Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 5 सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 5 सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 5 सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था

Bihar Board Class 12 Economics सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
सार्वजनिक वस्तु सरकार के द्वारा ही प्रदान की जानी चाहिए, क्यों? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रीय सुरक्षा, सड़कें, प्रशासन आदि वस्तुओं या सेवाओं को सार्वजनिक वस्तु कहते हैं। सार्वजनिक वस्तुएँ निम्नलिखित कारणों से सरकार द्वारा ही उपलब्ध कराई जाने चाहिए –

  1. सार्वजनिक वस्तुओं के लाभ केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होते हैं, बल्कि इनके लाभ सभी लोगों को प्राप्त हो सकते हैं। इनका प्रयोग प्रतिस्पर्धात्मक नहीं होता है। एक व्यक्ति दूसरों के लाभ में कमी किए बिना वस्तु का लाभ उठा सकता है।
  2. वह व्यक्ति, जो निजी वस्तुओं का भुगतान करने की इच्छा व सामर्थ्य नहीं रखता है निजी वस्तु के उपयोग से वंचित किया जा सकता है। लेकिन सार्वजनिक वस्तुओं के बारे में यह सोचने का प्रश्न ही नहीं उठता है। किसी भी व्यक्ति को, जो भुगतान कर सकता है या नहीं सार्वजनिक वस्तुओं के उपयोग से वंचित नहीं किया जाता है।

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प्रश्न 2.
राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय में भेद कीजिए।
उत्तर:

  1. सरकारी व्यय का वह भाग, जिससे भौतिक अथवा वित्तीय परिसंपत्तियों का निर्माण नहीं होता है, राजस्व व्यय कहलाता है, इसके विपरीत सरकारी व्यय का वह भाग, जिससे भौतिक अथवा वित्तीय परिसंपत्तियों का निर्माण होता है, पूंजीगत व्यय कहलाते हैं।
  2. सरकारी विभागों के सामान्य संचालन के लिए राजस्व व्यय किए जाते हैं, इसके अलावा ऋणों पर ब्याज भुगतान, राज्य सरकारों एवं अन्य संस्थाओं को दी जाने वाली आर्थिक सहायता भी राजस्व व्यय कहलाते हैं। दूसरी ओर भूमि, इमारत, मशीनों, अंश पत्रों में निवेश, राज्य सरकार को दिए जाने वाले ऋण एवं अग्रिमों पर किए जाने वाले व्यय पूंजीगत व्यय कहलाते हैं।
  3. राजस्व व्यय को योजना व गैर योजना व्यय में बाँटा जाता है, इसी प्रकार पूंजीगत व्यय भी योजना एवं गैर योजना व्यय में वर्गीकृत किए जाते हैं।

प्रश्न 3.
राजकोषीय घाटा से सरकार का ऋण-ग्रहण की आवश्यकता होती है, समझाइए।
उत्तर:
बजट घाटे से अभिप्राय है कि सरकार एक लेखा वर्ष की अवधि में प्राप्तियों से अधिक व्यय करती है। राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय एवं ऋण प्राप्तियों के अलावा अन्य प्राप्तियों के अंतर के समान होता है। राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – (कुल राजस्व प्राप्तियाँ + गैर ऋण पूंजीगत प्राप्तियाँ) = ऋण प्राप्तियाँ
अतः राजकोषीय घाटे के लिए वित्त व्यवस्था ऋणों के माध्यम से की जाती है। सरकार इस घाटे को पूरा करने के लिए घरेलू अथवा विदेशी अथवा दोनों प्रकार के ऋण ले सकती है।

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प्रश्न 4.
राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा में सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
राजस्व घाटा-एक लेखा वर्ष की अवधि में सरकार के कुल राजस्व व्यय एवं कुल राजस्व प्राप्तियों के अन्तर को राजस्व घाटा कहते हैं।
राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ
राजस्व घाटे में सरकारी चालू वर्ष के व्यय एवं प्राप्तियों को सम्मिलित किया जाता है, राजस्व व्यय वचनबद्ध व्यय होते हैं, इन्हें सरकार कम नहीं कर सकती है। राजस्व घाटे का वित्तीयन सरकार या तो भूतकाल की बचतों से करती है अथवा ऋण लेती है।

राजकोषीय घाटा:
एक लेखा वर्ष की अवधि में सरकार के कुल व्यय एवं गैर ऋण प्राप्तियों के अन्तर को राजकोषीय घाटा कहते हैं। राजकोषीय घाटे का वित्तीयन घरेलू अथवा विदेशी ऋणी से किया जाता है। राजस्व घाटे से राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी होती है।

प्रश्न 5.
मान लीजिए कि एक विशेष अर्थव्यवस्था में निवेश 200 के बराबर है, सरकार के क्रय की मात्रा 150 है, निवल कर (अर्थात् एकमुश्त कर से अंतरण को घटाने पर) 100 है और उपभोग C = 100 + 0.75 Y दिया हुआ है, तो
(a) सन्तुलन आय का स्तर क्या है?
(b) सरकारी व्यय गुणक और कर गुणक के मानों की गणना करें।
(c) यदि सरकार के व्यय में 200 की बढ़ोतरी होती है, तो सन्तुलन आय में क्या परिवर्तन होगा?
हल:
निवेश I = 200 सरकारी खरीद G = 150
शुद्ध कर T = 100
उपभोग C = 100 + 0.75 y

(a) साम्य राष्ट्रीय आय Y = – (C – CT + CTR + I + G)
= \(\frac{1}{1-0.75}\) (100 – 0.75 × 100 + 200 + 150)
= \(\frac{1}{0.25}\) (100 – 75 + 200 + 150)
= \(\frac{1}{0.25}\) (100 – 75 + 200 + 150) = \(\frac{375}{0.25}\) = \(\frac{375 × 100}{25}\)

(b) सार्वजनिक व्यय गुणांक = \(\frac{∆Y}{∆G}\) = \(\frac{1}{1-C}\) = \(\frac{1}{1-0.75}\) = \(\frac{1}{0.25}\) = \(\frac{100}{25}\) = 4
कर गुणांक = \(\frac{∆Y}{∆T}\) = \(\frac{-C}{1-C}\) = \(\frac{-0.75}{0.25}\) = –\(\frac{75}{25}\) = -3

(c) ∆G = 200
नई साम्य आय = \(\frac{1}{1-C}\) = [C – CT + I + G + ∆G]
\(\frac{1}{1-0.75}\) [100 – 0.75 × 100 + 200 + 150 + 200]
= \(\frac{1}{0.25}\) [100 – 75 + 200 + 150 + 200]
= \(\frac{1}{0.25}\) × 575 = \(\frac{100×575}{25}\) = 2300
उत्तर:
(a) साम्य आय = 1400
(b) सरकारी व्यय गुणांक = 4
(c) नई साम्य आय = 2300
कर गुणांक = -3

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प्रश्न 6.
एक ऐसी अर्थव्यवस्था पर विचार कीजिए, जिसमें निम्नलिखित फलन है –
C = 20 + 0.80Y, I = 30, G = 50, TR = 100
(a) आय का सन्तुलन स्तर और मॉडल में स्वायत्त व्यय गुणक ज्ञात कीजिए।
(b) यदि सरकार के व्यय में 30 की वृद्धि होती है, तो संतुलन आय पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
(c) यदि एकमुश्त कर 30 जोड़ दिया जाए, जिससे सरकार के क्रय में बढ़ोतरी का भुगतान किया जा सके, तो सन्तुलन आय में किस प्रकार का परिवर्तन होगा?
हल:
(a) C= 20 + 0.80Y;
I = 30 G = 50 TR = 100
साम्य आय Y = \(\frac{1}{1-C}\) [C + CTR + I + G + G]
= \(\frac{1}{1-0.80}\) [20 + 0.80 × 100 + 30 × 50]
= \(\frac{1}{0.20}\) [20 + 80 + 30 + 50] = \(\frac{1}{0.20}\) × 180 = 900
सरकारी व्यय गुणांक = \(\frac{1}{1-C}\) = \(\frac{1}{1-0.80}\) = \(\frac{1}{0.20}\) = \(\frac{100}{20}\) = 5

(b) सरकारी व्यय में वृद्धि ∆G = 30
नई साम्य आय Y’ = \(\frac{1}{1-C}\) (C + CTR + I + G + ∆G)
= \(\frac{1}{1-0.80}\) [20 + 0.80 × 100 + 30 + 50 + 30]
= \(\frac{1}{0.20}\) = \(\frac{210 × 100}{20}\) = 1050
अथवा, आय में परिवर्तन ∆Y = \(\frac{∆G}{1-C}\) = \(\frac{30}{1-0.80}\) = \(\frac{30}{0.20}\) = \(\frac{30 × 100}{20}\) = 150

(c) एकमुश्त किश्त ∆T = 30
आय में परिवर्तन ∆Y = \(\frac{∆T(-C)}{1-C}\) = \(\frac{30(-0.80)}{1-0.80}\) = \(\frac{30 × – 0.80}{0.20}\)
= \(\frac{100 × 30 × -80}{20 × 100}\) = – 120
नई साम्य आय = Y + ∆Y = 900 + (- 120) = 780
उत्तर:
(a) साम्य आय = 900
व्यय गुणांक = 5

(b) नई साम्य आय = 1050
अथवा, साम्य आय में परिवर्तन = 150

(c) नई साम्य आय = 780
अथवा, आय में परिवर्तन = – 120

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प्रश्न 7.
उपर्युक्त प्रश्न में अंतरण में 10 की वृद्धि और एकमुश्त करों में 10 की वृद्धि का निर्गत पर पड़ने वाले प्रभाव की गणना करें। दोनों प्रभावों की तुलना करें।
हल:
उपरोक्त प्रश्न में सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति C = 0.80, C = 20, I = 30, G = 50, TR = 100, ∆TR = 10
साम्य आय = \(\frac{1}{1-C}\) = [C + CTR + I + G + ∆TR]
= \(\frac{1}{1-0.80}\) [20 + 0.80 × 100 + 30 + 50 + 8]
= \(\frac{188}{0.20}\) = \(\frac{188×100}{20}\) = 940
आय में परिवर्तन = 940 – 900 = 40
अथवा, आय में परिवर्तन ∆Y = \(\frac{∆TR.C}{1-C}\) = \(\frac{10×0.80}{1-0.80}\) = \(\frac{8}{0.20}\) = \(\frac{8×100}{20}\) = 40
एकमुश्त कर में वृद्धि ∆T = 10
आय में परिवर्तन = \(\frac{∆T(-C)}{1-C}\) = \(\frac{10×-(0.8)}{1-0.80}\) = \(\frac{-8}{0.20}\) = \(\frac{8×100}{20}\) = – 40
उत्तर:
हस्तांतरण भुगतानों में 10 वृद्धि से आय में वृद्धि = 40
कर में 10 वृद्धि से आय में कमी = 40

प्रश्न 8.
हम मान लेते हैं कि C = 70 + 0.70YD, I = 90, G = 3D 100, T = 0.10Y
(a) सन्तुलन आय ज्ञात कीजिए।
(b) सन्तुलन आय पर कर राजस्व क्या है? क्या सरकार का बजट सन्तुलित बजट है?
हल:
C = 70 + 70YD, I = 90, G = 100, T = 0.10Y
(a) Y = C + I + G
Y = 70 + 70YD + 90 + 100
Y = 70 + 70 (Y – T) + 190
= 260 + 70Y – 0.7 Y
Y = 260 + 0.63 Y
Y – 0.63 Y = 260
Y = \(\frac{260}{0.37}\) Y = 702.7 = 70.27

(b) सरकारी व्यय = 100
कर राजस्व = 70.27
G > T
नहीं, सरकारी बजट सन्तुलित है, सरकार का व्यय प्राप्तियों से अधिक है। अतः सरकार का बजट घाटे का बजट है।

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प्रश्न 9.
मान लीजिए कि सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति 0.75 है और आनुपातिक आय कर 20 प्रतिशत है। सन्तुलन आय में निम्नलिखित परिवर्तनों को ज्ञात करें।
(a) सरकार के क्रय में 20 की वृद्धि।
(b) अंतरण में 20 की कमी।
हल:
(a) अनुपातिक कर की स्थिति में
∆Y = \(\frac{1 × ∆G}{1-C(1-t)}\) = \(\frac{1 × 20}{1-0.75(1-(0.2)}\) = \(\frac{20}{1-0.75 × 0.8}\)
= \(\frac{20}{1+0.600}\) = \(\frac{20}{0.4}\) = \(\frac{20 × 10}{4}\) = 50
(b) ∆Y = \(\frac{C}{1-C)}\) ∆TR = \(\frac{0.75}{1-0.75}\) × 20 = \(\frac{75}{25}\) × 20 = 3 × 20 = 60
उत्तर:
(a) आय में वृद्धि = 50
(b) आय में वृद्धि = 60

प्रश्न 10.
निरपेक्ष मूल्य में कर गुणक सरकारी व्यय गुणक से छोटा क्यों होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सार्वजनिक व्यय गुणांक की तुलना में कर गुणांक का निरपेक्ष मूल्य कम होता है। सार्वजनिक व्यय प्रत्यक्ष रूप से कुल को प्रभावित करता है लेकिन कर गुणक प्रक्रिया में प्रवेश करके प्रयोज्य आय को प्रभावित करता है। प्रयोज्य आय उपभोग व्यय को प्रभावित करती है। कर गुणांक का निरपेक्ष मूल्य सार्वजनिक व्यय गुणांक से एक इकाई छोटा होता है, इसे एक उदाहरण की सहायता से समझाया जा सकता है –
माना अर्थव्यवस्था में सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति C = 0.75
सार्वजनिक व्यय गुणांक = \(\frac{1}{1-C}\) = \(\frac{1}{1-0.75}\) (C का मूल्य रखने पर)
= \(\frac{1}{0.25}\) = \(\frac{100}{25}\) = 4
कर गुणांक = \(\frac{-C}{1-C}\) = \(\frac{0.75}{1-0.75}\) = \(\frac{-75}{25}\) = – 3
कर गुणांक का निरपेक्ष मान = + 3
इस प्रकार कर गुणांक का निरपेक्ष मान 3, सार्वजनिक व्यय गुणांक से 1 कम है।

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प्रश्न 11.
सरकारी घाटे और सरकारी ऋण-ग्रहण में क्या सम्बन्ध है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सरकारी घाटा तथा ऋण दोनों में घनिष्ठः सम्बन्ध है। सरकारी घाटा एक प्रवाह है, जबकि सरकारी ऋण एक स्टॉक है। सरकारी घाटा (प्रवाह) सरकारी ऋण स्टॉक में वृद्धि करता है। यदि सरकार वर्ष दर वर्ष सार्वजनिक घाटे को पूरा करने के लिए ऋण लेती है, तो ऋण के भार में बढ़ोतरी होती जाती है और सार्वजनिक ऋणों का भुगतान बढ़ जाता है, क्योंकि ऋणों का ब्याज भुगतान स्वयं ऋण भार को और अधिक बढ़ाता है।

प्रश्न 12.
क्या सार्वजनिक ऋण बोझ बनता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
1. सरकार वर्तमान पीढ़ी को बाँड जारी करके ऋण प्राप्त करती है। ऋण से सरकार के दायित्व में बढ़ोतरी होती है। इस दायित्व से निजात पाने के लिए अथवा दायित्व के भार को कम करने के लिए सरकार बाँड का भुगतान लगभग 20 वर्ष के बाद भारी कर आरोपित करके करती है। ये कर युवा पीढ़ी पर लगाए जाते हैं। इससे प्रयोज्य आय घट जायेगी, इसके परिणामस्वरूप उपभोग, बचत एवं पूंजी निर्माण के स्तर में कमी आयेगी। इस प्रकार सरकारी ऋण भावी पीढ़ी पर भार होते हैं।

2. उपरोक्त विचार के विपरीत सरकारी ऋण के बारे में दूसरा विचार भी है। उपभोक्ता दूर दृष्टिगोचर होते हैं। लोग विवेकशील होते हैं, वे अपने व्यय का निर्णय वर्तमान एवं भावी आय को ध्यान में रखकर करते हैं। वर्तमान पीढ़ी भावी पीढ़ी की अभिभावक या संरक्षक होती है। अतः वर्तमान पीढ़ी बच्चों के हितों को ध्यान रखते हुए निर्णय लेती है। वर्तमान पीढ़ी की बचत सरकार की अबचत के समान होती है। अतः राष्ट्रीय बचतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस विचार से ऋण कोई मुद्दा नहीं है। इसे हम अपने लिए लेते हैं। ऋणों से केवल संसाधनों का हस्तांतरण होता है। लेकिन देश के अन्दर क्रय शक्ति नहीं बदलती है। परन्तु विदेशी ऋण भार स्वरूप होते हैं, क्योंकि ब्याज भुगतान के बराबर वस्तुएँ एवं सेवाएँ विदेशों को भेजनी पड़ती है।

प्रश्न 13.
क्या राजकोषीय घाटा आवश्यक रूप से स्फीतिकारी है?
उत्तर:
सामान्यतः राजकोषीय घाटे को स्फीतिकारी माना जाता है। सार्वजनिक व्यय में वृद्धि तथा करों में कटौती से राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी होती है। सार्वजनिक व्यय में वृद्धि तथा करों में कमी करने पर सकल माँग में बढ़ोतरी होती है। सार्वजनिक व्यय में वृद्धि तथा करों में कमी करने पर सकल माँग में बढ़ोतरी होती है। फर्म या उत्पादन इतने छोटे समय में नहीं बढ़ पाता है।

अत: वर्तमान वस्तुओं की पूर्ति पर माँग का दाब बढ़ जाता है, जिससे सामान्य कीमत में बढ़ोतरी हो जाती है। अतः राजकोषीय घाटा स्फीतिकारी होता है। इस तथ्य का दूसरा पक्ष भी है, यदि अर्थव्यवस्था में संसाधन बेकार पड़े होते हैं या आंशिक रूप से बेकार संसाधन मौजूद होते हैं अथवा कम माँग के कारण उत्पादन कम हो जाता है, तो राजकोषीय घाटा अधिक सामूहिक माँग को जन्म देता है। अधिक सामूहिक माँग से उत्पादन स्तर बढ़ जाता है। अत: यदि अर्थव्यवस्था में संसाधन बेकार पड़े रहने की स्थिति में राजकोषीय घाटा स्फीतिकारी नहीं होता है।

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प्रश्न 14.
घाटे में कटौती के विषय पर विमर्श कीजिए।
उत्तर:
यदि सरकार सार्वजनिक व्यय का स्तर घटाती है अथवा करों की दर बढ़ाती है, तो राजकोषीय घाटे में कमी आ जाती है। सरकार करों की दर बढ़ाकर सार्वजनिक उद्यमों की इकाइयों के अंश पत्र बेचकर राजकोषीय घाटे को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था में क्षेत्र के हिसाब से प्रभाव डालता है। सरकार आर्थिक क्रियाकलापों को प्रभावशाली बनाने, प्रशासन एवं प्रबन्ध को श्रेष्ठ बनाकर राजकोषीय घाटे को कम करने का प्रयास कर रही है। महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों से सरकारी व्यय घटाने पर कृषि, स्वास्थ्य शिक्षा आदि पर बुरा प्रभाव पड़ता है। निर्धनता निवारण कार्यक्रम, रोजगार कार्यक्रम आदि प्रभावित होते हैं। समान राजकोषीय नीति से घाटा अधिक या कम हो सकता है, यह बात अर्थव्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करती है। मन्दी काल के दौरान GDP का स्तर घट जाता है, जिससे कर आगम में कमी आती है और राजस्व घाटे में बढ़ोतरी हो जाती है।

Bihar Board Class 12 Economics सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वित्त बिल का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वार्षिक वित्तीय विवरण के साथ पेश किए जाने वाला बिल वित्त बिल कहलाता है। बजट में कर आरोपण, कर छूट, पुनर्वितरण, नियमतिकरण आदि के विवरण को वित्त बिल कहते है।

प्रश्न 2.
उस कर का नाम लिखो, जो पुनर्वितरण के उद्देश्य से लगाया जाता है।
उत्तर:
प्रगतिशील कर से आय एवं संपत्ति का पुनः वितरण किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
अर्थव्यवस्था में व्यय का निर्धारण किस आधार पर होता है?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था में व्यय का स्तर आय स्तर एवं साख उपलब्ध पर निर्भर करता है।

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प्रश्न 4.
हस्तांतरण गुणांक ज्ञात करने का सूत्र लिखो।
उत्तर:
हस्तांतरण गुणांक = \(\frac{C}{1-C}\) जहाँ C सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति है।

प्रश्न 5.
कर गुणांक ज्ञात करने को सूत्र लिखिए।
उत्तर:
कर गुणांक = \(\frac{-C}{1-C}\), जहाँ C सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति है।

प्रश्न 6.
सार्वजनिक व्यय गुणांक का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
सार्वजनिक व्यय गुणांक = \(\frac{1}{1-C}\) जहाँ C सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति है।

प्रश्न 7.
एकमुश्त कर किस प्रकार सामूहिक माँग को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
एकमुश्त कर लगाने से सामूहिक माँग वक्र नीचे की ओर खिसकता है।

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प्रश्न 8.
एकमुश्त कर की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
वह कर, जिसकी दर या मात्रा आय पर निर्भर नहीं करती है, एकमुश्त कर कहलाता है।

प्रश्न 9.
“The General Theory of Employment, Interest and Money” at मुख्य विचार क्या है?
उत्तर:
इस पुस्तक का मुख्य विचार उत्पाद स्तर व रोजगार स्तर में दायित्व लाने से है।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित का अर्थ लिखिए –

  1. वित्त विधेयक।
  2. अनुपूरक बजट।

उत्तर:

  1. वित्त विधेयक-कर प्रस्तावों का विस्तृत विवरण, जिसे सरकार संसद में पेश करती है, उसे वित्त विधेयक कहते हैं।
  2. अनुपूरक बजट-प्राकृतिक आपदाओं जैसे-बाढ़, भूकंप, महामारी, सूखा, अकाल, तूफान एवं युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए सरकार संसद में जो बजट पेश करती है, उसे अनुपूरक बजट कहते हैं।

प्रश्न 11.
कार्य निष्पादन बजट की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
एक वित्तीय वर्ष की अवधि के लिए सरकार अनेक परियोजनाएँ बनाती है, इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन हेतु दर्शाए गए बजट को कार्य निष्पादन बजट कहते हैं।

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प्रश्न 12.
कर राजस्व एवं गैर कर राजस्व का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
कर राजस्व-संघीय सरकार द्वारा लगाए गए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों और शुल्कों से प्राप्त आय को कर राजस्व कहते हैं। जैसे-आय कर, संपत्ति कर, बिक्री कर, उत्पादन शुल्क आदि से प्राप्त आय को कर राजस्व कहते हैं। गैर कर राजस्व-सरकारी व्यावसायिक गतिविधियों, सरकारी निवेश से प्राप्त आय, ब्याज प्राप्ति, सरकारी प्रशासनिक विभागों की आय आदि को गैर कर राजस्व कहते हैं।

प्रश्न 13.
अर्थव्यवस्था में रोजगार व कीमत स्तर किससे निर्धारित होता है?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था में रोजगार व कीमत स्तर मुख्यतः सामूहिक माँग के स्तर से निर्धारित होता है।

प्रश्न 14.
मिश्रित अर्थव्यवस्था में मुख्य भूमिका निभाने वाले क्षेत्र का नाम लिखो।
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रश्न 15.
बजट का अर्थ लिखिए। भारत में केन्द्रीय बजट कहाँ और कौन पेश करता है?
उत्तर:
एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से अगले वर्ष 31 मार्च तक) की अवधि के लिए सरकार की अनुमानित आय एवं व्यय का विस्तृत लेखा-जोखा बजट कहलाता है। भारत में केन्द्रीय बजट भारतीय संसद में पेश किया जाता है। भारत सरकार का वित्त मंत्री केन्द्रीय बजट पेश करता है।

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प्रश्न 16.
बजट में राजस्व प्राप्ति की मदें लिखिए।
उत्तर:
बजट में राजस्व प्राप्ति की मदों को दो वर्गों में बाँटा जाता है –

  1. कर राजस्व-सभी प्रकार के करों (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष) से प्राप्त आय को कर श्रेणी में रखा जाता है।
  2. गैर कर राजस्व-व्यावसायिक राजस्व, निवेश से अर्जित लाभांश, ब्याज प्राप्ति, प्राशासकीय कार्यों से प्राप्त आय को गैर कर राजस्व की श्रेणी में रखा जाता है।

प्रश्न 17.
प्रगतिशील कर की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
कर की वह प्रणाली, जिसमें कर की दर आय एवं संपत्ति की मात्रा बढ़ने पर अधिक होती है एवं आय व संपत्ति की मात्रा घटने पर कर की दर कम होती है, प्रगतिशील कर प्रणाली कहलाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था में ज्यादातर कर प्रगतिशील कर लगाए जाते हैं।

प्रश्न 18.
प्राथमिक घाटे का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
राजकोषीय घाटे में से ऋणों पर किए गए ब्याज भुगतान को घटाने पर प्राप्त शेष को प्राथमिक घाटा कहते हैं।
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान
वास्तव में सरकार को खर्च करने के लिए उतनी ही रकम प्राप्त होती है, जो प्राथमिक घाटे के रूप में प्राप्त होती है।

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प्रश्न 19.
संतुलित एवं असंतुलित बजट का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
संतुलित बजट-सरकार का ऐसा बजट, जिसमें सरकार की सभी स्रोतों से प्राप्तियों का योग, समस्त मदों पर किए गए व्यय के समान होता है, तो ऐसा बजट को संतुलित बजट कहते हैं। असंतुलित बजट-सरकार का ऐसा बजट, जिसमें सरकार की सभी स्रोतों से प्राप्तियाँ, समस्त मदों पर खर्च से कम या ज्यादा होती है, तो इसे असंतुलित बजट कहते हैं।

प्रश्न 20.
राजस्व घाटे का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
सरकारी बजट में समस्त राजस्व प्राप्तियों तथा समस्त राजस्व व्ययों के अन्तर को राजस्व घाटा कहते हैं।
राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ
दूसरों शब्दों में राजस्व प्राप्तियों पर राजस्व व्यय के आधिक्य को राजस्व घाटा कहा जाता है।

प्रश्न 21.
पूंजीगत घाटा क्या होता है?
उत्तर:
समस्त पूंजीगत प्राप्तियों पर पूंजीगत व्ययों के अधिशेष को पूंजीगत घाटा कहते हैं।
दूसरे शब्दों में समस्त पूंजीगत प्राप्तियों एवं समस्त पूंजीगत व्ययों के अन्तर को पूंजीगत घाटा कहते हैं।
पूंजीगत घाटा = पूंजीगत व्यय – पूंजीगत प्राप्तियाँ

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प्रश्न 22.
कर की परिभाषा लिखिए एवं करों के प्रकार लिखिए।
उत्तर:
ऐसे अनिवार्य भुगतान, जिन्हें आय व संपत्ति, वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद फरोख्न पर अनिवार्य रूप से करना पड़ता है, उन्हें कर कहते हैं। कर दो प्रकार के होते हैं –

  1. प्रत्यक्ष कर एवं
  2. अप्रत्यक्ष कर

प्रश्न 23.
योजना व्यय की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
सरकार द्वारा किए गए व्यय, जिनका सम्बन्ध योजनाबद्ध विकास कार्यक्रम पर किए जाते हैं, योजना व्यय कहलाते हैं। जैसे-नहरों व सड़कों के निर्माण आदि पर व्यय ।

प्रश्न 24.
गैर योजना व्यय का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
योजनाबद्ध विकास कार्यक्रम के अलावा सरकार द्वारा किया गया व्यय गैर-योजना व्यय कहलाता है। जैसे-भूकंप की एवं बाढ़ पीड़ितों की सहायता आदि पर किया गया व्यय।

प्रश्न 25.
विकास व्यय का अर्थ उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
सरकार द्वारा किया गया ऐसा व्यय, जो आर्थिक विकास हेतु किया जाता है, विकास व्यय कहलाता है। विकास व्यय से अर्थव्यवस्था में वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में प्रत्यक्ष रूप से वृद्धि होती है। उदाहरण-सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के विस्तार पर किया जाने वाला व्यय आदि।

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प्रश्न 26.
गैर विकास व्यय का सउदाहरण अर्थ लिखिए।
उत्तर:
ऐसा व्यय, जिसका आर्थिक विकास से सीधे तौर पर कोई सम्बन्ध नहीं होता है। गैर विकास व्यय कहलाता है। गैर विकास व्यय का अर्थव्यवस्था में वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। जैसे-सुरक्षा, प्रशासन, कानून व्यवस्था आदि पर व्यय।

प्रश्न 27.
पूंजीगत व्यय का सउदाहरण अर्थ लिखिए।
उत्तर:
सरकार द्वारा किए गए ऐसे व्यय, जिनसे सरकार की परिसम्पत्तियों में वृद्धि होती है अथवा सरकार के दायित्व कम हो जाते हैं, पूंजीगत व्यय कहलाते हैं। जैसे-ऋण का भुगतान, भवन निर्माण पर व्यय आदि।

प्रश्न 28.
प्रत्यक्ष कर किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह कर, जिसका भुगतान प्रत्यक्ष रूप से उसी व्यक्ति या संस्था को करना पड़ता है, जिस पर वह कर लगाया जाता है। प्रत्यक्ष कर का भार दूसरे लोगों पर हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। प्रत्यक्ष कर का उदाहरण-आय कर, संपत्ति कर, उपहार कर आदि।

प्रश्न 29.
अप्रत्यक्ष कर का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
वह कर, जिसका भार आंशिक अथवा पूरी तरह से करदाता दूसरे व्यक्तियों अथवा संस्थाओं पर हस्तांतरित कर सकता है, अप्रत्यक्ष कर कहलाता है। अप्रत्यक्ष कर के उदाहरण-बिक्री कर, सीमा कर आदि।

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प्रश्न 30.
बजट के उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
बचत के उद्देश्य –

  1. आर्थिक व सामाजिक समता को बढ़ावा देने हेतु आय व सम्पत्ति का पुनः वितरण।
  2. सामाजिक कल्याण को बढ़ाने के लिए संसाधनों का पुनः वितरण।
  3. आर्थिक स्थिरता।
  4. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा संवृद्धि दर को तीव्र गति से बढ़ाना।

प्रश्न 31.
अर्थव्यवस्था पर बजट के प्रभाव लिखिए।
उत्तर:
बजट अर्थव्यवस्था को निम्न प्रकार से प्रभावित करता है –

  1. संपूर्ण राजकोषीय अनुशासन स्थापित हो सकता है।
  2. सामाजिक कल्याण में वृद्धि।
  3. सरकारी सेवाओं की उपलब्धता में बढ़ोतरी।
  4. संसाधनों का पुनः आबंटन।
  5. आर्थिक नीतियों की समीक्षा एवं नई आर्थिक नीतियों का निर्माण।

प्रश्न 32.
बजट की संरचना को अति संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:

  1. राजस्व बजट-इसमें सरकार की राजस्व प्राप्तियों तथा व्यय का विस्तृत लेखा-जोखा तैयार किया जाता है।
  2. पूंजीगत बजट-इसमें सरकार की समस्त पूंजीगत प्राप्तियों एवं पूंजीगत व्यय का विस्तृत ब्यौरा पेश किया जाता है।

प्रश्न 33.
राजस्व प्राप्ति का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
सरकार की ऐसी प्राप्तियाँ, जिनसे सरकार की परिसंपत्तियों में कोई कमी नहीं होती है अथवा सरकार के ऊपर कोई देयता उत्पन्न नहीं होती है, उन्हें राजस्व प्राप्तियाँ कहते हैं। जैसे-कर प्राप्तियाँ, ब्याज से प्राप्तियाँ आदि।

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प्रश्न 34.
पूंजीगत प्राप्ति का उदाहरण सहित अर्थ लिखिए।
उत्तर:
सरकार की ऐसी प्राप्तियों, जिनसे सरकार की परिसंपत्तियों में कमी आती है अथवा सरकार के ऊपर देयता उत्पन्न होती है, उन्हें पूंजीगत प्राप्तियाँ कहते हैं। जैसे-विनिवेश से प्राप्ति, बचत के रूप में प्राप्ति आदि।

प्रश्न 35.
प्रतिगामी कर का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
वह कर, जिसमें आय बढ़ने पर कर की दर घट जाती है तथा आय घटने पर कर की दर बढ़ जाती है, उसे प्रतिगामी कर कहते हैं। प्रतिगामी कर का भार अमीर व्यक्तियों पर कम पड़ता है तथा गरीब व्यक्तियों पर इसका अधिक भार पड़ता है।

प्रश्न 36.
राजस्व व्यय का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
सरकार द्वारा किए गए ऐसे व्यय, जिनसे सरकार की परिसंपत्तियों में कोई वृद्धि नहीं होती है अथवा सरकार के दायित्व में कमी नहीं होती है, राजस्व व्यय कहलाते हैं। जैसे-छात्रों का छात्रवृत्ति पर खर्च, वृद्धा पेंशन आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजकोषीय नीति के प्रयोग बताओ।
उत्तर:
General Theory of Income, Employment, Interest and Money में जे. एम. कीन्स ने राजकोषीय नीति के निम्नलिखित प्रयोग बताएँ हैं –

  1. इस नीति का प्रयोग उत्पादन-रोजगार स्थायित्व के लिए किया जा सकता है। व्यय एवं कर नीति में परिवर्तन के द्वारा सरकार उत्पादन एवं रोजगार में स्थायित्व पैदा कर सकती है।
  2. बजट के माध्यम से सरकार आर्थिक उच्चावचनों को ठीक कर सकती है।

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प्रश्न 2.
सार्वजनिक उत्पादन एवं सार्वजनिक बन्दोबस्त में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर:
सार्वजनिक बन्दोबस्त (व्यवस्था) से अभिप्राय उन व्यवस्थाओं से है, जिनका वित्तीयन सरकार बजट के माध्यम से करती है। ये सभी उपभोक्ताओं को बिना प्रत्यक्ष भुगतान किए मुफ्त में प्रयोग के लिए उपलब्ध होते हैं। सार्वजनिक व्यवस्था के अन्तर्गत आने वाली वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन सरकार प्रत्यक्ष रूप से भी कर सकती है अथवा निजी क्षेत्र से खरीदकर भी इनकी व्यवस्था की जा सकती है। सार्वजनिक उत्पादन से अभिप्राय उन वस्तुओं एवं सेवाओं से है, जिनका उत्पादन सरकार द्वारा संचालित एवं प्रबंधित होता है। इसमें निजी या विदीशी क्षेत्र की वस्तुओं को शामिल नहीं किया जाता है। इस प्रकार सार्वजनिक व्यवस्था की अवधारणा सार्वजनिक उत्पादन से भिन्न है।

प्रश्न 3.
Free rider (मुफ्त सवारी) समस्या समझाओ।
उत्तर:
भुगतान न करने वाले उपभोक्ताओं को सार्वजनिक वस्तुओं के उपयोग से वंचित नहीं किया जा सकता है। सार्वजनिक वस्तुओं के प्रयोग के बदले शुल्क एकत्र करना बड़ा कठिन कार्य है। उपभोक्ता स्वेच्छापूर्वक इन वस्तुओं के प्रयोग की शुल्क देना नहीं चाहते हैं। अतः सार्वजनिक वस्तुओं के प्रयोग करने से किसी को रोकने का कोई उपाय नहीं होता है। सभी धनी वर्ग व निर्धन वर्ग इन वस्तुओं का मुफ्त में उपयोग करते हैं इसको मुफ्त सवारी समस्या कहते हैं।

प्रश्न 4.
वितरण फलन को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
प्रत्येक सरकार की एक राजकोषीय नीति होती है। राजकोषीय नीति माध्यम से प्रत्येक सरकार समाज में आय के वितरण में समानता या न्याय करने की कोशिश करती है। सरकार उच्च आय वर्ग या अधिक संपत्ति के स्वामियों पर उच्च कर लगाती है तथा कमजोर वर्ग को हस्तांतरण भुगतान प्रदान करती है। कर एवं हस्तांतरण भुगतान दोनों प्रयोज्य आय को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार आय व संपत्ति के वितरण को वितरण फलन कहते हैं।

प्रश्न 5.
आबंटन (Allocation) फलन का अर्थ समझाइए।
उत्तर:
राष्ट्रीय सुरक्षा, सड़कें, प्रशासन, पार्क इत्यादि सार्वजनिक वस्तुएँ कहलाती है। सार्वजनिक वस्तुएँ निजी वस्तुओं से भिन्न होती है। निजी वस्तुएँ लोगों को कीमत तंत्र के द्वारा उपलब्ध होती है लेकिन सार्वजनिक वस्तुएँ सरकार द्वारा निःशुल्क या सामान्य कीमत पर जनता को उपलब्ध करायी जाती है। सार्वजनिक वस्तुओं के प्रयोग से किसी भी व्यक्ति को वंचित नहीं किया जा सकता है। इसे आबंटन फलन कहते हैं।

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प्रश्न 6.
माँग को कम करने के लिए प्रतिबन्धात्मक या कठोर दशाओं की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
अधिक लम्बे समय तक बेरोजगारी अथवा स्फीतिकारी दशाओं में अर्थव्यवस्था को आर्थिक उच्चावचनों का सामना करना पड़ता है। यदि अर्थव्यवस्था में सभी संसाधनों का पूर्ण विदोहन करने लायक व्यय का स्तर नहीं होता है, तो मजदूरी दर एवं सामान्य कीमत स्तर में गिरावट आती है, तो पूर्ण रोजगार स्तर को स्वतः आधार पर प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इस स्थिति में सामूहिक माँग के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए नीतिगत उपाय आवश्यक होते हैं। उच्च रोजगार स्तर पर सामूहिक माँग के स्तर में बढ़ोतरी होती है, जिससे स्फीतिकारी प्रभाव पनपने लगता है अर्थात् अर्थव्यवस्था में कीमत स्तर में वृद्धि होती है। इन स्थितियों में प्रतिबन्धात्मक नीति आवश्यक होती है।

प्रश्न 7.
निजी व सार्वजनिक वस्तुओं में भेद स्पष्ट करो।
उत्तर:
निजी एवं सार्वजनिक वस्तुओं में दो मुख्य अन्तर होते हैं, जैसे –

  1. निजी वस्तुओं का उपयोग व्यक्तिगत उपभोक्ता तक सीमित होता है लेकिन सार्वजनिक वस्तुओं का लाभ किसी विशिष्ट उपभोक्ता तक सीमित नहीं होता है, ये वस्तुएँ सभी उपभोक्ताओं को उपलब्ध होती है।
  2. कोई भी उपभोक्ता, जो भुगतान देना नहीं चाहता या भुगतान करने की शक्ति नहीं रखता निजी वस्तु के उपभोग से वंचित किया जा सकता है। लेकिन सार्वजनिक वस्तुओं के उपभोग से किसी को वंचित रखने का कोई तरीका नहीं होता है।

प्रश्न 8.
कर गुणांक का निरपेक्ष मूल्य सरकारी व्यय गुणांक से 1 कम होता है?
उत्तर:
कर गुणांक का निरपेक्ष मूल्य सरकारी व्यय गुणांक से कम इसलिए होता है, क्योंकि सार्वजनिक व्यय सीधे या प्रत्यक्ष रूप से कुल व्यय को प्रभावित करता है, जबकि कर प्रयोज्य आय को प्रभावित करते हैं और फिर गुणक प्रक्रिया केद्वारा उपभोग व व्यय को प्रभावित करता है। कर गुणक का निरपेक्ष मूल्य सार्वजनिक व्यय गुणक से 1 कम होता है, इसे नीचे समझाया गया है –
सरकारी व्यय गुणक \(\frac{∆Y}{∆G}\) = \(\frac{1}{1-C}\)
कर गुणांक \(\frac{∆Y}{∆T}\) = \(\frac{-C}{1-C}\)
\(\frac{∆Y}{∆G}\) – \(\frac{∆Y}{∆T}\) = \(\frac{1}{1-C}\) – |\(\frac{C}{1-C}\)| = \(\frac{1}{1-C}\) – \(\frac{C}{1-C}\) = \(\frac{1-C}{1-C}\) = 1
इस प्रकार कर गुणक का निरपेक्ष मूल्य सार्वजनिक व्यय गुणक से 1 कम है।

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प्रश्न 9.
कर गुणांक की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
करों में कटौती करने पर प्रयोज्य आय में बढ़ोतरी होती है। कर में कटौती करने पर सामूहिक माँग में वृद्धि होती है। दूसरी ओर करों में वृद्धि करने पर प्रयोज्य आय घटती है। प्रयोज्य आय घटने से उपभोग में कमी आती है। इससे उत्पादन एवं आय का स्तर घटता है। अत: कर गुणांक एक ऋणात्मक गुणक है। कर ∆T कमी करने पर कुल व्यय में बढ़ोतरी C∆T के समान होगी। गणितीय रूप में इसे निम्न प्रकार समझाया जा सकता है –
∆Y = \(\frac{1}{1-C}\) (-C) ∆T
या \(\frac{∆Y}{∆T}\) = \(\frac{-C}{1-C}\)
कर गुणांक = \(\frac{-C}{1-C}\)

प्रश्न 10.
सार्वजनिक व्यय गुणक की अवधारणा स्पष्ट करो।
उत्तर:
सार्वजनिक व्यय गुणक की अवधारणा को समझने के लिए करों को स्थिर या समान माना जाता है। जब सरकार वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद बढ़ाती है, तो नियोजित व्यय में वृद्धि हो जायेगी। विभिन्न चक्रों के माध्यम से सरकारी व्यय में बढ़ोत्तरी से राष्ट्रीय आय में वृद्धि उत्पन्न होती है। सरकारी व्यय गुणक की कार्य पद्धति ठीक निवेश गुणक की भाँति होती है। सरकारी व्यय गुणांक –
∆Y = \(\frac{∆G}{1-C}\) या \(\frac{∆Y}{∆G}\) = \(\frac{1}{1-C}\)
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 5 part - 1  सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था img 1
सीमान्त उपयोग प्रवृत्ति सीमान्त उपयोग प्रवृत्ति ऊँची होने पर सरकारी व्यय गुणक ऊँचा होता है तथा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति नीची होने पर व्यय गुणक का मान कम रहता है।

प्रश्न 11.
यदि सरकार आर्थिक गतिविधियों में भागीदार होती है, तो उपभोग फलन लिखो एवं साम्य आय का स्तर लिखो।
उत्तर:
सरकार आर्थिक गतिविधियों में कई प्रकार से भूमिका निभाती है। जब सरकार जनता को हस्तांतरण भुगतान प्रदान करती है, तो सामूहिक माँग का स्तर ऊपर की ओर उठता है अर्थात् सामूहिक माँग में वृद्धि होती है। दूसरी ओर सरकार जनता पर कर आरोपित करती है, जिससे प्रयोज्य आय कम होती है और सामूहिक माँग नीचे की ओर गिरती है।
उपभोग फलन को निम्न प्रकार लिख सकते हैं उपभोग = C + CYD (YD प्रयोज्य आय) = C + C (Y – T + TR)
AD = C + C (YT + TR) + I + G
साम्य स्तर पर Y = AD
Y = C + C (Y – T + TR) + I + G
= C + CY – CT + CTR + I + G
Y – CY = C – CT + CTR + I + G
Y = C-CT + CTR+I+G
Y = \(\frac{1}{1-C}\) × [C – CT + CTR + I + G]

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प्रश्न 12.
एकमुश्त कर गुणक तथा अनुपातिक कर गुणक की तुलना करो।
उत्तर:
एकमुश्त कर प्रणाली की स्थिति में बजट गुणक \(\frac{∆Y}{∆G}\) = \(\frac{-C}{1-C}\)
अन्पातिक कर प्रणाली की स्थिति में बजट गुणक \(\frac{∆Y}{∆G}\) = \(\frac{1}{1-C(1-t)}\)
उपरोक्त दोनों समीकरणों से स्पष्ट है कि प्रगतिशील कर प्रणाली में गुणक का मान एकमुश्त गुणक के मान से कम होगा।

एकमुश्त कर की स्थिति में सरकारी व्यय से आय में वृद्धि के परिणामस्वरूप उपभोग में वृद्धि आय से C गुना होती है, जबकि प्रगतिशील कर प्रणाली में सरकारी व्यय से उपभोग में वृद्धि C (1 – t) गुना होती है। C (1 – t) का मान C के मान से कम है। अत: C (1 – t) का गुणक, C के गुणक से कम होगा।

प्रश्न 13.
सन्तुलित बजट गुणक का मान सदैव इकाई (I) होता है। समझाइए।
उत्तर:
सरकार दो प्रकार से उपभोग या सामूहिक माँग को प्रभावित करती है। सरकार वस्तुओं एवं सेवाओं पर प्रत्यक्ष रूप से व्यय करती है। सरकारी व्यय प्रत्यक्ष रूप से कुल व्यय को प्रभावित करता है। खरीद और फिर गुणक प्रक्रिया द्वारा भी कुल व्यय प्रभावित होता है। इसे गणितीय रूप में इस प्रकार दर्शाया जा सकता है –
∆Y = ∆G + C∆G + C2 ∆G + …
= ∆G (1 + C + C2 + …)
सरकार लोगों पर कर लगाती है। कर प्रयोज्य आय के स्तर को घटाते हैं। प्रयोज्य आय में कमी से गुणक प्रक्रिया द्वारा कुल व्यय प्रभावित होता है। कर गुणक प्रभाव को नीचे दर्शाया गया है –
∆Y = C∆T – C2∆T + …
∆Y = ∆T (C + C2 + …)
सरकारी व्यय से आय में वृद्धि तथा करों से आय में कमी का योग आय पर शुद्ध प्रभाव के समान होता है। यदि सार्वजनिक व्यय में वृद्धि ∆G, कर राजस्व में वृद्धि ∆T के समान हो, तो इसे सन्तुलित बजट गुणक कहते हैं। उपरोक्त दोनों समीकरणों से –
∆Y = ∆G + C∆G + C (Y – ∆T)
∆Y = G + C (∆Y – ∆T) (∵∆G = ∆T)
∆Y = ∆G + C(∆Y – ∆G)
∆Y = ∆G + C∆Y – C∆G
∆Y – C∆Y = ∆G – C∆G
∆Y (1 – C) = ∆G(1 – C)
∆Y = ∆G \(\frac{(1-C)}{1-C}\) \(\frac{∆Y}{∆G}\) = \(\frac{1-C}{1-C}\)
सन्तुलित बजट गुणक = 1

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प्रश्न 14.
प्रगतिशील कर की स्थिति में गुणक अवधारणा को स्पष्ट करें।
उत्तर:
यदि सरकार के अनुपात में कर लगाती है, तो
T = tY
उपभोग C = C + C [Y – tY + TR] = C + C(1 – t) Y + CTR
अनुपातिक कर आय के प्रत्येक स्तर पर उपभोग को घटाते हैं। अनुपातिक कर से उपभोग प्रवृत्ति भी घटती है। अतः सामूहिक माँग निम्न प्रकार से ज्ञात की जाती है –
AD = C + C(1 – t) Y + CTR + I + G
= A + G (1 – t) Y (A = C + CTR + I + G)
AD = A + C (1 – t)Y
साम्य की अवस्था में
Y = AD
Y = A + C(1 – t)Y
Y = A +CY – CtY
Y = \(\frac{(A)}{1-C-Ct}\) Y = \(\frac{(A)}{1-C(1-t)}\)
अनुपातिक कर गुणांक \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-C(1-t)}\)

प्रश्न 15.
राजस्व बजट और पूंजी बजट का अन्तर क्या है?
उत्तर:
राजस्व बजट:
सरकार की राजस्व प्राप्तियों एवं राजस्व के विवरण को राजस्व बजट कहते हैं।
राजस्व प्राप्तियाँ दो प्रकार की होती है –

  1. कर राजस्व एवं
  2. गैर कर राजस्व

राजस्व व्यय सरकार की सामाजिक, आर्थिक एवं सामान्य गतिविधियों के संचालन पर किए गए खर्चों का विवरण है। राजस्व बजट में वे मदें आती है, जो आवृत्ति किस्म की होती है और इन्हें चुकाना नहीं पड़ता है।
राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ

पूंजी बजट:
सरकार की पूंजी प्राप्तियों एवं पूंजी व्यय के विवरण को पूंजी बजट कहते हैं।

पूंजी प्राप्तियाँ दो प्रकार की होती है –

  1. ऋण प्राप्तियाँ एवं
  2. गैर ऋण प्राप्तियाँ

पूंजी व्यय सरकार की सामाजिक, आर्थिक एवं सामान्य गतिविधियों के लिए पूंजी निर्माण पर किए गये व्यय को दर्शाता है।
पूंजी घाटा = पूंजी व्यय – पूंजीगत प्राप्तियाँ
पूंजीगत राजस्व सरकार के दायित्वों को बढ़ाता व पूंजीगत व्यय से परिसम्पत्तियों का अर्जन होता है।

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प्रश्न 16.
विकास और गैर विकास व्यय में अन्तर समझाएँ।
उत्तर:
विकास व्यय:
विकास व्यय में रेलवे, डाक एवं दूरसंचार तथा गैर विभागीय उद्यमों के अपने स्रोतों, बाजार उधार, वित्तीय संस्थानों से सावधि उधार आदि गैर बजटीय स्रोतों से योजना व्यय, केन्द्र एवं राज्य सरकारी द्वारा गैर विभागीय एवं स्थानीय निकायों को प्रदत्त ऋण भी शामिल किए जाते हैं।

गैर विकास व्यय:
प्रतिरक्षा, ब्याज भुगतान, कर संग्रहण, पुलिस एवं प्रशासनिक व्यय के अलावा पेन्शन, राजाओं की अनुग्रह राशि, आर्थिक सहायता आदि व्यय सम्मिलित किए जाते हैं। गैर विकास कार्यों के लिए दिए गए ऋण भी गैर विकास व्यय की श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 17.
हस्तान्तरण गुणक की अवधारण T स्पष्ट करो।
उत्तर:
सरकार जनता को हस्तान्तरण भुगतान प्रदान करती है। हस्तान्तरण भुगतान की प्राप्ति से परिवार क्षेत्र की प्रयोज्य आय में बढ़ोतरी होती है। जब सरकार हस्तान्तरण भुगतान में वृद्धि करती है, तो स्वायत्त व्यय C ∆TR बढ़ जायेगा। लकिन कुल उत्पाद में वृद्धि कम होगी क्योंकि हस्तांतरण भुगतान का कुछ भाग बचत के रूप में रखा जाता है। हस्तांतरण भुगतान से आय में वृद्धि की गणना निम्नलिखित ढंग से की जा सकती है।
हस्तान्तरण गुणक \(\frac{∆Y}{∆TR}\) = \(\frac{C}{1-C}\)

प्रश्न 18.
इनकी परिभाषा करें –

  1. राजकोषीय घाटा
  2. बजट घाटा
  3. राजस्व घाटा
  4. प्राथमिक घाटा

उत्तर:
1. राजकोषीय घाटा:
राजस्व व्यय एवं राजस्व प्राप्तियों, कर राजस्व तथा गैर कर राजस्व में अन्तर को राजकोषीय घाटा कहते हैं।
राजकोषीय घाटा = राजस्व घाटा – राजस्व प्राप्तियाँ – गैर ऋण पूंजीगत प्राप्तियाँ

2. बजट घाटा:
सरकार के कुल अनुमानित व्ययों और कुल अनुमानित आय के अन्तर को बजटीय घाटा कहा जाता है।
बजटीय घाटा = कुल अनुमानित आय – कुल अनुमानित प्राप्तियाँ

3. राजस्व घाटा:
राजस्व व्यय एवं राजस्व प्राप्तियों के अन्तर को राजस्व घाटा कहते हैं।
राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ

4. प्राथमिक घाटा:
राजकोषीय घाटे एवं ब्याज भुगतानों के अन्तर को प्राथमिक घाटा कहते हैं।
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान।

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प्रश्न 19.
घाटे का वित्तीयन किस प्रकार हो सकता है?
उत्तर:
समस्त व्यय एवं प्राप्तियों के अन्तर को बजटीय घाटा कहते हैं। बजटीय घाटा उस समय उत्पन्न होता है, जब सरकारी व्यय, सरकारी प्राप्तियों से ज्यादा होता है। घाटे के वित्तीयन के दो रास्ते हैं –
1. मौद्रिक प्रसार:
सरकार घाटे के समय नए नोट छपवा सकती है। यह प्रक्रिया सरकार द्वारा राजकोषीय हुन्डियों के आधार पर (RBI) से ऋण लेने जैसा है। रिजर्व बैंक नए नोट छापता है और सरकारी हुन्डियों के बदले उन्हें सरकार को देता है। सरकार इन नोटों से अपना घाटा पूरा कर सकती है।

2. ऋण लेना:
सरकार घाटे को पूरा करने के लिए घरेलू एवं विदेशी ऋण ले सकती है। भारत में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत तक हो सकता है, इससे अधिक नहीं।

प्रश्न 20.
पूंजीगत प्राप्तियों को संक्षेप में समझाएँ।
उत्तर:
सरकार को प्राप्त होने वाली ऐसी आय, जिसमें न, तो देनदारी उत्पन्न होती है और न ही सरकार की परिसम्पत्तियों में कमी आती है, राजस्व प्राप्तियाँ कहलाती है।
राजस्व प्राप्तियों का वर्गीकरण-इन्हें दो भागों में बाँटा जाता है –

  1. कर राजस्व
  2. गैर कर राजस्व

1. कर राजस्व:
कर ऐसे अनिवार्य भुगतान होते हैं, जिनके बदले करदाता को किसी भी प्रकार सीधा लाभ प्राप्त नहीं होता है। सभी प्रकार के करों से प्राप्त आय को राजस्व कहते हैं। कर अनेक प्रकार के होते हैं। जैसे –

  • प्रत्यक्ष कर
  • अप्रत्यक्ष कर
  • आनुपातिक कर
  • प्रगतिशील कर
  • प्रतिगामी कर
  • मूल्यवर्धित कर

2. गैर कर राजस्व:
करों के अतिरिक्त सरकार को प्राप्त होने वाली ऐसी आय, जिससे सरकार पर कोई दायित्व उत्पन्न नहीं होता है, उसे गैर कर राजस्व कहते हैं। गैर कर राजस्व प्राप्तियों में निम्न को शामिल किया जाता है –

  • ब्याज प्राप्तियाँ
  • लाभांश व लाभ
  • राजकोषीय सेवाओं की बिक्री से प्राप्त आय
  • विदेशी सहायता, आर्थिक एवं सामाजिक सेवाओं की बिक्री से प्राप्त आय
  • सामान्य सेवाओं से प्राप्त आय

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प्रश्न 21.
सार्वजनिक व्यय का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
सार्वजनिक व्यय को तीन वर्गों में बाँटते हैं –
1. राजस्व व्यय एवं पूंजीगत व्यय:
राजस्व व्यय सरकार की सामाजिक, आर्थिक एवं सामान्य गतिविधियों के संचालन पर किया गया व्यय होता है। इस व्यय से परिसम्पत्तियों का निर्माण नहीं होता है। पूंजीगत व्यय भूमि, भवन, यंत्र-संयत्र आदि पर किया गया निवेश होता है। इस व्यय से परिसम्पत्तियों का निर्माण होता है।

2. योजना व्यय एवं गैर योजना व्यय:
योजना व्यय में तत्कालिक विकास और निवेश मदें शामिल होती है। ये मदें योजना प्रस्तावों के द्वारा तय की जाती है। बाकी सभी खर्चे गैर योजना व्यय होते हैं।

3. विकास व्यय तथा गैर विकास व्यय:
विकास व्यय में रेलवे, डाक एवं दूरसंचार तथा गैर विभागीय उद्यमों के गैर बजटीय स्रोतों से योजना व्यय, सरकार द्वारा गैर विभागीय उद्यमों एवं स्थानीय निकायों को प्रदत्त ऋण भी शामिल किए जाते हैं। गैरे किस व्यय में प्रतिरक्षा, आर्थिक अनुदान आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 22.
राजस्व व्यय एवं पूंजीगत व्यय में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 5 part - 1 सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था img 2

प्रश्न 23.
पूंजीगत प्राप्तियों को संक्षेप में समझाएँ।
उत्तर:
पूंजीगत प्राप्तियों से अभिप्राय सरकार को प्राप्त होने वाली ऐसी आय से है, जिससे सरकार पर दायित्व उत्पन्न होता है या सरकार की परिसम्पत्तियों में कमी आती है। पूंजीगत प्राप्तियों में निम्न को शामिल किया जाता है –

  1. विदेशों से ऋण प्राप्तिया
  2. ऋणों एवं अग्रिमों की वसूली
  3. विनिवेश से प्राप्त आय
  4. लघु बचतें
  5. भविष्य निधि एवं अन्य जमाओं से प्राप्तियाँ
  6. घरेलू ऋण से प्राप्तियाँ आदि

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प्रश्न 24.
राजस्व व्यय को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
राजस्व व्यय सार्वजनिक व्यय का वह भाग है, जिससे न तो सरकार की परिसम्पत्तियों का निर्माण होता है, न ही सरकार की देनदारियों में कमी आती है और न ही सरकार की लेनदारी उत्पन्न होती है। राजस्व व्यय सामान्य सेवाओं, सामाजिक सेवाओं एवं आर्थिक सेवाओं के संचालन पर किये जाते हैं। राजस्व व्यय दो वर्गों में बाँटे जाते हैं –

1. विकासात्मक व्यय-आर्थिक एवं सामाजिक विकास के साथ सीधे तौर पर जुड़ी गतिविधियों के संचालन पर किये गये व्यय विकासात्मक व्यय कहलाते हैं। जैसे-ग्रामीण विकास, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, उद्योग, ऊर्जा, परिवहन, संचार
आदि।

2. गैर विकासात्मक व्यय-ऐसे व्यय, जिनसे प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक एवं सामाजिक विकास का संचालन नहीं होता है, बल्कि इनके लिए वातावरण तैयार होता है, गैर विकासात्मक व्यय कहलाते हैं। जैसे-सुरक्षा, प्रशासन, आर्थिक सहायता, पेंशन आदि।

प्रश्न 25.
पूंजीगत व्यय पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
पूंजीगत व्यय सार्वजनिक व्यय का वह भाग है, जिससे सरकार की परिसम्पत्तियों का निर्माण होता है, सरकार की देनदारियाँ कम होती है या सरकार की लेनदारियाँ उत्पन्न होती है। पूंजीगत व्यय दो प्रकार के होते हैं –
1. विकासात्मक व्यय:
विकासात्मक पूंजीगत व्यय प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक एवं सामाजिक विकास से जुड़े होते हैं। जैसे-आर्थिक विकास, सामाजिक एवं सामुदायिक विकास, रक्षा, प्रशासन, सामान्य सेवाओं पर पूंजीगत व्यय आदि।

2. गैर विकासात्मक व्यय:
गैर विकासात्मक पूंजी व्यय आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए वातावरण प्रदान करने के लिए किये जाते हैं। जैसे-रक्षा, पूंजी, सार्वजनिक उद्यमों का ऋण, विदेशों को ऋण, राजस्व एवं केन्द्र शासित सरकारों को ऋण आदि।

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प्रश्न 26.
कर तथा गैर कर राजस्व की परिभाषा करें।
उत्तर:
कर राजस्व:
संघीय सरकार द्वारा लगाये गए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों तथा शुल्कों से प्राप्त आय को कर राजस्व कहते हैं। जैसे-आय कर, ब्याज कर, सम्पत्ति कर, बिक्री कर आदि।

गैर कर राजस्व:
सरकार की व्यावसायिक गतिविधियों, निवेशों पर अर्जित लाभांश, ब्याज एवं सरकारी प्रशासनिक कार्यों से प्राप्त आय के योग को गैर कर राजस्व आय कहते हैं।

प्रश्न 27.
सन्तुलित बजट का अर्थ लिखें तथा इसके पक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
सन्तुलित बजट:
यदि सरकारी प्राप्तियाँ एवं व्यय बराबर होते हैं, तो ऐसे बजट को सन्तुलित बजट कहते हैं। सन्तुलित बजट के पक्ष में तर्क –

  1. सन्तुलित बजट बनाकर सरकार फिजूलखर्ची पर रोक लगा सकती है।
  2. सन्तुलित बजट देश को आर्थिक उतार-चढ़ाव (मन्दी व तेजी) से बचाने में सहायक हो सकता है।
  3. सन्तुलित बजट के आकार को बढ़ाकर आर्थिक मन्दी से भी बचा जा सकता है अर्थात् मन्दी से उभरने के लिए घाटे का बजट बनाना मजबूरी नहीं है।

प्रश्न 28.
सार्वजनिक राजस्व का अर्थ बताएँ तथा इसका महत्त्व भी बताएँ।
उत्तर:
अर्थ:
सार्वजनिक राजस्व से अभिप्राय एक लेखा वर्ष में सरकार को प्राप्त होने वाली ऐसी मौद्रिक आय से है, जिससे सरकार पर कोई दायित्व उत्पन्न नहीं होता है और न ही सरकार की परिसम्पत्तियों में कमी आती है।

महत्त्व:
आधुनिक सरकार कल्याणकारी सरकार है। आजकल सरकारें समाज के कमजोर वर्गों की भलाई के लिए अनेक प्रकार की योजनाएँ बनाती है। इन योजनाओं पर काम करने के लिए मुद्रा की आवश्यकता पड़ती है। सार्वजनिक राजस्व सार्वजनिक व्यय का एक साधन है अर्थात् सार्वजनिक राजस्व के अभाव में सरकारों के लिए समाज कल्याण करना सम्भव नहीं होगा।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 5 सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था

प्रश्न 29.
बजट के उद्देश्य क्या होते हैं?
उत्तर:
बजट के माध्यम से सरकार अपनी आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों को मूर्तरूप प्रदान करती है। बजट के निम्नांकित उद्देश्य होते हैं –

  1. संसाधनों का पुनः वितरण-संसाधनों को ज्यादा से ज्यादा सामाजिक, आर्थिक हितों के. अनुकूल पुनः बाँटने की कोशिश करती है।
  2. आय एवं सम्पत्ति का पुनः वितरण-बजट के माध्यम से सरकार आय एवं सम्पत्ति की असमानताओं को घटाने का प्रयास करती है।
  3. स्थायित्व: आय एवं रोजगार के ऊँचे स्तर को बनाएँ रखते हुए आर्थिक उतार-चढ़ाव को रोकना।
  4. सार्वजनिक उद्यमों का प्रबन्ध: सरकारी उद्यमों के माध्यम से भारी विनिर्माण, उत्पादन की मित्तव्ययताओं, अनियमित एकाधिकार को रोकने आदि को प्राप्त करने का प्रयास करती है।

प्रश्न 30.
सरकारी बजट के कोई तीन उद्देश्य समझाइए।
उत्तर:
1. रोजगार में वृद्धि:
सरकारी बजट का उद्देश्य रोजगार स्तर में वृद्धि करना होता है। रोजगार बढ़ाने के लिए सरकार श्रम प्रधान उत्पादन तकनीक के प्रयोग पर बल देती है। सरकार विशिष्ट रोजगार कार्यक्रम तैयार करती है। सड़कें, बाँध, पुल, विद्युत परियोजनाओं, सिंचाई परियोजनाओं आदि को प्रोत्साहित करने के लिए बजट में सरकार विशेष प्रावधान करती है।

2. आर्थिक समानता:
बजट का उद्देश्य गरीब व अमीर के फासले को कम करना भी होता है। गरीबी व अमीरी का अन्तर कम करने के उद्देश्य से सरकार प्रगतिशील कर प्रणाली आनुपातिक कर प्रणाली अपना कर गरीबों पर कर का भार कम डाल सकती है।

3. आर्थिक स्थिरता:
आर्थिक मन्दी एवं तेजी दोनों ही अर्थव्यवस्था के लिए घातक होती है। बजट के माध्यम से सरकार अनेक राजकोषीय उपायों से आर्थिक मन्दी व तेजी दोनों को नियन्त्रण में रख सकती है और देश के व्यापार एवं उद्योग दोनों में स्थिरता कायम की जा सकती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सरकार बजट की विभिन्न प्राप्तियों, व्यय एवं घाटों का खाका बनाइए।
उत्तर:
बजट अनुमान –
I. राजस्व प्राप्तियाँ –

  • कर राजस्व
  • गैर कर राजस्व

II. पूंजीगत प्राप्तियाँ –

  • ऋण प्राप्तियाँ
  • गैर ऋण प्राप्तियाँ

III. राजस्व व्यय –

  • ब्याज भुगतान
  • मुख्य आर्थिक सहायता
  • प्रतिरक्षा व्यय आदि

IV. पूंजीगत व्यय –

V. कुल व्यय –

  • योजना व्यय
  • गैर योजना व्यय

VI. राजस्व घाटा –

  • राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ।

VII. पूंजी घाटा = पूंजीगत व्यय – पूंजीगत प्राप्तियाँ।

VIII. राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ – गैर ऋण
पूँजी प्राप्तियाँ = ऋण प्राप्तियाँ।

IX. प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान % ऋण प्राप्तियाँ – ब्याज भुगतान।

X. निबल प्राथमिक घाटा = प्राथमिक घाटा – ब्याज प्राप्तियाँ।

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प्रश्न 2.
सरकारी बजट का स्वरूप संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
परिभाषा:
बजट आगामी लेखा वर्ष से सरकार के अनुमानित व्यय और प्राप्तियों का विवरण होता है।

बजट का स्वरूप:
बजट के स्वरूप से अभिप्राय बजट के विभिन्न अंगों से है। मुख्य रूप से बजट के दो अंग होते हैं –

I. बजट प्राप्तियाँ

II. बजट व्यय

I. बजट प्राप्तियाँ:
एक लेखा वर्ष में सरकार को सभी श्रोतों से जितनी आय प्राप्त होने का अनुमान होता है, उसे बजट प्राप्तियाँ कहते हैं। बजट प्राप्तियाँ दो प्रकार की होती है –

(I) राजस्व प्राप्तियाँ
(II) पूँजीगत प्राप्तियाँ।

(I) राजस्व प्राप्तियाँ:
राजस्व प्राप्तियाँ सरकार की वे प्राप्तियाँ हैं, जिनसे सरकार पर कोई दायित्व उत्पन्न नहीं होता है और न ही सरकार की परिसम्पत्तियों में कमी आती है। राजस्व प्राप्तियों भी दो प्रकार की होती है –

  • कर राजस्व-राजस्व में सरकार को सभी प्रकार के करों से प्राप्त होने वाली आय को शामिल किया जाता है। जैसे-प्रत्यक्ष कर, अप्रत्यक्ष कर आदि।
  • गैर कर राजस्व-करों के अलावा सरकार की ऐसी प्राप्तियाँ, जिनसे सरकार पर दायित्व उत्पन्न नहीं होता है, गैर कर राजस्व कहलाती है। जैसे-फीस, लाइसेन्स तथा परमिट फीस, एसचीट, जुर्माना, लाभांश, आर्थिक सहायता आदि।

(II) पूँजीगत प्राप्तियाँ:
पूँजीगत प्राप्तियाँ सरकार की वे प्राप्तियाँ है, जिनसे सरकार पर दायित्व उत्पन्न होता है और सरकार की परिसम्पत्तियों में कमी आती है। पूँजीगत प्राप्तियाँ दो प्रकार की होती है –

  • ऋण प्राप्तियाँ-इसमें विदेशी एवं घरेलू सभी प्रकार के ऋण एवं ऋणों की वसूली को शामिल किया जाता है।
  • गैर ऋण प्राप्तियाँ-इसमें विनिवेश से प्राप्तियाँ, लघु बचतें, प्रोविडेण्ट में जमा प्राप्तियाँ आदि।

II. बजट व्यय:
एक लेखा वर्ष के लिए सरकार द्वारा सभी मदों पर किए जाने वाले व्यय के अनुमान को बजट व्यय कहते हैं। बजट व्यय दो प्रकार के होते हैं –

  • राजस्व व्यय
  • पूँजीगत व्यय

राजस्व व्यय:
सरकार द्वारा किये जाने वाले ऐसे व्यय, जिनसे सरकारी परिसम्पत्तियों का निर्माण नहीं होता है, सरकार के दायित्वों में कमी उत्पन्न नहीं होती है, राजस्व व्यय कहलाते हैं। राजस्व व्यय प्रायः सामान्य, सामाजिक एवं आर्थिक सेवाओं के संचालन के लिए किए जाते हैं। राजस्व व्ययों का सम्बन्ध अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास के साथ प्रत्यक्ष रूप से नहीं होता है। ये व्यय आर्थिक विकास के लिए वातावरण तैयार करने में मदद करते हैं।

पूँजीगत व्यय:
सरकार द्वारा किये जाने वाले ऐसे व्यय, जिनसे सरकारी परिसम्पत्तियों का निर्माण होता है, सरकार के दायित्वों में कमी आती है, पूँजीगत व्यय कहलाते हैं।

पूँजीगत व्यय प्रायः
सामान्य, सामाजिक एवं आर्थिक सेवाओं के लिए पूँजी निर्माण हेतु किए जाते हैं। पूँजीगत व्ययों का आर्थिक विकास के साथ सीधा सम्बन्ध होता है।

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Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 5 सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था

प्रश्न 3.
सार्वजनिक व्यय के विभिन्न प्रकारों को समझाएँ एवं उनका महत्त्व भी लिखिए।
उत्तर:
सरकार आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए खर्च करती है। इन्हें सार्वजनिक व्यय कहते हैं। सार्वजनिक व्यय कई प्रकार के होते हैं –
1. विकासात्मक व्यय:
विकासात्मक व्यय से अभिप्राय सरकार द्वारा किए गए ऐसे खर्चों से है, जिनका आर्थिक एवं सामाजिक विकास से सीधा सम्बन्ध होता है। जैसे-शिक्षा, चिकित्सा, उद्योग, कृषि, यातायात, बिजली आदि के विकास पर किया जाने वाला खर्च।

2. गैर-विकासात्मक व्यय:
सरकार द्वारा किए गए ऐसे खर्च, जिनका सम्बन्ध आर्थिक एवं सामाजिक विकास के साथ प्रत्यक्ष नहीं होता है। जैसे-रक्षा, कानून, प्रशासन, वृद्धावस्था पेन्शन आदि पर किया गया व्यय।

3. योजना व्यय:
सरकार चालू पंचवर्षीय योजना के अधीन कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए व्यय करती है, ये व्यय योजना व्यय कहलाते हैं। जैसे – कृषि, ऊर्जा, संचार, उद्योग, यातायात, सार्वजनिक सेवाएँ। जैसे-स्वास्थ्य, शिक्षा आदि पर किया गया व्यय।

4. गैर योजना व्यय:
योजना कार्यक्रमों के अलावा सरकार द्वारा दूसरे कार्यों पर किए जाने वाले खर्चों को गैर-योजना व्यय कहते हैं। ये व्यय सामान्य सेवाओं पर किए जाते हैं। जैसे-आर्थिक सहायता, सुरक्षा, कानून, प्रशासन, ऋणों पर ब्याज का भुगतान आदि।

5. हस्तान्तरण भुगतान:
ऐसे भुगतान, जो बिना किसी वस्तु या सेवा के बदले दिये जाते हैं, उन्हें हस्तान्तरण भुगतान कहते हैं। हस्तान्तरण भुगतान एकपक्षीय होते हैं। इस प्रकार के भुगतानों से उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार के व्यय से वितरण प्रभावित होता है। जैसे-राष्ट्रीय ऋणों पर ब्याज, वृद्धावस्था पेन्शन, छात्रवृत्ति आदि।

सार्वजनिक व्यय का महत्त्व:
आधुनिक सरकारों का स्वरूप कल्याणकारी है, इसलिए सार्वजनिक व्यय का महत्त्व बहुत अधिक है। जैसे –

1. सामाजिक कल्याण में वृद्धि:
सरकार अनेक सामाजिक सेवाओं के उत्पादन व संचालन पर व्यय करती है। इससे स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, सांस्कृतिक आदि सेवाएँ लोगों को अधिक मात्रा में उपलब्ध होती है।

2. आर्थिक विकास में वृद्धि:
सरकार योजना कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए व्यय करती है। इस प्रकार के खर्चों से कृषि, उद्योग, बीमा, बैंकिंग, यातायात, संचार आदि का विकास होता है। इससे आर्थिक विकास की दर अधिक हो जाती है।

3. आय व सम्पत्ति की असमानता में कमी:
सरकार आय व सम्पत्ति की असमानता को कम करने के लिए निर्धन व पिछड़े लोगों व क्षेत्रों पर अधिक खर्च करती है। पिछड़े हुए क्षेत्रों व लोगों को हस्तान्तरण भुगतान आर्थिक सहायता प्रदान करके उनका आर्थिक विकास करती है।

4. आर्थिक कल्याण में वृद्धि:
बेरोजगारी उन्मूलन, महिला उत्थान, बाल उत्थान अनुसूचित व जनजातियों के उत्थान के लिए सार्वजनिक व्यय बहुत उपयोगी है।

5. आर्थिक क्रियाकलापों पर नियन्त्रण:
आर्थिक मन्दी व तेजी पर नियन्त्रण करने के लिए भी सार्वजनिक व्यय महत्त्वपूर्ण होते हैं। आर्थिक मन्दी के दुश्चक्र को तोड़ने के लिए सरकार सार्वजनिक व्यय बढ़ाकर प्रभावी माँग को बढ़ा सकती है। आर्थिक तेजी के समय सार्वजनिक व्यय बढ़ाकर प्रभावी माँग को बढ़ा सकती है। आर्थिक तेजी के समय सार्वजनिक व्यय को कम करके सरकार प्रभावी माँग को कम कर सकती है।

आंकिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित के उत्तर दो –

  1. MPS = 0.4, सरकारी व्यय गुणक का मूल्य ज्ञात करो।
  2. MPC = 0.9 सरकारी व्यय गुणक का मूल्य ज्ञात करो।
  3. MPS = 0.5 सरकारी व्यय गुणक का मूल्य ज्ञात करो।
  4. MPC = 0.75 कर गुणक का मूल्य ज्ञात करो।
  5. MPS = 0.1 कर गुणक का मूल्य क्या होगा?

हल:
1. (सरकारी व्यय गुणक \(\frac{∆Y}{∆G}\) = \(\frac{1}{1-C}\) = \(\frac{1}{MPS}\) (∵MPS = 1 – C)
= \(\frac{1}{0.4}\) = 2.5

2. सरकारी व्यय गुणक \(\frac{∆Y}{∆G}\) = \(\frac{1}{1-C}\) = \(\frac{1}{1-0.9}\) = \(\frac{1}{0.1}\) = \(\frac{10}{1}\) = 10

3. सरकारी व्यय गुणक \(\frac{∆Y}{∆G}\) = \(\frac{1}{MPS}\) = \(\frac{1}{0.5}\) = \(\frac{10}{5}\) = 2

4. कर गुणक \(\frac{∆Y}{∆T}\) = \(\frac{-C}{1-C}\) (∵C = MPC)
= \(\frac{-0.75}{1-0.75}\) = \(\frac{-0.75}{0.25}\) = \(\frac{-75}{25}\) = – 3

5. कर गुणक \(\frac{∆Y}{∆T}\) = \(\frac{-C}{1-C}\) = \(\frac{-(1-MPS)}{MPS}\) (∵C = MPC)
= \(\frac{-1}{(1-0.1)}\) = \(\frac{-0.9}{0.1}\) = – 9
उत्तर:

  1. 2.5
  2. 10
  3. 2
  4. – 3
  5. – 9

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

  1. यदि सरकारी व्यय गुणक 6 है, कर गुणक का मान क्या होगा।
  2. यदि कर गुणक का मान – 2 है, तो सरकारी व्यय गुणक का मान ज्ञात करो।

हल:
1. सरकारी व्यय गुणक = 6
\(\frac{1}{MPS}\) = 6; MPS = \(\frac{1}{6}\)
MPC = 1 – MPS = 1 – \(\frac{1}{6}\) = \(\frac{5}{6}\)
कर गुणक = \(\frac{-MPC}{MPS}\) = \(\frac{-5/6}{1/6}\) = \(\frac{-5}{6}\) × \(\frac{6}{1}\) = – 5

2. कर गुणक = – 2
\(\frac{-MPC}{MPS}\) = – 2
– MPC = – 2 MPS
MPC = – 2 MPS
MPC = 2 MPS
या 2MPS = MPC
2MPS = 1 – MPS
2MPS + MPS = 1
या 3MPS = 1 (∵MPC = 1 – MPS)
या MPS = \(\frac{1}{3}\)
MPS = 1 – MPS = \(\frac{1/1}{3}\) = \(\frac{3}{1}\) = 3
उत्तर:

  1. कर गुणक = – 5
  2. सरकारी व्यय गुणक = 3

प्रश्न 3.
एक अर्थव्यवस्था के बारे में निम्नलिखित सूचनाएँ दी गई है –
C = 85 + 0.5Yd, 1 = 58, G = 60, T = -40 + 0.25Y, Yd = Y – T, Y = C + I + G

  1. साम्य आय की गणना करो।
  2. सरकार को कितनी मात्रा में शुद्ध कर एकत्र करना चाहिए, जब अर्थव्यवस्था साम्य में हो।
  3. सरकारी बजट घाटा क्या है या सरकारी अधिशेष क्या है?

हल:
1. Y = C + I + G = 85 + 0.5 (Y – T) + 85 + 60
= 230 + 0.5 [Y – (-40 + 0.25Y)]
= 230 + 0.5Y + 20 – 0.125Y = 250 + 0.375Y
Y – 0.375Y = 250
Y (1 – 0.375) = 250
0.625Y = 250
Y = \(\frac{250}{0.625}\) = 400

2. T = – 40 + 0.25Y = – 40 + 0.025 × 400 = – 40 + 100 = 60

3. कोई बजट घाटा या अधिशेष नहीं होगा
उत्तर:

  1. साम्य आय = 400
  2. कर = 60
  3. बजट घाटा या बजट अधिशेष = 0

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प्रश्न 4.
एक अर्थव्यवस्था के बारे में नीचे सूचनाएँ दी गई है –
C = 100 + 0.5Yd, I = 100, G = 80, T = – 60 + 0.25Y
Y = C + I + G
Y = C + I + G

  1. साम्य आय ज्ञात करो।
  2. साम्यावस्था में सरकार को कितना कर एकत्र करना चाहिए?

हल:
1. Y = C + I + G
Y = 100 + 0.5Yd + 100 + 80
Y = 100 + 0.5 (Y – T) + 180
= 280 + 0.5 [Y – (- 60 + 0.25Y)]
= 280+ 0.5Y + 30 – 0.125Y
Y = 0.125Y – 0.5Y = 310
Y – 0.375Y = 310
0.625Y = 310
Y = \(\frac{310}{0.625}\) = \(\frac{310 × 1000}{625}\) = 496

2. T = – 60 + 0.25 × 496 = – 60 + 124 = 64
उत्तर:

  1. साम्य आय = 496
  2. कर राजस्व = 64

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प्रश्न 5.
एक अर्थव्यवस्था के बारे में निम्नलिखित सूचनाएँ उपलब्ध है –
वास्तविक उत्पाद = 1000
सरकारी खरीद = 200
कुल कर = 200
निवेश आय = 100
सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति प्रयोज्य आय की 75 प्र. श.
सीमान्त बचत प्रवृत्ति प्रयाज्य आय की 25 प्र. श.

  1. उपरोक्त सूचनाओं के आधार पर माल तालिका निवेश तथा उत्पाद के बारे में अनुमान लगाइए।
  2. अर्थव्यवस्था आय के किस स्तर पर साम्य अवस्था में होगी।

हल:
1. Y = 1000, Yd = Y – T= 1000 – 200 = 800, I = 100, G = 200,
C = 800 का 75 प्र. श. = \(\frac{800 × 75}{100}\) = 600
S = Yd – C = 800 – 600 = 200
कुल व्यय = C + I + G = 600 + 100 + 200 = 900
लेकिन अर्थव्यवस्था में कुल उत्पादन = 1000
कुल व्यय < कुल उत्पादन
900 < 1000 साम्य अवस्था में

2. Y = C + I + G
Y = 600 + 100 + 200 = 900
उत्तर:
साम्य आय = 900

प्रश्न 6.
निम्न प्रश्नों के उत्तर दो –
1. ∆C = 25, ∆Y = 100
सरकारी व्यय गुणक ज्ञात करो।

2. ∆S = 20, ∆Y = 100
सरकारी व्यय गुणक ज्ञात करो।
हल:
∆C = 25, ∆Y = 100
MPC = \(\frac{∆C}{∆Y}\) = \(\frac{25}{100}\) = 0.25
सरकारी व्यय गुणक = \(\frac{1}{1-C}\) = \(\frac{1}{1-0.25}\) = \(\frac{1}{0.75}\) = \(\frac{100}{75}\) = \(\frac{4}{3}\)
MPS = \(\frac{∆S}{∆Y}\) = \(\frac{20}{100}\) = 0.20
सरकारी व्यय गुणक = \(\frac{1}{MPS}\) = \(\frac{1}{0.20}\) = \(\frac{100}{20}\) = 5
उत्तर:

  1. सरकारी व्यय गुणक = \(\frac{4}{3}\)
  2. सरकारी व्यय गुणक = 5

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो।

  1. यदि MPS = 0.25 कर गुणक का मूल्य ज्ञात करो।
  2. यदि MPC = 0.1 कर गुणक का मूल्य निकालिए।

हल:
1. MPS = 0.25
MPC = 1 – MPS = 1 – 0.25 = 0.75
कर गुणक = – \(\frac{MPC}{1-MPC}\) = \(\frac{-MPC}{MPS}\) = \(\frac{-0.75}{0.25}\) = \(\frac{-75}{25}\) = – 3

2. MPC = 0.1
MPS = 1 – MPC = 1 – 0.1 = 0.9
कर गुणक = \(\frac{-MPC}{1-MPC}\) = \(\frac{-MPC}{MPS}\) = \(\frac{-0.1}{0.9}\) = \(\frac{-1}{9}\)
उत्तर:

  1. कर गुणक = -3
  2. कर गुणक = \(\frac{-1}{9}\)

प्रश्न 8.
यदि किसी अर्थव्यवस्था में MPC = 0.5 है, तो गणना द्वारा बताइए कि कर गुणक का निरपेक्ष मूल्य, सरकारी व्यय गुणक से कम है।
हल:
MPC = 0.5
MPS = 1 – MPC = 1 -0.5 = 0.5
सरकारी व्यय गुणक = \(\frac{1}{1-MPC}\) = \(\frac{1}{MPS}\) = \(\frac{1}{0.5}\) = \(\frac{10}{5}\) = 2
कर गुणक = \(\frac{-MPC}{1-MPC}\) = \(\frac{-MPC}{MPS}\) = \(\frac{-0.5}{0.5}\) = -1
कर गुणक का निरपेक्ष मूल्य = 1
उत्तर:
उपरोक्त गणना में कर गुणक का निरपेक्ष मान 1 है, जो सरकारी व्यय 2 से कम है।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित सूचना एक अर्थव्यवस्था के बारे में दी गई है –
C = 60 + 0.5Yd, I = 60, G = 45, T = -15 + 0.25Y
Yd = Y – T
Y = C + I + G
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो।

  1. साम्य आय की गणना करो।
  2. साम्य अवस्था में सरकार की कितना कर एकत्र करना चाहिए।

हल:
1. Y = C + I + G = 60 + 0.5Yd + 60 + 45
= 60 + 0.5 [Y – (- 15 + 0.25 × Y)] + 105
= 60 + 105 + 0.5 Y – 0.125Y + 7.5
= 172.5 + 0.375Y
Y – 0.375 = 172.5
0.625Y = \(\frac{1725}{0.625}\) = 276.4

2. कर (T) = – 15 + 0.25 × 276.4 = -15 + 69.10 = 54.10
उत्तर:
साम्य आय = 276.4
साम्य आय पर कर = 54.10

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वार्षिक वित्तीय विवरण में शामिल होता है –
(A) मुख्य बजट
(B) पूँजीगत बजट
(C) राजस्व बजट
(D) रेलवे बजट
उत्तर:
(A) मुख्य बजट

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प्रश्न 2.
राजस्व प्राप्तियों को दो वर्गों में बाँटा जाता है –
(A) कर एवं गैर कर प्राप्तियाँ
(B) ऋण एवं कर
(C) कर एवं हस्तान्तरण
(D) सरकार एवं विदेशों से हस्तान्तरण
उत्तर:
(A) कर एवं गैर कर प्राप्तियाँ

प्रश्न 3.
1990 – 91 से 2003 – 04 के मध्य कुल कर प्राप्तियों में प्रत्यक्ष करों की भागीदारी बढ़ी है –
(A) 29.1% से 50%
(B) 19.1% से 41.3%
(C) 41.3% से 50%
(D) 41.3% से 69.1%
उत्तर:
(B) 19.1% से 41.3%

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प्रश्न 4.
1990 – 91 से 2003 – 04 के मध्य भागीदारी घटी है –
(A) प्रत्यक्ष करों की
(B) प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों करों की
(C) अप्रत्यक्ष करों की
(D) इनमें से किसी की नहीं
उत्तर:
(C) अप्रत्यक्ष करों की

प्रश्न 5.
पूँजीगत बजट में शामिल होते हैं –
(A) राजस्व व्यय एवं राजस्व प्राप्तियाँ
(B) प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर
(C) पूँजीगत व्यय एवं पूँजीगत प्राप्तियाँ
(D) सभी
उत्तर:
(C) पूँजीगत व्यय एवं पूँजीगत प्राप्तियाँ

प्रश्न 6.
राजस्व घाटा होता है –
(A) शुद्ध घरेलू ऋण
(B) RBI से ऋण
(C) विदेशों से ऋण
(D) राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ
उत्तर:
(D) राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ

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प्रश्न 7.
राजकोषीय घाटा होता है।
(A) कुल व्यय-कुल प्राप्तियाँ
(B) कुल राजस्व व्यय – कुल राजस्व प्राप्तियाँ
(C) कुल व्यय-गैर ऋण कुल प्राप्तियाँ
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) कुल व्यय-गैर ऋण कुल प्राप्तियाँ

प्रश्न 8.
प्राथमिक घाटा होता है –
(A) कुल राजकोषीय घाटा-विदेशों से ऋण
(B) ऋण
(C) कुल राजकोषीय घाटा-शुद्ध ब्याज दायित्व
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) कुल राजकोषीय घाटा-शुद्ध ब्याज दायित्व

प्रश्न 9.
जो कर आय पर निर्भर नहीं होता है, कहलाता है –
(A) अप्रत्यक्ष कर
(B) प्रत्यक्ष कर
(C) एकमुश्त कर
(D) अनुपातिक कर
उत्तर:
(C) एकमुश्त कर

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प्रश्न 10.
सरकारी व्यय गुणक का सूत्र होता है।
(A) \(\frac{1}{1-C}\)
(B) \(\frac{-C}{1-C}\)
(C) \(\frac{1-C}{1-C}\)
(D) \(\frac{1}{1-C(1-t)}\)
उत्तर:
(A) \(\frac{1}{1-C}\)

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 2 राष्ट्रीय आय का लेखांकन

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BSEB Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 2 राष्ट्रीय आय का लेखांकन

Bihar Board Class 12 Economics राष्ट्रीय आय का लेखांकन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
उत्पादन के चार कारक कौन-कौन से हैं और इनमें से प्रत्येक के पारिश्रमिक को क्या कहते हैं?
उत्तर:
उत्पादन के निम्नलिखित चार साधन होते हैं –

  1. भूमि
  2. श्रम
  3. पूंजी एवं
  4. उद्यम

उत्पादन साधनों को दिए जाने वाले भुगतान नीचे लिखे गए हैं –

  1. भूमि की सेवाओं के लिए भूमिपति को दिए गए भुगतान को लगान या किराया कहते हैं।
  2. श्रमिक को मानसिक अथवा शारीरिक श्रम के बदले उत्पादन इकाई भुगतान करती है जिसे मजदुरी या वेतन कहते हैं।
  3. पूंजी के प्रयोग के बदले उत्पादन पूंजीपति को भुगतान प्रदान करता है जिसे ब्याज कहते हैं।
  4. उत्पादन प्रक्रिया में अनिश्चितता एवं जोखिमों को वहन करने के बदले उद्यमी को अधिशेष आय प्राप्त होती है जिसे लाभ कहते हैं।

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प्रश्न 2.
किसी अर्थव्यवस्था में समस्त अंतिम व्यय समस्त कारक अदायगी के बराबर क्यों होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि अर्थव्यवस्था में कोई बाह्य स्राव नहीं होता है अथवा मुद्रा खर्च करने का कोई और विकल्प नहीं होता है तो परिवार क्षेत्र के पास आय को खर्च करने का एक ही विकल्प होता है कि सम्पूर्ण आय को अर्थव्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं पर खर्च किया जाए। दूसरे शब्दों में उत्पादन साधनों को साधन आय के रूप में आय प्राप्त होती है वे इसका प्रयोग वस्तुओं एवं सेवाओं को क्रय करने के लिए करते हैं। इस प्रकार उत्पादक इकाइयों द्वारा साधन भुगतान के रूप में प्रदान की गई मुद्रा वस्तुओं व सेवाओं के विक्रय से प्राप्त आगम के रूप में वापिस मिल जाती है।

इस प्रकार फर्मों द्वारा किए गए साधन भुगतानों के योग तथा सामूहिक उपभोग पर किए गए व्यय में कोई अन्तर नहीं होता है। दूसरे चक्र में उत्पादक पुन: वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करेंगे और साधनों को उनकी सेवाओं के लिए साधन भुगतान करेंगे। साधनों के स्वामी साधनों से प्राप्त आय को वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद पर खर्च करेंगे। इस प्रकार वर्ष दर वर्ष आय को वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद पर खर्च किया जाता है। अतः परिवार क्षेत्र द्वारा किया गया सामूहिक व्यय फर्मों को प्राप्त हो जाता है।

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प्रश्न 3.
स्टॉक और प्रवाह में भेद स्पष्ट कीजिए। निवल निवेश और पूंजी में कौन स्टॉक है और कौन प्रवाह? हौज में पानी के प्रवाह से निवल निवेश और पूंजी की तुलना कीजिए।
उत्तर:
स्टॉक:
वह आर्थिक चर जिसे एक निश्चित समय बिन्दु पर मापा जात है स्टॉल कहलाता है।

प्रवाह:
आर्थिक चर जिसे एक निश्चित समयावधि में मापा जाता है, उसे प्रवाह कहते हैं।

शुद्ध निवेश:
सकल निवेश तथा स्थायी पूंजी के उपभोग के अन्तर को शुद्ध निवेश कहते हैं। सकल निवेश तथा स्थायी पूंजी के उपभोग को एक निश्चित समयावधि में मापा जाता है। सामान्यतः ये दोनों चर लेखा वर्ष की अवधि के लिए मापे जाते हैं। इस प्रकार शुद्ध निवेश प्रवाह आर्थिक चर का उदाहरण है।

पूंजी में वे सभी मानव निर्मित वस्तुएं शामिल की जाती हैं जो अन्य वस्तुओं अथवा सेवाओं के उत्पादन में काम आती है। पूंजी एक मशीन, कच्चे माल, उपकरण आदि के रूप में उत्पादन प्रक्रिया में पूंजी का प्रयोग किया जाता है। इनकी मात्रा का मापन एक निश्चित समय बिन्दु पर किया जाता है। इस प्रकार पूंजी एक आर्थिक स्टॉक है। शुद्ध निवेश एवं पूंजी की तुलना एक टैंक में बहने वाले पानी से की जा सकती है। टैंक मे बहने वाला पानी तथा शुद्ध निवेश दोनों आर्थिक प्रवाह हैं। इसी प्रकार किसी निश्चित समय बिन्दु पर टैंक में पानी की मात्रा तथा फर्म के पास पूंजी दोनों आर्थिक स्टॉक हैं।

प्रश्न 4.
नियोजित और अनियोजित माल-सूची संचय में क्या अंतर है? किसी फर्म की माल सूची और मूल्यवर्धित के बीच संबंध बताइए।
उत्तर:
बिना बिके माल, अर्द्धनिर्मित माल एवं कच्चे माल का स्टॉक जिसे कोई फर्म अगले वर्ष के लिए ले जाती है अथवा प्रयोग करने के लिए रखती है उसे माल तालिका निवेश कहते हैं। माल तालिका निवेश नियोजित एवं अनियोजित दोनों प्रकार का हो सकता है। माल तालिका निवेश में अनुमानित बढ़ोतरी के समान वृद्धि को नियोजित माल तालिका या भण्डार निवेश कहते हैं।

उदाहरण के लिए एक फर्म अपना भण्डार निवेश 100 कमीजों से बढ़ाकर 200 कमीज करना चाहती है। फर्म अनुमानित बिक्री 1000 कमीज के समान ही कमीजों की बिक्री करती है। फर्म का कमीज उत्पादन 1100 कमीज है तो फर्म का वास्तविक भण्डार निवेश निम्न प्रकार ज्ञात किया जा सकता है।

भण्डार निवेश में वृद्धि = आरंभिक स्टॉक + उत्पादन – बिक्री
= 100 + 1100 – 900 = 200 कमीज

इस उदाहरण में अनुमानित भण्डार निवेश में वृद्धि और वास्तविक भण्डार निवेश दोनों समान हैं। यदि किसी उत्पादक इकाई का वास्तविक भण्डार निवेश, अनुमानित भण्डार निवेश से अधिक या कम करता है तो इसे अनियोजित भण्डार निवेश कहते हैं। उदाहरण के लिए एक फर्म का आरंभिक स्टॉक 100 कमीज है वह अपना स्टॉक 200 कमीज बनाना चाहती है। फर्म 1100 कमीजों का उत्पादन करती है लेकिन फर्म केवल 900 कमीजों को ही बेच पाती है। इस उदाहरण में वास्तविक भण्डार निवेश में वृद्धि का आंकलन निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

भण्डार निवेश में वृद्धि = आरंभिक स्टॉक + उत्पादन – बिक्री
= 100 + 1100 – 900
= 300 कमीज

इस तरह फर्म का वास्तविक भण्डार निवेश 300 कमीज नियोजित भण्डार निवेश 200 कमीज से अधिक हैं। इस प्रकार की भण्डार वृद्धि को अनियोजित निवेश कहते हैं। भण्डार निवेश में परिवर्तन तथा मूल्य वृद्धि में संबंध फर्म की सकल मूल्य वृद्धि = फर्म द्वारा विक्रय + भण्डार निवेश में परिवर्तन – मध्यवर्ती – उपभोग

इस समीकरण में मूल्य वृद्धि तथा भण्डार निवेश में परिवर्तन का संबंध स्पष्ट प्रतीत होता है। भण्डार निवेश में वृद्धि से मूल्य वृद्धि में बढ़ोतरी होती है। इसके विपरीत भण्डार निवेश में कमी आने पर मूल्य वृद्धि में कमी आती है।

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प्रश्न 5.
तीन विधियों से किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद की गणना करने की किन्हीं तीन निष्पत्तियों लिखिए। संक्षेप में यह भी बताइए कि प्रत्येक विधि से सकल घरेलू उत्पाद का एक-सा मूल्य क्या आना चाहिए?
उत्तर:
GDP (सकल घरेलू उतपाद) को ज्ञात करने की तीन विधियां निम्नलिखित हैं –
1. मूल्य वृद्धि विधि
या अन्तिम उत्पाद विधि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) = सभी घरेलू उत्पादक इकाइयों की सकल मूल्य वृद्धि का योग
GVA1 + GVA2 + ………….. + GVAN
\(\sum_{i=1}^{N} G V A i\)

2. अन्तिम उपभोग विधि या व्यय विधि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) = सभी घरेलू उत्पादक इकाइयों द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं की बिक्री से प्राप्त आगम = कुल अन्तिम उपभोग का योग + निवेश + सरकारी
उपभोग व्यय + निर्यात – आयात
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 1
जहाँ C, I, G, X व्यय के वे भाग हैं जो घरेलू उत्पादकों को प्राप्त होते हैं जबकि Cm, Im, Gm अन्तिम व्यय के वे भाग हैं जो विदेशी उत्पादकों को प्राप्त होते हैं।

3. आय विधि
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) = उत्पादन साधनों को किए गए भुगतानों का योग
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 2
जहाँ Wi – परिवार क्षेत्र द्वारा प्राप्त मजदूरी एवं वेतन
Pi – परिवार क्षेत्र प्राप्त लाभ
li – परिवार क्षेत्र द्वारा प्राप्त ब्याज
Ri – परिवार क्षेत्र द्वारा प्राप्त किराया सरल रूप में इस समीकरण को निम्न प्रकार से भी लिखा जा सकता है
GDP = W + R + I + P

उपरोक्त तीनों विधियों का मिलान:
अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करने के लिए उत्पादक इकाइयां चार साधन आगतों भूमि, श्रमू, पूंजी एवं उद्यम की सहायता से मध्यवर्ती वस्तुओं का उपयोग करती है। फर्मों के द्वारा जो भी उत्पादन किया जाता है, उसे अर्थव्यवस्था में उपभोग एवं निवेश के उद्देश्य के लिए बेच दिया जाता है। फर्म उत्पादन साधनों को किराया, मजदूरी, ब्याज व लाभ का भुगतान करती हैं और उसे वस्तुओं व सेवाओं का विक्रय करके आगम के रूप में वापिस प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार उत्पादन स्तर जितना उत्पादन होता है या मूल्य वृद्धि होती है उसे साधनों में आय कगे रूप में बांट दिया जाता है, साधनों के स्वामी प्राप्त आय को अन्तिम वस्तुओं व सेवाओं पर खर्च कर देती है।

इसलिए तीनों विधियों से GDP का समान प्राप्त होता है।
GDP = \(\sum_{i=1}^{N} G V A i\)
W + R + I + P
= C + I + G + X – M

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प्रश्न 6.
बजटीय घाटा और व्यापार घाटा को परिभाषित कीजिए। किसी विशेष वर्ष में किसी देश की कुल बचत के ऊपर निजी निवेश का आधिक्य 2000 करोड़ रु. था। बजटीय घाटे की राशि 1500 करोड़ रु. थी। उस देश के बजटीय घाटे का परिणाम क्या था?
उत्तर:
बजटीय घाटा:
एक वर्ष की अवधि में सरकार द्वारा किए गए व्यय तथा सरकार की प्राप्तियों के अन्तर को बजटीय घाटा कहते हैं।

बजट घाटा:
सरकार का व्यय-सरकार द्वारा अर्जित कर आगम व्यापार शेष-आयात पर व्यय का निर्यात आगम पर अधिशेष व्यापार शेष कहलाता है।

व्यापार शेष = आयात पर व्यय-निर्यात से प्राप्त
आगम निजी निवेश बचत = 2000 करोड़ रु.
I – S = 2000 करोड़ रु.
बजट घाटा = (-) 1500 करोड़ रु.
व्यापार शेष = (I – S) + (G – T)
= 2000 करोड़ रु. + – (1500) करोड़ रु.
= 500 करोड़ रु.

प्रश्न 7.
मान लिजिए कि किसी विशेष वर्ष में किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद बाजार कीमत पर 1100 करोड़ रु. था। विदेशों से प्राप्त निवल कारक आय 100 करोड़ रु. था। अप्रत्यक्ष कर मूल्य-उत्पादन का मूल्य 150 करोड़ रु. और राष्ट्रीय आय 850 करोड़ रु. है, तो मूल्यहास के समस्त मूल्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद GDP at mp = 1100 करोड़ रु. विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय (NFIA) = 100 करोड़ रु.
शुद्ध अप्रत्यक्ष कर NIT = 150 करोड़ रु.
साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद NNP at fc = 850 करोड़ रु.
बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय-घिसावट-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर = राष्ट्रीय आय (NNP at fc)
1100 करोड़ रु. + 100 करोड़ रु.-घिसावट – 150 करोड़ रु.
= 850 करोड़ रु. 1050 करोड़ रु. – घिसावट = 850 करोड़ रु.
घिसावट = 850 करोड़ रु. -1050 करोड़ रु.
-घिसावट = (-)200 करोड़ रु.
घिसावट = 200 करोड़ रु.
उत्तर – घिसावट = 200 करोड़ रु.

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प्रश्न 8.
किसी देश विशेष में एक वर्ष लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद 1900 करोड़ रु. है। फर्मों/सरकार के द्वारा परिवार को अथवा परिवार के द्वारा सरकार/फर्मों को किसी भी प्रकार का ब्याज अदायगी नहीं की जाती है, परिवारों की वैयक्तिक प्रयोज्य आय 1200 करोड़ रु. है। उनके द्वारा अदा किया गया वैयक्तिक आयकर 600 करोड़ रु. है और फर्मों तथा सरकार द्वारा अर्जित आय का मूल्य 200 करोड़ रु. है। सरकार और फर्म द्वारा परिवार को की गई अंतरण अदायगी का मूल्य क्या है?
उत्तर:
साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP at fc) = 1900 करोड़ रु.
परिवारों द्वारा ब्याज भुगतान = 0 रु
वैयक्तिक प्रयोज्य आय = 1200 करोड़ रु.
परिवारों द्वारा प्रत्यक्ष करों का भुगतान = 600 करोड़ रु.
फर्म व सरकार की प्रतिधारित आय = 200 करोड़ रु.
हस्तांतरण भुगतान से प्राप्ति = ?
वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-प्रत्यक्ष करों का भुगतान – गैर कर भुगतान = [राष्ट्रीय आय-प्रतिधारित आय-परिवारों द्वारा शुद्ध ब्याज भुगतान – निगम कर + सरकार व फर्मों से परिवारों को हस्तांतरण भुगतान।] – प्रत्यक्ष करों का भुगतान-गैर कर भुगतान
1200 करोड़ रु. = 1900 करोड़ रु. – 200 करोड़ रु – 0 रु. – 0 रु. + सरकार व फर्मों से परिवारों को हस्तांतरण भुगतान – 0 रु.। – 600 करोड़ रु.
1200 करोड़ रु. = 1700 करोड़ रु. + सरकार व फर्मों से हस्तांतरण
भुगतान – 600 करोड़ रु. 1200 करोड़ रु. = 1100 करोड़ रु. + सरकार व फर्मों से हस्तांतरण भुगतान या 1100 करोड़ रु. + सरकार व फर्मों से परिवारों के हस्तांतरण भुगतान
= 1200 करोड़ रु. या सरकार व फर्मों से परिवार क्षेत्र को हस्तांतरण भुगतान
= 1200 करोड़ रु. – 1100 करोड़ रु.
= 100 करोड़ रु. उत्तर-सरकार व फर्मों से परिवार क्षेत्र को हस्तांतरण भुगतान = 100 करोड़ रु.

प्रश्न 9.
निम्नलिखित आँकड़ों से वैयक्तिक आय और वैयक्तिक प्रयोज्य आय की गणना कीजिए:Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 3
हल:
वैयक्तिक आय = साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय + हस्तांतरण आय-निगम कर-परिवारों द्वारा शुद्ध ब्याज प्राप्ति
= 800 + 200 + 300 – 500 – (1200 – 1500)
= 8500 – 500 – (- 300)
= 8500 – 500 + 300
= 8300 करोड़ रु.
वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-वैयक्तिगत प्रत्यक्ष कर-गैर कर भुगतान
= 8300 – 500 – 0 करोड़ रु.
= 7800 करोड़ रु.
उत्तर:

  1. वैयक्तिक आय = 8300 करोड़ रु.
  2. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = 7800 करोड़ रु.

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प्रश्न 10.
हजाम राजू एक दिन में बाल काटने के लिए 500 रु. का संग्रह करता है। इस दिन उसके उपकरण में 50 रु. का मूल्यह्रास होता है। इस 450 रु. में से राजू 30 रु. बिक्री कर अदा करता है। 200 रु. घर ले जाता है और 220 रु. उन्नति और नए उपकरणों का क्रय करने के लिए रखता है। वह अपनी आय में से 20 रु. आयकर के रूप में अदा करता है। इन पूरी सूचनाओं के आधार पर निम्नलिखित में राजू का योगदान ज्ञात कीजिए –
(a) सकल घरेलू उत्पाद।
(b) बाजार कीमत पर निबल राष्ट्रीय उत्पाद।
(c) कारक लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद।
(d) वैयक्तिक आय।
(e) वैयक्तिक प्रयोज्य आय।
उत्तर:
ΣRi = 500 रु.
स्थायी पूंजी का उपभोग = 50 रु.
बिक्री कर = 30 रु.
प्रतिधारित आय = 220 रु.
घर ले जाई गई आय = 200 रु.
आयकर = 20 रु.

(a) बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP at mp) में योगदान
= बाल काटने के लिए प्राप्त आगम
= 500रु.

(b) बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP at mp) में योगदान
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद – स्थायी पूंजी का उपभोग
= 500 रु. – 50 रु.
= 450 रु.

(c) साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान
= बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद – शुद्ध अप्रत्यक्ष कर
= 450 रु. -30 रु.
= 420 रु.

(d) वैयक्तिक आय = साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान – अवितरित लाभ
= 420 रु. -220 रु.
= 200 रु.

(e) वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-प्रत्यक्ष कर
= 200 रु. – 20 रु.
= 180 रु.
उत्तर:
(a) 500 रु.
(b) 450 रु.
(c) 420 रु.
(d) 200 रु.
(e) 180 रु.

