Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 2 परमाणु की संरचना

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 2 परमाणु की संरचना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 2 परमाणु की संरचना

Bihar Board Class 11 Chemistry परमाणु की संरचना Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 2.1

  1. एक ग्राम-भार में इलेक्ट्रॉनों की संख्या का परिकलन कीजिए।
  2. एक मोल इलेक्ट्रॉनों के द्रव्यमान और आवेश का परिकलन कीजिए।

उत्तर:
1. ∵ 9.1 × 10-28 ग्राम = 1 इलेक्ट्रॉन
∴ 1 ग्राम = \(\frac { 1 }{ 9.1\times 10^{ -28 } } \) इलेक्ट्रॉन
= 1.099 × 1027 इलेक्ट्रॉन
अतः एक ग्राम – भार में इलेक्ट्रॉनों की संख्या
= 1.099 × 1027 इलेक्ट्रॉन

2. ∵ 1 मोल = 6.022 × 1023 इकाई
∴ 1 मोल इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान = एक इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान × 6.022 × 1023
= 9.1 × 10-3 kg × 6.022 × 1023
= 5.48 × 10-7 kg
तथा 1 मोल इलेक्ट्रॉनों का आवेश
= एक इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान × 6.022 × 1023
= 1.602 × 10-19 C × 6.022 × 1023
= 9.65 × 10× 104 C

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प्रश्न 2.2
1. मेथेन के एक मोल में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या का परिकलन कीजिए।

2. 7 mg14 C में न्यूट्रॉनों की –
(क) कुल संख्या तथा
(ख) कुल द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। (न्यूट्रॉन का द्रव्यमान = 1.675 × 10-27 kg मान लीजिए)

3. मानक ताप और दाब (STP) पर 34mg NH3 में प्रोटॉनों की –
(क) कुल संख्या और
(ख) कुल द्रव्यमान बताइए। दाब और ताप में परिवर्तन से क्या उत्तर परिवर्तित हो जायेगा?
उत्तर:
1. मेथेन में इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 6 + 4 = 10
मेथेन के एक मोल में इलेक्ट्रॉन संख्या
= 6.022 × 1023 × 10
= 6.022 × 1024

2. 14C का द्रव्यमान = 7mg = 7 × 10-3g
तथा 14C का मोलर द्रव्यमान = 14g/mol
14C का 7 mg में द्रव्यमान = \(\frac { 7\times 10^{ -3 }g }{ 14g/mol } \)
= 5 × 10-14 mol

(क) 7mg14C में न्यूट्रॉनों की कुल संख्या
= 8 × 5 × 10-14 mol × 6.022 × 1023 mol-1
(∵ 14C में नाभिक में 8 न्यूट्रॉन होते हैं।)
= 2.4088 × 1021

(ख) 7mg 14C का कुल द्रव्यमान
= 2.41 × 1021 × 1.675 × 10-27 kg
= 4.0367 × 10-6 kg

3. प्रश्नानुसार,
NH3 का द्रव्यमान = 34 mg = 34 × 10-3g
= \(\frac { 34\times 10^{ -3 }g }{ 17g/mol } \) = 2 × 10-3 mol
∴ 34 mg में NH3 के अणुओं की संख्या
= 2 × 10-3mol × 6.022 × 1023mol-1
= 1.2044 × 1021
∵ NH3 में प्रोटॉनों की संख्या = 7 + 3 = 10

(क) अतः 34 mg NH3 में प्रोटॉनों की कुल संख्या
= 10 × 1.2044 × 1021
= 1.2044 × 1022

(ख) ∵ एक प्रोटॉन का द्रव्यमान = 1.675 × 10-27 kg
∴ 34 mg NH3 में प्रोटॉनों का कुल द्रव्यमान
= 1.2044 × 1022 × 1.675 × 10-27 kg
= 2.017 × 10-5 kg
ताप और दाब में परिवर्तन से उत्तर में कोई परिवर्तन नहीं होगा क्योंकि न्यूट्रॉनों, प्रोटॉनों और अणुओं की संख्या तथा द्रव्यमान ताप एवं दाब पर निर्भर नहीं करते।

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प्रश्न 2.3
निम्नलिखित नाभिकों में उपस्थित न्यूट्रॉनों और प्रोटॉनों की संख्या बताईए –
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उत्तर:
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प्रश्न 2.4
नीचे दिये गये परमाणु द्रव्यमान (A) और परमाणु संख्या (Z) वाले परमाणुओं का पूर्ण प्रतीक लिखिए –

  1. Z = 17, A = 35
  2. Z = 92, A = 233
  3. Z = 4, A = 9

उत्तर:
1. \(_{ 17 }^{ 35 }{ Cl }\)

2. \(_{ 233 }^{ 92 }{ U }\)

3. \(_{ 9 }^{ 4 }{ Be }\)

प्रश्न 2.5
सोडियम लैम्प द्वारा उत्सर्जित पीले प्रकाश की तरंग – दैर्घ्य (λ) 580 nm है। इसकी आवृत्ति (v) और तरंग-संख्या (\(\bar { υ } \)) का परिकलन कीजिए।
उत्तर:
पीले प्रकाश की आवृत्ति की गणना,
हम जानते हैं कि v = \(\frac{c}{λ}\)
दिया है, c = 3.0 × 10 ms-1
λ = 580nm = 580 × 10-9m
υ = \(\frac { 3.0\times 10^{ 8 }(ms^{ -1 }) }{ 580\times 10^{ -9 }(m) } \)
= 5.17 × 1014s-1
तरंग-संख्या की गणना
तरंग-संख्या (\(\bar { v } \)) = \(\frac{1}{λ}\) = \(\frac { 1 }{ (580\times 10^{ -9 })m } \)
= 1.724 × 106 m-1

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प्रश्न 2.6
प्रत्येक ऐसे फोटॉन की ऊर्जा ज्ञात कीजिए –

  1. जो 3 × 1015 Hz आवृत्ति वाले प्रकाश के संगत हो।
  2. जिसकी तरंग-दैर्घ्य 0.50 Å हो।

उत्तर:
1. फोटॉन की ऊर्जा E = hv
h = 6.626 × 10-34 J-s
v = 3 × 1015 Hz = 3 × 1015 s-1
∴ E = (6.626 × 10-34 J-s) × (3 × 1015 s-1)
= 1.988 × 10-18 J

2. फोटॉन की ऊर्जा E = hv = \(\frac{hc}{λ}\)
h = 6.626 × 10-34 J-s;
c = 3.0 × 108ms-1;
λ = 0. 50Å = 0.5 × 10-10 m
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= 3.97 × -15 J

प्रश्न 2.7
2.0 × 10-10 s काल वाली प्रकाश तरंग की तरंग-दैर्घ्य, आवृत्ति और तरंग-संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर:
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प्रश्न 2.8
ऐसा प्रकाश, जिसकी तरंग-दैर्घ्य 4000 pm हो और जो 1J ऊर्जा दे, के फोटॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर:
फोटॉन की ऊर्जा (E) = \(\frac{hc}{λ}\)
h = 6.626 × 10-34 J-s
c = 3 × 108 ms-1
λ = 4000pm = 4000 × 10-12 = 4 × 10-19 m
∴ फोटॉन की ऊर्जा
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= 4.97 × 10-17 J
इस प्रकार, 4.97 × 10-17 J ऊर्जा है = 1 फोटॉन
∴ कुल फोटॉन जिनकी ऊर्जा 1J होगी = \(\frac { 1 }{ 4.97\times 10^{ -17 } } \)
= 2.012 × 1016 फोटॉन

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प्रश्न 2.9
यदि 4 × 10-7 m तरंग-दैर्ध्य वाला एक फोटॉन 2.13 ev कार्यफलन वाली धातु की सतह से टकराता है, तो –

  1. फोटॉन की ऊर्जा (ev में)
  2. उत्सर्जन की गतिज ऊर्जा और
  3. प्रकाशीय इलेक्ट्रॉन के वेग का परिकलन कीजिए (1ev = 1.6020 × 10-19 J)।

उत्तर:
1. फोटॉन की ऊर्जा (E) = hυ = \(\frac{hc}{λ}\)
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2. उत्सर्जन की गतिज ऊर्जा = \(\frac{1}{2}\) mv2 = hυ – hυ0
= 3.10 – 2.13 = 0.97ev

3. \(\frac{1}{2}\) mυ2 = 0.97eV = 0.97 × 1.602 × 10-19 J
या \(\frac{1}{2}\) × (9.11 × 10-31 kg) × υ2
= 0.97 × 1.602 × 10-19 J
या υ2 = 0.341 × 1012
= 34.1 × 1010
या υ = 5.84 × 105 ms-1

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प्रश्न 2.10
सोडियम परमाणु के आयनन के लिए 242 nm तरंग-दैर्ध्य की विद्युत-चुम्बकीय विकिरण पर्याप्त होती है। सोडियम की आयनन ऊर्जा KJ mol-1 में ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
h = 6.626 × 10-34 J-s
c = 3 × 108 ms-1
λ = 242 nm = 242 × 10-9 m
∴ λ = 242nm = 242 × 10-9 m
∴ आयनन ऊर्जा (E) = \(\frac{hc}{λ}\)
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= 494 KJ mol-1

प्रश्न 2.11
25 वॉट का एक बल्ब 0.57µm तरंग दैर्ध्य वाले पीले रंग का एक वर्णी प्रकाश उत्पन्न करता है। प्रति सेकण्ड क्वाण्टा के उत्सर्जन की दर ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
एक फोटॉन की ऊर्जा (E) = \(\frac{hc}{λ}\)
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= 34.87 × 10-20 J
∵ शक्ति = 25 वाट = 25Js-1
तथा ऊर्जा = 34.87 × -20 J
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= 7.17 × 19 s-1

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प्रश्न 2.12
किसी धातु की सतह पर 6800Å तरंग-दैर्ध्य वाली विकिरण डालने से शून्य वेग वाले इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं। धातु की देहली आवृत्ति (υ0) और कार्यफलन (W0) ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
देहली आवृत्ति (υ0) = \(\frac{c}{λ}\) = \(\frac { (3\times 10^{ 8 }ms^{ -1 }) }{ (68\times 10^{ -8 }m) } \)
= 4.41 × 1014s-1
कार्यफलन (W0) = hv0
= (6.626 × 10-34 J-s) × (4.41 × 1014s-1)
= 2.92 × 10-19 J

प्रश्न 2.13
जब हाइड्रोजन परमाणु के n = 4 ऊर्जा स्तर से n = 2 ऊर्जा स्तर में इलेक्ट्रॉन जाता है, तो किस तरंग दैर्ध्य का प्रकाश उत्सर्जित होगा?
उत्तर:
बामर समीकरण के अनुसार तरंग-संख्या (\(\bar { υ } \))
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प्रश्नानुसार,
n1 = 2, n2 = 4, RH = 109678cm-1
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अतः तरंग – दैर्ध्य (λ) = \(\frac { 1 }{ \bar { \upsilon } } \)
\(\frac{16}{109678×3}\)
= 486 × 10-7cm
= 486 × 10-9 m
= 486 nm

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प्रश्न 2.14
यदि इलेक्ट्रॉन n = 5 कक्षक में उपस्थित हो, तो H परमाणु के आयनन के लिए कितनी ऊर्जा की आवश्यकता होगी? अपने उत्तर की तुलना हाइड्रोजन परमाणु के आयनन एन्थैल्पी से कीजिए। (आयनन ऐन्थेल्पी n = 1 कक्षक से इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा होती है।)
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन n = 5 कक्षक में उपस्थित है।
∴ n1 = 5, n2 = ∞
H परमाणु के आयनन के लिए आवश्यक ऊर्जा (∆E)
= E2 – E1
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n = 1 कक्षक में उपस्थित इलेक्ट्रॉन के लिए आयनन ऊर्जा
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प्रश्न 2.15
जब हाइड्रोजन परमाणु में उत्तेजित इलेक्ट्रॉन n = 6 से मूल अवस्था में जाता है तो प्राप्त उत्सर्जित रेखाओं की अधिकतम संख्या क्या होगी?
उत्तर:
हम जानते हैं कि उत्सर्जित रेखाओं की अधिकतम संख्या
= \(\frac{n(n-1)}{2}\)
= \(\frac{6×5}{2}\)
= 15

प्रश्न 2.16

  1. हाइड्रोजन के प्रथम कक्षक से सम्बन्धित ऊर्जा – 2.18 × 10-18 J atom-1 है। पाँचवें कक्षक से सम्बन्धित ऊर्जा बताइए।
  2. हाइड्रोजन परमाणु के पाँचवें बोर कक्षक की त्रिज्या की गणना कीजिए।

उत्तर:
1. किसी इलेक्ट्रॉन के लिए दो कक्षकों में ऊर्जाओं की तुलना निम्नवत् की जा सकती है –
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2. H – परमाणु के लिए बोर त्रिज्या,
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प्रश्न 2.17
हाइड्रोजन परमाणु की बामर श्रेणी में अधिकतम तरंग-दैर्ध्य वाले संक्रमण की तरंग-संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर:
हाइड्रोजन परमाणु से उत्सर्जित विकिरण की तरंग-संख्या निम्नवत् दी जा सकती है –
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बामर श्रेणी, n1 = 2 के लिए, तरंग-दैर्ध्य (λ) अधिकतम होगा जबकि इलेक्ट्रॉन ऊर्जा स्तर n2 = 3 से n2 = 2 पर आएगा।
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प्रश्न 2.18
हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन को पहली कक्ष से पाँचवीं कक्ष तक ले जाने के लिए आवश्यक ऊर्जा की जूल में गणना कीजिए। जब यह इलेक्ट्रॉन तलस्थ अवस्था में लौटता है तो किस तरंग-दैर्ध्य का प्रकाश उत्सर्जित होगा? (इलेक्ट्रॉन की तलस्थ अवस्था ऊर्जा -2.18 × 10-11 ergs है)।
उत्तर:
हाइड्रोजन परमाणु के n कक्ष में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा निम्नवत् दी जा सकती है –
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इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण के लिए आवश्यक ऊर्जा,
∆E = E5 – E1
= – 8.72 × 10-13 erg – (-2.18 × 10-11 erg)
= – 0.0872 × 10-11 + 2.18 × 10-11
= 2.09 × 10-11 erg
उत्सर्जित विकिरण की तरंग – दैर्ध्य
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प्रश्न 2.19
हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा En = \(\frac{\left(-2.18 \times 10^{-18}\right)}{n^{2}}\) द्वारा दी जाती है। n = 2 कक्षा से इलेक्ट्रॉन को पूरी तरह निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा की गणना कीजिए। प्रकाश की सबसे लम्बी तरंग – दैर्ध्य (cm में) क्या होगी। जिसका प्रयोग इस संक्रमण में किया जा सके?
उत्तर:
En = \(\frac{\left(-2.18 \times 10^{-18}\right)}{n^{2}}\)
n = 2 से एक इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा,
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ऊर्जा, तरंग-दैर्ध्य से निम्नलिखित सम्बन्ध द्वारा सम्बन्धित होती है –
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अतः इस संक्रमण में प्रयुक्त प्रकाश की तरंग – दैर्ध्य 3.647 × 10-5 cm(3647Å) है।

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प्रश्न 2.20
2.05 × 107 ms-1 वेग से गति कर रहे किसी इलेक्ट्रॉन का तरंग-दैर्ध्य क्या होगा?
उत्तर:
υ = 2.05 × 107 ms-1
तथा m = 9.1 × 1031 kg
∴ इलेक्ट्रॉन की तरंग-दैर्ध्य (λ) = \(\frac{h}{mυ}\)
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= 3.55 × 10-11 m

प्रश्न 2.21
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान 9.1 × 10-31 10-31 kg है। यदि इसकी गतिज ऊर्जा 3.0 × 10-25 तो इसकी तरंग-दैर्ध्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा (K.E.) = \(\frac{1}{2}\) mυ2
= 3.0 × 10-25 J
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान, m = 9.1 × 10-31 kg
यदि इस इलेक्ट्रॉन की तरंग-दैर्ध्य 2. हो तो
λ = \(\frac{h}{mυ}\)
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प्रश्न 2.22
निम्नलिखित में से कौन सम-आयनी स्पीशीज हैं, अर्थात् किन में इलेक्ट्रॉनों की समान संख्या है?
Na+, K+, Mg2+, Ca2+, S2-, Ar
उत्तर:
Na+ तथा Mg2+ सम-आयनी स्पीशीज हैं क्योंकि दोनों में 10 इलेक्ट्रॉन हैं।
K+, Ca2+, S2- तथा Ar सम-आयनी स्पीशीज हैं क्योंकि इनमें प्रत्येक में इलेक्ट्रॉनों की संख्या 18 है।

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प्रश्न 2.23
1. निम्नलिखित आयनों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए –
(क) H
(ख) Na+
(ग) O2-
(घ) F

2. उन तत्त्वों की परमाणु संख्या बताइए, जिनके सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉनों को निम्नलिखित रूप में दर्शाया जाता है –
(क) 3s1
(ख) 2p3
(ग) 3p5

3. निम्नलिखित विन्यासों वाले परमाणुओं के नाम बताईए
(क) [He]2s1
(ख) [Ne]3s23p3
(ग) [Ar]4s2 3d1
उत्तर:
1.
(क) 1s2
(ख) 1s2, 2s2, 2p6
(ग) 1s2, 2s2, 2p6
(घ) 1s2, 2s2, 2p6

2.
(क) Na (Z = 11) का सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3s1 है।
(ख) N(Z = 7) का सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉनों का विन्यास 2p3 है।
(ग) CI(Z = 17) का सबसे बहारी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3p5 है।

3.
(क) Li
(ख) P
(ग) Sc

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प्रश्न 2.24
किस निम्नतम n मान द्वारा g – कक्षक का अस्तित्व अनुमत होगा?
उत्तर:
g – कक्षक, l = 4 से सम्बन्धित है। अत: n का निम्नतम मान 5 होगा जिसके द्वारा g-कक्षक का अस्तित्व अनुमत होगा।

प्रश्न 2.25
एक इलेक्ट्रॉन किसी 3d – कक्ष में है। इसके लिएn, और m के सम्भव मान दीजिए।
उत्तर:
3d – कक्षक के लिए
n = 3, l = 2, ml = -2, -1, 0, +1,+2

प्रश्न 2.26
किसी तत्त्व के परमाणु में 29 इलेक्ट्रॉन और 35 न्यूट्रॉन हैं।

  1. इसमें प्रोटॉनों की संख्या बताइए।
  2. तत्त्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास बताइए।

उत्तर:
1. ∵ तत्त्व के परमाणु में 29 इलेक्ट्रॉन हैं।
∴ तत्त्व का परमाणु क्रमांक (Z) = 29
∴ प्रोटॉनों की संख्या = Z = 29

2. तत्त्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
= 1s2, 2s2, 3p6, 3s2 3p6, 4s1, 3d10

प्रश्न 2.27
\({ H }_{ 2 }^{ + }\), H2 \({ O }_{ 2 }^{ + }\) और स्पीशीज में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर:
\({ H }_{ 2 }^{ + }\) में इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 1
H2 में इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2
O2, में इलेक्ट्रॉनों की सख्या = 15

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प्रश्न 2.28

  1. किसी परमाणु कक्षक का n = 3 है। उसके लिए l और 2ml, के सम्भव मान क्या होंगे?
  2. 3d – कक्षक के इलेक्ट्रॉनों के लिए ml और l क्वाण्टम संख्याओं के मान बताइए।
  3. निम्नलिखित में से कौन – से कक्षक सम्भव हैं – 1p, 2s, 2p और 3f

उत्तर:
1. n = 3
अतः = 0, 1, 2 के लिए
l = 0, ml = 0
l = 1, ml = -1, 0, +1
l = 2, ml = -2, -1, 0, + 1, +2

2. d – कक्षक के लिए, l = 2
इसलिए, l = 2, ml = -2 -1, 0, + 1, +2

3. सम्भव कक्षक 2s, 2p हैं।

प्रश्न 2.29
s, p, d संकेतन द्वारा निम्नलिखित क्वांटम संख्याओं वाले कक्षकों को बताइए –
(क) n = 1, l = 0
(ख) n = 3, l = 1
(ग) n = 4, l = 2
(घ) n = 4, l = 3
उत्तर:
(क) 1s
(ख) 3p
(ग) 4d
(घ) 4f

प्रश्न 2.30
कारण देते हुए बताइए कि निम्नलिखित क्वांटम संख्या के कौन-से मान सम्भव नहीं हैं –
(क) n = 0, l = 0, ml = 0, ms = +\(\frac{1}{2}\)
(ख) n = 1, l = 0, ml = 0, ms = –\(\frac{1}{2}\)
(ग) n = 1, l = 1, ml = 0, ms = +\(\frac{1}{2}\)
(घ) n = 2, l = 1, ml = 0, ms = –\(\frac{1}{2}\)
(ङ) n = 3, l = 3, ml = -3, ms = +\(\frac{1}{2}\)
(च) n = 3, l = 1, ml = 0, ms = +\(\frac{1}{2}\)
उत्तर:
(क) असम्भव (∵ n ≠ 0)
(ख) सम्भव।
(ग) असम्भव। (∵ n = 1, l ≠ 1)
(घ) सम्भव।
(ङ) असम्भव। (∵ n = 3, l ≠ 3)
(च) सम्भव।

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प्रश्न 2.31
किसी परमाणु में निम्नलिखित क्वांटम संख्याओं वाले कितने इलेक्ट्रॉन होंगे?
(क) n = 4, ms = –\(\frac{1}{2}\)
(ख) n = 3, l = 0
उत्तर:
(क) n = 4 के लिए, उपकोशों की संख्या = 4s, 3d, 4p
∴ इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या = 2 + 10 + 6 = 18

(ख) l = 0 से s – कक्षक निरूपित होता है जिसमें अधिकतम 2 इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं।
अत: क्वांटम संख्या n = 3, l = 0 में इलेक्ट्रॉनों की संख्या 2 होगी।

प्रश्न 2.32
यह दर्शाइए कि हाइड्रोजन परमाणु की बोर कक्षा की परिधि उस कक्षा में गतिमान इलेक्ट्रॉन की दे-बाग्ली तरंग-दैर्ध्य का पूर्णांक गुणक होती है।
उत्तर:
बोर के सिद्धान्तानुसार,
mυr = \(\frac{nh}{2π}\)
या mυ = \(\frac{nh}{2πr}\) ……………… (i)
दे – ब्राग्ली समीकरण से
λ = \(\frac{h}{mυ}\)
या mυ = \(\frac{h}{mλ}\) ……………… (ii)
समीकरण (i) तथा (ii) से
\(\frac{nh}{2πr}\) = \(\frac{h}{λ}\)
या 2πr = nλ
अतः हाइड्रोजन परमाणु की बोर कक्षा की परिधि (2πr) उस कक्षा में गतिमान इलेक्ट्रॉन की दे-ब्राग्ली तरंग-दैर्ध्य का पूर्ण गुणांक होती है।

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प्रश्न 2.33
He+ स्पेक्ट्रम के n = 4 से n = 2 बामर संक्रमण से प्राप्त तरंग-दैर्ध्य के बराबर वाला संक्रमण हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम में क्या होगा?
उत्तर:
किसी परमाणु के लिए, तरंग संख्या
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He+ स्पेक्ट्रम के लिए:
Z = 2, n2 = 4, n1 = 2
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हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम के लिए:
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इसका तात्पर्य है कि n1 = 1 तथा n2 = 2
अतः हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम की स्थिति में संक्रमण n2 = 2 से n1 = 1 होगा।

प्रश्न 2.34
He+ (g) → He2+ (g) + e प्रक्रिया के लिए आवश्यक ऊर्जा की गणना कीजिए। हाइड्रोजन परमाणु की तलस्थ अवस्था में आयनन ऊर्जा 2.18 × 10-18 J atom-1 है।
उत्तर:
आयनन ऊर्जा के लिए व्यंजक निम्नवत् है –
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हाइड्रोजन परमाणु (Z = 1) के लिए, En = 2.18 × 10-18 × (2)2
He+ आयन (Z = 2) के लिए, En, = 2.18 × 10-18 × (2)2
= 8.72 × 10-18 J atom-1 (एकल इलेक्ट्रॉन स्पीशीज)

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प्रश्न 2.35
यदि कार्बन परमाणु का व्यास 0.15 nm है तो उन कार्बन परमाणुओं की संख्या की गणना कीजिए जिन्हें 20 cm स्केल की लम्बाई में एक-एक करके व्यवस्थित किया जा सकता है।
उत्तर:
स्केल की लम्बाई = 20cm = 20 × 107 nm = 2 × 107 nm = 2 × 108 nm
कार्बन परमाणु का व्यास = 0.15 nm
कार्बन परमाणुओं की संख्या जिन्हें स्केल की लम्बाई में एक – एक करके व्यवस्थित किया जा सकता है –
\(\frac { 2\times 10^{ 8 }nm }{ (0.15)nm } \) = 1.33 × 109

प्रश्न 2.36
कार्बन के 2 × 108 परमाणु एक कतार में व्यवस्थित हैं। यदि इस व्यवस्था की लम्बाई 2.4 cm है तो कार्बन परमाणु के व्यास की गणना कीजिए।
उत्तर:
कार्बन परमाणुओं की संख्या = 2 × 108
कतार की लम्बाई = 2.4 cm
कार्बन परमाणु का व्यास = \(\frac { 2.4 }{ 2\times 10^{ 8 } } \) = 1.20 × 10-8

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प्रश्न 2.37
जिंक परमाणु का व्यास 2.6Å है –
(क) जिंक परमाणु की त्रिज्या pm में तथा
(ख) 1.6 cm की लम्बाई में कतार में लगातार उपस्थित परमाणुओं की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर:
(क) 1Å = 102 pm
2.6Å = 2.6 × 102 pm = 260 pm
अत: जिंक परमाणु की त्रिज्या = \(\frac { 260 }{ 2 } \) pm
= 130 pm

(ख) स्केल की लम्बाई = 1.6cm = 1.6 × 1010
जिंक परमाणु का व्यास = 260pm
कतार में उपस्थित लगातार परमाणुओं की संख्या
= \(\frac { 1.6\times 10^{ 10 }pm }{ 260pm } \)
= 6.154 × 107

प्रश्न 2.38
किसी कण का स्थिर विद्युत आवेश 2.5 × 10-16C है। इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार, विद्युत आवेश का परिणाण (q) = 2.5 × 10-16C
तथा एक इलेक्ट्रॉन का आवेश (e) = 1.602 × 10-19C
∴ इलेक्ट्रॉनों की संख्या = \(\frac{q}{e}\)
= \(\frac { 2.5\times 10^{ -16 } }{ 1.602\times 10^{ -19 } } \)
= 1560

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प्रश्न 2.39
मिलिकन के प्रयोग में तेल की बूंद पर चमकती x – किरणों द्वारा प्राप्त स्थैतिक विद्युत-आवेश प्राप्त किया जाता है। तेल की बूँद पर यदि स्थैतिक विद्युत-आवेश -1.282 × 10-18C है तो इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार, तेल की बूँद पर आवेश का परिमाण
(q) = -1.282 × 10-18C
तथा एक इलेक्ट्रॉन का आवेश (e) = -1.602 × 10-19C
∴ इलेक्ट्रॉनों की संख्या = \(\frac{q}{e}\)
= \(\frac { -1.282\times 10^{ -18 } }{ 1.602\times 10^{ -19 } } \)
= 8

प्रश्न 2.40
रदरफोर्ड के प्रयोग में सोने, प्लैटिनम आदि भारी परमाणुओं की पतली पन्नी पर α – कणों द्वारा बमबारी की जाती है। यदि ऐलुमिनियम आदि जैसे हल्के परमाणु की पतली पन्नी ली जाए तो उपर्युक्त परिणामों में क्या अन्तर होगा?
उत्तर:
अधिकतर α – कण सीधे निकल जाएँगे; क्योंकि हल्के परमाणु का नाभिक भी हल्का होगा। कुछ α – कण अपने पथ से कम विक्षेपित होंगे, चूँकि नाभिक पर धनावेश भी कम होगा। इस प्रकार ऐलुमिनियम की पतली पन्नी लेने पर रदरफोर्ड के प्रयोग के परिणाम भिन्न होंगे।

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प्रश्न 2.41
\(_{ 35 }^{ 79 }{ Br }\) तथा 79Br प्रतीक मान्य हैं, जबकि \(_{ 79 }^{ 35 }{ Br }\) तथा 35Br मान्य नहीं हैं। संक्षेप में कारण बताइए।
उत्तर:
\(_{ 35 }^{ 79 }{ Br }\) तथा 79Br मान्य हैं जबकि \(_{ 79 }^{ 35 }{ Br }\)Br तथा 35Br मान्य नहीं है क्योंकि 35Br में द्रव्यमान संख्या को व्यक्त नहीं किया गया है और तत्त्व के निर्धारण हेतु द्रव्यमान संख्या का व्यक्त करना आवश्यक होता है।

प्रश्न 2.42
एक 81 द्रव्यमान संख्या वाले तत्त्व में प्रोटॉनों की तुलना में 31.7% न्यूट्रॉन अधिक है। इसका परमाणु प्रतीक लिखिए।
उत्तर:
माना प्रोटॉनों की संख्या x है।
∴ न्यूट्रॉनों की संख्या = x + \(\frac{x×31.7}{100}\)
= 1.317x
∵ तत्त्व की द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या
81 = x + 1.317x = 2.317x
x = \(\frac{81}{2.317}\) = 35
∴ तत्त्व का परमाणु क्रमांक (Z) = प्रोटॉनों की संख्या = 35
अतः परमाणु क्रमांक 35 वाला तत्त्व बोमीन है।

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प्रश्न 2.43
37 द्रव्यमान संख्या वाले एक आयन पर ऋणावेश की एक इकाई है। यदि आयन में इलेक्ट्रॉन की तुलना में न्यूट्रॉन 11.1% अधिक है तो आयन का प्रतीक लिखिए।
उत्तर:
माना आयन में इलेक्ट्रॉनों की संख्या = x
प्रोटॉनों की संख्या = x – 1
तथा न्यूट्रॉनों की संख्या = 1.111x
आयन का द्रव्यमान= प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या
= (x – 1 + 1.111x)
दिया है, आयन का द्रव्यमान = 37
∴ x – 1 + 1.111x = 37
2.111x = 37 + 1 = 38
x = \(\frac{38}{2.111}\) = 18
इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 18
प्रोटॉनों की संख्या = (18 – 1) = 17
आयन की परमाणु संख्या = 17
आयन से सम्बद्ध परमाणु = Cl
आयन का प्रतीक = Cl

प्रश्न 2.44
56 द्रव्यमान संख्या वाले एक आयन पर धनावेश की 3 इकाई हैं और इसमें इलेक्ट्रॉन की तुलना में 30.4% न्यूट्रॉन अधिक हैं। इस आयन का प्रतीक लिखिए।
उत्तर:
माना आयन में इलेक्ट्रॉनों की संख्या = x
∴ प्रोटॉनों की संख्या = x + 3
तथा न्यूट्रॉनों की संख्या = x + \(\frac{30.4x}{100}\) = x + 0.304x
अब आयन का द्रव्यमान = प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या
= (x + 3) + (x + 0.304x)
∴ 56 = (x + 3) + (x + 0.304x)
अथवा 2.304x = 56 – 3 = 53
x = \(\frac{53}{2.304}\) = 23
आयन (या तत्व) का परमाणु क्रमांक = 23 + 3 = 26
परमाणु क्रमांक 26 वाला तत्व आयरन (Fe) है तथा सम्बन्धित आयन Fe3+ है।

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प्रश्न 2.45
निम्नलिखित विकिरणों के प्रकारों को आवृत्ति के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित कीजिए –
(क) माइक्रोवेव ओवन (oven) से विकिरण
(ख) यातायात-संकेत से त्रणमणि (amber) प्रकाश
(ग) एफ०एम० रेडियो से प्राप्त विकिरण
(घ) बाहरी दिक् से कॉस्मिक किरणें
(ङ) x – किरणें।
उत्तर:
बाहरी दिक् से कॉस्मिक किरणें

प्रश्न 2.46
नाइट्रोजन लेजर 337.1nm की तरंग – दैर्ध्य पर एक विकिरण उत्पन्न करती है। यदि उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या 5.6 × 1024 हो तो इस लेजर की क्षमता की गणना कीजिए।
उत्तर:
एक फोटॉन की ऊर्जा (E) = hυ = \(\frac{hc}{λ}\)
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प्रश्न 2.47
निऑन गैस को सामान्यतः संकेत बोर्डों में प्रयुक्त किया जाता है। यदि यह 616 nm पर प्रबलता से विकिरण उत्सर्जन करती है, तो
(क) उत्सर्जन की आवृत्ति
(ख) 30 सेकण्ड में इस विकिरण द्वारा तय की गई दूरी
(ग) क्वाण्टम की ऊर्जा तथा
(घ) उपस्थित क्वाण्टम की संख्या की गणना कीजिए। (यदि यह 2J की ऊर्जा उत्पन्न करती है।)
उत्तर:
(क) ∵ λ = 616nm = 616 × 10-9
∴ उत्सर्जन की आवृत्ति (υ) = \(\frac{c}{λ}\)
= \(\frac { 3\times 10^{ 8 }ms^{ -1 } }{ 616\times 10^{ -9 }m } \)
= 4.87 × 1014 s-1

(ख) 30 सेकण्ड में विकरण द्वारा तय की गई दूरी ।
= (3 × 108 ms-1) × 3s
= 9.0 × 10m m

(ग) क्वाण्टम की ऊर्जा (E) = hυ
= (6.626 × 24-34 J-s) × (4.87 × 1014)
= 32.27 × 10-20 J

(घ) उपस्थित क्वाण्टम संख्या = 6.2 × 1018

प्रश्न 2.48
खगोलीय प्रेक्षणों में दूरस्थ तारों में मिलने वाले संकेत बहुत कमजोर होते हैं। यदि फोटॉन संसूचक 600 nm के विकिरण से कुल 3.15 × 10-18 J प्राप्त करता है तो संसूचक द्वारा प्राप्त फोटॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर:
फोटॉनों की संख्या η = \(\frac{E}{hυ}\) = \(\frac{Eλ}{hc}\)
E = 3.15 × 10-18 J
λ = 600nm = 600 × 10-9 m = 6.0 × 10-7 m
h = 6.626 × 10-34 J-s
c = 3 × 108 ms-1
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= 10 फोटॉन

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प्रश्न 2.49
उत्तेजित अवस्थाओं में अणुओं के जीवन-काल का माप प्रायः लगभग नैनो-सेकण्ड परास वाले विकिरण स्त्रोत का उपयोग करके किया जाता है। यदि विकिरण स्त्रोत का काल 2 ns और स्पन्दित विकिरण स्त्रोत के दौरान उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या 2.5 × 1015 है तो स्त्रोत की ऊर्जा की गणना कीजिए।
उत्तर:
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प्रश्न 2.50
सबसे लम्बी द्विगुणित तरंग-दैर्ध्य जिंक अवशोषण संक्रमण 589 और 589.6 nm पर देखा जाता है। प्रत्येक संक्रमण की आवृत्ति और दो उत्तेजित अवस्थाओं के बीच ऊर्जा के अन्तर की गणना कीजिए।
उत्तर:
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प्रश्न 2.51
सीजियम परमाणु का कार्यफलन 1.9eV है, तो
(क) उत्सर्जित विकिरण की देहली तरंग-दैर्ध्य
(ख) देहली आवृत्ति की गणना कीजिए यदि सीजियम तत्त्व को 500 nm की तरंग-दैर्ध्य के साथ विकीर्णित किया जाए, तो
(ग) निकले हुए फोटोइलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा और वेग की गणना कीजिए।
उत्तर:
(क) प्रश्नानुसार,
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(ख) देहली आवृत्ति (λ0) = \(\frac { c }{ \upsilon _{ 0 } } \)
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(ग) निकले हुए फोटोन इलेक्ट्रॉन की गजित ऊर्जा (E)
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माना फोटोन इलेक्ट्रॉन का वेग υ है।
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प्रश्न 2.52
जब सोडियम धातु को विभिन्न तरंग – दैध्यों के साथ विकीर्णित किया जाता है तो निम्नलिखित परिणाम प्राप्त होते हैं –
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देहली तरंग – दैर्ध्य, प्लांक स्थिरांक की गणना कीजिए।
उत्तर:
दिया है,
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h का अन्य मान प्रथम तथा तृतीय प्रेक्षण द्वारा भी ज्ञात किया जा सकता है।
h का औसत मान
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प्रश्न 2.53
प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रयोग में सिल्वर धात से फोटो-इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन 0.35V की वोल्टता द्वारा रोका जा सकता है। जब 256.7 nm के विकिरण का उपयोग किया जाता है तो सिल्वर धातु के लिए कार्यफलन की गणना
कीजिए।
उत्तर:
λ = 256.7 nm = 256.7 × 10-9 m
गतिज ऊर्जा = 0.35ev
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प्रश्न 2.54
यदि 150 pm तरंग – दैर्ध्य का फोटॉन एक परमाणु से टकराता है और इसके अन्दर बँधा हुआ इलेक्ट्रॉन 1.5 × 107 ms-1 वेग से बाहर निकलता है तो उस ऊर्जा की गणना कीजिए जिससे यह नाभिक से बँधा हुआ है।
उत्तर:
λ = 150pm
= 150 × 10-12 m
= 1.5 × 10-10 m
υ = 1.5 × 107 ms-1
गतिज ऊर्जा = \(\frac{1}{2}\) mυ2
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प्रश्न 2.55
पाशन श्रेणी का उत्सर्जन संक्रमण कक्ष से आरम्भ होता है। कक्ष n = 3 में खत्म होता है तथा इसे υ = 3.29 × 1015 (Hz) \(\)
से दर्शाया जा सकता है। यदि संक्रमण 1285 nm पर प्रेक्षित होता है, तो n के मान की गणना कीजिए तथा स्पेक्ट्रम का क्षेत्र बताइए।
उत्तर:
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प्रश्न 2.56
उस उत्सर्जन संक्रमण के तरंग-दैर्ध्य की गणना कीजिए, जो 1.3225 nm त्रिज्या वाले कक्ष से आरम्भ और 211.6pm पर समाप्त होता है। इस संक्रमण की श्रेणी का नाम और स्पेक्ट्रम का क्षेत्र भी बताइए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
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दो कक्षाओं के बीच के ऊर्जा अन्तर को निम्न समीकरण द्वारा दिया जा सकता है –
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यह क्षेत्र बामर श्रेणी के दृश्य क्षेत्र से सम्बन्धित है।

प्रश्न 2.57
दे ब्राग्ली द्वारा प्रतिपादित द्रव्य के दोहरे व्यवहार से इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की खोज हुई, जिसे जैव अणुओं और अन्य प्रकार के पदार्थों की अति आवर्धित प्रतिबिम्ब के लिए उपयोग में लाया जाता है। इस सूक्ष्मदर्शी में यदि इलेक्ट्रॉन का वेग 1.6 × 106 ms-1 है तो इस इलेक्ट्रॉन से सम्बन्धित दे-ब्राग्ली तरंग-दैर्ध्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
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= 0.455nm
= 455 pm

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प्रश्न 2.58
इलेक्ट्रॉन विवर्तन के समान न्यूट्रॉन विवर्तन सूक्ष्मदर्शी को अणुओं की संरचना के निर्धारण में प्रयुक्त किया जाता है। यदि यहाँ 800 pm की तरंग – ली जाए तो न्यूट्रॉन से सम्बन्धित अभिलाक्षणिक वेग की गणना कीजिए।
उत्तर:
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प्रश्न 2.59
यदि बोर के प्रथम कक्ष में इलेक्ट्रॉन का वेग 2.9 × 106 ms-1 है, तो इससे सम्बन्धित द ब्रॉग्ली तरंग-दैर्ध्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
υ = 2.9 × 106 ms-1
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प्रश्न 2.60
एक प्रोटॉन, जो 1000V के विभवान्तर में गति कर रहा है, से सम्बन्धित वेग 4.37 × 105 ms-1 है। यदि 0.1kg द्रव्यमान की हॉकी की गेंद इस वेग से गतिमान है तो इससे सम्बन्धित तरंग – दैर्ध्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
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प्रश्न 2.61
यदि एक इलेक्ट्रॉन की स्थिति ± 0.002 nm की शुद्धता से मापी जाती है तो इलेट्रॉन के संवेग में अनिश्चितता की गणना कीजिए। यदि इलेक्ट्रॉन का संवेग \(\frac{h}{4πm}\) × 0.05 nm है तो क्या इस मान को निकालने में कोई कठिनाई होगी?
उत्तर:
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यहाँ p < ∆p
∴ ∆p को निकाला नहीं जा सकता।

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प्रश्न 2.62
छः इलेक्ट्रॉन की क्वांटम संख्या नीचे दी गई है। उन्हें ऊर्जा के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए। क्या इनमें से किसी की ऊर्जा समान है?
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उत्तर:
इन क्वाण्टम संख्याओं के अनुसार ऊर्जा का बढ़ता क्रम निम्नवत् है –
5 < 2 = 4 < 6 = 3 < 1

प्रश्न 2.63
ब्रोमीन परमाणु में 35 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसके 2p कक्षक में छह इलेक्ट्रॉन, 3p कक्षक में छह इलेक्ट्रॉन तथा 4p कक्षक में पाँच इलेक्ट्रॉन होते हैं। इनमें से कौन-सा इलेक्ट्रॉन न्यूनतम प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करता
है?
उत्तर:
Br (35) = 1s2, 2s2, 2p6, 3s2 3p6 3d10, 4s2 4p5
2p कक्षक में 6 इलेक्ट्रॉन हैं। 3p कक्षक में 6 इलेक्ट्रॉन तथा 4p कक्षक में 5 इलेक्ट्रॉन हैं। इनमें 4p इलेक्ट्रॉन न्यूनतम प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेंगे, चूँकि इन पर आवरणी तथा परिरक्षण प्रभाव (screening and shielding effect) का परिमाण सर्वाधिक होगा।

प्रश्न 2.64
निम्नलिखित में से कौन-सा कक्षक उच्च, प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा?

  1. 25 और 3s
  2. 4d और 4f
  3. 3d और 3p

उत्तर:
नाभिक के समीप किसी निश्चित कक्षा में इलेक्ट्रॉनों की अत्यधिक उपलब्धता होती है जिससे नाभिकीय आवेश का परिमाण भी बढ़ जाता है।

  1. 2s इलेक्ट्रॉन उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा।
  2. 4d इलेक्ट्रॉन उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा।
  3. 3p इलेक्ट्रॉन उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा।

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प्रश्न 2.65
AI तथा Si में 3p – कक्षक में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। कौन-या इलेक्ट्रॉन नाभिक से अधिक प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा?
उत्तर:
A तथा Si के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नवत् हैं –
Al (Z = 13); 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3p6
Si (Z = 14), 1s2, 2s2 2p6, 3s3 3p2
Si में उपस्थित अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अधिक प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा क्योंकि Si का परमाणु क्रमांक Al से अधिक है।

प्रश्न 2.66
इन अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए –
(क) P
(ख) Si
(ग) Cr
(घ) Fe
(ङ) Kr
उत्तर:
(क) 15P का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
= 1s2, 2s2 2p6, 3s2, 3p3
अत: P में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 3

(ख) 14Si का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
= 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3p2
अत: Si का इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2

(ग) 24Cr का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
= 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3d5, 4s1
∴ Si में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 6

(घ) 26Fe का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
= 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3p6 3d5, 4s2
Fe में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 4

(ङ) 36Kr का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
= 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3p6 3d10, 4s2 4p6
∴ Kr में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 0

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 2.67
(क) n = 4 से सम्बन्धित कितने उपकोश हैं?
(ख) उस उपकोश में कितने इलेक्ट्रॉन उपस्थित होंगे, जिसके लिए ms = \(\frac{1}{2}\) एवं n = 4 हैं?
उत्तर:
(क) n = 4 के लिए उपकोशों की संख्या
= 4s, 3d, 4p = 3

(ख) ∵ उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या
= 2 + 10 + 6 = 18
∴ ms = \(\frac{1}{2}\) एवं n = 4 के लिए इलेक्ट्रॉन संख्या = 9

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

Bihar Board Class 11 Philosophy पद और तर्कवाक्य Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कौन शब्द संयोजक (Copula) है –
(क) होगा
(ख) है
(ग) था
(घ) चाहिए
उत्तर:
(ख) है

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प्रश्न 2.
अंशव्यापी भावात्मक तर्कवाक्य का संकेत है –
(क) A
(ख) E
(ग) I
(घ) O
उत्तर:
(ग) I

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में कौन संयोजक (Couple) है?
(क) है
(ख) हु
(ग) हैं
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 4.
किसने कहा कि “व्यक्तिवाचक नाम अगुणवाचक होते हैं”?
(क) जेवन्सं
(ख) जे. एस. मिल
(ग) पी. के. राय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) जे. एस. मिल

प्रश्न 5.
वे पद जो किसी पदार्थ की वर्तमान अनुपस्थिति का बोध कराते हैं, उन्हें कहा जाता हैं –
(क) निषेधात्मक
(ख) भावात्मक
(ग) विरहात्मक
(घ) संदेहात्मक
उत्तर:
(ग) विरहात्मक

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प्रश्न 6.
किसने कहा कि ‘व्यक्तिवाचक’ नाम गुणवाचक होते हैं?
(क) मिल
(ख) जेवन्स
(ग) पी. के. राय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) जेवन्स

प्रश्न 7.
पद होता है –
(क) सिर्फ उद्देश्य
(ख) सिर्फ विधेय
(ग) उद्देश्य एवं विधेय दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) उद्देश्य एवं विधेय दोनों

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प्रश्न 8.
‘भारत के वर्तमान राष्ट्रपति’ का पद है –
(क) निश्चित
(ख) अनिश्चित
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निश्चित

प्रश्न 9.
‘जंगल’ (Forest) पद है –
(क) समूहवाचक
(ख) असमूहवाचक
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) समूहवाचक

प्रश्न 10.
भाषा में व्यक्त निर्णय को कहते हैं –
(क) पद
(ख) तर्कवाक्य
(ग) न्याय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) तर्कवाक्य

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प्रश्न 11.
तर्कवाक्य में होते हैं –
(क) उद्देश्य
(ख) विधेय
(ग) संयोजक
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ख) विधेय

प्रश्न 12.
कोई पद व्याप्त (distributed) कहा जाता है, जब –
(क) वह पूर्णवस्तुवाचकता में व्यवहृत होता है
(ख) वह पूर्ण भाववाचकता में व्यवहृत होता है
(ग) वह आंशिक वस्तुवाचकता में व्यवहृत होता है
(घ) वह आंशिक भाववाचकता में व्यवहृत होता है
उत्तर:
(क) वह पूर्णवस्तुवाचकता में व्यवहृत होता है

प्रश्न 13.
तार्किक वाक्य में ‘संयोजक’ (Copula) को होना चाहिए –
(क) भूतकाल में
(ख) वर्तमान काल में
(ग) भविष्यत काल में
(घ) तीनों कालों में
उत्तर:
(ख) वर्तमान काल में

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प्रश्न 14.
परिमाण के दृष्टिकोण से तार्किक वाक्य का वर्गीकरण किया जाता है –
(क) भावात्मक एवं निषेधात्मक में
(ख) पूर्णव्यापी एवं अंशव्यापी में
(ग) उपर्युक्त दोनों में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) पूर्णव्यापी एवं अंशव्यापी में

प्रश्न 15.
पूर्णव्यापी भावात्मक तर्कवाक्य का संकेत है –
(क) E
(ख) A
(ग) I
(घ) O
उत्तर:
(ख) A

प्रश्न 16.
पूर्ण व्यापी निषेधात्मक तर्कवाक्य का संकेत है –
(क) E
(ख) A
(ग) I
(घ) O
उत्तर:
(क) E

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प्रश्न 17.
‘मनुष्य’ पद में –
(क) सिर्फ गुणवाचकता है
(ख) सिर्फ वस्तुवाचकता है
(ग) वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता है

प्रश्न 18.
पद है –
(क) स्वतः पद अयोग्य शब्द
(ख) पदयोग्य शब्द
(ग) पद अयोग्य शब्द
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) पदयोग्य शब्द

प्रश्न 19.
विपरीतता (Contrary) का सम्बन्ध पाया जाता है –
(क) A तथा E के बीच
(ख) A तथा O के बीच
(ग) E तथा O के बीच
(घ) O तथा A के बीच
उत्तर:
(क) A तथा E के बीच

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प्रश्न 20.
गुण एवं परिणाम के आधार पर तर्कवाक्य कितने प्रकार के होते हैं?
(क) चार
(ख) तीन
(ग) दो
(घ) एक
उत्तर:
(क) चार

प्रश्न 21.
E का उपाक्षित या उपाश्रयण है –
(क) O
(ख) A
(ग) I
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) O

प्रश्न 22.
E का व्याघाती है –
(क) 1
(ख) A
(ग) 0
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) 1

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प्रश्न 23.
‘A’ का व्याघाती है –
(क) O
(ख) E
(ग) I
(घ) सभी
उत्तर:
(क) O

प्रश्न 24.
‘साक्षर एवं निरक्षर’ पदों के बीच कौन-सा विरोध सम्बन्ध है?
(क) व्याघाती
(ख) विपरीत
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) व्याघाती

प्रश्न 25.
‘पशुता’ कैसा पद है?
(क) वस्तुवाचकता
(ख) गुणवाचकता
(ग) दोनों
(घ) पद नहीं है
उत्तर:
(ख) गुणवाचकता

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प्रश्न 26.
‘मनुष्य’ कैसा पद है?
(क) वस्तुवाचकता
(ख) गुणवाचकता
(ग) दोनों (घ) पद नहीं है
उत्तर:
(क) वस्तुवाचकता

प्रश्न 27.
यदि किसी पद की गुणवाचकता बढ़ती है तब उस पद की वस्तुवाचकता –
(क) घटती है
(ख) बढ़ती है
(ग) घटती तथा बढ़ती है
(घ) न तो बढ़ती है और न घटती है
उत्तर:
(क) घटती है

Bihar Board Class 11 Philosophy पद और तर्कवाक्य Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘A’ का व्याघाती कौन है?
उत्तर:
‘A’ का व्याघाती ‘O’ है।

प्रश्न 2.
‘Each man is mortal’ का उपाश्रय क्या होगा?
उत्तर:
L.E – All men are mortal – A.

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प्रश्न 3.
‘E’ का व्याघाती कौन है?
उत्तर:
‘E’ का व्याघाती ‘I’ है।

प्रश्न 4.
अंशव्यापी भावात्मक (1) तर्कवाक्य का एक उदाहरण दें।
उत्तर:
Some teachers are honest-I.

प्रश्न 5.
‘Every student is intelligent’ का तार्किक रूपान्तर क्या होगा?
उत्तर:
L.E-All students are intelligent-A.

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प्रश्न 6.
तर्कवाक्य कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
तर्कवाक्य चार प्रकार के होते हैं। वे हैं – पूर्णव्यापीभावात्मक
(A) पूर्णव्या। निषेधात्मक
(E) अंशव्यापी भावात्मक
(I) एवं अंशव्यापी निषेधात्मक (O)।

प्रश्न 7.
तर्कवाक्य के संयोजक (Copula) किस काल में होते हैं?
उत्तर:
तर्कवाक्य के संयोजक हमेशा वर्तमानकाल में होते हैं।

प्रश्न 8.
किसी तर्कवाक्य के कितने अंग (Parts) होते हैं?
उत्तर:
किसी भी तर्कवाक्य के तीन अंग होते हैं। वे हैं उद्देश्य (Subject), विधेय (Predicate) एवं संयोजक (Copula)।

प्रश्न 9.
E का उपाश्रय कौन है?
उत्तर:
E का उपाश्रय ‘O’ है।

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प्रश्न 10.
A का विपरीत कौन-सा वाक्य होता है?
उत्तर:
A का विपरीत ‘E’ वाक्य होता है।

प्रश्न 11.
पदों की व्याप्ति (Distribution of terms) की स्मरण रीति क्या है?
उत्तर:
पदों की व्याप्ति का स्मरण हम ‘ASEBINOP’ से करते हैं।

प्रश्न 12.
किसके अनुसार तर्कवाक्य चार प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
गुण एवं परिणाम के आधार पर तर्कवाक्य चार प्रकार के होते हैं।

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प्रश्न 13.
“No men are perfect” कौन-सा तर्कवाक्य है?
उत्तर:
यह पूर्णव्यापी निषेधात्मक तर्कवाक्य (E) है।

प्रश्न 14.
पद की वस्तुवाचकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी पद के कहने से उस पद के अंतर्गत आने वाले जिन व्यक्तियों या वस्तुओं का बोध होता है, उसे ही पद की वस्तुवाचकता कहते हैं। जैसे मनुष्य पद की वस्तुवाचकता सभी मनुष्य हैं।

प्रश्न 15.
किसी पद की गुणवाचकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जिस पद के कहने से उस पद के अंतर्गत आने वाले सभी व्यक्तियों, वस्तुओं पदार्थों के सामान्य एवं सार (essential) गुणों का बोध होता है, उसे ही उस पद की गुणवाचकता कहते हैं। जैसे-‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता ‘पशुता’ एवं ‘विवेकशीलता’ है।

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प्रश्न 16.
विपरीत पद (Contrary terms) क्या है?
उत्तर:
अगर दो पदों के बीच ऐसा सम्बन्ध हो कि एक पद के सत्य होने पर दूसरा अनिवार्य रूप से असत्य हों, लेकिन एक के असत्य होने पर दूसरे पर असत्य होना आवश्यक नहीं हो तो वे पद विपरीत (Contrary terms) कहलाते हैं। जैसे – ‘लाल’ और ‘काला’।

प्रश्न 17.
पद (Term) की परिभाषा दें।
उत्तर:
वे शब्द या शब्द-समूह जो स्वयं किसी तर्कवाक्य का उद्देश्य या विधेय हो सकते हैं या होते हैं, पद कहलाते हैं। जैसे – Ram is an intelligent. इस वाक्य में ‘Ram उद्देश्य तथा ‘intelligent’ विधेय है जिन्हें पद के रूप में जाना जाएगा।

प्रश्न 18.
पद को अंग्रेजी में term कहते हैं Term शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई है?
उत्तर:
“Term” शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के terminus शब्द से हुई है जिसका अर्थ है-छोर या किनारा।

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प्रश्न 19.
‘साक्षर’ और ‘निरक्षर’ पदों के बीच कौन-सा विरोध सम्बन्ध है?
उत्तर:
‘साक्षर’ और ‘निरक्षर’ पदों के बीच व्याघाती (Contradictory) विरोध का सम्बन्ध है।

प्रश्न 20.
तर्कवाक्य (Proposition) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब हम भाषा के माध्यम से किसी निर्णय को अभिव्यक्त करते हैं तो वह तर्कवाक्य कहलाता है। जैसे-All men are mortal-A-एक तर्कवाक्य है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
विरोध-सम्बन्ध याद करने का क्या तरीका है?
उत्तर:
विरोध का सम्बन्ध याद रखने के लिए सबसे पहले वर्ग के विभिन्न अंगों का नाम रख दिया जाता है। नामकरण करने के पहले इन अंगों पर विचार किया जाता है। हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि शरीर का मस्तक ऊपर होता है, पैर नीचे रहता है तथा हाथ बगल में और पेट बीच में रहता है। इसी प्रकार वर्ग का भी नामकरण कर देना चाहिए।

वर्ग के मस्तक का नाम ‘विपरीत’ रखा जाता है तथा नीचे वाली पंक्ति का नाम ‘अनुविपरित’। दोनों बगल की पंक्तियों का नाम ‘उपाश्रित’ तथा बीच अथवा पेट में एक कोने से दूसरे कोने तक का नाम ‘व्याघातक’ रखा जाता है। इसे याद रखने के लिए इस कहावत को नहीं भूलना चाहिए – ‘मनुष्य के पेट में छल-कपट रहता है।’ छल-कपट व्याघातक का प्रतीक होता है। इस प्रकार हम चारों प्रकार के विरोध सम्बन्ध को अच्छी तरह याद रख सकते हैं।

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प्रश्न 2.
तर्क वाक्यों में पदों की व्याप्ति के स्मरण की क्या रीति है?
उत्तर:
पदों की व्याप्ति के स्मरण के लिए अंग्रेजी शब्द ‘ASEBINOP’ को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। इस शब्द में चार जोड़े अक्षर हैं जिसमें प्रत्येक जोड़े का पहला अक्षर तर्कवाक्य का निर्देश करता है और दूसरा अक्षर यह बतलाता है कि इस निर्दिष्ट तर्कवाक्य में कौन-सा पद व्याप्त है। S का अर्थ है Subject, B का अर्थ है ‘Both’, N का अर्थ है ‘Nothing’ तथा P का अर्थ है Predicate होता है। AS + EB + IN + OP में AS का अर्थ हुआ-A तर्कवाक्य में उद्देश्य पद व्याप्त है, EB का अर्थ है – E तर्कवाक्य में both अर्थात् दोनों पद (Subject.and Predicate) व्याप्त होते हैं। इसी तरह IN का अर्थ हुआ कि I पद में Nothing अर्थात् कोई भी पद व्याप्त नहीं है तथा OP का तात्पर्य है – O वाक्य में Predicate (विधेय) पद व्याप्त है।

प्रश्न 3.
A, E, I तथा O वाक्यों का उदाहरण दें।
उत्तर:
‘प्रत्येक छात्र इस काम को कर सकता है’ – A वाक्य का उदाहरण है। इसका तार्किक रूपान्तर होगः-सभी छात्र ऐसे हैं जो इस काम को कर सकते हैं। इसमें इसका उद्देश्य पद छात्र व्याप्त है। बहुत कम मनुष्य चतुर हैं यह I वाक्य का उदाहरण है जिसका तार्किक रूपान्तरण होगा-‘कुछ मनुष्य चतुर है।’ E वाक्य का उदाहरण होगा-‘एक भी आदमी पूर्ण नहीं है’ इसका तार्किक रूपान्तरण होगा-कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं है। “सभी मनुष्य पूर्ण नहीं है यह O वाक्य का उदाहरण है – इसका तार्किक रूपान्तरण होगा ‘कुछ मनुष्य पूर्ण नहीं है। E वाक्य में उद्देश्य और विधेय दोनों पद व्याप्त हैं तथा O वाक्य में विधेय पद व्याप्त है। I वाक्य में कोई भी पद व्याप्त नहीं है।

प्रश्न 4.
क्या ‘उपाश्रित’ तर्कवाक्यों का विरोध है?
उत्तर:
समान उद्देश्य और विधेय वाले वाक्य चाहे गुण में भिन्न हों अथवा परिणाम में, उन दोनों वाक्यों के बीच विरोध सम्बन्ध अवश्य होता है। इस अर्थ में ‘उपाश्रित’ को भी तर्कवाक्यों के विरोध का एक रूप कहा जा सकता है। क्योंकि इसके दो वाक्यों में एक सामान्य वाक्य रहता है तथा दूसरा विशेष वाक्य होता है।

कुछ तार्किकों का मानना है कि चूँकि उपाश्रित में दोनों वाक्य एक ही गुण के होते हैं, इसलिए उन वाक्यों में विरोध-सम्बन्ध नहीं हो सकता। उपाश्रित के दोनों वाक्य सत्य भी होते हैं। विरोध का यदि व्यापक अर्थ लिया जाए और किसी भी प्रकार के विरोध को विरोध माना जाए तो उपाश्रित भी विरोध का एक प्रकार होगा। यदि विरोध के लिए गुणों में अन्तर रहना आवश्यक है तो उपाश्रित को विरोध का प्रकार नहीं माना जाएगा।

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प्रश्न 5.
“विरोध का वर्ग” क्या है?
उत्तर:
तर्कवाक्यों के विरोध-सम्बन्ध के विभिन्न प्रकारों का स्मरण रखने के लिए एक वर्ग का सहारा लिया जाता है, जिसे वर्ग का विरोध कहा जाता है। इस वर्ग के सहारे चारों प्रकार के विरोध सम्बन्ध को व्यक्त किया जा सकता है। विरोध का वर्ग बनाने के लिए ‘A’, ‘E’, ‘I’, ‘O’, ‘U’ अक्षरों का सहारा लिया जाता है।

इन अक्षरों को सही स्थान पर रखने के लिए एक फार्मूले को याद रखना पड़ता है जो इस प्रकार है – ‘बेश-कमी’ तथा ‘हाँ – नहीं’ I विरोध के वर्ग के ऊपर के हिस्से में ‘बेशी वाक्य’ अर्थात् ‘A’ तथा ‘E’ वाक्य रखा जाता है। ये दोनों तर्कवाक्य ‘All’ को सूचित करेंगे। कम वाला वाक्य अर्थात् विशेष वाक्य नीचे लिखा जाएगा। विरोध के वर्ग के नियम की शुद्धता के लिए यह याद रखना पड़ता है कि पहले ‘हाँ’ होता है और उसके बाद ‘नहीं’ होता है। इसका अर्थ हुआ कि विरोध के वर्ग में पहले ‘हाँ’ यानी स्वीकारात्मक वाक्य लिखा जाता है और तब ‘नहीं’ अर्थात् निषेधात्मक वाक्य लिखा जाता है।

प्रश्न 6.
पदसंयोज्य शब्द क्या है?
उत्तर:
पद संयोज्य शब्द वे होते हैं जो स्वतंत्र रूप से किसी तार्किक वाक्य का उद्देश्य या विधेय नहीं बन सकते बल्कि ऐसा होने के लिए वे पदयोग्य शब्दों की सहायता लेते हैं। इस.प्रकार यह कहा जा सकता है कि जब कोई पदयोग्य शब्द पदसंयोज्य से मिल जाता है तभी पदसंयोज्य किसी वाक्य का उद्देश्य और विधेय हो सकता है और तभी वह पद कहला सकता है, जैसे-का, के, पर आदि को जब अन्य पदयोग्य शब्द के साथ मिला देते हैं तब ये वाक्य में उद्देश्य या विधेय के स्थान पर व्यवहृत हो जाते हैं। जैसे-राम का घोड़ा दौड़ रहा है-इस वाक्य में ‘राम का घोड़ा’ उद्देश्य है। यहाँ ‘का’ का प्रयोग ‘राम’ और ‘घोड़ा’ के साथ हुआ है जो पदयोग्य शब्द हैं, अतः ‘का’ उद्देश्य के स्थान में प्रयुक्त है। इसलिए ‘का’ पदसंयोज्य शब्द (Syn-categorematic word) है।

प्रश्न 7.
क्या व्यक्तिवाचक पद गुणवाचक होते हैं?
उत्तर:
व्यक्तिवाचक नाम को व्यक्तिवाचक पद कहते हैं। मिल ने व्यक्ति वाचक पद को गुणवाचक नहीं माना है जबकि जेवन्स ने इसे गुणवाचक माना है। वेल्टन के अनुसार व्यक्तिवाचक पद अगुणवाचक होते हैं। ‘मिल’ ने व्यक्तिवाचक पद को निरर्थक चिह्न मात्र माना है। उनके अनुसार ‘नाम’ से केवल किसी व्यक्तिविशेष को समाज-समूह से अलग किया जा सकता है।

‘मिल’ के अनुसार व्यक्तिवाचक गुणवाचक नहीं होते, क्योंकि एक गरीब पिता भी अपने पुत्र का नाम ‘धनपत’ रखता है, एक अंधी लड़की का नाम ‘मृगनयनी’ हो सकता है लेकिन ‘जेवन्स’ का विचार है कि व्यक्तिवाचक पद या नाम गुणवाचक होते हैं। जैसे-यदि हम मोहन कहते हैं तो इससे एक व्यक्ति का बोध होता है अर्थात् व्यक्तिवाचक पद से वस्तु का मोटा-मोटी परिचय प्राप्त हो जाता है। परन्तु वेल्टन (Welton) का कहना है कि चूँकि व्यक्तिवाचक पद या नाम से किसी भी अन्तर्निहित गुण का बोध नहीं होता इसलिए ये गुणवाचक नहीं होते।

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प्रश्न 8.
भाषा में व्यक्त निर्णय से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
निर्णय जब भाषा में व्यक्त होता है तो उसे तार्किक-वाक्य कहा जाता है। उदाहरण के लिए गुलाब और लाल अलग-अलग प्रत्यय हैं और जब हम इसे एक साथ कर देते हैं तो निर्णय बनता है “गुलाब लाल है।” तार्किक वाक्य के लिए निर्णय का होना आवश्यक है। किसी के बारे में कुछ कहना ही निर्णय है।

जैसे जब हम कहते हैं कि “मोहन बुद्धिमान है” तब इस तर्क वाक्य में मोहन के बारे में बुद्धिमान होना कहा गया हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि मानसिक क्षेत्र में दो प्रत्ययों के बीच सम्बन्ध स्थापित होता है तो निर्णय भावात्मक होता है और यदि उनके बीच अभावात्मक सम्बन्ध स्थापित होता है तो अभावात्मक निर्णय होता है। ‘गुलाब लाल है’ तथा ‘गुलाब उजला नहीं है’ क्रमशः भावात्मक और अभावात्मक निर्णय है जो भाषा में व्यक्त हैं।

प्रश्न 9.
‘पदों के विरोध से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
दो पदों के बीच में विरोध तब होता है जब दोनों एक साथ सत्य नहीं होते। जैसे-उजला-काला, जीवित और मृत कोई भी वस्तु एक ही साथ उजली और काली नहीं हो सकती, कोई भी व्यक्ति एक ही साथ जीवित और मृत नहीं हो सकता। पदों के बीच में दो प्रकार के विरोध हो सकते हैं-विपरीत विरोध तथा व्याघातक विरोध। विपरीत विरोध में एक सत्य होगा तो दूसरा असत्य होगा, एक की असत्यता दूसरे को संदेहात्मक बना देती है तथा दोनों के बीच सम्भावना रहती है। कोई वस्तु उजली है तो वह काली नहीं हो सकती। हरी-पीली-कोई वस्तु हरी या पीली एक साथ नहीं है।

धनी-गरीब, कोई व्यक्ति न धनी है और न गरीब ही तब दोनों के बीच तीसरी सम्भावना हो सकती है कि वह मध्यम वर्ग का व्यक्ति है। व्याघातक विरोध में एक ही सत्य दूसरे की असत्यता बताती है, एक की असत्यता दूसरे की सत्यता बताती है, दोनों पद एक साथ न तो सत्य हो सकते हैं, और न असत्य हो सकते हैं तथा दोनों पदों के बीच कोई तीसरा विकल्प नहीं आ सकता। जीवन और मृत्यु पद में यदि पहला सत्य होगा तो दूसरा अवश्य ही असत्य होगा और यदि दूसरा सत्य होगा तो पहला असत्य होगा तथा इन दोनों के बीच कोई तीसरा विकल्प नहीं रहेगा। जीवन और मृत्यु के बीच कोई तीसरी सम्भावना नहीं रहती।

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प्रश्न 10.
साक्षात् वैषम्य सम्बन्ध तथा विषम अनुपात सम्बन्ध में क्या अंतर है?
उत्तर:
दो वस्तुओं में साक्षात् वैषम्य सम्बन्ध तब होता है जब एक में घटती होने से दूसरे भी घटती होती है अथवा एक की बढ़ती होने से दूसरे में भी बढ़ती होती है। जैसे-जब गर्मी घटती है तब थर्मामीटर का पारा घटता है और जब गर्मी बढ़ती है तब इसका पारा बढ़ता है। इस प्रकार ‘गर्मी’ और ‘पारे’ में साक्षात् वैषम्य सम्बन्ध है। परन्तु विषम अनुपात सम्बन्ध में दो वस्तुओं या परिणामों का घटना या बढ़ना विपरीत रीति से होता है। विषम अनुपात सम्बन्ध में जब एक वस्तु बढ़ती है तो दूसरी घटती है और फिर जब एक वस्तु घटती है तो दूसरी वस्तु बढ़ती है।

जैसे-बाजार में किसी वस्तु की कमी हो जाती है तो उसके मूल्य में वृद्धि हो जाती है। लेकिन दही वस्तु जब अधिक मात्रा में प्राप्त होने लगती है तो उसके मूल्य में गिरावट आ जाती है। वस्तुवाचकता और गुणवाचकता में विषम अनुपात का सम्बन्ध होता है, क्योंकि जब वस्तुवाचकता बढ़ती है तो गुणवाचकता घटती है अथवा गुणवाचकता बढ़ती है तो वस्तुवाचकता घटती है। जब वस्तुवाचकता घटती है तब गुणवाचकता बढ़ती है अथवा गुणवाचकता में कमी होती है तो वस्तुवाचकता में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 11.
संयोजक उद्देश्य और विधेय के वर्तमान सम्बन्ध को व्यक्त करता है – कैसे?
उत्तर:
संयोजक के काल के सम्बन्ध में कहा गया है यह भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीनों कालों में होना चाहिए, लेकिन यह मत प्रांतिपूर्ण है। वस्तुतः संयोजक उद्देश्य और विधेय के बीच का सम्बन्ध होता है। इसी वर्तमान सम्बन्ध को सत्य या असत्य साबित किया जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान सम्बन्ध व्यक्त करने के लिए वर्तमान काल ही एकमात्र उपयुक्तकाल (tense) है। चूंकि संयोजक उद्देश्य और विधेय के केवल वर्तमान सम्बन्ध को ही व्यक्त करता है, इसलिए इसे वर्तमान काल में ही होना चाहिए।

उदाहरण के लिए ‘राम दशरथ का लड़का था’ वाक्य का तार्किक रूप होगा-राम एक व्यक्ति हैं जो दशरथ का लड़का था। इसमें वाक्य का अर्थ अक्षुण्ण रहता है और संयोजक भी वर्तमान काल में हो जाता है। तार्किक वाक्यों में उद्देश्य और विधेय का सम्बन्ध यदि भूतकाल और भविष्यत्काल से भी हो तो उन्हें वर्तमान अर्थात् राम धनी भीराम धनी और विटा का है कि ‘राम और में व्यक्त किया जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि संयोजक उद्देश्य और विधेय के केवल वर्तमान सम्बन्ध को व्यक्त करता है।

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प्रश्न 12.
मिश्रित तर्कवाक्य क्या है?
उत्तर:
जिस तर्क वाक्य में उद्देश्य और विधेय की परिधि में दो निर्णयों को व्यक्त किया जाता है उसे मिश्रित तर्कवाक्य कहा जाता है। जैसे-‘राम धनी और विद्वान है। इस तर्कवाक्य में एक से अधिक निर्णय हैं-अर्थात् राम धनी भी है और विद्वान भी। इसी प्रकार हम यह कह सकते हैं कि ‘राम और श्याम विद्वान है।’ तो इस तार्किक वाक्य में भी दो निर्णय हैं – ये निर्णय हैं-‘राम विद्वान है’ तथा ‘श्याम विद्वान है।’ वाक्य का संयोजक भावात्मक तथा अभावात्मक दोनों ही होता है। उसी प्रकार मिश्रित वाक्य की भावात्मक तथा अभावात्मक दोनों होते हैं। जैसे – ‘राम और श्याम धनी हैं’ भावात्मक मिश्रित वाक्य है तथा ‘श्याम न तो परिश्रमी है और न धनी है’ अभावात्मक या निषेधात्मक मिश्रित तर्क वाक्य है।

प्रश्न 13.
वास्तविक तर्कवाक्य क्या है?
उत्तर:
जब किसी तर्क वाक्य के विधेय में ऐसे ज्ञान की वृद्धि हो जाती है जो विधेय में निहित नहीं होता तो ऐसे वाक्य को वास्तविक तर्क वाक्य कहते हैं। जैसे-‘मनुष्य सभ्यता का पुजारी है।’ इस तार्किक वाक्य में ‘सभ्यता का पुजारी’ विधेय है। यह एक ऐसा गुण है जो मनुष्य पद में निहित है। मनुष्य पद का तार्किक विश्लेषण है – विवेकशीलता तथा पशुता।

लेकिन उपर्युक्त तार्किक वाक्य में निहित गुणों के अतिरिक्त एक नये गुण की वृद्धि हुई है। अर्थात् उद्देश्य में अन्तर्भूत गुणों के साथ विधेय में व्यक्त किया हुआ गुण जुड़ गया है। ‘हिमालय एक पर्वत है’ तार्किक वाक्य में ‘हिमालय’ उद्देश्य है जो व्यक्तिवाचक नाम है जिससे किसी गुण का बोध नहीं होता, परन्तु इस वाक्य के विधेय से एक नये गुण का पता चलता है। इसलिए यह तर्कवाक्य वास्तविक तर्कवाक्य है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तार्किक वाक्य और व्याकरण वाक्य में क्या सम्बन्ध है? तर्क वाक्य का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
तर्कवाक्य और व्याकरण वाक्य में निम्नलिखित सम्बन्ध हैं –

1. व्याकरण वाक्यों का क्षेत्र तार्किक वाक्यों के क्षेत्र से वृहत् हैं जैसे – राम सुन्दर है। यह तार्किक वाक्य है, किन्तु साथ ही साथ व्याकरण का वाक्य भी है। लेकिन व्याकरण के प्रश्न सूचक, इच्छा सूचक, आज्ञासूचक एवं विस्मय सूचक इत्यादि वाक्य तार्किक वाक्य नहीं है। जैसे क्या राम सुन्दर है?

2. व्याकरण वाक्य के केवल दो अंग हैं –

  • उद्देश्य और
  • विधेय। परन्तु तर्क वाक्य के तीन अंग होते हैं-उद्देश्य, विधेय एवं संयोजक। जबकि संयोजक को व्याकरण के वाक्य में विधेय का ही अंग माना जाता है, जैसे-“Ram is poor”.

3. व्याकरण का वाक्य भूत, वर्तमान तथा भविष्यत् तीनों कालों में होता है। परन्तु, तर्क, वाक्य केवल वर्तमान काल में होता है।

4. तार्किक वाक्य के सम्बन्ध में सत्य-असत्य का प्रश्न उठता है। जबकि व्याकरण के वाक्य के संबंध में शुद्धि एवं अशुद्धि का प्रश्न उठता है।

5. तार्किक वाक्य केवल निर्णय को व्यक्त करता है परन्तु व्याकरण के वाक्य निर्णय के अलावा हमारी अनुभूतियों को भी व्यक्त करते हैं। जैसे-इच्छा, हर्ष, विषाद, विस्मय, आज्ञा, प्रार्थना आदि।

6. तार्किक वाक्य का परिमाण एवं गुण जानना जरूरी है, परन्तु व्याकरण संबंधी वाक्यों के लिए जरूरी नहीं है।

7. तार्किक वाक्य का रूप सर्वदा स्पष्ट, संक्षिप्त एवं एकार्थक होता है। परन्तु व्याकरण के वाक्य अस्पष्ट, जटिल, विस्तृत एवं अनेकार्थक तथा आलंकारिक होते हैं। व्याकरण संबंधी वाक्यों की शोभा, अलंकार, अनुप्रस्थ, लक्षणा, व्यंजना आदि से बढ़ जाती है किन्तु तार्किक वाक्यों में इनका कोई स्थान नहीं है।

8. तार्किक वाक्य में अभावात्मक चिह को संयोजक का अंग माना जाता है। किन्तु व्याकरण के वाक्य में इन अभावात्मक चिह्नों को विधेय का ही अंग माना जाता है। अंतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि “All grammatical sentences are not logical proposition but all logical propositions are grammatical sentences.” अर्थात् व्याकरण के सभी वाक्य तर्क वाक्य नहीं है परन्तु सभी तार्किक वाक्यों को व्याकरण वाक्य कहते हैं।

तर्क वाक्य का वर्गीकरण (Classification of Proposition):
वर्गीकरण के सामान्य, नियमों को ध्यान में रखते हुए तार्किक वाक्यों का वर्गीकरण निम्नलिखित दृष्टिकोण से किया गया है।

1. बनावट की दृष्टि से (According to construction) तर्क वाक्य दो तरह के हैं।
(क) सरल (Simple)
(ख) मिश्रित (Compound)

2. गुण (Quality) के अनुसार तर्क वाक्य दो हैं –
(क) स्वीकारात्मक (Affirmative)
(ख) निषेधात्मक (Negative)

3. परिमाण (Quantity) के अनुसार – तार्किक वाक्य दो तरह के हैं –
(क) सामान्य (universal)
(ख) विशेष (Particular)

4. विधि (Modality) के अनुसार – तर्क वाक्य के तीन भेद हैं –
(क) आवश्यक (Necessary)
(ख) साधारण (Assertory)
(ग) संदेहात्मक (Problematic)

5. अर्थ के अनुसार (Significance) तर्क वाक्य दो तरह के हैं –
(क) शाब्दिक (Verbal)
(ख) वास्तविक (Real)

6. संबंध (Relation) के अनुसार तर्क वाक्य दो तरह के हैं –
(क) निरपेक्ष (Categorical)
(ख) सापेक्ष (Conditional)

1. According to Construction:
बनावट की दृष्टि से तर्क वाक्य दो हैं –

(क) सरल तर्क वाक्य:
तर्क वाक्य में दो ही पद होते हैं। (उद्देश्य और विधेय) जब एक निर्णय को एक ही उद्देश्य तथा एक ही विधेय की परिधि में व्यक्त किया जाता है तब वह सरल तर्क वाक्य कहलाता हैं जैसे कुछ आम मीठे हैं। (Some mangoes are sweet) इसमें एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय पद है कुछ आम-मीठे हैं।

(ख) मिश्रित तर्क वाक्य:
इसमें उद्देश्य और विधेय की परिधि में दो निर्णयों को व्यक्त किया जाता है। जैसे-“राम धनी और विद्वान है।” “राम और मोहन विद्वान हैं।” इन वाक्यों में एक से अधिक निर्णय हैं। अतः यह मिश्रित वाक्य हैं। इसी तरह “हरि न पढ़ता है और न लिखता है।” (Hari neither reads nor writes)

2. गुण (Quality) के अनुसार:
भावात्मक तथा निषेधात्मक (Affirmative and nega tive):
दो प्रकार के तर्क वाक्य हैं –

(क) भावात्मक तर्क वाक्य उसे कहते हैं जिसमें विधेय पद उद्देश्य को स्वीकार करता है। जैसे ‘सभी विद्यार्थी तेज हैं’, ‘कुछ छात्र सज्जन हैं।’ यहाँ सभी विद्यार्थी तथा कुछ छात्र के बारे में तेज और सज्जनता का समर्थन किया गया है।
(ख) निषेधात्मक तर्कवाक्य-इसमें विधेय उद्देश्य को अस्वीकार करता है। जैसे सभी भारतीय धनी नहीं है। कुछ छात्र गरीब नहीं है। यहाँ दोनों विधेय उद्देश्य को अस्वीकार करते हैं। इस तरह के वाक्य में विधेय का निषेध करता है, जैसे-Some Indians are not poor.

