लोकतंत्र प्रणाली कुछ इस प्रकार की थी कि एक मतदाता सिपाही भी था, न्यायाधीश प्रशासी सभा का सदस्य भी होता था। प्रायः प्रत्यक्ष लोकतंत्र आधारित सरकारें भीड़ तंत्र की और झुक जाती थीं।

प्रश्न 11.
लोकतंत्र में वयस्क के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मताधिकार का अर्थ है, मत देने का अधिकार। वयस्क मताधिकार प्रणाली के अनुसार लोकतंत्रीय देशों में प्रत्येक उस नागरिक को मतदान का अधिकार दिया जाता है, जो एक निश्चित आयु सीमा को पार करके वयस्क हो चुका है। व्यस्क मताधिकार देते समय जाति, धर्म, भाषा या लिंग आदि का भेदभाव नहीं किया जाता। लोकतंत्रीय देशों में वयस्क मताधिकार का बहुत महत्त्व है। लोकतंत्र का मुख्य आधार समानता है, और वयस्क मताधिकार में सभी को समान समझा जाता है। इससे सभी नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा प्राप्त होती है, और उनमें आत्मश्विास तथा स्वाभिमान जागृत होता है।

प्रश्न 12.
निर्वाचन आयोग के दो कार्य बताइए।
उत्तर:
चुनाव आयोग के दो कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. मतदाता सूची तैयार करता
  2. निष्पक्ष चुनाव कराना।

प्रश्न 13.
निर्वाचन व्यवस्था में तीन प्रस्तावित सुधार बताइए।
उत्तर:

  1. निर्वाचन की घोषणा तथा निर्वाचन प्रक्रिया पूर्ण होने तक मंत्रियों द्वारा सरकारी तंत्र के प्रयोग पर पाबन्दी।
  2. निर्वाचन से पूर्व अधिकारियों की नियुक्ति व स्थानान्तरण पर प्रतिबन्ध।
  3. मतदाता पहचान पत्र के प्रयोग की अनिवार्यता।

प्रश्न 14.
भारत में मतदाता की योग्यताएँ क्या हैं?
उत्तर:
मतदाता की योग्यताएँ –

  1. वह भारत का नागरिक हो
  2. वह 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो
  3. उसका नाम मतदाता सूची में हो

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था के गुण तथा दोषों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
देश के शासन में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए जिस चुनाव प्रणाली का प्रयोग किया जाता हैं, उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली कहते हैं। इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को उनकी जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व देना है। इसके निम्नलिखित गुण हैं –
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के गुण –

1. प्रत्येक वर्ग या दल को उचित प्रतिनिधित्व:
इस प्रथा के अनुसार समाज का कोई भी वर्ग या देश का कोई भी दल प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं रहता। जिस वर्ग या दल के पीछे जितने मतदाता होते हैं, उसको उसी अनुपात से विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व मिल जाता है।

2. अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा:
इस प्रणाली में अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व मिल जाता है।

3. कोई वोट व्यर्थ नहीं जाता:
इस प्रणाली के अधीन प्रत्येक मत गिना जाता है। यदि कोई उम्मीदवार सफल नहीं होता तो उसके मत दूसरे उम्मीदवारों को हस्तान्तरित कर दिए जाते हैं, और इस प्रकार कोई भी मत व्यर्थ नहीं जाता।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के दोष –

  1. यह प्रक्रिया जटिल हैं। मतदाता के लिए अपने मत का उचित प्रयोग करना कठिन है।
  2. बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण जनता का अपने प्रतिनिधित्व से सीधा सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाता है।
  3. इस प्रणाली में प्रत्येक वर्ग के प्रतिनिधि विधान मंडल पहुँचकर अपने-अपने वर्गीय हितों को महत्त्व देते हैं, जिससे राष्ट्रीय हितों की हानि होती है।

प्रश्न 2.
चौदहवीं लोकसभा में विभिन्न दलों की स्थिति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
चौदहवीं लोकसभा में दलों की स्थिति (मई 2005 ई.)
Bihar Board Class 11 Political Science Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व Part - 2 Image 1

प्रश्न 3.
भारत में चुनाव आयोग के अधिकार एवं कार्य क्या है?
उत्तर:
निर्वाचन आयोग के अधिकार एवं कार्य-चुनाव व्यवस्था लोकतान्त्रिक प्रणाली का प्राण है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारतीय संविधान में एक ऐसे सांविधानिक आयोग की स्थापना की गई है, जिसका प्रमुख कार्य भारतीय संघ के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा, राज्यसभा एवं भारतीय संघ के सभी राज्यों के विधान मंडलों के चुनाव संपन्न कराना है।

इसी सांविधानिक आयोग को निर्वाचन आयोग के नाम से जाना जाता है। निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्त से संबधित व्यवस्था अनुच्छेद-324 में की गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की अवधि तथा अन्य आयुक्त का 6 वर्ष या 62 वर्ष के लिए की जाती है। आयोग निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन मतदाता सूची तैयार करना, राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना एवं चुनाव करवाना है।

प्रश्न 4.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से आप क्या समझते हैं? लोकतंत्र में इसके महत्त्व की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सार्वभौम वयस्क मताधिकार:
लोकतंत्र में जनता ही शासन का आधार होती है। जनता के मत से सरकार चुनी जाती है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का अर्थ यह है कि मत देने का अधिकार बिना जाति, धर्म, वर्ग अथवा लिंग भेद किए, सभी वयस्क नागरिकों को दिया जाना चाहिए। इसमें शिक्षा या सम्पत्ति आदि की कोई शर्त नहीं होती है। 1988 ई. तक भारत में वयस्कों की आयु 21 वर्ष परन्तु एक संशोधन के द्वारा अब यह 18 वर्ष कर दी गयी है।

वयस्क मताधिकार का लोकतंत्र में महत्त्व –

1. मानव स्वतन्त्रता की रक्षा का एक उपाय सभी नागरिकों को मताधिकार देना है। लास्की का कहना है-“प्रत्येक वयस्क नागरिक का अधिकार है वह यह बतलाए कि शासन का संचालन किन लोगों से कराना है।” इस प्रकार प्रजातंत्र में वयस्क मताधिकार मिलने से समाज के प्रत्येक नागरिक राजनीतिक जागरुकता बनाए रखते हैं। सरकार पूरे समाज के कल्याण के लिए बाध्य होती है।

प्रश्न 5.
भारत में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किस प्रकार चुनाव प्रक्रिया को हानि पहुँचाता है? इसे दूर करने के कोई दो सुझाव दीजिए।
उत्तर:
भारत में चुनाव के समय सत्ता दल द्वारा सांकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया जाता है। निर्वाचन से ठीक पहले महत्त्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में मनमाने ढंग से व्यापक संख्या में अधिकारियों का स्थानान्तरण किया जाता है, जिससे सत्तारूढ़ दल को मदद मिल सके। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के मंत्री सरकारी कार्य के नाम पर चुनाव के लिए दौरे तथा सरकारी पद व सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करते हैं।

सुधार:
सरकारी मशोनरी का दुरुपयोग रोकने के दो प्रमुख सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. चुनाव की घोषणा से लेकर चुनावों के परिणाम घोषित होने तक की अवधि में मंत्रियों के सभी प्रकार के सरकारी दौरों पर प्रतिबन्ध लगाया जाए।
  2. निर्वाचन से ठीक पहले सरकार द्वारा अधिकारियों के स्थानांतरण व नियुक्तियों पर रोक लगा दी जाए।

प्रश्न 6.
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का क्या अर्थ है? क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की किन्हीं दो विशेषताओं तथा किन्हीं दो सीमाओं की व्याख्या कीजिए। अथवा, बहुलवादी निर्वाचन व्यवस्था के दो गुण तथा दो दोषों का परिक्षण कीजिए।
उत्तर:
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व-इस व्यवस्था को सर्वाधिक वोट से जीत व्यवस्था भी कहते हैं। इस व्यवस्था में पूरे देश को प्रादेशिक क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। ये निर्वाचन क्षेत्र लगभग बराबर-बराबर आकार में होते हैं। उम्मीदवार में से निर्वाचक अपनी पसन्द के उम्मीदवार को मत देता है, और इस प्रकार जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं वह विजयी घोषित किया जाता है। इस व्यवस्था में यह आवश्यक नहीं है कि विजयी उम्मीदवार को आधे से अधिक मत मिले। केवल उसे अन्य उम्मीदवारों से अलग-अलग प्रत्येक से अधिक मत मिलना आवश्यक होता है। क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के चार प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

  1. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का आकार छोटा होता है। अत: मतदाताओं और प्रतिनिधि में सम्पर्क बना रहता है।
  2. निर्वाचन क्षेत्र छोटा होने के कारण खर्च भी कम होता है।
  3. यह प्रणाली सरल है। मतदाता एक मत का ही प्रयोग करता है। मतों की गिनती करना भी आसान होता है।
  4. निर्वाचन क्षेत्र छोटा होने के कारण संसद में प्रत्येक क्षेत्र के हितों का प्रतिनिधित्वं होता रहता है। राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ स्थानीय हितों की भी पूर्ति होती रहती है।

क्षेत्रीय अथवा बहुलवादी प्रतिनिधित्व के दो दोष (सीमाएँ) –

  1. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व स्पष्ट तथा सही ढंग से लोगों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करता।
  2. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व या प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की सोच तथा आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सर्वाधिक मत जीत प्रणाली के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए। अथवा, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली अथवा क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व प्रणाली में पूरे देश को समान जनसंख्या के अनुपात में विभिन्न क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है, जितने कि सदस्य चुने जाते हैं। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ समय-समय पर बदली जाती हैं। ऐसा जनसंख्या के घटने या बढ़ने के कारण किया जाता है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली की सीटों पर जनसंख्या अनुपात में असमानता होने से निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या असमान है। इसमें सुधार हेतु पुनर्सीमन किया जा रहा है।

क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के गुण –

  1. यह प्रणाली सरल तथा व्यावहारिक है। इस चुनाव प्रणाली में मतदाता को कई उम्मीदवारों में से किसी एक को ही चुनना होता है। मतदाता को अपनी पसन्द का उम्मीदवार चुनने में कोई कठिनाई नहीं होती।
  2. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का एक गुण यह भी है, कि इससे राष्ट्र का आर्थिक विकास होता है।
  3. इस प्रणाली के कारण जनता के हितों की रक्षा होती है। प्रत्येक प्रतिनिधि एक राजनीतिज्ञ होता है । वह देश की राजनीति में अपनी रुचि रखता है, और दोबारा चुने जाने के उद्देश्य से अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता के हितों की पूर्ति कराता है।
  4. राष्ट्रीय एकता में वृद्धि होती है। प्रतिनिधि राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर कार्य करते हैं।
  5. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति उत्तरदायी होता है। यदि प्रतिनिधि जनता के हित में कार्य नहीं करता है, तो जनता अगले चुनाव में उसे अपना समर्थन नहीं देती। इस भय के कारण प्रतिनिधि अपने उत्तरदायित्व को पूरा करने का प्रयास करते रहते हैं।
  6. इस प्रणाली में मतदाता और प्रतिनिधि के बीच सीधा सम्पर्क बना रहता है। साधारणतया एक निर्वाचन क्षेत्र मे एक प्रतिनिधि चुना जाता है। इसमें मतदाता अपनी शिकायतों को अपने प्रतिनिधि तक आसानी से पहुंचा सकता है, और प्रतिनिधि उन शिकायतों का निराकरण करता है।
  7. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों पर आधारित है। लोकतन्त्र का प्रमुख सिद्धान्त है कि सभी मनुष्य समान हैं। किसी के प्रति भी जाति, धर्म, लिंग, वर्ण या नस्ल आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
  8. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के पक्ष में एक तर्क यह भी कि इसमें प्रतिनिधि मंत्रिमंडल का निर्माण आसानी से कर लेते हैं।
  9. यह प्रणाली कम खर्चीली है, क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र अधिक बड़ा होता। उम्मीदवारों को अपने चुनाव प्रचार में अधिक पैसा खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के दोष –

  1. इस प्रकार की प्रणाली में यह दोष है, कि प्रतिनिधि राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा अपने क्षेत्र के हितों पर अधिक ध्यान देता है। इस प्रकार राष्ट्रीय हितों की अवहेलना होने लगती है।
  2. मतदाताओं की पसन्द सीमित हो जाती है, क्योंकि उम्मीदवार उसी निर्वाचन क्षेत्र से होते हैं, और यदि उनमें कोई भी योग्य उम्मीदवार नहीं है, तो भी मतदाता को उन्हीं में से एक को मत देना होता है।
  3. मतदाताओं की आवश्यकताओं और हितों में भिन्नता होती है। इस कारण एक प्रतिनिधि के लिए यह संभव नहीं कि वह सभी के हितों का प्रतिनिधित्व कर सके।
  4. इस प्रणाली में अल्पसंख्यकों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता।
  5. इस प्रणाली का एक दोष यह भी है, कि इसमें उम्मीदवार सभी वर्गों का मत प्राप्त करने के लिए झूठे आश्वासन देने लगते हैं।
  6. मतदाताओं को भ्रष्ट किए जाने की संभावना रहती है।

प्रश्न 2.
व्यावसायिक प्रतिनिधित्व प्रणाली किसे कहते हैं? उसके गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक प्रतिनिधित्व प्रणाली-प्रादेक्षिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को त्रुटिपूर्ण मानते हुए कुछ राजनीतिशास्त्रियों ने विकल्प के रूप में व्यावसायिक या प्रकार्यात्मक पद्धति का सुझाव दिया है। व्यावसायिक प्रतिनिधित्व का आधार पेशा या व्यवसाय होता है, न कि प्रादेशिक क्षेत्र। एक ही व्यवसाय में लगे लोगों के हित एक समान होते हैं, न कि एक प्रदेश में रहने वाले लागों के। श्रमिकों का प्रतिनिधित्व श्रमिक, वकीलों का प्रतिनिधित्व वकील, डॉक्टरों का प्रतिनिधित्व डॉक्टर, किसानों का प्रतिनिधित्व किसान तथा व्यापारियों का प्रतिनिधित्व व्यापारी ही करें तो देश में सच्चा लोकतन्त्र स्थापित होगा। व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के गुण –

