Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 19 कपड़ों का निर्माण

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 19 कपड़ों का निर्माण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 19 कपड़ों का निर्माण

Bihar Board Class 11 Home Science कपड़ों का निर्माण Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कताई प्रकार की होती है – [B.M.2009A]
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो

प्रश्न 2.
धागे को तंतुओं के आधार पर बाँटा गया है –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ख) तीन

प्रश्न 3.
ताने के आप-पार बुने जाने वाले धागे को कहते हैं –
(क) ताने (Warp)
(ख) बाने (Weft)
(ग) फेल्टिंग (Felting)
(घ) निटिंग (Knitting)
उत्तर:
(ग) फेल्टिंग (Felting)

प्रश्न 4.
धागे से कपड़ा बनाने की प्रमुख विधियाँ हैं –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ग) चार

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प्रश्न 5.
साटिन बुनाई में तंतुओं (Filament) का प्रयोग किया जाता है –
(क) लंबा
(ख) छोटा
(ग) मोटा
(घ) गोलाकार
उत्तर:
(क) लंबा

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सूत (Yam) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
अनेक तन्तुओं को एक साथ खींच कर ऐंठने से जो अविरल धागा बनाया जाता है, उसे सूत कहते हैं।

प्रश्न 2.
कताई (Spinning) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
कताई तन्तुओं के समूह में से धागा खींचकर व ऐंठन देते हुए अविरल सूत प्राप्त करने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 3.
यान्त्रिक कताई के क्या कारण हैं ?
उत्तर:
यान्त्रिक कताई (Mechanical Spinning): यान्त्रिक कताई अधिकतर प्राकृतिक तन्तुओं से की जाती है, जैसे-सूती, ऊनी व रेशमी तन्तुओं की कताई यान्त्रिक विधि से होती है। यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।

  • कच्चे माल की सफाई (Opening and cleaning of raw material) ।
  • धुनाई व कंघी करना (Carding and combing)।
  • कताई (Spinning)।
  • खींचना व ऐंठन देना।

प्रश्न 4.
सूत कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर:
सूतों के प्रकार (Types of Yam):
1. साधारण सूत (Simple Yarm):

  • इकहरा सूत (Simple Standard Yarm)
  • दोहरा सूत (Two Ply or Cable yam)
  • डोरिया सूत ।

2. सम्मिश्रित सूत (Complex or Novelty Yam)।

प्रश्न 5.
सम्मिश्रित सूत (Novelty or Complex Yarm) किसे कहते हैं ?
उत्तर;
दो या अधिक सूतों को मिलाकर बनने वाले सूत को सम्मिश्रित सूत कहते हैं। इससे बनने वाले वस्त्र में भी इन सभी धागों के गुण पाए जाते हैं।

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प्रश्न 6.
वस्त्र निर्माण की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं ? उनके नाम बताएँ।
उत्तर:

  • करघे पर बुनाई (Weaving)।
  • सिलाई द्वारा बुनाई (Knitting)।
  • दबाकर वस्त्र बनाना (Felting)।

प्रश्न 7.
‘कताई’ (Spinning) की पहली अवस्था क्या होती है ?
उत्तर:
कताई की पहली अवस्था खोलना तथा सफाई करना है।

प्रश्न 8.
फेल्टिंग (Felting) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
फेल्टिंग से अभिप्राय, तन्तुओं के जुड़ने से है। यह एक प्रकार की कपड़े की बुनाई है, जिससे कम्बल, नमदा आदि बनाए जाते हैं।

प्रश्न 9.
‘ताना बाना’ (Wasp & Weft) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
कपड़े की बुनाई करघे पर की जाती है। लम्बाई की ओर जो धागा जाता है, उसे ‘ताना’ और चौड़ाई की ओर से जाने वाले धागे को ‘बाना’ कहते हैं। दोनों ओर से इन्हीं धागों को आपस में गूंथने की प्रक्रिया के द्वारा ही कपड़े का निर्माण होता है।

प्रश्न 10.
उस बुनाई का नाम बताएं जिससे सस्ता व चमकीला (Lumstrous) कपड़ा बनाया जा सके।
उत्तर:
साटिन बुनाई (Satin Weave)।

प्रश्न 11.
अन्तर बताएं:
(क) सिलाई द्वारा बुनाई (Knitting) व लेस बनाना (Lace making)।
(ख) बुनाई (Weaving) फेल्टिंग बनाना (Felting)।
उत्तर:
(क) सिलाई द्वारा बुनाई
1. लूप बनाना
(Looping)

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2. लेस बनाना
गाँठ लगाना (knotting)

(ख) बुनाई

  1. इन्टर लेसिंग (Interlacing)
  2. फेल्टिंग तन्तुओं का जोड़ना आर्द्र गर्मी द्वारा

प्रश्न 12.
तन्तु और सूत (Fibre and Yarm) में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
तन्तु सूत निर्माण की छोटी-से-छोटी इकाई है जबकि सूत में कई सारे तन्तु होते हैं। अनेक तन्तुओं को एक साथ ऐंठने से जो अविरल धागा बनता है, सूत कहलाता है।

प्रश्न 13.
एक व्यापारी धागे में ऐंठन देना भूल गया था। उसका सूत (Yarm) पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
धागे में ऐंठन न देने से कमजोर सूत (weak yarm) बनेगा । ऐंठन से सूत में मजबूती आती है।

प्रश्न 14.
कपड़ा बुनने की दो प्रक्रियाओं के नाम लिखें । इनका कपड़े के गुणों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
1. सिलाई द्वारा बुनना (Knitting)
2. बुनाई (Weaving)।

कपड़े के गुणों पर प्रभाव :
1. बुनाई (Weaving):
(क) मजबूत सूत
(ख) विभिन्न प्रकार के डिजाइन बनाए जा सकते हैं।

2. सिलाई द्वारा बुनना (Knitting):
(क) रिब प्रभाव (Rib Effect)
(ख) लचीलापन (Elasticity)
(ग) बनावट (Shape) जल्दी खराब हो जाती है।
(घ) कम मजबूत होता है (Less strong)।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रेशे से धागे का निर्माण (Construction of yarn from fibre) किस प्रकार होता. है ?
उत्तर:
रेशे से धागे का निर्माण-सभी रेशों की लम्बाई एक-दूसरे से भिन्न होती है, कुछ बहुत छोटे तथा कुछ लम्बे होते हैं। छोटे रेशों को स्टेपल कहते हैं। अधिकतर प्राकृतिक रेशे स्टेपल (Staple) ही होते हैं। कृत्रिम रेशों को काट-काट कर छोटा कर लिया जाता है। छोटे-छोटे रेशों से बने वस्त्रों के अलग ही प्रकार के गुण होते हैं। लम्बे रेशों को फिलामेंट (Filament) कहते हैं। इससे बने धागे अपेक्षाकृत चिकने होते हैं क्योंकि उनकी सतह पर कम संख्या में रेशों के सिरे रहते हैं।

चिकनी, सीधी तथा यथाक्रम सतह होने के कारण, ऐसे लम्बे फिलामेंट से निर्मित धागों में चमक आ जाती है। चिकनी सतह के कारण धूलकण इनमें सटने या फंसने नहीं पाते तथा वस्त्र जल्दी गंदा नहीं होता। लम्बे रेशों के कारण ये बहुत मजबूत होते हैं। कृत्रिम रेशों को आवश्यकतानुसार छोटा, लम्बा, सीधा, मोटा या पतला बनाया जाता है।

अतः रेशों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है –

  • स्टेपल फाइबर (Staple fibre)।
  • फिलामेंट फाइबर (Filament fibre)।

प्रश्न 2.
धागा निर्माण की कौन-कौन-सी अवस्थाएँ हैं ?
उत्तर:
धागा निर्माण की अवस्थाएँ-रेशों को अविरल धागों के रूप में बदलने के लिए अधिकतर प्राकृतिक धागों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है ताकि वे अविरल रूप में तैयार किए जा सकें।
स्टेपल रेशों से धागा (Yam) बनाने की मूलभूत प्रक्रियाएं निम्नलिखित हैं:

  • रेशों को स्वच्छ करना (Cleaning of fibres)
  • रेशों को थोड़ा-बहुत समान्तर करना (Making the fiblres more or less paralled)।
  • लम्बी पट्ट बनाना (पूनी) (Forming a long strand called sliver)।
  • तैयार धागे को बोबिन पर चढ़ाना (Winding the yarn on bobbin) ।
  • धागा बनाने के लिए पूनी पर बटाई देना (Twisting to form yarn)।

प्रश्न 3.
रासायनिक कताई की चार प्रक्रियाएँ क्या हैं ?
उत्तर:
रासायनिक कताई (Chemical Spinning): मानव-निर्मित तन्तु प्रकृति में लम्बे रिबन के आकार में होते हैं। उनको धागे में बदलने से पहले संसाधित करने की आवश्यकता होती है।

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रासायनिक कताई में मूल रूप से चार प्रक्रियाँ हैं:
(क) गीली कताई
(ख) शुष्क कताई
(ग) पिघली कताई
(घ) इमलशन कताई।

(क) गीली कताई (Wet Spinning): जब तन्तु निर्माण करने वाले घोल को स्पिनरेट में से निकालने के पश्चात् रासायनिक पदार्थ भरे टब में सख्त होने के लिए डाला जाए तो उसे गीली कताई कहते हैं। रेयान इस प्रकार से बनाई जाती है।

(ख) शुष्क कताई (Dry Spinning): जब तन्तु निर्माण करने वाले घोल को स्पिनरेट से निकालने के पश्चात् गर्म हवा द्वारा वाष्पीकरण करके सुखाया जाता है तो उसे शुष्क कताई कहते हैं। ऐसिटेट और एक्रेलिक तन्तु इस प्रकार बनाए जाते हैं।

(ग) पिघली कताई-जब तन्तु निर्माण करने वाले पदार्थ को पिघला कर स्पिनरेट में से निकाला जाता है तथा ठण्डा होने पर सख्त कर लिया जाता है तो उसे पिघली कताई कहते हैं। पॉलिएस्टर/टेरीलीन तन्तु इस क्रिया से बनाये जाते हैं।

(घ) इमलशन कताई (Melt Spinning): जटिल तरीका होने के कारण यह कताई सामान्यतः प्रयोग में नहीं लाई जाती है । तन्तु निर्माण वाले पदार्थ को किसी दूसरे रासायनिक द्रव्य में मिलाया जाता है तथा फिर स्पिनरेट से निकाला जाता है।

प्रश्न 4.
कताई व बुनाई में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कताई (Spinning): कताई वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत तन्तुओं को एक समूह में से खींचकर व ऐंठ कर मजबूत अविरल सूत प्राप्त किया जाता है।
बुनाई (Weaving): यह कपड़ा निर्माण की विधि है जिसमें कम से कम दो धागों ताने और बाने का प्रयोग करके हथकरघे या मशीन पर कपड़ा निर्मित किया जाता है।

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प्रश्न 5.
तन्तु व सूत में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1. तन्तु (Fibre): कपड़ा निर्माण की सबसे छोटी इकाई को तन्तु या रेशा कहते हैं। इससे तुरत कपड़ा निर्मित नहीं किया जा सकता जब तक कि इससे सूत या धागे का निर्माण नहीं किया जाता।
2. सूत (Yarn): सूत या धागा वह अखंड तार है जो अनेक तन्तुओं को एक साथ ऐंठने से बनता है। इससे कपड़े का निर्माण होता है। यह तन्तु से अधिक लम्बे, चौड़े और मजबूत होते हैं।

प्रश्न 6.
सम्मिश्रित वस्त्र (Novelty Clothes) क्यों उपयोगी हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सम्मिश्रित वस्त्र जैसे टेरीकॉट, टेरीवुल आदि इसलिए उपयोगी हैं क्योंकि

  • ये सस्ते होते हैं, अतः मितव्ययी हैं।
  • इनका रख-रखाव भी सरल है।
  • प्रेस करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  • इनमें कीड़ा नहीं लगता।

प्रश्न 7.
‘हन परीक्षण’ (Flame Tact) को स्पष्ट करें।
उत्तर:
दहन परीक्षण अर्थात् कपड़े के तन्तु को ज्वाला के समीप ले जाने पर प्रभाव देखना। इसके लिए कपड़े की लम्बाई से एक रेशा निकाला जाता है। ऐंठन खोल कर तन्तु अलग किया जाता है । तन्तु को चिमटी से पकड़कर उसके सिरों को ज्वाला के निकट ले जाया जाता है और फिर निम्न प्रभाव आंके जाते हैं

  • ज्वाला के समीप ले जाने पर तन्तु पर प्रभाव
  • ज्वाला में तन्तु पर प्रभाव
  • लौ का रंग
  • गंध
  • राख का प्रकार।

प्रश्न 8.
कपड़ा फाड़ परीक्षण (Tearing Test) का वर्णन करें।
उत्तर:
इसे विदीर्ण परीक्षण भी कहते हैं। किसी कपड़े के टुकड़े को फाड़ने में कितनी शक्ति लगती है, फटते समय कैसी ध्वनि उत्पन्न होती है एवं फटे हुए सिरों का स्वरूप कैसा होता है, इसके आधार पर रेशे की पहचान की जाती है।

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प्रश्न 9.
सूत निर्माण (Yarm construction) की दो विधियाँ बताएँ। प्रत्येक का एक उदाहरण दें। किसमें सूत ज्यादा मजबूत है और क्यों ?
उत्तर:
1. तकली अथवा चरखा द्वारा सूत बनाना, जैसे सूती (cotton) व ऊनी (wool) सूत।
2. स्पिनरेट्स द्वारा (through Spinerrattes)-नाइलोन (Nylon) व पोलीएस्टर (Polyester) । (Spinerrates) द्वारा बनाया गया सूत ज्यादा मजबूत होता है क्योंकि इसकी विधि अत्यधिक वैज्ञानिक है और पर्याप्त लम्बाई का सूत प्राप्त होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
धागों के विभिन्न प्रकार का वर्णन करें ? [B.M.2009A]
उत्तर:
धागा प्राकृतिक व मानवकृत तंतुओं से प्राप्त होता है। दोनों स्रोत से धागा बनाने की विधि अलग होती है । धागे का उपयोग वस्त्र के अतिरिक्त कई कार्यों के लिए किया जाता है
जैसे-सिलाई कढ़ाई करना । प्रत्येक कार्य के लिए धागे की प्रकार अलग होती है। कढ़ाई के लिए रेशमी चमकीले धागे का प्रयोग किया जाता है। सिलाई के लिए मजबूत धागा लिया जाता है।
कपड़े की बुनाई के लिए दो प्रकार के धागों का प्रयोग किया जाता है।
1. ताना
2. बाना।

1. ताना-इसका धागा मजबूत होता है।
2. बाना-बाने का धागा कम मजबूत होता है। धागे को तंतुओं के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है।
(a) साधारण धागे
(b) मिश्रित धागे
(c) जटिल धागे।

(a) साधारण धागा-यह एक ही आकार और प्रकार वाले तंतओं से बनता है इनका व्यास एक समान होता है। इन धागे की ऐंठन भी एक समान होती है। साधारण धागे को आवश्यकता अनुसार एकहरा, दोहरा, चौहरा या इनका केतल भी बनाया जा सकता है।

(b) मिश्रित धागा-यह एक से अधिक प्रकार के तंतुओं के रेशे को मिलाकर बनाया जाता है। उदाहरण-सूती धागे के साथ रेशमी धागा मिलाकर सिल्कों का निर्माण होता है। कॉटन में पालिएस्टर मिलाकर टेरिकॉट का निर्माण होता है।

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(c) जटिल धागा-इसका प्रयोग वस्त्रों में भिन्नता लाने के लिए किया जाता है। यह एक दो या तीन धागों के लिए किया जाता है। इस विधि में प्रयोग किये जाने वाले धागे निम्न प्रकार से हैं –

  • गाँठ वाला धागा
  • चक्रदार या कॉर्क स्कू धागा
  • स्लव धागा
  • फ्लैक धागा
  • फंदेदार एवं घुमाउदार धागा
  • बीज धागा
  • क्रेप धागा

प्रश्न 2.
कताई (Spinning) के विभिन्न प्रकारों को विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर:
कताई के प्रकार (Kinds of Spinning): यह दो प्रकार की होती है:
1. यांत्रिक कताई (Mechanical Spinning)
2. रासायनिक कताई (Chemical Spinning)

1. यान्त्रिक कताई-यान्त्रिक कताई अधिकतर प्राकृतिक तन्तुओं से की जाती है, जैसे-सूती, ऊनी व रेशमी तन्तुओं की कताई यान्त्रिक विधि से होती है। यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।

  • खोलना व सफाई करना
  • कार्डिंग व कैबिंग
  • पूनियाँ बनाना
  • खींचना व घुमाना

यान्त्रिक कताई के चरण (Steps of Mechanical Spinning):
1. कच्चे माल की सफाई (Opening and Cleaning of Raw Material): सर्वप्रथम प्राकृतिक तन्तुओं को खोलकर उनकी सफाई की जाती है क्योंकि प्राकृतिक तन्तुओं में अशुद्धि काफी होती है।
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2. धुनाई व कंघी करना (Carding and Combing): अब तन्तुओं को अच्छी तरह साफ किया जाता है और सुलझाया जाता है। छोटे-छोटे तन्तुओं को अलग कर दिया जाता है और लम्बे तन्तुओं को समान्तर बिछा दिया जाता है, इन्हें पूनियाँ बनाना कहते हैं।

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3. खींचना व ऐंठन देना: अब पूनियों को खींचा जाता है व साथ ही साथ हल्का-सा घुमाव दिया जाता है ताकि रेशे एक साथ रह सकें और अलग-अलग न हो जाएँ।
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4. कताई-सूत को अधिक मजबूत बनाने के लिए इससे तकली या चरखे या मशीनों पर चढ़ाकर ज्यादा घुमाव व ऐंठन दिया जाता है, जिससे यह सूत अपेक्षाकृत अधिक मजबूत और टिकाऊ हो जाता है। इस विधि द्वारा कपास व ऊन का सूत बनाया जाता है। रेशम का सूत काकून गोंद को हटाने के पश्चात् सीधा चरखे पर ही चढ़ाया जाता है।
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2. रासायनिक कताई (Chemical Spinning): मानव-कृत तन्तुओं का निर्माण रासायनिक तरल पदार्थों द्वारा किया जाता है। यह एक गाढ़े घोल के रूप में होता है। इसे एक विशेष रूप से बने कातने वाले यन्त्र से, जिसमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, तेजी से निकाला जाता है। जैसे ही यह तन्तु हवा को स्पर्श करते हैं तो ठोस बन जाते हैं और अपारदर्शी हो जाते हैं। इन्हें सूत के रूप में एकत्रित कर दिया जाता है। फिर इन सूतों को खींचा जाता है। यह लम्बा, लचीला और मजबूत बन जाता है।
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प्रश्न 3.
सूत कितने प्रकार के होते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
सूतों के प्रकार (Types of Yams): सूत का प्रयोग कहाँ करना है इस पर उसकी बनावट निर्धारित होती है। उसको कितनी ऐंठन देनी है ताकि इच्छित प्रकार का सूत प्राप्त किया जा सके । सूत में विभिन्न परिवर्तन करके उसकी विशेषताओं का निर्धारण किया जा सकता है। सूत को मुख्य रूप से हम दो भागों में बाँटते हैं
1. साधारण सूत (Simple Yam)
2. सम्मिश्रित सूत (Novelty Yam)

साधारण सूत-यह तीन प्रकार का होता है –
(क) इकहरा सूत (Simple Standard Yarn): इसे बनाने में एक प्रकार के तन्तु का इस्तेमाल किया जाता है। यह सभी भागों में समान होता है। ऐंठन भी एक-सी और एक ही दिशा में दी जाती है।
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(ख) दोहरा सूत (Two Ply or Cable Yarn): यह दो या अधिक सूतों को ऐंठन देकर बनाया जाता है।
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(ग) डोरिया सूत-बहुत से सूत मिलाकर रस्सी जैसी सूत बनाया जाता है।
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2. सम्मिश्रित सूत (Complex or Novelty Yarm): इस प्रकार का सूत बनाने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। यह विभिन्न प्रकार के दोहरे सूत व अलग-अलग रंगों के धागों को मिला कर ऐंठन देकर एक सूत बनाने से बनता है। इसमें ऐंठन में परिवर्तन करके नए प्रकार का सूत बनाया जा सकता है। इसमें अलग-अलग तरीके के तन्तु मिलाए जा सकते हैं। जैसे रेयान व रुई, रुई व ऊन, रुई व रेशम आदि।

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इससे धागे में नवीनता लायी जाती है। एक सूत आधार रहता है व दूसरा उस पर लपेटा जाता है। यह कई प्रकार से बनाए जाते हैं। जैसे-तौलिए के लिए, शनील के लिए, लेस के लिए आदि। इनमें ऐंठन देने की क्रिया में परिवर्तन लाते हैं। लपेटने वाले धागे को कहीं कसके लपेटा जाता है तो कहीं ढीला रखा जाता है।

कहीं अधिक लपेटा जाता है कहीं दूरी पर कम लपेटा जाता है। इस प्रकार की कई तरह की विभिन्न विशेषताओं वाले सूत व कपड़े का निर्माण हो सकता है। दो या अधिक सूतों को मिलाकर बनने वाले सूत को सम्मिश्रित सूत कहते हैं। इससे बनने वाले वस्त्र में इन सभी धागों के गुण पाए जाते हैं। आजकल ऐसे वस्त्रों का चलन खूब है, जैसे-टेरीकॉट, कॉट्सवुल, टेरीसिल्क आदि ।
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प्रश्न 4.
बुनाई कला (weaving) से आप क्या समझती हैं ? इसके विभिन्न चरण लिखिए।
उत्तर:
बुनाई कला (Weaving): कपड़े का निर्माण करने की एक प्राचीन एवं लोकप्रिय विधि बुनाई है। प्राचीन काल में जब करघों का आविष्कार नहीं हुआ था तब जमीन पर निश्चित दूरी पर दोनों ओर खूटियां गाड़कर उनमें ताने के धागे कसकर बांधे जाते थे और हाथ से बाने के धागों को गूंथा जाता था। आज के युग में बुनाई हथकरघों (Hand-Loom) अथवा मशीनी करघों (Power Loom) से की जाती है, जिसमें कपड़ा बुनने की मूल विधि एक ही है। इसमें कपड़े की लम्बाई के समान्तर व्यवस्थित धागे अर्थात् बाने (Weft) के धागे होते हैं। इन दो जोड़ी धागों, तानों एवं बानों के पारस्परिक गुंथाव (Interlacing) को बुनाई कहते हैं।

बुनाई के चरण (Steps in Weaving):
करघे द्वारा बुनाई के निम्नलिखित चरण हैं –
1. ताना तनना एवं शेडिंग (Shedding): सर्वप्रथम जितना लम्बा कपड़ा बनाना हो उतने लम्बे ताने के धागे करघे पर कसे जाते हैं और फिर उन्हें करघे के पीछे के बेलन पर लपेटा जाता है जिस पर कपड़ा बुनने के बाद भी लपेटा जाता है। ताने के धागों को हार्नेस में से निकाल कर कसा जाता है। हार्नेस धातु की बनी तार होती है जिसके बीच में छेद होता है और एक फ्रेम में लगी होती है, जिसे हैंडल कहते हैं।

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ताने के धागे इन्हीं हार्नेस के छेदों में से पिरो कर कसे जाते हैं। प्रत्येक करघे में सादी बुनाई के लिए कम से कम दो हार्नेस तो अवश्य होते हैं, परन्तु अन्य विभिन्न प्रकार की बुनाइयों के लिए 3 से लेकर 8 तक हार्नेस करघे में लगाए जा सकते हैं। हैंडलों एवं हार्नेसों के द्वारा ताने के कुछ निश्चित धागों को ऊपर या कुछ धागों के नीचे करने को शैडिंग कहते हैं। जब ताने के कुछ निश्चित धागे ऊपर और कुछ नीचे हो जाते हैं तो उनके बीच में एक सुरंग (शैड) जैसा मार्ग बन जाता है जिसमें से शटल पर लिपटा हुआ बाने का धागा एक ओर से दूसरी ओर अथवा दायीं से बायीं ओर ले जाया जाता है।

2. पिकिंग (Picking): बुनाई का दूसरा चरण पिकिंग है। यह क्रिया हार्नेस द्वारा ही होती है। इसमें दूसरा हार्नेस अन्य निश्चित धागों को ऊपर उठाता है तो पुनः एक सुरंग (शैड) जैसा मार्ग बनता है, जिसमें से अब शटल को बायीं ओर से पुनः दायी ओर ले जाते हैं। इस प्रकार बाने के धागे को दायीं से बायीं और बायीं से दायीं ओर ले जाकर गुथाई करने को पिकिंग कहते हैं।

3. बेटनिंग (Battening): बाने के धागों को ताने के धागों में पिरोने के बाद एक दांतेदार कंघी (रीड़) द्वारा अच्छी प्रकार ठोका जाता है। इसके अतिरिक्त करघे में एक छड़ जिसे बैटन कहते हैं बाने के धागे के समान्तर लगी होती है और यह बाने के नए धागों को ठोक पीटकर पहले धागे के अत्यन्त निकट लाती है, जिससे कपड़े में सघनता आए और बाने के धागे एक समान दूरी पर रहें।

4. कपड़ा लपेटना तथा धागे छोड़ना (Taking up and Letting Off): इस प्रक्रिया में जो कपड़ा बुना जाता है उसे सामने की छड़ पर लपेटा जाता है और पीछे के बेलन से ताने के धागे और कपड़ा बुनने के लिए छोड़े जाते हैं। इस प्रकार उपर्युक्त क्रियों को दोहरा कर कपड़े की बुनाई की जाती है।

प्रश्न 5.
विभिन्न प्रकार की बुनावटें कौन-कौन-सी हैं ? विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर:
विभिन्न प्रकार की बुनावटें (Different Weaves): कपड़ा कई प्रकार की बुनावटों से बुना जा सकता है। कुछ बुनावटें उत्तम धागे के लिए होती हैं जबकि दूसरी को मोटे व खुरदुरे धागे के लिए प्रयोग किया जाता है। भिन्न-भिन्न बुनावटों से जादुई प्रभाव पड़ते हैं। कुछ बुनावटों के नाम हैं-साधारण, धारीदार, बास्केट, ट्विल, साटिन, कार्डेराय, मखमलनुमा, पाइल इत्यादि। कुछ

महत्त्वपूर्ण बुनावटें निम्नलिखित हैं –
साधारण बुनाई (Plain weave): कपड़ा बनाने की सबसे सरल प्रकार की बुनाई साधारण बुनाई है। सूती कपड़ा आमतौर पर इस बुनाई से बनता है। बाने को एक-एक ताने को छोड़कर डाला जाता है। ऐसे कपड़े की उल्टी सतह नहीं होती। साधारण बुनाई सस्ती व सरल है। कपड़ा मजबूत होता है तथा समतल दिखाई देता है। यह बुनाई लट्ठा, मलमल, वायल के कपड़ों के लिए उपयुक्त है।
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विल बुनाई (Twill weave): यह भी एक मूलभूत बुनाई है। इससे कपड़े की सतह पर एक प्रकार की तिरछी धारी बनने लगती है। ये धारियाँ कपड़े की उल्टी सतह पर भी दिखाई देती हैं तथा ताने से 14° से 75° तक का कोण बना सकती हैं। ये धारियां दो दिशाओं में चल सकती हैं। चित्र में बायां भुजा ट्विल और दायां ट्विल दिखाया गया है।
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बाना दो तानों के ऊपर तथा एक के नीचे, नियमित रूप से चलता है तथा धारियाँ बनाता है। हैरिंगवोन डिजाइन बनाना एक भिन्नता है। यह धारियों की दिशा, कुल लम्बाई के बाद, बदलने से बन सकती है। यह नियमित रूप से V डिजाइन बनाता है। ट्विल बुनाई द्वारा फलालेन, डेनिम, ड्रिल, गेबरडीन, जीन आदि सूती कपड़े बनाये जाते हैं।

ताने-बाने की कर्ण व्यवस्था से कपड़े में मजबूती होती है, क्रीज जल्दी नष्ट नहीं होती। ट्विल बुनाई वाले कपड़े साधारण बुनाई के कपड़ों से महंगे होते हैं क्योंकि इनका उत्पादन मूल्य और कच्चा माल अधिक महंगा होता है। ऐसे कपड़े देखने में सुन्दर होते हैं तथा रख-रखाव साधारण बुनाई वाले कपड़ों के अनुकूल होता है।

साटिन बुनाई (Satin weave): इस बुनाई में बाने का धागा, ताने के एक धागे के ऊपर से और एक से अधिक धागों से नीचे से गुजरता है। ताने के साधारणत: 4 धागे ऊपर रहते हैं। यह 7 धागों तक भी हो सकता है। इस प्रकार का बना हुआ कपड़ा ‘साटिन’ कहा जाता है। अगर ताने के स्थान पर बाने का धागा ऊपर हो तो कपड़े को ‘स्टन’ कहा जाता है। साटिन बुनाई द्वारा बने कपड़ों में अधिक चमक होती है परन्तु यह कपड़ा अन्य बुनाई द्वारा बने कपड़ों की अपेक्षा कमजोर होता है।

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कई बार अधिक चमक लाने के लिए तन्तुओं में कम ऐंठन दी जाती है। इस प्रकार की बुनाई (Snag) में अधिक आ जाते हैं। साटिन का रख-रखाव सुविधाजनक नहीं है। साटिन के कपड़ों को अधिक चमक वाला करने के लिए ताने में ऊन, रेयान तथा रेशम का प्रयोग किया जाता है। सूती कपड़े भी साटिन बुनाई से बुने जाते हैं।
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बायीं ओर का चित्र दर्शाता है कि धागे में ऐंठन अच्छा साटिन बनाता है। दायीं ओर का चित्र दर्शाता है कि धागे में असमान ऐंठना टूटा ट्विल हुआ बनाता है।

बुना हुआ कपड़ा (Knitting Fabrics): बुनने की क्रिया में कपड़ा (वस्त्र) तैयार करने के लिए धागे के फंदे बनाए जाते हैं तथा फिर फंदों में डालकर कपड़ा बुना जाता है। बुने हुए कपड़े बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि ये वजन में हल्के तथा पहनने में आरामदायक होते हैं। इनमें ताने-बाने वाले कपड़ों की अपेक्षा कम सिलवटें पड़ती हैं तथा यह सुविधा से रखे अर्थात् संभाले जाते हैं। धागे इस प्रकार व्यवस्थित किये जाते हैं कि एक फंदों की पंक्ति ऊपर व नीचे की फंदों की पंक्ति के सहारे लटकी हो।
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फंदों के स्तम्भ को Wale कहा जाता है जबकि लगातार फंदों की पंक्ति को Course कहते हैं। Gauge शब्द का अर्थ है – एक इंच में फंदों की संख्या। इस गिनती से कपड़े की दृढ़ता पता लगाई जा सकती है।

बुनाई वाले कपड़े दो प्रकार के होते हैं –
Tubular और flat गोलाकार (Tubular) बुनाई के कपड़ों में फंदे गोलाई में डाले जाते हैं। यह जुराबों के लिए उपयुक्त होता है। समतल (Flat) बुनाई में फंदे सीधी पंक्ति में होते हैं। यह उन कपड़ों के लिए उपयुक्त है जिनसे शरीर की गति होनी होती है। जब बुनाई के कपड़े का धागा टूटता है तो फंदा पंक्ति-दर-पक्ति नीचे गिरने लगता है, इसे laddering effect कहते हैं। बुनाई के समय एक अन्य ताने का धागा डालकर इसे रोका जा सकता है।

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नमदे का कपड़ा (Felt fabrics): नमदे के कपड़े में बुने हुए कपड़े की तरह कोई ताना-बाना नहीं होता। वे ऊनी बुनाई से भी भिन्न होते हैं। इस प्रकार के कपड़े बुनने वाले कपड़ों की खोज से पहले प्रयोग होते थे। ये कपड़े ऊन, बालों व चर्म से बनते थे। आजकल ऊन व अन्य जानवरों से उपलब्ध तन्तुओं के मिश्रण से बनाये जाते हैं। कश्मीर के नमदों के ऊपर विभिन्न रंगों से सुन्दर डिजाइनों की कढ़ाई की जाती है। नमदे का कपड़ा नई या पुरानी ऊन के रेशों से बनाया जाता है।

इन तन्तुओं को यांत्रिक शक्ति से रासायनिक क्रिया, नमी और गर्मी से जुड़ाव किया जाता है तथा इसमें कोई चिपकने वाला पदार्थ का प्रयोग नहीं किया जाता। नमदे का कपड़ा फर्श को ढंकने के लिए कालीन बनाने में तथा विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के काम आता है। यह विद्युत का कुचालक होता है तथा आवाजरोधी है। यह किसी भी आकार में काटा जा सकता है। कोनों को किसी भी परिसज्जा की आवश्यकता नहीं होती। नमदे का पतला कपड़ा लचीला होता है, अत: जैकेट बनाने में प्रयोग होता है। खुरदरी फेल्ट से टोप बनाए जाते हैं। फैल्ट या नमदे के कपड़ों के गुण बढ़ाये जा सकते हैं अगर हम उन्हें प्रतिरोधक, पानीरोधक व आगरोधक बना दें।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 18 तन्तु विज्ञान

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 18 तन्तु विज्ञान Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 18 तन्तु विज्ञान

Bihar Board Class 11 Home Science तन्तु विज्ञान Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वस्त्र निर्माण की सबसे छोटी इकाई को कहते हैं –
(क) रेशा
(ख) धागा
(ग) कपड़ा (Cloth)
(घ) वस्त्र (Textile)
उत्तर:
(क) रेशा

प्रश्न 2.
तंतुओं की न्यूनतम लम्बाई 5 मि. मी. होने पर उससे निर्माण किया जा सकता है – [B.M.2009A]
(क) कपड़ा का
(ख) वस्त्र का
(ग) धागा का
(घ) तंतु का
उत्तर:
(ग) धागा का

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प्रश्न 3.
कंबल किस विधि से तैयार किया जाता है। [B.M.2009A]
(क) ब्रेडस तथा लेंस
(ख) निटिंग
(ग) फेल्टिंग
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) फेल्टिंग

प्रश्न 4.
तंतुओं से सभी प्रकार की गंदगी और अशुद्धियों को दूर करने की विधि को कहते – [B.M.2009A]
(क) ट्राईंग आऊट
(ख) कोंबिग
(ग) काडिग
(घ) रोविंग
उत्तर:
(ग) काडिग

प्रश्न 5.
दो सूती कपड़े किस विधि से तैयार किया जाता है ? [B.M. 2009A]
(क) ट्विल बुनाई
(ख) धारीदार बुनाई
(ग) साटीन बुनाई
(घ) बासकेट बुनाई
उत्तर:
(घ) बासकेट बुनाई

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तन्तु (Fibre) शब्द को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
“वस्त्र निर्माण की छोटी-से-छोटी इकाई को तन्तु या रेशा कहते हैं।”

प्रश्न 2.
तन्तुओं का वर्गीकरण (Classification of fibre) किस आधार पर किया जाता है ?
उत्तर:
तन्तुओं का वर्गीकरण उनकी लम्बाई या स्रोत के आधार पर किया जा सकता है।
1. लम्बाई के आधार पर तन्तुओं का वर्गीकरण:

  • प्राकृतिक तन्तु (Natural fibre)
  • मानवकृत तन्तु (Man-made fibre)
  • मिश्रित तन्तु (Blended fibre)

प्रश्न 3.
वानस्पतिक तन्तु (Vegetative fibre) का मुख्य तत्त्व कौन-सा होता है ?
उत्तर:
वानस्पतिक तन्तु का मुख्य तत्त्व सेलूलोज होता है।

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प्रश्न 4.
टेक्सटाइल (Textile) या वस्त्र विज्ञान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
टेक्सटाइल शब्द लैटिन भाषा का शब्द है जो टैक्सटिली शब्द से बना है। जिसका अर्थ रेशों से या तन्तुओं से निर्मित कपड़ा अर्थात् बुना कपड़ा है

प्रश्न 5.
रेशम (Silk) की प्राप्ति कहाँ से होती है ?
उत्तर:
रेशम एक विशेष प्रकार के कीड़े से प्राप्त होता है।

प्रश्न 6.
तन्तुओं की दृढ़ता (Rigidity) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
किसी भी तन्तु को तोड़ने के लिए जितनी शक्ति लगाने की आवश्यकता होती है, उतनी ही उस तन्त की दढता होती है।

प्रश्न 7.
तन्तुओं के लचीलेपन (Flexibility) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जब तन्तु बिना टूटे मुड़ जाता है तो इस क्षमता को तन्तुओं का लचीलापन कहा जाता है।

प्रश्न 8.
प्रत्यास्थता.(Elasticity) का क्या गुण होता है ?
उत्तर:
तन्तुओं को खींचने पर लम्बा हो जाना और छोड़ने पर वापस अपनी लम्बाई में आ जाना ही प्रत्यास्थता का गुण कहलाता है।

प्रश्न 9.
कृत्रिम तन्तु (Artificial fibre) ने क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
मानव निर्मित तन्तु जो रासायनिक विधि द्वारा बनाए जाते हैं, उन्हें कृत्रिम तन्तु कहते हैं।

प्रश्न 10.
पॉलिएस्टर (Polyester fibre) तन्तु को किस नाम से जाना जाता है ?

प्रश्न 11.
ऊन (Wool) कैसा तन्तु है ?
उत्तर:
ऊन एक प्राकृतिक, प्राणिज तन्तु है जो पशुओं के बाल से बनाये जाते हैं।

प्रश्न 12.
अन्दर पहनने वाले वस्त्रों के लिए कौन सा कपड़ा चयन करोगे?
उत्तर:
अन्दर पहनने के लिए सूती कपड़ों का चयन करेंगे यह नमी को जल्दी सोख लेता है ।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्रोत के आधार पर तन्तुओं का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
स्रोत के आधार पर तन्तुओं का वर्गीकरण :
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प्रश्न 3.
कपास के तन्तु की कोई भौतिक एवं रासायनिक चार-चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):

  • संरचना (Composition)।
  • बनावट (Microscopic Structure)।
  • लम्बाई (Length)।
  • नमी सोखने की क्षमता (Absorbency)।
  • ताप का प्रभाव (Effect of Heat)।

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रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):

  • अम्ल का प्रभाव (Effect of Acid)।
  • क्षार का प्रभाव (Effect of Alkali)।
  • रंगों का प्रभाव (Effect of Colours)।
  • जीवाणु का प्रभाव (Effect of Moth and Mildew)।

प्रश्न 4.
रेशम के तन्तु की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर:
रेशम के तन्तु की विशेषताएँ (Properties of Silk Fibre):
भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):

  • संरचना (Composition)।
  • बनावट (Microscopic Structure)
  • मजबूती (Strength)।
  • लोच (Elasticity)।
  • नमी सोखने की क्षमता (Absorbency)।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):

  • क्षार का प्रभाव (Effect of Alkali)।
  • रंगों का प्रभाव (Effect of Colours)।
  • अम्ल का प्रभाव (Effect of Acid)।
  • जीवाणुओं का प्रभाव (Effect of Moth and Mildew)।

प्रश्न 5.
ऊन के तन्तुओं से कितने प्रकार का ऊनी कपड़ा तैयार किया जाता है ?
उत्तर:
1. ऊनी कपड़े (Woollens): इन्हें बनाने के लिए छोटे तन्तुओं का प्रयोग किया जाता है जिनकी अधिक कंघी व कताई नहीं की जाती। ये वस्त्र खुरदरे व मोटे होते हैं।

2. वस्टेंड (Worsted): इन्हें बनाने के लिए लम्बे रेशों का प्रयोग किया जाता है। इन रेशों की कंघी तथा कताई अच्छी तरह की जाती है। इससे बने वस्त्र अधिक मजबूत तथा चिकनी सतह वाले होते हैं। पैंट, सूट आदि इन्हीं वस्त्रों से बनते हैं।

3. नमदा (Felted Fabrics): कुछ ऊनी वस्त्र फेल्ट विधि से तैयार किये जाते हैं। ये वस्त्र सीधे तन्तुओं से बनाये जाते हैं। तन्तुओं को उचित नमी, तापमान तथा दबाव से जोड़ दिया जाता है। ऐसे वस्त्र खुरदरे होते हैं, जिससे नमदा, पटू आदि बनते हैं। ऊनी वस्त्रों के उत्पादन के लिए सबसे पहले भेड़ों पर से बाल काटे जाते हैं। फिर इनकी छंटाई की जाती है। अगली प्रक्रिया में इन्हें क्षार के घोल में कई बार धोया जाता है जिससे तन्तु स्वच्छ व कोमल हो जाते हैं।

अब इन्हें सुखाया जाता है। धोने व सुखाने से तन्तु थोड़े कड़े हो जाते हैं इसलिए इन पर जैतून के तेल का छिड़काव किया जाता है। ऊनी वस्त्र बनाने के लिए रेशों को केवल सुलझाया जाता है, लेकिन वर्टेड वस्त्र बनाने के लिए रेशों की धुनाई (Carding) तथा कंघी (Combing) की जाती है, जिससे रेशे पूर्ण रूप से समानान्तर हो जाते हैं तथा छोटे रेशे अलग निकल जाते हैं। इन रेशों की पूनिया बनाकर कताई की जाती है। इस प्रकार ऊनी धागा वस्त्र बनाने के लिए तैयार हो जाता है।

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प्रश्न 6.
नायलोन (Nylon) की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर:
नायलोन की विशेषताएँ (Characteristics of Nylon):

  1. सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता से देखने पर ज्ञात होता है कि नायलोन के तन्तु गोलाकार, चमकदार, सीधे और चिकने होते हैं।
  2. नायलोन मानव निर्मित तन्तुओं में सबसे अधिक मजबूत होता है।
  3. नायलोन के रेशे लम्बे व मजबूत होते हैं।
  4. नायलोन के कपड़े पर पसीने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता हालांकि रंग नष्ट हो जाते हैं।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):
1. इस पर क्षार का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु प्रत्येक अम्ल का रेशों पर अत्यन्त बुरा प्रभाव पड़ता है। .
2. ब्लीज व धब्बे मिटाने वाले रसायनों का नायलोन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
जैविक विशेषताएँ (Biological Properties): नायलोन के तन्तुओं पर जीवाणुओं का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। अगर चीटियाँ या कॉकरोच कपड़े में फंस जाएँ तो वह इसे काट खाकर बाहर निकल जाएगा।

प्रश्न 7.
मिश्रित तन्तु के नाम लिखें:
(क) जो ठंडी जलवायु में पहने जाएँ।
(ख) जो आर्द्र जलवायु में पहने जाए। कारण भी लिखें।
उत्तर:
मिश्रित तन्तु –
(क) ठंडी जलवायु के लिए-टेरीवुल (Terrywool) क्योंकि यह ऊन की तरह ही गरम हैं
(ख) आर्द्र जलवायु के लिए-टेरीकॉट (Terrycot) क्योंकि यह टेरीलीन की अपेक्षा ज्यादा ठंडा व अवशोषक शक्ति वाला है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कपास की भौतिक विशेषताएँ समझाएँ ? [B.M.2009A]
उत्तर:
कपास की भौतिक विशेषताएँ निम्नलिखित है –
(a) दृढ़ता
(b) प्रत्यास्थता
(c) पुनरुत्थान
(d) अवशोषकता
(e) ताप का प्रभाव
(f) रगड़ का प्रभाव
(g) चमक
(h) स्वच्छता।

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(a) सूखे तंतु के अपेक्षा गीले होने पर बढ़ जाती है।
(b) कपास में यह गुण नहीं होता इसलिए इसमें आकार बड़ा नहीं होता है।
(c) यह गुणा नहीं होने के कारण सलवट पड़ती है।
(d) 15-20 गुण अधिक नमी सोखने की क्षमता होती है।
(e) ताप सहन करने की बहुत अधिक क्षमता रहती है।
(f) मजबूत होने के कारण जल्दी फटता नहीं है।
(g) चमक कम होती है परिसज्जा द्वारा दी जाती है।
(h) आसानी से साफ किया जाता है ।

प्रश्न 2.
रूई (Cotton) की भौतिक, रासायनिक व जैविक विशेषताएँ एवं देखभाल व प्रयोग विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
रूई (Cotton): यह प्राकृतिक तन्तु है जो 90% सेलूलोज व 10% खनिज लवण, मोम और प्रोटीन से बनते हैं। मोहनजोदड़ो युग के मिले फूलदानों पर भी रूई के तन्तु लगे मिले हैं। रूई के बीजों के ऊपर उगे बालों द्वारा रूई बनती है। यह नर्म तथा गद्देदार होती है। रूई को ‘पेड़ की ऊन’ कहा जाता है। भारत, मिस्र, ब्राजील, अफ्रीका, अमेरिका रूई उत्पादन के कुछ मुख्य देश हैं।

सारे विश्व की रूई की माँग का 40% केवल अमेरिका में उत्पादित होता है। उत्पादन व निर्यात में भारत का दूसरा स्थान आता है। रूई की उत्पादकता सस्ती है और इसका प्रयोग बहुत से क्षेत्रों में किया जाता है। जैसे-कपड़े, चादरें, तौलिये, बनियान, घर की सजावट के लिए कपड़े आदि रूई से ही बनते हैं। रूई के तन्तु मिट्टी, बीज, उगाने का तरीका व मौसम से प्रभावित होते हैं तथा उनकी लम्बाई, नमी और चमक

1. भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):

  • कपास के रेशे कई प्रकार के होते हैं। सामान्यतः रूई के रेशे 1 सेमी. से 5 सेमी. तक लम्बे होते हैं तथा इनके व्यास 16-20 माइक्रोन तक होता है। रूई का रेशा ऊपर से एक कोशीय प्रतीत होता है परन्तु सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखने पर ज्ञात होता है कि यह तन्तु कुछ चपटी घुमावदार नली के समान होता है जिसकी भीतरी सतह खुरदरी होती है। ऐंठन तन्तु को शक्ति देती है तथा लम्बे तन्तुओं में बुनने में सहायक होती है। इस ऐंठन को “कनवोल्यूशन्स” कहते हैं। इनमें चमक कम होती है।
  • कपास के रेशे रंग में भिन्न-भिन्न होते हैं अर्थात् सफेद से क्रीम तक।
  • कपास में सलवटें शीघ्र पड़ जाती हैं। कपास को संसाधित करके सलवट-रोधक बनाया जाता है।
  • रूई के तन्तुओं में नमी को सोखने का एक विशेष गुण होता है। यही कारण है कि सूती कपड़ा शरीर का पसीना आसानी से शीघ्र सोख लेता है। इसीलिए कपास गर्म प्रदेशों में अधिक लोकप्रिय होती है।
  • सूती कपड़े में सिकुड़न-प्रवृत्ति पायी जाती है। इसे सिकुड़नरोधी बनाया जाता है।
  • इनमें लचक बहुत कम होती है।
  • सूखे तन्तु की तुलना में गीले तन्तु 25% अधिक मजबूत होते हैं। अतः इनका विशेष ध्यान नहीं रखा जाता।

2. तापीय विशेषताएँ (Thermal Properties):
कपास के तन्तुओं पर ताप का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि इनमें ताप सहन करने की क्षमता होती है। यही कारण है कि सूती कपड़ों पर गर्म इस्त्री कर सकते हैं।

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3. रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :

  • कपास के तन्तुओं पर सामान्य रूप से क्षार का कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः क्षारयुक्त साबुन व डिटर्जेंट से सूती कपड़ा आसानी से धोया जा सकता है, परन्तु रंगीन सूती कपड़ों को अधिक क्षारयुक्त साबुन से धोने से उनके रंग खराब होने का भय बना रहता है।
  • नमक व गन्धक के तेजाब के सम्पर्क में सूती वस्त्र नष्ट हो जाते हैं।
  • भारी पानी से रंग के नष्ट होने की आशंका रहती है जबकि ताप का इस पर कोई प्रभाव नहीं होता।

4. जैविक विशेषताएँ (Biological Properties) :

  • सिल्वर फिश सैलूलोज पर जिन्दा रहती है तथा सूती कपड़े को नष्ट कर सकती है।
  • सूती वस्त्र सीलन वाली गर्म जगह पर कुछ समय तक रखें तो उसमें दुर्गन्ध आने लगती है और फफूंदी लग सकती है।

कपास की देखभाल व प्रयोग (Use and Care of Cotton): धुलाई करते समय सूती वस्त्रों को आसानी से रगड़ कर धोया जा सकता है। रंग नष्ट होने के लिए रंगीन कपड़ों को छाया में सुखाना चाहिए। गीले कपड़ों पर इस्त्री करने से सिलवटें दूर की जा सकती हैं। मांड लगाये कपड़े अच्छी परिसज्जा देते हैं।

सूती कपड़ों की मूल विशेषताएँ (Properties of Cotten Cloth):
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प्रश्न 3.
रेशम के तन्तु की खोज, भौतिक व रासायनिक विशेषताएँ तथा उपयोगिताएँ विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
रेशम का तन्तु एक कीड़े के लार से बनाया जाता है। इसकी खोज सबसे पहले चीन में हुई। एक दंतकथा के अनुसार एक चीनी राजकुमारी ने अचानक एक ककून गर्म चाय में डाल दिया। जब उसे निकाला गया तो बारीक. सन्दर. आकर्षक व लम्बा तन्त खिंचता निकल आया। इन तन्तुओं को एकत्र करके, इन्हें बुनकर सुन्दर कपड़ा तैयार किया। कई वर्षों तक रेशम के उत्पादन का रहस्य चीनियों ने अपने तक ही सीमित रखा।

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लगभग 3000 वर्ष बाद यह रहस्य चीन से बाहर आया और कई देशों, जैसे-जापान, भारत, इटली, स्पेन, फ्रांस तथा अन्य यूरोपीय देशों में रेशम का उत्पादन होने लगा। भारत में प्राचीन ग्रन्थों में रेशमी वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। आधुनिक युग में वैज्ञानिक विधि से रेशम बनाने का श्रेय जापान को जाता है। रेशम के उत्पादन के लिए रेशम के कीड़ों को शहतूत के पेड़ पर पाला जाता है। कीड़े की खुराक शहतूत के पत्ते ही हैं।

रेशम के कीड़े के जीवन की चार अवस्थाएँ हैं :

  • अण्डा
  • लारवा
  • प्यूपा
  • कीड़ा।

रेशम के कीड़े से जब लारवा बनता है तब यह अपनी खुराक बन्द कर देता है। इसके मुख के पास दो छिद्रों से लार बाहर आने लगती है। यह दोहरा धागा एक गोंद सेरीसिन (Sericin) से आपस में जुड़ता जाता है और कीड़े के शरीर के चारों ओर लिपटता जाता है। जब कीड़ा पूरी तरह इससे ढक जाता है, तब इसे ककून कहते हैं। रेशम के रेशे प्राप्त करने के लिए ककून पानी में गर्म किए जाते हैं। इस क्रिया में थोड़ा-सा गोंद ढीला पड़ जाता है और रेशे आसानी से खुल जाते हैं।

ककून से रेशों को खोल कर सीधा किया जाता है। इस प्रक्रिया को रीलिंग (Reeling) कहते हैं । रेशम का तन्तु बहुत ही महीन होता है इसलिए 8-10 रेशों को इकट्ठे सीधा किया जाता है। फिर इन्हें एक साथ मिलाकर ऐंठन देकर रेशम का तन्तु बनाया जाता है। रेशम के तन्तु पर से गोंद को हटाने के लिए इसे फिर गर्म पानी में डाला जाता है। इस क्रिया को गोंद हटाना (Degumming) कहते हैं। अब रेशम का तन्तु वस्त्र बनाने के लिए तैयार है।

रेशम के तन्तु की विशेषताएँ (Properties of Silk Fibre) :
भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):
1. संरचना (Composition): रेशम के तन्तु का मुख्य भाग प्रोटीन से बना है। इसमें 90% प्रोटीन फाइब्रोइन (Fibroin) पायी जाती है।

इसके अतिरिक्त गोंद सेरीसिन (Sericin): पाया जाता है। रेशे का 95% भाग प्रोटीन तथा सेरीसिन से बनता है। शेष 5% मोम, लवण, वसा आदि से बनता है।
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2. बनावट (Microscopic Structure): सूक्ष्मदर्शी से देखने पर रेशम का तन्तु दो रेशों से मिलकर बना दिखाई देता है। दोनों रेशे स्थान-स्थान पर गोंद से सटे दिखाई देते हैं। गोंद के कारण रेशा असमान सतह वाला दिखाई देता है, लेकिन गोंद हटा देने पर यह चिकना, चमकदार, सीधी रेखा के समान दिखाई देता है।

3. लम्बाई (Length): रेशम का तन्तु प्राकृतिक तन्तुओं में सबसे लम्बा है। इसकी लम्बाई 1200 फीट से 4000 फीट तक रहती है। इसी कारण इनसे चिकने व चमकदार वस्त्र बनते हैं।

4. रंग एवं चमक (Colour and Lustre): रेशम में प्राकृतिक चमक रहती है। गोंद हटा देने पर यह और भी चमकीला हो जाता है। रंग सफेद से क्रीम होता है।

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5. मजबूती (Strength): प्राकृतिक तन्तुओं में रेशम के तन्तु सबसे अधिक मजबूत होते हैं। गीली अवस्था में इनकी शक्ति कम हो जाती है परन्तु सूखने पर फिर से शक्ति प्राप्त कर लेते हैं।

6. लोच (Elasticity): प्राकृतिक तन्तुओं में प्रत्यास्थता (लोच) का गुण रेशम में दूसरे स्थान पर रहता है। खींचने पर यह बिना टूटे अपनी लम्बाई से अधिक खिंच सकता है और छोड़ने पर अपनी पूर्व अवस्था में आ जाता है।

7.ताप की संवाहकता (Heat Conductivity): रेशम के तन्तु ताप के बुरे संवाहक हैं। शरीर की गर्मी को बाहर नहीं निकलने देते इसलिए रेशमी वस्त्र सर्द ऋतु में पहनने के लिए उपयुक्त हैं।

8. प्रतिस्कंदता (Resiliency): रेशम के तन्तु में लचक की क्षमता भी होती है। इसमें सलवटें नहीं पड़ती।

9.सिकुड़न (Shrinkage): तन्तु सीधे तथा लम्बे होने के कारण सिकुड़ते नहीं। थोड़ी बहुत सिकुड़न गीली अवस्था में प्रेस करने पर दूर हो जाती है।

10. रगड़ का प्रभाव (Effect of Friction): रगड़ से रेशम की चिकनी सतह पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इसकी कोमल सतह खुरदरी हो जाती है। इसलिए सिल्क के वस्त्रों को सावधानी से हल्के दबाव से धोना चाहिए।

11. ताप का प्रभाव (Effect of Heat): रेशम के तन्तु अत्यन्त कोमल होते हैं। इसलिए अधिक ताप नहीं सह पाते । 300°F ताप पर यह नष्ट होने लगता है। सिल्क के वस्त्रों पर हल्की गर्म प्रेस ही करनी चाहिए।

12. नमी सोखने की क्षमता (Absorbency): रेशम के तन्तु नमी को जल्दी सोखते हैं परन्तु जल्दी नमी को छोड़ते नहीं । कुछ मात्रा में इसमें नमी रह जाती है जिसे बाहर से देखने पर जानना कठिन होता है।

13. सफाई एवं धुलाई (Cleanliness and Washability): चिकनी सतह होने के कारण सिल्क के वस्त्र जल्दी गन्दे नहीं होते । रगड़ से रेशे खराब हो जाते हैं। सिल्क के वस्त्रों को निचोड़ना नहीं चाहिए क्योंकि गीली अवस्था में ये कमजोर हो जाते हैं। हल्के से दबा कर पानी निकालना चाहिए।

14. प्रकाश का प्रभाव (Effect of Light): धूप एवं प्रकाश में तन्तु बहुत जल्दी खराब होने लगते हैं। रंग भी उड़ने लगता है। सिल्क का प्रयोग पर्दे बनाने के लिए उचित नहीं।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :
1. क्षार का प्रभाव (Effect of Alkali): क्षार का रेशम के तन्तुओं पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है इसलिए रेशमी वस्त्र धोने के लिए क्षारयुक्त साबुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऊन के साथ यदि इसकी तुलना की जाए तो रेशम का रेशा ऊन की अपेक्षा क्षार के प्रति अधिक सहनशील है।

2. अम्ल का प्रभाव (Effect of Acid): कार्बनिक अम्ल को कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता । अकार्बनिक अम्ल का तनु घोल भी रेशम के वस्त्रों पर इस्तेमाल किया जा सकता है, किन्तु सान्द्र अम्ल रेशम के तन्तु को क्षति पहुँचाते हैं। नाइट्रिक अम्ल से इसका रंग एवं चटक पीला पड़ जाता है।

3. रंगों का प्रभाव (Effect of Colours): रेशम पर रंग आसानी से चढ़ जाते हैं और पक्के होते हैं।

4. जीवाणुओं का प्रभाव (Effect of Moth and mildew): सिल्क पर फफूंदी नहीं लगती लेकिन लम्बे समय तक नमी वाले स्थान पर फफूंदी लगने का डर रहता है । कीड़े का प्रभाव होता है।

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रेशम के वस्त्रों की उपयोगिता (Importance of Silk Clothes) :

1. रेशम को अपनी कोमलता, चिकनेपन, आकर्षण, चमक, मजबूती तथा लटकनशीलता (Draping Quality) के कारण ‘वस्त्रों की रानी’ कहा जाता है। रेशम का प्रयोग राजसी घरानों में होता आया है। इसके उत्पादन में अत्यन्त सावधानी तथा कुशल हाथों की आवश्यकता होती है, इसलिए यह एक महँगा वस्त्र है। रेशमी वस्त्रों का प्रयोग विशेष अवसरों पर ही किया जाता है।

2. ताप का कुचालक होने के कारण रेशमी वस्त्र सर्दी में पहनने के लिए उत्तम है। अपनी महीनता के कारण इन्हें गर्मी में भी पहना जा सकता है। बारीक रेशमी वस्त्रों से शरीर की गर्मी तथा हवा निकलती रहती है।

3. रेशमी वस्त्रों पर रंग आसानी से चढ़ जाते हैं, इसलिए कई रंगों में मिलते हैं। इसे दोबारा भी दूसरे रंग से आसानी से रंगा जा सकता है।

4. रेशमी वस्त्रों पर सलवटें नहीं पड़ती इसलिए अधिक प्रेस की भी जरूरत नहीं होती। रेशमी वस्त्र रंगड़ तथा क्षार में खराब हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
ऊन (Wool) के प्राप्ति स्रोत, ऊनी कपड़ा तैयार करना, भौतिक. एवं रासायनिक विशेषताएँ तथा उपयोगिता पर निबन्ध लिखें।
उत्तर:
ऊन (Wool): ऊन एक प्राकृतिक प्राणिज वस्त्रोपयोगी तन्तु है। ऊन के तन्तु हमें विभिन्न पशुओं से मिलते हैं। प्राचीन काल में मनुष्य पशुओं को मार कर उनकी खाल को वस्त्र के रूप में प्रयोग करता था। सभ्यता एवं ज्ञान के विकास से मनुष्य ने यह जाना कि पशुओं को मारे बिना ही उनकी त्वचा पर उगने वाले बालों को काट कर ऊन तैयार की जा सकती है, जिससे ऊनी वस्त्र तैयार करके वह अपने आपको सर्दी से बचा सकता है।

ऊन प्राप्ति के स्रोत (Sources of Wool): ऊन के रेशे हमें विभिन्न पशुओं जैसे भेड़, बकरी, ऊँट, लामा, खरगोश आदि से प्राप्त होते हैं। सर्वाधिक ऊन भेड़ों से प्राप्त की जाती है। अतः ऊन सभी पशुओं से प्राप्त की जा सकती है जिनके शरीर पर लम्बे बाल उगते हैं। भिन्न-भिन्न पशुओं से प्राप्त होने वाली ऊन की विशेषताएँ एवं उपयोगिताएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। भेड़ों से सबसे अच्छी ऊन मोरनी जाति की भेड़ से प्राप्त होती है।

मोरनी जाति की भेड़ स्पेन में है परन्तु अब सभी देशों में इस जाति की भेड़ को पाला जाता है। भारत में कश्मीरी बकरी से उत्तम किस्म की पश्मीना ऊन प्राप्त होती है। अंगोरा जाति की बकरी एवं खरगोश से भी रेशम की भांति कोमल एवं चमकीली ऊन प्राप्त होती है । दक्षिणी अमेरिका के पहाड़ी जानवर लामा-अल्पाका एवं हिकुना जो बोझा ढोने का काम करते हैं, उनके बालों को उतार कर भी ऊन के रेशे प्राप्त किए जाते हैं।

लामा से प्राप्त ऊन हल्की होती है, अल्पाका से प्राप्त ऊन मध्यम श्रेणी की होती है तथा हिकुना से प्राप्त ऊन बहुत बढ़िया किस्म की होती है। एशिया के पठार एवं तिब्बत के प्रदेशों में यॉक नामक पशु, जो बोझ ढोने का काम करता है, से ऊन प्राप्त की जाती है। यह ऊन अत्यन्त नर्म होती है। ऊँट से भी ऊन प्राप्त की जाती है जो कोमल व सुन्दर होती है।

ऊन के रेशे दो प्रकार के होते हैं –

  • कटी ऊन (Fleece):यह रेशे जीवित जानवर की खाल से निकाले जाते हैं।
  • खींची हुई ऊन (Pulled Wool): यह रेशे मरे हुए जानवर की खाल से निकाले जाते हैं।

ऊन के रेशों से तीन प्रकार के कपड़े तैयार करते हैं :
1. ऊनी कपड़े Woollens): इन्हें बनाने के लिए तन्तुओं का प्रयोग करते हैं। यह वस्त्र मोटे व खुरदरे होते हैं।

2. वस्टेंड (Worsted Fabric): इन्हें बनाने के लिए लम्बे तन्तुओं का प्रयोग करते हैं जिनकी कंघी व कटाई भली प्रकार की जाती है। यह वस्त्र चिकने व मजबूत होते हैं, जैसे-पैंट, कोट। आदि।

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3. नमदा (Felted Fabric): यह वस्त्र सीधे तन्तुओं से बनाए जाते हैं जिन्हें उचित नमी, तापमान व दबाव से जोड़ा जाता है। इसे फेल्ट विधि कहते हैं। यह वस्त्र खुरदरे होते हैं, जैसे नमदा आदि। ऊनी कपड़ा तैयार करना-मशीनों द्वारा ऊनी कपड़ा तैयार करने के लिए भेड़ों को गर्मियों के शुरू होते ही अच्छी तरह नहलाया जाता है तथा कुछ सप्ताह पश्चात् ऊन उतार ली जाती है। इस ऊन को गांठों में बांधकर कारखानों में भेज दिया जाता है।

कारखानों में ऊनी कपड़ा बनाते समय निम्नलिखित प्रक्रियाएँ की जाती है –
1. तन्तुओं को छांटना और साफ करना (Sorting & Cleaning): कारखानों में सर्वप्रथम फन को तन्तुओं की लम्बाई, व्यास, कोमलता अथवा मजबूती आदि गुणों के आधार पर अलग-अलग कर लिया जाता है।

साधारण तन्तु जिनकी लम्बाई अधिक नहीं होती है उससे सस्ता ऊनी कपड़ा बनाया जाता }। उत्तम किस्म के लम्बे व मुलायम ऊनी तन्तुओं से बढ़िया किस्म का कपड़ा बनाया जाता है। था सबसे घटिया किस्म के तन्तुओं से मोटे कपड़े, कम्बल या कालीन बनाए जाते हैं। धूल साफ करने वाली मशीन, जिसे डस्टर कहते हैं, की सहायता से तन्तुओं पर लगी धूल को हटा दिया जाता है।

2. तन्तुओं की धुलाई एवं निघर्षण करना (Washing and Scouring): ऊन के तन्तुओं की धुलाई करने के लिए साबुन के गर्म घोल तथा मन्द क्षार का प्रयोग किया जाता है। जब ऊन के तन्तु अच्छी तरह साफ हो जाते हैं तब इन्हें निघर्षण-क्रिया द्वारा सुखा लिया जाता है। इस कार अब ऊनी तन्तु गन्दगी, पसीने आदि से मुक्त हो जाते हैं। कई बार ऊनी तन्तुओं को इसी समय रंग भी दिया जाता है।

3. ऊनी तन्तुओं को धुनना (Carding): ऊनी तन्तुओं को मशीनों की सहायता से धुनाई करके सुलझाया जाता है। धुनाई करने से ऊन के तन्तुओं की गन्दगी भी हट जाती है।

4. कार्बोनीकरण (Carbonizing): धुलाई व धुनाई करने के पश्चात् भी ऊन के तन्तुओं में कुछ न कुछ गन्दगी शेष रह जाती है जिसे दूर करने के लिए कार्बोनीकरण की प्रक्रिया में ऊन । तन्तुओं को सल्फ्यूरिक अम्ल के हल्के घोल में डुबोया जाता है जिससे तन्तुओं में उपस्थित नावश्यक वानस्पतिक पदार्थ जल जाते हैं। इसके पश्चात् तन्तुओं को आहिस्ता से निचोड़ कर ‘पेक्षित सल्फ्यूरिक अम्ल को निकाल कर नियन्त्रित ताप पर इन्हें सावधानीपूर्वक सुखा लिया