3. परिमाण (Quantity) के अनुसार –
(क) सामान्य या पूर्णव्यापी (Universal)
(ख) विशेष या अंशव्यापी (Particular)

इस तरह के वाक्यों के परिमाण व्यक्त करने हेतु तर्कशास्त्र में ‘सब’ तथा ‘कुछ’ शब्दों का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में all तथा some.

(क) पूर्णव्यापी तर्कवाक्य:
यह वह तर्क वाक्य है जिसमें विधेय उद्देश्य की सम्पूर्ण वस्तुवाचकता स्वीकार या अस्वीकार (affirm or deny) करता है। जैसे-सभी मनुष्य धनी हैं, कोई भी नेता ‘मनुष्य सही’ नहीं है। (All men are rich. No men are perfect) इन वाक्यों में मनुष्य पद पूर्ण वस्तुवाचकता में व्यवहत हुआ है।

(ख) विशेष या अंशव्यापी तर्क वाक्य (Particular proposition):
इसके विधेय उद्देश्य की वस्तुवाचकता के एक ही अंश को स्वीकार या अस्वीकार करता है। जैसे-कुछ आदमी तेज हैं तथा कुछ आदमी विद्वान नहीं है। (Some men are intelligent and some men are not scholar) इसमें विधेय उद्देश्य की कुछ ही वस्तुवाचकता के बारे में विधान या निषेध (affirm or deny) करता है। इसलिए दोनों वाक्य अंशव्यापी कहे जाते हैं।

4. विधि (Modality) के अनुसार तर्क वाक्य तीन तरह के हैं –
(क) अनिवार्य या आवश्यक (Necessary) तर्कवाक्य:
यह वह तर्क वाक्य है जिसमें उद्देश्य और विधेयं का संबंध उनके स्वभाव में ही निहित रहता है। यह संबंध अनिवार्य तथा सामान्य होता है और सर्वदा के लिए सत्य होता है। जैसे-दो और दो मिलकर चार होते हैं।

(Two plus two must be four):
यहाँ उद्देश्य और विधेय का संबंध अनिवार्य है।

(ख) साधारण (assertory) तर्कवाक्य:
यह वह वाक्य है जिसमें उद्देश्य और विधेय का संबंध हमारी अनुभूति पर आधारित हो। जैसे सभी हंस उजले होते हैं। गुलाब लाल होता है। ये सभी वाक्य साधारण हैं।

(ग) संदेहात्मक तर्कवाक्य (Problematic proposition):
यह वह तर्क वाक्य है जिसमें उद्देश्य और विधेय का संबंध संदेहात्मक अर्थात् यह संबंध कभी सत्य और कभी असत्य भी हो सकता है। जैसे – राम शायद पटना आएगा। वह आ सकता है। वर्षा हो सकती है। (Ram may go to Patna. He may come. It may rain)

5. अर्थ (Significance) के अनुसार तर्क वाक्य के दो भेद हैं।

(क) शाब्दिक (Verbal) तर्कवाक्य:
शाब्दिक तर्क वाक्य उसे कहते हैं जिसमें विधेय उद्देश्य की पूर्ण गुणवाचकता या गुणवाचकता के एक अंश का वर्णन करता है। जैसे सभी मनुष्य विवेकशील पशु हैं। शाब्दिक तर्क वाक्य का विधेय उद्देश्य के संबंध में या तो जाति (genus) होता है या विभेदक (differentia) होता है। जैसे – ‘सभी मनुष्य जीव हैं’ तथा ‘सभी मनुष्य विवेकशील हैं। ये दोनों वाक्य शाब्दिक तर्क वाक्य हैं। इनमें ‘जीव’ genus हैं तथा ‘विवेकशील’ विभेदक (differentia) है।

(ख) वास्तविक वाक्य (Real proposition):
इसमें विधेय से एक ऐसे ज्ञान की वृद्धि होती है जो उद्देश्य में निहित होता है। जैसे – ‘मनुष्य सभ्यता का पुजारी है’। इनमें विधेय उद्देश्य के संबंध में या तो आकस्मिक गुण (accident) या सहज गुण (property) होता है। जैसे मनुष्य. गीत गाने वाला पशु है। यहाँ विधेय उद्देश्य के संबंध में आकस्मिक गुण के वर्ग में रहता है।

6. सम्बन्ध (Relation) के अनुसार तर्क वाक्य दो तरह के हैं –

(क) निरपेक्ष (Categorical proposition):
जब संबंध किसी शर्त पर निर्भर नहीं करता है तब उस वाक्य को निरपेक्ष कहते हैं। जैसे-‘राम धनी है, सभी कौए काले होते हैं। इन दोनों में भावात्मक संबंध स्थापित किया गया है। यहाँ उद्देश्य और विधेय का संबंध निरपेक्ष है। अर्थात् किसी पर आश्रित नहीं है।

(ख) सापेक्ष तर्क वाक्य (Conditional proposition):
सापेक्ष तर्क वह वाक्य है जिसके उद्देश्य और विधेय पदों का संबंध किसी शर्त पर निर्भर करता है। जैसे यदि तुम आओगे, तो मैं जाऊँगा, राम या तो विद्वान है या धनी। (If you come, I shall go; Ram is either scholar or rich) यहाँ शर्त छिपी हुई है। ये दोनों वाक्य सापेक्ष हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 2.
हेत्वाश्रित और वैकल्पिक तर्कवाक्य क्या है? इनमें क्या अन्तर है?
उत्तर:
हेत्वाश्रित तर्क वाक्य का स्वरूप-सापेक्ष तर्क वाक्य (Conditional proposition) की शर्त्त जब स्पष्ट रूप से व्यक्त कर दी जाती है तब उसे हेत्वाश्रित तर्क वाक्य कहते हैं। इसमें यदि, अगर, शब्द शुरू में रहते हैं और अंग्रेजी में वाक्य, If, had, when, should’ वगैरह से प्रारम्भ होते हैं। जैसे यदि राम आएगा तो मैं पढूँगा, यदि सूरज है तो प्रकाश है। इस तरह If there is sun, there is light. When the cat is away the rats play about. का अर्थ है-If the cat is away the rats play about इसी तरह –

1. Should I go there, I shall tell him everything. इसका भी अर्थ “If’ है।

2. इस तरह हेत्वाश्रित तर्कवाक्य (Hypothetical proposition) के दो अंग होते हैं। एक वह जिसमें शर्त होती है और दूसरा वह जिसमें फल होता है। शर्त के ऊपर कुछ फल आधारित रहता है। यहाँ शर्त भाग को पूर्ववर्ती (Antecedent) कहते हैं और फल वाले भाग को अनुवर्ती (Consequent) कहते हैं। जैसे –

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

इसमें If you come शर्त है। इसलिए वाक्य में इस भाग को पूर्ववर्ती कहते हैं। इसी शर्त पर आधारित फल I shall go है इसलिए वाक्य के इस भाग को अनुवर्ती (Consequent) कहते हैं।

3. हेत्वाश्रित वाक्य में शर्त और फल स्पष्ट रूप से व्यक्त रहता है। कौन शर्त है और कौन फल है इसका पता तुरंत चल जाता है। जैसे – If the college is closed, shall go home? इसमें स्पष्ट ही है कि कॉलेज का बन्द होना शर्त है जिसपर आधारित है मेरा घर जाना। ‘मैं घर जाऊँगा’ अनुवर्ती का फल है। इसमें पहले शर्त और बाद में फल रहता है। अतः पहले antecedent तब consequent होता है।

4. हेत्वाश्रित तर्कवाक्य को अर्थ के अनुसार निरपेक्ष तर्क वाक्य में और निरपेक्ष तर्क वाक्य को हेत्वाश्रित तर्कवाक्य में बदला जा सकता है। इसमें रूप का परिवर्तन होता है अर्थ का नहीं। जैसे – सूरज है तो प्रकाश है (If there is sun, there is light) का निरपेक्ष रूप में रूपान्तरण होगा-सूरज होने की सभी अवस्थाएँ प्रकाश होने की सभी अवस्थाएँ हैं।

“All the cases of sun are the cases of light.” इस तरह “यदि सूरज है तो प्रकाश है या सूरज होने की सभी अवस्थाएँ प्रकाश होने की अवस्थाएँ हैं, बात एक ही है। इस तरह सभी धर्मात्माओं का आदर होता है।” “All pious persons are respected” को हेत्वाश्रित रूप में वदल सकते हैं। जैसे- यदि कोई धर्मात्मा है तो उसका आदर होता है।” (If a man is pious, he is respected)

(i) हेत्वाश्रित तर्कवाक्य के गुण का निर्धारण (Determination of quality of hypothetical proposition):
हेत्वाश्रित वाक्य भावात्मक है या निरोधात्मक इस पर तार्किकों के बीच मतभेद है।

कुछ तार्किकों का विचार है कि हेत्वाश्रित वाक्य हमेशा स्वीकारात्मक होते हैं। इसके संबंध में इनका तर्क है कि ऐसे वाक्यों के अनुवर्ती हमेशा पूर्ववर्ती पर निर्भर करते हैं। इसलिए अनुवर्ती के साथ पूर्ववर्ती का भावात्मक संबंध ही रहता है। यदि अनुवर्ती पूर्ववर्ती पर निर्भर नहीं करे तो वह हेत्वाश्रित वाक्य नहीं होगा। अतः हरेक हेत्वाश्रित तर्क वाक्य भावात्मक (affirmative) वाक्य होते हैं, निषेधात्मक नहीं।

आलोचना:
हेत्वाश्रित वाक्य हमेशा भावात्मक होता है निषेधात्मक नहीं ऐसा कहना गलत है। हेत्वाश्रित वाक्य के दो अंग हैं-पूर्ववर्ती और अनुवर्ती (antecedent and consequent)। इन दोनों में प्रमुख अंग अनुवर्ती ही है और जो जहाँ प्रमुख है उसी के अनुसार सभी कार्यवाही होती है। हम जो कुछ भावात्मक या निषेधात्मक कहना चाहते हैं उसकी अभिव्यक्ति अनुवर्ती में ही होती है। अतः हेत्वाश्रित वाक्य भावात्मक और निषेधात्मक दोनों हो सकते हैं। क्योंकि हेत्वाश्रित वाक्य के गुण का निर्धारण अनुवर्ती को देखकर ही होना चाहिए। जैसे-यदि वह आता है, तो मैं नहीं पढूंगा-निषेधात्मक अनुवर्ती यदि वह आता है, तो मैं पढूँगा-भावात्मक अनुवर्ती।

If he comes I shall not go – Negative consequent.
If he comes, I shall go – Affirmative consequent

इसमें पहला निषेधात्मक वाक्य है क्योंकि इसका अनुवर्ती निषेधात्मक है किन्तु दूसरा वाक्य भावात्मक है क्योंकि दूसरा अनुवर्ती भावात्मक है। इसी तरह पूर्ववर्ती के निषेधात्मक रहने पर भी हेत्वाश्रित वाक्य भावात्मक होता है यदि इसका अनुवर्ती भावात्मक हो तो। जैसे-If you do not come, I shall go यहाँ अनुवर्ती भावात्मक है। अतः हम निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हेत्वाश्रित तर्कवाक्य का गुण अनुवर्ती पर निर्भर करता है पूर्ववर्ती पर नहीं। ‘पूर्ववर्ती’ में तो शर्त रहती है वाक्य का असल भाग अनुवर्ती ही है।

(ii) हेत्वाश्रित वाक्य के परिमाण का निर्धारण (Determination of quantity a hypothetical proposition):
हेत्वाश्रित तर्क वाक्य का परिमाण उसके पूर्ववर्ती पर निर्भर करता है। यदि पूर्ववर्ती All (सब) से शुरू होता है तो संपूर्ण वाक्य अंशव्यापी होगा और यदि पूर्ववर्ती अंशव्यापी कुछ (Some) से प्रारंभ होता है तो संपूर्ण वाक्य अंशव्यापी होगा। जैसे –
(a) यदि सभी नागरिक चरित्रवान हो तो देश का भविष्य उज्जल होगा-पूर्णव्यापी वाक्य।
(b) यदि कुछ व्यक्ति मरेंगे तो आबादी कम होगी-अंशव्यापी वाक्य।

(क) In all cases if there is sun, there is light
(ख) In some cases, if a man labours, he succeeds. इस तरह प्रथम वाक्य पूर्णव्यापी है तथा दूसरा वाक्य अंशव्यापी है।

उसी तरह यदि किसी हेत्वाश्रित तर्क वाक्य के पूर्ववर्ती में परिमाण स्पष्टतः नहीं दिया रहता है तो उसे पूर्णव्यापी मानलिया जाता है, जैसे-If A is B; C is D दूसरा अर्थ है कि In all cases If A is B, C is D.
इस तरह हेत्वाश्रित तर्क वाक्य के परिमाण का निर्धारण पूर्ववर्ती के अनुसार तथा गुण का निर्धारण अनुवर्ती के अनुसार किया जाता है। (Quantity is determined by antecedent and quality is determined by con sequent)

2. वैकल्पिक तर्कवाक्य (Disjunctive proposition):
इस तरह के वाक्य ‘या तो’ (Either, or) की परिधि में रहते हैं। जैसे-राम या तो छात्र है या शिक्षक है। इसमें कुछ विकल्प होते हैं जो विकल्प के विधेय के रूप में आते हैं। इसमें शर्त्त अस्पष्ट रहती है।

वैकल्पिक वाक्य में जितने विकल्प होते हैं उनमें से कौन विकल्प (alternative) उद्देश्य के संबंध में सत्य है यह कैसे जाना जा सकता है? इस तरह के वाक्य की शर्त को स्पष्ट करने के लिए उसे हेत्वाश्रित वाक्य में बदलना पड़ता है। जैसे-राम या तो छात्र है या शिक्षक है”। इसे हेत्वाश्रित में इस प्रकार बदल सकते हैं –

  • यदि राम छात्र नहीं है तो वह शिक्षक है।
  • यदि राम शिक्षक नहीं है तो वह छात्र है। इन हेत्वाश्रित वाक्यों से पता चलता है कि कौन शर्त है। इसके लिए वैकल्पिक वाक्य के स्वभाव को समझना पड़ता है।

वैकल्पिक वाक्यों के विकल्पों का स्वभाव (Nature of the alternatives of disjunctive proposition) इस पर दो तार्किकों के मतों का उल्लेख है।

1. यूबरवेग (Ueberweg) का मत है कि वैकल्पिक वाक्य के विकल्प परस्पर बहिष्कारक (Mutually exclusive) होते हैं। अर्थात् यदि एक विकल्प उद्देश्य के संबंध में सत्य है, तो दूसरा असत्य होगा और यदि दूसरा सत्य है तो पहला असत्य होगा। कहने का अर्थ है कि एक विकल्प दूसरे का बहिष्कार करता है। जैसे राम या तो मर गया है या वह जिन्दा है। इसमें दो विकल्प हैं।

2. मर गया है।

3. जिन्दा है। इन दोनों विकल्पों का स्वभाव परस्पर बहिष्कारक है। इसमें एक सत्य है तो दूसरा असत्य। इस वैकल्पिक वाक्य को यदि हेत्वाश्रित वाक्य में बदला जाए तो उसके चार रूप होते हैं। “राम या तो मरा है या जिन्दा है।”

इसके चार हेत्वाश्रित वाक्य होंगे –

  • यदि राम मर गया है तो वह जिन्दा नहीं है।
  • यदि राम जिन्दा है तो वह मरा नहीं है।
  • यदि राम मरा नहीं है तो वह जिन्दा है।
  • यदि राम जिन्दा नहीं है, तो वह मंरा है।

इसका अर्थ यही हुआ कि यदि विकल्प परस्पर बहिष्कार हैं तो वैकल्पिक वाक्य के उद्देश्य के साथ यदि एक विकल्प सत्य है तो दूसरा असत्य और फिर एक असत्य है तो दूसरा सत्य है।

2. मिल (Mill) साहब का मत है कि वैकल्पिक वाक्य के विकल्प परस्पर बहिष्कारक नहीं (Not mutually exclusive) होते हैं। अर्थात् उद्देश्य के साथ एक यदि सत्य है, तो दूसरा असत्य नहीं होकर सत्य भी हो सकता है। विरोधात्मक नहीं होने पर दोनों एक ही उद्देश्य के संबंध में ठीक भी हो सकते हैं।

अतः मिल साहब के अनुसार विकल्पों के स्वभाव को परस्पर बहिष्कार नहीं मानने से वैकल्पिक वाक्य को सिर्फ दो प्रकार से हेत्वाश्रित वाक्य में बदल सकते हैं। जैसे – मोहन या तो विद्वान है या वह धनी है। इसमें “विद्वान तथा धनी”-ये ही दो विकल्प हैं। ये दोनों विकल्प साथ-साथ सत्य भी हो सकते हैं। अर्थात् मोहन विद्वान भी हो सकता है और धनी भी। इस तरह के विकल्पों के केवल दो हेत्वाश्रित वाक्य बनते हैं।”

  • “यदि मोहन विद्वान नहीं है तो वह धनी है।”
  • “यदि मोहन धनी नहीं है, तो वह विद्वान है।”

यहाँ हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यदि वैकल्पिक वाक्य के विकल्प परस्पर बहिष्कार नहीं हैं तो एक विकल्प की असत्यता पर हम आ सकते हैं, किन्तु किसी एक की सत्यता से दूसरे की असत्यता पर नहीं आ सकते हैं। क्योंकि यहाँ ऐसी भी संभावना रहती है कि दोनों विकल्प साथ ही साथ वैकल्पिक वाक्य के उद्देश्य के साथ सत्य हो जाएँ। अब प्रश्न है कि किसका विचार माना जाए-यूबरवेग का या मिल का? दोनों के विचारों में आंशिक सत्यता है।

यूबरवेग का वैकल्पिक वाक्य चार हेत्वाश्रित वाक्यों के बराबर होता है और मिल का दो हेत्वाश्रित वाक्यों के बराबर होता है, सदा सत्य नहीं है। यदि वैकल्पिक वाक्य वास्तविक व्याघाती पद होते हैं तो उसकी शर्त चार हेत्वाश्रित वाक्यों में व्यक्त होगी। जैसे वह ‘मरणशील है या अमर’-इसके दोनों विकल्प ‘मरणशील’ और ‘अमर’ (Mortal and immor tal) व्याघाती पद हैं। इसलिए यहाँ इस वाक्य की शर्त चार हेत्वाश्रित वाक्यों में व्यक्त होगी।

  • यदि वह मरणशील नहीं है तो वह अमर है।
  • यदि वह अमर नहीं है तो वह मरणशील है।
  • यदि वह मरणशील है तो वह अमर नहीं है।
  • यदि वह अमर है तो वह मरणशील नहीं है।

इसी तरह ‘राम या तो तेज है या धनी है’ का विकल्प (तेज और धनी) व्याघातक पद नहीं है। एक ही व्यक्ति तेज और धनी दोनों हो सकता है। इसलिए दूसरे वाक्य की शर्त दो हेत्वाश्रित में भी व्यक्त होगी। जिसमें एक विकल्प को अस्वीकार कर दूसरे को स्वीकार करेंगे। जैसे-राम या तो तेज है, या धनी है। इसके हेत्वाश्रित वाक्य हैं –

  • यदि राम तेज नहीं है तो वह धनी है।
  • यदि राम धनी नहीं है तो वह तेज है।

इस तरह दोनों के विचार आंशिक रूप से सत्य है।

वैकल्पिक वाक्य का परिमाण (Quantity):
वैकल्पिक तर्क वाक्य भी पूर्णव्यापी और अंशव्यापी (Universal and particular) होते हैं। जैसे –

  • सभी मनुष्य या तो धनी है या गरीब। (पूर्णव्यापी)
  • कुछ छात्र या तो शहर के हैं या देहात के। (अंशव्यापी)
  • All men are either mortal or immortal (Universal)
  • Some men are either rich or poor (Particular)

इस तरह हम देखते हैं कि वैकल्पिक तर्क वाक्यों का परिमाण उनके उद्देश्य पर निर्भर करता

गुण (Quality):
वैकल्पिक वाक्य में उद्देश्य के संबंध में एक विकल्प स्वीकार करना किसी एक विकल्प के निषेध करने पर आधारित है। इस तरह वैकल्पिक वाक्य हमेशा भावात्मक ही होते हैं। यदि कोई न तो और न (Neither … nor) के सहारे वाक्य निर्णय करे तो वह गलत होगा।

वास्तव में Neither … nor संयुक्त वाक्य से दो निषेधात्मक वाक्यों का योग कहते हैं इसे विप्रकृष्ट वाक्य (Remotive compound proposition) कहा जाएगा न कि वैकल्पिक वाक्य। जैसे न तो राम धनी है और न चतुर है। यह वाक्य वैकल्पिक नहीं है। यह Remotive वाक्य हैं। इसमें दो निषेधात्मक वाक्य जुड़े हुए हैं –

  • राम धनी नहीं है।
  • राम चतुर नहीं है। ये दोनों वाक्य निरपेक्ष वाक्य हैं सापेक्ष नहीं है।

हेत्वाश्रित तथा वैकल्पिक वाक्यों में अन्तर (Distinction between hypothetical and disjunctive proposition):
हेत्वाश्रित तथा वैकल्पिक दोनों ही सापेक्ष तर्कवाक्य के दो रूप हैं। दोनों के उद्देश्य और विधेय का संबंध शर्त पर निर्भर करता है। दोनों में निम्नलिखित अन्तर है।

1. हेत्वाश्रित वाक्य की शर्त वाक्य में स्पष्ट रहती है। जैसे – यदि रात होगी तो राम पढ़ेगा? किन्तु वैकल्पिक वाक्य में शर्त अस्पष्ट रहती है। जैसे-राम या तो घर पर है या वह बाजार में

2. हेत्वाश्रित वाक्य “यदि तो” (If, then) की परिधि में रहता है और वैकल्पिक वाक्य या तो-या (either … or) की परिधि में रहता है, जैसे-If Ram comes I shall go. Ram is either poor or intelligent.

3. हेत्वाश्रित वाक्य के दो अंग होते हैं-पूर्ववर्ती तथा अनुवर्ती (consequent and antecedent)। लेकिन वैकल्पिक वाक्य में इस तरह की बातें नहीं हैं।

4. जिस तरह हेत्वाश्रित वाक्य को निरपेक्ष वाक्य में बदला जा सकता है उसी तरह वैकल्पिक वाक्य को पहले हेत्वाश्रित में फिर हेत्वाश्रित को निरपेक्ष वाक्य में बदला जा सकता है अर्थात् हेत्वाश्रित तथा वैकल्पिक दोनों ही प्रकार के वाक्यों को निरपेक्ष रूप दिया जा सकता है।

5. वैकल्पिक वाक्यों में विकल्पों की संख्या निश्चित नहीं है, वे एक से अधिक जरूर होते हैं।

6. हेत्वाश्रित वाक्य का गुण उसके अनुवर्ती पर निर्भर करता है। परन्तु उसका परिमाण उसके पूर्ववर्ती पर निर्भर करता है। किन्तु वैकल्पिक वाक्य निषेधात्मक नहीं होते हैं, ये सदा भावात्मक ही होते हैं। उसी तरह वैकल्पिक वाक्य के परिणाम के संबंध में ऐसा माना जाता है कि ऐसे वाक्य साधारणतः सामान्य (universal) ही हुआ करते हैं। अंशव्यापी वैकल्पिक वाक्य (Particular disjunctive proposition) यदि होता भी है तो उसके तार्किक महत्त्व नहीं होता है।

गुण और परिमाण के अनुसार तर्क वाक्यों का वर्गीकरण (The classification of proposition according to quality and quantity) या तर्कवाक्यों का सरलीकरण (Sim plification of proposition) तर्कशास्त्र में इस प्रकार के वाक्यों को आदर्श (standard) माना गया है। ये A, E, I तथा हैं। इस तरह किसी का विधान करते हैं या निषेध और वह भी अंशव्यापी रूप में या पूर्णव्यापी रूप में। इसलिए हरेक वाक्य का गुण और परिमाण (Quality and quantity) होता है। इस तरह गुण और परिमाण को देखते हुए चार तरह के ही वाक्यों की मान्यता दी गई है।

परिमाण की दृष्टि से –

  • पूर्णव्यापी (Universal)
  • अंशव्यापी (Particular)

गुण (quality) की दृष्टि से –

  • भावात्मक (Affirmative)
  • निषेधात्मक (Negative) इस तरह quantity and quality के दृष्टिकोण के चार तरह के वाक्य हुए –

(a) पूर्णव्यापी भावात्मक (Universal affirmative)
(b) पूर्ण निषेधात्मक (Universal negative)
(c) अंशव्यापी भावात्मक (Particular affirmative)
(d) अंशव्यापी निषेधात्मक (Particular negative)

जैसे-सभी मनुष्य मरणशील हैं – A
कोई भी मनुष्य मरणशील नहीं हैं – E
कुछ मनुष्य मरणशील हैं – I
कुछ मनुष्य मरणशील नहीं है – O

(a) All men are mortal – ‘A’
All S is P

(b) No men are mortal – E
No S is P

(c) Some men are mortal – I
Some S is P

(d) Some men are not mortal – O
Some S is not P

इस तरह तर्कशास्त्र में चार तरह के वाक्य हुए A, E, I, & O.

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 3.
व्याकरण के वाक्यों को तार्किक रूप में लाने की क्या विधि है?
उत्तर:
नियम 1.
यदि किसी वाक्य में सभी, प्रत्येक, कोई, हरेक, अवश्य ही, पूर्णतया, सर्वदा (All, every, any, each; necessarily, absolutely and always) शब्द रहे तो उसका तार्किक रूप Logical firm ‘A’ में होगा।
किन्तु ‘नहीं’ (Sign of negation “not’) शब्द भी रहे तो उसका तार्किक रूप L.E. ‘O’ में होगा यथा –

A. सभी काँग्रेसी ईमानदार हैं।
A. All Congress men are honest.
कोई भी इस कार्य को कर सकता है।

L.F सभी इस कार्य को कर सकता है।
प्रत्येक छात्र तेज है = सभी छात्र तेज है – A
Every student is intelligent.

L.F. – All students are intelligent.-A
हरेक मनुष्य मरणशील है = सभी मनुष्य मरणशील हैं – A
Each man is mortal = All men are mortal – A
दो और दो मिलकर अवश्य ही चार होते हैं = सभी हालतों में दो और दो मिलकर चार होते हैं।

Two plus two are necessarily four = In all cases two plus two are four – ‘A’.

सद्गुणी सर्वदा सुखी रहती है – सभी संतोषी सुखी हैं।
Virtous are always happy. L.F. All virtuous are happy – A
पूर्णतया छात्र ही देशभक्त होते हैं।
L.F. सभी छात्र देश भक्त हैं –
A Absolutely students are honest
L.F.-All students are honest

यदि उपर्युक्त शब्द रहे किन्तु ‘not’ (नहीं) लगा रहे पर तार्किक रूप ‘O’ में होगा। जैसे – सभी चमकनेवाली सोना नहीं है = L.E. कुछ चमकने वाला सोना नहीं है। All that glitters is not gold. L.F.-‘0’Some things that glitter are not gold. इसी तरह each/every, disease is not fatal.

L.F. – ‘O’ Some dieases are not fatal. Books are not always good.
L.F. – Some books are not good.
‘O’Absolutely men are not dishonest.
L.F. – Some books are not good. ‘O’Absolutely men are not dishonest.
L.F. – O’Some men are dishonest.
पूर्णतया मनुष्य ईमानदार नहीं होता है = कुछ मनुष्य ईमानदार नहीं है।

नियम 2.
यदि किसी वाक्य में ‘No, none, never, in no case, not even a single’
(नहीं, कोई नहीं, कभी नहीं, किसी भी परिस्थिति में नहीं, एक भी नहीं) शब्द रहे तो उसका तार्किक रूप ‘O’ में होगा। यथा –
कोई आम पका हुआ नहीं = L.F.’E’
कोई आम पका नहीं है।
No mango is reap = L.F. ‘E’
कोई आम पका नहीं है।
No mango is reap = L.F. ‘E’
कोई आम पका नहीं है।
No mango is reap = L.F. No mango is reap
No man is free from defect?
L.F. No man is such who is free from defect.
बेईमान कभी भी सफल नहीं होता है।
L.F. – कोई बेईमान सफल नहीं है।
Dishonesty never succeeds.
L.F. – No dishonesty is such which succeeds.
Not even a single man is good.
L.F. – No man is good. (E)
None are honest.
L.F. – No persons are honest.
No life is wholly pleasant.

नियम 3.
जिन वाक्यों में कुछ, कभी-कभी, अधिकांश, बहुधा, प्रायः, बहुत कम, सर्वदा शायद, बारम्बार, साधारणतया, बहुत कई, 99 प्रतिशत, मौके, बेमौके, एक को छोड़कर सभी, कुछ एक, कतिपय, धनिक, गरीब, सभी (Some, sometimes, most, many, mostly often, a few, nearly always, perhaps, frequently, generally, several, 99 percent, occa sionally, almost, all but one) आदि शब्द रहे तो इसका L.E-I में होगा। किन्तु Not लगा रहने पर तार्किक रूप ‘O’ में हो जाता है। यथा –
1. कुछ छात्र धनी हैं। Some students are rich.
I कभी – कभी छात्र व्याकुल हो जाते हैं।
L.F.I. कुछ छात्र व्याकुल हो जाते हैं।
अधिकांश भारतीय गरीब हैं।
L.F.I. कुछ भारतीय गरीब हैं।
धंनी व्यक्ति बहुधा कंजूस होते हैं।
L.F.I. कुछ धनी व्यक्ति वे हैं जो कंजूस होते हैं।
प्रायः सर्वदा पापी दंडित होते हैं।
L.F.I. कुछ पापी दंडित होते हैं। बच्चे बारंबार गलती करते हैं।
L.F.I. कुछ बच्चे वारम्बार गलती करते हैं।
L.F.I. बहुत से जानवर हिंसक होते हैं।
L.F.I. कुछ जानवर ऐसे हैं जो हिंसक होते हैं।
सैकड़े निन्यानबे प्रतिशत छात्र तेज हैं।
L.F.I. कुछ छात्र तेज हैं।
छात्र मौके बे मौके सिनेमा चले जाते हैं।
L.F.I. कुछ छात्र सिनेमा जाते हैं।
कभी-कभी आदमी अच्छा भी नहीं होता है।
L.F. ‘O’ कुछ आदमी अच्छे नहीं हैं।
अधिकांश छात्र गरीब नहीं हैं।
L.F. ‘O’ कुछ छात्र गरीव नहीं हैं।
कोई पदाधिकारी योग्य नहीं हैं।
L.F. ‘O’ कुछ पदाधिकारी योग्य नहीं हैं।
बच्चे प्रायः शांत नहीं होते हैं।
L.F. ‘O’ कुछ बच्चे शांत नहीं हैं।
L.F. ‘O’ Some students are not good.
Most students are not poor. Perhaps dogs are not faithful.
L.F. ‘O’ Some dogs are not faithful.
A few men are not good.
L.F. ‘O’ Some men are not good.
Several candidates are not fit. L.F. ‘O’
Some candidates are not fit.
Virtuous are often not happy.
L.F. ‘O’ Some virtuous persons are not happy.
Mangoes are not generally sour.
L.F. ‘O’ Some mangoes are not sour.
White cats with blue eyes are generally deaf.
L.F.I. Some white cats with blue eyes are deaf.
Virtuous persons are often happy.
L.F.I. Some virtious persons are happy.
Certain men are educated.
L.F.I. Some men are educated.

नियम 4.
यदि किसी वाक्य में few, seldom, hardly, scarcely (कुछ शायद ही, अधिकार से, कोई कठिनाई से) शब्द रहे तो उसका तार्किक रूप ‘O’ में होगा, किन्तु यदि Not शब्द भी लगा रहे तो I वाक्य में होगा। जैसे –
बच्चे जिद्दी शायद ही नहीं होते हैं।
कुछ बच्चे जिद्दी नहीं हैं ‘O’ ईश्वर शायद ही भक्ति से नहीं रीझते हैं।
L.F.I. कुछ हालतों में ईश्वर भक्ति से रीझते हैं।
मुश्किल से कोई अंग्रेज काला होता है।
L.F. ‘O’ कुछ अंग्रेज काले नहीं हैं।
अंग्रेजी वाक्य
Few students are rich.
L.F. ‘O’ Some students are not rich.
Persons are seldom found trustworthy.
L.F. ‘O’some persons are not trustworthy.
Any nations is hardly peaceful today.
L.F. ‘O’ Some nations are not peaceful today.
A thief scarcely sleeps at night.
L.F. ‘O’ Some thieves are not such who sleep at night.
Few Indians are not religious.
L.F.I. Some Indians are religious.

नियम 5.
यदि किसी वाक्य में Only, alone, none but ‘No’ One else but (केवल, अकेले, अतिरिक्त, कोई नहीं) शब्द रहे तो उसका L.E. A, E तथा I में बनाया जाता है। ‘A’ में रूपान्तरण करने के लिए उद्देश्य विधेय का स्थानान्तरण कर दिया जाता है।
‘A’ All trustworthy persons are students.
केवल पैसेन्जर गाड़ी यहाँ ठहरती है।
L.F. ‘A’ यहाँ ठहरने वाली सभी गाड़ियाँ पैसेन्जर गाड़ियाँ हैं।
‘E’ में रूपान्तरण करने के लिए उद्देश्य का व्याघाती पद (Contradictory term) तार्किक रूप का उद्देश्य रखा जाता है। जैसे – Only students are trustworthy.
L.F.E. No non-students are trustworthy.
केवल संतोषी व्यक्ति ही सुखी हैं।
L.F. ‘E’ कोई भी संतोषी व्यक्ति सुखी नहीं है।
‘I’ में रूपान्तरण करने के लिए कोई नियम नहीं है।
अर्थात् उद्देश्य विधेय में किसी तरह का परिवर्तन नहीं होगा। जैसे – Students are alone eligible.
L.F. ‘O’ Some students are eligible.
इसी तरह None but the brave deserves the fair.
L. F –

  • All persons who deserve/the fair are brave – ‘A’
  • No non – brave persons/are such who deserve the fair – ‘E’
  • Some brave persons/are such who deserve the/fair ‘I’

केवल ईमानदार व्यक्ति ही विश्वासपात्र हैं।
L.F.A. सभी विश्वासपात्र व्यक्ति ईमानदार व्यक्ति हैं।
E कोई गैर-ईमानदार व्यक्ति विश्वासपात्र नहीं है।
कुछ ईमानदार व्यक्ति विश्वासपात्र हैं।

नियम 6.
जिस व्याकरण वाक्य में अपवाद सूचक शब्द Except, all but a few, all but, (अतिरिक्त, प्रायः बहुत कम, सभी परन्तु कुछ) हों तो अपवाद निश्चित रहने पर तार्किक रूप ‘A’ में और अपवाद यदि अंशव्यापी हो तो तार्किक रूप में I में होगा अर्थात् अपवाद निश्चित रहने पर पूर्णव्यापी (A) में तथा अनिश्चित रहने पर अंशव्यापी (I) में होगा, जैसे –
All boys except Ram is good.
L.F. ‘A’All boys except Ram is good.
All boys except one is good.
L.F.I. Some boys are good.
All but two were killed.
L.F.I. Some persons are such who were killed.
All but a few could solve this problem.
L.F.I. Some persons are such who could solve this problem.

नियम 7.
जिस व्याकरण के वाक्य का उद्देश्य व्यक्तिवाचक हो अर्थात् निश्चित हो उसका तार्किक रूप ‘A’ में होगा या ‘E’ में गुण के अनुसार। जैसे –
The earth moves round the sun.
L.F.’A’ The earth/is such which moves round the sun.
The moon does not appear during the day.
L.F.E. The moon/is not/such which appears during the day.
You are different from me.
L.F. You are not I ‘E’.
A Greek conquered India.
L.F.I. Some Greeks are persons who conquered India.
A metal is not solid.
L.F. ‘O’ Some metals are not solid.

नियम 8.
प्रश्नवाचक वाक्यों का तार्किक रूप अर्थ के अनुसार होता है। अर्थात् ऐसे वाक्य से कभी निषेधात्मक और कभी भावात्मक (Negation-affirmation) का अर्थ निकलता है। यथा क्या ईश्वर सब कुछ देखने वाले नहीं है?
L.F.A. ईश्वर सब कुछ देखने वाले हैं।
इसी तरह अंग्रेजी वाक्य Am I your servant?
L.F.’E’ I am not your servant.
Am I so mean?
L.F.I. I am not so mean.
Am I not your well wisher?
L.F. ‘A’ I not your well wisher.

नियम 9.
कुछ वाक्य ‘It’ से शुरू होते हैं। इन्हें तार्किक रूप में बदलने पर ‘I’ के स्थान पर उद्देश्य लाया जाता है। जैसे It rains.
L.E. ‘A’ The weather is such which rains.
It is night.
L.F. ‘A’The time is night.

नियम 10.
जिस वाक्य में उद्देश्य की परिभाषा स्पष्ट रूप से नहीं दिया रहता है, उसके तार्किक रूप में परिभाषा से अनुभव के आधार पर स्पष्ट करते हैं। जैसे –
Man is mortal.
L.F. All men are mortal.
‘A’ Indians are.poor.
L.F. Some Indians are poor.
I Birds have two wings.
L.F. All birds are creature having two wings.
‘A’ पंखे घूमते हैं कुछ पंखे घूमते हैं ‘I’ हंस उजले होते हैं कुछ हंस उजले हैं – ‘I’.

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 4.
तर्क वाक्यों के विरोध में आप क्या समझते हैं? इसके विभिन्न भेदों की व्याख्या उदाहरण सहित करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र में चार तरह के आदर्श वाक्य माने गये हैं – A, E, I and O। अब प्रश्न उठता है कि इन चारों वाक्यों में आपसी संबंध किस प्रकार का है। इसमें गुण और परिमाण (Quality and Quantity) को लेकर चार प्रकार के संबंध हैं जिन्हें वाक्यों का विरोध कहा जाता है। यह विरोध दो तर्क वाक्यों के मध्य में रहता है जिनके उद्देश्य और विधेय (Subject and Predicate) समान होते हैं किन्तु अन्तर गुण या परिमाण या दोनों (Quality & Quantity) को लेकर होता है। Prof. B. N. Roy के शब्दों में इसकी परिभाषा इस प्रकार दी गई है –

“Opposition of proposition is the relation between two propositions hav ing the same subject and the same predicate but differing either in quality or in quantity or in both”.

अर्थात् “तर्क वाक्यों के विरोध में दो तर्क वाक्यों के बीच उद्देश्य, विधेय तो एक ही रहते हैं, किन्तु विरोध गुण या परिणाम या दोनों को लेकर रहता है। जैसे –

1. A सभी छात्र धनी हैं –
All students are rich.

‘A’E कोई छात्र धनी नहीं है –
No students are rich –
‘E’ इसमें विरोध तो है जबकि उद्देश्य और विधेय दोनों (A – E) के एक ही हैं किन्तु एक भावात्मक दूसरा निषेधात्मक है अर्थात् गुण संबंधी विरोध है। इसी तरह –

2. A – सभी छात्र धनी हैं –
Some students are rich ‘I’
इसमें भी उद्देश्य और विधेय दोनों के (A – I) एक रहते हुए भी परिमाण को लेकर भेद है।

इसी तरह –

3. A सभी छात्र धनी हैं – All students are rich. AIO कुछ छात्र धनी नहीं हैं – Some students are not rich. ‘O’ वाक्य हैं। इसके भी उद्देश्य और विधेय दोनों के (A – O) एक ही हैं किन्तु विरोध इसमें गुण और परिमाण दोनों को लेकर है, जैसे – एक पूर्णव्यापी और भावात्मक है तो दूसरा अंशव्यापी और निषेधात्मक है।”

विरोध के प्रकार (Kinds of opposition):
इस तरह तर्क वाक्यों के विरोध चार प्रकार के होते हैं जो इस प्रकार हैं –

  • उपाश्रित (Sub – altern) A – I and E – O
  • विपरीत (Contrary) – (A – E)
  • अनुविपरीत (Sub – contrary) – (I – O)
  • व्याघातक (Contradictory) – A – O and E – I

(i) उपाश्रित (Sub – altern):
यह विरोध A – I तथा E – O के बीच होता है। इसमें एक universal तथा दूसरा particular (पूर्णव्यापी तथा अंशव्यापी) होता है। यथा

A सभी मनुष्य मरणशील हैं (All men are mortal) ‘A’। I कुछ मनुष्य मरणशील हैं Some men are mortal ‘I’। E कोई मनुष्य मरणशील नहीं है No men are not mortal ‘E’। O कुछ मनुष्य मरणशील नहीं हैं Some men are not mortal ‘O’।

इन उपर्युक्त वाक्यों के बीच उपाश्रित विरोध संबंध है। इसमें यह ध्यान रखना जरूरी है कि सामान्य वाक्य को उपाश्रय तथा विशेष वाक्य को उपाश्रित कहते हैं। (Universal proposition is called subalternant and particular proposition is called subalternate)

इन उपाश्रित वाक्यों में यदि सामान्य वाक्य सत्य है तो अंशव्यापी वाक्य भी सत्य होगा। किन्तु सामान्य वाक्य असत्य है तो अंशव्यापी वाक्य संदेहात्मक होगा तथा अंशव्यापी असत्य है तो सामान्य वाक्य सत्य होगा। अर्थात् A सत्य है तो I भी सत्य होगा फिर यदि A असत्य है तो I संदेहात्मक होगा। फिर यदि I सत्य है तो A संदेहात्मक होगा और यदि I असत्य है तो A भी असत्य होगा। इसी तरह E तथा O के बीच भी चलेगा।

जैसे – यदि E सत्य है तो O सत्य होगा।
फिर यदि E असत्य है तो O संदेहात्मक होगा।
फिर यदि O सत्य हो तो ‘E’ संदेहात्मक होगा।
और यदि O असत्य है तो E भी असत्य होगा।

यथा –
A All men are mortal.
I Some men are mortal.
E No men are mortal.
O Some men are not mortal.

विरोध के भेदों की व्याख्या –

(i) उपाश्रित (Sub – altern):
उपाश्रित विरोध का सही रूप है क्योंकि A – I तथा E – O के बीच परिमाण को लेकर अन्तर है। एक पूर्णव्यापी है तो दूसरा अंशव्यापी है। दूसरे मत के अनुसार उपाश्रित विरोध का सही रूप नहीं है क्योंकि दोनों वाक्यों का गुण एक ही है, इसलिए विरोध संबंध कहना अनुचित है। दोनों साथ-साथ सत्य होते हैं। पूर्णव्यापी वाक्य में अंशव्यापी वाक्य अन्तर्निहित होता है।

विरोध का अर्थ यदि व्यापक रूप में समझा जाए और किसी भी प्रकार के विरोध को विरोध माना जाए तो उपाश्रित विरोध का सही रूप है। जैसा कहा गया कि एक के सत्य होने से दूसरा भी सत्य होगा लेकिन एक के असत्य होने से दूसरा असत्य न होकर संदेहात्मक हो जाता है। यह तो विरोध का सही रूप ही है।

(ii) विपरीत (Contrary):
यह विरोध दो पूर्णव्यापी वाक्यों के बीच होता है जिसमें एक भावात्मक तथा दूसरा निषेधात्मक होता है अर्थात् यह विपरीत विरोध (A – E) के बीच होता है, जैसे – A सभी मनुष्य धनी हैं –
All men are rich.A.
E कोई मनुष्य धनी नहीं है No men are rich E.
इसमें एक की सत्यता से दूसरे की असत्यता और एक की असत्यता से दूसरा संदेहात्मक है। अर्थात् यदि –
‘A’ सत्य है तो E असत्य है।
और A सत्य है तो ‘E’ असत्य है और E असत्य है तो A संदेहात्मक होगा।

(iii) अनुविपरित (Subcontrary):
यह संबंध दो अंशव्यापी तर्कवाक्यों के बीच होता है अर्थात् I तथा O के बीच। इसमें एक भावात्मक और दूसरा निषेधात्मक वाक्य रहता है, जैसे –
I कुछ मनुष्य धनी है Some men are rich. O
O कुछ मनुष्य धनी नहीं है Some men are not rich.

इसमें यदि एक असत्य है तो दूसरा सत्य है और एक सत्य है तो दूसरा संदेहात्मक होगा। यह विपरीत संबंध का उल्टा है। अर्थात् यदि ‘I’ असत्य है तो ‘O’ सत्य है और यदि ‘I’ सत्य है तो ‘O’ संदेहात्मक होगा। फिर यदि ‘O’ असत्य है तो I’ सत्य है और यदि ‘O’ सत्य है तो ‘I’ संदेहात्मक होगा।

(iv) व्याघातक (Contradictory):
यह वह विरोध है जिनके उद्देश्य और विधेय तो एक ही रहते हैं किन्तु गुण और परिमाण को लेकर भेद रहता है। यह A – 0 तथा E – I के बीच पाया जाता है, जैसे –
A सभी भारतीय गरीब हैं All Indians are poor ‘A’.
O कुछ भारतीय गरीब नहीं है Some Indian are not poor ‘O’
E कोई भारतीय गरीब नहीं हैं No Indian are poor ‘E’
I कुछ भारतीय गरीब हैं Some Indians are poor I’.

इसमें एक Universal affirmative है ‘A’ तो दूसरा Particular negative है ‘O’ तथा इसी तरह Universal Negative है ‘E’ तो Particular affirmative है ‘I’। इसमें यदि ‘A’ सत्य है तो ‘O’ असत्य है और यदि ‘O’ सत्य है तो ‘A’ असत्य है। फिर यदि ‘A’ असत्य है तो ‘O’ सत्य है और यदि ‘O’ असत्य है तो ‘A’ सत्य है। इसी तरह यदि ‘E’ सत्य है तो I असत्य है फिर यदि I सत्य है तो E असत्य है और I असत्य है तो E सत्य है। इस तरह के विरोध का चित्रांकन इस प्रकार है –

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

इसी तरह इन चार तरह के विरोध वाक्यों में कौन सत्य है तथा कौन असत्य है तथा संदेहात्मक है? इन कठिनाई को दूर करने के लिए निम्नलिखित सारणी का स्मरण रखना चाहिए –

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

नोट:
इसमें बड़ी टी (T) से सत्य प्रारम्भ करें और बड़ा (F) से असत्य प्रारम्भ करें। इसमें बड़ी T या छोटी। का अर्थ सत्य (Truth) से है बड़ा F या छोटा f का अर्थ असत्य (False) से है तथा D का अर्थ संदेहात्मक doubtful से है। जैसे प्रश्न है Draw inference by opposition of proposition from the truth and falsity of the proposition “Men are never kind.”
L.F.E. No men are kind. कोई भी मनुष्य कृपालु नहीं है।
सबसे पहले वाक्य को तार्किक रूप में लाया गया

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

नोट:
यहाँ ‘E’ यदि True है तो A असत्य, I सत्य है तो O असत्य फिर यदि ‘I’ स्वयं False है तो Adoubtful तथा ‘O’ भी doubtful होगा।

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

नोट:
यदि ‘A’ सत्य है तो ‘E’ असत्य, I’ सत्य है तो ‘O’ असत्य होगा। फिर यदि ‘A’। असत्य है तो ‘E’ संदेहात्मक (यहाँ ‘I’ संदेहात्मक होगा A का अनुविपरीत नहीं है।)

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

इसमें यदि ‘I’ सत्य है तो ‘A’ संदेहात्मक, ‘O’ संदेहात्मक तो ‘E’ असत्य और यदि ‘I’ असत्य है तो ‘A’ असत्य, ‘0’ सत्य तो ‘E’ सत्य होगा। ‘I’ का विपरीत नहीं होता है।

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

इसमें यदि ‘O’ असत्य है तो ‘I’ सत्य है, ‘E’ असत्य तो ‘A’ सत्य होगा। ‘O’ का विपरीत नहीं होता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 5.
तर्कवाक्यों में पदों की व्याप्ति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
व्याप्ति का अर्थ:
यदि किसी पद से उसकी सारी वस्तुवाचकता (Entire denotation) का बोध होता है तो उसे व्याप्त पद (Distributed term) कहते हैं। जैसे – सभी मनुष्य मरणशील हैं (All men are mortal) – इस तर्क वाक्य का उद्देश्य ‘मनुष्य’ (Men) व्याप्त पद है, क्योंकि इससे सारे मनुष्यों का बोध होता है। इसी तरह यदि किसी पद से उसकी सारी वस्तुवाचकता का बोध नहीं होता कुछ ही वस्तुवाचकता का बोध हो तो उसे अव्याप्त (Undistributed) पद कहते हैं, यथा “कुछ मनुष्य बुद्धिमान हैं” (Some men are wise)। इस तरह के अर्थव्यापी वाक्य का उद्देश्य और विधेय (men and wise) दोनों पद अव्याप्त हैं। “A, E, I and O” तर्क वाक्य के उद्देश्य और विधेय में कौन-कौन व्याप्त हैं तथा कौन-कौन अव्याप्त हैं? इस पर विचार करना है।

“A” वाक्य:
“All men are mortal.” – इस वाक्य मे Subject – men तो किन्तु predicate – mortal अव्याप्त है क्योंकि मनुष्य पद से सभी मनुष्य का बोध होता है लेकिन ‘mortal’ शब्द से तो सभी जीव जो मरते जन्म लेते हैं उन सबों का बोध होता है। इसी तरह “All S is P.” से स्पष्ट है कि इसका ‘S’ व्याप्त है क्योंकि इससे सभी ‘S’ का बोध होता है लेकिन ‘P’ अव्याप्त है क्योंकि P सिर्फ S के लिए व्यवहृत हुआ है। यह अन्य के लिए भी व्यवहृत हो सकता है। अतः P से सभी P का बोध नहीं होता है। यहाँ ‘S’ का अर्थ Subject से तथा ‘P’ का अर्थ Predicate से है।

“E” वाक्य:
“No men are Gods.” (कोई मनुष्य देवता नहीं) अर्थात् सभी मनुष्य सभी देवताओं से अलग हैं। इस तरह यहाँ सभी मनुष्यों और सभी देवताओं का बोध होता है। इससे स्पष्ट है कि Men and Gods (उद्देश्य-विधेय) दोनों पद व्याप्त हैं। क्योंकि दोनों से पूरे denotation का बोध होता है। सांकेतिक उदाहरण में भी No Sis P का अर्थ है कि कोई ‘S’, ‘P’ नहीं है यानी सभी ‘S’ सभी ‘P’ से अलग है। अतः E तर्कवाक्य का दोनों पद व्याप्त होते हैं।

I वाक्य:
कुछ छात्रं तेज हैं (Some students are intelligent) इसका उद्देश्य पद छात्र अव्याप्त हैं और विधेय पद तेज भी अव्याप्त है। क्योंकि यहाँ यह पद केवल कुछ छात्रों का बोध कराता है और तेज भी केवल कुछ छात्रों के लिए व्यवहृत हुआ है। जबकि अन्य लोग भी तेज होते हैं। जैसे शिक्षक, वकील, व्यापारी, डॉक्टर आदि। अतः ‘I’ तर्क वाक्य किसी भी पद को व्याप्त नहीं कर पाता है। इसका न तो उद्देश्य व्याप्त है और न इसका विधेय पद ही।

सांकेतिक उदाहरण:
Some S is P स्पष्ट होता है कि ‘S’ से सभी S का बोध नहीं होता है। अतः यह अव्याप्त है। ‘P’ भी केवल ‘S’ के लिए ही व्यवहृत हुआ है, अन्य के लिए नहीं। अतः ‘P’ भी अव्याप्त है। तर्क वाक्य “कुछ छात्र तेज नहीं है” (Some students are not intelligent) इसका उद्देश्य तो अव्याप्त है ही, क्योंकि इससे कुछ ही छात्रों को बोध होता है। लेकिन विधेय पद ‘तेज’ व्याप्त हो जाता हैं इसका अर्थ है कि विश्व में जितने व्यक्ति हैं उनके वृत्त के कुछ छात्र अलग हैं अर्थात् तेज पद से सभी तेज लोगों का बोध होता है। अतः यह पद अव्याप्त है। इस तरह ‘O’ का उद्देश्य अव्याप्त और विधेय व्याप्तं पद होता है।

सांकेतिक उदाहरण:
Some S is not ‘P’. से स्पष्ट है कि इसका उद्देश्य ‘S’ अव्याप्त है और विधेय P व्याप्त है, क्योंकि इसका साफ अर्थ है कि सभी ‘P’ से कुछ ‘S’ अलग हैं। इस तरह –

A वाक्य में उद्देश्य व्याप्त है किन्तु विधेय अव्याप्त है।
E वाक्य में उद्देश्य और विधेय दोनों व्याप्त हैं।
I वाक्य में उद्देश्य और विधेय दोनों अव्याप्त हैं।
O वाक्य में उद्देश्य अव्याप्त हैं किन्तु विधेय व्याप्त पद है।

इस को अंग्रेजी में कहा गया है –
A distributes subject.
E distributes both (Subject and Predicate)
I distributes none.
O distributes predicate only.
इसे एक सूत्र में कहा गया है।
ASEBINOP अर्थात्
AS, EB, IN, OP
स्पष्ट है कि A को Subject, E को both, I को none और O को Predicate कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यों को तार्किक रूप में रूपान्तरित कीजिए तथा तार्किक लक्षणों को निर्धारित कीजिए।
(a) Man is a rational animal मनुष्य मननशील प्राणी है।
(b) White cat with blue eyes are generally deaf.
नीली आँखोंवाली उजली बिल्लियाँ साधारणतया बहरी होती हैं।
(c) Humour is not given to all.
हास्य सभी को नहीं दिया गया है।
(d) A few men are above temptations.
नहीं के बराबर मनुष्य लोभी है।
उत्तर:
(a) L.E-All men are rational animal – A (सभी मनुष्य मननशील प्राणी हैं। – A)

तार्किक लक्षण (Logical character):
यह सरल, निरपेक्ष, भावात्मक, पूर्णव्यापी, अनिवार्य एवं शाब्दिक तर्कवाक्य (Proposition) है।

(b) L.F. – Some White cats with blue eyes are deaf – I.
(कुछ नीली आँखोंवाली उजली बिल्लियाँ बहरी होती हैं – I)

तार्किक लक्षण:
यह सरल, निरपेक्ष, भावात्मक, अंशव्यापी, साधारण (assertory) एवं यथार्थ (real) तर्क वाक्य हैं।

(c) L.F.-Some Men are not given humour – 0.
(कुछ मनुष्यों को हास्य नहीं दिया गया है – O)

तार्किक लक्षण:
यह सरल, निरपेक्ष, निषेधात्मक अंशव्यापी, साधारण और यथार्थ तर्कवाक्य हैं।

(d) L.F.-Some men are above temptation – I.
(कुछ मनुष्य लोभ से परे हैं – I)

तार्किक लक्षण::
यह सरल, निरपेक्ष, भावात्मक अंशव्यापी, साधारण और यथार्थ तर्कवाक्य हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पदों (Terms) के तार्किक लक्षण दें।
मनुष्य, राम, ईमानदारी, अन्धापन, लाल, जंगल, हजारीबाग का जंगल, सभ्यता, भारत का वर्तमान राष्ट्रपति, बिहार के राज्यपाल या बिहार के मुख्यमंत्री, सरकार, धर्म मानवता एवं महाविद्यालय।
उत्तर:
पदों के तार्किक लक्षण (Logical character of Terms):

मनुष्य (Man):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एक शब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक।

राम (Ram):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एक शब्दात्मक, व्यक्तिवाचक, असमूहवाचक, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक पद।

ईमानदारी (Honesty):
पदयोग्य एवं एकार्थक शब्द, एक शब्दात्मक, व्यक्तिवाचक, असमूहवाचक, निश्चित, भाववाचक, अभावात्मक, स्वतंत्र एवं निःस्वभाववाचक पद।

अन्धापन (Blindness):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एकशब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, पर्युदासक (Privative), सम्बद्ध (Relative) तथा स्वभाववाचक पद।

लाल (Red):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एकशब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र तथा स्वभाववाचक पद।

जंगल (Forest):
पदयोग्य एवं एकार्थक शब्द, एक शब्दात्मक, जातिवाचक, समूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक पद।

हजारीबाग का जंगल (The Forest of Hazaribagh):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, अनेक शब्दात्मक, व्यक्तिवाचक, समूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक पद।

सभ्यता (Civilization):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एकशब्दात्मक, समूहवाचक, जातिवाचक, अनिश्चित, भाववाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक पद।

भारत का वर्तमान राष्ट्रपति (The Present President of India):
पदयोग्य एवं एकार्थक शब्द, अनेक शब्दात्मक, व्यक्तिवाचक, असमूहवाचक, निश्चित द्रव्यवाचक, भावात्मक, सापेक्ष एवं स्वभाववाचक पद।

बिहार के राज्यपाल या बिहार के मुख्यमंत्री (The Governor or Bihar of The Chief Minister of Bihar):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, अनेकशब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक सापेक्ष एवं स्वभाववाचक पद।

सरकार (Government):
पदयोग्य एवं अनेकार्थक शब्द, एकशब्दात्मक, जातिवाचक, समूहवाचक, अनिश्चित, भाववाचक, भावात्मक, स्वतंत्र तथा स्वभाववाचक पद।

धर्म (Religion):
एकशब्दात्मक, एकार्थक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित, भाववाचक, भावात्मक, निरपेक्ष एवं गुणवाचक।

मानवता (Humanity):
एकार्थक एकशब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित वस्तुवाचक, निरपेक्ष, भावात्मक, गुणवाचक।

महाविद्यालय (College):
सरत, एकार्थक, जातिवाचक, समूहवाचक, निश्चित, वस्तुवाचक, भावात्मक, निरपेक्ष और गुणवाचक।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्यों को तार्किक रूप में रूपान्तरण करें तथा उनके गुण और परिमाण को निर्धारित करें।
(a) All good writers are not good speakers.
सभी अच्छे लेखक अच्छे वक्ता नहीं हैं।

(b) The educated alone are fit to vote.
शिक्षित मात्र वोट देने के योग्य हैं।

(c) All but two were killed.
दो को छोड़कर सभी मारे गये।

(d) Am I your servant?
क्या मैं तुम्हारा नौकर हूँ?
उत्तर:
(a) L.F. – Some good writers are not good speaker. – O
तार्किक रूप-कुछ अच्छे लेखक अच्छे वक्ता नहीं हैं। – O

गुण-निषेधात्मक एवं परिमाण:
अंशव्यापी, अतः यह अंशव्यापी निषेधात्मक तर्कवाक्य है जिसे – O वाक्य कहते हैं।

(b) L.F. – All who are fit to vote are educated – A.
तार्किक रूप – सभी जो वोट देने के योग्य हैं शिक्षित हैं। – A

गुण:
भावात्मक एवं परिमाण-पूर्णव्यापी। अतः यह तर्कवाक्य पूर्णव्यापी भावात्मक है जिसे हम ‘A’ तर्कवाक्य से जानते हैं।

(c) L.F. – Some persons are such who were killed – I.

तार्किक रूप:
कुछ लोग ऐसे हैं जो मारे गये – A

गुण:
भावात्मक एवं परिमाण-अंशव्यापी, अतः यह तर्कवाक्य अंशव्यापी भावात्मक है जिसे हम ‘I’ तर्कवाक्य से जानते हैं।

(d) L.F. – I am not your servant – E.
तार्किक रूप-मैं तुम्हारा नौकर नहीं हूँ। – E

गुण:
निषेधात्मक एवं परिमाण पूर्णव्यापी। अतः यह तर्कवाक्य पूर्णव्यापी निषेधात्मक है जिसे हम ‘E’ तर्कवाक्य से जानते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वाक्यों को तार्किक रूप में रूपान्तरित करें तथा उनमें व्याप्त पदों को बताएँ।
(a) All but one have succeeded.
एक को छोड़कर सभी सफल हुए।

(b) Graduates alone are eligible.
स्नातक मात्र वरणीय है।

(c) All honest persons are not wise.
सभी ईमानदार व्यक्ति बुद्धिमान नहीं हैं।

(d) Am I a god?
क्या मैं ईश्वर हूँ?

(e) Logic students are mostly intelligent.
तर्कशास्त्र के छात्र बहुधा तेज होते हैं।

(f) Few men are rich.
नहीं के बराबर मनुष्य धनी होते हैं।

(g) The educated alone are fit to vote.
शिक्षित मात्र वोट के योग्य हैं

(h) Enemy is never reliable.
शत्रु कभी विश्वसनीय नहीं है।

(i) Birds have wings.
पक्षियों के पंख होते हैं।
उत्तर:
(a) L.F. – Some persons are such who have succeeded – I.

तार्किक रूप:
कुछ लोग ऐसे हैं जो सफल हुए हैं – I यह ‘I’ तर्कवाक्य है। इसलिए इसका उद्देश्य पद persons (लोग) और विधेय पद ‘Such who have succeeded’ (जो सफल हुए हैं) कोई भी व्याप्त नहीं है।

(b) L.F. – All eligible persons are graduates – A.

तार्किक रूप:
सभी वरणीय व्यक्ति स्नातक हैं। – A
यह ‘A’ वाक्य है अतः इसके उद्देश्य पर eligible persons (वरणीय व्यक्ति) – व्याप्त (distributed) है।

(c) L.F. – Some persons are not wise – O.

तार्किक रूप:
कुछ ईमानदार व्यक्ति बुद्धिमान नहीं है। – O
यह ‘O’ तर्कवाक्य है। इसलिए इसका विधेय wise (बुद्धिमान) व्याप्त है।

(d) L.F. – I am not a God – E.

तार्किक रूप:
मैं ईश्वर नहीं हूँ। – E
यह ‘E’ तर्कवाक्य है, अतः इसका उद्देश्य I (मैं) एवं विधेय पद God (ईश्वर) दोनों व्याप्त हैं।

(e) L.F. – Some logic students are intelligent – I.

तार्किक रूप:
कुछ तर्कशास्त्र के छात्र तेज हैं – I
यह ‘I’ तर्कवाक्य हैं, अतः इसका उद्देश्य ‘logic students’ (तर्कशास्त्र के छात्र) तथा विधेय intelligent (तेज) दोनों अव्याप्त (undistributed) हैं।

(f) L.F. – Some men are not rich – O.

तार्किक रूप:
कुछ मनुष्य धनी नहीं हैं। – O
यहाँ ‘O’ तर्कवाक्य में उद्देश्य पद ‘men’. (मनुष्य) अव्याप्त तथा विधेय पद ‘rich’ (धनी) – व्याप्त है।

(g) L.F. – All who are fit to vote are educated – A.

तार्किक रूप:
सभी जो वोट देने के योग्य हैं, शिक्षित हैं। – A
यहाँ ‘A’ तर्कवाक्य में उद्देश्य पद ‘who are fit to vote’ (जो वोट देने योग्य हैं) व्याप्त तथा विधेय पद ‘educated’ (शिक्षित)-अव्याप्त हैं।

(h) L.F. – No enemy is reliable – E.

तार्किक रूप:
कोई शत्रु विश्वसनीय नहीं हैं। – E.
इसे ‘E’ तर्कवाक्य में उद्देश्य पद enemy (शत्रु) व्याप्त तथा विधेय पद reliable (विश्वसनीय) भी व्याप्त हैं।

(i) L.F. – All birds are creatures which have wings – A.
तार्किक रूप-सभी पक्षी एक जीव हैं जिसे पंख होते हैं। – A
यह ‘A’ तर्कवाक्य है। अतः इसके उद्देश्य पद bird (पक्षी) व्याप्त है तथा विधेय पद creatures which have wings अव्याप्त हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 10.
“All swans are not white” इस वाक्य की सत्यता (truth) एवं असत्यता (falsity) से संभव अनुमान निकालें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य
इस तालिका में T या t = true (सत्य), F या f = false (असत्य) तथा d = doubtful (संदेहात्मक) है।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित वाक्यों के विपरीत (Contrary), अनुविपरीत (Subcontrary), उपाश्रित (Sub-altern) एवं व्याघातक (Contradictory) बताएँ।
(a) Each man is mortal
प्रत्येक मनुष्य मरणशील है।

(b) Only intelligent student can answer this question.
केवल तेज विद्यार्थी ही इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं।
उत्तर:
(a) L.F. – All men are mortal – A.
इसका, Contrary – No men are mortal – E.
Sub – Contrary – A का
Sub – Contrary नियमानुसार नहीं होता है।
Sub – altern – Some men are mortal – I.
Contradictory – Some men are not mortal – O

(b) L.F. – No non – intelligent students are such who can answer this question – E इसका,

विपरीत:
All non – intelligent students are such who can answer this question – A.

व्याघातक:
Some non – intelligent students are such who can answer this questions – I.

उपाश्रित:
Some non – intelligent students are not such who can answer this questions – O.

अनुविपरीत:
E का अनुविपरीत नियमानुसार संभव नहीं है।

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प्रश्न 12.
वाक्यों के विरोध के आधार पर निम्नलिखित वाक्यों से सभी संभव अनुमान निकालें।
(a) Men are never perfect.
मनुष्य कभी पूर्ण नहीं होते हैं।

(b) Poets are generally poor.
कवि सामान्यतः गरीब होते हैं।
उत्तर:
(a) L.F. – No men are perfect – E.
यदि यह तर्कवाक्य सत्य है तो इसका,

Contrary (विपरीत):
All men are perfect – A – असत्य है।

Subcontrary (उपविपरीत) नियमानुसार संभव नहीं है।

Subalterm (उपाश्रित) Some men are not perfect. – 0 – सत्य है।

Contradictory (व्याघाती):
Some men are perfect – I – असत्य होगा।

(b) L.F. – Some poets are poor – I.
यदि यह तर्कवाक्य सत्य है तो इसका, विपरीत-नियमानुसार संभव नहीं है।
अनुविपरीत – Some poets are poor – O – संदेहात्मक होगा।

उपाश्रयण:
All poets are poor – A – संदेहात्मक होगा।
व्याघाती – No poets are poor – E – असत्य होगा।

प्रश्न 13.
पद से आप क्या समझते हैं? ‘शब्द’ और ‘पद’ में क्या अन्तर हैं?
उत्तर:
तर्कशास्त्र का संबंध अनुमान से है और अनुमान की जड़ में पद है। इन्हीं पदों से तार्किक वाक्य और तार्किक वाक्यों से अनुमान बनता है अर्थात् पद अनुमान की इकाई है, आरम्भ बिन्दु (Starting point) है। पद को अंग्रेजी में Term कहते हैं। यह Term शब्द ग्रीक भाषा के Terminus का छोटा रूप है।

Terminus का अर्थ होता है – अन्त, किनारा या छोर। इसी शब्द के अर्थ के आधार पर ‘पद’ की परिभाषा यह कहकर दी जाती है कि वह शब्द पद है जो वाक्य के छोर पर रहता है। वाक्य में दो छोर होते हैं एक छोर पर उद्देश्य रहता है और दूसरे छोर पर विधेय। जैसे-राम मरणशील है। इसमें राम और मरणशील क्रमशः उद्देश्य और विधेय हैं तथा एक छोर पर राम है और दूसरे छोर पर मरणशील।

अतः पद के संबंध में कहा गया है “Term is a word or combination of words which by itself is capable of being used as subject or predicate of a Logical proposition.” As Ram is mortal. अर्थात जो शब्द या शब्द समूह किसी तार्किक वाक्य में उद्देश्य या विधेय की तरह व्यक्त किया जा सके उसे पद कहते हैं।

जैसे – ‘राम मरणशील है’ इसमें राम एक पद है तथा मरणशील दूसरा पद है। इसके व्याकरण ‘राम’ को उद्देश्य तथा ‘मरणशील’ शब्द को विधेय कहते हैं। लेकिन बहुत से ऐसे भी शब्द हैं जिन्हें हम तार्किक वाक्य में उद्देश्य या विधेय के रूप में प्रयुक्त नहीं कर सकते हैं। इसलिए वे पद नहीं हैं। इससे स्पष्ट पता चलता है कि सभी शब्द पद नहीं है परन्तु जितने भी पद हैं वे सभी शब्द हैं। तार्किक दृष्टि से शब्द को तीन भेद बताये गये हैं।

1. पदयोग्य (Categorematic):
पदयोग्य शब्द वे शब्द हैं जो स्वतंत्र रूप से किसी तार्किक वाक्य के उद्देश्य या विधेय बन सकते हैं। जैसे राम, पुस्तक, नदी, गाय आदि। किसी भी तार्किक वाक्य का उद्देश्य या विधेय बताया जा सकता है। यथा-राम सुन्दर है। पुस्तक अच्छी है। नदी गहरी है। राम की गाय अच्छी है। अर्थात् ये सभी पदयोग्य शब्द हैं।

2. पदसंयोज्य (Syn-Categorematic):
शब्द-ये वैसे शब्द हैं जो स्वयं किसी तार्किक वाक्य में उद्देश्य या विधेय नहीं बन सकते हैं किन्तु किसी दूसरे पदयोग्य शब्द की सहायता से बन जाते हैं, जैसे-के, का, पर, में, ने इत्यादि शब्द पदयोग्य हैं। जैसे–मोहन का घोड़ा। इसमें मोहन और घोड़ा के बीच ‘का’ प्रयोग किया गया है। उसी तरह अंग्रेजी में At, on. by, since इत्यादि।

3. पदयोग्य (A-categorematic):
ये वे शब्द हैं जो न तो स्वतंत्र रूप से और न किसी पद की सहायता से ही किसी तार्किक वाक्य के उद्देश्य या विधेय के स्थान पर प्रयोग हो सकते हैं। अतः पदयोग्य शब्द पद नहीं है। जैसे – विस्मयादिबोधक शब्द हाय, अरे, हे, अहा आदि शब्द हैं। अतः पदयोग्य शब्द ही शुद्ध रूप से पद हैं। इसके अलावा पदसंयोज्य से भी पद बनाये जा सकते हैं, परन्तु पदयोग्य शब्द ही शुद्ध रूप से पद हैं। इसके अलावा पदसंयोज्य से भी पद बनाये जा सकते हैं, परन्तु पदयोग्य शब्द कभी भी पद नहीं कहे जा सकते हैं। अतः पद का क्षेत्र शब्द के क्षेत्र से संकुचित है।

शब्द और पद में निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं –

  • सभी पद शब्द हैं किन्तु सभी शब्द पद नहीं है (All terms are words but all words are not terms)
  • पद अनुमान की इकाई है किन्तु शब्द व्याकरण की इकाई है। एक पद में अनेक शब्द भी हो सकते हैं।
  • व्याकरण की दृष्टि से शब्दों को संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण आदि में विभक्त करते हैं, लेकिन तार्किक दृष्टि से शब्दों को पदयोग्य, पदसंयोज्य एवं पदायोग्य में विभक्त किया गया है।
  • पद एवं शब्द दोनों से ही मानसिक क्रियाओं की अभिव्यक्ति होती है। लेकिन पद से मानसिक विचार मात्र ही व्यक्त होते हैं जबकि शब्द के द्वारा मन के अनेकानेक भाव व्यक्त होते हैं। जैसे – विस्मय की भावना को व्यक्त करने के लिए ओह, अरे, हाय, अहा, शब्द पद नहीं कहे जा सकते हैं।
  • सभी पद किसी तार्किक वाक्य के उद्देश्य और विधेय के रूप में व्यक्त होने की क्षमता रखते हैं, परन्तु सभी शब्दों में ऐसी क्षमता नहीं है। पद सार्थक होता है किन्तु शब्द निर्रथक होता है। इस तरह पद और शब्द में तार्किकों ने अंतर किया है।

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प्रश्न 14.
किसी पद की वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता से क्या तात्पर्य है? वे किस प्रकार परस्पर सम्बन्धित है?
उत्तर:
Denotation (वस्तुवाचकता) एवं Connotation (गुणवाचकता) ये दोनों लैटिन भाषा के शब्द हैं। Denotation दो शब्दों से बना है। वे हैं – De जिसका अर्थ है Down और ‘Noto’ जिसका अर्थ है ‘To mark down’ अर्थात् निर्देश करना। इसी प्रकार connotation में ‘con’ जिसका अर्थ है ‘with’ और ‘noto’ जिसका अर्थ है ‘to mark’ अतः connota tion का अर्थ हुआ To mark with अर्थात् सामान्य एवं अनिवार्य गुणों को व्यक्त करना। इस तरह हम देखते हैं कि किसी भी पद में दो बातें व्यक्त करने की शक्ति रहती है। पहली बात यह है कि वह अपने क्षेत्र अर्थात् व्याप्ति को व्यक्त करती है अर्थात् उसकी वस्तुवाचकता कितनी है। दूसरी बात है कि उस पद की गुणवाचकता क्या है।

पदों की वस्तुवाचकता (Denotation of term):
किसी पद के क्षेत्र से हमारा मतलब यह है कि उस पद की व्याप्ति क्या है? पदों के क्षेत्र को ही उसकी वस्तुवाचकता कहते हैं। कहा भी गया है “By the denotation of a term we mean the number of objects to which the term is applicable in the same sense.” अर्थात् वस्तुवाचकता से उन व्यक्तियों का बोध होता है जिनके लिए वह पद समान अर्थ में प्रयोग किया गया है। जैसे जब ‘मनुष्य’, ‘छात्र’, ‘गाय’ पद कहते हैं तो उस पद से सम्पूर्ण मानव जाति, छात्र समुदाय की जाति का बोध होता है। यही मनुष्य, छात्र, गाय, सभी मनुष्यों, सभी छात्रों एवं सभी गायों के लिए समान रूप से प्रयोग किया जाता है। वस्तुवाचकता को विस्तार, परिधि या क्षेत्र (Extension, width or scope) भी कहा जाता है।

पदों की गुणवाचकता (connotation of term):
कोई पद अपने क्षेत्र, विस्तार के साथ ही साथ अपने सर्वश्रेष्ठ एवं अनिवार्य गुणों (Common and essential qualities) को भी बतलाता है। यही common and essential qualities किसी पद की गुणवाचकता कहलाती है। जैसे-‘मनुष्य’ पद पर विचार करते हैं तो इसमें विवेकशीलता एवं पशुता ये दो गुण इस तरह पाये जाते हैं जो मनुष्य के लिए सर्वनिष्ठ तथा अनिवार्य हैं। ये दोनों गुण हो ‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता है। इसी से कहा गया है “By the connotation of a term we mean the common essential attributes possessed by all the objects to which the term is applicable in the same sense.” अर्थात् गुणवाचकता द्वारा उन सर्वनिष्ट एवं अनिवार्य गुणों का बोध होता है जो उस पद द्वारा निर्दिष्ट व्यक्तियों में समान रूप से वर्तमान होते हैं। गुणवाचकता को पदत्व, गहराई या सामर्थ्य आदि भी कहते हैं।

वस्तुवाचकता और गुणवाचकता के बीच संबंध (Relation between Denotation and Connotation):
वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता में अन्योन्याश्रय संबंध देखा गया है जिसे Relation of interdependence कहते हैं। अर्थात् दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं। दोनों में दो प्रकार के संबंध पाये जाते हैं।

(क) अन्योन्याश्रय संबंध (Relation of Interdepence)
(ख) प्रतिलोम संबंध (The Inverse Relation)

(क) अन्योन्याश्रय संबंध:
परस्पर निर्भरता के संबंध को अन्योन्याश्रय संबंध कहते हैं। इसका अर्थ है कि वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता एक-दूसरे पर निर्भर करती है। अर्थात् (Denotation depends upon connotation and connotation depends upon Deno tation)

गुणवाचकता सामान्य गुण होती है जिसका पता वर्ग के व्यक्तियों या वस्तुओं के निरीक्षण से ही लग सकता है। वर्ग में व्यक्ति या वस्तु उस पद की वस्तुवाचकता है। पशुता और मरणशीलता मनुष्य के सामान्य एवं आवश्यक गुण हैं। सामान्य का अर्थ ही है कि जो सबों में हों। इस तरह गुणवाचकता का पता लगाने के लिए वस्तुवाचकता पर निर्भर करना पड़ता है। इसी तरह वस्तुवाचकता भी गुणवाचकता पर निर्भर करती है।

यथा, मान लिया कि हम लोगों के सामने एक विचित्र-सा जानवर लाया जाता है, जिसे हम लोग नहीं पहचानते हैं। नहीं पहचानने का अर्थ है कि वह किस पद की वस्तुवाचकता है इसे हम नहीं जानते हैं। इतने में ही देखते हैं कि कुत्ता के सभी सामान्य एवं आवश्यक लक्षण वाला जानवर मौजूद है। हमलोग तुरंत कह देते हैं कि वह कुत्ता है। अर्थात् वह जानवर ‘कुत्ता’ पद की वस्तुवाचता है। इस तरह सामान्य एवं आवश्यक लक्षण यानी गुणवाचकता से वस्तुवाचकता जानी जाती है। इस तरह वस्तुवाचकता भी गुणवाचकता पर निर्भर करती है।

(ख) प्रतिलोम संबंध (The Inverse Relation):
इस संबंध का अर्थ है कि एक के बढ़ने से दूसरा घटता है और एक के घटने से दूसरा बढ़ता है। इसे निम्नलिखित ढंग से व्यक्त कर सकते हैं।

(a) जब वस्तुवाचकता बढ़ती है तो गुणवाचकता घटती है।
(If denotation increases, connotation decreases)

(b) जब वस्तुवाचकता घटती है तो गुणवाचकता बढ़ती है।
(If denotation decreases, connotation increases)

(c) जब गुणवाचकता बढ़ती है तो वस्तुवाचकता घटती है।
(If connotation increases, denotation decreases)

(d) जब गुणवाचकता घटती है तो वस्तुवाचकता बढ़ती है।
(If connotation decreases, denotation increases)