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प्रश्न 11.
किसी वर्ष एक अर्थव्यवस्था में मौद्रिक सकल राष्ट्रीय उत्पाद का मूल्य 2500 करोड़ रु. था। उसी वर्ष, उस देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का मूल्य किसी आधार वर्ष की कीमत पर 3000 करोड़ रु. था। प्रतिशत के रूप में वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद अवस्फीतिक के मूल्य की गणना कीजिए। क्या आधार वर्ष और उल्लेखनीय वर्ष के बीच कीमत स्तर में वृद्धि हुई।
हल:
विशिष्ट वर्ष में मौद्रिक GNP%3D 2500 करोड़ रु.
विशिष्ट वर्ष में स्थिर कीमतों पर/वास्तविक (GNP) = 3000 करोड़ रु.
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 4
= \(\frac{2500}{3000}\) × 100% = \(\frac{5}{6}\) × 100%
= \(\frac{500}{6}\) % = 83.33%
नहीं कीमत स्तर आधार वर्ष से विशिष्ट वर्ष के बीच कम हुआ है
= (100 – 83.33)%
= 16.67%
उत्तर:
कीमत स्तर में कमी = 16.67%

प्रश्न 12.
किसी देश में कल्याण के निर्देशांक के रूप में सकल घरेलू उत्पाद की कुछ सीमाओं को लिखो।
उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद को कल्याण सूचकांक के रूप में प्रयोग करने की सीमाएं –

  1. सकल घरेलू उत्पाद के वितरण को अनदेखा किया जाता है।
  2. अमौद्रिक विनिमय इसमें शामिल नहीं किए जाते हैं।
  3. जनसंख्या वृद्धि की तरफ भी ध्यान नहीं दिया जाता है।
  4. उत्पादन तरीके की तरफ बाजिब ध्यान नहीं दिया जाता है।
  5. उत्पादन से होने वाले प्रदूषण का हिसाब इसमें नहीं होता है।
  6. उत्पादित वस्तुओं की प्रकृति इससे स्पष्ट नहीं होती है।
  7. नागरिक स्वतंत्रता का मुद्दा इससे प्रदर्शन नहीं होता है।
  8. GDP के माध्यम से कानून, सुरक्षा, न्याय आदि मूल्य प्रतिबिंबित नहीं होते हैं।
  9. प्राकृतिक संसाधनों का अधिक उपयोग अथवा पर्यावरण असन्तुलन की ओर ध्यान GDP के माध्यम से नहीं दिया जाता है।

Bihar Board Class 12th Economics राष्ट्रीय आय का लेखांकन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आर्थिक सहायता क्या है?
उत्तर:
राज्य की ओर उत्पादकों की दिए जाने वाली आर्थिक अनुदान को आर्थिक सहायता कहते हैं। आर्थिक सहायता किसी वस्तु के उत्पादन को प्रोत्साहित करते एवं उत्पादन लागत को कम करने के उद्देश्य से दी जाती है।

प्रश्न 2.
मौद्रिक प्रवाह का अर्थ लिखें।
उत्तर:
इससे अभिप्राय कारक आय का उत्पादक क्षेत्र से परिवार की ओर तथा परिवार क्षेत्र से उत्पादक क्षेत्र की ओर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं पर होने वाले मौद्रिक व्यय से है।

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प्रश्न 3.
अर्थव्यवस्था की रचना के बारे में लिखें।
उत्तर:
चक्रीय प्रवाह की दृष्टि से एक अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है। जैसे –

  1. परिवार क्षेत्र
  2. उत्पादक क्षेत्र
  3. सरकारी क्षेत्र
  4. मुद्रा बाजार/वित्तीय प्रणाली
  5. शेष विश्व क्षेत्र या विदेशी क्षेत्र या अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र

प्रश्न 4.
फर्म से परिवारों की ओर प्रवाहों की सूची बनाएं।
उत्तर:
फर्म से परिवारों की ओर निम्नलिखित प्रवाह है –

  1. अन्तिम वस्तुओं का क्रय फर्म से परिवार करते हैं अर्थात् अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह फर्म से परिवार की ओर होता है।
  2. साधन आगतों का क्रय फर्म परिवारों से करते हैं। साधन आगतों के पुरस्कार के रूप में लगान, मजदूरी, ब्याज व लाभ फर्म से परिवारों की ओर प्रवाहित होता है।

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प्रश्न 5.
तीन क्षेत्रीय मॉडल के किन क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
तीन क्षेत्रीय मॉडल में अर्थव्यवस्था में तीन क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है –

  1. परिवार क्षेत्र।
  2. उत्पादक क्षेत्र।
  3. सरकारी क्षेत्र के बीच होने वाले आय के चक्रीय प्रवाह।

प्रश्न 6.
वास्तविक प्रवाह क्या होता है?
उत्तर:
परिवार क्षेत्र द्वारा कारक सेवाओं का प्रवाह उत्पादक क्षेत्र की ओर होता है और उत्पादित क्षेत्र द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का प्रवाह परिवार क्षेत्र की ओर होता है।

प्रश्न 7.
आय के प्रवाह को चक्रीय प्रवाह क्यों कहते हैं?
उत्तर:
आय के प्रवाह को चक्रीय प्रवाह इसलिए कहते हैं, क्योंकि –

  1. विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्तियों और भुगतानों का प्रवाह बराबर होता है और
  2. प्रत्येक वास्तविक प्रवाह जिस दिशा में होता है उसाक मौद्रिक प्रवाह उसकी विपरीत दिशा में होता है।

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प्रश्न 8.
चक्रीय प्रवाह मॉडल का महत्त्व बताएं।
उत्तर:
चक्रीय प्रवाह मॉडल का निम्नलिखित महत्त्व है –

  1. विभिन्न क्षेत्रों की परस्पर निर्भरता का ज्ञान।
  2. समावेश और वापसी का ज्ञान।
  3. राष्ट्रीय आय के अनुमान की सुविधा।
  4. महत्त्वपूर्ण समष्टि चरों का ज्ञान।
  5. अर्थव्यवस्था की रचना का ज्ञान।

प्रश्न 9.
प्रयोज्य आय से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैयक्तिक आय में से प्रत्यक्ष करो तथा सरकारी प्रशासनिक विभागों की विविध प्राप्तियों अर्थात् फीस, जुर्माने आदि को कम करके जो आय बचती है, उसे प्रयोज्य आय कहते हैं।

प्रश्न 10.
क्या लॉटरी से प्राप्त आय को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा?
उत्तर:
नहीं, राष्ट्रीय आय में लॉटरी से प्राप्त आय को शामिल नहीं किया जायेगा, क्योंकि इसके परिणामस्वरूप वस्तुओं के प्रवाह में कोई वृद्धि नहीं होगी।

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प्रश्न 11.
क्या पुरानी कार के विक्रय मूल्य को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाता है?
उत्तर:
राष्ट्रीय आय में पुरानी कार के विक्रय मूल्य के शामिल नहीं किया जाता क्योंकि जब उस कार का उत्पादन हुआ था तब ही उसे GNP में शामिल कर लिया गया था।

प्रश्न 12.
क्या शेयर्स की बिक्री से प्राप्त राशि को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाता है?
उत्तर:
शेयर्स वित्तीय पुंजी के अंग हैं। इनके परिणामस्वरूप अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में प्रत्यक्ष रूप से कोई परिवर्तन नहीं होता, इसलिए शेयर्स की बिक्री से प्राप्त राशि को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता है।

प्रश्न 13.
चार क्षेत्रीय मॉडल में किन क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
चार क्षेत्रीय मॉडल में अर्थव्यवस्था के चार क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है –

  1. परिवार क्षेत्र।
  2. उत्पादक क्षेत्र।
  3. सरकारी क्षेत्र।
  4. शेष विश्व क्षेत्र के बीच होने वाले आय के चक्रीय प्रवाह।

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प्रश्न 14.
सकल घरेलू उत्पाद से क्या अभिप्राय है? या बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी राष्ट्र की घरेलू सीमाओं में एक वर्ष में निवासियों तथा गैर-निवासियों द्वारा उत्पादित अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं के बाजार मूल्य के जोड़ को सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है।

प्रश्न 15.
कारक लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद से क्या आशय है?
उत्तर:
कारक लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद से आशय बिना दोहरी गिनती के सभी कारकों को ब्याज, मजदूरी, लगान तथा लाभ क रूप में प्राप्त होने वाली कुल आय तथा निवल विदेशी कारक आय के जोड़ से है।

प्रश्न 16.
राष्ट्रीय आय लेखांकन के महत्त्व बताएँ।
उत्तर:

  1. इसके द्वारा राष्ट्रीय आय को मापने में सहायता प्राप्त होती है।
  2. यह अर्थव्यवस्था के ढाँचे को समझने में सहायक होता है।
  3. अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के सापेक्षिक महत्त्व का ज्ञान प्राप्त होता है।
  4. आय के कारकों में बँटवारे का ज्ञान प्राप्त होता है।
  5. अन्तक्षेत्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय तुलना में सहायक है।
  6. विभिन्न सयम अवधियों में आय की तुलना में सहायक।

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प्रश्न 17.
किन मदों को घरेलू उत्पाद/आय में शामिल नहीं किया जाता है?
उत्तर:
निम्नलिखित मदों को घरेलू उत्पाद/आय में शामिल नहीं किया जाता है –

  1. गृहणियों की सेवाएं
  2. पुरानी वस्तुओं का क्रय-विक्रय
  3. हस्तांतरण भुगतान
  4. वित्तीय लेन-देन
  5. गैर-कानूनी गतिविधियाँ
  6. खाली समय की गतिविधियाँ
  7. मध्यवर्ती वस्तुएँ

प्रश्न 18.
वास्तविक GNP क्या है?
उत्तर:
स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय तथा वास्तविक राष्ट्रीय आय किसी देश के सामान्य निवासियों द्वारा एक वर्ष में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं के स्थिर मूल्यों का जोड़ है।

प्रश्न 19.
कारक अदागियां क्या होती हैं?
उत्तर:
उत्पादन के कारकों यानि भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यमवृत्ति को प्राप्त आय जैसे-लगान, ब्याज, मजदूरी एवं लाभ को कारक अंदायगियां कहा जाता है।

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प्रश्न 20.
क्या लॉटरियों से प्राप्त अप्रत्याशित लाभों को कारक आय में शामिल किया जायेगा?
उत्तर:
लॉटरियों से प्राप्त अप्रत्याशित लाभों को कारक आय में शामिल नहीं किया जाता है, क्योंकि यह एक हस्तांतरण भुगतान है।

प्रश्न 21.
क्या पुराने टेलीविजन की बिक्री से प्राप्त राशि को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाता है?
उत्तर:
नहीं, पुराने टेलीविजन की बिक्री से प्राप्त राशि को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता है, क्योंकि राष्ट्रीय आय में केवल चालू वर्ष में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य को ही शामिल कियो जाता है।

प्रश्न 22.
व्यक्ति अ, कमीशन एजेन्ट स की सहायता से ब का पुराना स्कूटर बेचता है। इसका राष्ट्रीय आय पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
पुराने स्कूटर की बिक्री राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं करेंगे, लेकिने कमीशन एजेन्ट का कमीशन का कमीशन राष्ट्रीय आय में शामिल करेंगे, क्योंकि यह नई सेवा का पुरस्कार है।

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प्रश्न 23.
हस्तांतरण आय क्या होती है?
उत्तर:
ऐसी आय जो बिना किसी वस्तु या सेवा के प्राप्त होती है, उसे हस्तांतरण आय कहते हैं। हस्तांतरण आय कहते हैं। हस्तांतरण आय एक पक्षीय होती है। इसमें वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि नहीं होती है। जैसे-वृद्धावस्था पेन्शन, छात्रवृत्ति आदि। हस्तांतरण आय को राष्ट्रीय आय को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं करते।

प्रश्न 24.
सरकारी अंतिम उपभोग व्यय का अनुमान किस प्रकार लगाया जाता है?
उत्तर:
सरकार, प्रतिरक्षा, चिकित्सा, कानून और व्यवस्था तथा सांस्कृतिक सेवाओं का उत्पादन करती है। सरकार का अन्तिम उपभोग व्यय निम्न प्रकार से ज्ञात किया जा सकता है सरकार द्वारा अन्तिम उपभोग व्यय = वस्तुओं एवं सेवाओं का शुद्ध क्रय (विदेशी क्रय सहित) + कर्मचारियों का पारिश्रमिक

प्रश्न 25.
बाजार कीमत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद क्या है?
उत्तर:
बाजार कीमत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद किसी अर्थव्यवस्था की घरेलू सीमा में एक लेखा वर्ष में सामान्य निवासियों द्वारा अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं के बाजार मूल्य एवं मूल्य ह्रास के अन्तर तथा विदेशों से प्राप्त निवल कारक आय का जोड़ है।

प्रश्न 26.
मूल्य वृद्धि की अवधारणा की परिभाषा करें।
उत्तर:
विक्रय मूल्य एवं स्टॉक में वृद्धि के योग में से अंतर्वर्ती चीजों की लागत (मध्यवर्ती उपभोग) घटाने पर मूल्य वृद्धि प्राप्त होती है।
मूल्य वृद्धि = उत्पादन वृद्धि
मध्यवर्ती उपभोग अथवा उत्पादन प्रक्रिया में फर्म साधन आगतों (भूमि, श्रम, पूँजी एवं अद्यम) की सेवाओं का प्रयोग करके गैर-साधन आगतों (मध्यवर्ती वस्तुओं) की उपयोगिता में जितनी वृद्धि होती है।

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प्रश्न 27.
मूल्य ह्रास क्या होता है?
उत्तर:
उत्पादन प्रक्रिया में पूंजीगत वस्तुओं जैसे-इमारत, मशीन, उपकरण आदि के मूल्य में घिसावट, सामान्य टूट-फूट, अप्रचलन (तकनीकी परिवर्तन) आदि के कारण कमी को मूल्य हास कहते हैं। इसे स्थायी पूंजी का उपभोग एवं अचर पूंजी का उपभोग अथवा घिसावट भी कहते हैं।

प्रश्न 28.
सकल व्यय के घटक क्या होते हैं?
उत्तर:
सकल व्यय में परिवार, फर्म एवं सरकार द्वारा किए गए व्ययों को शामिल करते हैं। इन क्षेत्रों के अंतिम व्यय को निम्न वर्गों में भी बाँटते हैं –

  1. निजी अन्तिम उपभोग व्यय।
  2. निवेश व्यय।
  3. सरकारी अन्तिम उपभोग व्यय।
  4. शुद्ध निर्यात।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय आय लेखांकन के उपयोग क्या हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय आय लेखांकन के प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं –

  1. राष्ट्रीय आय का विभिन्न उत्पादन संसाधनों के बीच विभाजन समझाया जा सकता है अर्थात् राष्ट्रीय आय में किस संसाधन का कितना योगदान है-इसे जाना जा सकता है।
  2. अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में योगदान, इन क्षेत्रों की सापेक्ष एवं निरपेक्ष संवृद्धि की जानकारी राष्ट्रीय आय लेखांकन से प्राप्त होती है।
  3. अर्थव्यवस्था की संरचना में परिवर्तन का बोध होता है।
  4. राष्ट्रीय आय लेखांकन में अर्थव्यवस्था के मजबूत पक्षों व कमजोर पक्षों की जानकारी प्राप्त होती है।
  5. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों जीवन स्तर में वृद्धि, राष्ट्रीय आय का वितरण आदि की जानकारी प्रदान करते हैं।
  6. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों से विभिन्न देशों के तुलनात्मक अध्ययन का आधार प्राप्त होता है।
  7. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों से उपभोग, बचत व पूंजी निर्माण की जानकारी मिलती है।
  8. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों देश की आर्थिक नीतियों की समीक्षा का आधार होते हैं।
  9. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों के आधार पर भावी आर्थिक नीतियों, सामाजिक नीतियों की रचना की जाती है आदि।

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प्रश्न 2.
आय के चक्रीय प्रवाह में निर्गत/निवर्तन एवं आगत/परिवर्धन की अवधारणाएँ स्पष्ट करें।
उत्तर:
निर्वतन-इसमें वे सभी मदें शामिल की जाती है जिनसे राष्ट्रीय आय में घटोतरी होती है। इसकी प्रमुख मदें निम्नलिखित हैं –

  1. बचत
  2. कर एवं
  3. आयात

आगत/परिवर्धन:
इसमें वे सभी मदें शामिल की जाती हैं जिनसे राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी होती है। इसकी मुख्य मदें निम्नलिखित हैं –

  1. निवेश,
  2. सरकारी व्यय एवं
  3. निर्यात

यदि अर्थव्यवस्था में आगतों के सापेक्ष निर्गत कम होते हैं तो आय का स्तर बढ़ता है इसके विपरीत यदि निर्गत, आगतों से ज्यादा होते हैं आय का स्तर घटता है। संतुलन की अवस्था में निर्गतों का मान आगतों के मान के बराबर रहता है।

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प्रश्न 3.
दो क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह समझाइए।
उत्तर:
दो क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था सरल अर्थव्यवस्था होती है। इस अर्थव्यवस्था में केवल दो क्षेत्र-परिवार व फर्म विद्यमान होते हैं। परिवार फर्मों को साधन सेवाएँ प्रदान करते हैं बदले में फर्म साधन सेवाओं का भुगतान परिवारों को करती है। इसी प्रकार फर्म परिवारों को वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करती है तथा परिवार वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य का भुगतान फर्म को करते हैं।

इस अर्थव्यवस्था में पूंजी बाजार, सरकार तथा विदेशी व्यापार का कोई अस्तित्व नहीं होती है। परिवार उत्पादक क्षेत्र को भूमि, श्रम, पूंजी तथा उद्यम प्रदान करते हैं। फर्म परिवारों को मजदूरी, लगान, ब्याज व लाभ का भुगतान करती है। परिवार साधन आय की सहायता से फर्मों से वस्तु वे सेवाएं खरीदते हैं बदले में उनका मूल्य उत्पादक क्षेत्र को प्रवाहित होता है। इसे निम्न प्रकार भी दर्शाया जा सकता है –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 5

प्रश्न 4.
किसी चक्रीय प्रवाह प्रतिमान का प्रयोग कर दर्शाइए कि आय और उत्पादन के प्रवाह एक-समान होते हैं।
उत्तर:
चक्रीय प्रवाह के सभी प्रतिमानों में आय व उत्पादन के प्रवाह एक-समान होते हैं। उत्पादक क्षेत्र, परिवार क्षेत्र से साधन आगतों भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम की सेवाएं क्रय करता है। इन साधन आगतों की सेवाओं की सहायता से उत्पादक क्षेत्र गैर साधन आगतों की उपयोगिता को बढ़ाता है। गैर साधन आगतों की उपयोगिता में वृद्धि को आय का सृजन कहते हैं। इस सृजित आय पर चार साधन आगतों भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम का अधिकार होता है। अत: वितरण स्तर पर इस सृजित आय (उत्पादन) को चारों साधनों में आय के रूप में बांट दिया जाता है। उत्पादन के साधनों को उतनी ही आय प्राप्त होती है जितनी आय का सृजन उत्पादन क्षेत्र में होता है। अतः आय और उत्पादन के प्रवाह एक-समान होते हैं।

प्रश्न 5.
“समष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन का मार्ग राष्ट्रीय लेखांकन के गलियारों से होकर गुजरता है”। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रीय लेखांकन की सहायता से हम दो प्रमुख कार्य करते हैं। एक देश की विशिष्ट आर्थिक उपलब्धियों का पता चलता है। दो, आर्थिक नीतियों की समीक्षा के लिए तर्कसंगत आधार प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में, राष्ट्रीय लेखांकन की सहायता से न केवल आर्थिक समुच्चयों की माप की जाती है बल्कि अर्थव्यवस्था की कार्यशैली का मूल्यांकन व विश्लेषण भी किया जाता है और उनकी व्याख्या की जाती है। अतः यह कहना उचित है कि समष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन का मार्ग राष्ट्रीय लेखांकन के गलियारों से होकर गुजरता है।

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प्रश्न 6.
कृष्यर्थ शास्त्री कौन थे? आर्थिक गतिविधियों के बारे में उनके विचार क्या थे?
उत्तर:
18 वीं शताब्दी के फ्रांसीसी प्रकृतिवादी अर्थशास्त्रियों को कृष्णर्थ अर्थशास्त्री कहते हैं। आर्थिक गतिविधियों के संचालन के बारे में वे मुक्त प्रवाह के पक्षधर थे। इसलिए वे अर्थशास्त्री आर्थिक क्रियाकलापों में सरकार के हस्तक्षेप के विरोधी थे। वे स्वतन्त्र व्यापार के पक्षधर थे। उनके विचार में समाज की प्रमुख गतिविधि कृषि थी। क्वीने ने अर्थतालिका के द्वारा धन के चक्रीय प्रवाह तथा समाज के विभिन्न वर्गों के बीच कृषि उत्पादन के वितरण का विधिपूर्ण चित्रांकन प्रस्तुत किया।

प्रश्न 7.
आय और उत्पादन के चक्रीय प्रवाह से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रवाह की सहायता से एक निश्चित समय अवधि में आर्थिक चरों के मूल्य में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त होती है। आय तथा उत्पादन भी आर्थिक प्रवाह हैं। आर्थिक प्रवाह, आर्थिक स्टॉक से भिन्न होते हैं क्योंकि स्टॉक की माप एक निश्चित समय बिन्दु पर की जाती है। अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों जैसे परिवार, फर्म, सरकार एवं शेष विश्व की परस्पर निर्भरता के चित्रांकन को आय एवं उत्पादन का चक्रीय प्रवाह कहते हैं। दूसरे शब्दों में, एक क्षेत्र के आर्थिक निर्णय दूसरे क्षेत्रों के आर्थिक निर्णयों के प्रवाह के अनुरूप लिये, जाते हैं।

प्रश्न 8.
मौद्रिक प्रवाह की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यदि आर्थिक प्रवाह मुद्रा के रूप में होता है तो इसे मौद्रिक प्रवाह कहते हैं। मौद्रिक प्रवाह में एक क्षेत्र से अन्य क्षेत्र/क्षेत्रों को मुद्रा का प्रवाह होता है। इस प्रकार के प्रवाह में वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह शामिल नहीं किया जाता है। जैसे-परिवार क्षेत्र से फर्म, सरकार एवं शेष विश्व द्वारा क्रय की गई वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य का प्रवाह। फर्म, सरकार एवं शेष विश्व द्वारा परिवार क्षेत्र को साधन आय (लगान, मजदूरी, ब्याज एवं लाभ) का भुगतान आदि।

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प्रश्न 9.
आय और उत्पादन के चक्रीय प्रवाह का सिद्धान्त क्या है?
उत्तर:
वर्ष 1758 में क्वीने ने आय और उत्पादन की चक्रीय प्रवाह तालिका की रचना की थी। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री इस विषय में मौन रहे। 19वीं शताब्दी के मध्य में कार्ल मार्क्स ने आय और उत्पादन के चक्रीय प्रवाह के बारे में चर्चा की। आय व उत्पादन प्रवाह के निम्नलिखित सिद्धान्त हैं –

  1. विनिमय चाहे वस्तु के माध्यम से हो अथवा मुद्रा के माध्यम से, प्रत्येक प्रक्रिया में उत्पादक/विक्रेता को उतनी ही राशि प्राप्त होती है जितनी उपभोक्ता/क्रेता खर्च करते हैं।
  2. वस्तुओं व सेवाओं का प्रवाह एक ही दिशा में होता है परन्तु उन्हें प्राप्त करने के लिए किए गए भुगतानों का प्रवाह विपरीत दिशा में होता है।

प्रश्न 10.
परिवारों की प्राप्तियों एवं भुगतानों को लिखिए।
उत्तर:
परिवार क्षेत्र की प्राप्तियां एवं भुगतान निम्न हैं –
प्राप्तियां:
परिवार क्षेत्र को साधन सेवाओं का पुरस्कार लगान, मजदूरी ब्याज व लाभ प्राप्त होता है। इस क्षेत्र को उत्पादक क्षेत्र से अन्तिम वस्तुएं एवं सेवाएं प्राप्त होती हैं। परिवार को सरकार से आर्थिक सहायता की प्राप्ति होती है। शेष विश्व से परिवार क्षेत्र को साधन भुगतान प्राप्त होता है, परिवार विदेशों से वस्तुओं एवं सेवाओं को भी प्रत्यक्ष रूप से खरीदते हैं। शेष विश्व से परिवार को चालू हस्तांतरण भी प्राप्त होते हैं।

भुगतान:
परिवार फर्म, सरकार व विदेशों से जो वस्तुएं एवं सेवाएं क्रय करते हैं उनके मौद्रिक मूल्यों का भुगतान करना पड़ता है। सरकार परिवारों पर प्रत्यक्ष कर लगाती है। परिवार करों का भुगतान सरकारी क्षेत्र को करते हैं।

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प्रश्न 11.
समष्टि स्तर पर लेखांकन का महत्त्व बताएं।
उत्तर:
लेखांकन सभी स्तरों पर महत्त्वपूर्ण होता है परन्तु समष्टि स्तर और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है। इसके कई कारण हैं-लेखांकन के आधार पर अर्थव्यवस्था में पूरे वित्तीय वर्ष की गतिविधियों की समीक्षा की जाती है। आर्थिक विश्लेषण के बाद सरकार जन कल्याण की भावना से उपयुक्त आर्थिक व सामाजिक नीतियाँ बनाती है। इसी के आधार पर अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय उत्पादन, राष्ट्रीय आय, राष्ट्रीय व्यय, घरेलू पूंजी निर्माण, प्रति व्यक्ति आय आदि समाहारों की जानकारी प्राप्त होती है। लेखांकन के आधार पर अर्थव्यवस्था की विभिन्न वर्षों की उपलब्धियों का तुलनात्मक अध्ययन संभव होता है।

प्रश्न 12.
वैयक्तिक आय की परिभाषा दीजिए। यह वैयक्तिक प्रयोज्य आय से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
वैयक्तिक आय-परिवारों को सभी स्रोतों से प्राप्त आय के योग को वैयक्ति आय कहते हैं।
वैयक्तिक आय = निजी आय – निगम कर – निगमित बचत।
वैयक्तिक प्रयोज्य आय-वैयक्तिक आय का वह भाग जिसे परिवार स्वेच्छा से उपभोग या बचत के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।
वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय – प्रत्यक्ष कर – दण्ड, जुर्माना आदि।

प्रश्न 13.
वस्तु एवं सेवा में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 6

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प्रश्न 14.
मध्यवर्ती उपभोग क्या है? सरकार के मध्यवर्ती उपभोग के दो कारण दीजिए।
उत्तर:
मध्यवर्ती उपभोग-एक उत्पादक इकाई द्वारा दूसरी उत्पादन इकाई से खरीदी गई वे वस्तुएँ एवं सेवाएँ जिनको पुनः बेचा जाता है। मध्यवर्ती उपभोग कहलाती हैं। सरकार के मध्यवर्ती उपभोग के उदाहरण –

  1. सरकारी विभागों द्वारा खरीदी गई स्टेशनरी।
  2. सरकारी वाहनों के लिए खरीदा गया पेट्रोल।

प्रश्न 15.
हरित जीएनपी किसे कहते हैं?
उत्तर:
हरित जीएनपी की आवधारणा का विकास आर्थिक विकास के मापक के रूप में किया जा रहा है। जी.एन.पी. को मानवीय कुशलता को मापने के लायक बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं इसी सन्दर्भ में हरित जी.एन.पी. का प्रतिपादन किया है। हरित जीएनपी, आर्थिक संवृद्धि की कसौटी-प्राकृतिक संसाधनों के विवेकशील विदोहन और विकास के हित लाभों के समान वितरण पर जोर देती है। अर्थात् जीएनपी का संबंध प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, संरक्षण एवं समाज के विभिन्न वर्गों में उनके न्यायोचित बंटवारे से हैं।

प्रश्न 16.
परिभाषा करें-
(क) मौद्रिक जीएनपी
(ख) वास्तविक जीएनपी।
उत्तर:
(क) मौद्रिक जीएनपी-यदि सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गणना लेखा वर्ष में बाजार में प्रचलित कीमतों के आधार पर की जाती है तो इसे मौद्रिक सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं। मौद्रिक जीएनपी में परिर्वतन तात्कालिक बाजार कीमतों में परिवर्तन, तात्कालिक लेखा वर्ष में उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन अथवा दोनों में परिवर्तन के कारण हो सकता है।

(ख) वास्तविक जीएनपी-यदि सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गणना किसी आधार वर्ष की कीमतों के आधार पर की जाती है तो इसे वास्तविक सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) कहते हैं। वास्तविक जीएनपी में बढ़ोतरी केवल वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि के कारण होती है।

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प्रश्न 17.
बाजार कीमत और स्थिर कीमत पर राष्ट्रीय आय में भेद करें।
उत्तर:
बाजार कीमत पर राष्ट्रीय आय:
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के बाजार में प्रचलित कीमतों पर मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग को बाजार कीमत पर राष्ट्रीय आय कहते हैं।

स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय:
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा के उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के आधार वर्ष की कीमतों पर मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग को स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय कहते हैं। बाजार कीमतों पर राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी के कारण हैं-कीमतों में वृद्धि अथवा उत्पादन की मात्रा में वृद्धि अथवा कीमतों एवं उत्पादन की मात्रा दोनों में वृद्धि। स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी केवल उत्पादन की मात्रा में बढ़ोतरी के कारण होती है।

प्रश्न 18.
कर्मचारियों के पारिश्रमिक की परिभाषा दीजिए। इसके विभिन्न संघटक क्या हैं? उपयुक्त उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
परिभाषा:
उत्पादक इकाई द्वारा श्रमिकों को मानसिक एवं शारीरिक सेवाओं के बदले जो भुगतान दिया जाता है, उसे कर्मचारियों का पारिश्रमिक कहते हैं।
संघटक:

  1. नकद वेतन-उत्पादक इकाई द्वारा श्रमिकों को मानसिक एवं शारीरिक सेवाओं के बदले जो भुगतान नकद मुद्रा के रूप में दिया जाता है, उसे नकद वेतन कहते हैं। जैसे मूल वेतन, भत्ते, बोनस, कमीशन आदि।
  2. किस्म के रूप में वेतन-उत्पादक इकाई द्वारा श्रमिकों को मानसिक एवं शारीरिक सेवाओं के बदले जो भुगतान वस्तु या सेवाओं के रूप में दिया जाता है। उसे किस्म के रूप में वेतन कहते हैं। जैसे-मुफ्त आवास, सहायता युक्त भोजन आदि।
  3. सामाजिक सुरक्षा अंशदान-श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में मालिकों का अंशदान। जैसे सामूहिक बीमा प्रीमियम, प्रोविडेण्ड फण्ड आदि में मालिकों का भुगतान।

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प्रश्न 19.
सामान्य सरकार क्षेत्र में शुद्ध मूल्य वृद्धि कैसे ज्ञात की जाती है?
उत्तर:
सामान्य सरकार क्षेत्र में ब्याज, लगान व लाभ की अवधारणा, उत्पन्न नहीं होती है, सरकार को अप्रत्यक्ष करों का भुगतान नहीं करना पड़ता है सरकार घिसावट के आंकड़े एकत्र नहीं करती है। अतः इस क्षेत्र में
उत्पादन मूल्य = सामान्य सरकार का मध्यवर्ती उपभोग + कर्मचारियों का पारिश्रमिक। शुद्ध मूल्य वृद्धि = उत्पादन मूल्य-मध्यवर्ती उपभोग = कर्मचारियों का पारिश्रमिक। इस क्षेत्र में शुद्ध मूल्य वृद्धि कर्मचारियों के पारिश्रमिक के बराबर होती है।

प्रश्न 20.
मध्यवर्ती उत्पाद (वस्तुएं) तथा अन्तिम उत्पाद में अन्तर बताइए।
उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 7

प्रश्न 21.
अन्तिम वस्तु और अन्तर्वती वस्तु में क्या भेद होता है?
उत्तर:
अन्तिम वस्तु-वे वस्तुएँ जिनका प्रयोग उपभोग या निवेश के लिए किया जाता है, अन्तिम वस्तु कहलाती है। इन वस्तुओं को उत्पादन प्रक्रिया में पुनः कच्चे माल की तरह प्रयोग में नहीं लाया जाता है। ये पूरी तरह से तैयार हो जाती हैं इनका पुनः रूप, रंग, आकार नहीं बदला जाता है। इन वस्तुओं को घरेलू/राष्ट्रीय उत्पादन में शामिल किया जाता है। अन्तर्वर्ती वस्तु-वे वस्तुएँ जिनका प्रयोग उत्पादन प्रक्रिया में अन्य वस्तुओं के उत्पादन में कच्चे माल की तरह किया जाता है अन्तर्वर्ती वस्तु कहलाती है। ये वस्तुएं पूरी तरह से तैयार नहीं होती है उत्पादन प्रक्रिया में एक चरण से दूसरे चरण में इनके रूप, रंग, आकार आदि में परिवर्तन किया जाता है। उत्पादन प्रक्रिया में दूसरी वस्तुओं के निर्माण में इनका अपना अस्तित्व खो जाता है। इन वस्तुओं को घरेलू/राष्ट्रीय उत्पादन में शामिल नहीं किया जाता है।

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प्रश्न 22.
क्या GNP राष्ट्रीय कल्याण का मापन करता है?
उत्तर:
बहुत लम्बे समय से अर्थशास्त्री आर्थिक संवृद्धि एवं आर्थिक विकास के मापक रूप में GNP (सकल राष्ट्रीय उत्पाद) का प्रयोग करते आ रहे हैं। GNP में बढ़ोतरी को अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा एवं GNP में कमी को खराब माना जाता रहा है। परन्तु GNP में वृद्धि से राष्ट्रीय आय का वितरण, संसाधनों के प्रयोग का स्वभाव एवं दर, जीवन की गुणवत्ता आदि के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है। अत: GNP से राष्ट्रीय क्षेत्र स्तर का मापन नहीं होता है। आय की गणना का उद्देश्य लोगों को यह बताना है कि अपने आपको गरीब बनाए बगैर वे क्या कुछ उपभोग सकते हैं। GNP में बढ़ोत्तरी विकास का इकलौता उद्देश्य नहीं है। इसके अलग राष्ट्रीय आय के समान वितरण, जन समुदाय के जीवन की गुणवत्ता में सुधार तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण आदि भी आर्थिक विकास के उद्देश्यों में शामिल किए जाने चाहिए। दूसरे शब्दों में, आर्थिक विकास का उद्देश्य उत्पादकता में वृद्धि। मानवीय कुशलता में बढ़ोतरी के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को सतत् विकास के लिए आवश्यक माना जाता है। अत: GNP में बढ़ोतरी राष्ट्रीय कल्याण का अधूरा माप है।

प्रश्न 23.
निजी अन्तिम उपभोग व्यय के संघटक समझाइए।
उत्तर:
परिवारों के अन्तिम उपभोग एवं परिवारों की सेवा मे निजी गैर-लाभकारी संस्थाओं का अन्तिम उपभोग का योग निजी अन्तिम उपभोग कहलाता है।
निजी अन्तिम उपभोग = परिवारों का अन्तिम उपभोग + परिवारों की सेवा में निजी गैर लाभकारी संस्थाओं का अन्तिम उपभोग।
परिवारों का अन्तिम उपभोग = टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं पर व्यय + गैर टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं पर व्यय + विदेशों से प्रत्यक्ष खरीद पर व्यय + मकानों का आरोपित किराया + किस्म के रूप में वेतन + स्थिर परिसम्पत्तियों का स्व-लेखा उत्पादन – उपहार-पुराने एवं रद्दी सामान की बिक्री।
निजी गैर लाभकारी संस्थाओं का अन्तिम उपभोग = मध्यवर्ती उपभोग-विदेशों से चालू खाते पर प्रत्यक्ष खरीद + कर्मचारियों का पारिश्रमिक – जनता को बिक्री।

प्रश्न 24.
सकल घरेलू स्थाई पूंजी निर्माण और स्टॉक में परिवर्तन के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 8

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प्रश्न 25.
इन वाक्यांशों का अर्थ बताइए –

  1. स्थिर व्यावसायिक निवेश
  2. भण्डार निवेश
  3. गृह निर्माण निवेश
  4. सार्वजनिक निवेश

उत्तर:
1. स्थिर व्यावसायिक निवेश:
फर्मों द्वारा नए यंत्र-सयंत्रों पर किया गया व्यय स्थिर व्यावसायिक निवेश कहलाता है। स्थिर व्यावसायिक निवेश करते समय उत्पादक इकाईयाँ विचार-विमर्श करती हैं। सकल स्थिर व्यावसायिक निवेश में मूल्यह्रास शामिल रहता है परन्तु शुद्ध स्थिर व्यावसायिक निवेश की गणना करने के लिए स्थिर व्यवसायिक निवेश में से मूल्यह्रास घटाते हैं।

2. भण्डार निवेश:
भण्डार निवेश उत्पादन का वह भाग होता है जिसे बाजार में बेचा नहीं गया है। भण्डार निवेश में कच्चा माल, अर्द्धनिर्मित माल एवं तैयार माल को शामिल करते हैं। भण्डार निवेश में वृद्धि की गणना अन्तिम स्टॉक से आरम्भिक स्टॉक घटाकर की जाती है।

3. गृह निर्माण निवेश:
भवन निर्माण पर व्यय को गृह निर्माण निवेश कहते हैं। शुद्ध गृह निर्माण निवेश में से गृह निर्माण का मूल्यह्रास घटाते हैं।

4. सार्वजनिक निवेश:
सरकार द्वारा स्थिर परिसंपत्तियों (सड़कों, पुलों, विद्यालयों, अस्पतलों आदि) के निर्माण पर व्यय की गई राशि को सार्वजनिक निवेश कहते हैं। शुद्ध सार्वजनिक निवेश ज्ञात करने के लिए सकल सार्वजनिक निवेश में से मूल्यह्रास को घटाते हैं।

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प्रश्न 26.
निम्नलिखित को राष्ट्रीय आय में शामिल क्यों नहीं किया जाता है।

  1. एक घरेलू फर्म से पुरानी मशीन का क्रय।
  2. एक घरेलू फर्म के नए शेयरों का क्रय।
  3. सरकार द्वारा छात्रों को छात्रवृत्ति।
  4. संपत्ति कर।
  5. अप्रत्यक्ष कर।
  6. वृद्धावस्था पेंशन।

उत्तर:

  1. एक घरेलू फर्म से पुरानी मशीन का क्रय केवल स्वामित्व का हस्तातरंण है, इससे चालू वर्ष में उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं हुई है।
  2. क्योंकि इससे वस्तुओं या सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि नहीं हुई है यह केवल कागजी परिसंपत्ति का विनिमय है।
  3. छात्रों को छात्रवृत्ति एक प्रकार का अंतरण भुगतान है यह पक्षीय भुगतान इससे वस्तुओं व सेवाओं का प्रवाह नहीं बढ़ता है।
  4. क्योंकि संपत्ति कर एक प्रकार का अनिवार्य अंतरण भुगतान है।
  5. क्योंकि अप्रत्यक्ष कर एक प्रकार का अनिवार्य अंतरण भुगतान है।
  6. क्योंकि वृद्धावस्था पेंशन अंतरण भुगतान है।

प्रश्न 27.
नीचे दिए गए सौदे घरेलू उत्पाद को किस प्रकार प्रभावित करेंगे –

  1. एक पुरानी कार के मालिक द्वारा कार बेचकर उस रुपये से नया स्कूटर खरीदना।
  2. एक नई कंपनी द्वारा दलालों की मार्फत अंश पत्रों की बिक्री जिनको कमीशन का भुगतान किया जाता है।
  3. किराये पर लिए गए मकान की खरीद।

उत्तर:

  1. पुरानी कार की बिक्री को राष्ट्रीय उत्पाद में शामिल नहीं किया जायेगा परन्तु नए स्कूटर की खरीद को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा।
  2. अंश पत्रों की बिक्री से केवल स्वामित्व का हस्तांतरण होता है अतः इनकी बिक्री राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं करेंगे परन्तु इनकी बिक्री के लिए दलालों का कमीशन राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा।
  3. किराये पर लिया गया मकान पुराना है। अतः पुराने मकान की खरीद को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं करेंगे।

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प्रश्न 28.
सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अंकलन में किन कार्यों को शामिल नहीं किया जाता है?
उत्तर:
सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अंकलन में निम्नलिखित कार्यों को शामिल नहीं किया जाता है –
1. सरकार द्वारा हस्तांतरण भुगतान:
हस्तांतरण एक पक्षीय होते हैं। इन भुगतानों से वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में बढ़ोतरी नहीं होती है। जैसे वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृत्ति आदि।

2. कागजी परिसंपत्तियों का क्रय-विक्रय:
इन परिसंपत्तियों के क्रय-विक्रय में केवल स्वामित्व का हस्तांतरण होता है। इनसे वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में बढ़ोतरी नहीं होती है। जैसे बचत पत्र, अंश पत्र, ऋण पत्र आदि का क्रय-विक्रय आदि।

3. गैर कानूनी क्रियाएं:
इन क्रियाओं को अपराध माना जाता है इसलिए इन्हें राष्ट्रीय आय के आंकलन में नहीं जोड़ते हैं। जैसे चोरी, डकैती, जुआ आदि।

4. गैर-बाजार वस्तुएं एवं सेवाएं:
ये वस्तुएं बाजार परिधि से बाजार रहती है। इनके बारे में पर्यात जानकारी का अभाव रहता है। इनके मूल्य का अनुमान लगाना असंभव सा होता है।

5. निजी अंतरण भुगतान:
ये भुगतान भी एक पक्षीय होते हैं। इनसे वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह नहीं बढ़ता है।

प्रश्न 29.
GNP (सकल राष्ट्रीय उत्पाद) के आंकलन में किन कार्यों को अपवर्जित माना गया है? इसके कारण भी बताइए।
उत्तर:
GNP के मापन में निम्नलिखित कार्यों को छोड़ दिया जाता है –
1. वित्तीय/कागजी परिसंपत्तियों का लेन-देन:
बचत पत्र, ऋण पत्र, बाँड, अंश पत्र आदि को वित्तीय परिसपंत्ति कहते हैं। इनके क्रय-विक्रय से मात्र स्वामित्व बदलता हैं, वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि नहीं होती है। इसलिए इस प्रकार के लेन-देन GNP के आंकलन में छोड़ दिए जाते हैं।

2. सरकार द्वारा हस्तांतरण भुगतान:
हस्तांतरण भुगतान वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रतिफल नहीं होते हैं ये एक पक्षीय होते हैं। इनमें वस्तुओं एवं सेवाओं का सृजन नहीं होता है। जैसे-छात्रवृत्ति, वृद्धावस्था पेन्शन आदि। इसलिए इन्हें भी GNP के आंकलन में शामिल नहीं करते हैं।

3. निजी अन्तरण भुगतान-ये भी एक पक्षीय होते हैं इनमें भी आय का सृजन नहीं होता है। इसलिए इन्हें GNP में शामिल नहीं करते हैं। जैसे जेब खर्च आदि।

4. गैर बाजार वस्तुएं एवं सेवाएं-स्व-उपभोग के लिए उत्पन्न की गई सेवाएं बाजार की परिधि से बाहर रहती हैं उनके मूल्य का अनुमन लगाना असंभव होता है इसलिए इन्हें GNP से बाहर रखते हैं।

5. पुराने सामान की बिक्री-पुराने सामान को बेचने से आय का सृजन नहीं होता है। पुराने सामान के उत्पादक मूल्य को उत्पादित लेखा वर्ष में आय सृजन के रूप में शामिल किया जा चुका है। पुराने उत्पाद की बिक्री से नव उत्पादन नहीं होता है अतः पुराने सामान का मूल्य (GNP) में शामिल नहीं किया जाता है।

6. गैर-कानूनी क्रियाएँ-गैर-कानूनी क्रियाओं का उचित रूप में पता नहीं चलता है, या उनक सही हिसाब-किताब का ब्यौरा नहीं मिलता है। इससे भी ज्यादा देश में इन क्रियाओं को अपराध माना जाता है इसलिए GNP के आंकलन में इन्हें छोड़ देते हैं।

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प्रश्न 30.
किन परिस्थितियों में ऐसा होता है –

  1. राष्ट्रीय आय, घरेलू साधन आय के बराबर।
  2. निजी आय, वैयक्तिक आय के बराबर।
  3. राष्ट्रीय आय, घरेलू आय से कम।
  4. क्या वैयक्तिक आय निजी आय से अधिक हो सकती है।
  5. वैयक्तिक आय, वैयक्तिक प्रयोज्य आय के बराबर।

उत्तर:

  1. जब विदेशों से शुद्ध साधन आय शून्य होती है तो राष्ट्रीय आय, घरेलू साधन आय के समान होती है।
  2. वैयक्तिक आय में लाभ कर तथा अवितरित लाभ जोड़ने पर निजी आय प्राप्त होती है। यदि लाभ कर तथा अवितरित लाभ शून्य होते हैं वैयक्तिक आय व निजी आय समान होती है।
  3. यदि विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय ऋणात्मक होती है तो राष्ट्रीय आय, घरेलू आय से कम होती है।
  4. निजी आय = वैयक्तिक आय + लाभ कर + अवितरित लाभ। यदि लाभ कर अथवा अवितरित लाभ अथवा दोनों शून्य से अधिक होते हैं निजी आय, वैयक्तिक आय से ज्यादा होती है।
  5. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-प्रत्यक्ष कर-दण्ड जुर्माना आदि।

प्रश्न 31.
क्या निम्नलिखित को राष्ट्रीय आय के आंकलन में शामिल किया जाता है? कारण भी लिखो –

  1. सड़क की रोशनी पर सरकारी व्यय।
  2. विदेशों में काम कर रहे श्रमिक द्वारा उसके परिवार को मिली रकम।
  3. व्यावसायिक बैंक से परिवार को ब्याज की प्राप्ति।
  4. जमीन की बिक्री से प्राप्त राशि।
  5. सुरक्षा पर सरकारी व्यय।
  6. लंदन में सरकारी बैंक की एक शाखा द्वारा अर्जित लाभ।
  7. पाकिस्तान दूतावास में काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों को मिली मजदूरी।

उत्तर:

  1. सड़क की रोशनी पर सरकारी व्यय, सरकारी अन्तिम उपभोग व्यय का घटक है। अतः व्यय विधि से राष्ट्रीय आय की गणना करने में इसको शामिल किया जायेगा।
  2. विदेशों में काम कर रहे श्रमिक द्वारा परिवार को मिली रकम, विदेशों से अर्जित साधन आय है अतः राष्ट्रीय आय में शामिल की जायेगी।
  3. व्यावसायिक बैंक से प्राप्त ब्याज साधन आय है अतः राष्ट्रीय आय में शामिल की जायेगी।
  4. जमीन की बिक्री से प्राप्त आय राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं होगी क्योंकि इस सौदे मे केवल स्वामित्व परिवर्तन होता है।
  5. सुरक्षा पर सरकारी व्यय अन्तिम उपभोग व्यय का एक संघटक है अतः इसे राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा।
  6. विदेशों से अर्जित लाभ साधन आय का घटक है अतः राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा।
  7. भारतीय कर्मचारी को पाकिस्तान दूतावास से मिली मजदूरी साधन आय है अतः राष्ट्रीय आय में शामिल की जायेगी।

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प्रश्न 32.
राष्ट्रीय प्रयोज्य आय किसे कहते हैं? यह कैसे ज्ञात की जाती है?
उत्तर:
राष्ट्रीय प्रयोज्य आय-बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद, एवं शेष विश्व से शुद्ध चालू हस्तांतरण भुगतान के योग को राष्ट्रीय प्रयोज्य आय कहते हैं। राष्ट्रीय प्रयोज्य आय का उपयोग राष्ट्र जैसे चाहे कर सकता है। राष्ट्रीय प्रयोज्य आय का उपयोग निम्न प्रकार किया जा सकता है।

  1. सरकारी अन्तिम उपभोग
  2. निजी अन्तिम उपभोग एवं
  3. राष्ट्रीय बचत

राष्ट्रीय प्रयोज्य आय का मान राष्ट्रीय आय में कम या ज्यादा हो सकता है। यदि शेष विश्व से चालू अंतरण धनात्मक होते है तो राष्ट्रीय प्रयोज्य आय, राष्ट्रीय आय से अधिक होती है इसके विपरीत यदि शेष विश्व से चालू अंतरण ऋणात्मक होते हैं तो राष्ट्रीय प्रयोज्य आय, राष्ट्रीय आय से कम होती है।

राष्ट्रीय प्रयोज्य आय = बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद + शेष विश्व से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान या
राष्ट्रीय प्रयोज्य आय = साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद + शुद्ध अप्रत्यक्ष कर + विदेशों से शुद्ध साधन आय + शेष विश्व से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान

प्रश्न 33.
घरेलू उत्पाद (राष्ट्रीय आय) के आंकलन की मूल्य वृद्धि विधि की रूपरेखा दीजिए।
उत्तर:
इस विधि से राष्ट्रीय आय ज्ञान करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाये जाते हैं –

  1. अर्थव्यवस्था में उत्पादक इकाइयों की पहचान करना और उन्हें समान क्रियाओं के आधार पर विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों (प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक) में बांटना।
  2. प्रत्येक उत्पादन इकाई द्वारा मूल्य वृद्धि ज्ञात करना और उन्हें जोड़कर प्रत्येक क्षेत्र की साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि निकालना।
  3. देश की घरेलू सीमा में समस्त क्षेत्रों की साधन लागत पर मूल्य वृद्धि को जोड़कर घरेलू आय ज्ञात करना।
  4. शुद्ध विदेशी साधन आय ज्ञात करना और उसे घरेलू आय में जोड़कर राष्ट्रीय आय ज्ञात करना।

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प्रश्न 34.
स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय का महत्त्व बताइये।
उत्तर:
किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक संवृद्धि को ज्ञात करने के लिए एक वर्ष की राष्ट्रीय आय की तुलना आधार-वर्ष की राष्ट्रीय आय से की जाती है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि उत्पादन में वृद्धि के कारण भी हो सकती है और कीमतों में वृद्धि के कारण भी हो सकती है, जब कीमत में वृद्धि के कारण राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है तो यह वृद्धि अर्थव्यवस्था की प्रगति का वास्तविक चित्र प्रस्तुत नहीं करती।

जब उत्पादन में वृद्धि के कारण राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है तो इसे राष्ट्रीय आय में वास्तविक वृद्धि कहते हैं। यह वृद्धि आर्थिक संवृद्धि की सूचक है। प्रचलित कीमतों पर राष्ट्रीय आय में कीमतों का प्रभाव शामिल होने के कारण इसकी तुलना आधार वर्ष की राष्ट्रीय आय से नहीं की जा सकती। अत: प्रचलित कीमतों पर राष्ट्रीय आय को, स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय में परिवर्तित करके हम राष्ट्रीय आय की तुलना आधार वर्ष की राष्ट्रीय आय से कर सकते हैं।

प्रश्न 35.
माल भण्डार का अर्थ बताइए।
उत्तर:
किसी वस्तु का उत्पादने करने के लिए कच्चे माल, अर्द्धनिर्मित माल और तैयार माल की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार वस्तु के निर्माण की प्रक्रिया में उत्पादक नल तंत्र के बीच जितनी भी वस्तुएं होती हैं उसे ही माल भण्डार में निवेश करते हैं। यदि ये निवेश न किया जाये तो उत्पादन की प्रक्रिया बन्द हो जाती है। माल भण्डार के निवेश में निम्नलिखित वस्तुएँ शामिल की जाती है –

  1. उत्पादक और विक्रेताओं के पास निर्मित वस्तुएं।
  2. उत्पादन पाइप लाइन में अर्द्धनिर्मित वस्तुएं।
  3. उत्पादकों के पास कच्चा माल।

माल भण्डार धनात्मक भी हो सकता है और ऋणात्मक भी, यदि उपभोग उत्पादित वस्तुओं की मात्रा से अधिक हो तो भण्डार निवेश ऋणात्मक होगा। यदि उत्पादित वस्तुएं उपभोग की मात्रा से अधिक हैं तो माल भण्डार धनात्मक होगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय आय के आंकलन की उत्पादन और आय विधियां समझाइए।
उत्तर:
राष्ट्रीय आय के आंकलन की उत्पादन विधि:
उत्पादन विधि से राष्ट्रीय आय की गणना में निम्नलिखित चरणों का प्रयोग किया जाता है –
(I) आर्थिक इकाइयों का वर्गीकरण:
अर्थव्यवस्था की सभी उत्पादक इकाइयों को तीन क्षेत्रों-प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र में बांटते हैं। इन क्षेत्रों को विभिन्न उपक्षेत्रों में बांटा जाता है।

(II) बाजार कीमतो पर सकल उत्पादन मूल्य की गणना करना:
एक लेखा वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की बाजार कीमतों को सकल उत्पादन मूल्य कहते हैं। बाजार कीमतवे पर सकल उत्पादन मल्वा की गणला उत्तरदा-मूल्य लेहत वर्ष में बाजार कीमत पर उत्पादन मूल्य = उत्पादन की मात्रा × प्रति इकाई बाजार कीमत। सभी उत्पादक इकाइयों के उत्पादन मूल्य को जोड़कर पूरी अर्थव्यवस्था के लिए बाजार कीमतों पर सकल उत्पादन मूल्य की गणना की जाती है।

(III) अन्तर्वती/मध्यवर्ती उपभोग:
उत्पादक इकाइयां अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रयोग करती हैं। इस प्रकार की वस्तुओं के प्रयोग को मध्यवर्ती उपभोग कहते हैं। सभी उत्पादक इकाइयों के मध्यवर्ती उपभोग को जोड़कर पूरी अर्थव्यवस्था का मध्यवर्ती उपभोग ज्ञात कर लिया जाता है।

(IV) बाजार कीमतों पर सकल मूल्य वृद्धि:
बाजार कीमतों पर सकल उत्पादन मूल्य के आंकड़ों में से मध्यवर्ती उपभोग घटाकर बाजार कीमतों पर सकल मुल्य वृद्धि की गणना की जाती है। यह अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य या बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद के समान होती है।

(V) साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि (NVA at fc) या साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद (NVA at fc) या घरेलू साधन आय घरेलू साधन आय ज्ञात करने के लिए बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद में से स्थायी पूंजी का उपभोग व शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाते हैं।
घरेलू साधन आय = बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद-स्थायी पूंजी का उपभोग,-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर, अथवा,
घरेलू साधन आय = बाजार कीमतों पर सकल उत्पादन मूल्य-मध्यवर्ती उपभोग-स्थायी पूंजी का उपभोग-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर

(VI) राष्ट्रीय आय:
घरेलू साधन आय अथवा साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि में विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय जोड़कर राष्ट्रीय आय ज्ञात की जाती है।
राष्ट्रीय आय = घरेलू साधन आय + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय अथवा,
राष्ट्रीय आय = साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय अथवा,
राष्ट्रीय आय = बाजार कीमतों पर सकल उत्पादन मूल्य-मध्यवर्ती उपभोग-स्थायी पूंजी उपभोग-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय आय विधि से राष्ट्रीय आय-आय विधि से राष्ट्रीय आय की गणना में निम्नलिखित चरणों का प्रयोग किया जाता है। सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की उत्पादन प्रक्रिया में सृजित आय के योग को राष्ट्रीय आय कहते हैं –

1. कर्मचारियों का पारिश्रमिक:
श्रमिक वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करने के लिए अपनी शारीरिक एवं मानसिक सेवाएं प्रदान करते हैं। श्रमिकों की सेवाओं के बदले उन्हें नकद, किस्म या सामाजिक सुरक्षा के रूप में भुगतान दिया जाता है। श्रमिकों को दिए गए सभी भुगतानों के योग को कर्मचारियों का पारिश्रमिक कहते हैं।

2. लगान:
भूमि की सेवाओं के बदले भूमिपतियों को दिए जाने वाले भुगतान को लगान या किराया कहते हैं।

3. ब्याज:
पूंजी के प्रयोग के बदले पूंजीपतियों को किए गए भुगतान को ब्याज कहते हैं। इसमें परिवारों को प्राप्त शुद्ध ब्याज को शामिल किया जाता है। शुद्ध ब्याज की गणना करने के लिए परिवारों द्वारा प्राप्त ब्याज में से उनके द्वारा किए गए ब्याज भुगतानों को घटाते हैं।

4. लाभ:
उत्पादन प्रक्रिया के जोखिमों व अनिश्चिताओं को वहन करने के प्रतिफल को लाभ कहते हैं।

5. घरेलू साधन आय:
घरेलू साधन आय की गणना करने के लिए कर्मचारियों के पारिश्रमिक, लगान, ब्याज एवं लाभ का योग करते हैं। घरेलू साधन आय = कर्मचारियों का पारिश्रमिक + लगान + ब्याज + लाभ + मिश्रित आय (अनिगमित उद्यमों की आय जिसमें कर्मचारियों के पारिश्रमिक, लगान, ब्याज व लाभ को अलग बाँटना मुश्किल होता है)

6. राष्ट्रीय आय:
घरेलू साधन आय में विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय को जोड़कर राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है। राष्ट्रीय आय = घरेलू साधन आय + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय

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प्रश्न 2.
परिभाषा करें –

  1. बाजार कीमतों पर जी.एन.पी. (बाजार कीमतों पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद)।
  2. बाजार कीमतों पर एन.एन.पी. (बाजार कीमतों पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद)।
  3. साधन लागत पर जी.एन.पी. (साधन लागत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद)।
  4. साधन लागत पर एन.एन.पी. (साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद)।

उत्तर:
1. बाजार कीमतों पर जी.एन.पी. (GNP at mp):
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा में उत्पादित सभी अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं के बाजार कीमतों पर मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग को बाजार कीमतों पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं।
बाजार कीमतों पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद = बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय।

2. बाजार कीमतों पर एन.एन.पी. (NNP at mp):
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा में उत्पादित सभी अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग में से स्थायी पूंजी का उपभोग घटाने पर प्राप्त बाजार कीमतों को शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं।
अथवा बाजार कीमतों पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= बाजार कीमतों पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद-स्थायी पूंजी का उपभोग अथवा बाजार कीमतों पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद
= विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय-स्थान पूंजी का उपभोग

3. साधन लागत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP at fc):
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा में उत्पादित सभी अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग में शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाने पर प्राप्त साधन लागत पर शुद्ध उत्पाद कहते हैं।
अथवा साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर

4. साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP at fc):
एक लेखा वर्ष में देश की घरेलू सीमा में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग में से स्थायी पूंजी का उपभोग एवं शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाने पर साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन कहते हैं।
अथवा साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर-स्थायी पूंजी का उपभोग अथवा साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय

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प्रश्न 3.
साधन बाजार में विभिन्न क्षेत्रों के बीच आय और व्यय के चक्रीय प्रवाह को चित्रांकित कीजिए अथवा आय व्यय के चक्रीय प्रवाह को दर्शाइए।
उत्तर:
दो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में परिवार व फर्म दो क्षेत्र होते हैं। परिवार साधन आगतों भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम के स्वामी होते हैं फर्म परिवार क्षेत्र से इन साधन सेवाओं को क्रय करती है। दूसरे शब्दों में फर्म साधन आगतों के प्रतिफलों, लगान, ब्याज, मजदूरी व लाभ का भुगतान परिवार क्षेत्र को करती है। अर्थात् फर्म साधन सेवाओं का भुगतान करने के लिए मुद्रा व्यय करती है। इस प्रकार फर्म से परिवार की ओर मुद्रा के रूप में परिवार क्षेत्र को प्राप्त होते हैं। परिवार इस प्राप्त आय को वस्तुओं एवं सेवाओं का उपभोग करने के लिए व्यय करती है। इस प्रकार अर्थ व्यवस्था के दोनों क्षेत्र क्रेता एवं विक्रेता दोनों की भूमिका निभाते हैं इसलिए दोनों क्षेत्रों के बीच प्रवाह निरन्तर चलता है। इसे निम्नांकित चित्र से भी दर्शाया जा सकता है –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 9

प्रश्न 4.
द्विक्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के चक्रीय प्रवाह में वित्त क्षेत्र का समावेश होने पर आय और व्यय के चक्रीय प्रवाह को दर्शाइए।
उत्तर:
किसी अर्थव्यवस्था में विभिन्न वित्तीय संस्थाओं जैसे व्यापारिक बैंक, बीमा कंपनिया आदि को वित्तीय क्षेत्र या पूंजी बाजार कहते हैं। वित्तीय बाजार बचत करने वालों, निवेश करने वालों अथवा ऋण प्रदान करने वालों के बीच बिचौलिए का काम करता है। वास्तव में परिवार एवं उत्पादक दोनों क्षेत्र अपनी सम्पूर्ण आय को खर्च नहीं करते हैं। परिवार साधन आय में से कुछ बचत करते हैं। इसी प्रकार उत्पादक वस्तुओं एवं सेवाओं की बिक्री से प्राप्त आगम में से कुछ बचत करते हैं। कुछ फर्मों निवेश करने के लिए मुद्रा की मांग भी करती हैं।

अतः वित्तीय क्षेत्र को परिवार व उत्पादक के बीच मध्यवस्थ की भूमिका निभानी पड़ती है। वित्तीय संस्थाएँ उन परिवारों एवं फर्मों को जिनके पास अधिशेष आय होती है, बचत करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं तथा उनकी बचतों को अपने यहाँ जमा करवाती हैं। दूसरी ओर वित्तीय संस्थाएँ परिवारों एवं उद्यमों को उधार लेने अथवा फर्मों को निवेश करने के लिए भी प्रेरित करती हैं। इन क्षेत्रों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह ठीक उसी प्रकार होता है जैसे बिना वित्त क्षेत्र के समावेश के। लेकिन वहाँ परिवार एवं उद्यमों की बचतों को सुन्न मान लिया जाता है।Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 10

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प्रश्न 5.
निम्न पर टिप्पणी कीजिए –

  1. निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से उपार्जित आय।
  2. निजी आय।
  3. वैयक्तिक आय।
  4. वैयक्तिक प्रयोज्य आय।

उत्तर:
1. निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से उपार्जित आय:
घरेलू साधन आय में निजी व सरकारी दोनों क्षेत्रों की उपार्जित आय सम्मिलित होती है। सार्वजनिक क्षेत्र की उपार्जित आय में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रशासनिक विभागों की आय एवं गैर विभागीय उद्यमों की बचत को शामिल करते हैं। निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से अपार्जित आय ज्ञात करने के लिए घरेलू साधन आय में से सार्वजनिक क्षेत्र की उपार्जित आय घटाती जाती है। संक्षेप में निजी क्षेत्र की उपार्जित आय = घरेलू साधन आय प्रशासनिक विभागों की उद्यम वृत्ति एवं संपत्ति की आय-गैर विभागीय उद्यमों की बचतें

2. निजी आय:
निजी क्षेत्र को एक लेखा वर्ष में सभी स्रोतों से जितनी आय प्राप्त होती है, उसे निजी आय कहते हैं। निजी क्षेत्र में उपार्जित एवं गैर उपार्जित दोनों प्रकार की आय प्रवाहित होती है। निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से उपार्जित आय एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय निजी आय के उपार्जित घटक हैं तथा सरकार से चालू अन्तरण, शेष विश्व से शुद्ध चालू अन्तरण एवं राष्ट्रीय ऋणों पर ब्याज गैर उपार्जित आय के रूप में निजी क्षेत्र को प्रवाहित होते हैं। संक्षेप में निजी आय = निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से उपार्जित आय -विदेशों से शुद्ध साधन आय + सरकार से चालू अन्तरण – राष्ट्रीय ऋणों पर ब्याज

3. वैयक्तिक आय:
निजी आय का वह भाग जो परिवार क्षेत्र की ओर प्रवाहित होता है उसे वैयक्तिक आय कहते हैं। निजी आय का सम्पूर्ण भाग परिवारों की ओर प्रवाहित नहीं होता है। निजी आय का कुछ भाग सरकार को निगम कर के रूप में प्रवाहित होता है तथा कुछ भाग निजी उत्पादक क्षेत्र के पास निगमित बचत के रूप में रह जाता है।
अत: वैयक्तिक आय = निजी आय-निगम कर-निगमित बचत

4. वैयक्तिक प्रयोज्य आय:
निजी आय का वह भाग जिसे परिवार स्वेच्छापूर्वक उपभोग या बचत के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, वैयक्तिक प्रयोज्य आय कहलाता है। परिवार वैयक्तिक आय का सम्पूर्ण भाग स्वेच्छापूर्वक प्रयोग नहीं कर सकते हैं। कुछ भाग उन्हें इच्छा के विरुद्ध प्रत्यक्ष करों, दण्ड, जुर्माना आदि के भुगतान पर खर्च करना पड़ता है। संक्षेप में वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-प्रत्यक्ष कर-दण्ड/जुर्माना आदि

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प्रश्न 6.
दिखाइए कि मूल्य वृद्धि का योग साधन आयों के योग के समान किस प्रकार हो जाता है?
उत्तर:
मल्य वद्धि-फर्म गैर साधन आगतों की उपयोगिता बढाने के लिए साधन आगतों भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम की सेवाएं क्रय करती है। साधन आगतों की सेवाओं पर किया गया व्यय साधन भुगतान कहलाता है। साधन भुगतान को ही साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि कहते हैं। साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि की गणना करने के लिए उत्पादन मूल्य में से मध्यवर्ती उपभोग, स्थायी पूंजी का उपभोग एवं शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाते हैं।
साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि = उत्पादन मूल्य-मध्यवर्ती उपभोग-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर-स्थायी पूंजी का उपभोग अथवा = साधन भुगतान

साधन आय:
उत्पादन साधन भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम अपनी सेवाएं उत्पादन प्रक्रिया में फर्म को बेचती है। उनकी सेवाओं के बदले साधनों के मालिकों को जितनी-जितनी आय प्राप्त होती है उनके योग को साधनों की आयों का योग कहते हैं।

उपयुक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि फर्म साधनों की सेवाओं के प्रयोग के बदले उनके भुगतान पर जितना व्यय करती है ठीक उतनी ही राशि साधनों के मालिकों को आय के रूप में प्राप्त होती है। इसलिए साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि साधन आयों के योग के बराबर होती है।

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प्रश्न 7.
विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय की परिभाषा दीजिए और इसके संघटक बताइए।
उत्तर:
शेष विश्व से निवासियों द्वारा प्राप्त साधन-आय में से गैर-निवासियों को दिए गए साधन-भुगतान को घटाने पर हमें विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय प्राप्त होती है। शेष विश्व से शुद्ध साधन आय = निवासियों द्वारा शेष विश्व से प्राप्त साधन आय-गैर-निवासियों को दी जाने वाली साधन आय।
शेष विश्व से शुद्ध साधन आय के संघटक निम्नलिखित हैं –

  1. कर्मचारियों का शुद्ध पारिश्रमिक।
  2. शेष विश्व से शुद्ध सम्पत्ति व उद्यमवृत्ति से प्राप्त आय।
  3. विदेशों में निवासी कंपनियों द्वारा शुद्ध प्रतिधारित आय।

1. कर्मचारियों का शुद्ध पारिश्रमिक:
इसके अन्तर्गत एक देश के निवासी कर्मचारियों द्वारा विदेशों में प्राप्त पारिश्रमिक में से गैर-निवासी कर्मचारियों को दिए गए पारिश्रमिक को घटाया जाता है।
कर्मचारियों का शुद्ध पारिश्रमिक = विदेशों में निवासी कर्मचारियों द्वारा प्राप्त पारिश्रमिक – गैर निवासी कर्मचारियों को दिया गया पारिश्रमिक

2. शेष विश्व से शुद्ध सम्पत्ति व उद्यमवृत्ति से प्राप्त आय:
यह एक देश के निवासियों द्वारा किराया, ब्याज, लाभांश और लाभ के रूप में प्राप्त आय तथा इस प्रकार के शेष विश्व को किए गए भुगतान का अन्तर है। इसमें सरकार द्वारा विदेशी-ऋण पर दिया गया ब्याज भी
शामिल है।

3. विदेशों में निवासी कंपनियों द्वारा शुद्ध प्रतिधारित आय:
प्रतिधारित आय से तात्पर्य कंपनियों के अवितरित लाभ से है। विदेशों में काम करने वाली घरेलू कम्पनियों की प्रतिधारित आय और देश में विदेशी कम्पनियों की प्रतिधारित आय का अन्तर विदेशों में निवासी कम्पनियों की शुद्ध प्रतिधारित आय कहलाती है। निवासी कंपनियों की शुद्ध प्रतिधारित आय = विदेशों में निवासी कम्पनियों द्वारा प्रतिधारित आय-गैर-निवासी कम्पनियों की प्रतिधारित आय।

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प्रश्न 8.
चार क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह समझाइए।
उत्तर:
आधुनिक अर्थव्यवस्था चार क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था हैं। चार क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में अधिक जटिलता पाई जाती है। इस प्रतिमान में परिवार, फर्म, सरकार व विदेशों को शामिल किया जाता है। परिवारों व फर्मों के बीच प्रवाह द्वि-क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था की ही तरह होता है। फर्म, परिवार व सरकार के मध्य प्रवाह त्रि-क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था के समान होता है। शेष विश्व के साथ प्रवाह का संबंध अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार व पूंजी प्रवाहों के रूप में होता है। एक देश के निर्यात व आयात की सहायता से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उस देश को होने वाले लाभ व हानि की जानकारी प्राप्त होती है।

यदि किसी अर्थव्यवस्था का व्यापार शेष अनुकूल होता है तो उसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में लाभ मिलता है इसके विपरीत यदि व्यापार शेष प्रतिकूल होता है तो उस देश को विदेशों के साथ व्यापार में हानि होती है। परिवार विदेशों से प्रत्यक्ष रूप में वस्तुओं व सेवाओं को खरीदते हैं तथा उनके मौद्रिक मूल्यों का भुगतान करते हैं। विदेश में परिवार क्षेत्र से साधन सेवाएं खरीदी जाती है तथा साधन सेवाओं का मूल्य परिवार क्षेत्र को मिलता है। इसी प्रकार सरकार व उत्पादक क्षेत्र विदेशों से साधन आगतें क्रय करते हैं, उनकी सेवाओं का भुगतान विदेशों को प्रवाहित होता है। चक्रीय प्रवाह को निम्नांकित तरह से भी दर्शाया जा सकता है। वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 part - 1 img 11a

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प्रश्न 9.
तीन क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह समझाइए।
उत्तर:
तीन क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में परिवार क्षेत्र, उत्पादक क्षेत्र के अलावा सरकार का समावेश और हो जाता है। इस प्रकार के प्रतिमान में सरकार अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करती है तथा जन-कल्याण की भावना से वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि करने में सहयोग करती है।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 part - 1 img 12a

भ्रम की स्थिति से बचने के लिए सरकार द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के क्रय-विक्रय प्रवाह को ही शामिल किया जाता है हस्तांतरण भुगतानों के प्रवाह को शामिल नहीं करते हैं। फर्मों की ही तरह सरकार परिवार क्षेत्र से साधन आगतें, भूमि, श्रम, एवं पूंजी क्रय करती है और उनकी सेवाओं का भुगतान परिवार क्षेत्र को दिया जाता है। सरकार फर्मों से जरूरी वस्तुएं एवं सेवाएं क्रय करती है और उनके मौद्रिक मूल्य का प्रवाह सरकार से उत्पादक क्षेत्र की ओर होता है।

फर्म से परिवार वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदते हैं और बदले में उनके मौद्रिक मूल्य का प्रवाह फर्म की ओर होता है। सरकार, फर्म एवं परिवार क्षेत्रों के बीच विभिन्न प्रकार के हस्तांतरण भुगतानों जैसे-कर, आर्थिक सहायता आदि का प्रवाह भी होता है। त्रि-क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह निम्नलिखित चित्र के द्वारा भी दर्शाया जा सकता है।

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प्रश्न 10.
दोहरी गणना की समस्या को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए। तथा बताइए कि दोहरी गणना की समस्या से किस प्रकार बच सकते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय आय की गणना के लिए जब किसी वस्तु या सेवा के मूल्य की गणना एक से अधिक बार होती है तो उसे दोहरी गणना कहते हैं। दोहरी गणना के फलस्वरूप राष्ट्रीय आय बहुत अधिक हो जाती है। दोहरी गणना की समस्या को निम्न उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है मान लीजिए एक किसान 500 रु. के गेहूँ का उत्पादन करता है और उसे आटा मिल को बेच देता है। आटा मिल द्वारा गेहूँ की खरीद मध्यवर्ती उपभोग पर व्यय है। आटा-मिल गेहूँ से
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 part - 1 img 13a

भ्रम की स्थिति से बचने के लिए सरकार द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के क्रय-विक्रय प्रवाह को ही शामिल किया जाता है हस्तांतरण भुगतानों के प्रवाह को शामिल नहीं करते हैं। फर्मों की ही तरह सरकार परिवार क्षेत्र से साधन आगतें, भूमि, श्रम, एवं पूंजी क्रय करती है और उनकी सेवाओं का भुगतान परिवार क्षेत्र को दिया जाता है।

सरकार फर्मों से जरूरी वस्तुएं एवं सेवाएं क्रय करती है और उनके मौद्रिक मूल्य का प्रवाह सरकार से उत्पादक क्षेत्र की ओर होता है। फर्म से परिवार वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदते हैं और बदले में उनके मौद्रिक मूल्य का प्रवाह फर्म की ओर होता है। सरकार, फर्म एवं परिवार क्षेत्रों के बीच विभिन्न प्रकार के हस्तांतरण भुगतानों जैसे-कर, आर्थिक सहायता आदि का प्रवाह भी होता है। त्रि-क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह निम्नलिखित चित्र के द्वारा भी दर्शाया जा सकता है।

आंकिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्न आंकड़ों के आधार पर फर्म (A) तथा फर्म (B) द्वारा की गई मूल्य वृद्धियों का आंकलन करें –Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 14

उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 15

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 राष्ट्रीय आय का लेखांकन

प्रश्न 2.
निम्न आंकड़ों के आधार पर फर्म (X) तथा फर्म (Y) की मूल्य वृद्धि आकलित करें –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 16

उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 17

प्रश्न 3.
साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 18

उत्तर:
साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि = बिक्री + (अन्तिम स्टॉक – आरम्भिक स्टॉक) कच्चे माल की खरीद – (अप्रत्यक्ष कर आर्थिक सहायता) – घिसावट
= 750 + (10 – 15) – 300 – (75 – 0) – 125
= 750 – 5 – 300 – 75 – 125
= 750 – 380 – 125
= 245 रु.

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित आंकड़ों से प्रचालन – अधिशेष की गणना कीजिए –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 19

उत्तर:
प्रचालन अधिशेष = बाजार कीमत पर सकल मूल्य वृद्धि – स्थायी पूंजी का उपभोग – अप्रत्यक्ष कर + आर्थिक सहायता – मजदूरी और वेतन
= 7000 – 400 – 700 + 100 – 3000
= 7100 – 4100
= 3000 करोड़ रु.

प्रश्न 5.
कर्मचारियों का पारिश्रमिक ज्ञात कीजिए –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 20

उत्तर:
कर्मचारियों का पारिश्रमिक = साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद – किराया ब्याज – लाभ – घिसावट –
= 250 – 20 – 35 – 15 – 60
= 250 – 130
= 120 करोड़ रु.

प्रश्न 6.
इन आंकड़ों का प्रयोग करें और (क) व्यय विधि तथा (ख) आय विधि से शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद का आंकलन करें –Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 21

उत्तर:
(क) व्यय विधि –
शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (कारक लागत पर) = निजी अन्तिम उपभोग + सकल व्यावसायिक स्थिर निवेश + सकल गृह निर्माण निवेश-सकल सार्वजनिक निवेश + भण्डार निवेश + सरकार द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद + निर्यात – आयात + विदेशों से शुद्ध साधन आय – मूल्यह्रास – सहायता – अप्रत्यक्ष कर
= 700 + 60 + 60 + 40 + 20 + 200 + 40 – 20 – 20 + (-10) – 10 + 20
= 700 + 440 – 20 – 10 – 10
= 1140 – 60
= 1080 लाख रुपये

(ख) आय विधि शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (कारक लागत पर) –
= मजदूरी व वेतन + सामाजिक सुरक्षा हेतु रोजगारदाताओं का अंशदान + लाभ + लगान/भाड़ा + ब्याज + मिश्रित आय + विदेशों से शुद्ध साधन आय
= 700 + 100 + 100 + 50 + 40 + 100 + (-10) = 1090 – 10
= 1080 लाख रुपये

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प्रश्न 7.
निम्न जानकारी का प्रयोग कर (क) व्यय विधि (ख) आय विधि से साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद (GDPfc) का आंकलन करें –Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 22

उत्तर:
(क) व्यय विधि
साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद –
(GDpfc) = वैयक्तिक उपभोग व्यय + सकल व्यावसायिक स्थिर निवेश + सकल गृह निर्माण निवेश + वस्तुओं व सेवाओं की सरकारी खरीदारी + सकल सरकारी निवेश + भण्डार निवेश + निर्यात – आयात – अप्रत्यक्ष कर + सहायय्य
= 700 + 60 + 60 + 200 + 40 + 20 + 40 – 20 – 20 + 10
= 1130 – 40
= 1090 लाख रुपये

(ख) आय विधि
साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद –
(GDPfc) = मजदूरी वेतन + रोजगारदाताओं का सामाजिक सुरक्षा में योगदान + लाभ + लगान + ब्याज + मिश्रित आय + मूल्य ह्रास
= 700 + 100 + 100 + 50 + 50 + 100 + 20
= 1120 लाख रुपये

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प्रश्न 8.
निम्न आंकड़ों से बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद का आंकलन करें –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 23
उत्तर:
बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद = प्राथमिक क्षेत्र के उत्पादन का मूल्य द्वितीयक क्षेत्र का अन्तर्वर्ती उपभोग व प्राथमिक क्षेत्र का अन्तर्वर्ती उपभोग + सेवा क्षेत्र के उत्पादन का मूल्य + द्वितीयक क्षेत्र के उत्पादन का मूल्य – सेवा क्षेत्र का अन्तर्वर्ती उपभोग –
= 2000 – 800 – 1000 + 1400 + 1800 – 600
= (2000 + 1400 + 1800) – (800 – 1000 – 600)
= 5200 – 2400
= 2800 लाख रुपये

प्रश्न 9.
परिचालन अधिशेष ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 24
उत्तर:
परिचालन अधिशेष
= बाजार कीमत पर सकल मूल्य वृद्धि – वेतन एवं मजदूरी – शुद्ध अप्रत्यक्ष कर – घिसावट –
= 15000 – 5000 – 750 – 250
= 15000 – 6000
= 9000 रु.

प्रश्न 10.
निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से (क) आय विधि द्वारा बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद (ख) व्यय विधि द्वारा राष्ट्रीय आय ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 25
उत्तर:
(क) आय विधि द्वारा बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद –
= कर्मचारियों का पारिश्रमिक + लगान, ब्याज, लाभ + मिश्रित आय + स्थिर पूंजी का उपभोग + अप्रत्यक्ष कर – आर्थिक सहायता
= 240 + 100 + 280 + 40 + 90 – 90
= 740 करोड़ रु.
उत्तर:
बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद = 740 करोड़ रु.

(ख) व्यय विधि से राष्ट्रीय आय –
= निजी अन्तिम उपभोग + सरकारी अन्तिम उपभोग + सकल अचल पूंजी निर्माण + स्टॉक में परिवर्तन + निर्यात – आयात + विदेशों से शुद्ध साधन आय — अप्रत्यक्ष कर + आर्थिक सहायता – स्थिर पूंजी का उपभोग
= 510 + 75 + 130 + 35 + 50 – 60 – 5 – 90 + 10 – 40
= 615 करोड़
उत्तर:
राष्ट्रीय आय = 615 करोड़ रु.

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प्रश्न 11.
निम्न आंकड़ों से (क) बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद (ख) राष्ट्रीय आय ज्ञात करो –Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 26
उत्तर:
(क) बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद –
= निजी उपभोग व्यय + सरकारी अन्तिम उपभोग व्यय + शुद्ध घरेलू अंचल पूंजी निर्माण + स्थिर पूंजी का उपभोग + अन्तिम स्टॉक – शुद्ध आयात
= 300 + 70 + 30 + 40 + 10 – 25 – 15
= 410 करोड़ रु.

(ख) राष्ट्रीय आय –
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद + अनुदान-अप्रत्यक्ष कर-स्थिर पूंजी का उपभोग + विदेशों से शुद्ध साधन आय
= 410 + 5 – 50 – 40 + (-20)
= 305 करोड़ रु.
उत्तर:
(क) 410 करोड़ रुपये
(ख) 305 करोड़ रुपये

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प्रश्न 12.
निम्नलिखित आंकड़ों का प्रयोग करके राष्ट्रीय आय की गणना करो –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 27

उत्तर:
(क) बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद –
= सरकारी अन्तिम उपभोग व्यय + अन्तिम स्टॉक आरंभिक स्टॉक + सकल अचल पूंजी निर्माण + निजी अन्तिम उपभोग व्यय + निर्यात – आयात
= 150 + 100 – 80 + 130 + 600 + 60 – 70
= 890 करोड़ रु.

(ख) राष्ट्रीय आय –
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद – अचल पूंजी का उपभोग + विदेशों से शुद्ध साधन आय – अप्रत्यक्ष कर + अनुदान
= 890 – 20 + (-10) – 70 + 10
= 800 करोड़ रु.
उत्तर:
राष्ट्रीय आय = 800 करोड़ रुपये

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प्रश्न 13.
व्यय विधि तथा आय विधि से राष्ट्रीय आय ज्ञात करो –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 28
उत्तर:
व्यय विधि –
राष्ट्रीय आय = (ii) – (iii) + (iv) + (vii) + (viii) – (ix) + (x) + (xi) – (xii) + (xiii)
= 3800 – 3800 + 6300 + 1000 + 1700 – 1700 + 29000 + 300 – 2200 + 300
= 34700 करोड़ रु.

आय विधि –
राष्ट्रीय आय = कर्मचारियों का पारिश्रमिक + प्रचालन अधिशेष + मिश्रित आय + विदेशों से शुद्ध साधन आय
= 13300 + 5000 + 16000 + 300
= 34600 करोड़ रु.
उत्तर:
आय विधि से राष्ट्रीय आय = 34600 करोड़ रुपये व्यय विधि से राष्ट्रीय आय = 34700 करोड़ रुपये

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प्रश्न 14.
निम्नलिखित आंकड़ों का प्रयोग करके ज्ञात करें –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 29

1. घरेलू आय
= लगान + मजदूरी + ब्याज + लाभकर + लाभांश + मिश्रित आय + अवितरित लाभ
= 5000 + 30000 + 8000 + 2000 + 12000 + 4000 + 3000
= 64000 करोड़ रु.

2. राष्ट्रीय आय = घरेलू आय + विदेशों से शुद्ध साधन आय
= 64000 + 7000
= 71000 करोड़ रु.

3. वैयक्तिक आय = राष्ट्रीय आय – अधिशेष (सरकारी) – लाभकर – अवितरित लाभ + अंतरण भुगतान + उपहार व प्रेषणाएं
= 64000 – 15000 – 2000 – 3000 + 1000 + 2500
= 47500 करोड़ रु.

4. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय – वैयक्तिक कर
= 47500 – 1500 = 46000 करोड़ रु.
उत्तर:

  1. घरेलू आय = 64000 करोड़ रु.
  2. राष्ट्रीय आय = 71000 करोड़ रु.
  3. वैयक्तिक आय = 47500 करोड़ रु.
  4. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = 46000 करोड़ रु.

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प्रश्न 15.
निम्नलिखित आंकड़ों का प्रयोग करके ज्ञात करें –

  1. साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
  2. वैयक्तिक आय
  3. वैयक्तिक प्रयोज्य आय

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 30
उत्तर:
1. राष्ट्रीय आय = बाजार कीमत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद + शेष विश्व से शुद्ध साधन आय-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर
= 38000 + (-300) – 3000
= 34700 करोड़ रु.

2. वैयक्तिक आय = राष्ट्रीय आय-सरकारी प्रशासनिक विभागों की आय-कम्पनी लाभकर + राष्ट्रीय ऋण पर बयाज + शेष विश्व से चालू अंतरण + सरकार से वृद्धावस्था पेंशन
= 34700 – 600 – 600 + 200 + 100 + 600
= 34400 करोड़ रु.

3. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय – वैयक्तिक प्रत्यक्ष कर
= 34400 – 900
= 33500 करोड़ रु.
उत्तर:

  1. राष्ट्रीय आय = 34700 करोड़ रु.
  2. वैयक्तिक आय = 34400 करोड़ रु.
  3. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = 33500 करोड़ रु.

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामूहिक आर्थिक क्रियाकलापों को मापने का आधार होता है –
(A) आय का चक्रीय प्रवाह
(B) स्टॉक में परिवर्तन
(C) शुद्ध निवेश
(D) विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय
उत्तर:
(A) आय का चक्रीय प्रवाह

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प्रश्न 2.
विभिन्न उत्पादक इकाइयों की मूल्य वृद्धि ज्ञात करने के लिए शामिल करते हैं –
(A) केवल मध्यवर्त वस्तुओं का मूल्य
(B) अन्तिम वस्तुओं व सेवाओं का मूल्य
(C) केवल अन्तिम वस्तुओं का मूल्य
(D) सभी वस्तु का मूल्य
उत्तर:
(B) अन्तिम वस्तुओं व सेवाओं का मूल्य

प्रश्न 3.
GNP अपसायक माप सकता है –
(A) विशिष्ट वस्तुओं व सेवाओं का औसत कीमत स्तर
(B) सभी वस्तुओं व सेवाओं का औसत कीमत स्तर
(C) कीमत वृद्धि
(D) कीमत में कमी
उत्तर:
(B) सभी वस्तुओं व सेवाओं का औसत कीमत स्तर

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प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आय तथा घरेलू साधन आय समान होती है जब –
(A) विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय शून्य हो
(B) शुद्ध निर्यात शून्य हो
(C) विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय ऋणात्मक हो
(D) शुद्ध निर्यात धनात्मक हो
उत्तर:
(A) विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय शून्य हो

प्रश्न 5.
वित्तीय परिसंपत्तियों की खरीद-फरोख्त को –
(A) GNP में शामिल किया जाता है
(B) GNP में शामिल नहीं किया जाता है
(C) A व B में से कोई नहीं
(D) A व B दोनों
उत्तर:
(B) GNP में शामिल नहीं किया जाता है

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प्रश्न 6.
सकल निवेश का भाग निम्न में से कौन-सा नहीं है –
(A) व्यापारिक निवेश
(B) सरकारी निवेश
(C) ग्रह निर्माण निवेश
(D) घरेलू सीमा में पुरानी वस्तुओं का क्रय-विक्रय
उत्तर:
(D) घरेलू सीमा में पुरानी वस्तुओं का क्रय-विक्रय

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय प्रयोज्य आय है –
(A) NNP at mp + विदेशों से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान
(B) GDP + NFIA
(C) NNP at fc + विदेशों से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान
उत्तर:
(A) NNP at mp + विदेशों से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान

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प्रश्न 8.
राष्ट्रीय आय व इसके अवयवों पर पुस्तक लिखी थी –
(A) साइमन कुजनेटस
(B) रिचर्ड स्टोन
(C) जे. एम. कीन्स
(D) डेविड रिकार्डों
उत्तर:
(A) साइमन कुजनेटस

प्रश्न 9.
राष्ट्रीय आय लेखांकन का मानक प्रारूप तैयार कियो था –
(A) रिचर्ड स्टोन ने
(B) साइमन कुजनेटस ने
(C) जे. एम. कीन्स ने
(D) एडम स्मिथ ने
उत्तर:
(A) रिचर्ड स्टोन ने

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प्रश्न 10.
ब्रिटिश भारत में राष्ट्रीय आय लिखी थी –
(A) बी. सी. महालनोविस
(B) डी. आर. गाडगिल
(C) वी. के. आर. वी. राव
(D) अम्बेडकर
उत्तर:
(C) वी. के. आर. वी. राव

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

Bihar Board Class 12 Economics समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
व्यष्टि अर्थशास्त्र और समष्टि अर्थशास्त्र में क्या अंतर है?
उत्तर:
शेष अर्थव्यवस्था को समान मानकर व्यक्तिगत क्षेत्र की कार्य पद्धति का अध्ययन व्यष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है। उदाहरण के लिए वस्तु विशेष की कीमत का निर्धारण, वस्तु विशेष की मांग अथवा पूर्ति आदि व्यष्टि अर्थशास्त्र के विषय हैं। समष्टि अर्थशास्त्र में सामूहिक आर्थिक चरों का अध्ययन किया जाता है। इस शाखा में विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के अन्तर्संबंधों का अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए आय एवं रोजगार का निर्धारण, पूंजी निर्माण, सार्वजनिक व्यय, आदि विषयों का विश्लेषण समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 2.
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताएं –

  1. इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में संसाधनों पर जनता का निजी स्वामित्व होता है।
  2. वस्तु एवं सेवाओं का उत्पादन बाजार में बिक्री के लिए किया जाता है।
  3. बाजार में प्रचलित मजदूरी दर पर श्रम संसाधन का क्रय-विक्रय किया जाता है।
  4. उत्पादक लाभ कमाने के लिए वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करते हैं।
  5. विभिन्न उत्पादक इकाइयों में परस्पर प्रतियोगिता पायी जाती हैं।

प्रश्न 3.
समष्टि अर्थशास्त्र की दृष्टि से अर्थव्यवस्था के चार प्रमुख क्षेत्रकों का वर्णन करें।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था के चार प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

  1. परिवार क्षेत्र
  2. फर्म या उत्पादक क्षेत्र
  3. सामान्य सरकार
  4. विदेशी क्षेत्र

परिवार क्षेत्र से अभिप्राय अर्थव्यवस्था के उन सभी व्यक्तियों से जो उपभोग के लिए वस्तुएँ/सेवाएं खरीदते हैं। इसके परिवार क्षेत्र साधन आगतों जैसे भूमि, श्रम पूँजी एवं उद्यम की आपूर्ति करते हैं। उत्पादक क्षेत्र में उन सभी उत्पादक इकाइयों को शामिल किया जाता है जो साधनों को क्रय करती है, उनका संगठन करती है, उनकी सेवाओं का प्रयोग करके वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादक करती है और बाजार में उनका विक्रय करती है। फर्म का आकार छोटा अथवा बड़ा हो सकता है।

सरकार से अभिप्राय उस संगठन से है जो जनता को सुरक्षा, कानून, मनोरंजन, न्याय, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सेवाएं निःशुल्क या सामान्य कीमत पर प्रदान करता है। सामान्यतः सरकार जनहित के लिए आर्थिक क्रियाओं का संचालन करती है। सरकार लाभ कमाने के लिए आर्थिक क्रियाओं का संचालन नहीं करती है। शेष विश्व से अभिप्राय उन सभी आर्थिक इकाइयों से है जो देश की घरेलू सीमा से बाहर स्थित होती है। शेष विश्व में दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार, विश्व बैंक, विश्व मुद्रा कोष आदि को शामिल किया जाता है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 4.
1929 की महामंदी का वर्णन करें।
उत्तर:
वर्ष 1929 से 1933 की अवधि को महामंदी कहते हैं। इस अवधि में यूरोप व अमेरिका में उत्पादन, रोजगार में भारी कमी उत्पन्न हो गई थी। इस अवधि में वस्तुओं की मांग का स्तर कम था। उत्पादन साधन बेकार पड़े थे। श्रम शक्ति को भारी संख्या में कार्य क्षेत्र से बाहर कर दिया गया था। अमेरिका में बेरोजगारी का स्तर 3% से बढ़कर 25% हो गया था।

लगभग विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाएँ अभावी मांग की समस्या एवं मुद्रा अवस्फीति की समस्याओं से ग्रस्त थीं। आर्थिक महामंदी के काल में अर्थशास्त्रियों को समूची अर्थव्यवस्था को एक इकाई मानकर अध्ययन करने के लिए विवश कर दिया। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि महामंदीकाल की समस्याओं के परिणामस्वरूप ही समष्टि अर्थशास्त्र का उदय हुआ।

Bihar Board Class 12 Economics समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अर्थशास्त्र के दो विषय क्या हैं?
उत्तर:
अर्थशास्त्र अध्ययन के निम्नलिखित दो विषय हैं –

  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र, तथा
  2. समष्टि अर्थशास्त्र

प्रश्न 2.
व्यष्टि अर्थशास्त्र में किन समस्याओं का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र में विशिष्ट अथवा व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 3.
समष्टि अर्थशास्त्र में किन आर्थिक इकाइयों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
सामूहिक या वृहत स्तर पर आर्थिक चरों का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।

प्रश्न 4.
पूर्ण रोजगार का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वह स्थिति जिसमें सभी इच्छुक व्यक्तियों को उनकी रुचि एवं योग्यतानुसार प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य करने का अवसर प्राप्त हो जाता है पूर्ण रोजगार की स्थिति कहलाती है।

प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र की उस शाखा का नाम लिखो जो समष्टि आर्थिक चरों का अध्ययन करती है।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र सामूहिक चरों का अध्ययन करता है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 6.
समष्टि अर्थशास्त्र का विरोधाभास क्या है?
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र का विरोधाभास यह है कि जो बात एक व्यक्तिगत आर्थिक चर के बारे में सत्य होती है आवश्यक नहीं कि सामूहिक आर्थिक चरों के बारे में भी सत्य हो।

प्रश्न 7.
पूरी अर्थव्यवस्था के विश्लेषण का कार्य किससे होता है?
उत्तर:
विभिन्न आर्थिक इकाइयों अथवा क्षेत्रों में घनिष्ठ संबंध के कारण समूची अर्थव्यवस्था का विश्लेषण किया जाता है।

प्रश्न 8.
प्रतिनिधि वस्तु का अर्थ लिखो।
उत्तर:
एक अकेली वस्तु जो अर्थव्यवस्था में उत्पादित सभी वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रतिनिधित्व करती है प्रतिनिधि वस्तु कहलाती है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 9.
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त का अर्थ लिखो।
उत्तर:
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त के अनुसार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रचलित मजदूरी दर पर सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति रहती है।

प्रश्न 10.
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु लिखो।
उत्तर:
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु –

  1. वस्तु की आपूर्ति अपनी मांग की स्वयं जननी होती है।
  2. एक अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति पाई जाती है।

प्रश्न 11.
समष्टि अर्थशास्त्र की एक सीमा बताओ।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में सामूहिक आर्थिक चरों को समरूप माना जाता है जबकि वे वास्तव में समान होते नहीं हैं।

प्रश्न 12.
चार परंपरावादी अर्थशास्त्रियों के नाम लिखो।
उत्तर:
चार परंपरावादी अर्थशास्त्री –

  1. डेविड रिकार्डों
  2. जे. बी. से
  3. जे. एस. मिल तथा
  4. आल्फ्रेड मार्शल

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प्रश्न 13.
जे. एम. कीन्स द्वारा लिखित अर्थशास्त्र की पुस्तक का क्या नाम है?
उत्तर:
प्रो. जे. एम. कीन्स द्वारा लिखित पुस्तक का नाम है General Theory of Employment Interest and Money.

प्रश्न 14.
स्वतंत्र आर्थिक चरों का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वे आर्थिक चर जो दूसरी किसी आर्थिक चर/चरों को प्रभावित करता है स्वतंत्र आर्थिक चर कहलाते हैं। जैसे राष्ट्रीय आय आदि।

प्रश्न 15.
आश्रित आर्थिक चर का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वह आर्थिक चर दूसरे किसी आर्थिक चर से प्रभावित होता है आश्रित चर कहलाता है। जैसे उपभोग, बचत आदि।

प्रश्न 16.
समष्टि अर्थशास्त्र के चरों के उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
समष्टि चरों के उदाहरण –

  1. सामूहिक मांग
  2. सामूहिक पूर्ति
  3. रोजगार
  4. सामान्य कीमत स्तर आदि

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प्रश्न 17.
‘से’ का नियम क्या है?
उत्तर:
‘से’ का नियम बताता है कि किसी वस्तु की आपूर्ति उसकी मांग की स्वयं जननी होती है।

प्रश्न 18.
1929-1933 की अवधि में महामंदी के मुख्य बिन्दु लिखो।
उत्तर:
आर्थिक महामंदीकाल में बाजारों में वस्तुओं की आपूर्ति उपलब्ध थी लेकिन वहाँ मांग की कमी की समस्या थी और बेरोजगारी का स्तर भी बढ़ गया था।

प्रश्न 19.
उस आर्थिक चर का उदाहरण दीजिए जिसे समष्टि स्तर पर स्थिर माना जाता है।
उत्तर:
वस्तुओं के कीमत स्तर को समष्टि स्तर पर स्थिर माना जाता है।

प्रश्न 20.
सामूहिक मांग की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग के योग को कुल मांग/सामूहिक मांग कहते हैं।

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प्रश्न 21.
उपभोग फलन का अर्थ लिखो।
उत्तर:
उपभोग राष्ट्रीय आय का फलन है। दूसरे शब्दों में उपभोग फलन, उपभोग व राष्ट्रीय आय के बीच संबंध को व्यक्त करता है।

प्रश्न 22.
आर्थिक महामंदीकाल (1929-1933) से पूर्व समष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन किस शाखा में किया जाता था?
उत्तर:
आर्थिक महामंदीकाल (1929-1933) से पूर्व अर्थशास्त्र का अध्ययन केवल व्यष्टि अर्थशास्त्र के रूप में किया जाता था।

प्रश्न 23.
समष्टि अर्थशास्त्र का वैकल्पिक नाम लिखिए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र को आय सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न 24.
कीमत सिद्धान्त को और किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
वैकल्पिक तौर पर कीमत सिद्धान्त को व्यष्टि अर्थशास्त्र के नाम से जाना जाता था।

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प्रश्न 25.
दो आश्रित चरों के उदाहरण लिखो।
उत्तर:
आश्रित चरों के उदाहरण –

  1. उपभोग एवं
  2. बचत

प्रश्न 26.
अन्तः क्षेपण का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
वे आर्थिक क्रियाएं जिनसे राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी होती है अन्तः क्षेपण कहलाती हैं। जैसे निवेश, उपभोग आदि।

प्रश्न 27.
बाह्य स्राव का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वे आर्थिक क्रियाएं जिनसे राष्ट्रीय आय में कमी आती है बाह्य स्राव कहलाती है।

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प्रश्न 28.
समष्टि अर्थशास्त्र का उदय किस कारण हुआ?
उत्तर:
केन्द्रीय क्रांति अथवा आर्थिक महामंदी के बाद समष्टि अर्थशास्त्र का उदय हुआ।

प्रश्न 29.
उस आर्थिक चर का नाम लिखो जिसे व्यष्टि स्तर पर स्थिर माना जाता है।
उत्तर:
आय एवं रोजगार स्तर को व्यष्टि पर स्थिर माना जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यष्टि व समष्टि अर्थशास्त्र में अन्तर लिखो।
उत्तर:
व्यष्टि व समष्टि अर्थशास्त्र में अन्तर –

  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक चरों का अध्ययन करता है जबकि समष्टि अर्थशास्त्र सामूहिक स्तर पर आर्थिक चरों का अध्ययन करता है।
  2. व्यष्टि अर्थशास्त्र समझने में सरल है जबकि समष्टि अर्थशास्त्र सापेक्ष रूप से जटिल विषय है।
  3. संसाधनों का वितरण व्यष्टि अर्थशास्त्र का एक आवश्यक उपकरण है लेकिन समष्टि स्तर पर इसे स्थिर माना जाता है।
  4. व्यष्टि अर्थशास्त्र कीमत सिद्धान्त तथा संसाधनों के आबटन पर जोर देता है लेकिन आय व रोजगार समष्टि के मुख्य विषय हैं।

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प्रश्न 2.
समष्टि आर्थिक चरों के उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था को इकाई मानकर सामूहिक आर्थिक चरों का विश्लेषण करता है। समष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र अधिक व्यापक है। निम्नलिखित आर्थिक चरों का इस शाखा में अध्ययन किया जाता है –

  1. सामूहिक मांग
  2. सामूहिक पूर्ति
  3. सकल घरेलू पूंजी निर्माण
  4. स्वायत्त एवं प्रेरित निवेश
  5. निवेश गुणांक
  6. औसत उपभोग एवं बचत प्रवृत्ति
  7. सीमान्त उपभोग एवं बचत प्रवृत्ति
  8. पुंजी की सीमान्त कार्य क्षमता

प्रश्न 3.
संक्षेप में पूर्ण रोजगार की अवधारणा को स्पष्ट करो।
उत्तर:
वह स्थिति जिसमे एक अर्थव्यवस्था में सभी इच्छुक लोगों को दी गई या प्रचलित मजदूरी दर पर योग्यतानुसार आसानी से कार्य मिल जाता है पूर्ण रोजगार कहलाती है। परंपरावादी अर्थशास्त्री जे. बी. से का पूर्ण रोजगार के बारे में अलग विचार था। परंपरावादी रोजगार सिद्धान्त के अनुसार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है क्योंकि प्रचलित मजदूरी पर काम करने के इच्छुक सभी व्यक्तियों को आसानी से काम मिल जाता है।

जे. एम. कीन्स के अनुसार आय के सन्तुलन स्तर पर रोजगार स्तर को साम्य रोजगार स्तर कहते हैं। आवश्यक रूप से साम्य रोजगार का स्तर पूर्ण रोजगार स्तर के समान नहीं होता है। साम्य रोजगार का स्तर यदि पूर्ण रोजगार स्तर से कम होता है तो अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की समस्या रहती है। परंपरावादी अर्थशास्त्री साम्य रोजगार को ही पूर्ण रोजगार कहते थे।

प्रश्न 4.
व्यष्टि अर्थशास्त्र की अवधारणा को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध विशिष्ट या व्यक्गित आर्थिक चरों से है। दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र की इस शाखा में विशिष्ट आर्थिक इकाइयों या व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र की व्यष्टि शाखा में उपभोक्ता सन्तुलन, उत्पादक सन्तुलन, साम्य कीमत निर्धारण, एक वस्तु की मांग, एक वस्तु की पूर्ति आदि विषयों का अध्ययन किया जाता है। आर्थिक महामंदी से पूर्व अर्थशास्त्र के रूप में केवल व्यष्टि अर्थशास्त्र का ही अध्ययन किया जाता है। व्यष्टि अर्थशास्त्र को कीमत-सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है।

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प्रश्न 5.
समष्टि अर्थशास्त्र की अवधारणा संक्षेप में स्पष्ट करो।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र का संबंध सामूहिक या समष्ट्रीय आर्थिक चरों से हैं। दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र की इस शाखा में सामूहिक या समष्टि आर्थिक चरों का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र की समष्टि शाखा में आय एवं रोजगार निर्धारण, पूँजी निर्माण, सार्वजनिक व्यय, सरकारी व्यय, सरकारी बजट, विदेशी व्यापार आदि विषयों का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र ही इस शाखा का उदय आर्थिक महामंदी के बाद हुआ है। इस शाखा को आय एवं रोजगार सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न 6.
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त समझाइए।
उत्तर:
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त का प्रतिपादन परंपरावादी अर्थशास्त्रियों ने किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति को प्रचलित मजदूरी पर उसकी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार आसानी से काम मिल जाता है। दूसरे शब्दों में प्रचलित मजदूरी दर पर अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है। काम करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए दी गई मजदूरी दर पर बेरोजगारी की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती है। रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त को बनाने में डेविड रिकार्डो, पीगू, मार्शल आदि व्यष्टि अर्थशास्त्रियों ने योगदान दिया है। रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त में जे. बी. से का रोजगार सिद्धान्त बहुत प्रसिद्ध है।

प्रश्न 7.
संक्षेप में अनैच्छिक बेरोजगार को समझाइए।
उत्तर:
यदि दी गई मजदूरी दर या प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने के लिए इच्छुक व्यक्ति को आसानी से कार्य नहीं मिल पाता है तो इस समस्या को अनैच्छिक बेरोजगारी कहते हैं। एक अर्थव्यवस्था में अनैच्छिक बेरोजगारी के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं –

  1. अर्थव्यवस्था में जनसंख्या विस्फोट की स्थिति हो सकती है।
  2. प्राकृतिक संसाधनों की कमी।
  3. पिछड़ी हुई उत्पादन तकनीक।
  4. आधारिक संरचना की कमी आदि।

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प्रश्न 8.
सामूहिक मांग का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
दी गई अवधि में एक अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग के योग को कुल मांग या सामूहिक मांग कहते हैं। अर्थव्यवथा में वस्तुओं की मांग उपभोग तथा निवेश के लिए की जाती है। इस प्रकार वस्तुओं की उपभोग के लिए मांग तथा निवेश के लिए मांग के योग को भी सामूहिक मांग कह सकते हैं। संक्षेप में सामूहिक मांग = उपभोग + निवेश। सामूहिक मांग के संघटको को निम्न प्रकार से भी लिखा जा सकता है –

  1. निजी अन्तिम उपभोग व्यय।
  2. सार्वजनिक अन्तिम उपभोग व्यय।
  3. सकल घरेलू पूंजी निर्माण।
  4. शुद्ध निर्यात।

प्रश्न 9.
वे कारक लिखिए जिन पर कीन्स का रोजगार सिद्धान्त निर्भर करता है।
उत्तर:
कीन्स का आय एवं रोजगर सिद्धान्त निम्नलिखित कारकों पर निर्भर है –

  1. अर्थव्यवस्था में आय एवं रोजगार का स्तर, सामूहिक मांग के स्तर पर निर्भर होता है। सामूहिक मांग का स्तर जितना ऊँचा होता है, आय एवं रोजगार का स्तर भी उतना ही अधिक होता है। इसके विपरीत सामूहिक मांग का स्तर नीचा होने पर आय एवं रोजगार का स्तर भी नीचा रहता है।
  2. अर्थव्यवस्था आय एवं रोजगार के स्तर को उपभोग का स्तर बढ़ाकर बढ़ाया जा सकता है।
  3. अर्थवव्यवस्था के उपभोग का स्तर आय के स्तर व उपभोग प्रवृत्ति पर निर्भर होता है।

प्रश्न 10.
कुछ व्यष्टि आर्थिक चरों के उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध व्यक्तिगत या विशिष्ट आर्थिक चरों से होता है। कुछ व्यष्टि आर्थिक चरों के उदाहरण निम्नलिखित हैं –

  1. संसाधनों का आंबटन
  2. उपभोक्ता व्यवहार एवं उपभोक्ता सन्तुलन
  3. वस्तु की मांग
  4. वस्तु की मांग की लोच
  5. वस्तु की आपूर्ति
  6. उत्पादक व्यवहार एवं उत्पादक सन्तुलन
  7. वस्तु की पूर्ति लोच
  8. वस्तु की कीमत का निर्धारण।

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प्रश्न 11.
समष्टि अर्थशास्त्र में संरचना की भ्रान्ति को स्पष्ट करो।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में समूहों का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन में समूह की इकाइयों में बहुत अधिक विषमता पायी जाती है। समूह की इकाइयों की विषमता को पूरी तरह से अनदेखा किया जाता है। इस विषमता के कारण कई भ्रान्तियाँ पैदा हो जाती हैं। जैसे पूंजी वस्तुओं की कीमत गिरने से सामान्य कीमत स्तर गिर जाता है। लेकिन दूसरी ओर खाद्यान्नों की बढ़ती हुई कीमतें उपभोक्ताओं की कमर तोड़ती रहती हैं। लेकिन सरकार आंकड़ों की मदद से सामान्य कीमत स्तर को घटाने का श्रेय बटोरती है।

प्रश्न 12.
समष्टि अर्थशास्त्र का महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। जैसे –

  1. समष्टि शाखा से आर्थिक भ्रान्तियों को सुलझाने में मदद मिलती है।
  2. इस. शाखा के अध्ययन से आर्थिक उतार-चढ़ावों को समझना सरल हो जाता है।
  3. व्यष्टि अर्थशास्त्र के पूरक के रूप में इसके विकास को समष्टि अर्थशास्त्र सहायक है।
  4. समष्टि आर्थिक विश्लेषण से आर्थिक नियोजन से मदद मिलती है।
  5. आर्थिक नियोजन के क्रियान्वयन में मदद मिलती है।

प्रश्न 13.
परंपरावादी रोजगर सिद्धान्त की मान्यताएं लिखिए।
उत्तर:
आय एवं रोजगार का परंपरावादी सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है –

  1. वस्तु की आपूर्ति उसकी मांग की जननी होती है।
  2. मजदूरी दर पूर्णतया लोचदार होती है।
  3. ब्याज दर पूर्णतया लोचदार होती है।
  4. वस्तु की कीमत पूर्णतथा नम्य होती है।
  5. अर्थव्यवस्था में पूर्ण प्रतियोगिता पाई जाती है।
  6. आर्थिक क्रियाकलापों के संचालन में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है।

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प्रश्न 14.
समष्टि अर्थव्यवस्था के उपकरण बताइए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उपकरणों का उपयोग किया जाता है –
1. आय एवं रोजगार नीति –

  • सामूहिक मांग
  • सामूहिक पूर्ति

2. राजकोषीय नीति –

  • सरकारी बजट
  • मजदूरी नीति
  • आयात व निर्यात नीति
  • उत्पादन नीति

3. मौद्रिक नीति –

  • बैंक दर
  • नकद जमा अनुपात
  • संवैधानिक तरलता अनुपात
  • खुले बाजार की क्रियाएँ
  • साख नीति

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प्रश्न 15.
समष्टि अर्थशास्त्र के लिए व्यष्टि अर्थशास्त्र का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
जिस प्रकार व्यक्ति-व्यक्ति को मिलाकर समाज का गठन होता है फर्म-फर्म के संयोजन से उद्योग की रचना होती है। उद्योगों को मिलाकर अर्थव्यवस्था अर्थात् समग्र बनता है। इसलिए व्यष्टि अर्थशास्त्र समष्टि अर्थशास्त्र के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। जैसे –

  1. अलग-अलग वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमत के आधार पर ही सामान्य कीमत स्तर का आकलन करते हैं।
  2. व्यक्तिगत आर्थिक/उत्पादक इकाइयों के आय के योग के योग से राष्ट्रीय आय ज्ञात की जाती है।
  3. आर्थिक नियोजन के लिए फर्मों व उद्योगों के नियोजन का जानना अति आवश्यक है।

प्रश्न 16.
समष्टि अर्थशास्त्र में समूहों को मापने में आने वाली कठिनाइयों को लिखिए।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। वस्तुओं एवं सेवाओं का मापन अलग-अलग इकाइयों में किया जाता है। दूसरे शब्दों में सभी उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं का मापन करने के लिए कोई एक उपयुक्त इकाई नहीं है। अत: वस्तुओं एवं सेवाओं को मापने में केवल मुद्रा का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 17.
आय व उत्पादन के बारे में परंपरावादी विचार को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
आय एवं उत्पादन के परंपरावादी सिद्धान्त के अनुसार वस्तु की आपूर्ति, मांग की जननी होती है। अर्थव्यवस्था में प्रतियोगिता पायी जाती है। वस्तुओं की कीमत पूर्णतः नम्य होती है। इसका अभिप्राय यह है कि वस्तुओं की आपूर्ति एवं मांग में परिवर्तन के अनुसार कीमत में परिवर्तन हो जाता है। नम्य कीमत पर से वस्तु बाजार में मांग व पूर्ति में स्वतः सन्तुलन स्थापित हो जाता है।

इसलिए अधिशेष उत्पादन अथवा अधिमांग की कोई समस्या पैदा नहीं होती है। यदि अस्थायी तौर पर अधिशेष उत्पादन की समस्या उत्पन्न होती है तो वस्तु की कीमत गिर जाती है। कम कीमत पर वस्तु की मांग बढ़ जाती है और उत्पादक पूर्ति कम मात्रा में करने लगते हैं। मांग व पूर्ति में परिवर्तन का क्रम संतुलन स्थापित होने पर रुक जाता है। वस्तु बाजार की तरह श्रम बाजार में भी नम्य मजदूरी दर के द्वारा सन्तुलन स्थापित हो जाता है और अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति रहती है।

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प्रश्न 18.
व्यष्टिं अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र की परस्पर निर्भरता स्पष्ट करो।
उत्तर:
व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र की दो अलग-अलग शाखाएं हैं। ये दोनों शाखाएं परस्पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए एक वस्तु की कीमत निर्धारण व्यष्टि विश्लेषण के आधार पर किया जाता है और सामान्य कीमत का निर्धारण समष्टि विश्लेषण के द्वारा होता है। उद्योग में मजदूरी दर निर्धारण व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुद्दा है। सामान्य मजदूरी दर का निर्धारण समष्टि अर्थशास्त्र का विषय है। इस प्रकार से कहा जा सकता है। कि व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र एक-दूसरे पर निर्भर शाखाएं हैं।

प्रश्न 19.
संक्षेप में समष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र बताइए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र के क्षेत्र की एक विस्तृत श्रृंखला है। इस शाखा के कुछ क्षेत्र नीचे लिखे गए हैं –

  1. रोजगर सिद्धान्त-रोजगार एवं बेरोजगार से संबंधित विभिन्न अवधारणाओं का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।
  2. राष्ट्रीय आय का सिद्धान्त-राष्ट्रीय आय से संबंधित समाहारों जैसे बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद, साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद, बाजार कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद, राष्ट्रीय प्रयोज्य आयं आदि तथा उनके संघटकों का अध्ययन किया जाता है।
  3. मुद्रा सिद्धान्त-मुद्रा के कार्य, मुद्रा के प्रकार, बैंकिग प्रणाली आदि का विश्लेषण अर्थशास्त्र की इस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है।
  4. विश्व व्यापार का सिद्धान्त- व्यापार शेष, भुगतान शेष, विनिमय दर आदि के बारे में विश्लेषण समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।

प्रश्न 20.
आर्थिक विरोधाभास को समझने के लिए समष्टि अर्थशास्त्र किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
कुछ आर्थिक तथ्य ऐसे होते हैं जो व्यक्तिगत स्तर पर उपयुक्त होते हैं परन्तु सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं। ऐसी धारणाओं को आर्थिक विरोधाभास कहते है। जैसे महामंदीकाल में व्यक्तिगत बचत व्यक्तिगत स्तर पर लाभकारी रही परन्तु पूरी अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक सिद्ध हुई। इस विरोधाभास को प्रो. जे. एम. कीन्स ने समष्टि अर्थव्यवस्था की सहायता से स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि बचत व्यक्तिगत स्तर पर वरदान होती है परन्तु सामूहिक स्तर पर अभिशाप होती है।

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प्रश्न 21.
क्या व्यष्टि अर्थशास्त्र को समझने के लिए समष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन जरूरी है?
उत्तर:
कई बार व्यक्तिगत निर्णय समष्टि निर्णयों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। इसी प्रकार व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयां निर्णय लेने के लिए सामूहिक निर्णयों को ध्यान में रखना जरूरी होता है –

  1. एक फर्म के उत्पादन का स्तर का पैमाना कुल मांग अथवा लोगों की क्रय शक्ति को ध्यान में रखकर तय करती है।
  2. एक वस्तु की कीमत उस वस्तु की मांग व पूर्ति से ही तय नहीं होती है बल्कि दूसरी वस्तुओं की मांग व पूर्ति को भी ध्यान में रखकर तय की जाती है।
  3. एक फर्म साधन भुगतान के निर्धारण के लिए दूसरी फर्मों के साधन भुगतान संबंधी निर्णय ध्यान में रखती है। आदि।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आय एवं रोजगार सिद्धान्त की कीन्स विचारधारा के मुख्य बिन्दु बताइए।
उत्तर:
आर्थिक महामंदीकाल (1929-1933) ने कई ऐसी आर्थिक समस्याओं को जन्म दिया जिनको व्यष्टि अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर हल नहीं किया जा सका। इन समस्याओं के समाधान हेतु प्रो. जे. एम. कीन्स ने General Theory of Employment, Interest & Money लिखी। इस पुस्तक में कीन्स ने आय एवं रोजगार के बारे में निम्नलिखित मुख्य बातें बतायीं –

1. एक अर्थव्यवस्था में आय एवं रोजगार का स्तर संसाधनों की उपलब्धता एवं उपयोग पर निर्भर करता है। यदि किसी अर्थव्यवस्था में कुछ संसाधन बेकार पड़े होते हैं तो अर्थव्यवस्था उन्हें उपयोग में लाकर आय एवं रोजगार के स्तर को बढ़ा सकती है।

2. कीन्स ने परंपरावादियों के इस विचार को कि एक वस्तु की पूर्ति मांग की जनक होती है खारिज कर दिया। कीन्स ने बताया कि वस्तु की कीमत उपभोक्ता की आय और उपभोक्ता की उपभोग प्रवृत्ति पर निर्भर करती है।

3. परंपरावादी अर्थशास्त्रियों के अनुसार सन्तुलन की अवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है। लेकिन कीन्स ने सन्तुलन स्तर के रोजगार स्तर को साम्य रोजगार स्तर का नाम दिया और स्पष्ट किया कि साम्य रोजगार स्तर आवश्यक रूप से पूर्ण रोजगार स्तर के समान नहीं होता है यदि साम्य रोजगार स्तर, पूर्ण रोजगार स्तर से कम है तो अर्थव्यवस्था उपभोग या सामूहिक मांग को बढ़ाकर आय एवं रोजगार स्तर में वृद्धि कर सकती है।

4. परंपरावादी विचार में सरकारी हस्तक्षेप को निषेध करार दिया गया था। लेकिन कीन्स ने सुझाव दिया कि विषम परिस्थितियों जैसे अभावी मांग अधिमांग आदि में हस्तक्षेप करके इन्हें ठीक करने के लिए उपाय अपनाने चाहिए।

5. परंपरावदी सिद्धांत में बचतों को वरदान बताया गया है जबकि समष्टि स्तर पर कीन्स ने बचतों को अभिशाप की संज्ञा दी है। व्यक्तिगत स्तर पर बचत वरदान हो सकती है।

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प्रश्न 2.
व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर:
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प्रश्न 3.
आय एवं रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
परंपरावादी अर्थशास्त्रियों जैसे पीग, डेविड रिकार्डों, आल्फ्रेड मार्शल, जे. एस. मिल, जे. बी. से आदि ने व्यष्टि अर्थशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। दूसरे शब्दों में परंपरावादी अर्थशास्त्रियों ने अपना ध्यान व्यष्टि अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों एवं नियमों का प्रतिपादन करने की ओर केन्द्रित किया। परंपरावादी अर्थशास्त्रियों की मान्यता थी कि साम्य स्तर पर एक अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है। आर्थिक परिवर्तन से अस्थायी अधिशेष उत्पादन अथवा बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो सकती है। परन्तु नम्य मजदूरी दर एवं नम्य कीमत के द्वारा ये समस्याएं स्वतः सरकारी हस्तक्षेप के बिना ठीक हो जाती है। इस सिद्धांत की मुख्य बातें निम्न प्रकार हैं –

  1. एक वस्तु की आपूर्ति, मांग की जनक होती है।
  2. साम्य की अवस्था में अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है।
  3. अर्थव्यवस्था में अधिशेष उत्पादन कोई समस्या नहीं होती है। यदी कभी यह समस्या उत्पन्न होती है तो वस्तु की नम्य कीमत के द्वारा यह समस्या स्वयं हल हो जाती है।
  4. अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की समस्या भी उत्पन्न नहीं होती है। यदि अस्थायी रूप से यह समस्या उत्पन्न होती है तो नुम्य मजदूरी दर उसे ठीक कर देती है।
  5. अर्थव्यवस्था में मुद्रा स्फीति अथवा अवस्फीति की भी कोई समस्या नहीं होती है। नम्य ब्याज दर मुद्रा की मांग एवं आपूर्ति में सन्तुलन बना देती है।
  6. सरकार को आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

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प्रश्न 4.
समष्टि आर्थिक दृष्टिकोण की आवश्यकता को स्पष्ट करो।
उत्तर:
परंपरावादी अर्थशास्त्रियों जैसे पीगू, डेविड रिकाडौँ, आल्फ्रेड मार्शल, जे. एस. मिल. जे. बी. से आदि ने व्यष्टि आर्थिक सिद्धान्तों को प्रतिपादित करने में अहम भूमिका निभायी। इन अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक समस्याओं का हल ढूंढने का काम व्यष्टि स्तर तक सीमित रखा। 1929 तक व्यष्टि आर्थिक सिद्धान्त एवं उनकी मान्यताओं से आर्थिक समस्याओं का स्वतः समाधान होता रहा। लेकिन (1929-1933) के महामंदीकाल ने व्यष्टि अर्थशास्त्रियों की मान्यताओं एवं सिद्धान्त को असफल कर दिया। वस्तुएं प्रचुर मात्रा में बाजार में उपलब्ध थीं परन्तु अपनी मांग नहीं उत्पन्न कर पा रही थी। वस्तु की कीमत नम्यता के आधार पर कीमत घटने पर भी वस्तुओं की मांग नहीं बढ़ी।

इसी प्रकार साधन बाजार नम्य मजदूरी पर बेरोजगारी की समस्या को ठीक नहीं कर पाई। नम्य ब्याज दर से अर्थव्यवस्थाओं में अवस्फीति की स्थिति ठीक नहीं हो पा रही है। महामंदी की लम्बी अवधि, इसके द्वारा उत्पन्न विकट समस्याओं जैसे अभावी मांग, मुद्रा अवस्फीति, बेरोजगारी आदि ने अर्थव्यवस्थाओं को बेहाल बना दिया। इन समस्याओं का समाधान करने में व्यष्टि आर्थिक सिद्धान्तों के हाथ खड़े हो गए। अर्थात् व्यष्टि सिद्धान्तों से इन समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा था।