5. तन्तुओं पर तेल लगाना (Oiling): कार्बोनाइजिंग की प्रक्रिया के पश्चात् तन्तुओं को | पानी में धोकर सुखा लिया जाता है और उन पर जैतून का तेल अथवा ग्लिसरीन लगाई जाती है नपसे तन्तु कोमल तथा लचीले हो जाते हैं और धुनाई करते समय अधिक नहीं टूटते हैं।

6. कताई करना (Spinning): रूई के तन्तुओं की भाँति ऊनी तन्तुओं में से मशीनों द्वारा धागा खींचकर उसे ऐंठन दी जाती है। वर्सटेड कपड़े (Worsted Cloth) के लिए साधारण ऊनी कपड़े की अपेक्षा धागों को अधिक ऐंठन दी जाती है। यही कारण है कि वर्सटेड कपड़ा पतला, कड़ा व मजबूत हो जाता है तथा साधारण ऊनी कपड़ा जिसके धागे में कम ऐंठन होती है मोटा, नरम, गुदगुदा व रोएँदार होता है।

7. कंघी करना और खींचना (Combing and Drawing): तेल लगाने के पश्चात् तन्तुओं पर कंघा किया जाता है जिससे 10 सेमी. से अधिक लम्बे तन्तु एक-दूसरे समान्तर स्थिति में आ जाते हैं और छोटे-छोटे तन्तु अलग हो जाते हैं। कारखानों में विशेष मशीनों द्वारा कंघी की जाती है जिससे तन्तु खींचकर सीधे धागे का रूप धारण कर लेते हैं। इन सीधे धागों (तन्तुओं) को (Top) टॉप कहते हैं। बहुधा टॉप तन्तुओं को ही रंग लिया जाता है परन्तु कई बार वर्सटेड कपड़ा बनाने के लिए पहले धागा बनाया जाता है फिर उसे रंगा जाता है।

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8. रंगाई तथा विरंजन (Dying and Bleaching): ऊनी कपड़ों को अम्लीय रंगों से रंग कर आकर्षक बनाया जाता है। यदि कपड़ा रंगना न हो तो उसे ब्लीच किया जाता है जिससे उसके पीलेपन को दूर किया जा सके। ऊन के तन्तुओं की विशेषताएँ (Properties of Wool Fibres) :

भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties) :
1. रचना एवं स्वरूप (Construction): ऊन के तन्तु कैरोटिन नामक प्रोटीन से बने होते हैं। तन्तु के बाहर के आवरण स्केल अर्थात् परतदार (Epidermal) कोशिकाओं के बने होते हैं – जो एक-दूसरे पर चढ़ी रहती हैं। परतदार कोशिकाओं के एक-दूसरे पर चढ़े हुए किनारे ही ऊन के रोएँ होते हैं। उत्तम किस्म की ऊन में यह रोएँ अधिक होते हैं।
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2. लम्बाई (Length)-भिन्न-भिन्न जाति के पशुओं से प्राप्त ऊन के रेशों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है। यहाँ तक कि भिन्न-भिन्न जाति के भेड़ों से प्राप्त ऊन के रेशों की लम्बाई भी भिन्न-भिन्न होती है। ऊन के रेशे जितने लम्बे होते हैं, उतने ही उत्तम कोटि के माने जाते हैं। सामान्यत: ऊन के रेशे 5 सेमी. से लेकर 35 सेमी. तक लम्बे हो सकते हैं। इसी प्रकार ऊन के तन्तुओं का व्यास भी 15 माइक्रोन से 40 माइक्रोन तक हो सकता है।

3. तन्तु की दृढ़ता (Rigidity of Fibres)-ऊनी तन्तु अन्य प्राकृतिक तन्तुओं से अधिक निर्बल होते हैं। लम्बे तन्तुओं की अपेक्षा छोटे तन्तु कमजोर होते हैं। गीली अवस्था में ऊनी तन्तु अपनी 10 से 15 प्रतिशत शक्ति खो देते हैं परन्तु सूखने पर उनकी शक्ति पुनः वापस आ जाती है।

4. लचीलापन (Flexibility)-ऊन का दीर्धीकरण (Elongation) लगभग 20 से 50 प्रतिशत तक होता है परन्तु गीली अवस्था में यह और भी बढ़ जाता है। ऊन का यह लचीलापन उसकी प्राकृतिक ऐंठन के कारण होता है। तन्तुओं की निर्बलता के कारण धुलाई करते समय ऊनी कपड़ों को अधिक दबाव नहीं देना चाहिए। ऊन के रेशे जितने अधिक बारीक एवं मजबूत होते हैं उनमें उतनी ही अधिक लचक पायी जाती है। यही कारण है कि उत्तम कोटि के ऊनी कपड़े सिकुड़ते नहीं और न ही बदशक्ल होते हैं। इसी लचक के कारण ऊनी कपड़ों को वस्त्रों का रूप देने में सरलता रहती है तथा अधिक टिकाऊ भी होते हैं।

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5.अवशोषकता-ऊनी रेशों में नमी सोखने की क्षमता अन्य तन्तुओं की अपेक्षा अधिक होती है। यही कारण है कि ऊनी कपड़े गीले हो जाने पर देर से सूखते हैं और यह वातावरण की नमी को भी शीघ्र सोख लेते हैं।

6. पुनरुत्थान-ऊनी रेशों में पुनरुत्थान का गुण अधिक होता है। यही कारण है कि ऊनी रेशों से बने वस्त्रों को जैसे भी पहना जाए वह अपनी मौलिक अवस्था में आ जाते हैं और इन पर इस्तरी की अधिक आवश्यकता नहीं होती है।

7.प्रत्यास्थता-ऊनी तन्तुओं को जब खींचते हैं तो वह बिना टूटे अपनी पूर्व लम्बाई से लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं और छोड़ने पर पुनः अपनी मौलिक अवस्था में आ जाते हैं। सभी प्राकृतिक तन्तुओं में ऊन के तन्तुओं में सबसे अधिक प्रत्यास्था होने के कारण ये शरीर पर फिट आ जाते हैं।

8. अपघर्षण प्रतिरोधकता-ऊनी तन्तु रगड़ सहन नहीं कर सकते हैं तथा रगड़ने पर कमजोर पड़ जाते हैं। चूँकि गीले ऊनी कपड़े की शक्ति क्षीण हो जाती है, अतः धोते समय इन्हें रगड़ना नहीं चाहिए। यही कारण है कि महंगे उत्तम किस्म के ऊनी कपड़ों को शुष्क धुलाई (ड्राईक्लीन) से धोया जाता है क्योंकि पानी से इनका आकार बिगड़ने का भय रहता है।

9.ताप की संवाहकता-ऊनी रेशे ताप के अच्छे संवाहक नहीं होते हैं। ऊनी रेशों में रिक्त स्थान होते हैं जिनमें वायु रहती है जो शरीर के ताप को बाहर नहीं निकलने देती है। यही कारण है कि सर्दियों में ऊनी वस्त्र पहनने से हमारा शरीर गर्म रहता है।

10. ताप का प्रभाव-प्रत्यक्ष ताप का ऊनी रेशों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और रेशे की बाहरी परत नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि ऊनी वस्त्रों को इस्तरी करते समय ऊन के ऊपर पतला सूती कपड़ा रखना चाहिए।

11. स्वच्छता-ऊनी रेशों की सतह खुरदरी होने के कारण उन पर धूल के कण आसानी से फंस जाते हैं जिन्हें प्रतिदिन नर्म ब्रुश से झाड़ कर साफ करना चाहिए अन्यथा यह गन्दगी कपड़े की सतह पर जमकर उसे खराब कर देती है।

धोते समय ऊनी कपड़ों को पानी में देर तक भिंगो कर नहीं रखना चाहिए क्योंकि पानी में भिंगोने से उनकी शक्ति कम हो जाती है और तन्तु खुरदरे हो जाते हैं। धोने के पश्चात् ऊनी कपड़ों को लटका कर सुखाना नहीं चाहिए क्योंकि इससे आकार खराब हो जाता है। यही कारण है कि ऊनी कपड़ों को धोते समय अतिरिक्त सावधानी रखी जाती है।

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12. धूप का प्रभाव-ऊनी कपड़ों को अधिक समय तक धूप के सम्मुख रखने से उनका रंग उड़ने लगता है तथा उनकी रासायनिक रचना में परिवर्तन आ जाता है जिससे उन्हें पुनः रंगना भी कठिन हो जाता है।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :
1. अम्ल का प्रभाव (Effect of acids)-ऊनी कपड़ों पर सान्धित अम्ल विशेषकर सल्फ्यूरिक अम्ल का हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इस अम्ल से ऊनी कपड़ा पूर्णत: नष्ट हो जाता है। हल्के अम्ल के घोलों का ऊनी वस्त्रों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।

2.क्षार का प्रभाव (Effect of alkalies)-सभी प्रकार के क्षारीय घोलों का ऊनी तन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सोडियम हाइड्रॉक्साइड के केवल पाँच प्रतिशत घोल में ऊनी तन्तुओं को देर तक रखने से वह शीघ्र घुल जाते हैं। यदि क्षार का घोल गर्म हो तो और भी विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। केवल अमोनिया तथा बोरेक्स जैसे क्षार का ऊन के तन्तुओं पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः ऊनी कपड़ों को धोने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है।

3. कार्बनिक घोलों का प्रभाव-ऊनी तन्तुओं पर कार्बनिक घोलों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। केवल हल्के ब्लीज जैसे हाइड्रोजनपरॉक्साइड का ही प्रयोग ऊनी तन्तुओं पर सुरक्षित रूप से किया जा सकता है।

4.जीवाणुओं का प्रभाव-साधारणतः ऊनी कपड़ों पर फफूंदी का प्रभाव नहीं पड़ता है परन्तु अधिक समय तक ऊनी कपड़े को नमी वाले स्थान पर रखा जाए तो उसमें फफूंदी लग जाती है।

5.कीड़ा लगना-ऊनी कपड़ों पर कीड़ा लगने का भय अधिक होता है। कीड़े ऊनी कपड़े को खाकर नष्ट कर देते हैं। ऊनी कपड़े में नमी होने पर कीड़ा शीघ्र लगता है। ऊनी कपड़ों को कीड़ों से बचाने के लिए समय-समय पर धूप लगाते रहना चाहिए तथा गर्मियों में इन्हें अखबार के कागज में लपेटकर रखना चाहिए। इनके अतिरिक्त नैपथलीन की गोलियों, सूखी नीम की पत्तियों आदि से भी ऊनी कपड़ों की रक्षा की जा सकती है।

6. समय का प्रभाव-यदि ऊनी वस्त्रों को गन्दा ही रख दिया जाए तो यह कमजोर पड़ जाते हैं और इनमें कीड़े भी लग जाते हैं, परन्तु ऊनी वस्त्रों को साफ करके उचित उपायों का पालन करके काफी समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

ऊनी वस्त्रों की उपयोगिता (Importance of Woollen cloth) :

  • ऊनी वस्त्र ताप के कुचालक होने के कारण सर्दियों में पहने जाते हैं। वर्टेड कपड़ा कोट, पैंट, आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है। ऊन से कम्बल, स्वेटर, जुराबें, टोपी आदि बनाई जाती हैं। ऊनी तन्तु को फैल्ट करके नमदा आदि बनाए जाते हैं।
  • ऊनी कपड़ों में सिलवटें नहीं पड़ती हैं।
  • ऊनी कपड़ा लचीला होने के कारण शरीर के आकार पर फिट हो जाता है।
  • ऊन के साथ टेरीलीन अथवा कॉटन मिलाकर मजबूत टेरीवूल (Terrywool) व काट्सवूल (Cotswool) बनाया जाता है।

प्रश्न 5.
मिश्रित तन्तु (Blended Fibres) किसे कहते हैं ? उनकी उपयोगिता दर्शाइए।
उत्तर:
मिश्रित तन्तु (Blended Fibres): हम जानते हैं कि विभिन्न प्रकार के तन्तुओं के गुण व दोष भी भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। ऐसा कोई भी तन्तु नहीं है जिससे बने धागे या कपड़े में सभी वांछित गुण विद्यमान हों। प्रत्येक व्यक्ति कपड़े में सभी गुणों जैसे सुन्दरता, टिकाऊपन, सिलवट मुक्त, धुलाई व रंगाई में आसानी तथा फफूंदी, कीड़ा आदि न लगने का समावेश चाहता है। इन सभी विशेष वाछित विशेषताओं का किसी एक तन्तु में पाया जाना असम्भव है तथा सभी तन्तुओं में कोई न कोई दोष भी होता है।

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वस्त्रोद्योग के विशेषज्ञ वर्षों से मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं के लिए वांछित गुणों वाले तथा दोषों से मुक्त कपड़े के उत्पादन के लिए प्रयास करते रहे हैं। इन प्रयासों के फलस्वरूप अब मिश्रित (Blended) धागे बनने लगे हैं। जब एक से अधिक प्रकार के तन्तुओं को मिला कर धागा तैयार करते हैं तो उन्हें मिश्रित धागा कहते हैं। प्रायः ऐसे दो तन्तुओं को मिश्रित किया जाता है जिनके द्वारा बनाए गए कपड़े में इन दोनों के मिश्रित गुणों का समावेश चाहते हैं।

अलग-अलग तन्तुओं के आकार-प्रकार एवं लम्बाई में भिन्नता होने के कारण मिश्रित तन्तुओं से बने धागों में समानता का अभाव होता है। यह कहीं से अधिक पतले तो कहीं से अधिक मोटे होते हैं, परन्तु विज्ञान की उन्नति से इस समस्या का समाधान भी हो गया है। आज बाजार में अनेक प्रकार के मिश्रित तन्तुओं से बने कपड़े मिलते हैं।

1. दो प्राकृतिक तन्तुओं के मिश्रण से मिश्रित तन्तु: कपास के तन्तु एवं ऊन के तन्तु को मिलाकर बने तन्तु जैसे काट्सवुल (Cotswool), रेशम के तन्तु एवं सूती तन्तु को मिला कर बने तन्तु-सिल्को (Silkco)।

2. एक प्राकृतिक तन्तु एवं एक कृत्रिम तन्तु के मिश्रण से बने मिश्रित तन्तु:

  • पॉलीएस्टर तन्तु टेरीलीन एवं सूत के तन्तुओं को मिलाकर बने टेरीकॉट (Terry Cot)
  • पॉलीएस्टर तन्तु टेरीलीन एवं रेशम के तन्तुओं को मिलाकर बने टेरीसिल्क (Terry Silk)
  • पॉलीएस्टर तन्तु टेरीलीन एवं ऊन के तन्तुओं को मिलाकर बने टेरीवुल (Terry Wool)

मिश्रित तन्तुओं से बने कपड़े आजकल बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि इनमें दोनों तन्तुओं के अच्छे गुणों का समावेश होता है जिससे कपड़ा अधिक सुविधाजनक एवं आकर्षक हो जाता है।

टेरीकॉट की बनी कमीजें शुद्ध टेरीलीन अथवा सूत की बनी कमीजों से अधिक टिकाऊ, आकर्षक एवं सुविधाजनक होती हैं क्योंकि इनमें टेरीलीन व सूत दोनों के अच्छे गुणों का समावेश होता है। शुद्ध ऊनी वस्त्रों को धोने में जहाँ बहुत अधिक सावधानी रखनी पड़ती है वहाँ टेरीवुल को आसानी से धोकर साफ किया जा सकता है।

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इसी प्रकार शुद्ध ऊनी कपड़े अधिक मजबूत नहीं होते हैं परन्तु जब उनमें टेरीलीन के तन्तु मिलाते हैं तो वह अधिक मजबूत हो जाते हैं। टेरीसिल्क से बने कपड़े सिल्क की चमक लिये हुए आकर्षक तो होते ही हैं, परन्तु सिल्क से कहीं अधिक मजबूत एवं टिकाऊ भी होते हैं। मिश्रित कपड़ा बनाने के लिए धागा तैयार करते समय दोनों प्रकार के तन्तुओं को एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है और इन रेशों के अनुपात के अनुसार ही तैयार वस्त्र के गुण निर्धारित होते हैं।

प्रश्न 6.
मानव निर्मित (Man-made fibres), नायलोन (Nylon) व टेरीलीन-पॉलिएस्टर रेशा (Terrylene-the Polyster fibre) की भौतिक, रासायनिक, तापीय, जैविक विशेषताएँ तथा प्रयोग व सावधानी विस्तार से लिखें।
उत्तर:
मानव निर्मित तन्तु (Man-made fibres):
नायलोन (Nylon)-यह सबसे पहला मानव-निर्मित रेशा है। डू-पोंट कम्पनी ने इसे 1927-29 ई. में खोज निकाला। यह एक पोलिअमाइड रेशा है। बुनी हौजरी के रूप में यह 1930 ई. से बाजार में बिकती है। सारे विश्व में नायलोन की हौजरी व जुराबें बहुत प्रसिद्ध हैं। पहले नायलोन को 6,6 कहा जाता था। नम्बरों का अर्थ था कि नायलोन बनाने के लिए दो रसायनों का प्रयोग किया गया है जिसमें प्रत्येक 6 कार्बनिक परमाणु हैं। नायलोन 6, 10 नायलोन ब्रश बनाने के काम आता है। भारत में केवल 6, 6 नायलोन का उत्पादन तथा प्रयोग होता है।

नायलोन बनाने के लिए प्रयोग में लाए गए दो यौगिकों के नाम हैं एडीपिक अम्ल और हेक्सामेथीलीन डायमीन। प्रेशर के साथ गर्म करने से इनमें पाए जाने वाले छोटे-छोटे कण परस्पर मिलकर लम्बे-लम्बे कतरों में बदल जाते हैं। इन कतरों को पिघलाकर पम्प के दबाव से स्पिन्नरैट के छिद्रों में से निकालते हैं तो महीन लम्बे रेशे बनते हैं जो हवा के सम्पर्क में आते ही सूख जाते हैं। पोलिमर छोटे-छोटे अणुओं को मिलाकर बनाया गया अणु होता है तथा इस प्रक्रिया को Polymerization कहते हैं।

भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties) :
1. सूक्ष्मदर्शी यन्त्र की सहायता से देखने पर ज्ञात होता है कि नायलोन के तन्तु गोलाकार, चमकदार, सीधे और चिकने होते हैं। इन तंतुओं में प्राकृतिक पारदर्शकता होती है। इनकी सहायता से पूर्ण पारदर्शक वस्त्र बनाए जा सकते हैं। नायलोन की राल में सफेद रंग लगाकर अपारदर्शी नायलोन तैयार करने का ही अधिक प्रचलन है।

2. नायलोन मानव-निर्मित तंतुओं में सबसे अधिक मजबूत होता है।

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3. गीले होने पर भी नायलोन के रेशे अपनी मजबूती व प्रत्यास्थता बनाए रखते हैं। अतः इन्हें धोने के समय विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं होती । पानी शीघ्र फैल जाता है तथा वाष्पीकरण में सहायक होता है।
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4. नायलोन के रेशे लम्बे व मजबूत होते हैं। उनमें दूसरे प्रकार के रेशों को काटने की शक्ति होती है। यह फन्दा डालने की कोशिश करते हैं परंतु कमजोर रेशों की तरह टूटते नहीं बल्कि तन जाते हैं। इसी कारण कुछ समय के बाद कपड़ों में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं।

5. नायलोन के कपड़ों पर पसीने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, हालाँकि रंग नष्ट हो जाते हैं।

तापीय विशेषताएँ (Thermal Properties) :
1. नायलोन आग की लपट में पिघल जाती है तथा लाल रंग की लेसदार राख बन जाती है जो ठंडे होने पर सख्त हो जाती है।
2. नायलोन को ऊष्मता के विरुद्ध बनाया जाता है। इसलिए हर प्रकार के नायलोन 140°C तक का तापमान काफी समय तक बिना किसी हानि के सह लेते हैं। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि इन्हें इस तापमान से अधिक तापमान पर न रखा जाए।
3. सूर्य की किरणें नायलोन को नष्ट कर देती हैं। अधिक देर तक सूर्य की किरणों में रखने से यह कमजोर हो जाते हैं तथा टूटने का खतरा बढ़ जाता है।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):
1. इस पर क्षार का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु प्रत्येक अम्ल का रेशों पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ता है।
2. ब्लीच व धब्बे मिटाने वाले रसायनों का नायलोन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता।

जैविक विशेषताएँ (Biological Properties) :
1. नायलोन के तंतुओं पर जीवाणुओं का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
2. अगर चीटियाँ या कॉकरोच कपड़े में फंस जाए तो वे इसे काटकर बाहर निकल जाएँगे।

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नायलोन का प्रयोग और सावधानी (Use and Care of Nylon): नायलोन को धोना व इसका रख-रखाव आसान है। यह ठंडे या गर्म पानी से धोया जा सकता है और तुरत ही सूख जाता है। ठंडे पानी में धोने से सिलवटें नहीं पड़ती। अगर दूसरे कपड़ों के साथ इसे धोया जाए तो नायलोन का यह स्वभाव होता है कि वह उनका रंग और मैल स्वयं ले ले। इस प्रकार कपड़े में मटमैलापन या पीलापन आ जाता है जो कठिनाई से दूर होता है, अत: तुरत धब्बे मिटाना आवश्यक है। यह वेशभूषा, पर्दो और रात के परिधान के लिए प्रयोग में लाया जाता है। दूसरे देशों के साथ मिलाकर इसका बहुमुखी प्रयोग किया जा सकता है।

टेरीलीन-पॉलिएस्टर रेशा (Terrylene-The Polyester Fibre): डू-पोंट की अनुसंधान संस्था में सबसे पहले इसकी खोज हुई। नायलोन की खोज का श्रेय डू-पोंट को जाता है। पॉलिएस्टर को ब्रिटेन स्थिति कैलिको प्रिंटर्स एसोसिएशन ने परिचित करवाया जिसकी सार्वजनिक सूचना 1946 में ही दी गई चूँकि उस समय द्वितीय महायुद्ध चल रहा था, डू-पोंट ने इसे. डेकरॉन नाम दिया जबकि इम्पीरिल केमिकल इण्डस्ट्रीज ICI ने इंगलैंड व यूरोप में इसे टेरीलीन कहा। पॉलिएस्टर का रख-रखाव आसान है और यह क्रीजरोधक है। अमेरिका में इसके कपड़े सबसे अधिक प्रयोग में लाये जाते हैं।

पॉलिएस्टर के अणु पॉलीमर हैं जो विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बनाए जाते हैं। इसके भार का लगभग 85% कार्बोक्सिलिक अम्ल होता है। तेज ताप पर प्रतिक्रिया कराकर पॉलीमर बनाए जाते हैं जिससे यन्त्रों द्वारा रिबन जैसी लम्बी-लम्बी पट्टियाँ बनाई जाती हैं। फिर इन पट्टियों के टुकड़े काटे जाते हैं जिन्हें पिघलाकर तथा स्पिन्नरैटों से निकाल कर तंतुओं का निर्माण किया जाता है। इन तंतुओं का भी अन्य तंतुओं की भाँति धागा बनाया जाता है जिससे अनेक प्रकार के सुंदर कपड़े बनाए जाते हैं।

(Physical Properties):

  • सूक्ष्मदर्शी यन्त्र की सहायता से देखने पर यह ज्ञात होता है कि इसके तन्तु नायलोन के तंतुओं के समान ही होते हैं। ये तन्तु चिकने, सीधे और चमकदार होते हैं।
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  • विभिन्न पॉलिएस्टर की अलग-अलग दृढ़ता होती है। कई रेशों की मजबूती नायलोन से भी अधिक होती है व अन्यों की रेयान की तरह कम । सूखी एवं गीली दोनों अवस्थाओं में मजबूती में कोई अंतर नहीं होता।
  • यह स्पर्श पर गर्म होता है।
  • यह ऐसा वस्त्र होता है जो पहनने पर न तो सिकुड़ता है न ही फैलता है। इसलिए ग्राहकों को यह शीघ्र ही पसंद आ जाता है।
  • पॉलिएस्टर के कपड़े की सूती कपड़ों से दो-चार गुना अधिक अपघर्षण प्रतिरोधकता होती है।
  • इन कपड़ों में स्थिर-विद्युत पैदा होती है।
  • इनकी अवशोषकता कम होती है। धब्बे सतह पर ही रहते हैं तथा शीघ्र ही धुल जाते हैं।
  • टेरीलीन में विकिंग प्रभाव होता है। विकिंग (wicking) का अर्थ है कि रेशा पहनने वाले के शरीर से नमी ले लेता है जो वाष्पीकरण के बाद त्वचा पर ठंडक का अहसास कराता है।

तापीय विशेषताएँ (Thermal Properties):

  • पॉलिएस्टर बंधक वाला काला धुआँ छोड़ते हुए जलता है।
  • इसे थोड़ी हल्की इस्त्री चाहिए ।
  • एक बार बैठने के बाद क्रीज व प्लेट अधिक देर तक टिक सकती है।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :

  • पॉलिएस्टर के तंतुओं पर हल्के क्षार का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
  • पॉलिएस्टर के तंतुओं पर अम्ल के हल्के घोल का कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन तीव्र धातु अम्ल व उच्च तापमान के फलस्वरूप इसके तन्तु नष्ट हो जाते हैं।
  • इन पर कार्बनिक घोलों, ब्लीच और धब्बे छुड़ाने वाले यौगिकों का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।
  • पॉलिएस्टर के कपड़ों को अधिक समय तक धूप में रखने से वे कमजोर हो जाते हैं। शीशे के पीछे से यह अच्छी प्रतिरोधकता रखता है, इसलिए पर्यों के लिए अच्छा कपड़ा है।

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जैविक विशेषताएँ (Biological Properties):सामान्यतः शुद्ध पॉलिएस्टर के तंतुओं पर जीवाणुओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इन पर कीड़ों का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

पॉलिएस्टर का प्रयोग और सावधानी (Use and Care of Polyester): इन वस्त्रों पर सिलवटें नहीं पड़ती जिससे इन पर इस्त्री करने की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए लोगों को यह बहुत पसन्द आते हैं। अम्ल, क्षार और कार्बनिक यौगिकों का भी कोई प्रभाव नहीं होता। अधिक मैले कपड़े को साफ करने के लिए विशेष परिश्रम भी नहीं करना पड़ता। धोने के बाद यह वस्त्र शीघ्र ही सूख जाता है।

पॉलिएस्टर का प्रयोग पर्दे, फर्नीचर तथा फर्श की सजावट के लिए किया जाता है। औद्योगिक वस्तुएँ, जैसे-रस्सियाँ, मछली पकड़ने का जाल, टायर, मशीनों के पट्टे आदि अपनी मजबूती भी पॉलिएस्टर से ही पाते हैं। बिना किसी हानि के पॉलिएस्टर की नाड़ियाँ बनाकर हृदय सर्जरी के काम में लाया जाता है। आधुनिक युग में बिना बुना हुआ पॉलिएस्टर टेरीलीन का छतों व चटाइयों में भी प्रयोग हो रहा है।
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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 16 समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 16 समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
द्वितीयक रंग (Secondry colour) होता है। [B.M.2009A]
(क) लाल-नीला-पीला
(ख) बैंगनी-हरा-केसरी
(ग) काला-सफेद-हरा
(घ) पीला केसरी-नीला-लाल केसरी
उत्तर:
(ख) बैंगनी-हरा-केसरी

प्रश्न 2.
कार्बन हमारे शरीर को – [B.M.2009A]
(क) टूट-फूट का निर्माण करता है
(ख) शक्ति प्रदान करता है
(ग) ऊर्जा प्रदान करता है।
(घ) उष्मा प्रदान करता है
उत्तर:
(ग) ऊर्जा प्रदान करता है।

प्रश्न 3.
ऊर्जा को पोषण विज्ञान में कैसे मापा जाता है ? [B.M.2009A]
(क) तराजू बाट में
(ख) धन में
(ग) कैलोरीज में
(घ) आय में
उत्तर:
(ग) कैलोरीज में

प्रश्न 4.
अवकाश काल में की जाने वाली क्रियाओं को भागों में बाँटा जा सकता है [B.M.2009A ]
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ख) तीन

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प्रश्न 5.
थकान प्रकार की होती है – [B.M.2009A]
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समय क्या है ?
उत्तर:
समय (Time) में भूत, वर्तमान व भविष्य सम्मिलित हैं। अपनी सुविधा के लिए मनुष्य ने उसे वर्ष, दिन, मिनट व क्षणों में विभाजित कर दिया है। समय को कई विधियों से मापा जाता है। पृथ्वी के अपनी धुरी पर परिक्रमा करने से, दोलक (Pendulum) के हिलने से मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए समय को वर्ष, महीने, सप्ताह व दिनों में विभाजित करके कैलेण्डर (Calendar) बना लिया है। समय के सही माप के लिए हाथ घड़ी का आविष्कार किया गया ।

प्रश्न 2.
समय व्यवस्था का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
समय व्यवस्था (Time management): कम-से-कम समय खर्च करके अधिक-से-अधिक कार्य सम्पन्न करना।

प्रश्न 3.
समय योजना को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
समय योजना (Time Plan): समय योजना एक अग्रिम योजना के रूप में परिभाषित की जाती है जिसमें दिए हुए समय में काम करने का कार्यक्रम बनाया जाता है।

प्रश्न 4.
समय व्यवस्था की प्रक्रिया के विभिन्न चरण कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
समय व्यवस्था (Step in time management) :

  • योजना बनाना (Planning)
  • क्रियान्वयन एवं नियन्त्रण (Implementation and controls)
  • मूल्यांकन (Evaluation)।

प्रश्न 5.
शक्ति क्या है?
उत्तर:
शक्ति (Energy) – गुडइयर, कलोर, ग्रैसवक़डल के अनुसार “शक्ति एक निहित या आन्तरिक शक्ति है तथा कार्य करने की क्षमता है।”

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प्रश्न 6.
अवकाश काल (Leisure Time) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
अपनी इच्छानुसार अपना मनपसंद कार्य करने में या विश्राम करने में बिताया गया समय अवकाश काल कहलाता है।

प्रश्न 7.
शक्ति की व्यवस्था से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
शक्ति की व्यवस्था (Energy Management): कम-से-कम शक्ति खर्च करके, बिना थकान महसूस किए, अधिक-से-अधिक कार्य सम्पन्न करना।

प्रश्न 8.
शक्ति की व्यवस्था करते समय किन-किन घटकों का अध्ययन रखना चाहिए?
उत्तर:

  • विभिन्न कार्यों के लिए अपेक्षित शक्ति।
  • थकान (Fatigue)।
  • कार्य सरलीकरण (Work simplification)।

प्रश्न 9.
थकान (Fatigue) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यदि कार्य करते समय कार्य क्षमता में कमी आ जाए या पहले की तरह कार्य करने का उत्साह न रहे तो इस अवस्था को थकान कहते हैं।

प्रश्न 10.
थकान (Fatigue) कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर:
थकान के प्रकार (Kinds of Fatigue):

  • शारीरिक थकान (Physiological Fatigue)।
  • मानसिक थकान (Psychological Fatigue)।

प्रश्न 11.
शारीरिक थकान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शारीरिक थकान (Physiological Fatigue) शारीरिक थकान वह शारीरिक शक्ति है जो कि पूर्व किए गए कार्य के कारण कार्यक्षमता को कम कर देती है।

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प्रश्न 12.
मानसिक थकान (Psychological Fatigue) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
मानसिक थकान (Psyshological Fatigue) एक मनोवैज्ञानिक शक्ति है, जिसमें कार्य करने की इच्छा नहीं होती, कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है, जबकि वास्तविक शारीरिक क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 13.
कार्य सरलीकरण से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
कार्य सरलीकरण (Work Simplification)-कार्य सरलीकरण अर्थात् कार्य करने का सबसे सरल, शीघ्र और आसान तरीका । कार्य करने की विधि में ऐसे परिवर्तनों को लाना . जिसमें कम से कम समय व ऊर्जा का व्यय करके अधिक से अधिक कार्य सम्पादित किया जा सके. कार्य सरलीकरण कहलाता है।

प्रश्न 14.
कार्य सरलीकरण के कौन-कौन-से तरीके हैं ?
उत्तर:
कार्य सरलीकरण के तरीके (Methods of work simplification) :
1. हाथ और शारीरिक गतिविधियों में परिवर्तन।
2. कार्य, संग्रहीकरण स्थान एवं उपकरणों में परिवर्तन।
3. तैयार उत्पादन में परिवर्तन, नए उत्पादों का प्रयोग।

प्रश्न 15.
घर में स्थान व्यवस्था करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:

  1. एकान्तता
  2. कमरों का पारस्परिक सम्बन्ध
  3. घूमने-फिरने की व्यवस्था
  4. कमरों का आकार
  5. उपलब्ध स्थान का उचित प्रयोग
  6. सघन लेकिन पर्याप्त कार्य समय
  7. स्वास्थ्यवर्धक।

प्रश्न 16.
सजावट का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
सजावट (Decoration): रंगों, साधनों तथा उपसाधनों की व्यवस्था इस प्रकार की जा , क कमरा आरामदायक, आकर्षक बने तथा मानसिक सन्तुष्टि दें।

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प्रश्न 17.
कला के सिद्धांत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
कला के सिद्धांत (Principles of Art):

  • अनुरूपता (Harmony)।
  • सन्तुलन (Balance)।
  • अनुपात (Proportion)।
  • लचर (Rhythm)

प्रश्न 18.
रंगों के कौन-कौन-से प्रकार हैं?
उत्तर:
रंगों के प्रकार (Kinds of Colours):

  • प्राथमिक रंग (Primary colour) ।
  • द्वितीयक रंग (Secondary colour)
  • मध्य रंग (Tertiary colour)

प्रश्न 19.
रंग योजनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • एकरंगीय योजना (Monochromatic colour)।
  • समदर्शी योजना ( Analogous colour scheme)
  • fausta 2175191 (Complementary colour scheme)
  • खंडित विपरीत योजना (Split complementary scheme)।

प्रश्न 20.
रीता अपना कार्य समय पर पूरा नहीं कर पाती । ऐसे दो उपाय बताएँ, जिससे वह समय आयोजन का लाभ उठाए।
उत्तर:
समय आयोजन के लाभ:

  • कार्य के प्रत्येक भाग को उपस्थित किया जाए।
  • कार्य को पूरा करें।
  • आराम के लिए समय।
  • कार्य सरलीकरण।
  • संतुष्ट होना।

प्रश्न 21.
कविता को एक बार में एक से ज्यादा कार्य करने में कठिनाई होती है ? उदाहरण के साथ बताइए कि वह कैसे कार्य करे ?
उत्तर:
एक ही समय में एक से अधिक कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं। जैसे-जब ओवन में केक, बिस्कुट आदि बन रहे हों तो उस समय कपड़े धोना, घर की सफाई करना आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समय व्यवस्था (Management of Time) पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
‘समय’ मानव जीवन की अमूल्य निधि है। बीता हुआ समय पुनः प्राप्त नहीं हो पाता, अतः सत्य ही है कि समय जीवन का निर्माता है, अतः इसे नष्ट नहीं करना चाहिए। व्यावसायिक कार्यों में ही नहीं अवकाश काल के लिए भी समय एक साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी साधन विकासशील हैं परन्तु समय नहीं।

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यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान ही है परन्तु फिर भी चौबीस के बीस घण्टे कर लेना (समय का पूर्ण उपयोग) तथा चौबीस के तीस घण्टे कर लेना (समय का अपव्यय) आज भी चरितार्थ है। इस समान मात्रा में प्राप्त साधन का प्रयोग करते हुए हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना पड़ता है। सोच-समझकर अथवा व्यवस्थित किया गया समय कठिन कार्यों को आसान बना देता है।

प्रश्न 2.
आयोजन तथा व्यवस्थापन (Planning and Management) में आपसी सम्बन्ध क्या है?
उत्तर:
इस चरण में लक्ष्य का स्पष्टीकरण होना आवश्यक है अर्थात् कार्य, विश्राम तथा. मनोरंजन में सामंजस्य बैठाना। समय आयोजन की आंशिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि इसके द्वारा व्यक्ति को अनेक व्यावहारिक समस्याओं के सम्बन्ध में पूर्व में विचार करने को बाध्य होना पड़ता है। इससे निर्णय न ले पाने की स्थिति समाप्त हो जाती है।

परिणामतः मस्तिष्क अन्य समस्याओं का हल करने तथा निरंतर उपस्थित होने वाले तनावों का सामना करने के लिए मुक्त रहता है। समय आयोजन करना सीखने से धीरे-धीरे विचारों का ढांचा बन जाता है जो आगे चलकर स्वतः ही कार्य करता है। उदाहरण के लिए प्रातः उठते ही शौचादि, स्नानादि करके भगवान का स्मरण करना। प्रारम्भ में कोई कार्य मात्र कार्य लगता है. पर बार-बार दोहराए जाने से वह ‘आदत’ बनकर दिनचर्या में स्वयं ही शामिल हो जाता है।

प्रश्न 3.
‘अवकाश काल’ (Leisure Time) किसे कहते हैं ? इसका क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
अपनी इच्छानुसार अपने मनपसन्द कार्यों को करने में बिताया गया समय अवकाश काल कहलाता है। यह विश्राम में बिताया हुआ समय भी हो सकता है। प्रतिदिन के व्यस्त जीवन में अवकाश काल बहुत महत्त्व रखता है। इस नीरस जीवन में कुछ सुखद व आनन्दपूर्ण क्षण अवकाश काल में ही प्राप्त हो सकते हैं जब व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार रुचि के कार्य कर पाए । इन क्रियाओं को करने में आनन्द की अनुभूति तो होती ही है, साथ ही थकान का अनुभव भी नहीं होता।

अवकाश काल में की जाने वाली कलात्मक, संग्रहात्मक एवं क्रियात्मक क्रियाएँ जीवन को विकसित करने में सहायता करती हैं। कई संग्रहात्मक क्रियाएँ जैसे सिक्के, टिकट, किताबें, चित्र आदि का संग्रह ज्ञान वृद्धि में सहायक है। विभिन्न प्रकार के खेल हमारे स्वास्थ्य के स्तर को सुधारने में सहायक हैं। कलात्मक क्रियाएँ जैसे संगीत सुनना, मूर्तियां बनाना, चित्र बनाना, नृत्यकला आदि मनोरंजन के साथ-साथ जीवन को सांस्कृतिक दृष्टि से विकसित करने में भी सहायक हैं। अतः व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास में अवकाश काल का विशेष स्थान है।

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प्रश्न 4.
शारीरिक थकान (Physical Fatigue) किसे कहते हैं ? शारीरिक थकान का कारण दें।
उत्तर:
निरन्तर शारीरिक कार्य करने के परिणामस्वरूप जो कार्यक्षमता की गति में कमी आ जाती है, उसे “शारीरिक थकान” कहते हैं। यह थकान शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तनों के कारण होती है। माँसपेशियाँ जो शारीरिक क्रियाएँ करने में प्रयुक्त होती हैं, अपनी ऊर्जा ग्लाईकोजिन से प्राप्त करती हैं। इस क्रिया में लैक्टिक अम्ल व कार्बन डाइऑक्साइड जैसे व्यर्थ पदार्थ अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं जो माँसपेशियों के क्रियाकलापों में अवरोध या बाधा उत्पन्न करते हैं।

इनकी रक्त में अधिकता से हम थकान का अनुभव करते हैं। परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पत्ति व ऊर्जा की माँग में असन्तुलन पैदा हो जाता है जिससे हम थकावट महसूस करना आरम्भ कर देते हैं। विश्राम करने पर ये व्यर्थ के पदार्थ निष्कासित हो जाते हैं और हम पुनः कार्य करने के योग्य हो जाते हैं, क्योंकि ऊर्जा उत्पत्ति नियम के अनुसार होने लगती है।

प्रश्न 5.
कार्य सरलीकरण (Work Simplification) से आप क्या समझती हैं ? कार्य सरलीकरण की कुछ विधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
कार्य करने की विधि में ऐसे परिवर्तनों को लाना जिससे कम-से-कम समय व ऊर्जा का व्यय करके अधिक-से-अधिक कार्य सम्पादित किए जा सकें, कार्य का सरलीकरण कहलाता है। कार्य को सरल करने की कुछ विधियाँ निम्नलिखित हैं :
1. हाथ तथा शारीरिक गतिविधियों में परिवर्तन लाकर (By hand & physical changes):
(क) अनावश्यक कदमों को रोक कर: नियोजिन रूप से सामान एक ही समय में एकत्रित कर लिया जाए जैसे ट्रे आदि का प्रयोग करके तो समय, शक्ति दोनों की बचत की जा सकती है।
(ख) कार्यों का क्रम निर्धारित करके (By numbering the work): एक ही प्रकार का कार्य करके जो गति प्राप्त हो जाती है, उसे तोड़ना नहीं चाहिए जैसे झाडू लगा कर फिर पोछा लगाना चाहिए।
(ग) कार्य में निपुणता (Efficiency in work): निपुणता हासिल करके समय तथा श्रम दोनों की बचत की जा सकती है।
(घ) उचित मुद्रा का प्रयोग करके (By using correct posture): लिखते समय सही मुद्रा रखने से पीठ व कमर की माँसपेशियों पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ेगा व थकान कम होगी।

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2. कार्य एवं भण्डारण स्थान और उपकरण में परिवर्तन लाकर (By making work, storage place & equipment changes):
(क) स्थान की ऊँचाई आरामदायक हो ताकि कन्धों और बाजुओं पर दबाव न पड़े।

(ख) बैठने के लिए स्टूल व कुर्सी आरामदायक हो जिससे आराम से बैठकर काम किया जा सके।

(ग) वस्तुओं पर लेबल लगा हो ताकि ढूंढने में समय व्यर्थ न जाए। कार्य करने का एक ढंग होता है और उस शारीरिक स्थिति में कार्य करने से कम ऊर्जा व्यय होती है। यदि किसी और स्थिति में कार्य किया जाए तो शारीरिक मांसपेशियों पर तनाव पड़ता है और ऊर्जा अधिक व्यय होने के साथ-साथ थकावट भी अधिक होती है। कुछ भारी चीज उठाते समय कमर से झुक कर उठाने की बजाय घुटनों को झुकाकर उठायी जाए तो थकान कम होती है।

(घ) कार्यकुशलता (Skill in work) किसी कार्य में कुशल होने पर उसके कार्य को करने में कम समय एवं कम ऊर्जा व्यय होती है। जैसे-जैसे कार्यकुशलता बढ़ती जाती है, गतिविधियाँ अधिक नियंत्रित एवं तेज हो जाती हैं, जिससे कार्य शीघ्र सम्पन्न हो जाता है। उपर्युक्त विधियों से कार्य को सरलीकृत किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
उत्प्रेरक या प्रेरणा से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
उत्प्रेरक या प्रेरणा (Motivation): जब कार्यकर्ता किसी कार्य को अनिच्छा से करता है अथवा जब उत्प्रेरण का स्तर निम्न होता है तो थकान शीघ्र अनुभव होने लगती है परन्तु जब यही स्तर उच्च होता है तब काफी मात्रा में शक्ति व्यय होने पर भी थकन दृष्टिगोचर नहीं होती। अतः उच्च स्तर का उत्प्रेरण अधिक शक्ति उपलब्ध कराता है। लक्ष्यों के स्पष्ट परिभाषित होने से कार्य रोचक तथा सरल हो जाते हैं तथा जिन लक्ष्यों को सरलता से प्राप्त किया जाए, वे कार्य को कम नीरस तथा उत्प्रेरक बना देते हैं।

प्रश्न 7.
शक्ति का व्यवस्थापन से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
शक्ति का व्यवस्थापन (Management of Energy): मानवीय शक्ति एक सीमित साधन होने पर भी इसका व्यवस्थापन समय की व्यवस्था अनुसार करना सरल तथा स्पष्ट नहीं है क्योंकि समय की उपलब्धता, मात्रा का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है जबकि शक्ति का नहीं । प्रत्येक व्यक्ति की कार्य शक्ति उसकी शारीरिक रचना तथा मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। गृहिणी को अपनी क्रियाओं की योजना इस प्रकार बनानी चाहिए कि उनमें प्रयुक्त होने वाली शक्ति का कम-से-कम व्यय हो ताकि अन्य कार्य-कलापों के लिए उसके पास पर्याप्त शक्ति शेष रहे।

शक्ति की व्यवस्था के निम्नलिखित प्रभावकारी कारक हैं –

  • परिवार का जीवन-चक्र।
  • विभिन्न क्रियाओं पर व्यय होने वाली शक्ति।
  • थकान-कारण तथा प्रकार।
  • व्यवस्थापक के मानवीय गुण-कुशलता, बुद्धिमत्ता, मानव-स्वभाव समझने की क्षमता, उत्साह ।

प्रश्न 8.
चित्र के द्वारा रसोई घर के विभिन्न आकार बताएँ ? [B.M. 2009A]
उत्तर:
(a) I : आई आकार
(b) 1 : एल आकार
(c) UN : यू आकार
(d) : स्ट्रेट आकार

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प्रश्न 9.
घरेलू गतिविधियों को लिखें ? [B.M.2009A]
उत्तर:
घरेलू गतिविधियाँ-घर में किए जाने वाले कार्यों की व्यवस्था करने पर सभी गृह कार्य सुचारु रूप से किए जा सकते हैं। हर कार्य का अपना स्थान होता है। जैसे-पकाने के लिए रसोई कक्ष, सोने के लिए शयन कक्ष इन सभी स्थानों को व्यस्थित करना अनिवार्य है।

प्रश्न 10.
एक अच्छे घर में घरेलू गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान निर्धारित करें।
उत्तर:
घरेलू गतिविधियाँ व उपयुक्त स्थान (Household Activities and Space Ailocation): एक अच्छे घर में सभी घरेलू गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान निर्धारित होना चाहिए। कुछ सामान्य गतिविधियाँ व उनके लिए स्थान निम्नलिखित तालिका में दिया गया है:

गतिविधियाँ (Activities):

  1. रसोई घर।
  2. खाना खाना
  3. अतिथियों का सत्कार
  4. मौज मस्ती-संगीत सुनना, टी.वी. खना
  5. पढ़ना
  6. सोना
  7. नहाना
  8. कपड़े धोना
  9. मल-मूत्र त्यागना

आवंटित स्थान (Space Allocation):

  1. खाना पकाना
  2. खाने का कमरा, रसोई घर या साथ में कोई लॉबी।
  3. गोल कमरा, बैठक, बरामदा या लॉन, बाग।
  4. गोल कमरा, बैठक, लॉबी, बरामदा, सोने का कमरा इत्यादि।
  5. पढ़ाई का कमरा, सोने का कमरा, बैठक, लॉबी, पिछला बरामदा, बाग इत्यादि।
  6. सोने का कमरा, लॉबी, बरामदा, गोल कमरे में सोफा या बेड पर।
  7. स्नान घर, पिछला बरामदा।
  8. स्नान घर, कोई भी स्थान जहां सुविधाएं उपलब्ध हों।
  9. शहरी घरों में संडास, सामुदायिक सुलभ शौचालय।

प्रश्न 11.
उत्पादन में परिवर्तन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
उत्पादन में परिवर्तन (Change in Product): कार्य के अन्तिम रूप में परिवर्तन लाकर समय एवं ऊर्जा पर हुए व्यय को कम किया जा सकता है। यह परिवर्तन परिवार को उपलब्ध सामान तथा पारिवारिक स्तर पर निर्भर करता है। इस परिवर्तन को लाने में गृहिणी की विशेष भूमिका है। वह अपनी बुद्धिमत्ता, मानव स्वभाव को समझने की क्षमता, जागरूकता आदि जैसे गुणों द्वारा परिवार में स्थित व्यर्थ के विचार हटा सकती है तथा नए और आधुनिक विचारों को स्वीकृत करा सकती है।

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अंतिम रूप या उत्पादनों में परिवर्तनों के उदाहरण –

  • सूती कपड़ों की अपेक्षा कृत्रिम कपड़ों के वस्त्रों का प्रयोग (क्योंकि इनका रख-रखाव अपेक्षाकृत बहुत आसान है।)
  • ताजी सब्जियों की अनुपलब्धि या उनके स्थान पर संरक्षित सब्जियों का प्रयोग (क्योंकि साफ करने तथा काटने का समय बचता है)
  • कपड़ों के रूमाल के स्थान पर कागज के रूमालों का प्रयोग (Napkins) (क्योंकि इससे उन्हें धोने का समय व खर्चा बचता है)
  • साबुत मसालों के स्थान पर पीसे मसालों की खरीद (क्योंकि पीसने के झंझट से मुक्ति मिल जाती है)
  • धातु के स्थान पर प्लास्टिक की बनी वस्तुओं का प्रयोग करना, जैसे-प्लेट, गिलास आदि। (क्योंकि इनका रख-रखाव आसान है)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि कच्ची वस्तुओं के प्रयोग अथवा उसी कच्ची वस्तु से विभिन्न वस्तुएँ उत्पादित करने अथवा कच्ची सामग्री और उत्पादित वस्तु दोनों में ही परिवर्तन करने से . कार्य का सरलीकरण किया जा सकता है।

प्रश्न 12.
रंगों के प्रयोग व प्रकार समझाइए।
उत्तर:
रंग चीजों को सुन्दर व आकर्षक तो बनाते ही हैं, इसके साथ-साथ रंगों का प्रभाव सार्वभौमिक भी रहता है। रंगों के शारीरिक प्रभाव की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक प्रभाव अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। रंगों के प्रभाव भिन्न-भिन्न होते हैं-सफेद रंग शान्ति तथा सन्तोष का प्रतीक है, लाल, नारंगी रंग उत्तेजित करते हैं, हरा रंग चंचलता को दर्शाता है, नीला रंग उदासीन तथा शीतल है। रंगों का सही उपयोग करना भी एक कला है। रंगों का प्रयोग करने से पहले उनके बारे में कुछ जानकारी होना आवश्यक है।

रंगों के प्रकार (Kinds of Colour):
रंग मुख्यतः तीन प्रकार के हैं –

  • प्राथमिक रंग (Primary Colour)।
  • द्वितीयक रंग (Secondary Colour)।
  • मध्य रंग (Tertiary Colour)।

प्राथमिक रंग – लाल, पीला तथा नीला प्राथमिक रंग हैं।
द्वितीयक रंग – दो प्राथमिक रंगों को समान अनुपात में मिलाने से एक द्वितीयक रंग बनता हैं। जैसे – लाल + पीला = नारंगी, पीला + नीला = हरा, लाल + नीला = बैंगनी।
मध्य रंग – एक द्वितीयक रंग तथा एक प्राथमिक रंग को मिला कर मध्य रंग बनता है। जैसे – पीला + नारंगी = पीला नारंगी, पीला + नीला = पीला नीला, लाल + नारंगी = लाल नारंगी, लाल + बैंगनी = लाल बैंगनी, पीला + हरा = पीला हरा, नीला + बैंगनी = नीला बैंगनी
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1.
समय व्यवस्थापन (Time Management) के विभिन्न चरण लिखें।
उत्तर:
एक परिवार की आवश्यकता के अनुकूल व्यावहारिक समय एवं क्रिया का निर्माण करना चाहिए। किन्हीं दो परिवारों की परिस्थितियाँ एक-सी नहीं होतीं। कुछ गृहिणियाँ जैसे किसान व डॉक्टर की पत्नियों को अपने पति के व्यवसाय की दृष्टि से समय व क्रियाओं का आयोजन करना होगा। अप्रत्याशित अवरोधों या आकस्मिक घटनाओं के लिए दैनिक समय-सारणी में पहले से ही कछ समय का आयोजन करना चाहिए।

1. विभिन्न कार्यों की सूची बनाना (Listing different activities):
गृहिणी को सर्वप्रथम सभी कार्यों की सूची बना लेनी चाहिए तथा परिवार की सहायता से उनका विभाजन निम्न रूप से कर लेना चाहिए :

(i) दैनिक कार्य-जैसे-भोजन बनाना, दोपहर का भोजन, शाम की चाय तथा रात्रि का भोजन, बच्चों की देख-रेख करना, घर की सफाई, बिस्तर लगाना, बर्तन साफ करना, नौकरी पर जाना, विश्राम करना आदि।

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(ii) साप्ताहिक एवं विशेष कार्य-जैसे-कपड़े धोना, कपड़े प्रेस करना, गलीचा आदि साफ करना, बाजार से सामान खरीदना, खिड़कियों, दरवाजे आदि की सफाई करना आदि। सिक एवं सामयिक कार्य-जैसे-आटा पिसवाना. कपडे सिलाना. छटिटयों के लिए तैयारी करना, किसी पार्टी आदि के लिए तैयारी करना, अचार बनाना, स्क्वैश आदि बनाना, मौसम के कपड़े सम्भाल कर रखना आदि। यदि सभी कार्यों को दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक कार्यों में विभाजित करके सूची बना ली जाए तो सभी कार्य सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाते हैं और जल्दबाजी में कोई भी काम छूटने की आशंका नहीं रहती है।

2. प्रतिदिन के कार्यों एवं समय की मूल योजना बनाना-दूसरे चरण में प्रतिदिन के कार्यों एवं उसमें व्यय होने वाले समय की मूल योजना बनायी जाती है। इस योजना के लिए सबसे पहले वह कार्य लिये जाते हैं जो प्रतिदिन अवश्य करने होते हैं तथा जिन्हें सम्पन्न करने के लिए निश्चित समय का ज्ञान होता है। इस प्रकार दूसरे चरण में समय एवं कार्य योजना का ढाँचा तैयार हो जाता है जिसके आधार पर पूरी योजना बनाई जा सकती है।

प्रतिदिन के आवश्यक कार्य जैसे भोजन बनाना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना और स्कूल भेजना, घर की दैनिक सफाई आदि आते हैं। इस मूल योजना में सुबह तथा दोपहर को खाली समय छोड़ा जाता है तथा इस समय में साप्ताहिक कार्यों को सम्पन्न किया जाता है। एक दैनिक मूल समय-योजना का उदाहरण निम्नलिखित तालिका में दिया गया है –

दैनिक मूलं समय-योजना (Daily Basic Time Plan):
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समय-योजना बनाते समय यह ध्यान भी अवश्य रखना चाहिए कि कौन-सा कार्य किस समय पर करना उचित रहेगा तथा सामान्यतः उसमें कितना समय लगेगा। दैनिक समय योजना में जो काम जिस परिवार के सदस्य को सौंपा हो, उसको घर में उपस्थिति का ध्यान रखना चाहिए। कुछ कार्य जो निश्चित समय पर ही किए जाते हैं, जैसे बच्चों का स्कूल जाना, ऑफिस आदि के लिए निश्चित समय ही प्रयुक्त करना चाहिए।

प्रत्येक परिवार की समय-योजना में काफी अन्तर पाया जाता है। यदि गृहिणी नौकरी भी करती हो तो उसकी दैनिक समय-योजना बिल्कुल भिन्न हो जाएगी। अतः प्रत्येक गृहिणी को अपने दैनिक कार्यों, परिवार के सदस्यों की आवश्यकता एवं सहयोग को ध्यान में रखते हुए ही दैनिक मूल समय-योजना बनानी चाहिए।

3. साप्ताहिक योजना बनाना (Weekly Time Plan): इस साप्ताहिक योजना में सप्ताह के कार्यों, विशेष कार्य तथा सामाजिक कार्यों के लिए समय निश्चित किया जाता है। इस योजना का निर्माण करते समय गृहिणी को घरेलू आवश्यकताओं, कार्य करने की आदतों एवं परिवार के सदस्यों के खाली समय का ध्यान रखना चाहिए। निम्नलिखित तालिका में एक साप्ताहिक योजना का उदाहरण दिया गया है –

साप्ताहिक समय योजना (Weekly Time Plan):
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4. समय-योजना के चौथे चरण में इस बात का निर्णय लिया जाता है कि कौन-सा कार्य कौन-सा सदस्य पूर्ण करेगा। यह निर्णय लेते समय परिवार के सभी सदस्यों से विचार-विनिमय करना चाहिए तथा उस व्यक्ति विशेष के समय, भोजन का भी ध्यान रखना चाहिए। परिवार के विभिन्न सदस्यों में कार्य बाँटते समय तथा उचित समय के उपयोग के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

1. परिवार के सदस्यों के पास उपलब्ध समय तथा वह अपना कितना समय कार्यों के प्रति प्रयोग कर सकता है।

2. परिवार के सदस्यों की विशेष रुचियों को ध्यान में रखते हुए कार्यों को सौंपना चाहिए क्योंकि रुचि होने पर कार्य सफलतापूर्वक समय पर सम्पन्न किए जा सकते हैं। यदि रुचियों के अनुरूप कामों को न सौंपा जाए तो कार्य पूर्ण होने में कई प्रकार की रुकावटें होती हैं।

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3. एक प्रकार के तथा एक साथ किए जाने वाले कार्यों को सदैव एक ही परिवार के सदस्य को सौंपना चाहिए जैसे बाजार से विभिन्न वस्तुएँ खरीदना आदि।

4. एक समय में एक से अधिक कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं। जैसे जब ओवन में केक, बिस्कुट आदि बन रहे हों तो उस समय कपड़े धोना, घर की सफाई आदि।

5. समय बचाऊ उपकरणों जैसे प्रेशर कूकर, मिक्सी आदि का प्रयोग करना चाहिए।

6. प्रतिदिन प्रयोग में आने वाली वस्तुओं को उचित स्थान एवं चालू हालत में रखना चाहिए जैसे चाकू एक छोटी-सी चीज है यदि इसे उचित स्थान पर न रखा जाए तो उसे ढूँढने में काफी समय लग जाता है। इसी प्रकार यदि चाकू का हत्था टूटा हो या उसकी धार तेज न हो तो सब्जियाँ, फल आदि ‘ को काटने में सामान्य से बहुत अधिक समय लगता है।

7. दैनिक उपयोग की वस्तुओं को प्रतिदिन खरीद कर लाने के स्थान पर इकट्ठा खरीदना चाहिए जिससे प्रतिदिन उन्हें खरीद कर इकट्ठा करने की आवश्यकता न पड़े और व्यर्थ ही समय नष्ट न हो।

8. कार्य करने की विधि से पूर्णतया परिचित होने पर काम कम समय में ठीक प्रकार से सम्पन्न हो जाता है तथा समय का अपव्यय नहीं होता है।

9.  प्रत्येक कार्य को एकाग्रचित होकर कुशलतापूर्वक करना चाहिए। ऐसा करने से काम कम समय में उचित रूप से सम्पन्न हो जाता है। किसी भी कार्य को पूरी सूझ-बूझ एवं पूर्व अनुभवों के आधार पर करने से भी समय की बचत होती है। जैसे खाना परोसते समय ट्रे का प्रयोग करना आदि।

10. समय-योजना लचीली होनी चाहिए जिससे आवश्यकता एवं परिस्थितियों के अनुरूप उसे बदला जा सके। यदि समय तालिका में लचीलापन नहीं होगा तो उसका सफल होना कठिन है।

11. समय योजना बनाते समय अन्य गृहिणियों की समय योजनाओं को देखकर लाभ उठाना चाहिए या फिर विभिन्न गृहिणियों के समय उपयोग पर हुए अध्ययनों का लाभ उठाना चाहिए।

5. मूल्यांकन (Evaluation):
समय की योजना का सप्ताह के अन्त में मूल्यांकन करना भी अति आवश्यक है। इसके लिए यह देखना चाहिए कि सभी कार्य समय योजना के अनुरूप सम्पन्न हुए अथवा नहीं। समय-योजना का मूल्यांकन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है –

  • क्या पत्येक कार्य समय-योजना के प्रस्तावित समय में पूर्ण हो सका।
  • यदि नहीं, तो प्रत्येक कार्य पूर्ण करने के लिए कितना समय लगा? इस अतिरिक्त समय का अगली योजना बनाते समय पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।
  • क्या परिवार के सभी सदस्यों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हा सका? अथवा नहीं। यदि नहीं तो क्या कारण थे ?
  • क्या गृहिणी को विश्राम, मनोरंजन आदि के लिए पर्याप्त समय मिला अथवा नहीं। यदि नहीं तो क्या कारण थे ?
  • क्या अवकाश के समय का पूर्ण उपयोग हो सका ?
  • अगली समय-योजना में क्या-क्या परिवर्तन लाने आवश्यक हैं ? क्या पारिवारिक लक्ष्यों की पूर्ति हो सकी अथवा नहीं?