इन चारों की विस्तृत व्याख्या निम्नलिखित हैं –

(a) जब वस्तुवाचकता बढ़ती है तो गुणवाचकता घटती है, जैसे – पद-मनुष्य, वस्तुवाचकता सभी मनुष्य गुणवाचकता – पशुता, विवेकशीलता।

यहाँ मनुष्य पद की वस्तुवाचकता संसार के सभी मनुष्यों से है और गुणवाचकता पशुता + विवेकशीलता है। अब यदि मनुष्य के स्थान पर पशु को कह दिया जाय तो मनुष्य से पशु कह देने पर वस्तुवाचकता होगी पशु समुदाय जो मनुष्य समुदाय से कहीं अधिक है। इसलिए मनुष्य से पशु कह देने पर वस्तुवाचकता बढ़ जाती है। लेकिन पशु का सामान्य एवं आवश्यक गुण सिर्फ पशुता है इसलिए गुणवाचकता से घटकर सिर्फ पशुता रह जाती है। यहाँ वस्तुवाचकता के बढ़ने से गुणवाचकता घटती है।

(b) जब वस्तुवाचकता घटती है तो गुणवाचकता बढ़ती है।
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

यहाँ यदि सभी ‘मनुष्य’ से घटकर सिर्फ ‘विद्वान’ कर दिया जाए तो वस्तुवाचकता घट जाती है। क्योंकि विद्वान मनुष्य की संख्या मनुष्य की संख्या की अपेक्षा बहुत कम है। लेकिन विद्वान मनुष्य के तीन सामान्य आवश्यक गुण होते हैं। मनुष्य होने के नाते पशुता + विवेकशीलता एवं विद्वान होने के नाते विद्वत्ता। इस तरह मनुष्य की गुणवाचकता जहाँ दो ही है (पशुता + विवेकशीलता) वहाँ विद्वान मनुष्य की गुणवाचकता तीन हो जाती है (पशुता + विवेकशीलता + विद्वत्ता) इस तरह वस्तुवाचकता के घटने से गुणवाचकता में वृद्धि हो जाती है। जब गुणवाचकता बढ़ती है तो वस्तुवाचकता घटती है।

(c)
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यहाँ ‘मनुष्य’ पद है जिसमें यदि पशुता और विवेकशीलता में बुद्धिमत्ता जोड़ दी जाती है तो गुणवाचकता बढ़ जाती है। ये तीनों गुण बुद्धिमान मनुष्य के हैं। बुद्धिमान मनुष्यों की संख्या मनुष्यों की संख्या की अपेक्षा बहुत कम है। इस तरह गुणवाचकता के बढ़ने से वस्तुवाचकता घट जाती है।

(d) जब गुणवाचकता घटती है तो वस्तुवाचकता बढ़ती है।

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

यहाँ मनुष्य पद में पशुता और विवेकशीलता दोनों हैं लेकिन विवेकशीलता घटा देने पर गुणवाचकता घट जाती है। ‘पशुता’ पशुओं की गुणवाचकता है। अतः पशुता से पशुओं का बोध होता है जो मनुष्य की अपेक्षा बहुत अधिक है। अतः गुणवाचकता के घटने से वस्तुवाचकता में वृद्धि होती है।

इस तरह नियम के रूप में यह सिद्ध हो जाता है कि वस्तुवाचकता और गुणवाचकता में प्रतिलोम संबंध (inverse relation) है।

विपरीत वैषम्य संबंध के अपवाद
विपरीत वैषम्य संबंध सामान्य नियम नहीं है। इसके निम्नलिखित अपवाद भी हैं –

(क) विपरीत वैषम्य का संबंध वैसे पदों में लागू नहीं होता है जिसमें जाति और उपजाति का संबंध नहीं हो। जैसे उजली गाय और काली गाय के बीच यह नियम लागू नहीं होगा। मनुष्य और वृक्ष में भी यह संबंध लागू नहीं होता है। क्योंकि इसमें जाति उपजाति का संबंध नहीं है।

(ख) यदि किसी पद की गुणवाचकता में ऐसा गुणा बढ़ा दिया जाए जो सबों में पाया जाता है तो उस पद की वस्तुवाचकता में कमी नहीं आएगी। यथा ‘मनुष्यता’ की गुणवाचकता में पशुता और विवेकशीलता में ‘मरणशीलता’ जोड़ दी जाए तो इससे मनुष्य की वस्तुवाचकता में कमी नहीं होगी।

(ग) जन्म लेने से करोड़ों लोग साल में बढ़ जाते हैं जिससे मनुष्य की वस्तुवाचकता में वृद्धि हो जाती है। परन्तु इससे मनुष्य पद की गुणवाचकता में कमी नहीं होती है। यहाँ पर भी विपरीत वैषम्य का संबंध लागू नहीं होता है।

आलोचना:
(क) कुछ आलोचकों के अनुसार पद की वस्तुवाचकता और गुणवाचकता में जो घटना और बढ़ना होता है वह वास्तविक ज्ञान नहीं होता है बल्कि हमारे विचार क्षेत्र में होता है। जैसे – मनुष्य की गुणवाचकता में से किसी गुण को घटा लेते हैं या किसी गुण को जोड़ देते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वास्तव में मनुष्य की गुणवाचकता में वृद्धि या हास होता है। यह बढ़ना और घटना हमारे दिमाग में है।

(ख) विपरीत वैषम्य संबंध में गुणवाचकता का वैज्ञानिक अर्थ नहीं लिया गया है। जिसके घटने और बढ़ने का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता है। ऊपर जिन उदाहरणों में जिन गुणों को घटाया बढ़ाया गया है, वे साधारण गुण हैं न कि गुणवाचकता। अतः गुणवाचकता का वैज्ञानिक अर्थ जोड़ने से गुणवाचकता और वस्तुवाचकता में कमी-बेसी नहीं होगी।

(ग) वस्तुवाचकता और गुणवाचकता में हास किसी गणितीय अनुपात में नहीं होता है। किसी एक गुण को जोड़ने से वस्तुवाचकता में बहुत कमी होती है और किसी एक गुण के जोड़ने से वस्तुवाचकता में थोड़ी कमी होती है। जैसे-मनुष्य की वस्तुवाचकता में कालापन गुण जोड़ने से मनुष्य की वस्तुवाचकता में उतनी कमी नहीं होती जितनी कमी पी-एच. डी. जोड़ने से होती है। काले मनुष्य दुनिया में बहुत है। किन्तु पी-एच.डी बहुत कम हैं।

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प्रश्न 15.
पदों का वर्गीकरण उदाहरण सहित करें।
उत्तर:
पदों का वर्गीकरण तार्किकों ने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से किया है। इस तरह पदों के वर्गीकरण के समय नौ (9) दृष्टिकोण को अपनाया गया है और उसी के अनुसार पदों का वर्गीकरण भी किया गया है। जैसे – एक ही पद ‘राम’ पदों की बनावट की दृष्टि से सरल है और अर्थ की दृष्टि से एकार्थक है।

1. बनावट (Construction) की दृष्टि से पद दो हैं –
(क) सरल (Simple) (ख) मिश्रित (Composite)

2. अर्थ (Meaning) के अनुसार
(क) एकार्थक (Univocal) (ख) अनेकार्थक. (Equivocal)

3. वचन (Number) के अनुसार
(क) व्यक्तिवाचक (Singular) (ख) जातिवाचक (General)

4. संगठन (Collection) के अनुसार
(क) समूहवाचक (Collective) (ख) असमूहवाचक (Non-Collective)

5. स्थिति (Certainty) के अनुसार
(क) निश्चित (Definite) (ख) अनिश्चित (Indefinite)

6. अस्तित्व (Exitence) के अनुसार
(क) वस्तुवाचकता (Concrete) (ख) भाववाचक (Abstract)

7. स्वभाव (Quality) के अनुसार
(क) भावात्मक (Positive) (ख) अभावात्मक (Negative) (ग) विरहात्मक (Privative)

8. संबंध (Relation) के अनुसार
(क) निरपेक्ष (Absolute) (ख) सापेक्ष (Relative)

9. गुण (Connotation) के अनुसार
(क) गुणवाचक (Connotative) (ख) अगुणवाचक (Non-Connotative)

1. बनावट (Construction) की दृष्टि से पद के दो भेद हैं –

(क) सरल (Simple):
जिस पद में केवल एक ही शब्द होता है उसे सरल पद कहते हैं, जैसे-राम तेज है। इसमें राम और तेज सरल पद है।

(ख) मिश्रित (Composite):
यह वह पद है जो एक से अधिक शब्दों के मिश्रण से बना है, जैसे मगध विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति सज्जन हैं। इसमें मगध विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति एक ही पद है जिसमें अनेक शब्द (मगध विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति) हैं। अतः यह पद मिश्रित है किन्तु सज्जन पद सरल है। मिश्रित पद पदयोग्य तथा पदसंयोज्य से बना रहता है।

2. अर्थ (Meaning) के अनुसार पद दो हैं –
(क) एकार्थक (Univocal):
जिस पद का एक ही अर्थ होता है, उसे एकार्थक पद कहते हैं, जैस-मनुष्य, पुस्तक, नदी, घोड़ा।

(ख) अनेकार्थक (Equivocal):
जिस पद में एक से अधिक अर्थ का बोध होता है उसे अनेकार्थक पद कहते हैं, जैसे-तीन, कनक, सैंधव, आर्य, Sound, light, foot, head, page वगैरह। तीर का अर्थ वाण और नदी का किनारा होता है, इसी तरह कनक का अर्थ सोना और धतूरा है। Sound (आवाज-ठोस), Light (हल्का-प्रकाश), Page (पृष्ठ-नौकर) आदि से है।

3. वचन (Number):
वचन के अनुसार पद के दो भेद हैं –
(क) व्यक्तिवाचक (Singular):
वह पद जो सिर्फ एक ही वस्तु का बोध कराने के लिए व्यवहृत किया जाए वह व्यक्तिवाचक पद कहलाता है। जैसे-राम, पटना से एक ही का बोध होता है। इसमें नामवाचक शब्द व्यक्तिवाचक पद होते हैं।

(ख) जातिवाचक (General):
जातिवाचक पद वह पद है जो अपने वर्ग के एक से अधिक पदार्थों के लिए व्यवहृत किया जा सके। यथा-पुस्तक, नदी, आम। जातिवाचक पद अपने सम्पूर्ण जाति के लिए बोधक है। परन्तु जब किसी जातिवाचक पद के साथ यह, वह (This, That) जोड़ देते हैं तो वह व्यक्तिवाचक पद बन जाता है। जैसे–पुस्तक जातिवाचक पद है किन्तु यह पुस्तक या वह पुस्तक व्यक्तिवाचक पद हो जाता है। इसी प्रकार कभी-कभी व्यक्तिवाचक नाम भी जातिवाचक के रूप में व्यवहृत किये जाते हैं। यथा “प्रत्येक युग में गाँधी होते हैं”- यहाँ ‘गाँधी’ का अर्थ ‘महापुरुष’ है। अतः यहाँ ‘गाँधी’ जातिवाचक पद है, व्यक्तिवाचक नहीं।

4. संगठन (collection) के अनुसार पद के दो भेद हैं –
(क) समूहवाचक पद (Collective term):
वह पद जिससे किसी समूह या जत्थे का बोध होता है, उसे समूहवाचक पद कहते हैं। जैसे-सेना, क्लास, मेला, सभा, माला, वन आदि। सिपाहियों के समूह के सेना, वृक्षों के समूह से वन तथा फूलों के समूह से माला का बोध होता है।

समूहवाचक पद भी दो तरह के हैं –

  • व्यक्ति समूहवाचक पद (Singular Collective term) तथा
  • जाति समूहवाचक पद (General Collective term)

व्यक्ति समूह वाचक से किसी निश्चित समूह का बोध होता है। जैसे-रामलखन सिंह यादव कॉलेज पुस्तकालय। केवल पुस्तकालय कह देने से जाति समूहवाचक पद बन जाता है, क्योंकि इससे सभी पुस्तकालयों का बोध नहीं होता है। असमूहवाचक पद वह पद है जिससे किसी समूह का बोध न हो, जैसे-राम, हरि, पटना, मनुष्य। चूँकि ये पद वर्ग के अलग-अलग व्यक्तियों एवं वस्तुओं के लिए भी व्यवहृत होते हैं इसलिए इन्हें व्यक्तिवाचक कहा जाता है।

5. स्थिति (Certainty):
स्थिति के अनुसार पद दो माने जाते हैं –

(क) निश्चित पद (Definite term):
यह वह पद है जिसके द्वारा किसी निश्चित वस्तु या व्यक्ति या वर्ग का बोध होता हो। जैसे-राम, पटना, यह मनुष्य, वह पशु। इसके अलावा सामान्य पद जिनसे सम्पूर्ण वर्ग का बोध होता है वे सभी निश्चित पद होते हैं, जैसे-सभी लड़के उत्साही हैं या कोई मनुष्य ईश्वर नहीं है।

(ख) अनिश्चित पद (Indefinite term):
वे पद जिनसे किसी व्यक्ति या वर्ग की निश्चितता नहीं मालूम पड़ती है, अनिश्चित पद कहलाते हैं। जैसे-कुछ लड़के, एक व्यक्ति, कोई आदमी। साधारणतया जातिवाचक पद या सामान्य पद प्रायः अनिश्चित ही हुआ करते हैं, जैसे – मनुष्य, आम, छात्र। इसके साथ-ही-साथ जितने अनन्त पद (Infinite terms) हैं वे सभी अनिश्चित पद हैं। जैसे – नहीं उजला (not white), नहीं लाल (not red) आदि।

6. अस्तित्व (Exitence) के अनुसार पद के दो भेद हैं –

(क) वस्तुवाचकता पद (Concrete term):
कहा गया है कि “A concrete term is the name of a thing” अर्थात् वस्तुवाचकता पद किसी वस्तु के नाम को कहते हैं। प्रत्येक में वस्तुवाचकता और गुणवाचकता प्रायः पाया जाता है। अर्थात् जितने भी विश्लेषण हैं वे सभी वस्तुवाचकता पद ही कहे जाएँगे क्योंकि विशेषणों से सिर्फ गुण का ही बोध नहीं होता है बल्कि वह अमुक वस्तु का भी संकेत करता है जिसमें वह गुण है, जैसे-लाल, पीला, ईमानदार से यह बोध होता है कि व्यक्ति है जो ईमानदार है। इस तरह इन पदों से गुण सहित वस्तु तथा गुणयुक्त व्यक्ति का बोध होता है। अर्थात् पद वस्तुवाचक है।

(ख) भाववाचक पद (Abstract Term):
भाववाचक पद गुणों के संग्रह का नाम है, जैसे-लाली, ईमानदारी, मनुष्यत्व, पीलापन। इन भाववाचक पदों का हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्षीकरण नहीं कर सकते हैं। लाली, ईमानदारी, सत्यता को किसी वस्तु या व्यक्ति से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। अतः जिसके अन्त में त्व, ता, पन, आवर, आहट आदि प्रत्यय लगे रहते हैं, उन्हें भाववाचक पद कहते हैं।

भाववाचक पद के भी दो पद हैं –

1. व्यक्ति भाववाचक पद (Singular abstract):
व्यक्ति भाववाचक पद उस पद को कहते हैं जिससे सिर्फ एक गुण का बोध होता है जैसे लाली, ईमानदारी, सफेदी। ये एक ही गुण को बताते हैं – लाली। इस तरह व्यक्ति भाववाचक पद है।

2. जाति भाववाचक पद (General abstract):
जिस पद से बहुत गुणों का बोध हो और वह पद उन गुणों में से प्रत्येक के लिए लागू होता हो उसे व्यक्ति भाववाचक पद कहते हैं, जैसे-रंग, धर्म, सद्गुण। यहाँ रंग से लाल, उजलापन, कालापन, नीलापन, हरापन का बोध होता है। इसी तरह धर्म से हिन्दुत्व, ईसाईत्व, इस्लामियत आदि का। अतः ये जाति भाववाचक पद हैं। भाववाचक पद व्यक्तिवाचक होते हैं या दोनों इसमें मतान्तर है।

भाववाचक पद व्यक्तिवाचक होते हैं या जातिवाचक (Are Abstract terms singu lar or general?):
इस प्रश्न को लेकर तर्कशास्त्रियों में मतभेद है। इस संबंध में चार तरह के विचार पाये जाते हैं –

1. कुछ लोग सभी भाववाचक पद को जातिवाचक मानते हैं। कई गुण बहुत से पदार्थ में पाया जाता है। इसलिए गुणवाचक पद जातिवाचक होते हैं जैसे ‘लाली’ का गुण दुनिया की बहुत-सी वस्तुओं में पाया जाता है। जैसे – कपड़ा, कलम, फूल, सेब आदि में। अतः लाली जातिवाचक पद है। लेकिन ऐसा विचार सर्वमान्य नहीं है। लाली एक गुण है, चाहे वह अनगिनत वस्तुओं में ही क्यों न पायी जाए। अतः ‘लाली’ जाति भाववाचक पद नहीं माना जा सकता है।

2. जेवेन्स जैसे तर्कशास्त्री का कहना है कि सभी भाववाचक व्यक्तिवाचक होते हैं। इनके अनुसार गुण एक ही होता है, परन्तु ये विभिन्न वस्तुओं में पाये जाते हैं। ईमानदारी एक गुण हैं, परन्तु विभिन्न व्यक्तियों में पायी जाती है। किन्तु इनके विचार भी पूर्ण सत्य नहीं है। इन्होंने उन पदों पर विचार ही नहीं किया जो तरह-तरह के गुणों को बतलाते हैं। जैसे-रंग, धर्म आदि। अतः रंग और धर्म को व्यक्तिवाचक पद मानना ठीक नहीं है।

3. कीनिज आदि विद्वानों का तर्क है कि भाववाचक पद के संबंध में व्यक्तिवाचक और जातिवाचक का प्रश्न उठाना ही निरर्थक है। पदों का वर्गीकरण एक सिद्धान्त से व्यक्तिवाचक और जातिवाचक में होता है और दूसरे सिद्धान्त से वस्तुवाचक और भाववाचक में होता है। दोनों वर्गीकरण के विभिन्न सिद्धान्त है। परन्तु यह मत भी युक्तिसंगत नहीं है।

4. मिल साहब का कहना है कि भाववाचक पद के व्यक्तिवाचक और जातिवाचक दोनों भेद होते हैं। जो भाववाचक ऐसे गुण को बतलाते हैं जो प्रकार और मात्रा में एक होते हैं, उन्हें व्यक्तिवाचक पंद कहते हैं, जैसे-सेब की लाली, दूध का उजलापन आदि। लेकिन जो भाववाचक ऐसे गुण को बतलाते हैं, जो या तो तरह-तरह के होते हैं या विभिन्न मात्राओं में होते हैं, उन्हें मिल साहब के अनुसार जाति भाववाचक पद कहते हैं।

रंग जाति-भाववाचक पद है, क्योंकि वह तरह-तरह के रंगों का बोध कराता है। लाली भी जाति भाववाचक पद है क्योंकि लाली में मात्रा का भेद होता है। जैसे गाढ़ा लाल, मध्यम लाल और फीका लाल आदि मात्रा के भेद बतलाते हैं। अतः मात्रा का भेद होने से जाति भाववाचक पद बन जाता है और मात्रा तथा प्रकार का भेद नहीं होने से यह व्यक्तिवाचक हो जाता है।

यही मिल साहब का विचार है। अतः निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि मिल साहब का विचार मात्रा वाला ठीक नहीं है। फिर भी जो पद तरह-तरह के गुणों का संकेत करता है, वह जाति भाववाचक पद होता है तथा रंग, पुष्प, धर्म आदि सभी पद व्यक्तिवाचक पद होते हैं, यथा-लाली, सफेदी, ईमानदारी आदि।

7. स्वभाव (Quality) के अनुसार पद तीन तरह के होते हैं –

(क) भावात्मक (Positive):
भावात्मक पद से किसी वस्तु या गुण के अस्तित्व का बोध होता है, जैसे-राम, गंगा, पटना, सत्यता। ये सभी किसी के व्यक्तित्व का बोध कराते हैं।

(ख) अभावात्मक (Negative):
अभावात्मक पद से किसी वस्तु या गुण के सिर्फ अभाव का बोध होता है। जैसे-अ-मनुष्य (not-man), अ-सुख (not-happy) आदि। प्रायः अभावात्मक ‘पद में निम्नलिखित प्रत्यय या उपसर्ग लगे रहते हैं-अ, हीन, अम्, निस, निर, रहित, शून्य-जैसे अनुपस्थिति, द्रव्यहीन, अस्तित्व, निस्संकोच, निर्लोभ, वृद्धि रहित, ज्ञान-शून्य।

भावात्मक और अभावात्मक पदों के संबंध में एक बात ध्यान देने की है कि कुछ पद ऐसे हैं जो आकार में भावात्मक मालूम पड़ते हैं किन्तु वास्तव में वे अभावात्मक हैं। कुछ पद ऐसे हैं जो देखने में अभावात्मक और यथार्थ में भावात्मक है। जैसे-राम बहरा है (श्रवणहीन)। कमरा खाली (भरा नहीं) है। गणेश अंधा (नेत्रहीन) है। सुदामा दरिद्र (निर्धन) है। इसी प्रकार doubt, capacity, ildeness, ignorance – ये सभी देखने में भावात्मक हैं परन्तु यथार्थ में अभावात्मक पद हैं।

इसी तरह आकार में अभावात्मक किन्तु वास्तव में भावात्मक पद है। जैसे – अधर्म (पाप) नहीं करना चाहिए। अप्रिय (बुरा) कार्य नहीं करना चाहिए। अरुचि (घृणा) है। इसके अलावा साधारणतया दो अभावात्मक अर्थ वाले पदों से भावात्मक अर्थ सूचित होता है। जैसे-वह अन्धा नहीं है। अर्थात् वह देख सकता है। यहाँ अन्धा और नहीं ये दो शब्द अभावात्मक अर्थ सूचित करते हैं और इसका अर्थ भावात्मक हो जाता है।

(ग) विरहात्मक (Privative):
विरहात्मक पद से वर्तमान में उन गुणों के अभाव का बोध होता है जो गुण किसी वस्तु में रह सकता है। जैसे-अंधा, लंगड़ा, गूंगा, बहरा, बाँझ। इस तरह वर्तमान में विरहात्मक.पद से अमुक गुण का अभाव मालूम होता है। परन्तु भविष्य में डॉक्टरी इलाज से उस खाये हुए गुण की पूर्ति हो सकती है। विराहात्मक पद में भावात्मक और अभावात्मक दोनों ही पदों के गुण युक्त देखते हैं।

इस प्रकार भावात्मक और अभावात्मक दोनों अर्थों को संकेत करने की वजह से विरहात्मक पद को भावात्मक और अभावात्मक पदों का केन्द्र बिन्दु कह सकते हैं। विरहात्मक पद से बने हुए भाववाचक पद अभावात्मक पद हो जाते हैं। जैसे-कंधा विरहात्मक पद है किन्तु अंधापन अभावात्मक पद है।

8. संबंध (Relation) की दृष्टि से पद दो तरह के होते हैं –

(क) निरपेक्ष पद (Absolute term):
निरपेक्ष पद जिस पद के गुण का बोध करता है, उस पद में गुण का अपना एक निश्चित अर्थ रहता है, जिस अर्थ को बिना किसी वस्तु की सहायता से ही समझा जा सकता है। अतः निरपेक्ष उस पद को कहते हैं जिनके अर्थ को समझने के लिए अन्य पद की सहायता नहीं लेने पड़े, यथा-पुस्तक, कलम, वृक्ष, पर्वत। ये सभी निरपेक्ष पद हैं।

(ख) सापेक्ष पद (Relative term):
सापेक्ष पद उस पद को कहते हैं जिसके अर्थ को समझने के लिए किसी दूसरे पद की सहायता लेने पड़े। जैसे-पिता का अर्थ तभी स्पष्ट होता है जब हम पुत्र पद की सहायता लेते हैं। पुत्र का ही पिता होता है। अतः पिता एक सापेक्ष पद है। इस तरह सापेक्ष पद जोड़ में होते हैं अर्थात् द्वन्द्व समास के रूप में होते हैं, यथा-पिता-पुत्र, पति-पत्नी, मालिक-नौकर, बड़ा-छोटा, नया-पुराना, पूरब-पश्चिम, स्त्री-पुरुष आदि। इस तरह सापेक्ष पद चार प्रकार के हैं –

  • सम्बन्ध सूचक-पति-पत्नी, भाई-बहन।
  • दिशा सूचक-पूरब-पश्चिम, ऊपर-नीचे।
  • समय सूचक-नया-पुराना, आगे-पीछे।
  • परिमाण सूचक-मोटा-पतला, हल्का-भारी। इसी तरह अभावात्मक पद निरपेक्ष पद ही हैं, जैसे-अ-सुख। इसी तरह विरहात्मक पद अंधा, लंगड़ा, गूंगा आदि सभी सापेक्ष पद हैं।

9. गुण (Connotation) के अनुसार पद दो तरह के हैं –

(क) गुणवाचक (Connotative):
गुणवाचक के संबंध में हो गया है कि “A conno tative term denotes things as well as connotes attributes.” अर्थात् गुणवाचक पद से गुण एवं वस्तु दोनों का बोध होता है। जैसे – मनुष्य। इसमें व्यक्ति के साथ ही साथ पशुता एवं विवेकशीलता दोनों का बोध होता है।

इसमें सामान्य पद उपाधिसूचक, व्यक्तिवाचक संज्ञा, विशेषणबोधक पद, व्यक्तिवाचक नाम जब जातिवाचक अर्थ में प्रयुक्त हों तथा भावात्मक, निषेधात्मक एवं विरहात्मक पद, जो अर्थहीन व्यक्तिवाचक नाम से सूचित नहीं करें, वे सभी गुणवाचक पद ही होते हैं। जैसे-मनुष्य पद, रंग, सदाचार, सूर्य, चक्र, भारत का वर्तमान राष्ट्रपति, काला, पीला, नीला, गाँधी, बुद्ध, नेपोलियन आदि।

(ख) अगुणवाचक (Non-connotative):
इस पद के संबंध में कहा गया है – Anon connotative term either denotes things or connotes attributes but not both. अर्थात् “अगुणवाचक पद वह है जो या तो वस्तु का बोध कराए या केवल गुण का ही बोध कराए, परन्तु दोनों का नहीं। जैसे-वर्गता, उज्जवलता। इनमें सीधे गुण का ही बोध होता है वस्तु का निर्देश नहीं होता।

इसी तरह व्यक्तिवाचक नाम, जैसे-राम, घटना आदि भी अगुणवाचक पद ही होते हैं। “मिल साहब का विचार है कि अगुणवाचक से या तो केवल subject का बोध हो या केवल attribute (गुण) का। किन्तु गुणवाचक पद वस्तु (subject) को निर्देश करने के साथ-साथ उसके गुण (attribute) का भी बोध कराता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 16.
विपरीत और व्याघाती पदों में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
दो पदों के बीच विरोध का संबंध तब होता है जब वे दोनों एक साथ सत्य नहीं हो सकते हैं, जैसे – ‘लाल और काला’। कोई वस्तु एक ही समय लाल और काला नहीं कही जा सकती है। अतः इन दोनों पदों में विरोध है। पदों के बीच विरोध दो प्रकार के होते हैं।

  1. विपरीत विरोध और
  2. व्याघाती विरोध।

जिन दो पदों में विपरीत विरोध होता है उन्हें विपरीत पद (contrary term) और जिनमें व्याघाती विरोध होता है उन्हें व्याघाती पद (contradictory term) कहते हैं।

विपरीत पद के निम्नलिखित लक्षण होते हैं –

(क) एक की सत्यता दूसरे की असत्यता बतलाती है:
विपरीत पदों में यदि एक सत्य होता है तो दूसरा अवश्य असत्य होता है। जैसे किसी वस्तु का लाल कहना सत्य है तो काला कहना असत्य होगा। लाल और काला में यदि एक सत्य है तो दूसरा असत्य है।

(ख) एक की असत्यता दूसरे की संदेहात्मक बतलाती है:
विपरीत पदों में यदि एक असत्य होता है तो दूसरा सत्य हो सकता है या असत्य। एक के असत्य होने से दूसरे के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते हैं। इसलिए दूसरा संदेहात्मक हो जाता है। जैसे लाल और काला में यदि लाल कहना असत्य है तो काला कहना सत्य भी हो सकता है और असत्य भी।

अर्थात् लाल नहीं होने पर कोई वस्तु काली हो सकती है या किसी अन्य रंग की भी हो सकती है। अर्थात् काला संदेहात्मक भी हो सकता है। उसी तरह काला के असत्य होने से ‘लाल’ संदेहात्मक (doubtful) हो जाता है। इस तरह हम देखते हैं कि लाल और काला में एक की असत्यता दूसरे की संदेहात्मकता बतलाती है। इस तरह हम विपरीत पदों में दोनों एक साथ असत्य भी हो सकते हैं परन्तु एक साथ सत्य नहीं हो सकते हैं।

(ग) दोनों पदों के बीच तीसरी संभावना रहती है:
विपरीत पदों के बीच लाल, काला के बीच बहुत से रंग होते हैं, उजला, नीला, बैंगनी आदि। इस तरह ‘लाल और काला’ विपरीत पद (contrary term) हैं क्योंकि विपरीत पदों के तीनों लक्षण उनमें मौजूद हैं –
(क) सत्य-असत्य
(ख) असत्य-संदेहात्मक
(ग) तीसरी संभावना।

2. व्याघाती पद के निम्नलिखित लक्षण होते हैं –

(क) एक की सत्यता दूसरे की असत्यता बतलाती है:
व्याघाती पदों में यदि एक सत्य है तो दूसरा अवश्य ही असत्य होगा, जैसे – ‘लाल और अलाल’ (Red and not red) – इसमें लाल और अलाल दोनों एक साथ सत्य नहीं हो सकते हैं। इसमें यदि लाल कहना सत्य है तो अलाल कहना असत्य होगा और यदि अलाल कहना सत्य है तो लाल कहना असत्य होगा। व्याघाती पद में विपरीत पद एक साथ सत्य नहीं हो सकते हैं।

(ख) एक की असत्यता दूसरे की सत्यता बतलाती है:
व्याघाती पदों में यदि एक असत्य होता है तो दूसरा अवश्य सत्य होता है। जैसे यदि किसी वस्तु को लाल कहना असत्य है तो अलाल कहना सत्य होगा और यदि अलाल असत्य है तो लाल कहना सत्य होगा। व्याघाती पद कभी भी एक साथ असत्य नहीं होते हैं। व्याघाती पद विपरीत पद से भिन्न हो जाते हैं।

(ग) दोनों पदों के बीच तीसरा संभावना नहीं रहती है:
व्याघाती पदों के बीच तीसरी संभावना नहीं रहती है, जैसे लाल और अलाल के बीच कोई तीसरा रंग नहीं बच जाता है। क्योंकि लाल के अलावा जितने रंग हैं वे सभी अलाल के अन्दर आ जाते हैं। फलतः Red and not-red मिलकर रंग के पूरे क्षेत्र को ढक लेते हैं। इस तरह लाल और अलाल व्याघाती पद हैं। क्योंकि व्याघाती पदों के तीनों लक्षणों इनमें मौजूद हैं –

(क) सत्य-असत्य
(ख) असत्य-सत्य
(ग) तीसरी संभावना नहीं।

विपरीत और व्याघाती पदों में तुलना
विपरीत पद (Contrary term)

(क) एक सत्य है तो दूसरा असत्य
(ख) एक असत्य है तो दूसरा संदेहात्मक
(ग) दोनों के बीच तीसरी संभावना होती है, जैसे – तेज – भेंदू, खट्टा – मीठा, युद्ध – शान्ति, Hot-cold.

व्याघाती पद (Contradictory term)
(क) एक सत्य है तो दूसरा असत्य
(ख) एक असत्य है तो दूसरा सत्य
(ग) दोनों के बीच तीसरी संभावना नहीं होती है।
जैसे – जीवित – मृत, श्वेत-अश्वेत, मरणशील-अमर, Perfect-Imperfect.

नोट:
किसी पद का व्याघाती पद बनाने के लिए पद में non, not, ‘न’, ‘अ’ लगा दिया जाता है। जैसे Intelligent का non-intelligent या not-intelligent. श्वेत का अश्वेत आदि।

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प्रश्न 17.
क्या व्यक्तिवाचक पद गुणवाचक होते हैं? अथवा, व्यक्तिवाचक नाम गुणवाचक है या अगुणवाचक?
उत्तर:
व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ गुणवाचक हैं या अगुणवाचक इस पर तार्किकों के निम्नलिखित विचार हैं –

1. मिल साहब का विचार है कि व्यक्तिवाचक नाम अगुणवाचक होते हैं। जैसे-राम, मोहन कहने से किसी गुण का बोध नहीं होता है। वे सिर्फ व्यक्ति या वस्तु का निर्देश ही करते हैं। व्यक्तिवाचक नाम पर एक निरर्थक चिह्न है। नाम से समाज में किसी व्यक्ति विशेष को अलग किया जाता है। नाम का सिर्फ इतना ही महत्त्व है। नाम के अनुसार किसी गुण का बोध नहीं होता है। कभी-कभी महादरिद्र भी अपने बच्चे का नाम धनपति रख देते हैं और करोड़पति अपने बच्चे का नाम तिनकौड़ी लाल।

एक अंधी लड़की का नाम भी मृगनयनी होता है। अतः नाम से गुण का बोध नहीं होता है। मिल ने कहा है कि नाम एक निरर्थक चिह्नमात्र है, यह विचार गलत है। कार्वेथ रीड का कहना है कि व्यक्तिवाचक नाम का जो अर्थ होता है यह आकस्मिक होता है और आकस्मिक गुण वास्तव में गुण नहीं है। ‘राम’ शब्द से कोई सामान्य सारगुणों का बोध नहीं होता है। राम किसी मनुष्य का भी नाम हो सकता है। इसी तरह काफे भी व्यक्तिवाचक नाम को अगुणवाचक ही मानते हैं।

2. जेवन्स तथा बोसांके:
जेवन्स साहेब का विचार है कि व्यक्तिवाचक नाम गुणवाचक होते हैं। इनके अनुसार राम पद से गुण का भी बोध हो जाता है। इतना तो अवश्य बोध होता है कि राम एक पुरुष का नाम है। सीता से किसी नारी का बोध होता है। पटना से किसी शहर के नाम का, इससे मोटा-मोटी गुणों का परिचय तो मिल ही जाता है। अतः ये व्यक्तिवाचक पद गुणवाचक होते हैं। ‘सोनपुर’ से यह गुण मालूम होता है कि वह सोन नदी के तट पर बसा हुआ है। यदि नदी सुख जाए या दूर हट जाए तो भी गुण बोध होगा कि सोनपुर किसी समय सोन नदी के तट पर बसा हुआ था। अतः जेवन्स के अनुसार व्यक्तिवाचक नाम गुणवाचक ही है।

बोसांके साहब का कहना है कि व्यक्ति वाचक संज्ञा से उस गुण का बोध होता है जो कि निश्चित एवं असामान्य है। इनके अनुसार व्यक्तिवाचक नाम एक संकेत मात्र है। इसी संकेत से वस्तु-विशेष के सभी गुणों का बोध हो जाता है। हिटलर, गाँधी का नाम सुनते ही उसके सभी गुणों का एक खाका हमारे मस्तिष्क में खींच जाता हैं अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बोसांके के अनुसार व्यक्तिवाचक नाम से गुण का बोध तो होता है किन्तु गुणवाचकता का बोध नहीं होता है।

3. डॉ. पी. के. राय का विचार है कि व्यक्तिवाचक संज्ञा पहले तो अगुणवाचक हो जाती है। जैसे-जब कोई छात्र सर्वप्रथम कॉलेज में नाम लिखाकर पढ़ने आता है तो शिक्षक और छात्र दोनों एक-दूसरे के गुणों से अपरिचित रहते हैं। छात्र का नाम शिक्षकों के लिए और शिक्षक का नाम छात्र के लिए अगुणवाचक रहते हैं। किन्तु समय बीतने पर दिन-प्रतिदिन के अनुभव के फलस्वरूप वे एक-दूसरे के गुण के बारे में जान जाते हैं और तब वही नाम जो एक-दूसरे के लिए अगुणवाचक था, अब गुणवाचक बन जाता है। इनका विचार भी जेवन्स जैसा ही था।

4. वेल्टन इनका कहना है कि व्यक्तिवाचक संज्ञा गुणवाचक है या अगुणवाचक इस प्रश्न के निर्णय में कोई कठिनाई नहीं है। यदि दो शब्दों के सहवर्ती गुण तथा अन्तर्निहितगुण पर विचार किया जाए।

(i) सहवर्ती गुण:
यह वह गुण है जिस गुण का वस्तु या व्यक्ति के साथ सिर्फ साहचर्य ही रहता है। वह उस वस्तु या व्यक्ति में अन्तर्निहित नहीं रहता है। जैसे-राम अभी काला कोट एवं फूलपैंट पहने हुए है। यहाँ राम कहने से ‘काला कोट एवं फूलपैंट पहनने का गुण’ स्वतः नहीं व्यक्त होता है। अतः यह गुण राम का सहवर्ती गुण है।

(ii) अन्तर्निहित गुण:
यह वह गुण है जो वस्तु या व्यक्ति के सिर्फ साथ ही नहीं रहता वरन् उस वस्तु या व्यक्ति के आन्तरिक स्वभाव को भी व्यक्त करता है। जैसे-‘मनुष्य’ पद में दो गुण अन्तर्निहित हैं। वे हैं ‘पशुता तथा विवेकशीलता’। यहाँ मनुष्य शब्द पशुता और विवेकशीलता की ओर संकेत करता है। परन्तु राम के लिए काला कोट एवं फूलपैंट पहनने का गुण रहना आवश्यक नहीं है।

इस तरह वेल्टन साहब का कहना है कि वे पद जिसे अन्तर्निहित गुणों का बोध होता है गुणवाचक पद होते हैं और जिनसे केवल सहवर्ती गुणों का बोध होता है वे पद गुणवाचक नहीं होते हैं। इस तरह, वेल्टन के अनुसार व्यक्तिवाचक संज्ञा अगुणवाचक ही सिद्ध होते हैं क्योंकि व्यक्तिवाचक नाम से किसी अन्तर्निहित गुण का बोध नहीं होता है।

यदि कभी किसी गुण का बोध भी होता है तो वह सहवर्ती गुण ही होता है। इस तरह अन्य सभी व्यक्तिवाचक नाम अगुणवाचक है। यहाँ वेल्टन साहब मिल के विचार से सहमत हैं। नोट-इस तरह सभी व्यक्तिवाचक नाम तथा सभी व्यक्ति भाववाचक अगुणवाचक होते हैं। जैसे-राम, हरि, पटना तथा काली सफेदी ईमानदारी। इनसे केवल गुण का बोध होता है, वस्तु का नहीं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 18.
तार्किक वाक्य क्या है? संयोजक के स्वभाव, गुण और विधि का वर्णन करें।
उत्तर:
तर्कवाक्य अनुमान से बनता है, अनुमान वाक्य पदों से बनता है। परिभाषा-तार्किक वाक्यों की संश्लेषणात्मक परिभाषा – “A proposition is but a judge ment expressed in language” अर्थात् भाषा में व्यक्त निर्णय ही तार्किक वाक्य है। इससे पता चलता है कि तार्किक वाक्य के लिए निर्णय का होना जरूरी है। “किसी के बारे में कुछ कहना ही निर्णय है।” जैसे-राम पढ़ता है। कलम अच्छी है।

सीता बुद्धिमान है। इसमें पढ़ना, अच्छी, बुद्धिमान ये सभी जब तक मानसिक क्षेत्र में रहते हैं तभी तक निर्णय है लेकिन जब बोलकर या लिखकर हम व्यक्त करते हैं तब वे निर्णय नहीं है बल्कि तार्किक वाक्य बन जाते हैं। अतः तार्किक वाक्य स्पष्ट हो जाता है और निर्णय अस्पष्ट रहता है। हम ऐसा भी कह सकते हैं कि तार्किक वाक्य निर्णय का व्यक्त रूप है और निर्णय तार्किक वाक्य का फलक रूप है। “Proposition is nothing but judgement revealed and judgement is nothing but proposition concealed.”

तार्किक वाक्य की विश्लेषणात्मक परिभाषा:
“A proposition is the statement of a certain relation between the two terms.” अर्थात् दो पदों के बीच संबंध के कथन को तार्किक वाक्य कहते हैं। यहाँ तार्किक वाक्य की तीन अंग हो जाते हैं –

  1. उद्देश्य
  2. विधेय
  3. संयोजक। जैसे ‘राम मरणशील है’ इसमें राम उद्देश्य है, मरणशील विधेय है तथा उद्देश्य और विधेय के बीच जो ‘संबंध’ है, भावात्मक है।

Ram is mortal. यहाँ Ram (S) Mortal (P) और is (Copula) है। यह संयोजक एक प्रक्रियापद है जो दो पदों के बीच संबंध व्यक्त करता है। संयोजक वाक्य में कहीं भी रहकर दो पदों के बीच संबंध ही व्यक्त करता है।

संयोजक का स्वभाव:
संयोजक के स्वभाव को निर्धारित करने के समय तीन बातों पर विचार करना जरूरी है।

1. संयोजक का काल (Tense):
कुछ लोगों का विचार है कि संयोजक भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों में होना चाहिए, क्योंकि तार्किक वाक्य व्यक्तियों की अनुभूतियों को व्यक्त करता है और ये अनुभूतियाँ भूत, वर्तमान तथा भविष्य से संबंधित हो सकती है।

आलोचना:
यह मत उपयुक्त नहीं है। संयोजक का काम उद्देश्य और विधेय के वर्तमान संबंध को ही व्यक्त करना है तथा इसी वर्तमान संबंध को हम सत्य या असत्य साबित करते हैं। अतः सिद्ध है कि वर्तमान को व्यक्त करने के लिए वर्तमान काल हो। अतः संयोजक को वर्तमान काल में ही होना चाहिए तथा वाक्य के भूत और भविष्यत् कालों से संबंधित विचारों को विधेय का ही अंग मानना चाहिए।

भूत और भविष्य को व्यक्त करनेवालों पदों को वाक्य के विधेय के रूप में व्यक्त कर देने से यह कठिनाई जाती रहती है। जैसे – “राम अयोध्या के राजा थे।” इस वाक्य का तार्किक रूप है राम एक व्यक्ति हैं जो अयोध्या के राजा थे। इस तरह वाक्य का रूप ज्यों का त्यों रह जाता है और संयोजक भी वर्तमान काल में हो जाता है। राम परीक्षा पास कर जाएगा। इसका तार्किक वाक्य होगा ‘राम एक छात्र है जो परीक्षा पास कर जाएगा।’

2. संयोजक का गुण:
संयोजक के गुण का संबंध उसके भावात्मक तथा अभावात्मक दोनों पक्षों से है। तार्किक वाक्यों का संयोजक भावात्मक या अभावात्मक (Positive or negative) है इसमें तार्किकों में मतभेद है। हॉब्स का विचार है कि संयोजक हमेशा भावात्मक ही होना चाहिए। इनका कहना है कि वाक्य में यदि अभावात्मक चिह्न (नहीं not) हो तो भी उसे संयोजक के साथ नहीं मिलाकर विधेय के साथ मिला देना चाहिए।

जैसे राम ईमानदार नहीं है (Ram is not honest) इस वाक्य में अभावात्मक चिह्न ‘नहीं’ (not) को विधेयक के साथ मिला देने पर तार्किक वाक्य का रूप इस प्रकार बन जाता है – राम नहीं ईमानदार है (Ram is not-honest)। यहाँ राम उद्देश्य है तथा ‘नहीं-ईमानदार’ (not-honest) विधेय है, तथा है (is) संयोजक है। इस तरह सभी वाक्य भावात्मक ही होंगे और संयोजक भावात्मक ही होगा।

आलोचना:
यह मत कई कारणों से अमान्य है।

(क) भाव के दो पक्ष होते हैं:
भावात्मक और अभावात्मक। अर्थात् ‘हाँ’ और ‘नहीं’। भाव के ये दोनों पक्ष समान महत्त्व रखते हैं। अतः अभावात्मक चिह्न (नहीं not) को विधेय में मिलाकर अभावात्मक वाक्य को समूल नष्ट कर देना उचित नहीं है। अतः भावात्मक और अभावात्मक दोनों ही रूप में संयोजक को मानना उचित है।

(ख) हॉब्स साहब के विचार को स्वीकार करने से यह अनन्त पद बन जाता है जिसका ज्ञान होना संभव ही नहीं है। जैसे-जब हम कहते हैं कि ‘राम नहीं-ईमानदार है’ तो नहीं-ईमानदार (not-honest) का अर्थ है ईमानदार को छोड़कर सभी चीज। अतः निष्कर्ष है कि संयोजक भावात्मक और अभावात्मक दोनों ही होता है। राम ईमानदार हैभावात्मक तथा राम ईमानदार नहीं है अभावात्मक ये दोनों उचित हैं।

3. संयोजक की विधि (Modality):
उद्देश्य और विधेय के बीच संबंध को व्यक्त करने की विधि तीन प्रकार की होती है।

(क) जब उद्देश्य और विधेय के बीच साधारण संबंध होता है तो ये वाक्य साधारण (Assertory) रह जाते हैं। जैसे-राम धनी है, या राम धनी नहीं है। (Ram is rich or Ram is not rich)
(ख) जब उद्देश्य और विधेय के बीच निश्चयात्मक संबंध होता है तब वह अवश्य ही ‘must be’ से व्यक्त होता है। जैसे-हरेक कार्य का कारण होता है (Every event must have a cause) इसी तरह दो और दो मिलकर चार होते हैं (Two and two must be four) ये वाक्य विधि अनुसार निश्चयात्मक (necessary) हैं।

(ग) फिर इसी तरह उद्देश्य और विधेय का संबंध संदेहात्मक (may be) ‘सकना’ भी होता है। जैसे-राम यह काम कर सकता है – (Ram may do this work)। विधि के अनुसार इस प्रकार के वाक्य संदिग्धवाक्य कहे जाते हैं, जिसे अंग्रेजी में Problematic proposition कहते हैं।

‘अवश्य ही’ तथा ‘सकना’ अंग्रेजी का ‘must be and may be’ दोनों संयोजक के साथ ही मिला दिये जाते हैं और यह सत्य भी है। यहाँ may be and may not be संयोजक में ही गिने जाते हैं। परन्तु यह मत कुछ तार्किकों को मान्य नहीं है क्योंकि इसके अनुसार अनावश्यक परिश्रम ‘बढ़ जाता है। इसलिए विधि चिह्न को संयोजक के साथ रहना चाहिए, क्योंकि संयोजक द्वारा ही उद्देश्य और विधेय का संबंध व्यक्त किया जाता है।

इस तरह संयोजक के स्वभाव के संबंध में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि संयोजक हमेशा ‘होगा’ क्रिया का कोई रूप (Any form of verb to be) होना चाहिए। जैसे – (is, is not, am, am not, are, are not) है, नहीं हैं, हूँ, नहीं हूँ, नहीं हैं। इसी तरह may be, may not be and must be, must not be (सकते हैं, नहीं सकते हैं तथा अवश्य ही, अवश्य ही नहीं) को भी संयोजक ही मानना उचित है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 10 बौद्ध/बुद्धवादी आकारिकी तर्कशास्त्र

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 10 बौद्ध/बुद्धवादी आकारिकी तर्कशास्त्र Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 10 बौद्ध/बुद्धवादी आकारिकी तर्कशास्त्र

Bihar Board Class 11 Philosophy बौद्ध/बुद्धवादी आकारिकी तर्कशास्त्र Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वैभाषिक तत्त्व विज्ञान के अनुसार तत्त्व के कितने प्रकार हैं –
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(घ) चार

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प्रश्न 2.
आलंबन, समानान्तर, अधिपति एवं माध्यम ज्ञान के हैं –
(क) कारण
(ख) कार्य
(ग) कारण एवं कार्य दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) कारण

प्रश्न 3.
‘सर्वास्तिवाद’ एक प्रकार का –
(क) यथार्थवादी सिद्धान्त है
(ख) अयथार्थवादी सिद्धान्त है
(ग) (क) एवं (ख) दोनों है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) यथार्थवादी सिद्धान्त है

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प्रश्न 4.
वैभाषिक मत आण्विक सिद्धान्त को –
(क) स्वीकार करता है
(ख) अस्वीकार करता है
(ग) न तो स्वीकार करता है नहीं अस्वीकार
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) स्वीकार करता है

प्रश्न 5.
बुद्ध के मध्यम-मार्ग एवं शून्यवाद का मेल है –
(क) माध्यमिक-शून्यवाद
(ख) योगाचार-विज्ञानवाद
(ग) सौत्रांतिक-बाह्यानुमेयवाद
(घ) वैभाषिक-बाह्य प्रत्यक्षवाद
उत्तर:
(क) माध्यमिक-शून्यवाद

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प्रश्न 6.
बौद्ध तर्कशास्त्र के प्रतिपादक थे?
(क) दिग्नाग
(ख) धर्मकीर्ति
(ग) दिग्नाग एवं धर्मकीर्ति दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 7.
बौद्ध तर्कशास्त्र है –
(क) न्याय तर्कशास्त्र का विरोधी
(ख) न्याय तर्कशास्त्र का पूरक
(ग) तर्कशास्त्र की नई विधा
(घ) बौद्ध दर्शन का आधार
उत्तर:
(ख) न्याय तर्कशास्त्र का पूरक

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प्रश्न 8.
माध्यमिक शून्यवाद के प्रवर्तक हैं –
(क) नागार्जुन
(ख) गौतमबुद्ध
(ग) धर्मकीर्ति
(घ) दिग्नाग
उत्तर:
(क) नागार्जुन

प्रश्न 9.
सौतांतिक के अनुसार –
(क) बाह्य एवं आभ्यंतर दोनों सत्य है
(ख) सभी बाह्य पदार्थ असत्य है
(ग) संसार शून्य है
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(क) बाह्य एवं आभ्यंतर दोनों सत्य है

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 10 बौद्ध/बुद्धवादी आकारिकी तर्कशास्त्र

प्रश्न 10.
‘चित्त एकमात्र सत्ता है।’ यह बौद्ध तर्कशास्त्र किस वाद का मंत्र है?
(क) विज्ञानवाद
(ख) शून्यवाद
(ग) बाह्यानुमेयवाद
(घ) बाह्य प्रत्यक्षवाद
उत्तर:
(क) विज्ञानवाद

प्रश्न 11.
शून्यवाद (Nihilism) एक तरह का है –
(क) सापेक्षवाद
(ख) निरपेक्षवाद
(ग) सापेक्षवाद एवं निरपेक्षवाद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सापेक्षवाद

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प्रश्न 12.
माध्यमिक शून्यवाद के अनुसार सत्य कितने प्रकार के होते हैं?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो

प्रश्न 13.
माध्यमिक-शून्यवाद के अनुसार सत्य के प्रकार हैं –
(क) व्यावहारिक सत्य
(ख) पारमार्थिक सत्य
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) (क) एवं (ख) दोनों

Bihar Board Class 11 Philosophy बौद्ध/बुद्धवादी आकारिकी तर्कशास्त्र Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ज्ञान के कितने कारण हैं?
उत्तर:
सौत्रांतिकों के अनुसार ज्ञान के चार कारण हैं। वे हैं-आलंबन, समानान्तर, अधिपति एवं माध्यम।

प्रश्न 2.
बाह्य प्रत्यक्षवाद क्या है?
उत्तर:
बौद्ध दर्शन में वैभाषिक मत को बाह्य प्रत्यक्षवाद के नाम से जानते हैं। इसमें चेतना एवं बाह्य पदार्थ के अस्तित्व को माना गया है। इस मत के अनुसार, पदार्थ का ज्ञान प्रत्यक्ष (Perception) को छोड़कर अन्य किसी माध्यम से नहीं हो सकता है।

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प्रश्न 3.
वैभाषिक तत्त्व विज्ञान (Metaphysics) के अनुसार तत्त्व कितने हैं?
उत्तर:
वैभाषिक तत्त्व विज्ञान के अनुसार चार तत्त्व हैं। वे हैं – पृथ्वी, जल, आग और हवा। वैभाषिक मत ‘आकाश’ को एक तत्त्व के रूप में नहीं स्वीकार करता है।

प्रश्न 4.
वैभाषिक मत के अनुसार अनुभव (experience) क्या है?
उत्तर:
वैभाषिक मत के अनुसार अनुभव को ही पदार्थों के स्वरूप का निर्दोष साक्षी माना जाता है। अनुभव का अभिप्राय उस प्रत्यक्षज्ञान से है जो पदार्थ के साथ सीधा सम्पर्क से प्राप्त होता है। समूचा संसार ही प्रत्यक्ष ज्ञान का क्षेत्र है।

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प्रश्न 5.
सौत्रांतिक-सम्प्रदाय के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
सौत्रांतिक-सम्प्रदाय हीनयान-सम्प्रदाय की दूसरी शाखा है। ये लोग चेतना के साथ-साथ बाह्य संसार के अस्तित्व को भी स्वीकार करते हैं। सौत्रांतिक ‘सुत्तपिटक’ को ही सर्वमान्य ग्रंथ मानते हैं, जिसमें भगवान बुद्ध के संवाद हैं।

प्रश्न 6.
शून्यवाद (Nihilism) क्या है? अथवा, शून्यवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शून्य शब्द का अर्थ इतना गूढ़ और जटिल है कि उसका वर्णन शब्दों के द्वारा संभव नहीं है। परमतम सत्य का वर्णन शब्दों के द्वारा किसी भी दर्शन में नहीं हो सका है। अतः नागार्जुन भी शून्य के रूप में पारमार्थिक सत्ता को बताकर उसे अवर्णनीय की संज्ञा देते हैं। शून्यवाद एक तरह का सापेक्षवाद है।

प्रश्न 7.
माध्यमिक शून्यवाद के अनुसार सत्य कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
माध्यमिक-शून्यवाद के विद्वानों के अनुसार सत्य के दो रूप हैं। वे हैं – व्यावहारिक सत्य (Empirical truth) एवं परमार्थिक सत्य (Ultimate truth)।

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प्रश्न 8.
विज्ञानवाद (Consciousness) क्या है? अथवा, चेतनावाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
चेतना के अस्तित्व पर विश्वास रखना ही विज्ञानवाद के सिद्धान्त की स्थापना करता है। योगाचारी विज्ञानवाद या चेतनावाद पर पूर्ण विश्वास करते हैं। उनके अनुसार चेतना का अपना अलग अस्तित्व है। इसका स्वरूप भावात्मक है।

प्रश्न 9.
बौद्ध दर्शन में दार्शनिक विचारों की भिन्नता के आधार पर कितने मुख्य सम्प्रदाय (Schools) हैं?
उत्तर:
बौद्ध दर्शन में दार्शनिक विचारों की भिन्नता के आधार पर चार सम्प्रदायों की चर्चा मुख्य रूप से की जाती है। वे हैं माध्यमिक-शून्यवाद, योगाचार-विज्ञानवाद, सौत्रांतिक-बाह्यानुमेयवाद तथा वैभाषिक-वाह्य प्रत्यक्षवाद।

प्रश्न 10.
माध्यमिक-शून्यवाद सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन हैं?
उत्तर:
नागार्जुन माध्यमिक-शून्यवाद सिद्धान्त के प्रवर्तक (Propounder) माने जाते हैं।

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प्रश्न 11.
माध्यमिक क्या है?
उत्तर:
माध्यमिक उस अवस्था का नाम है जिसमें अन्तिम रूप से भाव (affirmation) और अन्तिम रूप से निषेध (negation) करने की क्रियाओं के बीच ही एक मध्यममार्ग का निर्माण होता है। अन्तिम स्वरूप में कोई भी पदार्थ न तो सत्य है और न असत्य है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ज्ञान के चार कारण कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
सौत्रांतिकगण बाह्य संसार की यथार्थता को स्वीकार करने के बाद ज्ञान की उत्पत्ति की प्रक्रिया का जिक्र करते हैं। चार अवस्थाओं के आधार पर ज्ञान की उत्पत्ति होती है। हम अपनी इच्छानुसार किसी पदार्थ को जहाँ-तहाँ नहीं देख सकते हैं। अतः ज्ञान केवल हमारे मन पर निर्भर नहीं करता है। अतः सौत्रांतिक विद्वान ज्ञान के चार प्रकार के कारणों की चर्चा करते हैं, जो निम्नलिखित हैं –

(क) आलम्बन:
बाह्य विषय (External Objects) ज्ञान का आलम्बन कारण है, जैसे-घड़ा, कलम आदि। ज्ञान का आकार (form) इसी आलम्बन कारण से उत्पन्न होता है।

(ख) समानान्तर:
ज्ञान के अव्यवहृत पूर्ववर्ती मानसिक अवस्था में ज्ञान में एक प्रकार की चेतना आती है। इसे समानान्तर अथवा झुकाव कहते हैं। समानान्तर का अर्थ है जिसका कोई अन्तर अथवा व्यवधान नहीं हो।

(ग) अधिपति यानि प्रमुख इन्द्रिय:
ज्ञान की प्राप्ति में इन्द्रिय का बहुत बड़ा महत्त्व है, पूर्ववर्ती ज्ञान और विधेय के रहने पर भी बिना इन्द्रिय से बाह्य ज्ञान नहीं हो सकता है। आँख, कान, नाक, जीभ एवं त्वचा पाँच बाह्य ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। अतः इन्द्रियों को ज्ञान का अधिपति कारण कहा जाता है।

(घ) सहकारी या माध्यम:
ज्ञान के लिए इन्द्रिय की आवश्यकता तो रहती ही है लेकिन उन इन्द्रियों से ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रकाश, आवश्यक दूरी, आकार इत्यादि अन्य सहायक कारणों का होना आवश्यक है। इसलिए इस तरह के कारण को सहकारी प्रत्यय अथवा माध्यम कहते हैं।

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प्रश्न 2.
बाह्यनुमेयवाद क्या है?
उत्तर:
ज्ञान के चार कारण यथा आलम्बन, समानान्तर अधिपति एवं सहकारी यानि माध्यम से ही किसी पदार्थ का ज्ञान संभव होता है। अतः ज्ञान का आकार (form) ज्ञात पदार्थ के अनुसार ही निर्धारित होता है। प्रत्यक्ष पदार्थों के जो विभिन्न आकार दिखाई पड़ते हैं, वे वास्तव में ज्ञान ही के आकार हैं। उनका निवास मन में ही होता है। अतः बाह्य पदार्थों का ज्ञान पदार्थ-जनित मानसिक आकारों से अनुमान के द्वारा प्राप्त होता है। इस मत को ही बाह्यनुमेयवाद कहते हैं।

प्रश्न 3.
वैभाषिक तत्त्व विज्ञान के बारे में आप क्या जानते हैं? अथवा, वैभाषिक मत के आण्विक सिद्धान्त (Theory of Atoms) की व्याख्या करें।
उत्तर:
वैभाषिक तत्त्व विज्ञान के अनुसार चार तत्त्व हैं। वे हैं – पृथ्वी, जल, आग और हवा। स्वभाव से पृथ्वी कठोर है, जल शीतल है, आग गर्म है और हवा गतिमान है। ‘आकाश’ को पाँचवें तत्त्व के रूप में वैभाषिक मतं स्वीकार नहीं करता है। बाह्य पदार्थ परम अणुओं (atoms) की अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार एकत्रीकरण का फल है। इस प्रकार वैभाषिक मत आण्विक सिद्धान्त (Theory of atoms) को स्वीकार करते हैं। सभी पदार्थ अन्ततः अणुओं के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।

अणु को अकेले नहीं देखा जा सकता है। अणुओं को समूह में देखना संभव है। बसुबन्धु के अनुसार अणु एक अत्यन्त ही छोटा कण हैं इसे कहीं भी स्थापित कर लेना संभव नहीं है। इसे न तो हाथ से पकड़ा जा सकता है और न पैर से दबाया जा सकता है। यह न तो लम्बा है और न छोटा। न वर्गाकार है, न गोलाकार, न टेढ़ा और न सीधा न ऊँचा है, न नीचा। अणु वस्तुतः अविभाज्य और अदृश्य है।

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प्रश्न 4.
‘शून्यवाद’ की. पूर्ण शाब्दिक व्याख्या कठिन है। इस कथन की विवेचना करें।
उत्तर:
‘शून्यवाद’ की पूर्ण शाब्दिक व्याख्या कठिन है क्योंकि शून्यता अवर्णनीय (inde scribable) है। शून्य शब्द का अर्थ इतना गूढ़ और जटिल है कि उसका वर्णन शब्दों के द्वारा संभव नहीं हैं। परमतम सत्य यानि पारमार्थिक सत्ता का वर्णन शब्दों के द्वारा किसी भी दर्शन में संभव नहीं है। नागार्जुन ‘शून्य’ को पारमार्थिक सत्ता की संज्ञा देकर इसे अवर्णनीय बनाते हैं। उसके सम्बन्ध में कोई नहीं बता सकता है कि वह मानसिक है कि अमानसिक (non-mental)।

सामान्य लोगों द्वारा उसे नहीं समझ पाना ही ‘शून्यता’ शब्द के निर्माण का कारण है। नागार्जुन के अनुसार किसी भी पदार्थ के सम्बन्ध में चार तरह की संभावनाएँ हो सकती हैं। वे हैं सत्य होना, असत्य होना, सत्य और असत्य दोनों होना तथा न तो सत्य होना और न असत्य होना। संसार के पदार्थ इन चारों श्रेणी से पृथक् हैं।

इसलिए शून्यवाद (Nihilism) सिद्धान्त की स्थापना होती है। संसार को अंतिम पारमार्थिक रूप में शून्य का ही प्रतीक (symbol) समझा जाता है। संसार के पदार्थों पर निर्भरता को देख कर प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धान्त (Theory of Dependent Organization) को भी ‘शून्यता’ से ही पुकारते हैं। इस प्रकार, शून्यवाद एक प्रकार का सापेक्षवाद है।

प्रश्न 5.
विज्ञानवाद (Theory of consciousness) क्या है? अथवा, चेतनावाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विज्ञान यानि चेतना के अस्तित्व पर विश्वास रखना ही विज्ञानवाद है। विज्ञानवादी माध्यमिक शून्यवाद के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं कि विज्ञान बाहरी पदार्थों (External objects) का अस्तित्व नहीं है। दूसरी ओर, विज्ञानवादी यह स्वीकार करते हैं कि विज्ञान अथवा : चेतना का अपना अलग अस्तित्व है। इसका स्वरूप भावात्मक है।

बाह्य संसार के विषय में जो कुछ भी कहा जाता है, इसका निषेध आन्तरिक अनुभवों के आधार पर नहीं हो सकता है। अन्तिम सत्य (Ultimate reality) का कोई भी निषेध नहीं कर सकता है। ज्ञान की अपनी एक मुक्त स्थिति है। अतः ज्ञान का अस्तित्व एक पूर्ण सत्य है। चित्त या मन मनुष्य का विश्वसनीय अंग है। चेतना का प्रवाह वह अनुभव करता है। अतः विज्ञान यानि चेतना को मानना अत्यावश्यक है। विज्ञानवाद के अनुसार चेतना ही एकमात्र सत्ता है।

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प्रश्न 6.
“बाह्य पदार्थ (External Objects) सत्य हैं तथा उनके अस्तित्व के लिए प्रमाण हैं।” इस कथन की विवेचना करें।
उत्तर:
सौत्रांतिकों के अनुसार पदार्थ के सामने रहने पर ही उसका प्रत्यक्ष होता है। एक दृष्टिकोण से पदार्थ और उसका ज्ञान समकालीन है। दोनों समकालीन होने के कारण पदार्थ और उसका ज्ञान आपस में अभिन्न है। उदाहरण के लिए हम ‘घड़े’ को एक पदार्थ के रूप में स्वीकारते हैं। जब घड़े का प्रत्यक्ष होता है तो घड़ा बाह्य पदार्थ के रूप में हमसे बिल्कुल बाहर हैं। उसे घड़े का जो ज्ञान (knowledge) हमें प्राप्त होता है वही हमारे अन्दर है।

उसका स्पष्ट अनुभव हमें प्राप्त होता है। अतः इससे निष्कर्ष निकलता है कि ‘पदार्थ’ हमेशा ही ‘ज्ञान’ से भिन्न है। यदि उस घड़े में और मुझमें कोई भेद नहीं होता तो मैं कहता कि मैं ही घड़ा हूँ। यदि बाह्य वस्तुओं का कोई अपना अस्तित्व नहीं है तो ‘घड़े का ज्ञान’ और ‘पट का ज्ञान’ दोनों में कोई अन्तर नहीं होता। ‘घट’ और ‘पट’ अगर केवल ज्ञान हैं तो दोनों में अन्तर नहीं होना चाहिए। अतः घट-ज्ञान तथा पट-ज्ञान दोनों दो तथ्य हैं। दोनों में पदार्थ सम्बन्धी अन्तर स्पष्ट हैं। अतः पदार्थ और ज्ञान दोनों का अलग-अलग अस्तित्व है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शून्यवाद (Nihilism) के अर्थ को स्पष्ट करें। शून्यवाद में निहित मूल मान्यताओं को स्पष्ट करें। अथवा, नागार्जुन के शून्यवाद की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
‘शून्य’ शब्द के अनेक अर्थ लगाए जाते हैं। एक अर्थ में शून्य का स्वरूप अभावात्मक बताया जाता है। यह अर्थ आनुभाविक संसार के लिए सत्य माना जाता है। शून्य के इस अर्थ में भ्रान्ति के रूप में किसी का अस्तित्व नहीं रह पाता है। उदाहरण के लिए रस्सी को साँप समझना या साँप को रस्सी समझना ज्ञान का एक अभाव है। दूसरे अर्थ में, शून्य का अर्थ एक स्थिर अवर्णनीय (Indescribable) तत्त्व है जो सभी पदार्थों के भीतर छिपा रहता है। पूर्ण संशयवाद एक काल्पनिक तथ्य है। नागार्जुन खुद एक श्रेष्ठ यथार्थता (reality) के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। नागार्जुन यह भी स्वीकार करते हैं कि श्रेष्ठ यथार्थता अनुभव का विषय नहीं है। उस यथार्थता को आँख नहीं देख सकती और न ही मन उसका विचार कर सकता है।

नागार्जुन के अनुसार वह क्षेत्र जहाँ पर सभी पदार्थों एक झलक हमें दिखाई पड़ सकती है, बुद्ध के शब्दों में ‘परमार्थ’ है जो कि एक निरपेक्ष सत्य है। इसकी व्याख्या शब्दों के द्वारा नहीं हो सकती है। इसे न तो शून्य कह सकते हैं और न अशून्य ही, दोनों भी साथ नहीं कह सकते हैं और न दोनों में एक कह सकते हैं, लेकिन केवल उसके संकेत को ‘शून्य’ कहा जा सकता है। अतः शून्यवाद एक भावात्मक तत्त्व है। कुमारजीव के अनुसार, इस शून्यता के कारण ही प्रत्येक वस्तु संभव हो सकती है तथा बिना इसके संसार में कुछ भी संभव नहीं है।

शून्यवाद के सामान्य अर्थ के अनुसार यह सारा संसार शून्यमय है। अतः किसी भी पदार्थ का अस्तित्व नहीं है। ज्ञाता (knower) ज्ञेय (object of knowledge) और ज्ञान तीनों ही एक-दूसरे पर आधारित हैं। अतः उसमें किसी एक के असत्य रहने पर शेष दो भी असत्य साबित हो जाते हैं। किसी रस्सी को साँप समझ बैठने में साँप का अस्तित्व बिल्कुल असत्य है।

अतः ज्ञात वस्तु के रूप में साँप अगर असत्य है तो ज्ञाता और ज्ञान दोनों ही असत्य हो जाते हैं। अतः बाहरी सत्ता बिल्कुल ही स्थापित नहीं होती है। अतः यह सम्पूर्ण संसार का बहुत बड़ा शून्य है। यह शून्यवाद का बहुत साधारण अर्थ है। गहराई में जाने पर जब पारमार्थिक सत्ता का अस्तित्व स्वीकारा जाता है तो शून्यवाद का भावात्मक तत्त्व के रूप में अर्थपूर्ण हो जाता है। शून्यवाद को सर्व विनाशवाद (Complete Destructionism) से अलग समझना चाहिए।

सर्व विनाशवाद के अनुसार संसार के सभी पदार्थों का पूर्ण विनाश हो जाता है। अतः किसी भी पदार्थ का अस्तित्व नहीं है। दूसरी ओर, माध्यमिक शून्यवाद के अनुसार केवल इन्द्रियजन्य संसार (Phenomenal world) ही असत्य है। अतः परमार्थिक सत्ता सत्य है। परमार्थिक सत्ता न तो मानसिक है और न बाह्य है। वह अवर्णनीय है। अतः साधारण लोग उसे शून्य कहते हैं। जो सत्य है वह तो बिल्कूल निरपेक्ष है। अत: वह अपने अस्तित्व के लिए किसी दूसरे पर आधारित नहीं है। यह अनुभव संसार के लिए असत्य नहीं समझा जा सकता है। नागार्जुन माया या भ्रम में दिखनेवाले को इन्द्रजाल कहते हैं। सभी पदार्थ और मनुष्य धर्मों के संग्रहीत पुँज हैं।

उनके बीच का अन्तर धर्मों के स्वभावों के द्वारा जाना जाता है। नागार्जुन के अनुसार संसार का अस्तित्व देश और काल की स्थिति के सम्बन्ध में है। अस्तित्व स्थायी और हमेशा एक ही समान बना रहनेवाला नहीं है। वह बिल्कुल क्षणिक है। शून्यवाद की पूर्ण शाब्दिक व्याख्या कठिन है क्योंकि शून्यता अवर्णनीय (Indescrible) है।

शून्य शब्द का अर्थ इतना गूढ़ और जटिल है कि उसका वर्णन शब्दों के द्वारा संभव नहीं है। नागार्जुन भी पारमार्थिक सत्ता को शून्य के रूप में बताकर उसे अवर्णनीय कहते हैं। संसार को अन्तिम परमार्थिक रूप में शून्य का ही एक प्रतीक समझा जाता है। शून्यता की वर्णनातीतता को प्रमाणित करने के लिए प्रतीत्य-समुत्पाद के सिद्धान्त (Theory of Dependent organisation) की सहायता ली जाती है। संसार के पदार्थों पर निर्भरता को देखकर प्रतीत्य समुत्पाद को भी एक शून्यता से ही जानते हैं।

शून्यवाद एक प्रकार का सापेक्षवाद (Relativism) है। माध्यमिक शून्यवाद के विद्वानों ने शून्य शब्द का व्यवहार एक भाषात्मक तत्त्व के रूप में किया है। इसलिए नागार्जुन ने सत्य के अनेक प्रकारों को बताया हैं उनके अनुसार सत्य दो प्रकार हैं। व्यावहारिक सत्य एवं परमार्थिक सत्य। पहले प्रकार के सत्य से साधारण लोगों के ज्ञान को संतुष्टि मिलती है। दूसरे प्रकार के सत्य से सिद्ध तथा पहुँचे हुए महात्माओं के ज्ञान को प्रकाश मिलता है। संसार के एक पदार्थ का धर्म दूसरे पदार्थ पर निर्भर करता है। अतः एक का अस्तित्व दूसरे पर निर्भर करता है। इस प्रकार शून्यवाद सिद्धान्त का झुकाव सापेक्षवाद की ओर होता है।

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प्रश्न 2.
नागार्जुन के माध्यमिक विचारों की संक्षेप में व्याख्या करें। अथवा, माध्यमिक से आपका क्या अभिप्राय है? माध्यमिक में अन्तर्निहित मूल तथ्यों को रेखांकित करें।
उत्तर:
दार्शनिक विचारधारा में बुद्ध के मध्यम-मार्ग (Middle path) एवं शून्यवाद (Nihil ism) का मेल माध्यमिक-शून्यवाद के नाम से पुकारा जाता है। इस दार्शनिक सिद्धान्त के मुख्य प्रवर्तक ‘नागार्जुन’ हैं। नामार्जुन की कृति ‘मूल माध्यमिक-कारिका’ में इस तथ्य पर प्रकाश डाले गए हैं।

माध्यमिक उप अवस्था का नाम है, जिसमें अन्तिम रूप से भाव (Affirmation) और अन्तिम रूप से निषेध (Negation) करने की क्रियाओं के बीच ही एक मध्यम-मार्ग का निर्माण हो जाता है। इस कथन का अभिप्राय है कि अन्तिम स्वरूप में कोई भी पदार्थ न तो सत्य है और ही असत्य। सत्य और असत्य की सीमा-रेखा खींचने से एकान्तिक मतों (one-sided views) का निर्माण होता है। अतः दोनों के अन्तिम छोर पर पहुँचने से पहले ही वस्तुओं के ‘पर-निर्भर अस्तित्व (Conditional Existence)’ पर विश्वास कर लिया जाता है। अतः प्रतीत्य-समुत्पाद सिद्धान्त (Theory of Dependent Organisation) को भी बुद्ध ने मध्यम-मार्ग के रूप में स्वीकारा।

माध्यमिक सम्प्रदाय धर्म के निषेधात्मक स्वरूप को स्वीकार करने का सुझाव देते हैं। धर्म के रूप में प्रत्येक विचार, संवेदना (sensation) और इच्छा (Desire) के अस्तित्वों को स्वीकारा जाता है। अतः प्रत्येक मनुष्य अपने व्यक्तिगत रूप में धर्मों का एक संग्रह है। इसी तरह ‘धर्म’ कोई एक सूखा भाववाचक पद नहीं होकर जीवन की समस्त भावनाओं का प्रतीक बन जाता है। इसलिए मनुष्य में भौतिक और मानसिक धर्मों का मिला-जुला रूप ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण कर सकता है। इस दृष्टि से धर्म का अस्तित्व है और उसका विनाश भी संभव है। अतः प्रवाह रूपी श्रृंखला (chain) में धर्म बिल्कुल ही क्षणिक है। नागार्जुन के अनुसार यह संसार केवल प्रतीति मात्र (Apparent) है।

संसार में अज्ञेय सम्बन्धों का जाल बिछा हुआ है। प्रकृति और आत्मा देश और काल, कारण और कार्य, गति और स्थिरता-ये सभी निराधार एवं खोखला है। यथार्थता को तो स्थिर एवं संगतपूर्ण होनी चाहिए। लेकिन वह बुद्धिगम्य नहीं है। वे पदार्थ जो परस्पर संगत नहीं हो सकते, वे वास्तविक दिखाई पड़ते हैं, लेकिन अन्तिम रूप में यथार्थ नहीं हैं।

यह विचार पश्चिमी दार्शनिक ब्रेडले (Bradley) के निकट प्रतीत होता है। माध्यमिक सूत्रों के पाँचवें अध्याय में कारण-कार्य सम्बन्धों (Causal relations) का खंडन किया गया है। नागार्जुन के अनुसार कारण से अलग कार्य अथवा कार्य से अलग कारण अभावात्मक है। अतः पारमार्थिक दृष्टिकोण से न तो कोई कारण (cause) है और न कोई कार्य (Effect) न तो उत्पत्ति (Origin) है और न विनाश (Destruction)। इससे यह भी स्पष्ट है कि परिवर्तन का विचार बुद्धि की पहुँच के बाहर है। अतः कारण-कार्य भाव परिवर्तन का समाधान नहीं है क्योंकि यह स्वयं असंभव (impossible) है।

ज्ञान (knowledge) की विवेचना असंभव है। विचारों का जन्म संवेदनाओं से होता है। संवेदनाओं से ही विचारों का भी निर्माण होता है। यह तथ्य वैसा ही है जैसा कि पौधों से बीज उत्पन्न होते हैं तथा बीजों से पौधे उत्पन्न होते हैं। जिस प्रकार पुत्र अपने माता-पिता पर निर्भर करता है ठीक उसी प्रकार दृष्टि शक्ति की संवेदना आँखों एवं रंगों पर निर्भर करती है।

यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि हम जो कुछ भी देखते हैं, वह सम्पूर्ण रूप से हमारा अपना ही है। एक ही पदार्थ भिन्न-भिन्न मनुष्यों को भिन्न-भिन्न प्रकार का दिखाई पड़ता है। माध्यमिक मत के अनुसार विश्व से अलग कोई ईश्वर नहीं है। दोनों एक समान प्रतीति (appearance) मात्र है। इस तरह, ईश्वर के विचार की उपेक्षा के पीछे नागार्जुन का उद्देश्य देववादी आस्तिक विचारों का पूर्ण निराकरण (elimination) है। ईश्वर महायान बौद्ध-धर्म में ‘धर्म-काय’ के रूप में बताया गया है।

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प्रश्न 3.
बौद्ध दर्शन में ‘योगाचार’ विज्ञानवाद के बारे में क्या जानते हैं? अथवा, योगाचारी विद्वान के अनुसार विज्ञानवाद अथवा चेतनावाद (Theory of Consiousness) की मूल मान्यताओं को स्पष्ट करें।
उत्तर:
योगाचार-विज्ञानवाद सिद्धान्त की स्थापना के सम्बन्ध में आर्यसंग तथा उनके छोटे भाई बसुबन्धु का नाम लिया जाता है। अश्वघोष भी योगाचार शाखा के अनुयायी माने जाते हैं। योगाचार शब्द के दो अर्थ हैं। पहले अर्थ में आनुभविक यानि बाह्य जगत की काल्पनिकता को समझने के लिए ‘योग’ का अभ्यास किया जाता है। दूसरे अर्थ में योगाचार की दो विशेषताओं को स्वीकार किया जाता है योग और अभ्यास। योग का मतलब जिज्ञासा (Curiosity) तथा आचार का मतलब सदाचार से लगाया जाता है। इस प्रकार दर्शनशास्त्र के क्रियात्मक पक्ष पर योगाचारों द्वारा अधिक बल दिया जाता है। योगाचारी विद्वान विज्ञानवाद पर अपने दार्शनिक विचारों को आधारित, रखते हैं।

विज्ञानवाद (Theory of consciousness)

