Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

Bihar Board Class 12 Political Science लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
बताइए कि आपात काल के बारे में निम्नलिखित कथन सही है या गलत –
(क) आपातकाल की घोषणा 1975 में इंदिरा गाँधी ने की।
(ख) आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निष्क्रिय हो गये।
(ग) बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति के मद्देनजर आपातकाल की घोषणा की गई थी।
(घ) आपात काल के दौरान के अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
(ङ) सी.पी.आई. ने आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया।
उत्तर:
(क) – सही
(ख) – सही
(ग) – गलत
(घ) – सही
(ङ) – सही

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा अपातकाल की घोषणा के संदर्भ से मेल नहीं खाता है।
(क) सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान
(ख) 1974 की रेल हड़ताल
(ग) इलाहाबाद उच्चन्यायलय का फैसला
(घ) शाह कमीशन की रिपोर्ट का निष्कर्ष
उत्तर:
(ख) 1974 की रेल हड़ताल

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में मेल बैठाएं:

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 6 कांग्रेसी प्रणाली चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Part - 2 img 1
उत्तर:
(1) – (ख)
(2) – (क)
(3) – (ग)
(4) – (घ)

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प्रश्न 4.
किन कारणों से 1980 में मध्यावधि चुनाव करवाने पड़े?
उत्तर:
आपतकाल की स्थिति 1977 में समाप्त हुई व 1971 में संसदीय चुनाव किये गये। इस चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ प्रमुख विरोधी दलों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया जिसे बाबू जयप्रकाश नारायण व आचार्य कृपलानी का आशीर्वाद प्राप्त था। इनमें प्रमुख दल सोसलिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ, कांग्रेस ओल्ड व भारतीय लोक दल थे। बाद में जगजीवन राम की कांग्रेस फार डोमोक्रेसी भी जनता पार्टी में शामिल हो गयी। ये सभी दल आपातकालीन समय में प्रमुख विरोधी दल थे तथा इनके प्रमुख नेता जेल में बन्द थे।

चुनाव में जनता पार्टी को भारी सफलता मिली परन्तु 351 सीटों के बावजूद यह सरकार केवल 18 महीने ही चल पायी क्योंकि प्रधानमंत्री के पद पर ही झगड़ा हो गया जिसके कारण श्री मोजराजी भाई देसाई को प्रधानमंत्री बनाने के साथ-साथ श्री जगजीवन राम को और चौधरी चरण सिंह को भी उपप्रधानमंत्री बनाना पड़ा।

जनता पार्टी में इतने अधिक आन्तरिक मतभेद थे कि एक पार्टी के रूप में ये कार्य नहीं कर सके व 18 महीने बाद सरकार गिर गई व पार्टी का कई हिस्सों में विभाजन हो गया। जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस को बाहरी समर्थन से केन्द्र में सरकार बनाई परन्तु चार महीने बाद कांग्रेस के द्वारा समर्थन वापस लेने के कारण चौधरी चरण सिंह की सरकार भी गिर गई। चौधरी चरण सिंह ने लोकसभा भंग करके नये चुनाव कराने की सिफारिश की जिसको तत्कालीन राष्ट्रपति श्री एन. संजीवा रेड्डी ने स्वीकार कर लिया। इस प्रकार से 1980 में चुनाव आवश्यक हुए।

प्रश्न 5.
जनता पार्टी ने 1977 में शाह आयोग को नियुक्त किया था। इस आयोग की नियुक्ति क्यों की गई थी और इसके क्या निष्कर्ष थे?
उत्तर:
1977 के मई में जनता पार्टी की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री. जे.सी. शाह की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया। इस आयोग का गठन 25 जून 1975 के दिन घोषित आपातकाल के दौरान की गई कार्यवाही तथा सत्ता के दुरूपयोग, अत्याचार के विभिन्न आरोपों में विभिन्न पहलुओं की जाँच के लिए किया गया था। आयोग ने विभिन्न प्रकार के साक्ष्यों की जाँच तथा गवाहों के बयान दर्ज किये आयोग ने अपनी रिपोर्ट में विभिन्न तथ्यों के आधार पर अपने निष्कर्ष दिये जिन पर सरकार ने विचार विमर्श कर स्वीकार की।

शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि इस अवधि में बहुत सारी ज्यादतियाँ हुई। इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान के साथ जरूरत से ज्यादा छेड़छाड़ की गयी। सरकारी अधिकारियों ने अपने पदों व अधिकार का दुरूपयोग किया। लोगों की स्वतन्त्रता व अधिकारों का हनन किया गया। प्रेस पर अनावश्यक पाबन्दियाँ लगाई गयी। शाह आयोग का निष्कर्ष था कि निवारक नजरबन्दी के कानून के तहत लगभग एक लाख ग्यारह हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया। शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि दिल्ली बिजली आपूर्ति निगम के महाप्रबन्धक को दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर के दफ्तर से 21 जून 1975 की रात दो बजे मौखिक आदेश मिला कि सभी अखबारों की बिजली आपूर्ति काट दी जाये।

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प्रश्न 6.
1975 में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करते हुए सरकार ने इसके क्या कारण बताए थे?
उत्तर:
विभिन्न आर्थिक व राजनीतिक कारणों से गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों ने देश के विभिन्न भागों में आन्दोलन प्रारम्भ किये हुए थे। जगह-जगह हड़ताल बाँध व धरनों का आयोजन किया जा रहा था। बिहार में विद्यार्थी भी इस आन्दोलन में कूद पड़ें थे। प्रशासन एक प्रकार से ठप्प हो गया था। क्षेत्रीय आन्दोलनों का प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर पड़ रहा था। यद्यपि 1971 में भारी सफलता प्राप्त करके चुनावों में श्रीमती इंदिरा गाँधी विजयी हुई थी। 1974 में तो देश में एक प्रकार से अराजकता की स्थिति हो गयी थी। कई राज्यों में नक्सलवादी गतिविधियाँ फैल रही थी। 1975 में जय प्रकाश नारायण ने जनता के संसद मार्च का नेतृत्व किया।

सरकार ने विरोधी दलों के आन्दोलन को दबाने के लिए 25 जून 1975 के दिन आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर दी जिसके निम्न कारण बताए –

  1. आपातकालीन स्थिति को घोषणा संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत की गयी जिसका अर्थ है कि आन्तरिक गड़बड़ी के कारण आपातकालीन स्थिति की घोषणा की गई।
  2. सरकार का कहना था कि चुनी हुई सरकारों को काम करने नहीं दिया जा रहा था।
  3. जगह-जगह आन्दोलन व धरनों का आयोजन हो रहा था।
  4. अनेक क्षेत्रों में आन्दोलनों के कारण हिंसक घटनाएं हो रही थी।
  5. सेना व पुलिस को बगावत व विद्रोह के लिए उकसाया जा रहा था।
  6. साम्प्रदायिक उन्माद को हवा दी जा रही थी।
  7. राष्ट्रीय एकता व अखंडता को खतरा हो रहा था।
  8. राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा था।
  9. कानून के शासन को खतरा उत्पन्न हो रहा था।
  10. अर्थव्यवस्था का संकट और गहरा रहा था।

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प्रश्न 7.
1977 के चुनावों के बाद पहली दफा केन्द्र में विपक्षी दल की सरकार बनी। ऐसा किन कारणों से सम्भव हुआ?
उत्तर:
1977 के चुनाव में पहली बार केन्द्र में कांग्रेस सरकार नहीं बना पायी व पहली बार ही विपक्षी दलों की सरकार केन्द्र में बन पायी हालांकि 1967 के चुनाव में भी गैर-कांग्रेसवाद के नारे पर विपक्षी दलों ने इक्ट्ठे होकर चुनाव लड़े थे परन्तु केन्द्र में तो कांग्रेस सरकार बना पायी थी हालांकि 1967 के चुनावों में कांग्रेस को 9 राज्यों में सरकार गवानी पड़ी थी। इस बार अर्थात् 1977 के चुनावों में अनेक कारणों से कांग्रेस विरोधी धारणा ज्यादा तेज थी जिसके कारण उत्तर भारत में तो कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया था। यहाँ तक की श्रीमती इंदिरा गाँधी भी रायबरेली से चुनाव हार गयी थी। 1977 के चुनाव में कांग्रेस के प्रमुख कारण निम्न थे –

  1. देश का आर्थिक संकट
  2. आवश्यक चीजों की कीमतों में वृद्धि
  3. सभी विरोधी दलों का एक जुट हो जाना
  4. जनता पार्टी का निर्माण
  5. जय प्रकाश नारायण का विरोधी दलों को आशीर्वाद
  6. आपातकाल की ज्यादतियाँ
  7. न्यायपालिका व कार्यपालिका का टकराव
  8. संविधान को पूरा बदलने का प्रयास
  9. प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला
  10. जनमत का विरोध
  11. नागरिकों की स्वतन्त्रता पर हमला
  12. अधिकारियों द्वारा ज्यादतियाँ
  13. नागरिकों की धार्मिक भावनाओं पर हमला
  14. मौलिक अधिकारों का हनन
  15. भारत के संघीय स्वरूप में परिवर्तन

प्रश्न 8.
हमारी राजव्यवस्था के निम्नलिखित पक्ष पर आपातकाल का क्या असर हुआ?

  1. नागरिकों के अधिकारों की दशा तथा नागरिकों पर इसका असर।
  2. कार्यपालिका और न्यायपालिका के सम्बन्ध।
  3. जनसंचार माध्यमों के कामकाज।
  4. पुलिस और नौकरशाही की कार्यवाहियाँ।

उत्तर:
1. नागरिकों के अधिकारों की दशा और नागरिकों पर इसका असर-आपातकाल की स्थिति में राजव्यवस्था के अनेक पक्षों पर प्रभाव पड़ा। 25 जून 1975 को देश में जब संविध न के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल स्थिति की घोषणा की गयी तो इसका मौलिक अधि कारों पर असर इस प्रकार से पड़ा कि सभी मौलिक अधिकार को स्थगित कर दिया। जिसके फलस्वरूप उनकी नागरिक के रूप में अनेक सुविधाएँ, अधिकार व स्वतन्त्राएँ समाप्त हो गयी।

नागरिकों के विचारों की अभिव्यक्ति, घूमने फिरने व सभाएँ आयोजित करने पर रोक लगा दी गयी। इस प्रकार से आपातकाल में नागरिकों का जीवन अत्यन्त घुटन का जीवन हो गया सरकार ने निवारक नजरबंदी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जिसके अन्दर किसी व्यक्ति को इसलिए गिरफ्तार नहीं किया जाता था कि उसने कोई अपराध किया है बल्कि इसलिए कि वह इस आशंका पर कि वह अपराध कर सकता है। आपातकाल के समय में नागरिकों पर अनेक ज्यादतियाँ की गई।

2. कार्यपालिका और न्यायपालिका के सम्बन्ध:
आपातकाल स्थिति की घोषणा का कार्यपालिका व न्यायपालिका के सम्बन्धों पर भी बुरा प्रभाव पड़ा सरकार ने न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार में कमी कर दी। उच्च न्यायलयों को अनेक संघीय विषय पर मुदकमें सुनने का अधिकार न रहा व इसी प्रकार से सर्वोच्च न्यायालय से भी प्रान्तीय विषयों से संबंधित मुकदमें सुनने का अधिकार ले लिया।

कई प्रमुख पदों के चुनावों में सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर कर दिया। अनेक विषयों पर सर्वोच्च न्यायालय की वह उच्च न्यायालय की न्यापुनः शक्ति में कमी कर दी। 42वें संविधान संशोधन के द्वारा न्यायपालिका की शक्तियों में काफी कमियाँ की गई। इंदिरा गाँधी के खिलाफ उच्च न्यायालय इलाहाबाद के निर्णय की पृष्ठ भूमि में भी संविधान में कई संशोधन करके न्यायपालिका की शक्तियों को प्रभावित किया।

3. जनसंचार के माध्यमों के काम काज:
आपातकाल की स्थिति की घोषणा का सबसे अधिक बुरा प्रभाव प्रेस व मीडिया पर पड़ा। आपातकालीन प्रावधानों के अन्तर्गत प्राप्त अपनी शक्तियों पर अमल करते हुए सरकार ने प्रेस की आजादी पर रोक लगा दी। समाचार पत्रों को कहा गया कि वे कुछ भी छापने से पहले छापने की अनुमति ले। इस प्रकार से प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी।

अनेक धार्मिक व सांस्कृतिक संस्थाओं जैसे आर.एस.एस. व जमाते इस्लाम पर पाबन्दियाँ लगा दी। अनेक प्रमुख अखबारों इण्डियन एक्सप्रेस और स्टेट्समेन जैसे अखबारों ने इस प्रेस सेंसरशिप का विरोध किया। जो अखबार सरकार के आदेशों का पालन नहीं करते थे उनकी बिजली काट दी जाती थी। कई अखबारों को इन सब कारणों से बन्द करना पड़ा। इसके विरोध में अनेक बुद्धजीवियों ने अपने पदक बापिस कर दिये।

4. पुलिस व नौकरशाही की कार्यवाहियाँ:
आपातकाल के समय में पुलिस व नौकरशाही की भूमिका की सबसे अधिक आलोचना हुई है क्योंकि इन अधिकारियों ने अपनी शक्तियों का व अपनी स्थितियों का दुरूपयोग किया। राजनीतिज्ञों को खुश करने के लए इन्होंने सरकार की गलत नीतियों को भी पूरे जोश के साथ लागू किया।

उदाहरण के तौर पर परिवार नियोजन की नीति व कार्यक्रमों को लागू करने के लिए जबरदस्ती की गई व लोगों की धार्मिक भावनाओं का मजाक उड़ाया गया। पुलिस व नौकरशाही के द्वारा सत्ता का खुला दुरूपयोग किया गया। इनके डर से दिल्ली के गरीब इलाकों के निवासियों को बड़े पैमाने पर विस्थापित होना पड़ा। शहरों के सुन्दरीकरण के नाम पर लोगों के घरों को उजाड़ दिया गया।

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प्रश्न 9.
भारत की दलीय प्रणाली पर आपातकाल का किस तरह असर हुआ? अपने उत्तर की पुष्टि उदाहरणों से करें।
उत्तर:
भारत में बहुदलीय प्रणाली है अर्थात् भारतीय राजनीति में व चुनावी प्रक्रिया में अनेक दल सक्रिय रहते हैं ये दल विभिन्न आधारों पर बनते रहते हैं। इनमें कुछ क्षेत्रीय दल है व कुछ राष्ट्रीय दल है। 1967 तक के चुनावों में सभी दल अलग-अलग चुनाव चिन्हों पर चुनाव लड़ते रहे हैं जिसका लाभ सीधा कांग्रेस को मिलता रहा। 1967 तक के पहले सभी चुनावों का प्रभुत्व रहा। 1967 के चुनावों में पहली बार कछ विरोधी दलों ने मिलकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा परन्तु कांग्रेस के केन्द्र में प्रभुत्व को नहीं तोड़ पायी परन्तु कांग्रेस के जनाधार में कमी अवश्य आ गयी।

राज्यों में कांग्रेस को सरकारें गवानी भी पड़ी। इसके बाद 1971 के मध्याविधि चुनाव में सभी विरोधी दलों ने मिलकर कांग्रेस के खिलाफ विशाल गठबन्धन बनाया परन्तु इन चुनावों में फिर भी कांग्रेस को ही विशाल बहुमत मिला व कांग्रेस इस चुनाव के बाद इंदिरा गाँधी और अधिक शक्तिशाली प्रधानमंत्री के रूप में उभरकर आयी और इस प्रकार से 1971 के चुनाव तक भी कांग्रेस का ही प्रभुत्व रहा। साम्यवादी दल भी अक्सर कांग्रेस के साथ ही रहे।

1975 में देश में आपातकालीन स्थिति लगने के बाद प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया व 18 महीने तक सभी राजनीतिक गतिविधियों पर पाबन्दियाँ लगा दी गई। 18 महीने के अन्दर सभी गैर कांग्रेसी नेताओं में कांग्रेस विरोधी व इंदिरा गाँधी विरोधी भावना बढ़ गयी। जैसे ही 1977 में श्रीमती इंदिरा गाँधी ने चुनावों की घोषणा की, सभी विरोधी दलों के नेताओं ने अपने मत-भेद, विचारधारा व कार्यक्रम भुलाकर केवल एक ही कार्यक्रम बनाया कि इस चुनाव में कांग्रेस को हटाया जाये। अतः सभी दलों ने अपने दलों का एक पार्टी में विलय कर जनता पार्टी के नाम से एक दल का निर्माण किया।

इसमें प्रमुख रूप से समाजवादी पार्टी, कांग्रेस ओल्ड, भारतीय लोक दल व भारतीय जन संघ शामिल हुए बाद में बाबू जगजीवन राम के नेतृत्व वाली कांग्रेस फार डेमोक्रेसी पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गई। इस प्रकार मुख्य रूप से दो प्रकार के दल इस चुनाव में रहे एक कांग्रेस व साम्यवादी दलों का गठबन्धन व दूसरा जनता पार्टी।

इस प्रकार से आपातकाल स्थिति के अनुभव से भारत में पहली बार दो दलीय प्रणाली के विकास का आभास हुआ। जनता पार्टी एक प्रकार सभी हितों, विचारधाराओं व कार्यक्रमों का प्रतिनिधित्व कर रही थी। चुनावों में जनता पार्टी को भारी सफलता मिली व इसकी सरकार भी बनी परन्तु मात्र 18 महीने में यह जनता पार्टी की सरकार जनता पार्टी के विभाजन के कारण गिर गई व भारत में फिर बहुदलीय प्रणाली का दौर आ गया।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित अवतरण को पढ़े और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दें।
1977 के दौरान भारतीय लोकतन्त्र, दो दलीय व्यवस्था के जितना नजदीक आ गया था उतना पहले कभी नहीं आया। बहरहाल अगले कुछ सालों में मामला पूरी तरह बदल गया। हारने के तुरन्त बाद कांग्रेस दो टूकड़ों में बंट गई जनता पार्टी में भी बड़ी अफरा-तफरी मची। डेविड वटलर, अशोक लाहिडी और प्रणव राय –

(क) किन वजहों से 1977 में भारत की राजनीति दो दलीय प्रणाली के समान जान पड़ रही थी?
(ख) 1977 में दो से ज्यादा पार्टियाँ अस्तित्व में थी। इसके बावजूद लेखकगण इस दौर को दो दलीय प्रणाली के नजदीक क्यों बात रहे हैं?
(ग) कांग्रेस और जनता पार्टी में किन कारणों से टूट पैदा हुई?

उत्तर:
(क) 1977 के चुनावों में भारतीय दलीय प्रणाली के स्वरूप में निश्चित रूप से कुछ परिवर्तन नजर आ रहे थे। पहली बार चुनाव मुख्य रूप से दो दलों के बीच हुआ। यद्यपि 1971 के चुनाव में विरोधी दलों ने एक विशाल गठबन्धन बनाकर चुनाव लड़ा था परन्तु 1977 का चुनाव स्पष्ट राय से दो राजनीतिक दलों के बीच लड़ा गया एक कांग्रेस व दूसरी जनता पार्टी जिसमें सभी प्रमुख विरोधी दलों का विलय हो गया था। इस प्रकार 1977 में भारतीय दलीय प्रणाली दो दलीय जान पड़ रही थी।

(ख) निश्चित रूप से 1977 के चुनाव में दो पार्टियाँ अस्तित्व में थी परन्तु इस दौर को इस प्रकार की दो दलीय व्यवस्था नहीं कहा जा सकता जैसी कि ब्रिटेन व अमेरिका में प्रचलित है अतः लेखक ठीक ही कहते हैं कि 1977 में भारत में दलीय प्रणाली दो दलीय प्रणाली के नजदीक अवश्य थी परन्तु स्पष्ट दो दलीय प्रणाली नहीं थी क्योंकि जनता पार्टी एक राजनीतिक दल नहीं था बल्कि कुछ राजनीतिक दलों का मिश्रण था। इसको साधारण भाषा में खिचड़ी कहा जाता था जो 1979 में जनता पार्टी के विभाजन के समय सच भी सिद्ध हो गयी।

(ग) जनता पार्टी कांग्रेस में विभाजन अलग-अलग समय पर अवश्य हुआ परन्तु दोनों में विभाजन के कारण समान ही नजर आते हैं। कांग्रेस में विभाजन 1978 में हुआ जब कांग्रेस के पास सत्ता नहीं थी व जनता पार्टी में विभाजन 1979 में हुआ जब जनता पार्टी सत्ता में तो थी परन्तु विभिन्न पदों के लिए आपसी लड़ाई जारी थी। वास्तव में जनता पार्टी के संगठित राजनीतिक दल के रूप में स्थापित ना हो सकी। आपसी अन्तर विरोध के कारण जनता पार्टी में विभाजन हुआ।

Bihar Board Class 12 Political Science लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
1979 के बाद आर्थिक संकट के प्रमुख कारण क्या थे जिनसे आन्दोलन प्रारम्भ हुए।
उत्तर:
भारत आजादी के बाद से ही आर्थिक संकट का शिकार रहा क्योंकि भारत को अंग्रेजों से एक पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था मिली। यह आर्थिक संकट सत्तर के दशक में और अधिक गहरा हो गया जिसके तत्कालीन कारण निम्न थे:

  1. 1971 में हुई बांग्लादेश युद्ध का आर्थिक भार।
  2. उन करोड़ों बांग्लादेशियों के आर्थिक बोझ का जो भारत में शरणार्थियों के रूप में भारत की सीमा पार करके भारत में रह रहे थे।
  3. 1971 के युद्ध में उन युद्ध बन्दियों का आर्थिक बोझ जिन्होंने लाखों की संख्या में भारतीय फौजों के सामने आत्म समर्पण कर दिया था।
  4. भारत के खिलाफ 1971 के युद्ध के बाद अमेरिका के द्वारा लगाये गये आर्थिक बन्धनों का प्रभाव।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि।
  6. मानसून की विफलता के कारण कृषि पैदावाद में भारी कमी।

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प्रश्न 2.
नक्सलवादी आन्दोलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पश्चिमी बंगाल, बिहार, आन्ध्र प्रदेश में चल रहा नक्सलवादी आन्दोलन उन लोगों का समूह है जो क्रांतिकारी तरीके से यहाँ तक कि हिंसात्मक तरीके से भी सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में तुरन्त परिवर्तन व सम्पूर्ण परिवर्तन करना चाहते हैं ये लोग धनी भूमि-स्वामियों से जमीन छीनकर भूमिहीन लोगों में बांटते हैं। इन राज्यों के ये हिंसक आन्दोलन सरकारों के प्रयासों से भी समाप्त नहीं हुए अब ये आन्दोलन झारखंड जैसे राज्यों में भी सक्रिय है फिलहाल राज्यों के 75 जिले नक्सलवादी आन्दोलन से प्रभावित है नक्सलवादी मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा से प्रभावित है।

प्रश्न 3.
केशवानन्द भारती के 1973 के विषय में बताइये।
उत्तर:
आजादी के बाद से ही यह विवाद का विषय बन गया था कि क्या संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है या नहीं। 1967 तक के निर्माण में न्यायालयों ने इसका उत्तर हाँ में दिया परन्तु 1967 में गोलकनाथ केस सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों को संशोधित नहीं कर सकती जिसके प्रभाव को समाप्त करने के लिए संसद ने संविधान में संशोधन किये जिनकी 1973 में केशवानन्द भारती केस में चुनौती दी इसमें निर्णय हुआ कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती हो भले ही मौलिक अधिकार हो परन्तु संविधान को मूल रचना में परिवर्तन नहीं कर सकती।

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प्रश्न 4.
1975 में आपातकाल स्थिति की घोषणा के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
सत्तर के दशक में देश आर्थिक व राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा था। 1971 के चुनाव में कांग्रेस भारी बहुमत से जीती थी परन्तु फिर भी सारे देश में राजनीतिक आन्दोलन चल रहे थे। 25 जून 1975 को श्रीमती इंदिरा गाँधी ने आपात स्थिति की घोषणा की जिसके निम्न प्रमुख कारण थे –

  1. बिहार का विद्यार्थी आन्दोलन।
  2. गुजरात आन्दोलन जिसमें चुनी हुई सरकार को कार्य करने नहीं दिया जा रहा था।
  3. राष्ट्र की एकता व अखंडता को खतरा।
  4. आन्तरिक गड़बड़ी जिससे प्रशासन ठप्प हो गया था।
  5. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के संदर्भ में श्रीमती इंदिरा गाँधी से इस्तीफे की माँग।

प्रश्न 5.
श्रीमती इंदिरा गाँधी ने आपात स्थिति की घोषणा किस प्रकार से की।
उत्तर:
श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 25 जून 1975 को देश में आपात स्थिति की घोषणा करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद को मौखिक सलाह दी जिसको मानकर उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आन्तरिक गड़बड़ी के कारण आपातकाल की स्थिति की घोषणा कर दी। श्रीमती गाँधी ने इस निर्णय के लिए मंत्रिमंडल की भी कोई औपचारिक बैठक नहीं की। मंत्रिमंडल को भी इसकी सूचना 26 जून की सुबह को दी गई। देश में इस बार आपातकाल की स्थिति की घोषणा प्रथम बार की गई थी। श्रीमती इंदिरा गाँधी ने देश को यह बताने का प्रयास किया कि आपातकाल की स्थिति की घोषणा के लिए विरोधी दल जिम्मेवार हैं।

प्रश्न 6.
आपातकाल की स्थिति की घोषणा के तुरन्त परिणाम क्या थे।
उत्तर:
आपातकालीन स्थिति की घोषणा के तुरन्त परिणाम निम्न थे:

  1. नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थगित हो जाते हैं।
  2. देश का संघात्मक स्वरूप समाप्त हो जाता है।
  3. देश का प्रशासनिक स्वरूप एकात्मक हो जाता है।
  4. सभी प्रकार के आन्दोलनों पर पाबन्दियाँ लगा दी।
  5. निवारक नजरबन्दी कानून का लागू होना।
  6. सभी विषयों पर संसद को कानून बनाने का अधिकार
  7. राष्ट्रपति के हाथों में पूरे देश का शासन आ जाता है।

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प्रश्न 7.
42 वें संविधान संशोधन की मुख्य विशेषताएँ क्या थी।
उत्तर:
42 वें संविधान संशोधन की मुख्य विशेषताएँ अथवा प्रावधान निम्न थे –

  1. संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद धर्मनिर्पेक्ष शब्द जोड़े गये।
  2. न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार में कटौती की गई।
  3. संसद व विधान सभा के कार्य काल में वृद्धि की गई।
  4. राज्य की नीति के निर्धारित तत्वों को मौलिक अधिकारों से अधिक वरीयता दी गई।
  5. राष्ट्रपति की स्थिति भी कमजोर की गई क्योंकि उसके लिए मंत्रिमंडल की सलाह को मानना आवश्यक किया गया।
  6. संसद की शक्तियों में वृद्धि की गई।
  7. भारतीय संघीय स्वरूप में भी परिवर्तन किया। जिसमें सूचियों के विषयों को बदला गया।

प्रश्न 8.
आपात स्थिति की घोषणा के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
आपात स्थिति की घोषणा के पक्ष में निम्न तर्क दिये जा सकते हैं –

  1. पूरे देश में आर्थिक व राजनीतिक अस्थिरता का दौर था।
  2. पुलिस व सेना को उकसाया जा रहा था कि वे बगावत कर दें।
  3. चुनी हुई सरकारों को हटाये जाने की मांग की जा रही थी।
  4. देश की एकता व अखंडता का खतरा उत्पन्न हो रहा था।
  5. प्रशासन व कानून व्यवस्था चरमरा गई थी।
  6. देश विरोधी व समाज विरोध व अन्य तोड़-फोड़ की गतिविधियाँ जारी थी।
  7. विदेशी ताकतों का हस्तक्षेप सम्भव था।

प्रश्न 9.
आपातकाल स्थिति की घोषणा के विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
आपातकाल स्थिति के विपक्ष में भी निम्न तर्क दिये जा सकते हैं –

  1. बांध व हड़ताले शान्ति पूर्ण थे व नागरिकों के राजनीतिक अधिकार भी हैं।
  2. आर्थिक संकट के लिए सरकार की नीतियाँ दोषी थी।
  3. कीमतें मंहगी हो रही थी।
  4. देश में प्रचलित हालातों को उच्च तरीकों से भी हल किया जा सकता था।
  5. आपातकाल की स्थिति को गलत तरीके से लगाया गया।
  6. इससे न्यायालय की गरिमा की अवहेलना की गई।

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प्रश्न 10.
तुर्कमान गेट घटना के बारे में समझाइये।
उत्तर:
आपातकालीन स्थिति के दौरान दिल्ली के गरीब इलाके के निवासियों को बड़े पैमाने पर विस्थापित होना पड़ा। इन गरीब विस्थापित लोगों को यमुना नदी के जिस निर्जन इलाके में इन लोगों को बसाया गया। इसी उद्देश्य की एक घटना तुर्कमान गेट इलाके की एक बस्ती की है। आपातकाल स्थिति की यह बहुत ही चर्चित घटना है।

इस इलाके की झुग्गी झोपड़ियों को उजाड़ दिया गया व इलाके के सैंकड़ों लोगों की जबरन ही नसबन्दी कर दी गई। यह कार्य अधिकारियों ने अपने आंकड़े पूरे करने के लिए किये। नसबन्दी के केस के लिए कोटा निर्धारित कर दिया जिसको पूरा करने के लिए बीच के लोगों ने गरीब लोगों को छोटे-छोटे लालच देकर नसबन्दी करा दी। इस तरह कुछ लोग अगर सरकार द्वारा प्रायोजित प्रयासों के शिकार हुए तो कुछ लोगों ने कानून जमीन हासिल करने के लालच में दूसरों को बलि का बकरा बनाया व ऐसा करके खुद को विस्थापित होने से बचाया।

प्रश्न 11.
1975 की आपातकाल स्थिति के अनुभव से हमें क्या सबक मिला?
उत्तर:
आपातकाल की स्थिति की घोषणा संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत की गयी। सबसे पहले बात यह है कि जब तक आपातकालीन स्थिति के लिए प्रयाप्त कारण ना हो आपातकाल की स्थिति की घोषणा नहीं होनी चाहिए। दुसरा सबक इस बात का कि आपातकाल स्थिति की घोषणा करने का तरीका सही होना चाहिए।

श्रीमती इंदिरा गाँधी ने आपातकाल स्थिति की घोषणा बिना मंत्रिमंडल की सलाह के राष्ट्रपति को मौखिक रूप से आदेश जारी करने के लिए कहा जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया इस प्रकार का तरीका गलत था। इसमें भी सुधार हुआ। आपाताकाल में नागरिकों के अधिकारों का हनन हुआ व एक प्रकार से अफसर ज्ञाही का बोलबाला रहा। देश में एक प्रकार का अधिनायकवाद रहा इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आपातकालीन स्थिति का अनुभव गलत था।

प्रश्न 12.
जनता पार्टी का गठन किस प्रकार से हुआ?
उत्तर:
जनता पार्टी का गठन 1977 में श्री जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा से उस समय हुआ जब सभी विरोधी दलों के प्रमुख नेता जेल में थे। इन नेताओं ने 1977 में होने वाले चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ एक जुट होकर लड़ने का फैसला किया। इसमें प्रमुख दल थे कांग्रेस (ओल्ड) समाजवादी पार्टी, भारतीय लोकदल व भारतीय जनसंघा कांग्रेस फार डेमोक्रेसी भी बाद में जनता पार्टी में शामिल हो गयी।

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प्रश्न 13.
जनता पार्टी की सरकार 1977 में किस प्रकार से बनी।
उत्तर:
1977 के चुनाव में जनता पार्टी को इसके सहयोगियों को भारी सफलता मिली। श्रीमती इंदिरा गाँधी की कांग्रेस का उत्तरी भारत व मध्य भारत में पूरी तरह से सफाया हो गया। यहाँ तक कि खुद श्रीमती इंदिरा गाँधी भी रायबरेली से चुनाव हार गयी। जनता पार्टी व इसकी सहयोगी दलों को लोकसभा की 330 सीटे मिली जिसमें से अकेले जनता पार्टी को 295 सीटें प्राप्त हुई इस प्रकर से राष्ट्रपति ने औपचारिक रूप से जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।

इस प्रकार से इन परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि इस चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर थी यह आपातकाल स्थिति की घोषणा के खिलाफ एक जनता की प्रतिक्रिया थी। प्रधानमंत्री के पद पर जनता पार्टी के तीन प्रमुख नेताओं के विवाद ने खुशी के माहौल को निराशा में बदल दिया क्योंकि श्री मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह व बाबू जगजीवन राम ने प्रधानमंत्री के पद के लिए अपना-अपना दावा रखा। अन्तः में विचार विमर्श के बाद मोरारजी देसाई देश के प्रधान मंत्री बने व चौधरी चरण सिंह व जगजीवन राम देश के उपप्रधानमंत्री बने।

प्रश्न 14.
जनता पार्टी की सरकार गिरने के क्या प्रमुख कारण थे?
उत्तर:
जनता पार्टी की सरकार के गिरने के प्रमुख कारण निम्न थे –

  1. जनता पार्टी का टूटना। वास्तव में जनता पार्टी केवल कुछ खास परिस्थितियों का ही परिणाम था।
  2. जनता पार्टी के घटकों में ताल मेल नहीं था।
  3. कुछ प्रमुख नेताओं की पद लोलपता।
  4. प्रमुख घटकों में व्यक्ति पूजा।
  5. जनता पार्टी के घटकों में आपसी मतभेदों का जारी रहना।

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प्रश्न 15.
कांग्रेस व्यवस्था किस प्रकार से दोबारा सत्ता में आयी।
उत्तर:
जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई जो मात्र चार महीने ही चली। चौधरी चरण सिंह ने लोकसभा भंग कर दी। जिससे 1980 में लोकसभा में मध्यावधि चुनाव हुए। इन चुनावों में जनता पार्टी हो हार का मुंह देखना पड़ा व कांग्रेस को पुनः सफलता मिली। श्रीमती इंदिरा गाँधी फिर से देश की प्रधानमंत्री बनी। कांग्रेस की पुनः जीत का प्रमुख कारण जनता पार्टी का विभाजन रहा। कांग्रेस की इस प्रकार से पुर्नस्थापना हुई।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आपातकाल स्थिति की घोषणा के कौन से प्रमुख आर्थिक व राजनीतिक कारण थी?
उत्तर:
आपातकाल स्थिति की घोषणा के प्रमुख आर्थिक व राजनीतिक कारण निम्न थे –

आर्थिक कारण:

  1. 1971 की बांग्लादेश की लड़ाई का आर्थिक बोझ।
  2. बांग्लादेश के शरणार्थियों का आर्थिक बोझ।
  3. 1971 की लड़ाई में कैदियों पर लम्बे समय तक किये गये खर्च का आर्थिक बोझ।
  4. मानसून की विफलता।
  5. 1974 का खाद्यान्न संकट।
  6. आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि।

राजनीतिक कारण:

  1. गुजरात आन्दोलन।
  2. बिहार में विद्यार्थी आन्दोलन।
  3. चुनी हुई सरकारों के खिलाफ आन्दोलन।
  4. गुजरात में आन्दोलन का मोरारजी भाई देसाई का नेतृत्व।
  5. जय प्रकाश नारायण का नेतृत्व व उनके द्वारा संसद मार्च।
  6. देश के अनेक हिस्सों में कानून व व्यवस्था का खराब होना।
  7. देश की एकता व अखण्डता को खतरा।

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प्रश्न 2.
बिहार के आन्दोलन का कांग्रेस के खिलाफ चल रहे आन्दोलन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
यूँ तो कांग्रेस सरकार की सरकारों के खिलाफ पूरे देश में विरोध पनप रहा था परन्तु बिहार व गुजरात में आन्दोलन का रूप अधिक उग्र था। बिहार के आन्दोलन में विद्यार्थी भी शामिल हो गये थे व श्री जयप्रकाश नारायण इसका नेतृत्व कर रहे थे। इसी प्रकार से गुजरात में भी आन्दोलन बहुत सक्रिय था जिसका नेतृत्व मोरारजी देसाई कर रहे थे। श्री जयप्रकाश नारायण ने इस आन्दोलन को अहिंसात्मक तरीके से पूरे देश में चलाने की अपील की जिसका व्यापक प्रभाव पड़ा। इन आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य केन्द्र व प्रान्तों की कांग्रेस सरकारों को हटाना था। इस आन्दोलन में महंगाई व आर्थिक संकट को मुख्य मुद्दा बनाया। श्री जयप्रकाश नारायण ने इस आन्दोलन को सम्पूर्ण क्रान्ति का नाम दिया जिसका उद्देश्य सम्पूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन करना था।

प्रश्न 3.
आपातकाल स्थिति की घोषणा से पहले कार्यपालिका व न्यायपालिका में चल रहे टकराव पर प्रकाश डालिये।
उत्तर:
प्रारम्भ से ही कार्यपालिका व न्यायपालिका के बीच मतभेद रहे हैं। परन्तु संविधान संशोधन के प्रश्न पर सत्तर के दशक के बाद कार्यपालिका व न्यायपालिका में विवाद और अधिक गहराया था। संसद की मौलिक अधिकारों के संशोधन के अधिकार पर न्यायपालिका का 1967 तक यह दृष्टिकोण रहा है कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है।

परन्तु 1967 में प्रसिद्ध गोलकवाद केस में न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती जिससे कार्यपालिका व न्यायपालिका में टकराव बढ़ गया। सरकार ने इस निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने के लिए संविधान में कुछ संशोधन किये जिनको फिर 1973 में केशवानन्द केस में चुनौती दी गयी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस केस के निर्णय में निश्चित किया कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है। भले ही मौलिक अधिकार ही क्यों ना हो परन्तु संसद संविधान की मूल रचना को नहीं बदल सकती। इस प्रकार से कार्यपालिका व न्यायपालिका में टकराव चलता रहा आपातकालीन स्थिति में 42वां संविधान संशोधन कर न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार में कमी दी गई।

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प्रश्न 4.
देश में आपातकालीन स्थिति की घोषणा के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
देश में आपातकाल स्थिति की घोषणा के निम्न कारण बताये गये –

  1. आन्तरिक गड़बड़ी
  2. पुलिस व सैनिकों में बगावत का डर
  3. देश की एकता अखण्डता को खतरा
  4. आर्थिक संकट
  5. राजनीतिक अस्थिरता का डर
  6. राज्यों में कानून व्यवस्था का खराब होना
  7. चुनी हुई सरकारों के खिलाफ आन्दोलन
  8. प्रशासन का ठप्प होना
  9. अराजकता की स्थिति
  10. हिंसा का माहौल

प्रश्न 5.
आपात स्थिति लागू होने के क्या परिणाम थे।
उत्तर:
आपातकाल की स्थिति के निम्न परिणाम सामने आये। देश में 25 जून 1975 को आपात स्थिति की घोषणा की गई थी –

  1. मौलिक अधिकारों का हनन होना (स्थगत होना)
  2. संविधान का संघीय स्वरूप समाप्त हो जाता है देश की सभी शक्तियाँ केन्द्र के पास आ जाती है। इस प्रकार से संविधान एकात्मक हो जाता है।
  3. केन्द्र सरकार की शक्तियाँ बढ़ जाती है।
  4. देश का प्रजातन्त्रीय स्वरूप प्रभावित होता है।
  5. प्रेस पर पाबन्दियाँ लगा दी गयी।
  6. सभी दलों के प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया गया।
  7. न्यायालय की शक्तियाँ कम कर दी गई।
  8. संसद का कार्य काल बढ़ा दिया गया।
  9. लोगों की स्वतंत्रता समाप्त हो गई।
  10. संविधान में व्यापक संशोधन किये गये।
  11. राष्ट्रपति की स्थिति कमजोर कर दी गई।
  12. देश में एक प्रकार से आतंक का माहौल पैदा हो गया।

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प्रश्न 6.
आपातकाल स्थिति में न्यायापालिका की शक्तियों व क्षेत्राधिकार में क्या परिवर्तन किये गये?
उत्तर:
आपातकाल की स्थिति में संविधान में व्यापक परिवर्तन किये गये। प्रेस व मीडिया की शक्तियों व स्वतंत्रता को भी प्रभावित किया। इसके साथ-साथ न्यायपालिका की शक्तियों व क्षेत्राधिकार में परिवर्तन कर दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायाल के संदर्भ में आपातकालीन स्थिति के संविधान में संशोधन कर यह व्यवस्था की कि सर्वोच्च न्यायालय प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व स्पीकर के चुनाव सम्बन्धी किसी झगड़े को सर्वोच्च न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर कर दिया।

42 वें संविधान संशोधन से संविधान में व्यापक परिवर्तन किये गये। सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधि कार कम कर दिये गये। सर्वोच्च न्यायालय अब कई राज्यों के विषयों से सम्बन्धित झगड़े नहीं सुन सकती थी। इसी प्रकार राज्यों की उच्च न्यायालय केन्द्र में विषयों से सम्बन्धित झगड़े नहीं सुन सकती थी। इस प्रकार से आपातकालीन स्थिति में न्यायालय के क्षेत्राधिकार में व्यापक परिवर्तन किया गया।

प्रश्न 7.
42 वें संविधान संशोधन की मुख्य विशेषताएँ समझाइये।
उत्तर:
संविधान में 42 वां संशोधन 1976 में किया गया। उस समय देश में आपातकाल की स्थिति थी। इस संविधान संशोधन ने संविधान में बड़े पैमाने पर परिवर्तन कर दिये अतः इसे लघु संविधान भी कहा जाता है। इसमें निम्न मुख्य प्रावधान थे:

  1. संविधान की प्रस्तावना में संशोध न कर दो नये शब्द जोड़े एक समाजवाद व दूसरा धर्मनिरपेक्ष।
  2. लोकसभा व राज्य विधान सभाओं के कार्यकाल पांच वर्ष की जगह 6 वर्ष कर दिये गये।
  3. राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों को मौलिक अधिकारों के स्थान पर अधिक प्राथमिकता की व्यवस्था कर दी।
  4. राष्ट्रपति को मन्त्रीमंडल की सलाह मानने के लिए बाध्य कर दिया।
  5. न्यायपालिका की शक्तियों व क्षेत्राधिकार में कमी कर दी गई।
  6. नागरिकों की स्वतंत्रताओं में कमी की गई।
  7. समवर्ती सूची में नये विषयों को जोड़ गया।
  8. कई राज्यों के विषयों को केन्द्र सूची में शामिल कर दिया।
  9. प्रेस की स्वतन्त्रता को प्रभावित किया।
  10. केन्द्र व प्रान्तों के सम्बन्धों को प्रभावित किया।

प्रश्न 8.
शाह आयोग की नियुक्ति का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
आपातकाल की स्थिति के समाप्त होने के साथ-साथ लोकसभा के चुनाव भी 1977 में कराये गये जिसमें जनता पार्टी ने चुनाव जीता व सरकार बनाई। कांग्रेस को इस चुनाव में आपातकाल स्थिति की ज्यादतियों की सजा भुगतनी पड़ी। यहाँ तक की श्रीमती इंदिरा गाँधी व उनके प्रमुख मंत्री चुनाव हार गये।

जनता पार्टी ने सरकार बनाने के बाद आपातकाल में हुई विभिन्न ज्यादतियों को जनता के सामने लाने के लिए जस्टिस जे.सी. शाह की अध्यक्षता में मई 1977 में एक आयोग का गठन किया गया जिसको शाह आयोग के नाम से जाना जाता है। इसका प्रमुख कार्य 25 जून 1975 के दिन घोषित आपातकाल के दौरान की गई कार्यवाही तथा इस दौरान सत्ता के दुरूपयोग, अतिचार और सदाचार के विभिन्न आरोपों के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करना था। आयोग ने अपने कार्य में विभिन्न साक्षों की जाँच की विभिन्न लोगों के बयान दर्ज करे। व इस आधार पर अपनी रिपोर्ट दी।

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प्रश्न 9.
शाह कमीशन रिपोर्ट की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
1977 में चुनाव में सफलता प्राप्त करने के बाद आपातकाल में कांग्रेस सरकार द्वारा की गई ज्यादतियों का अध्ययन करने के लिए शाह आयोग की नियुक्ति की जिसकी मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं:

  1. नजरबन्दी निवारक कानून का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग किया गया।
  2. 676 राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार हुई।
  3. आपातकाल के दौरान लगभग एक लाख लोगों की गिरफ्तारी की गई।
  4. अखबारों की बिजली पूर्ति को काटने के लिए बिजली आपूर्ति निगम के अधिकारियों को उपराज्यपाल के द्वारा मौखिक आदेश दिये गये।
  5. दो दिन के बाद अखबारों की बिजली जारी की गई।
  6. बिना किसी अधिकारिक पद के गैर सरकारी लोग सरकारी पदों का इस्तेमाल व दुरूपयोग कर रहे थे।
  7. श्रीमति इंदिरा गाँधी के पुत्र श्री संजय गाँधी ने सरकारी कार्यों की दिन प्रतिदिन गतिविधियों में हस्तक्षेप किया।
  8. परिवार नियोजन के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए अधिकारियों ने जबरदस्ती मासूम व युवा नागरिकों की नसबन्दी की जिससे उनका शेष जीवन ही बेकार हो गया।
  9. अनुशासन के नाम पर अधिकारियों ने अनावश्यक रूप से अपने तहत काम करने वाले कर्मचारियों को परेशान किया।

प्रश्न 10.
आपातकाल स्थिति के अनुभव से हमें क्या सबक मिला?
उत्तर:
यद्यपि हम आपातकाल स्थिति की घोषणा के आदेश को उचित नहीं ठहरा सकते परन्तु इस अनुभव से भारतीय प्रजातन्त्र की अनेक कमजोरियां व मजबूरियाँ सामने अवश्य आ गयी। कई आलोचक कहते हैं कि आपातकाल के दौरान भारत में प्रजातंत्र समाप्त हो गया था क्योंकि कानून का शासन नहीं था। संविधान को पूर्णतः बदल दिया गया था। मौखिक आदेशों पर सरकार चल रही थी। बिना सत्ता के लोग सत्ता का दुरूपयोग कर रहे थे।

ऐसी स्थिति में ऐसा भी सोचा जाने लगा था। कि भारत में चुनाव नहीं होगें परन्तु यह सोच गलत सिद्ध हुई क्योंकि इन परिस्थितियों में भी चुनावों की घोषणा की व चुनाव समय पर निष्पक्ष तरीके से सम्पन्न हुआ। इस अनुभव से नागरिकों स्वतंत्रता के महत्त्व का पल लगा। इस अनुभव से यह भी समझा गया कि संविधान के प्रावधानों का किस प्रकार से प्रयोग करना चाहिए। जनता ने यह भी समझा दिया कि भारत में तानाशाही व्यवस्था स्वीकारीय नहीं है।

प्रश्न 11.
पुलिस व नौकरशाही की आपातकाल के समय की भूमिका समझाइये।
उत्तर:
आपातकालीन के अनेक बुरे अनुभवों में आम जनता के लिए सबसे बुरा अनुभव यह रहा कि उनको पुलिस व नौकरशाही की ज्यादितयों का शिकार होना पड़ा। सरकार की नीतियों को लागू करने अपने बड़े अधिकारों व नेताओं की वाह-वाह लूटने के लिए पुलिस व नौकरशाही के अधिकारियों ने जनता पर ज्यादतियाँ व अत्याचार किये। अनेक निर्दोष नागरिकों पर अत्याचार किये गये। आपातकाल स्थिति के दौरान ऐसा लगता था कि पुलिस व नौकरशाही के अधिकारों शासक दल के यंत्र बन गये हैं।

शाह आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य को उजागर किया कि आपातकाल स्थिति मे पुलिस व नौकरशाही की भूमिका सबसे अधिक आपत्तिजनक रही। उन्होंने जनता के सेवक के रूप में नहीं बल्कि जनता के शोषण के रूप में कार्य किया। इंदिरा गाँधी के 20 सूत्रीय कार्यक्रम व संजय गाँधी के 5 सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने के लिए पुलिस व सरकारी अधिकारियों ने आपस में प्रतियोगिता की जिसका शिकार जनता बनी। वास्तव में आपातकाल की अगर कुछ सकारात्मक बाते हैं तो वे पुलिस व अधिकारियों की ज्यादतियों के कारण धूमल हो गयी।

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प्रश्न 12.
जनता पार्टी के उदय व 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की सफलता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आपातकाल स्थिति में सभी दलों के प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया गया। यहाँ तक श्री जयप्रकाश नारायण व आचार्य कृपलानी को भी जेल में डाल दिया गया। 1977 में संसदीय चुनावों की घोषणा की गई। सभी विरोधी दलों के नेताओं ने इस चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ एक जुट होकर चुनाव लड़ने का निर्णय किया। इसके लिए सभी दलो ने वैचारिक मतभेद भुलाकर जनता पार्टी का गठन किया। इसमें सोसलिस्ट पार्टी, कांग्रेस ओल्ड भारतीय जनसंघ पार्टी व भारतीय लोक दल शामिल थे। बाद में बाबू जगजीवन राम की कांग्रेस फार डेमोक्रेसी ने भी जनता पार्टी में विलय कर लिया। जनता पार्टी ही कांग्रेस के खिलाफ मुख्य विरोधी दल था। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को भारी सफलता मिली। 543 में से 352 सीट प्राप्त कर जनता पार्टी ने केन्द्र में प्रथम गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई।

प्रश्न 13.
1977 में सरकार बनाने के बाद जनता पार्टी के कौन से प्रमुख निर्णय थे?
उत्तर:
1977 में केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनने से चारों ओर खुशी का वातावरण था क्योंकि जनता को 18 महीने की आपातकाल की घुटन के बाद स्वरूप रूप में सांस लेने का अवसर मिला था। जनता पार्टी ने सरकार के बनने के बाद लोगों को राहत देने के लिए निम्न प्रमुख निर्णय लिये –

  1. जनता पार्टी ने आपातकाल में किये 42 वें संविधान संशोधन को सभी नकारात्मक प्रावधानों को समाप्त करते हुए 44वां संविधान संशोधन किया।
  2. लोकसभा व राज्य विधान सभाओं के कार्य काल को 6 वर्ष से 5 वर्ष कर दिया गया।
  3. राष्ट्रपति की स्थिति को पहले जैसी सम्मानजनक स्थिति प्रदान की।
  4. सम्पत्ति का मौलिक अधिकार समाप्त किया गया। अब यह केवल कानूनी अधिकार रह गया।
  5. न्यायपालिका का क्षेत्राधिकार पहले की तरह किया गया।
  6. आपत्तिजनक कानून जैसे डी.आई.आर. व पिसा समाप्त किये गये।
  7. मौलिक अधिकारों को नीति निर्देशक तत्वों के स्थान पर प्राथमिकता का स्थान दिया गया।

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प्रश्न 14.
जनता पार्टी की सरकार किस प्रकार से गिरी?
उत्तर:
देश में 1977 के चुनाव के बाद प्रथम गैर-कांग्रेसी सरकार का बड़े उत्साह व उम्मीद के साथ स्वागत किया गया था परन्तु जल्द ही जनता को निराशा का मुँह देखना पड़ा। जनता पार्टी की सरकार बनने के समय में जनता पार्टी के घटकों में प्रधानमंत्री के पद को लेकर खींचातानी प्रारंभ हो गयी। प्रधानमंत्री के पद के लिए तीन घटकों के तीन दावेदार सामने आ गये थे कांग्रेस ओल्ड के श्री मोरारजी भाई देसाई, भारतीय लोकदल के चौधरी चरण सिंह व कांग्रेस फार डेमोक्रेसी के बाबू जगजीवन राम। अन्त में जय प्रकाश नारायण के हस्तक्षेप से मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री व जगजीवनराम व चरण सिंह को उपप्रधानमंत्री बनाया। इस प्रकार सभी घटकों में खींचा-तानी चलती रही। 1979 में चौधरी चरण सिंह जनता पार्टी से अलग हो गये जिससे जनता पार्टी की सरकार गिर गई व जनता पार्टी में कई विभाजन हुए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आपातकाल स्थिति की घोषणा के कारण व इसके परिणामों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आपातकाल स्थिति की घोषणा के कारण:
श्रीमती इंदिरा गाँधी की कांग्रेस सरकार ने देश में 25 जून 1975 को आपातकाल स्थिति की घोषणा के निम्न कारण हैं –

  1. देश में आन्तरिक गड़बड़ी।
  2. देश की एकता व अखण्डता को खतरा।
  3. आर्थिक संकट।
  4. पूरे देश के विभिन्न राज्यों में राजनीतिक आन्दोलन।
  5. चुनी हुई सरकारों का कार्य न करने देना।
  6. आन्दोलन कर्मियों के द्वारा पुलिस व सरकारी कर्मचारियों को बगावत के लिए उकसाना।
  7. प्रशासन का ठप्प हो जाना।
  8. अराजकता की स्थिति का पैदा होना।
  9. कानून व्यवस्था को लोगों के द्वारा अपने हाथों में लेना।
  10. विरोधी दलों का गैर-जिम्मेवार हो जाना।

आपातकाल स्थिति की घोषणा के परिणाम:
18 महीने चली आपातकाल स्थिति के अनेक भयंकर परिणाम रहे जिनमें प्रमुख निम्न हैं –

  1. बड़ी संख्या में विरोधी दलों के नेताओं की गिरफ्तारी।
  2. नागरिकों के मौलिक अधिकार का स्थगन।
  3. नागरिकों की स्वतंत्रताओं का हनन।
  4. न्यायपालिका की शक्तियाँ में कमी।
  5. नजबरन्दी निवारक कानून का दुरूपयोग।
  6. भारतीय संविधान के संघीय स्वरूप की समाप्ति।
  7. प्रेस व मीडिया की स्वतंत्रता की समाप्ति क्योंकि इन पर सेंसरशिप लागू कर दी गईं।
  8. 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान में व्यापक परिवर्तन किये गये।
  9. राष्ट्रपति की स्थिति में परिवर्तन।
  10. पुलिस व नौकरशाही के द्वारा सत्ता का दुरूपयोग इस प्रकार से देश में उक्त कारणों से आपात स्थिति की घोषणा की गयी जिनके गम्भीर परिणामों भी सामने आये।

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प्रश्न 2.
जनता पार्टी के बनने व टूटने की प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सत्तर का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था व राजनीति दोनों के लिए दुखद रहा। विभिन्न कारणों से देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था। जिसके प्रमुख कारण 1971 के पाकिस्तान के युद्ध का परिणाम व इसका प्रभाव व प्राकृतिक विपदाओं का प्रभाव जैसे मानसून का फेल हो जाना व सूखा पड़ना आदि। इन कारणों से देश में अवाक वस्त्रों की कीमतें बहुत बह गयी जिमर्क कारण देश में असन्तोष फैल गया। इससे आर्थिक संकट की राजनीति प्रारम्भ हो गयी व देश के अनेक भागों में आन्दोलन प्रारम्भ हो गये। बिहार व गुजरात में ये आन्दोलन बड़े पैमाने पर हुए जिनका नेतृत्व विद्यार्थी वर्ग कर रहा था। जयप्रकाश नारायण व मोरारजी भाई देसाई भी इस आन्दोलन में विरोधी दलों के साथ हो गये।

आन्दोलन से उत्पन्न स्थिति के कारण श्रीमति इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल स्थिति की घोषणा कर दी व विरोधी दलों के प्रमुख लागों को जेल में डाल दिया गया। 25 जून 1975 के 18 महीने बाद देश में श्रीमती इंदिरा गाँधी ने संसदीय चुनावों की घोषणा की जेल में ही सभी विरोधी दलों ने यह निर्णय किया कि वे 1977 के चुनाव में इंदिरा गाँधी व कांग्रेस के खिलाफ एक पार्टी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेंगे ताकि कांग्रेस की हार को निश्चित किया जा सके। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए श्री जयप्रकाश नारायण व आचार्य कृपलानी की प्रेरणा से प्रमुख विरोधी दलों ने मिलकर व अपने दलों का एक दल में विलय करके जनता पार्टी का गठन किया।

1977 के चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ एक कार्यक्रम व एक नेता के तहत चुनाव लड़ा। इस चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली व कांग्रेस को देश के अधिकांश भाग में हार का मुंह देखना पड़ा। यहाँ तक की रायबरेली संसदीय चुनाव क्षेत्र से श्रीमती इंदिरा गाँधी चुनाव हार गयी। जनता पार्टी ने लोकसभा में 213 बहुमत प्राप्त कर केन्द्र में सरकार बनाई परन्तु जनता पार्टी अपनी इस ताकत के बोझ को झेल न सकी और बनने के साथ-साथ इसमें दरार पड़ गयी। प्रधानमंत्री के पद पर इसके घटक दलों में तनाव पैदा हो गया जो अन्ततः इसके विभाजन व जनता पार्टी की सरकार के पतन का कारण बना। लोकदल के चौधरी चरण सिंह अपने घटक के साथ अलग हो गये व श्रीमती इंदिरा गाँधी के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई जो केवल 4 महीने चली।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में सही का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
निम्न में से किस कारण से 1975 में आपातकाल स्थिति की घोषणा की?
(अ) आन्तरिक गड़बड़ी
(ब) बाहरी युद्ध
(स) वित्तीय संकट
(द) ग्रह युद्ध
उत्तर:
(अ) आन्तरिक गड़बड़ी

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प्रश्न 2.
संविधान के किस अनुच्छेद के तहत आपातकाल स्थिति की घोषणा की?
(अ) 352
(ब) 356
(स) 358
(द) 360
उत्तर:
(अ) 352

प्रश्न 3.
सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा किसने दिया?
(अ) चौधरी चरण सिंह
(ब) राम मनोहर लोहिया
(स) जयप्रकाश नारायण
(द) आचार्य कृपलानी
उत्तर:
(स) जयप्रकाश नारायण

प्रश्न 4.
निम्न में से जनता पार्टी का घटक कौन-सा दल नहीं था?
(अ) भारतीय लोकदल
(ब) सोसलिस्ट पार्टी
(स) कांग्रेस फार डेमोक्रेसी
(द) कांग्रेस आई
उत्तर:
(द) कांग्रेस आई

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन कथन सही है?
(क) 25 जून, 1975 को इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की उद्घोषणा की।
(ख) आपातकाल के दौरान सभी विपक्षी दलों के नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया।
(ग) लोकनायक जयप्रकाश ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया।
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
इंदिरा गाँधी ने भारत में आपताकाल की घोषणा कब की थी?
(क) 18 मई, 1975
(ख) 25 जून, 1975
(ग) 5 जुलाई, 1975
(घ) 10 अगस्त, 1975
उत्तर:
(ख) 25 जून, 1975

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प्रश्न 7.
जनता पार्टी की सरकार कब बनी?
(क) 1974 में
(ख) 1977 में
(ग) 1980 में
(घ) 1983 में
उत्तर:
(ख) 1977 में

प्रश्न 8.
संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना कब हुई?
(क) 1945 में
(ख) 1947 में
(ग) 1950 में
(घ) 1952 में
उत्तर:
(क) 1945 में

प्रश्न 9.
1975 में भारत में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा संविधान के किस अनुच्छेद के अन्तर्गत की गई?
(क) अनुच्छेद, 352
(ख) अनुच्छेद, 355
(ग) अनुच्छेद, 356
(घ) अनुच्छेद, 360
उत्तर:
(क) अनुच्छेद, 352

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प्रश्न 10.
1977 में पहली बार केन्द्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनवाने का मुख्य श्रेय किन्हें दिया जाता है?
(क) जयप्रकाश नारायण
(ख) मोरारजी देसाई
(ग) जगजीवन राम
(घ) कृपलानी
उत्तर:
(क) जयप्रकाश नारायण

प्रश्न 11.
किस राजनीतिक दल ने 1975 में आपातकाल की घोषणा का स्वागत किया था?
(क) जनसंघ
(ख) अकाली दल
(ग) डी०एम०के०
(घ) सी०पी०आई०
उत्तर:
(घ) अकाली दल

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प्रश्न 12.
1973 में तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश किन्हें बनाया गया था?
(क) न्यायमूर्ति के० सुव्वाराव
(ख) न्यायमूर्ति ए० एन० रे
(ग) न्यायमूर्ति वाई० चन्द्रचूड़
(घ) न्यायमूर्ति एच० आर० खन्ना
उत्तर:
(ख) न्यायमूर्ति ए० एन० रे

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से कौन-सा आपातकालीन घोषणा के संदर्भ में मेल नहीं खाता है –
(क) सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान
(ख) 1974 का रेल हड़ताल
(ग) नक्सलवादी आंदोलन
(घ) शाह आयोग की रिपोर्ट के निष्कर्ष
उत्तर:
(ग) नक्सलवादी आंदोलन

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प्रश्न 14.
संविधान ने किस भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया है?
(क) अंग्रेजी
(ख) हिन्दी
(ग) उर्दू
(घ) हिन्दुस्तानी
उत्तर:
(ख) हिन्दी

II. मिलान वाले प्रश्न एवं उनके उत्तर

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 6 कांग्रेसी प्रणाली चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Part - 2 img 2
उत्तर:
(1) – (य)
(2) – (स)
(3) – (द)
(4) – (अ)
(5) – (ब)

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

Bihar Board Class 12 Political Science कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
1967 के चुनावों के बारे में निम्नलिखित में कौन-कौन से बयान सही है।
(क) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव में विजयी रही, लेकिन नई राज्यों में विधान सभा के चुनाव वह हार गई।
(ख) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव भी हारी और विधान सभा के भी।
(ग) कांग्रेस को लोकसभा में बहुमत नहीं मिला, लेकिन उसने दूसरी पार्टिया के समर्थन से एक गठबन्धन सरकार बनाई।
(घ) कांग्रेस केन्द्र में सत्तासीन रही और उसका बहुमत भी बढ़ा।
उत्तर:
(क) 1967 के चुनावों में कांग्रेस लोकसभा चुनाव में विजयी रही, लेकिन कई राज्यों में विधान सभा के चुनाव वह हार गई।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित का मेल करें:

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 5 कांग्रेसी प्रणाली चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Part - 2 img 1
उत्तर:
(1) – (घ)
(2) – (क)
(3) – (ख)
(4) – (ग)

प्रश्न 3.
निम्नलिखित नारे से किन नेताओं का सम्बन्ध है।
(क) जय जवान जय किसान
(ख) इंदिरा हटाओ
(ग) गरीबी हटाओं
उत्तर:
(क) लाल बहादुर शास्त्री
(ख) विपक्षी दल
(ग) श्रीमती इंदिरा गाँधी

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प्रश्न 4.
1971 के ग्रैंड अलाइंस के बारे में कौन-सा कथन ठीक है?
(क) इसका गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था।
(ख) इसके पास एक स्पष्ट राजनीतिक तथा विचारधारात्मक कार्यक्रम था।
(ग) इसका गठन सभी गैर-कांग्रेसी दलों ने एक जुट होकर किया था।
उत्तर:
(क) इसका गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था।

प्रश्न 5.
किसी राजनीतिक दल को अपने अंदरुनी मतभेदों का समाधान किस तरह करना चाहिए? यहाँ कुछ समाधान दिए गये हैं। प्रत्येक पर विचार कीजिए और उसके सामने उसके फायदों और घाटों को लिखिए।
(क) पार्टी के अध्यक्ष द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना।
(ख) पार्टी के भीतर बहुमत की राय पर अमल करना।
(ग) प्रत्येक मामले पर गुप्त मतदान करना।
(घ) पार्टी के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं से सलाह करना।
उत्तर:
(क) पार्टी के अध्यक्ष का पद बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है अतः उसकी सलाह अथवा आदेश महत्त्वपूर्ण होता है जिसका पालन करना चाहिए। हालांकि अगर वह गलत हो तो उसको अध्यक्ष से कहा जाना चाहिए कि वह गलत है प्रजातंत्र में इस प्रकार की सलाह देना गलत नहीं है। इससे पार्टी मजबूत ही होगी।

(ख) बहुमत के द्वारा आमतौर से निर्णय लिये जाते हैं। अतः किसी भी राजनीतिक दल में भी किसी विषय पर निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जा सकता है।

(ग) कोई भी दल बिना आन्तरिक प्रजातंत्र के मजबूत नहीं हो सकता अतः प्रत्येक मंच पर व प्रत्येक विषय पर खुलकर विचार विमर्श, बहस व आम सहमति बननी चाहिए। और अगर आवश्यक हो तो मतदान भी कराया जा सकता है। गुप्त मतदान ही ज्यादा प्राकृतिक व प्रजातान्त्रीय माना जाता है। क्योंकि गुप्त तदान में ही व्यक्ति स्वतन्त्रता से अपना निर्णय ले सकता है।

(घ) किसी भी मंच पर, संस्था में व राजनीतिक दल में सलाह व मशवरा व परामर्श की प्रक्रिया होनी ही चाहिए। जिससे उसमें सभी सदस्यों में एक प्रकार का जुड़ाव बना रहता है किसी भी राजनीतिक दल के वरिष्ठ व अनुभवी व्यक्तियों को पार्टी में उचित सम्मान व स्थान मिलना ही चाहिए व विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर उनके परामर्श व विचारों को सम्मान अवश्य ही मिलना चाहिए ताकि वे पार्टी में अपनी सकारात्मक भूमिका अदा कर सकें।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से किसे/किन्हें 1967 के चुनावों में कांग्रेस की हार के कारण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए।
(क) कांग्रेस पार्टी में आश्चर्यजनक नेतृत्व का अभाव
(ख) कांग्रेस पार्टी के भीतर टूट
(ग) क्षेत्रीय, जातीय और सांप्रदायिक समूहों की लाभ बंदी को बढ़ाना
(घ) कांग्रेस पार्टी के अन्दर मतभेद
उत्तर:
(क) उपरोक्त कारणों से 1967 में कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण कांग्रेस पार्टी के पास करिश्माई नेतृत्व का अभाव था। क्योंकि 1964 में पंडित जवाहरलाल का देहान्त होने के बाद कांग्रेस का नेतृत्व श्री लाल बहादुर शास्त्री ने संभाला जिनकी 1966 में मृत्यु हो गई। इसके बाद श्रीमति इंदिरा गाँधी ने नेतृत्व संभाला जिनको राजनीतिक व प्रशासनिक अनुभव अधि क नहीं था। वे कांग्रेस के सीनियर नेताओं के गुट पर निर्भर थी। इस कारण से 1967 के चुनाव में कांग्रेस के प्रभाव में कमी आयी।

(घ) अन्य दूसरा कारण कांग्रेस के प्रभुत्व में कमी के कारण कई राज्यों की हारा था। इस चुनाव में गैर-कांग्रेसी दलों ने एक गठबन्धन बना लिया जिससे गैर-कांग्रेसी वोट का विभाजन नहीं हुआ क्योंकि इससे पहले गैर-कांग्रेसी वोट विभाजित हो जाते थे जिसका लाभ कांग्रेस को मिलता था । परन्तु 1967 के चुनाव में ऐसा नहीं हुआ। अतः कांग्रेस की वोट व सीटों में कमी आने का एक यह भी कारण था।

प्रश्न 7.
1970 के दशक में इंदिरा गाँधी की सरकार किन कारणों से लोकप्रिय हुई थी?
उत्तर:
1970 के दशक में श्रीमती इंदिरा गाँधी अत्यन्त लोकप्रिय हो गयी थी। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद अपनी पार्टी अर्थात् नई कांग्रेस पर उसका प्रभुत्व था। पुरानी कांग्रेस व नई कांग्रेस के बीच संघर्षो को उसने वैचारिक संघर्ष करा दिया। श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपनी नीतियों में समाजवादी व साम्यवादी आधार देकर किसानों व मजदूरों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। इंदिरा गाँधी का नारा था कि ‘गरीबी हटाओं’ अत्यन्त प्रभावकारी सिद्ध हुआ इंदिरा गाँधी ने अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की संवृद्धि के लिए अनेक प्रकार के कार्यक्रम प्रारम्भ किये जिनमें से प्रमुख निम्न थे –

  1. प्रिवीपर्स की समाप्ति
  2. बैंकों को राष्ट्रीकरण
  3. ग्रामीण भू-स्वामित्व और शहरी सम्पदा के परसीमन
  4. सामाजिक व आर्थिक विषमताओं व असमानताओं की समाप्ति
  5. भूमिहीन किसानों के लिए सुविधाएँ
  6. दलित व आदिवासियों के लिए विशेष कार्यक्रम
  7. जमीन सुधारों पर जोर
  8. नौजवानों के लिए रोजगार के अनेक अवसर
  9. अल्पसंख्यकों में विश्वास उत्पन्न करने के लिए अनेक उपाय
  10. गरीबी उन्मूलन योजनाओं का प्रारम्भ

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प्रश्न 8.
1960 के दशक की कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में सिंडीकेट का क्या अर्थ है? सिंडीकेट ने कांग्रेस पार्टी में क्या भूमिका निभाई?
उत्तर:
1960 के दशक में कांग्रेस के भीतर ताकतवर व प्रभावकारी नेताओं के समूह को ‘सिंडीकेट’ के नाम से जाना जाता था। इस संगठन के नेताओं का कांग्रसे पार्टी का नियन्त्रण था। सिंडीकेट के प्रमुख नेता मद्रास के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके कामराज थे। इस संगठन में कुछ राज्यों के प्रमुख ताकतवर नेता भी थे। जैसे बम्बई से एस. के. पाटिल मैसूर के एस. निजलिंगप्पा, आन्ध्र प्रदेश के एन. संजीवा रेड्डी व पश्चिमी बंगाल के अतुल्य घोष थे।

लाल बहादुर शास्त्री व श्रीमती इंदिरा गाँधी दोनों ही सिंडिकेट के समर्थन से ही प्रधानमंत्री बने। इंदिरा गाँधी व लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल के निर्माण में भी सिंडिकेट की अहम भूमिका रही। यहाँ तक की सरकार की नीतियों के निर्धारण व क्रियान्वयन में भी सिंडिकेट की अहम भूमिका रही परन्तु इंदिरा गाँधी के शक्तिशाली बनने के बाद यह गुट धीरे-धीरे शक्तिहीन हो गया। 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में इस गुट के उम्मीदवार श्री एन. संजीवा रेड्डी के हारने के बार इंदिरा गाँधी की कांग्रेस ही वास्तविक कांग्रेस के रूप में उभर कर आयी।

यद्यपि सिंडिकेट के नेताओं को प्रारम्भ में यह उम्मीद थी कि इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री के रूप में उनके परामर्श पर ही कार्य करेंगी परन्तु ऐसा केवल थोड़े दिन ही रहा इसके बाद इंदिरा गाँधी ने अपने व्यक्ति व अपनी नीतियों के आधार पर अपना अलग जनाधार बना लिया धीरे-धीरे उसने सिंडीकेट के नेताओं को हाशिए पर ला खड़ा किया यद्यपि प्रारम्भ में सिंडीकेट ने कांग्रेस के प्रत्येक निर्णय में निर्णायक भूमिका निभाई परन्तु बाद में कांग्रेस पर पूर्णतः श्रीमती इंदिरा गाँधी का ही नियंत्रण हो गया। 1960 की कांग्रेस पर सिंडीकेट का नियन्त्रण था । परन्तु 1970 की कांग्रेस पर श्रीमती इंदिरा गाँधी का नियन्त्रण हो गया।

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प्रश्न 9.
कांग्रेस पार्टी किन मसलों को लेकर 1969 में टूट की शिकार हुई।
उत्तर:
1967 के आम चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व कम होता नजर आया क्योंकि 1967 के चुनाव में कांग्रेस के हाथ से कई राज्यों की सरकारें निकल गई अर्थात् कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, केरल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार नहीं बन पायी व केन्द्र में भी कांग्रेस पार्टी केवल साधारण बहुमत से ही सरकार बना पायी। 1967 के चुनाव के बाद कांग्रेस के बीच आन्तरिक स्तर पर सत्ता संघर्ष प्रारम्भ हो गया। कांग्रेस का एक बड़ा प्रभावशाली नेताओं का गुट सरकार पर नियंत्रण करना चाहता था परन्तु इंदिरा गाँधी धीरे-धीरे अपना नियंत्रण सरकार व पार्टी पर बनाने के प्रयास में लगी थी।

कांग्रेस के बीच अर्थात् इंदिरा गाँधी व सिडीकेट के बीच सत्ता संघर्ष की लड़ाई 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में आमने-सामने आ गयी जब कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ राष्ट्रपति पद के लिए श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपने स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. वी.वी गिरी को न केवल खड़ा किया बल्कि उसकी जीत भी निश्चित की जिसके कारण श्रीमती इंदिरा गाँधी को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। जिसके फलस्वरूप 1969 में कांग्रेस में औपचारिक रूप से विभाजन हो गया व धीरे-धीरे पुरानी कांग्रेस क्षीण हो गई व इंदिरा गाँधी की नई कांग्रेस ही वास्तविक कांग्रेस उभर कर आयी। इस विवरण से पता लगता है कि 1969 में कांग्रेस के विभाजन के प्रमुख कारण निम्न विषय थे –

  1. सिंडीकेट का प्रभावकारी रुख
  2. सिंडीकेट व श्रीमती इंदिरा गाँधी के बीच सत्ता संघर्ष
  3. राष्ट्रपति का चुनाव जिसमें श्रीमती इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ डॉ. वी.वी. गिरी को खड़ा किया।
  4. श्रीमती इंदिरा गाँधी की अपनी स्वतन्त्र रूप से कार्य करने की शैली।
  5. कांग्रेस की आन्तरिक गुटबाजी
  6. इंदिरा गाँधी की बढ़ती हुई लोकप्रियता

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित अनुच्छेद को पढ़े और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दें।
उत्तर:
इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस को अत्यन्त केन्द्रीकृत और अलोकतांत्रिक पार्टी संगठन में तब्दील कर दिया। जबकि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस शुरूआती दशकों में एक संघीय लोकतांत्रिक और विचारधाराओं के समाहार का मंच थी। नयी और लोकलुभावन राजनीति ने राजनीतिक विचारधारा को महज चुनावी विमर्श में बदल दिया। कई नारे उछाले गये लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उसी के अनुकूल सरकार को नीतियाँ भी बनानी थी-1970 के दशक के शुरूआती सालों में अपनी बड़ी चुनावी जीत के जश्न के बीच कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर मर गई।

(क) लेखक के अनुसार नेहरू और इंदिरा गाँधी द्वारा अपनाई गई रणनीतियों में क्या अन्तर था।
(ख) लेखक ने क्यों कहा कि सत्तर के दशक में कांग्रेस मर गई?
(ग) कांग्रेस पार्टी में आये बदलावों का असर दूसरी पार्टियों पर कि तरह पड़ा?