प्रश्न 2.
अवकाश काल (Leisure Time) पर एक लेख लिखें।
उत्तर:
अवकाश की श्रेणी में वह समय आता है जो न तो कार्य में प्रयुक्त होता है, न विश्राम में। मुख्यतः अवकाश का उपयोग मनोरंजन के लिए होता है। हर व्यक्ति को अवकाश काल बिताने का अपना एक अलग ढंग होता है। अवकाश काल के सदुपयोग के विभिन्न साधन हैं –
(अ) घर में बैठकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ (Indoor Activities)।
(ब) घर के बाहर जाकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ (Outdoor Activities)।

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(अ) घर में बैठकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ-इसके अन्तर्गत क्रियात्मक क्रियाएँ, संग्रहात्मक क्रियाएँ एवं कलात्मक क्रियाएँ आती हैं। जैसे

  • सामाजिकता (Sociability): इसमें सम्भाषण, मित्रों से मिलना व उन्हें घर बुलाना, समय परिवार के साथ बिताना और समाज की गतिविधियों में भाग लेना है।
  • संस्थाओं की सदस्यता (Association): इनके अन्तर्गत विभिन्न संस्थाओं, जैसे-क्लब आदि में जाना।
  • स्थिरता (Immobility): इसके अन्तर्गत सिलाई, कढ़ाई, पढ़ना-लिखना, टेलीविजन देखना. रेडियो सुनना, बागवानी आदि हैं।
  • संग्रहात्मक क्रियाएँ: इसके अन्तर्गत सिक्कों, टिकटों, किताबों, चित्रों, ग्रन्थों आदि का संग्रह सम्मिलित हैं।
  • कलात्मक क्रियाएँ (Arts): मूर्ति बनाना आदि।
  • खेल (Game): दर्शक के रूप में विभिन्न खेल देखना, ताश खेलना आदि।

(ब) घर से बाहर जाकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ:
1. खेल (Games and Sports): स्वयं कोई खेल जैसे टेबिल टेनिस, बैडमिण्टन आदि खेलना।
2. कला (Arts): इसके अन्तर्गत संगीत, नाटक, नृत्य साहित्य, छायांकन (Photography) आदि में अभिरुचि सम्मिलित हैं।
3. गतिशीलता (Mobility): इस वर्ग में कार या बस में सफर, बाजार में वस्तुएँ क्रय करना, टहलना, नाव में सैर करना आदि आते हैं।
आदर्श रूप में अवकाश एक उपहार स्वरूप है जिसका उपयोग हर व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने, ज्ञान अर्जित करने तथा स्वयं में निरन्तर सुधार करने के लिए करना चाहिए।

प्रश्न 3.
गृह कार्य में लगने वाले श्रम का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
सभी गृह कार्यों में श्रम करना पड़ता है। यह श्रम मुख्यतः दो प्रकार का होता है –
1. शारीरिक और
2. मानसिक।
व्यावसायिक जीवन में दोनों पूर्णतः भिन्न नहीं हैं। अधिकांश शारीरिक क्रियाओं में भी थोड़ा सोचना पड़ता है।

1. शारीरिक कार्य कई प्रकार के होते हैं। कुछ में हाथों की अधिक आवश्यकता होती है तो कुछ में धड़ की आवश्यकता होती है। कुछ में पैरों की आवश्यकता होती है। वस्तुओं को पकड़ने, उठाने, खिसकाने. खींचने या एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखने में हाथों की विशेष आवश्यकता होती है। बैठने-झुकने, मुड़ने, उठने आदि में शरीर के मध्य भाग का अधिक उपयोग होता है। खड़े होने, चलने-फिरने आदि में पैरों का अधिक उपयोग होता है।

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2. मानसिक श्रम भी गृहिणी के दैनिक जीवन का अंग है। उसे विभिन्न प्रकार के निर्णय लेने होते हैं। साधनों का समुचित व्यवस्थापन करना होता है। भविष्य के लिए योजनाएँ बनानी होती हैं। इन सभी मानसिक क्रियाओं में शक्ति का व्यय होता है परन्तु शारीरिक क्रियाओं से कम।

माँसपेशीय क्रियाओं की विभिन्न दशाओं में प्रति घण्टा शक्ति व्यय –
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प्रश्न 4.
संक्षेप में गृह कार्यों पर उपयोग की गई शक्ति के विषय में लिखें।
उत्तर:
गृह कार्यों को तीन भागों में विभाजित किया गया है :
1. हल्के कार्य (Light Work): इस वर्ग के अन्तर्गत मुख्यत: वही कार्य सम्मिलित किए जाते हैं जिन्हें करते समय खड़ा नहीं होना पड़ता, जैसे हाथ तथा मशीन द्वारा बुनाई करना, रफू करना, सिलाई करना आदि।
2. साधारण कार्य (Normal Work): इसके अन्तर्गत शिशु को वस्त्र पहनाना, प्लेट धोना, तौलिये पर इस्त्री करना, पैर की मशीन से सिलाई करना जैसे कार्य आते हैं।

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3. श्रमशील कार्य (Heavy Work): इन कार्यों को सम्पन्न करने के लिए अधिक शक्ति. की आवश्यकता होती है। इसके अन्तर्गत कपड़े धोना, फर्श झाड़ना आदि कार्य आते हैं।
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हमेशा उचित व्यवस्था (Posture) में बैठकर या खड़े होकर कार्य करने से कम शक्ति व्यय होती है। इसके विपरीत कार्य हल्का होने पर भी यदि शारीरिक अवस्था उचित न हो तो शक्ति व्यय बहुत अधिक होती है। उचित व्यवस्था के लिए कुशल गृहणी को कार्यों का विभाजन इस प्रकार करना चाहिए कि प्रतिदिन शक्ति वाले कार्यों में संतुलन रहे। यदि एक ही दिन में सभी अधिक शक्ति वाले कार्य किए जाएँ तो थकान हो जाती है तथा कार्य भी भली प्रकार से सम्पन्न नहीं होते हैं।

श्रम के अनुसार कार्य का वर्गीकरण (Classification of work according to energy spent):
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प्रश्न 5.
थकान के विभिन्न स्वरूप कौन-कौन-से हैं ? गृहिणी की कार्य-क्षमता पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?
अथवा,
मानसिक थकान कम करने के छः तरीके विस्तारपूर्वक सुझाएँ।
उत्तर:
जब हम कोई कार्य करते हैं तब कछ समय बाद ऐसी स्थिति आ जाती है कि कार्य करने की क्षमता कम होती जाती है और शरीर शिथिल हो जाता है और कम काम कर पाते हैं इस अवस्था को थकान कहते हैं। “निरन्तर कार्य करने के परिणामस्वरूप कुशलता में कमी या मानसिक रूप से ऊब जाना या दोनों के होने को थकान कहते हैं।”

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थकान के लक्षण (Symptoms of fatigue):

  • शरीर में सुस्ती, आलस्य और शिथिलता आ जाती है।
  • मन किसी भी कार्य को करने में एकाग्र नहीं होता।
  • सरल कार्य में भी गलती अधिक होती है, समय ज्यादा लगता है।
  • नींद एवं जम्हाई आने लगती है।
  • कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है।

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1. शारीरिक थकान (Physiological Fatigue): जब शरीर की पेशियाँ कार्य करती हैं तब शरीर ईंधन का उपयोग करता है तथा शक्ति को निकालता है। पेशियों में शक्ति-उत्पादन करने वाला पदार्थ ग्लाइकोजीन होता है। ग्लाइकोजीन का निर्माण कला द्वारा लाई गई शर्करा से पेशीय तन्तुओं द्वारा होता है। पेशीय कार्यों में ग्लाइकोजीन रक्त प्रवाह में विद्यमान ऑक्सीजन से संयोग करके शक्ति को निष्क्रमित करता है तथा लैक्टिक अम्ल एवं कार्बन डाइ-आक्साइड नामक निरर्थक पदार्थों का उत्पादन करता है। ये दोनों पदार्थ निरन्तर पेशीय क्रिया-कलापों में अवरोध उत्पन्न करते हैं। किसी भी कार्य को करने के पश्चात् पुनः शक्ति प्राप्त करना अथवा लैक्टिक अम्ल एवं कार्बन डाइ-आक्साइड को माँसपेशियों से निकालना नितान्त आवश्यक है।

इस प्रक्रिया में रक्त-प्रवाह कार्बन डाइऑक्साइड को फेफडे में ले जाते हैं जहाँ इसे निष्कासित किया जाता है। रक्त माँसपेशियों में ऑक्सीजन ले जाता है तथा ऑक्सीजन और ग्लाइकोजिन के पुनः परिवर्तन की प्रक्रिया के द्वारा लैक्टिक अम्ल भी निष्कासित कर दिया जाता है। इस प्रकार ऑक्सीजन लैक्टिक अम्ल को माँसपेशियों से हटाने में योग देकर थकान को रोकने में सहायता प्रदान करता है।

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अधिक थका देने वाले कार्य में लैक्टिक अम्ल अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है जिसे दूर करने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन शीघ्र उत्पन्न नहीं किया जा सकता और इस तरह थकान बढ़ जाती है जिसे पूरा करने के लिए विश्राम करना आवश्यक हो जाता है। गृहिणी में काम करने की शक्ति सुबह के प्रथम चरण में अधिक रहती है। जैसे-जैसे काम करने में थकान बढ़ती है, वैसे-वैसे उसमें कार्यक्षमता कम होती जाती है।
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2. मानसिक थकान (Psychological Fatigue): शारीरिक थकान की भाँति मानसिक थकान से भी कार्य क्षमता कम हो जाती है और कार्य के प्रति अरुचि हो जाती है।
वार्टले के अनुसार “थकान या थकावट एक व्यक्ति की उस परिस्थिति के प्रति संपूर्ण प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसका वह जाने या अनजाने में मूल्यांकन करता है।” मानसिक थकान दो प्रकार की होती है –
(अ) नीरस थकान (Boredom fatigue)।
(ब) कुंठाजन्य थकान (Frustration fatigue)।

(अ) नीरस थकान (Boredom fatigue): एक लम्बी अवधि तक कार्य करने के उपरान्त काम के प्रति अरुचि महसूस करते हैं। इस थकान के बाहरी लक्षण हैं-जम्हाई आना, बेचैनी और कार्य को छोड़ देने की इच्छा। कार्य के प्रति उत्साह समाप्त हो जाता है। कार्य में परिवर्तन अनिवार्य है। एक कार्य अरुचिकर या नीरस हो जाने पर दूसरे कार्य को प्रारंभ करने से थकान दूर हो जाती है।

(ब) कुंठाजन्य थकान (Frustration fatigue): कुण्ठा निराशा का ही एक रूप है। इसे व्यक्ति तब अनुभव करता है जब किसी स्थिति को ठीक से नियन्त्रित नहीं कर पाता । उस स्थिति के समक्ष वह स्वयं को अक्षम अनुभव करता है। तब वह खीज और चिड़चिड़ाहट महसूस करने लगता है। वह पलायन तो करना चाहता है परन्तु कर नहीं पाता।

तब वह मानसिक तनाव महसूस करने लगता है। तनाव कुछ अवधि के लिए बना रहता है तो वह थकान महसूस करता है। कुण्ठाजन्य थकान नीरस थकान से इस रूप में भिन्न है कि कुण्ठित व्यक्ति स्वयं का दोष महसूस करता है जबकि नीरस थकान अनुभव करने वाला व्यक्ति बाहरी वातावरण को अपनी अरुचि के लिए दोषी मानता है।

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वट कम करने के साधन (Ways of Reducing Fatigue) :
1. विश्राम काल (Rest Periods): दिन में कार्य करने की अवधि में विश्राम करने से थकान दूर हो जाती है तथा कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। एक व्यक्ति को दिन में कितनी देर तक तथा कितनी बार विश्राम करने की आवश्यकता होती है। उसके कार्य की प्रकृति तथा व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता निर्धारित करती है। गृहिणी अनेक प्रकार के कार्य करती है। उसके लिए विश्राम की अवधि कितनी हो, यह उसके स्वास्थ्य व उसकी शक्ति की मात्रा पर निर्भर करती है। कुछ गृहिणियाँ कार्य-परिवर्तन में ही विश्राम कर लेती हैं।

2. प्रोत्साहन का महत्त्व (Role of Motivation): जब कोई व्यक्ति किसी कार्य को पसन्द नहीं करता या उत्प्रेरकों की कमी रहती है तब थकान शीघ्र उत्पन्न हो जाती है। यदि कार्य कार्यकर्ता की रुचि का होता है तथा उसे करने में अगर प्रेरणा मिलती है तब थकान शीघ्र उत्पन्न नहीं होती। ऐसे कार्य तो लगातार अधिक समय तक भी बिना थकान उत्पन्न हुए किये जा सकते हैं। ऐसे लक्ष्य या कार्य जो आसानी से पूरे हो जाते हैं या प्राप्त हो जाते हैं कार्य की नीरसता को दर करते हैं तथा उत्प्रेरक का काम करते हैं।

किसी कार्य को करने में बाधा या अवरोध उत्पन्न होने से सम्पूर्ण कार्य अव्यवस्थित हो जाता है और थकान अनुभव होने लगती है। फलस्वरूप कार्यकर्ता में कण्ठाजन्य थकान होने लगती है। काम की नीरसता तथा शारीरिक तनाव के कारण जो थकान उत्पन्न होती है, वह थोड़ी-सी उत्तेजना-यथा मित्रों से बातचीत. सिनेमा देखना. पिकनिक या कार्य में परिवर्तन-से समाप्त हो ज है। यदि कार्य की पूर्ति के पश्चात् व्यक्ति की प्रशंसा कर दी जाए तो वह भी प्रोत्साहन का कार्य करती है और मानसिक थकान को कम करती है।

3. कार्य करने की उचित सुविधाएँ (Good working condition): अध्ययनों द्वारा ज्ञात हुआ है कि यदि कार्य करने के लिए उचित सुविधाएँ प्रयुक्त की जाएँ तो दोनों शारीरिक एवं मानसिक थकान कम होंगी। ये उचित सुविधाएँ निम्नलिखित हैं:

  • कार्य करने के लिए उचितं रोशनी का होना आवश्यक है।
  • कार्य स्थल खुला और हवादार होना चाहिए।
  • श्रम तथा समय बचाऊ उपयोगी यन्त्रों का प्रयोग करना चाहिए।
  • खड़े होकर कार्य करने के लिए कार्यकर्ता की लम्बाई के अनुरूप ऊँची मेज या फट्टा होना चाहिए। अधिक ऊँचे या नीचे मेज पर कार्य करने में थकान अधिक होती है।
  • घर का सारा सामान निश्चित जगह पर व्यवस्थित ढंग से रखा होना चाहिए जिससे आवश्यकता पड़ने पर आसानी से मिल जाए और समय तथा शक्ति का अपव्यय न हो।
  • कार्य करने के लिए यन्त्र या उपकरण ऐसे होने चाहिए जिससे शरीर को सामान्य स्थिति में ही रखा जाए। अधिक झुककर या उचककर कार्य करने से थकान अधिक होती है। उदाहरण के लिए घर की सफाई करते समय लम्बे झाडू का प्रयोग करना चाहिए तथा पोंछा लगाने के लिए लम्बे डंडे का प्रयोग उचित रहता है।

4. कार्य करने का उचित ढंग (Proper way of doing work): कार्य सदैव उचित ढंग से ही करना चाहिए जिससे उसे करते समय अनावश्यक क्रियाओं को दूर किया जा सके तथा थकावट भी कम की जा सके। बैठकर खाना बनाने से थकावट अधिक होती है। खड़े होकर खाना बनाने से थकावट कम होती है, अतः खाना बनाने का उचित ढंग खड़े होकर खाना बनाना है।

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5. कार्य करने की सही मुद्रा (Good working posture): कार्य करते समय कार्यकर्ता को शरीर की मुद्रा सही रखनी चाहिए। बैठने या खड़े होने की मुद्रा ऐसी होनी चाहिए जिससे मांसेपशियों पर अधिक जोर न पड़े और थकान कम हो। कार्य करने की सतह अधिक ऊँची या नीची होने पर, उन पर कार्य करते समय माँसपेशियों का खिंचाव होता है, जिससे थकान अधिक होती है।

6. कार्य करने का उचित क्रम (Right sequence of work): कार्य करने के उचित क्रम को अपनाना चाहिए जिससे थकान कम हो। उचित क्रम के लिए एक से कार्य एक समय में करने चाहिए। जैसे घर की सफाई करते समय पहले सारे घर को झाड़ लिया जाए फिर झाडू लगानी चाहिए तथा फिर पोंछा लगाना चाहिए। यदि पहले एक कमरे में झाडू और पोंछा लगाया। और फिर दूसरे कमरे में झाडू और पोंछा लगाया जाए तो बार-बार झाडू और पोंछा को बदलने के कारण श्रम और समय दोनों ही अधिक लगते हैं।

7. कार्यकुशलता (Work Skill): किसी कार्य में जब गृहिणी प्रवीण होती है तो उस कार्य को करते समय उसे कम थकावट होती है। यदि एक गृहिणी सिलाई करने में प्रवीण है तो उसे समय कम थकान महसस होगी। इसके विपरीत जो सिलाई करना नया-नया सीखती है, उसे सिलाई करते समय गलतियाँ होने के कारण अधिक थकावट होती है।

8. कार्यों में हेर-फेर (Change in work): बहुधा अधिक समय एक-सा कार्य करते रहने पर भी थकावट हो जाती है। अत: कुछ समय बाद कार्यों में हरे-फेर करते रहने से थकावट कम होती है।

9. कार्य को रोचक बनाना (Make work more interesting): अधिकांश दैनिक कार्य नीरस रहते हैं। उनको अधिक समय तक करते रहने से गृहिणी ऊबने लगती है। इस नीरसता को निम्न विधियों से कम किया जा सकता है –
(अ) कई बार कार्य बड़ा लम्बा व अन्तहीन-सा प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में अल्प अवधि का लक्ष्य रखकर गहिणी कार्य के प्रति उत्साहित अनभव कर सकती है।
(ब) गृहिणी को यदि परिवार के किसी अन्य सदस्य का सहयोग मिल जाता है तो भी वह कार्य के प्रति अधिक उत्साह अनुभव करती है। भोजन पकाने में यदि उसे अपनी पुत्री का सहयोग मिल जाता है तो काम की नीरसता कम हो जाती है और वह कार्य भी अधिक शीघ्रता से होता है।
(स) दैनिक कार्यों में विविधता भी थकान को कम करने में सहायक होती है। एक भारी काम पूरा करने के बाद यदि एक हल्का काम हाथ में लिया जाए तो थकान अत्यधिक नहीं हो पाती।

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10. मनोरंजन (Entertainment) मनोरंजन शरीर को विश्राम देता है और कुछ समय के लिए दैनिक चिन्ताओं को भी भुलाने में सहायता करता है।

प्रश्न 6.
कार्य सरलीकरण (Simplification) क्या है ?
उत्तर:
समय एवं शक्ति दोनों ही गृहिणी के लिए महत्त्वपूर्ण साधन हैं। दोनों के व्यवस्थापन में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनका समाधान गृहिणी को करना होता है। एक निर्धारित समय और शक्ति के अन्तर्गत अधिक कार्य सम्पादित करना ही कार्य का सरलीकरण है। ग्रौस व कैण्डल के अनुसार “यह वह विधि है जिसके द्वारा एक निश्चित समय व शक्ति की मात्रा व्यय करके अधिक कार्य सम्पन्न किया जाता है अथवा एक निश्चित कार्य दोनों का ही कम व्यय करके पूर्ण किया जाता है।” निकिल व डौसी के अनुसार “कार्य सरलीकरण किसी कार्य को सबसे सुविधाजनक व शीघ्रता से सम्पन्न करने की विधि की खोज है।” इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि कार्य सरलीकरण में कुशलता एवं व्यावहारिक प्रबन्ध एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

प्रश्न 7.
कार्य सरल करने की विधियों (Methods of work simplification) का उल्लेख करो।
उत्तर:
ग्रौस व क्रैन्डल ने कार्य सरलीकरण को तीन भागों में वर्गीकृत किया है –

  • हाथ और शरीर की गतियों में परिवर्तन (Changes in hand and body motions)।
  • कार्य स्थल, संग्रहण स्थान तथा उपकरणों में परिवर्तन (Changes in work and storage space and equipment)।
  • उत्पादन में परिवर्तन (Change in the products)।

1. हाथ और शरीर की गतियों में परिवर्तन : हाथ और शरीर की गतियों में परिवर्तन होने से समय और शक्ति की बचत होती है।
(अ) बर्तनों को साफ करने के बाद यदि गर्म पानी में खंगालकर सूखने रख दिया जाए तो उन्हें कपड़े से पोंछने की अनावश्यक शारीरिक क्रिया की बचत हो सकती है।
(ब) एक हाथ के स्थान पर दोनों हाथों से कार्य करना, विस्तार के अनावश्यक कदमों को समाप्त करना। पूर्व आयोजन से कई कदम अथवा शारीरिक गतियों की बचत सम्भव है।

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2. कियाओं का कम (Work seanence): घर में काम करने के मार्ग में परिवर्तन कर कई कदमों की चाल की बचत की जा सकती है। कई कार्यों को साथ-साथ भी किया जा सकता है। भोजन पकाने के साथ केक बनाना सम्भव है।

3. कदमों में दक्षता (Skill in work): कुशल गृहिणी अपने गृह कार्य तीव्र गति से तथा सरलता से करने में समर्थ होती है। दक्षता जन्म-जात कम और प्रयास से अधिक आती है। कार्यदक्षता प्राप्त करने की तीन अवस्थाएँ होती हैं –

  • प्रारम्भिक अथवा खोजने की अवस्था (Exploratory stage)।
  • कठिन एवं प्रयासयुक्त अवस्था (Awkward and Effortful stage)।
  • दक्षता की अवस्था (Skilled stage)।

उदाहरण के लिए आलू या प्याज छीलने में पहली अवस्था में गृहिणी को यह जानना होता है कि चाकू को तथा काटने वाली वस्तु को सही तरीके से कैसे पकड़ा जाए। आरम्भ में दोनों को ही वह ठीक ढंग से नहीं पकड़ पाती। क्रियाएँ धीमी रहती हैं, छिलाई भी सफाई से नहीं होती। दूसरी अवस्था में धीरे-धीरे वह सीखने लगती है कि दोनों का सही प्रयोग कैसे हो। उसकी कार्य करने की गति बढ़ने लगती है। वह अपनी गलतियाँ सुधारती जाती है। तीसरी अवस्था में वह यह काम तेजी से और सफाई से करने लगती है। एक कार्य में दक्षता गृहिणी को दूसरे कार्य में वैसी ही दक्षता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।

प्रश्न 8.
कार्य-स्थल, संग्रहण स्थान तथा उपकरणों में परिवर्तन करने से शक्ति उपयोग पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
1. प्रमुख उपकरण व्यवस्थित रूप से लगे हों-उपकरण इस प्रकार से लगाए जाएँ जिससे गृहिणी को हर वस्तु आसानी से उपलब्ध रहे और उसे कम से कम चलना पड़े। प्रमुख उपकरण उचित स्थान पर ऐसी रखे जायें जहाँ उपयोग करते समय इन्हें बार-बार निकालने व रखने में शक्ति व्यर्थ न जाए।

2. कार्य सतहें सुविधाजनक चौड़ाई की व ऊँचाई की हों (Work surface should be of convenient length & height): app and 944 pirific int 47 3fera feefa to लिए कार्य-स्थल की ऊँचाई एवं चौड़ाई आरामदायक होनी चाहिए। यदि कार्य सतह अधिक नीची है तो झुककर कन्धों को अधिक ऊपर उठाना होता है। यदि कार्य सतह अत्यधिक चौड़ी है तो बाँहों को अधिक फैलाना होता है अथवा झुकाना होता है। ऐसी क्रियाओं से असुविधा व थकान होती है। कार्य सतह व्यक्ति की लम्बाई के अनुरूप होनी चाहिए।

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3. कुर्सियाँ व स्टूल आरामदेह हों (Comfortable Chairs & Stools): आरामदेह कुर्सी या तिपाई वह है जिस पर बैठ कर गृहिणी बिना असुविधा के अपना कार्य कर सकें। कुर्सी व स्टूल की ऊँचाई इतनी होनी चाहिए कि गृहिणी के पाँव जमीन पर रखे जाएँ।

4. सर्वाधिक उपयुक्त उपकरणों का चयन किया जाए (Selection of maximumuse of equipment): उपयुक्त उपकरणों से समय व शक्ति की बचत होती है। कपड़ें सुखाने के लिए डायर, गलीचा साफ करने के लिए वैक्यूम क्लीनर उपयुक्त होता है।

5. खाद्य-सामग्री व छोटे उपकरणों को उपयोग करने के स्थान के पास रखना चाहिए। सभी बर्तन, खाद्य-सामग्री तथा उपकरण इस प्रकार रखे जाएँ, जिससे आवश्यकता पड़ने पर उन्हें शीघ्र उठाया जा सके।

6. कार्य के अन्तिम रूप में परिवर्तन (Changes in the last form of work): नई वस्तुओं के उपयोग से घर का काम सुविधाजनक हुआ है।

प्रश्न 9.
विभिन्न क्रिया कलापों के लिए घर को किन स्थल व कक्षाओं में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर:
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ये मुख्यतः क्रियाएँ हैं जिनको करने के लिए घर में स्थान चाहिए। इस सभी क्रियाओं के आगे कई उप-क्रियाएँ हैं, जिनके लिए स्थान चाहिए। जैसे – बर्तन धोने के लिए –
1. गन्दे बर्तन इकट्ठा रखने का स्थान।
2. बर्तन धोने की सामग्री रखने का स्थान।
3. पानी का प्रबन्ध जहाँ बर्तन धोए जाएँगे।
4. धुले बर्तनों को रखने के लिए उचित स्थान।

यह जरूरी नहीं कि घर में इन सभी क्रिया-कलापों को करने के लिए अलग-अलग स्थान हों। छोटे घरों में एक ही स्थान पर दो-तीन क्रियाएँ की जाती हैं। जैसे शयन कक्ष में बनाव-श्रृंगार, अध्ययन या सिलाई का काम करना। खाने का अलग कमरा नहीं है तो यह काम रसोई घर बरामदे या किसी अन्य कमरे में किया जा सकता है। इसलिए जब एक ही कमरे में एक से अधिक क्रियाओं को स्थान दिया जाता है तो स्थान व्यवस्था करना अनिवार्य है। किन्हीं दो परिवारों के लिए स्थान का विभाजन एक जैसा नही होता।

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किसी परिवार की स्थान व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारक हैं –

  • परिवार के पास उपलब्ध स्थान।
  • परिवार के सदस्यों की संख्या।
  • परिवार की आर्थिक व सामाजिक स्थिति।

घर चाहे छोटा हो या बड़ा, विभिन्न क्रियाओं के लिए स्थान का विभाजन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है –
1. एकान्तता-एकान्तता दो प्रकार की है। एक तो कमरे ऐसे होने चाहिए कि बाहर से अन्दर का दृश्य न दिखाई पड़े। या दरवाजे व खिड़कियों पर पर्दे लगा कर हो सकता है। दूसरे घर के अन्दर ही एक कमरे की दूसरे कमरे से एकान्तता (Privacy) होनी चाहिए। इसके लिए लॉबी या गलियारा बनाना चाहिए, जो विभिन्न कमरों को जोड़े भी तथा कमरों की एकान्ता भी बनी रहे।  लॉबी या गलियारा होने पर एक कमरे से निकल कर बाहर जाने के लिए दूसरे कमरे में से नहीं निकलना पड़ता।
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2. कमरों का पारस्परिक सम्बन्ध-कमरों में की जाने वाली क्रियाओं के अनुसार कमरों का पारस्परिक सम्बन्ध होना चाहिए। जैसे स्नान गृह, शयन कक्ष के नजदीक होना चाहिए। भोजन कक्ष रसोईघर के नजदीक होना चाहिए।
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3. घूमने-फिरने में सुविधा हो: इसके लिए कमरे में दरवाजे, खिड़कियों की स्थिति तथा फर्नीचर व्यवस्था ठीक होनी चाहिए। कमरे में यदि अधिक फर्नीचर रख दिए जाएँगें तो कमरे में चलने-फिरने की जगह न बचेगी। कमरों की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए कि एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के लिए अनावश्यक न चलना पड़े। यदि लॉबी या गलियारा है तो एक कमरे से निकल कर, लॉबी में से होकर दूसरे कमरे में जा सकते हैं। इससे सभी कमरों की एकान्तता बनी रहेगी।

4. कमरों का आकार-आयताकार कमरे, वर्गाकार कमरों की अपेक्षा अधिक बड़े दिखते हैं तथा अधिक सुविधाजनक होते हैं।

5. उपलब्ध स्थान का उचित उपयोग-आजकल अधिकतर लोगों के पास स्थान की कमी रहती है, इसलिए उपलब्ध स्थान का मितव्ययिता से प्रयोग करना चाहिए । इसके लिए दरवाजे व खिड़की के ऊपर के स्थान पर सामान रखने के लिए मियानी बनाई जा सकती है। दीवार में अलमारी बनानी चाहिए, जो कि फर्श पर रखी सामान्य अलमारी की अपेक्षा कम स्थान घेरती है। समान रखने वाले फर्नीचर का अधिक प्रयोग करना चाहिए जैसे बक्सेनुमा पलंग अथवा दीवान।

6. कार्य स्थान सघन लेकिन पर्याप्त हो-किसी भी कार्य को करने के लिए यदि अधि क खुला स्थान है तो वहाँ चलने फिरने के लिए काफी समय व शक्ति का व्यय होगा । अतः कार्य स्थान सघन होना चाहिए, लेकिन इतना स्थान हो कि कार्य करने का सामान रखने तथा कार्य करने की सुविधा हो। घर में स्थान की व्यवस्था परिवार के सदस्यों के अनुकूल एवं सुविधाजनक होनी चाहिए।

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7. स्वास्थ्यवर्धक-कमरों में पर्याप्त खिड़की, दरवाजे हों ताकि प्राकृतिक प्रकाश तथा शुद्ध ताजा हवा का आवागमन हो सके।

घर में विभिन्न क्रियाओं को करने के लिए तीन मुख्य कार्य केंद्र हैं –

  • निजी क्षेत्र-इसमें स्नान घर तथा शयन कक्ष आते हैं। यहाँ सबसे अधिक एकान्तता की आवश्यकता है।
  • कार्य क्षेत्र-इसमें रसोईघर, कपड़े धोने का स्थान, भोजन कक्ष, अध्ययन कक्ष, भण्डार घर आदि आते हैं।
  • मनोरंजन क्षेत्र-इसमें बैठक, बरामदा, आंगन आदि आते हैं।

इस क्षेत्र को अतिथियों के सत्कार, टी.वी. देखने, संगीत सुनने आदि के लिए प्रयोग किया जाता है।

आइए, अब हम देखें कि इन विभिन्न कमरों की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए –
बैठक (Drawing Room or Living Room): इस कमरे का उपयोग आने-जाने वाले मित्रों, अतिथियों को बैठाने, बातचीत करने के लिए किया जाता है। घर के सदस्य भी खाली समय में यहाँ विश्राम तथा मनोरंजन कर सकते हैं। बैठक साधारणतः बाकी कमरों से बड़ा तथा अधिक आकर्षक एवं सुव्यवस्थित होता है। बैठक की व्यवस्था तथा सज्जा से घर के सदस्यों की पसन्द, नापसन्द तथा व्यक्तित्व की झलक मिलती है। बैठक का कमरा प्रवेश द्वार के पास हो।

इसका एक दरवाजा बाहर की तरफ खुलना चाहिए ताकि आने-जाने वाले मेहमानों से घर की एकान्तता बनी रहे। यह कमरा आयताकार होना चाहिए। इसकी लम्बाई और चौड़ाई 3 और 2 के अनुपात में होनी चाहिए। आजकल बैठक के साथ-साथ इसमें भोजन का भी प्रबन्ध रखा जाता है। यदि इन दोनों क्रियाओं के लिए कमरे का प्रबन्ध करना है तो कमरे का आकार भी बड़ा होना चाहिए। इस कमरे में खिड़कियों की स्थिति ऐसी हो कि बाहर का सुन्दर दृश्य दिखे। कमरे में प्राकृतिक प्रकाश तथा स्वच्छ वायु का भी प्रबन्ध होना चाहिए।

बैठक में प्रयुक्त होने वाले फर्नीचर सुन्दर-टिकाऊ तथा हल्की हो जिन्हें आसानी से उठाया जा सके। फर्नीचर में सोफा-सैट या आराम कुर्सियां, बीच की मेज (Centre Table), छोटी मेज (Side Table), दीवान आदि रख सकते हैं। 6-8 लोगों के बैठने के लिए फर्नीचर होना चाहिए। फर्नीचर दीवार के साथ-साथ रखा जाए ताकि घूमने-फिरने में असुविधा न हो।

बैठक की सज्जा सुन्दर तथा सादी होनी चाहिए। यदि परिवार बड़ा है और स्थान की कमी है तो बैठक का प्रयोग रात के समय सोने के लिए भी कर सकते हैं। बैठक का एक भाग पढ़ने-लिखने के काम भी आ सकता है। यदि टी.वी. बैठक में रखा है तो परिवार के सभी सदस्य वहाँ बैठ कर अपना मनोरंजन भी कर सकते हैं।

खाने का कमरा (Dining Room): आजकल घरों में खाने के लिए अलग कमरे की व्यवस्था रहती है। यदि रसोईघर बड़ा है तो उसी में एक ओर इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। यह कमरा रसोईघर के पास होना चाहिए, लेकिन यहाँ से रसोईघर का भीतरी भाग नहीं दिखाई देना चाहिए। भोजन कक्ष में खाने की मेज तथा कुर्सियों की व्यवस्था की जाती है। मेज कितनी बड़ी हो तथा कितनी कुर्सियाँ हों, यह स्थान की उपलब्धता तथा सदस्यों की संख्या पर निर्भर करता है। मेज के इर्द-गिर्द घूमने के लिए पर्याप्त स्थान रखना चाहिए।

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भोजन कक्षा में क्राकरी तथा अन्य उपकरण रखने के लिए दीवार में आलमारी बनी होनी चाहिए। इस कमरे में फ्रिज रखने का भी प्रबन्ध कर सकते हैं। भोजन कक्ष में प्रकाश तथा स्वच्छ हवा आनी चाहिए। कमरे में हाथ धोने के लिए सिंक भी रख सकते हैं। स्थान की कमी के कारण यदि भोजन कक्ष की अलग व्यवस्था नहीं है तो रसोईघर, बरामदे या किसी अन्य कमरे में भोजन खाने की व्यवस्था हो सकती है। भोजन कक्ष का प्रयोग पढ़ने-लिखने या अन्य क्रियाएँ जैसे सिलाई, पेन्टिंग आदि करने के लिए भी हो सकता है।

शयन कक्ष (Bed Room): शयन कक्ष का प्रयोग आराम करने तथा रात को सोने के लिए किया जाता है। इसलिए यह कमरा शोरगुल से दूर होना चाहिए। चूंकि यह निजी कमरा है अतः इसमें सबसे अधिक एकान्तता की आवश्यकता है। 10 वर्ष से अधिक उम्र के लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शयन कक्ष होने चाहिए। शयन कक्ष का मुख्य फर्नीचर पलंग है। इसके अतिरिक्त यदि स्थान है तो दो आराम कुर्सी तथा एक छोटी मेज भी रख सकते हैं।

इस कमरे का प्रयोग यदि पढ़ने तथा श्रृंगार के लिए भी करना है तो पढ़ने की मेज तथा शृंगार मेज रखने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। यह मेज ऐसी जगह रखी जाए, जहाँ प्रकाश की उचित व्यवस्था हो। जहाँ तक सम्भव हो, शयन कक्ष के दरवाजे, खिड़कियाँ पूर्व दिशा की ओर हों ताकि सुबह के सूर्य का प्रकाश तथा शुद्ध वायु आ सके। इस कमरे में सुरक्षा, शान्ति तथा आराम होनी चाहिए। भारतीय घरों में गर्मी के मौसम में बरामदा, आंगन या घर की छत भी सोने के काम में आती है।

रसोईघर (Kitchen): यह घर का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। गृहिणी अपने जीवन का एक तिहाई समय रसोईघर में व्यतीत करती है । सुव्यवस्थित तथा आधुनिक उपकरणों से युक्त रसोईघर में समय तथा शक्ति दोनों की बचत होती है। सफाई भी आसानी से की जा सकती है। रसोईघर भोजन कक्ष के नजदीक होना चाहिए। यह शयन कक्ष तथा बैठक से दूर होना चाहिए ताकि धुआं तथा गन्ध आदि इन कमरों में न पहुंचे। रसोईघर में प्रकाश तथा हवा का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। रसोईघर की दिशा उत्तर-पूर्व की ओर हो तो अच्छा है ताकि सुबह की धूप आ सके तथा बाकी समय रसोईघर ठण्डा रहे।

रसोईघर के दरवाजे और खिड़कियों पर जाली रहनी चाहिए ताकि मक्खी, मच्छर से बचाव रहे। रसोइघर का फर्श ऐसा हो जो आसानी से साफ हो जाए। इसका ढलान भी सही होना चाहिए, जिससे कि सारा पानी नाली में निकल जाए और खड़ा न रहे। खड़ी रसोई में स्लैब के ऊपर की दीवारें टाईल्स की होनी चाहिए ताकि आसानी से साफ हो जाएँ। रसोइघर में गर्म हवा तथा धुआं निकलने के लिए चिमनी या हवा निकालने वाला पंखा (Exhaust Fan) लगा हो। बहुत-से घरों में खाना बनाने के लिए अलग कमरे की व्यवस्था नहीं रहती।

बरामदे या किसी कमरे के कोने में खाना बनाने का काम होता है। यहाँ भोजन बनाने की व्यवस्था बैठ कर कर सकते हैं या एक मेज लगा कर खड़े होकर उस पर खाना बना सकते हैं। रसोइघर की व्यवस्था करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि रसोइघर में काम करने के लिए तीन मुख्य स्थान हैं –

  • खाना बनाने का स्थान (Cooking Area)
  • खाना बनाने की तैयारी करने का स्थान (Preparation Area)
  • बर्तन धोने का स्थान (Washing Area)

सुव्यवस्थित रसोईघर के लिए यह आवश्यक है कि ये तीनों कार्य स्थान इस प्रकार हों कि काम में रुकावट न पड़े। तीनों कार्य क्षेत्रों में 4-5′ का अन्तर होना चाहिए। तैयारी करने का स्थान खाना बनाने के स्थान के नजदीक हो। तैयारी करने में पानी की भी आवश्यकता होती है अतः तैयारी केन्द्र के पास पानी की भी व्यवस्था होनी चाहिए।

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आजकल अधिकतर घरों में खड़े रसोईघर (Standing Kitchen) बनाए जाते हैं, जहाँ भोजन की तैयारी करने, बनाने तथा बर्तन धोने की व्यवस्था खड़े होकर की जाती है। खड़े होकर काम करने में उठाने, रखने के लिए कम शारीरिक गतिविधियाँ करनी पड़ती हैं, जिससे कम समय तथा शक्ति लगती है, रसोईघर भी अधिक साफ रहता है।

1. खाना बनाने का स्थान-यह स्थान तैयारी केन्द्र के दायीं ओर होना चाहिए। यहाँ मुख्य उपकरण ऊर्जा का स्रोत है। जैसे अंगीठी, स्टोव या गैस । खड़े होकर खाना बनाने के लिए फर्श से उचित ऊँचाई पर स्लैब बनाई जाती है। इस स्लैब पर स्टोव या गैस रखने की व्यवस्था की जाती है। स्लैब चिकना होना चाहिए जो पानी न सोखे तथा आसानी से साफ हो जाए।

2. खाना बनाने की तैयारी करने का स्थान-भोजन पकाने से पहले जो सम्बन्धित तैयारी होती है जैसे-सब्जी काटना, दाल-चावल साफ करना, मसाला पीसना, आटा गूंथना आदि क्रियाएँ यहाँ की जाती है। इस क्षेत्र में बिजली के प्वाइंट की व्यवस्था भी हो ताकि मिक्सी आदि वहीं रख कर प्रयोग कर सकें।

3. बर्तन धोने का स्थान-यहाँ पानी की उपलब्धता तथा पानी के बाहर निकलने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। खड़े होकर बर्तन धोने हैं तो सिंक हो और उसके साथ ढलानदार बोर्ड हो जिस पर बर्तन धोकर सखने के लिए रखे जा सकते हैं। बर्तनों के सख जाने पर उन्हें उचित स्थान पर रख सकते हैं। सिंक के ऊपर खिड़की होनी चाहिए ताकि रसोईघर में गीलापन न रहे।

रसोईघर में संग्रहीकरण के लिए स्थान व्यवस्था-इन कार्य क्षेत्रों के अतिरिक्त खाना बनाने में जो सामान प्रयुक्त होना है जैसे-आटा, चावल, दाल, मसाले, चीनी, चाय पत्ती, घी, तेल आदि तथा बर्तन रखने के लिए भी स्थान होना चाहिए। यदि स्थान उपलब्ध है तो रसोईघर के साथ ही स्टोर बना सकते हैं, जहाँ सारे भोज्य पदार्थ रख सकते हैं। बर्तन रखने के लिए भी अलग स्थान हो सकता है, लेकिन अधिकतर घरों में अलग से स्टोर नहीं होता, वहाँ इन सभी चीजों को रखने की व्यवस्था रसोईघर में ही करनी पड़ती है।

सुविधा के लिए जो सामान जिस कार्य-स्थान से सम्बन्धित है, उसके उसी के पास संग्रह करना चाहिए। स्थान की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए जो स्थान स्लैब तथा फर्श के बीच खाली है, वहाँ अलमारियाँ बनाकर आवश्यक सामान रख सकते हैं। जैसे खाना बनाने के स्थान के नीचे अलमारी बन कर, गैस सिलैण्डर या खाना बनाने में प्रयुक्त होने वाले बर्तन रख सकते हैं। तैयारी स्थान के ऊपर तथा नीचे अलमारी बना कर दाल, मसाले तथा अन्य उपकरण रख सकते हैं। जहाँ सिंक है, उसके पास स्लैब पर रैक लगा कर बर्तन रख सकते हैं। बर्तन धोने में प्रयुक्त होने वाली सामग्री रखने की व्यवस्था भी सिंक के पास होनी चाहिए।

रसोईघर में विभिन्न भोज्य पदार्थ इस प्रकार रखे जाएँ कि उन्हें ढूंढ़ने में कठिनाई न हो। एक प्रकार का सामान एक साथ रखें। जैसे दालें एक साथ, मसाले एक साथ हों। डिब्बों के ऊपर नाम लिखा हो तो ढूँढ़ने में समय नहीं लगता। चाय, चीनी, घी, का उपयोग बार-बार होता है, उन्हें खाना बनाने के स्थान पर एक शेल्फ बनाकर रख सकते हैं।

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रसोईघर में ऊपर की तरफ भी स्लैब डाल सकते हैं, जहाँ कभी-कभी प्रयोग होने वाले बर्तन अथवा अन्य सामान रख सकते हैं। रसोईघर में पानी भर कर रखने के लिए भी स्थान होना चाहिए। आकार के आधार पर रसोईघर चार प्रकार के हो सकते हैं। रसोईघर का आकार कैसा भी हो, उसमें तीन मुख्य कार्य स्थान होने चाहिए।
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बच्चों का कमरा (Children Room): भारतीय परिवारों में साधारणत: बच्चों का अलग कमरा नहीं होता। जगह की कमी के कारण या जगह भी हो तो उसे महत्त्व नहीं दिया जाता है। लेकिन घर में कोई स्थान ऐसा होना चाहिए जिसे बच्चा अपना समझे, अपने अनुसार वहाँ पढ़ या खेल सके। बच्चों के कमरे में खिड़कियाँ नीची हों ताकि आसानी से बाहर का दृश्य दिख सके।

फर्नीचर भी कम ऊँचा, हल्का, सादा हो। अलमारी तथा शैल्फ इतनी ऊँचाई के होने चाहिए कि बच्चा आसानी से अपना सामान रख तथा उठा सके। यह कमरा रसोईघर के पास हो ताकि गृहिणी काम करते समय बच्चे पर नजर रख सके। पढ़ने वाले बच्चों के कमरे में पढ़ने की मेज-कुर्सी की व्यवस्था होनी चाहिए।

लॉबी (Lobby): आधुनिक घरों में लॉबी की व्यवस्था को अधिक महत्त्व दिया जाता है। इससे एकान्तता तो बनी ही रहती है, साथ-साथ यहाँ और भी कई कार्य किए जा सकते हैं। अगर लॉबी थोड़ी बड़ी है तो घर के सदस्य वहाँ बैठ कर टी.वी. देख सकते हैं, बच्चे खेल सकते हैं, पढ़ सकते हैं या गृहिणी सिलाई, बुनाई का काम कर सकती है।

स्नान घर (Bath Room): जहाँ तक हो सके स्नान घर शयन कक्ष के साथ हो। स्नान घर के दो दरवाजे होने चाहिए, एक कमरे में खुले तथा दूसरा बाहर की तरफ। स्नानघर की खिड़की ऊँची तथा बड़ी हो ताकि पर्याप्त रोशनी एवं हवा आ सके। खिड़की पर फ्रॉस्टेड शीशा (Frosted Glass) लगा हो।

स्नान घर में नहाने के लिए नल, फव्वारा हो तथा वाश बेसिन (Wash Basin) लगा हो। यदि कपड़े भी स्नानघर में ही धोए जाने हैं तो कपड़े धोने की मशीन रखने की भी व्यवस्था हो। नहाने से सम्बन्धित सामग्री तथा कपड़े धोने की सामग्री रखने के लिए दीवार में शेल्फ बने हों, कपड़े, तौलिया आदि टाँगने के लिए दरवाजे के पीछे खूटियाँ लगी हों। स्नान घर की फर्श तथा दिवारें चिकनाई रहित एवं मजबूत हों। दीवारों पर टाइल्स लगी हों तो सफाई करना आसान रहता है।

आजकल स्नानघरों साथ शौचालय भी जुड़े रहते हैं। इसमें भारतीय या पश्चिमी पद्धति की सीट लगी होती है। सम्पन्न घरों में प्रक शयन कक्ष के साथ एक स्नानघर जुड़ा हुआ भी हो सकता है। यदि स्नान घर छोटा है तो कपड़े धोने की व्यवस्था बाहर आंगन में की जा सकती है। सम्पन्न घरों में कपड़े धोने का कमरा (Laundry room) अलग ही होता है।

स्टोर (Store बक्से, सूटकेस तथा कभी-कभी प्रयोग होने वाले सामान को रखने के लिए स्टोर बनाया जाता है। छोटे घरों में स्टोर उपलब्ध न होने पर सामान रखने वाला फर्नीचर प्रयोग करना चाहिए या दरवाजे, खिड़कियों के ऊपर मियानी बनानी चाहिए। सीढ़ियों के नीचे भी सामान रखने के लिए जगह बनाई जाती है।

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बरामदा (Verandah): भारतीय घरों में बरामदे का बहुत महत्त्व है। बरामदा हमें गर्मी तथा वर्षा की बौछारों से बचाता है। एकदम अनजान व्यक्ति को, जिसे हम अन्दर नहीं ले जाना चाहते, बरामदे में बैठा सकते हैं। बरामदा घर में आगे या पीछे या दोनों ओर बना सकते हैं। साधारण घरों में अधिकांश समय बरामदे में बीतता है।

बरामदे में सुबह शाम बैठ सकते हैं, बच्चे खेल सकते हैं; गृहिणियाँ सब्जी छीलने, काटने आदि का काम कर सकती हैं। स्थान की कमी के कारण आवश्यकता हो तो इसे बन्द करवा कर कमरा भी बनवाया जा सकता है। अगर धन तथा स्थान की कमी नहीं है तो घर में अलग से शृंगार कक्ष (Dressing Room), अतिथि कक्ष (Guest Room), अध्ययन कक्ष (Study Room), पूजा कक्ष (Prayer Room) कपड़े धोने का कक्ष (Laundry Room) भी बनवाया जा सकता है।

प्रश्न 10.
रंग और सहायक वस्तुओं का सजावट में क्या योगदान है ?
उत्तर:
रंग और सहायक वस्तुओं का सजावट में योगदान (Use of Colour and Accessories in Decoration): स्थान व्यवस्था के क्रियात्मक रूप के साथ-साथ आकर्षण भी महत्त्वपूर्ण रूप है। जब स्थान सीमित हो तो सजावट सोच-विचार कर करनी चाहिए। किसी भी स्थान की सुन्दरता को रंग व सहायक वस्तुओं से बढ़ाया जा सकता है। घर की सुसज्जा के लिए रंग की बहुत महत्ता है। रंग-घर को सुन्दर और आकर्षित दिखाने में रंग का एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। इससे भावात्मक प्रभाव पैदा होता है। समस्या केवल यह है कि उसे रंगने तथा कार्य के स्थान के लिए सही-सही चुनना। रंग को पूरी तरह समझने के लिए उसके तीन आयामों को जानना आवश्यक है।

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वे हैं-वर्ण, मात्रा व मूल्य (मान)।
(क) वर्ण (Hue): इससे मूल रंग का पता चलता है। जैसे-लाल, हरा और नीला।
(ख) मूल्य (Value): रंग का हल्कापन या भारीपन जैसे-हल्का हरा, गहरा हरा।
(ग) मात्रा (Intensity): रंग की मन्दता व चमक के बारे में बतायें जैसे रक्त की तरह लाल, गुलाब का लाल इत्यादि।
विभिन्न रंगों का वर्गीकरण तीन भागों में किया जा सकता है, प्राथमिक, द्वितीयक ओर तृतीयक रंग।

पीला, लाल और नीला प्रथम श्रेणी अर्थात् प्राथमिक रंग है।
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दो प्राथमिक रंगों को समानुपात में मिलाने से एक द्वितीयक रंग बनता है। जैसे : नारंगी, हरा बैंगनी।
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तृतीयक रंग को एक प्राथमिक रंग तथा साथ वाले द्वितीयक रंग को मिलाकर बनाया जाता है जैसे लाली-नारंगी, लाल-बैंगनी, पीला-नारंगी और पीला-हरा, काला-सफेद, ग्रे और मटमैला रंग तटस्थ रंग हैं जो बाकी रंगों को सुन्दर दिखाते हैं।
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रंगों की योजना (Colour Schemes): रंगों की योजना बनाना एक दिलचस्प कार्य है। कई प्रकार की रंग योजनायें हैं। उनका वर्गीकरण संबंधित और अलग-अलग रंग योजना में किया जा सकता है।
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एक-रंगीय योजना (Mono-cromatic colour scheme): इसमें कोई भी एक मनपसन्द रंग प्रयोग किया जाता है। एक ही रंग के विभिन्न शेड प्रयोग किये जा सकते हैं। एक-रंगीय लाल योजना में पिंक, लाल, मैरून आदि रंग आते हैं।

समदर्शी योजना (Analogous colour scheme): समदर्शी योजना में प्राथमिक रंग के साथ उसके साथ वाले द्वितीयक रंगों का प्रयोग करते हैं। जैसे लाल-बैंगनी, नीला-बैंगनी इत्यादि । इस योजना में 3-5 रंग हो सकते हैं तथा आप अपनी आवश्यकतानुसार रंग चुन सकते हैं।

विपरीत योजना (Complementary colour scheme): इसमें रंग चक्र के बराबर की दूरी वाले तीनों रंगों को प्रयोग करते हैं जैसे पीला-नीला लाल, हरा व केसरी-बैंगनी, लाल, केसरी-नीला, बैंगनी-पीला हरा आदि।

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खण्डित विपरीत योजना (Split colour scheme): इसमें रंग चक्र के एक रंग के साथ इसके सामने वाले रंग को छोड़कर उसके आस-पास के रंगों को लिया जाता है जैसे पीला-नीला बैंगनी और लाल बैंगनी।

त्रिकोणीय योजना (Triad colour scheme): इसमें रंग चक्र के एक रंग के रंगों को लिया जाता है जैसे पीला-नीला बैंगनी और लाल बैंगनी।

रंगों के लाभ (Uses of colour)
व्यक्तित्व उभारना (Express personality): अगर आप गर्म स्वभाव के व्यक्ति हैं तो आप सारे रंगों के सामने लाल को ही प्रयोग में लायेंगे । पीले को मध्यम स्वभाव का कहा गया है। हरा, नीला ठंडे रंग के नाम से जाने जाते हैं।

रंग कमरे का वातावरण निश्चित करता है –
चमकदार रंग गर्मी, शक्ति व मित्रता के रूप हैं जबकि सफेद रंग सफाई; पवित्रता व शांति का द्योतक है। रंग से कमरे का आकार व स्थान बदल सकता है-एक लंबे और कम चौड़े कमरे का आकार आप बदल सकते हैं। लम्बी दीवारों को गहरे रंगों से रंग कर कमरा अनुपाती बनाया जा सकता है। एक अंधेरा व छोटा कमरा, सफेद रंग करने से बड़ा दिखता है। ठीक ढंग से रंग . का प्रयोग करने से स्थान की सुन्दरता बढ़ जाती है।

कमियों को छुपाने के लिए रंग (Colour for disguising flaws): भवन निर्माण के समय रह गई कुछ कमियों को छुपाने के लिए अक्सर रंग का प्रयोग करके भवन को सुन्दर बना दिया जाता है। सफेद दीवार के सामने लाल रंग की पुष्प परिसज्जा हर व्यक्ति को प्रसन्नचित्त कर देती है। रंग किसी भी स्थान को सुन्दर बना देता है। सजावट के उपसाधनों में रंगों का प्रयोग जगह की सुन्दरता को चार चांद लगा देता है।

प्रश्न 11.
रंगों का गृहसज्जा में प्रयोग करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखेंगे?
उत्तर:
रंग प्रयोग करने की मार्गदर्शिका (Guidelines for Using Colours):
1. वही रंग प्रयोग करें जो परिवार के सदस्यों को अच्छा लगे।
2. हल्का, कम मात्रा व ठंडे रंग को प्रयोग करने से कमरा बड़ा लगता है।
3. गहरे रंग प्रयोग करने से कमरा छोटा लगता है।
4. विषम रंग अपनी ओर ध्यान आकर्षित करते हैं –
(क) विषम रंग की दीवार के विरुद्ध सफेद सोफा अधिक ध्यान आकर्षित करेगा बजाय इसके कि सफेद दीवार के विरुद्ध सफेद सोफा रखा गया हो।
(ख) एक कमरे में बहुत से विषम रंगों से ध्यान बंट जाएगा तथा थकान पैदा करेगा।
5. एक जैसा रंग आरामदायक होता है।
6. लाल रंग पर आधारित रंग कमरे को गर्म बनाते हैं।
7. नीले रंग पर आधारित रंग कमरे को ठंडा बनाते हैं ।
8. हल्के रंग शीघ्र गंदे हो जाते हैं तथा अतिरिक्त सफाई मांगते हैं। गहरे रंगों पर मिट्टी चमकती है।
9. साथ-साथ रंग प्रयोग करने में उनका अन्तर बढ़ जाता है –
(क) हल्के और गहरे. रं का साथ-साथ प्रयोग करने पर हल्का अधिक हल्का व गहरा अधिक गहरा लगता है
(ख) चमक व फीके रंम को साथ-साथ प्रयोग करने से चमकीले रंग अधिक चमकीले व फीव अधिक फीके लगते हैं।
(ग) जब गर्म व ठंडे रंग साथ-साथ प्रयोग किये जाते हैं तो ठंडे अधिक ठंडे व गर्म अधिक गर्म लगते हैं।
10. रंग का गहरापन उसकी मात्रा पर आधारित होता है। जितना भी क्षेत्र अधिक होगा, रंग उतना ही गहरा लगता है।
11. बड़े क्षेत्र पर हल्का रंग करने से अच्छा लगता है। चमकीले रंगों को थोड़ी मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।
12. रंग योजना अच्छी लगती है जब एक रंग का अधिक प्रयोग किया जाए।
13. जब विपरीत रंग प्रयोग में लाये जाते हैं तो दोनों एक-दूसरे को अधिक चमकीला बना देते हैं।
14. रोशनी के साथ रंग भी बदल जाते हैं। बनावटी रोशनी रंगों को नर्म कर देती है। वह रंग जो बनावटी रोशनी में आकर्षित लगते हैं, प्राकृतिक रोशनी में आकर्षक लगें, यह आवश्यक नहीं।
15. तटस्थ रंग भी रंग योजना का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
16. खुरदरी सतह पर रंग गहरे लगते हैं तथा वही रंग से चिकनी सतह पर उतने गहरे नहीं लगते।

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प्रश्न 12.
निम्नलिखित स्थितियों में रंगों का किस प्रकार प्रयोग करेंगे –
(क) एक छोटा कमरा बड़ा लगे
(ख) एक अंधेरा कमरा उज्जवलित लगे
(ग) लम्बा और पतला कमरा अनुपात में लगे।
उत्तर:
रंगों की सहायता से बदलाव लाने के तरीके
I. एक छोटा कमरा बड़ा लगे –
(क) दीवारों को हल्के रंग पेन्ट करने से (By painting the walls with light colours)
(ख) पूरे कमरे में एक ही रंग का प्रयोग करके (Using the same colour throughout the room)
(ग) ठंडे रंगों का प्रयोग करके (Making use of cool colours)
II. एक अंधेरामय कमरा उज्जवलित लगे-गहरे रंगों का प्रयोग करके (Making use of warm colours)
III. एक लम्बा व पतला कमरा अनुपात में लगे –
(क) लम्बी दीवारों को हल्के रंगों से पेन्ट करना तथा छोटी दीवारों को गहरे रंग से पेन्ट करना चाहिए (By painting longer walls in cool colours and shorter walls in warm colours)
(ख) लम्बी दीवारों को रंग की गहराई बढ़ाते हुए प्रयोग करना तथा छोटी दीवारों को रंग की गहराई कम करते हुए प्रयोग करना (By painting longer walls in darker value of the colour and shorter walls in lighter value of the same colour)

प्रश्न 13.
आपकी सहेली अब एक कमरे के मकान में रहने लगी है। उसके लिए फर्नीचर की विशेषताएँ बताएँ। जगह बड़ी लगने के लिए फर्नीचर सज्जा के दो तरीके सुझाएँ।
उनर:
छोटे कमरों के लिए फर्नीचर सज्जा की विशेषताएँ –

  • बहुमुखीय प्रयोग (Multi puniti)
  • हल्का पन (Light)
  • मजबूत व ज्यादा देर तक चलने वाला (durable)
  • तह कग्न वान (Folding)

जगह बड़ी लगने के तरीके (फर्नीचर द्वारा):

  • आवश्यकतानुसार थोड़ा फर्नीचर प्रयोग में रखे।
  • जब फर्नीचर की आवश्यकता न हो तो तह कर दें।
  • बड़ा फर्नीचर जैसे पलंग व अलमारी दीवार के साथ रखें।
  • जगह के इस्तेमाल के अनुसार फर्नीचर रखें। सम्बन्धित कार्य जगह पास-पास होनी चाहिए।
  • दीवारों की जगह का अत्यधिक प्रयोग करना चाहिए। (built in fixtures)

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

Bihar Board Class 11 Home Science कार्याचर या कार्य नैतिकता Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत जैसे विकासशील देश की सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Income) कम हो जाती है – [B.M.2009A]
(क) समय पर न पहुंचने के कारण
(ख) कार्य का सैद्धांतिक जानकारी (Theoretical knowledge और व्यवहारिक जानकारी (Pratical knowledge) न होने के कारण
(ग) कार्य अवधि में अपने कार्य स्थान पर उपलब्ध न रहना
(घ) उपर्युक्त में सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त में सभी

प्रश्न 2.
टीम की भावना दर्शाता है – [B.M.2009A]
(क) विकास का
(ख) सहयोग का
(ग) अवकाश का
(घ) अपात का
उत्तर:
(क) विकास का

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प्रश्न 3.
किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रथम आईना है – [B.M.2009A]
(क) व्यवहार
(ख) भाषा
(ग) आवाज
(घ) संस्कार
उत्तर:
(ख) भाषा

प्रश्न 4.
एक अच्छे ‘व्यक्तित्व की प्रथम पहचान है – [B.M.2009A]
(क) विनम्र भाषा
(ख) कटु भाषा
(ग) तुनकता
(घ) उग्र भाषा
उत्तर:
(क) विनम्र भाषा

प्रश्न 5.
हल्का श्रम के अंतर्गत कौन-सा कार्य आता है ? [B.M.2009A]
(क) फर्श साफ करना
(ख) कपड़े धोना
(ग) प्रेस करना
(घ) बुनाई करना
उत्तर:
(घ) बुनाई करना

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी भी कार्य स्थिति के लिए श्रमिक, कार्य उपकरण व कार्य स्थान के कौन-कौन-से तीन महत्त्वपूर्ण संघटक हैं ?
उत्तर:
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प्रश्न 2.
कार्याचार (Work Ethics) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कार्याचार से अभिप्राय है कार्य के समय व्यक्ति का आचार या व्यवहार। कार्याचार या कार्य नैतिकता किसी भी कार्य को आनंदित ढंग से पूर्ण करने के लिए आवश्यक है। कार्याचार से कार्य करने तथा करवाने वाले दोनों को आदर तथा सम्मान का भाव मिलता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

प्रश्न 3.
कार्य नैतिकता (Work Ethics) से संबंधित कोई पांच आदतें लिखें।
उत्तर:

  • कार्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा।
  • कार्य के प्रति नियमित व समयनिष्ठ होना।
  • कार्य को सही रूप में समझना।
  • अपने सहकर्मियों के साथ नम्र व सादर भाषा में बोलना।
  • अपने साधनों का उचित प्रबंध व उपयोग करना।

प्रश्न 4.
कार्य स्थान पर अनुशासन रखने के लिए दो महत्त्वपूर्ण तथ्य लिखिए।
उत्तर:
1. समयनिष्ठा (Punctuality)।
2. नियमितता (Regularity)।

प्रश्न 5.
नम्र व मृदु व्यवहार (Calm & Soft behaviour) कार्यक्षमता को बढ़ाता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कार्यालय में मधुर और प्रसन्न वातावरण बनाए रखने में मधुर व नम्र भाषा का प्रयोग बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि ऊँची आवाज में बोला जाए तो लोगों में कड़वाहट उत्पन्न होती है, झगड़ा-फसाद हो जाता है और बहसबाजी में न केवल समय व्यर्थ जाता है परन्तु हमारी शान्ति भी व्यर्थ जाती है। परिणामस्वरूप हमारी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है।

प्रश्न 6.
कार्य में दक्षता (Efficiency in work) का कार्यपूर्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
अपने कार्य को सफलतापूर्वक करने हेतु उस कार्य में दक्षता हासिल करना अति आवश्यक है। कार्य दक्षता हासिल करने से न केवल कार्य समय पर पूरे होते हैं अपितु आत्मिक सन्तुष्टि भी प्रदान करती है। किसी भी कार्य को रुचिपूर्वक करते रहने हेतु सन्तुष्टि की प्राप्ति (Job satisfaction) अति आवश्यक है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कार्य नैतिकता का क्या अर्थ है तथा इसके क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
कार्य नैतिकता (Work ethics): का अर्थ सदाचार तथा गलत-सही अनुभूति होना है, कार्य नैतिकता कार्य करने की मानक स्थिति है। व्यक्ति की अच्छे-बुरे की सही और गलत अवधारणा ही उसके कार्य पर प्रभाव डालती है।

लाभ (Advantages):
किसी भी कार्य को पूरी लगन से करने के निम्नलिखित लाभ हैं –

  • कार्य करने वाले व्यक्ति तथा कार्य करवाने वाले व्यक्ति को सन्तुष्टि होती है और आनन्द प्राप्त होता है।
  • व्यक्ति को कार्य करने का उचित उद्देश्य मिलता है और वह उद्देश्यहीन होकर कार्य को केवल कार्य करने के लिए नहीं करता है।
  • पूरी लगन से कार्य करने पर व्यक्ति अपने द्वारा अपने अधिकारियों द्वारा बनाए लक्ष्यों की प्राप्ति सरलतापूर्वक करता है।
  • कार्य पूर्ण होने अथवा लक्ष्य प्राप्ति से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता है जो उसे भविष्य के लिए प्रेरित करता है।
  • व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह भविष्य में कार्यों को और अच्छे ढंग से करने का प्रयास करता है।

प्रश्न 2.
कार्य स्थल पर अनुशासन (Discipline) क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
अनुशासन-व्यवस्था का एक हथियार (Discipline as a Tool of Management): अनुशासन लक्ष्य की सफलता को प्राप्त करने के लिए व्यवस्था का एक अस्त्र है। अनुशासन एक प्रकार का दबाव है जिसके द्वारा लक्ष्य प्राप्ति के लिए बनाए गए निर्देशों तथा नियमों का पालन कराया जाता है। यह संस्था या समूह के सामान्य कार्यकलापों के लिए उत्तरदायी है। व्यवस्था को उपर्यक्त दोनों प्रकार की विधियों के आवश्यकतानसार प्रयोग द्वारा बनाए रखना चाहिए। इससे एक अच्छे कार्यकर्ता को अभिप्रेरणा मिलती है तथा कर्तव्यों से विमुख कार्यकर्ता को सजा।

इससे अच्छे कार्यकत्तओं की उपलब्धियों को देखकर दूसरे के मन में इसकी इच्छा जागती है तथा वह भी अधिक मेहनत करता है। परन्तु इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उस वर्ग के व्यक्तियों को जिनके पास ये सभी अधिकार हैं, उन्हें पहले स्वयं उ.वेत आदर्श व्यवहार प्रस्तुत करना चाहिए अर्थात् अपने अधीन काम करने वाले कार्यकर्ताओं को आदेश देने से पूर्व उन्हें उन नियमों एवं सिद्धान्तों को स्वयं अमल में लाना चाहिए, जिसका पालन वे दूसरों से करवाना चाहते हैं। तभी सही अनुशासन कायम हो पाएगा।

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प्रश्न 3.
कार्यस्थल पर नैतिकता का पालन करने के नियमों का उल्लेख करें।
उत्तर:
अपने कार्यस्थल पर नैतिकता का पालन करना अति आवश्यक है ताकि कार्य सफलतापूर्वक किया जा सके। ये नियम निम्न हैं –

  • कार्य के प्रति निष्ठा रखना।
  • कार्य में दक्षता हासिल करना।
  • संसाधनों का सुव्यवस्थित ढंग से प्रयोग करना अर्थात् अपना समझ कर प्रयोग करना।
  • सुनियोजित व नियमित ढंग से कार्य करना।
  • अपने स्थान पर उपलब्ध रहना व कार्यरत रहना।
  • मधुर व नम्र भाषा का प्रयोग करना।
  • संगठन व सहयोग की भावना से कार्य करना।
  • अपने कार्य से सम्बन्धित नई जानकारी प्राप्त करते रहना तथा अपने ज्ञान को विशेष कार्यक्रमों द्वारा आधुनिक बनाना।

उपर्युक्त नियमों का पालन करने से ही वांछित परिणाम मिल सकते हैं अन्यथा उत्तम कार्यस्थल व उपकरण लेने के बाद भी सफलता असम्भव है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कार्यस्थल पर अनुशासन में रहने के लिए किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए ? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
कार्य चाहे घर अथवा बाहर का हो, हमें निम्नलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है –
1. अनुशासन (Discipline): किसी भी कार्य को करने के लिए अनुशासन के नियमों का पालन करना आवश्यक है। कोई भी कार्य यदि अनुशासित ढंग से न किया जाए तो वह सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं होता और उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होती है। अनुशासन बनाए रखने के लिए प्रत्येक कार्यालय अथवा घर में कुछ नियम बनाए जाते हैं, जैसे कार्यालय में समय पर पहुँचना, अपने से बड़े पद के अधिकारी का सम्मान करना, सौंपे गए कार्य को उचित ढंग से पूरा करना आदि।

घर में विभिन्न परिवार के सदस्यों के लिए भिन्न-भिन्न नियम होते हैं, जैसे बच्चों को शाम को निश्चित समय तक घर लौटना, समय पर पढ़ना तथा खेलना, समय पर स्कूल में पहुंचने के लिए समय पर प्रात:काल उठना व तैयार होना आदि। अनुशासन के अभाव में कोई भी कार्य सन्तोषजनक रूप से पूर्ण नहीं होता है। अनुशासनहीन व्यक्ति का व्यक्तित्व बिखरा हुआ होने के कारण कार्य के परिणामों में भी इसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

कार्यस्थल पर अनुशासन निम्न दो प्रकार से लाया जा सकता है –
(क) सकारात्मक विधि (Positive Method)
(ख) नकारात्मक विधि (Negative Method)

(क) सकारात्मक विधि-इस विधि द्वारा व्यक्ति का कार्य के प्रति अच्छा दृष्टिकोण, उसमें अच्छी आदतों का विकास, उसका प्रोत्साहन तथा उसकी प्रशंसा द्वारा कार्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाया जाता है जिससे वह कार्य को पूरी लगन से करे और उसे अपने पर बोझ न समझे।

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(ख) नकारात्मक विधि-इस विधि द्वारा व्यक्ति को दंड व जुर्माने के डर से अनुशासित किया जाता है जिससे वह कार्य को बोझ समझकर करता है और सदैव कार्यप्रणाली को दोषी ठहराता है।

2. समय पर कार्य करना (Working in time): उचित समय पर कार्य करना आवश्यक है। प्रत्येक कार्य के लिए एक उचित समय होता है और वह समय हाथ से निकलने के पश्चात् दोबारा वापस नहीं आता है। यहाँ पर समय पर कार्य करने से अभिप्राय कार्यस्थल में समय पर पहुँचना भी है। यदि कार्यस्थल में पहुंचने का कोई निश्चित समय नहीं होगा तो वहाँ कार्य करने वाले सभी अपनी सुविधा एवं इच्छानुसार पहुंचेंगे और दूसरों के लिए असुविधा का कारण बनेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति को यह अवश्य समझ लेना चाहिए कि जो असुविधा एवं खिन्नता उन्हें दूसरों का इन्तजार करने में होती है शायद वही असुविधा एवं खिन्नता दूसरों को भी उनके देर से पहुंचने पर होगी। उदाहरण के लिए बैंक अथवा किसी अन्य कार्यालय में किसी अधिकारी के देर से आने पर यदि कार्य देर से शुरू हो तो वहाँ पर इन्तजार कर रहे व्यक्तियों को किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यह उस व्यक्ति से अच्छा और कोई नहीं जान सकता।

कई कार्य स्थल तो ऐसे हैं जहाँ पर यदि देर से पहुँचा जाए तो कार्य में विलम्ब तो होगा ही उसके साथ-साथ हम अनेक व्यक्तियों के लिए एक गलत उदाहरण बनेंगे। उदाहरण के लिए स्कूल, कॉलेज आदि में यदि शिक्षक देर से पहुँचेंगे तो वह विद्यार्थियों के लिए क्या उदाहरण बनाएँगे। इस प्रकार कुछ व्यक्तियों की लापरवाही के कारण अनेक विद्यार्थी अनजाने ही समय की पाबन्दी को अपना जीवन मूल्य नहीं बना पाते हैं।