इसी संदर्भ मे जे. एम. कीन्स ने General Theory of Income & Employment, Money and Interest लिखी। इस पुस्तक ने महामंदी की समस्याओं से छुटकारा पाने की नई राह दिखाई। इस नई राह को समष्टि अर्थशास्त्र कहते हैं। इस सिद्धान्त में सुझाए गये सिद्धान्तों के आधार पर अर्थव्यवस्थाओं में बेकार पड़े, साधनों का सदोपयोग बढ़ा, जिससे उत्पादन, आय एवं रोजगार स्तर में सुधार संभव हो पाया। अतः समष्टि स्तर की समस्याओं जैसे आय का स्तर बढ़ाने, बेरोजगारी दूर करने, अवस्फीति या स्फीति आदि को ठीक करने के लिए समष्टि दृष्टिकोण आवश्यक है।

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प्रश्न 5.
समष्टि अर्थशास्त्र के क्षेत्रों का संक्षिप्त ब्योरा दीजिए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में निम्नांकित विषयों का अध्ययन किया जाता है –

  1. राष्ट्रीय आय का सिद्धान्त-इस शाखा में राष्ट्रीय आय की विभिन्न अवधारणाओं, संघटकों माप की विधियों तथा सामाजिक लेखांकनों का अध्ययन किया जाता है।
  2. मुद्रा का सिद्धान्त-मुद्रा की मांग व पूर्ति रोजगार के स्तर को प्रभावित करती है। मुद्रा के कार्य, प्रकर तथा मुद्रा सिद्धान्तों का अध्ययन समष्टि स्तर पर किया जाता है।
  3. सामान्य कीमत सिद्धान्त-मुद्रा स्फीति, मुद्रा, अवस्फिति, इनके उत्पन्न होने के कारणों एवं इन्हें ठीक करने के उपायों का अध्ययन एवं विश्लेषण अर्थशास्त्र में किया जाता है।
  4. आर्थिक विकास का सिद्धान्त-आर्थिक विकास/प्रति व्यक्ति आय में होने वाले परिवर्तनों एवं इनकी समस्याओं का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है। सरकार की राजस्व नीति, एवं मौद्रिक नीतियों का अध्ययन समष्टि शाखा में किया जाता है।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सिद्धान्त-विभिन्न देशों के बीच आयात-निर्यात की मात्रा, दिशा के साथ विभिन्न देशों के दूसरे आर्थिक लेन-देनों का विश्लेषण भी इस शाखा में किया जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पूर्ण रोजगार वह स्थिति होती है जिसमें सभी इच्छुक व्यक्तियों को आसानी से कार्य मिल जाता है –
(A) बाजार मजदूरी दर पर
(B) स्थिर मजदूरी दर पर
(C) बाजार से कम मजदूरी दर पर
(D) बाजार से अधिक मजदूरी दर पर
उत्तर:
(A) बाजार मजदूरी दर पर

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 2.
सन्तुलन रोजगारी स्थिति वह होती है जिसमें –
(A) सामूहिक मांग व सामूहिक पूर्ति समान होती है
(B) सामूहिक मांग, सामूहिक पूर्ति से ज्यादा होती है
(C) सामूहिक मांग, सामूहिक पूर्ति से कम होती है
(D) सामूहिक मांग शून्य होती है
उत्तर:
(A) सामूहिक मांग व सामूहिक पूर्ति समान होती है

प्रश्न 3.
उपभोग प्रवृत्ति जिस परिवर्तन के बारे में बताती है वह है –
(A) आय के कारण बचत में परिवर्तन
(B) आय के कारण निवेश में परिवर्तन
(C) आय के कारण ब्याज दर में परिवर्तन
(D) आय के कारण उपभोग में परिवर्तन
उत्तर:
(D) आय के कारण उपभोग में परिवर्तन

प्रश्न 4.
वर्ष 1929 से पूर्व अर्थशास्त्र जिस शाखा का अध्ययन किया जाता था वह है –
(A) समष्टि अर्थशास्त्र
(B) व्यष्टि अर्थशास्त्र
(C) A तथा B दोनों
(D) बीजगणित व समष्टि अर्थशास्त्र
उत्तर:
(B) व्यष्टि अर्थशास्त्र

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 5.
Teh General Theory of Income & Employment, Money and Interest लिखा था –
(A) आल्फ्रेड मार्शल
(B) जे. एस. मिल
(C) डेविड रिकार्डो
(D) जे. एम. कीन्स
उत्तर:
(D) जे. एम. कीन्स

प्रश्न 6.
Teh General Theory of Income & Employment,Money and Interest प्रकाश में आयी –
(A) वर्ष 1929
(B) वर्ष 1729
(C) वर्ष 1936
(D) वर्ष 1991
उत्तर:
(C) वर्ष 1936

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 7.
समष्टि अर्थशास्त्र का वैकल्पिक नाम है –
(A) आय सिद्धान्त
(B) कीमत सिद्धान्त
(C) उपभोक्ता सिद्धान्त
(D) उत्पादक सिद्धान्त
उत्तर:
(A) आय सिद्धान्त

प्रश्न 8.
व्यष्टि अर्थशास्त्र का वैकल्पिक नाम है –
(A) आय सिद्धान्त
(B) कीमत सिद्धांत
(C) उपभोक्ता सिद्धान्त
(D) उत्पादक सिद्धान्त
उत्तर:
(B) कीमत सिद्धांत

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 9.
बचत प्रवृत्ति जिस परिवर्तन के बारे में बताती है वह है –
(A) आय के कारण बचत में परिवर्तन
(B) आय के कारण उपभोग में परिवर्तन
(C) आय के कारण निवेश में परिवर्तन
(D) आय के कारण ब्याज परिवर्तन
उत्तर:
(A) आय के कारण बचत में परिवर्तन

प्रश्न 10.
आर्थिक महामंदीकाल की अवधि थी –
(A) 1939-1942
(B) 1857-1860
(C) 1929-1932
(D) 1947-1950
उत्तर:
(C) 1929-1932

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं जीवन

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं जीवन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं जीवन

Bihar Board Class 12 Psychology मनोविज्ञान एवं जीवन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
आप ‘पर्यावरण’ पद से क्या समझते हैं? मानव-पर्यावरण संबंध को समझने। के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण (Environment) शब्द, हमारे चारों ओर जो कुछ है उसे संदर्भित करता है, शाब्दिक रूप से हमारे चारों ओर भौतिक, सामाजिक कार्य तथा सांस्कृतिक पर्यावरण में जो कुछ है वह इसमें निहित है। व्यापक रूप से, व्यक्ति के बाहर जो शक्तियाँ हैं, जिनके प्रति व्यक्ति अनुक्रिया करता है, वे सब इसमें निहित हैं। मानव-पर्यावरण संबंध को समझने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्य निम्नलिखित हैं –

1. अल्पमतवादी परिप्रेक्ष्य (Minimalist perspective) का यह अभिग्रह है कि भौतिक पर्यावरण मानव व्यवहार, स्वास्थ्य तथा कुशल-क्षेम (कल्याण) पर न्यूनतम या नगण्य प्रभाव डालता है। भौतिक पर्यावरण तथा मनुष्य का अस्तित्व समांतर घटक के रूप में होता है।

2. नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य (Instrumental perspective) प्रस्तावित करता है कि भौतिक पर्यावरण का अस्तित्व ही प्रमुखतया मनुष्य के सुख एवं कल्याण के लिए है। पर्यावरण के ऊपर मनुष्य के अधिकांश प्रभाव इसी नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य को प्रतिबिंबित करते हैं।

3. आध्यात्मिक परिप्रक्ष्य (Spiritual perspective) पर्यावरण को एक सम्मान योग्य और मूल्यवान वस्तु के रूप में संदर्भित करता है न कि एक समुपयोग करने योग्य वस्तु के रूप में। इसमें मान्यता है कि मनुष्य अपने तथा पर्यावरण के मध्य परस्पर-निर्भर संबंध को पहचानते हैं, अर्थात् मनुष्य का भी तभी अस्तित्व रहेगा और वे प्रसन्न रहेंगे जब पर्यावरण को स्वस्थ तथा प्राकृतिक रखा जाएगा।

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प्रश्न 2.
भीड़ के प्रमुख लक्षण क्या हैं? भीड़ के प्रमुख मनोवैज्ञानिक परिणामों की व्याख्या करते हैं।
उत्तर:
भीड़, के संदर्भ उस असुस्थता की भावना से है जिसका कारण यह है कि हमारे आस – पास बहुत अधिक व्यक्ति या वस्तुएँ होती हैं जिससे हमें भौतिक बंधन की अनुभूति होती है तथा कभी-कभी वैयक्तिक स्वतंत्रता में न्यूनतम का अनुभव होता है। एक विशिष्ट क्षेत्र या दिक् में बड़ी संख्या में व्यक्तियों की उपस्थिति के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रिया ही भीड़ कहलाती है। जब यह संख्या एक निश्चित स्तर से अधिक हो जाती है तब इसके कारण वह व्यक्ति जो इस स्थिति में फंस गया है, दबाव का अनुभव करता है। दबाव का अनुभव करता है। इस अर्थ में भीड़ भी एक पर्यायवाची दाबवकारक का उदाहरण है।

भीड़ के अनुभव के निम्नलिखित लक्षण होते हैं –

  1. असुरक्षा की भावना
  2. वैयक्तिक स्वतंत्रता में न्यूनता या कमी
  3. व्यक्ति का अपने आस-पास के परिवेश के संबंध में निषेधात्मक दृष्टिकोण, तथा
  4. सामाजिक अंत:क्रिया पर नियंत्रण के अभाव की भावना।

भीड़ क प्रमुख मनोवैज्ञानिक परिणाम –

1. भीड़ तथा अधिक घनत्व के परिणामस्वरूप अपसामान्य व्यवहार तथा आक्रामकता उत्पन्न हो सकते हैं। अनेक वर्षों पूर्व चूहों पर किए गए शोध में यह परिलक्षित हुआ था। इन प्राणियों को एक बाड़े में रखा गया, प्रारंभ में यह कम संख्या में आक्रामक तथा विचित्र व्यवहार प्रकट होने लगे, जैसे-दूसरे चूहों की पूँछ काट लेना। यह आक्रामक व्यवहार इस सीमा तक बढ़ा कि अंततः ये प्राणी बड़ी संख्या में मर गए जिससे बाड़े में उनकी जनसंख्या फिर कम हो गई। मनुष्य में भी जनसंख्या वृद्धि के साथ कभी-कभी हिंसात्मक अपराधों में वृद्धि पाई गई है।

2. भीड़ के फलस्वरूप उन कठिन कार्यों का जिनमें संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ निहित होती निष्पादन निम्न स्तर का हो जाता है तथा स्मृति और संवेगात्मक दशा पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ये निषेधात्मक प्रभाव उन व्यक्तियों में अल्प मात्र में परिलक्षित होते हैं जो भीड़ वाले परिवेश के आदी होते हैं।

3. वे बच्चे जो अत्यधिक भीड़ वाले घरों में बड़े होते हैं, वे निचले स्तर के शैक्षिक निष्पादन प्रदर्शित करते हैं। यदि वे किसी कार्य पर असफल होते हैं तो उन बच्चों की तुलना वे जो कम भीड़ वाले घरों में बढ़ते हैं, उस कार्य पर निरंतर काम करते रहने की प्रवृत्ति भी उनमें दुर्बल होती है। अपने माता-पिता के साथ अधिक द्वंद्व के अनुभव करते हैं तथा उन्हें अपने परिवार से भी कम सहायता प्राप्त होती है।

4. सामाजिक अंत: क्रिया की प्रकृति भी यह निर्धारित करती है कि व्यक्ति भीड़ के प्रति किसी सीमा तक प्रतिक्रिया करेगा। उदाहरण के लिए यदि अंत:क्रिया किसी आनंददायक सामाजिक अवसर पर होती है; जैसे – किसी प्रीतिभोज अथवा सार्वजनिक समारोह में; तब संभव है कि उसे भौतिक स्थान में बड़ी संख्या में अनेक लोगों की उपस्थिति कोई भी दबाव उत्पन्न करे। बल्कि, इसके फलस्वरूप सकारात्मक सांवेगिक प्रतिक्रियाएँ हो सकती है। इसके साथ ही, भीड़ भी सामाजिक अंत:क्रिया की प्रकृति को प्रभावित करती है।

5. व्यक्ति भीड़ के प्रति जो निषेधात्मक प्रभाव प्रदर्शित करते हैं; उसकी मात्रा में व्यक्तिगत भिन्नताएँ होती हैं तथा उनकी प्रतिक्रियाओं की प्रकृति में भी भेद होता है।

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प्रश्न 3.
शोर क्या है? मनुष्य के व्यवहार पर शोर के प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कोई भी ध्वनि जो खीझ या चिड़चिड़ाहट उत्पन्न करे और अप्रिय हो, उसे शोर कहते हैं। मनुष्य के व्यवहार पर शोर के प्रभाव निम्नलिखित हैं –

  1. शोर चाहे तीव्र हो या धीमा हो, वह समग्र निष्पादन को तब तक प्रभावित नहीं करता है जब तक कि संपादित किए जाने वाला कार्य सरल हो; जैसे-संख्याओं का योग। ऐसी स्थितियों में व्यक्ति अनुकूलन कर लेता है या शोर का ‘आदी’ हो जाता है।
  2. जिस कार्य का निष्पादन किया जा रहा है यदि वह अत्यंत रुचिकर होता है, तब भी शोर की उपस्थिति में निष्पादन प्रभावित नहीं होता है।
  3. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कार्य की प्रकृति व्यक्ति को पूरा ध्यान उसी में लगाने तथा शोर को अनसुना करने में सहायता करती है। यह भी एक प्रकार अनुकूलन हो सकता है।
  4. जब शोर कुछ अंतराल के बाद आता है तथा उसके संबंध में भविष्यकथन नहीं किया जा सकता, तब वह निरंतर होनेवाले शोर की अपेक्षा अधिक बाधाकारी प्रतीत होता है।
  5. जिस कार्य का निष्पादन किया जा रहा है, जब वह कठिन होता है यह उसपर पूर्ण एकाग्रता की आवश्यकता होती है, तब तीव्र, भविष्यकथन न करने योग्य तथा नियंत्रण न किया जा सकने वाला शोर निष्पादन स्तर को घटाता है।
  6. जब शोर को सहन करना या बंद कर देना व्यक्ति के नियंत्रण में होता है तब कार्य निष्पादन में त्रुटियों में कमी आती है।
  7. संवेगात्मक प्रभावों के संदर्भ में, शोर यदि एक विशेष स्तर से अधिक हो तो उसके कारण चिड़चिड़ापन आता है तथा इससे नींद में गड़बड़ी भी उत्पन्न हो सकती है।

प्रश्न 4.
“मानव पर्यावरण को प्रभावित करते हैं तथा उससे प्रभावित होते हैं।” इस कथन की व्याख्या उदाहरणों की सहायता से कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण पर मानव प्रभाव-मनुष्य भी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और अन्य उद्देश्यों से भी प्राकृतिक पर्यावरण के ऊपर अपना प्रभाव डालते हैं। निर्मित पर्यावरण के सारे उदाहरण पर्यावरण के ऊपर मानव प्रभाव को अभिव्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिये मानव ने जिसे हम ‘घर’ कहते हैं, उसका निर्माण प्राकृतिक पर्यावरण को परिवर्तित करके ही किया जिससे कि उन्हें एक आश्रय मिल सके। मनुष्यों के इस प्रकर के कुछ कार्य पर्यावरण को क्षति भी पहुंचा सकते हैं और अंततः स्वयं उन्हें भी अनेकानेक प्रकार से क्षति पहुंचा सकते हैं।

उदाहरण के लिए, मनुष्य उपकरणों का उपयोग करते हैं, जैसे-रेफ्रीरजेटर तथा वातानुकूलन यंत्र जो रासायनकि द्रव्य (जैसे-सी.एफ.सी. या क्लोरो-फ्लोरो कार्बन) उत्पादित करते हैं, जो वायु को प्रदूषित करते हैं तथा अंतत: ऐसे शारीरिक रोगों के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं, जैसे-कैंसर के कुछ प्रकार। धूम्रपान के द्वारा हमारे आस-पास की वायु प्रदूषित होती है तथा प्लास्टिक एवं धातु से बनी वस्तुओं को जलाने से पर्यावरण पर घोर विपदाकारी प्रदूषण फैलानेवाला प्रभाव होता है।

वृक्षों के कटान या निर्वनीकरण के द्वारा कार्बन चक्र एवं जल चक्र में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। इससे अंतत: उस क्षेत्र विशेष में वर्षा के स्वरूप पर प्रभाव पड़ सकता है और भू-क्षरण तथा मरुस्थलीकरण में वृद्धि हो सकती है। वे उद्योग जो निस्सारी का बहिर्वाह करते हैं तथा इस असंशोधित गंदे पानी को नदियों में प्रवाहित करते हैं, इस प्रदूषण के भयावह भौतिक (शारीरिक) तथा मनोवैज्ञानिक परिणामों से तनिक भी चिंतित प्रतीत नहीं होते हैं।

मानव व्यवहार पर पर्यावरणी प्रभाव –

1. प्रत्यक्ष पर पर्यावरणी प्रभाव-पर्यावरण के कुछ पक्ष मानव प्रत्यक्षण को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, अफ्रीका की एक जनजाति समाज गोल कुटियों (झोपड़ियों) में रहती है अर्थात् ऐसे घरों में जिनमें कोणीय दीवारें नहीं हैं। वे ज्यामितिक भ्रम (मूलर-लायर भ्रम) में कम त्रुटि प्रदर्शित करते हैं, उन व्यक्तियों की अपेक्षा जो नगरों में रहते हैं और जिनके मकानों में कोणीय दीवारें होती हैं।

2. संवेगों पर पर्यावरणीय प्रभाव-पर्यावरण का प्रभाव हमारी सांवेगिक प्रतिक्रियाओं पर भी पड़ता है। प्रकृति के प्रत्येक रूप का दर्शन चाहे वह शांत नदी का प्रवाह हो, एक मुस्कुराता हुआ फूल हो, या एक शांत पवर्त की चोटी हो, मन को एक ऐसी प्रसन्नता से भर देता है जिसकी तुलना किसी अन्य अनुभव से नहीं की जा सकती।

प्राकृतिक विपदाएँ; जैसे-बाढ़, सूखा, भू-स्खलन, भूकंप चाहे पृथ्वी के ऊपर हो या समुद्र के नीचे हो, वह व्यक्ति के संवेगों पर इस सीमा तक प्रभाव डाल सकते हैं कि वे गहन अवसाद और दुःख तथा पूर्ण असहायता की भावना और अपने जीवन पर नियंत्रण के अभाव का अनुभव करते हैं। मानव संवेगों पर ऐसा प्रभाव एक अभिघातज अनुभव है जो व्यक्तियों के जीवन को सदा के लिए परिवर्तित कर देता है तथा घटना के बीत जाने के बहुत समय बाद तक भी अभिघातज उत्तर दबाव विकार (Post-traumatic stress disorder, PTDS) के रूप में बना रहता है।

3. व्यवसाय, जीवन शैली तथा अभिवृतियों पर पारिस्थितिक का प्रभाव-किसी क्षेत्र का प्राकृतिक पर्यावरण या निर्धारित करता है कि उस क्षेत्र के उस क्षेत्र के निवासी कृषि पर (जैसे-मैदानों में) या अन्य व्यवसायों, जैसे-शिकार तथा संग्रहण पर (जैसे-वनों, पहाड़ों या रेगिस्तानी क्षेत्रों में) या उद्योगों पर (जैसे-उन क्षेत्रों में जो कृषि के लिए उपजाऊ नहीं है) निर्भर रहते हैं परन्तु किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र के निवासियों के व्यवसाय भी उनकी जीवन शैली और अभिवृत्तियों का निर्धारण करते हैं।

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प्रश्न 5.
मानस के लिए-व्यक्तिगत स्थान’ का संप्रत्यय क्यों महत्त्वपूर्ण है? अपने उत्तर को एक उदाहरण की सहायता से उचित सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
व्यक्गित स्थान (Personal space) या वह सुविधाजनक भौतिक स्थान जिसे व्यक्ति अपने आस – पास बनाए रखना चाहता है, अधिक घनत्व वाले पर्यावरण से प्रभावित होता है। भीड़ में व्यक्तिगत स्थान प्रतिबंधित है। व्यक्तिगत स्थान का संप्रत्यय निम्नलिखित कारणों से महत्त्वपूर्ण है –

1. यह भीड़ के निषेधात्मक प्रभावों को एक पर्यावरणी दबाव कारक के रूप में समझता है।

2. यह हमें सामाजिक संबंधों के बारे में बताता है। उदाहरण के लिए, दो व्यक्ति यदि एक-दूसरे. से काफी निकट खड़े या बैठे हों तो उनका प्रत्यक्ष मित्र या संबंधी के रूप में होता है। जब एक छात्र विद्यालय पुस्तकालय में जाता है और यदि उसका मित्र जिस मेज पर बैठा है उसके निकट का स्थान खाली है तो वह उसके निकट के स्थान पर ही बैठता है। किन्तु यदि उस मेज पर कोई अपरिचित बैठा है और उसके निकट स्थान खाली है तो इस बात की संभावना कम है कि वह उस व्यक्ति के निकट के स्थान पर बैठेगा।

3. हमें कुछ सीमा तक यह ज्ञात होता है कि भौतिक स्थान को किस प्रकार परिवर्तित किया जा सकता है जिससे कि सामाजिक स्थितियों में दबाव अथवा असुविधा में कमी की जा सके अथवा सामाजिक अंत:क्रिया को अधिक आनंददायक तथा उपयोगी बनाया जा सके।

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प्रश्न 6.
‘विपदा’ पद से आप क्या समझते हैं? अभिघातज उत्तर दबाव विकार के लक्षणों को सूचीबद्ध कीजिए। उसका उपचार कैसे किया जा सकता है?
उत्तर:
प्राकृतिक विपदाएँ ऐसे दबावपूर्ण अनुभव हैं जो कि प्रकृति के प्रकोप के परिणाम हैं अर्थात् जो प्राकृतिक पर्यावरण में अस्त-व्यस्तता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। प्राकृतिक विपदाओं के भी उदाहरण भूकंप, सूनामी, बाढ़, तूफान तथा ज्वालामुखीय उद्गार हैं। अन्य विपदाओं के भी उदाहरण मिलते हैं, जैसे-युद्ध, औद्योगिक दुर्घटनाओं (जैसे-औद्योगिक कारखानों में विषैली गैस अथवा रेडियो सक्रिय तत्त्वों का रिसाव) अथवा महामारी (उदाहरण के लिये, प्लेग जिसने 1994 में हमारे देश के अनेक क्षेत्रों में तबाही मची थी)।

किन्तु, युद्ध तथा महा मानव द्वारा रचित घटनाएँ हैं, यद्यपि उनके प्रभाव भी उतने ही गंभीर हो सकते हैं जैसे कि प्राकृतिक विपदाओं के। इन घटनाओं को ‘विपदा’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इन्हें रोका नहीं जा सकता, प्रायः ये बिना किसी चेतावनी के आती हैं और मानव जीवन एवं संपत्ति को इनसे अत्यधिक क्षति पहुँचाती है।

अभिधातज उत्तर दबाव विकास (पी.टी.एस.डी) एक गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या है जो अभिघातज घटनाओं, जैसे-प्राकृतिक विपदाओं के कारण उत्पन्न होती है। इस विकास के निम्नलिखित कारण हैं –

1. किसी विपदा के प्रति तात्कालिक प्रतिक्रिया सामान्यत: अनभिविन्यास (आत्म-विस्मृति) की होती है। सामान्य जन को यह समझने में कुछ समय लगता है कि इस विपदा का पूरा अर्थ क्या है तथा इसने उनके जीवन में क्या कर दिया है। कभी-कभी वे स्वयं अपने से यह स्वीकार। नहीं करते कि उनके साथ कोई भयंकर घटना घटी है। इन तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के पश्चात् शारीरिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं।

2. शारीरिक प्रतिक्रियाएँ-जैसे बिना कार्य किए भी शारीरिक परिश्रति, निद्रा में कठिनाई, भोजन के स्वरूप में परिवर्तन, हृदयगति और रक्तचाप में वृद्धि तथा एकाएक चौंक पड़ना पीड़ित व्यक्तियों में सरलता से दृष्टिगत होती हैं।

3. सामाजिक प्रतिक्रियाएँ, जैसे-शोक एवं भय, चिड़चिड़ापन क्रोध (“यह मेरे ही साथ क्यों घटित हुआ”) सहायता की भावना, निराशा (“इस घटना का निवारण करने के लिए मैं कुछ कर सका/सकी”) अवसाद, कभी-कभी पूर्ण संवेग-शून्यता अपराध भावना कि व्यक्ति स्वयं जीवित है जबकि परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो गई, स्वयं अपने को दोष देना तथा जीवन के नेमी क्रियाकलापों (Routine activities) में भी अभिरुचि का अभाव।

4. संज्ञानात्मक प्रतिक्रियाएँ, जैसे-आकुलता, एकाग्रता में कठिनाई, अवधान विस्तृति में कमी, संभ्रम, स्मृतिलोप या ऐसी सुस्पष्ट स्मृतियाँ जो वांछित हैं (अथवा, घटना का दुःस्वप्न)।

5. सामाजिक प्रतिक्रियाएँ, जैसे-दूसरों से विननिवर्तन (Withdra), दूसरों के साथ द्वंद्व, प्रियजनों के साथ भी अक्सर विवाद और अस्वीकृति महसूस करना या अलग-अलग पड़ जाना।

6. यह आश्चर्यजनक है कि अक्सर कुछ उत्तरजीवी, दबाव के प्रति प्रबल सांवेगिक प्रतिक्रियाओं के मध्य में भी, वास्तव में स्वस्थ होने की प्रक्रिया में दूसरों के लिए सहायक होते हैं। इन अनुभवों को सामना करने के बाद भी जीवित बच जाने तथा अपना अस्तित्व बचाए रखने से व्यक्ति जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर लेते हैं तद्नुभूति के द्वारा इस अभिवृत्ति को दूसरे उत्तरजीवियों में विकसित कराने में समर्थ हो जाते हैं।

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प्रश्न 7.
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार क्या है? प्रदूषण के पर्यावरण का संरक्षण कैसे किया जा सकता है? कुछ सुझाव दीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार (Pro-environmental behaviour) के अनतर्गत वे दोनों प्रकार के व्यवहार आते हैं जिनका उद्देश्य पर्यावरण की समस्याओं से संरक्षण करना है तथा स्वस्थ पर्यावरण को उन्नत करना है। प्रदूषण से पर्यावरण का संरक्षण करने के लिए कुछ प्रोत्साहन क्रियाएँ निम्नलिखित हैं:

1. वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है, वाहनों को अच्छी हालत में रखने से अथवा ईंधन रहित वाहन चलाने से और धूम्रपान की आदत छोड़ने से।

2. शोर के प्रदूषण में कमी लाई जा सकती है, यह सुनिश्चित करके कि शोर का प्रबलता स्तर मद्धिम हो। उदाहरण के लिए सड़क पर अनावश्यक हॉर्न बजाने का कम कर अथवा ऐसे नियमों का निर्माण कर जो शोर वाले संगीत को कुछ विशेष समय पर प्रतिबंधित कर सकें।

3. कूड़ा-करकट से निपटने का उपयुक्त प्रबंधन, उदाहरण के लिए जैविक रूप से नष्ट होने वाले तथा जैविक से नष्ट नहीं होने वाले अवशिष्ट कूड़े का पृथक कर या रसोईघर की अवशिष्ट सामग्री से खाद बनाकर। इस प्रकार के उपायों का उपयोग घर तथा सार्वजनिक स्थानों पर किया जाना चाहिए। औद्योगिक तथा अस्पताल की अवशिष्ट सामग्रियों के प्रबंधन के प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

4. वृक्षारोपण करना तथा उनकी देखभाल की व्यवस्था, यह ध्यान में रखकर करने की आवश्यकता है कि ऐसे पौधे और वृक्ष नहीं लगाने चाहिए जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों।

5. प्लास्टिक के उपयोग का किसी भी रूप में निषेध करना, इस प्रकार ऐसी विषैली अवशिष्ट सामग्रियों को कम करना जिनसे जल, वायु तथा मृदा का प्रदूषण होता है।

6. उपभोक्ता वस्तुओं का वेष्टन या पैकेज जैविक रूप से नष्ट होने वाले पदार्थों में कम बनाना। ऐसे निर्माण नियमों का बनाना (विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में) जो इष्टतम पर्यावरणी अभिकल्प का उल्लंघन न करने दें।

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प्रश्न 8.
“निर्धनता’ ‘भेदभाव से कैसे संबंधित है? निर्धनता तथा वंचन के मुख्य मनोवैज्ञानिक, प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निर्धनता की सर्वसामान्य परिभाषा है कि यह एक ऐसी दशा है जिसमें जीवन में आवश्यक वस्तुओं का अभाव होता है तथा इसका संदर्भ समाज में धन अथवा संपत्ति का असमान विवरण होता है। जाति तथा निर्धनता के कारण सामाजिक असुविधा द्वारा सामाजिक भेदभाव या विभेदन (Social discrimination) की समस्या उत्पन्न हुई है। भेदभाव प्रायः पूर्वाग्रह से संबंधित होते हैं। निर्धनता के संदर्भ में भेदभाव का अर्थ उन व्यवहारों से है जिनके द्वारा निर्धन तथा धनी के बीच विभेद किया जाता है जिससे धनी तथा सुविधासंपन्न व्यक्तियों का निर्धन का निर्धन तथा सुविधावचित व्यक्तियों में क्षमता होते हुए भी उन्हें उन अवसरों से दूर रखा जाता है जो समाज के बाकी लोगों को उपलब्ध होते हैं।

निर्धनों के बच्चों को अच्छे विद्यालयों में अध्ययन करने या अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग करने तथा रोजगार के अवसर नहीं मिलते हैं। सामाजिक असुविधा तथा भेदभाव के कारण निर्धन अपनी सामाजिक-आर्थिक दशा को अपने प्रयासों से उन्नत करने में बाधित हो जाते हैं और इस प्रकार निर्धन और भी निर्धन हो जाते हैं। संक्षेप में, निर्धनता तथा भेदभाव इस प्रकार के संबद्ध है कि भेदभाव निर्धनता का कारण तथा परिणाम दोनों ही हो जाता है। यह सुस्पष्ट है कि निर्धनता या जाति के आधार पर भेदभाव सामाजिक रूप से अन्यायपूर्ण है तथा उसे घटना ही होगा।

निर्धनता तथा वंचन की मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ तथा उनके प्रभाव-निर्धनता तथा वंचन हमारे समाज की सुस्पष्ट समस्याओं में से है। भारतीय समाज-विज्ञानियों ने जिनमें समाजशात्री, मनोवैज्ञानिक तथा अर्थशास्त्री सभी शामिल हैं, समाज के निर्धन एवं वंचित वर्गों के ऊपर सुव्यवस्थित शोधकार्य किए हैं। उनके निष्कर्ष तथा प्रेक्षण यह प्रदर्शित करते हैं कि निर्धनता तथा वंचन के प्रतिकूल प्रभाव अभिप्रेरणा, व्यक्तित्व, सामाजिक व्यवहार, संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं तथा मानसिक स्वास्थ्य पर परिलक्षित होते हैं।

1. अभिप्रेरणा के संबंध में पाया गया है कि निर्धन व्यक्तियों में निम्न आकांक्षा स्तर और दुर्बल उपलब्धि अभिप्रेरणा तथा निर्धनता की प्रबल आवश्यकता परिलक्षित होती हैं। वे अपने सफलताओं की व्याख्या भाग्य के आधार पर करते हैं न कि योग्यता कठिन पश्रिम के आधार पर। सामान्यतः उनका यह विश्वास होता है कि उनके बाहर जो घटक हैं वे उनके जीवन की घटनाओं की नियंत्रित करते हैं, उनके भीतर के घटक नहीं।

2. जहाँ तक व्यक्तित्व का संबंध हे निर्धन एवं वंचित व्यक्तियों में आत्म-सम्मान का निम्न स्तर और दुश्चिंता तथा अंतर्मुखता में खोए रहते हैं। वे बड़े किन्तु सुदूर पुरस्कारों की तुलना में छोटे किन्तु तात्कालिक पुरस्कारों को अधिक वरीयता देते हैं क्योंकि उनके प्रत्यक्षण के अनुसार भविष्य बहुत ही अनिश्चित है। वे निराशा, व्यक्तिहीनता और अनुभूत अन्याय के बोध के साथ जीते हैं तथा अपनी अपन्यता के खो जाने का अनुभव करते हैं।

3. सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में निर्धन तथा वंचित वर्ग समाज के शेष वर्गों के प्रति अमर्ष या विद्वेष की अभिवृत्ति रखते हैं।

4. संज्ञानात्मक प्रकार्यों पर दीर्घकालीन वंचन के प्रभाव के संबंध में यह पाया गया है कि निम्न की अपेक्षा उच्च वंचन स्तर के पीड़ित व्यक्तियों में ऐसे कृत्यों (जैसे-वर्गीकरण, शाब्दिक तर्क, काल प्रत्यक्ष तथा चित्र गहनात प्रत्यक्षण) पर बौद्धिक क्रियाएँ तथा निपष्पादन निम्न स्तर के होते हैं। यह भी स्पष्ट हो चुका है कि वंचन का प्रभाव इसलिए होता है क्यों कि जिस परिवेश में बच्चे पलकर बड़े होते हैं चाहे वह साधन संपन्न हों या कंगाल, वह उनके संज्ञानात्मक विकास की प्रभावित करता है तथा या उनके संज्ञानात्मक कृत्य निष्पादन में परिलक्षित होता है।

5. जहाँ तक मानसिक स्वास्थ्य का संबंध है, मानसिक विकारों तथा निर्धनता या वंचन में ऐसा संबंध है जिस पर प्रश्नचिह्न भी नहीं लगाया जा सकता है। निर्धन व्यक्तयों में कुछ विशिष्ट मानसिक रोगों से पीड़ित होने की संभावना, धनी व्यक्तियों की अपेक्षा, संभवतः इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि वे मूल आवश्यकताओं के विषय में निरंतर चिंतित रहते हैं, असुरक्षा की भावना अथवा चिकित्सा-सुविधाओं, विशेष रूप से मानसिक रोगों के लिए, की अनुपलब्धता से ग्रस्त रहते हैं।

वस्तुत: यह सुझाव भी दिया गया है कि अवसाद प्रमुखतया निर्धन व्यक्तियों का ही मानसिक विकास है। इनके अतिरिक्त, निर्धन निराशा-भावना तथा अन्नयता के खो जाने का भी ऐसे अनुभव करते हैं जैसे कि वे समाज के अंग ही नहीं है। इसके परिणामस्वरूप वे संवेगात्मक तथा समायोजन संबंधी समस्याओं से भी पीड़ित होते हैं।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं जीवन

प्रश्न 9.
‘नैमत्तिक आक्रमण’ तथा शत्रुतापूर्ण आक्रमण’ में अंतर कीजिए। आक्रात्मक तथा हिंसा को कम करने हेतु कुछ युक्तियों का सुझाव दीजिए।
उत्तर:
‘नैमित्तिक आक्रमण’ तथा ‘शत्रुतापूण आक्रमण’ में अंतरः
नैमित्तिक आक्रमण (Instrumental aggression) तथा शत्रुतापूर्ण आक्रमण (Hostile aggression) में भी भेद किया जाता है। जब किसी लक्ष्य या वस्तु को प्राप्त करने के लिए आक्रमण किया जाता है तो उसे नैमित्तिक आक्रमण कहते हैं। उदाहरण के लिए, एक दबंग छात्र विद्यालय में नए विद्यार्थी को इसलिए चपत लगाता है जिससे कि वह उसकी चॉकलेट ले सके।

शत्रुतापूर्ण आक्रमण वह कहलाता है जिसमें लक्ष्य (पीड़ित) के प्रति क्रोध की अभिव्यक्ति होती है या उसे हानि पहुँचाने के आशय से किया जाता है, जबकि हो सकता है कि आक्रमण का आशय पीड़ित व्यक्ति से कुछ भी प्राप्त करना न हो। उदाहरण के लिए, समुदाय के किसी व्यक्ति की एक अपराधी इसलिए पिटाई कर देता है क्योंकि उसने पुलिस के समक्ष अपराधी का नाम लिया।

आक्रामकता तथा हिंसा को कम करने की युक्तियाँ –

1. माता-पिता तथा शिक्षकों को विशेष रूप से सतर्क करने की आवश्यकता है कि वे आक्रामकता को किसी भी रूप में प्रोत्साहित या पुरस्कृत न करें, अनुशासित करने के लिए दंड के उपयोग को भी परिवर्तित करना होगा।

2. आक्रामक मॉडलों के व्यवहारों को प्रेक्षपण करने तथा उनका अनुकरण करने के लिए अवसरों को कम करने की आवश्यकता है। आक्रमण को वीरोचित व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करने को विशेष रूप में परिहार की आवश्यकता है क्योंकि इससे प्रेक्षण द्वारा अधिगम करने के लिए उपयुक्त परिस्थिति का निर्माण होता है।

3. निर्धनता तथा सामाजिक अन्याय आक्रमण के प्रमुख कारण हो सकते हैं क्योंकि वह समाज के कुछ वर्गों में कुंठा उत्पन्न कर सकते हैं। सामाजिक न्याय तथा समानता को समाज में परिपालन करने से कुंठा के स्तर को कम करने तथा उसके द्वारा आक्रामक प्रवृतित्तयों को नियंत्रित करने में कम-से-कम कुछ सीमा तक सफलता मिल सकती है।

4. इन उक्तियों के अतिरिक्त सामाजिक या सामुदायिक स्तर पर यह आवश्यक है कि शांति के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति का विकास किया जाए। हमें न केवल आक्रामकता को कम करने की आवश्यकता है बल्कि इसकी भी आवश्यकता है कि हम सक्रिय रूप से शांति विकसित करें एवं उसे बनाए रखें। हमारे अपने संस्कृति मूल्य सदा शांतिपूर्ण तथा सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व को अधिक महत्त्व देते हैं। हमारे राष्ट्रीय महात्मा गाँधी ने विश्व की शांति कार एक नया दृष्टिकोण दिया जबकि आक्रमण का अभाव नहीं था, यह अहिंसा (Non-violence less) का विचार था, जिस पर उन्होंने स्वयं जीवन भर अभ्यास किया।

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प्रश्न 10.
मानव व्यहार पर टेलीविजन देखने के मनोवैज्ञानिक समाघात का विवेचन कीजिए। उसके प्रतिकूल परिणामों को कैसे कम किया जा सकता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मानव व्यवहार पर टेलीविजन देखने का मनोवैज्ञानिक समाघात-इसमें कोई संदेह नहीं है कि टेलीविजन प्रौद्योगिक प्रगति कार एक उपयोगी उत्पाद है, किन्तु उसके मानव पर मनोवैज्ञानिक समाघात के संबंध में दोनों सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव पाए गए हैं। अनेक शोध अध्ययनों में टेलीविजन देखने की संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं तथा सामाजिक व्यवहारों पर प्रभाव का अध्ययन किया गया, है विशेष रूप से पाश्चात्य संस्कृतियों में उनके निष्कर्ष मिश्रित (मिले-जुले) प्रभाव दिखाते हैं। अधिकांश अध्ययन बच्चों पर किए गए हैं क्योंकि ऐसा समझा जाता है कि वे वयस्कों की अपेक्षा टेलीविजन के समाघात के प्रति अधिक संवेदनशील या असुरक्षित हैं।

1. टेलीविजन बड़ी मात्र में सूचनाएँ और मनोरंजन को आकर्षक रूप से प्रस्तुत करता है तथा यह दृश्य माध्यम है, अतः यह अनुदेश देने का एक प्रभावी माध्यम बन गया। इसके साथ ही क्योंकि कार्यक्रम आकर्षक होते हैं, इसलिए बच्चे उन्हें देखने में बहुत अधिक समय व्यतीत करते हैं। इसके कारण उनके पठन-लेखन (पढ़ने-लिखने) की आदत तथा घर के बाहर की गतिविधि यों जैसे-खेलने में कम आती है।

2. टेलीविजन देखने से बच्चों की एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की योग्यता, उनकी सर्जनात्मकता तथा समझने की क्षमता तथा उनकी सामाजिक अंतः क्रियाएँ भी प्रभावित हो सकता है। एक ओर, कुछ श्रेष्ठ कार्यक्रम सकारात्मक अंतर्वैयक्तिक अभिवृत्तियों पर बल देते हैं तथा उपयोगी तथ्यात्मक सूचनाएँ उपलब्ध कराते हैं जो बच्चों को कुछ वस्तुओं को अभिकल्पित तथा निर्मित करने में सहायता करते हैं। दूसरी ओर, ये कार्यक्रम कम उम्र के दर्शकों का विकर्षण या चित्त-अस्थिर कर एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की उनकी योग्यता में व्यवधान उत्पन्न कर सकते हैं।

3. लगभग चालीस वर्ष पूर्व अमेरिका तथा कनाडा में एक गंभीर वाद-विवाद इस विषय पर उठा कि टेलीविजन देखने का दर्शकों, विशेषकर बच्चों की आक्रामकता तथा हिंसात्मक प्रवृत्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है। जैसा कि पहले आक्रामक व्यवहारों के संदर्भ में बताया जा चुका है, शोध के परिणामों ने यह प्रदर्शित किया कि टेलीविजन पर हिंसा को देखना वस्तुतः दर्शकों में अधिक आक्रामकता से संबद्ध था।

यदि दर्शक बच्चे थे तो जो कुछ वे देखते थे उसका अनुकरण करने की उनमें प्रवृत्ति थी किन्तु उनमें ऐसे व्यवहारों के परिणामों को समझने की परिपक्वता नहीं थी। तथापि, कुछ अन्य शोध-निष्कर्ष यह भी प्रदर्शित करते हैं कि हिंसा को देखने से दर्शकों में वस्तुतः सहज आक्रामक प्रवृत्तियों में कमी आ सकती है-जो कुछ भीतर रुका हुआ है उसे निकास या निर्गम का मार्ग मिल जाता है, इस प्रकार तंत्र साफ हो जाता है, जैसे कि एक बंद निकास-नल की सफाई हो रही है। यह प्रक्रिया केथार्सिस (Catharisis) कहलाती है।

4. वयस्कों तथा बच्चों के संबंध में यह कहा जात है कि एक उपभोक्तावादी अभिवृत्ति (प्रवृत्ति) विकसित हो रही है और यह टेलीविजन देखने के कारण है। बहुत से उत्पादों के विज्ञापन प्रसारित किए जाते हैं तथा किसी दर्शक के लिए उनके प्रभाव में आ जाना काफी स्वाभाविक प्रक्रिया है। इन परिणामों की चाहे कैसे भी व्याख्या की जाए इस बात के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं जो असीमित टेलीविजन देखने के प्रति चेतावनी देते हैं।

Bihar Board Class 12 Psychology मनोविज्ञान एवं जीवन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राकृतिक पर्यावरण क्या है?
उत्तर:
प्रकृति वह अंश जिसे मानव ने नहीं छुआ है, वह प्राकृतिक पर्यावरण कहलाता है।

प्रश्न 2.
निर्मित पर्यावरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक पर्यावरण में जो कुछ भी मानव द्वारा सर्जित है, वह निर्मित पर्यावरण है। उदाहरण-मकन, पुल, सड़कें बाँध आदि।

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प्रश्न 3.
किस मनोवैज्ञानिक ने मानव-पर्यावरण संबंधी का विवरण प्रस्तुत करने के लिए तीन उपागमों का वर्णन किया है?
उत्तर:
स्टोकोल्स ने मानव-पर्यावरण संबंधी का विवरण प्रस्तुत करने के लिए तीन उपागमों का वर्णनन किया है।

प्रश्न 4.
स्टोकोल्स नामक मनोवैज्ञानिक द्वारा प्रस्तुत तीन उपागमों का नाम बताइए।
उत्तर:
स्टोकोल्स द्वारा मानव-पर्यावरण संबंधी का विवरण प्रस्तुत करने के वर्णित तीन उपागम –

  1. अल्पतमवादी परिप्रेक्ष्य
  2. नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य
  3. आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य

प्रश्न 5.
नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य का मानव-पर्यावरण संबंध के बारे में क्या मानना है?
उत्तर:
अल्पतमवादी परिप्रेक्ष्य का यह अभिग्रह है कि भौतिक पर्यावरण मानव व्यवहार, स्वास्थ्य तथा कुशल क्षेम पर न्यूनतम या नगण्य प्रभाव डालता है।

प्रश्न 6.
नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य क्या प्रस्तावित करता है?
उत्तर:
नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तावित करता है कि भौतिक पर्यावरण की अस्तित्व ही प्रमुखतया मनुष्य के सुख एवं कल्याण के लिए है। पर्यावरण के ऊपर मनुष्य के अधिकांश प्रभाव इसी नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य का प्रतिबिंबित करते हैं।

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प्रश्न 7.
आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य मानव-पर्यावरण संबंध का किस रूप में विवरण प्रस्तुत करता है।
उत्तर:
आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य पर्यावरण को एक सम्मान योग्य और मूल्यवान वस्तु के रूप में संदर्भित करता है अर्थात् इसका मानना है कि मनुष्य तभी स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगे जब पर्यावरण का स्वस्थ तथा प्राकृतिक रखा जायेगा।

प्रश्न 8.
पर्यावरण के विषय में भारतीय दृष्टिकोण किस परिप्रेक्ष्य को मान्यता देता है?
उत्तर:
पर्यावरण के विषय में पारंपरिक भारतीय दृष्टिकोण आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य को मान्यता देता है।

प्रश्न 9.
पर्यावरणी मनोविज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर:
मनोविज्ञान की एक शाखा जो अनेक ऐसे मनोवैज्ञानिक मुद्दों का अध्ययन करता है जिनका संबंध व्यापक अर्थ में मानव-पर्यावरण अंतः क्रियाओं से होता है, पर्यावरणी मनोविज्ञान कहलाता है।

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प्रश्न 10.
आजकल किन पर्यावरणी समस्याओं के प्रति जागरुकता बढ़ रही है?
उत्तर:
आजकल पर्यावरणी समस्याएँ-शोर वायु, जल तथा प्रदूषण और कूड़े को निपटाने के असंतोषजनक उपायों का शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़नेवाले क्षतिकर प्रभाव के प्रति जागरुकता बढ़ रही है।

प्रश्न 11.
पर्यावरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण शब्द हमारे चारों ओर जो कुछ है उसे संदर्भित है। व्यक्ति के बाहर जो शक्तियाँ है जिनके प्रति व्यक्ति अनुक्रिया करता है वे सब पर्यावरण में निहित हैं।

प्रश्न 12.
पारिस्थितिकी क्या है?
उत्तर:
पारिस्थितिकी जीव तथा उसके पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन है।

प्रश्न 13.
दबाव क्या है?
उत्तर:
दबाव एक अप्रिय मनोवैज्ञानिक स्थिति है जो व्यक्ति में तनाव तथा दुश्चिंता उत्पन्न करती है।

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प्रश्न 14.
शोर क्या है?
उत्तर:
कोई भी ध्वनि जो खीझ या चिड़चिड़ाहट उत्पन्न करे और अप्रिय हो, उसे शोर कहते हैं।

प्रश्न 15.
कार्य निष्पादन पर शोर के प्रभाव को उसकी कौन-सी विशेषताएँ निर्धारित करती हैं?
उत्तर:
शोर की तीन विशेषताएँ शोर की तीव्रता, भविष्यकथनीयता तथा नियंत्रणीयता कार्य निष्पादन पर शोर के प्रभाव को निर्धारित करते हैं।

प्रश्न 16.
शोर का क्या प्रभाव होता है?
उत्तर:
शोर हमारे चिंतन, स्मृति तथा अधिगम पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। शोर से हमारी सुनने की क्षमता में कमी आ सकती है तथा मानसिक क्रियाओं पर निषेधात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इससे एकाग्रता कम हो जाती है।

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प्रश्न 17.
पर्यावरणी प्रदूषण कितने रूपों में हो सकता है?
उत्तर:
पर्यावरणी प्रदूषण वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण के रूपों में हो सकता है।

प्रश्न 18.
प्रदूषण क्या होता है?
उत्तर:
प्रदूषण किसी प्राकृतिक संसाधन की गुणवत्ता में अनचाहा परिवर्तन है जो जीने वालों के लिए हानिकारक हो सकता है।

प्रश्न 19.
कुछ ऐसे अवशिष्ट पदार्थों के उदाहरण दें जो जैविक रूप से क्षरणशील नहीं होते।
उत्तर:
प्लास्टिक, टीन तथा धातु से बने पात्र ऐसे अवशिष्ट पदार्थ हैं जो जैविक रूप से झरणशील नहीं होते।

प्रश्न 20.
हमारे देश के संदर्भ में आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
हमारे देश में अध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य के दो उदाहरण हैं-राजस्थान के विश्नोई समुदाय के रीति-रिवाज तथा उत्तराखण्ड क्षेत्र के चिपको आंदोलन।

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प्रश्न 21.
अभिघातज उत्तर दबाव विकास क्या है?
उत्तर:
अभिघाज उत्तर दबाव विकास एक मनोवैज्ञानिक समस्या है जो अभिघातज घटनाओं जैसे-प्राकृतिक विपदाओं के कारण उत्पन्न होती हैं।

प्रश्न 22.
रेफ्रीजरेटर तथा वातानुकूलन यंत्र किस रासायनिक द्रव्य को उत्पादित करते हैं?
उत्तर:
रेफ्रीजरेटर तथा वातानुकूल यंत्र सी.एफ.सी. या क्लोरो-फ्लोरो रासायनिक द्रव्य को उत्पादित करते हैं।

प्रश्न 23.
वृक्षों का कटान किस प्रकार का व्यवधान उत्पन्न करता है?
उत्तर:
वृक्षों का कटान कार्बन चक्र एवं जल चक्र में व्यवधान उत्पन्न करता है।

प्रश्न 24.
पर्यावरणी दबावकरकों के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
शोर, प्रदूषण, भीड़ तथा प्राकृतिक विपदाएँ ये सब पर्यावरणी दबाव कारकों को उदाहरण हैं।

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प्रश्न 25.
अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरी किसे कहते हैं?
उत्तर:
सामाजिक स्थितियों में मनुष्य जिन व्यक्तियों के साथ अंत:क्रिया कर रहा होता है उनके साथ एक विशेष भौतिक (शारीरिक) दूरी बनाए रखना चाहता है। इसे अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरी कहते हैं।

प्रश्न 26.
प्राकृतिक विपदाएँ क्या हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक विपदाएँ ऐसे दबावपूर्ण अनुभव है जो कि प्रकृति प्रकोप के परिणाम हैं अर्थात् जो प्राकृतिक पर्यावरण में अस्तव्यस्तता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। उदाहरण-भूकंप, सुनानी, बाढ़, तूफान आदि।

प्रश्न 27.
प्राकृतिक घटनाओं को विपदा क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
भूकंप, बाढ़, तूफान तथा ज्वालामुखीय उद्गार आदि प्राकृतिक घटनाओं को विपदा इसलिए कहते हैं क्योंकि इन्हें रोका नहीं जा सकता, प्रायः ये बिना किसी चेतावनी के आती तथा मानव जीवन एवं संपत्ति को इनसे अत्यधिक क्षति पहुँचती है।

प्रश्न 28.
प्राकृतिक विपदाओं के एक प्रभाव को लिखिए।
उत्तर:
प्राकृतिक विपदाओं के पश्चात् सामान्य जन निर्धनता की चपेट में आ जाते हैं बेघर तथा संसाधन रहित हो जाते हैं और उनका सब कुछ क्षतिग्रस्त और नष्ट हो जाता है।

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प्रश्न 29.
प्राकृतिक विपदाओं के विध्वंसक परिणामों को कम करने हेतु किस प्रकार की तैयार की जा सकती है?
उत्तर:
प्राकृतिक विपदाओं के विध्वंसक परिणामों को कम करने हेतु अग्र तैयारी की जा सकती है –

  1. चेतावनी
  2. सुरक्षा उपायों के द्वारा और
  3. मनोवैज्ञानिक विकारों के उपचार द्वारा

प्रश्न 30.
वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण के स्रोतों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अवशिष्ट पदार्थ या कूड़ा-करकट जो घरों या उद्योगों से निकलते हैं, वाहनों से निकलनेवाले विषैला धुआँ, चिमनियों से निकलनेवाले धुआँ, औद्योगिक धूल, तम्बाकू, पाल आदि वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण के बड़े स्रोत हैं।

प्रश्न 31.
भीड़ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक विशिष्ट क्षेत्र या दिक् में बड़ी संख्या में व्यक्तियों की उपस्थिति के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रिया ही भीड़ कहलाती है।

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प्रश्न 32.
भीड़ के अनुभव के किन्हीं दो लक्षणों को बताइए।
उत्तर:
भीड़ के अनुभव के दो लक्षण निम्नलिखित है –

  1. असुस्थता की भावना
  2. वैयक्तिक स्वतंत्रता में न्यूनता या कमी

प्रश्न 33.
भीड़ सहिष्णुता क्या है?
उत्तर:
भीड़ सहिष्णुता, अधिक घनत्व या भीड़वाले पर्यावरण के साथ मानसिक रूप से संयोजन करने की योग्यता की संदर्भित करती है। जैसे-घर के भीतर भीड़।

प्रश्न 34.
प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता वह योग्यता है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति उस स्थिति को भी सह लेता है जिसमें उसे माल संसाधनों यहाँ तक कि भौतिक स्थान के लिए भी अनेक व्यक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती हैं।

प्रश्न 35.
भारतीय समाज में सामाजिक असुविधा का एक प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर:
भारतीय समाज में सामाजिक असुविधा का एक प्रमुख कारण जाति व्यवस्था रही है।

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प्रश्न 36.
सामाजिक असुविधा किस स्थिति को कहते हैं?
उत्तर:
वह स्थिति जिसके कारण समाज के कुछ वर्गों को उन असुविधाओं का उपयोग नहीं करने दिया जाता है जो कि समाज के शेष वर्ग के व्यक्ति करते हैं।

प्रश्न 37.
भेदभाव का क्या अर्थ है?
उत्तर:
भेदभाव का अर्थ उन व्यवहारों से है जिनके द्वारा धनी तथा निर्धन के बीच विभेद किया जाता है जिससे धनी और सुविधासंपन्न व्यक्तियों का निर्धन तथा सुविधावंचित व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक पक्षपात किया जाता है।

प्रश्न 38.
निर्धनता तथा वंचन के प्रभव किन बातों पर परिलक्षित होते हैं?
उत्तर:
निर्धनता तथा वंचन के प्रतिकूल प्रभाव अभिप्रेरणा, व्यक्तित्व, सामाजिक व्यवहार, संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं तथा मानसिक स्वास्थ्य पर परिलक्षित होते हैं।

प्रश्न 39.
सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में निर्धन तथा वंचित वर्ग शेष वर्गों के प्रति किस प्रकार की अभिवृत्ति रखते हैं।
उत्तर:
सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में निर्धन तथा वंचित वर्ग समाज के शेष वर्गों के प्रति उमर्ष या विद्वैष की अभिवृत्ति रखते हैं।

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प्रश्न 40.
मनोवैज्ञानिक विकारों का उपचार करने के लिए किस प्रमुख अभिवृत्ति को विकसित करने की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
मनोविज्ञानिक विकारों का उपचार करने के लिए एक प्रमुख अभिवृत्ति जिसे उत्तरजीवियों में विकसित करने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 41.
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार के अंतर्गत वे दोनों प्रकार के व्यवहार होते हैं जिनका उद्देश्य पर्यावरण का समस्याओं से संरक्षण करना है तथा ईंधनरहित वाहन चलाने से।

प्रश्न 42.
वायु प्रदुषण को कम करने का कोई एक उपाय बताइए।
उत्तर:
वाहनों को अच्छी हालत में रखने अथवा ईंधनरहित वाहन चलाने से।

प्रश्न 43.
आर्थिक अर्थ में निर्धनता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
आर्थिक अर्थ में निर्धनता का मापन आय, पोषण तथा जीवन की मूल आवश्यकताओं, जैसे-भोजन, वस्तु तथा मकान पर कितनी धनराशि व्यय की जा रही हैं, के आधार पर ही करते हैं।

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प्रश्न 44.
वंचन किस दशा को संदर्भित करता है?
उत्तर:
वंचन उस दशा को संदर्भित करता है जिसमें व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसने कोई मूल्यवान वस्तु खो दी है तथा उसे वह प्राप्त नहीं हो रही है जिसके लिए वह योग्य है।

प्रश्न 45.
सामाजिक असुविधा या विभेदन की समस्या के उत्पन्न होने के कारण बताइए।
उत्तर:
जाति और निर्धनता के कारण सामाजिक असुविधा द्वारा सामाजिक भेदभाव या विभेदन की समस्या उत्पन्न हुई है।

प्रश्न 46.
हिंसा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
दूसरे व्यक्ति या वस्तु के प्रति बलपूर्वक ध्वंसात्मक या विनाशकारी व्यवहार को हिंसा कहते हैं।

प्रश्न 47.
किस प्रकार के आक्रमण को नैमित्तिक आक्रमण की संज्ञा दी जाती है?
उत्तर:
जब किसी लक्ष्य या वस्तु को प्राप्त करने के लिए आक्रमण किया जाता है तो इसे नैमित्तिक आक्रमण कहते हैं।

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प्रश्न 48.
शत्रुतापूर्ण आक्रमण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
शत्रुतापूर्ण आक्रमण वह कहलाता है जिसमें लक्ष्य के प्रति क्रोध की अभिव्यक्ति होती है या उसे हानि पहुँचाने के आशय से किया जाता है जबकि हो सकता है कि आक्रामक का आशय पीड़ित व्यक्ति से कुछ भी प्राप्त करना न हो।

प्रश्न 49.
आक्रमण के किन्हीं दो कारणों को लिखें।
उत्तर:
आक्रमण के दो कारण हैं –

  1. आक्रामकता की सहज प्रवृत्ति का होना और
  2. कुंठा

प्रश्न 50.
निर्धनता की संस्कृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक विश्वास व्यवस्था, जीवन शैली तथा वे मूल्य जिनके साथ निर्धन व्यक्ति पलकर बड़ा हुआ है तथा व्यक्ति को यह मनवा या स्वीकार करवा देती है कि वह तो निर्धन ही रहेगा या रहेगी, निर्धनता की संस्कृति कहलाती है।

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प्रश्न 51.
अन्त्योदय के कार्यक्रमों में किन बातों का प्रावधान किया गया है?
उत्तर:
अन्त्योदय के कार्यक्रम में स्वास्थ्य सुविधाओं, पोषण शिक्षा तथा रोजगार के लिए प्रशिक्षण उन सभी क्षेत्रों जिनमें निर्धन व्यक्तियों को सहायता की आवश्यकता होती है, का प्रावधान किया गया है।

प्रश्न 52.
उस अंतर्राष्ट्रीय समूह का नाम लिखें जो निर्धनों के हित के लिए समर्पित या प्रतिबद्ध है।
उत्तर:
एकॉन एड् ‘एक अंतर्राष्ट्रीय समूह है, जो निर्धनों के हित के लिए समर्पित या प्रतिबद्ध है।

प्रश्न 53.
एक्शन एड् का लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
एकॉन एड् का लक्ष्य निर्धनों को उनके अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाना, समानता तथा न्याय के प्रति जागरूक करना तथा उसके लिए पर्याप्त पोषण, स्वास्थ्य तथा शिक्षा एवं रोजगार की सुविधाओं को सुनिश्चित करना है।

प्रश्न 54.
आक्रमण पद का उपयोग मनोवैज्ञानिक किस प्रकार के व्यवहार के लिए करते हैं?
उत्तर:
आक्रमण पद का उपयोग मनोवैज्ञानिक ऐसे किसी भी व्यवहार को इंगित करने के लिए करते हैं जो किसी व्यक्तियों के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति/व्यक्तियों के हानि पहुँचाने के आशय से किया जाता है।

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प्रश्न 55.
कुछ संक्रामक या संचारी रोगों के नाम बताइए।
उत्तर:
एच. आई. वी./एड्स, तपेदिक, मलेरिया, श्वसन-संक्रामक या संचारी रोग हैं।

प्रश्न 56.
कुंठा-आक्रामकता सिद्धांत क्या है?
उत्तर:
कुठां-आक्रामकता सिद्धांत के अनुसार, कुंठा के कारण आक्रामक व्यवहार उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 57.
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जॉन डोलार्ड ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर किस सिद्धांत का परीक्षण करने के लिए शोध अध्ययन किया?
उत्तर:
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जॉन डोलॉर्ड ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर कुंठा-आक्रामकता सिद्धांत का परीक्षण करने के लिए विशेष रूप से शोध अध्ययन किया।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पारिस्थितिकी को परिभाषित कीजिए। ‘अभिकल्प’ में होने वाले कुछ लक्षणों को लिखिए।
उत्तर:
पारिस्थितिकी जीव तथा उसके पर्यावरण के बीच के संबंधी का अध्ययन है। मनोविज्ञान में पर्यावरण तथा मनुष्यों की परस्पर निर्भरता पर फोकस है क्योंकि पर्यावरण का अर्थ उन मनुष्यों के आधार पर ही निकलता है जो उसमें रहते हैं। निर्मित पर्यावरण के अंतर्गत साधारणतया पर्यावरणी अभिकल्प (Environmental design) का संप्रत्यय भी आता है। ‘अभिकल्प’ में कुछ मनोवैज्ञानिक लक्षण होते हैं; जैसे –

  1. मानव मस्तिष्क की सर्जनात्मकता, जैसा कि वास्तुविदों, नगर योजनाओं और सिविल अभियंताओं के कार्यों में अभिव्यक्त होता है।
  2. प्राकृतिक पर्यावरण पर नियंत्रण के अर्थ में, जैसा कि नदी के प्राकृतिक बहाव को बाँध कर बनाकर नियमित करने से प्रदर्शित होता है।
  3. निर्मित पर्यावरण में सामाजिक अंत:क्रिया के प्रकार पर प्रभाव। यह विशिष्टता उदाहरण के लिये, कॉलोनी में घरों की बीच कली दूरी, एक घर से कक्षों की अवस्थिति या किसी दफ्तर में औपचारिक तथा औपचारिक सभा के लिए कार्य करने की मेजों और कुर्सियों की व्यवस्था में प्रतिबिंबित होता है।

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प्रश्न 2.
स्थिति पर निर्भरता के आधार पर चार प्रकार की अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्थिति पर निर्भरता के आधार पर चार प्रकार की अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरियों को एडवर्ड हॉल (Edward Hall) नामक मानव विज्ञानी ने बताया है –

  1. अंतरंग दूरी (18 इंच तक)-यह वह दूरी है जो हम तब बनाकर रखते हैं जब हम किसी निजी बातचीत करते हैं या किसी घनिष्ट मित्र या संबंधी के साथ अंत:क्रिया करते हैं।
  2. व्यक्तिगत दूरी (18 इंच से 4 फुट)-यह वह दूरी है जो हम तब बनाकर रखते हैं जब किसी घनिष्ठ मित्र या संबंधी के साथ एकेक अंतः क्रिया करते या फिर कार्य स्थान अथवा दूसरे सामाजिक स्थिति में किसी ऐसे व्यक्ति से अकेले में बात करते हैं जो हमारा बहुत अंतरंग नहीं हैं।
  3. सामाजिक दूरी (8 इंच से 10 फुट)-यह वह दूरी है जो हम उन अंत:क्रियाओं में बनाते हैं जो औचापरिक होते हैं, अंतरंग नहीं।
  4. सार्वजनिक दूरी (10 फीट से अनंत तक)-यह वह दूरी है जो हम औपचारिक स्थिति में, जहाँ बड़ी संख्या में लोग उपस्थिति हों बनाकर रखते हैं। उदाहरण के लिए किसी सार्वजनिक वक्ता से श्रोताओं की या कक्षा में अध्यापक की दूरी होती है।

प्रश्न 3.
प्रतिक्रिया की तीव्रता किन तत्त्वों से प्रभावित होती हैं?
उत्तर:
सामान्यतः प्रतिक्रिया की तीव्रता निम्नलिखित तत्त्वों से प्रभावित होती है –

  1. विपदा की तीव्रता तथा उसके द्वारा की गई क्षति (संपत्ति एवं जीवन), दोनों के संबंध में।
  2. व्यक्ति की सामना करने की सामान्य योग्यता।
  3. विपदा के पूर्व अन्य दबावपूर्ण अनुभव। उदाहरण के लिए जिन व्यक्तियों ने पहले भी दबावपूर्ण स्थितियों का अनुभव किया है उन्हें फिर एक और कठिन और दबावपूर्ण स्थिति में निपटने में अधिक कठिनाई हो सकती है।

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प्रश्न 4.
भीड़ सहिष्णुता तथा प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता में क्या अंतर है?
उत्तर:
भीड़ सहिष्णुता, अधिक घनत्व या भीड़ वाले पर्यावरण के साथ मानसिक रूप से संयोजन करने की योग्यता को संदर्भित करती है; जैसे-घर के भीतर भीड़ (एक छोटे कमरे में बड़ी संख्या में लोग) जो लोग ऐसे पर्यावरण के आदी होते हैं जिसमें अनेक व्यक्ति उनके चारों ओर रहते ही हैं – उदाहरण के लिये वे व्यक्ति जो एक बड़े परिवार में पलकर बड़े होते हैं तथा परिवार एक छोटे मकान में रहता है), वे उन लोगों की अपेक्षा जिन्हें अपने आस-पास केवल कुछ ही व्यक्तियों के रहने की आदत होती, भीड़ सहिष्णुता अधिक विकसित कर लेते हैं। हमारे देश की जनसंख्या विशाल है तथा अनेक व्यक्ति बड़े परिवारों में परंतु छोटे मकानों में रहते हैं।

इसके कारण यह प्रत्याशा होती है कि सामान्यतः भारतीयों में भीड़ सहिष्णुता कम जनसंख्या वाले देशों के वासियों की अपेक्षा अधिक होगी। प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता, वह योग्यता है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति उस स्थिति को भी संह लेता है जिसमें उसे मूल संसाधनों यहाँ तक कि भौतिक स्थान के लिए भी अनेक व्यक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) करनी पड़ती है। चूंकि भीड़ की स्थिति में संसाधनों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा की संभावना होती है इसलिए इस स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया भी संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता से प्रभावित होगी।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं जीवन

प्रश्न 5.
वायु-प्रदूषण क्या है और इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है?
उत्तर:
आधुनिकीकरण तथा औद्योगिकरण के कारण हमारे पर्यावरण की हवा की गुणवत्ता अत्यधिक प्रभावित हुई है। हवा हमारे तथा सभी जीव-जंतुओं के जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वाहनों तथा उद्योगों से निकलनेवाला धुआँ, धूम्रपान आदि से हवा में खतरनाक जहर घुल जाते हैं। इसे हम वायु-प्रदूषण के नाम से जानते हैं। हम इस समस्या के प्रति अपनी सजगता बढ़ाकर इस पर नियंत्रण कर सकते हैं – वाहनों को अच्छी हालत में रखने से या ईंधनरहित वाहन का उपयोग कर तथा धूम्रपान की आदत छोड़कर हम वायु-प्रदूषण को कम कर सकते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निर्धनता के मुख्य कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निर्धनता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –
1. निर्धन स्वयं अपनी निर्धनता के लिए उत्तरदायी होते हैं। इस मत के अनुसार, निर्धन व्यक्तियों में योग्यता तथा अभिप्रेरणा दोनों की कमी होती है जिसके कारण वे प्रयास करके उपलब्ध अवसरों का लाभ नहीं उठा पाते। सामान्यतः निर्धन व्यक्तियों के विषय में यह मत निषेधात्मक है तथा उनकी स्थिति को उत्तम बनाने में तनिक भी सहायता नहीं करता है।

2. निर्धनता का कारण कोई व्यक्ति नहीं अपितु एक विश्वास व्यवस्था, जीवन शैली तथा वे मूल्य हैं जिनके साथ वह पलकर बड़ा हुआ है। यह विश्वास व्यवस्था, जिसे निर्धनता की संस्कृति’ (Culture of poverty) कहा जाता है, व्यक्ति को यह मनवा या स्वीकार करवा देती है कि वह तो निर्धन ही रहेगा/रहेगी तथा यह विश्वास एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहता है।

3. आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक कारक मिलकर निर्धनता का कारण बनते हैं। भेदभाव के कारण समाज के कुछ वर्गों को जीविका की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करने के अवसर भी दिए जाते। आर्थिक व्यवस्था को सामाजिक तथा राजनीतिक शोषण के द्वारा वैषम्यपूर्ण (असंगत) तरह से विकसित किया जाता है जिससे कि निर्धन इस दौड़ से बाहर हो जाते हैं। ये सारे कारक सामाजिक असुविधा के संप्रत्यय में समाहित किए जा सकते हैं जिसका निर्धन सामाजिक अन्याय, वंचन, भेदभाव तथा अपवर्जन का अनुभव करते हैं।

4. वह भौगोलिक क्षेत्र, व्यक्ति जिसके निवासी हों, उसे निर्धनता का एक महत्त्वपूर्ण कारण माना जाता है। उदाहरण के लिए, वे व्यक्ति जो ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जिनमें प्राकृतिक संसाधनों का अभाव होता है। (जैसे-मरुस्थल) तथा जहाँ की जलवायु भीषण होती है (जैसे-अत्यधिक सर्दी या गर्मी) प्रायः निर्धनता के शिकार हो जाते हैं यह कास्क मानव द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। फिर भी इन क्षेत्रों के निवासियों की सहायता के लिए प्रयास अवश्य किए जा सकते हैं ताकि वे जीविका के वैकल्पिक उपाय खोज सकें तथा उन्हें उनकी शिक्षा एवं रोजगार हेतु विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकें।

5. निर्धनता चक्र (Poverty cycle) भी निर्धनता का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण है जो यह व्याख्या करता है कि निर्धनता उन्हीं वर्गों में ही क्यों निरंतर बनी रहती है। निर्धनता की निर्धनता की जननी भी है। निम्न आय और संसाधनों के अभाव से प्रारंभ कर निर्धन व्यक्ति निम्न स्तर के पोषण तथा स्वास्थ्य, शिक्षा के अभाव तथा कौशलों के अभाव से पीड़ित होते हैं। इनके कारण उनके रोजगार पाने के अवसर भी कम हो जाते हैं जो पुनः उनकी निम्न आय स्थिति तथा निम्न स्तर के स्वास्थ्य एवं पोषण स्थिति को सतत् रूप से बनाए रखते हैं।

इनके परिणामस्वरूप निम्न अभिप्रेरणा स्तर स्थिति को और भी खराब कर देता है, यह चक्र पुनः प्रारंभ होता है और चलता रहता है। इस प्रकार निर्धनता चक्र में उपर्युक्त विभिन्न कारकों की अंतः क्रियाएँ सन्निहित होती हैं तथा इसके परिणामस्वरूप वैयक्तिक अभिप्ररेणा, अभिप्रेरणा, आशा तथा नियंत्रण-भावना में न्यूनता आती है।

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प्रश्न 2.
निर्धनता उपशमन के उपयोग की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निर्धनता उपशमन के उपाय निर्धनता एवं उसके निषेधात्मक परिणामों को उपशमित अथवा कम करने के लिए सरकार तथा अन्य समुहों द्वारा अनेक कार्य किए जा रहे हैं। यह कार्य निम्नलिखित है –
1. निर्धनता चक्र को तोड़ना तथा निर्धन व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाने हेतु सहायता करना-प्रारंभ में निर्धन व्यक्तियों को वित्तीय सहायता, चिकित्सापरक एवं अन्य सुविधाएँ उपलबध कराना आवश्यक हो सकता है। यह ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि निर्धन व्यक्ति इस वित्तीय एवं अन्य प्रकार की सहायताओं और स्रोतों पर अपनी जीविका के लिए निर्भर न हो जाएँ।

2. ऐसे संदर्भो का निर्माण जो निर्धन व्यक्तियों को उनकी निर्धनता के लिए दोषी ठहराने की बजाय उन्हें उत्तरदायित्व सिखाए-इस उपाय के द्वारा उन्हें आशा, नियंत्रण एवं अनन्यता की भावनाओं को दोबारा अनुभव करने में सहायता मिलेगी।

3. सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए शैक्षिक एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना-इस उपाय के द्वारा निर्धन व्यक्तियों को अपनी योग्यताओं तथा कौशलों को पहचानने में सहायता मिलेगी जिससे वे समाज के अन्य वर्गों के समकक्ष अपने में समर्थ हो सकें। यह कुंठा को कम करके अपराध एवं हिंसा को भी कम करने में सहायक होगा तथा निर्धन व्यक्तियों को अवैध साधनों के बजाय, वैध साधनों से जीविकोपार्जन करने हेतु प्रोत्साहित करेगा।

4. उन्नत मानसिक स्वास्थ्य हेतु उपाय-निर्धनता न्यूनीकरण के अनेक उपाय उनके – शारीरिक स्वास्थ्य को तो सुधारने में सहायता करते हैं किन्तु उनके मानसिक स्वास्थ्य की समस्या का समाधान प्रभावी ढंग से करना फिर भी आवश्यक होता है। यह आशा की जा सकती है कि इस समस्या के प्रति जागरूकता के द्वारा निर्धनता के इस पक्ष पर अधिक ध्यान देना संभव हो सकेगा।

5. निर्धन व्यक्तियों को सशक्त करने के उपाय-उपर्युक्त उपायों के द्वारा निर्धन व्यक्तियों को अधिक सशक्त बनाना चाहिए जिससे वे स्वतंत्र रूप से गरिमा के साथ अपना जीवन-निर्वाह करने में समर्थ हो सकें तथा सरकार अथवा अन्य समूहों की सहायता पर निर्भर नहीं रहें।

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प्रश्न 3.
आक्रमण के कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
आक्रमण के निम्नलिखित कारण हैं –
1. सहज प्रवृत्ति-आक्रामकता मानव में (जैसा कि यह पशुओं में होता है) सहज (अंतर्जात) होती है। जैविक रूप से यह सहज प्रवृत्ति आत्मरक्ष हेतु हो सकती है।

2. शारीरिक क्रियात्मक तंत्र-शरीर क्रियात्मक तंत्र अप्रत्यक्ष रूप से आक्रामतकता जनिक कर सकते हैं, विशेष रूप से मस्तिष्क के कुछ ऐसे भागों को सक्रिय करके जिनकी संवेगात्मक अनुभव में भूमिका होती हैं शरीरक्रियात्मक भाव प्रबोधन की एक सामान्य स्थिति या सक्रियण की भावना प्रायः आक्रमण के रूप में अभिव्यक्ति हो सकती है। भाव प्रबोधन के कई कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, भीड़ के कारण भी आक्रमण हो सकता है, विशेष रूप से गर्म तथा आई मौसम में।

3. बाल-पोषण-किसी बच्चे का पालन किस तरह से किया जाता है वह प्रायः उसी आक्रामकता को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, वे बच्चे जिनके माता-पिता शारीरिक दंढ का उपयोग करते हैं, उन बच्चों की अपेक्षा जिनके माता-पिता अन्य अनुशासनिक, तकनीकों का उपयोग करते हैं, अधिक आक्रामक बन जाते हैं। ऐसा संभवतः इसलिए होता है कि माता-पिता ने आक्रामक व्यवहार का एक आदर्श उपस्थित किया है, जिसका बच्चा अनुकरण करता है। यह इसलिए भी हो सकता है कि शारीरिक दंड बच्चे को क्रोधित तथा अप्रसन्न बना दे और फिर बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है वह इस क्रोध को आक्रामक व्यवहार के द्वारा अभिव्यक्त करता है।

4. कुंठा-आक्रमण कुंठा की अभिव्यक्ति तथा परिणाम हो सकते हैं, अर्थात् वह संवेगात्मक स्थिति जो तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति को किसी लक्ष्य तक पहुँचने में बाधित किया जाता है अथवा किसी ऐसी वस्तु जिसे वह पाना चाहता है, उसको प्राप्त करने से उसे रोका जाता है। व्यक्ति किसी लक्ष्य के बहुत निकट होते हुए भी उसे प्राप्त करने से वंचित रह सकता है। यह पाया गया है कि कुठित स्थितियों में जो व्यक्ति होते हैं, वे आक्रामक व्यवहार उन लोगों की अपेक्षा अधिक प्रदर्शित करते हैं जो कुठित नहीं होते।

5. कुंठा के प्रभाव की जाँच करने के लिए किए गए एक प्रयोग में बच्चों को कुछ आकर्षक खिलौनों, जिन्हें वे पारदर्शी पर्दे (स्क्रीन) के पीछे से देख सकते थे, को लेने से रोका गया। इसके परिणामस्वरूप ये बच्चे, उन बच्चों की अपेक्षा, जिन्हें खिलौने उपलब्ध थे, खेल में अधिक विध्वंसक या विनाशकारी पाए गए।

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प्रश्न 4.
कुछ स्थितिपरक कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कुछ स्थितिपरक कारक निम्नलिखित हैं –
1. अधिगम-मनुष्यों में आक्रमक प्रमुखतया अधिगम का परिणाम होता है, न कि केवल सहज प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति। आक्रामकता का अधिगम एक से अधिक तरीकों द्वारा घटित हो सकता है। कुछ व्यक्ति आक्रामकता इसलिए सीख सकते हैं क्योंकि उन्होंने पाया है कि ऐसा करना एक प्रकर का पुरस्कार है (उदाहरण के लिए, शत्रुतापूर्ण आक्रमण के द्वारा आक्रामक व्यक्ति को वह प्राप्त हो जाता है जो वह चाहता है)। यह प्रत्यक्ष प्रबलन द्वारा अधिगम का एक उदाहरण है। व्यक्ति दूसरों के आक्रामण व्यवहार का प्रेक्षण करते हुए भी आक्रामण करना सीखता है। यह मॉडलिंग या प्रतिरूपण (Modelling) के द्वारा अधिगम का एक उदाहरण है।

2. आक्रामक मॉडल का प्रेक्षण-एलबर्ट बंदूरा (Albert Bandura) एवं उनके सहयोगियों तथा अन्य मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए अनेक शोध अध्ययन आक्रामकता के अधि गम में मॉडल की भूमिका को प्रदर्शित करते हैं। यदि कोई बच्चा टेलीविजन पर आक्रमण तथा हिंसा देखता है तो वह उस व्यवहार का अनुकरण करना प्रारंभ कर सकता है।

इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि टेलीविजन तथा सिनेमा के माध्यम से दिखाई जानेवाली हिंसा एवं आक्रामकता का दर्शकों, विशेष रूप से बच्चों पर, प्रबल प्रभाव पड़ता है, किन्तु प्रश्न यह है कि क्या केवल टेलीविजन पर हिंसा देखने मात्र से व्यक्ति आक्रामक व्यवहार को प्रकट करने में सहायक होते हैं? या कुछ अन्य स्थितिपरक कारक हैं जो उसके आक्रामक व्यवहार को प्रकट करने में सहायक होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर स्थितिपरक कारकों के संबंध में प्राप्त करके दिया जा सकता है।

3. दूसरों द्वारा क्रोध-उत्तेजनक क्रियाएँ-यदि कोई व्यक्ति एक हिंसा प्रदर्शित करनेवाला सिनेमा देखता है तथा इसके पश्चात् उसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा क्रोध दिलाया जाता है (उदाहरण के लिए उसका अपमान कर या उसे धमकी देकर, शारीरिक आक्रमण द्वारा या बेईमानी द्वारा) तो उस व्यक्ति में आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित करने की संभावना बढ़ जाते है, इसकी तुलना में कि यदि उसे क्रोधित नहीं किया गया हो। जिन अध्ययनों द्वारा कुंठा-आक्रामकता सिद्धांत का परीक्षण किया गया था उनमें व्यक्ति को उत्तेजित कर क्रोध दिला कुंठा उत्पन्न करने का तरीका था।

4. आक्रमण के शास्त्रों (हथियारों) की उपलब्धता- यह पाया है कि हिंसा को देखने के पश्चात् प्रेक्षक में आक्रामकता की संभावना उसी दशा में तब बढ़ती है जब वह आक्रमण के शस्त्र जैसे-डंडा, पिस्तौल या चाकू आसानी से उपलब्ध हों।

5. व्यक्तित्व-कारक-व्यक्तियों से अंतः क्रिया करते समय हम देखते हैं कि उनमें से कुछ स्वाभाविक रूप से ही अधिक ‘क्रोधी (गर्म-मिजाज)’ होते हैं तथा अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक आक्रामकता प्रदर्शित करते हैं। अतः, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि आक्रमकता एक वैयक्तिक गुण है। यह पाया गया है कि वे व्यक्ति जिनमें निम्नस्तरीय आत्म-सम्मान होता है तथा जो असुरक्षित महसूस करते हैं, वे अपने अहं को प्रबल दिखाने के लिए आक्रामक व्यवहार कर सकते हैं। इसी प्रकार वे व्यक्ति जिन्हें अत्यंत उच्चस्तरीय आत्म-सम्मान होता है वे भी आक्रामकता इसलिए प्रदर्शित कर सकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरे लोग उन्हें उस उच्च स्तर’ पर नहीं रखते जिस पर उन्होंने स्वयं को रखा हुआ है।

6. सांस्कृतिक कारक-जिस संस्कृति में व्यक्ति पल कर बड़ा होता है वह अपने सदस्यों को आक्रामक व्यवहार सिखा सकती है अथवा नहीं। ऐसा वह आक्रामक व्यवहारों की प्रशंसा द्वारा तथा उन्हें प्रोत्साहन कर सकती है अथवा ऐसे व्यवहारों को हतोत्साहित करके उनकी आलोचना कर सकती है। कुछ जनजातीय समुदाय रूप से शांतिप्रिय हैं जबकि कुछ अन्य आक्रामकता को अपनी उत्तरजीविता के लिए आवश्यक समझते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दबाव एक स्थिति हैं –
(A) मनोवैज्ञानिक
(B) सामाजिक
(C) आर्थिक
(D) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(A) मनोवैज्ञानिक

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प्रश्न 2.
सी.एफ.सी. या क्लोरो-फ्लोरो कार्बन किसे प्रदूषित करते हैं?
(A) मृदा
(B) जल
(C) वायु
(D) उपरोक्त कोई नहीं
उत्तर:
(C) वायु

प्रश्न 3.
कार्य निष्पादन पर शोर के प्रभाव को शोर की कौन-सी विशेषता निर्धारित करती है?
(A) शोर की तीव्रता
(B) भविष्यकथनीयता
(C) नियंत्रणीयता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 4.
भोपाल गैस त्रासदी कब हुई थी?
(A) दिसंबर 1984
(B) दिसंबर, 1986
(C) मई 1984
(D) जनवरी, 1984
उत्तर:
(A) दिसंबर 1984

प्रश्न 5.
अवशिष्ट पदार्थ जो जैविक रूप से क्षरणशील नहीं होते
(A) प्लास्टिक
(B) धातु से बने पात्र
(C) टीन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 6.
निम्न में किन कारणों से अभिघातज उत्तर दबाव विकार उत्पन्न होते हैं।
(A) शोर
(B) प्राकृतिक विपदाएँ
(C) प्रदूषण
(D) भीड़
उत्तर:
(B) प्राकृतिक विपदाएँ

प्रश्न 7.
अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरी में व्यक्ति किसी प्रकार की दूरी बनाए रखता है?
(A) भौतिक (शारीरिक)
(B) आर्थिक
(C) मानसिक
(D) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(A) भौतिक (शारीरिक)

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प्रश्न 8.
किस मनोवैज्ञानिक ने स्थिति पर निर्भरता के आधार पर चार प्रकार के अंतर्वैयक्तिक दूरी को बताया है –
(A) जॉन डोलार्ड
(B) स्टोकोल्स
(C) एडवर्ड हॉल
(D) एलबर्ट बंदूरा
उत्तर:
(C) एडवर्ड हॉल

प्रश्न 9.
अंतरंग दूरी में एक व्यक्ति कितनी दूर की दूरी बनाए रखता है?
(A) 18 इंच तक
(B) 4 इंच से 10 फुट तक
(C) 4 इंच से 8 फुट तक
(D) 18 इंच से 4 फुट तक
उत्तर:
(A) 18 इंच तक

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प्रश्न 10.
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार नहीं है –
(A) पर्यावरण की समस्याओं से संरक्षण करना
(B) पर्यावरण को नष्ट करना
(C) स्वस्थ पर्यावरण को उन्नत करना
(D) पर्यावरण-मित्र वस्तुओं का उपयोग करना
उत्तर:
(B) पर्यावरण को नष्ट करना

प्रश्न 11.
निम्न में किस पर निर्धनता तथा वचन का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
(A) अभिप्रेरणा
(B) संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं
(C) व्यक्तित्व
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 12.
निम्न में कौन पर्यावरण का संरक्षण करने के लिए प्रोत्साहन क्रियाएँ हैं?
(A) वाहनों को अच्छी हालत में रखना
(B) वृक्षारोपण करना एवं उनकी देखभाल करना
(C) कूड़ा-करकट से निपटने का उपर्युक्त प्रबंधन करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
पर्यावरणीय मनोवैज्ञानिक किन माध्यमों द्वारा पर्यावरण संरक्षण पर बल देते हैं?
(A) पर्यावरणीय शिक्षा
(B) पूर्व व्यवहार अनुबोधक
(C) पश्च व्यवहार पुनर्बलन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) पर्यावरणीय शिक्षा

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प्रश्न 14.
ग्रिफिट का योगदान निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में है?
(A) प्रकाश
(B) शोरगुल
(C) वायु-प्रदूषण
(D) तापमान
उत्तर:
(D) तापमान

प्रश्न 15.
विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है –
(A) 5 अप्रैल
(B) 5 मई
(C) 5 जून
(D) 5 जूलाई
उत्तर:
(C) 5 जून

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प्रश्न 16.
भूकंप एक संकट है –
(A) प्राकृतिक
(B) राजनैतिक
(C) सामाजिक
(D) धार्मिक
उत्तर:
(A) प्राकृतिक

प्रश्न 17.
शोर या ध्वनि को मानने के लिए किस पैमाने का प्रयोग किया जाता है?
(A) सिरदर्द रहना
(B) श्रवण-शक्ति का कम होना
(C) चक्कर आना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) श्रवण-शक्ति का कम होना

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प्रश्न 18.
आक्रमण के कारणों के संबंध में निम्नलिखित में कौन-सा मत नहीं है?
(A) शरीरक्रियात्मक तंत्र
(B) सहज प्रवृत्ति
(C) दादात्मीकरण
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) शरीरक्रियात्मक तंत्र

प्रश्न 19.
भारतीय परिपेक्ष्य में निर्धन किसे कहेंगे?
(A) आमदनी इतनी कम हो कि व्यक्ति अपर्याप्त जीवन व्यतीत करें
(B) आमदनी अधिक हो पर आवश्यकताएँ दोनों अधिक हो
(C) आमदनी और आवश्यकताएँ दोनों अधिक हो
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) आमदनी इतनी कम हो कि व्यक्ति अपर्याप्त जीवन व्यतीत करें

प्रश्न 20.
शुद्ध वायु कहलाती हैं –
(A) 78.98% N2, 20.44% O2, तथा 0.03% CO2
(B) 20.44% N2, 78.98% O2, तथा 0.03% CO2
(C) 60.30% N2, 39.20% O2, तथा 0.03% CO2
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) 78.98% N2, 20.44% O2, तथा 0.03% CO2

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प्रश्न 21.
मानव-पर्यावरण संबं को समझने के लिए कितने संदर्भ विकसित किए गए हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(B) तीन

प्रश्न 22.
जिन प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति अपने वातावरण के सतत् आवाज के साथ सामंजस्य स्थापित कर लेता है। उसे कहा जाता है –
(A) अभ्यसन
(B) सीखना
(C) आदत बनाना
(D) इनमें कुछ भी नहीं
उत्तर:
(A) अभ्यसन

प्रश्न 23.
प्लास्टिक थैलों का उपयोग पर्यावरण के लिए एक बड़ी समस्या है, क्योंकि प्लास्टिक थैले –
(A) जैविक झरणशील होते हैं
(B) जैविक अक्षरशील होते हैं
(C) ज्वलनशील होते हैं
(D) उपर्युक्त सभी होते हैं
उत्तर:
(B) जैविक अक्षरशील होते हैं

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प्रश्न 24.
भूकंप, सुनामी, बाढ़, तूफान ये सब विपदाएँ हैं?
(A) प्राकृतिक
(B) राजनैतिक
(C) सामाजिक
(D) धार्मिक
उत्तर:
(A) प्राकृतिक

प्रश्न 25.
निम्न में कौन प्राकृति विपदा नहीं है –
(A) भूकंप
(B) सुनामी
(C) विषैली गैसें का कारखाने मे रिसाव
(D) बाढ़
उत्तर:
(C) विषैली गैसें का कारखाने मे रिसाव

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प्रश्न 26.
निम्नलिखित में कौन-से निर्मित पर्यावरण उदाहरण है?
(A) नगर
(B) बाँध
(C)पुल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 27.
मानव-निर्मित विपदा के उदाहरण नहीं हैं –
(A) युद्ध
(B) तूफान
(C) महामारी
(D) कारखानों में विषैली गैसों का रिसाव
उत्तर:
(B) तूफान

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प्रश्न 28.
मानव-पर्यावरण सम्बन्ध का विवरण प्रस्तुत करने के लिए निम्न में किस मनोवैज्ञानिक ने तीन उपागमों का वर्णन किया?
(A) स्टोकोल्स
(B) जॉन डोलार्ड
(C) एलबर्ट बंदूरा
(D) एडवडं हॉल
उत्तर:
(A) स्टोकोल्स

प्रश्न 29.
र्यावरण के विषय में पारंपरिक भारतीय दृष्टिकोण किस परिप्रेक्ष्य का मान्यता देता है?
(A) अल्पतमावादी परिप्रेक्ष्य
(B) नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य
(C) अध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) अध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य

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प्रश्न 30.
‘उत्तराखंड क्षेत्र’ के ‘पिचको आंदोलन’ मानव-पर्यावरण संबंधों में किस परिप्रक्ष्य का उदाहरण है?
(A) आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य
(B) नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य
(C) अल्ल्पतमवादी परिप्रेक्ष्य
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य

प्रश्न 31.
निम्न में कौन पर्यावरणी दबाव कारकों के उदाहरण हैं?
(A) शोर
(B) भीड़
(C) प्राकृतिक विपदाएँ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 32.
पर्यावरण को क्षतिग्रस्त करना’ मानव पर्यावरण संबंध के किस परिप्रेक्ष्य को दर्शाता है –
(A) अल्पतमवादी परिप्रेक्ष्य
(B) आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य
(C) नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(C) नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास

Bihar Board Class 12 Psychology मनोविज्ञान कौशलों का विकास Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एक सेवार्थी-परामर्शदाता संबंधों के नैतिक मानदंड क्या है?
उत्तर:

  1. भौतिक/व्यावसायिक आचरण-संहिता, मानक तथा दिशा-निर्देशों का ज्ञान: संविधियों, नियमों एवं अधिनियमों की जानकारी के साथ मनोविज्ञान के लिए जरूरी कानूनों की जानकारी भी आवश्यक है।
  2. विभिन्न नैदानिक स्थितियों में नैतिक एवं विधिक मुद्दों को पहचानना और उनका विश्लेषण करना।
  3. नैदानिक स्थितियों में अपनी अभिवृत्तियों एवं व्यवहार को नैतिक विमाओं को पहचानना और समझना।
  4. जब भी नैतिक मुद्दों का सामना हो तब उपयुक्त सूचनाओं एवं।
  5. नैतिक मुद्दों से संबंधित उपयुक्त व्यावसायिक आग्रहिता।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास

प्रश्न 2.
साक्षात्कार कौशल को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
एक साक्षात्कार दो या अधिक व्यक्तियों के बीच एक उद्देश्यपूर्ण वार्तालाप है जिसमें प्रश्न-उत्तर प्रारूप या फॉमेंट का अनुसरण किया जाता है। साक्षात्कार अन्य प्रकार के वार्तालाप की तुलना में अधिक औपचारिक होता है क्योंकि इसका एक पूर्वनिर्धारित उद्देश्य होता है तथा उसकी संरचना केंद्रित होती है। अनेक प्रकार के साक्षात्कार होते हैं। उनमें से एक रोजगार साक्षात्कार है जिसका अनुभव हममें से अधिकांश लोग करेंगे। अन्य प्रारूपों में सूचना संग्रह संबंधी साक्षात्कार, परामर्शी साक्षात्कार पूछताछ संबंधी साक्षात्कार, रेडियो-टेलीविजन के साक्षात्कार तथा शोध साक्षात्कार आते हैं।

प्रश्न 3.
संप्रेषण को परिभाषित कीजिए। संप्रेषण प्रक्रिया का कौन-सा घटक सबसे महत्त्वपूर्ण है? अपने उत्तर को प्रासंगिक उदाहरणों से पुष्ट कीजिए।
उत्तर:
संप्रेषण एक सचेतन या अचेतन, साभिप्राय या अनभिप्रेत प्रक्रिया है जिसमें भावनाओं तथा विचारों को, वाचिक या अवाचिक संदेश के रूप में भेजा, ग्रहण किया और समझा जाता है। श्रवण संप्रेषण प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण घटक है। श्रवण एक महत्त्वपूर्ण कौशल है जिसका उपयोग हम प्रतिदिन करते हैं। शैक्षिक सफलता, नौकरी की उपलब्धि एवं व्यक्तिगत प्रसन्नता काफी हर तक हमारे प्रभावी ढंग से सुनने की योग्यता पर निर्भर करती है। प्रथमतया, श्रवण हमें एक निष्क्रिय व्यवहार लग सकता है क्योंकि इसमें चुप्पी होती है लेकिन निष्क्रियता की यह छवि सच्चाई से दूर है। श्रवण में एक प्रकार की ध्यान सक्रियता होती है। सुनने वाले धैर्यवान तथा अनिर्णायाताक होने के साथ विश्लेषण करते रहना पड़ता है ताकि सही अनुक्रिया दी जा सके।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास

प्रश्न 4.
श्रवण में संस्कृति की भूमिका को समझाइए।
उत्तर:
श्रवण में संस्कृति की भूमिका-मस्तिष्क की तरह और हम जिस संस्कृति में पलते बढ़ते हैं वह भी हमारी श्रवण एवं सीखने की योग्यताओं को प्रभावित करती है। एशियाई संस्कृति, जैसे कि भारत में जब बड़े या वरिष्ठ लोग संदेश देते हैं तब उसकी शांत संप्रेषक की तरह ग्रहण किया जाता है। कुछ संस्कृतियाँ में ध्यान को नियंत्रित करने पर ध्यान दिया जाता है। उदाहरण के लिए, बौद्ध दर्शन में एक संप्रत्यय होता है जिसको ‘मनोयोग’ कहते हैं। इसका अर्थ है कि आप जो भी करें, उस पर अपना संपूर्ण ध्यान केंद्रित रखें। बाल्यावस्था में ‘मनोयोग’ का प्रशिक्षण देने से ध्यान केंद्रित करने की योग्यता का विस्तार हो जाता है और इससे श्रवण की क्षमता बेहतर हो जाती है। व्यक्ति में इससे सहानुभूति श्रवण की योग्यता भी बढ़ती है। फिर भी अनेक संस्कृतियों में श्रवण कौशलों में बढ़ोत्तरी से जुड़े संप्रत्ययों को अभाव है।

प्रश्न 5.
परामर्शी साक्षात्कार का विशिष्ट प्रारूप क्या है?
उत्तर:
परामर्शी साक्षात्कार के विशिष्ट प्रारूप इसे प्रकार से होते हैं:

1. साक्षात्कार का प्रारंभ:
इसका उद्देश्य यह होता है कि साक्षात्कार देनेवाला आराम की स्थिति में आ जाए। सामान्यतः साक्षात्कारकर्ता बातचीत की शुरुआत करता है और प्रारंभिक समय में ज्यादा बात करता है।

2. साक्षात्कार का मुख्य भाग:
यह इस प्रक्रिया का केन्द्र है। इस अवस्था में साक्षात्कारकर्ता सूचना और प्रदत्त प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रश्न पूछने का प्रयास करता है जिसके लिए साक्षात्कार का आयोजन किया जाता है।

3. प्रश्नों का अनुक्रम:
साक्षात्कारकर्ता प्रश्नों की सूची तैयार करता है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों या श्रेणियों से जो वह जानना चाहता है, प्रश्न होते हैं।

4. साक्षात्कार का समापन:
साक्षात्कार का समापन करते समय साक्षात्करकर्ता ने जो संग्रह किया है उसे उसाक सारांश बताना चाहिए। साक्षात्कार का अंत आगे के लिए जानेवाले कदम पर चर्चा के साथ होना चाहिए। जब साक्षात्कार समाप्त हो रहा हो तब साक्षात्कारकर्ता को साक्षात्कार देनेवाले को भी प्रश्न पूछने का अवसर देना चाहिए या टिप्पणी करने का मौका देना चाहिए।

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प्रश्न 6.
परामर्श से आप क्या समझते हैं? एक प्रभावी परामर्शदाता की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
साक्षात्कार की योजना, सेवार्थी एवं परामर्शदाता के व्यवहार का विश्लेषण तथा सेवार्थी के ऊपर पड़नेवाले विकासात्मक प्रभाव के निर्धारण के लिए परामर्श एक प्रणाली प्रस्तुत करता है। एक परामर्शदाता इस बात में अभिरुचि रखता है कि वह सेवार्थी की समस्याओं को उसके दृष्टिकोण और भावनाओं को ध्यान में रखकर समझ सके।

इसमें समस्या से जुड़े वास्तविक तथ्य या वस्तुनिष्ठ तथ्य कम महत्त्वपूर्ण होते हैं और यह अधिक महत्त्वपूर्ण होता है कि सेवार्थी द्वारा स्वीकार की गई भावनाएँ कैसी हैं, उनको लेकर काम किया जाए। इसमें व्यक्ति तथा वह समस्या को किस प्रकार परिभाषित करता है, इसको ध्यान में रखा जाता है। परामर्श में सहायतापरक संबंध होता है जिसमें सम्मिलित होता है वह जो मदद चाह रहा है, मदद से रहा है, देने का इच्छुक है, जो मदद देने में सक्षम हो या प्रशिक्षित हो और उस स्थिति में हो जहाँ मदद लेना और देना सहज हो।

एक प्रभावी परामर्शदाता की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. प्रामाणिकता:
हमारे अपने बारे में प्रत्यक्ष या अपनी छवी हमारे “मैं” को बनाती है। यह स्व प्रत्यक्षित ‘मैं’ हमारे विचारों, शब्दों क्रियाओं, पोशाक और जीवन शैली के माध्यम से अभिव्यक्ति होता है। यह सभी हमारे ‘मैं’ को दूसरों तक संप्रेषित करते हैं। जो हमारे निकट संपर्क में आते हैं वे अपने लिए हमारे बारे में अलग छवि या धारण बनाते हैं और वे कभी-कभी इस छवि को हम तक पहुँचाते भी हैं। उदाहरण के लिए मित्र हमें बताते हैं कि वे हमारे बारे में क्या पसंद या नापसंद करते हैं।

हमारे माता-पिता या अध्यापक हमारी प्रशंसा या आलोचना करते हैं। हम जिनका आप सम्मान करते हैं वे भी आपका मूल्यांकन करते हैं। ये सामूहिक निर्णय उन लोगों के द्वारा जिनका आप सम्मान करते हैं, इनको ‘दूसरे महत्त्वपूर्ण’ भी कहा जा सकता है, एक ‘हम’ का विकास करते हैं। इस ‘हम’ में वह प्रत्यक्षण सम्मिलित है जो दूसरे हमारे बारे में बताते हैं। यह प्रत्यक्षण हमारे स्व-प्रत्यक्षित-‘मैं’ जैसा भी हो सकता है या उससे भिन्न हो सकता है। जहाँ तक हम अपने स्वयं के बारे में अपने प्रत्यक्षण तथा दूसरों के अपने बारे में प्रत्यक्षण के प्रति जितने जानकार एवं सजग है, इससे हमारी आत्म-जागरुकता का पता चलता है। प्रामाणिकता का अर्थ है कि हमारे व्यवहार की अभिव्यक्ति आपको मूल्यों, भावनाओं एवं आंतरिक आत्मबिंब या आत्म-छवि (Self-image) के साथ संगत होती है।

2. दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर:
एक उपबोध्य (Counselee) परामर्शदाता संबंध में एक अचछा संबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करता है। यह इस स्वीकृति को परावर्तित करता है कि दोनों की भावनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। जब हम नए संबंध बनाते हैं तब हम एक अनिश्चितता की भावना एवं दुश्चिता का अनुभव करते हैं। इन भावनाओं को कम किया जा सकता है अगर परामर्शदाता सेवार्थी जैसा महसूस कर रहा हो बारे में एक सकारात्मक आदर का भाव प्रदर्शित करता है। दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर का भाव दिखाने के लिए निम्नलिखित दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखना चाहिए।

  • जब कोई बोल रहा हो तब ‘मैं’ संदेश का उपयोग बनाए न कि ‘तुम’ संदेश की। इसका एक उदाहरण होगा, ‘मैं समझता हूँ’ न कि “आपको/तुमको नहीं चाहिए।”
  • दूसरे व्यक्ति को अनुक्रिया तभी देना चाहिए तब व्यक्ति उसकी कही हुई बात को समझ लें।
  • दूसरे व्यक्ति को यह स्वतंत्रता देनी चाहिए ताकि वह जैसा महसूस करता है वैसा बता सकें। उसको टोकना या बाधित नहीं करना चाहिए।
  • यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि दूसरा यह जानता है कि व्यक्ति क्या सोच रहा है। अपने को निर्देश आधार के अनुसार ही व्यक्त करना चाहिए अर्थात् उस संदर्भ के अनुसार जिसमें बातचीत चल रही है।
  • स्वयं या दूसरों के ऊपर कोई लेबल लगाना चाहिए (उदाहरणार्थ, “तुम एक अंतर्मुखी व्यक्ति हो” इत्यादि)

3. तदनुभूति:
यह एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कौशल है जो परामर्शदाता के पास होना चाहिए। तदनुभूति एक परामर्शदाता की वह योग्यता है जिसके द्वारा वह सेवार्थी की भावनाओं को उसके ही परिप्रेक्ष्य से समझता है। यह दूसरे के जूते में पैर डालने जैसा है, जिसके द्वारा व्यक्ति दूसरों की तकलीफ एवं पीड़ा को महसूस करके समझ सकते हैं। सहानुभूति एवं तनुभूति में अंतर हाता लगता है कि उसकी दया की किसी को जरूरत है।

4. पुनर्वाक्यविन्यास:
इसमें परामर्शदाता उस योग्यता का परिचय देता है कि कैसे सेवार्थी को कही हुई बातों को या भावनाओं को विभिन्न शब्दों को उपयोग करते हुए कहा जा सकता है।

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प्रश्न 7.
परामर्श के मिथकों का खंडन किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
परामर्श के मिथकों का खंडन –

  1. परामर्श का तात्पर्य केवल सूचना देना नहीं होता है।
  2. परमर्श केवल सलाह देना नहीं होता है।
  3. किसी नौकरी या पाठ्यक्रम में चयन या स्थान परामर्श देना नहीं होता है।
  4. परामर्श. और साक्षात्कार समान नहीं है यद्यपि परामर्श में साक्षात्कार प्रक्रिया का उपयोग किया जा सकता है।
  5. परामर्श के अंतर्गत अभिवृत्तियों, विश्वासों और व्यवहारों का अनुनय करके, भर्त्सना करके, धमकी देकर या विवश करके प्रभावित करना नहीं आता है।

प्रश्न 8.
प्रभावी संबंधों को किस प्रकार विकसित किया जा सकता है?
उत्तर:
प्रभावी संबंधों को विकसित करना-अधिकतर लोग जो परामर्शदाता से मदद लेते हैं, उनके प्रभावी या संतोषजनक संबंध बेहद कम होते हैं या उनका पूरी तरह अभाव होता है। चूँकि व्यवहार में परिवर्तन अक्सर सामाजिक अवलंब या समर्थन के एक नेटवर्क से आता है इसके लिए जरूरी है कि सेवार्थी दूसरे व्यक्तियों से अच्छा संबंध विकसित करने पर ध्यान दें। परामर्श संबंध वह माध्यम है जिससे इसका प्रारंभ किया जा सकता है।

हम सभी की तरह परामर्शदाता भी पूर्ण नहीं होते हैं, लेकिन दूसरों की तुलना में स्वस्थ एवं सहायक संबंधों का विकास करने की विशेषताओं में प्रशिक्षण प्राप्त होते हैं। संक्षेप में, परामर्श में सेवार्थी के लिए एक वे अधिक परिणामों की अपेक्षा होती है, जो साथ ही घटित होते हैं। सेवार्थी में होनेवाले प्रभावी व्यवहार परिवर्तन बहुपक्षीय होते हैं। इसको इस रूप से देखा जा सकता है कि सेवार्थी अधिक जिम्मेदारी ले, नई अंतदृष्टि विकसित करे, विभिन्न प्रकार के व्यवहार करे तथा अधिक प्रभावी संबंध विकसित करने का प्रयास करे।

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प्रश्न 9.
अपने एक मित्र के व्यक्तिगत जीवन के एक ऐसे पक्ष की पहचान कीजिए जिसे वह बदलना चाहता है। अपने मित्र की सहायता करने के लिए मनोविज्ञान के एक विद्यार्थी के रूप में विचार करके उसकी समस्या के समाधान या निराकरण के लिए एक कार्यक्रम को प्रस्तावित कीजिए।
उत्तर:
मेरा मित्र धूम्रपान करता है। उसकी यह आदत काफी दिनों से है और पिछले कुछ दिनों में उसकी आदत काफी बढ़ गई है। धूम्रपान के कारण उसके व्यक्तिगत जीवन में कठिनाइयाँ सामने आने लगी हैं। प्रतिदिन पारिवारिक कलह से परेशान है। कार्यालय में ठीक ढंग से कार्य नहीं कर पाता है। गहरे अवसाद के दौर से गुजर रहा है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि उसने धूमपान छोड़ने की कोशिश न की हो। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। मनोविज्ञान के छात्र होने के नाते मैं उसके लिए कुछ करना चाहूँगा। सबसे पहले मैं उसके इस नकारात्मक सोच कि धूम्रपान को वह नहीं छोड़ पाएगा। इसे सकारात्मक सोच में बदलूँगा।

उसमें आत्मविश्वास जगाने के बाद उसे किसी ऐसे चिकित्सक या केन्द्र में ले जाऊँगा, जहाँ इस प्रकार की आदतों को छुड़वाने का काम किया जाता हो। मैं इस संबंध में उसके परिवार वालों से भी बात करूँगा उनको भी आश्वस्त करूँगा और परामर्श दूंगा कि सब काम स्नेह, प्रेम और प्यार से संभव हो सकता है। इसमें सभी व्यक्ति की बराबर की भागीदारी होनी चाहिए। सभी को अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी। जब सब्र एक साथ इस काम में लगेंगे तो मेरे मित्र में आत्म-विश्वास जगेगा और दुगुने जोश से धूम्रपान को छोड़ने की कोशिश करेगा और अंत में उसे इसमें सफलता मिलेगी।

Bihar Board Class 12 Psychology मनोविज्ञान कौशलों का विकास Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान में सेवार्थी किसे कहते हैं?
उत्तर:
मनोविज्ञान में सेवार्थी वह व्यक्ति/संगठन है जो स्वयं ही अपनी किसी समस्या के समाधान में मनोवैज्ञानिक से मदद, निर्देश या हस्तक्षेप प्राप्त करना चाहता है।

प्रश्न 2.
संज्ञानात्मक कौशल क्या है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक कौशल समस्या समाधान की योग्यता, आलोचनात्मक चिंतन और व्यवस्थित तर्कना, बौद्धिक जिज्ञासा तथा नम्यता है।

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प्रश्न 3.
भावनात्मक कौशल क्या है?
उत्तर:
सांवेगिक नियंत्रण एवं संतुलन, अंतर्वैयक्तिक द्वंद्व के प्रति सहनशीलता, अनिश्चितताओं और अस्पष्टताओं के प्रति सहनशीलता भावनात्मक कौशल है।

प्रश्न 4.
कौशल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कौशल पद को प्रवीणता, दक्षता या निपुणता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसका अर्जन या विकास प्रशिक्षण अनुभव के द्वारा किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
परावर्ती कौशल क्या है?
उत्तर:
स्वयं की अभिप्रेरणाओं, अभिवृत्तियों एवं व्यवहारों को समझने तथा परीक्षण करने की योग्यता, अपने और दूसरों के व्यवहारों के प्रति संवेदनशीलता परिवर्ती कौशल है।

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प्रश्न 6.
अभिवृत्ति क्या है?
उत्तर:
दूसरों के प्रति सहायता की इच्छा, नए विचारों के प्रति खुलापन, ईमानदारी/अंखडता/मूल्यपरक नैतिक व्यवहार, व्यक्तिगत साइंस आदि अभिवृत्ति हैं।

प्रश्न 7.
प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागम कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागम हैं –

  1. प्रकृतिवादी प्रेक्षण और
  2. सहभागी प्रेक्षण

प्रश्न 8.
प्रकृतिवादी प्रेक्षण क्या है?
उत्तर:
प्रकृतिवादी प्रेक्षण एक प्राथमिक तरीका है जिससे हम सीखते हैं कि लोग भिन्न स्थितियों में कैसे व्यवहार करते हैं।

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प्रश्न 9.
सहभागी प्रेक्षण किसे कहते हैं?
उत्तर:
सहभागी प्रेक्षण में प्रेक्षण की प्रक्रिया में एक सक्रिय सदस्य के रूप में संलग्न होता है। इसके लिए वह उस स्थिति में स्वयं भी सम्मिलित हो सकता है जहाँ प्रेक्षण करना है।

प्रश्न 10.
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ ने कौशलों के किन तीन समुच्चयों की संस्तुति की है?
उत्तर:
अमेरिकी मनोविज्ञान संघ ने कौशलों के निम्नलिखित तीन समुच्चयों की संस्तुति की है –

  1. व्यक्तिगत भिन्नताओं का मूल्यांकन
  2. व्यवहार परिष्करण कौशल
  3. परामर्श एवं निर्देशन कौशल

प्रश्न 11.
एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण किस स्तर पर करता है?
उत्तर:
एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण वैज्ञानिक स्तर पर करता है।

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प्रश्न 12.
व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण वैज्ञानिक स्तर पर किस तरह करते हैं?
उत्तर:
वे अपनी समस्याओं को प्रयोगशाला या क्षेत्र में ले जाकर परीक्षण करके उत्तर प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। वे अपने प्रश्नों को उत्तर गणितीय संभाव्यताओं के आधार पर करते हैं। उसके बाद ही वे किसी विश्वसनीय मनोवैज्ञानिक सिद्धांत या नियम पर पहुँचते हैं।

प्रश्न 13.
आधारभूत कौशल को कितनी श्रेणियों में बाँटा गया है?
उत्तर:
आधारभूत कौशल को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है –

  1. सामान्य कौशल
  2. प्रेक्षण कौशल
  3. विशिष्ट कौशल

प्रश्न 14.
अंतर्वैयक्तिक कौशल क्या है?
उत्तर:
सुनने की योग्यता एवं तंदनुभूति की क्षमता, दूसरों की संस्कृति के प्रति सम्मान एवं अभिरुचि की भावना, अनुभवों के मूल्यों, दृष्टिकोणों, लक्ष्यों एवं इच्छाओं तथा भय को समझने का खुलापन तथा प्रतिप्राप्ति को ग्रहण करने की सकारात्मक भावना इत्यादि अंतर्वैयक्तिक कौशल है।

प्रश्न 15.
अंतरावैयक्तिक संप्रेषण किसे कहते हैं?
उत्तर:
अंतरावैयक्तिक संप्रेषण का संबंध व्यक्ति की स्वयं से संवाद करने की क्रिया को कहते हैं। विचार-प्रक्रम, वैयक्तिक निर्णयन तथा स्वयं पर केन्द्रित विचार शामिल होते हैं।

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प्रश्न 16.
अंतर्वैयक्तिक संप्रेक्षण से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण का तात्पर्य उस संप्रेषण से है जो दो या दो से अधिक व्यक्तियों से संबंधित होता है, जो एक संप्रेषणपरक संबंध स्थापित करते हैं।

प्रश्न 17.
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण के अंतर्गत क्या-क्या आते हैं?
उत्तर:
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण के अंतर्गत अनेक प्रकारों में मुखोन्मुख या मध्यस्थ आधारित वार्तालाप, साक्षात्कार एवं लघु समूह परिचर्चा आते हैं।

प्रश्न 18.
सार्वजनिक संप्रेषण से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सार्वजनिक संप्रेषण में वक्ता अपनी बातों या संदेशों को श्रोताओं तक पहुँचाता है। यह प्रत्यक्ष, जैसे-कोई वक्ता मुखोन्मुख जनसभा में भाषण देता है या अप्रत्यक्ष, जैसे-जहाँ वक्ता रेडियो या टेलीविजन के माध्यम से बात करता है।

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प्रश्न 19.
चयनात्मक संप्रेषण से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जब हम संप्रेषण करते हैं तब हमारा संप्रेषण चयनात्मक होता है। इसका अर्थ है, हमारे पास उपलब्ध शब्दों एवं व्यवहारों के एक विशाल संग्रह में से हम उन शब्दों एवं क्रियाओं को चुनते हैं जिसके बारे में हमारा भरोसा रहता है कि वे हमारे विचारों की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त हैं।

प्रश्न 20.
कूट संकेतन क्या है?
उत्तर:
कूट संकेतन में विचार लेना, उनको अर्थ देना और उनको संदेश के रूप में बदल देना आदि कार्य होते हैं।

प्रश्न 21.
प्रेक्षण के एक लाभ को लिखिए।
उत्तर:
प्रेक्षण का प्रमुख लाभ यह है कि यह प्राकृतिक या स्वाभाविक स्थिति में व्यवहार को देखने और अध्ययन करने का अवसर देता है।

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प्रश्न 22.
प्रेक्षण की एक कमी को लिखिए।
उत्तर:
प्रेक्षण की एक कमी यह है कि प्रेक्षण करने में अभिनति या प्रर्वाग्रह की भावना आ जाती है क्योंकि प्रेक्षक या प्रेक्षित की भावनाएँ इसको प्रभावित कर देती हैं।

प्रश्न 23.
एक संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक को अन्य कौशलों की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
एक संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक को भी शोध कौशलों के अलावा मूल्यांकन, सुगमीकरण, परामर्शन एवं व्यवहारपरक कौशलों की आवश्यकता होती है जिससे वे व्यक्ति, समूहों, टीमों और संगठनों के विकास की प्रक्रिया को समझ सकें या समझने में मदद कर सकें।

प्रश्न 24.
संप्रेषण प्रक्रिया से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संप्रेक्षण एक सचेतन या अचेतन, साभिप्राय या अनभिप्रेत प्रक्रिया है जिसमें भावनाओं तथा विचारों को वाचिक या अवाचिक संदेश के रूप में भेजा, ग्रहण किया और समझा जाता है।

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प्रश्न 25.
मनोयोग का क्या अर्थ है?
उत्तर:
मनोयोग का अर्थ है कि व्यक्ति जो भी करे उस पर अपना संपूर्ण ध्यान केन्द्रित रखे।

प्रश्न 26.
बाल्यावस्था में मनोयोग करने के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
बाल्यावस्था में मनोयोग का प्रशिक्षण देने से ध्यान केंद्रित करने की योग्यता का विस्तार हो जाता है और इससे श्रवण की क्षमता बेहतर हो जाती है।

प्रश्न 27.
क्रोध का शरीर भाषा में संप्रेषण का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
अगर सीधी मुद्रा में सीने पर हाथ बँधे हो, शरीर की मांसपेशियाँ तनी हो, जबड़ों को मांसपेशियाँ में जकड़न और आँखों की मांसपेशियों में संकुचन हो तो यह संभवतः क्रोध का संप्रेषण करता है।

प्रश्न 28.
संगति किसे कहते हैं?
उत्तर:
संप्रेक्षण में वर्तमान व्यवहार और अतीत के व्यवहार के बीच एकरूपता तथा वार्षिक एवं अवाचित व्यवहार के बीच सुमेल को संगति कहते हैं।

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प्रश्न 29.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उपयोग कहाँ किया जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उपयोग मुख्यतः सामान्य बुद्धि, व्यक्तित्व, विभेदक अभिक्षकताओं, शैक्षिक उपलब्धियों, व्यावसायिक उपयुक्तता या अभिरुचियों, सामाजिक अभिवृत्तियों तथा विभिन्न अबौद्धिक विशेषताओं के विश्लेषण एवं निर्धारण में किया जाता है।

प्रश्न 30.
संप्रेषण अविराम क्यों है?
उत्तर:
संप्रेषण अविराम है क्योंकि यह कभी भी रुकता नहीं चाहे हम सोए या जागे हों-हम लगातार विचारों का प्रक्रमण करते रहते हैं। हमारा मस्तिष्क सदैव सक्रिय रहता है।

प्रश्न 31.
संप्रेषण प्रक्रिया के प्रभावी होने की मात्रा किस बात पर निर्भर करती है?
उत्तर:
संप्रेषण प्रक्रिया के प्रभावी होने की मात्रा इस बार पर निर्भर करती है कि संप्रेषण में प्रयुक्त होनेवाले संकेतों या कूटों, जिनका उपयोग संदेश को प्रेषित करने और उसको ग्रहण करने के लिए किया गया है, के प्रति संप्रेषण करनेवाले संप्रेषकों की आपसी समझ कितनी है।

प्रश्न 32.
संप्रेषण का बृहत्तर अर्थ क्या है?
उत्तर:
संप्रेषण का बृहत्तर अर्थ है-इसमें दो या उससे अधिक व्यक्तियों के बीच एक संबंध होता है जिसमें वे अर्थ निरूपण की हिस्सेदारी में शामिल होते हैं जिससे संदेश के भेजने एवं ग्रहण करने में एक समानता बनी रहती है।

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प्रश्न 33.
संभाषण क्या है?
उत्तर:
भाषा का उपयोग करके बोलना संभाषण है।

प्रश्न 34.
सुनना और श्रवण में क्या अंतर है?
उत्तर:
सुनना एक जैविक क्रिया है जिसमें संवेदी सरणियों के द्वारा संदेश का अभिग्रहण शामिल होता है। यह श्रवण का एक आंशिक पक्ष है। इसमें अभिग्रहण ध्यान, अर्थ का आरोपण तथा श्रवणकर्ता की संदेश के प्रति अनुक्रिया आदि शामिल होते हैं।

प्रश्न 35.
दृष्टि प्रणाली से श्रवण कैसे किया जाता है?
उत्तर:
श्रवण तंत्र के अलावा कुछ लोग अपनी दृष्टि प्रणाली से भी श्रवण करते हैं। वे किसी व्यक्ति की मुखीय अभिव्यक्ति, भंगिमा, गति एवं रूप-रंग का प्रेक्षण करते हैं, जिससे अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकेत प्राप्त होते हैं और जिनको मात्र संदेश के वाचिक अंश के श्रवण से नहीं समझा जा सकता है।

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प्रश्न 36.
परामर्श क्या है?
उत्तर:
परामर्श में सहायतापरक संबंध होता है जिसमें सम्मिलित होता है वह जो मदद चाह रहा है, जो मदद दे रहा है या देने का इच्छुक है, जो मदद देने में सक्षम हो या प्रशिक्षित हो और स्थिति में हो जहाँ मदद लेना और देना सहज हो।

प्रश्न 37.
परामर्श की सफलता किन बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
परामर्श की सफलता परामर्शदाता की योग्यता, कौशल, अभिवृत्ति, व्यक्तिगत गुणों एवं व्यवहारों पर निर्भर करती है।

प्रश्न 38.
उच्च चार गुणों को लिखिए जो प्रभावली परामर्शदाता के साथ संबंधित होते हैं।
उत्तर:

  1. प्रमाणिकता
  2. दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर
  3. तदनुभूति की योग्यता
  4. पुनर्वाक्यविन्यास

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प्रश्न 39.
प्रामाणिकता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
प्रामाणिकता का अर्थ है कि व्यक्ति के व्यवहार की अभिव्यक्ति उसके मूल्यों, भावनाओं एवं आंतरिक आत्मबिंब या आत्म-छवि के साथ संगत होती है।

प्रश्न 40.
तदनुभूति से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यह एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कौशल है जो परामर्शदाता के पास होना चाहिए। ये। परामर्शदाता की वह योग्यता है जिसके द्वारा वे सेवार्थी की भावनाओं को उसके ही परिप्रेक्ष्य से समझाता है।

प्रश्न 41.
पुनर्वाक्यविन्यास क्या है?
उत्तर:
इसमें परामर्शदाता उस योग्यता का परिचय देता है कि कैसे सेवार्थी की कही हुई बातों को या भावनाओं को विभिन्न शब्दों को उपयोग करते हुए कहा जा सकता है।

प्रश्न 42.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग करते समय कितना बातों के प्रति सजग रहना चाहिए?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग करते समय वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक उन्मुखता तथा मानकीकृत व्याख्या के प्रति सजगता रखना आवश्यक होता है।

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प्रश्न 43.
साक्षात्कार क्या है?
उत्तर:
एक साक्षात्कार दो या अधिक व्यक्तियों के बीच एक उद्देश्यपूर्ण वार्तालाप है जिसमें प्रश्न-उत्तर प्रारूप या फार्मेट का अनुसरण किया जाता है।

प्रश्न 44.
प्रत्यक्ष प्रश्न किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रत्यक्ष प्रश्न स्पष्ट होते हैं और इनको विशिष्ट सूचनाओं की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, “अंतिम बार आपने कहाँ काम किया था?”