  1. यह प्रणाली क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व प्रणाली के दोषों को दूर करती है। इस प्रणाली से चुने गए प्रतिनिधियों वाला विधानमण्डल वास्तव में लोगों के विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व करेगा।
  2. गिल्ड समाजवादी कोल का कथन है, कि “वास्तविक लोकतंत्र एक सर्वशक्तिमान प्रतिनिधि सभा में संगठन में पाया जाता है।” उयुग्वी ने कहा है कि “विभिन्न गुटों को प्रतिनिधित्व प्रदान करके जन इच्छा को उपयुक्त अभिव्यक्ति प्रदान की जा सकती है।”
  3. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व में क्योंकि प्रतिनिधि व्यवसाय के आधार पर चुने जाते हैं, अतः इसमें अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का प्रश्न नहीं होता।
  4. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व प्रणाली एक व्यावहारिक प्रणाली है। यदि निम्न सदन के प्रतिनिधि प्रादेशिक प्रतिनिधित्व के आधार पर चुने जाएँ तो सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा।

व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के दोष –

  1. इसके फलस्वरूप राष्ट्रीय विधायिका वर्गीय और ‘विशेष हितों की सभा बन जाएगी और ये प्रतिनिधि राष्ट्रीय हितों का उचित ध्यान नहीं रखेंगे।
  2. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व सामाजिक गुटों की स्वायत्तता पर अधिक बल देता है, जो राज्य के सर्वाच्च सत्तात्मक प्रधिकरण के लिए चुनौती बन जाती है।
  3. राष्ट्रीय एकता को हानि पहुँचती है।
  4. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व से आर्थिक पक्ष का प्रतिनिधित्व तो ठीक-ठाक हो जाता है परन्तु मानव जीवन के अन्य पक्षों की अवहेलना होती है।

प्रश्न 3.
भारत के विगत 14 आम चुनावों के दौरान मतदाताओं के प्रतिमानों व रुझानों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विगत चौदह आम चुनावों के दौरान भारतीय मतदाताओं के द्वारा मतदान व्यवहार के जो प्रतिमान व रुझान प्रकट हुए हैं, उनका विवरण इस प्रकार है – मतदाताओं के निर्णय अपने सामाजिक समूह, दीर्घव्यवस्था की दशा, दल का नेतृत्व करने वाले नेताओं तथा दल की छवि, चुनाव अभियान तथा राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान देते हुए मतदान किया गया है। भारतीय मतदाता के बारे में जो प्रारम्भ में आशंकाएँ प्रकट की गयी थीं उन्हें मतदाता ने निर्मूल सिद्ध किया और लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करते हुए भारतीय मतदाता ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया है। समय के साथ निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका और उनका भाग्य अन्धकारमय बना है।

1951-52 ई. से लेकर 1969 ई. तक पहले आम चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया है। 1971 ई. में इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व और उनके द्वारा दिए गए ‘गरीबी हटाओं’ के नारे का सम्मान करते हुए कांग्रेस (ई) को भारी बहुमत से चुनाव जिताया। 1977 ई. में इन्दिरा गाँधी की नीतियों को ठुकराते हुए भारतीय मतदाता ने जनता पार्टी को सत्तारूढ़ किया परन्तु उसके घटक दलों में एकता और समन्वय की भावना न रहने के कारण 1980 ई. में भारतीय मतदाता ने फिर से राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखते हुए श्रीमती इन्दिरा गाँधी को कांग्रेस (ई.) को भारी बहुमत से चुनाव जिताया।

1984 ई. में इन्दिरा गाँधी की हत्या से उत्पन्न सहानुभूति और भ्रष्टाचार समाप्त करने की आशा में राजीव गाँधी को पूर्ण बहुमत दिया। इसके बाद से स्थानीय हितों की उपेक्षा से नाराज होकर भारतीय मतदाता किसी एक दल को पूर्ण बहुमत न देते हुए गठबन्धन का जनादेश देता आया है। 1989, 1991, 1996, 1998, 1999,2004 ई. इन सभी आम चुनावों में भारतीय मतदाता का सम्मान गठबन्धन सरकारों की और उन्मुख हुआ है। स्वतंत्र निर्दलीय उम्मीदवारों की ओर मतदाताओं का झुकाव अब बहुत ही कम रह गया है।

प्रश्न 4.
भारत की निर्वाचन पद्धति के दोषों का वर्णन करते हुए उनके सुधार के उपाय बताइए।
उत्तर:
भारत में अब तक 14 आम चुनाव हो चुके हैं। यद्यपि ये सभी चुनाव सामान्यतः शान्तिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुए परन्तु कुछ ऐसी त्रुटियाँ आ गयी हैं, जिनके कारण जनता की आस्था चुनावों में कम होने लगी है। अतः प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान चुनाव में सुधार की ओर आकर्षित हुआ है। 1983-84 ई. में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त श्री आर. के त्रिवेदी ने चुनाव प्रक्रिया की येकमियाँ बताई। एक चुनाव में धन का बढ़ता प्रयोग, दो फर्जी मतदान, तीन चुनाव में बाहुबल का प्रयोग और चार मतदान केन्द्रों पर कब्जा।

1990 में दिनेश गोस्वामी समिति ने निम्नलिखित सुझाव दिए –

  1. मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने की घटनाओं को रोकने के लिए पुनर्मतदान कराया जाए।
  2. आरक्षित सीटों के लिए रोटेशन पद्धति अपनायी जाए।
  3. सभी मतदाताओं को फोटो पहचान पत्र दिए जाए।
  4. चुनाव याचिकाओं का शीघ्र निपटारा किया जाए।
  5. इलेक्ट्रोनिक मतदान मशीनों का प्रयोग किया जाए।
  6. किसी भी रिक्त स्थान के लिए 6 माह के अन्दर उपचुनाव कराया जाए।

विविध पक्षों द्वारा दिए गए सुझावों में से अधिकांश स्वीकार किए जा चुके हैं परन्तु अभी भी चुनाव प्रक्रिया में अनेक त्रुटियाँ हैं, और इन त्रुटियों का उपचार निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

(क) FPTP के स्थान पर PR पद्धति अपनायी जानी चाहिए तभी राजनीतिक दलों को प्राप्त जन समर्थन और प्राप्त सीटों की संख्या में अन्तर को समाप्त किया जा सकता है।
(ख) चुनाव में धन के अत्यधिक प्रयोग पर अंकुश लगाना जरूरी है। इसके लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं –

  • राजनीतिक दलों के आय-व्यय की विधिवत जाँच हो।
  • संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों।
  • चुनाव अवधि में सार्वजनिक संस्थाओं को अनुदान देने पर रोक लगे।
  • चुनाव खर्च राज्य सरकार द्वारा वहन करना।

(ग) चुनाव में बाहुबल और हिंसा का प्रयोग रोकने के कदम उठाये जाएं। इसके लिए संबधित राज्य से बाहर के राज्यों की पुलिस और अर्धसैनिक बल पर्याप्त मात्रा में बुलाए जाएँ। हथियारों के लाने ले जाने पर प्रतिबन्ध लगाया जाए।

(घ) जाली मतदान रोकने के लिए फोटो पहचान पत्र अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए।

(ङ) चुनाव में अपराधी तत्वों को खड़ा होने से रोकने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में परिवर्तन किया जाना चाहिए।

(च) निर्दलीय उम्मीदवारों की बड़ी संख्या को कम करने के लिए 1996 में जमानत की राशि दस गुना बढ़ा दी गयी है।

(छ) सत्तादल द्वारा प्रशासनिक तन्त्र का दुरुपयोग रोकने के लिए चुनाव शुरू होने के दिन से लेकर नयी सरकार का गठन होने तक कामचलाऊ सरकार कार्य करे।

(ज) निर्वाचन याचिकाओं की सुनवाई शीघ्रता से की जानी चाहिए।

(झ) प्रत्येक 10 वर्ष बाद निर्वाचन क्षेत्रों का अनिवार्य तौर पर परिसीमन कराया जाए।

प्रश्न 5.
लोकतंत्र में चुनाव क्यों आवश्यक है? चुनाव सुधार के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को लिखें।
उत्तर:
लोकतंत्र में लोग दो तरह से शासन में भागीदारी निभाते हैं। एक प्रत्यक्ष ढंग से और दूसरा अप्रत्यक्ष ढंग से अप्रत्यक्ष ढंग से लोकतंत्र में भागीदारी अपने प्रतिनिधि के माध्यम से निभाते हैं। लोग अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते है। चुने गये प्रतिनिधि ही शासन और प्रशासन को चलाने में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। सुयोग्य प्रतिनिधि ही लोगों की इच्छा, आवश्यकता और समस्याओं को भली भाँति समझ सकते हैं, इसलिए लोकतंत्र में चुनाव आवश्यक है।

लोकतंत्र में चुनाव में हमेशा गड़बड़ी होती रही है या गड़बड़ी होने की आशंका बनी रहती है। भारत भी इससे अछ्ता नहीं है। भारत में 1951 में प्रथम आम चुनाव हुए तब से लेकर आज तक चुनावों में व्यापक धांधली हुई है, जो लोकतंत्र को कलंकित किया है। इसलिए भारत सरकार चुनाव सुधार के लिए कई प्रयास किये हैं। इसके लिए कई समितियाँ भी बनाई जैसे-तारा कुण्डे समिति, 1975 गोस्वामी समिति 1990, आदि।

इसके अलावे भी चुनाव सुधार के लिए सरकार द्वारा अनेक उपाय किये हैं जैसे – 1983 ई. में चुनाव आयोग सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठक की जिसमें निष्पक्ष चुनाव पर सहमती बनी, 1996 में जन प्रतिनिधि कानून में कई संशोधन किए 1997 में राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी नियमों में परिवर्तन किया। 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश जारी किया की अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोका जाय। न्यायालय के निर्देश के बाद सरकार ने यह निर्णय किया कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद कोई भी पार्टी कोई ऐसी घोषणी या निर्देश नहीं जारी कर सकता है, जिसे निष्पक्ष चुनाव होने में समस्या उत्पन्न हो सकती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रपति चुनाव में उत्पन्न विवादों को कौन निपटाता है?
(क) उपराष्ट्रपति
(ख) चुनाव आयोग
(ग) उच्चतम न्यायालय
(घ) प्रधानमंत्री
उत्तर:
(ग) उच्चतम न्यायालय

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य चुनाव आयोग का नहीं है –
(क) मतदाता सुची तैयार करना
(ख) पंचायत चुनावों का पर्यवेक्षण करना
(ग) विधान सभा में निर्वाचन की व्यवस्था करना
(घ) राज्यसभा के उम्मीदवारों का नामांकन की जांच करना
उत्तर:
(ख) पंचायत चुनावों का पर्यवेक्षण करना

प्रश्न 3.
निम्न में से उस व्यक्ति का नाम बताइए जिसने लोकसभा का विश्वास मत प्राप्त किये बिना ही प्रधानमंत्री पद पर कार्य किया।
(क) चरण सिंह
(ख) चन्द्रशेखर
(ग) वी. पी. सिंह
(घ) मोरारजी देसाई
उत्तर:
(घ) मोरारजी देसाई

प्रश्न 4.
लोकतंत्र जनता का जनता के लिए और जनता की सरकार है, किसने कहा है?
(क) अब्राहम लिंकन
(ख) राजेन्द्र प्रसाद
(ग) नेहरू
(घ) महात्मा गाँधी
उत्तर:
(क) अब्राहम लिंकन

Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 1A भूमि, मृदा एवं जल संसाधन

Bihar Board Class 8 Social Science Solutions Geography Hamari Duniya Bhag 3 Chapter 1A भूमि, मृदा एवं जल संसाधन Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 1A भूमि, मृदा एवं जल संसाधन

Bihar Board Class 8 Social Science भूमि, मृदा एवं जल संसाधन Text Book Questions and Answers

अभ्यास-प्रश्न

I. बहुवैकल्पिक प्रश्न

भूमि, मृदा एवं जल संसाधन Bihar Board Class 8 प्रश्न 1.
पृथ्वी का कितना प्रतिशत हिस्सा भूमि के अंतर्गत है ?
(क) 71
(ख) 29
(ग) 41
(घ) 26
उत्तर-
(क) 71

भूमि मृदा एवं जल संसाधन Bihar Board Class 8 प्रश्न 2.
विश्व में सघन जनसंख्या कहाँ मिलती है ?
(क) पहाड़ों पर
(ख) पठारों पर
(ग) मैदानों में
(घ) मरूस्थल में
उत्तर-
(ग) मैदानों में

Bihar Board Class 8 Geography Solution प्रश्न 3.
भारत में भूमि उपयोग संबंधी आँकड़े कौन रखता है ?
(क) भूगर्भ विज्ञान विभाग
(ख) भू-राजस्व विभाग
(ग) गृह विभाग
(घ) भूमि सुधार विभाग
उत्तर-
(ख) भू-राजस्व विभाग

Bihar Board Class 8 Social Science Solution प्रश्न 4.
भूमि उपयोग के कुल कितने प्रमुख वर्ग हैं ?
(क) 9
(ख) 7
(ग) 5
(घ) 3
उत्तर-
(ग) 5

Bihar Board Class 8 Hamari Duniya Solution प्रश्न 5.
मृदा में कुल कितने स्तर पाये जाते हैं ?
(क) 2
(ख) 3
(ग) 4
(घ) 7
उत्तर-
(ग) 4

Bihar Board Solution Class 8 Geography प्रश्न 6.
समोच्चरेखी खेती करना किसका उपाय है ?
(क) जल प्रदूषण को रोकने का
(ख) मृदा अपरदन को रोकने का
(ग) जल संकट को दूर करने का
(घ) भूमि की उर्वरता घटाने का
उत्तर-
(ख) मृदा अपरदन को रोकने का

Bihar Board Class 8 Atit Se Vartman Solution प्रश्न 7.
रासायनिक दृष्टि से जल किसका संयोजन है ?
(क) हाइड्रोजन एवं नाइट्रोजन का
(ख) ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन का
(ग) हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का
(घ) ऑक्सीजन एवं कार्बन का
उत्तर-
(ग) हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का

Bihar Board Class 8 Hamari Duniya प्रश्न 8.
इनमें कौन एक महासागर नहीं है ?
(क) अंटार्कटिक
(ख) आर्कटिक ।
(ग) हिन्द
(घ) प्रशांत
उत्तर-
(क) अंटार्कटिक