3. पूर्ण समय तक कार्यालय में उपस्थित रहना (Full time duty at work place): कई व्यक्ति प्रायः यह समझते हैं कि कार्यालय में समय पर पहुँचकर अपनी उपस्थिति लगाने से उनका काम पूरा हो गया है। यह धारणा एकदम गलत है क्योंकि कार्यालय के समय के अनुसार पूरे समय अपनी जगह पर बैठना तथा कार्य करना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि कार्यालय में समय पर पहुँचना तथा समय से बाहर निकलना।

प्रत्येक कर्मचारी के लिए यह आवश्यक है कि वह पूरे दिन में सम्पन्न किए जाने वाले कार्यों की सूची बना ले और इस बात का प्रयत्न करे कि जो कार्य उसे आज पूरा करना है वह उसे कल के लिए न छोड़े। प्रत्येक कर्मचारी चाहे वह अधिकारी हो या क्लर्क हो अथवा किसी मिल में मजदूर हो या मालिक हो, अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से इस आदत को डाल ले तो कार्यक्षमता बढ़ने के साथ-साथ देश की उन्नति होगी और देखते ही देखते भारत की गिनती विकासशील देशों से विकसित देशों में हो जाएगी।

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4. कार्य में निपुणता होना (Efficiency in work): किसी भी कार्य को सफलता से करने के लिए कार्य में निपुणता होना अति आवश्यक है। आप इस बात को भली प्रकार से जानते हैं कि बीमार होने पर यदि हम दवाई किसी प्रशिक्षित डॉक्टर की अपेक्षा नीम हकीम से लें तो बीमारी ठीक होने के स्थान पर अधिक उग्र भी हो सकती है। प्रायः कार्य का पूर्ण ज्ञान न होने पर कार्य कुशलता तो कम होगी ही अपितु कार्य के परिणाम भी उत्तम नहीं होंगे।

किसी अधिकारी को अपने कार्य का पूर्ण ज्ञान न होने पर या तो उसे हर समय अन्य साथियों से पूछना पड़ेगा या फिर जैसे-तैसे गलत-सही कार्य को सम्पन्न करना पड़ेगा। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने काम को भली प्रकार जानता है वह कम समय में ही कार्य को भली प्रकार सम्पन्न करके दूसरों के लिए उदाहरण बन सकता है।

5. शिष्ट भाषा का प्रयोग करना (Use of disciplined language): प्रत्येक व्यक्ति को सदैव शिष्ट भाषा का प्रयोग करना चाहिए। शिष्ट भाषा का प्रयोग न केवल कार्यस्थल में अपितु घर, परिवार में व साथियों में करना भी वांछनीय है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रथम आईना उसकी भाषा है। कोई चाहे कितना भी. शिक्षित हो, ऊँचे से ऊँचे पद पर हो या आयु में बड़ा हो, वह एक शिष्ट व्यक्ति तभी माना जाएगा जब उसमें अन्य वांछित गुणों के साथ-साथ शिष्टतापूर्वक विनम्र भाषा में बोलने का गुण हो।

विनम्र भाषा एक अच्छे व्यक्तित्व की प्रथम पहचान है। एक अमिट छाप तभी छोड़ी जा सकती है जबकि आपकी भाषा व बोलचाल विनम्र एवं शिष्ट हो। विनम्रता से बोलने के लिए हमें किसी को भी कुछ नहीं देना पड़ता है परन्तु उससे हमें दूसरों से आदर, दोस्ती जैसी अमूल्य चीजें सहज ही मिल जाती हैं।ऐसे कार्यालय जहाँ प्रतिदिन हमें दूसरे व्यक्तियों का सामना करना पड़ता है वहाँ तो भाषा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

एक दुखी व्यक्ति जब कोई समस्या लेकर किसी अधिकारी के पास पहुँचता है तो चाहे वह अधिकारी उसका काम करे अथवा नहीं परन्तु उसके सहानुभूति भरे दो चार विनम्र शब्द ही उस व्यक्ति के आधे दुख को कम कर देते हैं। प्रायः रोगी जब डॉक्टर के पास पहुँचकर उसे रोग के बारे में बता देता है और डॉक्टर उसके रोग के बारे में सुनकर उसे प्यार भरे शब्दों में समझाता है तो रोगी का आधा रोग तो उसी समय दूर हो जाता है।

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प्रश्न 2.
कार्य करते समय किस प्रकार के कार्याचार का पालन करने की आवश्यकता होती है ?
उत्तर:
1. कार्य को भली-भांति समझना (Absolutely knowing the work): किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पहले उस कार्य को पूरी तरह जान लेना अति आवश्यक है। कार्य के बारे में पहले पूरी रूपरेखा बनानी चाहिए। उस रूपरेखा के अनुसार ही कार्य करना चाहिए। यह जानकारी प्राप्त करनी चाहिए कि इस कार्य को पूरा करने में क्या-क्या सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी, किन-किन विधियों का प्रयोग किया जाएगा इत्यादि। यदि कार्य करने की सही विधि का चुनाव किया जाए तथा कार्य में प्रयोग आने वाली सामग्री पहले से ही प्राप्त कर ली जाए तो कार्य बड़ी कुशलता से और शीघ्र पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार से किया गया कार्य कर्मी को प्रसन्नता तथा सन्तुष्टि देता है।

2. कार्य के समय में कार्य पूरी निष्ठा से करना (Devotion in work while working): कार्य नैतिकता का यह एक महत्त्वपूर्ण पद है। कर्मी को कार्य के समय पर पूरी निष्ठा से कार्य करना चाहिए बहुधा देखा गया है कि कर्मी या तो कार्यस्थल पर देर से आते हैं या अपनी जगह पर नहीं मिलते या अपने सहकर्मियों के साथ गप्पें मारते या चाय, सिगरेट इत्यादि पीते रहते हैं।

इस प्रकार के व्यवहार से न तो कार्य पूरा होता है और न ही कार्य की अधिकता के कारण उसमें कार्य के प्रति सन्तुष्टि की भावना रहती है। कार्यालय के अधिकारी भी ऐसे कर्मी को डाँट-डपट करते हैं जिससे उसमें अशान्ति पैदा हो जाती है। इसलिए यह बहुत ही आवश्यक है कि काम के समय कर्मी अपनी जगह मौजूद रहे और कार्य को पूरी लगन तथा निष्ठा से करे। ऐसा करने से उसे कार्य सन्तुष्टि (Work satisfaction) मिलती है।

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3. अनुशासनप्रिय होना (Discipline oriented): प्रत्येक कर्मी को अपने कार्यालय के नियमों का पालन करना ही अनुशासनप्रियता है। कार्यालय समय पर पहुँचना, कार्य के समय कार्य ही करना, कार्यालय में धूम्रपान न करना इत्यादि अनुशासन की कसौटियाँ हैं। परन्तु आमतौर पर देखा गया है कि कर्मी में बहुधा अनुशासनहीनता पायी जाती है जिसके कारण कार्यालय के कार्य उचित प्रकार से नहीं होते। इस प्रकार के कर्मचारियों को उचित प्रकार की प्रेरणा तथा दबाव-विधियों के प्रयोग से अनुशासित किया जाना चाहिए ताकि उस कार्यालय का कार्य सुचारु रूप से हो सके।

4. अपने ज्ञान को आधुनिक बनाना (Making the knowledge modern): यह एक मनोवैज्ञानिक कहावत है कि मनुष्य जीवन भर सीखता रहता है। यह कहावत बिल्कुल सही है। यदि कोई व्यक्ति यह सोचता है कि उसे जितना सीखना था, वह सीख चुका है तो यह उसकी भ्रान्ति है। ऐसा सोचने से जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता, परन्तु दूसरी ओर कोई व्यक्ति इस कहावत के अनुसार अपने ज्ञान में वृद्धि करता है तो उसको अपने कार्य करने में सरलता तथा सुविधा का आभास होता है और वह कार्य को अच्छी तरह करके अपने अधिकारियों तथा कर्मचारियों से प्रशंसा प्राप्त करता है। जैसे कि आजकल कम्प्यूटर का बोलवाला है और बैंक का कार्य करने वाला कम्प्यूटर की सहायता से शीघ्र तथा ठीक प्रकार से खातों का चालन कर सकता है वनिस्पत उसके जिसे कम्प्यूटर का ज्ञान नहीं है। इसलिए प्रत्येक कर्मी को अपने कार्य को सकुशल पूरा करने के लिए अपने ज्ञान को आधुनिक बनाना अति आवश्यक है।

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5. अच्छा तथा मधुर व्यवहार (Good and soft behaviour): यदि आप चाहते हैं कि अन्य लोग आपके साथ अच्छा तथा मधुर व्यवहार करें, तो आपको उनके साथ भी अच्छा तथा मधुर व्यवहार करना होगा। कार्यालय का वातावरण अच्छा तथा मधुर बनाने के लिए आपको अपने सहकर्मी तथा आगन्तुकों के साथ मित्रतापूर्ण, सहयोगी तथा मधुर व्यवहार करना होगा। इस प्रकार का वातावरण नम्र भाषा के प्रयोग तथा सेवाभाव से बन सकता है। यदि आपके कार्यालय में वातावरण अच्छा, मधुर है तो आपको ऐसे वातावरण में काम करके सन्तुष्टि प्राप्त होगी और कार्य भी सुगमता से होगा। इसके विपरीत यदि कार्यालय का वातावरण खराब होगा तो उससे आपके तथा आपके अन्य सहकर्मियों की कार्यकुशलता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा कार्य की गति भी धीमी होगी।

6. कार्य को सेवाभाव से करना (Working with devotion): आप चाहे किसी भी कार्यालय में कार्य कर रहे हों या जो भी कार्य कर रहे हों, वह किसी-न-किसी के हित में होता है। यदि कर्मी वह कार्य सेवाभाव से करे तो उसे उस कार्य को करके सन्तुष्टि प्राप्त होगी क्योंकि उसमें यह भावना आएगी कि मैंने इस कार्य को करके उस जरूरतमन्द व्यक्ति की सेवा की है, यह भावना अपने आप में सन्तुष्टि देती है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि कर्मी किसी भी कार्य को करते समय सेवा भाव की भावना से प्रेरित हो तथा इसी भावना के अनुसार कार्य कों
पूरा करे।

7. टीम की भावना का होना (Team Spirit): किसी भी कर्मी को किसी समूह में कार्य करना होता है। उस समूह के यदि सभी कर्मी मिल-जुलकर कार्य करें तो कार्य शीघ्र हो जाएगा तथा उसमें उत्पन्न बाधाएँ भी शीघ्र ही दूर हो जाएंगी। यह सहयोग समूह के सभी सदस्यों की ओर से आना चाहिए चाहे वे समूह का मालिक हों या कार्यकर्ता। यदि टीम भावना से किया . जाता है तो इसमें कर्मियों की कमियाँ भी ढंक जाती हैं और कार्य भी पूरा हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

Bihar Board Class 11 Philosophy तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सत्य कथन को चुनें –
(क) आकारिक सत्यता वास्तविक सत्यता के लिए आवश्यक है
(ख) वास्तविक सत्यता आकारिक सत्यता के लिए आवश्यक नहीं है
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) (क) एवं (ख) दोनों

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प्रश्न 2.
‘Logike’ किस भाषा का शब्द है?
(क) ग्रीक
(ख) लैटिन
(ग) ग्रीक एवं लैटिन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ग्रीक

प्रश्न 3.
निगमन तर्कशास्त्र में हम जाते हैं –
(क) सामान्य से विशेष की ओर
(ख) विशेष से सामान्य की ओर
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सामान्य से विशेष की ओर

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प्रश्न 4.
आगमन तर्कशास्त्र में हम जाते हैं –
(क) सामान्य से विशेष की ओर
(ख) विशेष से सामान्य की ओर
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) विशेष से सामान्य की ओर

प्रश्न 5.
धुआँ देखकर हमें आग का ज्ञान होता है। यह उदाहरण है –
(क) अनुमान का
(ख) प्रत्यक्ष का
(ग) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) अनुमान का

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प्रश्न 6.
निगमन तर्कशास्त्र का सम्बन्ध है –
(क) आकारिक सत्यता से
(ख) वास्तविक सत्यता से
(ग) उपर्युक्त दोनों से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आकारिक सत्यता से

प्रश्न 7.
तर्कशास्त्र की उपयोगिता है –
(क) परिशोधनात्मक
(ख) सृजनात्मक
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) परिशोधनात्मक

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प्रश्न 8.
तर्कशास्त्र है –
(क) आदर्शमूलक विज्ञान
(ख) भौतिक विज्ञान
(ग) यथार्थ विज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आदर्शमूलक विज्ञान

प्रश्न 9.
सोने का पहाड़, उड़ता घोड़ा, दूध की नदी आदि जैसे विचार हैं –
(क) आकारिक सत्य
(ख) वास्तविक सत्य
(ग) आकारिक एवं वास्तविक सत्य
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आकारिक सत्य

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प्रश्न 10.
“तर्कशास्त्र तर्क करने की कला एवं विज्ञान दोनों है।” यह किसने कहा था?
(क) हेटली ने
(ख) हैमिल्टन ने
(ग) थॉमसन ने
(घ) मिल ने
उत्तर:
(क) हेटली ने

प्रश्न 11.
“तर्कशास्त्र विचार के नियमों का विज्ञान है।” यह परिभाषा किसने प्रस्तुत की थी?
(क) हेटली
(ख) हैमिल्टन
(ग) थॉमसन
(घ) एलड्रिच
उत्तर:
(ग) थॉमसन

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प्रश्न 12.
“तर्क करने की कला को तर्कशास्त्र कहते हैं।” यह किसकी उक्ति है?
(क) एलड्रिच
(ख) थॉमसन
(ग) हेटली
(घ) यूबरबेग
उत्तर:
(क) एलड्रिच

प्रश्न 13.
“तर्कशास्त्र विचार के आकार सम्बन्धी नियमों का विज्ञान है।” यह कथन किसका
(क) हैमिल्टन
(ख) थॉमसन
(ग) एलड्रिच
(घ) किसी का नहीं
उत्तर:
(क) हैमिल्टन

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प्रश्न 14.
‘उड़ता घोड़ा’ यह विचार किसकी सत्यता को प्रस्तुत करेगा?
(क) आकारिक सत्यता
(ख) वास्तविक सत्यता
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आकारिक सत्यता

प्रश्न 15.
दैनिक जीवन में सत्य को क्या कहते हैं?
(क) आकारिक सत्य
(ख) वास्तविक सत्य
(ग) व्यावहारिक सत्य
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ग) व्यावहारिक सत्य

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प्रश्न 16.
“तर्कशास्त्र सभी कलाओं की कला है” यह किसने कहा था?
(क) डन्स स्कॉटस (Duns Scotus)
(ख) हैटली
(ग) हैमिल्टन
(घ) एलड्रिच
उत्तर:
(क) डन्स स्कॉटस (Duns Scotus)

प्रश्न 17.
सभी जीव मरणशील है। घोड़ा एक जीव है। घोड़ा मरणशील है। उपरोक्त में किस प्रकार सत्यता समाहित है?
(क) वास्तविक (Natural truth)
(ख) आकारिक सत्यता (Formal truth)
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 18.
तर्कशास्त्र का उद्देश्य है –
(क) सत्य की प्राप्ति एवं असत्य का निराकरण
(ख) सत्य की प्राप्ति
(ग) असत्य का निराकरण
(घ) अनुमान करना
उत्तर:
(क) सत्य की प्राप्ति एवं असत्य का निराकरण

Bihar Board Class 11 Philosophy तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तर्कशास्त्र के दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
तर्कशास्त्र के दो लाभों की चर्चा हम इस प्रकार कर सकते हैं-प्रथम, प्रत्येक विज्ञान को तार्किक नियमों से परिचित होना आवश्यक है; यह परिचय तर्कशास्त्र से ही मिल पाता है। दूसरा, तर्कशास्त्र के अध्ययन से मानसिक व्यायाम हो जाता है।

प्रश्न 2.
व्यावहारिक सत्य क्या है?
उत्तर:
जो दैनिक जीवन में सत्य हो, उसे व्यावहारिक सत्य कहते हैं। जैसे – ईश्वर, जीव एवं जगत् इत्यादि।

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प्रश्न 3.
तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र वह विज्ञान है जो अनुमान के व्यापक नियमों तथा अन्य सहायक मानसिक क्रियाओं का अध्ययन इस ध्येय से करता है कि उनके व्यवहार से सत्यता की प्राप्ति हो।

प्रश्न 4.
थॉमसन के अनुसार तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
थॉमसन के अनुसार तर्कशास्त्र विचार के नियमों का विज्ञान है।

प्रश्न 5.
हेमिल्टन के अनुसार तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
हेमिल्टन के अनुसार, “तर्कशास्त्र विचार के आकार सम्बन्धी नियमों का विज्ञान है।” (Logic is the science of the formal laws of thought)

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प्रश्न 6.
एलचि के अनुसार तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
एलचि के अनुसार, “तर्कशास्त्र तर्क करने की कला है।” (Logic is the art of reasoning)

प्रश्न 7.
यूबरबेग के अनुसार तर्कशास्त्र की क्या परिभाषा है?
उत्तर:
“तर्कशास्त्र मानव-ज्ञान के व्यवस्थापरक नियमों का विज्ञान है।” (Logic is the science of the regulative laws of human knowledge)

प्रश्न 8.
ह्वेटली ने तर्कशास्त्र की क्या परिभाषा दी?
उत्तर:
हेटली ने तर्कशास्त्र की परिभाषा इस प्रकार दी, “तर्कशास्त्र तर्क करने का विज्ञान और कला है।” (Logic is the science and also the art of reasoning)

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प्रश्न 9.
Logic शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र को अंग्रेजी में (Logic कहा जाता है, जो ग्रीक भाषा के विशेषण Logike (लॉजिकी) से आया है। यह शब्द पुनः ग्रीक संज्ञा Logos से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है ‘विचार’ या ‘शब्द’।

प्रश्न 10.
आकारिक सत्यता (Formal Truth) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आकारिक सत्य (Formal Truth) केवल हमारे विचारों में या मानसिक प्रदेश में होता है। इस प्रकार के सत्य में हमारे विचारों के बीच संगति रहती है। यह कोई आवश्यक नहीं है कि हमारे विचारों के अनुरूप बाह्य विश्व में कोई वस्तु अस्तित्ववान हो ही। जैसे-सोने का पहाड़, उड़ता घोड़ा आदि।

प्रश्न 11.
वास्तविक सत्यता (Material Truth) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब हमारे मन में विद्यमान विचारों के अनुरूप ही बाह्य विश्व में उस विचार से मिलता-जुलता कोई पदार्थ अस्तित्ववान होता है तब उसे वास्तविक सत्य (Material Truth) कहते हैं। इसकी जाँच निरीक्षण एवं प्रयोग से संभव है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तर्कशास्त्र की ‘आकारिक सत्यता’ का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र में आकारिक सत्यता का तात्पर्य ‘उस तरीका से है जिसके द्वारा हम किसी वस्तु पर विचार करते हैं’ (The way in which we think about a thing) तर्कशास्त्र अनुमान से सम्बद्ध है और अनुमान का भी एक आकार होता है। अनेक अर्थशास्त्रियों का यह मानना है कि तर्कशास्त्र का सम्बन्ध केवल अनुमान के आकार से रहता है। उनके अनुसार यदि तर्कशास्त्र का विषय वास्तविक दृष्टि से सही नहीं भी हो, तब भी तर्कशास्त्र इस बात पर बल देता है कि अनुमान के नियमों का पालन अवश्य हो, जैसे –

All men are dogs
Sohan is a man
∴ Sohan is a dog

उपर्युक्त अनुमान आकारिक रूप में सत्य है क्योंकि इसका निष्कर्ष आधार वाक्य पर आधारित तथा तार्किक नियम के अनुकूल है। इस तर्क की प्रक्रिया में तर्कशास्त्र की आकारिक सत्यता दिखाई पड़ती है।

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प्रश्न 2.
क्या तर्कशास्त्र कला है?
उत्तर:
डन्स स्कॉटस (Duns Scotus) का कथन है कि तर्कशास्त्र सभी कलाओं की कला इसलिए है, क्योंकि यह सबसे अधिक ‘सामान्य कला’ है। इसे ‘सामान्य’ इसलिए कहा जाता है। क्योंकि इसमें प्रत्येक कला का मूल तत्त्व सामान्य रूप से पाया जाता है। प्रत्येक कला का एक निश्चित लक्ष्य होता है तथा उस लक्ष्य की प्राप्ति के कुछ नियम होते हैं। सत्य की प्राप्ति के लिए तर्कशास्त्र में जिन-जिन नियमों व सिद्धान्तों का सहारा लिया जाता है, उन सभी नियमों का अनुसरण अन्य कलाओं में भी किया जाता है।

कला हमें कोई कार्य करना सिखाती है। तैरना एक कला है जिसके कुछ नियम हैं तथा उन नियमों का पालन करने से ही कोई व्यक्ति तैराक बन सकता है। जिस प्रकार संगीतकला संगीत सिखाती है, नृत्यकला नृत्य सिखाती है; उसी प्रकार तर्कशास्त्र तर्क करना सिखाता है। यह कलाओं की कला इस अर्थ में है कि सभी कलाओं में अनुमान के सहारे कलाओं के नियमों की व्यापकता सिद्ध की जाती है और तर्कशास्त्र अनुमान पद पर आधारित होता है।

प्रश्न 3.
शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार तर्कशास्त्र का क्या अर्थ है?
उत्तर:
ग्रीक भाषा के ‘Logike शब्द से अंग्रेजी का ‘Logic’ वना है। ‘Logike’ विशेषण शब्द है जिसका संज्ञा रूप ‘Logos’ होता है। ‘Logos’ का अर्थ विचार (thought) और शब्द (word) दोनों होता है। इस प्रकार हम शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार यह कह सकते हैं कि ‘Logic’ (तर्कशास्त्र) उन विचारों का शास्त्र है जो विचार शब्दों में व्यक्त होते हैं। तर्कशास्त्र में हम विचारों को शुद्ध रूप में शब्दों में व्यक्त करते हैं। भाषा में व्यक्त तर्क यदि युक्तिसंगत होता है तो हमें सही निष्कर्षों की प्राप्ति होती है।

शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार ‘Logic’ शब्दों में व्यक्त वह विज्ञान है जो नियमों का निर्धारण भाषा के अनुसार करता है। यदि हम यह कहें कि ‘बर्फ जल रही है’ तो बर्फ के साथ जलना कहना व्याघातक हो जाता है, क्योंकि आग के साथ जलना शब्द कहना ही युक्तिसंगत है। अतः ‘बर्फ जल रही है’ कहना तार्किक नियमों के अनुकूल नहीं है। इसलिए शब्दों में ऐसा व्यक्त करना अशुद्ध है। इस प्रकार तर्कशास्त्र का अर्थ हुआ भाषा में अभिव्यक्त विचारों के वे शब्द जो तार्किक नियमों के अनुकूल और युक्तसंगत हों।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 4.
अनुमान क्या है?
उत्तर:
जो ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित होता है, उसे अनुमान कहते हैं। तर्कशास्त्र की भाषा में अनुमान को इस तरह परिभाषित किया गया है … “अनुमान वह ज्ञान है जिसमें सामने दिये हुए तथ्यों से उसके पीछे के कारणों को जाना जाता है और उसके आधार पर जो सामने .. नहीं है उस तथ्य का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।” अनुमान दो शब्दों के मेल से बना है-अनु का अर्थ है ‘बाद’ और मान का अर्थ है ‘ज्ञान’। इस प्रकार अनुमान का शाब्दिक अर्थ हुआ-‘बाद का ज्ञान’।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष ज्ञान के बाद का ज्ञान ही अनुमान है। उदाहरण के लिए–‘सभी मनुष्य मरणशील हैं – इस तथ्य के आधर पर हम अनुमान (तर्कशास्त्रीय अर्थ में) द्वारा किसी भी व्यक्ति की मरणशीलता का ज्ञान प्राप्त करते हैं। धुएँ को देखकर हम आग का ज्ञान प्राप्त करते हैं। आग होने का ज्ञान अनुमानजन्य ज्ञान है जो धुएँ का ज्ञान होने के बाद हुआ। धुएँ को देखकर हम यह तर्क करते हैं जहाँ-जहाँ धुआँ, वहाँ-वहाँ आग। यहाँ धुआँ यहाँ आग।

प्रश्न 5.
तर्कशास्त्र सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक विज्ञान दोनों है। कैसे?
उत्तर:
तर्कशास्त्र सैद्धान्तिक विज्ञान इसलिए है कि इसमें विभिन्न सिद्धान्तों के द्वारा सत्य-असत्य की जानकारी की जाती है। तर्कशास्त्र अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन आगमनात्मक और निगमनात्मक विधि द्वारा निरीक्षण और विश्लेषण के आधार पर सामान्यीकरण के अनुसार करता है। तर्कशास्त्र सैद्धान्तिक विज्ञान इसलिए है कि इसमें सिद्धान्तों के अनुकूल तर्क किया जाता है और सही ज्ञान की प्राप्ति की जाती है।

तर्कशास्त्र केवल तर्क का शास्त्र नहीं है बल्कि उन सिद्धान्तों का भी विज्ञान है जो तर्क करने में सहायता पहुँचाते हैं। हैमिल्टन ने तर्कशास्त्र को सैद्धान्तिक विज्ञान मानते हुए इन शब्दों में परिभाषित किया है, “तर्कशास्त्र विचार के आकारिक नियमों का विज्ञान है” (Logic is the science of the formal laws of thought)।

तर्कशास्त्रं व्यावहारिक विज्ञान इसलिए है, क्योंकि इसमें तर्क के द्वारा जीवन के व्यावहारिक पक्ष की समस्याओं का हल प्रस्तुत किया जाता है। तर्कशास्त्र का सम्बन्ध अनुमान से है और अपने ‘ व्यावहारिक जीवन में हमें अनुमान की आवश्यकता पड़ती है। विचार करना, तर्क करना मनुष्य के स्वाभाविक गुण हैं, जिस प्रकार बोलना, हँसना, रोना, भूख लगना आदि। चूँकि तर्क करना। हमारे व्यवहार का एक आवश्यक अंग है, इसलिए तर्कशास्त्र एक पूर्ण व्यावहारिक विज्ञान भी है जिसके द्वारा हम व्यवहार के नियमों के शुद्ध निष्कर्ष तक पहुँच पाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तर्कशास्त्र की विभिन्न परिभाषाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रायः देखा गया है कि, “तर्कशास्त्र में जितने लेखक हैं उतनी ही इसकी परिभाषाएँ दी गई है और सबों में कुछ-न-कुछ दोष अवश्य पाया जाता है। इसमें से प्रमुख दोषयुक्त निम्नलिखित परिभाषाओं को रखा जा सकता है जो या तो संकुचित हैं, या वृहत् –

1. थॉमसन के अनुसार:
Logic is the science of the laws of thought अर्थात् “तर्कशास्त्र विचार के नियमों का ‘विज्ञान है।” इस परिभाषा में तर्कशास्त्र को केवल विज्ञान कहा गया है। जबकि तर्कशास्त्र की दूसरी त्रुटि है कि इसे विचार का विज्ञान कहा गया है। जबकि ‘विचार’ बहुत व्यापक शब्द है। अतः यह वृहत् (Wide) परिभाषा है।

2. हैमिल्टन के अनुसार:
Logic is the science of the formal laws of thought Hamilton:
अर्थात् तर्कशास्त्र विचार के आकार संबंधी नियमों का विज्ञान है। इससे भी तर्कशास्त्र को सिर्फ विज्ञान माना गया है परन्तु हम जानते हैं कि तर्कशास्त्र विज्ञान के साथ ही कला भी है।

यह भी स्पष्ट है कि तर्कशास्त्र का संबंध केवल आकारिक सत्यता से ही है क्योंकि इसको आकार संबंधी नियमों का ही विज्ञान कहा गया है। परन्तु हम जानते हैं कि तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ आकारिक सत्यता (Formal truth) से ही नहीं, बल्कि वास्तविक सत्यता (Natural truth) से भी उतना ही है, अतः यहाँ तर्कशास्त्र का क्षेत्र बहुत व्यापक कर दिया गया है, जो अनुचित है।

3. एल्ड्चि के अनुसार:
Logic is the art of reasoning-Aldrich:
अर्थात् तर्कशास्त्र तर्क की कला है।

(क) इस परिभाषा में तर्कशास्त्र को केवल कला ही कहा गया है, जबकि तर्कशास्त्र विज्ञान भी है। जिसकी चर्चा भी नहीं की गई है, अतः यह परिभाषा संकीर्ण है।

(ख) संकीर्णता के अलावा इस परिभाषा में सिर्फ क्रियात्मक पक्ष का ही जिक्र किया गया है जबकि सिद्धान्त पक्ष की ओर भी निर्देश करना चाहिए था।

(ग) इस परिभाषा से यह ज्ञात होता है कि तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ तर्क (Reasoning) से ही है परन्तु ऐसी बात सही नहीं है। तर्कशास्त्र से संबंध तर्क में सही पता पहुँचाने वाली अन्य क्रियाओं जैसे परिभाषा, विभाग, वर्गीकरण, नामकरण इत्यादि से भी है। लेकिन इन क्रियाओं पर एल्ड्रिच महोदय ने विचार ही नहीं किया।

4. अलबर्ट्स मैगनस के अनुसार:
Logic is the science of argumentation Albertus Magnus अर्थात् तर्कशास्त्र तर्क का विज्ञान है। यह परिभाषा भी संकुचित है क्योंकि यहाँ तर्कशास्त्र के सभी आवश्यक एवं सामान्य गुणों का वर्णन नहीं किया गया है।

5. स्पैल्डिंग के अनुसार:
Logic is the theory of inference-Spalding-अर्थात् तर्कशास्त्र अनुमान का सिद्धान्त है। यह परिभाषा भी संकुचित ही है।

6. अरनॉल्ड के अनुसार:
Logic is the science of understanding in the pur suit of truth-Arnauld:
अर्थात् तर्कशास्त्र बुद्धि विषयक विज्ञान है जिसके द्वारा सत्य की प्राप्ति की जाती है। इस परिभाषा में भी दोष है।

(क) यहाँ सैद्धान्तिक पक्ष पर जोर दिया गया है और क्रियात्मक पक्ष को छोड़ दिया गया है जबकि तर्कशास्त्र सिद्धान्त और क्रिया दोनों से संबंधित है।
(ख) इस परिभाषा में ‘सत्य’ शास्त्र का प्रयोग किया गया है परन्तु यह स्पष्ट नहीं बताया गया है कि इस सत्य में सत्य के दोनों ही पहलू (आकारिक सत्यता और वास्तविक सत्यता) समाविष्ट है या नहीं। अतः ‘सत्य’ शब्द संदिग्ध है।

7. ह्वेटली के अनुसार:
Logic is the art and science of reasoning-Whately:
अर्थात् तर्कशास्त्रा तर्क की कला एवं विज्ञान है। यह भी दोषयुक्त परिभाषा ही है। इसमें अनुमान की चर्चा तो हुई है किन्तु अन्य सहायक क्रियाओं, जैसे विभाजन, परिभाषा, वर्गीकरण आदि की चर्चा नहीं की गई है। अतः यह भी संकुचित परिभाषा है।

8. यूबरवेग के अनुसार:
Logic is the science of the regulative laws of human knowledge-Ueberweg:
अर्थात् तर्कशास्त्र मानव ज्ञान के नियंत्रणात्मक नियमों का विज्ञान है। इस परिभाषा में वृहत् परिभाषा का दोष है। तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ अनुमान से है प्रत्यक्ष से नहीं। परन्तु इस परिभाषा के अनुसार इसे मानव ज्ञान का शास्त्र बतलाया गया है। मानव-ज्ञान बहुत ही विस्तृत शब्द है। अतः इसमें वृहत् परिभाषा का दोष है।

9. पोर्ट-रॉयल लॉजिक के अनुसार:
Logic is the science of the operation of the human understanding in the persuit of truths-Port Royal Logic:
अर्थात् तर्कशास्त्र मनुष्यों की आकस्मिक प्रक्रियाओं का वह विज्ञान है जिसके द्वारा सत्य की खोज की जाती है। यह परिभाषा भी दोषपूर्ण ही हैं इसमें तर्कशास्त्र का सम्बन्ध सभी मानसिक क्रियाओं में प्रत्यक्ष ज्ञान भी है। परन्तु तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ अनुमान से है। यह परिभाषा वृहत् (Wide) हो जाती है। दूसरा दोष है कि इसमें ‘सत्य’ शब्द भी है। यहाँ स्पष्ट करना था कि सत्य का अर्थ है आकारिक और वास्तविक सत्यता।

10. वेल्टन के अनुसार:
“Logic is science of the principles which regulate valid thought”-Welton:
अर्थात् तर्कशास्त्र उन सिद्धान्तों का विज्ञान है जिनके द्वारा सत्य विचारों का नियंत्रण होता है।

विश्लेषण:
वेल्टन की परिभाषा में निम्नलिखित गुण हैं।

(क) तर्कशास्त्र विज्ञान है क्योंकि यहाँ सिद्धान्तों का निरूपण तथा उनके द्वारा लक्ष्य प्राप्ति का प्रयास होता है।

(ख) इस परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि तर्कशास्त्र विज्ञान होने के साथ ही साथ कला भी है। इसमें तार्किक सिद्धान्तों के द्वारा सत्य की प्राप्ति की चेष्टा की जाती है।

(ग) यह एक आदर्श निर्धारक भी है। क्योंकि इसका लक्ष्य सत्य की प्राप्ति से है।

(घ) तर्कशास्त्र का संबंध तर्क करने के सिद्धान्तों से तो है ही साथ-ही-साथ तर्क करने में सहायता पहुँचाने वाली क्रियाओं परिभाषा, विभाजन, नामकरण, वर्गीकरण से भी इसका अभीष्ट सम्बन्ध है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इन परिभाषाओं में तर्कशास्त्र के सभी सामान्य एवं आवश्यक गुणों (Common essential qualities) का समावेश है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 2.
क्या तर्कशास्त्र विज्ञान है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र का अंग्रेजी शब्द Logic है। यह लौजिक शब्द ग्रीक भाषा के विशेषण Logike से बना है और इसका संज्ञा के रूप में Logos व्यवहार होता है। Logos का अर्थ ‘विचार’ (Thought) या ‘शब्द’ (Word) होता है। अर्थात् Logos का अर्थ Thought and word हुआ जिसका अर्थ विचार और शब्द से हुआ। अतः स्पष्ट सिद्ध है कि ‘विचार एवं शब्द’ में घनिष्ठ संबंध है। यहाँ पर हम तर्कशास्त्र को विचारों का शास्त्र कह सकते हैं।

विचारों को शब्दों में व्यक्त करना आसान काम नहीं है। क्योंकि मन में एक ऐसा भी विचार आ सकता है कि बर्फ जल रही है। लेकिन शब्द में व्यक्त कर देने पर यह युक्तिसंगत नहीं मालूम पड़ता है, क्योंकि बर्फ के साथ जलना कहना व्याघातक हो जाता है।

‘बर्फ जल रही है’ यह तार्किक नियमों के अनुकूल वाक्य नहीं है। शब्दों का उचित प्रयोग नहीं करना अशुद्ध है। अतः तर्कशास्त्र के बारे में कह सकते हैं कि तर्कशास्त्र का संबंध भाषा में अभिव्यक्त तर्क से है, अर्थात् तर्कशास्त्र वह आदर्शात्मक विज्ञान है जो नियमों का निर्धारण सत्य-असत्य के निर्णय के लिए करता है।

‘तर्कशास्त्र’ दो शब्दों के योग से बना है-‘तर्क और शास्त्र’। तर्क का अर्थ है ज्ञात से अज्ञात की ओर जाना। विचारों में सुव्यवस्थित सम्बन्ध हुआ या नहीं यह इसी पर निर्भर करता है कि हमारा तर्क युक्तिसंगत है या नहीं। नियमानुकूल तर्क करने पर ही शुद्ध निष्कर्ष की प्राप्ति होती है। अतः तर्कशास्त्र तर्क’ की शुद्धि एवं अशुद्धि का निर्णय करता है। जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
राम मनुष्य है।
∴ राम मरणशील है।

ऐसा निष्कर्ष निकालना अशुद्ध है। अब प्रश्न यह भी उठ सकता है कि ‘राम मरणशील है।’ यही निष्कर्ष क्यों शुद्ध है और ‘राम रोटी दूध खाता है’ यह निष्कर्ष क्यों अशुद्ध है? इसी तरह के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए तर्कशास्त्र का अध्ययन जरूरी हो जाता है। हम जो अनुमान करते हैं, निष्कर्ष निकालते हैं तब हमारा तर्क शुद्ध हुआ या अशुद्ध इसका निर्णय ‘तर्कशास्त्र’ ही करता है। इस तरह कुछ शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि तर्कशास्त्र तर्क को शुद्ध और अशुद्ध घोषित करने का एक मापदंड है।

अतः तर्कशास्त्र वह शास्त्र है जहाँ तर्क के सभी नियमों और सिद्धान्तों का विशद वर्णन है। इन्हीं नियमों और सिद्धान्तों के सहारे तर्क की लड़ी को शुद्ध एवं अशुद्ध सिद्ध किया जाता है। ‘ऊपर के उदाहरण में सभी मनुष्य मरणशील हैं, राम मनुष्य है, इसलिए राम मरणशील है। यही निष्कर्ष शुद्ध होगा और यह निष्कर्ष कि राम रोटी दूध खाता है, अशुद्ध होगा; क्योंकि ऐसा नियम है कि निष्कर्ष आधार-वाक्य से ही निकाले जाते हैं और वह निष्कर्ष इन आधार वाक्यों के अन्तर्गत ही होता है।

परिभाषा भी दो तरह की होती है –
(क) विश्लेषणात्मक और
(ख) संश्लेषणात्मक।

(क) विश्लेषणात्मक:
जब हम किसी वस्तु के अंग-प्रत्यंग का वर्णन अलग-अलग विस्तारपूर्वक करते हैं तब वह विश्लेषणात्मक कहलाती है।

(ख) संश्लेषणात्मक:
जब किसी वस्तु के सार गुणों का वर्णन कुछ ही सारगर्भित शब्दों द्वारा करते हैं तब उसे संश्लेषणात्मक कहते हैं।

तर्कशास्त्र की संश्लेषणात्मक (Synthetic) परिभाषा इस प्रकार दे सकते हैं:
“Logic is the science of reasoning as expressed in language for the attaiment of truth and avoidence of error.” अर्थात् तर्कशास्त्र भाषा में अभिव्यक्त तर्क का वह विज्ञान है जिसके द्वारा सत्य की प्राप्ति एवं दोष का परिहार किया जाता है। इस संश्लेषणात्मक परिभाषा का जब हम विश्लेषण करते हैं तब निम्नलिखित विशेषताएँ पाते हैं –

1. तर्कशास्त्र विज्ञान है:
Logic is the science:
विज्ञान विश्व के किसी खास विभाग के क्रमबद्ध (Systematic) ज्ञान को कहते हैं – Systematic knowledge of anything is called science. क्रमबद्ध का अर्थ होता है जो नियमों से बंधा हुआ हो।

अर्थात् विज्ञान में कुछ नियम होते हैं और जब कुछ निश्चित प्रणाली इन्हीं नियमों से बंधी रहती है, तब उसे हम नियमबद्ध कहते हैं और उस प्रकार का ज्ञान ही विज्ञान कहलाता है। इन नियमों के कारण ही विज्ञान में एक सिलसिला बंध जाता है और यह सिलसिला नियमों पर ही निर्भर करता है।

इसी तरह हम देखते हैं कि तर्कशास्त्र भी प्रकृति के एक खास विभाग से संबंधित है और यह विभाग है तर्क का। यह तर्क मन (mind) से संबंधित है। कोई भी अनुमान (Inference) सत्य है या असत्य, इसकी जाँच के पहले यह देखना जरूरी है कि वह तार्किक नियमों के अनुकूल है या प्रतिकूल। अनुमान तर्कसंगत रहने पर सत्य एवं प्रतिकूल रहने पर असत्य होता है। इस तरह तर्कशास्त्र इन्हीं कारणों से विज्ञान कहा गया है।

2. यह तर्क का विज्ञान है:
“It is the science of reasoning”:
तर्कशास्त्र को तर्क का विज्ञान इसलिए कहा गया है कि इसमें तर्क से संबंधित तर्क करने के अनेक नियम एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। अतः विभिन्न नियमों के प्रतिपादन एवं उसके अनुसार तर्क करने की रीति बताने के कारण तर्कशास्त्र को तर्क का विज्ञान कहा गया है।

3. तर्क को भाषा में व्यक्त करते हैं:
Reasoning is expressed in the language. तर्कशास्त्र का संबंध निर्णय से नहीं बल्कि भाषा में व्यक्त किये हुए निर्णय से है। यहाँ पर यह विचार करना जरूरी है कि जब हम मन-ही-मन सोचते हैं कि ‘बर्फ जल रही है’ तब मानसिक प्रदेश में इस प्रकार के निर्णय का संबंध तर्कशास्त्र से ही रहता है। तार्किक दृष्टि से सत्य या असत्य हम तभी कहते हैं जब निर्णय को व्यक्त किया जाता है। भाषा में व्यक्त हो जाती है तब वह तर्कशास्त्र के अधीन हो जाती है। मन के विचार को कई तरह से व्यक्त किया जाता है यथा लिखकर, बोलकर एवं इशारे से।

लेकिन जब हम कहते हैं कि तर्कशास्त्र का संबंध व्यक्त निर्णय (Expressed judgement) से है तब वहाँ व्यक्ति का संबंध इशारे से नहीं है। इशारे में मनोभाव को व्यक्त करना.तार्किक दृष्टि से सत्य या असत्य नहीं कहा जा सकता है। विचारों को बोलकर या लिखकर व्यक्त करना ही तर्कशास्त्र का विषय बनता है।

जब हम बर्फ जल रही है, ऐसा बोलते हैं या लिख देते हैं तव कहा जाता है कि वह तर्क संगत नहीं हुआ। इन्हीं कारणों से कहा गया है कि “Logic is concerned not with the process of though but with the product of thought” अर्थात् तर्कशास्त्र का संबंध विचारों की प्रक्रिया से नहीं बल्कि उनकी निष्पत्ति से है।

यहाँ प्रक्रिया और निष्पत्ति में अन्तर बताना जरूरी है। कागज बनाने की एक मशीन होती है। इस जगह फटे-पुराने कपड़े, बाँस की कोपलें या कागज संबंधी सामग्री रख दी जाती है और इसके बाद मशीन चला दी जाती है। इसके बाद उन सामग्रियों की पिसाई, बेलाई, सुखाई, कटाई एवं इसी तरह के कई पहलुओं से गुजरने के बाद कागज बन कर निकल आता है। यहाँ पर कागज निकलने के पहले जितने भी पहलू दिखाई देते हैं, वे सब प्रक्रियाएँ हैं और कागज निकलना ही निष्पत्ति है।

इसी तरह विचारों के साथ भी है। किसी अनुमान पर पहुँचने के लिए मानसिक क्षेत्र में अनेक प्रक्रियाएँ होती हैं, जैसे-कुछ विचारों को हटाना, कुछ को चुनना, कुछ को जोड़ना। फिर तार्किक नियमानुसार उन चुने विचारों में सुव्यस्थित संबंध देना। ये सब विचारों की प्रक्रियाएँ हैं और तब ये विचार सुसंगठित होकर अनुमान बनकर मन से निकल आते हैं अर्थात् शब्दों द्वारा व्यक्त हो जाते हैं तव ऐसे व्यक्त विचारों (expressed thought) को विचारों की निष्पत्ति (Product of thought) कहते हैं।

विचारों की इसी निष्पत्ति से तर्कशास्त्र का संबंध है। विचारों की प्रक्रियाओं से तर्कशास्त्र का संबंध नहीं है। जैसे बर्फ के साथ जलना का संबंध मानसिक प्रदेश में एक विचरण है जो विचारों की पक्रिया मात्र है।

तर्कशास्त्र उससे संबंधित नहीं है। परन्तु जब विचार छनकर आपस में संबंधित होकर मन से निकल आता है तब वह तर्कशास्त्र का विषय हो जाता है। बर्फ जल रही है, यह अतार्किक विचार है और बर्फ गल रही है, यही तार्किक विचार है। अतः तर्कशास्त्र भाषा में व्यक्त तर्क से संबंधित है (Resoning expressed in Language)।

4. इसके द्वारा सत्य की प्राप्ति होती है:
It attains truth-अर्थात् संश्लेषणात्मक (Synthetic) दृष्टि से विचार करने पर सत्य के संबंध में तीन विचार दिये गये हैं –

(क) चरम सत्य या परम सत्य (Ultimate truth):
इसमें केवल सत्य को ही चरम लक्ष्य के रूप में समझा जाता है। इस रूप में सत्य का अर्थ है ईश्वर, सत्य के ऐसे रूप का निरूपण तात्विक क्षेत्र में किया गया है जहाँ सत्य के अर्थ को मूलतः मूलतत्त्व (ultimate reality in the metaphysical field) ही समझते हैं।

(ख) व्यावहारिक सत्य (Practical truth):
इसका अर्थ इस सत्य से है जिसका संबंध जीवन के किसी अंग से है। यह सत्य संबंध-युक्त (Relative) हुआ करता है। अर्थात् एक दृष्टि से एक स्थान पर सत्य है तो दूसरी दृष्टि से दूसरे स्थान पर असत्य भी है। अतः व्यावहारिक जीवन में समयानुसार उपयोगिता की दृष्टि से इस सत्यता का महत्त्व होता है, जैसे संसार व्यावहारिक दृष्टि से सत्य है किन्तु चरम दृष्टि से, दिव्यदृष्टि से असत्य है।

(ग) तार्किक सत्य (Logical truth):
तार्किक सत्य का अर्थ उस सत्य से है जिसका सामंजस्य विचार एवं बाह्य जगत् से है। साथ-ही-साथ यह भी देखा गया है कि तार्किक नियमों से इसकी अनुकूलता है एवं इसमें व्याघातक विचारों की अवहेलना की गई है।

विश्लेषणात्मक (Analytical) ढंग से सत्य को हम दो खंडों में विभाजित कर अध्ययन करते हैं।

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth)
(ख) वास्तविक सत्यता (Matetial truth)।

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth):
आकारिक सत्य वह है जिसमें सत्यता केवल आकार में ही हो। जैसे एक फूल का चित्र बना दें तो इस चित्र में सिर्फ आकारिक सत्यता ही है। यह चित्र वास्तविक फूल नहीं है यह सिर्फ आकार में ही फूल है परन्तु एक फूल को टेबुल पर रख देते हैं तो वास्तव में फूल में वास्तविकता है।

इस आकारिक और वास्तविक सत्य को अर्थशास्त्र में क्रमशः बाह्य और आंतरिक (Facial and intrinsic) मूल्य कहा गया है और दर्शन शास्त्र में इसे दृश्य तथा तथ्य (appearance and reality) कहते हैं। जैसे यह जगत् जो हम देख रहे हैं झूठा है। यह दृश्य में ही सत्य है वास्तव में यह वैसा नहीं है, जैसा दीख रहा है। इसकी वास्तविकता का संबंध तो चिरंतन सत्य से है जो अदृश्य है किन्तु वास्तव में सत्य है। तर्कशास्त्र में सत्य के उन दोनों अंगों का नाम है आकारिक सत्य एवं वास्तविक सत्य। आकारिक सत्य का अर्थ है तार्किक नियमों की अनुकूलता, जैसे

सभी मनुष्य जानवर हैं।
राम मनुष्य है।
∴ राम जानवर है।

यह अनुमान आकारिक रूप में सत्य है क्योंकि इसका निष्कर्ष आधार वाक्य पर आश्रित एवं तार्किक नियमानुकूल है। अतः इस तर्क की प्रक्रिया में आकारिक सत्यता है।

(ख) वास्तविक सत्यता (Material truth):
वास्तविक सत्यता हेतु विचार एवं बाह्य जगत् में सामंजस्य होना आवश्यक है। जैसे जब हम कहते हैं कि फूल लाल है तब इसमें वास्तविक सत्यता है, क्योंकि इसमें जो लाल फूल की अवधारणा है उसी के अनुरूप बाह्य जगत् में भी ‘लाल देखने को मिलता है’, अतः बाह्य जगत् एवं अन्तर्जगत में अनुकूलता रहने की वह इसमें वास्तविकता है, जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
सभी भारतीय मनुष्य हैं।
∴ सभी भारतीय मरणशील हैं।

इस अनुमान में आकारिक सत्यता के साथ ही साथ वास्तविक सत्यता भी है। किन्तु आकारिक सत्यता के साथ वास्तविक सत्यता रह भी सकती है और नहीं भी रह सकती है जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
मोहन मनुष्य है।
∴ मोहन मरणशील है।

तो इसमें वास्तविक सत्यता के साथ-साथ आकारिक सत्यता भी है। परन्तु जब हम यह कहते हैं कि सभी मनुष्य जानवर हैं।

मोहन मनुष्य है।
∴ मोहन जानवर है।

तो इस अनुमान में आकारिक सत्यता तो है, परन्तु वास्तविक सत्यता नहीं है। तर्कशास्त्र में नियम प्रणाली से आकारिक सत्यता की प्राप्ति होती है तथा आगमन प्रणाली से वास्तविक सत्यता की। इस प्रकार आगमन एवं निगमन प्रणाली से पूर्ण सत्य की प्राप्ति ही तर्कशास्त्र का लक्ष्य है।

(v) तर्कशास्त्र दोष को हटाता है:
Logic avoids error:
तर्कशास्त्र का विषय अनुमान है और अनुमान शुद्ध होना चाहिए। अतः इससे स्पष्ट है कि तर्कशास्त्र का काम शुद्धता से भी है और कहा भी गया है – “Logic is a corrective science and not a creative science.” अर्थात् तर्कशास्त्र शुद्धात्मक विज्ञान है, सर्जनात्मक विज्ञान नहीं है। अनुमान को शुद्ध करने के. लिए बहुत से तार्किक नियमों का अनुसंधान किया गया है जिसके सहारे तर्क की प्रणाली को शुद्ध किया जाता है।

तर्क करने की शक्ति ईश्वरीय देन है। पर इसकी उत्पत्ति पर मनुष्यों का कुछ भी अधिकार नहीं है। तर्क करना और सुधार करना दोनों दो कार्य हैं। सृष्टि करना ब्रह्म का कार्य है और उसमें सुधार कर देना मनुष्य का काम है। इस तरह जिसमें तर्कशक्ति का अभाव है वह तार्किक नहीं हो सकता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 3.
आकारिक एवं वास्तविक सत्यता से आप क्या समझते हैं? अथवा, तर्कशास्त्र की विषय-वस्तु का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रत्यक्ष के आधार पर अप्रत्यक्ष के ज्ञान को अनुमान कहते हैं। अनुमान में अनु + मान दो शब्द हैं जिसका अर्थ है बाद का ज्ञान, अर्थात् किसके बाद का? उत्तर है – प्रत्यक्ष के बाद का। धुएँ को देखकर आग का ज्ञान अनुमान है। इसमें धुएँ का ज्ञान प्रत्यक्ष होता है और आग का ज्ञान अनुमान से प्राप्त करते हैं। जैसे –

जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ आग है।
यहाँ धुआँ है।
∴ यहाँ आग है।

इसी तरह सिगनल झुका हुआ देखकर गाड़ी के आने का अनुमान करते हैं। यहाँ गाड़ी अप्रत्यक्ष है, परन्तु झुके हुए सिगनल के प्रत्यक्ष से इस अप्रत्यक्ष का बोध होता है। अतः ज्ञानोपार्जन का अनुमान एक काव्य साधन है। इस तरह अनुमान करना हमारा स्वाभाविक धर्म है। बुद्धि विकास के साथ-साथ जीवन के अन्त तक अनुमान किया जाता है।

इस तरह हरेक व्यक्ति अनुमान करता है। छात्र-शिक्षक सभी अनुमान करते हैं कि अगर वे चार घंटा प्रतिदिन पढ़ेंगे तो प्रथम श्रेणी में पास कर जाएँगे। इसी तरह अच्छी वर्षा देखकर किसान अच्छी फसल होगी का अनुमान करते हैं। इस तरह ज्ञान का भंडार अनुमान से खूब भरता है। इस तरह ज्ञानोपार्जन के लिए अनुमान की बहुत महत्ता है।

परन्तु अनुमान का दोष यह भी है कि यह गलत भी हो सकता है। उमड़े हुए बादल को देखकर किसान वर्षा का अनुमान करते हैं किन्तु वर्षा नहीं होती है। किसी के मीठे-मीठे वचन को सुनकर हम उसके सज्जन होने का अनुमान करते हैं परन्तु वह दुर्जन रहता है और ठगने हेतु मीठे वचन का प्रयोग करता हैं इस तरह अनुमान असंदिग्ध ज्ञान नहीं दे पाता है। शंका की गुंजाइश रह जाती है। इसीलिए एक शास्त्र बना जिसे तर्कशास्त्र (Logic) कहते हैं जो सही-सही अनुमान करना सिखलाता है।

तर्कशास्त्र अनुमान का नियम प्रतिपादित करता है जिसका अनुशरण कर हम सत्य की प्राप्ति करते हैं। हम किस तरह सोचें, कैसे तर्क करें, कैसे अनुमान करें ताकि सत्य की प्राप्ति हो यही तर्क की समस्या है। तर्कशास्त्र में अनुमान के व्यापक क्रियाओं का वर्णन है। इन नियमों के अनुसार अनुमान करने पर वास्तविकता को प्राप्त करते हैं और गलती से छुटकारा पाते हैं।

इसलिए कहा गया है कि “Attainment of truth and avoidence of error are the aims of Logic” अर्थात् सत्य की प्राप्ति और असत्य का निराकरण ही तर्कशास्त्र का उद्देश्य है।

अतः अनुमान की सत्यता का अध्ययन तर्कशास्त्र में होता है। इससे साफ हो जाता है कि तर्कशास्त्र के अध्ययन का विषय अनुमान है। इसमें अनुमान संबंधी सारी समस्याओं को हल किया जाता है। अतः तर्कशास्त्र की विषय-वस्तु अनुमान है प्रत्यक्ष नहीं। तर्कशास्त्र का लक्ष्य है सत्यता की प्राप्ति करना और सत्य दो तरह के होते हैं –

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth) तथा
(ख) वास्तविक सत्यता (Material truth)।

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth):
जब हमारे विचारों में विरोध या संघर्ष नहीं होता है तो उनमें आकारिक सत्यता होती है। यहाँ एक भावना दूसरे के अनुकूल होती है। ऐसी भी हो सकता है कि उन विचारों या भावनाओं के अनुकूल बाहर में कोई वस्तु न हो। फिर भी विरोध निहित होने के कारण उनमें आकारिक सत्यता होती है, यथा-सोने का पहाड़, दूध-घी की नदी। यहाँ वास्तविक जगत् में सोने का पहाड़ और दूध-घी की नदी नहीं पाया जाता है। फिर भी इसमें आकारिक सत्यता हैं। ये विचार आपस में विरोधी नहीं हैं। वास्तविक जगत में सोने का पहाड़ नहीं पाया जाता है फिर भी इसकी आकारिक सत्यता है।

बहुत-सी भावनाएँ असंभव होती हैं। उनका विचार नहीं किया जा सकता है। जैसे वृत्ताकार वर्ग (circular square), बंध्या माता (barren mother) आदि। यहाँ वृत्त और वर्ग एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसी तरह बन्ध्या और माता कभी मेल नहीं खा सकते हैं। इनमें वास्तविक सत्यता तो है ही नहीं और आकारिक सत्यता भी नहीं है क्योंकि इनके बारे में सोचा नहीं जा सकता है। स्वर्णिम पर्वत, दूध की नदी, नाचता हुआ नगर, उड़ता हुआ घोड़ा आदि सबों में आकारिक सत्यता है क्योंकि इसकी कल्पनाओं में विरोध नहीं है।

हम इनके बारे में सोच सकते हैं। भले वे वास्तविक जगत् में नहीं पाये जाते हैं परन्तु विचार के जगत् में सत्य हैं। परन्तु वृत्ताकार वर्ग और बन्ध्या माता न तो वास्तविक जगत् में सत्य हैं और न विचार के जगत् में ही। ये असंभव धारणाएँ हैं। इनमें आकारिक सत्यता नहीं है।

(ख) वास्तविक सत्यता (Material truth):
जब विचारों या भावनाओं में मेल रहता है और उनके अनुकूल वस्तुएँ पायी जाती हैं तो उनमें वास्तविक सत्यता होती है। जैसे-‘लाल गुलाब’ एक वास्तविक सत्य है। यहाँ लाल और गुलाव की भावनाओं में विरोध नहीं बल्कि मेल है। लाल गुलाव वास्तविक सत्यता है। स्वर्णिम पहाड़ में आकारिक सत्यता है, वास्तविक सत्यता नहीं है परन्तु जिसमें वास्तविक सत्यता होती है उसमें आकारिक सत्यता भी होती है। परन्तु जिसमें आकारिक सत्यता हो उसमें वास्तविक सत्यता का होना जरूरी नहीं है।

जैसे वास्तविक गुलाव में गुलाब का आकार भी होता ही है, परन्तु कागज के गुलाब में गुलाब का आकार वास्तविक नहीं होती है। अर्थात वास्तविक सत्यता के लिए आकारिक सत्यता का होना जरूरी है, किन्तु आकारिक सत्यता के लिए वास्तविक सत्यता का होना जरूरी नहीं है। (Formal truth is essential for material truth but material truths not essential for formal truth) क्या तर्कशास्त्र का संबंध दोनों तरह के सत्यों से है?