प्रश्न 45.
द्विध्रुवीय प्रश्न क्या होते हैं?
उत्तर:
इस प्रकार के प्रश्नों में हाँ/नहीं अनुक्रिया अपेक्षित होती है। उदाहरण के लिए, “क्या आप इस कंपनी के लिए काम करना चाहेंगे?”

प्रश्न 46.
दर्पण प्रश्न का क्या उद्देश्य होता है?
उत्तर:
दर्पण प्रश्न का उद्देश्य होता है कि व्यक्ति ने जो कहा है उस पर परिवर्तन करके विचार करे या उसको आगे बढ़ाए।

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प्रश्न 47.
संप्रेषण अंतःक्रियात्मक क्यों है?
उत्तर:
संप्रेषण अंत:क्रियात्मक है क्योंकि हम लगातार दूसरों के ओर स्वयं के संपर्क में रहते हैं। दूसरे हमारे भाषणों तथा व्यवहार के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं तथा हम स्वयं भी अपनी वाक्-क्रिया के प्रति अनुक्रिया देते हैं। इस प्रकार हमारे संप्रेषण के आधार पर क्रिया-प्रतिक्रिया चक्र का बने रहना है।

प्रश्न 48.
एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए कौन-कौन सी सक्षमताएँ आवश्यक होती है?
उत्तर:
प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए निम्नलिखित सक्षमताएँ आवश्यक है –

  1. सामान्य कौशल
  2. प्रेक्षण कौशल
  3. विशिष्ट कौशल

प्रश्न 49.
कौन-से सामान्य कौशल सभी मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक होते हैं?
उत्तर:
बौद्धिक और वैयक्तिक दोनों प्रकार के सामान्य कौशल सभी मनोवैज्ञानिक के लिए आवश्यक है। एक बार इन कौशलों का प्रशिक्षण प्राप्त कर लेने के बाद ही किसी विशिष्ट क्षेत्र में विशिष्टि प्रशिक्षण देकर उन कौशलों का अग्रिम विकास किया जा सकता है।

प्रश्न 50.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण के कौशल विकसित करना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
इसमें परामर्शदाता उस योग्यता का परिचय देता है कि कैसे सेवार्थी की कही हुई बातों को या भावनाओं को विभिन्न शब्दों का उपयोग करते हुए कहा जा सकता है।

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प्रश्न 51.
साक्षात्कार मुखोन्मुख क्या है? यह किस प्रकार आगे बढ़ती है?
उत्तर:
साक्षात्कार मुखोन्मुख आमने-सामने के वार्तालाप की प्रक्रिया है। यह तीन अवस्थाओं से आगे बढ़ती है, प्रारंभिक तैयारी, प्रश्न एवं उत्तर तथा समापन अवस्था।

प्रश्न 52.
प्रभावी संप्रेषण में होनेवाली विकृतियों को किस प्रकार कम किया जा सकता है?
उत्तर:
एक उचित संदेश की रचना करना, पर्यावरणीय शोर को नियंत्रित करना तथा प्रतिपादित देना कुछ तरीके हैं जिनके द्वारा प्रभावी संप्रेषण में होनेवाली विकृतियों को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 53.
प्रभावी मनोवैज्ञानिक होने के लिए किन बातों का होना आवश्यक है?
उत्तर:
प्रभावी मनोवैज्ञानिक के रूप में विकसित होने के लिए, मनोवैज्ञानिक में सक्षमता, अखंडता, व्यावसायिक एवं उत्तरदायित्व, लोगों के अधिकारों तथा मर्यादा के प्रति सम्मान की भावना आदि का होना आवश्यक है।

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प्रश्न 54.
श्रवण कौशलों को सुधारने का एक संकेत बतलाइए।
उत्तर:
संप्रेषित की जा रही सूचना प्राप्त करने की शुरुआत में कोई निर्णय लेने से बचना चाहिए। सभी विचारों के प्रति खुलापन रखना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामान्य कौशल क्या है? समझाइए।
उत्तर:
ये कौशल मूलतः सामान्य स्वरूप के हैं और इनकी आवश्यकता सभी प्रकार के मनोवैज्ञानिक को होती है चाहे उनकी विशेषज्ञता को क्षेत्र कोई भी हो। ये कौशल सभी व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक के आवश्यक है, चाहे वे नैदानिक एवं स्वास्थ्य मनोविज्ञान के क्षेत्र के हों, औद्योगिक/संगठनात्मक, सामाजिक या पर्यावरणी मनोविज्ञान से संबंधित हों या सलाहकार के रूप में कार्यरत हों। इन कौशलों में वैयक्तिक तथा बौद्धिक कौशल दोनों शामिल होते हैं। यह अपेक्षा की जाती है कि किसी भी प्रकार का व्यावसायिक प्रशिक्षण (चाहे नैदानिक या संगठानात्मक हो) उन विद्यार्थियों को नहीं दिया जाना चाहिए जिनमें इन कौशलों का अभाव हो। एक बार इन कौशलों का शिक्षण प्राप्त कर लेने के बाद ही किसी विशिष्ट प्रशिक्षण देकर उन कौशलों का अग्रिम विकास किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
बौद्धिक और वैयक्तिक कौशल को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
बौद्धिक और वैयक्तिक कौशल निम्न हैं –

  1. अंतर्वैयक्तिक कौशल-सुनने की योग्यता एवं तदनुभूति की क्षमता, दूसरों की संस्कृति के प्रति सम्मान तथा अभिरुचि की भावना, अनुभवों, दृष्टिकोणों, लक्ष्यों एवं इच्छाओं तथा भय को समझने का खुलापन तथा प्रतिप्राप्ति को ग्रहण करने की सकारात्मक भावना इत्यादि। इन कौशलों की वाचिक या अवाचिक रूप से व्यक्त किया जाता है।
  2. संज्ञानात्मक कौशल-समस्या समाधान की योग्यता, आलोचनात्मक चिंतन और व्यवस्थित तर्कना, बौद्धिक जिज्ञासा तथा नम्यता।
  3. भावात्मक कौशल-सांवेगिक नियंत्रण एवं संतुलन, अंतर्वैयक्तिक द्वंद्व के प्रति सहनशीलता, अनिश्चिताओं और अस्पष्टताओं के प्रति सहनशीलता।
  4. व्यक्तित्व/अभिवृत्ति-दूसरों के प्रति सहायता की इच्छा, नए विचारों के प्रति खुलापन, ईमानदारी/अखंडता/मूल्यपरक नैतिक व्यवहार, व्यक्तिगत साहस।
  5. अभिव्यक्तिपरक कौशल-अपने विचारों, भावनाओं, सूचनाओं को वाचिक, अवाचिक तथा लिखित, रूप में संप्रेषित करने की योग्यता।
  6. परावर्ती या मननात्मक कौशल-स्वयं की अभिप्रेरणाओं अभिवृत्तियों एवं व्यवहारों को समझने तथा परीक्षण करने की योग्यता अपने और दूसरे के व्यवहारों के प्रति संवेदनशीलता।
  7. वैयक्तिक कौशल-वैयक्तिक संगठन, स्वास्थ्य, समय प्रबंधन एवं उचित परिधान या वंश।

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प्रश्न 3.
एक मनोवैज्ञानिक किस प्रकार सभी पक्षों का रिकॉर्ड तैयार करता है जिससे प्रेक्षण की प्रक्रिया में कुछ महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक पक्षों को समझा जा सके?
उत्तर:

  1. धैर्यपूर्वक प्रेक्षक करना।
  2. अपने भौतिक परिवेश को निकट से देखना जिससे क्या, कौन, कैसे, कहाँ और कब का समझा जा सके।
  3. लोगों की प्रतिक्रियाओं, संवेगों और अभिप्रेरणाओं के प्रति जागरूक रहना।
  4. उन प्रश्नों को पूछना जिनका उत्तर प्रेक्षण करते समय पाया जा सके।
  5. स्वयं को उपस्थित रखना अपने बारे में सूचना देना, यदि पूछा जाए।
  6. एक आशावादी कौतूहल या जिज्ञासा से प्रेक्षण करे।
  7. नैतिक आचरण करें-प्रेक्षण के दौरा लोगों की निजता के मानकों का पालन करें ; उनसे प्राप्त सूचनाओं को किसी को भी न बताएँ, इसका ध्यान रखें।

प्रश्न 4.
प्रेक्षण के क्या लाभ और हानि हैं?
उत्तर:
प्रेक्षण के लाभ और हानि निम्नलिखित हैं –

  1. इसका प्रमुख लाभ यह है कि यह प्राकृतिक या स्वाभाविक स्थिति में व्यवहार को देखने और अध्ययन करने का अवसर देता है।
  2. बाहर के लोगों को या उस स्थिति में रहनेवाले लोगों को प्रेक्षण के लिए प्रशिक्षण दिया सकता है।
  3. इसकी एक कमी यह है कि प्रेक्षण करने में अभिनति या पूर्वाग्रह की भावना आ जाती है क्योंकि प्रेक्षक या प्रेक्षित की भावनाएँ इसको प्रभावित कर देती हैं।
  4. किसी दी गई परिस्थिति में दैनंदिन क्रियाएँ नित्यकर्म (रूटीन) की तरह होती हैं जो अक्सर प्रेक्षक की दृष्टि से चूक जाती हैं।
  5. दूसरी संभाव्य कमी यह है कि वास्तविक व्यवहार और दूसरों की अनुक्रियाएँ प्रेक्षक की उपस्थिति से प्रभावित हो सकती हैं, इस प्रकार प्रेक्षण का उद्देश्य पराजित हो सकता है।

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प्रश्न 5.
संप्रेषण की विशेषताओं को समझाइए।
उत्तर:
संप्रेक्षण की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. संप्रेषण गतिशील है-क्योंकि इसकी प्रक्रिया निरंतर परिवर्तनशील रहती है। जैसे कि व्यक्ति की अपेक्षाओं, अभिवृत्तियों; भावनाओं तथा संवेगों में परिवर्तन होता रहता है, इस परिवर्तन को हम लगातार अभिव्यक्त करते हैं’ इसी से उनका संप्रेषण भी लगातार परिवर्तित होता रहता है।

2. संप्रेषण अविराम है-क्योंकि यह कभी भी रुकता नहीं है ‘चाहे हम सोए जगे हों-हम लगातार विचारों का प्रक्रम करते रहते हैं। हमारा मस्तिष्क सदैव सक्रिय रहता है।

3. संप्रेषण अनुत्क्रमणीय है-क्योंकि एक बार संदेश भेज देने के बाद हम उसे वापस नहीं कर सकते हैं। अगर एक बार जबान फिसल जाए, एक बार दृष्टिपात कर दें या संवेगात्मक उत्तेजना को प्रकट कर दें तो हम उसको मिटा नहीं सकते। हमारी क्षमायाचनाएँ या अस्वीकरण इसके प्रभाव को हल्का कर सकती है। लेकिन उसको पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती जो कहा जा चुका है।

4. संप्रेषण अंतःक्रियात्मक है-क्योंकि हम लगतार दूसरों के और स्वयं के संपर्क में रहते हैं। दूसरे हमारे भाषणों तथा व्यवहार के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं तथा हम स्वयं भी अपनी वाक्-क्रिया के प्रति अनुक्रिया देते हैं। इस प्रकार, हमारे संप्रेषण के आधार पर एक क्रिया-प्रतिक्रिया चक्र का बने रहता है।

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प्रश्न 6.
वाचन क्या है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
वाचन संप्रेषण का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। भाषा को उपयोग करके बोलना वाचन कहलाता है। भाषा में प्रतीकों का उपयोग किया जाता है जिसमें अर्थ बँधे हुए होते हैं। प्रभावी होने के लिए यह आवश्यक है कि संप्रेषण भाषा का सही उपयोग करना जानता हो क्योंकि भाषा प्रतीकात्मक होती है, इसलिए जहाँ तक संभव हो शब्दों का उपयोग स्पष्ट एवं परिशुद्ध होना चाहिए। संप्रेषण किसी सदंर्भ के अंतर्गत घटित होता है। इसलिए दूसरे के संदर्भ आधार को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ है प्रेषक जिससे संदर्भ से संदेश प्रेषित कर रहा है, उसके प्रति जानकारी होनी चाहिए। साथ ही उस संदर्भ की व्याख्या की हिस्सेदारी आवश्यक है। अगर नहीं तो अपनी शब्दावली स्तर पर शब्दों के चयन को सुननेवाले के अनुरूप स्तर पर लाना पड़ता है। किसी संस्कृति-विशिष्ट या क्षेत्र अनुरूप अपभाषा तथा शब्दों की अभिव्यक्ति कभी-कभी संप्रेषण की प्रभावित में बाधा बन जाती है।

प्रश्न 7.
अभिग्रहण को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
श्रवण प्रक्रिया का प्रारंभिक चरण है उद्दीपन या संदेश का अभिग्रहण करना। ये संदेश श्रव्य हो सकते हैं। श्रवण प्रक्रिया कुछ जटिल शारीरिक अंत: क्रियाओं पर आधारित होती है जिसमें कान तथा मस्तिष्क की भूमिका होती है। श्रवण तंत्र के अलावा कुछ लोग अपनी दृष्टि प्रणाली में भी श्रवण करते हैं। वे किसी व्यक्ति का मुखीय अभिव्यक्ति, भगिमा (मुद्रा), गति एवं रंग-रूप का प्रेषण करते हैं, जिससे अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकेत प्राप्त होते हैं और जिनको मात्र संदेश के वाचिक अंश के श्रवण से नहीं समझा जा सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि एक प्रभावी परामर्शदाता होने के लिए उसका व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित होना अनिवार्य है? अपने तर्कों के समर्थन में कारण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
हाँ, एक प्रभावी परामर्शदाता होने के लिए उसका व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित होना अनिवार्य है। यह आवश्यक है कि वह परामर्श एवं निर्देशन के क्षेत्र में सक्षम हो। सक्षमताओं को विकसित करने के लिए मनोवैज्ञानिकों की उचित शिक्षा और प्रशिक्षण कुशल पर्यवेक्षण में दिया जाना चाहिए। गलत व्यवसाय में जाने के भयंकर परिणाम हो सकते हैं। मान लीजिए, कोई व्यक्ति किसी ऐसे काम में चला जाता है जिसके लिए उसके पास अपेक्षित अभिक्षमता का अभाव है, तब उसके सामने समायोजन की या निषेधात्मक संवेगों की गंभीर समस्या विकसित हो सकती है, वह हीनता मनोग्रंथि से भी ग्रसित हो सकता है।

इन कठिनाइयों को वह दूसरे माध्यमों से प्रक्षेपित कर सकता है। इसके विपरीत, अगर कोई ऐसा व्यवसाय चुनता है जिसके लिए उसमें पर्याप्त अनुकलनशीलता है तब उसको अपने काम में संतुष्टि होगी। इससे उत्पन्न सकारात्मक भावनाएँ उसके समग्र जीवन समायोजन पर अच्छा प्रभाव डालेंगी। परामर्श भी एक ऐसा ही क्षेत्र है जहाँ एक व्यक्ति को प्रवेश करने लिए आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता पड़ती है जिसमें वह अपनी अनुकूलता और अपने आधारभूत कौशलों का मूल्यांकन करके देख सके कि वह इस व्यवसाय के लिए प्रभावी है या नहीं। किसी परामर्शदाता की प्रभाविता के लिए संदेशों के प्रति अभिज्ञता (जानकारी) और संवेदनशीलता अनिवार्य घटक है।

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प्रश्न 2.
एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक को एक कूट मनोवैज्ञानिक से कैसे अलग किया जा सकता है?
उत्तर:
अधिकतर लोग सोचते हैं कि वे किसी न किसी प्रकार के मनोवैज्ञानिक हैं। हम अक्सर बुद्धि, हीनता, मनोग्रंथि, अनन्यता संकट, मानसिक बाधाओं, अभिवृत्ति, दबाव, संप्रेषण बाधाओं के बारे में बात करते हैं। सामान्यतः इन पदों का परिचय लोगों के लोकप्रिय लेखन तथा जनसंचार के माध्यमों से होता है। मानव व्यवहार के बारे में कई प्रकर के सामान्य बुद्धि के पद लोग अपने जीवन से जुड़ी प्रक्रियाओं से सीख लेते हैं। मानव व्यवहार से जुड़ी कुछ नियमितताओं के अनुभव के आधार पर उनके बारे में सामान्यीकरण किया जाता है। इस प्रकार का दैनिक व्यवसायी (शौकिया) मनोविज्ञान अकसर उल्टा असर डालता है, कभी-कभी तो अत्यंत भयावह हो सकता है।

एक कूट मनोवैज्ञानिक को वास्तविक मनोविज्ञान से कैसे अलग करेंगे? इसका उत्तर कुछ इस प्रकार के प्रश्न पूछकर तैयार किया जा सकता है, जैसे-उसका व्यावसायिक प्रशिक्षण, शैक्षिक पृष्ठभूमि, संस्थागत संबंधन तथा उसका सेवा देने संबंधी अनुभव आदि। यहाँ पर यह महत्त्वपूर्ण है कि उस मनोवैज्ञानिक का प्रशिक्षण एक शोधकर्ता के रूप में कैसे हुआ है और उसमें व्यावसायिक मूल्यों का आंतरिकीकरण कितना हुआ है। अब इस बात को माना जा रहा है कि मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रयुक्त उपकरणों का ज्ञान, उनसे जुड़ी विधियों एवं सिद्धांत मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं।

उदाहरण के लिए एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण वैज्ञानिक स्तर पर करता है। वे अपनी समस्याओं को प्रयोगशाला या क्षेत्र में ले जाकर परीक्षण करके उत्तर प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। वे अपने प्रश्नों का उत्तर गणितीय प्रसंभाव्यताओं के आधार पर प्राप्त करते हैं। उसके बाद ही वह किसी विश्वसनीय मनोवैज्ञानिक सिद्धांत या नियम पर पहुँचते हैं। यहाँ पर एक और अंतर स्थापित करना चाहिए। कुछ मनोवैज्ञानिक शोध के माध्यम से सैद्धांतिक निरूपणों की खोज करते हैं।

जबकि कुछ अन्य हमारे प्रतिदिन की क्रियाओं और व्यवहारों से संबंधित रहते हैं। हमें दोनों प्रकार के मनोवैज्ञानिकों की जरूरत है। हमें कुछ ऐसे वैज्ञानिक चाहिए जो सिद्धांतों का विकास करे जबकि कुछ दूसरे उनका उपयोग मानव समस्याओं के समाधान के लिए करें। यहाँ यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि शोध कौशलों के अलावा एक मनोवैज्ञानिक के लिए वे कौन-सी सक्षमताएँ हैं जो आवश्यक हैं। कुछ दशाएँ ऐसी हैं जो मनोवैज्ञानिक के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक मानी जा रही है।

इसके अंतर्गत ज्ञान के वे क्षेत्र आते हैं, जिसकी शिक्षा और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद व्यवसाय में आने से पूर्व किसी मनोवैज्ञानिक को जानना चाहिए। ये शिक्षकों, अभ्यास करनेवाले एवं शोध करनेवाले सभी के लिए जरूरी हैं जो छात्रों से, व्यापार से, उद्योगों से और बृहत्तर समुदायों के साथ परामर्शन की भूमिकाओं में होते हैं। यह माना जा रहा है कि मनोविज्ञान में सक्षमताओं को विकसित करना, उनको अमल में लाना और उनका मापन करना कठिन है, क्योंकि विशिष्ट पहचान और मूल्यांकन की कसौटियों पर आम सहमति नहीं बन पाई है।

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प्रश्न 3.
प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागमों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागम हैं –

  1. प्रकृतिवादी प्रेक्षण तथा
  2. सहभागी प्रेक्षण

1. प्रकृतिवादी प्रेक्षण (Naturalisticobsevation):
एक प्राथमिक तरीका है जिससे हम सीखते हैं लोग भिन्न स्थितियों में कैसे व्यवहार करते हैं। मान लीजिए, कोई जानना चाहता हैं कि जब कोई कंपनी अपने उत्पाद में भारी छूट की घोषणा करती है तो प्रतिक्रियास्वरूप लोग शॉपिंग मॉल जाने पर कैसा व्यवहार करते हैं। इसके लिए वह शॉपिंग मॉल में जा सकता है जहाँ इन छूट वाली वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है, क्रमबद्ध ढंग से वह प्रेक्षण कर सकता है कि लोग खरीदारी से पहले या बाद में क्या कहते या करते हैं। उनके तुलनात्मक अध्ययन से, वहाँ क्या हो रहा है, इस बारे में रुचिकर सूझ बन सकती है।

2. सहभागी प्रेक्षण (Participant observation):
प्रकृतिवादी प्रेक्षण का ही एक प्रकार है। इसमें प्रेक्षक प्रेक्षक की प्रक्रिया में एक सक्रिय सदस्य के रूप में संलग्न होता है। इसके लिए वह उस स्थिति में स्वयं भी सम्मिलित हो सकता है जहाँ प्रेक्षण करना है। उदाहरण के लिए, ऊपर दी गई समस्या में, एक प्रेक्षणकर्ता उसी शॉपिंग मॉल की दुकान में अशंकालिक नौकरी लेकर अंदर का व्यक्ति बनकर ग्राहकों को व्यवहार में विभिन्नताओं का प्रेक्षण कर सकता है। इस तकनीक का मानवशास्त्री बहुतायत से उपयोग करते हैं जिनका उद्देश्य होता है कि उस सामाजिक व्यवस्था का प्रथमतया दृष्टि से एक परिप्रेक्ष्य विकसित कर सकें जो एक बाहरी व्यक्ति को सामान्यता उपलब्धता नहीं होता है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –

  1. ध्यान
  2. पूनर्वाक्यविन्यास
  3. अर्थ का आरोपण
  4. शरीर भाषा

उत्तर:
1. ध्यान-एक बार जब उद्दीपक, जैसे-एक शब्द या दृष्टि संकेत या दोनों, ग्रहण किए जाते हैं तो वे मानव प्रक्रमण तंत्र की ध्यान अवस्था पर पहुंचते हैं। इस अवस्था में अन्य उद्दीपन पश्चगमन की अवस्था में आ जाते हैं ताकि हम विशिष्ट शब्दों या दृश्य प्रतीकों पर पूरा ध्यान सकें। सामान्यता हमारा ध्यान हम जो सुन रहे हैं और समझ रहे हैं उनके बीच बँटा रहता है या हमारे आस-पास जो कुछ घटित हो रहा है उसमें उलझा रहता है।

मान लीजिए कि एक छात्र कोई सिनेमा देख रहा है। उसके सामने बैठा व्यक्ति अपने बगल में बैठे व्यक्ति के साथ लगातार कानाफूसी कर रहा है। सिनेमाघर का ध्वनि यंत्र भी खड़खड़ा रहा है। साथ ही, उसे आगे आनेवाली परीक्षा के बारे में भी चिंता है। इस तरह से उसका ध्यान अनेक दिशाओं में बँटा रहता है। विभक्त ध्यान किसी संदेश या संकेत को ग्रहण करना कठिन बना देता है।

2. पुनर्वाक्यविन्यास-यह कैसे पता चलेगा कि कोई श्रवण कर रहा है कि नहीं? उससे पूछकर कि उसने जो कहा वह उसको फिर से कहे। ऐसा करनेवाले व्यक्ति उसके शब्दों को एकदम से नहीं दोहरा सकता है। वह मूलतः अपनी समझ से आपकी बातों या विचारों को पुनर्कथित करता है-वही जो उसकी समझ में आया होता है। इसी को पुनर्वाक्यविन्यास (Paraphrasing) कहते हैं। इसके द्वारा व्यक्ति को यह समझ में आ जाता है कि उसने जो कहा वह कितना समझा या सुना गया है।

अगर कोई कही हुई बात को संक्षप में दुबारा दोहरा नहीं सकता तब यह इसका साक्ष्य है कि उसने पूरा संदेश ठीक से ग्रहण नहीं किया हैं अर्थात् या तो सुना नहीं है या समझा नहीं है। हम जब कक्षा में अध्यापक या किसी दूसरे व्यक्ति को सुन रहे हों तब भी इस बार ध्यान रखना चाहिए कि क्या हम उसकी बात दोहरा सकते हैं या नहीं? सुनी हुई बात को पुनर्वाक्यविन्यास करने का प्रयास करना चाहिए और यदि ऐसा नहीं कर पाते हैं तब संभव होने पर तत्काल स्पष्टीकरण करना चाहिए।

3. अर्थ का आरोपण-किसी भी उद्दीपन को ग्रहण करने के बाद उसको हम एक पूर्वानिर्धारित श्रेणी में रखते हैं, उसे श्रेणी को विकास भाषा के सीखने के साथ ही जुड़ा रहता है। हम उन मानसिक श्रेणियों को विकसित करते हैं। जिने द्वारा प्राप्त संदेश की व्याख्या की जाती है। उदाहरण के लिए, हमारी श्रेणीकरण प्रणाली ने ‘पनीर’ शब्द को दुग्ध उत्पादन के रूप में श्रेणीबद्ध कर रहा है, जिसका एक खास स्वाद है, रंग है, जिसके द्वारा हम ‘पनीर’ शब्द का उपयोग सही अर्थ में कर पाते हैं।

4. शरीर भाषा-जब हम दूसरों से संवाद करते हैं तब हमारे शब्द हमारे संदेश का पूर्ण अर्थ संप्रेषित नहीं कर पाते हैं। हम सभी जानते हैं कि संप्रेषण का एक बड़ा भाग वाचिक भाषा का उपयोग किए बिना भी हो सकता है। हमें पता है कि अवाचिक क्रियाएँ प्रतीकात्मक होती किसी भी बातचीत की क्रिया से गहराई से जुड़ी रहती हैं। इन्हीं अवाचिक क्रियाओं के अंश को शरीर भाषा (Body Language) कहते हैं। शरीर भाषा में वह सारे संदेश शामिल होते हैं जो शब्दों के अलावा लोग बातचीत के दौरान उपयोग करते हैं।

शरीर भाषा पढ़ते समय इस बात का अवश्य ध्यान चाहिए कि कोई भी एक अवाचित संकेत अपने आप में संपूर्ण अर्थ नहीं रखता है। इसमें हावभाव, भंगिमा, शरीर की बनावट, नेत्र संपर्क शरीर की गति, पोशाक शैली जैसे कारक शामिल होते हैं और इसको एक गुच्छ (Cluster) के रूप में समझना पड़ता है। साथ ही, वाचिक संप्रेषण में अवाचिक संकेतों के अनेक अर्थ हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, सीने पर एक-दूसरे पर रखी गई बाहुओं या भुजाओं का अर्थ होता है कि व्यक्ति स्वयं को अलग रखता चाहता है, परंतु अगर सीधी मुद्रा में सीने पर हाथ बँधे हों, शरीर की मांसपेशियाँ तनी हों, जबड़ों की मांसपेशियों में जकड़न और आँखों की मांसपेशियों में सकुचन हो तो यह संभवतः क्रोध का संप्रेषण करता है।

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प्रश्न 5.
श्रवण कौशलों को सुधारने के कुछ संकेतों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
श्रवण कौशलों को सुधारने के कुछ संकेत निम्नलिखित हैं –

  1. इस बात की पहचान करनी चाहिए कि प्रेषक एवं संग्राहक दोनों संप्रेषण को प्रभावी बनाने के लिए समान रूप से जिम्मेदार होते हैं।
  2. संप्रेषित की जा रही सूचना प्राप्त करने की शुरुआत में कोई निर्णय लेने से बचना चाहिए। सभी विचारों के प्रति खुलापन रखना चाहिए।
  3. धैर्यवान श्रवणकर्ता बनना चाहिए। अनुक्रिया देने में जल्दी नहीं करना चाहिए।
  4. अहं कथन से बचना चाहिए। केवल जो चाहते हैं उसकी के बारे में नहीं करना चाहिए। दूसरों को भी अवसर देना चाहिए और जो कहना है कहने देना चाहिए।
  5. सांवेगिक अनुक्रियाओं के प्रति सावधान रहना, विशेष रूप से वे शब्द जो भावपूर्ण हों।
  6. यह ध्यान रखना चाहिए कि शरीर भंगिमा श्रवण को प्रभावित करती है।
  7. विमनस्कता को नियंत्रित करना चाहिए।
  8. अगर कोई संदेह हो तो पुनर्कथन (पुनर्वाक्यविन्यास) करना चाहिए। प्रेषक से पूछना चाहिए कि वह आपके द्वारा ठीक समझा जा रहा है या नहीं।
  9. जो कहा जा रहा है उसका मानस-प्रत्यक्षीकरण करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि संदेश को मूर्त क्रिया के रूप में अनुदित करना चाहिए।

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प्रश्न 6.
मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कौशलों के मूल तत्त्वों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कौशलों के मूल तत्त्व अग्रलिखित हैं –

  1. विविध प्रकार की विधियों एवं माध्यमों से मूल्यांकन करने की योग्यता, इसमें उन तरीकों का ध्यान रखना भी सम्मिलित है जिसमें विविध व्यक्तियों, युग्मों, परिवारों एवं समूहों के प्रति सम्मान एवं अनुक्रियाशीलता की भावना बनी रहे।
  2. निर्णय लेने के लिए प्रदत्त संग्रह करते समय एक प्रणालीबद्ध उपागम के उपयोग की योग्यता।
  3. मूल्यांकन विधियों के आधारों से जुड़े मनोमितिक मुद्दों का ज्ञान।
  4. विभिन्न स्रोतों से प्रा त प्रदत्तों को समाकलित करने से संबंधित मुद्दों की जानकारी रखना।
  5. नैदानिक उद्देश्यों के लिए विभिन्न स्रोतों से प्राप्त प्रदत्तों को समाकलित करने की योग्यता।
  6. निदान के उपयोग एवं निरूपण की योग्यता, जिसमें उपलब्ध नैदानिक उपागमों की सीमाओं और शक्तियों को समझा जा सके।
  7. कौशलों को बढ़ाने एवं अमल लाने के लिए पर्यवेक्षण के प्रभावी उपयोग की क्षमता कोई भी जो मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग करता है उसका व्यावसायिक रूप से योग्य होना तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षण में प्रशिक्षित होना आवश्यक है।
  8. मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का संचालन परीक्षण पुस्तिका (मैन्युअल) में दी गई सूचना/अनुदेशों के अनुसार ही किया जाता है।

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प्रश्न 7.
साक्षात्कार प्रश्नों के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
साक्षात्कार प्रश्नो के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं –

  1. प्रत्यक्ष प्रश्न-ये स्पष्ट होते हैं और इनको विशिष्ट सूचनाओं की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, “अंतिम बार आपने कहाँ काम किया था?”
  2. मुक्तोत्तर प्रश्न-ये कम स्पष्ट होते हैं और केवल विषय को बताते हैं। उदाहरण के लिए “आप अपनी नौकरी से कुल मिलाकर कितने प्रसन्न थे?”
  3. अमुक्तोत्तर प्रश्न-ये अनुक्रिया के विकल्प भी प्रस्तुत करते हैं जिससे अनुक्रिया का प्रसरण संकीर्ण रहता है। उदाहरण के लिए, “क्या आपको लगता है कि उत्पाद संबंधी ज्ञान या संप्रेषण कौशल एक विक्रेता के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण होता है?”
  4. द्वि-ध्रुवीय प्रश्न-यह अमुक्तोत्तर प्रश्न का ही एक प्रकार है। इसमें हाँ/नहीं अनुक्रिया अपेक्षित होती है। उदाहरण के लिए, “क्या आप इस कंपनी के लिए काम करना चाहेंगे?”
  5. संकेतन प्रश्न-ये किसी विशिष्ट उत्तर के पक्ष में अनुक्रिया को प्रोत्साहन देते हैं। उदाहरण के लिए, “क्या आप इस पक्ष में नहीं हैं कि इस कंपनी में अधिकारियों का एक संघ (यूनियन) बने?”

प्रश्न 8.
एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक को एक कटु मनोवैज्ञानिकों से कैसे अलग किया जा सकता है?
उत्तर:
अधिकतर लोग सोचते हैं कि वे किसी न किसी प्रकार के मनोवैज्ञानिक हैं। हम अक्सर बुद्धिहीनता मनोग्रंथि, अनन्यता संकट, मानसिक बाधाओं, अभिवृत्ति दबाव, संप्रेषण बाधाओं के बारे में बात करते हैं। सामान्यतः इन पदों का परिचय लोगों के लोकप्रिय लेखन तथा जनसंचार के माध्यमों से होता है। मानव व्यवहार के बारे में कई प्रकार के सामान्य बुद्धि के पद लोग अपने जीवन से जुड़ी प्रक्रियाओं से सीख लेते हैं। मानव व्यवहार से जुड़ी कुछ नियमितताओं के अनुभव के आधार पर उनके बारे में सामान्यीकरण किया जाता है। इस प्रकार के दैनिक व्यवसायी मनोविज्ञान अक्सर उल्टा प्रभाव डालता है, कभी-कभी तो अत्यंत भयावह हो सकता है एक कूट मनोवैज्ञानिक को वास्तविक मनोविज्ञान से कैसे अलग करेंगे?

इसका उत्तर कुछ इस प्रकार के प्रश्न पूछकर तैयार किया जाता है, जैसे-उसका व्यावसायिक प्रशिक्षण, शैक्षिक पृष्ठभूमि, संस्थागत संबंधन तथा उसका सेवा देने संबंधी अनुभव आदि। यहाँ पर महत्त्वपूर्ण है कि उस मनोवैज्ञानिक का प्रशिक्षण एक शोधकर्ता के रूप में कैसे हुआ है उसमें व्यासायिक मूल्यों का आंतरिकीकरण कितना हुआ है? अब इस बात को माना जा रहा है कि मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रयुक्त उपकरणों का ज्ञान, उनसे जुड़ी विधियों एवं सिद्धांत मनोवैज्ञानिक विशेषता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। उदाहरण के लिए एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण वैज्ञानिक स्तर पर करता है। वे अपनी समस्याओं को प्रयोगशाला या क्षेत्र में ले जाकर परीक्षण करके उत्तर प्राप्त करने का प्रयास करते हैं वे अपने प्रश्नों का उत्तर गणितीय प्रसंभाव्यताओं के आधार पर प्राप्त करते हैं। उसके बाद ही वह किसी विश्वसनीय मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त या नियम पर पहुँचते हैं।

यहाँ पर एक और अंतर स्थापित करना चाहिए। कुछ मनोवैज्ञानिक शोध के माध्यम से सैद्धांतिक निरूपणों की खोज करते हैं जबकि कुछ अन्य हमारे प्रतिदिन की क्रियाओं और व्यवहारों से संबंधित रहते हैं। हमें दोनों प्रकार के मनोवैज्ञानिकों की जरूरत हैं। हमें कुछ ऐसे वैज्ञानिक चाहिए जो सिद्धान्तों का विकास करे जबकि कुछ दूसरे उनका उपयोग मानव समस्याओं के समाधान के लिए करें। यहाँ यह जानना महत्त्वपूर्ण है शोध कौशलों के अलावा एक मनोवैज्ञानिक के लिए वे कौन-सी क्षमताएँ हैं जो आवश्यक हैं। कुछ दशाएँ और सक्षमताएँ ऐसी हैं जो मनोवैज्ञानिकों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक मानी जा रही हैं।

इसके अंतर्गत ज्ञान के वे क्षेत्र आते हैं जिसको शिक्षा और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद व्यवसाय में आने से पूर्व किसी मनोवैज्ञानिक को जानना चाहिए। ये शिक्षकों, अभ्यास करनेवाले एवं शोध करनेवाले सभी के लिए जरूरी हैं जो छात्रों से, व्यापार से, उद्योगों से और वृहत्तर समुदायों के साथ परामर्श की भूमिकाओं में होते हैं। यह माना जा रहा है कि मनोविज्ञान में सक्षमताओं को विसरित करना, उनको अमल में लाना और उनका.मापना करना कठिन है, क्योंकि विशिष्ट पहचान और मूल्यांकन की कसौटियों पर अम सहमति नहीं बना पायी है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संप्रेक्षण एक प्रक्रिया है –
(A) सचेतन
(B) अचेतन
(C) साभिप्राय
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 2.
व्यक्ति की स्वयं से संवाद करने की क्रिया को कहते हैं –
(A) अन्तरवैयक्तिक संप्रेषण
(B) अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण
(C) सार्वजनिक संप्रेषण
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) अन्तरवैयक्तिक संप्रेषण

प्रश्न 3.
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण संबंधित होता है –
(A) स्वयं से
(B) दो या दो से अधिक व्यक्तियों से
(C) जनसभा से
(D) भीड़ से
उत्तर:
(B) दो या दो से अधिक व्यक्तियों से

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प्रश्न 4.
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण के प्रकार हैं –
(A) मध्यस्थ आधारित वार्तालाप
(B) साक्षात्कार
(C) लघु समूह परिचर्चा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
अपनी बातों को रेडियो या टेलीविजन के माध्यम से वक्ता द्वारा कहने को कहते हैं –
(A) सार्वजनिक संप्रेषण
(B) अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण
(C) अंतरवैयक्तिक संप्रेषण
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) सार्वजनिक संप्रेषण

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प्रश्न 6.
गरम स्टोव को छूने पर अंगुलियों का खींचना और हमारी आँखों में आँसू आना किसका उदाहरण है?
(A) वाचिक संप्रेषण
(B) अवाचिक संप्रेषण
(C) भाषायी संप्रेषण
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(B) अवाचिक संप्रेषण

प्रश्न 7.
श्रवण में कौन-सी विशेषता नहीं होनी चाहिए –
(A) धैर्यवान
(B) अधैर्यवान
(C) अनिर्णयात्मक
(D) ध्यान सक्रियता
उत्तर:
(B) अधैर्यवान

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास

प्रश्न 8.
सुननेवाला द्वारा हमारी की गई बातों को अपनी समझ में बातों या विचारों को पुनर्कथित कहलाता है –
(A) पुनर्वाक्यविन्यास
(B) अभिग्रहण
(C) ध्यान
(D) आरोपण
उत्तर:
(A) पुनर्वाक्यविन्यास

प्रश्न 9.
श्रवण प्रक्रिया में किन अंगों की भूमिका नहीं होती है?
(A) कान
(B) मस्तिष्क
(C) नाक
(D) आँख
उत्तर:
(C) नाक

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प्रश्न 10.
शरीर भाषा में निम्न में कौन-से कारक शामिल हैं?
(A) हावभाव
(B) हाथ की गति
(C) भंगिमा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 11.
साक्षात्कार के किस आग में साक्षात्कारकर्ता सूचना और प्रदत्त प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रश्न पूछता है?
(A) प्रारंभ
(B) मुख्य भाग
(C) समापन
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(B) मुख्य भाग

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प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग करते समय आवश्यक है –
(A) वस्तुनिष्ठता
(B) वैज्ञानिक उन्मुखता
(C) मानकीकृत व्याख्या
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
एक प्रभावी परामर्शदाता के गुण नहीं हैं –
(A) प्रामाणिकता
(B) दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर
(C) दूसरों के प्रति सकारात्मक अनादर
(D) तद्नुभूति की योग्यता
उत्तर:
(C) दूसरों के प्रति सकारात्मक अनादर

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प्रश्न 14.
मनोवृत्ति का निर्माण निम्नांकित में किस कारक द्वारा प्रभावित नहीं होता है?
(A) सामाजिक सीखना
(B) विश्वसनीय सूचनाएँ
(C) आवश्यकता पूर्ति
(D) श्रोता की विशेषताएँ
उत्तर:
(D) श्रोता की विशेषताएँ

प्रश्न 15.
योग में सम्मिलित होता है –
(A) ध्यान
(B) मुद्रा
(C) नियम
(D) ज्ञान
उत्तर:
(A) ध्यान

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प्रश्न 16.
समय प्रबन्ध किस श्रेणी का कौशल है?
(A) वैयक्तिक
(B) सामूहिक
(C) राजनैतिक
(D) धार्मिक
उत्तर:
(A) वैयक्तिक

प्रश्न 17.
दो या अधिक व्यक्तियों के बीच वार्तालाप और अन्तःक्रिया है –
(A) परीक्षण
(B) साक्षात्कार
(C) परामर्श
(D) प्रयोग
उत्तर:
(B) साक्षात्कार

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प्रश्न 18.
किसी वस्तु को खोने का बोध या संताप क्या कहलाता है?
(A) निर्धनता
(B) वंचन
(C) सामाजिक असुविधा
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) वंचन

प्रश्न 19.
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ के ने एक कार्यदल गठित किया जिसका उद्देश्य किनके लिए आवश्यक कौशलों की पहचान करना था?
(A) समाजशास्त्रियों
(B) अर्थशास्त्रियों
(C) व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(C) व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों

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प्रश्न 20.
प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए आवश्यक आधारभूत कौशल है –
(A) सामान्य कौशल
(B) विशिष्ट कौशल
(C) प्रेक्षण कौशल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 21.
सामान्य कौशल किस प्रकार के व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक है?
(A) नैदानिक एवं स्वास्थ्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में मनोवैज्ञानिकों को
(B) औद्योगिक एवं संगठनात्मक क्षेत्र के मनोवैज्ञानिकों को
(C) सामाजिक या पर्यावरणी क्षेत्र के मनोवैज्ञानिकों को
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 22.
सामान्य कौशल में शामिल होते हैं –
(A) वैयक्तिक कौशल
(B) बौद्धिक कौशल
(C) वैयक्तिक तथा बौद्धिक कौशल दोनों
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(C) वैयक्तिक तथा बौद्धिक कौशल दोनों

प्रश्न 23.
मनोवैज्ञानिक अपने परिवेश के किन पक्षों के विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रेक्षण करता है?
(A) घटनाएँ
(B) व्यक्ति
(C) घटनाएँ एवं व्यक्ति दोनों
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(C) घटनाएँ एवं व्यक्ति दोनों

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प्रश्न 24.
प्रेक्षण का वह तरीका जिससे हम सीखते हैं कि लोग भिन्न स्थितियों में कैसे व्यवहार करते हैं, कहलाता है –
(A) प्रकृतिवादी प्रेक्षण
(B) प्रेक्षण
(C) सहभागी प्रेक्षण
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) प्रकृतिवादी प्रेक्षण

प्रश्न 25.
एक प्रेक्षणकर्ता द्वारा शॉपिंग मॉल की दुकान में अंशकालिक नौकरी लेकर अंदर का व्यक्ति बनकर ग्राहकों के व्यवहार में भिन्नताओं का प्रेक्षण कहलाता है –
(A) प्रकृतिवादी प्रेक्षण
(B) सहभागी प्रेक्षण
(C) आत्म-प्रत्यक्षण
(D) मूल्यांकन प्रेक्षण
उत्तर:
(B) सहभागी प्रेक्षण

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 7 सामाजिक प्रभाव एवं समूह प्रक्रम

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 7 सामाजिक प्रभाव एवं समूह प्रक्रम Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 7 सामाजिक प्रभाव एवं समूह प्रक्रम

Bihar Board Class 12 Psychology सामाजिक प्रभाव एवं समूह प्रक्रम Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एक व्यक्ति की अनन्यता कैसे बनी है? अथवा, सामाजिक अनन्यता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक अनन्यता हमारे अपने-संप्रत्यय का वह पक्ष है जो हमारी समूह सदस्यता पर आधारित है। सामाजिक अनन्यता हमें स्थापित करती है, अर्थात् एक बड़े सामाजिक सदर्भ में हमें यह बताती है कि हम क्या हैं और हमारी क्या स्थिति है तथा इस प्रकार समाज में हम कहाँ हैं इसको जानने में सहायता करती है। अपने विद्यालय के एक विद्यार्थी के रूप में छात्र की एक सामाजिक अनन्यता है। एकबार जब एक छात्र अपने विद्यालय के एक विद्यार्थी के रूप में एक अनन्यता स्थापित कर लेता है तो वह उन मूल्यों को आत्मसात् कर लेते हैं जिन पर उसके विद्यालय में बल दिया जाता है और उन मूल्यों को वह स्वयं बना लेते हैं। वह अपने विद्यालय में वाक्यों का पालन करने का पूरा प्रयास करता है।

सामाजिक अनन्यता सदस्यों को स्वयं के तथा उनके सामाजिक जगत के विषय में एक जैसे मूल्यों, विश्वासों तथा लक्ष्यों का एक संकलन (सेट) प्रदान करती है। एक बार जब कोई छात्र अपने विद्यालय के मूल्यों को आत्मसात् कर लेता है तो यह उनकी अभिवृत्तियों एवं व्यवहार के समन्वयन एवं नियमन में सहायता करता है। वह अपने विद्यालय को शहर राज्य के सर्वोत्तम विद्यालय बनाने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं। जब हम अपने समूह के साथ एक दृढ़ अनन्यता विकसित कर लेते हैं तो अंत: समूह एवं बाह्य समूह का वर्गीकरण महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

जिस समूह से हम अपना तादात्म्य रखते हैं वह अंतःसमूह बन जाता है और दूसरे समूह बाह्य समूह बन जाते हैं। इस अंतः समूह तथा बाह्य समूह वर्गीकरण का एक नकारात्मक पक्ष यह है कि हम बाह्य समूह की तुलना में अंतःसमूह का अधिक अनुकूल निर्धारण करते हुए अंत:समूह के प्रति पक्षपात का प्रदर्शन प्रारंभ कर देते हैं और बाह्य समूह का अवमूल्यन करने लगते हैं। अनेक अंतर-समूह द्वंद्वों का आधार बाह्य समूह का यह अवमूल्यन होता है।

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प्रश्न 2.
क्या आप किसी समूह के सदस्य हैं? वह क्या है जिसने आपको इस समूह में सम्मिलित होने के लिए अभिप्रेरित किया? इसकी विवेचना कीजिए। अथवा, व्यक्ति क्यों समूह में सम्मिलित होते हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी समूह का सदस्य होता है। हम अपने परिवार, कक्षा और उस समूह के सदस्य हैं जिनके साथ हम अंतःक्रिया करते हैं या खेलते हैं। इसी प्रकार किसी विशेष समय पर अन्य व्यक्ति भी अनेक समूहों के सदस्य होते हैं। अलग-अलग समूह भिन्न-भिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को संतुष्ट करते हैं और इसलिए हम एक साथ अनेक समूहों के सदस्य होते।

यह कभी-कभी हम लोगों के साथ एक दबाव उत्पन्न करता है क्योंकि समूहों की प्रतिस्पर्धी प्रत्याशाएँ और माँगें हो सकती हैं। अधिकांश स्थितियों में हम ऐसी प्रतिस्पर्धी माँगों और प्रत्याशाओं को प्रबंधित करने में सक्षम होते हैं। लोग समूह में इसलिए सम्मिलित होते हैं क्योंकि ऐसे समूह अनेक आवश्यकताओं को संतुष्ट करते हैं। सामान्यतः लोग निम्न कारणों से समूह में सम्मिलित होते हैं –

1. सुरक्षा-जब हम अकेले होते हैं तो असुरक्षित अनुभव करते हैं। समूह इस असुरक्षा को कम करता है। व्यक्तियों के साथ रहना आराम की अनुभूति और संरक्षण प्रदान करता है परिणामस्वरूप लोग स्वयं को अधिक शक्तिशाली महसूस करते हैं और खतरों की संभावना हो जाती है।

2. प्रतिष्ठा या हैसियत-जब हम किसी ऐसे समूह के सदस्य होते हैं जो दूसरे लोगों द्वारा महत्त्वपूर्ण समझा जाता है तो हम सम्मानित महसूस करते हैं तथा शक्ति-बोध का अनुभव करते हैं। मान लीजिए कि किसी विद्यालय का छात्र किसी अंतर्विद्यालयी वाद-विवाद प्रतियोगिता का विजेता बन जाता है तो गर्व का अनुभव करता है और वह स्वयं को दूसरों से बेहतर समझता है।

3. आत्म-सम्मान-समूह आत्म-अर्ध अनूभूति देता है और एक सकारात्मक सामाजिक अनन्यता स्थापित करता है। एक प्रतिष्ठित समूह का सदस्य होना व्यक्ति की आत्म-धारणा या आत्म-संप्रत्यय को बढ़ावा देता है।

4. व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आवश्यकताओं की संतुष्टि-समूह व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आवश्यकताओ को संतुष्ट करते हैं जैसे-समूह के द्वारा आत्मीयता-भावना, ध्यान देना और पाना, प्रेम तथा शक्ति बोध का अनुभव प्राप्त करना।

5. लक्ष्य प्राप्ति-समूह ऐसे लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक होता है जिन्हें व्यक्तिगत रूप से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। बहुमत में शक्ति होती है।

6. ज्ञान और जानकारी या सूचना प्रदान करना-समूह सदस्यता हमें ज्ञान और जानकारी प्रदान करती है और हमारे दृष्टिकोण को विस्तृत करती है। संभव है कि वैयक्तिक रूप से हम सभी वांछित जानकारियों या सूचनाओं को प्राप्त न कर सकें। समूह इस प्रकार की जानकारी और ज्ञान की कमी को पूरा करता है।

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प्रश्न 3.
समूह निर्माण को समझने में टकमैन का अवस्था मॉडल किस प्रकार से सहायक है?
उत्तर:
टकमैन का अवस्था मॉडल-टकमैन (Tuckman) ने बताया है कि समूह पाँच विकासात्मक अनुक्रमों से गुजरता है। ये पाँच अनुक्रम हैं-निर्माण या आकृतिकरण, विप्लवन या झंझावात, प्रतिमान या मानक निर्माण, निष्पादन एवं समापन।

1. निर्माण की अवस्था-जब समूह के सदस्य पहली बार मिलते हैं तो समूह, लक्ष्य एवं लक्ष्य को प्राप्त करने के संबंध में अत्यधिक अनिश्चितता होती है। लोग एक-दूसरे को जानने का प्रत्यन करते हैं और वह मूल्यांकन करते हैं कि क्या वे समूह के लिए उपयुक्त रहेंगे। यहाँ उत्तेजना के साथ ही साथ भय होता है। इस अवस्था को निर्माण या आकृतिकरण की अवस्था (Forming stage) कहा जाता है।

2. विप्लवन की अवस्था-प्रायः इससे अवस्था के बाद अंतरा-समूह द्वंद्व की अवस्था होती है जिसे विप्लवन या झंझावात (Storming) की अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में समूह के सदस्यों के बीच इस बात को लेकर द्वंद्व चलता रहता है कि समूह के लक्ष्य को कैसे प्राप्त करना है, कौन समूह एवं उसके संसाधनों को नियंत्रित करनेवाला है और कौन क्या कार्य निष्पादित करनेवाला है। इस अवस्था के संपन्न होने के बाद समूह में नेतृत्व करने के लक्ष्य को कैसे प्राप्त करना है इसके लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण होता है।

3. प्रतिमान अवस्था-विप्लवन या झंझावात की अवस्था के बाद एक दूसरी अवस्था आती है जिसे प्रतिमान या मानक निर्माण (Norming) की अवस्था के नाम से जाना जाता है। इस अवधि में समूह के सदस्य समूह व्यवहार से संबंधित मानक विकसित करते हैं। यह एक सकारात्मक समूह अनन्यता के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।

4. निष्पादन-चतुर्थ अवस्था निष्पादन (Performing) की होती है। इस अवस्था तक समूह की संरचना विकसित हो चुकी होती है और समूह के सदस्य इसे स्वीकृत कर लेते हैं समूह लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में समूह अग्रसर होता है। कुछ समूहों के लिए विकास की अंतिम व्यवस्था हो सकती है।

5. समापन की अवस्था-तथापि समूहों के लिए जैसे-विद्यालय समारोह सदस्यता के लिए आयोजन समिति के संदर्भ में एक अन्य अवस्था हो सकती है जिसे समापन की अवस्था (Adjourning stage) के नाम से जाना जाता है। इस अवस्था में जब समूह का कार्य पूरा हो जाता है तब समूह भंग किया जा सकता है।

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प्रश्न 4.
अंतर-द्वंद्व की परिणातियों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
ड्युश ने अंतर-समूह द्वंद्व के निम्नलिखित परिणतियों की पहचान की है –

  1. समूहों के बीच संप्रेषण खराब हो जाता है। समूह एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करते हैं। जिसके कारण संप्रेषण भंग हो जाता है और एक-दूसरे के प्रति संदेह को उत्पन्न करता है।
  2. समूह अपने मतभेदों को बढ़ा-चढ़ाकर देखना प्रारंभ कर देते हैं और अपने व्यवहारों को उचित एवं दूसरों के व्यवहारों को अनुचित मानने लगते हैं।
  3. प्रत्येक पक्ष अपनी शक्ति एवं वैधता को बढ़ाने का प्रयास करता है। इसके परिणामस्वरूप कुछ छोटे-मोटे मुद्दों की ओर जाते हुए द्वंद्व बढ़ने लगता है।
  4. एक बार जब द्वंद्व प्रारंभ हो जाता है तो अनेक दूसरे कारक द्वंद्व को बढ़ाने लगते हैं। तः समूह मत का दृढ़ीकरण बाह्य समूह की ओर निर्देशित सुस्पष्ट धमकी, प्रत्येक समूह की काधिक बदला लेने की प्रवृत्ति और दूसरे पक्षों के द्वारा किसी का पक्ष लेने का निर्णय द्वंद्व गद्धि उत्पन्न करता है।

प्रश्न 5.
समूहों में सामाजिक स्वैराचार को कैसे कम किया जा सकता है? अपने विद्यालय में सामाजिक स्वैराचार की किन्हीं दो घटनाओं पर विचार कीजिए। आपने इसे कैसे दूर किया?
उत्तर:
सामाजिक स्वरौचार को निम्न के द्वारा कम किया जा सकता है –

  1. प्रत्येक सदस्य के प्रयासों को पहचानने योग्य बनाना।
  2. कठोर परिश्रम के लिए दबाव का बढ़ाना (सफल कार्य निष्पादन के लिए समूह सदस्यों को वचनबद्ध करना)।
  3. कार्य के प्रकट महत्त्व या मूल्य को बढ़ाना।
  4. लोगों को यह अनुभव कराना कि उनका व्यक्तिगत प्रयास महत्त्वपूर्ण है।
  5. समूह संतक्तता को प्रबल करना जो समूह के सफल परिणाम के लिए अभिप्रेरणा को बढ़ाता है।

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प्रश्न 6.
आप अपने व्यवहार में प्रायः सामाजिक अनुरूपता का प्रदर्शन कैसे करते हैं? सामाजिक अनुरूपता के कौन-कौन से निर्धारक हैं? अथवा, सामाजिक अनुरूपता पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
हम अपने व्यवहार में प्रायः सामाजिक अनुरूपता का प्रदर्शन निम्न तरीके से करते हैं –
ऐसा लगता है कि मानक के अनुसरण करने की प्रवृत्ति नैसर्गिक है और इसकी किसी विशेष व्याख्या की आवश्यकता नहीं है। इसके बावजूद हम जानना चाहते हैं कि क्यों इस प्रकार की प्रवृत्ति नैसर्गिक अथवा स्वतःस्फूर्त होती है।

1. मानक व्यवहार के नियमों के एक अलिखित तथा अनौपचारिक समुच्चय को निरूपित करता है जो एक समूह के सदस्यों को यह सूचना प्रदान करता है कि विशिष्ट स्थितियों में उनसे क्या अपेक्षित है। यह संपूर्ण स्थिति को स्पष्ट बना देते हैं और व्यक्ति तथा समूह दोनों को अधिक सुगमता से कार्य करने का अवसर प्रदान करता है।

2. सामान्यतया लोग असहजता का अनुभव करते हैं यदि उन्हें दूसरों से ‘भिन्न’ समझा जाता है। व्यवहार करने का वैसा तरीका जो व्यवहार के प्रत्याशित ढंग से भिन्न होता है, तो वह दूसरों के द्वारा अनुमोदन एवं नापसंदगी को उत्पन्न करता है जो सामाजिक दंड का एक रूप है। अनुसरण करना अनुमोदन का परिहार करने एवं अन्य लोगों से अनुमोदन प्राप्त करने का सरलतम तरीका है।

3. मानक को बहुसंख्यक के विचार एवं विश्वास को प्रतिबिंबित करनेवाला समझा जाता है। अधिकांश लोग मानते हैं कि बहुसंख्यक के गलत होने की तुलना में सही होने की संभावना अधिक होती है। इसके एक दृष्टांत को टेलीविजन पर दिखाई जानेवाली प्रश्नोत्तरी में प्राय: देखा जाता है। जब एक प्रतियोगी किसी प्रश्न का सही उत्तर नहीं जानता है तो वह दर्शकों की राय ले सकता है और प्रायः व्यक्ति उसी विकल्प को चुनता है जिसे बहुसंख्यक दर्शक चुनते हैं। इसी तर्क के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लोग मानक के प्रति अनुरूपता का प्रदर्शन करते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि बहुसंख्यक को सही होना चाहिए। अनुरूपता के निर्धारक।

4. समूह का आकार-अनुरूपता तब अधिक पाई जाती है जब समूह बड़े से अपेक्षाकृत छोटा है। छोटे समूह में विसामान्य सदस्य (वह जो अनुरूपता प्रदर्शित नहीं करता है) को पहचानना आसान होता है परंतु एक बड़े समूह में यदि अधिकांश सदस्यों के बीच प्रबल सहमति होती है तो यह बहुसंख्यक समूह को मजबूत बनाता है और इसलिए मानक भी सशक्त होते हैं। ऐसी स्थिति में अल्पसंख्यक सदस्यों के अनुरूपता प्रदर्शन की संभावना अधिक होती है क्योंकि समूह दबाव प्रबल होगा।

5. अल्पसंख्यक समूह का आकार-मान लीजिए कि रेखाओं के बारे में निर्णय के कुछ प्रयासों के बाद प्रयोज्य यह देखता है कि एक दूसरो सहभागी प्रयोज्य की अनुक्रिया से सहमति प्रदर्शित करना प्रारंभ कर देता है। क्या अब प्रयोज्य के अनुरूपता प्रदर्शन की संभावना अथवा विसामान्य अल्पसंख्यकों का आकार बढ़ा सकता है।

6. कार्य की प्रकृति-ऐश के प्रयोग में प्रयुक्त कार्य में ऐसे उत्तर की अपेक्षा की जाती है जिसका सत्यापन किया जा सकता है और वह गलत. अथवा सही हो सकता है। मान लीजिए कि प्रायोगिक कार्य में किसी विषय के बारे में मत प्रकट करना निहित है। ऐसी स्थिति में कोई भी उत्तर सही या गलत नहीं होता है। किस स्थिति में अनुरूपता के पाए जाने की संभावना अधिक है, पहली स्थिति जिसमें गलत या सही उत्तर की तरह कोई चीज हो अथवा दूसरी स्थिति जिसमें बिना किसी सही या गलत उत्तर के व्यापक रूप से बदले जा सकते हैं? संभव है कि सही अनुमान लगाया होगा; दूसरी स्थिति में अनुरूपता के पाए जाने की संभावना कम है।

7. व्यवहार की सार्वजनिक या व्यक्तिगत अभिव्यक्ति-ऐश की प्रविधि में समूह के सदस्यों को सार्वजनिक रूप से अपनी अनुक्रिया देने के लिए कहा जाता है अर्थात् सभी सदस्य जानते हैं कि किस व्यक्ति ने क्या अनुक्रिया दी है। यद्यपि, एक दूसरी स्थिति भी हो सकती है (उदाहरणार्थ, गुप्त मतपत्र द्वारा मतदान करना) जिसमें सदस्यों के व्यवहार व्यक्तिगत होते हैं (जिन्हें दूसरे लोग नहीं जानते हैं)। व्यक्तिगत अभिव्यक्ति में सार्वजनिक अभिव्यक्ति की तुलना में कम अनुरूपता पाई जाती है।

8. व्यक्तित्व-ऊपर वर्णित दशाएँ यह प्रदर्शित करती हैं कि कैसे स्थितिपरक विशेषताएँ प्रदर्शित अनुरूपता के निर्धारण में महत्वपूर्ण हैं। कुछ व्यक्तियों का व्यक्तित्व अनुरूपतापरक होता है। अधिकांश स्थितियों में दूसरे लोग जो कहते हैं या करते हैं उनके अनुसार अपने व्यवहार का परिवर्तित करने की ऐसे व्यक्तियों में एक प्रवृत्ति पाई जाती है।

इसके विपरीत कुछ ऐसे व्यक्ति होते है जो आत्मनिर्भर होते हैं और वे किसी विशिष्ट स्थिति में कैसे व्यवहार करना है इसके लिए किसी मानक की तलाश नहीं करते हैं। शोध यह प्रदर्शित करते हैं कि वैसे व्यक्ति जो उच्च बुद्धि
वाले होते हैं, जो स्वयं के बारे में विश्वस्त होते हैं, जो प्रबल रूप से प्रतिबद्ध होते हैं एवं जो उच्च आत्म-सम्मान वाले होते हैं उनमें अनुरूपता प्रदर्शित करने की संभावना कम होती है।

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प्रश्न 7.
लोग यह जानते हुए भी उनका व्यवहार दूसरों के लिए हानिकारक हो सकता है, वे क्यों आज्ञापालन करते हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
लोग आज्ञापालन निम्नलिखित कारणों से करते हैं –

  1. लोग इसलिए आज्ञापालन करते हैं क्योंकि वे अनुभव करते हैं कि वे स्वयं के क्रियाकलापों के लिए उत्तरदायी नहीं है, वे मात्र आप्त व्यक्तियों द्वारा निर्गत आदेशों का पालन कर रहे हैं।
  2. सामान्यता आप्त व्यक्तियों के पास प्रतिष्ठा का प्रतीक (जैसे-वर्दी, पद-नाम) होता जिसका विरोध करने में लोग कठिनाई का अनुभव करते हैं।
  3. आप्त व्यक्ति आदेशों को क्रमश: कम से अधिक कठिन स्तर तक बढ़ाते हैं और प्रारंभिक आज्ञापालन अनुसरणकर्ता को प्रतिबद्धता के लिए बाध्य करता है।
  4. एक बार जब कोई किसी छोटे आदेश का पालन कर देता है तो धीरे-धीरे यह आप्त व्यक्ति के प्रति प्रतिवद्धता को बढ़ाता है और व्यक्ति बड़ आदेशों का पालन करना प्रारंभ कर देता है।
  5. अनेक बार घटनाएँ शीघ्रता से बदलती रहती हैं, जैसे-दंगे की स्थिति में, कि एक व्यक्ति के पास विचार करने के लिए समय नहीं होता है, उसे मात्र ऊपर से मिलनेवाले आदेशों का पालन करना होता है।

प्रश्न 8.
सहयोग के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
जब समूह किसी साझा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक साथ कार्य करते हैं तो हम इसे सहयोग कहते हैं। सहयोगी स्थितियों में प्राप्त होनेवाले प्रतिफल सामूहिक पुरस्कार होते हैं न कि वैयक्तिक पुरस्कार। किसी समूह में सहयोगी लक्ष्य वह है जिसमें कोई व्यक्ति तभी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है जब उसके समूह के अन्य व्यक्ति भी लक्ष्य को प्राप्त कर लें। उदाहरण के लिए, एक रिले रेस विजय टीम के सभी सदस्यों के सामूहित निष्पादन पर निर्भर करती है। यदि समूह में सहयोग होता है तो लोगों के बीच अधिक तालमेल होती है, एक-दूसरे के विचारों के लिए अधिक स्वीकृतिक होती है, जहाँ सहयोग होता है वहाँ लोगों के अधिक मित्रवत होते हैं तो वह व्यक्ति भी हमारी सहायता करता है।

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प्रश्न 9.
औपचारिक एवं अनौपचारिक समूह में विभेद करें।
उत्तर:
औपचारिक एवं अनौपचारिक समूह उस मात्रा में भिन्न होते हैं जिस मात्रा में समूह के प्रकार्य स्पष्ट एवं औपचारिक रूप से घोषित किए जाते हैं। एक औपचारिक समूह जैसे-किसी कार्यालय संगठन के प्रकार्य स्पष्ट रूप से घोषित किए जाते हैं। एक औपचारिक समूह, जैसे-किसी कार्यालय संगठन के प्रकार्य स्पष्ट रूप से घोषित होते हैं। समूह के सदस्यों द्वारा निष्पादित की जानेवाली भूमिकाएँ स्पष्ट रूप से घोषित होती हैं।

औपचारिक तथा अनौपचारिक समूह संरचना के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। औपचारिक समूह का निर्माण कुछ विशिष्ट नियमों या विधि पर आधारित होता है और सदस्यों की सुनिश्चित भूमिकाएँ होती हैं। औपचारिक समूह में मानकों का एक समुच्चय होता है जो व्यवस्था स्थापित करने में सहायक होता है। कोई भी विश्वविद्यालय एक औपचारिक समूह का उदाहरण है। दूसरी तरफ अनौपचारिक समूहों का निर्माण नियमों या विधि पर आधारित नहीं होता है और इस समूह के सदस्यों में घनिष्ठ संबंध होता है।

प्रश्न 10.
अंतर-समूह द्वंद्व के कुछ कारण क्या हैं? किसी अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष पर विचार कीजिए। इस संघर्ष की मानवीय कीमत पर विचार कीजिए।
उत्तर:
अंतरसमूह द्वंद्व के कुछ मुख्य कारण निम्नांकित हैं –
1. दोनों पक्षों में संप्रेषण का अभाव एवं दोषपूर्ण द्वंद्व का एक प्रमुख कारण है। इस प्रकार का संपेषण संदेह अर्थात् विश्वास के अभाव को उत्पन्न करता है। इसके परिणामस्वरूप द्वंद्व उत्पन्न होता है।

2. सापेक्ष वंचन अंतर समूह द्वंद्व का एक दूसरा कारण है। यह तब उत्पन्न होता है जब एक समूह के सदस्य स्वयं की तुलना दूसरे समूह के सदस्यों से करते हैं और यह अनुभव करते हैं कि वे जो चाहते हैं वह उनके पास नहीं परंतु दूसरे समूह के पास है। दूसरे शब्दों में, वे यह अनुभव करते हैं कि वे दूसरे समूह की तुलना में अच्छा नहीं कर पा रहे हैं। यह वचन एवं असंतोष की भावनाओं को उत्पन्न करता है जो द्वंद्व को उद्दीपन कर सकते हैं।

3. द्वंद्व का एक दूसरा कारण किसी एक पक्ष का यह विश्वास होता है कि एक पक्ष दूसरे से बेहतर हैं और वे जो कुछ कह रहे हैं उसे होना चाहिए। जब यह नहीं होता है तो दोनों पक्ष एक-दूसरे पर दोषारोपण करने लगते हैं। बहुत छोटे से मतभेद या विवाद का बढ़ा-चढ़ाकर देखने की एक प्रवृत्ति को प्राय: देखा जा सकता है, जिसके कारण द्वंद्व बढ़ जाता है क्योंकि प्रत्येक सदस्य अपने समूह के मानकों का आदर करना चाहता है।

4. यह भावना कि दूसरा समूह मेरे समूह के मानकों का आदर नहीं करता है और अपकारी या द्वेषपूर्ण आशय के कारण वास्तव में इन मानकों का उल्लंघन करता है।

5. पूर्व में की गई किसी क्षति का बदला लेने की इच्छा भी द्वंद्व का एक कारण हो सकती है।

6. पूर्वाग्रही प्रत्यक्षण अधिकांश द्वंद्व के मूल या जड़ में होते हैं। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि ‘वे’ एवं ‘हम’ की भावनाएँ पूर्वाग्रही प्रत्यक्षण को जन्म देती हैं।

7. शोध कार्यों ने यह प्रदर्शित किया है कि अकेले की अपेक्षा समूह में कार्य करते समय लोग अधिक प्रतिस्पर्धी एवं आक्रामक होते हैं। समूह दुर्लभ संसाधनों, दोनों ही प्रकार के संसाधनों भौतिक, जैसे-भू-भाग या क्षेत्र एवं धन एवं सामाजिक; जैसे-आदर और सम्मान के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।

8. प्रत्यक्षित असमता द्वंद्व का एक दूसरा कारण है। समता व्यक्ति के योगदान के अनुपात में लाभों या प्रतिफलों के वितरण को बताता है।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 7 सामाजिक प्रभाव एवं समूह प्रक्रम

प्रश्न 11.
समूह हमारे व्यवहार को किस प्रकार से प्रभावित करते हैं? अथवा, सामाजिक प्रभाव पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
समूह एवं व्यक्ति हमारे व्यवहार को प्रभावित करते हैं। यह प्रभाव हम लोगों को अपने व्यवहार को एक विशिष्ट दिशा में परिवर्तित करने के लिए बाध्य कर सकता है। सामाजिक प्रभाव उन प्रक्रमों को इंगित करता है जिसके द्वारा हमारे व्यवहार एवं अभिवृत्तियाँ दूसरे लोगों को काल्पनिक या वास्तविक उपस्थिति से प्रभावित होते हैं। दिन भर में हम अनेक ऐसी स्थितियों का सामना कर सकते हैं जिसमें दूसरों ने हमें प्रभावित करने का प्रयास किया हो और हमें उस तरीके से सोचने को विवश किया हो जैसा वे चाहते हैं।

माता-पिता, अध्यापक, मित्र रेडियो तथा टेलीविजन करते हैं। सामाजिक प्रभाव हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है। कुछ स्थितियों का सामना कर सकते हैं जिसमें दूसरों ने हमें प्रभावित करने का प्रयास किया हो और हमें उस तरीके से सोचने को विवश किया हो जैसे वे चाहते हैं। कुछ स्थितियों में लोगों पर सामाजिक प्रभाव बहुत अधिक प्रबल होता है जिसके परिणामस्वरूप हम लोग उस प्रकार के कार्य करने की ओर प्रवृत्त होते हैं जो हम दूसरी स्थितियों में नहीं करते। दूसरे अवसरों पर हम दूसरे लोगों के प्रभाव को नकारने में समर्थ होते हैं और यहाँ तक कि हम उन लोगों का अपने विचार या दृष्टिकोण को अपनाने के लिए अपना प्रभाव डालते हैं।

Bihar Board Class 12 Psychology सामाजिक प्रभाव एवं समूह प्रक्रम Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या कोई व्यक्ति आत्म-सम्मान के लिए भी किसी समूह में सम्मिलित हो सकता है? क्यों?
उत्तर:
हाँ, समूह आत्म-अर्ध की अनुभूति देता है और एक सकारात्मक सामाजिक अनन्यता – स्थापित करता है। एक प्रतिष्ठित समूह का सदस्य होना व्यक्ति की आत्म-धारणा या आत्म-संप्रत्यय हो बढ़ावा देता है।

प्रश्न 2.
समूह को किन-किन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है?
उत्तर:
समूह को सामान्यतया निर्माण, द्वंद्व स्थायीकरण, निष्पादन और निष्काषण/अस्वीकरण की विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ता है।

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प्रश्न 3.
समूह जिन विकासात्मक अनुक्रमों से गुजरता है, उनको लिखिए।
उत्तर:
समूह निम्नलिखित पाँच विकासात्मक अनुक्रमों से गुजरता है। निर्माण, विप्लवन, प्रतिमान, निष्पादन और समापन।

प्रश्न 4.
समूह की आकृतिकरण की अवस्था क्या है?
उत्तर:
जब समूह के सदस्य पहली बार मिलते हैं तो समूह, लक्ष्य एवं लक्ष्य को प्राप्त करने के संबंध में अत्यधिक अनिश्चित होती है। लोग एक-दूसरे को जानने का प्रयत्न करते हैं और यह मूल्यांकन करते हैं कि क्या वे समूह के लिए उपयुक्त रहेंगे। यहाँ उत्तेजना के साथ ही साथ भय भी होता है। इस अवस्था को निर्माण या आकृतिकरण की अवस्था कहा जाता है।

प्रश्न 5.
समूह की विप्लवन अवस्था क्या है?
उत्तर:
समूह की विप्लवन अवस्था में समूह के सदस्यों के बीच इस बात को लेकर द्वंद्व चलता रहता है कि समूह के लक्ष्य को कैसे प्राप्त करना है, कौन समूह एवं उसके संसाधनों को नियंत्रित करनेवाला है और कौन या कार्य निष्पादित करनेवाला है।

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प्रश्न 6.
समूह संरचना कंब विकसित होती है?
उत्तर:
समूह संरचना तब विकसित होती है जब सदस्य परस्पर अंत:क्रिया करते हैं।

प्रश्न 7.
समूह संरचना के चार घटक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
समूह संरचना के चार घटक हैं-भूमिकाएँ, प्रतिमान, प्रतिष्ठा एवं संसक्तता।

प्रश्न 8.
भूमिकाएँ किस व्यवहार को इंगित करती हैं?
उत्तर:
भूमिकाएँ वैसे विशिष्ट व्यवहार को इंगित करती हैं जो व्यक्ति को एक दिए गए सामाजिक संदर्भ में चित्रित करती है।

प्रश्न 9.
प्रतिमान क्या है?
उत्तर:
प्रतिमान या मानक समूह के सदस्यों द्वारा स्थापित समर्थित एवं प्रवर्तित व्यवहार एवं विश्वास के अपेक्षित मानदंड होते हैं।

प्रश्न 10.
प्राथमिक समूह किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्राथमिक समूह पूर्व-विद्यमान निर्माण होते हैं जो प्रायः व्यक्ति को प्रदत्त किया जाता है।

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प्रश्न 11.
प्राथमिक समूह के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
परिवार, जाति एवं धर्म प्राथमिक समूह के उदाहरण हैं।

प्रश्न 12.
प्राथमिक समूह की क्या विशेषताएँ होती हैं?
उत्तर:
प्राथमिक समूह में मुखोन्मुख’अंत:क्रिया होती है सदस्यों में घनिष्ठ शारीरिक सामीप्य होता है और उनमें एक उत्साहपूर्ण सांवेगिक बंधन पाया जाता है।

प्रश्न 13.
सापेक्ष पंचन कब उत्पन्न होता है?
उत्तर:
सापेक्ष पंचन तब उत्पन्न होता है जब एक समूह के सदस्य स्वयं की तुलना दूसरे समूह के सदस्यों से करते हैं और यह अनुभव करते हैं कि वे जो चाहते हैं वह उनके पास नहीं हैं परंतु वहं दूसरे समूह के पास है।

प्रश्न 14.
औपचारिक समूह का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर:
औपचारिक समूह का निर्माण कुछ विशिष्ट नियमों या विधि पर आधारित होती है और सदस्यों की सुनिश्चित भूमिकाएं होती हैं।

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प्रश्न 15.
औपचारिक समूह का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
कोई विश्वविद्यालय औपचारिक समूह का उदाहरण है।

प्रश्न 16.
औपचारिक समूहों में सदस्यों में किस प्रकार का संबंध होता है?
उत्तर:
औपचारिक समूहों में सदस्यों में घनिष्ट संबंध होता है।

प्रश्न 17.
अंतःसमूह और बाह्य समूह के बीच एक अंतर को लिखिए।
उत्तर:
अंत: समूह स्वयं के समूह को इंगित करता है और बाह्य समूह दूसरे को इंगित करता है।

प्रश्न 18.
सामाजिक सुकरीकरण क्या है?
उत्तर:
दूसरे की उपस्थिति में एक व्यक्ति का अकेले किसी कार्य पर निष्पादन करना सामाजिक सुकरीकरण कहलाता है।

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प्रश्न 19.
सामाजिक स्वैराचार क्या है?
उत्तर:
एक बड़े समूह के अंग के रूप में दूसरे व्यक्तियों के साथ एक व्यक्ति का किसी कार्य पर निष्यादन करने सामाजिक स्वैराचार कहलाता है।

प्रश्न 20.
समूह ध्रुवीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
समूह में अंत:क्रिया और विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप समूह की प्रारंभिक स्थिति की प्रबलता या मजबूती को समूह ध्रुवीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 21.
सामाजिक प्रभाव किन प्रक्रमों को इंगित करता है?
उत्तर:
सामाजिक प्रभाव उन प्रक्रमों को इंगित करता है जिसके द्वारा हमारे व्यवहार एवं अभिवृत्तियाँ दूसरे लोगों को काल्पनिक या वास्तविक उपस्थिति से प्रभावित होते हैं।

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प्रश्न 22.
अनुरूपता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अनुरूपता का अर्थ समूह प्रतिमान या मानक अर्थात् समूह के अन्य सदस्यों की प्रत्याशाओं के अनुसार व्यवहार करने से है।

प्रश्न 23.
विसामान्य कौन होते हैं?
उत्तर:
वे लोग जो अनुरूपता नहीं प्रदर्शित करते हैं, उन्हें विसामान्य या अननुपंथी कहा जाता है।

प्रश्न 24.
तीन प्रकार के सामाजिक प्रभाव कौन-कौन हैं?
उत्तर:
तीन प्रकार के सामाजिक प्रभाव हैं-अनुपालन, तादात्मीकरण और अंतरिकीकरण।

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प्रश्न 25.
अनुपालन क्या है?
उत्तर:
अनुपालन में ऐसी बाह्य स्थितियाँ होती हैं जो व्यक्ति को अन्य महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के प्रभाव को स्वीकार करने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रश्न 26.
आज्ञापालन की एक विभेदनीय विशेषता को लिखिए।
उत्तर:
आज्ञापालन की एक विभेदनीय विशेषता यह है कि आप्त व्यक्तियों के प्रति की गई अनुक्रिया होती है।

प्रश्न 27.
हम अनुरूपता का प्रदर्शन क्यों करते हैं?
उत्तर:
हम इसलिए अनुरूपता का प्रदर्शन करते हैं क्योंकि हम समूह मानक से विसामान्य नहीं होना चाहते हैं।

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प्रश्न 28.
अनुरूपता पर अग्रगमन प्रयोग किसने किया था?
उत्तर:
अनुरूपता पर अग्रगमन प्रयोग शेरिफ एवं ऐश के द्वारा किया गया था।

प्रश्न 29.
अनुरूपता किस स्थिति में अधिक पाई जाती है?
उत्तर:
अनुरूपता तब अधिक पाई जाती है जब समूह बड़े से अपेक्षाकृत छोटा होता है।

प्रश्न 30.
अनुपालन क्या है?
उत्तर:
अनुपालन मानक की अनुपस्थिति में भी मात्र दूसरे व्यक्ति या समूह के अनुरोध के प्रत्युत्तर में व्यवहार करने को इंगित करता है।

प्रश्न 31.
अनुपालन का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
किसी विक्रेता के हमारे घर पर आने पर जिस प्रकार का व्यवहार प्रदर्शित किया जाता है वह अनुपालन का एक अच्छा उदाहरण है।

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प्रश्न 32.
आज्ञापालन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
जब अनुपालन किसी ऐसे अनुदेश या आदेश के प्रति प्रदर्शित किया जाता है जो किसी आप्त व्यक्ति, जैसे–माता-पिता, अध्यापक या पुलिसकर्मी के द्वारा निर्गत होता है तब इस व्यवहार को आज्ञापालन कहा जाता है।

प्रश्न 33.
सहयोग किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब समूह किसी साझा लक्ष्य को प्राप्त करने लिए एक साथ कार्य करते हैं तो इसे सहयोग कहा जाता है।

प्रश्न 34.
प्रतिस्पर्धी लक्ष्य किस प्रकार से निर्धारित किए जाते हैं?
उत्तर:
प्रतिस्पर्धी लक्ष्य इस प्रकार से निर्धारित किए जाते हैं कि कोई व्यक्ति अपना लक्ष्य केवल तब प्राप्त कर सकता है जब अन्य लोग अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर पाएँ।

प्रश्न 35.
सहयोगी पारितोषिक संरचना क्या है?
उत्तर:
सहयोगी पारितोषिक संरचना वह है जिसमें प्रोत्साहक परस्पर निर्भरता पाई जाती है।

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प्रश्न 36.
प्रतिस्पर्धी परितोषिक संरचना क्या है?
उत्तर:
प्रतिस्पर्धी पारितोषिक संरचना वह है जिसमें कोई व्यक्ति तभी पुरस्कार प्राप्त कर सकता है जब दूसरे व्यक्ति पुरस्कार नहीं पाते हैं।

प्रश्न 37.
परस्परता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
परस्परता का अर्थ यह है कि लोग जिस चीज को प्राप्त करते हैं उसे लौटाने में कृतज्ञता को अनुभव करते हैं।

प्रश्न 38.
प्रतिस्पर्धा भी अधिक प्रतिस्पर्धा को उत्पन्न कर सकती है। इसका एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
यदि कोई हमारी सहायता करता है तो हम उस व्यक्ति की सहायता करना चाहते हैं, दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति जब हमें सहायता की आवश्यकता होती है तब हमें सहायता करने से मना कर देता है तो हम भी उस व्यक्ति की सहायता नहीं करना चाहते हैं।

प्रश्न 39.
सामाजिक अनन्यता से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सामाजिक अनन्यता हमारे आत्म-संप्रत्यय का वह पक्ष है जो हमारी समूह सदस्यता पर आधारित है। सामाजिक अनन्यता हमें स्थापित करती है अर्थात् एक बड़े सामाजिक संदर्भ में हमें यह बताती है कि हम क्या हैं और हमारी क्या स्थिति है तथा इस प्रकार समाज में हम कहाँ हैं इसको जानने में सहायता करती है।

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प्रश्न 40.
द्वंद्व क्या है?
उत्तर:
द्वंद्व एक ऐसा प्रक्रम है जिसमें एक व्यक्ति या समूह यह प्रत्यक्षण करते हैं कि दूसरे (व्यक्ति या समूह) उनके विरोधी हितों को रखते हैं और दोनों पक्ष एक-दूसरे को खंडन करने का प्रयास करते रहते हैं।

प्रश्न 41.
समूह को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
समूह दो या दो से अधिक व्यक्तियों की एक संगठित व्यवस्था है, जो एक-दूसरे से अंत:क्रिया करते हैं एवं परस्पर-निर्भर होते हैं, जिनकी एक जैसे अभिप्रेरणाएं होती हैं, सदस्यों के बीच निर्धारित भूमिका संबंध होता है और सदस्यों के व्यवहार को नियमित या नियंत्रित करने के लिए प्रतिमान या मानक होते हैं।

प्रश्न 42.
एक उदाहरण देकर बताइए कि समूह में एक व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य दूसरों के लिए कुछ परिणाम उत्पन्न कर सकता है।
उत्तर:
क्रिकेट के खेल में एक खिलाड़ी कोई महत्त्वपूर्ण कैच छोड़ देता है तो इसका प्रभाव संपूर्ण टीम पर पड़ेगा।

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प्रश्न 43.
समूह की एक विशेषता लिखिए।
उत्तर:
समूह ऐसे व्यक्तियों का एक समुच्चय है जिसमें सभी की एक जैसी अभिप्रेरणाएँ एवं लक्ष्य होते हैं। समूह निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने या समूह को किसी खतरे से दूर करने के लिए कार्य करते हैं।

प्रश्न 44.
भीड़ की विशेषता क्या होती है?
उत्तर:
भीड़ में न कोई संरचना होती है और न ही आत्मीयता की भावना होती है। भीड़ में लोगों का व्यवहार अविवेकी होता है और सदस्यों के बीच परस्पर निर्भरता भी नहीं होती है।

प्रश्न 45.
किसी दल की क्या विशेषता होती है?
उत्तर:
दल के सदस्यों में प्रायः पूरक कौशल होते हैं और वे एक समान लक्ष्य या उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं।

प्रश्न 46.
कोई व्यक्ति समूह में क्यों सम्मिलित होता है? उत्तर-व्यक्ति अपनी सुरक्षा कारण से समूह में सम्मिलित हो सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समूह को परिभाषित कीजिए। समूह और भीड़ में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समूह दो या दो से अधिक व्यक्तियों की एक संगठित व्यवस्था है जो एक-दूसरे से अंत:क्रिया करते हैं एवं परस्पर निर्भर होते हैं जिनकी एक जैसे अभिप्रेरणाएं होती हैं, सदस्यों के बीच निर्धारित भूमिका संबंध होता है और सदस्यों के व्यवहार को नियमित या नियंत्रित करने लिए प्रतिमान होते हैं। समूह और भीड़ में अंतर-भीड़ (Crowd) भी व्यक्तियों का एक समूहन या एकत्रीकरण है जिसमें लोग एक स्थान या स्थिति में संयोगवश उपस्थित रहते हैं। कोई व्यक्ति सड़क पर कहीं जा रहा है और कोई दुर्घटना घटित हो जाती है। शीघ्र ही बड़ी संख्या में लोग वहाँ एकत्र हो जाते हैं। यह भीड़ का एक उदाहरण है। भीड़ में न तो कोई संरचना होती है और न ही आत्मीयता की भावना होती है। भीड़ में लोगों का व्यवहार अविवेकी होता है और सदस्यों के बीच परस्पर-निर्भरता भी नहीं होती है।

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प्रश्न 2.
दल की क्या विशेषताएं होती हैं? यह समूह से किस प्रकार भिन्न होता है?
उत्तर:
टीम या दल (Team)समूहों के विशेष प्रकार होते हैं। दल के सदस्यों में प्रायः पूरक कौशल होते हैं और वे समान लक्ष्य या उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। सदस्य अपने क्रियाकलापों के लिए परस्पर उत्तरदायी होते हैं। दलों में सदस्यों के समन्वित प्रयासों के द्वारा एक सकारात्मक सह-क्रिया प्राप्त की जाती है। समूहों और दलों के बीच निम्न मुख्य अंतर है –

  1. समूह में सदस्यों के व्यक्तिगत योगदानों पर निष्पादन आश्रित रहता है। दल में व्यक्तिगत योगदान एवं दल-कार्य या टीम-कार्य दोनों ही महत्त्व रखते हैं।
  2. समूह में नेता या समूह का मुखिया कार्य की जिम्मेवारी सँभालता है, जबकि दल में यद्यपि एक नेता होता है फिर भी सभी सदस्य स्वयं पर ही जिम्मेवारी लेते हैं।

प्रश्न 3.
समानता किस प्रकार समूह निर्माण को सुगम बनाती है? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समानता – किसी के साथ कुछ समय तक रहने पर हमे अपने समानताओं के मूल्यांकन का अवसर प्राप्त होता है, जो समूह के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है। हम ऐसे लोगों को क्यों पसंद करते हैं जो हमारी तरह या हमारे समान होते हैं? व्याख्या यह है कि व्यक्ति संगति पसंद करता है और ऐसे संबंधों को पसंद करता है जो संगत हों। जब दो व्यक्ति एक जैसे होते हैं तो वहाँ संगति होती है और दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगते हैं। उदाहरण के लिए, एक छात्र फुटबॉल खेलना पसंद करता और उसी कक्षा का एक अन्य छात्र को भी फुटबॉल का खेल प्रिय है।

इस स्थिति में इस दोनों की अभिरुचियाँ मेल खाती हैं। उन दोनों के मित्र बन जाने की संभावना उच्च है। मनोवैज्ञानिकों ने जो दूसरी व्याख्या प्रस्तुत की है वह यह है कि जब हम अपने जैसे व्यक्तियों से मिलते हैं तो वे हमारे मत और मूल्यों को प्रबलित करते हैं और उन्हें वैधता या मान्यता प्रदान करते हैं। हमे अनुभव होता है कि हम सही हैं और हम उन्हें पसंद करने लगते हैं। यदि कोई व्यक्ति इस मत का है कि बहुत अधिक टेलीविजन देखना अच्छा नहीं होता है क्योंकि इसमें बहुत अधिक हिंसा को दिखाया जाता है। वह किसी ऐसे व्यक्ति से मिलता है जिसका मत उसके समान होता है। इससे उसके मत को मान्यता मिलती है और वह उस व्यक्ति को पसंद करने लगता है जो उसके मत को मान्यता प्रदान करने में सहायक था।

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प्रश्न 4.
प्राथमिक तथा द्वितीयक समूह में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्राथमिक तथा द्वितीयक समूह में अंतर-प्राथमिक एवं द्वितीयक समूह के मध्य एक प्रमुख अंतर यह है कि प्राथमिक समूह पूर्व-विद्यमान निर्माण होते हैं जो प्रायः व्यक्ति को प्रदत्त किया जाता है जबकि द्वितीयक समूह वे होते हैं जिसमें व्यक्ति अपने पसंद से जुड़ता है। अतः परिवार, जाति एवं धर्म प्राथमिक समूह हैं जबकि राजनीतिक दल की सदस्यता द्वितीयक समूह का उदाहरण है। प्राथमिक समूह में मुखोन्मुख अंत:क्रिया होती है, सदस्यों में घनिष्ठ शारीरिक सामीप्य होता है और उनमें एक उत्साहपूर्वक सांवेगिक बंधन पाया जाता है। प्राथमिक समूह व्यक्ति के प्रकार्यों के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं और विकास की आरंभिक अवस्थाओं में व्यक्ति के मूल्य एवं

आदर्श के विकास में इनकी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके विपरीत, द्वितीयक समूह वे होते हैं जहाँ सदस्यों में संबंध अधिक निर्वयक्तिक, अप्रत्यक्ष एवं कम आवृत्ति वाले होते हैं। जहाँ सदस्यों में संबंध अधिक निर्वैयक्तिक, अप्रत्यक्ष एवं कम आवृत्ति वाले होते हैं। प्राथमिक समूह में सीमाएँ कम पारगम्य होती हैं अर्थात् सदस्यों के पास इसकी सदस्यता वरण या चरण करने का विकल्प नहीं रहता है विशेष रूप से द्वितीयक समूह की तुलना में जहाँ इसकी सदस्यता को छोड़ना और दूसरे समूह से जुड़ना आसान होता है।

प्रश्न 5.
सामाजिक स्वैराचार क्यों उत्पन्न होता है? समझाइए।
उत्तर:
सामाजिक स्वैराचार निम्नलिखित कारणों से उत्पन्न होता है –

  1. समूह के सदस्य निष्पादित किए जानेवाले संपूर्ण कार्य के प्रति कम उत्तरदायित्व का अनुभव करते हैं और इस कारण वे कम प्रयास करते हैं।
  2. सदस्यों की अभिप्रेरणा कम हो जाती है क्योंकि वे अनुभव करते हैं कि उनके योगदान का मूल्यांकन व्यक्तिगत स्तर पर नहीं किया जाएगा।
  3. समूह के निष्पादन की तुलना किसी दूसरे समूह से नहीं की जाती है।
  4. सदस्यों के बीच अनुपयुक्त समन्वयन होता है (या समन्वय नहीं होता है)।
  5. सदस्यों के लिए उसी समूह की सदस्यता आवश्यक नहीं होती है। यह मात्र व्यक्तियों का एक समुच्चयन या समूहन होता है।

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प्रश्न 6.
समूह ध्रुवीकरण क्या है? समूह ध्रुवीकरण क्यों उत्पन्न होता है? एक उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
समूह में अंत: क्रिया और विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप समूह की प्रारंभिक स्थिति की प्रबलता को समूह ध्रुवीकरण कहा जाता है। समूह ध्रुवीकरण क्यों उत्पन्न होता है इसे निम्नलिखित उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है-क्या मृत्युदंड का प्रावधान होना चाहिए। यदि व्यक्ति जघन्य अपराध के लिए मृत्युदंड के पक्ष में है और यदि वह इस मुद्दे पर किसी समान विचार रखनेवाले व्यक्ति से परिचर्चा कर रहा है तो उसका क्या होगा? इस अंतःक्रिया के बाद उसका विचार और अधिक दृढ़ हो सकता है। इस दृढ़ धारणा के निम्नलिखित तीन कारण हैं –

  1. समान विचार रखने वाले व्यक्ति की गति में उसके दृष्टिकोण को समर्थित करनेवाले नए तर्क को सुनने की संभवना रहती है। यह उसे मृत्युदंड के प्रति अधिक पक्षधर बनाएगा।
  2. जब वह यह देखता है कि अन्य लोग भी मृत्युदंड के पक्ष में हैं तो वह यह अनुभव करता है कि यह दृष्टिकोण या विचार जनता के द्वारा वैधीकृत की जा रही है। यह एक प्रकार का अनुरूपता प्रभाव (Bandwagon effect) है।
  3. जब वह समान विचार रखनेवाले व्यक्तियों को देखता है तो संभव है कि वह उन्हें अंत:समूह के रूप में देखे। वह समूह के साथ तादात्म्य स्थापित करना प्रारंभ कर देता है, अनुरूपता का प्रदर्शन आरंभ कर देता है और जिसके परिणमास्वरूप उसके विचार दृढ़ हो जाते हैं।

प्रश्न 7.
अनुरूपता, अनुपालन तथा अज्ञापालन में क्या अंतर है?
उत्तर:
अनुरूपता, अनुपालन तथा आज्ञापालन में अंतर-ये तीनों एक व्यक्ति के व्यवहार पर दूसरों के प्रभाव को निर्दिष्ट करते हैं। आज्ञापालन सामाजिक प्रभाव का सबसे प्रत्यक्ष एवं स्पष्ट रूप है, जबकि अनुपालन आज्ञापालन की तुलना में कम प्रत्यक्ष होता है क्योंकि किसी व्यक्ति से किसी ने अनुरोध किया जब उसने अनुपालन किया। इसमें अस्वीकार करने की प्रायिकता या संभावना है। अनुरूपता सबसे अप्रत्यक्ष रूप है। कोई व्यक्ति इसलिए अनुरूपता का प्रदर्शन करता है क्योंकि वह समूह मानक से विसामान्य नहीं होना चाहता है।

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प्रश्न 8.
अनुरूपता क्यों उत्पन्न होती है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
1. अनुरूपता सूचनात्मक प्रभाव अर्थात् प्रभाव जो वास्तविकता के बजाय साक्ष्यों को स्वीकार करने के परिणामस्वरूप होता है, के कारण उत्पन्न होती है। इस प्रकार की तर्कसंगत अनुरूपता को दूसरों के कार्यों के द्वारा संसार के बारे में जानकारी प्राप्त करने के रूप में समझा जा सकता है। हम व्यक्तियों को प्रेक्षण करके सीखते हैं जो अनेक सामाजिक परंपराओं के बारे में सूचना के सर्वोत्तम स्रोत होते हैं। नए समूह सदस्य समूह के रीति-रिवाजों के बारे में जानकारी समूह के अन्य सदस्यों की गतिविधियों का प्रेक्षण करके प्राप्त करते हैं।

2. अनुरूपता मानक प्रभाव अर्थात् व्यक्ति की दूसरों से स्वीकृति या प्रशंसा पाने की इच्छा पर आधारित प्रभाव के कारण भी उत्पन्न हो सकती है। ऐसी स्थितियों में लोग अनुरूपता का प्रदर्शन इसलिए करते हैं क्योंकि समूह से विसामान्यता बहिष्कार या कम-से-कम अस्वीकरण या किसी प्रकार के दंड को उत्पन्न कर सकता है। यह सामान्यतया देखा गया है कि समूह बहुमत अंतिम निर्णय का निर्धारण करता है परंतु कुछ दशाओं में अल्पसंख्यक अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं। यह तब घटित होता है जब अल्पसंख्यक एक दृढ़ एवं अटल आधार बनाता है जिसके कारण बहुसंख्यकों के दृष्टिकोण की सत्यता पर एक संदेह उत्पन्न होता है। यह समूह में एक द्वंद्व उत्पन्न करता है।

प्रश्न 9.
सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा के निर्धारकों को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा के निर्धारक –
1. पारितोषिक संरचना-मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि लोग सहयोग करेंगे अथवा प्रतिस्पर्धा करेंगे यह पारितोषिक संरचना पर निर्भर करता है। सहयोगी पारितोषिक संरचना वह है जिसमें प्रोत्साहक परस्पर-निर्भरता पाई जाती है। प्रत्येक पुरस्कार का लाभभोगी होता है और पुरस्कार पांना तभी संभव होता है जब सभी सदस्य मिलकर प्रयास करते हैं। प्रतिस्पर्धात्मक पारितोषिक संरचना वह है जिसमें कोई व्यक्ति तभी पुरस्कार प्राप्त कर सकता है जब दूसरे व्यक्ति पुरस्कार नहीं पाते हैं।

2. अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण-जब समूह में अच्छा अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण होता है तो सहयोग इसकी संभावित परिणति होती है। संप्रेषण अंतःक्रिया और विचार-विमर्श को सुनकर बनाता है। इसके परिणामस्वरूप समूह के सदस्य एक-दूसरे को अपनी बात मनवा सकते हैं और एक-दूसरे के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

3. परस्परता-परस्परता का अर्थ यह है कि लोग जिस चीज को प्राप्त करते हैं उसे लौटाने में कृतज्ञता का अनुभव करते हैं। प्रारंभिक सहयोग आगे चलकर अधिक प्रतिस्पर्धा को उत्पन्न कर सकती है। यदि कोई आपकी सहायता करता है तो आप उस व्यक्ति की सहायता करना चाहते है। दूसरी ओर, कोई व्यक्ति जब आपको सहायता की आवश्यकता होती है तब आपकी सहायता करने से मना कर देता है तो आप भी व्यक्ति की सहायता नहीं करना चाहेंगे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समूह की विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समूह की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ होती हैं –
1. हम दो या दो से अधिक व्यक्तियों, जो स्वयं को समूह से संबद्ध समझते हैं, कि एक सामाजिक इकाई है। समूह की यह विशेषता एक समूह को दूसरे समूह से पृथक् करने में सहायता करती है और समूह को अपनी एक अलग अनन्यता या पहचान प्रदान करती है।

2. यह ऐसे व्यक्तियों का एक समुच्चय है जिसमें सभी की एक जैसी अभिप्ररेणाएँ एवं लक्ष्य होते हैं। समूह निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने या समूह को किसी खतरे से दूर करने के लिए कार्य करते हैं।

3. यह ऐसे व्यक्तियों का एक समुच्चय होता है जो परस्पर-निर्भर होते हैं अर्थात् एक व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य दूसरों के लिए कुछ परिणाम उत्पन्न कर सकता है। क्रिकेट के खेल में एक खिलाड़ी कोई महत्त्वपूर्ण कैच छोड़ देता है तो इसका प्रभाव संपूर्ण टीम पर पड़ेगा।

4. वे लोग जो अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि अपने संयुक्त संबंध के आधार पर कर रहे हैं वे एक-दूसरे को प्रभावित भी करते हैं।

5. ये ऐसे व्यक्तियों का एकत्रीकरण या समूहन है जो एक-दूसरे से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंत:क्रिया करते हैं।

6. यह ऐसे व्यक्तियों का एक समुच्चय होता है जिनका अंतःक्रियाएँ निर्धारित भूमिकाओं और प्रतिमानों के द्वारा संरचित होती हैं। इसका आशय यह हुआ कि जब समूह के सदस्य एकत्रित होते हैं या मिलते हैं तो समूह के सदस्य हर ओर एक ही तरह के कार्यों का निष्पादन करते हैं और समूह के सदस्य प्रतिमानों का पालन करते हैं। प्रतिमान हमें यह बताते हैं कि समूह में हम लोगों को किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए और समूह के सदस्यों से अपेक्षित व्यवहार करना चाहिए और समूह के सदस्यों से अपेक्षित व्यवहार को निर्धारित करते हैं।

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प्रश्न 2.
औपचारिक एवं अनौपचारिक समूह तथा अंतः एवं बाह्य समूहों की तुलना कीजिए एवं अंतर बताइए।
उत्तर:
1. औपचारिक एवं अनौपचारिक समूह-ऐसे समूह उस मात्रा में भिन्न होते हैं जिस मात्रा में समूह के प्रकार्य स्पष्ट और अनौपचारिक रूप से घोषित किये जाते हैं। एक औपचारिक समूह, जैसे-किसी कार्यालय संगठन द्वारा निष्पादित की जानेवाली भूमिकाएँ स्पष्ट रूप से घोषित होती हैं। औपचारिक तथा अनौपचारिक समूह के आधार पर भिन्न होते हैं। औपचारिक समूह का निर्माण कुछ विशिष्ट नियमों या विधि पर आधारित होता है और सदस्यों की सुनिश्चित भूमिकाएँ होती हैं। इसमें मानकों का एक समुच्चय होता है जो व्यवस्था स्थापित करने में सहायक होता है। कोई विश्वविद्यालय एक औपचारिक समूह का उदाहरण है। दूसरी तरफ अनौपचारिक समूहों का निर्माण नियमों या विधि पर आधारित नहीं होता है और सदस्यों में घनिष्ठ संबंध होता है।

2. अंत: समूह एवं बाह्य समूह-जिस प्रकार व्यक्ति अपनी तुलना दूसरों से समानता या भिन्नता के आधार पर इस संदर्भ में करते हैं कि क्या उनके पास है और क्या दूसरों के पास है, वैसे ही व्यक्ति जिस समूह से संबंध रखते हैं उसकी तुलना उन समूहों से करते हैं जिनके वे सदस्य हैं। अंत:समूह में सदस्यों के लिए ‘हम लोग (We) शब्द का उपयोग होता है जबकि बाह्य समूह के सदस्यों के लिए ‘वे’ (They) शब्द को उपयोग किया जाता है।

हम लोग या वे शब्द के उपयोग से कोई व्यक्ति लोगों को समान भिन्न के रूप में वर्गीकृत करता है। यह पाया गया है कि अंत:समूह में सामान्यतया व्यक्तियों में समानता मानी जाती है, उन्हें अनुकूल दृष्टि से देखा जाता है और उनमें वांछनीय विशेषक पाए जाते हैं। बाह्य समूह के सदस्यों को अलग तरीके से देखा जाता है और उनका प्रत्यक्षण अंत:समूह के सदस्यों की तुलना में प्रायः नकारात्मक होता है। अंत: समूह तथा बाह्य समूह का प्रत्यक्षण हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है।

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प्रश्न 3.
द्वंद्व समाधान युक्तियों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
द्वंद्व समाधान युक्तियाँ:
1. उच्चकोटि लक्ष्यों का निर्धारण-शैरिफ के अनुसार उच्चकोटि लक्ष्यों का निर्धारण करके अंतर – समूह को कम किया जा सकता है। एक उच्चकोटि लक्ष्य दोनों ही पक्षों के लिए परस्पर हितकारी होता है, अत: दोनों ही समूह सहयोगी रूप से कार्य करते हैं।

2. प्रत्यक्षण में परिवर्तन करना-अनुनय, शैक्षिक तथा मीडिया अपील और समूहों का समाज में भी भिन्न रूप से निरूपण इत्यादि के माध्यम से प्रत्यक्षण एवं प्रतिक्रियाओं में परिवर्तन करने के द्वारा द्वंद्व में कमी लाई जा सकती है। प्रारंभ से ही दूसरों के प्रति सहानुभूति को प्रोत्साहित करना सिखाया जाना चाहिए।

3. अंतर-समूह संपर्क को बढ़ाना-समूहों के बीच संपर्क को बढ़ाने से भी द्वंद्व को कम किया जा सकता है। सामुदायिक परियोजनाओं और गतिविधियों के द्वारा द्वंद्व में उलझे समूहों को तटस्थ मुद्दों या विचारों में संलग्न कराकर द्वंद्व को कम किया जा सकता है। इसमें समूहों को एक साथ लाने की योजना होती है जिससे कि वे एक-दूसरे की विचारधाराओं को अधिक अच्छी तरह से समझने योग्य हो जाएँ। परंतु, संपर्क के सफल होने के लिए उनको बनाए रखना आवश्यक है जिसका अर्थ है कि संपर्कों का समर्थन एक अन्य अवधि तक किया जाना चाहिए।

4. समूह की सीमाओं का पुनः निर्धारण-समूह की सीमाओं के पुनःनिर्धारण को कुछ मनोवैज्ञानिक द्वारा एक दूसरी प्रतिविधि के रूप सुझाया गया है। यह ऐसी दशाओं को उत्पन्न करके किया जा सकता है जिसमें समूह की सीमाओं को पुनः परिभाषित किया जाता है और समूह को एक उभयनिष्ठ समूह से जुड़ा अनुभव करने लगता है।

5. समझौता वार्ता-समझौता (negotiation) एवं किसी तृतीय पक्ष के हस्तक्षेप के द्वारा भी द्वंद्व का समाधान किया जा सकता है। प्रतिस्पर्धा समूह द्वंद्व का समाधान परस्पर स्वीकार्य हल को ढूँढ़ने का प्रयास करके भी कर सकते हैं। इसके लिए समझ एवं विश्वास की आवश्यकता होती है। समझौता वार्ता पारस्परिक संप्रेषण को कहते हैं जिससे ऐसी स्थितियाँ जिसमें द्वंद्व होता है उसमें समझौता या सहमति पर पहुँचा जाता है। कभी-कभी समझौता वार्ता के माध्यम से द्वंद्व एवं विवाचन (Arbitration) की आवश्यकता होती है। मध्यस्थता करनेवाली दोनों पक्षों को प्रासंगिक मुद्दों पर अपनी बहस को केंद्रित करने एवं एक स्वैच्छिक समझौते तक पहुँचने में सहायता करते हैं। विवाचन में तृतीय पक्ष को दोनों पक्षों को सुनने के बाद एक निर्णय देने का प्राधिकार होता है।

6. संरचनात्मक समाधान-न्याय के सिद्धांतों के अनुसार सामाजिक संसाधनों का पुनर्वितरण करके भी द्वंद्व को कम किया जा सकता है। न्याय पर किए गए शोध में न्याय के अनेक सिद्धांतों की खोज की गई है। इनमें कुछ हैं – समानता (सभी को समान रूप से विनिधान करना), आवश्यकता (आवश्यकताओं के आधार पर विनिधान करना) तथा समता (सदस्यों के योगदान के आधार पर विनिधान करना)