उत्तर:
(क) यद्यपि पंडित जवाहर लाल नेहरू व श्रीमती इंदिरा गाँधी दोनों के ही करिश्माई व्यक्तित्व थे परन्तु दोनों की कार्य शैली भिन्न थी पंडित नेहरू का पार्टी पर व्यापक प्रभाव स्वयं ही था परन्तु दोनों की कार्य शैली भिन्न थी पंडित नेहरू का पार्टी पर व्यापक प्रभाव स्वयं ही था परन्तु इंदिरा गाँधी ने एक राजनीतिक योजना के तहत पार्टी पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस में आन्तरिक प्रजातन्त्र स्थापित किया। जबकि इंदिरा गाँधी की कार्य शैली में अधिनायकवाद झलकता था। पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय वरिष्ठ कांग्रेसियों को सम्मानजक स्थान प्राप्त था परन्तु श्रीमती इंदिरा गाँधी ने उन्हीं लोगों को हाशिये पर रख दिया जिन वरिष्ठ नेताओं ने इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने में मदद की थी।

पंडित जवाहर लाल नेहरू एक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापक नजरिया रखने वाले नेता थे जबकि श्रीमती इंदिरा गाँधी की राजनीति सत्ता राजनीति तक ही सीमित थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू एक धैर्यवान नेता थे जो सभी की सुनते वे सभी के विचारों की कदर करते थे जबकि श्रीमती इंदिरा गाँधी विरोध सुनना पसंद नहीं करती थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू में आम सहमति व समायोजन की क्षमता थी जो श्रीमती इंदिरा गाँधी में नहीं थी।

(ख) लेखक ने सही ही कहा कि सत्तर के दशक में कांग्रेस मर गई क्योंकि सत्तर के दशक में कांग्रेस की न तो वे संस्कृति थी, ना ही वह नेतृत्व था और ना ही वह प्रभाव था जो साठ के दशक में था सत्तर के दशक में श्रीमती इंदिरा गांधी का नेतृत्व था जो साठ के दशक के नेहरू शास्त्री के नेतृत्व से बिल्कुल भिन्न था। नेहरू व शास्त्री के नेतृत्व में प्रजातंत्रीयवाद, धैर्य व खुलापन था परन्तु ये सभी गुण श्रीमती इंदिरा गाँधी में नहीं थे।

इंदिरा गाँधी में अधिनायकवाद व रूढ़ता थी। इसके अलावा सत्तर की कांग्रेस की संस्कृति साठ के दशक की संस्कृति से भिन्न थी। सत्तर के दशक में कांग्रेस में ही गुटबाजी व सत्ता संघर्ष था जबकि साठ के दशक में सहनशीलता व्यापकता व आपसी सूझबूझ, सामजस्य व संवाद की संस्कृति थी। पुरानी कांग्रेस में मूल्यों पर आधारित राजनीति थी। सत्तर के दशक में अवसरवाद व गुटबाजी की राजनीति थी साठ के दशक में राष्ट्रीय आन्दोलन के समय का राष्ट्रवाद व संस्कृति थी लेकिन सत्तर के दशक में राष्ट्रीय आन्दोलन का जज्बा धीरे-धीरे समाप्त हो रहा था। साठ के दशक में सेवा की राजनीति थी लेकिन सत्तर के दशक में वोट व सत्ता की राजनीति थी अतः लेखक ने सही कहा कि सत्तर के दशक में कांग्रेस मर चुकी थी उसकी जगह दूसरी कांग्रेस ने दूसरे रूप में अवतार लिया।

(ग) 1964 में पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहान्त व 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के देहान्त के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का संकट अर्थात् एक रिक्त स्थान पैदा हो गया। 1966 में श्री लाल बहादुर शास्त्री के देहान्त के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी का प्रधानमंत्री तो अवश्य बनाया गया परन्तु कांग्रेस पर सिंडिकेट का नियंत्रण था। सिंडिकेट कांग्रेस के विभिन्न राज्यों के शक्तिशाली व प्रभावशाली लोगों का समूह था जिनके प्रमुख नेता श्री कामराज थे।

धीरे-धीरे श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया व समाजवादी व साम्यवादी विचारधारा के आधार पर किसान व मजदूरों के हित सम्बन्धी नीतियाँ बनाना प्रारम्भ किया। कांग्रेस में भी सिंडिकेट के नेताओं व श्रीमती इंदिरा गाँधी के बीच सत्ता संघर्ष प्रारम्भ हो गया जो 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में सामने आ गया जो बाद में कांग्रेस के विभाजन के रूप में बदल गया। 1967 के चुनाव में ही गैर-कांग्रेसवार की राजनीति का प्रभाव प्रारम्भ हो गया था जिसके परिणाम स्वरूप 1967 के चुनावों में 9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। 1971 में भी कांग्रेस के विरुद्ध मुख्य विरोधी दलों ने एक बड़ा एन्टी कांग्रेस अलाइंस बनाया परन्तु इनको अधिक सफलता नहीं मिली। गैर-कांग्रेसवाद ने ही गठबन्धन की राजनीति को जन्म दिया।

Bihar Board Class 12 Political Science कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पंडित जवाहर लाल नेहरू की भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में भूमिका समझाइये।
उत्तर:
राष्ट्रीय आन्दोलन के समय पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रथम नम्बर के नेता थे जिनके नेतृत्व में सभी को विश्वास था अतः आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ही देश के प्रथम प्रधानमंत्री के साथ पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रथम विदेश मंत्री भी बने। वे एक करिश्माई व्यक्तित्व के नेता थे। कांग्रेस के संगठन व सरकार पर उनका पूर्ण नियंत्रण था।

भारत के राष्ट्रनिर्माण राज्य निर्माण में उनकी अहम भूमिका थी अतः पंडित जवाहर लाल नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। उन्होंने भारत की विभिन्न समस्याओं को निश्चित समय में हल करने के लिए नियोजित अर्थव्यवस्था प्रारम्भ की। पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत को औद्योगिक रूप से विकसित राज्य बनाना चाहते थे। भारत की विदेश नीति के निर्माता भी पंडित जवाहर लाल नेहरू ही थे तथा उन्होंने विश्व राजनीति में भी सक्रिय भूमिका अदा की। पंडित नेहरू के बाद अनेक प्रकार की अनिश्चिताएँ उत्पन्न हुई।

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प्रश्न 2.
लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री कार्यकाल में मुख्य चुनौतियाँ कौन-कौन सी थी?
उत्तर:
पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहान्त के बाद लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। उनका प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल बहुत छोटा रहा परन्तु इस छोटे काल में उनको कई प्रकार की चुनौतियाँ झेलनी पड़ी जिनमें प्रमुख निम्न थीं:

  1. सिंडीकेट का प्रभाव
  2. 1962 में हुई चीन युद्ध का प्रभाव
  3. भारत पाक युद्ध 1965
  4. अनेक प्राकृतिक विपदाएँ

प्रश्न 3.
लाल बहादुर शास्त्री ने किन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी।
उत्तर:
लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री बनने के बाद ‘जय जवान जय किसान’ का नारा लगाया। उनका जीवन बहुत ही सीधा साधा था। उनकी जीवन शैली व कार्य शैली से लगता था कि उनकी निम्न प्रमुख प्राथमिकता है –

  1. कृषि विकास व किसान की स्थिति में सुधार।
  2. मिलिट्री तैयारियाँ व जवान की सन्तुष्टि।

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 4.
1967 के आम चुनावों में मुख्य मुद्दे क्या थे?
उत्तर:
1967 का आम चुनाव श्रीमती इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में हुए । इस चुनाव में निम्न प्रमुख मुद्दे थे:

  1. प्राकृतिक विपदाओं को प्रभाव
  2. गम्भीर खाद्य संकट
  3. विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी
  4. औद्योगिक उत्पादन और निर्यात में गिरावट
  5. 1962 व 1965 के युद्धों का प्रभाव
  6. आर्थिक संकट
  7. कीमतों में भारी वृद्धि
  8. कांग्रेस में करिश्माई नेतृत्व का अभाव

प्रश्न 5.
गैर-कांग्रेसवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
1952 से लेकर 1962 तक के चुनावों में कांग्रेस को ही बार-बार सफलता मिलती रही जिससे चुनावी राजनीति पर कांग्रेस का ही प्रभुत्व रहा। गैर-कांग्रेसी वोट विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों में बँट जाती थी जिससे कांग्रेस को ही अधिक सीटें व अधिक वोट प्राप्त होती थी। 1967 के चुनाव में इस स्थिति को रोकने के लिए विरोधी दलों में गठबन्धन बनाये तथा कांग्रेस के खिलाफ अलग-अलग उम्मीदवार खड़ा न करके एक संयुक्त उम्मीदवार को खड़ा किया। गैर-कांग्रेसी विरोधी दलों ने एक प्रकार की भावना का नारा दिया कि इस बार कांग्रेस को हराना है। इस भावना को गैर-कांग्रेसवाद के नाम से जाना जाता है। गैर-कांग्रेसवाद की भावना का चुनाव में प्रभाव दिखायी दिया।

प्रश्न 6.
1967 के चुनाव के परिणाम बताइये।
उत्तर:
1967 के चुनावों में पहली बार कांग्रेस को झटका लगा अर्थात् चुनावी राजनीति में कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट आयी। कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट आयी। कांग्रेस को 1967 के चुनावों में 9 राज्यों में हार का मुहँ देखना पड़ा। जहाँ कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकी ये राज्य थे हरियाणा, पंजाब, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मद्रास व केरल। इसके अलावा केन्द्र में भी कांग्रेस के प्रभुत्व में कमी आयी। कांग्रेस की सीटों व वोटों के प्रतिशत में भी गिरावट आयी जिसके फलस्वरूप कांग्रेस को केन्द्र में केवल साधारण बहुत ही प्राप्त हुआ । इस प्रकार 1967 के आम चुनाव में गैर-कांग्रेसवाद के कारण के प्रभुत्व में गिरावट आयी।

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प्रश्न 7.
मिले जुले संगठन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब कई सारे राजनीतिक दल सरकार बनाने के उद्देश्य के चुनाव में एक साथ इकट्ठा होकर चुनाव लड़ते हैं उसे मिला जुला संगठन या मिली जुली सरकार कहते हैं। 1967 के चुनावों में पहली बार गैर-कांग्रेसी दलों ने साथ चुनाव लड़कर साझी सरकारें कई राज्यों में बनाई इन मिली जुली व्यवस्था का उद्देश्य कांग्रेस को सत्ता से दूर करना था। भारतीय राजनीतिक में मिली जुली सरकारों का दौर 1967 में प्रारम्भ हुआ जो भिन्न-भिन्न समय पर भारतीय राजनीति को प्रभावित करता रहा है। इस समय भी देश में मिली जुली सरकारों का दौर चल रहा है।

प्रश्न 8.
दल बदल से आप क्या समझते हैं? दल बदल के संदर्भ में आया राम गया राम का अर्थ समझाइये।
उत्तर:
भारत राजनीतिक को दलबदल की प्रवृत्ति में सबसे अधिक प्रभावित किया है। जब कोई सदस्य उस राजनीतिक दल को अन्य दल में शामिल होने के लिए छोड़ देता है जिस दल से उसने चुनाव जीता हो, उस स्थिति को दल बदल की स्थिति कहते हैं। 1967 के बाद दल बदल की प्रवृति ने सरकारों को बनाने व सरकारों के गिराने का काम किया है। भारत में इस प्रवृत्ति को रोकने के प्रयास किये गये हैं। इसको रोकने के लिए 1985 में 52वां संविधान किया गया परन्तु यह संशोधन की दलबदल को रोकने में असफल रहा है। दल बदल के सन्दर्भ में आया राम गया राम की कहावत का सम्बन्ध हरियाणा से है जब एक व्यक्ति ने (गया लाल) ने 15 दिनों के अन्दर 3 बार दल बदल किया।

प्रश्न 9.
सिंडिकेट से आप क्या समझते हैं।
उत्तर:
सिंडिकेट नेहरू के बाद कांग्रेस में उभरा उन शक्तिशाली नेताओं का गुट था जो विभिन्न राज्यों से सम्बन्धित थे व जिनका कांग्रेस संगठन पर नियंत्रण था। इन नेताओं में प्रमुख रूप से मद्रास में कामराज, महाराष्ट्र से एस. के. पाटिल, कर्नाटक से निजिलगप्पा व पश्चिमी बंगाल से अरूण घोष थे। नेहरू के देहान्त के बाद लाल बहादुर शास्त्री व श्रीमती इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने में सिंडिकेट के नेताओं की प्रमुख भूमिका थी। सिंडीकेट के नेताओं को यह विश्वास था कि श्रीमती इंदिरा गाँधी अनुभवहीन के कारण कमजोर प्रधानमंत्री होगी व उनके परामर्श पर गर्व करेगी।

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प्रश्न 10.
‘सिंडीकेट’ गुट के नेताओं की चुनौती से निपटने के लिए क्या रणनीति बनाई?
उत्तर:
सिंडीकेट गुट के नेताओं ने श्रीमती इंदिरा गाँधी को इसलिए प्रधानमंत्री ने बनाया था कि वह कमजोर नेता रहेगी व उनके परामर्श व निर्देश पर निर्भर रहेगी। परन्तु उसने ऐसा नहीं किया व धीरे-धीरे अपनी नीतियों के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लगी। लोगों पर व पार्टी पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। इसके लिए श्रीमती गाँधी ने अपनी नीतियों में समाजवादी व साम्यवादी विचाराधारा को शामिल कर लिया व किसानों, मजदूरों व समाज के कमजोर वर्गों के लिए अनेक कार्यक्रम प्रारम्भ किये। इसके लिए श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपना दस सूत्रीय कार्यक्रम तैयार किया जिनमें प्रिवीपर्स समाप्त करना, बैंकों का राष्ट्रीकरण करना व ग्रामीण व शहरी सम्पत्ति पर पाबन्दी लगाना शामिल था।

प्रश्न 11.
कांग्रेस के 1967 के चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
1967 के चुनाव में कांग्रेस के प्रभुत्व को झटका लगा । कई राज्यों में यह सरकार नही बना सकी व केन्द्र में भी केवल साधारण बहुत प्राप्त हुआ कई दलों के समर्थन से सरकार बनी। इसी प्रकार से प्रभाव में कमी आने के निम्न कारण थे:

  1. चीन व पाकिस्तान के युद्धों का प्रभाव
  2. मानसुन फेल हो जाने के कारण खाद्यान्न में कमी
  3. आवश्यक चीजों की कीमतों में बढ़ोत्तरी
  4. करिश्माई नेतृत्व का अभाव
  5. कांग्रेस की गुटबाजी
  6. श्रीमती इंदिरा गाँधी की अनुभव हीनता
  7. कई सारे क्षेत्रीय दलों के विकास का कारण

प्रश्न 12.
राष्ट्रपति के 1969 के चुनाव में कांग्रेस का अधिकारिक उम्मीदवार क्यों सफल नहीं हो सका?
उत्तर:
1969 के सष्ट्रपति के चुनाव के समय श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं जबकि कांग्रेस संगठन पर सिंडीकेट गुट का नियंत्रण था। इस गुट ने एन. संजीवा रेड्डी को कांग्रेस का अधिकारिक उम्मीदवार राष्ट्रपति पद के लिए घोषित कर दिया। उधर श्रीमती इंदिरा गाँधी ने तत्कालीन उपराष्ट्रपति डा. वी. वी. गिरी को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़ा कर दिया तथा प्रचार किया। जिससे कांग्रेस का असली उम्मीदवार चुनाव हार गया व वी. वी गिरी चुनाव जीत गये।

प्रश्न 13.
1969 में कांग्रेस के विभाजन के प्रमुख कारण बताइये।
उत्तर:
1967 के चुनाव से पहले ही कांग्रेस में गुटबाजी प्रारम्भ हो गई थी। कांग्रेस पर कुछ बड़े नेताओं का एक गुट हावी था जिसकी सिंडीकेट के नाम से जाना जाता था। 1967 के चुनावों में कांग्रेस के प्रभुत्व में कमी आ गयी व 1969 में कांग्रेस का औपचारिक रूप से विभाजन हो गया। इसके निम्न प्रमुख कारण थे।

  1. सिंडीकेट जो कि कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं का गुट का अत्याधिक प्रभाव।
  2. कांग्रेस के बीच गुटबाजी। सिंडीकेट ग्रुप में श्रीमती इंदिरा गाँधी में गुटबाजी प्रारम्भ हो गयी थी।
  3. श्रीमती इंदिरा गाँधी का प्रभावशाली व्यक्तित्व।
  4. श्रीमती गाँधी की समाजवादी व साम्यवादी नीतियाँ जो कांग्रेस की पूंजीवादी लांबी के लोगों को पसंद नहीं थी।
  5. राष्ट्रपति के चुनाव में टकराव।

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प्रश्न 14.
प्रिवीपर्स के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
श्रीमती इंदिरा गाँधी के अनेक साहसिक कदमों में से प्रिवीपर्य को समाप्त करना भी एक साहसिक कदम था। जिसका उद्देश्य सामजवादी विचाधारा पर समाज का निर्माण करना था। प्रिवीपर्य वह व्यवस्था थी जिसके तहत पूर्व राजा व महाराजाओं को कुछ निजी संपदा रखने का अधिकार दिया गया व साथ-साथ सरकार की ओर से उन्हें कुछ विशेष भत्ते भी दिये जायेंगे इस प्रकार से प्रिवीपर्स उन राजा महाराजाओं को दी गयी विशेष आर्थिक सुविधा थी जिन्होंने स्वेच्छा से अपने राज्यों को भारतीय संघ में विलय करना स्वीकार कर लिया था। पंडित जवाहर लाल नेहरू भी प्रिवीपर्स के खिलाफ थे। परन्तु कई नेताओं की ओर से इसे समाप्त करने का विरोध होता रहा था। श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने कार्यक्रम 1971 में इसे समाप्त किया।

प्रश्न 15.
1971 के चुनाव में कांग्रेस की सफलता के कारण बताइये।
उत्तर:
1971 के चुनाव से पहले कांग्रेस की काफी कमजोर स्थिति थी। कांग्रेस गुटबाजी का शिकार थी। कांग्रेस की निर्भरता अन्य दलों पर थी। 1971 के चुनाव में गैर-कांग्रेसवाद के नाम पर विपक्ष दलों ने एक बड़ा गठबन्धन बना रखा था परन्तु फिर कांग्रेस को अप्रत्याशित जीत मिली। इसके निम्न प्रमुख कारण थे –

  1. इंदिरा गांधी का करिश्माई व्यक्तित्व।
  2. इंदिरा गाँधी की किसान गरीब व मजदूर समर्पित नीतियाँ।
  3. गरीबी हटाओं का नारा
  4. नई कांग्रेस की राष्ट्रपति के चुनाव में जीत।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत में द्वितीय प्रधानमंत्री के रूप में लाल बहादुर शास्त्री की भूमिका समझाइये।
उत्तर:
लाल बहादुर शास्त्री नेहरू के देहान्त के समय उनके मंत्रिमंडल में मंत्री थे। सिंडीकेट के निर्णय के अनुसार लाल बहादुर शास्त्री को पंडित जवाहर लाल नेहरू का उत्तराधिकारी चुना गया। श्री लाल बहादुर शास्त्री एक सरल, सीधे व ईमानदार व्यक्तित्व के व्यक्ति थे। लाल बहादुर शास्त्री की नियुक्ति ने उन चर्चाओं पर विराम लगा दिया जो नेहरू जी के अस्वस्थ्य होने के समय चल रही थी कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। ऐसा भी सोचा जा रहा था। पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद भारत में प्रजातंत्र चल पायेगा या नहीं।

लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री के कार्यकाल में उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा उन्होंने अत्यन्त हिम्मत से सामना किया। भारत चीन के बीच 1962 के युद्ध का भारत की आर्थिक व्यवस्था व भारत की विदेश नीति का बुरा प्रभाव पड़ा मानसून फेल हो जाने से खाद्य पदार्थों का संकट पैदा हो गया क्योंकि सूखा पड़ने से कृषि पैदावार में भारी कमी हुई। 1965 में भारत व पाकिस्तान का युद्ध उनके लिए दूसरी बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया। लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा लगाया। उन्होंने इन चुनौतियों से निपटने के लिए अनेक प्रकार के उपाय किये वे देशवासियों से हिम्मत रखने की अपील की। शान्ति के लिए 1966 के ताशकंद समझौते के बाद उनका निधन हो गया।

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प्रश्न 2.
लाल बहादुर शास्त्री के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी की प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्ति समझाइये।
उत्तर:
1964 से लेकर 1966 के बीच देश के दो प्रधानमंत्रियों की मृत्यु के कारण देश में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया मोरारजी देसाई व श्रीमती इंदिरा गाँधी के बीच प्रधानमंत्री के पद के लिए कड़ा संघर्ष रहा। सिंडीकेट के प्रभाव के कारण श्रीमती इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त किया। वास्तव में यह नियुक्ति गोपनीय मतों के आधार पर हुई। जिसमें श्रीमती इंदिरा गाँधी ने श्री मोरारजी को हराया। श्री मोरारजी देसाई ने इस निर्णय को खुशी से स्वीकार कर लिया। इस प्रकार से सत्ता परिवर्तन शान्ति से हो गया जो एक प्रकार से भारतीय प्रजातंत्र की परिपक्वता की निशानी है।

प्रश्न 3.
चौथे आम चुनाव (1971) के समय की परिस्थितियों को समझाइये।
उत्तर:
भारत की चुनावी राजनीति के इतिहास में 1967 का चौथा आम चुनाव एक ऐसा चुनाव था जिसने भारतीय राजनीति को एक नई दिशा दी। इस चुनाव में पहली बार कांग्रेस के प्रभुत्व को कम करने में सफलता भी प्राप्त की। इस चुनाव में निम्न मुख्य परिस्थितियाँ थी:

  1. इस चुनाव में भारत व चीन के बीच 1962 के युद्ध व भारत पाकिस्तान के बीच 1965 के युद्ध का प्रभाव था।
  2. कांग्रेस में गुटबाजी।
  3. विभिन्न विरोधी दलों का एक होना।
  4. खाद्यान्न संकट।
  5. कांग्रेस में सिंडीकेट का प्रभुत्व।
  6. आर्थिक संकट व कीमतों में वृद्धि
  7. गैर-कांग्रेसवाद का विकास।
  8. कांग्रेस के वोट बैंक में गिरावट।
  9. श्रीमती इंदिरा गाँधी की अनुभव हीनता।
  10. प्राकृतिक विपदाएँ।

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प्रश्न 4.
गैर-कांग्रेसवाद का अर्थ व प्रभाव समझाइये।
उत्तर:
गैर-कांग्रेसवाद वह स्थिति थी जो विभिन्न विरोधी राजनीतिक दलों में कांग्रेस के खिलाफ उत्पन्न की तथा इस बात के लिए वातावरण बनाने का प्रयास किया कि कांग्रेस के प्रभुत्व को कम किया जाये। विरोधी दलों ने विभिन्न राज्यों में बढ़ती मँहगाई के खिलाफ हड़ताल, धरने व विरोध प्रदर्शन किये। गैर-कांग्रेसवाद के विकास का उद्देश्य यह भी था कि कांग्रेस के खिलाफ पड़ने वाली वोटों को विभाजित होने से रोका जाये क्योंकि गैर-कांग्रेसी वोट विभिन्न दलों के उम्मीदवारों को इसका फायदा ना मिले। 1967 के आम चुनाव में यही हुआ कि गैर-कांग्रेसी वोट विभिन्न उम्मीदवारों में बंट जाने के बजाय एक ही उम्मीदवार को मिली जिससे कांग्रेस की सीटों व मतों के प्रतिशत में भी गिरावट आ गई। इस चुनाव में कांग्रेस को 9 राज्यों में सरकारें खोनी पड़ी व केन्द्र में भी कांग्रेस को केवल साधारण बहुमत ही प्राप्त हुआ।

प्रश्न 5.
चौथे आम चुनाव (1967) में कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट के कारण व प्रभाव समझाइये।
उत्तर:
1967 का चौथा चुनाव कांग्रेस के लिए अच्छे वातावरण में नहीं हुआ। देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था, आवश्यक चीजों की कीमतें आसमान छू रही थी। इस स्थिति को विरोधी दलों ने सरकार (कांग्रेस) के खिलाफ भुनाया। विरोधी दल इक्टठे हो गये व सारे देश में गैर कांग्रेसवाद का सन्देश फैला रहा था। सभी विरोधी दलों में संगठित होकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा। इस चुनाव के दौरान कांग्रेस एक दल के रूप में कमजोर थी क्योंकि कांग्रेस इस दौरान गुटबाजी के दौर से गुजर रही थी। कांग्रेस पर कब्जे के लिए इंदिरा गाँधी के समर्थकों व सिंडिकेट के समर्थकों में सत्ता संघर्ष चल रहा था।

1967 के चुनाव के परिणाम अत्यन्त ही अप्रत्याशित रहे। 1962 के चुनाव तक प्रत्येक चुनाव में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। 1967 के चुनाव में पहली बार कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट आयी। इसका प्रभाव बिल्कुल स्पष्ट था। कांग्रेस को 9 राज्यों हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, तमिलाडू, पश्चिमी बंगाल व केरल में सरकारें गंवानी पड़ी। 1967 के चुनाव में कांग्रेस केन्द्र में केवल साधारण बहुमत से ही सरकार बना पायी।

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प्रश्न 6.
चौथे आम चुनाव के बाद मिली चुली सरकारों को समझाइये।
उत्तर:
जब दो या दो से अधिक राजनीतिक दल भले ही उनकी विचारधारा अलग-अलग हो शासन करने के लिए एक दूसरे के नजदीक आकर सरकार बनाते हैं तो इसे मिली-जुली सरकार कहते हैं। इस समय भारत में भी मिली जुली सरकारों का दौर चल रहा है इसका प्रारम्भ 1967 के चुनाव के बाद ही प्रारम्भ हो गया था जब कई राज्यों में संयुक्त विधायक दलों की सरकार चल रही थी।

1967 के चुनावों के बाद भारत में मिली जुली सरकारों के उदय के निम्न प्रमुख कारण थे –

  1. विरोधी दलों की गैर कांग्रेसवाद की नीति की सफलता।
  2. विरोधी दलों का मिला जुला गठबन्धन बना। इस प्रकार गठबन्धन की राजनीति का उदय।
  3. कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट।
  4. क्षेत्रवाद का उदय।
  5. कांग्रेस के खिलाफ चुनावी राजनीति।

प्रश्न 7.
दल बदल का अर्थ व इसका भारतीय राजनीति पर प्रभाव समझाइये।
उत्तर:
जब संसद सदस्य अथवा राज्य विधान सभा का निर्वाचित अथवा मनोनीत सदस्य चुने जाने के बाद उस दल को छोड़ देता है जिसके चुनाव चिन्ह पर उसने चुनाव जीता है व किसी निजी लाभ हेतु अन्य दल में शामिल हो जाता है तो उसे दल बदल कहा जाता है। दल बदल की प्रवृत्ति ने भारतीय राजनीति को अत्याधिक प्रभावित किया भारतीय राजनीति में अपराधीकरण, व्यावसायीकरण व अस्थिरता दल बदल का ही परिणाम है राजीव गाँधी की सरकार ने 1985 में 52 वां संविधान संशोधन करके इस बदल को रोकने का प्रयास किया परन्तु दल बदल घटने की बजाय बढ़ गया है 1967 के बाद से आज तक भी दल बदल भारतीय राजनीति का पर्यायवाची बन गया है।

हरियाणा में दल बदल के सन्दर्भ में आया राम गया राम एक मुहावरा बन गया है। हरियाणा में एक व्यक्ति ने 15 दिन में तीन बार दल बदल का रिकार्ड बनाया। 1979 में हरियाणा में ही चौधरी भजन लाल के पूरे मंत्रिमंडल ने मुख्यमंत्री सहित दल बदल करके पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गये। इस प्रकार पूरी सरकार जनता पार्टी की सरकार से कांग्रेस की सरकार बन गयी। इस प्रकार से दल बदल भारतीय राजनीति में केन्द्र के स्तर पर भी व प्रान्तों के स्तर पर भी मौजूद है।

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प्रश्न 8.
सिंडीकेट से आप क्या समझते हैं? कांग्रेस में सिंडीकेट व श्रीमती इंदिरा गाँधी के संघर्ष को समझाइये।
उत्तर:
पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहान्त के बाद कांग्रेस में गुटबाजी प्रारम्भ हो गयी। कांग्रेस में कुछ राज्यों के वरिष्ठ नेताओं का एक समूह प्रभावकारी व शक्तिशाली गुट के रूप में उभर कर निकला जिसने कांग्रेस के प्रत्येक निर्णयों को प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया। मद्रास के पूर्व मुख्यमंत्री इस गुट के नेता थे। अन्य प्रमुख नेता एस. निजलिगप्पा एस. के. पाटिल व अरूण घोष व एन. सजीव रेड्डी। लाल बहादुर शास्त्री व श्रीमती इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त करने में इस गुट की अहम भूमिका थी। कांग्रेस में इस गुट को सिंडिकेट के नाम से जाना जाता है। बाद में जैसे-जैसे श्रीमती गाँधी ने अपने निर्णय स्वयं लेने प्रारम्भ किये तो सिंडिकेट के साथ संघर्ष प्रारम्भ हो गया। श्रीमती इंदिरा गाँधी कुछ कल्याणकारी निर्णय स्वयं लिए जिससे संषर्घ और बढ़ गया। 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में दोनों गुट आमने-सामने आ गये व 1969 में ही कांग्रेस में विभाजन हो गया।

प्रश्न 9.
1969 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव की परिस्थितियों को समझाइये।
उत्तर:
जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद राष्ट्रपति का चुनाव कराना आवश्यक हो गया। कांग्रेस पहले से ही गुटबाजी का शिकार बनी हुई थी। कांग्रेस में सिंडीकेट गुट इंदिरा गाँधी गुट में संघर्ष चल रहा था। राष्ट्रपति के पद के लिए कांग्रेस की ओर से श्री. संजीवा रेड्डी को अधिकारिक उम्मीदवार बनाया गया परन्तु श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपनी ओर से तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री वी. वी. गिरी को राष्ट्रपति पद के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में ना केवल खड़ा किया बल्कि कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार श्री एन. संजीवा रेड्डी के खिलाफ डा. वी.वी. गिरी की जीत को निश्चित किया।

इस घटना में कांग्रेसी का अन्दरूनी संघर्ष और तेज हो गया। सिंडिकेट ने असली कांग्रेस का दावा करते हुए श्रीमती इंदिरा गाँधी को कांग्रेस विरोधी गतिविधियों के इलजाम में निष्कासित कर दिया परन्तु कांग्रेस पर इंदिरा गाँधी ने पहले ही अपना प्रभाव जमाया हुआ था। इस संघर्ष के परिणाम स्वरूप 1969 में कांग्रेस में औपचारिक रूप से विभाजन हो गया। इंदिरा गाँधी की कांग्रेस ही बाद में वास्तविक कांग्रेस उभर कर आयी जिसको 1971 के चुनाव में भारी सफलता मिली।

प्रश्न 10.
1969 में कांग्रेस के विभाजन के कारण समझाइये।
उत्तर:
राष्ट्रपति के चुनाव में 1969 में ही कांग्रेस के बीच आपसी संघर्ष अत्याधिक गहरा गया। सिंडीकेट के नेताओं ने प्रारम्भ में यह सोचा था कि श्रीमती इंदिरा गाँधी अनुभवहीन है अतः उनके निर्देश पर व परामर्श पर कार्य करेगी परन्तु ऐसा नहीं हुआ। श्रीमती ने अपनी सत्ता का अपने तरीके से प्रयोग किया। समाज के विभिन्न वर्गों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम प्रारम्भ किये। श्रीमती इंदिरा गाँधी ने इसे कांग्रेस के बीच वैचारिक संघर्ष का नाम दिया। श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपनी नीतियों में समाजवादी व साम्यवादी विचारधारा को बढ़ावा दिया जिससे कांग्रेस का पूंजीपति वर्ग भी इंदिरा जी से नाराज हुआ। कांग्रेस के बीच का यह संघर्ष अन्ततः कांग्रेस के विभाजन के रूप में बदल गया।

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प्रश्न 11.
1971 के चुनाव के संदर्भ में विशाल गठबंधन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
1967 के चुनाव में कांग्रेस की सरकार को केवल साधारण बहुमत ही प्राप्त था व सरकार की निश्चितता व स्थिरता के लिए वह छोटे-मोटे दलों जैस साम्यवादी दलों पर निर्भर थी। 1969 के राष्ट्रपति के चुनाव में कांग्रेस के विभाजन के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी की स्थिति और भी अधिक कमजोर हो गयी थी। इसके अलावा आर्थिक संकट व बढ़ी हुई कीमतों को लेकर विपक्षीय दलों को गिराने के प्रयास किये जा रहे थे। इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 1971 में मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी। इस चुनाव में गैर-कांग्रेसी दलों ने इंदिरा कांग्रेस को हटाने के लिए मिलकर एक बड़ा संगठन बनाया जिसे विशाल गठबन्धन कहा गया। इस संगठन में प्रमुख रूप से एस. एस. पी. भारतीय जनसंघ, स्वतन्त्र पार्टी व भारतीय क्रान्तिदल। इन दलों का पूरे देश में एक ही नारा था कि ‘इन्दिरा हटाओ’ इंदिरा कांग्रेस को गठबन्धन केवल साम्यवादी पार्टी के साथ था।

प्रश्न 12.
1971 के मध्यावति चुनाव का महत्त्व समझाइये।
उत्तर:
1971 के मध्यावधि चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस साम्यवाद दल गठबन्धन व गैर कांग्रेसी दलों के विशाल गठबंधन के बीच था। विशाल गठबन्धन में कई विरोधी दल शामिल थे। इसमें मुख्य रूप एस. एस. पी., भारतीय जन संघ, स्वतन्त्र पार्टी व भारतीय क्रान्ति दल। पुरानी कांग्रेस का अधिक प्रभाव नहीं था। इस चुनाव में मुख्य मुद्दा आर्थिक संकट व मंहगाई का था। इस मुद्दे पर ही गैर-कांग्रेसी दल सरकार को हटाना चाहते थे। उनका प्रमुख नारा ‘इंदिरा हटाओं’ था। 1971 के चुनावों परिणामों ने सभी को चकित कर दिया। इंदिरा कांग्रेस को सबसे अधिक कमजोर स्थिति में समझा जा रहा था क्योंकि सभी विरोधी दलों ने एक मजबूत विशाल संगठन बना लिया था। परन्तु इस चुनाव में सबसे अधिक सफलता इंदिरा कांग्रेस को ही मिली। इसने लोकसभा की 375 सीटें प्राप्त कर व 48.4% वोट प्राप्त किये। इससे यह भी साबित हो गया कि इंदिरा कांग्रेस ही वास्तविक कांग्रेस है।

प्रश्न 13.
1971 की बंगला देश युद्ध के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
1971 के चुनाव के बाद भारत को एक और युद्ध का सामना करना पड़ा। इससे पहले भी भारत को 1962 में चीन के साथ व 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध करना पड़ा था जिनका भारत की अर्थव्यस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा था। इन्हीं के कारण भारत में कीमतें ऊंची हो गयी थी। 1971 में भारत के ऊपर एक प्रकार से युद्ध थोपा गया था क्योंकि भारत ने पाकिस्तान के पूर्वी भाग में वहाँ के नागरिकों के ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ मानवीय आधार पर हस्तक्षेप किया। इस युद्ध के अन्य कारण निम्न थे –

  1. पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक व सैनिक संकट
  2. पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर सैनिक अत्याचार
  3. भारत में पूर्वी पाकिस्तान से लाखों की संख्या में शरणार्थियों का आना।
  4. पूर्वी पाकिस्तान में आन्तरिक कलह
  5. भारत द्वारा पूर्वी पाकिस्तान में मानवीय आधार पर हस्तक्षेप
  6. भारत पर पाकिस्तान का आक्रमण
  7. बड़ी शक्तियों का हस्तक्षेप

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प्रश्न 14.
कांग्रेस की पुर्नस्थापना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कांग्रेस का इतिहास स्पष्ट रूप से बताता है कि 1952 के प्रथम चुनाव से लेकर 1962 तक कांग्रेस का प्रभुत्व सारे देश पर रहा। केन्द्र में व लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकारें रही। पंडित जवाहर लाल नेहरू के करिश्माई नेतृत्व ने इस प्रभुत्व को बनाये रखा परन्तु नेहरू के बार 1967 में जब चौथा चुनाव हुआ तो कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट आ गयी। देश के 9 राज्यों में कांग्रेस सरकार नहीं बना पायी। वोट प्रतिशत भी घटा।

कांग्रेस की स्थिति में लगातार गिरावट आयी। 1966 में श्रीमती इंदिरा गाँधी व सिंडिकेट के बड़े नेताओं में सत्ता संघर्ष प्रारम्भ हो गया जो 1969 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में खुलकर सामने आ गया व कांग्रेस 1969 में ही औपचारिक रूप से विभाजित हो गई। इस प्रकार से कांग्रेस में 1967 से लेकर 1969 तक गिरावट का दौर रहा। परन्तु 1971 में हुए मध्यावधि चुनाव ने इंदिरा कांग्रेस ने फिर कांग्रेस को नया जीवन दिया। सभी विराधी दलों के द्वारा कांग्रेस के खिलाफ विशाल गठबन्धन बनाकर चुनाव लड़ने के बावजूद कांग्रेस ने 48.4% वोट प्राप्त करके लोकसभा की 375 सीटें प्राप्त की। इससे यह भी सिद्ध हो गया कि इंदिरा कांग्रेस ही वास्तविक कांग्रेस है। इसी को ही कांग्रेस व्यवस्था की पुर्नस्थाना कहते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
1967 के चुनाव में कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट के प्रमुख कारण क्या थे व 1971 के मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस व्यवस्था का पुर्नस्थापना कि प्रकार से हुई।
उत्तर:
1967 के चौथे आम चुनाव में कांग्रेस के प्रभुत्व में भारी गिरावट आयी। कांग्रेस को देश के 9 राज्यों में सरकारें गवानी पड़ी । वास्तव में 1964 में पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहान्त के बाद ही कांग्रेस के प्रभाव में कमी आ गयी थी। श्री लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल अत्यन्त छोटा था परन्तु घटनात्मक था क्योंकि उनके ही कार्यकाल में 1965 में भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ था 1962 में पहले ही भारत व चीन के बीच युद्ध हुआ था। इन दोनों युद्धों के कारण भारत में आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया। 1967 के चुनाव के प्रभुत्व में गिरावट प्रमुख कारण निम्न थे –

  1. करिश्माई नेतृत्व का अभाव।
  2. 1962 व 1965 के युद्धों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव।
  3. सूखा पड़ने से कृषि पैदावार में कमी, जिससे खाद्यान्न का संकट पैदा हो गया।
  4. कांग्रेस में आन्तरिक गुटबाजी का प्रभाव।
  5. सभी विरोधी दलों का कांग्रेस के खिलाफ संगठित होना।
  6. कांग्रेस में सिंडिकेट व श्रीमती इंदिरा गाँधी के बीच सत्ता के बीच सत्ता संघर्ष।
  7. मानसून का फेल होना।
  8. आर्थिक संकट व आवश्यक चीजों की कीमतों में वृद्धि।

1967 से लेकर 1971 तक कांग्रेस का समय अच्छा नहीं रहा। इस बीच में श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने इस अनिश्चितता व अस्थिरता को दूर करने के लिए 1971 में मध्यावधि चुनाव की घोषणा करी दी। 1971 के इस चुनाव में सभी गैर-कांग्रेसी दलों ने कांग्रेस के खिलाफ विशेषकर श्रीमती इंदिरा गाँधी के खिलाफ एक विशाल गठबन्धन बना लिया जिसका उद्देश्य इंदिरा कांग्रेस को सत्ता से हटाना था। परन्तु चुनावों के परिणामों ने विराधी दलों की आशाओं पर पानी फेर दिया। इस चुनाव में इंदिरा कांग्रेस को 48.4% वोट मिली। जिसके आधार पर कांग्रेस की लोकसभा की 375 सीटें मिली। इस प्रकार से कांग्रेस को फिर प्रभुत्व प्राप्त हो गया। जिसे कांग्रेस का पुर्नस्थापना कहा गया।

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 2.
निम्न पर टिप्पणियाँ लिखिए।

  1. प्रिवीपर्स
  2. मिली-जुली सरकारें
  3. दल बदल
  4. सिंडिकेट।

उत्तर:
1. प्रिवीपर्स:
देश की आजादी के बाद देशी रियासतों को भारतीय संघ में विलय की व्यवस्था के उद्देश्य से विभिन्न स्तर पर प्रयास किये गये। सरकार की ओर से तत्कालीन शासक परिवारों को निश्चित मात्रा में निजी संपदा रखने का अधिकार दिया गया व उन्हें कुछ विशेष भत्ते भी देने की व्यवस्था भी की गयी। इस प्रकार की निजी संपदा रखने व भत्तों को प्रिवीपर्स कहा गया। प्रिवीपर्स की राशि इस बात निर्भर करेगी। जिस राज्य का विलय है उसका विस्तार, राजस्व और क्षमता कितनी है। 1970 में श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपनी समाजवादी नीतियों के संदर्भ में समाप्त कर दिया। इंदिरा गाँधी के इस कदम की अनेक क्षेत्रों में प्रशंसा की गई व कुछ क्षेत्रों में आलोचना भी हुई।

2. मिली-जुली सरकारें:
जब कई राजनीतिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं उन्हें मिली जुली सरकारें कहते हैं। कांग्रेस के प्रभुत्व के समय तक केन्द्र व राज्यों में कांग्रेस की ही सरकारें रहीं। परन्तु 1967 में प्रथम बार अनेक राज्यों में गैर-कांग्रेसी दलों ने कांग्रेस के खिलाफ संयुक्त रूप से चुनाव लड़कर मिल-जुली सरकार बनी। इसके बाद मिली-जुली सरकारों का दौर भारत में चल रहा है। आज भी भारत में केन्द्र तथा प्रान्तों में मिली जुली सरकारों चल रही हैं।

3. दल बदल:
जब कोई संसद सदस्य व राज्य विधान सभा का सदस्य अपने उस राजनीतिक दल से त्यागपत्र देकर जिसके टिकट व चुनाव चिन्ह पर उसने चुनाव जीता है, किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है तो उसे दल बदल कहते हैं। दल बदल की प्रवृत्ति ने भारतीय राजनीति को बहुत अधिक प्रभावित किया है।

4. सिंडीकेट:
सिंडिकेट कांग्रेस के 1960 के दशक के उन शक्तिशाली व प्रभावकारी नेताओं का गुट था जिसने अपने समय में कांग्रेस के प्रत्येक निर्णय को प्रभावित किया इस गुट के प्रमुख नेता कामराज, एन, संजीवा रेड्डी, एस. के. पाटिल व निजलगप्पा थे। सिंडिकेट के नेताओं में व श्रीमती इंदिरा गाँधी के बीच संघर्ष से कांग्रेस में 1969 में विभाजन हो गया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में सही का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
पंडित जवाहरलाल नेहरू का देहान्त किस वर्ष में हुआ?
(अ) 1964
(ब) 1963
(स) 1965
(द) 1966
उत्तर:
(अ) 1964

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प्रश्न 2.
प्रिविपर्स का सम्बन्ध किससे था?
(अ) जमींदारों से
(ब) पूंजीपत्तियों से
(स) देशी रियासतों से
(द) किसानों से
उत्तर:
(स) देशी रियासतों से

प्रश्न 3.
सिंडिकेट निम्न में से किन पार्टी के नेताओं का गुट था।
(अ) साम्यवादी दल
(ब) समाजवादी पार्टी
(स) कांग्रेस
(द) जनसंघ
उत्तर:
(स) कांग्रेस

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प्रश्न 4.
गरीबी हटाओं का नारा किसने लगाया था।
(अ) पंडित जवाहर लाल नेहरू
(ब) श्रीमती इंदिरा गाँधी
(स) साम्यवादी दल
(द) लाल बहादुर शास्त्री
उत्तर:
(ब) श्रीमती इंदिरा गाँधी

प्रश्न 5.
‘गरीबी हटाओ’ के नारे ने किस चुनाव को अपना मत्कारी प्रभाव दिखया?
(अ) 1971 का मध्यावधि चुनाव
(ब) 1967 का चौथा चुनाव
(स) 1957 का दूसरा चुनाव
(द) 1991 में
उत्तर:
(अ) 1971 का मध्यावधि चुनाव

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प्रश्न 6.
कांग्रेस पार्टी को भंग कर लोक सेवक संघ गठित करने का सुझाव किसने दिया था।
(अ) जय प्रकाश नारायण
(ब) एम. एन. राय
(स) महात्मा गाँधी
(द) अरविंद
उत्तर:
(स) महात्मा गाँधी

प्रश्न 7.
1967 में कांग्रेस व्यवस्था को चुनौती मिली, परिणामस्वरूप निम्न बातों में क्या असंगत है।
(अ) कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें
(ब) कांग्रेस में अन्तर्कलह
(स) 1969 में राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की हार
(द) सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति में ह्रास
उत्तर:
(द) सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति में ह्रास

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प्रश्न 8.
1967 में स्थापित राज्यों की गैर कांग्रेसी सरकारों ने किस संवैधानिक पद को समाप्त किए जाने की मांग की?
(अ) राज्यपाल
(ब) उपराष्ट्रपति
(स) वित्त आयोग के अध्यक्ष
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) राज्यपाल

प्रश्न 9.
ताशकंद समझौता कब और किसके बीच किया गया?
(अ) 10 जनवरी 1966, भारत-पाक
(ब) 11 जनवरी 1966, भारत-पाक
(स) 20 जनवरी 1970, भारत-चीन
(द) 1965 भारत-पाक
उत्तर:
(अ) 10 जनवरी 1966, भारत-पाक

प्रश्न 10.
जवाहर लाल नेहरू का देहांत कब हुआ?
(अ) 27 मई, 1964
(ब) 30 मई 1957
(स) 27 मई, 1960
(द) 28 मई, 1963
उत्तर:
(अ) 27 मई, 1964

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प्रश्न 11.
लाल बहादुर शास्त्री का निधन कब हुआ?
(अ) 10/11 जनवरी, 1966
(ब) जून, 1996
(स) 4 जनवरी, 1996
(द) 5 मार्च, 1963
उत्तर:
(अ) 10/11 जनवरी, 1966

प्रश्न 12.
कांग्रेस पार्टी का केन्द्र में प्रभुत्व कब तक रहा?
(अ) 1947-1977 तक
(ब) 1947-1970 तक
(स) 1947-1960 तक
(द) 1947-1990 तक
उत्तर:
(अ) 1947-1977 तक

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प्रश्न 13.
भारत में प्रतिबद्ध नौकरशाही तथा प्रतिबद्ध न्यायपालिका की धारणा को किसने जन्म दिया?
(अ) इंदिरा गाँधी
(ब) लाल बहादुर शास्त्री
(स) मोरारजी देसाई
(द) जवाहरलाल नेहरू
उत्तर:
(अ) जवाहरलाल नेहरू

प्रश्न 14.
किसने का है सम्प्रदायवाद फासीवाद का रूप है?
(अ) महात्मा गाँधी
(ब) जवाहरलाल नेहरू
(स) सरदार पटेल
(द) बी. आर. अम्बेदकर
उत्तर:
(ब) जवाहरलाल नेहरू

II. मिलान वाले प्रश्न एवं उनके उत्तर

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 5 कांग्रेसी प्रणाली चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Part - 2 img 2
उत्तर:
(1) – (स)
(2) – (य)
(3) – (ब)
(4) – (द)
(5) – (अ)

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

Bihar Board Class 12 Political Science भारत के विदेश संबंध Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
इन बयानों के आगे सही या गलत का निशान लगाइये।
(क) गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत, सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका, दोनों की सहायता हासिल कर सका।
(ख) अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के सम्बन्ध शुरूआत से ही तनावपूर्ण रहे।
(ग) शीतयुद्ध का असर भारत-पाक सम्बन्धों पर भी पड़ा।
(घ) 1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमेरिका से भारत की निकटता का परिणाम थी।
उत्तर:
(क) सही
(ख) गलत
(ग) सही
(घ) गलत

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित का सही जोड़ा मिलाए –

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 4 भारत के विदेश संबंध Part - 2 img 1
उत्तर:
(क) – (2)
(ख) – (3)
(ग) – (4)
(घ) – (1)

प्रश्न 3.
नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे? अपने उत्तर में दो कारण बताएँ और उनके पक्ष में उदाहरण भी दें।
उत्तर:
पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत की विदेश नीति के निर्माता माने जाते हैं। वे भारत के प्रधानमंत्री के साथ-साथ भारत के प्रथम विदेशमंत्री भी थे। उनका यह मानना था कि देश की एकता अखंडता के लिए एक दूरदर्शी, प्रभावशाली व व्यवहारिक विदेश नीति का निर्माण व इसका सही संचालन अति आवश्यक है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू 1949 में संविधान सभा की एक बहस में कहा था कि आजादी बुनियादी तौर पर विदेशी सम्बन्धों से ही बनती है। यही आजादी की कसौटी भी है। बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है। एक बार विदेशी संबंध अपने हाथ से निकलकर दूसरे के हाथ में चले जाये तो फिर जिस हद तक आपके हाथ से ये संबंध छूटे और जिन मसलों में छूटे-वहाँ तक आप आजाद नहीं रहते।

एक राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में हुआ ऐसे में भारत ने अपनी विदेश नीति में अन्य सभी देशों की सप्रभुत्ता का सम्मान करने और शांति कायम करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य सामने रखा। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि जिस तरह किसी व्यक्ति या परिवार के व्यवहारों को अंदरी और बाहरी धारक निर्देशित करते हैं उसी तरह एक देश की विदेश नीति पर भी घरेलू व अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है।

आपकी विदेश नीति व आपके अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में सम्बन्धों के ऊपर आपकी आर्थिक व राजनीतिक स्वतंत्रता निर्भर करती है। विकासशील देशों के पास अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संसाधनों का अभाव होता है जिसके लिए उसे विकसित देशों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है अतः उसी के अनुरूप उनको अपनी विदेश नीति भी निश्चित करनी पड़ती है दूसरे विश्व युद्ध के बाद अनेक विकासशील देशों ने ताकतवार देशों की मर्जी के अनुसार अपनी विदेश नीति तय की थी।

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प्रश्न 4.
“विदेश नीति का निर्धारण घरेलू जरूरत और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।” 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश नीति से एक उदाहरण देते हुए अपने उत्तर की पुष्टि करें।
उत्तर:
निश्चित रूप से विदेश नीति के निर्माण में अन्तरिक व वाह्य परिस्थितियाँ प्रमुख रूप में निर्धारण का काम करती है। किसी भी देश की विदेशी नीति के निम्न प्रमुख तत्व होते हैं –

  1. राष्ट्रीय हित
  2. देश की जनसंख्या व विचारधारा
  3. आर्थिक परिस्थितियाँ
  4. कृषि व उद्योग विकास की स्थिति
  5. विज्ञान व तकनीकी विकास
  6. भौगोलिक व सामरिक स्थिति

उपरोक्त आन्तरिक तत्वों के अलावा अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी किसी देश की विदेश नीति के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जिनमें निम्न हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव
  2. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण मुद्दे
  3. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग
  4. विचारधारा का प्रभुत्व
  5. सामूहिक विषय जैसे आंतकवाद मानव अधिकार व पर्यावरण की समस्या आदि
  6. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध का खतरा
  7. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गुटबाजी

1960 के दशक में भारत की स्थिति आन्तरिक स्तर पर भी व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी खराब थी। भारत कृषि के क्षेत्र में व उद्योग के क्षेत्र में भी पिछड़ा हुआ था। नियोजित अर्थव्यवस्था के आधार पर आर्थिक विकास के कार्य में लगा था जिसके लिए उसको अन्य देशों की आर्थिक व वैज्ञानिक सहायता की आवश्यकता थी।

अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारत के पास प्रयाप्त अनाज पैदा करने की क्षमता नहीं थी। बेरोजगारी व गरीबी देश में व्याप्त थी। आर्थिक विकास के लिए वैज्ञानिक व तकनीकी मदद की आवश्यकता थी। इन सभी आन्तरिक स्थितियों ने भारत की विदेश नीति को प्रभावित किया। इसी प्रकार से अन्तर्राष्ट्रीय तत्वों ने भी भारत की विदेश नीति को प्रभावित किया। विदेश नीति के दो प्रमुख उद्देश्य थे प्रथम राष्ट्र की एकता व अखंडता को निश्चित करना व दूसरे आर्थिक विकास प्राप्त करना।

उस समय अर्थात् 1960 के दशक में दुनिया दो गुटों में बँटी थी कि अमेरिका का गुट व दूसरा सोवियत संघ के नेतृत्व का गुट। दोनों अपना-अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे। अतः उनके प्रभाव से बंधने के लिए गुट निरपेक्षता की नीति को अपनाया व राष्ट्रीय एकता अखंडता को निश्चित करने के लिए पंचशील का सिद्धांत व संयुक्त राष्ट्र का ना केवल प्रारम्भिक सदस्य बना बल्कि विश्व शांति को बढ़ाना अपनी विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य बनाया।

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प्रश्न 5.
अगर आपको भारत की विदेश नीति के बारे में फैसला लेने के लिए कहा जाये तो आप इसकी किन दो बातों को बदलना चाहेंगे। ठीक उसी तरह यह भी बताएं कि भारत की विदेश नीति के किन दो पहलुओं को आप बरकरार रखना चाहेंगे। अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
उत्तर:
भारत की विदेश नीति के सम्बन्ध में निर्णय लेने के सन्दर्भ में निम्न दो बातों को बदला जा सकता है –

  1. परमाणु नीति
  2. निःशस्त्रीकरण

भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्वों में भारत की परमाणु नीति व निशस्त्रीकरण का समर्थन दो प्रमुख तत्व रहे हैं। अब समय आ गया है कि इन विषयों के सम्बन्ध में आज की परिस्थितियों की माँग के अनुसार कुछ आवश्यक बदलाव लाये जाये। भारत की परमाणु नीति रही है कि भारत परमाणु शक्ति का प्रयोग केवल शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही करेगा व किसी भी परमाणु हथियार बनाने व उन्हें युद्ध के लिए प्रयोग करने का कार्य नहीं करेगा।

परंतु आज के युग में ना केवल पाँच सदस्यों अर्थात् अमेरिका, सोवियत संघ, चीन, ब्रिटेन व फ्रांस के पास परमाणु बम है अथवा बम बनाने की क्षमता है बल्कि अन्य और विकसित देशों जैसे इजराइल, जर्मन, कोरिया, इन्डोनेशिया, ब्राजील व पाकिस्तान के पास भी या तो बम है अथवा परमाणु बम बनाने की क्षमता है। यह तो निश्चित है कि इन नई परमाणु शक्तियों के पास परमाणु शक्ति का युद्ध के लिए प्रयोग करने की योजनाएँ हैं इस स्थिति में भारत को अपनी परमाणु क्षमता बनाने व दिखाने की आवश्यकता है जिसके लिए उसे अपनी विदेश नीति में बदलाव करना चाहिए।

दूसरे शस्त्रीकरण का सम्बन्ध शस्त्रों के बनाने व उसके खरीदने की स्थिति से है, यद्यपि भारत ने इसका विरोध किया है परंतु जब हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में चीन व अमेरिका से शस्त्र खरीदकर हमारे खिलाफ प्रयोग किये जा रहे हैं तो इसे भी इस नीति को बदलकर अपनी रक्षा के लिए शस्त्र खरीदने चाहिए। जिन विषयों को हम बनाये रखना चाहेंगे वे हैं –

  1. गुट निरपेक्षता का सिद्धांत
  2. पंचशील का सिद्धांत क्योंकि ये दोनों सिद्धांत सदा प्रांसागिक रहेंगे।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:
(क) भारत की परमाणु नीति।
(ख) विदेश नीति के मामलों में सर्व-सहमति
उत्तर:
(क) भारत की परमाणु नीति:
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू भारत की विदेश नीति के निर्माता थे। वे विश्व शांति में सबसे बड़े समर्थक थे अतः उन्होंने परमाणु ऊर्जा के लड़ाई व युद्ध में प्रयोग करने के किसी भी स्तर पर प्रयास करने का विरोध किया। भारत की विदेश नीति में भी उन्होंने यह निश्चित किया कि भारत परमाणु ऊर्जा का प्रयोग केवल विकास कार्यों व शांति के लिए ही करेगा।

भारत की परमाणु ऊर्जा के संस्थापक डॉ. भावा थे जिन्होंने पंडित नेहरू के निर्देश पर परमाणु ऊर्जा का शांति के प्रयोग करने के लिए अनेक अनुसंधान किए। भारत ने 1974 में प्रथम परमाणु परीक्षण किया जिसके फलस्वरूप दुनिया के अनेक देशों ने भारत के खिलाफ प्रतिकूल प्रतिक्रिया की।

भारत सदैव परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण क्षेत्र में प्रयोग का ही समर्थक रहा व विश्व के देशों पर परमाणु विस्फोट रोकने के लिए एक व्यापक संधि के लिए जोर डाला। भारत ने परमाणु प्रसार के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए की गई संधियों का विरोध किया क्योंकि ये संधियाँ पक्षपातपूर्ण थी।

इसी कारण से भारत ने 1995 में बनी (सी.टी.-बी.टी.) व्यापक परमाणु निरीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये। 1998 में भारत में फिर परमाणु विस्फोट किये। अब परमाणु ऊर्जा के सम्बन्ध में भारत की नीति यह है कि भारत परमाणु ऊर्जा का प्रयोग शांति के लिए करेगा लेकिन आत्म रक्षा के लिए परमाणु क्षमता बनाने का अपना विकल्प खुला रखेगा।

(ख) विदेश नीति के मामले पर सर्वसहमति:
भारत की विदेश नीति की यह विशेषता रही है कि भारतीय विदेश नीति के निश्चित मूल तत्व रहे हैं सरकार व विरोधी दलों व अन्य जनमत निर्माण करने वाले वर्गों के बीच इन तत्वों पर आमतौर से सहमति रही है अगर इन तत्वों में किसी प्रकार का परिवर्तन करने की जरूरत पड़ी तो उस पर भी आम राय अर्थात् आम सहमति बनी। जैसे परमाणु शक्ति के प्रयोग के सम्बन्ध में व परमाणु परीक्षण करने के सम्बन्ध में आम सहमति रही। पंचशील गुट निरपेक्षता, पड़ोसियों के साथ सम्बन्ध व बड़ी शक्तियों के साथ सम्बन्धों पर आमतौर से सर्व सहमति रही है।

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प्रश्न 7.
भारत की विदेश नीति का निर्माण शांति और सहयोग के सिद्धांतों को आधार मानकर हुआ। लेकिन 1962 से 1972 की अवधि यानि महज दस सालों में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि यह भारत की विदेश नीति की असफलता है अथवा आप इसे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम मानेंगे? अपने मंतव्य के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
भारत को विदेश के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। वे प्रधानमंत्री के साथ-साथ भारत के विदेश मंत्री भी थे। उनके अनुसार भारत की विदेश नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता व अखंडता को सुरक्षित करना व भारत का आर्थिक विकास निश्चित करना था। इस उद्देश्य के अनुरूप भारत के विदेशों से सम्बन्धों का निर्धारण किया। पंचशील व गुट निरपेक्षता के सिद्धांतों को अपनाया गया।

दुर्भाग्यवश भारत को 1962 से लेकर 1972 के दशक में तीन युद्धों को झेलना पड़ा जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा। 1962 में चीन के साथ युद्ध हुआ, 1965 में भारत को पाकिस्तान के साथ युद्ध करना पड़ा व तीसरा युद्ध 1971 में भारत को पाकिस्तान के साथ ही करना पड़ा। यह सच है कि भारत को 1962 से 1972 के दशक में तीन युद्धों का सामना करना पड़ा परंतु यह नहीं कहा जा सकता कि ये भारत की विदेश नीति भी असफलता का परिणाम था। भारत ने चीन के साथ 1954 में पंचशील का समझौता किया चीन ने इस समझौते को तोड़ा तो यह चीन के द्वारा किया गया विश्वासघात था।

चीन ने एक बड़ा भारत का हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया परंतु बाद में भी वह अपनी पुरानी सीमा पर बापिस चला गया। धीरे-धीरे भारत व चीन के सम्बन्धों में फिर सुधार हो गया। इसी प्रकार से भारत व पाकिस्तान के बीच कश्मीर के गुद्दे पर तनाव व मतभेद 1948 से ही लगातार रहे जो 1965 में युद्ध के रूप में बदल गया।

1971 में बंगलादेश व पाकिस्तान के बीच आपसी समस्या में भारत के हस्तक्षेप के कारण 1971 का युद्ध हुआ। भारत व पाकिस्तान के बीच सम्बन्ध अब धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि 1962-1972 के बीच तीन युद्ध भारत की विदेश नीति की असफलता नहीं बल्कि तत्कालीन परिस्थितियों का ही परिणाम है।

प्रश्न 8.
क्या भारत की विदेश नीति से झलकता है कि क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है? 1971 के बंगलादेश युद्ध के संदर्भ में इस प्रश्न पर विचार करें।
उत्तर:
भारत की विदेश नीति के किसी भी तत्व से यह नहीं झलकता कि भारत अपने क्षेत्र में प्रभुत्व जमाकर क्षेत्रीय महाशक्ति बनना चाहता है। भारत की विदेश नीति के दो प्रमुख तत्वों नं. 1 पंचशील नं. 2 पड़ोसी देशों के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने की नीति के अनुसार भारत का यह सिद्धांत है कि कोई भी किसी अन्य के अन्दरूनी मामले में हस्तक्षेप नहीं कर वे अपासी सहयोग को बढ़ाये।

साथ-साथ पंचशील का यह भी सिद्धांत है कि सभी एक-दूसरे की राष्ट्रीय एकता अखंडता व प्रभुसत्ता का सम्मान करे तथा एक-दूसरे पर आक्रमण ना करे। शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का सिद्धांत भी भारतीय विदेश नीति का प्रमुख तत्व है। गुट निरपेक्षता का उद्देश्य यह है कि तृतीय विश्व के देशों की राष्ट्रीय एकता व अखंडता सुरक्षित रहे व आर्थिक विकास में सभी तृतीय विश्व के विकासशील व अविकसित देश आपस में सहयोग करें।

1971 के बंगलादेश के संदर्भ में ऐसा कहा जाता रहा है कि भारत ने पाकिस्तान के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप करके पाकिस्तान का विभाजन कराया व इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाना चाहता है। भारत के कई ऊँचे प्रमुख देश जैसे श्रीलंका नेपाल भी कुछ ऐसा ही सोचने लगे हैं परंतु सच्चाई यह नहीं है। भारत ईमानदारी के साथ गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत व पंचशील के सिद्धांत पर चल रहा है।

भारत ने सार्क (दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन) के गठन व विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अतः यह कहना गलत है कि भारत ने एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में व्यवहार किया है। बंगलादेश में भारत ने मानवीय आधारों पर हस्तक्षेप किया व सार्क के सभी देशों के साथ विशेषकर छोटे राज्यों जैसे नेपाल, भूटान व मालद्वीप जैसे देशों के साथ बड़े भाई की भूमिका निभाई है।

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प्रश्न 9.
किसी देश का राजनीतिक नेतृत्व किस तरह से उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता है? भारत की विदेश नीति का उदाहरण देकर इस प्रश्न पर विचार कीजिए।
उत्तर:
किसी देश की विदेश नीति के कुछ निश्चित निर्धारक तत्व होते हैं जिनका सम्बन्ध उस देश की आन्तरिक स्थिति जैसे, सामाजिक आर्थिक स्थिति, वैज्ञानिक तकनीकी विकास, भौगोलिक सामरिक स्थिति, विचारधारा, सैनिक शक्ति व संधि-समझौते पर निर्भर करती है व साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति व अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण पर निर्भर करती है परंतु देश का शासक दल व उसका नेता भी उस देश की विदेश नीति को निश्चित रूप से प्रभावित करता है भारत के सन्दर्भ में भी हम इस तथ्य को समझ सकते हैं।

भारत के प्रथम प्रधानममंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ देश के विदेश मंत्री भी रहे। भारत की विदेश नीति पर पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों की, प्राथमिकताओं की दृष्टिकोणों की व व्यक्तित्व की इतनी अधिक छाप है कि उन्हें भारत की विदेश नीति का निर्माता कहा जाता है। 1947 से 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू रहे।

उन्होंने भारत की गुट निरपेक्षता के सिद्धांतों के आधार पर सभी देशों व महाशक्तियों के साथ बराबर के सम्बन्ध रखें। उन्होंने भारत के विकास में सोवियत संघ का भी सहयोग लिया व अमेरिका से भी मदद ली। परंतु इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनाने के बाद, भले ही भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांत वही रहे परंतु इंदिरा गाँधी ने भारतीय सम्बन्धों को सोवियत संघ की ओर अधिक मोड़ दिया व 1971 में सोवियत संघ के साथ संधि की।

जनता पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री रहे श्री मोरारजी देशाई के समय में भारतीय सम्बन्धों का रूप अमेरिका की ओर रहा। इसी प्रकार परमाणु ऊर्जा के प्रयोग के लिए भारत की सदैव यह नीति रही कि परमाणु परीक्षण नहीं करेंगे व परमाणु शक्ति का प्रयोग केवल शान्तिपूर्ण उपयोग के लिए किया जायेगा परंतु एन. डी. ए. की सरकार में प्रधानमंत्री रहे श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस नीति में व्यापक परिवर्तन कर 1998 में कई परमाणु परीक्षण किये। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि किसी देश की विदेश नीति उसके नेतृत्व पर भी निर्भर करती है।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

गुट निरपेक्षता का व्यापक अर्थ है अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल ना करना …… इसका अर्थ होता है चीजों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना और इसको कभी जरूरत आन पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नजरिये को अपनाने को जगह स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना …… जवाहरलाल नेहरू

(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे?
(ख) क्या आप मानते हैं कि भारत-सोवियत मैत्री की संधि से गुट निरपेक्षता के सिद्धांतों का उलंघन हुआ? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
(ग) अगर सैन्य गुट न होते तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?