आकारिक तर्कशास्त्रियों के अनुसार तर्कशास्त्र का संबंध दोनों तरह के सत्यों से है? आकारिक तर्कशास्त्रियों के अनुसार तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ अनुमान के आकार से रहता है। अनुमान की वस्तु से नहीं। इसलिए इन विचारों के अनुसार तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ आकारिक सत्यता से है। अनुमान का आकार यदि सही है, तो सब ठीक है। जैसे –

सभी छात्र गदहे हैं।
राम छात्र है।
∴ राम गदहा है।

यह अनुमान आकारिक दृष्टि से सही है। निष्कर्ष भी आधार वाक्यों से नियमानुकूल निकाला गया है। यह प्रथम आकार में बारबारा (Barbara) योग में है। परन्तु इसमें वास्तविक सत्यता का सर्वथा अभाव है। आकारिक तर्कशास्त्रियों के अनुसार सत्य का अर्थ आकारिक सत्यता है और निगमन तर्कशास्त्र का संबंध विशेषतः आकारिक सत्यता से है। इसमें अरस्तू, हैमिल्टन, जेवन्स, मैनसेल आदि इस प्रकार के विचार को मानने वाले हैं।

दूसरा विचार वस्तुवादी तर्कशास्त्रियों का है कि तर्कशास्त्र का संबंध आकारिक सत्यता के साथ-साथ वास्तविक सत्यता से है। आकारिक सत्यता के साथ-ही-साथ वास्तविक सत्यता का रहना आवश्यक है। इस मत के समर्थकों में मिल, बेन, ब्रैडले आदि प्रमुख हैं। इन लोगों के अनुसार अनुमान का संबंध वास्तविक जीवन से होना चाहिए।

यदि तर्कशास्त्र का संबंध केवल आकारिक सत्यता से रहेगा तो तर्कशास्त्र हास्य का विषय हो जाएगा। इसलिए इन लोगों ने आगमन को तर्कशास्त्र का सच्चा रूप माना है। आगमन का संबंध आकारिक सत्यता के साथ-साथ वास्तविक सत्यता से रहता है। अतः निष्कर्ष निकलता है कि तर्कशास्त्र का संबंध दोनों प्रकार के सत्य से है। निगमन का संबंध आकारिक सत्यता से अधिक है और तर्कशास्त्र का लक्ष्यपूर्ण सत्यता की प्राप्ति से है, जिसमें दोनों प्रकार के सत्य आते हैं। दोनों के द्वारा तर्कशास्त्र अपने लक्ष्य की प्राप्ति करता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 4.
तर्कशास्त्र की उपयोगिता की विवेचना करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र के अध्ययन से निम्नलिखित लाभ हैं –
1. तर्कशास्त्र हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। इसका कारण है कि तर्कशास्त्र का संबंध अनुमान से है तथा अनुमान का संबंध हमारे जीवन से है। अनुमान जीवन के लिए आवश्यक है। अनुमान के बिना हमारा काम नहीं चल सकता है। अतः तर्कशास्त्र जीवन के लिए बहुत उपयोगी है।

2. यह सत्य है कि तर्कशास्त्र तर्क करने की शक्ति पैदा नहीं कर सकता है क्योंकि यह शक्ति प्राकृतिक है। परन्तु यदि तर्क में गलती हुई तो इसे सुधारने में काम कर सकता है। अतः यह सृजनात्मक नहीं बल्कि परिशोधनात्मक है (The function of logic is not creative but corrective)। जिसने तर्कशास्त्र को नहीं पढ़ा है वह तर्क की गलती को नहीं समझ सकता हैं अनुमान की गलती में वह उधेड़बुन में पड़ जाएगा।

गलती को नहीं समझने के कारण, उसका निराकरण भी नहीं कर सकेगा। परन्तु एक तर्कशास्त्री गलती करने पर गलती को समझ सकता है और सुधार भी सकता है। इसलिए तर्कशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है। प्रकृति ने हमें स्वास्थ्य दिया है, परन्तु बीमार पड़ने पर दवाई की जरूरत पड़ जाती है। इसी तरह प्रकृति न हमें तर्क करने की शक्ति दी है, परन्तु गलती करने पर तर्कशास्त्र की जरूरत हो जाती है।

3. सभी विज्ञान और कला की जड़ में तर्क है। अतः विभिन्न शास्त्रों के लिए तर्कशास्त्र के नियमों से परिचित होना जरूरी है। अतः तर्कशास्त्र का अध्ययन जरूरी है।

4. जिस तरह शरीर वृद्धि के लिए शारीरिक व्यायाम की आवश्यकता है उसी तरह मानसिक वृद्धि के लिए तर्कशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता है।

5. मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह अपने विचार को भाषा के द्वारा दूसरे के समक्ष रखता है। यदि उसका विचार तर्कसंगत होता है तो उससे लोग प्रभावित होते हैं। इसलिए भी तर्कशास्त्र का अध्ययन लाभकारी है। वक्ता, वकील, व्यापारी, शिक्षक, छात्र, मनोवैज्ञानिक वैज्ञानिक तथा नेताओं के लिए तर्कशास्त्र विशेषकर सहायक होता है।

6. तर्कशास्त्र का अध्ययन दर्शनशास्त्र के लिए भी जरूरी है। दर्शनशास्त्र का विषय अति सूक्ष्म है, जैसे-आत्मा, परमात्मा आदि। इनका ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा प्राप्त नहीं होता है। हम अनुमान से ही इन विषयों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। अतः तर्कशास्त्र के अध्ययन से दर्शनशास्त्र के विवेचन में लाभ होता है।

7. तर्कशास्त्र अलंकार शास्त्र के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। अलंकारशास्त्र के बारे में कहा गया है कि यह Art of effective speaking or writing है अर्थात् अलंकार प्रभावशाली भाषण या लेखन की कला है। भाषण या लेखन तभी प्रभावोत्पादक हो सकता है जब तक तर्कपूर्ण है। तर्कपूर्ण अलंकारशास्त्र में छिछलापन नहीं होता है और वह दूसरों पर बराबर समानरूप से प्रभाव डालता है।

इन बातों से हम निष्कर्ष पर आते हैं कि तर्कशास्त्र के अध्ययन पर बहुत महत्त्व है। इसकी महत्ता को पूर्वीय तथा पाश्चात्य दोनों विद्वानों ने स्वीकार किया है। पाश्चात्य विद्वान Bosanquet तर्कशास्त्र के बारे में कहते हैं – यह Morphology of human knowledge अर्थात् मानवीय ज्ञान का ढाँचा है।

वहीं भारतीय विद्वानों ने भी तर्कशास्त्र की महत्ता को सर्वोपरि मानते हुए इसके संबंध में कहा है – “प्रदीपः सर्व शास्त्रानां उपायः सर्वकर्मणाम्” अर्थात् तर्कशास्त्र सभी शास्त्रों के लिए दीपक के समान है एवं सभी कार्यों में सफलता हेतु उपाय बताने वाला शास्त्र है। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ज्ञान दीपके से अपने को एवं दूसरों को आलोकित करने के लिए तर्कशास्त्र का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। तर्कशास्त्र बहुत उपयोगी है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र) Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

Bihar Board Class 11 Philosophy ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र) Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रमाणशास्त्र (Theory of knowledge) का महत्त्व है –
(क) तर्क विद्या के महत्त्व को बढ़ाने के कारण
(ख) धर्म विद्या के महत्त्व को बढ़ाने के कारण
(ग) नीतिशास्त्र के महत्त्व को बढ़ाने के कारण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) तर्क विद्या के महत्त्व को बढ़ाने के कारण

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 2.
प्रमा है –
(क) ज्ञान का वास्तविक रूप
(ख) ज्ञान का अवास्तविक रूप
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ज्ञान का वास्तविक रूप

प्रश्न 3.
‘उपमान’ का शाब्दिक अर्थ होता है –
(क) सादृश्यता या समानता के द्वारा संज्ञा-संज्ञि सम्बन्ध का ज्ञान होना
(ख) समानुपात के द्वारा संज्ञा-संज्ञि सम्बन्ध
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सादृश्यता या समानता के द्वारा संज्ञा-संज्ञि सम्बन्ध का ज्ञान होना

प्रश्न 4.
न्याय – दर्शन के अनुसार ‘शब्द’ के क्या अर्थ हैं?
(क) विश्वासी और महान पुरुष के वचन के अर्थ का ज्ञान
(ख) ‘शब्द’ के अर्थ का ज्ञान
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) विश्वासी और महान पुरुष के वचन के अर्थ का ज्ञान

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 5.
पद हैं –
(क) आकृति विशेष
(ख) जाति-विशेष
(ग) प्राकृति विशेष
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
न्याय दर्शन के अनुसार शब्द होते हैं –
(क) नित्य (Eternal)
(ख) अनित्य (Not-eternal)
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) अनित्य (Not-eternal)

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 7.
गौतम के अनुसार न्याय के प्रकार हैं –
(क) पूर्ववत् अनुमान
(ख) शेषवत् अनुमान
(ग) समान्तयो दृष्टि
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 8.
पंचावयव में प्रतिज्ञा का कौन-सा स्थान है?
(क) पहला
(ख) दूसरा
(ग) तीसरा
(घ) चौथा
उत्तर:
(क) पहला

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प्रश्न 9.
न्याय की ज्ञानमीमांसा (Nyaya theory of knowledge) का पहला अंग है –
(क) अनुमान
(ख) प्रत्यक्ष
(ग) उपमान
(घ) शब्द
उत्तर:
(ख) प्रत्यक्ष

प्रश्न 10.
न्याय दर्शन के प्रतिपादक हैं –
(क) महर्षि गौतम
(ख) महर्षि कणाद
(ग) महर्षि कपिल
(घ) महात्मा बुद्ध
उत्तर:
(क) महर्षि गौतम

प्रश्न 11.
न्याय दर्शन को कितने खण्डों में बाँटा गया है –
(क) चार
(ख) तीन
(ग) दो
(घ) पाँच
उत्तर:
(क) चार

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प्रश्न 12.
न्यायशास्त्र के अनुसार ज्ञान के स्वरूप है –
(क) प्रभा (Real knowledge)
(ख) अप्रभा (Non-real Knowledge)
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

प्रश्न 13.
न्याय के अनुसार प्रमाण है –
(क) प्रत्यक्ष एवं अनुमान
(ख) प्रत्यक्ष एवं उपमान
(ग) अनुमान एवं शब्द
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 14.
ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान कहलाता है –
(क) प्रत्यक्ष (Perception)
(ख) उपमान (Comparison)
(ग) शब्द (Verbal authority)
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) प्रत्यक्ष (Perception)

प्रश्न 15.
मीमांसा दर्शन के प्रर्वतक कौन थे?
(क) महर्षि जेमिनी
(ख) महर्षि गौतम
(ग) महर्षि कणाद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) महर्षि जेमिनी

प्रश्न 16.
परार्थानुमान में कितने वाक्यों (Propositions) की आवश्यकता होती है –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(घ) पाँच

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प्रश्न 17.
न्याय दर्शन के अनुसार पदार्थों की संख्या है –
(क) 8
(ख) 5
(ग) 16
(घ) 14
उत्तर:
(ग) 16

प्रश्न 18.
प्रयोजनानुसार अनुमान होते हैं –
(क) स्वार्थानुमान एवं परमार्थानुमान
(ख) पूर्ववत् एवं शेषवत् अनुमान
(ग) सामान्य तो दृष्टि अनुमान
(घ) परमार्थानुमान केवल
उत्तर:
(क) स्वार्थानुमान एवं परमार्थानुमान

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प्रश्न 19.
‘अक्षपाद’ नाम से कौन जाने जाते हैं?
(क) महर्षि गौतम
(ख) महर्षि नागार्जुन
(ग) महर्षि कपिल
(घ) महर्षि चर्वाक
उत्तर:
(क) महर्षि गौतम

Bihar Board Class 11 Philosophy ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र) Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘प्रमाण’ के कितने प्रकार हैं?
उत्तर:
गौतम के अनुसार प्रमाण के चार प्रकार हैं। वे हैं-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्द।

प्रश्न 2.
न्याय-दर्शन के अनुसार ‘शब्द’ (Verbal Authority) के अभिप्राय को स्पष्ट करें।
उत्तर:
न्याय-दर्शन के अनुसार, ‘शब्द’ चौथा प्रमाण है। किसी विश्वासी और महान पुरुष के वचन के अर्थ (meaning) का ज्ञान ही शब्द प्रमाण है।

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प्रश्न 3.
उपमान क्या है? अथवा, उपमान (Comparison) का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
न्याय-दर्शन के अनुसार ‘उपमान’ को प्रमाण का तीसरा भेद बताया गया है। उपमान का शाब्दिक अर्थ होता है, सादृश्यता या समानता के द्वारा संज्ञा-संज्ञि-संबंध का ज्ञान होना।

प्रश्न 4.
न्याय दर्शन के प्रवर्तक कौन थे?
उत्तर:
न्याय दर्शन के प्रवर्तक गौतम ऋषि माने जाते हैं।

प्रश्न 5.
व्याप्ति-सम्बन्ध क्या है?
उत्तर:
दो वस्तुओं के बीच एक आवश्यक सम्बन्ध जो व्यापक माना जाता है, इसे ही . व्याप्ति-सम्बन्ध (Universal relation) से जानते हैं। जैसे-धुआँ और आग में व्याप्ति सम्बन्ध है।

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प्रश्न 6.
अनुमान क्या है?
उत्तर:
अनुमान का अर्थ होता है, एक बात से दूसरी बात को जान लेना। यदि कोई बात हमें प्रत्यक्ष या आगमन के द्वारा जानी हुई है तो उससे दूसरी बात भी निकाल सकते हैं। इसी को अनुमान कहते हैं। गौतम अनुमान को प्रमाण का दूसरा भेद मानते हैं।

प्रश्न 7.
प्रमाणशास्त्र (Theory of knowledge) का न्याय दर्शन में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
पूरे न्याय दर्शन का महत्त्व उसके प्रमाणशास्त्र को लेकर है, जिसमें शुद्ध विचार के नियमों का वर्णन है। उन नियमों के पालन से तत्त्व-ज्ञान प्राप्त करने के उपायों पर प्रकाश डाला गया है। तर्क विद्या के महत्त्व को बढ़ाने के कारण न्याय दर्शन को लोग ‘न्याय-शास्त्र’ कहकर पुकारते हैं, जो भारतीय तर्कशास्त्र (Indian logic) का प्रतीक बन गया है।

प्रश्न 8.
न्याय दर्शन को कितने खण्डों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर:
न्याय दर्शन को चार खण्डों में बाँटा जाता हैं वे हैं-प्रमाणशास्त्र, संसार सम्बन्धी विचार, आत्मा एवं मोक्ष विचार तथा ईश्वर-विचार।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 9.
‘प्रमाण’ क्या है?
उत्तर:
‘प्रमा’ को प्राप्त करने के जितने साधन हैं, उन्हें ही ‘प्रमाण’ कहा गया है। गौतम के अनुसार प्रमाण के चार साधन हैं।

प्रश्न 10.
प्रत्यक्ष (Perception) क्या है?
उत्तर:
वे सभी ज्ञान जो हमें ज्ञानेन्द्रियों (Sense Organs) के द्वारा प्राप्त होते हैं, उन्हें हम प्रत्यक्ष (Perception) कहते हैं। प्रत्यक्ष तभी संभव है, जब इन्द्रियाँ और पदार्थ के बीच सम्पर्क हो।

प्रश्न 11.
‘प्रमा’ (Real knowledge) क्या है?
उत्तर:
न्यायशास्त्र में ज्ञान के दो स्वरूप बताए गए हैं-प्रमा और अप्रमा। प्रमा ही ज्ञान का वास्तविक रूप है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपमान एवं अनुमान (Comparison and inference) के बीच सम्बन्धों की व्याख्या करें। अथवा, उपमान एवं अनुमान के बीच क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
अनुमान प्रत्यक्ष के आधार पर ही होता है लेकिन अनुमान प्रत्यक्ष से बिल्कुल ही भिन्न क्रिया है। अनुमान का रूप व्यापक है। उसमें उसका आधार व्याप्ति-सम्बन्ध (Universal relation) रहता है, जिसमें निगमन यानि निष्कर्ष में एक बहुत बड़ा बल रहता है तथा वह सत्य होने का अधिक दावा कर सकता है। दूसरी ओर, उपमान भी प्रत्यक्ष पर आधारित है, लेकिन अनुमान की तरह व्याप्ति-सम्बन्ध से सहायता लेने का सुअवसर प्राप्त नहीं होता है।

उपमान से जो कुछ ज्ञान हमें प्राप्त होता है उसमें कोई भी व्याप्ति-सम्बन्ध नहीं बतलाया जा सकता है। अतः उपमान से जो निष्कर्ष निकलता है वह मजबूत है और हमेशा सही होने का दावा कभी नहीं कर सकता है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अनुमान को उपमान पर उस तरह निर्भर नहीं करना पड़ता है जिस तरह उपमान अनुमान पर निर्भर करता है। सांख्य और वैशेषिक दर्शनों में ‘उपमान’ को एक स्वतंत्र प्रमाण नहीं बताकर अनुमान का ही एक रूप बताया गया है। अगर हम आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो पाएँगे कि उपमान भले ही ‘अनुमान’ से अलग रखा जाए लेकिन अनुमान का काम ‘उपमान’ में हमेशा पड़ता रहता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 2.
पदार्थ-प्रत्यक्ष (Object-Perception) का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी ज्ञान की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि हमारे सामने कोई पदार्थ वस्तु या द्रव्य हो। जब हमारे सामने ‘गाय’ रहेगी तभी हमें उसके सम्बन्ध में किसी तरह का प्रत्यक्ष भी हो सकता है। अगर हमारे सामने कोई पदार्थ या वस्तु नहीं रहे तो केवल ज्ञानेन्द्रियाँ ही प्रत्यक्ष का निर्माण नहीं कर सकती हैं। इसलिए प्रत्यक्ष के लिए बाह्य पदार्थ या वस्तु का होना आवश्यक है। न्याय दर्शन में सात तरह के पदार्थ बताए गए हैं। वे हैं-द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष समवाय एवं अभाव। इनमें ‘द्रव्य’ को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इसके बाद अन्य सभी द्रव्य पर आश्रित हैं।

प्रश्न 3.
प्रमाण-शास्त्र (Theory of knowledge) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
पूरा न्याय-दर्शन गौतम के प्रमाण सम्बन्धी विचारों पर आधारित है। प्रमाणशास्त्र ज्ञान प्राप्त करने के साधनों (Sources of knowledge) पर प्रकाश डालने का प्रयास करता है। न्यायशास्त्र में ज्ञान के दो रूप बताए गए हैं-प्रमा और अप्रमा। प्रमा ही ज्ञान का वास्तविक रूप है। प्रमा को प्राप्त करने के जितने साधन बताए गए हैं, उन्हें ही ‘प्रमाण’ कहते हैं।

प्रमाण के सम्बन्ध में जो विचार पाए जाते हैं, उन्हें ही प्रमाण-शास्त्र के नाम से पुकारते हैं। न्याय-शास्त्र में प्रमाण के चार प्रकार बताएँ गए हैं। दूसरे शब्दों में गौतम के अनुसार चार तरह के शब्दों से वास्तविक ज्ञान यानि ‘प्रमा’ की प्राप्ति हो सकती है। वे हैं – प्रत्यक्ष (Perception), अनुमान (Inference), उपमान (Comparison) एवं शब्द (Verbal Authority)।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 4.
न्याय-दर्शन के आधार पर ‘पद’ के अर्थ को स्पष्ट करें। अथवा, भारतीय दर्शन में ‘पद’ के अर्थ को स्पष्ट करें।
उत्तर:
जिस किसी शब्द में अर्थ या संकेत की स्थापना हो जाती है, उसे ‘पद’ कहते हैं। दूसरे शब्दों में शक्तिमान शब्द को हम पद कहते हैं। किसी पद या शब्द में निम्नलिखित अर्थ या संकेत को बतलाने की शक्ति होती है –

1. व्यक्ति-विशेष (Individual):
यहाँ ‘व्यक्ति’ का अर्थ है वह वस्तु जो अपने गुणों के साथ प्रत्यक्ष हो सके। जैसे-हम ‘गाय’ शब्द को लें। वह द्रव्य या वस्तु जो गाय के सभी गुणों की उपस्थिति दिखावे गाय के नाम से पुकारी जाएगी। न्याय-सूत्र के अनुसार गुणों का आधार-स्वरूप जो मूर्तिमान द्रव्य है, वह व्यक्ति है।

2. जाति-विशेष (Universal):
अलग-अलग व्यक्तियों में रहते हुए भी जो एक समान गुण पाया जाए उसे जाति कहते हैं। पद में जाति बताने की भी शक्ति होती है। जैसे-संसार में ‘गाय’ हजारों या लाखों की संख्या मे होंगे लेकिन उन सबों की ‘जाति’ एक ही कही जाएगी।

3. आकृति-विशेष (Form):
पद में आकृति (Form) को बतलाने की शक्ति होती है। आकृति का अर्थ है, अंगों की रचना। जैसे-सींग, पूँछ, खूर, सर आदि हिस्से को देखकर हमें ‘जानवर’ का बोध होता है। इसी तरह, दो पैर, दो हाथ, दो आँखें, शरीर, सर आदि को देखकर आदमी (मानव) का बोध होता है।

प्रश्न 5.
‘परार्थानुमान’ से आप क्या समझते हैं? अथवा, पंचावयव (Five-membered syllogisem) के अर्थ को स्पष्ट करें।
उत्तर:
जब हमें दूसरों के सामने तथ्य (facts) के प्रदर्शन की जरूरत पड़ती है तो अपने अनुमान से दूसरे को सहमत करने की जरूरत पड़ती हैं, वहाँ हमारा अनुमान परार्थानुमान (knowledge for others) कहलाता है। परार्थानुमान में हमें अपने विचारों को सुव्यवस्थित करना पड़ता है तथा अपने वाक्यों को सावधानी और आत्मबल (Self Confidence) के साथ एक तार्किक शृंखला (Logical Chain) में रखना पड़ता है।

इसलिए परार्थानुमान में हमें पाँच वाक्यों (Five propositions) की जरूरत पड़ती है। इस प्रकार के अनुमान में पाँच भाग होते हैं। इसे ही पंचावयव (Five membered syllogism) के नाम से पुकारा जाता है। गौतम के अनुसार अनुमान में पाँच वाक्यों का होना बिल्कुल ही आवश्यक है। इसे हम निम्नलिखित ढंग से उदाहरण के रूप में रख सकते हैं –

(क) पहाड़ पर आग है। – प्रतिज्ञा
(ख) क्योंकि इसमें धुआँ है। – हेतु
(ग) जहाँ-जहाँ धुआँ होता है, वहाँ-वहाँ आग होती है। – व्याप्ति
(घ) पहाड़ पर धुआँ है। – उपनय
(ङ) इसलिए पहाड़ पर आग है। – निगमन

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 6.
क्या शब्द ‘नित्य’ (Eternal) है?
उत्तर:
नित्य का मतलब है कि जिसका न तो आदि हो और न अन्त (End)। इसी तरह अनित्य का मतलब होता है जिसका आदि और अन्त जाना जा सकें। क्या शब्द नित्य है ? इस संबंध में न्याय-दर्शन एवं मीमांसा-दर्शन के विद्वानों में मतभेद पाए जाते हैं। मीमांसा दर्शन के प्रवर्तक महर्षि जेमिनि का कहना है कि ‘शब्द’ नित्य (Eternal) है।

कहने का मतलब इसका आदि और अंत नहीं होता है। शब्द की न तो उत्पत्ति होती है और न इनका विनाश हो सकता है। ‘शब्द’ का अस्तित्व तो अनादि काल से है। उनके अनुसार शब्द के ऊपर एक आवरण रहता है जिस कारण उसे हम हमेशा सुन नहीं सकते। जब वह आवरण हट जाता है तो वह सुनाई पड़ता हैं। जेमिनि ऋषि का तर्क है कि ‘शब्द’ का विनाशक कारण तो कुछ भी देखने को मिलता नहीं है, तो फिर उसका विनाश कैसे होगा?

न्याय-दर्शन मीमांसा के मत का खंडन करते हुए यह बतलाता है कि शब्द अनित्य (Note eternal) है। कहने का मतलब शब्द का जन्म होता है और उसका विनाश भी होता है। अभिप्राय यह है कि शब्द का आदि और अन्त दोनों सम्भव है। गौतम के अनुसार ‘शब्द’ का विनाशक कारण है, लेकिन वह दिखाई नहीं पड़ता है। अगर हमारी इच्छा हो तो उस विनाश कारक को अनुमान (Inference) के द्वारा जान सकते हैं वात्स्यायन भी गौतम की बात का जोरदार समर्थन करते हैं।

न्याय-दर्शन के विद्वानों का तर्क है कि शब्द की उत्पत्ति’ होती है, अभिव्यक्ति नहीं। अभिव्यक्ति तो उसकी होती है जो पहले से रहता है तथा जो आवरण में छिपे रहने के कारण दिखाई नहीं पड़ता है। ऐसी बात शब्द के साथ नहीं है। न्याय दर्शन के समर्थकों का कहना है कि अगर शब्द नित्य है तो वह ‘शाश्वत’ क्यों नहीं बना रहता यानि हमेशा कायम क्यों नहीं रहता? अतः शब्द उत्पन्न होने पर ही सुनाई पड़ता है। इसलिए शब्द अनित्य (Not-eternal) है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शब्द क्या है? शब्द के मुख्य प्रकारों या भेदों की व्याख्या करें। अथवा, न्याय दर्शन के अनुसार शब्द के अर्थ को स्पष्ट करें। शब्द के मुख्य प्रकारों की व्याख्या करें।
उत्तर:
बौद्ध, जैन, वैशेषिक दर्शन शब्द को अनुमान का अंग मानते हैं जबकि गौतम के अनुसार ‘शब्द’ चौथा प्रमाण (Source of knowledge) है। अनेक शब्दों एवं वाक्यों द्वारा जो वस्तुओं का ज्ञान होता है उसे हम शब्द कहते हैं। सभी तरह के शब्दों से हमें ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है। अतः ऐसे ही शब्द को हम प्रमाण मानेंगे जो यथार्थ तथा विश्वास के योग्य हो।

भारतीय विद्वानों के अनुसार ‘शब्द’ तभी प्रमाण बनता है जब वह विश्वासी आदमी का निश्चयबोधक वाक्य हो, जिसे आप्त वचन भी कह सकते हैं। संक्षेप में, “किसी विश्वासी और महान पुरुष के वचन के अर्थ (meaning) का ज्ञान ही शब्द प्रमाण है।” अतः रामायण, महाभारत या पुराणों से जो ज्ञान हमें मिलते हैं, वह प्रत्यक्ष, अनुमान और उपमान के द्वारा नहीं मिलते हैं, बल्कि ‘शब्द’ (verbal authority) के द्वारा प्राप्त होते हैं।

‘शब्द’ के ज्ञान में तीन बातें मुख्य हैं। वे हैं-शब्द के द्वारा ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया। शब्द ऐसे मानव के हों जो विश्वसनीय एवं सत्यवादी समझे जाते हों, कहने का अभिप्राय, जिनकी बातों को सहज रूप में सत्य मान सकते हों। शब्द ऐसे हों जिनके अर्थ हमारी समझ में हो। कहने का अभिप्राय है कि यदि कृष्ण के उपदेश को यदि अंग्रेजी भाषा में हिन्दी भाषियों को सुनाया जाए तो उन्हें समझ में नहीं जाएगी।

शब्द के प्रकार या भेद (Kinds or Forms of Types of Verbal Authority):
शब्द के वृहत् अर्थानुसार कान का जो विषय है वह ‘शब्द’ कहलाता है। इस दृष्टिकोण से शब्द के दो प्रकार होते हैं –

1. ध्वनि-बोधक (Inarticulate) शब्द:
जिसमें केवल एक ध्वनि या आवाज ही कान को सुनाई पड़ती है, उससे कोई अक्षर प्रकट नहीं होता है। जैसे–मृदंग या सितार की आवाज को, गधे का रेंगना आदि।

2. वर्ण-बोधक (Articulate) शब्द:
जिसमें कंठ, तालु आदि के संयोग से स्वर-व्यंजनों का उच्चारण प्रकट होता है। जैसे-मानव की आवाज-पानी, हवा, आम, मछली आदि।

वर्ण-बोधक शब्द के भी दो रूप होते हैं –

3. सार्थक (meaningful) शब्द:
सार्थक शब्दों में कुछ-न-कुछ अर्थ छिपे रहते हैं। जैसे-धर्म, कॉलेज, पूजा, पुस्तक, भवन आदि।

4. निरर्थक (unmeaningful) शब्द:
निरर्थक शब्द के अर्थ प्रकट नहीं होते हैं। जैसे – आह, ओह, उफ, खट, पट आदि। तर्कशास्त्र में हमारा सम्बन्ध केवल सार्थक शब्दों से ही रहता है क्योंकि तर्कशास्त्र का विषय विचार है। कोई भी विचार सार्थक शब्दों द्वारा ही प्रकट किए जाते हैं।

नैयायिकों ने शब्द के दो प्रकार बताए हैं। वे निम्नलिखित हैं –

1. दृष्टार्थ (Perceptible) शब्द:
दृष्टार्थ शब्द उसे कहेंगे जिसका ज्ञान प्रत्यक्ष (Percep tion) के द्वारा प्राप्त हो सकता है। यह भी आवश्यक नहीं है कि सभी शब्दों का प्रत्यक्ष हमें हमेशा ही हो। जैसे-हिमालय पहाड़, आगरा का ताजमहल, नई दिल्ली का संसद भवन आदि की बात की जाए तो वे दृष्टार्थ शब्द होंगे क्योंकि उनका प्रत्यक्ष संभव है।

2. अदृष्टार्थ (Inperceptible) शब्द:
अदृष्टार्थ शब्द वे हैं जो सत्य तो माने जाते हैं, लेकिन प्रत्यक्ष की पहुँच से बिल्कुल बाहर रहते हैं। ऐसे शब्द आप्त वचन या विश्वसनीय लोगों के मुँह से सुनाई पड़ते हैं, यदि उन शब्दों का प्रत्यक्षीकरण करना चाहें तो संभव नहीं है।

जैसे-ईश्वर, मन, आत्मा, अमरता आदि ऐसे शब्द हैं जिन्हें हम सत्य तो मान लेते हैं लेकिन उसका प्रत्यक्षीकरण संभव नहीं है। इसी तरह बड़े-बड़े महात्माओं एवं ऋषि-मुनियों की पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, नीति-अनीति आदि बातों का प्रत्यक्षीकरण संभव नहीं है। सूत्र के आधार पर नैयायिकों ने शब्द के दो भेद बताए हैं। वे हैं-वैदिक शब्द (Words of Vedas) एवं लौकिक शब्द (Words of human being)।

वैदिक शब्द (Words of vedas of God):
भारतवर्ष में ‘वेद’ आदि ग्रन्थ है। वैदिक वचन ईश्वर के वचन माने जाते हैं। ऐसे शब्द की सत्यता पर संदेह की बातें नहीं की जा सकती हैं। इसे हम ब्रह्मवाक्य नाम से जानते हैं। वैदिक शब्द सदा निर्दोष, अभ्रान्त, विश्वास-पूर्ण तथा पवित्र माने जाते हैं। कहने का अभिप्राय वैदिक शब्दों को बहुत से भारतीय स्वतः एक प्रमाण मानते हैं। वैदिक शब्द या वाक्य तीन प्रकार के हैं –

(क) विधि वाक्य:
विधि वाक्य में हम एक तरह की आज्ञा या आदेश पाते हैं। जैसे-जो स्वर्ग की इच्छा रखते हैं, वे अग्निहोत्र होम करें।

(ख) अर्थवाद:
अर्थवाद वर्णनात्मक वाक्य के रूप में हम पाते हैं। इसके चार प्रकार माने जाते हैं –

(i) स्तुतिवाक्य:
स्तुति-वाक्य में किसी काम का फल बतलाकर किसी की प्रशंसा की जाती है। जैसे-अमुक यज्ञ को पूरा कर अमुक व्यक्ति ने यश की प्राप्ति की।

(ii) निंदा वाक्य:
निंदा वाक्य में बुरे काम के फल को बतलाकर उसकी निंदा की जाती है। जैसे-पाप कर्म करने से मनुष्य नरक में जाता है।

(iii) प्रकृति वाक्य:
प्रकृति वाक्य में मानव के द्वारा किए हुए कामों में विरोध दिखलाया जाता है। जैसे-कोई पूरब मुँह होकर आहुति करता है और कोई पश्चिम मुँह।

(iv) पुराकल्प वाक्य:
पुराकल्प वाक्य ऐसी विधि को बतलाता है जो परम्परा से चली आती है। जैसे-‘महान संतगण’ यही कहते आते हैं, अतः हम इसे ही करें।

(ग) अनुवाद:
अनुवाद वैदिक वाक्य का तीसरा रूप कहा जा सकता है। इसमें पहले से। कही हुई बातों को दुहरा (repeat) किया जाता है।

लौकिक शब्द (Words of human beings):
सामान्य रूप से मनुष्य के वचन को हम लौकिक शब्द कह सकते हैं। लौकिक शब्द वैदिक शब्द की तरह पूर्णतः सत्य होने का दावा नहीं कर सकता है। मनुष्य के वचन झूठे भी हो सकते हैं। यदि लौकिक शब्द किसी महान् या विश्वसनीय पुरुष के द्वारा कहे जाएँ तो वे शब्द भी वैदिक वचन की तरह सत्य माने जाते हैं।

मीमांसा – दर्शन में भी शब्द के दो भेद बताए गए हैं। वे हैं-‘पौरुषेय’ और ‘अपौरुषेय’। नैयायिकों ने जिस शब्द को लौकिक कहा है, उसी को मीमांसा-दर्शन में ‘पौरुषेय’ कहा जाता है। जैसे मनुष्य के वचन या आप्तवचन ‘पौरुषेय’ शब्द कहलाते हैं। दूसरी ओर, वैदिक शब्द को मीमांसा-दर्शन में ‘अपौरुषेय’ शब्द से पुकारा जाता है। मीमांसा-दर्शन वैदिक शब्द की सत्यता एवं प्रामाणिकता को सिद्ध करना ही अपना लक्ष्य मानता है। अतः वहाँ ‘शब्द-प्रमाण’ का सहारा आवश्यक हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 2.
न्याय-दर्शन के परिप्रेक्ष्य में वाक्य (sentence) के अर्थ को स्पष्ट करें। वाक्य को अर्थपूर्ण होने के लिए किन-किन बातों की आवश्यकता पड़ती है? अथवा, नैयायिकों के अनुसार वाक्य को अर्थपूर्ण होने हेतु किन-किन बातों की जरूरत होती है?
उत्तर:
न्याय-शास्त्र के विद्वान के अनुसार, ‘पदों के समूह का नाम वाक्य है।’ किसी वाक्य से जो अर्थ निकलता है, उसे ‘शब्द-बोध’ या वाक्यार्थ ज्ञान (verbal cognition) कहा जाता हैं। सभी पदों के समूह को हम वाक्य नहीं कह सकते हैं, बल्कि ऐसे ही पदों का समूह वाक्य कहलाता है, जिसका अर्थ निकले। किसी भी वाक्य को अर्थपूर्ण होने के लिए चार बातें आवश्यक हैं।

वे हैं-आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि या आसक्ति एवं तात्पर्य। यहाँ इस तथ्य को स्पष्ट कर देना प्रासंगिक प्रतीत होता है कि प्राचीन न्याय-दर्शन में केवल तीन बातों, यथा-आकांक्षा, योग्यता एवं आसक्ति को आवश्यक माना गया है जबकि नव्य-न्याय के अनुसार ‘तात्पर्य’ को भी आवश्यक ‘माना गया है।

1. आकांक्षा:
वाक्य होने के लिए पदों को आपस में एक-दूसरे की अपेक्षा रहती है, जिसे ही हम आकांक्षा कहते हैं। कहने का मतलब जब एक पद दूसरे के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करता है, तभी वाक्य से अर्थ निकलता है। जैसे, जब हम ‘मनुष्य’ और ‘मरणशील’ में सम्बन्ध स्थापित करते हुए कहते हैं कि ‘मनुष्य’ मरणशील है तो यह वाक्य का उदाहरण है।

2. योग्यता:
वाक्यों के पदों के द्वारा जिन वस्तुओं का बोध होता है, यदि उसमें कोई विरोध नहीं हो तो इस विरोधाभाव (Absence of contradiction) को ‘योग्यता’ कहते हैं। उदाहरण के लिए, हम यदि कहें कि ‘आग से प्यास बुझायी जाती है, तो इस वाक्य में योग्यता का अभाव है।’ यदि हम कहते हैं कि ‘पानी से प्यास बुझती है’ तो इस वाक्य में योग्यता का भाव है।

3. सन्निधि या आसक्ति:
वाक्य में पदों (Terms) का एक-दूसरे से समीपता (Near ness) होना ही ‘सन्निधि’ या ‘आसक्ति’ है। कहने का अभिप्राय यदि पदों के बीच समय (time) या स्थान (Place) की बहुत ही लम्बी दूरी हो तो आकांक्षा और योग्यता रहते हुए भी अर्थ नहीं निकल सकता है। अतः पदों की निकटता वाक्य के लिए आवश्यक है। यदि हम एक पेज में लिखें ‘मनुष्य’ फिर दो-चार पन्ने के बाद लिखें ‘मरणशील’ है तो उससे वाक्य का निर्माण नहीं होगा क्योंकि सभी पद बहुत दूर-दूर हैं। यद्यपि सबों में वाक्य बनाने की ‘आकांक्षा’ और ‘योग्यता’ मौजूद है।

4. तात्पर्य:
नव्य-नैयायिकों को अनुसार ‘तात्पर्य’ का जानना किसी वाक्य के लिए बहुत आवश्यक है। कहने का मतलब है कि किसी ‘पद’ का अर्थ, समय और स्थान के साथ बदल सकता है। अतः बोलनेवाले या लिखनेवाले का अभिप्राय भी समझना आवश्यक है। जैसे- कनक, Page, Light का अर्थ क्रमशः सोना या धतूरा, नौकर या पृष्ठ, प्रकाश या हल्का होता है। अतः वाक्य लिखते समय ‘पद’ के प्रयुक्त अर्थ को लिखना आवश्यक है ताकि वाक्य को समझने में कठिनाई न हो।

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प्रश्न 3.
हेत्वाभास से आप क्या समझते हैं? हेत्वाभास के मुख्य प्रकारों की संक्षेप में व्याख्या करें? अथवा, हेत्वाभास क्या है? इसके भेदों को लिखें।
उत्तर:
अनुमान करना मनुष्य का स्वभाव है। साथ ही गलती करना भी मानव का स्वभाव है। अनुमान करते समय जब हमसे भूल होती है तो भारतीय तर्कशास्त्र में हेत्वाभास कहा जाता है। ‘हेत्वाभास’ का व्यवहार संकुचित एवं वृहत् दोनों अर्थों में होता है। पाश्चात्य तर्कशास्त्र में सत्य को दो रूप में देखा जाता है। वे हैं आकारिक (Formal) एवं वास्तविक (material)। इसलिए वहाँ अनुमान में दो तरह की भूलें हो सकती है। वे हैं-आकारिक एवं वास्तविक। लेकिन भारतीय तर्कशास्त्र में केवल वास्तविक सत्यता पर ही विचार किया जाता है। अतः यहाँ आकारिक दोष की चर्चा नहीं की जाती है।

हेत्वाभास वैसा अनुमान है, जिसमें अययार्थ हेतु केवल देखने में हेतु-सा प्रतीत होता है। हेत्वाभास का शाब्दिक अर्थ है-हेतु + आभास। यानि हेतु-सा जिसका आभास हो। वस्तुतः ऐसे हेतु नहीं होने पर वैसा प्रतीत होते हैं। नैयायिकों के अनुसार ऐसे दोष वास्तविक होते हैं, आकारिक नहीं। हेत्वाभास के भेद या प्रकार-नैयायिकों के हेत्वाभास के पाँच प्रकार बताए हैं, जो निम्नलिखित हैं –

1. सव्यभिचार (Irregular Middle):
अनुमान में निष्कर्ष हेतु (Middle term) पर निर्भर करता है। हेतु का साध्य (Major term) के साथ व्याप्ति सम्बन्ध होने से अनुमान शुद्ध हो जाता है। कहने का अभिप्राय हेतु साध्य के साथ नियमित साहचर्य होना चाहिए।

जब तक हेतु तथा साध्य का सम्बन्ध नियत तथा अनौपचारिक (Unconditional) नहीं होगा तबतक उस – व्याप्ति पर आधारित अनुमान भी गलत होगा। इस गलती को भी सव्यभिचार कहते हैं। इस प्रकार के अनुमान में हेतु साख्य के साथ रह भी सकता है और नहीं भी।
जैसे – सभी ज्ञात पदार्थों में आग है।

पहाड़ ज्ञात पदार्थ है।
∴ पहाड़ पर आग है।

यहाँ हेतु (Middle term) एवं साध्य (Major Term) में नियत साहचर्य नहीं है, क्योंकि हेतु साध्य से अलग भी पाया जाता है। यह आवश्यक नहीं कि सभी ज्ञात पदार्थों में आग हो।

2. विरुद्ध हेतु (Contradictory Middle):
अनुमान में हेतु के आधार पर ही साध्य को सिद्ध किया जाता है जो हम साबित करना चाहते हैं, अगर उसका विपरीत (opposite) ही हेतु द्वारा साबित हो तो अनुमान गलत समझा जाएगा तथा उसे विरुद्ध हेत्वाभास कहते हैं। जैसे-हवा भारी है क्योंकि वह अविरक्त (empty) है। यहाँ अविरक्त पद हेतु है लेकिन यह हल्कापन सिद्ध करता है, न कि भारीपन। अतः यहाँ जो सिद्ध करना है उसका उल्टा हेतु द्वारा सिद्ध होता है।

3. सत्यप्रतिपक्ष हेतु (Inferentially contradicted middle):
जब साध्य के पक्ष तथा विपक्ष में दो समान हेतु रहे तो अनुमान के इस दोष को सत्यप्रतिपक्ष हेत्वाभास कहते हैं। इन दोनों हेतुओं में एक साध्य को प्रमाणित करता है तो दूसरा अप्रमाणित। दोनों हेतुओं का बल बराबर रहता है। जैसे-शब्द नित्य है क्योंकि वह सब जगह सुनाई पड़ता है। शब्द अनित्य है क्योंकि घर की तरह वह एक कार्य है। यहाँ दूसरा अनुमान पहले अनुमान के निष्कर्ष को गलत साबित करता है, दोनों के हेतु बराबर शक्तिशाली हैं। अतः दोनों में कौन सही निष्कर्ष है-यह समझना कठिन है।

4. असिद्ध हेतु (Unproved Middle):
निष्कर्ष हेतु के आधार पर निकलता है। अतः यदि हेतु ही असिद्ध (Unproved) होगा तो उससे सही अनुमान नहीं निकलेगा। यथा, आकाश का फूल सुगन्धित है, क्योंकि फूल सुगन्धित होते हैं। असिद्ध हेत्वाभास भी तीन तरह के होते हैं – आश्रयासिद्ध, स्वरूपासिद्ध एवं अन्यथासिद्ध।

आश्रयासिद्ध:
यदि हेतु का आश्रय भूत अर्थात् पक्ष ही असिद्ध रहे तो उससे उत्पन्न दोष को आश्रयसिद्ध हेत्वाभास कहेंगे। जैसे-आकाश का फूल सुगन्धित है क्योंकि सभी फूल सुगन्धित होते हैं।

स्वरूपासिद्ध:
इसमें दिया हेतु पक्ष में नहीं रहता है। जैसे—आवाज नित्य है क्योंकि वह दृश्य पदार्थ है। यहाँ पक्ष ‘आवाज’ में हेतु-दृश्य पदार्थ का होना असिद्ध है।

अन्यथासिद्ध:
इस तरह के हेत्वाभास के दिए गए हेतु के अभाव में भी साध्य का सिद्ध होना संभव है। जैसे-वह मनुष्य विद्वान है क्योंकि वह ब्राह्मण है। यहाँ ‘ब्राह्मण’ और ‘विद्वान’ के बीच सही अर्थ में व्याप्ति सम्बन्ध नहीं है क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि ब्राह्मण विद्वान ही हों।

5. बाधिक या कालातीत हेतु (Non-inferentially Contradicted Middle):
हेतु से बलशाली दूसरा प्रमाण अगर साध्य को गलत साबित कर दे तो वह अनुमान दोषपूर्ण समझा जाता है। जैसे-आग ठंडी है क्योंकि वह एक द्रव्य है। यहाँ जो बात कही गयी है वह देखने को नहीं मिलती है। प्रत्यक्ष ज्ञान हमें यह बोध कराता है कि आग गर्म है। अतः यहाँ प्रत्यक्ष ज्ञान हेतु से। अधिक बलशाली हेतु को उल्टा ही साबित करता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 4.
प्रत्यक्ष (Perception) क्या है? प्रत्यक्ष के कितने भेद हैं? अथवा, प्रत्यक्ष के मुख्य प्रकारों की संक्षेप में व्याख्या करें।
उत्तर:
गौतम ने प्रमाण के चार भेद बताएँ हैं। उन्होंने ‘प्रत्यक्ष’ को ‘प्रमा’ (Real knowledge) की प्राप्ति का पहला प्रमाण माना है। इन्द्रिय एवं वस्तु के संयोग से जिस ज्ञान की उत्पत्ति होती है, उसे हम प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं। हमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं आँख, नाक, कान, जीभ एवं त्वचा। इनका जब वस्तुओं के साथ संयोग होता है तो जिस अनुभव की उत्पत्ति होती है, उसे हम प्रत्यक्ष कहते हैं।

जैसे-जब कान का संगीत के साथ सम्पर्क होता है तो हमें संगीत का प्रत्यक्ष होता है। अतः इन्द्रिय और वस्तु के सम्पर्क से जिस असंदिग्ध यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होती है उसे प्रत्यक्ष कहते हैं। इसके अतिरिक्त ‘मन’ (Mind) को छठा ज्ञानेन्द्रिय (Sence organ) बताया गया है। मन एक भीतरी ज्ञानेन्द्रिय (Inner sense organ) है। सुख, दुख, इच्छा, प्रेम आदि का ज्ञान ‘मन’ के द्वारा ही प्राप्त होता है।

प्रत्यक्ष के भेद (Forms of Perception):
प्रत्यक्ष का वर्गीकरण भारतीय तर्कशास्त्र में कई तरह से बताया गया है। कहने का अभिप्राय भिन्न-भिन्न आधार पर प्रत्यक्ष के भिन्न-भिन्न भेद बताए गए हैं। इन्द्रिय का पदार्थ के साथ सम्पर्क होने पर प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इस आधार पर प्रत्यक्ष के दो प्रकार हैं –

  1. लौकिक प्रत्यक्ष (Ordinary perception)
  2. अलौकिक प्रत्यक्ष (Extra-ordinary perception)।

1. लौकिक प्रत्यक्ष:
जब इन्द्रियों के साथ वस्तु का साधारण सम्पर्क (Simple contact) होता है तो हम उसे लौकिक प्रत्यक्ष (ordinary.perception) कहते हैं। जैसे-आँख से जब कमल के फूल का सम्पर्क होता है तो हमें प्रत्यक्ष ज्ञान होता है कि वह फूल लाल, उजला या पीला है। लौकिक प्रत्यक्ष के दो भेद हैं-बाह्य प्रत्यक्ष (External perception) एवं मानस प्रत्यक्ष (Mental perception)।

बाह्य प्रत्यक्ष (External Perception):
बाह्य प्रत्यक्ष हमें अपनी बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त होती हैं, जिनकी संख्या पाँच हैं। इसे हम चाक्षुष-प्रत्यक्ष (Visual perception), श्रवण-प्रत्यक्ष (Auditory perception), घ्राणज-प्रत्यक्ष (Olfactory percetion), रासना-प्रत्यक्ष (Taste perception) एवं त्वाचिक-प्रत्यक्ष (Tactual perception) के नाम से जानते हैं।

मानस प्रत्यक्ष:
न्याय-दर्शन में ‘मन’ को एक ज्ञानेन्द्रिय (Sense-organ) के रूप में माना गया है। मन द्वारा जब आन्तरिक अवस्थाओं का प्रत्यक्ष होता है तो उसे मानस-प्रत्यक्ष कहते हैं। मानस प्रत्यक्ष के उदाहरण सुख, दुख, प्रेम, घृणा आदि मनोभावों के अनुभव हैं। मन को न्यायशास्त्र में केन्द्रीय इन्द्रिय के रूप में माना गया है। इस तथ्य को वैशेषिक, सांख्य और मीमांसा दर्शन भी मानते हैं। क्योंकि ‘मन’ सभी प्रकार के ज्ञान के बीच एकता स्थापित करता है।

केवल वेदान्त-दर्शन ‘मन’ को एक आन्तरिक ज्ञानेन्द्रिय नहीं मानता है। लौकिक प्रत्यक्ष के अन्य तीन भेदों की चर्चा की गयी है। वे हैं-निर्विकल्प प्रत्यक्ष, सविकल्प प्रत्यक्ष एवं प्रत्यभिज्ञा। निर्विकल्प प्रत्यक्ष-कभी-कभी पदार्थों का प्रत्यक्ष तो होता है लेकिन उसका स्पष्ट ज्ञान नहीं हो पाता है। उसका सिर्फ आभास मात्र होता है। उदाहरण के लिए, गम्भीर चिन्तन या अध्ययन में मग्न होने पर सामने की वस्तुओं का स्पष्ट ज्ञान नहीं हो पाता है। हमें सिर्फ यह ज्ञान होता है कि कुछ है, लेकिन क्या है, इसको नहीं जानते हैं। निर्विकल्प प्रत्यक्ष को मनोविज्ञान में संवेदना के नाम से भी जानते हैं।

सविकल्प प्रत्यक्ष:
जब किसी विषय या वस्तु का प्रत्यक्ष हमें हो तथा उस विषय का ज्ञान भी हमें प्राप्त हो जाए कि वह ‘क्या है’ तो उसे हम सविकल्प प्रत्यक्ष कहते हैं। इसे ही हम मनोविज्ञान में प्रत्यक्षीकरण कहते हैं। मनोविज्ञान में ‘प्रत्यक्षीकरण’ की परिभाषा अर्थपूर्ण संवेदना के रूप में दी गयी है। उदाहरण के लिए, जब कान से कोई आवाज सुनाई पड़ती है तो सुनाई निर्विकल्प प्रत्यक्ष रहता है, लेकिन जब हम यह जान जाते हैं कि वह सुनाई पड़नेवाली आवाज ‘कोयल’ की ही है, तो इसे हम सविकल्प प्रत्यक्ष कहेंगे।

प्रत्यभिज्ञा-न्यायशास्त्र में कुछ नैयायिकों ने निर्विकल्प और सविकल्प प्रत्यक्ष के साथ एक तीसरा लौकिक प्रत्यक्ष के रूप में प्रत्यभिज्ञा की चर्चा की है। प्रत्यभिज्ञा को हम हिन्दी में ‘पहचानना’ कह सकते हैं। ‘प्रत्यभिज्ञा’ का अर्थ है ‘प्रतिगता अभिज्ञान’। कहने का अर्थ है कि जिस विषय का पहले साक्षात्कार हो चुका हो, उसका फिर से अगर प्रत्यक्ष हो तो उसे ‘प्रत्यभिज्ञा’ कहेंगे। यदि हम किसी व्यक्ति को देखकर यह कह बैठते हैं कि यह अमुक लड़की है। जिसको हमने अमुक समय में अमुक स्थान पर देखा था तो इसे हम प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। हमें इस तथ्य को स्मरण रखनी चाहिए कि इन की इन तीनों लौकिक प्रत्यक्ष के वर्गीकरण को बौद्ध दर्शन एवं वेदान्त दर्शन नहीं मानते हैं।

2. अलौकिक प्रत्यक्ष:
जब किसी पदार्थ या वस्तु के साथ इन्द्रियों का असाधारण या अलौकिक सम्पर्क हो तो वह अलौकिक प्रत्यक्ष कहलाता है। उदाहरण के लिए हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ कुछ ही जानवरों को देख सकती हैं। सभी जानवरों को साधारण रूप में जानना असंभव है। इसके बावजूद हमें सभी जानवरों के ‘पशुत्व-गुण’ का प्रत्यक्ष हो सकता है। इसे ही हम अलौकिक प्रत्यक्ष कहते हैं। अलौकिक प्रत्यक्ष के तीन भेद यानि प्रकार होते हैं-सामान्य लक्षण, ज्ञान लक्षण एवं योगज।

सामान्य लक्षण:
जाति गुण के द्वारा सम्पूर्ण जाति का प्रत्यक्ष होना सामान्य लक्षण प्रत्यक्ष कहलाता हैं। मनुष्य का जाति गुण मनुष्यता है। किसी एक मनुष्य में ‘मनुष्यत्व’ को देखकर हम सम्पूर्ण मानव जाति को देख लेते हैं क्योंकि यह गुण सभी मनुष्यों का सामान्य गुण है। सभी मानव का लौकिक प्रत्यक्ष संभव नहीं है। इसलिए हम कहते हैं कि सबों का अलौकिक प्रत्यक्ष होता है।

अतः जाति-गुण के प्रत्यक्ष के द्वारा सम्पूर्ण जाति का प्रत्यक्ष होना सामान्य लक्षण प्रत्यक्ष है। ज्ञान लक्षण-जब हमें एक इन्द्रिय से किसी दूसरी इन्द्रिय के विषय का प्रत्यक्ष होता है तो यह असाधारण या अलौकिक प्रत्यक्ष है, जिसे हम ज्ञान-लक्षण कहते हैं। जैसे-चन्दन देखने से सुगन्धित होने का ज्ञान, चाय देखने से गर्म होने का ज्ञान आदि अलौकिक ज्ञान लक्षण के श्रेणी में आते हैं।

योगज:
योगज ऐसा प्रत्यक्ष है जो भूत, वर्तमान, भविष्य के गुण तथा सूक्ष्म, निकट तथा दूरस्थ सभी प्रकार की वस्तुओं की साक्षात् अनुभूति कराता है। योगज या अन्तर्ज्ञान एक शक्ति हैं जिसे हम बढ़ा-घटा सकते हैं। जब यह शक्ति बढ़ जाती है तो हम दूर की चीजें तथा सूक्ष्म-चीजों का भी प्रत्यक्ष कर पाते हैं। ‘युजान’ की अवस्था में जो मनुष्य होते हैं, उन्हें कुछ ध्यान धारण करने से योगज की शक्ति आ जाती है। भगवान बुद्ध को ‘निर्वाण’ का योग, शंकराचार्य को ‘ब्रह्म का ज्ञान’ तथा तुलसीदास को चित्रकूट के घाट पर चन्दन घिसते समय भगवान राम के ‘दर्शन’ ये सभी योगज के उदाहरण कहे जा सकते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 5.
पाश्चात्य न्याय वाक्य और पंचावयव में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
पाश्चात्य न्याय वाक्य एवं पंचावयव में निम्नलिखित मुख्य अंतर हैं –

  1. पाश्चात्य न्याय वाक्य (Syllogism) में केवल तीन वाक्य होते हैं, जबकि गौतम के पंचावयव में पाँच वाक्य होते हैं।
  2. पश्चात्य न्याय-वाक्य में निष्कर्ष तीसरे या अन्तिम वाक्य के रूप में होता है, लेकिन गौतम के पंचावयव में निष्कर्ष यानि निगमन तीसरे वाक्य के रूप में नहीं रहता है। यह प्रतिज्ञा के रूप में एक जगह पहले वाक्य के रूप में रहता है तथा निगमन के रूप में पाँचवें वाक्य की जगह होता है।
  3. पाश्चात्य न्याय वाक्य में जो वाक्य वृहत् वाक्य (Major premise) के रूप में रहता है वह वाक्य ‘व्याप्ति’ के रूप में ‘पंचावयव’ में तीसरे स्थान के वाक्य में रहता है।
  4. पाश्चात्य न्याय-वाक्य (Syllogism) में उदाहरण देने की कोई जरूरत नहीं होती है उसके लिए कोई जगह भी नहीं रहती है, लेकिन गौतम के पंचावयव में निगमन को मजबूत दिखाने के लिए उदाहरण दिया जाता है तथा उसके लिए ‘व्याप्ति-वाक्य’ के रूप में एक खास स्थान दिया जाता है।
  5. पाश्चात्य न्याय वाक्य में परिभाषा तथा गुण की स्थापना पश्चिमी तरीके से की जाती है जो भारतीय तरीके से भिन्न है। इसलिए दोनों के न्याय-वाक्य का गुण भी आपस में एक-दूसरे से भिन्न श्रेणी का पाया जाता है।
  6. भारतीय नैयायिकों का तर्क है कि पाँच वाक्य होने से हमारा अनुमान अधिक मजबूत होता है जबकि पाश्चात्य न्याय वाक्य में केवल तीन वाक्य ही होते हैं। अतः उनका अनुमान पंचावयव की तरह मजबूत नहीं कहा जा सकता है।
  7. पाश्चात्य न्याय वाक्य में एक ही वाक्य पूर्णव्यापी होता है, जिसे हम वृहत् वाक्य के रूप में जानते हैं। उदाहरणार्थ सभी मनुष्य मरणशील हैं।
  8. पाश्चात्य तर्कशास्त्र में पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना हेतु आगमन की जरूरत पड़ती है, जिसमें कुछ उदाहरणों का निरीक्षण कर हम पूर्णव्यापी वाक्य बनाते हैं। जैसे-मोहन, सोहन, करीम, आदि को मरते देखकर हम पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं।’
  9. भारतीय न्याय दर्शन में ‘आगमन’ के रूप में कोई तर्कशास्त्र अलग नहीं है। जो काम आगमन के द्वारा होता है वह तो उदाहरण सहित ‘व्याप्ति-वाक्य’ में ही हो जाता है।
  10. इस प्रकार स्पष्ट है कि ‘पंचावयव’ में आगमन एवं निगमन दोनों सम्मिलित हैं। इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि पाश्चात्य न्याय-वाक्य एवं पंचायवयव’ में मौलिक अंतर है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 6.
न्याय-शास्त्र में ज्ञान (Knowledge) के अर्थ को स्पष्ट करें। न्यायशास्त्र के सोलह पदार्थों की संक्षेप में व्याख्या करें।
उत्तर:
भारतीय दर्शनों में ज्ञान, बुद्धि एवं प्रत्यय इत्यादि शब्दों का प्रयोग एक अर्थ या एक रूप में नहीं किया जाता है। अतः इन शब्दों के एक अर्थ में प्रयोग की आदत से एक शब्द-भ्रम हो जाता है। अतः इन भ्रमों से बचने के लिए न्याय-सूत्र में उन शब्दों का प्रयोग एक ही अर्थ में किया जाता है। ‘ज्ञान’ शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है, व्यापक तथा संकुचित अर्थ में। व्यापक अर्थ में यथार्थ और अयथार्थ दोनों तरह के ज्ञान का बोध कराया जाता है।

संकुचित अर्थ में ज्ञान का मतलब केवल यथार्थ ज्ञान से ही लिया जाता है। न्यायशास्त्र में ज्ञान के दो प्रकार बताए जाते हैं। वे हैं-प्रमा (Real) एवं अप्रमा (Unreal knowledges)। मनुष्य का अनुभव भी दो तरह का होता है यथार्थ और अयथार्थ। यथार्थ अनुभव के द्वारा जो हम ज्ञान प्राप्त करते हैं उसे ‘प्रमा’ कहते हैं, जैसे अपनी आँख से देखकर यह कहना कि दूध उजला होता है। इसके विपरीत, अयथार्थ अनुभव के आधार पर जो हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसे ‘अप्रमा’ कहते हैं। जैसे अंधेरी रात में रस्सी को देखकर साँप का ज्ञान होना। प्रमा को प्राप्त करने के लिए जो साधन बताए गए हैं, उन्हें प्रमाण कहा जाता है। न्याय-दर्शन के अनुसार सोलह पदार्थ हैं, वे निम्नलिखित हैं –

1. प्रमाण:
प्रमा को प्राप्त करने के जो साधन हैं, उसे ही प्रमाण कहते हैं। अतः प्रमाण के द्वारा यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के सभी उपायों का वर्णन किया जाता है।

2. प्रमेय:
प्रमाण के द्वारा जिन विषयों का ज्ञान हमें होता है, उसे प्रमेय कहते हैं। गौतम के अनुसार प्रमेय की संख्या बारह है –

  • आत्म
  • शरीर
  • उभय ज्ञानेन्द्रियाँ
  • इन्द्रियों के विषय
  • बुद्धि
  • मन
  • प्रवृत्ति
  • दोष
  • प्रैत्यभाव यानि पुनर्जन्म
  • फल
  • दुःख तथा
  • अपवर्ग प्रमेयों का वर्णन किया है, जिनसे मोक्ष की प्राप्ति हो।

3. संशय:
यह मन की वह अवस्था है, जिसमें मन के सामने दो या अधिक विकल्प दिखाई पड़ते हैं। अतः जब एक ही वस्तु के सम्बन्ध में कई परस्पर विरोधी विकल्प उठ जाते हैं तो उसका निश्चित ज्ञान नहीं होता है, उसे ही हम संशय कहते हैं। संशय न तो निश्चित ज्ञान है और न ज्ञान का पूर्ण अभाव। इसे हम भ्रम या विपर्यय भी नहीं कह सकते हैं।

4. प्रयोजन:
जिसके लिए कार्य में प्रवृत्ति होती है उसे ही प्रयोजन कहते हैं। प्रयोजन की प्राप्ति के लिए ही हम कोई कार्य करते हैं। जो कोई कार्य इच्छापूर्वक किया जाता है, उसका प्रयोजन अवश्य रहता है।

5. दृष्टांत:
जिसे देखने से किसी बात का निश्चय हो जाए, उसे दृष्टांत कहते हैं, वाद-विवाद में अपनी बात को साबित करने के लिए इसका सहारा लिया जाता है।

6. सिद्धान्त:
सिद्धान्त उसे कहते हैं जिसके द्वारा किसी वाद-विवाद का अन्तर का विषय साबित हो जाए। कोई विषय जब प्रमाण द्वारा अन्तिम रूप से स्थापित किया जाता है तो उसे सिद्धान्त कहते हैं।

7. अवयव:
अनुमान दो तरह का होता है। वे हैं-स्वार्थानुमान और परार्थानुमान। परार्थानुमान में हम पाँच नियम पूर्ण वाक्यों द्वारा कोई अनुमान निकालते हैं। उन नियमपूर्ण वाक्यों को ही अवयव कहते हैं।

8. तर्क:
तर्क एक प्रकार की काल्पनिक युक्ति है जिसके द्वारा विपक्षी के कथन को दोषपूर्ण और गलत साबित किया जाता है। तर्क के द्वारा ही किसी सिद्धान्त का प्रबल समर्थन होता है।

9. निर्णय:
किसी विषय के सम्बन्ध में निश्चित ज्ञान को ही निर्णय कहते हैं। अत: किसी विषय के सम्बन्ध में उत्पन्न संशय के दूर हो जाने पर हम जिस निश्चय पर पहुँचते हैं, उसे ही निर्णय कहते हैं।

10. बाद:
बाद उस विचार को कहते हैं, जिसमें प्रमाण और तर्क की सहायता से विपक्षी के कथन की पूर्ण खंडन करके अपने पक्ष का समर्थन किया जाता है और वहीं पर लिया गया यह अन्तिम निर्णय किसी स्वीकृत पूर्व स्थापित सिद्धान्त के विरोध में नहीं होता है।

11. जल्प:
जब वादी और प्रतिवादी के वाद-विवाद का उद्देश्य यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना नहीं होता है, तो वह जल्प कहलाता है। इसमें सत्य की प्राप्ति की इच्छा का बिल्कुल ही अभाव रहता है। यहाँ दोनों पक्षों का उद्देश्य केवल विजय प्राप्त करना ही रहता है।

12. वितंडा:
वितंडा वह है जिसमें वादी अपने पक्ष का समर्थन नहीं करता केवल प्रतिवादी के मत का खंडन करता चला जाता है। वितंडा में केवल प्रतिवादी के मत का किसी तरह खंडन करके ही जीतने का प्रयास किया जाता है। जल्प में वादी किसी-न-किसी तरह से अपने मत का प्रतिपादन भी करता है, जिसका अभाव वितंडा में पाया जाता है।

13. छल:
जब प्रतिवादी के शब्दों का वास्तविक अर्थ छोड़कर कोई दूसरा अर्थ ग्रहण करके दोष दिखलाया जाए, तो उसे छल कहते हैं। यह धूर्तता पूर्ण उत्तर है। छल तीन प्रकार का होता है –

(क) वाक्छल
(ख) सामान्य छल
(ग) उपचार छल।

14. जाति:
केवल समानता और असमानता के आधार पर जो दोष दिखाया जाता है उसे जाति कहते हैं। उदाहरण के लिए नैयायिकों का कहना है कि शब्द अनित्य है, क्योंकि वह घर की तरह एक कार्य है। अगर कोई इसका खंडन यह कहकर करना चाहे कि ‘शब्द’ और ‘अशरीरधारी’ में कोई भी व्याप्ति सम्बन्ध नहीं किया जा सकता है।

15. निग्रह स्थान:
इसका शाब्दिक अर्थ होता है पराजय अथवा तिरस्कार का स्थान वाद-विवाद के क्रम में वादी एक ऐसे स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ उसे हार स्वीकार करनी पड़ती है या उसके चलते कोई अपमान सहना पड़ता है तो उसे निग्रह स्थान कहते हैं। निग्रह स्थान के दो कारण होते हैं। वे हैं-अज्ञानता एवं गलत ज्ञान।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 7.
अनुमान क्या है? अनुमान के विभिन्न भेदों की संक्षेप में व्याख्या करें। अथवा, अनुमान से आप क्या समझते हैं? अनुमान के मुख्य प्रकारों की विवेचना करें।
उत्तर:
भारतीय तर्कशास्त्र में प्रत्यक्ष के बाद अनुमान दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। भारतीय न्यायशास्त्र में अनुमान का महत्त्व पाश्चात्य तर्कशास्त्र के जैसा नहीं माना गया है। भारतीय तर्कशास्त्र में ‘अनुमान’ को केवल ज्ञान प्राप्त करने का एक साधन मात्र माना गया है। अनुमान शब्द के दो भाग मालूम पड़ते हैं-अनु + मान। ‘अनु’ का अर्थ होता है पश्चात् या बाद में तथा ‘मान’ का अर्थ होता है ज्ञान। अतः अनुमान का शाब्दिक अर्थ है बाद में प्राप्त होने वाला ज्ञान।

भारतीय तर्कशास्त्रियों के अनुसार ‘अनुमान’ उस ज्ञान को कहते हैं जो किसी पूर्वज्ञान के बाद प्राप्त होता है। जैसे-आकाश में बादल देखने के बाद अनुमान करते हैं कि वर्षा होगी। न्यायशास्त्र के अनुसार जिसके आधार पर कोई अनुमान निकाला जाए उसे ‘हेतु’ या ‘साधन’ या ‘लिंग’ अथवा ‘चिह्न’ कहते हैं। न्याय-दर्शन में अनुमान को ‘तत्पूर्वक’ भी कहा गया है। इसका अर्थ है-“दो प्रत्यक्ष जिसके पूर्व में हो, वह अनुमान है। ऐसा विचार गौतम का है।” अनुमान के भेद या प्रकार-भारतीय तर्कशास्त्र में अनुमान को हम तीन श्रेणियों में बाँट सकते हैं। वे हैं –

(अ) प्रयोजन के अनुसार (According to purpose)
(ब) प्राचीन न्याय यानि गौतम के अनुसार (According to Gautam or old Nyana)
(स) नव्य-न्याय के अनुसार (According to New-Nyaya)

यहाँ हम गौतम के विचारानुसार अनुमान के भेदों को समझने का प्रयत्न करेंगे।

प्रयोजन के अनुसार अनुमान के प्रकार (According to purpose):
अनुमान करने में हमारे दो उद्देश्य या प्रयोजन हो सकते हैं-एक तो अपने लिए अनुमान करना और दूसरे लोगों या पराये लोगों के लिए अनुमान करना। इस दृष्टि से अनुमान के दो भेद हैं –

(क) स्वार्थानुमान (Knowledge for oneself)
(ख) परार्थानुमान (Knowledge for others)

स्वार्थानुमान:
जब हम केवल अपने बारे में कुछ जानना चाहते हैं या अपनी शंका को दूर करने के लिए अनुमान करते हैं तो वह स्वार्थानुमान कहलाता है। इसमें तीन ही वाक्यों का प्रयोग होता है। जैसे-पहाड़ पर धुआँ है तो अन्त में हेतु (Middle term) और साध्य (Major term) के बीच व्याप्ति-सम्बन्ध (Universal relation) के द्वारा सम्बन्ध दिखाया जाता है। यथा, जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ आग रहती है।

परार्थानुमान:
जो अनुमान दूसरों की शंका मिटाने या समझाने के लिए किया जाता है, उसे हम परार्थानुमान कहते हैं। परार्थानुमान में अनुमान के लिए पाँच वाक्य की आवश्यकता होती है, जिसे गौतम मुनि ने पंचावयव (Five membered syllogism) कहा है। जैसे –

  1. पहाड़ पर आग है। – प्रतिज्ञा
  2. क्योंकि पहाड़ पर धुआँ है।
  3. जहाँ धुआँ रहता है, वहाँ आग रहती है। – यथा रसोईघर (उदाहरण सहित व्याप्ति वाक्य)
  4. पहाड़ पर धुआँ है। – उपनय
  5. इसलिए पहाड़ पर आग है। – निगमन भारतीय तर्कशास्त्र में गौतम के पंचावयव नाम से प्रसिद्ध है।

गौतम या प्राचीन न्याय के अनुसार अनुमान के भेद या प्रकार:
गौतम के अनुसार न्याय के तीन भेद होते हैं –

(क) पूर्ववत् अनुमान (Inference from Cause to Effect)
(ख) शेषवत् अनुमान (Inference from Effect to cause)
(ग) सामान्यतोदृष्टि (Inference from Similarity)

(क) पूर्ववत् अनुमान:
जब हम कारण से कार्य का कोई अनुमान निकालते हैं तो वह पूर्ववत् अनुमान कहलाता है। इसमें भविष्य का अनुमान वर्तमान कारण से भी करते हैं। जैसे-समय से वर्षा देखकर अच्छी फसल का अनुमान करना पूर्ववत् अनुमान है। इसी तरह, बादल देखकर वर्षा का अनुमान पूर्ववत् अनुमान है। यहाँ ‘बादल’ कारण है और उसका कार्य ‘वर्षा’ है। इस तरह का अनुमान व्याप्ति-सम्बन्ध (Universal Relation) पर भी आश्रित रहता है। पाश्चात्य तर्कशास्त्र में यह अनुमान कार्य-कारण के नियम (Law of Causation) पर निर्भर करता है।

(ख) शेषवत् अनुमान:
यह अनुमान भी कार्य-कारण के नियम पर निर्भर करता है। शेषवत् अनुमान में हम कार्य से कारण (from effect to cause) के बारे में कुछ सोचते हैं। अतः जब कोई कार्य दिया रहे और तब उसके कारण (cause) का जो हम अनुमान करेंगे उसे शेषवत् अनुमान कहेंगे। जैसे-सड़क पर पानी देखकर वर्षा का अनुमान, मलेरिया देखकर उसके मच्छर का अनुमान आदि शेषवत् अनुमान के उदाहरण हैं।

(ग) सामान्यतोदृष्टि:
यदि दो पदार्थों या वस्तुओं को साथ-साथ देखें तो एक को देखकर दूसरे का भी अनुमान किया जा सकता है। यह ‘सामान्यतोदृष्टि’ अनुमान कहलाता है। जैसे-जब किसी जानवर में ‘सीग’ देखते हैं तो उसमें ‘पूँछ’ होने का भी अनुमान कर बैठते हैं तो यह सामान्यतोदृष्टि अनुमान है। इसमें कार्य-कारण नियम का सर्वथा अभाव होता है। इसमें अनुमान का आधार सामान्यता की बातें (Point of similarity) तथा दो वस्तुओं के साथ मेल की बातें रहती हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 8.
गौतम के अनुसार ‘पंचावयव’ का विशलेषण करें। अथवा, न्याय दर्शन के अनुसार पाँच वाक्यों (Five propositions) को समझावें।
उत्तर:
परार्थानुमान में हमें अपने विचारों को सुव्यवस्थित करना पड़ता है। अपने वाक्यों को सावधानी और आत्मबल के साथ एक तार्किक शृंखला में रखना पड़ता है। अतः परार्थानुमान में हमें पाँच वाक्यों की जरूरत पड़ती है। इस प्रकार के अनुमान में पाँच हिस्से होते हैं। इसे पंचावयव (Five membered Syllogism) के नाम से पुकारा जाता है।