विज्ञान यानि चेतना (consciousness) के अस्तित्व पर विश्वास रखना ही विज्ञानवाद सिद्धान्त की स्थापना करता है। विज्ञानवादी माध्यमिक शून्यवाद के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं कि विज्ञान बाहरी पदार्थों (External objects) का अस्तित्व नहीं है फिर भी वे यह स्वीकार करते हैं कि विज्ञान यानि चेतना का अपना अलग अस्तित्व है। इसका स्वरूप भावात्मक है। परम सत्ता यानि अन्तिम सत्य का कोई भी निषेध नहीं कर सकता है। ज्ञान (knowledge) की अपनी एक मुक्त स्थिति है। अतः ज्ञान का अस्तित्व एक पूर्ण सत्य है। चित्त या मन मनुष्य का विश्वसनीय अंग है। चेतना का प्रवाह वह अनुभव करता है। अतः विज्ञान यानि चेतना को मानना आवश्यक है।

योगाचार-विज्ञानवाद के अनुसार भौतिकवाद (materalism) को सभी विचारों का कारण मानना हमारे अधिकारों के बाहर है। प्रकृति (Nature) स्वयं ही एक विचार है। संसार में दिखाई पड़ने वाले सभी पदार्थ संवेदनाओं (sensation) के समूह हैं। ज्ञान के विषय के रूप में वे विचार आते हैं जिनकी छाप इन्द्रिय पर पड़ती है। अतः चेतना या विज्ञान से अलग किसी पदार्थ का अस्तित्व नहीं है। चेतना के प्रवाह से संसार के बाह्य अस्तित्व का एक आभास मिलता है। पानी के बुलबुलों का अन्तिम स्वरूप पानी हैं। उसी तरह चेतना के प्रवाह से उत्पन्न सभी पदार्थ अन्त में उसी प्रवाह में विलीन हो जाते हैं। अन्ततः चेतना का ही अस्तित्व सिद्ध होता है।

ज्ञान महत्त्वपूर्ण है। बिना ज्ञान के किसी भी पदार्थ को जानना संभव नहीं है। अतः ज्ञान के बाहर किसी भी सांसारिक पदार्थ का अपना स्वतंत्र अस्तित्द कभी भी स्थापित नहीं किया जा सकता है। चेतना यानि विज्ञान ही एकमात्र सत्यता है। प्राचीन बौद्ध-दर्शन इस बात का पूर्ण समर्थन करता है। इस दर्शन के अनुसार, हम जो कुछ भी हैं, अपने विचारों के परिणामस्वरूप हैं। विचारों से ही सबकुछ बना है। योगाचारी विद्वान बाहरी पदार्थों पर चेतना के निर्माण को’ स्वीकार नहीं करते हैं।

इसे ‘निरालम्बनवाद’ से भी जाना जाता है। योगाचार विद्वान के अनुसार बाहरी पदार्थों के अस्तित्व को स्वीकारने से विचार में अनेक दोष आ जाते हैं। अगर कोई पदार्थ अपना अस्तित्व अलग रखने का दावा करता है, तो उसमें दो संभावनाएँ हैं, प्रथम वह पदार्थ परमाणुमात्र (atom) है या दूसरा, वह अनेक परमाणुओं के मेल से बना है। पहली संभावना के अनुसार पदार्थ परमाणु मात्र नहीं है क्योंकि परमाणु इतना सूक्ष्म (minute) होता है कि उसका प्रत्यक्षण संभव नहीं है।

दूसरी संभावना में भी सभी परमाणुओं का एक साथ प्रत्यक्षीकरण संभव नहीं है। अतः मन से बाहर किसी पदार्थ के अस्तित्व जानने से भी उसका पूर्णज्ञान संभव नहीं है। अतः पदार्थों का अस्तित्व बिल्कुल मानसिक है। इस विचार को पाश्चात्य दर्शन में आत्मगत प्रत्ययवाद (Subjective Idealism) के नाम से जाना जाता है। पाश्चात्य दार्शनिक बर्कले का नाम इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है। योगाचारी विज्ञानवाद स्पष्टतः आदर्शवादी है। विज्ञान या चेतना एक अमूर्त भाव रूप नहीं होकर एक मूर्त रूप ठोस यथार्थ सत्ता है।

सत्य घटनाओं की पूरी पद्धति मनुष्य की व्यक्तिगत चेतना के भीतर ही पायी जाती है। विषय (Subject) और विषयी (Object) सम्बन्धी अपने आन्तरिक द्वैत (Dualism) के साथ स्वयं जीवन में एक छोटे संसार का निर्माण होता है, जिसे ‘आलय’ कहते हैं। आलय चेतना का लगातार बदलता हुआ प्रवाह है। ‘आलय’ मात्र सामान्य आत्म नहीं है।

यह चेतना का विशाल समुद्र है। आत्मनिरीक्षण और ध्यानमग्न समाधि में यह पता चल सकता है कि हमारी व्यक्तिगत चेतना किस प्रकार से सम्पूर्ण चेतना या आलय का केवल एक अंग मात्र है। हमारी वैयक्तिक चेतना को पूर्ण व्यापी चेतना (Universal Conscious ness) के छोटे अंश का ही सीमित ज्ञान प्राप्त होता है। पूर्ण ज्ञान पूर्ण समाधि में ही संभव है। वही निर्वाण है।

विज्ञानवाद के विरोध में यह कहा जाता है कि किसी पदार्थ का अस्तित्व ज्ञाता (knower) पर ही निर्भर करता है। वह ज्ञाता अपने इच्छानुसार किसी पदार्थ को क्यों नहीं उत्पन्न कर लेता है। आपत्ति के उत्तर में विज्ञानवादी का कहना है कि हमारा ‘मन (mind) एक प्रवाह है। प्रवाह में भी जीवन के अनुभवों का संस्कार छिपा होता है। हमारी स्मरण शक्ति (Power of rememberance) इस बात को स्पष्ट कर देती है। विशेष समय में विशेष संस्कार की स्मृति हो सकती है। इसलिए ज्ञान की संभावना हमेशा बनी रहती है। इस प्रकार, चेतना यानि विज्ञान का अस्तित्व स्वप्रमाणित सत्य है।

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प्रश्न 4.
वैभाशिक बाह्य प्रत्यक्षवाद के बारे में आप क्या जानते हैं? बाह्य प्रत्यक्षवाद में निहित विचारों की आलोचनात्मक व्याख्या करें। अथवा, ‘सर्वास्तिवाद’ एक प्रकार का यथार्थवादी सिद्धान्त है। विवेचना करें।
उत्तर:
बौद्ध दर्शन में वैभाषिक मत को बाह्य प्रत्यक्षवाद से जानते हैं। सौत्रांतिकों की तरह ही इस मत को माननेवाले चेतना एवं बाह्य पदार्थ दोनों के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं। अभिधर्म पर महाविभाषा या विभाषा नाम की बहुत बड़ी महत्त्वपूर्ण टीका इस मत का आधार माना जाता है। इसलिए इसे वैभाषिक नाम से जानते हैं। इस मत के लोग सर्वास्तिवाद या यथार्थवाद को मानते हैं। सर्वास्तिवाद एक प्रकार यथार्थवादी सिद्धान्त है। इसे हेतुवादी. यानि कारण कार्यवाही भी कहा जाता है। सर्वास्तिवाद के अनुसार ‘सात ग्रंथ महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं’ जिसमें ‘ज्ञान प्रस्थान’ सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसकी रचना काव्यायनी पुत्र ने बुद्ध की मृत्यु के तीन सौ वर्ष बाद की। इस ग्रंथ के ऊपर टीका का नाम ही ‘महाविभाषा’ है। बाह्य प्रत्यक्षवाद में निहित मुख्य विचार निम्नलिखित हैं –

1. वैभाषिक मत आधुनिक युग के नव्य-वस्तुवादियों (neo-realists) से मिलते हैं। वैभाषिकों के अनुसार पदार्थ का ज्ञान प्रत्यक्ष (perception) को छोड़कर अन्य किसी माध्यम से नहीं होता है। धुआँ देखकर आग के अनुमान की बात करने से अनुमान (Inference) की व्याख्या होती है। यह अनुमान इसलिए संभव होता है कि अतीत (past) के अनुभव में हमने आग और धुआँ दोनों को एक साथ प्रत्यक्षण (perception) कर लिया है। अगर बाह्य पदार्थों का प्रत्यक्षण कभी भी नहीं हुआ हो, तो केवल मानसिक प्रतिरूपों के आधार पर उनका अस्तित्व साबित नहीं किया जा सकता है।

2. वैभाषिक मत में अनुभव (Experience) का अधिक महत्त्व है। अनुभव को पदार्थों के स्वरूप का निर्दोष साक्षी माना जाता है। अनुभव का मतलब उस प्रत्यक्ष ज्ञान से है जो पदार्थ के साथ सीधा सम्पर्क (contact) होने पर प्राप्त होता है। अतः समस्त संसार प्रत्यक्ष ज्ञान का एक क्षेत्र है। अनुमान के निमित्त पदार्थों का वर्गीकरण दो प्रकार का है-एक जो प्रत्यक्ष ज्ञान के विषय हैं और दूसरे वे जो अनुमान द्वारा जाने जाते हैं।

इन्हें क्रमशः इन्द्रियगम्य एवं तर्कनीय कहा जाता है। विचारों के आन्तरिक जगत और पदार्थों के बाह्य जगत के बीच अन्तर संभव बताया जाता है। इस प्रकार वैभाषिक मत स्वभाव से द्वैतवादी (Dualist) है। द्वैतवाद प्रकृति को बाह्य पदार्थ का प्रतीक मानते हैं। मन को चेतना या विज्ञान माना जाता है। यहाँ चेतना एवं बाह्य पदार्थ दोनों के अस्तित्व को माना जाता है। प्रमाणशास्त्र के दृष्टिकोण (Theory of knowledge) के अनुसार वैभाषिक मत को सरल और अकृत्रिम यथार्थवाद कहा जा सकता है।

3. पदार्थों में नित्य क्षणिक प्रतीति नहीं है:
पदार्थ वे अवयव हैं जो प्रतीति (appear ance) के विषय यथा पदार्थों की पृष्ठभूमि का निर्माण करते हैं। कुछ सर्वास्तिवादी कारण-कार्य सम्बन्ध (casual relation) की परेशानी से बचने के लिए ऐसा मानते हैं कि कारण और कार्य दोनों ही पदार्थ (object) के दो पक्ष हैं। जैसे-जल, बर्फ और नदी की धारा दोनों में जल एक समान पदार्थ है। रूप क्षणिक है लेकिन अधिष्ठान स्थायी है। आर्य देव के अनुसार कारण कभी भी नष्ट नहीं होता है। लेकिन अवस्था बदलने पर जब वह कार्य (Effect) बन जाता है तो केवल अपना नाम बदल लेता है। जैसे-मिट्टी अपनी अवस्था परिवर्तित करके घड़ा बन जाती है। इस अवस्था में कारण मूल मिट्टी का नाम बदलकर घड़ा हो जाता है।

4. पदार्थों का नाश संभव है:
जिन पदार्थों को हम देखते हैं, वे उस अवस्था में नष्ट हो जाते हैं। उनकी सत्ता (reality) का अवधिकाल बहुत कम है। जैसे-बिजली की चमक अणु (atoms) जल्द ही अलग-अलग हो जाते हैं। उनका एकीकरण कुछ ही समय के लिए होता है। पदार्थों का अस्तित्व चार क्षणों (moments) तक ही रहता है। वे हैं-उत्पत्ति, स्थिति, क्षय एवं विनाश यानि मृत्यु। पदार्थों की स्थिति हमारी प्रत्यक्ष-क्रिया से बिल्कुल स्वतंत्र रह सकती है।

5. वैभाषिक मत आण्विक सिद्धान्त (Theory of atoms) को स्वीकार करता है। वैभाषिक तत्व विज्ञान के अनुसार तत्त्व चार हैं। वे हैं-पृथ्वी, जल, आग और हवा। स्वभाव के अनुसार, पृथ्वी कठोर है, जल ठंढा है, आग गर्म है और हवा गतिमान है। पाँचवें तत्त्व ‘आकाश’। को वैभाषिक मत स्वीकार नहीं करता है।

वस्तुतः बाह्य पदार्थ परम अणुओं (atom) की अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार एकत्रीकरण का एक फल है। सभी पदार्थ अन्त में जाकर अणुओं (atoms) के रूप में बदल जाते हैं। अणु को अकेले देखना संभव नहीं है। अणुओं के समूह को देखना सम्भव है। बसुबन्धु के अनुसार अणु एक अत्यन्त ही छोटा कण है। इसे कहीं भी स्थापित करना कठिन है। इसे न तो हाथ से पकड़ा जा सकता है और न पैर से दबाया जा सकता है। यह आकार विहीन है। यह अविभाज्य (indivisible) और अदृश्य (invisible) है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 9 प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 9 प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 9 प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र

Bihar Board Class 11 Philosophy प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘और’, ‘तथा’, ‘सिवाय’ ‘और भी’, ‘लेकिन’, ‘यद्यपि’, ‘तो भी’ आदि हैं –
(क) संयोजन
(ख) निषेधात्मक प्रकथन
(ग) सोपाधिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) संयोजन

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प्रश्न 2.
‘राम तेज है या नटखट है।’ इस यौगिक प्रकथन को क्या कहते हैं?
(क) वियोजन
(ख) निषेध
(ग) सोपाधिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) वियोजन

प्रश्न 3.
‘यदि परीक्षा जल्द हुई, तो वह प्रथम करें’ यह कौन-सा यौगिक प्रकथन है?
(क) सोपाधिक प्रकथन
(ख) वियोजन
(ग) निषेधात्मक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सोपाधिक प्रकथन

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प्रश्न 4.
सोपाधिक प्रकथन को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
(क) आपादानात्मक प्रकथन
(ख) हेत्वाश्रित प्रकथन
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) उपर्युक्त दोनों

प्रश्न 5.
यदि ‘P’ कोई एक प्रकथन हो तो उसका निषेध होगा –
(क) ‘p.d’
(ख) ‘p vq’
(ग) ‘P’
(घ) ‘VP’
उत्तर:
(ग) ‘P’

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प्रश्न 6.
‘A \(\supset \) B’ से किस यौगिक तर्कवाक्य का संकेत मिलता है?
(क) संयुक्त यौगिक तर्कवाक्य
(ख) वैकल्पिक यौगिक तर्कवाक्य
(ग) आपादिक यौगिक तर्कवाक्य
(घ) निषेध तर्कवाक्य
उत्तर:
(ग) आपादिक यौगिक तर्कवाक्य

प्रश्न 7.
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र (Symbolic logic) प्रक्रिया है –
(क) प्रतीकों के माध्यम से सत्यता की स्थापना
(ख) प्रतीकों के माध्यम से सत्यान्वेषण
(ग) प्रतीकों के माध्यम से नये ज्ञान की प्राप्ति
(घ) प्रतीकों के माध्यम से छात्रों में असमंजस की स्थिति उत्पन्न करना
उत्तर:
(क) प्रतीकों के माध्यम से सत्यता की स्थापना

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प्रश्न 8.
उक्तियों के (Argument) के प्रकार हैं –
(क) सरल
(ख) जटिल
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

प्रश्न 9.
कीलक (V) क्या है?
(क) वियोजक की सत्यता मूल्य
(ख) निषेधात्मक उक्ति की सत्यता मूल्य
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) वियोजक की सत्यता मूल्य

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प्रश्न 10.
किसी सत्य उक्ति का निषेध होता है –
(क) असत्य
(ख) सत्य
(ग) सत्यासत्य
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) असत्य

प्रश्न 11.
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र (Symbolic Logic) ज्ञान की किस विद्या का विकसित तथा व्यवस्थित रूप है?
(क) तर्कगणित
(ख) जीव विज्ञान
(ग) भौतिकी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) तर्कगणित

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प्रश्न 12.
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र के लाभ हैं –
(क) भाषा की अस्पष्टता से बचने हेतु
(ख) समय की बचत
(ग) स्थान की बचत
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
सरल प्रकथन किस प्रकथन को कहते हैं?
(क) जिस प्रकथन में केवल एक ही उक्ति हो
(ख) जिस प्रकथन में दो या दो से अधिक उक्ति हो
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) जिस प्रकथन में केवल एक ही उक्ति हो

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प्रश्न 14.
‘आम लाल है ।’ यह प्रकथन है –
(क) सरल
(ख) जटिल
(ग) आपादित
(घ) सोपाधिक
उत्तर:
(क) सरल

प्रश्न 15.
जटिल उक्ति किसे कहते हैं?
(क) जिस प्रकथन में केवल एक उक्ति हो
(ख) जिस प्रकथन में दो या दो से अधिक उक्ति हो
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) जिस प्रकथन में दो या दो से अधिक उक्ति हो

Bihar Board Class 11 Philosophy प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सरल उक्ति किसे कहते हैं? अथवा, सरल प्रकथन किसे कहते हैं?
उत्तर:
सरल उक्ति उसे कहा जाता है जिसके निर्णायक तत्त्व के रूप में कोई अन्य उक्ति नहीं हो। जैसे-आम लाल है, टेबुल चौकोर है आदि।

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प्रश्न 2.
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
भाषा की अस्पष्टता से बचने हेतु तथा समय एवं स्थान में मितव्ययिता के लिए प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र बहुत उपयोगी है।

प्रश्न 3.
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र (symbolic logic) क्या है?
उत्तर:
तर्कगणित के विकसित तथा व्यवस्थित रूप को ही प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र कहा जाता है।

प्रश्न 4.
जटिल उक्ति (Compound) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जटिल उक्ति वह है, जिसके नियामक तत्त्व के रूप में एक से अधिक उक्तियाँ हों। जैसे-‘मोहन मुजफ्फरपुर जाएगा और राम पटना’, ‘वह कला पढ़ेगा या वह पढ़ाई छोड़ देगा’।

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प्रश्न 5.
संयोजन क्या है? अथवा, संयोजन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
दो या दो से अधिक सरल उक्तियों के बीच ‘और’ या ‘तथा’ शब्द लगाकर एक ६ जटिल उक्ति की रचना की जाती है, उसे ही संयोजन (conjunction) कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सरल एवं जटिल उक्ति के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
वाक्य कई प्रकार के हो सकते हैं, जैसे क्या आप तर्कशास्त्र पढ़ना चाहते हैं? एक ग्लास पानी दें, गुलाब लाल है आदि। सभी वाक्य एक प्रकार के नहीं हैं, कोई प्रश्नार्थक है तो कोई आज्ञार्थक और कोई वर्णनात्मक। ‘क्या आप तर्कशास्त्र पढ़ना चाहते हैं?’ यह वाक्य प्रश्नार्थक है, ‘एक ग्लास पानी दें’ – यह वाक्य आज्ञार्थक है, पर ‘गुलाब लाल है’ एक वर्णनात्मक वाक्य है। किंसी वर्णनात्मक वाक्य को ही उक्ति कहा जाता है। उक्ति वैसे वाक्य होते हैं, जो सत्य हों या असत्य हों। उक्तियाँ दो प्रकार की होती हैं, सरल या जटिल। सरल उक्ति उसे कहा जाता है, जिसके निर्मायक तत्त्व के रूप में कोई अन्य उक्ति नहीं हो, जैसे, गुलाब लाल है, यह कुर्सी चौकोर है आदि।

इसमें केवल एक उक्ति होती है। जटिल उक्ति वह है, जिसके निर्मायक तत्त्व के रूप में एक से अधिक उक्तियाँ हो, जैसे – ‘राम कलकत्ता जाएगा और श्याम पटना’। वह विज्ञान पढ़ेगा या वह पढ़ाई छोड़ देगा।’ प्रत्येक उदाहरण में दो-दो उक्तियाँ हैं। ‘राम कलकत्ता जाएगा और श्याम पटना’ में दो उक्तियाँ हैं –

  1. राम कलकत्ता जाएगा और
  2. श्याम पटना जाएगा और दूसरी उक्ति में भी दो उक्तियाँ हैं –
    • वह विज्ञान पढ़ेगा या
    • वह पढ़ाई छोड़ देगा। जटिल उक्तियों में एक से अधिक उक्तियाँ होती हैं। जटिल उक्तियों के निर्मायक अंश स्वयं जटिल भी हो सकते हैं। सरल उक्तियों को विभिन्न विधियों से सम्बन्धित कर एक जटिल उक्ति की रचना की जाती है।

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प्रश्न 2.
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भाषा की अस्पष्टता तथा दुरूहता से बचने के लिए तथा समय और स्थान में मितव्ययिता के लिए समकालीन युग में तर्कशास्त्र के क्षेत्र में प्रतीकों का प्रयोग प्रारम्भ किया गया। प्रत्येक विज्ञान में प्रतीकों की आवश्यकता होती है। गणित में, x × x × x × x × x को बहुत संक्षिप्ति रूप x5 में व्यक्त कर देते हैं। इससे समय और स्थान की बचत तो होती ही है, साथ-साथ ध्यान भी बिखरता नहीं है और स्मृति में सहायता मिलती है। पदार्थ तथा रसायन-विज्ञान में प्रतीकों का प्रयोग होता है। इसी लक्ष्य से तर्कशास्त्र में भी प्रतीकों का प्रयोग होता है। प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र और प्राचीन तर्कशास्त्र में गुणात्मक भेद नहीं है, पर प्रतीकों का प्रयोग विश्लेषण तथा तों की प्रामाणिकता की परीक्षा का अधिक शक्तिशाली अस्त्र सिद्ध हुआ है।

प्रश्न 3.
यदि अ और ब सत्य उक्तियों हों और स और प असत्य, तो निम्नलिखित जटिल उक्तियों का सत्यता – मूल्य बतलाएँ।
(क) ~ (अ V स)
(ख) ~ (~[~(अ ~ स) ~ अ] ~ स)
उत्तर:
(क) चूँकि अ सत्य उक्ति है और स असत्य, इसलिए वियोजन (अ V स) सत्य होगा और इसका निषेध ~ (अ V स), असत्य। अतः, जटिल उक्ति ~ (अ V स) का सत्यता-मूल्य असत्य होगा।

(ख) चूँकि स असत्य है, इसलिए उसका निषेध ~ स सत्य होगा और चूँकि अभी सत्य है, अतः संयोजन (अ ~ स) सत्य होगा और उसका निषेध (अ ~ स), असत्य। चूँकि अ सत्य है, इसलिए उसका निषेध ~ अ असत्य होगा और इसका संयोजन [~ (अ . ~ स) ~ अ] असत्य होगा। इसलिए इस सयोजन का निषेध ~ [~ (अ . ~ स) . ~ अ], सत्य होगा। चूँकि स असत्य है, इसलिए उसका निषेध ~ स, सत्य होगा और उसका संयोजन {~ {~ (अ . ~ स)} सत्य होगा और इसका निषेध जो दी हुई जटिल उक्ति है ~ {~ [~ (अ . ~ स). ~ अ] . ~ स}, असत्य होगा।

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प्रश्न 4.
संयोजन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संयोजन (Conjunction):
दो या दो से अधिक सरल उक्तियों के बीच और, या, तथा, शब्द लगाकर एक जटिल उक्ति की रचना की जाती है। जैसे –

  1. कुर्सी बैठने की सामग्री है और कलम लिखने की –
  2. ‘राम तेज है तथा वह गरीब है’-दोनों जटिल उक्तियाँ हैं।

दो या दो से अधिक उक्तियों को ‘और’, ‘या’, ‘तथा’ लगाकर सम्बन्धित करने पर जिस सरल उक्ति की रचना होती है, उसे संयोजन (Conjunction) कहते हैं। जिन सरल उक्तियों को इस तरह मिलाया जाता है, उन्हें ‘संयुक्त’ (Conjuncts) कहा जाता है। पहली जटिल उक्ति में ‘कुर्सी बैठने की सामग्री है’ एक संयुक्त और ‘कलम लिखने की सामग्री है’ दूसरा संयुक्त। दूसरी जटिल उक्ति में ‘राम तेज है’ एक संयुक्त है और ‘राम गरीब है’ दूसरा संयुक्त। ‘और’ शब्द के लगा देने से ही कोई उक्ति जटिल नहीं हो जाती।

‘और’ शब्द का प्रयोग दूसरी तरह भी होता है, जैसे-राम और श्याम शत्रु हैं। यह एक जटिल उक्ति नहीं है, हालाँकि इसमें ‘और’ शब्द का प्रयोग हुआ है। यह एक, सरल उक्ति है, जिसमें एक विशेष सम्बन्ध को व्यक्त किया गया है। दो उक्तियों को संयोजित रूप में सम्बन्धित करने के लिए ‘और’ या ‘तथा’ के लिए एक विशिष्ट प्रतीक ‘.’ (बिन्दु) का प्रयोग किया गया है, जैसे, कुर्सी बैठने की सामग्री है और कलम लिखने की = कुर्सी बैठने की सामग्री है, कलम लिखने की। यदि प और फ को सरल उक्तियाँ मान लें तो इनका संयोजन होगा-प, फ। हिन्दी या अंग्रेजी में ‘और’ के अतिरिक्त अन्य शब्द जैसे सिवाय, और भी, फिर भी, लेकिन, यद्यपि, तो भी का प्रयोग संयोजन में होता है, अतः उनका प्रतीक भी बिन्दु ‘ . ‘ ही होगा।

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प्रश्न 5.
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र (Symbolic logic) की उपयोगिता बताएँ।
उत्तर:
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र की उपयोगिता –

  1. प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र का अध्ययन बौद्धिक स्तर को ऊँचा करता है।
  2. यह सभी विषयों को तार्किक ढंग से हल करने में सहायता करता है।
  3. यह शुद्ध एवं स्पष्ट अनुमान निकालने में सहायता करता है।
  4. इसकी सहायता से सही युक्तियों (Correct argument) का स्पष्ट विश्लेषण पहुँचाया जा सकता है।
  5. इसकी सहायता से विचारों को पूर्ण अभिव्यक्तियों का सही अर्थ दूसरों तक पहुँचाया जा सकता है।

प्रश्न 6.
किन्हीं चार प्रतीकों का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
चार प्रतीकों के अर्थ हम निम्नलिखित ढंग से स्पष्ट कर सकते हैं –
(क) A. B यहाँ . संयुक्तक है।
(ख) AV यहाँ V वैकल्पिक है।
(ग) A \(\supset \) B यहाँ \(\supset \) आपादिक है।
(घ) – A यहाँ – निषेधक है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र में कोष्ठों के प्रयोग को समझाएँ।
उत्तर:
कोष्ठों का प्रयोग-अस्पष्टता को दूर करने के लिए भाषाओं में विरामचिह्न का, गणित में कोष्ठों का प्रयोग किया जाता है। न को किसके साथ माना जाए इस आधार पर ‘बेटा न बेटी’ के कई अर्थ हो सकते हैं। 6 + 3 ÷ 3 से 9 ÷ 3 = 3 या 6 + (3 ÷ 3) = 7 का बोध हो सकता है। इसलिए विराम-चिह्न तथा कोष्ठों का प्रयोग किया जाता है। प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र में भी भाषा की दुरूहता को दूर करने के लिए विराम – चिह्नों के प्रयोग की आवश्यकता होती है।

प फ Vब में अस्पष्टता है। इसका अर्थ हो सकता है –

1. प का फ V ब के साथ संयोजन या प . फ का ब के साथ वियोजन। इन अर्थों का स्पष्टीकरण विराम-चिह्नों के प्रयोग से होता है – जैसे,

  • प (फ V ब) या
  • (प . फ) V ब। यदि प और फ दोनों सत्य हों और ब सत्य हो तो –

2. प . (फ V ब) अ स असत्य होगा। चूँकि इसका पहला संयुक्त असत्य है और –

3. (प, फ) V ब, सत्य होगा, अ स क्योंकि इसका एक वियुतक सत्य है। इसलिए विरामचिह्न में अन्तर होने से सत्यता-मूल्य में अन्तर हो जाता है। विराम-चिह्न के लिए प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र में लघु कोष्ठ, कोष्ट और वृहत् कोष्ठ का प्रयोग किया जाता है।

विराम चिह्नों की संख्या कम करने के लिए कुछ परम्पराएँ स्थापित की गयी हैं, जैसे, ~ प Vफ का अर्थ हो सकता है (~प) V फ या ~ (प V फ)। पर एक परम्परा स्थापित की गयी है कि किसी अभिव्यक्ति के सबसे छोटे अंश पर ही ‘ कुटिल ~ ‘ प्रतीक लागू होगा इसलिए ~ प V फ का अर्थ होगा (~प) V फ न कि ~ (प V फ)।

व्यावर्तक वियोजन में कम-से-कम एक वियुतक सत्य है और कम-से-कम एक असत्य, जैसे गुलाब लाल है या पीला। दोनों सत्य नहीं हो सकते। इसलिए उसे यह प्रतीकात्मक रूप दिया जा सकता है – (प V फ) . (~प V~ फ)। उपर्युक्त विधियों से भिन्न प्रकार की जटिल उक्तियों का प्रतीकात्मक रूप हो सकता है। जिस जटिल उक्ति की रचना सत्यता-फल-सम्बन्धी सम्बन्धकों के द्वारा सरल उक्तियों को सम्बन्धित करने से होती है, उसका सत्यता-मूल्य उसकी निर्मायक सरल उक्तियों के सत्यता-मूल्य पर निर्भर है।

उदाहरण के लिए. यदि अ और ब को असत्य उक्तियाँ और क और ख को सत्य उक्तियाँ मान लें तो ~ [(~ अ V क) V~ ( ब ख)] का सत्यता-मूल्य निम्न तरीके से निकलेगा। चूँकि अ असत्य है, इसलिए ~ अ सत्य होगा, चूँकि क भी सत्य है, इसलिए वियोजन (~ अ Vक) सत्य होगा। चूँकि ब असत्य है और ख. सत्य, इसलिए संयोजन (ब . ख) असत्य होगा और इसका निषेध ~ (ब . ख), सत्य। अतः वियोजन (~अ V क) V~ (ब . ख) सत्य होगा। इसलिए इसका निषेध ~ [(~ अ V क) V~ (ब ख)] असत्य होगा। इसी प्रकार क्रम से किसी सत्यता-फलन-सम्बन्धी जटिल उक्ति का सत्यता-मूल्य इसकी निर्मायक सरल उक्तियों के सत्यता-मूल्य से निर्धारित किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र के लाभ की व्याख्या करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र का सम्बन्ध युक्तियों से है। युक्तियों के घटक (Constituents) तर्कवाक्य या प्रकथन होते हैं।

(क) सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं।
(ख) मंगल एक ग्रह है।
(ग) अतः, मंगल सूर्य के चारों ओर घूमता है।

यह एक युक्ति का उदाहरण है। इस युक्ति के घटक (क) (ख) और (ग) तर्कवाक्य हैं। इस तर्क-वाक्यों में ‘क’ और ‘ख’ आधार-वाक्य हैं और ‘ग’ उनका निष्कर्ष। ये आधार-वाक्य तथा निष्कर्ष वर्णनात्मक (declarative) वाक्यों की भाँति भाषा से सम्बन्धित नहीं है अपितु उन वाक्यों के अर्थ से। पर किसी भी तथ्य को व्यक्त करने का माध्यम भाषा ही है। किसी भाषा में व्यक्त किसी तथ्य का प्रसंगानुसार ठीक-ठीक अर्थ लगा लेना कठिन होता है क्योंकि किसी भी शब्द के अनेक अर्थ होते हैं।

कभी वाक्यों की बनावट के कारण, कभी कहावतों और मुहावरों के प्रयोग के कारण, कभी शब्दों के अनेकार्थकता के कारण, जो अर्थ होना चाहिए वह अर्थ नहीं लग पाता है। भाषा की दुरूहता को शुद्ध करना तर्कशास्त्र का लक्ष्य नहीं है पर जब तक भाषा शुद्ध नहीं हो जाती तब तक युक्तियों की वैधता या अवैधता की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। भाषा की कठिनाई से बचने के लिए बहुत-से विद्वानों ने अपनी तकनीकी शब्द-कोष को विकसित किया है। रसायन-शास्त्र में, भौतिक विज्ञान में, गणित में अपने प्रतीकों का प्रयोग होता है।

फिर, एक कठिनाई और उपस्थित होती है। विज्ञानों में दत्त सामग्रियाँ अनेक होती हैं। उन्हें भाषा में विस्तारपूर्वक अंकित करने में समय और स्थान दोनों की बहुत अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। प्रतीकों के प्रयोग से उनका रूप छोटा हो जाता है। उन्हें अंकित करने में न उतने स्थान, न उतने समय की आवश्यकता होती है।

फिर यह भी कि दत्त सामग्रियों के छोटे रूप पर ध्यान देना जितना सरल है, उतना अन्यथा नहीं। दत्त सामग्रियों के संकलित रूपों की तुलना करना भी सरल सरल होता है। गणित में या संख्यांत प्रणाली में व्याख्यात्मक प्रतीकों के प्रयोग से किसी समीकरण को बहुत ही संक्षिप्त रूप में व्यक्त किया जाता है, जैसे –
क × क × क × क × क × क × क = ख × ख × ख इसका संक्षिप्त रूप, का7 = ख3 प्रायः सभी विज्ञानों में प्रतीकों का प्रचलन हो गया है।

इन्हीं सुविधाओं के कारण तर्कशास्त्र में भी विशेष चिह्नों का विकास हुआ है। अरस्तू ने भी प्रतीकों तथा चिह्नों का अपने अन्वेषण में प्रयोग किया था, जैसे पूर्णव्यापी भावात्मक वाक्य के लिए A, पूर्णव्यापी निषेधात्मक के लिए E इत्यादि। आधुनिक तर्कशास्त्र में इन चिह्नों को और भी विकसित किया गया है। वर्तमान तर्कशास्त्र ने मात्र तर्कवाक्यों के लिए चिह्नों का प्रयोग नहीं, उन तर्कवाक्यों के सम्बन्धों के लिए भी प्रतीकों का प्रयोग किया है। इसलिए पारम्परिक और नवीन तर्कशास्त्र में गुणात्मक अर्थात् किस्म का अन्तर नहीं है अपितु केवल मात्रा में अन्तर है (they do not differ in kind but only in degrees)।

पर यह अन्तर साधारण नहीं है। विश्लेषण तथा निगमन के लिए यह एक शक्तिशाली अस्त्र सिद्ध हुआ है। आज की वैज्ञानिक प्रणाली में इसका प्रयोग हर क्षेत्र में हो रहा है। आधुनिक तर्कशास्त्र के प्रतीक किसी युक्ति की तार्किक बनावट को सरलता से स्पष्ट कर देते हैं, जो साधारण भाषा के प्रयोग से अस्पष्ट रहता है।

भाषा की कठिनाईयाँ इससे दूर हो जाती हैं और वैध या अवैध युक्तियों का वर्गीकरण आसान हो जाता है। प्रतीकों के प्रयोग से निगमनात्मक अनुमान के स्वरूप भी स्पष्टीकरण हो जाता है। हाइटहेड ने ठीक ही कहा है कि प्रतीकों की सहायता से एक बार देखकर ही यांत्रिक रूप से युक्तियों की वैधता जानी जा सकती है, जिसके लिए अन्यथा उच्च मानसिक योग्यता की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 3.
सत्यता मूल्य के बारे में आप क्या जानते हैं? समझाकर लिखें। अथवा, सत्यता-सारणी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रत्येक उक्ति या तो सत्य होती है या असत्य। सत्य उक्ति या सत्यता-मूल्य ‘सत्य’ होता है तथा असत्य उक्ति का सत्यता-मूल्य ‘असत्य’ होता है। किसी जटिल उक्ति को सत्यता-मूल्य के आधार पर दो भागों में बाँटा जा सकता है। कुछ जटिल उक्तियाँ ऐसी होती हैं जिनको सत्यता-मूल्य उनकी निर्णायक उक्तियों पर निर्भर नहीं होता है, जैसे – ‘मेरा विश्वास है कि लोहा सोना से भारी होती है।

‘इस जटिल उक्ति का सत्यता-मूल्य इसकी निर्णायक सरल उक्ति ‘लोहा सोना से भारी है’ के सत्यता-मूल्य से स्वतंत्र है। सरल उक्ति सत्य हो या असत्य, ‘मुझे ऐसा विश्वास है’ तो वह विश्वास असत्य नहीं होगा, क्योंकि लोगों को गलत और सही दोनों प्रकार का विश्वास रहता है। कुछ जटिल उक्तियाँ ऐसी होती हैं, जिनका सत्यता-मूल्य उनकी निर्मायक सरल उक्तियों के सत्यता-मूल्य पर निर्भर होता है।

संयोजन के सत्यता-मूल्य और उसके संयुक्त के सत्यता-मूल्य में आवश्यक सम्बन्ध है। कोई संयोजन तभी सत्य होता है जब उसके संयुक्त सत्य होते हैं, जैसे, ‘छड़ी सीधी है’ और ‘टेबुल गोल-यह संयोजन तभी सत्य होगा जब दोनों संयुक्त ‘छड़ी सीधी है’ और ‘टेबुल गोल है’, सत्य हों। यदि उनमें एक भी असत्य हो या दोनों असत्य हों तब संयोजन असत्य होगा। वैसी जटिल उक्ति को, जिसका सत्यता-मूल्य उसकी निर्मायक उक्तियों के सत्यता-मूल्य से निर्धारित हो, सत्यता-फलन सम्बन्धी (Truth functionally) जटिल उक्ति कहा जाता है।

संयोजन सत्यता-फलन-सम्बन्धी जटिल युक्ति है, क्योंकि इसका सत्यता-मूल्य संयुक्त के सत्यता-मूल्य पर निर्भर है। इसलिए संयोजन का प्रतीक सत्यता-फलनीय सम्बन्धक (Connective) है। यदि दो दी हुई उक्तियाँ प और फ हों तो उनके सिर्फ चार प्रकार सत्यता-मूल्य सम्भव हैं और प्रत्येक स्थिति में संयोजन का सत्यता मूल्य अपने रूप से निर्धारित होता है। प और फ के सत्यता-मूल्य निम्नांकित चार प्रकार से हो सकते हैं –

  1. उस दशा में जब प सत्य है, और फ सत्य है, प . फ सत्य होगा।
  2. उस दशा में जब प सत्य है, और फ असत्य है, प . फ असत्य होगा।
  3. उस दशा में जब प असत्य है, और फ सत्य है, प . फ असत्य होगा।
  4. उस दशा में जब प असत्य है और फ असत्य है, प . फ असत्य होगा।

यदि सत्यता का ‘स’ से और असत्यता का ‘अ’ से संकेत करें तो सत्यता-सारणी (Truth table) के द्वारा संक्षेप में यह बतलाया जा सकता है कि किस तरह संयोजन का सत्यता-मूल्य उसके संयुक्त के सत्यता-मूल्य से निर्धारित होता है –
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 9 प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र
उपर्युक्त सत्यता सारणी को बिन्दु प्रतीक (.) की परिभाषा माना जा सकता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 9 प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र

प्रश्न 4.
निषेधात्मक उक्ति का सत्यता मूल्य कैसे निर्धारित किया जाता है?
उत्तर:
निर्मायक उक्ति का निषेध करके भी जटिल उक्ति की रचना की जाती है। जैसे, यह बात नहीं है कि राम अमीर है’। यह उक्ति जटिल है, क्योंकि इसमें निर्मायक सरल उक्ति ‘राम अमीर है’ का निषेध किया गया है। निषेध को व्यक्त करने के कई रूप हैं। जैसे – यह गलत है कि राम अमीर है, यह सत्य नहीं है कि राम अमीर है, राम अमीर नहीं है, राम कदापि अमीर नहीं है, इत्यादि। निषेध या व्याघातक के लिए ~ (कुटिल) प्रतीक का प्रयोग किया जाता है। जैसे, ‘यह बात नहीं है कि राम अमीर है’ = ~ राम अमीर है। यदि प कोई एक उक्ति हो तो उसका निषेध होगा ~ प।

निषेध का सत्यता-मूल्य:
चूंकि किसी सत्य उक्ति का निषेध असत्य होता है और असत्य उक्ति का निषेध सत्य, इसलिए कुटिल ~ प्रतीक की परिभाषा निम्न सत्यता-सारणी से कर सकते हैं –
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 9 प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र

प्रश्न 5.
वियोजन का सत्यता मूल्य कैसे दर्शाया जाता है?
उत्तर:
दो या दो से अधिक उक्तियों को ‘या’, ‘वा’ लगाकर वियोजित रूप से सम्बन्धित किया जाता है, जैसे राम मूर्ख है या बदमाश है। ऐसी उक्तियाँ भी जटिल हैं। इन्हें ‘वियोजन’ (Disjunction) कहा जाता है। जिन उक्तियों को इस प्रकार सम्बन्धित किया जाता है, उन्हें वियुतक या विकल्प (Disjuncts) कहा जाता है। ‘या’, ‘वा’ शब्दों का प्रयोग दो रूपों में हो सकता है।

जैसे, ‘राम मूर्ख है या बदमाश है’ का अर्थ यह नहीं है कि राम केवल मूर्ख है या केवल बदमाश है, पर यह भी कि वह मूर्ख और बदमाश दोनों हो सकता है। यह ‘या’ शब्द का निर्बल या समावेशित (Weak or inclusive) अर्थ है। ‘या’ शब्द का अर्थ ‘यह गुलाब लाल है या पीला’ उक्ति में पहले अर्थ में भिन्न है। यह गुलाब लाल और पीला दोनों नहीं हो सकता। दोनों विकल्पों या वियुतकों में केवल एक ही सत्य होगा, दोनों नहीं।

‘या’ का ऐसा प्रयोग सबल या व्यावर्तक (Strong or exclusive) कहा जाता है। दोनों प्रयोगों में अन्तर यह है कि पहले में ‘या’ लगाने का अर्थ हुआ कि कम-से-कम एक विकल्प या वियुतक सत्य है (दोनों भी सत्य हो सकते हैं), दूसरे में कम-से-कम एक विकल्प या वियुतक सत्य है और कम-से-कम एक असत्य (दोनों सत्य नहीं हो सकते)। दोनों प्रयोगों में एक बात सामान्य है कि कम-से-कम एक विकल्प सत्य होगा।

इसलिए समावेशित वियोजन का यह पूर्ण अर्थ होगा और व्यावर्तक वियोजन का आंशिक अर्थ। लैटिन भाषा में ‘भेल’ (Vel) शब्द ‘या’ शब्द के समावेशित अर्थ को व्यक्त करता है और ‘ऑट’ (aut) शब्द ‘या’ शब्द के व्यावर्तक अर्थ को। प्रचलित रूप में ‘भेल’ (Vel) शब्द के प्रथम अक्षर ‘भी’ (V) को समावेशित ‘या’ के प्रतीक के रूप में माना गया है। जैसे, राम मूर्ख है या बदमाश = राम मूर्ख है V बदमाश। यदि प और फ दो उक्तियाँ हों, तो उनका समावेशित वियोजन लिखा जाएगा–प Vफ।

वियोजन का सत्यता-मूल्य:
‘V’ प्रतीक जिसे ‘कीलक’ कहा जाता है, एक सत्यता फलन-सम्बन्धी सम्बन्धक है, जिसकी परिभाषा निम्नांकित सत्यता-सारणी के द्वारा दी जाती है –
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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 20 वस्त्रों की परिसज्जा

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 20 वस्त्रों की परिसज्जा Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 20 वस्त्रों की परिसज्जा

Bihar Board Class 11 Home Science वस्त्रों की परिसज्जा Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कपड़ों की परिष्कृति की मुख्यतः विधियाँ हैं –
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो

प्रश्न 2.
वस्त्र निर्माण के पहले या बाद में सफेदीपन लाने के लिए जो प्रक्रिया की जाती है उसे कहते हैं –
(क) विरजन
(ख) कैलेंडरिंग
(ग) टैटरिंग
(घ) मीराइजिंग
उत्तर:
(क) विरजन

प्रश्न 3.
टैंटरिंग की मशीन फुट लंबी होती है –
(क) 20-50
(ख) 20-60
(ग) 20-80
(घ) 20-70
उत्तर:
(घ) 20-70

प्रश्न 4.
कपड़े में सिलिकोन (Silicon) का प्रयोग किया जाता है –
(क) पानी रोकने के लिए
(ख) हवादार बनाने के लिए
(ग) गर्मी को कम करने के लिए।
(घ) पसीने से बचाव के लिए
उत्तर:
(क) पानी रोकने के लिए

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प्रश्न 5.
स्रोतों के आधार पर रंगों को वर्गों में विभाजित किया गया है –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(क) दो

प्रश्न 6.
वस्त्र निर्माण की सबसे छोटी इकाई [B.M.2009A]
(क) धागा
(ख) तंतु
(ग) कपड़ा
(घ) कताई
उत्तर:
(ख) तंतु

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्त

प्रश्न 1.
परिसज्जा (Finishing) का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
अर्थ (Meaning): तंतु व धागों के तैयार कपड़े को उचित रूप देने के लिए जो क्रियाएं की जाती हैं, उन्हें कपड़े की परिसज्जा कहा जाता है।

प्रश्न 2.
परिसज्जा का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
परिसज्जा का महत्त्व (Importance of Finishing): वस्त्रों पर विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएं विभिन्न लक्ष्यों को सामने रखकर की जाती हैं जिनसे वस्त्रों में अलग-अलग गुण
प्रस्फुटित होते हैं। यह गुण परिसज्जा को दर्शाते हैं। अतः परिसज्जा का ध्येय ही उसका महत्त्व है, जो निम्न हैं

  • वस्त्रों के बाहरी रूप को आकर्षित बनाना (To enhance the appearances of fabric)।
  • वस्त्र की उपयोगिता बढ़ाना (To enhance the utility of fabric)।
  • विभिन्नता लाना (To bring variety)।
  • at ont facilish GAH (To bring durability)
  • अनुकरण वस्त्र बनाना (To produce imitation fabrics)।

प्रश्न 3.
परिसज्जा को कितने वर्गों में बांटा जा सकता है ?
उत्तर:
परिसज्जा के वर्गों (Types of Finishing) को दो भागों में बाँटा जा सकता है-(ii) आधारभूत परिसज्जाएं (Basic Finishes), (ii) विशिष्ट परिसज्जाएं (Special finishes)।

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प्रश्न 4.
परिसज्जा के प्रकार (Types) लिखें।
उत्तर:
1. आधारभूत (Basic):

  • शुद्धिकरण (Cleaning)
  • विरंजन (Bleaching)
  • कड़ा करना (Sizing)
  • टेंटरिंग (Tantering)।

2. विशिष्ट (Special):

  • मसराइजेशन (Mercerisation)
  • सिकुड़न प्रतिरोधकता (Shrinking control)
  • जल अभेद्यता (Water proofing)
  • रंगाई (Dying)
  • छपाई (Printing)।

प्रश्न 5.
रंग को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
रंग (Colour):
किसी भी तन्तु या वस्त्र को रंगने के लिए जिस पदार्थ की आवश्यकता होती है, वह रंग कहलाता है।

प्रश्न 6.
विरंजन या ब्लीचिंग (Bleaching) से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
वस्त्रों से उनके मैले दिखते रंगों को तथा दाग-धब्बों को छुड़ाकर उनको स्वच्छ या । सफेद करने की प्रक्रिया विरंजन या ब्लीचिंग कहलाती है।

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प्रश्न 7.
परिसज्जा के टिकाऊपन (Permanence of finishes) के आधार पर इसे कितने वर्गों में बांटा जाता है ?
उत्तर:
परिसज्जा के टिकाऊपन के आधार पर इसे दो वर्गों में बांटा गया है –
(i) अस्थाई परिसज्जा
(ii) स्थायी परिसज्जा।

प्रश्न 8.
कड़ा करना या साइजिंग (Sizing) को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कड़ा करना या साइजिंग कपड़ों में कड़ापन लाने के लिए की जाती है। सूती कपड़ों में मांड द्वारा व रेशमी वस्त्रों में गोंद द्वारा कड़ापन लाया जाता है। यह अस्थायी परिसज्जा है, जो धुलने पर निकल जाती है।

प्रश्न 9.
रंगाई से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
रंगाई (Dying) अर्थात् रंगों के प्रयोग से ऐसी परिसज्जा करना जिसके द्वारा कपड़े में आकर्षण और विविधता लाई जा सके।

प्रश्न 10.
छपाई (Printing) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
छपाई वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बने हुए वस्त्रों पर निश्चित डिजाइन में रंग लगाया जाता है।

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प्रश्न 11.
छपाई (Printing) कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर:
(i) हाथ द्वारा छपाई (Hand Printing)।
(ii) मशीन द्वारा छपाई (Machine Printing)।

प्रश्न 12.
कपड़ों
पर लगे “सैन्फराइज्ड” चिह्न से आपको क्या जानकारी मिलती है ?
उत्तर:
सैन्फराइज्ड (Sanfarized) चिह्न इस गारंटी का निशान है कि वस्त्र सिकुड़ेगा नहीं।

प्रश्न 13.
कार्यानुरूप परिसज्जा (Functional finishing) क्या है ?
उत्तर:
जिन परिष्कृति एवं परिसज्जा की विधियों को उनके कार्य विशेष के लिए चुना जाता है, कार्यानुरूप परिसज्जा कहलाती है। जैसे-जलभेद्य (Water-proofing) परिष्कृति उसी वस्त्र पर दी जाती है जिन वस्त्रों के लिए जल से अप्रभावित रहना अनिवार्य है। जैसे-तिरपाल, बरसाती कपड़ा आदि । उज्ज्वलनशील परिसज्जा भी इसी प्रकार फायरमैन की पोशाक तथा अन्य अज्वलनशील वस्त्रों को दी जाती है।

प्रश्न 14.
बरसाती (Raincoat) पर कौन-सी परिसज्जा की जाती है ?
उत्तर:
जल अभेद्यता (Water Proofing)।

प्रश्न 15.
पर्वतारोही नाइलोन की रस्सी का प्रयोग क्यों करते हैं ?
उत्तर:
1. मजबूती (Strength)
2. हल्कापन (Lightness)।

प्रश्न 16.
Tie and Dye बंधेज करने का एक मुख्य सिद्धान्त लिखें।
उत्तर:
बंधेज में (Resist Printing) अवरोधक छपाई का सिद्धान्त प्रयोग में लाया जाता है तथा बंधे हुए स्थान पर रंग नहीं चढ़ता।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रंगाई की तीन मुख्य विधियों के बारे में लिखें? [B.M.2009A]
उत्तर:
कपड़ो को आकर्षक एवं सुन्दर बनाने के लिए रंगाई की जाती है। कपड़ों के अनुसार उपयुक्त रंग चुनाव करना पड़ता है। रंग रेशों में जितनी गहराई तक प्रवेश करता है उतना ही स्थाई रहता है रंगाई की मुख्य तीन विधियाँ निम्नलिखित हैं –

1. साधारण रंगाई (Simple Dyeing): इस विधि में रंगने वाले कपड़े को स्वच्छ पानी में भिगोकर निचोड़कर तैयार रंग के घोल में डुबो दिया जाता है उसे पक्का करने के लिए कुछ समय तक पकाया जाता है।

2. बंधेज (Tie and Dye): इस विधि में एक ही रेशे से बने कपड़े को नमूने के अनुसार कसा या बाँधा जाता है और रंग वाले गर्म (ऊबलते हुए) पानी में डुबोया जाता है । जहाँ पर कपड़ा बँधा हुआ होता है उस स्थान पर रंग नहीं चढ़ता।

3. बाटिक (Batik): इस विधि में मोम के गर्म घोल को डिजाइन के अनुसार कपड़े पर लगाया जाता है सुखने पर इसे मनचाहे रंग से रंगा जाता है मोम लगे स्थान पर रंग नहीं चढ़ता परन्तु बाकी जगहों पे रंग चढ़ता हैं। इस रंगाई में हमेशा ठंडे पानी का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 2.
परिष्कृति तथा परिसज्जा की विधि के निर्णायक तत्त्व कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
परिष्कृति तथा परिसज्जा की अनेक विधियां हैं जिनके कारण वस्त्रों में बहुत परिवर्तन आ जाते हैं परन्तु ये सभी प्रक्रियाएं अलग-अलग वस्त्रों के लिए अलग-अलग हैं। इनका चुनाव आवश्यकतानुसार और प्रयोजन के अनुसार किया जाता है। इनमें से कुछ सभी वस्त्रों के लिए जरूरी हैं परन्तु शेष सभी में से चुनकर आवश्यकता के अनुसार इनका प्रयोग किया जाता है। इनका चयन करते समय कई बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, जैसे

1. रेशे की प्रकृति (Nature of fibre):
रेशों के भौतिक तथा रासायनिक गुणों को देखकर ही उनके लिए परिसज्जा का चुनाव किया जाता है अन्यथा वांछित प्रभाव की प्राप्ति नहीं हो पाती । रेशों की जल सोखने की क्षमता, रगड़, घर्षण, दबाव आदि का प्रभाव उसके द्वारा परिसज्जा को ग्रहण करने या न करने के लिए उत्तरदायी होते हैं।

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2. धागे की किस्म तथा बुनाई (Quality of fibre & weaving process): साधारण बुनाई द्वारा बुने हुए ऐसे वस्त्र जिसमें एक ही प्रकार के वर्ग के रेशों का प्रयोग किया गया हो, किसी भी प्रकार की परिसज्जा को आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। बुनाई जितनी जटिल होती है, परिसज्जा देना उतना ही कठिन होता जाता है। अतः सादी बुनाई से तैयार वस्त्र की सतह की संग्राहकता (Receptivity) किसी भी प्रकार की परिसज्जा के लिए अच्छी रहती है परन्तु सजावट वाली बुनाइयां कठिनाई परिसज्जा ग्रहण कर पाती हैं।

प्रश्न 3.
सैन्फराइजिंग विधि किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सैन्फराइजिंग (Sanfarizing): यह एक व्यापारिक चिह्न है, जो इस बात का द्योतक है कि इस छाप का वस्त्र धुलाई के बाद नहीं सिकुड़ेगा। कभी-कभी कैलेण्डरिंग आदि परिसज्जा की विधियों में वस्त्र को जितना वास्तविक रूप से लम्बा तथा चौड़ा हो सकता है, उससे अधिक खींचकर लम्बा-चौड़ा कर दिया जाता है जिसके कारण पहली धुलाई में ही वह अपने वास्तविक रूप को प्राप्त हो जाता है जिसको हम सिकुड़ना कहते हैं।

इस क्षेत्र में कई प्रयत्न किए गए हैं ताकि वस्त्र धुलने के उपरान्त सिकुड़े नहीं। कई मशीनों का आविष्कार किया गया है जिनकी सहायता से फैले हुए वस्त्रों को उनकी परिष्कृति नष्ट किए बिना ही पूर्वाकार में लाया जा सकता है। इस प्रक्रिया में वस्त्र भाप से गर्म किए सिलेण्डर की सतह पर कम्बल के मध्य से गुजरता है जहाँ इसे सिलेण्डर दबा देता है, जिससे-वस्त्र घना व चिकना होकर ठीक स्थिति में आ जाता है।

प्रश्न 4.
जल अभेद्यता (Water proofing) पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जल अभेद्यता (Water proofing): वस्त्रोद्योग में जल अभेद्य वस्त्रों के निर्माण कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इनका उद्देश्य पानी के प्रवेश को रोकना है । तिरपाल, बरसाती आदि इन गुणों का होना अनिवार्य है। तिरपाल का वस्त्र घटिया, भारी तथा सस्ता होता है तथा छूने व देखने में अनाकर्षक होते हैं क्योंकि इसको बनाने के लिए वस्त्र पर तारकोल आदि का लेप किया जाता है। बरसाती तथा अन्य जल अभेद्य पोशाकों के लिए प्रयोग में आने वाले वस्त्रों का कोमल व चिकना होना अनिवार्य है।

अतः इनमें प्रयुक्त सतह को रबर के घोल से लेप दिया जाता है। आजकल रबर के स्थान पर संश्लेषणात्मक राल (Resin) का प्रयोग किया जाने लगा। ये बुनाई के कारण बने छिद्रों को बंद कर देते हैं तथा पानी ऊपर से ही फिसलकर बह जाता है और भीतर प्रवेश नहीं कर पाता । वस्त्र का झिरझिरापन समाप्त हो जाने के कारण ये स्वास्थ्य और आराम की दृष्टि से अच्छे नहीं होते हैं। आजकल जल-निवारक कपड़े बनाने के लिए उन पर मोम का घोल और मेटेलिक लेप लगाया जाता है परन्तु यह परिसज्जा अस्थायी है।

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प्रश्न 5.
टैन्टरिंग और कड़ापन लाने में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
टैन्टरिंग (Tantering): विरंजन और रंगाई से कपड़े की कम हुई चौड़ाई को सामान्य चौड़ाई पर लाने की प्रक्रिया टैन्टरिंग कहलाती है। यंत्र के प्रयोग से वस्त्र को एक आकार व एक समान चौड़ाई वाला किया जाता है।
कड़ापन लाना (Stiffening): रेजनी, स्टार्च और अन्य प्लास्टिक पदार्थों के प्रयोग से ढीले कपड़े को आकार देकर चिकनापन व चमक लाने की प्रक्रिया को ‘कड़ापन लाना’ कहते हैं।

प्रश्न 6.
मीराइजिंग विधि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इस प्रक्रिया द्वारा चमक पैदा की जाती है। इसके अंतर्गत विशेष रूप से तैयार कास्टिक सोडे के घोल में वस्त्र को दस मिनट के लिए डुबोया जाता है। इसके साथ उस पर एक समान मात्रा में ताप, तनाव तथा दबाव दिया जाता है और फिर कास्टिक सोडे को धोकर निकाल दिया जाता है। इस क्षार के प्रभाव से निष्फलन के लिए वस्त्र को तन अम्लीय घोल में डाल दिया जाता है और अंत में स्वच्छ पानी में धो डाला जाता है।

इस प्रक्रिया के प्रभाव से रेशे फूल जाते हैं तथा दबाव पड़ने से चपटे होकर बुनावट के छिद्रों को बंद कर देते हैं और रेशों के रासायनिक संगठन में परिवर्तन आ जाता है। रेशों के फूलने के कारण वे लम्बाई में सिकुड़ कर मोटाई में फैल जाते हैं जिससे वस्त्र की रचना सघन हो जाती है तथा उनकी सिकुड़न भी समाप्त हो जाती है। इस सघनता तथा समतल जमीन के कारण वस्त्र चिकना व चमकदार हो जाता है। वस्त्रों का सौंदर्य बढ़ने के साथ ही इसकी मजबूती बीस प्रतिशत तक बढ़ जाती है।

प्रश्न 7.
सैन्फराइजिंग व मीराइजिंग में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सैन्फराइजिंग (Sanfarizing):
1. यह प्रक्रिया वस्त्रों को सिकुड़न निरोधक बनाने की है।

2. इसमें यांत्रिक विधि का प्रयोग भी किया जाता है। वस्त्र भाप में गर्म किये सिलेण्डर की सतह तथा कम्बल के मध्य से गुजरता है जहां से सिलेण्डर वस्त्र को दबा देता है जिससे वस्त्र घना व चिकना होकर ठीक स्थिति में आ जाता है।

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3. इसमें मोलेमीन फॉरमेल्डराइड रेजिन व यूरिया फॉरमेल्डीहाइड रेजिन का प्रयोग करके कपड़े की लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई को स्थायी रूप दिया जाता है।

मीराइजिंग (Mercerizing):

  • यह प्रक्रिया वस्त्रों में चमक तथा शिकन दूर करने के लिए प्रयोग में लायी जाती है।
  • इसमें कास्टिक सोडे के घोल में वस्त्र को दस मिनट के लिए डुबोकर उस पर एक समान ताप, तनाव तथा दबाव दिया जाता है। फिर धोकर सोडे को निकाला जाता है। सोडे के प्रभाव को निष्फलन करने हेतु तनु अम्लीय घोल में डालकर अंत में स्वच्छ पानी से धोया जाता है।
  • इस प्रक्रिया के प्रभाव से रेशे फूल कर चपेपटे हो जाते हैं और वस्त्रों मे सघनता, चमक, चिकनाहट और आकर्षण आ जाता है।

प्रश्न 8.
रंगाई और छपाई में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1. रंगाई (Dye): कपड़े, धागे या तंतु को प्राकृतिक या वानस्पतिक रंग से जिस प्रक्रिया द्वारा चढ़ाया जाता है, उसे रंगाई कहते हैं।
2. छपाई (Printing): जिस प्रक्रिया द्वारा बुने हुए वस्त्रों पर निश्चित डिजाइन में रंग लगाया जाता है, उसे छपाई कहते हैं।

प्रश्न 9.
सफाई (Cleaning) और विरंजन (Bleaching) में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सफाई (Cleaning): वस्त्रों में से चर्बी, तेलयुक्त पदार्थ, गोंद तथा धातु द्वारा पैदा की गई अन्य अशुद्धियों को झुलसा कर, निघर्षण द्वारा मांड हटाकर, रोएँ काट कर ब्रश को साफ करने की प्रक्रिया ‘स्वच्छ करना’ कहलाती है।

विरंजन (Bleaching): वस्त्रों से उसके मैले दिखते रंगों को तथा दाग-धब्बों को छुड़ा कर श्वेत करने की प्रक्रिया विरंजन कहलाती है। प्राकृतिक तौर से सूर्य का प्रकाश एक विरंजक है, अन्यथा इस विधि में कृत्रिम विरंजकों का प्रयोग किया जाता है। ये विरंजक ऑक्सीकरण कर्मक (Oxidising agents) जैसे हाइड्रोजन परॉक्साइड या अपचयन प्रतिकर्मक (Reducing agents) जैसे जिंकडस्ट टिटेनस क्लोराइड आदि हो सकते हैं। सबसे सुरक्षित विरंजक-हाइड्रोजन पैरॉक्साइड है।

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प्रश्न 10.
आपके पास ग्रे वसा (Grey Fabric) है। उसे आकर्षक बनाने के लिए आप कौन-कौन-सी परिसज्जा करेंगे?
उत्तर:

  • विरंजन करके व धोकर (Can be bleached and washed)
  • रंगाई करके (dyed)
  • छपाई करके (Printed)
  • प्रेस करके (Signing)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कपड़े की परिसज्जा के महत्त्व को विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
कपड़े की परिसज्जा का महत्त्व (Importance of cloth finishing): उपभोक्ताओं की आवश्यकतानुसार एवं रुचि अनुसार कपड़ा बनाने के लिए परिसज्जा का विशेष महत्त्व है।

वस्त्र परिसज्जा के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं –
1. कपड़े के बाहरी स्वरूप (Appearance) को आकर्षक बनाना-कपड़ा बनाने की विभिन्न प्रक्रियाओं, जैसे-कताई, बुनाई आदि के समय कपड़े पर कारीगरों के हाथों अथवा मशीनों द्वारा धब्बे लग जाते हैं। इसके अतिरिक्त कपड़ा तैयार करने में काफी समय लगता है और वातावरण की गन्दगी व धूल भी बुने कपड़े को गन्दा कर देती है।

इस गन्दगी व धब्बों को दूर करने के लिए बुनने के पश्चात् कपड़े का ब्लीच (bleach) किया जाता है। ब्लीच करना एक प्रकार की परिसज्जा है। बुनाई करते समय कपड़े की सतह पर असावधानी के कारण छोटे-छोटे रुए उठ जाते हैं, कई बार कहीं-कहीं धागे की गांठें उभर जाती हैं तो कहीं कोई धागा छूट जाता है, जिससे कपड़े भद्दे लगते हैं और इनकी सतह खुरदरी हो जाती है। इन सबको दूर करने के लिए कपड़ों पर परिसज्जा की जाती है जिससे कपड़ा साफ, चिकना व आकर्षक हो जाता है।

2. कपड़ों की उपयोगिता को बढ़ाना (Increasing the utility of clothes): कपड़ा जब बुन कर तैयार होता है, उस समय वह ढीला, बेजान और प्रयोग करने के अनुकूल नहीं होता है । अतः ऐसे कपड़े को उपयोग नहीं किया जा सकता है। कपड़े की उपयोगी बनाने के लिए उस पर विभिन्न प्रकार से परिसज्जाएं की जाती हैं। रेशम के तन्तुओं को कातने योग्य बनाने के लिए उनके प्राकृतिक मोम को हटाना आवश्यक है और इस गोंद उतारने की प्रक्रिया को गोंद उतारना (Degumming) कहते हैं।

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इस प्रक्रिया द्वारा कपड़ा हल्का हो जाता है। फिर इस रेशम के कपड़े की उपोगिता को बढ़ाने के लिए कृत्रिम तरीकों से उनका वजन बढ़ाया जाता है जिस कपड़े की परिसज्जा करना है। इसी प्रकार बुनाई के पश्चात् कपड़ों में कड़ापन लाने के लिए उन पर कलफ या गोंद लगाया जाता है। कपड़े पर कलफ या गोंद लगाना भी एक प्रकार की परिसज्जा है।

3. कपड़ों को अधिक टिकाऊ (Durable): बनाना-बुने हुए कपड़े को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए भी परिसज्जाएं की जाती हैं। कपड़ों के ढीलेपन को दूर करने के लिए, बुनाई की सघनता को बढ़ाने के लिए या फिर कपड़ों को फफूंदी व कीड़ों से बचाने के लिए कपड़ों पर विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएं की जाती हैं। इन्हीं परिसज्जाओं के कारण ही कपड़ा अधिक टिकाऊ हो जाता है और बिना खराब हुए अधिक समय तक प्रयोग किया जाता है।

4. कपड़ों में विविधता लाना (To bring variety in fabrics): जब कपड़ा बुनकर तैयार होता है, तब उसका रूप एक समान होता है। इस एक समान रूप वाले कपड़े को प्रयोग करना पसन्द नहीं किया जा सकता है। अतः वस्त्र में विविधता लाना अनिवार्य है। कपड़े में विविधता लाने के लिए विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएँ की जाती हैं। ये परिसज्जाएँ रंग एवं डिजाइन द्वारा की जाती हैं। विभिन्न प्रकार की डिजाइनों तथा छपाई द्वारा वस्त्रों में विविधता लाई जाती है। विविधता से वस्त्र का महत्त्व तथा आकर्षण बढ़ता है।

5. अनुकरणीय वस्त्र बनाना (To manufacture quality fabrics)-कुछ कपड़े ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी विशिष्ट परिसज्जा द्वारा किसी अन्य उत्तम प्रकार के कपड़े के समान बनाया जाता है। इस प्रकार की परिसज्जा से अनुकरणीय वस्त्र तैयार किये जाते हैं। जैसे-पापलीन के कपड़ों को मर्सिराइजिंग की परिसज्जा द्वारा एक विशेष चमक प्रदान की जाती है, जिससे ये रेशम के समान प्रतीत होने लगते हैं।

प्रश्न 2.
विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएँ कौन-कौन-सी हैं ? विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएँ निम्नलिखित है –
सामान्य परिसज्जाएँ –
सफाई (Cleaning), विरंजन (Bleaching), कड़ापन लाना (Stiffening), टैंटरिंग (Tantering)।

विशेष परिसज्जाएं –
मीराइजिंग (Mercerizing), सिकुड़न-नियंत्रण (Shrinkage), जल अभेद्यता (Water proofing), रंगाई (Dying), छपाई (Printing)।

सामान्य परिसज्जाएँ (Normal finishes):
1. सफाई (Cleaning): ग्रे कपड़े में गोंद, प्राकृतिक मोम, प्राकृतिक नाइट्रोजनीकृत पदार्थ, प्रक्रिया के समय के तेल, मांड आदि रह जाती हैं। ब्लीचिंग, रंगाई और दूसरी परिसज्जा के पहले इन सबको निकालना आवश्यक है। सफाई को शुद्ध करना (Scouring) तथा Kier Boiling भी कहते हैं। सफाई निम्नलिखित चरणों में होती हैं –
(क) ग्रे को साबुन से धोने से यह सुनिश्चित हो जाता है कि उत्पादन के समय के रसायन दूर हो गए हैं। बुनने से पहले भागों को सरेस लगाया जाता है, जो धोने से निकल जाता है।
(ख) कास्टिक सोडा, गीले करने वाले तत्त्व का तैलीय तत्त्वों आदि के प्रयोग से मोम दूर हो जाता है।
(ग) ग्रे में उपस्थित गंदगी के अनुसार व कास्टिक की सांद्रता पर सफाई का स्तर आधारित होता है। इच्छित सफाई के लिए यह सारी प्रक्रिया दुबारा भी की जा सकती है।
(घ) मोम, गंदगी व रसायनों को निकालने के लिए अच्छी प्रकार से खंगालना आवश्यक होता है।

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2. विरंजन (Bleaching): धूप में प्राकृतिक विरंजन की शक्ति होती है। सफेद कपड़ों को धोने के बाद धूप में सुखाना एक अच्छी आदत है। कपड़े को घास या झाड़ियों पर सुखाया जाए तो क्लोरोफिल की प्रक्रिया स्वरूप यह और भी उत्तम है। कपड़े का विरंजन अपचयन (reducing) या ऑक्सीकरण (oxidation) ब्लीच से किया जा सकता है।

अपचयन ब्लीच अधिक समय तक नहीं चलते व कपड़ा थोड़ी देर बाद फिर पहले रंग में आ जाता है। हाइड्रोजन परॉक्साइड एक ऑक्सीकरण ब्लीच है और लगभग हर प्रकार के कपड़े पर प्रयोग किया जाता है। एक गैलन हाइड्रोजन परॉक्साइड के घोल में 5 मिलि. अमोनिया या सोडियम परबोरेट मिलाने से क्रिया बेहतर होती है। विरंजन के बाद कपड़े को अच्छी तरह खंगालना चाहिए। अधिक ब्लीच प्रयोग करना हानिकारक सिद्ध होता है।

लम्बी अवधि तक सफेदी के लिए नील लगाना चाहिए। कपड़ों को पोटैशियम परमैगनेट द्वारा भी ब्लीच किया जा सकता है। पसीने और फफूंदी के दाग भी इससे दूर हो जाते हैं। 3 ग्राम परमैगनेट को 1 लीटर पानी में घोलें। विरंजन वाले कपड़े को इसमें डालें। पहले यह कपड़े को मटमैला-सा बना देता है। फिर इसे 6 ग्राम प्रति लीटर वाले ऑक्जेलिक अम्ल के घोल में डालें तथा अच्छी-तरह खंगालें। कपड़ों के विरंजन के लिए अक्सर ब्लीचिंग पाउडर (CaCI(OCI)4H2O) प्रयोग में लाया जाता है।

3. कड़ापन लाना (Stiffening): जब कपड़े को भार/आकार देना हो तो उसमें कड़ापन लाते हैं। कड़ापन देने से कपड़े में चमक आती है तथा मैल अवरोधकता बढ़ती है। रेसिन, स्टार्च और अन्य प्लास्टिक पदार्थों के प्रयोग से कडापन थोडी देर के लिए होता है तथा कपडे के ढीले होने पर ग्राहक अप्रसन्न हो जाते हैं। रेशम सामान्यतया वजन से बेचा जाता है। हल्के रेशम पर यह प्रक्रिया करने से उसे भार व कड़ापन मिलता है। रेसिन और स्टार्च लगाने से कपड़ा चमकदार व चिकना दिखाई देता है। अतः उसका विक्रय मूल्य और ग्राहक की पसंद बढ़ जाती है।

4. टैंटरिंग (Tantering): विरंजन और रंगाई से कपड़े की चौड़ाई कम हो जाती है । टैंटरिंग कपड़े की सामान्य चौड़ाई पर लाने की प्रक्रिया है। थोड़ा-सा गीला कपड़ा टैंटरिंग यंत्र में से निकाला जाता है। कपड़े को खूब खींचकर सीधा तथा सिलवटमुक्त करके सुखाया जाता है। इस प्रकार कपड़ा अपनी सामान्य चौड़ाई बनाए रखता है।

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विशेष परिसज्जाएँ (Some Special Finishes):
1. मीराइजिंग (Mercerizing): यह प्रक्रिया सूती व मिश्रित सूती (टेरीकॉट) कपड़ों पर की जाती है। सूती वस्त्र की क्षार के साथ क्रिया की जाती है जिससे उसकी चमक बढ़ जाती है तथा रंगना आसान हो जाता है। इस परिसज्जा के निम्नलिखित चरण हैं –
(क) सूती कपड़े को अच्छी प्रकार भिंगो लें।
(ख) कपड़े को कास्टिक सोडा (NaOH) के 18-20 प्रतिशत घोल में लगभग 15 मिनट के लिए डुबो दें। इस समय कपड़े को एक निश्चित ताप एवं दबाव में रखें।
(ग) कपड़े को निष्क्रिय पानी से धोएं।
(घ) पानी से अच्छी प्रकार खंगालें।

इस प्रक्रिया से कपड़े में भौतिक व रासायनिक परिवर्तन आ जाते हैं। क्षार से सूती तंतु फूल जाते हैं, इससे उनकी ऐंठन दूर हो जाती है। परिणामतः कपड़े में चमक आ जाती है।

2. सिकुड़न-नियंत्रण (Shrinkage control): सेलुलोज तंतुओं जैसे सूती, फ्लैक्स, जूट, नारियल की जटा आदि को जब बुना जाता है तो उनका आकार बिगड़ने की स्थिति में होता है। ग्रे कपड़े को चरख के लिए (दो रोलरों के बीच) खींचा जाता है ताकि कपड़े की ऊपरी सतह चिकनी व घनी हो जाए। इस प्रकार कपड़े की लम्बाई बढ़ जाती है। इस प्रक्रिया से बढ़ी हुई लंबाई सिकुड़ना चाहती है। आधुनिक युग में कपड़ों पर “दबाव-सिकुड़न” विधि अपनाई जाती है।

इस विधि के पश्चात् कपड़े में 2 प्रतिशत से अधिक सिकुड़न नहीं होती। गीले कपड़े को रोलर द्वारा खींचकर एक दूसरे गर्म रोलर से तने हुए कपड़े को दबाया जाता है। जैसे ही तना हुआ कपड़ा (या रबड़ का कंबल) रोलर से बाहर आता है वैसे ही कंबल की बाहरी सतह फैल कर कपड़े से चिपक जाती है।

जब कंबल ठंडा होता है तो कपड़े के साथ ही सिकुड़ जाता है। इस प्रकार कपड़ा दबाव से जितना छोटा होना होता है, हो जाता है। इस परिसज्जा का ही परिणाम है कि बाजार में कपड़ा गारंटी के साथ मिलता है कि अमुक वस्त्र सिकुड़ेगा नहीं। ऐसी गारंटी का निशान ‘Sanfrizing’ है। कपड़े पर यह निशान नियमित दूरी पर ग्राहक की सुरक्षा के लिए लगाया जाता है।

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3. जल अभेद्य परिसज्जा (Water proofing): जल अभेद्यता से अभिप्राय है कि कपड़े की सतह पर पानी नहीं टिकता। जल अभेद्य बनाने के लिए कपड़े पर कोलतार पदार्थों से लेप किया जाता था। ऐसा कपड़ा हवा को भी रोक लेता था। इसी कारण ऐसे कपड़े से वस्त्र बनाना असंभव था। इससे पहले रबड़ या वार्निश का लेप किया जाता था पर इससे भी कपड़ा भारी हो जाता था।

इससे कार ढकने का कपड़ा या बरसाती आदि बनाई जाती थी। आधुनिक युग में रबड़ को रेसिन से बदल दिया गया है। अब एल्युमीनियम की इमलशन के लेप से भी ऐसा कपड़ा बनाया जा रहा है। यह आसानी से प्रयोग किया जाता है तथा इसे कपड़े में सुखाया जा सकता है। दोहरा लेप लगाने से बेहतर जल अभेद्य कपड़ा बनाया जा सकता है, जिससे बरसाती व स्कूल के बस्ते बनाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
कपड़ों पर छपाई (Printing) से क्या अभिप्राय है ? छपाई की मुख्य विधियाँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:
कपड़ों की छपाई (Cloth Printing): प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने कपड़ों पर विभिन्न प्रकार के डिजाइन बनाते रहे हैं। भारत में सहस्रों वर्षों से हाथ की छपाई द्वारा कपड़ों पर आकर्षक नमूने बनाए जाते हैं। छपाई की यह कला जावा, सुमात्रा व धीरे-धीरे यूरोपीय देशों में लोकप्रिय हुई। भारत में आज भी कुशल कारीगर विभिन्न रंगों से विभिन्न डिजाइनों के चमकीले, रोचक व आकर्षक कपड़े तैयार करते हैं।

प्राय: यह कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में परम्परागत रूप से जाती है। पूरे विश्व में भारतीय परम्परागत डिजाइन बहुत लोकप्रिय हैं, जिससे छपे हुए भारतीय कपड़ों की मांग बहुत बढ़ गई है और इनके निर्यात से बहुत-सी विदेशी मुद्रा कमाई जाती है।

प्रारम्भिक काल में वस्त्रों पर छपाई का कार्य हाथ से किया जाता था। नमूने को लड़की के गुटकों पर उल्टा खोद कर उसे रंग में डुबो कर कपड़े पर ठप्पे लगाकर छपाई की जाती थी। अब छपाई मशीनों द्वारा की जाती है तथा छपाई के लिए विभिन्न प्रकार की विधियाँ अपनाई जाती हैं।
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1.ब्लॉक छपाई (Block Printing): वस्त्र की छपाई की एक विधि ‘ब्लॉक द्वारा छपाई’ करना है। हमारे देश में अति प्राचीन काल से ही वस्त्रों की छपाई के लिए इस विधि को अपनाया जा रहा है। यह एक लोकप्रिय एवं अत्यधिक प्रचलित वस्त्र-छपाई की विधि है। वस्त्रों पर ब्लॉक द्वारा दो प्रकार की छपाई की जाती है। प्रथम प्रकार की छपाई हाथ द्वारा की जाती है तथा दूसरी प्रकार की छपाई मशीन द्वारा की जाती है।

1. हाथ द्वारा की जाने वाली ब्लॉक छपाई (Block printing by hand): हाथ द्वारा की जाने वाली ब्लॉक छपाई अति प्राचीन काल से प्रचलित है। इस क्रम में पेड़ के सूखे तने को काटकर ब्लॉक बना लिये जाते थे। सूखे तने की लकड़ी में कुछ स्वाभाविक एवं प्राकृतिक डिजाइन होते है। इन लकड़ी के ब्लॉक को अभीष्ट रंग में डुबोकर कपड़े को छाप लिया जाता था।