उत्तर:
(क) पंडित जवाहरलाल नेहरू गुट निर्पेक्ष आंदोलन के संस्थापक थे। गुटनिर्पेक्ष आंदोलन का उद्देश्य एशिया अफ्रीका व लेटिन अमेरिका के देशों को अमेरिका व सोवियत संघ के सैनिक गठबंधनों (नेटो व वार्षा सन्धि) से अलग रखना था ताकि इन देशों की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता व अखंडता को किसी प्रकार का कोई नया खतरा पैदा हो।

सोवियत संघ व अमेरिका इन नये स्वतंत्र देशों को अपने-अपने प्रभाव में लाने का प्रयास कर रहे थे जिसके लिए उन्होंने सैनिक गठबंधन बनाये थे। पंडित नेहरू ने इन नये स्वतंत्र देशों को गुट निरपेक्षता की नीति के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया कि किसी सैनिक गठबंधन की सदस्यता लेने पर उनकी स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। गुट निरपेक्षता का उद्देश्य इन नये देशों में आपसी सहयोग को बढ़ाना था।

(ख) अगस्त 1971 में भारत ने सोवियत संघ के साथ मित्रता व सहयोग की सन्धि की जो किसी भी प्रकार का कोई सैनिक समझौता नहीं था। इस प्रकार के सहयोग के समझौते तो भारत व अमेरिका के बीच भी चल रहे थे। अत: सोवियत संघ के साथ यह समझौता गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत का उलंघन नहीं करता। यह समझौता समय की कसौटी पर खरा उतारा। 1971 (दिसम्बर) को जब भारत व पाकिस्तान के युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपना सातवाँ बेडा बंगाल की खाड़ी में भेजा तो सोवियत संघ ने इसका जवाब दिया जिससे अमेरिका को पीछे हटना पड़ा।

(ग) अगर सोवियत संघ व अमेरिका के सैन्य गुट ना बनते तो हो सकता है कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन का यह स्पष्ट रूप न होता। परंतु यह तो निश्चित ही है कि द्वितीय विश्व के बाद दुनिया दो गुटों में बँट गयी थी। एक साम्यवादी गुट जिसका नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था व दूसरा पूँजीवादी गुट जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा था।

दोनों ही गुट अपना-अपना प्रभाव इन क्षेत्रों पर बढ़ाने के लिए आर्थिक मदद की पेशकश कर रहे थे। अत: इस सन्दर्भ में भी गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत प्रासांगिक है। गुटरिपेक्षता के सिद्धांत का उद्देश्य यह भी है कि निर्णय विषय की योग्यता पर किया जाये व मान सम्मान व उचित शर्तों पर किसी से सहायता ली जाये।

Bihar Board Class 12 Political Science भारत के विदेश संबंध Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध व विदेश नीति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विज्ञान व तकनीकी ने विश्व को एक छोटा सा गाँव बना दिया जिस प्रकार से एक छोटे समाज में आपस में अन्तर निर्भरता होती है उसी प्रकार से विश्व के सभी देशों में आपसी अन्तर निर्भरता बढ़ रही है यातायात, संचार, व्यापार के क्षेत्र व साथ-साथ खेल व संस्कृति के क्षेत्र में विभिन्न देशों के बीच सम्बन्धों में विस्तार हो रहा है।

विभिन्न देशों के बीच विभिन्न क्षेत्र में चल रहे सम्बन्धों को अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध कहते हैं। एक देश दूसरे देश के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सम्बन्धों का संचालन करने के लिए जिस नीति व दृष्टिकोण को अपनाता है उसे उस देश की विदेश नीति कहते हैं। प्रत्येक देश की अपनी एक विदेश नीति होती है जिसको विभिन्न आन्तरिक व वाह्य परिस्थितियाँ निश्चित करती हैं।

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प्रश्न 2.
विदेश नीति व अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के सम्बन्ध में राज्य की नीति निर्देशक तत्वों में दिये गये निर्देशों को समझाइये।
उत्तर:
भारत में संविधान के चौथे भाग में राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों के अध्याय के अनुच्छेद 51 में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को निश्चित करने के निर्देश दिये गये हैं। इनकी मुख्य सैद्धान्तिक बाते निम्न हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  2. सभी देशों के बीच आपसी सम्बन्धों को मजबूत करना।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय कानून के प्रति सम्मान रखना।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों को निभाना।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को बातचीत व मध्यस्थता से तय करना।

प्रश्न 3.
भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व समझाइये।
उत्तर:
भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व निम्न हैं –

  1. पंचशील
  2. गुटनिरपेक्षता
  3. अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा व शान्ति को बढ़ाना
  4. अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों को मजबूत करना
  5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के प्रजातंत्रीयकरण में सहायता करना
  6. रंगभेद की नीति का विरोध करना
  7. निःशस्त्रीकरण में सहायता करना

प्रश्न 4.
द्विध्रुवी विश्व से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया दो गुटों में बँट गयी। एक साम्यवादी गुट जिसका नेतृत्व सोवियत संघ ने किया व दूसरा गुट पूँजीवादी देशों का था जिसका नेतृत्व अमेरिका ने किया। इस प्रकार से विभाजित दो गुटों की दुनिया को द्विध्रुवी विश्व कहा गया। 1950 के बाद एशिया अफ्रीका व लेटिन अमेरिका में साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद टूट रहा था व नये देश स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आ रहे थे। दोनों ही गुट अर्थात् साम्यवाद गुट व पूँजीवादी गुट सैनिक गठबंधनों के आधार पर व आर्थिक सहायता के आधार पर इन नये स्वतंत्र देशों को अपने-अपने प्रभाव में लाने का प्रयास कर रहे थे। पूँजीवादी देशों में सैनिक गठबंधन नेटो व सेन्टो थे व साम्यवादी देशों का सैनिक गुट वारसा सन्धि था। इस प्रकार से पूरी दुनिया दो गुटों में बँटती नजर आ रही थी।

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प्रश्न 5.
पंचशील के पाँच प्रमुख सिद्धांतों को समझाइये।
उत्तर:
भारत व चीन के बीच सम्बन्धों की आधारशिला पंचशील था जिस पर 1954 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू व चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ ऐनलाई ने हस्ताक्षर किया। वास्तव में पंचशील भारत व चीन के बीच ही सम्बन्धों की आधारशिला नहीं थी बल्कि यह विश्व के सभी देशों के बीच सम्बन्धों की बुनियाद थी। पंचशील भारत की विदेश नीति का प्रमुख तत्व है। इसके प्रमुख सिद्धांत निम्न हैं –

  1. एक-दूसरे के देशों की एकता, प्रभुसत्ता व अखंडता का सम्मान रखना।
  2. एक-दूसरों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप ना करना।
  3. आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।
  4. आपसी मतभेदों व झगड़ों को बातचीत से हल करना।
  5. सह अस्तित्व का सिद्धांत।

प्रश्न 6.
गुट निरपेक्षता के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
गुट निरपेक्षता का शाब्दिक अर्थ है कि किसी भी गुट के साथ ना जुड़ना। ऐतिहासिक सन्दर्भ में गुट निरपेक्षता का सिद्धांत नये स्वतंत्र देशों के किसी भी सैनिक गुट से अलग रहने का था। जैसा कि हम जानते हैं कि द्वितीय युद्ध के बाद अमेरिका व सोवियत संघ के नेतृत्व में सैनिक गुट बने थे जो तृतीय विश्व के देशों पर अपना-अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे। वास्तव में गुट निरपेक्षता का अर्थ इससे अधिक कुछ और भी है। इसका अर्थ है कि किसी भी विषय पर योग्यता के आधार पर निर्णय लेना।

प्रश्न 7.
सार्क के आठ सदस्यों के नाम बताइये।
उत्तर:
सार्क एक क्षेत्रीय संगठन है जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के मध्य विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग हो बढ़ाना है। प्रारम्भ में इसमें 7 सदस्य थे अब एक सदस्य बढ़ने से इसकी संख्या 8 हो गयी है जो निम्न हैं –

  1. पाकिस्तान
  2. भारत
  3. श्रीलंका
  4. नेपाल
  5. बांगला देश
  6. मालदीव
  7. माइमार

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प्रश्न 8.
शीतयुद्ध से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व के स्तर पर सोवियत संघ व अमेरिका दो महाशक्ति के रूप में उभर कर आयी। यूरोप के देश भी द्वितीय महायुद्ध में राजनीतिक रूप से व सैनिक रूप से कमजोर हो गये थे। दोनों ही महाशक्तियाँ अपने सैनिक गठबंधनों के माध्यम से दुनिया में अपना-अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे जिससे अमेरिका व सोवियत संघ के बीच तनाव बढ़ता गया। दोनों गुटों के बीच के तनाव को शीत युद्ध कहा गया।

शीत युद्ध के विश्व राजनीति को लम्बे समय तक प्रभावित किया। शीत युद्ध का अर्थ था कि किसी प्रकार के वास्तविक युद्ध के बिना तनाव बने रहना। इसमें एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक लड़ाई रहती है जिसमें एक-दूसरे के हितों को प्रभावित करना व नुकसान करने का प्रयास किया जाता रहा है। 1950 से 1990 तक के कार्यकाल में शीतयुद्ध अपनी चर्म अवस्था में दुनिया में रहा है।

प्रश्न 9.
भारत व पाकिस्तान के बीच सम्बन्धों में तनाव के मुख्य कारण क्या थे?
उत्तर:
भारत व पाकिस्तान का उदय बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण व हिंसात्मक परिस्थितियों में हुआ। आज भी भारत व पाकिस्तान के बीच मुख्य विषय निम्न हैं जो दोनों देशों के बीच बाधा बने हैं –

  1. कशमीर की समस्या
  2. धर्म के आधार पर उग्रवाद व साम्प्रदायिकता
  3. सीमा से सम्बन्धित झगड़े
  4. पाकिस्तान के द्वारा भारत में उग्रवादियों को मदद देना
  5. पाकिस्तान के द्वारा हथियारों को इकट्ठा करना।

प्रश्न 10.
अफ्रिकन व एशियन एकता में पंडित जवाहरलाल नेहरू के योगदान को समझाइये।
उत्तर:
पंडित जवाहरलाल नेहरू ना केवल भारत की विदेश नीति के निर्माता थे बल्कि विश्व राजनीति में भी उनका बड़ा योगदान था। पंडित नेहरू अफ्रिकन देशों व एशियन देशों के बीच मित्रता व सहयोग के सबसे बड़े समर्थक थे जिसके लिए उन्होंने अथक प्रयास भी किये।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में वाड्ग सम्मेलन किया जिसका उद्देश्य अफ्रीका व एशियन देशों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ाना था। गुट निर्पेक्ष आंदोलन को लोकप्रिय बनाने व विकसित केरने का भी यही उद्देश्य था। भारत ने एशिया व अफ्रिकन देशों में सहयोग को बढ़ाने का प्रयास 1947 में ही प्रारम्भ कर दिया था। गाँधीजी ने भी अपना मिशन दक्षिण अफ्रीका में प्रारम्भ किया था।

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प्रश्न 11.
भारत व चीन के बीच सम्बन्धों में प्रमुख बाधक तत्व समझाइये।
उत्तर:
भारत व चीन के बीच सम्बन्धों का विस्तार व विकास 1954 में हुऐ पंचशील समझौते के आधार पर हुआ भारत प्रथम देश था जिसने 1949 में अस्तित्व में आयी साम्राज्यवादी सरकार को मान्यता दी। परंतु बाद में भारत व चीन के बीच सम्बन्ध बिगड़ गये जिनके निम्न प्रमुख कारण थे –

  1. सीमा विवाद
  2. तिब्बत के सम्बन्ध में दृष्टिकोण
  3. तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाईलामा को राजनीतिक शरण देना
  4. चीन के द्वारा पाकिस्तान को सैनिक मदद देना
  5. चीन का कशमीर के सम्बन्ध में दृष्टिकोण
  6. भारत के खिलाफ उत्तर-पूर्वी राज्यों में उग्रवादियों को मदद देना।

प्रश्न 12.
भारत व चीन के बीच युद्ध का भारत की साम्यवादी पार्टी पर क्या प्रभाव?
उत्तर:
भारत पर चीन के द्वारा 1962 में हुए सैनिक आक्रमण का भारत की राजनीतिक स्थिति पर व्यापक प्रभाव पड़ा तत्कालीन रक्षा मंत्री व कुछ सैनिक अधिकारियों को अपने-अपने पदों से हाथ धोना पड़ा। भारत की साम्यवादी पार्टी में 1964 में विभाजन हुआ जिसका एक वर्ग CPI (M) चीन के नजदीक आ गया व दूसरा गुट (CPI) साम्यवादी दल सोवियत संघ के नजदीक गया जो कांग्रेस को समर्थन देता रहा।

प्रश्न 13.
कारगिल घटना को विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
1999 के शुरूआती महीनों में भारतीय इलाके की नियंत्रण सीमा रेखा के कई ठिकानों जैसे द्रास, माश्कोड, काकसर व बतालिक पर अपने को मुजाहिद्दिन बताने वालों ने कब्जा कर लिया था। पाकिस्तान की सेना का इसमें पूरा-पूरा हाथ था जिसको निश्चित कर भारतीय सेना ने आवश्यक कार्यवाही प्रारम्भ की।

इन हालात से दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई जिसको कारगिल की घटना के नाम से जाना जाता है। 1999 के मई-जून में यह लड़ाई जारी रही। 26 जुलाई 1999 तक भारत अपने अधिकतर ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था। कारगिल की लड़ाई ने भारत व पाकिस्तान के बीच बने आपसी दिरवास को फिर संकट में डाल दिया पूरे विश्व का इस घटना की ओर ध्यान केन्द्रित हुआ क्योंकि इसने पूरे दक्षिण एशिया के क्षेत्र में तनाव पैदा कर दिया था। यह लड़ाई केवल कारगिल के इलाके तक ही सीमित रही।

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प्रश्न 14.
भारत की परमाणु नीति को समझाइये।
उत्तर:
भारत परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल केवल शात्तिपूर्ण उद्देश्य के लिए ही करेगा। यह भारत की विदेश नीति का प्रमुख तत्व था। पंडित जवाहरलाल नेहरू परमाणु ऊर्जा के किसी भी रूप में सैनिक प्रयोग के विरुद्ध थे। परंतु भारत किसी भी ऐसे प्रयास का समर्थन नहीं करेगा जो पक्षपात व्यवहार पर आधारित हो जैसा कि बड़ी परमाणु शक्तियों, अमेरिका, सोवियत संघ, चीन, ब्रिटेन व फ्रांस ने एन.पी.टी. की सन्धि के बारे में किया जिसका उद्देश्य विकासशील देशों पर परमाणु परीक्षण के लिए पाबंदी लगाना था जबकि परमाणु हथियार बनाने व रखने का अधिकार इनके पास था। इसी आधार पर भारत ने सी.टी.-बी.टी. पर भी हस्ताक्षर नहीं किये। भारत ने 1998 के विस्फोट करने के बाद दुनिया को अपनी परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में क्षमता दिखा दी है।

प्रश्न 15.
संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे की विदेश नीति समझाइये।
उत्तर:
संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे की सरकार भी लगभग उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर विदेश नीति का संचालन कर रही है जो प्रारम्भ से भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्व रहे हैं। यू.पी.ए. सरकार ने उदारीकरण व विश्वीकरण की नीति को बढ़ाया है व परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका के साथ अधिक सहयोग के लिए समझौता भी किया है। चीन व सोवियत संघ के साथ भी भारत के अच्छे सम्बन्ध हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी देश की विदेश नीति के आन्तरिक व वाह्य मुख्य तत्व समझाइये।
उत्तर:
किसी देश की विदेश नीति उसकी आन्तरिक स्थिति व अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम होते हैं। प्रमुख तत्व निम्न हैं –

  1. ऐतिहासिक व सांस्कृतिक परिवेश
  2. भौगोलिक व सामरिक स्थिति
  3. आर्थिक व वाणिज्य की स्थिति
  4. राष्ट्रीय हित
  5. वैज्ञानिक व तकनीकी विकास
  6. सैनिक क्षमता
  7. विचारधारा
  8. राष्ट्र का नेतृत्व
  9. तत्कालीन अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति
  10. शासक दल की प्राथमिकताएँ
  11. लोगों का राष्ट्रीय चरित्र
  12. राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप

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प्रश्न 2.
अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध से आप क्या समझते हैं? इसमें अध्ययन की आवश्यकता व महत्त्व समझाइये।
उत्तर:
किसी भी देश का व्यवहार व्यक्ति के व्यवहार जैसा ही होता है जिस प्रकार किसी व्यक्ति के व्यवहार को उसका व्यक्तिगत हित प्रभावित करता है, उसी प्रकार से एक राष्ट्र का व्यवहार भी उसके राष्ट्रीय हित से प्रभावित होता है विश्व में बढ़ते हुए अन्तर्राष्ट्रीयवाद में एक देश के दूसरे देशों के साथ सम्बन्धों में विस्तार हुआ है। आपस में आदान-प्रदान व सहयोग के अनेक क्षेत्रों का विकास हुआ है।

जिन बातों को ध्यान में रखकर व जिस नीति के तहत कोई राष्ट्र अन्य देशों के साथ अपने सम्बन्ध तय करता है उसे उस देश की विदेश नीति कहते हैं। एक देश अन्य देशों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सम्बन्धों को अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध कहते हैं जिनका स्वरूप लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में अन्तर्राष्ट्रवाद का स्वरूप बढ़ा है आपस में देशों के बीच संघर्ष, मतभेद, व सहयोग को अध्ययन करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण बन गया। वास्तव में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन एक स्वतंत्र विषय बन गया है।

प्रश्न 3.
भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व क्या हैं? इनकी सैंवाधानिक स्थिति समझाइये।
उत्तर:
भारतीय संविधान के निर्माता जिस प्रकार से भारत में सामाजिक व आर्थिक विकास के स्वरूप के सम्बन्धों में चिंतित थे व आवश्यक निर्देश संविधान में निश्चित किये उसी प्रकार से उन्होंने भारत की विदेश नीति व अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत की भूमिका के बारे में भी दिशा निर्देश दिये जिनका विवरण भारतीय संविधान के चौथे भाग में राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों के अध्याय में अनुच्छेद 51 में किया गया है जिसकी मुख्य बातें निम्न हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  2. विभिन्न देशों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय कानून व अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों के प्रति सम्मान व वचन बद्धता को कायम रखना।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करने में सहायता देना।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मतभेदों व झगड़ों को बातचीत के माध्यम से हल करना।

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प्रश्न 4.
गुट निरपेक्षता के सिद्धांत का अर्थ व उदय का इतिहास समझाइये।
उत्तर:
द्वितीय युद्ध के बाद विश्व दो गुटों में बँट गया। एक साम्यवादी गुट व दूसरा पूँजीवादी गुट। साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ ने किया व पूँजीवादी गुट का नेतृत्व अमेरिका ने किया। दोनों ही गुट एशिया व अफ्रीका में उपनिवेशवाद टूटने के उपरान्त अस्तित्व में आये नये स्वतंत्र देशे पर अपना-अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे व अपने-अपने सैनिक गठबंधनों में शामिल कर रहे थे जिससे इन स्वतंत्र देशों की स्वतंत्रता को खतरा हो रहा था।

इस स्थिति को देखकर भारत ने तत्कालीन प्रधानमंत्री, मिश्र के राष्ट्रपति नासर, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सहारनों व यूगोस्लोविया के राष्ट्रपति मार्शल टिटो ने गुट निरपेक्षता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसका उद्देश्य इन नये देशों को इन महाशक्तियों के सैनिक गठबंधनों से दूर रखना था । गुट निरपेक्षता का अर्थ है किसी गुट में शामिल ना होना। इस सिद्धांत का यह भी उद्देश्य था कि अफ्रीका, एशिया व लेटिन अमेरिकन देशों के बीच में आपसी सहयोग बढ़े। धीरे-धीरे यह विचार एक आंदोलन बन गया। गुट निरपेक्षता का अर्थ यह भी है कि प्रत्येक देश स्वतंत्र नीति अपनाये व मुद्दों की योग्यता के आधार पर निर्णय ले।

प्रश्न 5.
गुट निर्पेक्ष आंदोलन का विकास व महत्व समझाइये।
उत्तर:
गुटनिर्पेक्ष आंदोलन का उदय व विकास द्वितीय युद्ध के बाद उत्पन्न शीत युद्ध के सन्दर्भ में हुआ। द्वितीय युद्ध की समाप्ति के बाद तृतीय युद्ध तो नहीं हुआ परंतु विश्व के अनेक क्षेत्रों में युद्ध जैसी स्थितियाँ पैदा होने से तनाव जारी रहा। इस तनाव पूर्ण स्थिति को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शीत युद्ध का नाम दिया गया। इसका मुख्य कारण उस समय की दो महान शक्तियों सोवियत संघ व अमेरिका के बीच लगातार तनाव रहा। कोरिया संकट व हँगरी संकट अरब-इजराइल युद्ध, पाकिस्तान व भारत के बीच कशमीर विवाद ऐसे विषय रहे जिन पर अमेरिका व सोवियत संघ आमने-सामने दिखाई भी दिए जिससे युद्ध तो नहीं हुआ परंतु युद्ध जैसी परिस्थितियाँ व्यापक रही।

दोनों ही महाशक्तियों नये स्वतंत्र देशों पर अपना-अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे जिससे इनकी स्वतंत्रता को खतरा पैदा हो रहा था। इस प्रभाव को नियमित करने व एशिया व अफ्रीका के देशों की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए गुटरिपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित गुट निर्पेक्ष आंदोलन का विकास हुआ। इसकी आवश्यकता व महत्त्व को समझते व स्वीकार करते हुए इसका विकास हुआ। प्रारम्भ में इसकी सदस्य संख्या 25 थी, परंतु 2004 तक इसकी संख्या 103 हो गयी जो इसकी आवश्यकता व महत्त्व को दर्शाता है इसका प्रथम शिखर सम्मेलन 1961 में हुआ था।

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प्रश्न 6.
आज के विश्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासांगिकता समझाइये।
उत्तर:
गुटनिर्पेक्ष आंदोलन अपने अस्तित्व से आज तक विश्व राजनीति में विशेषकर तृतीय विश्व के देशों के राजनीतिक व आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है आज विश्व के लगभग 200 देशों में से 103 सदस्य देश गुटनिर्पेक्ष आंदोलन के सदस्य हैं। जिस समय गुट निर्पेक्ष आंदोलन 1961 में अस्तित्व में आया उस समय विश्व दो गुटों में बँटा था। एक सोवियत संघ का गुट व दूसरा अमेरिका का गुट। दोनों गुटों के बीच शीतयुद्ध का दौर था।

अब क्योंकि विश्व में, सोवियत संघ टूटने से इस गुट का प्रभाव समाप्त हो गया है व विश्व की रचना का स्वरूप ही बदल गया है अत: इस प्रकार के प्रश्न उठने लगे हैं कि क्या अब गुटनिर्पेक्ष आंदोलन के अस्तित्व की कोई प्रासांगिकता है? इस सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि भले ही विश्व रचना का स्वरूप बदल गया हो परंतु गुटनिर्पेक्ष आंदोलन की प्रासांगिकता आज भी है क्योंकि इसका उद्देश्य तृतीय विश्व में देशों के लिए स्वतंत्रता है।

प्रश्न 7.
पंडित जवाहरलाल नेहरू की भारत की विदेश नीति के निर्माता के रूप में भूमिका समझाइये।
उत्तर:
पंडित जवाहरलाल नेहरू को भारत की विदेश नीति का निर्माता कहना न्यायोचित है क्योंकि वे देश के प्रथम प्रधानमंत्री ही नहीं थे बल्कि भारत के प्रथम विदेशमंत्री भी थे कांग्रेस के प्रमुख नेता थे व चमत्कारिक व्यक्ति के धनी थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू को अन्तर्राष्ट्रीय विषयों की अच्छी समझ थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू अफ्रोएशियन एकता व इन देशों के आर्थिक विकास के बहुत बड़े समर्थक थे। सोवियत संघ की नियोजित अर्थव्यवस्था से वे बहुत प्रभावित थे। चीन व भारत के आपसी सम्बन्धों को सुदृढ़ आधार देने के लिए उन्होंने 1954 में चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री के साथ पंचशील का समझौता किया।

पंचशील का समझौता ना केवल भारत व चीन के बीच सम्बन्धों का आधार था बल्कि विश्व के देशों में आपसी सम्बन्धों को मजबूत आधार देने के लिए एक मजबूत सेतू था। दुनिया के गरीब देशों के आर्थिक विकास व उनकी स्वतंत्रता को निश्चित करने के लिए पंडित नेहरू ने गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत के प्रतिपादन व इसके विकास में अपना विशेष योगदान दिया। पंडित नेहरू का न केवल भारत की विदेश नीति के निर्माण में योगदान था, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय के विकास में भी पंडित नेहरू का अथाह योगदान रहा।

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प्रश्न 8.
भारत की विदेश नीति के प्रमुख तत्व समझाइये जिन्होंने इसके निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उत्तर:
भारत की विदेश नीति पर पंडित जवाहरलाल नेहरू की विचारधारा, प्राथमिकता व दृष्टिकोणों की अमिट छाप है। जिन प्रमुख तत्वों ने भारत की विदेश नीति के निर्धारण में अहम भूमिका अदा की हैं वे निम्न हैं –

  1. गुट निरपेक्षता
  2. पंचशील
  3. संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करना
  4. अन्तर्राष्ट्रवाद का विकास करना
  5. सैनिक गुटों का विरोध करना
  6. निशस्त्रीकरण में सहयोग करना
  7. रंग भेद की नीति का विरोध करना
  8. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का प्रजातंत्रीयकरण करना
  9. पड़ोसी देशों के साथ अच्छे सम्बन्ध कायम करना
  10. मानव अधिकारों की रक्षा करना

प्रश्न 9.
चीन भारत का दोस्त भी रहा व दुश्मन भी। समझाइये।
उत्तर:
चीन के साथ भारत के पुराने ऐतिहासिक व सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे हैं। भारत की आजादी के बाद से भी भात व चीन के अच्छे सम्बन्ध रहे हैं दोनों देशों में सांस्कृतिक कृषि व व्यापार के क्षेत्रों में आदान-प्रदान होता रहा है। चीन में साम्यवादी दल की सरकार 1949 में अस्तित्व में आयी। भारत सबसे पहला देश था जिसने उसे मान्यता दी।

1954 में दोनों देशों के बीच पंचशील का समझौता हुआ जिसके आधार पर दोनों देशों के बीच सम्बन्धों का विस्तार हुआ। परंतु 1959 के बाद तिब्बत पर भारत के दृष्टिकोण को लेकर व भारत के द्वारा तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को भारत में शरण देने के कारण दोनों देशों के बीच सम्बन्धों में तनाव पैदा हो या जो पहले सीमा विवाद में बदला व बाद में 1962 में सैनिक युद्ध में बदल गया।

चीन ने भारत पर आक्रमण कर भारत के एक बड़े क्षेत्र पर अपना कब्जा कर लिया व भारत के सिक्किम व अरूणाचल प्रदेश तक के राज्यों पर अपना दावा कायम करने लगा। हिन्दी चीनी भाई-भाई का नारा देने वाला चीन भारत के हर क्षेत्र में विरोधी बन गया । पाकिस्तान के साथ 1965 में होने वाले युद्ध में भी चीन ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान को सैनिक मदद दी व कश्मीर के मुद्दे पर भी पाकिस्तान को राजनीतिक व कूटनीतिक मदद दी। यदि इस समय भारत व चीन के बीच सम्बन्धों में सुधार है फिर भी कड़वाहट व तनाव का एक लम्बा अध्याय भी जुड़ा हुआ है।

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प्रश्न 10.
भारत व चीन के बीच तिब्बत के प्रश्न पर उत्पन्न विवाद को समझाइये।
उत्तर:
तिब्बत भारत व चीन के बीच मध्य एशिया में एक मशहूर पठार है। ऐतिहासिक रूप से तिब्बत भारत व चीन के बीच विवाद का एक बड़ा विषय रहा है। तिब्बत का इतिहास इसके स्वतंत्र रूप से रहने की इच्छा के संघर्ष का इतिहास है। 1950 में चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया। तिब्बत के बहुमत के लोगों ने चीन के नियंत्रण का विरोध किया।

भारत व चीन के पंचशील के समझौते के समय चीन के प्रधानमंत्री ने इसे भारत की स्वीकृति समझा अत: जब भारत के सम्मुख तिब्बत के धार्मिक नेता दलाईलामा ने तिब्बत के लोगों के मत को रखा तब नेहरू ने तिब्बत के लोगों के प्रति अपना समर्थन दिया जिस पर चीन ने अपनी नाराजगी व्यक्त की। भारत द्वारा दलाई लामा को राजनीतिक शरण देने के कारण भारत व चीन के बीच सम्बन्ध और भी अधिक तनावपूर्ण हो गये।

प्रश्न 11.
भारत के विभाजन के मुख्य कारणों को समझाइये।
उत्तर:
भारतीय समाज को धर्म के आधार पर बाँटने का कार्य अंग्रेजों ने बहुत पहले ही कर दिया। मुस्लिम लीग का गठन 1906 में हुआ जो प्रारम्भ में तो उदारवादी राष्ट्रवादी पार्टी थी परंतु बाद में वह साम्प्रदायिकता के आधार पर राजनीति करने लगी। मोहम्मद अली जिन्ना के दृष्टिकोण में भी परिवर्तन मुस्लिम लीग ने ही किया। 1940 में मुस्लिम लीग ने भारत के विभाजन पर अलग पाकिस्तान बनने की माँग औपचारिक रूप से रख दी। मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की माँग को अपने दो राष्ट्र के सिद्धांत पर उचित ठहराया। इस प्रकार से भारत का विभाजन हुआ। इसके निम्न प्रमुख कारण थे –

  1. अंग्रेजों की साम्प्रदायिक नीतियाँ
  2. अंग्रेजों की फूट डालो व राज्य करो की नीति
  3. अंग्रेजों का सामाजिक व आर्थिक पिछड़ापन
  4. मोहम्मद अली जिन्ना की हठधर्मी
  5. कांग्रेस की कुछ गलत नीतियाँ
  6. जिन्ना की सीधी कार्यवाही का निर्णय
  7. हिन्दू मुस्लिम झगड़े
  8. हिन्दू उग्रवाद

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 12.
भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध व तनाव के प्रमुख विषय क्या हैं?
उत्तर:
अगस्त 1947 में भारत का विभाजन हुआ जिसके कारण भारत व पाकिस्तान के रूप में दो स्वतंत्र राज्यों का उदय हुआ। यह विभाजन व्यापक हिंसात्मक माहौल में हुआ जिसने अनेक प्रश्न पीछे छोड़ दिये जो आज भी भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध व तनाव का कारण बने हुए हैं। 1947 से अब तक तीन युद्ध भारत व पाकिस्तान के बीच हो चुके हैं ये विषय निम्न हैं –

  1. सीमा विवाद
  2. कशमीर की समस्या
  3. उग्रवादियों का भारत में प्रवेश व हिंसात्मक कार्यवाही करना
  4. भारत में पाकिस्तान उग्रवादियों का हस्तक्षेप
  5. परमाणु परीक्षण
  6. पाकिस्तान के द्वारा जरूरत से ज्यादा सैनिक सामग्री इकट्ठा करना
  7. भारत का विश्व शक्ति के रूप में उभरना
  8. कशमीर के प्रश्न का अन्तर्राष्ट्रीयकरण पर नियंत्रण
  9. सीमा क्षेत्र में हस्तक्षेप करना
  10. कारगिल घटना

प्रश्न 13.
भारत व पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध के प्रमुख कारण व परिणाम समझाइये।
उत्तर:
1970 के बाद पाकिस्तान के पूर्वी भाग में पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ जनादेश आया व अपने ऊपर दोयम नागरिक की तरह व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने लगे। इस पर पूर्वी पाकिस्तान की आवामी पार्टी के नेता शेख मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया व विरोध करने वाले नागरिकों पर अत्याचार किये गये। वहाँ पर एक प्रकार से आन्तरिक कलह की स्थिति पैदा हो गई।

लाखों की संख्या में बंगला देशी शरणार्थी भारत की सीमा में घुस आये जिनके कारण भारत पर बड़ा आर्थिक बोझ पड़ा इन परिस्थितियों में भारत बांगलादेश में मानवीय आधार पर हस्तक्षेप किया जिसके कारण पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया जो 16 दिसम्बर 1971 तक चला। 16 दिसम्बर 1971 को बांगलादेश एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आ गया। पाकिस्तान की सेना ने भारत के सामने आत्मसमर्पण किया। 1972 में शिमला में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री व श्रीमति इंदिरा गाँधी के बीच समझौता हुआ। शिमला समझौते को भारत व पाकिस्तान के बीच भावी सम्बधों का आधार माना गया।

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प्रश्न 14.
भारत की परमाणु नीति को समझाइये।
उत्तर:
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्राथमिकता भारत के आर्थिक, वैज्ञानिक व औद्योगिक विकास की थी अत: वे परमाणु ऊर्जा का प्रयोग केवल औद्योगिक विकास के लिए ही करना चाहते थे व परमाणु ऊर्जा के किसी भी रूप में सैनिक प्रयोग के विरुद्ध थे अतः उन्होंने कभी भी परमाणु परीक्षण नहीं किया व महाशक्तियों पर परमाणु निशस्त्रीकरण के लिए जोर देते रहे। परंतु 1971 के युद्ध के बाद इंदिरा गाँधी ने नेहरू की इस नीति में परिवर्तन किया व 1974 में प्रथम परमाणु परीक्षण किया। जिसे भारत ने शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया।

भारत ने महाशक्तियों के द्वारा बनाई गई 1968 की परमाणु अनुसार सन्धि का विरोध किया क्योंकि यह सन्धि पक्षपात पर आधारित थी। भारत ने 1995 में बनी व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध सन्धि का भी इस आधार पर विरोध किया व हस्ताक्षर नहीं किये। 1998 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. सरकार ने पुनः परमाणु परीक्षण किया व अपनी परमाणु हथियार रखने की क्षमता को दर्शाया। भारत की इस समय इस सम्बन्ध में नीति यह है कि भारत परमाणु ऊर्जा का प्रयोग शांति के लिए करेगा परंतु अपने विकल्प खुले भी रखेगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत और पाकिस्तान व भारत के चीन के बीच सम्बन्धों में मुख्य बाधक तत्वों अर्थात् विषयों को समझाइये।
उत्तर:
भारत व पाकिस्तान दो अलग-अलग राज्य के रूप में हिंसात्मक वातावरण में अस्तित्व में आये। दोनों राज्यों के बीच लगातार तनाव पूर्ण सम्बन्ध रहे हैं व 1947 से 1971 तक तीन युद्ध व 2000 में कारगिल घटना भी हो चुकी है भारत व पाकिस्तान के बीच तनाव के मुख्य कारण निम्न विषय हैं –

  1. सीमा विवाद
  2. साम्प्रदायिकता का विरासत
  3. उग्रवादियों की पाकिस्तान में ट्रेनिंग व उनका भारत में हस्तक्षेप करना
  4. जम्मू व कशमीर की समस्या
  5. पाकिस्तान के द्वारा सैनिक हथियार इकट्ठे करना व उनका भारत के खिलाफ प्रयोग करना
  6. कशमीर के मुद्दे का पाकिस्तान के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय करण करना
  7. परमाणु परीक्षण करना
  8. अक्ष्यचिन का विषय

चीन व भारत के सम्बन्धों में तनाव के विषय:
प्रारम्भ में भारत व चीन के बीच अच्छे सम्बन्ध रहे। 1949 में भारत ने सबसे पहले चीन की साम्यवादी सरकार को मान्यता दी। परंतु 1959 के बाद इन के रिश्तों में तनाव आ गया जबकि 1954 में भारत व चीन के बीच पंचशील का समझौता हुआ व दोनों देशों के बीच हिन्दी चीनी भाई-भाई के नारे लगाये गये। तिब्बत के विषय पर दोनों देशों के बीच सम्बन्धों में तनाव पैदा हो गया जो 1962 में युद्ध में बदल गया जिसमें भारत का एक बड़ा क्षेत्र उसने अपने कब्जे में ले लिया यद्यपि भारत व चीन के बीच सम्बन्धों में सुधार तो हुआ परंतु निम्न विषय तनाव के कारण आज भी बने हुए हैं –

  1. सीमा विवाद
  2. तिब्बत का विषय
  3. दलाईलामा को भारत द्वारा राजनीतिक शरण देना
  4. कशमीर के मुद्दे पर चीन का पाकिस्तान को समर्थन
  5. चीन द्वारा पाकिस्तान को सैनिक सामग्री देना
  6. उत्तर पूर्वी राज्यों में चीन के द्वारा उग्रवादियों को समर्थन देना।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्न में से सही उत्तर चुनिए

प्रश्न 1.
भारत की विदेश नीति का निर्माता किसे कहा जाता है?
(अ) पंडित जवाहरलाल नेहरू
(ब) कृष्णा मेनन
(स) सरदार पटेल
(द) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
उत्तर:
(अ) पंडित जवाहरलाल नेहरू

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प्रश्न 2.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रथम शिखर सम्मेलन कहाँ पर हुआ?
(अ) वैलग्रेड
(ब) वाडूंगा
(स) काहिरा
(द) देहली
उत्तर:
(अ) वैलग्रेड

प्रश्न 3.
पंचशील का समझौता किस वर्ष में हुआ?
(अ) 1954
(ब) 1955
(स) 1961
(द) 1965
उत्तर:
(अ) 1954

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प्रश्न 4.
वाडूंगा सम्मेलन किस वर्ष में हुआ?
(अ) 1954
(ब) 1961
(स) 1955
(द) 1965
उत्तर:
(स) 1955

II. मिलान वाले प्रश्न

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 4 भारत के विदेश संबंध Part - 2 img 2
उत्तर:
(1) – (स)
(2) – (द)
(3) – (घ)
(4) – (ब)
(5) – (अ)

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

Bihar Board Class 12 Political Science नियोजित विकास की राजनीति Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘बॉम्बे प्लान’ के बारे में निम्नलिखित में कौन-सा बयान सही नहीं है।
(क) यह भारत के आर्थिक भविष्य का एक ब्लू-प्रिंट था।
(ख) इसमें उद्योगों के ऊपर राज्य के स्वामित्व का समर्थन किया गया था।
(ग) इसकी रचना कुछ अग्रणी उद्योगपतियों ने की थी।
(घ) इसमें नियोजन के विचार का पुरजोर समर्थन किया गया था।
उत्तर:
(ख) इसमें उद्योगों के ऊपर राज्य के स्वामित्व का समर्थन किया गया था।

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प्रश्न 2.
भारत ने शुरुआती दौर में विकास की जो नीति अपनाई उसमें निम्नलिखित में से कौन-सा विचार शामिल नहीं था।
(क) नियोजन
(ख) उदारीकरण
(ग) सहकारी खेती
(घ) आत्म निर्भरता
उत्तर:
(ख) उदारीकरण

प्रश्न 3.
भारत में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का विचार ग्रहण किया गया था।
(क) बॉम्बे प्लान से
(ख) सोवियत खेमे के देशों के अनुभव से
(ग) समाज के बारे में गाँधीवादी विचार से
(घ) किसान संगठनों की मांगों से
उत्तर:
(ख) सोवियत खेमे के देशों के अनुभव से

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित का मेल करें।
Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति Part - 2 img 1
उत्तर:
(क) – (ii)
(ख) – (i)
(ग) – (ii)
(घ) – (iv)

प्रश्न 5.
आजादी के समय विकास के सवाल पर प्रमुख मतभेद क्या थे? क्या इन मतभेदों को सुलझा लिया गया?
उत्तर:
आजादी के समय भारत के सामने अनेक प्रकार की सामाजिक व राजनीतिक समस्याएँ थी जिनका हल निकालने के लिए भारत ने नियोजित अर्थव्यवस्था को अपनाया। परन्तु नियोजन की यह प्रक्रिया इतनी सहज व सरल नहीं हो पायी व अनेक प्रकार के मतभेदों के दायरे में आ गयी सबसे पहले मतभेद वैचारिक था। वैचारिक स्तर पर भारतीय नेतृत्व में प्रमुख रूप से दो वर्ग थे। प्रथम उदारवादी चिन्तक जो विकास का पश्चिमी उदारवादी मॉडल अपनाना चाहते थे व दूसरा वर्ग उन नेताओं व चिंतकों का था जो साम्यवादी समाजवादी मॉडल को अपनाने के पक्ष में था।

दूसरा मतभेद प्राथमिकताओं को लेकर था। कुछ लोग निजी क्षेत्र को प्राथमिकता दे रहे थे व अन्य सार्वजनिक क्षेत्र में अधिक आर्थिक गतिविधियाँ व निवेश के पक्ष में थे ताकि राज्य के माध्यम से आर्थिक विकास हो ताकि उसका अधिक से अधिक लाभ जनता तक पहुँच सके। तीसरा मुद्दा कृषि बनाम उद्योग था। जिस पर विभिन्न सोच के लोगों में मतभेद था। कुछ लोग जैसे पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत की गरीबी, बेरोजगारी की समस्या का हल औद्योगिकरण के द्वारा करना चाहते थे जबकि अन्य वर्ग के लोगों का यह मानना था कि ग्रामीण क्षेत्र कृषि की कीमत पर अगर औद्योगिकरण किया जाता है तो वह कृषि क्षेत्र के लिए हानिकारक होना इसी संदर्भ में ग्रामीण बनाम शहरी मुद्दा भी इस अवसर पर रहा कि ग्रामीण क्षेत्र को अधिक निवेश व विकास की जरूरत है शहरी विकास ग्रामीण विकास की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

इस प्रकार से नियोजन की प्रक्रिया कई प्रकार के मतभेदों से घिरी रही लेकिन क्योंकि सभी राष्ट्रीय हितों से प्रेरित थे अतः मतभेद होते हुए भी समायोजन व आम सहमति के माध्यम से मतभेद दूर किए गए तथा उचित रास्ता अपनाया गया। जैसे निजी क्षेत्र व सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई गई। ग्रामीण क्षेत्र के साथ शहरी क्षेत्र का विकास भी निश्चित किया गया। इसी प्रकार से कृषि विकास व औद्योगिक विकास में भी सम्बन्ध स्थापित किया गया।

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प्रश्न 6.
पहली पंचवर्षीय योजना का किस चीज पर सबसे ज्यादा जोर था? दूसरी पंचवर्षीय योजना पहली से किन अर्थों में अलग थी?
उत्तर:
प्रथम पंचवर्षीय योजना 1951 में बनी जिसका कार्यकाल 1956 तक का था इस पंचवर्षीय योजना का सबसे प्रथम उद्देश्य गरीबी को दूर करना था। इस योजना को तैयार करने में जुटे विशेषज्ञों में एक के. एन. राज थे। पहली पंचवर्षीय योजना का मुख्य क्षेत्र अर्थात् प्राथमिकता कृषि विकास पर था। इसी योजना के अन्तर्गत खाद्य और सिंचाई के क्षेत्र में निवेश किया गया। विभाजन का सबसे बुरा असर कृषि पर पड़ा था अतः कृषि के विकास की ओर सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत थी। कृषि को उचित रूप से उपयोगी बनाने के लिए इसी योजना में भूमि सुधारों पर जोर दिया गया।

दूसरी पंचवर्षीय योजना का समय 1957 से 1962 तक का था। इस पंचवर्षीय योजना के प्रमुख रूप से निर्माता पी.सी. महालनोबिस थे। यह योजना प्रथम पंचवर्षीय योजना से इस रूप में मिली थी कि इसमें जोर औद्योगीकरण पर दिया। अर्थात् इस योजना कि प्राथमिकता औद्योगिक विकास पर थी जबकि प्रथम योजना में प्राथमिकता कृषि विकास पर थी। प्रथम योजना का मूलमंत्र था धीरज, लेकिन दूसरी योजना की कोशिश तेज गति से संरचनात्मक बदलाव करने की थी। सरकार ने देशी उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयात पर भारी शुल्क लगाया। संरक्षण की इस नीति से निजी क्षेत्र व सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को आगे बढ़ने में मदद मिली।

प्रश्न 7.
हरित क्रान्ति क्या थी? हरित क्रान्ति के दो सकारात्मक और दो नकारात्मक परिणामों का उल्लेख करें।
उत्तर:
भारत 1960 के दशक में खाद्य के संकट से जूझ रहा था। कृषि पैदावार व जनसंख्या विस्तार में अनुपात बिगड़ रहा था। अनाज की कमी के कारण अमेरिका की गलत नीतियों व दबावों के बावजूद भी अमेरिका से अनाज का आयात करना पड़ रहा था। इसी समय पर सूखे के कारण अनाज उत्पादन का संकट और अधिक गहरा गया था। 1962 के चीन युद्ध व 1965 के पाकिस्तान के युद्ध ने अनाज के संकट को और बढ़ा दिया। अनाज खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा भी चुकानी पड़ती थी।

इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ नए उपयों का सूत्रपात किया गया जिसमें से एक थी हरित क्रान्ति। हरित क्रान्ति का अर्थ था विज्ञान तकनीकी, रसायनिक खाद, उन्नत बीजों का प्रयोग करके अन्न उत्पादन को बढ़ाना। 1960 के दशक में ही भारत में हरित क्रान्ति का सूत्रपात किया गया। इसका प्रयोग पहले केवल उन राज्यों में किया गया जो पहले से ही अपेक्षाकृत संसाधन रखने वाले राज्य थे। इन राज्यों में हरियाणा, पंजाब व उत्तर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र थे। निश्चित रूप से हरित क्रान्ति से अन्न पैदावार में बड़ी क्रान्ति आयी।

हरित क्रान्ति के दो निम्न सकारात्मक परिणाम –

  1. जमीन का उचित प्रयोग।
  2. अनाज उत्पादन में वृद्धि।

हरित क्रान्ति के दो निम्न नकारात्मक परिणाम थे –

  1. केवल कुछ ही राज्यों तक इसका प्रभाव सीमित रहा।
  2. अनाज की गुणवत्ता में कमी आयी।

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प्रश्न 8.
दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान औद्योगिक विकास बनाम कृषि-विकास का विवाद चला था। इस विवाद में क्या-क्या तर्क दिए गए थे?
उत्तर:
(1951 – 1956) तक की प्रथम पंचवर्षीय योजना में उम्मीद के अनुसार कृषि क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता दी गई क्योंकि कृषि भारत का एक बड़ा क्षेत्र था वह भारत की 80% जनता ग्रामों में रहती थी खेती क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या इसके प्रबन्धन की कमी व इसके सही प्रकार से उपयोग का अभाव था। अत: कृषि का विकास की अत्यन्त आवश्यकता थी ताकि भारतीय समाज की मूल समस्याएँ बेरोजगारी व गरीबी को दूर किया जा सके।

परन्तु इसी बीच एक अन्य सोच का जन्म हुआ जिसमें कृषि के स्थान पर औद्योगिक विकास को अधिक प्राथमिकता देने पर बल दिया गया क्योंकि गरीबी व बेरोजगारी को दूर करने के लिए कृषि के स्थान पर उद्योगों को अधिक उपयुक्त समझा गया। इस विचार को दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-1961) में लागू किया गया। पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों की एक टोली ने यह योजना तैयार की थी। इस योजना में औद्योगीकरण पर दिए गए जोर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को एक नया आयाम दिया। परन्तु कुछ नए मुद्दों व समस्याओं अर्थात् विवादों का भी जन्म हुआ। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा कृषि बनाम उद्योग बना विवाद यह था कि किस क्षेत्र में अधिक संसाधन लगाए जाए।

कुछ लोगों का यह मानना था कि दूसरी पंचवर्षीय योजना में औद्योगिक विकास को अधिक प्राथमिकता देने से कृषि विकास के हितों का नुकसान हुआ है। जे.सी. कुमारप्पा जैसे गाँधीवादी अर्थशात्रियों ने एक वैकल्पिक योजना का खाका तैयार किया जिसमें ग्रामीण औद्योगीकरण पर बल दिया। उनका तर्क यह था कि अगर औद्योगीकरण ही करना है तो कृषि के क्षेत्र में औद्योगीकरण किया जाना चाहिए ताकि ग्रामों में रहने वाले लोगो को रोजगार मिले व उनके जीवन में सुधार किया जा सके। जबकि अन्य वर्ग के लोगों का यह मानना था कि बगैर भारी औद्योगीकरण के गरीबी का निवारण नहीं किया जा सकता। इन लोगों का मानना था कि ग्रामीण व कृषि विकास के लिए भी औद्योगीकरण विकास आवश्यक है।

प्रश्न 9.
“अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका पर जोर देकर भारतीय नीति निर्माताओं ने गलती की। अगर शुरुआत से ही निजी क्षेत्र को खुली छूट दी जाती तो भारत का विकास कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से होता” इस विचार के पक्ष में व विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
भारतीय अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका के बारे में काफी विवाद रहा। कुछ लोग सार्वजनिक क्षेत्र के पक्ष में थे जिसमें राज्य को अधिक से अधिक भूमिका दी जाती है जबकि अन्य वर्ग आर्थिक विकास के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को अधिक महत्त्व दी जाती है जबकि अन्य वर्ग आर्थिक विकास के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को अधिक महत्व देते थे तथा राज्य के क्षेत्र को सीमित करना चाहते थे। अन्त में बीच का रास्ता अर्थात् मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया लेकिन यह निश्चित है कि सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक महत्त्व दिया गया क्योंकि भारत अर्थव्यवस्था को समाजवादी सिद्धान्तों पर बनाना चाहता था।
उपरोक्त कथन के पक्ष में तर्क निम्न है। पक्ष में –

  1. व्यक्तिगत विकास के लिए अधिक उपयुक्त होता।
  2. औद्योगिक विकास की रफ्तार तेज होती।
  3. रोजगार के अधिक अवसर प्राप्त होते।
  4. गरीबी दूर करने में अधिक सहायक होता।
  5. आर्थिक गतिविधियाँ तेज होती जिससे आर्थिक विकास तेज होता।
  6. विदेशी मुद्रा कमाने में सहायक होता।

विपक्ष में –

  1. संविधान की भावना के प्रतिकूल होता।
  2. समाज में असमानताएँ व विषमताएँ बढ़ती।
  3. कृषि क्षेत्र का विकास रुक जाना।
  4. ग्रामीण व शहरी क्षेत्र में टकराव बढ़ता।
  5. पूँजीपतियों में वृद्धि होती।
  6. सामाजिक न्याय का उद्देश्य प्राप्त नहीं होता।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें –
आजादी के बाद के आरम्भिक वर्षों में कांग्रेस पार्टी के भीतर परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ पनपी। एक तरफ राष्ट्रीय पार्टी कार्यकारिणी ने राज्य के स्वामित्व का समाजवादी सिद्धान्त अपनाया, उत्पादकता को बढ़ाने के साथ-साथ आर्थिक संसाधनों के संकेंद्रण को रोकने के लिए अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों का नियंत्रण और नियमन किया। दूसरी तरफ कांग्रेस की राष्ट्रीय सरकार ने निजी निवेश के लिए उदार आर्थिक नीतियाँ अपनाई और उसके बढ़ाने के लिए विशेष कदम उठाए। इससे उत्पादन में अधिकतम वृद्धि की अकेली कसौटी पर जायज ठहराया गया।

(क) यहाँ लेखक किस अंतर्विरोध की चर्चा कर रहा है? ऐसे अंतर्विरोध के राजनीतिक परिणाम क्या होंगे?
(ख) अगर लेखक की बात सही है तो फिर बताएँ कि कांग्रेस इस नीति पर क्यों चल रही थी? क्या इसका संबंध विपक्षी दलों की प्रकृति से था?
(ग) क्या कांग्रेस पार्टी के केन्द्री: और इसके प्रान्तीय नेताओं के बीच भी कोई अंतर्विरोध था?

उत्तर:
(क) आजादी के बाद में प्रारम्भिक वर्षों में कांग्रेस पार्टी के भीतर दो परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ पनपी जिनमें से एक आर्थिक गतिविधियों के निजी क्षेत्र में करने की पक्षधर थी दूसरी विचारधारा के लोग वे थे जो आर्थिक गतिविधियों को सार्वजनिक क्षेत्र में देकर राज्य की एक बड़ी भूमिका के पक्षधर थे। दोनों दबावों के मद्देनजर मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक गतिविधियाँ दोनों क्षेत्रों में की गई।

(ख) कांग्रेस की सरकार के निर्णय ने निजी निवेश के लिए उदार आर्थिक नीतियाँ अपनाई और उसके बढ़ाने के लिए विशेष कदम उठाए। सरकार ने ये कार्य बड़े-बड़े पूँजीपतियों व उद्योगपतियों के समूह के दबाव में उठाये।

(ग) कांग्रेस पार्टी एक अनुशासित दल जिसमें पंडित जवाहर लाल नेहरू का चमत्कारिक व प्रभावशाली नेतृत्व था। अतः यह मानना गलत ही होगा कि कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व व प्रान्तीय नेतृत्व में किसी प्रकार का अन्त:विरोध था। अधिकांश राज्यों में कांग्रेस दल की ही सरकारें थीं जिनको केन्द्र के लगभग सभी निर्णय मान्य होते थे।

Bihar Board Class 12 Political Science नियोजित विकास की राजनीति Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की प्रमुख विरासतें समझाइए।
उत्तर:
भारत में आजादी के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद को निम्न प्रमुख आर्थिक विरासतें मानी जा सकती हैं –

  1. आर्थिक गरीबी
  2. बेरोजगारी
  3. क्षेत्रीय असंतुलन
  4. आर्थिक पिछड़ापन
  5. विकसित स्रोतों का अभाव
  6. प्रति व्यक्ति कम आय
  7. अर्थव्यवस्था में पूँजीवादी व सामन्तवादी प्रवृतियाँ
  8. कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था

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प्रश्न 2.
आजादी के बाद आर्थिक विकास की प्रमुख दृष्टिकोण कौन-कौन से थे?
उत्तर:
आजादी के बाद भारत के सामने आर्थिक विकास के बड़ी चुनौती थी जिसमें अनेक प्रकार की आर्थिक समस्याएँ थीं जिनको दूर करने के लिए कई प्रकार की विधियाँ व माडल थे जिनमें से कुछ प्रमुख निम्न थे।

1. समाजवादी सिद्धान्त:
समाजवादी चिन्तक, भारत की अर्थव्यवस्था का निर्माण समाजवादी सिद्धान्तों पर करना चाहते थे जिससे समाज में व्याप्त असमानता, अन्याय व शोषण को दूर किया जा सके। समाजवादी चिन्तन का दूसरा पक्ष यह था कि आर्थिक विकास के क्षेत्र में राज्य की अधिक से अधिक भूमिका हो।

2. उदारवादी पूँजीवादी सिद्धान्त:
उदारवादी चिन्तक खुली व मार्केट अर्थव्यवस्था का निर्माण करना चाहते थे जिससे राज्य के कम से कम नियन्त्रण व हस्तक्षेप से आर्थिक विकास किया जा सके।

प्रश्न 3.
नियोजित आर्थिक विकास से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
नियोजित आर्थिक विकास का अर्थ है कि आर्थिक विकास के क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियाँ इस प्रकार से की जाए जिनसे निश्चित समय अवधि में निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके। तथा जिससे उपलब्ध श्रोतों का अधिक से अधिक प्रयोग व उपयोग करके उत्तम परिणाम प्राप्त किया जा सके।

प्रश्न 4.
मिश्रित अर्थव्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था होती है जिसमें आर्थिक गतिविधियाँ दोनों क्षेत्रों अर्थात् निजी क्षेत्र व सार्वजनिक क्षेत्र में की जाती है। निजी क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप व नियन्त्रण न्यूनतम होता है व आर्थिक गतिविधियाँ खुली प्रतियोगिता के आधार पर की जाती है। यह पूँजीवादी अर्थव्यवस्था को जन्म देता है। दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र वह क्षेत्र होता है जहाँ पर आर्थिक गतिविधियाँ खुली प्रतियोगिता के आधार पर की जाती है। यह पूँजीवादी अर्थव्यवस्था को जन्म देता है। दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र वह क्षेत्र होता है जहाँ पर आर्थिक गतिविधियों में राज्य का अधिक से अधिक नियन्त्रण व हस्तक्षेप होता है। इसमें लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर चीजों का उत्पादन किया जाता है। भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया था। 1990 तक भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में दबदबा रहा परन्तु 1990 के बाद भारत में निजी क्षेत्र का महत्त्व बढ़ रहा है।

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प्रश्न 5.
योजना आयोग क्या है? इसके प्रमुख कार्य क्या हैं?
उत्तर:
योजना आयोग एक महत्त्वपूर्ण संस्था है जिसका उद्देश्य भारत में नियोजन की क्रिया का संचालन करना है यह एक गैर संवैधानिक संस्था है वह इसका स्वरूप व भूमिका एक परामर्शदाता के रूप में होता है। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं व एक उपाध्यक्ष व कुछ सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। इसके निम्न कार्य हैं –

  1. स्रोतों का मूल्यांकन करना
  2. योजनाओं के लिए प्राथमिकता निश्चित करना
  3. योजनाओं का बीच में मूल्यांकन करना
  4. उद्देश्यों को निश्चित करना
  5. योजनाओं के लिए वजट निश्चित करना
  6. राज्यों की योजनाओं को मंजूरी देना

प्रश्न 6.
प्रथम पंचवर्षीय योजना का मुख्य क्षेत्र क्या था?
उत्तर:
प्रथम पंचवर्षीय योजना का समय 1951 से 1956 का था जिसका निर्माण श्री के. एन. राज ने किया था। क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है इसलिए प्रथम योजना में प्राथमिकता के तौर पर कृषि को महत्व दिया गया। कृषि की स्थिति बहुत खराब थी। जमीन की सिंचाई के साधन उपयुक्त नहीं थे। प्राकृतिक जल पर ही खेती चलती थी। अधिकांश लोग ग्रामों में रहते थे जिनका सम्बन्ध जमीन व कृषि से था। इसलिए इस प्रथम योजना में कृषि विकास को ज्यादा प्राथमिकता दी गई।

प्रश्न 7.
निजी क्षेत्र व सार्वजनिक क्षेत्र में मुख्य अन्तर समझाइए।
उत्तर:
निजी व सार्वजनिक क्षेत्र दोनों को भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई। दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएँ व क्षेत्र हैं। दोनों में निम्न प्रमुख अन्तर हैं।

  1. निजी क्षेत्र उदारवादी पूँजीवादी चिन्तन पर आधारित हैं। जबकि सार्वजनिक क्षेत्र समाजवादी चिन्तन पर आधारित हैं।
  2. निजी क्षेत्र में आर्थिक क्षेत्रों का केन्द्रीकरण होता है जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में श्रोतों का विकेन्द्रीकरण होता है।
  3. निजी क्षेत्र में राज्य की सीमित भूमिका होती है। जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
  4. निजी क्षेत्र में व्यक्तिगत लाभ को महत्व दिया जाता है जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में सर्वहित को महत्व दिया जाता है।
  5. निजी क्षेत्र प्रतियोगिता पर आधारित होता है। जबकि सार्वजनिक क्षेत्र सभी के सहयोग पर आधारित होता है।

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प्रश्न 8.
जमीन सुधार उपायों का क्या उद्देश्य या?
उत्तर:
भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषि मुख्य रूप से जमीन पर आधारित है। आजादी के समय जमीन का प्रबन्ध उचित नहीं था। इसका वितरण व रखरखाव भी ठीक नहीं था जिसके कारण इसका उपयोग भी पूर्ण नहीं होता था जिससे पैदावार भी कम होती थी। आजादी के बाद भारत सरकार ने जमीन सुधार कार्यक्रम के तहत जमीन के प्रबन्धन व वितरण को न्यायोचित बनाने के लिए विभिन्न उपाय प्रारम्भ किए जिसमें प्रमुख था जमींदारी प्रणाली को समाप्त करना, चकबन्दी करना व जमीन की अधिकतम सीमा पर सीलिंग करना। इस प्रकार से जमीन को उन लोगों को सौंपा जो वास्तव में खेत पर खेती करते थे इस प्रकार से इन उपायों से जमीन की गुणवत्ता बढ़ी व साथ साथ पैदावार भी बढ़ा व हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हुए।

प्रश्न 9.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना की प्राथमिकता क्या थी?
उत्तर:
द्वितीय पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 1956-1962 तक का था। प्रथम पंचवर्षीय योजना के बाद यह महसूस किया गया कि बिना औद्योगिक विकास की रफ्तार को तेज किए बिना भारत की मूल समस्याओं जैसे गरीबी, बेरोजगारी व क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर नहीं किया जा सकता अतः द्वितीय पंचवर्षीय योजना में औद्योगिक विकास को प्राथमिकता दी गई तथा आर्थिक विकास की गतिविधियों को तेज किया गया। इस योजना में भारत की अर्थव्यवस्था में रचनात्मक व संगठनात्मक. परिवर्तन किए गए।

प्रश्न 10.
गाँधीवादी अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ समझाइए।
उत्तर:
जहाँ एक तरफ भारत में भारतीय अर्थव्यवस्था की समाजवादी चिन्तन व उदारवादी चिन्तन के आधार पर बनाने वाले लोग एक वर्ग गाँधीवादियों का था जो भारतीय अर्थव्यवस्था को गाँधीवादी सिद्धान्तों पर बनाना चाहता था इसमें प्रमुख रूप से जे.सी. कुमारप्पा व चौधरी चरण सिंह के नाम लिए जा सकते हैं। गाँधीवादी चिन्ता व सिद्धान्त की निम्न विशेषताएँ हैं –

  1. कृषि विकास पर अधिक जोर।
  2. ग्राम विकास को प्राथमिकता देने वाली नियोजन प्रक्रिया।
  3. छोटे व लघु उद्योगों का विकास।
  4. सादा जीवन।
  5. आत्मनिर्भरता।
  6. अपने श्रोतों में ही जीना।

प्रश्न 11.
भारत में आजादी के बाद पहले दो दशकों में आर्थिक विकास की कौन-सी नीति अपनाई गई और क्यों?
उत्तर:
यद्यपि भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया लेकिन आर्थिक विकास के क्षेत्र में भारत में अधिक जोर सार्वजनिक क्षेत्र में रहा जिसके कारण अधिकांश आर्थिक गतिविधियाँ राज्य के नियन्त्रण में की गई। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि भारत में संविधान की भावना के अनुरूप भारतीय अर्थव्यवस्था को समाजवादी सिद्धान्तों के आधार बनाना था ताकि वर्षों से चल रही गरीबी, बेरोजगारी सामाजिक व आर्थिक असमानताओं को दूर किया जा सके। इस कारण इन दर्शकों में निजी क्षेत्र को सीमित भूमिका दी गई।

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प्रश्न 12.
समाजवादी विचारधारा के आधार पर आर्थिक नीतियों के मुख्य परिणाम समझाइए।
उत्तर:
भारत में समाजवादी विचारधारा अधिक लोकप्रिय रही जिसके आधार पर आर्थिक नीतियाँ बनाई गई। इसकी निम्न प्रमुख सफलताएँ हैं –

  1. नियोजित आर्थिक विकास राज्य के नियन्त्रण व निर्देशन में चला।
  2. समाज में व्याप्त सामाजिक व आर्थिक असमानताओं को दूर किया गया।
  3. गरीब वर्ग का जीवन स्तर उठाया गया।
  4. सामाजिक न्याय को प्राप्त करने का प्रयास किया गया।
  5. सामन्तवादी व पूँजीवादी प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण लगा।
  6. समाजवादी चिन्तन पर प्रजातन्त्र का विकास हुआ।

प्रश्न 13.
हरित क्रान्ति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भारत में 1960 के दशक में अनाज व अन्य खाद्यान्न का गम्भीर संकट था। खाद्यान्न अभाव के कारण अमेरिका से पी.एल. 480 के तहत अनाज आयात करना पड़ा। खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से कुछ एक अन्य राज्यों में जहाँ स्रोत उपलब्ध थे विज्ञान व तकनीकी का प्रयोग कर उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग करके अनाज की पैदावार बढ़ाने का प्रयास किया इसमें रासायनिक खाद व दवाइयों का भी प्रयोग किया। इस प्रकार से अनाज पैदावार में बढ़ोत्तरी को हरित क्रान्ति कहा गया। इसका लाभ केवल उन विकसित राज्यों तक ही सीमित रहा जो पहले से ही समृद्ध थे। जैसे पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश। हरित क्रान्ति के पीछे डा. एम.एस. स्वामीनाथन का विचार एक प्रेरणा थी।

प्रश्न 14.
भारत में खाद्य संकट के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
भारत को 1960 के दशक में खाद्य संकट से गुजरना पड़ा इसका एक प्रमुख कारण यह था किस अन्न की पैदावार व जनसंख्या वृद्धि में बड़ा अन्तर था। जमीन का बड़ा भाग खेती के लिए उपयुक्त नहीं था। उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश, व बिहार सबसे ज्यादा प्रभावित थे।

इस संकट के प्रमुख कारण निम्न थे –

  1. खाद्य पैदावार व जनसंख्या वृद्धि में बड़ा अन्तर
  2. 1965 व 1962 के युद्धों का प्रभाव
  3. प्राकृतिक संकट
  4. विदेशी मुद्रा का संकट
  5. भूमि का अन्याय संगत बँटवारा
  6. सिंचाई के साधनों का अभाव

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प्रश्न 15.
हरित क्रान्ति की मुख्य उपलब्धियाँ समझाइए।
उत्तर:
हरित क्रान्ति भारत में उस समय जबकि भारत एक बड़े खाद्य संकट से गुजर रहा था। हरित क्रान्ति की निम्न उपलब्धियों मान सकते हैं –

  1. खाद्य पैदावार में वृद्धि
  2. कृषि में विज्ञान का प्रयोग
  3. किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ
  4. कृषि का मशीनीकरण किया गया
  5. उन्नत बीज बनाने व रासायनिक खाद्य बनाने वाले कारखाने लगे।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आजादी के बाद आर्थिक विकास के सम्बन्ध में कौन-सी प्रमुख धारणाएँ व विधियाँ थी?
उत्तर:
जब देश आजाद हुआ तो कई प्रकार की सामाजिक व आर्थिक समस्याएँ हमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद की विरासत में मिली, जिनमें प्रमुख रूप से गरीबी, बेरोजगारी व क्षेत्रीय असन्तुलन व अनपढ़ता थी। वास्तव में ये समस्याएँ उस समय के नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौतियाँ थी। विभिन्न स्तरों पर इस पर लम्बी बहस हुई कि इन सामाजिक व आर्थिक समस्याओं को हल करने के लिए विकास का कौन-सा मॉडल अपनाया जाए।

उस समय दुनिया में प्रमुख रूप से दो मॉडल प्रचलित थे, एक तो समाजवादी मॉडल एक पश्चिमी उदारवादी पूँजीवादी मॉडल। यद्यपि भारत में समाजवादी चिन्तन का व्यापक प्रभाव था परन्तु उदारवादी विचारधारा के आधार पर स्वतंत्र अर्थव्यवस्था के समर्थन भी मौजूद थे। कांग्रेस में अनेक नेता यहाँ तक कि पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे भी समाजवादी सिद्धान्तों से प्रभावित थे। कांग्रेस ने स्वयं गुवाहाटी अधिवेशन में समाजवादी सिद्धान्तों को अपनाने का प्रस्ताव पारित किया। संविधान की प्रस्तावना में भी बाद में समाजवाद जोड़ा गया व संविधान में ही चौथे भाग में अर्थात् राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों के अध्याय में समाजवादी सिद्धान्तों के आधार पर अर्थव्यवस्था को बनाने का निर्देश दिया गया है। लेकिन पूँजीवादी विचारकों की भावी मजबूत थी। जिन्होंने अपना दबाव बनाया व भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया।

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प्रश्न 2.
नियोजित आर्थिक विकास की राजनीति से आप क्या समझते हो?
उत्तर:
देश की आजादी के बाद विभिन्न सामाजिक आर्थिक समस्याओं से निपटने के लिए व उपलब्ध स्रोतों का उचित प्रयोग करने के लिए एक निश्चित तकनीकी व विधि की आवश्यकता थी जिस पर विचार करने व निर्णय लेने की प्रक्रिया विभिन्न स्तर पर प्रारम्भ हुई। इसी को ही नियोजित आर्थिक विकास की राजनीति कहते हैं। विभिन्न दृष्टिकोणों व विचारधाराओं के समर्थक अपने-अपने तरीकों से इस बात का प्रयास कर रहे थे कि भारत की समस्याओं का हल उनकी विचारधारा के माध्यम से हो सकता है। विकास का कार्यक्रम जब प्रारम्भ हुआ तो विभिन्न स्तर पर कई प्रकार के विवाद पैदा हो गए। नियोजकों व स्थानीय लोगों में विवाद पैदा हुए। इस प्रकार विकास की प्रक्रिया का राजनीतिकरण हो गया।

प्रश्न 3.
वामपंथी व दक्षिण पंथी राजनीतिक दलों से आप क्या समझते हैं।
उत्तर:
आमतौर से राजनीतिक दलों को उनकी विचारधारा, कार्यविधि व प्राथमिकता के आधार पर तीन भागों में बाँटते हैं –

  1. वामपंथी
  2. दक्षिणपंथी व
  3. केन्द्रपंथी

वामपंथी वे राजनीतिक दल होते हैं जो कि सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक परिवर्तन तेजी से समाज में आमूल परिवर्तन करके लाना चाहते हैं। ये राज्य की भूमिका को सीमित करना चाहते हैं। आमतौर से वामपंथी दल किसान मजदूर व अन्य गरीब वर्गों के हितेशी माने जाते हैं। भारत में साम्यवादी दलों को वामपथी दल कहा जाता है ये उस सरकार का समर्थन करते हैं जो समाज के कमजोर वर्गों के हितों को सुरक्षित करें।

उधर दक्षिणपंथी वे राजनीतिक दल के होते हैं सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में स्थिरता अर्थात् यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं अर्थात् कोई बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन का विरोध करते हैं। ये राजनीतिक दल परम्पराओं में विश्वास करते हैं व पुरानी परम्पराओं को बनाए रखना चाहते हैं। भारतीय जनता पार्टी व शिवसेना, अकाली दल व मुस्लिम लीग को हम दक्षिणपंथी दल मान सकते हैं। इसके अलावा जो राजनीतिक दल बीच का रास्ता अपनाते हैं उनको केन्द्रपंथी कहते हैं। कांग्रेस, जनतादल व अन्य दल केन्द्रपंथी है।

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प्रश्न 4.
समाजवादी समाज से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रमुख विशेषताएँ समझाए।
उत्तर:
एक ऐसा समाज जिसकी सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था को समाजवादी सिद्धान्तों पर बनाया जाता है। अर्थात् समता व न्याय के आधार पर बनाया जाता है उसे समाजवादी समाज कहते हैं। भारतीय संविधान सभा में ही यह निर्णय लिया गया था कि भारत की सामाजिक आर्थिक नीतियाँ समाजवादी सिद्धान्तों पर, निर्धारित की जाएंगी। राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों में समाजवादी सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है। इसकी निम्न प्रमुख विशेषताएँ हैं –

  1. अधिक से अधिक सामाजिक व आर्थिक नीतियाँ सार्वजनिक क्षेत्र में। अर्थात् राज्य को अधिक से अधिक जिम्मेवारी।
  2. सामाजिक आर्थिक समानताएँ व न्याय प्रमुख उद्देश्य।
  3. सामाजिक आर्थिक प्रजातन्त्र का निर्माण करना।
  4. विभिन्न प्रकार की विषमताओं को दूर करना।
  5. पूँजीवादी व सामन्तवादी प्रवृत्तियाँ समाप्त करना।

प्रश्न 5.
विकास से आप क्या समझते हैं? भारत में आर्थिक सामाजिक विकास से जुड़ी अवधारणाओं को समझाइए।
उत्तर:
विकास शब्द का अर्थ अलग-अलग व्यक्तियो के लिए अलग-अलग है। वास्तव में विकास शब्द का अर्थ उपलब्ध स्रोतों का सर्वोत्तम प्रयोग करके अर्थात् स्रोतों का नियोजित वैज्ञानिक व विवेकपूर्ण आधार पर प्रयोग करके एक आधुनिक समाज का निर्माण करना है। विकास शब्द का अर्थ मनुष्य के शारीरिक मानसिक व बौद्धिक विकास से है। विकास शब्द का सम्बन्ध, एक विवेकयुक्त, व आत्मनिर्भर समाज का गठन करना है। विकास समाज की मूल रचना, मूल्य व सोच में सकारात्मक परिवर्तन करता है। विकास का सम्बन्ध परिवर्तन व आधुनिकीकरण से है। भारत में सामाजिक आर्थिक विकास के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार के मॉडल की वकालत की गई थी। प्रथम समाजवादी चिन्तन में आधार पर मॉडल व दूसरा उदारवादी पूँजीवादी मॉडल।

समाजवाद का प्रभाव उन दिनों पूरी दुनिया में था। भारत में समाजवादी चिन्तन के आधार पर समाज का विकास करने के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ थीं। कांग्रेस के अनेक नेता समावादी मॉडल के पक्षधर रहे। प्रारम्भ में भारत में कई दशकों समाजवादी सिद्धान्तों के आधार पर सामाजिक आर्थिक विकास किया गया। परन्तु कुछ लोग उदारवादी पूँजीवादी मॉडल के पक्षधर थे जो राज्य को कम से कम क्षेत्र देकर व्यक्ति को अधिक से अधिक स्वतन्त्रता के पक्षधर रहे। अन्त में भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को भारत के सामाजिक व आर्थिक विकास के लिए अपनाया गया।

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प्रश्न 6.
योजना की प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं? इसका क्या महत्त्व है।
उत्तर:
योजना वह प्रक्रिया है जिसमें संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से अधिक से अधिक उपयोग करके कम से कम समय व खर्च में अधिक से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सके। योजना एक वैज्ञानिक व क्रमबद्ध प्रक्रिया है। इसकी निम्न विशेषता है।

  1. यह एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है।
  2. इसमें निश्चित उद्देश्य तय किया जाता है।
  3. उद्देश्यों व लक्ष्यों को कम से कम समय में प्राप्त कराने की योजना होती है।
  4. योजनाएँ निश्चित समय के लिए निश्चित उद्देश्य तय किए जाते हैं।

प्रश्न 7.
योजना आयोग का गठन व कार्य समझाइए?
उत्तर:
देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत का वैज्ञानिक पद्धति से। विकास करना चाहते थे। भारत की सामाजिक आर्थिक समस्याओं को क्रमबद्ध तरीके से हल करना चाहते थे। वे सोवियत संघ की योजना प्रक्रिया से अत्यन्त प्रभावित थे। अतः उन्होंने भारत में नियोजन की प्रक्रिया प्रारम्भ की। नियोजन की प्रक्रिया का संचालन करने के लिए उन्होंने 1950 में योजना आयोग का गठन किया। योजना आयोग का एक उपाध्यक्ष होता है। जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। इसके अलावा योजना आयोग के कई सरकारी व गैर सरकारी सदस्य होते हैं। कुछ मन्त्री इसके पदेन सदस्य होते हैं। भारत का प्रधानमंत्री योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष होता है। योजना आयोग का स्वरूप एक सलाहकार संस्था के रूप में होता है।

योजना आयोग का कार्य –

  1. पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण करना।
  2. स्रोतों का अवलोकन करना।
  3. योजनाओं की प्राथमिकता निश्चित करना।
  4. योजनाओं के लक्ष्यों को प्राप्त करना।
  5. योजनाओं के बीच में प्रगति प्राप्त करना व मूल्यांकन करना।
  6. योजना की प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं को दूर करना।
  7. विभिन्न प्रकार की सलाह प्रदान करना।

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प्रश्न 8.
मिश्रित अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ समझाइए।
उत्तर:
भारत में आजादी के बाद दो प्रकार की विचारधाराओं के आधार पर भारत के आर्थिक विकास के लिए प्रतियोगिता व बहस जारी थी। समाजवादी चिन्तन के लोग अधिक गतिविधियाँ सार्वजनिक क्षेत्र में चाहते थे जबकि उदारवादी चिन्तक पूँजीवाद के विस्तार के पक्षधर थे। इस विवाद को समाप्त करने के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया। मिश्रित अर्थव्यवस्था की निम्न विशेषताएँ हैं।

  1. आर्थिक गतिविधियाँ दोनों क्षेत्रों में चलाए जाने की व्यवस्था अर्थात् निजी क्षेत्र व: सार्वजनिक क्षेत्र में भी थी।
  2. निजी क्षेत्र भी सरकार की नीतियों का नियमों के तहत ही काम करता है।
  3. दोनों ही क्षेत्रों को विकसित करने के अवसर।
  4. राज्य की ही अन्तिम जिम्मेदारी सामाजिक व आर्थिक विकास की होती है।

प्रश्न 9.
प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रमुख क्षेत्र क्या था?
उत्तर:
प्रथम पंचवर्षीय योजना का समय 1951 से 1956 तक का था। इस समय देश की आर्थिक दशा ठीक नहीं थी। खाद्य के क्षेत्र में अत्यधिक अभाव था। देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार खेती को ही माना जाता था। देश का अधिकांश भाग ग्रामों में था जो कि खेती पर निर्भर रहते थे अत: कृषि के विकास को ही प्रथम पंचवर्षीय योजना में प्राथमिकता मिली। प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रमुख निर्माताओं में श्री के.एन.राज एक थे। उनका मानना था कि प्रारम्भिक दशकों में आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी ही रखनी चाहिए क्योंकि तेज रफ्तार से आर्थिक विकास को नुकसान होगा। इसी योजना में बाँध निर्माण और सिंचाई के क्षेत्र में निवेश किया गया।

कृषि को ही भारत में विभाजन का सबसे अधिक खामयाजा उठाना पड़ा था। भाखड़ा नांगल जैसी विशाल परियोजनाओं के लिए बड़ी धन राशि निश्चित की गई थी। इन सभी का उद्देश्य सिंचाई के साधन बढ़ाकर कृषि के क्षेत्र में पैदावार बढ़ाना था क्योंकि अभी तक अनाज पैदावार व जनसंख्या वृद्धि में एक बड़ा अन्तर था। कृषि पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर करती है। अतः इस स्थिति में प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि विकास पर प्राथमिकता देना आवश्यक था व उचित भी था। इस योजना में ही जमीन सुधार जैसे कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए व अधिक से अधिक जमीन को कृषि के लिए तैयार किया गया।

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प्रश्न 10.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना का प्रमुख प्राथमिकता का क्षेत्र क्या था?
उत्तर:
द्वितीय पंचवर्षीय योजना का समय 1956-1961 तक का था। इसके निर्माता श्री पी. सी. महालनोबिस थे। इस योजना का प्राथमिक क्षेत्र औद्योगिक विकास था। पहली योजना का मूलतंत्र था धीरज परन्तु द्वितीय पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य तेज गति से संरचनात्मक बदलाव करने की थी। यद्यपि प्रथम पंचवर्षीय योजना में खाद्य पूर्ति के लिए कृषि विकास को आवश्यक समझा गया था परन्तु द्वितीय पंचवर्षीय योजना में गरीबी व बेरोजगारी को दूर करने के लिए औद्योगिक विकास को जरूरी समझा गया अत: इसे प्राथमिक स्थान दिया गया। रोजगार को ही लोगों के जीवन स्तर को उठाने के लिए आवश्यक समझा गया। औद्योगीकरण पर दिए गए इस बल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को एक नया आयाम दिया।