II. खाली स्थान को उपयुक्त शब्दों से पूरा करें।

  1. मृदा में जीवों के सड़े-गले अवशेषों को …………. कहा जाता है।
  2. दक्कन क्षेत्र में …….. मृदा पाई जाती है ।
  3. लैटेराइट मृदा का निर्माण … … प्रक्रिया से होता है।
  4. भूमि एक ………… संसाधन है।
  5. महासागरों में जल का ……… प्रतिशत भाग पाया जाता है।

उत्तर-

  1. ह्यूमस
  2. काली
  3. निक्षालन
  4. प्राकृतिक,
  5. 97.3%

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें (अधिकतम 50 शब्दों में)

Bihar Board Class 8 Social Science Solution In Hindi प्रश्न 1.
भूमि उपयोग से क्या समझते हैं ?
उत्तर-
भूमि का उपयोग हम भिन्न-भिन्न कामों में करते हैं । भूमि पर ही कृषि कार्य होता है तथा इसी पर पेड़-पौधे, उगते हैं तथा मकान, गाँव, शहर, तालाब, नहर, कुंआ, चापाकल, सड़कमार्ग, रेलमार्ग, पाइपलाइन मार्ग, कारखाना, विभिन्न खेलों में मैदान एवं स्टेडियम इत्यादि बने होते हैं।

Class 8 Atit Se Vartman Bihar Board प्रश्न 2.
मृदा निर्माण में सहायक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
किसी स्थान के मृदा के निर्माण में वहाँ उपस्थित मौलिक चट्टान, क्षेत्र की जलवायु, वनस्पति, सूक्ष्म जीवाणु, क्षेत्र की ऊँचाई, ढाल तथा समय का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

प्रश्न 3.
भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर-
भूमि का उपयोग दो प्रमुख कारकों द्वारा प्रभावित होता है

  1. प्राकृतिक कारक
  2. मानवीय कारक ।

1. प्राकृतिक कारक-स्थल रूप में भिन्नता, मृदा की विशेषता, खनिजों की उपस्थिति, जलवायु एवं जल संबंधी विशेषताएँ इत्यादि जैसे प्राकृतिक कारक भूमि के उपयोग में परिवर्तन ला देते हैं।

2. मानवीय कारक-तकनीकी ज्ञान में वृद्धि, जनसंख्या वृद्धि, श्रमिकों की उपलब्धता तथा मानवीय आवश्यकताओं में अंतर इत्यादि जैसे कारक भूमि के उपयोग में अंतर ला देते हैं।

प्रश्न 4.
भूमि उपयोग के पाँच वर्गों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
भूमि उपयोग वर्ग-भूमि उपयोग के वर्ग निश्चित हैं । ये वर्ग

  1. वन क्षेत्र की भूमि
  2. कृषि कार्य के लिए अनुपलब्ध भूमि
  3. परती भूमि
  4. अन्य कृषि अयोग्य भूमि
  5. शुद्ध बोई गई भूमि

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें (अधिकतम 200 शब्दों में)

प्रश्न 1.
भूमि उपयोग क्या है ? भूमि उपयोग के विभिन्न वर्गों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भूमि उपयोग का अर्थ कुल उपलब्ध भूमि का विविध कार्यों में होनेवाले उपयोग के आँकड़ों से है । इससे संबंधित आँकड़े हमेशा बदलते रहते हैं। मतलब यह कि विभिन्न देशों के मध्य इसका प्रारूप एक जैसा नहीं मिलता है। कहीं वन क्षेत्र अधिक मिलता है, तो कहीं शुद्ध बोई गई भूमि का क्षेत्र, तो कहीं बंजर भूमि का क्षेत्र अधिक मिलता है भारत में भूमि उपयोग प्रारूप संबंधी आँकड़े या रिकार्ड भू-राजस्व विभाग रखता है ।

भूमि उपयोग वर्ग-भूमि उपयोग के वर्ग निश्चित हैं। ये वर्ग हैं

1. वन क्षेत्र की भूमि

2. कृषि कार्य के लिए अनुपलब्ध भूमि

  • बंजर एवं व्यर्थ भूमि
  • सड़क, मकान, उद्योगों में लगी भूमि

3. परती भूमि

  • चालू परती भूमि (जिस भूमि पर एक वर्ष या उससे कम समय से कृषि नहीं की गई हो)
  • अन्य परती भूमि (जिस भूमि पर एक वर्ष से अधिक तथा पाँच वर्ष से कम समय से कृषि नहीं की गई हो ।)

4. अन्य कृषि अयोग्य भूमि

  • स्थायी चारागाह की भूमि
  • कृषि योग्य बंजर भूमि (जिस भूमि पर पाँच वर्ष से अधिक समय से खेती नहीं की गई हो ।)

5. शुद्ध बोई गई भूमि

प्रश्न 2.
मृदा निर्माण की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
किसी स्थान के मृदा के निर्माण में वहाँ उपस्थित मौलिक चट्टान, क्षेत्र की जलवायु, वनस्पति, सूक्ष्म जीवाणु, क्षेत्र की ऊँचाई, ढाल तथा समय का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है । मृदा निर्माण प्रक्रिया में सबसे पहले मौलिक चट्टानें टूटती हैं । टूटे हुए कणों के और महीन होने की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है । हजारों लाखों वर्षों बाद वही चट्टानी टुकड़ा भौतिक, रासायनिक एवं जैविक ऋतुक्षरण से महीन कणों में बदल जाता है, जो ‘मृदा’ कहलाता है। सामान्यत: यह एक सेंटीमीटर मोटी सतहवाली मृदा के निर्माण में सैकड़ों हजारों वर्ष लग जाते हैं।

मृदा निर्माण की प्रक्रिया काफी लंबी अवधि में पूरी होती है । इस दौरान मृदा के तीन स्तर तैयार हो जाते हैं। इन्हें ऊपर से नीचे की ओर क्रमशः ‘अ’ स्तर, ‘ब’ स्तर, एवं ‘स’ स्तर कहा जाता है । ऊपरी स्तर ‘अ’ में ह्यूमस की अधिकता होती है । ‘ब’ स्तर में बालू एवं पंक की प्रधानता होती है। ‘स’ स्तर में ऋतुक्षरण से प्राप्त चट्टानी कण मिला करते हैं। जबकि सबसे निचले स्तर में मूल चट्टानें होती हैं

प्रश्न 3.
मृदा अपरदन के कारकों का उल्लेख कर इसके बचाव हेतु उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर-
मृदा अपरदन के मुख्य कारक हैं-जलवायु, वनस्पति विस्तार, स्थलरूप, भूमि की ढाल एवं मानवीय क्रियाएँ ।

वनों की कटाई, पशुचारण, आकस्मिक तेज वर्षा, तेज पवन, अवैज्ञानिक – कृषि पद्धति तथा बाढ़ के प्रभाव से मृदा का अपरदन ज्यादा होता है । तेज

पवन या पानी के बहाव से मैदानी या चौरस क्षेत्रों में सतही अपरदन होता है। जबकि उबड़-खाबड़ क्षेत्रों में क्षुद्रनालिका या अवनालिका अपरदन होता

मृदा अपरदन के कारण मृदा के मौलिक गुणों एवं उर्वरता में कमी आने लगती है । इसका असर फसलों, फलों एवं साग-सब्जियों के उत्पादन पर पड़ता है । इसलिए मृदा संरक्षण के उपायों को अपनाना जरूरी है । मृदा संरक्षण के लिए हमें निम्न उपाय करने पड़ेंगे

  1. पर्वतीय क्षेत्रों में समोच्चरेखी खेती करना ।
  2. पर्वतीय ढलानों पर वृक्षारोपण करना ।
  3. बंजर भूमि पर घास लगाना ।
  4. फसल चक्र तकनीक को अपनाना ।
  5. खेती के वैज्ञानिक तकनीक को अपनाना।
  6. जैविक खाद का प्रयोग करना ।

प्रश्न 4.
जल प्रदूषण के कारणों का उल्लेख कर इसके दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
जल के (स्वाभाविक) प्राकृतिक गुणों में अंतर आना या जल में अवांछित पदार्थों का मिल जाना, जो जीवन के लिए हानिकारक होता है, जल प्रदूषण कहलाता है । जल प्रदूषण के निम्न स्रोत हैं

  1. घरेलू कूड़ा-करकट
  2. औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ
  3. नगरीय क्षेत्रों का गंदा जल
  4. परिवहन एवं यातायात दुर्घटनाएँ

इस प्रदूषित जल को पीने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं । जैसे-उल्टी आना, किडनी का खराब होना, पेट दर्द, सिर दर्द, डायरिया, छाती दर्द, हड्डी का विकृति, वजन घटना, दिमागी विकृति इत्यादि।
जल प्रदूषण से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय करना चाहिए

(क) नदियों, तालाबों में अपशिष्ट पदार्थों को डालने पर प्रतिबंध लगाना।
(ख) अजैविक खादों के उपयोग पर रोक लगाना ।

प्रश्न 5.
जल संकट क्या है ? जल संकट के लिए जिम्मेवार कारकों का उल्लेख कर इसे दूर करने के उपायों का विवरण दीजिए।
उत्तर–
जनसंख्या का बढ़ना, जल का अति दोहन, जल का अनुचित उपयोग, जल का असमान वितरण, जल का प्रदूषित होना, शहरों में पनपती अपार्टमेंट संस्कृति इत्यादि जल प्रदूषण के बड़े कारण हैं । कई शहरों में

आवश्यकता से अधिक जल उपलब्ध है, परंतु वे प्रदूषित हैं । इसी तरह, कई : शहर महासागरों के किनारे अवस्थित हैं परंतु वहाँ जल का उपयोग नहीं किया – जा सकता । इसलिए जल की कमी या जल संकट पूरे विश्व में व्याप्त है। जल संकट को दूर करने के निम्नलिखित उपाय हैं

  1. वर्षा जल संग्रह की तकनीक
  2. छत का वर्षा जल संग्रहित करना
  3. जल का समुचित उपयोग करना
  4. जल को प्रदूषित होने से बचाना
  5. जल के पुन:चक्रण तकनीक को अपनाना
  6. सिंचाई के लिए आधुनिक तकनीकों को अपनाना
  7. बच्चों के बीच जल संरक्षण की महत्ता को बताना
  8. प्राचीन जल संचय तकनीकों को अपनाना

प्रश्न 6.
भारत में पाई जानेवाली मृदाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारत में जलोढ़ मृदा, काली मृदा, लाल मृदा, पीली मृदा, लैटेराइट मृदा, मरूस्थलीय मृदा एवं पर्वतीय मृदा पाई जाती है । जलोढ़ मृदा देश के सभी नदी घाटियों में पाई जाती है । उत्तर भारत का विशाल मैदान पूर्णत: जलोढ़ निर्मित है । नवीन जलोढ़ को खादर एवं पुराने जलोढ़ को बाँगर कहा जाता है । जलोढ़ मृदा चावल, गेंहूँ, मक्का, गन्ना एवं दलहन फसलों के उत्पादन के लिए उपयुक्त है

काली मृदा ऐलुमिनियम एवं लौह यौगिक की उपस्थिति के कारण काली होती है। यह मृदा कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश तथा तामिलनाडु में यह मृदा अधिक पाई जाती है। लाल एवं पीली मुदा प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी एवं दक्षिणी हिस्से में पाई जाती है । लोहे के अंश के कारण इस मदा का रंग लाल होता है। जल में मिलने के बाद यह मृदा पीली रंग की हो जाती है । ज्वार-बाजरा, मक्का, मुंगफली, तंबाकू और फलों के उत्पादन के लिए उपयुक्त यह मृदा उड़ीसा, झारखंड एवं मेघालय में पाया जाता है ।

लैटेराइट मृदा का निर्माण निक्षालन की प्रक्रिया से होता है । यह मृदा केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु राज्यों में मिलती है । मरूस्थलीय मृदा हल्के भूरे रंग की होती है जो राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, पश्चिमी हरियाणा एवं दक्षिणी पंजाब में पाई जाती है । पर्वतीय मृदा पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है ।

कार्यकलाप

प्रश्न 1.
भारत का मानचित्र बनाकर मृदाओं के विवरण को दिखाइए ।
उत्तर-
Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 1A भूमि, मृदा एवं जल संसाधन 1

Bihar Board Class 6 English Book Solutions Chapter 13 Laughing Song

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BSEB Bihar Board Class 6 English Book Solutions Chapter 13 Laughing Song

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Bihar Board Class 6 English Laughing Song Text Book Questions and Answers

A. Warmer

Laughing Song Question Answer Class 6 Bihar Board Question 1.
Different people laugh in different ways. Can you do a mimicry’ showing different ways of laughing ?
Answer:
Yes. I can do the mimicry.
(Laugh in different ways in your classroom yourselves.)

B. Comprehension

B. 1. Think and Tell.

A Laughing Song Poem Questions And Answers Bihar Board Question 1.
How do the green woods laugh ?
Answer:
With the voice of joy.

Laughing Song Poem Questions And Answers Bihar Board Question 2.
Where do the painted birds laugh ?
Answer:
In the shade.

Questions And Answers On Poem Laughing Song Bihar Board Question 3.
How does the green hill laugh ?
Answer:
With the noise of it.

B. 2. Think and Write.

B. 2. 1. Fill in the blanks

Laughing Song Question Answer Bihar Board Question 1.

  1. The greenwood laughs with the voice of
  2. The air laughs with our wit.
  3. Mary, Susan and Emily ‘ha, ha, he’
  4. The painted birds laugh in the
  5. Our table is spread with cherries and

Answer:

  1. joy
  2. merry
  3. sing
  4. shade
  5. nuts.

B. 2. 2. Tick the right answers to each of the questions given below.

Laughing Song By William Blake Questions And Answers Bihar Board Question 1.
When the air does laugh with our merry wit. “Our merry wit” means:
(a) Our laughing.
(b) Our natural aptitude for using our words and ideas in a quick and inventive way to create humour.
(c) The air laughing.
Answer:
(b) Our natural aptitude for using our words and ideas in a quick and inventive way to create humour.

Laughing Song In Hindi Bihar Board Question 2.
When the painted birds laugh in the shade. Here painted birds means:
(a) Birds painted by an artist.
(b) Colorful birds.
Answer:
(b) Colorful birds.