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इस प्रकार वस्त्र पर अनेक प्राकृतिक डिजाइन छापे जाते थे, परंतु जैसे-जैसे सभ्यता एवं कारीगरी का विकास हुआ, वैसे-वैसे मनुष्य ने स्वयं विभिन्न डिजाइनों वाले लकड़ी के गुटके बनाए। छपाई के गुटके बनाने के लिए मज त तथा चिकनी लकड़ी में लगभग 1/4″ गहरे विभिन्न प्रकार के डिजाइन खोदे जाते हैं।

ये डिजाइ कुछ भी हो सकते हैं जैसे कि फूल-पत्तियाँ, पशु-पक्षी या अन्य कोई भी आकृति। यह गुटवं विभिन्न आकार के बनाए जा सकते हैं। तैयार लकड़ी के गुटकों को छपाई के लिए प्रयोग लिया जाता है। गुटकों या ब्लॉक द्वारा छपाई करने के लिए वस्त्र को कम्बल से ढंकी मेज पर फैलाते हैं।

गुटकों पर रंग लगाकर विशेष सावधानी से इन्हें वस्त्र पर सही स्थान पर छापा जाता है। गुटकों पर लगाने वाले रंग तरल, अर्द्ध तरल अथवा पेस्ट के रूप में होते हैं। विभिन्न रंगों की छपाई के लिए उसी के अनुसार अलग-अलग गुटके प्रयोग किये जाते हैं। हथकरघे द्वारा निर्मित सूती वस्त्रों पर इन हाथ के गुटकों से बहुत अच्छी छपाई होती है।

2. मशीन द्वारा की जाने वाली ब्लॉक छपाई-उन्नीसवीं शताब्दी में मशीन द्वारा ब्लॉक छपाई आरम्भ हुई। इटली, इंगलैंड तथा फ्रांस आदि देशों में कपड़ों की छपाई मशीनों द्वारा होने लगी। आजकला तो विश्व भर में मशीनों द्वारा कपड़ों की छपाई की जाती है। इन मशीनों में रोलर लगे होते हैं। इन रोलर्स पर तांबे या लिनालियम के बने हुए डिजाइन होते हैं। रोलर पर अभीष्ट रंग द्वारा वस्त्र पर छपाई की जाती है। कपड़ा घूमते हुए ब्लॉक में से निकलता है और छपता जाता है। इस विधि द्वारा छपाई बहुत सफाई से होती है।

II. स्क्रीन छपाई (Screen Printing): कपड़ों की छपाई करने की एक विधि स्क्रीन छपाई (Screen Printing) है। यह छपाई भी हाथ द्वारा की जाती है। इस प्रकार की छपाई के लिए एक फ्रेम का प्रयोग किया जाता है। जिस कपड़े पर छपाई करनी होती है उसे एक समतल मेज पर बिछा लिया जाता है। इसके बाद कपड़े पर फ्रेम को रखा जाता है तथा हाथ से रंग लगाया जाता है।

नमूने में जहां रंग नहीं लगाना होता उन स्थानों पर कोई अवरोधक लगा दिया जाता है। इस प्रकार एक के बाद दूसरे स्थान पर फ्रेम को रखकर छपाई की जाती है। इस विधि द्वारा छपाई में काफी समय लगता है, अत: यह एक महंगी विधि है। स्क्रीन प्रिटिंग द्वारा भी कई रंगों की छपाई की जा सकती है। अलग-अलग रंग की छपाई के लिए अलग-अलग फ्रेम तथा नमूने का प्रयोग किया जाता है।

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III. स्टेंसिल छपाई (Stencil Printing): वस्त्रों पर छपाई करने के लिए एक अन्य विधि को स्टेंसिल छपाई कहते हैं। इस विधि का प्रारम्भ जापान में हुआ था। स्टेंसिल प्रिंटिंग की विधि स्क्रीन प्रिंटिंग के ही समान है। स्टेंसिल प्रिंटिंग के लिए किसी धातु की महीन पर्त को या मोम से चिकने कागज को किसी अभीष्ट डिजाइन के अनुसार काट लिया जाता है।

डिजाइन के एक रंग के लिए एक स्टेंसिल काटा जाता है। यदि डिजाइन में एक से अधिक रंग हों तो रंगों के अनुसार एक से अधिक स्टेंसिल काटे जाते हैं। वस्त्र पर स्टेंसिल रखकर रंग लगा दिया जाता है। रंग लगाने का काम हाथ के ब्रुश, एयर ब्रुश या दबाव से चलने वाली स्प्रे गन से किया जाता है।

IV. रोलर छपाई (Roller Printing): वस्त्र छपाई की एक अन्य विधि छपाई है। रोलर प्रिंटिंग एक खास प्रकार की मशीन द्वारा की जाती है। इस मशीन का आविष्कार फ्रांस में हुआ था। इस मशीन में रोलर्स पर नमूने बने होते हैं तथा इन्हीं से कपड़े पर छपाई होती है। प्रारम्भ में रोलर प्रिंटिंग के लिए इन रोलर्स पर हाथ द्वारा ही सुन्दर नमूने अंकित किये जाते थे, परन्तु बाद में रोलर्स पर डिजाइन फोटो मशीन द्वारा अंकित किये जाने लगे हैं। इससे डिजाइन अधिक महीन एवं उत्कृष्ट प्रकार के बनते हैं। रोलर्स द्वारा छपाई विभिन्न विधियों द्वारा की जाती है जो निम्नलिखित हैं :

1. रोलर छपाई की प्रत्यक्ष विधि-रोलर मशीन द्वारा कपड़ों पर छपाई करने की सबसे साधारण विधि को प्रत्यक्ष विधि (Direct method) कहते हैं। इस विधि में रोलर्स व डिजाइन बनाए जाते हैं तथा उन पर रंग लगाकर कपड़े को रोलर्स के बीच में गुजारा जाता है जिससे कपड़े पर डिजाइन छप जाता है। इस विधि के अन्तर्गत यदि एक से अधिक रंगों की छपाई करनी हो तो एक से अधिक रोलर्स प्रयोग करना पड़ता है।

2. रंग खींचने वाली छपाई-रोलर्स द्वारा छपाई करने की एक विधि को ‘रंग खींचने वाली छपाई” (Discharge Printing) कहते हैं। यह विधि प्रत्यक्ष विधि से कुछ भिन्न है। इस विधि के अन्तर्गत सर्वप्रथम पूरे कपड़े को किसी गहरे रंग में रंग लिया जाता है। उसके बाद जैसा नमूने के रूप में है, अंकित कर दिया जाता है। इसके लिए रोलर पर अंकित डिजाइन के ऊपर जिंक ऑक्साइड का पेस्ट लगा दिया जाता है।

गहरे रंग में रंगे हए वस्त्र को रोलर्स के मध्य से गुजारा जाता है। रोलर्स में लगे ब्लीच द्वारा नमूने के आकार में वस्त्र सफेद हो जाता है। इस कपड़े को शीघ्र ही भाप द्वारा सुखा लेते हैं तथा सूखे हुए वस्त्र को साफ पानी में से धो लेते हैं। इस प्रकार गहरे रंग पर सफेद डिजाइन बहुत सुन्दर एवं आकर्षक लगता है। रोलर छपाई की इस विधि में प्रबल विरंजक प्रयोग किया जाता है जिससे कपड़ा उस जगह से कमजोर हो जाता है और शीघ्र फटता है। इस विधि में यह दोष होते हुए भी यह छपाई में एक विशेष महत्त्व रखती है।

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3. अवरोधक छपाई (Resist Printing): रोलर्स छपाई की एक अन्य विधि अवरोधक छपाई है। यह विधि रंग खींचने वाली विधि के विपरीत है। इस विधि के अन्तर्गत रोलर पर डिजाइन अंकित किया जाता है तथा कपड़े को रोलर्स के मध्य गुजारा जाता है। इससे वस्त्र पर प में अवरोधक पदार्थ लग जाता है। इसके बाद परे वस्त्र को इच्छित रंग में रंग लिया जाता है। इस प्रकार रंगने से पूरा वस्त्र तो रंगा जाता है, परन्तु अवरोधक लगे स्थान पर सफेदी ही रहती है। वस्त्र को धोकर अवरोधक पदार्थ हटा दिया जाता है। इस प्रकार वस्त्र पर सुन्दर छपाई हो जाती है।

4. ड्यूपलेक्स छपाई (Duplex Printing): रोलर्स द्वारा छपाई की एक अन्य विधि को ड्यूपलेक्स छपाई कहते हैं। इस विधि के अन्तर्गत छपाई के लिए कपड़े को क्रमश: दो रोलर्स के मध्य से गुजारा जाता है। पहले रोलर के मध्य से गुजरने पर कपड़े के एक ओर नमूना छप जाता है। इसके बाद दूसरे रोलर्स द्वारा वस्त्र पर दूसरी ओर नमूना छप जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 19 कपड़ों का निर्माण

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 19 कपड़ों का निर्माण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science कपड़ों का निर्माण Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कताई प्रकार की होती है – [B.M.2009A]
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो

प्रश्न 2.
धागे को तंतुओं के आधार पर बाँटा गया है –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ख) तीन

प्रश्न 3.
ताने के आप-पार बुने जाने वाले धागे को कहते हैं –
(क) ताने (Warp)
(ख) बाने (Weft)
(ग) फेल्टिंग (Felting)
(घ) निटिंग (Knitting)
उत्तर:
(ग) फेल्टिंग (Felting)

प्रश्न 4.
धागे से कपड़ा बनाने की प्रमुख विधियाँ हैं –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ग) चार

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प्रश्न 5.
साटिन बुनाई में तंतुओं (Filament) का प्रयोग किया जाता है –
(क) लंबा
(ख) छोटा
(ग) मोटा
(घ) गोलाकार
उत्तर:
(क) लंबा

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सूत (Yam) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
अनेक तन्तुओं को एक साथ खींच कर ऐंठने से जो अविरल धागा बनाया जाता है, उसे सूत कहते हैं।

प्रश्न 2.
कताई (Spinning) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
कताई तन्तुओं के समूह में से धागा खींचकर व ऐंठन देते हुए अविरल सूत प्राप्त करने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 3.
यान्त्रिक कताई के क्या कारण हैं ?
उत्तर:
यान्त्रिक कताई (Mechanical Spinning): यान्त्रिक कताई अधिकतर प्राकृतिक तन्तुओं से की जाती है, जैसे-सूती, ऊनी व रेशमी तन्तुओं की कताई यान्त्रिक विधि से होती है। यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।

  • कच्चे माल की सफाई (Opening and cleaning of raw material) ।
  • धुनाई व कंघी करना (Carding and combing)।
  • कताई (Spinning)।
  • खींचना व ऐंठन देना।

प्रश्न 4.
सूत कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर:
सूतों के प्रकार (Types of Yam):
1. साधारण सूत (Simple Yarm):

  • इकहरा सूत (Simple Standard Yarm)
  • दोहरा सूत (Two Ply or Cable yam)
  • डोरिया सूत ।

2. सम्मिश्रित सूत (Complex or Novelty Yam)।

प्रश्न 5.
सम्मिश्रित सूत (Novelty or Complex Yarm) किसे कहते हैं ?
उत्तर;
दो या अधिक सूतों को मिलाकर बनने वाले सूत को सम्मिश्रित सूत कहते हैं। इससे बनने वाले वस्त्र में भी इन सभी धागों के गुण पाए जाते हैं।

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प्रश्न 6.
वस्त्र निर्माण की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं ? उनके नाम बताएँ।
उत्तर:

  • करघे पर बुनाई (Weaving)।
  • सिलाई द्वारा बुनाई (Knitting)।
  • दबाकर वस्त्र बनाना (Felting)।

प्रश्न 7.
‘कताई’ (Spinning) की पहली अवस्था क्या होती है ?
उत्तर:
कताई की पहली अवस्था खोलना तथा सफाई करना है।

प्रश्न 8.
फेल्टिंग (Felting) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
फेल्टिंग से अभिप्राय, तन्तुओं के जुड़ने से है। यह एक प्रकार की कपड़े की बुनाई है, जिससे कम्बल, नमदा आदि बनाए जाते हैं।

प्रश्न 9.
‘ताना बाना’ (Wasp & Weft) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
कपड़े की बुनाई करघे पर की जाती है। लम्बाई की ओर जो धागा जाता है, उसे ‘ताना’ और चौड़ाई की ओर से जाने वाले धागे को ‘बाना’ कहते हैं। दोनों ओर से इन्हीं धागों को आपस में गूंथने की प्रक्रिया के द्वारा ही कपड़े का निर्माण होता है।

प्रश्न 10.
उस बुनाई का नाम बताएं जिससे सस्ता व चमकीला (Lumstrous) कपड़ा बनाया जा सके।
उत्तर:
साटिन बुनाई (Satin Weave)।

प्रश्न 11.
अन्तर बताएं:
(क) सिलाई द्वारा बुनाई (Knitting) व लेस बनाना (Lace making)।
(ख) बुनाई (Weaving) फेल्टिंग बनाना (Felting)।
उत्तर:
(क) सिलाई द्वारा बुनाई
1. लूप बनाना
(Looping)

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2. लेस बनाना
गाँठ लगाना (knotting)

(ख) बुनाई

  1. इन्टर लेसिंग (Interlacing)
  2. फेल्टिंग तन्तुओं का जोड़ना आर्द्र गर्मी द्वारा

प्रश्न 12.
तन्तु और सूत (Fibre and Yarm) में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
तन्तु सूत निर्माण की छोटी-से-छोटी इकाई है जबकि सूत में कई सारे तन्तु होते हैं। अनेक तन्तुओं को एक साथ ऐंठने से जो अविरल धागा बनता है, सूत कहलाता है।

प्रश्न 13.
एक व्यापारी धागे में ऐंठन देना भूल गया था। उसका सूत (Yarm) पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
धागे में ऐंठन न देने से कमजोर सूत (weak yarm) बनेगा । ऐंठन से सूत में मजबूती आती है।

प्रश्न 14.
कपड़ा बुनने की दो प्रक्रियाओं के नाम लिखें । इनका कपड़े के गुणों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
1. सिलाई द्वारा बुनना (Knitting)
2. बुनाई (Weaving)।

कपड़े के गुणों पर प्रभाव :
1. बुनाई (Weaving):
(क) मजबूत सूत
(ख) विभिन्न प्रकार के डिजाइन बनाए जा सकते हैं।

2. सिलाई द्वारा बुनना (Knitting):
(क) रिब प्रभाव (Rib Effect)
(ख) लचीलापन (Elasticity)
(ग) बनावट (Shape) जल्दी खराब हो जाती है।
(घ) कम मजबूत होता है (Less strong)।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रेशे से धागे का निर्माण (Construction of yarn from fibre) किस प्रकार होता. है ?
उत्तर:
रेशे से धागे का निर्माण-सभी रेशों की लम्बाई एक-दूसरे से भिन्न होती है, कुछ बहुत छोटे तथा कुछ लम्बे होते हैं। छोटे रेशों को स्टेपल कहते हैं। अधिकतर प्राकृतिक रेशे स्टेपल (Staple) ही होते हैं। कृत्रिम रेशों को काट-काट कर छोटा कर लिया जाता है। छोटे-छोटे रेशों से बने वस्त्रों के अलग ही प्रकार के गुण होते हैं। लम्बे रेशों को फिलामेंट (Filament) कहते हैं। इससे बने धागे अपेक्षाकृत चिकने होते हैं क्योंकि उनकी सतह पर कम संख्या में रेशों के सिरे रहते हैं।

चिकनी, सीधी तथा यथाक्रम सतह होने के कारण, ऐसे लम्बे फिलामेंट से निर्मित धागों में चमक आ जाती है। चिकनी सतह के कारण धूलकण इनमें सटने या फंसने नहीं पाते तथा वस्त्र जल्दी गंदा नहीं होता। लम्बे रेशों के कारण ये बहुत मजबूत होते हैं। कृत्रिम रेशों को आवश्यकतानुसार छोटा, लम्बा, सीधा, मोटा या पतला बनाया जाता है।

अतः रेशों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है –

  • स्टेपल फाइबर (Staple fibre)।
  • फिलामेंट फाइबर (Filament fibre)।

प्रश्न 2.
धागा निर्माण की कौन-कौन-सी अवस्थाएँ हैं ?
उत्तर:
धागा निर्माण की अवस्थाएँ-रेशों को अविरल धागों के रूप में बदलने के लिए अधिकतर प्राकृतिक धागों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है ताकि वे अविरल रूप में तैयार किए जा सकें।
स्टेपल रेशों से धागा (Yam) बनाने की मूलभूत प्रक्रियाएं निम्नलिखित हैं:

  • रेशों को स्वच्छ करना (Cleaning of fibres)
  • रेशों को थोड़ा-बहुत समान्तर करना (Making the fiblres more or less paralled)।
  • लम्बी पट्ट बनाना (पूनी) (Forming a long strand called sliver)।
  • तैयार धागे को बोबिन पर चढ़ाना (Winding the yarn on bobbin) ।
  • धागा बनाने के लिए पूनी पर बटाई देना (Twisting to form yarn)।

प्रश्न 3.
रासायनिक कताई की चार प्रक्रियाएँ क्या हैं ?
उत्तर:
रासायनिक कताई (Chemical Spinning): मानव-निर्मित तन्तु प्रकृति में लम्बे रिबन के आकार में होते हैं। उनको धागे में बदलने से पहले संसाधित करने की आवश्यकता होती है।

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रासायनिक कताई में मूल रूप से चार प्रक्रियाँ हैं:
(क) गीली कताई
(ख) शुष्क कताई
(ग) पिघली कताई
(घ) इमलशन कताई।

(क) गीली कताई (Wet Spinning): जब तन्तु निर्माण करने वाले घोल को स्पिनरेट में से निकालने के पश्चात् रासायनिक पदार्थ भरे टब में सख्त होने के लिए डाला जाए तो उसे गीली कताई कहते हैं। रेयान इस प्रकार से बनाई जाती है।

(ख) शुष्क कताई (Dry Spinning): जब तन्तु निर्माण करने वाले घोल को स्पिनरेट से निकालने के पश्चात् गर्म हवा द्वारा वाष्पीकरण करके सुखाया जाता है तो उसे शुष्क कताई कहते हैं। ऐसिटेट और एक्रेलिक तन्तु इस प्रकार बनाए जाते हैं।

(ग) पिघली कताई-जब तन्तु निर्माण करने वाले पदार्थ को पिघला कर स्पिनरेट में से निकाला जाता है तथा ठण्डा होने पर सख्त कर लिया जाता है तो उसे पिघली कताई कहते हैं। पॉलिएस्टर/टेरीलीन तन्तु इस क्रिया से बनाये जाते हैं।

(घ) इमलशन कताई (Melt Spinning): जटिल तरीका होने के कारण यह कताई सामान्यतः प्रयोग में नहीं लाई जाती है । तन्तु निर्माण वाले पदार्थ को किसी दूसरे रासायनिक द्रव्य में मिलाया जाता है तथा फिर स्पिनरेट से निकाला जाता है।

प्रश्न 4.
कताई व बुनाई में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कताई (Spinning): कताई वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत तन्तुओं को एक समूह में से खींचकर व ऐंठ कर मजबूत अविरल सूत प्राप्त किया जाता है।
बुनाई (Weaving): यह कपड़ा निर्माण की विधि है जिसमें कम से कम दो धागों ताने और बाने का प्रयोग करके हथकरघे या मशीन पर कपड़ा निर्मित किया जाता है।

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प्रश्न 5.
तन्तु व सूत में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1. तन्तु (Fibre): कपड़ा निर्माण की सबसे छोटी इकाई को तन्तु या रेशा कहते हैं। इससे तुरत कपड़ा निर्मित नहीं किया जा सकता जब तक कि इससे सूत या धागे का निर्माण नहीं किया जाता।
2. सूत (Yarn): सूत या धागा वह अखंड तार है जो अनेक तन्तुओं को एक साथ ऐंठने से बनता है। इससे कपड़े का निर्माण होता है। यह तन्तु से अधिक लम्बे, चौड़े और मजबूत होते हैं।

प्रश्न 6.
सम्मिश्रित वस्त्र (Novelty Clothes) क्यों उपयोगी हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सम्मिश्रित वस्त्र जैसे टेरीकॉट, टेरीवुल आदि इसलिए उपयोगी हैं क्योंकि

  • ये सस्ते होते हैं, अतः मितव्ययी हैं।
  • इनका रख-रखाव भी सरल है।
  • प्रेस करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  • इनमें कीड़ा नहीं लगता।

प्रश्न 7.
‘हन परीक्षण’ (Flame Tact) को स्पष्ट करें।
उत्तर:
दहन परीक्षण अर्थात् कपड़े के तन्तु को ज्वाला के समीप ले जाने पर प्रभाव देखना। इसके लिए कपड़े की लम्बाई से एक रेशा निकाला जाता है। ऐंठन खोल कर तन्तु अलग किया जाता है । तन्तु को चिमटी से पकड़कर उसके सिरों को ज्वाला के निकट ले जाया जाता है और फिर निम्न प्रभाव आंके जाते हैं

  • ज्वाला के समीप ले जाने पर तन्तु पर प्रभाव
  • ज्वाला में तन्तु पर प्रभाव
  • लौ का रंग
  • गंध
  • राख का प्रकार।

प्रश्न 8.
कपड़ा फाड़ परीक्षण (Tearing Test) का वर्णन करें।
उत्तर:
इसे विदीर्ण परीक्षण भी कहते हैं। किसी कपड़े के टुकड़े को फाड़ने में कितनी शक्ति लगती है, फटते समय कैसी ध्वनि उत्पन्न होती है एवं फटे हुए सिरों का स्वरूप कैसा होता है, इसके आधार पर रेशे की पहचान की जाती है।

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प्रश्न 9.
सूत निर्माण (Yarm construction) की दो विधियाँ बताएँ। प्रत्येक का एक उदाहरण दें। किसमें सूत ज्यादा मजबूत है और क्यों ?
उत्तर:
1. तकली अथवा चरखा द्वारा सूत बनाना, जैसे सूती (cotton) व ऊनी (wool) सूत।
2. स्पिनरेट्स द्वारा (through Spinerrattes)-नाइलोन (Nylon) व पोलीएस्टर (Polyester) । (Spinerrates) द्वारा बनाया गया सूत ज्यादा मजबूत होता है क्योंकि इसकी विधि अत्यधिक वैज्ञानिक है और पर्याप्त लम्बाई का सूत प्राप्त होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
धागों के विभिन्न प्रकार का वर्णन करें ? [B.M.2009A]
उत्तर:
धागा प्राकृतिक व मानवकृत तंतुओं से प्राप्त होता है। दोनों स्रोत से धागा बनाने की विधि अलग होती है । धागे का उपयोग वस्त्र के अतिरिक्त कई कार्यों के लिए किया जाता है
जैसे-सिलाई कढ़ाई करना । प्रत्येक कार्य के लिए धागे की प्रकार अलग होती है। कढ़ाई के लिए रेशमी चमकीले धागे का प्रयोग किया जाता है। सिलाई के लिए मजबूत धागा लिया जाता है।
कपड़े की बुनाई के लिए दो प्रकार के धागों का प्रयोग किया जाता है।
1. ताना
2. बाना।

1. ताना-इसका धागा मजबूत होता है।
2. बाना-बाने का धागा कम मजबूत होता है। धागे को तंतुओं के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है।
(a) साधारण धागे
(b) मिश्रित धागे
(c) जटिल धागे।

(a) साधारण धागा-यह एक ही आकार और प्रकार वाले तंतओं से बनता है इनका व्यास एक समान होता है। इन धागे की ऐंठन भी एक समान होती है। साधारण धागे को आवश्यकता अनुसार एकहरा, दोहरा, चौहरा या इनका केतल भी बनाया जा सकता है।

(b) मिश्रित धागा-यह एक से अधिक प्रकार के तंतुओं के रेशे को मिलाकर बनाया जाता है। उदाहरण-सूती धागे के साथ रेशमी धागा मिलाकर सिल्कों का निर्माण होता है। कॉटन में पालिएस्टर मिलाकर टेरिकॉट का निर्माण होता है।

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(c) जटिल धागा-इसका प्रयोग वस्त्रों में भिन्नता लाने के लिए किया जाता है। यह एक दो या तीन धागों के लिए किया जाता है। इस विधि में प्रयोग किये जाने वाले धागे निम्न प्रकार से हैं –

  • गाँठ वाला धागा
  • चक्रदार या कॉर्क स्कू धागा
  • स्लव धागा
  • फ्लैक धागा
  • फंदेदार एवं घुमाउदार धागा
  • बीज धागा
  • क्रेप धागा

प्रश्न 2.
कताई (Spinning) के विभिन्न प्रकारों को विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर:
कताई के प्रकार (Kinds of Spinning): यह दो प्रकार की होती है:
1. यांत्रिक कताई (Mechanical Spinning)
2. रासायनिक कताई (Chemical Spinning)

1. यान्त्रिक कताई-यान्त्रिक कताई अधिकतर प्राकृतिक तन्तुओं से की जाती है, जैसे-सूती, ऊनी व रेशमी तन्तुओं की कताई यान्त्रिक विधि से होती है। यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।

  • खोलना व सफाई करना
  • कार्डिंग व कैबिंग
  • पूनियाँ बनाना
  • खींचना व घुमाना

यान्त्रिक कताई के चरण (Steps of Mechanical Spinning):
1. कच्चे माल की सफाई (Opening and Cleaning of Raw Material): सर्वप्रथम प्राकृतिक तन्तुओं को खोलकर उनकी सफाई की जाती है क्योंकि प्राकृतिक तन्तुओं में अशुद्धि काफी होती है।
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2. धुनाई व कंघी करना (Carding and Combing): अब तन्तुओं को अच्छी तरह साफ किया जाता है और सुलझाया जाता है। छोटे-छोटे तन्तुओं को अलग कर दिया जाता है और लम्बे तन्तुओं को समान्तर बिछा दिया जाता है, इन्हें पूनियाँ बनाना कहते हैं।

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3. खींचना व ऐंठन देना: अब पूनियों को खींचा जाता है व साथ ही साथ हल्का-सा घुमाव दिया जाता है ताकि रेशे एक साथ रह सकें और अलग-अलग न हो जाएँ।
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4. कताई-सूत को अधिक मजबूत बनाने के लिए इससे तकली या चरखे या मशीनों पर चढ़ाकर ज्यादा घुमाव व ऐंठन दिया जाता है, जिससे यह सूत अपेक्षाकृत अधिक मजबूत और टिकाऊ हो जाता है। इस विधि द्वारा कपास व ऊन का सूत बनाया जाता है। रेशम का सूत काकून गोंद को हटाने के पश्चात् सीधा चरखे पर ही चढ़ाया जाता है।
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2. रासायनिक कताई (Chemical Spinning): मानव-कृत तन्तुओं का निर्माण रासायनिक तरल पदार्थों द्वारा किया जाता है। यह एक गाढ़े घोल के रूप में होता है। इसे एक विशेष रूप से बने कातने वाले यन्त्र से, जिसमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, तेजी से निकाला जाता है। जैसे ही यह तन्तु हवा को स्पर्श करते हैं तो ठोस बन जाते हैं और अपारदर्शी हो जाते हैं। इन्हें सूत के रूप में एकत्रित कर दिया जाता है। फिर इन सूतों को खींचा जाता है। यह लम्बा, लचीला और मजबूत बन जाता है।
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प्रश्न 3.
सूत कितने प्रकार के होते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
सूतों के प्रकार (Types of Yams): सूत का प्रयोग कहाँ करना है इस पर उसकी बनावट निर्धारित होती है। उसको कितनी ऐंठन देनी है ताकि इच्छित प्रकार का सूत प्राप्त किया जा सके । सूत में विभिन्न परिवर्तन करके उसकी विशेषताओं का निर्धारण किया जा सकता है। सूत को मुख्य रूप से हम दो भागों में बाँटते हैं
1. साधारण सूत (Simple Yam)
2. सम्मिश्रित सूत (Novelty Yam)

साधारण सूत-यह तीन प्रकार का होता है –
(क) इकहरा सूत (Simple Standard Yarn): इसे बनाने में एक प्रकार के तन्तु का इस्तेमाल किया जाता है। यह सभी भागों में समान होता है। ऐंठन भी एक-सी और एक ही दिशा में दी जाती है।
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(ख) दोहरा सूत (Two Ply or Cable Yarn): यह दो या अधिक सूतों को ऐंठन देकर बनाया जाता है।
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(ग) डोरिया सूत-बहुत से सूत मिलाकर रस्सी जैसी सूत बनाया जाता है।
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2. सम्मिश्रित सूत (Complex or Novelty Yarm): इस प्रकार का सूत बनाने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। यह विभिन्न प्रकार के दोहरे सूत व अलग-अलग रंगों के धागों को मिला कर ऐंठन देकर एक सूत बनाने से बनता है। इसमें ऐंठन में परिवर्तन करके नए प्रकार का सूत बनाया जा सकता है। इसमें अलग-अलग तरीके के तन्तु मिलाए जा सकते हैं। जैसे रेयान व रुई, रुई व ऊन, रुई व रेशम आदि।

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इससे धागे में नवीनता लायी जाती है। एक सूत आधार रहता है व दूसरा उस पर लपेटा जाता है। यह कई प्रकार से बनाए जाते हैं। जैसे-तौलिए के लिए, शनील के लिए, लेस के लिए आदि। इनमें ऐंठन देने की क्रिया में परिवर्तन लाते हैं। लपेटने वाले धागे को कहीं कसके लपेटा जाता है तो कहीं ढीला रखा जाता है।

कहीं अधिक लपेटा जाता है कहीं दूरी पर कम लपेटा जाता है। इस प्रकार की कई तरह की विभिन्न विशेषताओं वाले सूत व कपड़े का निर्माण हो सकता है। दो या अधिक सूतों को मिलाकर बनने वाले सूत को सम्मिश्रित सूत कहते हैं। इससे बनने वाले वस्त्र में इन सभी धागों के गुण पाए जाते हैं। आजकल ऐसे वस्त्रों का चलन खूब है, जैसे-टेरीकॉट, कॉट्सवुल, टेरीसिल्क आदि ।
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प्रश्न 4.
बुनाई कला (weaving) से आप क्या समझती हैं ? इसके विभिन्न चरण लिखिए।
उत्तर:
बुनाई कला (Weaving): कपड़े का निर्माण करने की एक प्राचीन एवं लोकप्रिय विधि बुनाई है। प्राचीन काल में जब करघों का आविष्कार नहीं हुआ था तब जमीन पर निश्चित दूरी पर दोनों ओर खूटियां गाड़कर उनमें ताने के धागे कसकर बांधे जाते थे और हाथ से बाने के धागों को गूंथा जाता था। आज के युग में बुनाई हथकरघों (Hand-Loom) अथवा मशीनी करघों (Power Loom) से की जाती है, जिसमें कपड़ा बुनने की मूल विधि एक ही है। इसमें कपड़े की लम्बाई के समान्तर व्यवस्थित धागे अर्थात् बाने (Weft) के धागे होते हैं। इन दो जोड़ी धागों, तानों एवं बानों के पारस्परिक गुंथाव (Interlacing) को बुनाई कहते हैं।

बुनाई के चरण (Steps in Weaving):
करघे द्वारा बुनाई के निम्नलिखित चरण हैं –
1. ताना तनना एवं शेडिंग (Shedding): सर्वप्रथम जितना लम्बा कपड़ा बनाना हो उतने लम्बे ताने के धागे करघे पर कसे जाते हैं और फिर उन्हें करघे के पीछे के बेलन पर लपेटा जाता है जिस पर कपड़ा बुनने के बाद भी लपेटा जाता है। ताने के धागों को हार्नेस में से निकाल कर कसा जाता है। हार्नेस धातु की बनी तार होती है जिसके बीच में छेद होता है और एक फ्रेम में लगी होती है, जिसे हैंडल कहते हैं।

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ताने के धागे इन्हीं हार्नेस के छेदों में से पिरो कर कसे जाते हैं। प्रत्येक करघे में सादी बुनाई के लिए कम से कम दो हार्नेस तो अवश्य होते हैं, परन्तु अन्य विभिन्न प्रकार की बुनाइयों के लिए 3 से लेकर 8 तक हार्नेस करघे में लगाए जा सकते हैं। हैंडलों एवं हार्नेसों के द्वारा ताने के कुछ निश्चित धागों को ऊपर या कुछ धागों के नीचे करने को शैडिंग कहते हैं। जब ताने के कुछ निश्चित धागे ऊपर और कुछ नीचे हो जाते हैं तो उनके बीच में एक सुरंग (शैड) जैसा मार्ग बन जाता है जिसमें से शटल पर लिपटा हुआ बाने का धागा एक ओर से दूसरी ओर अथवा दायीं से बायीं ओर ले जाया जाता है।

2. पिकिंग (Picking): बुनाई का दूसरा चरण पिकिंग है। यह क्रिया हार्नेस द्वारा ही होती है। इसमें दूसरा हार्नेस अन्य निश्चित धागों को ऊपर उठाता है तो पुनः एक सुरंग (शैड) जैसा मार्ग बनता है, जिसमें से अब शटल को बायीं ओर से पुनः दायी ओर ले जाते हैं। इस प्रकार बाने के धागे को दायीं से बायीं और बायीं से दायीं ओर ले जाकर गुथाई करने को पिकिंग कहते हैं।

3. बेटनिंग (Battening): बाने के धागों को ताने के धागों में पिरोने के बाद एक दांतेदार कंघी (रीड़) द्वारा अच्छी प्रकार ठोका जाता है। इसके अतिरिक्त करघे में एक छड़ जिसे बैटन कहते हैं बाने के धागे के समान्तर लगी होती है और यह बाने के नए धागों को ठोक पीटकर पहले धागे के अत्यन्त निकट लाती है, जिससे कपड़े में सघनता आए और बाने के धागे एक समान दूरी पर रहें।

4. कपड़ा लपेटना तथा धागे छोड़ना (Taking up and Letting Off): इस प्रक्रिया में जो कपड़ा बुना जाता है उसे सामने की छड़ पर लपेटा जाता है और पीछे के बेलन से ताने के धागे और कपड़ा बुनने के लिए छोड़े जाते हैं। इस प्रकार उपर्युक्त क्रियों को दोहरा कर कपड़े की बुनाई की जाती है।

प्रश्न 5.
विभिन्न प्रकार की बुनावटें कौन-कौन-सी हैं ? विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर:
विभिन्न प्रकार की बुनावटें (Different Weaves): कपड़ा कई प्रकार की बुनावटों से बुना जा सकता है। कुछ बुनावटें उत्तम धागे के लिए होती हैं जबकि दूसरी को मोटे व खुरदुरे धागे के लिए प्रयोग किया जाता है। भिन्न-भिन्न बुनावटों से जादुई प्रभाव पड़ते हैं। कुछ बुनावटों के नाम हैं-साधारण, धारीदार, बास्केट, ट्विल, साटिन, कार्डेराय, मखमलनुमा, पाइल इत्यादि। कुछ

महत्त्वपूर्ण बुनावटें निम्नलिखित हैं –
साधारण बुनाई (Plain weave): कपड़ा बनाने की सबसे सरल प्रकार की बुनाई साधारण बुनाई है। सूती कपड़ा आमतौर पर इस बुनाई से बनता है। बाने को एक-एक ताने को छोड़कर डाला जाता है। ऐसे कपड़े की उल्टी सतह नहीं होती। साधारण बुनाई सस्ती व सरल है। कपड़ा मजबूत होता है तथा समतल दिखाई देता है। यह बुनाई लट्ठा, मलमल, वायल के कपड़ों के लिए उपयुक्त है।
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विल बुनाई (Twill weave): यह भी एक मूलभूत बुनाई है। इससे कपड़े की सतह पर एक प्रकार की तिरछी धारी बनने लगती है। ये धारियाँ कपड़े की उल्टी सतह पर भी दिखाई देती हैं तथा ताने से 14° से 75° तक का कोण बना सकती हैं। ये धारियां दो दिशाओं में चल सकती हैं। चित्र में बायां भुजा ट्विल और दायां ट्विल दिखाया गया है।
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बाना दो तानों के ऊपर तथा एक के नीचे, नियमित रूप से चलता है तथा धारियाँ बनाता है। हैरिंगवोन डिजाइन बनाना एक भिन्नता है। यह धारियों की दिशा, कुल लम्बाई के बाद, बदलने से बन सकती है। यह नियमित रूप से V डिजाइन बनाता है। ट्विल बुनाई द्वारा फलालेन, डेनिम, ड्रिल, गेबरडीन, जीन आदि सूती कपड़े बनाये जाते हैं।

ताने-बाने की कर्ण व्यवस्था से कपड़े में मजबूती होती है, क्रीज जल्दी नष्ट नहीं होती। ट्विल बुनाई वाले कपड़े साधारण बुनाई के कपड़ों से महंगे होते हैं क्योंकि इनका उत्पादन मूल्य और कच्चा माल अधिक महंगा होता है। ऐसे कपड़े देखने में सुन्दर होते हैं तथा रख-रखाव साधारण बुनाई वाले कपड़ों के अनुकूल होता है।

साटिन बुनाई (Satin weave): इस बुनाई में बाने का धागा, ताने के एक धागे के ऊपर से और एक से अधिक धागों से नीचे से गुजरता है। ताने के साधारणत: 4 धागे ऊपर रहते हैं। यह 7 धागों तक भी हो सकता है। इस प्रकार का बना हुआ कपड़ा ‘साटिन’ कहा जाता है। अगर ताने के स्थान पर बाने का धागा ऊपर हो तो कपड़े को ‘स्टन’ कहा जाता है। साटिन बुनाई द्वारा बने कपड़ों में अधिक चमक होती है परन्तु यह कपड़ा अन्य बुनाई द्वारा बने कपड़ों की अपेक्षा कमजोर होता है।

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कई बार अधिक चमक लाने के लिए तन्तुओं में कम ऐंठन दी जाती है। इस प्रकार की बुनाई (Snag) में अधिक आ जाते हैं। साटिन का रख-रखाव सुविधाजनक नहीं है। साटिन के कपड़ों को अधिक चमक वाला करने के लिए ताने में ऊन, रेयान तथा रेशम का प्रयोग किया जाता है। सूती कपड़े भी साटिन बुनाई से बुने जाते हैं।
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बायीं ओर का चित्र दर्शाता है कि धागे में ऐंठन अच्छा साटिन बनाता है। दायीं ओर का चित्र दर्शाता है कि धागे में असमान ऐंठना टूटा ट्विल हुआ बनाता है।

बुना हुआ कपड़ा (Knitting Fabrics): बुनने की क्रिया में कपड़ा (वस्त्र) तैयार करने के लिए धागे के फंदे बनाए जाते हैं तथा फिर फंदों में डालकर कपड़ा बुना जाता है। बुने हुए कपड़े बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि ये वजन में हल्के तथा पहनने में आरामदायक होते हैं। इनमें ताने-बाने वाले कपड़ों की अपेक्षा कम सिलवटें पड़ती हैं तथा यह सुविधा से रखे अर्थात् संभाले जाते हैं। धागे इस प्रकार व्यवस्थित किये जाते हैं कि एक फंदों की पंक्ति ऊपर व नीचे की फंदों की पंक्ति के सहारे लटकी हो।
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फंदों के स्तम्भ को Wale कहा जाता है जबकि लगातार फंदों की पंक्ति को Course कहते हैं। Gauge शब्द का अर्थ है – एक इंच में फंदों की संख्या। इस गिनती से कपड़े की दृढ़ता पता लगाई जा सकती है।

बुनाई वाले कपड़े दो प्रकार के होते हैं –
Tubular और flat गोलाकार (Tubular) बुनाई के कपड़ों में फंदे गोलाई में डाले जाते हैं। यह जुराबों के लिए उपयुक्त होता है। समतल (Flat) बुनाई में फंदे सीधी पंक्ति में होते हैं। यह उन कपड़ों के लिए उपयुक्त है जिनसे शरीर की गति होनी होती है। जब बुनाई के कपड़े का धागा टूटता है तो फंदा पंक्ति-दर-पक्ति नीचे गिरने लगता है, इसे laddering effect कहते हैं। बुनाई के समय एक अन्य ताने का धागा डालकर इसे रोका जा सकता है।

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नमदे का कपड़ा (Felt fabrics): नमदे के कपड़े में बुने हुए कपड़े की तरह कोई ताना-बाना नहीं होता। वे ऊनी बुनाई से भी भिन्न होते हैं। इस प्रकार के कपड़े बुनने वाले कपड़ों की खोज से पहले प्रयोग होते थे। ये कपड़े ऊन, बालों व चर्म से बनते थे। आजकल ऊन व अन्य जानवरों से उपलब्ध तन्तुओं के मिश्रण से बनाये जाते हैं। कश्मीर के नमदों के ऊपर विभिन्न रंगों से सुन्दर डिजाइनों की कढ़ाई की जाती है। नमदे का कपड़ा नई या पुरानी ऊन के रेशों से बनाया जाता है।

इन तन्तुओं को यांत्रिक शक्ति से रासायनिक क्रिया, नमी और गर्मी से जुड़ाव किया जाता है तथा इसमें कोई चिपकने वाला पदार्थ का प्रयोग नहीं किया जाता। नमदे का कपड़ा फर्श को ढंकने के लिए कालीन बनाने में तथा विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के काम आता है। यह विद्युत का कुचालक होता है तथा आवाजरोधी है। यह किसी भी आकार में काटा जा सकता है। कोनों को किसी भी परिसज्जा की आवश्यकता नहीं होती। नमदे का पतला कपड़ा लचीला होता है, अत: जैकेट बनाने में प्रयोग होता है। खुरदरी फेल्ट से टोप बनाए जाते हैं। फैल्ट या नमदे के कपड़ों के गुण बढ़ाये जा सकते हैं अगर हम उन्हें प्रतिरोधक, पानीरोधक व आगरोधक बना दें।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 18 तन्तु विज्ञान

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 18 तन्तु विज्ञान Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 18 तन्तु विज्ञान

Bihar Board Class 11 Home Science तन्तु विज्ञान Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वस्त्र निर्माण की सबसे छोटी इकाई को कहते हैं –
(क) रेशा
(ख) धागा
(ग) कपड़ा (Cloth)
(घ) वस्त्र (Textile)
उत्तर:
(क) रेशा

प्रश्न 2.
तंतुओं की न्यूनतम लम्बाई 5 मि. मी. होने पर उससे निर्माण किया जा सकता है – [B.M.2009A]
(क) कपड़ा का
(ख) वस्त्र का
(ग) धागा का
(घ) तंतु का
उत्तर:
(ग) धागा का

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प्रश्न 3.
कंबल किस विधि से तैयार किया जाता है। [B.M.2009A]
(क) ब्रेडस तथा लेंस
(ख) निटिंग
(ग) फेल्टिंग
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) फेल्टिंग

प्रश्न 4.
तंतुओं से सभी प्रकार की गंदगी और अशुद्धियों को दूर करने की विधि को कहते – [B.M.2009A]
(क) ट्राईंग आऊट
(ख) कोंबिग
(ग) काडिग
(घ) रोविंग
उत्तर:
(ग) काडिग

प्रश्न 5.
दो सूती कपड़े किस विधि से तैयार किया जाता है ? [B.M. 2009A]
(क) ट्विल बुनाई
(ख) धारीदार बुनाई
(ग) साटीन बुनाई
(घ) बासकेट बुनाई
उत्तर:
(घ) बासकेट बुनाई

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तन्तु (Fibre) शब्द को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
“वस्त्र निर्माण की छोटी-से-छोटी इकाई को तन्तु या रेशा कहते हैं।”

प्रश्न 2.
तन्तुओं का वर्गीकरण (Classification of fibre) किस आधार पर किया जाता है ?
उत्तर:
तन्तुओं का वर्गीकरण उनकी लम्बाई या स्रोत के आधार पर किया जा सकता है।
1. लम्बाई के आधार पर तन्तुओं का वर्गीकरण:

  • प्राकृतिक तन्तु (Natural fibre)
  • मानवकृत तन्तु (Man-made fibre)
  • मिश्रित तन्तु (Blended fibre)

प्रश्न 3.
वानस्पतिक तन्तु (Vegetative fibre) का मुख्य तत्त्व कौन-सा होता है ?
उत्तर:
वानस्पतिक तन्तु का मुख्य तत्त्व सेलूलोज होता है।

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प्रश्न 4.
टेक्सटाइल (Textile) या वस्त्र विज्ञान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
टेक्सटाइल शब्द लैटिन भाषा का शब्द है जो टैक्सटिली शब्द से बना है। जिसका अर्थ रेशों से या तन्तुओं से निर्मित कपड़ा अर्थात् बुना कपड़ा है

प्रश्न 5.
रेशम (Silk) की प्राप्ति कहाँ से होती है ?
उत्तर:
रेशम एक विशेष प्रकार के कीड़े से प्राप्त होता है।

प्रश्न 6.
तन्तुओं की दृढ़ता (Rigidity) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
किसी भी तन्तु को तोड़ने के लिए जितनी शक्ति लगाने की आवश्यकता होती है, उतनी ही उस तन्त की दढता होती है।

प्रश्न 7.
तन्तुओं के लचीलेपन (Flexibility) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जब तन्तु बिना टूटे मुड़ जाता है तो इस क्षमता को तन्तुओं का लचीलापन कहा जाता है।

प्रश्न 8.
प्रत्यास्थता.(Elasticity) का क्या गुण होता है ?
उत्तर:
तन्तुओं को खींचने पर लम्बा हो जाना और छोड़ने पर वापस अपनी लम्बाई में आ जाना ही प्रत्यास्थता का गुण कहलाता है।

प्रश्न 9.
कृत्रिम तन्तु (Artificial fibre) ने क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
मानव निर्मित तन्तु जो रासायनिक विधि द्वारा बनाए जाते हैं, उन्हें कृत्रिम तन्तु कहते हैं।

प्रश्न 10.
पॉलिएस्टर (Polyester fibre) तन्तु को किस नाम से जाना जाता है ?

प्रश्न 11.
ऊन (Wool) कैसा तन्तु है ?
उत्तर:
ऊन एक प्राकृतिक, प्राणिज तन्तु है जो पशुओं के बाल से बनाये जाते हैं।

प्रश्न 12.
अन्दर पहनने वाले वस्त्रों के लिए कौन सा कपड़ा चयन करोगे?
उत्तर:
अन्दर पहनने के लिए सूती कपड़ों का चयन करेंगे यह नमी को जल्दी सोख लेता है ।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्रोत के आधार पर तन्तुओं का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
स्रोत के आधार पर तन्तुओं का वर्गीकरण :
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प्रश्न 3.
कपास के तन्तु की कोई भौतिक एवं रासायनिक चार-चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):

  • संरचना (Composition)।
  • बनावट (Microscopic Structure)।
  • लम्बाई (Length)।
  • नमी सोखने की क्षमता (Absorbency)।
  • ताप का प्रभाव (Effect of Heat)।

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रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):

  • अम्ल का प्रभाव (Effect of Acid)।
  • क्षार का प्रभाव (Effect of Alkali)।
  • रंगों का प्रभाव (Effect of Colours)।
  • जीवाणु का प्रभाव (Effect of Moth and Mildew)।

प्रश्न 4.
रेशम के तन्तु की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर:
रेशम के तन्तु की विशेषताएँ (Properties of Silk Fibre):
भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):

  • संरचना (Composition)।
  • बनावट (Microscopic Structure)
  • मजबूती (Strength)।
  • लोच (Elasticity)।
  • नमी सोखने की क्षमता (Absorbency)।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):

  • क्षार का प्रभाव (Effect of Alkali)।
  • रंगों का प्रभाव (Effect of Colours)।
  • अम्ल का प्रभाव (Effect of Acid)।
  • जीवाणुओं का प्रभाव (Effect of Moth and Mildew)।

प्रश्न 5.
ऊन के तन्तुओं से कितने प्रकार का ऊनी कपड़ा तैयार किया जाता है ?
उत्तर:
1. ऊनी कपड़े (Woollens): इन्हें बनाने के लिए छोटे तन्तुओं का प्रयोग किया जाता है जिनकी अधिक कंघी व कताई नहीं की जाती। ये वस्त्र खुरदरे व मोटे होते हैं।

2. वस्टेंड (Worsted): इन्हें बनाने के लिए लम्बे रेशों का प्रयोग किया जाता है। इन रेशों की कंघी तथा कताई अच्छी तरह की जाती है। इससे बने वस्त्र अधिक मजबूत तथा चिकनी सतह वाले होते हैं। पैंट, सूट आदि इन्हीं वस्त्रों से बनते हैं।

3. नमदा (Felted Fabrics): कुछ ऊनी वस्त्र फेल्ट विधि से तैयार किये जाते हैं। ये वस्त्र सीधे तन्तुओं से बनाये जाते हैं। तन्तुओं को उचित नमी, तापमान तथा दबाव से जोड़ दिया जाता है। ऐसे वस्त्र खुरदरे होते हैं, जिससे नमदा, पटू आदि बनते हैं। ऊनी वस्त्रों के उत्पादन के लिए सबसे पहले भेड़ों पर से बाल काटे जाते हैं। फिर इनकी छंटाई की जाती है। अगली प्रक्रिया में इन्हें क्षार के घोल में कई बार धोया जाता है जिससे तन्तु स्वच्छ व कोमल हो जाते हैं।

अब इन्हें सुखाया जाता है। धोने व सुखाने से तन्तु थोड़े कड़े हो जाते हैं इसलिए इन पर जैतून के तेल का छिड़काव किया जाता है। ऊनी वस्त्र बनाने के लिए रेशों को केवल सुलझाया जाता है, लेकिन वर्टेड वस्त्र बनाने के लिए रेशों की धुनाई (Carding) तथा कंघी (Combing) की जाती है, जिससे रेशे पूर्ण रूप से समानान्तर हो जाते हैं तथा छोटे रेशे अलग निकल जाते हैं। इन रेशों की पूनिया बनाकर कताई की जाती है। इस प्रकार ऊनी धागा वस्त्र बनाने के लिए तैयार हो जाता है।

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प्रश्न 6.
नायलोन (Nylon) की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर:
नायलोन की विशेषताएँ (Characteristics of Nylon):

  1. सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता से देखने पर ज्ञात होता है कि नायलोन के तन्तु गोलाकार, चमकदार, सीधे और चिकने होते हैं।
  2. नायलोन मानव निर्मित तन्तुओं में सबसे अधिक मजबूत होता है।
  3. नायलोन के रेशे लम्बे व मजबूत होते हैं।
  4. नायलोन के कपड़े पर पसीने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता हालांकि रंग नष्ट हो जाते हैं।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):
1. इस पर क्षार का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु प्रत्येक अम्ल का रेशों पर अत्यन्त बुरा प्रभाव पड़ता है। .
2. ब्लीज व धब्बे मिटाने वाले रसायनों का नायलोन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
जैविक विशेषताएँ (Biological Properties): नायलोन के तन्तुओं पर जीवाणुओं का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। अगर चीटियाँ या कॉकरोच कपड़े में फंस जाएँ तो वह इसे काट खाकर बाहर निकल जाएगा।

प्रश्न 7.
मिश्रित तन्तु के नाम लिखें:
(क) जो ठंडी जलवायु में पहने जाएँ।
(ख) जो आर्द्र जलवायु में पहने जाए। कारण भी लिखें।
उत्तर:
मिश्रित तन्तु –
(क) ठंडी जलवायु के लिए-टेरीवुल (Terrywool) क्योंकि यह ऊन की तरह ही गरम हैं
(ख) आर्द्र जलवायु के लिए-टेरीकॉट (Terrycot) क्योंकि यह टेरीलीन की अपेक्षा ज्यादा ठंडा व अवशोषक शक्ति वाला है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कपास की भौतिक विशेषताएँ समझाएँ ? [B.M.2009A]
उत्तर:
कपास की भौतिक विशेषताएँ निम्नलिखित है –
(a) दृढ़ता
(b) प्रत्यास्थता
(c) पुनरुत्थान
(d) अवशोषकता
(e) ताप का प्रभाव
(f) रगड़ का प्रभाव
(g) चमक
(h) स्वच्छता।

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(a) सूखे तंतु के अपेक्षा गीले होने पर बढ़ जाती है।
(b) कपास में यह गुण नहीं होता इसलिए इसमें आकार बड़ा नहीं होता है।
(c) यह गुणा नहीं होने के कारण सलवट पड़ती है।
(d) 15-20 गुण अधिक नमी सोखने की क्षमता होती है।
(e) ताप सहन करने की बहुत अधिक क्षमता रहती है।
(f) मजबूत होने के कारण जल्दी फटता नहीं है।
(g) चमक कम होती है परिसज्जा द्वारा दी जाती है।
(h) आसानी से साफ किया जाता है ।

प्रश्न 2.
रूई (Cotton) की भौतिक, रासायनिक व जैविक विशेषताएँ एवं देखभाल व प्रयोग विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
रूई (Cotton): यह प्राकृतिक तन्तु है जो 90% सेलूलोज व 10% खनिज लवण, मोम और प्रोटीन से बनते हैं। मोहनजोदड़ो युग के मिले फूलदानों पर भी रूई के तन्तु लगे मिले हैं। रूई के बीजों के ऊपर उगे बालों द्वारा रूई बनती है। यह नर्म तथा गद्देदार होती है। रूई को ‘पेड़ की ऊन’ कहा जाता है। भारत, मिस्र, ब्राजील, अफ्रीका, अमेरिका रूई उत्पादन के कुछ मुख्य देश हैं।

सारे विश्व की रूई की माँग का 40% केवल अमेरिका में उत्पादित होता है। उत्पादन व निर्यात में भारत का दूसरा स्थान आता है। रूई की उत्पादकता सस्ती है और इसका प्रयोग बहुत से क्षेत्रों में किया जाता है। जैसे-कपड़े, चादरें, तौलिये, बनियान, घर की सजावट के लिए कपड़े आदि रूई से ही बनते हैं। रूई के तन्तु मिट्टी, बीज, उगाने का तरीका व मौसम से प्रभावित होते हैं तथा उनकी लम्बाई, नमी और चमक

1. भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):

  • कपास के रेशे कई प्रकार के होते हैं। सामान्यतः रूई के रेशे 1 सेमी. से 5 सेमी. तक लम्बे होते हैं तथा इनके व्यास 16-20 माइक्रोन तक होता है। रूई का रेशा ऊपर से एक कोशीय प्रतीत होता है परन्तु सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखने पर ज्ञात होता है कि यह तन्तु कुछ चपटी घुमावदार नली के समान होता है जिसकी भीतरी सतह खुरदरी होती है। ऐंठन तन्तु को शक्ति देती है तथा लम्बे तन्तुओं में बुनने में सहायक होती है। इस ऐंठन को “कनवोल्यूशन्स” कहते हैं। इनमें चमक कम होती है।
  • कपास के रेशे रंग में भिन्न-भिन्न होते हैं अर्थात् सफेद से क्रीम तक।
  • कपास में सलवटें शीघ्र पड़ जाती हैं। कपास को संसाधित करके सलवट-रोधक बनाया जाता है।
  • रूई के तन्तुओं में नमी को सोखने का एक विशेष गुण होता है। यही कारण है कि सूती कपड़ा शरीर का पसीना आसानी से शीघ्र सोख लेता है। इसीलिए कपास गर्म प्रदेशों में अधिक लोकप्रिय होती है।
  • सूती कपड़े में सिकुड़न-प्रवृत्ति पायी जाती है। इसे सिकुड़नरोधी बनाया जाता है।
  • इनमें लचक बहुत कम होती है।
  • सूखे तन्तु की तुलना में गीले तन्तु 25% अधिक मजबूत होते हैं। अतः इनका विशेष ध्यान नहीं रखा जाता।

2. तापीय विशेषताएँ (Thermal Properties):
कपास के तन्तुओं पर ताप का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि इनमें ताप सहन करने की क्षमता होती है। यही कारण है कि सूती कपड़ों पर गर्म इस्त्री कर सकते हैं।

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3. रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :

  • कपास के तन्तुओं पर सामान्य रूप से क्षार का कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः क्षारयुक्त साबुन व डिटर्जेंट से सूती कपड़ा आसानी से धोया जा सकता है, परन्तु रंगीन सूती कपड़ों को अधिक क्षारयुक्त साबुन से धोने से उनके रंग खराब होने का भय बना रहता है।
  • नमक व गन्धक के तेजाब के सम्पर्क में सूती वस्त्र नष्ट हो जाते हैं।
  • भारी पानी से रंग के नष्ट होने की आशंका रहती है जबकि ताप का इस पर कोई प्रभाव नहीं होता।

4. जैविक विशेषताएँ (Biological Properties) :

  • सिल्वर फिश सैलूलोज पर जिन्दा रहती है तथा सूती कपड़े को नष्ट कर सकती है।
  • सूती वस्त्र सीलन वाली गर्म जगह पर कुछ समय तक रखें तो उसमें दुर्गन्ध आने लगती है और फफूंदी लग सकती है।

कपास की देखभाल व प्रयोग (Use and Care of Cotton): धुलाई करते समय सूती वस्त्रों को आसानी से रगड़ कर धोया जा सकता है। रंग नष्ट होने के लिए रंगीन कपड़ों को छाया में सुखाना चाहिए। गीले कपड़ों पर इस्त्री करने से सिलवटें दूर की जा सकती हैं। मांड लगाये कपड़े अच्छी परिसज्जा देते हैं।

सूती कपड़ों की मूल विशेषताएँ (Properties of Cotten Cloth):
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प्रश्न 3.
रेशम के तन्तु की खोज, भौतिक व रासायनिक विशेषताएँ तथा उपयोगिताएँ विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
रेशम का तन्तु एक कीड़े के लार से बनाया जाता है। इसकी खोज सबसे पहले चीन में हुई। एक दंतकथा के अनुसार एक चीनी राजकुमारी ने अचानक एक ककून गर्म चाय में डाल दिया। जब उसे निकाला गया तो बारीक. सन्दर. आकर्षक व लम्बा तन्त खिंचता निकल आया। इन तन्तुओं को एकत्र करके, इन्हें बुनकर सुन्दर कपड़ा तैयार किया। कई वर्षों तक रेशम के उत्पादन का रहस्य चीनियों ने अपने तक ही सीमित रखा।

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लगभग 3000 वर्ष बाद यह रहस्य चीन से बाहर आया और कई देशों, जैसे-जापान, भारत, इटली, स्पेन, फ्रांस तथा अन्य यूरोपीय देशों में रेशम का उत्पादन होने लगा। भारत में प्राचीन ग्रन्थों में रेशमी वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। आधुनिक युग में वैज्ञानिक विधि से रेशम बनाने का श्रेय जापान को जाता है। रेशम के उत्पादन के लिए रेशम के कीड़ों को शहतूत के पेड़ पर पाला जाता है। कीड़े की खुराक शहतूत के पत्ते ही हैं।

रेशम के कीड़े के जीवन की चार अवस्थाएँ हैं :

  • अण्डा
  • लारवा
  • प्यूपा
  • कीड़ा।

रेशम के कीड़े से जब लारवा बनता है तब यह अपनी खुराक बन्द कर देता है। इसके मुख के पास दो छिद्रों से लार बाहर आने लगती है। यह दोहरा धागा एक गोंद सेरीसिन (Sericin) से आपस में जुड़ता जाता है और कीड़े के शरीर के चारों ओर लिपटता जाता है। जब कीड़ा पूरी तरह इससे ढक जाता है, तब इसे ककून कहते हैं। रेशम के रेशे प्राप्त करने के लिए ककून पानी में गर्म किए जाते हैं। इस क्रिया में थोड़ा-सा गोंद ढीला पड़ जाता है और रेशे आसानी से खुल जाते हैं।

ककून से रेशों को खोल कर सीधा किया जाता है। इस प्रक्रिया को रीलिंग (Reeling) कहते हैं । रेशम का तन्तु बहुत ही महीन होता है इसलिए 8-10 रेशों को इकट्ठे सीधा किया जाता है। फिर इन्हें एक साथ मिलाकर ऐंठन देकर रेशम का तन्तु बनाया जाता है। रेशम के तन्तु पर से गोंद को हटाने के लिए इसे फिर गर्म पानी में डाला जाता है। इस क्रिया को गोंद हटाना (Degumming) कहते हैं। अब रेशम का तन्तु वस्त्र बनाने के लिए तैयार है।

रेशम के तन्तु की विशेषताएँ (Properties of Silk Fibre) :
भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):
1. संरचना (Composition): रेशम के तन्तु का मुख्य भाग प्रोटीन से बना है। इसमें 90% प्रोटीन फाइब्रोइन (Fibroin) पायी जाती है।

इसके अतिरिक्त गोंद सेरीसिन (Sericin): पाया जाता है। रेशे का 95% भाग प्रोटीन तथा सेरीसिन से बनता है। शेष 5% मोम, लवण, वसा आदि से बनता है।
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2. बनावट (Microscopic Structure): सूक्ष्मदर्शी से देखने पर रेशम का तन्तु दो रेशों से मिलकर बना दिखाई देता है। दोनों रेशे स्थान-स्थान पर गोंद से सटे दिखाई देते हैं। गोंद के कारण रेशा असमान सतह वाला दिखाई देता है, लेकिन गोंद हटा देने पर यह चिकना, चमकदार, सीधी रेखा के समान दिखाई देता है।

3. लम्बाई (Length): रेशम का तन्तु प्राकृतिक तन्तुओं में सबसे लम्बा है। इसकी लम्बाई 1200 फीट से 4000 फीट तक रहती है। इसी कारण इनसे चिकने व चमकदार वस्त्र बनते हैं।

4. रंग एवं चमक (Colour and Lustre): रेशम में प्राकृतिक चमक रहती है। गोंद हटा देने पर यह और भी चमकीला हो जाता है। रंग सफेद से क्रीम होता है।

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5. मजबूती (Strength): प्राकृतिक तन्तुओं में रेशम के तन्तु सबसे अधिक मजबूत होते हैं। गीली अवस्था में इनकी शक्ति कम हो जाती है परन्तु सूखने पर फिर से शक्ति प्राप्त कर लेते हैं।

6. लोच (Elasticity): प्राकृतिक तन्तुओं में प्रत्यास्थता (लोच) का गुण रेशम में दूसरे स्थान पर रहता है। खींचने पर यह बिना टूटे अपनी लम्बाई से अधिक खिंच सकता है और छोड़ने पर अपनी पूर्व अवस्था में आ जाता है।

7.ताप की संवाहकता (Heat Conductivity): रेशम के तन्तु ताप के बुरे संवाहक हैं। शरीर की गर्मी को बाहर नहीं निकलने देते इसलिए रेशमी वस्त्र सर्द ऋतु में पहनने के लिए उपयुक्त हैं।

8. प्रतिस्कंदता (Resiliency): रेशम के तन्तु में लचक की क्षमता भी होती है। इसमें सलवटें नहीं पड़ती।

9.सिकुड़न (Shrinkage): तन्तु सीधे तथा लम्बे होने के कारण सिकुड़ते नहीं। थोड़ी बहुत सिकुड़न गीली अवस्था में प्रेस करने पर दूर हो जाती है।

10. रगड़ का प्रभाव (Effect of Friction): रगड़ से रेशम की चिकनी सतह पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इसकी कोमल सतह खुरदरी हो जाती है। इसलिए सिल्क के वस्त्रों को सावधानी से हल्के दबाव से धोना चाहिए।

11. ताप का प्रभाव (Effect of Heat): रेशम के तन्तु अत्यन्त कोमल होते हैं। इसलिए अधिक ताप नहीं सह पाते । 300°F ताप पर यह नष्ट होने लगता है। सिल्क के वस्त्रों पर हल्की गर्म प्रेस ही करनी चाहिए।

12. नमी सोखने की क्षमता (Absorbency): रेशम के तन्तु नमी को जल्दी सोखते हैं परन्तु जल्दी नमी को छोड़ते नहीं । कुछ मात्रा में इसमें नमी रह जाती है जिसे बाहर से देखने पर जानना कठिन होता है।

13. सफाई एवं धुलाई (Cleanliness and Washability): चिकनी सतह होने के कारण सिल्क के वस्त्र जल्दी गन्दे नहीं होते । रगड़ से रेशे खराब हो जाते हैं। सिल्क के वस्त्रों को निचोड़ना नहीं चाहिए क्योंकि गीली अवस्था में ये कमजोर हो जाते हैं। हल्के से दबा कर पानी निकालना चाहिए।

14. प्रकाश का प्रभाव (Effect of Light): धूप एवं प्रकाश में तन्तु बहुत जल्दी खराब होने लगते हैं। रंग भी उड़ने लगता है। सिल्क का प्रयोग पर्दे बनाने के लिए उचित नहीं।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :
1. क्षार का प्रभाव (Effect of Alkali): क्षार का रेशम के तन्तुओं पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है इसलिए रेशमी वस्त्र धोने के लिए क्षारयुक्त साबुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऊन के साथ यदि इसकी तुलना की जाए तो रेशम का रेशा ऊन की अपेक्षा क्षार के प्रति अधिक सहनशील है।

2. अम्ल का प्रभाव (Effect of Acid): कार्बनिक अम्ल को कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता । अकार्बनिक अम्ल का तनु घोल भी रेशम के वस्त्रों पर इस्तेमाल किया जा सकता है, किन्तु सान्द्र अम्ल रेशम के तन्तु को क्षति पहुँचाते हैं। नाइट्रिक अम्ल से इसका रंग एवं चटक पीला पड़ जाता है।

3. रंगों का प्रभाव (Effect of Colours): रेशम पर रंग आसानी से चढ़ जाते हैं और पक्के होते हैं।

4. जीवाणुओं का प्रभाव (Effect of Moth and mildew): सिल्क पर फफूंदी नहीं लगती लेकिन लम्बे समय तक नमी वाले स्थान पर फफूंदी लगने का डर रहता है । कीड़े का प्रभाव होता है।

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रेशम के वस्त्रों की उपयोगिता (Importance of Silk Clothes) :

1. रेशम को अपनी कोमलता, चिकनेपन, आकर्षण, चमक, मजबूती तथा लटकनशीलता (Draping Quality) के कारण ‘वस्त्रों की रानी’ कहा जाता है। रेशम का प्रयोग राजसी घरानों में होता आया है। इसके उत्पादन में अत्यन्त सावधानी तथा कुशल हाथों की आवश्यकता होती है, इसलिए यह एक महँगा वस्त्र है। रेशमी वस्त्रों का प्रयोग विशेष अवसरों पर ही किया जाता है।

2. ताप का कुचालक होने के कारण रेशमी वस्त्र सर्दी में पहनने के लिए उत्तम है। अपनी महीनता के कारण इन्हें गर्मी में भी पहना जा सकता है। बारीक रेशमी वस्त्रों से शरीर की गर्मी तथा हवा निकलती रहती है।

3. रेशमी वस्त्रों पर रंग आसानी से चढ़ जाते हैं, इसलिए कई रंगों में मिलते हैं। इसे दोबारा भी दूसरे रंग से आसानी से रंगा जा सकता है।

4. रेशमी वस्त्रों पर सलवटें नहीं पड़ती इसलिए अधिक प्रेस की भी जरूरत नहीं होती। रेशमी वस्त्र रंगड़ तथा क्षार में खराब हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
ऊन (Wool) के प्राप्ति स्रोत, ऊनी कपड़ा तैयार करना, भौतिक. एवं रासायनिक विशेषताएँ तथा उपयोगिता पर निबन्ध लिखें।
उत्तर:
ऊन (Wool): ऊन एक प्राकृतिक प्राणिज वस्त्रोपयोगी तन्तु है। ऊन के तन्तु हमें विभिन्न पशुओं से मिलते हैं। प्राचीन काल में मनुष्य पशुओं को मार कर उनकी खाल को वस्त्र के रूप में प्रयोग करता था। सभ्यता एवं ज्ञान के विकास से मनुष्य ने यह जाना कि पशुओं को मारे बिना ही उनकी त्वचा पर उगने वाले बालों को काट कर ऊन तैयार की जा सकती है, जिससे ऊनी वस्त्र तैयार करके वह अपने आपको सर्दी से बचा सकता है।

ऊन प्राप्ति के स्रोत (Sources of Wool): ऊन के रेशे हमें विभिन्न पशुओं जैसे भेड़, बकरी, ऊँट, लामा, खरगोश आदि से प्राप्त होते हैं। सर्वाधिक ऊन भेड़ों से प्राप्त की जाती है। अतः ऊन सभी पशुओं से प्राप्त की जा सकती है जिनके शरीर पर लम्बे बाल उगते हैं। भिन्न-भिन्न पशुओं से प्राप्त होने वाली ऊन की विशेषताएँ एवं उपयोगिताएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। भेड़ों से सबसे अच्छी ऊन मोरनी जाति की भेड़ से प्राप्त होती है।

मोरनी जाति की भेड़ स्पेन में है परन्तु अब सभी देशों में इस जाति की भेड़ को पाला जाता है। भारत में कश्मीरी बकरी से उत्तम किस्म की पश्मीना ऊन प्राप्त होती है। अंगोरा जाति की बकरी एवं खरगोश से भी रेशम की भांति कोमल एवं चमकीली ऊन प्राप्त होती है । दक्षिणी अमेरिका के पहाड़ी जानवर लामा-अल्पाका एवं हिकुना जो बोझा ढोने का काम करते हैं, उनके बालों को उतार कर भी ऊन के रेशे प्राप्त किए जाते हैं।

लामा से प्राप्त ऊन हल्की होती है, अल्पाका से प्राप्त ऊन मध्यम श्रेणी की होती है तथा हिकुना से प्राप्त ऊन बहुत बढ़िया किस्म की होती है। एशिया के पठार एवं तिब्बत के प्रदेशों में यॉक नामक पशु, जो बोझ ढोने का काम करता है, से ऊन प्राप्त की जाती है। यह ऊन अत्यन्त नर्म होती है। ऊँट से भी ऊन प्राप्त की जाती है जो कोमल व सुन्दर होती है।

ऊन के रेशे दो प्रकार के होते हैं –

  • कटी ऊन (Fleece):यह रेशे जीवित जानवर की खाल से निकाले जाते हैं।
  • खींची हुई ऊन (Pulled Wool): यह रेशे मरे हुए जानवर की खाल से निकाले जाते हैं।

ऊन के रेशों से तीन प्रकार के कपड़े तैयार करते हैं :
1. ऊनी कपड़े Woollens): इन्हें बनाने के लिए तन्तुओं का प्रयोग करते हैं। यह वस्त्र मोटे व खुरदरे होते हैं।

2. वस्टेंड (Worsted Fabric): इन्हें बनाने के लिए लम्बे तन्तुओं का प्रयोग करते हैं जिनकी कंघी व कटाई भली प्रकार की जाती है। यह वस्त्र चिकने व मजबूत होते हैं, जैसे-पैंट, कोट। आदि।

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3. नमदा (Felted Fabric): यह वस्त्र सीधे तन्तुओं से बनाए जाते हैं जिन्हें उचित नमी, तापमान व दबाव से जोड़ा जाता है। इसे फेल्ट विधि कहते हैं। यह वस्त्र खुरदरे होते हैं, जैसे नमदा आदि। ऊनी कपड़ा तैयार करना-मशीनों द्वारा ऊनी कपड़ा तैयार करने के लिए भेड़ों को गर्मियों के शुरू होते ही अच्छी तरह नहलाया जाता है तथा कुछ सप्ताह पश्चात् ऊन उतार ली जाती है। इस ऊन को गांठों में बांधकर कारखानों में भेज दिया जाता है।

कारखानों में ऊनी कपड़ा बनाते समय निम्नलिखित प्रक्रियाएँ की जाती है –
1. तन्तुओं को छांटना और साफ करना (Sorting & Cleaning): कारखानों में सर्वप्रथम फन को तन्तुओं की लम्बाई, व्यास, कोमलता अथवा मजबूती आदि गुणों के आधार पर अलग-अलग कर लिया जाता है।

साधारण तन्तु जिनकी लम्बाई अधिक नहीं होती है उससे सस्ता ऊनी कपड़ा बनाया जाता }। उत्तम किस्म के लम्बे व मुलायम ऊनी तन्तुओं से बढ़िया किस्म का कपड़ा बनाया जाता है। था सबसे घटिया किस्म के तन्तुओं से मोटे कपड़े, कम्बल या कालीन बनाए जाते हैं। धूल साफ करने वाली मशीन, जिसे डस्टर कहते हैं, की सहायता से तन्तुओं पर लगी धूल को हटा दिया जाता है।

2. तन्तुओं की धुलाई एवं निघर्षण करना (Washing and Scouring): ऊन के तन्तुओं की धुलाई करने के लिए साबुन के गर्म घोल तथा मन्द क्षार का प्रयोग किया जाता है। जब ऊन के तन्तु अच्छी तरह साफ हो जाते हैं तब इन्हें निघर्षण-क्रिया द्वारा सुखा लिया जाता है। इस कार अब ऊनी तन्तु गन्दगी, पसीने आदि से मुक्त हो जाते हैं। कई बार ऊनी तन्तुओं को इसी समय रंग भी दिया जाता है।

3. ऊनी तन्तुओं को धुनना (Carding): ऊनी तन्तुओं को मशीनों की सहायता से धुनाई करके सुलझाया जाता है। धुनाई करने से ऊन के तन्तुओं की गन्दगी भी हट जाती है।

4. कार्बोनीकरण (Carbonizing): धुलाई व धुनाई करने के पश्चात् भी ऊन के तन्तुओं में कुछ न कुछ गन्दगी शेष रह जाती है जिसे दूर करने के लिए कार्बोनीकरण की प्रक्रिया में ऊन । तन्तुओं को सल्फ्यूरिक अम्ल के हल्के घोल में डुबोया जाता है जिससे तन्तुओं में उपस्थित नावश्यक वानस्पतिक पदार्थ जल जाते हैं। इसके पश्चात् तन्तुओं को आहिस्ता से निचोड़ कर ‘पेक्षित सल्फ्यूरिक अम्ल को निकाल कर नियन्त्रित ताप पर इन्हें सावधानीपूर्वक सुखा लिया

5. तन्तुओं पर तेल लगाना (Oiling): कार्बोनाइजिंग की प्रक्रिया के पश्चात् तन्तुओं को | पानी में धोकर सुखा लिया जाता है और उन पर जैतून का तेल अथवा ग्लिसरीन लगाई जाती है नपसे तन्तु कोमल तथा लचीले हो जाते हैं और धुनाई करते समय अधिक नहीं टूटते हैं।

6. कताई करना (Spinning): रूई के तन्तुओं की भाँति ऊनी तन्तुओं में से मशीनों द्वारा धागा खींचकर उसे ऐंठन दी जाती है। वर्सटेड कपड़े (Worsted Cloth) के लिए साधारण ऊनी कपड़े की अपेक्षा धागों को अधिक ऐंठन दी जाती है। यही कारण है कि वर्सटेड कपड़ा पतला, कड़ा व मजबूत हो जाता है तथा साधारण ऊनी कपड़ा जिसके धागे में कम ऐंठन होती है मोटा, नरम, गुदगुदा व रोएँदार होता है।

7. कंघी करना और खींचना (Combing and Drawing): तेल लगाने के पश्चात् तन्तुओं पर कंघा किया जाता है जिससे 10 सेमी. से अधिक लम्बे तन्तु एक-दूसरे समान्तर स्थिति में आ जाते हैं और छोटे-छोटे तन्तु अलग हो जाते हैं। कारखानों में विशेष मशीनों द्वारा कंघी की जाती है जिससे तन्तु खींचकर सीधे धागे का रूप धारण कर लेते हैं। इन सीधे धागों (तन्तुओं) को (Top) टॉप कहते हैं। बहुधा टॉप तन्तुओं को ही रंग लिया जाता है परन्तु कई बार वर्सटेड कपड़ा बनाने के लिए पहले धागा बनाया जाता है फिर उसे रंगा जाता है।

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8. रंगाई तथा विरंजन (Dying and Bleaching): ऊनी कपड़ों को अम्लीय रंगों से रंग कर आकर्षक बनाया जाता है। यदि कपड़ा रंगना न हो तो उसे ब्लीच किया जाता है जिससे उसके पीलेपन को दूर किया जा सके। ऊन के तन्तुओं की विशेषताएँ (Properties of Wool Fibres) :

भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties) :
1. रचना एवं स्वरूप (Construction): ऊन के तन्तु कैरोटिन नामक प्रोटीन से बने होते हैं। तन्तु के बाहर के आवरण स्केल अर्थात् परतदार (Epidermal) कोशिकाओं के बने होते हैं – जो एक-दूसरे पर चढ़ी रहती हैं। परतदार कोशिकाओं के एक-दूसरे पर चढ़े हुए किनारे ही ऊन के रोएँ होते हैं। उत्तम किस्म की ऊन में यह रोएँ अधिक होते हैं।
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2. लम्बाई (Length)-भिन्न-भिन्न जाति के पशुओं से प्राप्त ऊन के रेशों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है। यहाँ तक कि भिन्न-भिन्न जाति के भेड़ों से प्राप्त ऊन के रेशों की लम्बाई भी भिन्न-भिन्न होती है। ऊन के रेशे जितने लम्बे होते हैं, उतने ही उत्तम कोटि के माने जाते हैं। सामान्यत: ऊन के रेशे 5 सेमी. से लेकर 35 सेमी. तक लम्बे हो सकते हैं। इसी प्रकार ऊन के तन्तुओं का व्यास भी 15 माइक्रोन से 40 माइक्रोन तक हो सकता है।

3. तन्तु की दृढ़ता (Rigidity of Fibres)-ऊनी तन्तु अन्य प्राकृतिक तन्तुओं से अधिक निर्बल होते हैं। लम्बे तन्तुओं की अपेक्षा छोटे तन्तु कमजोर होते हैं। गीली अवस्था में ऊनी तन्तु अपनी 10 से 15 प्रतिशत शक्ति खो देते हैं परन्तु सूखने पर उनकी शक्ति पुनः वापस आ जाती है।