प्रश्न 11.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना के आधार पर किए गए औद्योगीकरण में प्रारम्भिक वर्षों में कौन-कौन-सी प्रमुख समस्याएँ सामने आयी?
उत्तर:
द्वितीय पंचवर्षीय योजना में गरीबी व बेरोजगारी जैसी प्रमुख समस्याओं को दूर करने के उद्देश्य से औद्योगिक विकास पर जोर दिया गया जबकि प्रथम योजना कृषि विकास को प्रथमिकता मिली थी। औद्योगीकरण की प्रक्रिया के प्रारम्भिक चरणों में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा। क्योंकि भारत प्रौद्योगिकी की दृष्टि से पिछड़ा हुआ था। अत: विश्व बाजार से तकनीकी खरीदने के लिए अपनी बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी।

इसके अतिरिक्त उद्योगों ने कृषि की अपेक्षा निवेश को अधिक आकर्षित किया। क्योंकि इस योजना में कृषि को उचित प्राथमिकता नहीं मिल पायी। अत: खाद्यान्न संकट बढ़ गया। भारत में योजनाकारों को उद्योग व कृषि के बीच सन्तुलन साधने में भारी कठिनाई आई। इसके अलावा औद्योगीकरण की नीति के सम्बन्ध में भी योजनाकारों व अन्य विशेषज्ञों में मतभेद था। कुछ लोग कृषि से जुड़े उद्योगों के पक्ष में थे व अन्य भारत में विकास के लिए भारी उद्योगों की स्थापना के पक्ष में थे। इसके अलावा औद्योगीकरण की नीति को लागू करने में भी स्थानीय लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। अनेक सामाजिक संगठनों व वातावरण बचाओ अभियान से जुड़े लोगों ने भी भारी औद्योगीकरण का विरोध किया।

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प्रश्न 12.
भारत में समाजवादी व्यवस्था निर्माण की प्रमुख विशेषाएँ समझाइए।
उत्तर:
1950 के दशक में समाजवादी विचारधारा का पूरी दुनिया की तरह भारत में भी इसका प्रभाव पड़ा भारत की प्रमुख सामाजिक व आर्थिक समस्याओं का हल समाजवादी चिन्तन के माध्यम से देखा गया। अतः भारत के नेतृत्व ने भारत को एक समाजवादी व्यवस्था के आधार पर निर्माण करने का निर्णय लिया जिसके आधार पर सरकारों को निर्देश दिए गए कि वे सामाजिक आर्थिक नीतियाँ समाजवादी सिद्धान्तों के आधार पर बनाएँ। इसकी प्रमुख निम्न विशेषताएँ हैं।

  1. पैदावार व वितरण के साधनों पर सामूहिक नेतृत्व।
  2. असमानताओं व अन्याय को समाप्त करना।
  3. सामाजिक व आर्थिक न्याय प्राप्त करना।
  4. राज्य की मुख्य भूमिका।
  5. सार्वजनिक क्षेत्र का विकास।

प्रश्न 13.
हरित क्रान्ति का अर्थ व महत्त्व समझाइए।
उत्तर:
भारत में आजादी के बाद से खाद्यान्न संकट चल रहा था। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि कृषि के लिए जमीन का सही उपयोग नहीं चल रहा था। अधिकांश जमीन पर सिंचाई की सुविधा नहीं थी। जमीन का प्रबन्ध भी उचित नहीं था खेती करने का ढंग भी परम्परागत था। प्रथम पंचवर्षीय योजना में हालाँकि खेती को प्राथमिकता दी गई थी परन्तु कृषि उत्पादन में इतनी वृद्धि नहीं हो पायी कि हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएँ।

1970 के दशक में कृषि वैज्ञानिक श्री एम.एस.स्वामीनाथन के विचारों व प्रयासों के आधार पर भारत के उत्तरी राज्यों विशेषकर पंजाब हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पैदावार बढ़ाने के उद्देश्य से कृषि के लिए वैज्ञानिक व तकनीकी का प्रयोग किया गया। नए उपकरण व मशीनों का प्रयोग किया गया। अधिक पैदावार देने वाले उन्नत बीजों का प्रयोग किया। रासायनिक खाद व दवाइयों का प्रयोग कर अनाज पैदावार में अत्यधिक वृद्धि की गई। इस प्रकार से इन नई विधियों व रासायनिक खाद के प्रयोग से पैदावार में हुई वृद्धि को हरित क्रान्ति के नाम से जाना गया। हरित क्रान्ति प्रारम्भ में केवल कुछ विकसित राज्यों तक ही सीमित रही व इसका लाभ भी उच्च किसानों व बड़े जमींदारों को मिला इस कारण से किसानों में भी हरित क्रान्ति के प्रभावों के कारण विशिष्ट वर्ग पैदा हो गया।

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प्रश्न 14.
जमीन सुधार से आप क्या समझते हैं? इसका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
आजादी के बाद कृषि के क्षेत्र में कम पैदावार का सबसे बड़ा कारण यह था कि जमीन का ना तो सही प्रबन्धन था और ना ही इसका समुचित प्रयोग किया जा रहा था। जिसके नाम पर जमीनें थी वे उस पर खेती करते नहीं थे व जो वास्तव में खेती करते थे उनके नाम जमीन नहीं होती थी। दूसरा कारण यह था कि जमीन का उचित प्रयोग भी नहीं हो पाता था इन सभी को दूर करने के लिए भारत में आजादी के बाद जमीन सुधार कार्यक्रम चलाया गया जिसके तहत जमीन की चकबन्दी की गई। जमींदारी प्रणाली को समाप्त किया गया जो अपने आप में एक बड़ा कदम था। इसके अलावा जमीन पर सीलिंग लगा कर यह निश्चित किया गया कि एक नाम पर अधिक से अधिक कितनी जमीन हो सकती है। इस प्रकार से कृषि के क्षेत्र में सम्बन्ध बदले व जमीन की उपयोगिता भी बढ़ी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत में नियोजित विकास की राजनीति समझाइए।
उत्तर:
भारत एक कल्याणकारी राज्य है। लोगों के जन कल्याण के लिए श्रोतों का समुचित प्रयोग व आर्थिक विकास का लक्ष्य प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक था। इसके लिए भारत में नियोजन की प्रक्रिया का आरम्भ किया गया। 1950 में योजना आयोग का गठन किया गया व 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार की गई।

प्रथम पंचवर्षीय योजना में कार्य को प्राथमिकता दी गई क्योंकि कृषि ही भारत की सबसे प्रमुख पूँजी है व भारत की अधिकांश जनता कृषि पर ही निर्भर करती है। अतः ग्रामीण विकास भारत समाज के सामाजिक व आर्थिक विकास के लिए आवश्यक समझा गया। नियोजन की प्रक्रिया जो पंडित जवाहर लाल नेहरू के कुशल निर्देशन में प्रारम्भ हुई, राजनीतिकरण व विवादों के घेरे से नहीं बच पायी। इस सम्बन्ध में जो प्रमुख विवाद सामने आए वो निम्न प्रकार के थे।

1. वैचारिक विवाद-सबसे प्रमुख विवाद नियोजन के सम्बन्ध में अपनाई जाने वाली विचारधारा के सम्बन्ध में उत्पन्न हुआ जो समाजवादी चिन्तक थे वे चाहते थे कि आर्थिक गतिविधियाँ सार्वजनिक क्षेत्र में दी जाए जिनके संचालन में राज्य की अधिक से अधिक भूमिका हो। सार्वजनिक क्षेत्र में ही अधिक निवेश हो। परन्तु दूसरी ओर उदारवादी चिन्तक इस बात पर जोर देते थे कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को विकसित करने के लिए अधिक से अधिक भूमिका व महत्व निजी क्षेत्र के विकास को दिया जाए।

2. कृषि बनाम उद्योग-आर्थिक नियोजन के क्षेत्र में इसका प्रमुख विवाद कृषि बनाम उद्योग से सम्बन्धित था। दूसरी पंचवर्षीय योजना में जब उद्योगों के विकास को प्राथमिकता दी गई अनेक गाँधीवादी नेताओं व विचारकों ने विरोध किया कि कृषि विकास की कीमत पर उद्योग विकास करना ग्रामीण क्षेत्र के लिए हानिकारक रहेगा क्योंकि देश के अधिकतम लोग खेती पर अर्थात् कृषि पर निर्भर करते हैं। अतः भारी उद्योग देश के हित में नहीं है।

3. सार्वजनिक क्षेत्र बनाम निजी क्षेत्र-भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाने पर तो समझौता हो गया परन्तु इसके दोनों क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी जिससे एक विवाद को जन्म मिला।

4. ग्रामीण क्षेत्र बनाम शहरी क्षेत्र-नियोजन की राजनीति के संदर्भ में ही ग्रामीण क्षेत्र व शहरी क्षेत्र की भावनाओं को जन्म मिला।

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प्रश्न 2.
मिश्रित अर्थव्यवस्था से आप क्या समझते हैं? सार्वजनिक क्षेत्र की सफलता व असफलता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
ऐसी अर्थव्यवस्था जहाँ पर आर्थिक गतिविधियाँ निजी क्षेत्र व सार्वजनिक क्षेत्र दोनों में की जाती है, उसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं। भारत में एक लम्बी बहस के बाद यह निश्चित किया गया कि भारत के सामाजिक व आर्थिक विकास में निजी क्षेत्र व सार्वजनिक क्षेत्र दोनों को ही अपनी अपनी भूमिका निभाने देना चाहिए। अत: भारत एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है। सार्वजनिक क्षेत्र समाजवादी चिन्तन पर कार्य करता है। जबकि निजीक्षेत्र उदारवादी चिन्तन पर कार्य करता है। भारत में अधिकांश महत्त्वपूर्ण आर्थिक गतिविधियाँ सार्वजनिक क्षेत्र में हैं।

पहले कुछ दशकों में सार्वजनिक क्षेत्र में बहुत उत्साह से कार्य हुआ परन्तु इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों से कोई अधिक लाभ नहीं हुआ। पहले दशकों में सार्वजनिक क्षेत्र ने स्टील उत्पादन, बीज उत्पादन, तेल उत्पादन, खाद उत्पादन, दवाइयों के उत्पादन व सीमेंट उत्पादन में अच्छे परिणाम दिए परन्तु इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र में कई प्रकार के दोष पैदा हो गए जिससे इसके परिणाम पर ही नकारात्मक प्रभाव पड़ा बल्कि निजी क्षेत्र को विकसित होने का अवसर भी प्राप्त हुआ। इस सबके परिणामस्वरूप 1990 के बाद निजीकरण, उदारीकरण व वैश्वीकरण के प्रभाव में सार्वजनिक क्षेत्र का महत्व काफी घट गयीं।

सार्वजनिक क्षेत्र के दोष –

  1. निष्क्रियता।
  2. लाल फीताशाही।
  3. उपक्रम का आभाव।
  4. भ्रष्टाचार।
  5. पैदावार में गिरावट।
  6. सरकारीकरण का माहौल।
  7. जिम्मेवारी व जवाबदेही का अभाव।

सार्वजनिक क्षेत्र में उपरोक्त दोष होने के कारण सार्वजनिक क्षेत्र का महत्त्व घट गया। सरकार को भी अपनी नीति में परिवर्तन करना पड़ा। कई महत्वपूर्ण अनुसंधान बंद किए गए व इन गतिविधियों को निजी क्षेत्र में लाया गया। आज ऐसी स्थिति है कि सार्वजनिक क्षेत्र में चलने वाली महत्वपूर्ण गतिविधियाँ जैसे, यातायात, संचार व्यवस्था, बीमा, बैंकिंग, उड्यान को भी निजी क्षेत्र में दे दिया गया है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में सही का चुनाव कीजिए।

प्रश्न 1.
किस देश से भारत में योजना की प्रक्रिया की प्रेरणा ली गई?
(अ) अमेरिका
(ब) सोवियत संघ
(स) चीन
(द) जापान
उत्तर:
(ब) सोवियत संघ

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प्रश्न 2.
किस वर्ष में योजना आयोग का गठन किया गया?
(अ) 1950
(ब) 1952
(स) 1948
(द) 1955
उत्तर:
(अ) 1950

प्रश्न 3.
प्रथम पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल क्या था?
(अ) 1956-1961
(ब) 1951-1956
(स) 1950-1955
(द) 1948-1953
उत्तर:
(ब) 1951-1956

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प्रश्न 4.
द्वितीय योजना की प्राथमिकता का विषय क्या था?
(अ) कृषि
(ब) उद्योग
(स) टूरिज्म
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) उद्योग

II. मिलान वाले प्रश्न एवं उनके उत्तर

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति Part - 2 img 2
उत्तर:
(1) – (स)
(2) – (द)
(3) – (य)
(4) – (ब)
(5) – (अ)

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 9 वैश्वीकरण

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 9 वैश्वीकरण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 9 वैश्वीकरण

Bihar Board Class 12 Political Science वैश्वीकरण Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण के बारे में कौन-सा कथन सही है?
(क) वैश्वीकरण सिर्फ आर्थिक परिघटना है।
(ख) वैश्वीकरण की शुरुआत 1991 में हुई।
(ग) वैश्वीकरण और पश्चिमीकरण समान है।
(घ) वैश्वीकरण एक बहुआयामी परिघटना है।
उत्तर:
(घ) वैश्वीकरण एक बहुआयामी परिघटना है।

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प्रश्न 2.
वैश्वीकरण के प्रभाव के बारे में कौन-सा कथन सही है?
(क) विभिन्न देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव विषम रहा है।
(ख) सभी देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव सामान रहा है।
(ग) वैश्वीकरण का असर सिर्फ राजनैतिक दायरे तक सीमित है।
(घ) वैश्वीकरण से अनिवार्यतया सांस्कृतिक समरूपता आती है।
उत्तर:
(घ) वैश्वीकरण से अनिवार्यतया सांस्कृतिक समरूपता आती है।

प्रश्न 3.
वैश्वीकरण के कारणों के बारे में कौन-सा कथन सही है?
(क) वैश्वीकरण का एक महत्त्वपूर्ण कारण प्रौद्योगिकी है।
(ख) जनता का एक खास समुदाय वैश्वीकरण का कारण है।
(ग) वैश्वीकरण का जन्म संयुक्त राज्य अमरीका में हुआ।
(घ) वैश्वीकरण का एक मात्र कारण आर्थिक धरातलत पर पारस्परिक निर्भरता है।
उत्तर:
(क) वैश्वीकरण का एक महत्त्वपूर्ण कारण प्रौद्योगिकी है।

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प्रश्न 4.
वैश्वीकरण के बारे में कौन सा कथन सही है?
(क) वैश्वीकरण का संबंध सिर्फ वस्तुओं की आवाजाही से है।
(ख) वैश्वीकरण में मूल्यों का संघर्ष नहीं होता।
(ग) वैश्वीकरण के अंग के रूप में सेवाओं का महत्त्व गौण है।
(घ) वैश्वीकरण का संबंध विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव से है।
उत्तर:
(घ) वैश्वीकरण का संबंध विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव से है।

प्रश्न 5.
वैश्वीकरण के बारे में कौन-सा कथन गलत है?
(क) वैश्वीकरण के समर्थकों का तर्क है कि इससे आर्थिक समृद्धि बढ़ेगी।
(ख) वैश्वीकरण के आलोचकों का तर्क है कि इससे आर्थिक असमानता और ज्यादा बढ़ेगी।
(ग) वैश्वीकरण के पैरोपकारों का तर्क है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी।
(घ) वैश्वीकरण के आलोचकों का तर्क है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी।
उत्तर:
(घ) वैश्वीकरण के आलोचकों का तर्क है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी।

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प्रश्न 6.
विश्वव्यापी ‘पारस्परिक जुड़ाव’ क्या है? इसके कौन-कौन से घटक है?
उत्तर:
विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव:
इसका अर्थ है विश्व के विभिन्न देशों और लोगों का एक-दूसरे के निकट आना। वस्तुतः इस प्रक्रिया के कारण वैश्वीकरण का जन्म हुआ। आधुनिक युग में विभिन्न देशों की बढ़ती हुई आवश्यकताओं ने एक-दूसरे से संबंध स्थापित करने के लिए विवश कर दिया है।

विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव के चार घटक है –

  1. विश्व के एक हिस्से के विचारों का दूसरे हिस्से में पहुंचना।
  2. पूंजी का एक से अधिक जगहों पर जाना।
  3. वस्तुओं का कई-कई देशों में पहुंचना।
  4. वस्तुओं का व्यापार तथार बेहतर आजीविका की तलाश में विश्व के विभिन्न भागों में लोगों की आवाजाही।

प्रश्न 7.
वैश्वीकरण में प्रौद्योगिकी का क्या योगदान है?
उत्तर:
वैश्वीकरण में प्रौद्योगिकी की योगदान –

  1. यद्यपि वैश्वीकरण के विकास में अनेक कारकों का योगदान है, परंतु प्रौद्योगिकी इन सबसे महत्त्वपूर्ण है। प्रौद्योगिकी के विकास से जीवन के सभी क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया।
  2. टेलीफोन, टेलीग्राफ और माइक्रोचिप के नवीनतम् अविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार की क्रांति आ गयी।
  3. आरंभ में मुद्रण (छपाई) के आविष्कार से राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिला।
  4. प्रौद्योगिकी का प्रभाव सोचने के तरीकों पर भी हुआ है। आज हम विश्व परिप्रेक्ष्य में सोचते हैं।
  5. विचार, पूंजी, वस्तु और लोगों को विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही की आसानी प्रौद्योगिकी में हुई तरक्की के कारण हुई।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण के सन्दर्भ में विकासशील देशों में राज्य की बदलती भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
उत्तर:
वैश्वीकरण के सन्दर्भ में विकासशील देशों में राज्य की बदलती भूमिकाः
वैश्वीकरण के सन्दर्भ में विकासशील देशों में राज्य की बदलती भूमिका के विषय में विभिन्न विचार हैं। यहाँ तीन आधारों पर अध्ययन कर सकते है:

1. राज्य की क्षमता में कमी:
कुछ लोगों का विचार है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता पर प्रभाव पड़ा है। उसकी कार्य करने की क्षमता में कमी आई है। संपूर्ण विश्व में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा समाप्त सी हो गई है। राज्य का कार्य सीमित हो गया है। उसका कार्य केवल कानून व्यवस्था एवं सुरक्षा रखना रह गया है। वह अनेक सामाजिक एवं आर्थिक कार्यों से मुक्त हो गया है। विश्व में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के फैलाव के कारण सरकारों का निर्णय लेने का कार्य संकुचित हो गया है।

2. राज्य की भूमिका अपरिवर्तनीयः
कुछ अन्य लोगों का विचार है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य की भूमिका में कोई परिवर्तन नहीं आया है। राजनीतिक समुदाय के रूप में उसकी प्रधानता कायम है और उसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों में भी राज्य अपना मुख्य कार्य कानून व्यवस्था तथा राष्ट्रीय सुरक्षा का कार्य कर रहा है। वह कोई कार्य अपनी इच्छा के विरुद्ध नहीं करता है।

3. राज्य की शक्ति में वृद्धिः
कुछ राजनीतिज्ञों का कथन है कि वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की शक्ति में वृद्धि हुई है। इसके कारण राज्यों को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी प्राप्त है। इसके द्वारा राज्य अपने नागरिकों के विषय में सूचनाएं एकत्र कर सकता है और व्यवस्थित ढंग से सेवा कर सकता है।

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प्रश्न 9.
वैश्वीकरण की आर्थिक परिणतियां क्या हुई है? इस सन्दर्भ में वैश्वीकरण ने भारत पर कैसे प्रभाव डाला है?
उत्तर:
वैश्वीकरण की आर्थिक परिणतियाँ:
लाभ के रूप में:

  1. आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया में विश्व के विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह तेज हो जाता है।
  2. आर्थिक प्रवाह में वस्तुओं, पूँजी और विचारों का प्रवाह होता है।
  3. इसके कारण वस्तुओं के व्यापार को फायदा हुआ है।
  4. आर्थिक प्रतिबंध समाप्त होने के अनेक धनी देश विकासशील देशों में निवेश कर रहे हैं जिससे अधिक फायदा हो सके।
  5. वैश्वीकरण से इंटरनेट और कम्प्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार हुआ है।

हानि के अर्थ में –

  1. विकसित देशों का विकासशील देशों पर प्रवाह बढ़ रहा है।
  2. धनी और विकसित राष्ट्र संरक्षण की नीति अपनायी है और अपने देश में विकासशील राष्ट्र के लोगों और व्यापार को घुसने देना नहीं चाहते।
  3. वैश्वीकरण वस्तुतः पश्चिम की नीति है।

वैश्वीकरण का भारत का प्रभाव:
यद्यपि भारत में वैश्वीकरण का स्वरूप पहले से है परंतु 1991 में इसमें तीव्रता आ गयी है। इसके कारण भारत की वित्तीय स्थिति में सुधार आया है और आर्थिक वृद्धि दर बढ़ी है। विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में विदेशी निवेश और व्यापार को बढ़ावा मिला है।

प्रश्न 10.
क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि वैश्वीकरण से सांस्कृतिक विभिन्नता बढ़ रही है।
उत्तर:
यह सर्वथा सही है कि वैश्वीकरण से सांस्कृतिक विभिन्नता को बढ़ावा मिला है जो निम्नलिखित हैं:

  1. वैश्वीकरण का प्रभाव हमारे रहन-सहन, वेशभूषा, खान-पान और विचारों पर पड़ा है।
  2. अब हमारी पसंद वैश्वीकरण से निर्धारित होती है। इससे यह भय बना हुआ है कि इससे संस्कृति को भी खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  3. वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता लाने का प्रयास करता है। ऐसे में संस्कृति में परिवर्तन सुनिश्चत है।
  4. विश्व संस्कृति के नाम पर विभिन्न देशों में पश्चिमी संस्कृति थोपने का प्रयास किया जा रहा है।
  5. लोगों का मानना है कि वैश्वीकरण के अंतर्गत विभिन्न संस्कृतियाँ अब अपने को अमरीकी ढरें पर ढालने में लगी हैं। इसमें विश्व की समृद्ध संस्कृतियाँ समाप्त हो रही हैं।

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प्रश्न 11.
वैश्वीकरण ने भारत को कैसे प्रभावित किया है और भारत कैसे वैश्वीकरण को प्रभावित कर रहा है।
उत्तर:
वैश्वीकरण का भारत पर प्रभाव:

  1. भारत में 1991 से वैश्वीकरण तेज हो गया है।
  2. इसके कारण भारत की वित्तीय स्थिति में सुधार हो रहा है।
  3. भारत की आर्थिक वृद्धि दर में बढ़ोत्तरी हुई है।
  4. भारत में विदेशी निवेश बढ़ रहा है।
  5. भारत में विदेशी व्यापार भी बढ़ा है।

भारत का वैश्वीकरण पर प्रभाव:

(क) भारत में विशेष रूप से वामपंथी विचारों के लोग इसका पुरजोर विरोध कर रहे है। इसके विरोध के लिए इंडियन सोशल मंच बनाया गया है।
(ख) औद्योगिक मजदूर और किसान संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों का विरोध किया है।
(ग) कुछ वस्तुओं यथा नीम के पेटेंट कराने यूरोपीय और अमरीकी प्रयास का विरोध किया गया है।
(घ) दक्षिणपंथी की सांस्कृतिक प्रभावों का विरोध कर रहा है।

Bihar Board Class 12 Political Science वैश्वीकरण Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण क्या है?
उत्तर:

  1. एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण का बुनियादी अर्थ-‘प्रवाह’ है। प्रवाह कई प्रकार के हो सकते हैं।
  2. विश्व के एक हिस्से के विचारों का दूसरे हिस्सों में पहुंचना, पूंजी का एक से अधिक जगहों पर जाना, वस्तुओं का कई कई देशों में पहुंचना, व्यापार तथा बेहतर आजीविका की तलाश में विश्व के विभिन्न हिस्सो में लोगों की आवाजाही प्रवाह है।

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प्रश्न 2.
क्या वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है?
उत्तर:

  1. वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है और इसके अनेक आयाम राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हो सकते हैं।
  2. वैश्वीकरण कोई एक परिघटना यथा-राजनीतिक, आर्थिक या सांस्कृतिक नहीं कहा जा सकता । इसका प्रभाव विषम होता है।

प्रश्न 3.
संचार साधनों के कारण वैश्वीकरण को कैसे बढ़ावा मिला?
उत्तर:

  1. प्रौद्योगिकी के विकास से अनेक साधनों टेलीफोन, टेलीग्राफ और माइक्रोचिप के आविष्कार हुए। इनके कारण संचार की क्रांति दिखाई देती है।
  2. संचार साधनों से लोग को आपसी संबंध बढ़ गया। इसके माध्यम से पूंजी, विचार, वस्तुओं और लोगों की आवाजाही में पर्याप्त उन्नति हुई। इस प्रकार वैश्वीकरण को बढ़ावा मिला।

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प्रश्न 4.
क्या वैश्वीकरण के कारण कल्याणकारी राज्य के स्वरूप में अंतर आया है?
उत्तर:

  1. वैश्वीकरण का कल्याणकारी राज्य के स्वरूप पर बुरा असर पड़ा है। अब यह अवधारणा पुरानी पड़ गई है और इसका स्थान न्यूनतम हस्तक्षेपकारी ने ले लिया है।
  2. इसके कार्य सीमित हो गये है। यह कानून और व्यवस्था तथा नागरिकों की सुरक्षा का कार्य करता है। सामाजिक और आर्थिक कल्याण का कार्य समाप्त हो गया है।

प्रश्न 5.
बहुराष्ट्रीय निगमों ने सरकारों को कैसे प्रभावित किया है?
उत्तर:

  1. वैश्वीकरण के विकास में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बहुत अधिक योगदान है। ये कम्पनियां सभी देशों में अपने पांव पसार चुकी हैं।
  2. विभिन्न देशों में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गयी हैं। फलस्वरूप सरकार स्वयं कोई निर्णय नहीं ले पा रही हैं। अर्थात् सरकारों के निर्णय लेने की क्षमता में कमी आई है।

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प्रश्न 6.
क्या वैश्वीकरण से राज्य की ताकत में इजाफा हुआ है?
उत्तर:

  1. कुछ लोगों का मानना है कि वैश्वीकरण से राज्य की ताकत में इजाफा हुआ है। अब राज्य के अंतर्गत उच्च कोटि की प्रौद्योगिकी मौजूद है।
  2. प्रौद्योगिकी के माध्यम से राज्य अपने नागरिकों के विषय में अधिक सूचनायें एकत्र कर सकता है। इस सूचना के आधार पर राज्य अधिक व्यवस्थित ढंग से काम कर सकता है। इससे उनकी क्षमता बढ़ी है। स्पष्ट है कि राज्य ताकतवर हो गया है।

प्रश्न 7.
आर्थिक वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. आर्थिक वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें विश्व के विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह तेज हो जाता है अर्थात् उनके बीच पूंजी और व्यापार की आवाजाही तेज हो जाती है।
  2. कुछ आर्थिक प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं जबकि कुछ अंतराष्ट्रीय संस्थाओं और ताकतवर देशों द्वारा जबर्दस्ती लादे जाते हैं।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण के चलते व्यापारिक गतिविधियों में क्या वृद्धि हई है?
उत्तर:

  1. विभिन्न देशों ने आयात होने वाली वस्तुओं पर से लगभग सभी प्रतिबंध समाप्त कर दिये हैं। इसलिए व्यापार तेज हो गया है। प्रारंभ में संरक्षणवाद की नीति के अंतर्गत यह संभव नहीं था।
  2. विश्व के विभिन्न देशों में पूंजी निवेश की छूट मिल गयी है। अब कुछ ही प्रतिबंध हैं। ऐसे में विभिन्न देश आपस में निवेश व्यपार की बढ़ावा दे रहे हैं।

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प्रश्न 9.
आर्थिक वैश्वीकरण की हानियां बताइए।
उत्तर:

  1. आर्थिक वैश्वीकरण के कारक संपूर्ण जनमत कई भागों में विभाजित हो गया है और विचारों में अंतर आ गया है।
  2. सरकारें अपनी जिम्मेदारी महसूस नहीं कर रही हैं और इससे सामाजिक न्याय को भारी धक्का लगा है। आर्थिक कल्याण के लिए सरकार पर निर्भर रहने वाले लोगों की स्थिति बदतर हो जायेगी।

प्रश्न 10.
आर्थिक वैश्वीकरण को पुनः उपनिवेशीकरण क्यों कहा जाता है?
उत्तर:

  1. लोगों का विचार है कि आर्थिक वैश्वीकरण के सामाजिक सुरक्षा कवच का अभाव है। लोगों का अनुमान है कि इससे धनी देशों और धनी लोगों को ही लाभ होगा, उनकी आमदनी बढ़ सकती है परंतु गरीब देशों और गरीब को फायदा नहीं होगा। ऐसे में उनकी स्थिति बदतर हो जायेगी उनके आवास का क्षेत्र उपनिवेश बन जायेगा।
  2. उपनिवेशीकरण के अंतर्गत शक्तिशाली देश कमजोर राष्ट्रों पर अधिकार कर लेता था और उनके संसाधनों का उपयोग करता था और स्थानीय लोगों की स्थिति खराब होती थी। इस प्रकार की स्थिति वैश्वीकरण के कारण भी होने वाली है।

प्रश्न 11.
‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ क्या है?
उत्तर:

  1. यह वह प्रक्रिया है जिसमें कोई राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपना प्रभाव छोड़ती है और विश्व वैसा ही दिखाई देता है जैसा शक्तिशाली संस्कृति इसे बनाना चाहती है।
  2. इसके समर्थक लोगों का मानना है कि विभिन्न संस्कृतियों अब अपने को प्रभुत्वशाली अमरीकी ढरें पर ढालने लगी हैं। इससे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे समाप्त हो रही है और संपूर्ण मानवता के लिए खतरा उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 12.
वैश्वीकरण के सकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव बताइए।
उत्तर:

  1. वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभाव के साथ सकारात्मक प्रभाव भी होते हैं। वैश्वीकरण के अंतर्गत बाहरी प्रभावों से पसंद-नापसंद का क्षेत्र बढ़ता है।
  2. परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना भी संस्कृति में सुधार हो सकता है उदाहरण के लिए बर्गर, डोसा आदि का यदि कोई विकल्प नहीं है, इसलिए बर्गर से वस्तुत: कोई खतरा नहीं है। इससे भोजन की पसंदीदा वस्तुओं में एक चीज और शामिल हो जाती है।

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प्रश्न 13.
सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:

  1. अधिकांश का मानना है कि वैश्वीकरण से विश्व के विभिन्न देशों में सांस्कृतिक समरूपता आती है, परंतु इसके विपरीत प्रक्रिया भी हो सकती है।
  2. वैश्वीकरण में प्रत्येक संस्कृतिक कहीं अधिक अलग और विशिष्ट होती जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।

प्रश्न 14.
ब्रिटीश शासनकाल में भारत की आयात-निर्यात की क्या स्थिति थी? इसका क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:

  1. ब्रिटीश शासनकाल में भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक था तथा बने बनाये समानों का आयातक देश था।
  2. इसके कारण भारत की आर्थिक स्थिति दिनों दिन खराब होती गई। अंग्रेज सस्ते दरों पर आधारभूत वस्तुएं और कच्चे माल खरीदते थे और मंहगे दामों पर भारत में ही बेचते थे।

प्रश्न 15.
भारत के संरक्षणवाद के क्या परिणाम रहे?
उत्तर:

  1. ब्रिटिश शासनकाल में भारत अनेक वस्तुओं का आयात करता था जिससे उसे पर्याप्त आर्थिक घाटा होता था। इसलिए उसने संरक्षणवाद को बढ़ावा दिया।
  2. संरक्षणवाद के अंतर्गत विदेशों से वस्तुओं के आयात पर रोक लगा दी। यह सोचा गया कि अधिक से अधिक उपयोग की वस्तुओं को देश में ही बनाया जाये।
  3. इससे कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त उन्नति हुई। परंतु क्षेत्रों यथा स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा में आशातीत सफलता नहीं मिली और आर्थिक वृद्धि दर भी धीमी रही।

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प्रश्न 16.
सिएटल बैठक का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. 1999 में सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री स्तरीय बैठक हुई जिसमें वैश्वीकरण पर विस्तृत चर्चा हुई।
  2. इसके विरोध में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। आर्थिक रूप से शक्तिशाली देशों द्वारा व्यापार के असंगत तौर-तरीकों के अपनाने के विरोध में प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया जा रहा है।

प्रश्न 17.
वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF) का क्या कार्य है?
उत्तर:

  1. वर्ल्ड सोशल फोरम नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध के लिए एक विश्वव्यापी मंच है।
  2. इस मंच में मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता शामिल है। ये सभी नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रौद्योगिकी वैश्वीकरण का एक महत्वपूर्ण कारण है, विवेचना कीजिए।
उत्तर:

  1. यद्यपि वैश्वीकरण के विकास में अनेक कारकों का योगदान है, परन्तु प्रौद्योगिकी इन सबसे महत्त्वपूर्ण है। प्रौद्योगिकी के विकास से जीवन के सभी क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है।
  2. विचार, पूंजी, वस्तु और लोगों को विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही की सुविधा प्रौद्योगिकी में हुई तरक्की के कारण हुई।
  3. टेलीफोन, टेलीग्राफ और माइक्रोचिप के नवीनतम् आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार की क्रांति आ गई।
  4. प्रौद्योगिकी प्रभाव सोचने के तरीके पर भी हुआ है। आज हम सब कुछ विश्व परिप्रेक्ष्य में सोचते हैं।

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प्रश्न 2.
वास्तविक जीवन से संबंधित वैश्वीकरण के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वास्तविक जीवन से संबंधित वैश्वीकरण के उदाहरण –

  1. पश्चिमी वेशभूषा ध परण करने वाली कॉलेजों की छात्राओं को एक उग्रवादी संगठन ने धमकी दे दी।
  2. फसल के मारे जाने से कुछ कृषकों ने आत्महत्या कर ली। इन किसानों ने एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी से मंहगे बीज खरीदते थे।
  3. यूरोप स्थित एक बड़ी और अपनी प्रतियोगी कंपनी को एक भारतीय कंपनी ने खरीद लिया। खरीदी गई कंपनी का स्वामी उसका विरोध कर रहा था।
  4. भारतीय खुदरा दुकानदारों को यह भय है कि अगर कुछ बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों ने देश में खुदरा दुकाने खोल ली तो उनकी बिक्री बंद हो जायेगी।
  5. हालीवुड में बनी एक फिल्म की नकल मुंबई फिल्म निर्माता ने की। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि वैश्वीकरण के अनेक रूप हैं।

प्रश्न 3.
एक कल्याणकारी राज्य में किन-किन विशेषताओं का होना जरूरी है। भारत को एक कल्याणकारी राज्य कहना कहां तक उपयुक्त है?
उत्तर:
कल्याणकारी राज्य की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं –
1. लोक कल्याण (Public Welfare):
लोक कल्याण नागरिकों का अधिकार है-राज्य लोक कल्याण के कार्य इसलिए नहीं करता है कि उसे समाज में गरीबी दूर करनी है वरन् इसलिए करता है कि जनता की भलाई राज्य का कर्तव्य है। राज्य का ध्येय लोक कल्याण होना चाहिए।

2. आर्थिक सुरक्षा (Economic Security):
लोक कल्याणकारी राज्य आर्थिक- सुरक्षा की व्यवस्था करता है। यह सभी व्यक्तियों को रोजगार, न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी तथा अधिकतम समानता की स्थापना करता है। वह नागरिकों के भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा तथा बेकारी व बीमारी के समय सुरक्षा की व्यवस्था करता है।

भारत एक कल्याणकारी राज्य है। भारत के संविधान में इस बात पर पूर्ण बल दिया गया है। इसके लोक-कल्याणकारी होने के तीन उदाहरण निम्न प्रकार से है:

(क) भारत राज्य जनगणना, भू-सर्वेक्षण, मौसम की जानकारी आदि इकट्ठी करता है। पर्यावरण के संरक्षण पर भी ध्यान रखता है। इस प्रकार वह लोक कल्याण के कार्यों को संरक्षण प्रदान करता है। वह उद्योगों को इस प्रकार नियंत्रित करता है कि उससे जन-स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

(ख) भारत सरकार का नीति निर्देशक सिद्धांतों को क्रियान्वित करके नागरिकों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर रही है। न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी, जवाहर रोजगार योजना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (कम मूल्य पर अनाज उपलब्ध कराना), आदि कार्यक्रमों से सरकारी सहायता दी जा रही है।

(ग) भारत सरकार उद्देश्य जन-कल्याणकारी है। उसके द्वारा किए गए महत्त्वपूर्ण कार्यों का स्वरूप लोकहित है। जैसे राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के मानसिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास में सहयोग दें।

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प्रश्न 4.
क्या वैश्वीकरण से राज्य की शक्ति में बढ़ोत्तरी हुई है?
उत्तर:
वैश्वीकरण से राज्य की शक्ति में बढ़ोत्तरी:
1. अनेक लोग मानते हैं कि वैश्वीकरण से राज्य की ताकत में कमी आयी है परंतु ऐसी बात नहीं है। राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को कोई चुनौती नहीं मिली है और राज्य इस अर्थ में आज भी प्रमुख है।

2. विभिन्न देशों के मध्य ईर्ष्या और प्रतिद्वन्द्विता के होते हुए भी राज्य अपना मुख्य कार्य-कानून और व्यवस्था तथा राष्ट्रीय सुरक्षा का कार्य कर रहे है। वह कोई कार्य अपनी इच्छा के विरुद्ध नहीं करते।

3. कुछ लोगों का मानना है कि वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की शक्ति में वृद्धि हुई है। इसके कारण राज्यों को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी प्राप्त है। इसके द्वारा राज्य अपने नागरिकों के विषय में सूचनायें एकत्र कर सकता है और व्यवस्थित ढंग से सेवा कर सकता है। इस प्रकार राज्य की क्षमता में वृद्धि हुई है।

प्रश्न 5.
वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभावों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभाव:

  1. आर्थिक वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें विश्व के विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह तेज हो जाता है। कुछ आर्थिक प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं जबकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और शक्तिशाली देशों द्वारा थोपे जाते हैं।
  2. आर्थिक प्रवाह में वस्तुओं, पूंजी और विचारों का प्रवाह होता है। वैश्वीकरण के कारण वस्तुओं के व्यापार को लाभ हुआ है।
  3. वस्तुतः वैश्वीकरण के प्रभाव से पूंजी और वस्तुओं के आयात पर विभिन्न देशों द्वारा प्रतिबंध समाप्त कर दिये गये हैं। इसलिए धनी देश अपना निवेश किसी अन्य देश या विशेष रूप से विकासशील देशों में कर सकते हैं, जहां उन्हें अधिक लाभ हो सकता है।
  4. विचारों की दृष्टि से राष्ट्र की सीमा बाधक नहीं है। इसलिए इंटरनेट और कम्प्यूटर से. जुड़ी सेवाओं को विस्तार हुआ है।
  5. विकसित देशों ने विकासशील देशों के लिए संरक्षण नीति अपना ली है।

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प्रश्न 6.
वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभावों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभाव:

  1. वैश्वीकरण का जनमत पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है और वह पर्याप्त सीमा तक विभाजित हुआ है।
  2. वैश्वीकरण से सरकार के उत्तरदायित्व में कमी आई है जिससे सामाजिक न्याय को भारी झटका लगा है।
  3. सामाजिक न्याय के समर्थक लोगों का कहना है कि आर्थिक वैश्वीकरण से आबादी के एक छोटे से भाग को लाभ होगा।
  4. नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई आदि सुविधा प्राप्त करने के लिए सरकार पर आश्रित रहने वाले लोगों की स्थिति खराब हो जायेगी।
  5. वैश्वीकरण में सामाजिक सुरक्षा के अभाव के कारण विश्व के कई भागों में आंदोलन हुए हैं और अकेले सुरक्षा कवच को अपर्याप्त मानते हैं।

प्रश्न 7.
वैश्वीकरण के लाभदायक पक्षों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण के लाभदायक पक्ष:

  1. आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं के समर्थकों का कहना है कि इससे समृद्धि बढ़ती है और खुलेपन के कारण अधिक से अधिक आबादी की खुशहाली बढ़ती है।
  2. इससे व्यापार का विकास होता है। फलस्वरूप प्रत्येक देश को अपने को बेहतर करने का अवसर मिलता है।
  3. वैश्वीकरण के समर्थकों का कहना है कि आर्थिक वैश्वीकरण अपरिहार्य है और इसको अवरुद्ध करना इतिहास से धारा को रोकना होगा।
  4. मध्यमार्गी समर्थकों का विचार है कि वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की है और चैतन्य होकर पूरी बुद्धिमानी से इसका सामना किया जाना चाहिए।
  5. वस्तुतः देशों और नागरिकों का विभिन्न जरूरतों के कारण पारस्परिक निर्भरता में वृद्धि हो रही है। ऐसे में वैश्वीकरण आवश्यक हो जाती है।

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प्रश्न 8.
सांस्कृतिक वैश्वीकरण के हानिकारक पक्ष की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सांस्कृतिक वैश्वीकरण के हानिकारक पक्ष:

  1. इसका प्रभाव हमारे रहन-सहन, वेशभूषा, खान-पान और विचारों पर भी दिखाई देता है।
  2. अब हमारी पसंद भी वैश्वीकरण से निर्धारित होती है इस प्रकार पूरा भय बना हुआ है कि इससे संस्कृति को भी खतरा हो सकता है।
  3. वस्तुत: सांस्कृतिक वैश्वीकरण संस्कृतियों में समरूपता लाने का प्रयास करता है। ऐसे में संस्कृति में परिवर्तन सुनिश्चित हैं।
  4. वास्तव में विश्व संस्कृति के नाम पर विभिन्न देशों में पश्चिमी संस्कृति थोपने का प्रयास किया जा रहा है।
  5. अमरीकी वर्चस्व बढ़ता जा रहा है और अमरीकी वस्तुओं का प्रचलन बढ़ाया जा रहा है। जिससे लोग गहराई तक प्रभावित हो सके।

प्रश्न 9.
सांस्कृतिक वैश्वीकरण के लाभ बताइए।
उत्तर:
सांस्कृतिक वैश्वीकरण के लाभ: वैश्वीकरण का सांस्कृतिक प्रभाव केवल नकारात्मक ही नहीं है बल्कि इसका सकारात्मक प्रभाव भी है:

  1. बाहरी संस्कृति से हमारी पसंदगी में कमी आती है परंतु जरूरी नहीं है।
  2. इनसे परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति में सुधार होता है। यदि बर्गर, डोसा, मसाला डोसा के कोई विकल्प नहीं है तो इससे कोई खतरा नहीं है बल्कि इससे हमारी खाने वाली वस्तुओं की पसंद में एक चीज और शामिल हो जाती है।
  3. वैश्वीकरण से संस्कृतियों के मिश्रण से संस्कृति में विशिष्टता आती है। उदाहरण के लिए नीली जींस के उपर खादी कुर्ता पहना जा रहा है। एक अजूबापन और देखने को मिल रहा है कि इस वेशभूषा को पश्चिमी देशों में भी पसंद किया जा रहा है। अमरीका में भी यह संभव है।
  4. वैश्वीकरण से प्रत्येक संस्कृति अधिक अलग और विशिष्ट होती जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।

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प्रश्न 10.
भारत में 1991 के बाद वैश्वीकरण के क्षेत्र में क्या कार्य किया गया?
उत्तर:
भारत में 1991 के बाद वैश्वीकरण के क्षेत्र में कार्य:

  1. भारत में 1991 में भारी वित्तीय संकट आया था। इससे उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊंची दर प्राप्त करने की इच्छा से भारत में आर्थिक सुधारों की योजना शुरू हुई।
  2. इसके अंतर्गत आयात के विभिन्न क्षेत्रों से अनेक प्रतिबंध हटाये गये।
  3. व्यापार में खुलेपन की नीति अपनाई गई और विदेशी निवेश को निमंत्रित किया गया।
  4. वैश्वीकरण का लाभ निचले तबके तक पहुंचाने का निश्चय का निश्चय किया गया।

प्रश्न 11.
वैश्वीकरण के प्रति वामपंथी एवं दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञों की राय बताइए।
उत्तर:
वैश्वीकरण के प्रति वामपंथी एवं दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञों की राय:

  1. वामपंथी राजनीतिज्ञों का विचार है कि मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूंजीवाद की एक विशेष व्यवस्था है जो समृद्ध लोगों को अधिक धनी और गरीब लोगों को अधिक गरीब बनाती है।
  2. वैश्वीकरण से राज्य के अधिकारों में कमी आती है इसलिए वह गरीब लोगों की रक्षा करने में सक्षम नहीं होगा।
  3. दक्षिणपंथी लोग वैश्वीकरण के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभावों से बहुत चिंतित हैं। उनका मानना है कि इससे निश्चित रूप से राज्य कमजोर हो जायेगा।
  4. वे चाहते है कि कुछ क्षेत्रों में आर्थिक निर्भरता और संरक्षणवाद कायम रहना चाहिए।
  5. वे मानते है कि परंपरागत संस्कृति भी अस्त व्यस्त हो जायेगी। लोग अपने जीवन मूल्यों को भूल जायेंगे और रीति रिवाज इतिहास के पन्नों में दफन हो जायेंगे।

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प्रश्न 12.
1999 में सिएटल में किस बात को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ?
उत्तर:
1999 में सिएटल में विरोध प्रदर्शन के कारण –

  1. 1999 में सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री स्तरीय बैठक हुई। यहाँ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए।
  2. यह प्रदर्शन आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर तरीकों को अपनाने के विरोध में किया गया।
  3. विरोधियों का अरोप था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों के हितों का ध्यान नहीं रखा गया है।
  4. इस अर्थव्यवस्था में विकसित देश व्यापार आदि के माध्यम से गरीब देशों का शोषण कर रहे हैं।

प्रश्न 13.
वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF) का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम (World Social Forum):

  1. यह एक ऐसा विश्वव्यापी मंच है जो नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करता है।
  2. इस मंच के अंतर्गत मानवाधि कार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता एकत्र होकर वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।
  3. इस मंच की पहली बैठक 2001 में ब्राजील के पोर्टो अलगेरे में हुई।
  4. 2004 में इसकी चौथी बैठक मुंबई में हुई थी।
  5. वर्ल्ड सोशल फोरम की सातवीं बैठक नैरोबी (कीनिया) में जनवरी, 2007 में हुई थी।

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प्रश्न 14.
भारत में वैश्वीकरण के प्रतिरोध का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत में वैश्वीकरण के प्रतिरोध –

  1. भारत के कई क्षेत्रों में वैश्वीकरण का विरोध हो रहा है। विशेषरूप से वामपंथी राजनीतिज्ञ पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
  2. भारत में वैश्वीकरण के विरोध के लिए इंडियन सोशल फोरम मंच बनाया गया।
  3. यहां औद्योगिक मजदूरों और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों का विरोध किया है।
  4. कुछ वस्तुओं (यथा जींस) के पेटेंट कराने के यूरोपीय और अमरीकी प्रयास का विरोध किया गया है।
  5. दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ वैश्वीकरण के प्रभावों का विरोध कर रहा है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1. वैश्वीकरण से क्या अभिप्राय है? उदारीकरण की दिशा में भारत द्वारा अपनी नीति में किए मुख्य परिवर्तनों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण और उदारीकरण की दिशा में भारत द्वारा अपनी नीति में किए गए मुख्य परिवर्तन-पहले की तुलना में आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा भाग अब निजी क्षेत्र के अंतर्गत लाया जा रहा है। इसे निजीकरण (Privatisation) अथवा उदारीकरण (liberalisation) की संज्ञा दी गई है। उदारीकरण के साथ-साथ वैश्वीकरण शब्द का प्रयोग अभी पिछले कुछ वर्षों से ही होने लगा है। वैश्वीकरण से आशय है, ‘व्यापार, पूंजी एवं टेक्नालॉजी के प्रवाहों के माध्यम से घरेलू अर्थव्यवस्था का शेष संसार के साथ एकीकरण एवं समन्वयन।

भारत में वैसे तो अस्सी के दशक से ही वैश्वीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी, किन्तु 1991 में आर्थिक सुधारों को अपनाने के बाद से तो यह प्रक्रिया काफी तेज हो गई। विश्व व्यापार का वैश्वीकरण संगठन (WTO) की सदस्यता स्वीकार कर लेने के बाद तो भारतीय अर्थव्यवस्था खुलकर ही सामने आ गया। उसके बाद से देश के विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी निवेश टेक्नालॉजी का प्रवाह बढ़ता गया। बहुराष्ट्रीय कंपनिया भी भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से पांव पसारने लगी हैं। सरकार ने अनेक वस्तुओं के आयातों पर से मात्रात्मक प्रतिबंध हटा लिए है और सीमा शुल्क (Customs) की दरें भी कम कर दी हैं।

वैश्वीकरण की नीति को लागू करने के लिए भारत को बहुत से ढांचागत सुधार करने पड़े, जो इस प्रकार हैं:

  1. वर्ष 1991 में नई औद्योगिक नीति लागू की गई जिसके अंतर्गत सुरक्षा और सामाजिक दृष्टि से कुछ संवेदनशील उद्योगों को छोड़कर शेष उद्योगों के लिए लाइसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई।
  2. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment) को बढ़ावा दिया गया है। कुछ क्षेत्रों में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश की इजाजत है, जैसे कि बिजली क्षेत्र और तेल शोधन का क्षेत्र।
  3. विनिवेश (Disinvestment) का कार्यक्रम को प्रोत्साहन दिया गया है अर्थात् अनेक सार्वजनिक उद्योगों को निजी क्षेत्र के अंतर्गत लाया जा रहा है।
  4. श्रम सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण श्रम कानूनों में संशोधन किया गया है ताकि उद्योगपति अलाभप्रद कारखानों को सरकार की अनुमति के बिना भी बंद कर सकें।

यह आशा की जाती है कि वैश्वीकरण की नीति पर चलकर विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 0.5 प्रतिशत से बढ़कर एक प्रतिशत हो जाएगा। भारत से कपड़े व वस्त्र का निर्यात बढ़ सकेगा और विश्व के बाजारों में भारत की कृषि वस्तुओं की भी मांग बढ़ेगी। इसके अतिरिक्त वैश्वीकरण का एक अनुकूल प्रभाव यह भी रहेगा कि भारत विश्व के विकसित देशों की उच्च टेक्नालॉजी प्राप्त कर सकेगा। परंतु परिणाम आशा के विपरीत निकले हैं।

बौद्धिक संपदा अधिकार के समझौते (पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क आदि) भारत के लिए लाभप्रद साबित नहीं हुए। अनिवार्य दवाओं की कीमत में भी वृद्धि हुई और इसका हमारी कृषि पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। बैंकिग, बीमा, दूरसंचार और शिपिंग के क्षेत्र में हमारे लिए विदेशी फर्मों से प्रतियोगिता करना कठिन है। विश्व व्यापार संगठन बनने के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट आई है। कृषि, उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में यह संकट और गहरा होता जा रहा है। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि दुनिया में नई उपनिवेशवादी व्यवस्था जन्म लेती जा रही है और विकासशील देशों की प्रभुसत्ता के लिए संकट खड़ा हो रहा है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में से सही का चुनाव कीजिए।

प्रश्न 1.
कौन वैश्वीकरण से संबंधित नहीं है?
(अ) विश्व के एक हिस्से के विचारों का दूसरे हिस्से में पहुंचना।
(ब) पूंजी का एक से ज्यादा जगहों पर जाना।
(स) व्यापार और आजीविका की तलाश में दूसरे देशों में जाना।
(द) भारत के एक खेत का पौधा दूसरे खेत में स्थानान्तरित करना।
उत्तर:
(द) भारत के एक खेत का पौधा दूसरे खेत में स्थानान्तरित करना।

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प्रश्न 2.
वैश्वीकरण के लिए क्या सही है?
(अ) एक आयामी।
(ब) दो आयामी।
(स) त्री आयामी।
(द) बहु आयामी।
उत्तर:
(द) बहु आयामी।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में क्या सही है?
(अ) वैश्वीकरण केवल एक राजनीतिक घटना है।
(ब) वैश्वीकरण केवल एक आर्थिक घटना है।
(स) वैश्वीकरण केवल एक सांस्कृतिक घटना है।
(द) उपरोक्त सभी घटनायें शामिल हैं।
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी घटनायें शामिल हैं।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन वैश्वीकरण का कारण नहीं है?
(अ) प्रौद्योगिकी
(ब) संचार साधन
(स) खेल
(द) पूंजी
उत्तर:
(स) खेल

प्रश्न 5.
वैश्वीकरण कल्याणकारी राज्य पर क्या असर पड़ा है?
(अ) कल्याणकारी राज्य का अस्तित्व खत्म हो रहा है।
(ब) कल्याणकारी राज्य की उन्नति हुई है।
(स) कल्याणकारी राज्य के अधिकार बढ़ गये हैं।
(द) कल्याणकारी राज्य पर कोई असर नहीं है।
उत्तर:
(द) कल्याणकारी राज्य पर कोई असर नहीं है।

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प्रश्न 6.
बहुराष्ट्रीय निगमों ने सरकारों को कैसे प्रभावित किया है?
(अ) सरकारों के अधिकार बढ़ गये हैं।
(ब) सरकारों के फैसला करने की क्षमता में कमी आई है।
(स) निर्णय करने की शक्ति छीन ली गई है।
(द) कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
उत्तर:
(द) कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।

प्रश्न 7.
आर्थिक वैश्वीकरण में क्या होता है?
(अ) विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह घट जाता है।
(ब) विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह के लिए धन की कमी हो जाती है।
(स) विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह तेज हो जाता है।
(द) विभिन्न देशों के बीच व्यापार शून्य हो जाता है।
उत्तर:
(द) विभिन्न देशों के बीच व्यापार शून्य हो जाता है।

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प्रश्न 8.
विभिन्न देशों में संरक्षण नीति क्यों प्रचलित हैं?
(अ) अपने नागरिक की सुरक्षा के लिए।
(ब) बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए।
(स) अपने उद्योग-धंधों को बचाने के लिए।
(द) बच्चों की सुरक्षा के लिए।
उत्तर:
(द) बच्चों की सुरक्षा के लिए।

प्रश्न 9.
वैश्वीकरण के विरुद्ध होने वाले आंदोलनों की क्या मांग है?
(अ) वैश्वीकरण को रोका जाय।
(ब) उदारीकरण को लागू किया जाय।
(स) वस्तुओं का दाम कम किया जाय।
(द) अमरीका से सहायता ली जाय।
उत्तर:
(द) अमरीका से सहायता ली जाय।

प्रश्न 10.
मैक्डोनाल्डीकरण में क्या हो रहा हैं?
(अ) विभिन्न संस्कृतियां अमरीका का विरोध कर रही हैं।
(ब) विभिन्न संस्कृतियां अब अपने को प्रभुत्वशाली अमरीकी ढरें पर ढालने लगी हैं।
(स) संस्कृतियों की सहायता पश्चिमी देश कर रहे हैं।
(द) संस्कृतियों में समृद्धि आ रही है।
उत्तर:
(द) संस्कृतियों में समृद्धि आ रही है।

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प्रश्न 11.
भारत ने वैश्वीकरण का क्यों अपनाया?
(अ) 1991 में वित्तीय संकट से उबरने के लिए।
(ब) आर्थिक वृद्धि की ऊंची दर प्राप्त करने के लिए।
(स) दूसरे देशों में विनेश के लिए।
(द) वित्तीय संकट से उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊंची दर प्राप्त करने के लिए।
उत्तर:
(द) वित्तीय संकट से उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊंची दर प्राप्त करने के लिए।

प्रश्न 12.
वामपंथी लोग वैश्वीकरण का प्रतिरोध क्यों करते हैं?
(अ) इससे सभी धनी हो जायेंगे।
(ब) इससे सभी गरीब हो जायेंगें।
(स) इससे धनी अधिक धनी और गरीब अधिक गरीब हो जायेंगे।
(द) सभी पूंजीवादी बन जायेंगे।
उत्तर:
(द) सभी पूंजीवादी बन जायेंगे।

II. निम्नलिखित सतंभ (अ) का मिलान स्तंभ (ब) से कीजिए।

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 9 वैश्वीकरण Part - 1 img 1
उत्तर:

1 – (vi)
2 – (viii)
3 – (iv)
4 – (i)
5 – (ii)
6 – (vii)
7 – (iii)
8 – (vii)

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

Bihar Board Class 12 Political Science समकालीन दक्षिण एशिया Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
देशों की पहचान करें: –
(क) राजतंत्र, लोकतंत्र-समर्थक समूहों और आतकंवादियों के बीच संघर्ष के कारण राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बना।
(ख) चारों तरफ भूमि से घिरा देश।
(ग) दक्षिण एशिया का वह देश जिसने सबसे पहले अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया।
(घ) सेना और लोकतंत्र-समर्थक समूहों के बीच संघर्ष में सेना ने लोकतंत्र के ऊपर बाजी मारी।
(ङ) दक्षिण एशिया के केन्द्र में अवस्थित। इन देशों की सीमाएं दक्षिण एशिया के अधि कांश देशों से मिलती हैं।
(च) पहले इस द्वीप में शासन की बागडोर सुल्तान के हाथ में थी। अब यह गणतंत्र है।
(छ) ग्रामीण क्षेत्र में छोटी बचत और सहकारी ऋण को पवस्था के कारण इस देश को गरीबी कम करने में मदद मिली है।
(ज) एक हिमालयी देश जहां संवैधानिक राजतंत्र है। यह देश भी हर तरफ से भूमि से घिरा है।
उत्तर:
(क) नेपाल
(ख) बांग्लादेश
(ग) श्रीलंका
(घ) पाकिस्तान
(ङ) भारत
(च) मालदीव
(छ) चीन
(ज) भूटान

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प्रश्न 2.
दक्षिण एशिया के बारे में कौन-सा कथन गलत है?
(क) दक्षिण एशिया में सिर्फ एक तरह की राजनीतिक प्रणाली चलती है।
(ख) बांग्लादेश और भारत ने नदी-जल की हिस्सेदारी के बारे में एक समझौते पर हस्ताक्षर, किये हैं।
(ग) ‘साफ्ट’ पर हस्ताक्षर इस्लामाबाद के 12वें सार्क सम्मेलन में हुए।
(घ) दक्षिण एशिया की राजनीति में चीन और संयुक्त राज्य अमरीका महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उत्तर:
(क) दक्षिण एशिया में सिर्फ एक तरह की राजनीतिक प्रणाली चलती है।

प्रश्न 3.
पाकिस्तान की लोकतंत्रीकरण में कौन-कौन सी कठिनाइयाँ हैं?
उत्तर:
पाकिस्तान की लोकतंत्रीकरण में कठिनाइयाँ –

  1. यहां सेना, धर्मगुरु और भूस्वामी वर्ग का सामाजिक दबदबा है। इसके कारण कई बार निर्वाचित सरकारों को गिराकर सैनिक शासन स्थापित हुआ।
  2. पाकिस्तान का भारत से तनाव होने के कारण, सेवा समर्थक समूह अधिक मजबूत हैं। वे तर्क देते हैं कि पाकिस्तान के राजनैतिक दलों और लोकतंत्र में खोट हैं इसलिए पाकिस्तान खतरे में पड़ सकता है।
  3. पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शासन चलाने के लिए विशेष अंतर्राष्ट्रीय समर्थन नहीं मिलता। इसलिए सेना हावी होती है।
  4. संयुक्त राज्य अमेरीका तथा पश्चिमी देशों ने स्वार्थवश पाकिस्तान में सैनिक शासन को बढ़ावा दिया।

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प्रश्न 4.
नेपाल के लोग अपने देश में लोकतंत्र को बहाल करने में कैसे सफल हए?
उत्तर:
नेपाल के लोगों द्वारा अपने देश में लोकतंत्र को बहाल करने के तरीके –

  1. प्रारंभ में नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र था। इस दौर में भी राजनीतिक दल और आम जनता स्वतंत्र और उत्तरदायी शासन की आवाज उठाती रही।
  2. लोकतांत्रिक आंदोलनों के फलस्वरूप 1990 में नए लोकतांत्रिक संविधान की मांग को राजा को स्वीकार करना पड़ा परंतु यह केवल 2002 तक चला।
  3. अप्रैल 2006 में देशस्तर पर लोकतंत्र समर्थकों ने भीषण आंदोलन किया, फलस्वरूप राजा ज्ञानेन्द्र ने विवश होकर संसद को बहाल किया।
  4. नेपाल में लोकतंत्र अभी अपने पूर्ण स्वरूप में कार्य नहीं कर रहा है। वहा संविधान सभा के गठन की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। यह संविधान सभा नेपाल का संविधान लिखेगी। कुछ लोगों का कहना है कि अंलकारिक अर्थों में राजा का पद कायम रखना जरूरी है।

प्रश्न 5.
श्रीलंका ने जातीय-संघर्ष में किसकी भूमिका प्रमुख है?
उत्तर:
श्रीलंका के जातीय-संघर्ष में भूमिका:

  1. श्रीलंका के जातीय संघर्ष में उन लोगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है जिसकी मांग है कि श्रीलंका के एक क्षेत्र को अलग राष्ट्र बनाया जाए।
  2. श्रीलंका की राजनीति पर बहुसंख्यक सिंहली समुदाय के हितों का नेतृत्व करने वालों का बोलबाला था। ये लोग भारत से आई तमिल आबादी के खिलाफ थे। वे तमिल लोगों की उपेक्षा करते हैं। फलस्वरूप तमिल राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद हो गई।
  3. उग्र तमिल संगठन लिट्टे का निर्माण हुआ जो श्रीलंकाई सेना के साथ संघर्ष कर रही है।

प्रश्न 6.
भारत और पाकिस्तान के बीच हाल में क्या समझौते हुए?
उत्तर:
भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के समझौते:

  1. भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध के पश्चात् दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने शिमला में एक समझौता किया जिसके अनुसार दोनों देशों की सेनाओं को युद्ध से पूर्व की सीमाओं पर वापस जाने की घोषणा की गई।
  2. इसमें यह भी शर्त रखी गई कि दोनों देशों के बीच डाक-तार सेवा व संचार व्यवस्था चलती रहेगी। आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे की सहायता करेंगे।
  3. 1978 में भारत के विदेश मंत्री पाकिस्तान में वार्ता के लिए गये और बाद में सलाल बांध के संबंध में दोनों देशों में समझौता हुआ।
  4. दोनों देशों के बीच मौजूद बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए सम्मेलनों में नेता बात करते हैं।
  5. पिछले 5 वर्षों के दौरान दोनों देशों के पंजाब वाले हिस्से के बीच कई बस मार्ग खुले हैं। अब वीजा आसानी से मिल जाता है।

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प्रश्न 7.
ऐसे दो मसलों के नाम बताएं जिन पर भारत-बांग्लादेश के बीच आपसी सहयोग है और इस तरह दो ऐसे मसलों के नाम बताएं जिन पर असहमति है।
उत्तर:
भारत-बांग्लादेश के बीच आपसी सहयोग के मसले:

  1. पिछले 10 वर्षों के दौरान दोनों के बीच आर्थिक संबंध अधिक बेहतर हुए है। बांग्लादेश भारत के ‘पूरब चलो’ की नीति का हिस्सा है। इस नीति के अंतर्गत म्यांमार के द्वारा दक्षिण पूर्व एशिया से संपर्क साधने की बात है।
  2. आपदा प्रबंधन और पर्यावरण के मसले पर भी दोनों देशों ने निरंतर सहयोग किया है। भारत-बांग्लादेश के बीच असहमति के मसले:

(क) गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी के जल में हिस्सेदारी पर मतभेद है।
(ख) भारत सेना को पूर्वोत्तर भारत में जाने के लिए अपने क्षेत्र से मार्ग देने में बांग्लादेश सहमत नहीं है।

प्रश्न 8.
दक्षिण एशिया में द्विपक्षीय संबंधों को बाहरी शक्तियों कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
दक्षिण एशिया में द्विपक्षीय संबंधों पर बाहरी शक्तियों का प्रभाव –

  1. चीन और संयुक्त राज्य अमरीका दक्षिण एशिया की राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं और द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करते हैं।
  2. पिछले 10 वर्षों में भारत और चीन के संबंध बेहतर हुए है, परंतु चीन की रणनीति साझेदारी पाकिस्तान के साथ है और यह भारत-चीन संबंधों में एक बड़ी कठिनाई है।
  3. शीतयुद्ध के बाद दक्षिण एशिया में अमरीकी प्रभाव तेजी से बढ़ा है। वह भारत पाक कि बीच लगातार मध्यस्थल की भूमिका निभा रही है।

प्रश्न 9.
दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक सहयोग की राह तैयार करने में दक्षेस (सार्क) की भूमिका और सीमाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें। दक्षिण एशिया की बेहतरी में ‘दक्षेस’ (सार्क) ज्यादा बड़ी भूमिका निभा सके, इसके लिए आप क्या सूझाव देंगें?
उत्तर:
दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक सहयोग की राह तैयार करने में दक्षेस (सार्क) की भूमिका –

  1. दक्षेस के सदस्य देशों ने 2002 में दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार-क्षेत्र समझौते (SAFTA) पर हस्ताक्षर किये हैं। इसमें पूरे दक्षिण एशिया के लिए मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने का वायदा है।
  2. इस समझौते का यह भी लक्ष्य है कि इन देशों के बीच आपसी व्यापार में लगने वाले सीमा शुल्क को 2007 तक 20% कम कर दिया जाए।

दक्षेस की बड़ी भूमिका के लिए सुझाव –

  1. दक्षेस के देशों को आपसी आशंकायें समाप्त करनी चाहिए। ऐसा करने से इन देशों के संसाधनों का उचित विकास हो सकता है।
  2. साफ्ट से इस क्षेत्र के सभी देशों को तभी फायदा होगा जब सभी देश एक-दूसरे को सहयोग देंगे और अपने मतभेद दूर कर लेंगें।

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प्रश्न 10.
दक्षिण एशिया के देश एक-दूसरे पर अविश्वास करते हैं। इससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर यह क्षेत्र एकजुट होकर अपना प्रभाव नहीं जमा पाता। इस कथन की पुष्टि में कोई भी दो उदाहरण दें और दक्षिण एशिया को मजबूत बनाने के लिए उपाये सुझाएँ।
उत्तर:
यह सही है कि दक्षिण एशिया के देश एक-दूसरे पर अविश्वास करते हैं। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर यह क्षेत्र एकजुट होकर अपना प्रभाव नहीं जमा पाता। इसके उदाहरण निम्नलिखित हैं –

  1. भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे पर अविश्वास करते हैं। इसलिए दोनों के परमाणु शक्ति सम्पन्न होने पर भी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इसका कोई प्रभाव नहीं है और अमरीका आये दिन हस्तक्षेप करता है। यदि दोनों एक-दूसरे पर विश्वास करें तो यह हस्तक्षेप और आतंकवादी कार्यवाहिया बंद हो जायेंगी।
  2. दक्षिण एशिया के छोटे देश भारत पर शक करते है कि वह उनकी कमजोरी का लाभ उठा रहा है। भारत नहीं चाहता कि इन देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो। उसे भय लगता है कि ऐसी स्थिति में बाहरी ताकतों को इस क्षेत्र में प्रभाव जमाने में मदद मिलेगी।

दक्षिण एशिया के देशों को मजबूत बनाने के लिए सभी देशों को एक-दूसरे देशों पर विश्वास बढ़ाना होगा और एक-दूसरे का सहयोग करना चाहिए। अपने मतभेदों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर नहीं उछालना चाहिए। उन्हें आपस में एक-दूसरे का आर्थिक सहयोग करना चाहिए ताकि कमजोर देश अपनी आर्थिक कठिनाइयों से उबर सके।

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प्रश्न 11.
दक्षिण एशिया के देश भारत को एक बहुबली समझते हैं जो इस क्षेत्र के छोटे देशों पर अपना दबदबा जमाना चाहता है और उनके अंदरूनी मामलों में दखल देता है। इन देशों की ऐसी सोच के लिए कौन-कौन सी बातें जिम्मेदार हैं?
उत्तर:
इन देशों की ऐसी सोच के लिए निम्नलिखित बातें जिम्मेदार हैं –

  1. भारत का आकार विशाल है और यह शक्तिशाली है। ऐसे में अपेक्षाकृत छोटे देशों का भारत के इरादों को लेकर शंकालु सोच बनाना उचित है।
  2. भारत सरकार प्रायः अनुभव करती है कि उसके पड़ोसी देश उसका गलत लाभ उठा रहे है। भारत नहीं चाहता है कि इन देशों में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो।
  3. भारत को इस बात का डर रहता है कि भारत के हस्तक्षेप करने से बाहरी शक्तियों को इस क्षेत्र में प्रभाव जमाने का अवसर मिल जायेगा।
  4. छोटे देशों को यह आभास रहता है कि भारत दक्षिण एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है।

Bihar Board Class 12 Political Science समकालीन दक्षिण एशिया Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दक्षिण एशिया क्या है?
उत्तर:

  1. यह एक विशिष्ट प्राकृतिक क्षेत्र है जो उत्तर में विशाल हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में हिंद महासागर तक एवं पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में अरब सागर तक फैला हुआ है।
  2. प्रायः इसमें सात देश-बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल हैं।

प्रश्न 2.
समकालीन दक्षिण एशिया विश्व की नजर में क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:

  1. भारत और पाकिस्तान दोनों ने स्वयं को परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की बिरादरी में स्थापित कर लिया हैं।
  2. इस क्षेत्र में कई विवाद और संघर्ष चल रहे हैं। कई देशों के बीच सीमा और नदी जल बंटवारे को लेकर विवाद कायम है। इसके अलावा विद्रोह, जातीय संघर्ष और संसाधनों के विभाजन को लेकर भी संघर्ष हैं। इन कारणों से यह इलाका बहुत अधिक संवेदनशील है।

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प्रश्न 3.
नेपाल में राजनीतिक प्रणाली में क्या परिवर्तन आया है?
उत्तर:

  1. नेपाल एक शुद्ध हिंदू देश है और यहां 2006 तक संवैधानिक राजतंत्र स्थापित था और इस बात का हमेशा खतरा था कि राजा कार्यपालिका की संपूर्ण शक्ति अपने हाथ में ले लेगा।
  2. 2006 में एक सफल विद्रोह के द्वारा लोकतंत्र की बहाली हुई और राजा के अधिकार अति सीमित रहा गये हैं।

प्रश्न 4.
पाकिस्तान के किन नेताओं के काल में पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रणाली थी?
उत्तर:

  1. जुल्फिकार अली भुट्टो
  2. श्रीमति बेनजीर भुट्टो
  3. नवाज शरीफ

प्रश्न 5.
मालदीव की राजनीतिक प्रणाली का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. 1968 तक यहां सुल्तानों का शासन होता था परंतु 1968 में यहां गणतंत्र की स्थापना हुई और यहां शासन की अध्याक्षात्मक प्रणाली अपनायी गई।
  2. 2005 के जून में मालदीव की संसद ने बहुदलीय प्रणाली को अपनाने के पक्ष में एकमत से मतदान किया। 2005 के निर्वाचनों के पश्चात् यहां लोकतंत्र मजबूत हुआ है, क्योंकि इस चुनाव में विपक्षी दलों को कानूनी मान्यता प्रदान कर दी गयी है।

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प्रश्न 6.
बांग्लादेश की स्थापना कैसे हुई?
उत्तर:

  1. पाकिस्तान के जनरल याहिया खान के सैनिक शासन के दौरान 1971 ई० में भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ। युद्ध में पाकिस्तान पराजित हुआ।
  2. युद्ध के परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान टूटकर एक स्वतंत्र देश बना जो बांग्लादेश कहलाया।

प्रश्न 7.
शिमला समझौता कब और कैसे हुआ?
उत्तर:

  1. 1971 ई० में बांग्लादेश की मुक्ति को लेकर भारत और पाकिस्लन में युद्ध हुआ जिसमें पाकिस्तान बुरी तरह पराजित हुआ और अनेक पाकिस्तानी युनगंदी बोगये।
  2. आगे चलकर दोनों देशों के बीच राजनायिक संबंध सामान्य बनाने के लिए पाकिस्तान की पहल पर शिमला में दोनों प्रधानमंत्रियों में (इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो) 2 जुलाई, 1972 को समझौता हुआ। इसी राजनायिक समझौते को शिमला समझौता कहते हैं।

प्रश्न 8.
जनरल परवेज मुशर्रफ किस प्रकार पाकिस्तान के तानाशाह शासक बन गये?
उत्तर:

  1. बेनजीर भुट्टों और नवाज शरीफ की निर्वाचित सरकार 1999 तक कायम रही। 1999 मे पुनः सेना ने हस्तक्षेप किया और जनरल परवेज मुशर्रफ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को हटाकर स्वयं शासक बन बैठे।
  2. 2001 में परवेज मुशर्रफ ने अपना निर्वाचन राष्ट्रपति के रूप में कराया। पाकिस्तान में वर्तमान में नवाज शरीफ का शासन है।

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प्रश्न 9.
पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) के लोग पश्चिमी पाकिस्तान (पाकिस्तान) के क्यों खिलाफ थे?
उत्तर:

  1. पूर्वी पाकिस्तान के लोग पश्चिमी पाकिस्तान के दबदबे और अपने ऊपर उर्दू भाषा को लादने के खिलाफ थे।
  2. पाकिस्तान के निर्माण के तुरंत बाद ही यहां के लोगों ने बंगाली संस्कृति और भाषा के साथ किये जा रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ विरोध जताना शुरू कर दिया।

प्रश्न 10.
बांग्लादेश के संविधान की क्या विशेषता थी?
उत्तर:

  1. बांग्लादेश ने अपने संविधान में स्वयं को धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक तथा समाजवादी देश घोषित किया।
  2. 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान ने संविधान में संशोधन कराया और संसदीय प्रणाली की जगह अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली को मान्यता मिली। उन्होंने अपनी पार्टी आवामी लीग को छोड़कर अन्य सभी पार्टियों को समाप्त कर दिया।

प्रश्न 11.
नेपाल में वर्तमान लोकतंत्र कब और कैसे स्थापित हुआ?
उत्तर:

  1. नेपाल में 2002 में राजा ने संसद को भंग कर लोकतंत्र समाप्त कर दिया था और सरकार को गिरा दिया था।
  2. अप्रैल 2006 में यहां देशव्यापी लोकतंत्र समर्थकों ने बड़े पैमाने पर आंदोलन किये। उनका आंदोलन सफल हुआ और राजा ज्ञानेन्द्र ने विवश होकर संसद को बहाल किया। वस्तुतः यह नेपाल के सात दलों के गठबंधन, माओवादी एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का प्रयास था।

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प्रश्न 12.
दुर्गा थापा क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर:

  1. नेपाल की यह महिला लोकतंत्र समर्थक है। उसने इसे स्थापित करने के लिए काठमांडू में 1990 में एक विशाल रैली निकाली। इसके बाद भी वे लोकतंत्र बहाली के कार्य में लगी रहीं।
  2. अंतत: 2006 में उन्हें सफलता मिली और नेपाल में लोकतांत्रिक शासन स्थापित हुआ। उन्होंने इसके लिए एक विशाल उत्सव का आयोजन किया।

प्रश्न 13.
शांति सेना क्या है। इसे श्रीलंका में सफलता क्यों नहीं मिली?
उत्तर:

  1. 1987 में भारतीय सरकार श्रीलंका के तमिल मसले में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुई। भारत की सरकार ने श्रीलंका से एक समझौता किया तथा श्रीलंका सरकार और तमिलों के बीच संबंध सामान्य करने के लिए एक भारतीय सेना भेजी जो ‘शांति सेना’ कहलायी।
  2. भारतीय सेना लिट्टे के साथ युद्ध में फंस गई। भारतीय सेना की उपस्थिति को श्रीलंका की जनता ने विशेष पसंद नहीं किया। फलस्वरूप :989 में भारत ने अपनी शांति सेना वापस बुला ली।

प्रश्न 14.
श्रीलंका की अर्थव्यवस्था की विशेषतायें बताइए।
उत्तर:

  1. जातीय संघर्ष के बावजूद उसका आर्थिक विकास उच्च स्तर का रहा। उसने विकासशील देशों में सर्वप्रथम जनसंख्या की वृद्धि दर पर नियंत्रण स्थापित किया।
  2. दक्षिण एशिया के देशों में श्रीलंका यह प्रथम देश है जिसने एशिया के देशों में सर्वप्रथम अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया। इस देश का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद दक्षिण एशिया में सबसे ज्यादा है।

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प्रश्न 15.
भारत पाकिस्तान में संघर्ष का कारण क्या है?
उत्तर:

  1. दोनों देशों के संघर्ष का मुख्य कारण कश्मीर है। पाकिस्तान की सरकार का दावा था। कि कश्मीर पाकिस्तान का है। इसको लेकर दोनों देशों के बीच 1947-48 और 1965 में दो बार युद्ध हुए।
  2. 1948 के युद्ध के फलस्वरूप कश्मीर दो भागों में बंट गया। एक हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहलाया जबकि दूसरा हिस्सा भारत का जम्मू कश्मीर प्रान्त बना। दोनों के बीच नियंत्रण रेखा है। 1971 में दोनों के बीच फिर युद्ध हुआ था।

प्रश्न 16.
आई एस आई (ISI) क्या है?
उत्तर:

  1. यह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी है जिसका पूरा नाम इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस (Inter Services Intelligence) है।
  2. इस एजेंसी द्वारा पाकिस्तान भारत की गुप्त बातों की जानकारी प्राप्त करता है। इस पर बांग्लादेश और नेपाल के गुप्त ठिकानों से पूर्वोत्तर भारत में भारत विरोधी अभियानों में संलग्न होने का आरोप है।

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प्रश्न 17.
सिंघु जल संधि क्या है?
उत्तर:

  1. 1960 में विश्व बैंक की सहायता से भारत और पाकिस्तान ने ‘सिंधु जल संधि’ पर हस्ताक्षर किये और यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच कई सैनिक संघर्षों के बावजूद भी कायम है।
  2. संधि होने के बाद भी इसकी व्याख्या और नदी जल के इस्तेमाल को लेकर अभी भी कुछ छोटे विवाद है।

प्रश्न 18.
‘भारत और नेपाल के बीच मधुर संबंध है’ एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
भारत और नेपाल के बीच मधुर संबंध के विरले ही उदाहरण मिलते हैं। दोनों देशों के बीच एक विशेष संधि हुई। इस संधि के अंतर्गत दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे के देश में बिना पासपोर्ट (पार-पत्र) और वीजा के आ जा सकते है और काम कर सकते हैं।

प्रश्न 19.
भारत और मालदीव के संबंधों का खुलासा कीजिए।
उत्तर:

  1. मालदीव के साथ भारत के संबंध सौहार्दपूर्ण तथा गर्मजोशी से भरे हैं। 1988 में श्रीलंका के भाड़े के तमिल सैनिकों ने जब मालदीव पर हमला किया तब मालदीव ने आक्रमण रोकने के लिए भारत से सहायता मांगी तो भारत के वायुसेना और नौसेना ने तुरंत कार्यवाही की।
  2. भारत ने मालदीव के आर्थिक विकास पर्यटन और मत्स्य उद्योग में भी सहायता की है।

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प्रश्न 20.
दक्षेस या सार्क (SAARC) क्या है?
उत्तर:

  1. दक्षेस (South Asian Association for Regional Cooperation) दक्षिण एशियाई देशों द्वारा बहुस्तरीय साधनों से आपस में सहयोग करने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है।
  2. इसका आरंभ 1985 में हुआ। इसके देशों के बीच आपसी मतभेद है। इसलिए इसको अधिक सफलता नहीं मिली है।

प्रश्न 21.
साफ्टा (SAFTA) क्या है?
उत्तर:

  1. दक्षेस के सदस्य देशों ने 2002 में ‘दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र समझौते’ (South Asian Free Trade Area Agreement) पर हस्ताक्षर किये।
  2. इसमें संपूर्ण दक्षिण एशिया के लिए मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने का वायदा है। यदि दक्षिण एशिया के सभी देश इससे सहमत हो जायें तो शांति और सहयोग की एक नई धारा शुरू हो सकती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों में एक सी राजनीतिक प्रणाली नहीं है? विवेचन कीजिए।
उत्तर:
दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों में एक सी राजनीतिक प्रणाली नहीं है जो निम्नलिखित बातों से स्पष्ट है:

  1. अनेक समस्याओं और सीमाओं के बावजूद भारत और श्रीलंका में ब्रिटिश राज्य के पश्चात् लोकतंत्र कायम है।
  2. पाकिस्तान और बांग्लादेश में लोकतांत्रिक और सैनिक दोनों प्रकार के नेताओं का शासन रहा है। शीतयुद्ध के बाद के सालों में बांग्लादेश में लोकतंत्र कायम रहा है। पाकिस्तान में शीतयुद्ध के बाद के वर्षों में लगातार दो लोकतांत्रिक सरकारे बनी। 1999 में यहां सैनिक शासन स्थापित हुआ।
  3. 2006 तक नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र था परंतु 2006 सफल जनविद्रोह के कारण लोकतंत्र की नींव पड़ी।
  4. भूटान में अब भी राजतंत्र है लेकिन यहा के राजा ने भूटान में बहुदलीय लोकतंत्र स्थापित करने की योजना की शुरूआत कर दी है।
  5. मालदीव 1968 तक सल्तनत राज्य था परंतु उसके बाद यह गणतंत्र हो गया और यहां शासन अध्यक्षात्मक प्रणाली अपनायी गयी।

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प्रश्न 2.
दक्षिण एशिया में लोकतंत्र मजबूत है, समीक्षा कीजिए।
उत्तर:

  1. यद्यपि दक्षिण एशिया में लोकतंत्र का रिकॉर्ड मिला जुला रहा है, परंतु यहा की जनता की आकांक्षायें लोकतंत्र से जुड़ी हैं।
  2. इस क्षेत्र के पांच देशों के सर्वेक्षण से ज्ञात होता है कि यहां लोकतंत्र को व्यापक जन-समर्थन प्राप्त है।
  3. इन देशों के आम नागरिक-धनी-गरीब अथवा सभी धर्म के लोगों को लोकतंत्र अच्छा लगता है।
  4. यहां के नागरिकों के शासन की किसी और प्रणाली की अपेक्षा लोकतंत्र को वरीयता देते हैं और मानते हैं कि उनके देश के लिए लोकतंत्र ही ठीक है।

प्रश्न 3.
पाकिस्तान में सैनिक शासन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पाकिस्तान में सैनिक शासन –

  1. पाकिस्तान में संविधान निर्माण के बाद अयूब खान ने सत्ता अपने हाथ में ले ली और शीघ्र ही अपना निर्वाचन भी करा लिया परंतु शीघ्र ही उनके खिलाफ विद्रोह हो गया।
  2. अयूब खान के बाद जनरल याहिया खान ने शासन की बागडोर संभाली। उनके शासन काल में बांग्लादेश का संकट आया।
  3. इसके बाद जुल्फिकार अली भुट्टो की निर्वाचित सरकार ने 1971 से 1977 तक शासन किया। 1977 में जनरल जिया-उल-हक ने इस सरकार को गिरा दिया और उन्होंने 1982 तक शासन किया।
  4. 1982 के बाद लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के बाद बेनजीर भुट्टो और बाद में नवाज शरीफ की सरकार बनी जो 1999 तक कायम रही।
  5. 1999 में एक बार फिर सेना ने हस्तक्षेप किया और जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को हटा दिया। 2001 में परवेज मुशर्रफ ने अपना निर्वाचन राष्ट्रपति के रूप में कराया। अब भी पाकिस्तान में सैनिक शासन जारी है।

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प्रश्न 4.
पाकिस्तान में लोकतंत्र स्थायी न होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
पाकिस्तान में लोकतंत्र स्थायी न होने के कारण –

  1. पाकिस्तान में सेना, धर्मगुरु और भूस्वामी वर्ग का प्रभुत्व है और यह निर्वाचित सरकार को गिरा देता है।
  2. पाकिस्तान का भारत से तनाव के कारण सैनिक शासन को समर्थन मिला है। ऐसे लोगों का कहना है कि राजनैतिक दलों में यह साहस नहीं है कि वे पाकिस्तान की सुरक्षा कायम रख सकें।
  3. पाकिस्तान में लोकतंत्र के सफल न होने का कारण यह भी है कि लोकतंत्र को अंतर्राष्ट्रीय समर्थन का न होना है। इससे सैनिक शासन को बढ़ावा मिला है।
  4. अमरीका और पश्चिमी देशों ने अपने स्वार्थ के अनुसार सैनिक शासन का समर्थन किया है। वस्तुतः ये देश इस्लामी आतंकवाद से भयभीत हैं और उन्हें डर है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार कहीं आतंकवादियों के हाथ न लग जायें, इसलिए वे अपने रक्षक के रूप में पाकिस्तान का समर्थन करते हैं।

प्रश्न 5.
बांग्लादेश की स्थापना में शेख मुजीबुर्रहमान के कार्यों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
बांग्लादेश की स्थापना में शेख मुजीबुर्रहमान के कार्यों का मूल्यांकन:

  • पूर्वी पाकिस्तान में भी पश्चिमी पाकिस्तान का दबदबा था। वहां के लोगों को बंगाली संस्कृति और भाषा को बचाना मुश्किल हो गया था। जनता ने प्रशासन में अपने समुचित प्रतिनिधित्व तथा राजनीतिक सत्ता में समुचित हिस्सेदारी की मांग की और जनसंघर्ष आरंभ कर दिया जिसका नेतृत्व मुजीबुर्रहमान ने किया।
  • उनकी पार्टी आवामी लीग को 1970 के चुनावों में पूर्वी पाकिस्तान की सभी सीटों पर विजय प्राप्त हुई और इस पार्टी को प्रस्तावित संविधान सभा में बहुमत मिल गया परंतु उन्हें सरकार बनाने के लिए नहीं बुलाया गया।
  • जनरल याहिया की सेना ने शेख मुजीब को गिरफ्तार कर लिया और जन आंदोलन को दबाने का प्रयास किया।
  • पूर्वी पाकिस्तान के हजारों लोगों की हत्या हुई और लोग अपना घर छोड़कर भारत में प्रवेश करने लगे। भारत में शरणार्थियों को संभालने की समस्या उत्पन्न हो गयी।
  • भारत ने पूर्वी पाकिस्तान को वित्तीय और सैनिक सहायता दी। 1971 में भारत-पाक युद्ध हुआ। जिसमें पाकिस्तान पराजित हुआ और बांग्लादेश नामक एक नया राष्ट्र बना।

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प्रश्न 6.
बांग्लादेश में सैनिक शासन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बांग्लादेश में सैनिक शासन –

  1. 1975 में शेख मुजीब ने संविधान में संशोधन करके अध्यात्मक शासन प्रणाली लागू की। उन्होंने अपनी पार्टी आवामी लीग के अलावा अन्य सभी पार्टियों को समाप्त कर दिया।
  2. शेख मुजीब के इस कार्य से देश में तनाव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गयी। सेना ने शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या कर दी।
  3. सैनिक शासक जियाऊर्रहमान ने अपनी बांग्लादेश नेशनल पार्टी बनायी और 1979 के चुनाव में विजय रहे। बाद में उनकी हत्या कर दी गयी।
  4. बाद में ले० जनरल एच० इरशाद के नेतृत्व में बांग्लादेश में एक और सैनिक शासक ने बागडोर संभाली। उनके काल में जनविद्रोह जारी रहा। फलस्वरूप 1990 में उन्हें राष्ट्रपति का पद छोड़ना पड़ा। आगे चलकर लोकतंत्र बहाल हुआ।

प्रश्न 7.
नेपाल में राजतंत्र के स्थान पर लोकतंत्र किस प्रकार स्थापित हुआ।
उत्तर:
नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना –

  1. नेपाल में प्रारंभ में वर्षों तक राजतंत्र का शासन चलता रहा। यह राजतंत्र संवैधानिक था। जनता उत्तरदायी शासन की मांग कर रही थी परंतु राजा सेना की सहायता से इन आंदोलनों को दबा देता था।
  2. शीघ्र ही लोकतंत्र समर्थक आंदोलन ने भयंकर रूप धारण कर लिया जिसके आगे राजा को 1990 में झुकना पड़ा और उसे संविधान निर्माण की मांग स्वीकार करनी पड़ी और नेपाल में संसदीय सरकार बनी।
  3. परंतु यह सरकार बहुत दिनों तक काम न कर सकी।
  4. माओवादी, राजा और संसद के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाने लगे। इस प्रकार नेपाल में त्रिकोणीय संघर्ष शुरू हो गया।
  5. 2002 में राजा ने संसद को भंग कर दिया और सरकार को गिरा दिया और इसी के साथ लोकतंत्र का अंत हो गया।
  6. अप्रैल 2006 में यहां देशव्यापी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन हुए। फलस्वरूप राजा ज्ञानेन्द्र ने विवश होकर संसद को बहाल किया। इस प्रकार स्थापित लोकतंत्र आज भी जारी है।

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प्रश्न 8.
श्रीलंका में जातीय संघर्ष के क्या कारण हैं?
उत्तर:
श्रीलंका में जातीय संघर्ष के कारण –

  1. श्रीलंका में जातीय संघर्ष श्रीलंका सरकार और लिट्टे के मध्य है। यह श्रीलंका के एक विशेष भाग को एक अलग राष्ट्र के रूप में मांग कर रहा है।
  2. 1948 (आजादी) के बाद श्रीलंका की राजनीति पर बहुसंख्यक सिंहली समुदाय के हितों का नेतृत्व करने वाला प्रभुत्व थाः वे भारत में आये तमिल आबादी के खिलाफ थे और उन्हें श्रीलंका का नागरिक नहीं मानते थे।
  3. फलस्वरूप तमिल राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद हुई 1983 के बाद से उग्र तमिल संगठन (Leberation Tigers of Tamil Elum) जिन्हें लिट्टे भी कहा जाता था, सेना के साथ संघर्ष कर रहा है।
  4. सिट्टे का श्रीलंका के उत्तर पूर्वी भाग पर कब्जा है। वे भारत-सरकार का भी सहयोग चाहते हैं।

प्रश्न 9.
श्रीलंका के जातीय संघर्ष में भारत की भूमिका बताइए।
उत्तर:
श्रीलंका के जातीय संघर्ष में भारत की भूमिका –

  1. तमिल ईलम (श्रीलंका के तमिल) इस संघर्ष में भारत सरकार का सहयोग चाहते हैं। भारत सरकार ने भी समय-समय पर श्रीलंका सरकार से वार्ता की है।
  2. 1987 में भारत सरकार लिट्टे के मुद्दे पर प्रत्यक्ष रूप से सामने आ गई।
  3. भारत सरकार ने श्रीलंका से एक समझौता किया। लिट्टे और श्रीलंका के बीच सामान्य संबंध स्थापित करने के लिए भारतीय सेना भेजी गई, जिसे शांति सेना’ कहा गया।
  4. श्रीलंका की जनता ने इसे पसंद नहीं किया और भारतीय सेना लिट्टे से युद्ध में फंस गयी।
  5. इस प्रकार शांति सेना को सफलता नहीं मिली और वह 1989 में वापस आ गई।

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प्रश्न 10.
भारत और पाकिस्तान के बीच किन-किन मुद्दों पर मतभेद है।
उत्तर:
भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेद के मुद्दे –

  1. भारत और पाकिस्तान के मध्य मतभेद का प्रमुख कारण कश्मीर है। दो युद्धों और अनेक वार्ताओं के बाद भी यह मतभेद बना हुआ है और दोनों कश्मीर पर अपने दावे करते हैं।
  2. सियाचिन गलेशियर पर नियंत्रण और हथियारों की होड़ के कारण भी दोनों के मध्य तनाव है।
  3. दोनों ने 1998 में एक साथ एक परमाणु परीक्षण किये हैं। दोनों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध की संभावना तो कम है परंतु दोनों की सरकारें एक-दूसरे के प्रति आशंकित हैं।
  4. भारत का आरोप है कि पाकिस्तानी सरकार आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है और आतंकवादियों की धन हथियार और सुरक्षा से मदद कर रही है। उसने खालिस्तान समर्थकों की भी 10 वर्षों से मदद की हैं इसी प्रकार का आरोप पाकिस्तान की सरकार भी लगाती है।
  5. नदी जल बंटवारे को लेकर भी इन दोनों के बीच तनाव है। इसमें सबसे विवादग्रस्त सिंघु नदी के उपयोग का है।

प्रश्न 11.
भारत सरकार बांग्लादेश से क्यों नाखुश है?
उत्तर:
भारत सरकार के बांग्लादेश से नाराज होने के कारण –

  1. भारत में अवैध आप्रवास पर ढाका के खंडन।
  2. भारत-विरोधी इस्लामी कट्टरपंथी जमातों का समर्थन।
  3. भारतीय सेना को भारत में ले जाने के लिए अपने इलाके से रास्ते देने से बांग्लादेश का इंकार।
  4. ढाका के भारत को प्राकृतिक गैस निर्यात न करने के फैसले तथा म्यांमार को बांग्लादेशी इलाके से होकर भारत की प्राकृतिक गैस निर्यात न करने देना।

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प्रश्न 12.
भारत-नेपाल के विभेद को इंगित कीजिए।
उत्तर:
भारत और नेपाल के विभेद-यद्यपि नेपाल भारत का अच्छा मित्र है परंतु उनमें आपस में कुछ विभेद भी हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. चीन और नेपाल में दोस्ती है। इसलिए भारत ने अप्रसन्नता जतायी है।
  2. नेपाल सरकार भारत विरोधी तत्त्वों के खिलाफ कोई सख्त कदम नही उठाती है।
  3. भारत की सुरक्षा एजेंसिया नेपाल में चल रहे नक्सल आंदोलन से चिंतित है, क्योंकि भारत में उत्तर में बिहार से लेकर दक्षिण में आंध्र प्रदेश तक विभिन्न प्रांतों में नक्सलवादी समूहों का उभार हुआ है।
  4. नेपाल के लोग सोचते हैं भारत सरकार नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है और उसके नदी जल तथा पनबिजली पर बगुला दृष्टि लगाये हैं।
  5. नेपाल को यह भी लगता है कि भारत उसको अपने भूक्षेत्र से होकर समुद्र तक पहुंचने से रोकता है।

प्रश्न 13.
भारत के भूटान के साथ संबंधों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
भारत के भूटान के साथ संबंध-भूटान भारत के उत्तर में हिमालय की श्रृंखलाओं में स्थित एक छोटा-सा राज्य है जिसका क्षेत्रफल कुल 4.7 हजार वर्ग किलोमीटर है। 1865 ई० में अंग्रेजों ने इस पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। अंग्रेजी सहयोग से ही 1907 में उस समय के राज्यपाल उग्यान वागचुक ने अपना राजतंत्र स्थापित कर लिया जो वंशानुसार रूप से आज भी जारी हैं 1940 ई० में भारत और भूटान के बीच एक संधि हुई जिसके अनुसान भारत भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा और भूटान अपने विदेशी मामलों में भारत की सलाह के अनुसार कार्य करेगा।

1958 ई० में भारत ने भूटान को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाए जाने की सिफारिश की जो उसे 1971 में प्राप्त हुई। आज भूटान सार्क (SAARC) का एक सदस्य है। भूटान ने कई देशों से अपने राजनीतिक तथा आर्थिक संबंध भी स्थापित कर लिए है। आज भूटान में राजा सरकार तथा राज्य दोनों का अध्यक्ष है और उसे सलाह देने के लिए राष्ट्रीय सभा तथा मंत्रिपरिषद् की व्यवस्था है। भूटान में बौद्ध तथा हिंदू दो बड़ी जातियां है।

भारत ने भूटान के आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है और इसकी सभी योजनाएं भारतीय सहायता से बनी है। बेशक 1971 के बाद भूटान ने दूसरे देशों से भी सहायता लेनी आरंभ कर दी थी। इसके बावजूद आज भी भारतीय सहायता वहां के विकास कार्यों में सबसे अधिक है। भारत से भेजे गए हजारों विशेषज्ञ अधिकारी तथा श्रमिक आज भी भूटान के विकास कार्यों में सहायता प्रदान कर रहे हैं। भारत और भूटान के प्रारंभ से ही बहुत अच्छे आपसी संबंध रहे हैं। आज भी हैं और आगे भी रहने की संभावना है।

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प्रश्न 14.
भारत और बांग्लादेश के संबंध का विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत और बांग्लादेश के संबंध-एक सम्प्रभु राज्य के रूप में बंग्लादेश का उदय 1971 में हुआ। 1947 में पाकिस्तान का निर्माण हुआ तो पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान एक-दूसरे से 1000 मील की दूरी पर थे। पूर्वी पाकिस्तान क्षेत्रफल में पश्चिमी पाकिस्तान से छोटा परंतु जनसंख्या की दृष्टि से बड़ा था। पूर्वी पाकिस्तान के जूट का निर्यात करने से विदेशी मुद्रा प्राप्त होती थी किंतु इससे प्राप्त आय पूर्वी पाकिस्तान के आर्थिक विकास में व्यय नहीं की जाती थी।

बंगला भाषा और बंगला मुस्लिम संस्कृति को गौण बना दिया। पाकिस्तान के दोनों भागों में तनाव रहने लगा। 1970 में शेख मुजीबुर्रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान के लिए आरक्षित 169 सीटों में से 168 सीटें जीत लीं। लेकिन जुल्फीकार अली भुट्टो तथा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी जिसमें पार्टी ने पाकिस्तान में बहुमत हासिल किया था, ने शेख मुजीब की सरकार नहीं बनने दी। करोड़ों शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से भारत आ गए। दिसम्बर 1971 में भारत को पूर्वी पाकिस्तान की जनता के मुक्ति संग्राम के समर्थन में हस्तक्षेप करना पड़ा। परिणामस्वरूप बंग्लादेश का जन्म हुआ। भारत बांग्लादेश संबंधों में गंगा जल बँटवारा, बंग्लादेश की बाढ़ समस्या, चकमा शरणार्थी, बंग्लादेशी घुसपैठिये आदि समस्याएं दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव पैदा करती रहती है।

प्रश्न 15.
शिमला समझौते (1971) में कौन-सी शर्त थीं?
उत्तर:
शिमला समझौते की शर्ते –
शिमला समझौता-1971 के भारत:
पाक युद्ध की समाप्ति के बाद दोनों देशों में 1972 में शिमला समझौता हुआ था। इस समझौते में निम्न तथ्यों पर जोर दिया गया था –

  1. दोनों देश अपने परस्पर विवादों को शांतिपूर्ण उपायों से हल करेंगे।
  2. दोनों देश मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देंगें।
  3. दोनों देश अपने मतभेदों को द्विपक्षीय बातचीत द्वारा दूर करेंगे अथवा उन शांतिपूर्ण उपायों से करेंगे जो दोनों को स्वीकार होगें।
  4. दोनों देश किसी की ऐसी सहायता नहीं करेंगे जिससे दोनों के संबंधों में कटुता आए।
  5. पंचशील के सभी नियमों का दोनों देश सम्मान करेंगे।
  6. यातायात संचार, संस्कृति, विज्ञान आदि में दोनों देश एक-दूसरे की सहायता व आदान प्रदान करेंगे।

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प्रश्न 16.
दक्षेस या सार्क के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर:
दक्षेस या सार्क क मुख्य उद्देश्य दक्षेस या सार्क के चार्टर में उसके निम्नलिखित उद्देश्य बताए गए हैं –

  1. दक्षिणी एशिया के लोगों के कल्याण की कामना करना और उनकी आजीविका स्तर में सुधार लाना।
  2. इस क्षेत्र में अधिक विकास, सामाजिक प्रगति तथा सांस्कृतिक उन्नति को प्राप्त करना और इस क्षेत्र में सभी व्यक्तियों के लिए प्रतिष्ठा के अवसर देना ताकि लोग अपनी सभी क्षमताओं को प्राप्त कर सकें।
  3. दक्षिणी एशिया के देशों में सामूहिक आत्मविश्वास का समर्थन करना तथा उसे बढ़ावा देना।
  4. एक-दूसरे की समस्याओं को पारस्परिक विश्वास और सूझ-बूझ से हल करना।
  5. दक्षेस जैसे उद्देश्यों के हेतु बनी अन्य अन्तर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय संस्थाओं के साथ सहयोग करना।
  6. अन्य विकासशील देशों के साथ सहयोग को बढ़ावा।

प्रश्न 17.
सार्क (SAARC) के कौन-कौन से कार्य हैं?
उत्तर:
सार्क (SAARC) के निम्न कार्य हैं –

  1. सदस्य देशों में जीवन स्तर को सुधार कर जनकल्याण के कार्यक्रम बनाना।
  2. दक्षिणी एशियाई प्रदेश में सामाजिक प्रगति एवं सांस्कृतिक उन्नति करना।
  3. सदस्य देशों में आत्मविश्वास को बढ़ावा देना।
  4. सभी विकासशील देशों के साथ सहयोग बढ़ाना।
  5. सदस्य देशों की समस्याओं को पारस्परिक एवं सूझबूझ के द्वारा सुलझाना।
  6. अन्य अंतर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय संस्थाओं के साथ सहयोग करना।
  7. सदस्य देशों के बीच वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का आदान प्रदान करना।
  8. आतंकवाद और नशीली वस्तुओं की तस्करी पर प्रतिबंध लगाना।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों को किस प्रकार सुधारा जा सकता है?
उत्तर:
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कारण –
1. पाकिस्तान भारत के अभिन्न अंग के रूप में कश्मीर को नहीं स्वीकार करता है। वह कश्मीर के भारत में वैध विलय को नहीं मानता है।

2. सितंबर 1965 में जम्मू कश्मीर के छंब क्षेत्र पर पाकिस्तान ने हमला बोल दिया। ताशकंद समझौते के अनुसार दोनों देशों ने एक-दूसरे के क्षेत्र खाली कर दिए और यह घोषणा भी कि गई कि दोनों देश आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने की कोशिश करेंगे।

3. बांग्लादेश जो उस समय पाकिस्तान का एक अंग था, पाकिस्तान के फौजी डिक्टेटर याह्या खां के जुल्मों का शिकार बना हुआ था। बांग्लादेश के लोगों ने शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में अपनी आजादी की घोषणा कर दी। पाकिस्तान ने मुक्त आंदोलन को बर्बरता से कुचलना चाहा। 1968-70 के दौरान करीब एक करोड़ शरणार्थी बांग्लादेश से भारत आए। 1971 में पाकिस्तान ने भारत के कई हवाई अड्डों पर धावा बोल दिया। भारत-पाक युद्ध सिर्फ दो सप्ताह चला पर वह निर्णायक सिद्ध हुआ। पूर्वी बंगाल स्वतंत्र बांग्लादेश के रूप में उदित हुआ।

शिमला समझौता:
1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता (Shimla Agreement – 1972) हुआ। यह घोषणा की गई कि दोनों देशों की सेनाएं युद्ध से पहले की सीमाओं में लौट जाएंगी तथा दोनों देश आपसी विवादों के निपटारे के लिए शक्ति का इस्तेमाल नहीं करेंगें। शिमला समझौते की दो अन्य शर्ते ये थीं कि –

  1. दोनों देशों के बीच डाक-तार सेवा व संचार व्यवस्था फिर से बहाल की जाएगी, तथा
  2. आर्थिक व सांस्कृतिक क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे को मदद देंगें। 1975 में भारत और पाकिस्तान ने आपस में वस्तुओं का आयात-निर्यात शुरू कर दिया।

पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों को आश्रय (Pakistan’s Support to Terrorism):
पाकिस्तान ने आतंकवादियों को न केवल आश्रय दिया बल्कि प्रशिक्षण भी दिया है। आतंकवादियों की मार्फत पाकिस्तान ने पंजाब और जम्मू कश्मीर में अशांति का दौर पैदा किया और आम लोगों के जान-माल को भारी क्षति पहुंचाई। कश्मीर घाटी में आतंक फैलाने की सारी योजनाएं पाक कब्जे वाले कश्मीर में बनती है और वह उन्हें सीमा के इस पार लागू करवाता रहता है। फरवरी 1999 में भारत के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान का दौरा किया।

पिछले 10 वर्षों में भारत के किसी प्रधानमंत्री की यह पहली यात्रा थी। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ सहयोग का एक मजबूत ढांचा खड़ा करने की कोशिश की पर शीघ्र ही उनका यह प्रयास उस समय धूल में मिल गया जब मई 1999 में पाकिस्तान के सैनिकों द्वारा कारगिल क्षेत्र में भारी घुसपैठ की घटना घटी। भारत ने इसके खिलाफ आपरेशन विजय अभियान शुरू किया। युद्ध मोर्चे पर भारी पराजय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण पाकिस्तान को नियंत्रण रेखा से पीछे हटना पड़ा।

दिसंबर 1999 में इंडियन एयरलाइंस के एक विमान का अपहरण किया गया। आतंकवादी इसे कंधार ले गए। भारत सरकार ने तीन आतंकवादियों को रिहा कर इस विमान के यात्रियों को बचाया। कारगिल की घुसपैठ हो या इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण ऐसी घटनाओं के लिए पाकिस्तान जिम्मेदार है।

आगरा शिखर वार्ता (AgraSummit):
12 अक्टूबर, 1999 से पाकिस्तान में एक सैनिक सरकार है। आतंकवादियों को लगातार मदद देते रहने के कारण भारत-पाकिस्तान के संबंध बहुत नाजुक स्थिति में पहुंच चुके है। जुलाई 2001 में प्रधानमंत्री वाजपेयी व पाकिस्तान के शासन परवेज मुशर्रफ के बीच आगरा में शिखर स्तर की वार्ता हुई। इस वार्ता का कोई सुखद परिणाम सामने नहीं आया। आतंकवादियों ने 11 अक्टूबर, 2001 को जम्मू कश्मीर विधानसभा भवन पर धावा बोल दिया, जिसमें 26 व्यक्ति मारे गए और 60 से ज्यादा लोग घायल हो गए। 13 दिसंबर, 2001 को आतंकवादियों ने संसद भवन को निशाना बनाया। भारत ने संसद भवन पर हमले के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया है।

आपसी रिश्तों को बेहतर बनाने के उपाए:
भारत पाकिस्तान दोनों पड़ोसी देश है। पाक का जन्म 1947 में भारत से ही हुआ था किंतु प्रारंभ से ही इन दोनों के संबंध अच्छे नहीं रहे। कश्मीर को लेकर 1948 में दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ। 1965 तथा 1971 में भी भारत तथा पाकिस्तान के बीच युद्ध हुए। इसके पश्चात् शिमला समझौता हुआ जिसमें दोनों देशों के संबंधों को सुधारने के लिए महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये गये। किंतु पाकिस्तान भारत में आतंकवाद को निरन्तर सहायता प्रदान करता रहा।

1998 में भारत में परमाणु परीक्षण से पाकिस्तान अत्यंत भयभीत हो गया। भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस परीक्षण का स्पष्टीकरण एवं उद्देश्य विश्व के सामने पहले ही कर दिया था। भारतीय जनता पार्टी की सरकार पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को सुधारने के लिए सदैव प्रयत्नशील रही है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री श्री नावज शरीफ ने भी भारत के साथ अपने संबंध सुधारने के लिए अपनी इच्छा प्रकट की थी। पारस्परिक संबंधों को सुधारने के लिए कई बार सचिव, विदेशमंत्री तथा प्रधानमंत्री स्तर पर खुलकर बातचीत हुई। दोनों देश के बीच व्यापार बढ़ाने का प्रयत्न किया गया।

इस संदर्भ में दोनों देशों के बीच बस यात्रा करने का प्रयत्न किया गया। 20 फरवरी, 1999 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की बस यात्रा की। बाघा चौकी को पार करने पर श्री वाजपेयी का भव्य स्वागत हुआ। यह यात्रा एक ऐतिहासिक अद्वितीय घटना सिद्ध हुई। 21 फरवरी, 1999 को भारत-पाक के बीच लाहौर समझौता हुआ।

इसके अंतर्गत कश्मीर समेत सभी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया गया है। इस ऐतिहासिक कदम की अमरीका, ब्रिटेन, चीन, जापान सहित सारे विश्व ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। इस घटना का दोनों देशों की जनता ने हार्दिक स्वागत किया। 16 मार्च, 1999 को दिल्ली तथा लाहौर के बीच नियमित बस सेवा आरंभ हो गई। इस बस सेवा से दोनों देश एक-दूसरे के अधिक निकट हो जायेंगें। अन्ततः हाल की घटनाएं भारत तथा पाक के संबंधों को सुधारने की ओर संकेत कर रही है।

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प्रश्न 2.
भारत-श्रीलंका समझौता (1987) का विवरण दीजिए।
उत्तर:
भारत श्रीलंका समझौता (1987)-जुलाई 1987 में वहां के तमिलों की समस्या को सुलझाने के लिए भारत-श्रीलंका का समझौता हुआ। इस समझौते के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे –

  1. उत्तरी व पूर्वी जिन दो प्रदेशों को, जहां तमिल बहुसंख्यक हैं एकीकृत क्षेत्र बनाया जाएगा।
  2. उपरोक्त क्षेत्र में विधान सभा की स्थापना की जाएगी तथा लोकप्रिय सरकार गठित की जाएगी।
  3. जनमत संग्रह के माध्यम से यह ज्ञात किया जाएगा कि ये दोनों प्रान्त विलय के पक्ष में हैं या नहीं। यदि ने प्रान्त इसके विरुद्ध निर्णय देते हैं तो इनकी अलग ही सरकारें रहेंगी। जनमत संग्रह 1988 तक करा लिया जाना तय हुआ।
  4. यदि तमिल उग्रवादी इस समझौते के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष बन्द नहीं करते तो श्रीलंका सरकार शांति स्थापना के लिए भारतीय सेना को आमन्त्रित कर सकती है।
  5. श्रीलंका की अखण्डता पर सहमति व्यक्त की गई।

उपरोक्त समझौते के बाद भारतीय सेना श्रीलंका के निमंत्रण पर वहां गई। सेना ने सराहनीय कार्य किया। श्रीलंका के उत्तरी व पूर्वी प्रान्तों में लोकप्रिय सरकारें बनी। तामिल उग्रवादी बाद में भी संघर्ष करते रहे। श्रीलंका की जनता के दबाव में आकर वहां की सरकार ने भारत से जुलाई 1989 तक सेना वापिस बुलाने का आग्रह किया। भारत सरकार का कहना था कि बिना शांति स्थापित किए सेना की वापसी उचित नहीं है किंतु अन्ततः मार्च 1990 तक भारतीय शांति सेना वापिस बुला ली गई। भारत की तमिलों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही से तमिल समाज में भारत सरकार के प्रति रोष उत्पन्न हो गया। भारत के प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की हत्या इसी पृष्ठभूमि में रचित षडयंत्र का परिणाम थी। आज कल भी दोनों के संबंध मधुर बने हुए हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कौन-सा देश दक्षिण एशिया में नहीं है?
(अ) भारत
(ब) चीन
(स) भूटान
(द) श्रीलंका
उत्तर:
(ब) चीन

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन-सा देश परमणु शक्ति सम्पन्न नहीं है।
(अ) भारत
(ब) पाकिस्तान
(स) चीन
(द) नेपाल
उत्तर:
(द) नेपाल

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में किस देश में 2006 तक राजतंत्र था?
(अ) भारत
(ब) पाकिस्तान
(स) मालदीव
(द) नेपाल
उत्तर:
(द) नेपाल

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प्रश्न 4.
किस देश में अब भी राजतंत्र है?
(अ) भारत
(ब) पाकिस्तान
(स) भूटान
(द) नेपाल
उत्तर:
(स) भूटान

प्रश्न 5.
दक्षिण एशिया में किस राजनीतिक प्रणाली की प्रमुखता है?
(अ) लोकतंत्र
(ब) राजतंत्र
(स) तानाशाही
(द) अलग-अलग
उत्तर:
(अ) लोकतंत्र

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प्रश्न 6.
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल संधि कब हुई?
(अ) 1958
(ब) 1959
(स) 1960
(द) 1961
उत्तर:
(स) 1960

प्रश्न 7.
बांग्लादेश के नेताओं द्वारा आजादी की उद्घोषणा कब हुई।
(अ) मार्च 1970
(ब) मार्च 1971
(स) मार्च 1972
(द) मार्च 1973
उत्तर:
(ब) मार्च 1971

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प्रश्न 8.
पाकिस्तान के प्रथम सैनिक शासन का मुखिया कौन था?
(अ) जनरल अयूब खान
(ब) जनरल याहिया खान
(स) जनरल जिया-उल-हक
(द) परवेज मुशर्रफ
उत्तर:
(अ) जनरल अयूब खान

प्रश्न 9.
पूर्वी पाकिस्तान में कौन सी भाषा लोकप्रिय थी?
(अ) हिंदी
(ब) उर्दू
(स) बंगाली
(द) उड़िसा
उत्तर:
(स) बंगाली

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित में कौन-सा देश ‘सेवेन पार्टी अलाएंस’ में नहीं था?
(अ) भारत
(ब) चीन
(स) श्रीलंका
(द) भूटान
उत्तर:
(ब) चीन

प्रश्न 11.
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद किया अधिक है?
(अ) भारत
(ब) श्रीलंका
(स) नेपाल
(द) भूटान
उत्तर:
(ब) श्रीलंका

II. मिलान वाले प्रश्न एवं उनके उत्तर

निम्नलिखित स्तंभ (अ) का मिलान स्तंभ (ब) से कीजिए।
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उत्तर:
(1) – (viii)
(2) – (i)
(3) – (x)
(4) – (iv)
(5) – (ix)
(6) – (ii)
(7) – (vii)
(8) – (iii)
(9) – (v)
(10) – (vi)

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Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 12 Political Science सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
तिथि के हिसाब से इन सबको क्रम दें –
(क) विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश
(ख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना
(ग) यूरोपीय संघ की स्थापना
(घ) आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना
उत्तर:
(क) विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश – 2001
(ख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना – 1957
(ग) यूरोपीय एंघ की स्थापना – 1992
(घ) आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना – 1994

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प्रश्न 2.
‘आसियान वे’ या आसियान शैली क्या है?
(क) आसियान के सदस्य देशों की जीवन शैली है।
(ख) आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज का स्वरूप है।
(ग) आसियान सदस्यों की रक्षा नीति है।
(घ) सभी आसियान सदस्य देशों को जोड़ने वाली सड़क है।
उत्तर:
(ख) आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज का स्वरूप है।

प्रश्न 3.
इनमें से किसने ‘खुले द्वारा’ की नीति अपनाई?
(क) चीन
(ख) यूरोपयी संघ
(ग) जापान
(घ) अमरीका
उत्तर:
(क) चीन

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प्रश्न 4.
खाली स्थान भरें –
(क) 1962 में भारत और चीन के बीच ………… और ………. को लेकर सीमावर्ती लड़ाई हुई थी।
(ख) आसियान क्षेत्रीय मंच के कामों में ……. और ……… करना शामिल है।
(ग) चीन ने 1972 में ……… के साथ दोतरफा संबंध शुरू करके अपना एकांतवास समाप्त किया।
(घ) …………….. योजना के प्रभाव से 1948 में यूरोपयी आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना हुई।
(ङ) ………… आसियान का एक स्तंभ है जो इसके सदस्य देशों की सुरक्षा के मामले देखता है।
उत्तर:
(क) अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों, लद्दाख के अक्साई चिनी क्षेत्र
(ख) आर्थिक विकास को तेज करना, उसके माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक विकास
(ग) अमरीका
(घ) मार्शल योजना
(ङ) आसियान सुरक्षा समुदाय

प्रश्न 5.
क्षेत्रीय संगठनों को बनाने के उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर:
क्षेत्रीय संगठनों के बनाने के उद्देश्य –
(क) आर्थिक विकास को तेज करना और उसक माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक विकास करना।
(ख) कानून के शासन और संयुक्त राष्ट्र के नियमों पर आधारित क्षेत्रीय शांति और स्थायित्व को बढ़ावा देना।

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प्रश्न 6.
भौगोलिक निकटता का क्षेत्रीय संगठनों के गठन पर क्या असर होता है?
उत्तर:
भौगोलिक निकटता का क्षेत्रीय संगठनों के गठन पर गहरा असर पड़ता है।

  1. यदि क्षेत्रीय संगठनों में भौगोलिक निकटता हो तो आपस में तालमेल रखना आवश्यक होता है अन्यथा अनेक प्रकार की बाधायें उत्पन्न हो जाती हैं।
  2. क्षेत्रीय संगठनों के निकट होने पर एक-दूसरे की विभिन्न क्षेत्रों में सहायता आसानी से कर सकते हैं।
  3. इससे अहस्तक्षेप को बढ़ावा मिलता है।
  4. उनके बीच आवागमन के साधन आसानी से जुटाये जा सकते हैं।

प्रश्न 7.
आसियान विजन 2020 की मुख्य बातें क्या हैं?
उत्तर:
आसियान विजन 2020 की मुख्य बातें –

  1. अंतराष्ट्रीय समुदाय में आसियान की एक बहिर्मुखी भूमिका होगी जिससे उसको विश्व में लोकप्रियता प्राप्त हो सके।
  2. टकराव के स्थान पर बातचीत को महत्त्व दिया जायेगा। इसी आधार पर कम्बोडिया से टकराव को टाला गया, पूर्वी तिमोर के संकट को टाला गया।
  3. पूर्वी एशियाई सहयोग पर बातचीत जारी रखी जायेगी। इसलिए इसकी बैठक 1999 से जारी है।

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प्रश्न 8.
आसियान समुदाय के मुख्य स्तंभों और उनके उद्देश्यों के बारे में बताएँ।
उत्तर:
आसियान समुदाय के मुख्य स्तंभ और उनके उद्देश्य –

  1. आसियान सुरक्षा समुदाय
  2. आसियान आर्थिक समुदाय
  3. आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय

आसियान सुरक्षा समुदाय का मुख्य उद्देश्य सैनिक टकराहट को टालना और बातचीत के द्वारा समस्या का हल निकालना है। इसके अलावा शांति, निष्पक्षता, सहयोग और अहस्तक्षेप को बढ़ावा देना है। आसियान आर्थिक समुदाय का उद्देश्य आसियान देशों का साझा बाजार और उत्पादन आधार तैयार करना तथा इस इलाके के सामाजिक और आर्थिक विकास में मदद करना है। आसियान सामाजिक सांस्कृतिक मुद्रा और समाज और संस्कृति में वृद्धि करना है।

प्रश्न 9.
आज की चीनी अर्थव्यवस्था नियंत्रित अर्थव्यवस्था से किस तरह अलग है?
उत्तर:
आज की चीनी अर्थव्यवस्था नियंत्रित अर्थव्यवस्था से निम्नलिखित प्रकार से अलग है –

  1. 1978 में तत्कालीन नेता देंग श्याआपेंग ने चीन में आर्थिक सुधारों और खुले द्वारा की नीति की घोषणा की।
  2. इस घोषणा के पश्चात् यह निश्चित किया गया कि विदेशी पंजी और प्रौद्योगिकी के निवेश से उच्चतर उत्पादकता को प्राप्त किया जाय। बाजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाने के लिए चीन में अपना तीरका अपनाया।
  3. चीन में शॉक थेरेपी को महत्त्व नहीं दिया बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था को क्रमबद्ध तरीके से आरंभ किया।
  4. कृषि का निजीकरण कर दिया गया जिसके कारण कृषि उत्पादों तथा ग्रामीण में पर्याप्त आय हुई।
  5. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निजी बचत को महत्त्व दिया गया जिससे ग्रामीण उद्योगों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि हुई। इस प्रकार उद्योग और कृषि दोनों ही क्षेत्रों में चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर तेज रही।
  6. व्यापार के नये कानून तथा विशेष आर्थिक क्षेत्रों (Special Economic Zone) का निर्माण किया गया। इससे विदेशी व्यापार में अदभुत बढ़ोत्तरी हुई।
  7. उसने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को महत्व दिया । फलस्वरूप उसके पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार हो गया है। विदेशी मुद्रा की सहायता से वह दूसरे देशों में निवेश कर रहा है।
  8. 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन में शामिल हो गया है। इस प्रकार वह दूसरे देशों में अपनी अर्थव्यवस्था खोलने में सक्षम हो गया है।

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प्रश्न 10.
किस तरह यूरोपीय देशों ने युद्ध के बाद की अपनी परेशानियों सुलझाई? संक्षपे में उन कदमों की चर्चा करें जिनसे होते हुए यूरोपयी संघ की स्थापना हुई?
उत्तर:
युद्ध के बाद यूरोपीय देशों द्वारा अपनी परेशानियां सुलझाने के तरीके और यूरोपीय संघ की स्थापना के कदम –

  1. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् विश्व में शीत युद्ध का दौर आरंभ हुआ, इससे यूरोपीय देशों को मेल मिलाप का अवसर मिल गया।
  2. मार्शल योजना के अंतर्गत अमरीकन ने यूरोपीय देशों के पुनर्गठन के लिए आर्थिक सहायता की।
  3. इसी योजना के अंतर्गत 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहायोग की स्थापना हुई जिसके माध्यम से यूरोपीय देशों को आर्थिक मदद मिली।
  4. 1949 में राजनैतिक सहयोग के लिए यूरोपीय परिषद् की स्थापना हुई।
  5. पूंजीवादी देशों के बीच आर्थिक एकीकरण बढ़ता गया और इसके परिणामस्वरूप 1957 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना हुई।
  6. सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् इसका तेजी से राजनीतिकरण हुआ। 1992 में इस प्रक्रिया के फलस्वरूप यूरोप संघ की स्थापना हुई।
  7. यूरोपीय संघ के रूप में समान विदेशी नीति और सुरक्षा नीति, आंतरिक मामलों तथा न्याय से जुड़े मुद्दो पर सहयोग और समान मुद्रा के चलन के लिए रास्ता तैयार हो गया।

प्रश्न 11.
यूरोपीय संघ को क्या चीजे एक प्रभावी क्षेत्रीय संगठन बनाती हैं।
उत्तर:
यूरोपीय संघ को प्रभावी क्षेत्रीय संगठन बनाने वाली चीजें –

  1. यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था 2005 में सबसे बड़ी थी। उसका सकल घरेलु उत्पाद 12000 अरब डालर से अधि क था जो अमरीका से थोड़ा अधिक था।
  2. इसकी मुद्रा यूरो (Euro) है जिसकी विश्व व्यापार में हिस्सेदारी अमरीकी डॉलर से तिगूनी है।
  3. यूरोपीय संघ की आर्थिक शक्ति का प्रभाव निकटवर्ती देशों के साथ सुदूर एशिया और अफ्रीका के देशों में भी है।
  4. विश्व व्यापार संगठन में भी इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है।
  5. यूरोपीय संघ का राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव विस्तृत है। यूरोपीय संघ के कई सुरक्षा परिषद् के स्थायी और अस्थायी सदस्य है।
  6. यूरोपीय संघ सैनिक दृष्टि से दूसरा ताकतवर राज्य है। यूरोपीय संघ के दो देशों-ब्रिटेन और फ्रांस के पास परमाणु हथियार हैं।
  7. संचार-प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष विज्ञान की दृष्टि से विश्व में इसका दूसरा स्थान है।
  8. अंतर्राष्ट्रीय संगठन के तौर पर यूरोपयी संघ राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप करने में सक्षम है।

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प्रश्न 12.
चीन और भारत की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में मौजूदा एकधुवीय विश्व व्यवस्था को चुनौती दे सकने की क्षमता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने तर्को से अपने विचारों को पुष्ट करो।
उत्तर:
चीन और भारत की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में मौजूद एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था को चुनौती देने वाली क्षमतायें –
निचित रूप से भारत और चीन की अर्थव्यवस्था इस लायक हो गयी है कि वे एक-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था को चुनौती दे सकती है जो निम्नलिखित तर्कों से स्पष्ट है –

  1. दोनों देशों ने विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में आपसी सहयोग और व्यापार के लिए सीमा पर चार पोस्ट खोलने के समझौते किये हैं। निश्चित ही इससे आर्थिक ताकत बढ़ी है।
  2. 1999 से भारत और चीन के मध्य व्यापर 30% वार्षिक की दर से बढ़ रहा है।
  3. भारत और चीन के बीच 1992 का 33 करोड़ 80 लाख डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार 2006 में 18 अरब डॉलर का हो चुका है।
  4. विदेशों में ऊर्जा से उत्पन्न विवाद को उन्होंने आपस में हल कर लिया है।
  5. दोनों देशों की विश्व व्यापार संगठन के प्रति समान नीतियां है।

प्रश्न 13.
मुल्कों की शांति और समृद्धि क्षेत्रीय संगठनों को बनाने और मजबूत करने पर टिकी है। इस कथन की पुष्टि करें।
उत्तर:
यह कथन सत्य है कि मुल्कों की शांति और समृद्धि क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों को बनाने और मजबूत करने पर टिकी है। इसका उदाहरण दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (आसियान) है। इस संगठन के देशों ने क्षेत्रीय आर्थिक संगठन पर ही विशेष जोर दिया जिसके कारण ये न केवल आर्थिक दृष्टि से अपितु राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली हो गये है। वे महाशक्ति के विकल्प के रूप में खड़ा हो गया है। उसने विभिन्न देशों के साथ शांति, निष्पक्षता, सहयोग, अहस्तक्षेप को बढ़ाने की नीति पर समझौते किये हैं।

उन्होंने आपसी मतभेद तथा सम्प्रभुता के अधिकारों के सम्मान पर सहमति जताई है। ऐसा करके ही संगठन को मजबूत किया जा सकता है। यदि कोई आर्थिक दृष्टि से समृद्ध हो जाता है और सैनिक दृष्टि से कमजोर है तो उसका काम बिना क्षेत्रीय संगठन के नही चल सकता। उस पर विदेशियों की नजर लगी रहेगी। क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों से ही कोई राष्ट्र आर्थिक दृष्टि से सम्बल हो सकता है और तभी वहां शांति स्थापित हो सकती है।

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प्रश्न 14.
भारत और चीन के बीच विवाद के मामलों की पहचान करें और बताएं कि वृहत्तर सहयोग के लिए उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अपने सुझाव भी दीजिए।
उत्तर:
भारत और चीन के बीच विवाद के मामले और वृहत्तर सहयोग के लिए निपटारे के तरीके –

  1. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है। इसको हल करने के लिए दोनों देशों के बीच 1981 से वार्ताओं की श्रृंखला शुरू हो गई है।
  2. पाकिस्तान के परमाणु हथियार कार्यक्रम के चीन सहायता दे रहा है जिससे भारत को खतरा हो सकता है। इस समस्या को भी बातचीत द्वारा हल किया जा सकता है।
  3. बांग्लादेश और म्यांमार का चीन के साथ सैनिक संबंध है जो दक्षिण एशिया में भारतीय हितों के खिलाफ माना जाता है। यह मुद्दा दोनों के बीच टकराव नहीं उत्पन्न कर सकता।

Bihar Board Class 12 Political Science सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यूरोपीय संघ और आसियान किस प्रकार शक्तिशाली बने?
उत्तर:

  1. यूरोपीय संघ और आसियान दोनों ने ही अपने-अपने क्षेत्रों में चलने वाली लंबी शत्रुताओं और कमजोरियों का क्षेत्रीय स्तर पर निपटरा किया और संगठन को मजबूत किया।
  2. उन्होंने अपनी क्षेत्रों में अधिक शांतिपूर्ण और सहकारी क्षेत्रीय व्यवस्था विकसित करने की तथा इस क्षेत्र के देशों की अर्थव्यवस्थाओं का समूह बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

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प्रश्न 2.
चीन ने ‘खुले द्वार’ की नीति कब चलाई और उससे उसे क्या लाभ हुए?
उत्तर:

  1. दिसंबर 1978 में देंग श्याओपेंग ने ‘खुले द्वार’ (Open Door) की नीति चलाई।
  2. इसके कारण चीन अद्भूत प्रगति के ओर आने वाले वर्षों में एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभरा।

प्रश्न 3.
यूरोपीय संघ की स्थापना कब हुई। इसकी सामान्य नीतियाँ क्या थी?
उत्तर:

  1. यूरोपीय संघ की स्थापना 1992 ई. में हुई।
  2. इसकी समान्य नीतियां-समान विदेशी नीति और सुरक्षा नीति, आंतरिक मामलों तथा न्याय से जुड़े मामलों में सहयोग और एक समान मुद्रा का चलन।

प्रश्न 4.
यूरोपीय संघ में नये सदस्यों विशेष रूप से पूर्व सोवियत संघ के सदस्यों को शामिल करने के मामले का क्या विवाद था?
उत्तर:

  1. अनेक यूरोपीय देश इनको शामिल करने के. प्रश्न पर सहमत नहीं थें।
  2. अनेक देशों के लोग इस बात को लेकर उत्साहित नहीं थे। उनका कहना था कि जो ताकत उनकी देश की सरकार को प्राप्त थी, वह अब यूरोपीय संघ को दे दी जाए।

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प्रश्न 5.
यूरोपीय संघ विश्व की एक आर्थिक शक्ति है? दो प्रमाण दीजिए।
उत्तर:

  1. 2005 में यह विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और इसका सकल घरेलू उत्पादन 12 हजार अरब डॉलर से ज्यादा था, जो अमरीका से भी थोड़ा अधिक था।
  2. इसकी मुद्रा यूरो अमरीकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए खतरा बन सकती है। विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी अमरीका से तीन गुनी अधिक हैं।

प्रश्न 6.
यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय का गठन कब हुआ और इसके कौन-कौन सदस्य थे?
उत्तर:

  1. यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय की स्थापना अप्रैल 1951 को हुई।
  2. पश्चिमी यूरोप के छः देश-फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, इटली, बेल्जियम, हॉलैंड और लक्जमबर्ग थे।

प्रश्न 7.
पूर्व सोवियत संघ के कौन-कौन से देश यूरोपीय संघ में शामिल थे?
उत्तर:
मई 2004 में साइप्रस, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, हंगरी, लताविया, लिथुआनिया, माल्टा, पौलेंड, स्लोवाकिया और स्लोवेनिया यूरोपीय संघ में शामिल हुए।

प्रश्न 8.
यूरोपीय संघ ने अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाओं को प्रभावित किया है। उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. ईरान के परमाणु कार्यक्रम से संबंधित अमरीकी नीतियों को हाल के दिनों में प्रभावित करना इसका एक उदाहरण है।
  2. चीन के साथ मानवाधिकारों के उल्लंघन और पर्यावरण विनाश के मामलों पर धमकी या सैनिक शक्ति का उपयोग करने की जगह कूटनीतिक, आर्थिक निवेश और बातचीत को इसकी नीति अधिक प्रभावी सिद्ध हुई है।

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प्रश्न 9.
यूरोपीय संघ में मतभेद के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. यूरोपीय संघ में सदस्य देशों में मतभेद भी थे। उदाहरण के लिए इराक पर अमरीकी हमले में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर तो उसके साथ थे लेकिन जर्मनी और फ्रांस इस हमले के खिलाफ थे।
  2. यूरोप के कुछ हिस्सों में यूरो को लागू करने के कार्यक्रम को लेकर असहमति थी।

प्रश्न 10.
आसियान की नींव कब और किसने रखी?
उत्तर:

  1. 1967 में इस क्षेत्र के पांच देशों ने बैंकाक घोषणा पर हस्ताक्षर करके आसियान की स्थापना की।
  2. ये देश इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर और थाइलैंड थे।

प्रश्न 11.
आसियान के झंडे का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. आसियान के झंडे में ‘आसियान’ के प्रतीक चिह्न में धान की दस बालियां दक्षिण-पूर्व के दस देशों का प्रतीक है जो आपस में मैत्री और एकता के सूत्रों में बंधे हैं।
  2. झंडे पर बना वृत्त आसियान की एकता का प्रतीक है।

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प्रश्न 12.
आसियान शैली की विशेषतायें बताइए।
उत्तर:

  1. आसियान में अनौपचारिक, टकरावरहित और सहयोगात्मक मेल मिलाप है। यह सर्वथा नया उदाहरण है और इससे आसियान ने काफी प्रसिद्धि प्राप्त की। इसी को ‘आसियान शैली कहा जाने लगा है।
  2. आसियान के क्रियाकलाप में राष्ट्रीय सार्वभौमिकता का सम्मान करना अति महत्त्वपूर्ण रहा है।

प्रश्न 13.
आसियान समुदाय कब बनाया गया? आसियान के तीन समुदाय कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. 2003 में आसियान ने तीन आसियान समुदाय बनाये जो आसियान के तीन स्तंभ कहे जाते हैं।
  2. तीन समुदाय हैं –

(क) आसियान सुरक्षा समुदाय
(ख) आसियान आर्थिक समुदाय
(ग) आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय

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प्रश्न 14.
आसियान आर्थिक समुदाय के क्या अर्थ हैं?
उत्तर:

  1. आसियान देशों को साझा बाजार और उत्पादन आधार तैयार करना तथा इस क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में मदद करना प्रमुख कार्य है।
  2. यह संगठन इस क्षेत्र के देशों में आर्थिक विवादों को निपटाने के लिए बने वर्तमान को भी सुधारना चाहता है।

प्रश्न 15.
2040 तक चीन की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाने की आशा है। कैसे?
उत्तर:

  1. चीन के पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक स्तर पर जुड़ाव हो गया है। वह पूर्व एशिया के विकास का इंजन जैसा बना हुआ है और इस कारण क्षेत्रीय मामलों में उसका प्रभाव बढ़ गया है।
  2. चीन की विशाल आबादी, बड़ा भूभाग संसाधन, क्षेत्रीय अवस्थिति और राजनैतिक प्रभाव इस आर्थिक वृद्धि में सोने पे सुहागा का कार्य कर रहे हैं।

प्रश्न 16.
1970 से पूर्व चीनी अर्थव्यवस्था की क्या कमियां थी?
उत्तर:

  1. चीन की आबादी 2-3% वार्षिक दर से बढ़ी है। बढ़ती आबादी के कारण चीन के आर्थिक विकास का लाभ सबको नहीं मिल पाया है।
  2. खेती का उत्पादन पर्याप्त नहीं था, जिसके अधिशेष (Surplus) से उद्योगों की आवश्यकतायें पूरी की जा सकें।
  3. विदेशी पूंजी की कमी थी और प्रति व्यक्ति आय भी बहुत कम थी।

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प्रश्न 17.
चीन विश्व व्यापार संगठन (WTO) में कब शामिल हुआ। इससे उसको क्या लाभ हुआ?
उत्तर:

  1. चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन में शामिल हुआ।
  2. इसके कारण चीन को दूसरे देशों में अपनी अर्थव्यवस्था खोलने का अवसर मिल गया और विश्व अर्थव्यवस्था अधिक साझीदारी का मौका मिल गया।

प्रश्न 18.
1988 के पश्चात् भारत-चीन संबंधों में क्या सुधार हुए हैं?
उत्तर:

  1. 1988 ई. में राजीव गांधी ने चीन का दौरा किया । फलस्वरूप इसके बाद भारत चीन संबंधों में सुधार आया है। दोनों देशों ने टकराव टालने और सीमा पर शांति और यथास्थिति बनाये रखने के उपायों की शुरूआत की है।
  2. दोनों देशों ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान, विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में परस्पर सहयोग और व्यापार के लिए सीमा पर चार पोस्ट खोलने के समझौते भी किए है।

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प्रश्न 19.
चीन में ऐसे कौन से कार्य किये हैं जिनसे भारत को आपत्ति है?
उत्तर:

  1. चीन पाकिस्तान को परमाणु हथियार कार्यक्रम में मदद कर रहा है।
  2. उसने बांग्लादेश और म्यांमार से चीन के सैनिक संबंधों को बढ़ावा दिया है जो दक्षिण एशिया में भारतीय हितों के खिलाफ है।

प्रश्न 20.
उच्च प्रौद्योगिकी के उत्पाद बनाने वाले जापानी ब्रांडों के नाम बताइए।
उत्तर:
सोनी, पैनासोनिक, कैनन, सुजुकी, होंडा, ट्योटा, माज्दा आदि।

प्रश्न 21.
जापानी अर्थव्यवस्था की क्या विशेषता है?
उत्तर:

  1. जापान की अर्थव्यवस्था विश्व की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है और आश्चर्य से भरी है। उसके पास प्राकृतिक संसाधन कम है और वह अधिकांश कच्चे माल का आयात करता है। इसके बावजूद दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान ने बड़ी तेजी से प्रगति की।
  2. एशिया महाद्वीप के देशों में अकेला जापान ही समूह 8 के देशों में शामिल है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के सामने कौन-कौन सी समस्यायें थीं?
उत्तर:
द्वितीय युद्ध के पश्चात् यूरोप की समस्यायें-यद्यपि द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों (जिसमें अधिकांश यूरोपीय देश शामिल थे) की विजय हुई परंतु यूरोपीय देशों के बहुत अधिक हानि हुई। उनके सामने निम्नलिखित समस्यायें उत्पन्न हुई –

  1. विभिन्न यूरोपीय देशों के सामने यह समस्या थी कि वह अपनी पुरानी शत्रुता को शुरु करें या छोड़े।
  2. उनको यह भी निर्णय करना था कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में सकारात्मक योगदान करने वाले सिद्धांतों और संस्थाओं के आधार पर उन्हें अपने संबंधों को नये प्रकार से बनाना चाहिए या नहीं।
  3. युद्ध ने उन अनेक मान्यताओं और व्यवस्थाओं को नष्ट कर दिया था जिसके आधार पर यूरोपीय देशों को अपासी संबंध बने थे।
  4. यूरोप के अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था नष्ट हो गयी उन्हें पुनर्निर्माण भी करना था।

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प्रश्न 2.
यूरोपीय संघ के निर्माण के विभिन्न चरणों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
यूरोपीय संघ के निर्माण के चरण –

  1. मार्शल योजना के अंतर्गत 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन स्थापना हुई। जिसके माध्यम से यूरोपयी देशों को आर्थिक सहायता प्राप्त हुई।
  2. 1949 में राजनीतिक सहयोग के लिए यूरोपीय परिषद् की स्थापना हुई।
  3. पूंजीवादी देशों के बीच आर्थिक एकीकरण बढ़ता गया और इसके परिणामस्वरूप 1957 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय का गठन हुआ।
  4. सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् इसका तेजी से राजनीतिकरण हुआ। जिसके फलस्वरूप 1992 में यूरोपीय संघ की स्थापना हुई।

प्रश्न 3.
यूरोपीय संघ के राजनीतिकरण का विवरण दीजिए।
उत्तर:

  1. एक समय तक यूरोपीय संघ आर्थिक व्यवस्था करने वाली संस्था थी परंतु तेजी से राजनैतिक स्वरूप लेता गया।
  2. अब यूरोपीय संघ एक विशाल राष्ट्र के समान कार्य करने लगा है। इसके बावजूद भी इसका अपना कोई संविधान नहीं है। संविधान बनाने में सफलता नहीं मिली।
  3. इसका अपना झंडा, राष्ट्रगान, स्थापना दिवस और अपनी मुद्रा है।
  4. विदेशी नीति के संबंधों में इसने पर्याप्त सीमा तक साझी विदेश और सुरक्षा नीति भी बना ली है।
  5. यूरोपीय संघ ने सहयोग के क्षेत्र में विस्तार के लिए अपने संघ में नये सदस्य देशों को शामिल किया, हालांकि संघ के कई देशों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि जो ताकत उनके देश की सरकार को प्राप्त थी वह अब यूरोपीय संघ को दे दी जायेगी।

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प्रश्न 4.
यूरोपीय संघ की आर्थिक, राजनैतिक कूटनीतिक तथा सैनिक प्रभाव की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
यूरोपीय संघ का प्रभाव –

  1. इसकी मुद्रा यूरो अमरीकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए खतरा है।
  2. 2005 में यह विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और इसका सकत घरेलु उत्पाद 12 हजार डालर से अधिक था जो अमरीका से थोड़ा अधिक था।
  3. विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी अमरीका से तीन गुनी ज्यादा है और इसके चलते यह अमरीका और चीन से व्यापारिक विवादों में पूरे रोब के साथ बात करता है।
  4. इसकी आर्थिक शक्ति का प्रभाव इसके पड़ोसी देशों पर ही नहीं, बल्कि एशिया और अफ्रीका के सुदूर देशों पर भी है।
  5. यह विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठनों के अंदर एक महत्त्वपूर्ण समूह के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 5.
यूरोपीय संघ की सैनिक ताकत का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
यूरोपीय संघ की सैनिक ताकत का मूल्यांकन –

  1. सैनिक ताकत के हिसाब से यूरोप संघ विश्व की सबसे बड़ी सेना है।
  2. इसका कुल रक्षा बजट अमरीका के बाद सबसे अधिक है।
  3. यूरोपीय संघ के दो देशों – ब्रिटेन और फ्रांस के पास परमाणु हथियार है और अनुमान है कि इनके जखीरे में लगभग 550 परमाणु हथियार हैं।
  4. अंतरिक्ष विज्ञान और संचार प्रौद्योगिकी के मामले में भी यूरोपीय संघ का विश्व में दूसरा स्थान है।

प्रश्न 6.
यूरोपीय संघ के सदस्य राष्ट्रों में किन बातों को लेकर मतभेद है?
उत्तर:
यूरोपीय संघ के सदस्य राष्ट्रों में मतभेद –

  1. अधिराष्ट्रीय संगठन के तौर पर यूरोपीय संघ आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक मामलों में दखल देने में सक्षम हैं। परंतु अनेक मामलों में इसके सदस्य देशों की अपनी विदेश और रक्षा नीति है जो कई बार एक दूसरे के खिलाफ होती है।
  2. इराक पर अमरीकी हमले में ब्रिटेन में प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर तो उसके साथ थे लेकिन जर्मनी और फ्रांस इसके खिलाफ थे।
  3. यूरोपीय संघ के कई नए सदस्य देश भी अमरीकी गठबंधन में थे।
  4. यूरोप के कुछ भागों में यूरो को लागू करने के कार्यक्रम को लेकर काफी नाराजगी है। यही कारण है कि ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर में ब्रिटेन को यूरोपीय बाजार से अलग रखा।
  5. डेन्मार्क और स्वीडन ने मास्ट्रिस्ट संधि और साझी यूरोपयी मुद्रा यूरो का प्रतिरोध किया इससे विदेशी और रक्षा मामलों में काम करने की यूरोपीय संघ की क्षमता सीमित होती है।

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प्रश्न 7.
दक्षिण पूर्व एशियाई संगठन (आसियान) के निर्माण के क्या कारण थे? अथवा, आसियान निर्माण के पूर्व दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व और उसके दौरान एशिया का यह भाग कई बार यूरोपीय और जापानी उपनिवेशवाद का शिकार हुआ और उसे पर्याप्त क्षति सहनी पड़ी।
  2. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे राष्ट्र निर्माण, आर्थिक पिछड़ापन और गरीबी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
  3. शीत युद्ध के दौरान किसी एक महाशक्ति के साथ जाने के दबावों को भी झेलना पड़ा।
  4. बांडुग सम्मेलन और गुट-निरपेक्ष आंदोलन आदि के माध्यम से एशिया और तीसरी दुनिया के देशों में एकता कायम करने के प्रयास अनौपचारिक स्तर पर सहयोग और मेलजोल कराने के मामले में कारगर नहीं हो रहे थे।
  5. ऐसी स्थिति में दक्षिण-पूर्व एशिया देशों ने आसियान का गठन किया।

प्रश्न 8.
आसियान की स्थापना कैसे हुई। इसके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
आसियान की स्थापना और इसके उद्देश्य –

  1. 1967 ई. में दक्षिण पूर्व एशिया के पांच देशों-इडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस सिंगापुर, और थाइलैंड ने बैंकॉक घोषणा पर हस्ताक्षर करके आसियान की स्थापना की।
  2. इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास को तेज करना और उसके माध्यम से सामाजिक और सांस्कृति विकास करना था।
  3. कानून के शासन और संयुक्त राष्ट्र के नियमों पर आधारित क्षेत्रीय शांति और स्थायित्व को बढ़ावा देना भी इसका अन्य उद्देश्य था।
  4. यूरोपीय संघ के समान खुद को अधिराष्ट्रीय संगठन बनाने या उसके समान अन्य व्यवस्थाओं को हाथ में लेने का उसका लक्ष्य नहीं था।
  5. यह राष्ट्रों के बीच अनौपचारिक, टकरावरहित और सहयोगात्मक मेल मिलाप रखना सबसे बड़ा उद्देश्य था।
  6. राष्ट्रीय सार्वभौमिकता का सम्मान करना भी इसका महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था।

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प्रश्न 9.
आसियान सुरक्षा समुदाय का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
आसियान सुरक्षा समुदाय –

  1. आसियान सुरक्षा समुदाय का मुख्य उद्देश्य विवाद को सैनिक टकराहट से बचाना और बातचीन के द्वारा सहमति लाना है।
  2. 2003 तक आसियान के सदस्य देशों ने कई समझौते किए जिनके द्वारा प्रत्येक देश ने शांति, निष्पक्षता, सहयोग, अहस्तक्षेप को बढ़ावा देने पर बल दिया।
  3. उन्होंने राष्ट्रों के आपसी अंतर तथा सम्प्रभुता के अधिकारों को सम्मान करने पर अपनी वचनबद्धता प्रकट की।
  4. आसियान के देशों की सुरक्षा और विदेशी नीतियों में तालमेल बनाने के लिए 1994 में आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना की गई।

प्रश्न 10.
भारत और आसियान के संबंधों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारतीय आसियान संबंध –