‘पंचावयव’ का अर्थ ही होता है जिसमें पाँच अवयव या हिस्से हों। न्याय दर्शन में इसे ही गौतम का पंचावयव नाम से जानते हैं। इसे ‘न्याय प्रयोग’ के नाम से भी जानते हैं। मीमांसा दर्शन एवं वेदान्त दर्शन के विद्वानों के अनुमान के निमित्त केवल तीन वाक्यों को ही चर्चा की है। उनके अनुसार पंचावयव में समय और शक्ति की बचत होती है। गौतम के अनुसार पंचावयव में पाँच वाक्यों का होना आवश्यक है। इसे हम निम्नलिखित ढंग से स्पष्ट कर सकते हैं –

  1. पहाड़ पर आग है। – प्रतिज्ञा
  2. क्योंकि पहाड़ पर धुआँ है। – हेतु
  3. जहाँ धुआँ रहता है, वहाँ आग रहती है। – यथा रसोईघर। उदाहरण सहित व्याप्ति वाक्य
  4. पहाड़ पर धुआँ है। – उपनय
  5. इसलिए पहाड़ पर आग है। – निगमन प्रतिज्ञा-प्रतिज्ञा अनुमान का वह वाक्य है जिसे हम साबित करना चाहते हैं।

वाक्यों के क्रम में इसका पहला स्थान होता है। गौतम मुनि के अनुसार जो हमें साबित करना है उसका एक मजबूत संकल्प कर लेना चाहिए। इसीलिए इसे प्रतिज्ञा के नाम से पुकारा जाता है। गौतम के अनुसार जो साध्य विषय है, उसका निर्देशन करना ही प्रतिज्ञा है, जैसे-‘पहाड़ पर आग है’ यह अनुमान में प्रतिज्ञा के रूप में है।

हेतु-हेतु का स्थान न्याय-वाक्य में दूसरा रहता है। यह प्रतिज्ञा का कारण बताता है। प्रतिज्ञा की वास्तविकता दिखाने के लिए जिस कारण को हम सामने वाक्य के रूप में रखते हैं, उसे हेतु कहेंगे। क्योंकि इसमें धुआँ है।’ हेतु वाक्य है। पाश्चात्य तर्कशास्त्र में हेतु के साथ मेल खाते हुए जो वाक्य होते हैं, उसे लघु वाक्य (Minor premise) के नाम से जानते हैं।

उदाहरण सहित व्याप्ति-वाक्य-यह एक पूर्णव्यापी वाक्य के रूप में रहता है। इसका स्थान भारतीय न्याय वाक्यों के क्रम में तीसरा रहता है। इस वाक्य में ‘साध्य’ (Major term) एवं हेतु’ (Middle term) का वह सम्बन्ध दिखाया जाता है जो टूट नहीं सकता है। व्याप्ति-सम्बन्ध बहुत ही मजबूत रहता है, वह टूटता नहीं है। इसका रूप सर्वव्यापक रहता है।

जैसे-‘धुआँ’ और ‘आग’ के बीच व्याप्ति सम्बन्ध है। जैसे रसोईघर का उदाहरण देकर हम यह बताना चाहते हैं कि रसोईघर में जब धुआँ देखते हैं तो वहाँ पर आग मिलती है। अतः इसे हम उदाहरणसहित व्याप्ति वाक्य कहते हैं। वस्तुतः यह अनुमान का मेरुदण्ड है। जब तक इस वाक्य की हम स्थापना नहीं करेंगे तब तक प्रतिज्ञा साबित नहीं होती है।

उपनय-उपनय का स्थान पंचावयव में चौथा है। अनुमान के लिए यहीं पर वह स्थान या पक्ष रहता है यहाँ हम कुछ साबित कर दिखाना चाहते हैं। यहाँ साध्य के अस्तित्व को दिखाने की व्यवस्था की जाती है। ‘पहाड़ पर धुआँ है। उपनय का उदाहरण है। गौतम के अनुसार ‘हेतु’ और ‘साध्य’ का सम्बन्ध उदाहरण के द्वारा देने के बाद अपने पक्ष में उसे स्वींचना ही उपनय कहलाता है। निगमन-निगमन को दूसरे शब्दों में निष्कर्ष भी कहते हैं। निगमन वही वाक्य है जिसमें हम अनुमान के द्वारा कुछ साबित कर दिखला देते हैं।

गौतम के पंचावयव में इसका स्थान पाँचवें वाक्प के रूप में रहता है। स्वार्थानुमान या पाश्चात्य न्याय-वाक्य में इसका स्थान तीसरे वाक्य के रूप में रहता है। गौतम के अनुसार जब प्रतिज्ञा साबित हो जाती है तो उसका रूप ‘निगमन’ का हो जाता है।

उदाहरण के लिए-‘पहाड़ पर आग है’ इसे हम साबित करना चाहते थे, अतः जब तक यह साबित नहीं हुआ था तब तक इसे हम प्रतिज्ञा के नाम से जानते थे लेकिन जब ‘हेतु’, ‘व्याप्ति-वाक्य’ और ‘उपनय’ की सहायता से इसे साबित कर देते हैं तो इसका रूप निगमन का हो जाता है। अतः प्रतिज्ञा जब ‘निगमन’ की अवस्था में आता है तो वहाँ संदेह दूर हो जाता है। इसके एक विश्वास और बल मिल जाता है। वस्तुतः निगमन ही ‘अनुमान’ की अन्तिम सीढ़ी है।

उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि गौतम अनुमान की परिपक्वता एवं मजबूती के लिए पाँच वाक्यों का होना आवश्यक बताते हैं। गौतम ने तो केवल पंचावयव को आवश्यक बताया जबकि वात्स्यायन मुनि ने दस अवयव की चर्चा की जो उपयुक्त नहीं जान पड़ता है। मीमांसा एवं वेदान्त दर्शन केवल तीन वाक्यों को ही आवश्यक बताते हैं। वस्तुतः गौतम के पंचावयव का अपना विशेष महत्त्व है। यहाँ पाश्चात्य तर्कशास्त्र की तरह आगमन का अलग अस्तित्व नहीं रखा गया है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 5 ज्ञान का न्याय सिद्धान्त (प्रमाणशास्त्र)

प्रश्न 9.
प्रमाण-शास्त्र (Theory of knowledge) में प्रमाण के कितने स्त्रोत बताए गए हैं? संक्षेप में व्याख्या करें। अथवा, गौतम के अनुसार वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति के कितने स्त्रोत हैं? अथवा, प्रमा (Real knowledge) प्राप्ति के कितने साधन हैं? विवेचना करें।
उत्तर:
न्याय दर्शन गौतम के प्रमाण-सम्बन्धी विचारों पर आधारित है। न्यायशास्त्र में ज्ञान के दो स्वरूप बताए गए हैं। वे हैं-प्रमा एवं अप्रमा। प्रमा ही ज्ञान का वास्तविक स्वरूप है। प्रमा को प्राप्त करने के जितने साधन बताए गए हैं, उन्हें ही ‘प्रमाण’ कहते हैं। प्रमाण के सम्बन्ध में जो विचार पाए जाते हैं, उन्हें ही प्रमाण-शास्त्र के नाम से पुकारते हैं। गौतम के अनुसार प्रमाण – के चार प्रकार बताए गए हैं। गौतम के अनुसार चार तरह के वास्तविक ज्ञान यानि प्रमा की प्राप्ति हो सकती है। वे हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्द।

1. प्रत्यक्ष (Perception):
न्यायशास्त्र में प्रत्यक्ष को प्रमाण का पहला भेद बताया गया है। प्रत्यक्ष की उत्पत्ति प्रति + अक्षण से हुई है, जिसका अर्थ ‘आँख’ के सामने होना होता है। लेकिन यह संकीर्ण अर्थ है क्योंकि प्रत्यक्ष का मतलब ‘आँख’ के साथ-साथ अन्य इन्द्रियों से रहता हैं कान से सुनना, जीभ से चखना, नाक से सूंघना, चमड़े से छूना भी उसी तरह का प्रत्यक्ष कहलाता है, जिस तरह आँख से देखना। अतः प्रत्यक्ष का अर्थ होता है किसी भी ज्ञानेन्द्रिय के सामने होना। प्रत्यक्ष तभी संभव है जब इन्द्रियाँ (Organs) और पदार्थ (Object) के बीच एक सन्निकर्ष (Contact) हो। प्रत्यक्ष के मुख्य दो भेद होते हैं –

(क) लौकिक प्रत्यक्ष एवं अलौकिक प्रत्यक्ष (Extra-ordinary perception)। लौकिक प्रत्यक्ष के दो भेद बताये गए हैं। वे हैं-बाह्य प्रत्यक्ष (External Perception) एवं मानस-प्रत्यक्ष (Internal Perception) न्यायं दर्शन में मन (Mind) एक ज्ञानेन्द्रिय (Sense-Organ) के रूप में माना गया है। मन कोई बाहरी चीज नहीं है, जिसे हम आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों की तरह देख सकें। मन का अस्तित्व शरीर के भीतर माना गया है जो अदृश्य है। हमें अपने जीवन में सुख-दुख, प्रेम-घृणा आदि मनोभावों का अनुभव होता रहता है।

सुख-दुख का ज्ञान हमें आँख, कान, नाक आदि से प्राप्त नहीं हो सकता है। इस ज्ञान की प्राप्ति ‘मन’ के द्वारा की जा सकती है। इसीलिए ‘मन’ से प्राप्त ‘प्रत्यक्ष को मानस-प्रत्यक्ष’ कहते हैं। न्यायशास्त्र के अनुसार ‘मन’ कोई पदार्थ या द्रव्य (Matter) का बना हुआ नहीं रहता है। अतः इसकी ज्ञान-शक्ति भी विशेष प्रकार की होती है। यह सभी प्रकार के ज्ञान के बीच एकता स्थापित करता रहता है इसलिए इसे केन्द्रीय इन्द्रिय (Central organ) कहा जाता है।

2. अनुभव (Inference):
भारतीय तर्कशास्त्र में अनुमान का स्थान प्रत्यक्ष के बाद आता है। तर्कशास्त्र में प्रमाण (Sources of knowledge) के रूप में अनुमान को दूसरा भेद बतलाया गया है। अनुमान का महत्त्व पाश्चात्य दर्शन में तो इतना अधिक है कि समूचे तर्कशास्त्र का विषय ही अनुमान समझा जाता है। इसके अनुसार अनुमान का अर्थ होता है ज्ञात से अज्ञात की ओर जाना। लेकिन भारतीय तर्कशास्त्र में ‘अनुमान’ का महत्त्व पाश्चात्य तर्कशास्त्र के ऐसा नहीं बतलाया गया है।

यहाँ अनुमान को केवल ज्ञान प्राप्त करने का एक साधन मात्र माना गया है। जिसका स्थान प्रत्यक्ष के बाद आता है। ‘अनुमान’ शब्द के दो भाग हैं अनु + मान। ‘अनु’ का अर्थ होता है पश्चात् या बाद में और ‘मान’ का अर्थ होता है ‘ज्ञान’ इसलिए, ‘अनुमान’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है ‘बाद’ में प्राप्त होने वाला ज्ञान। अतः अनुमान उस ज्ञान को कहते हैं जो किसी पूर्वज्ञान के बाद प्राप्त होता है। जैसे-बादल से वर्षा का अनुमान करते हैं, धुएँ से आग का अनुमान करते हैं।

गौतम ने अनुमान को ‘तत्पूर्वकम्’ कहा है क्योंकि ‘तत्पूर्वक’ का अर्थ होता है प्रत्यक्ष मूलक। यदि लक्षण या लिंग दिखाई नहीं पड़े, किन्तु आगमन (शास्त्र) या बड़े महापुरुषों के आप्त वचन से उसका हमें ज्ञान हो तो उसी के बल पर अनुमान किया जा सकता है। अतः अनुमान का अर्थ होता है, एक बात से दूसरी बात को जान लेना। यदि कोई बात हमें प्रत्यक्ष या आगमन के द्वारा जानी हुई है तो उससे दूसरी बात भी निकाल सकते हैं।

इसी को अनुमान कहा जाता अनुमान के लिए एक और पूर्वज्ञान की आवश्यकता रहती है, जिसे व्यक्ति-ज्ञान कहते हैं। व्याप्ति दो वस्तुओं के बीच एक आवश्यक सम्बन्ध है जो व्यापक माना जाता है। जैसे – ‘धुआँ’ और ‘आग’ में व्याप्ति सम्बन्ध है, क्योंकि यह सर्वविदित है कि जहाँ-जहाँ धुआँ रहता है, वहाँ-वहाँ आग पायी जाती है। इसका कारण यह है कि ‘धुआँ’ और ‘आग’ के बीच व्याप्ति-सम्बन्ध है। जिसका ज्ञान हमें पहले से रहना चाहिए तभी उसके बल पर अनुमान निकाला जा सकता है।

अनुमान में पक्षधर्मता होता है। पक्षधर्मता का अर्थ होता है पक्ष (स्थान-विशेष) में लिंग या हेतु या साधन का पाया जाना, जैसे-पहाड़ (स्थान-विशेष) में ‘धुआँ’ का पाया जाना। व्याप्ति ज्ञान से धुआँ और आग का सम्बन्ध जाना जाता है तथा पक्षधर्मता से पहाड़ और धुआँ का सम्बन्ध जानते हैं। दोनों को मिलाकर हम पहाड़ और आग के बीच सम्बन्ध स्थापित करते हैं, यही परामर्श है और इसी के चलते अनुमान होता है।

3. उपमान (Comparison):
न्याय दर्शन में ‘उपमान’ को प्रमाण (Sources of knowledge) के तीसरे भेद के रूप में बतलाया गया है। न्याय-दर्शन और मीमांसा दर्शन उपमानं को एक स्वतंत्र प्रमाण (Independent source of knowledge) के रूप में बतलाया गया है। उपमान का शाब्दिक अर्थ होता है “सादृश्यता’ या ‘समानता’ के द्वारा संज्ञा-संज्ञि-सम्बन्ध का ज्ञान होना।

जिस वस्तु को हमने पहले कभी नहीं देखा हैं और उसके बारे में दूसरों से वर्णन सुना है और अगर उसी से मिलती कोई वस्तु मिलती है तो वहाँ, हम सुनी हुई बातों के साथ उस वस्तु का मिलान करने लगते हैं, जिसे उपमान (Comparison) कहते हैं। उपमा या सादृश्यता के आधार पर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है, उसे उपमिति कहते हैं। उपमान कारण है तो उपमिति उसका फल या कार्य। उपमा के बाद जो ज्ञान हमें प्राप्त होता है, उसे हम उपमिति कहते हैं।

न्याय-दर्शन एवं मीमांसा-दर्शन में उपमान को प्रमाण के लिए महत्त्वपूर्ण माना गया है। आज के युग में बहुत से आविष्कार और अदृश्य पदार्थों का ज्ञान इसी उपमान के द्वारा प्राप्त होता है। आयुर्वेद में उपमान के आधार पर ही अनेक अपरिचित औषधियों और औषधी के द्रव्यों का वर्णन मिलता हैं। उपमान को लेकर सभी भारतीय दार्शनिकों का एक समान मत नहीं है। कुछ विद्वान उपमान को अनुमान का ही एक रूप मानते हैं।

4. शब्द (Verbal Authority):
न्याय दर्शन के अनुसार ‘शब्द’ चौथा प्रमाण है। ‘शब्द’ का अर्थ एक या दो साधारण शब्दों (Words) से नहीं लगाया गया है, बल्कि अनेक शब्दों और वाक्यों के द्वारा जो वस्तुओं का ज्ञान होता है, उसे शब्द (knowledge) के नाम से जाना जाता है। सभी शब्दों से हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है, अतः ऐसे ही ‘शब्द’ को हम प्रमाण मानते हैं, जो यथार्थ हो तथा जो विश्वास के योग्य हो। भारतीय दार्शनिकों के अनुसार ‘शब्द’ तभी प्रमाण बनता है जबकि वह किसी बड़े और विश्वासी आदमी का निश्चय बोधक वाक्य हो जिसे हम आप्त वचन भी कह सकते हैं। दूसरे शब्दों में, “किसी विश्वासी और महान् पुरुष के वचन के अर्थ (Meaning) का ज्ञान ही शब्द प्रमाण है।”

इतिहास का ज्ञान हमें शब्द के द्वारा ही होता है। रामायण, महाभारत या अन्य पुराण का जो ज्ञान लोगों को होता है, उसका ज्ञान प्रत्यक्ष, अनुमान या उपमान नहीं है बल्कि उनका ज्ञान ‘शब्द’ के द्वारा ही प्राप्त होता है। अतः ‘शब्द’ को न्याय-दर्शन में एक स्वतंत्र प्रमाण माना गया है। अतः स्पष्ट है कि ‘शब्द’ ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया है। शब्द ऐसे मनुष्य के हों, जो विश्वसनीय और सत्यवादी समझे जाते हों, कहने का अभिप्राय जिनकी बातों को सहज रूप में सत्य मान सकते हैं तथा शब्द ऐसे हों जिनके अर्थ हमारी समझ में हों।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy मिल की प्रायोगिक विधियाँ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसमें केवल दोनों उदाहरणों की आवश्यकता होती है –
(क) व्यतिरेक विधि
(ख) अन्वय विधि
(ग) अवशेष विधि
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) व्यतिरेक विधि

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प्रश्न 2.
मिल की प्रायोगिक विधि को जाना जाता है –
(क) निराकरण विधि के रूप में
(ख) संयोजन विधि के रूप में
(ग) वियोजन विधि के रूप में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निराकरण विधि के रूप में

प्रश्न 3.
व्यतिरेक विधि से प्राप्त निष्कर्ष होते हैं –
(क) निश्चित
(ख) अनिश्चित
(ग) संदिग्ध
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निश्चित

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प्रश्न 4.
अवशेष-विधि एक विशेष रूप है –
(क) व्यतिरेक विधि का
(ख) अन्वय विधि का
(ग) संयुक्त विधि का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) व्यतिरेक विधि का

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन एक प्रमाण तथा खोज दोनों की विधि है?
(क) अवशेष विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) अन्वय विधि
(घ) संयुक्त विधि
उत्तर:
(क) अवशेष विधि

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प्रश्न 6.
अन्वय विधि –
(क) निरीक्षण प्रधान विधि है
(ख) प्रयोग प्रधान विधि है
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निरीक्षण प्रधान विधि है

प्रश्न 7.
मिल की प्रायोगिक विधियाँ हैं –
(क) पाँच
(ख) चार
(ग) तीन
(घ) दो
उत्तर:
(क) पाँच

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प्रश्न 8.
मिल की प्रयोगात्मक विधियों में कौन-सी विधि कारण की मात्रा की व्याख्या करती है –
(क) अन्वय विधि (Method of agreement)
(ख) व्यतिरेक विधि (Method of difference)
(ग) संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि (Joint method of agreement)
(घ) सहगामी सहचर विधि (Method of concomitant variations)
उत्तर:
(घ) सहगामी सहचर विधि (Method of concomitant variations)

प्रश्न 9.
घटना के यथार्थ कारण जानने के लिए किसने प्रायोगिक विधियों का वर्णन किया?
(क) मिल (Mill) ने
(ख) हेवेल ने
(ग) डेकार्ट ने
(घ) किसी ने नहीं
उत्तर:
(क) मिल (Mill) ने

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प्रश्न 10.
मिल ने कारण के गुणात्मक लक्षणों को आधार बनाकर जिन प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया था। वह है –
(क) अन्वय विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि
(घ) अवशेष विधि
उत्तर:
(ग) संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि

प्रश्न 11.
कारण के परिमाणात्मक लक्षणों के आधार मिल द्वारा बनाई गई विधियाँ हैं –
(क) सहचरी परिवर्तन विधि
(ख) अवशेष विधि
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 12.
प्रमाण की विधि (Method of proof) है –
(क) व्यतिरेक विधि
(ख) अन्वय विधि
(ग) अवशेष विधि
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(क) व्यतिरेक विधि

प्रश्न 13.
खोज की विधि है –
(क) अन्वय विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) अन्वय विधि

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प्रश्न 14.
किसके द्वारा स्थाई कारणों के कार्य का पता लगाया जा सकता है?
(क) अन्वय विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) सहचरी परिवर्तन विधि
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ग) सहचरी परिवर्तन विधि

प्रश्न 15.
निगमन पर आधारित प्रयोग विधि है –
(क) अवशेष विधि
(ख) अन्वय विधि
(ग) व्यतिरेक विधि
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(क) अवशेष विधि

Bihar Board Class 11 Philosophy मिल की प्रायोगिक विधियाँ Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किस विधि में केवल दो उदाहरणों की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
व्यतिरेक विधि में केवल दो उदाहरणों की आवश्यकता होती है। एक उदाहरण भावात्मक होते हैं और दूसरा निषेधात्मक।

प्रश्न 2.
किस विधि में सह परिणामों को कारण-कार्य मान लेने का भ्रम होता है?
उत्तर:
अन्वय विधि में सह परिणामों को कारण-कार्य मान लेने का भ्रम होता है।

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प्रश्न 3.
प्रमाण की विधि (Method of proof) किसे कहा जाता है?
उत्तर:
व्यतिरेक विधि (Method of difference) को प्रयोग प्रधान विधि होने के कारण प्रमाण विधि कहा जाता है।

प्रश्न 4.
प्रयोगात्मक विधियाँ किसे कहते हैं? अथ्वा, प्रयोगात्मक विधियाँ क्या हैं?
उत्तर:
कार्य-कारण सम्बन्ध निश्चित करने की विधियों को प्रयोगात्मक विधियाँ कहते हैं।

प्रश्न 5.
मिल की प्रायोगिक विधियाँ कितनी हैं?
उत्तर:
मिल की प्रायोगिक विधियाँ पाँच हैं। वे हैं-अन्वय विधि, व्यतिरेक विधि, संयुक्त अन्वय-व्यतिरेक विधि, सहचारी-परिवर्तन-विधि तथा अवशेष विधि।

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प्रश्न 6.
घटना के यथार्थ कारण जानने के लिए किसने प्रायोगिक विधियों का वर्णन किया?
उत्तर:
जे. एस. मिल ने घटना के यथार्थ कारण जानने के लिए प्रायोगिक विधियों का वर्णन किया।

प्रश्न 7.
मिल ने कारण के परिमाणात्मक लक्षण (Quantitative marks of cause) के आधार पर कितनी प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया?
उत्तर:
मिल ने कारण के परिमाणात्मक लक्षण के आधार पर दो प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया। वे हैं-सहचारी-परिवर्तन-विधि (The method of concomitant variations) एवं अवशेष-विधि (The method of residues)।

प्रश्न 8.
अन्वय विधि के मुख्य दोष क्या हैं? अथवा, अन्वय विधि की मुख्य सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
अन्वय विधि का मुख्य दोष है कि यह बहुकारणवाद (Plurality of causes) की समस्या से ग्रस्त है। दूसरा दोष यह है कि निरीक्षण-प्रधान विधि के कारण निरीक्षण के सभी दोष इसमें शामिल हैं।

प्रश्न 9.
खोज की विधि (Method of discovery) किसे कहा जाता है?
उत्तर:
अन्वय विधि को मुख्यतः निरीक्षण पर आधारित होने के कारण खोज की विधि कहा जाता है।

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प्रश्न 10.
कौन-सी प्रायोगिक विधि निगमन पर आधारित विधि है?
उत्तर:
अवशेष विधि (The method of residues) निगमन पर आधारित विधि है।

प्रश्न 11.
किस विधि से स्थायी कारणों के कार्य का पता लगाया जा सकता है?
उत्तर:
सहचारी-परिवर्तन-विधि (The method of concomitant variations) से स्थायी। कारणों के कार्य का पता लगाया जाता है।

प्रश्न 12.
किस विधि को ‘दुहरा अन्वय विधि’ (Double agreement) कहा जाता है?
उत्तर:
संयुक्त अन्वय-व्यतिरेक-विधि (The joint method of agreement and differ ence) को दुहरा अन्वय विधि कहा जाता है।

प्रश्न 13.
बहिष्करण या निराकरण की विधि (Method of elimination) से आप क्या समझते हैं? अथवा, बहिष्करण या निराकरण विधि का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
बहिष्करण का अर्थ होता है ‘हटाना’ या ‘छाँटना’। किसी घटना के कारण या कार्य का पता तब चलता है जब अनावश्यक बातों को छाँटकर आवश्यक तथ्यों को निकाल लिया जाता है। इसे ही मिल ने निराकरण की विधि कहा है। मिल की प्रायोगिक विधियाँ ही निराकरण की विधियाँ हैं।

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प्रश्न 14.
अन्वय विधि (Method of agreement) के दो मुख्य गुण बताएँ।
उत्तर:
अन्वय विधि निरीक्षण कि विधि होने के कारण इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है। दूसरा, निरीक्षण की विधि होने के कारण इसमें कारण से कार्य की ओर या कार्य से कारण की ओर बढ़ते हैं।

प्रश्न 15.
मिल ने कारण के गुणात्मक लक्षणों को आधार बनाकर कितने प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया?
उत्तर:
मिल ने कारण के गुणात्मक लक्षणों को आधार बनाकर तीन प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया। वे हैं-अन्वय विधि, व्यतिरेक-विधि एवं संयुक्त-अन्वय व्यतिरेक विधि।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अन्वय विधि के दोष क्या हैं?
उत्तर:
अन्वय विधि के निम्न दोष पाए जाते हैं –

  1. इसमें कई उदाहरणों को निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला जाता है। इसलिए इसमें बहुकारणवाद का दोष आ जाता है।
  2. यह विधि निरीक्षण पर आधारित है, इससे सूक्ष्म एवं गुप्त परिस्थिति का निरीक्षण न हुआ हो, जो कि घटना का वास्तविक कारण और कार्य हो। इन्द्रियों के द्वारा सूक्ष्म तत्त्वों का निरीक्षण संभव नहीं हो पाता है।
  3. इसमें एक ही कारण के दो सहपरिणामों (Co-effects) को एक-दूसरे के कारण कार्य समझने की गलती करते हैं। जैसे दिन के पहले गत और गन के पहले दिन नियत रूप से आते हैं।
  4. इसमें यह त्रुटि है कि उपाधि को पूर्ण कारण मान लिया जाता है।
  5. इस विधि को कागज पर सांकेतिक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना आसान है जो कौमन अक्षर रहता है। यह कारण या कार्य तुरत बतला देते हैं। परन्तु, वास्तविक जगत में इसका व्यवहार आसान नहीं है।
  6. यह विधि एकांकी भी है क्योंकि यह केवल भावात्मक उदाहरणों में अन्वय देखता है। निषेधात्मक उदाहरणों पर विचार नहीं करता है।

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प्रश्न 2.
अन्वय विधि क्या है?
उत्तर:
अन्वय विधि मिल साहब के प्रयोगात्मक विधि का एक प्रथम रूप है। इसकी परिभाषा इस प्रकार से दी गई है। “यदि किसी जाँच की जानेवाली घटना के दो या उससे अधिक उदाहरणों में उस घटना के अतिरिक्त एक और बात सामान्य हो तो वह बात जो सब उदाहरणों से मिलती है उस घटना के साथ कारण-कार्य का संबंध रखती है।” इसे सांकेतिक उदाहरण के द्वारा दिखाया गया है।
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∴ A, X का कारण है या ‘X’ A का कार्य है। यहाँ A सभी उदाहरणों के पूर्ववर्तियों में सामान्य रूप से उपस्थित है अतः ‘X’ घटना का कारण – ‘A’ ही है।

प्रश्न 3.
अवशेष विधि क्या निगमनात्मक है?
उत्तर:
कुछ लोगों के अनुसार अवशेष विधि का स्वरूप निगमनात्मक है। निगमन में आधार वाक्य से निष्कर्ष को निकाला जाता है। उसी प्रकार आगमन में ज्ञात कारण के कार्य को सम्मिलित कार्य से निकाल कर व शेष कार्य और बचे हुए कारण में संबंध स्थापित करते हैं। पुनः आगमन में विशिष्ट उदाहरणों का निरीक्षण किया जाता है। निरीक्षण आगमन के लिए आवश्यक है। अवशेष विधि में निरीक्षण से काम नहीं किया जाता है। बल्कि गणना (Calculation) से काम लेते हैं। घटाने की प्रक्रिया एक प्रकार की गणना है, अतः इसका आंतरिक स्वरूप निगमनात्मक है न कि आगमनात्मक है।

लेकिन यह धारणा ठीक नहीं है। निगमन की मदद लेते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यह पूर्णतया निगमनात्मक है। इस तरह सभी विधियाँ निगमनात्मक हो जाती है क्योंकि सभी विधियाँ कारणता के नियम से निकाली गई हैं। इसलिए इस विधि को निगमनात्मक कहना न्याय संगत न होगा। अतः निष्कर्ष निकलता है कि अवशेष विधि निगमनात्मक नहीं है। मात्र गणना की क्रिया देखकर इसे निगमनात्मक नहीं कहना चाहिए। अनुभव आगमन के स्वरूप को बतलाता है। अतः इसका स्वरूप आगमनात्मक है न कि निगमनात्मक।

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प्रश्न 4.
अन्वय विधि के गुण क्या हैं?
उत्तर:
अन्वय विधि के निम्नलिखित गुण या लाभ हैं –

  1. अन्वय विधि निरीक्षण प्रधान होने के कारण इसका क्षेत्र बहुत विशाल है क्योंकि इस विधि 1 के अंतर्गत निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला जाता है। निरीक्षण सभी घटनाओं का होता है।
  2. इस विधि में कारण से कार्य की ओर या कार्य से कारण की ओर बढ़ सकते हैं। इस प्रकार की सुविधाएँ दूसरे विधि में नहीं है।
  3. यह विधि सर्वसाधारण की विधि है, इसका उपयोग कोई भी कर सकता है।
  4. इस विधि से प्राकृतिक घटनाओं जैसे-भूकंप, बाढ़, महामारी इत्यादि के कारण का पता अच्छी तरह लगती है। इन घटनाओं का निरीक्षण ही होता है, इन पर प्रयोग संभव नहीं है। अतः, इन घटनाओं के कारण का पता लगाने में अन्वय विधि ही सक्षम एवं समर्थ हैं।

प्रश्न 5.
निराकरण के सिद्धान्त क्या है?
उत्तर:
मिल साहब द्वारा बताई गई पाँच प्रयोगात्मक विधियों को निराकरण की विधियाँ के नाम से भी पुकारा जाता है। निराकरण का अर्थ है जाँच की जानेवाली घटना के संबंध में अनावश्यक बातों का छाँट देना या असंबंधित स्थितियों को दूरकर कार्य-कारण संबंध की स्थापना करना! निराकरण का अर्थ ही है जो कारण नहीं उसे दूर हटाकर। मिल साहब के अनुसार कारण की व्याख्या उसके गुण और परिमाण दोनों के आधार पर की गई है।

कारण के गुणात्मक स्वरूप को बताते हुए मिल साहब कहते हैं “कारण नियम, आसन्न अनौपाधिक, पूर्ववर्ती घटना है तथा कारण के परिमाण को बताते हुए कहा गया है” कारण और कार्य परिमाण के अनुसार बिल्कुल ही बराबर होते हैं। A cause is equal to effect according to quantity इस तरह हमें ऐसा करने के लिए निराकरण की सहायता लेनी पड़ती है। जिस तरह फुलवारी में घास की पत्ती बढ़ जाने पर हम उसे छाँट देते हैं ताकि फूल-पौधे ठीक से बढ़ सकें, उसी तरह सही कारण को जानने के लिए हमें बहुत-सी अनावश्यक बातों को छाँट या हटा देना पड़ता है।

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प्रश्न 6.
मिल के प्रयोगात्मक विधि क्या हैं?
उत्तर:
आगमन का उद्देश्य सामान्य यथार्थ वाक्य की रचना करना है इसका अर्थ है – दो घटनाओं के बीच कारण-कार्य संबंध की स्थापना करना। मिल ने प्रयोगात्मक विधि के द्वारा आगमन के उद्देश्य की प्राप्ति करने का प्रयास किया। प्रयोगात्मक विधि के द्वारा केवल किसी घटना का पता नहीं लगाया जाता है। बल्कि उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनावश्यक बातों को छाँट भी दिया जाता है। मिल के मुख्यतः पाँच प्रयोगात्मक विधि हैं –

  1. अन्वय विधि
  2. व्यतिरेक विधि
  3. संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि
  4. सहगामी विवरण विधि और
  5. अवशेष विधि

इन पाँचों विधियों के द्वारा कारण से कार्य और कार्य से कारण की ओर बढ़ते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
व्यतिरेक विधि क्या है? इसके गुण-दोष की व्याख्या करें।
उत्तर:
व्यतिरेक विधि मुख्य रूप से प्रयोग पर आधारित विधि हैं इसमें जिन दो उदाहरणों की आवश्यकता पड़ती है वे प्रयोग से ही प्राप्त होते हैं। फिर भी निरीक्षण के क्षेत्र में भी व्यवहार कर कार्य-कारण संबंध स्थापित किया जाता है। मिल साहब ने इसका परिभाषा इस प्रकार दिए हैं।

“If an instance in which the phenomenon under investigation occurs and an instance in which it does not occur, have every circumstance in common save one that one occuring only in the former the circumstance in which alone the two instances differ is the effect of the cause, or an indisperisable part of the cause of the phenomenon.” अर्थात् “यदि किसी एक उदाहरण में जाँच की जानेवाली घटना घटती हो और दूसरे उदाहरण में जाँच की जानेवाली घटना नहीं घटती हो, सभी बातें समान हों, केवल यही भेद पाया जाए कि प्रथम उदाहरण में किसी एक बात का भाव हो और केवल उसी का दूसरे उदाहरण में अभाव, तो उस बात का उस घटना से कार्य-कारण संबंध पाया जाता है या घटना के कारण का आवश्यक अंश रहता है।” इसकी भाषा के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित बातें हम पाते हैं।

  1. जाँच की जानेवाली घटना के दो उदाहरण दिए जाते हैं। एक उदाहरण में घंटना उपस्थित रहती है और दूसरे उदाहरण में घटना अनुपस्थित रहती है।
  2. दोनों उदाहरणों में एक परिस्थिति को छोड़ कर सभी कुछ समान ही रहते हैं। वह परिस्थिति एवं उदाहरण में स्थित रहती है तथा दूसरे उदाहरण में नहीं।
  3. वह परिस्थिति की अवस्था जिसमें दोनों उदाहरणों को भिन्न पाते हैं घटना का कारण या कार्य होता है या घटना के कारण का आवश्यक अंग होता है। जैसे-सांकेतिक उदाहरण –
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∴ A और X में कार्य कारण-संबंध है यहाँ ‘A’ के रहने पर X और Aके अनुपस्थित रहने पर X भी अनुपस्थित रहता है। इसके दो रूप में पूर्ववर्ती में से एक पूर्ववर्ती को निकाल देते हैं जिससे अनुवर्ती में से भी कोई बात घट जाती है। जैसे-पूर्ववर्ती में से ‘A’ घटता है तो अनुवर्ती में भी ‘A’ घट जाता है दूसरा रूप-पूर्ववर्ती में कुछ जोड़ देते हैं तो अनुवर्ती में भी कुछ जुट जाता है। जैसे –
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इसलिए D और X में कार्य-कारण संबंध है।

वास्तविक उदाहरण:
जब किसी व्यक्ति को मादा अनोफिल मच्छर काटता है, तो उसे मलेरिया हो जाता है और जब किसी व्यक्ति को मादा अनोफिल मच्छर नहीं काटता है, तो उसे मलेरिया नहीं होता है। इस तरह निष्कर्ष निकलता है कि मादा अनोफिल मच्छर ही मलेरिया का कारण है। अतः सांकेतिक एवं वास्तविक दोनों प्रकार के उदाहरणों से स्पष्ट है कि दो उदाहरणों में सभी बातें समान रहती हैं केवल एक बात का अंतर रहता है और वह घटना का कार्य या कारण होता है।

गुण (Merits):

व्यतिरेक विधि के निम्नलिखित गुण हैं –

  1. इस विधि का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि जो कार्य-कारण संबंध स्थापित होता है वह निश्चित होता है क्योंकि यह विधि प्रयोग की विधि है। अन्वय और संयुक्त विधि की तुलना में इसका निष्कर्ष विश्वसनीय होता है।
  2. इस विधि में केवल दो उदाहरण लिये जाते हैं। अतः, परिश्रम कम लगता है। समय भी बचता है।
  3. जबकि अन्वय एवं संयुक्त विधियों में समय एवं श्रम अधिक लगता है।
  4. अन्वय विधि से कारण का जो संकेत मिलता है उसकी जाँच इस विधि से कर सकते हैं। अन्वय विधि कारण को प्रमाणित नहीं करती है। केवल कारण का संकेत करती है। अन्वय विधि से प्राप्त निष्कर्ष की जाँच अतिरिक्त विधि में की जा सकती है क्योंकि यह प्रयोग प्रधान विधि है।
  5. यह विधि हमारे व्यावहारिक जीवन के लिए भी लाभप्रद है, जैसे-एक किसान समझता है कि जिस साल अच्छी वर्षा होती है धान की फसल अच्छी होती है और वर्षा के अभाव में धान की फसल भी खराब होती है, अतः अच्छी वर्षा धान के लिए उपयोगी कारण है।
  6. यह विधि बहुकारणवाद से उत्पन्न कठिनाइयों को बहुत अंश में दूर करती है।

व्यतिरेक विधि के दोष (Demerits):

  1. व्यतिरेक विधि प्रयोग प्रधान विधि होने के कारण उसका क्षेत्र सीमित हो जाता है। प्राकृतिक घटनाओं, जैसे-बाढ़, भूकंप, महामारी पर इस विधि का व्यवहार नहीं हो सकता है।
  2. इसमें केवल कारण से कार्य की ओर जाते हैं क्योंकि यह विधि प्रयोग पर आधारित है।
  3. इसमें कारण और कारणांश (Condition) में भेद नहीं कर पाते हैं। कारणांश ही पूर्ण कारण हो जाता है। जैसे-दाल, सब्जी में नमक मिलाकर भोजन करने में अच्छा लगता है। यदि नमक नहीं मिला है तो भोजन अच्छा नहीं लगता है। यहाँ नमक कारणांश है जो कारण बन जाता है, स्वादिष्ट भोजन का।
  4. इस विधि का व्यवहार असावधानी पूर्वक करने से Post hoc ergo propter hoc (यत्पूर्व सकारणम्) का दोष हो जाता है जैसे किसी पुत्र के उत्पन्न होने पर उसकी माँ का देहान्त होना उस बच्चे के जन्म देने का कारण मानते हैं। फिर भी त्रुटियों के बावजूद यह विधि सबसे अच्छी विधि मानी गई है। इसलिए इसे Method of part excullance कहते हैं। इनकी महत्ता मिल बहुत बताते हैं।

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प्रश्न 2.
सहगामी विचरण विधि की सोदाहरण व्याख्या करें। इसके गुण और दोषों को बताएँ।
उत्तर:
सहचारी या सहगामी विचरण विधि अन्वय एवं व्यतिरेक विधि का एक रूप है। इस विधि के द्वारा कारण-कार्य संबंध का पता इस बात को देखकर लगाया जाता है कि किन दो घटनाओं में साथ-साथ परिवर्तन होता है, इस विधि में परिवर्तन के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है। इसकी परिभाषा मिल ने दिया है। (What ever phenomenon varies in any manner whatever another phenomenon varies in some particular manner is either a cause or an effect of that phenomenon or is connected with it through some fact of causation) अर्थात् जब कोई घटना किसी दूसरी घटना के साथ किसी खास नियम से घटती है या बढ़ती है तो उन दोनों में कारण-कार्य का संबंध रहता है। इस परिभाषा की निम्नलिखित विशेषताएँ हम विश्लेषण करने पर पाते हैं।

  1. इस विधि में दो या दो से अधिक उदाहरणों के निरीक्षण हो सकते हैं।
  2. उन उदाहरणों में दो अवस्थाएँ होती हैं-पूर्ववर्ती और अनुवर्ती।
  3. इसमें परिमाण के आधार पर निष्कर्ष की स्थापना की जाती है।
  4. इसमें बदलने वाली अवस्था के वीच कारण-कार्य का संबंध रहता है। दो घटनाएँ साथ-साथ बढ़े, दो घटना साथ-साथ घटे, यह प्रक्रिया उसी अनुपात में होती है।

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∴ A और X में कार्य-कारण संबंध है। इसमें A और X में समानुपाती परिवर्तन हम देखते हैं। अन्वय विधि की तरह ही एक अवस्था में समानता है तथा दूसरी अवस्था में भिन्नता है।
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यहाँ A और X कार्य – कारण संबंध है। यह उदाहरण व्यतिरेक विधि का रूपांतरण है। वास्तविक उदाहरण –

(क) जैसे-जैसे बुखार बढ़ता है थर्मामीटर का पारा बढ़ता है और जैसे-जैसे बुखार घटता है थर्मामीटर का पारा भी घटता है। अतः, दोनों में कार्य-कारण का संबंध है।
(ख) जैसे-जैसे ऊपर की ओर अर्थात् ऊँचाई पर जाते हैं ठंडा बढ़ता है, अतः कार्य-कारण का संबंध है एवं किसी वस्तु की माँग बढ़ती है तो उस वस्तु की कीमत बढ़ती है। माँग घटने पर कीमत भी घट जाती है। अतः, माँग और कीमत (Demand and price) में कार्य कारण संबंध है।
(ग) देखा गया है कि Frustration जैसे – जैसे बढ़ता है हिंसात्मक प्रवृत्ति भी वैसे-वैसे बढ़ती है।

गुण (Merits):

  1. इससे लाभ है कि जब हम किसी घटना के परिणाम या वेग को जानना चाहते हैं तो इस विधि की सहायता लेकर जान लेते हैं।
  2. प्रकृति के अन्दर कुछ ऐसे तत्त्व हैं जिनके बीच कारण-कार्य के संबंध को पता लगाने के लिए सहगामी विचरण विधि की सहायता लेते हैं। यह विधि बिल्कुल सर्वोत्तम विधि है। वायुमंडल का दबाव, ताप, घर्षण, पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति इत्यादि के बीच कारण-कार्य का पता इस विधि द्वारा आसानी से लगाया जा सकता है।
  3. कारण को निश्चित करने के लिए कल्पना की सहायता ली जाती है यह इसी विधि से प्राप्त किया जाता है।
  4. जहाँ घटना के वेग और परिणाम की माप होती है वहाँ यह विधि अन्वय और व्यतिरेक विधि से अधिक लाभदायक है।
  5. बेन साहब के अनुसार, असाधारण परिस्थिति में यह विधि बहुत उपयोगी है।
  6. धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्रों में इस विधि से कारण का पता लगता है। जैसे–अंधविश्वास ही धार्मिक उपद्रव में पाया जाता है। जनसंख्या और मृत्यु में आवश्यक संबंध है। इसी तरह अज्ञानता की मात्रा जितनी अधिक होगी दुःख की मात्रा भी उतनी ही अधिक होती है।

दोष या सीमाएँ (Demerits):

  1. यह विधि केवल परिमाणतः परिवर्तन में सफलीभूत होती है। गुणगत परिवर्तन में इस विधि का व्यवहार कर कारण का पता नहीं लगा सकते।
  2. यहाँ भी सहपरिणामों को एक-दूसरे का कारण समझने की भूल की संभावना बनी रहती
  3. इस विधि का अंतिम सीमा है कि जब परिवर्तन एकाएक होता है, वहाँ इस विधि का व्यवहार नहीं कर सकते हैं। इस विधि का व्यवहार नहीं होता है जहाँ धीरे-धीरे परिवर्तन क्रमशः होता है।

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प्रश्न 3.
अवशेष विधि की सोदाहरण व्याख्या इसके गुण-दोष के साथ करें।
उत्तर:
प्रायोगिक विधियों में अवशेष विधि एक महत्त्वपूर्ण विधि है। इसके द्वारा जटिल कार्य के बचे हुए अंश के कारण का पता लगाते हैं। जटिल कार्य के कुछ अंश के कारण का पता पहले से मालूम रहता है और बचे हुए अंश के कारण का पता अवशेष विधि से लगाते हैं। मिल ने इसकी परिभाषा इस प्रकार दिए हैं।

(“Subduce from any given phenomenon such parts as is known by previous inductions to be the effect of certain anteced ents and the residues of this phenomenon is this effect of this remaining ante cedents-Mill”) अर्थात् “अगर किसी दी हुई घटना से उस भाग को निकाल दिया जाए तो पहले आगमन के आधार पर कुछ पूर्ववर्ती अवस्थाओं का निष्कर्ष समझा गया है, तो घटनाओं का अवशेष भाग अवश्य ही अवशेष अवस्थाओं का कार्य होगा।” इस परिभाषा में निम्नलिखित विशेषताओं को पाते हैं।

  1. कोई जटिल कार्य दिया रहता है जिसके कुछ अंश के कारण का पता पहले से मालूम रहता है, कार्य के शेष अंश के कारण का पता लगाना रहता है।
  2. जो बातें हमें पहले से ज्ञात रहती है उसे सम्मिलित कार्य से हटा देते हैं।
  3. अब कार्य के बचे अंश तथा कारण (पूर्ववर्ती) के बचे अंश में कार्य-कारण स्थापित करते हैं अर्थात् कारण का शेषांश कार्य के शेषांश का कारण होगा। जैसे –

सांकेतिक उदाहरण –
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यहाँ पहले से मालूम है कि कारण B तथा Z का कारण C है। इसलिए Aनिराकरण है ‘X’ का। यह अवशेष विधि निराकरण के सिद्धान्त पर आधारित है, निराकरण का सिद्धांत है “जो किसी एक वस्तु का कारण है वह किसी अन्य वस्तु का कारण नहीं हो सकता है।” इसलिए B, CX का कारण नहीं होता है B, C तो Y, Z का कारण है इसलिए अनुमान करते हैं कि A ही X का कारण है।

वास्तविक उदाहरण –
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अवशेष विधि के गुण (Merits):

1. इस विधि से आविष्कार में सहायता मिलती है। वैज्ञानिकों को मालूम था कि यूरेनस अपनी गति-निर्धारित मार्ग पर नहीं चलकर कुछ भटक जाता है। वैज्ञानिकों ने किसी अज्ञात कारण की कल्पना की और खोज के द्वारा नेपच्युन ग्रह को खोज निकाला। आर्गन गैस की खोज इसी विधि से हुई है। अतः विज्ञान के क्षेत्र में विशेष कर रसायन शास्त्र में इस विधि से अनेक गैसों और तत्त्वों की खोज हुई है।

2. यही एक विधि है जिसके द्वारा किसी सम्मिलित कार्य के बचे हुए अंश के कारण का पता लगा सकते हैं। अन्वय विधि, संयुक्त विधि, व्यतिरेक विधि एवं सहगामी विचरण विधि से बचे हुए अंश के कारण का पता नहीं लगा सकते हैं।

अवशेष विधि का दोष (Demerits):

  1. इस विधि में प्रथम दोष है कि इसका व्यवहार तब होता है जब हमें पहले से घटना के बारे में कुछ ज्ञान प्राप्त रहता है। पूर्व ज्ञान आवश्यक है यदि कोई व्यक्ति किसी घटना से पूर्ण अनभिज्ञ है तो कारण का पता नहीं लगा सकता है।
  2. सहगामी विचरण विधि की तरह इस विधि का भी व्यवहार केवल परिमाण संबंधी खोज से है। गुण संबंधी खोज में इसका व्यवहार नहीं हो सकता है।
  3. अवशेष विधि व्यतिरेक विधि का विशेष रूप है इसलिए व्यतिरेक विधि के दोष अवशेष विधि में चले आते हैं। इन त्रुटियों के बावजूद यह विधि विज्ञान के क्षेत्र में उपयोगी है।

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प्रश्न 4.
संयुक्त अन्वय विधि क्या है? इसके गुण-दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
संयुक्त विधि अन्वय विधि का रूपांतर या विशेष रूप है। यह विधि अन्वय विधि की कमी को दूर करती है। इसमें दो प्रकार के उदाहरणों के समूहों को लिया जाता है।

  1. भावात्मक तथा
  2. अभावात्मक।

इन दोनों के आधार पर निष्कर्ष को निकाला जाता है। इसकी परिभाषा इस प्रकार से दी गई है। “If two or more instances in which the phenomenon occurs have and one circumstance in common while two or more instances in which it does not occur have nothing in common save the absence of the circumstance this circumstance in which lend sets of instance differ is the effect of this cause or an indispensable part of the cause of the phenomenon.” “यदि किसी घटना के दो या दो से अधिक उदाहरणों में कोई एक बात सामान्य रूप से पायी जाए तो उस घटना के अभाव वाले दो या दो से अधिक उदाहरणों में उस घटना की अनुपस्थिति के अलावा और कोई बात सामान्य न हो, तो केवल उस बात का जिसमें दोनों प्रकार के उदाहरणों का भेद रहे घटना का कारण या कार्य या कारण अपना कार्य का आवश्यक अंग होता है।” इस परिभाषा की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • इस विधि से कुछ भावात्मक और कुछ अभावात्मक उदाहरण लिये जाते हैं।
  • भावात्मक उदाहरण के लिए दो या दो से अधिक उदाहरणों की जाँच क़रना, उन सभी उदाहरणों में किसी अमुक घटना का या उसका भाव देखना सभी परिस्थितियों में अन्य बातों में विभिन्नता और एक बात में समता का खोजना अनिवार्य है।
  • अतः, घटना की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर निष्कर्ष को निकाला जाता है। जैसे-सांकेतिक उदाहरण –Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

वास्तविक उदाहरण:
जब परीक्षा के समय मन लगाकर पुस्तकों का अध्ययन किया जाता है तो अच्छी सफलता मिलती है और जब परीक्षा के समय मन लगाकर अध्ययन नहीं किया जाता हे तो परीक्षा में अच्छी सफलता नहीं मिलती है इसलिए अच्छी सफलता का मिलना पुस्तकों का मन लगाकर अध्ययन करना है।

गुण (Merits):

  1. संयुक्त अन्वय विधि निरीक्षण प्रधान विधि है। इसलिये निरीक्षण के जितने भी लाभ हैं वे सभी इसमें पाए जाते हैं। इस विधि का क्षेत्र भी व्यापक है। इसमें निरीक्षण के द्वारा घटनाओं का अध्ययन किया जाता है।
  2. अन्वय विधि में बहुकारणवाद का दोष पाया जाता है। किन्तु, संयुक्त अन्वय विधि में इन बाधाओं को आंशिक रूप में अवश्य दूर किया गया है। इसके लिए अभावात्मक उदाहरणों की संख्या को बढ़ा दी जाए।
  3. इसमें जिस कारण कार्य नियम की स्थापना की चेष्टा की जाती है, उसके सत्य होने में अधिक संभावना पायी जाती है क्योंकि इसमें हम भावात्मक और अभावात्मक दोनों प्रकार के उदाहरणों को पाते हैं।
  4. इस विधि का उपयोग हम व्यावहारिक जीवन में अधिक करते हैं।
  5. निरीक्षण प्रधान विधि होने से इसका क्षेत्र व्यापक एवं विस्तृत है। प्रयोग आधारित रहने के कारण विधि का क्षेत्र संकुचित है। राजनीतिक, सामाजिक एवं प्राकृतिक घटनाओं पर इसका व्यवहार कर कारण या कार्य का पता लगाना असंभव है।

दोष (Demerits):

  1. संयुक्त अन्वय विधि निरीक्षण प्रधान विधि है इसलिए निरीक्षण के जितने भी दोष हैं इस विधि के भी दोष हो जाते हैं।
  2. दो सहपरिणामों के बारे में जो निष्कर्ष निकाला जाता है, वह सत्य नहीं होता है। इसमें दोष पाया जाता है।
  3. कभी-कभी एक उपाधि या स्थिति को कारण के रूप में समझने से दोष आ जाता है। जैसे दो तीन बार जब बंदूक से गोली निकलती है, तो आवाज होती है। दो-तीन बार गोली नहीं निकलती है तो आवाज भी नहीं होती है। अतः, गोली निकलने को आवाज का कारण मान लेते हैं, परन्तु गोली एक उपाधि है।
  4. यहाँ पर दो घटनाओं में आकस्मिक सहचर देखने पर कार्य-कारण संबंध स्थापित करने की भूल करते हैं। अतः, संयुक्त अन्वय विधि त्रुटि से संयुक्त नहीं है। फिर भी अन्वय विधि से अधिक विश्वसनीय है। इसके निष्कर्ष में सत्य होने की संभावना अधिक रहती है। इसकी त्रुटियों को दूर भी किया जा सकता है।

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प्रश्न 5.
अन्वय विधि के गुण एवं दोषों की व्याख्या करें।
उत्तर:
तार्किकों ने अन्वय विधि का निरीक्षण प्रधान विधि बताए हैं क्योंकि इसके उदाहरण निरीक्षण से प्राप्त होते हैं। मिल साहब ने इसकी परिभाषा में कहा है “If two or more instances of the phenomenon under investigation have only one circumstance in common, the circumstance in which alone are the instances agree is the cause or effect of the given phenomenon.” “यदि जाँच की जानेवाली घटना के दो या दो से अधिक उदाहरणों में एक बात सामान्य हो, तो वह वात जिसमें सभी उदाहरण अनुकूल हो, दी हुई घटना का कारण या कार्य हो।” इस परिभाषा की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. जाँच की जानेवाली घटना के दो या उससे अधिक उदाहरण लिये जाते हैं।
  2. अगर घटना कार्य है तो उसके कारण का पता पूर्ववर्तियों के निरीक्षण का उदाहरण जमा करने से होगा।
  3. पूर्ववर्तियों में देखते हैं कि कौन-सी बातें सभी उदाहरगों में सामान्य रूप से पायी जाती हैं। वही घटना का कारण होगी।
  4. यदि घटना कारण है और उसके कार्य का पता लगाना है तो अनुवर्तियों के उदाहरण को जमा करते हैं।
  5. अनुवर्तियों में जो बातें सभी उदाहरणों में सामान्य रूप से पायी जाती हैं वही घटना का कार्य होता है। इस तरह हम देखते हैं कि अन्वय विधि में एक ही बात की समानता (Agreement in one single point) इस विधि का मूल आधार है। जैसे –

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“A is the cause of Xor X is the effect of A.” अर्थात् A ही X का कारण है या X ही A का कार्य है। क्योंकि इसमें A उदाहरणों में उपस्थित है। अतः Aनियम पूर्ववर्ती है और X कार्य का कारण है। इसमें B,C, D, E, F, ‘X’ कार्य का कारण नहीं है। क्योंकि ये नियम पूर्ववर्ती है।

वास्तविक उदाहरण:
मिल साहब अन्वय विधि के माध्यम से एक व्यक्ति की दिनचर्या के आधार पर उसके सिर दर्द का कारण जानना चाहते हैं।
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मंगलवार:
पकौड़ी खाना, मांस खाना, दूध पीना, रात में शीत में सोना सिर दर्द यहाँ सिर दर्द का कारण बाहर में रात में शीत में सोना ही है क्योंकि सभी उदाहरणों में रात में शीत में सोना सभी दिन है और अन्य कारण सभी दिन उपस्थित नहीं है। अतः सिर दर्द का कारण शीत में सोना मान लिया जाता है। मिल की इस विधि को अन्वय विधि कहते हैं।
गुण या लाभ-अन्वय विधि से निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. अन्वय विधि-निरीक्षण प्रधान विधि होने के कारण व्यापक क्षेत्र रखता है। इसका व्यवहार सभी क्षेत्रों में होता है। प्रयोग की तुलना में।
  2. इस विधि से कारण से कार्य तथा कार्य से कारण का पता लगाते हैं। इस तरह इस विधि में दोनों सुविधाएँ हैं, क्योंकि यह निरीक्षण प्रधान विधि है।
  3. इससे प्राकृतिक घटनाओं का पता आसानी से लगाया जाता है। भृकंप, बाढ़, महामारी इत्यादि के कारणों का पता अच्छी तरह लग जाती है। क्योंकि इन सभी घटनाओं का निरीक्षण ही होता है।
  4. इन पर प्रयोग संभव नहीं है। अतः, इन प्राकृतिक घटनाओं के कारण का पता लगाने में अन्वय विधि ही सक्षम एवं समर्थ है।
  5. यह सरल विधि है। इसका व्यवहार सभी लोग कर सकते हैं। क्योंकि निरीक्षण प्रयोग की तुलना में आसान एवं सरल है। जबकि प्रयोग का काम कठिन है।
  6. निरीक्षण से जितने लाभ हैं वे सभी इस विधि के गुण हैं या लाभ हैं।

दोष:
1. चूँकि यह निरीक्षण प्रधान विधि है क्योंकि अन्वय विधि निरीक्षण पर आधारित होने के कारण सूक्ष्म एवं गुप्त परिस्थितियों का निरीक्षण संभव नहीं भी हो पाता है जो कि घटना का वास्तविक कारण और कार्य हो। इन्द्रियों के द्वारा भी सूक्ष्म तत्त्वों का निरीक्षण संभव नहीं हो पाता है। अतः, वास्तविक कारण खोजने में भूल हो सकती है।

2. कभी-कभी दो घटनाओं में आकस्मिक सहचर के आधार पर दोनों में कार्य-कारण संबंध स्थापित करने की भूल कर बैठते हैं। जैसे-जब-जब मेरे घर में अमुक संबंधी आते हैं तो मेरा नौकर बीमार पड़ जाता है।
अन्वय विधि के अनुसार नौकर का बीमार पड़ना अमुक संबंधी के आने पर एक घटना है जिसका कारण संबंधी के आने से है। लेकिन ऐसा निर्णय लेना अन्याय एवं अतार्किक है। इन दोनों में घटनाओं में आकस्मिक संबंध हैं जो इस विधि की त्रुटि है।

3. एक ही कारणं के दो सहपरिणामों (Co-effects) को एक-दूसरे का कारण-कार्य समझने की गलती करते हैं। जैसे-दिन के पहले रात्रि और रात्रि के पहले दिन नियत रूप से आते हैं। अन्वय विधि के आधार पर दिन और रात एक-दूसरे के कारण-कार्य हो जाते हैं। इसी तरह बिजली और बादल का गर्जन सदा एक साथ पाए जाते हैं। ये भी एक-दूसरे के कारण और कार्य हो जाते हैं। परन्तु, ये सभी सहपरिणाम है जो अन्वय विधि के दोष हैं।

4. इसमें उपाधि को पूर्ण मान लिया जाता है, जो एक भूल है।

5. अन्वय विधि का बहुकारणवाद सिद्धांत से मेल नहीं है। इसलिए कहा गया है कि “The doctrine of plurality of causes for frustrates the method of Agreement.”