Laugh And Be Happy Class 6 Questions And Answers Bihar Board Question 3.
Whom does the poet invite to sing the sweet chorus of ‘ha, ha, he’?
(a) Everyone
(b) Mary. Susan and Emily
(c) The painted birds
Answer:
(a) Everyone

B. 2. 3. Answer in not more than 50 words

Laughing Song Poem Hindi Translation Bihar Board Question 1.
Why is laughter called a sweet chorus ?
Answer:
In the poem. ‘Laughing song’ laughter is called sweet chorus. It is so. because men, birds, animals and all the nature is laughing. All laugh together, so laughter is called a sweet chorus.

Laugh And Be Happy Class 6 Bihar Board Question 2.
Describe the scene around the poet ?
Answer:
The green woods laugh with the voice of joy. The dimpling stream laughs as it runs. Air laughs making noise. Green hills, meadows, the grass hopper an children and painted birds all laugh, making a sweet chorus.

The Laughing Song Poem Questions And Answers Bihar Board Question 3.
Write the theme of the poem in your own words.
Answer:
The poet, William Blake suggests the readers to laugh. He says that in nature all things seems to be laughing. People should understand their merriness. They should try to remain happy. People should enjoy the scenes and beauty of nature and make merry. It is of no use to worry and be in tension. We should try to remain happy. Nature helps us to be happy. We should give tithe to Nature and live merrily.

C. Word Power

C. 1. Match column ‘A’ with column ‘B’

Question 1.
Laughing Song Question Answer Class 6 Bihar Board
Answer:
A Laughing Song Poem Questions And Answers Bihar Board

C. 2. Use the following words in the sentences of your own:

Question 1.
(Joy, voice, wit, noise, shade)
Answer:
Joy – He laughed with the voice of joy.
Voice – His voice is sweet.
Wit – His wit is praised by all.
Noise – Do not make a noise.
Shade – The birds were sitting in the shade.

D. Let’s Rhyme

Can you find out the rhyming words for the following:
wit – it
joy – by
green – scene
shade – spread
merry – cherry

E. Let’s Talk and Write

Question 1.
Discuss in pairs the theme of the poem and then write a paragraph it
Answer:
[Discuss in pairs the theme of the poem yourselves.]
The theme of the poem The poet, William Blake suggests the readers to laugh. He say that in nature all things seems to be laughing. People should understand merriness. They should try to remain happy. People should enjoy the scenes and beauty of nature and make merry. It is of no use to always worry and be in tension. We should try to remain happy. Nature helps us to be happy. We should give time to Nature and live merrily.

F. Composition

Question 1.
What do you see in the picture? Describe in six sentences.
Answer:
A farmer is going to plough his fields. He is siting on a tractor. He will plough his field with the tractor. He seems to be a rich farmer. Beside him, a poor farmer is going. He is carrying a spade on his shoulder.

G. Translation

Translate into your mother tongue:

  1. The green woods laugh.
  2. The dimpling stream runs.
  3. The moon shines in the sky.
  4. The stars twinkle.
  5. The trees sing a beautiful song.

Answer:

  1. हरे-भरे जंगल हँसते हैं।
  2. गड्ढेदार धारा/नदी बहती है।
  3. चाँद आसमान में चमकता है।
  4. तारे टिमटिमाते हैं।
  5. पेड़ एक सुन्दर गीत गाते हैं।

H. Let’s play

H. 1. Word Search Puzzle

Find out the names of the natural objects in the following Word Search Puzzle.

(Could you search out, tree, meadows, star, river, sun, moon, flower, woods, stream, cloud, sky, earth ?)

Bihar Board Class 6 English Book Solutions Chapter 13 Laughing Song 3

G. Word Search Puzzle

G. 1. Word Search Puzzle 

Question 1.
Find out the names of the natural objects in the following word Search Puzzle. Could you search out; tree, meadows, star, river, sun, moon, flower, woods, stream, cloud, sky, earth ?
Answer:
Bihar Board Class 6 English Book Solutions Chapter 13 Laughing Song 4

Laughing Song Summary in English

The poem Laughing Song’ is written by the great poet William Blake. This is a nature describing poem. The poet feels and sees happiness all around the nature. He invites his readers to be happy with the nature.

Laughing Song Summary in Hindi

‘लॉफिंग सौंग’ (हँसी का गीत) के कवि हैं, महान कवि विलियम ब्लंक। यह एक प्रकृति-वर्णन की कविता है। कवि प्रकृति में चारों ओर आनन्द को महसूस करता है और देखता भी है। वह अपने पाठकों को प्रकृति के साथ आनन्द मनाने के लिए निमंत्रित करता है।
Word Meanings : Stream (n) [स्ट्रीम) = नदी धारा | Merry (adj)[मेरी) = आनन्दित । Wit (n) [विट] = बुद्धि, समझ । Meadows (n) मिडोज) = घास का मैदान | Shade (n) [शेड) = छाया । Chorus (m) [कोरस] = गायकदल।

Laughing Song Hindi Translation of The Poem

Now enjoy this poem. अब इस कविता का मजा लो:
When the green …………………..the merry scene.
Word Meanings : Woods (n) [वुड्स] = जंगल । Voice (n) [वोएस) = आवाज । Joy (n) [जॉय] = आनंद । Dimpling (adj) (डिम्पलिंग) = गड्ढों वाली | Lively (adj) लाइवली] = जीवन्त । हिन्दी अनुवाद-जब हरे-भरे जंगल आनन्द का शोर मचाते हँसते हैं और गड्ढों वाली धारा/नदी हँसते हुए बहती है और जब हवाएँ बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से हँसते हुए शोर मचाते बहती हैं; जब घास के मैदान जीवन्तता से हँसते हैं और टिड्डा (ग्रासहॉपर) इस आनन्दपूर्ण दृश्य पर हँसता है।

When Mary, and Susan …………… ‘ha, ha, he’.
Word Meanings : Sweet (adj)[स्वीट] = मीठा, (यहाँ पर सुन्दर)। Painted (adj)[पेन्टेड] = रंगे हुए, रंग भरे । Cherries (n) [चेरीज] = चेरी, एक फल। हिन्दी अनुवाद-जब मेरी, सुसान और एमिली अपने सुन्दर गोल मुँह से ” गाते-‘हा-हा-हे’; जब रंग भरे, कई रंगों वाली चिड़ियाँ छाया में हँसती, जहाँ हमारे टेबुल पर चरी फल और अखरोट फैला होता है : आओ हमारे पास आओ, रहो हमारे साथ और आनन्दित होओ, समूह में ‘हा-हा-हे’ गाने के लिए।

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Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 8 दाब और बल का आपसी सम्बन्ध

Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 8 दाब और बल का आपसी सम्बन्ध Text Book Questions and Answers.

BSEB Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 8 दाब और बल का आपसी सम्बन्ध

Bihar Board Class 8 Science दाब और बल का आपसी सम्बन्ध Text Book Questions and Answers

अभ्यास

1. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दीजिए

Bihar Board Class 8 Science Solution प्रश्न (i)
पृथ्वी द्वारा सभी वस्तुओं पर लगाया गया आकर्षण बल ।
उत्तर-
गुरुत्वाकर्षण बल

Bihar Board Class 8 Science Solution In Hindi प्रश्न (ii)
इकाई क्षेत्रफल पर कार्य करनेवाला बल।
उत्तर-
दाब।

Science बुक बिहार क्लास 8 Solution Bihar Board प्रश्न (iii)
तरल द्वारा ऊपरमुखी दाब।
उत्तर-
उत्पलावक बल।

Bihar Board Solution Class 8 Science प्रश्न (iv)
वह बल जो वस्तु को जल में तैरते हुए रखती है।
उत्तर-
उत्प्लावक बल।

Science Class 8 Bihar Board प्रश्न (v)
इकाई क्षेत्र पर लगनेवाला वायु दाब ।
उत्तर-
वायुमंडलीय दाब ।

2. खाली स्थानों को भरें।

  1. ठोस द्वारा केवल ………. दिशा में दाब आरोपित किया जाता है।
  2. वायु द्वारा आरोपित दाब का मान ……….. दिशा में होता है।
  3. द्रव द्वारा आरोपित दाब ……….. दिशा में होता है।
  4. दाब की इकाई ……….. है।
  5. जल की गहराई में दाब का मान ………. होता है।

उत्तर-

  1. नीचे
  2. सभी
  3. सभी
  4. N.M² या पास्कल
  5. अधिक।

3. सत्य एवं असत्य कथनों को पहचानें।

  1. ठोसों द्वारा दाब उसके भार के कारण होता है।
  2. द्रव में गहराई के साथ दाब का मान बढ़ता है।
  3. वायु में भार होता है।
  4. क्षेत्रफल का मान घटाने पर दाब का मान घटता है।

उत्तर-

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य

बल और दाब में सम्बन्ध Bihar Board प्रश्न 4.
बल एवं दाब में क्या अंतर होता है?
उत्तर-
बल वह भौतिक कारक होता है जो किसी वस्तु पर लगकर उसके स्थान को परिवर्तित कर देता है या स्थान परिवर्तित करने का प्रयास करता है। बल एक सदिश राशि है । बल का मात्रक न्यूटन होता है। जबकि प्रति एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को दाब कहते हैं।

Bihar Board Class 8 Science Book Solution
दाब का मात्रक N/m² या पास्कल होता है। बल के मान बढ़ने पर दाब का मान बढ़ता है। बल के मान घटने से दाब का मान घटते हैं। यानि दाब, बल के अनुक्रमानुपाती होते हैं तथा क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं।

Class 8 Science Bihar Board प्रश्न 5.
आप पिन को नुकीला क्यों बनाते हैं ?
उत्तर-
पिन, आसानी से किसी चीज में पार कर जाए। दाब, क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है यानि क्षेत्रफल कम होने पर दाब का मान ज्यादा होगा। इसलिए उसे नुकीला बनाया जाता है। ताकि कम-से-कम बल में अधिक-से-अधिक दाब बने और कार्य आसानी से सम्पादित हो जाए।

Bihar Board Class 8 Science प्रश्न 6.
आप अपने सिर पर कितना वायु के भार को ढो रहे हैं। अगर आपके सिर का क्षेत्रफल 100 वर्ग सेमी है।
उत्तर-
इस प्रश्न का उत्तर शिक्षक महोदय से गणना करा लें।

Bihar Board Class 8 Science Book Solutions प्रश्न 7.
पर्वतारोही को पर्वत के ऊपर चढ़ने में साँस लेने में कठिनाइयों का सामना क्यों करना पड़ता है ?
उत्तर-
पृथ्वी सतह से जैसे-जैसे ऊपर चढ़ते जाते हैं। वैसे-वैसे वायुमंडलीय दाब कम होता चला जाता है। वायुमंडल की तुलना में शारीरिक रक्त या हवा का दबाव बढ़ जाता है जिसके कारण पर्वतारोही को पर्वत के ऊपर चढ़ने में साँस लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

Bihar Board Class 8th Science Solution प्रश्न 8.
पास्कल ने कैसे दर्शाया कि द्रव सभी दिशाओं में दाब आरोपित – करते हैं।
उत्तर-
पास्कल ने अनेकों प्रयोगों के आधार पर यह साबित कर दिखा दिया कि द्रव सभी दिशाओं में दाब आरोपित करते हैं। उन प्रयोगों में से एक प्रयोग इस प्रकार है। एक कठोर रबड़ की गेंद (लॉन टेनिस) लेते हैं। इसमें सूर्य की सहायता से छोटे-छोटे बहुत से छिद्र हर तरफ कर देते हैं। इसे दबाकर वायु को निकाल

दिया जाता है। इसके बाद जल से भरे बाल्टी के अन्दर डुबाते हैं। गेंद से दाब हटाते ही जल छिद्रों से अन्दर चला जाता है। अब गेंद को बाहर निकाल लेते हैं तथा उस दबाने पर सभी छिद्रों से जल बाहर निकलना शुरू हो जाता है। इस प्रकार देखा गया कि द्रव सभी दिशओं में छिद्र पर दाब आरोपित करते

Bihar Board Science Class 8 प्रश्न 9.
आप किसी स्थान पर वायुदाब कैसे निकालेंगे? एक साधारण वायु
दाब मापी निर्माण एवं क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
एक साधारण वायु दाबमापी मैनोमीटर की बनावट तथा क्रियाविधि – का वर्णन

आवश्यक सामग्री- U-आकार का ग्लास ट्यूब, एक प्लास्टिक कीप, गुब्बारे का एक छोटा टुकड़ा, धागे का टुकड़ा, रबड़।

क्रियाविधि – U – नली को किसी बोर्ड पर लगा देते हैं । U – नली पर मध्य से निश्चित दूरी पर दोनों नली को अशांकित कर देते हैं । U – नली में कुछ रंगीन जल भर देते हैं। U – नली के दोनों बाँहों पर जल के चिह्न के स्तर को नोट कर लेते हैं। एक कीप के बड़े वाले मुँह पर बैलून की झिल्ली को बाँध देते हैं। कीप की पतली नली में रबड़ की नली का दूसरा छोर U – नली के बाँह में लगा दीजिए। इस प्रकार मैनोमीटर बनकर तैयार हो जाता है।

Bihar Board Science Solution Class 8
कीप की झिल्ली पर ऊपर की ओर दाब लगाने से कीप के अन्दर की वायु पर दाब लगता है। संपीड़ित होकर ये वायु U – नली के रंगीन जल पर दबाव डालती है। U – नली के दूसरी बाँह का रंगीन जल बाँह में ऊपर चढ़ जाता है। इस प्रकार झिल्ली को नची खींचनं पर नल में रंगीन जल नीचे गिर जाता है। इस प्रकार द्रव से दाब की माप की जा सकती है।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 4 हॉकी का जादूगर

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 1 Chapter 4 हॉकी का जादूगर Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 4 हॉकी का जादूगर

Bihar Board Class 6 Hindi हॉकी का जादूगर Text Book Questions and Answers

प्रश्न अभ्यास

पाठ से –

Bihar Board Solution Class 6 Hindi प्रश्न 1.
ध्यानचंद किस खेल से सम्बन्ध रखते हैं?
उत्तर:
ध्यानचंद का संबंध हॉकी के खेल से रहा है।