  1. आसियान की वर्तमान आर्थिक शक्ति से चीन और भारत दोनों आकर्षित हुए है।
  2. भारत और चीन दोनों का एशियाई देशों के साथ व्यापार और निवेश बढ़ रहा है। ऐसे में आसियान के साथ संबंध स्थापित करना प्रासंगिक है।
  3. आरंभिक वर्षों में भारतीय विदेशी नीति ने आसियान पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया परंतु हाल के वर्षों में भारत ने अपनी नीति सुधारने का प्रयास किया है।
  4. भारत ने दो आसियान देशों-सिंगापुर और थाइलैंड के साथ मुक्त व्यापार का समझौता किया है।
  5. भारत ने आसियान के साथ ही मुक्त व्यापार संधि करने की कोशिश की हैं।

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प्रश्न 11.
चीन ने 1949 में हुई साम्यवादी के बाद औद्योगिक अर्थव्यवस्था का आधार किस प्रकार तैयार किया?
उत्तर:

  1. चीन की अर्थव्यवस्था सोवियत मॉडल पर आधारित थी और पूंजीवादी दुनिया से उसका संबंध समाप्त हो गया था एसे में उसने अपने संसाधनों से ही औद्योगिक आधार तैयार किया।
  2. इसने विकास का जो मॉडल अपनाया उसमें खेती से पूंजी लेकर सरकारी बड़े उद्योग खड़े करने पर जोर था।
  3. चीन के पास विदेशी बाजारों की तकनीक और समानों को खरीद के लिए विदेशी मुद्रा की कमी थी। इसलिए चीन में आयतित सामानों को धीरे-धीरे से घरेलू स्तर पर ही तैयार करवाना शुरू किया।
  4. इस मॉडल ने चीन को अभूतपूर्व स्तर पर औद्योगिक अर्थव्यवस्था खड़ी करने का आधार बनाने के लिए सम्पूर्ण संसाधनों का इस्तेमाल करने दिया।

प्रश्न 12.
1970 में चीन ने क्या-क्या आर्थिक सुधार किये?
उत्तर:
1970 में चीन के आर्थिक सुधार –

  1. इस समय चीन की आर्थिक स्थिति खराब थी। इस स्थिति ने निपटने के लिए चीन ने अपनी नीतियों में विशेष परिवर्तन किये।
  2. उसने 1972 में अमरीका से संबंध स्थापित किया और उसने एकांतवास को तोड़ा।
  3. 1973 में चीनी प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई ने कृषि उद्योग, सेना और विज्ञान-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आधुनिकीकरण के चार प्रस्ताव रखे।
  4. 1978 में तत्कालीन चीनी नेता देंग श्याओपेंग ने चीन में अधिक सुधारों और ‘खुले द्वारा की नीति’ की घोषणा की।
  5. अब चीन का उद्देश्य यह हो गया कि विदेशी पूंजी और प्रौद्योगिकी के निवेश से उच्चतर उत्पादकता को प्राप्त किया जाए।
  6. चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से आरंभ किया। सर्वप्रथम 1982 में खेती का निजीकरण किया गया और उसके बाद 1998 में उद्योगों को भी इन प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। अनेक व्यापारिक अवरोधों को हटाया गया।

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प्रश्न 13.
चीन की नई आर्थिक नीतियों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
चीन की नई आर्थिक नीतियों का प्रभाव-चीन ने 1970 के बाद नई आर्थिक नीतियों को अपनाया जिसका अच्छा प्रभाव पड़ा जो निम्नलिखित है –

  1. उसकी अर्थव्यवस्था जड़ता से ऊपर उठी। कृषि के निजीकरण के कारण कृषि उत्पादों तथा ग्रामीण आय में आशा के अनुरूप सफलता मिली।
  2. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निजी बचत बढ़ गई और इससे ग्रामीण उद्योगों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। उद्योग और कृषि दोनों ही क्षेत्रों में चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि-दर तेज रही।
  3. व्यापार के नये कानून तथा विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) के निर्माण से विदेशी व्यापार में अदभूत वृद्धि हुई।
  4. चीन संपूर्ण विश्व में विदेशी निवेश के लिए सर्वाधिक आकर्षक देश बनकर उभरा।
  5. चीन के पास विदेशी मुद्रा का भरपूर भंडार है और इसके बूते चीन दूसरे देशों में निवेश कर रहा है।
  6. 2001 में चीन ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में प्रवेश किया और दूसरे देशों को अपने देश में निवेश का द्वारा खोल दिया।

प्रश्न 14.
चीनी अर्थव्यवस्था की कुछ कमियों की ओर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
चीनी अर्थव्यवस्था की कमियां-यद्यपि चीनी अर्थव्यवस्था में अद्भुत सुधार हुआ है परंतु अब भी इसकी अनेक कमियां हैं जो निम्नलिखित है –

  1. सुधारों का लाभ सभी लोगों को नहीं प्राप्त हो सका है। चीनी में बेरोजगारी बढ़ी है और लगभग 10 करोड़ लोग बेरोजगार है।
  2. यहां महिलाओं को काम नहीं मिलता है और भारी संख्या में बेरोजगार है।
  3. पर्यावरण को काफी नुकसान हुआ है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है।
  4. आर्थिक विषमता को बढ़ावा मिला है। गांव और शहर तथा तटीय और मुख्य भूमि पर रहने वाले लोगों के बीच आर्थिक फासला बढ़ता जा रहा है।

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प्रश्न 15.
क्या क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर चीन आर्थिक शक्ति बनकर उभरा है, विवेचन कीजिए।
उत्तर:
आर्थिक शक्ति के रूप में चीन का उभार –

  1. वस्तुतः आर्थिक दृष्टि से सभी देश चीन को लोहा मानने लगे हैं। इसका कारण चीन की अर्थव्यवस्था का बाहरी दुनिया से जुड़ाव और पारस्परिक निर्भरता है।
  2. चीन का अपने व्यावसायिक साझीदारों पर जबर्दस्त प्रभाव है। इसीलिए जापान, अमरीका आसियान और रूस आदि सभी चीन से व्यापार करना चाहते है और अपनी विवादों को भुला चुके हैं।
  3. ऐसी आशा की जा रही है कि चीन और ताइवान से मतभेद समाप्त हो जायेंगे और ताइवान इसकी अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ जायेगा। इससे
  4. चीन की आर्थिक स्थिति और मजबूत हो जायेगी।
  5. 1997 को वित्तीय संकट के बाद आसियान देशों को अर्थव्यवस्था को संभालने में चीन का उभार काम आया है।
  6. चीन ने लेटिन अमरीका और अफ्रीका में निवेश और मदद की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

प्रश्न 16.
ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत और चीन के संबंधों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

  1. ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत और चीन में घनिष्ट संबंध नहीं था और एक दूसरे को सामानान्तर विकास करते रहे और महाशक्ति के रूप को कार्य करते रहे तथा दोनों का प्रभाव क्षेत्र लगभग बराबर था।
  2. चीन का कई पड़ोसी देशों पर अधिकार था। वे उसका प्रभुत्व स्वीकार करते थे और उसे भेंट देते थे तथा शांति से रहते थे।
  3. चीनी राजवंशों ने लंबे समय तक शासन किया और मंगोलिया, कोरिया, हिंदचीन और तिब्बत उसके अधीन थे। भारत में अनके राजवंशों ने शासन किया और उनके अपने साम्राज्य विस्तृत थे। कई अन्य देश भी भारतीय साम्राज्य में शामिल थे।
  4. भारत और चीन दोनों का अपने साम्राज्य में राजनैतिक प्रभाव के साथ-साथ आर्थिक धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव भी था।
  5. दोनों शक्तिशाली देश थे परंतु प्रभाव-क्षेत्र को लेकर कभी आपस में नही टकराये। फलस्वरूप दोनों को एक दूसरे के विषय में अधिक जानकारी नहीं थी।

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प्रश्न 17.
जापान की प्रमुख राजनैतिक और आर्थिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जापान की प्रमुख राजनैतिक और आर्थिक विशेषतायें:-

  1. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् जापान ने बड़ी तेजी से उन्नति की है। उसकी अर्थव्यवस्था विश्व की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है। एशिया महाद्वीप के देशों में अकेला जापान ही समूह 8(G-8) के देशों में शामिल है।
  2. परमाणु बम की भयंकरता झेलने वाला जापान एकमात्र देश है।
  3. जापान संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट में 20% का योगदान देता है। इसी दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा देश है।
  4. उसकी सेना अत्याधिक शक्तिशाली है। उसका सैन्य व्यय 10% है।
  5. 1951 से जापान का अमरीका के साथ सुरक्षा गठबंधन है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत और चीन के संबंधों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
भारत और चीन का संबंध-भारत-चीन संबंध प्राचीन काल में ही स्थापित हो गये थे। ईसा पूर्व से ही भारत और चीन में व्यापारी आने-जाने लगे थे और बौद्ध धर्म के प्रचार और प्रसार के साथ ही संबंध और अधिक घनिष्ठ हो गये। लेकिन बाद में मुगलकाल और ब्रिटिश काल में इन संबंधों में शिथिलता आ गई। सन 1949 में चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई और भारत उसे मान्यता देने वाले प्रथम देशों में एक था। उसके पश्चात् काफी समय तक चीन व भारत के संबंध मित्रतापूर्ण रहे।

सन् 1962 में चीन ने सीमा विवाद को लेकर भारत पर अचानक ही आक्रमण कर दिया और नेफा (NEFA) तथा लद्दाख के एक बहुत बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। यह क्षेत्र आज तक चीन के अधिकार में है। चीन के इस कार्य की समस्त संसार ने निंदा की और भारत को कई देशों से सहायता प्राप्त हुई। इसके परिणामस्वरूप 21 नबम्बर 1962 को चीन ने स्वयं ही अपनी ओर से युद्ध-बंदी की घोषणा कर दी। 10 दिसंबर, 1962 को कोलम्बों में दोनों देशों के बीच शांति स्थापना के कुछ सुझाव पेश किए परंतु चीन ने उन्हें अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार दोनों के संबंध बहुत ही तनावपूर्ण रहे।

सन् 1976 तक भारत तथा चीन के आपसी संबंध तनावपूर्ण रहे। उस वर्ष चाऊ-एन-लाई तथा माऊ (Mao) दोनों की मृत्यु हो गई जिसक पश्चात् दोनों देशों के संबंधों में कुछ सुधार हुआ। 15 अप्रैल, 1976 को श्री के. आर. नारायण को बीजिंग में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया और चीन ने भी नई दिल्ली ने अपना राजदूत भेजा।

सन् 1980 में इंदिरा गांधी दोबारा प्रधानमंत्री बनी और उन्होंने चीन के साथ भारत संबंधों को सुधारने का प्रयत्न जारी रखा। 15 अगस्त, 1984 को भारत तथा चीन के बीच एक व्यापार संबंधी समझौता हुआ। सन् 1986 में दोनों देशों के बीच सीमा-विवाद को हल करने के लिए फिर बातचीत हुई परंतु इसका कोई विशेष परिणाम नहीं निकला सन् 1988 में भारत में प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी पांच दिन की यात्रा पर चीन पहुंचे। पिछले लगभग 34 वर्षों में किसी भी प्रधानमंत्री की यह पहली चीन यात्रा थी। सन् 1989 में दोनों देशों के संयुक्त कार्यदल की बैठक हुई। उसी वर्ष चीन के उपप्रधानमंत्री भारत आए और उन्होनें भारतीय नेताओं के साथ बातचीत की।

सन् 1991 के अंतिम दिनों में चीन के प्रधानमंत्री ली पेंग (Li-Peng) भारत की 6 दिन की यात्रा पर आए और दोनों देशों के बीच समझौते किए गए।

  1. सीमा विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने का निर्णय लिया गया।
  2. व्यापार संबंधी समझौता किया गया।
  3. मुंबई तथा संघाई में राजदूत कार्यालय खोलने का समझौता किया गया।

1999 में भारत और चीन के बढ़ते व्यापार की दर (30% प्रतिवर्ष) से दोनों प्रभावित हुए है और दोनों में मधुरता आई है। भारत और चीन के बची 1992 का 33 करोड़ 80 लख डॉलर का व्यापार 2006 में बढ़कर 18 हजार अरब डॉलर हो चुका है। दोनों की विश्व व्यापार संगठन के प्रति समान नीतियां है। 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के प्रति चीन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। चीन ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा से सैनिक संबंध से भारत को थोड़ी किरकिरी जरूर है। दोनों देशों के बीच नेताओं और अधिकारियों का आवागमन जारी हे और सीमा-विवाद के विषय में बातचीत चल रही है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तिथि के हिसाब से इन सबको क्रम दें –
(क) विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश
(ख) यूरपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना
(ग) यूरोपीय संघ की स्थापना
(घ) आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना
उत्तर:
(क) विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश
(ख) यूरपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना
(ग) यूरोपीय संघ की स्थापना।
(घ) आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थाना

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प्रश्न 2.
तिथि के हिसाब से निम्न सभी को ठीक क्रम दें –
(क) चीन ने भारत पर आक्रमण किया।
(ख) शीतयुद्ध का अंत हुआ।
(ग) दो ध्रुवीय व्यवस्था टूट गई।
(घ) यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना हुई।
उत्तर:
(क) चीन ने भारत पर आक्रमण किया
(ख) शीतयुद्ध का अंत हुआ
(ग) दो ध्रुवीय व्यवस्था टूट गई
(घ) यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना हुई

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प्रश्न 3.
‘आसियान वे’ या आसियान शैली क्या है?
(क) आसियान के सदस्य देशों की जीवन शैली है
(ख) आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज का स्वरूप है
(ग) आसियान सदस्यों की रक्षा नीति है
(घ) सभी आसियान सदस्य देशों को जोड़ने वाली सड़क है
उत्तर:
(ख) आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज का स्वरूप है

प्रश्न 4.
सार्क अथवा दक्षेस क्या है?
(क) यह राष्ट्रसंघ लीग ऑफ नेशन्स का एक अंग (Organ) था जो समाप्त हो गया है
(ख) यह संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO) की एक एजेंसी है
(ग) यह एक दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन अथवा संघ है
(घ) यह भारत और चीन का सैन्य गुट है
उत्तर:
(ग) यह एक दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन अथवा संघ है

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प्रश्न 5.
मार्शल योजना के नाम से जाना जाता है –
(क) संयुक्त राज्य अमेरिका ने द्वितीय महायुद्ध के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन है के लिए जो जबरदस्त मदद की थी
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका ने यूरोपीय देशों पर जो अपना सैन्य वर्चस्व स्थापित किया था।
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका ने जो यूरोपीय देशों पर अपना सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित किया था।
(घ) उपर्युक्त में कोई नहीं।
उत्तर:
(क) संयुक्त राज्य अमेरिका ने द्वितीय महायुद्ध के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन है के लिए जो जबरदस्त मदद की थी

प्रश्न 6.
इसमें किसने ‘खुले द्वार’ की नीति अपनाई?
(क) चीन
(ख) यूरोपीय संघ
(ग) जापान
(घ) अमेरिका
उत्तर:
(क) चीन

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प्रश्न 7.
यूरोपीय संघ के झंडे में सितारों की संख्या है –
(क) 20
(ख) 12
(ग) 30
(घ) 5
उत्तर:
(ख) 12

प्रश्न 8.
रिक्त स्थानों को भरें –
(क) 1992 में भारत और चीन के बीच ……….. और ……… को लेकर सीमावर्ती लड़ाई हुई थी।
(ख) आसियान क्षेत्रीय मंच के कामों में …………. और कामा म …………….. और …………….. करना शामिल है।
(ग) चीन 1972 में …………. के साथ दोतरफा सम्बन्ध शुरू करके अपना एकांतवास समाप्त किया।
(घ) ………… योजना के प्रभाव से 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना
(ङ) ………….. आसियान का एक स्तम्भ है जो इसके सदस्य देशों की सुरक्षा के मामले देखता है।
उत्तर:
(क) अरुणाचल, लद्दाख
(ख) आर्थिक विकास तेज करना, सामाजिक और सांस्कृतिक प्राप्त
(ग) अमेरिका
(घ) मार्शल
(ङ) सुरक्षा समुदाय

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प्रश्न 9.
यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना हुई –
(क) 1957 में
(ख) 1992 में
(ग) 2005 में
(घ) 2006 में
उत्तर:
(क) 1957 में

प्रश्न 10.
दक्षेस की स्थापन कब हुई?
(क) 1985 में
(ख) 1980 में
(ग) 1990 में
(घ) 2008 में
उत्तर:
(क) 1985 में

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प्रश्न 11.
पूर्वी जर्मनी में लोगों ने बर्लिन दीवार गिराई थी –
(क) 1946 ई. में
(ख) 1947 ई. में
(ग) 1989 ई. में
(घ) 1991 ई. में
उत्तर:
(ग) 1989 ई. में

प्रश्न 12.
लेनिन का जीवन काल माना जाता है –
(क) 1870-1924
(ख) 1870-1954
(ग) 1870-1934
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(क) 1870-1924

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प्रश्न 13.
दक्षिण एशिया में सबसे बड़ा देश कौन सा है?
(क) भारत
(ख) पाकिस्तान
(ग) श्रीलंका
(घ) बाग्लादेश
उत्तर:
(क) भारत

प्रश्न 14.
पहला परमाणु परीक्षण भारत में कब किया गया था?
(क) 1971
(ख) 1974
(ग) 1980
(घ) 1985
उत्तर:
(ख) 1974

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प्रश्न 15.
सार्क का गठन कब हुआ?
(क) 1980
(ख) 1985
(ग) 1990
(घ) 1995
उत्तर:
(ख) 1985

प्रश्न 16.
सार्क के सदस्य देशों में निम्नलिखित में कौन नहीं है?
(क) मालदीव
(ख) श्रीलंका
(ग) नेपाल
(घ) म्यांमार
उत्तर:
(घ) म्यांमार

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प्रश्न 17.
चीन द्वारा विदेश व्यापार हेतु खुले द्वार की नीति कब अपनाई गई?
(क) 1975
(ख) 1978
(ग) 1985
(घ) 1990
उत्तर:
(ख) 1978

प्रश्न 18.
विश्व मानवाधिकार दिवस कब मनाया जाता है?
(क) 26 जनवरी
(ख) 15 अगस्त
(ग) 1 मई
(घ) 10 दिसम्बर
उत्तर:
(घ) 15 अगस्त

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प्रश्न 19.
साम्यवादी चीन का उदय कब हुआ?
(क) 1949
(ख) 1939
(ग) 1957
(घ) 1849
उत्तर:
(क) 1949

प्रश्न 20.
दक्षिण एशिया में सबसे बड़ा देश कौन-सा है?
(क) भारत
(ख) पाकिस्तान
(ग) श्रीलंका
(घ) बाग्लादेश
उत्तर:
(घ) पाकिस्तान

II. मिलान वाले प्रश्न एवं उनके उत्तर

निम्नलिखित सतंभ (अ) का मिलान स्तंभ (ब) से कीजिए।
Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter - 4 सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र Part - 1 img 1
उत्तर:
(1) – (v)
(2) – (i)
(3) – (vi)
(4) – (vii)
(5) – (ii)
(6) – (iii)
(7) – (iv)

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

Bihar Board Class 12 Political Science पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
पर्यावरण के प्रति बढ़ते सरोकारों का क्या कारण है? निम्नलिखित में सबसे बेहतर विकल्प चुनें।
(क) विकसित देश प्रकृति की रक्षा को लेकर चिंतित हैं।
(ख) पर्यावरण की सुरक्षा मूलवासी लोगों और प्राकृतिक पर्यावासों के लिए जरूरी है।
(ग) मानवीय गतिविधियों से पर्यावरण को व्यापक नुकसान हुआ है और यह नुकसान खतरे की हद तक पहुँच गया है।
(घ) इनमें से कोई नही।
उत्तर:
(ग) मानवीय गतिविधियों से पर्यावरण को व्यापक नुकसान हुआ है और यह नुकसान खतरे की हद तक पहुँच गया है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित कथनों में प्रत्येक के आगे सही या गलत का चिह्न लगायें। ये कथन पृथ्वी-सम्मेलन के बारे में हैं –
(क) इनमें 170 देश, हजारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भाग लिया।
(ख) यह सम्मेलन संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में हुआ।
(ग) वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दों ने पहली बार राजनीतिक धरातल पर ठोस आकार ग्रहण किया।
(घ) यह महासम्मेलनी बैठक थी।
उत्तर:
(क) सत्य
(ख) सत्य
(ग) सत्य
(घ) असत्य

प्रश्न 3.
“विश्व की साझी विरासत” के बारे में निम्नलिखित में कौन से कथन सही हैं?
(क) धरती का वायुमंडल, अंटार्कटिक, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष को ‘विश्व की साझी विरासत’ माना जाता है।
(ख) ‘विश्व की साझी विरासत’ किसी राज्य के संप्रभु क्षेत्राधिकार में नहीं आते।
(ग) “विश्व की साझी विरासत’ के प्रबंधन के सवाल पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच विभेद है।
(घ) उत्तरी गोलार्द्ध के देश ‘विश्व की साझी विरासत’ को बचाने के लिए दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों से कहीं ज्यादा चिंतित हैं।
उत्तर:
(क) सत्य
(ख) सत्य
(ग) सत्य
(घ) असत्य

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प्रश्न 4.
रियो सम्मेलन के क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
रियो सम्मेलन के परिणाम –

  1. रियो सम्मेलन से यह निष्कर्ष निकला कि विश्व के धनी देश और विकसित देश (उत्तरी गोलार्द्ध) और विकासशील देश (दक्षिणी गोलार्द्ध) पर्यावरण के अलग-अलग मुद्दों के समर्थक हैं।
  2. उत्तरी देशों के मुख्य चिंता ओजोन परत की छेद और वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming) को लेकर थी। जबकि दक्षिणी देश आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को सुलझाने के लिए ज्यादा चिंतित थे।
  3. रियो सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और वानिकी के संबंध में कुछ नियमाचार निर्धारित हुए।
  4. इसमें ‘अजेंडा-21’ के रूप में विकास के कुछ तौर तरीके से सुझाए गए।
  5. सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि आर्थिक वृद्धि में पर्यावरण को क्षति न पहुँचे।

प्रश्न 5.
‘विश्व की साझी विरासत’ का क्या अर्थ है? इसका दोहन और प्रदूषण कैसे होता है?
उत्तर:
विश्व की साझी विरासत –

  1. विश्व के कुछ भाग और क्षेत्र किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं।
  2. इनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है । इन्हें ही साझी विरासत या वैश्विक संपदा कहते हैं।
  3. इनमें पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं।

विश्व की साझी विरासत का दोहन और प्रदूषण के तरीके –

  1. पृथ्वी के उपरी वायुमंडल में ओजोन गैस की मात्रा में निरंतर कमी हो रही है। वस्तुतः ऐसा औद्योगीकरण के कारण है। पश्चिमी देशों का इस कार्य में अधिक हाथ रहा है।
  2. अंटार्कटिक क्षेत्र के कुछ हिस्से अवशिष्ट पदार्थ जैसे तेल के रिसाव के दबाव में अपनी गुणवत्ता खो रहे हैं।
  3. सम्पूर्ण विश्व में समुद्री तटों पर प्रदूषण बढ़ रहा है। इसका तटवर्ती जल जमीन क्रियाकलाप से प्रदूषित हो रहा है।
  4. अंतरिक्ष में विभिन्न देश तेजी से प्रयोग कर रहे हैं और उसे प्रदूषित कर रहे हैं।

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प्रश्न 6.
‘साझी जिम्मेवारी लेकिन अलग-अलग भूमिकाएं’ से क्या अभिप्राय है। हम इस विचार को कैसे लागू कर सकते हैं?
उत्तर:
साझी जिम्मेवारी लेकिन अलग-अलग भूमिकायें एवं लागू करने के तरीके:
राष्ट्र संघ नियमाचार (UNFCC-1992) में बताया गया कि इस संधि को स्वीकार करने वाले देश अपनी क्षमता के अनुरूप पर्यावरण के अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधार पर साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेवारी निभाते हुए पर्यावरण की सुरक्षा के प्रयास करेगें। इस बात पर सभी देश सहमत थे कि ऐतिहासिक रूप से भी और मौजूदा समय में भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे अधिक हिस्सा विकसित देशों में ग्रीन हाउस गैसों का है।

यह बात भी स्वीकार की गई है कि विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है। इस कारण चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों को क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है। विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज्यादा है और इन देशों के पास पर्याप्त प्रौद्योगिकी एवं वित्तीय संसाधन है ऐसे में टिकाऊ विकास के अंतर्राष्ट्रीय आयाम में विकसित देश अपनी विशेष जिम्मेदारी स्वीकार करेगें।

प्रश्न 7.
वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे सन् 1990 के दशक से विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार क्यों बन गए हैं?
उत्तर:
वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार:
वैश्विक पर्यावरण को विभिन्न कारणों विभिन्न प्रकार की हानि उठानी पड़ रही है जिसका असर सभी देशों पर पड़ रहा है। इसलिए वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार बन गए हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और अधिकांश स्थानीय स्तर पर सक्रिय हैं। हैं। ये आंदोलन ताकतवर सामाजिक आंदोलन का रूप धारण कर रहे हैं। भारत सहित अनेक देशों के वन आंदोलन पर पर्याप्त दबाव है।

यद्यपि खनिज उद्योग विश्व अर्थयवस्था का एक प्रमुख अंग है परंतु बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कारण इससे पर्यावरण को भारी क्षति हुई है। इससे भूमि और जलमार्ग प्रदूषित हुआ है और स्थानीय वनस्पतियों की कमी हुई है। इसी प्रकार के आंदोलन बांधों के खिलाफ चल रहे हैं। वस्तुतः अनेक देशों में बांधों के निर्माण की होड़ लगी हुई है। भारत में विरोधी और नदी प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं जिसमें नर्मदा आंदोलन प्रसिद्ध है।

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

प्रश्न 8.
पृथ्वी को बचाने के लिए जरूरी है कि विभिन्न देश सुलह और सहकार की नीति अपनाएं। पर्यावरण के सवाल पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच जारी वार्ताओं की रोशनी में इस कथन की पुष्टि करें।
उत्तर:
पृथ्वी को बचाने के लिए विभिन्न देशों की सुलह और सहकार की नीति-पृथ्वी को बचाने के लिए उत्तर और दक्षिण के देशों के बीच सुलह और सहकार की नीति होनी चाहिए। हालांकि दोनों (उत्तर और दक्षिण के देश) यह जिम्मेदारी एक-दूसरे पर थोपना चाहते हैं। उत्तर के देशों का कहना है कि पृथ्वी को बचाने में सभी देशों का योगदान होना चाहिए। इसके विपरित दक्षिण के देशों का कहना है कि ओजोन परत में उत्सर्जन उत्तरी देशों के अधिक औद्योगीकरण के कारण हुआ है और उनके पास भरपूर संसाधन हैं। इसलिए पृथ्वी को बचाने में उनका अधिक योगदान होना चाहिए। इन विवादों के प्रकाश में विभिन्न देशों के बीच 1992 में क्योटो प्रोटोकॉल नामक समझौता हुआ जिस पर सभी देशों की सहमति 1997 में हुई। इस समझौते के लिए कुछ सिद्धांत निर्धारित किये गये और सिद्धांत की इस रूपरेखा पर सहमति जताते हुए विभिन्न देशों के हस्ताक्षर हुए।

प्रश्न 9.
विभिन्न देशों के सामने सबसे गंभीर चुनौती वैश्विक पर्यावरण को आगे कोई नुकसान पहुंचाए बगैर आर्थिक विकास करने की है। यह कैसे हो सकता है? कुछ उदाहरणों के साथ समझाएँ।
उत्तर:
रियो सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि आर्थिक वृद्धि से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। इसे टिकाऊ विकास का तरीका कहा गया परंतु समस्या यह है कि यह कैसे हो सकता है। कुछ आलोचकों का कहना है कि एजेंडा-21 का झुकाव पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करने के बजाए आर्थिक वृद्धि की ओर है। वस्तुतः आर्थिक वृद्धि को रोके बिना पर्यावरण को बचाने का उपाय करना चाहिए। इसके लिए विकल्पों पर विचार करना चाहिए। उदाहरण के लिए पेट्रोल के स्थान पर जल विद्युत जैसे साधनों का प्रयोग करना चाहिए। प्राकृतिक गैस के स्थान पर सौर ऊर्जा का विकास करना चाहिए।

Bihar Board Class 12 Political Science पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विश्व में खाद्य उत्पादन की कमी के क्या कारण हैं?
उत्तर:

  1. विश्व के कृषि योग्य भूमि में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है जबकि मौजूदा उपजाऊ भूमि के एक बड़े हिस्से की उर्वरा शक्ति कम हो रही है।
  2. चरागाह समाप्त होने को हैं, मत्स्य भंडार घट रहा है। जलाशयों में प्रदूषण बढ़ रहा है।

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प्रश्न 2.
विश्व में स्वच्छ जल की क्या स्थिति है?
उत्तर:

  1. संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों की एक अरब 20 करोड़ जनता को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होता।
  2. साफ-सफाई की सुविधा से 30 लाख से अधिक बच्चे वंचित हैं। फलस्वरूप उनकी मौत हो जाती है।

प्रश्न 3.
ओजोन परत में छेद होना क्या है?
उत्तर:

  1. पृथ्वी की ऊपरी वायुमंडल में ओजोन गैस की मात्रा में लगातार कमी हो रही है। इसे ओजोन परत में छेद होना भी कहते है।
  2. इससे परिस्थितिकी तंत्र और मनुष्य के स्वास्थ्य पर एक वास्तविक खतरा मंडरा रहा है।

प्रश्न 4.
अकाल के लोगों की क्या समस्या है?
उत्तर:

  1. अकाल के निकटवर्ती क्षेत्र में बसे हजारों लोगों को घरबार छोड़ना पड़ा, क्योंकि पानी के विषाक्त होने से मत्स्य उद्योग नष्ट हो गया। जहाज रानी उद्योग और इससे जुड़े सभी कार्य खत्म हो गये।
  2. वस्तुतः पानी में नमक की सान्द्रता के बढ़ जाने से पैदावार कम हो गई। अनेक शोधों के पश्चात् इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता है।

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प्रश्न 5.
पर्यावरण की समस्याओं के अध्ययन के लिए क्या किया गया है?
उत्तर:

  1. संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Enviroment Programme- UNEP) सहित अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं पर सम्मेलन कराये।
  2. इस विषय पर अध्ययन को बढ़ावा देना शुरू किया गया। इस प्रयास का उद्देश्य पर्यावरण की समस्याओं पर अधिक कारगर और सुलक्षी हुई पहलकदमियों की शुरूआत करना था।

प्रश्न 6.
पृथ्वी सम्मेलन या रियो सम्मेलन क्या है?
उत्तर:

  1. 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ का पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर केन्द्रित एक सम्मेलन ब्राजील के रियो डी जनेरियो में हुआ। इसे पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) कहा जाता है।
  2. वैश्विक राजनीति के क्षेत्र में पर्यावरण को लेकर बढ़ते सरोकारों को इस सम्मेलन में एक ठोस रूप मिला।

प्रश्न 7.
टिकाऊ विकास का तरीका क्या है?
उत्तर:

  1. 1992 के रियो सम्मेलन में यह सहमति बनी कि आर्थिक वृद्धि से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। इसे टिकाऊ विकास का तरीका कहा गया।
  2. परंतु समस्या यह थी कि ‘टिकाऊ विकास’ का क्रियान्वयन किस प्रकार किया जाए, क्योंकि इस सम्मेलन ‘अजेंडा-21’ का झुकाव पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करने के बजाय आर्थिक वृद्धि की ओर था।

प्रश्न 8.
वैश्विक सम्पदा या मानवता की साझी विरासत से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. विश्व के कुछ हिस्से और क्षेत्र किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं। इसलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है। इन्हें वैश्विक सम्पदा या मानवता की साझी विरासत कहा जाता है।
  2. इसके अंतर्गत पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं। इस सम्पदा की सुरक्षा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा की जाती है।

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प्रश्न 9.
वैश्विक सम्पदा की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से समझौते हुए हैं?
उत्तर:

  1. अंटार्कटिक संधि (1959)
  2. मांट्रियल न्यायाचार अथवा प्रोटोकॉल (1987)
  3. अंटार्कटिक पर्यावरणीय न्यायाचार अथवा प्रोटोकॉल (1991)

प्रश्न 10.
अंटार्कटिक महादेश का विस्तार बताइये।
उत्तर:

  1. इसका क्षेत्र 1 करोड़ 40 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यहां विश्व का निर्जन क्षेत्र 26% है।
  2. स्थलीय हिम का 90% हिस्सा और धरती पर मौजूद जल का 70% इस महादेश में मौजूद है। अंटार्कटिक महादेश का 3 करोड़ 60 लाख वर्ग किलोमीटर तक अतिरिक्त विस्तार समुद्र में है।

प्रश्न 11.
पर्यावरणीय शरणार्थी का क्या अर्थ है?
उत्तर:

  1. अफ्रीका के कुछ देशों के लोगों को पर्यावरणीय शरणार्थी कहा गया है। खेती के अभाव के कारण उन्हें अपना घरबार छोड़ना पड़ा और उन्होंने दूसरी जगह जाकर शरण ली।
  2. वस्तुत: उस क्षेत्र में 1970 के दशक में भीषण अनावृष्टि हो गयी जिससे वहाँ की भूमि बंजर हो गयी और उसमें दरार पड़ गयी।

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प्रश्न 12.
ग्लोबल वार्मिग के परिणाम बतायें।
उत्तर:

  1. ग्लोबल वार्मिग या वैश्विक तापवृद्धि का अर्थ विश्व में तापमान में वृद्धि। यह कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन और हाइड्रो फ्लोरो कार्बन आदि गैंसे इसके कारण हैं।
  2. विश्व का तापमान बढ़ने से धरती के जीवन के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है। विभिन्न देश इस संबंध में वार्तालाप कर रहे हैं। क्योटो प्रोटोकॉल नामक समझौते में विभिन्न देशों की सहमति बन गई है।

प्रश्न 13.
साझी सम्पदा का क्या अर्थ है?
उत्तर:

  1. साझी सम्पदा ऐसी सम्पदा होती है जिस पर किसी समूह के प्रत्येक सदस्य का स्वामित्व हो।
  2. इसके पीछे मूल तर्क यह है कि ऐसे संसाधन की प्रकृति, उपयोग के स्तर और रख-रखाव के संदर्भ में समूह के प्रत्येक सदस्य को समान अधिकार प्राप्त होगें और समान उत्तर दायित्व निभाने होंगें।

प्रश्न 14.
ग्रुप-8 की जून 2005 की बैठक में भारत ने किन-किन बातों का उल्लेख किया।
उत्तर:

  1. भारत ने उल्लेख किया कि विकासशील देशों की प्रति व्यक्ति ग्रीन हाउस गैस की उत्सर्जन दर विकसित देशों की तुलना में नाममात्र है।
  2. साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेवारी के सिद्धांत के अनुरूप भारत का विचार है कि उत्सर्जन दर में कमी करने की सबसे अधिक जिम्मेदारी विकसित देशों की है, क्योंकि इन देशों ने एक लंबी अवधि से बहुत अधिक उत्सर्जन किया है।

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प्रश्न 15.
भारत की ग्रीन हाउस के उत्सर्जन दर का विवरण दीजिए।
उत्तर:

  1. 2000 तक भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर 0.9 टन था। अनुमान है कि 2030 तक यह मात्रा बढ़कर 1.6 टन प्रति व्यक्ति हो जायेगी।
  2. भारत का यह उत्सर्जन दर विश्व के वर्तमान (2000) औसत 3.8 टन प्रति व्यक्ति से बहुत कम है। इसलिए भारत क्योटो प्रोटोकॉल के नियमों को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

प्रश्न 16.
‘फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज’ की मौजूदा प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए भारत की क्या मांग है?
उत्तर:

  1. विकासशील देशों को रियायती शर्तो पर नये और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन तथा पर्यावरण के संदर्भो में बेहतर साबित होने वाली प्रौद्योगिकी मुहैया कराने की दिशा में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है।
  2. भारत की मांग है कि विकसित देश विकासशील देशों को वित्तीय संसाधन तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकी मुहैया कराने के लिए तुरंत उपाय करें ताकि विकासशील देश फ्रेमवर्क ऑन क्लाईमेट चेंज की मौजूदा प्रतिबद्धताओं को पूरा कर सके।

प्रश्न 17.
दक्षिणी देशों के वन आंदोलन की क्या कमी रही है?
उत्तर:

  1. अनेक दक्षिणी देशों-भारत, मैक्सिको, चिली ब्रांजील, मलेशिया, इंडोनेशिया, अफ्रीका आदि में वन आंदोलन चल रहे हैं, परंतु इन पर बहुत दबाव है।
  2. तीन दशकों से पर्यावरण को लेकर सक्रियता का दौर जारी है। इसके बावजूद तीसरी दुनिया के विभिन्न देशों में वनों की कटाई खतरनाक गति से जारी है। पिछले दशक में बचे खुचे विशालतम वनों का विनाश बढ़ा है।

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प्रश्न 18.
वनों के विजनपन का क्या अर्थ है?
उत्तर:

  1. उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में वन जनविहिन हैं। अर्थात् मानव और पक्षियों आदि का अभाव-सा है। इसे वनों का विजनपन कहते हैं जो पर्यावरण के लिए खतरनाक स्थिति है।
  2. वनों का विजनपन आस्ट्रेलिया, स्केडिनेविया, उत्तरी अमरीका और न्यूजीलैंड में हावी हैं। वनों के विजनपन को दूर करने के लिए वनों की प्रजातियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।

प्रश्न 19.
शीतयुद्ध के दौरान उत्तरी गोलार्द्ध के विकसित देशों ने संसाधनों का शोषण करने के लिए क्या-क्या उपाय अपनाये?
उत्तर:

  1. इसके अंतर्गत संसाधन दोहन के इलाकों तथा समुद्री परिवहन मार्गो के आसपास सेना की तैनाती महत्त्वपूर्ण संसाधनों का भंडारण किया।
  2. इसके अलावा संसाधनों के उत्पादक देशों में मनचाही सरकार स्थापित करवायी, बहुराष्ट्रीय निगमों और अपने हितसाधक अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का समर्थन किया।

प्रश्न 20.
मूलवासी कौन लोग हैं?
उत्तर:

  1. किसी देश के मूलवासी वे लोग हैं जो उस देश में एक लंबे समय से निवास कर रहे हैं।
  2. मूलवासी आज भी उस देश की संस्थाओं के अनुरूप आचरण करने से ज्यादा अपनी परंपरा, सांस्कृतिक रिवाज तथा अपने खास सामाजिक, आर्थिक ढर्रे पर जीवन यापन करना पसंद करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राकृतिक वनों से क्या लाभ है? वैश्विक राजनीति में इनसे संबंधित चिंतायें क्या हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक वनों से लाभ –

  1. ये जलवायु को संतुलित करने में सहायता करते हैं।
  2. इनसे जल चक्र भी संतुलित रहता है।
  3. वनों में जैव विविधता का भंडार भरा पड़ा है।
  4. इनसे इमारती लकड़ी और अन्य बहुमूल्य लकड़ियां मिलती हैं।

संबंधित चिंतायें:

(क) वनों की कटाई तेजी से हो रही है।
(ख) फलस्वरूप वनों के जीव जंतु विस्थापित हो रहे हैं। जैव विविधता की हानि जारी है।
(ग) वनों के कटने से बाढ़ की संभावनायें बढ़ गई हैं।
(घ) जलवायु असंतुलित होती जा रही है।

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प्रश्न 2.
ऑवर कॉमन फ्यूचर रिपोर्ट (1987) की मुख्य बातें क्या हैं?
उत्तर:
ऑवर कॉमन फ्यूचर रिपोर्ट (1987) की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं –

  1. रिपोर्ट में चेताया गया था कि आर्थिक विकास के मौजूदा तरीके स्थायी नहीं रहेंगें।
  2. विश्व के दक्षिणी देशों में औद्योगिक विकास की मांग अधिक तेज है और रिपोर्ट में इसी हवाले से चेतावनी दी गई थी।
  3. रियो सम्मेलन में यह बात खुलकर सामने आयी कि विश्व के धनी और विकसित देशों तथा गरीब और विकासशील देशों का पर्यावरण के संबंध में अलग-अलग दृष्टिकोण है।
  4. दक्षिणी देश आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को सुलझाने के लिए ज्यादा चिंतित थे।

प्रश्न 3.
अंटार्कटिका पर किसका स्वामित्व है?
उत्तर:

  1. अंटार्कटिक विश्व का सबसे सुदूर महादेश है। इसका इलाका 1 करोड़ 40 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।
  2. प्रश्न उठता है कि इस पर किसका स्वामित्व है। इस संबंध में दो दावे किये जाते हैं।
  3. कुछ देश जैसे-ब्रिटेन, अर्जेन्टाइना, चिली, नार्वे, फ्रांस, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने अंटार्कटिक क्षेत्र पर अपने संप्रभु अधिकार का वैधानिक दावा किया है।
  4. अन्य अधिकांश देशों ने इससे उल्टा रूख अपनाया कि अंटार्कटिक प्रदेश विश्व की साझी संपदा है और यह किसी भी क्षेत्राधिकार में शामिल नहीं है।

इस मतभेद के रहते हुए अंटार्कटिक के पर्यावरण और परिस्थिति तंत्र की सुरक्षा के नियम बनाये गये और उन्हें अपनाया गया। अंटार्कटिक और पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्र पर्यावरण सुरक्षा के विशेष क्षेत्रीय नियमों के अंतर्गत आते हैं।

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प्रश्न 4.
पर्यावरण को लेकर उत्तरी गोलार्द्ध के देशों और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों की दृष्टि में क्या अंतर है?
उत्तर:
पर्यावरण को लेकर उत्तरी गोलार्द्ध के देशों और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में अंतर –

  1. उत्तरी गोलार्द्ध के विकसित देश पर्यावरण के मुद्दे पर उसी रूप में चर्चा करना चाहते हैं जिस दशा में पर्यावरण आज मौजूद है। ये देश चाहते है कि पर्यावरण के संरक्षण में प्रत्येक देश की जिम्मेदारी बराबर हो।
  2. दक्षिणी गोलार्द्ध के देशो का कहना है कि विश्व में पारिस्थितिकी को क्षति बहुत अधिक विकसित देशों के औद्योगिक विकास से पहुंची है। यदि उत्तरी देशों ने पर्यावरण को अधिक क्षति पहुंचाई है, तो उन्हें इस हानि की भरपाई की जिम्मेदारी उठानी चाहिए।
  3. फिर विकासशील देश अभी औद्योगीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और जरूरी है कि उस पर वे प्रतिबंध न लगे जो विकसित देशों पर लगाये जाते हैं।
  4. इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण कानून के निर्माण, प्रयोग और व्याख्या में विकासशील देशों की विशिष्ट जरूरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
  5. 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में इस तर्क को मान लिया गया और इसे साझी उत्तरदायित्व परंतु पृथक्-पृथक् भूमिका सिद्धांत कहा गया।

प्रश्न 5.
रियो घोषणापत्र की मुख्य घोषणाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रियो घोषणापत्र की मुख्य घोषणाएँ:

  1. पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता और गुणवत्ता की बहाली, सुरक्षा और संरक्षण के लिए विभिन्न देश विश्व बंधुत्व की भावना से आपस में सहयोग करेंगे।
  2. पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है। ऐसे में विभिन्न राज्यों का साझा परंतु पृथक् पृथक् उत्तरदायित्व होगा।
  3. विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव अधिक है और इन देशों के पास पर्याप्त प्रौद्योगिक एवं वित्तीय संसाधन हैं।
  4. टिकाऊ विकास के अंतर्राष्ट्रीय प्रयास में विकसित देश अपनी विशेष जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।

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प्रश्न 6.
1992 के जलवायु के परिवर्तन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमाचार (United Nations Framework Convention on Climate Change of 1992) at or धारायें बताइए।
उत्तर:
1992 के जलवायु के परिवर्तन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमाचार की मुख्य धारायें:

  1. इस संधि को स्वीकार करने वाले देश अपनी क्षमता के अनुसार, पर्यावरण के अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधार पर साझी परंतु पृथक्-पृथक् जिम्मेदारी निभाते हुए पर्यावरण की सुरक्षा के प्रयत्न करेंगे।
  2. इस नियमाचार को स्वीकार करने वाले देश इस बात पर सहमत थे कि ऐतिहासिक रूप से भी और मौजूदा समय में भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे अधिक हिस्सा विकसित देशों में ग्रीन हाउस गैसों का है।
  3. यह बात भी स्वीकार की गई कि विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है। इसलिए भारत, चीन और अन्य विकासशील देशों को क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है।
  4. 1992 में प्रोटोकॉल समझौते के लिए कुछ सिद्धांत निर्धारित किये गये थे और सिद्धांत की इस रूपरेखा अर्थात् जलवायु के परिवर्तन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमाचार पर सहमति प्रकट करते हुए हस्ताक्षर हुए थे।

प्रश्न 7.
क्योटो प्रोटोकॉल पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
क्योटो प्रोटोकॉल –

  1. क्योटो प्रोटोकॉल एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है।
  2. इसके अंतर्गत औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं।
  3. प्रोटोकॉल में यह भी माना गया है कि कार्बन डाईआक्साइड, मीथेन और हाइड्रो-फ्लोरो कार्बन जैसी कुछ गैसों के कारण वैश्विक तापवृद्धि होती है।
  4. यह भी कहा गया है कि वैश्विक तापवृद्धि की परिघटना में विश्व का तापमान बढ़ता है और पृथ्वी के जीवन के लिए खतरनाक हो सकती है।

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प्रश्न 8.
पावन वन प्रांतर से आप क्या समझते हैं? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. प्राचीन भारत में प्रकृति को देवता के रूप में स्वीकार किया गया है और उसकी सुरक्षा की प्रथा थी। इस प्रथा के सुंदर उदाहरण पावन वन प्रांतर हैं।
  2. कुछ वनों को काटा नही जाता था। इन स्थानों पर देवता अथवा किसी पुण्यात्मा को माना जाता है। इसे ही पावन-प्रांतर या देवस्थान कहा गया है।
  3. इन पावन वन प्रांतरों का राष्ट्रीय विस्तार है। इसकी पुष्टि विभिन्न भाषाओं के शब्दों से होती है। इन देव स्थानों को राजस्थान में बानी केकड़ी और ओरान, झारखंड में जहेरा थाव और सरन, मेघालय में लिंगदोह, उत्तराखंड में धान या देवभूमि आदि नामों से जाना जाता है।
  4. पर्यावरण संरक्षण से जुड़े साहित्य में देवस्थान के महवत को स्वीकार किया गया है।
  5. कुछ अनुसंधानकर्ताओं की राय है कि देवस्थान की मान्यता से जैव विविधता, पारिस्थितिक संतुलन के साथ सांस्कृतिक विविधता में भी सहायता मिल सकती है।

प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र संघ के जलवायु परिवर्तन से संबंधित नियमाचार (United Nations Framework Convention on Climate Change) में भारत कहां तक अनुकल है?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ की जलवायु परिवर्तन से संबंधित नियमाचार में भारत की अनुकूलता –

  1. भारत संयुक्त राष्ट्र संघ की जलवायु परिवर्तन से संबंधित नियमाचार के अनुरूप पर्यावरण से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय मसलों में अधिकांश तथा उत्तरदायित्व का तर्क रखता है।
  2. इस तर्क के अनुसार ग्रीन हाउस गैसों के रिसाव की जवाबदेही अधिकांशतया विकसित देशों की है।
  3. हाल में संयुक्त राष्ट्र संघ के इस नियमाचार के अंतर्गत यह बात उठी कि तेजी से औद्योगीकरण होते देश (ब्राजील, चीन और भारत) नियमाचार की बाध्यताओं का पालन करते हुए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करें।
  4. भारत इसके खिलाफ है। उसका कहना है कि यह बात इस नियमाचार की मूल भावना के विरुद्ध है। क्योंकि भारत का उत्सर्जन दर (2030 में लगभग 1.6 टन प्रति व्यक्ति) विश्व के वर्तमान उत्सर्जन दर (2000 में 3.8 टन प्रति व्यक्ति) से बहुत कम है।

प्रश्न 10.
भारत ने पर्यावरण सुरक्षा के संदर्भ में कौन-कौन से ठोस कदम उठाये हैं?
उत्तर:
भारत द्वारा पर्यावरण सुरक्षा के संदर्भ में उठाये गये ठोस कदम –

  1. भारत ने अपनी नेशनल ऑटो फ्यूडल पॉलिसी के अंतर्गत वाहनों के लिए स्वच्छ ईंधन अनिवार्य कर दिया है।
  2. 2001 में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम पारित हुआ। इसमें ऊर्जा के अधिक कारगर इस्तेमाल का प्रयास किया है।
  3. 2003 के बिजली अधिनियम में पुन: नवीनीकरण ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया है।
  4. हाल में प्राकृतिक गैस के आयात और स्वच्छ कोयले के उपयोग पर आधारित प्रौद्योगिकी को अपनाने की ओर रूझान बढ़ा है।
  5. भारत बायोडीजल से संबंधित एक राष्ट्रीय मिशन चलाने के लिए भी तत्पर है। इसके अंतर्गत 2011-12 तक बायोडीजल तैयार होने लगेगा।

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प्रश्न 11.
उत्तरी देशों के वनों और दक्षिणी देशों के वन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उत्तरी देशों के वनों और दक्षिणी देशों के वनों में अंतर –

  1. दक्षिणी देशों के वन निर्जन नहीं हैं जबकि उत्तरी देशों के वन जनविहीन हैं। अर्थात् यहां के वन को निर्जन प्रांत कहा जाता है।
  2. दक्षिणी देशों के लोग मनुष्य को प्रकृति का हिस्सा मानते हैं जबकि उत्तरी देशों के लोग ऐसा नहीं मानते अर्थात् वे पर्यावरण को मनुष्य से दूर की चीज मानते हैं।
  3. दक्षिणी देशों में पर्यावरण के अधिकांश मसले इस मान्यता पर आधारित है कि लोग वनों में भी रहते हैं। उत्तरी देशों में ऐसा नहीं है।
  4. उत्तरी देशों के लोगों का दृष्टिकोण आध्यात्मिक नहीं है जबकि दक्षिणी देशों के लोगों का दृष्टिकोण आध्यात्मिक है।

प्रश्न 12.
पर्यावरण की दृष्टि से खनिज उद्योग की आलोचना की गई है? विवेचन कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण की दृष्टि से खनिज उद्योग की आलोचना के कारण –

  1. वैश्विक अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के कारण दक्षिणी गोलार्द्ध के अनेक देशों की अर्थव्यवस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुल चुकी हैं।
  2. खनिज उद्योग के भीतर मौजूद संसाधनों को बाहर निकालता है।
  3. खनिज उद्योग रसायनों का भरपूर उपयोग करता है।
  4. यह भूमि और जलमार्गों को प्रदूषित करता है।
  5. खनिज उद्योग स्थानीय वनस्पतियों का विनाश करता है और इसके कारण जनसमुदाय को विस्थापित होना पड़ता है।
  6. आस्ट्रेलियाई बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘वेस्टर्न माइनिंग कारपोरेशन’ के खिलाफ कई संगठनों ने आंदोलन चलाया इस कंपनी की स्वयं अपने देश में भी आलोचना हो रही है।

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प्रश्न 13.
पश्चिमी देशों के राजनीतिक चिंतन का केन्द्रीय सरोकार क्या है?
उत्तर:
पश्चिमी देशों के राजनीतिक चिंतन का केन्द्रीय सरोकार:

  1. ये देश चाहते हैं कि उनका संसाधनों पर अबाध रूप से सत्ता बनी रहे, क्योंकि सोवियत संघ से उन्हें खतरा था।
  2. वे खाड़ी देशों में मौजूद तेल भंडार, दक्षिण और पश्चिम एशिया के देशों में मौजूद खनिज पर विकसित देशों का नियंत्रण बना रहे।
  3. शीतयुद्ध के पश्चात् ये देश सुरक्षित आपूर्ति को जारी रखना चाहते हैं।
  4. वे रेडियोधर्मी खनिजों पर भी नियंत्रण चाहते हैं।

प्रश्न 14.
स्वच्छ जल को लेकर विश्व राजनीति की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
स्वच्छ जल के संदर्भ में विश्व राजनीति –

  1. विश्व के कई भागों में स्वच्छ जल की कमी हो रही है। इस कारण ये देश चिंतित है।
  2. विश्व के प्रत्येक भाग में स्वच्छ जल का समान वितरण नहीं है। फिर कई नदियों में कई देश साझीदार हैं। ऐसे में उनके बीच प्रबल संघर्ष की संभावना है। इसको अब जलयुद्ध कहा जाने लगा है।
  3. जल-स्रोत से दूर बसे देशों को जल कम मात्रा में मिलता है और वह भी प्रदूषित जल होता है।
  4. उद्गम के निकट बसा देश बांध और सिंचाई आदि के माध्यम से जल की अत्याधिक मात्रा का प्रयोग करता है और वह नदी के जल को प्रदूषित भी करता है।
  5. देशों के बीच स्वच्छ जल संसाधनों को हथियाने अथवा उनकी सुरक्षा करने के लिए हिंसक झड़पें हुई हैं। इसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण 1950 और 1960 के दशक में इजराइल, सीरिया तथा जार्डन के बीच संघर्ष है। इनमें से प्रत्येक देश ने जार्डन और यारमुक नदी से पानी का बहाव मोड़ने की कोशिश की थी।

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प्रश्न 15.
विश्व राजनीति में मूलवासियों की क्या मांग है?
उत्तर:
विश्व राजनीति में मूलवासियों की मांग:

  1. किसी देश के मूलवासी ऐसे लोग हैं जो उस देश में लंबे समय से निवास कर रहे हैं और अपने सांस्कृतिक परंपरा में ही जीवित रहना चाहते हैं। वस्तुतः उनका अस्तित्व असुरक्षित हो गया है।
  2. विश्व राजनीति में मूलवासियों की आवाज विश्व बिरादरी में बराबरी का दर्जा पाने के लिए उठी है।
  3. मध्य और दक्षिण अमरीका, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, भारत, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के मूलवासियों की सरकारों से मांग है कि इन्हें मूलवासी कौम के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाला समुदाय माना जाय।
  4. मूलवासी अपने मूल निवास स्थान को खोना नहीं चाहते और वे उस पर अपना स्थायी अधिकार चाहते हैं।
  5. वे अपनी जमीन पर भी अधिकार रखना चाहते हैं, वस्तुत: यह उनका आर्थिक संसाधन भी है। इसकी हानि का तात्पर्य उनके जीवन को बहुत बड़ा खतरा है।

प्रश्न 16.
भारत में मूलवासियों की क्या स्थिति है?
उत्तर:
भारत में मूलवासियों की स्थिति –

  1. भारत में मूलंचासियों के लिए अनुसूचित जनजाति या आदिवासी शब्द का प्रयोग किया जाता है जो कुल जनसंख्या के 80% है।
  2. भारत के अधिकांश आदिवासी जीविका के लिए खेती पर निर्भर होते हैं। कुछ घुमन्तू भी हैं। वे अपने आसपास संपूर्ण भूमि पर खेती करते आ रहे हैं।
  3. संविधान में इनको राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हैं इन्हें संवैधानिक सुरक्षा भी मिली हुई है।
  4. देश के विकास का इनको ज्यादा लाभ नहीं मिल सका है और इनकी स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ है।
  5. विभिन्न परियोजनाओं के चलते इन्हें अपनी भूमि से हाथ धोना पड़ा है और ये विस्थापित हुए हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत में जनजातीय विकास के लिए उठाये गये कदमों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
भारत में जनजातीय विकास के लिए उठाये गये कदम-भारत में नया संविधान लागू होने के बाद अनुसूचित जाति के लोगों के विकास के कार्यक्रमों के साथ-साथ अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए भी विभिन्न योजनाएँ बनाई गई व कार्यक्रम लागू किए गए। पांचवीं योजना के दौरान जनजातीय विकास के लिए भी एक नयी योजना बनायी गई। इसके अनुसार जिन इलाकों में पचास प्रतिशत व इससे अधिक प्रतिशत जनजाति के लोग रहते हैं ऐसे क्षेत्रों में 19 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में उप-योजनाएं बनायी गयीं।

जनजातियों के विकास का कार्यक्रम द्विपक्षीय दृष्टिकोण पर आधारित है –

(क) जनजातियों के जीवन स्तर को उठाने के लिए विकास संबंधी क्रिया-कलापों की उन्नति।
(ख) कानूनी और प्रशासनिक सहायता द्वारा उनके हितों की सुरक्षा।

इस समय जनजातियों के विकास की परियोजना के अंतर्गत जनजाति उप-योजनाओं का विस्तार लगभग सभी राज्यों तथा केन्द्रशासित क्षेत्रों में है। इसका क्रियान्वयन 184 समेकित जनजाति विकास परियोजनाओं के माध्यम से जनजातियों के 277 आवास केन्द्रों में तथा 5000 की कुल आबादी वाले 32 समूहों अथवा जनजाति केन्द्रित 50 प्रतिशत या उससे अधिक क्षेत्रों में किया गया है। 73 आदिवासी जनजातियों के विकास के लिए परियोजना आधारित विचार के माध्यम से कार्यक्रम चलाये गए हैं।

राज्य सरकारों से समेकित जनजातीय परियोजना, जनजातीय निवास स्थलों तथा आदिवासी जनजातीय समूहों के लिए नयी कार्ययोजना। परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के लिए. आग्रह किया गया है। कुछ राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में जनजातियों की संख्या बहुत अधिक है जैसे अरूणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, लक्षद्वीप और दादरा तथा नगर हवेली। इन्हें उप योजनाओं के अंतर्गत नहीं लिया गया है क्योंकि इन राज्यों की योजनाएं वस्तुतः जनजातीय विकास के लिए हैं:

जनजातियों के लिए बनी उप-योजनाओं के मुख्य उद्देश्य हैं –

  1. जनजाति क्षेत्रों और अन्य क्षेत्रों के बीच विकास के अंतर को कम करना।
  2. जनजातियों के रहन-सहन को ऊंचा उठाना।

इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए जनजातियों का शोषण समाप्त करने, विशेषकर, भूमि, महाजनी, कृषि और वन की उपज में अनाचार, समाप्त करने आदि उच्च प्राथमिकता दी गयी। जनजाति क्षेत्रों के समेकित विकास के लिए जनजाति उप-योजनाओं के अधीन संपूर्ण भौतिक और वित्तीय उपायों की व्यवस्था है। इन क्षेत्रीय उप-योजनाओं को धन-राशि केन्द्रीय मंत्रालयों और विभागों के केन्द्रीय परिव्यय, राज्य योजनाओं के संस्थागत वित्त तथा विशेष केन्द्रीय सहायता से प्राप्त होती है। पांचवीं योजना में यह राशि 475 करोड़ रुपये रखी गयी थी।

छठी योजना के दौरान जनजातियों के ऐसे क्षेत्रों को जिनकी कुल आबादी 10,000 तथा जनजातियों की आबादी 50 प्रतिशत अथवा उससे अधिक है, उप-योजना की नीति के अनुसार संशोधित क्षेत्र विकास कार्यक्रम के अंतर्गत लिया जा रहा है। उपयोजना की नीति लचीली है ताकि उसे स्थानीय स्थिति के अनुरूप.चलाया जा सके। कार्यक्रमों के अंतर्गत कृषि, सिंचाई, घर व्यवस्था और सहकारिता शिक्षा आदि है। बहुत ही पिछड़े हुए जनजाति समूहों की ओर विशेष ध्यान देने के लिए अलग से योजनाएं बनायी जाती हैं।

अनुच्छेद 164 (1) के माध्यम से व्यवस्था की गयी है कि बिहार, मध्यप्रदेश तथा उड़ीसा राज्यों में जहां जनजातियां पर्याप्त मात्रा में रहती हैं, एक मंत्री की नियुक्ति की जाएगी जो जनजातियों के साथ-साथ रहने वाली अनुसूचित जातियों के कल्याण के कार्य को देखेमा। लोकसभा व विधानसभाओं में जनजातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थानों का आरक्षण किया गया है। यह व्यवस्था सन् 2000 तक बढ़ा दी गयी है।

1993 में 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से 11 वीं अनुसूची को संविधान में जोड़कर तथा 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से 12 वीं अनुसूची जोड़कर क्रमशः पंचायतों और नगरीय स्वशासी संस्थाओं में भी उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इन स्थानों में से एक तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित होगें। सरकारी सेवाओं में जनजातियों के लिए साढ़े सात प्रतिशत आरक्षण किया हुआ है। राज्य सरकारें अपने यहां पड़ी बंजर भूमि का दुर्बल समाज में आवंटन करती है, इसका एक तिहाई भाग अनुसूची जाति वे अनुसूचित जनजाति के लिए किया जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में से सही का चुनाव कीजिए।

प्रश्न 1.
कब से पर्यावरण के महत्त्व पर जोर दिया जाने लगा?
(अ) 1950 के दशक से
(ब) 1960 के दशक से
(स) 1970 के दशक से
(द) 1980 के दशक से
उत्तर:
(ब) 1960 के दशक से

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प्रश्न 2.
अकाल के आसपास के लोगों को घरबार छोड़ना पड़ा क्योंकि –
(अ) भीषण बाढ़ आ गई थी
(ब) भूकम्प के प्रकोप के कारण
(स) पानी के विषाक्त होने से
(द) वायु के प्रदूषण से
उत्तर:
(स) पानी के विषाक्त होने से

प्रश्न 3.
ओजोन परत में छेद होना क्या है?
(अ) धरती की ऊपरी वायुमंडल में ओजोन गैस की मात्रा में कमी
(ब) वायुमंडल में आक्सीजन की कमी
(स) वायुमंडल में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा में बढ़ोत्तरी
(द) धरती का फटना
उत्तर:
(अ) धरती की ऊपरी वायुमंडल में ओजोन गैस की मात्रा में कमी

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प्रश्न 4.
1972 में पर्यावरण से संबंधित पुस्तक लिमिट्स टू ग्रोथ’ किसने लिखी?
(अ) लायन्स क्लब ऑव इंडिया
(ब) आर. एस. एस.
(स) कांग्रेस सेवा दल
(द) क्लब ऑफ रोम
उत्तर:
(द) क्लब ऑफ रोम

प्रश्न 5.
पृथ्वी सम्मेलन किस देश में हुआ था?
(अ) भारत
(ब) अमरीका
(स) ब्राजील
(द) इण्डोनेशिया
उत्तर:
(स) ब्राजील

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प्रश्न 6.
पृथ्वी सम्मेलन का संबंध किससे है?
(अ) वसीय सम्मेलन
(ब) क्योटो सम्मेलन
(स) रियो सम्मेलन
(द) वारसा सम्मेलन
उत्तर:
(स) रियो सम्मेलन

प्रश्न 7.
वैश्विक सम्पदा क्या है?
(अ) मानवता की साझी विरासत
(ब) विश्व की सम्पूर्ण सम्पदा
(स) विश्व की तेल सम्पदा
(द) विश्व की कृषि सम्पदा
उत्तर:
(अ) मानवता की साझी विरासत

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प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन विश्व सम्पदा की सुरक्षा से संबंधित नहीं है –
(अ) अंटार्कटिक संधि (1959)
(ब) मांट्रियल न्यायाचार (1987)
(स) अंटार्कटिक पर्यावरणीय न्यायाचार (1991)
(द) वसीय संधि (1919)
उत्तर:
(द) वसीय संधि (1919)

प्रश्न 9.
उत्तरी गोलार्द्ध के देश क्या चाहते हैं?
(अ) पर्यावरण संरक्षण में सभी देशों की जिम्मेदारी बराबर हो।
(ब) वे स्वयं जिम्मेदारी लेते हैं।
(स) दक्षिणी गोलार्द्ध के देश जिम्मेदारी लें।
(द) संयुक्त राष्ट्र संघ जिम्मेदारी ले।
उत्तर:
(अ) पर्यावरण संरक्षण में सभी देशों की जिम्मेदारी बराबर हो।

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प्रश्न 10.
क्योटो प्रोटोकॉल किससे संबंधित है?
(अ) कार्बन डाईआक्साइड की निकासी
(ब) ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन
(स) आक्सीजन का उत्पादन
(द) वायुमंडल का प्रदूषण
उत्तर:
(ब) ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन

प्रश्न 11.
संयुक्त राष्ट्रसंघ के नियमाचार की बाध्यताओं से भारत क्यों नहीं जुड़ा है?
(अ) यहां आक्सीजन की मात्रा अधिक है।
(ब) यहां कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा अधिक है।
(स) प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर कम है।
(द) यहां आक्सीजन की मात्रा कम है।
उत्तर:
(स) प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर कम है।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में कौन-सा देश दक्षिणी देश नहीं है?
(अ) मैक्सिको
(ब) मलेशिया
(स) अमरीका
(द) इण्डोनेशिया
उत्तर:
(स) अमरीका

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प्रश्न 13.
फ्रैंकलिन नदी कहां है?
(अ) भारत
(ब) अमरीका
(स) आस्ट्रेलिया
(द) इटली
उत्तर:
(स) आस्ट्रेलिया

प्रश्न 14.
नर्मदा आंदोलन किसके विरुद्ध है?
(अ) बांध
(ब) नदी
(स) नहर
(द) नाले
उत्तर:
(अ) बांध

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प्रश्न 15.
खाड़ी देश में सबसे अधिक तेल भंडार कहां है?
(अ) कुवैत
(ब) आबू धावी
(स) सऊदी अरब
(द) ईरान
उत्तर:
(स) सऊदी अरब

II. मिलान वाले प्रश्न

निम्नलिखित स्तंभ (अ) का मिलान स्तंभ (ब) से कीजिए।
Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन Part - 1 img 1
उत्तर:
(1) – (vi)
(2) – (viii)
(3) – (i)
(4) – (iii)
(5) – (ii)
(6) – (iv)
(7) – (v)
(8) – (vii)

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Bihar Board Class 12 Political Science समकालीन विश्व में सुरक्षा Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पदों को उनके अर्थ से मिलाएँ:
(1) विश्वास बहाली के उपाय (कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स – CBMS)
(2) अस्त्र-नियंत्रण
(3) गठबंधन
(4) निरस्त्रीकरण

(क) कुछ खास हथियारों के इस्तेमाल से परहेज
(ख) राष्ट्रों के बीच सुरक्षा-मामलों पर सूचनाओं के आदान प्रदान की नियमित प्रक्रिया
(ग) सैन्य हमले की स्थिति से निबटने अथवा उसके अवरोध के लिए कुछ राष्ट्रों का आपस में मेल करना
(घ) हथियारों के निर्माण अथवा हासिल करने पर अंकुश

उत्तर:
(1) – (ख)
(2) – (घ)
(3) – (ग)
(4) – (क)

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किसको आप सुरक्षा का परंपरागत सरोकार/सुरक्षा अपारंपरिक सरोकार/खतरे की स्थिति नहीं का दर्जा देंगें –
(क) चिकनगुनिया/डेंगु बुखार का प्रसार
(ख) पड़ोसी देश के कामगारों की आमद
(ग) पड़ोसी राज्य से कामगारों की आमद
(घ) अपने इलाके को राष्ट्र बनाने की मांग करने वाले समूह का उदय
(ङ) अपने इलाके को अधिक स्वायत्तता दिए जाने की मांग करने वाले समूह का उदय
(च) देश की सशस्त्र सेना को आलोचनात्मक नजर से देखने वाला अखबार
उत्तर:
(ख) पड़ोसी देश के कामगारों की आमद
(ग) पड़ोसी राज्य से कामगारों की आमद

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प्रश्न 3.
परम्परामत और अपारंपरिक सुरक्षा में क्या अंतर है? गठबंधनों का निर्माण करना और उनको बनाये रखना इनमें से किस कोटि में आता है?
उत्तर:
परम्परागत सुरक्षा:
सुरक्षा की परंपरागत धारणा मुख्य रूप से सैन्य बल के प्रयोग अथवा सैन्य बल के इस्तेमाल की आशंका से सम्बद्ध है। सुरक्षा की परम्परागत धारणा में माना जाता है कि सैन्य बल से सुरक्षा को खतरा पहुँचता है और सैन्य बल से ही सुरक्षा को कायम रखा जा सकता है।

अपारंपरिक सुरक्षा:
सुरक्षा की अपारंपरिक सुरक्षा में माननीय अस्तित्व पर चोट करने वाले व्यापक खतरों और आशंकाओं को शामिल किया जाता है। इसमें मानवता की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसलिए इसको मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व रक्षा कहा जाता है। गठबंधनों का निर्माण करना और उनको बनाये रखना परम्परागत सुरक्षा में आता है।

प्रश्न 4.
तीसरी दुनिया के देशों और विकसित देशों की जनता के सामने मौजूद खतरों में क्या अंतर है?
उत्तर:
तीसरी दुनिया के देशों और विकसित देशों की जनता के सामने मौजूद खतरों में अंतर:

  1. तीसरी दुनिया के देश नवस्वतंत्र देश हैं। इसलिए उन्हें अपनी स्वतंत्रता की चिंता बनी रहती है। उन्हें अपने पड़ोसी देशों के आक्रमण का भय बना रहता है। इसके विपरीत विकसित देश प्रारंभ से ही आजाद रहे हैं उन्हें अपनी स्वतंत्रता और दूसरे देशों के आक्रमण का अधिक भय नहीं है।
  2. तीसरी दुनिया के देश आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं। उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था का पुन:निर्माण करना है। इसलिए युद्धों में भाग नहीं ले सकते। विकसित देशों के सामने इस प्रकार की समस्या नहीं है।
  3. सुरक्षा के लिए गठबंधन बनाना आवश्यक है। तीसरी दुनिया के देश आसानी से गठबंध न नहीं कर सकते क्योंकि उनके ऊपर शत्रु देश के आक्रमण का अधिक भय होता है। विकसित देशों का गठबंधन सफल रहा है और उन्हें उससे सुरक्षा प्राप्त है।
  4. तीसरी दुनिया के देश अपारंपरिक खतरों जैसे निर्धनता, महामारियां आदि को आसानी से दूर नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि उनके पास संसाधनों की कमी है। विकसित देशों के पास पर्याप्त संसाधन हैं और वे आसानी से इनसे निपट सकते हैं।

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प्रश्न 5.
आतंकवाद सुरक्षा के लिए परंपरागत खतरे की श्रेणी में आता है या अपरंपरागत?
उत्तर:
आतंकवाद सुरक्षा के अपरंपरागत खतरे में आता है। इसका संबंध मानव के अस्तित्व से है। इसका आशय हिंसा से है जो जानबूझकर और बिना किसी सहानुभूति के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद एक से अधिक देशों में फैला हुआ है और उसके निशाने पर कई देश हैं। इसका चिर परिचित उदाहरण विमान अपहरण या भीड़ वाली जगह पर बम गिराना है।

प्रश्न 6.
सुरक्षा के परंपरागत परिप्रेक्ष्य में बताएँ कि अगर किसी राष्ट्र पर खतरा मंडरा रहा हो तो उसके सामने क्या विकल्प होते हैं?
उत्तर:
सुरक्षा के परंपरागत परिप्रेक्ष्य में अगर किसी राष्ट्र पर खतरा मंडरा रहा हो तो उसमें निम्नलिखित विकल्प होते हैं:

  1. आत्मसमर्पण करना तथा दूसरे पक्ष की बात को बिना युद्ध किए स्वीकार कर लेना।
  2. युद्ध से होने वाले विनाश को इस सीमा तक बढ़ाने का संकेत देना कि दूसरा पक्ष भयभीत होकर हमला न करे।
  3. यदि युद्ध शुरू हो जाय तो अपनी रक्षा करना ताकि आक्रमक देश अपने मकसद में सफल न हो और पीछे हट जाय अथवा उसको पराजित कर देना।

प्रश्न 7.
‘शक्ति-संतुलन’ क्या है? कोई देश इसे कैसे कायम करता है?
उत्तर:
शक्ति संतुलन का अर्थ :-सुरक्षा नीति का एक प्रमुख तत्व शक्ति संतुलन है। शक्ति संतुलन से तात्पर्य है-एक देश को अपने पड़ोसी देशों की शक्ति में बराबर पर आना। सभी देशों को यह पता चल जाता है कि उसके आसपास कौन-सा ताकतवर देश है और भविष्य में वह आक्रमक हो सकता है। इसी कारण प्रत्येक सरकार दूसरे देश से अपने शक्ति संतुलन को लेकर बहुत संवेदनशील होती है। सभी सरकारें दूसरे देशों से शक्ति संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने के लिए जीतोड़ प्रयास करती हैं। शक्ति संतुलन कायम रखना: शक्ति संतुलन कायम रखने के लिए कोई देश निम्नलिखित कार्य करता है:

  1. वह देश अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाता है। इसकी आर्थिक और प्रौद्योगिक शक्ति का होना जरूरी है।
  2. वह देश गठबंधन बनाकर भी शक्ति संतुलन कायम रख सकता है। गठबंधन में कई देश होते हैं जो सैनिक हमले रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए मिलकर कदम उठाते हैं।

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प्रश्न 8.
सैन्य गठबंधन के क्या उद्देश्य होते हैं? किसी ऐसे सैन्य गठबंधन का नाम बताएँ जो अभी मौजूद है। इस गठबंधन के उद्देश्य भी बताएँ?
उत्तर:
गठबंधन के उद्देश्य:

  1. अपने गठबंधन के किसी देश पर आक्रमण होने पर सैन्य हमले को रोकना अथवा रक्षा करने के लिए समवेत कदम उठाना।
  2. कोई भी देश अपनी ताकत बढ़ाने के लिए गठबंधन बनाता है।
  3. गठबंधन के देशों को हथियार की सहायता देना या बेचना।
  4. शक्ति संतुलन को कायम रखने के लिए।

नाटो नामक सैन्य गठबंधन अब भी कायम है। इसका पूरा नाम उत्तर अंध महासागर संधि संगठन है। इसमें अमरीका, इंग्लैंड, फ्रांस, कनाडा सहित 12 देश शामिल हैं। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

(क) यदि कोई अन्य देश इनमें से किसी पर आक्रमण करेगा तो सब मिलकर उसका सामना करेगें।
(ख) प्रत्येक देश की सैनिक शक्ति को संगठित करना तथा इस कार्य में अमरीका सहयोग करेगा।
(ग) शांति के समय विभिन्न देशों द्वारा एक-दूसरे की सहायता करना।
(घ) आपसी विवादों को आपसी बातचीत द्वारा हल करना।

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प्रश्न 9.
पर्यावरण के तेज नुकसान से देशों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। क्या आप इस कथन से सहमत है? अपने तर्को की पुष्टि करें।
उत्तर:
यह सही है कि पर्यावरण के तेज नुकसान से देशों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। इसको निम्नलिखित तर्को से पुष्ट किया जा सकता है:

  1. तेजी से औद्योगीकरण के कारण पेड़-पौधों का अभाव होता जा रहा है जिससे वायु प्रदूषित हो गई है और अनेक महामारियों एवं बिमारियों का जन्म हो रहा है।
  2. कारखानों के धुएं से भी वायु प्रदूषित हो रही है जिससे अनेक स्थानों पर वातावरण विषाक्त हो गया है।
  3. कारखानों का कूड़ा-कचरा और गंदा पानी बहकर नदी में आ जाता है जिससे नदी का जल प्रदूषित हो गया है और पेयजल के रूप में अनेक रोगों को जन्म दे रहा है।
  4. अनेक प्रकार के यंत्रों, मशीनों एवं वाद्ययंत्रों से ध्वनि प्रदूषण हो रहा है जो व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

प्रश्न 10.
देशों के सामने फिलहाल जो खतरे मौजूद हैं उनके परमाण्विक हथियार का सुरक्षा अथवा अपरोध के लिए बड़ा सीमित उपयोग रह गया है। इस कथन का विस्तार करें।
उत्तर:
देशों के सामने जो खतरे मौजूद हैं उनके परमाण्विक हथियार की सुरक्षा अथवा अपरोध के लिए सीमित उपयोग रह गया है। अस्त्र नियंत्रण के अंतर्गत हथियारों को विकसित करने अथवा उनको प्राप्त करने के संबंध में कुछ नियम कानूनों का पालन करना पड़ता है। उदाहरण के लिए 1972 की एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि (ABM) ने अमरीका और सोवियत संघ को बैलेस्टिक मिसाइलों को रक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका। इसी प्रकार की कई अन्य संधियां हैं।

परमाणु अप्रसार संधि (NPT-1968) भी एक अर्थ में अस्त्र नियंत्रण संधि ही थी, क्योंकि इसने परमाणु हथियारों के निर्माण को नियम कानून के दायरे में ला दिया। परंतु इसके नियम के उपयोग में बाधा डालने वाले नियम बन गये। जिन देशों ने 1967 से पूर्व परमाणु हथियार बना लिये थे या उनका परीक्षण कर चुके थे उन्हें इस संधि के अंतर्गत इन हथियारों को रखने की अनुमति दी गई। जो देश 1967 तक ऐसा नहीं कर पाये थे उन्हें ऐसे हथियारों को हासिल करने के अधिकार से वंचित किया गया। परमाणु अप्रसार संधि ने परमाणु हथियारों को समाप्त तो नहीं किया लेकिन इन्हें हासिल कर सकने वाले देशों की संख्या जरूर कम कर दी।

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पश्न 11.
भारतीय परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए किस किस्म की सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए-पारंपरिक या अपारंपरिक? अपने तर्क की पुष्टि में आप कौन-से उदाहरण देंगे?
उत्तर:
भारतीय परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए अपारंपरिक सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए। इस संबंध में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं:

  1. वर्तमान में भारत को सैन्य हमले का लगभग भय नहीं है। इसलिए पारंपरिक सुरक्षा को वरीयता नहीं देनी चाहिए।
  2. भारत आतंकवाद से ग्रस्त है। उसे अपने पड़ोसी देश का खतरा बना रहता है।
  3. पड़ोसी देश के पास परमाणु हथियार हैं।
  4. भारत के कुछ राज्यों में असामाजिक तत्त्वों द्वारा लोगों के मानवाधिकारों का हनन हो रहा है।
  5. भारत विकास कर रहा है परंतु अब भी अनेक लोग निर्धनता के शिकार हैं। यहां आर्थिक दृष्टि से असमानता भी है।

प्रश्न 12.
नीचे दिए गए कार्टून को समझें। कार्टून में युद्ध और आतंकवाद का जो संबंध दिखाया गया है। उसके पक्ष या विपक्ष में एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 7 समकालीन विश्व में सुरक्षा Part - 1 img 1
उत्तर:
कार्टून से प्रकट होता है कि युद्ध और आतंकवाद में घनिष्ठ संबंध है। यहां सुअर को युद्ध और आतंकवाद को उसके सन्तति के रूप में दिखाया गया है। यह सही है कि युद्ध से आतंकवाद का जन्म होता है। कोई भी देश युद्ध से विजय प्राप्त करने के लिए आतंकवादी गतिविधियां चलाता है ताकि विरोधी देश के हौसले पस्त हो जायें और वह आक्रमक देश के आगे घुटने टेक दे। यह भी सही है कि आतंकवाद से युद्ध का जन्म होता है। जब कोई देश आतंकवादी कार्यों से तंग हो जाता है तो युद्ध के लिए उवधृत हो जाता है उदाहरण के लिए जब पाकिस्तान ने भारतीय संसद पर आतंकवादी आक्रमण करवाया तो भारत ने पाकिस्तान पर आक्रमण करने के लिए लगभग तैयारी कर ली परंतु कुछ शक्तियों के हस्तक्षेप से ऐसा नहीं हो सका।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सुरक्षा क्या है?
उत्तर:

  1. सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है – खतरे से आजादी। परंतु यह खतरा गंभीर होना चाहिए।
  2. ऐसे खतरे जिनको रोकने के उपाय न किये गए तो इससे केन्द्रीय मूल्यों को अपूरित हानि हो सकती है।

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प्रश्न 2.
सुरक्षा की पारंपरिक धारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. सुरक्षा की पारंपरिक अवधारणा में सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सबसे अधिक खतरनाक माना जाता है।
  2. इस खतरे का स्रोत कोई अन्य मुल्क होता है जो सैन्य आक्रमण की धमकी देकर संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखण्डता जैसे किसी देश के केन्द्रीय मूल्यों को खतरा करता है।

प्रश्न 3.
बुनियादी तौर पर किसी सरकार के पास युद्ध की स्थिति में कौन-कौन से विकल्प होते हैं?
उत्तर:
बुनियादी तौर पर किसी सरकार के पास युद्ध की स्थिति में तीन विकल्प होते हैं:

  1. आत्मसमर्पण करना तथा दूसरे पक्ष की बात को बिना युद्ध किए मान लेना।
  2. युद्ध से होने वाले विनाश को एक सीमा तक बढ़ाना कि दूसरा पक्ष सहमकर आक्रमण न करे।
  3. युद्ध शुरू हो जाय तो अपनी रक्षा करना ताकि हमलावर देश अपने मकसद में सफल न हो सके और पीछे हट जाये अथवा आक्रमक को पराजित कर देना।

प्रश्न 4.
अपरोध का क्या अर्थ है?
उत्तर:
युद्ध में कोई देश भले ही आत्मसमर्पण कर दे परंतु वह इसे अपने देश की नीति के रूप में फैलाना नहीं चाहेगी इसलिए सुरक्षा की नीति का उद्देश्य युद्ध की आशंका को रोकने में होता है जिसे अपरोध कहते हैं।

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प्रश्न 5.
शांति संतुलन का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. प्रत्येक देश के आसपास कोई न कोई शक्तिशाली देश होता है और उससे उसे हमले की आशंका बनी रहती है। इसलिए प्रत्येक सरकार दूसरे देश से अपने शक्ति संतुलन को लेकर बहुत संवेदनशील होती है।
  2. प्रत्येक देश शक्ति संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने के जोरदार प्रयास करती है ताकि उसकी स्थिति मजबूत बनी रहे।

प्रश्न 6.
गठबंधन क्या है?
उत्तर:

  1. पारंपरिक सुरक्षा का एक महत्त्वपूर्ण तत्व गठबंधन है जो एक प्रकार का संघ है जिसमें कई देश शामिल होते हैं।
  2. अधिकांश गठबंधनों को लिखित संधि से एक औपचारिक रूप मिलता है। किसी देश अथवा गठबंधन की तुलना में अपनी ताकत का असर बढ़ाने के लिए देश गठबंधन बनाते हैं।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं। उदाहरण से पुष्टि कीजिए।
उत्तर:

  1. संयुक्त राज्य अमरीका ने 1980 के दशक में सोवियत संघ के विरुद्ध इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया।
  2. परंतु ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अल-कायदा नामक समूह के आतंकवादियों ने जब 11 सितंबर, 2001 के दिन उस पर आक्रमण किया तो उसने उग्रवादियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

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प्रश्न 8.
विश्व राजनीति में संयुक्त राष्ट्र संघ एक केन्द्रीय सत्ता है परंतु वह नियंत्रण करने में असफल है। विवेचन कीजिए।
उत्तर:
यह सही है कि विश्व राजनीति में संयुक्त राष्ट्र संघ ऐसी सत्ता है अथवा ऐसी बन सकती है। परंतु अपनी बनावट के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र संघ अपने सदस्य देशों का दास है और इसके सदस्य देश जितनी सत्ता इसको सौंपते हैं और मानते हैं, उतनी ही सत्ता उसे हासिल होती है। अत: विश्व राजनीति में प्रत्येक देश को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होती है।

प्रश्न 9.
1945 के पश्चात् महाशक्तियों की आंतरिक सुरक्षा की क्या स्थिति थी?
उत्तर:

  1. 1945 के पश्चात् अमरीका और सोवियत संघ अपनी सीमा के अंदर एकीकृत और शांति सम्पन्न थे।
  2. अधिकांश यूरोपीय देश विशेषकर ताकतवर पश्चिमी देशों के सामने अपनी सीमा के भीतर बसे समुदायों अथवा वर्गो से कोई गंभीर खतरा नहीं था। इस कारण इन देशों ने अपना ध्यान सीमापार के खतरों पर केन्द्रित किया।

प्रश्न 10.
नवस्वतंत्र देशों के सामने सुरक्षा की क्या चुनौती थी?
उत्तर:

  1. इन देशों के आंतरिक भागों में अलगाववादी आंदोलन चल रहे थे। ऐसे में देश का बंटवारे का भय था।
  2. इन देशों को यह भी डर था कि कोई अन्य देश इन अलगाववादी आंदोलनों को हवा न दे दे। क्योंकि फिर पड़ोसी देश के साथ तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती। इस प्रकार पड़ोसी देशों से युद्ध और आंतरिक संघर्ष नव स्वतंत्र देशों के सामने सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती थी।

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 7 समकालीन विश्व में सुरक्षा

प्रश्न 11.
दो उदाहरण देकर बतायें कि किस प्रकार के हथियारों के निर्माण को प्रतिबंधित कर दिया गया है?
उत्तर:
कुछ विशेष प्रकार के हथियारों के निर्माण को संधियों द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया है जो निम्नलिखित हैं:

  1. 1972 की जैविक हथियार संधि (Biological Weapons Convention)।
  2. 1992 की रसायनिक हथियार संधि (Chemical Weapons Convention)।

प्रश्न 12.
एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि (ABM) क्या है?
उत्तर:

  1. यह संधि 1972 में हुई थी। इसके अंतर्गत अमरीका और सोवियत संघ को बैलेस्टिक मिसाइलों को रक्षा कवच के रूप में प्रयोग करने पर प्रतिबंध लगा दिया।
  2. संधि में दोनों देशों को सीमित संख्या में ऐसी रक्षा प्रणाली तैनात करने की अनुमति थी लेकिन इस संधि ने दोनों देशों को ऐसी रक्षा प्रणाली के व्यापक उत्पादन पर रोक लगा दी।

प्रश्न 13.
सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में विश्वास बहाली का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. विश्वास बहाली के उपायों से देशों के बीच हिंसाचार कम किया जा सकता है। वस्तुतः इस प्रक्रिया में सैन्य टकराव और प्रतिद्वन्द्विता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान-प्रदान करने का फैसला करते हैं।
  2. देश एक-दूसरे को अपने सैन्य बल के विषय में जानकारी देते हैं। यह भी बता सकते हैं कि सैन्य बल को कहां तैनात किया जा रहा है। ऐसी सूचनाओं से प्रतिद्वन्द्वी देश गलतफहमी का शिकार नहीं होता।

प्रश्न 14.
सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व सुरक्षा क्यों कहते हैं?
उत्तर:

  1. सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा में मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले व्यापक खतरों और आशंकाओं को शामिल किया जाता है।
  2. सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा के प्रतिपादकों का कथन है, ‘सिर्फ राज्य ही नहीं शक्तियों और समुदायों या कहें कि समूची मानवता को सुरक्षा की जरूरत है।’

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प्रश्न 15.
नागरिक सुरक्षा और राज्य की सुरक्षा में क्या संबंध है?
उत्तर:

  1. नागरिक सुरक्षा को राज्य सुरक्षा से श्रेष्ठ माना जाता है।
  2. मानवता की सुरक्षा और राज्य की सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए और अक्सर होते भी हैं।
  3. सुरक्षित राज्य में नागरिक भी सुरक्षित हों, जरूरी नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि विदेशियों से लोग अधिक अपनी सरकारों से मारे गये हैं।

प्रश्न 16.
विश्व सुरक्षा की धारणा की उत्पत्ति कैसे हुई?
उत्तर:

  1. विश्वव्यापी खतरे जैसे वैश्विक तापवृद्धि (Global warming) अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, एड्स और बर्ड फ्लू जैसी महामारियों के मद्देनजर 1990 के दशक में विश्व धारणा की उत्पत्ति हुई।
  2. कोई भी देश इन समस्याओं का समाधान अकेले नहीं कर सकता । इन स्थितियों का दूसरे देशों पर प्रभाव पड़ सकता है।

प्रश्न 17.
आतंकवाद क्या है? इसके कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. आतंकवाद का आशय राजनीतिक हिंसा से है जो जानबूझकर और बिना किसी सहानुभूति के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है।
  2. उदाहरण-विमान अपहरण अथवा भीड़-भाड़ भरी जगहों जैसे रेलगाड़ी, होटल, बाजार या ऐसे अन्य स्थानों पर बम लगाना। अमरीका में 9/11 की घटना भी इसी का उदाहरण है।

प्रश्न 18.
मानवाधिकारों के हनन की स्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ को हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं?
उत्तर:

  1. इसको लेकर विविध विचार हैं। कुछ का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणापत्र अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को अधिकार देता है कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उसे हथियार उठाना चाहिए।
  2. कुछ दूसरे लोगों का तर्क है कि संभव है, ताकतवर देशों के हितों से यह निर्धारित होता हो कि संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार उल्लघंन के किस मामले में कारवाई करेगा और किसमें नहीं।

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प्रश्न 19.
आतंरिक रूप से विस्थापित जन कौन लोग होते हैं?
उत्तर:

  1. ये लोग ऐसे होते हैं जो अपना घर-बार छोड़ चुके हैं परंतु राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं। ऐसे लोगों को ही ‘आंतरिक रूप से विस्थापित जन’ कहा जाता है।
  2. उदाहरण-1990 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में हिंसा से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित ‘आतंरिक रूप से विस्थापित जन’ के उदाहरण हैं।

प्रश्न 20.
‘मैड काऊ’ (Mad Cow) की घटना क्या है?
उत्तर:

  1. जानवरों में महामारी फैलने के भारी दुष्प्रभाव का उदाहरण ‘मैड काऊ’ है।
  2. 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध के वर्षों में ब्रिटेन ने ‘मैड काऊ’ महामारी के भड़कने से अरबों डॉलर की हानि उठाई है।

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प्रश्न 21.
क्योटो प्रोटोकॉल क्या है?
उत्तर:

  1. 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल पर भारत सहित कई राष्ट्रों के हस्ताक्षर हुए। इसमें वैश्विक तापवृद्धि पर काबू रखने के लिए ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने के संबंध में दिशा-निर्देश बताए गए हैं।
  2. सहयोगमूलक सुरक्षा की पहल करने के कदम के समर्थन में भारत ने अपनी सेना संयुक्त राष्ट्रसंघ के शांति बहाली के मिशनों में भेजी है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सुरक्षा की पारंपरिक धारणा या राष्ट्रीय सुरक्षा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सुरक्षा की पारंपरिक धारणा या राष्ट्रीय सुरक्षा –

  1. पारंपरिक अवधारणा में किसी राष्ट्र को सबसे बड़ा खतरा सेना से होता है।
  2. इस खतरे का स्रोत कोई दूसरा राष्ट्र होता है जो सैनिक हमले की धमकी देकर संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखण्डता जैसे किसी देश के केन्द्रीय मूल्यों के लिए खतरा पैदा करता है।
  3. सैनिक कार्रवाई से आम नागरिकों के जीवन को भी खतरा होता है। सैनिक कार्रवाई में सैनिकों के साथ नागरिक भी मारे जाते हैं।
  4. युद्ध में निहत्थे स्त्री-पुरुषों को निशाना बनाया जाता है।
  5. इसमें नागरिकों और उनकी सरकार के साहस को तोड़ने का प्रयास किया जाता है।

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प्रश्न 2.
परम्परागत सुरक्षा नीति के तत्त्वों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
परम्परागत सुरक्षा नीति के तत्त्व:

  1. आत्मसमर्पण-परम्परागत सुरक्षा नीति का प्रथम तत्व आत्मसमर्पण है। इसमें विरोधी पक्ष की बात बिना युद्ध किए मान लेना अथवा युद्ध से होने वाले नाश को बढ़ा चढ़ाकर संकेत देना ताकि दूसरा पक्ष डर जाए और आक्रमण न करे। युद्ध होने पर उसे पराजित करना।
  2. शक्ति संतुलन-परम्परागत सुरक्षा नीति का दूसरा तत्त्व शक्ति संतुलन है। इसके अंतर्गत किसी को अपनी शक्ति को विरोधी ताकतवर देश के बराबर करनी होती है और शक्ति संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में करना होता है।
  3. सैन्य शक्ति में वृद्धि-शक्ति संतुलन के लिए किसी देश को अपनी सैन्य शक्ति बढ़ानी होती है। इसका आधार आर्थिक और प्रोद्योगिकी ताकत है।
  4. गठबंधन निर्माण पारंपरिक सुरक्षा नीति का चौथा तत्त्व गठबंधन है। इसके अंदर कई देश होते हैं जो सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए एक साथ कदम उठाते हैं।

प्रश्न 3.
शक्ति संतुलन के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शक्ति संतुलन का महत्त्व –

  1. सुरक्षा नीति का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व शक्ति संतुलन है। इसके अंतर्गत किसी देश को अपनी शक्ति को विरोधी ताकतवर देश के बराबर करना होता है और शक्ति संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में करना होता है।
  2. यदि कोई देश ऐसा नहीं करता है कि ताकतवर देश उसके ऊपर आक्रमण कर सकता है और उसको विनाश की ओर ले जा सकता है।
  3. शक्ति संतुलन के प्रति सभी सरकारें संवेदनशील होती हैं। कोई भी सरकार दूसरे देशों से शक्ति संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने के लिए जी तोड़ कोशिश करती है।
  4. पड़ोसी, शत्रु या जिन देशों के साथ अतीत में लड़ाई हो चुकी हो, उनके साथ शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में करने पर विशेष जोर दिया जाता है।
  5. शक्ति संतुलन बनाये रखने के लिए गठबंधन स्थापित करना जरूरी हो गया है। पूर्व सोवियत संघ और अमरीका के गठबंधन के कारण विश्व में शक्ति संतुलन कायम था।

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प्रश्न 4.
किसी देश के लिए आतंरिक सुरक्षा क्यों जरूरी है? अथवा, पारंपरिक अवधारणा की आंतरिक सुरक्षा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी देश के लिए आंतरिक सुरक्षा की आवश्यकता –

  1. प्रत्येक देश के लिए आंतरिक शांति और कानून व्यवस्था अति आवश्यक है। आंतरिक शांति के अभाव में बाहरी आक्रमणों का सामना नहीं किया जा सकता।
  2. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् इस पर जोर नहीं दिया गया। वस्तुत: इसका कारण यह था कि ताकतवर देशों में लगभग आंतरिक शासन स्थापित था।
  3. 1945 के पश्चात् संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ अपनी सीमा के अंदर एकीकृत और शांति संपन्न हैं।
  4. अधिकांश यूरोपीय देशों विशेष रूप से पश्चिमी देशों के सामने अपनी सीमा के भीतर बसे समुदायों अथवा वर्गो से कोई गंभीर खतरा नहीं था। इसलिए इन देशों ने सीमा पार के खतरों पर ध्यान दिया।
  5. कुछ यूरोपीय देशों को अपने उपनिवेशों में जनता से हिंसा का भय था क्योंकि अब ये लोग आजादी चाहते थे।

प्रश्न 5.
नवस्वतंत्र देशों की सुरक्षा के क्या खतरे थे?
उत्तर:
नवस्वतंत्र देशों को सुरक्षा के खतरे:

  1. इन देशों को बढ़ते शीतयुद्ध से डर था, क्योंकि कुछ नवस्वतंत्र देश यूरोपीय शक्तियों के समान शीतकालीन गुटों में किसी न किसी के सदस्य बन गये थे।
  2. दूसरे गुटों में जाने वाले अपने पड़ोसी देश अथवा दूसरे गुट के नेता (अमरीका या सोवियत संघ) से शत्रुता मोल लेना था।
  3. अमरीका अथवा सोवियत संघ के किसी साथी देश से शत्रुता ठाननी थी। वस्तुतः द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जितने युद्ध हुए उसमें एक तिहाई युद्धों के लिए शीतयुद्ध जिम्मेदार रहा।
  4. नवस्वतंत्र देशों को उसके यूरोपीय औपनिवेशिक शासकों के आक्रमण का भय था। ऐसे में इन देशों को एक साम्राज्यवादी युद्ध से अपनी रक्षा के लिए तैयारी करनी पड़ी।
  5. नवस्वतंत्र देशों में आंतरिक सैन्य संघर्ष भी चल रहा था। अलगाववादी आंदोलन तेज हो रहे थे।

प्रश्न 6.
सुरक्षा के पारंपरिक तरीके कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
सुरक्षा के पारंपरिक तरीके –

  1. किसी देश को युद्ध उचित कारणों या आत्मरक्षा अथवा दूसरों को जनसंहार से बचाने के लिए करना चाहिए।
  2. युद्ध में युद्ध साधनों का सीमित इस्तेमाल करना चाहिए।
  3. आक्रमक सेना को चाहिए कि वह युद्ध न करने वाले शत्रु, निहत्थे व्यक्ति अथवा आत्मसमर्पण करने वाले शत्रु पर आक्रमण न करे।
  4. सेना को उतने ही बल का प्रयोग करना चाहिए। जितना एक सीमा तक आवश्यक हो और उसे एक सीमा तक ही हिंसा का सहारा लेना चाहिए।
  5. बल प्रयोग तभी करना चाहिए जब अन्य सभी उपाय असफल हो गये हों।

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प्रश्न 7.
सुरक्षा की परम्परागत धारणा में राष्ट्रों में किस प्रकार का आपसी सहयोग होना चाहिए।
उत्तर:
राष्ट्रों में आपसी सहयोग –

  1. राष्ट्रों में आपसी सहयोग निरस्त्रीकरण, अस्त्र नियंत्रण तथा विश्वास की बहाली में होना चाहिए।
  2. निरस्त्रीकरण के अंतर्गत सभी राज्य चाहे उनका आकार, ताकत और प्रभाव कुछ हो कुछ खास किस्म के हथियारों का निर्माण नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए जैविक और रासायनिक हथियार।
  3. अस्त्र नियंत्रण के अंतर्गत हथियारों को विकसित करने अथवा उनको हासिल करने के संबंध में कुछ नियमों, कानूनों का पालन करना चाहिए।
  4. सुरक्षा को पारंपरिक धारणा में विश्वास की बहाली भी महत्त्वपूर्ण है। विश्वास बहाली की प्रक्रिया में सैन्य टकराव और प्रतिद्वन्द्विता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान-प्रदान का निर्णय करते हैं।

प्रश्न 8.
परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
परमाणु अप्रसार संधि: (Nuclear Non-Proliferation Treaty):

  1. परमाणु अप्रसार संधि एक प्रकार की अस्त्र नियंत्रण संधि है जो 1968 में हुई थी।
  2. इसके अंतर्गत परमाणु हथियारों के उपार्जन को नियमों और कानूनों के दायरे में खड़ा कर दिया।
  3. जिन देशों ने 1967 से पूर्व परमाणु हथियार बना लिये थे या उनका परीक्षण करा लिया था उन्हें इस संधि के अंतर्गत इन हथियारों को रखने की अनुमति दे दी गई।
  4. जो देश 1967 तक ऐसा नहीं कर पाये थे उन्हें ऐसे हथियार को हासिल करने के अधि कार से वंचित किया गया।
  5. परमाणु अप्रसार संधि ने परमाणु हथियारों को समाप्त तो नहीं किया लेकिन इन्हें हासिल कर सकने वाले देशों की संख्या अवश्य कम कर दी।

प्रश्न 9.
सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में विश्वास बहाली से क्या लाभ हैं?
उत्तर:
विश्वास बहाली से लाभ –

  1. सुरक्षा नीति का एक महत्त्वपूर्ण तरीका विश्वास बहाली है। इन उपायों से देशों के बीच हिंसाप्रचार कम किया जा सकता है।
  2. इस प्रक्रिया में वे देश सैन्य टकराव और प्रतिद्वन्द्विता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान-प्रदान का निर्णय करते हैं।
  3. ऐसा करके ये देश अपने प्रतिद्वन्द्वी को इस बात का आश्वासन देते हैं कि उनकी ओर से अचानक. हमले की योजना नहीं है।
  4. इसके अलावा अन्य कई बातों का आदान-प्रदान होता है। जिससे देशों के बीच गलतफहमी नहीं होती और वे आक्रमण की तैयारी नहीं करते हैं।
  5. विभिन्न देश एक-दूसरे को अपने सैन्य बल के विषय में जानकारी देते हैं और यह भी बताते हैं कि उनके बलों को कहां तैनात किया जा रहा है।

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प्रश्न 10.
मानवता की सुरक्षा के संकीर्ण और व्यापक अर्थों में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मानवता की सुरक्षा का अर्थ –

  1. मानवता की सुरक्षा का प्राथमिक लक्ष्य व्यक्तियों की सुरक्षा है। संकीर्ण अर्थ में मानवता की सुरक्षा का अर्थ लोगों को हिंसक खतरों से बचाना है।
  2. सुरक्षा के व्यापक अर्थ में हिंसा के अलावा कई अन्य खतरे माने गये हैं। इसमें अकाल, महामारी और आपदायें शामिल हैं।
  3. मानवता की सुरक्षा के व्यापक अर्थ में आर्थिक सुरक्षा और मानवीय गरिमा को सुरक्षा में भी शामिल किया जाता है। इसमें अभाव से मुक्ति और भय से मुक्ति आती है।
  4. 1990 के दशक में विश्व सुरक्षा धारणा का उभार हुआ इसमें वैश्विक तापवृद्धि, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, एड्स और बर्ड फ्लू जैसी महामारियों से सुरक्षा आती है।
  5. ये ऐसी समस्यायें हैं जिनका समाधान अकेले कोई देश नहीं कर सकता। इसमें सबको सहयोग देना होगा।

प्रश्न 11.
आतंकवाद से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
आतंकवाद का अर्थ एवं उदाहरण –

  1. आतंकवाद का आशय राजनीतिक हिंसा से है जिसमें निर्दयता से जनता की हत्या की जाती है। आतंकवाद से आज विश्व के कई देश ग्रस्त हैं।
  2. कोई राजनीतिक संदर्भ या स्थिति नापसंद हो तो आतंकवादी समूह उसे बल प्रयोग की धमकी देकर बदलना चाहते हैं।
  3. जनमत को आतकित करने के लिए नागरिकों को निशाना बनाया जाता है।
  4. आतंकवाद में नागरिकों के असंतोष का इस्तेमाल किया जाता है और राष्ट्रीय सरकारों अथवा संघर्षों में शामिल अन्य पक्ष के खिलाफ कारवाई की जाती है।
  5. आतंकवाद का प्रसिद्ध उदाहरण-विमान अपहरण, भीड़ भरी जगहों यथा-रेलगाड़ी, होटल, बाजार आदि पर बम से हमला किया जाता हैं।

प्रश्न 12.
मानवाधिकारों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
मानवाधिकारों का वर्गीकरण-मानवाधिकारों को तीन कोटियों में विभाजित किया गया है –

  1. पहली कोटि-इसमें राजनैतिक अधिकार आते हैं। जैसे:-अभिव्यक्ति का अधिकार और सभा करने की स्वतंत्रता।
  2. दूसरी कोटि-यह कोटि आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की है। जैसे जीविका कमाने का अधिकार, रोजगार पाने का अधिकार आदि।
  3. तीसरी कोटि-इसके अंतर्गत उपनिवेशीकृत जनता अथवा जातीय और मूलवासी अल्पसंख्यकों के अधिकार आते हैं।
  4. इस वर्गीकरण को लेकर व्यापक सहमति हैं परंतु इनमें सार्वभौम मानवाधिकारों को लेकर मतभेद हैं। अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय शक्तियाँ क्या दण्ड दे सकती हैं, सुनिश्चित नहीं हो पाया है।

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प्रश्न 13.
वैश्विक निर्धनता की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
वैश्विक निर्धनता –

  1. यह बड़े आश्चर्य की बात है कि गरीब देशों में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। विद्वानों का अनुमान है कि अगले 50 वर्षों में विश्व के सबसे गरीब देशों में आबादी तीन गुना बढ़ेगी जबकि इसी अवधि में अनेक धनी देशों की आबादी घटेगी।
  2. प्रति व्यक्ति उच्च आय और जनसंख्या की कम वृद्धि के कारण धनी देश अथवा सामाजिक समूहों को और धनी बनने में मदद मिलती है जबकि प्रति व्यक्ति निम्न आय और जनसंख्या की तीव्र वृद्धि एक साथ मिलकर गरीब देशों और सामाजिक समूहों को और गरीब बनाते हैं।
  3. दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में असमानता बड़े पैमाने पर बढ़ी है। सहारा मरूस्थल विश्व का सबसे गरीब इलाका है। उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में इतनी असमानता नहीं है।
  4. इसी असमानता के दक्षिणी गोलार्द्ध के लोग बेहतर जीवन और आर्थिक अवसरों की तलाश में उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में प्रवास कर रहे हैं।

प्रश्न 14.
एच. आई. वी. एड्स के दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एच० आई. वी. एड्स का दुष्प्रभाव –

  1. एच० आई० वी०-एड्स, बर्ड फ्लू और सार्स जैसी महामारियाँ अप्रवास, व्यवसाय, पर्यटन और सैन्य अभियानों के द्वारा बड़ी तेजी से विभिन्न देशों में फैली है।
  2. इन बीमारियों के फैलाव को रोकने में किसी एक देश की सफलता अथवा असफलता का प्रभाव दूसरे देशों में होने वाले संक्रमण पर पड़ता है।
  3. एक अनुमान के अनुसार विश्व में 4 करोड़ लोग एच० आई० वी० एड्स से प्रभावित हो चुके थे। इसमें 2/3 आबादी अफ्रीका में रहती है जबकि शेष का 50% दक्षिण एशिया में है।
  4. उत्तरी अफ्रीका तथा अन्य औद्योगिक देशों में उपचार की नई विधियाँ खोजी गई हैं जिससे एच० आई० वी० एड्स से होने वाली मृत्यु दर कम हुई है परंतु अफ्रीका में ऐसा उपचार संभव नहीं हो सका है। अफ्रीका को अधिक गरीब बनाने में एच० आई० वी० एड्स प्रमुख घटक रहा है।

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प्रश्न 15.
सहयोग मूलक सुरक्षा के लिए किस प्रकार की रणनीति तैयार करनी चाहिए।
उत्तर:
सहयोग मूलक सहयोग की रणनीतियाँ –

  1. यदि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से रणनीतियाँ तैयार की जाय तो बेहतर होगा।
  2. सहयोग द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, महादेशीय अथवा वैश्विक स्तर का हो सकता है। वस्तुतः यह देशों की इच्छा और खतरे की प्रकृति पर निर्भर करता है।
  3. सहयोगमूलक सहयोग में विभिन्न देशों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय-राष्ट्रीय स्तर की अन्य संस्थायें जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन (संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा प्रसिद्ध हस्तियाँ (यथा नेल्सन मंडेला, मदर टेरेसा) हो सकती हैं।
  4. सहयोग मूलक सहयोग में अंतिम उपाय बल प्रयोग हो सकता है। अंतर्राष्ट्रीय शक्तियाँ इसमें सहयोग दे सकती है। उन देशों के विरुद्ध सैन्य बल का प्रयोग किया जा सकता है। जो अपनी जनता को सता रहे हैं, महामारियों से सुरक्षा नहीं दे रहे हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत की सुरक्षा नीति के विभिन्न घटकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत की सुरक्षा नीति के घटक-भारत ऐसा देश है जो दोनों प्रकार-पारंपरिक और अपांरपरिक खतरों का सामना कर रहा है। ये खतरे सीमा के अंदर और बाहर दोनों ओर से हैं। भारत की सुरक्षा नीति के चार घटक हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. सैन्य क्षमता
  2. अंतर्राष्ट्रीय नियमों और संस्थाओं को मजबूत करना
  3. देश की अंदरूनी सुरक्षा समस्यायें
  4. गरीबी और अभाव से छुटकारा

1. सैन्य क्षमता:
पड़ोसी देशों के हमलों से बचने के लिए भारत को अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करना जरूरी है। भारत पर पाकिस्तान के कई आक्रमण हुए हैं। दक्षिण एशियाई क्षेत्र में उसके चारों ओर परमाणु शक्ति सम्पन्न देश हैं, इसलिए भारत ने 1974 और 1998 में परमाणु परीक्षण किया था।

2. अंतर्राष्ट्रीय नियमों और संस्थाओं को मजबूत करना:
भारत ने अपने सुरक्षा हितों को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय नियमों और संस्थाओं को मजबूत करने में सहयोग दिया है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एशियाई एकता, अनौपनिवेशीकरण और निरस्त्रीकरण के प्रयासों का समर्थन किया। भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ को अंतिम पंच मानने पर जोर दिया। उसका मानना है कि हथियारों और परमाणु शस्त्रों की दृष्टि से सभी देशों को समान अधिकार होना चाहिए । भारत ने नव-अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की मांग उठाई।

3. देश की अंदरूनी सुरक्षा समस्यायें:
भारत की नीति का तीसरा महत्त्वपूर्ण घटक देश की अंदरूनी सुरक्षा समस्याओं से निपटने की तैयारी है। भारत के कई राज्यों-नागालैंड, मिजोरम, पंजाब और कश्मीर आदि राज्यों में अलगाववादी संगठन सक्रिय रहे हैं । इसलिए भारत ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का प्रयास किया है। उसने देश में लोकतांत्रिक और राजनीतिक व्यवस्था का पालन किया है। उसने सभी समुदाय के लोगों और जन समूहों को अपनी शिकायतें रखने का मौका दिया है।

4. गरीबी और अभाव से छुटकारा:
भारत ने ऐसी व्यवस्थायें करने का प्रयास किया है जिससे बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी और अभाव से छुटकारा मिल सके और नागरिकों के मध्य आर्थिक असमानता समाप्त हो सके।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए:

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन सुरक्षा के अर्थ में नहीं हो सका?
(अ) किसी देश पर आक्रमण
(ब) मंहगाई को लेकर आंदोलन
(स) महामारी फैलना
(द) बड़े पैमाने पर जनसंहार
उत्तर:
(ब) मंहगाई को लेकर आंदोलन

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प्रश्न 2.
सुरक्षा की पारंपरिक अवधारणा से कौन जुड़ा है?
(अ) राष्ट्रीय सुरक्षा
(ब) राज्य की सुरक्षा
(स) जिले की सुरक्षा
(द) ग्रामीण क्षेत्रों की सुरक्षा
उत्तर:
(अ) राष्ट्रीय सुरक्षा

प्रश्न 3.
युद्ध का तात्पर्य क्या सही है?
(अ) असुरक्षा
(ब) विध्वंस
(स) मृत्यु
(द) जन्म
उत्तर:
(द) जन्म

प्रश्न 4.
शक्ति संतुलन के लिए सर्वाधिक आवश्यक क्या है?
(अ) सैन्य शक्ति बढ़ाना
(ब) हमले से बचना
(स) आर्थिक मजबूती
(द) प्रौद्योगिकी का विकास
उत्तर:
(अ) सैन्य शक्ति बढ़ाना

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प्रश्न 5.
ओसामा बिन लादेन को शह किसने दी थी?
(अ) इस्लाम ने
(ब) अमरीका
(स) इंग्लैंड
(द) जर्मनी
उत्तर:
(ब) अमरीका

प्रश्न 6.
तीसरी दुनिया के देश किस महाद्वीप में कम थे?
(अ) एशिया
(ब) अफ्रीका
(स) लैटिन अमरीका
(द) उत्तरी अमरीका
उत्तर:
(द) उत्तरी अमरीका

प्रश्न 7.
अंदरूनी सैन्य संघर्ष की समस्या किसको नहीं थी?
(अ) एशिया के देश
(ब) यूरोप के देश
(स) अफ्रीका के देश
(द) अमरीका
उत्तर:
(ब) यूरोप के देश

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प्रश्न 8.
युद्धरत सेना को किस पर आक्रमण करना चाहिए?
(अ) संघर्षरत शत्रु
(ब) संघर्षविमुख शत्रु
(स) निहत्थे व्यक्ति
(द) औरतें
उत्तर:
(अ) संघर्षरत शत्रु

प्रश्न 9.
कौन सी संधि अस्त्र नियंत्रण की सीमा में नहीं है?
(अ) सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि – 2
(ब) सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि
(स) स्ट्रेटाजीक आर्स रिडक्शन संधि
(द) परमाणु अप्रसार संधि
उत्तर:
(द) परमाणु अप्रसार संधि

II. मिलान वाले प्रश्न एवं उनके उत्तर

निम्नलिखित स्तंभ (अ) का मिलान स्तंभ (ब) से कीजिए।
Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 7 समकालीन विश्व में सुरक्षा Part - 1 img 2
उत्तर:
(1) – (v)
(2) – (viii)
(3) – (i)
(4) – (vii)
(5) – (ii)
(6) – (iii)
(7) – (vi)
(8) – (iv)

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 6 अन्तराष्ट्रीय संगठन

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 6 अन्तराष्ट्रीय संगठन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 6 अन्तराष्ट्रीय संगठन

Bihar Board Class 12 Political Science अन्तराष्ट्रीय संगठन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निषेधाधिकार (वीटो) के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं। इनमें प्रत्येक के आगे सही या गलत का चिह्न लगाएँ।
(क) सुरक्षा परिषद् के सिर्फ स्थायी सदस्यों को ‘वीटो’ का अधिकार है।
(ख) यह एक तरह की नकारात्मक शक्ति है।
(ग) सुरक्षा परिषद् के फैसले से असंतुष्ट होने पर महासचिव ‘वीटो’ का प्रयोग करता है।
(घ) एक ‘वीटो’ से भी सुरक्षा परिषद् का प्रस्ताव नामंजूर हो सकता है।
उत्तर:
(क) सही
(ख) सही
(ग) गलत
(घ) सही

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प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ के कामकाज के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं। इनमें से प्रत्येक के सामने सही या गलत का चिह्न लगाएँ।
(क) सुरक्षा और शांति से जुड़े सभी मसलों का निपटारा सुरक्षा-परिषद् में होता है।
(ख) मानवतावादी नीतियों का क्रियान्वयन विश्वभर में फैली मुख्य शाखाओं तथा एजेंसियों के मार्फत होता है।
(ग) सुरक्षा के किसी मसले पर पांचों स्थाई सदस्य देशों का सहमत होना उसके बारे में लिए गए फैसले के क्रियान्वयन के लिए जरूरी है।
(घ) संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के सभी सदस्य संयुक्त राष्ट्र संघ के बाकी प्रमुख अंगों और विशेष एजेंसियों के स्वतः सदस्य हो जाते हैं।
उत्तर:
(क) सही
(ख) सही
(ग) सही
(घ) गलत

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता के प्रस्ताव को ज्यादा वजनदार बनाता है?
(क) परमाणु क्षमता
(ख) भारत संयुक्त राष्ट्रसंघ के जन्म से ही उसका सदस्य है।
(ग) भारत एशिया में है।
(घ) भारत की बढ़ती हुई आर्थिक ताकत और स्थिर राजनीतिक व्यवस्था।
उत्तर:
(घ) भारत की बढ़ती हुई आर्थिक ताकत और स्थिर राजनीतिक व्यवस्था।

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प्रश्न 4.
परमाणु प्रौद्योगिकी के शांतिपूर्ण उपयोग और उसकी सुरक्षा से संबद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसी का नाम है –
(क) संयुक्त राष्ट्रसंघ, निरस्त्रीकरण समिति
(ख) अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी
(ग) संयुक्त राष्ट्र संघ अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा समिति
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी

प्रश्न 5.
विश्व व्यापार संगठन निम्नलिखित में से किस संगठन का उत्तराधिकारी है?
(क) जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ
(ख) जनरल एरेंजमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ
(ग) विश्व स्वास्थ्य संगठन
(घ) संयुक्त राष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम
उत्तर:
(क) जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ

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प्रश्न 6.
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।
(क) संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य …………….. है।
(ख) संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे बड़ा पद ………….. का है।
(ग) संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में ………………. स्थायी और ………. अस्थाई सदस्य हैं।
(घ) ………………. संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्तमान महासचिव हैं।
(च) मानवाधिकारों की रक्षा में सक्रिय दो स्वयंसेवी संगठन ……………. और …………… हैं।
उत्तर:
(क) शांति स्थापना
(ख) महासचिव
(ग) 5,10
(घ) बान की मून
(च) एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच।

प्रश्न 7.
संयुक्त राष्ट्र संघ की मुख्य शाखाओं और एजेंसियों का सुमेल उनके काम से करें –
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उत्तर:
(1) – (ग)
(2) – (ङ)
(3) – (घ)
(4) – (ख)
(5) – (च)
(6) – (ब)
(7) – (क)
(8) – (छ)
(9) – (झ)
(10) – (ज)

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प्रश्न 8.
सुरक्षा परिषद् के कार्य क्या हैं?
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् के कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. यह विश्व में शांति स्थापित करने के लिए उत्तरदायी है और किसी भी मामले पर जो विश्व शांति के लिए खतरा बना हुआ हो पर विचार कर सकती है।
  2. यह किसी भी देश द्वारा भेजी गई किसी भी शिकायत पर विचार करती है और उस मामले या झगड़े का निर्णय करती है।
  3. सुरक्षा परिषद् अपने प्रस्तावों या निर्णयों को लागू करवाने के लिए सैनिक कार्यवाही भी कर सकती है। इराक के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही का निर्णय सुरक्षा परिषद् ने लिया था।
  4. यह महासभा के साथ मिलकर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के जजों की नियुक्ति भी करती है।

प्रश्न 9.
भारत के नागरिक के रूप में सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता के पक्ष का समर्थन आप कैसे करेंगे? अपने प्रस्ताव का औचित्य सिद्ध करें।
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता-सुरक्षा परिषद् में भारत को स्थायी सदस्य के रूप में स्वीकार करना चाहिए । इस प्रस्ताव के समर्थन में कई तर्क दिये जा सकते हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. सुरक्षा परिषद् में प्रतिनिधिमूलक चरित्र का अभाव है। इसको सुरक्षा परिषद् के विस्तार से और भारत को सदस्य बनाकर ही दूर किया जा सकता है।
  2. सुरक्षा परिषद् में चीन के अलावा कोई विकासशील देश नही है। सुरक्षा परिषद् इनकी आवाज बुलंद करने के लिए विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व आवश्यक है।
  3. पिछले कुछ वर्षों से सुरक्षा परिषद् का कार्य क्षेत्र बढ़ा है इसलिए इसका विस्तार जरूरी है।
  4. भारत सुरक्षा परिषद् में सदस्यता की योग्यता रखता है। उसकी आबादी विश्व की संपूर्ण जनसंख्या की 20% है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।
  5. उसने संयुक्त राष्ट्र संघ के कई क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। इसके साथ वह विश्व के फलक पर आर्थिक शक्ति बनकर उभर रहा है। वह संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट में नियमित योगदान देता है। इन सब कारणों से भारत को सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्य बनाना चाहिए।

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प्रश्न 10.
संयुक्त राष्ट्र संघ के ढांचे को बदलने के लिए सुझाए गए उपायों के क्रियान्वयन में आ रही कठिनाइयों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के ढांचे को बदलने के लिए सुझाए गए उपायों के क्रियान्वयन में आने वाली कठिनाइयाँ –

  1. संयुक्त राष्ट्र संघ के ढांचे को बदलने को लेकर सदस्य राष्ट्रों के बीच विवाद है। सभी राष्ट्र इस मसले पर सहमत नहीं होते।
  2. सुरक्षा परिषद् की सदस्यता के लिए सदस्य देश की कुछ योग्यताओं के सुझाव आये हैं जिस पर कोई देश खरा नहीं उतरता। इससे ढांचे में बदलाव कठिन हो जाता है।
  3. प्रतिनिधित्व के मसले को हल करने में कठिनाई है क्योंकि इसके कई आधार जैसे भौगोलिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि हैं।
  4. कुछ देशों का विचार है कि निषेधाधिकार को समाप्त कर दिया जाये। परंतु कठिनाई यह है कि क्या सुरक्षा परिषद् के पांचों स्थायी सदस्य इससे सहमत होंगे।

प्रश्न 11.
हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ युद्ध और इससे उत्पन्न विपदा को रोकने में नाकामयाब रहा है लेकिन विभिन्न देश अभी भी इसे बनाये रखना चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ को एक अपरिहार्य संगठन मानने के क्या कारण हैं।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ को एक अपरिहार्य संगठन मानने के कारण:
यह सही है कि संयुक्त राष्ट्र संघ युद्ध और इससे उत्पन्न विपदा को रोकने में नाकामयाब रहा है, लेकिन कई कारणों से विभिन्न देश इसे अभी भी बनाये रखना चाहते हैं। ये कारण निम्नलिखित हैं:

  1. सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् अमरीका अकेला महाशक्ति और ताकतवर देश रह गया है। शेष विश्व संयुक्त संघ के माध्यम से ही अमरीका पर अंकुश लगा सकता है।
  2. संयुक्त राष्ट्र संघ ही ऐसा मंच है जहां एक साथ 190 राष्ट्रों के लोग एकत्र हो सकते हैं और उन्हें एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।
  3. संयुक्त राष्ट्र संघ ही ऐसी जगह है जहां देश निरंकुश अमरीकी नीतियों और रवैये के विरुद्ध आवाज उठा सकते हैं और बीच का रास्ता निकालने के लिए बाध्य कर सकते है।
  4. यह सही है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में कुछ कमियाँ हैं परंतु सभी देशों को इसका सहयोग करना पड़ेगा, क्योंकि इसके बिना विश्व की स्थिति निश्चित रूप से असंतुलित और खराब हो जायेगी।
  5. आज विभिन्न कारणों से विभिन्न देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं। प्रौद्योगिकी के तेजी से बढ़ते आविष्कार पारस्परिक निर्भरता को बढ़ा रहे हैं। इसलिए इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था का महत्त्व बढ़ता ही रहेगा।
  6. लोगों, सरकारों और विश्व बिरादरी की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से सहयोग प्राप्त करने के तरीके ढूंढने पड़ेंगे तभी सबका उत्तरोत्तर विकास हो सकेगा।

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प्रश्न 12.
संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार का अर्थ है सुरक्षा परिषद् के ढांचे में बदलाव। इस कथन का सत्यापन करें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार का अर्थ: सुरक्षा परिषद् के ढांचे में बदलाव:
शीतयुद्ध के पश्चात् (1989) संयुक्त राष्ट्र संघ में पर्याप्त परिवर्तन आया है, परंतु इसमें सुधार की मांगें भी उठी हैं। लगभग सभी देश विशेष रूप से सुरक्षा परिषद् के ढांचे से बदलाव चाहते हैं। बदलाव की ये मांगे निम्नलिखित हैं –
1. एक प्रमुख मांग यह है कि सुरक्षा परिषद् में स्थायी और अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाय ताकि समकालीन विश्व राजनीति की वास्तविकताओं को इस संगठन से बेहतर नेतृत्व मिल सके।

2. 1992 की संयुक्त राष्ट्र संघ की आम बैठक में सुरक्षा परिषद् के विषय में तीन शिकायतों का प्रस्ताव पारित हुआ –
(क) सुरक्षा परिषद् अब राजनीतिक वास्तविकताओं का नेतृत्व नहीं करता।
(ख) इसके निर्णय पश्चिमी मूल्यों और हितों से प्रभावित होते हैं।
(ग) इसमें समान प्रतिनिधित्व का अभाव है।

3. सुरक्षा परिषद् के ढांचे में परिवर्तन के लिए 1997 में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव कोफी अन्नान ने जांच की प्रक्रिया शुरू की। फलस्वरूप सुरक्षा परिषद् के स्थायी और अस्थायी सदस्यता के लिए मानदंड सुझाये गये जो विकासशील देशों के अनुरूप नहीं थे।

4. कुछ सदस्य राष्ट्रों की मांग है कि पांच स्थायी सदस्यों को दिया गया निषेधाधिकार (Veto power) समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि यह लोकतंत्र और संप्रभु राष्ट्रों के मध्य बराबरी की धारणा से मेल नहीं खाता। इसलिए यह प्रासंगिक नहीं है।

इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ के सुधार में सुरक्षा परिषद् के ढांचे के बदलाव पर जोर दिया गया । इसलिए कहा जाता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार का अर्थ सुरक्षा परिषद् के ढांचे में बदलाव है।

Bihar Board Class 12 Political Science अन्तराष्ट्रीय संगठन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अंतर्राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:

  1. अंतर्राष्ट्रीय संगठन युद्ध और शांति के मामलों में सहायता करते हैं।
  2. ये संगठन अंतर्राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं को हल करने में मदद करते हैं। ऐसे कार्यों में संगठन इस कार्य के लिए देशों को प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए वैश्विक तापवृद्धि में देशों के सम्मिलित सहयोग की आवश्यकता होती है।
  3. अंतर्राष्ट्रीय संगठन सहयोग करने के उपाय और सूचनाएं जुटाने में मदद कर सकते हैं।

प्रश्न 2.
विश्वव्यापी तापवृद्धि क्या है?
उत्तर:

  1. इसके कारण विश्व के कई देशों में तापमान बढ़ जाता है। ऐसा क्लोरो फ्लोरो कार्बन कहलाने वाले कुछ रसायनों के फैलाव के कारण बढ़ रहा है।
  2. इससे समुद्रतल की ऊंचाई बढ़ने का खतरा होता है। ऐसा होने पर विश्व के कई समुद्रतटीय नगर डूब सकते हैं।
  3. सभी देशों के प्रयास से ही इस पर काबू पाया जा सकता है।

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प्रश्न 3.
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की क्या भूमिका है?
उत्तर:

  1. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष वैविक स्तर की वित्त व्यवस्था की देखरेख करता है।
  2. यह विभिन्न देशों की मांग पर वित्तीय और तकनीकी सहायता मुहैया कराता है।
  3. इस कोष के 184 देश सदस्य है।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा पर कब हस्ताक्षर हुए?
उत्तर:

  1. धुरी शक्तियों के खिलाफ लड़ रहे 26 मित्र राष्ट्र अटलांटिक चार्टर के समर्थन में वाशिंगटन में मिले।
  2. उसी समय दिसंबर 1943 में संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा पर हस्ताक्षर हुए।

प्रश्न 5.
अमेरिका से विश्व को क्या चिंता है?
उत्तर:

  1. शीतयुद्ध के पश्चात् अमरीका अकेला महाशक्ति और ताकतवर देश है। ऐसे में वह मनमाने ढंग से कार्य कर सकता है।
  2. क्या संयुक्त राष्ट्र संघ अमरीका की इच्छाओं-आकांक्षाओं पर नियंत्रण रख सकता है? क्या संयुक्त राष्ट्र संघ अमरीका के साथ संवाद और चर्चा में सहायता कर सकता है।

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प्रश्न 6.
संयुक्त राष्ट्र-संघ के उद्देश्यों को लिखिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य:

  1. अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की स्थापना।
  2. विभिन्न राष्ट्रों के मध्य संबंध एवं सहयोग की वृद्धि करना।
  3. शांतिपूर्ण उपायों से अंतर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाना।
  4. विश्व की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदि मानवीय समस्याओं के समाधान हेतु अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना।
  5. इन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति में लगे विभिन्न राष्ट्रों के कार्यों में समन्वयकारी केन्द्र के रूप में कार्य करना।

प्रश्न 7.
संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांत क्या हैं?
उत्तर:

  1. संयुक्त राष्ट्र सभी सदस्यों की प्रभुसत्ता और समानता के सिद्धांत में विश्वास रखता है।
  2. सभी सदस्य राष्ट्रों का यह कर्तव्य है कि इस चार्टर के अनुसार उनकी जो जिम्मेदारियां हैं, उन्हें वे ईमानदारी के साथ निभाएँ।
  3. सभी सदस्य राष्ट्र अपने विवादों का निपटारा शांतिपूर्ण तरीकों से करें।
  4. अन्य राष्ट्रों की अखण्डता और राजनीतिक स्वाधीनता का आदर करें।
  5. संयुक्त राष्ट्र इस चार्टर के अनुसार कोई कार्यवाही करे तो सभी सदस्य राष्ट्रों को उसकी सहायता करनी चाहिए।
  6. संयुक्त राष्ट्र उन मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा जो अनिवार्य रूप से किसी राज्य के आंतरिक अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

पश्न 8.
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख अंग कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. महासभा या आमसभा
  2. सुरक्षा परिषद्
  3. आर्थिक सामाजिक परिषद्
  4. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय
  5. सचिवालय

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प्रश्न 9.
राष्ट्रसंघ (League of Nations) की स्थापना कब और क्यों हुई?
उत्तर:

  1. संयुक्त राष्ट्र संघ राष्ट्रसंघ का उत्तराधिकारी है और इसकी स्थापना प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् 1920 में हुई थी।
  2. अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा एवं भविष्य में युद्धों को रोकने के लिए इस संगठन की स्थापना की गई।

प्रश्न 10.
संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रतीक चिह्न क्या है?
उत्तर:

  1. संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतीक चिह्न में विश्व का मानचित्र बना हुआ है और इसके चारों ओर जैतून की पत्तियां है।
  2. जैतून की पत्तियां विश्व शांति का संकेत करती हैं।

प्रश्न 11.
सुरक्षा परिषद् में कितने सदस्य होते हैं?
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् (Security Council):
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका के समान है। इसके 15 सदस्य होते हैं, जिनमें 5 स्थायी सदस्य हैं – अमेरिका, इंगलैंड, फ्रांस, चीन और रूस। पहले सोवियत संघ इसका स्थायी सदस्य था परंतु जनवरी 1992 में सोवियत संघ की समाप्ति के बाद यह स्थान रूसी गणराज्य को दे दिया गया है। इसके अन्य 10 सदस्य महासभा के द्वारा 2 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। भारत कई बार सुरक्षा परिषद्का सदस्य चुना जा चुका है।

प्रश्न 12.
क्या भारत कभी सुरक्षा परिषद् का सदस्य रहा है?
उत्तर:
भारत सुरक्षा परिषद् का 6 बार सदस्य चुना जा चुका है। प्रथम बार 1950 में द्वितीय बार 1967 में तथा तृतीय बार 1972 में, चतुर्थ बार 1977 में, पांचवीं बार 1984 में, छठी बार 1991 में भारत दो-दो वर्षों के लिए सुरक्षा परिषद् का सदस्य चुना गया था।

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प्रश्न 13.
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय क्या है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय-अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का प्रधान न्यायिक अंग है। उसका प्रधान कार्यालय हेग (हालैंड) में है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 न्यायाधीश होते हैं। वे महासभा और सुरक्षा परिषद् द्वारा 9 वर्ष की अवधि के लिए चुने जाते हैं। केवल वे व्यक्ति न्यायाधीश चुने जायेंगे जिन्हें दोनों निकायों (महासभा और सुरक्षा परिषद्) में अधिकतम मत मिले हैं। इनमें से कोई भी दो न्यायाधीश एक ही राज्य के राष्ट्रिक नहीं हो सकेंगे। 9 वर्ष की अवधि के पश्चात् किसी भी न्यायाधीश को पुनः निर्वाचित किया जा सकेगा। न्यायाधीश केवल वही व्यक्ति बन सकेंगे जो अपने-अपने देशों में उच्चतम न्यायिक पदों पर नियुक्त किये जाने की योग्यताएं रखते हैं।

प्रश्न 14.
संयुक्त राष्ट्र संघ की कुछ विशेष एजेंसियों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)
  2. खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO)
  3. संयुक्त राष्ट्र संघ शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)
  4. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)
  5. अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF)
  6. अंतर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान संगठन (IMO)
  7. अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU)

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प्रश्न 15.
निषेधाधिकार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें 5 स्थायी सदस्य तथा 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। प्रक्रिया संबंधी विषयों (Procedural matters) पर कोई निर्णय तभी लिया जाएगा अब 15 में से 9 सदस्यों के सकारात्मक मत होंगे परंतु अन्य महत्त्वपूर्ण मामलों में जिनमें आर्थिक या सैनिक कार्यवाई शामिल हैं, किसी निर्णय के लिए 9 सदस्यों का बहुमत जिसमें पांचों स्थायी सदस्यों का भी मत भी अनिवार्य है । इस प्रकार किसी भी स्थायी सदस्य का नकारात्मक मत होने की स्थिति में सुरक्षा परिषद् कोई सक्षम कार्यवाई नहीं कर सकेगी । इसी को निषेधाधिकार (VETO) कहा गया है।

प्रश्न 16.
आज संयुक्त राष्ट्र (UN) का महासचिव कौन है? उनका क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. आज संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव दक्षिण कोरिया के बान की मून हैं।
  2. वह संयुक्त राष्ट संघ के 8वें महासचिव हैं। उन्होंने महासचिव का पद 1 जनवरी 2007 को संभाला। 1971 के बाद इस पद पर बैठने वाले वे पहले एशियाई हैं।

प्रश्न 17.
संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मुख सुधार के बुनियादी मसले क्या हैं?
उत्तर:

  1. संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मुख बुनियादी सुधारों के दो मसले हैं –
    (क) संगठन की बनावट और इसकी प्रक्रिया में सुधार।
  2. संगठन के न्यायाधिकार में आने वाले मुद्दों की समीक्षा। लगभग सभी देश सहमत हैं कि ये दोनों प्रकार के सुधार होने चाहिए परंतु सुधारों के स्वरूप, विधि और समय पर सदस्य राष्ट्रों में सहमति नहीं है।

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प्रश्न 18.
विश्व के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं?
उत्तर:

  1. जनसंहार
  2. गृहयुद्ध
  3. जातीय युद्ध
  4. आतंकवाद
  5. परमाण्विक प्रसार
  6. जलवायु में परिवर्तन
  7. पर्यावरण की हानि
  8. महामारी

प्रश्न 19.
1992 के संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में सदस्य राष्ट्रों ने सुरक्षा परिषद् की किन कमियों की ओर संकेत किया?
उत्तर:

  1. सुरक्षा परिषद् अब राजनीतिक सत्यताओं का नेतृत्व नहीं करता।
  2. इसके निर्णय पर पश्चिमी मूल्यों और हितों की छाप होती है और इन फैसलों पर कुछ देशों का दबदबा होता है।
  3. सुरक्षा परिषद् में बराबर का प्रतिनिधित्व नहीं है।

प्रश्न 20.
भारत सुरक्षा परिषद् की संरचना में क्या परिवर्तन चाहता है?
उत्तर:

  1. भारत सुरक्षा परिषद् की संरचना में विस्तार चाहता है। वस्तुतः सुरक्षा परिषद् सदस्य की संख्या स्थिर रही है जबकि संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ रही है।
  2. सुरक्षा परिषद् में सदस्य संख्या न बढ़ने से इसके प्रतिमूलक चरित्र की हानि हुई है। ऐसे में सुरक्षा परिषद् का विस्तार आवश्यक है।

प्रश्न 21.
अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के क्या कार्य हैं?
उत्तर:

  1. अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी की स्थापना 1957 में हुई। यह संगठन परमाण्विक ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने और सैन्य उद्देश्यों में इसके इस्तेमाल को रोकने की कोशिश करता है।
  2. इस संगठन के अधिकारी नियमित रूप से परमाण्विक सुविधाओं की जांच करते हैं ताकि नागरिक परमाणु संयंत्रों का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए न हो।

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प्रश्न 22.
एमनेस्टी इंटरनेशनल क्या है?
उत्तर:

  1. यह एक स्वयंसेवी संगठन है जो सम्पूर्ण विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अभियान चलाता है।
  2. यह संगठन मानवाधिकारों से संबंधित रिपोर्ट तैयार और प्रकाशित करता है।
  3. उसकी रिपोर्ट से कई सरकारों की किरकिरी हो जाती है, क्योंकि यह उनके दुर्व्यवहार की चर्चा करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अंतर्राष्ट्रीय संगठन क्यों आवश्यक है?
उत्तर
अंतर्राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता के कारणः

  1. अंतर्राष्ट्रीय संगठन यथा संयुक्त राष्ट्र शांति और प्रगति के प्रति मानवता की आशा के प्रतीक होते हैं। डेग हैमरसोल्ड (संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव) ने कहा है – “संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन मानवता को स्वर्ग पहुंचाने के लिए नहीं बल्कि उसे नरक से बचाने के लिए हुआ है।”
  2. ये संगठन देशों के बीच होने वाले तनाव और झगड़ों को रोकते हैं और उनका समाधान करते हैं।
  3. अंतर्राष्ट्रीय संगठन अंतर्राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं यथा- महामारी, विश्वव्यापी तापमान वृद्धि को देशों की सहायता से हल करते हैं।
  4. अंतर्राष्ट्रीय संगठन विभिन्न देशों को आवश्यक कार्य में सहयोग देने के लिए तैयार करते हैं।

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प्रश्न 2.
महासभा के संगठन और कार्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महासभा (General Assembly):
महासभा संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च अंग है और एक प्रकार से विश्व की संसद के समान है। संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य इसके सदस्य होते हैं और प्रत्येक सदस्य राष्ट्र इसमें पांच प्रतिनिधि भेजता है परंतु उनका मत एक ही होता है। प्रायः वर्ष में एक बार इसका अधिवेशन होता है। इसकी स्थापना के समय इसके सदस्यों की संख्या कुल 51 थी जो बाद में बढ़ते-बढ़ते अब 185 के लगभग है। 1992 के आरंभ में सोवियत संघ के समाप्त होने से उसके पूर्व स्वायत्त गणराज्य अब स्वतंत्र बनकर इसके सदस्य बन गए हैं –

  1. यह सभा अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा संबंधी मामलों पर विचार करती है और निर्णय लेती है।
  2. यह संयुक्त राष्ट्र का बजट पास करती है।
  3. महासभा नए राज्यों को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाए जाने का निर्णय करती है और किसी पुराने सदस्य की सदस्यता को समाप्त करने का निर्णय ले सकती है।
  4. संयुक्त राष्ट्र के अन्य अंगों के सदस्यों का चुनाव महासभा द्वारा किया जाता है।
  5. महासभा अपना प्रधान एक वर्ष के लिए चुनती है।
  6. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफारिश से महासभा द्वारा की जाती है।

प्रश्न 3.
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की शक्तियों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
न्यायालय की शक्तियों और कार्य:
न्यायालय के समक्ष मामलों में केवल राज्य ही पक्षकार (Parties) हो सकेंगे, व्यक्ति नहीं। वे सभी राज्य जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य हैं, न्यायालय में जा सकेंगें। ऐसे राज्य भी अपने मामले न्यायालय में ले जा सकते हैं जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य नहीं हैं। उस स्थिति में उस राज्य को न्यायालय के व्यय का कुछ अंश वहन करना पड़ेगा।

1. अनिवार्य अथवा बाध्यकर अधिकार क्षेत्र:
न्यायालय उन विवादों पर विचार करता है जिनमें किसी संधि (Treaty) की व्याख्या का प्रश्न निहित है। वह अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की व्याख्या करता है और किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि के भंग किए जाने की स्थिति में हानिपूर्ति (reparation) की प्रकृति और मात्रा तय करता है।

2. ऐच्छिक अधिकार क्षेत्र:
न्यायालय का अधिकार क्षेत्र उन सभी मामलों को लेकर है जो राज्यों या सुरक्षा परिषद् द्वारा उसके समक्ष लाए जाते हैं। जब एक राज्य न्यायालय के समक्ष कोई विवाद लाता है और दूसरा राज्य उस मामले में प्रतिवादी बनना स्वीकार कर लेता है तो यह मान लिया जाता है कि दोनों राज्य अपने झगड़े का न्यायालय द्वारा समाधान चाहते हैं।

3. सलाहकारी अधिकारी क्षेत्र:
महासभा अथवा सुरक्षा परिषद् की प्रार्थना पर न्यायालय परामर्श भी देता है। संयुक्त राष्ट्र के विशिष्ट अभिकरण (Specialized Agencies) भी कानूनी प्रश्नों पर न्यायालय से सलाहकारी राय देने का अनुरोध कर सकते हैं।

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प्रश्न 4.
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की भूमिका का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की भूमिका:

  1. यह संगठन वैश्विक स्तर की वित्त व्यवस्था की देखरेख करता है।
  2. यह मांग के आधार पर वित्तीय तथा तकनीकी सहायता मुहैया कराता है।
  3. इस संगठन के 184 देश सदस्य हैं परंतु प्रत्येक सदस्य की सलाह का वजन समान नहीं है।
  4. अग्रणी दस सदस्यों के 55% मत हैं। ये देश अमरीका, जापान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, कनाडा, रूस, सउदी अरब और चीन हैं।
  5. अकेले अमरीका के पास 17.4 प्रतिशत मताधिकार हैं।

प्रश्न 5.
राष्ट्रसंघ (League of Nations) क्यों असफल हुआ?
उत्तर:
राष्ट्रसंघ की असफलता के कारण:
1. प्रमुख देशों के प्रतिनिधित्व का अभाव:
राष्ट्र संघ सभी देशों का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। स्वयं अमेरिका राष्ट्र संघ में शामिल नहीं था। ब्रिटेन तथा फ्रांस ने सोवियत रूस को राष्ट्रसंघ में प्रवेश की अनुमति नहीं दी। इस प्रकार दो बड़े देशों और अन्य कई देशों के शामिल न होने से राष्ट्रसंघ असफल हुआ।

2. सेना का अभाव:
राष्ट्रसंघ के पास अपनी कोई सेना नहीं थी। वह सदस्य राष्ट्रों पर निर्भर था जो स्वार्थ की वजह से एक-दूसरे का सहयोग नहीं करते थे और सेना की सहायता नहीं करते थे।

3. संघ के सदस्यों की फासिस्टपक्षी नीति:
राष्ट्रसंघ के सदस्य फासिस्टपक्षी नीति के शिकार थे। जब 1931 ई० में जापान, इटली तथा जर्मनी की शक्ति बढ़ रही थी और युद्ध की संभावना बढ़ गई तो सोवियत रूस को खतरे में डालने के लिए इन तीनों को फ्रांस, ब्रिटेन और अमरीका ने बढ़ावा दिया। बाद में इनमें झगड़ा शुरू हो गया और वे राष्ट्र को भूल गये।

4. बड़े राष्ट्रों का अधिकार:
राष्ट्रसंघ में बड़े राष्ट्रों (फ्रांस, ब्रिटेन) को अधिक अधिकार प्राप्त थे जबकि छोटे राष्ट्रों की उपेक्षा की गई। बड़े राष्ट्रों की समस्यायें बढ़ गई जिसको राष्ट्रसंघ हल न कर सका।

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प्रश्न 6.
संयुक्त राष्ट्र संघ की सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से संबंधित एजेंसियों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से संबंधित एजेंसियां:

  1. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)
  2. संयुक्त राष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम (UNDP)
  3. संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग (UNHRC)
  4. संयुक्त राष्ट्र संघ शरणार्थी उच्चायोग (UNHRC)
  5. संयुक्त राष्ट्र संघ बाल आयात कोष (UNICEF)
  6. संयुक्त राष्ट्र संघ शैक्षिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)

प्रश्न 7.
विश्व शांति बनाये रखने में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
विश्व शांति बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका:
विश्व में शांति स्थापना में संयुक्त राष्ट्र संघ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

  1. इसने विश्व की राजनीतिक समस्याओं का समाधान करके उनके बीच युद्ध को टालने का प्रयत्न किया है। इसने नहर स्वेज, कश्मीर समस्या, सोवियत संघ, कोरिया, वनमुला, कांगो, वियतनाम की समस्याओं का अत्यंत शांतिपूर्ण ढंग से समाधान किया है।
  2. संयुक्त राष्ट्र संघ में हथियारों की बढ़ती हुई होड़ को दूर करने का प्रयत्न किया है। जेनेवा समझौते के द्वारा अणु एवं हाइड्रोजन बमों के निर्माण पर काफी रोक लगाने में संस्था सफल हुई है।
  3. संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने बहुत से कानून विवादों को शांत किया है।
  4. इस विश्व की संस्था ने साम्यवादी तथा पूंजीवादी गुटों को समाप्त किया है और शीतयुद्ध को समाप्त किया है।
  5. अरब देशों की समस्याओं को इसने काफी कुशलता के साथ सुलझाया है। इजराइल: फिलस्तीन की सीमा संबंधी समस्या को सुलझाने में यह संलग्न है। इस संस्था ने बहुत से दुर्बल देशों की रक्षा की है। उसने इराक की नीति को बड़ी कुशलता के साथ दबाया है।
  6. संयुक्त राष्ट्र संघ ने बहुत-सी प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित देशों की ठीक समय पर सहायता की है। विश्व के एकीकरण में सं० रा. संघ ने बहुत से सराहनीय कार्य किए हैं।

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प्रश्न 8.
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत द्वारा निभाई गई भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत द्वारा निभाई गई भूमिका:
भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका विवेचन निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

  1. संयुक्त राष्ट्र संघ का भारत प्रारंभ से सदस्य है। उसके चार्टर (संविधान) के निर्माण में भारत का सक्रिय योगदान रहा है।
  2. भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से शीतयुद्ध का डटकर विरोध किया है तथा इसे समाप्त कराके ही दम लिया है।
  3. भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ को समय-समय पर भारी आर्थिक सहायता प्रदान की है। वह तीसरे नंबर का आर्थिक अनुदान देने वाला देश है।
  4. निशस्त्रीकरण के क्षेत्र में भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की भारी सहायता की है।
  5. भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष आई विश्व समस्याओं का समाधान किया है। उसने हंगरी, कोरिया, क्यूबा, स्वेज नहर, कांगो, वियतनाम आदि विश्व समस्याओं के समाधान में हर प्रकार की आर्थिक एवं सैनिक सहायता प्रदान की है।
  6. भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर प्रजाति तथा रंगभेद नीति को दूर किया है।
  7. चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता प्रदान कराने में भारत की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
  8. भारत ने सदैव संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेशों का पालन किया है। भारत ने पाकिस्तान के विरूद्ध चल रहे युद्ध को उसका आदेश मिलते ही अचानक बंद कर दिया।
  9. भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा चलाई गई योजनाओं का सदैव समर्थन किया है।
  10. भारत का विश्व शांति स्थापना में भारी योगदान रहा है।

प्रश्न 9.
मानवाधिकार का क्या अर्थ है? भारत मानवाधिकारों का प्रबल समर्थक क्यों है?
उत्तर:
मानवाधिकार:
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का उद्देश्य केवल विश्व शांति की स्थापना करना ही नहीं था बल्कि इसके साथ-साथ मानव की उन्नति व विकास के लिए आवश्यक अधिकारों को दिलाना भी था। इस कार्य के लिए संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक व सामाजिक परिषद् ने 1946 ई० में मानव अधिकारों की समस्या को लेकर एक आयोग की नियुक्ति की। इस आयोग की रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 ई० को मानव अधिकारों का घोषणा-पत्र (Charter of Human Rights) स्वीकार किया। इस घोषणा-पत्र के द्वारा संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की सरकारों से यह उपेक्षा की जाती है कि वे अपने नागरिकों के अधिकारों का आदर करेगी। मानव अधिकार वे अधिकार हैं जो कि मानव होने के नाते अवश्य ही प्राप्त होने चाहिए। ये अधिकार प्रत्येक व्यक्ति, जाति, धर्म, भाषा के भेदभाव के बिना मिलने चाहिए। भारत मानव अधिकारों का प्रबल समर्थक है। इसके तीन प्रमुख कारण निम्न हैं –