6. इस विधि को कागज पर सांकेतिक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना आसान है। क्योंकि जो कॉमन अक्षर है उसे कारण या कार्य तुरंत बता दिया जाता है। किन्तु, वास्तविक जगत में इसका व्यवहार आसान नहीं है। प्रकृति की घटनाएँ बहुत जटिल होती हैं।

7. यह विधि एकांगी है क्योंकि यह केवल भावात्मक उदाहरणों में अन्वय करता है निषेधात्मक उदाहरणों पर विचार नहीं करता है।

8. निरीक्षण प्रधान विधि होने से आवश्यक को अनावश्यक से पृथक नहीं कर सकते हैं। क्योंकि कारण के साथ अनावश्यक बातें भी मिली रहती हैं। जिससे वास्तविक कारण का पता लगाना कठिन हो जाता है। अतः, यह विधि अनेक त्रुटियों से पूर्ण है। यह विधि कारण कार्य का संकेत करती है। कार्य-कारण संबंध को सिद्ध नहीं करती है। “The method of Agreement merely suggests but cannot prove a casual connection.” अतः, यह विधि आविष्कार की विधि है प्रमाण की नहीं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

Bihar Board Class 11 Philosophy विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निर्णायक उदाहरण किससे प्राप्त होता है?
(क) निरीक्षण से
(ख) प्रयोग से
(ग) दोनों से
(घ) किसी से नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों से

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प्रश्न 2.
किसने कहा था- “आगमन में कल्पना का उद्देश्य आविष्कार है, प्रमाण नहीं।”
(क) हेवेल
(ख) मिल
(ग) पियर्सन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) हेवेल

प्रश्न 3.
वैज्ञानिक पूर्वकल्पना आधारित है –
(क) साधारण विश्वास पर
(ख) वैज्ञानिक विश्वास पर
(ग) कारणता नियम पर
(घ) अंधविश्वास पर
उत्तर:
(ग) कारणता नियम पर

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प्रश्न 4.
विधि-संबंधी पूर्वकल्पना का संबंध है –
(क) परिस्थिति से
(ख) कर्त्ता से
(ग) प्रक्रिया से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) प्रक्रिया से

प्रश्न 5.
“निर्णायक उदाहरण केवल एक कल्पना का समर्थन ही नहीं करता है, बल्कि दूसरी कल्पना का खंडन भी करता है।” यह कथन किसका है?
(क) बेन का
(ख) बेकन का
(ग) जेवन्स का
(घ) मिल का
उत्तर:
(ग) जेवन्स का

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प्रश्न 6.
प्राक-कल्पना का लक्ष्य है –
(क) सामान्य नियम की स्थापना
(ख) विशेष नियम की स्थापना
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सामान्य नियम की स्थापना

प्रश्न 7.
किसका कथन है – किसी कल्पना के अति पर्याप्त (Super adequacy) भी इसके सत्य होने के प्रमाण हैं?
(क) मिल
(ख) हेवेल
(ग) पियर्सन
(घ) डेकार्ट
उत्तर:
(ख) हेवेल

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प्रश्न 8.
वह प्रयोग जिससे निर्णायक उदाहरण (Crucial instance) प्राप्त होता है, कहलाता है –
(क) निर्णायक प्रयोग (Experimentum crucis)
(ख) कल्पना की अतिपर्याप्त (Super adequacy)
(ग) वास्तविक कारण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निर्णायक प्रयोग (Experimentum crucis)

प्रश्न 9.
कल्पना की जाँच निरीक्षण एवं प्रयोग द्वारा किया जाता है। यह रीति क्या है?
(क) साक्षात् रीति
(ख) परोक्ष रीति
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) साक्षात् रीति

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प्रश्न 10.
कर्ता सम्बन्धी कल्पना (Hypothesis concerning agent) का अभिप्राय है –
(क) घटना घटने की परिस्थिति मालूम हो
(ख) घटना घटने की विधि मालूम हो
(ग) कर्ता (Agent) मालूम नहीं रहता है
(घ) उपर्युक्त तीनों
उत्तर:
(घ) घटना घटने की विधि मालूम हो

प्रश्न 11.
“कल्पना व्याख्या करने का एक प्रयत्न है” यह कथन किसका है?
(क) कॉफी
(ख) बेकन
(ग) न्यूटन
(घ) मिल
उत्तर:
(क) कॉफी

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प्रश्न 12.
घटना एक व्याख्या की दृष्टि में प्राक्-कल्पना कितने प्रकार का होता है?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ग) तीन

प्रश्न 13.
परिस्थिति सम्बन्धी कल्पना (Hypothesis Concerning Collection) होता है?
(क) व्याख्यात्मक
(ख) वर्णनात्मक
(ग) दोनों
(घ) वैज्ञानिक
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 14.
निर्णायक प्रयोग (Crucial experiment) प्राक्-कल्पना का/की –
(क) शर्त है
(ख) प्रमाण है
(ग) दोनों है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) प्रमाण है

प्रश्न 15.
वैज्ञानिक सत्यता (Scientific truth) की स्थापना में प्राक्कल्पना –
(क) एक अनावश्यक स्थिति है
(ख) आवश्यक शर्त है
(ग) अनावश्यक शर्त है
(घ) अनुपयोगी है
उत्तर:
(ख) आवश्यक शर्त है

Bihar Board Class 11 Philosophy विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसने कहा कि आगमन में कल्पना का स्थान प्रमुख नहीं बल्कि गौण है?
उत्तर:
ऐसा कल्पना के सम्बन्ध में जे. एस. मिल (John Stuart Mill) ने कहा।

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प्रश्न 2.
वास्तविक कारण (Vera cause) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
घटना के सम्बन्ध में वह कल्पना जो तर्कसंगत होती है और जिससे घटना के घटने की संभावना रहती है, वास्तविक कारण (Vera cause) कहलाती है।

प्रश्न 3.
“किसी कल्पना की अतिपर्याप्त (Super adequacy) भी इसके सत्य होने के प्रमाण हैं।” ऐसा किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन तर्कशास्त्री हेवेल (Whewell) का है।

प्रश्न 4.
कल्पना की जाँच के साक्षात् रीति (directly) का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कल्पना की जाँच साक्षात् रीति से करने का मतलब है निरीक्षण एवं प्रयोग की विधियों का व्यवहार।

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प्रश्न 5.
निर्णायक उदाहरण (Crucial instance) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
निर्णायक उदाहरण (Crucial instance) ऐसे उदाहरण को कहते हैं जो अनेक कल्पनाओं में किसी एक को सत्य प्रमाणित कर देता है।

प्रश्न 6.
कल्पना की जाँच कितने तरह से की जाती है?
उत्तर:
कल्पना की जाँच दो तरह से की जाती हैं। वे हैं-साक्षात् रीति (directly) एवं परोक्ष रीति (indirectly) से।

प्रश्न 7.
प्राक-कल्पना के महत्त्व के सम्बन्ध में हेवेल (Whewell) का क्या कथन हैं।
उत्तर:
प्राक्-कल्पना के महत्व के सम्बन्ध में हेवेल का कहना है कि आगमन में कल्पना का उद्देश्य आविष्कार है, प्रमाण नहीं।

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प्रश्न 8.
निर्णायक प्रयोग (Experimentum Crucis) क्या है?
उत्तर:
निर्णायक उदाहरण जब प्रयोग से पाया जाता है तो इसे निर्णायक प्रयोग कहते हैं।

प्रश्न 9.
कर्ता सम्बन्धी कल्पना (Hypothesis concerning agent) का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब घटना घटने की परिस्थिति और विधि मालूम रहे लेकिन कर्ता (agent) मालूम नहीं रहता है। अतः कर्ता (agent) के बारे में अन्दाज लगाना ही कर्ता सम्बन्धी कल्पना है।

प्रश्न 10.
प्राक्-कल्पना (Hypothesis) की एक परिभाषा दें।
उत्तर:
प्राक्-कल्पना व्याख्या करने का प्रयत्न है। यह सामयिक (provisional) कल्पना है जिसके द्वारा हम वैज्ञानिक दृष्टि से लक्ष्यों या घटनाओं की व्याख्या करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
साधारण कल्पना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कल्पना दो तरह की होती है –

  1. साधारण कल्पना
  2. वैज्ञानिक कल्पना।

साधारण कल्पना में एक तरह की अटकलबाजी लगानी पड़ती है। इसमें यह जरूरी नहीं है कि जो कल्पना कर रहे हैं वह अंदाजा सही ही हो। इस तरह की कल्पना का रूप पूर्णव्यापी नहीं होता है। बल्कि व्यक्तिगत या अंशव्यापी होता है। इस तरह की कल्पना साधारण लोग लगाते हैं। इसमें सही कारण कोई कार्य के लिए स्वीकार नहीं किया जाता है। इसमें दूसरे कारण को स्वीकार किया जाता है, जो व्यक्तिगत होता है। अतः, इस तरह की कल्पना साधारण कल्पना कहलाती है।

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प्रश्न 2.
निर्णायक उदाहरण क्या है?
उत्तर:
निर्णायक उदाहरण कल्पना का एक प्रमुख कारण माना जाता है। जब किसी घटना के बारे में कल्पना की जाती है। उसमें एक ऐसा ही प्रमाण मिल जाता है जो घटना को सही प्रमाणित कर देता है, उसी को निर्णायक उदाहरण के रूप में माना जाता है।

निर्णायक उदाहरण निरीक्षण या प्रयोग से पाए जाते हैं। एक पात्र में रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, गैस को पाकर इसमें दो प्रकार की कल्पना की जाती है यह ऑक्सीजन गैस या हाइड्रोजन? इसे प्रमाणित करने के लिए जलती हुई मोमबत्ती ले जाते हैं। मोमबत्ती बुझने पर हाइड्रोजन और जलने पर ऑक्सीजन गैस समझते हैं। यही निर्णायक उदाहरण कहलाता है।

प्रश्न 3.
अच्छी और बुरी कल्पना क्या है?
उत्तर:
कल्पना अच्छा होना या बुरा होना उसकी शत्तों पर निर्भर करता है। इसका अर्थ है कि जो कल्पना शर्तों को पूरा करती है वह अच्छी कल्पना कही जाती है और जो कल्पना शर्तों को पूरा नहीं करती है वह बुरा कल्पना नहीं जाती है। जैसे-जब पृथ्वी में कम्पन्न होती है तो कल्पना करें कि पृथ्वी शेषनाग पर अवस्थित है। इस शेषनाग के हिलने-डूबने से पृथ्वी पर कम्पन्न होती है तो इस प्रकार की कल्पना को बुरी कल्पना कहते हैं। क्योंकि इस प्रकार की कल्पना उटपटांग होती है। परन्तु भौगोलिक कारणों से इस कम्पन्न की व्याख्या करने पर इसे अच्छी कल्पना कहते हैं।

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प्रश्न 4.
वैज्ञानिक कल्पना क्या है?
उत्तर:
वैज्ञानिक कल्पना में कारण-कार्य नियम का पालन किया जाता है। यह पूर्णव्यापी होता है। यह कल्पना जनसमुदाय के लिए किया जाता है। इसमें किसी भी कार्य के लिए सह कारण को स्वीकार किया जाता है। इसमें निष्कर्ष को सत्य होने के लिए वैज्ञानिक आधार रहता है। भले ही कल्पित कारण गलत हो जाए, किन्तु उसकी व्याख्या वैज्ञानिक तरीके से की जाती है।

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक आगमन में प्राक्-कल्पना के महत्त्व की विवेचना करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्री हेवेल वैज्ञानिक आगमन में प्राक्-कल्पना के महत्त्व को बहुत अधिक बताते हैं। उनके अनुसार वैज्ञानिक खोज में प्राक्-कल्पना का महत्त्व अत्यधिक है। घटनाओं के बीच कारण-कार्य का सम्बन्ध स्थापित करने हेतु प्राक्-कल्पना की आवश्यकता होती है। प्राक्-कल्पना का दूसरा महत्त्व यह है कि यह हमारे निरीक्षण एवं प्रयोग को नियंत्रित करता है। कभी-कभी हमारे खोज का विषय ऐसा होता है कि हम उसका अध्ययन निरीक्षण एवं प्रयोग से नहीं कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति में हम अपनी सूझ के बल पर उस विषय या वस्तु के स्वरूप की कुछ कल्पना करते हैं तथा उस कल्पना के द्वारा आवश्यक परिणामों को निकालते हैं। यदि हमारी कल्पना यथार्थता से मेल खाती है तो कल्पना की सत्यता सिद्ध हो जाती है। वस्तुतः वैज्ञानिक पद्धति में प्राक्-कल्पना तथ्यों के सागर में दिशा सूचक (Compass) की तरह कार्य करता है। ऊर्जा के सापेक्षवाद का सिद्धान्त वस्तुतः प्राक्-कल्पना की ही देन है। इसी तरह, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों का संकेत अवलोकन के द्वारा प्राक्-कल्पना से हुआ है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
न्याय संगत या यथार्थ कल्पना की शर्तों की सोदाहरण व्याख्या करें ।
उत्तर:
आगमन का संबंध सही कल्पना से है। सही कल्पना होने के लिए कुछ शर्तों का पालन करना पड़ता है।

1. कल्पना को आंतरिक विरोध रहित निश्चित एवं स्पष्ट होना चाहिए:
इसमें आंतरिक विरोध रहित का अर्थ है कि इसमें विचारों का आपसी मेल होना चाहिए। तभी उसमें संदेह की कम संभावना होती है। दिन-रात होने के लिए हम यदि यह कल्पना करें कि ‘शायद पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ नहीं घूमती है, तो हमारी यह कल्पना संदेहपूर्ण रहेगी।

वैज्ञानिक कल्पनाएँ संदेह को दूर करना ही निश्चितता को लाना है। ”कल्पना को स्पष्ट होने का अर्थ है कि उटपटांग न होकर युक्ति संगत और सुव्यवस्थित हो। वर्षा के कारण बादल को नहीं मानकर इन्द्र की कृपा को मानें तो ऐसी कल्पना अस्पष्ट होगी। समुद्र का पानी वाष्प बनकर ऊपर जाता है और बादल बनकर वर्षा होती है। कल्पना का यही सही रूप है।

2. कल्पना को किसी स्थापित सत्य का विरोध नहीं होना चाहिए। इसमें कहा गया है कि पहले से कुछ बातें सत्य हैं जैसे पृथ्वी में एक आकर्षण शक्ति है यह सत्य है। किन्तु, यदि हम यह कल्पना करें कि जहाज जो आकाश में उड़ता है उसमें पृथ्वी की आकर्षण शक्ति काम नहीं करती है, तो असत्य होगी। पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है यह पूर्व स्थापित सत्य है।

3. कल्पना को यथार्थ एवं वास्तविक होना चाहिए। किसी घटना का पता लगाने के लिए कल्पना किया जाता है। यथार्थ कल्पना के लिए यह जरूरी है कि हमें निष्पक्ष भाव से किसी घटना के घटने की कल्पना करनी चाहिए। इसमें वास्तविकता भी होनी चाहिए। अर्थात् घटना का vera cause होना चाहिए। इसका अर्थ है कि सच्चा कारण vera cause जिससे घटना के घटने की संभावना हो। किसी घटना के बारे में वैसा कारण जिससे वह घटना घटती है। जैसे-वर्षा का वास्तविक कारण बादल है। बादल के अभाव में वर्षा नहीं हो सकती है।

4. कल्पना को परीक्षा के योग्य होना चाहिए। इसके अंतर्गत कहा गया है कि कल्पना के सत्य होने के लिए उसकी जाँच या परीक्षा होनी चाहिए। बिना परीक्षा के कल्पना सत्य नहीं हो सकती है। जाँच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से की जाती है। यदि नींद की अवस्था में कोई आवाज आती है तो इसकी परीक्षा करते हैं और देखते हैं कि कहीं चोर तो नहीं है।

या चूहे के द्वारा खट-पट की आवाज आ रही है। अतः, परीक्षा के बाद ही हमारी कल्पना सत्य होती है। कल्पना की ये शर्ते मितव्ययिता नियम (Law of Parsimony) के अनुकूल है। यदि किसी घटना की व्याख्या एक ही कल्पना से हो जाती है तो उसके लिए अधिक अटकलबाजी करने की जरूरत नहीं है। इसलिए सही कारण को जानने के लिए कम-से-कम संख्या में कल्पना को लाना चाहिए।

5. कल्पना को अधिक-से-अधिक सरल होना चाहिये। कल्पना में जटिलता का बहिष्कार करना चाहिए। जैसे-वर्षा के अभाव के कारण अच्छी फसल का नहीं होना सरल कल्पना है। इस तरह कल्पना के सही होने के लिए उपर्युक्त शर्तों की व्याख्या की गई है।

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प्रश्न 2.
कल्पना क्या है? कल्पना के स्वरूप का वर्णन करें।
उत्तर:
साधारण जीवन में साधारण कल्पना के द्वारा मनुष्य अपने या दूसरे के खास व्यक्तिगत जीवन का विभाग खोज सकता है। इस तरह की कल्पना का रूप पूर्णव्यापी न होकर व्यक्तिगत रहता है। इसमें अंधविश्वास का स्थान भी रहता है। किन्तु, आगमन का लक्ष्य पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करना है। इसके लिए कुछ विधियों को बतलाया गया है।

इन्हीं विधियों में से कल्पना भी एक है। कल्पना के माध्यम से हम घटना के कारण का पता लगाना चाहते हैं। इसके लिए छान-बीन भी करना पड़ता है। एक तरह से अटकलबाजी भी करना शुरू कर देते हैं। अतः, घटनाओं के कारण को पता लगाने के लिए जो संभावित कारण को पहले मानते हैं, उसे कल्पना कहते हैं।

कौफी (Coffy) महोदय ने इसकी परिभाषा में कहा है –
“Ahypothesis is an attempt of explanation a provisional supposition made in order to explain scientifi cally some facts or phenomenon.” अर्थात् कल्पना व्याख्या करने का एक प्रयत्न है, यह सामयिक कल्पना है जिसके द्वारा हम वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों या घटनाओं की व्याख्या करते हैं।

इसी कल्पना की परिभाषा Mill महोदय ने इस तरह दिए हैं, “A hypothesis is any supposition which we make in order to endeavour to deduce from its conclusion in accordance with facts which are known to be real under the idea that if the conclusion to which the hypothesis leads are known truths the hypothesis itself either must be or at fast is likely to be true.”

“प्राक्-कल्पना वह कल्पना है जिसे हमलोग इस लक्ष्य से बनाते हैं कि हम उससे वे निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करें जो उन तथ्यों के अनुकूल हों, जिन्हें हम सत्य मानते हैं। ऐसा करने में हमारा विचार यह रहता है कि यदि वे निष्कर्ष, जो इस कल्पना के द्वारा प्राप्त करते हैं, वास्तव में सत्य हैं, तो वह कल्पना स्वयं सत्य होगी या कम-से-कम सत्य होने की संभावना होगी।” इस परिभाषा के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित बातें हम पाते हैं।

1. निरीक्षण:
सहज रूप में जब कोई घटना घटती है तो उसके कारण को जानने की इच्छा होती है। उसी के फलस्वरूप कल्पना का जन्म होता है। अतः, जो घटना घटती है उसका सबसे पहले निरीक्षण करना जरूरी हो जाता है, जैसे चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण यदि घटना के रूप में है तो उसके निरीक्षण करने के बाद ही उसके कारण को जानने की कल्पना की गई है। इसी तरह भूकंप के निरीक्षण के बाद ही उसके कारण जानने की प्रक्रिया शुरू करते हैं, जिसे कल्पना कहते हैं।

2. अटकलबाजी या अंदाज:
जब घटी हुई घटना का हम निरीक्षण कर लेते हैं तो उसके कारण को शीघ्र ही जान लेना संभव नहीं होता है। इसके लिए हम तरह-तरह की अटकलें लगाते हैं, अंदाज करते हैं कि अमुक कारण से अमुक घटना घटी है। यही कल्पित कारण कल्पना का एक मुख्य अंग बनकर काम करता है। इसी के द्वारा सही कारण को भी जानने का संकेत मिलता है। न्यूटन ने जब वृक्ष से फल को पृथ्वी पर गिरते हुए निरीक्षण किया तो उसके कारण को जानने की इच्छा हुई। इससे उन्होंने अंदाज लगाया कि पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है, जिसके कारण सभी वस्तुएँ नीचे पृथ्वी पर गिरती हैं।

3. कल्पित कारण से निष्कर्ष निकालना:
कल्पित कारण से निष्कर्ष निकालना भी एक प्रमुख तथ्य रहता है इसमें कल्पित कारण के बाद ही एक संभावित कारण का पता लगाया जाता है। यह कल्पना का निष्कर्ष होता है कि पृथ्वी में आकर्षण-शक्ति है। यह निष्कर्ष तभी निकलता है जब हम कल्पित कारण को पहले स्वीकार कर लेते हैं।

4. निष्कर्ष की परीक्षा:
अटकलबाजी के समय बहुत-सी बातें दिमाग में आती हैं, किन्तु निष्कर्ष पर पहुँचने हेतु बहुत-सी संभावित अटकलों को परीक्षा के द्वारा छाँटकर हटा दिया करते हैं। इस तरह परीक्षा के बाद केवल एक ही कारण सामने आती है, जिसका संबंध कल्पना से रहता है। अतः, यह उत्पत्ति आवश्यक अंग है। कल्पना की सत्यता इसी पर निर्भर करती है।

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प्रश्न 3.
कल्पना के विभिन्न प्रमाणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कल्पना को वैज्ञानिक बनाने के लिए निम्नलिखित कुछ प्रमाणों को बताया गया है –

1. परीक्षा योग्य (Verifiable):
किसी परीक्षा के बाद ही कल्पना की सत्यता जानी जा सकती है। परीक्षा दो तरह की हो सकती है – प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष परीक्षा हमें निरीक्षण और प्रयोग द्वारा पूरी होती है। जैसे किसी के सर पर गाँधी टोपी देखकर कल्पना कर लेते हैं कि यह काँग्रेसी है।

फुलवारी में कोयल की आवाज सुनकर वसन्त ऋतु की कल्पना कर लेते हैं। इसी तरह प्रयोग द्वारा विभिन्न बीमारियों के कारणों के बारे में कल्पना की और उसकी सत्यता भी प्रयोग द्वारा हम स्थापित कर सकते हैं। जैसे-मादा अनोफिल मच्छर के काटने से मलेरिया होता है। इसी तरह अप्रत्यक्ष परीक्षा में बहुत-सी बातों को सत्य मानकर उससे बहुत कुछ अनुमान निकालते हैं।

2. कल्पना के लिए सहज बुद्धि और तेजीपन का होना जरूरी है। जैसे – ‘राम घर से भागकर कोलकात्ता चला गया’ क्योंकि उसके बड़े भाई ने डाँट-डपट की थी। यह परीक्षणीय भी है। लेकिन हमें यहाँ सहज बुद्धि और तेजीपन का व्यवहार कर यह सोचना चाहिए। उसके भागने का कारण और भी है। जैसे-घर में माँ-बाप का प्यार नहीं मिलना, स्वभाव से भावुक होना, कोलकात्ता से किसी मित्र या संबंधी की बुलाहट आना आदि। इसलिए कल्पना के लिए बुद्धि का प्रयोग करना भी जरूरी है।

3. कल्पना को समुचित व्याख्या करने की क्षमता हो – कल्पना ऐसी हो कि जिससे किसी वस्तु की पूर्ण और उपयुक्त व्याख्या हो सके। जैसे-परीक्षा में फेल करने का कारण, परीक्षा के समय बीमार रहना, क्लास से बराबर अनुपस्थित रहना, लिखने की आदत में कमी होना, नोट पढ़ना और फेल करना कल्पना की पूरी व्याख्या नहीं है।

4. कल्पना ऐसी हो कि केवल किसी एक ही वस्तु की व्याख्या हो जाए। यदि उसकी व्याख्या और किसी दूसरी पूर्व कल्पना से उसी तरह की जाए तो उसमें यथार्थता नहीं रह पाती है। अतः, इसे दूर करना चाहिए। कभी-कभी दो प्रतिद्वन्द्वी पूर्व कल्पनाओं में किसी काम को गलत या सही सिद्ध करने का काम निर्णायक उदाहरण से कर सकते हैं।

Crucial Instances:
मानलिया कि सिनेमा के मालिक ने शिकायत किया कि कुछ छात्र आधा घंटे पहले सिनेमा हॉल का शीशा और दरवाजा तोड़-फोड़ दिए हैं। हमारे सामने एक साथ दो कल्पनाएँ उठती हैं कि छात्र कॉलेज का है या स्कूल का। इसी समय एक नौकर आकर दर्शनशास्त्र की किताब देते हुए कहा है कि उस छात्र की यह पुस्तक गिर गई है।

इस किताब से हमें तुरत पता चलता है कि वह छात्र कॉलेज का हैं इस हालत में उस पुस्तक को हम निर्णायक उदाहरण कहेंगे क्योंकि उसी पुस्तक से हम कुछ निर्णय कर सके। इसलिए Jevons का कथन है कि “निर्णायक उदाहरण किसी एक पूर्व कल्पना का समर्थन ही नहीं करता बल्कि दूसरी पूर्व कल्पना का निषेध भी करता है।” निर्णायक उदाहरण की प्राप्ति दो तरह से होता है-निरीक्षण और प्रयोग द्वारा।

गाड़ी पकड़ने के लिए स्टेशन पाँच मिनट देर से पहुंचते हैं। दो कल्पनाएँ उठती हैं। गाड़ी आकर चली गई या गाड़ी आने में विलम्ब है। दोनों कल्पनाएँ ठीक हैं। सिगनल को देखने पर पता चला कि सिगनल हरा है। इससे पता चलता है कि गाड़ी अभी आ रही है। यहाँ निर्णायक उदाहरण का निरीक्षण किया जिसमें एक कल्पना सत्य और दूसरा असत्य साबित हुआ।

इसी तरह एक बरतन में गैस है। दो कल्पनाएँ उठती हैं। ऑक्सीजन है या हाइड्रोजन गैस। देखने से दोनों रंगहीन, स्वादहीन एवं गंधहीन होती है। एक निर्णायक उदाहरण की खोज करते हैं। एक जलती हुई लकड़ी को बरतन में डालते हैं। गैस प्रज्वलित हो जाती है। इससे सिद्ध हुआ कि गैसें ऑक्सीजन गैस है। जलती लकड़ी निर्णायक उदाहरण है जो प्रयोग से प्राप्त हुआ है।

5. कल्पना में भविष्यवाणी (Power of prediction) की शक्ति हो। अर्थात् भविष्य की व्याख्या हो सके अर्थात् जो कुछ कल्पना की जाए वह भविष्य में सत्य निकले। ज्योतिषी लोग इसी कारण से भविष्य की घटनाओं का वर्णन पहले कर देते हैं। कल्पना में भविष्यवाणी करने की शक्ति रहने से उसे सत्य होने की अधिक संभावना रहती है।

लेकिन मिल साहब का कथन है कि भविष्यवाणी की कल्पना को यथार्थता का प्रमाण नहीं मानना चाहिए क्योंकि कभी गलत और कभी सत्य होता रहता है। अतः, पूर्वकल्पना, सिद्धांत, नियम और तथ्य (Hypothesis theory, law and fact) के ऊपर के जितने भी नाम हैं सबों का प्रयोग एक मत और एक अर्थ में न होकर बदलते रूप में रहता है। इस तरह निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि उपर्युक्त प्रमाण कल्पना के बारे में जो दिया गया है, वह सत्य है इसके आधार पर ही कल्पना सत्य होती है।

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प्रश्न 4.
कल्पना के कितने भेद हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
घटना की व्याख्या की दृष्टि से प्राक्कल्पना तीन की प्रकार होती हैं –

  1. कर्ता संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Agent)
  2. विधि संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning law of Method)
  3. परिस्थिति संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Collection)

1. कर्ता संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Agent):
घटना की व्याख्या तब – होती है जब उसके कारण का पता लगता है। इसका कारण कर्त्ता होता है। कारण के संबंध में जो कल्पना करते हैं वहीं कर्ता संबंधी कल्पना कहलाती है। चोरी की व्याख्या के लिए चोर के संबंध में जो कल्पना की जाएगी वह कर्ता संबंधी कल्पना कहलाएगी।

विज्ञान के क्षेत्र में भी इसी तरह के उदाहरण मिलते हैं। जैसे-यूरेनस ग्रह की गति में गड़बड़ी देखी गई। वैज्ञानिकों ने कल्पना की कि कोई दूसरा ग्रह उसकी गति में बाधा डाल रहा है। जिसके चलते ही गड़बड़ी है और पता चला कि यह नेपच्युन ग्रह के चलते ऐसा हो रहा है। यह कल्पनाकर्त्ता-संबंधी कल्पना कहलाता है।

2. विधि संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning law of Method):
घटना घटने की विधि का अर्थ है कि कर्ता ने किस तरीके से किस नियम से घटना को संपादित किया। जैसे-चोर ने चोरी कैसे की? इस संबंध में जो कल्पना करते हैं वह विधि संबंधी कल्पना है। चोर दरवाजे को खोलकर आया था, उसे तोड़कर या सेंध मारकर आदि।

3. परिस्थिति संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Collection):
कभी-कभी किसी घटना के कर्ता और विधि या तरीके दोनों मालूम रहते हैं किन्तु परिस्थिति मालूम नहीं रहती है, तो ऐसी स्थिति में परिस्थिति का पता लगाना पड़ता हैं जैसे-गाँव में चोरी हुई। चोरी एक घटना है, इसके कर्ता मालूम है, विधि भी मालूम है। चोरी किवाड़ को तोड़कर हुई है, किन्तु परिस्थिति मालूम नहीं है, इसके लिए परिस्थिति का पता लगाना पड़ता है।

परिस्थिति यही है कि परिवार के सभी लोग सिनेमा देखने चले गये थे। रात में देर से आने के कारण चोरी हुई। इस तरह घटना की परिस्थिति संबंधी कारण का पता लगाने को परिस्थिति संबंधी कल्पना कहते हैं। अतः, निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि कल्पना के तीन भेद हैं, कर्ता, विधि एवं परिस्थिति संबंधी कल्पना। तीनों के बारे में पता लगाने के बाद ही घटना के सही कारण का पता चल जाता है।

दूसरी दृष्टि से कल्पना के दो भेद बताए गए हैं –

  1. साधारण कल्पना एवं
  2. वैज्ञानिक कल्पना।

1. साधारण कल्पना:
साधारण कल्पना का संबंध किसी व्यक्तिगत समस्याओं के सुलझाने से रहता है। जैसे कोई व्यापारी व्यापार में हानि होने के कारण के संबंध में कल्पना करता है। कोई छात्र परीक्षा में फेल होने के कारण के संबंध में कल्पना करता है।

2. वैज्ञानिक कल्पना:
वैज्ञानिक कल्पना का संबंध ऐसी घटनाओं से रहता है, जिनका संबंध सबों से रहता है। वैज्ञानिक कल्पना तर्क प्रमाण पर आधारित रहती है। विज्ञान के क्षेत्र में जो कल्पनाएँ की जाती हैं, वे वैज्ञानिक कल्पना हैं।

तीसरी दृष्टिकोण से कल्पना दो प्रकार की है –

  1. व्याख्यात्मक कल्पना एवं
  2. वर्णनात्मक कल्पना।

इसमें कारण संबंधी या कर्ता संबंधी कल्पना को व्याख्यात्मक कल्पना कहते हैं। विधि या नियम संबंधी कल्पना को वर्णनात्मक कल्पना कहते हैं। व्याख्यात्मक कल्पना यह बतलाती है कि कोई घटना क्यों घटती है और वर्णनात्मक कल्पना बतलाती है कि घटना कैसे घटती है? व्यावहारिक दृष्टि से कल्पना दो तरह की है –

  1. काम चलाऊ कल्पना एवं
  2. सादृश्यानुमान मूलक कल्पना।

1. काम चलाऊ कल्पना (Working hypothesis):
कभी कभी किसी घटना के कारण के लिए कोई उपयुक्त कल्पना नहीं दिखाई पड़ती है तो उस हालत में हम काम चलाने के लिए एक नकली कल्पना कर बैठते हैं उसे जब मन चाहे तब हटाकर बदल सकते हैं।

जैसे-कलम को जेब में नहीं रहने पर अटकल लगाते हैं कि शायद क्लास में छूट गई, या रास्ते में गिर गई या राम ने चुरा लिया। उसमें एक को परीक्षा के बाद सही पाते हैं। इस तरह की कल्पना को काम चलाऊ कल्पना कहते हैं “A working hypothesis means a provisional support tion.”

2. सादृश्यानुमान मूलक कल्पना (Analogical):
इस तरह की कल्पना में हैं कि जो बात एक वस्तु में सत्य है वह दूसरे में भी सत्य होगी। यदि इन दोनों वस्तुनो में और कुछ बातों की समानता हो तो, जैसे-पृथ्वी और मंगलग्रह में कुछ बातों की समानता है, वैसे दोनों ग्रह हैं, दोनों सूर्य के चारों तरफ घूमते हैं। दोनों का वातावरण एक-सा है। दोनों पर पर्वत, नदी, जंगल हैं। इस तरह पृथ्वी पर आदमी हैं तो कल्पना करते हैं कि मंगल ग्रह पर भी आदमी होंगे। इस तरह की कल्पना सादृश्यानुमान मूलक कल्पना कहलाती है।

काल्पनिक प्रतिरूपक कल्पना (Representative fiction):
बेकन ने कल्पना का एक और रूप दिया है जिसे काल्पनिक प्रतिरूपक कहा जाता है जिसका ज्ञान इन्द्रियों से संभव नहीं है। जैसे-अणु, परमाणु। इस तरह की कल्पना के कारण-स्वरूप हमारे सामने आज अणु-परमाणु के सिद्धान्त ईश्वर की कल्पना, मोझ की कल्पना, प्रकाश तरंग सिद्धान्त तथा भूत-प्रेम या आत्मा-परमात्मा के विषय में दिखाई पड़ते हैं। इस तरह कल्पना के कई प्रकार बताए गए हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक विधि में प्राक-कल्पना का स्थान क्या है? अथवा, वैज्ञानिक आगमन में कल्पना के स्थान की विवेचना करें। अथवा, आगमन में कल्पना के महत्त्वों को लिखें।
उत्तर:
अज्ञात वस्तुओं की छानबीन करने की प्रवृत्ति मनुष्य में जन्मजात होती है। वह भिन्न-भिन्न वस्तुओं के बीच छिपे रहस्यों को जानना चाहता है। वस्तुतः मनुष्य खोजी प्रवृत्ति का होता है। इन सभी बातों की पूर्ति तभी हो सकती है जब हम प्राक्-कल्पना की सहायता लेते हैं।

अतः प्राक्-कल्पना की आवश्यकता हमें प्रयोग करने, वैज्ञानिक एवं कलात्मक खोजों में होती है। प्राकृतिक नियमों की खोज, प्राकृतिक जटिलताओं के कारणों की खोज आदि में प्राक्-कल्पना की सहायता लेते हैं। वस्तुतः बिना कल्पना के हम कोई भी वैज्ञानिक खोज आरंभ नहीं कर सकते हैं।

किसी भी वैज्ञानिक विधि यानि वैज्ञानिक खोज में प्राक्-कल्पना का प्रथम स्थान है। वैज्ञानिक आगमन में कार्य-कारण (Causal relation) स्थापित करते हैं। यही कारण-सम्बन्ध स्थापित करना वैज्ञानिक विधि का लक्ष्य होता है। कार्य-कारण सम्बन्ध निश्चित करने के लिए हम प्राक्-कल्पना ही करते हैं। उसके बाद उसकी जाँच करते हैं तथा जब प्राक्-कल्पना जाँच में सही उतरती है तब उसे हम सिद्धान्त का रूप देते हैं फिर उसे नियम के रूप में मानकर वैज्ञानिक खोज में निश्चित निष्कर्ष पर आते हैं।

वैज्ञानिक विधि में निरीक्षण एवं प्रयोग (Observation and experiments) की सहायता लेना आवश्यक होता है। इसके बिना निश्चितता नहीं आती है। व्यवहार में हम देखते हैं कि निरीक्षण एवं प्रयोग आरंभ से ही प्राक्-कल्पना के द्वारा नियंत्रित होते हैं। निरीक्षण की तरह प्रयोग (Experiment) में भी प्राक्कल्पना का स्थान प्रमुख है। प्रयोग में हम कृत्रिम ढंग से घटना उपस्थित करते हैं। इसके लिए हम पहले प्राक्-कल्पना करते हैं और इसकी जाँच के लिए प्रयोग का सहारा लेते हैं।

जैसे हम पहले यह प्राक्-कल्पना करते हैं कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की निश्चित मात्रा को मिलाने के बाद जब हम उससे होकर विद्युतधारा प्रवाहित करते हैं तो ‘जल’ बनता है। इस प्राक-कल्पना की जाँच हम प्रयोग के सहारे करते हैं। प्रयोगशाला में हम आवश्यक परिस्थिति उत्पन्न कर प्राक्-कल्पना की सत्यता का पता लगा लेते हैं। प्रयोग के लिए पहले किसी-न-किसी प्रकार की प्राक्-कल्पना करना आवश्यक है, क्योंकि प्रयोग में प्राक्-कल्पना की ही जाँच की जाती है।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि निरीक्षण और प्रयोग जिसका महत्त्व वैज्ञानिक खोज में अधिक है, प्राक्-कल्पना द्वारा ही नियंत्रित होते हैं। बेकन प्राक्-कल्पना के महत्त्व को कम आँकते हैं। लेकिन हम उनके विचार को गहराई से देखें तो बहिष्कार एवं निरीक्षण में भी शुद्ध निष्कर्ष प्राप्त करने हेतु प्राक्-कल्पना की आवश्यकता होती है।

महान् वैज्ञानिक न्यूटन का कहना है कि “मैं प्राक्-कल्पना की कल्पना ही नहीं करता हूँ।” लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से प्राक्-कल्पना की स्वीकृति गुरुत्वाकर्षण के नियम को सिद्ध करने में दीखता है। न्यूटन ने जब सेव को जमीन पर गिरते हुए देखा था तो सर्वप्रथम इसके कारण के बारे में प्राक्-कल्पना ही की थी। तर्कशास्त्री जेएस मिल के अनुसार, प्राक्-कल्पना का अधिक महत्त्व खोज के सम्बन्ध में होता है, प्रमाण (Proof) के सम्बन्ध में नहीं। तर्कशास्त्री ह्वेवेल के अनुसार वैज्ञानिक आगमन का संबंध आविष्कार से अधिक है। अतः उनकी नजर में प्राक्-कल्पना का महत्त्व बहुत अधिक है।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 12 नीतिश्लोकाः

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 Chapter 12 नीतिश्लोकाः Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 12 नीतिश्लोकाः

Bihar Board Class 6 Sanskrit नीतिश्लोकाः Text Book Questions and Answers

अभ्यासः

मौखिकः

प्रश्न 1.
निम्न श्लोकों को सस्वर गावें
उत्तर-
नीति श्लोकाः पाठ के प्रत्येक श्लोक को लय (सुन्दर स्वर) में . गावें।

लिखितः

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें –

(क) ……………… सर्वे तुष्यन्ति ………………।
तस्मात्तदेव ………………….. दरिद्रता ।।
उत्तर-
प्रिय वाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 12 नीतिश्लोकाः

(ख) काव्यशास्त्र विनोदेन …………………….. ।
…………… निद्रया. …………… वा ॥
उत्तर-
काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन तु मुर्खाणां निद्रया कलहेन वा

प्रश्न 3.
श्लोकों को जोड़ें –

  1. काव्यशास्त्रविनोदेन – (i) सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः
  2. हस्तस्यभूषणं दानं – (ii) कालो गच्छति धीमताम्
  3. प्रियवाक्यप्रदानेन । – (iii) न प्रीतिर्न च बान्धवाः
  4. यस्मिन् देशे न सम्मानो – (iv) अविद्यस्य कुतो धनम्
  5. अलसस्य कुतो विद्या – (v) सत्यं कण्ठस्य भूषणम्

उत्तर-

  1. काव्यशास्त्रविनोदेन – (ii) कालो गच्छति धीमताम्
  2. हस्तस्यभूषणं दानं – (v) सत्यं कण्ठस्य भूषणम्
  3. प्रियवाक्यप्रदानेन । – (i) सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः
  4. यस्मिन् देशे न सम्मानो – (iii) न प्रीतिर्न च बान्धवाः
  5. अलसस्य कुतो विद्या – (iv) अविद्यस्य कुतो धनम्

प्रश्न 4.
उपयुक्त कथनों के सामने सही ✓ का तथा अनुपयुक्त कथनों के सामने गलत ✗ का चिह्न लगावें :

यथा – प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्तिा – ✓
मूर्खाणां कालः काव्यशास्त्रविनोदन गच्छति। – ✗

प्रश्नोत्तर साथ दिये गए हैं

  1. दानं हस्तस्य भूषणम् । – ✓
  2. सत्यं श्रोत्रस्य भूषणम् । – ✗
  3. धीमतां कालः निद्रया गच्छति। – ✗
  4. यत्र सम्मानः तत्र वसेत्। – ✓
  5. श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रम् । – ✓

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 12 नीतिश्लोकाः

प्रश्न 5.
उत्तराणि लिखत –

  1. सर्वे जन्तवः केन तुष्यन्ति ?
  2. कुत्र न वसेत् ?
  3. धीमताम् कालः कधं गच्छति ?
  4. मूर्खाणां कालः कथं गच्छति ?
  5. हस्तस्य भूषणं किम् ?

उत्तर-

  1. सर्वे जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति ।।
  2. यत्र न सम्मानः मिलति, न प्रीतिः ना च बान्धवाः न विद्या आगमनस्य साधनं तत्र न वसेत् ।
  3. धीमताम् कालः काव्यशास्त्र विनोदेन गच्छति ।
  4. मूर्खाणां काल: व्यसनेन निद्रया कलहेन वा गच्छति ।
  5. हस्तस्य भूषणं दानम् ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit नीतिश्लोकाः Summary

प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।।1।।

अर्थ – प्रिय वचन बोलने से सभी जीव प्रसन्न होते हैं। इसलिए वैसा ही बोलना चाहिए। बोलने में गरीबी (कंजूसी) कैसी । अर्थात प्रिय वाक्य बोलने से क्या गरीबी आ जाएगी?

यस्मिन्देशे न सम्मानो न प्रीतिर्न चबा-वाः।
न च विद्यागमः कश्चिन्न तत्र दिवसं वसेत् ।।2।।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 12 नीतिश्लोकाः

अर्थ – जिस स्थान पर सम्मान न मिले, जहाँ प्रसन्नता नहीं हो, जहाँ कोई बान्धव (मित्र) नहीं हो, और जहाँ विद्याध्ययन की व्यवस्था नहीं हो, वहाँ एक दिन भी नहीं रहना चाहिए।

काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन तु मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ।।3।।

अर्थ – बुद्धिमानों का समय काव्य शास्त्र के अधययन-अध्यापन में बीतता है। लेकिन मूखों का समय बुरे कार्यों में सोने में या झगड़ा (विवाद) करने में बीतता है।

आलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतः सुखम् ।।4।।

अर्थ – आलसी को विद्या कहाँ प्राप्त होती है, जो विद्याहीन (मूर्ख) होते हैं उनको धन नहीं प्राप्त होता है। धनहीन को मित्र नहीं होता तथा बिना मित्र के सुख की प्राप्ति नहीं होती है।

हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्र भूषणैः किं प्रयोजनम् ।।5।।

अर्थ- हाथ की शोभा दान देने से होती है। कण्ठ की शोभा सत्य वचन बोलने से होती है। कान की शोभा शास्त्र की बातें सुनने से होती है। जिसने दान-सत्य और शास्त्ररूपी आभूषण धारण कर लिया है उसके लिए. अन्य आभूषण (स्वर्णालंकार) की क्या आवश्यकता है।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 12 नीतिश्लोकाः

शब्दार्थ:-प्रियवाक्यप्रदानेन – प्रिय वचन बोलने से। तुष्यन्ति ( तुष् + लट्)- प्रसन्न होते हैं। जन्तवः (जन्तु, प्रथमा, बहु०) – प्राणियों (सभी प्राणी)। तस्मात्तदेव (तस्मात् + तत् + एव) – इसलिए वैसा ही। वक्तव्यम् – (वच् + तव्यत्) – बोलना चाहिए। दक्षिा – निर्धनता, कंजूसी, कमजोरी। . सम्मानः – आदर, मान, सम्मान। प्रीतिः – प्रसन्नता। विद्यागमः (विद्या + आगम:) – विद्या-प्राप्ति की व्यवस्था। वसेत् (वस् + विधिलिङ्) – वसना

चाहिए, रहना चाहिए। काव्यशास्त्र-विनोदेन – काव्य शास्त्र के अध्ययन-अध्यापन से। धीमताम् (धीमत् + षष्ठी बहुवचन) – बुद्धिमानों का व्यसनेन – बुरी आदतें/ बुरे काम सो निद्रया (निद्रा + तृतीया विभक्ति) – सोने से । सोकर। कलहेन – झगड़ा करने / विवाद करने में। आलसस्य – आलसी का। कुतः – कहाँ से, कैसे। अविद्यस्य – विद्या से हीन (मूर्ख) का। अधनस्य – ध नहीन (दरिद्र) का। अमित्रस्य – मित्रहीन (मित्ररहित) व्यक्ति का। श्रोत्रस्य – कान का।

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 6 लोकतांत्रिक अधिकार

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Political Science राजनीति विज्ञान : लोकतांत्रिक राजनीति भाग 1 Chapter 6 लोकतांत्रिक अधिकार Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Political Science Solutions Chapter 6 लोकतांत्रिक अधिकार

Bihar Board Class 9 Political Science लोकतांत्रिक अधिकार Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है ?
(क) भाषण की स्वतंत्रता
(ख) संगठन बनाने का अधिकार
(ग) समान काम के लिए स्त्री एवं पुरुष को समान वेतन पाने का अधिकार
(घ) दंगों में शस्त्र लेकर चलना
उत्तर-
(ग) समान काम के लिए स्त्री एवं पुरुष को समान वेतन पाने का अधिकार

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 6 लोकतांत्रिक अधिकार

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान द्वारा यहाँ के नागरिकों को कितने मौलिक अधिकार प्राप्त हैं ?
(क) 6
(ख) 7
(ग) 8
(घ) 5
उत्तर-
(क) 6

प्रश्न 3.
भारतीय नागरिकों के कितने मौलिक कर्त्तव्य हैं ?
(क) दस
(ख) पन्द्रह
(ग) सात
(घ) छः
उत्तर-
(क) दस

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प्रश्न 4.
इनमें से कौन मौलिक अधिकार है ?
(क) सम्पत्ति का अधिकार
(ख) समानता का अधिकार
(ग) शोषण के विरुद्ध अधिकार
(घ) असमानता का अधिकार
उत्तर-
(क) सम्पत्ति का अधिकार

प्रश्न 5.
मौलिक अधिकारों की सूची से किस वर्ष सम्पत्ति के अधिकार को हटा दिया गया?
(क) 1976 ई. में
(ख) 1978 ई. में
(ग) 1979 ई. में
(घ) 1985 ई. में
उत्तर-
(ख) 1978 ई. में

प्रश्न 6.
किस संविधान संशोधन द्वारा मौलिक कर्तव्य निश्चित किया गया?
(क) 42वाँ
(ख) 43वाँ
(ग) 44वाँ
(घ) 45वाँ ।
उत्तर-
(क) 42वाँ

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प्रश्न 7.
प्रतिनिधात्मक प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना की पहली शर्त क्या है?
(क) अधिकारों की मौजूदगी
(ख) कर्त्तव्यों का न होना
(ग) साम्प्रदायिक दंगे
(घ) महिलाओं के माथ गैर-सरकारी का व्यवहार
उत्तर-
(क) अधिकारों की मौजूदगी

प्रश्न 8.
विश्व के परिप्रेक्ष्य में मौलिक अधिकारों का सर्वप्रथम प्रयोग कब किया गया?
(क) 1648 ई. में
(ख) 1789 में फ्रांसीसी क्रान्ति के समय
(ग) 1948 ई. में
(घ) 1990 ई. में
उत्तर-
(ख) 1789 में फ्रांसीसी क्रान्ति के समय

प्रश्न 9.
भारत में सबसे पहले किस राजनेता ने मौलिक अधिकारों का सवाल उठाया ?
(क) पं. जवाहरलाल नेहरू ने
(ख) गाँधी जी ने
(ग) बालगंगाधर तिलक ने
(घ) गोपाल कृष्ण गोखले ने
उत्तर-
(ग) बालगंगाधर तिलक ने

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प्रश्न 10.
स्वतंत्रता का अधिकार का उल्लेख भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में किया गया है ?
(क) अनुच्छेद 15-21 में
(ख) अनुच्छेद 14-18 में
(ग) अनुच्छेद 19-22 में
(घ) अनुच्छेद 12 में
उत्तर-
(ग) अनुच्छेद 19-22 में

प्रश्न 11.
समता का अधिकार का उल्लेख भारतीय संविधान के किस
अनुच्छेद में किया गया है ?
(क) अनुच्छेद 24 में
(ख) अनुच्छेद 32 में
(ग) अनुच्छेद 19-22 में
(घ) अनुच्छेद 14-18 में
उत्तर-
(घ) अनुच्छेद 14-18 में

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन-सी स्वतंत्रता नागरिकों को प्राप्त है ?
(क) किसो का निरादर करने का
(ख) झठा अभियोग लगाने का
(ग) हिंसा भड़काने का
(घ) देश के किसी भी हिस्से में जाकर बसने का
उत्तर-
(घ) देश के किसी भी हिस्से में जाकर बसने का

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रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

प्रश्न 1.
प्रजातंत्र की रक्षा के लिए ………………. की सुरक्षा आवश्यक है।
उत्तर-
मौलिक अधिकार

प्रश्न 2.
प्रत्येक ………………… संविधान में मूल अधिकारों की व्यवस्था है।
उत्तर-
लोकतांत्रिक

प्रश्न 3.
अधिकार लोकतांत्रिक राजनीति की ………………………. है।
उत्तर-
सहगामी

प्रश्न 4.
समाज सिर्फ ऐसी ही माँगों को स्वीकारता है जिसमें …………… की भावना-निहित होती है।
उत्तर-
सार्वजनिक कल्याण

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प्रश्न 5.
किसी व्यक्ति से बेगारी लेना ………….. के विरुद्ध अधिकार है।
उत्तर-
शोषण

प्रश्न 6.
मौलिक अधिकारों की रक्षा ………….. करता है।
उत्तर-
सर्वोच्च न्यायालय

प्रश्न 7.
भारत के सभी नागरिकों को अपनी धर्म, भाषा, संस्कृति को सुरक्षित रखने का ……………. अधिकार है।
उत्तर-
शिक्षा एवं संस्कृति संबंधी

प्रश्न 8.
सरकार में किसी पद पर नियुक्ति या रोजगार के मामले में भी सभी नागरिकों के लिए है।
उत्तर-
अवसर की समानता

प्रश्न 9.
सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था तथा सदाचार को ध्यान में रखकर धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को ………….. कर सकता है।
उत्तर-
नियमित तथा नियंत्रित

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प्रश्न 10.
यदि सरकार को किसी व्यक्ति पर अपराधी होने का संदेह है तो अपराध करने के पहले ही वह . कर सकती है।
उत्तर-
नजरबंद

प्रश्न 11.
नजरबंदी की व्यवस्था को ………. को संसद के दोनों सदनों ने …………… आतंकवाद विरोधी अधिनियम को समाप्त कर दिया। .
उत्तर-
26 मार्च, 2002

प्रश्न 12.
कोई भी व्यक्ति …………. से कम उम्र के बच्चे से खरनाक काम नहीं करवा सकता है।
उत्तर-
14 वर्ष

प्रश्न 13.
………………………. वाँ संवैधानिक संशोधन 2002 के द्वारा भारत में शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार बनाया गया है।
उत्तर-
86

प्रश्न 14.
अब 6 से ………………………. वर्ष की आयु के सभी भारतीय बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
उत्तर-
14 वर्ष

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प्रश्न 15.
सभी मौलिक अधिकार व्यर्थ हैं अगर इन्हें माननेवाला और लागू करनेवाला ……………………… हो।
उत्तर-
वन

प्रश्न 16.
यदि मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा हो तो हम सीधे ………………….. भी जा सकते हैं।
उत्तर-
सर्वोच्च

प्रश्न 17.
सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों का मौलिक अधिकार लागू कराने के मामले में आदेश या ………………जारी करने का अधिकार है।
उत्तर-
लेख (रिट)

प्रश्न 18.
अधिकारों का दायरा ……………………… जाता है।
उत्तर-
बढ़ता

प्रश्न 19.
मूल अधिकारों में से बहुत सारे अधिकार निकले हैं जैसे …………………।
उत्तर-
सूचना का अधिकार

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प्रश्न 20.
दक्षिण अफ्रीका में नागरिकों और उनके …………….. को सरकार नहीं ले सकती है।
उत्तर-
घर

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मौलिक अधिकारों को सुरक्षा कौन प्रदान करता है ?
उत्तर-
न्यायालय (उच्च या सर्वोच्च न्यायालय)।

प्रश्न 2.
अधिकारों के बिना जीवन कैसा होता है ?
उत्तर-
बुरा।

प्रश्न 3.
अधिकारों का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
एक अच्छे नागरिक के विकास के लिए तथा जीवन को जीने योग्य बनाने के लिए।

प्रश्न 4.
संविधान लागू करने वाला पहला देश कौन था ?
उत्तर-
फ्रांस ने 1789 ई. में संविधान की घोषणा की।

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प्रश्न 5.
जातीय नरसंहार के नाम पर विश्व में क्या हुआ? .
उत्तर-
इराक में, युगोस्लाविया में, भारत में तथा विश्व के कई देशों में जातीय नरसंहार हुए।

प्रश्न 6.
मनुष्य के दावे किस तरह के होने चाहिए?
उत्तर-
दावे तार्किक एवं विवेकपूर्ण होने चाहिए ।

प्रश्न 7.
मताधिकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-
प्रशासन के लिए प्रतिनिधियों को चुनने के लिए नागरिकों को जिस अधिकार की जरूरत होती है उसे मताधिकार कहते हैं।

प्रश्न 8.
नेहरू समिति ने मौलिक अधिकारों की मांग कब की?
उत्तर-
1933 ई. के कराँची अधिवेशन में।

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प्रश्न 9.
मौलिक अधिकारों के मामले ने कब जोर पकड़ा?
उत्तर-
सुपसमिति ने 1945 ई० में मौलिक अधिकारों का मामला जोर-शोर से उठाया।

प्रश्न 10.
किस स्थिति में राज्य धर्म के क्षेत्र में दखल देकर उसे नियंत्रित तथा स्थगित कर सकता है ?
उत्तर-
किसी धर्म के अनुयायियों के धर्म प्रचार के ढंग से राज्य के अन्दर अमन-चैन में खलल पहुँच सकती है तो ऐसी स्थिति में राज्य उसे नियंत्रित तथा स्थगित कर सकता है।

प्रश्न 11.
बंधुआ मजदूरी किसे कहते हैं ?
उत्तर-
किसी मजदूर से जबरन जीवन भर काम कराना बंधुआ मजदूरी कहलाता है।

प्रश्न 12.
दावा का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर-
सभी नागरिकों, समाज या सरकार से किसी नागरिक द्वारा कानूनी या नैतिक अधिकारों की माँग दावा है।

प्रश्न 13.
‘रिट’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार को जारी किया गया एक औपचारिक लिखित आदेश है।

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प्रश्न 14.
उत्प्रेषण क्या है ?
उत्तर-
इस अधिकार के द्वारा उच्च न्यायालय निम्न न्यायालय से किसी अभियोग संबंधित सारे रिकार्ड अपने पास मँगवा सकता है।

प्रश्न 15.
व्यक्ति के बढ़ते अधिकार किस बात की गवाही देते हैं ?
उत्तर-
यह इस बात की गवाही देते हैं कि समाज में लोकतंत्र की जड़ें काफी मजबूत हो रही हैं।

प्रश्न 16.
राष्ट्रीय गान का सम्मान करना किसका कर्तव्य है ?
उत्तर-
भारत के नागरिकों का।।

प्रश्न 17.
माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति क्या कर्त्तव्य है ?
उत्तर-
उचित शिक्षा एवं संबंधित अवसरों की व्यवस्था करना ।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अधिकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-
अपने विकास हेतु ऐसी जायज माँगें, जो उनके राज्य द्वारा स्वीकृत हो, नागरिक अधिकार कहलाते हैं।

प्रश्न 2.
मौलिक अधिकार का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
प्रत्येक मनुष्य में कुछ शक्तियाँ अन्तर्निहित होती हैं। उन शक्तियों के विकास से ही मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास होता है । इन शक्तियों के विकास के लिए मनुष्य को कुछ अधिकारों की आवश्यकता होती है। ऐसे अधिकारों को ही हम मौलिक अधिकार कहते हैं। इन अधिकारों की चर्चा संविधान में कर दी गयी है । लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए मौलिक अधिकार आवश्यक हैं।

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प्रश्न 3.
कानून के समक्ष समानता का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
कानून के समक्ष समानता का साधारण अर्थ है कि कानून सभी व्यक्तियों को समान समझता है तथा किसी भी आधार पर किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में कानून के द्वारा कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। यह सार्वजनिक स्थलों-जैसे दूकान, होटल, मनोरंजन गृह. कुआँ, स्नान घाट और पूजा स्थलों में समानता के आधार पर प्रवेश देता है । जाति नस्ल, रंग, लिंग, धर्म या जन्म स्थान के आधार पर प्रवेश में कोई भेद-भाव नहीं कर सकता।

प्रश्न 4.
अधिकारों का क्या महत्व है ?
उत्तर-
जहाँ व्यक्ति के अधिकारों का हनन होता है जिसके कारण अपनी तकलीफ एवं त्रासदी स्वभावत: व्यक्ति के मन मस्तिष्क को यह अहसास कराता है कि अधिकारों के बिना जीवन कैसा होता है । वास्तव में लोकतंत्र में जनता की सत्ता में साझेदारी होती है । यह साझेदारी व्यक्ति के अधिकारों के माध्यम से संभव हो पाती है, जैसे नागरिकों के मतदान का अधिकार, विचार अभिव्यक्ति का अधिकार, सूचना पाने का अधिकार आदि । इसलिए व्यक्ति के अधिकार न सिर्फ लोकतंत्र की स्थापना को अनिवार्य शर्त है; वरन् लोकतांत्रिक राजनीति की सहगामी है जिसकी उपस्थिति लोकतांत्रिक शासन के वास्तविक स्वरूप को निरन्तर प्रकट करने में होती है।

प्रश्न 5.
अधिकारों के बिना जीवन कैसा? संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
अथवा, लोकतंत्र में अधिकारों की क्या आवश्यकता है?
उत्तर-
मनुष्य अच्छा जीवन जीना चाहता है। प्रत्येक नागरिक के जीवन का मुख्य लक्ष्य सुखमय जीवन की प्राप्ति है। समाज के सभी लोगों को ये सुविधाएँ चाहिए इसलिए माँगे गए दावे तार्किक एवं विवेकपूर्ण होना चाहिए । इन दावों को सब पर समान रूप से लागू किया जाने वाला होना चाहिए तथा जिसे कानून द्वारा मान्यता हो वह अधिकार हो जाता है । यह अधिकार लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में ही संभव है। अतः लोकतांत्रिक राज्य का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह अपने नागरिकों के व्यक्तित्व के विकास या सर्वांगीण विकास के लिए उचित अधिकार दें । वास्तव में नागरिकों के लिए अधिकार एक अवसर है, इसके अभाव में मनुष्य अपना पूर्ण विकास नहीं कर सकता । यह सरकार एवं अन्य लोगों के अत्याचार से सुरक्षा प्रदान करता है।

Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 6 लोकतांत्रिक अधिकार

प्रश्न 6.
अधिकारों को संविधान में लिखने की क्या जरूरत है ?
उत्तर-
कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि लोकतांत्रिक सरकार भी अपने नागरिकों के अधिकार की रक्षा नहीं करती है या इससे भी बढ़कर . वह स्वयं नागरिकों के अधिकार पर हमला करती है, जैसे भागलपुर की जेल में कैदियों की आँखें पुलिस द्वारा फोड़ दी गयीं । इस प्रकार नागरिकों के अधिकारों का अतिक्रमण किया गया । अतः इस बात की बहुत आवश्यकता है कि कुछ नागरिक अधिकारों को सरकार से भी ऊँचा दर्जा प्रदान किया जाए ताकि भविष्य में कोई भी सरकार इनका अतिक्रमण नहीं कर सके तथा इसे सख्ती से लागू करवाया जा सके । इसलिए लोकतानिक शासन व्यवस्था में नागरिकों के अधिकार को लिखने की जरूरत होती है।

प्रश्न 7.
विश्व के परिप्रेक्ष्य में मौलिक अधिकारों के संबंध में बतावें।,
उत्तर-
विश्व के संदर्भ में मौलिक अधिकारों का सर्वप्रथम प्रयोग 1789 ई. में फ्रांसीसी क्रान्ति के समय किया गया । फ्रांस की राष्ट्रीय सभा में दो मानव अधिकारों की घोषणा करते हुए संविधान में नागरिकों के कुछ मूल अधिकारों को शामिल किया गया। मानव अधिकारों की घोषणा ने विश्व के बहुत सारे संविधानों को प्रभावित किया । संयुक्त राज्य अमेरिका ने संविधान लागू होने के दो वर्ष के अन्दर दस संशोधनों के द्वारा मूल ‘अधिकारों को संविधान का अंग बनाया । आज लगभग सभी देशों के संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है। यहाँ तक कि रूस और चीन जैसे सर्वाधिकार वादी संविधान में भी नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है ।

प्रश्न 8.
भारत के संदर्भ में मौलिक अधिकारों की चर्चा कब से शुरू हुई ?
उत्तर-
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के जुझारू नेताओं में से एक बाल गंगाधर तिलक ने सर्वप्रथम मौलिक अधिकारों की मांग की। स्वतंत्रता आन्दोलन में अनेक बार कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों की मांग की। 1918 ई. में बम्बई अधिवेशन, 1933 ई. में कराची अधिवेशन में नेहरू समिति ने 1928 ई. में तथा संप्रभु समिति ने 1945 में मौलिक अधिकारों का मामला जोर-शोर से उठाया लेकिन भारतीयों को मौलिक अधिकार नहीं दिए गए । अतः स्वाभाविक था कि स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माण के समय अधिकारों का अनिवार्य रूप से समावेश किया जाय और संविधान के मूल ढाँचे में उन अधिकारों को सूचीबद्ध किया गया जिन्हें सुरक्षा देनी थी। यही मौलिक अधिकार कहलाए।

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प्रश्न 9.
किन परिस्थितियों में मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है?
उत्तर-
सार्वजनिक व्यवस्था तथा राज्य की शांति एवं सुरक्षा के हित में राज्य सरकार को स्वतंत्रता के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार प्राप्त है। संकटकालीन स्थिति में राष्ट्रपति इन अधिकारों पर प्रतिबंध लगा सकता है । संविधान को संशोधित कर मूल अधिकारों को स्थगित या सीमित किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
मौलिक अधिकारों की रक्षा कैसे की जा सकती है ?
उत्तर-
यदि राज्य सरकार या कोई व्यक्ति किसी नागरिक के मूल अधिकारों का अपहरण करता है या उसके उपभोग में अनुचित हस्तक्षेप . करता है, तो संवैधानिक उपचार के अन्तर्गत नागरिक उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय की शरण ले सकता है। न्यायालय ऐसा करने से रोक लगा सकता है । नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा का दायित्व उच्चतम न्यायालय को है।

प्रश्न 11.
समता के किन्हीं चार अधिकारों का वर्णन करें।
उत्तर-
समता के चार अधिकार निम्नलिखित हैं जो अनुच्छेद 1418 तक में वर्णित हैं-

  • कानूनी समता-कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं; चाहे वह अमीर हो या गरीब ।
  • सामाजिक समता-किसी भी नागरिक को उसकी जाति, धर्म, लिंग तथा जन्म स्थान आदि के आधार पर सार्वजनिक स्थानों जैसेहोटलों, पार्को, मनोरंजन गृहों, स्नानघरों आदि में प्रवेश करने से रोका नहीं जा सकता है।
  • अवसर की समानता- सभी नागरिकों को नौकरी पाने के क्षेत्र · में अवसर. की समानता का अधिकार प्राप्त है।
  • उपाधियों का अंत-सेना एवं शिक्षा को छोड़कर अन्य सभी प्रकार की उपाधियों का अंत कर दिया गया है।

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प्रश्न 12.
संविधान में वर्णित नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों का वर्णन करें।
उत्तर-
संविधान की धारा 19 से 22 तक में नागरिकों के स्वतंत्रता के अधिकार का वर्णन है । जिनमें छः अधिकार प्रमुख हैं-

  • भाषण तथा विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ।
  • शान्तिपूर्वक एवं बिना हथियार के एकत्र होने की स्वतंत्रता ।
  • नागरिकों को संगठन बनाने की भी स्वतंत्रता है ।
  • किसी भी नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में जाने या रहने की स्वतंत्रता ।
  • पेशा चुनने के मामले में भी ऐसी ही स्वतंत्रता प्राप्त है।
  • प्रेस स्वतंत्रता की व्यवस्था ।

प्रश्न 13.
शोषण के विरुद्ध अधिकार के अन्तर्गत उठाए गए किन्हीं चार उपायों की चर्चा करें।
उत्तर-
शोषण के विरुद्ध अधिकार के अंतर्गत उठाए गए कदम निम्नलिखित हैं

  • बंधुआ मजदूर की प्रथा को समाप्त कर दिया गया।
  • संविधान बाल मजदूरी (चौदह वर्ष से कम) का भी निषेध . करता है।
  • संविधान मनुष्य जाति के अवैध व्यापार का निषेध करता है।
  • देवदासी प्रथा को अधिनियम बनाकर समाप्त कर दिया गया ।

प्रश्न 14.
सूचना का अधिकार का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर-
यह एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार है। लोकतंत्र की भावनाओं के अनुरूप भारत की संसद के द्वारा विधि-निर्माण कर भारत के नागरिकों को सूचना प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया है। यदि सरकारी कर्मचारी इस प्रकार के आलेखों की प्रति नहीं देते तो उनके विरुद्ध भी कानन के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

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प्रश्न 15.
अधिकार-पृच्छा लेख से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
यह एक प्रकार का अदालती आदेश है । इसके द्वारा न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति को जिसकी नियुक्ति या चुनाव कानून के अनुसार नहीं । हुआ हो, उसे सरकारी कार्य करने से रोक सकता है।

प्रश्न 16.
विधि का शासन किसे कहते हैं ?
उत्तर-
समता का अधिकार भारत को एक सच्चे लोकतंत्र के रूप में किसी भी व्यक्ति का दर्जा; पद, चाहे जो भी हो सब पर कानूनन समान रूप से लागू होता है। इसे ही विधि का शासन कहते हैं।

प्रश्न 17.
आरक्षण क्या है ?
उत्तर-
भारत सरकार ने नौकरियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की है। अनेक सरकारी विभिन्न योजनाओं के तहत कुछ नौकरियों में विशेष आरक्षण है। कई बार अवसर की समानता निश्चित करने के लिए कुछ लोगों को विशेष अवसर देना जरूरी होता है । आरक्षण यही करता है। इस बात को साफ करने के लिए संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि इस तरह आरक्षण. समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है।

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प्रश्न 18.
44वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में क्या संशोधन किया गया ?
उत्तर-
1978 के 44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गयी है कि संसद के किसी सदन अथवा राज्य विधानमंडल में किसी कारण सदन की कार्यवाही की सच्ची रिपोर्ट प्रकाशित करने के कारण किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जा सकती। किन्तु प्रकाशन बुरी भावना से किया गया है तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कानूनी कार्रवाही की जा सकती है।

प्रश्न 19.
धार्मिक स्वतंत्रता क्या है ?
उत्तर-
भारत एक धर्म निरपेक्ष ग्रज्य है। राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है। धर्म व्यक्तिगत स्वतंत्रता की वस्तु बना दी गयी है । संविधान के अंतर्गत भारत में नागरिकों को किसी भी धर्म को ग्रहण करने तथा प्रसार करने तथा उसके लिए अन्य कार्य करने का अधिकार दिया गया । विभिन्न धर्मावलम्बियों को अपने धर्म का प्रचार-प्रसार के लिए भाषण देने, सभा करने, पुस्तकें प्रकाशित करने, संस्थाओं की स्थापना करने तथा शिक्षण संस्थान चलाने का अधिकार है।

प्रश्न 20.
धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को किस स्थिति में सरकार नियमित तथा नियंत्रित कर सकती है ?
उत्तर-
भारत में अनेक धर्मों के लोग रहते हैं। इनमें धर्म प्रचार के ढंग से आपस में मतभेद हो जाने की संभावना है। फलस्वरूप सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था तथा सदाचार को ध्यान में रखकर धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को नियमित तथा नियंत्रित कर सकता है। अगर धर्म प्रचार से राज्य के अन्दर अमन-चैन में खलल पहुँच सकती है या कोई अनैतिक कार्य होता है तो राज्य उसे नियंत्रित तथा स्थगित कर सकता है।

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प्रश्न 21.
धर्म और शिक्षण संस्थाओं से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर-
विभिन्न धर्मावलम्बियों द्वारा स्कूल, कॉलेज, पाठशाला तथा मदरसा खोलने की स्वतंत्रता है। दूसरी शिक्षण संस्थाओं की तरह इन्हें भी राज्य द्वारा आर्थिक सहायता मिलेगी। राज्य द्वारा संचालित तथा नियमित शिक्षण संस्थानों में धर्म संबंधी शिक्षा नहीं दी जाएगी और न विभिन्न धर्मावलम्बियों द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थाओं में किसी विद्यार्थी को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी धर्म को मानने के लिए बाध्य किया जाएगा।

प्रश्न 22.
संस्कृति संबंधी नागरिकों के कौन-से अधिकार प्राप्त हैं ?
उत्तर-
भारत में विविधता में एकता है। इसमें भाँति-भाँति के लोग तथा उनकी अपनी भाषा लिपि तथा संस्कृति है । संविधान में इन धाराओं के माध्यम से भारत में रहने वाले हर प्रकार के लोगों को अपनी-अपनी लिपि, भाषा तथा संस्कृति की रक्षा करने का अधिकार दिया गया है। विभिन्न धर्मों पर आधारित वर्गों तथा अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि तथा संस्कृति की रक्षा करने का अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 23.
जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के हित में नागरिकों को कौन-से उपाय दिए गए हैं ?
उत्तर-
संविधान के अनुसार किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित.प्रक्रिया के अतिरिक्त जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है । इसका यह भी मतलब है कि कानूनी आधार होने पर सरकार या पुलिस अधिकारी किसी नागरिक को गिरफ्तार कर सकता है, पर उसे गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देनी होती है। बिना कारण बताए किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता और गिरफ्तार होने के समय से चौबीस घंटे के भीतर निकटस्थ दंडाधिकारी के समक्ष पेश करना आवश्यक है । गिरफ्तार हुए व्यक्ति को यह भी अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी इच्छानुसार किसी वकील से अपनी गिरफ्तारी के संबंध में परामर्श कर सके।

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प्रश्न 24.
शिक्षा का अधिकार क्या है ?
उत्तर-
86वाँ संवैधानिक संशोधन 2002 के द्वारा भारत में शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया गया है। अब 6 वर्ष से लेकर 14 वर्ष के आयु के सभी भारतीय बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त है। 6 वर्ष तक के बच्चों को बाल्यकाल और शिक्षा की देखभाल करने के लिए सरकार द्वारा आवश्यक शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी। यदि इस अधिकार का उल्लंघन किया जाता है तो इसे लागू कराने के लिए याचिका दायर की जा सकती है।

प्रश्न 25.
जनहित याचिका किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जनहित याचिका के द्वारा कोई भी व्यक्ति अथवा समूह सरकार के किसी कानून अथवा कार्य के खिलाफ सार्वजनिक हितों की सुरक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालयों में जा सकता है। इस प्रकार के मामले जज के नाम पोस्टकार्ड पर लिखा निजी अर्जी के माध्यम से भी उठाए जा सकते हैं। अगर न्यायाधीशों को लगे कि वास्तव में इस मामले में सार्वजनिक हितों पर चोट पहुँच रही है तो वे मामले को विचार के लिए स्वीकार कर सकते हैं।