7. दूसरे समूह के मानकों का आदर करना-भारत जैसे बहुविध समाज में विभिन्न सामाजिक एवं संजातीय समूहों के प्रबल मानकों का आदर करना एवं उनके प्रति संवेदनशील होना आवश्यक है। यह देखा गया है कि विभिन्न समूहो के बीच होनेवाले अनेक सांप्रदायिक दंगे इस प्रकार की असंवेदनशीलता के कारण ही हुए हैं।

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प्रश्न 4.
समूह संरचना के मुख्य घटकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समूह संरचना के घटक –
1. भूमिकाएँ (Roles) सामाजिक रूप से परिभाषित अपेक्षाएँ होती हैं जिन्हें दी हुई स्थितियों में पूर्ण करने की अपेक्षा व्यक्तियों से की जाती है। भूमिकाएँ वैसे विशिष्ट व्यवहार को इंगित करती हैं जो व्यक्ति को एक दिये गये सामाजिक संदर्भ में चित्रित करती हैं। किसी विशिष्ट भूमिका में किसी व्यक्ति से अपेक्षित व्यवहार इन भूमिका प्रत्याशाओं में निहित होता है। एक पुत्र या पुत्री के रूप में आपसे अपेक्षा या आशा की जाती है कि आप बड़े का आदर करें, उनकी बातों को सुनें और अपने अध्ययन के प्रति जिम्मेदार रहें।

2. प्रतिमान या मानक (Norms) समूह के सदस्यों द्वारा स्थापित, समर्थित एवं प्रवर्तित व्यवहार एवं विश्वास के अपेक्षित मानदंड होते हैं। इन्हें समूह के, अकथनीय नियम’ के रूप में माना जा सकता है। परिवार के भी मानक होते हैं जो परिवार के सदस्यों के व्यवहार का मार्गदर्शन देखा जा सकता है।

3. हैसियत या प्रतिष्ठा (Status) समूह के सदस्यों को अन्य सदस्यों द्वारा दी जानेवाली सापेक्ष स्थिति को बताती है। यह सापेक्ष स्थिति या प्रतिष्ठा या तो प्रदत्त या आरोपित (संभव है कि यह एक व्यक्ति की वरिष्ठतां के कारण दिया जा सकता है) या फिर साधित या उपार्जित (व्यक्ति के विशेषज्ञता या कठिन परिश्रम के कारण हैसियत या प्रतिष्ठा को अर्जित किया है) होती है। समूह के सदस्य होने से हम इस समूह से जुड़ी हुई प्रतिष्ठा का लाभ प्राप्त करते हैं।

इसलिए हम सभी ऐसे समूहों के सदस्य बनना चाहते हैं जो प्रतिष्ठा में उच्च स्थान रखते हों अथवा दूसरों द्वारा अनुकूल दृष्टि से देखे जाते हों। यहाँ तक कि किसी समूह के अंदर भी विभिन्न सदस्य भिन्न-भिन्न सम्मान एवं प्रतिष्ठा रखते हैं। उदाहरण के लिए, एक क्रिकेट टीम का कप्तान अन्य सदस्यों की अपेक्षा उच्च हैसियत या प्रतिष्ठा रखता है, जबकि सभी सदस्य टीम की सफलता के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण होते हैं।

4. संसक्तता (Cohesiveness) समूह सदस्यों के बीच एकता, बद्धता एवं परस्पर आकर्षण को इंगित करती है। जैसे-जैसे समूह अधिक संसक्त होता है, समूह के सदस्य एक सामाजिक इकाई के रूप में विचार, अनुभव एवं कार्य करना प्रारंभ करते हैं और पृथक्कृत व्यक्तियों के समान कम। उच्च संसक्त समूह के सदस्यों में निम्न संसक्त सदस्यों की तुलना में समूह में बने रहने की तीव्र इच्छा होती है। संसक्तता दल-निष्ठा अथवा ‘वयं भावना’ अथवा समूह के प्रति आत्मीयता की भावना को प्रदर्शित करती है। एक संसक्त समूह को छोड़ना अथवा एक उच्च संसक्त समूह की सदस्यता प्राप्त करना कठिन होता है।

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प्रश्न 5.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समूह निर्णय के उदाहरण को लेते हुए समूल चिंतन के गोचर का स्पष्टीकरण कीजिए।
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिए गए अनेक समूह निर्णय के उदाहरणों को समूह चिंतन के गोचर के स्पष्टीकरण के लिए उद्धत किया जा सकता है। ये निर्णय बहुत बड़ी असफलता के रूप में परिणत हुए हैं। वियतनाम युद्ध इसका एक उदाहरण है। 1964 से 1967 तक राष्ट्रपति लिंडन जनिसन और संयुक्त राष्ट्र में उनके सलाहकारों ने वियतनाम युद्ध को यह सोचकर बढ़ाया कि यह युद्ध उत्तरी वियतनाम को शांति वार्ता के लिए अग्रसर करेगा।

चेतावनी के बावजूद युद्ध को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया। इस घोर गलत-आकलित निर्णय के परिणामस्वरूप 56,000 अमेरिकियों एवं 10 लाख से अधिक वियतनामियों को अपनी जान गंवानी पड़ी और इससे बहुत बड़े बजट घाटे अर्थात् आर्थिक तंगी को उत्पन्न किया। समूह-चिंतन के रोकथाम अथवा प्रतिकार करने के कुछ उपाय निम्नांकित हैं –

  1. समूह सदस्यों के बीच असहमति के बावजूद आलोचनात्मक चिंतन को पुरस्कृत एवं प्रोत्साहित करना
  2. समूह को वैकल्पिक कार्य योजना प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहित करना
  3. समूह के निर्णयों के मूल्यांकन के लिए बाहरी विशेषज्ञों को आमंत्रित करना, और
  4. सदस्यों को अन्य विश्वासपात्रों से अपने निर्णय के संबंध में प्रतिक्रिया को जानने के लिए प्रोत्साहित करना

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
इन द माइंड्स ऑफ मेन’ मानक पुस्तक किसने लिखी?
(A) विलियम
(B) गार्डनीर मरफी
(C) कार्ल लेविस
(D) डिकी आर्थर
उत्तर:
(A) विलियम

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन अंतर द्वंद्व की परिणति है?
(A) समूहों के बीच संप्रेषण अच्छा हो जाता है
(B) समूह एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं
(C) एक बार द्वंद्व प्रारंभ होने पर अनेक दूसरे कारण द्वंद्व को बढ़ाने लगते हैं
(D) इनमे कोई नहीं
उत्तर:
(B) समूह एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं

प्रश्न 3.
समूह दो या दो से अधिक व्यक्तियों की एक संगठित व्यवस्था होती है –
(A) जो एक-दूसरे से अंत:क्रिया करते हैं
(B) जो परस्पर निर्भर होते हैं
(C) जिनकी एक जैसी अभिप्रेरणाएँ होती हैं
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) जिनकी एक जैसी अभिप्रेरणाएँ होती हैं

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प्रश्न 4.
भीड़ में –
(A) कोई संरचना नहीं होती है
(B) आत्मीयता की भावना नहीं होती है
(C) लोगों का व्यवहार अविवेकी होता है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
समूह में लोगों के सम्मिलित होने का कारण है:
(A) सुरक्षा
(B) प्रतिष्ठिा
(C) आत्म-सम्मान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 6.
समूह संरचना कब विकसित होती है?
(A) जब सदस्य अलग-अलग क्रिया करते हैं
(B) जब सदस्य परस्पर अंतःक्रिया करते हैं
(C) जब कोई सदस्य अकेले कोई कार्य करता है
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) जब सदस्य परस्पर अंतःक्रिया करते हैं

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में कौन अंतर द्वंद्व की परिणति है?
(A) भूमिकाएँ
(B) प्रतिमान
(C) प्रतिष्ठा
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(D) इनमें कोई नहीं

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प्रश्न 8.
अंत: समूह –
(A) दूसरे समूह को इंगित करता है
(B) के सदस्यों के लिए ‘वे’ शब्द का इस्तेमाल होता है
(C) के सदस्यों के लिए ‘हम लोग’ शब्द का इस्तेमाल होता है
(D) के सदस्यों को अलग तरीके से देखा जाता है
उत्तर:
(C) के सदस्यों के लिए ‘हम लोग’ शब्द का इस्तेमाल होता है

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन असत्य है?
(A) उच्चकोटि लक्ष्यों का निर्धारण करके अंतर-समूह द्वंद्व को बढ़ाया जा सकता है
(B) समझौता वार्ता एवं किसी तृतीय पक्ष के हस्तक्षेप के द्वारा द्वंद्व को कम किया जा सकता है
(C) समूहों के बीच द्वंद्व अनेक असामाजिक एवं संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को प्रेरित करते हैं
(D) अधिकांश द्वंद्व लोगों के मन में उत्पन्न होते हैं
उत्तर:
(D) अधिकांश द्वंद्व लोगों के मन में उत्पन्न होते हैं

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित में द्वंद्व समाधान की युक्ति कौन-सी है?
(A) प्रत्यक्षण में परिवर्तन करना
(B) समझौता वार्ता
(C) अंतर-समूह संपर्क को बढ़ाना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) प्रत्यक्षण में परिवर्तन करना

प्रश्न 11.
प्राथमिकता समूह –
(A) में व्यक्ति अपनी पसंद से जुड़ता है
(B) पूर्व विद्यमान निर्माण होते हैं
(C) में मुखोन्मुख अंत-क्रिया नहीं होती है
(D) सदस्यों में किसी प्रकार का शारीरिक सामीप्य नहीं होता है
उत्तर:
(B) पूर्व विद्यमान निर्माण होते हैं

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प्रश्न 12.
जाति –
(A) प्राथमिकता समूह के उदाहरण हैं
(B) द्वितीयक समूह के उदाहरण हैं
(C) औपचारिक समूह के उदाहरण हैं
(D) बाह्य-समूह के उदाहरण हैं
उत्तर:
(A) प्राथमिकता समूह के उदाहरण हैं

प्रश्न 13.
दो व्यक्तियों के समूह को किस समूह के अंतर्गत रखा जा सकता है?
(A) संगठित समूह
(B) द्वितीयक समूह
(C) प्राथमिक समूह
(D) अस्थायी समूह
उत्तर:
(C) प्राथमिक समूह

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प्रश्न 14.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
(A) सामाजिक प्रभाव उन प्रक्रमों को इंगित करता है जिसके द्वारा हमारे व्यवहार एवं अभिवृत्तियाँ दूसरे लोगों की काल्पनिक या वास्तविक उपस्थित से प्रभावित होता है
(B) वे लोग जो अनुरूपता प्रदर्शित करते हैं उन्हें विसामान्य कहते हैं
(C) अनुरूपता का अर्थ समूह प्रतिमान के अनुसार व्यवहार करने से है
(D) अनुरूपता सबसे अप्रत्यक्ष रूप है
उत्तर:
(A) सामाजिक प्रभाव उन प्रक्रमों को इंगित करता है जिसके द्वारा हमारे व्यवहार एवं अभिवृत्तियाँ दूसरे लोगों की काल्पनिक या वास्तविक उपस्थित से प्रभावित होता है

प्रश्न 15.
समूह में अंतः क्रिया और विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप समूह की प्रारंभिक स्थिति की प्रबलता को कहा जाता है –
(A) समूह ध्रुवीकरण
(B) अनुपालन
(C)आज्ञापालन
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) समूह ध्रुवीकरण

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प्रश्न 16.
सामाजिक स्वैराचार को किसके द्वारा कम किया जा सकता है?
(A) प्रत्येक सदस्य के प्रयासों को पहचानने योग्य बनाना
(B) कठोर परिश्रम के लिए दबाव को बढ़ाना
(C) कार्य के प्रकट महत्त्व को बढ़ाना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) प्रत्येक सदस्य के प्रयासों को पहचानने योग्य बनाना

प्रश्न 17.
किसी विशिष्ट समूह के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति को कहते हैं?
(A) अभिक्षमता
(B) अभिरुचि
(C) पूर्वाग्रह
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(C) पूर्वाग्रह

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प्रश्न 18.
वह परीक्षण जिसके द्वारा एक समय में एक व्यक्ति का बुद्धि परीक्षण किया जाता है, कहलाता है –
(A) वैयक्तिक परीक्षण
(B) शाब्दिक परीक्षण
(C) समूह परीक्षण
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) वैयक्तिक परीक्षण

प्रश्न 19.
प्राथमिक मानसिक क्षमताओं के सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया?
(A) थर्स्टन
(B) लिकर्ट
(C) फेस्टिंगर
(D) बोगार्ड्स
उत्तर:
(A) थर्स्टन

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प्रश्न 20.
एक सामाजिक समूह की संरचना के लिए कम-से-कम कितने सदस्यों की आवश्यकता होती है?
(A) पाँच
(B) चार
(C) तीन
(D) दो
उत्तर:
(D) दो

प्रश्न 21.
निम्नलिखित में कौन औपचारिक समूह का उदाहरण है?
(A) परिवार
(B) जाति
(C) विश्वविद्यालय
(D) धर्म
उत्तर:
(B) जाति

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प्रश्न 22.
निम्नलिखित में कौन प्राथमिक समूह का उदाहरण नहीं है?
(A) परिवार
(B) जाति
(C) धर्म
(D) स्कूल
उत्तर:
(D) स्कूल

प्रश्न 23.
द्वितीयक समूह के सदस्यों में:
(A) संबंध कम निर्वैयक्तिक होते हैं
(B) संबंध अप्रत्यक्ष होते हैं
(C) संबंध प्रत्यक्ष होते हैं
(D) संबंध अधिक आकृति वाले होते हैं
उत्तर:
(B) संबंध अप्रत्यक्ष होते हैं

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प्रश्न 24.
सामाजिक स्वैराचार सामूहिक कार्य करने में व्यक्तिगत प्रयास की –
(A) अधिकता है
(B) कमी है
(C) प्रचुरता है
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) कमी है

प्रश्न 25.
सामाजिक स्वैराचार सामूहिक कार्य का एक उदाहरण है:
(A) क्रिकेट का खेल
(B) रस्साकशी का खेल
(C) हॉकी का खेल
(D) बैडमिंटन
उत्तर:
(B) रस्साकशी का खेल

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प्रश्न 26.
परिवार एक समूह का उदाहरण है –
(A) प्राथमिक
(B) द्वितीयक
(C) संदर्भ
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) प्राथमिक

प्रश्न 27.
एक संदर्भ समूह के लिए सर्वाधिक वांछित अवस्था क्या है?
(A) समूह के साथ सम्बद्धता
(B) समूह की सदस्यता
(C) समूह का प्रभाव
(D) समूह का आकार
उत्तर:
(C) समूह का प्रभाव

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प्रश्न 28.
द्वि-ध्रुवीय विकार के दो दोनों ध्रव हैं –
(A) तर्कसंगत तथा अतर्कसंगत चिन्तन
(B) स्नायु विकृति तथा मनोविक्षिप्ति
(C) मनोग्रस्ति तथा बाध्यता
(D) उन्माद तथा विषाद
उत्तर:
(D) उन्माद तथा विषाद

प्रश्न 29.
निम्नलिखित में कौन द्वितीयक समूह नहीं है?
(A) परिवार
(B) विद्यालय
(C) राजनैतिक दल
(D) क्लब
उत्तर:
(D) क्लब

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प्रश्न 30.
सामाजिक प्रभाव के समूह प्रभाव प्रक्रमों में निम्नलिखित में कौन-सा एक शामिल है?
(A) अनुपालना
(B) आंतरिकीकरण
(C) अननुपंथीकरण
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) अनुपालना

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 6 अभिवृत्ति एवं सामाजिक संज्ञान

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 6 अभिवृत्ति एवं सामाजिक संज्ञान Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 6 अभिवृत्ति एवं सामाजिक संज्ञान

Bihar Board Class 12 Psychology अभिवृत्ति एवं सामाजिक संज्ञान Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अभिवृत्ति को परिभाषित कीजिए। अभिवृत्ति के घटकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक प्रभाव के कारण लोक व्यक्ति के बारे में जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों के बारे में एक दृष्टिकोण विकसित करते हैं जो उनके अंदर एक व्यवहारात्मक प्रवृत्ति के रूप में विद्यमान करती है अभिवृत्ति कहलाती है।

अभिवृत्ति के तीन घटक होते हैं –
भावात्मक, संज्ञानात्मक एवं व्यवहारात्मक। सांवेगिक घटक को भावात्मक पक्ष के रूप में जाना जाता है। विचारपरक घटक को संज्ञानात्मक पक्ष कहा जाता है। क्रिया करने की प्रवृत्ति को व्यवहारपरक या क्रियात्मक घटक कहा जाता है। इन तीनों घटकों को अभिवृत्ति का ए. बी. सी. घटक कहा जाता है। अभिवृत्ति स्वयं में व्यवहार नहीं है परंतु वह एक निश्चित प्रकार से व्यवहार या क्रिया करने की प्रवृत्ति को प्रकट करती है। ये संज्ञान के अंग हैं जो सांवेगिक घटक से युक्त होते तथा इनका बाहर से प्रेक्षण नहीं किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
व्यक्ति को जानने की प्रक्रियाओं को समझाइए। छवि निर्माण और गुणारोपण किससे प्रभावित होते हैं?
उत्तर:
व्यक्ति को जानने या समझने की प्रक्रिया को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है – छवि निर्माण और गुणारोपण। वह व्यक्ति जो छवि बनाता है उसे प्रत्यक्षकर्ता (Perceiver) कहते हैं। वह व्यक्ति जिसके बार में छवि बनाई जाती है उससे लक्ष्य (Target) कहा जाता है। प्रत्यक्षकर्ता लक्ष्य के गुणों के संबंध में सूचनाएँ एकत्र करता है या दी गई सूचना के प्रति अनुक्रिया करता है, सूचनाओं को संगठित करना है तथा लक्ष्य के बारे में निष्कर्ष निकालता है।

गुणारोपण में, प्रत्यक्षकर्ता इससे आगे बढ़ता है और व्याख्या करता है कि क्यों लक्ष्य ने किसी विशिष्ट प्रकार से व्यवहार किया। लक्ष्य के व्यवहार के लिए कारण देना गुणोरोपण का मुख्य तत्त्व है। प्रायः प्रत्यक्षकर्ता लक्ष्य के बारे में केवल एक छवि का निर्माण करती है, परंतु यदि परिस्थिति की माँग होती है तो लक्ष्य के लिए गुणारोपण भी कर सकता है।

छवि निर्माण एवं गुणारोपण निम्नांकित से प्रभावित होते हैं –

  1. प्रत्यक्षकर्ता को उपलब्ध सूचनाओं की प्रकृति
  2. प्रत्यक्षकर्ता के सामाजिक स्कीमा (रूढ़धारणाओं सहित)
  3. प्रत्यक्षकर्ता की व्यक्तिगत विशेषताएँ
  4. परिस्थितिजन्सय कारक

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 6 अभिवृत्ति एवं सामाजिक संज्ञान

प्रश्न 3.
क्या व्यवहार सदैव व्यक्ति की अभिवृत्ति को प्रतिबिंबित करता है? एक प्रासंगिक उदाहरण देते हुए व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति प्राय:
यह अपेक्षा करता है कि व्यवहार अभिवृत्ति का तार्किक रूप से अनुसरण करे। हालाँकि एक व्यक्ति की अभिवृत्ति सदैव उसके व्यवहार के माध्यम से प्रदर्शित नहीं होती है। इसी प्रकार से एक व्यक्ति का वास्तविक व्यवहार व्यक्ति की विशिष्ट विषय के प्रति अभिवृत्ति का विरोधी हो सकता है।

अभिवृत्ति एवं व्यवहार में संगति तब हो सकती है, जब –

  1. अभिवृत्ति प्रबल हो और अभिवृत्ति तंत्र में एक केंद्रीय स्थान रखती हो।
  2. व्यक्ति अपनी अभिवृत्ति के प्रति सजग या जागरूक हो।
  3. किसी विशिष्ट तरीके से व्यवहार करने के लिए व्यक्ति पर बहुत कम या कोई बाह्य दबाव न हो। उदाहरणार्थ, जब किसी विशिष्ट मानक का पालन करने के लिए कोई समूह दबाव नहीं होता है।
  4. व्यक्ति का व्यवहार दूसरों के द्वारा देखा या मूल्यांकित न किया जा रहा हो।
  5. व्यक्ति यह सोचता हो कि व्यवहार का एक सकारात्मक परिणाम होगा एवं इसलिए, वह उस व्यवहार में संलिप्त होना चाहता है।

प्रश्न 4.
पूर्वाग्रह भेदभाव के बिना एवं भेदभाव पूर्वाग्रह के बिना रह सकता है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
पूर्वाग्रह के भेदभाव प्रदर्शित किया सकता है। फिर भी दोनों प्रायः साथ-साथ पाए जाते हैं जहाँ भी पूर्वाग्रह एवं भेदभाव रहता है वहाँ एक ही समाज के समूहों में अंतर्द्वद्व उत्पन्न होने को संभावना बहुत प्रबल होती है। हमारे स्वयं के समाज में लिंग, धर्म, समुदाय, जाति शारीरिक विकलांगत एवं बीमारियों; जैसे-एड्स पर आधारित, पूर्वाग्रहयुक्त या पूर्वाग्रहरहित, भेदभाव की अनेक खेदजनक या दु:खद घटनाओं को देखा है। इसके अतिरिक्त अनेक स्थितियों में भेदभावपूर्ण व्यवहार विधिक नियमों के द्वारा प्रतिबंधित या नियंत्रित किया जा सकता है परंतु पूर्वाग्रह के संज्ञानात्मक एवं भावात्मक घटकों को परिवर्तित करना बहुत कठिन है।

प्रश्न 5.
छवि निर्माण को प्रभावित करनेवाले महत्त्वपूर्ण कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
छवि निर्माण को प्रभावित करनेवाले महत्त्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं।

(I) छवि निर्माण की प्रक्रिया में निम्नलिखित तीन उप-प्रक्रियाएँ होती हैं –

(अ) चयन-हम लक्ष्य व्यक्ति के बारे में सूचनाओं की कुछ इकाइयों को ही ध्यान में रखते हैं।
(ब) संगठन-चयनित सूचनाएँ एक क्रमबद्ध या व्यवस्थित तरीके से जोड़ी जाती है।
(स) अनुमान-हम इस बारे में निष्कर्ष निकालते हैं कि लक्ष्य किस प्रकार का व्यक्ति है।

(II) छवि निर्माण को कुछ विशिष्ट गुण अन्य शीलगुणों की अपेक्षा अधिक प्रभावित करते हैं।

(III) जिस क्रम या अनुक्रम में सूचना प्रस्तुत की जाती है वह छवि निर्माण को प्रभावित करते हैं। बहुधा, पहले प्रस्तुत की जानेवाली सूचना के प्रभाव अंत में प्रस्तुत की जानेवाली सूचना से अधिक प्रबल होती है। इसे प्रथम प्रभाव (Primacy effect) कहते हैं (प्रथम छवि टिकाऊ छवि होती है) यद्यपि यदि प्रत्यक्षणकर्ता को केवल प्रथम सूचना पर नहीं बल्कि सभी सूचनाओं पर ध्यान देने के लिए कहा जाए तब भी जो सूचनाएँ अंत में आती हैं उनका अधिक प्रबल प्रभाव होता है। यह आसन्नता प्रभाव (Recency effect) के नाम से जाना जाता है।

(IV) हम लोगों में यह सोचने की एक प्रवृत्ति होती है कि एक लक्ष्य व्यक्ति जिसमें सकारात्मक गुणों का एक समुच्चय है उसमें इस प्रथम समुच्चय से जुड़े दूसरे विशिष्ट सकारात्मक गुण भी होने चाहिए। यह परिवेश प्रभाव (halo effect) के रूप में जाना जाता है। उदाहरण के लिए, यदि हमें यह बताया जाता है कि एक व्यक्ति ‘सुव्यस्थित’ एवं ‘समयनिष्ट’ है तो हम लोगों में यह सोचने की संभावना है कि उस व्यक्ति को परिश्रमी’ भी होना चाहिए।

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प्रश्न 6.
पूर्वाग्रह एवं रूढ़धारणा में विभेदन कीजिए।
उत्तर:
पूर्वाग्रह किसी विशिष्ट समूह के प्रति अभिवृति का उदाहरण है। ये प्रायः नकारात्मक होते हैं एवं अनेक स्थितियों में विशिष्ट समूह के संबंध में रूढ़धारणा (Stereotype) (संज्ञानात्मक घटक) पर आधारित होते हैं। एक रूढ़धारणा किसी विशिष्ट समूह की विशेषताओं से संबद्ध विचारों का एक पुंज या गुच्छा होती है। इस समूह के सभी सदस्य इन विशेषताओं से युक्त माने जाते हैं। प्रायः रूढ़धारणाएँ लक्ष्य समूह के बारे में अवांछित विशेषताओं से युक्त होती हैं और यह विशिष्ट समूह के सदस्यों के बारे में एक नकारात्मक अभिवृत्ति या पूर्वाग्रह को जन्म देती हैं। पूर्वाग्रह के संज्ञानात्मक घटक के साथ प्रायः नापसंद या घृणा का भी अर्थात् भावात्मक घटक जुड़ा होता है।

पूर्वाग्रह भेदभाव के रूप में, व्यवहारपरक घटक, रूपांतरित या अनुदित हो सकता है, जब लोग एक विशिष्ट लक्ष्य समूह के प्रति उस समूह की तुलना में जिसे वे पसंद करते हैं कम सकारात्मक तरीके से व्यवहार करने लगते हैं। इतिहास में प्रजाति एवं सामाजिक वर्ग या जाति पर आधारित भेदभाव के असंख्य उदाहरण हैं। जर्मनी में नाजियों के द्वारा यहूदियों के विरुद्ध किया गया प्रजाति-संहार पूर्वाग्रह की पराकाष्ठा का एक उदाहरण है जो यह प्रदर्शित करता है कि कैसे पूर्वाग्रह घृणा, भेदभाव निर्दोष लोगों को सामूहिक संहार की ओर ले जाता है।

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प्रश्न 7.
परामर्श का अर्थ लिखें।
उत्तर:
परामर्श एक प्राचीन शब्द है फलतः इसके अनेक कार्य बताए गए हैं। वेबस्टर शब्दकोष के अनुसार, “परामर्श का अर्थ पूछताछ, पारस्परिक तर्क-वितर्क या विचारों का पारस्परिक विनिमय है। “रॉबिन्सन ने परामर्श की अत्यन्त स्पष्ट परिभाषा देते हुए कहा कि परामर्श में वे सभी परिस्थितियाँ सम्मिलित कर ली जाती हैं, जिनसे परामर्श प्रार्थी अपने आपको पर्यावरण के अनुसार समायोजित करने में सहायता प्राप्त कर सकें। परामर्श दो व्यक्तियों से संबंध रखता है। परामर्शदाता तथा परामर्श प्रार्थी। परामर्श प्रार्थी की कुछ समस्याएँ तथा आवश्यकताएँ होती हैं जिनको वह अकेला बिना किसी की राय या सुझाव के पूरा नहीं कर सकता है। इन समस्याओं के समाधान तथा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उसे वैज्ञानिक राय की आवश्यकता होती है और यह वैज्ञानिक राय या सुझाव ही परामर्श कहलाता है।

प्रश्न 8.
पूर्वधारणा का अर्थ लिखें।
उत्तर:
पूर्वधारणा या पूर्वाग्रह अंग्रेजी भाषा के Predjudice का हिन्दी अनुवाद है जो लैटिन भाषा के Prejudicium से बना है। Pre का अर्थ है पहले और Judicium का अर्थ है निर्णय। इस दृष्टिकोण से पूर्वधारणा या पूर्वाग्रह का शाब्दिक अर्थ हुआ पूर्व निर्णय। इस प्रकार, पूर्वाग्रह जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के विपक्ष में पूरी तरह से जानकारी किए बिना ही किसी न किसी प्रकार का विचार अथवा धारणा बना बैठना है।

प्रश्न 9.
स्पष्ट कीजिए कि कैसे ‘कर्ता’ द्वारा किया गया गुणारोपण ‘प्रेक्षक’ के द्वारा किए गए गुणारोपण से भिन्न होगा?
उत्तर:
किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं के सकारात्मक एवं नकारात्मक अनुभवों के लिए किए जानेवाले गुणारोपण (कर्ता भूमिका) तथा दूसरे व्यक्ति के सकारात्मक एवं नकारात्मक अनुभवों के लिए किये जानेवाले गुणारोपण (प्रेक्षक-भूमिका) के मध्य भी अंतर पाया जाता है। इसे कर्ता – प्रेक्षक प्रभाव (Actor-observer effect) कहा जाता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई छात्र स्वयं एक परीक्षा में अच्छे अंक अर्जित करता है तो इसका गुणारोपण स्वयं की योग्यता या कठोर परिश्रम पर करेगा।

कर्ता-भूमिका एक सकारात्मक अनुभव के आतंरिक गुणारोपण यदि वह खराब अंक पाता है तो वह कहेगा कि यह इसलिए हुआ क्योंकि वह दुर्भाग्यशाली था, या परीक्षा बहुत कठिन थी। (कर्ता भूमिका, एक नकारात्मक अनुभव के लिए बाह्य गुणारोपण)। दूसरी ओर, यदि उसका एक सहपाठी इस परीक्षा में अच्छे अंक पाता है तो वह उसकी सफलता को उसके अच्छे भाग्य या सरल परीक्षा पर आरोपित करेगा। (प्रेक्षक भूमिका एक सकारात्मक अनुभव के लिए बाह्य गुणारोपण)। यदि वही सहपाठी खराब अंक पाता है तो उसके यह कहने की संभावना है कि अपनी कम योग्यता या प्रयास की कमी के कारण असफल रहा। (प्रेक्षक भूमिका, एक नकारात्मक अनुभव के लिए आंतरिक गुणारोपण) कर्ता एवं प्रेक्षक भूमिकाओं में अंतर का मूल कारण यह है कि लोग दूसरों की तुलना में अपनी छवि चाहते हैं।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 6 अभिवृत्ति एवं सामाजिक संज्ञान

प्रश्न 10.
सामाजिक संज्ञान किसे कहते हैं? सामाजिक वस्तुओं से संबद्ध सूचनाओं का प्रक्रमण भौतिक वस्तुओं से संबद्ध सूचनाओं के प्रक्रमण से किस प्रकार भिन्न होता है?
उत्तर:
सामाजिक संज्ञान (Social congnition) उन सभी मानसिक प्रक्रियाओं को इंगित करता है जो सामाजिक वस्तुओं से संबद्ध सूचना को प्राप्त करने और उनका प्रक्रमण करने से जुड़े हैं। इनमें वे सभी प्रक्रियाएँ आती हैं जो सामाजिक व्यवहार को समझने, उनकी व्याख्या एवं विवेचना करने में सहायक होती हैं। सामाजिक वस्तुओं (विशेष रूप से व्यक्तियों, समूहों, लोगों से संबंधों, सामाजिक मदों इत्यादि) से संबद्ध सूचनाओं के प्रक्रमण भौतिक वस्तुओं से संबद्ध सूचनाओं के प्रक्रमण से भिन्न होता है।

जैसे ही संज्ञानात्मक प्रक्रमण प्रारंभ होता है। सामाजिक वस्तु के रूप में लोग स्वयं को बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक अध्यापक जो एक विद्यार्थी को विद्यालय में देखता है उसके बारे में ऐसे निष्कर्ष निकाल सकता है जो उसकी माता द्वारा निकाले गए निष्कर्ष से सर्वथा भिन्न हो सकता है, जो उसे घर के परिवेश में देखती है। विद्यार्थी अपने व्यवहार में अंतर प्रदर्शित कर सकता है, यह इस बात पर निर्भर है कि उसको कौन देख रहा है – एक अध्यापक या एक माता। सामाजिक संज्ञान मानसिक इकाइयों, जिन्हें स्कीमा कहा जाता है, के द्वारा निर्देशित होते हैं।

प्रश्न 11.
समाजोपकारी व्यवहार के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
दूसरों का भला करना एवं उनके लिए सहायक होना विश्व में एक सद्गुण की तरह वर्णित किया गया है। सभी धर्मों में यह सिखाया जाता है कि हम लोगों को उनकी मदद करनी चाहिए तो जरूरतमंद हैं। इस व्यवहार को समाजोपकारी व्यवहार कहा जाता है। अपनी चीजों को दूसरों के साथ बाँटना, दूसरों के साथ सहयोग करना, प्राकृतिक विपत्तियों के समय सहायता करना, सहानुभूति का प्रदर्शन करना, दूसरों का समर्थन करना या उनका पक्ष लेना एवं सहायतार्थ दान देना समाजोपकारी व्यवहार के कुछ सामान्य उदाहरण हैं।
समाजोपकारी व्यवहार की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं –

  1. इसमें दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों को लाभ पहुँचाने या उनका भला करने का लक्ष्य होना चाहिए।
  2. इसके बदले में किसी चीज की अपेक्षा किए बिना किया जाना चाहिए।
  3. यह व्यक्ति द्वारा स्वेच्छा से किया जाना चाहिए, न किसी प्रकार के दबाव के कारण।
  4. इसमें सहायता करनेवाले व्यक्ति के लिए कुछ कठिनाइयाँ निहित होती हैं या उसे कुछ ‘कीमत’ चुकानी पड़ती है।

उदाहरण के लिए, यदि एक धनी व्यक्ति अवैध तरीके से प्राप्त किया गया बहुत सारा धन इस आशय के दान करता है कि उसका चित्र एवं नाम समाचारपत्रों में छप जाएगा तो इसे ‘समाजोपकारी व्यवहार’ नहीं कहा जा सकता है। यद्यपि यह दान बहुत-से लोगों का भला कर सकता है।

समाजोपकारी व्यवहार का बहुत अधिक मूल्य और महत्त्व होने के बावजूद बहुधा लोग ऐसे व्यवहार का प्रदर्शन नहीं करते हैं। 11 जुलाई, 2006 के मुंबई विस्फोट के तत्काल बाद हमारा समुदाय जिस किसी भी प्रकार से हो सका, विस्फोट पीड़ितों की सहायता के लिए आगे आया। इसमें विपरीत, एक पूर्व घटना जिसमें मुंबई में एक चलती हुई उपनगरीय रेलगाड़ी में एक लड़की का पर्स छीन लिया गया, कोई भी व्यक्ति उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया। दूसरे यात्रियों ने उनकी सहायता के लिए कुछ नहीं किया और लड़की को रेलगाड़ी से फेंक दिया गया। जहाँ तक कि जब लड़की रेल की पटरियों पर घायल पड़ी थी, उस क्षेत्र के आसपास के भवनों में रहनेवाले लोग भी उसकी मदद को नहीं आए।

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प्रश्न 12.
आपका मित्र बहुत अधिक अस्वास्थ्यकर भोजन करता है, आप भोजन के प्रति उसकी अभिवृत्ति में किस प्रकार से परिवर्तन लाएँगे? अथवा, लियान फेस्टिंगर के संज्ञानात्मक विसंवादिता के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मैं अपने मित्र के साथ बहुत अधिक अस्वास्थ्यकर भोजन करने की अभिवृत्ति में परिवर्तन लाने की कोशिश करूँगा। इसके लिए सियान फेस्टिंगर द्वारा प्रतिपादित संज्ञानात्मक विसंवादिता या विसंगति का संप्रत्यय का उपयोग किया जा सकता है। यह संज्ञानात्मक घट पर बल देता है। जहाँ पर आधारभूत तत्त्व यह है कि एक अभिवृत्ति के संज्ञानात्मक घटक निश्चित रूप से संवादी होने चाहिए उन्हें तार्किक रूप से एक-दूसरे के समान होना चाहिए। यदि एक व्यक्ति यह अनुभव करता है कि एक अभिवृत्ति में दो संज्ञान विसंवादी है तो इनमें एक संवादी की दिशा में परिवर्तित कर दिया जायगा। उदाहरण के लिए, निम्नलिखित विचारों (संज्ञान) को लिया जा सकता है –

संज्ञान – 1:  बहुत अधिक अस्वास्थ्यकर भोजन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।
संज्ञान – 2:  मैं बहुत अस्वास्थ्यकर भोजन करता हूँ।

इन दोनों विचारों या संज्ञानों को मन में रखना किसी भी व्यक्ति को यह अनुभव करने के लिए प्रेरित करेगा कि अत्यधिक अस्वास्थ्यकर भोजन के प्रति अभिवृत्ति में कुछ न कुछ एक-दूसरे से संवादी है। अतः, इनमें से किसी एक विचार को बदल देना होगा जिससे कि संवादिता प्राप्त की जा सके। उस उदाहरण में विसंगित दूर करनेया कम करने के लिए अत्यधिक अस्वास्थ्यकर भोजन करना छोड़ देगा। यह विसंगित कम करने का स्वस्थ, तार्किक एवं अर्थपूर्ण तरीका होगा।

Bihar Board Class 12 Psychology अभिवृत्ति एवं सामाजिक संज्ञान Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक अवरोध क्या है?
उत्तर:
सामाजिक अवरोध का अर्थ है दूसरों की उपस्थिति में अपरिचित अथवा नए कार्यों को निष्पादन में कमी।

प्रश्न 2.
समाजोपकारी व्यवहार किसे कहते हैं?
उत्तर:
वैसे व्यवहार जो संकटग्रस्त या जरूरतमंद लोगों के प्रति ध्यान देते हैं या सहायता करते हैं, समाजोपकारी व्यवहार कहलाते हैं।

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प्रश्न 3.
अभिवृत्ति को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
अभिवृत्ति मन की एक अवस्था है, किसी विषय के संबंध में विचारों का एक पुंज है जिसमें एक मूल्यांकनपरक विशेषता (सकारात्मक, नकारात्मक अथवा तटस्थता का गुण) पाई जाती है।

प्रश्न 4.
अभिवृत्ति के तीन घटक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
अभिवृत्ति के तीन घटक हैं –

  1. विचारपरक घटक
  2. सांवेगिक घटक और
  3. क्रियात्मक घटक

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प्रश्न 5.
विचारपरक घटक को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
विचारपरक घटक को संज्ञानात्मक पक्ष कहा जाता है।

प्रश्न 6.
सांवेगिक घटक को किस रूप में जाना जाता है?
उत्तर:
सांवेगिक घटक को भावात्मक पक्ष के रूप में जाना जाता है।

प्रश्न 7.
अभिवृत्ति के क्रियात्मक घटक को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
अभिवृत्ति के क्रियात्मक घटक को व्यवहारपरक के रूप में जाना जाता है।

प्रश्न 8.
अभिवृत्ति के तीनों घटकों को संक्षेप में क्या कहा जाता है?
उत्तर:
संक्षेप में अभिवृत्ति के तीनों घटकों का उनके अंग्रेजी नाम के प्रथम अक्षर के आधार पर अभिवृत्ति का ए.बी.सी. घटक कहा जाता है।

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प्रश्न 9.
अभिवृत्ति के दो संप्रत्यय के नाम लिखिए।
उत्तर:
अभिवृत्ति के दो संप्रत्यय हैं-विश्वास और मूल्य।

प्रश्न 10.
अभिवृत्ति की कितनी प्रमुख विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
अभिवृत्ति की चार प्रमुख विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 11.
अभिवृत्ति की विशेषताओं को लिखिए।
उत्तर:
अभिवृत्ति की प्रमुख विशेषताएँ हैं –

  1. कर्षण-शक्ति (सकारात्मकता या नकारात्मकता)
  2. चरम सीमा
  3. सरलता या जटिलता बहुविधता तथा
  4. केन्द्रिकता

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प्रश्न 12.
अभिवृत्ति क्या है?
उत्तर:
सामाजिक प्रभाव के कारण लोक व्यक्ति के बारे में तथा जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों के बारे में एक दृष्टिकोण विकसित करते हैं तो उनके अंदर एक व्यवहारात्मक प्रवृत्ति के रूप में विद्यमान रहती है, अभिवृत्ति कहलाती है।

प्रश्न 13.
छवि निर्माण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब हम लोगों से मिलते हैं जब हम उनके व्यक्तिगत गुणों या विशेषताओं के बारे। में अनुमान लगाते हैं इसे ही छवि निर्माण कहा जाता है।

प्रश्न 14.
गुणारोपण किस प्रक्रिया को कहते हैं?
उत्तर:
विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों में प्रदर्शित व्यवहार के कारणों का आरोपण की प्रक्रिया को गुणारोपण कहते हैं।

प्रश्न 15.
सामाजिक संज्ञान को परिभाषित करें।
उत्तर:
उन सभी मानसिक प्रक्रियाओं का समुच्चय या पुंज जो हमारे आसपास के सामाजिक संसार को समझने में निहित है उसे सामाजिक संज्ञान कहा जाता है।

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प्रश्न 16.
किन तीन प्रक्रियाओं को संयुक्त रूप से सामाजिक संज्ञान कहा जाता है?
उत्तर:
अभिवृत्ति, छवि निर्माण और गुणारोपण की प्रक्रिया को संयुक्त रूप से सामाजिक संज्ञान कहा जाता है।

प्रश्न 17.
प्रेक्षणीय व्यवहार के रूप में सामाजिक प्रभाव को प्रदर्शित करनेवाले कुछ उदाहरण दें।
उत्तर:
प्रेक्षणीय व्यवहार के रूप में सामाजिक प्रभाव को प्रदर्शित करने वाले कुछ उदाहरण हैं-सामाजिक सुगमीकरण/अवरोध तथा समाजोन्मुख या समाजोपकारी व्यवहार।

प्रश्न 18.
सामाजिक सुगमीकरण का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सामाजिक सुगमीकरण का तात्पर्य है दूसरों की उपस्थिति में किसी कार्य के निष्पादन में सुधार।

प्रश्न 19.
द्विस्तरीय संप्रत्यय को किसने प्रस्तावित किया?
उत्तर:
द्विस्तरीय संप्रत्यय को एक भारतीय वैज्ञानिक एम.एम. मोहसिन ने प्रस्तावित किया।

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प्रश्न 20.
तादात्म्य स्थापित करने का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर:
तादात्म्य स्थापित करने का आशय है कि लक्ष्य स्रोत को पसंद करता है एवं उसके प्रति एक सम्मान रखता है। वह स्वयं को लक्ष्य के स्थान पर रखकर उसके जैसा अनुभव करने का प्रयास करता है।

प्रश्न 21.
द्विस्तरीय संप्रत्यय के प्रथम स्तर या चरण में क्या होता है?
उत्तर:
प्रथम स्तर या चरण में परिवर्तन का लक्ष्य स्रोत से तादात्म्य स्थापित करता है।

प्रश्न 22.
अभिवृत्ति परिवर्तन को प्रभावित करनेवाले कारक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
अभिवृत्ति परिवर्तन को प्रभावित करनेवाले कारक निम्न हैं –
अभिवृत्ति की विशेषताएँ, स्रोत की विशेषताएँ, संदेश की विशेषताएँ एवं लक्ष्य की विशेषताएँ।

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प्रश्न 23.
स्रोत की कौन-सी दो विशेषताएँ अभिवृत्ति परिवर्तन को प्रभावित करती हैं?
उत्तर:
स्रोत की विश्वसनीयता एवं आकर्षकता ये दो विशेषताएँ अभिवृत्ति परिवर्तन को प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 24.
लक्ष्य के कौन-कौन-से गुण अभिवृत्ति परिवर्तन की संभावना एवं विस्तार को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
लक्ष्य के गुण जैसे-अनुनयता, प्रबल पूर्वाग्रह, आत्म सम्मान एवं बुद्धि अभिवृत्ति परिवर्तन की संभावना एवं विस्तार को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 25.
कर्षण-शक्ति हमें क्या बताती है?
उत्तर:
अभिवृत्ति की कर्षण-शक्ति हमें यह बताती है कि अभिवृत्ति विषय के प्रति कोई अभिवृत्ति सकारात्मक है अथवा नकारात्मक।

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प्रश्न 26.
अभिवृत्ति की चरम सीमा क्या इंगित करती है?
उत्तर:
अभिवृत्ति की चरम सीमा यह इंगित करती है कि अभिवृत्ति किस सीमा तक सकारात्मक या नकारात्मक है।

प्रश्न 27.
अभिवृत्ति की विशेषता सरलता या जटिलता का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
इस विशेषता से तात्पर्य है कि एक व्यापक अभिवृत्ति की कितनी अभिवृत्तियाँ होती हैं। जब अभिवृत्ति तंत्र में एक या बहुत थोड़ी-सी अभिवृत्तियाँ हों तो उसे सरल और जब वह अनेक अभिवृत्तियों से बना हो तो उसे ‘जटिल’ कहा जाता है।

प्रश्न 28.
विश्वास की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
विश्वास, अभिवृत्ति के संज्ञानात्मक घटक को इंगित करते हैं तथा ऐसे आधार का निर्माण करते हैं जिन पर अभिवृत्ति टिकी है; जैसे-ईश्वर में विश्वास।

प्रश्न 29.
‘मूल्य’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मूल्य, ऐसी अभिवृत्ति या विश्वास है जिसमें ‘चाहिए’ का पक्ष निहित रहता है; जैसे-आचारपरक या नैतिक मूल्य।

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प्रश्न 30.
एक ऐसी अभिवृत्ति का उदाहरण दें जिसमें अनेक अभिवृत्तियाँ पाई जाती हों।
उत्तर:
स्वास्थ्य एवं कुशल-क्षेम के प्रति अभिवृत्ति जिसमें अनेक अभिवृत्तियाँ पाई जाती हैं; जैसे-शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का सम्प्रत्यय, प्रसन्नता एवं कुशल-क्षेम के प्रति उसका दृष्टिकोण एवं व्यक्ति की स्वास्थ्य एवं प्रसन्नता प्राप्त करने के संबंध में उसका विश्वास एवं मान्यताएँ।

प्रश्न 31.
केन्द्रिकता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
केन्द्रिकता अभिवृत्ति तंत्र में किसी विशिष्ट अभिवृत्ति की भूमिका को बताता है।

प्रश्न 32.
कौन-कौन से कारक अभिवृत्तियों के अधिगम के लिए एक संदर्भ प्रदान करते हैं?
उत्तर:
अभिवृत्तियों के अधिगम के लिए संदर्भ प्रदान करनेवाले कारक हैं-परिवार एवं विद्यालय का परिवेश, संदर्भ समूह, व्यक्तिगत अनुभव और संचार माध्यम संबद्ध प्रभाव।

प्रश्न 33.
संतुलन के संप्रत्यय को किसने प्रस्तावित किया?
उत्तर:
फ्रिट्ज हाइडर ने संतुलन के संप्रत्यय को प्रस्तावित किया।

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प्रश्न 34.
संतुलन के संप्रत्यय को किस रूप में कभी-कभी व्यक्त किया जाता है?
उत्तर:
संतुलन के संप्रत्यय को कभी-कभी पी-ओ-एक्स त्रिकोण के रूप में व्यक्त किया जाता है।

प्रश्न 35.
लियॉन फेस्टिंगर ने किसका संप्रत्यय प्रतिपादित किया?
उत्तर:
लियॉन फेस्टिगर ने संज्ञानात्मक विसंवादिता या विसंगति का संप्रत्यय प्रतिपादित किया।

प्रश्न 36.
संज्ञानात्मक विसंवादित या विसंगति का संप्रत्यय किस घटक पर बल देता है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक विसंवादित या संज्ञानात्मक घटक पर बल देता है।

प्रश्न 37.
संज्ञानात्मक संगति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक संगति का अर्थ है कि अभिवृत्ति या अभिवृत्ति तंत्र के दो घटकों, पक्षों का तत्वों को एक दिशा में होना चाहिए एवं प्रत्येक तत्व को तार्किक रूप से एक समान होना चाहिए।

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प्रश्न 38.
संज्ञानात्मक संगति के दो उदाहरण बताइए।
उत्तर:
संतुलन एवं संज्ञानात्मक विसंवादिता दोनों संज्ञानात्मक संगति के उदाहरण हैं।

प्रश्न 39.
एक स्कीमा या अन्विति योजना क्या है?
उत्तर:
एक स्कीमार या अन्विति योजना एक ऐसी मानसिक संरचना है जो किसी वस्तु के बारे में सूचना के प्रक्रमण के लिए एक रूपरेखा, नियमों का समूह या दिशा-निर्देश प्रदान करती है। ये हमारी स्मृति में संग्रहित मौलिक इकाइयाँ हैं तथा ये सूचना प्रक्रमण के लिए आशुलिपि की तरह कार्य करती हैं।

प्रश्न 40.
सामाजिक स्कीमा किसे कहते हैं?
उत्तर:
सामाजिक संज्ञान के संदर्भ में मौलिक इकाइयाँ सामाजिक स्कीमा होती हैं।

प्रश्न 41.
किस प्रकार के स्कीमा को आद्यरूप कहा जाता है?
उत्तर:
वे स्कीमा जो संवर्ग के रूप में कार्य करती हैं, उन्हें आद्यरूप कहा जाता है।

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प्रश्न 42.
व्यक्ति को जानने या समझने की प्रक्रिया को कितने वर्गों में विभाजित किया जा सकता है?
उत्तर:
व्यक्ति को जानने या समझने की प्रक्रिया को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. छवि निर्माण तथा
  2. गणारोपण

प्रश्न 43.
प्रत्यक्षणकर्ता कौन होता है?
उत्तर:
वह व्यक्ति जो छवि बनाता है, उसे प्रत्यक्षणकर्ता कहते हैं।

प्रश्न 44.
लक्ष्य किसे कहा जाता है?
उत्तर:
वह व्यक्ति जिसके बारे में छवि बनाई जाती है, उसे लक्ष्य कहा जाता है।

प्रश्न 45.
प्रत्यक्षणकर्ता के कार्य क्या हैं?
उत्तर:
प्रत्यक्षणकर्ता लक्ष्य के गुणों के संबंध में सूचनाएँ एकत्र करता है या दी गई सूचना के प्रति अनुक्रिया करता है, सूचनाओं को संगठित करता है तथा लक्ष्य के बारे में निष्कर्ष निकालता है।

प्रश्न 46.
गुणारोपण में प्रत्यक्षणकर्ता क्या करता है?
उत्तर:
गुणारोपण में प्रत्यक्षणकर्ता व्याख्या करता है कि क्यों लक्ष्य ने किसी विशिष्ट प्रकार से व्यवहार किया।

प्रश्न 47.
गुणारोपण का मुख्य तत्त्व क्या है?
उत्तर:
लक्ष्य के व्यवहार के लिए कारण देना गुणारोपण का मुख्य तत्त्व है।

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प्रश्न 48.
छवि निर्माण की प्रक्रिया में तीन कौन-सी उप-प्रक्रियाएँ होती हैं?
उत्तर:
छवि निर्माण की प्रक्रिया में तीन उप-प्रक्रियाएँ होती हैं-चयन, संगठन और अनुमान।

प्रश्न 49.
प्रथम प्रभाव से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पहले प्रस्तुत की जानेवाली सूचना का प्रभाव में प्रस्तुत की जानेवाली सूचना से अधिक प्रबल होती है। इसे प्रथम प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 50.
मूल गुणारोपण त्रुटि किसे कहते हैं?
उत्तर:
गुणारोपण करने में लोगों में आंतरिक या प्रवृत्तिपरक कारकों को बाह्य या परिस्थितिजन्य कारकों की अपेक्षा अधिक महत्त्व देने की एक समग्र प्रवृत्ति पाई जाती है। इसे ही मूल गुणारोपण त्रुटि कहा जाता है।

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प्रश्न 51.
कर्ता भूमिका और प्रेक्षक भूमिका के मध्य मुख्य अंतर क्या हैं?
उत्तर:
किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं के सकारात्मक एवं नकारात्मक अनुभवों के लिए किये जानेवाले गुणारोपण कर्ता भूमिका कहलाता है जबकि दूसरे व्यक्ति के सकारात्मक एवं नकारात्मक अनुभवों के लिए किये जानेवाले गुणारोपण प्रक्षेक भूमिका कहलाता है।

प्रश्न 52.
सामाजिक स्वैराचर या सामाजिक श्रमाव-नयन क्या है?
उत्तर:
यदि हम समूह में एक साथ कार्य कर रहे हैं तो जितना ही बड़ा समूह होगा उतना ही कम प्रयास प्रत्येक सदस्य करेगा। दायित्व के विसरण पर आधारित इस गोचर को सामाजिक स्वरौचार या सामाजिक श्रमावनयन हैं।

प्रश्न 53.
अभिवृत्ति निर्माण को प्रभावित करनेवाले कौन-कौन से कारक हैं?
उत्तर:
अभिवृत्ति निर्माण को प्रभावित करनेवाले कारक निम्नलिखित हैं:

  1. परिवार एवं विद्यालय का परिवेश
  2. संदर्भ समूह
  3. व्यक्तिगत अनुभव
  4. संचार माध्यम संबंद्ध प्रभाव

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प्रश्न 54.
आसन्नता प्रभाव क्या है?
उत्तर:
सभी सूचनाओं पर ध्यान देने पर सूचनाएँ अंत में आती हैं उनका अधिक प्रबल प्रभाव होता है। यह आसन्नता प्रभाव के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 55.
पूर्वाग्रह को परिभाषित करें।
उत्तर:
पूर्वाग्रह किसी विशिष्ट समूह के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति है एवं अनेक स्थितियों में विशिष्ट समूह के संबंध में रूढ़धारणा पर आधारित होते हैं।

प्रश्न 56.
रूढ़धारणा किसे कहते हैं?
उत्तर:
रूढ़धारणा जो कि एक प्रकार का सामाजिक स्कीमा है में एक विशिष्ट समूह के प्रति अति सामन्यीकृत विश्वास होता है जो प्रायः पूर्वाग्रहों को उत्पन्न करता है एवं उन्हें दृढ़ता प्रदान करता है।

प्रश्न 57.
पूर्वाग्रह किन स्रोतों के द्वारा अधिगमित किए जा सकते हैं?
उत्तर:
पूर्वाग्रह साहचर्य, पुरस्कार एवं दंड, दूसरों के प्रेक्षण, समूह या संस्कृति के मानक तथा सूचनाओं की उपलब्धता, परिवार, संदर्भ समूह, व्यक्तिगत अनुभव तथा संचार माध्यम के द्वारा अधिगमित किये जा सकते हैं।

प्रश्न 58.
संज्ञान क्या है?
उत्तर:
संज्ञान उन सभी मानसिक प्रक्रियाओं को इंगित करता है जो सूचना को प्राप्त करने और उसके प्रक्रमण से जुड़ हैं।

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प्रश्न 59.
सामाजिक संज्ञान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सामाजिक संज्ञान उन सभी मानसिक प्रक्रियाओं को इंगित करता है जो सामाजिक वस्तुओं से संबद्ध सूचना को प्राप्त करने और उनका प्रक्रमण करने से जुड़े हैं। इनमें वे सभी प्रक्रियाएँ आती हैं जो सामाजिक व्यवहार को समझने, उनकी व्याख्या करने एवं विवेचना करने. में सहायक होती हैं।

प्रश्न 60.
सामाजिक संज्ञान किससे निर्देशित होते हैं?
उत्तर:
सामाजिक संज्ञान मानसिक इकाइयों जिन्हें स्कीमा अन्विति योजना कहते हैं, के द्वारा निर्देशित होते हैं।

प्रश्न 61.
‘परहितवाद’ क्या है?
उत्तर:
परहितवाद का अर्थ है बिना किसी आत्महित के भाव के दूसरों के लिए कुछ करना उनके कल्याण के बारे में सोचना।

प्रश्न 62.
दूसरों की उपस्थिति का कार्य निष्पादन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
कार्य निष्पादन को दूसरों की उपस्थिति से सहज किया जा सकता है एवं सुधारा जा संकता है या अवरुद्ध अथवा खराब किया जा सकता है।

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प्रश्न 63.
परिवेश प्रभाव क्या होता है?
उत्तर:
एक लक्ष्य व्यक्ति जिसमें सकारात्मक गुणों का एक समुच्चय है उसमें इस प्रथम समुच्चय से जुड़े दूसरे विशिष्ट सकारात्मक गुण भी होने चाहिए। यह परिवेश प्रभाव के रूप जाना जाता है।

प्रश्न 64.
दूसरों की उपस्थिति में किन कारणों से विशिष्ट कार्य का निष्पादन प्रभावित होता है?
उत्तर:
दूसरों की उपस्थिति में बेहतर कार्यों का निष्पादन निम्न कारणों से प्रभावित होता है-भाव प्रबोधन, मूल्यांकन, बोध, कार्य की प्रकृति एवं सह क्रिया परिस्थिति।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विश्वास और मूल्य में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विश्वास अभिवृत्ति के संज्ञानात्मक घटक को इंगित करते हैं तथा ऐसे आधार का निर्माण करते हैं जिन अभिवृत्ति टिकी है, जैसे ईश्वर में विश्वास या राजनीतिक विचारधारा के रूप में प्रजातंत्र में विश्वास। मूल्य, ऐसी अभिवृत्ति या विश्वास है जिसमें ‘चाहिए’ का पक्ष निहित रहता है; जैसे-आचारपरक या नैतिक मूल्य। एक व्यक्ति को मेहनत करनी चाहिए, या एक व्यक्ति को हमेशा ईमानदार रहना चाहिए, क्योंकि ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है, ऐसे विचार मूल्य के उदाहरण हैं। मूल्य का निर्माण तब होता है जब कोई विशिष्ट विश्वास या अभिवृत्ति व्यक्ति के जीवन के प्रति उसके दृष्टिकोण का एक अभिन्न अंग बन जाती है। इसे परिणामस्वरूप मूल्य में परिवर्तन करना कठिन है।

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प्रश्न 2.
स्रोत की विशेषताएँ किस प्रकार अभिवृत्ति परिवर्तन को प्रभावित करती हैं? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
स्रोत की विश्वसनीयता (Credibility) एवं आकर्षकता (Attractiveness) ये दो विशेषताएँ हैं जो अभिवृत्ति परिवर्तन को प्रभावित करती हैं। अभिवृत्तियों में परिवर्तन तब अधिक संभव है जब सूचना एक उच्च विश्वसनीय स्रोत से आती है न कि एक निम्न विश्वसनीय स्रोत से। उदाहरणार्थ, जो युवक एक लैपटॉप खरीदने की योजना बना रहे हैं वे एक कंप्यूटर इंजीनियर, या उन्हें लैपटाप के एक विशिष्ट ब्रांड की विशिष्ट विशेषताओं को बताता है, जो अधिक प्रभावित होंगे तुलना में एक स्कूली बच्चे से जो संभव है कि उन्हें बड़ी सूचनाएँ प्रदान करें। परंतु यदि खरीदार स्वयं स्कूल के बच्चे हैं तो वे लैपटाप का विज्ञापन करनेवाले स्कूल के दूसरे बालक से अधिक प्रभावित होंगे तुलना में उसी प्रकार की सूचना देनेवाले एक व्यावसायिक व्यक्ति से। कुछ दूसरे उत्पादों, जैसे-कार की बिक्री को बढ़ाया जा सकता है यदि उनका प्रचार विशेषज्ञों से न कराकर किसी लोकप्रिय हस्ती से कराया जाए।

प्रश्न 3.
लक्ष्य से विभिन्न गुण अभिवृत्ति परिवर्तन को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
लक्ष्य के गुण, जैसे अनुनयता, प्रबल पूर्वाग्रह, आत्म-सम्मान और वृद्धि अभिवृत्ति परिवर्तन का संभावना एवं विस्तार को प्रभावित करते हैं। वे लोग जिनका व्यक्ति अधिक खुला एवं लचीला होता है, आसानी से परिवर्तित हो जाते हैं। कम प्रबल पूर्वाग्रह वाले लोगों की तुलना में प्रबल पूर्वाग्रह रखनेवाले अभिवृत्ति परिवर्तन के लिए कम प्रवण होते हैं। उच्च आत्म-सम्मान वालों की तुलना में वैसे लोग जिनमें आत्म-विश्वास नहीं होता है अपनी अभिवृत्तियों में आसानी से परिवर्तन कर लेते हैं। कम वृद्धि वाले लोगों की तुलना में अधिक बुद्धिमान व्यक्तियों में अभिवृत्ति परिवर्तन की संभावना कम होती है। हालाँकि, कभी-कभी अधिक बुद्धिमान व्यक्ति कम बुद्धि वाले व्यक्तियों की तुलना में अपनी अभिवृत्ति को अधिक सूचना एवं चिंतन पर आधारित करते हैं।

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प्रश्न 4.
पूर्वाग्रह नियंत्रण की युक्तियों को किस प्रकार प्रभावी बनाया जा सकता है? उन लक्ष्यों को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर:
पूर्वाग्रहों नियंत्रण की युक्तियाँ तब अधिक प्रभावी होंगी जब उनका प्रयास होगा –

(अ) पूर्वाग्रहों के अधिगम के अवसरों को कम करना।
(ब) ऐसी अभिवृत्तियों को परिवर्तित करना।
(स) अंत:समूह पर आधारित संकुचित सामाजिक अनन्यता के महत्त्व को कम करना।
(द) पूर्वाग्रह के शिकार लोगों में स्वतः साधक भविष्योक्ति की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना। इन लक्ष्यों को निम्न प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है।

1. शिक्षा एवं सूचना के प्रसार द्वारा विशिष्ट समूह से संबद्ध रूढ़ धारणाओं को संशोधित करना एवं प्रबल अंतः समूह अभिनति की समस्या से निपटना।

2. अंत: समूह संपर्क को बढ़ाना प्रत्यक्ष संपेषण, समूहों के मध्य अविश्वास को दूर करने तथा बाह्य समूह के सकारात्मक गुणों को खोज करने का अवसर प्रदान करना है। हालाँकि ये युक्तियाँ तभी सफल होती हैं, जब दो समूह प्रतियोगी संदर्भ के स्थान पर एक सहयोगी संदर्भ में मिलते हैं। समूहों के मध्य घनिष्ठ अंत:क्रिया एक दूसरे को समझने या जानने में सहायता करती है। दोनों समूह शक्ति या प्रतिष्ठा में भिन्न नहीं होते हैं।

3. समूह अनन्यता की जगह व्यक्तिगत अनन्यता को विशिष्टता प्रदान करना अर्थात् दूसरे व्यक्ति के मूल्यांकन के आधार के रूप में समूह (अंतः एवं बाह्य दोनों ही समूह) के महत्त्व को बलहीन करना।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अभिवृत्ति की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अभिवृत्ति की चार प्रमुख विशेषताएँ हैं-कर्षण-शक्ति, चरम-सीमा, सरलता या जटिलता तथा केंद्रिकता।

1. कर्षण-शक्ति (सकारात्मक या नकारात्मक):
अभिवृत्ति की कर्षण-शक्ति हमें यह बताती है कि अभिवृत्ति-विषय के प्रति कोई अभिवृत्ति सकारात्मक है अथवा नकारात्मक। उदाहरण के लिए यदि किसी अभिवृत्ति (जैसे-नाभिकीय शोध के प्रति अभिवृत्ति) को 5 बिंदु मापनी व्यक्त करना है जिसका प्रसार

  • (बहुत खराब)
  • (खराब)
  • (तटस्थ-न खराब न अच्छा)
  • (अच्छा) से
  • (बहुत अच्छा) तक है। यदि कोई व्यक्ति नाभिकीय शोध के प्रति अपने दृष्टिकोण या मत का आकलन इस मापनी या 4 या 5 करता है तो स्पष्ट रूप से यह एक सकारात्मक अभिवृत्ति है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति नाभिकीय शोध के विचार को पसंद करता है तथा सोचता है कि यह कोई अच्छी चीज है।
  • दूसरी ओर यदि आकलित मूल्य 1 या 2 है तो अभिवृत्ति नकारात्मक है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति नाभिकीय शोध के विचार को नापंसद करता है एवं सोचता है कि यह कोई खराब चीज है।
  • हम तटस्थ अभिवृत्तियों को भी स्थान देते हैं। यदि इस उदाहरण में नाभिकीय शोध के प्रति तटस्थ अभिवृत्ति इस मापनी पर अंक 3 के द्वार प्रदर्शित की जाएगी। एक तटस्थ अभिवृत्ति में कर्षण-शक्ति न तो सकारात्मक होगी, न ही नकारात्मक।

2. चरम-सीमा-एक अभिवृत्ति की चरम-सीमा यह इंगित करती है कि अभिवृत्ति किस सीमा तक सकारात्मक या नकारात्मक है। नाभिकीय शोध के उपयुक्त उदाहरण में मापनी मूल्य ‘1’ उसी चरम-सीमा का है जितना कि ‘5’। बस अंतर इतना है कि दोनों ही विपरीत दिशा में है। तटस्थ अभिवृत्ति नि:संदेह न्यूनतम तीव्रता की है।

3. सरलता या जटिलता (बहुविधता)-इस विशेषता से तात्पर्य है कि एक व्यापक अभिवृत्ति के अंतर्गत कितनी अभिवृत्तियाँ होती हैं। उस अभिवृत्ति को एक परिवार के रूप में समझना चाहिए जिसमें अनेक ‘सदस्य’ अभिवृत्तियाँ हैं। बहुत-से विषयों (जैसे स्वास्थ्य एवं विश्व शांति) के संबंध में लोग एक अभिवृत्ति के स्थान पर अनेक अभिवृत्तियाँ रखते हैं। जब अभिवृत्ति तंत्र में एक या बहुत थोड़ी-सी अभिवृत्तियाँ हो तो उसे ‘सरल’ कहा जाता है और जब वह अनेक अभिवृत्तियों से बना हो तो उसे ‘जटिल’ कहा जाता है।

स्वास्थ्य एवं कुशल-क्षेम के प्रति अभिवृत्तियों के पाए जाने की संभावना है, जैसे व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का संप्रत्यय, प्रसन्नता एवं कुशल-क्षेम के प्रति उसका दृष्टिकोण एवं व्यक्ति स्वास्थ्य एवं प्रसन्नता कैसे प्राप्त कर सकता है, इस संबंध में उसका विश्वास एवं मान्यताएँ। इसके विपरीत, किसी व्यक्ति विशेष के प्रति अभिवृत्ति में मुख्य रूप में एक अभिवृत्ति के पाये जाने की संभावना है। एक अभिवृत्ति तंत्र के घटकों के रूप में नहीं देखना चाहिए। एक अभिवृत्ति तंत्र के प्रत्येक सदस्य अभिवृत्ति में भी संभाव्य या (ए. बी. सी.) घटक होता है।

4. केंद्रिकता:
यह अभिवृत्ति तंत्र में किसी विशिष्ट अभिवृत्ति की भूमिका को बताता है। गैर-केंद्रीय (या परिधीय) अभिवृत्तियों की तुलना में अधिक केंद्रिकता वाली कोई अभिवृत्ति, अभिवृत्ति तंत्र की अन्य अभिवृत्तियों को अधिक प्रभावित करेगी। उदाहरण के लिए, विश्वशांति के प्रति अभिवृत्ति में सैनिक व्यय के प्रति एक नकारात्मक अभिवृत्ति, एक प्रधान या केंद्रीय अभिवृत्ति के रूप में हो सकती है तो बहु-अभिवृत्ति तंत्र की अन्य अभिवृत्तियों को प्रभावित कर सकती है।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 6 अभिवृत्ति एवं सामाजिक संज्ञान

प्रश्न 2.
क्या अभिवृत्तियाँ अधिगत होती हैं? वे किस प्रकार से अधिगत होती हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
हाँ, अभिवृत्तियाँ अधिगत होती हैं। सामान्यतया अभिवृत्तियाँ स्वयं के अनुभव तथा दूसरों से अंत:क्रिया के माध्यम से सीखी जाती हैं। अधिगम की प्रक्रियाएँ एवं दशाएँ भिन्न हो सकती हैं, जिसके परिणामस्वरूप लोगों में विविध प्रकार के अभिवृत्तियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

1. साहचर्य के द्वारा अभिवृत्तियों का अधिगम:
विद्यार्थी अध्यापन के कारण एक विशिष्ट विषय के प्रति रुचि विकसित कर लेता है। यह इसलिए होता है कि वे उस अध्यापक में अनेक सकारात्मक गुण देखते हैं; ये सकारात्मक गुण उसे विषय के साथ जुड़ जाते हैं जिसे वह पढ़ाता है और अंततोगत्वा उस विषय के प्रति रुचि के रूप में अभिव्यक्त होता है। दूसरे शब्दों में विषय के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति अध्यापक एवं विद्यार्थी के मध्य सकारात्मक साहचर्य के द्वारा सीखी या अधिगमित की जाती है।

2. पुरस्कृत या दंडित होने के कारण अभिवृत्तियों को सीखना:
यदि एक विशिष्ट अभिवृत्ति को प्रदर्शित करने के लिए किसी व्यक्ति की प्रशंसा की जाती है तो यह संभावना उच्च हो जाती है कि वह आगे चलकर उस अभिवृत्ति को विकसित करेगा। उदाहरण के लिए, यदि एक किशोरी नियमित रूप से योगासन करती है एवं अपने विद्यालय में ‘मिस गुड हेल्थ’ का सम्मान पाती है, तो वह योग एवं स्वास्थ्य के प्रति एक सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित कर सकती है। इसी प्रकार यदि एक बालक समुचित आहार के स्थान पर सड़ा-गला या अस्वास्थ्यकर भोजन लेने के कारण लगातार बीमार रहता है तो संभव है कि बालक अस्वास्थ्यकर भोजन के प्रति नकारात्मक एवं स्वास्थ्यकर भोजन के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करे।

3. प्रतिरूपकण (दूसरों के प्रेक्षण) के द्वारा अभिवृत्ति का अधिगत करना:
प्रायः ऐसा नहीं होता है कि हम मात्र साहचर्य या पुरस्कार एवं दंड के द्वारा ही अभिवृत्तियों का अधिगम करते हैं बल्कि हम दूसरों को अभिवृत्ति-विषय के प्रति एक विशिष्ट प्रकार का विचार व्यक्त करने या व्यवहार प्रदर्शित करने के लिए पुरस्कृत या दंडित होते देखकर कि माता-पिता बड़ों के प्रति आदर प्रदर्शित करते हैं एवं इसके लिए सम्मान पाते हैं, वे बड़ों के प्रति एक श्रद्धालु अभिवृत्ति विकसित कर सकते हैं।

4. समूह या सांस्कृतिक मानकों के द्वारा अभिवृत्ति का अधिगम करना:
प्रायः हम अपने समूह या संस्कृति के मानकों के माध्यम से अभिवृत्तियों का अधिगम करते हैं। मानक अलिखित नियम होते हैं जिनका विशिष्ट परिस्थितियों में पालन करने की अपेक्षा सभी से की जाती है।

कालांतर में ये मानक अभिवृत्ति के रूप में हमारे सामाजिक संज्ञान के अंग बन जाते हैं। समूह या संस्कृति के मानकों के माध्यम से अभिवृत्तियों का अधिगम करना वस्तुतः ऊपर वर्णित तीनों प्रकार के अधिगम-साहचर्य, पुरस्कार या दंड तथा प्रतिरूपण के माध्यम से अधिगम के उदाहरण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, पूजा या आराधना स्थल पर रुपया-पैसा, मिठाई, फल एवं फल भेंट करना कुछ धर्मों में एक आदर्श व्यवहार है। जब लोग देखते हैं कि ऐसे व्यवहार दूसरों के द्वारा प्रदर्शित किए जाते हैं, इनको समाज से स्वीकृति एवं मान्यता प्राप्त है तो वे अंततोगत्वा ऐसे व्यवहार एवं उससे संबद्ध समर्पण की भावना के प्रति एक सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित कर लेते हैं।

5. सूचना के प्रभाव से अधिगम:
अनेक अभिवृत्तियों का अधिगम सामाजिक संदर्भो में होता है परंतु आवश्यक नहीं है कि यह दूसरों की शारीरिक या वास्तविक उपस्थिति में ही हो। आजकल विभिन्न संचार माध्यमों के द्वारा प्रदत्त सूचना के विशाल भंडार के कारण सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों ही प्रकार की अभिवृत्तियों का निर्माण होता है। आत्मसिद्ध (Selfactualised) व्यक्ति की जीवनी पढ़ने से एक व्यक्ति जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम एवं अन्य पक्षों के प्रति एक सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित कर सकता है।

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प्रश्न 3.
सामाजिक सुकरीकरण किस प्रकार से होता है?
उत्तर:
जब दूसरों की उपस्थिति से किसी विशिष्ट कार्य का निष्पादन प्रभावित होता है तो इसे सामाजिक सुकरीकरण कहा जाता है।

1. दूसरों की उपस्थिति में बेहतर निष्पादन इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति भाव प्रबोधन (Arousal) का अनुभव कर रहा होता है जो उस व्यक्ति को अधिक तीव्र या गहन प्रतिक्रिया करने योग्य बनाती है। यह व्याख्या जाइंस के द्वारा दी गई है। इस नाम का उच्चारण ‘साइंस’ की तरह करते हैं।

2. यह भाव-प्रबोधन इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसका मूल्यांकन किया जा रहा है। कॉटरेल (Cottrell) ने इस विचार को मूल्यांकन बोध (Evaluation apprehension) कहा है। व्यक्ति की प्रशंसा की जाएगी यदि उसका निष्पादन अच्छा होगा (पुरसकार), या अलोचना की जाएगी यदि निष्पादन खराब होगा (दंड)। हम प्रशंसा पाना चाहते हैं कि आलोचना का परिहार करना चाहते हैं, इसलिए हम भली प्रकार से निष्पादन करने और त्रुटियों को दूर करने का प्रयास करते हैं।

3. निष्पादित किए जानेवाले कार्य की प्रकृति (Nature of the task) भी दूसरो की उपस्थिति में निष्पादन को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, सरल या परिचित कार्य की दशा में व्यक्ति अच्छे निष्पादन के लिए अधिक आश्वस्त रहता है और प्रशंसा या पुरस्कार पाने की उत्कंठा भी अधिक प्रबल रहती है। इसलिए लोगों की उपस्थिति में व्यक्ति अच्छा निष्पादन करता है तुलना में जब वह अकेले होता है। परंतु जटिल या नए कार्य की दशा में व्यक्ति त्रुटियाँ करने के भय से ग्रस्त हो सकता है। आलोचना या दंड का भय प्रबल होता है। इसलिए जब व्यक्ति अकेला होता है तो उसकी तुलना में वह लोगों की उपस्थिति में खराब निष्पादन करता है।

4. यदि दूसरे उपस्थित लोग भी उसी कार्य को कर रहे हों तो इस सह-क्रिया (Co-action) परिस्थिति कहा जाता है। इस परिस्थिति में एक सामाजिक तुलना एवं प्रतियोगिता होती है। इस स्थिति में भी जब कार्य सरल या परिचित होता है तो सह-क्रिया की दशा में निष्पादन अच्छा होता है. तुलना में जब व्यक्ति अकेला होता है।

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प्रश्न 4.
अभिवृत्ति निर्माण को प्रभावित करनेवाले कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अभिवृत्ति निर्माण को प्रभावित करनेवाले कारक निम्नलिखित हैं –
1. परिवार एवं विद्यालय का परिवेश:-विशेष रूप से जीवन के प्रारंभिक वर्षों में अभिवृत्ति निर्माण करने में माता-पिता एवं परिवार के अन्य सदस्य महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बाद में विद्यालय का परिवेश अभिवृत्ति निर्माण के लिए एक महत्त्वपूर्ण पृष्ठभूमि बन जाता है। परिवार एवं विद्यालय में अभिवृत्तियों का अधिकता आमतौर पर साहचर्य, पुरस्कार और दंड तथा प्रतिरूपण के माध्यम से होता है।

2. संदर्भ समूह-संदर्भ समूह एक व्यक्ति को सोचने एवं व्यवहार करने के स्वीकृत नियमों या मानकों को बताते हैं। अतः, ये समूह या संस्कृति के मानकों के माध्यम से अभिवृत्तियों के अधिगम को दर्शाते हैं। विभिन्न विषयों जैसे-राजनीतिक, धार्मिक तथा सामाजिक समूह, व्यवसाय, राष्ट्रीय एवं अन्य मुद्दों के प्रति अभिवृत्ति प्राय: संदर्भ समूह के माध्यम से ही विकसित होती है। यह प्रभाव विशेष रूप से किशोरावस्था के प्रारंभ में अधिक स्पष्ट होता है जब व्यक्ति के लिए यह अनुभव करना महत्त्वपूर्ण होता है कि वह किसी समूह का सदस्य है। इसलिए अभिवृत्ति निर्माण में संदर्भ समूह की भूमिका एवं दंड के द्वारा अधिगम का भी एक उदाहरण हो सकता है।

3. व्यक्तिगत अनुभव-अनेक अभिवृत्तियों का निर्माण पारिवारिक परिवेश में या संदर्भ समूह के माध्यम से नहीं होता बल्कि इनका निर्माण प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुभव के द्वारा होता है, जो लोगों के साथ स्वयं के जीवन के प्रति हमारी अभिवृत्ति में प्रबल परिवर्तन उत्पन्न करता है। यहाँ वास्तविक जीवन से संबंधित एक उदाहरण प्रस्तुत है। सेना का एक चालक (ड्राइवर) एक ऐसे व्यक्तित्व अनुभव से गुजरा जिसने उसके जीवन को ही परिवर्तित कर दिया।

एक अभियान के दौरान, जिसमें उसके सभी साथी मारे जा चुके थे, वह मृत्यु के बहुत नजदीक से गुजरा। अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में विचार करते हुए उसने सेना में अपनी नौकरी छोड़ दी तथा महाराष्ट्र के एक गाँव में स्थित अपनी जन्मभूमि में वापस लौट आया और वहाँ एक सामुदायिक नेता के रूप में सक्रिय रूप से कार्य किया। एक विशुद्ध व्यक्तिगत अनुभव के द्वारा इस व्यक्ति ने सामुदायिक उत्थान या विकास के लिए एक प्रबल सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित कर ली। उसके प्रयास ने उसके गाँव के स्वरूप को पूर्णरूपेण बदल दिया।

4. संचार-माध्यम संबद्ध प्रभाव-वर्तमान समय में प्रौद्योगिकीय विकास ने दृश्य-श्रव्य माध्यम एवं इंटरनेट को एक शक्तिशाली सूचना को स्रोत बना दिया है जो अभिवृत्तियों का निर्माण को प्रभावित करती हैं। ये स्रोत सबसे पहले संज्ञानात्मक एवं भावात्मक घटक को प्रबल बनाते हैं और बाद में व्यवहारपरक घटक को भी प्रभावित कर सकते हैं। संचार माध्यम अभिवृत्ति पर अच्छा एवं खराब दोनों ही प्रकार के प्रभाव डाल सकते हैं।

एक तरफ, संचार माध्यम एवं इंटरनेट, संचार के अन्य माध्यमों की तुलना में लोगों को भली प्रकार से सूचित करते हैं, दूसरी तरफ इन संचार-माध्यमों से सूचना संकलन की प्रकृति पर कोई रोक या जाँच नहीं होती इसलिए निर्मित होनेवाली अभिवृत्तियों या पहले से बनी अभिवृत्तियों में परिवर्तन की दिशा पर कोई नियंत्रण भी नहीं होता है। संचार माध्यमों का उपयोग उपभोक्तावादी अभिवृत्तियों के निर्माण के लिए किया जा सकता है और इनका उपयोग सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए सकारात्मक अभिवृत्तियों को उत्पन्न करने के लिए भी किया जा सकता है।

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प्रश्न 5.
पूर्वाग्रह के विभिन्न स्रोतों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पूर्वाग्रह के विभिन्न स्रोत निम्नलिखित हैं –

1. अधिगम:
अन्य अभिवृत्तियों की तरह पूर्वाग्रह भी साहचर्य, पुरस्कार एवं दंड, दूसरों के प्रेक्षण, समूह या संस्कृति के मानक तथा सूचनाओं की उपलब्धता, जो पूर्वाग्रह को बढ़ावा देते है। के द्वारा अधिगमित किए जा सकते हैं। परिवार, संदर्भ, समूह, व्यक्तिगत अनुभव तथा संचार माध्यम पूर्वाग्रह के अधिगम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जो लोग पूर्वाग्रहग्रस्त अभिवृत्तियों को सीखते हैं वे ‘पूर्वाग्रहग्रस्त व्यक्तित्व’ विकसित कर लेते हैं तथा समायोजन स्थापित करने की क्षमता में कमी, दुश्चिता तथा बाह्य समूह के प्रति आक्रामकता की भावना को प्रदर्शित करते हैं।

2. एक प्रबल सामाजिक अनन्यता तथा अंतःसमूह अभिनति-वे लोग जिनमें सामाजिक अनन्यता की प्रबल भावना होती है एवं अपने समूह के प्रति एक बहुत ही सकारात्मक अभिवृत्ति होती है वे अपनी अभिवृत्ति को और प्रबल बनाने के लिए बाह्य समूहों के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति रखते हैं। इनका पूर्वाग्रह के रूप में होता है।

3. बलि का बकरा बनाना-यह एक ऐसी प्रक्रिया या गोचर है जिसके द्वारा बहुसंख्यक समूह अपनी-अपनी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं के लिए अल्पसंख्यक बाह्य समूह को दोषी ठहराता है अल्पसंख्यक इस आरोप से बचाव करने में या तो बहुत कमजोर होते हैं या संख्या में बहुत कम होते हैं। बलि का बकरा बनाने वाली प्रक्रिया कुंठा को प्रदर्शित करने का समूह आधारित एक तरीका है तथा प्रायः इसकी परिणति कमजोर समूह के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति या पूर्वाग्रह के रूप में होती है।

4. सत्य के संप्रत्यय का आधार तत्त्व-कभी-कभी लोग एक रूढ़धारणा को बनाए रखते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि जो सभी लोग दूसरे के बारे में कहते हैं उसमें कोई न कोई सत्य का आधार तत्त्व (Kermel of truth) तो अवश्य होना चाहिए। यहाँ कि केवल कुछ उदाहरण ही ‘सत्य के आधार तत्त्व’ की अवधारणा को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त होते हैं।

5. स्वतः साधक भविष्योक्ति:
कुछ स्थितियों में वह समूह जो पूर्वाग्रह का लक्ष्य होता है स्वयं ही पूर्वाग्रह को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होता है। लक्ष्य समूह इस तरह से व्यवहार करता है कि वह पूर्वाग्रह को प्रमाणित करता है अर्थात् नकारात्मक प्रत्याशाओं की पुष्टि करता है। उदाहरणार्थ, यदि लक्ष्य समूह को ‘निर्भर’ और इसलिए प्रगति करने में अक्षम के रूप में वर्णित किया जाता है तो हो सकता है कि इस लक्ष्य समूह के सदस्य वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं।

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प्रश्न 6.
समाजोपकारी व्यवहार को प्रभावित करनेवाले कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समाजोपकारी व्यवहार को प्रभावित करनेवाले कारक –
1. समाजोपकारी व्यवहार, मनुष्यों की अपनी प्रजाति के दूसरे सदस्यों की सहायता करने की एक सहज, नैसर्गिक प्रवृत्ति पर आधारित है। यह सहज प्रवृत्ति प्रजाति की उत्तरजीविता या अस्तित्व बनाए रखने में सहायक होती है।

2. समाजोपकारी व्यवहार अधिगम से प्रभावित होता है। लोग जो ऐसे पारिवारिक परिवेश में पले-बढ़े होते हैं, जो लोगों की सहायता करने का आदर्श स्थापित करते हैं, वे सहायता करने की प्रशंसा करते हैं और उन व्यक्तियों की तुलना में अधिक समाजोपकारी व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं जो एक ऐसे पारिवारिक परिवेश में पले बढ़े होते हैं जहाँ इन गुणों का अभाव होता है।

3. समाजोपकारी व्यवहार को सांस्कृतिक कारक भी प्रभावित करते हैं। कुछ संस्कृतियों में जरूरतमंद एवं संकटग्रस्त लोगों की सहायता के लिए लोगों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया जाता है वहाँ लोग समाजोपकारी व्यवहार का प्रदर्शन कम करते हैं क्योंकि लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी देखभाल स्वयं करें एवं दूसरों की सहायता पर आश्रित न रहें। संसाधन के अभाव से ग्रस्त संस्कृतियों में हो सकता है कि लोग उच्च स्तर के समाजोपकारी व्यवहार का प्रदर्शन न करें।

4. समाजोपकारी व्यवहार उस समय अभिव्यक्त होता है जब परिस्थिति कोई सामाजिक मानक (Social norms) को सक्रिय करती है, जिसमें दूसरों की सहायता करने की आवश्यकता या माँग होती है। समाजोपकारी व्यवहार के संदर्भ में तीन कारकों का उल्लेख किया गया है –

(अ) सामाजिक उत्तरदायित्व (Social responsibility) का मानक-हमें किसी अन्य कारक पर विचार किए बिना उनकी मदद या सहायता करनी चाहिए जो मदद चाहते हों।
(ब) परस्परता (Reciprocity) का मानक-हमें उन लोगों की सहायता करनी चाहिए जिन्होंने हमारी सहायता पहले की है।
(स) न्यायसंगतता या समानता (Equality) मानक-हमें जब दूसरों की सहायता करनी चाहिए जब हमें लगे कि ऐसा करना सही या उचित है। उदाहरण के लिए, हमें से अनेक लोग ऐसा महसूस करेंगे कि ऐसे व्यक्ति की सहायता कारण अधिक उचित है जिसने अपनी सारी संपत्ति को बाढ़ में गंवा दिया हो, तुलना में उस व्यक्ति के जिसने जुए में अपना सब कुछ खो दिया हो।

5. समाजोपकारी व्यवहार उस व्यक्ति की प्रत्याशित प्रतिक्रिया से प्रभावित होता है जिसकी सहायता की जा रही है। उदाहरणार्थ, लोगों में एक जरूरतमंद व्यक्ति को पैसा देने की अनिच्छा हो सकती है क्योंकि वे महसूस करते हैं कि इससे व्यक्ति अपमानित कर सकता है या निर्भरता विकसित कर सकता है।

6. उन लोगों में समाजोपकारी व्यवहार प्रदर्शित होने की संभावना अधिक होती है जिनमें तद्नुभूति (Empathy) अर्थात् सहायता पानेवाले व्यक्ति होती है; जैसे-बाबा साहेब आम्टे (Baba Saheb Amte) और मदर टेरेसा (Mother Teresa)। समाजोपकारी व्यवहार की संभावना उन परिस्थितियों में भी अधिक होती है जो तद्नुभूति को उत्पन्न या उद्दीप्त करते हैं, जैसे-अकाल में भूख से पीड़ित बच्चों का चित्र।

7. समाजोपकारी व्यवहार ऐसे कारकों से कम हो सकता है जैसे-खराब मन:स्थिति, अपनी ही समस्याओं में व्यक्त रहना या यह भावना कि सहायता दिए जानेवाला व्यक्ति अपनी स्थिति के लिए स्वयं जिम्मेदार है (अर्थात् जब दूसरे व्यक्ति की जरूरत को अवस्था के लिए आंतरिक गुणारोपण किया जाए)।

8. समाजोपकारी व्यवहार उस समय भी कम हो सकता है जब दर्शकों की संख्या एक से अधिक हो। उदाहरण के लिए, कभी-कभी सड़क दुर्घटना में पीड़ित व्यक्ति को सहायता इसलिए नहीं मिल पाती क्योंकि घटनास्थल के आस-पास बहुत लोग खड़े रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति यह सोचता है कि सहायता देना उसकी अकेले की जिम्मेदारी नहीं है एवं कोई दूसरा व्यक्ति उसकी सहायता की जिम्मेदारी ले सकता है। इस गोचर को दायित्व का विसरण (Diffusion of responsibility) कहा जाता है। दूसरी ओर, यदि घटनास्थल पर केवल एक ही दर्शक है तो यह संभावना अधिक है कि वह व्यक्ति जिम्मेदारी या दायित्व और पीड़ित का वास्तव में मदद करेगा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पी-ओ-एक्स त्रिकोण में पी कौन है?
(A) वह व्यक्ति है जिसकी अभिवृत्ति का अध्ययन करता है
(B) एक दूसरा व्यक्ति है
(C) एक विषय-वस्तु है जिसके प्रति अभिवृत्ति का अध्ययन करता है
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) वह व्यक्ति है जिसकी अभिवृत्ति का अध्ययन करता है

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प्रश्न 2.
वह व्यक्ति जो छवि बनाता है, उसे क्या कहते हैं?
(A) लक्ष्य
(B) प्रत्यक्षणकर्ता
(C) प्रतिभागी
(D) स्रोत
उत्तर:
(B) प्रत्यक्षणकर्ता

प्रश्न 3.
छवि निर्माण की प्रक्रिया में छवि बनाता है, उसे क्या कहते हैं?
(A) चयन
(B) अनुमान
(C) संगठन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 4.
पहले प्रस्तुत की जानेवाली सूचना का प्रभाव अंत में प्रस्तुत की जानेवाली सूचना से अधिक प्रबल होता है। इस प्रभाव को क्या कहते हैं?
(A) प्रथम प्रभाव
(B) परिवेश प्रभाव
(C) आसन्नता प्रभाव
(D) कर्ता-प्रेक्षक प्रभाव
उत्तर:
(D) कर्ता-प्रेक्षक प्रभाव

प्रश्न 5.
अभिवृत्ति के विचारपरक घटक को कहा जाता है –
(A) संज्ञानात्मक पक्ष
(B) भावात्मक पक्ष
(C) व्यवहारात्मक पक्ष
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) संज्ञानात्मक पक्ष

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प्रश्न 6.
भावात्मक पक्ष के रूप में जाना जाता है –
(A) क्रियात्मक घटक
(B) विचारपरक घटक
(C) सांवेगिक घटक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) सांवेगिक घटक

प्रश्न 7.
अभिवृत्ति की कौन-सी-विशेषता यह इंगित करती है कि अभिवृत्ति किसी सीमा तक सकारात्मक है या नकारात्मक?
(A) कर्षण-शक्ति
(B) चरम सीमा
(C) सरलता या जटिलता
(D) केंद्रिकता
उत्तर:
(B) चरम सीमा

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प्रश्न 8.
कर्षण शक्ति हमें यह बताती है कि अभिवृत्ति विषय के प्रति कोई अभिवृत्ति:
(A) सकारात्मक है
(B) नकारात्मक है
(C) सकारात्मक है अथवा नकारात्मक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) सकारात्मक है

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में कौन-से कारक अभिवृत्तियों के अधिगम के लिए एक संदर्भ प्रदान करते हैं?
(A) परिवार एवं विद्यालय का परिवेश
(B) व्यक्तिगत अनुभव
(C) संदर्भ समूह
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 10.
संतुलन का संप्रत्यय किसने प्रतिपादित किया?
(A) फ्रिट्ज हाइडर
(B) लियॉन फेस्टिंगर
(C) एस. एस. मोहसिन
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) फ्रिट्ज हाइडर

प्रश्न 11.
एक भारतीय वैज्ञानिक एम. एम. मोहसिन ने किस संप्रत्यय को प्रतिपादित किया?
(A) संतुलन का संप्रत्यय
(B) द्विस्तरीय संप्रत्यय
(C) द्विस्तरीय संप्रत्यय
(D) संज्ञानात्मक विसंवादिता का संप्रत्यय
उत्तर:
(B) द्विस्तरीय संप्रत्यय

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प्रश्न 12.
द्विस्तरीय संप्रत्यय के अनुसार अभिवृत्ति में परिवर्तन कितने स्तरों पर या चरणों में होता है?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) एक
उत्तर:
(A) दो

प्रश्न 13.
एक अभिवृत्ति में परिवर्तन हो सकता है –
(A) सर्वसम या संगत और विसंगत दोनों
(B) नहीं होता
(C) विसंगत
(D) सर्वसम या संगत
उत्तर:
(A) सर्वसम या संगत और विसंगत दोनों

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प्रश्न 14.
निम्नलिखित में कौन-सा लक्ष्य का गुण नहीं है?
(A) अनुनयता
(B) बुद्धि
(C) आत्मसम्मान
(D) आलस्य
उत्तर:
(D) आलस्य

प्रश्न 15.
मनोवैज्ञानिक ने अभिवृत्ति परिवर्तन ‘द्विस्तरीय संप्रत्यय’ को प्रस्तावित किया?
(A) फेस्टिगर
(B) कार्ल स्मिथ
(C) फ्रिट्ज हाइडर
(D) एस० एम० मोहसिन
उत्तर:
(D) एस० एम० मोहसिन

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प्रश्न 16.
व्यक्ति की किसी विशेष क्षेत्र की विशेष योग्यता कहलाती है –
(A) व्यक्तित्व
(B) अभिक्षमता
(C) अभिवृत्ति
(D) अभिरुचि
उत्तर:
(B) अभिक्षमता

प्रश्न 17.
मनोवृत्ति परिवर्तन के दो-स्तरीय संप्रत्यय का प्रतिपादन किसने किया?
(A) मुहम्मद सुलेमान
(B) ए० के० सिंह
(C) एम० एम० मुहसिन
(D) जे० पी० दास
उत्तर:
(C) एम० एम० मुहसिन

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प्रश्न 18.
मनोवृत्ति के भावात्मक संघटक से तात्पर्य होता है –
(A) मनोवृत्ति वस्तु के प्रति भाव से
(B) मनोवृत्ति वस्तु के प्रति भाव एवं संवेग दोनों
(C) मनोवृत्ति वस्तु के प्रति संवेग से
(D) इनमें किसी से भी नहीं
उत्तर:
(C) मनोवृत्ति वस्तु के प्रति संवेग से

प्रश्न 19.
एक व्यक्ति सुव्यवस्थित एवं समयनिष्ठ है फिर भी हम लोगों में यह सोचने की संभावना होती है कि उसे परिश्रमी भी होना चाहिए। यह कौन-सा प्रभाव है?
(A) प्रथम प्रभाव
(B) परिवेश प्रभाव
(C) आसन्नता प्रभाव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 20.
एक स्कीमा या अन्विति योजना है –
(A) मानसिक संरचना
(B) शारीरिक संरचना
(C) सामाजिक संरचना
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) मानसिक संरचना

प्रश्न 21.
निम्नांकित में कौन पूर्वाग्रह में तेजी से कमी लाता है?
(A) शिक्षा
(B) अंतर्समूह संपर्क
(C) पूर्वाग्रह-विरोधी प्रचार
(D) सामाजिक विधान
उत्तर:
(C) पूर्वाग्रह-विरोधी प्रचार

प्रश्न 22.
एक स्कीमा या अन्विति योजना है –
(A) मानसिक संरचना
(B) शारीरिक संरचना
(C) सामाजिक संरचना
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) मानसिक संरचना

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 6 अभिवृत्ति एवं सामाजिक संज्ञान

प्रश्न 23.
पूर्वधारणा से मनोवृत्ति किस दृष्टिकोण से भिन्न है?
(A) बैर-भाव
(B) सम्बद्धता
(C) आवेष्टन
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(C) आवेष्टन

प्रश्न 24.
योग के ‘अष्टांग साधन’ का संबंध है –
(A) कर्मयोग
(B) राजयोग
(C) ज्ञानयोग
(D) मंत्रयोग
उत्तर:
(B) राजयोग

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प्रश्न 25.
पूर्वाग्रह में घटकों की संख्या होती है –
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(C) चार

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 5 चिकित्सा उपागम

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 5 चिकित्सा उपागम Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 5 चिकित्सा उपागम

Bihar Board Class 12 Psychology चिकित्सा उपागम Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
मनश्चिकित्सा की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र का वर्णन कीजिए। मनश्चिकित्सा में चिकित्सात्मक संबंध के महत्त्व को उजागर कीजिए।
उत्तर:
मनश्चिकित्सा उपचार चाहनवाले या सेवार्थी तथा उपचार करनेवाले या चिकित्सा के बीच में एक ऐछिक संबंध है। इस संबंध का उद्देश्य उन मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान करना होता है जिनका सामना सेवार्थी द्वारा किया जा रहा हो। यह संबंध सेवार्थी के विश्वास को बनाने में सहायक होता है जिससे वह अपनी समस्याओं के बारे में मुक्त होकर चर्चा कर सके। मनश्चिकित्सा का उद्देश्य दुरनुकूलक व्यवहारों को बदलना, वैयक्तिक कष्ट की भावना को कम करना तथा रोगी को अपने पर्यावरण से बेहतर ढंग से अनुकूलन करने में मदद करना है। अपर्याप्त वैवाहिक, व्यावसायिक तथा सामाजिक समायोजन की वह आवश्यकता होती है कि व्यक्ति के वैयक्तिक पर्यावरण में परिवर्तन किए जाएँ।

सभी मनश्चिकित्सात्मक उपागमों में निम्न अभिलक्षण पाए जाते हैं –

  1. चिकित्सा के विभिन्न सिद्धांत में अंतर्निहित नियमों का व्यवस्थित या क्रमबद्ध अनुप्रयोग होता है।
  2. केवल वे व्यक्ति, जिन्होंने कुशल पर्यवेक्षण में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया हो, मनश्चिकित्सा कर सकते हैं, हर कोई ही, एक अप्रशिक्षित व्यक्ति अनजाने में लाभ के बजाय हानि अधिक पहुँचा सकता है।
  3. चिकित्सात्मक स्थितियों में एक चिकित्सक और एक सेवार्थी होता है जो अपनी संवेगात्मक समस्याओं के लिए सहायता चाहता है और प्राप्त करता है चिकित्सात्मक प्रक्रिया में यही व्यक्ति ध्यान का मुख्य केन्द्र होता है; तथा।
  4. इन दोनों व्यक्तियों, चिकित्सक एवं सेवार्थी के बीच अंत:क्रिया के परिणामस्वरूप एक चिकित्सात्मक संबंध का निर्माण एवं उसका सुदृढीकरण होता है। यह मानवीय संबंध किसी भी मनोवैज्ञानिक चिकित्सा का केन्द्र होता है तथा यही परिवर्तन का माध्यम बनता है।

मनश्चिकित्सा में चिकित्सात्मक संबंध का महत्त्व:
सेवार्थी एवं चिकित्सक के बीच एक विशेष संबंध को चिकित्सात्मक संबंध या चिकित्सात्मक मैत्री कहा जाता हैं यह न तो एक क्षणिक परिचय होता है और न ही एक स्थायी एवं टिकाऊ संबंध। इस चिकित्सात्मक मैत्री के दो मुख्य घटक होते हैं। पहला घटक इस संबंध के संविदात्मक प्रकृति है, जिसमें दो इच्छुक व्यक्ति, सेवार्थी एवं चिकित्सक, एक ऐसी साझेदारी या भागीदारी में प्रवेश करते हैं जिसका उद्देश्य सेवार्थी की समस्याओं का निराकरण करने में उसकी मदद करना होता है। चिकित्सात्मक मैत्री का दूसरा घटक है-चिकित्सा की सीमित अवधि।

यह मैत्री तब तक चलती है जब तक सेवार्थी अपनी समस्याओं का सामना करने में समर्थ न हो जाए तथा अपने जीवन का नियंत्रण अपने हाथ में न ले। इस संबंध की कई अनूठी विशिष्टताएँ हैं। यह एक विश्वास तथा भरोसे पर आधारित संबंध है। उच्चस्तरीय विश्वास सेवार्थी को चिकित्सक के सामने अपना बोझ हल्का करने तथा उसके सामने अपनी मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिगत समस्याओं को विश्वस्त रूप से बताने में समर्थ बनाता है। चिकित्सक सेवार्थी के प्रति अपनी स्वीकृति, तद्नुभूति, सच्चाई और गर्मजोशी दिखाकर इसे बढ़ावा दिखाता रहेगा चाहे इसके प्रति अशिष्ट व्यवहार क्यों न करे या पूर्व में की गई या सोची गई ‘गलत’ बातों को क्यों न बताएँ।

यह अशर्त सकारात्मक आदर (Unconditional positive regard) की भावना है जो चिकित्सक की सेवार्थी के प्रति होती है। चिकित्सक की सेवार्थी के प्रति तद्नुभूति होती है। चिकित्सात्मक संबंध के लिए यह भी आवश्यक है कि चिकित्सा सेवार्थी द्वारा अभिव्यक्त किए गए अनुभवों, घटनाओं, भावनाओं तथा विचारों के प्रति नियमबद्ध गोपनीयता का अवश्य पालन करे। चिकित्सक को सेवार्थी विश्वास और भरोसे का किसी प्रकार से कभी भी अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहिए। अंततः यह एक व्यावसायिक संबंध है इसे ऐसा ही रहना चाहिए।

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प्रश्न 2.
मनश्चिकित्सा के विभिन्न प्रकार कौन-से हैं? किस आधार पर इनका वर्गीकरण किया गया है?
उत्तर:
मनश्चिकित्सा को तीन व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  1. मनोगतिक मनश्चिकित्सा।
  2. व्यवहार मनश्चिकित्सा।
  3. अस्तित्वपरक मनश्चिकित्सा।

मनश्चिकित्सा का वर्गीकरण निम्नलिखित प्राचलों के आधार पर किया गया है:

  1. क्या कारण है, जिसने समस्या को उत्पन्न किया?
  2. कारण का प्रादुर्भाव कैसे हुआ?
  3. उपचार की मुख्य विधि क्या है?
  4. सेवार्थी और चिकित्सक के बीच चिकित्सात्मक संबंध की स्वीकृति क्या होती है?
  5. सेवार्थी के मुख्य लाभ क्या हैं?
  6. उपचार की अवधि क्या है?