Bihar Board Class 6 Hindi Solution In Hindi प्रश्न 2.
दूसरी टीम के खिलाड़ी ने ध्यानचंद को हॉकी क्यों मारी?
उत्तर:
विपक्षी टीम के खिलाड़ी ध्यानचंद से गेंद छीनने की कोशिश करते लेकिन उनकी हर कोशिश बेकार जाती। इतने में गुस्से में आकर एक खिलाड़ी ने ध्यानचंद के सिर पर हॉकी दे मारी।

Bihar Board 6th Class Hindi प्रश्न 3.
ध्यानचंद ने अपनी सफलता का राज क्या बताया है?
उत्तर:
मेजर ध्यानचंद ने अपनी सफलता का राज बताते हुये कहा है-“मेरे पास सफलता का कोई गुरुमंत्र तो है नहीं। लगन, साधना और खेल की भावना ही सफलता के सबसे बड़े मन्त्र हैं।”

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solution प्रश्न 4.
“दोस्त! खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं लगता”‘- ऐसा ध्यानचंद ने क्यों कहा?
उत्तर:
चोट खाकर पुन: मैदान में लौटने के बाद ध्यानचंद ने एक के बाद एक छः गोल विरोधी दल के गोलपोस्ट में दाग दिये। खेल की समाप्ति के बाद ध्यानचंद ने उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और कहा- मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।” वह खिलाड़ी सुनकर अत्यन्त शर्मिन्दा हुआ।

Bihar Board Class 6 Hindi Book प्रश्न 5.
ध्यानचंद को कब से ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा?
उत्तर:
1936 में बर्लिन में आयोजित ऑलम्पिक खेल को भारतीय हॉकी टीम के मेजर ध्यानचंद कप्तान बनाये गये। उस समय वे सेना में लांसनायक थे। उस ऑलम्पिक खेल में भारत का हॉकी स्वर्ण पदक प्राप्त करने का गौरव मिला। उस सफलता का श्रेय लोगों ने ध्यानचंद के करिश्माई खेल को दिया और इन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा।

पाठ से आगे –

Bihar Board Class Six Hindi प्रश्न 1.
अगर ध्यानचंद हॉकी नहीं खेलते तो वे क्या कर रहे होते?
उत्तर:
अगर ध्यानचंद हॉकी नहीं खेलते तो वे सेना में एक सामान्य सैनिक की तरह अपनी सेवा देते रहते और अपनी सेवा की बदौलत उनकी पदोन्नति उच्च पदों पर होती रहती और फिर एक दिन वे सेवानिवृत्त होकर ..अन्य सेवा अधिकारी की तरह जीवन-यापन करते।

Bihar Board Class 6 Hindi Solution प्रश्न 2.
ध्यानचन्द की जगह अगर आप होते तो अपना बंदला किस प्रकार लेते?
उत्तर:
हो सकता है कि इस झगड़े का निपटारा मैदान में ही हो जाता और दोनों टीमें एक दूसरे से हॉकी का स्टिक लेकर आपस में भीड़ जाती और खेल का मैदान युद्ध के मैदान में परिवर्तित हो जाता।

Class 6 Bihar Board Hindi Book प्रश्न 3.
खेलते समय नोक-झोंक क्यों होते हैं?
उत्तर:
खेलते समय झगड़े अक्सर खेल भावना के विपरीत जाने से होते हैं। अपने-आप को विजेता बनाने की होड़ में खिलाड़ी आपस में भिड़ जीते हैं और उपनी श्रेष्ठता झगड़कर तय करना चाहते हैं। वैसे खेल के दौरान आवेश में आ जाना स्वाभाविक भी है।

Bihar Board Class Six हॉकी का जादूगर प्रश्न 4.
विजेता बनने के लिये मनुष्य में क्या-क्या गुण होने चाहिये?
उत्तर:
विजेता बनने के लिये व्यक्ति में लगन, साधना, साहस और खेल-भावना के गुण का समावेश आवश्यक है।

व्याकरण –

प्रश्न 1.
थोड़ी देर बाद मैं पट्टी बाँधकर फिर मैदान में आ पहुंचा। आते ही मैंने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा- ‘तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं जरूर लूँगा” मेरे इतना कहते ही वह खिलाड़ी घबड़ा गया।
ऊपर के वाक्य में मैं, मैंने, उस, तुम, इसका, मेरे, इतना, वह आदि शब्द संज्ञा की जगह आए हैं। ऐसे शब्द सर्वनाम कहलाते हैं।
उत्तर:
संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किए जाने वाले शब्द सर्वनाम कहलाते हैं। सर्वनाम के निम्नांकित छ: भेद हैं –

(क) पुरुषवाचक सर्वनाम – जो शब्द बोलने वाला अपने लिए, सुननेवाले के लिए या किसी अन्य के लिए प्रयोग किए जाते हैं, पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
जैसे – मैं, तुम, वह ।

(ख) निश्चयवाचक सर्वनाम-जो शब्द किसी व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत के लिए प्रयोग किया जाए, वे निश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। जैसे- उस, इसका, इतना।

(ग) अनिश्चयवाचक सर्वनाम-जो शब्द किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु का बोध नहीं कराता है, वे अनिश्यवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
जैसे – कोई, कुछ।

(घ) प्रश्नवाचक सर्वनाम-प्रश्न करने के लिए जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग करते हैं, प्रश्नवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। जैसे – कौन, क्या।

(ङ) सम्बन्धवाचक सर्वनाम-जो शब्द किसी व्यक्ति वस्तु या घटना का संबंध जोड़ते हैं, वे सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
जैसे- जो, से, जिसने, जैसा, तैसा ।

(च) निजवाचक सर्वनाम-जो शब्द कर्ता अपने लिए प्रयोग करता है, वे निजवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
जैसे – अपना, स्वयं, आप ही।

निम्नलिखित वाक्यों में मोटे अक्षरों में छपे सर्वनाम के भेद सामने कोष्ठक में लिखिए।
प्रश्नोत्तर –
(क) कौन खा रहा है? (प्रश्नवाचक)
(ख) मैं अपने काम पर लौट आया। (पुरुषवाचक)
(ग) यही मेरा घर है। (निश्चयवाचक)
(घ) जैसी करनी वैसी भरनी (सम्बन्धवाचक)
(ङ) मैं स्वयं चला जाऊँगा। (निजवाचक)
(च) कुछ तो किया करो। (अनिश्चयवाचक)

प्रश्न 2.
इन शब्दों से वाक्य बनाइए। धक्का -मुक्की , नोंक-झोंक, बार-बार, जैसे-जैसे, वैसे-वैसे।
उत्तर:
(क) धक्का -मुक्की – बस में चढ़ने के लिये बच्चों में ध क्का-मुक्की होने लगी।
(ख) मार-पीट-वहाँ दो दलों में मार-पीट हो गयी और कई-एक लोग घायल हो गये।
(ग) जैसे-तैसे-जैसे-तैसे हमलोगों ने भीड़ वाले रास्ते को पार किया।
(घ) गुरु-मंत्र-ध्यानचंद ने कहा-मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र – नहीं है।
(ङ) वैसे-वैसे-जैसे-जैसे आप मेहनत करेंगे वैसे-वैसे आपको सफलता मिलेगी।

प्रश्न 3.
इन वाक्यों में क्रिया शब्द को रेखांकित कीजिए।
उत्तर:
(क) खेल में तो यह सब चलता ही है।
(ख) मैं पंजाब रेजीमेंट की ओर से खेला करता था।
(ग) बाद में हम झाँसी आकर बस गये।
(घ) वह बार-बार मुझे खेलने के लिये कहते।
(ङ) बर्लिन ओलम्पिक में हमें स्वर्ण पदक मिला।

प्रश्न 4.
नीचे लिखे शब्दों को क्रम में सजाकर वाक्य बनाइए –
(क) नौसिखिया/उस समय/मैं एक/था/खिलाड़ी।
(ख) आता/खेल में/मेरे/गया/निखार ।
(ग) शर्मिंदा/वह/बड़ा/हुआ/सचमुच/खिलाड़ी।
(घ) ले जाया/मैदान से/बाहर/मुझे।
उत्तर:
(क) मैं उस समय एक नौसिखिया खिलाड़ी था।
(ख) मेरे खेल में निखार आता गया।
(घ) वह सचमुच बड़ा शर्मिंदा खिलाड़ी हुआ।
(घ) मुझे मैदान से बाहर ले जाया गया ।

कुछ करने को –

प्रश्न 1.
अखबार में रोजाना खेल का एक पृष्ठ आता है। आपको जो खबर अच्छी लगे उसे संकलित कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
यह पाठ एक ‘संस्मरण’ है। आप भी अपना कोई संस्मरण लिखिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

हॉकी का जादूगर Summary in Hindi

पाठ का सार-संक्षेप

यह संस्मरण हॉकी के एक अद्भुत खिलाड़ी के जीवन की घटनाओं पर आधारित है जिसे बाद में ‘हॉकी का जादुगर’ कहकर सम्मानित किया गया और इसी सम्मान से उसे विश्वभर में जाना जाने लगा। उसका नाम था ध्यानचन्द। बड़ा होकर उसने सेना में नौकरी कर ली और सिपाही से तरक्की पाकर मेजर बना जो सेना में एक उच्च पद माना जाता है।

ध्यानचंद का जन्म 1904 में, प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ था। बाद में ध्यानचंद का परिवार झाँसी आकर बस गया। 16 साल की उम्र में ध्यानचंद, फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट में एक सिपाही के रूप में भर्ती हुआ। इस रेजिमेंट का हॉकी के खेल में बड़ा नाम था। इस रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी थे। वे बार-बार ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिये प्रेरित करते। उस छावनी में हॉकी खेलने का कोई समय निर्धारित नहीं था। सैनिक जब चाहते मैदान में पहुँच जाते और अभ्यास शुरू कर देते। ध्यानचंद ने भी हॉकी खेलना शुरू किया। ध्यानचंद ने लिखा है कि उस समय वह एक नौसिखिया खिलाड़ी था -धीरे-धीरे उसने खेल में प्रवीणता हासिल करनी शुरू कर दी और उसके खेल में निखार आता गया।

सन् 1936 के बर्लिन ऑलम्पिक में ध्यानचंद को भारत की टीम का कप्तान बनाकर भेजा गया। बर्लिन ऑलम्पिक में लोग ध्यानचंद के खेल से इतने प्रभावित हुये कि इन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा। उस समय ध्यानचंद सेना में लांसनायक के पद पर कार्यरत थे।

ध्यानचंद अपने संस्मरण में कहा है कि ऐसा नहीं है कि खेल में सारे गोल इन्हीं के द्वारा बनाये जाते थे। वे कहते हैं – “मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाय। अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल-प्रेमियों का दिल जीत लिया। बर्लिन ओलम्पिक में हमें स्वर्ण पदक मिला।”

। खेल के मैदान में घटित एक घटना का उल्लेख करते हये मेजर ध्यानचंद लिखते हैं- खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और मारपीट की घटनाएँ तो होती रहती हैं। जिस दिन हम खेला करते थे, उन दिनों भी यह सब चलता था।

सन् 1933 की बात का उल्लेख करते हुये वे कहते हैं – “उन दिनों मैं पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेलता था। एक दिन पंजाब रेजिमेंट और संपर्स एण्ड माइनर्स टीम के बीच मुकाबला हो रहा था। माइनर्स टीम के खिलाड़ी मुझसे गेंद छीनने की कोशिश करते लेकिन उनकी हर कोशिश बेकार जाती। इतने में एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर हॉकी मेरे सिर पर दे मारी। मुझे मैदान से बाहर ले जाया गया। थोड़ी देर बाद मैं पट्टी बाँध कर फिर मैदान में आ पहुँचा। आते ही खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रख कर कहा- “तुम चिन्ता मत करो, इसका बदला मैं जरूर लूँगा।” वह खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की बात सुनकर घबड़ा गया और पूरे खेल के दौरान मेरी ओर ही देखता रहा, कि मैं कब उसके सिर पर हॉकी मारने वाला हूँ। इसी दौरान मैंने झटपट एक के बाद एक छः गोल कर दिये। खेल खत्म होने पर मैंने उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और कहा- “दोस्त! खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं लगता। मैंने तो अपना बदला ले लिया।” वह खिलाड़ी अपनी करनी पर शर्मिन्दा था क्योंकि उसने जानबूझकर एक गलत काम किया था।

आज जब भी कोई मुझसे पूछता है कि मेरी सफलता का क्या राज है तो मैं एक ही उत्तर देता हूँ “लगन, साधना और खेल-भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं। हार या जीत मेरी नहीं है, बल्कि पूरे देश की है।”

Bihar Board Class 10 History Solutions Chapter 7 व्यापार और भूमंडलीकरण

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions History इतिहास : इतिहास की दुनिया भाग 2 Chapter 7 व्यापार और भूमंडलीकरण Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

नीचे दिये गए प्रश्नों के उत्तर के रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। जो आपको सर्वाधिक उपयुक्त लगे उनमें सही का चिह्न लगायें।

प्रश्न 1.
प्राचीन काल में किस स्थल मार्ग से एशिया और यूरोप का व्यापार होता था ?
(क) सूती मार्ग
(ख) रेशम मार्ग
(ग) उत्तरा पथ
(घ) दक्षिण पथ
उत्तर-
(ख) रेशम मार्ग

प्रश्न 2.
पहला विश्व बाजार के रूप में कौन-सा शहर उभर कर आया ?
(क) अलेक्जेन्ड्रिया
(ख) दिलमून
(ग) मैनचेस्टर
(घ) बहरीन
उत्तर-
(ख) दिलमून

प्रश्न 3.
आधुनिक युग में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में होने वाली सबसे बड़ी क्रांति कौन सी थी?
(क) वाणिज्यिक क्रान्ति
(ख) औद्योगिक क्रान्ति
(ग) साम्यवादी क्रान्ति
(घ) भौगोलिक खोज
खाज
उत्तर-
(ख) औद्योगिक क्रान्ति

प्रश्न 4.
“गिरमिटिया मजदूर’ बिहार के किस क्षेत्र से भेजे जाते थे?
(क) पूर्वी क्षेत्र
(ख) पश्चिमी क्षेत्र
(ग) उत्तरी क्षेत्र
(घ) दक्षिणी क्षेत्र
उत्तर-
(ख) पश्चिमी क्षेत्र