4. लचीलापन (Flexibility)-ऊन का दीर्धीकरण (Elongation) लगभग 20 से 50 प्रतिशत तक होता है परन्तु गीली अवस्था में यह और भी बढ़ जाता है। ऊन का यह लचीलापन उसकी प्राकृतिक ऐंठन के कारण होता है। तन्तुओं की निर्बलता के कारण धुलाई करते समय ऊनी कपड़ों को अधिक दबाव नहीं देना चाहिए। ऊन के रेशे जितने अधिक बारीक एवं मजबूत होते हैं उनमें उतनी ही अधिक लचक पायी जाती है। यही कारण है कि उत्तम कोटि के ऊनी कपड़े सिकुड़ते नहीं और न ही बदशक्ल होते हैं। इसी लचक के कारण ऊनी कपड़ों को वस्त्रों का रूप देने में सरलता रहती है तथा अधिक टिकाऊ भी होते हैं।

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5.अवशोषकता-ऊनी रेशों में नमी सोखने की क्षमता अन्य तन्तुओं की अपेक्षा अधिक होती है। यही कारण है कि ऊनी कपड़े गीले हो जाने पर देर से सूखते हैं और यह वातावरण की नमी को भी शीघ्र सोख लेते हैं।

6. पुनरुत्थान-ऊनी रेशों में पुनरुत्थान का गुण अधिक होता है। यही कारण है कि ऊनी रेशों से बने वस्त्रों को जैसे भी पहना जाए वह अपनी मौलिक अवस्था में आ जाते हैं और इन पर इस्तरी की अधिक आवश्यकता नहीं होती है।

7.प्रत्यास्थता-ऊनी तन्तुओं को जब खींचते हैं तो वह बिना टूटे अपनी पूर्व लम्बाई से लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं और छोड़ने पर पुनः अपनी मौलिक अवस्था में आ जाते हैं। सभी प्राकृतिक तन्तुओं में ऊन के तन्तुओं में सबसे अधिक प्रत्यास्था होने के कारण ये शरीर पर फिट आ जाते हैं।

8. अपघर्षण प्रतिरोधकता-ऊनी तन्तु रगड़ सहन नहीं कर सकते हैं तथा रगड़ने पर कमजोर पड़ जाते हैं। चूँकि गीले ऊनी कपड़े की शक्ति क्षीण हो जाती है, अतः धोते समय इन्हें रगड़ना नहीं चाहिए। यही कारण है कि महंगे उत्तम किस्म के ऊनी कपड़ों को शुष्क धुलाई (ड्राईक्लीन) से धोया जाता है क्योंकि पानी से इनका आकार बिगड़ने का भय रहता है।

9.ताप की संवाहकता-ऊनी रेशे ताप के अच्छे संवाहक नहीं होते हैं। ऊनी रेशों में रिक्त स्थान होते हैं जिनमें वायु रहती है जो शरीर के ताप को बाहर नहीं निकलने देती है। यही कारण है कि सर्दियों में ऊनी वस्त्र पहनने से हमारा शरीर गर्म रहता है।

10. ताप का प्रभाव-प्रत्यक्ष ताप का ऊनी रेशों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और रेशे की बाहरी परत नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि ऊनी वस्त्रों को इस्तरी करते समय ऊन के ऊपर पतला सूती कपड़ा रखना चाहिए।

11. स्वच्छता-ऊनी रेशों की सतह खुरदरी होने के कारण उन पर धूल के कण आसानी से फंस जाते हैं जिन्हें प्रतिदिन नर्म ब्रुश से झाड़ कर साफ करना चाहिए अन्यथा यह गन्दगी कपड़े की सतह पर जमकर उसे खराब कर देती है।

धोते समय ऊनी कपड़ों को पानी में देर तक भिंगो कर नहीं रखना चाहिए क्योंकि पानी में भिंगोने से उनकी शक्ति कम हो जाती है और तन्तु खुरदरे हो जाते हैं। धोने के पश्चात् ऊनी कपड़ों को लटका कर सुखाना नहीं चाहिए क्योंकि इससे आकार खराब हो जाता है। यही कारण है कि ऊनी कपड़ों को धोते समय अतिरिक्त सावधानी रखी जाती है।

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12. धूप का प्रभाव-ऊनी कपड़ों को अधिक समय तक धूप के सम्मुख रखने से उनका रंग उड़ने लगता है तथा उनकी रासायनिक रचना में परिवर्तन आ जाता है जिससे उन्हें पुनः रंगना भी कठिन हो जाता है।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :
1. अम्ल का प्रभाव (Effect of acids)-ऊनी कपड़ों पर सान्धित अम्ल विशेषकर सल्फ्यूरिक अम्ल का हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इस अम्ल से ऊनी कपड़ा पूर्णत: नष्ट हो जाता है। हल्के अम्ल के घोलों का ऊनी वस्त्रों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।

2.क्षार का प्रभाव (Effect of alkalies)-सभी प्रकार के क्षारीय घोलों का ऊनी तन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सोडियम हाइड्रॉक्साइड के केवल पाँच प्रतिशत घोल में ऊनी तन्तुओं को देर तक रखने से वह शीघ्र घुल जाते हैं। यदि क्षार का घोल गर्म हो तो और भी विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। केवल अमोनिया तथा बोरेक्स जैसे क्षार का ऊन के तन्तुओं पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः ऊनी कपड़ों को धोने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है।

3. कार्बनिक घोलों का प्रभाव-ऊनी तन्तुओं पर कार्बनिक घोलों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। केवल हल्के ब्लीज जैसे हाइड्रोजनपरॉक्साइड का ही प्रयोग ऊनी तन्तुओं पर सुरक्षित रूप से किया जा सकता है।

4.जीवाणुओं का प्रभाव-साधारणतः ऊनी कपड़ों पर फफूंदी का प्रभाव नहीं पड़ता है परन्तु अधिक समय तक ऊनी कपड़े को नमी वाले स्थान पर रखा जाए तो उसमें फफूंदी लग जाती है।

5.कीड़ा लगना-ऊनी कपड़ों पर कीड़ा लगने का भय अधिक होता है। कीड़े ऊनी कपड़े को खाकर नष्ट कर देते हैं। ऊनी कपड़े में नमी होने पर कीड़ा शीघ्र लगता है। ऊनी कपड़ों को कीड़ों से बचाने के लिए समय-समय पर धूप लगाते रहना चाहिए तथा गर्मियों में इन्हें अखबार के कागज में लपेटकर रखना चाहिए। इनके अतिरिक्त नैपथलीन की गोलियों, सूखी नीम की पत्तियों आदि से भी ऊनी कपड़ों की रक्षा की जा सकती है।

6. समय का प्रभाव-यदि ऊनी वस्त्रों को गन्दा ही रख दिया जाए तो यह कमजोर पड़ जाते हैं और इनमें कीड़े भी लग जाते हैं, परन्तु ऊनी वस्त्रों को साफ करके उचित उपायों का पालन करके काफी समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

ऊनी वस्त्रों की उपयोगिता (Importance of Woollen cloth) :

  • ऊनी वस्त्र ताप के कुचालक होने के कारण सर्दियों में पहने जाते हैं। वर्टेड कपड़ा कोट, पैंट, आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है। ऊन से कम्बल, स्वेटर, जुराबें, टोपी आदि बनाई जाती हैं। ऊनी तन्तु को फैल्ट करके नमदा आदि बनाए जाते हैं।
  • ऊनी कपड़ों में सिलवटें नहीं पड़ती हैं।
  • ऊनी कपड़ा लचीला होने के कारण शरीर के आकार पर फिट हो जाता है।
  • ऊन के साथ टेरीलीन अथवा कॉटन मिलाकर मजबूत टेरीवूल (Terrywool) व काट्सवूल (Cotswool) बनाया जाता है।

प्रश्न 5.
मिश्रित तन्तु (Blended Fibres) किसे कहते हैं ? उनकी उपयोगिता दर्शाइए।
उत्तर:
मिश्रित तन्तु (Blended Fibres): हम जानते हैं कि विभिन्न प्रकार के तन्तुओं के गुण व दोष भी भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। ऐसा कोई भी तन्तु नहीं है जिससे बने धागे या कपड़े में सभी वांछित गुण विद्यमान हों। प्रत्येक व्यक्ति कपड़े में सभी गुणों जैसे सुन्दरता, टिकाऊपन, सिलवट मुक्त, धुलाई व रंगाई में आसानी तथा फफूंदी, कीड़ा आदि न लगने का समावेश चाहता है। इन सभी विशेष वाछित विशेषताओं का किसी एक तन्तु में पाया जाना असम्भव है तथा सभी तन्तुओं में कोई न कोई दोष भी होता है।

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वस्त्रोद्योग के विशेषज्ञ वर्षों से मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं के लिए वांछित गुणों वाले तथा दोषों से मुक्त कपड़े के उत्पादन के लिए प्रयास करते रहे हैं। इन प्रयासों के फलस्वरूप अब मिश्रित (Blended) धागे बनने लगे हैं। जब एक से अधिक प्रकार के तन्तुओं को मिला कर धागा तैयार करते हैं तो उन्हें मिश्रित धागा कहते हैं। प्रायः ऐसे दो तन्तुओं को मिश्रित किया जाता है जिनके द्वारा बनाए गए कपड़े में इन दोनों के मिश्रित गुणों का समावेश चाहते हैं।

अलग-अलग तन्तुओं के आकार-प्रकार एवं लम्बाई में भिन्नता होने के कारण मिश्रित तन्तुओं से बने धागों में समानता का अभाव होता है। यह कहीं से अधिक पतले तो कहीं से अधिक मोटे होते हैं, परन्तु विज्ञान की उन्नति से इस समस्या का समाधान भी हो गया है। आज बाजार में अनेक प्रकार के मिश्रित तन्तुओं से बने कपड़े मिलते हैं।

1. दो प्राकृतिक तन्तुओं के मिश्रण से मिश्रित तन्तु: कपास के तन्तु एवं ऊन के तन्तु को मिलाकर बने तन्तु जैसे काट्सवुल (Cotswool), रेशम के तन्तु एवं सूती तन्तु को मिला कर बने तन्तु-सिल्को (Silkco)।

2. एक प्राकृतिक तन्तु एवं एक कृत्रिम तन्तु के मिश्रण से बने मिश्रित तन्तु:

  • पॉलीएस्टर तन्तु टेरीलीन एवं सूत के तन्तुओं को मिलाकर बने टेरीकॉट (Terry Cot)
  • पॉलीएस्टर तन्तु टेरीलीन एवं रेशम के तन्तुओं को मिलाकर बने टेरीसिल्क (Terry Silk)
  • पॉलीएस्टर तन्तु टेरीलीन एवं ऊन के तन्तुओं को मिलाकर बने टेरीवुल (Terry Wool)

मिश्रित तन्तुओं से बने कपड़े आजकल बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि इनमें दोनों तन्तुओं के अच्छे गुणों का समावेश होता है जिससे कपड़ा अधिक सुविधाजनक एवं आकर्षक हो जाता है।

टेरीकॉट की बनी कमीजें शुद्ध टेरीलीन अथवा सूत की बनी कमीजों से अधिक टिकाऊ, आकर्षक एवं सुविधाजनक होती हैं क्योंकि इनमें टेरीलीन व सूत दोनों के अच्छे गुणों का समावेश होता है। शुद्ध ऊनी वस्त्रों को धोने में जहाँ बहुत अधिक सावधानी रखनी पड़ती है वहाँ टेरीवुल को आसानी से धोकर साफ किया जा सकता है।

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इसी प्रकार शुद्ध ऊनी कपड़े अधिक मजबूत नहीं होते हैं परन्तु जब उनमें टेरीलीन के तन्तु मिलाते हैं तो वह अधिक मजबूत हो जाते हैं। टेरीसिल्क से बने कपड़े सिल्क की चमक लिये हुए आकर्षक तो होते ही हैं, परन्तु सिल्क से कहीं अधिक मजबूत एवं टिकाऊ भी होते हैं। मिश्रित कपड़ा बनाने के लिए धागा तैयार करते समय दोनों प्रकार के तन्तुओं को एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है और इन रेशों के अनुपात के अनुसार ही तैयार वस्त्र के गुण निर्धारित होते हैं।

प्रश्न 6.
मानव निर्मित (Man-made fibres), नायलोन (Nylon) व टेरीलीन-पॉलिएस्टर रेशा (Terrylene-the Polyster fibre) की भौतिक, रासायनिक, तापीय, जैविक विशेषताएँ तथा प्रयोग व सावधानी विस्तार से लिखें।
उत्तर:
मानव निर्मित तन्तु (Man-made fibres):
नायलोन (Nylon)-यह सबसे पहला मानव-निर्मित रेशा है। डू-पोंट कम्पनी ने इसे 1927-29 ई. में खोज निकाला। यह एक पोलिअमाइड रेशा है। बुनी हौजरी के रूप में यह 1930 ई. से बाजार में बिकती है। सारे विश्व में नायलोन की हौजरी व जुराबें बहुत प्रसिद्ध हैं। पहले नायलोन को 6,6 कहा जाता था। नम्बरों का अर्थ था कि नायलोन बनाने के लिए दो रसायनों का प्रयोग किया गया है जिसमें प्रत्येक 6 कार्बनिक परमाणु हैं। नायलोन 6, 10 नायलोन ब्रश बनाने के काम आता है। भारत में केवल 6, 6 नायलोन का उत्पादन तथा प्रयोग होता है।

नायलोन बनाने के लिए प्रयोग में लाए गए दो यौगिकों के नाम हैं एडीपिक अम्ल और हेक्सामेथीलीन डायमीन। प्रेशर के साथ गर्म करने से इनमें पाए जाने वाले छोटे-छोटे कण परस्पर मिलकर लम्बे-लम्बे कतरों में बदल जाते हैं। इन कतरों को पिघलाकर पम्प के दबाव से स्पिन्नरैट के छिद्रों में से निकालते हैं तो महीन लम्बे रेशे बनते हैं जो हवा के सम्पर्क में आते ही सूख जाते हैं। पोलिमर छोटे-छोटे अणुओं को मिलाकर बनाया गया अणु होता है तथा इस प्रक्रिया को Polymerization कहते हैं।

भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties) :
1. सूक्ष्मदर्शी यन्त्र की सहायता से देखने पर ज्ञात होता है कि नायलोन के तन्तु गोलाकार, चमकदार, सीधे और चिकने होते हैं। इन तंतुओं में प्राकृतिक पारदर्शकता होती है। इनकी सहायता से पूर्ण पारदर्शक वस्त्र बनाए जा सकते हैं। नायलोन की राल में सफेद रंग लगाकर अपारदर्शी नायलोन तैयार करने का ही अधिक प्रचलन है।

2. नायलोन मानव-निर्मित तंतुओं में सबसे अधिक मजबूत होता है।

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3. गीले होने पर भी नायलोन के रेशे अपनी मजबूती व प्रत्यास्थता बनाए रखते हैं। अतः इन्हें धोने के समय विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं होती । पानी शीघ्र फैल जाता है तथा वाष्पीकरण में सहायक होता है।
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4. नायलोन के रेशे लम्बे व मजबूत होते हैं। उनमें दूसरे प्रकार के रेशों को काटने की शक्ति होती है। यह फन्दा डालने की कोशिश करते हैं परंतु कमजोर रेशों की तरह टूटते नहीं बल्कि तन जाते हैं। इसी कारण कुछ समय के बाद कपड़ों में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं।

5. नायलोन के कपड़ों पर पसीने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, हालाँकि रंग नष्ट हो जाते हैं।

तापीय विशेषताएँ (Thermal Properties) :
1. नायलोन आग की लपट में पिघल जाती है तथा लाल रंग की लेसदार राख बन जाती है जो ठंडे होने पर सख्त हो जाती है।
2. नायलोन को ऊष्मता के विरुद्ध बनाया जाता है। इसलिए हर प्रकार के नायलोन 140°C तक का तापमान काफी समय तक बिना किसी हानि के सह लेते हैं। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि इन्हें इस तापमान से अधिक तापमान पर न रखा जाए।
3. सूर्य की किरणें नायलोन को नष्ट कर देती हैं। अधिक देर तक सूर्य की किरणों में रखने से यह कमजोर हो जाते हैं तथा टूटने का खतरा बढ़ जाता है।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):
1. इस पर क्षार का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु प्रत्येक अम्ल का रेशों पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ता है।
2. ब्लीच व धब्बे मिटाने वाले रसायनों का नायलोन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता।

जैविक विशेषताएँ (Biological Properties) :
1. नायलोन के तंतुओं पर जीवाणुओं का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
2. अगर चीटियाँ या कॉकरोच कपड़े में फंस जाए तो वे इसे काटकर बाहर निकल जाएँगे।

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नायलोन का प्रयोग और सावधानी (Use and Care of Nylon): नायलोन को धोना व इसका रख-रखाव आसान है। यह ठंडे या गर्म पानी से धोया जा सकता है और तुरत ही सूख जाता है। ठंडे पानी में धोने से सिलवटें नहीं पड़ती। अगर दूसरे कपड़ों के साथ इसे धोया जाए तो नायलोन का यह स्वभाव होता है कि वह उनका रंग और मैल स्वयं ले ले। इस प्रकार कपड़े में मटमैलापन या पीलापन आ जाता है जो कठिनाई से दूर होता है, अत: तुरत धब्बे मिटाना आवश्यक है। यह वेशभूषा, पर्दो और रात के परिधान के लिए प्रयोग में लाया जाता है। दूसरे देशों के साथ मिलाकर इसका बहुमुखी प्रयोग किया जा सकता है।

टेरीलीन-पॉलिएस्टर रेशा (Terrylene-The Polyester Fibre): डू-पोंट की अनुसंधान संस्था में सबसे पहले इसकी खोज हुई। नायलोन की खोज का श्रेय डू-पोंट को जाता है। पॉलिएस्टर को ब्रिटेन स्थिति कैलिको प्रिंटर्स एसोसिएशन ने परिचित करवाया जिसकी सार्वजनिक सूचना 1946 में ही दी गई चूँकि उस समय द्वितीय महायुद्ध चल रहा था, डू-पोंट ने इसे. डेकरॉन नाम दिया जबकि इम्पीरिल केमिकल इण्डस्ट्रीज ICI ने इंगलैंड व यूरोप में इसे टेरीलीन कहा। पॉलिएस्टर का रख-रखाव आसान है और यह क्रीजरोधक है। अमेरिका में इसके कपड़े सबसे अधिक प्रयोग में लाये जाते हैं।

पॉलिएस्टर के अणु पॉलीमर हैं जो विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बनाए जाते हैं। इसके भार का लगभग 85% कार्बोक्सिलिक अम्ल होता है। तेज ताप पर प्रतिक्रिया कराकर पॉलीमर बनाए जाते हैं जिससे यन्त्रों द्वारा रिबन जैसी लम्बी-लम्बी पट्टियाँ बनाई जाती हैं। फिर इन पट्टियों के टुकड़े काटे जाते हैं जिन्हें पिघलाकर तथा स्पिन्नरैटों से निकाल कर तंतुओं का निर्माण किया जाता है। इन तंतुओं का भी अन्य तंतुओं की भाँति धागा बनाया जाता है जिससे अनेक प्रकार के सुंदर कपड़े बनाए जाते हैं।

(Physical Properties):

  • सूक्ष्मदर्शी यन्त्र की सहायता से देखने पर यह ज्ञात होता है कि इसके तन्तु नायलोन के तंतुओं के समान ही होते हैं। ये तन्तु चिकने, सीधे और चमकदार होते हैं।
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  • विभिन्न पॉलिएस्टर की अलग-अलग दृढ़ता होती है। कई रेशों की मजबूती नायलोन से भी अधिक होती है व अन्यों की रेयान की तरह कम । सूखी एवं गीली दोनों अवस्थाओं में मजबूती में कोई अंतर नहीं होता।
  • यह स्पर्श पर गर्म होता है।
  • यह ऐसा वस्त्र होता है जो पहनने पर न तो सिकुड़ता है न ही फैलता है। इसलिए ग्राहकों को यह शीघ्र ही पसंद आ जाता है।
  • पॉलिएस्टर के कपड़े की सूती कपड़ों से दो-चार गुना अधिक अपघर्षण प्रतिरोधकता होती है।
  • इन कपड़ों में स्थिर-विद्युत पैदा होती है।
  • इनकी अवशोषकता कम होती है। धब्बे सतह पर ही रहते हैं तथा शीघ्र ही धुल जाते हैं।
  • टेरीलीन में विकिंग प्रभाव होता है। विकिंग (wicking) का अर्थ है कि रेशा पहनने वाले के शरीर से नमी ले लेता है जो वाष्पीकरण के बाद त्वचा पर ठंडक का अहसास कराता है।

तापीय विशेषताएँ (Thermal Properties):

  • पॉलिएस्टर बंधक वाला काला धुआँ छोड़ते हुए जलता है।
  • इसे थोड़ी हल्की इस्त्री चाहिए ।
  • एक बार बैठने के बाद क्रीज व प्लेट अधिक देर तक टिक सकती है।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :

  • पॉलिएस्टर के तंतुओं पर हल्के क्षार का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
  • पॉलिएस्टर के तंतुओं पर अम्ल के हल्के घोल का कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन तीव्र धातु अम्ल व उच्च तापमान के फलस्वरूप इसके तन्तु नष्ट हो जाते हैं।
  • इन पर कार्बनिक घोलों, ब्लीच और धब्बे छुड़ाने वाले यौगिकों का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।
  • पॉलिएस्टर के कपड़ों को अधिक समय तक धूप में रखने से वे कमजोर हो जाते हैं। शीशे के पीछे से यह अच्छी प्रतिरोधकता रखता है, इसलिए पर्यों के लिए अच्छा कपड़ा है।

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जैविक विशेषताएँ (Biological Properties):सामान्यतः शुद्ध पॉलिएस्टर के तंतुओं पर जीवाणुओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इन पर कीड़ों का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

पॉलिएस्टर का प्रयोग और सावधानी (Use and Care of Polyester): इन वस्त्रों पर सिलवटें नहीं पड़ती जिससे इन पर इस्त्री करने की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए लोगों को यह बहुत पसन्द आते हैं। अम्ल, क्षार और कार्बनिक यौगिकों का भी कोई प्रभाव नहीं होता। अधिक मैले कपड़े को साफ करने के लिए विशेष परिश्रम भी नहीं करना पड़ता। धोने के बाद यह वस्त्र शीघ्र ही सूख जाता है।

पॉलिएस्टर का प्रयोग पर्दे, फर्नीचर तथा फर्श की सजावट के लिए किया जाता है। औद्योगिक वस्तुएँ, जैसे-रस्सियाँ, मछली पकड़ने का जाल, टायर, मशीनों के पट्टे आदि अपनी मजबूती भी पॉलिएस्टर से ही पाते हैं। बिना किसी हानि के पॉलिएस्टर की नाड़ियाँ बनाकर हृदय सर्जरी के काम में लाया जाता है। आधुनिक युग में बिना बुना हुआ पॉलिएस्टर टेरीलीन का छतों व चटाइयों में भी प्रयोग हो रहा है।
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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 16 समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 16 समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 16 समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन

Bihar Board Class 11 Home Science समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
द्वितीयक रंग (Secondry colour) होता है। [B.M.2009A]
(क) लाल-नीला-पीला
(ख) बैंगनी-हरा-केसरी
(ग) काला-सफेद-हरा
(घ) पीला केसरी-नीला-लाल केसरी
उत्तर:
(ख) बैंगनी-हरा-केसरी

प्रश्न 2.
कार्बन हमारे शरीर को – [B.M.2009A]
(क) टूट-फूट का निर्माण करता है
(ख) शक्ति प्रदान करता है
(ग) ऊर्जा प्रदान करता है।
(घ) उष्मा प्रदान करता है
उत्तर:
(ग) ऊर्जा प्रदान करता है।

प्रश्न 3.
ऊर्जा को पोषण विज्ञान में कैसे मापा जाता है ? [B.M.2009A]
(क) तराजू बाट में
(ख) धन में
(ग) कैलोरीज में
(घ) आय में
उत्तर:
(ग) कैलोरीज में

प्रश्न 4.
अवकाश काल में की जाने वाली क्रियाओं को भागों में बाँटा जा सकता है [B.M.2009A ]
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ख) तीन

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प्रश्न 5.
थकान प्रकार की होती है – [B.M.2009A]
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समय क्या है ?
उत्तर:
समय (Time) में भूत, वर्तमान व भविष्य सम्मिलित हैं। अपनी सुविधा के लिए मनुष्य ने उसे वर्ष, दिन, मिनट व क्षणों में विभाजित कर दिया है। समय को कई विधियों से मापा जाता है। पृथ्वी के अपनी धुरी पर परिक्रमा करने से, दोलक (Pendulum) के हिलने से मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए समय को वर्ष, महीने, सप्ताह व दिनों में विभाजित करके कैलेण्डर (Calendar) बना लिया है। समय के सही माप के लिए हाथ घड़ी का आविष्कार किया गया ।

प्रश्न 2.
समय व्यवस्था का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
समय व्यवस्था (Time management): कम-से-कम समय खर्च करके अधिक-से-अधिक कार्य सम्पन्न करना।

प्रश्न 3.
समय योजना को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
समय योजना (Time Plan): समय योजना एक अग्रिम योजना के रूप में परिभाषित की जाती है जिसमें दिए हुए समय में काम करने का कार्यक्रम बनाया जाता है।

प्रश्न 4.
समय व्यवस्था की प्रक्रिया के विभिन्न चरण कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
समय व्यवस्था (Step in time management) :

  • योजना बनाना (Planning)
  • क्रियान्वयन एवं नियन्त्रण (Implementation and controls)
  • मूल्यांकन (Evaluation)।

प्रश्न 5.
शक्ति क्या है?
उत्तर:
शक्ति (Energy) – गुडइयर, कलोर, ग्रैसवक़डल के अनुसार “शक्ति एक निहित या आन्तरिक शक्ति है तथा कार्य करने की क्षमता है।”

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प्रश्न 6.
अवकाश काल (Leisure Time) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
अपनी इच्छानुसार अपना मनपसंद कार्य करने में या विश्राम करने में बिताया गया समय अवकाश काल कहलाता है।

प्रश्न 7.
शक्ति की व्यवस्था से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
शक्ति की व्यवस्था (Energy Management): कम-से-कम शक्ति खर्च करके, बिना थकान महसूस किए, अधिक-से-अधिक कार्य सम्पन्न करना।

प्रश्न 8.
शक्ति की व्यवस्था करते समय किन-किन घटकों का अध्ययन रखना चाहिए?
उत्तर:

  • विभिन्न कार्यों के लिए अपेक्षित शक्ति।
  • थकान (Fatigue)।
  • कार्य सरलीकरण (Work simplification)।

प्रश्न 9.
थकान (Fatigue) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यदि कार्य करते समय कार्य क्षमता में कमी आ जाए या पहले की तरह कार्य करने का उत्साह न रहे तो इस अवस्था को थकान कहते हैं।

प्रश्न 10.
थकान (Fatigue) कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर:
थकान के प्रकार (Kinds of Fatigue):

  • शारीरिक थकान (Physiological Fatigue)।
  • मानसिक थकान (Psychological Fatigue)।

प्रश्न 11.
शारीरिक थकान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शारीरिक थकान (Physiological Fatigue) शारीरिक थकान वह शारीरिक शक्ति है जो कि पूर्व किए गए कार्य के कारण कार्यक्षमता को कम कर देती है।

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प्रश्न 12.
मानसिक थकान (Psychological Fatigue) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
मानसिक थकान (Psyshological Fatigue) एक मनोवैज्ञानिक शक्ति है, जिसमें कार्य करने की इच्छा नहीं होती, कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है, जबकि वास्तविक शारीरिक क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 13.
कार्य सरलीकरण से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
कार्य सरलीकरण (Work Simplification)-कार्य सरलीकरण अर्थात् कार्य करने का सबसे सरल, शीघ्र और आसान तरीका । कार्य करने की विधि में ऐसे परिवर्तनों को लाना . जिसमें कम से कम समय व ऊर्जा का व्यय करके अधिक से अधिक कार्य सम्पादित किया जा सके. कार्य सरलीकरण कहलाता है।

प्रश्न 14.
कार्य सरलीकरण के कौन-कौन-से तरीके हैं ?
उत्तर:
कार्य सरलीकरण के तरीके (Methods of work simplification) :
1. हाथ और शारीरिक गतिविधियों में परिवर्तन।
2. कार्य, संग्रहीकरण स्थान एवं उपकरणों में परिवर्तन।
3. तैयार उत्पादन में परिवर्तन, नए उत्पादों का प्रयोग।

प्रश्न 15.
घर में स्थान व्यवस्था करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:

  1. एकान्तता
  2. कमरों का पारस्परिक सम्बन्ध
  3. घूमने-फिरने की व्यवस्था
  4. कमरों का आकार
  5. उपलब्ध स्थान का उचित प्रयोग
  6. सघन लेकिन पर्याप्त कार्य समय
  7. स्वास्थ्यवर्धक।

प्रश्न 16.
सजावट का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
सजावट (Decoration): रंगों, साधनों तथा उपसाधनों की व्यवस्था इस प्रकार की जा , क कमरा आरामदायक, आकर्षक बने तथा मानसिक सन्तुष्टि दें।

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प्रश्न 17.
कला के सिद्धांत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
कला के सिद्धांत (Principles of Art):

  • अनुरूपता (Harmony)।
  • सन्तुलन (Balance)।
  • अनुपात (Proportion)।
  • लचर (Rhythm)

प्रश्न 18.
रंगों के कौन-कौन-से प्रकार हैं?
उत्तर:
रंगों के प्रकार (Kinds of Colours):

  • प्राथमिक रंग (Primary colour) ।
  • द्वितीयक रंग (Secondary colour)
  • मध्य रंग (Tertiary colour)

प्रश्न 19.
रंग योजनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • एकरंगीय योजना (Monochromatic colour)।
  • समदर्शी योजना ( Analogous colour scheme)
  • fausta 2175191 (Complementary colour scheme)
  • खंडित विपरीत योजना (Split complementary scheme)।

प्रश्न 20.
रीता अपना कार्य समय पर पूरा नहीं कर पाती । ऐसे दो उपाय बताएँ, जिससे वह समय आयोजन का लाभ उठाए।
उत्तर:
समय आयोजन के लाभ:

  • कार्य के प्रत्येक भाग को उपस्थित किया जाए।
  • कार्य को पूरा करें।
  • आराम के लिए समय।
  • कार्य सरलीकरण।
  • संतुष्ट होना।

प्रश्न 21.
कविता को एक बार में एक से ज्यादा कार्य करने में कठिनाई होती है ? उदाहरण के साथ बताइए कि वह कैसे कार्य करे ?
उत्तर:
एक ही समय में एक से अधिक कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं। जैसे-जब ओवन में केक, बिस्कुट आदि बन रहे हों तो उस समय कपड़े धोना, घर की सफाई करना आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समय व्यवस्था (Management of Time) पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
‘समय’ मानव जीवन की अमूल्य निधि है। बीता हुआ समय पुनः प्राप्त नहीं हो पाता, अतः सत्य ही है कि समय जीवन का निर्माता है, अतः इसे नष्ट नहीं करना चाहिए। व्यावसायिक कार्यों में ही नहीं अवकाश काल के लिए भी समय एक साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी साधन विकासशील हैं परन्तु समय नहीं।

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यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान ही है परन्तु फिर भी चौबीस के बीस घण्टे कर लेना (समय का पूर्ण उपयोग) तथा चौबीस के तीस घण्टे कर लेना (समय का अपव्यय) आज भी चरितार्थ है। इस समान मात्रा में प्राप्त साधन का प्रयोग करते हुए हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना पड़ता है। सोच-समझकर अथवा व्यवस्थित किया गया समय कठिन कार्यों को आसान बना देता है।

प्रश्न 2.
आयोजन तथा व्यवस्थापन (Planning and Management) में आपसी सम्बन्ध क्या है?
उत्तर:
इस चरण में लक्ष्य का स्पष्टीकरण होना आवश्यक है अर्थात् कार्य, विश्राम तथा. मनोरंजन में सामंजस्य बैठाना। समय आयोजन की आंशिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि इसके द्वारा व्यक्ति को अनेक व्यावहारिक समस्याओं के सम्बन्ध में पूर्व में विचार करने को बाध्य होना पड़ता है। इससे निर्णय न ले पाने की स्थिति समाप्त हो जाती है।

परिणामतः मस्तिष्क अन्य समस्याओं का हल करने तथा निरंतर उपस्थित होने वाले तनावों का सामना करने के लिए मुक्त रहता है। समय आयोजन करना सीखने से धीरे-धीरे विचारों का ढांचा बन जाता है जो आगे चलकर स्वतः ही कार्य करता है। उदाहरण के लिए प्रातः उठते ही शौचादि, स्नानादि करके भगवान का स्मरण करना। प्रारम्भ में कोई कार्य मात्र कार्य लगता है. पर बार-बार दोहराए जाने से वह ‘आदत’ बनकर दिनचर्या में स्वयं ही शामिल हो जाता है।

प्रश्न 3.
‘अवकाश काल’ (Leisure Time) किसे कहते हैं ? इसका क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
अपनी इच्छानुसार अपने मनपसन्द कार्यों को करने में बिताया गया समय अवकाश काल कहलाता है। यह विश्राम में बिताया हुआ समय भी हो सकता है। प्रतिदिन के व्यस्त जीवन में अवकाश काल बहुत महत्त्व रखता है। इस नीरस जीवन में कुछ सुखद व आनन्दपूर्ण क्षण अवकाश काल में ही प्राप्त हो सकते हैं जब व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार रुचि के कार्य कर पाए । इन क्रियाओं को करने में आनन्द की अनुभूति तो होती ही है, साथ ही थकान का अनुभव भी नहीं होता।

अवकाश काल में की जाने वाली कलात्मक, संग्रहात्मक एवं क्रियात्मक क्रियाएँ जीवन को विकसित करने में सहायता करती हैं। कई संग्रहात्मक क्रियाएँ जैसे सिक्के, टिकट, किताबें, चित्र आदि का संग्रह ज्ञान वृद्धि में सहायक है। विभिन्न प्रकार के खेल हमारे स्वास्थ्य के स्तर को सुधारने में सहायक हैं। कलात्मक क्रियाएँ जैसे संगीत सुनना, मूर्तियां बनाना, चित्र बनाना, नृत्यकला आदि मनोरंजन के साथ-साथ जीवन को सांस्कृतिक दृष्टि से विकसित करने में भी सहायक हैं। अतः व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास में अवकाश काल का विशेष स्थान है।

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प्रश्न 4.
शारीरिक थकान (Physical Fatigue) किसे कहते हैं ? शारीरिक थकान का कारण दें।
उत्तर:
निरन्तर शारीरिक कार्य करने के परिणामस्वरूप जो कार्यक्षमता की गति में कमी आ जाती है, उसे “शारीरिक थकान” कहते हैं। यह थकान शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तनों के कारण होती है। माँसपेशियाँ जो शारीरिक क्रियाएँ करने में प्रयुक्त होती हैं, अपनी ऊर्जा ग्लाईकोजिन से प्राप्त करती हैं। इस क्रिया में लैक्टिक अम्ल व कार्बन डाइऑक्साइड जैसे व्यर्थ पदार्थ अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं जो माँसपेशियों के क्रियाकलापों में अवरोध या बाधा उत्पन्न करते हैं।

इनकी रक्त में अधिकता से हम थकान का अनुभव करते हैं। परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पत्ति व ऊर्जा की माँग में असन्तुलन पैदा हो जाता है जिससे हम थकावट महसूस करना आरम्भ कर देते हैं। विश्राम करने पर ये व्यर्थ के पदार्थ निष्कासित हो जाते हैं और हम पुनः कार्य करने के योग्य हो जाते हैं, क्योंकि ऊर्जा उत्पत्ति नियम के अनुसार होने लगती है।

प्रश्न 5.
कार्य सरलीकरण (Work Simplification) से आप क्या समझती हैं ? कार्य सरलीकरण की कुछ विधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
कार्य करने की विधि में ऐसे परिवर्तनों को लाना जिससे कम-से-कम समय व ऊर्जा का व्यय करके अधिक-से-अधिक कार्य सम्पादित किए जा सकें, कार्य का सरलीकरण कहलाता है। कार्य को सरल करने की कुछ विधियाँ निम्नलिखित हैं :
1. हाथ तथा शारीरिक गतिविधियों में परिवर्तन लाकर (By hand & physical changes):
(क) अनावश्यक कदमों को रोक कर: नियोजिन रूप से सामान एक ही समय में एकत्रित कर लिया जाए जैसे ट्रे आदि का प्रयोग करके तो समय, शक्ति दोनों की बचत की जा सकती है।
(ख) कार्यों का क्रम निर्धारित करके (By numbering the work): एक ही प्रकार का कार्य करके जो गति प्राप्त हो जाती है, उसे तोड़ना नहीं चाहिए जैसे झाडू लगा कर फिर पोछा लगाना चाहिए।
(ग) कार्य में निपुणता (Efficiency in work): निपुणता हासिल करके समय तथा श्रम दोनों की बचत की जा सकती है।
(घ) उचित मुद्रा का प्रयोग करके (By using correct posture): लिखते समय सही मुद्रा रखने से पीठ व कमर की माँसपेशियों पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ेगा व थकान कम होगी।

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2. कार्य एवं भण्डारण स्थान और उपकरण में परिवर्तन लाकर (By making work, storage place & equipment changes):
(क) स्थान की ऊँचाई आरामदायक हो ताकि कन्धों और बाजुओं पर दबाव न पड़े।

(ख) बैठने के लिए स्टूल व कुर्सी आरामदायक हो जिससे आराम से बैठकर काम किया जा सके।

(ग) वस्तुओं पर लेबल लगा हो ताकि ढूंढने में समय व्यर्थ न जाए। कार्य करने का एक ढंग होता है और उस शारीरिक स्थिति में कार्य करने से कम ऊर्जा व्यय होती है। यदि किसी और स्थिति में कार्य किया जाए तो शारीरिक मांसपेशियों पर तनाव पड़ता है और ऊर्जा अधिक व्यय होने के साथ-साथ थकावट भी अधिक होती है। कुछ भारी चीज उठाते समय कमर से झुक कर उठाने की बजाय घुटनों को झुकाकर उठायी जाए तो थकान कम होती है।

(घ) कार्यकुशलता (Skill in work) किसी कार्य में कुशल होने पर उसके कार्य को करने में कम समय एवं कम ऊर्जा व्यय होती है। जैसे-जैसे कार्यकुशलता बढ़ती जाती है, गतिविधियाँ अधिक नियंत्रित एवं तेज हो जाती हैं, जिससे कार्य शीघ्र सम्पन्न हो जाता है। उपर्युक्त विधियों से कार्य को सरलीकृत किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
उत्प्रेरक या प्रेरणा से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
उत्प्रेरक या प्रेरणा (Motivation): जब कार्यकर्ता किसी कार्य को अनिच्छा से करता है अथवा जब उत्प्रेरण का स्तर निम्न होता है तो थकान शीघ्र अनुभव होने लगती है परन्तु जब यही स्तर उच्च होता है तब काफी मात्रा में शक्ति व्यय होने पर भी थकन दृष्टिगोचर नहीं होती। अतः उच्च स्तर का उत्प्रेरण अधिक शक्ति उपलब्ध कराता है। लक्ष्यों के स्पष्ट परिभाषित होने से कार्य रोचक तथा सरल हो जाते हैं तथा जिन लक्ष्यों को सरलता से प्राप्त किया जाए, वे कार्य को कम नीरस तथा उत्प्रेरक बना देते हैं।

प्रश्न 7.
शक्ति का व्यवस्थापन से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
शक्ति का व्यवस्थापन (Management of Energy): मानवीय शक्ति एक सीमित साधन होने पर भी इसका व्यवस्थापन समय की व्यवस्था अनुसार करना सरल तथा स्पष्ट नहीं है क्योंकि समय की उपलब्धता, मात्रा का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है जबकि शक्ति का नहीं । प्रत्येक व्यक्ति की कार्य शक्ति उसकी शारीरिक रचना तथा मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। गृहिणी को अपनी क्रियाओं की योजना इस प्रकार बनानी चाहिए कि उनमें प्रयुक्त होने वाली शक्ति का कम-से-कम व्यय हो ताकि अन्य कार्य-कलापों के लिए उसके पास पर्याप्त शक्ति शेष रहे।

शक्ति की व्यवस्था के निम्नलिखित प्रभावकारी कारक हैं –

  • परिवार का जीवन-चक्र।
  • विभिन्न क्रियाओं पर व्यय होने वाली शक्ति।
  • थकान-कारण तथा प्रकार।
  • व्यवस्थापक के मानवीय गुण-कुशलता, बुद्धिमत्ता, मानव-स्वभाव समझने की क्षमता, उत्साह ।

प्रश्न 8.
चित्र के द्वारा रसोई घर के विभिन्न आकार बताएँ ? [B.M. 2009A]
उत्तर:
(a) I : आई आकार
(b) 1 : एल आकार
(c) UN : यू आकार
(d) : स्ट्रेट आकार

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प्रश्न 9.
घरेलू गतिविधियों को लिखें ? [B.M.2009A]
उत्तर:
घरेलू गतिविधियाँ-घर में किए जाने वाले कार्यों की व्यवस्था करने पर सभी गृह कार्य सुचारु रूप से किए जा सकते हैं। हर कार्य का अपना स्थान होता है। जैसे-पकाने के लिए रसोई कक्ष, सोने के लिए शयन कक्ष इन सभी स्थानों को व्यस्थित करना अनिवार्य है।

प्रश्न 10.
एक अच्छे घर में घरेलू गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान निर्धारित करें।
उत्तर:
घरेलू गतिविधियाँ व उपयुक्त स्थान (Household Activities and Space Ailocation): एक अच्छे घर में सभी घरेलू गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान निर्धारित होना चाहिए। कुछ सामान्य गतिविधियाँ व उनके लिए स्थान निम्नलिखित तालिका में दिया गया है:

गतिविधियाँ (Activities):

  1. रसोई घर।
  2. खाना खाना
  3. अतिथियों का सत्कार
  4. मौज मस्ती-संगीत सुनना, टी.वी. खना
  5. पढ़ना
  6. सोना
  7. नहाना
  8. कपड़े धोना
  9. मल-मूत्र त्यागना

आवंटित स्थान (Space Allocation):

  1. खाना पकाना
  2. खाने का कमरा, रसोई घर या साथ में कोई लॉबी।
  3. गोल कमरा, बैठक, बरामदा या लॉन, बाग।
  4. गोल कमरा, बैठक, लॉबी, बरामदा, सोने का कमरा इत्यादि।
  5. पढ़ाई का कमरा, सोने का कमरा, बैठक, लॉबी, पिछला बरामदा, बाग इत्यादि।
  6. सोने का कमरा, लॉबी, बरामदा, गोल कमरे में सोफा या बेड पर।
  7. स्नान घर, पिछला बरामदा।
  8. स्नान घर, कोई भी स्थान जहां सुविधाएं उपलब्ध हों।
  9. शहरी घरों में संडास, सामुदायिक सुलभ शौचालय।

प्रश्न 11.
उत्पादन में परिवर्तन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
उत्पादन में परिवर्तन (Change in Product): कार्य के अन्तिम रूप में परिवर्तन लाकर समय एवं ऊर्जा पर हुए व्यय को कम किया जा सकता है। यह परिवर्तन परिवार को उपलब्ध सामान तथा पारिवारिक स्तर पर निर्भर करता है। इस परिवर्तन को लाने में गृहिणी की विशेष भूमिका है। वह अपनी बुद्धिमत्ता, मानव स्वभाव को समझने की क्षमता, जागरूकता आदि जैसे गुणों द्वारा परिवार में स्थित व्यर्थ के विचार हटा सकती है तथा नए और आधुनिक विचारों को स्वीकृत करा सकती है।

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अंतिम रूप या उत्पादनों में परिवर्तनों के उदाहरण –

  • सूती कपड़ों की अपेक्षा कृत्रिम कपड़ों के वस्त्रों का प्रयोग (क्योंकि इनका रख-रखाव अपेक्षाकृत बहुत आसान है।)
  • ताजी सब्जियों की अनुपलब्धि या उनके स्थान पर संरक्षित सब्जियों का प्रयोग (क्योंकि साफ करने तथा काटने का समय बचता है)
  • कपड़ों के रूमाल के स्थान पर कागज के रूमालों का प्रयोग (Napkins) (क्योंकि इससे उन्हें धोने का समय व खर्चा बचता है)
  • साबुत मसालों के स्थान पर पीसे मसालों की खरीद (क्योंकि पीसने के झंझट से मुक्ति मिल जाती है)
  • धातु के स्थान पर प्लास्टिक की बनी वस्तुओं का प्रयोग करना, जैसे-प्लेट, गिलास आदि। (क्योंकि इनका रख-रखाव आसान है)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि कच्ची वस्तुओं के प्रयोग अथवा उसी कच्ची वस्तु से विभिन्न वस्तुएँ उत्पादित करने अथवा कच्ची सामग्री और उत्पादित वस्तु दोनों में ही परिवर्तन करने से . कार्य का सरलीकरण किया जा सकता है।

प्रश्न 12.
रंगों के प्रयोग व प्रकार समझाइए।
उत्तर:
रंग चीजों को सुन्दर व आकर्षक तो बनाते ही हैं, इसके साथ-साथ रंगों का प्रभाव सार्वभौमिक भी रहता है। रंगों के शारीरिक प्रभाव की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक प्रभाव अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। रंगों के प्रभाव भिन्न-भिन्न होते हैं-सफेद रंग शान्ति तथा सन्तोष का प्रतीक है, लाल, नारंगी रंग उत्तेजित करते हैं, हरा रंग चंचलता को दर्शाता है, नीला रंग उदासीन तथा शीतल है। रंगों का सही उपयोग करना भी एक कला है। रंगों का प्रयोग करने से पहले उनके बारे में कुछ जानकारी होना आवश्यक है।

रंगों के प्रकार (Kinds of Colour):
रंग मुख्यतः तीन प्रकार के हैं –

  • प्राथमिक रंग (Primary Colour)।
  • द्वितीयक रंग (Secondary Colour)।
  • मध्य रंग (Tertiary Colour)।

प्राथमिक रंग – लाल, पीला तथा नीला प्राथमिक रंग हैं।
द्वितीयक रंग – दो प्राथमिक रंगों को समान अनुपात में मिलाने से एक द्वितीयक रंग बनता हैं। जैसे – लाल + पीला = नारंगी, पीला + नीला = हरा, लाल + नीला = बैंगनी।
मध्य रंग – एक द्वितीयक रंग तथा एक प्राथमिक रंग को मिला कर मध्य रंग बनता है। जैसे – पीला + नारंगी = पीला नारंगी, पीला + नीला = पीला नीला, लाल + नारंगी = लाल नारंगी, लाल + बैंगनी = लाल बैंगनी, पीला + हरा = पीला हरा, नीला + बैंगनी = नीला बैंगनी
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1.
समय व्यवस्थापन (Time Management) के विभिन्न चरण लिखें।
उत्तर:
एक परिवार की आवश्यकता के अनुकूल व्यावहारिक समय एवं क्रिया का निर्माण करना चाहिए। किन्हीं दो परिवारों की परिस्थितियाँ एक-सी नहीं होतीं। कुछ गृहिणियाँ जैसे किसान व डॉक्टर की पत्नियों को अपने पति के व्यवसाय की दृष्टि से समय व क्रियाओं का आयोजन करना होगा। अप्रत्याशित अवरोधों या आकस्मिक घटनाओं के लिए दैनिक समय-सारणी में पहले से ही कछ समय का आयोजन करना चाहिए।

1. विभिन्न कार्यों की सूची बनाना (Listing different activities):
गृहिणी को सर्वप्रथम सभी कार्यों की सूची बना लेनी चाहिए तथा परिवार की सहायता से उनका विभाजन निम्न रूप से कर लेना चाहिए :

(i) दैनिक कार्य-जैसे-भोजन बनाना, दोपहर का भोजन, शाम की चाय तथा रात्रि का भोजन, बच्चों की देख-रेख करना, घर की सफाई, बिस्तर लगाना, बर्तन साफ करना, नौकरी पर जाना, विश्राम करना आदि।

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(ii) साप्ताहिक एवं विशेष कार्य-जैसे-कपड़े धोना, कपड़े प्रेस करना, गलीचा आदि साफ करना, बाजार से सामान खरीदना, खिड़कियों, दरवाजे आदि की सफाई करना आदि। सिक एवं सामयिक कार्य-जैसे-आटा पिसवाना. कपडे सिलाना. छटिटयों के लिए तैयारी करना, किसी पार्टी आदि के लिए तैयारी करना, अचार बनाना, स्क्वैश आदि बनाना, मौसम के कपड़े सम्भाल कर रखना आदि। यदि सभी कार्यों को दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक कार्यों में विभाजित करके सूची बना ली जाए तो सभी कार्य सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाते हैं और जल्दबाजी में कोई भी काम छूटने की आशंका नहीं रहती है।

2. प्रतिदिन के कार्यों एवं समय की मूल योजना बनाना-दूसरे चरण में प्रतिदिन के कार्यों एवं उसमें व्यय होने वाले समय की मूल योजना बनायी जाती है। इस योजना के लिए सबसे पहले वह कार्य लिये जाते हैं जो प्रतिदिन अवश्य करने होते हैं तथा जिन्हें सम्पन्न करने के लिए निश्चित समय का ज्ञान होता है। इस प्रकार दूसरे चरण में समय एवं कार्य योजना का ढाँचा तैयार हो जाता है जिसके आधार पर पूरी योजना बनाई जा सकती है।

प्रतिदिन के आवश्यक कार्य जैसे भोजन बनाना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना और स्कूल भेजना, घर की दैनिक सफाई आदि आते हैं। इस मूल योजना में सुबह तथा दोपहर को खाली समय छोड़ा जाता है तथा इस समय में साप्ताहिक कार्यों को सम्पन्न किया जाता है। एक दैनिक मूल समय-योजना का उदाहरण निम्नलिखित तालिका में दिया गया है –

दैनिक मूलं समय-योजना (Daily Basic Time Plan):
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समय-योजना बनाते समय यह ध्यान भी अवश्य रखना चाहिए कि कौन-सा कार्य किस समय पर करना उचित रहेगा तथा सामान्यतः उसमें कितना समय लगेगा। दैनिक समय योजना में जो काम जिस परिवार के सदस्य को सौंपा हो, उसको घर में उपस्थिति का ध्यान रखना चाहिए। कुछ कार्य जो निश्चित समय पर ही किए जाते हैं, जैसे बच्चों का स्कूल जाना, ऑफिस आदि के लिए निश्चित समय ही प्रयुक्त करना चाहिए।

प्रत्येक परिवार की समय-योजना में काफी अन्तर पाया जाता है। यदि गृहिणी नौकरी भी करती हो तो उसकी दैनिक समय-योजना बिल्कुल भिन्न हो जाएगी। अतः प्रत्येक गृहिणी को अपने दैनिक कार्यों, परिवार के सदस्यों की आवश्यकता एवं सहयोग को ध्यान में रखते हुए ही दैनिक मूल समय-योजना बनानी चाहिए।

3. साप्ताहिक योजना बनाना (Weekly Time Plan): इस साप्ताहिक योजना में सप्ताह के कार्यों, विशेष कार्य तथा सामाजिक कार्यों के लिए समय निश्चित किया जाता है। इस योजना का निर्माण करते समय गृहिणी को घरेलू आवश्यकताओं, कार्य करने की आदतों एवं परिवार के सदस्यों के खाली समय का ध्यान रखना चाहिए। निम्नलिखित तालिका में एक साप्ताहिक योजना का उदाहरण दिया गया है –

साप्ताहिक समय योजना (Weekly Time Plan):
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4. समय-योजना के चौथे चरण में इस बात का निर्णय लिया जाता है कि कौन-सा कार्य कौन-सा सदस्य पूर्ण करेगा। यह निर्णय लेते समय परिवार के सभी सदस्यों से विचार-विनिमय करना चाहिए तथा उस व्यक्ति विशेष के समय, भोजन का भी ध्यान रखना चाहिए। परिवार के विभिन्न सदस्यों में कार्य बाँटते समय तथा उचित समय के उपयोग के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

1. परिवार के सदस्यों के पास उपलब्ध समय तथा वह अपना कितना समय कार्यों के प्रति प्रयोग कर सकता है।

2. परिवार के सदस्यों की विशेष रुचियों को ध्यान में रखते हुए कार्यों को सौंपना चाहिए क्योंकि रुचि होने पर कार्य सफलतापूर्वक समय पर सम्पन्न किए जा सकते हैं। यदि रुचियों के अनुरूप कामों को न सौंपा जाए तो कार्य पूर्ण होने में कई प्रकार की रुकावटें होती हैं।

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3. एक प्रकार के तथा एक साथ किए जाने वाले कार्यों को सदैव एक ही परिवार के सदस्य को सौंपना चाहिए जैसे बाजार से विभिन्न वस्तुएँ खरीदना आदि।

4. एक समय में एक से अधिक कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं। जैसे जब ओवन में केक, बिस्कुट आदि बन रहे हों तो उस समय कपड़े धोना, घर की सफाई आदि।

5. समय बचाऊ उपकरणों जैसे प्रेशर कूकर, मिक्सी आदि का प्रयोग करना चाहिए।

6. प्रतिदिन प्रयोग में आने वाली वस्तुओं को उचित स्थान एवं चालू हालत में रखना चाहिए जैसे चाकू एक छोटी-सी चीज है यदि इसे उचित स्थान पर न रखा जाए तो उसे ढूँढने में काफी समय लग जाता है। इसी प्रकार यदि चाकू का हत्था टूटा हो या उसकी धार तेज न हो तो सब्जियाँ, फल आदि ‘ को काटने में सामान्य से बहुत अधिक समय लगता है।

7. दैनिक उपयोग की वस्तुओं को प्रतिदिन खरीद कर लाने के स्थान पर इकट्ठा खरीदना चाहिए जिससे प्रतिदिन उन्हें खरीद कर इकट्ठा करने की आवश्यकता न पड़े और व्यर्थ ही समय नष्ट न हो।

8. कार्य करने की विधि से पूर्णतया परिचित होने पर काम कम समय में ठीक प्रकार से सम्पन्न हो जाता है तथा समय का अपव्यय नहीं होता है।

9.  प्रत्येक कार्य को एकाग्रचित होकर कुशलतापूर्वक करना चाहिए। ऐसा करने से काम कम समय में उचित रूप से सम्पन्न हो जाता है। किसी भी कार्य को पूरी सूझ-बूझ एवं पूर्व अनुभवों के आधार पर करने से भी समय की बचत होती है। जैसे खाना परोसते समय ट्रे का प्रयोग करना आदि।

10. समय-योजना लचीली होनी चाहिए जिससे आवश्यकता एवं परिस्थितियों के अनुरूप उसे बदला जा सके। यदि समय तालिका में लचीलापन नहीं होगा तो उसका सफल होना कठिन है।

11. समय योजना बनाते समय अन्य गृहिणियों की समय योजनाओं को देखकर लाभ उठाना चाहिए या फिर विभिन्न गृहिणियों के समय उपयोग पर हुए अध्ययनों का लाभ उठाना चाहिए।

5. मूल्यांकन (Evaluation):
समय की योजना का सप्ताह के अन्त में मूल्यांकन करना भी अति आवश्यक है। इसके लिए यह देखना चाहिए कि सभी कार्य समय योजना के अनुरूप सम्पन्न हुए अथवा नहीं। समय-योजना का मूल्यांकन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है –

  • क्या पत्येक कार्य समय-योजना के प्रस्तावित समय में पूर्ण हो सका।
  • यदि नहीं, तो प्रत्येक कार्य पूर्ण करने के लिए कितना समय लगा? इस अतिरिक्त समय का अगली योजना बनाते समय पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।
  • क्या परिवार के सभी सदस्यों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हा सका? अथवा नहीं। यदि नहीं तो क्या कारण थे ?
  • क्या गृहिणी को विश्राम, मनोरंजन आदि के लिए पर्याप्त समय मिला अथवा नहीं। यदि नहीं तो क्या कारण थे ?
  • क्या अवकाश के समय का पूर्ण उपयोग हो सका ?
  • अगली समय-योजना में क्या-क्या परिवर्तन लाने आवश्यक हैं ? क्या पारिवारिक लक्ष्यों की पूर्ति हो सकी अथवा नहीं?

प्रश्न 2.
अवकाश काल (Leisure Time) पर एक लेख लिखें।
उत्तर:
अवकाश की श्रेणी में वह समय आता है जो न तो कार्य में प्रयुक्त होता है, न विश्राम में। मुख्यतः अवकाश का उपयोग मनोरंजन के लिए होता है। हर व्यक्ति को अवकाश काल बिताने का अपना एक अलग ढंग होता है। अवकाश काल के सदुपयोग के विभिन्न साधन हैं –
(अ) घर में बैठकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ (Indoor Activities)।
(ब) घर के बाहर जाकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ (Outdoor Activities)।

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(अ) घर में बैठकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ-इसके अन्तर्गत क्रियात्मक क्रियाएँ, संग्रहात्मक क्रियाएँ एवं कलात्मक क्रियाएँ आती हैं। जैसे

  • सामाजिकता (Sociability): इसमें सम्भाषण, मित्रों से मिलना व उन्हें घर बुलाना, समय परिवार के साथ बिताना और समाज की गतिविधियों में भाग लेना है।
  • संस्थाओं की सदस्यता (Association): इनके अन्तर्गत विभिन्न संस्थाओं, जैसे-क्लब आदि में जाना।
  • स्थिरता (Immobility): इसके अन्तर्गत सिलाई, कढ़ाई, पढ़ना-लिखना, टेलीविजन देखना. रेडियो सुनना, बागवानी आदि हैं।
  • संग्रहात्मक क्रियाएँ: इसके अन्तर्गत सिक्कों, टिकटों, किताबों, चित्रों, ग्रन्थों आदि का संग्रह सम्मिलित हैं।
  • कलात्मक क्रियाएँ (Arts): मूर्ति बनाना आदि।
  • खेल (Game): दर्शक के रूप में विभिन्न खेल देखना, ताश खेलना आदि।

(ब) घर से बाहर जाकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ:
1. खेल (Games and Sports): स्वयं कोई खेल जैसे टेबिल टेनिस, बैडमिण्टन आदि खेलना।
2. कला (Arts): इसके अन्तर्गत संगीत, नाटक, नृत्य साहित्य, छायांकन (Photography) आदि में अभिरुचि सम्मिलित हैं।
3. गतिशीलता (Mobility): इस वर्ग में कार या बस में सफर, बाजार में वस्तुएँ क्रय करना, टहलना, नाव में सैर करना आदि आते हैं।
आदर्श रूप में अवकाश एक उपहार स्वरूप है जिसका उपयोग हर व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने, ज्ञान अर्जित करने तथा स्वयं में निरन्तर सुधार करने के लिए करना चाहिए।

प्रश्न 3.
गृह कार्य में लगने वाले श्रम का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
सभी गृह कार्यों में श्रम करना पड़ता है। यह श्रम मुख्यतः दो प्रकार का होता है –
1. शारीरिक और
2. मानसिक।
व्यावसायिक जीवन में दोनों पूर्णतः भिन्न नहीं हैं। अधिकांश शारीरिक क्रियाओं में भी थोड़ा सोचना पड़ता है।

1. शारीरिक कार्य कई प्रकार के होते हैं। कुछ में हाथों की अधिक आवश्यकता होती है तो कुछ में धड़ की आवश्यकता होती है। कुछ में पैरों की आवश्यकता होती है। वस्तुओं को पकड़ने, उठाने, खिसकाने. खींचने या एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखने में हाथों की विशेष आवश्यकता होती है। बैठने-झुकने, मुड़ने, उठने आदि में शरीर के मध्य भाग का अधिक उपयोग होता है। खड़े होने, चलने-फिरने आदि में पैरों का अधिक उपयोग होता है।

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2. मानसिक श्रम भी गृहिणी के दैनिक जीवन का अंग है। उसे विभिन्न प्रकार के निर्णय लेने होते हैं। साधनों का समुचित व्यवस्थापन करना होता है। भविष्य के लिए योजनाएँ बनानी होती हैं। इन सभी मानसिक क्रियाओं में शक्ति का व्यय होता है परन्तु शारीरिक क्रियाओं से कम।

माँसपेशीय क्रियाओं की विभिन्न दशाओं में प्रति घण्टा शक्ति व्यय –
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प्रश्न 4.
संक्षेप में गृह कार्यों पर उपयोग की गई शक्ति के विषय में लिखें।
उत्तर:
गृह कार्यों को तीन भागों में विभाजित किया गया है :
1. हल्के कार्य (Light Work): इस वर्ग के अन्तर्गत मुख्यत: वही कार्य सम्मिलित किए जाते हैं जिन्हें करते समय खड़ा नहीं होना पड़ता, जैसे हाथ तथा मशीन द्वारा बुनाई करना, रफू करना, सिलाई करना आदि।
2. साधारण कार्य (Normal Work): इसके अन्तर्गत शिशु को वस्त्र पहनाना, प्लेट धोना, तौलिये पर इस्त्री करना, पैर की मशीन से सिलाई करना जैसे कार्य आते हैं।

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3. श्रमशील कार्य (Heavy Work): इन कार्यों को सम्पन्न करने के लिए अधिक शक्ति. की आवश्यकता होती है। इसके अन्तर्गत कपड़े धोना, फर्श झाड़ना आदि कार्य आते हैं।
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हमेशा उचित व्यवस्था (Posture) में बैठकर या खड़े होकर कार्य करने से कम शक्ति व्यय होती है। इसके विपरीत कार्य हल्का होने पर भी यदि शारीरिक अवस्था उचित न हो तो शक्ति व्यय बहुत अधिक होती है। उचित व्यवस्था के लिए कुशल गृहणी को कार्यों का विभाजन इस प्रकार करना चाहिए कि प्रतिदिन शक्ति वाले कार्यों में संतुलन रहे। यदि एक ही दिन में सभी अधिक शक्ति वाले कार्य किए जाएँ तो थकान हो जाती है तथा कार्य भी भली प्रकार से सम्पन्न नहीं होते हैं।

श्रम के अनुसार कार्य का वर्गीकरण (Classification of work according to energy spent):
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प्रश्न 5.
थकान के विभिन्न स्वरूप कौन-कौन-से हैं ? गृहिणी की कार्य-क्षमता पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?
अथवा,
मानसिक थकान कम करने के छः तरीके विस्तारपूर्वक सुझाएँ।
उत्तर:
जब हम कोई कार्य करते हैं तब कछ समय बाद ऐसी स्थिति आ जाती है कि कार्य करने की क्षमता कम होती जाती है और शरीर शिथिल हो जाता है और कम काम कर पाते हैं इस अवस्था को थकान कहते हैं। “निरन्तर कार्य करने के परिणामस्वरूप कुशलता में कमी या मानसिक रूप से ऊब जाना या दोनों के होने को थकान कहते हैं।”

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थकान के लक्षण (Symptoms of fatigue):

  • शरीर में सुस्ती, आलस्य और शिथिलता आ जाती है।
  • मन किसी भी कार्य को करने में एकाग्र नहीं होता।
  • सरल कार्य में भी गलती अधिक होती है, समय ज्यादा लगता है।
  • नींद एवं जम्हाई आने लगती है।
  • कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है।

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1. शारीरिक थकान (Physiological Fatigue): जब शरीर की पेशियाँ कार्य करती हैं तब शरीर ईंधन का उपयोग करता है तथा शक्ति को निकालता है। पेशियों में शक्ति-उत्पादन करने वाला पदार्थ ग्लाइकोजीन होता है। ग्लाइकोजीन का निर्माण कला द्वारा लाई गई शर्करा से पेशीय तन्तुओं द्वारा होता है। पेशीय कार्यों में ग्लाइकोजीन रक्त प्रवाह में विद्यमान ऑक्सीजन से संयोग करके शक्ति को निष्क्रमित करता है तथा लैक्टिक अम्ल एवं कार्बन डाइ-आक्साइड नामक निरर्थक पदार्थों का उत्पादन करता है। ये दोनों पदार्थ निरन्तर पेशीय क्रिया-कलापों में अवरोध उत्पन्न करते हैं। किसी भी कार्य को करने के पश्चात् पुनः शक्ति प्राप्त करना अथवा लैक्टिक अम्ल एवं कार्बन डाइ-आक्साइड को माँसपेशियों से निकालना नितान्त आवश्यक है।

इस प्रक्रिया में रक्त-प्रवाह कार्बन डाइऑक्साइड को फेफडे में ले जाते हैं जहाँ इसे निष्कासित किया जाता है। रक्त माँसपेशियों में ऑक्सीजन ले जाता है तथा ऑक्सीजन और ग्लाइकोजिन के पुनः परिवर्तन की प्रक्रिया के द्वारा लैक्टिक अम्ल भी निष्कासित कर दिया जाता है। इस प्रकार ऑक्सीजन लैक्टिक अम्ल को माँसपेशियों से हटाने में योग देकर थकान को रोकने में सहायता प्रदान करता है।

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अधिक थका देने वाले कार्य में लैक्टिक अम्ल अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है जिसे दूर करने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन शीघ्र उत्पन्न नहीं किया जा सकता और इस तरह थकान बढ़ जाती है जिसे पूरा करने के लिए विश्राम करना आवश्यक हो जाता है। गृहिणी में काम करने की शक्ति सुबह के प्रथम चरण में अधिक रहती है। जैसे-जैसे काम करने में थकान बढ़ती है, वैसे-वैसे उसमें कार्यक्षमता कम होती जाती है।
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2. मानसिक थकान (Psychological Fatigue): शारीरिक थकान की भाँति मानसिक थकान से भी कार्य क्षमता कम हो जाती है और कार्य के प्रति अरुचि हो जाती है।
वार्टले के अनुसार “थकान या थकावट एक व्यक्ति की उस परिस्थिति के प्रति संपूर्ण प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसका वह जाने या अनजाने में मूल्यांकन करता है।” मानसिक थकान दो प्रकार की होती है –
(अ) नीरस थकान (Boredom fatigue)।
(ब) कुंठाजन्य थकान (Frustration fatigue)।

(अ) नीरस थकान (Boredom fatigue): एक लम्बी अवधि तक कार्य करने के उपरान्त काम के प्रति अरुचि महसूस करते हैं। इस थकान के बाहरी लक्षण हैं-जम्हाई आना, बेचैनी और कार्य को छोड़ देने की इच्छा। कार्य के प्रति उत्साह समाप्त हो जाता है। कार्य में परिवर्तन अनिवार्य है। एक कार्य अरुचिकर या नीरस हो जाने पर दूसरे कार्य को प्रारंभ करने से थकान दूर हो जाती है।

(ब) कुंठाजन्य थकान (Frustration fatigue): कुण्ठा निराशा का ही एक रूप है। इसे व्यक्ति तब अनुभव करता है जब किसी स्थिति को ठीक से नियन्त्रित नहीं कर पाता । उस स्थिति के समक्ष वह स्वयं को अक्षम अनुभव करता है। तब वह खीज और चिड़चिड़ाहट महसूस करने लगता है। वह पलायन तो करना चाहता है परन्तु कर नहीं पाता।

तब वह मानसिक तनाव महसूस करने लगता है। तनाव कुछ अवधि के लिए बना रहता है तो वह थकान महसूस करता है। कुण्ठाजन्य थकान नीरस थकान से इस रूप में भिन्न है कि कुण्ठित व्यक्ति स्वयं का दोष महसूस करता है जबकि नीरस थकान अनुभव करने वाला व्यक्ति बाहरी वातावरण को अपनी अरुचि के लिए दोषी मानता है।

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वट कम करने के साधन (Ways of Reducing Fatigue) :
1. विश्राम काल (Rest Periods): दिन में कार्य करने की अवधि में विश्राम करने से थकान दूर हो जाती है तथा कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। एक व्यक्ति को दिन में कितनी देर तक तथा कितनी बार विश्राम करने की आवश्यकता होती है। उसके कार्य की प्रकृति तथा व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता निर्धारित करती है। गृहिणी अनेक प्रकार के कार्य करती है। उसके लिए विश्राम की अवधि कितनी हो, यह उसके स्वास्थ्य व उसकी शक्ति की मात्रा पर निर्भर करती है। कुछ गृहिणियाँ कार्य-परिवर्तन में ही विश्राम कर लेती हैं।

2. प्रोत्साहन का महत्त्व (Role of Motivation): जब कोई व्यक्ति किसी कार्य को पसन्द नहीं करता या उत्प्रेरकों की कमी रहती है तब थकान शीघ्र उत्पन्न हो जाती है। यदि कार्य कार्यकर्ता की रुचि का होता है तथा उसे करने में अगर प्रेरणा मिलती है तब थकान शीघ्र उत्पन्न नहीं होती। ऐसे कार्य तो लगातार अधिक समय तक भी बिना थकान उत्पन्न हुए किये जा सकते हैं। ऐसे लक्ष्य या कार्य जो आसानी से पूरे हो जाते हैं या प्राप्त हो जाते हैं कार्य की नीरसता को दर करते हैं तथा उत्प्रेरक का काम करते हैं।

किसी कार्य को करने में बाधा या अवरोध उत्पन्न होने से सम्पूर्ण कार्य अव्यवस्थित हो जाता है और थकान अनुभव होने लगती है। फलस्वरूप कार्यकर्ता में कण्ठाजन्य थकान होने लगती है। काम की नीरसता तथा शारीरिक तनाव के कारण जो थकान उत्पन्न होती है, वह थोड़ी-सी उत्तेजना-यथा मित्रों से बातचीत. सिनेमा देखना. पिकनिक या कार्य में परिवर्तन-से समाप्त हो ज है। यदि कार्य की पूर्ति के पश्चात् व्यक्ति की प्रशंसा कर दी जाए तो वह भी प्रोत्साहन का कार्य करती है और मानसिक थकान को कम करती है।

3. कार्य करने की उचित सुविधाएँ (Good working condition): अध्ययनों द्वारा ज्ञात हुआ है कि यदि कार्य करने के लिए उचित सुविधाएँ प्रयुक्त की जाएँ तो दोनों शारीरिक एवं मानसिक थकान कम होंगी। ये उचित सुविधाएँ निम्नलिखित हैं:

  • कार्य करने के लिए उचितं रोशनी का होना आवश्यक है।
  • कार्य स्थल खुला और हवादार होना चाहिए।
  • श्रम तथा समय बचाऊ उपयोगी यन्त्रों का प्रयोग करना चाहिए।
  • खड़े होकर कार्य करने के लिए कार्यकर्ता की लम्बाई के अनुरूप ऊँची मेज या फट्टा होना चाहिए। अधिक ऊँचे या नीचे मेज पर कार्य करने में थकान अधिक होती है।
  • घर का सारा सामान निश्चित जगह पर व्यवस्थित ढंग से रखा होना चाहिए जिससे आवश्यकता पड़ने पर आसानी से मिल जाए और समय तथा शक्ति का अपव्यय न हो।
  • कार्य करने के लिए यन्त्र या उपकरण ऐसे होने चाहिए जिससे शरीर को सामान्य स्थिति में ही रखा जाए। अधिक झुककर या उचककर कार्य करने से थकान अधिक होती है। उदाहरण के लिए घर की सफाई करते समय लम्बे झाडू का प्रयोग करना चाहिए तथा पोंछा लगाने के लिए लम्बे डंडे का प्रयोग उचित रहता है।

4. कार्य करने का उचित ढंग (Proper way of doing work): कार्य सदैव उचित ढंग से ही करना चाहिए जिससे उसे करते समय अनावश्यक क्रियाओं को दूर किया जा सके तथा थकावट भी कम की जा सके। बैठकर खाना बनाने से थकावट अधिक होती है। खड़े होकर खाना बनाने से थकावट कम होती है, अतः खाना बनाने का उचित ढंग खड़े होकर खाना बनाना है।

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5. कार्य करने की सही मुद्रा (Good working posture): कार्य करते समय कार्यकर्ता को शरीर की मुद्रा सही रखनी चाहिए। बैठने या खड़े होने की मुद्रा ऐसी होनी चाहिए जिससे मांसेपशियों पर अधिक जोर न पड़े और थकान कम हो। कार्य करने की सतह अधिक ऊँची या नीची होने पर, उन पर कार्य करते समय माँसपेशियों का खिंचाव होता है, जिससे थकान अधिक होती है।

6. कार्य करने का उचित क्रम (Right sequence of work): कार्य करने के उचित क्रम को अपनाना चाहिए जिससे थकान कम हो। उचित क्रम के लिए एक से कार्य एक समय में करने चाहिए। जैसे घर की सफाई करते समय पहले सारे घर को झाड़ लिया जाए फिर झाडू लगानी चाहिए तथा फिर पोंछा लगाना चाहिए। यदि पहले एक कमरे में झाडू और पोंछा लगाया। और फिर दूसरे कमरे में झाडू और पोंछा लगाया जाए तो बार-बार झाडू और पोंछा को बदलने के कारण श्रम और समय दोनों ही अधिक लगते हैं।

7. कार्यकुशलता (Work Skill): किसी कार्य में जब गृहिणी प्रवीण होती है तो उस कार्य को करते समय उसे कम थकावट होती है। यदि एक गृहिणी सिलाई करने में प्रवीण है तो उसे समय कम थकान महसस होगी। इसके विपरीत जो सिलाई करना नया-नया सीखती है, उसे सिलाई करते समय गलतियाँ होने के कारण अधिक थकावट होती है।

8. कार्यों में हेर-फेर (Change in work): बहुधा अधिक समय एक-सा कार्य करते रहने पर भी थकावट हो जाती है। अत: कुछ समय बाद कार्यों में हरे-फेर करते रहने से थकावट कम होती है।

9. कार्य को रोचक बनाना (Make work more interesting): अधिकांश दैनिक कार्य नीरस रहते हैं। उनको अधिक समय तक करते रहने से गृहिणी ऊबने लगती है। इस नीरसता को निम्न विधियों से कम किया जा सकता है –
(अ) कई बार कार्य बड़ा लम्बा व अन्तहीन-सा प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में अल्प अवधि का लक्ष्य रखकर गहिणी कार्य के प्रति उत्साहित अनभव कर सकती है।
(ब) गृहिणी को यदि परिवार के किसी अन्य सदस्य का सहयोग मिल जाता है तो भी वह कार्य के प्रति अधिक उत्साह अनुभव करती है। भोजन पकाने में यदि उसे अपनी पुत्री का सहयोग मिल जाता है तो काम की नीरसता कम हो जाती है और वह कार्य भी अधिक शीघ्रता से होता है।
(स) दैनिक कार्यों में विविधता भी थकान को कम करने में सहायक होती है। एक भारी काम पूरा करने के बाद यदि एक हल्का काम हाथ में लिया जाए तो थकान अत्यधिक नहीं हो पाती।

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10. मनोरंजन (Entertainment) मनोरंजन शरीर को विश्राम देता है और कुछ समय के लिए दैनिक चिन्ताओं को भी भुलाने में सहायता करता है।

प्रश्न 6.
कार्य सरलीकरण (Simplification) क्या है ?
उत्तर:
समय एवं शक्ति दोनों ही गृहिणी के लिए महत्त्वपूर्ण साधन हैं। दोनों के व्यवस्थापन में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनका समाधान गृहिणी को करना होता है। एक निर्धारित समय और शक्ति के अन्तर्गत अधिक कार्य सम्पादित करना ही कार्य का सरलीकरण है। ग्रौस व कैण्डल के अनुसार “यह वह विधि है जिसके द्वारा एक निश्चित समय व शक्ति की मात्रा व्यय करके अधिक कार्य सम्पन्न किया जाता है अथवा एक निश्चित कार्य दोनों का ही कम व्यय करके पूर्ण किया जाता है।” निकिल व डौसी के अनुसार “कार्य सरलीकरण किसी कार्य को सबसे सुविधाजनक व शीघ्रता से सम्पन्न करने की विधि की खोज है।” इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि कार्य सरलीकरण में कुशलता एवं व्यावहारिक प्रबन्ध एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

प्रश्न 7.
कार्य सरल करने की विधियों (Methods of work simplification) का उल्लेख करो।
उत्तर:
ग्रौस व क्रैन्डल ने कार्य सरलीकरण को तीन भागों में वर्गीकृत किया है –

  • हाथ और शरीर की गतियों में परिवर्तन (Changes in hand and body motions)।
  • कार्य स्थल, संग्रहण स्थान तथा उपकरणों में परिवर्तन (Changes in work and storage space and equipment)।
  • उत्पादन में परिवर्तन (Change in the products)।

1. हाथ और शरीर की गतियों में परिवर्तन : हाथ और शरीर की गतियों में परिवर्तन होने से समय और शक्ति की बचत होती है।
(अ) बर्तनों को साफ करने के बाद यदि गर्म पानी में खंगालकर सूखने रख दिया जाए तो उन्हें कपड़े से पोंछने की अनावश्यक शारीरिक क्रिया की बचत हो सकती है।
(ब) एक हाथ के स्थान पर दोनों हाथों से कार्य करना, विस्तार के अनावश्यक कदमों को समाप्त करना। पूर्व आयोजन से कई कदम अथवा शारीरिक गतियों की बचत सम्भव है।

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2. कियाओं का कम (Work seanence): घर में काम करने के मार्ग में परिवर्तन कर कई कदमों की चाल की बचत की जा सकती है। कई कार्यों को साथ-साथ भी किया जा सकता है। भोजन पकाने के साथ केक बनाना सम्भव है।

3. कदमों में दक्षता (Skill in work): कुशल गृहिणी अपने गृह कार्य तीव्र गति से तथा सरलता से करने में समर्थ होती है। दक्षता जन्म-जात कम और प्रयास से अधिक आती है। कार्यदक्षता प्राप्त करने की तीन अवस्थाएँ होती हैं –

  • प्रारम्भिक अथवा खोजने की अवस्था (Exploratory stage)।
  • कठिन एवं प्रयासयुक्त अवस्था (Awkward and Effortful stage)।
  • दक्षता की अवस्था (Skilled stage)।

उदाहरण के लिए आलू या प्याज छीलने में पहली अवस्था में गृहिणी को यह जानना होता है कि चाकू को तथा काटने वाली वस्तु को सही तरीके से कैसे पकड़ा जाए। आरम्भ में दोनों को ही वह ठीक ढंग से नहीं पकड़ पाती। क्रियाएँ धीमी रहती हैं, छिलाई भी सफाई से नहीं होती। दूसरी अवस्था में धीरे-धीरे वह सीखने लगती है कि दोनों का सही प्रयोग कैसे हो। उसकी कार्य करने की गति बढ़ने लगती है। वह अपनी गलतियाँ सुधारती जाती है। तीसरी अवस्था में वह यह काम तेजी से और सफाई से करने लगती है। एक कार्य में दक्षता गृहिणी को दूसरे कार्य में वैसी ही दक्षता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।