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प्रश्न 3.
एक चिकित्सक सेवार्थी से अपने सभी विचार यहाँ तक कि प्रारंभिक बाल्यावस्था के अनुभवों को बताने को कहता है। इसमें उपयोग की गई तकनीक और चिकित्सा के प्रकार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इसमें अंत:मनोद्वंद्व के स्वरूप को बाहर निकालने की विधि का उपयोग किया गया है। यह चिकित्सा मनोगतिक चिकित्सा है। चूँकि मनोगतिक उपागम अंत:द्वंद्व मनोवैज्ञानिक विकारों का मुख्य कारण समझता है । अतः, उपचार में पहला चरण इसी अंत:मनोद्वंद्व को बाहर निकालना है। मनोविश्लेषण ने अंत:मनोद्वंद्व को बाहर निकालने के लिए दो महत्त्वपूर्ण विधियों मुक्त साहचर्य (Free association) विधि तथा स्वप्न व्याख्या (Dream interpretation) विधि का आविष्कार किया।

मुक्त साहचर्य विधि सेवार्थी की समस्याओं को समझने की प्रमुख विधि है। जब एक बार चिकित्सात्मक संबंध स्थापित हो जाता है और सेवार्थी आरमदेह महसूस करने लगता है तब चिकित्सक उससे कहता है कि वह स्तरण पटल (Couch) पर लेट जाए, अपनी आँखों को बंद कर ले और मन में जो कुछ भी आए उसे बिना किसी अपरोधन या काट-छाँट के बताने को कहता है। सेवार्थी को एक विचार को दूसरे विचार से मुक्त रूप से संबद्ध करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और इस विधि को मुक्त साहचर्य विधि कहते हैं। जब सेवार्थी एक आरामदायक और विश्वसनीय वातावरण में मन में जो कुछ भी आए बोलता है तब नियंत्रक पराहम् तथा सतर्क अहं को प्रसुप्तावस्था में रखा जाता है। चूँकि चिकित्सक बीच में हस्तक्षेप नहीं करता इसलिए विचारों का मुक्त प्रवाह, अचेतन मन की इच्छाएँ और द्वंद्व जो अहं द्वारा दमिन की जाती रही हों वे सचेतन मन में प्रकट होने लगती हैं।

सेवार्थी का यह मुक्त बिना काट-छाँट वाला शाब्दिक वृत्तांत सेवार्थी के अचेतन मन की एक खिड़की है जिसमें अभिगमन का चिकित्सक को अवसर मिलता है। इस तकनीक के साथ ही साथ सेवार्थी को निद्रा से जागने पर अपने स्वप्नों को लिख लेने को कहा जाता है। मनोविश्लेषक इन स्वप्नों को अचेतन मन में उपस्थित अतृप्त इच्छाओं के प्रतीक के रूप में देखता है। स्वप्न की प्रतिमाएँ प्रतीक है जो अंत: मानसिक शक्तियों का संकेतक होती हैं। स्वप्न प्रतीकों का उपयोग करते हैं क्योंकि वे अप्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त होते हैं इसलिए अहं को सकर्त नहीं करते। यदि अतृप्त इच्छाएँ प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त की जाएँ तो सदैव सतर्क अहं उन्हें दमित कर देगा जो पुनः दुश्चिता का कारण बनेगा। इन प्रतीकों की व्याख्या अनुवाद की एक स्वीकृत परंपरा के अनुसार की जाती है जो अतृप्त इच्छाओं और द्वंद्वों के संकेतक होते हैं।

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प्रश्न 4.
उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए कि संज्ञानात्मक विकृति किस प्रकार घटित होती है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक चिकित्साओं में मनोवैज्ञानिक कष्ट का कारण अविवेकी विचारों और विश्वासों में स्थापित किया जाता है।
1. अल्बर्ट एलिस (AlbertElis) ने संवेग तर्क चिकित्सा (Rational emotive therapy, RET) को प्रभावित किया। इस चिकित्सा की केन्द्रीय धारणा है कि अविवेकी विश्वास पूर्ववती घटनाओं और उनके परिणामों के बीच मध्यस्थता करते हैं। संवेग तर्क चिकित्सा में पहला चरण है पूर्ववती-विश्वास-परिणाम (पू.वि.प.) विश्लेषण। पूर्ववर्ती घटनाओं जिनसे मनोवैज्ञानिक कष्ट उत्पन्न हुआ, को लिख लिया जाता है। सेवार्थी के साक्षात्कार द्वारा उसके उन अविवेकी विश्वासों का पता लगाया जाता है जो उसकी वर्तमानकालिक वास्तविकता को विकृत कर रहे हैं।

हो सकता है इन विवेकी विश्वासों को पुष्ट करनेवाले आनुभाविक प्रमाण पर्यावरण में नहीं भी हो। इन विश्वासों को अनिवार्य या चाहिए विचार कह सकते हैं, तात्पर्य यह है कि कोई भी बात एक विशिष्ट तरह से होनी ‘अनिवार्य’ या ‘चाहिए’ है। अविवेकी विश्वासों के उदाहरण हैं; जैसे-“किसी को हर एक का प्यार हर समय मिलना चाहिए”, “मनुष्य की तंगहाली बाह्य घटनाओं के कारण होती है जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं होता” इत्यादि। अविवेकी विश्वासों के कारण पूर्ववती घटना का विकृत प्रत्यक्षण नकारात्मक संवेगों और व्यवहारों के परिणाम का कारण बनता है।

अविवेकी विश्वासों का मूल्यांकन प्रश्नावली और साक्षात्कार के द्वारा किया जाता है। संवेग तर्क चिकित्सा की प्रक्रिया में चिकित्सक अनिदेशात्मक प्रश्न करने के प्रक्रिया से अविवेकी विश्वासों का खंडन करता है। प्रश्न करने का स्वरूप सौम्य होता है, निदेशात्मक या जाँच-पड़ताल वाला नहीं। ये प्रश्न सेवार्थी को अपने जीवन और समस्याओं से संबंधित पूर्वधारणाओं के बारे में गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। धीरे-धीरे सेवार्थी अपने जीवन दर्शन में परिवर्तन लाकर अविवेकी विश्वासों को परिवर्तित करने में समर्थ हो जाता है। तर्कमूलक विश्वास तंत्र अविवेकी विश्वास तंत्र को प्रतिस्थापित करता है और मनोवैज्ञानिक कष्टों में कमी आती है।

2. दूसरी संज्ञानात्मक चिकित्सा आरन बेक (Aaron Beck) की है। दुश्चिता या अवसाद द्वारा अभिलक्षित मनोवैज्ञानिक कष्ट संबंधी उनके सिद्धांत के अनुसार परिवार और समाज द्वारा दिए गए बाल्यावस्था के अनुभव मूल अन्विति योजना या मूल स्कीमा (Core Schema) या तंत्र के रूप में विकसित हो जाते हैं, जिनमें व्यक्ति के विश्वास और क्रिया के प्रतिरूप सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार एक सेवार्थी जो बाल्यावस्था में अपने माता-पिता द्वारा उपेक्षित था एक ऐसा मूल स्कीमा विकसित कर लेता है कि “मैं बाछित नहीं हूँ।” जीवनकाल के दौरान कोई निर्णायक घटना उसके जीवन में घटित होती है। विद्यालय में सबके सामने अध्यापक के द्वारा उसकी हंसी उड़ाई जाती है।

यह निर्णायक घटना उसके मूल स्कीमा “मैं बाछित नहीं हूँ।” को क्रियाशील कर देती है जो नकारात्मक स्वचालित विचारों को विकसित करती है। नकारात्मक विचार सतत अविवेकी विचार होते हैं; जैसे-कोई मुझे प्यार नहीं करता, मैं कुरूप हूँ मैं मूर्ख हूँ, मैं सफल नहीं हो सकता/सकती इत्यादि। इन नकारात्मक स्वचालित विचारों में संज्ञानात्मक विकृतियाँ भी होती हैं। संज्ञानात्मक विकृतियों चिंतन के ऐसे तरीके हैं जो सामान्य प्रकृति के होते हैं किन्तु वे वास्तविकता को नकारात्मक तरीके से विकृत के होते हैं। विचारों के इन प्रतिरूपों को अपक्रियात्मक संज्ञानात्मक संरचना (Dyfunctional cognitive structures) कहते हैं। सामाजिक यथार्थ के बारे में ये संज्ञानात्मक त्रुटियाँ उत्पन्न करती हैं।

इन विचारों का बार-बार उत्पन्न होना दुश्चिता और अवसाद की भावनाओं को विकसित करता है। चिकित्सक जो प्रश्न करता है वे सौम्य होते हैं तथा सेवार्थी के विश्वासों और विचारों के प्रति बिना धमकी वाले किन्तु उनका खंडन करनेवाले होते हैं। इन प्रश्नों के उदाहरण कुछ ऐसे हो सकते हैं, “क्यों हर कोई तुम्हें प्यार करे?” “तुम्हारे लिए सफल होना क्या अर्थ रखता है?” इत्यादि। ये प्रश्न सेवार्थी को अपने नकारात्मक स्वाचालित विचारों की विपरीत दिशा में सोचने को बाध्य करते हैं जिससे वह अपने अपक्रियात्मक स्कीमा के स्वरूप के बारे में अंतर्दृष्टि प्राप्त करता है तथा अपनी संज्ञानात्मक संरचना को परिवर्तित करने में समर्थ होता है। इस चिकित्सा का लक्ष्य संज्ञानात्मक पुनःसंरचना को प्राप्त करना है जो दुश्चिता तथा अवसाद को घटाती है।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 5 चिकित्सा उपागम

प्रश्न 5.
मनोवृत्ति के स्वरूप का वर्णन करें।
उत्तर:
मनोवृत्ति या अभिवृत्ति एक प्रचलित शब्द है जिसका व्यवहार हम प्रायः अपने दैनिक जीवन दिन-प्रतिदिन करते रहते हैं। अर्थात् किसी व्यक्ति की मानसिक प्रतिछाया या तस्वीर को, जो किसी व्यक्ति या समूह, वस्तु परिस्थिति, घटना आदि के प्रति व्यक्ति के अनुकूल या प्रतिकूल दृष्टिकोण अथवा विचार को प्रकट करता है, मनोवृत्ति या अभिवृति कहते हैं। क्रेच, क्रेचफिल्ड तथा वैलेची ने मनोवृत्ति को परिभाषित करते हुए कहा है कि “किसी एक वस्तु के संबंध में तीन इन तीन तंत्रों का टिकाऊ तंत्र मनोवृत्ति कहलाता है।” इन तीनों तंत्रों से मनोवृत्ति का वास्तविक स्वरूप सही ढंग से स्पष्ट होता है। ये तीन तंत्र है-पहला, संज्ञानात्मक संघटक अर्थात् किसी वस्तु से संबंधित व्यक्ति के संवेगात्मक अनुभव को भावात्मक संघटक कहते हैं। दूसरा, भावात्मक संघटक अर्थात् किसी वस्तु से संबंधित व्यक्ति के संवेगात्मक अनुभव को भावात्मक संघटक कहते हैं। तीसरा, व्यवहारात्मक संघटक अर्थात् किसी वस्तु के प्रति व्यवहार या क्रिया करने की तत्परता को व्यवहारात्मक संघटक कहते हैं। इस प्रकार मनोवृत्ति उपर्युक्त तीनों संघटकों का एक टिकाऊ तंत्र है।

प्रश्न 6.
कौन-सी चिकित्सा सेवार्थी को व्यक्तिगत संवृद्धि चाहने एवं अपनी संभाव्यताओं की सिद्धि के लिए प्रेरित करती है? उन चिकित्साओं की चर्चा कीजिए जो इस सिद्धांत पर आधारित हैं।
उत्तर:
मानवतावादी अस्तित्वपरक चिकित्सा सेवार्थी को व्यक्तिगत संवृद्धि चाहने एवं अपनी संभाव्यताओं की सिद्धि के लिए प्रेरित करती है। मानवतावादी-अस्तित्वपरक चिकित्सा की धारणा है मनोवैज्ञानिक कष्ट व्यक्ति के अकेलापन, विसंबंधन तथा जीवन का अर्थ समझने और यथार्थ संतुष्टि प्राप्त करने में अयोग्यता की भावनाओं के कारण उत्पन्न होते हैं। मनुष्य व्यक्तिगत संवृद्धि एवं आत्मसिद्धि (Self-actualisation) की इच्छा तथा संवेगात्मक रूप से विकसित होने की सहज आवश्यकता से अभिप्रेरित होते हैं।

जब समाज और परिवार के द्वारा ये आवश्यकताएँ बाधित की जाती हैं तो मनुष्य मनोवैज्ञानिक कष्ट का अनुभव करता है। आत्मसिद्धि को एक सहज शक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो व्यक्ति को अधिक जटिल, संतुलित और समाकलित होने के लिए अर्थात् बिना खंडित हुए जटिलता एवं संतुलन प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। समाकलित होने का तात्पर्य है साकत्य-बोध, एक संपूर्ण व्यक्ति होना, भिन्न-भिन्न अनुभवों के होते हुए भी मूल भाव में वही व्यक्ति होना। जिस तरह से भोजन या पानी की कमी कष्ट का कारण होती है, उसी तरह आत्मसिद्धि का कुंठित होना भी कष्ट का कारण होता है।

जब सेवार्थी अपने जीवन में आत्मसिद्धि की बाधाओं का प्रत्यक्षण कर उनको दूर करने योग्य हो जाता है तब रोगोपचार घटित होता है। आत्मसिद्धि के लिए आवश्यक है संवेगों की मुक्त अभिव्यक्ति। समाज और परिवार संवेगों की इस मुक्त अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं क्योंकि उन्हें भय होता है कि संवेगों की मुक्त अभिव्यक्ति से समाज को क्षति पहुँच सकती है क्योंकि इससे ध्वंसात्मक शक्तियाँ उन्मुक्त हो सकती हैं। यह नियंत्रण सांवेगिक समाकलन का प्रक्रिया को निष्फल करके विध्वंसक व्यवहार और नकारात्मक संवेगों का कारण बनता है।

इसलिए चिकित्सा के दौरान एक अनुज्ञात्मक, अनिर्णयात्मक तथा विकृतिपूर्ण वातावरण तैयार किया जाता है जिसमें सेवार्थी के संवेगों की मुक्त अभिव्यक्ति हो सके तथा जटिलता, संतुलन और समाकलन प्राप्त किया जा सके। इसमें मूल पूर्वधारणा यह है कि सेवार्थी को अपने व्यवहारों का नियंत्रण करने की स्वतंत्रता है तथा यह उसका ही उत्तरदायित्व है। चिकित्सक केवल एक सुगमकर्ता और मार्गदर्शक होता है। चिकित्सा को सफलता के लिए सेवार्थी स्वयं उत्तरदायी होता है। चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य सेवार्थी की जागरुकता को बढ़ाना है। जैसे-जैसे सेवार्थी अपने विशिष्ट व्यक्तिगत अनुभवों को समझने लगता है वह स्वस्थ होने लगता है। सेवार्थी आत्म-संवृद्धि की प्रक्रिया को प्रारंभ करता है जिससे यह स्वस्थ हो जाता है।

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प्रश्न 7.
मनश्चिकित्सा में स्वास्थ्य-लाभ के लिए किन कारकों का योगदान होता है? कुछ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों की गणना कीजिए।
उत्तर:
मनश्चिकित्सा में स्वास्थ्य-लाभ में योगदान देनेवाले कारक निम्नलिखित हैं:
1. स्वास्थ्य-लाभ में एक महत्त्वपूर्ण कारक है चिकित्सक द्वारा अपनाई गई तकनीक तथा रोगी/सेवार्थी के साथ इन्हीं तकनीकों का परिपालन। यदि दुश्चित सेवार्थी को स्वस्थ करने के लिए व्यवहार पद्धति और संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा शाखा अपनाई जाती है तो विभ्रांति की विधियाँ और संज्ञानात्मक पुनः संरचना तकनीक स्वास्थ्य-लाभ में बहुत बड़ा योगदान देती है।

2. चिकित्सात्मक मैत्री जो चिकित्सक एवं रोगी/सेवार्थी के बीच में बनती है, में स्वास्थ्य-लाभ से गुण विद्यमान होते हैं क्योंकि चिकित्सक नियमित रूप से सेवार्थी से मिलता है तथा उसे तदनुभूति और हार्दिकता प्रदान करता है।

3. चिकित्सा के प्रारंभिक सत्रों में जब रोगी/सेवार्थी की समस्याओं की प्रकृति को समझने के लिए उसका साक्षात्कार किया जाता है, जो वह स्वयं द्वारा अनुभव किए जा रहे संवेगात्मक समस्याओं को चिकित्सक के सामने रखता है। संवेगों को बाहर निकालने की इस प्रक्रिया को भाव-विरेचन या केथार्सिस कहते हैं और इसमें स्वास्थ्य-लाभ के गुण विद्यमन होते हैं।

4. मनश्चिकित्सा से संबंधित अनेक अविशिष्ट कारक हैं। इनमें कुछ कारक रोगी/सेवार्थी से संबंधित बताए जाते हैं तथा कुछ चिकित्सक से। ये कारक अविशिष्ट इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि ये मनश्चिकित्सा की विभिन्न पद्धतियों, भिन्न रोगियों/सेवार्थियों तथा भिन्न मनश्चिकित्सकों के आर-पार घटित होती हैं। रोगियों/सेवार्थियों पर लागू होने वाले अविशिष्ट कारक हैं-परिवर्तन के लिए अभिप्रेरणा उपचार के कारण सुधार की प्रत्याशा इत्यादि। इन्हें रोगी चर (Patient variables) कहा जाता है। चिकित्सक पर लागू होने वाले विशिष्ट कारक हैं – सकारात्मक स्वभाव, अनसुलझे संवेगात्मक द्वंद्वों की अनुपस्थिति, अच्छे मानसिक स्वास्थ्य की उपस्थिति इत्यादि। इन्हें चिकित्सक चर (Therapist variables) कहा जाता है।

योग, ध्यान, ऐक्यूपंक्चर, वनौषधि, उपचार आदि वैकल्पिक चिकित्साएँ हैं। योग एक प्राचीन भारतीय पद्धति है जिसे पतंजलि के योग सूत्र के अष्टांग योग में विस्तृत रूप से बताया गया है। योग, जैसा कि सामान्यत: आजकल इसे कहा जाता है, का आशय केवल आसन या शरीर संस्थति घटक अथवा श्वसन अभ्यास अथवा किसी वस्तु या विचार या किसी मंत्र पर ध्यान केन्द्रित करने के अभ्यास से है। जहाँ ध्यान केन्द्रित किया जाता है। विपश्यना ध्यान जिसे सतर्कता-आधारित ध्यान के नाम से भी जाना जाता है, में ध्यान बाँधे रखने के लिए कोई नियत वस्तु या विचार नहीं होता है। व्यक्ति निष्क्रिय रूप से विभिन्न शारीरिक संवेदनाओं एवं विचारों, जो उसकी चेतना में आते रहते हैं, प्रेक्षण करता है।

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प्रश्न 8.
मानसिक रोगियों के पुनः स्थापन के लिए कौन-सी तकनीकों का उपयोग किया जाता है? अथवा, मानसिक रोगियों के पुनःस्थापन पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
मानसिक रोगियों का पुनःस्थापन-मनोवैज्ञानिक विकारों के उपचार के दो घटक होते हैं अर्थात् लक्षणों में कमी आना तथा क्रियाशीलता या जीवन की गुणवत्ता के स्तर में सुधार लाना। कम तीव्र विकारों; जैसे-सामान्यीकृत दुश्चिता, प्रतिक्रियात्मक अवसाद या दुर्गति के लक्षणों में कमी आना जीवन की गुणवत्ता में सुधार से संबंधित नहीं हो सकता है। कई रोगी नकारात्मक क्षणों से ग्रसित होते हैं। जैसे-काम करने या दूसरे लोगों के साथ अन्योन्यक्रिया में अभिरुचि तथा अभिप्रेरणा का अभाव। इस तरह के रोगियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पुनःस्थापना की आवश्यकता होती है। पुनःस्थापना का उद्देश्य रोगी को सशक्त बनाना होता है जिससे जितना संभव हो सके वह समाज का एक उत्पादक सदस्य बन सके।

पुनःस्थापन में रोगियों को व्यावसायिक चिकित्सा, सामाजिक कौशल प्रशिक्षण तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा: है। व्यावसायिक चिकित्सा में रोगियों को मोमबत्ती बनाना, कागज की थैली बनाना और कपड़ा बुनना सिखाया जाता है जिससे वे एक कार्य अनुशासन बना सकें। भूमिका निर्वाह, अनुकरण और अनुदेश के माध्यम से रोगियों को सामाजिक कौशल प्रशिक्षण दिया जाता है जिसे कि वे अंतवैयक्तिक कौशल विकसित कर सकें। इसका उद्देश्य होता है रोगी को सामाजिक समूह में काम करना सिखाना। संज्ञानात्मक पुनः प्रशिक्षण मूल संज्ञानात्मक प्रकार्यों; जैसे-अवधान, स्मृति और अधिशासी प्रकार्यों में सुधार लाने के लिए दिया जाता हैं जब रोगी में पर्याप्त सुधार आ जाता है तो उसे व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है जिसमें उत्पादक रोजगार प्रारंभ करने के लिए आवश्यक कौशलों में अर्जन में उसकी मदद की जाती है।

प्रश्न 9.
छिपकली/तिलचट्टा के दुर्भीति भय का सामाजिक अधिगम सिद्धांतकार किस प्रकार स्पष्टीकरण करेगा? इसी दुर्भीति का एक मनोविश्लेषक किस प्रकार स्पष्टीकरण करेगा?
उत्तर:
छिपकली/तिलचट्टा आदि से होनेवाले भय को दुर्भीति कहते हैं। जिन लोगों को दुर्भीति होती है उन्हें किसी विशिष्ट वस्तु लोग या स्थितियों के प्रति अविवेकी या अर्वक भय होता है। यह बहुधा दुश्चिता विकार से उत्पन्न होती है। दुर्भीति या अविवेकी भय के उपचार के लिए वोल्प द्वारा प्रतिपादित क्रमित विसंवेदनीकरण एक तकनीक है। छिपकली/तिलचट्टा के दुर्भीति भय वाले व्यक्ति का साक्षात्कार मनोविश्लेषक भय उत्पन्न करनेवाली स्थितियों को जानने के लिए किया जाता है तथा सेवार्थी के साथ-साथ चिकित्सक भय उत्पन्न करनेवाले उद्दीपकों का एक पदानुक्रम तैयार करता है तथा सबसे नीचे रखता हैं मनोविश्लेषक सेवार्थी को विभ्रांत करता है और सबको कम दुश्चिता उत्पन्न करनेवाली स्थिति के बारे में सोचने को कहता है।

सेवार्थी से कहा जाता है कि जरा-सा भी तनाव महसूस करने पर भयानक स्थिति के बारे में सोचना बंद कर दे। कई सत्रों के पश्चात् सेवार्थी विश्रांति की अवस्था बनाए रखते हुए तीव्र भय उत्पन्न करनेवाली स्थितियों के बारे में सोचने में समर्थ हो जाता है। इस प्रकार सेवार्थी छिपकली या तिलचट्टा के भय के प्रति विसंवेदनशील हो जाता है। जहाँ अन्योन्य प्रावरोध का सिद्धांत क्रियाशील होता है। पहले विश्रांति की अनुक्रिया विकसित की जाती है तत्पश्चात् धीरे से दुश्चिता उत्पन्न करनेवाले दृश्य की कल्पना की जाती है और विश्रांति से दुश्चिता पर विजय प्राप्त की जाती है। इसके अतिरिक्त मनोविश्लेषक सौम्य बिना धमकी वाले किन्तु सेवार्थी के दुर्भीति भय का खंडन करनेवाले प्रश्न करता हैं। ये प्रश्न सेवार्थी को दुर्भीति भय की विपरीत दिशा में सोचने को बाध्य करते हैं जो दुश्चिता को घटाती है। सामाजिक अधिगम सिद्धान्तकार सामाजिक पक्षों को पर्यावरण परिवर्तन द्वारा स्पष्ट करेगा।

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प्रश्न 10.
क्या विद्युत-आक्षेपी चिकित्सा मानसिक विकारों के उपचार के लिए प्रयुक्त की जानी चाहिए?
उत्तर:
विद्युत-आक्षेपी चिकित्सा:
विद्युत आक्षेपी चिकित्सा जैव-आयुर्विज्ञान चिकित्सा का एक दूसरा प्रकार है। इलेक्ट्रोड द्वारा बिजली के हल्के आघात रोगी के मस्तिष्क में दिए जाते हैं जिससे आक्षेप उत्पन्न हो सके। जब रोगी के सुधार के लिए बिजली के आघात आवश्यक समझे जाते हैं तो ये केवल मनोरोगविज्ञानी के द्वारा ही दिए जाते हैं। विद्युत-आक्षेपी चिकित्सा एक नयी उपचार नहीं है और यह तभी दिया जाता है जब दवाएँ रोगी के लक्षणों को नियंत्रित करने में प्रभावी नहीं होती हैं।

प्रश्न 11.
किस प्रकार की समस्याओं के लिए संज्ञानातमक व्यवहार चिकित्सा सबसे उपयुक्त मानी जाती है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक विकारों जैसे-दुश्चिता, अवसाद, आंतक दौरा, सीमावर्ती व्यक्तित्व इत्यादि के लिए एक संक्षिप्त एवं प्रभावोत्पादक उपचार है।

Bihar Board Class 12 Psychology चिकित्सा उपागम Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सहानुभूति क्या होती है?
उत्तर:
तद्नुभूति में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की दुर्दशा को समझ सकता है तथा उसी की तरह अनुभव कर सकता है।

प्रश्न 2.
तद्नुभूति क्या होती है?
उत्तर:
तनुभूति में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की दुर्दशा को समझ सकता है तथा उसी की. तरह अनुभव कर सकता है।

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प्रश्न 3.
मनश्चिकित्सा को कितने समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:
मनश्चिकित्सा को तीन व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

  1. मनोगतिक मनश्चिकित्सा
  2. व्यवहार मनश्चिकित्सा
  3. अस्तित्वपरक मनश्चिकित्सा

प्रश्न 4.
व्यवहार चिकित्सा के अनुसार मनोवैज्ञानिक समस्याएँ किस कारण उत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
व्यवहार चिकित्सा के अनुसार मनोवैज्ञानिक समस्याएँ व्यवहार एवं संज्ञान के दोषपूर्ण अधिगम के कारण उत्पन्न होती है।

प्रश्न 5.
अस्तित्वपरक चिकित्सा की क्या अवधारणा है?
उत्तर:
अस्तित्वपरक चिकित्सा की अवधारणा है कि अपने जीवन और अस्तित्व के अर्थ में संबंधित प्रश्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण होते हैं।

प्रश्न 6.
मनोगतिक चिकित्सा में क्या उत्पन्न किया जाता है?
उत्तर:
मनोगतिक चिकित्सा में बाल्यावस्था की अतृप्त इच्छाएँ तथा बाल्यावस्था के अनसुलझे भय अंत: मनोद्वंद्व को उत्पन्न करते हैं।

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प्रश्न 7.
व्यवहार चिकित्सा की अभिधारण क्या है?
उत्तर:
व्यवहार चिकित्सा की अभिधारण है कि दोषपूर्ण अनुबंधन प्रतिरूप, दोषपूर्ण अधिगम तथा दोषपूर्ण चिंतन एवं विश्वास दुरनुकूलक व्यवहारों को उत्पन्न करते हैं जो बाद में मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण बनते हैं।

प्रश्न 8.
अस्तित्वपरक चिकित्सा किसे महत्त्व देती है?
उत्तर:
अस्तित्वपरक चिकित्सा वर्तमान को महत्त्व देती है। यह व्यक्ति के अकेलेपन, विसबंधन, अपने अस्तित्व की व्यर्थता के बोध इत्यादि से जुड़ी वर्तमान भावनाएँ हैं जो मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण है।

प्रश्न 9.
मनोगतिक चिकित्सा के उपचार की मुख्य विधि क्या है?
उत्तर:
मनोगतिक चिकित्सा मुक्त साहचर्य विधि और स्वप्न को बताने की विधि का उपयोग सेवार्थी की भावनाओं और विचारों को प्राप्त करने के लिए करती है। इस सामग्री की व्याख्या सेवार्थी के समक्ष की जाती है ताकि इसकी मदद से वह अपने द्वंद्वों का सामना और समाधान कर अपनी समस्याओं पर विजय पा सके।

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प्रश्न 10.
मानवतावादी चिकित्सा किसे मुख्य लाभ मानती है?
उत्तर:
मानवतावादी चिकित्सा व्यक्तिगत संवृद्धि को मुख्य लाभ मानती है।

प्रश्न 11.
व्यक्तिगत संवृद्धि क्या है?
उत्तर:
व्यक्तिगत संवृद्धि अपने बारे में और अपनी आकांक्षाओं, संवेगों तथा अभिप्रेरकों के बारे में बढ़ती समझ प्राप्त करने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 12.
मनोगतिक चिकित्सा का प्रतिपादन किसने किया था?
उत्तर:
मनोगतिक चिकित्सा का प्रतिपादन फ्रायड द्वारा किया गया था।

प्रश्न 13.
अंत: मनोद्वंद्व को बाहर निकालने के लिए किन विधियों का आविष्कार किया गया?
उत्तर:
अंत: मनोद्वंद्व को बाहर निकालने के लिए दो महत्त्वपूर्ण विधियाँ-मुक्त साहचर्य विधि तथा स्वप्न व्याख्या विधि का आविष्कार किया गया।

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प्रश्न 14.
सेवार्थी की समस्याओं को समझने की प्रमुख विधि क्या है?
उत्तर:
मुक्त साहचर्य विधि सेवार्थी की समस्याओं को समझने की प्रमुख विधि है।

प्रश्न 15.
मनश्चिकित्सा क्या है?
उत्तर:
मनश्चिकित्सा उपचार चाहनेवाले या सेवार्थी तथा उपचार करनेवाले या चिकित्सक के बीच में एक ऐच्छिक संबंध है।

प्रश्न 16.
मनश्चिकित्सा का क्या उद्देश्य होता है?
उत्तर:
मनश्चिकित्सा का उद्देश्य दुरनुकूलक व्यवहारों को बदलना, वैयक्तिक कष्ट की भावना को कम करना तथा रोगी को अपने पर्यावरण से बेहतर ढंग से अनुकूलन करने में मदद करना है।

प्रश्न 17.
चिकित्सात्मक मैत्री किसे कहते हैं?
उत्तर:
सेवार्थी एवं चिकित्सक के बीच एक विशेष संबंध को चिकित्सात्मक संबंध या चिकित्सात्मक मैत्री कहा जाता है। यह न तो एक क्षणिक परिचय होता है और न ही एक स्थायी एवं टिकाऊ संबंध।

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प्रश्न 18.
चिकित्सात्मक मैत्री के दो मुख्य घटक कौन-से है?
उत्तर:
चिकित्सात्मक मैत्री के दो मुख्य घटक हैं –

  1. पहला घटक इस संबंध की संविदात्मक प्रकृति है, जिसमें दो इच्छुक व्यक्ति, सेवार्थी एवं चिकित्सक, एक ऐसी साझेदारी भागीदारी में प्रवेश करते हैं जिसका उद्देश्य सेवार्थी की समस्याओं का निराकरण करने में उसकी मदद करना होता है।
  2. दूसरा घटक है-चिकित्सा की सीमित अवधि।

प्रश्न 19.
निर्वचन की दो विश्लेषणात्मक तकनीक कौन-सी है?
उत्तर:
प्रतिरोध तथा स्पष्टीकरण निर्वचन की दो विश्लेषणात्मक तकनीक है।

प्रश्न 20.
प्रतिरोध क्या है?
उत्तर:
प्रतिरोध निर्वचन की विश्लेषणात्मक तकनीक है जिसमें चिकित्सक सेवार्थी के किसी एक मानसिक पक्ष की ओर संकेत करता है जिसका सामना सेवार्थी को अवश्य करना चाहिए।

प्रश्न 21.
स्पष्टीकरण क्या है?
उत्तर:
स्पष्टीकरण एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से चिकित्सक किसी अस्पष्ट या भ्रामक घटना को केन्द्रबिन्दु में लाता है।

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प्रश्न 22.
समाकलन कार्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रतिरोध, स्पष्टीकरण तथा निर्वचन को प्रयुक्त करने की पुनरावृत प्रक्रिया को समाकलन कार्य कहते हैं।

प्रश्न 23.
समाकलन कार्य में क्या कार्य होता है?
उत्तर:
समाकलन कार्य रोगी को अपने आपको और अपनी समस्या के स्रोत को समझने में तथा बाहर आई सामग्री को अपने अहं में समाकलित करने में सहायता करता है।

प्रश्न 24.
‘अंतर्दृष्टि’ से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अंतर्दृष्टि एक क्रमिक प्रक्रिया है जहाँ अचेतन स्मृतियाँ लगातार सचेतन अभिज्ञता में समाकलित होती रहती है; ये अचेतन घटनाएँ एवं स्मृतियाँ अन्यारोपण में पुनः अनुभूत होती हैं और समाकलित की जाती हैं।

प्रश्न 25.
सांवेगिक समझ से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सांवेगिक समझ भूतकाल की अप्रीतिकर घटनाओं के प्रति अपनी अविवेकी प्रतिक्रिया की स्वीकृति, सांवेगिक रूप से परिवर्तन की तत्परता तथा परिवर्तन करना सांवेगिक अंतर्दृष्टि है।

प्रश्न 26.
सकारात्मक अन्यारोपण क्या है?
उत्तर:
कारात्मक अन्यारोपण में सेवार्थी चिकित्सक की पूजा करने लगता है या उससे प्रेम करने लगता है और चिकित्सक का अनुमोदन चाहता है।

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प्रश्न 27.
नकारात्मक अन्यारोपण कब प्रदर्शित होता है?
उत्तर:
नकारात्मक अन्यारोपण तब प्रदर्शित होता है जब सेवार्थी में चिकित्सक के प्रति शत्रुता, क्रोध और अमर्ष या अप्रसन्नता की भावना होती है।

प्रश्न 28.
अन्यारोपण की प्रक्रिया में प्रतिरोध क्यों होता है?
उत्तर:
चूँकि अन्यारोपण की प्रक्रिया अचेतन इच्छाओं और द्वंद्वों को अनावृत्त करती है, जिससे कष्ट का स्तर बढ़ जाता है इसलिए सेवार्थी अन्यारोपण का प्रतिरोध करता है।

प्रश्न 29.
सचेत प्रतिरोध कब होता है?
उत्तर:
सचेत प्रतिरोध तब होता है जब सेवार्थी जान-बूझकर किसी सूचना को छिपाता।

प्रश्न 30.
अचेतन प्रतिरोध कब होता है?
उत्तर:
अचेतन प्रतिरोध तब माना जाता है जब सेवार्थी चिकित्सा सत्र के दौरान मूक या चुप हो जाता है, तुच्छ बातों का पुनः स्मरण करता है किन्तु संवेगात्मक बातों का नहीं, नियोजित भेंट में अनुपस्थित होता है तथा चिकित्सा सत्र के लिए देर से आता है।

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प्रश्न 31.
परिवर्तन को किस युक्ति द्वारा प्रभावित किया जाता है?
उत्तर:
निर्वचन मूल युक्ति है जिससे परिवर्तन को प्रभावित किया जाता है।

प्रश्न 32.
विमुखी अनुबंधन क्या है?
उत्तर:
विमुखी अनुबंधन का संबंध अवांछित अनुक्रिया के विमुखी परिणाम के साथ पुनरावृत्त साहचर्य से है।

प्रश्न 33.
निषेधात्मक प्रबलन का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
एक अध्यापक कक्षा में शोर मचाने के लिए एक बालक को फटकार लगाता है, यह निषेधात्मक प्रबलन है।

प्रश्न 34.
निषेधात्मक प्रबलन से आपका क्या तात्पर्य है।
उत्तर:
निषेधात्मक प्रबलन का तात्पर्य अवांछित अनुक्रिया के साथ संलग्न एक ऐसे परिणाम से है जो कष्टकर या पसंद न किया जानेवाला हो।

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प्रश्न 35.
अन्योग्य प्रावरोध का सिद्धांत क्या है?
उत्तर:
इस सिद्धांत के अनुसार दो परस्पर विरोधी शक्तियों की एक ही समय में उपस्थिति कमजोर शक्ति को अवरुद्ध करती है। अतः, पहले विश्रांति की अनुक्रिया विकसित की जाती है तत्पश्चात् धीरे से दुश्चिता उत्पन करनेवाले दृश्य की कल्पना की जाती है और विश्रांति से दुश्चिता पर विजय प्राप्त की जाती है। सेवार्थी अपनी विश्रांत अवस्था के कारण प्रगामी तीव्रतर दुश्चिता को सहन करने योग्य हो जाता है।

प्रश्न 36.
प्रगामी पेशीय विश्रांति क्या है?
उत्तर:
प्रगामी पेशीय विश्रांति दुश्चिता के स्तर को कम करने की एक विधि है जिसमें सेवार्थी को पेशीय तनाव या तनाव के प्रति जागरुकता लाने के लिए, विशिष्ट पेशी समूहों को संकुचित करना सिखाया जाता है।

प्रश्न 37.
क्रमिक विसंवेदीकरण को किसने प्रतिपादित किया था?
उत्तर:
दुर्भाति या अविवेकी भय के उपचार के लिए वोल्प द्वारा प्रतिपादित क्रमिक विसंवेदनीकरण एक तकनीक है।

प्रश्न 38.
विभेदक प्रबलन क्या है?
उत्तर:
विभेदक प्रबलन द्वारा एक साथ अवांछित व्यवहार को घटाया जा सकता है तथा वांछित व्यवहार को बढ़ावा दिया जा सकता है।

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प्रश्न 39.
विमुखी अनुबंधन का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
एक मद्यव्यसनी को बिजली का एक हल्का आघात दिया जाए और मद्य सूंघने को कहा जाए। ऐसे पुरावृत्त युग्मन से मद्य की गंधक उसके लिए अरुचिकर हो जाएगी क्योंकि बिजली के आघात की पीड़ा के साथ इसका साहचर्य स्थापित हो जाएगा और व्यक्ति मद्य छोड़ देगा।

प्रश्न 40.
सकारात्मक प्रबलन कब दिया जाता है?
उत्तर:
यदि कोई अनुकूली व्यवहार कभी-कभी ही घटित होता है तो इस न्यूनता को बढ़ाने के लिए सकारात्मक प्रबलन दिया जाता है।

प्रश्न 41.
सकारात्मक प्रबलन का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
यदि कोई बालक गृहकार्य नियमित रूप से नहीं करता तो उसकी माँ नियत समय गृहकार्य करने के लिए सकारात्मक प्रबलन के रूप में बच्चे का मनपसंद पकवान बनाकर दे सकती है। मनपसंद भोजन का सकारात्मक प्रबलन उसके नियम समय पर गृहकार्य करने के व्यवहार को बढ़ाएगा।

प्रश्न 42.
टोकन अर्थव्यवस्था किसे कहते हैं?
उत्तर:
व्यवहारात्मक समस्याओं वाले लोगों को कोई वांछित व्यवहार करने पर हर बार पुरस्कार के रूप में एक टोकन दिया जा सकता है। ये टोकन संगृहीत किए जाते हैं और किसी पुरस्कार से उनका विनिमय या आदान-प्रदान किया जाता है, जैसे रोगी को बाहर घुमाने ले जाना। इसे टोकन अर्थव्यवस्था कहते हैं।

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प्रश्न 43.
अपक्रियात्मक व्यवहार क्या होते हैं?
उत्तर:
अपक्रियात्मक व्यवहार वे व्यवहार होते हैं जो सेवार्थी को कष्ट प्रदान करते हैं।

प्रश्न 44.
व्यवहार चिकित्सा का आधार क्या होता है?
उत्तर:
व्यवहार चिकित्सा का आधार दोषपूर्ण या अपक्रियात्मक व्यवहार को निरूपित करना, इस व्यवहारों को प्रबलित तथा संपोषित करने वाले कारकों तथा उन विधियों को खोजना है जिनसे उन्हें परिवर्तित किया जा सके।

प्रश्न 45.
व्यवहार चिकित्सा का केन्द्र बिन्दु क्या होता है?
उत्तर:
व्यवहार चिकित्सा का केन्द्र बिन्दु सेवार्थी में विद्यमान व्यवहार और विचार होते हैं।

प्रश्न 46.
व्यवहार चिकित्सा के अनुसार मनोवैज्ञानिक कष्ट क्यों उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
व्यवहार चिकित्सा के अनुसार मनोवैज्ञानिक कष्ट दोषपूर्ण व्यवहार प्रतिरूपों या विचार प्रतिरूपों के कारण उत्पन्न होते हैं।

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प्रश्न 47.
पूर्ववर्ती कारक क्या होते हैं?
उत्तर:
पूर्ववर्ती कारक वे कारक होते हैं जो व्यक्ति को उस व्यवहार में मग्न हो जाने के लिए पहले ही से प्रवृत्त कर देते हैं।

प्रश्न 48.
संपोषण कारक क्या होते हैं?
उत्तर:
संपोषण कारक वे कारक होते हैं जो दोषपूर्ण व्यवहार के स्थायित्व को प्रेरित करते हैं।

प्रश्न 49.
स्थापन संक्रिया का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
यदि एक बच्चा रात का भोजन करने में परेशान करता है तो स्थापन संक्रिया यह होगी कि चायकाल के समय खाने की मात्रा को घटा दिया जाए। उससे रात के भोजन के समय भूख बढ़ जाएगी तथा इस प्रकार रात के भोजन के समय खाने का प्रबलन मूल्य बढ़ जाएगा।

प्रश्न 50.
व्यवहार को परिवर्तित करने की तकनीकों का क्या सिद्धांत है?
उत्तर:
व्यवहार को परिवर्तित करने की तकनीकों का सिद्धांत है सेवार्थी के भाव-प्रबोधन स्तर को कम करना, प्राचीन अनुबंधन या क्रियाप्रसूत अनुबंधन द्वारा व्यवहार को बदलना जिसमें प्रबलन की भिन्न-भिन्न प्रासंगिकता हो, साथ ही यदि आवश्यकता हो तो प्रतिस्थानिक अधिगम प्रक्रिया का भी उपयोग करना।

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प्रश्न 51.
व्यवहार परिष्करण की मुख्य तकनीक क्या है?
उत्तर:
व्यवहार परिष्करण की दो मुख्य तकनीकें हैं-निषेधात्मक प्रबलन तथा विमुखी अनुबंधन।

प्रश्न 52.
मॉडलिंग प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:
मॉडलिंग या प्रतिरूपण की प्रक्रिया में सेवार्थी एक विशेष प्रकार से व्यवहार करना सीखता है। इसमें वह कोई भूमिका-प्रतिरूप या चिकित्सक, जो प्रारंभ में भूमिका प्रतिरूप की तरह कार्य करता है, के व्यवहार का प्रेक्षण करके उस व्यवहार को करना सीखता है।

प्रश्न 53.
मुक्त साहचर्य विधि किसे कहते हैं?
उत्तर:
सेवार्थी को एक विचार को दूसरे विचार से मुक्त रूप से संबद्ध करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और इस विधि को मुक्त साहचर्य विधि कहते हैं।

प्रश्न 54.
रोगी के उपचार करने का क्या उपाय है?
उत्तर:
अन्यारोपन तथा व्याख्या या निर्वचन रोगी का उपचार करने के उपाय हैं।

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प्रश्न 55.
सेवार्थी केन्द्रित चिकित्सा किसने प्रतिपादित की थी?
उत्तर:
सेवार्थी केन्द्रित चिकित्सा कार्ल राबर्स द्वारा प्रतिपादित की गई थी।

प्रश्न 56.
गेस्टाल्ट चिकित्सा का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
गेस्टाल्ट चिकित्सा का उद्देश्य व्यक्ति की आत्म-जागरुकता एवं आत्म-स्वीकृति के स्तर को बढ़ाना होता है।

प्रश्न 57.
उद्बोधक चिकित्सा का क्या उद्देश्य होता है?
उत्तर:
उद्बोधक चिकित्सा का उद्देश्य अपने जीवन की परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना – जीवन में अर्थवत्ता और उत्तरदायित्व बोध प्राप्त कराने में सेवार्थी की सहायता करना है।

प्रश्न 58.
संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा किस प्रकार के मनोवैज्ञानिक विकारों का उपचार करती है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक विकारों; जैसे-दुश्चिता, अवसाद, आंतक दौरा, सीमवर्ती व्यक्तित्व इत्यादि के लिए एक संक्षिप्त और प्रभावोत्पादक उपचार है।

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प्रश्न 59.
वर्तमान में मनोविकार के लिए किस चिकित्सा का सर्वाधिक प्रयोग होता है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा का।

प्रश्न 60.
आरन बेक का संज्ञानात्मक सिद्धांत क्या हैं?
उत्तर:
आरन बेक के संज्ञानात्मक सिद्धांत के अनुसार परिवार और समाज द्वारा दिये गये बाल्यावस्था के अनुभव मूल अन्विति योजना या मूल स्कीमा या तंत्र के रूप में विकसित हो जाते हैं, जिसमें व्यक्ति के विश्वास और क्रिया के प्रतिरूप सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 61.
प्रतिस्थानिक अधिगम क्या है?
उत्तर:
दूसरों का प्रेक्षण करते हुए सीखना को प्रतिस्थानिक अधिगम कहते हैं।

प्रश्न 62.
संज्ञानात्मक चिकित्सा में मनोवैज्ञानिक कष्ट का कारण किसे माना जाता है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक चिकित्साओं में मनोवैज्ञानिक कष्ट का कारण विवेकी विचारों और विश्वासों में स्थापित किया जाता है।

प्रश्न 63.
संवेग तर्क चिकित्सा को किसने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
अल्बर्ट एलिस ने संवेग तर्क चिकित्सा को प्रतिपादित किया।

प्रश्न 64.
संवेग तर्क चिकित्सा की केन्द्रीय धारणा क्या है?
उत्तर:
इस चिकित्सा की केन्द्रीय धारण है कि अविवेकी विश्वास पूर्ववर्ती घटनाओं ओर उनके परिणामों के बीच मध्यस्थ करते हैं।

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प्रश्न 65.
संवेग तर्क चिकित्सा में पहला चरण क्या है?
उत्तर:
संवेग तर्क चिकित्सा में पहला चरण है-पूर्ववर्ती विश्वास-परिणाम विश्लेषण।

प्रश्न 66.
अविवेकी विश्वासों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
अविवेकी विश्वासों के उदाहरण हैं; जैसे-किसी को हर एक का प्यार हर समय मिलना चाहिए: मनुष्य की तंगहाली बाह्य घटनाओं के कारण होती है जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं होता, इत्यादि।

प्रश्न 67.
अविवेकी विश्वासों के क्या परिणाम होते हैं?
उत्तर:
अविवेकी विश्वासों के कारण पूर्ववर्ती घटना का विकृत प्रत्यक्षण नकारात्मक संवेगों और व्यवहारों के परिणाम का कारण बनता है।

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प्रश्न 68.
अविवेकी विश्वासों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
अविवेकी विश्वासों का मूल्यांकन प्रश्नावली और साक्षात्कार के द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 69.
अपक्रियात्मक संज्ञानात्मक संरचना किसे कहते हैं?
उत्तर:
संज्ञानात्मक विकृतियाँ चिंतन के ऐसे तरीके है जो सामान्य प्रकृति के होते हैं किन्तु वे वास्तविकता को नकारात्मक तरीके से विकृत करते हैं। विचारों के इन प्रतिरूपी को अपक्रियात्मक संज्ञानात्मक संरचना कहते हैं।

प्रश्न 70.
उद्बोधक चिकित्सा को किसने प्रतिपादित किया था?
उत्तर:
विक्टर फ्रेंसल ने उद्बोधक चिकित्सा को प्रभावित किया।

प्रश्न 71.
विद्युत-आक्षेपी चिकित्सा क्या है?
उत्तर:
विद्युत-आक्षेपी चिकित्सा जैव-आयुर्विज्ञान चिकित्सा का एक प्रकार है जिसमें इलेक्ट्रोड द्वारा बिजली के हल्के आघात रोगी के मस्तिष्क में दिए जाते हैं जिससे आक्षेप उत्पन्न हो सके।

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प्रश्न 72.
सुदर्शन क्रिया योग में कौन-सी तकनीक उपयोग में लाई जाती है?
उत्तर:
तीव्र गति से श्वास लेने की तकनीक, जो अत्यधिक वायु संचार करती है, सुदर्शन क्रिया योग से उपयोग की जाती है।

प्रश्न 73.
तीव्र गति से श्वास लेने की तकनीक से किस प्रकार विकारों में फायदा होता है?
उत्तर:
यह दबाव, दुश्चिता, अभिघातज उत्तर दबाव विकार, अवसाद, दबाव-संबंधी चिकित्सा रोग, मादक द्रव्यों का दुरुपयोग तथा अपराधियों के पुन:स्थापन के लिए उपयोग की जाती है।

प्रश्न 74.
गेस्टाल्ट चिकित्सा को किसने प्रतिपादित किया।
उत्तर:
गेस्टाल्ट चिकित्सा फ्रेडरिक पर्ल्स ने अपनी पत्नी लॉरा पर्ल्स के साथ प्रस्तुत की थी।

प्रश्न 75.
कुछ वैकल्पिक चिकित्सा के नाम लिखिए।
उत्तर:
योग, ध्यान, सेक्यूपंक्चर, वनौषधि, उपचार इत्यादि वैकल्पिक चिकित्साएँ हैं।

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प्रश्न 76.
योग का क्या आशय है?
उत्तर:
योग का आशय केवल आसन या शरीर संस्थिति घटक अथवा श्वसन अभ्यास या प्राणायाम अथवा दोनों के संयोग से होता है।

प्रश्न 77.
ध्यान का संबंध किससे होता है?
उत्तर:
ध्यान का संबंध श्वास अथवा किसी वस्तु या विचार या किसी मंत्र पर ध्यान केन्द्रित करने के अभ्यास से है।

प्रश्न 78.
विपश्यना ध्यान क्या है?
उत्तर:
विपश्यना ध्यान, जिसे सतर्कता आधारित ध्यान के नाम से भी जाना जाता है, में ध्यान को बाँधे रखने के लिए कोई निष्क्रिय रूप से विभिन्न शारीरिक संवेदनाओं एवं विचारों, जो उसकी चेतना में आते रहते हैं, का प्रेक्षण करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मनश्चिकित्सात्मक उपागमों में पाए जानेवाले अभिलक्षणों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सभी मनश्चिकित्सात्मक उपागमों में निम्न अभिलक्षण पाए जाते हैं:

  1. चिकित्सा के विभिन्न सिद्धांतों में अंतर्निहित नियमों का व्यवस्थित या क्रमबद्ध अनुप्रयोग होता है।
  2. केवल वे व्यक्ति, जिन्होंने कुशल पर्यवेक्षण में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया हो, मनश्चिकित्सा कर सकते हैं, हर कोई नहीं।
  3. चिकित्सात्मक स्थितियों में एक चिकित्सक और एक सेवार्थी होता है जो अपनी संवेगात्मक समस्याओं के लिए सहायता चाहता है और प्राप्त करता है।
  4. इन दोनों व्यक्तियों, चिकित्सक एवं सेवार्थी के बीच की अंत:क्रिया के परिणामस्वरूप एवं चिकित्सात्मक संबंध का निर्माण एवं उसका सुदृढीकरण होता है। यह एक गोपनीय, अंतर्वैयक्तिक एवं गत्यात्मक संबंध होता है। वही मानवीय संबंध किसी भी मनोविज्ञान चिकित्सा का केन्द्र होता है तथा यही परिवर्तन का माध्य बनता है।

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प्रश्न 2.
मनश्चिकित्साओं के उद्देश्यों को लिखिए।
उत्तर:
सभी मनश्चिकित्साओं के उद्देश्य निम्नलिखित लक्ष्यों में कुछ या सब होते हैं –

  1. सेवार्थी के सुधार के संकल्प को प्रबलित करना।
  2. संवेगात्मक दबाव को कम करना।
  3. सकारात्मक विकास के लिए संभाव्यताओं को प्रकट करना।
  4. आदतों में संशोधन करना।
  5. चिंतन के प्रतिरूपों में परिवर्तन करना।
  6. आत्म-जागरुकता को बढ़ावा।
  7. अंतवैयक्तिक संबंधों एवं संप्रेषण में सुधार करना।
  8. निर्णयन को सुकर बनाना।
  9. जीवन में अपने विकल्पों के प्रति जागरूक होना।
  10. अपने सामाजिक पर्यावरण से एक सर्जनात्मक एवं आत्म-जागरूक तरीके से संबंधित होना।

प्रश्न 3.
सहानुभूति तथा तद्नुभूति में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
तनुभूति सहानुभूति तथा किसी दूसरे व्यक्ति की स्थिति की बौद्धिक समझ से भिन्न होती है। सहानुभूति में व्यक्ति को दूसरे के कष्ट के प्रति दया और करुणा होती है किन्तु दूसरे व्यक्ति की तरह वह अनुभव नहीं कर सकता। बौद्धिक समझ भाव-शून्य इस आशय से होती है कि कोई व्यक्ति की दुर्दशा को समझ सकता है तथा उसकी की तरह अनुभव कर सकता है। इसका तात्पर्य हुआ है कि दूसरे व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से या उसके स्थान पर स्वयं को रखकर बातों को समझना। तद्नुभूति चिकित्सात्मक संबंध को समृद्ध बनाती है तथा इसे एक स्वास्थ्यकर संबंध में परिवर्तित करती है।

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प्रश्न 4.
नैदानिक निरूपण के क्या लाभ हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नैदानिक निरूपण के निम्नलिखित लाभ हैं –
1. समस्या की समझ-चिकित्सा सेवार्थी द्वारा अनुभव किए जा रहे कष्टों के निहितार्थों को समझने में समर्थ होता है।

2. मनश्चिकित्सा में उपचार हेतु लक्ष्य क्षेत्रों की पहचान-सैद्धांतिक निरूपण में चिकित्सा के लिए समस्या के लक्ष्य-क्षेत्रों की स्पष्ट रूप से पहचान की जाती है। अतः, यदि कोई सेवार्थी किसी नौकरी पर बने रहने में असमर्थता के लिए मदद चाहता है और अपने उच्च अधिकारियों का सामना करने में असमर्थता अभिव्यक्त करता है तो व्यवहार चिकित्सा में नैदानिक निरूपण इसे दुश्चिता तथा आग्रहिता कौशलों में कमी बताएगा । अतः अपने आपको निश्चयात्मक रूप से व्यक्त करने में असमर्थता अभिव्यक्त तथा बढ़ी हुई दुश्चिता लक्ष्य-क्षेत्र के रूप में पहचाने गए।

3. उपचार के लिए तकनीक का वरण या चुनाव-उपचार के लिए तकनीक का मुख्य चुनाव इस बात पर निर्भर करना है कि चिकित्सक किस प्रकार की चिकित्सात्मक व्यवस्था में चिकित्सा के परिणाम से प्रत्याशाएँ नैदानिक निरूपण पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 5.
“अन्यारोपण की प्रक्रिया में प्रतिरोध भी होता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अन्यारोपण की प्रक्रिया में प्रतिरोध (Resistance) भी होता है। चूंकि अन्यारोपण की प्रक्रिया अचेतन इच्छाओं और द्वंद्वों को अनावृत करती है, जिससे कष्ट का स्तर बढ़ जाता है। इसलिए सेवार्थी अन्यारोपण का प्रतिरोध करना है। इस प्रतिरोध के कारण अपने आपको अचेतन मन की कष्टकर स्मृतियों के पुनः स्मरण से बचाने के लिए सेवार्थी चिकित्सा की प्रगति का विरोध करता है। प्रतिरोध सचेतन और अचेतन दोनों हो सकता है।

सचेतन प्रतिरोध तब होता है जब सेवार्थी जान-बूझकर किसी सूचना को छिपाता है। अचेतन प्रतिरोध तब उपस्थित माना जाता है, जब सेवार्थी चिकित्सा सत्र के दौरान मूक या चुप हो जाता है, तुच्छ बातों का पुनः स्मरण करता है किन्तु संवेगात्मक बातों का नहीं, नियोजित भेंट में अनुपस्थित होता है तथा चिकित्सा सत्र के लिए देर से आता है। चिकित्सक बार-बार इसे सेवार्थी के सामने रखकर तथा दुश्चिता, भय, शर्म जैसे संवेगों को उभार कर, जो इस प्रतिरोध के कारण हैं, इस प्रतिरोध पर विजय प्राप्त करता है।

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प्रश्न 6.
निर्वचन की विश्लेषणात्मक तकनीकों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
निर्वचन की दो विश्लेषणात्मक तकनीक हैं –

  1. प्रतिरोध
  2. स्पष्टीकरण

प्रतिरोध में चिकित्सक सेवार्थी के किसी एक मानसिक पक्ष की ओर संकेत करता है जिसका सामना सेवार्थी को अवश्य करना चाहिए। स्पष्टीकरण एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से चिकित्सक किसी अस्पष्ट या भ्रामक घटना को केन्द्रबिन्दु में लाता है। यह घटना के महत्त्वपूर्ण विस्तृत वर्णन की महत्त्वहीन वर्णन से अलग करके तथा विशिष्टता प्रदान करके किया जाता है। निर्वचन एक अधिक सूक्ष्म प्रक्रिया है। यह मनोविश्लेषण का शिखर माना जाता है। चिकित्सक मुक्त साहचर्य, स्वप्न व्याख्या, अन्यारोपण तथा प्रतिरोध को प्रक्रिया में अभिव्यक्त अचेतन सामग्री का उपयोग सेवार्थी को अभिज्ञ बनाने के लिए करता है कि किन मानसिक अंतर्वस्तुओं एवं द्वंद्वों ने कुछ घटनाओं, लक्षणों तथा द्वंद्वों को उत्पन्न किया है। निर्वचन बालवस्था में भोगे हुए वंचन या अंत:मनोद्वंद्व पर केन्द्रित हो सकता है।

प्रश्न 7.
समाकलन कार्य किसे कहते हैं? समाकलन कार्य का परिणाम क्या है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
प्रतिरोध, स्पष्टीकरण तथा निर्वचन को प्रयुक्त करने की पुरावृत्त प्रक्रिया को समाकलन कार्य (Working through) कहते हैं। समाकलन कार्य रोगी को अपने आपको और अपनी समस्या के स्रोत को समझने में तथा बाहर आई सामग्री को अपने अहं में समाकलित करने में सहायता करता है। समाकलन कार्य का परिणाम है अंतर्दृष्टि (Insight)। अंतर्दृष्टि कोई आकस्मिक घटना नहीं है बल्कि एक क्रमिक प्रक्रिया है जहाँ अचेतन घटनाएँ स्मृतियाँ अन्यारोपण में पुनः अनुभूत होती हैं और समाकलित की जाती हैं।

जैसे यह प्रक्रिया चलती रहती है, सेवार्थी बौद्धिक एवं सांवेगिक स्तर पर अपने आपको बेहतर समझने लगता है और अपनी समस्याओं और द्वंद्वों के बारे में अंतर्दृष्टि प्राप्त करता है। बौद्धिक अंतर्दृष्टि है। सांवेगिक समझ भूतकाल की अप्रीतिकर घटनाओं के प्रति अपनी अविवेकी प्रतिक्रिया की स्वीकृति, सांवेगिक रूप में परिवर्तन करना सांवेगिक अंतर्दृष्टि चिकित्सा का अंतिम बिन्दु है जब सेवार्थी अपने बारे में एक नई समझ प्राप्त कर चुका होता है। बदले में भूतकाल के द्वंद्व, रक्षा युक्तियाँ और शारीरिक लक्षण भी नहीं रह जाते और सेवार्थी मनोवैज्ञानिक रूप से एक स्वस्थ व्यक्ति हो जाता है। इस अवस्था पर मनोविश्लेषण समाप्त कर दिया जाता है।

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प्रश्न 8.
मनोगतिक चिकित्सा में उपचार की अवधि क्या होती है?
उत्तर:
सप्ताह में चार-पाँच दिनों तक रोज एक घंटे के साथ मनोविश्लेषण कई वर्षों तक चल सकता है। यह एक गहन उपचार है। उपचार में तीन अवस्थाएँ (Three stages) होती हैं। पहली अवस्था प्रारंभिक अवस्था है। सेवार्थी नित्यकर्मी से परिचित हो जाता है, विश्लेषक से एक चिकित्सात्मक संबंध स्थापित करता है तथा अपी चेतना से भूत और वर्तमान को कष्टप्रद घटनाओं के बारे में सतही सामग्रियों को संस्मृति प्रक्रिया से वह कुछ राहत महसूस करता है। दूसरी अवस्था मध्य अवस्था है जो एक लंबी प्रक्रिया है। इसकी विशेषता सेवार्थी की ओर से अन्यारोपण और प्रतिरोध तथा चिकित्सक के द्वारा प्रतिरोध एवं स्पष्टीकरण अर्थात् समाकलन कार्य है। तीसरी अवस्था समाप्ति की अवस्था है जिसमें विश्लेषक के साथ संबंध भंग हो जाता है और सेवार्थी चिकित्सा छोड़ने की तैयारी कर लेता है।

प्रश्न 9.
व्यवहार चिकित्सा क्या है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
व्यवहार चिकित्सा मनश्चिकित्सा का एक प्रकार है –
व्यवहार चिकित्साओं का यह मानना है कि मनोवैज्ञानिक कष्ट दोषपूर्ण व्यवहार प्रतिरूपों या विचार प्रतिरूपों के कारण उत्पन्न होते हैं। अतः इनका केन्द्रबिन्दु सेवार्थी में विद्यमान व्यवहार और विचार होते हैं। उसका अतीत केवल उसके दोषपूर्ण व्यवहार तथा विचार प्रतिरूपों की उत्पत्ति को समझने के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण होता है। अतीत को फिर से सक्रिय नहीं किया जाता। वर्तमान में केवल दोषपूर्ण प्रतिरूपों में सुधार किया जाता है।

अधिगम के सिद्धांतों का नैदानिक अनुप्रयोग की व्यवहार चिकित्सा को गठित करता है। व्यवहार चिकित्सा में विशिष्ट तकनीकों एवं सुधारोन्मुख हस्तक्षेपों का एक विशाल समुच्चय होता है। यह कोई एकीकृत सिद्धांत नहीं है जिसे क्लिनिकल निदान या विद्यमान लक्षणों को ध्यान में रखें बिना अनुप्रयुक्त किया जा सके। अनुप्रयुक्त किए जानेवाली विशिष्ट तकनीकों या सुधारोन्मुख हस्तक्षेपों के चयन में सेवार्थी के लक्षण तथा क्लिनिकल निदान मार्गदर्शक कारक होते हैं।

दुर्भीति या अत्यधिक और अपंगकारी भय के उपचार के लिए तकनीकों के एक समुच्चय को प्रयुक्त करने की आवश्यकता होगी जबकि क्रोध-प्रस्फोटन के उपचार के लिए दूसरी। अवसादग्रस्त सेवार्थी को चिकित्सा दुश्चितित सेवार्थी से भिन्न होगी। व्यवहार चिकित्सा का आधार दोषपूर्ण या अप्रक्रियात्मक व्यवहार को निरूपित करना, इन व्यवहारों को प्रबलित तथा संपोषित करनेवाले कारकों तथा उन विधियों को खोजना है जिनसे उन्हें परिवर्तित किया जा सके।

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प्रश्न 10.
विश्रांत की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विश्रांत की विधियाँ-दुश्चिता मनोवैज्ञानिक कष्ट की अभिव्यक्ति है जिसके लिए सेवार्थी उपचार चाहता है। व्यवहारात्मक चिकित्सा दुश्चिता को सेवार्थी के भाव-प्रबोधन के स्तर को बढ़ाने के रूप में देखता है जो दोषपूर्ण व्यवहार उत्पन्न करने में एक पूर्ववर्ती कारक की तरह कार्य करता है। सेवार्थी दुश्चिता का कम करने के लिए धूम्रपान कर सकता है, अपने आपको अन्य क्रियाओं में निमग्न कर सकता है। जैसे-भोजन या दुश्चिता के कारण लंबे समय तक अपने अध्ययन में एकाग्र नहीं कर पाता है।

अतः, दुश्चिता में कमी अत्यधिक भोजन या धूम्रपान के अवांछित व्यवहारों को कम करेगी। दुश्चिता के स्तर को कम करने के लिए विश्रांति की विधियों का उपयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ, प्रगामी पेशीय विश्रांति और ध्यान एक विश्रांति में सेवार्थी को पेशीय तनाव या तनाव के प्रति जागरुकता लाने के लिए विशिष्ट पेशी समूहों को संकुचित करना सिखाया जाता है। सेवार्थी के पेशी समूह; जैसे-अग्रबाहु को तानना सीखने के बाद सेवार्थी को तनाव को मुक्त करने के लिए कहा जाता है। सेवार्थी को यह भी बताया जाता है कि उसे (सेवार्थी) वर्तमान में ही तनाव है और इसकी विपरीत अवस्था में जाना है। पुरावृत्त अभ्यास के साथ सेवार्थी शरीर की सारी पेशियों को विश्रांत करना सीख जाता है।

प्रश्न 11.
अन्योन्य प्रावरोध के सिद्धांत को समझाइए।
उत्तर:
अन्योन्य प्रावरोध के सिद्धांत के अनुसार दो परस्परविरोधी शक्तियों की एक ही समय में उपस्थिति कमजोर शक्ति को अवरुद्ध करती है। अतः, पहले विश्रांति की अनुक्रिया विकसित की जाती है तत्पश्चात् धीरे-से दुश्चिता उत्पन्न करनेवाले दृश्य की कल्पना की जाती है और विश्रांति से दुश्चिता पर विजय प्राप्त की जाती है। सेवार्थी अपने विश्रांति अवस्था के कारण प्रगामी तीव्रतर दुश्चिता को सहन करने योग्य हो जाता है। मॉडलिंग या प्रतिरूपण (Modelling) की प्रक्रिया में सेवार्थी एक विशेष प्रकार से व्यवहार करना सीखता है।

इसमें वह कोई भूमिका-प्रतिरूप (Role model) या चिकित्सक, जो प्रारंभ में भूमिका-प्रतिरूप की तरह कार्य करता है, के व्यवहार का प्रेक्षण करके उस व्यवहार को करना सीखता है। प्रतिस्थानिक अधिगम अर्थात् दूसरों का व्यवहार का प्रेक्षण करके उस व्यवहार को करना सीखता है। प्रतिस्थानिक अधिगम अर्थात् दूसरों का प्रेक्षण करते हुए सीखना, का उपयोग किया जाता है और व्यवहार में आए हुए छोटे-छोटे मॉडल के व्यवहारों को अर्जित करना सीख जाता है।

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प्रश्न 12.
गेस्टाल्ट चिकित्सा क्या है? उसके क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर:
गेस्टाल्ट चिकित्सा-जर्मन शब्द ‘गेस्टाल्ट’ का अर्थ है-‘समग्र’। यह चिकित्सा फ्रेडेरिक (फ्रिट्ज) पर्ल्स ने अपनी पत्नी लॉरा पर्ल्स के साथ प्रस्तुत की थी। गेस्टाल्ट चिकित्सा का उद्देश्य व्यक्ति की आत्म-जागरुकता एवं आत्म-स्वीकृति के स्तर को बढ़ाना होता है। सेवार्थी को शारीरिक प्रक्रियाओं और संवेगों, जो जागरुकता को अवरुद्ध करते हैं, को पहचानना सिखाया जाता है। चिकित्सक इसके लिए सेवार्थी को अपनी भावनाओं और द्वंद्वों के बारे में उसकी कल्पनाओं की अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करता है। यह चिकित्सा समूहों में भी प्रयुक्त की जा सकती है।

प्रश्न 13.
मनश्चिकित्सा के नैतिक सिद्धांत क्या हैं?
उत्तर:
मनश्चिकित्सा के नैतिक सिद्धांत कुछ नैतिक मानक जिनका व्यवसायी मनोश्चिकित्सकों द्वारा प्रयोग किया जाना चाहिए, वे हैं –

  1. सेवार्थी से सुविज्ञ सहमति लेनी चाहिए।
  2. सेवार्थी की गोपनीयता बनाए रखनी चाहिए।
  3. व्यक्तिगत कष्ट और व्यथा को कम करना मनश्चिकित्सक के प्रत्येक प्रयासों का लक्ष्य होना चाहिए।
  4. चिकित्सक-सेवार्थी संबंध की अखंडता महत्त्वपूर्ण है।
  5. मानव अधिकार एवं गरिमा के लिए आदर।
  6. व्यावसायिक सक्षमता एवं कौशल आवश्यक है।

प्रश्न 14.
संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा पर संक्षेप में एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा-यह सर्वाधिक प्रचलित चिकित्सा पद्धति है। मनोश्चिकित्सा की प्रभावित एवं परिणाम पर किए गए अनुसंधान ने निर्णायक रूप से यह प्रमाणित किया है कि संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक विकारों; जैसे-दुश्चिता, अवसाद, आंतक दौरा, सीमावर्ती व्यक्तित्व इत्यादि के लिए एक संक्षिप्त और प्रभावोत्पादन उपचार है। मनोविकृति रूपरेखा बताने के लिए संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा जैव-मनोसामाजिक उपागम का उपयोग करती है। यह संज्ञानात्मक चिकित्सा को व्यवहारपरक तकनीकों के साथ संयुक्त करती है।

प्रश्न 15.
सुदर्शन क्रिया योग पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सुदर्शन क्रिया योग-तीव्र गति से श्वास लेने की तकनीक, जो अत्यधिक वायु-संचार करती है तथा जो सुदर्शन क्रिया योग में प्रयुक्त की जाती है, लाभदायक, कम खतरेवाली और कम खर्चवाली तकनीक है। यह दबाव, दुश्चिता, अभिघातज उत्तर विकार, अवसाद, दबाव-संबंधी चिकित्सा रोग, मादक द्रव्यों का दुरुपयोग तथा अपराधियों के पुनः स्थापन के लिए उपयोग की जाती है। सुदर्शन क्रिया योग का उपयोग सामूहिक विपदा के उत्तरजीवियों में अभिघातज उत्तर दबाव विकास को समाप्त करने के लिए एक लोक-स्वास्थ्य हस्तक्षेप तकनीक के रूप में किया जाता है।

योग, विधि कुशल-क्षेम, भावदशा, ध्यान, मानसिक केन्द्रीयता तथा दबाव सहिष्णुता को बढ़ती है। एक कुशल योग शिक्षक द्वारा उचित प्रशिक्षण तथा प्रतिदिन 30 मिनट तक का अभ्यास इसके लाभ को बढ़ा सकता है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिकाविज्ञान संस्थान (National Institute of Mental Health and Neuro Sciences, NIHMHANS), भारत में किए गए शोध ने प्रदर्शित किया है कि सुदर्शन क्रिया अवसाद को कम करता है। इसके अलावा जो मद्यव्यसनी रोगी सुदर्शन क्रिया योग का अभ्यास करते हैं उनके अवसाद एवं दबाव स्तर में कमी पाई गई है। अनिद्रा का उपचार योग से किया गया है। योग नींद आने की अवधि को कम करता है तथा निद्रा की गुणवत्ता को बढ़ाता है।

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प्रश्न 16.
विभेदक प्रबलन को उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
विभेदक प्रबलन-विभेदक प्रबलन द्वारा एक साथ अवांछित व्यवहार को घटाया जा सकता है, तथा वांछित व्यवहार को बढ़ावा दिया जा सकता है। वांछित व्यवहार के लिए सकारात्मक प्रबलन तथा अवाछित व्यवहार के लिए निषेधात्मक प्रबलन के साथ-साथ उपयोग एक विधि हो सकती है। दूसरी विधि वांछित व्यवहार को सकारात्मक रूप से प्रबलन देना तथा अवांछित व्यवहार को सकारात्मक रूप से प्रबलन देना तथा अवांछित व्यवहार को उपेक्षा करना है। दूसरी विधि कम कष्टकर तथा समान रूप से प्रबलन देना तथा अवांछित व्यवहार को सकारात्मक रूप से बदल देना तथा अवांछित समान रूप से प्रभावी है। उदाहरण के लिए, एक लड़की इसलिए रोती और रूठती है कि उसके कहने पर उसे सिनेमा दिखाने नहीं ले जाया जाता। माता-पिता को अनुदेश दिया जाता है कि यदि वह रूठे और रोए नहीं तो उसे सिनेमा ले जाया जाए। इसके बाद, उन्हें अनुदेश दिया जाता है कि जब भी लड़की रूठे या रोए तो उसके उपेक्षा की जाए। इस प्रकार शिष्टतापूर्वक सिनेमा ले जाने के लिए कहने का वांछित व्यवहार बढ़ता है तथा रोने और रूठने का अवांछित व्यवहार कम होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मनश्चिकित्सा का वर्गीकरण प्राचलों पर किया गया है, उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनश्चिकित्सा का वर्गीकरण निम्नलिखित प्राचलों पर आधारित है –
1. क्या कारण है, जिसने समस्या को उत्पन्न किया?
मनोगतिक चिकित्सा के अनुसार अंत:मनोद्वंद्व अर्थात् व्यक्ति के मानस में विद्यमान द्वंद्व मनोवैज्ञानिक समस्याओं का स्रोत होते हैं। व्यवहार चिकित्सा के अनुसार मनोवैज्ञानिक समस्याएँ व्यवहार एवं संज्ञान के दोषपूर्ण अधिगम के कारण उत्पन्न होती हैं। अस्तित्वपरक चिकित्सा की अभिधारणा है कि अपने जीवन और अस्तित्व के अर्थ से संबंधित प्रश्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण होते हैं।

2. कारण का प्रादुर्भाव कैसे हुआ?
मनोगतिक चिकित्सा में बाल्यावस्था की अतृप्त इच्छाएँ तथा बाल्यावस्था के अनसुलझे भय अंत:मनोद्वंद्व को उत्पन्न करते हैं। व्यवहार चिकित्सा की अभिधारणा है कि दोषपूर्ण चिंतन एवं विश्वास दुरनुकूलक व्यवहारों को उत्पन्न करते हैं जो शब्द में मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण बनते हैं। अस्तित्वपरक चिकित्सा वर्तमान को महत्त्व देती है। यह व्यक्ति के अकेलेपन, विसंबंधन (Alienation) अपने अस्तित्व की व्यर्थता के बोध इत्यादि से जुड़ी वर्तमान भावनाएँ हैं जो मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण है।

3. उपचार की मुख्य विधि क्या है?
मनोगतिक चिकित्सा मुक्त साहचर्य विधि और स्वप्न को बताने की विधि का उपयोग सेवार्थी की भावनाओं और विचारों का प्राप्त करने के लिए करती है। इस सामग्री की व्याख्या सेवार्थी के समक्ष की जाती है ताकि इसकी मदद से वह अपने द्वंद्वों का सामना और समाधान कर अपनी समस्याओं पर विजय पा सके। व्यवहार चिकित्सा दोषपूर्ण अनुबंधन प्रतिरूप की पहचान कर वैकल्पिक व्यवहारात्मक प्रासंगिकता (Behavioural contingencies) नियम करती है जिससे व्यवहार में सुधार हो सके।

इस प्रकार की चिकित्सा में प्रयुक्त संज्ञानात्मक विधियाँ सेवार्थी के दोषपूर्ण चिंतन प्रतिरूप को चुनौती देकर उसे अपने मनोवैज्ञानिक कष्टों पर विजय पाने में मदद करती हैं। अस्तित्वपरक चिकित्सा एक चिकित्सात्मक पर्यावरण प्रदान करती है जो सकारात्मक स्वीकारात्मक तथा अनिर्णयात्मक होता है। सेवार्थी अपनी समस्याओं के बारे में बात कर सकता है तथा चिकित्सा एक सुकरकर्ता की तरह कार्य करता है। सेवार्थी व्यक्ति संबुद्धि की प्रक्रिया के माध्यम से समाधान तक पहुँचता है।

4. सेवार्थी और चिकित्सक के बीच चिकित्सात्मक संबंध की प्रकृति क्या होती है?
मनोगतिक चिकित्सा का मानना है कि चिकित्सा सेवार्थी की अपेक्षा उसके अंत: मनोद्वंद्व को ज्यादा अच्छी तरह से समझता है इसलिए वह (चिकित्सक) सेवार्थी के विचारों और भावनाओं की व्याख्या उसके लिए करता है जिससे वह (सेवार्थी) उनको समझ सके। व्यवहार चिकित्सा का मानना है कि चिकित्सक सेवार्थी के दोषपूर्ण व्यवहार और विचारों के प्रतिरूपों को पहचानने में समर्थ होता है। इसके आगे व्यवहार चिकित्सा का यह भी मानना है कि चिकित्सक उचित व्यवहार और विचारों के प्रतिरूपों को जानने में समर्थ होता है जो सेवार्थी के लिए अनुकूल होगा। मनोगतिक और व्यवहार चिकित्सा दोनों का मानना है कि चिकित्सक सेवार्थी की समस्याओं के समाधान तक पहुँचने में समर्थ होते हैं। इन चिकित्सकों के विपरीत अस्तित्वपरक चिकित्सा इस बात पर बल देती है कि चिकित्सक केवल एक गर्मजोशी भरा और तद्नूभूतिक संबंधन प्रदान करता है, जिसमें सेवार्थी अपनी समस्याओं की प्रकृति और कारण स्वयं अन्वेषण करने में सुरक्षित महसूस करता है।

5. सेवार्थी को मुख्य लाभ क्या है? मनोगतिक चिकित्सा संवेगात्मक अंतर्दृष्टि को महत्त्वपूर्ण लाभ मानती है जो सेवार्थी उपचार के द्वारा प्राप्त करता है। संवेगात्मक अंतर्दृष्टि तब उपस्थित मानी जाती है जब सेवार्थी अपने द्वंद्वों को बौद्धिक रूप से समझता है; द्वंद्वों को संवेगात्मक रूप से स्वीकार करने में समर्थ होता है। इस संवेगात्मक अंतर्दृष्टि के परिणामस्वरूप सेवार्थी के लक्षण दूर रहते हैं तथा कष्ट कम हो जाते हैं। व्यवहार चिकित्सा दोषपूर्ण व्यवहार और विचारों के प्रतिरूपों को अनुकूली प्रतिरूपों में बदलने को उपचार का मुख्य लाभ मानती है। अनुकूली या स्वस्थ्य व्यवहार और विचारों के प्रतिरूपों को स्थापित करने से कष्ट में कमी और लक्षणों को दूर होना सुनिश्चित होता है। मानवतावादी चिकित्सा व्यक्तिगत संवृद्धि को मुख्य लाभ मानती है। व्यक्तिगत संवृद्धि अपने बारे में बढ़ती समझ प्राप्त करने की प्रक्रिया है।

6. उपचार की अवधि क्या है?
क्लासिकी मनोविश्लेषण की अवधि कई वर्षों तक की हो सकती है। हालांकि मनोगतिक चिकित्सा के कई आधुनिक रूपांतर 10-15 सत्रों में पूरे हो जाते हैं। व्यवहार और संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा तथा अस्तित्वपरक चिकित्सा संक्षिप्त होती हैं तथा कुछ महीनों में ही पूरी हो जाती हैं।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए:

  1. अस्तित्वपरक चिकित्सा।
  2. सेवार्थी-केन्द्रित चिकित्सा।

उत्तर:
1. अस्तित्वपरक चिकित्सा-विक्टर फ्रेंकल (Victor Frankl) नामक एक मनोरोगविज्ञानी और तंत्रिकाविज्ञानी ने उद्बोधक चिकित्सा (Logotherapy) प्रतिपादित की। लॉगोस (Logos) आत्मा के लिए ग्रीक भाषा का एक शब्द है और उद्बोधक चिकित्सा का तात्पर्य आत्मा का उपचार है। फ्रेंकल जीवन के प्रति खतरनाक परिस्थितियों में भी अर्थ प्राप्त करने की इस प्रक्रिया को अर्थ निर्माण की प्रक्रिया कहते हैं। इस अर्थ निर्माण की प्रक्रिया का आधार व्यक्ति की अपने अस्तित्व का आध्यात्मिक अचेतन भी होता है जो प्रेम, सौंदर्यात्मक अभिज्ञता और जीवन मूल्यों का भंडार होता है।

जब व्यक्ति के अस्तित्व के शारीरिक, मनोवैज्ञानिक या आध्यात्मिक पक्षों से जीवन की समस्याएँ जुड़ती हैं तो तंत्रिकापाती दुश्चिता उत्पन्न होती है। फ्रेंकल ने निरर्थकता की भावना को उत्पन्न करने में आध्यात्मिक दुश्चिता की भूमिका पर जोर दिया है और इसलिए उसे अस्तित्व दुश्चिता (Existential anxiety) अर्थात् आध्यात्मिक मूल की तंत्रिकातापी दुश्चिता कहा जा सकता है। उद्बोधक चिकित्सा का उद्देश्य अपने जीवन को परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना जीवन में अर्थवत्ता और उत्तदायित्व बोध प्राप्त कराने में सेवार्थी की सहायता करना है। चिकित्सा-सेवार्थी के जीवन की विशिष्ट प्रकृति पर जोर देता है और सेवार्थी को अपने जीवन में अर्थवत्ता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

उद्बोधक चिकित्सा में चिकित्सक निष्कपट होता है और अपनी भावनाओं, मूल्यों और अपने अस्तित्व के बारे में सेवार्थी से खुलकर बात करता है। इसमें ‘आज और अभी’ पर जोर दिया जाता है और अन्यारोपण को सक्रिय रूप से हतोत्साहित किया जाता है। चिकित्सक सेवार्थी को वर्तमान की तात्कालिकता का स्मरण कराता है। अपने अस्तित्व का अर्थ प्राप्त करने की प्रक्रिया में सेवार्थी की मदद करना चिकित्सक का लक्ष्य होता है।

2. सेवार्थी-केन्द्रित चिकित्सा:
सेवार्थी-केन्द्रित चिकित्सा कार्ल रोजर्स (Carl Rogers) द्वारा प्रतिपादित की गई है। रोजर्स ने वैज्ञानिक निग्रह को सेवार्थी-केन्द्रित चिकित्सा का व्यष्टीकृत पद्धति से संयुक्त किया। रोजर्स ने मनश्चिकित्सा में स्व के संप्रत्यय को प्रस्तुत किया और उनकी चिकित्सा का मानना है कि किसी व्यक्ति के अस्तित्व का मूल स्वतंत्रता और वरण होते हैं। चिकित्सा एक ऐसा गर्मजोशी का संबंध प्रदान करती है जिससे सेवार्थी अपनी विघटित भावनाओं के साथ संबद्ध होता है।

चिकित्सक अनुभूति प्रदर्शित करता है अर्थात् सेवार्थी के अनुभवों को समझना, जैसे कि वे उसकी के हों, उसके प्रति सहृदय होता है तथा आशर्त सकारात्मक आदर यह बताता है कि चिकित्सक की सकारात्मक हार्दिकता सेवार्थी की उन भावनाओं पर आश्रित नहीं है जो वह चिकित्सा सत्र के दौरान प्रदर्शित करता है। यह अनन्य अशर्त हार्दिकता यह सुनिश्चित करती है कि सेवार्थी चिकित्सक के ऊपर विश्वास कर सकता है तथा स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सकता है।

सेवार्थी इतना सुरक्षित महसूस करता है कि वह अपनी भावनाओं का अन्वेषण करने लगता है। चिकित्सक सेवार्थी की भावनाओं का अनिर्णयात्मक तरीके से परावर्तन करता है। यह परावर्तन सेवार्थी के कथनों की पुनः अभिव्यक्ति से प्राप्त किया जाता है अर्थात् सेवार्थी के कथनों के अर्थवर्धन के लिए उससे सरल स्पष्टीकरण माँगना। परावर्तन की यह प्रक्रिया सेवार्थी को समाकलित होने में मदद करती है। समायोजन बढ़ने के साथ ही व्यक्तिगत संबंध भी सुधरते हैं। सार यह है कि यह चिकित्सा सेवार्थी को अपना वास्तविक स्व होने में मदद करती है जिसमें चिकित्सक एक सुगमकर्ता की भूमिका निभाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सेवार्थी एवं चिकित्सक के बीच एक संबंध को क्या कहा जाता है?
(A) मैत्री
(B) सकारात्मक मैत्री
(C) चिकित्सात्मक मैत्री
(D) व्यवहारात्मक मैत्री वहारात्मक मत्रा
उत्तर:
(C) चिकित्सात्मक मैत्री

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही नहीं है?
(A) सहानुभूति में व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की तरह का अनुभव नहीं कर सकता
(B) सहानुभूति में व्यक्ति को दूसरे के कष्ट के प्रति बिल्कुल करुणा नहीं होती है
(C) सहानुभूति में व्यक्ति को दूसरे के कष्ट के प्रति दया और करुणा होती है
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) सहानुभूति में व्यक्ति को दूसरे के कष्ट के प्रति बिल्कुल करुणा नहीं होती है

प्रश्न 3.
मनोगतिक चिकित्सा का प्रतिपादन किसने किया?
(A) कार्ल रोजर्स
(B) फ्रेडरिक पर्ल्स
(C) सिगमंड फ्रायड
(D) वोल्प
उत्तर:
(C) सिगमंड फ्रायड

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प्रश्न 4.
अंत: मनोद्वंद्व को बाहर निकालने के लिए किस विधि का उपयोग होता है?
(A) मुक्त साहचर्य विधि
(B) अन्यारोपण विधि
(C) स्पष्टीकरण विधि
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) मुक्त साहचर्य विधि

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन मनश्चिकित्सा में उद्देश्य नहीं हैं?
(A) संगात्मक दबाव को अधिक बढ़ाना
(B) आत्म-जागरुकता को बढ़ाना
(C) निर्णय को सुकर बनाना
(D) जीवन में अपनी विकल्पों के प्रति जागरूक होना
उत्तर:
(A) संगात्मक दबाव को अधिक बढ़ाना

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प्रश्न 6.
अमेरिका में सिखाए जानेवाले योग को क्या कहते हैं?
(A) योग
(B) कुंडलिनी योग
(C) सुदर्शन योग
(D) निष्ठा योग
उत्तर:
(B) कुंडलिनी योग

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में किसमें मंत्रों के उच्चारण के साथ वसन तकनीक या प्राणायाम को संयुक्त किया जाता है?
(A) ध्यान
(B) सुदर्शन योग
(C) कुंडलिनी योग
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(C) कुंडलिनी योग

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प्रश्न 8.
मानसिक रोगियों के पुनः स्थापन का उद्देश्य होता है –
(A) रोगी को सशक्त बनाना
(B) रोगी को घर देना
(C) रोगी की देखभाल करना
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) रोगी को सशक्त बनाना

प्रश्न 9.
मानसिक रोगियों के पुनः स्थापन का उद्देश्य होता है –
(A) व्यावसायिक चिकित्सा
(B) सामाजिक कौशल प्रशिक्षण
(C) व्यावसायिक प्रशिक्षण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 10.
योग विधि बढ़ाती है –
(A) भावदशा
(B) ध्यान
(C) दबाव सहिष्णुता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 11.
अपर्याप्त वैवाहिक, व्यावसायिक तथा सामाजिक समायोजन की यह आवश्यकता होती है कि व्यक्ति के पर्यावरण में परिवर्तन किए जाएँ –
(A) वैयक्तिक
(B) सामाजिक
(C) आर्थिक
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) वैयक्तिक

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प्रश्न 12.
निम्नलिखित में कौन मनश्चिकित्सात्मक उपागम के लक्षण नहीं हैं?
(A) चिकित्सा के विभिन्न सिद्धांतों में अंतनिर्हित नियमों का व्यवस्थित या क्रमबद्ध अनुप्रयोग होता है
(B) चिकित्सात्मक स्थितियों में एक चिकित्सक और सेवार्थी होता है जो अपनी व्यवहारात्मक समस्याओं के लिए सहायता चाहता है
(C) केवल वे व्यक्ति जिन्होंने कुशल पर्यवरण में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया हो, मनश्चिकित्सा कर सकते हैं, हर कोई नहीं
(D) मनश्चिकित्सा उपचार चाहनेवाले या सेवार्थी तथा उपचार करनेवाले के बीच में एक ऐच्छिक संबंध है
उत्तर:
(D) मनश्चिकित्सा उपचार चाहनेवाले या सेवार्थी तथा उपचार करनेवाले के बीच में एक ऐच्छिक संबंध है

प्रश्न 13.
मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों के जीवन दर्शन में –
(A) निश्चितता पाई जाती है
(B) दूसरों के जीवन दर्शन की नकल पाई जाती है
(C) अपूर्वता पाई जाती है
(D) भावी योजनाओं की झलक पाई जाती है
उत्तर:
(A) निश्चितता पाई जाती है

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 5 चिकित्सा उपागम

प्रश्न 14.
मनोविश्लेषणात्मक चिकित्सा का संबंध है –
(A) फ्रायड से
(B) युंग से
(C) एडलर से
(D) मैस्लो से
उत्तर:
(A) फ्रायड से

प्रश्न 15.
निम्नांकित में से व्यवहार चिकित्सा किस सिद्धांत पर आधारित है?
(A) अभिप्रेरणा के सिद्धांत पर
(B) प्रत्यक्षण के सिद्धांत पर
(C) सीखने के सिद्धांत पर
(D) इनमें सभी सिद्धांतों पर
उत्तर:
(C) सीखने के सिद्धांत पर

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प्रश्न 16.
संवेग तर्क चिकित्सा को किसने प्रतिपादित किया?
(A) अल्बर्ट एलिस
(B) विक्टर फेकल
(C) आरन बेक
(D) सिगमंड फ्रायड
उत्तर:
(A) अल्बर्ट एलिस

प्रश्न 17.
यदि कोई अनुकूली व्यवहार कभी-कभी ही घटित होता है जो इस न्यूनता को बढ़ाने के लिए क्या दिया जाता है?
(A) निषेधात्मक प्रबलन
(B) विमुखी अनुबंधन
(C) सकारात्मक प्रबलन
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(C) सकारात्मक प्रबलन

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प्रश्न 18.
मानसिक अस्वस्थता का प्रमुख लक्षण है –
(A) उल्टी-सीधी हरकतें करना
(B) पागलपन के लक्षण
(C) संतुलित व्यवहार न करना
(D) नई परिस्थिति में घूटन महसूस करना
उत्तर:
(C) संतुलित व्यवहार न करना

प्रश्न 19.
इनमें किसे ‘विशेषक उपागम’ का अग्रणी माना जाता है?
(A) गेस्टॉल्ट
(B) गॉर्डन ऑलपोर्ट
(C) टिचनर
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) गॉर्डन ऑलपोर्ट

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प्रश्न 20.
व्यक्ति का मूल्यांकन करने के लिए सबसे अधिक उपयोग की जानेवाली तकनीकों के अंतर्गत कौन-सा नहीं आता है?
(A) मनोमितिक परीक्षण
(B) आत्म-प्रतिवेदन माप
(C) प्रक्षेपी तकनीकें
(D) अविभेदित प्रकार
उत्तर:
(D) अविभेदित प्रकार

प्रश्न 21.
जर्मन शब्द ‘गेस्टाल्ट’ का अर्थ है –
(A) विकृति
(B) समग्र
(C) दुश्चिता
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) समग्र

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प्रश्न 22.
व्यवहार चिकित्सा की जिस प्रविधि में रोगी को वास्तविक परिस्थिति में रखकर इसमें काफी मात्रा में चिंता उत्पन्न कर दी जाती है, उसे कहा जाता है –
(A) फ्लडिंग
(B) विरुचि चिकित्सा
(C) अन्तः स्फोटात्मक चिकित्सा
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) फ्लडिंग

प्रश्न 23.
बीमारियों का अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण का दसवां संस्करण-ICD-10 कब प्रकाशित किया गया है?
(A) 1982 ई०
(B) 1992 ई०
(C) 2006 ई०
(D) 2009 ई०
उत्तर:
(B) 1992 ई०

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प्रश्न 24.
बुलिमिया एक ऐसी विकृति है जिसमें रोगी को –
(A) भूख कम लगता है
(B) प्यास अधिक लगता है
(C) भूख अधिक लगता है
(D) प्यास कम लगता है
उत्तर:
(C) भूख अधिक लगता है

प्रश्न 25.
मनोगतिक चिकित्सा सर्वप्रथम के द्वारा प्रतिपादित किया गया?
(A) फ्रायड
(B) एडलर
(C) गुंग
(D) वाटसन
उत्तर:
(A) फ्रायड

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प्रश्न 26.
रैसनल इमोटिव चिकित्सा का प्रतिपादन किया गया था?
(A) इलिस
(B) बेक
(C) फ्रीडमैन
(D) टर्क
उत्तर:
(A) इलिस

प्रश्न 27.
किसने मनोगत्यात्मक चिकित्सा का प्रतिपादन किया?
(A) कार्ल रोजर्स
(B) सिगमंड फ्रायड
(C) रौल में
(D) विक्टर फैक्ल
उत्तर:
(B) सिगमंड फ्रायड

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प्रश्न 28.
निम्नांकित में किस अंतरण में क्लायंट चिकित्सक के प्रति घृणा, ईर्ष्या आदि को दिखलाता है?
(A) धनात्मक
(B) ऋणात्मक
(C) धनात्मक तथा ऋणात्मक दोनों
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) धनात्मक

प्रश्न 29.
निम्नलिखित में किसमें सेवार्थी चिकित्सक की पूजा करने लगता है?
(A) नकारात्मक अन्यारोपण
(B) सकारात्मक अन्यारोपण
(C) अन्यारोपण तंत्रिकाताप
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) सकारात्मक अन्यारोपण

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प्रश्न 30.
निम्नलिखित में निर्वचन के विश्लेषणात्मक तकनीक कौन-सी है?
(A) प्रतिरोधी
(B) स्पष्टीकरण
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) और (B) दोनों

प्रश्न 31.
निम्नलिखित में कौन रोगी को अपने आपको और अपनी समस्या के स्रोत को समझने में बाहर आई सामग्री को अपने अहं में समाकलित करने में सहायता करता है?
(A) प्रतिरोधी
(B) स्पष्टीकरण
(C) अन्यारोपण
(D) समाकलन कार्य
उत्तर:
(D) समाकलन कार्य

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प्रश्न 32.
निम्नलिखित में किसमें अचेतन स्मृतियाँ लगातार सचेतन अभिज्ञता में समाकलित होती रहती हैं?
(A) अंतर्दृष्टि
(B) अन्यारोपण
(C) स्वप्न विधि
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) अंतर्दृष्टि

प्रश्न 33.
निम्नलिखित में कौन सेवार्थी को कष्ट प्रदान करते हैं?
(A) अपक्रियात्मक व्यवहार
(B) क्रियात्मक व्यवहार
(C) व्यक्तिगत व्यवहार
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) अपक्रियात्मक व्यवहार

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प्रश्न 34.
क्रमिक विसंवेदनीकरण को किसने प्रतिपादित किया?
(A) अल्बर्ट एलिस
(B) वोल्प
(C) विक्टर फ्रेंकल
(D) जॉन पर्ल्स
उत्तर:
(B) वोल्प

प्रश्न 35.
मनोविश्लेषणात्मक चिकित्सा में निम्नांकित में किसका महत्व सर्वाधिक बतलाया गया है?
(A) स्थानान्तरण
(B) प्रतिरोध
(C) स्वतंत्र साहचर्य
(D) स्वप्न विश्लेषण
उत्तर:
(D) स्वप्न विश्लेषण

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प्रश्न 36.
मन, मस्तिष्क तथा असंक्राम्य तंत्र के आपसी संबंध को अध्ययन करने वाले विज्ञान को कहा जाता है?
(A) लाइको-न्यूरो इम्यूनोलॉजी
(B) फेकल्टी साइकोलॉजी
(C) फंग्सनल साइकोलॉजी
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) लाइको-न्यूरो इम्यूनोलॉजी

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 4 मनोवैज्ञानिक विकार

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 4 मनोवैज्ञानिक विकार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 4 मनोवैज्ञानिक विकार

Bihar Board Class 12 Psychology मनोवैज्ञानिक विकार Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अवसाद और उन्माद से संबंधित लक्षणों की पहचाना कीजिए।
उत्तर:
अवसाद-इसमें कई प्रकार के नकारात्मक भावदशा और व्यवहार परिवर्तन होते हैं। इनके लक्षणों में अधिकांश गतिविधियों में रुचि या आनंद नहीं रह जाता है। साथ ही अन्य लक्षण भी हो सकते हैं; जैसे-शरीर के भार में परिवर्तन, लगातार, निद्रा से संबंधित समस्याएँ, थकान, स्पष्ट रूप से चिंतन करने में असमर्थता, क्षोभ, बहुत धीरे-धीरे कार्य करना तथा मृत्यु और आत्महत्या के विचारों का आना, अत्यधिक दोष या निकम्मेपन की भावना का होना। उन्माद-इससे पीड़ित व्यक्ति उल्लासोन्मादी, अत्यधिक सक्रिय, अत्यधिक बोलनेवाले तथा आसानी से चित्त-अस्थिर हो जाते हैं, उन्माद की घटना या स्थिति स्वतः कभी-कभी ही दिखाई देती है, इनका परिवर्तन अवसर अवसाद के साथ होता रहता है।

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प्रश्न 2.
अतिक्रियाशील बच्चों की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। अथवा, आवेगशील बच्चों की विशेषताओं को लिखिए।
उत्तर:
जो बच्चे आवेगशील (impulsive) होते हैं वे अपनी तात्कालिक प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण नहीं कर पाते या काम करने से पहले सोच नहीं पाते। वे प्रतीक्षा करने में कठिनाई महसूस करते हैं। या अपनी बारी आने की प्रतीक्षा नहीं कर पाते, अपने तात्कालिक प्रलोभन को रोकने में कठिनाई होती है या परितोषण में विलंब या देरी सहन नहीं कर पाते। छोटी घटनाएँ जैसे चीजों को गिरा देना काफी सामान्य बात है जबकि इससे अधिक गंभीर दुर्घटनाएँ और चोटें भी लग सकती हैं। अतिक्रिया (Hyperactivity) के भी कई रूप होते हैं। ए० डी० एच० डी० वाले बच्चे हमेशा कुछ न कुछ करते रहते हैं। इस पाठ के समय स्थिर या शांत बैठे रहना उनके लिए बहुत कठिन होता है। बच्चा चुलबुलाहट कर सकता है, उपद्रव कर सकता है, कमरे में ऊपर चढ़ सकता है या यों ही कमरे में निरुद्देश्य दौड़ सकता है। माता-पिता और अध्यापक ऐसे बच्चे के बारे में कहते हैं कि उसके पैर में चक्की लगी है, जो हमेशा चलता रहता है तथा लगातार बातें करता रहता है। लड़कियों की तुलना में लड़कों में यह चार गुना अधिक पाया जाता है।

प्रश्न 3.
मादक द्रव्यों के दुरुपयोग तथा निर्भरता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मादक द्रव्य दुरुपयोग (Substance abuse) में बारंबार घटित होनेवाले प्रतिकूल या हानिकारक परिणाम होते हैं जो मादक द्रव्यों के सेवन से संबंधित होते हैं। जो लोग नियमित रूप से मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं, उनके पारिवारिक और सामाजिक संबंध बिगड़ जाते हैं, वे कार्य स्थान पर ठीक से निष्पादन नहीं कर पाते तथा दूसरों के लिए शारीरिक खतरा उत्पन्न करते हैं। मादक द्रव्य निर्भरता (Substance dependence) में जिस मादक द्रव्य का व्यसन होता है उसके सेवन के लिए तीव्र इच्छा जागृत होती है, व्यक्ति सहिष्णुता और विनिवर्तन लक्षण प्रदर्शित करता है तथा उसे आवश्यक रूप से उस मादक द्रव्य का सेवन करना पड़ता है। सहिष्णुता का तात्पर्य व्यक्ति के ‘वैसा ही प्रभाव’ पाने के लिए अधिक-से-अधिक उस मादक द्रव्य के सेवन से है। विनिवर्तन का तात्पर्य मन:प्रभावी (Psychoactive) मादक द्रव्य का सेवन बंद या कम कर देता है। मनःप्रभावी मादक द्रव्य वे मादक द्रव्य हैं जिनमें इतनी क्षमता होती है।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 4 मनोवैज्ञानिक विकार

प्रश्न 4.
क्या विकृत शरीर प्रतिमा भोजन विकार को जन्म दे सकती है? इसके विभिन्न रूपों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
हाँ, विकृत शरीर प्रतिमा भोजन विकार को दे सकती है। भोजन विकार में क्षुधा अभाव क्षुधतिशयता तथा अनियंत्रित भोजन सम्मिलित हैं। क्षुधा-अभाव (Anorexia nervosa) में व्यक्ति को अपनी शरीर प्रतिमा के बारे में गलत धारणा होती है जिसके कारण वह अपने को अधिक वजनवाला समझता है। अक्सर खाने को मना करना, अधिक व्यायाम-बाध्यता का होना तथा साधारण आदतों को विकसित करना, जैसे दूसरों के सामने न खाना-इनसे व्यक्ति काफी मात्रा में वजन घटा सकता है और मृत्यु की स्थिति तक अपने को भूखा रख सकता है। क्षुधातिशयता (Bulima nervosa) में व्यक्ति बहुत अधिक मात्रा में खाना खा सकता है, इसके बाद रेचक और मूत्रवर्धक दवाओं के सेवन से या उल्टी करके, खाने को अपने शरीर से साफ कर सकता है। व्यक्ति पेट साफ होने के बाद तनाव और नकारात्मक संवेगों से अपने आपको मुक्त महसूस करता है। अनियंत्रित भोजन (Binge eating) में अत्यधिक भोजन करने का प्रसंग बारंबार पाया जाता है।

प्रश्न 5.
“चिकित्सक व्यक्ति के शारीरिक लक्षणों को देखकर बीमारी का निदान करते हैं।” मनोवैज्ञानिक विकारों का निदान किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक विकार भी अन्य बीमारियों की तरह होते हैं जो कि अनुकूलन की असफलता के कारण होती हैं। मनोवैज्ञानिक विकार किसी भी असामान्य बात की तरह हमारे लिए असुविधा उत्पन्न कर सकता है और भयभीत भी कर सकता है। मनोवैज्ञानिक विकारों के बारे में लोगों के अस्पष्ट विचार हैं जो अंधविश्वास, अज्ञान और भय के तत्त्वों पर आधारित होते हैं। सामान्यतः भी माना जाता है कि मनोवैज्ञानिक विकार कुछ शर्मनाक पहलू है तथा मानसिक रोगों पर लगे कलंक के कारण लोग मनोवैज्ञानिक से परामर्श लेने में हिचकिचाते हैं क्योंकि अपनी समस्याओं को वे लज्जास्पद समझते हैं।

परंतु मनोवैज्ञानिक विकारों का निदान किया जा सकता है। अतिप्राकृत दृष्टिकोण के अनुसार मनोवैज्ञानिक विकार अलौकिक और जादुई शक्तियों जैसे-बुरी आत्माएँ या शैतान के कारण इनका निदान आज भी झाड़-फूंक और प्रार्थना द्वारा किया जाता है। जैविक और आगिक उपागम के अनुसार मनोवैज्ञानिक विकार शरीर और मस्तिष्क के उचित प्रकार से काम नहीं करने के कारण होती है तथा कई प्रकार के विकारों को दोषपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं को ठीक करके दूर किया जा सकता है जिसका परिणाम समुन्त प्रकार्यों में होता है।

मनोवैज्ञानिक उपागम के अनुसार मनोवैज्ञानिक समस्याएँ व्यक्ति के विचारों, भावनाओं तथा संसार को देखने के नजरिए में अपर्याप्तता के कारण उत्पन्न होती है। भूत-विद्या और अंधविश्वासों के अनुसार विकारों में ग्रसित व्यक्ति में दुष्ट आत्माएँ होती हैं और मध्य युग में उनका धर्मशास्त्रीय उपचार पर बल दिया जाता था। पुनर्जागरण काल में मानसिक विकारों का निदान के लिए चिकित्सा उपचार पर जोर दिया जाता था। परंतु आज वैज्ञानिक युग में मनोवैज्ञानिक विकारों के प्रति वैज्ञानिक अभिवृति में वृद्धि हुई है। आज मनोवैज्ञानिक विकारों में ग्रसित व्यक्तियों के प्रति करुणा या सहानुभूति की भावना में वृद्धि हुई है तथा मनोवैज्ञानिक विकारों का निदान मनोवैज्ञानिक व्यवहारों द्वारा तथा उपयुक्त देख-रेख द्वारा लोगों एवं विशेषकर मनोवैज्ञानिक द्वारा किया जाता है।

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प्रश्न 6.
मनोग्रस्ति और बाध्यता के विभेद स्थापित कीजिए।
उत्तर:
जो लोग मनोग्रस्ति-बाध्यता विकार (Obessive compulsive disorder) से पीड़ित होते हैं वे कुछ विशिष्ट विचारों में अपनी ध्यानमग्नता को नियंत्रित करने में असमर्थ होते हैं या अपने आपको बार-बार कोई विशेष क्रिया करने से रोक नहीं पाते हैं, यहाँ तक कि वे उनकी सामान्य गतिविधियों में भी बाधा पहुंचाते हैं। किसी विशेष विचार या विषय पर चिंतन को रोक पाने की असमर्थता मनोग्रस्ति व्यवहार (Obessive behaviour) कहलाता है। इससे ग्रसित व्यक्ति अपने विचारों को अप्रिय और शर्मनाक समझता है। किसी व्यवहार को बार-बार करने की आवश्यकता बाध्यता व्यवहार (Compulsive behaviour) कहलाता है। कई तरह की बाध्यता में गिनता, आदेश, जाँचना, छूना और धोना सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 7.
क्या विसामान्य व्यवहार का एक दीर्घकालिक प्रतिरूप अपसामान्य समझा जा सकता है? इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अपसामान्य का शाब्दिक अर्थ है-“जो सामान्य से परे है” अर्थात् जो स्पष्ट रूप से परिभाषित मानकों या मापदंडों से हटकर है। वे व्यवहार, विचार और संवेग जो सामाजिक मानकों को तोड़ते हैं, अपसामान्य कहे जाते हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांतकारों के अनुसार, जिन लोगों में कुछ समस्याएँ होती हैं उनमें अपसामान्य व्यवहारों की उत्पत्ति सामाजिक संज्ञाओं और भूमिकाओं से प्रभावित होती है। जब लोगे समाज के मानकों को तोड़ते हैं तो उन्हें ‘विसामान्य’ और मानसिक रोगी जैसी संज्ञाएँ दी जाती हैं। इस प्रकार की संज्ञाएँ उन लोगों से इतनी अधिक जुड़ जाती हैं कि लोग इन्हें सनकी इत्यादि पुकारने लगते हैं और उन्हें उसी बीमार की तरह क्रिया करने के लिए उकसाते रहते हैं। धीरे-धीरे वह व्यक्ति बीमार की भूमिका स्वीकार कर लेता है तथा अपसामान्य व्यवहार करने लगता है। अतः, विसामान्य व्यवहार का एक दीर्घकालिक प्रतिरूप उपसामान्य जा सकता है।

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प्रश्न 8.
लोगों के बीच बात करते समय रोगी बारंबार विषय परिवर्तन करता है, क्या यह मनोविदलता का सकारात्मक या नकारात्मक लक्षण है? मनोविदलता के अन्य लक्षणों तथा उप-प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लोगों के बीच बात करते समय रोगी बारंबार विषय परिवर्तन करता है। यह मनोविदलता का सकारात्मक लक्षण है। मनोविदलता के लक्षण-मनोविदलता के लक्षण तीन श्रेणियों में समूहित किए जा सकते हैं –

  1. सकारात्मक लक्षण।
  2. नकारात्मक लक्षण।
  3. मन:चालित लक्षण।

1. सकारात्मक लक्षण:
में व्यक्ति के व्यवहार में ‘विकृत अतिशयता’ तथा ‘विलक्षणता का बढ़ना’ पाया जाता है। भ्रमासिक्त, असंगठित चिंतन एवं भाषा, प्रवर्धित प्रश्रम तथा अनुपयुक्त भाव मनोविदलता में सबसे अधिक पाए जाने वाले लक्षण हैं। मनोविदलता से ग्रसित कई, व्यक्तियों में भ्रमासक्ति (Delusions) विकसित हो जाते हैं। भ्रमासक्ति एक झूठी विश्वास है जो अपर्याप्त आधार पर बहुत मजबूती से टिका रहता है। इस पर तार्किक युक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता तथा वास्तविकता में जिसका कोई आधार नहीं होता। मनोविदलता में उत्पीड़न भ्रमासक्ति से ग्रसित लोग यह विश्वास करते हैं कि लोग उनके विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैं, उनकी जासूसी कर रहे हैं या उन्हें जानबूझकर उत्पीड़ित किया जा रहा है।

मनोविदलता में ग्रसित लोगों में संदर्भ भ्रमासक्ति (Delusions of reference) भी हो सकता है जिसमें वे दूसरों के कार्यों या वस्तुओं और घटनाओं के प्रति विशेष और व्यक्तिगत अर्थ जोड़ देते हैं। अत्यहंमन्यता भ्रमासक्ति (Delusions grandeur) में व्यक्ति अपने आपको बहुत सारी विशेष शक्तियों से संपन्न मानता है तथा नियंत्रण भ्रमासक्ति (Delusions of control) में वे मानते हैं कि उनके विचार, भावनाएँ और क्रियाएँ दूसरों के द्वारा नियंत्रित की जा रही हैं। मनोविदलता में व्यक्ति तर्कपूर्ण ढंग से सोच नहीं सकते तथा विचित्र प्रकार से बोलते हैं। यहाँ औपचारिक चिंतन विकार (Formal though disorder) उनके संप्रेषण को और कठिन बना देता है। उदाहरणार्थ, एक विषय से दूसरे विषय पर तेजी से बदलना जो चिंतन की सामान्य संरचना को गड़बड़ कर देता है। और यह तर्कहीन लगने लगता है (विषय के साहचर्य को खोना, विषय अवपथन), नए शब्दों या मुहावरों की खोज करना (नव शब्द निर्माण) और एक ही विचार को अनुयुक्त तरह से बार-बार दोहराना संतनन।

मनोविदलता रोगी की विभ्रांति (Haillucination) हो सकती है, अर्थात् बिना किसी बाह्य उद्दीपक के प्रत्यक्षण करना। मनोविदलता में श्रवण विभ्रांति (Auditory hallucination) सबसे ज्यादा पाए जाते हैं। रोगी ऐसी आवाजें या ध्वनि सुनते हैं जो सीधे रोगी से शब्द, मुहावरे और वाक्य बोलते हैं (द्वितीय-व्यक्ति विभ्रांति) या आपस में रोगी से संबंधित बातें करते हैं (तृतीय-व्यक्ति विभ्रांति)। इन विभ्रांतियों में अन्य ज्ञानेंद्रियाँ भी शामिल को सकती हैं, जिनमें स्पर्शी विभ्रांति (Tactile hallucination) (कई प्रकार की झुनझुनी, जलन), दैहिक विभ्रांति (So matic hallucination) (शरीर के अंदर कुछ घटित होना, जैसे-पेट में साँप का रेंगना इत्यादि), दृष्टि विभ्रांति (Visual hallucination) (जैसे-लोगों या वस्तुओं की सुस्पष्ट दृष्टि या रंग का अस्पष्ट प्रत्यक्षण), रससंवदी विभ्रांति (Gustatory hallcination) (अर्थात खाने और पीने की वस्तुओं का विचित्र स्वाद) तथा घ्राण विभ्रांति (Olfactory halluncination) (धुएँ और जहर की गंध) प्रमुख है। मनोविदलता के रोगी अनुपयुक्त भाव (Inappropriate affect) भी प्रदर्शित करते हैं अर्थात ऐसे संवेग जो स्थिति के अनुरूप न हों।

2. नकारात्मक लक्षण (Negative symptom):
विकट न्यूनता होते हैं जिनके वाक्-अयोग्यता, विसंगत एवं कुंठितं भाव, इच्छाशक्ति का ह्रास और सामाजिक विनिवर्तन सम्मिलित होते हैं। मनोविदलता के रोगियों में अलोगिया (Alogia) या वाक्-अयोग्यता पाई जाती है जिसमें भाषण, विषय तथा बोलने में कमी पाई जाती है। मनोविदलता के कई रोगी दूसरे अधिकांश लोगों की तुलना में कम क्रोध, उदासी, खुशी तथा अन्य भावनाएँ प्रदर्शित करते हैं। इसलिए उनके विसंगत भाव (Blunted affect) होते हैं। कुछ रोगी किसी भी प्रकार का संवेग प्रदर्शित नहीं करते जिसे कुठित भाव (Flat affect) की स्थिति कहते हैं। मनोविदलता के रोगी इच्छाशक्ति न्यूनता (Aulition) अर्थात् किसी काम को शुरू करने या पूरा करने में असमर्थता तथा उदासीनता प्रदर्शित करते हैं। इस विकार के रोगी सामाजिक रूप से अपने को अलग कर देते हैं तथा अपने कल्पनाओं में पूर्ण से खोए रहते हैं।

3. मनःचालित लक्षण:
मनोविदलता के रोगी मन:चालित लक्षण (Psycho-motor symptoms) भी प्रदर्शित करते हैं। वे अस्वाभाविक रूप से चलते तथा विचित्र मुख-विकृतियों एवं मुद्राएँ प्रदर्शित करते हैं। यह लक्षण चरम-सीमा को प्राप्त कर सकते हैं जिसे केटाटोनिया (Catatonia) कहते हैं। कैटाटोनिया जडिमा (Catatonia rigidity) अर्थात् घंटों तक एक ही मुद्रा में रहना प्रदर्शित करते हैं। दूसरे अन्य रोगी केटाटोनिक संस्थिति (Catatoniaposturing) अर्थात् विचित्र उटपटांग मुद्राओं को लंबे समय तक प्रदर्शित करते हैं।

मनोविदलता के उप प्रकार:

डी. एस. एम. IV टी. आर. (DSM-IV-TR) के अनुसार, मनोविदलता के उप-प्रकार तथा उनकी विशेषताएँ निम्न हैं –

  1. व्यामोहाभ प्रकार (Paranoid type): श्रवण विभ्रांति और भ्रमासक्ति में ध्यानमग्नता कोई अनुपयुक्त भाव या विसंगठित वाक् (भाषा) या व्यवहार नहीं।
  2. विसंगठित प्रकार (Disorganised type): विसंगठित वाक् (भाषा) और व्यवहार; अनुपयुक्त या कुठित भाव: कोई केटाटानिक लक्षण नहीं।
  3. केटाटोनिक प्रकार (Catatonic type): चरम पेशीय गतिहीनता; चरम पेशीय निष्क्रियता; चरम नकरावृति (अनुदेशों के प्रति प्रतिरोध) या मूकता (बोलने से मना करना)।
  4. अविभेदित प्रकार (Undifferentiated type): किसी भी उप प्रकार में सम्मिलित होने योग्य नहीं परंतु लक्षण मापदंड के अनुकूल हों।
  5. अवशिष्ट प्रकार (Residual type): कम-से-कम मनोविदलता के एक प्रसगिक वृत्त का अनुभव किया हो; कोई सकारात्मक लक्षण नहीं किंतु नकारात्मक लक्षण प्रदर्शित करता हो।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 4 मनोवैज्ञानिक विकार

प्रश्न 9.
विच्छेदन से आप क्या समझते हैं? इसके विभिन्न रूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विचारों और संवेगों के बीच संयोजन का हो जाना ही विच्छेदन कहलाता है। विच्छेदन में अवास्तविकता की भावना, मनमुटाव या विरक्ति, व्यक्तित्व-लोप और कभी-कभी अस्मिता-लोप या परिवर्तन भी पाया जाता है। चेतना में अचानक और अस्थायी परिवर्तन जो कष्टकर अनुभवों को रोक देता है, विच्छेदी विकार (Dissociative disorder) की मुख्य विशेषता होती है।

विच्छेद के विभिन्न रूप इस प्रकार से हैं:

1. विच्छेदी स्मृतिलोप (Dissociative amnesia) में अत्यधिक किन्तु चयनात्मक स्मृतिभ्रंश होता है जिसका कोई ज्ञात आंगिक कारण (जैसे-सिर में चोट लगना) नहीं होता है। कुछ लोग को अपने अतीत के बारे में कुछ भी याद नहीं रहता है। दूसरे लोग कुछ विशिष्ट घटनाएँ, लोग, स्थान या वस्तुएँ याद नहीं कर पाते, जबकि दूसरी घटनाओं के लिए उनकी स्मृति बिल्कुल ठीक होती है। यह विकार अक्सर अत्यधिक दबाव में संबंधित होता है।

2. विच्छेदी आत्मविस्मृति (Dissociative fugue) का एक आवश्यक लक्षण है घर और कार्य स्थान से अप्रत्याशित यात्रा, एक नई पहचान की अवधारणा तथा पुरानी पहचान को याद न कर पाना। आत्मविस्मृति सामान्यता समाप्त हो जाती है। जब व्यक्ति अचानक जागता है और आत्मविस्मृति की अवधि में जो कुछ घटित हुआ उसकी कोई स्मृति नहीं रहती।

3. विच्छेदी पहचान विकार (Dissociative identity disorder) को अक्सर बहु व्यक्तित्व वाला कहा जाता है। यह सभी विच्छेदी विकारों में सबसे अधिक नाटकीय होती है। अक्सर यह बाल्यावस्था के अभिघातज अनुभवों से संबंधित से होता है । इस विकार में व्यक्ति प्रत्यावर्ती व्यक्तियों की कल्पना करता है जो आपस में एक-दूसरे के प्रति जानकारी रख सकते हैं या नहीं रख सकते हैं।

4. व्यक्तित्व लोप (Depersonalisation) में एक स्वप्न जैसी अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति को स्व और वास्तविकता दोनों से अलग होने की अनुभूति होती है। व्यक्तित्व-लोप में आत्म-प्रत्यक्षण में परिवर्तन होता है और व्यक्ति का वास्तविकता बोध अस्थायी स्तर पर लुप्त हो जाता है या परिवर्तित हो जाता है।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 4 मनोवैज्ञानिक विकार

प्रश्न 10.
दुश्चिता को ‘पेट में तितलियों का होना’ जैसी अनुभूति कहा जाता है। किस अवस्था में दुश्चिता विकार का रूप ले लेती है? इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हमें दुश्चिता का अनुभव तब होता है जब हम किसी परीक्षा की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं या किसी दंत चिकित्सक के पास जाना होता है या कोई एकल प्रदर्शन प्रस्तुत करना होता है यह सामान्य है, जिसकी हमसे प्रत्याशा की जाती है। यहाँ तक कि इसमें अपना कार्य अच्छी तरह करने की अभिप्रेरणा भी मिलती है। इसके विपरीत, जब उच्चस्तरीय दुश्चिता जो कष्टप्रद होती है तथा हमारे सामान्य क्रियाकलापों में बाधा पहुँचती हैं तब यह मनोवैज्ञानिक विकारों की सबसे सामान्य श्रेणी, दुश्चिता विकार की उपस्थिति को संकेत है।

प्रत्येक व्यक्ति को आकुलता और भय होते हैं। सामान्यतः दुश्चिता (Anxiety) शब्द को भय और आशंका की विसृत, अस्पष्ट और अप्रीतिकर भावना के रूप में परिभाषित किया जाता है। दुश्चितित व्यक्ति में निम्न लक्षणों का सम्मिलित रूप रहता है, यथा, हृदय गति से तेज होना, साँस की कमी होना, दस्त होना, भूख न लगना, बेहोशी, घुमनी या चक्कर आना, पसीना आना निद्रा की कमी, बार-बार मूत्र त्याग करना तथा कँपकँपी आना। दुश्चिता विकार कई प्रकार के होते हैं।

1. सामान्यीकृत दुश्चिता विकार (Generalised anxiety disorder) होता है जिसमें लंबे समय तक चलनेवाले, अस्पष्ट, अवर्णनीय तथा तीव्र भय होते हैं जो किसी भी विशिष्ट वस्तु के प्रति जुड़े हुए नहीं होते हैं। इनके लक्षणों में भविष्य के प्रति आकुलता एवं आशंका तथा अत्यधिक सतर्कता, यहाँ तक कि पर्यावरण में किसी भी प्रकार के खतरे की छानबीन, शामिल होती है। इसमें पेशीय तनाव भी होता है जिसके कारण व्यक्ति विश्राम नहीं कर पाता, बेचैन रहता है तथा स्पष्ट रूप से कमजोर और तनावग्रस्त दिखाई देता है।

2. आतंक विकार (Panic disorder) में दुश्चिता के दौरे लगातार पड़ते हैं और व्यक्ति तीव्र त्रास या दहशत का अनुभव करता है। आतंक आक्रमण का तात्पर्य हुआ कि जब भी कभी विशेष उद्दीपक से संबंधित विचार उत्पन्न हों तो अचानक तीव्र दुश्चिता अपनी उच्चतम सीमा पर पहुँच जाए। इस तरह के विचार अकल्पित तरह से उत्पन्न होते हैं इसके नैदानिक लक्षणों में साँस की कमी, घुमनी या चक्कर आना, कँपकँपी, दिल धड़कना, दम घुटना, जी मिचलाना, छाती में दर्द या बेचैनी-सनकी होने का भय, नियंत्रण खोना या मरने का एहसास सम्मिलित होते हैं।

Bihar Board Class 12 Psychology मनोवैज्ञानिक विकार Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक उपागम के अनुसार मनोवैज्ञानिक समस्याएँ क्यों उत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक उपागम के अनुसार मनोवैज्ञानिक समस्याएँ व्यक्ति के विचारों, भावनाओं तथा संसार को देखने के नजरिए में अपर्याप्तता के कारण उत्पन्न होती हैं।

प्रश्न 2.
ग्लेन के अनुसार मनोवैज्ञानिक विकार क्यों उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
ग्लेन के अनुसार, यह भौतिक संसार चार तत्त्वों से बना है। जैसे-पृथ्वी, वायु, अग्नि और जल, जो मिलकर हमारे शरीर के चार आवश्यक द्रव जैसे-रक्त, कला पित्त और श्लेष्मा बनाते हैं। इनमें प्रत्येक द्रव भिन्न-भिन्न स्वभाव को बनाते हैं। इन चार वृत्तियों में असंतुलन होने से विभिन्न विकार उत्पन्न होते हैं।

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प्रश्न 3.
अपसामान्य व्यवहार के आधुनिक मनोगतिक सिद्धांतों की आधारशिला किसने रखी थी?
उत्तर:
संत ऑगस्टीन ने।

प्रश्न 4.
योहान वेयर के मुताबिक मनोवैज्ञानिक विकार के क्या कारण थे?
उत्तर:
योहान वेयर के मुताबिक मनोवैज्ञानिक द्वंद्व तथा अंतर्वैयक्तिक संबंधों में बाधा को मनोवैज्ञानिक विकारों का महत्त्वपूर्ण कारण माना।

प्रश्न 5.
अपसामान्य व्यवहार से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अपसामान्य व्यवहार वह व्यवहार है जो विसामान्य, कष्टप्रद, अपक्रियात्मक और दुःखद होता है। उन व्यवहारों को अपसामान्य समझा जाता है जो सामाजिक मानकों से विचलित होते हैं और जो उपयुक्त संवृद्धि एवं क्रियाशीलता में बाधक होते हैं।

प्रश्न 6.
दुरनुकूलक व्यवहार क्या है?
उत्तर:
किसी व्यवहार को दुरनुकूलक कहने का तात्पर्य यह है कि समस्या बनी हुई है। इससे यह संकेत मिलता है कि व्यक्ति की सुभेद्यता, बचाव की अक्षमता या पर्यावरण में असाधारण दबाव के कारण जीवन में समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं।

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प्रश्न 7.
ओझा कौन होता है?
उत्तर:
कई समाजों में ओझा वे व्यक्ति समझते जाते हैं जिनका संबंध अतिप्राकृत शस्तियों से होता है और जिनके माध्यम से प्रेतात्माएँ व्यक्तियों से बात करती हैं।

प्रश्न 8.
अवसाद का संबंध किससे है?
उत्तर:
अवसाद का संबंध सीरोटोनिन की निम्न क्रियाशीलता से है।

प्रश्न 9.
आनुवंशिक कारकों का संबंध किस प्रकार के मनोवैज्ञानिक विकारों से है?
उत्तर:
आनुवंशिक कारकों का संबंध भावदशा विकारों, मनोविदलता, मानसिक मंदन तथा अन्य मनोवैज्ञानिक विकारों से पाया गया है।

प्रश्न 10.
उन मनोवैज्ञानिक और अंतर्वैयक्तिक कारकों को लिखिए जिनकी अपसामान्य व्यवहार में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
उत्तर:
इन कारकों में मातृत्व वंचन, माता-पिता और बच्चे के बीच दुरनुकूलक संबंध, दुरनुकूलक परिवार संरचना तथा अत्यधिक दबाव का होना है।

प्रश्न 11.
मनोवैज्ञानिक मॉडल के मनोगतिक सिद्धांत क्या हैं?
उत्तर:
मनोगतिक सिद्धांतवादियों का विश्वास है कि व्यवहार चाहे सामान्य हो या असामान्य वह व्यक्ति के अंदर की मनोवैज्ञानिक शक्तियों के द्वारा निर्धारित होता है जिनके प्रति वह स्वयं चेतन रूप से अनभिज्ञ होता है।

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प्रश्न 12.
गत्यात्मक शक्तियाँ क्या होती हैं?
उत्तर:
गत्यात्मक शक्तियाँ आंतरिक शक्तियाँ हैं जो एक-दूसरे से अंत:क्रिया करती हैं तथा उनकी यह अंतःक्रिया व्यवहार, विचार और संवेगों को निर्धारित करती हैं।

प्रश्न 13.
अठारहवीं शताब्दी में सुधार आंदोलन का सकारात्मक पक्ष क्या था?
उत्तर:
सुधार आंदोलन का एक पक्ष यह था कि संस्था-विमुक्ति के प्रति रुझान बढ़ा जिसमें मानसिक रूप से बीमार लोगों के ठीक होने के पश्चात् सामुदायिक देख-रेख के ऊपर जोर दिया जाने लगा।