प्रश्न 5.
विश्व बाजार का विस्तार आधुनिक काल में किस समय से आरंभ हुआ?
(क) 15वीं शताब्दी
(ख)-18वीं शताब्दी
(ग) 19वीं शताब्दी
(घ) 20वीं शताब्दी
उत्तर-
(ख)-18वीं शताब्दी

प्रश्न 6.
विश्वव्यापी आर्थिक संकट किस वर्ष आरंभ हुआ था?
(क) 1914
(ख) 1922
(ग) 1929
(घ) 1927
उत्तर-
(ग) 1929

प्रश्न 7.
आर्थिक संकट (मंदी) के कारण यूरोप में कौन सी नई शासन प्रणाली का उदय हुआ?
(क) साम्यवादी शासन प्रणाली
(ख) लोकतांत्रिक शासन प्रणाली
(ग) फासीवादी-नाजीवादी शासन प्रणाली
(घ) पूँजीवादी शासन प्रणाली
उत्तर-
(ग) फासीवादी-नाजीवादी शासन प्रणाली

प्रश्न 8.
ब्रेटन दुइस सम्मेलन किम वर्ष हुआ?
(क) 1945
(ख) 1947
(ग) 1944
(घ) 1952
उत्तर-
(ग) 1944

प्रश्न 9.
भूमंडलीकरण की शुरूआत किस दशक में हुआ?
(क) 1990 के दशक में
(ख) 1970 के दशक में
(ग) 1960 के दशक में
(घ) 1980 के दशक में
उत्तर-
(क) 1990 के दशक में

प्रश्न 10.
द्वितीय महायुद्ध के बाद यूरोप में कौन सी संस्था का उदय आर्थिक दुष्प्रभावों को समाप्त करने के लिए हुआ?
(क) सार्क
(ख) नाटो
(ग) ओपेक
(घ) यूरोपीय संघ
उत्तर-
(घ) यूरोपीय संघ

निम्नलिखित में रिक्त स्थानों को भरें :

प्रश्न 1.
अलेक्जेंड्रिया नामक पहला विश्व बाजार………….के द्वारा स्थापित किया गया।
उत्तर-
यूनानी सम्राट सिकन्दर

प्रश्न 2.
विश्वव्यापी आर्थिक संकट ……………………..देश से आरंभ हुआ।
उत्तर-
यूरोपीय

प्रश्न 3.
………………..नामक सम्मेलन के द्वारा विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना हुई।
उत्तर-
ब्रेटन वुड्स

प्रश्न 4.
आर्थिक संकट से विश्व स्तर पर……………………..नामक एक बड़ी सामाजिक समस्या उदित हुई ?
उतर-
बेरोजगारी

प्रश्न 5.
……………………….ने 1990 के बाद भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को काफी तीव्र कर दिया ?
उत्तर-
जॉन विलियम्स

सही मिलान करें:

Bihar Board Class 10 History Solutions Chapter 7 व्यापार और भूमंडलीकरण - 1
उत्तर-
1. (ख)
2. (क)
3. (घ)
4. (ग)
5. (च)
6. (ङ)।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (20 शब्दों में उत्तर दें)

प्रश्न 1.
विश्व बाजार किसे कहते हैं ?
उत्तर-
बाजार जहाँ विश्व के सभी देशों की वस्तुएं आमलोगों को खरीदने के लिए उपलब्ध हों। जैसे, भारत की आर्थिक राजधानी ‘मुम्बई।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रान्ति क्या है?
उत्तर-
उत्पादन के क्षेत्रों में मशीनों और वाष्प की शक्ति के उपयोग से जो व्यापक परिवर्तन हुए और इन परिवर्तनों के कारण लोगों की जीवन पद्धति और उनके विचारों में जो मौलिक परिवर्तन हुए उसे ही औद्योगिक क्रान्ति कहते हैं।

प्रश्न 3.
आर्थिक संकट से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
अर्थतंत्र में आनेवाली वैसी स्थिति जब उसके तीनों आधार कृषि, उद्योग और व्यापार का विकास अवरुद्ध हो जाए, आर्थिक संकट कहलाता है।

प्रश्न 4.
भूमंडलीकरण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जीवन के सभी क्षेत्रों में एक अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप जिसने दुनिया के सभी भागों को आपस में जोड़ दिया है-सम्पूर्ण विश्व एक बड़े गाँव के रूप में परिवर्तित हो गया।

प्रश्न 5.
ब्रिटेन वुड्स सम्मेलन का उद्देश्य क्या था?
उत्तर-
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद औद्योगिक विश्व में आर्थिक स्थिरता एवं पूर्ण रोजगार बनाये रखना एवं विश्वशांति स्थापित करना।

प्रश्न 6.
बहुराष्ट्रीय कंपनी क्या है ?
उत्तर-
कई देशों में एक ही साथ व्यापार और व्यवसाय करने वाली कंपनियों को बहुराष्ट्रीय कंपनी कहा जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (60 शब्दों में उत्तर दें)

प्रश्न 1.
1929 के आर्थिक संकट के कारणों को संक्षेप में स्पष्ट करें।
उत्तर-

  • नवीन तकनीकी प्रगति तथा बढ़ते हुए मुनाफे के कारण उत्पादन में जो भारी वृद्धि हुई उससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई कि जो कुछ उत्पादित किया जाता था, उसे खरीद सकने वाले लोग बहुत कम थे।
  • विश्व के सभी भागों में कृषि उत्पादन एवं खाद्यान्नों के मूल्य की विकृति।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रान्ति ने किस प्रकार विश्व बाजार के स्वरूप को विस्तत किया ?
उत्तर-
औद्योगिक क्रान्ति ने बाजार को तमाम आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बना दिया। इसी के साथ जैसे-जैसे औद्योगिक क्रान्ति का विकास हुआ बाजार का स्वरूप विश्वव्यापी होता चला गया और 20वीं शताब्दी के पहले तक तो इसने सभी महादेशों में अपनी उपस्थिति कायम कर ली।

प्रश्न 3.
विश्व बाजार के स्वरूप को समझावें।
उत्तर-
औद्योगिक क्रान्ति के फैलाव के साथ-साथ बाजार का स्वरूप विश्वव्यापी होता गया। इसने व्यापार, श्रमिकों का पलायन और पूंजी का प्रवाह इन तीन आर्थिक प्रवृत्तियों को जन्म दिया।
व्यापार मुख्यतः कच्चे मालों को इंगलैंड और अन्य यूरोपीय देशों तक पहुँचाने और वहाँ के कारखानों में निर्मित वस्तुओं को विश्व के कोने-कोने में पहुंचाने तक सीमित था।

प्रश्न 4.
भूमंडलीकरण में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के योगदान (भूमिका) को स्पष्ट करें।
उत्तर-
1980 के दशक के बाद आर्थिक रूप से काफी जर्जर हो चुकी स्थिति के प्रभाव को कम करने में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का योगदान काफी सराहनीय रहा जिसने भूमंडलीकरण को बढ़ावा दिया।

प्रश्न 5.
1950 के बाद विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निमाण के लिए किए जाने वाले प्रयासो का उल्लेख करें।
उत्तर-
द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद उससे उत्पन्न समस्या को हल करने तथा व्यापक तबाही से निबटने के लिए पुनर्निर्माण का कार्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आरंभ हुआ। 1957 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय, यूरोपीय इकॉनॉमिक कम्युनिटि (ई. ई. सी.) की स्थापना की गयी। इसमें फ्रांस, प. जर्मनी, बेल्जियम, हालैण्ड, लग्जमबर्ग और इटली शामिल हुआ। इन देशों ने एक साझा बाजार स्थापित किया। 1960 में ग्रेट ब्रिटेन इसका सदस्य बना। तत्कालीन विश्व के दोनों महत्वपूर्ण आर्थिक शक्तियाँ सं. रा. अमेरिका एवं सोवियत रूस अपना प्रभाव स्थापित करना चाहते थे। इस प्रयास में अमेरिका की सहायता, विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भरपूर सहायता की। जबकि रूस ने अपने विचारों और राजनैतिक शक्ति का इस्तेमाल ज्यादा किया। दोनों देशों ने अपनी नीतियों के अनुसार विश्व के दो देशों का सहयोग किया।

प्रश्न 6.
विश्व बाजार के लाभ-हानि पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
विश्व बाजार के लाभ-विश्व बाजार ने व्यापार और उद्योग को तीव्रगति से बढ़ाया। आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था के उदय में सहायता की। औपनिवेशिक देशों में यातायात के साधनों, खनन, बागवानी जैसे संरचनात्मक क्षेत्र का विकास हुआ। कृषि उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। नवीन तकनीकों को सृजित किया। शहरीकरण के विस्तार में सहायता की।

विश्व बाजार की हानि – इससे औपनिवेशिक देशों का शोषण और तीव्र हो गया। लघु तथा कुटीर उद्योग नष्ट होने लगे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें)

प्रश्न 1
929 के आर्थिक संकट के कारण और परिणामों को स्पष्ट करें।
उत्तर-
आर्थिक संकट के कारण- इसका बुनियादी कारण स्वयं इसकी अर्थव्यवस्था के स्वरूप में ही समाहित था जो निम्न है-

  • बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का विस्तार- यूरोप को छोड़कर शेष सभी देशों में बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का विस्तार होता गया जिससे मुनाफे बढ़ते चले गये, दूसरी तरफ अधिकांश लोग गरीबी और अभाव में पिसते रहे।
  • उत्पादन में वृद्धि नवीन तकनीकी प्रगति तथा बढ़ते हुए मुनाफे के कारण उत्पादन में – तो भारी वृद्धि हुई लेकिन उसे खरीदने वाले लोग कम थे।
  • कृषि उत्पादन एवं खाद्यान्नों के मूल्य की विकृति-कृषि क्षेत्र में भी अति उत्पादन के कारण उत्पादों की कीमतें गिरने लगी जिससे किसानों की आय घटने लगी। अतः ज्यादा माल बेचकर अपनी आय स्तर को बनाए रखने के लिए किसानों में होड़ मच गयी।
  • कर्म का प्रभाव-1920 के मध्य में बहुत सारे देशों ने अमेरिका से कर्ज लेकर युद्ध  हो चुकी अपनी अर्थव्यवस्था को नए सिरे से विकसित करने का प्रयास किया। लेकिन में घरेल स्थिति में संकट के कुछ संकेत मिलने से वे लोग कर्ज वापस माँगने लगे। इससे के समक्ष गहरा आर्थिक संकट आ खड़ा हुआ।
  • अमेरिका में संकट अमेरिका में संकट के लक्षण प्रकट होते ही उसने अपने संरक्षण के लिए आयात शुल्क में वृद्धि कर दी तथा आयात की मात्रा को सीमित कर दिया। संकट का असर धीरे-धीरे अन्य देशों में प्रकट होने लगा और वे प्रयास करने लगे कि अपनी आवश्यकता : अधिकांश वस्तुएँ स्वयं ही उत्पादित कर लें, जिसमें आर्थिक राष्ट्रवाद संकुचित होने लगा और व्यापार की कमर टूट गयी।

आर्थिक संकट के परिणाम-

  • मंदी के कारण बैंकों ने लोगों को कर्ज देना बन्द कर दिए। कों की वसूली तेज कर दी।
  • किसान अपनी उपज को नहीं बेच पाने के कारण बर्बाद हो गए।
  • कारोबार के ठप पड़ने से बेरोजगारी बढ़ी, कर्ज की वसूली नहीं होने से बैंक बर्बाद हो गए।
  • लगभग 110000 कंपनियाँ चौपट हो गई।

प्रश्न 2.
1945 से 1960 के बीच विश्वस्तर पर विकसित होने वाले आर्थिक संबंधों पर । प्रकाश डालें।
उत्तर-
1945 के बाद विश्व में दो भिन्न अर्थव्यवस्था का प्रभाव बढ़ा और दोनों ने विश्व स्तर पर अपने प्रभावों तथा नीतियों को बढ़ाने का प्रयास किया। इस स्थिति से विश्व में एकनवीन आर्थिक और राजनैतिक प्रतिस्पर्धा ने जन्म लिया। सम्पूर्ण विश्व मुख्यतः दो गुटों में विभाजित हो गया। एक साम्यवादी अर्थतन्त्र वाले देशों के गुट का नेतृत्व सोवियत रूस कर रहा था। दूसरा पूँजीवादी अर्थतन्त्र वाले देशों के गुट का नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका कर रहा था।

सोवियत रूस ने पूर्वी यूरोप और भारत जैसे नवस्वतंत्र देशों में अपनी आर्थिक व्यवस्था को फैलाने का गंभीर प्रयास किया, जिसमें पूर्वी यूरोप तथा उ. कोरिया वियतनाम जैसे देशों में उसे पूर्ण सफलता मिली। दूसरी ओर पूँजीवादी अर्थतन्त्र का मुखिया सं. रा. अमेरिका ने विश्व के दो क्षेत्रों दक्षिण अमेरिका और मध्य तथा पश्चिमी एशिया के तेल सम्पदा सम्पन्न देशों (ईरान, ईराक, सऊदी अरब, जार्डन, यमन, सीरिया, लेबनान) में जबरन अपनी नीतियों को थोपने का काम किया। दक्षिणी अमेरिकी महादेश के देशों में तो सं. रा. अमेरिका ने अपनी खूफिया संस्था सी. आई. ए. के माध्यम से सैनिक शक्ति के इस्तेमाल की हद तक जाकर अपना प्रभाव स्थापित किया। जबकि पश्चिमी मध्य एशिया के देशों पर अपने प्रभाव को बनाने के लिए अरब बहुल आबादी वाले फिलिस्तीन क्षेत्र में एक नये यहूदी राष्ट्र इजरायल को स्थापित करवाकर, उसका सहारा लिया।

पश्चिमी यूरोपीय देशों (ब्रिटेन, फ्रांस, प. जर्मनी, बाल्टिक देश स्पेन) में भी महत्वपूर्ण आर्थिक संबंधों का विकास हुआ। 1944 में नीदरलैंड बेल्जियम और लग्जमवर्ग ने ‘बेनेलेक्स’ नामक संघ बनाया। 1948 में ब्रेसेल्स संधि हुआ जिसमें यूरोपीय आर्थिक सहयोग की प्रक्रिया कोयला एवं इस्पात के माध्यम से शुरू किया।