प्रश्न 8.
कार्य-स्थल, संग्रहण स्थान तथा उपकरणों में परिवर्तन करने से शक्ति उपयोग पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
1. प्रमुख उपकरण व्यवस्थित रूप से लगे हों-उपकरण इस प्रकार से लगाए जाएँ जिससे गृहिणी को हर वस्तु आसानी से उपलब्ध रहे और उसे कम से कम चलना पड़े। प्रमुख उपकरण उचित स्थान पर ऐसी रखे जायें जहाँ उपयोग करते समय इन्हें बार-बार निकालने व रखने में शक्ति व्यर्थ न जाए।

2. कार्य सतहें सुविधाजनक चौड़ाई की व ऊँचाई की हों (Work surface should be of convenient length & height): app and 944 pirific int 47 3fera feefa to लिए कार्य-स्थल की ऊँचाई एवं चौड़ाई आरामदायक होनी चाहिए। यदि कार्य सतह अधिक नीची है तो झुककर कन्धों को अधिक ऊपर उठाना होता है। यदि कार्य सतह अत्यधिक चौड़ी है तो बाँहों को अधिक फैलाना होता है अथवा झुकाना होता है। ऐसी क्रियाओं से असुविधा व थकान होती है। कार्य सतह व्यक्ति की लम्बाई के अनुरूप होनी चाहिए।

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3. कुर्सियाँ व स्टूल आरामदेह हों (Comfortable Chairs & Stools): आरामदेह कुर्सी या तिपाई वह है जिस पर बैठ कर गृहिणी बिना असुविधा के अपना कार्य कर सकें। कुर्सी व स्टूल की ऊँचाई इतनी होनी चाहिए कि गृहिणी के पाँव जमीन पर रखे जाएँ।

4. सर्वाधिक उपयुक्त उपकरणों का चयन किया जाए (Selection of maximumuse of equipment): उपयुक्त उपकरणों से समय व शक्ति की बचत होती है। कपड़ें सुखाने के लिए डायर, गलीचा साफ करने के लिए वैक्यूम क्लीनर उपयुक्त होता है।

5. खाद्य-सामग्री व छोटे उपकरणों को उपयोग करने के स्थान के पास रखना चाहिए। सभी बर्तन, खाद्य-सामग्री तथा उपकरण इस प्रकार रखे जाएँ, जिससे आवश्यकता पड़ने पर उन्हें शीघ्र उठाया जा सके।

6. कार्य के अन्तिम रूप में परिवर्तन (Changes in the last form of work): नई वस्तुओं के उपयोग से घर का काम सुविधाजनक हुआ है।

प्रश्न 9.
विभिन्न क्रिया कलापों के लिए घर को किन स्थल व कक्षाओं में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर:
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ये मुख्यतः क्रियाएँ हैं जिनको करने के लिए घर में स्थान चाहिए। इस सभी क्रियाओं के आगे कई उप-क्रियाएँ हैं, जिनके लिए स्थान चाहिए। जैसे – बर्तन धोने के लिए –
1. गन्दे बर्तन इकट्ठा रखने का स्थान।
2. बर्तन धोने की सामग्री रखने का स्थान।
3. पानी का प्रबन्ध जहाँ बर्तन धोए जाएँगे।
4. धुले बर्तनों को रखने के लिए उचित स्थान।

यह जरूरी नहीं कि घर में इन सभी क्रिया-कलापों को करने के लिए अलग-अलग स्थान हों। छोटे घरों में एक ही स्थान पर दो-तीन क्रियाएँ की जाती हैं। जैसे शयन कक्ष में बनाव-श्रृंगार, अध्ययन या सिलाई का काम करना। खाने का अलग कमरा नहीं है तो यह काम रसोई घर बरामदे या किसी अन्य कमरे में किया जा सकता है। इसलिए जब एक ही कमरे में एक से अधिक क्रियाओं को स्थान दिया जाता है तो स्थान व्यवस्था करना अनिवार्य है। किन्हीं दो परिवारों के लिए स्थान का विभाजन एक जैसा नही होता।

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किसी परिवार की स्थान व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारक हैं –

  • परिवार के पास उपलब्ध स्थान।
  • परिवार के सदस्यों की संख्या।
  • परिवार की आर्थिक व सामाजिक स्थिति।

घर चाहे छोटा हो या बड़ा, विभिन्न क्रियाओं के लिए स्थान का विभाजन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है –
1. एकान्तता-एकान्तता दो प्रकार की है। एक तो कमरे ऐसे होने चाहिए कि बाहर से अन्दर का दृश्य न दिखाई पड़े। या दरवाजे व खिड़कियों पर पर्दे लगा कर हो सकता है। दूसरे घर के अन्दर ही एक कमरे की दूसरे कमरे से एकान्तता (Privacy) होनी चाहिए। इसके लिए लॉबी या गलियारा बनाना चाहिए, जो विभिन्न कमरों को जोड़े भी तथा कमरों की एकान्ता भी बनी रहे।  लॉबी या गलियारा होने पर एक कमरे से निकल कर बाहर जाने के लिए दूसरे कमरे में से नहीं निकलना पड़ता।
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2. कमरों का पारस्परिक सम्बन्ध-कमरों में की जाने वाली क्रियाओं के अनुसार कमरों का पारस्परिक सम्बन्ध होना चाहिए। जैसे स्नान गृह, शयन कक्ष के नजदीक होना चाहिए। भोजन कक्ष रसोईघर के नजदीक होना चाहिए।
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3. घूमने-फिरने में सुविधा हो: इसके लिए कमरे में दरवाजे, खिड़कियों की स्थिति तथा फर्नीचर व्यवस्था ठीक होनी चाहिए। कमरे में यदि अधिक फर्नीचर रख दिए जाएँगें तो कमरे में चलने-फिरने की जगह न बचेगी। कमरों की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए कि एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के लिए अनावश्यक न चलना पड़े। यदि लॉबी या गलियारा है तो एक कमरे से निकल कर, लॉबी में से होकर दूसरे कमरे में जा सकते हैं। इससे सभी कमरों की एकान्तता बनी रहेगी।

4. कमरों का आकार-आयताकार कमरे, वर्गाकार कमरों की अपेक्षा अधिक बड़े दिखते हैं तथा अधिक सुविधाजनक होते हैं।

5. उपलब्ध स्थान का उचित उपयोग-आजकल अधिकतर लोगों के पास स्थान की कमी रहती है, इसलिए उपलब्ध स्थान का मितव्ययिता से प्रयोग करना चाहिए । इसके लिए दरवाजे व खिड़की के ऊपर के स्थान पर सामान रखने के लिए मियानी बनाई जा सकती है। दीवार में अलमारी बनानी चाहिए, जो कि फर्श पर रखी सामान्य अलमारी की अपेक्षा कम स्थान घेरती है। समान रखने वाले फर्नीचर का अधिक प्रयोग करना चाहिए जैसे बक्सेनुमा पलंग अथवा दीवान।

6. कार्य स्थान सघन लेकिन पर्याप्त हो-किसी भी कार्य को करने के लिए यदि अधि क खुला स्थान है तो वहाँ चलने फिरने के लिए काफी समय व शक्ति का व्यय होगा । अतः कार्य स्थान सघन होना चाहिए, लेकिन इतना स्थान हो कि कार्य करने का सामान रखने तथा कार्य करने की सुविधा हो। घर में स्थान की व्यवस्था परिवार के सदस्यों के अनुकूल एवं सुविधाजनक होनी चाहिए।

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7. स्वास्थ्यवर्धक-कमरों में पर्याप्त खिड़की, दरवाजे हों ताकि प्राकृतिक प्रकाश तथा शुद्ध ताजा हवा का आवागमन हो सके।

घर में विभिन्न क्रियाओं को करने के लिए तीन मुख्य कार्य केंद्र हैं –

  • निजी क्षेत्र-इसमें स्नान घर तथा शयन कक्ष आते हैं। यहाँ सबसे अधिक एकान्तता की आवश्यकता है।
  • कार्य क्षेत्र-इसमें रसोईघर, कपड़े धोने का स्थान, भोजन कक्ष, अध्ययन कक्ष, भण्डार घर आदि आते हैं।
  • मनोरंजन क्षेत्र-इसमें बैठक, बरामदा, आंगन आदि आते हैं।

इस क्षेत्र को अतिथियों के सत्कार, टी.वी. देखने, संगीत सुनने आदि के लिए प्रयोग किया जाता है।

आइए, अब हम देखें कि इन विभिन्न कमरों की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए –
बैठक (Drawing Room or Living Room): इस कमरे का उपयोग आने-जाने वाले मित्रों, अतिथियों को बैठाने, बातचीत करने के लिए किया जाता है। घर के सदस्य भी खाली समय में यहाँ विश्राम तथा मनोरंजन कर सकते हैं। बैठक साधारणतः बाकी कमरों से बड़ा तथा अधिक आकर्षक एवं सुव्यवस्थित होता है। बैठक की व्यवस्था तथा सज्जा से घर के सदस्यों की पसन्द, नापसन्द तथा व्यक्तित्व की झलक मिलती है। बैठक का कमरा प्रवेश द्वार के पास हो।

इसका एक दरवाजा बाहर की तरफ खुलना चाहिए ताकि आने-जाने वाले मेहमानों से घर की एकान्तता बनी रहे। यह कमरा आयताकार होना चाहिए। इसकी लम्बाई और चौड़ाई 3 और 2 के अनुपात में होनी चाहिए। आजकल बैठक के साथ-साथ इसमें भोजन का भी प्रबन्ध रखा जाता है। यदि इन दोनों क्रियाओं के लिए कमरे का प्रबन्ध करना है तो कमरे का आकार भी बड़ा होना चाहिए। इस कमरे में खिड़कियों की स्थिति ऐसी हो कि बाहर का सुन्दर दृश्य दिखे। कमरे में प्राकृतिक प्रकाश तथा स्वच्छ वायु का भी प्रबन्ध होना चाहिए।

बैठक में प्रयुक्त होने वाले फर्नीचर सुन्दर-टिकाऊ तथा हल्की हो जिन्हें आसानी से उठाया जा सके। फर्नीचर में सोफा-सैट या आराम कुर्सियां, बीच की मेज (Centre Table), छोटी मेज (Side Table), दीवान आदि रख सकते हैं। 6-8 लोगों के बैठने के लिए फर्नीचर होना चाहिए। फर्नीचर दीवार के साथ-साथ रखा जाए ताकि घूमने-फिरने में असुविधा न हो।

बैठक की सज्जा सुन्दर तथा सादी होनी चाहिए। यदि परिवार बड़ा है और स्थान की कमी है तो बैठक का प्रयोग रात के समय सोने के लिए भी कर सकते हैं। बैठक का एक भाग पढ़ने-लिखने के काम भी आ सकता है। यदि टी.वी. बैठक में रखा है तो परिवार के सभी सदस्य वहाँ बैठ कर अपना मनोरंजन भी कर सकते हैं।

खाने का कमरा (Dining Room): आजकल घरों में खाने के लिए अलग कमरे की व्यवस्था रहती है। यदि रसोईघर बड़ा है तो उसी में एक ओर इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। यह कमरा रसोईघर के पास होना चाहिए, लेकिन यहाँ से रसोईघर का भीतरी भाग नहीं दिखाई देना चाहिए। भोजन कक्ष में खाने की मेज तथा कुर्सियों की व्यवस्था की जाती है। मेज कितनी बड़ी हो तथा कितनी कुर्सियाँ हों, यह स्थान की उपलब्धता तथा सदस्यों की संख्या पर निर्भर करता है। मेज के इर्द-गिर्द घूमने के लिए पर्याप्त स्थान रखना चाहिए।

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भोजन कक्षा में क्राकरी तथा अन्य उपकरण रखने के लिए दीवार में आलमारी बनी होनी चाहिए। इस कमरे में फ्रिज रखने का भी प्रबन्ध कर सकते हैं। भोजन कक्ष में प्रकाश तथा स्वच्छ हवा आनी चाहिए। कमरे में हाथ धोने के लिए सिंक भी रख सकते हैं। स्थान की कमी के कारण यदि भोजन कक्ष की अलग व्यवस्था नहीं है तो रसोईघर, बरामदे या किसी अन्य कमरे में भोजन खाने की व्यवस्था हो सकती है। भोजन कक्ष का प्रयोग पढ़ने-लिखने या अन्य क्रियाएँ जैसे सिलाई, पेन्टिंग आदि करने के लिए भी हो सकता है।

शयन कक्ष (Bed Room): शयन कक्ष का प्रयोग आराम करने तथा रात को सोने के लिए किया जाता है। इसलिए यह कमरा शोरगुल से दूर होना चाहिए। चूंकि यह निजी कमरा है अतः इसमें सबसे अधिक एकान्तता की आवश्यकता है। 10 वर्ष से अधिक उम्र के लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शयन कक्ष होने चाहिए। शयन कक्ष का मुख्य फर्नीचर पलंग है। इसके अतिरिक्त यदि स्थान है तो दो आराम कुर्सी तथा एक छोटी मेज भी रख सकते हैं।

इस कमरे का प्रयोग यदि पढ़ने तथा श्रृंगार के लिए भी करना है तो पढ़ने की मेज तथा शृंगार मेज रखने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। यह मेज ऐसी जगह रखी जाए, जहाँ प्रकाश की उचित व्यवस्था हो। जहाँ तक सम्भव हो, शयन कक्ष के दरवाजे, खिड़कियाँ पूर्व दिशा की ओर हों ताकि सुबह के सूर्य का प्रकाश तथा शुद्ध वायु आ सके। इस कमरे में सुरक्षा, शान्ति तथा आराम होनी चाहिए। भारतीय घरों में गर्मी के मौसम में बरामदा, आंगन या घर की छत भी सोने के काम में आती है।

रसोईघर (Kitchen): यह घर का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। गृहिणी अपने जीवन का एक तिहाई समय रसोईघर में व्यतीत करती है । सुव्यवस्थित तथा आधुनिक उपकरणों से युक्त रसोईघर में समय तथा शक्ति दोनों की बचत होती है। सफाई भी आसानी से की जा सकती है। रसोईघर भोजन कक्ष के नजदीक होना चाहिए। यह शयन कक्ष तथा बैठक से दूर होना चाहिए ताकि धुआं तथा गन्ध आदि इन कमरों में न पहुंचे। रसोईघर में प्रकाश तथा हवा का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। रसोईघर की दिशा उत्तर-पूर्व की ओर हो तो अच्छा है ताकि सुबह की धूप आ सके तथा बाकी समय रसोईघर ठण्डा रहे।

रसोईघर के दरवाजे और खिड़कियों पर जाली रहनी चाहिए ताकि मक्खी, मच्छर से बचाव रहे। रसोइघर का फर्श ऐसा हो जो आसानी से साफ हो जाए। इसका ढलान भी सही होना चाहिए, जिससे कि सारा पानी नाली में निकल जाए और खड़ा न रहे। खड़ी रसोई में स्लैब के ऊपर की दीवारें टाईल्स की होनी चाहिए ताकि आसानी से साफ हो जाएँ। रसोइघर में गर्म हवा तथा धुआं निकलने के लिए चिमनी या हवा निकालने वाला पंखा (Exhaust Fan) लगा हो। बहुत-से घरों में खाना बनाने के लिए अलग कमरे की व्यवस्था नहीं रहती।

बरामदे या किसी कमरे के कोने में खाना बनाने का काम होता है। यहाँ भोजन बनाने की व्यवस्था बैठ कर कर सकते हैं या एक मेज लगा कर खड़े होकर उस पर खाना बना सकते हैं। रसोइघर की व्यवस्था करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि रसोइघर में काम करने के लिए तीन मुख्य स्थान हैं –

  • खाना बनाने का स्थान (Cooking Area)
  • खाना बनाने की तैयारी करने का स्थान (Preparation Area)
  • बर्तन धोने का स्थान (Washing Area)

सुव्यवस्थित रसोईघर के लिए यह आवश्यक है कि ये तीनों कार्य स्थान इस प्रकार हों कि काम में रुकावट न पड़े। तीनों कार्य क्षेत्रों में 4-5′ का अन्तर होना चाहिए। तैयारी करने का स्थान खाना बनाने के स्थान के नजदीक हो। तैयारी करने में पानी की भी आवश्यकता होती है अतः तैयारी केन्द्र के पास पानी की भी व्यवस्था होनी चाहिए।

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आजकल अधिकतर घरों में खड़े रसोईघर (Standing Kitchen) बनाए जाते हैं, जहाँ भोजन की तैयारी करने, बनाने तथा बर्तन धोने की व्यवस्था खड़े होकर की जाती है। खड़े होकर काम करने में उठाने, रखने के लिए कम शारीरिक गतिविधियाँ करनी पड़ती हैं, जिससे कम समय तथा शक्ति लगती है, रसोईघर भी अधिक साफ रहता है।

1. खाना बनाने का स्थान-यह स्थान तैयारी केन्द्र के दायीं ओर होना चाहिए। यहाँ मुख्य उपकरण ऊर्जा का स्रोत है। जैसे अंगीठी, स्टोव या गैस । खड़े होकर खाना बनाने के लिए फर्श से उचित ऊँचाई पर स्लैब बनाई जाती है। इस स्लैब पर स्टोव या गैस रखने की व्यवस्था की जाती है। स्लैब चिकना होना चाहिए जो पानी न सोखे तथा आसानी से साफ हो जाए।

2. खाना बनाने की तैयारी करने का स्थान-भोजन पकाने से पहले जो सम्बन्धित तैयारी होती है जैसे-सब्जी काटना, दाल-चावल साफ करना, मसाला पीसना, आटा गूंथना आदि क्रियाएँ यहाँ की जाती है। इस क्षेत्र में बिजली के प्वाइंट की व्यवस्था भी हो ताकि मिक्सी आदि वहीं रख कर प्रयोग कर सकें।

3. बर्तन धोने का स्थान-यहाँ पानी की उपलब्धता तथा पानी के बाहर निकलने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। खड़े होकर बर्तन धोने हैं तो सिंक हो और उसके साथ ढलानदार बोर्ड हो जिस पर बर्तन धोकर सखने के लिए रखे जा सकते हैं। बर्तनों के सख जाने पर उन्हें उचित स्थान पर रख सकते हैं। सिंक के ऊपर खिड़की होनी चाहिए ताकि रसोईघर में गीलापन न रहे।

रसोईघर में संग्रहीकरण के लिए स्थान व्यवस्था-इन कार्य क्षेत्रों के अतिरिक्त खाना बनाने में जो सामान प्रयुक्त होना है जैसे-आटा, चावल, दाल, मसाले, चीनी, चाय पत्ती, घी, तेल आदि तथा बर्तन रखने के लिए भी स्थान होना चाहिए। यदि स्थान उपलब्ध है तो रसोईघर के साथ ही स्टोर बना सकते हैं, जहाँ सारे भोज्य पदार्थ रख सकते हैं। बर्तन रखने के लिए भी अलग स्थान हो सकता है, लेकिन अधिकतर घरों में अलग से स्टोर नहीं होता, वहाँ इन सभी चीजों को रखने की व्यवस्था रसोईघर में ही करनी पड़ती है।

सुविधा के लिए जो सामान जिस कार्य-स्थान से सम्बन्धित है, उसके उसी के पास संग्रह करना चाहिए। स्थान की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए जो स्थान स्लैब तथा फर्श के बीच खाली है, वहाँ अलमारियाँ बनाकर आवश्यक सामान रख सकते हैं। जैसे खाना बनाने के स्थान के नीचे अलमारी बन कर, गैस सिलैण्डर या खाना बनाने में प्रयुक्त होने वाले बर्तन रख सकते हैं। तैयारी स्थान के ऊपर तथा नीचे अलमारी बना कर दाल, मसाले तथा अन्य उपकरण रख सकते हैं। जहाँ सिंक है, उसके पास स्लैब पर रैक लगा कर बर्तन रख सकते हैं। बर्तन धोने में प्रयुक्त होने वाली सामग्री रखने की व्यवस्था भी सिंक के पास होनी चाहिए।

रसोईघर में विभिन्न भोज्य पदार्थ इस प्रकार रखे जाएँ कि उन्हें ढूंढ़ने में कठिनाई न हो। एक प्रकार का सामान एक साथ रखें। जैसे दालें एक साथ, मसाले एक साथ हों। डिब्बों के ऊपर नाम लिखा हो तो ढूँढ़ने में समय नहीं लगता। चाय, चीनी, घी, का उपयोग बार-बार होता है, उन्हें खाना बनाने के स्थान पर एक शेल्फ बनाकर रख सकते हैं।

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रसोईघर में ऊपर की तरफ भी स्लैब डाल सकते हैं, जहाँ कभी-कभी प्रयोग होने वाले बर्तन अथवा अन्य सामान रख सकते हैं। रसोईघर में पानी भर कर रखने के लिए भी स्थान होना चाहिए। आकार के आधार पर रसोईघर चार प्रकार के हो सकते हैं। रसोईघर का आकार कैसा भी हो, उसमें तीन मुख्य कार्य स्थान होने चाहिए।
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बच्चों का कमरा (Children Room): भारतीय परिवारों में साधारणत: बच्चों का अलग कमरा नहीं होता। जगह की कमी के कारण या जगह भी हो तो उसे महत्त्व नहीं दिया जाता है। लेकिन घर में कोई स्थान ऐसा होना चाहिए जिसे बच्चा अपना समझे, अपने अनुसार वहाँ पढ़ या खेल सके। बच्चों के कमरे में खिड़कियाँ नीची हों ताकि आसानी से बाहर का दृश्य दिख सके।

फर्नीचर भी कम ऊँचा, हल्का, सादा हो। अलमारी तथा शैल्फ इतनी ऊँचाई के होने चाहिए कि बच्चा आसानी से अपना सामान रख तथा उठा सके। यह कमरा रसोईघर के पास हो ताकि गृहिणी काम करते समय बच्चे पर नजर रख सके। पढ़ने वाले बच्चों के कमरे में पढ़ने की मेज-कुर्सी की व्यवस्था होनी चाहिए।

लॉबी (Lobby): आधुनिक घरों में लॉबी की व्यवस्था को अधिक महत्त्व दिया जाता है। इससे एकान्तता तो बनी ही रहती है, साथ-साथ यहाँ और भी कई कार्य किए जा सकते हैं। अगर लॉबी थोड़ी बड़ी है तो घर के सदस्य वहाँ बैठ कर टी.वी. देख सकते हैं, बच्चे खेल सकते हैं, पढ़ सकते हैं या गृहिणी सिलाई, बुनाई का काम कर सकती है।

स्नान घर (Bath Room): जहाँ तक हो सके स्नान घर शयन कक्ष के साथ हो। स्नान घर के दो दरवाजे होने चाहिए, एक कमरे में खुले तथा दूसरा बाहर की तरफ। स्नानघर की खिड़की ऊँची तथा बड़ी हो ताकि पर्याप्त रोशनी एवं हवा आ सके। खिड़की पर फ्रॉस्टेड शीशा (Frosted Glass) लगा हो।

स्नान घर में नहाने के लिए नल, फव्वारा हो तथा वाश बेसिन (Wash Basin) लगा हो। यदि कपड़े भी स्नानघर में ही धोए जाने हैं तो कपड़े धोने की मशीन रखने की भी व्यवस्था हो। नहाने से सम्बन्धित सामग्री तथा कपड़े धोने की सामग्री रखने के लिए दीवार में शेल्फ बने हों, कपड़े, तौलिया आदि टाँगने के लिए दरवाजे के पीछे खूटियाँ लगी हों। स्नान घर की फर्श तथा दिवारें चिकनाई रहित एवं मजबूत हों। दीवारों पर टाइल्स लगी हों तो सफाई करना आसान रहता है।

आजकल स्नानघरों साथ शौचालय भी जुड़े रहते हैं। इसमें भारतीय या पश्चिमी पद्धति की सीट लगी होती है। सम्पन्न घरों में प्रक शयन कक्ष के साथ एक स्नानघर जुड़ा हुआ भी हो सकता है। यदि स्नान घर छोटा है तो कपड़े धोने की व्यवस्था बाहर आंगन में की जा सकती है। सम्पन्न घरों में कपड़े धोने का कमरा (Laundry room) अलग ही होता है।

स्टोर (Store बक्से, सूटकेस तथा कभी-कभी प्रयोग होने वाले सामान को रखने के लिए स्टोर बनाया जाता है। छोटे घरों में स्टोर उपलब्ध न होने पर सामान रखने वाला फर्नीचर प्रयोग करना चाहिए या दरवाजे, खिड़कियों के ऊपर मियानी बनानी चाहिए। सीढ़ियों के नीचे भी सामान रखने के लिए जगह बनाई जाती है।

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बरामदा (Verandah): भारतीय घरों में बरामदे का बहुत महत्त्व है। बरामदा हमें गर्मी तथा वर्षा की बौछारों से बचाता है। एकदम अनजान व्यक्ति को, जिसे हम अन्दर नहीं ले जाना चाहते, बरामदे में बैठा सकते हैं। बरामदा घर में आगे या पीछे या दोनों ओर बना सकते हैं। साधारण घरों में अधिकांश समय बरामदे में बीतता है।

बरामदे में सुबह शाम बैठ सकते हैं, बच्चे खेल सकते हैं; गृहिणियाँ सब्जी छीलने, काटने आदि का काम कर सकती हैं। स्थान की कमी के कारण आवश्यकता हो तो इसे बन्द करवा कर कमरा भी बनवाया जा सकता है। अगर धन तथा स्थान की कमी नहीं है तो घर में अलग से शृंगार कक्ष (Dressing Room), अतिथि कक्ष (Guest Room), अध्ययन कक्ष (Study Room), पूजा कक्ष (Prayer Room) कपड़े धोने का कक्ष (Laundry Room) भी बनवाया जा सकता है।

प्रश्न 10.
रंग और सहायक वस्तुओं का सजावट में क्या योगदान है ?
उत्तर:
रंग और सहायक वस्तुओं का सजावट में योगदान (Use of Colour and Accessories in Decoration): स्थान व्यवस्था के क्रियात्मक रूप के साथ-साथ आकर्षण भी महत्त्वपूर्ण रूप है। जब स्थान सीमित हो तो सजावट सोच-विचार कर करनी चाहिए। किसी भी स्थान की सुन्दरता को रंग व सहायक वस्तुओं से बढ़ाया जा सकता है। घर की सुसज्जा के लिए रंग की बहुत महत्ता है। रंग-घर को सुन्दर और आकर्षित दिखाने में रंग का एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। इससे भावात्मक प्रभाव पैदा होता है। समस्या केवल यह है कि उसे रंगने तथा कार्य के स्थान के लिए सही-सही चुनना। रंग को पूरी तरह समझने के लिए उसके तीन आयामों को जानना आवश्यक है।

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वे हैं-वर्ण, मात्रा व मूल्य (मान)।
(क) वर्ण (Hue): इससे मूल रंग का पता चलता है। जैसे-लाल, हरा और नीला।
(ख) मूल्य (Value): रंग का हल्कापन या भारीपन जैसे-हल्का हरा, गहरा हरा।
(ग) मात्रा (Intensity): रंग की मन्दता व चमक के बारे में बतायें जैसे रक्त की तरह लाल, गुलाब का लाल इत्यादि।
विभिन्न रंगों का वर्गीकरण तीन भागों में किया जा सकता है, प्राथमिक, द्वितीयक ओर तृतीयक रंग।

पीला, लाल और नीला प्रथम श्रेणी अर्थात् प्राथमिक रंग है।
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दो प्राथमिक रंगों को समानुपात में मिलाने से एक द्वितीयक रंग बनता है। जैसे : नारंगी, हरा बैंगनी।
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तृतीयक रंग को एक प्राथमिक रंग तथा साथ वाले द्वितीयक रंग को मिलाकर बनाया जाता है जैसे लाली-नारंगी, लाल-बैंगनी, पीला-नारंगी और पीला-हरा, काला-सफेद, ग्रे और मटमैला रंग तटस्थ रंग हैं जो बाकी रंगों को सुन्दर दिखाते हैं।
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रंगों की योजना (Colour Schemes): रंगों की योजना बनाना एक दिलचस्प कार्य है। कई प्रकार की रंग योजनायें हैं। उनका वर्गीकरण संबंधित और अलग-अलग रंग योजना में किया जा सकता है।
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एक-रंगीय योजना (Mono-cromatic colour scheme): इसमें कोई भी एक मनपसन्द रंग प्रयोग किया जाता है। एक ही रंग के विभिन्न शेड प्रयोग किये जा सकते हैं। एक-रंगीय लाल योजना में पिंक, लाल, मैरून आदि रंग आते हैं।

समदर्शी योजना (Analogous colour scheme): समदर्शी योजना में प्राथमिक रंग के साथ उसके साथ वाले द्वितीयक रंगों का प्रयोग करते हैं। जैसे लाल-बैंगनी, नीला-बैंगनी इत्यादि । इस योजना में 3-5 रंग हो सकते हैं तथा आप अपनी आवश्यकतानुसार रंग चुन सकते हैं।

विपरीत योजना (Complementary colour scheme): इसमें रंग चक्र के बराबर की दूरी वाले तीनों रंगों को प्रयोग करते हैं जैसे पीला-नीला लाल, हरा व केसरी-बैंगनी, लाल, केसरी-नीला, बैंगनी-पीला हरा आदि।

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खण्डित विपरीत योजना (Split colour scheme): इसमें रंग चक्र के एक रंग के साथ इसके सामने वाले रंग को छोड़कर उसके आस-पास के रंगों को लिया जाता है जैसे पीला-नीला बैंगनी और लाल बैंगनी।

त्रिकोणीय योजना (Triad colour scheme): इसमें रंग चक्र के एक रंग के रंगों को लिया जाता है जैसे पीला-नीला बैंगनी और लाल बैंगनी।

रंगों के लाभ (Uses of colour)
व्यक्तित्व उभारना (Express personality): अगर आप गर्म स्वभाव के व्यक्ति हैं तो आप सारे रंगों के सामने लाल को ही प्रयोग में लायेंगे । पीले को मध्यम स्वभाव का कहा गया है। हरा, नीला ठंडे रंग के नाम से जाने जाते हैं।

रंग कमरे का वातावरण निश्चित करता है –
चमकदार रंग गर्मी, शक्ति व मित्रता के रूप हैं जबकि सफेद रंग सफाई; पवित्रता व शांति का द्योतक है। रंग से कमरे का आकार व स्थान बदल सकता है-एक लंबे और कम चौड़े कमरे का आकार आप बदल सकते हैं। लम्बी दीवारों को गहरे रंगों से रंग कर कमरा अनुपाती बनाया जा सकता है। एक अंधेरा व छोटा कमरा, सफेद रंग करने से बड़ा दिखता है। ठीक ढंग से रंग . का प्रयोग करने से स्थान की सुन्दरता बढ़ जाती है।

कमियों को छुपाने के लिए रंग (Colour for disguising flaws): भवन निर्माण के समय रह गई कुछ कमियों को छुपाने के लिए अक्सर रंग का प्रयोग करके भवन को सुन्दर बना दिया जाता है। सफेद दीवार के सामने लाल रंग की पुष्प परिसज्जा हर व्यक्ति को प्रसन्नचित्त कर देती है। रंग किसी भी स्थान को सुन्दर बना देता है। सजावट के उपसाधनों में रंगों का प्रयोग जगह की सुन्दरता को चार चांद लगा देता है।

प्रश्न 11.
रंगों का गृहसज्जा में प्रयोग करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखेंगे?
उत्तर:
रंग प्रयोग करने की मार्गदर्शिका (Guidelines for Using Colours):
1. वही रंग प्रयोग करें जो परिवार के सदस्यों को अच्छा लगे।
2. हल्का, कम मात्रा व ठंडे रंग को प्रयोग करने से कमरा बड़ा लगता है।
3. गहरे रंग प्रयोग करने से कमरा छोटा लगता है।
4. विषम रंग अपनी ओर ध्यान आकर्षित करते हैं –
(क) विषम रंग की दीवार के विरुद्ध सफेद सोफा अधिक ध्यान आकर्षित करेगा बजाय इसके कि सफेद दीवार के विरुद्ध सफेद सोफा रखा गया हो।
(ख) एक कमरे में बहुत से विषम रंगों से ध्यान बंट जाएगा तथा थकान पैदा करेगा।
5. एक जैसा रंग आरामदायक होता है।
6. लाल रंग पर आधारित रंग कमरे को गर्म बनाते हैं।
7. नीले रंग पर आधारित रंग कमरे को ठंडा बनाते हैं ।
8. हल्के रंग शीघ्र गंदे हो जाते हैं तथा अतिरिक्त सफाई मांगते हैं। गहरे रंगों पर मिट्टी चमकती है।
9. साथ-साथ रंग प्रयोग करने में उनका अन्तर बढ़ जाता है –
(क) हल्के और गहरे. रं का साथ-साथ प्रयोग करने पर हल्का अधिक हल्का व गहरा अधिक गहरा लगता है
(ख) चमक व फीके रंम को साथ-साथ प्रयोग करने से चमकीले रंग अधिक चमकीले व फीव अधिक फीके लगते हैं।
(ग) जब गर्म व ठंडे रंग साथ-साथ प्रयोग किये जाते हैं तो ठंडे अधिक ठंडे व गर्म अधिक गर्म लगते हैं।
10. रंग का गहरापन उसकी मात्रा पर आधारित होता है। जितना भी क्षेत्र अधिक होगा, रंग उतना ही गहरा लगता है।
11. बड़े क्षेत्र पर हल्का रंग करने से अच्छा लगता है। चमकीले रंगों को थोड़ी मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।
12. रंग योजना अच्छी लगती है जब एक रंग का अधिक प्रयोग किया जाए।
13. जब विपरीत रंग प्रयोग में लाये जाते हैं तो दोनों एक-दूसरे को अधिक चमकीला बना देते हैं।
14. रोशनी के साथ रंग भी बदल जाते हैं। बनावटी रोशनी रंगों को नर्म कर देती है। वह रंग जो बनावटी रोशनी में आकर्षित लगते हैं, प्राकृतिक रोशनी में आकर्षक लगें, यह आवश्यक नहीं।
15. तटस्थ रंग भी रंग योजना का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
16. खुरदरी सतह पर रंग गहरे लगते हैं तथा वही रंग से चिकनी सतह पर उतने गहरे नहीं लगते।

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प्रश्न 12.
निम्नलिखित स्थितियों में रंगों का किस प्रकार प्रयोग करेंगे –
(क) एक छोटा कमरा बड़ा लगे
(ख) एक अंधेरा कमरा उज्जवलित लगे
(ग) लम्बा और पतला कमरा अनुपात में लगे।
उत्तर:
रंगों की सहायता से बदलाव लाने के तरीके
I. एक छोटा कमरा बड़ा लगे –
(क) दीवारों को हल्के रंग पेन्ट करने से (By painting the walls with light colours)
(ख) पूरे कमरे में एक ही रंग का प्रयोग करके (Using the same colour throughout the room)
(ग) ठंडे रंगों का प्रयोग करके (Making use of cool colours)
II. एक अंधेरामय कमरा उज्जवलित लगे-गहरे रंगों का प्रयोग करके (Making use of warm colours)
III. एक लम्बा व पतला कमरा अनुपात में लगे –
(क) लम्बी दीवारों को हल्के रंगों से पेन्ट करना तथा छोटी दीवारों को गहरे रंग से पेन्ट करना चाहिए (By painting longer walls in cool colours and shorter walls in warm colours)
(ख) लम्बी दीवारों को रंग की गहराई बढ़ाते हुए प्रयोग करना तथा छोटी दीवारों को रंग की गहराई कम करते हुए प्रयोग करना (By painting longer walls in darker value of the colour and shorter walls in lighter value of the same colour)

प्रश्न 13.
आपकी सहेली अब एक कमरे के मकान में रहने लगी है। उसके लिए फर्नीचर की विशेषताएँ बताएँ। जगह बड़ी लगने के लिए फर्नीचर सज्जा के दो तरीके सुझाएँ।
उनर:
छोटे कमरों के लिए फर्नीचर सज्जा की विशेषताएँ –

  • बहुमुखीय प्रयोग (Multi puniti)
  • हल्का पन (Light)
  • मजबूत व ज्यादा देर तक चलने वाला (durable)
  • तह कग्न वान (Folding)

जगह बड़ी लगने के तरीके (फर्नीचर द्वारा):

  • आवश्यकतानुसार थोड़ा फर्नीचर प्रयोग में रखे।
  • जब फर्नीचर की आवश्यकता न हो तो तह कर दें।
  • बड़ा फर्नीचर जैसे पलंग व अलमारी दीवार के साथ रखें।
  • जगह के इस्तेमाल के अनुसार फर्नीचर रखें। सम्बन्धित कार्य जगह पास-पास होनी चाहिए।
  • दीवारों की जगह का अत्यधिक प्रयोग करना चाहिए। (built in fixtures)

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

Bihar Board Class 11 Home Science कार्याचर या कार्य नैतिकता Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत जैसे विकासशील देश की सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Income) कम हो जाती है – [B.M.2009A]
(क) समय पर न पहुंचने के कारण
(ख) कार्य का सैद्धांतिक जानकारी (Theoretical knowledge और व्यवहारिक जानकारी (Pratical knowledge) न होने के कारण
(ग) कार्य अवधि में अपने कार्य स्थान पर उपलब्ध न रहना
(घ) उपर्युक्त में सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त में सभी

प्रश्न 2.
टीम की भावना दर्शाता है – [B.M.2009A]
(क) विकास का
(ख) सहयोग का
(ग) अवकाश का
(घ) अपात का
उत्तर:
(क) विकास का

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प्रश्न 3.
किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रथम आईना है – [B.M.2009A]
(क) व्यवहार
(ख) भाषा
(ग) आवाज
(घ) संस्कार
उत्तर:
(ख) भाषा

प्रश्न 4.
एक अच्छे ‘व्यक्तित्व की प्रथम पहचान है – [B.M.2009A]
(क) विनम्र भाषा
(ख) कटु भाषा
(ग) तुनकता
(घ) उग्र भाषा
उत्तर:
(क) विनम्र भाषा

प्रश्न 5.
हल्का श्रम के अंतर्गत कौन-सा कार्य आता है ? [B.M.2009A]
(क) फर्श साफ करना
(ख) कपड़े धोना
(ग) प्रेस करना
(घ) बुनाई करना
उत्तर:
(घ) बुनाई करना

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी भी कार्य स्थिति के लिए श्रमिक, कार्य उपकरण व कार्य स्थान के कौन-कौन-से तीन महत्त्वपूर्ण संघटक हैं ?
उत्तर:
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प्रश्न 2.
कार्याचार (Work Ethics) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कार्याचार से अभिप्राय है कार्य के समय व्यक्ति का आचार या व्यवहार। कार्याचार या कार्य नैतिकता किसी भी कार्य को आनंदित ढंग से पूर्ण करने के लिए आवश्यक है। कार्याचार से कार्य करने तथा करवाने वाले दोनों को आदर तथा सम्मान का भाव मिलता है।

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प्रश्न 3.
कार्य नैतिकता (Work Ethics) से संबंधित कोई पांच आदतें लिखें।
उत्तर:

  • कार्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा।
  • कार्य के प्रति नियमित व समयनिष्ठ होना।
  • कार्य को सही रूप में समझना।
  • अपने सहकर्मियों के साथ नम्र व सादर भाषा में बोलना।
  • अपने साधनों का उचित प्रबंध व उपयोग करना।

प्रश्न 4.
कार्य स्थान पर अनुशासन रखने के लिए दो महत्त्वपूर्ण तथ्य लिखिए।
उत्तर:
1. समयनिष्ठा (Punctuality)।
2. नियमितता (Regularity)।

प्रश्न 5.
नम्र व मृदु व्यवहार (Calm & Soft behaviour) कार्यक्षमता को बढ़ाता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कार्यालय में मधुर और प्रसन्न वातावरण बनाए रखने में मधुर व नम्र भाषा का प्रयोग बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि ऊँची आवाज में बोला जाए तो लोगों में कड़वाहट उत्पन्न होती है, झगड़ा-फसाद हो जाता है और बहसबाजी में न केवल समय व्यर्थ जाता है परन्तु हमारी शान्ति भी व्यर्थ जाती है। परिणामस्वरूप हमारी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है।

प्रश्न 6.
कार्य में दक्षता (Efficiency in work) का कार्यपूर्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
अपने कार्य को सफलतापूर्वक करने हेतु उस कार्य में दक्षता हासिल करना अति आवश्यक है। कार्य दक्षता हासिल करने से न केवल कार्य समय पर पूरे होते हैं अपितु आत्मिक सन्तुष्टि भी प्रदान करती है। किसी भी कार्य को रुचिपूर्वक करते रहने हेतु सन्तुष्टि की प्राप्ति (Job satisfaction) अति आवश्यक है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कार्य नैतिकता का क्या अर्थ है तथा इसके क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
कार्य नैतिकता (Work ethics): का अर्थ सदाचार तथा गलत-सही अनुभूति होना है, कार्य नैतिकता कार्य करने की मानक स्थिति है। व्यक्ति की अच्छे-बुरे की सही और गलत अवधारणा ही उसके कार्य पर प्रभाव डालती है।

लाभ (Advantages):
किसी भी कार्य को पूरी लगन से करने के निम्नलिखित लाभ हैं –

  • कार्य करने वाले व्यक्ति तथा कार्य करवाने वाले व्यक्ति को सन्तुष्टि होती है और आनन्द प्राप्त होता है।
  • व्यक्ति को कार्य करने का उचित उद्देश्य मिलता है और वह उद्देश्यहीन होकर कार्य को केवल कार्य करने के लिए नहीं करता है।
  • पूरी लगन से कार्य करने पर व्यक्ति अपने द्वारा अपने अधिकारियों द्वारा बनाए लक्ष्यों की प्राप्ति सरलतापूर्वक करता है।
  • कार्य पूर्ण होने अथवा लक्ष्य प्राप्ति से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता है जो उसे भविष्य के लिए प्रेरित करता है।
  • व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह भविष्य में कार्यों को और अच्छे ढंग से करने का प्रयास करता है।

प्रश्न 2.
कार्य स्थल पर अनुशासन (Discipline) क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
अनुशासन-व्यवस्था का एक हथियार (Discipline as a Tool of Management): अनुशासन लक्ष्य की सफलता को प्राप्त करने के लिए व्यवस्था का एक अस्त्र है। अनुशासन एक प्रकार का दबाव है जिसके द्वारा लक्ष्य प्राप्ति के लिए बनाए गए निर्देशों तथा नियमों का पालन कराया जाता है। यह संस्था या समूह के सामान्य कार्यकलापों के लिए उत्तरदायी है। व्यवस्था को उपर्यक्त दोनों प्रकार की विधियों के आवश्यकतानसार प्रयोग द्वारा बनाए रखना चाहिए। इससे एक अच्छे कार्यकर्ता को अभिप्रेरणा मिलती है तथा कर्तव्यों से विमुख कार्यकर्ता को सजा।

इससे अच्छे कार्यकत्तओं की उपलब्धियों को देखकर दूसरे के मन में इसकी इच्छा जागती है तथा वह भी अधिक मेहनत करता है। परन्तु इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उस वर्ग के व्यक्तियों को जिनके पास ये सभी अधिकार हैं, उन्हें पहले स्वयं उ.वेत आदर्श व्यवहार प्रस्तुत करना चाहिए अर्थात् अपने अधीन काम करने वाले कार्यकर्ताओं को आदेश देने से पूर्व उन्हें उन नियमों एवं सिद्धान्तों को स्वयं अमल में लाना चाहिए, जिसका पालन वे दूसरों से करवाना चाहते हैं। तभी सही अनुशासन कायम हो पाएगा।

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प्रश्न 3.
कार्यस्थल पर नैतिकता का पालन करने के नियमों का उल्लेख करें।
उत्तर:
अपने कार्यस्थल पर नैतिकता का पालन करना अति आवश्यक है ताकि कार्य सफलतापूर्वक किया जा सके। ये नियम निम्न हैं –

  • कार्य के प्रति निष्ठा रखना।
  • कार्य में दक्षता हासिल करना।
  • संसाधनों का सुव्यवस्थित ढंग से प्रयोग करना अर्थात् अपना समझ कर प्रयोग करना।
  • सुनियोजित व नियमित ढंग से कार्य करना।
  • अपने स्थान पर उपलब्ध रहना व कार्यरत रहना।
  • मधुर व नम्र भाषा का प्रयोग करना।
  • संगठन व सहयोग की भावना से कार्य करना।
  • अपने कार्य से सम्बन्धित नई जानकारी प्राप्त करते रहना तथा अपने ज्ञान को विशेष कार्यक्रमों द्वारा आधुनिक बनाना।

उपर्युक्त नियमों का पालन करने से ही वांछित परिणाम मिल सकते हैं अन्यथा उत्तम कार्यस्थल व उपकरण लेने के बाद भी सफलता असम्भव है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कार्यस्थल पर अनुशासन में रहने के लिए किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए ? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
कार्य चाहे घर अथवा बाहर का हो, हमें निम्नलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है –
1. अनुशासन (Discipline): किसी भी कार्य को करने के लिए अनुशासन के नियमों का पालन करना आवश्यक है। कोई भी कार्य यदि अनुशासित ढंग से न किया जाए तो वह सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं होता और उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होती है। अनुशासन बनाए रखने के लिए प्रत्येक कार्यालय अथवा घर में कुछ नियम बनाए जाते हैं, जैसे कार्यालय में समय पर पहुँचना, अपने से बड़े पद के अधिकारी का सम्मान करना, सौंपे गए कार्य को उचित ढंग से पूरा करना आदि।

घर में विभिन्न परिवार के सदस्यों के लिए भिन्न-भिन्न नियम होते हैं, जैसे बच्चों को शाम को निश्चित समय तक घर लौटना, समय पर पढ़ना तथा खेलना, समय पर स्कूल में पहुंचने के लिए समय पर प्रात:काल उठना व तैयार होना आदि। अनुशासन के अभाव में कोई भी कार्य सन्तोषजनक रूप से पूर्ण नहीं होता है। अनुशासनहीन व्यक्ति का व्यक्तित्व बिखरा हुआ होने के कारण कार्य के परिणामों में भी इसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

कार्यस्थल पर अनुशासन निम्न दो प्रकार से लाया जा सकता है –
(क) सकारात्मक विधि (Positive Method)
(ख) नकारात्मक विधि (Negative Method)

(क) सकारात्मक विधि-इस विधि द्वारा व्यक्ति का कार्य के प्रति अच्छा दृष्टिकोण, उसमें अच्छी आदतों का विकास, उसका प्रोत्साहन तथा उसकी प्रशंसा द्वारा कार्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाया जाता है जिससे वह कार्य को पूरी लगन से करे और उसे अपने पर बोझ न समझे।

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(ख) नकारात्मक विधि-इस विधि द्वारा व्यक्ति को दंड व जुर्माने के डर से अनुशासित किया जाता है जिससे वह कार्य को बोझ समझकर करता है और सदैव कार्यप्रणाली को दोषी ठहराता है।

2. समय पर कार्य करना (Working in time): उचित समय पर कार्य करना आवश्यक है। प्रत्येक कार्य के लिए एक उचित समय होता है और वह समय हाथ से निकलने के पश्चात् दोबारा वापस नहीं आता है। यहाँ पर समय पर कार्य करने से अभिप्राय कार्यस्थल में समय पर पहुँचना भी है। यदि कार्यस्थल में पहुंचने का कोई निश्चित समय नहीं होगा तो वहाँ कार्य करने वाले सभी अपनी सुविधा एवं इच्छानुसार पहुंचेंगे और दूसरों के लिए असुविधा का कारण बनेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति को यह अवश्य समझ लेना चाहिए कि जो असुविधा एवं खिन्नता उन्हें दूसरों का इन्तजार करने में होती है शायद वही असुविधा एवं खिन्नता दूसरों को भी उनके देर से पहुंचने पर होगी। उदाहरण के लिए बैंक अथवा किसी अन्य कार्यालय में किसी अधिकारी के देर से आने पर यदि कार्य देर से शुरू हो तो वहाँ पर इन्तजार कर रहे व्यक्तियों को किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यह उस व्यक्ति से अच्छा और कोई नहीं जान सकता।

कई कार्य स्थल तो ऐसे हैं जहाँ पर यदि देर से पहुँचा जाए तो कार्य में विलम्ब तो होगा ही उसके साथ-साथ हम अनेक व्यक्तियों के लिए एक गलत उदाहरण बनेंगे। उदाहरण के लिए स्कूल, कॉलेज आदि में यदि शिक्षक देर से पहुँचेंगे तो वह विद्यार्थियों के लिए क्या उदाहरण बनाएँगे। इस प्रकार कुछ व्यक्तियों की लापरवाही के कारण अनेक विद्यार्थी अनजाने ही समय की पाबन्दी को अपना जीवन मूल्य नहीं बना पाते हैं।

3. पूर्ण समय तक कार्यालय में उपस्थित रहना (Full time duty at work place): कई व्यक्ति प्रायः यह समझते हैं कि कार्यालय में समय पर पहुँचकर अपनी उपस्थिति लगाने से उनका काम पूरा हो गया है। यह धारणा एकदम गलत है क्योंकि कार्यालय के समय के अनुसार पूरे समय अपनी जगह पर बैठना तथा कार्य करना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि कार्यालय में समय पर पहुँचना तथा समय से बाहर निकलना।

प्रत्येक कर्मचारी के लिए यह आवश्यक है कि वह पूरे दिन में सम्पन्न किए जाने वाले कार्यों की सूची बना ले और इस बात का प्रयत्न करे कि जो कार्य उसे आज पूरा करना है वह उसे कल के लिए न छोड़े। प्रत्येक कर्मचारी चाहे वह अधिकारी हो या क्लर्क हो अथवा किसी मिल में मजदूर हो या मालिक हो, अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से इस आदत को डाल ले तो कार्यक्षमता बढ़ने के साथ-साथ देश की उन्नति होगी और देखते ही देखते भारत की गिनती विकासशील देशों से विकसित देशों में हो जाएगी।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

4. कार्य में निपुणता होना (Efficiency in work): किसी भी कार्य को सफलता से करने के लिए कार्य में निपुणता होना अति आवश्यक है। आप इस बात को भली प्रकार से जानते हैं कि बीमार होने पर यदि हम दवाई किसी प्रशिक्षित डॉक्टर की अपेक्षा नीम हकीम से लें तो बीमारी ठीक होने के स्थान पर अधिक उग्र भी हो सकती है। प्रायः कार्य का पूर्ण ज्ञान न होने पर कार्य कुशलता तो कम होगी ही अपितु कार्य के परिणाम भी उत्तम नहीं होंगे।

किसी अधिकारी को अपने कार्य का पूर्ण ज्ञान न होने पर या तो उसे हर समय अन्य साथियों से पूछना पड़ेगा या फिर जैसे-तैसे गलत-सही कार्य को सम्पन्न करना पड़ेगा। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने काम को भली प्रकार जानता है वह कम समय में ही कार्य को भली प्रकार सम्पन्न करके दूसरों के लिए उदाहरण बन सकता है।

5. शिष्ट भाषा का प्रयोग करना (Use of disciplined language): प्रत्येक व्यक्ति को सदैव शिष्ट भाषा का प्रयोग करना चाहिए। शिष्ट भाषा का प्रयोग न केवल कार्यस्थल में अपितु घर, परिवार में व साथियों में करना भी वांछनीय है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रथम आईना उसकी भाषा है। कोई चाहे कितना भी. शिक्षित हो, ऊँचे से ऊँचे पद पर हो या आयु में बड़ा हो, वह एक शिष्ट व्यक्ति तभी माना जाएगा जब उसमें अन्य वांछित गुणों के साथ-साथ शिष्टतापूर्वक विनम्र भाषा में बोलने का गुण हो।

विनम्र भाषा एक अच्छे व्यक्तित्व की प्रथम पहचान है। एक अमिट छाप तभी छोड़ी जा सकती है जबकि आपकी भाषा व बोलचाल विनम्र एवं शिष्ट हो। विनम्रता से बोलने के लिए हमें किसी को भी कुछ नहीं देना पड़ता है परन्तु उससे हमें दूसरों से आदर, दोस्ती जैसी अमूल्य चीजें सहज ही मिल जाती हैं।ऐसे कार्यालय जहाँ प्रतिदिन हमें दूसरे व्यक्तियों का सामना करना पड़ता है वहाँ तो भाषा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

एक दुखी व्यक्ति जब कोई समस्या लेकर किसी अधिकारी के पास पहुँचता है तो चाहे वह अधिकारी उसका काम करे अथवा नहीं परन्तु उसके सहानुभूति भरे दो चार विनम्र शब्द ही उस व्यक्ति के आधे दुख को कम कर देते हैं। प्रायः रोगी जब डॉक्टर के पास पहुँचकर उसे रोग के बारे में बता देता है और डॉक्टर उसके रोग के बारे में सुनकर उसे प्यार भरे शब्दों में समझाता है तो रोगी का आधा रोग तो उसी समय दूर हो जाता है।

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प्रश्न 2.
कार्य करते समय किस प्रकार के कार्याचार का पालन करने की आवश्यकता होती है ?
उत्तर:
1. कार्य को भली-भांति समझना (Absolutely knowing the work): किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पहले उस कार्य को पूरी तरह जान लेना अति आवश्यक है। कार्य के बारे में पहले पूरी रूपरेखा बनानी चाहिए। उस रूपरेखा के अनुसार ही कार्य करना चाहिए। यह जानकारी प्राप्त करनी चाहिए कि इस कार्य को पूरा करने में क्या-क्या सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी, किन-किन विधियों का प्रयोग किया जाएगा इत्यादि। यदि कार्य करने की सही विधि का चुनाव किया जाए तथा कार्य में प्रयोग आने वाली सामग्री पहले से ही प्राप्त कर ली जाए तो कार्य बड़ी कुशलता से और शीघ्र पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार से किया गया कार्य कर्मी को प्रसन्नता तथा सन्तुष्टि देता है।

2. कार्य के समय में कार्य पूरी निष्ठा से करना (Devotion in work while working): कार्य नैतिकता का यह एक महत्त्वपूर्ण पद है। कर्मी को कार्य के समय पर पूरी निष्ठा से कार्य करना चाहिए बहुधा देखा गया है कि कर्मी या तो कार्यस्थल पर देर से आते हैं या अपनी जगह पर नहीं मिलते या अपने सहकर्मियों के साथ गप्पें मारते या चाय, सिगरेट इत्यादि पीते रहते हैं।

इस प्रकार के व्यवहार से न तो कार्य पूरा होता है और न ही कार्य की अधिकता के कारण उसमें कार्य के प्रति सन्तुष्टि की भावना रहती है। कार्यालय के अधिकारी भी ऐसे कर्मी को डाँट-डपट करते हैं जिससे उसमें अशान्ति पैदा हो जाती है। इसलिए यह बहुत ही आवश्यक है कि काम के समय कर्मी अपनी जगह मौजूद रहे और कार्य को पूरी लगन तथा निष्ठा से करे। ऐसा करने से उसे कार्य सन्तुष्टि (Work satisfaction) मिलती है।

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3. अनुशासनप्रिय होना (Discipline oriented): प्रत्येक कर्मी को अपने कार्यालय के नियमों का पालन करना ही अनुशासनप्रियता है। कार्यालय समय पर पहुँचना, कार्य के समय कार्य ही करना, कार्यालय में धूम्रपान न करना इत्यादि अनुशासन की कसौटियाँ हैं। परन्तु आमतौर पर देखा गया है कि कर्मी में बहुधा अनुशासनहीनता पायी जाती है जिसके कारण कार्यालय के कार्य उचित प्रकार से नहीं होते। इस प्रकार के कर्मचारियों को उचित प्रकार की प्रेरणा तथा दबाव-विधियों के प्रयोग से अनुशासित किया जाना चाहिए ताकि उस कार्यालय का कार्य सुचारु रूप से हो सके।

4. अपने ज्ञान को आधुनिक बनाना (Making the knowledge modern): यह एक मनोवैज्ञानिक कहावत है कि मनुष्य जीवन भर सीखता रहता है। यह कहावत बिल्कुल सही है। यदि कोई व्यक्ति यह सोचता है कि उसे जितना सीखना था, वह सीख चुका है तो यह उसकी भ्रान्ति है। ऐसा सोचने से जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता, परन्तु दूसरी ओर कोई व्यक्ति इस कहावत के अनुसार अपने ज्ञान में वृद्धि करता है तो उसको अपने कार्य करने में सरलता तथा सुविधा का आभास होता है और वह कार्य को अच्छी तरह करके अपने अधिकारियों तथा कर्मचारियों से प्रशंसा प्राप्त करता है। जैसे कि आजकल कम्प्यूटर का बोलवाला है और बैंक का कार्य करने वाला कम्प्यूटर की सहायता से शीघ्र तथा ठीक प्रकार से खातों का चालन कर सकता है वनिस्पत उसके जिसे कम्प्यूटर का ज्ञान नहीं है। इसलिए प्रत्येक कर्मी को अपने कार्य को सकुशल पूरा करने के लिए अपने ज्ञान को आधुनिक बनाना अति आवश्यक है।

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5. अच्छा तथा मधुर व्यवहार (Good and soft behaviour): यदि आप चाहते हैं कि अन्य लोग आपके साथ अच्छा तथा मधुर व्यवहार करें, तो आपको उनके साथ भी अच्छा तथा मधुर व्यवहार करना होगा। कार्यालय का वातावरण अच्छा तथा मधुर बनाने के लिए आपको अपने सहकर्मी तथा आगन्तुकों के साथ मित्रतापूर्ण, सहयोगी तथा मधुर व्यवहार करना होगा। इस प्रकार का वातावरण नम्र भाषा के प्रयोग तथा सेवाभाव से बन सकता है। यदि आपके कार्यालय में वातावरण अच्छा, मधुर है तो आपको ऐसे वातावरण में काम करके सन्तुष्टि प्राप्त होगी और कार्य भी सुगमता से होगा। इसके विपरीत यदि कार्यालय का वातावरण खराब होगा तो उससे आपके तथा आपके अन्य सहकर्मियों की कार्यकुशलता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा कार्य की गति भी धीमी होगी।

6. कार्य को सेवाभाव से करना (Working with devotion): आप चाहे किसी भी कार्यालय में कार्य कर रहे हों या जो भी कार्य कर रहे हों, वह किसी-न-किसी के हित में होता है। यदि कर्मी वह कार्य सेवाभाव से करे तो उसे उस कार्य को करके सन्तुष्टि प्राप्त होगी क्योंकि उसमें यह भावना आएगी कि मैंने इस कार्य को करके उस जरूरतमन्द व्यक्ति की सेवा की है, यह भावना अपने आप में सन्तुष्टि देती है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि कर्मी किसी भी कार्य को करते समय सेवा भाव की भावना से प्रेरित हो तथा इसी भावना के अनुसार कार्य कों
पूरा करे।

7. टीम की भावना का होना (Team Spirit): किसी भी कर्मी को किसी समूह में कार्य करना होता है। उस समूह के यदि सभी कर्मी मिल-जुलकर कार्य करें तो कार्य शीघ्र हो जाएगा तथा उसमें उत्पन्न बाधाएँ भी शीघ्र ही दूर हो जाएंगी। यह सहयोग समूह के सभी सदस्यों की ओर से आना चाहिए चाहे वे समूह का मालिक हों या कार्यकर्ता। यदि टीम भावना से किया . जाता है तो इसमें कर्मियों की कमियाँ भी ढंक जाती हैं और कार्य भी पूरा हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

Bihar Board Class 11 Philosophy तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सत्य कथन को चुनें –
(क) आकारिक सत्यता वास्तविक सत्यता के लिए आवश्यक है
(ख) वास्तविक सत्यता आकारिक सत्यता के लिए आवश्यक नहीं है
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) (क) एवं (ख) दोनों

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प्रश्न 2.
‘Logike’ किस भाषा का शब्द है?
(क) ग्रीक
(ख) लैटिन
(ग) ग्रीक एवं लैटिन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ग्रीक

प्रश्न 3.
निगमन तर्कशास्त्र में हम जाते हैं –
(क) सामान्य से विशेष की ओर
(ख) विशेष से सामान्य की ओर
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सामान्य से विशेष की ओर

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प्रश्न 4.
आगमन तर्कशास्त्र में हम जाते हैं –
(क) सामान्य से विशेष की ओर
(ख) विशेष से सामान्य की ओर
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) विशेष से सामान्य की ओर

प्रश्न 5.
धुआँ देखकर हमें आग का ज्ञान होता है। यह उदाहरण है –
(क) अनुमान का
(ख) प्रत्यक्ष का
(ग) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) अनुमान का

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प्रश्न 6.
निगमन तर्कशास्त्र का सम्बन्ध है –
(क) आकारिक सत्यता से
(ख) वास्तविक सत्यता से
(ग) उपर्युक्त दोनों से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आकारिक सत्यता से

प्रश्न 7.
तर्कशास्त्र की उपयोगिता है –
(क) परिशोधनात्मक
(ख) सृजनात्मक
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) परिशोधनात्मक

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प्रश्न 8.
तर्कशास्त्र है –
(क) आदर्शमूलक विज्ञान
(ख) भौतिक विज्ञान
(ग) यथार्थ विज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आदर्शमूलक विज्ञान

प्रश्न 9.
सोने का पहाड़, उड़ता घोड़ा, दूध की नदी आदि जैसे विचार हैं –
(क) आकारिक सत्य
(ख) वास्तविक सत्य
(ग) आकारिक एवं वास्तविक सत्य
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आकारिक सत्य

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प्रश्न 10.
“तर्कशास्त्र तर्क करने की कला एवं विज्ञान दोनों है।” यह किसने कहा था?
(क) हेटली ने
(ख) हैमिल्टन ने
(ग) थॉमसन ने
(घ) मिल ने
उत्तर:
(क) हेटली ने

प्रश्न 11.
“तर्कशास्त्र विचार के नियमों का विज्ञान है।” यह परिभाषा किसने प्रस्तुत की थी?
(क) हेटली
(ख) हैमिल्टन
(ग) थॉमसन
(घ) एलड्रिच
उत्तर:
(ग) थॉमसन

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प्रश्न 12.
“तर्क करने की कला को तर्कशास्त्र कहते हैं।” यह किसकी उक्ति है?
(क) एलड्रिच
(ख) थॉमसन
(ग) हेटली
(घ) यूबरबेग
उत्तर:
(क) एलड्रिच

प्रश्न 13.
“तर्कशास्त्र विचार के आकार सम्बन्धी नियमों का विज्ञान है।” यह कथन किसका
(क) हैमिल्टन
(ख) थॉमसन
(ग) एलड्रिच
(घ) किसी का नहीं
उत्तर:
(क) हैमिल्टन

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प्रश्न 14.
‘उड़ता घोड़ा’ यह विचार किसकी सत्यता को प्रस्तुत करेगा?
(क) आकारिक सत्यता
(ख) वास्तविक सत्यता
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आकारिक सत्यता

प्रश्न 15.
दैनिक जीवन में सत्य को क्या कहते हैं?
(क) आकारिक सत्य
(ख) वास्तविक सत्य
(ग) व्यावहारिक सत्य
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ग) व्यावहारिक सत्य

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प्रश्न 16.
“तर्कशास्त्र सभी कलाओं की कला है” यह किसने कहा था?
(क) डन्स स्कॉटस (Duns Scotus)
(ख) हैटली
(ग) हैमिल्टन
(घ) एलड्रिच
उत्तर:
(क) डन्स स्कॉटस (Duns Scotus)

प्रश्न 17.
सभी जीव मरणशील है। घोड़ा एक जीव है। घोड़ा मरणशील है। उपरोक्त में किस प्रकार सत्यता समाहित है?
(क) वास्तविक (Natural truth)
(ख) आकारिक सत्यता (Formal truth)
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 18.
तर्कशास्त्र का उद्देश्य है –
(क) सत्य की प्राप्ति एवं असत्य का निराकरण
(ख) सत्य की प्राप्ति
(ग) असत्य का निराकरण
(घ) अनुमान करना
उत्तर:
(क) सत्य की प्राप्ति एवं असत्य का निराकरण

Bihar Board Class 11 Philosophy तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तर्कशास्त्र के दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
तर्कशास्त्र के दो लाभों की चर्चा हम इस प्रकार कर सकते हैं-प्रथम, प्रत्येक विज्ञान को तार्किक नियमों से परिचित होना आवश्यक है; यह परिचय तर्कशास्त्र से ही मिल पाता है। दूसरा, तर्कशास्त्र के अध्ययन से मानसिक व्यायाम हो जाता है।

प्रश्न 2.
व्यावहारिक सत्य क्या है?
उत्तर:
जो दैनिक जीवन में सत्य हो, उसे व्यावहारिक सत्य कहते हैं। जैसे – ईश्वर, जीव एवं जगत् इत्यादि।

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प्रश्न 3.
तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र वह विज्ञान है जो अनुमान के व्यापक नियमों तथा अन्य सहायक मानसिक क्रियाओं का अध्ययन इस ध्येय से करता है कि उनके व्यवहार से सत्यता की प्राप्ति हो।

प्रश्न 4.
थॉमसन के अनुसार तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
थॉमसन के अनुसार तर्कशास्त्र विचार के नियमों का विज्ञान है।

प्रश्न 5.
हेमिल्टन के अनुसार तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
हेमिल्टन के अनुसार, “तर्कशास्त्र विचार के आकार सम्बन्धी नियमों का विज्ञान है।” (Logic is the science of the formal laws of thought)

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प्रश्न 6.
एलचि के अनुसार तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
एलचि के अनुसार, “तर्कशास्त्र तर्क करने की कला है।” (Logic is the art of reasoning)

प्रश्न 7.
यूबरबेग के अनुसार तर्कशास्त्र की क्या परिभाषा है?
उत्तर:
“तर्कशास्त्र मानव-ज्ञान के व्यवस्थापरक नियमों का विज्ञान है।” (Logic is the science of the regulative laws of human knowledge)

प्रश्न 8.
ह्वेटली ने तर्कशास्त्र की क्या परिभाषा दी?
उत्तर:
हेटली ने तर्कशास्त्र की परिभाषा इस प्रकार दी, “तर्कशास्त्र तर्क करने का विज्ञान और कला है।” (Logic is the science and also the art of reasoning)

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प्रश्न 9.
Logic शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र को अंग्रेजी में (Logic कहा जाता है, जो ग्रीक भाषा के विशेषण Logike (लॉजिकी) से आया है। यह शब्द पुनः ग्रीक संज्ञा Logos से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है ‘विचार’ या ‘शब्द’।

प्रश्न 10.
आकारिक सत्यता (Formal Truth) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आकारिक सत्य (Formal Truth) केवल हमारे विचारों में या मानसिक प्रदेश में होता है। इस प्रकार के सत्य में हमारे विचारों के बीच संगति रहती है। यह कोई आवश्यक नहीं है कि हमारे विचारों के अनुरूप बाह्य विश्व में कोई वस्तु अस्तित्ववान हो ही। जैसे-सोने का पहाड़, उड़ता घोड़ा आदि।

प्रश्न 11.
वास्तविक सत्यता (Material Truth) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब हमारे मन में विद्यमान विचारों के अनुरूप ही बाह्य विश्व में उस विचार से मिलता-जुलता कोई पदार्थ अस्तित्ववान होता है तब उसे वास्तविक सत्य (Material Truth) कहते हैं। इसकी जाँच निरीक्षण एवं प्रयोग से संभव है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तर्कशास्त्र की ‘आकारिक सत्यता’ का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र में आकारिक सत्यता का तात्पर्य ‘उस तरीका से है जिसके द्वारा हम किसी वस्तु पर विचार करते हैं’ (The way in which we think about a thing) तर्कशास्त्र अनुमान से सम्बद्ध है और अनुमान का भी एक आकार होता है। अनेक अर्थशास्त्रियों का यह मानना है कि तर्कशास्त्र का सम्बन्ध केवल अनुमान के आकार से रहता है। उनके अनुसार यदि तर्कशास्त्र का विषय वास्तविक दृष्टि से सही नहीं भी हो, तब भी तर्कशास्त्र इस बात पर बल देता है कि अनुमान के नियमों का पालन अवश्य हो, जैसे –

All men are dogs
Sohan is a man
∴ Sohan is a dog

उपर्युक्त अनुमान आकारिक रूप में सत्य है क्योंकि इसका निष्कर्ष आधार वाक्य पर आधारित तथा तार्किक नियम के अनुकूल है। इस तर्क की प्रक्रिया में तर्कशास्त्र की आकारिक सत्यता दिखाई पड़ती है।

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प्रश्न 2.
क्या तर्कशास्त्र कला है?
उत्तर:
डन्स स्कॉटस (Duns Scotus) का कथन है कि तर्कशास्त्र सभी कलाओं की कला इसलिए है, क्योंकि यह सबसे अधिक ‘सामान्य कला’ है। इसे ‘सामान्य’ इसलिए कहा जाता है। क्योंकि इसमें प्रत्येक कला का मूल तत्त्व सामान्य रूप से पाया जाता है। प्रत्येक कला का एक निश्चित लक्ष्य होता है तथा उस लक्ष्य की प्राप्ति के कुछ नियम होते हैं। सत्य की प्राप्ति के लिए तर्कशास्त्र में जिन-जिन नियमों व सिद्धान्तों का सहारा लिया जाता है, उन सभी नियमों का अनुसरण अन्य कलाओं में भी किया जाता है।

कला हमें कोई कार्य करना सिखाती है। तैरना एक कला है जिसके कुछ नियम हैं तथा उन नियमों का पालन करने से ही कोई व्यक्ति तैराक बन सकता है। जिस प्रकार संगीतकला संगीत सिखाती है, नृत्यकला नृत्य सिखाती है; उसी प्रकार तर्कशास्त्र तर्क करना सिखाता है। यह कलाओं की कला इस अर्थ में है कि सभी कलाओं में अनुमान के सहारे कलाओं के नियमों की व्यापकता सिद्ध की जाती है और तर्कशास्त्र अनुमान पद पर आधारित होता है।

प्रश्न 3.
शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार तर्कशास्त्र का क्या अर्थ है?
उत्तर:
ग्रीक भाषा के ‘Logike शब्द से अंग्रेजी का ‘Logic’ वना है। ‘Logike’ विशेषण शब्द है जिसका संज्ञा रूप ‘Logos’ होता है। ‘Logos’ का अर्थ विचार (thought) और शब्द (word) दोनों होता है। इस प्रकार हम शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार यह कह सकते हैं कि ‘Logic’ (तर्कशास्त्र) उन विचारों का शास्त्र है जो विचार शब्दों में व्यक्त होते हैं। तर्कशास्त्र में हम विचारों को शुद्ध रूप में शब्दों में व्यक्त करते हैं। भाषा में व्यक्त तर्क यदि युक्तिसंगत होता है तो हमें सही निष्कर्षों की प्राप्ति होती है।

शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार ‘Logic’ शब्दों में व्यक्त वह विज्ञान है जो नियमों का निर्धारण भाषा के अनुसार करता है। यदि हम यह कहें कि ‘बर्फ जल रही है’ तो बर्फ के साथ जलना कहना व्याघातक हो जाता है, क्योंकि आग के साथ जलना शब्द कहना ही युक्तिसंगत है। अतः ‘बर्फ जल रही है’ कहना तार्किक नियमों के अनुकूल नहीं है। इसलिए शब्दों में ऐसा व्यक्त करना अशुद्ध है। इस प्रकार तर्कशास्त्र का अर्थ हुआ भाषा में अभिव्यक्त विचारों के वे शब्द जो तार्किक नियमों के अनुकूल और युक्तसंगत हों।

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प्रश्न 4.
अनुमान क्या है?
उत्तर:
जो ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित होता है, उसे अनुमान कहते हैं। तर्कशास्त्र की भाषा में अनुमान को इस तरह परिभाषित किया गया है … “अनुमान वह ज्ञान है जिसमें सामने दिये हुए तथ्यों से उसके पीछे के कारणों को जाना जाता है और उसके आधार पर जो सामने .. नहीं है उस तथ्य का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।” अनुमान दो शब्दों के मेल से बना है-अनु का अर्थ है ‘बाद’ और मान का अर्थ है ‘ज्ञान’। इस प्रकार अनुमान का शाब्दिक अर्थ हुआ-‘बाद का ज्ञान’।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष ज्ञान के बाद का ज्ञान ही अनुमान है। उदाहरण के लिए–‘सभी मनुष्य मरणशील हैं – इस तथ्य के आधर पर हम अनुमान (तर्कशास्त्रीय अर्थ में) द्वारा किसी भी व्यक्ति की मरणशीलता का ज्ञान प्राप्त करते हैं। धुएँ को देखकर हम आग का ज्ञान प्राप्त करते हैं। आग होने का ज्ञान अनुमानजन्य ज्ञान है जो धुएँ का ज्ञान होने के बाद हुआ। धुएँ को देखकर हम यह तर्क करते हैं जहाँ-जहाँ धुआँ, वहाँ-वहाँ आग। यहाँ धुआँ यहाँ आग।

प्रश्न 5.
तर्कशास्त्र सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक विज्ञान दोनों है। कैसे?
उत्तर:
तर्कशास्त्र सैद्धान्तिक विज्ञान इसलिए है कि इसमें विभिन्न सिद्धान्तों के द्वारा सत्य-असत्य की जानकारी की जाती है। तर्कशास्त्र अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन आगमनात्मक और निगमनात्मक विधि द्वारा निरीक्षण और विश्लेषण के आधार पर सामान्यीकरण के अनुसार करता है। तर्कशास्त्र सैद्धान्तिक विज्ञान इसलिए है कि इसमें सिद्धान्तों के अनुकूल तर्क किया जाता है और सही ज्ञान की प्राप्ति की जाती है।

तर्कशास्त्र केवल तर्क का शास्त्र नहीं है बल्कि उन सिद्धान्तों का भी विज्ञान है जो तर्क करने में सहायता पहुँचाते हैं। हैमिल्टन ने तर्कशास्त्र को सैद्धान्तिक विज्ञान मानते हुए इन शब्दों में परिभाषित किया है, “तर्कशास्त्र विचार के आकारिक नियमों का विज्ञान है” (Logic is the science of the formal laws of thought)।

तर्कशास्त्रं व्यावहारिक विज्ञान इसलिए है, क्योंकि इसमें तर्क के द्वारा जीवन के व्यावहारिक पक्ष की समस्याओं का हल प्रस्तुत किया जाता है। तर्कशास्त्र का सम्बन्ध अनुमान से है और अपने ‘ व्यावहारिक जीवन में हमें अनुमान की आवश्यकता पड़ती है। विचार करना, तर्क करना मनुष्य के स्वाभाविक गुण हैं, जिस प्रकार बोलना, हँसना, रोना, भूख लगना आदि। चूँकि तर्क करना। हमारे व्यवहार का एक आवश्यक अंग है, इसलिए तर्कशास्त्र एक पूर्ण व्यावहारिक विज्ञान भी है जिसके द्वारा हम व्यवहार के नियमों के शुद्ध निष्कर्ष तक पहुँच पाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तर्कशास्त्र की विभिन्न परिभाषाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रायः देखा गया है कि, “तर्कशास्त्र में जितने लेखक हैं उतनी ही इसकी परिभाषाएँ दी गई है और सबों में कुछ-न-कुछ दोष अवश्य पाया जाता है। इसमें से प्रमुख दोषयुक्त निम्नलिखित परिभाषाओं को रखा जा सकता है जो या तो संकुचित हैं, या वृहत् –

1. थॉमसन के अनुसार:
Logic is the science of the laws of thought अर्थात् “तर्कशास्त्र विचार के नियमों का ‘विज्ञान है।” इस परिभाषा में तर्कशास्त्र को केवल विज्ञान कहा गया है। जबकि तर्कशास्त्र की दूसरी त्रुटि है कि इसे विचार का विज्ञान कहा गया है। जबकि ‘विचार’ बहुत व्यापक शब्द है। अतः यह वृहत् (Wide) परिभाषा है।

2. हैमिल्टन के अनुसार:
Logic is the science of the formal laws of thought Hamilton:
अर्थात् तर्कशास्त्र विचार के आकार संबंधी नियमों का विज्ञान है। इससे भी तर्कशास्त्र को सिर्फ विज्ञान माना गया है परन्तु हम जानते हैं कि तर्कशास्त्र विज्ञान के साथ ही कला भी है।

यह भी स्पष्ट है कि तर्कशास्त्र का संबंध केवल आकारिक सत्यता से ही है क्योंकि इसको आकार संबंधी नियमों का ही विज्ञान कहा गया है। परन्तु हम जानते हैं कि तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ आकारिक सत्यता (Formal truth) से ही नहीं, बल्कि वास्तविक सत्यता (Natural truth) से भी उतना ही है, अतः यहाँ तर्कशास्त्र का क्षेत्र बहुत व्यापक कर दिया गया है, जो अनुचित है।

3. एल्ड्चि के अनुसार:
Logic is the art of reasoning-Aldrich:
अर्थात् तर्कशास्त्र तर्क की कला है।

(क) इस परिभाषा में तर्कशास्त्र को केवल कला ही कहा गया है, जबकि तर्कशास्त्र विज्ञान भी है। जिसकी चर्चा भी नहीं की गई है, अतः यह परिभाषा संकीर्ण है।

(ख) संकीर्णता के अलावा इस परिभाषा में सिर्फ क्रियात्मक पक्ष का ही जिक्र किया गया है जबकि सिद्धान्त पक्ष की ओर भी निर्देश करना चाहिए था।

(ग) इस परिभाषा से यह ज्ञात होता है कि तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ तर्क (Reasoning) से ही है परन्तु ऐसी बात सही नहीं है। तर्कशास्त्र से संबंध तर्क में सही पता पहुँचाने वाली अन्य क्रियाओं जैसे परिभाषा, विभाग, वर्गीकरण, नामकरण इत्यादि से भी है। लेकिन इन क्रियाओं पर एल्ड्रिच महोदय ने विचार ही नहीं किया।