प्रश्न 14.
भारत में तथा अन्यत्र बीमारियों के अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण का कौन-सा संस्करण प्रयुक्त होता है और उसे क्या कहा जाता है?
उत्तर:
भारत में अन्यत्र बीमारियों के अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण का दसवाँ संस्करण प्रयुक्त होता हैं, जिसे आई. सी. डी.-10 व्यवहारात्मक एवं मानसिक विकारों का वर्गीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 15.
कुछ जैविक कारकों को लिखिए जो हमारे व्यवहार के सभी पक्षों को प्रभावित करते हैं।
उत्तर:
दोषपूर्ण जीन, अंतःस्रावी अंसतुलन, कुपोषण, चोट आदि।

प्रश्न 16.
तंत्रिका संचारक किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब कोई विद्युत आवेग तंत्रिका-कोशिका के अंतिम छोर तक पहुँचता है तब अक्षतंतु उद्दीप्त होकर कुछ रसायन प्रवाहित करते हैं जिसे तंत्रिका संचारक कहते हैं।

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प्रश्न 17.
दुश्चिता विकार का संबंध किससे है?
उत्तर:
दुश्चिता विकार का संबंध न्यूरोट्रांसमीटर गामा एमिनाब्यूटिरिक एसिड की निम्न क्रियाशीलता से है।

प्रश्न 18.
मनोविदलता का संबंध किससे है?
उत्तर:
मनोविदलता का संबंध डोपामाइन की अतिरेक क्रियाशीलता से है।

प्रश्न 19.
अठारहवीं शताब्दी में मनोवैज्ञानिक विकार के प्रति क्या जागरुकता आई?
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी में मनोवैज्ञानिक विकारों के प्रति वैज्ञानिक अभिवृत्ति में वृद्धि के कारण इन विकारों से ग्रसित लोगों के प्रति करुणा या सहानुभूति की भावना बढ़ी जिससे सुधार आंदोलन का बल प्राप्त हुआ।

प्रश्न 20.
रोगान्मुखता-दबाव मॉडल के तीन घटक कौन-से हैं?
उत्तर:
इस मॉडल के तीन घटक हैं –

  1. रोगोन्मुखता या कुछ जैविक विपथन जो वंशागत हो सकते हैं।
  2. रोगान्मुखता के कारण किसी मनोवैज्ञानिक विकार के प्रति दोषपूर्णता उत्पन्न हो सकती है।
  3. विकारी प्रतिबलकों की उपस्थिति।

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प्रश्न 21.
दुश्चितित व्यक्ति में किन लक्षणों का सम्मिलित रूप रहता है?
उत्तर:
दुश्चितित व्यक्ति में निम्न लक्षणों का सम्मिलित रूप रहता है-हृदयगति का तेज होना, साँस की कमी होना, दस्त होना, भूख न लगना, बेहोशी, चक्कर आना, पसीना आना, निद्रा की कमी, बार-बार मूत्र त्याग करना तथा कंपकंपी आना।

प्रश्न 22.
सामान्यीकृत दुश्चिता व्यक्ति में किन लक्षणों का सम्मिलित रूप रहता है?
उत्तर:
सामान्यीकृत दुश्चिता विकार में लंबे समय तक चलनेवाले, अस्पष्ट, अवर्णनीय तथा तीव्र भय होते हैं तो किसी भी विशिष्ट वस्तु के प्रति जुड़े हुए नहीं होते हैं।

प्रश्न 23.
सामान्यीकृत दुश्चिता विकार के क्या लक्षण होते हैं?
उत्तर:
इनके लक्षणों में भविष्य के प्रति आकुलता एवं आशंका तथा अत्यधिक सतर्कता, यहाँ तक कि पर्यावरण में किसी भी प्रकार के खतरे की छानबीन शामिल होती है।

प्रश्न 24.
मनोगतिक मॉडल को सर्वप्रथम किसने प्रतिपादित किया था?
उत्तर:
यह मॉडल सर्वप्रथम फ्रॉयड द्वारा प्रतिपादित किया गया था।

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प्रश्न 25.
फ्रॉयड के अनुसार कौन-सी तीन केन्द्रीय शक्तियाँ व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं?
उत्तर:
फ्रॉयड के अनुसार निम्नलिखित तीन केन्द्रीय व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं –

  1. मूल प्रवृतिक आवश्यकताएँ
  2. अंतर्नाद तथा आवेग
  3. तार्किक चिंतन तथा नैतिक मानक

प्रश्न 26.
फ्रॉयड के अनुसार अपसामान्य व्यवहार क्या है?
उत्तर:
फ्रॉयड के अनुसार अपसामान्य व्यवहार अचेतन स्तर पर होनेवाले मानसिक द्वंद्वों की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है जिसका संबंध सामान्यतः प्रारंभिक बाल्यावस्था या शैशवावस्था में होता है।

प्रश्न 27.
व्यवहारात्मक मॉडल क्या है?
उत्तर:
यह मॉडल बताता है कि सामान्य और अपसामान्य दोनों व्यवहार अधिगम होते हैं और मनोवैज्ञानिक विकार व्यवहार करने के दुरनुकूलक तरीके सीखने के परिणामस्वरूप होते हैं।

प्रश्न 28.
अधिगम प्राचीन अनुबंधन क्या है?
उत्तर:
अधिगम प्राचीन अनुबंधन यह कालिक साहचर्य है जिसमें दो घटनाएँ बार-बार एक-दूसरे के साथ घटित होती हैं।

प्रश्न 29.
क्रियाप्रसूत अनुबंधन क्या है?
उत्तर:
क्रियाप्रसूत अनुबंधन में व्यहवार किसी पुरस्कार से संबंधित किया जाता है।

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प्रश्न 30.
सामाजिक अधिगम क्या है?
उत्तर:
सामाजिक अधिगम दूसरे के व्यवहारों का अनुकरण करके सीखना है।

प्रश्न 31.
रोगोन्मुखता-दबाव मॉडल क्या है?
उत्तर:
रोगोन्मुखता-दबाव मॉडल के अनुसार, जब कोई रोगोन्मुखता किसी दबावपूर्ण स्थिति के कारण सामने आ जाती है तब मनोवैज्ञानिक विकार उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 32.
मनोग्रस्ति-बाध्यता विकार क्या है?
उत्तर:
जो लोग मनोग्रस्ति-बाध्यता विकार से पीड़ित होते हैं वे कुछ विशिष्ट विचारों में अपनी ध्यानमग्नता को नियंत्रित करने में असमर्थ होते हैं या अपने आपको बार-बार कोई विशेष क्रिया करने से रोक नहीं पाते हैं, यहाँ तक कि ये उनकी सामान्य गतिविधियों में भी बाधा पहुँचाते हैं।

प्रश्न 33.
मनोग्रस्ति व्यवहार किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी विशेष विचार या विषय पर चिंतन को रोक पाने की असमर्थता मनोग्रस्ति व्यवहार कहलाता है। इससे ग्रसित व्यक्ति अक्सर अपने विचारों को अप्रिय और शर्मनाक समझता है।

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प्रश्न 34.
बाध्यता व्यवहार किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी व्यवहार को बार-बार करने की आवश्यकता बाध्यता व्यवहार कहलाता है। कई तरह की बाध्यता में गिनना, आदेश देना, जाँचना, छूना और धोना सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 35.
अभिघातज उत्तर दबाव विकार का अनुभव किन लोगों में पाया जाता है?
उत्तर:
कई लोग जो किसी प्राकृतिक विपदा (जैसे-सुनामी) में फंस चुके होते हैं या किसी गंभीर दुर्घटना या युद्ध की स्थितियों को अनुभव कर चुके होते हैं, वे अभिघातज उत्तर दबाव विकार का अनुभव करते हैं।

प्रश्न 36.
उत्तर अभिघातक दबाव विकार के क्या लक्षण होते हैं?
उत्तर:
उत्तर अभिघातक दबाव विकार के लक्षणों में बार-बार किसी स्वप्न का आना, अतीतावलोकन, एकाग्रता की कमी और सांवेगिक शून्यता शामिल हो सकती है।

प्रश्न 37.
कायरूप विकार क्या है?
उत्तर:
कायरूप विकारों में शक्ति को मनोवैज्ञानिक कठिनाइयाँ होती हैं और वह शिकायत उन शारीरिक लक्षणों की करता है जिसका कोई जैविक कारण नहीं होता।

प्रश्न 38.
कायरूप विकार में किस प्रकार के रोग सम्मिलित हैं?
उत्तर:
कायरूप विकारों में पीड़ा विकार, काय-आलंबिता विकार, परिवर्तित विकार तथा स्वकार्यदुश्चिता रोग सम्मिलित होते हैं।

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प्रश्न 39.
काय-आलंबिता विकार क्या है?
उत्तर:
काय-आलंबिता विकार के रोगियों में कई प्रकार की और बार-बार घटित होनेवाली या लंबे समय तक चलनेवाली शारीरिक शिकायतें होती हैं।

प्रश्न 40.
काय-आलंबिता विकारवाले व्यक्तियों की क्या सामान्य शिकायतें होती हैं?
उत्तर:
उनमें सामान्य शिकायतें हैं-सिरदर्द, थकान, हृदय की धड़कन, बेहोशी का दौरा, उल्टी करना और एलर्जी।

प्रश्न 41.
आंतक विकार क्या है?
उत्तर:
आंतक विकार एक तरह का दुश्चिता विकार होता है जिसमें दुश्चिता के दौर लगातार पड़ते हैं और व्यक्ति तीव्र त्रास या दहशत का अनुभव करता है।

प्रश्न 42.
आंतक आक्रमण से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
आंतक आक्रमण का तात्पर्य हुआ कि जब भी कभी विशेष उद्दीपक से संबंधित विचार उत्पन्न हों तो अचानक तीव्र दुश्चिता अपनी उच्चतम सीमा पर पहुँच जाए। इस तरह के विचार अकल्पित तरह से उत्पन्न होते हैं।

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प्रश्न 43.
आंतक विकार के नैदानिक लक्षण क्या-क्या हैं?
उत्तर:
इसके नैदानिक लक्षणों में सांस की कमी, चक्कर आना, कंपकंपी, दिल धड़कना, दम घुटना, जी मिचलाना, छाती में दर्द या बेचैनी, सनकी होने का भय, नियंत्रण खोना या मरने का एहसास सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 44.
दुर्भीति क्या है?
उत्तर:
दुर्भीति एक प्रकार का भय है। जिन लोगों में दुर्भीति होती है उन्हें किसी विशिष्ट वस्तु, लोग या स्थितियों के प्रति अविवेकी या अतर्क भय होता है।

प्रश्न 45.
दुर्भीति कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
दुर्भीति तीन प्रकार की होती है-विशिष्ट दुर्भीति, सामाजिक दुर्भीति तथा वितिभीति।

प्रश्न 46.
विशिष्ट दुर्भीति क्या है?
उत्तर:
इसमें सामान्यतः घटित होनेवाली दुर्भीति होती है। इसमें अविवेकी या अतर्क भय जैसे किसी विशिष्ट प्रकार के जानवर के प्रति तीव्र भय का होना या किसी बंद जगह में होने का भय का होना सम्मिलित होते हैं।

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प्रश्न 47.
सामाजिक दुर्भीति का क्या लक्षण होता है?
उत्तर:
दूसरों के साथ बर्ताव करते समय तीव्र और अक्षम करनेवाला भय और उलझण अनुभव करना सामाजिक दुर्भीति का लक्षण है।

प्रश्न 48.
विवृतिभीति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विवृतिभीति शब्द उस समय प्रयुक्त किया जाता है जब लोग अपरिचित स्थितियों में प्रवेश करने के भय से ग्रसित हो जाते हैं। इससे ग्रसित अधिकांश लोग अपने घर से निकलने में घबराते हैं।

प्रश्न 49.
विच्छेदी स्मृतिलोप क्या है?
उत्तर:
विच्छेदी स्मृतिलोप में अत्यधिक किन्तु चयनात्मक स्मृतिभ्रंश होता है जिसका कोई ज्ञात आंगिक कारण नहीं होता है।

प्रश्न 50.
विच्छेदी विकार की क्या विशेषता होती है?
उत्तर:
चेतना में अचानक और अस्थायी परिवर्तन जो कष्टकर अनुभवों को रोक देता है, विच्छेदी विकार की मुख्य विशेषता होती है।

प्रश्न 51.
काय-आलंबिता विकार के रोगी की क्या अवधारणा होती है?
उत्तर:
इस विकार के रोगी यह मानते हैं कि वे बीमार हैं, अपनी बीमारी का लंबा और विस्तृत ब्यौरा बताते हैं तथा काफी मात्रा में दवाएँ लेते हैं।

प्रश्न 52.
परिवर्तन विकार क्या है?
उत्तर:
परिवर्तन विकार के लक्षणों में शरीर के कुछ मूल प्रकार्य में से सबमें या कुछ अंशों में क्षति बनाई जाती है।

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प्रश्न 53.
परिवर्तन विकार के लक्षणों को लिखिए।
उत्तर:
पक्षाघात, अंधापन, बधिरता या बहरापन और चलने में कठिनाई या होना इसके सामान्य लक्षण होते हैं।

प्रश्न 54.
स्वकायदुश्चिता रोग का निदान कब किया जाता है?
उत्तर:
स्वकायदुश्चिता रोग का निदान तब दिया जाता है जब चिकित्सा आश्वासन, किसी भी शारीरिक लक्षणों का न पाया जाना या बीमारी के न बढ़ने के बावजूद रोगी लगातार यह मानता है कि उसे गंभीर बीमारी है।

प्रश्न 55.
स्वलीन विकार क्या होता है?
उत्तर:
स्वलीन विकारवाले बच्चों का सामाजिक अंतःक्रिया और संप्रेषण में कठिनाई है, उनकी बहुत सीमित अभिरुचियाँ होती हैं तथा उनमें एक नियमित दिनचर्या की तीव्र इच्छा होती है। 70 प्रतिशत के लगभग स्वालीनता से पीड़ित बच्चे मानसिक रूप से मंद होते हैं।

प्रश्न 56.
मादक द्रव्य दुरुपयोग विकार किसे कहते हैं?
उत्तर:
नियमित रूप से लगातार मादक द्रव्यों के सेवन से उत्पन्न होनेवाले दुरनुकूलक व्यवहारों से संबंधित विकारों को मादक द्रव्य दुरुपयोग विकार कहा जाता है।

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प्रश्न 57.
मादक द्रव्य निर्भरता से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मादक द्रव्य निर्भरता में जिस मादक द्रव्य का व्यसन होता है उसके सेवन के लिए तीव्र इच्छा जागृत होती है, व्यक्ति सहिष्णुता और विनिवर्तन लक्षण प्रदर्शित करता है तथा उसे आवश्यक रूप से उस मादक द्रव्य का सेवन करना पड़ता है।

प्रश्न 58.
‘सहिष्णुता’ से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सहिष्णुता का तात्पर्य व्यक्ति के वैसा ही प्रभाव पाने के लिए अधिक-से-अधिक उस मादक द्रव्य के सेवन से है।

प्रश्न 59.
व्यक्तित्व लोप क्या है?
उत्तर:
व्यक्तिगत लोप में एक स्वप्न जैसी अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति को स्व और वास्तविकता दोनों से अलग होने की अनुभूति होती है। व्यक्तिगत लोप में आत्म-प्रत्यक्षण में परिवर्तन होता है और व्यक्ति का वास्तविकता बोध अस्थायी स्तर पर लुप्त हो जाता है या परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 60.
भावदशा विकार क्या है?
उत्तर:
भावदशा विकार में व्यक्ति की भावदशा या लंबी संवेगात्मक स्थिति में बाधाएं आ जाती हैं।

प्रश्न 61.
मनोविदलता के सकारात्मक लक्षणों को लिखिए।
उत्तर:
मनोविदालता के सकारात्मक लक्षणों में व्यक्ति के व्वहार में विकृत अतिशयता तथा विलक्षणता का बढ़ना पाया जाता है। भ्रमासक्ति असंगठित चिंतन एवं भाषा, प्रवर्धित और विभ्रम तथा अनुपयुक्त भाव मनोविदलता में सबसे अधिक पाये जानेवाले लक्षण हैं।

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प्रश्न 62.
भ्रमासक्ति क्या है?
उत्तर:
भ्रमासक्ति एक झूठा विश्वास है जो अपर्याप्त आधार पर बहुत मजबूती से टिका रहता है। इस पर तार्किक युक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता तथा वास्तविकता में जिसका कोई आधार नहीं होता।

प्रश्न 63.
‘अलोगिया’ क्या है?
उत्तर:
अलोगिया एक प्रकार का रोग है जिसमें व्यक्ति में वाक्-अयोग्यता पाई जाती है जिसमें, भाषण, विषय तथा बोलने में कमी पाई जाती है।

प्रश्न 64.
मनोविदलता के केटाटोनिक प्रकार की क्या विशेषताएँ होती हैं?
उत्तर:
चरमपेशीय गतिहीनता, चरमपेशीय निष्क्रियता, चरम नकारावृत्ति या मूकता।

प्रश्न 65.
बच्चों में बहिःकरण विकार क्या होते हैं?
उत्तर:
बहिःकरण विकारों में वे व्यवहार आते हैं जो विध्वंसकारी, अक्सर आक्रामक और बच्चे के पर्यावरण में जो लोग हैं उनके प्रति विमुखता वाले होते हैं।

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प्रश्न 66.
बच्चों में आंतरिकीकरण विकार क्या होते हैं?
उत्तर:
आंतरिकीकरण विकार से स्थितियाँ होती हैं जिनमें बच्चा अवसाद, दुश्चिता और ‘अस्वस्थता या कष्ट महसूस करता है जो दूसरों को दिखाई नहीं दे सकती हैं।

प्रश्न 67.
वियोगज दुश्चिता विकार क्या है?
उत्तर:
वियोगज दुश्चिता विकार एक ऐसा आंतरिकीकृत विकार है जो बच्चों में विशिष्ट रूप से होता है। इसका सबसे प्रमुख लक्षण अतिशय दुश्चिता है, यहाँ तक कि अपने माता-पिता से अलग होने पर बच्चे अतिशय भय का अनुभव करते हैं।

प्रश्न 68.
‘विनिवर्तन’ का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
विनिवर्तन का तात्पर्य उन शारीरिक लक्षणों से है जो जब उत्पन्न होते हैं जब व्यक्ति मन:प्रभावी मादक द्रव्य का सेवन बंद या कम कर देता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक विकारों के वर्गीकरण पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
अमरीकी मनोरोग संघ ने विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक विकारों का वर्णन तथा वर्गीकरण करते हुए एक अधिकारिक पुस्तिका (Official manual) प्रकाशित की है। इसका वर्तमान संस्करण डायग्नोस्टिक एवं स्टैटिस्टिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर, चतुर्थ संस्करण (डी. एस. एम. – IV) रोगी के (Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders, IV Edition) मानसिक विकार’ के केवल एक वृहत् पक्ष पर नहीं बल्कि पाँच विमाओं या आयामों पर मूल्यांकन करता है। ये विमाएँ जैविक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक तथा अन्य दूसरे, पक्षों से संबंधित है।

भारत में तथा अन्यत्र, बीमारियों के अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण का दसवाँ संस्करण (International Classification of Disease ICD-10 Classification of Behavioural and Mental Disorders) कहा जाता है। इस योजना में, प्रत्येक विकार के नैदानिक लक्षण और उनसे संबंधित अन्य लक्षणों तथा नैदानिक पथप्रदर्शिका का वर्णन किया गया है।

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प्रश्न 2.
अपसामान्य व्यवहार के लिए आनुवंशिक कारक किस प्रकार जिम्मेदार है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
आनुवंशिक कारकों (Genetic factors) का संबंध भावदशा विकारों, मनोविदलता, मानसिक मंदन तथा अन्य मनोवैज्ञानिक विकारों में पाया गया है। यद्यपि शोधकर्ता यह नहीं पहचान पाए हैं कि कौन-से विशिष्ट जीन मुख्यतः इसके दोषी हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकांशतः कोई एक जीन किसी विशेष व्यवहार या मनोवैज्ञानिक विकार के लिए उत्तरदायी नहीं होता बल्कि कई जीन मिलकर हमारे कई प्रकार के व्यवहारों तथा सांवेगिक प्रतिक्रियाओं, क्रियात्मक तथा अपक्रियात्मक दोनों को उत्पन्न करते हैं। यद्यपि इस बात के काफी पुष्ट प्रमाण हैं कि आनुवंशिकांजीवरासायनिक कारक भिन्न-भिन्न प्रकार के मानसिक विकारों जैसे-मनोविदलता, अवसाद, दुश्चिता इत्यादि में अपनी भूमिका रखते हैं तथापि केवल जीवविज्ञान ही अधिकांश मनोवैज्ञानिक विकारों का कारण नहीं होते।

प्रश्न 3.
संज्ञानात्मक और मानवतावादी अस्तित्वपरक मनोवैज्ञानिक मॉडलों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1. संज्ञानात्मक मॉडल (vognitive model) ने मनोवैज्ञानिक कारकों पर जोर दिया है। इस मॉडल के अनुसार, अपसामान्य व्यवहार संज्ञानात्मक समस्याओं के कारण घटित हो सकते हैं। लोगों की अपने बारे में ऐसी धारणाएँ और अभिवृत्तियाँ हो सकती हैं जो अविवेकशील और गलत हैं और सामान्य धारणा बना सकते हैं जिसके कारण किसी एक घटना, जो महत्त्वपूर्ण नहीं है, के आधार पर ही वे वृहत् नकारात्मक निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

2. मानवतावादी-अस्तित्वपरक मॉडल (Humansticexistential model) है जो मनुष्य के अस्तित्व के व्यापक पहलुओं पर जोर देता है। मानवतावादी सोचते हैं कि मनुष्यों में जन्म से ही मित्रवत् सहयोगी और रचनात्मक होने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है और वह स्वयं को विकसित करने के लिए है। अच्छाई और संवृद्धि के लिए. मनुष्य अपनी इस क्षमता का उपयोग करने को प्रेरित होते हैं। अस्तित्ववादियों का विश्वास है कि जन्म से हमें अपने अस्तित्व को अर्थ प्रदान करने की पूरी स्वतंत्रता होती है, इस उत्तरदायित्व को हम निभा सकते हैं या परिहार कर सकते हैं। जो उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ते हैं वे खाली, अप्रमाणिक तथा अपक्रियात्मक जीवन जीते हैं।

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प्रश्न 4.
मुख्य दुश्चिता विकारों तथा उनके लक्षणों को लिखिए।
उत्तर:
मुख्य दुश्चिता विकार तथा उनके लक्षण इस प्रकार हैं –

  1. सामान्यीकृत दुश्चिता विकार-दीर्घ, अस्पष्ट अवर्णनीय तथा तीव्र जिसका संबंध किसी वस्तु से नहीं होता है तथा जिसमें अतिसर्तकता और पेशीय तनाव होता है।
  2. आंतक विकार-बार-बार दुश्चिता के दौर पड़ना जिसमें तीव्र त्रास या दहशत और आशंका की भावना; जिसे पहले से न बताया जा सके ऐसे ‘आंतक के आक्रमण’ साथ ही शारीरिक लक्षण जैसे साँस फूलना, धड़कन, कंपन, चक्कर आना तथा नियंत्रण खोने का यहाँ तक कि मृत्यु का भाव होना।
  3. दुर्भीति-किसी विशिष्ट वस्तु, दूसरों के साथ अंत:क्रिया तथा अपरिचित स्थितियों के प्रति अविवेकी भय का होना।
  4. मनोग्रस्ति-बाध्यता विकार-कुछ विचारों में संलग्न रहना जिन्हें व्यक्ति शर्मनाक और अप्रिंय समझता है; कुछ ऐसी क्रियाएँ जैसे-जाँचना, धोना, गिनना इत्यादि को बार-बार करने के आवेग पर नियंत्रण न कर पाना।
  5. उत्तर अभिघातज दबाव विकार-बार-बार आनेवाले स्वप्न, अतीतावलोकन, एकाग्रात में कमी और सांवेगिक शून्यता का होना जो किसी अभिधातज या दबावपूर्ण घटना, जैसे-प्राकृतिक विपदा, गंभीर दुर्घटना इत्यादि के पश्चात् व्यक्ति द्वारा अनुभव किए जाते हैं।

प्रश्न 5.
काय-आलंबिता विकार को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
काय-आलंबिता विकार (Somatisation disorder) के रोगियों में कई प्रकार की और बार-बार घटित होनेवाली या लंबे समय तक चलनेवाली शारीरिक शिकायतें होती हैं। ये शिकायतें नाटकीय और बढ़े-चढ़े रूप से प्रस्तुत की जा सकती हैं। इनमें सामान्य शिकायतें हैं-सिरदर्द, थकान, हृदय की धड़कन, बेहोशी का दौरान, उल्टी करना और एलर्जी। इस विकार के रोगी यह मानते हैं कि वे बीमार हैं अपनी बीमारी का लंबा और विस्तृत ब्यौरा बताते हैं तथा काफी मात्रा में दवाएँ लेते हैं।

प्रश्न 6.
आत्महत्या को किस प्रकार रोका जा सकता है?
उत्तर:
आत्महत्या को निम्नलिखित लक्षणों के प्रति सजग रहकर रोका जा सकता है –

  1. खाने और सोने की आदतों में परिवर्तन।
  2. मित्रों, परिवारों और नियमित गतिविधियों से विनिवर्तन।
  3. उग्र क्रिया व्यवहार, विद्रोही व्यवहार, भाग जाना।
  4. मद्य एवं मादक द्रव्य सेवन।
  5. व्यक्तित्व में काफी परिवर्तन आना।
  6. लगातार ऊब महसूस करना।
  7. एकाग्रता में कठिनाई।
  8. आनंददायक गतिविधियों में अभिरुचि का न होना।

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प्रश्न 7.
द्विध्रुवीय भावदशा विकार को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
इस प्रकार के भावदशा विकार, जिसमें उन्माद और अवसाद बारी-बारी से उपस्थित होते हैं, में कभी-कभी सामान्य भावदशा की अवधि भी आती है। इसे द्विध्रुवीय भावदशा विकार में आत्महत्या के प्रयास का आजीवन खतरा सबसे ज्यादा रहता है। मानसिक स्वास्थ्य स्थिति के अतिरिक्त खतरे के अन्य कारण व्यक्ति की आत्महत्या करने की संभावना को बताते हैं। इनमें प्रमुख हैं-उम्र, लिंग, नृजातीयता या प्रजाति और हाल में घटित जीवन की गंभीर घटनाएँ।

किशोर और युवाओं में आत्महत्या के खतरे उतने ही अधिक हैं जितने 70 वर्ष से ऊपर के लोगों में। लिंग भी प्रभावित करनेवाला एक कारक है अर्थात् स्त्रियों की तुलना पुरुषों में आत्महत्या करने के बारे में सोचने की दर अधिक है। आत्महत्या के प्रति सांस्कृतिक अभिवृत्तियाँ भी आत्महत्या की दर को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, जापान में शर्म और बदनामी की स्थिति से निपटने के लिए आत्महत्या सांस्कृतिक रूप से उचित तरीका है। जिन लोगों में आत्महत्या के प्रति उन्मुखता होती है उनमें नकारात्मक प्रत्याशाएँ, निराशा, यथार्थ से हटकर बनाए गए ऊँचे मानकों का होना तथा आत्म-मूल्यांकन में अति-आलोचना करना मुख्य बातें होती हैं।

प्रश्न 8.
अवसाद के पूर्वयोगी कारक को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
अवसाद के पूर्वयोगी कारक:
मुख्य अवसादी तथा द्विध्रुवीय विकारों में आनुवांशिक विकारों में आनुवांशिक संरचना या आनुवांशिकता खतरे का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। उम्र भी इस विकार के खतरे का कारण है। उदाहरणार्थ स्त्रियों को प्रारंभिक प्रौढ़ावस्था में अधिक खतरा रहता है जबकि पुरुषों के लिए प्रारंभिक मध्यावस्था में सबसे ज्यादा खतरा होता है। इसी तरह लिंग भी एक महत्त्वपूर्ण कारण होता है जिनकी भूमिका इन विभेदक खतरों के संदर्भ में होती है। उदाहरणार्थ, पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में अवसादी विकार से ग्रसित होने की संभावना अधिक रहती है। अन्य खतरे के कारण, जीवन की नकारात्मक घटनाओं और सामाजिक अवलंब की कमी का अनुभव करता है।

प्रश्न 9.
बच्चों के बहिःकरण और आंतरिकीकरण विकारों में क्या अंतर है?
उत्तर:
बहिःकरण विकारों (Externalising disorders) या अनियंत्रित विकारों में वे व्यवहार आते हैं जो विध्वंसकारी, अक्सर आक्रामक और बच्चे के पर्यावरण में जो लोग हैं उनके प्रति विमुखता वाले होते हैं। आंतरिकीकरण विकार (Internalising disorders) या अनियंत्रित समस्याएँ वे स्थितियाँ होती हैं जिनमें बच्चा अवसाद, दुश्चिता और अस्वस्थता या कष्ट महसूस करता है जो दूसरों को दिखाई नहीं दे सकती है।

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प्रश्न 10.
विरुद्धक अवज्ञाकारी विकार को संक्षेप में समझाइए। आचरण विकार और समाजविरोधी व्यवहार क्या होते हैं?
उत्तर:
विरुद्धक अवज्ञाकारी विकार (Oppositional Defiant disorder, ODD) से ग्रसित बच्चे उम्र के अनुपयुक्त हठ या जिद प्रदर्शित करते हैं तथा चिड़चिड़े, दुराग्रही, अवज्ञाकारी और शत्रुतापूर्ण तरह से व्यवहार करनेवाले होते हैं। ए. डी. एच. डी. के विपरीत ओ. डी. डी. की दर लड़के और लड़कियों में ज्यादा भिन्न नहीं होती। आचरण विकार (Conduct disorder) तथा समाजविरोधी व्यवहार (Antisocial behaviour) उन व्यवहारों और अभिवृत्तियों के लिए प्रयुक्त होते जो उम्र के उपयुक्त नहीं होते तथा जो परिवार की प्रत्याशाओं, सामाजिक मानकों और दूसरों के व्यक्तिगत या स्वत्व अधिकारों का उल्लंघन करनेवाले होते हैं।

आचरण विकार के विशिष्ट व्यवहारों में ऐसे आक्रामक व्यवहार आते हैं जो जानवरों या मनुष्यों को किसी प्रकार की हानि पहुँचाने वाले या हानि की धमकी देनेवाले हों और ऐसे व्यवहार जो आक्रामक तो नहीं हैं किन्तु संपत्ति का नुकसान करनेवाले हों। गंभीर रूप से धोखा देना, चोरी करना और नियमों का उल्लंघन करना भी ऐसे व्यवहारों में शामिल होते हैं बच्चे कई तरह के आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। जैसे-शाब्दिक आक्रामकता (Verbal aggression) (गालियाँ देना, कसम देना), शारीरिक आक्रामकता (Physical aggression) (मारना, झगड़ना), शत्रुतापूर्ण आक्रामकतां (Hostile aggression) (दूसरों को चोट पहुंचाने के इरादे से प्रदर्शित आक्रामकता) और अग्रलक्षी आक्रामकता (Proactive aggression) (बिना उकसाने के भी दूसरे लोगों को धमकाना और डराना, उन पर प्रभावी या प्रबल होना)।

प्रश्न 11.
आंतरिकीकरण विकार को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
आंतरिकीकरण विकारों में वियोगज दुश्चिता विकार (Separation anxiety disorder) और अवसाद (depression) मुख्यतः होते हैं। वियोगज दुश्चिता विकार (एस. ए. डी.) एक ऐसा आंतरिकीकृत विकार है जो बच्चों में विशिष्ट रूप से होता है। इसका सबसे प्रमुख लक्षण अतिशय दुश्चिता है, यहाँ तक कि अपने माता-पिता से अलग होने पर बच्चे अतिशय भय का अनुभव करते हैं। इस विकार से ग्रसित बच्चे कमरे में अकेले रहने में, स्कूल अकेले जाने में और नई स्थितियों में प्रवेश से घबराते हैं तथा अपने माता-पिता से छाया की तरह उनके हर काम में चिपके रहते हैं। वियोगज न हो इसके लिए बच्चे चिल्लाना, हंगामा करना, मचलना या आत्महत्या के हावभाव प्रदर्शित करना जैसे व्यवहार कर सकते हैं।

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प्रश्न 12.
स्वलीन विकारवाले बच्चों की विशेषताओं को समझाइए।
उत्तर:
स्वलीन विकार (Autistic disorder) या स्वलीनता इनमें सबसे अधिक पाया जाने वाला विकार होता है। स्वलीन विकारवाले बच्चों को सामाजिक अंतःक्रिया ओर संप्रेषण में कठिनाई होती है, उनकी बहुत सीमित अभिरुचियाँ होती हैं तथा उनमें एक नियमित दिनचर्या की तीव्र इच्छा होती है। सत्तर प्रतिशत के लगभग स्वलीनता से पीड़ित बच्चे मानसिक रूप से मंद होते हैं। स्वलीनता से ग्रस्त बच्चे दूसरों में मित्रवत् होने में गहन कठिनाई का अनुभव करते हैं।

वे सामाजिक व्यवहार प्रारंभ करने में असमर्थ होते हैं तथा अन्य लोगों की भावनाओं के प्रति अनुक्रियाशील प्रवीत नहीं होते हैं। वे अपने अनुभवों या संवेगों को दूसरों के साथ बाँटने में असमर्थ होते हैं। वे संप्रेषण और भाषा की गंभीर असामान्यताएँ प्रदर्शित करते हैं जो काफी समय तक बनी रहती हैं। बहुत से स्वलीन बच्चे कभी भी वाक् (बोली) का विकास नहीं कर पाते हैं और वे जो कर पाते हैं, उनका वाक्-प्रतिरूप पुनरावर्ती और विसामान्य होता है। स्वलीनता से पीड़िता बच्चे सीमित अभिरुचियाँ प्रदर्शित करते हैं और इनके व्यवहार पुरावर्ती होते हैं; जैसे वस्तुओं को एक लाइन से लगाना या रूढ़ शरीर गति, जैसे-शरीर को इधर-उधर हिलानेवाले होते हैं। ये पेशीय गति स्व-उद्दीप्त, जैसे-हाथ से मारना या आत्म-हानिकर जैसे-दीवार से सिर पटकना हो सकते हैं।

प्रश्न 13.
दुर्भाति विकार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
दुर्भाति विकार एक बहुत ही सामान्य दुश्चिता विकार है, जिसमें व्यक्ति अकारण या अयुक्तिक अथवा विवेकहीन डर अनुभव करता है। इसमें व्यक्ति कुछ खास प्रकार की वस्तुओं या परिस्थितियों से डरना सीख लेता है। जैसे, जिस व्यक्ति में मकड़ा से दुर्भीति होता है वह व्यक्ति वहाँ नहीं जा सकता है जहाँ मकड़ा उपस्थित हो। जबकि मकड़ा एक ऐसा जीव है जो व्यक्ति विशेष के लिए खतरा पैदा नहीं करता है। फिर भी व्यक्ति में दुर्भीति उत्पन्न हो जाने पर सामान्य व्यवहार को विचलित कर देता है।

यद्यपि डरा हुआ व्यक्ति यह जानता है कि उसका डर अयुक्तिक है, फिर भी वह उक्त डर से मुक्त नहीं हो पाता है। इसका कारण व्यक्ति का आंतरिक रूप से चिंतित होना होता है। व्यक्ति का यह चिंता किसी खास वस्तु से अनुकूलित होकर संलग्न हो जाता है। उदाहरणार्थ कुछ महत्त्वपूर्ण दुर्भीतियाँ जैसे बिल्ली से डर एलूरोफोबिया, मकड़ा से डर एरेकनोफोबिया, रात्रि से डर नायक्टोफोबिया तथा आग से डर पायरोफोबिया आदि दुर्भीति के उदाहरण हैं।

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प्रश्न 14.
एक ध्रुवीय विषाद क्या है?
उत्तर:
एक ध्रुवीय विषाद को मुख्य विषाद भी कहा जाता है। इसके प्रमुख लक्षणों में उदास मनोदशा, भूख, वजन तथा नींद में कमी तथा क्रिया स्तर (Activity level) में भयंकर क्षुब्धता पायी जाती है। ऐसे व्यक्ति किसी कार्य में जल्द थकान महसूस करने लगते हैं, उनका आत्म-संप्रत्यय ऋणात्मक (Negative) होता है तथा उनमें आत्म-निंदा की प्रवृति भी अधिक होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कायरूप विकार से आपका क्या तात्पर्य है? विभिन्न कायरूप विकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कायरूप विकार वे दशाएँ या स्थितियाँ हैं जहाँ बिना किसी शारीरिक बीमारी के शारीरिक लक्षण प्रदर्शित होते हैं। कार्यरूप विकारों में व्यक्ति को मनोविज्ञानिक कठिनाइयाँ होती हैं और वह शिकायत उन शारीरिक लक्षणों की करता है जिसका कोई जैविक कारण नहीं होता। कायरूप विकारों में पीड़ा विकार, कार्य-आलंबित विकारी, परिवर्तन विकार तथा स्वकायदुश्चिता रोग सम्मिलित होते हैं।

1. पीड़ा विकार (Pain disorder) में अति तीव्र और अक्षम करनेवाली पीड़ा बताया जाता है जो या तो बिना किसी अभिक्षेय जैविक लक्षणों के होता है या जितना जैविक लक्षण होना चाहिए उससे कहीं ज्यादा बताया जाता है। व्यक्ति किस प्रकार अपनी पीड़ा को समझता है यह उसके पूरे समायोजन को प्रभावित करता है। कुछ पीड़ा रोगी सक्रिय साधक व्यवहार सीख सकते हैं अर्थात पीड़ा की अवहेलना करके सक्रिय रह सकते हैं। दूसरे निष्क्रिय साधक व्यवहार प्रयुक्त करते हैं जो घटी हुई सक्रियता और सामाजिक विनिवर्तन हो बढ़ावा देता है।

2. काय-आलंबिता विकार (Somatisation disorder) के रोगियों में कई प्रकार की और बार-बार घटित होनेवाली या लंबे समय तक चलनेवाली शारीरिक शिकायतें होती हैं। ये शिकायतें नाटकीय और बढ़े-चढ़े रूप से प्रस्तुत की जा सकती हैं। इनमें सामान्य शिकायतें हैं – सिरदर्द, थकान, हृदय की धड़कन, बेहोशी का दौरा, उलटी करना और एलर्जी। इस विकार के रोगी यह मानते हैं कि वे बीमार का लंबा और विस्तृत ब्यौरा बताते हैं तथा काफी मात्रा में दवाएँ लेते हैं।

3. परिवर्तन विकार (Conversion Disorder) के लक्षणों में शरीर के कुछ मूल प्रकार्यों में से सब में या कुछ अंशों में क्षति बताई जाती है। पक्षाघात, बधिरता या बहरापन और चलने में कठिनाई का होना इसके सामान्य लक्षण होते हैं। यह लक्षण अधिकांशतः किसी दबावपूर्ण – अनुभव के बाद घटित होते हैं जो अचानक उत्पन्न हो सकते हैं।

4. स्वकायदुश्चिता रोग (Hypochondriasis) का निदान तब किया जाता है जब चिकित्सा आश्वासन, किसी भी शारीरिक लक्षणों का न पाया जाना या बीमारी के न बढ़ने के बावजूद रोगी लगातार यह मानता है कि उसे गंभीर बीमारी है। स्वकायदुश्चिता रोगी को अपने शारीरिक अंगों की स्थिति के बारे में मनोग्रस्ति ध्यानमग्नता तथा चिंता रहती है तथा वे बराबर अपने स्वास्थ्य के लिए आकुल रहते हैं।

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प्रश्न 2.
उन मनोवैज्ञानिक मॉडलों का वर्णन कीजिए जो मानसिक विकारों के मनोवैज्ञानिक कारणों को बताते हैं।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक मॉडल के अंतर्गत मनोगतिक, व्यवहारपरक, संज्ञानात्मक, तथा मानवतावादी-अस्तित्वपरक मॉडल सम्मिलित है।

1. आधुनिक मनोवैज्ञानिक मॉडल में मनोगतिक मॉडल (Psychodynamic model) यह सबसे प्राचीन और सबसे प्रसिद्ध है। मनोगतिक सिद्धांतवादियों का विश्वास है कि व्यवहार चाहे सामान्य हो या आसामान्य वह व्यक्ति के अंदर की मनोवैज्ञानिक शक्तियों के द्वारा निर्धारित होता है, जिनके प्रति वह गत्यात्मक कहलाती है, अर्थात् वे एक-दूसरे से अंत:क्रिया करती है तथा उनकी यह अंत:क्रिया व्यवहार, विचार और संवेगों को निर्धारित करती है।

इन शक्तियों के बीच द्वंद्व के परिणामस्वरूप फ्रॉयड (Freud) द्वारा प्रतिपादित किया गया था जिनका विश्वास था कि तीन केंद्रीय शक्तियाँ व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं-मूल प्रवृतिक आवश्यकताएँ, अंतर्नाद तथा आवेग (इदम् या इड) तार्किक चिंतन (अहम्) तथा नैतिक मानक (पराहम्)। फ्रॉयड के अनुसार अपसामान्य व्यवहार अचेतन स्तर पर होनेवाले मानसिक द्वंद्वों की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है जिसका संबंध सामान्यतः प्रारंभिक बाल्यावस्था या शैशवावस्था से होता है।

2. एक और मॉडल जो मनोवैज्ञानिक कारणों की भूमिका पर जोर देता है वह व्यवहारात्मक मॉडल (Behavioral model) है। यह मॉडल बताता है कि सामान्य और अपसामान्य दोनों व्यवहार अधिगत होते हैं। यह मॉडल उन व्यवहारों पर ध्यान देता है। जो अनुबंधन (Conditioning) के कारणं सीखे गए हैं तथा इसका उद्देश्य होता है कि जो कुछ सीख गया है। उसे अनधिगत या भुलाया जा सकता है।

अधिगम प्राचीन अनुबंधन (कालिक साहचर्य जिसमें दो घटनाएँ बार-बार एक दूसरे के साथ-साथ घटित होती है), क्रियाप्रसूत अनुबंध (जिसमें व्यवहार किसी पुरस्कार से संबंधित (जिसमें व्यवहार किसी पुरस्कार से संबंधित किया जाता है) तथा सामाजिक अधिगम (दूसरे के व्यवहारों का अनुकरण करके सीखना) से हो सकता है। यह तीन प्रकार के अनुबंधन सभी प्रकार के व्यवहार, अनुकूली या दुरनूकूलक के लिए उत्तरदायी हैं।

3. सामाजिक-सांस्कृतिक मॉडल (Socio-cultural model) के अनुसार, सामाजिक और सांस्कृतिक शक्तियाँ जो व्यक्तियों को प्रभावित करती हैं, इनके संदर्भ में उपसामान्य व्यवहार को ज्यादा अच्छे ढंग से समझा जा सकता है। चूँकि व्यवहार सामाजिक शक्तियों के द्वारा ही विकसित होता है अत: ऐसे कारक जैसे कि परिवार संरचना और संप्रेषण, सामाजिक तंत्र, सामाजिक दशाएँ तथा सामाजिक नामपत्र और भूमिकाएँ अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।

ऐसा देखा गया है कि कुछ पारिवारिक व्यवस्थाओं में व्यक्तियों में उपसामान्य व्यवहार उत्पन्न होने की संभावना अधिक होती है। कुछ परिवारों में ऐसी जालबद्ध संरचना होती है जिसमें परिवार के सदस्य एक-दूसरे की गतिविधियों, विचारों और भावनाओं में कुछ ज्यादा ही अंतनिर्हित होते हैं। इस तरह के परिवारों के बच्चों को जीवन में स्वावलंबी होने में कठिनाई आ सकती है। इससे भी बड़े स्तर का सामाजिक तंत्र हो सकता है जिसमें व्यक्ति के सामाजिक और व्यावसायिक संबंध सम्मिलित होते हैं।

कई अध्ययनों से यह पता नहीं होता है अर्थात गहन और संतुष्टिदायक अंतर्वैयक्तिक संबंध जीवन में नहीं प्राप्त होता, वे उन लोगों की अपेक्षा अधिक और लंबे समय तक अवसादग्रस्त हो सकते हैं, जिनके अच्छे मित्रतापूर्ण संबंध होते हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांतकारों के अनुसार, जिन लोगों में कुछ समस्याएँ होती हैं उनमें अपसामान्य व्यवहारों की उत्पत्ति संज्ञाओं और भूमिकाओं से प्रभावित होता है। जब लोग समाज के मानकों को तोड़ते हैं तो उन्हें ‘विसामान्य’ और ‘मानसिक रोगी’ जैसी संज्ञाएँ दी जाती हैं। इस प्रकार की संज्ञाएँ इतनी ज्यादा उन लोगों से जुड़ जाती हैं कि लोग उन्हें ‘सनकी’ इत्यादि पुकारने लगते हैं और इन्हें बीमार की तरह से क्रिया करने के लिए उकसाते रहते हैं। धीरे-धीरे वह व्यक्ति बीमार की भूमिका स्वीकार कर लेता है तथा अपसामान्य व्यवहार करने लगता है।

4. इन मॉडलों के अतिरिक्त, व्यवहार की एक बहुमान्य व्याख्या रोगोन्मुखता-दबाव मॉडल (Diathesistress model) द्वारा की गई है। इस मॉडल के अनुसार, जब कोई रोगोन्मुखता (किसी विकार के लिए जैविक पूर्ववृत्ति) किसी दबावपूर्ण स्थिति के कारण सामने आ जाती है तब मनोवैज्ञानिक विकार उत्पन्न होते हैं। दूसरा घटक है।

पहला घटक रोगोन्मुखता या कुछ जैविक विपथन जो वंशगत हो सकते हैं। दूसरा घटक यह है कि रोगोन्मुखता के कारण किस मनोवैज्ञानिक विकार के प्रति दोषपूर्णता उत्पन्न हो सकती है, जिसका तात्पर्य यह हुआ कि व्यक्ति उस विकार के विकास के लिए ‘पूर्ववृत्त’ या ‘खतरे में रहनेवाले व्यक्ति को इस तरह के दबावकारकों का सामना करना पड़ता है तो उनकी यह पूर्ववृत्ति वास्तव में विकार को जन्म है सकती है। इस मॉडल का कोई विकारों, जैसे दुश्चिता, अवसाद और मनोविदलता पर अनुप्रयोग किया गया है।

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प्रश्न 3.
कायरूप तथा विच्छेदी विकारों के प्रमुख अभिलक्षणों को लिखिए।
उत्तर:
1. कायरूप विकारों के अभिलक्षण:

  • स्वकायदुश्चिता रोग-चिकित्सक के द्वारा जाँच तथा किसी भी बीमारी के लक्षण न होने या विकार के न होने के आश्वासन के बावजूद महत्त्वहीन लक्षणों को व्यक्ति द्वारा गंभीर बीमारी समझा जाना।
  • काय-आलंबिता-व्यक्ति अस्पष्ट और बार-बार घटित होनेवाले तथा बिना किसी आंगिक कारण के शारीरिक लक्षण जैसे पीड़ा, अम्लता इत्यादि को प्रदर्शित करता है।
  • परिवर्तन-व्यक्ति संवेदी या पेशीय प्रकार्यों (जैसे-पक्षाघात, अंधापन इत्यादि) में क्षति या हानि प्रदर्शित करता है जिसका कोई शारीरिक कारण नहीं होता किन्तु किसी दबाव या मनोवैज्ञानिक समस्याओं के प्रति व्यक्ति की अनुक्रिया के कारण हो सकता है।

2. विच्छेदी विकारों के अभिलक्षण:

  • विच्छेदी स्मृतिलोप-व्यक्ति अपनी महत्त्वपूर्ण, व्यक्तिगत सूचनाएँ, जो अक्सर दबावपूर्ण और अभिघातज सूचना से संबंधित हो सकती हैं, का पुनःस्मरण करने में असमर्थ होता है। विस्मरण की मात्रा सामान्य से परे होती है।
  • विच्छेदी आत्मविस्मृति-व्यक्ति एक विशिष्ट विकार से ग्रसित होता है जिसमें स्मृतिलोप और दबावपूर्ण पर्यावरण से भाग जाना दोनों का मेल होता है।
  • विच्छेदी पहचान (बहु-व्यक्तित्व)-व्यक्ति दो या अधिक, भिन्न और वैषम्यात्मक, व्यक्तित्व का प्रदर्शित करता है जो अक्सर शारीरिक दुव्यवहार के इतिहास से जुड़ा होता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए:

  1. मद्यसेवन एवं निर्भरता
  2. हेरोइन दुरुपयोग एवं निर्भरता
  3. कोकीन दुरुपयोग एवं निर्भरता

उत्तर:
1. मद्यसेवन एवं निर्भरता-जो लोग मद्य या शराब का दुरुपयोग करते हैं वे काफी मात्रा में शराब का सेवन करने के लिए इस पर निर्भर रहते हैं। धीरे-धीरे शराब पीना उनके सामाजिक व्यवहार तथा सोचने और काम करने की क्षमता को प्रभावित करने लगता है। कई लोगों में शराब का दुरुपयोग उस पर निर्भरता की सीमा तक पहुँच जाता है। इसका तात्पर्य हुआ कि उनका शरीर शराब में सहन करने की क्षमता विकसित कर लेता है तथा उन्हें वही प्रभाव पाने के लिए ज्यादा मात्रा में शराब पीने पड़ते है।

जब वे शराब पीना बंद कर देते हैं तो उन्हें विनिवर्तन अनुक्रियाओं का अनुभव होता है। मद्यव्यसनता करोड़ों परिवारों, सामाजिक संबंधों और जीविकाओं को बर्बाद कर देती है। शराब पीकर गाड़ी चलानेवाले कई सड़क दुर्घटनाओं के जिम्मेदार होते हैं। मद्यव्यसनिता से ग्रसित के बच्चों पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है। इन बच्चों मे मनोवैज्ञानिक समस्याओं की उच्च दर पाई जाती है, विशेषकर दुश्चिता, अवसाद, दुर्भाता और मादक द्रव्यों के सेवन संबद्ध विकार। अधिक शराब पीना शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से खराब कर सकता है।

2. हेरोइन दुरुपयोग एवं निर्भरता-हेरोइन का दुरुपयोग सामाजिक तथा व्यावसायिक क्रियाकलापों में महत्त्वपूर्ण ढंग से बाधा पहुंचाता है। अधिकांश दुरुपयोग करनेवाले हेरोइन पर निर्भरता विकसित कर लेते हैं, इसी के इर्द-गिर्द अपना जीवन केंद्रित कर लेते हैं इसके लिए सहिष्णुता बना लेते हैं और जब वे इसका सेवन बंद कर देते हैं तो विनिवर्तन प्रतिक्रिया का अनुभव करते हैं। हेरोईन दुरुपयोग का सबसे प्रत्यक्ष खतरा इसकी मात्रा का सेवन है जो मस्तिष्क में श्वसन केंद्रों को धीमा कर देती है और कई मामलों में मृत्यु का कारण बनती है।

3. कोकीन दुरुपयोग एवं निर्भरता-कोकीन का लगातार उपयोग एक ऐसे दुरुपयोग प्रतिरूप को बनाता है जिसमें व्यक्ति पूरे दिन नशे की हालत में रह सकता है तथा अपने कार्य स्थान और सामाजिक संबंधों में खराब ढंग से व्यवहार कर सकते हैं। यह अल्पकालिक स्मृति तथा अवधान में भी समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है। निर्भरता बढ़ जाती है जिससे कोकीन व्यक्ति के जीवन पर हावी हो जाता है, इच्छित प्रभाव के लिए अधिक मात्रा में इसकी आवश्यकता होती है और इसका सेवन बंद करने से व्यक्ति अवसाद, थकावट, निद्रा-संबंधित समस्या, उत्तेजनशीलता और दुश्चिता का अनुभव करता है। मनोवैज्ञानिक क्रियाकलापों और शारीरिक क्षेम या कल्याण पर इसका खतरनाक प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 5.
मद्य के प्रभावों को लिखिए।
उत्तर:
मद्य के प्रभाव –

  1. सभी ऐल्कोहॉल पेय पदार्थों में एथाइल एल्कोहॉल होता है।
  2. यह द्रव्य रक्त में अवशोषित होकर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक जाता है (मस्तिष्क एवं मेरुरज्जु) जहाँ तक क्रियाशीलता को मंद करता है।
  3. एथाइल एल्कोहॉल मस्तिष्क के उन हिस्सों को सुस्त करता है जो निर्णय अवरोध को नियंत्रित करते हैं; लोग ज्यादा बातूनी और मैत्रीपूर्ण हो जाते हैं और वे अधिक आत्मविश्वास तथा खुशी का अनुभव करते हैं।
  4. जैसे-जैसे ऐल्कोहॉल अवशोषित होता है, यह मस्तिष्क के अन्य हिस्सों को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, शराब पीनेवाले व्यक्ति ठीक से निर्णय नहीं कर पाते, बोली कम स्पष्ट और कम सावधानी वाली हो जाती है, स्मृति विसामान्य होने लगती है; बहुत लोग संवेगात्मक या भावुक, उग्र और आक्रामक हो जाते हैं।
  5. पेशीय कठिनाइयाँ बढ़ जाती हैं उदाहरणार्थ, चलते समय लोग अस्थिर हो जाते हैं तथा सामान्य कार्य करना में भी अकुशल हो जाते हैं; दृष्टि धुंधली हो जाती है और सुनने में उन्हें कठिनाई होती है। उन्हें वाहन चलाने या साधारण-सी समस्या का समाधान करने में भी कठिनाई होती है।

प्रश्न 6.
विभिन्न स्तर के मानसिक मंदनवाले व्यक्तियों के अभिलक्षण को एक तालिका द्वारा समझाइए।
उत्तर:
तालिका विभिन्न स्तर के मानसिक मंदनवाले व्यक्तियों के अभिलक्षण –

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मेस्कालाइन एक –
(A) विभ्रांति उत्पादक है
(B) निकोटिन है
(C) शामक
(D) ओपिऑयड है
उत्तर:
(C) शामक

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प्रश्न 2.
विसामान्य कष्टप्रद अपक्रियात्मक और दुःखद व्यवहार हो कहा जाता है –
(A) सामान्य व्यवहार
(B) अपसामान्य व्यवहार
(C) विचित्र व्यवहार
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) अपसामान्य व्यवहार

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में अपसामान्य व्यवहार के कौन-से परिप्रेक्ष्य नहीं हैं?
(A) अतिप्राकृत
(B) अजैविक
(C) जैविक
(D) आंगिक
उत्तर:
(B) अजैविक

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प्रश्न 4.
हेरोइन एक प्रकार का –
(A) कोकीन है
(B) केनेबिस है
(C) ओपिऑयड है
(D) कैफीन है
उत्तर:
(C) ओपिऑयड है

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन ओपिऑयड नहीं है?
(A) मॉर्फिन
(B) कफ सिरप
(C) पीड़ानाशक गोलियाँ
(D) एल. एल. डी.
उत्तर:
(D) एल. एल. डी.

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन काय-आलंबिता विकार के लक्षण नहीं हैं?
(A) खूब खाना
(B) सिरदर्द
(C) थकान
(D) उलटी करना
उत्तर:
(A) खूब खाना

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित में कौन कायरूप विकार नहीं है?
(A) परिवर्तन विकार
(B) स्वकायदुश्चिता रोग
(C) विच्छेदी विकार
(D) पीड़ा विकार
उत्तर:
(C) विच्छेदी विकार

प्रश्न 8.
किस प्रकार में व्यक्ति प्रत्यावर्ती की कल्पना करता है जो आपस में एक-दूसरे के प्रति जानकारी रख सकते हैं या नहीं रख सकते हैं?
(A) विच्छेदी पहचान विकार
(B) पीड़ा विकार
(C) विच्छेदी स्मृतिलोप
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) विच्छेदी पहचान विकार

प्रश्न 9.
सभी ऐल्कोहॉल पेय पदार्थों में होता है:
(A) मिथाइल ऐल्कोहॉल
(B) एथाइल ऐल्कोहॉल
(C) कीटोन
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) एथाइल ऐल्कोहॉल

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित में कौन-सा मादक पदार्थ है?
(A) कैफीन
(B) गाँजा
(C) भाँग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में कौन निकोटिन की श्रेणी में आता है?
(A) हशीश
(B) हेरोइन
(C) तंबाकू
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(C) तंबाकू

प्रश्न 12.
गांजा एक प्रकार का –
(A) कैफीन है
(B) कोकीन है
(C) केनेबिस है
(D) निकोटिन है
उत्तर:
(C) केनेबिस है

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प्रश्न 13.
निम्नलिखित में कौन मादक पदार्थ की श्रेणी में आते हैं?
(A) गोंद
(B) पेंट
(C) सिगरेट
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) पेंट

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में कौन कैफीन नहीं है?
(A) कॉफी
(B) चॉकलेट
(C) कफ सरप
(D) कोको
उत्तर:
(D) कोको

प्रश्न 15.
तनाव के कई कारण होते हैं जिससे तनाव उत्पन्न होता है, उन्हें कहा जाता है –
(A) प्रतिगमन
(B) प्रतिबलक
(C) प्रत्याहार
(D) अनुकरण
उत्तर:
(B) प्रतिबलक

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प्रश्न 16.
एक लड़की का अपने पिता से कामुक लगाव तथा अपने माँ का स्थान लेने की इच्छा को कहा जाता है –
(A) इलेक्ट्रा या पितृ मनोग्रंथि
(B) ओडिपस या मातृ मनोग्रंथि
(C) जीवन-प्रवृत्ति
(D) मृत्यु-प्रकृति
उत्तर:
(A) इलेक्ट्रा या पितृ मनोग्रंथि

प्रश्न 17.
एक व्यक्ति काम पर जाने के लिए घर से बाहर निकलते समय बार-बार दरवाजे के ताले की जाँच, कम-से-कम दर बार करता है, वह विकार से ग्रसित है –
(A) दुर्भीति
(B) आंतक
(C) सामान्यीकृत दुश्चिता
(D) मनोग्रस्ति-बाध्यता
उत्तर:
(D) मनोग्रस्ति-बाध्यता

प्रश्न 18.
सामान्य, असामान्य तथा श्रेष्ठ में केवल का अंतर होता है –
(A) मात्रा का
(B) क्रम का
(C) दूरी का
(D) समय का
उत्तर:
(A) मात्रा का

प्रश्न 19.
उतर अभिघातज दबाव विकार के लक्षण होते हैं –
(A) बार-बार आनेवाले स्वप्न
(B) एकाग्रता में कमी
(C) सांवेगिक शून्यता का होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 20.
किसी विशिष्ट वस्तु, दूसरों के साथ अंतःक्रिया तथा अपरिचित स्थितियों के प्रति अविवेकी भय का होना कहलाता है:
(A) आंतक विकार
(B) दुर्भीति
(C) उत्तर अभिघातज दबाव विकार
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) दुर्भीति

प्रश्न 21.
दुश्चिंतित व्यक्ति में कौन-से लक्षण पाए जाते हैं?
(A) हृदय गति का तेज होना
(B) साँस की कमी होना
(C) दस्त होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 22.
आनुवंशिक कारकों का संबंध कहाँ पाया जाता है?
(A) भावदशा विकारों में
(B) मनोविदलता में
(C) मानसिक मंदन में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 23.
दुश्चिता विकार का संबंध किससे है?
(A) डोपामाइन से
(B) सीरोटीनिन से
(C) गामा एमिनोब्यूटिरिकएसिड से
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(C) गामा एमिनोब्यूटिरिकएसिड से

प्रश्न 24.
निम्नलिखित में किसने सर्वांगीण उपागम को विकसित किया?
(A) प्लेटो
(B) वायु
(C) पार्कर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) प्लेटो

प्रश्न 25.
निम्नांकित में कौन मनोवैज्ञानिक विकारों के वर्गीकरण का नवीनतम पद्धति है?
(A) DSM-IIIR
(B) DSM-IV
(C) ICD-9
(D) WHO
उत्तर:
(B) DSM-IV

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प्रश्न 26.
मनोगत्यात्मक चिकित्सा का प्रतिपादन निम्नांकित में से किसने किया है?
(A) वाटसन
(B) एडलर
(C) ऑलपोर्ट
(D) फ्रायड
उत्तर:
(D) फ्रायड

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में कौन असामान्य व्यवहार से संबंधित नहीं है?
(A) मानसिक असंतुलन
(B) क्रोमोसोम असमानता
(C) याददाश्त का कमजोर होना
(D) शरीर गठन
उत्तर:
(C) याददाश्त का कमजोर होना

प्रश्न 28.
विचारों, प्रेरणाओं, आवश्यकताओं अथवा उद्देश्यों के परस्पर विरोध के फलस्वरूप पैदा हुई विक्षोप या तनाव की स्थिति क्या कहलाती है?
(A) द्वन्द्व
(B) तर्क
(C) कुण्ठा
(D) दमन
उत्तर:
(A) द्वन्द्व

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प्रश्न 29.
मनोविदालिता पद का प्रयोग सबसे पहले किसने किया था?
(A) ब्लियूलर
(B) मोरेल
(C) फ्रायड
(D) क्रेपलिन
उत्तर:
(A) ब्लियूलर

प्रश्न 30.
सामान्य अनुकूलन संलक्षण में कितनी अवस्थाएँ पायी जाती हैं?
(A) तीन
(B) दो
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(A) तीन

प्रश्न 31.
DSM-IV के अनुसार निम्नांकित में से किसे दुश्चिता विकृति की श्रेणी में नहीं रखा गया है?
(A) दुर्भीति
(B) तीव्र प्रतिबल विकृति
(C) रूपांतर विकृति
(D) मनोग्रस्ति-बाध्यता विकृति
उत्तर:
(C) रूपांतर विकृति

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प्रश्न 32.
मनोविदलता के रोगी में सबसे ज्यादा कौन-सी विभ्रांति पायी जाती है?
(A) श्रवण विभ्रांति
(B) दैहिक विभ्रांति
(C) दृष्टि विभ्रांति
(D) स्पर्शी विभ्रांति
उत्तर:
(A) श्रवण विभ्रांति

प्रश्न 33.
निम्नांकित में कौन-से दुश्चिता विकार नहीं है?
(A) दुर्भीति विकार
(B) आंतक विकार
(C) मनोग्रस्ति-बाध्यता विकार
(D) मनोविच्छेदी
उत्तर:
(A) दुर्भीति विकार

प्रश्न 34.
बार-बार हाथ धोना, किसी चीज को छूना या गिनना मानसिक विकार के लक्षण हैं?
(A) दुर्भीति विकार
(B) मनोग्रस्ति-बाध्यता विकार
(C) आंतक विकार
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) दुर्भीति विकार

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प्रश्न 35.
कायरूप विकार निम्न में किससे संबंधित है?
(A) शारीरिक समस्या से
(B) मनोवैज्ञानिक समस्या से
(C) आनुवंशिक समस्या से
(D) दैवीय समस्या से
उत्तर:
(A) शारीरिक समस्या से

प्रश्न 36.
फ्रायड के द्वारा दिए गए रक्षा युक्तियों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है –
(A) दमन
(B) विस्थापन
(C) प्रतिगमन
(D) दलन
उत्तर:
(A) दमन

प्रश्न 37.
निम्नलिखित में विकास का सही क्रम कौन-सा है?
(A) अहं-पराह-उपाहं
(B) उपाहं-पराह-अहं
(C) उपाह-अहं-पराह
(D) पराह-अहं-उपाहं
उत्तर:
(C) उपाह-अहं-पराह

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प्रश्न 38.
हेरोइन एक प्रकार का –
(A) कोकीन है
(B) केनेबिस है
(C) ओपिआयूड है
(D) केफीन है
उत्तर:
(C) ओपिआयूड है

प्रश्न 39.
शीलगुण कहलाने के लिए आवश्यक है –
(A) व्यवहार में संगतता
(B) व्यवहार में स्थिरता
(C) व्यवहार में संगतता तथा स्थिरता दोनों
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(C) व्यवहार में संगतता तथा स्थिरता दोनों

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प्रश्न 40.
मनोविदलता के उप-प्रकारों में से कौन-सा एक नहीं है?
(A) व्यामोहाभ प्रकार
(B) विसंगठित प्रकार
(C) अवधान-न्यूनता अतिक्रिया प्रकार
(D) अविभेदित प्रकार
उत्तर:
(C) अवधान-न्यूनता अतिक्रिया प्रकार

प्रश्न 41.
‘तदनुभूति’ अनुभव करने की क्षमता अधिक रखनेवालों में सबसे उपर्युक्त उदाहरण है –
(A) मदर टेरेसा
(B) हेमवती नंदन बहुगुणा
(C) मेधा पाटेकर
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) मदर टेरेसा

प्रश्न 41.
अगर कोई व्यक्ति में उन्माद तथा विषाद दोनों तरह की मानसिक अवस्थाएँ क्रम से होती हैं तो इसे DSM-IV में क्या संज्ञा दी गई है?
(A) उत्साद-विषाद मनोविक्षिप्त
(B) द्वि-ध्रुवीय विकार
(C) मुख्य विषाद
(D) मनःस्थिति विकार
उत्तर:
(B) द्वि-ध्रुवीय विकार

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 3 जीवन की चुनौतियों का सामना

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 3 जीवन की चुनौतियों का सामना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 3 जीवन की चुनौतियों का सामना

Bihar Board Class 12 Psychology जीवन की चुनौतियों का सामना Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
दबाव के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए। दैनिक जीवन से उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
दबाव का वर्णन किसी जीवन द्वारा उद्दीपक घटना के प्रति की जाने वाली अनुक्रियाओं के प्रतिरूप के रूप में किया जा सकता है जो उसकी साम्यावस्था में व्यवधान उत्पन्न करता है तथा उसके सामने करने की क्षमता से कहीं अधिक होता है। उदाहरण के लिए, किसी चुनौती के सामने होने पर हम अधिक प्रयास करते हैं तथा चुनौती से निपटने के लिए अपने सारे सं नों और अवलंब व्यवस्था को भी संघटित कर देते हैं। सभी चुनौतियाँ, समस्याएँ तथा कठिन परिस्थितियाँ हमें दबाव में डालती हैं। दबाव विद्युत की भाँति होते हैं। दबाव ऊर्जा प्रदान करते हैं। मानव भाव-प्रबोधन में वृद्धि करते हैं तथा निष्पादन को प्रभावित करते हैं। तथापि, यदि विद्युत धारा अत्यन्त तीव्र हो तो वह बल्ब की बत्ती को जला सकती है। विद्युत उपकरणों को खराब कर सकती है। ठीक इस प्रकार यदि दबाव का ठीक से प्रबंधन नहीं किया गया है तो वह जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

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प्रश्न 2.
दबाव के लक्षणों तथा स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दबाव के कारण हर व्यक्ति की दबाव के प्रति अनुक्रिया उसके व्यक्तित्व पालन-पोषण तथा जीवन के अनुभवों के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। प्रत्येक व्यक्ति के दबाव अनुक्रियाओं के अलग-अलग प्रतिरूप होते हैं । अतः, चेतावनी देने वाले संकेत तथा उनकी तीव्रता भी भिन्न-भिन्न होती है। हममें कुछ व्यक्ति अपनी दबाव अनुक्रियाओं को पहचानते हैं तथा अपने लक्षणों की गंभीरता तथा प्रकृति के आधार पर अथवा व्यवहार में परिवर्तन के आधार पर समस्या की गहनता का आकलन कर लेते हैं। दबाव के ये लक्षण शारीरिक, संवेगात्मक तथा व्यवहारात्मक होते हैं। कोई भी लक्षण दबाव की प्रबलता को ज्ञापित कर सकता है, जिसका यदि निराकरण न किया जाए तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

दबाव के स्रोत – दबाव के निम्नलिखित स्रोत हो सकते हैं –

1. जीवन घटनाएँ:
जब से हम पैदा होते हैं, तभी से बड़े और छोटे, एकाएक उत्पन्न होने वाले और धीरे-धीरे घटित होने वाले परिवर्तन हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। हम छोटे तथा दैनिक होने वाले परिवर्तनों का सामना करना तो सीख लेते हैं किन्तु जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ दबावपूर्ण हो सकती हैं। क्योंकि वे हमारी दिनचर्या को बाधित करती हैं और उथल-पुथल मचा देती हैं। यदि इस प्रकार की कई घटनाएँ चाहे वे योजनाबद्ध हो (जैसे-घर बदलकर नए घर में जाना) या पूर्वानुमानित न हों (जैसे-किसी दीर्घकालिक संबंध का टूट जाना) कम समय अवधि में घटित होती हैं, तो हमें उनका सामना करने में कठिनाई होती है तथा हम दबाव के लक्षणों के प्रति अधिक प्रवण होते हैं।

2. परेशान करने वाली घटनाएँ:
इस प्रकार के दबावों की प्रकृति होती है, जो अपने दैनिक जीवन में घटने वाली घटनाओं के कारण बनी रहती है। कोलाहलपूर्ण परिवेश, प्रतिदिन का आना-जाना, झगड़ालू पड़ोसी, बिजली-पानी की कमी, यातायात की भीड़-भाड़ इत्यादि ऐसी कष्टप्रद घटनाएँ हैं। एक गृहस्वामिनी को भी अनेक ऐसी आकस्मिक कष्टप्रद घटनाओं का अनुभव करना पड़ता है। कुछ व्यवसायों में ऐसी परेशान करने वाली घटनाओं का सामना बारंबार करना पड़ता है। कभी-कभी ऐसी परेशानियों का बहुत तबाहीपूर्ण परिणाम उस व्यक्ति के लिए होता है जो उन घटनाओं का सामना करता है क्योंकि बाहरी दूसरे व्यक्तियों को इन परेशानियों की जानकारी भी नहीं होती। जो व्यक्ति इन परेशानियों के कारण जितना ही अधिक दबाव अनुभव लरता है उतना ही अधिक उसका मनोवैज्ञानिक कुशल-क्षेम निम्न स्तर का होता है।

3. अभिघातज घटनाएँ:
इनके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की गंभीर घटनाएँ जैसे-अग्निकांड, रेलगाड़ी या सड़क दुर्घटना, लूट, भूकम्प, सुनामी इत्यादि सम्मिलित होती हैं। इस प्रकार की घटनाओं का प्रभाव कुछ समय बीत जाने के बाद दिखाई देता है तथा कभी-कभी ये प्रभाव दुश्चिता, अतीतावलोकन, स्वप्न तथा अंतर्वेधी विचार इत्यादि के रूप में सतत रूप से बने रहते हैं। तीव्र अभिघातों के कारण संबंधों में भी तनाव उत्पन्न हो जाते हैं। इनका सामना करने के लिए विशेषज्ञों की सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है, विशेष रूप से जब वे घटना के पश्चात् महीनों तक सतत रूप से बने रहें।

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प्रश्न 3.
जी० ए० एस० मॉडल का वर्णन कीजिए तथा इस मॉडल की प्रासंगिकता को एक उदाहरण की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सेल्ये ने जी० ए० एस० मॉडल को प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, जी० ए० एस० के अंतर्गत तीन चरण होते हैं-सचेत प्रतिक्रिया, प्रतिरोध तथा परिश्रांति।

1. सचेत प्रतिक्रिया चरण:
किसी हानिकार उद्दीपक या दबावकारक की उपस्थिति के कारण एड्रीनल-पीयूष-कॉर्टेक्स तंत्र का सक्रियण हो जाता है। यह उन अंत:स्रावों को छोड़ने के लिए प्रेरित करता है जिससे दबाव अनुक्रिया होती है। अब व्यक्ति संघर्ष या पलायन के लिए तैयार हो जाता है।

2. प्रतिरोध चरण:
यदि दबाव दीर्घकालिक होता है तो प्रतिरोध चरण प्रारंभ होता है। परानुकंपी तंत्रिका तंत्र, शरीर के संसाधनों का अधिक सावधानीपूर्ण उपयोग करने का उद्धत करता है। जीव खतरे का सामने करने के लिए मुकाबला करने का प्रयास करता है।

3. परिश्रांति चरण:
एक ही दबावकारक अथवा अन्य दबावकारकों के समक्ष दीर्घकालिक उद्भाषण से शरीर के संसाधन निष्कासित हो जाते हैं, जिसके कारण परिश्रांति का तृतीय चरण आता है। सचेत प्रतिक्रिया तथा प्रतिरोध चरण में कार्यरत शरीर-क्रियात्मक तंत्र अप्रभावी हो जाते हैं तथा दबाव-संबद्ध रोगों, जैसे-उच्च रक्तचाप की संभावना बढ़ जाती है।

सेल्ये के मॉडल की आलोचना इसलिए की गई है कि उसमें दबाव में मनोवैज्ञानिक कारकों की बहुत सीमित भूमिका बताई गई है। शोधकर्ताओं के अनुसार, घटनाओं का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन दबाव के निर्धारण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। व्यक्ति दबाव के प्रति क्या अनुक्रिया करेगा, यह बहुत सीमा तक उसके प्रत्यक्षण, व्यक्तित्व तथा जैविक संरचना से प्रभावित होता है।

प्रश्न 4.
उन पर्यावरणी कारकों का वर्णन कीजिए जो (अ) हमारे ऊपर सकारात्मक प्रभाव तथा (ब) नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
उत्तर:
विभिन्न पर्यावरणी कारक हमारे ऊपर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं जबकि ऐसे भी पर्यावरणी कारक हैं जो हमारे ऊपर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। वायु प्रदूषण, भीड़, शोर, ग्रीष्मकाल की गर्मी, शीतकाल की सर्दी इत्यादि आदि पर्यावरणी दबाव हमारे परिवेश की वैसी दशाएँ होती हैं जो प्रायः अपरिहार्य होती हैं। इनका हमारे ऊपर नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। कुछ पर्यावरणी दबाव प्राकृतिक विपदाएँ तथा विपाती घटनाएँ हैं और उनका हमारे ऊपर लम्बे अंतराल तक नकारात्मक प्रभाव रहता है। आग, भूकम्प, बाढ़, सूखा, तूफान, सुनामी आदि इनमें शामिल हैं।

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प्रश्न 5.
मनोवैज्ञानिक प्रकार्यों पर दबाव के प्रभाव की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रकार्यों पर दबाव के प्रभाव:
1. संवेगात्मक प्रभाव:
वे व्यक्ति जो दबावग्रस्त होते हैं। प्रायः आकस्मिक मन:स्थिति परिवर्तन का अनुभव करते हैं तथा सनकी की तरह व्यवहार करते हैं, जिसके कारण वे परिवार तथा मित्रों से विमुख हो जाते हैं। कुछ स्थितियों में इसके कारण एक दुश्चक्र प्रारम्भ होता है जिससे विश्वास में कमी होती है तथा जिसके कारण फिर और भी गंभीर संवेगात्मक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। उदाहरण के लिए, दुश्चिता तथा अवसाद की भावनाएँ, शारीरिक तनाव में वृद्धि, मनोवैज्ञानिक तनाव में वृद्धि तथा आकस्मिक मनःस्थिति परिवर्तन।

2. शरीर-क्रियात्मक प्रभाव:
जब शारीरिक या मनोवैज्ञानिक दबाव मनुष्य के शरीर पर क्रियाशील होते हैं तो शरीर में कुछ हार्मोन, जैसे-एड्रिनलीन तथा कॉर्टिसोल का स्राव बढ़ जाता है। ये हॉर्मोन हृदयगति, रक्तचाप स्तर, चयापचय तथा शारीरिक क्रिया में विशिष्ट परिवर्तन कर देते हैं। जब हम थोड़े समय के लिए दबावग्रस्त हों तो ये शारीरिक प्रतिक्रियाएँ कुशलतापूर्वक कार्य करने में सहायता करती हैं, किन्तु दीर्घकालिक रूप से यह शरीर को अत्यधिक नुकसान पहुंचा सकती हैं। एपिनेफरीन तथा नॉरएपिनेफरीन छोड़ना, पाचक तंत्र की धीमी गति, फेफड़ों में वायुमार्ग का विस्तार, हृदयगति में वृद्धि तथा रक्त-वाहिकाओं का सिकुड़ना, इस प्रकार के शरीरक्रियात्मक प्रभावों के उदाहरण हैं।

3. संज्ञानात्मक प्रभाव:
यदि दबाव के कारण दाब (प्रेशर) निरंतर रूप से बना रहता है तो व्यक्ति मानसिक अभितार से ग्रस्त हो जाता है। उच्च दबाव के कारण उत्पन्न यह पीड़ा, व्यक्ति में ठोस निर्णय लेने की क्षमता को तेजी से घटा सकती है। घर में, जीविका में अथवा कार्य स्थान में लिए गए गलत निर्णयों के द्वारा तर्क-वितर्क, असफलता, वित्तीय घाटा, यहाँ तक कि नौकरी की क्षति भी इसके परिणामस्वरूप हो सकती है। एकाग्रता में कमी तथा न्यूनीकृत अल्पकालिक स्मृति क्षमता भी दबाव के संज्ञानात्मक प्रभाव हो सकते हैं।

4. व्यवहारात्मक प्रभाव:
दबाव का प्रभाव हमारे व्यवहार पर कम पौष्टिक भोजन करने, उत्तेजित करने वाले पदार्थों, जैसे-केफीन को अधिक सेवन करने एवं सिगरेट, मद्य तथा अन्य औषधियो; जैसे-उपशामकों इत्यादि के अत्यधिक सेवन करने में परिलक्षित होता है। उपशामक औषधियाँ व्यसन बन सकती हैं तथा उनके अन्य प्रभाव भी हो सकते हैं; जैसे-एकाग्रता में कठिनाई, समन्वय में कमी तथा घूर्णी या चक्कर आ जाना। दबाव के कुछ ठेठ या प्ररूपी व्यवहारात्मक प्रभाव, निद्रा-प्रतिरूपों में व्याघात, अनुपस्थिता में वृद्धि तथा कार्य निष्पादन में हास है।

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प्रश्न 6.
जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए जीवन कौशल कैसे उपयोगी हो सकते हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जीवन कौशल, अनुकूली तथा सकारात्मक व्यवहार की वे योग्यताएँ हैं जो व्यक्तियों को दैनिक जीवन की मांगों और चुनौतियों से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए सक्षम बनाती हैं। दबाव का सामना करने की हमारी योग्यता इस बात पर निर्भर करती है कि हम दैनिक जीवन की माँगों के प्रति संतुलन करने तथा उनके संबंध में व्यवहार करने के लिए कितने तैयार हैं तथा अपने जीवन में साम्यावस्था बनाए रखने के लिए कितने तैयार हैं। ये जीवन कौशल सीखे जा सकते हैं तथा उसमें सुधार, स्वयं की देखभाल के साथ-साथ ऐसी असहायक आदतों, जैसे-पूर्णतावादी होना, विलंबन या टालना इत्यादि से मुक्ति, कुछ ऐसे जीवन कौशल हैं जिनसे जीवन को चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी।

प्रश्न 7.
उन कारकों का विवेचन कीजिए जो सकारात्मक स्वास्थ्य तथा कुशल-क्षेम की ओर ले जाते हैं।
उत्तर:
अनेक ऐसे कारक हैं जो सकारात्मक स्वास्थ्य के विकास को सुकर या सुसाध्य बनाते हैं। ये कारक निम्नलिखित हैं –

1. आहार:
संतुलित आहार व्यक्ति की मन:स्थिति को ठीक कर सकता है, ऊर्जा प्रदान कर सकता है, पेशियों का पोषण कर सकता है। परिसंचरण को समुन्नत कर सकता है, रोगों से रक्षा कर सकता है, प्रतिरक्षक तंत्र को सशक्त बना सकता है तथा व्यक्ति को अधिक अच्छा अनुभव करा सकता है, जिससे वह जीवन में दबावों का सामना और अच्छी तरह से कर सके। स्वास्थ्यकर जीवन की कुंजी है, दिन में तीन बार संतुलित और विविध आहार का सेवन करना।

किसी व्यक्ति को कितने पोषण की आवश्यकता है, यह व्यक्ति की सक्रियता स्तर, आनुवंशिक प्रकृति, जलवायु नथा स्वास्थ्य के इतिहास पर निर्भर करता है। कोई व्यक्ति क्या भोजन करता है तथा उसका वजन ना है, इसमें व्यवहारात्मक प्रतिक्रियाएँ निहित होती हैं। कुछ व्यक्ति पौष्टिक आहार तथा वजन रख-रखाव सफलतापूर्वक कर पाते हैं किन्तु कुछ व्यक्ति मोटापे के शिकार हो जाते हैं। जब हम दबावग्रस्त होते हैं तो हम आराम देने वाले भोजन, जिसमें प्रायः अधिक वसा, नमक तथा चीनी होती है का सेवन करते हैं।

2. व्यायाम:
बड़ी संख्या में किए गए अध्ययन शारीरिक स्वास्थ्यता एवं स्वास्थ्य के बीच सुसंगत सकारात्मक संबंधों की पुष्टि करते हैं। इसके अतिरिक्त, कोई व्यक्ति स्वास्थ्य की समुन्नति के लिए जो उपाय कर सकता है उसमें व्यायाम जीवन शैली में वह परिवर्तन है जिसके व्यापक रूप से लोकप्रिय अनुमोदन प्राप्त है। नियमित व्यायाम वजन तथा दबाव के प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तथा तनाव, दुश्चिता एवं अवसाद को घटाने में सकारात्मक प्रभाव प्रदर्शित करता है।

अच्छे स्वास्थ्य के लिए जो व्यायाम आवश्यक है, उनमें तनने या खिंचाव वाले व्यायाम, जैसे-दौड़ना, तैरना, साइकिल चलाना इत्यादि आते हैं। जहाँ खिंचाव वाले व्यायाम शांतिदायक प्रभाव डालते हैं, वहाँ वायुजीवी व्यायाम शरीर के भाव-प्रबोधन स्तर को बढ़ाते हैं। व्यायाम के स्वास्थ्य-संबंधी फायदे दबाव प्रतिरोधक के रूप में कार्य करते हैं। अध्ययन प्रदर्शित करते हैं कि शारीरिक स्वस्थता, व्यक्तियों को सामान्य मानसिक तथा शारीरिक कुशल-क्षेम का अनुभव कराती है उस समय भी जब जीवन में नकारात्मक घटनाएं घट रही हैं।

3. सकारात्मक चिंतन:
सकारात्मक चिंतन की शक्ति, दबाव का सामना करने तथा उसे कम करने में अधिकाधिक मानी जा रही है। आशावाद, जो कि जीवन में अनुकूल परिणामों की प्रत्याशा करने के प्रति झुकाव है, को मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक कुशल-क्षेम से संबंधित किया गया है। आशावादी व्यक्ति यह मानते हैं कि विपत्ति का सफलतापूर्वक सामना किया जा सकता है। वे समस्या-केन्द्रित सामना करने का अधिक उपयोग करते हैं तथा दूसरों से सलाह और सहायता मांगते हैं।

4. सकारात्मक अभिवृत्ति:
सकारात्मक स्वास्थ्य तथा कुशल-क्षेम सकारात्मक अभिवृत्ति के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। सकारात्मक अभिवृत्ति की ओर ले जाने वाले कुछ कारक इस प्रकार हैं वास्तविकता का सही प्रत्यक्षण, जीवन में उद्देश्य तथा उत्तरदायित्व की भावना का होना, दूसरे व्यक्तियों के विभिन्न दृष्टिकोणों के प्रति स्वीकृति एवं सहिष्णुता का होना तथा सफलता के लिए श्रेय एवं असफलता के लिए दोष भी स्वीकार करना। अंत में नए विचारों के लिए खुलापन तथा विनोदी स्वभाव, जिससे व्यक्ति स्वयं अपने ऊपर भी हंस सके, हमें ध्यान केन्द्रित करने तथा चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में देख सकने में सहायता करते हैं।

5. सामाजिक अवलंब:
ऐसे व्यक्तियों का अस्तित्व तथा उपलब्धता जिन पर हम विश्वास रख सकते हैं, जो यह स्वीकार करते हैं कि हमारी परवाह है, जिनके लिए हम मूल्यवान हैं तथा जो हमें प्यार करते हैं, यही सामाजिक अवलंब की परिभाषा है। कोई व्यक्ति जो यह विश्वास करता/करती है कि वह संप्रेषण और पारस्परिक आभार के एक सामाजिक जालक्रम का भाग है, वह सामाजिक अवलंब का अनुभव करता/करती है। प्रत्यक्षित अवलंब अर्थात् सामाजिक अवलंब की गुणवत्ता स्वास्थ्य तथा कुशल-क्षेम से सकारात्मक रूप से संबद्ध है, जबकि सामाजिक जालक्रम अर्थात् सामाजिक अवलंब की मात्रा कुशल-क्षेम से संबद्ध नहीं है क्योंकि एक बड़े सामाजिक जालक्रम को बनाए रखना अत्यधिक समय लेने वाला तथा व्यक्ति पर मांगों का दाब डालने वाला होता है।

अध्ययन प्रदर्शित करते हैं कि वे महिलाएँ जो दबावपूर्ण जीवन घटनाओं का अनुभव करती हैं, उनका यदि कोई अंतरंग मित्र या तो गर्भावस्था के दौरान वे कम अवसादग्रस्त थीं तथा उन्हें कम चिकित्सा जटिलताओं का सामना करना पड़ा। सामाजिक अवलंब दबाव के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है। वे व्यक्ति जिन्हें परिवार तथा मित्रों से अधिक सामाजिक उपलब्ध होता है, दबाव का अनुभव होने पर, कम तनाव महसूस करते हैं तथा वे दबाव का सामना अधिक सफलतापूर्वक कर सकते हैं।

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प्रश्न 8.
प्रतिरक्षक तंत्र को दबाव कैसे प्रभावित करता हैं?
उत्तर:
दबाव के कारण प्रतिरक्षक तंत्र की कार्यप्रणाली दुर्बल हो जाती है जिसके कारण बीमारी उत्पन्न हो सकती है। प्रतिरक्षक तंत्र शरीर के भीतर तथा बाहर से होने वाले हमलों से शरीर की रक्षा करता है। मनस्तंत्रिका प्रतिरक्षा विज्ञान (Psychoneuroimmunology) मन, मस्तिष्क और प्रतिरक्षक तंत्र के बीच संबंधों पर ध्यान केन्द्रित करता है। यह प्रतिरक्षक तंत्र पर दबाव के प्रभाव का अध्ययन करता है। प्रतिरक्षक तंत्र में श्वेत रक्त कोशिकाएँ या श्वेताणु (Antibodies) का निर्माण भी होता है। प्रतिरक्षक तंत्र में ही टी-कोशिकाएँ, बी-कोशिकाएँ तथा प्राकृतिक रूप से नष्ट करने वाली कोशिकाओं सहित कई प्रकार के श्वेताणु होते हैं।

टी-कोशिकाएँ हमला करने वाली को नष्ट करती हैं, तथा टी-सहायक कोशिकाएँ प्रतिरक्षात्मक क्रियाओं में वृद्धि करती हैं। इन्हीं टी-सहायक कोशिकाओं तथा ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वाइरस (एच० आई० वी०) हमला करते हैं, जो कि एक्वायर्ड इम्यूना डेफिशिएंसी सिंड्रोम (एड्स) के कारक हैं। बी-कोशिकाएँ रोगप्रतिकारकों का निर्माण करती हैं। प्राकृतिक रूप से नष्ट करने वाली कोशिकाएँ वाइरस तथा अर्बुद या ट्यूमर दोनों के विरुद्ध लड़ाई करती हैं।

दबाव के कारण प्राकृतिक रूप के नष्ट करने वाली कोशिकाओं की कोशिका-विषाक्तता प्रभावित हो सकती है, जो प्रमुख संक्रमणों तथा कैंसर से रक्षा में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है। अत्यधिक उच्च दबाव से ग्रस्त व्यक्तियों में, प्राकृतिक रूप से नष्ट करने वाली कोशिकाओं की कोशिका-विषाक्त में भारी कमी पाई गई है। यह उन विद्यार्थियों, जो महत्त्वपूर्ण परीक्षाओं में बैठने जा रहे हैं, शोकसंतप्त व्यक्तियों तथा जो गंभीर रूप से अवसादग्रस्त हैं, में भी पाई गई हैं। अध्ययन यह प्रदर्शित करते हैं कि प्रतिरक्षक तंत्र की क्रियाशीलता उन व्यक्तियों में बेहतर पाई जाती है जिन्हें सामाजिक अवलंब उपलब्ध रहती है। इसके अतिरिक्त प्रतिरक्षक तंत्र में परिवर्तन उन व्यक्तियों के स्वास्थ्य को अधिक प्रभावित करता है जिसका प्रतिरक्षक तंत्र पहले से ही दुर्बल हो चुका है। नकारात्मक संवेगों सहित, दबाव हार्मोन का स्राव होना जिनके द्वारा प्रतिरक्षक तंत्र दुर्बल होता है, जिसके परिणामस्वरूप मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं।

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चित्र: दबाव का बीमारी से संबंध

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 3 जीवन की चुनौतियों का सामना

प्रश्न 9.
किसी ऐसी जीवन घटना का उदाहरण दीजिए जो दबावपूर्ण हो सकती है। उन तथ्यों पर प्रकाश डालिए जिनके कारण वह घटना अनुभव करने वाले व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न मात्रा में दबाव उत्पन्न कर सकती हैं?
उत्तर:
अग्निकांड, रेलगाड़ी दुर्घटना आदि जीवन की ऐसी घटनाएँ हैं जो दबावपूर्ण हो सकती हैं। व्यक्ति जिन दबावों का अनुभव करते हैं, वे तीव्रता, अवधि, जटिलता तथा भविष्यकथनीयता में भिन्न हो सकी है। किसी दबाव का परिणाम इस पर किसी विशिष्ट दबावपूर्ण अनुभव का स्थान क्या है। प्रायः वे दबाव, जो अधिक तीव्र दीर्घकालिक या पुराने, जटिल तथा अप्रत्याशित होते हैं, वे अधिक नकारात्मक परिणाम उत्पन्न करते हैं, बजाय उनके जो कम तीव्र, अल्पकालिक, कम जटिल तथा प्रत्याशित होते हैं। किसी व्यक्ति द्वारा दबाव का अनुभव करना उसके शरीरक्रियात्मक बल पर भी निर्भर करता है। अतः, वे व्यक्ति जिनका शारीरिक स्वास्थ्य खराब है तथा दुर्बल शारीरिक गठन के हैं, उन व्यक्तियों की अपेक्षा, जो अच्छे स्वास्थ्य तथा बलिष्ठ शारीरकि गठन वाले हैं, दबाव के समक्ष अधिक असुरक्षित होंगे।

कुछ मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ; जैसे-मानसिक स्वास्थ्य, स्वभाव तथा स्व-संप्रत्यय भी दबाव के लिए प्रासंगिक हैं। वह सांस्कृतिक संदर्भ जिसमें हम जीवन-यापन करते हैं किसी भी घटना के अर्थ का निर्धारण करता है तथा यह भी निर्धारित करता है कि विभिन्न परिस्थितियों में किस प्रकार की अनुक्रियाएँ अपेक्षित होती हैं। अंततः दबाव के अनुभव, किसी व्यक्ति के पास उपलब्ध संसाधन; जैसे-धन, सामाजिक कौशल, सामना करने की शैली, अवलंब का नेटवर्क इत्यादि द्वारा निर्धारित होते हैं। ये सारे कारक निर्धारित करते हैं कि किसी विशिष्ट दबावपूर्ण परिस्थिति का मूल्यांकन कैसे होगा।

प्रश्न 10.
दबाव का सामना करने वाली युक्तियों की अपनी जानकारी के आधार पर आप अपने मित्रों को दैनिक जीवन में दबाव का परिहार करने के लिए क्यों सुझाव देगें?
उत्तर:
मैं अपने मित्र से दबाव के परिहार करने के लिए विभिन्न युक्तियों को अपनाने के लिए कहूँगा। दबावपूर्ण स्थिति के संबंध में सूचनाएं एकत्रित करके उनके प्रति क्या-क्या वैकल्पिक क्रियाएँ हो सकती हैं तथा उनके क्या परिणाम हो सकते हैं उसका अध्ययन करना। फिर मन में विश्वास जगाना तथा आशा को बनाए रखना तथा अपने संवेगों पर नियंत्रण रखना भी आवश्यक होगा।

इनके अतिरिक्त दबावपूर्ण विचारों का सचेतन दमन तथा उसके स्थान पर आत्म-रक्षित विचारों के प्रतिस्थापन के लिए कहूँगा। उससे कहूँगा कि किसी कार्य को करने के लिए एक योजना बनाए तथा उस योजना के मुताबिक काम करके सफलता प्राप्त करें। इन सबके अतिरिक्त मैं उसे सकारात्मक स्वास्थ्य तथा कुशल-क्षेम बनाए रखने वाले विभिन्न कारकों को भी बताऊँगा जैसे-संतुलित आहार लेना, व्यायाम करना, अपनी सोच को सकारात्मक रखना, अपनी अभिवृत्ति को सकारात्मक रखना आदि शामिल है।

प्रश्न 11.
दबाव का सामना करने के विभिन्न उपायों की गणना कीजिए।
उत्तर:
एंडलर तथा पार्कर ने दबाव का सामना करने के निम्नलिखित उपाय बताए हैं –
1. कृत्य-अभिविन्यस्त युक्ति:
दबावपूर्ण स्थिति के संबंध में सूचनाएँ एकत्रित करना, उनके प्रति क्या-क्या वैकल्पिक क्रियाएँ हो सकती हैं तथा उनके संभावित परिणाम क्या हो सकते हैं यह सब इनके अंतर्गत आते हैं। उसके अंतर्गत प्राथमिकताओं तथा क्रियाओं के संबंध में निर्णय करना भी सम्मिलित होता है ताकि दबावपूर्ण स्थिति का प्रत्यक्ष रूप से सामना किया जा सके। उदाहरण के लिए, मैं अपने लिए बेहतर समय-सारणी बनाऊँ या विचार करूँ कि इनके समान समस्याओं का समाधान मैंने कैसे किया था।

2. संवेग-अभिविन्यस्त युक्ति-इसके अंतर्गत मन में आशा बनाए रखने के प्रयास तथा अपने संवेगों पर नियंत्रण सम्मिलित हो सकते हैं; कुंठा तथा क्रोध की भावनाओं को अभिव्यक्त करना या फिर यह निर्णय करना कि परिस्थिति को बदलने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है, भी इसके अंतर्गत सम्मिलित हो सकते हैं; उदाहरण के लिए, मैं अपने मन को समझाऊँ कि यह सब कुछ मेरे साथ घटित नहीं हो रहा था या फिर मैं यही चिंता करूं कि मुझे क्या करना है।

3. परिहार-अभिविन्यस्त युक्ति:
इसके अंतर्गत स्थिति की गंभीरता को नकारना या कम समझना सम्मिलित होते हैं। इसमें दबावपूर्ण विचारों का सचेन दमन तथा उनके स्थान पर आत्म-दक्षित विचारों का प्रतिस्थापना भी सम्मिलित होता है। लेजारस तथा फोकसमैन ने दबाव का सामना करने का संकल्पना-निर्धारण एक गत्यात्मक प्रक्रिया के रूप में किया है, न कि किसी व्यक्तिगत विशेषक के रूप में। उनके अनुसार, सामना करने की अनुक्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं-समस्या-केन्द्रित तथा संवेग-केन्द्रित।

4. समस्या-केन्द्रित युक्तियाँ:
समस्या-केन्द्रित युक्तियँ समस्या पर ही हमला करती हैं, ऐसा वे उन व्यवहारों द्वारा करती हैं जो सूचनाएँ एकत्रित करने, घटनाओं को परिवर्तित करने तथा विश्वास और प्रतिबद्धता को परिवर्तित करने के लिए होते हैं। वे व्यक्ति की जागरुकता में वृद्धि करती हैं, ज्ञान के स्तर को बढ़ाती हैं तथा दबाव का सामना करने के संज्ञानात्मक एवं व्यवहारात्मक विकल्पों में वृद्धि करती हैं। घटना से उत्पन्न खतरे की अनुभूति को भी घटाने का कार्य वे करती हैं। उदाहरण के लिए, “मैं कार्य करने के लिए एक योजना का निर्माण किया तथा उसका क्रियान्वयन किया।”

5. संवेग-केन्द्रित युक्तियाँ:
ये युक्तियाँ प्रमुखतया मनोवैज्ञानिक परिवर्तन लाने हेतु उपयोग की जाती हैं जिससे घटना में परिवर्तन लाने का अल्पतम प्रयास करते हुए उसके कारण उत्पन्न होने वाले संवेगात्मक विघटन के प्रभावों को सीमित किया जा सके। उदाहरण के लिए, “मैंने कुछ कार्य इसलिए किए कि मेरे भीतर से वह निकल जाए।” यद्यपि जब व्यक्ति के समक्ष दबावपूर्ण स्थिति उत्पन्न होती है तो समस्या-केन्द्रित तथा संवेग-केन्द्रित दोनों ही सामना करने की युक्तियों का उपयोग आवश्यक होता है। मगर यह साबित हो चुका है कि व्यक्ति प्रथम प्रकार की युक्तियों का अपेक्षाकृत अधिक बार उपयोग करते हैं।

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प्रश्न 12.
हम यह जानते हैं कि कुछ जीवन शैली के कारक दबाव उत्पन्न कर सकते हैं तथा कैंसर तथा हृदयरोग जैसी बीमारियों को भी जन्म दे सकते हैं फिर भी हम अपने व्यवहारों में परिवर्तन क्यों नहीं ला पाते? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
दबाव के कारण अस्वास्थ्यकर जीवन शैली या स्वस्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार उत्पन्न हो सकते हैं। व्यक्ति के निर्णयों तथा व्यवहारों का वह समग्र प्रतिरूप जीवन शैली कहलाता है जो व्यक्ति के स्वास्थ्य तथा जीवन की गुणवत्ता को निर्धारित करता है। दबाव से ग्रस्त व्यक्ति रोगजनकों (Pathogens), जो कि शारीरिक रोग उत्पन्न करने के अभिकर्ता होते हैं, के समक्ष अधिक आरक्षित रहते हैं। दबाव से ग्रस्त व्यक्तियों की पौष्टिक भोजन की आदत कम होती है, वे सोते भी कम हैं, तथा वे स्वास्थ्य के लिए जोखिम वाले व्यवहार, जैसे-धूमपान तथा मद्य दुरुपयोग भी अधिक करते हैं।

स्वास्थ्य को क्षति पहुंचाने वाले ये व्यवहार धीरे-धीरे विकसित होते हैं तथा अस्थायी रूप से आनंददायक अनुभवों से संबद्ध होते हैं। अपितु, हम उनके दीर्घकालिक नुकसानों की अनदेखी करते हैं तथा उनके कारण हमारे जीवन में उत्पन्न होने वाले जोखिम को कम महत्त्व देते हैं। स्वास्थ्यवर्धक व्यवहार जैसे-संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पारिवारिक अवलंब आदि अच्छे स्वास्थ्य में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जीवन शैली से जुड़ाव जिसमें सम्मिलित होते हैं, संतुलित निम्न वसायुक्त आहार, नियमित व्यायाम और सकारात्मक चिंतन के साथ क्या करते हैं।

Bihar Board Class 12 Psychology जीवन की चुनौतियों का सामना Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भौतिक दबाव क्या है?
उत्तर:
भौतिक दबाव वे माँगें हैं, जिसके कारण हमारी शारीरिक दशा में परिवर्तन उत्पन्न हो जाता है। हम तनाव का अनुभव करते हैं जब हम शारीरिक रूप से अधिक परिश्रम करते हैं, पौष्टिक भोजन की कमी हो जाती है, कोई चोट लग जाती है या निद्रा कम हो जाती है।

प्रश्न 2.
पर्यावरणी दबाव क्या है?
उत्तर:
पर्यावरणी दबाव हमारे परिवेश की वैसी दशाएँ होती हैं जो प्रायः अपरिहार्य होती हैं। उदाहरण-वायु प्रदूषण, भीड़, शोर, ग्रीष्मकाल की गर्मी, शीतकाल की सर्दी आदि।

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प्रश्न 3.
संज्ञानात्मक अनुक्रियाओं के अंतर्गत आनेवाली कुछ अनुक्रियाओं को लिखिए।
उत्तर:
ध्यान केन्द्रित न कर पाना तथा अंतर्वेधी पुनरावर्ती या दूषित विचार आना आदि संज्ञानात्मक अनुक्रिया के अंतर्गत आते हैं।

प्रश्न 4.
संज्ञानात्मक अनुक्रियाओं के अंतर्गत क्या होता है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक अनुक्रियाओं के अंतर्गत, कोई घटना कितना नुकसान पहुंचा सकती है या कितनी खतरनाक है तथा उसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है, इससे संबंधित विश्वास आते हैं।

प्रश्न 5.
व्यवहारात्मक अनुक्रियाओं की दो सामान्य श्रेणियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
दबावकारक का मुकाबला या खतरनाक घटना से पीछे हट जाना (पलायन), व्यवहारात्मक अनुक्रियाओं की दो सामान्य श्रेणियाँ हैं।

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प्रश्न 6.
तनाव किसे कहते हैं?
उत्तर:
बाह्य प्रतिबलक के प्रतिक्रिया को तनाव कहते हैं।

प्रश्न 7.
दबाव के संज्ञानात्मक सिद्धांत के किसने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
लेजारस एवं उनके सहयोगियों ने दबाव के संज्ञानात्मक सिद्धांत को प्रतिपादित किया।

प्रश्न 8.
दबावपूर्ण परिस्थिति के प्रति एक व्यक्ति की अनुक्रिया कि बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
दबावपूर्ण परिस्थिति के प्रति एक व्यक्ति की अनुक्रिया घटनाओं के प्रत्यक्षण तथा उनकी व्याख्या या मूल्यांकन पर निर्भर करती है।

प्रश्न 9.
कौन-कौन-सी परिस्थितियाँ हमें दबाव में डालती हैं?
उत्तर:
सभी चुनौतियाँ, समस्याएँ तथा कठिन परिस्थितियाँ हमें दबाव में डालती हैं।

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प्रश्न 10.
‘यूस्ट्रेस’ क्या है?
उत्तर:
दबाव के उस स्तर, जो हमारे लिए लाभकर है तथा चोटी के निष्पादन के स्तर की उपलब्धि एवं छोटे संकटों के प्रबंधन के लिए व्यक्ति के सर्वोत्तम गुणों में एक है, को वर्णित करने के लिए यूस्ट्रेस पद का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
दबाव का वर्णन किस रूप में किया जाता है?
उत्तर:
दबाव का वर्णन किसी जीव द्वारा उद्दीपक घटना के प्रति की जाने वाली अनुक्रियाओं के प्रतिरूप के रूप में किया जा सकता है जो उसकी साम्यावस्था में व्यवधान उत्पन्न करता है और उसके सामने करने की क्षमता से कहीं अधिक होता है।

प्रश्न 12.
प्राथमिक मूल्यांकन क्या है?
उत्तर:
प्राथमिक मूल्यांकन का संबंध एक नए या चुनौतीपूर्ण पर्यावरण का उसके सकारात्मक, तटस्थ तथा नकारात्मक परिणामों के रूप में प्रत्यक्षण से है।

प्रश्न 13.
कुछ नकारात्मक संवेगों को लिखिए।
उत्तर:
भय, दुश्चिता, उलझन, क्रोध, अवसाद, नकार आदि नकारात्क संवेग हैं।

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प्रश्न 14.
जी० ए० एस० के अंतर्गत कौन-से तीन चरण होते हैं?
उत्तर:
जी० ए० एस० के अंतर्गत तीन चरण होते हैं-सचेत प्रतिक्रिया, प्रतिक्रिया, प्रतिरोध तथा परिश्रांति।

प्रश्न 15.
बर्नआउट किसे कहते हैं?
उत्तर:
शारीरिक, संवेगात्मक तथा मनोवैज्ञानिक परिश्रांति की विभिन्न अवस्थाओं की बर्नआउट कहते हैं।

प्रश्न 16.
शरीरक्रियात्मक प्रभाव के चार उदाहरणों को लिखिए।
उत्तर:
एपिनेफरीन तथा नॉरएपिनेफरीन छोड़ना, पाचनतंत्र की धीमी गति, फेफड़ों में वायुमार्ग का विस्तार तथा हृदयगति में वृद्धि।

प्रश्न 17.
संवेगात्मक प्रभाव के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
दुश्चिता तथा अवसाद की भावनाएँ, शारीरिक तनाव में वृद्धि, मनोवैज्ञानिक तनाव में वृद्धि, मनोवैज्ञानिक तनाव में वृद्धि तथा आकस्मिक मन:स्थिति परिवर्तन।

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प्रश्न 18.
तीन ऐसे पर्यावरणी दबावों को लिखिए जो प्राकृतिक विपदाएँ तथा विपाती घटनाएँ हैं।
उत्तर:
आग, भूकम्प और बाढ़ आदि।

प्रश्न 19.
मनोवैज्ञानिक दबाव क्या होते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक दबाव वे दबाव हैं जिन्हें हम अपने मन में उत्पन्न करते हैं। ये दबाव अनुभव करने वाले व्यक्ति के लिए विशिष्ट होते हैं तथा दबाव के आंतरिक स्रोत होते हैं।

प्रश्न 20.
मनोवैज्ञानिक दबाव के कुछ प्रमुख स्रोतों को लिखिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक दबाव के कुछ प्रमुख स्रोत हैं-कुंठा, द्वंद्व, आंतरिक एवं सामाजिक दबाव इत्यादि।

प्रश्न 21.
कुंठा किस प्रकार उत्पन्न होती है?
उत्तर:
जब कोई व्यक्ति या परिस्थिति हमारी आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों को अवरुद्ध करती है, जो हमारे इष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा डालती है तो कुंठा उत्पन्न होती है।

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प्रश्न 22.
कुंठा उत्पन्न होने के किन्हीं तीन कारणों को लिखिए।
उत्तर:
कुंठा उत्पन्न होने के निम्नलिखित तीन कारण हो सकते हैं –

  1. सामाजिक भेदभाव
  2. अंतर्वैयक्तिक क्षति
  3. स्कूल में कम अंक प्राप्त होना

प्रश्न 23.
द्वंद्व किनमें हो सकता है?
उत्तर:
दो या दो से अधिक असंगत आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों में द्वंद्व हो सकता है, जैसे क्या नृत्य का अध्ययन किया जाय या मनोविज्ञान का।

प्रश्न 24.
आंतरिक दबाव क्यों उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
आंतरिक दबाव हमारे अपने उन विश्वासों के कारण उत्पन्न होते हैं जो हमारी ही कुछ प्रत्याशाओं पर आधारित होते हैं जैसे कि मुझे हर कार्य में सर्वोत्तम होना चाहिए।

प्रश्न 25.
सामाजिक दबाव किस प्रकार उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
सामाजिक दबाव उन व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं जो हमारे ऊपर अत्यधिक माँगें थोप देते हैं। ये बाह्य जनित होते हैं तथा लोगों के साथ हमारी अंत:क्रियाओं के कारण उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 26.
अभिघातज घटनाओं के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
अग्निकांड, रेलगाड़ी या सड़क दुर्घटना, लूट, भूकम्प, सुनामी आदि।

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प्रश्न 27.
जैवप्रति प्राप्ति प्रशिक्षण में कितनी अवस्थाएँ होती हैं?
उत्तर:
जैवप्रति प्राप्ति प्रशिक्षण में तीन अवस्थाएँ होती हैं –

  1. किसी विशिष्ट शरीर क्रियात्मक अनुक्रिया, जैसे-हृदय गति के प्रति जागरुकता विकसित करना
  2. उस शरीर क्रियात्मक अनुक्रिया को शांत व्यवस्था में नियंत्रित करने के उपाय सीखना
  3. उस नियंत्रण को सामान्य दैनिक जीवन में अंतरित करना

प्रश्न 28.
संवेग-केन्द्रित युक्तियाँ क्या हैं?
उत्तर:
संवेग-केन्द्रित युक्तियाँ प्रमुखतया मनोवैज्ञानिक परिवर्तन लाने हेतु उपयोग की जाती हैं जिससे घटना में परिवर्तन लाने का अल्पतम प्रयास करते हुए उसके कारण उत्पन्न होने वाले संवेगात्मक विघटन के प्रभावों को सीमित किया जा सके।

प्रश्न 29.
समस्या-केन्द्रित युक्ति के क्या फायदे हैं?
उत्तर:
समस्या-केन्द्रित युक्तियाँ व्यक्ति की जागरुकता में वृद्धि करती हैं, ज्ञान के स्तर को बढ़ाती हैं तथा दबाव का सामना करने के ज्ञानात्मक तथा व्यवहारात्मक विकल्पों में वृद्धि करती हैं। घटना से उत्पन्न खतरे की अनुभूति को भी घटाने का कार्य वे करती हैं।

प्रश्न 30.
सामना करने की समस्या-केन्द्रित अनुक्रिया क्या है?
उत्तर:
समस्या-केन्द्रित युक्तियाँ समस्या पर ही हमला करती हैं जो सूचनाएँ एकत्रित करने, घटनाओं को परिवर्तित करने तथा विश्वास और प्रतिबद्धता को परिवर्तित करने के लिए होते हैं।

प्रश्न 31.
मनस्तंत्रिका प्रतिरक्षा विज्ञान क्या है?
उत्तर:
मनस्तात्रिका प्रतिरक्षा विज्ञान मन, मस्तिष्क और प्रतिरक्षक तंत्र के बीच संबंधों पर ध्यान केन्द्रित करता है। यह प्रतिरक्षक तंत्र पर दबाव के प्रभाव का अध्ययन करता है।

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प्रश्न 32.
दीर्घकालिक दबाव के क्या लक्षण एवं अनुभव हो सकते हैं?
उत्तर:
दीर्घकालिक दबाव के दाब में व्यक्ति, अविवेकी भय, मन:स्थिति में आकस्मिक परिवर्तन एवं दुर्भीति के प्रति अधिक प्रवण होते हैं तथा वे अवसाद, क्रोध तथा उत्तेजनशीलता के दौरे का अनुभव कर सकते हैं।

प्रश्न 33.
जीवन शैली किसे कहते हैं?
उत्तर:
व्यक्ति के निर्णयों तथा व्यवहारों का वह समग्र प्रतिरूप जीवन शैली कहलाता है जो व्यक्ति के स्वास्थ्य तथा जीवन की गुणवत्ता को निर्धारित करता है।

प्रश्न 34.
रोगजनक क्या होते हैं?
उत्तर:
रोगजनक शारीरिक रोग उत्पन्न करने के अभिकर्ता होते हैं।

प्रश्न 35.
सामना करना क्या होता है?
उत्तर:
सामना करना दबाव के प्रति एक गत्यात्मक स्थिति विशिष्ट प्रतिक्रिया है। यह दबावपूर्ण स्थितियों या घटनाओं के प्रति कुछ निश्चित मूर्त अनुक्रियाओं का समुच्चय होता है, जिनका उद्देश्य समस्या का समाधान करना तथा दबाव को कम करना होता है।

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प्रश्न 36.
दबाव का प्रबंधन करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर:
दबाव का प्रबंधन करने के लिए हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम अपने सोचने के तरीके का पुनः मूल्यांकन करें तथा दबाव का सामना करने की युक्तियों या कौशलों को सीखें।

प्रश्न 37.
परिहार-अभिविन्यस्त युक्ति क्या है?
उत्तर:
परिहार-अभिविन्यस्त युक्ति के अंतर्गत स्थिति को गंभीरता को नकारना या कम समझना सम्मिलित होते हैं। इसमें दबावपूर्ण विचारों का सचेतन दमन तथा उनके स्थान पर आत्म-रक्षित विचारों का प्रतिस्थापना भी सम्मिलित होता है।

प्रश्न 38.
आग्रहिता क्या है?
उत्तर:
आग्रहिता एक ऐसा व्यवहार या कौशल है जो हमारी भावनाओं, आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा विचारों के सुस्पष्ट तथा विश्वासपूर्ण संप्रेषण में सहायक होता है।

प्रश्न 39.
समय प्रबंधन का प्रमुख नियम क्या है?
उत्तर:
समय प्रबंधन का प्रमुख नियम यह है कि हम जिन कार्यों को महत्त्व देते हैं, उनका परिपालन करने में समय लगाएँ या उन कार्यों को करने में जो हमारे लक्ष्य प्राप्ति में सहायक हों।

प्रश्न 40.
सविवेक चिंतन के कुछ नियमों को लिखिए।
उत्तर:
सविवेक चिंतन के कुछ नियम इस प्रकार हैं-अपने विकृत चिंतन तथा अविवेकी विश्वासों को चुनौती देना, संभावित अंतर्वेधी नकारात्मक दुश्चिता, उत्तेजक विचारों को मन से निकालना तथा सकारात्मक कथन करना।

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प्रश्न 41.
संप्रेषण के अंतर्गत तीन आवश्यक निहित कौशल कौन-से हैं?
उत्तर:
संप्रेषण के अंतर्गत तीन अत्यावश्यक कौशल निहित हैं-सुनना कि दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है, अभिव्यक्त करना कि आप कैसा सोचते हैं और महसूस करते हैं तथा दूसरों की भावनाओं और मतों को स्वीकारना चाहे वे स्वयं आपके अपने से भिन्न हों।

प्रश्न 42.
सबसे अधिक विश्रांत कहाँ होता है?
उत्तर:
सबसे अधिक विश्रांत श्वसन मंद, मध्यपट या डायाफ्राम अर्थात् सीना और उदर गुहिका के बीच एवं गुंबदाकार पेशी से उदर केन्द्रित श्वसन होता है।

प्रश्न 43.
कुछ पर्यावरणीय दबावों को लिखिए जो हमारी मन:स्थिति को प्रभावित कर सकता है?
उत्तर:
पर्यावरणीय दबाव, जैसे-शोर, प्रदूषण, प्रकाश, वर्ण इत्यादि सब हमारी मन:स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।