1957 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय यूरोपीय इकॉनॉमिक कम्यूनिटि की स्थापना हुई। इसमें फ्रांस, प. जर्मनी, बेल्जियम, हालैण्ड, लग्जमवर्ग और इटली शामिल हुए। इन देशों ने एक साझा बाजार स्थापित किया। ग्रेट ब्रिटेन 1960 में इसका सदस्य बना। इन सभी देशों पर सं. रा. अमेरिका  का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 3.
भूमंडलीकरण के कारण आमलोगों के जीवन में आने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करें।
उत्तर-
भूमंडलीकरण राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विश्वव्यापी समायोजन की एक प्रक्रिया है जो विश्व के विभिन्न भागों के लोगों को भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक स्तर पर एकीकृत करने का सफल प्रयास करती है। अर्थात जीवन के सभी क्षेत्रों में लोगों के द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलापों में विश्वस्तर पर पायी जानेवाली (एकरूपता या समानता) भूमंडलीकरण के अन्तर्गत सम्मिलित होती है। भूमंडलीकरण के कारण जीविकोपार्जन के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है। इसकी झलक शहर, कस्बा और गाँव सभी जगहों पर दिख रही है। इसके कारण जीविकोपार्जन के गई नए क्षेत्र खुले हैं जैसे-कॉल सेंट, शॉपिंग मॉल, होटल और रेस्टोरेंट, बैंक और बीमा क्षेत्र में दी जानेवाली सुविधा, दूरसंचार और सूचना तकनीक का विकास इत्यादि। इन क्षेत्रों में कई लोगों को रोजगार मिला है और मिल रहा है जिससे अच्छी आमदनी होती है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आर्थिक भूमण्डलीकरण ने हमारी आवश्यकताओं के दायरे को बढ़ाया है और उसी अनुरूप उसकी पूर्ति हेतु नयी-नयी सेवाओं का उदय हो रहा है जिससे जुड़कर लाखों लोग अपनी जीविका चला रहे हैं इससे उनका जीवन स्तर भी बढ़ा है।

प्रश्न 4.
1919 से 1945 के बीच विकसित होने वाले राजनैतिक और आर्थिक सम्बन्धों पर । टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
1920 के बाद जो भी अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध विकसित हुए। उसमें आर्थिक कारकों का महत्वपूर्ण स्थान था। 1929 के आर्थिक मंदी को आधार वर्ष मानकर 1919-1945 के बीच बनने वाले आर्थिक सम्बन्धों को दो भागों में बाँटा जा सकता है।

1920 से 1929 तक का काल सामान्यतः आर्थिक समुत्थान और विकास का काल था! प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विश्व पर से यूरोप का प्रभाव क्षीण हो गया। यद्यपि उपनिवेशों (एशिया-अफ्रीका) पर उसकी पकड़ बनी रही लेकिन इस दौर में सं. रा. अमेरिका, जापान और सोवियत रूस ये तीन देश विश्व की सर्वप्रमुख्न शक्ति के रूप में उभरे। सं. रा. अमेरिका में युद्ध के तुरंत बाद का दो वर्ष आर्थिक संकट का काल था। परंतु 1922 के बाद तकनीकी उन्नति के कारण औद्योगिक विकास हुआ। परन्तु इसका एक नकारात्मक परिणाम देखने को मिला कि देश की आर्थिक शक्ति और सता कुछ हाथों और कम्पनियों के पास केन्द्रित हो गयी।

रूस और जापान ने 1920-1929 के बीच आर्थिक क्षेत्र में काफी प्रगति की। जापान अपनी आर्थिक प्रगति को बनाए रखने के लिए साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा को आक्रामक रूप दिया जिसका शिकार चीन हुआ। इसी समय भारत एवं अन्य और निवेशिक देशों में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ।
इस काल में नए राजनैतिक संबंधों का भी विकास हुआ। 1932 ई. में अमेरिकी राजनीति में फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट का उदय हुआ। उसने ‘न्यू डील” नामक नवीन आर्थिक नीतियों को अमेरिका में लागः उसके अन्तर्गत रेलमार्ग, सड़क, पुल स्थानीय विकास हेतु ऋण वितग्नि किया गया। औद्योगिक क्षेत्र में व्यापार और उत्पादन का नियमन, मजदूरी में वृद्धि, काम के घण्टे तथ करना, मूल्यों में वृद्धि रोकना इत्यादि सम्मिलित थे। कृषि क्षेत्र में किसानों की क्रय शक्ति तथा सामान्य आर्थिक स्थिति को युद्ध के पूर्व के स्तर तक ले जाने का प्रयास हुआ।

आर्थिक मंदी के आलोक में यूरोप की राजनैतिक स्थिति में दो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। एक रूस में स्थापित साम्यवादी आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था का आकर्षण सम्पूर्ण विश्व में बढ़ा क्योंकि वही एक देश था, जिसपर इस मंदी का प्रभाव बिल्कुल नहीं पड़ा इससे उसका प्रभाव बहुत बढ़ा। इटली और जर्मनी में लोकतंत्र की विफलता और अधिनायकवादी तथा तानाशाही तंत्र के उदय ने यूरोप के कई और देशों को अपने लपेटे में ले लिया जैसे-स्पेन, आस्ट्रिया, यूनान इत्यादि। यूरोप में आर्थिक मंदी के बाद उदित होने वाली राजनैतिक व्यवस्था ने अपनी नीतियों से द्वितीय महायुद्ध को अवश्यम्भावी बना दिया।

Bihar Board Class 10 History व्यापार और भूमंडलीकरण Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रेशम माग कहाँ से आरंभ होता था?
उत्तर-
रेशम मार्ग का आरंभ चीन से होता था।

प्रश्न 2.
गुलामी प्रथा का प्रचलन किस देश में था?
उत्तर-
गुलामी प्रथा का प्रचलन इंगलैंड, जर्मनी एवं फ्रांस में था।

प्रश्न 3.
कॉर्न लॉ किस देश में पारित किया गया था ?
उत्तर-
कॉर्न लॉ को ब्रिटेन में पारित किया गया था।

प्रश्न 4.
अमेरिका में वृहत उत्पादन व्यवस्था किसने आरंभ की?
उत्तर-
हेनरी फोर्ड ने अमेरिका में वृहत उत्पादन व्यवस्था को आरंभ किया।

प्रश्न 5.
गिरमिटिया मजदूर किस देश से ले जाए जाते थे ?
उत्तर-
गिरमिटिया मजदूर भारत से ले जाए जाते थे।

प्रश्न 6.
अमेरिका के उपनिवेशीकरण में किसका महत्वपूर्ण योगदान था?
उत्तर-
अमेरिका के उपनिवेशीकरण में इंगलैंड का महत्वपूर्ण योगदान था।

प्रश्न 7.
अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय किन तीन प्रवाहों पर आधृत है ?
उत्तर-
अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय तीन प्रवाहों पर आधारित हैं वे हैं व्यापार, श्रम एवं पूंजी।

प्रश्न 8.
गिरमिटिया मजदूर कौन थे?
उत्तर-
औपनिवेशिक देशों के ऐसे मजदूर जिन्हें एक निश्चित समझौता द्वारा निश्चित समय के लिए अपने शासित क्षेत्रों में ले जाया जाता था, गिरमिटिया मजदूर कहलाते थे

प्रश्न 9.
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में स्थापित दो वित्तीय संस्थाओं के नाम लिखें।
उत्तर-
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में स्थापित दो वित्तीय संस्थाओं के नाम हैं-

  1. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं
  2. विश्व बैंक।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
साधारण शब्दों में वैश्वीकरण का अर्थ है अपनी अर्थव्यवस्था और विश्व अर्थव्यवस्था में सामंजस्य स्थापित करना। इसके अंतर्गत अनेक विदेशी उत्पाद अपना सामान और सेवाएं बेच सकते हैं। इसी प्रकार हम अपने देश से निर्मित माल और सेवाएँ दूसरे देशों में बेच सकते हैं। इस प्रकार वैश्वीकरण के कारण विभिन्न देश अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक-दुसरे से परस्पर रूप में निर्भर हते हैं।

प्रश्न 2.
भारत के सूती वस्त्र उद्योग में गिरावट के क्या कारण थे?
उत्तर-
18वीं शताब्दी तक भारतीय सूती कपड़े की मांग सारे विश्व में थी, परंतु 19वीं शताब्दी के आते-आते इस में गिरावट आती गयी जिसके निम्नलिखित प्रमुख कारण थे।

  • भारतीय सूती कपड़े के उद्योग की गिरावट का सबसे मुख्य कारण इंगलैंड की औद्योगिक क्रांति थी जिसके कारण अब उसने भारत से सूती कपड़े का आयात बंद कर दिया था।
  • औपनिवेशिक सरकार भारतीय बाजारों में ब्रिटिश निर्मित सूती वस्त्रों की भरमार कर  दी जो भारतीय वस्त्र के मुकाबले काफी सस्ते होते थे।
  • अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी काफी कम कीमत में भारतीय कपास या रूई खरीदकर इंगलैंड भेज देती थी। जिससे भारतीय निर्माताओं को अच्छी कपास मिलना मुश्किल हो गया। तथा
  • भारतीय सूती कपड़े के निर्यात पर काफी कर लगा दिए गए।

प्रश्न 3.
सत्रहवीं शताब्दी के पूर्व होनेवाले आदान-प्रदान का एक उदाहरण एशिया से और एक अमेरिका से दें।
उत्तर-
विभिन्न देशों के संपर्क का एक अन्य महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि खाने-पीने की वस्तुएँ एक देश से दूसरे देश में जाने लगी। व्यापारी और यात्री अपने देश का सामान ले जाते थे और विदेशों की विशिष्ट वस्तुओं को अपने यहाँ लाते थे। नूइल्स के विषय में विद्वानों का मानना है कि यह चीनी मूल का था और वहाँ से ही यह पश्चिमी जगत में पहुँचा। क्रिस्टोफर कोलम्बस अमेरिका से आलु, सोया, मूंगफली, मक्का, टमाटर इत्यादि अपने साथ यूरोप ले गया जहाँ से वे एशिया आए।

प्रश्न 4.
ब्रिटेन में कॉन लॉ समाप्त करने के क्या कारण थे? इसके क्या परिणाम हुए ?
उत्तर-
18वीं शताब्दी से ब्रिटेन की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई जिसके कारण खाद्यान्न की मांग बढ़ने लगी। शहरों के विकास और औद्योगीकरण ने भी खाद्यान्नों की मांग बढ़ा दी। खाद्यानों की बढ़ती मांग ने कृषि उत्पादों की मांग में तेजी ला दी। इससे कृषि उत्पादों का मूल्य बढ़ गया। इसका लाभ बड़े कृषकों एवं भूस्वामियों ने उठाया। अपने उत्पादों को बेचने के लिए इन दोनों ने सरकार पर दबाव डालकर ब्रिटेन में कॉर्न लॉ द्वारा मक्का के आयात को प्रतिबंधित करवा दिया। फलतः इंगलैंड में भू-स्वामी कृषि उत्पादों को ऊंची कीमत पर बेचकर लाभ कमाने लगे। दूसरी ओर अनाज की बढ़ी कीमतों से उद्योगपति और शहरों में रहने वाले लोग त्रस्त हो गए। इन लोगों ने कॉर्न लॉ का जबर्दस्त विरोध किया और इसे वापस लेने की मांग की। सरकार को बाध्य होकर कॉर्न लॉ को समाप्त करना पड़ा तथा खाद्यान्न के आयात की अनुमति देनी पड़ी।

प्रश्न 5.
न्यू डील से आप क्या समझते हैं ? इसे क्यों लागू किया गया?
उत्तर-
आर्थिक महामंदी के प्रभावों को समाप्त करने एवं उसे नियंत्रित करने के उद्देश्य से 1932 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट ने नई आर्थिक नीति अपनाई। इसे न्यू डील का नाम दिया गया। इस नई नीति के अनुसार जनकल्याण की व्यापक योजना के अंतर्गत आर्थिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक नीतियों को नियमित करने का प्रयास किया गया। नई योजना का उद्देश्य कृषि और उद्योग में संतुलन स्थापित करना तथा मानव समान और स्वाधीनता को सुरक्षित रखना था। जनकल्याण की नीति के अंतर्गत परिवहन के साधनों तथा स्थानीय विकास कार्यों के लिए . आर्थिक सहायता दी गयी जिससे रोजगार के लिए नए अवसर उपलब्ध हो सके। औद्योगिक क्षेत्र में व्यापक और उत्पादन में नियमन का प्रयास किया गया। श्रमिकों की मजदूरी में वृद्धि की गयी उनके काम के घंटे भी नियत किए गए। किसानों की क्रयशक्ति को बढ़ाने.तथा उनकी सामान्र ।
आर्थिक स्थिति को युद्ध के पूर्व की स्थिति तक ले जाने का प्रयास किया गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय के तीन प्रवाहों का उल्लेख करें। भारत से संबद्ध तीनों प्रवाहों का उदाहरण दें।
उत्तर-
9वीं शताब्दी से नई विश्व अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। इसमें आर्थिक विनिमयों की प्रमुख भूमिका थी। अर्थशास्त्रियों के अनुसार आर्थिक विनिमय तीन प्रकार के प्रवाहों पर आधारित है वे हैं-(i) व्यापार, (ii) श्रम तथा (ii) पूंजी। 19वीं सदी से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का तेजी से विकास हुआ। परंतु यह व्यापार मुख्यतः कपड़ा और गेहूँ जैसे खाद्यानों तक ही सीमित थे। दूसरा प्रवाह श्रम का था। इसके अंतर्गत रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग एक स्थान या देश से दूसरे स्थान और देश की जाने लगे। इसी प्रकार कम अथवा अधिक अवधि के लिए दूर-दूर के क्षेत्रों में पूँजी निवेश किया गया। विनिमय के ये तीनों प्रवाह एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, यद्यपि कभी-कभी ये संबंध टूटते भी थे। इसके बावजूद अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में इन  तीनों प्रवाहों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

भारत से संबंधित तीनों प्रवाह का उदाहरण इस प्रकार हैं –

भारत से श्रम का प्रवाह अंतर्राष्ट्रीय बाजार की माँग के अनुरूप उत्पादन बढ़ाने के लिए 19वीं शताब्दी से श्रम का प्रवाह भारत से दूसरे देशों की ओर हुआ। इन श्रमिकों को गिरमिटिया श्रमिक कहा जाता था क्योंकि इन्हें विदेशों में काम करने के लिए एक अनुबंध के तहत ले जाया गया।