प्रश्न 26.
बंदी प्रत्यक्षीकरण क्या है ?
उत्तर-
बंदी प्रत्यक्षीकरण के द्वारा न्यायालय गैर-कानूनी ढंग से गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को अपने सम्मुख प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है। अगर न्यायालय द्वारा उसकी गिरफ्तारी अनुचित तथा गैर-कानूनी समझी गयी तो उसे रिहा करने का भी आदेश दे सकती है।

प्रश्न 27.
परमादेश क्या है ?
उत्तर-
यह भी एक प्रकार का अदालती आदेश है जो किसी व्यक्ति या संस्था को अपने उस कर्त्तव्य को करने के लिए बाध्य कर सकता है जिसे काननी रूप से करने के लिए वह बाध्य है। जैसे कोई कारखाने का, मालिक या नियोक्ता किसी मजदूर को बिना कारण बताए हटा देता है या उसके वेतन भत्ता से कटौती करता है तो मजदूर के आवेदन पर कारखाने के मालिक के विरुद्ध न्यायालय द्वारा परमादेश जारी किया जा सकता है और जाँच के बाद न्यायालय उचित फैसला दे सकता है।

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प्रश्न 28.
प्रतिषेध क्या है ?
उत्तर-
यह भी एक प्रकार का अदालती आदेश है । प्रतिषेध के द्वारा सर्वोच्च या उच्च न्यायालय की ओर से किसी अधीनस्थ न्यायालय को ऐसा कार्य करने से रोकने के लिए रिट जारी किया जा सकता है जो कानून के विरुद्ध हो या उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो ।

प्रश्न 29.
संवैधानिक उपचारों का अधिकार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
मौलिक अधिकार व्यर्थ है अगर इन्हें माननेवाला और लागू करनेवाला न हो। संभव है कि कई बार हमारे अधिकारों का उल्लंघन कोई व्यक्ति या कोई संस्था या फिर स्वयं सरकार ही कर रही हो । अगर हमारे किसी भी अधिकार का उल्लंघन होता है तो हम अदालत के जरिए उसे रोक सकते हैं।

अगर मामला मौलिक अधिकारों का हो तो हम सीध सर्वोच्च न्यायालय या किसी राज्य के उच्च न्यायालय में जा सकते हैं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय को आदेश या ‘रिट’ जारी करने का अधिकार है । यह संवैधानिक उपचार है जिससे नागरिक अपने मौलिक अधिकारों को बचा सकते हैं।

प्रश्न 30.
अधिकारों का बढ़ता दायरा से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
मौलिक अधिकारों के अलावा और भी बहुत सारे अधिकार एवं कानून संविधान द्वारा प्राप्त होते हैं, जो सामाजिक, राजनैतिक, परिस्थितियों में विकास एवं बदलाव करते हैं। इस तरह से अधिकारों का दायरा बढ़ता जाता है । लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में अधिकारों की माँग तेजी से बढ़ती है। वास्तव में लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास के समानान्तर अधिकारों का विकास होता है। अर्थात व्यक्ति के बढ़ते अधिकार इस बात की गवाही देते हैं कि उस समाज में लोकतंत्र की जड़ें कितनी मजबूत हो रही हैं।

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प्रश्न 31.
नये संविधान के निर्माण के समय दक्षिण अफ्रीका में कौन-कौन से नये अधिकार आए ?
उत्तर-
नये संविधान के निर्माण में भी नये-नये अधिकार सामने आये । जैसे- दक्षिण अफ्रीका में नागरिकों और उनके घरों की तलाशी नहीं ली जा सकती, उनके फोन टेप नहीं किए जा सकते, उनके पत्र आदि खोलकर नहीं पढ़े जा सकते ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान के द्वारा भारत के नागरिकों को कौन-कौन से मौलिक अधिकार प्रदान किये गए हैं ?
उत्तर-
भारतीय संविधान के तीसरे अध्याय में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है। भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को निम्नलिखित अधिकार प्रदान किये गए हैं

  • समता का अधिकार।
  • स्वतंत्रता का अधिकार।
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार।
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार।
  • सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी अधिकार।
  • संवैधानिक उपचार का अधिकार।

नोट : इन सभी का विस्तार देखें लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर क्रमश: 12, 13, 14, 20, 30 एवं 26 में।

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प्रश्न 2.
भारतीय नागरिकों के कर्तव्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
86वाँ संशोधन के अनुसार भारतीय नागरिकों के निम्नलिखित दस कर्तव्य निश्चित किये गए हैं

  1. संविधान का पालन करना उसके व्यवस्थाओं के अनुसार संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज तथा राष्ट्रीय गान का सम्मान करना
  2. स्वतंत्रता के लिए किये गए राष्ट्रीय संघर्ष को प्रोत्साहित करनेवाले आदर्शों का पालन करना ।
  3. भारत की सम्प्रभुता, एकता, अखंडता का समर्थन और रक्षा करना ।
  4. देश की रक्षा एवं आवश्यकता के समय राष्ट्रीय सेवा करना ।
  5. धार्मिक, भाषायी, क्षेत्रीय अथवा वर्गीय भिन्नता से ऊपर उठकर भाईचारा बढ़ाना।
  6. संयुक्त सांस्कृतिक तथा समृद्ध विरासत का सम्मान करना और इसको स्थिर रखना।
  7. पर्यावरण एवं वन्य प्राणियों का संरक्षण करना ।
  8. दृष्टिकोण में वैज्ञानिकता, मानवतावाद, अन्वेषण एवं सुधार की भावना का विकास करना ।
  9. हिंसा से परहेज करना, सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा करना तथा राष्ट्रहित उच्च के स्तरों की ओर बढ़ते रहना।
  10. माता-पिता द्वारा बच्चों के लिए शिक्षा संबंधी अवसरों की व्यवस्था करना।

प्रश्न 3.
अधिकार और मौलिक अधिकारों में अन्तर स्पष्ट करते हुए भारत के नागरिकों के अधिकारों का वर्णन करें।
उत्तर-
लोकतांत्रिक राज्य में नागरिक को अपने व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास हेतु अधिकारों की आवश्यकता होती है । इस तरह अधिकार लोगों के वे तार्किक दावे हैं जिसे समाज से स्वीकृति एवं अदालतों द्वारा मान्यता मिलती है।

मौलिक अधिकार वैसे अधिकार जिसकी चर्चा भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता एवं न्याय दिलाने का वायदा करता है। मौलिक अधिकार इन्हीं वायदों को पूरा करने का प्रयास है।

भारतीय नागरिकों के अधिकार इस प्रकार हैं-

(i) जीवन जीने का अधिकार-हर मनुष्य अच्छा जीवन जीना चाहता है । व्यक्ति इन सुविधाओं को माँग दावे के रूप में करता है । उन दावों जिनमें व्यक्त्वि विकास की भावना हो जीने का अधिकार कहलाता है। इसके विरुद्ध कोई व्यक्ति आत्महत्या करने का प्रयास करता है तो वह अपराध है और उस पर मुकदमा चलाया जायेगा।

(ii) विचार अभिव्यक्ति का अधिकार- अपने विचारों को हम भाषण देकर, पुस्तक लिखकर अभिव्यक्त कर सकते हैं । अपमान जनक शब्दों द्वारा नहीं।

(iii) संगठन बनाने का अधिकार नागरिकों को यह अधिकार है . कि वे अपने हित के लिए संगठन बना सकते हैं। ये संगठन सरकारी अथवा गैर-सरकारी स्तर पर बना सकते हैं । जैसे किसी शहर के कुछ लोग भ्रष्टाचार या प्रदूषण के खिलाफ अभियान चलाने के लिए संगठन बना सकते हैं। किसी कारखाने में मजदूर संघ का निर्माण हो सकता है ।

(iv) धार्मिक स्वतंत्रता-भारत में नागरिकों को किसी भी धर्म को ग्रहण करने उसका प्रचार-प्रसार तथा उसके लिए अन्य कार्य करने का अधिकार दिया गया है।

(v) संपत्ति का अधिकार प्रत्येक मनुष्य को धन अर्जन करने, जमा करने का अधिकार है।

(vi) शिक्षा का अधिकार प्रत्येक नागरिक का यह अधिकार है कि किसी भी शिक्षण संस्था में जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्र इत्यादि के भेदभाव के बिना दाखिला ले सकते हैं और शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।

(vii) वैवाहिक स्वतंत्रता का अधिकार-कोई भी बालिग लड़का व लड़की अपनी मर्जी से विवाह कर सकते हैं।

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प्रश्न 4.
दक्षिण अफ्रीका के संविधान द्वारा वहाँ के नागरिकों को कौन-कौन से प्रमुख अधिकार दिए गए हैं ?
उत्तर-
दक्षिण अफ्रीका के संविधान द्वारा वहाँ के नागरिकों को निम्नलिखित अधिकार दिए गए हैं –
(i) गरिमा का अधिकार ।
(ii) निजता का अधिकार ।
(iii) श्रम · संबंधी समुचित व्यवहार का अधिकार ।
(iv) स्वस्थ पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण का अधिकार ।
(v) समुचित आवास का अधिकार ।
(vi) स्वास्थ्य सुविधाएँ, भोजन, पानी और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार ।
(vii) बाल अधिकार ।
(viii) बुनियादी और उच्च शिक्षा का अधिकार ।
(ix) संस्कृति, आर्थिक और भाषायी समुदायों का अधिकार ।
(x) सूचना का अधिकार ।

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Bihar Board Class 9 Political Science Solutions Chapter 5 संसदीय लोकतंत्र की संस्थाएँ

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Political Science राजनीति विज्ञान : लोकतांत्रिक राजनीति भाग 1 Chapter 5 संसदीय लोकतंत्र की संस्थाएँ Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Political Science Solutions Chapter 5 संसदीय लोकतंत्र की संस्थाएँ

Bihar Board Class 9 Political Science संसदीय लोकतंत्र की संस्थाएँ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नीतिगत फैसला निम्नलिखित में से कौन लेती है ?
(क) विधायिका
(ख) कार्यपालिका
(ग) न्यायपालिका
(घ) राष्ट्रपति
उत्तर-
(ख) कार्यपालिका

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प्रश्न 2.
राजनैतिक कार्यपालिका का प्रधान कौन होता है ?
(क) प्रधानमंत्री
(ख) जज
(ग) राष्ट्रपति
(घ) राजनैतिक नेता
उत्तर-
(ग) राष्ट्रपति

प्रश्न 3.
भारत के राष्ट्रपति द्वारा संकट काल की घोषणा निम्नलिखित में से किस वर्ष हुई?
(क) 1960 ई. में
(ख) 1970 ई. में
(ग) 1972 ई. में
(घ) 1975 ई० में
उत्तर-
(घ) 1975 ई० में

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प्रश्न 4.
भारत में राष्ट्रीय संकटकाल की घोषणा कौन करता है ?
(क) विदेशमंत्री
(ख) रक्षामंत्री
(ग) राष्ट्रपति
(घ) प्रधानमंत्री
उत्तर-
(ग) राष्ट्रपति

प्रश्न 5.
राष्ट्रपति का चुनाव होता है
(क) प्रत्यक्ष रूप से
(ख) अप्रत्यक्ष रूप से
(ग) दोनों ढंग से
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ख) अप्रत्यक्ष रूप से

प्रश्न 6.
उपराष्ट्रपति का चुनाव होता है
(क) अप्रत्यक्ष ढंग से
(ख) प्रत्यक्ष ढंग से
(ग) प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों ढंग से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) अप्रत्यक्ष ढंग से

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प्रश्न 7.
केन्द्र में मंत्रियों की नियुक्ति कौन करता है?
(क) राष्ट्रपति
(ख) संसद
(ग) उपराष्ट्रपति
(घ) प्रधानमंत्री
उत्तर-
(घ) प्रधानमंत्री

प्रश्न 8.
केन्द्र में कानून बनाने का कार्य कौन करती है ?
(क) विधायिका
(ख) न्यायपालिका
(ग) राज्यसभा
(घ) सर्वोच्च न्यायालय
उत्तर-
(क) विधायिका

प्रश्न 9.
राज्यपाल की नियुक्ति कितने वर्षों के लिए होती है ?
(क) 3 वर्षों
(ख) 4 वर्षों
(ग) 5 वर्षों
(घ) 6 वर्षों
उत्तर-
(ग) 5 वर्षों

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प्रश्न 10.
बिहार राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति इनमें से कौन करता है ?
(क) राष्ट्रपति
(ख) बिहार का राज्यपाल
(ग) मुख्य न्यायाधीश
(घ) मुख्यमंत्री
उत्तर-
(ख) बिहार का राज्यपाल

प्रश्न 11.
बिहार विधान मंडल के कितने सदन हैं ?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर-
(ख) दो

प्रश्न 12.
बिहार विधान परिषद् में वर्तमान में कितने सदस्य हैं ?
(क) 75
(ख) 60
(ग) 40
(घ) 36
उत्तर-
(क) 75

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प्रश्न 13.
विधानसभा के मनोनीत सदस्यों को छोड़कर बाकी सदस्यों का चुनाव किस प्रकार होता है ?
(क) अप्रत्यक्ष मतदान द्वारा
(ख) प्रत्यक्ष मतदान द्वारा
(ग) एकल विधि
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) प्रत्यक्ष मतदान द्वारा

प्रश्न 14.
विधान सभा का कार्यकाल कितने वर्षों का होता है ?
(क) 3 वर्ष
(ख) 4 वर्ष
(ग) 5 वर्ष
(घ) 6 वर्ष
उत्तर-
(ग) 5 वर्ष

प्रश्न 15.
न्यायाधीशों की नियुक्ति किसके द्वारा होती है ?
(क) मुख्य न्यायाधीश द्वारा
(ख) राष्ट्रपति द्वारा
(ग) मुख्यमंत्री द्वारा
(घ) प्रधानमंत्री द्वारा
उत्तर-
(ख) राष्ट्रपति द्वारा

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प्रश्न 16.
पटना उच्च न्यायालय की स्थापना हुई थी ?
(क) 1 मार्च, 1910 ई०
(ख) 1 मार्च, 1912 ई०
(ग) 1 मार्च, 1914 ई०
(घ) 1 मार्च, 1916 ई०
उत्तर-
(घ) 1 मार्च, 1916 ई०

प्रश्न 17.
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के अवकाश प्राप्त करने की उम्र निम्नलिखित में से क्या है ?
(क) 62 वर्ष
(ख) 60 वर्ष
(ग) 65 वर्ष
(घ) 70 वर्ष
उत्तर-
(क) 62 वर्ष

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प्रश्न 18.
भारत का राष्ट्रपति जटिल कानूनी मामलों पर किससे परामर्श ले सकता है ?
(क) कानून मंत्री से
(ख) प्रधानमंत्री से
(ग) उपराष्ट्रपति से
(घ) सर्वोच्च न्यायालय से
उत्तर-
(घ) सर्वोच्च न्यायालय से

प्रश्न 19.
भारत का सर्वोच्च न्यायालय किसका निरीक्षण कर सकता है ? .
(क) अपने अधीनस्थ न्यायालयों का
(ख) संसद का
(ग) लोकसेवा आयोग का
(घ) सेना का
उत्तर-
(क) अपने अधीनस्थ न्यायालयों का

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प्रश्न 20.
राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी को कितने रुपये जमानत की राशि जमा करनी होती है ?
(क) 10,000
(ख) 12,000
(ग) 14,000
(घ)15,000
उत्तर-
(घ)15,000

प्रश्न 21.
राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ रहे व्यक्ति के नाम को कितने मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित होना चाहिए?
(क) 50
(ख) 60
(ग) 70
(घ) 100
उत्तर-
(क) 50

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प्रश्न 22.
बाबू जगजीवन राम कब उपप्रधानमंत्री बने थे ?
(क) 1947 ई. में
(ख)1950 ई. में
(ग) 1960 ई० में
(घ) 1978 ई० में
उत्तर-
(घ) 1978 ई० में

प्रश्न 23.
लालकृष्ण आडवानी कब उप प्रधानमंत्री बने थे ?
(क) 1947 ई. में
(ख) 1978 ई. में
(ग) 2002 ई. में
(घ) 2006 ई. में
उत्तर-
(ग) 2002 ई. में

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प्रश्न 24.
लोकसभा को कहा जाता है ?
(क) प्रथम सदन
(ख) द्वितीय सदन
(ग) उच्च सदन
(घ) तृतीय सदन
उत्तर-
(क) प्रथम सदन

प्रश्न 25.
लोकसभा और विधानसभा के कुल स्थानों की संख्या कब तक
परिवर्तन नहीं किया जायेगा?
(क) 2015 तक
(ख) 2020 तक
(ग) 2025 तक
(घ) 2026 तक
उत्तर-
(घ) 2026 तक

प्रश्न 26.
राज्य सभा की कार्यवाही चलाने के लिए इसमें कुल सदस्यों के कितने भाग की उपस्थिति अनिवार्य होती है ?
(क) 1/10 भाग
(ख) 1/12 भाग
(ग) 1/15 भाग
(घ) 1/20 भाग
उत्तर-
(क) 1/10 भाग

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प्रश्न 27.
पटना विश्वविद्यालय का कुलपति कौन है ?
(क) राज्यपाल
(ख) मुख्यमंत्री
(ग) राष्ट्रपति
(घ) मुख्य न्यायाधीश
उत्तर-
(क) राज्यपाल

रिक्त स्थान की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
शासन के कार्यकारी स्वरूप का निर्धारण व्यावहारिक रूप में …………………. द्वारा होता है।
उत्तर-
कार्यपालिका

प्रश्न 2.
केन्द्र सरकार ………………… महत्व के विषयों पर निर्णय लेती है।
उत्तर-
सर्वदेशीय

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प्रश्न 3.
राज्य सरकार ……………….. महत्व के विषयों पर निर्णय लेती है।
उत्तर-
स्थानीय

प्रश्न 4.
आधुनिक देशों में विभिन्न कार्य करने के लिए विभिन्न …………………. होती है।

प्रश्न 5.
……………….प्रधानमंत्री की सलाह से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं।
उत्तर-
राष्ट्रपति

प्रश्न 6.
राज्य में …………………….. कानून बनाता है।
उत्तर-
विधायिका

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प्रश्न 7.
लोकसभा…………..का प्रतिनिधि है।
जनता

प्रश्न 8.
इंगलैंड में संसद को ……………….. कहते हैं।
उत्तर-
हाउस ऑफ कौमन्स

प्रश्न 9.
अमेरिका में संसद को …………………. कहते हैं।
उत्तर-
प्रतिनिधिसभा

प्रश्न 10.
कानून बनाने हेतु जो प्रस्ताव तैयार किया जाता है उसे ………………… कहते
उत्तर-
विधेयक

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प्रश्न 11.
संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का अधिकार इतना अधिक बढ़ गया है कि इसे ……………….. व्यवस्था कहा जाने लगा है।
उत्तर-
प्रधानमंत्रीय शासन

प्रश्न 12.
भारत में ……… व्यवस्था है।
उत्तर-
संघीय शासन

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प्रश्न 13.
राज्य में ………………. कार्यपालिका का प्रधान होता है।
उत्तर-
मुख्यमंत्री

प्रश्न 14.
राज्यपाल विधानमंडल के दोनों सदनों के ………………. में भाषण देते हैं।
उत्तर-
संयुक्त अधिवेशन

प्रश्न 15.
राज्यपाल के भाषण को ………………. कहा जाता है।
उत्तर-
अभिभाषण

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प्रश्न 16.
राष्ट्रपति शासन होने पर राज्यपाल केन्द्र के ……………….  के रूप में कार्य – करते हैं।
उत्तर-
एजेंट

प्रश्न 17.
राज्यपाल मुख्यमंत्री की ……………….  से सारा कार्य करते हैं। उत्तर-सलाह
उत्तर-
संस्थाएँ

प्रश्न 18.
भारतीय न्यायपालिका में पूरे देश के लिए ………………. . है।
उत्तर-
सर्वोच्च न्यायालय

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प्रश्न 19.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति ……………….  करते हैं।
उत्तर-
राष्ट्रपति

प्रश्न 20.
भारत का सर्वोच्च न्यायालय को ………………. बनाया गया है।
उत्तर-
स्वतंत्र और निष्पक्ष

प्रश्न 21.
फाँसी के सजा की माफी का अधिकार केवल ……………….  की है।
उत्तर-
राष्ट्रपति

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प्रश्न 22.
ग्राम कचहरी को………………. की सजा देने का अधिकार प्राप्त है।
उत्तर-
एक माह

प्रश्न 23.
राष्ट्रपति के चुनाव के लिए जन्मजात और ……………….  में भेदभाव नहीं किये जाने का प्रावधान है।
उत्तर-
राज्यकृत

प्रश्न 24.
राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे व्यक्ति का 50 मतदाताओं द्वारा ……………….  होना चाहिए।
उत्तर-
अनुमोदित

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प्रश्न 25.
संसद और विधान सभा के मनोनित सदस्य राष्ट्रपति के ………………………….. में भाग नहीं लेंगे।
उत्तर-
चुनाव

प्रश्न 26.
संसद और विधान सभा के मनोनित सदस्य राष्ट्रपति को ……………………की प्रक्रिया में अवश्य भाग लेंगे।
उत्तर-
हटाने

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प्रश्न 27.
सर्वोच्च न्यायालय वह संस्था है, जहाँ नागरिक और सरकार के बीच ………………. सुलझाये जाते हैं।
उत्तर-
विवाद अंततः

प्रश्न 28.
नीतिगत फैसले कार्यपालिका जनता के ………………… . में लेती है।
उत्तर-
हित

प्रश्न 29.
राज्य स्तर पर विधान मंडल …………………. .कहलाती है।
उत्तर-
विधानसभा

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प्रश्न 30.
अध्यक्षीय शासन का उदाहरण ………………. है।
उत्तर-
संयुक्त राज्य अमेरिका

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संघीय सरकार के अधीन कार्य करनेवाली महत्वपूर्ण संस्थाओं का नाम लिखें।
उत्तर-
तीन संस्थाएँ हैं- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ।

प्रश्न 2.
भारतीय संसद के कितने सदन हैं ?
उत्तर-
भारतीय संसद के दो सदन हैं- लोकसभा तथा राज्य सभा ।

प्रश्न 3.
राज्य सभा के सदस्य कितने वर्ष के लिए चुने जाते हैं ?
उत्तर-
छः वर्ष के लिए चुने जाते हैं।

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प्रश्न 4.
उपराष्ट्रपति का कार्यकाल कितने साल का होता है ?
उत्तर-
5 वर्ष ।

प्रश्न 5.
राज्यसभा का सभापति कौन होता है ?
उत्तर-
उपराष्ट्रपति ।

प्रश्न 6.
प्रधानमंत्री की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर-
राष्ट्रपति ।

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प्रश्न 7.
लोकसभा में सदस्यों की कुल संख्या कितनी है ?
उत्तर-
वर्तमान समय में 545 है।

प्रश्न 8.
मंडल आयोग का गठन कब हुआ?
उत्तर-
सन् 1979 ई० में।

प्रश्न 9.
मंडल आयोग के अध्यक्ष कौन थे ?
उत्तर-
श्री बी.पी. मंडल ।

प्रश्न 10.
संघीय कार्यपालिका का प्रधान कौन होता है ?
उत्तर-
राष्ट्रपति ।

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प्रश्न 11.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है ? .
उत्तर-
राष्ट्रपति ।

प्रश्न 12.
केन्द्र में किसके हस्ताक्षर के बाद कानून बन जाता है ?
उत्तर-
राष्ट्रपति के ।

प्रश्न 13.
राज्य की कार्यपालिका शक्ति का वास्तविक प्रधान कौन होता है ?
उत्तर-
मुख्यमंत्री।

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प्रश्न 14.
सबसे निचले स्तर पर कौन-सा न्यायालय होता है ?
उत्तर-
ग्राम कचहरी ।।

प्रश्न 15.
विधेयक कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर-
दो प्रकार के-(i) सामान्य विधेयक (ii) धन विधेयक ।

प्रश्न 16.
पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरी में कितना प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है ?
उत्तर-
27%।

प्रश्न 17.
पिछड़े वर्गों के लिए 27% का आरक्षण कानून कब बना?
उत्तर-
13 अगस्त, 1990 ई. को।

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प्रश्न 18.
भारत के वर्तमान राष्ट्रपति का नाम बताएँ।
उत्तर-
श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ।

प्रश्न 19.
बिहार के मुख्यमंत्री का नाम बताएँ।
उत्तर-
श्री नीतिश कुमार ।

प्रश्न 20.
विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक कानून कब बनता है ?
उत्तर-
राज्यपाल की स्वीकृति के बाद ।

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प्रश्न 21.
बिहार में सरकार के खिलाफ अविश्वास या काम रोको प्रस्ताव किस सदन में उठाया जाएगा?
उत्तर-
सिर्फ विधानसभा में ।

प्रश्न 22.
विधान का उच्च सदन कौन है ?
उत्तर-
विधान परिषद ।

प्रश्न 23.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को समय से पहले कैसे हटाया जा सकता है ?
उत्तर-
महाभियोग प्रस्ताव के द्वारा ।

प्रश्न 24.
किस प्रकार के मुकदमों को सीधे उच्च न्यायालय में ले जाया जा सकता है ?
उत्तर-
मौलिक अधिकारों से संबंधित।

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प्रश्न 25.
क्या भारत में राज्यसभा में सभी राज्यों का समान प्रतिनिधित्व है ?
उत्तर-
नहीं, ऐसा होता ही नहीं है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संघीय संसद की रचना लिखें।
उत्तर-
संघीय संसद में राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा शामिल हैं । लोकसभा के सदस्यों की संख्या 552 हो सकती है। पर, आजकल लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 545 है। इनमें 543 निर्वाचित सदस्य हैं और दो राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य हैं। राज्य सभा सदन का ऊपरी सदन है जो जनता का प्रतिनिधित्व न करके राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें अधिकतम संख्या 250 हो सकती है पर इसमें 245 सदस्य हैं जिनमें 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत हैं।

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प्रश्न 2.
सरकार के अधीन कार्य करनेवाली संस्थाओं के नाम लिखें । इसमें कार्यपालिका के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
सरकार के अधीन कार्य करनेवाली तीन महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका । इन तीनों के द्वारा ही शासन के सम्पूर्ण कार्यों का संचालन होता है । लेकिन शासन के कार्यकारी स्वरूप का निर्धारण व्यावहारिक रूप से कार्यपालिका द्वारा होता है । इसके द्वारा किए जाने वाले कार्य-

  • प्रशासकीय कार्य
  • नियुक्ति संबंधी कार्य
  • विधायिनी कार्य
  • सैनिक कार्य ।

प्रश्न 3.
संसद की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर-
निम्नलिखित बातों को लेकर इसकी आवश्यकता है

  • कानून बनाने के लिए ।
  • सरकार पर नियंत्रण रखने के लिए।
  • सार्वजनिक धन पर नियंत्रण रखने के लिए ।
  • लोगों के प्रतिनिधियों को एक मंच प्रदान करने के लिए संसद की आवश्यकता होती

प्रश्न 4.
नीतिगत फैसला क्या है ?
उत्तर-
केन्द्र सरकार के कार्य पद्धति को सर्वोच्च समझकर लिया गया फैसला ही नीतिगत फैसला है।

  • नीतिगत फैसला कार्यपालिका लेती है।
  • नीतिगत फैसले कार्यपालिका जनता के हित में लेती है।
  • नीति निर्धारण के क्रम में कार्यपालिका संसद की अनदेखी नहीं कर सकती है।

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प्रश्न 5.
संसदीय शासन-प्रणाली किसे कहते हैं ?
उत्तर-
कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका के सहयोग पर सरकार आधारित है। इस प्रणाली में कार्यपालिका का प्रधान नाममात्र का होता है। . वास्तविक शक्ति व्यवस्थापिका में बहुमत प्राप्त दल के नेता के हाथों में – होती है। वह अपने कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होता है। भारत का राष्ट्रपति नाममात्र का कार्यपालिका का प्रधान होता है, वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री के हाथों में होती है ।

प्रश्न 6.
अध्यक्षात्मक सरकार किसे कहते हैं, उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें।
उत्तर-
लोकतांत्रिक सरकार का दूसरा रूप अध्यक्षात्मक सरकार है । इसमें राज्य और सरकार का वास्तविक प्रधान राष्ट्रपति होता है। इस प्रणाली में राष्ट्रपति कार्यपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता । अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार है। संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रपति कार्यपालिका का सर्वेसर्वा होता है । विधायिका उसे समय के पूर्व हटा नहीं सकती है ।

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प्रश्न 7.
कार्यपालिका कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर-
कार्यपालिका दो तरह की होती है।
(i) राजनैतिक कार्यपालिका (ii) स्थायी कार्यपालिका

(i) राजनैतिक कार्यपालिका में ही शासन की वास्तविक शक्ति छिपी हुई है। राजनैतिक कार्यपालिका जनता के प्रतिनिधि के रूप में जनता की ओर से शासन करती है । इसका कार्यकाल निश्चित अवधि के लिए होता है । अथवा लोकसभा में बहुमत रहने तक दायित्व संभाले रहता है ।
(ii) स्थायी कार्यपालिका ऐसे उच्च पदाधिकारियों की फौज है जो , विभिन्न स्तर पर सरकार के नीति निर्धारण में परामर्श देती है एवं निर्देशानुसार नीति के स्वरूप को अमली जामा पहनाती है। इसका कार्यकाल पदस्थापित अधिकारियों के अवकाश ग्रहण करने तक बना रहता है।

प्रश्न 8.
राष्ट्रपति पद के निर्वाचन के लिए योग्यताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए योग्यताओं का वर्णन संविधान में किया गया है। ये योग्यताएँ इस प्रकार हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो ।
  • वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो ।
  • वह लोकसभा के लिए सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो ।
  • किसी लाभवाले पद पर कार्यरत न हो।

प्रश्न 9.
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होता है ?
उत्तर-
राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से एक निर्वाचन मंडल द्वारा होता है, जिसमें दो तरह के सदस्य होते हैं-

  • भारतीय संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य।
  • राज्य के विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य ।

राष्ट्रपति का निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote System) द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार होता है। राष्ट्रपति के चुनाव में एक सदस्य एक मत वाली विधि नहीं अपनाई गई है। वैसे एक मतदाता को केवल एक ही मत मिलता है, लेकिन उसके मत की गणना नहीं होती बल्कि उसका मूल्यांकन होता है।

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प्रश्न 10.
राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने तथा उसे पद से हटाने के लिए संविधान में कौन-सी प्रक्रिया दी गयी है ?
उत्तर-
राष्ट्रपति को पाँच वर्ष के लिए चुना जाता है; परंतु यदि कोई राष्ट्रपति अपनी शक्तियों के प्रयोग में संविधान का उल्लंघन करे तो पाँच वर्ष से पहले भी उसे अपने पद से हटाया जा सकता है। उसे महाभियांग द्वारा अपदस्थ किया जा सकता है । एक सदन राष्ट्रपति के विरुद्ध आरोप लगाता है। यदि दूसरा सदन 2/3 बहुमत से उन आरोपों की पुष्टि कर दे तो राष्ट्रपति को उसी दिन पद त्यागना पड़ेगा। जब तक दूसरा सदन राष्ट्रपति को हटाये जाने का प्रस्ताव पास नहीं करता, उस समय तक राष्ट्रपति अपने पद पर आसीन रहता है।

प्रश्न 11.
उपराष्ट्रपति का निर्वाचन कैसे होता है ? उनके किन्हीं तीन अधिकारों का वर्णन करें।
उत्तर-
उपराष्ट्रपति का चुनाव 5 वर्ष के लिए होता है । उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा गठित एक निर्वाचक मंडल द्वारा एकल संक्रमणीय मतविधि से आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर होता है।

इनके तीन अधिकार निम्नलिखित हैं –

  • राज्य सभा की बैठक का सभापतित्व करना।
  • राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति का कार्यभार संभालना।
  • राज्यसभा में मत समानता की स्थिति में निर्णायक मत देना ।
  • जब राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाता है तब वैसी स्थिति में नव-नियुक्त राष्ट्रपति के पद ग्रहण करने तक वह राष्ट्रपति का पद सम्भालता है।

प्रश्न 12.
बिहार विधान परिषद् का गठन कैसे होता है ?
उत्तर-
यह विधानमंडल का दूसरा सदन है। यह एक स्थायी सदन है। विधान परिषद के सदस्यों की संख्या कम-से-कम 40 एवं अधिकतम संख्या उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या की एक-तिहाई तक हो सकती है। वर्तमान में बिहार विधानपरिषद में 75 सदस्य हैं । विधान परिषद् के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से होता है।

  • एक-तिहाई सदस्य राज्य की विधानसभा सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
  • एक-तिहाई सदस्य राज्य के स्थानीय निकायों के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
  • 1/2 सदस्य राज्य के माध्यमिक एवं उच्च शिक्षण संस्थानों के अध्यापकों द्वारा।
  • 1/2 सदस्य स्नातकों द्वारा चुने जाते हैं।
  • 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत होते हैं।

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प्रश्न 13.
बिहार विधानसभा का गठन किस प्रकार होता है ?
उत्तर-
विधानसभा विधान मंडल का निम्न सदन है । विधानसभा का गठन जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा हाता है। निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है । संपूर्ण राज्य को कई विधानसभा क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है तथा प्रत्येक क्षेत्र से एक-एक उम्मीदवार निर्वाचित होते हैं। बिहार विधानसभा में कुल 243 सदस्य हैं। बिहार विधान सभा जनता की प्रतिनिधि सभा है । संविधान के अनुसार राज्य में विधानसभा के सदस्यों की संख्या अधिक-से-अधिक 500 तथा कम-से-कम 50 हो सकती है।

राज्य में रहनेवाले प्रत्येक नागरिक जिसकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक हो, विधान सभा के चुनाव में हिस्सा ले सकता है। प्रत्येक विधानसभा में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए स्थान सुरक्षित रखा जाता है । चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति भारत का नागरिक हो तथा 25 वर्ष की आयु पूरा कर चुका हो । बिहार विधानसभा में अनुसूचित जातियों के लिए 39 स्थान सुरक्षित हैं पर अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान सुरक्षित नहीं है, क्योंकि यहाँ उनकी आबादी नगण्य है।

प्रश्न 14.
प्रधानमंत्री का निर्वाचन कैसे होता है ?
उत्तर-
संविधान की धारा 74 में अंकित है कि राष्ट्रपति के कार्यों में सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है । राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त करता है । लोकसभा में अगर किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है, उस परिस्थिति में वह संयुक्त संसदीय दल के नेता को प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त करता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मंडल आयोग क्या है ? उसने क्या सिफारिशें की ? उसका परिणाम क्या हुआ?
उत्तर-
मंडल आयोग की स्थापना जनता पार्टी की सरकार ने 1979 ई. में की थी । इसके अध्यक्ष श्री वी. पी. मंडल थे। इस आयोग का कार्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए वर्गों की पहचान करना तथा उनके विकास के लिए सुझाव देना था, मंडल आयोग ने 31 दिसम्बर, 1980 को अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की। मंडल आयोग ने निम्नलिखित सिफारिशें की –

(i) सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 27% आरक्षण होना चाहिए।
(ii) अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए बनाए गए कार्यक्रम के लिए धन, केन्द्र सरकार को देना चाहिए ।

1989 ई० का लोकसभा चुनाव हुआ। चुनाव के बाद जनता दल की सरकार बनी । प्रधानमंत्री श्री वी. पी. सिंह ने संसद में राष्ट्रपति भाषण के जरिए मंडल रिपोर्ट लागू करने की अपनी मंशा की घोषणा को। तब जाकर 6 अगस्त, 1990 ई. को केन्द्रीय कैबिनेट की बैठक में एक औपचारिक निर्णय लिया गया । केन्द्रीय सरकार की तरफ से इस पर स्वीकृति दे दी गई और 13 अगस्त, 1990 ई. में संयुक्त सचिव के हस्ताक्षर से कानून निर्गत हुआ। देशभर में इसका काफी विरोध हुआ। इस निर्णय के विरुद्ध कई अदालतों में मुकदमें दायर किये गये । निर्णय को अवैध घोषित करने की मांग हुई। परन्तु भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इन सभी मुकदमों को एक साथ जोड़ दिया और मुकदमें को ‘इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामला’ कहा । कोर्ट के 11 सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 1992 ई. में फैसला दिया कि पिछड़े वर्ग में अच्छी स्थिति वाले लोगों को इस आरक्षण से वंचित करते हुए मंडल आयोग को वैध ठहराया। उसी के मुताबिक 8 सितम्बर 1993 ई. को कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय ने एक आदेश जारी किया । यह विवाद सुलझ गया और तभी से इस नीति पर अमल किया जा रहा है।

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प्रश्न 2.
संसद की शक्तियों तथा कार्यों का वर्णन करें ।
उत्तर-
भारतीय संसद संघ की विधानपालिका है और संघ की सभी विधायिनी शक्तियाँ उसे प्राप्त हैं। इसके अतिरिक्त उसे और भी कई शक्तियाँ प्राप्त हैं। संसद को निम्नलिखित शक्तियाँ दी गई हैं-

  •  विधायिनी शक्तियाँ-इसका मुख्य कार्य है कानून बनाना ।
  • वित्तीय शक्तियाँ-संसद राष्ट्र के धन पर नियंत्रण रखती है । वित्तीय वर्ष के आरम्भ होने से पहले बजट संसद में पेश किया जाता है ।
  • कार्यपालिका पर नियंत्रण-संसद हर कार्य के लिए उत्तरदायी है।
  • राष्ट्रीय नीतियों का कार्यान्वयन कार्यान्वयन करना भी संसद का एक महत्वपूर्ण कार्य है।
  • संवैधानिक शक्तियाँ संविधान संशोधन का भी अधिकार इस प्राप्त है।
  • विकास संबंधी कार्य-आधुनिक काल में सरकार का स्वरूप लोक कल्याणकारी हो गया है । इसका उद्देश्य केवल जनता की जानमाल की रक्षा ही नहीं बल्कि सर्वांगीण विकास है । जैसे-सड़कें बनवाना, रोशनी की व्यवस्था करना, सिंचाई की व्यवस्था, विद्यालयों, महाविद्यालयों की स्थापना करना, आवास के लिए भवनों का निर्माण कराना, अस्पताल की व्यवस्था करना, सफाई पर ध्यान देना इत्यादि ।

प्रश्न 3.
संसदीय और अध्यक्षात्मक शासन में क्या अंन्तर है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
संसदीय शासन और अध्यक्षात्मक शासन में निम्नलिखित अंतर हैं-

  • संसदीय शासन में कार्यपालिका प्रधान नाममात्र का संविधानिक प्रधान होता है। अध्यात्मक शासन देश का प्रधान कार्यपालिका का ही प्रधान नहीं होता वरन राष्ट्र का भी वास्तविक प्रधान होता है।
  • संसदीय शासन का आधार शक्तियों का संयोग है। इसके विपरीत अध्यक्षात्मक शासन का आधार पृथक्करण का सिद्धान्त है ।
  • संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका एवं विधायिका में घनिष्ठ संबंध है। अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका और विधायिका एक दूसरे से पृथक और स्वतंत्र है।
  • संसदीय शासन में कार्यपालिका विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी
    अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
  • संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका पर विधायिका का नियंत्रण होता है और वह उसके प्रति उत्तरदायी भी रहता है। अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका पर विधायिका का नियंत्रण नहीं होता।
  • संसदीय शासन में कार्यपालिका और विधायिका के बीच संघर्ष की संभावना नहीं रहती। अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका और विधायिका के बीच संघर्ष की सम्भावना रहती है । अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका और विधायिका में संघर्ष का वातावरण हमेशा बना रहता है।
  • संसदीय शासन में मंत्रिमंडल के सदस्य विधानमंडल के प्रति उत्तरदाीय होते हैं क्योंकि वे विधानमंडल के सदस्य होते हैं । अध्यक्षात्मक शासन में मंत्रिमंडल के सदस्य राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

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प्रश्न 4.
संघीय सरकार किसे कहते हैं ? इसके गुण-दोषों का वर्णन करें।
उत्तर-
संघीय शासन वह पद्धति है जिसमें समस्त शासकीय शक्ति केन्द्रीय सरकार तथा उन विभिन्न राज्यों या क्षेत्रीय उपविभागों की सरकारों के बीच बँटी रहती है जिसे मिलाकर संघ बनता है।

संघीय सरकार के निम्नलिखित गुण हैं-

  • राष्ट्रीय एकता में वृद्धि-इसका निर्माण अनेक इकाइयों के सहयोग से होता है; इसलिए विभिन्न इकाइयाँ पारस्परिक एकता के सूत्र में बँध जाती हैं।
  • क्षेत्रीय स्वतंत्रता-संघीय शासन से केवल राष्ट्रीय एकता में ही वृद्धि नहीं होती बल्कि विभिन्न इकाइयों तथा राज्यों की स्वतंत्रता एवं समानता भी कायम रहती है।
  • जन जागरूकता-संघीय शासन प्रणाली में शक्ति विकेन्द्रित रहती है इसलिए जनता को शासन में भाग लेने का अधिक समय मिलता है। इससे जनता अपने सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों से परिचित रहती है।
  • उत्तरदायी पूर्ण शासन-संघीय शासन में अधिकारों का विभाजन केन्द्र तथा विभिन्न इकाइयों में रहता है। इसलिए केन्द्र तथा इकाइयाँ अपने-अपने दायित्व के अनुसार शासन के प्रति उत्तरदायी रहता है।
  • आर्थिक दृष्टि से उपयोगी-संघीय शासन प्रणाली आर्थिक दृष्टि से उपयोगी होता है क्योंकि केन्द्र तथा विभिन्न राज्यों को अपने आर्थिक साधनों में वृद्धि करने का समान अवसर मिलता है।
  • कुशल प्रशासन–संघीय शासन में अधिकारों का स्पष्ट विभाजन हो जाता है। इसमें प्रशासन की कार्य-कुशलता में वृद्धि हो जाती है।
  • प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा-संघीय शासन प्रणाली का सबसे बड़ा गुण है कि यह प्रजातात्रिक मूल्यों की रक्षा करता है।

संघीय शासन व्यवस्था के दोष-

(i) प्रधानमंत्री शासन व्यवस्था संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का अधिकार हाल के दशकों में इतना अधिक बढ़ गया है कि संसदीय लोकतंत्र को कभी-कभी प्रधानमंत्रीय शासन व्यवस्था कहा जाने लगा है क्योंकि प्रधानमंत्री के पास सारे अधिकार सीमित रहने की प्रवृत्ति देखी गयी है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ढेर सारे अधिकारों का इस्तेमाल किया । इन्दिरा गाँधी काफी प्रभावशाली प्रधानमंत्री थीं।

(ii) एकता का अभाव-बहमत नहीं मिलने पर गठबंधन सरकार का निर्माण होता है। गठबंधन सरकार का प्रधानमंत्री अपने मर्जी से फैसले नहीं कर सकता। गठबंधन के साझीदारों की राय भी माननी पड़ती है क्योंकि उन्हीं के समर्थन के आधार पर सरकार टिके होती है। हाल के ताजा उदाहरण डा. मनमोहन सिंह के सरकार पर संकट तब हुआ जब एंटमी करार पर वामदल ने मनमोहन सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।

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प्रश्न 5.
राष्ट्रपति के अधिकार एवं कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति भारतीय संघ का प्रधान होता है। उनकी शक्तियाँ एवं कार्य निम्न हैं

(i) कार्यपालिका संबंधी अधिकार-राष्ट्रपति संघीय कार्यपालिका का प्रधान होता है। शासन. का सारा कार्य उन्हीं के नाम से होता है। कार्यपालिका के क्षेत्र में उसे निम्न अधिकार प्राप्त है-

(क) राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है, तथा प्रधानमंत्री की सलाह से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है तथा उनके बीच कार्यों का बँटवारा करता है।
(ख) प्रधानमंत्री की सलाह से ही राज्यपाल, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, चुनाव आयुक्त, राजदूतों, महालेखा परीक्षक, संघीय लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति करता है।
(ग) सेनाध्यक्षों की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करते हैं।
(घ) राष्ट्रपति किसी देश के विरुद्ध युद्ध एवं शान्ति की घोषणा कर सकता है।
(ङ) भारतीय संघ के मुख्य कार्यपालक होने के नाते उसका दायित्व है कि वह सदैव प्रशासन पर निगरानी रखे।

(ii) विधायिका संबंधी कार्य-राष्ट्रपति को भारतीय संसद की बैठक बुलाने, स्थगित करने तथा लोकसभा भंग करने का अधिकार प्राप्त
राष्ट्रपति के प्रमुख कार्यों में अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हैं, इसके अतिरिक्त वित्त आयोग की नियुक्ति, धनविधेयक की मंजूरी आदि महत्वपूर्ण कार्य हैं ।

(iii) वित्तीय अधिकार-वार्षिक बजट तैयार करने तथा वित्तमंत्री के माध्यम से संसद में प्रस्तुत कराने का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त है । कोई भी धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति के बिना संसद में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। राज्यों के बीच वित्त वितरण का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त है। .

(iv) न्यायसंबंधी अधिकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।
राष्ट्रपति किसी अपराधी के फाँसी की सजा को माफ या आजीवन कारावास की सजा में बदल सकते हैं।

(v) संकट कालीन अधिकार-भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को कुछ संकटकालीन शक्तियाँ सौंपी गई हैं । ।

(क) युद्ध तथा बाहरी आक्रमण के समय राष्ट्रपति संकटकाल की घोषणा कर सकते हैं।
(ख) राज्यों में संवैधानिक विफलता पर ।
(ग) भारत में वित्तीय संकट उत्पन्न होने पर :
राष्ट्रपति के इस अधिकार का प्रयोग हमारे देश में 1962, 1971 एवं 1975 ई० में हुआ।

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प्रश्न 6.
प्रधानमंत्री के अधिकार और कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
संविधान की धारा 74 में उल्लेख है कि राष्ट्रपति के कार्यों ‘ में सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक मंत्री परिषद होगी जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा। प्रधानमंत्री के अधिकार एवं कार्य निम्नलिखित हैं

  • मंत्रीपरिषद् गठन करने का अधिकार-प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद् का निर्माता, पालनकर्ता एवं विनाशकर्ता है। वह मंत्रियों की नियुक्ति करता है। उसकी इच्छा पर ही मंत्री मंत्री परिषद में बने रहते हैं।
  • वह मंत्रियों के बीच कार्यों का विभाजन करता है तथा उनके कार्यों पर निगरानी रखता है।
  • नीति निर्धारण का अधिकार-प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों की सहायता से सरकार के लिए उच्चस्तरीय नीतियों का निर्धारण करता है ।
  • मंत्रीपरिषद और राष्ट्रपति के बीच की कड़ी-प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति के बीच कड़ी का काम करता है। मंत्री परिषद के निर्णय की सूचना प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को देता है तथा राष्ट्रपति के विचारों से मंत्रिपरिषद को अवगत कराता है।
  • मध्यस्थता का कार्य-दो मंत्रियों या विभागों के बीच अगर किसी बात को लेकर मतभेद उत्पन्न होता है, तो उसे सुलझाने में प्रधानमंत्री मदद करता है।
  • संसद संबंधी कार्य-लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होने के कारण प्रधानमंत्री का दायित्व बढ़ जाता है। वह लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। संसद में कार्यों का संचालन, समय निर्धारण इत्यादि में प्रधानमंत्री मुख्य भूमिका निभाता है।
  • नियुक्ति संबंधी अधिकार कार्यपालिका के क्षेत्र में जो अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त है, उसका वास्तविक रूप से उपयोग प्रधानमंत्री करते हैं।
  • वैदेशिक मामले संबंधी-यह अधिकार अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में प्रधानमंत्री महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । इसमें प्रधानमंत्री अपने देश का प्रतिनिधित्व करता है।
  • संकटकालीन अधिकार-राष्ट्रपति को प्राप्त संकटकालीन अधिकारों का उपयोग प्रधानमंत्री ही करता है।

प्रश्न 7.
लोकसभा का गठन कैसे होता है ? इसके कार्य एवं अधिकारों का वर्णन करें।
उत्तर-
लोकसभा भारतीय जनता की प्रतिनिधि सभा है। इसके सदस्यों का निर्वाचन प्रत्येक 5 वर्ष पर वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष ढंग से होता है । यह जनता की ओर से असली प्रतिनिधि सभा है। इसमें सदस्यों की संख्या 552 तक हो सकती है जिनमें 530 सदस्य विभिन्न राज्यों से एवं 20 सदस्य केन्द्रशासित प्रदेशों से चुनकर आते हैं।

शेष 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं । अनुसूचित जातियों ” के लिए 84 तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए 47 स्थान सुरक्षित है। लोकसभा का सदस्य वही हो सकता है जो-

  • भारत का नागरिक हो।
  • जिसने 25 वर्ष की आयु पूरा कर लिया हो।

लोकसभा के कार्य एवं अधिकार

(i) विधायिका संबंधी कार्य-लोकसभा को उन सभी विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है। वह संघ सूची, समवर्ती सूची तथा आवश्यकता पड़ने पर राज्य सूची पर भी नियम बनाता है।

(ii) वित्तीय अधिकार भारतीय संसद वित्त पर पूर्ण नियंत्रण रखती है। लोकसभा नये करों को लगाने, पुराने करों को कम करने अथवा हटाने की स्वीकृति प्रदान करती है। भारत का वित्तमंत्री प्रतिवर्ष आय-व्यय का लेखा संसद में पेश करता है। लोकसभा को यह अधिकार प्राप्त है कि खर्च की रकम कम कर दे या अस्वीकार कर दे।

(iii) कार्यपालिका संबंधी अधिकार-संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका का एक सहायक निकाय है, इसलिए कार्यपालिका को हमेशा विधायिका के नियंत्रण में काम करना पड़ता है। कार्यपालिका निम्नलिखित तरीके से मंत्रीपरिषद पर नियंत्रण रखती है- (क) अविश्वास प्रस्ताव द्वारा, (ख) प्रश्न द्वारा, (ग) पूरक प्रश्न द्वारा, (घ) सरकारी विधेयक द्वारा, (ङ) सरकारी विधेयक को अस्वीकृत करके, (च) आलोचना करके, (छ) निंदा प्रस्ताव के द्वारा ।।

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प्रश्न 8.
साधारण विधेयक को कानून बनने के पहले कितने चरणों से – गुजरना पड़ता है ? वर्णन करें।
उत्तर-
साधारण विधेयक को कानून बनने के पहले पाँच चरणों से गुजरना पड़ता है।
(i) प्रथम वाचन-साधारण विधेयक लोकसभा या राज्यसभा दोनों में से किसी एक सभा में उपस्थित किया जा सकता है। विधेयक उपस्थापित करनेवाले उस विधेयक के नाम और शीर्षक बताने के बाद विधेयक से संबंधित मुख्य बातों की चर्चा करते हैं।

(1) द्वितीय वाचन-इस स्तर पर यह तय होता है कि विधेयक को प्रवर समिति के पास विचार के लिए प्रस्तुत किया जाय अथवा जनमत हेतु इसे प्रस्तावित किया जाए । अथवा उस पर सदन से ही तुरंत विचार कर लिया जाय । इसमें संशोधन का सुझाव देती है।

(iii) तृतीय वाचन-तृतीय वाचन में विधेयक पर मतदान होता है। मतदान में बहुमत मिलने पर विधेयक पास समझा जाता है। तृतीय वाचन में विधेयक में कोई हेर-फेर नहीं किया जाता है।

(iv) दूसरे सदन में पेश करना-एक सदन में पारित होने के बाद विधेयक दूसरे सदन में प्रस्तुत किया जाता है। दूसरे सदन में भी विधेयक को उन्हीं सब स्तरों से गुजरना पड़ता है जैसे पहले सदन में गुजरा है। संयुक्त बैठक में बहुमत मिल जाता है क्योंकि लोकसभा में सदस्यों की संख्या अधिक होती है।

(v) राष्ट्रपति की स्वीकृति—दोनों सदनों से पारित विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, जिसका स्वीकृति मिलने के बाद विधेयक कानून बन जाता है। राष्ट्रपति चाहे तो विधेयक को संसद में पुन: विचार के लिए वापस कर सकते हैं । अगर संसद विधेयक की राष्ट्रपति के पास पुनः भेज देती है तो हस्ताक्षर करना अनिवार्य हो जाता है। इस तरह विधेयक कानून बन जाता है।

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प्रश्न 9.
राज्य सभा के गठन एवं कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
सदन के दो सदन हैं-लोकसभा और राज्यसभा । राज्य सभा को द्वितीय सदन भी कहते हैं।
गठन-यह सदन स्थायी सदन होता है। इसमें सदस्यों की संख्या 250 है। इसमें 238 सदस्य विभिन्न राज्यों के विधानसभा सदस्यों द्वारा निर्वाचित होते हैं तथा 12 सदस्य विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्टता के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किये जाते हैं। राज्यसभा के सदस्यों की कार्य अवधि 6 साल की होती है। इसमें सदस्यों की उम्र सीमा कम-से-कम 30 साल का होना चाहिए तथा वह भारत का नागरिक हो तथा लोकसभा की सदस्यता की योग्यता रखता हो । राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष उपराष्ट्रपति होते हैं । एक उपाध्यक्ष भी होते हैं जो उपराष्ट्रपति की अनुपस्थिति में सभा का संचालन करते हैं।

  • कार्यपालिका संबंधी-राज्यसभा सदस्य प्रश्न पूछकर, पूरक प्रश्न पूछकर, काम रोको प्रस्ताव पास कर यह सदन कार्यपालिका पर. नियंत्रण रखती है।
  • विधायिका संबंधी विधायिका संबंधी शक्तियाँ सीमित हैं। साधारण विधेयक राज्यसभा में प्रस्तुत किये जा सकते हैं । दोनों सदनों में मतभेद हो जाने पर राज्यसभा की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। ऐसी हालत में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक होती है, किन्तु संयुक्त बैठक में सदस्य संख्या कम होने के कारण वह बात स्वीकृत नहीं हो पाती; यह . एकमात्र रुकावट है।
  • वित्त संबंधी राष्ट्रपति की स्वीकृति से ही संसद में बजट पेश किया जाता है । धन-विधेयक को स्वीकृति प्रदान करना, वित्त आयोग की नियुक्ति करना भी राष्ट्रपति के महत्वपूर्ण कार्य हैं।

प्रश्न 10.
राज्यपाल की नियुक्ति किस प्रकार होती है ? उसके कार्य एवं अधिकारों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-
नियुक्ति-भारतीय संविधान के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति. राष्ट्रपति द्वारा होती है। राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्ति केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह से करता है, जिसमें प्रधानमंत्री की भूमिका अधिक रहती है। राज्यपाल की नियुक्ति के लिए आवश्यक है-

  • वह भारत का नागरिक हो
  • वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  • वह किसी विधानमंडल या संसद का सदस्य नहीं हो ।
  • वह किसी लाभ के पद पर न हो।

कार्य एवं अधिकार राज्य के निम्नलिखित कार्य एवं अधिकार हैं-

(i) कार्यपालिका संबंधी अधिकार राज्यपाल कार्यपालिका प्रधान होता है। इस कारण राज्य के सभी काम राज्यपाल के नाम होते हैं। राज्य के प्रमुख पदाधिकारियों की नियुक्ति करते हैं । राज्यपाल बहुमत दल के नेता को मुख्य मंत्री के पद पर नियुक्त करता है तथा मुख्यमंत्री की सलाह से मंत्री परिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है।

(ii) विधायिका संबंधी अधिकार-विधायिका क्षेत्र में निम्नलिखित अधिकार हैं

  • राज्यपाल ही राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों की बैठक बुलाता है। वह विधान सभा को भंग भी कर सकता है।
  • राज्य सत्र के आरम्भ में विधानमंडल के दोनों सदनों को सम्बोधित करता है।
  • वह विधानपरिषद के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करता है।
  • राज्यपाल के हस्ताक्षर के बिना कोई भी विधेयक कानून नहीं बन सकता।
  • धन विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के बिना विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता है।

(iii) न्यायपालिका संबंधी अधिकार-उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति राज्यपाल से भी परामर्श लेता है। वह किसी
अपराधी की सजा को कम कर सकता है या माफ भी कर सकता है।

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प्रश्न 11.
मुख्यमंत्री की नियुक्ति कैसे होती है ? इसके अधिकार एवं कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
जो स्थान संघीय मंत्रिपरिषद् में प्रधानमंत्री का होता है, वही स्थान राज्यमंत्री परिषद में मुख्यमंत्री का होता है।
नियुक्ति- संविधान के अनुच्छेद 164 में कहा गया है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जायेगी लेकिन व्यवहार में राज्यपाल उसी व्यक्ति को मुख्य पद पर नियुक्त करता है जो विधानमंडल में बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है। अगर किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है उस परिस्थिति में राज्यपाल संयुक्त दल के नेता को मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त करता है।

मुख्यमंत्री के अधिकार एवं कार्य-

  • मंत्रिमंडल का निर्माणमुख्यमंत्री ही मंत्रिमंडल का निर्माता होता है, राज्यपाल उस पर अपनी सहमति दे देते हैं और विभागों का बंटवारा भी मंत्रियों के बीच वही करता
  • मंत्रीपरिषदका अध्यक्ष-मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष होता है और मंत्रिपरिषद की बैठक का सभापतित्व करता है।
  • विधानसभा का नेतृत्व-बहुमत दल का नेता होने के कारण वह सदन का कुशल नेतृत्व भी करता है। सभी प्रशासनिक विभागों का निरीक्षण करता है तथा मंत्रियों के बीच किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न होने पर मुख्यमंत्री उस विवाद का निपटारा कर अन्तिम निर्णय देता है।
  • नियुक्तियाँ-राज्यपाल एक औपचारिक प्रधान है। उसकी वास्तविक शक्ति का प्रयोग मुख्यमंत्री ही करता है। उसके कहने पर ही राज्यपाल किसी मंत्री को नियुक्त अथवा पदच्युत कर सकता है तथा विधान सभा को विघटित कर सकता है।
  • राज्यपाल एवं मंत्रिपरिषद के बीच एक कड़ी का काम मुख्यमंत्री करते हैं। वह राज्यपाल को मंत्रिपरिषद के सभी कार्यों की सूचना देता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि मुख्यमंत्री राज्य शासन का कप्तान है और राज्य मंत्रिमंडल में उसकी विशिष्ट स्थिति होती है।

प्रश्न 12.
विधानसभा के अधिकार और कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
विधानसभा राज्य विधान मंडल का प्रमुख सदन है। यह राज्य का प्रतिनिधि सभा है । इसके निम्नलिखित कार्य हैं

(i) विधान संबंधी अधिकार-विधान सभा कानून बनाने वाला प्रमुख सदन है। धन विधेयक तो सिर्फ विधान सभा में ही उपस्थापित किया जाता है। विधानसभा द्वारा पारित विधेयक पर विधान परिषद चार महीने के भीतर अपना अनुमोदन देने के लिए बाध्य है। चार महीना से अधिक विलम्ब होने पर विधेयक अपने आप पारित समझा जाता है। अतः विधि निर्माण में विधान सभा एक सशक्त सदन है।

(i) कार्यपालिका संबंधी अधिकार राज्य मंत्रिपरिषद अपने कार्यों के लिए विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होता है। मंत्रिपरिषद को विधानसभा के सदस्य काम रोको प्रस्ताव एवं निंदा प्रस्ताव लाकर मंत्रिपरिषद को नियंत्रित रखती है।

(iii) वित्तीय शक्तियाँ-विधानसभा को राज्य के वित्त पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त है। वित्त विधेयक सबसे पहले विधानसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। वित्त विधेयक में अन्तिम निर्णय विधान सभा के अध्यक्ष ही दे सकता है। जहाँ तक विधान परिषद का अधिकार है वह वित्त विधेयक को 14 दिनों तक ही रोक कर रख सकती है। 14 दिनों के अन्दर वह वापस नहीं करती तो धन विधेयक अपने आप पारित समझा जाता है।

(iv) विविध अधिकार-विविध अधिकार निम्नलिखित हैं-

(क) राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेना
(ख) संवैधानिक संशोधन में सहयोग करना

इस प्रकार विधान मंडल एक लोकप्रिय तथा शक्तिशाली सदन है।

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प्रश्न 13.
विधान परिषद के अधिकारों एवं कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
विधान परिषद विधान सभा की अपेक्षा एक निर्बल सदन है।

इसके निम्नलिखित कार्य हैं-

(i) विधायिनी शक्तियाँ-धन विधेयक को छोड़कर अन्य विधेयक विधान परिषद में पेश किया जा सकता है। परंतु कोई भी विधेयक विधान सभा के सहमति के बिना पारित नहीं होता। अत: विधायनी शक्तियों नियः

(ii) वित्तीय शक्तियाँ-वित्तीय क्षेत्र में विधानपरिषद की स्थिति , केन्द्र सरकार के राज्यसभा की तरह है। धन विधेयक इस सभा में पेश ‘नहीं किया जाता है। विधानसभा में पारित होने के बाद धन विधयक विधानपरिषद में आता है। विधान परिषद अपनी सुझाव के साथ अधिक-से-अधिक 14 दिनों तक रख सकता हैं। 14 दिनों के अन्दर विधानसभा में लौटा देना पड़ता है नहीं तो विधेयक स्वतः पारित समझा जाता है।

(iii) प्रशासकीय अधिकार-विधान परिषद का कार्यकारिणी पर बहुत कम अधिकार है। विधान परिषद अविश्वास के द्वारा नहीं हटा सकता, सिर्फ आलोचना कर सकता है। वास्तव में विधान परिषद के पास नगण्य अधिकार है।

प्रश्न 14.
भारत में सर्वोच्च न्यायालय का गठन कैसे होता है ? इसके क्षेत्राधिकार का वर्णन करें।’
उत्तर-
सर्वोच्च न्यायालय देश का सबसे बड़ा न्यायालय है। इसका गठन सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 26 जनवरी 1950 को की गई और यह नई दिल्ली में स्थित है। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यता निम्न है

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • कम से कम पाँच वर्ष किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो या
  • कम से कम दस वर्ष किसी उच्च न्यायालय में वकालत कर” चुका हो या
  • राष्ट्रपति की राय में कानून का ज्ञाता हो ।

न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होता है। भारत में 65 वर्ष के उम्र तक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद पर बने रहते हैं।

क्षेत्राधिकार-

  • प्रारंभिक क्षेत्राधिकार-इसमें दो या दो से अधिक राज्यों के मध्य विवाद, केन्द्र एवं राज्यों के मध्य विवाद, मौलिक अधिकारों से संबंधित मुकदमें आदि सम्मिलित है।
  • अपीलीय अधिकार-सर्वोच्च न्यायालय को दीवानी एवं आपराधिक दोनों क्षेत्रों में अपीलीय क्षेत्राधिकार प्राप्त है । सर्वोच्च न्यायालय में कोई भी नागरिक अथवा राज्य सरकार उच्च न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपील कर सकता है।
  • परामर्श संबंधी अधिकार-सर्वोच्च न्यायालय को परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार भी प्राप्त है। राष्ट्रपति कानून के किसी प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय की राय ले सकते हैं, पर उस परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
  • संविधान का रक्षक-नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व सर्वोच्च न्यायालय पर है । इसलिए वह संविधान का रक्षक है।
  • पुनर्विचार का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णयों पर पुनर्विचार करने का भी अधिकार है।
  • निरीक्षण का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति के पूर्वानुमति से न्यायालय के अधिकारियों के वेतन, भत्ते, छुट्टी, पेंशन और सेवा की अन्य शर्तों से संबंधित नियम बना सकता है।

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प्रश्न 15.
लोकसभा के अध्यक्ष का निर्वाचन कैसे होता है ? उसके अधिकार एवं कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
लोकसभा का एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष होता है, जिसका निर्वाचन लोकसभा सदस्य अपने में से ही करते हैं। अध्यक्ष लोकसभा की कार्यवाहियों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, और लोकसभा की कार्यवाहियों का संचालन करता है। इनका कार्यकाल सामान्यत: 5 वर्षों के लिए होता है । यह अपने पद पर तब तक बना रहता है जबतक कि नव-निर्वाचित लोकसभा अपने अध्यक्ष का चुनाव न कर ले।

लोकसभा के अध्यक्ष के कार्य एवं अधिकार निम्नलिखित हैं-

  • सभापतित्व करना लोकसभा का अध्यक्ष बैठक का सभापतित्व करता है.। सभापतित्व करते हुए सदन में शांति एवं अनुशासन बनाये रखना उसी का दायित्व है।
  • वाद-विवाद का समय निश्चित करना अध्यक्ष सदन के नेता से राय लेकर विभिन्न विषयों के संबंध में वाद-विवाद का समय निश्चित करता है।
  • काम रोको प्रस्ताव-किसी भी सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर काम रोको प्रस्ताव लोकसभा में पेश करने की आज्ञा अध्यक्ष द्वारा ही दी जाती है।
  • प्रवर समिति के अध्यक्षों की नियुक्ति-लोकसभा के अध्यक्ष _ही प्रवर समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति करता है।
  • बजट संबंधी भाषणों की सीमा निर्धारण करना—इसकी काल . सीमा का निर्धारण अध्यक्ष ही करता है।
  • अन्य अधिकार-सदन को स्थगित करने, राष्ट्रपति तथा लोकसभा का माध्यम होना, सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करना, संसदीय कार्यवाही से आपत्तिजनक शब्दों को हटाने का आदेश देना, संसद के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता करना, तथा सभी विधेयकों का संचालन लोकसभा का अध्यक्ष ही करता है।