प्रश्न 44.
असहायक आदतें क्या हैं?
उत्तर:
असहायक आदतें, जैसे-पूर्णतावाद, परिहार, विलंबन या टालना इत्यादि ऐसी युक्तियाँ हैं जो अल्पकाल तक तो सामना करने में सहायक हो सकती हैं किन्तु वे व्यक्ति को दबाव के समक्ष अधिक असुरक्षित बना देती हैं।

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प्रश्न 45.
पूर्णतावादी व्यक्ति कौन होते हैं?
उत्तर:
पूर्णतावादी व्यक्ति वे होते हैं जिन्हें सब कुछ बिल्कुल सही चाहिए।

प्रश्न 46.
‘परिहार’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
परिहार का अर्थ है-समस्या को स्वीकार या सामना करने से नकारना।

प्रश्न 47.
‘विलंबन’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
विलंबन का अर्थ है, जो जरूरी कार्य हमें करना है उसमें विलंब करते जाना।

प्रश्न 48.
सर्जनात्मक मानस-प्रत्यक्षीकरण क्या है?
उत्तर:
दबाव से निपटने के लिए यह एक प्रभावी तकनीक है। सर्जनात्मक मानस-प्रत्यक्षीकरण एक आत्मनिष्ट अनुभव है जिसमें प्रतिमा तथा कल्पना का उपयोग किया जाता है।

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प्रश्न 49.
मूल्यांकन के अंतर्गत क्या आते हैं?
उत्तर:
मूल्यांकन के अंतर्गत समस्या की प्रकृति पर परिचय करना तथा उसे व्यक्ति/सेवार्थी के दृष्टिकोण से देखना सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 50.
दबाव न्यूनीकरण क्या है?
उत्तर:
दबाव न्यूनीकरण के अंतर्गत दबाव कम करने वाली तकनीकों जैसे-विश्रांति तथा आत्म-अनुदेशन को सीखना सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 51.
नियमित व्यायाम के फायदों को लिखिए।
उत्तर:
नियमित व्यायाम के द्वारा हृदय की दक्षता में सुधार होता है, फेफड़ों के प्रकार्यों में वृद्धि होती है, रक्तचाप में कमी होती है, रक्त में वसा की मात्रा घटती है तथा शरीर के प्रतिरक्षक तंत्र में सुधार होता है।

प्रश्न 52.
‘दृढ़ता’ क्या है?
उत्तर:
के व्यक्ति जिनमें उच्च स्तर के दबाव किन्तु निम्न स्तर के रोग होते हैं, उनमें तीन विशेषताएँ सामान्य रूप से पाई जाती हैं, जिन्हें दृढ़ता नामक तीन व्यक्तित्व विशेषक के नाम से जाना जाता है।

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प्रश्न 53.
खिंचाव वाले व्यायाम का क्या फायदा है?
उत्तर:
खिंचाव वाले व्यायाम शांतिदायक प्रभाव डालते हैं।

प्रश्न 54.
संतुलित आहार के क्या फायदे हैं?
उत्तर:
संतुलित आहार व्यक्ति की मन:स्थिति को ठीक कर सकता है, ऊर्जा प्रदान कर सकता है, पेशियों का पोषण कर सकता है, परिसंचरण को समुन्नत कर सकता है, रोगों से रक्षा कर सकता है, प्रतिरक्षक तंत्र को सशक्त बना सकता है।

प्रश्न 55.
कौन-से कारक सकारात्मक स्वास्थ्य को सुकर बनाते हैं?
उत्तर:
विशेष रूप से जो कारक दबाव के प्रतिरोधक का कार्य करते हैं तथा सकारात्मक स्वास्थ्य को सुकर बनाते हैं, वे हैं आहार, व्यायाम, सकारात्मक अभिवृत्ति, सकारात्मक चिंतन तथा सामाजिक अवलंब।

प्रश्न 56.
दृढ़ता व्यक्तित्व विशेषक की तीन अवस्थाओं को लिखिए।
उत्तर:
प्रतिबद्धता, नियंत्रण तथा चुनौती।

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प्रश्न 57.
दबाव का सामना करने की योग्यता किस बात पर निर्भर करती है?
उत्तर:
दबाव का सामना करने की हमारी योग्यता इस बात पर निर्भर करती है कि हम दैनिक जीवन की माँग के प्रति संतुलन करने तथा उनके संबंध में व्यवहार करने के लिए कितने तैयार हैं तथा अपने जीवन में साम्यावस्था बनाए रखने के लिए कितने तैयार हैं।

प्रश्न 58.
कुछ जीवन कौशल के उदाहरण दीजिए जिनसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी।
उत्तर:
आग्रहिता, समय प्रबंधन, सविवेक चिंतन, संबंधों में सुधार, स्वयं की देखभाल के साथ-साथ ऐसी असहायक आदतों, जैसे-पूर्णतावादी होना, विलंबन या टालना इत्यादि से मुक्ति, कुछ ऐसे जीवन कौशल हैं जिनसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलती है।

प्रश्न 59.
सकारात्मक स्वास्थ्य के अंतर्गत कौन-सी निर्मितियाँ आती हैं?
उत्तर:
सकारात्मक स्वास्थ्य के अंतर्गत निम्नलिखित निर्मितियाँ आती हैं-“स्वस्थ शरीर; उच्च गुणवत्ता वाले व्यक्तिगत संबंध; जीवन में उद्देश्य का बोध, आत्मसम्मान, जीवन के कृत्यों में प्रवीणता, दबाव, अभिघात एवं परिवर्तन के प्रति स्थिति स्थापना।”

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प्रश्न 60.
सामाजिक अवलंब को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
ऐसे व्यक्तियों का अस्तित्व तथा उपलब्धता जिन पर हम विश्वास रख सकते हैं, जो यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें हमारी परवाह है, जिनके लिए हम मूल्यवान हैं तथा जो हमें प्यार करते हैं, यही सामाजिक अवलंब की परिभाषा है।

प्रश्न 61.
आशावाद क्या है?
उत्तर:
आशावाद जीवन में अनुकूल परिणामों की प्रत्याशा करने के प्रति झुकाव है।

प्रश्न 62.
वायुजीवी व्यायाम का क्या फायदा है?
उत्तर:
वायुजीवी व्यायाम शरीर के भाव-प्रबोधन स्तर को बढ़ाते हैं।

प्रश्न 63.
सकारात्मक अभिवृत्ति के क्या फायदे हैं?
उत्तर:
सकारात्मक अभिवृत्ति द्वारा सकारात्मक स्वास्थ्य तथा कुशल-क्षेम प्राप्त किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राथमिक तथा द्वितीयक मूल्यांकन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्राथमिक मूल्यांकन-इसका संबंध एक नए या चुनौतीपूर्ण पर्यावरण का उसके सकारात्मक, तटस्थ अथवा नकारात्मक परिणामों के रूप में प्रत्यक्षण से है। नकारात्मक घटनाओं का मूल्यांकन उनके द्वारा संभावित नुकसान, खतरा या चुनौती के लिए किया जाता है। किसी घटना के द्वारा अब तक की जा चुकी क्षति का मूल्यांकन ही नुकसान है। भविष्य में उस घटना द्वारा संभावित क्षति का मूल्यांकन ही खतरा है। घटना के चुनौतीपूर्ण होने का मूल्यांकन उस दबावपूर्ण घटना का सामना करने की योग्यता की प्रत्याशा से संबद्ध है कि उस पर विजय पाना संभव है तथा उससे लाभ भी उठाया जा सकता है।

द्वितीयक मूल्यांकन-जब हम किसी घटना का प्रत्यक्षण दबावपूर्ण घटना के रूप में करते हैं तो प्रायः हम उसका द्वितीयक मूल्यांकन करते हैं, जो व्यक्ति की अपनी सामना करने की योग्यता स्था संसाधनों का मूल्यांकन होता है कि क्या वे उस घटना द्वारा उत्पन्न नुकसान, खतरे या चुनौती से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। ये संसाधन मानसिक, शारीरिक वैयक्तिक अथवा सामाजिक हो सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति समझता है कि संकट से निपटने के लिए उसके सकारात्मक अभिवृत्ति, स्वास्थ्य, कौशल तथा सामाजिक अवलंब उपलब्ध है तो वह कम दबाव का अनुभव करेगा। मूल्यांकन का यह द्विस्तरीय प्रक्रम न केवल हमारी संज्ञानात्मक तथा व्यवहारात्मक अनुक्रियाएँ निर्धारित करता है बल्कि बाह्य घटनाओं के प्रति हमारी सांवेगिक एवं शरीरक्रियात्मक अनुक्रियाओं को भी निर्धारित करता है।

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प्रश्न 2.
हाइपोथैलेमस किन पथों के माध्यम से क्रिया प्रारम्भ करता है? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हाइपोथैलेमस दो पथों से क्रिया प्रारम्भ करता है। प्रथम पथ के अंतर्गत स्वायत्त तंत्रिका तंत्र सम्मिलित हैं। अधिवृक्क (एड्रीनल) ग्रंथि रुधिर में बड़ी मात्रा में केटेकोलामाइन्स (एपिनेफरीन तथा नॉरएपिनेफरीन) छोड़ देती है। इसी के फलस्वरूप वह शरीरक्रियात्मक परिवर्तन होते हैं जो संघर्ष या पलायन जैसी अनुक्रिया में परिलक्षित होते हैं। द्वितीय पथ के अंतर्गत पीयूष या पिट्यूइटरी ग्रंथि सम्मिलित हैं, जो कॉटिकोस्टीरायड (कॉर्टिसोल) का स्राव करती है तथा जो ऊर्जा प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
आंतरिक और सामाजिक दबाव में भेद स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आंतरिक दबाव-ये दबाव हमारे अपने उन विश्वासों के कारण उत्पन्न होते हैं जो हमारी ही कुछ प्रत्याशाओं पर आधारित होते हैं, जैसे कि ‘मुझे हर कार्य में सर्वोत्तम होना चाहिए।’ इस प्रकार की प्रत्याशाएँ केवल निराश ही करती हैं। हममें से अनेक अपने लक्ष्य तथा अवास्तविक अत्यंत उच्च स्तर को प्राप्त करने के लिए निर्दयता से स्वयं को प्रेरित करते रहते हैं। सामाजिक दबाव–यह उन व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न किए जा सकते हैं जो हमारे ऊपर अत्यधिक माँगें थोप देते हैं। यह दबाव तब और बढ़ जाता है जब हमें इस तरह के लोगों के साथ काम करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं जिनके हमें अंतर्वैयक्तिक कठिनाई होती है, एक प्रकार से ‘व्यक्तियों की टकराहट’।

प्रश्न 4.
‘मनोवैज्ञानिक दबाव के साथ नकारात्मक संवेग तथा संबद्ध व्यवहार भी अनुषंगी होते हैं।’ इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक दबाव के साथ नकारात्मक संवेग तथा संबद्ध व्यवहार, जैसे-अवसाद, शत्रुता, क्रोध तथा आक्रामकता भी अनुषंगी होते हैं। स्वास्थ्य पर दबाव के प्रभाव का अध्ययन करते समय नकारात्मक सांवेगिक स्थितियों विशेष सरोकार रखती हैं। दीर्घकालिक दबाव में वृद्धि होते रहने से मनोवैज्ञानिक विकारों जैसे-आतंक (पैनिक) दौरे तथा मनोग्रस्त व्यवहार बढ़ जाते हैं। आकुलता से परेशानी इस सीमा तक बढ़ सकती है जो दिल के दौरे तक का भ्रम उत्पन्न कर सकती है।

दीर्घकालिक दबाव के दाब में व्यक्ति, अविवेकी भय, मन:स्थिति में आकस्मिक परिवर्तन एवं दुर्भीति के प्रति प्रवण होते हैं तथा अवसाद, क्रोध तथा उत्तेजनशीलता के दौरे का अनुभव कर सकते हैं। यह नकारात्मक संवेग, प्रतिरक्षक तंत्र के प्रकार्यों से संबद्ध प्रतीत होता है। अपने संसार की व्याख्या करने की योग्यता तथा उस व्याख्या को अपने वैयक्तिक अर्थ तथा संवेगों से जोड़ने का हमारे शरीर पर प्रत्यक्ष एवं प्रबल प्रभाव पड़ता है। नकारात्मक मनःस्थिति दुर्बल स्वास्थ्य परिणामों से संबद्ध पाई गई है। निराशा की भावनाओं का संबंध रोगों के और बिगड़ने से, चोट के जोखिम में वृद्धि तथा विभिन्न कारणों से मृत्यु से संबद्ध होता है।

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प्रश्न 5.
जैवप्रतिप्राप्ति तकनीक क्या है?
उत्तर:
जैवप्रतिप्राप्ति या बायोफीडबैक तकनीक वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा दबाव के शरीरक्रियात्मक पक्षों का परिवीक्षण कर उन्हें कम करने के लिए फीडबैक दिया जाता है कि व्यक्ति में वर्तमानकालिक शरीर क्रियाएँ क्या हो रही हैं। प्रायः इसके साथ विश्रांत परीक्षण का भी उपयोग किया जाता है। जैवप्रतिप्राप्ति प्रशिक्षण में तीन अवस्थाएँ होती हैं-किसी विशिष्ट शरीरक्रियात्मक अनुक्रिया, जैसे हृदयगति के प्रति जागरुकता विकसित करना, उस शरीर क्रियात्मक अनुक्रिया को शांत व्यवस्था में नियंत्रित करने के उपाय सीखना तथा उस नियंत्रण को सामान्य दैनिक जीवन में अंतरित करना।

प्रश्न 6.
सविवेक चिंतन द्वारा जीवन की चुनौतियों का सामना किस प्रकार कर सकते हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सविवेक चिंतन-दबाव-संबंधी अनेक समस्याएँ विकृत चिंतन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है। हमारे चिंतन और अनुभव करने के तरीकों में घनिष्ठ संबंध होता है। जब हम दबाव का अनुभव करते हैं तो हमें अंत:निर्मित वर्णात्मक अभिनति होती है जिससे हमारा ध्यान भूतकाल के नकारात्मक विचारों तथा प्रतिमाओं पर केन्द्रित हो जाता है, जो हमारे वर्तमान तथ भविष्य के प्रत्यक्षण को प्रभावित करता है। सविवेक चिंतन के कुछ नियम इस प्रकार हैं-अपने विकृत चिंतन तथा विवेकी विश्वासों को चुनौती देना, संभावित अंतर्वेधी नकारात्मक दुश्चिता-उत्तेजक विचारों को मन से निकालना तथा सकारात्मक कथन करना।

प्रश्न 7.
असहायक आदतों पर किस प्रकार विजय पाकर दबाव को कम कर सकते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
असहायक आदतों पर विजयी होना-असहायक आदतें, जैसे-पूर्णतावाद, परिहार, ‘विलंबन या टालना इत्यादि ऐसी युक्तियाँ हैं जो अल्पकाल तक तो सामना करने में सहायक हो सकती हैं किन्तु वे व्यक्ति को दबाव के समक्ष अधिक असुरक्षित बना देती हैं। पूर्णतावाद वे व्यक्ति होते हैं जिन्हें सब कुछ बिल्कुल सही चाहिए। उन्हें इस प्रकार के कारकों जैसे-उपलब्ध समय, कार्य बंद न करने के परिणामों तथा प्रयास जो अपेक्षित हैं, के स्तरों को परिवर्तित करने में कठिनाई होती है।

उनके तनावग्रस्त होने की संभावना अधिक होती है तथा वे विश्राम करने में कठिनाई अनुभव करते हैं, स्वयं अपनी तथा दूसरों की आलोचना करते रहते हैं, तथा चुनौतियों का परिहार करने की ओर उनका झुकाव होता है। परिहार का अर्थ है, समस्या को स्वीकार या सामना करने से नकारना तथा उसे जैसे, कालीन के नीचे समेट देना। विलंबन का अर्थ है, जो जरूरी कार्य हमें करना ही है उसमें विलंब करते जाना। हम सभी यह करने के दोषी हैं कि “मैं इसे बाद में करूँगा/करूँगी” वे व्यक्ति जो स्वभावतः कार्यों को टालते हैं, वे जानबूझकर अपने असफलता भय या अस्वीकृति का सामना करने से परिहार करते हैं।

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प्रश्न 8.
सकारात्मक चिंतन से आपका क्या तात्पर्य है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
सकारात्मक चिंतन-सकारात्मक चिंतन की शक्ति, दबाव का सामना करने तथा उसे कम करने में अधिकाधिक मानी जा रही है। आशावाद, जो कि जीवन में अनुकूल परिणामों की प्रत्याशा करने के प्रति झुकाव है, को मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक कुशल-क्षेम से संबंधित किया गया है। व्यक्ति जिस प्रकार दबाव का सामना करते हैं, उसमें भिन्नता होती है। उदाहरण के लिए, आशावादी यह मानते हैं कि विपत्ति का सफलतापूर्वक सामना किया जा सकता है जबकि निराशावादी घोर संकट या अनर्थ की ही प्रत्याशा करते हैं। आशावादी समस्या-केन्द्रित सामना करने की युक्तियों का अधिक उपयोग करते हैं तथा दूसरों से सलाह और सहायता माँगते हैं। निराशावादी समस्या या दबाव के स्रोतों की उपेक्षा करते हैं और इस प्रकार युक्तियों का उपयोग करते हैं; जैसे-उस लक्ष्य को ही त्याग देना जिसमें दबाव के कारण बाधा पड़ रही है या नकारना कि दबाव विद्यमान भी है।

प्रश्न 9.
सकारात्मक स्वास्थ्य पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सकारात्मक स्वास्थ्य-ऐसे कारक अनेक हैं जो सकारात्मक स्वास्थ्य के विकास को सुकर या सुसाध्य बनाते हैं। पूर्ण शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक कुशल-क्षेम की अवस्था ही स्वास्थ्य है न कि केवल रोग अथवा अशक्तता का अभाव। सकारात्मक स्वास्थ्य के अंतर्गत निम्नलिखित निर्मितियाँ आती हैं-“स्वस्थ शरीर उच्च गुणवत्ता वाले व्यक्तिगत संबंध जीवन में उद्देश्य का बोध आत्मसम्मान, जीवन के कृत्यों में प्रवीणता दबाव, अभिघात एवं परिवर्तन के प्रति स्थिति स्थापना।” विशेष रूप से जो कारक दबाव के प्रतिरोध का कार्य करते हैं तथा सकारात्मक स्वास्थ्य को सुकर बनाते हैं, वे हैं आहार, व्यायाम, सकारात्मक अभिवृत्ति, सकारात्मक चिंतन तथा सामाजिक अवलंब।

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प्रश्न 10.
आहार तथा दबाव के संबंध पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
संतुलित आहार व्यक्ति की मन:स्थिति को ठीक कर सकता है, ऊर्जा प्रदान कर सकता है, पेशियों का पोषण कर सकता है, परिसंचरण को समुन्नत कर सकता है, रोगों से रक्षा कर सकता है, प्रतिरक्षक तंत्र को सशक्त बना सकता है तथा व्यक्ति को अधिक अच्छा अनुभव करा सकता है जिससे वह जीवन में दबावों का सामना और अच्छी तरह से कर सके।

स्वास्थ्यकर जीवन की कुंजी है, दिन में तीन बार संतुलित और विविध आहार का सेवन करना। किसी व्यक्ति को कितने पोषण की आवश्यकता है, यह व्यक्ति की सक्रियता स्तर, आनुवंशिक प्रकृति, जलवायु और स्वास्थ्य के इतिहास पर निर्भर करता है। कोई व्यक्ति क्या भोजन करता है तथा उसका वजन कितना है, जिसमें व्यवहारात्मक प्रक्रियाएँ निहित होती हैं। कुछ व्यक्ति पौष्टिक आहार तथा वजन का रख-रखाव सफलतापूर्वक कर पाते हैं किन्तु कुछ अन्य व्यक्ति मोटापे के शिकार हो जाते हैं। जब हम दबावग्रस्त होते हैं तो हम ‘आराम देने वाले भोजन’ जिसमें प्रायः वसा, नमक तथा चीनी होती है, का सेवन करना चाहते हैं।

प्रश्न 11.
सकारात्मक अभिवृत्ति से आपका क्या तात्पर्य है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सकारात्मक प्रवृत्ति-सकारात्मक स्वास्थ्य तथा कुशल-क्षेम सकारात्मक अभिवृत्ति के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। सकारात्मक अभिवृत्ति की ओर ले जाने वाले कुछ कारक इस प्रकार हैं-वास्तविकता का सही प्रत्यक्षण; जीवन में उद्देश्य तथा उत्तरदायित्व की भावना का होना; दूसरे व्यक्तियों के भिन्न दृष्टिकोणों के प्रति स्वीकृति एवं सहिष्णुता का होना तथा सफलता के लिए श्रेय एवं असफलता के लिए दोष भी स्वीकार करना। अंत में, नए विचारों के लिए खुलापन तथा विनोदी स्वभाव, जिससे व्यक्ति स्वयं अपने ऊपर भी हँस सके, हमें ध्यान केन्द्रित करने तथा चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में देख सकने में सहायता करते हैं।

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प्रश्न 12.
विभिन्न सामाजिक अवलंब पर संक्षिप्त में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विभिन्न सामाजिक अवलंब निम्नलिखित हैं –
1. मूर्त अवलंब:
इसके रूप में अर्थात् महत्त्वपूर्ण साधनों, जैसे-धन, वस्तु, सेवा इत्यादि की सहायता के द्वारा हो सकता है। उदाहरण के लिए, कोई बालक अपने मित्र को अपनी कक्षा के नोट्स इसलिए दे देता है क्योंकि वह बीमारी के लिए विद्यालय से अनुपस्थित था।

2. सूचनात्मक अवलंब:
परिवार तथा मित्र दबावपूर्ण घटनाओं के बारे में सूचनात्मक अवलंब प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, एक विद्यार्थी, जिसे बोर्ड की एक कठिन परीक्षा देनी है, जो एक दबावपूर्ण घटना है, की यदि उसका कोई मित्र जो इस प्रकार की परीक्षा दे चुका है, उसे परीक्षा-संबंधी सूचनाएँ देता है, तो वह न केवल उसमें निहित बिल्कुल ठीक प्रक्रिया को जान लेगा बल्कि वह उसे यह निर्धारित करने में भी सहायता करेगा कि इस परीक्षा में सफलतापूर्वक उत्तीर्ण होने के लिए कौन-कौन से संसाधन एवं सामना करने के लिए कौन-सी युक्तियाँ उपयोगी होंगी।

3. सांवेगिक अवलंब:
दबाव के समय कोई व्यक्ति दुःख, दुश्चिता तथा आत्म-सम्मान में क्षति का अनुभव कर सकता है। ऐसे समय में सहायक मित्र तथा परिवार सांवेगिक अवलंब (Emotional support) उपलब्ध करा सकते हैं। यदि वे उसे आश्वस्त करा सकें कि वह उनका प्रिय है, उनके लिए मूल्यवान है तथा उसकी उन्हें परवाह है।

प्रश्न 13.
तनाव के प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
तनाव के कई प्रकार होते हैं, जिससे व्यक्ति को प्रतिदिन सामना करना पड़ता है। इन सभी तनावों को उनके क्षेत्र के आधार पर तीन मुख्य प्रकारों में बाँटा जा सकता है-पर्यावरणीय तनाव, सामाजिक तनाव तथा मनोवैज्ञानिक तनाव। पर्यावरणीय तनाव पर्यावरणीय विसंतुलन से उत्पन्न होता है, जैसे-बाढ़, आग, भूकम्प आदि से उत्पन्न तनाव। सामाजिक तनाव से तात्पर्य एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया से उत्पन्न तनाव से होता है। जैसे-परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु या बीमारी, विवाह-विच्छेद, अलगाव, पड़ोसियों से अनबन आदि से उत्पन्न तनाव। मनोवैज्ञानिक तनाव से तात्पर्य मन द्वारा उत्पन्न तनाव से होता है, जैसे-कुण्ठा, द्वंद्व तथा दबाव आदि मनोवैज्ञानिक तनाव के प्रमुख स्रोत हैं।

प्रश्न 14.
भौतिक दबाव किसे कहते हैं?
उत्तर:
भौतिक दबाव वे माँगें हैं, जिसके कारण हमारी शारीरिक दशा में परिवर्तन उत्पन्न हो जाता है। हम तनाव का अनुभव करते हैं जब हम शारीरिक रूप से अधिक परिश्रम करते हैं, पौष्टिक भोजन की कमी हो जाती है, कोई चोट लग जाती है या निद्रा कम हो जाती है।

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प्रश्न 15.
प्राथमिक समूह तथा गौण समूह में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
कूले द्वारा किया गया समूह विभाजन अधिक संतोषप्रद है। इन दोनों समूहों में निम्नांकित अंतर पाया जाता है –
प्राथमिक समूह का आकार छोटा होता है। जैसे-परिवार; जबकि गौण समूह का आकार बड़ा होता है। जैसे-राजनीतिक दल। प्राथमिक समूह के सदस्यों में औपचारिकता नहीं होती है या कम होती है; जबकि गौण समूह के सदस्यों में औपचारिकता अधिक होती है। प्राथमिक समूह के सदस्यों के बीच घनिष्ठ पारस्परिक संबंध होता है। जबकि गौण समूह के सदस्यों के बीच घनिष्ठ पारस्परिक संबंध नहीं होता है। प्राथमिक समूह छोटा होता है, अत: इसके सदस्यों में आमने-सामने का संबंध होता है जबकि गौण समूह का आकार बड़ा होता है, अत: इसके सदस्यों में आमने-सामने का संबंध नहीं होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दबाव शब्द से आपका क्या तात्पर्य है? दबाव की प्रकृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दबाव के अंग्रेजी भाषा के शब्द स्ट्रेस (Stress) की व्युत्पत्ति, लैटिन शब्द ‘स्ट्रिक्टस’ (Strictus) जिसका अर्थ है तंग या संकीर्ण, तथा ‘स्ट्रिनगर’ (Stringer) जो क्रियापद है, जिसका अर्थ है कसना, से हुई है । यह मूल शब्द अनेक व्यक्तियों द्वारा दबाव अवस्था में वर्णित मांसपेशियों तथा श्वसन की कसावट तथा संकुचन की आंतरिक भावनाओं को प्रतिबंबित करता है। प्रायः दबाव को पर्यावरण की उन विशेषताओं के द्वारा भी समझाया जाता है जो व्यक्ति के लिए विघटनकारी होती हैं। दबावकारक वे घटनाएं हैं जो हमारे शरीर में दबाव उत्पन्न करती हैं। ये शोर, भीड़, खराब संबंध या रोज स्कूल अथवा दफ्तर जाने की घटनाएं हो सकती हैं।

दबाव कारण तथा प्रभाव दोनों से संबद्ध हो गया है तथापि दबाव का यह दृष्टिकोण भ्रांति उत्पन्न कर सकता है। हेंस सेल्ये (Hans Selye), जो आधुनिक दबाव शोध के जनक कहे जाते हैं, ने दबाव को इस प्रकार परिभाषित किया है कि यह “किसी भी माँग के प्रति शरीर की अविशिष्ट अनुक्रिया है” अर्थात् खतरे का कारण चाहे जो भी हो व्यक्ति प्रतिक्रियाओं के समान शरीरक्रियात्मक प्रतिरूप से अनुक्रिया करेगा। अनेक शोधकर्ता इस परिभाषा से सहमत नहीं हैं क्योंकि उनका अनुभव है दबाव के प्रति अनुक्रिया उतनी सामान्य तथा अविशिष्ट नहीं होती है जितना सेल्ये का मत है। भिन्न-भिन्न दबावकारक दबाव प्रतिक्रिया के भिन्न-भिन्न प्रतिरूप उत्पन्न कर सकते हैं एवं भिन्न व्यक्तियों की अनुक्रियाएँ विशिष्ट प्रकार की हो सकती हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति परिस्थिति को अपनी दृष्टि से देखेगा और माँगों तथा उनका सामना करने की हमारी क्षमता का प्रत्यक्षण ही यह निर्धारित करेगा कि हम दबाव महसूस कर रहे हैं अथवा नहीं।

दबाव कोई ऐसा घटक नहीं है जो व्यक्ति के भीतर या पर्यावरण में पाया जाता है। इसके बजाय, यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया में सन्निहित है जिसके अंतर्गत व्यक्ति अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरणों में कार्य संपादन करता है। इन संघर्षों का मूल्यांकन करता है तथा उनसे उत्पन्न होने वाली विभिन्न समस्याओं का सामना करने का प्रयास करता है। दबाव एक गत्यात्मक मानसिक/संज्ञानात्मक अवस्था है। वह समस्थिति को विघटित करता है या एक ऐसा असंतुलन उत्पन्न करता है जिसके कारण उस असंतुलन के समाधान अथवा समस्थिति को पुनःस्थापित करने की आवश्यकता उत्पन्न होती है।

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चित्र: दबाव का मनोवैज्ञानिक अर्थ

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प्रश्न 2.
दबावकारक की प्रक्रिया को एक मॉडल द्वारा समझाइए।
उत्तर:
दबाव का प्रत्यक्षण व्यक्ति द्वारा घटनाओं के संज्ञानात्मक मूल्यांकन तथा उनसे निपटने के लिए उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करता है। दबावपूर्ण परिस्थिति के प्रति एक व्यक्ति की अनुक्रिया बहुत सीमा तक घटनाओं के प्रत्यक्षण तथा उनकी व्याख्या या मूल्यांकन पर निर्भर करती है।

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प्रश्न 3.
विभिन्न जीवन कौशलों का वर्णन कीजिए। इन जीवन कौशलों से जीवन की चुनौतियों का सामना करने में किस प्रकार मदद मिलती है?
उत्तर:
निम्नलिखित जीवन कौशलों द्वारा जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलती है –
1. आग्रहिता:
आग्रहिता एक ऐसा व्यवहार या कौशल है जो हमारी भावनाओं, आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा विचारों के सुस्पष्ट तथा विश्वासपूर्ण संप्रेषण में सहायक होता है। यह ऐसी योग्यता है कि जिसके द्वारा किसी के निवेदन को अस्वीकार करना, किसी विशेष पर बिना आत्मचेतन के अपने मत को अभिव्यक्त करना या फिर खुलकर ऐसे संवेगों; जैसे-प्रेम, क्रोध इत्यादि को अभिव्यक्त करना संभव होता है। यदि कोई आग्रही हैं तो उसमें उच्च आत्म-विश्वास एवं आत्म-सम्मान तथा अपनी अस्मिता की एक अटूट भावना होती है।

2. समय-प्रबंधन:
कोई अपना समय जैसे व्यतीत करता है वह उसके जीवन की गुणवत्ता को निर्धारित करता है। समय का प्रबंधन तथा प्रत्यायोजित करना सीखने से, दबाव मुक्त होने में सहायता मिल सकती है। समय दबाव कम करने का एक प्रमुख तरीका, समय के प्रत्यक्षण में परिवर्तन लाना है। समय प्रबंधन का प्रमुख नियम यह है कि हम जिन कार्यों का महत्त्व देते हैं, उनका परिपालन करने में समय लगाएँ या उन कार्यों को करने में जो हमारे लक्ष्य प्राप्ति में सहायक हों। हमें अपने जानकारियों की वास्तविकता का बोध हो तथा कार्य को निश्चित समयावधि में करें। यह स्पष्ट होनी चाहिए कि हम क्या करना चाहते हैं तथा हम अपने जीवन में इन दोनों बातों में सामंजस्य स्थापित कर सकें, इन पर समय प्रबंधन निर्भर करता है।

3. सविवेक चिंतन-दबाव:
संबंधी अनेक समस्याएँ विकृत चिंतन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती हैं। व्यक्ति के चिंतन और अनुभव करने के तरीकों में घनिष्ठ संबंध होता है। जब हम दबाव का अनुभव करते हैं तो हमें अंत:निर्मित वर्णात्मक अभिनति होती है जिससे हमारा ध्यान भूतकाल के नकारात्मक विचारों तथा प्रतिमाओं पर केन्द्रित हो जाता है, जो हमारे वर्तमान तथा भविष्य के प्रत्यक्षण को प्रभावित करता है सविवेक चिंतन के कुछ नियम इस प्रकार हैं-अपने विकृत चिंतन तथा अविवेकी विश्वासों को चुनौती देना, संभावित अंतर्वेधी दुश्चिता उत्तेजक विचारों को मन से निकालना तथा सकारात्मक कथन करना।

4. संबंधों में सुधार:
संप्रेषण सुदृढ़ और स्थायी संबंधों की कुंजी है। इसके अंतर्गत तीन अत्यावश्यक कौशल निहित हैं-सुनना कि दूसरा व्यक्ति क्या कह रहा है, अभिव्यक्त करना कि कोई कैसा सोचता है और महसूस करता है तथा दूसरों की भावनाओं और मतों को स्वीकारना चाहे वे स्वयं उसके अपने से भिन्न हों। इसमें हमें अनुचित ईर्ष्या और नाराजगीयुक्त व्यवहार से दूर रहने की जरूरत होती है।

5. स्वयं की देखभाल:
यदि हम स्वयं को स्वस्थ्य, दुरूस्त तथा विश्रांत रखते हैं तो हमें दैनिक जीवन के दबावों का सामना करने के लिए शारीरिक एवं सांवेगिक रूप से और अच्छी तरह तैयार रहते हैं। हमारे श्वसन का प्रारूप हमारी मानसिक तथा सांवेगिक स्थिति को परिलक्षित करता है जब हम दबावग्रस्त अथवा दुश्चितित होते हैं तो हमारा श्वसन और तेज हो जाता है, जिसके बीच-बीच में अक्सर आहें भी निकलती रहती हैं। सबसे अधिक विश्रांत श्वसन मंद, मध्यपट या डायाफ्रम, अर्थात् सीना और उदर गुहिका के बीच एवं गुंबदकार पेशी से उदर-केन्द्रित श्वसन होता है। पर्यावरणी दबाव, जैसे-शोर, प्रदूषण, दिक् प्रकार, वर्ण इत्यादि सब हमारी क्षमता तथा कुशल-क्षेम पर पड़ता है।

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प्रश्न 4.
दबाव के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
दबाव मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं। ये हैं –

1. भौतिक एवं पर्यावरणीय दबाव:
भौतिक दबाव वे माँगें हैं, जिसके कारण हमारी शारीरिक दशा में परिवर्तन उत्पन्न हो जाता है। हम तनाव का अनुभव करते हैं जब हम शारीरिक रूप से अधिक परिश्रम करते हैं, पौष्टिक भोजन की कमी हो जाती है, कोई चोट लग जाती है, या निद्रा की कमी हो जाती है। पर्यावरणीय दबाव हमारे परिवेश की वैसी दशाएँ होती हैं जो प्रायः अपरिहार्य होती है। जैसे-वायु प्रदूषण, भीड़, शोर, ग्रीष्मकाल की गर्मी, शीतकाल की सर्दी इत्यादि। एक अन्य प्रकार के पर्यावरणीय दबाव प्राकृतिक विपदाएँ तथा विपाती घटनाएँ हैं; जैसे-आग, भूकम्प, बाढ़ इत्यादि।

2. मनोवैज्ञानिक दबाव:
यह वे दबाव हैं जिन्हें हम अपने मन से उत्पन्न करते हैं। ये दबाव अनुभव करने वाले व्यक्ति के लिए विशिष्ट होते हैं तथा दबाव के आंतरिक स्रोत होते हैं। हम समस्याओं के बारे में परेशान होते हैं, दुश्चिता करते हैं या अवसादग्रस्त हो जाते हैं। ये सभी केवल। दबाव के लक्षण ही नहीं है बल्कि यह हमारे लिए दबाव को बढ़ाते भी हैं। मनोवैज्ञानिक दबाव के कुछ प्रमुख स्रोत कुंठा, द्वंद्व, आंतरिक एवं सामाजिक दबाव इत्यादि हैं।
जब कोई व्यक्ति या परिस्थिति हमारी आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों को अवरुद्ध करती है, जो हमारे इष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा डालती है तो कुंठा (Frustration) उत्पन्न होती है।

कुंठा के अनेक कारण हो सकते हैं; जैसे-सामाजिक भेदभाव, अंतर्वैयक्तिक क्षति, स्कूल में कम अंक प्राप्त करना इत्यादि। दो या दो से अधिक असंगत आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों में द्वंद्व (Conflict) हो सकता है, जैसे-क्या नृत्य का अध्ययन किया जाए या मनोविज्ञान का। हम अध्ययन को जारी भी रखना चाह सकते हैं या नौकरी भी करना चाह सकते हैं। हमारे मूल्यों में भी तब द्वंद्व हो सकता है जब हमारे ऊपर किसी ऐसे कार्य को करने के लिए दबाव डाला जाए जो हमारे अपनी जीवन मूल्यों के विपरीत हो।

3. सामाजिक दबाव:
ये बाह्यजनित होते हैं तथा दूसरे लोगों के साथ हमारी अंत:क्रियाओं के कारण उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार की सामाजिक घटनाएँ; जैसे-परिवार में किसी की मृत्यु या बीमारी, तनावपूर्ण संबंध, पड़ोसियों से परेशानी, सामाजिक दबाव के कुछ उदाहरण हैं। एक सामाजिक दबाव व्यक्ति-व्यक्ति में बहुत भिन्न होते हैं। यह व्यक्ति जो अपने घर में शाम में शांतिपूर्वक बिताना चाहता है उसके लिए उत्सव या पार्टी में जाना दबावपूर्ण हो सकता है, जबकि किसी बहुत मिलनसार व्यक्ति के लिए शाम को घर बैठे रहना दबावपूर्ण हो सकता है।

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प्रश्न 5.
दबाव प्रबंधन की विभिन्न तकनीकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
दबाव प्रबंधन की विभिन्न तकनीक निम्नलिखित हैं –

1. विश्रांति की तकनीकें:
यह वे सक्रिय कौशल हैं जिनके द्वारा दबाव के लक्षणों तथा बीमारियों, जैसे-उच्च रक्तचाप एवं हृदय रोग के प्रभावों में कमी की जा सकती है। प्रायः विश्राति शरीर के निचले भाग से प्रारम्भ होती है तथा मुख पेशियों तक इस प्रकार लाई जाती है जिससे सम्पूर्ण शरीर विश्राम अवस्था में आ जाए । मन को शांति तथा शरीर को विश्राम अवस्था में लाने के लिए गहन श्वसन के साथ पेशी-शिथिलन का उपयोग किया जाता है।

2. ध्यान प्रक्रियाएँ:
योग विधि में ध्यान लगाने की प्रक्रिया में कुछ अधिगम प्रविधियाँ एक निश्चित अनुक्रम में उपयोग में लाई जाती हैं जिससे ध्यान को पुनः केन्द्रित कर चेतना की परिवर्तित स्थिति उत्पन्न की जा सके। इसमें एकाग्रता को इतना पूर्णरूप से केन्द्रित किया जाता है कि ध्यानस्थ व्यक्ति किसी बाह्य उद्दीपन के प्रति अनभिज्ञ हो जाता है तथा वह चेतना की एक भिन्न स्थिति में पहुँच जाता है।

3. जैवप्रतिप्राप्ति या बायोफीडबैक:
यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा दबाव के शरीरक्रियात्मक पक्षों का परिवीक्षण कर उन्हें कम करने के लिए फीडबैक दिया जाता है कि व्यक्ति में वर्तमानकालिक शरीर क्रियाएँ क्या हो रही हैं। प्रायः इसके साथ विश्रांति प्रशिक्षण का भी उपयोग किया जाता है। जैव प्रतिप्राप्ति प्रशिक्षण में तीन अवस्थाएँ होती हैं-किसी विशिष्ट शरीरक्रियात्मक अनुक्रिया को शांत व्यवस्था में नियंत्रित करने के उपाय सीखना उस नियंत्रण को सामान्य दैनिक जीवन में अंतरित करना।

4. सर्जनात्मक मानस-प्रत्यक्षीकरण:
दबाव से निपटने के लिए यह एक प्रभावी तकनीक है। सर्जनात्मक मानव-प्रत्यक्षीकरण एक आत्मनिष्ठ अनुभव है जिसमें प्रतिमा तथा कल्पना का उपयोग किया जाता है। मानस-प्रत्यक्षीकरण के पूर्व व्यक्ति को वास्तविकता के अनुकूल एक लक्ष्य निर्धारित कर लेना चाहिए, यह आत्म-विश्वास के निर्माण में सहायक होता है। यदि व्यक्ति का मन शांत हो, शरीर विश्राम अवस्था में हो तथा आँखें बंद हों तो मानस-प्रत्यक्षीकरण सरल होता है। ऐसा करने से अवांछित विचारों के हस्तक्षेप में कमी आती है तथा व्यक्ति को वह सर्जनात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है जिससे कि काल्पनिक दृश्य को वास्तविकता में परिवर्तित किया जा सके।

5. संज्ञानात्मक व्यवहारात्मक तकनीकें:
इन तकनीकों का उद्देश्य व्यक्ति को दबाव के विरुद्ध संचारित. करना होता है। मीचेनबॉम (Meichenbaum) ने दबाव संचारण प्रशिक्षण (Stress inoculation training) की एक प्रभावी विधि विकसित की है। इस उपागम का सार यह है कि व्यक्ति के नकारात्मक तथा अविवेकी विचारों के स्थान पर सकारात्मक तथा सविवेक विचार प्रतिस्थापित कर दिए जाएँ। इसके तीन प्रमुख चरण हैं-मूल्यांकन, दबाव न्यूनीकरण तकनीकें तथा अनुप्रयोग एवं अनुवर्ती कार्रवाई। मूल्यांकन के अंतर्गत समस्या की प्रकृति पर परिचर्चा करना तथा उसे व्यक्ति/सेवार्थी के दृष्टिकोण से देखना सम्मिलित होते हैं। दबाव न्यूनीकरण के अंतर्गत दबाव कम करने वाली तकनीकों जैसे-विश्रांति तथा आत्म-अनुदेशन को सीखना सम्मिलित होते हैं।

6. व्यायाम:
दबाव के प्रति अनुक्रिया के बाद अनुभव किए गए शरीरक्रियात्मक भाव-प्रबोधन के लिए व्यायाम एक सक्रिय निर्गम-मार्ग प्रदान कर सकता है। नियमित व्यायाम के द्वारा हृदय की दक्षता में सुधार होता है, फेफड़ों के प्रकार्यों में वृद्धि होती है, रक्तचाप में कमी होती है, रक्त में वसा की मात्रा घटती है तथा शरीर के प्रतिरक्षक तंत्र में सुधार होता है। तैरना, टहलना, दौड़ना, साइकिल चलाना, रस्सी कूदना इत्यादि दबाव को कम करने में सहायक होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को सप्ताह में कम-से-कम चार दिन एक साथ 30 मिनट तक इनमें किसी व्यायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्रत्येक सत्र में गरमाना, व्यायाम तथा ठंडा या सामान्य होने के चरण अवश्य होने चाहिए।

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प्रश्न 6.
स्थिति-स्थापन तथा स्वास्थ्य पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
स्थिति-स्थापन एक गत्यात्मक विकासात्मक प्रक्रिया है, जो चुनौतीपूर्ण जीवन-दशाओं में सकारात्मक समायोजन के अनुरक्षण को संदर्भित करता है। दबाव तथा विपत्ति के होते हुए भी उछलकर पुनः अपने स्थान पर पहले के समान वापस आने को स्थिति-स्थापन कहते हैं। स्थिति-स्थापन का संकल्पना-निर्धारण, आत्म-अर्ध तथा आत्म-विश्वास, स्वायत्तता तथा आत्मनिर्भरता की भावनाओं को अभिव्यक्त करता है, अपने लिए सकारात्मक भूमिका-प्रतिरूप हँढ़ना, किसी अंतरंग मित्र को खोजना ऐसे संज्ञानात्मक कौशल विकसित करना, जैसे-समस्या समाधान, सर्जनात्मकता, संसाधन-सम्पन्नता तथा नम्यता और यह विश्वास कि मेरी जीवन अर्थपूर्ण है तथा उसका एक उद्देश्य हैं स्थिति-स्थापक व्यक्ति अभिघात के प्रभावों, दबाव तथा विपत्ति पर विजयी होने में सफल होते हैं, एवं मानसिक रूप से स्वस्थ तथा अर्थपूर्ण जीवन व्यतीत करना सीख लेते हैं।

स्थिति स्थापन को तीन संसाधनों के आधार पर हाल ही में परिभाषित किया गया है मेरे पास हैं (सामाजिक तथा अंतवैयक्तिक बल), अर्थात् “मेरे आस-पास मेरे विश्वास पात्र व्यक्ति हैं तथा चाहे कुछ भी हो जाए तो वे मुझसे प्यार करते हैं।” मैं हूँ (आंतरिक शक्ति), अर्थात् “स्वयं अपना तथा दूसरों का सम्मान करता/करती हूँ।” मैं समर्थ हूँ (अंतवैयक्तिक तथा समस्या समाधान कौशल), अर्थात् “जो भी समस्याएँ” मेरे सम्मुख आएँ, उनका समाधान ढूँढ़ने में मैं सक्षम हूँ “किसी बालक को स्थिति स्थापक होने के लिए उसे उपरोक्त में से एक से अधिक शक्तियों की आवश्यकता होती है।

उदाहरण के लिए, बालकों को काफी आत्म-सम्मान हो सकता हैं (मैं हूँ), किन्तु हो सकता है कि उनके पास ऐसे व्यक्ति न हों जिससे वह सहायता प्राप्त कर सकें (मेरे पास हैं), तथा उनमें समस्याओं के समाधान की क्षमता न हो (मैं समर्थ हूँ)। ऐसे बालक स्थिति स्थापक नहीं कहे जाएँगे। बालकों पर किए गए अनुदैर्ध्य अध्ययन इस प्रकार के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि निर्धनता तथा अन्य सामाजिक असुविधाओं से उत्पन्न विकट असुरक्षा के उपरांत भी अनेक व्यक्ति योग्य एवं ध्यान रखनेवाले वयस्कों में विकसित हो जाते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी भी माँग के प्रति शरीर की अविशिष्ट अनुक्रिया को कहा जाता है?
(A) तनाव
(B) दबाव
(C) उत्तेजना
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) दबाव

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प्रश्न 2.
दबाव के संज्ञानात्मक सिद्धांत को किसने प्रतिपादित किया?
(A) फोकमैन
(B) एंडलर
(C) सेल्ये
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 3.
नकारात्मक घटनाओं का मूल्यांकन किसके लिए किया जाता है?
(A) संभावित नुकसान
(B) संभावित खतरा
(C) संभावित चुनौती
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 4.
हाइपोथैलेमस कितने माध्यम से क्रिया प्रारम्भ करता है?
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार
उत्तर:
(B) दो

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन-से संवेग नकारात्मक हैं?
(A) भय
(B) दुश्चिता
(C) उलझन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
संज्ञानात्मक अनुक्रिया के अंतर्गत कैसी अनुक्रियाएँ आती हैं?
(A) ध्यान केन्द्रित न कर पाना
(B) अंतर्वेधी
(C) पुनरावर्ती
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) अंतर्वेधी

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प्रश्न 7.
व्यक्ति जिन दबावों का अनुभव करते हैं वे निम्नलिखित में किनमें भिन्न हो, सकते हैं?
(A) तीव्रता
(B) अवधि
(C) जटिलता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) अवधि

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
(A) किसी दबाव का परिणाम इस बात पर निर्भर नहीं करता कि विभिन्न आयामों पर किसी विशिष्ट दबावपूर्ण अनुभव का स्थान क्या है।
(B) दबाव के अनुभव किसी व्यक्ति के पास उपलब्ध संसाधन द्वारा निर्धारित होते हैं।
(C) प्रत्येक व्यक्ति के दबाव अनुक्रियाओं के अलग-अलग प्रतिरूप होते हैं।
(D) पर्यावरणी दबाव हमारे परिवश की वैसी दशाएँ होती हैं जो प्रायः अपरिहार्य होता हैं।
उत्तर:
(A) किसी दबाव का परिणाम इस बात पर निर्भर नहीं करता कि विभिन्न आयामों पर किसी विशिष्ट दबावपूर्ण अनुभव का स्थान क्या है।

प्रश्न 9.
वे दबाव जिन्हें हम अपने मन में उत्पन्न करते हैं उन्हें कहा जाता है –
(A) भौतिक दबाव
(B) पर्यावरणी दबाव
(C) मनोवैज्ञानिक दबाव
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(C) मनोवैज्ञानिक दबाव

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित में कौन कुंठा के कारण नहीं हैं?
(A) सामाजिक भेदभाव
(B) स्कूल में अधिक अंक प्राप्त करना
(C) स्कूल में कम अंक प्राप्त करना
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) स्कूल में अधिक अंक प्राप्त करना

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में कौन अभिघातज घटना है?
(A) अग्निकांड
(B) कोलाहलपूर्ण परिवेश
(C) बिजली-पानी की कमी
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) अग्निकांड

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में कौन हमें दबाव में डालती हैं?
(A) चुनौतियाँ
(B) समस्याएँ
(C) कठिन परिस्थितियाँ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 13.
यदि दबाव का ठीक से प्रबंधन किया जाए तो वह व्यक्ति की अतिजीविता की संभावना में:
(A) कमी करता है
(B) अत्यधिक कमी करता है
(C) वृद्धि करता है
(D) कमी और वृद्धि दोनों करता है
उत्तर:
(C) वृद्धि करता है

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन सत्य है?
(A) दबाव ऊर्जा प्रदान करते हैं
(B) दबाव मानव भाव-प्रबोधन में वृद्धि करते हैं
(C) दबाव निष्पादन को प्रभावित करते हैं
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 15.
बाह्य प्रतिबलक के प्रति प्रतिक्रिया को क्या कहा जाता है?
(A) दबाव
(B) तनाव
(C) उपागम
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(D) इनमें कोई नहीं

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में किन्हें आधुनिक दबाव शोध का जनक कहा जाता है?
(A) हैंस सेल्ये
(B) लेजारस
(C) फोकमैन
(D) एंडलर
उत्तर:
(D) एंडलर

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प्रश्न 17.
विभिन्न शोधों एवं अध्ययनों द्वारा ज्ञात हुआ है कि तकरीबन ……… प्रतिशत रोगों का कारण तनाव होता है?
(A) 25%
(B) 50%
(C) 75%
(D) 100%
उत्तर:
(C) 75%

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में कौन शरीर में बाह्य तत्त्वों को पहचान कर नष्ट कर देता है?
(A) श्वेताणु
(B) रक्ताणु
(C) रोग प्रतिकारक
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) श्वेताणु

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प्रश्न 19.
निम्नलिखित में कौन संवेगात्मक प्रभाव के उदाहरण हैं?
(A) हृदयगति में वृद्धि
(B) मनोवैज्ञानिक तनाव में वृद्धि
(C) उच्च रक्तचाप
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(D) इनमें कोई नहीं

प्रश्न 20.
निम्नलिखित में कौन शरीरक्रियात्मक प्रभाव का उदाहरण है?
(A) पाचकतंत्र की धीमी गति
(B) हृदयगति में वृद्धि
(C) रक्त वाहिकाओं का सिकुड़ना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 21.
निम्नलिखित में कौन संज्ञानात्मक प्रभाव हो सकते हैं?
(A) एकाग्रता में वृद्धि
(B) न्यूनीकृत अल्पकालिक स्मृति क्षमता
(C) एलर्जी
(D) सिरदर्द
उत्तर:
(B) न्यूनीकृत अल्पकालिक स्मृति क्षमता

प्रश्न 22.
‘कुंठा-आक्रामकता सिद्धांत’ के प्रतिपादक हैं –
(A) एफ पर्ल्स
(B) इरिक बर्नी
(C) जॉन डोलॉड
(D) ये सभी
उत्तर:
(C) जॉन डोलॉड

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प्रश्न 23.
पतंजलि का नाम किससे सम्बद्ध है?
(A) मन:चिकित्सा से
(B) योग से
(C) स्वप्न विश्लेषण से
(D) परामर्श से
उत्तर:
(B) योग से

प्रश्न 24.
फ्रायड के अनुसार बच्चे विपरीत लिंग के माता-पिता से सहज जुड़ाव महसूस करते हैं। इसे क्या कहा जाता है?
(A) रक्षा युक्तियाँ
(B) पराहम्
(C) इडिपस और इलेक्ट्रा मनोग्रंथि
(D) हीन भावना मनोथि
उत्तर:
(C) इडिपस और इलेक्ट्रा मनोग्रंथि

प्रश्न 25.
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक हंस सेली किस क्षेत्र से संबंधित है?
(A) अभिप्रेरकों के संघर्ष के क्षेत्र में
(B) तनाव के अध्ययन के क्षेत्र में
(C) समाजीकरण के अध्ययन के क्षेत्र में
(D) इनमें से किसी भी क्षेत्र से संबंधित नहीं
उत्तर:
(B) तनाव के अध्ययन के क्षेत्र में

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प्रश्न 26.
‘भिड़ो या भागो’ अनुक्रिया का संबंध है –
(A) डोलार्ड एवं मिलर से
(B) कैनन से
(C) कोहेन से
(D) ग्लास एवं सिंगर से
उत्तर:
(B) कैनन से

प्रश्न 27.
हंस सेली ने तनाव के बारे में कहा है?
(A) तनाव एक अवशिष्ट अनुक्रिया है
(B) तनाव एक सामाजिक सीखना अनुक्रिया है
(C) तनाव एक अतिविशिष्ट अनुक्रिया है
(D) तनाव एक समायोजन अनुक्रिया है
उत्तर:
(A) तनाव एक अवशिष्ट अनुक्रिया है

प्रश्न 28.
मानव शरीर में काला पित्त की अधिकता से उत्पन्न होता है –
(A) विषाद
(B) उत्साह
(C) विषाद तथा उत्साह दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) विषाद

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प्रश्न 29.
अंग्रेजी के शब्द ‘स्ट्रेस’ की उत्पत्ति किस भाषा से हुई है?
(A) जर्मन
(B) हिन्दी
(C) ग्रीक
(D) लैटिन
उत्तर:
(D) लैटिन

प्रश्न 30.
लक्ष्य प्राप्ति में बाधा और आवश्यकताओं एवं अभिप्रेरकों के अवरुद्ध होने से क्या उत्पन्न होता है?
(A) आन्तरिक दबाव
(B) कुंठा
(C) द्वन्द्व
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कुंठा

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : एक बदलाव

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : एक बदलाव Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : एक बदलाव

Bihar Board Class 12 Political Science भारतीय राजनीति : एक बदलाव Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
उन्नी मुन्नी ने अखबार की कुछ कतरनों को बिखेर दिया। आप इन्हें कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित करें।

  1. मंडल आयोग की सिफारिश और आरक्षण विरोधी हंगामा
  2. जनता दल का गठन
  3. बाबरी मस्जिद का विध्वंस
  4. इंदिरा गांधी की हत्या
  5. राजग सरकार का गठन
  6. गोधरा की दुर्घटना और उसके परिणाम
  7. संप्रग का गठन

उत्तर:

  1. इंदिरा की हत्या – 1984
  2. जनता दल का गठन – 1989
  3. मंडल आयोग की सिफारिश और आरक्षण विरोधी हंगामा – 1990
  4. बाबरी मस्जिद का विधवंश – 1992
  5. राजग सरकार का गठन – 1999
  6. गोधरा की दुर्घटना और उसके परिणाम – 2002
  7. सप्रंग का गठन – 2004

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : एक बदलाव

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में मेल करें

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions chapter 9 भारतीय राजनीति एक बदलाव Part - 2 img 1
उत्तर:
(क) – (4)
(ख) – (2)
(ग) – (1)
(घ) – (3)

प्रश्न 3.
1989 के बाद की अवधि में भारतीय राजनीतिक के मुख्य मुद्दे क्या रहे? इन मुद्दों से राजनीतिक दलों के आपसी जुड़ाव के क्या रूप सामने आए हैं?
उत्तर:
1989 के चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा मुख्य था जिसके आधार पर नव गठित जनता दल की सरकार बनी जिसमें श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमन्त्री बने। जनता दल व इसके सहयोगी दलों ने राष्ट्रीय मोर्चा बनाया परन्तु राष्ट्रीय मोर्चा को भी पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ अतः राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार को दो विरोधी विचारधारा रखने वाली पार्टियों भारतीय जनता पार्टी व वामपंथी दलों ने बाहर से समर्थन दिया। यह व्यवस्था अधिक समय तक सुचारू रूप से ना चल सकी व जल्द ही इसमें मतभेद उभर कर सामने आने लगे।

विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा मंडल कमीशन की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए शिक्षण संस्थाओं व रोजगार में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने से भारतीय राजनीति में एक बड़ा तूफान सा आया जिसने आरक्षण की राजनीतिक के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों में राजनीतिक जागरूकता का विकास कर राजनीतक सत्ता में एक नए संघर्ष को जन्म दे दिया। पिछड़े वर्ग की जो राजनीति दक्षिण में चल रही थी वह अब उत्तर भारत में भी प्रारम्भ हो गई जिसके आधार पर कई राज्यों कई क्षेत्रीय दलों का गठन किया गया। इस प्रकार से 1989 के बाद भारतीय राजनीति में आरक्षण व अन्य पिछड़ा वर्ग का राजनीतिकरण एक प्रमुख मुद्दा उभर कर सामने आया।

आरक्षण के अलावा जो दूसरा मुद्दा भारतीय राजनीति में उभर कर आया वह था बाबरी मस्जिद विवाद जिसको 6 दिसम्बर 1992 में लाखों की संख्या में पहुँचे हिन्दू कट्टर पंथियों ने ध्वस्त कर दिया था व इसके बाद उत्तर प्रदेश की सरकार को केन्द्र ने बर्खास्त कर दिया। परन्तु इस घटना में साम्प्रदायिक हिंसा व तनाव रहा। इस पूरे घटना चक्र से धार्मिक ध्रुवीकरण हुआ जिसका परिणाम 2002 में गोधरा कांड व गुजरात में मुसलमानों की नियोजित तरीके से की गई हत्याएँ। इस पूरे घटना चक्र ने हिन्दू ध्रुवीकरण किया जिसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को 1996 के चुनाव में मिला। तीसरा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन भारतीय राजनीति में हुआ कि राष्ट्रीय दलों का घटता हुआ प्रभाव जिसने गठबन्धन की राजनीति को जन्म दिया।

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प्रश्न 4.
“गठबन्धन की राजनीति के इस नए दौर में राजनीतिक दल विचारधारा को आधार मानकर गठजोड़ नहीं करते” इस कथन के पक्ष में आप कौन-से तर्क देंगे।
उत्तर:
वैसे तो 1977 में जनता पार्टी की सरकार भी एक गठबन्धन की ही सरकार थी क्योंकि इसमें कई राजनीतिक दलों के विलय होकर जाता पार्टी का गठन किया था परन्तु 1989 में गठबन्धन की राजनीति का युग अधिक स्पष्ट रूप से सामने आया है जो आज तक भी जारी है। जनता पार्टी में घटकदलों ने विलय के बाद अपना अस्तित्व समाप्त कर दिया था परन्तु 1989 के बाद गठबन्धनों की सरकार में प्रायः एक राष्ट्रीय दल व अन्य क्षेत्रीय दल शामिल है जिसमें कोई भी दल अपने अस्तित्व को समाप्त नहीं करता। जनता पार्टी की सरकार केवल 1979 तक ही चली जबकि 1996 के बाद अब गठबन्धन सरकारें लगातार चल रही हैं।

गठबन्धन के इस नए दौर में विशेष बात यह है कि हलाँकि राजनीतिक दल गठबन्धन सरकार बनाने के लिए अपना अस्तित्व तो समाप्त नहीं करते परन्तु अपनी विचारधाराओं को या तो नई परिस्थितियों के अनुसार समायोजित कर लेते है। जिन पर सभी दलों, घटकों की सहमति होती है जिसे न्यूनतम साझा कार्यक्रम कहते हैं। एन.डी.ए. की सरकार चलाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (जो सबसे बड़ा घटक था) ने अपनी विचारात्मक मसलों जैसे कश्मीर का अनुच्छेद 370, बाबरी मस्जिद मसला व यूनिफार्म सिविल कोड़ को न्यूनतम साझा कार्यक्रम से अलग रखकर सभी दलों की अन्य विषयों पर सहमति व सहयोग प्राप्त किया। इस कारण एन.डी.ए. की सरकार पूरे पाँच वर्ष चली।

इसी प्रकार से 2004 में यू.पी.ए. का गठन किया गया जिसमें कांग्रेस सबसे बड़ा राष्ट्रीय दल है व अन्य दल सभी क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं। यू.पी.ए. को बाहर से वामपंथियों का समर्थन है। इस गठबन्धन में अलग-अलग विचारों के राजनीतिक दल है जैसे ऐसे अनेक विषय हैं जिस पर कांग्रेस व वामपंथी दल गम्भीर मतभेद रखते हैं व जो सामने भी आए हैं। जैसे उदारीकरण की नीति पर निजीकरण की प्रक्रिया पर व हाल ही में नाभकीय समझौते को लेकर। परन्तु सभी दलों में न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति है जिसके आधार पर गठबन्धन सरकार 2014 तक चली।

प्रश्न 5.
आपातकाल के बाद के दौर में भाजपा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। इस दौर में इस पार्टी के विकास क्रम का उल्लेख करें।
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी वास्तव में जनवरी 1980 में अस्तित्व में आयी। इससे पहले यह भारतीय जनसंघ के नाम से जानी जाती थी। आपातकाल में जनसंघ के भी प्रमुख नेता व कार्यकर्ता जेल में बंद थे। जनता पार्टी के गठन की प्रक्रिया में जनसंघ ने भी सक्रिय व महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जय प्रकाश नारायण के परामर्श व आशीर्वाद से तत्कालीन प्रमुख विरोधी दलों ने अपने-अपने दलों का एक-दूसरे में विलय कर जनता पार्टी का गठन किया। भारतीय जनसंघ जो कि एक हिन्दुवादी पार्टी मानी जाती थी, अपनी विचारधारा में उदारवादी दृष्टिकोण का समायोजन करते हुए, सोसालिस्ट, कांग्रेस (ओल्ड) व भारतीय लोकदल जैसी पार्टियों के साथ विलय करना स्वीकार कर जनता पार्टी का गठन किया।

1977 में जनता पार्टी ने आपातकाल के बाद चुनाव में हिस्सा लिया व भारी सफलता प्राप्त की। प्रधानमन्त्री के पद पर कांग्रेस (ओल्ड) के नेता श्री मुरारजी भाई देसाई, को नियुक्त किया गया। जनता पार्टी में सरकार बनने के बाद ही मतभेद व विवाद उत्पन्न होंगे। जनसंघ के आर. एस. एस. के साथ सम्बन्धों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गए। उधर चौधरी चरण सिंह व बाबू जगजीवन राम को भी दबाव की राजनीति के चलते उप-प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त करना पड़ा।

इस प्रकार जनता पार्टी आए दिन नए-नए विवादों में घिरती रही व अन्त में 1979 में जनता पार्टी टूट गयी। जनवरी 1980 को जनसंघ को दोबारा जीवित ना करते हुए भारतीय जनता पार्टी का गठन किया गया। इस बार की भारतीय जनता पार्टी पुरानी जनसंघ से भिन्न थी। इस बार भारतीय जनता पार्टी का आधार व्यापक किया गया। यह जनसंघ की अपनी हिन्दुवादी, पूँजीपतियों की पार्टी व शहर से सम्बन्ध रखने वाली पार्टी की छवि को दूर कर सभी वर्गों के समर्थन को प्राप्त करना चाहती थी। भारतीय जनता पार्टी ने अपना ग्रामीण क्षेत्र में भी अपना जनाधार बनाया व किसानों के हितों को भी अपने कार्यक्रमों में शामिल किया भारतीय जनता पार्टी ने गाँधीवाद समाजवाद को अपना एजेन्डा बनाया। यहाँ तक कि अल्पसंख्यकों का भी भरोसा जीतने का निर्णय लिया गया। इस प्रकार आपातकाल के बाद भारतीय जनता पार्टी एक व्यापक विचारधारा वाली पार्टी बनी।

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प्रश्न 6.
कांग्रेस के प्रभुत्व का दौर समाप्त हो गया है। इसके बावजूद देश की राजनीति पर कांग्रेस का असर लगातार कायम है। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
1952 के चुनाव से कांग्रेस का प्रभुत्व लगातार कायम रहा है। 1967 के चुनाव में पहली बार कांग्रेस को झटका लगा जब 1967 के चुनाव में कांग्रेस 9 राज्यों में सरकार नहीं बना सकी व केन्द्र में भी साधारण बहुमत से ही सरकार बना पायी राजनीतिक क्षेत्र में यह माना जाता है कि 1967 में कांग्रेस का प्रभुत्व समाप्त हो गया। यह सच है कि 1947 से लेकर 1967 तक कांग्रेस का प्रभुत्व कायम था क्योंकि कांग्रेस के पास राष्ट्रीय आन्दोलन के समय का पंडित जवाहर लाल नेहरू व सरदार पटेल जैसा करिश्माई नेतृत्व था व राष्ट्रीय आन्दोलन को लड़ने व स्वतन्त्रता प्राप्त करने की गौरवमई विरासत भी थी।

1967 के चुनाव से 1971 तक कांग्रेस बड़े संघर्ष से गुजरी क्योंकि इस बीच कांग्रेस आन्तरिक मन्थन से चल रही थी। 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ। कांग्रेस ने श्रीमति इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व में कई क्रान्तिकारी कार्यक्रम प्रारम्भ किए। 1971 में चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस ने गरीबी हटाओ जैसे नारे लगाए। 1971 में संयुक्त विरोधी दलों के बावजूद कांग्रेस को भारी सफलता मिली। 1971 से लेकर 1975 तक विभिन्न राज्यों विशेषकर बिहार व गुजरात में कांग्रेस विरोधी आन्दोलन चले जो इतने अधिक हो गए कि 25 जून 1975 को आपातकाल स्थिति की घोषणा करनी पड़ी। 1975 से लेकर 1977 तक आपातकाल की स्थिति रही। 1977 के चुनाव में कांग्रेस को आपातकाल का गुस्सा झेलना पड़ा व कांग्रेस को फिर सफलता मिली। 1984 में श्रीमति इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद 1984 के चुनावों में कांग्रेस को फिर सफलता मिली 1989 के चुनाव में फिर कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। 1989 से लेकर 1996 तक फिर कांग्रेस सबसे बड़ी विरोधी दल रही। परन्तु पुनः 2004 से यू.पी.ए. सरकार का नेतृत्व कांग्रेस ही कर रही है।

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प्रश्न 7.
अनेक लोग सोचते हैं कि सफल लोकतन्त्र के लिए दलीय व्यवस्था जरूरी है। पिछले बीस सालों के भारतीय अनुभवों को आधार बनाकर एक लेख लिखिए और इसमें बताइए कि भारत की मौजूदा बहुदलीय व्यवस्था के क्या फायदे हैं।
उत्तर:
भारत एक संघीय समाज है जिसमें अनेक जाति, धर्म, भाषा, बोली, संस्कृति व भौगोलिकताओं के लोग रहते हैं अत: लोगों के विभिन्न प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, व्यवसायिक व क्षेत्रीय हित हैं जिनको विकसित करने के लिए व इनकी रक्षा करने के लिए इनके अर्थात् नागरिकों के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। अपनी बात को कहने, विचारों को व्यक्त करने, संघ व समुदाय बनाने का भी अधिकार नागरिकों को प्राप्त हैं। इसी आधार पर भारत में बहुदलीय प्रणाली है।

बहुदलीय प्रणाली होते हुए भी भारत में कांग्रेस का प्रभुत्व एक लम्बे समय तक रहा है। एक लम्बे समय तक बहुत सारी विरोधी पार्टियाँ होते हुए भी भारत में मजबूत विरोधी दल का अभाव रहा है। भारत में बहुदलीय प्रणाली के कारण वैचारिक कम है बल्कि सामाजिक धार्मिक वे क्षेत्रीय अधिक है। 1984 के बाद भारत में भारतीय दलीय व्यवस्था एक नए दौर से गुजर रही है। क्षेत्रीय दलों की सरकारें सफलता पूर्वक कार्य कर रही है। 1984 से लेकर 2004 तक विभिन्न राजनीतक दल विरोधी दलों व शासक दलों के रूप में कार्य कर रहे हैं। यह बहुदलीय प्रणाली की सबसे बड़ी उपयोगिता है कि शासक दल पर कई और से दबाव बना रहता है व सरकार गिरने की स्थिति में विरोधी दल सरकार बनाने के लिए तैयार रहते हैं।

1989 के बाद भारत के गठबंधन सरकारों का दौर चल रहा है जिसमें बहुदलीय प्रणाली का अपना अलग प्रभाव है। क्षेत्रीय दल गठबन्धन सरकारों में प्रान्तीय स्तर व केन्द्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। क्षेत्रीय दल ना केवल अपने राज्यों के हितों की रक्षा कर रहे हैं व अपने क्षेत्र के लोगों का विकास कर रहे हैं बल्कि राष्ट्रीय हितों व क्षेत्रीय हितों में एक सामंजस्य पैदा करने में सहायक होते हैं। बहुदलीय प्रणाली भारत की विभिन्नता में एकता की युक्ति को चरितार्थ करती है।

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : एक बदलाव

प्रश्न 8.
निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें।
उत्तर:
“भारत की दलगत राजनीति ने कई चुनौतियों का सामना किया है। कांग्रेस प्रणाली ने अपना खात्मा ही नहीं किया बल्कि कांग्रेस के जमावड़े के बिखर जाने से आत्म-प्रतिनिधित्व की कई नई प्रवृत्ति का जोर बढ़ा। इससे दलगत व्यवस्था और विभिन्न हितों की कमाई करने की इसकी क्षमता पर भी सवाल उठे। राज व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण काम एक ऐसी दलगत व्यवस्था खड़ी करने अथवा राजनीतिक दलों को गढ़ने की है जो कारगर तरीके से विभिन्न हितों को मुखर और एकजुट करें।”

(क) इस तथ्य को पढ़ने के बाद क्या आप दलगत व्यवस्था की चुनौतियों की सुचि बना सकते हैं?
(ख) विभिन्न हितों का समाहार और उनमें एक जुटता का होना जरूरी है।
(ग) इस अध्याय में आपने अयोध्या विवाद के बारे में पढ़ा। इस विवाद ने भारत के राजनीतिक दलों की समाहार की क्षमता के आगे क्या चुनौती पेश की?
उत्तर:
(क) भारतीय दलीय प्रणाली की निम्न चुनौतियाँ हैं –

  • आन्तरिक प्रजातन्त्र का अभाव
  • व्यक्ति पूजा
  • अनुशासनहीनता
  • अवसरवादिता
  • गुटबाजी
  • राष्ट्रीय दलों का घटता प्रभाव
  • क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव
  • जाति के आधार पर राजनीतिक दलों का गठन
  • धर्म के आधार पर राजनीतिक दलों का गठन
  • गठबन्धन की राजनीति
  • सिद्धान्त हीन समझौते
  • धन की बढ़ती भूमिका
  • हिंसा की बढ़ती भूमिका
  • संस्थाओं की गरिमा में गिरावट
  • दल-बदल की प्रवृति

(ख) बहुल समाज में लोगों के विभिन्न आधारों पर भिन्न-भिन्न हित होते हैं, जिनका पूरा होना लोगों के विकास के लिए व प्रजातन्त्र की सफलता के लिए अति आवश्यक है। प्रजातन्त्रीय विकेन्द्रीकरण की आवश्यकता है कि शक्तियों का विकेन्द्रीकरण इस प्रकार से हो कि लोगों की क्षेत्रीय आवश्यकताएं पूरी हो उनकी सांस्कृतिक मान्यताएँ व आकांक्षाएँ विकसित हो। बहुल समाज में लोगों के दो प्रकार के हित होते हैं एक क्षेत्रीय हित दूसरे राष्ट्रीय हित अत: राष्ट्रीय एकता अखंडता के लिए यह आवश्यक है कि लोगों के क्षेत्रीय, निजी हितों व राष्ट्रीय हितों में सामंजस्य हो व समायोजन हो।

(ग) अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनाम राम मन्दिर विवाद ने भारतीय राजनीति को अत्यधिक प्रभावित किया है व भारतीय दलीय प्रणाली के सामने अनेक प्रश्न खड़े कर उन्हें अग्नि परीक्षा देने के लिए मजबूर किया। बाबरी मस्जिद व राम मन्दिर निर्माण का विवाद एक ऐसा विवाद है जिसको ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर राष्ट्रीय भावना के आधार पर सुलझाना चाहिए परन्तु इस विषय का हमेशा रोजनीतिकरण व साम्प्रदायिकरण किया गया। इस विवाद पर कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं रहा जिसने इस विवाद पर व्यापक सोच के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया दी हो। सभी राजनीतिक दलों ने इस विवाद से राजनीतिक लाभ ही निकालने का प्रयास किया है।

सर्वप्रथम श्री राजीव गाँधी ने 1986 में बाबरी मस्जिद के विवादित जगह के आहते का ताला खुलवा कर हिन्दुओं को पूजा पाठ करने की स्वीकृति दी जिसका उद्देश्य हिन्दुओं की वोटों को सुरक्षित करना था। मुस्लिम लीग व अन्य मुस्लिम संगठनों ने भी इस विषय को केवल धार्मिक/साम्प्रदायिक सोच के आधार पर ही देखा। भारतीय जनता पार्टी जो पहले हिन्दुवादी जनसंघ थी, ने इस विवाद का सबसे अधिक राजनीतिक लाभ उठाया व साम्प्रदायिकरण किया। 1992 में विवादित ढाँचा ध्वंस करने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अपने राजनीतिक आधार पर इस प्रकार से बढ़ाया है कि लोकसभा ने इसके सदस्यों की संख्या में वृद्धि हुई है। 1999 से 2004 में एन.डी.ए. सरकार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में ही चली।

Bihar Board Class 12 Political Science भारतीय राजनीति : एक बदलाव Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
1989 के बाद के भारतीय राजनीति की प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
1989 के चुनाव के बाद में घटनाचक्र बहुत तेजी से चला जिससे राजनीतिक माहौल में व्यापक परिवर्तन हुए। इस बीच में जो प्रमुख घटनाएं घटी वे निम्न थी –

  1. इस समय की महत्त्वपूर्ण घटना थी 1989 के चुनाव परिणाम जिसमें कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा। 1984 के चुनाव में लोकसभा की 415 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी को 1989 के चुनाव में केवल 197 सीटें ही प्राप्त हुई।
  2. गठबन्धन की राजनीति का आरम्भ वे केन्द्र में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका।
  3. मंडल व कमंडल की राजनीति जिसने भारतीय राजनीति को जातिकरण व साम्प्रदायिकरण को बढ़ाया। आरक्षण की राजनीति का आरम्भ व 1991 में नई आर्थिक नीति व आर्थिक सुधार प्रारम्भ।

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प्रश्न 2.
गठबन्धन की राजनीति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
1989 के चुनाव के बाद एक दल की सरकार का केन्द्र में लगभग अन्त हो गया। 1989 के चुनाव में किसी भी एक दल को बहुमत नहीं मिला। इस स्थिति में एक ऐसी सरकार बनी जिसमें राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी जिसको बाहर से वामपंथी दलों व भाजपा का समर्थन रहा। इस प्रकार से कई राजनीतिक दलों की मिली-जुली सरकारों को गठबन्धन की सरकार कहते। हैं भारत में 1989 के चुनाव के बाद यह स्थिति जारी है। गठबन्धन सरकारों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ती जा रही है।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय मोर्चा का गठन समझाइए।
उत्तर:
1989 के चुनाव में जनता दल चुनाव से पहले हुए लोकदल, जनमोर्चा, कांग्रेस (एस) व जनता पार्टी के विलय का परिणाम था। जनता दल ने फिर कई अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर राष्ट्रीय मोर्चा का गठन किया। इन क्षेत्रीय दलों में थे तमिलनाडू की डी.एम.के. पार्टी, आन्ध प्रदेश की टी.डी.पी. आदि राष्ट्रीय मोर्चा ने 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में वामपंथी दलों व भाजपा के बाहरी समर्थन से सरकार बनायी।

प्रश्न 4.
1989 के चुनाव में मुख्य मुद्दे क्या थे?
उत्तर:
1984 के चुनाव में राजीव गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। कांग्रेस को इस चुनाव में 415 सीटें प्राप्त हुई। परन्तु धीरे-धीरे सरकार का ग्राफ गिरता गया। कई प्रकार के स्केन्डल सामने आए। राजीव गाँधी की सरकार में रहे वित्त मंत्री व रक्षा मंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने विभिन्न रक्षा सौदों में हुई किमबैक यानि रिश्वत की चर्चाओं के सन्दर्भ में ना केवल अपने पद से त्याग पत्र दे दिया बल्कि कांग्रेस से त्याग पत्र देकर नया दल जन मोर्चा बना लिया जो बाद में अन्य प्रमुख विरोधी दलों के साथ विलय होकर जनता दल का गठन किया। 1989 के चुनाव के परिणामों ने भारतीय राजनीति को एक नई दिशा प्रदान की। 1989 के चुनाव में प्रमुख मुद्दा भ्रष्टाचार था। श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जो पहले ही एक ईमानदार छवि वाले व्यक्ति थे मिस्टर क्लीन बन कर उभरे कांग्रेस को इस चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा।

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प्रश्न 5.
मंडल आयोग का विषय क्या था?
उत्तर:
1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो जनता पार्टी में रहे गृहमंत्री श्री चरण सिंह ने पिछड़े वर्ग के लोगों की पहचान करने व उनके लिए आरक्षण की सीमा तय करने के लिए वी.पी. मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया जिसको मंडल आयोग के नाम जाना जाता है। मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट जनता पार्टी के टूटने के बाद इंदिरा गांधी सरकार के समय में पेश की व जिसको रख दिया गया। 1989 में समय पड़ने पर इस रिपोर्ट को जनता दल की सरकार ने लागू कर दिया। इस रिपोर्ट के लागू करने से पूरे देश में हिंसा का महौल हो गया व अंत में राजनीतिक दलों का विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के खिलाफ इस प्रकार से ध्रुवीकरण हुआ कि जनता दल सरकार को गद्दी छोड़नी पड़ी।

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय मोर्चा व संयुक्त मोर्ग के गठन में अन्तर समझाइए।
उत्तर:
1977 के बाद 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेस सरकार बनी जिसमें प्रमुख रूप से जनता दल व कुछ क्षेत्रीय दल शामिल थे। इनको बाहर से बी.जे.पी. व वामपंथियों का समर्थन प्राप्त था। जबकि यूनाइटेड फ्रंट की सरकार 1996 में बनी जिसमें प्रमुख रूप से क्षेत्रीय दल थे व बाहर से कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था।

प्रश्न 7.
1989 में कांग्रेस के प्रभाव में कमी के प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर:
1984 के चुनाव में कांग्रेस को 415 सीटें प्राप्त हुई जबकि 1989 के चुनावों में केवल 197 सीटें प्राप्त हुई। इस मिरावट के निम्न प्रमुख कारण थे –

  1. करिश्माई व अनुभवी नेता का अभाव
  2. कांग्रेस में गुटबाजी
  3. विश्वनाथ प्रताप सिंह का करिश्माई नेतृत्व व ईमानदारी की छवि
  4. गैर कांग्रेसी दलों का संगठित होना
  5. कांग्रेस शासन में भ्रष्टाचार का मुद्दा
  6. क्षेत्रीय दलों का बढ़ता हुआ प्रभाव।

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प्रश्न 8.
1991 में मध्यावधी चुनाव के क्या कारण थे?
उत्तर:
1989 के चुनावों के बाद जनता दल अर्थात् राष्ट्रीय मोर्चा भी सरकार एक संगठित राजनीतिक समूह के रूप में कार्य नहीं कर सकी ब 1991 में सरकार गिर गई जिससे 1991 में मध्यावधि चुनाव आवश्यक हो गए। इस घटनाक्रम के निम्न कारण थे –

  1. मंडल आयोग की सिफारिशों का लागू करना
  2. पूरे देश में आरक्षण का विरोध व आरक्षण की राजनीति
  3. बाबरी मस्जिद व राम मन्दिर निर्माण विवाद
  4. साम्प्रदायिक वातावरण
  5. राष्ट्रीय मोर्चा के घटकों में आपसी खींच-तान
  6. भारतीय जनता पार्टी द्वारा राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार से समर्थन लेना।

प्रश्न 9.
1989 के बाद भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका के कारण समझाइए।
उत्तर:
1989 के बाद भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका केन्द्र स्तर पर व प्रान्त स्तर पर भी बढ़ी है। इसके निम्न कारण प्रमुख हैं –

  1. बढ़ता हुआ क्षेत्रवाद
  2. राष्ट्रीय दलों के प्रभाव में कमी
  3. राष्ट्रीय स्तर पर करिश्माई नेतृत्व का अभाव
  4. राज्यों में नए नेतृत्व का विकास
  5. क्षेत्रीय भेदभाव
  6. संविधान के प्रावधानों का दुरुपयोग

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प्रश्न 10.
एन.डी.ए. के गठन को समझाइए।
उत्तर:
1991 से 1996 तक कांग्रेस ने नरसिम्हा राव के नेतृत्व में अल्पमत सरकार चलायी। 1996 के चुनावों में कांग्रेस का प्रभाव घटा व भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आयी व अल्पमत सरकार बनायी जो मात्र 13 दिन चली। भारतीय जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद यूनाइटेड फ्रंट ने काँग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई जो 1999 तक चली। इस बीच दो प्रधानमंत्री रहे। पहले श्री एच.डी. देवगोडा व बाद में इन्द्र कुमार गुजराल। 1999 में एन.डी.ए. का गठन किया गया। जिसमें भारतीय जनता पार्टी के साथ अन्य 22 क्षेत्रीय दल व छोटी पार्टियाँ थी। 1999 में एन.डी.ए. की सरकार बनी जो 2004 तक चली। 2004 के चुनाव में यू.पी.ए. ने सरकार बनायी।

प्रश्न 11.
पिछड़े वर्ग की राजनीतिक सत्ता में बढ़ती हुई भागीदारी को समझाइए।
उत्तर:
भारत का पिछड़ा वर्ग परम्परागत रूप से कांग्रेस पार्टी का समर्थन रहा है परन्तु मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 27% आरक्षण लागू होने के बाद पिछड़ा वर्ग राजनीतिक रूप से जागरूक हो गया व आरक्षण की राजनीति ने अन्य पिछड़ा वर्ग को चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण बना दिया। मंडल आयोग ने सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग की पहचान कर विभिन्न जातियों को पिछड़ा वर्ग के रूप में अंकित किया। पिछड़ा वर्ग की राजनीति इतनी अधिक तेज हुई कि जातियों में पिछड़ा वर्ग में शामिल होने की होड़ लग गई। इस प्रकार से राजनीतिक सत्ता में पिछड़ा वर्ग के लोगों की भागीदारी बढ़ गयी। इनके हितों को आगे बढ़ाने के लिए अनेक दल अस्तित्व में आए। इसी प्रक्रिया में पिछड़ा वर्ग में नेतृत्व का विकास हुआ।

प्रश्न 12.
भारतीय राजनीति में बहुजन समाज पार्टी के उदय को समझाइए।
उत्तर:
भारतीय राजनीति में बहुजन समाज पार्टी कई राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश व केन्द्र में भी अहम भूमिका निभा रही है। बहुजन समाज में जागृती का आन्दोलन करने व बहुजन समाज पार्टी बनाने में श्री कांशीराम का अहम योगदान है। बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस की परम्परागत रूप से समर्थन करने वाले वोट बैंक को तोड़ दिया जिनमें प्रमुख रूप से हरिजन, मुस्लिम व पिछड़ा वर्ग शामिल थे। कुमारी मायावती बहुजन समाज पार्टी को नेतृत्व प्रदान कर रही है।

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प्रश्न 13.
2004 के लोक सभा चुनाव के परिणाम समझाइए।
उत्तर:
2004 के चुनाव में एन.डी.ए. बहुमत प्राप्त नहीं कर पायी व कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आया क्योंकि कांग्रेस की वोट प्रतिशत के आधार पर सीटें एन.डी.ए. से अधिक थी। एन.डी.ए. (यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाइंस) का गठन किया व वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन से डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनायी। 2004 के चुनावों ने एक तथ्य को निश्चित कर दिया कि भारत में राष्ट्रीय दलों की स्थिति अभी भी ऐसी नहीं है कि वे स्वतंत्र रूप से अपनी सरकार बना सके। अतः गठबन्धन की सरकारों का दौर भारत में अभी चलेगा।

प्रश्न 14.
गठबन्धन की राजनीति के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
1989 से भारत में गठबन्धन सरकारें लगभग निरन्तर चल रही है। जिसके निम्न प्रमुख कारण हैं –

  1. क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की बढ़ती संख्या
  2. राष्ट्रीय दलों के प्रभाव मे गिरावट
  3. त्रिशंकु संसद व विधान सभाएँ
  4. समाज का विभिन्न सामाजिक आर्थिक वर्गों में बँटवारा
  5. सत्ता की राजनीति का बढ़ता प्रभाव
  6. न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति
  7. क्षेत्रीय दलों का दबाव की राजनीति

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प्रश्न 15.
बाबरी मस्जिद के 1992 में ध्वंश होने का भारतीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित स्थान को कार सेवकों में व हिन्दू कट्टरवादियों ने ध्वंश कर दिया जिससे सारे देश में दंगे व साम्प्रदायिक तनाव फैल गया। सभी राजनीतिक दलों व बुद्धिजीवियों ने इसकी निंदा की परन्तु इस घटना ने हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कर दिया जिसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को 1996 के चुनाव में मिला जिसमें वह लोकसभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आयी। बाबरी मस्जिद का टूटना भारत के इतिहास में एक काला अध्याय जुड़ गया।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप समझते हैं कि 1989 के चुनाव में कांग्रेस की सफलता के बाद कांग्रेस का सफाया हो गया?
उत्तर:
इस प्रश्न का सीधा उत्तर यह दिया जा सकता है कि कांग्रेस का 1989 के चुनाव में असफलता का अर्थ यह. नहीं लगाया जा सकता कि कांग्रेस का हमेशा के लिए सफाया हो गया। कांग्रेस भारत का एक बड़ा प्रमुख राजनीतिक दल है जिसकी जड़ें सारे देश में गइराई हुई हैं। बाद के चुनावों के परिणाम ने इसको सिद्ध भी कर दिया। 1989 में बनी राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार 1990 तक ही चली व 1991 में चुनाव कराना आवश्यक हो गया जिसमें फिर कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी जबकि इस चुनाव के दौरान कांग्रेस के प्रभावकारी नेता श्री राजीव गाँधी की हत्या हो गई थी।

1991 से लेकर 1996 तक कांग्रेस ने श्री नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार चलाई हालांकि बहुत बड़ा बहुमत कांग्रेस के साथ नहीं रहा। 1996 के चुनाव में कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी परन्तु कांग्रेस के समर्थन से ही 1996 से लेकर 1999 तक यूनाइटिड फ्रंट की सरकार चली। 2004 के चुनाव में फिर गठबन्धन की सरकार बनी तथा फिर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी व इसके ही नेतृत्व में यू.पी. ए. की सरकार डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में 2014 तक चली। अतः यह प्रमाणित होता है कि कांग्रेस आज भी प्रभावकारी राजनीतिक दल है।

प्रश्न 2.
मंडल आयोग की सिफारिशों का भारतीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
मंडल आयोग का गठन जनता पार्टी की सरकार ने 1979 में पिछड़े वर्ग के लोगों की पहचान करने व उनके शिक्षण संस्थाओं व सरकारी नौकरियों में आरक्षण निश्चित करने के लिए किया था। जिसमें शैक्षणिक व सामाजिक पिछड़ेपन को आधार माना गया था। मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1980 में ही दे दी थी। परन्तु इसको वी.पी. सिंह की सरकार ने 1989 में लागू किया। इस रिपोर्ट के लागू होने से जिसमें 27% के आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, पूरे देश में हिंसात्मक झगड़े प्रारम्भ हो गए। इस रिपोर्ट के लागू होने के बाद भारत में आरक्षण की राजनीति प्रारम्भ हो गई जिसने समाज का व राजनीति का ध्रुवीकरण कर दिया। पिछड़ा वर्ग राजनीतिक सत्ता के लिए संघर्षमय हो गया। इससे प्रान्तों व केन्द्र की राजनीति दोनों प्रभावित हुई।

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प्रश्न 3.
1989 के चुनावों के बाद की प्रमुख घटनाओं का वर्णन करो।
उत्तर:
1989 के बाद भारतीय राजनीति में घटनाचक्र बहुत तेजी के साथ चला। एक प्रकार से 1989 में भारतीय राजनीति का स्वरूप ही बदल गया। निम्न प्रमख घटनाएँ बड़ी तेजी से घटीं।

  1. सबसे महत्त्वपूर्ण घटना 1989 में कांग्रेस की पराजय। जिस पार्टी को 1989 के चुनाव में 415 सीटें मिली थी 1989 के चुनाव में इसे केवल 197 सीटें ही प्राप्त हुई। 1989 के चुनाव कई पार्टियों की मिली-जुली सरकार बनी।
  2. एक अन्य महत्वपूर्ण घटना क्षेत्रीय दलों का विकास/जनता दल व कुछ क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रीय मोर्चा बनाया व विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठबन्धन सरकार बनी।
  3. एक अन्य विशेषता यह रही कि विपरीत विचारधारा रखने वाली भारतीय जनता पार्टी व वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन से राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार चली।
  4. गैर कांग्रेसवाद के प्रचार का युग प्रारम्भ हुआ।
  5. आरक्षण की राजनीति का प्रारम्भ।
  6. बाबरी मस्जिद व राम मन्दिर विवाद।
  7. 1991 में आर्थिक सुधार व आर्थिक उदारीकरण की नीतियाँ प्रारम्भ।
  8. क्षेत्रीय दलों की केन्द्र की राजनीति में बढ़ती भूमिका।

प्रश्न 4.
राजीव गाँधी के बाद कांग्रेस की स्थिति समझाइए।
उत्तर:
1991 के चुनाव में तमिलनाडू में चुनाव प्रचार करते समय राजीव गाँधी की लिट्टे के उग्रवादियों ने हत्या कर दी जिससे कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। कुछ समय के लिए कांग्रेस नेतृत्वहीन हो गयी। राजीव गाँधी के अभाव का 1991 के चुनावों पर भी प्रभाव पड़ा क्योंकि कांग्रेस को अल्पमत की सरकार बनानी पड़ी। कांग्रेस में नेतृत्व संकट उत्पन्न हो गया। अन्ततः ये श्री नरसिम्हा राव जी को प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त किया गया जो एक कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते हैं हालांकि उन्हीं के कार्यकाल में ही नई आर्थिक नीतियाँ लागू की व स्थानीय संस्थाओं को मजबूत करने के लिए संविधान में 73 वाँ 74 वाँ संविधान संशोधन भी पारित किए गए। 1989 से लेकर 2004 तक के चुनाव तक कांग्रेस एक करिशमाई नेतृत्व की तलाश में रहा।

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प्रश्न 5.
1989 के चुनाव बाद कांग्रेस के प्रभाव में कमी के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
1989 के चुनाव में कांग्रेस के प्रभाव में गिरावट आयी जिसके प्रमुख कारण थे –

  1. कांग्रेस सरकार में बढ़ता भ्रष्टाचार
  2. करिश्माई नेतृत्व का अभाव
  3. कांग्रेस में बढ़ती अनुशासनहीनता
  4. विश्वनाथ प्रताप सिंह का एक करिश्माई नेता के रूप में उदय
  5. 1991 में कांग्रेस में नेतृत्व का संकट
  6. क्षेत्रीय दलों का विकास
  7. केन्द्र में अनिश्चितता का दौर
  8. केन्द्र की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती हुई भूमिका
  9. केन्द्र की कांग्रेस सरकारों के द्वारा संविधान के प्रावधानों का दुरुपयोग
  10. कांग्रेस की परम्परागत वोट बैंक का इससे दूर हो जाना
  11. दलित राजनीति का विकास
  12. अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति का विकास

प्रश्न 6.
गठबन्धन की राजनीति से आप क्या समझते हैं? राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार किस प्रकार बनी समझाइए।
उत्तर:
जब चुनाव के बाद किसी एक राजनीतिक दल को सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत ना मिले तो कई सारे राजनीतिक दलों में इस प्रकार से समझौता होता है कि न्यूनतम साँझा कार्यक्रम की सहमति के आधार पर मिली-जुली सरकार बनाते हैं, ऐसी सरकार को गठबन्धन सरकार कहते हैं। 1989 के चुनाव में कांग्रेस को पर्याप्त बहुमत ना मिलने पर राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी जो एक गठबन्धन सरकार थी क्योंकि इसमें जनता दल प्रमुख पार्टी थी व इसके साथ कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने मिलकर राष्ट्रीय मोर्चे में गठन कर भारतीय जनता पार्टी व वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। 1989 से ही भारत में गठबन्धन सरकारों का प्रचलन चला जो आज भी चल रहा है। 1996 से 1999 तक यूनाइटेड फ्रंट की सरकार 1999 से 2004 तक एनडीए की गठबन्धन सरकार व अब 2004 से 2014 तक यू.पी.ए. की 2014 से अब तक एन.डीए. गठबन्धन सरकार चल रही है।

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प्रश्न 7.
भारत की राजनीतिक व्यवस्था पर गठबन्धन की राजनति का प्रभाव समझाइए।
उत्तर:
1989 के बाद देश में गठबन्धन की राजनीति का दौर जारी है। गठबन्धन सरकारें ना केवल केन्द्र में चल रहा है बल्कि अनेक राज्यों में भी गठबंधन की सरकारें चल रही है जैसे पश्चिम बंगाल, केरल, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, पंजाब में गठबन्धन की सरकारें चल रही है। गठबन्धन की सरकारों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका अहम रही है। गठबन्धन की राजनीति ने भारतीय राजनीति को दोनों तरह से अर्थात् नकारात्मक तरीके से भी व सकारात्मक तरीके से प्रभावित किया है जिसको निम्न क्षेत्रों में समझ सकते हैं –

  1. राजनीतिक अस्थिरता
  2. क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका
  3. क्षेत्रीय हितों व आकांक्षाओं की पूर्ति
  4. केन्द्र व प्रान्तों के सम्बन्धों पर प्रभाव
  5. राज्यों की राजनीति पर प्रभाव
  6. भारतीय संघीय प्रणाली के स्वरूप पर प्रभाव
  7. राजनीतिक अवसरवाद में वृद्धि
  8. राजनीति संस्थाओं व पदों की स्थिति में परिवर्तन

प्रश्न 8.
बाबरी मस्जिद विवाद ने भारतीय राजनीति को किस प्रकार से प्रभावित किया?
उत्तर:
साम्प्रदायिक भारतीय राजनीति की एक नकारात्मक विरासत रही है जो वास्तव में अंग्रेजी शासन की ही देन है साम्प्रदायिकता आज भी भारतीय समाज व राजनीति को प्रभावित कर रही है। बाबरी मस्जिद व राम मन्दिर विवाद ने भारतीय समाज व राजनीति को विभाजित किया। कुछ एक राजनीतिक दलों ने इस विवाद का राजनीतिकरण किया है। इसका उन्माद इस प्रकार बढ़ा कि 6 नवम्बर 1992 को कट्टरवादियों ने विवादित ढाँचे को ध्वंस कर दिया। जिससे साम्प्रदायिक झगड़ों की झड़ी लग गई। गोधराकांड व गुजरात में 2002 में हुए साम्प्रदायिक दंगे इसी चिंगारी का परिणाम है। इस विवाद ने समाज को बाँटा है व आपस में नफरत व तनाव को बढ़ाया है जिसका राजनीतिक दलों ने अपने-अपने हित में प्रयोग किया है।

प्रश्न 9.
मंडल विवाद से आप क्या समझते हैं? भारत में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन को इसने किस प्रकार से प्रभावित किया?
उत्तर:
मंडलवाद का सम्बन्ध उस राजनीतिक व सामाजिक माहौल से है जो 1990 में मंडल आयोग की पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए सरकारी नौकरियों व शैक्षणिक संस्थाओं में 27% आरक्षण के सिफारिशों को लागू करने के बाद पूरे देश में उत्पन्न हुआ। शैक्षणिक रूप से व सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण के बाद पूरे देश में सामाजिक तनाव हो गया जिसको राजनीतिक दलों ने आने-अपने तरीके से परिभाषित व प्रचारित किया।

इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह रहा कि जिस सरकार ने इस आदेश को लागू किया था अर्थात् विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में चल रही राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। देश ऊंची जाति व पिछड़ी जातियों के वर्गों में बँट गया व इसने पूरे सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था को इस प्रकार से प्रभावित किया कि पिछड़े वर्ग के लोगों में जागरूकता बढ़ी व इनका सामाजिक व राजनीतिक ध्रुवीकरण हो गया। पिछड़े वर्ग के लागों ने संख्या के अनुपात में ना केवल आर्थिक श्रोतों पर हिस्सेदारी की बात करी बल्कि राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी की बात की। अनेक क्षेत्रीय दलों का विकास इस संघर्ष पर ही आधारित है।

Bihar Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : एक बदलाव

प्रश्न 10.
पिछड़ी जातियों के राजनीतिकरण का भारतीय राजनीति पर प्रभाव समझाइए।
उत्तर:
मंडल की देन आरक्षण की राजनीति है जिसने भारत में पिछड़े वर्ग की राजनीति को जन्म दिया जिसके आधार पर पिछड़ा वर्ग एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर कर आया। इस आधार पर कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों का गठन किया जो विभिन्न राज्यों में सरकार में शामिल है। केन्द्र की राजनीति को भी आरक्षण की राजनीति ने प्रभावित किया। पिछड़े वर्ग का सामाजिक आर्थिक व राजनीति विकास हुआ। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि मंडल आयोग कि सिफारिशों के आधार पर किए गए 27% आरक्षण के कारण समाज के जीवन में हर पक्ष में परिवर्तन हुआ। पिछड़ा वर्ग विभिन्न दलों के लिए केवल वोट बैंक ही नहीं बल्कि एक राजनीतिक शक्ति है जिसने भारतीय समाज व राजनीति में गतिशीलता को जन्म दिया है।

प्रश्न 11.
भारतीय समाज में राजनीतिक गतिशीलता व सक्रियता लाने में बाबरी मस्जिद विवाद की भूमिका समझाइए।
उत्तर:
भारत में प्रजातन्त्रीय लोकतन्त्र को अपनाया गया है। चुनावी प्रक्रिया व राजनीतिक प्रक्रिया के प्रभाव में समाज के विभिन्न वर्गों, क्षेत्रों व समुदायों में जागरूकता का विकास हुआ। इसी प्रक्रिया में दुर्भाग्यवश कुछ नकारात्मक संकीर्ण प्रवृत्तियों व सोच ने भी जन्म लिया है। जिससे समाज के विभिन्न वर्गों में तनाव व आपसी द्वेष बड़ा है। बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि विवाद भी एक ऐसा ही विवाद है जिसने भारतीय समाज में साम्प्रदायिक तनाव व विभाजन को जन्म दिया।

इस विषय को दलगत व स्वार्थी राजनीति व कट्टरवादी तत्वों ने और अधिक हवा दी। इस विवाद का साम्प्रदायिक आधार वोट बैंक बनाने में प्रयोग किया। 1986 को राजीव गाँधी सरकार ने विवादित जगह के अहाते का ताला खोलकर हिन्दुओं को पूजा करने की अनुमति दे दी जिससे इस विवादित स्थान का विवाद बढ़ने लगा। भारतीय जनता पार्टी ने विवादित स्थान पर राम मन्दिर निर्माण करने का वायदा कर लोगों की भावनाओं को भड़का कर इस विषय को और अधिक गर्म कर दिया जिससे इस विषय का तेजी के साथ समाजीकरण व राजनीतिकरण हो गया। परिणाम स्वरूप 1992 में बाबरी मस्जिद को कट्टरवादियों ने ध्वंस कर दिया जिससे पूरे देश में उत्तेजना का वातावरण हो गया जिसको वोट बैंक में प्रयोग कर भारतीय जनता पार्टी ने सर्वोच्च राजनीतिक सफलता प्राप्त की।

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प्रश्न 12.
गठबन्धन की राजनीति के कुछ प्रमुख गुण बताइए।
उत्तर:
गठबन्धन की राजनीति विश्व के अनेक देशों में प्रचलित है। भारत में इसकी उत्पत्ति 1989 के बाद हुई। आज भारत के अनेक राज्यों व केन्द्र में गठबन्धन सरकारें चल रही हैं। इसके कुछ अवगुणों के बावजूद कुछ गुण भी अवश्य है जो निम्न हैं –

  1. त्रिशंकु संसद व विधान सभाओं की स्थिति में सरकार बनने की संभावनाएँ निश्चित करता है।
  2. संघीय प्रणाली को मजबूत किया है।
  3. केन्द्र व प्रान्तों के सम्बन्धों को एक नया स्वरूप प्रदान किया है।
  4. क्षेत्रीय दलों का विकास व क्षेत्रीय आकांक्षाओं व हितों की पूर्ति में सहायक।
  5. राज्यों की स्थिति मजबूत हुई है।

प्रश्न 13.
गठबन्धन सरकारों के दौर में उन क्षेत्रों पर प्रकाश डालिए जिन पर लगभग सभी दलों की प्रायः सहमति होती है।
उत्तर:
भारत में गठबन्धन सरकारें पहली संसद का परिणाम नहीं है व ना ही भारत में गठबन्धन सरकार बनाने व चलाने की संस्कृति रही। वास्तव में भारत में गठबन्धन सरकारें निश्चित परिस्थितियों का परिणाम है और वह परिस्थितियाँ ही सत्ता को साझा करने की स्थिति जब किसी भी दल को इतना बहुमत ना मिले कि सरकार बन सके।

सत्ता को साझा करने के लिए वह आवश्यक हो जाता है दल अपनी नीतियों व कार्यक्रमों में भी समझौता करें। व मतभेदों को मुद्दों को अलग रख कर कुछ मुद्दों पर आम सहमति बनाए भारत में चल रही गठबन्धन सरकारों के न्यूनतम साझा कार्यक्रम इसी सहमति का ही परिणाम है। भारतीय गठबन्धन सरकारों में निम्न मुद्दों पर आम सहमति प्रतीत नजर आती है –

  1. आरक्षण
  2. नई आर्थिक नीतियाँ
  3. गठबन्धन सरकारें
  4. विचारधाराओं को व्यवहारिक धरातल के साथ जोड़ना
  5. राजनीतिक स्थिरता के लिए वैचारिक मतभेदों में तालमेल करना

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प्रश्न 14.
भारत में गठबन्धन सरकारों का भविष्य क्या है?
उत्तर:
1989 में विभिन्न राज्यों व केन्द्र में गठबन्धन सरकारें चल रही हैं। दलीय प्रणाली का स्वरूप इस प्रकार से बदला है कि भारत में दो दलीय प्रणाली तो नहीं बल्कि दो प्रमुख दो यानि कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी दलों की प्रमुखता के साथ गठबन्धन रहे जिनमें भारतीय जनता पार्टी अथवा कांग्रेस ने प्रमुख भूमिका अदा की है।

भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस का जनाधार घटता बढ़ता रहा है। विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकार कार्य कर रही है व ये क्षेत्रीय दल केन्द्र में भी सरकार बनाने व चलाने में भूमिका अदा कर रहे हैं चाहे कांग्रेस के साथ या भारतीय जनता पार्टी के साथ। आज स्थिति यह है कि कोई भी राजनीतिक दल स्वतंत्र स्वरूप से अकेले सरकार बनाने की स्थिति यह है कि कोई भी राजनीतिक दल स्वतंत्र से अकेले सरकार बनाने की स्थिति में नहीं लगता अत: अभी भारत में गठबन्धन की सरकारें चलेगी इनका अभी भी भविष्य है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
गठबन्धन सरकार से आप क्या समझते हैं? गठबन्धन सरकारों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका समझाइए।
उत्तर:
जब चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल को सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत ना मिले व कई राजनीतिक दल मिलाकर अपने विवादित मुद्दों को अलग कर एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति के आधार पर साझा सरकार बनाते हैं तो इसे गठबन्धन सरकार कहते हैं। यह स्थिति बहुदलीय प्रणाली में उस समय आ जाती है जब राष्ट्रीय दलों का प्रभाव कम हो जाता है व कई सारे क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ जाता है जिससे वोट अनेक राजनीतिक दलों में विभाजित होने के कारण किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता।

1980 के बाद भारत में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ने लगी है। इससे पहले बहुदलीय प्रणाली होते हुए भी कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। कुछ राष्ट्रीय दल रहे परन्तु उनकी स्थिति काँग्रेस के सामने कमजोर ही रही। 1950 से लेकर 1980 तक के काल में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। 1980 के दशक के बाद विभिन्न कारणों से क्षेत्रवाद का विकास हुआ जिसके आधार पर क्षेत्रीय दलों का गठन किया गया। इन क्षेत्रीय दलों की संख्या विभिन्न कारणों से लगातार बढ़ती ही रही। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी रही कि 1990 के दशक में राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों के सामने बौने पड़ गए। क्षेत्रीय दलों ने केवल अपने राज्यों में सरकारें बनायी बल्कि केन्द्र में भी सरकार बनाने व चलाने में अहम भूमिका निभायी। निम्न मुद्दे ऐसे रहे जिन्होंने समाज को विभाजित किया जिसके आधार पर लोगों के राजनीतिक व्यवहार में परिवर्तन हुआ व क्षेत्रीय दलों की संख्या में वृद्धि हुई। ये मुद्दे थे –

  1. आरक्षण
  2. मन्दिर मस्जिद विवाद (बाबरी मस्जिद व राम मन्दिर)
  3. पिछड़ा वर्ग की राजनीति
  4. महिला राजनीति
  5. अल्प संख्यकों की राजनीति
  6. आदिवासी राजनीति
  7. दलित राजनीति
  8. क्षेत्रवाद

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प्रश्न 2.
भारतीय राजनीति में 1990 से 2004 तक की विभिन्न प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
1989 के चुनाव के बाद भारत में गठबन्धन की राजनीति प्रारम्भ हुई। 1989 से लेकर 2004 में यू.पी.ए. सरकार बनने तक घटनाचक्र बड़ी तेजी के साथ चला जिससे भारतीय राजनीति में व्यापक परिवर्तन आए। पिछले 20 वर्षों में भारतीय राजनीति में निम्न प्रमुख विषय छाए रहे हैं –

1. कांग्रेस के प्रभाव में उतार चढ़ाव:
कांग्रेस भारत का एक प्रमुख राजनीतिक दल रहा है जिसके साथ गौरवमय इतिहास रहा है। 1970 के दशक में भारतीय राजनीति पर कांग्रेस का प्रभुत्व रहा है केन्द्र व प्रान्तों कांग्रेस की सरकारें लगातार रही हैं परन्तु 1970 के बाद कांग्रेस के प्रभुत्व में कमी आयी है। 1989 से 90 तक कांग्रेस सत्ता से बाहर रही, परन्तु 1991 में पुनः सत्ता में आ गई। 1996 से लेकर 2004 तक कांग्रेस का जनाधार कम हुआ व 2004 तक सत्ता से बाहर रही। 2004 में पुनः कांग्रेस संसद में सबसे बड़े दल के नेता के रूप में उभर कर आयी व गठबन्धन सरकार का नेतृत्व 2014 तक की।

2. आरक्षण की राजनीति:
1989 से देश की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा छाया रहा है वास्तव में आरक्षण की राजनीति हो रही है जिसने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को अत्यधिक प्रभावित किया है। 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 27% आरक्षण की व्यवस्था की जिसका प्रारम्भ में बहुत विरोध हुआ व देश में हिंसा हुई परन्तु कुछ समय के बाद इसको सभी ने स्वीकार कर लिया है व पिछड़ा वर्ग में शामिल होने की होड़ में सब लगे हैं।

3. राम मन्दिर व बाबरी मस्जिद विवाद-भारतीय राजनीति को 1990 के बाद बाबरी मस्जिद विवाद ने अत्यधिक प्रभावित किया है व साम्प्रदायिक तनाव व द्वेष को जन्म दिया जिसका भारतीय जनता पार्टी ने लाभ उठाया।

4. गठबन्धन सरकारों का उदय

5. क्षेत्रीय पार्टियों की केन्द्र व राज्यों में बढ़ती भूमिका

6. केन्द्र व प्रान्तों में रिस्तों की पुनः व्याख्या का प्रश्न

7. आर्थिक उदारीकरण

8. अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग व महिलाओं का सशक्तिकरण

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

I. निम्नलिखित विकल्पों में सही का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय मोर्चा में सबसे बड़ा दल कौन-सा था?
(अ) जनता दल
(ब) डी.एम.के.
(स) बी.जे.डी.
(द) तेलगू देशम
उत्तर:
(अ) जनता दल

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प्रश्न 2.
तेलगू देशम पार्टी किस राज्य में है?
(अ) आन्ध्र प्रदेश
(ब) तमिलनाडू
(स) उड़ीसा
(द) मध्यप्रदेश
उत्तर:
(अ) तमिलनाडू

प्रश्न 3.
मंडल आयोग की रिपोर्ट किस वर्ष में लागू की गई?
(अ) 1989
(ब) 1990
(स) 1991
(द) 1992
उत्तर:
(ब) 1990

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प्रश्न 4.
बाबरी मस्जिद को किस दिन व वर्ष में ध्वंश किया गया?
(अ) 4 जनवरी 1991
(ब) 5 जनवरी 1992
(स) 6 दिसम्बर 1992
(द) 10 दिसम्बर 1992
उत्तर:
(स) 6 दिसम्बर 1992

प्रश्न 5.
भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ था –
(अ) 25 जून, 1975
(ब) 6 अप्रैल, 1980
(स) 25 जुलाई, 1978
(द) 6 मार्च, 1982
उत्तर:
(ब) 6 अप्रैल, 1980

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प्रश्न 6.
देश में घटित 26.11.2008 की घटना किससे संबंधित है।
(अ) क्षेत्रवाद
(ब) जातिवाद
(स) नक्सलवाद
(द) आतंकवाद
उत्तर:
(द) आतंकवाद

प्रश्न 7.
स्वतंत्र भारत की प्रथम सरकार में गृहमंत्री कौन था?
(अ) सरदार बल्लभ भाई पटेल
(ब) चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
(स) जगजीवन राम
(द) डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
उत्तर:
(अ) सरदार बल्लभ भाई पटेल

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प्रश्न 8.
भारत ने श्रीलंका से अपनी शांति सेना कब बापस बुला ली?
(अ) 1987 में
(ब) 1989 में
(स) 1992 में
(द) 1991प्र
उत्तर:
(ब) 1989 में

प्रश्न 9.
गठबंधन सरकारों के होने से संसदीय व्यवस्था में क्या प्रमुख खामियाँ आयी है?
(अ) राष्ट्रपति की दुर्बल स्थिति
(ब) प्रधानमंत्री की सबल स्थिति
(स) क्षेत्रीय दलों का उदय
(द) सामूहिक उत्तरदायित्व के सूत्र की अवहेलना
उत्तर:
(द) सामूहिक उत्तरदायित्व के सूत्र की अवहेलना

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प्रश्न 10.
राजीव गांधी की हत्या कब हुई?
(अ) अक्टूबर, 1984
(ब) मई, 1991
(स) जुलाई, 1993
(द) अगस्त, 1996
उत्तर:
(ब) मई, 1991

प्रश्न 11.
6 दिसम्बर, 1992 के इनमें से कौन-सी घटना हुई है?
(अ) बाबरी मस्जिद का विध्वंस
(ब) जनता दल का गठन
(स) राजग सरकार का गठन
(द) गोधरा कांड
उत्तर:
(अ) बाबरी मस्जिद का विध्वंस

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प्रश्न 12. डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के गठबंधन का क्या नाम है?
(अ) संप्रग
(ब) राजग
(स) पंजाब गठबंधन
(द) सभी
उत्तर:
(अ) संप्रग

प्रश्न 13.
विधायिका में महिलाओं को कितना प्रतिशत आरक्षण देने हेतु विधेयक पर लंबे समय से संसद में निर्णय नहीं हो पाया है?
(अ) 50 प्रतिशत
(ब) 33 प्रतिशत
(स) 40 प्रतिशत
(द) 25 प्रतिशत
उत्तर:
(ब) 33 प्रतिशत

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प्रश्न 14.
कांशीराम राजनीतिक दल के संस्थापक थे?
(अ) बहुजन समाज पार्टी
(ब) शिव सेना
(स) राष्ट्रीय जनता दल
(द) लोक जनशक्ति पार्टी
उत्तर:
(अ) बहुजन समाज पार्टी

प्रश्न 15.
भारतीय संसद पर आक्रमण किया गया था –
(अ) 2005
(ब) 2006
(स) 2001
(द) 2002
उत्तर:
(स) 2001

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प्रश्न 16.
भारतीय शांति सेना को श्रीलंका कब भेजा गया?
(अ) 1987
(ब) 1988
(स) 1989
(द) 1990
उत्तर:
(अ) 1987

प्रश्न 17.
भारत में नई आर्थिक नीतिके संचालक हैं –
(अ) डॉ. मनमोहन सिंह
(ब) यशवंत सिन्हा
(स) वी. पी. सिंह
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) डॉ. मनमोहन सिंह

II. मिलान वाले प्रश्न एवं उनके उत्तर

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उत्तर:
(1) – (य)
(2) – (स)
(3) – (अ)
(4) – (द)
(5) – (ब)