वैश्विक बाजार में भारतीय पूंजीपति विश्व बाजार के लिए बड़े स्तर पर कृषि उत्पादों के लिए पूँजी की आवश्यकता थी। बागान मालिक बैंक और बाजार से अपने लिए पूँजी की व्यवस्था कर लेते थे परंतु असली कठिनाई छोटे किसानों की थी। अतः उन्हें साहूकारों और महाजनों की शरण में जाना पड़ा जो ऊँची सूद की दर पर किसानों को पूँजी उपलब्ध कराते थे। इससे महाजनी और साहूकारी का व्यवसाय चल निकला।

भारतीय व्यापार इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति के पूर्व इंगलैंड को भारत से सूती वस्त्र और महीन कपास का निर्यात बड़ी मात्रा में किया जाता था। इसी बीच कृषि के विकास होने से ब्रिटेन में कपास का उत्पादन बढ़ गया साथ ही सरकार ने भारतीय सूती वस्त्र पर इंगलैंड में भारी आयात शुल्क लगा दिया। इसका असरं भारतीय निर्यात पर पड़ा। संती वस्त्र एवं कपास का निर्यात घट गया। दूसरी ओर मैनचेस्टर में बने वस्त्र का आयात भारत में बढ़ गया।

प्रश्न 2.
कैरीबियाई क्षेत्र में काम करनेवाले गिरमिटिया मजदूरों की जिंदगी पर प्रकाश डालें। अपनी पहचान बनाए रखने के लिए उन लोगों ने क्या किया ?
उत्तर-
गिरमिटिया मजदूर ऐसे मजदूरों को कहा जाता था जिन्हें विदेशों में काम करने के लिए एक अनुबंध अथवा एग्रीमेंट के अंतर्गत ले जाया गया। इन मजदूरों को कृषि, खाद्यानों, सड़क और रेल निर्माण कार्यों में लगाया गया। भारत से अधिकांश अनुबंधित श्रमिक पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु से ले जाए गए। भारत से श्रमिक मुख्यतः कैरीबियाई द्वीप समूह में स्थित त्रिनिदाद गुयाना, और सूरीनाम ले जाए गए। बहुतेरे जमैका, मॉरीशस एवं फिजी भी ले जाए गए। हालाकि ब्रिटिश सरकार ने 1921 में गिरिमिटिया श्रमिकों की व्यवस्था समाप्त कर दी।

इस प्रथा के समाप्त होने के बाद भी दशकों तक अनुबंधित मजदूरों के वंशज कैरीबियाई द्वीप समूह में कष्टदायक और अपमानपूर्ण जीवन व्यतीत करने को विवश किए गए। गिरमिटिया मजदूर सुखी-संपन्न जीवन की उम्मीद में अपना घर द्वार छोड़कर काम करने जाते थे लेकिन कार्य स्थल पर पहुँचकर उनका स्वप्न भंग हो जाता था। बागानों अथवा अन्य कार्यस्थलों पर उनका जीवन कष्टदायक था। उन्हें एक प्रकार की दासता की जंजीरों में जकड़ दिया गया था। इस स्थिति से ऊबकर अनेक मजदूर काम छोड़कर भागने का प्रयास करते थे परंतु मालिक के चंगुल से बच निकलना आसान नहीं था। पकड़े जाने पर उन्हें कठोर दंड दिया जाता था।

इस स्थिति स रहते हुए आप्रवासी भारतीयों ने जीवन की राह ढूँढी जिससे वे सहजता से नए परिवेश में खप सकें। इसके लिए उन लोगों ने अपनी मूल संस्कृति के तत्वों तथा नए स्थान के सांस्कृतिक तत्वों का सम्मिश्रण कर एक नई संस्कृति का विकास कर लिया। इसके द्वारा उन लोगों ने अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक पहचान बनाए रखने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए त्रिनिदाद में गिरमिटिया श्रमिकों ने वार्षिक मुहर्रम के जुलूस को एक भव्य उत्सव और मेले के रूप में परिवर्तित कर दिया।

इस मेले का नाम उन लोगों ने ‘होसे मेला रखा। यह मेला सांप्रदायिक एकता और सद्भावना का प्रतीक बन गया। इसमें त्रिनिदाद में रहने वाले सभी धर्मों और नस्लों के श्रमिक भाग लेते थे। इसी प्रकार त्रिनिदाद और गुयाना में विख्यात ‘चटनी म्यूजिक’ में भी स्थानीय और भारतीय संगीत के तत्वों का मिश्रण कर आप्रवासी भारतीयों ने इसे बनाया। इस प्रकार आप्रवासी भारतीयों ने कैरीबियाई द्वीप समूह के सांस्कृतिक तत्वों को अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते हुए भी आत्मसात करने का प्रयास किया।

प्रश्न 3.
आर्थिक महामंदी के कारणों की व्याख्या करें? भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
1929 ई. की आर्थिक महामंदी के निम्नलिखित कारण थे
(i) बुनियादी कारण-1929 के आर्थिक संकट का बुनियादी कारण स्वयं इस अर्थव्यवस्था के स्वरूप में ही समाहित था। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ तो दूसरी तरफ अधिकांश जनता गरीबी और अभाव में पिसती रही। नवीन तकनीकी प्रगति के कारण उत्पादन में तो भारी वृद्धि हुई लेनिन उत्पादित वस्तुओं के खरीदार बहुत कम थे।

(ii) कृषि उत्पादन एवं खाद्यानों के मूल में कमी-बढ़े हुए कृषि उत्पाद के खरीदार नहीं मिलने के कारण कृषि उत्पादों की कीमतें काफी गिर गयी जिससे किसानों की आय घट गयी। प्रमुख अर्थशास्त्री काडलिफ ने अपनी पुस्तक “दि कॉमर्स ऑफ नेशन” में लिखा कि विश्व के सभी भागों में कृषि उत्पादन एवं खाद्यानों के मूल की विकृति 1929-32 के आर्थिक संकटों के प्रमुख कारण थे।

(iii) यूरोपीय देशों के बीच संकुट-प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के बहुत सारे देशों में अपनी तबाह हो चुकी अर्थव्यवस्था को नए सिरे से विकसित करने के लिए अमेरिका से कर्ज लिया। अमेरिकी पूँजीपतियों ने कर्ज तो दिए लेकिन जब अमेरिका में घरेलु संक्रट के संकेत मिले तो वे कर्ज वापस माँगने लगे। इस परिस्थिति से यूरोपीय देशों के बीच गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया। परिणामस्वरूप यूरोप के कई बैंक डूब गये तथा कई देशों के मुद्रा मुल्य गिर गया।

(iv) सट्टेबाजी की प्रवृत्ति- इन उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त अमेरिकी बाजारों में शुरू हुआ सट्टेबाजी की प्रवृत्ति भी आर्थिक मंदी में निर्णायक भूकिा निभाई। प्रथम महायुद्ध के पश्चात् अमेरिका की आर्थिक समृद्धि में वृद्धि के परिणामस्वरूप वहाँ के पूँजीपति अतिरिक्त पूँजी को सट्टा ।। लगाने की ओर आकर्षित हुए। शुरू में तो काफी लाभ हुआ बाद में संकट उभरकर सामने आ गया।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव-आर्थिक मंदी का प्रभाव विश्वव्यापी था। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। भारत पर आर्थिक मंदी के निम्नलिखित प्रभाव पड़े –

(i) व्यापार में गिरावट-महामंदी के पूर्व वैश्विक अर्थव्यवस्था में आयातक और निर्यातक के रूप में भारत की महत्वपूर्ण भागीदारी थी। महामंदी का प्रभाव इस आयात-निर्यात व्यापार पर पड़ा। यह काफी घट गया। 1928-34 के मध्य आयात-निर्यात घटकर आधा रह गया।

(ii) कृषि उत्पादों के मूल्य में कमी-विश्व बाजार में कृषि उत्पादों के मूल्य में कमी आने के पश्चात भारतीय कृषि उत्पादों के मूल्य में भी गिरावट आई। 1928-1934 के मध्य गेहूँ की कीमत में 50 प्रतिशत की कमी आई।

(iii) किसानों की दयनीय स्थिति-महामंदी का सबसे बुरा प्रभाव किसानों पर पड़ा। मूल्य में कमी आने तथा बिक्री कम हो जाने से उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय बन गई। वे लगान चुकाने में असमर्थ हो गए लेकिन सरकार ने न तो लगान की राशि घटाई और न ही लगान माफ की। जिससे किसानों में असंतोष की भावना बढ़ी। इसी आर्थि संकट के कारण महात्मा गांधी ने भारत में व्यापक सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ किया।

प्रश्न 4.
ब्रिटेन वुड्स समझौता की व्याख्या करें।
उत्तर-
दो महायुद्धों के बीच आर्थिक अनुभवों से सीख लेकर अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं ने आर्थिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए दो उपाय सुझाव ये थे- (i) आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक सरकारी हस्तक्षेप तथा (ii) अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों को सुनिश्चित करने में सरकार की भूमिका। इसे कार्यान्वित करने की प्रक्रिया पर विचार-विमर्श करने के लिए जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में बबन वुड्स नामक स्थान पर एक सम्मेलन आयोजित किया गया। विचार-विमर्श करने के बाद दो संस्थाओं का गठन किया गया। इनमें पहला अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) था और दूसरा अंतराष्ट्रीय पुनर्निमाण एवं विकास बैंक अथवा विश्व बैंक (World Bank)। इन दोनों संस्थानों को ‘ब्रेटन वुड्स ट्विन’ या ‘क्रेटनवुड्स की जुड़वाँ संतान’ कहा गया।

आई. एम. एफ. ने अंतराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था और राष्ट्रीय मुद्राओं तथा मौद्रिक व्यवस्थाओं को जोड़ने की व्यवस्था की। इसमें राष्ट्रीय मुद्राओं के विनिमय की दर अमेरिकी मुंद्रा ‘डॉलर’ के मूल्य पर निर्धारित की गयी। डॉलर का मूल्य भी सोने के मूल्य से जुड़ा हुआ था। विश्व बैंक चने विकसित देशों को पुनर्निर्माण के लिए कर्ज के रूप में पूँजी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की। इसी आधार पर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को नियमित करने का प्रयास किया गया। ब्रेटनवुड्स संस्थानों ने औपचारिक रूप से 1947 से काम करना आरंभ कर दिया। इन संस्थानों के निर्णयों पर पश्चिमी औद्योगिक देशों का नियंत्रण स्थापित किया गया। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका को अई. एम. एफ. और विश्व बैंक के किसी भी निर्णय पर निषेधाधिकार (वीटो) प्रदान किया गया।

Bihar Board Class 10 History व्यापार और भूमंडलीकरण Notes

  • प्राचीन भारत में विकसित सिन्धुघाटी सभ्यता का व्यापारिक सम्बन्ध प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता के साथ था।
  • 1919 में विश्व स्तर पर आर्थिक मंदी का दौर था क्योंकि 1929 के बाद ब्रिटेन के उत्पादन, निर्यात, रोजगार, आयात तथा जीवन निर्वाह स्तर, इन सब में तेजी से गिरावट आया।
  • 1932 में फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट (अमेरिकी राष्ट्रपति) ने जनकल्याण की एक बड़ी योजना से संबंधित नई नीति बनायी जिसे न्यू-डील कहते हैं। इसमें आर्थिक क्षेत्र के अलावा राजनीतिक और प्रशासनिक नीतियों को भी नियमित किया गया।
  • जुलाई 1944 में अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशायर “ब्रेटन वुड्स’ नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन हुआ, जिसमें एक सहमति बनी जिसके बाद अन्तर्राष्ट्री मुद्राकोष एवं विश्व बैंक का गठन किया।
  • 1119 के बाद विश्वव्यापी अर्थतंत्र में यूरोप के स्थान पर संयुक्त राज्य अमारका और रूस का प्रभाव बढ़ा जो द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व व्यापार और राजनैतिक व्यवस्था में निर्णायक हो गया।
  • 1919 के बाद विश्व बाजार के अन्तर्गत ही एक नवीन आर्थिक प्रवृति भूमंडलीकरण का उत्कर्ष हुआ जो निजीकरण और आर्थिक उदारीकरण से प्रत्यक्षतः जुड़ा था।
  • भूमंडलीकरण ने सम्पूर्ण विश्व के अर्थतंत्र का केन्द्र बिन्दु संयुक्त राज्य अमेरिका को बना दिया। उसकी मुद्रा डॉलर पूरे विश्व की मानक मुद्रा बन गई।
  • आर्थिक मंदी का सबसे बुरा असर अमेरिका को ही झेलना पड़ा।
  • 1928 से 1934 के बीच भारत में गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत गिर गया।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलीन डी रूजवेल्ट ने 1932 में न्यूडील (नई व्यवस्था) नामक नवीन आर्थिक नीतियों को अमेरिका में लागू किया।
  • व्यापार को बढ़ाने के उद्देश्य से 1932 में लोजान सम्मेलन हुआ जिसमें जर्मनी के क्षतिपूर्ति राशि को कम कर दिया गया।
  • फ्रांस के विदेश मंत्री त्रिया ने पहली बार यूरोप में एक आर्थिक संघ बनाने का सुझाव दिया।
  • 1944 में अमेरिका स्थित न्यू हैल्थशायर में ‘ब्रेटनवुडस’ नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन हुआ।
  • 1948 में ब्रसेल्स संधि हुई जिसमें यूरोपीय आर्थिक सहयोग की प्रक्रिया कोयला एवं इस्पात के माध्यम से शुरू हुआ।
  • 1991 के बाद विश्व बाजार के अंतर्गत ही एक नवीन आर्थिक प्रवृत्तिं भूमंडलीकरण का उत्कर्ष हुआ जो निजीकरण और आर्थिक उदारीकरण से प्रत्यक्षतः जुड़ा था।
  • भौगोलिक खोजों पुनर्जागरण तथा राष्ट्रीय राज्यों के उदय से वाणिज्यक क्रांति हुई।
  • औद्योगिक क्रांति और उपनिवेशवाद के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का विकास हुआ।
  • रेशम मार्ग चीन से आरंभ होकर जमीनी मार्ग द्वारा मध्य एशिया होते हुए यूरोप से जुड़ जाता था।