  1. भारत का यह मानना है कि आधुनिक युग में कोई भी स्वतंत्र व लोकतांत्रिक देश मानव अधिकारों के बिना न तो प्रगति कर सकता है और न ही उस देश में शांति स्थापित की जा सकती है।
  2. मानव अधिकार ऐसे अधिकार हैं जो कि मानव की उन्नति व प्रगति के लिए अति आवश्यक व महत्त्वपूर्ण हैं।
  3. भारत विश्व शांति तथा मानवता के उत्थान में विश्वास रखता है, इसलिए मानव अधिकार का प्रबल समर्थक है।

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प्रश्न 10.
संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता से भारत को क्या लाभ हुए हैं?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता से भारत को लाभ:
संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता से भारत को विभिन्न क्षेत्रों में अनेक लाभ हुए हैं। विश्व स्वास्थ्य संघ की सदस्यता के कारण भारतीयों मान को स्वास्थ्य की रक्षा के लिए अनेक सुविधायें प्राप्त हुई। भारत में पेनसिलिन बनाने का कारखाना इसकी मदद से खोला गया। टी० बी० की रोकथाम के लिए बी० सी० जी० के टीके उपलब्ध हुए। इसके अतिरिक्त लगभग बीस हजार डॉलर की सहायता स्वास्थ्य संबंधी कार्यों के लिये प्राप्त हुए। यूनेस्को से शिक्षा संस्कृति और विज्ञान के क्षेत्र में उन्नति करने के लिए जो विशेष सहायता मिली है, वह इस क्षेत्र में हमारी प्रगति को आगे बढ़ाने में विशेष सहायक हुई है।

इसकी सहायता में भारतीय विद्यार्थियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए विदेशों में जाने और विदेशी विद्यार्थियों को भारत में आने की सुविधायें दी गयी हैं। जोधपुर में यूनेस्को की सहायता से सेन्ट्रल ग्रिड जोन रिसर्च इन्स्टीट्यूट (Central Grid Zone Research Institute) की स्थापना की गई है, जिसमें बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के उपायों पर काम हो रहा है। इसी प्रकार से अनेक संस्थायें यूनेस्कों की सहायता से विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं।

विश्व बैंक द्वारा कई सौ करोड़ रुपयों की सहायता विकास कार्यों के लिये मिली है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष विनिमय की व्यवस्था करता है जिसमें हमारे विदेशी व्यापार को बहुत अधिक प्रोत्साहन मिलता है। संयुक्त राष्ट्र विश्व शिशु आपात कोष (UNICEF) द्वारा भारत में बाल कल्याण के लिये सन् 1964 में 77300 डॉलर सहायता के रूप में मिले। तब से इस सहायता में काफी वृद्धि हो चुकी है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सं० रा० द्वारा भारत को विभिन्न क्षेत्रों में पर्याप्त सहायता मिली है। सं० रा० और उनकी संस्थाओं में भारत के सहयोग एवं प्रतिष्ठा के कारण अंतर्राष्ट्रीय जगत में हमारी साख बहुत बढ़ गई है।

इस प्रकार हमने पढ़ा है कि सं० रा० की स्थापना के समय से ही भारत इसका सदस्य रहा है। सं० रा० से पूर्व सहयोग, भारत का विदेश नीति का अंग रहा। साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद की रंगभेद विरोधी अपनी विदेश नीति पर आचरण करते हुए, भारत ने सं० रा० के मंच का विश्व की उन शक्तियों का पर्दाफाश करने का खूब उपयोग किया है, जो अन्य राष्ट्रों को अपना उपनिवेश बनाती है। भारत ने चैकोस्लोवाकिया, लेबनान, जोर्डन, कांगों में महाशक्तियों के हस्तक्षेप की सदैव निंदा की है। विश्व बैंक की स्थापना के उद्देश्य से सं० रा० की शांति सेना में भारत कई बार सम्मिलित हो चुका है। सं० रा० की विभिन्न एजेंसियां एवं संस्थाओं के कार्यों में भारत ने खूब रूचि ली है, इसके इस सहयोग के कारण भारत को सं० रा० से उचित सम्मान एवं विभिन्न क्षेत्रों में सहायता मिली है।

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प्रश्न 11.
1991 से कौन-कौन से मुख्य परिवर्तन हुए हैं जो संयुक्त राष्ट्र संघ के परिवर्तन को प्रभावित कर रहे हैं?
उत्तर:
1991 से हुए मुख्य परिवर्तन:

  1. अमरीका की प्रतिद्वंद्वी महाशक्ति सोवियत संघ का पतन हो गया है।
  2. अमरीका विश्व का सर्वाधिक ताकतवर देश बन गया है।
  3. सोवियत संघ उत्तराधिकारी राज्य रूस और अमरीका में अधिक सहयोगात्मक संबंध स्थापित हो गया है।
  4. चीन बड़ी तेजी से एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है, इसके समानान्तर भारत भी एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
  5. एशिया की अर्थव्यवस्था प्रत्याशित दर से प्रगति हो रही है।
  6. अनेक नये देश संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल हुए हैं। ये वे देश हैं जो सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् स्वतंत्र हुए हैं अथवा पूरी यूरोप के भूतपूर्व देश हैं।
  7. विश्व के सामने अनेक चुनौतियां यथा जनसंहार, गृहयुद्ध, जातीय संघर्ष, आतंकवाद, परमाण्विक प्रसार, जलवायु में परिवर्तन, पर्यावरण की हानि और महामारी उपस्थित हुई हैं।

प्रश्न 12.
संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् की सदस्यता के लिए क्या-क्या नये मानदंड सुझावों से आये हैं।
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् की सदस्यता के नये मानदंड:

  1. किसी सदस्य राष्ट्र को बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित होना चाहिए।
  2. उसे सैनिक दृष्टि से ताकतवर होना चाहिए जिससे वह बड़े से बड़े युद्धों का सामना कर सके।
  3. उस देश को लोकतंत्र और मानवाधिकारों को सम्मान देने में अग्रणी होना चाहिए।
  4. संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट में उसका अधिक से अधिक योगदान होना चाहिए।
  5. उसकी जनसंख्या विशाल होनी चाहिए।
  6. सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए उस देश को अपने भूगोल, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की दृष्टि से विश्व की विविधता का नेतृत्व करना चाहिए।

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प्रश्न 13.
विश्व बैंक (World Bank) के प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर:
विश्व बैंक के कार्य:

  1. द्वित्तीय विश्व युद्ध के पश्चात् विश्व के विभिन्न देशों की पर्याप्त बर्बादी हुई थी। उन देशों के पुरनोद्धार के लिए 1945 ई० में विश्व बैंक की स्थापना हुई।
  2. इस बैंक का कार्यक्षेत्र विकासशील देश हैं और उनके विकास के लिए यह धन उपलब्ध करता है।
  3. यह बैंक मानवीय विकास (शिक्षा, स्वास्थ्य), कृषि और ग्रामीण विकास (सिंचाई और ग्रामीण सेवायें) के कार्य करता है।
  4. पर्यावरण सुरक्षा (प्रदूषण में कमी, नियमों का निर्माण और उन्हें लागू करना) में भी रूचि लेता है।
  5. यह आधारभूत ढांचा (सड़क, शहरी विकास, बिजली) में भी सुधार लाता है।
  6. यह विभिन्न देशों में सुशासन (कदाचार का विरोध विधिक संस्थाओं का विकास) के लिए भी कार्य करता है।
  7. यह अपने सदस्य देशों को आसान ऋण और अनुदान देता है । अधिक गरीब देशों को अनुदान वापस भी नहीं लेता है।

प्रश्न 14.
संयुक्त राष्ट्र संघ को अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए सितंबर 2005 में सदस्यों द्वारा क्या-क्या प्रस्ताव पारित किये गये?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ को अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए उठाये जाने वाले कदम:

  1. एक शांति संस्थापक आयोग का गठन किया जाय।
  2. यदि कोई राष्ट्र अपने नागरिकों की रक्षा करने में असमर्थ हो तो इसका उत्तरदायित्व विश्व बिरादरी को स्वीकार करना चाहिए।
  3. मानवाधिकार परिषद् की स्थापना कार्य 19 जून, 2006 से सक्रिय रूप से होगा।
  4. सहस्राब्दि विकास लक्ष्य (Millenium Development Goals) को प्राप्त करने पर सहमति हुई।
  5. सभी प्रकार से आतंकवाद की निंदा की जाए।
  6. एक लोकतंत्र कोष का गठन होगा।
  7. न्यासिता परिषद् (Trustship Council) को समाप्त करने पर सहमति हुए।

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प्रश्न 15.
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विषय में क्या जानते हैं ?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन (WTO):

  1. यह एक ऐसा विश्व व्यापार संगठन है जो वैश्विक व्यापार के नियमों को सुनिश्चित करता है।
  2. यह संगठन जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ का उत्तराधिकारी है जो द्वित्तीय विश्व युद्ध के पश्चात् 1995 में प्रकाश में आया।
  3. इसके सदस्यों की संख्या 150 है। यद्यपि प्रत्येक निर्णय सर्वसम्मति से किया जाता है परंतु अमरीका, यूरोपीय संघ तथा जापान जैसी बड़ी शक्तियां विश्व व्यापार संगठन के नियमों को अपने हित के अनुसार बनाने का प्रयास करती हैं।
  4. विकासशील देश इन आर्थिक शक्तियों की कटु आलोचना करते हैं और मानते है कि विश्व व्यापार संगठन के नियम पारदर्शी नहीं हैं।

पश्न 16.
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का क्या स्थान है?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र में भारत का स्थान: संयुक्त राष्ट्र में भारत के योगदान के कारण उसे बहुत सम्मान मिला है। उसकी विभिन्न एजेंसियों व आयोगों में भारत का स्थान महत्त्वपूर्ण रहा है। श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित सं० रा० की महासभा जनरल असेम्बली की अध्यक्ष चुनी गई, इसकी आर्थिक व सामाजिक परिषद् के पाँचवे अधिवेशन के अध्यक्ष भारत के श्री रामस्वामी मुदालियार चुने गये और 1962 में भारत इसका सदस्य चुना गया। सन् 1957 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की अध्यक्षा श्रीमती राजकुमारी अमृतकौर बनीं।

युनेस्को की कार्य समिति का अध्यक्ष पद डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन तथा श्री लक्ष्मण स्वामी मुदालियर ने सुशोभित किया और युनेस्को का नौंवा अधिवेशन भारत में हुआ जिसकी अध्यक्षता स्व० अब्दुल कलाम आजाद ने की। वित्तमंत्री श्री देशमुख की अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर स्व. श्री बी० राव नियुक्त हुए। भारत जनसंख्या आयोग व मानव अधिकारों के आयोग का सदस्य चुना गया। इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन सं० रा० का द्वितीय व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुआ और भी कितनी ही गोष्ठियों को भारत में आयोजित करने का गौरव हमें प्राप्त हुआ।

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प्रश्न 17.
हयूमन राइट्स वॉच क्या है?
उत्तर:
ह्यूमन राइट्स वॉच:

  1. यह मानवाधिकारों का समर्थन करने वाला और उनसे संबंधित अनुसंधान करने वाला एक अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संगठन है।
  2. यह अमरीका का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन है।
  3. यह मानवाधिकारों के उल्लंघन की ओर मीडिया का ध्यान आकर्षित करता है।
  4. इसने बारूदी सुरंगों पर रोक लगाने के लिए, बाल सैनिकों का प्रयोग रोकने के लिए और अंतर्राष्ट्रीय दंड न्यायालय स्थापित करने के लिए अभियान चलाने में सहायता की है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र में भारत की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1. संयुक्त राष्ट्र में भारत की भूमिका (India’s Role in the United Nations):
संयुक्त राष्ट्र का चार्टर बनाने में भारत ने भाग लिया। भारत की ही सिफारिश पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने चार्टर में मानव अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं को बिना किसी भेदभाव के लागू करने के उद्देश्य से जोड़ा। सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि श्री सं० राधास्वामी मुदालियर ने इस बात पर जोर दिया कि युद्धों को रोकने के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय का महत्त्व सर्वाधिक होना चाहिए। भारत संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर करने वाले प्रारंभिक देशों में से एक था।

2. संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता बढ़ाने में सहयोग (Co-operation for increasing the membership of United Nations):
संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनने के लिए भारत ने विश्व के प्रत्येक देश को कहा है। भारत ने चीन, बांग्लादेश, हंगरी, श्रीलंका, आयरलैंड और रूमानिया आदि देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

3. आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में सहयोग (Co-operation for solving the Economic and Social problems):
भारत ने विश्व की सामाजिक व आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत ने हमेशा आर्थिक रूप से पिछड़े हुए देशों के आर्थिक विकास पर बल दिया है और विकसित देशों से आर्थिक मदद और सहायता देने के लिए कहा है।

4. निःशस्त्रीकरण के बारे में भारत का सहयोग (India’sco-operation to U.N. for the disarmament):
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में महासभा और सुरक्षा परिषद् दोनों के ऊपर यह जिम्मेदारी डाल दी गई है कि निःशस्त्रीकरण के द्वारा ही विश्व-शांति को बनाया जा सकता है और अणु-शक्ति का प्रयोग केवल मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने अक्टूबर 1987 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में बोलते हुए पुनः पूर्ण परमाण्विक निःशस्त्रीकरण की अपील की थी।

संयुक्त राष्ट्र संघ के राजनीतिक कार्यों में भारत का सहयोग (India’s co operation in the political function of theUnited Nations):
भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सुलझाई गई प्रत्येक समस्या में अपना पूरा-पूरा सहयोग दिया ये समस्याएं निम्नलिखित हैं –

(क) कोरिया की समस्या (Korean problems):
जब उत्तर कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया तो तीसरे विश्व युद्ध का खतरा उत्पन्न हो गया क्योंकि उस समय उत्तरी कोरिया रूस के और दक्षिण कोरिया अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में था। ऐसे समय में भारत की सेना कोरिया में शांति स्थापित करने के लिए गई। भारत ने इस युद्ध को समाप्त करने तथा दोनों देशों को युद्धबंदियों के आदान-प्रदान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(ख) स्वेज नहर की समस्या (Problems concerned with Suez Canal):
जुलाई 1956 के बाद में मिस्र ने स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण की घोषणा कर दी। इस राष्ट्रीयकरण से इंग्लैंड और फ्रांस को बहुत अधिक हानि होने का भय था अतः उन्होंने स्वेज नहर पर अपना अधिकार जमाने के उद्देश्य से इजराइल द्वारा मित्र पर आक्रमण करा दिया। इस युद्ध को बंद कराने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने सभी प्रयास किए। इन प्रयासों में भारत ने भी पूरा सहयोग दिया और यह युद्ध बंद हो गया।

(ग) हिंद-चीन का प्रश्न:
सन् 1954 में हिन्द-चीन में आग भड़की। उस समय ऐसा लगा कि संसार की अन्य शक्तियां भी उसमें उलझ जाएंगी। जिनेवा में होने वाली अंतर्राष्ट्रीय कान्फ्रेंस में भारत ने इस क्षेत्र की शांति स्थापना पर बहुत बल दिया।

(घ) हंगरी में अत्याचारों का विरोध:
जब रूसी सेना ने हंगरी में अत्याचार किए तो भारत ने उसके विरुद्ध आवाज उठाई। इस अवसर पर उसने पश्चिमी देशों के प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसमें रूस से ऐना न करने का अनुरोध किया गया था।

(ङ) चीन की सदस्यता में भारत का योगदान:
विश्व-शांति की स्थापना के संबंध में भारत का मत है कि जब तक संसार के सभी देशों का प्रतिनिधित्व संयुक्त राष्ट्र में नहीं होगा वह प्रभावशाली कदम नहीं उठा सकता। भारत के 26 वर्षों के प्रयत्न स्वरूप संसार में यह वातावरण बना लिया गया। इस प्रकार चीन सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य भी बन गया है।

(च) नए राष्ट्रों की सदस्यता:
भारत का सदा प्रयत्न रहा है कि अधिकाधिक देशों को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाया जाए। इस दृष्टि से नेपाल, श्रीलंका, जापान, इटली, स्पेन, हंगरी, बल्गारिया, ऑस्ट्रिया, जर्मनी आदि को सदस्यता दिलाने में भारत ने सक्रिय प्रयास किया।

(छ) रोडेशिया की सरकार:
जब स्मिथ ने संसार की अन्य श्वेत जातियों के सहयोग से रोडेशिया के निवासियों पर अपने साम्राज्यवादी शिकंजे को कसा तो भारत ने राष्ट्रमंडल तथा संयुक्त राष्ट्र के मंचों से इस कार्य की कटु आलोचना की।

(ज) विभिन्न पदों की प्राप्ति:
भारत की सक्रियता का प्रभाव यह है कि श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित को साधारण सभा की अध्यक्ष चुना गया। इसके अतिरिक्त मौलाना आजाद यूनेस्को के प्रधान बने, श्रीमती अमृत कौर विश्व स्वास्थ्य संघ की अध्यक्षा बनीं। डा. राधाकृष्णनन आर्थिक व सामाजिक परिषद् के अध्यक्ष चुने गए। सर्वाधिक महत्व की बात भारत को 1950 में सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य चुना गया था।

अब तक छः बार 1950, 1967, 1972, 1977, 1984 तथा 1992 में भारत स्थायी सदस्य चुना गया। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में स्व० श्री बी० राव न्यायाधीश चुने गए। श्री के० पी० एस० मेनन कोरिया समस्या के संबंध में स्थापित आयोग के अध्यक्ष चुने गए थे। निष्कर्ष-भारत विश्व-शांति व सुरक्षा को बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र को सहयोग देता रहा है और भारत को अटल विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र विश्व-शांति को बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण यंत्र है। पं० जवाहरलाल ने एक बार कहा था, “हम संयुक्त राष्ट्र के बिना विश्व की कल्पना भी नहीं कर सकते।”

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए:

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतीक चिह्न में किसका मानचित्र है?
(अ) विश्व का मानचित्र
(ब) अमरीका का मानचित्र
(स) चीन का मानचित्र
(द) फ्रांस का मानचित्र
उत्तर:
(अ) विश्व का मानचित्र

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प्रश्न 2.
यह किसका कथन है कि हथियार लड़ाने से बढ़िया है कि जबान से लड़ाई की जाए।
(अ) हिटलर
(ब) लेनिन
(स) चर्चिल
(द) महात्मा गांधी
उत्तर:
(स) चर्चिल

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में कौन समूह का स्थायी सदस्य नहीं है?
(अ) अमरीका
(ब) जापान
(स) रूस
(द) भारत
उत्तर:
(द) भारत

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प्रश्न 4.
आई एम एफ (IMF) का पूर्णरूप क्या है?
(अ) इंडिया म्यूचुअल फंड
(ब) इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड
(स) इंडोनेशिया म्यूचुअल फंड
(द) इंटरनेट मिटींग फंड
उत्तर:
(ब) इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड

प्रश्न 5.
सान फ्रांसिस्को में संयुक्त राष्ट्र संघ का अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने का सम्मेलन कब हुआ।
(अ) अप्रैल-मई 1945
(ब) अगस्त 1941
(स) फरवरी 1945
(द) अक्टूबर 1945
उत्तर:
(अ) अप्रैल-मई 1945

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प्रश्न 6.
भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में कब शामिल हुआ?
(अ) अप्रैल-मई, 1945
(ब) 26 जून, 1945
(स) 24 अक्टूबर 1945
(द) 30 अक्टूबर 1945
उत्तर:
(द) 30 अक्टूबर 1945

प्रश्न 7.
2006 तक संयुक्त राष्ट्र संघ के कितने सदस्य राष्ट्र हैं?
(अ) 191
(ब) 192
(स) 193
(द) 194
उत्तर:
(ब) 192

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प्रश्न 8.
निम्नलिखित में कौन सं० रा0 संघका महासचिव नहीं रहा है?
(अ) बुतरस बुतरस घाली
(ब) कोफी ए. अन्नान
(स) डेग हैमरशोल्ड
(द) कुर्त वाल्डहीम
उत्तर:
(स) डेग हैमरशोल्ड

प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट में सर्वाधिक योगदान किसका है?
(अ) ब्रिटेन
(ब) जर्मनी
(स) अमरीका
(द) जापान
उत्तर:
(स) अमरीका

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प्रश्न 10.
वीटो का अधिकार किसको है?
(अ) महासभा के सदस्य राष्ट्रों को
(ब) सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यों को
(स) सुरक्षा परिषद् के अस्थाई सदस्यों को
(द) अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों को
उत्तर:
(ब) सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यों को

प्रश्न 11.
अमरीका क्या नहीं कर सकता?
(अ) अपने हित के विरुद्ध कार्यों को ‘वीटो’ पावर से रोक सकता है
(ब) विश्व के राष्ट्रों में फूट डाल सकता है
(सं) विरोधी राष्ट्र का दमन कर सकता है
(द) विकासशील राष्ट्रों को ताकतवर बना सकता है
उत्तर:
(द) विकासशील राष्ट्रों को ताकतवर बना सकता है

II. मिलान वाले प्रश्न एवं उनके उत्तर

निम्नलिखित स्तम्भ (अ) का मिलान स्तम्भ (ब) से कीजिए।
Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 6 अन्तराष्ट्रीय संगठन Part - 1 img 2
उत्तर:
(1) – (ii)
(2) – (v)
(3) – (i)
(4) – (viii)
(5) – (ii)
(6) – (vii)
(7) – (vi)
(8) – (iv)

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व

Bihar Board Class 12 Political Science समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
वर्चस्व के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?
(क) इसका अर्थ किसी एक देश की अगुआई या प्रावल्य है।
(ख) इस शब्द का इस्तेमाल प्राचीन यूनान में एथेंस की प्रधानता को चिह्नित करने के लिए किया जाता था।
(ग) वर्चस्वशील देश की सैन्यशक्ति अजेय होती है।
(घ) वर्चस्व की स्थिति नियत होती है। जिसने एक बार वर्चस्व कायम कर लिया उसने हमेशा के लिए वर्चस्व कायम कर लिया।
उत्तर:
(घ) वर्चस्व की स्थिति नियत होती है। जिसने एक बार वर्चस्व कायम कर लिया उसने हमेशा के लिए वर्चस्व कायम कर लिया।

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प्रश्न 2.
समकालीन विश्व-व्यवस्था के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?
(क) ऐसी कोई विश्व-सरकार मौजूद नहीं जो देशों के व्यवहार पर अंकुश रख सके।
(ख) अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अमेरिका की चलती है।
(ग) विभिन्न देश एक-दूसरे पर बल-प्रयोग कर रहे हैं।
(घ) जो देश अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं उन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ कठोर दंड देता है।
उत्तर:
(घ) जो देश अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं उन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ कठोर दंड देता है।

प्रश्न 3.
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ (इसकी मुक्ति अभियान) के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?
(क) इराक पर हमला करने के इच्छुक अमेरिकी अगुआई वाले गठबंधन में 40 से ज्यादा देश शामिल हुए।
(ख) इराक पर हमले का कारण बताते हुए कहा गया कि यह हमला इराक को सामूहिक संहार के हथियार बनाने से रोकने के लिए किया जा रहा है।
(ग) इस कारवाई से पहले संयुक्त राष्ट्रसंघ की अनुमति ले ली गई थी।
(घ) अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन को इराकी सेना से तगड़ी चुनौती नहीं मिली।
उत्तर:
(ग) इस कारवाई से पहले संयुक्त राष्ट्रसंघ की अनुमति ले ली गई थी।

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प्रश्न 4.
इस अध्याय में वर्चस्व के तीन अर्थ बताए गए हैं। प्रत्येक का एक-एक उदाहरण बताएँ। ये उदाहरण इस अध्याय में बताए गए उदाहरणों से अलग होने चाहिए।
उत्तर:
वर्चस्व के अर्थ और उदाहरण –

  1. वर्चस्व के पहले अर्थ का संबंध राज्यों के बीच सैन्य क्षमता की बनावट और तौल से है। उदाहरण- पूर्व सोवियत संघ।
  2. वर्चस्व दूसरे अर्थ में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इस अर्थ में बुनियादी धारणा है कि वैश्विक अथव्यवस्था में कोई भी देश अपनी मर्जी चला सकता है। उदाहरण – पूर्व ब्रिटेन।
  3. वर्चस्व के तीसरे अर्थ का संबंध व्यवहार से है। अमेरिका सांस्कृतिक अर्थ में भी वर्चस्व रखता है। उदाहरण के लिए किसी खान-पान में या मनोरंजन में लोग अमरीकी प्रथा की बात करते हैं अर्थात् इस खर्च में सबको अपना-अपना हिस्सा देना चाहिए।

प्रश्न 5.
उन तीन बातों का जिक्र करें जिनसे साबित होता है कि शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद अमरीकी प्रभुत्व का स्वभाव बदला है और शीतयुद्ध के वर्षों के अमरीकी प्रभुत्व की तुलना में यह अलग है।
उत्तर:
1. शीतयुद्ध के बाद में जब क्लिटन अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने कठोर राजनीति की जगह लोकतंत्र के बढ़ावे, जलवायु परिवर्तन तथा विश्व व्यापार जैसे नरम मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित किया। अमरीका ने अपने घरेलु मामलों को सीमित कर लिया और विश्व के मामलों की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया।

2. अमेरिका ने जब तब सैनिक शक्ति का भी इस्तेमाल किया। जैसे अब कोसोवो प्रांत युगोस्लाविया ने अल्वानियाई लोगों के आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया तो अमेरिकी नेतृत्व में नाटो के देशों ने युगोस्लावियाई क्षेत्रों पर बमबारी शुरू कर दी और घुटने टेकने को विवश कर दिया।

3. आगे चलकर अमेरिका ने मनमानी भी शुरू कर दी और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे संस्था का तिरस्कार शुरू कर दिया। अमेरिका ने 19 मार्च 2003 को ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ कूटनाम से अभियान शुरू किया। उसने संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति के बिना 40 से अधिक देशों के सहयोग से आक्रमण किया। इसका कारण दिखाने के लिए सामूहिक संहार के हथियार बनाने से रोकने के लिए इराक पर आक्रमण किया गया। यह आक्रमण अन्यायपूर्ण था।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित का मेल करें।

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter - 3 समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व Part - 1 img 1
उत्तर:
(क) – (ii)
(ख) – (iii)
(ग) – (i)
(घ) – (iv)

प्रश्न 7.
अमरीकी वर्चस्व की राह में कौन-से व्यवधान हैं। आपके जानते इनमें से कौन-सा व्यवधान आगामी दिनों में सबसे महत्त्वपूर्ण साबित होगा?
उत्तर:
अमरीकी वर्चस्व की राह में मुख्यतः तीन व्यवधान हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. प्रथम व्यवधान अमरीका की संस्थागत बनावट है यहाँ शासन के तीन अंगों के बीच शक्ति का बँटवारा है। कार्यपालिका सैन्य शक्ति के अनियंत्रित इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगती है।
  2. द्वितीय अवरोध-अमरीकी समाज की उन्मुक्ता है। अमेरिका में जन संचार के साधन जनमत तैयार करने में सहायक हैं परंतु अमेरिकी राजनीतिक संस्कृति में शासन के उद्देश्य और तरीके को लेकर लोगों में गहरी शंकायें हैं।
  3. तृतीय अवरोध-नाटो है जो सैनिक संगठन है और वही अमेरिकी ताकत पर लगाम लगा सकता है। अमेरिका का बहुत बड़ा हित लोकतांत्रिक देशों के इस संगठन को कायम रखने से जुड़ा है क्योकि इन देशों में बाजारमूलक अर्थव्यवस्था चलती है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण तृतीय अवरोध-नाटो है।

प्रश्न 8.
भारत-अमेरिका समझौते से संबंधित बहस के तीन अंश इस अध्याय में दिए गए हैं। इन्हें पढ़ें और किसी एक अंश को आधार मानकर पूरा भाषण तैयार करें जिसमें भारत-अमेरिकी संबंध के बारे में किसी एक रुख का समर्थन किया गया हो।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन से पूर्व भारत के संबंध अमेरिका से बहुत अच्छे नहीं रहे। परंतु बाद में वह अमेरिका के निकट आता जा रहा है। इस अवधि में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया है और उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने का प्रयास किया है। उसने प्रभावशाली आर्थिक दर भी हासिल कर ली है। इसलिए भारत अब अमेरिका सहित अनेक देशों का आर्थिक केन्द्र बन गया है। दोनों देश एक दूसरे के लिए आर्थिक दृष्टि से कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं।

भारत का साफ्टवेयर निर्यात 65% भारत अमेरिका को जाता है। अमरीका में भारतीय प्रवासी के रूप में भारी संख्या में हैं और विभिन्न उद्योगों में लगे हुए हैं। यह अमरीका के विश्वव्यापी वर्चस्व का दौर है और भारत को अमरीका के साथ संबंधों की निश्चित दिशा देनी है। इस विचार श्रृंखला में कई प्रकार की विचारधाराएँ सामने आई हैं परंतु सभी में कुछ न कुछ अवरोध हैं। सबसे बेहतर विकल्प यह है कि भारत को अमेरिकी वर्चस्व का लाभ उठाना चाहिए अपने को शक्तिशाली बनाना चाहिए। इससे भारत की आर्थिक विकास की दर बढ़ सकती है।

जहाँ तक अमेरिकी वर्चस्व से निपटने का प्रश्न है, उसके लिए गैर सरकारी संस्थाओं का सहारा लिया जा सकता है। ये संस्थाएँ अमेरिकी वर्चस्व का जोरदार विरोध कर सकती हैं। इससे अमरीकी वर्चस्व को आर्थिक और सांस्कृतिक धरातल पर चुनौती मिलेगी। यह चुनौती स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक आंदोलन और जनमत के आपसी मेल से किया जा सकता है। मीडिया, बुद्धिजीवी, कलाकार और लेखक आदि भी अमेरिकी वर्चस्व का प्रतिकार कर सकते हैं।

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प्रश्न 9.
“यदि बड़े और संसाधन संपन्न देश अमेरिकी वर्चस्व का प्रतिकार नहीं कर सकते तो यह मानना अव्यावहारिक है कि अपेक्षाकृत छोटी और कमजोर राज्येतर संस्थाएँ अमेरिकी वर्चस्व का कोई प्रतिरोध कर पाएँगी।” इस कथन की जाँच करें और अपनी राय बताएँ।
उत्तर:
यदि बड़े और संसाधन सम्पन्न देश अमेरिकी वर्चस्व का प्रतिकार नहीं कर सकते तो राज्येतर संस्थाएँ अमरीकी वर्चस्व का प्रतिरोध कर सकती हैं। इससे अमेरिकी वर्चस्व को आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर चुनौती मिलेगी यह चुनौती स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक आंदोलन और जनमत के आपसी मेल से की जा सकती है। मीडिया, बुद्धिजीवी, कलाकार और लेखक आदि भी अमेरिकी वर्चस्व का प्रतिकार कर सकते हैं। इन सभी संस्थाओं का विश्व स्तर पर नेटवर्क बन सकता है। जिसमें अमरीकी नागरिक शामिल हो सकते हैं। यह बहुत अव्यावहारिक नहीं है। वस्तुतः ऐसी नीति अपनाना विवशता है। हम अपना देश, राज्य, समाज और गाँव नहीं छोड़ सकते हैं। ऐसे में प्रतिरोध ही एकमात्र उपाय बचा है।

Bihar Board Class 12 Political Science समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वर्चस्व का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वर्चस्व (Hagemoney) ताकत से जुड़ा हुआ है। विश्व राजनीति में भी विभिन्न देश या देशों की समूह शक्ति पाने और कायम रखने की लगातार कोशिश करते हैं। यह ताकत सैनिक प्रभुत्व, आर्थिक शक्ति, राजनीतिक रूतबे और सांस्कृतिक वृद्धि के रूप में होती है। इन सभी क्षेत्रों में प्रभुत्व स्थापित करना ही वर्चस्व है।

प्रश्न 2.
अमेरिका का वर्चस्व कब स्थापित हुआ?
उत्तर:

  1. सामान्य रूप से अमरीका का वर्चस्व 1991 से माना जाता है जब महाशक्ति के रूप में सोवियत संघ का पतन हो गया और वह अंतर्राष्ट्रीय से गायब हो गया। अमरीका अब भी बढ़ी हुई ताकत के साथ कायम था।
  2. कुछ लोगों के विचार से अमरीकी वर्चस्व कुछ पहलुओं का इतिहास 1991 तक सीमित नहीं है बल्कि यह पीछे 1945 से आरंभ होता है। वस्तुतः बाद में यह स्पष्ट हुआ कि विश्व वर्चस्व के दौर से गुजर रहा है।

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प्रश्न 3.
जार्ज बुश ने ‘नई विश्व व्यवस्था’ किसको कहा?
उत्तर:

  1. अगस्त 1990 में इराक ने कुवैत पर कब्जा करने के लिए उस पर आक्रमण कर दिया और जीत लिया। कई देशों ने इराक से छोड़ने की अपील की।
  2. इराक द्वारा अपील न मानने पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुवैत को मुक्त कराने के लिए बलप्रयोग की अनुमति दे दी। संयुक्त राष्ट्र का यह एक नाटकीय फैसला था, क्योंकि शीत युद्ध के विभिन्न विवादों के प्रति चुप्पी साध लेता था। अमेरिका राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इसे नई विश्व व्यवथा नाम दिया।

प्रश्न 4.
‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म’ क्या है?
उत्तर:

  1. इराक द्वारा कुवैत पर कब्जा न छोड़ने के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में 34 देशों की मिली-जुली और 660000 सैनिकों की विशाल सेना ने इराक के विरुद्ध मोर्चा खोला और उसे परास्त कर दिया।
  2. इस युद्ध को प्रथम खाड़ी युद्ध कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के इस सैन्य अभियान को ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म’ कहा जाता है। वस्तुत: अमेरिकी सैन्य अभियान का ही हिस्सा था।

प्रश्न 5.
कंप्यूटर युद्ध’ या ‘वीडियो गेम वार’ किस युद्ध को कहा जाता है और क्यों?
उत्तर:

  1. प्रथम खाड़ी युद्ध (1990) को कंप्यूटर युद्ध कहा गया क्योंकि इसमें ‘स्मार्ट बमों का प्रयोग किया गया।
  2. इस युद्ध को दूरदर्शन पर विस्तार से दिखाया गया। विश्व के विभिन्न स्थानों पर बैठे दर्शक युद्ध को ध्यान से देख रहे थे कि इराकी सेना किस प्रकार पराजित हो रही है। इसी कारण ‘वीडियो गेम वार’ भी कहा गया।

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प्रश्न 6.
प्रथम खाड़ी युद्ध से अमरीका को क्या आर्थिक लाभ हुआ?
उत्तर:

  1. प्रथम खाड़ी युद्ध कहने को संयुक्त राष्ट्र संघ की विजय हुई परंतु वास्तविक अमेरिका को मिला। कुवैत फिर उसके प्रभाव में आ गया जहाँ से अमरीका तेल प्राप्त करता था।
  2. अमरीका ने इस युद्ध के नाम पर जमकर मुनाफा कमाया। कई रिपोर्टों के अनुसार उसने जितना धन इस युद्ध में खर्च किया उससे कहीं ज्यादा रकम उसे जर्मनी, जापान और सऊदी अरब से प्राप्त हुई।

प्रश्न 7.
‘ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच’ का आदेश क्यों हुआ?
उत्तर:

  1. अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिटन के दौर में एक बड़ी सैन्य कार्रवाई नैरोबी (केन्या) और दारे सलाम (तंजानिया) के अमेरिकी दूतावासों पर बमबारी हुई।
  2. आतंकवादी संगठन ‘अल-कायदा’ को इस बमबारी का जिम्मेदार ठहराया गया। इस बमबारी के जवाब में ‘ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच’ का आदेश हुआ।

प्रश्न 8.
‘नाइन एलेवन’ 9/11 से क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. विभिन्न अरब देशों के 19 अपहरणकर्ताओं ने 4 अमेरिकी व्यावसायिक विमानों पर कब्जा करके इनके द्वारा 11 सितंबर 2001 को विभिन्न महत्वपूर्ण इमारतों को ध्वस्त कर दिया।
  2. इस हमले को ‘नाइन एलेवन (9/11) कहा जाता है। वस्तुतः अमेरिका में माह (सितंबर) को तारीख (9) से पहले लिखने का चलन है। इसी का संक्षिप्त रूप 9/11 है, जबकि भारत में इसे 11/9 लिखा जाएगा।

प्रश्न 9.
‘ऑपरेशन एन्डयूरिंग फ्रीडम’ की घटना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. 9/11 के जवाब में अमेरिका ने आतंकवाद के विरुद्ध विश्यव्यापी युद्ध के रूप में ‘ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम’ चलाया।
  2. यह अभियान उन सभी के विरुद्ध चलाया गया जिन पर 9/11 का शक था। मुख्य निशाना अल-कायदा और अफगानिस्तान के तालिबान शासन को बनाया गया।

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प्रश्न 10.
‘काअलिशन ऑफ वीलिंग्स’ (आकांक्षियों का महाजोत) क्या है?
उत्तर:

  1. ऑपरेशन इराकी फ्रीडम में अमेरिका के नेतृत्व में 40 से अधिक देश शामिल हुए। विभिन्न देशों के इस महाजोत को ‘कॉअलिशन ऑफ वीलिंग्स’ कहा गया।
  2. इनके द्वारा इराक पर जबर्दस्ती हमला किया गया।

प्रश्न 11.
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के मुख्य परिणाम क्या थे?
उत्तर:

  1. इस युद्ध में इराक पराजित हुआ और सद्दाम हुसैन की सत्ता समाप्त हो गई। लेकिन इराक में शांति नहीं स्थापित हुई।
  2. अमेरिका के 3000 सैनिक इस युद्ध में मारे गए जबकि इराक के सैनिक कहीं अधिक मारे गए। एक अनुमान के अनुसार अमरीकी हमले के बाद लगभग 50 हजार नागरिक इस युद्ध में खेत रहे।

प्रश्न 12.
एकधुवीय व्यवस्था का क्या अर्थ है?
उत्तर:

  1. जब अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में किसी एक महाशक्ति या कहें कि उद्धत महाशक्ति के दबदबे में हो तो प्रायः उसे ‘एकध्रुवीय व्यवस्था’ कहा जाता है।
  2. यह भौतिकी (physics) के शब्द ‘ध्रुव’ का यह एक प्रकार से भ्रामक प्रयोग है। इस व्यवस्था की उत्पति सोवियत संघ के पतन के बाद हुई।

प्रश्न 13.
आज अमेरिका की सैन्य शक्ति अनूठी मानी जाती है, क्यों?
उत्तर:

  1. अमेरिका आज अपनी सैन्य शक्ति के कारण ताकतवर माना जाता है। यह सैन्य शक्ति अनूठी है।
  2. वस्तुतः अमेरिका अपनी सैन्य क्षमता के बूते संपूर्ण विश्व में कहीं भी निशाना साध सकता है। उसके पास सही समय में अचूक और घातक हमला करने की क्षमता है। उसकी सेना विश्व के शेष देशों की तुलना में बेजोड़ है।

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प्रश्न 14.
कमान का क्या अर्थ है?
उत्तर:

  1. विश्व की अधिकांश सशस्त्र सेनाएँ अपनी सैनिक कार्रवाई के क्षेत्र को विभिन्न कमानों में विभाजित किया है।
  2. प्रत्येक कमान के लिए अलग-अलग कमांडर होते हैं।

प्रश्न 15.
विश्व स्तर पर ‘सार्वजनिक वस्तुओं’ से क्या आशय है?
उत्तर:

  1. विश्व स्तर पर ‘सार्वजनिक वस्तुओं’ से आशय ऐसी वस्तुओं से है जिसका उपयोग कोई एक व्यक्ति करे तो दूसरे को उपलब्ध इस वस्तु की मात्रा में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
  2. सार्वजनिक वस्तुओं के उदाहरण-स्वच्छ वायु, सड़क और समुद्री व्यापार मार्ग आदि है।

प्रश्न 16.
इंटरनेट का अमेरिका से क्या संबंध है?
उत्तर:

  1. इंटरनेट तरंगों (waves) का जाल होता है जो संपूर्ण विश्व के देशों को जोड़ता है।
  2. उल्लेखनीय है कि अमेरिकी सैन्य अनुसंधान परियोजना का परिणाम है। यह परियोजना 1950 में शुरु हुई थी। आज भी इंटरनेट उपग्रहों के एक वैश्विक तंत्र पर निर्भर है।

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प्रश्न 17.
ब्रेटनवुड प्रणाली क्या है?
उत्तर:

  1. इस प्रणाली के अंतर्गत वैश्विक व्यापार के नियम निर्धारित किए जाते थे।
  2. इन नियमों को अमेरिकी हितों के अनुकूल बनाया गया था। यह प्रणाली आज भी विश्वकी अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना का काम कर रही है।

प्रश्न 18.
कैसे कह सकते हैं कि सांस्कृतिक दृष्टि से विश्व में अमेरिका वर्चस्व स्थापित है?
उत्तर:

  1. विश्व के अधिकांश लोगों और समाजों के बरताव-व्यवहार 20वीं शताब्दी के अमेरिका के प्रचलित बरताव-व्यवहार के प्रतिबिंब हैं।
  2. अमेरिकी संस्कृति का एक पहलू यह भी है कि कोई भी अनिच्छा से नहीं रजामंदी मनवायी जाती है।

प्रश्न 19.
नाटो किस प्रकार अमेरिका लिए एक व्यवधान है?
उत्तर:

  1. नाटो का पूरा नाम उत्तर अटलांटिक ट्रीटी आर्गनाइजेशन है। यह 12 देशों का समूह है। अमेरिका का बहुत बड़ा हित लोकतांत्रिक देशों के इस संगठन को कायम रखने से जुड़ा है क्योंकि इन देशों में बाजारमूलक अर्थव्यवस्था चलती है।
  2. इसी कारण इस बात की संभावना बनती है कि नाटो में शामिल अमेरिका के साथ देश उसके वर्चस्व पर कुछ नियंत्रण लगा सकते हैं।

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प्रश्न 20.
बैंडबैंगन की रणनीति क्या है?
उत्तर:

  1. बैंडवैगन की नीति का अर्थ है – “जैसी बहे बयार पीठ तैसी कीजै।” कुछ विद्वानों का कहना है भारत को अमरीका के साथ मिलकर काम करने से अधिक लाभ हो सकता है।
  2. अमेरिका के वर्चस्व में रहते हुए भारत को अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार लाना चाहिए। इसे बैडबैंगन की रणनीति कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रथम खाड़ी युद्ध का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रथम खाड़ी युद्ध –

  1. यह युद्ध अमरीका सहित 34 देशों की सेना और इराक के मध्य हुआ। इस युद्ध का कारण इराक द्वारा कुवैत पर कब्जा करना था। अनेक राजनयिकों के अपील करने पर भी इराक ने कुवैत पर कब्जा नहीं छोड़ा फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुवैत को मुक्त कराने के लिए आक्रमण अनुमति प्रदान कर दी।
  2. 34 देशों की मिली-जुली 660000 सैनिकों की एक विशाल फौज ने इराक पर आक्रमण कर दिया और उसे हरा दिया।
  3. वैसे तो यह कहने को संयुक्त राष्ट्र संघ का अभियान था परंतु वास्तव में यह अमेरिका अभियान था। इसका संचालन अमेरिकी जनरल नार्मन श्वार्जफोंव ने किया। इसमें अमेरिका के 75% सैनिक थे।
  4. इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने बड़े साहस से इस युद्ध का सामना किया परंतु अंततः इराक पराजित हुआ और उसे कुवैत छोड़ने पर विवश होना पड़ा।
  5. इस युद्ध में अमेरिका ने आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया। उसने ‘स्मार्ट बमों’ का इस्तेमाल किया। इससे अमेरिका की सैनिक क्षमता की धाक जम गई।

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प्रश्न 2.
अमेरिका में बिल क्लिटन के राष्ट्रपति बनने पर वहाँ की राजनीति में क्या परिवर्तन हुए।
उत्तर:
बिल क्लिटन और अमेरिकी नीति –

  1. जार्ज बुश के पश्चात् 1992 में विलियम जेफर्सन क्लिटन राष्ट्रपति बने। उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में विदेश नीति की जगह घरेलू नीति में सुधार का वादा किया था।
  2. क्लिटन 1996 में दोबारा चुनाव जीतकर निरंतर 8 वर्षों तक राष्ट्रपति के पद पर काम करते रहे। इस सम्पूर्ण काल में अमेरिका घरेलू मामलों तक सीमित रहा और विश्व के मामलों में विशेष हस्तक्षेप नहीं किया।
  3. विदेश नीति के मामले में क्लिटन सरकार ने सैन्य शक्ति और सुरक्षा जैसी कठोर राजनीति’ की जगह लोकतंत्र को बढ़ाने, जलवायु परिवर्तन तथा विश्व व्यापार जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया।
  4. क्लिटन के काल में भी कुछ फौजी ताकत का इस्तेमाल किया गया । उदाहरणार्थ-अल्बानियाइयों के विरुद्ध आक्रमण नैरोबी (केन्या) और दारे सलाम (तंजानिया) के विरुद्ध कार्रवाई आदि।

प्रश्न 3.
ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच –

  1. अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिटन के काल में एक बड़ी सैन्य कार्रवाई नैरोबी (केन्या) और दारे सलाम (तंजानिया) के अमरीकी दूतावास पर बमबारी हुई।
  2. आतंकवादी संगठन अल-कायदा को इस बमबारी के लिए दोषी ठहराया गया। इस बमबारी के जवाब में ‘ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच’ का आदेश हुआ।
  3. इस अभियान के अंतर्गत अमेरिका ने सूडान और अफगानिस्तान के अलकायदा के ठिकानों पर कई बार क्रेज मिसाइल से हमले किए।
  4. अपनी इस कार्रवाई के के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ या अंतर्राष्ट्रीय कानून की परवाह नहीं की।
  5. अमेरिका की इस कार्रवाई की विश्व में खूब आलोचना हुई। कहा गया कि अमेरिका ने इस अभियान में कुछ नागरिक ठिकानों पर निशाना साधा जबकि इसका आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं था।

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प्रश्न 4.
नाइन-एलेवन घटना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
9/11 की घटना –

  1. विभिन्न अरब देशों के 19 अपहरणकर्ताओं ने चार अमरीकी व्यावसायिक विमानों पर कब्जा करके इनके द्वारा 11 सितम्बर 2001 की विभिन्न महत्वपूर्ण इमारतों को ध्वस्त कर दिया।
  2. दो विमान न्यूयार्क, स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी दक्षिण टावर से टकराये। तीसरा विमान वर्जिनिया के अलिंगटन स्थिति ‘पेंटागन’ से टकराया जहाँ अमेरिकी रक्षा विभाग का मुख्यालय है।
  3. चौथे विमान को अमरीकी कांग्रेस की मुख्य इमारत से टकराना था लेकिन वह पैंसिलवेनिया के एक खेत में गिर गया।
  4. इस घटना को नाइन-एलेवन 9/11 कहा जाता है। इस हमले में लगभग 3 हजार अमेरिकियों की जाने गई इस घटना की तुलना 1814 और 1941 की घटनाओं से की।
  5. अमेरिकी जमीन पर यह सबसे गंभीर हमला माना जाता है।

प्रश्न 5.
‘ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम’ के परिणाम क्या थे?
उत्तर:
ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम के परिणाम –

  1. यह ऑपरेशन आतंकवादी संगठनों के खिलाफ किया गया। इस आक्रमण से तालिबान की जमीन उखड़ गई।
  2. इस आक्रमण के बावजूद तालिबान और अल-कायदा के अवशेष अब भी सक्रिय हैं। 9/11 की घटना के पश्चात् से अब तक इनकी ओर से पश्चिमी देशों में कई आक्रमण किये गये हैं। इससे इनकी सक्रियता स्पष्ट हो जाती है।
  3. अमेरिकी सेना ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ की और उस विषय में वहाँ के देश की सरकार को जानकारी नहीं दी।
  4. गिरफ्तार लोगों को अलग-अलग देशों में भेजा गया और उन्हें खुफिया जेलखानों में बंदी बनाकर रखा गया।
  5. इन कैदियों को किसी प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं प्राप्त है।

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प्रश्न 6.
इराक पर अमरीकी आक्रमण (2003) का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इराक पर अमरीकी आक्रमण 2003 –

  1. अमरीका ने 19 मार्च 2003 को ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ कूटनाम से अभियान शुरू किया।
  2. संयुक्त संघ की अनुमति के बिना 40 से अधिक देशों के सहयोग से आक्रमण किया।
  3. इसका कारण दिखावे के लिए ‘सामूहिक संहार के हथियार (Weapons of Mass Destruction)
  4. यह आक्रमण अन्यायपूर्ण था। वस्तुतः अमरीका इराक के तेल भंडार पर नियंत्रण करना चाहता था ओर अपनी मनपसंद सरकार स्थापित करना चाहता था।
  5. यद्यपि इसकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सरकार समाप्त हो गई परंतु वहाँ अमरीकी विरोधी आग बुझी नहीं है और अमरीका के खिलाफ विद्रोह हो रहे हैं।

प्रश्न 7.
वर्चस्व की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वर्चस्व की अवधारणा –

  1. वर्चस्व (Hagemony) ताकत से जुड़ा हुआ है। विश्व राजनीति में भी विभिन्न देश या देशों के समूह शक्ति पाने और कायम रखने की लगातार कोशिश करते हैं।
  2. यह ताकत सैनिक प्रभुत्व, आर्थिक शक्ति, राजनीतिक रूतवे और सांस्कृतिक वृद्धि के रूप में होती है।
  3. शीत युद्ध की अवधि (1945-1991) में विश्व की शक्ति दो गुटों में विभाजित थी। अमरीका और सोवियत संघ शक्ति के दो केन्द्र और गुट थे।
  4. सोवियत संघ के विघटन के साथ एक महाशक्ति (अमरीका) का दबदबा हो गया और विश्व एकध्रुवीय व्यवस्था के अंतर्गत आ गया है, परन्तु इसे अमरीका का वर्चस्व कहना न्याय संगत नहीं प्रतीत होता।

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प्रश्न 8.
सैन्य शक्ति के अर्थ में वर्चस्व का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
सैन्य शक्ति के अर्थ में वर्चस्व –

  1. हेगेमनी (वर्चस्व) शब्द का प्रयोग प्राचीन यूनान के अन्य नगर राज्यों की तुलना में एथेंस की बसलता का प्रतीक था। इसलिए सैन्य दृष्टि से वर्चस्व का अर्थ सैन्य प्रबलता से है।
  2. यह अर्थ आज विश्व राजनीति में अमरीका की हैसियत को बताने में इस्तेमाल होता है।
  3. परंतु सैनिक वर्चस्व केवल किसी देश या व्यक्ति का भौतिक रूप से क्षति पहुँचा सकता है, उसकी आत्मा, का दमन नहीं कर सकता। ऐसे में यह पूर्ण रूप में वर्चस्व नहीं माना जा सकता।
  4. यह सही है कि अमरीका की विद्यमान ताकतं की रीढ़ उसकी सैन्य शक्ति है। अन्य देशों की तुलना उसकी सैनिक शक्ति बेजोड़ है और कई देश मिलकर भी उसका सामना नहीं कर सकते। परंतु इराक में उसकी अनेक कमजोरियाँ प्रकट हुई है।

प्रश्न 9.
अमरीकी सैन्य शक्ति अनूठी है, समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
अमरीकी सैन्य शक्ति का अनूठापन –

  1. अमरीकी सैन्य शक्ति अनूठी है। वह अपनी सैनिक शक्ति के बल पर किसी पर भी आक्रमण कर सकता है।
  2. वह अपनी सेना को युद्धभूमि से सुदूर रखकर अपने शत्रु को उसके ही घर में परास्त कर सकता है।
  3. वस्तुतः वह अपनी सैनिक क्षमता के लिए पर्याप्त धन खर्च करता है। अमरीका के नीचे के कुल 12 ताकतवर देश एक साथ मिलकर अपनी सैनिक क्षमता के लिए जितना धन खर्च करते हैं उससे कहीं अधिक अपनी सैनिक क्षमता के लिए अमरीका अकेले खर्च करता है।
  4. इसके अतिरिक्त पेंटागन अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा रक्षा अनुसंधान और प्रौद्योगिकी में व्यय करता है।
  5. उसकी सैनिक प्रौद्योगिकी भी उच्च कोटि की है।

प्रश्न 10.
इराक युद्ध से अमरीकी सेना की कौन-कौन-सी कमजोरियां प्रकट हुई हैं?
उत्तर:
अमरीकी सेना की कमजोरियाँ –

  1. अमरीका अपने गठबंधन से इराक की जनता को नतमस्तक कराने में असफल हुआ है। वहाँ अब भी अशांति है और विद्रोह हो रहे हैं।
  2. सैनिक बल के इस्तेमाल के चार लक्ष्य-जीतने, अपरोध करने, दण्ड देने और कानून व्यवस्था बहाल करना है।
  3. अमरीका ने प्रथम तीन लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया है परंतु कानून व्यवस्था स्थापित करने में असफल रहा है।

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प्रश्न 11.
ढाँचागत ताकत के अर्थ में वर्चस्व का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
ढाँचागत ताकत के अर्थ में वर्चस्व का परीक्षण –

  1. वर्चस्व का ढाँचागत ताकत के अर्थ में अपना विशेष अर्थ है जो सैनिक वर्चस्व से सर्वथा भिन्न है।
  2. इसका संबंध वैश्विक अर्थव्यवस्था से है। इस व्यवस्था में एक ऐसे देश की आवश्यकता होती है जो अपनी मर्जी चलाए। वह अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ बनाता है और उसे कायम रखता है।
  3. ऐसे देश के लिए आवश्यक है- नियम और कानून को लागू करने की क्षमता और इच्छा-शक्ति होनी चाहिए। वस्तुतः ऐसा ताकतवर देश ही कर सकता है।
  4. वास्तव में इसमें उसे हानि भी हो सकती है। अन्य देश वैश्विक अर्थव्यवस्था के खुलेपन का लाभ उठाते हैं और किसी प्रकार का खर्च भी नहीं करते।
  5. वर्चस्व के इस दूसरे अर्थ को स्वीकार करें तो इसकी विश्वव्यापी सार्वजनिक वस्तुओं को उपलब्ध कराने में अमरीकी भूमिका मिलती है। अमरीका से समुद्री व्यापार मार्ग और इंटरनेट आदि सार्वजनिक वस्तु उपलब्ध कराए हैं परंतु समानता नहीं है।

प्रश्न 12.
वर्चस्व के अर्थ में ‘सार्वजनिक वस्तुओं’ से क्या आशय है?
उत्तर:
वर्चस्व के अर्थ में ‘सार्वजनिक वस्तुओं’ का आशय –

  1. सार्वजनिक वस्तुओं से आशय ऐसी वस्तुओं से है जिसका उपयोग कोई एक व्यक्ति करे तो दूसरे को उपलब्ध इसी वस्तु की मात्रा में कोई कमी नहीं आए।
  2. इसका उदाहरण स्वच्छ वायु और सड़क और व्यापारिक समुद्री मार्ग आदि इसके उदाहरण हैं।
  3. समुद्री व्यापार मार्ग (Sea lane communications) है जिसका इस्तेमाल व्यापारिक जहाज करते हैं। खुली वैश्विकी अर्थव्यवस्था में मुक्त व्यापार समुद्री व्यापार मार्ग के खुलेपन के बिना संभव नहीं है।
  4. ताकतवर या दबदबे वाला देश अपनी नौसैनिक शक्ति से समुद्री व्यापार मार्गों पर आवागमन के नियम तय करता है और अंतर्राष्ट्रीय समुद्र में आवाजाही को सुनिश्चित करता है। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अमरीकी नौसैनिक शक्ति इसमें सक्षम है।
  5. वैश्विक सार्वजनिक वस्तु का उदाहरण इंटरनेट है जो सूचना प्रौद्योगिकी का महत्वपूर्ण साधन बन गया। उल्लेखनीय है यह अमरीका सैन्य अनुसंधान परियोजना का परिणाम है।

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प्रश्न 13.
वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमरीका का वर्चस्व है, प्रमाणित कीजिए।
उत्तर:
वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमरीका का वर्चस्व –

  1. वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी अमरीका का वर्चस्व है। इसमें इसका हिस्सा 28% है। इसी प्रकार विश्व व्यापार में उसका हिस्सा 15% है।
  2. विश्व की अर्थव्यवस्था कोई ऐसा हिस्सा नहीं है जिसमें कोई अमरीका कंपनी महत्वपूर्ण तीन कंपनियों में से एक न हो।
  3. अमरीका की आर्थिक प्रबलता उसकी ढाँचागत ताकत अर्थात् वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक विशिष्ट आकार में ढालने की ताकत से जुड़ी हुई है।
  4. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् ब्रेटनवुड प्रणाली कायम हुई थी। अमरीका द्वारा कायम यह प्रणाली आज भी विश्व की अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना का काम कर रही है।
  5. विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष विश्व व्यापार संगठन को अमरीकी वर्चस्व परिणाम मान सकते हैं।

प्रश्न 14.
‘अमरीका की ढाँचागत ताकत का एक मानक उदाहरण एमबीए की अकादमिक डिग्री है।’ व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अमरीकी ढांचागत ताकत का एक मानक उदाहरण एमबीए –

  1. एमबीए (Master of Business Administration) के कारण भी अमरीकी वर्चस्व दिखाई देता है। अमरीका मानता है कि व्यवसाय एक पेशा है और इस कौशल को विश्वविद्यालय में प्राप्त किया जा सकता है।
  2. सर्वप्रथम इसकी पढ़ाई यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिवेनिया में वाहर्टन स्कूल में शुरु हुई जिसकी स्थापना 1881 में हुई थी।
  3. धीरे-धीरे इसका विस्तार हुआ परंतु 1950 में ही जाकर दूसरे देशों में इसका पाठ्यक्रम आरम्भ हुआ।
  4. आज सभी देशों में एमबीए को प्रतिष्ठित अकादमिक डिग्री का दर्जा प्राप्त है।
  5. प्रायः अधिकांश परिवारों के अभिभावक/माता-पिता अपने बच्चों को एमबीए कराना चाहते हैं।

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प्रश्न 15.
सांस्कृतिक अर्थ में वर्चस्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सांस्कृतिक अर्थ में वर्चस्व –

  1. अमरीका के वर्चस्व का एक सांस्कृतिक क्षेत्र भी है। यह व्यवहार से संबंधित है। अमरीका का सैन्य और आर्थिक वर्चस्व के साथ सांस्कृतिक अर्थ में भी वर्चस्व है।
  2. आज देखा जाए तो अधिकांश लोग अच्छे जीवन और व्यक्तिगत सफलता की झलक 20 वीं शताब्दी के अमरीका में प्रचलित व्यवहार-बरताव के रूप में देखते हैं।
  3. अमरीकी संस्कृति आज आकर्षक बन गई है और वह विश्व में वर्चस्व रखती है। यह बात बल में नहीं, बल्कि रजामंदी या स्वीकृति से मनवायी है।
  4. वस्तुतः शीत युद्ध के दौरान अमरीका को लगा कि सैनिक शक्ति की दृष्टि से वह सोवियत संघ को नहीं पछाड़ सकता है, इसलिए उसने ढाँचागत ताकत और सांस्कृतिक प्रभुत्व को बढ़ाया। अमरीका ने सबसे बड़ी जीत प्रभुत्व के क्षेत्र में की।

प्रश्न 16.
किस प्रकार नाटो अमरीका वर्चस्व के मार्ग में अवरोध है?
उत्तर:
अमरीका के वर्चस्व में बाधा के रूप में नाटो –

  1. अमरीका के वर्चस्व में तीन अवरोध हैं परंतु इन तीनों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण नाटों है।
  2. प्रथम व्यवधान अमरीका की संस्थागत बनावट है। यहाँ शासन के तीनों अंगों के बीच शक्ति का विभाजन है। कार्यपालिका सैन्य शक्ति के अनियंत्रित इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाती है।
  3. द्वितीय अवरोध – अमरीकी समाज की उन्मुक्तता है। अमरीका में जनसंचार के साधन जनमत तैयार करने में सहायक हैं परंतु अमरीकी राजनीतिक संस्कृति में शासन के उद्देश्य और तरीके को लेकर लोगों में गहरी आशंकाएँ हैं।

तृतीय अवरोध:
नाटो है जो सैनिक संगठन है और वही अमरीकी ताकत पर लगान लगा सकता है। अमरीका का बहुत बड़ा हित लोकतांत्रिक देशों के इस संगठन को कायम रखने से जुड़ा है, क्योंकि इन देशों में बाजारमूलक अर्थव्यवस्था चलती है।

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प्रश्न 17.
भारत और अमरीका एक दूसरे के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
भारत और अमरीका एक दूसरे के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. भारत और अमरीका एक दूसरे के लिए महत्वपूर्ण है जिसका संबंध और अमरीका में बसे अनिवासी भारतीयों से है।
  2. सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में अमरीका भारत का सबसे बड़ा आयातक देश है। भारत के निर्यातक का 65% अमरीका को जाता है।
  3. अमरीका में बोईग में काम करने वाले 35% तकनीकी कर्मचारी भारतीय मूल के हैं।
  4. सिलिकन वैली में भी भारतीयों की एक बड़ी तादाद (3 लाख) काम करती है।
  5. अमरीका के प्रवासी भारतीयों ने उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्र की 15% कम्पनियों का शुभारंभ किया।

प्रश्न 18.
‘अमरीका के वर्चस्वजनित अवसरों की लाभ उठाने की रणनीति अधिक संगत है।’ समीक्षा कीजिए।
उत्तर:

  1. कुछ राजनीतिज्ञों का विचार है कि भारत को अमरीका के वर्चस्वजनित अवसरों का लाभ उठाने की रणनीति अपनानी चाहिए, क्योंकि यह भारत के लिए अधिक लाभकारी है।
  2. भारत आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाने, व्यापार बढ़ाने, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और निवेश में अमरीका का सहयोग ले सकता है।
  3. ऐसे में सुझाव दिया जाता है कि सर्वाधिक शक्तिशाली देश के विरुद्ध जाने के बजाय उसके वर्चस्व तंत्र में रहते हुए लाभ उठाना कहीं उचित रणनीति है। इसे ‘बैंडबैंगन’ अथवा ‘जैसी बड़े बयार पीठ तेजी कीजै’ की रणनीति कहते हैं।

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प्रश्न 19.
अमरीका से तटस्थ रहने की नीति कहाँ तक कारगर है?
उत्तर:
अमरीका से तटस्थ रहने की नीति –

  1. विभिन्न देशों के लिए एक विकल्प यह भी है कि दबदबे वाले देश से यथासंभव दूर रहा जाए। जैसे चीन रूस और यूरोपीय संघ सभी किसी न किसी प्रकार से अमरीका से दूर-दूर रहते हैं।
  2. ऐसा करके वे अमरीका की बेवजह नाराजगी से अपने को बचाते हैं।
  3. यह बात दूसरी है कि बड़े और मध्यम श्रेणी के देशों को यह नीति अमरीका से अधिक दिनों तक बचा नहीं सकती।
  4. छोटे देशों के लिए यह नीति कारगर हो सकती है, क्योंकि अमरीका ऐसे देशों की ओर कम ध्यान देता है।
  5. यह तर्क अटपटा सा प्रतीत होता है कि भारत, चीन और रूस जैसे बड़े देश अथवा यूरोपीय संघ जैसा विशाल संघ स्वयं को अधिक दिनों तक अमरीका से दूर रख सकता है।

प्रश्न 20.
इतिहास से हमें वर्चस्व के विषय में क्या जानकारी मिलती है?
उत्तर:
इतिहास और वर्चस्व –

  1. अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में विभिन्न देश शक्ति संतुलन के प्रति अधिक सतर्क होते हैं और सामान्य रूप से वे किसी देश को इतना शक्तिशाली नहीं बनने देते कि वह शेष देश के लिए भयंकर खतरा बन जाए।
  2. 1648 ई. में विभिन्न संप्रभु राज्य विश्व राजनीति के प्रमुख नायक बन गए थे। इसके 350 वर्षों बाद वर्चस्व की स्थिति दो बार आई।
  3. यूरोप की राजनीति के संदर्भ में 1660 से 1713 तक फ्रांस का दबदबा था और यह वर्चस्व का प्रथम उदाहरण है।
  4. समुद्री व्यापार के कारण ब्रिटेन का वर्चस्व कायम हुआ था। उसका साम्राज्य 1860 से 1910 तक बना रहा, यह वर्चस्व का दूसरा उदाहरण है।
  5. इतिहास से यह भी ज्ञात होता है कि वर्चस्व अपने चरमोत्कर्ष के समय अजेय दिखता है लेकिन यह हमेशा के लिए कायम नहीं रहता। इसके विपरीत शक्ति संतुलन की राजनीति वर्चस्वशील देश की ताकत को आने वाले समय में कम कर देती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अमरीकी वर्चस्व से निपटने के कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
अमरीकी वर्चस्व से निपटने के कुछ सुझाव:
प्रश्न उठता है कि अमरीकी वर्चस्व से किस प्रकार छुटकारा पाया जाए? यह प्रश्न जटिल और झकझोरने वाला है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कुछ ही ऐसे तरीके हैं जिनके द्वारा किसी देश की सैनिक शक्ति पर कुछ प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यदि कोई विश्वस्तरीय सरकार होती तो समस्या हल हो सकती थी, परंतु ऐसा नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के कुछ कानून अवश्य हैं जो युद्ध पर नियंत्रण रखते हैं, परंतु ये युद्ध को रोकने में सक्षम नहीं है। फिर कोई भी देश अपनी सुरक्षा को अंतर्राष्ट्रीय कानून के हवाले नहीं कर सकता।

फिर वर्चस्व और युद्ध से छुटकारा कैसे हो सकता है? भारत, चीन और रूस मिलकर अमरीकी वर्चस्व का सामना कर सकते हैं परंतु उनमें आपस में ही मतभेद है। ये अकेले उसका सामना नहीं कर सकते। कुछ लोगों का कहना है कि वर्चस्वजनित अवसरों का लाभ उठाने की नीति भारत के लिए अधिक हितकर होगी। उदाहरण के लिए आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाने, व्यापार बढ़ाने, प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और निवेश में अमरीका का सहयोग लिया जा सकता हैं। इसे ‘बैडवैगन’ कहते हैं। भारत सहित विभिन्न देशों के लिए एक विकल्प यह भी है कि दबदबे वाले देश से यथासंभव दूर रहा जाए, जैसे चीन, रूस और यूरोपीय संघ सभी किसी न किसी प्रकार से अमरीका से दूर-दूर रहते हैं।

ऐसा करके वे अमरीका से बेवजह नाराजगी से अपने को बचाते हैं। यह बात दूसरी है कि बड़े और मध्य श्रेणी के देशों के लिए यह नीति अधिक दिनों तक बचा नहीं सकती, छोटे देशों के लिए यह नीति कारगर हो सकती है। कुछ अन्य लोगों की राय है कि गैरसरकारी संस्थाएँ अमरीकी वर्चस्व का विरोध कर सकती है इसको अमरीकी वर्चस्व में अर्थिक और सांस्कृतिक धरातल पर चुनौती मिलेगी। यह चुनौती स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक आंदोलन और जनमत के आपसी मेल से किया जा सकता है। मीडिया, बुद्धिजीवी, कलाकार और लेखक आदि भी अमरीकी वर्चस्व का प्रतिकार कर सकते हैं। इन सभी संस्थाओं में अर्थिक और सांस्कृतिक आपसी मेल से किया जा सकते हैं। इन सभी को विश्व स्तर पर नेटवर्क बन सकता है जिसमें अमरीकी नागरिक भी शामिल हो सकते हैं। हम अपना देश, राज्य, समाज और गाँव छोड़ नहीं सकते हैं। ऐसे में प्रतिरोध ही एकमात्र उपाय बचा है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में सही का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन महाशक्ति के रूप में स्थापित है?
(अ) अमरीका
(ब) रूस
(स) फ्रांस
(द) इंग्लैंड
उत्तर:
(अ) अमरीका

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प्रश्न 2.
अमरीका कब महाशक्ति बना?
(अ) 1989
(ब) 1990
(स) 1991
(द) 1992
उत्तर:
(स) 1991

प्रश्न 3.
इराक ने कुवैत पर कब आक्रमण किया?
(अ) 1989
(ब) 1990
(स) 1991
(द) 1992
उत्तर:
(ब) 1990

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प्रश्न 4.
ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म में मुख्य सेना किसकी थी?
(अ) फ्रांस
(ब) इंग्लैंड
(स) अमरीका
(द) रूस
उत्तर:
(स) अमरीका

प्रश्न 5.
खाड़ी युद्ध को कम्प्यूटर युद्ध क्यों कहते हैं?
(अ) इसमें कम्प्यूटर जैसे हथियार
(ब) स्मार्ट बमों का प्रयोग किया गया
(स) कम्प्यूटर से युद्ध की गतिविधि
(द) कहते ही नहीं हैं
उत्तर:
(ब) स्मार्ट बमों का प्रयोग किया गया

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प्रश्न 6.
क्लिटन कितने वर्ष राष्ट्रपति रहे?
(अ) 5 वर्ष
(ब) 6 वर्ष
(स) 7 वर्ष
(द) 8 वर्ष
उत्तर:
(द) 8 वर्ष

प्रश्न 7.
अमरीका में स्थित ‘पेंटागन’ क्यों महत्त्वपूर्ण थे?
(अ) व्यापार के लिए
(ब) सुंदरता के लिए
(स) अमरीकी रक्षा विभाग का मुख्यालय
(द) कम्प्यूटीकृत भवन
उत्तर:
(स) अमरीकी रक्षा विभाग का मुख्यालय

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प्रश्न 8.
9/11 की घटना अमरीका के लिए क्या स्थान रखती है।
(अ) छोटी घटना
(ब) बड़ी घटना
(स) अब तक की सबसे बड़ी घटना
(द) नगण्य
उत्तर:
(ब) बड़ी घटना

प्रश्न 9.
अमरीका का सबसे आकर्षक सांस्कृतिक पहलु क्या है?
(अ) जोर-जबरदस्ती
(ब) मित्रता
(स) रजामंदी
(द) शत्रुता
उत्तर:
(स) रजामंदी

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प्रश्न 10.
9/11 की घटना के समय अमरीका का राष्ट्रपति कौन था?
(अ) विलियम जेफसिन (बिल) क्लिटन
(ब) एच डब्ल्यू बुश
(स) जार्ज डब्ल्यू बुश
(द) कोई नहीं
उत्तर:
(अ) विलियम जेफसिन (बिल) क्लिटन

प्रश्न 11.
ग्वांतानामी वे अब क्यों प्रसिद्ध है?
(अ) रूस का नौसेना का ठिकाना
(ब) अमरीका का नौसेना का ठिकाना
(स) ब्रिटेन का नौसेना का ठिकाना
(द) फ्रांस का नौसेना का ठिकाना
उत्तर:
(ब) अमरीका का नौसेना का ठिकाना

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प्रश्न 12.
इराक पर आक्रमण करने का अमरीका का वास्तविक उद्देश्य क्या था?
(अ) इराक द्वारा सामूहिक संहार के हथियार बनाने से रोकना
(ब) सैनिक ठिकाना प्राप्त करने के लिए इराक के तेल भंडार पर नियंत्रण
(स) इराक से तेल भंडार पर नियंत्रण
(द) इराक में शासन स्थापित करना
उत्तर:
(स) इराक से तेल भंडार पर नियंत्रण

प्रश्न 13.
विश्व में एकध्रुवीय व्यवस्था कब स्थापित हुई?
(अ) शीत युद्ध के दौर से पूर्व
(ब) शीत युद्ध के दौर में
(स) शीत युद्ध के बाद
(द) 9/11 की घटना के बाद
उत्तर:
(स) शीत युद्ध के बाद

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प्रश्न 14.
सैन्य बल के चार लक्ष्यों में से किस लक्ष्य को अमरीका नहीं प्राप्त कर सका है।
(अ) जीतना
(ब) अपरोध करने
(स) दंड देना
(द) कानून व्यवस्था बहाल रखने के लिए
उत्तर:
(अ) जीतना

प्रश्न 15.
कौन-सी अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी है?
(अ) ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था
(ब) जापान की अर्थव्यवस्था
(स) अमरीका की अर्थव्यवस्था
(द) इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था
उत्तर:
(स) अमरीका की अर्थव्यवस्था

II. मिलान वाले प्रश्न एवं उनके उत्तर

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter - 3 समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व Part - 1 img 2
उत्तर:
(1) – (iv)
(2) – (xi)
(3) – (i)
(4) – (vi)
(5) – (viii)
(6) – (vii)
(7) – (ii)
(8) – (x)
(9) – (ix)
(10) – (v)
(11) – (iii)