4. अलबर्ट्स मैगनस के अनुसार:
Logic is the science of argumentation Albertus Magnus अर्थात् तर्कशास्त्र तर्क का विज्ञान है। यह परिभाषा भी संकुचित है क्योंकि यहाँ तर्कशास्त्र के सभी आवश्यक एवं सामान्य गुणों का वर्णन नहीं किया गया है।

5. स्पैल्डिंग के अनुसार:
Logic is the theory of inference-Spalding-अर्थात् तर्कशास्त्र अनुमान का सिद्धान्त है। यह परिभाषा भी संकुचित ही है।

6. अरनॉल्ड के अनुसार:
Logic is the science of understanding in the pur suit of truth-Arnauld:
अर्थात् तर्कशास्त्र बुद्धि विषयक विज्ञान है जिसके द्वारा सत्य की प्राप्ति की जाती है। इस परिभाषा में भी दोष है।

(क) यहाँ सैद्धान्तिक पक्ष पर जोर दिया गया है और क्रियात्मक पक्ष को छोड़ दिया गया है जबकि तर्कशास्त्र सिद्धान्त और क्रिया दोनों से संबंधित है।
(ख) इस परिभाषा में ‘सत्य’ शास्त्र का प्रयोग किया गया है परन्तु यह स्पष्ट नहीं बताया गया है कि इस सत्य में सत्य के दोनों ही पहलू (आकारिक सत्यता और वास्तविक सत्यता) समाविष्ट है या नहीं। अतः ‘सत्य’ शब्द संदिग्ध है।

7. ह्वेटली के अनुसार:
Logic is the art and science of reasoning-Whately:
अर्थात् तर्कशास्त्रा तर्क की कला एवं विज्ञान है। यह भी दोषयुक्त परिभाषा ही है। इसमें अनुमान की चर्चा तो हुई है किन्तु अन्य सहायक क्रियाओं, जैसे विभाजन, परिभाषा, वर्गीकरण आदि की चर्चा नहीं की गई है। अतः यह भी संकुचित परिभाषा है।

8. यूबरवेग के अनुसार:
Logic is the science of the regulative laws of human knowledge-Ueberweg:
अर्थात् तर्कशास्त्र मानव ज्ञान के नियंत्रणात्मक नियमों का विज्ञान है। इस परिभाषा में वृहत् परिभाषा का दोष है। तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ अनुमान से है प्रत्यक्ष से नहीं। परन्तु इस परिभाषा के अनुसार इसे मानव ज्ञान का शास्त्र बतलाया गया है। मानव-ज्ञान बहुत ही विस्तृत शब्द है। अतः इसमें वृहत् परिभाषा का दोष है।

9. पोर्ट-रॉयल लॉजिक के अनुसार:
Logic is the science of the operation of the human understanding in the persuit of truths-Port Royal Logic:
अर्थात् तर्कशास्त्र मनुष्यों की आकस्मिक प्रक्रियाओं का वह विज्ञान है जिसके द्वारा सत्य की खोज की जाती है। यह परिभाषा भी दोषपूर्ण ही हैं इसमें तर्कशास्त्र का सम्बन्ध सभी मानसिक क्रियाओं में प्रत्यक्ष ज्ञान भी है। परन्तु तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ अनुमान से है। यह परिभाषा वृहत् (Wide) हो जाती है। दूसरा दोष है कि इसमें ‘सत्य’ शब्द भी है। यहाँ स्पष्ट करना था कि सत्य का अर्थ है आकारिक और वास्तविक सत्यता।

10. वेल्टन के अनुसार:
“Logic is science of the principles which regulate valid thought”-Welton:
अर्थात् तर्कशास्त्र उन सिद्धान्तों का विज्ञान है जिनके द्वारा सत्य विचारों का नियंत्रण होता है।

विश्लेषण:
वेल्टन की परिभाषा में निम्नलिखित गुण हैं।

(क) तर्कशास्त्र विज्ञान है क्योंकि यहाँ सिद्धान्तों का निरूपण तथा उनके द्वारा लक्ष्य प्राप्ति का प्रयास होता है।

(ख) इस परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि तर्कशास्त्र विज्ञान होने के साथ ही साथ कला भी है। इसमें तार्किक सिद्धान्तों के द्वारा सत्य की प्राप्ति की चेष्टा की जाती है।

(ग) यह एक आदर्श निर्धारक भी है। क्योंकि इसका लक्ष्य सत्य की प्राप्ति से है।

(घ) तर्कशास्त्र का संबंध तर्क करने के सिद्धान्तों से तो है ही साथ-ही-साथ तर्क करने में सहायता पहुँचाने वाली क्रियाओं परिभाषा, विभाजन, नामकरण, वर्गीकरण से भी इसका अभीष्ट सम्बन्ध है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इन परिभाषाओं में तर्कशास्त्र के सभी सामान्य एवं आवश्यक गुणों (Common essential qualities) का समावेश है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 2.
क्या तर्कशास्त्र विज्ञान है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र का अंग्रेजी शब्द Logic है। यह लौजिक शब्द ग्रीक भाषा के विशेषण Logike से बना है और इसका संज्ञा के रूप में Logos व्यवहार होता है। Logos का अर्थ ‘विचार’ (Thought) या ‘शब्द’ (Word) होता है। अर्थात् Logos का अर्थ Thought and word हुआ जिसका अर्थ विचार और शब्द से हुआ। अतः स्पष्ट सिद्ध है कि ‘विचार एवं शब्द’ में घनिष्ठ संबंध है। यहाँ पर हम तर्कशास्त्र को विचारों का शास्त्र कह सकते हैं।

विचारों को शब्दों में व्यक्त करना आसान काम नहीं है। क्योंकि मन में एक ऐसा भी विचार आ सकता है कि बर्फ जल रही है। लेकिन शब्द में व्यक्त कर देने पर यह युक्तिसंगत नहीं मालूम पड़ता है, क्योंकि बर्फ के साथ जलना कहना व्याघातक हो जाता है।

‘बर्फ जल रही है’ यह तार्किक नियमों के अनुकूल वाक्य नहीं है। शब्दों का उचित प्रयोग नहीं करना अशुद्ध है। अतः तर्कशास्त्र के बारे में कह सकते हैं कि तर्कशास्त्र का संबंध भाषा में अभिव्यक्त तर्क से है, अर्थात् तर्कशास्त्र वह आदर्शात्मक विज्ञान है जो नियमों का निर्धारण सत्य-असत्य के निर्णय के लिए करता है।

‘तर्कशास्त्र’ दो शब्दों के योग से बना है-‘तर्क और शास्त्र’। तर्क का अर्थ है ज्ञात से अज्ञात की ओर जाना। विचारों में सुव्यवस्थित सम्बन्ध हुआ या नहीं यह इसी पर निर्भर करता है कि हमारा तर्क युक्तिसंगत है या नहीं। नियमानुकूल तर्क करने पर ही शुद्ध निष्कर्ष की प्राप्ति होती है। अतः तर्कशास्त्र तर्क’ की शुद्धि एवं अशुद्धि का निर्णय करता है। जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
राम मनुष्य है।
∴ राम मरणशील है।

ऐसा निष्कर्ष निकालना अशुद्ध है। अब प्रश्न यह भी उठ सकता है कि ‘राम मरणशील है।’ यही निष्कर्ष क्यों शुद्ध है और ‘राम रोटी दूध खाता है’ यह निष्कर्ष क्यों अशुद्ध है? इसी तरह के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए तर्कशास्त्र का अध्ययन जरूरी हो जाता है। हम जो अनुमान करते हैं, निष्कर्ष निकालते हैं तब हमारा तर्क शुद्ध हुआ या अशुद्ध इसका निर्णय ‘तर्कशास्त्र’ ही करता है। इस तरह कुछ शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि तर्कशास्त्र तर्क को शुद्ध और अशुद्ध घोषित करने का एक मापदंड है।

अतः तर्कशास्त्र वह शास्त्र है जहाँ तर्क के सभी नियमों और सिद्धान्तों का विशद वर्णन है। इन्हीं नियमों और सिद्धान्तों के सहारे तर्क की लड़ी को शुद्ध एवं अशुद्ध सिद्ध किया जाता है। ‘ऊपर के उदाहरण में सभी मनुष्य मरणशील हैं, राम मनुष्य है, इसलिए राम मरणशील है। यही निष्कर्ष शुद्ध होगा और यह निष्कर्ष कि राम रोटी दूध खाता है, अशुद्ध होगा; क्योंकि ऐसा नियम है कि निष्कर्ष आधार-वाक्य से ही निकाले जाते हैं और वह निष्कर्ष इन आधार वाक्यों के अन्तर्गत ही होता है।

परिभाषा भी दो तरह की होती है –
(क) विश्लेषणात्मक और
(ख) संश्लेषणात्मक।

(क) विश्लेषणात्मक:
जब हम किसी वस्तु के अंग-प्रत्यंग का वर्णन अलग-अलग विस्तारपूर्वक करते हैं तब वह विश्लेषणात्मक कहलाती है।

(ख) संश्लेषणात्मक:
जब किसी वस्तु के सार गुणों का वर्णन कुछ ही सारगर्भित शब्दों द्वारा करते हैं तब उसे संश्लेषणात्मक कहते हैं।

तर्कशास्त्र की संश्लेषणात्मक (Synthetic) परिभाषा इस प्रकार दे सकते हैं:
“Logic is the science of reasoning as expressed in language for the attaiment of truth and avoidence of error.” अर्थात् तर्कशास्त्र भाषा में अभिव्यक्त तर्क का वह विज्ञान है जिसके द्वारा सत्य की प्राप्ति एवं दोष का परिहार किया जाता है। इस संश्लेषणात्मक परिभाषा का जब हम विश्लेषण करते हैं तब निम्नलिखित विशेषताएँ पाते हैं –

1. तर्कशास्त्र विज्ञान है:
Logic is the science:
विज्ञान विश्व के किसी खास विभाग के क्रमबद्ध (Systematic) ज्ञान को कहते हैं – Systematic knowledge of anything is called science. क्रमबद्ध का अर्थ होता है जो नियमों से बंधा हुआ हो।

अर्थात् विज्ञान में कुछ नियम होते हैं और जब कुछ निश्चित प्रणाली इन्हीं नियमों से बंधी रहती है, तब उसे हम नियमबद्ध कहते हैं और उस प्रकार का ज्ञान ही विज्ञान कहलाता है। इन नियमों के कारण ही विज्ञान में एक सिलसिला बंध जाता है और यह सिलसिला नियमों पर ही निर्भर करता है।

इसी तरह हम देखते हैं कि तर्कशास्त्र भी प्रकृति के एक खास विभाग से संबंधित है और यह विभाग है तर्क का। यह तर्क मन (mind) से संबंधित है। कोई भी अनुमान (Inference) सत्य है या असत्य, इसकी जाँच के पहले यह देखना जरूरी है कि वह तार्किक नियमों के अनुकूल है या प्रतिकूल। अनुमान तर्कसंगत रहने पर सत्य एवं प्रतिकूल रहने पर असत्य होता है। इस तरह तर्कशास्त्र इन्हीं कारणों से विज्ञान कहा गया है।

2. यह तर्क का विज्ञान है:
“It is the science of reasoning”:
तर्कशास्त्र को तर्क का विज्ञान इसलिए कहा गया है कि इसमें तर्क से संबंधित तर्क करने के अनेक नियम एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। अतः विभिन्न नियमों के प्रतिपादन एवं उसके अनुसार तर्क करने की रीति बताने के कारण तर्कशास्त्र को तर्क का विज्ञान कहा गया है।

3. तर्क को भाषा में व्यक्त करते हैं:
Reasoning is expressed in the language. तर्कशास्त्र का संबंध निर्णय से नहीं बल्कि भाषा में व्यक्त किये हुए निर्णय से है। यहाँ पर यह विचार करना जरूरी है कि जब हम मन-ही-मन सोचते हैं कि ‘बर्फ जल रही है’ तब मानसिक प्रदेश में इस प्रकार के निर्णय का संबंध तर्कशास्त्र से ही रहता है। तार्किक दृष्टि से सत्य या असत्य हम तभी कहते हैं जब निर्णय को व्यक्त किया जाता है। भाषा में व्यक्त हो जाती है तब वह तर्कशास्त्र के अधीन हो जाती है। मन के विचार को कई तरह से व्यक्त किया जाता है यथा लिखकर, बोलकर एवं इशारे से।

लेकिन जब हम कहते हैं कि तर्कशास्त्र का संबंध व्यक्त निर्णय (Expressed judgement) से है तब वहाँ व्यक्ति का संबंध इशारे से नहीं है। इशारे में मनोभाव को व्यक्त करना.तार्किक दृष्टि से सत्य या असत्य नहीं कहा जा सकता है। विचारों को बोलकर या लिखकर व्यक्त करना ही तर्कशास्त्र का विषय बनता है।

जब हम बर्फ जल रही है, ऐसा बोलते हैं या लिख देते हैं तव कहा जाता है कि वह तर्क संगत नहीं हुआ। इन्हीं कारणों से कहा गया है कि “Logic is concerned not with the process of though but with the product of thought” अर्थात् तर्कशास्त्र का संबंध विचारों की प्रक्रिया से नहीं बल्कि उनकी निष्पत्ति से है।

यहाँ प्रक्रिया और निष्पत्ति में अन्तर बताना जरूरी है। कागज बनाने की एक मशीन होती है। इस जगह फटे-पुराने कपड़े, बाँस की कोपलें या कागज संबंधी सामग्री रख दी जाती है और इसके बाद मशीन चला दी जाती है। इसके बाद उन सामग्रियों की पिसाई, बेलाई, सुखाई, कटाई एवं इसी तरह के कई पहलुओं से गुजरने के बाद कागज बन कर निकल आता है। यहाँ पर कागज निकलने के पहले जितने भी पहलू दिखाई देते हैं, वे सब प्रक्रियाएँ हैं और कागज निकलना ही निष्पत्ति है।

इसी तरह विचारों के साथ भी है। किसी अनुमान पर पहुँचने के लिए मानसिक क्षेत्र में अनेक प्रक्रियाएँ होती हैं, जैसे-कुछ विचारों को हटाना, कुछ को चुनना, कुछ को जोड़ना। फिर तार्किक नियमानुसार उन चुने विचारों में सुव्यस्थित संबंध देना। ये सब विचारों की प्रक्रियाएँ हैं और तब ये विचार सुसंगठित होकर अनुमान बनकर मन से निकल आते हैं अर्थात् शब्दों द्वारा व्यक्त हो जाते हैं तव ऐसे व्यक्त विचारों (expressed thought) को विचारों की निष्पत्ति (Product of thought) कहते हैं।

विचारों की इसी निष्पत्ति से तर्कशास्त्र का संबंध है। विचारों की प्रक्रियाओं से तर्कशास्त्र का संबंध नहीं है। जैसे बर्फ के साथ जलना का संबंध मानसिक प्रदेश में एक विचरण है जो विचारों की पक्रिया मात्र है।

तर्कशास्त्र उससे संबंधित नहीं है। परन्तु जब विचार छनकर आपस में संबंधित होकर मन से निकल आता है तब वह तर्कशास्त्र का विषय हो जाता है। बर्फ जल रही है, यह अतार्किक विचार है और बर्फ गल रही है, यही तार्किक विचार है। अतः तर्कशास्त्र भाषा में व्यक्त तर्क से संबंधित है (Resoning expressed in Language)।

4. इसके द्वारा सत्य की प्राप्ति होती है:
It attains truth-अर्थात् संश्लेषणात्मक (Synthetic) दृष्टि से विचार करने पर सत्य के संबंध में तीन विचार दिये गये हैं –

(क) चरम सत्य या परम सत्य (Ultimate truth):
इसमें केवल सत्य को ही चरम लक्ष्य के रूप में समझा जाता है। इस रूप में सत्य का अर्थ है ईश्वर, सत्य के ऐसे रूप का निरूपण तात्विक क्षेत्र में किया गया है जहाँ सत्य के अर्थ को मूलतः मूलतत्त्व (ultimate reality in the metaphysical field) ही समझते हैं।

(ख) व्यावहारिक सत्य (Practical truth):
इसका अर्थ इस सत्य से है जिसका संबंध जीवन के किसी अंग से है। यह सत्य संबंध-युक्त (Relative) हुआ करता है। अर्थात् एक दृष्टि से एक स्थान पर सत्य है तो दूसरी दृष्टि से दूसरे स्थान पर असत्य भी है। अतः व्यावहारिक जीवन में समयानुसार उपयोगिता की दृष्टि से इस सत्यता का महत्त्व होता है, जैसे संसार व्यावहारिक दृष्टि से सत्य है किन्तु चरम दृष्टि से, दिव्यदृष्टि से असत्य है।

(ग) तार्किक सत्य (Logical truth):
तार्किक सत्य का अर्थ उस सत्य से है जिसका सामंजस्य विचार एवं बाह्य जगत् से है। साथ-ही-साथ यह भी देखा गया है कि तार्किक नियमों से इसकी अनुकूलता है एवं इसमें व्याघातक विचारों की अवहेलना की गई है।

विश्लेषणात्मक (Analytical) ढंग से सत्य को हम दो खंडों में विभाजित कर अध्ययन करते हैं।

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth)
(ख) वास्तविक सत्यता (Matetial truth)।

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth):
आकारिक सत्य वह है जिसमें सत्यता केवल आकार में ही हो। जैसे एक फूल का चित्र बना दें तो इस चित्र में सिर्फ आकारिक सत्यता ही है। यह चित्र वास्तविक फूल नहीं है यह सिर्फ आकार में ही फूल है परन्तु एक फूल को टेबुल पर रख देते हैं तो वास्तव में फूल में वास्तविकता है।

इस आकारिक और वास्तविक सत्य को अर्थशास्त्र में क्रमशः बाह्य और आंतरिक (Facial and intrinsic) मूल्य कहा गया है और दर्शन शास्त्र में इसे दृश्य तथा तथ्य (appearance and reality) कहते हैं। जैसे यह जगत् जो हम देख रहे हैं झूठा है। यह दृश्य में ही सत्य है वास्तव में यह वैसा नहीं है, जैसा दीख रहा है। इसकी वास्तविकता का संबंध तो चिरंतन सत्य से है जो अदृश्य है किन्तु वास्तव में सत्य है। तर्कशास्त्र में सत्य के उन दोनों अंगों का नाम है आकारिक सत्य एवं वास्तविक सत्य। आकारिक सत्य का अर्थ है तार्किक नियमों की अनुकूलता, जैसे

सभी मनुष्य जानवर हैं।
राम मनुष्य है।
∴ राम जानवर है।

यह अनुमान आकारिक रूप में सत्य है क्योंकि इसका निष्कर्ष आधार वाक्य पर आश्रित एवं तार्किक नियमानुकूल है। अतः इस तर्क की प्रक्रिया में आकारिक सत्यता है।

(ख) वास्तविक सत्यता (Material truth):
वास्तविक सत्यता हेतु विचार एवं बाह्य जगत् में सामंजस्य होना आवश्यक है। जैसे जब हम कहते हैं कि फूल लाल है तब इसमें वास्तविक सत्यता है, क्योंकि इसमें जो लाल फूल की अवधारणा है उसी के अनुरूप बाह्य जगत् में भी ‘लाल देखने को मिलता है’, अतः बाह्य जगत् एवं अन्तर्जगत में अनुकूलता रहने की वह इसमें वास्तविकता है, जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
सभी भारतीय मनुष्य हैं।
∴ सभी भारतीय मरणशील हैं।

इस अनुमान में आकारिक सत्यता के साथ ही साथ वास्तविक सत्यता भी है। किन्तु आकारिक सत्यता के साथ वास्तविक सत्यता रह भी सकती है और नहीं भी रह सकती है जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
मोहन मनुष्य है।
∴ मोहन मरणशील है।

तो इसमें वास्तविक सत्यता के साथ-साथ आकारिक सत्यता भी है। परन्तु जब हम यह कहते हैं कि सभी मनुष्य जानवर हैं।

मोहन मनुष्य है।
∴ मोहन जानवर है।

तो इस अनुमान में आकारिक सत्यता तो है, परन्तु वास्तविक सत्यता नहीं है। तर्कशास्त्र में नियम प्रणाली से आकारिक सत्यता की प्राप्ति होती है तथा आगमन प्रणाली से वास्तविक सत्यता की। इस प्रकार आगमन एवं निगमन प्रणाली से पूर्ण सत्य की प्राप्ति ही तर्कशास्त्र का लक्ष्य है।

(v) तर्कशास्त्र दोष को हटाता है:
Logic avoids error:
तर्कशास्त्र का विषय अनुमान है और अनुमान शुद्ध होना चाहिए। अतः इससे स्पष्ट है कि तर्कशास्त्र का काम शुद्धता से भी है और कहा भी गया है – “Logic is a corrective science and not a creative science.” अर्थात् तर्कशास्त्र शुद्धात्मक विज्ञान है, सर्जनात्मक विज्ञान नहीं है। अनुमान को शुद्ध करने के. लिए बहुत से तार्किक नियमों का अनुसंधान किया गया है जिसके सहारे तर्क की प्रणाली को शुद्ध किया जाता है।

तर्क करने की शक्ति ईश्वरीय देन है। पर इसकी उत्पत्ति पर मनुष्यों का कुछ भी अधिकार नहीं है। तर्क करना और सुधार करना दोनों दो कार्य हैं। सृष्टि करना ब्रह्म का कार्य है और उसमें सुधार कर देना मनुष्य का काम है। इस तरह जिसमें तर्कशक्ति का अभाव है वह तार्किक नहीं हो सकता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 3.
आकारिक एवं वास्तविक सत्यता से आप क्या समझते हैं? अथवा, तर्कशास्त्र की विषय-वस्तु का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रत्यक्ष के आधार पर अप्रत्यक्ष के ज्ञान को अनुमान कहते हैं। अनुमान में अनु + मान दो शब्द हैं जिसका अर्थ है बाद का ज्ञान, अर्थात् किसके बाद का? उत्तर है – प्रत्यक्ष के बाद का। धुएँ को देखकर आग का ज्ञान अनुमान है। इसमें धुएँ का ज्ञान प्रत्यक्ष होता है और आग का ज्ञान अनुमान से प्राप्त करते हैं। जैसे –

जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ आग है।
यहाँ धुआँ है।
∴ यहाँ आग है।

इसी तरह सिगनल झुका हुआ देखकर गाड़ी के आने का अनुमान करते हैं। यहाँ गाड़ी अप्रत्यक्ष है, परन्तु झुके हुए सिगनल के प्रत्यक्ष से इस अप्रत्यक्ष का बोध होता है। अतः ज्ञानोपार्जन का अनुमान एक काव्य साधन है। इस तरह अनुमान करना हमारा स्वाभाविक धर्म है। बुद्धि विकास के साथ-साथ जीवन के अन्त तक अनुमान किया जाता है।

इस तरह हरेक व्यक्ति अनुमान करता है। छात्र-शिक्षक सभी अनुमान करते हैं कि अगर वे चार घंटा प्रतिदिन पढ़ेंगे तो प्रथम श्रेणी में पास कर जाएँगे। इसी तरह अच्छी वर्षा देखकर किसान अच्छी फसल होगी का अनुमान करते हैं। इस तरह ज्ञान का भंडार अनुमान से खूब भरता है। इस तरह ज्ञानोपार्जन के लिए अनुमान की बहुत महत्ता है।

परन्तु अनुमान का दोष यह भी है कि यह गलत भी हो सकता है। उमड़े हुए बादल को देखकर किसान वर्षा का अनुमान करते हैं किन्तु वर्षा नहीं होती है। किसी के मीठे-मीठे वचन को सुनकर हम उसके सज्जन होने का अनुमान करते हैं परन्तु वह दुर्जन रहता है और ठगने हेतु मीठे वचन का प्रयोग करता हैं इस तरह अनुमान असंदिग्ध ज्ञान नहीं दे पाता है। शंका की गुंजाइश रह जाती है। इसीलिए एक शास्त्र बना जिसे तर्कशास्त्र (Logic) कहते हैं जो सही-सही अनुमान करना सिखलाता है।

तर्कशास्त्र अनुमान का नियम प्रतिपादित करता है जिसका अनुशरण कर हम सत्य की प्राप्ति करते हैं। हम किस तरह सोचें, कैसे तर्क करें, कैसे अनुमान करें ताकि सत्य की प्राप्ति हो यही तर्क की समस्या है। तर्कशास्त्र में अनुमान के व्यापक क्रियाओं का वर्णन है। इन नियमों के अनुसार अनुमान करने पर वास्तविकता को प्राप्त करते हैं और गलती से छुटकारा पाते हैं।

इसलिए कहा गया है कि “Attainment of truth and avoidence of error are the aims of Logic” अर्थात् सत्य की प्राप्ति और असत्य का निराकरण ही तर्कशास्त्र का उद्देश्य है।

अतः अनुमान की सत्यता का अध्ययन तर्कशास्त्र में होता है। इससे साफ हो जाता है कि तर्कशास्त्र के अध्ययन का विषय अनुमान है। इसमें अनुमान संबंधी सारी समस्याओं को हल किया जाता है। अतः तर्कशास्त्र की विषय-वस्तु अनुमान है प्रत्यक्ष नहीं। तर्कशास्त्र का लक्ष्य है सत्यता की प्राप्ति करना और सत्य दो तरह के होते हैं –

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth) तथा
(ख) वास्तविक सत्यता (Material truth)।

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth):
जब हमारे विचारों में विरोध या संघर्ष नहीं होता है तो उनमें आकारिक सत्यता होती है। यहाँ एक भावना दूसरे के अनुकूल होती है। ऐसी भी हो सकता है कि उन विचारों या भावनाओं के अनुकूल बाहर में कोई वस्तु न हो। फिर भी विरोध निहित होने के कारण उनमें आकारिक सत्यता होती है, यथा-सोने का पहाड़, दूध-घी की नदी। यहाँ वास्तविक जगत् में सोने का पहाड़ और दूध-घी की नदी नहीं पाया जाता है। फिर भी इसमें आकारिक सत्यता हैं। ये विचार आपस में विरोधी नहीं हैं। वास्तविक जगत में सोने का पहाड़ नहीं पाया जाता है फिर भी इसकी आकारिक सत्यता है।

बहुत-सी भावनाएँ असंभव होती हैं। उनका विचार नहीं किया जा सकता है। जैसे वृत्ताकार वर्ग (circular square), बंध्या माता (barren mother) आदि। यहाँ वृत्त और वर्ग एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसी तरह बन्ध्या और माता कभी मेल नहीं खा सकते हैं। इनमें वास्तविक सत्यता तो है ही नहीं और आकारिक सत्यता भी नहीं है क्योंकि इनके बारे में सोचा नहीं जा सकता है। स्वर्णिम पर्वत, दूध की नदी, नाचता हुआ नगर, उड़ता हुआ घोड़ा आदि सबों में आकारिक सत्यता है क्योंकि इसकी कल्पनाओं में विरोध नहीं है।

हम इनके बारे में सोच सकते हैं। भले वे वास्तविक जगत् में नहीं पाये जाते हैं परन्तु विचार के जगत् में सत्य हैं। परन्तु वृत्ताकार वर्ग और बन्ध्या माता न तो वास्तविक जगत् में सत्य हैं और न विचार के जगत् में ही। ये असंभव धारणाएँ हैं। इनमें आकारिक सत्यता नहीं है।

(ख) वास्तविक सत्यता (Material truth):
जब विचारों या भावनाओं में मेल रहता है और उनके अनुकूल वस्तुएँ पायी जाती हैं तो उनमें वास्तविक सत्यता होती है। जैसे-‘लाल गुलाब’ एक वास्तविक सत्य है। यहाँ लाल और गुलाव की भावनाओं में विरोध नहीं बल्कि मेल है। लाल गुलाव वास्तविक सत्यता है। स्वर्णिम पहाड़ में आकारिक सत्यता है, वास्तविक सत्यता नहीं है परन्तु जिसमें वास्तविक सत्यता होती है उसमें आकारिक सत्यता भी होती है। परन्तु जिसमें आकारिक सत्यता हो उसमें वास्तविक सत्यता का होना जरूरी नहीं है।

जैसे वास्तविक गुलाव में गुलाब का आकार भी होता ही है, परन्तु कागज के गुलाब में गुलाब का आकार वास्तविक नहीं होती है। अर्थात वास्तविक सत्यता के लिए आकारिक सत्यता का होना जरूरी है, किन्तु आकारिक सत्यता के लिए वास्तविक सत्यता का होना जरूरी नहीं है। (Formal truth is essential for material truth but material truths not essential for formal truth) क्या तर्कशास्त्र का संबंध दोनों तरह के सत्यों से है?

आकारिक तर्कशास्त्रियों के अनुसार तर्कशास्त्र का संबंध दोनों तरह के सत्यों से है? आकारिक तर्कशास्त्रियों के अनुसार तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ अनुमान के आकार से रहता है। अनुमान की वस्तु से नहीं। इसलिए इन विचारों के अनुसार तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ आकारिक सत्यता से है। अनुमान का आकार यदि सही है, तो सब ठीक है। जैसे –

सभी छात्र गदहे हैं।
राम छात्र है।
∴ राम गदहा है।

यह अनुमान आकारिक दृष्टि से सही है। निष्कर्ष भी आधार वाक्यों से नियमानुकूल निकाला गया है। यह प्रथम आकार में बारबारा (Barbara) योग में है। परन्तु इसमें वास्तविक सत्यता का सर्वथा अभाव है। आकारिक तर्कशास्त्रियों के अनुसार सत्य का अर्थ आकारिक सत्यता है और निगमन तर्कशास्त्र का संबंध विशेषतः आकारिक सत्यता से है। इसमें अरस्तू, हैमिल्टन, जेवन्स, मैनसेल आदि इस प्रकार के विचार को मानने वाले हैं।

दूसरा विचार वस्तुवादी तर्कशास्त्रियों का है कि तर्कशास्त्र का संबंध आकारिक सत्यता के साथ-साथ वास्तविक सत्यता से है। आकारिक सत्यता के साथ-ही-साथ वास्तविक सत्यता का रहना आवश्यक है। इस मत के समर्थकों में मिल, बेन, ब्रैडले आदि प्रमुख हैं। इन लोगों के अनुसार अनुमान का संबंध वास्तविक जीवन से होना चाहिए।

यदि तर्कशास्त्र का संबंध केवल आकारिक सत्यता से रहेगा तो तर्कशास्त्र हास्य का विषय हो जाएगा। इसलिए इन लोगों ने आगमन को तर्कशास्त्र का सच्चा रूप माना है। आगमन का संबंध आकारिक सत्यता के साथ-साथ वास्तविक सत्यता से रहता है। अतः निष्कर्ष निकलता है कि तर्कशास्त्र का संबंध दोनों प्रकार के सत्य से है। निगमन का संबंध आकारिक सत्यता से अधिक है और तर्कशास्त्र का लक्ष्यपूर्ण सत्यता की प्राप्ति से है, जिसमें दोनों प्रकार के सत्य आते हैं। दोनों के द्वारा तर्कशास्त्र अपने लक्ष्य की प्राप्ति करता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 4.
तर्कशास्त्र की उपयोगिता की विवेचना करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र के अध्ययन से निम्नलिखित लाभ हैं –
1. तर्कशास्त्र हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। इसका कारण है कि तर्कशास्त्र का संबंध अनुमान से है तथा अनुमान का संबंध हमारे जीवन से है। अनुमान जीवन के लिए आवश्यक है। अनुमान के बिना हमारा काम नहीं चल सकता है। अतः तर्कशास्त्र जीवन के लिए बहुत उपयोगी है।

2. यह सत्य है कि तर्कशास्त्र तर्क करने की शक्ति पैदा नहीं कर सकता है क्योंकि यह शक्ति प्राकृतिक है। परन्तु यदि तर्क में गलती हुई तो इसे सुधारने में काम कर सकता है। अतः यह सृजनात्मक नहीं बल्कि परिशोधनात्मक है (The function of logic is not creative but corrective)। जिसने तर्कशास्त्र को नहीं पढ़ा है वह तर्क की गलती को नहीं समझ सकता हैं अनुमान की गलती में वह उधेड़बुन में पड़ जाएगा।

गलती को नहीं समझने के कारण, उसका निराकरण भी नहीं कर सकेगा। परन्तु एक तर्कशास्त्री गलती करने पर गलती को समझ सकता है और सुधार भी सकता है। इसलिए तर्कशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है। प्रकृति ने हमें स्वास्थ्य दिया है, परन्तु बीमार पड़ने पर दवाई की जरूरत पड़ जाती है। इसी तरह प्रकृति न हमें तर्क करने की शक्ति दी है, परन्तु गलती करने पर तर्कशास्त्र की जरूरत हो जाती है।

3. सभी विज्ञान और कला की जड़ में तर्क है। अतः विभिन्न शास्त्रों के लिए तर्कशास्त्र के नियमों से परिचित होना जरूरी है। अतः तर्कशास्त्र का अध्ययन जरूरी है।

4. जिस तरह शरीर वृद्धि के लिए शारीरिक व्यायाम की आवश्यकता है उसी तरह मानसिक वृद्धि के लिए तर्कशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता है।

5. मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह अपने विचार को भाषा के द्वारा दूसरे के समक्ष रखता है। यदि उसका विचार तर्कसंगत होता है तो उससे लोग प्रभावित होते हैं। इसलिए भी तर्कशास्त्र का अध्ययन लाभकारी है। वक्ता, वकील, व्यापारी, शिक्षक, छात्र, मनोवैज्ञानिक वैज्ञानिक तथा नेताओं के लिए तर्कशास्त्र विशेषकर सहायक होता है।

6. तर्कशास्त्र का अध्ययन दर्शनशास्त्र के लिए भी जरूरी है। दर्शनशास्त्र का विषय अति सूक्ष्म है, जैसे-आत्मा, परमात्मा आदि। इनका ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा प्राप्त नहीं होता है। हम अनुमान से ही इन विषयों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। अतः तर्कशास्त्र के अध्ययन से दर्शनशास्त्र के विवेचन में लाभ होता है।

7. तर्कशास्त्र अलंकार शास्त्र के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। अलंकारशास्त्र के बारे में कहा गया है कि यह Art of effective speaking or writing है अर्थात् अलंकार प्रभावशाली भाषण या लेखन की कला है। भाषण या लेखन तभी प्रभावोत्पादक हो सकता है जब तक तर्कपूर्ण है। तर्कपूर्ण अलंकारशास्त्र में छिछलापन नहीं होता है और वह दूसरों पर बराबर समानरूप से प्रभाव डालता है।

इन बातों से हम निष्कर्ष पर आते हैं कि तर्कशास्त्र के अध्ययन पर बहुत महत्त्व है। इसकी महत्ता को पूर्वीय तथा पाश्चात्य दोनों विद्वानों ने स्वीकार किया है। पाश्चात्य विद्वान Bosanquet तर्कशास्त्र के बारे में कहते हैं – यह Morphology of human knowledge अर्थात् मानवीय ज्ञान का ढाँचा है।

वहीं भारतीय विद्वानों ने भी तर्कशास्त्र की महत्ता को सर्वोपरि मानते हुए इसके संबंध में कहा है – “प्रदीपः सर्व शास्त्रानां उपायः सर्वकर्मणाम्” अर्थात् तर्कशास्त्र सभी शास्त्रों के लिए दीपक के समान है एवं सभी कार्यों में सफलता हेतु उपाय बताने वाला शास्त्र है। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ज्ञान दीपके से अपने को एवं दूसरों को आलोकित करने के लिए तर्कशास्त्र का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। तर्कशास्त्र बहुत उपयोगी है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसमें केवल दोनों उदाहरणों की आवश्यकता होती है –
(क) व्यतिरेक विधि
(ख) अन्वय विधि
(ग) अवशेष विधि
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) व्यतिरेक विधि

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प्रश्न 2.
मिल की प्रायोगिक विधि को जाना जाता है –
(क) निराकरण विधि के रूप में
(ख) संयोजन विधि के रूप में
(ग) वियोजन विधि के रूप में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निराकरण विधि के रूप में

प्रश्न 3.
व्यतिरेक विधि से प्राप्त निष्कर्ष होते हैं –
(क) निश्चित
(ख) अनिश्चित
(ग) संदिग्ध
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निश्चित

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

प्रश्न 4.
अवशेष-विधि एक विशेष रूप है –
(क) व्यतिरेक विधि का
(ख) अन्वय विधि का
(ग) संयुक्त विधि का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) व्यतिरेक विधि का

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन एक प्रमाण तथा खोज दोनों की विधि है?
(क) अवशेष विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) अन्वय विधि
(घ) संयुक्त विधि
उत्तर:
(क) अवशेष विधि

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प्रश्न 6.
अन्वय विधि –
(क) निरीक्षण प्रधान विधि है
(ख) प्रयोग प्रधान विधि है
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निरीक्षण प्रधान विधि है

प्रश्न 7.
मिल की प्रायोगिक विधियाँ हैं –
(क) पाँच
(ख) चार
(ग) तीन
(घ) दो
उत्तर:
(क) पाँच

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प्रश्न 8.
मिल की प्रयोगात्मक विधियों में कौन-सी विधि कारण की मात्रा की व्याख्या करती है –
(क) अन्वय विधि (Method of agreement)
(ख) व्यतिरेक विधि (Method of difference)
(ग) संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि (Joint method of agreement)
(घ) सहगामी सहचर विधि (Method of concomitant variations)
उत्तर:
(घ) सहगामी सहचर विधि (Method of concomitant variations)

प्रश्न 9.
घटना के यथार्थ कारण जानने के लिए किसने प्रायोगिक विधियों का वर्णन किया?
(क) मिल (Mill) ने
(ख) हेवेल ने
(ग) डेकार्ट ने
(घ) किसी ने नहीं
उत्तर:
(क) मिल (Mill) ने

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प्रश्न 10.
मिल ने कारण के गुणात्मक लक्षणों को आधार बनाकर जिन प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया था। वह है –
(क) अन्वय विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि
(घ) अवशेष विधि
उत्तर:
(ग) संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि

प्रश्न 11.
कारण के परिमाणात्मक लक्षणों के आधार मिल द्वारा बनाई गई विधियाँ हैं –
(क) सहचरी परिवर्तन विधि
(ख) अवशेष विधि
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 12.
प्रमाण की विधि (Method of proof) है –
(क) व्यतिरेक विधि
(ख) अन्वय विधि
(ग) अवशेष विधि
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(क) व्यतिरेक विधि

प्रश्न 13.
खोज की विधि है –
(क) अन्वय विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) अन्वय विधि

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प्रश्न 14.
किसके द्वारा स्थाई कारणों के कार्य का पता लगाया जा सकता है?
(क) अन्वय विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) सहचरी परिवर्तन विधि
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ग) सहचरी परिवर्तन विधि

प्रश्न 15.
निगमन पर आधारित प्रयोग विधि है –
(क) अवशेष विधि
(ख) अन्वय विधि
(ग) व्यतिरेक विधि
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(क) अवशेष विधि

Bihar Board Class 11 Philosophy मिल की प्रायोगिक विधियाँ Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किस विधि में केवल दो उदाहरणों की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
व्यतिरेक विधि में केवल दो उदाहरणों की आवश्यकता होती है। एक उदाहरण भावात्मक होते हैं और दूसरा निषेधात्मक।

प्रश्न 2.
किस विधि में सह परिणामों को कारण-कार्य मान लेने का भ्रम होता है?
उत्तर:
अन्वय विधि में सह परिणामों को कारण-कार्य मान लेने का भ्रम होता है।

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प्रश्न 3.
प्रमाण की विधि (Method of proof) किसे कहा जाता है?
उत्तर:
व्यतिरेक विधि (Method of difference) को प्रयोग प्रधान विधि होने के कारण प्रमाण विधि कहा जाता है।

प्रश्न 4.
प्रयोगात्मक विधियाँ किसे कहते हैं? अथ्वा, प्रयोगात्मक विधियाँ क्या हैं?
उत्तर:
कार्य-कारण सम्बन्ध निश्चित करने की विधियों को प्रयोगात्मक विधियाँ कहते हैं।

प्रश्न 5.
मिल की प्रायोगिक विधियाँ कितनी हैं?
उत्तर:
मिल की प्रायोगिक विधियाँ पाँच हैं। वे हैं-अन्वय विधि, व्यतिरेक विधि, संयुक्त अन्वय-व्यतिरेक विधि, सहचारी-परिवर्तन-विधि तथा अवशेष विधि।

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प्रश्न 6.
घटना के यथार्थ कारण जानने के लिए किसने प्रायोगिक विधियों का वर्णन किया?
उत्तर:
जे. एस. मिल ने घटना के यथार्थ कारण जानने के लिए प्रायोगिक विधियों का वर्णन किया।

प्रश्न 7.
मिल ने कारण के परिमाणात्मक लक्षण (Quantitative marks of cause) के आधार पर कितनी प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया?
उत्तर:
मिल ने कारण के परिमाणात्मक लक्षण के आधार पर दो प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया। वे हैं-सहचारी-परिवर्तन-विधि (The method of concomitant variations) एवं अवशेष-विधि (The method of residues)।

प्रश्न 8.
अन्वय विधि के मुख्य दोष क्या हैं? अथवा, अन्वय विधि की मुख्य सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
अन्वय विधि का मुख्य दोष है कि यह बहुकारणवाद (Plurality of causes) की समस्या से ग्रस्त है। दूसरा दोष यह है कि निरीक्षण-प्रधान विधि के कारण निरीक्षण के सभी दोष इसमें शामिल हैं।

प्रश्न 9.
खोज की विधि (Method of discovery) किसे कहा जाता है?
उत्तर:
अन्वय विधि को मुख्यतः निरीक्षण पर आधारित होने के कारण खोज की विधि कहा जाता है।

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प्रश्न 10.
कौन-सी प्रायोगिक विधि निगमन पर आधारित विधि है?
उत्तर:
अवशेष विधि (The method of residues) निगमन पर आधारित विधि है।

प्रश्न 11.
किस विधि से स्थायी कारणों के कार्य का पता लगाया जा सकता है?
उत्तर:
सहचारी-परिवर्तन-विधि (The method of concomitant variations) से स्थायी। कारणों के कार्य का पता लगाया जाता है।

प्रश्न 12.
किस विधि को ‘दुहरा अन्वय विधि’ (Double agreement) कहा जाता है?
उत्तर:
संयुक्त अन्वय-व्यतिरेक-विधि (The joint method of agreement and differ ence) को दुहरा अन्वय विधि कहा जाता है।

प्रश्न 13.
बहिष्करण या निराकरण की विधि (Method of elimination) से आप क्या समझते हैं? अथवा, बहिष्करण या निराकरण विधि का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
बहिष्करण का अर्थ होता है ‘हटाना’ या ‘छाँटना’। किसी घटना के कारण या कार्य का पता तब चलता है जब अनावश्यक बातों को छाँटकर आवश्यक तथ्यों को निकाल लिया जाता है। इसे ही मिल ने निराकरण की विधि कहा है। मिल की प्रायोगिक विधियाँ ही निराकरण की विधियाँ हैं।

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प्रश्न 14.
अन्वय विधि (Method of agreement) के दो मुख्य गुण बताएँ।
उत्तर:
अन्वय विधि निरीक्षण कि विधि होने के कारण इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है। दूसरा, निरीक्षण की विधि होने के कारण इसमें कारण से कार्य की ओर या कार्य से कारण की ओर बढ़ते हैं।

प्रश्न 15.
मिल ने कारण के गुणात्मक लक्षणों को आधार बनाकर कितने प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया?
उत्तर:
मिल ने कारण के गुणात्मक लक्षणों को आधार बनाकर तीन प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया। वे हैं-अन्वय विधि, व्यतिरेक-विधि एवं संयुक्त-अन्वय व्यतिरेक विधि।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अन्वय विधि के दोष क्या हैं?
उत्तर:
अन्वय विधि के निम्न दोष पाए जाते हैं –

  1. इसमें कई उदाहरणों को निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला जाता है। इसलिए इसमें बहुकारणवाद का दोष आ जाता है।
  2. यह विधि निरीक्षण पर आधारित है, इससे सूक्ष्म एवं गुप्त परिस्थिति का निरीक्षण न हुआ हो, जो कि घटना का वास्तविक कारण और कार्य हो। इन्द्रियों के द्वारा सूक्ष्म तत्त्वों का निरीक्षण संभव नहीं हो पाता है।
  3. इसमें एक ही कारण के दो सहपरिणामों (Co-effects) को एक-दूसरे के कारण कार्य समझने की गलती करते हैं। जैसे दिन के पहले गत और गन के पहले दिन नियत रूप से आते हैं।
  4. इसमें यह त्रुटि है कि उपाधि को पूर्ण कारण मान लिया जाता है।
  5. इस विधि को कागज पर सांकेतिक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना आसान है जो कौमन अक्षर रहता है। यह कारण या कार्य तुरत बतला देते हैं। परन्तु, वास्तविक जगत में इसका व्यवहार आसान नहीं है।
  6. यह विधि एकांकी भी है क्योंकि यह केवल भावात्मक उदाहरणों में अन्वय देखता है। निषेधात्मक उदाहरणों पर विचार नहीं करता है।

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प्रश्न 2.
अन्वय विधि क्या है?
उत्तर:
अन्वय विधि मिल साहब के प्रयोगात्मक विधि का एक प्रथम रूप है। इसकी परिभाषा इस प्रकार से दी गई है। “यदि किसी जाँच की जानेवाली घटना के दो या उससे अधिक उदाहरणों में उस घटना के अतिरिक्त एक और बात सामान्य हो तो वह बात जो सब उदाहरणों से मिलती है उस घटना के साथ कारण-कार्य का संबंध रखती है।” इसे सांकेतिक उदाहरण के द्वारा दिखाया गया है।
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∴ A, X का कारण है या ‘X’ A का कार्य है। यहाँ A सभी उदाहरणों के पूर्ववर्तियों में सामान्य रूप से उपस्थित है अतः ‘X’ घटना का कारण – ‘A’ ही है।

प्रश्न 3.
अवशेष विधि क्या निगमनात्मक है?
उत्तर:
कुछ लोगों के अनुसार अवशेष विधि का स्वरूप निगमनात्मक है। निगमन में आधार वाक्य से निष्कर्ष को निकाला जाता है। उसी प्रकार आगमन में ज्ञात कारण के कार्य को सम्मिलित कार्य से निकाल कर व शेष कार्य और बचे हुए कारण में संबंध स्थापित करते हैं। पुनः आगमन में विशिष्ट उदाहरणों का निरीक्षण किया जाता है। निरीक्षण आगमन के लिए आवश्यक है। अवशेष विधि में निरीक्षण से काम नहीं किया जाता है। बल्कि गणना (Calculation) से काम लेते हैं। घटाने की प्रक्रिया एक प्रकार की गणना है, अतः इसका आंतरिक स्वरूप निगमनात्मक है न कि आगमनात्मक है।

लेकिन यह धारणा ठीक नहीं है। निगमन की मदद लेते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यह पूर्णतया निगमनात्मक है। इस तरह सभी विधियाँ निगमनात्मक हो जाती है क्योंकि सभी विधियाँ कारणता के नियम से निकाली गई हैं। इसलिए इस विधि को निगमनात्मक कहना न्याय संगत न होगा। अतः निष्कर्ष निकलता है कि अवशेष विधि निगमनात्मक नहीं है। मात्र गणना की क्रिया देखकर इसे निगमनात्मक नहीं कहना चाहिए। अनुभव आगमन के स्वरूप को बतलाता है। अतः इसका स्वरूप आगमनात्मक है न कि निगमनात्मक।

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प्रश्न 4.
अन्वय विधि के गुण क्या हैं?
उत्तर:
अन्वय विधि के निम्नलिखित गुण या लाभ हैं –

  1. अन्वय विधि निरीक्षण प्रधान होने के कारण इसका क्षेत्र बहुत विशाल है क्योंकि इस विधि 1 के अंतर्गत निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला जाता है। निरीक्षण सभी घटनाओं का होता है।
  2. इस विधि में कारण से कार्य की ओर या कार्य से कारण की ओर बढ़ सकते हैं। इस प्रकार की सुविधाएँ दूसरे विधि में नहीं है।
  3. यह विधि सर्वसाधारण की विधि है, इसका उपयोग कोई भी कर सकता है।
  4. इस विधि से प्राकृतिक घटनाओं जैसे-भूकंप, बाढ़, महामारी इत्यादि के कारण का पता अच्छी तरह लगती है। इन घटनाओं का निरीक्षण ही होता है, इन पर प्रयोग संभव नहीं है। अतः, इन घटनाओं के कारण का पता लगाने में अन्वय विधि ही सक्षम एवं समर्थ हैं।

प्रश्न 5.
निराकरण के सिद्धान्त क्या है?
उत्तर:
मिल साहब द्वारा बताई गई पाँच प्रयोगात्मक विधियों को निराकरण की विधियाँ के नाम से भी पुकारा जाता है। निराकरण का अर्थ है जाँच की जानेवाली घटना के संबंध में अनावश्यक बातों का छाँट देना या असंबंधित स्थितियों को दूरकर कार्य-कारण संबंध की स्थापना करना! निराकरण का अर्थ ही है जो कारण नहीं उसे दूर हटाकर। मिल साहब के अनुसार कारण की व्याख्या उसके गुण और परिमाण दोनों के आधार पर की गई है।

कारण के गुणात्मक स्वरूप को बताते हुए मिल साहब कहते हैं “कारण नियम, आसन्न अनौपाधिक, पूर्ववर्ती घटना है तथा कारण के परिमाण को बताते हुए कहा गया है” कारण और कार्य परिमाण के अनुसार बिल्कुल ही बराबर होते हैं। A cause is equal to effect according to quantity इस तरह हमें ऐसा करने के लिए निराकरण की सहायता लेनी पड़ती है। जिस तरह फुलवारी में घास की पत्ती बढ़ जाने पर हम उसे छाँट देते हैं ताकि फूल-पौधे ठीक से बढ़ सकें, उसी तरह सही कारण को जानने के लिए हमें बहुत-सी अनावश्यक बातों को छाँट या हटा देना पड़ता है।

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प्रश्न 6.
मिल के प्रयोगात्मक विधि क्या हैं?
उत्तर:
आगमन का उद्देश्य सामान्य यथार्थ वाक्य की रचना करना है इसका अर्थ है – दो घटनाओं के बीच कारण-कार्य संबंध की स्थापना करना। मिल ने प्रयोगात्मक विधि के द्वारा आगमन के उद्देश्य की प्राप्ति करने का प्रयास किया। प्रयोगात्मक विधि के द्वारा केवल किसी घटना का पता नहीं लगाया जाता है। बल्कि उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनावश्यक बातों को छाँट भी दिया जाता है। मिल के मुख्यतः पाँच प्रयोगात्मक विधि हैं –

  1. अन्वय विधि
  2. व्यतिरेक विधि
  3. संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि
  4. सहगामी विवरण विधि और
  5. अवशेष विधि

इन पाँचों विधियों के द्वारा कारण से कार्य और कार्य से कारण की ओर बढ़ते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
व्यतिरेक विधि क्या है? इसके गुण-दोष की व्याख्या करें।
उत्तर:
व्यतिरेक विधि मुख्य रूप से प्रयोग पर आधारित विधि हैं इसमें जिन दो उदाहरणों की आवश्यकता पड़ती है वे प्रयोग से ही प्राप्त होते हैं। फिर भी निरीक्षण के क्षेत्र में भी व्यवहार कर कार्य-कारण संबंध स्थापित किया जाता है। मिल साहब ने इसका परिभाषा इस प्रकार दिए हैं।

“If an instance in which the phenomenon under investigation occurs and an instance in which it does not occur, have every circumstance in common save one that one occuring only in the former the circumstance in which alone the two instances differ is the effect of the cause, or an indisperisable part of the cause of the phenomenon.” अर्थात् “यदि किसी एक उदाहरण में जाँच की जानेवाली घटना घटती हो और दूसरे उदाहरण में जाँच की जानेवाली घटना नहीं घटती हो, सभी बातें समान हों, केवल यही भेद पाया जाए कि प्रथम उदाहरण में किसी एक बात का भाव हो और केवल उसी का दूसरे उदाहरण में अभाव, तो उस बात का उस घटना से कार्य-कारण संबंध पाया जाता है या घटना के कारण का आवश्यक अंश रहता है।” इसकी भाषा के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित बातें हम पाते हैं।

  1. जाँच की जानेवाली घटना के दो उदाहरण दिए जाते हैं। एक उदाहरण में घंटना उपस्थित रहती है और दूसरे उदाहरण में घटना अनुपस्थित रहती है।
  2. दोनों उदाहरणों में एक परिस्थिति को छोड़ कर सभी कुछ समान ही रहते हैं। वह परिस्थिति एवं उदाहरण में स्थित रहती है तथा दूसरे उदाहरण में नहीं।
  3. वह परिस्थिति की अवस्था जिसमें दोनों उदाहरणों को भिन्न पाते हैं घटना का कारण या कार्य होता है या घटना के कारण का आवश्यक अंग होता है। जैसे-सांकेतिक उदाहरण –
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∴ A और X में कार्य कारण-संबंध है यहाँ ‘A’ के रहने पर X और Aके अनुपस्थित रहने पर X भी अनुपस्थित रहता है। इसके दो रूप में पूर्ववर्ती में से एक पूर्ववर्ती को निकाल देते हैं जिससे अनुवर्ती में से भी कोई बात घट जाती है। जैसे-पूर्ववर्ती में से ‘A’ घटता है तो अनुवर्ती में भी ‘A’ घट जाता है दूसरा रूप-पूर्ववर्ती में कुछ जोड़ देते हैं तो अनुवर्ती में भी कुछ जुट जाता है। जैसे –
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इसलिए D और X में कार्य-कारण संबंध है।

वास्तविक उदाहरण:
जब किसी व्यक्ति को मादा अनोफिल मच्छर काटता है, तो उसे मलेरिया हो जाता है और जब किसी व्यक्ति को मादा अनोफिल मच्छर नहीं काटता है, तो उसे मलेरिया नहीं होता है। इस तरह निष्कर्ष निकलता है कि मादा अनोफिल मच्छर ही मलेरिया का कारण है। अतः सांकेतिक एवं वास्तविक दोनों प्रकार के उदाहरणों से स्पष्ट है कि दो उदाहरणों में सभी बातें समान रहती हैं केवल एक बात का अंतर रहता है और वह घटना का कार्य या कारण होता है।

गुण (Merits):

व्यतिरेक विधि के निम्नलिखित गुण हैं –

  1. इस विधि का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि जो कार्य-कारण संबंध स्थापित होता है वह निश्चित होता है क्योंकि यह विधि प्रयोग की विधि है। अन्वय और संयुक्त विधि की तुलना में इसका निष्कर्ष विश्वसनीय होता है।
  2. इस विधि में केवल दो उदाहरण लिये जाते हैं। अतः, परिश्रम कम लगता है। समय भी बचता है।
  3. जबकि अन्वय एवं संयुक्त विधियों में समय एवं श्रम अधिक लगता है।
  4. अन्वय विधि से कारण का जो संकेत मिलता है उसकी जाँच इस विधि से कर सकते हैं। अन्वय विधि कारण को प्रमाणित नहीं करती है। केवल कारण का संकेत करती है। अन्वय विधि से प्राप्त निष्कर्ष की जाँच अतिरिक्त विधि में की जा सकती है क्योंकि यह प्रयोग प्रधान विधि है।
  5. यह विधि हमारे व्यावहारिक जीवन के लिए भी लाभप्रद है, जैसे-एक किसान समझता है कि जिस साल अच्छी वर्षा होती है धान की फसल अच्छी होती है और वर्षा के अभाव में धान की फसल भी खराब होती है, अतः अच्छी वर्षा धान के लिए उपयोगी कारण है।
  6. यह विधि बहुकारणवाद से उत्पन्न कठिनाइयों को बहुत अंश में दूर करती है।

व्यतिरेक विधि के दोष (Demerits):

  1. व्यतिरेक विधि प्रयोग प्रधान विधि होने के कारण उसका क्षेत्र सीमित हो जाता है। प्राकृतिक घटनाओं, जैसे-बाढ़, भूकंप, महामारी पर इस विधि का व्यवहार नहीं हो सकता है।
  2. इसमें केवल कारण से कार्य की ओर जाते हैं क्योंकि यह विधि प्रयोग पर आधारित है।
  3. इसमें कारण और कारणांश (Condition) में भेद नहीं कर पाते हैं। कारणांश ही पूर्ण कारण हो जाता है। जैसे-दाल, सब्जी में नमक मिलाकर भोजन करने में अच्छा लगता है। यदि नमक नहीं मिला है तो भोजन अच्छा नहीं लगता है। यहाँ नमक कारणांश है जो कारण बन जाता है, स्वादिष्ट भोजन का।
  4. इस विधि का व्यवहार असावधानी पूर्वक करने से Post hoc ergo propter hoc (यत्पूर्व सकारणम्) का दोष हो जाता है जैसे किसी पुत्र के उत्पन्न होने पर उसकी माँ का देहान्त होना उस बच्चे के जन्म देने का कारण मानते हैं। फिर भी त्रुटियों के बावजूद यह विधि सबसे अच्छी विधि मानी गई है। इसलिए इसे Method of part excullance कहते हैं। इनकी महत्ता मिल बहुत बताते हैं।

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प्रश्न 2.
सहगामी विचरण विधि की सोदाहरण व्याख्या करें। इसके गुण और दोषों को बताएँ।
उत्तर:
सहचारी या सहगामी विचरण विधि अन्वय एवं व्यतिरेक विधि का एक रूप है। इस विधि के द्वारा कारण-कार्य संबंध का पता इस बात को देखकर लगाया जाता है कि किन दो घटनाओं में साथ-साथ परिवर्तन होता है, इस विधि में परिवर्तन के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है। इसकी परिभाषा मिल ने दिया है। (What ever phenomenon varies in any manner whatever another phenomenon varies in some particular manner is either a cause or an effect of that phenomenon or is connected with it through some fact of causation) अर्थात् जब कोई घटना किसी दूसरी घटना के साथ किसी खास नियम से घटती है या बढ़ती है तो उन दोनों में कारण-कार्य का संबंध रहता है। इस परिभाषा की निम्नलिखित विशेषताएँ हम विश्लेषण करने पर पाते हैं।

  1. इस विधि में दो या दो से अधिक उदाहरणों के निरीक्षण हो सकते हैं।
  2. उन उदाहरणों में दो अवस्थाएँ होती हैं-पूर्ववर्ती और अनुवर्ती।
  3. इसमें परिमाण के आधार पर निष्कर्ष की स्थापना की जाती है।
  4. इसमें बदलने वाली अवस्था के वीच कारण-कार्य का संबंध रहता है। दो घटनाएँ साथ-साथ बढ़े, दो घटना साथ-साथ घटे, यह प्रक्रिया उसी अनुपात में होती है।

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∴ A और X में कार्य-कारण संबंध है। इसमें A और X में समानुपाती परिवर्तन हम देखते हैं। अन्वय विधि की तरह ही एक अवस्था में समानता है तथा दूसरी अवस्था में भिन्नता है।
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यहाँ A और X कार्य – कारण संबंध है। यह उदाहरण व्यतिरेक विधि का रूपांतरण है। वास्तविक उदाहरण –

(क) जैसे-जैसे बुखार बढ़ता है थर्मामीटर का पारा बढ़ता है और जैसे-जैसे बुखार घटता है थर्मामीटर का पारा भी घटता है। अतः, दोनों में कार्य-कारण का संबंध है।
(ख) जैसे-जैसे ऊपर की ओर अर्थात् ऊँचाई पर जाते हैं ठंडा बढ़ता है, अतः कार्य-कारण का संबंध है एवं किसी वस्तु की माँग बढ़ती है तो उस वस्तु की कीमत बढ़ती है। माँग घटने पर कीमत भी घट जाती है। अतः, माँग और कीमत (Demand and price) में कार्य कारण संबंध है।
(ग) देखा गया है कि Frustration जैसे – जैसे बढ़ता है हिंसात्मक प्रवृत्ति भी वैसे-वैसे बढ़ती है।

गुण (Merits):

  1. इससे लाभ है कि जब हम किसी घटना के परिणाम या वेग को जानना चाहते हैं तो इस विधि की सहायता लेकर जान लेते हैं।
  2. प्रकृति के अन्दर कुछ ऐसे तत्त्व हैं जिनके बीच कारण-कार्य के संबंध को पता लगाने के लिए सहगामी विचरण विधि की सहायता लेते हैं। यह विधि बिल्कुल सर्वोत्तम विधि है। वायुमंडल का दबाव, ताप, घर्षण, पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति इत्यादि के बीच कारण-कार्य का पता इस विधि द्वारा आसानी से लगाया जा सकता है।
  3. कारण को निश्चित करने के लिए कल्पना की सहायता ली जाती है यह इसी विधि से प्राप्त किया जाता है।
  4. जहाँ घटना के वेग और परिणाम की माप होती है वहाँ यह विधि अन्वय और व्यतिरेक विधि से अधिक लाभदायक है।
  5. बेन साहब के अनुसार, असाधारण परिस्थिति में यह विधि बहुत उपयोगी है।
  6. धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्रों में इस विधि से कारण का पता लगता है। जैसे–अंधविश्वास ही धार्मिक उपद्रव में पाया जाता है। जनसंख्या और मृत्यु में आवश्यक संबंध है। इसी तरह अज्ञानता की मात्रा जितनी अधिक होगी दुःख की मात्रा भी उतनी ही अधिक होती है।

दोष या सीमाएँ (Demerits):

  1. यह विधि केवल परिमाणतः परिवर्तन में सफलीभूत होती है। गुणगत परिवर्तन में इस विधि का व्यवहार कर कारण का पता नहीं लगा सकते।
  2. यहाँ भी सहपरिणामों को एक-दूसरे का कारण समझने की भूल की संभावना बनी रहती
  3. इस विधि का अंतिम सीमा है कि जब परिवर्तन एकाएक होता है, वहाँ इस विधि का व्यवहार नहीं कर सकते हैं। इस विधि का व्यवहार नहीं होता है जहाँ धीरे-धीरे परिवर्तन क्रमशः होता है।

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प्रश्न 3.
अवशेष विधि की सोदाहरण व्याख्या इसके गुण-दोष के साथ करें।
उत्तर:
प्रायोगिक विधियों में अवशेष विधि एक महत्त्वपूर्ण विधि है। इसके द्वारा जटिल कार्य के बचे हुए अंश के कारण का पता लगाते हैं। जटिल कार्य के कुछ अंश के कारण का पता पहले से मालूम रहता है और बचे हुए अंश के कारण का पता अवशेष विधि से लगाते हैं। मिल ने इसकी परिभाषा इस प्रकार दिए हैं।

(“Subduce from any given phenomenon such parts as is known by previous inductions to be the effect of certain anteced ents and the residues of this phenomenon is this effect of this remaining ante cedents-Mill”) अर्थात् “अगर किसी दी हुई घटना से उस भाग को निकाल दिया जाए तो पहले आगमन के आधार पर कुछ पूर्ववर्ती अवस्थाओं का निष्कर्ष समझा गया है, तो घटनाओं का अवशेष भाग अवश्य ही अवशेष अवस्थाओं का कार्य होगा।” इस परिभाषा में निम्नलिखित विशेषताओं को पाते हैं।

  1. कोई जटिल कार्य दिया रहता है जिसके कुछ अंश के कारण का पता पहले से मालूम रहता है, कार्य के शेष अंश के कारण का पता लगाना रहता है।
  2. जो बातें हमें पहले से ज्ञात रहती है उसे सम्मिलित कार्य से हटा देते हैं।
  3. अब कार्य के बचे अंश तथा कारण (पूर्ववर्ती) के बचे अंश में कार्य-कारण स्थापित करते हैं अर्थात् कारण का शेषांश कार्य के शेषांश का कारण होगा। जैसे –

सांकेतिक उदाहरण –
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यहाँ पहले से मालूम है कि कारण B तथा Z का कारण C है। इसलिए Aनिराकरण है ‘X’ का। यह अवशेष विधि निराकरण के सिद्धान्त पर आधारित है, निराकरण का सिद्धांत है “जो किसी एक वस्तु का कारण है वह किसी अन्य वस्तु का कारण नहीं हो सकता है।” इसलिए B, CX का कारण नहीं होता है B, C तो Y, Z का कारण है इसलिए अनुमान करते हैं कि A ही X का कारण है।

वास्तविक उदाहरण –
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अवशेष विधि के गुण (Merits):

1. इस विधि से आविष्कार में सहायता मिलती है। वैज्ञानिकों को मालूम था कि यूरेनस अपनी गति-निर्धारित मार्ग पर नहीं चलकर कुछ भटक जाता है। वैज्ञानिकों ने किसी अज्ञात कारण की कल्पना की और खोज के द्वारा नेपच्युन ग्रह को खोज निकाला। आर्गन गैस की खोज इसी विधि से हुई है। अतः विज्ञान के क्षेत्र में विशेष कर रसायन शास्त्र में इस विधि से अनेक गैसों और तत्त्वों की खोज हुई है।

2. यही एक विधि है जिसके द्वारा किसी सम्मिलित कार्य के बचे हुए अंश के कारण का पता लगा सकते हैं। अन्वय विधि, संयुक्त विधि, व्यतिरेक विधि एवं सहगामी विचरण विधि से बचे हुए अंश के कारण का पता नहीं लगा सकते हैं।

अवशेष विधि का दोष (Demerits):

  1. इस विधि में प्रथम दोष है कि इसका व्यवहार तब होता है जब हमें पहले से घटना के बारे में कुछ ज्ञान प्राप्त रहता है। पूर्व ज्ञान आवश्यक है यदि कोई व्यक्ति किसी घटना से पूर्ण अनभिज्ञ है तो कारण का पता नहीं लगा सकता है।
  2. सहगामी विचरण विधि की तरह इस विधि का भी व्यवहार केवल परिमाण संबंधी खोज से है। गुण संबंधी खोज में इसका व्यवहार नहीं हो सकता है।
  3. अवशेष विधि व्यतिरेक विधि का विशेष रूप है इसलिए व्यतिरेक विधि के दोष अवशेष विधि में चले आते हैं। इन त्रुटियों के बावजूद यह विधि विज्ञान के क्षेत्र में उपयोगी है।

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प्रश्न 4.
संयुक्त अन्वय विधि क्या है? इसके गुण-दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
संयुक्त विधि अन्वय विधि का रूपांतर या विशेष रूप है। यह विधि अन्वय विधि की कमी को दूर करती है। इसमें दो प्रकार के उदाहरणों के समूहों को लिया जाता है।

  1. भावात्मक तथा
  2. अभावात्मक।

इन दोनों के आधार पर निष्कर्ष को निकाला जाता है। इसकी परिभाषा इस प्रकार से दी गई है। “If two or more instances in which the phenomenon occurs have and one circumstance in common while two or more instances in which it does not occur have nothing in common save the absence of the circumstance this circumstance in which lend sets of instance differ is the effect of this cause or an indispensable part of the cause of the phenomenon.” “यदि किसी घटना के दो या दो से अधिक उदाहरणों में कोई एक बात सामान्य रूप से पायी जाए तो उस घटना के अभाव वाले दो या दो से अधिक उदाहरणों में उस घटना की अनुपस्थिति के अलावा और कोई बात सामान्य न हो, तो केवल उस बात का जिसमें दोनों प्रकार के उदाहरणों का भेद रहे घटना का कारण या कार्य या कारण अपना कार्य का आवश्यक अंग होता है।” इस परिभाषा की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • इस विधि से कुछ भावात्मक और कुछ अभावात्मक उदाहरण लिये जाते हैं।
  • भावात्मक उदाहरण के लिए दो या दो से अधिक उदाहरणों की जाँच क़रना, उन सभी उदाहरणों में किसी अमुक घटना का या उसका भाव देखना सभी परिस्थितियों में अन्य बातों में विभिन्नता और एक बात में समता का खोजना अनिवार्य है।
  • अतः, घटना की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर निष्कर्ष को निकाला जाता है। जैसे-सांकेतिक उदाहरण –Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

वास्तविक उदाहरण:
जब परीक्षा के समय मन लगाकर पुस्तकों का अध्ययन किया जाता है तो अच्छी सफलता मिलती है और जब परीक्षा के समय मन लगाकर अध्ययन नहीं किया जाता हे तो परीक्षा में अच्छी सफलता नहीं मिलती है इसलिए अच्छी सफलता का मिलना पुस्तकों का मन लगाकर अध्ययन करना है।

गुण (Merits):

  1. संयुक्त अन्वय विधि निरीक्षण प्रधान विधि है। इसलिये निरीक्षण के जितने भी लाभ हैं वे सभी इसमें पाए जाते हैं। इस विधि का क्षेत्र भी व्यापक है। इसमें निरीक्षण के द्वारा घटनाओं का अध्ययन किया जाता है।
  2. अन्वय विधि में बहुकारणवाद का दोष पाया जाता है। किन्तु, संयुक्त अन्वय विधि में इन बाधाओं को आंशिक रूप में अवश्य दूर किया गया है। इसके लिए अभावात्मक उदाहरणों की संख्या को बढ़ा दी जाए।
  3. इसमें जिस कारण कार्य नियम की स्थापना की चेष्टा की जाती है, उसके सत्य होने में अधिक संभावना पायी जाती है क्योंकि इसमें हम भावात्मक और अभावात्मक दोनों प्रकार के उदाहरणों को पाते हैं।
  4. इस विधि का उपयोग हम व्यावहारिक जीवन में अधिक करते हैं।
  5. निरीक्षण प्रधान विधि होने से इसका क्षेत्र व्यापक एवं विस्तृत है। प्रयोग आधारित रहने के कारण विधि का क्षेत्र संकुचित है। राजनीतिक, सामाजिक एवं प्राकृतिक घटनाओं पर इसका व्यवहार कर कारण या कार्य का पता लगाना असंभव है।

दोष (Demerits):

  1. संयुक्त अन्वय विधि निरीक्षण प्रधान विधि है इसलिए निरीक्षण के जितने भी दोष हैं इस विधि के भी दोष हो जाते हैं।
  2. दो सहपरिणामों के बारे में जो निष्कर्ष निकाला जाता है, वह सत्य नहीं होता है। इसमें दोष पाया जाता है।
  3. कभी-कभी एक उपाधि या स्थिति को कारण के रूप में समझने से दोष आ जाता है। जैसे दो तीन बार जब बंदूक से गोली निकलती है, तो आवाज होती है। दो-तीन बार गोली नहीं निकलती है तो आवाज भी नहीं होती है। अतः, गोली निकलने को आवाज का कारण मान लेते हैं, परन्तु गोली एक उपाधि है।
  4. यहाँ पर दो घटनाओं में आकस्मिक सहचर देखने पर कार्य-कारण संबंध स्थापित करने की भूल करते हैं। अतः, संयुक्त अन्वय विधि त्रुटि से संयुक्त नहीं है। फिर भी अन्वय विधि से अधिक विश्वसनीय है। इसके निष्कर्ष में सत्य होने की संभावना अधिक रहती है। इसकी त्रुटियों को दूर भी किया जा सकता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

प्रश्न 5.
अन्वय विधि के गुण एवं दोषों की व्याख्या करें।
उत्तर:
तार्किकों ने अन्वय विधि का निरीक्षण प्रधान विधि बताए हैं क्योंकि इसके उदाहरण निरीक्षण से प्राप्त होते हैं। मिल साहब ने इसकी परिभाषा में कहा है “If two or more instances of the phenomenon under investigation have only one circumstance in common, the circumstance in which alone are the instances agree is the cause or effect of the given phenomenon.” “यदि जाँच की जानेवाली घटना के दो या दो से अधिक उदाहरणों में एक बात सामान्य हो, तो वह वात जिसमें सभी उदाहरण अनुकूल हो, दी हुई घटना का कारण या कार्य हो।” इस परिभाषा की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. जाँच की जानेवाली घटना के दो या उससे अधिक उदाहरण लिये जाते हैं।
  2. अगर घटना कार्य है तो उसके कारण का पता पूर्ववर्तियों के निरीक्षण का उदाहरण जमा करने से होगा।
  3. पूर्ववर्तियों में देखते हैं कि कौन-सी बातें सभी उदाहरगों में सामान्य रूप से पायी जाती हैं। वही घटना का कारण होगी।
  4. यदि घटना कारण है और उसके कार्य का पता लगाना है तो अनुवर्तियों के उदाहरण को जमा करते हैं।
  5. अनुवर्तियों में जो बातें सभी उदाहरणों में सामान्य रूप से पायी जाती हैं वही घटना का कार्य होता है। इस तरह हम देखते हैं कि अन्वय विधि में एक ही बात की समानता (Agreement in one single point) इस विधि का मूल आधार है। जैसे –

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“A is the cause of Xor X is the effect of A.” अर्थात् A ही X का कारण है या X ही A का कार्य है। क्योंकि इसमें A उदाहरणों में उपस्थित है। अतः Aनियम पूर्ववर्ती है और X कार्य का कारण है। इसमें B,C, D, E, F, ‘X’ कार्य का कारण नहीं है। क्योंकि ये नियम पूर्ववर्ती है।

वास्तविक उदाहरण:
मिल साहब अन्वय विधि के माध्यम से एक व्यक्ति की दिनचर्या के आधार पर उसके सिर दर्द का कारण जानना चाहते हैं।
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मंगलवार:
पकौड़ी खाना, मांस खाना, दूध पीना, रात में शीत में सोना सिर दर्द यहाँ सिर दर्द का कारण बाहर में रात में शीत में सोना ही है क्योंकि सभी उदाहरणों में रात में शीत में सोना सभी दिन है और अन्य कारण सभी दिन उपस्थित नहीं है। अतः सिर दर्द का कारण शीत में सोना मान लिया जाता है। मिल की इस विधि को अन्वय विधि कहते हैं।
गुण या लाभ-अन्वय विधि से निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. अन्वय विधि-निरीक्षण प्रधान विधि होने के कारण व्यापक क्षेत्र रखता है। इसका व्यवहार सभी क्षेत्रों में होता है। प्रयोग की तुलना में।
  2. इस विधि से कारण से कार्य तथा कार्य से कारण का पता लगाते हैं। इस तरह इस विधि में दोनों सुविधाएँ हैं, क्योंकि यह निरीक्षण प्रधान विधि है।
  3. इससे प्राकृतिक घटनाओं का पता आसानी से लगाया जाता है। भृकंप, बाढ़, महामारी इत्यादि के कारणों का पता अच्छी तरह लग जाती है। क्योंकि इन सभी घटनाओं का निरीक्षण ही होता है।
  4. इन पर प्रयोग संभव नहीं है। अतः, इन प्राकृतिक घटनाओं के कारण का पता लगाने में अन्वय विधि ही सक्षम एवं समर्थ है।
  5. यह सरल विधि है। इसका व्यवहार सभी लोग कर सकते हैं। क्योंकि निरीक्षण प्रयोग की तुलना में आसान एवं सरल है। जबकि प्रयोग का काम कठिन है।
  6. निरीक्षण से जितने लाभ हैं वे सभी इस विधि के गुण हैं या लाभ हैं।

दोष:
1. चूँकि यह निरीक्षण प्रधान विधि है क्योंकि अन्वय विधि निरीक्षण पर आधारित होने के कारण सूक्ष्म एवं गुप्त परिस्थितियों का निरीक्षण संभव नहीं भी हो पाता है जो कि घटना का वास्तविक कारण और कार्य हो। इन्द्रियों के द्वारा भी सूक्ष्म तत्त्वों का निरीक्षण संभव नहीं हो पाता है। अतः, वास्तविक कारण खोजने में भूल हो सकती है।

2. कभी-कभी दो घटनाओं में आकस्मिक सहचर के आधार पर दोनों में कार्य-कारण संबंध स्थापित करने की भूल कर बैठते हैं। जैसे-जब-जब मेरे घर में अमुक संबंधी आते हैं तो मेरा नौकर बीमार पड़ जाता है।
अन्वय विधि के अनुसार नौकर का बीमार पड़ना अमुक संबंधी के आने पर एक घटना है जिसका कारण संबंधी के आने से है। लेकिन ऐसा निर्णय लेना अन्याय एवं अतार्किक है। इन दोनों में घटनाओं में आकस्मिक संबंध हैं जो इस विधि की त्रुटि है।

3. एक ही कारणं के दो सहपरिणामों (Co-effects) को एक-दूसरे का कारण-कार्य समझने की गलती करते हैं। जैसे-दिन के पहले रात्रि और रात्रि के पहले दिन नियत रूप से आते हैं। अन्वय विधि के आधार पर दिन और रात एक-दूसरे के कारण-कार्य हो जाते हैं। इसी तरह बिजली और बादल का गर्जन सदा एक साथ पाए जाते हैं। ये भी एक-दूसरे के कारण और कार्य हो जाते हैं। परन्तु, ये सभी सहपरिणाम है जो अन्वय विधि के दोष हैं।

4. इसमें उपाधि को पूर्ण मान लिया जाता है, जो एक भूल है।

5. अन्वय विधि का बहुकारणवाद सिद्धांत से मेल नहीं है। इसलिए कहा गया है कि “The doctrine of plurality of causes for frustrates the method of Agreement.”

6. इस विधि को कागज पर सांकेतिक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना आसान है। क्योंकि जो कॉमन अक्षर है उसे कारण या कार्य तुरंत बता दिया जाता है। किन्तु, वास्तविक जगत में इसका व्यवहार आसान नहीं है। प्रकृति की घटनाएँ बहुत जटिल होती हैं।

7. यह विधि एकांगी है क्योंकि यह केवल भावात्मक उदाहरणों में अन्वय करता है निषेधात्मक उदाहरणों पर विचार नहीं करता है।

8. निरीक्षण प्रधान विधि होने से आवश्यक को अनावश्यक से पृथक नहीं कर सकते हैं। क्योंकि कारण के साथ अनावश्यक बातें भी मिली रहती हैं। जिससे वास्तविक कारण का पता लगाना कठिन हो जाता है। अतः, यह विधि अनेक त्रुटियों से पूर्ण है। यह विधि कारण कार्य का संकेत करती है। कार्य-कारण संबंध को सिद्ध नहीं करती है। “The method of Agreement merely suggests but cannot prove a casual connection.” अतः, यह विधि आविष्कार की विधि है प्रमाण की नहीं।