Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 6 आपदा और सह अस्तित्व

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Disaster Management आपदा प्रबन्धन Chapter 6 आपदा और सह अस्तित्व Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Disaster Management Solutions Chapter 6 आपदा और सह अस्तित्व

Bihar Board Class 10 Disaster Management आपदा और सह अस्तित्व Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन प्राकृतिक आपदा है ?
(क) आग लगना
(ख) बम विस्फोट
(ग) भूकम्प
(घ) रासायनिक दुर्घटनाएँ
उत्तर-
(ग) भूकम्प

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प्रश्न 2.
भूकंप संभावित क्षेत्रों में भवनों की आकृति कैसी होनी चाहिए?
(क) अंडाकार
(ख) त्रिभुजाकार
(ग) चौकोर
(घ) आयाताकार
उत्तर-
(घ) आयाताकार

प्रश्न 3.
भूस्खलन वाले क्षेत्र में ढलान पर मकानों का निर्माण क्या है ?
(क) उचित
(ख) अनुचित
(ग) लाभकारी
(घ) उपयोगी ।
उत्तर-
(ख) अनुचित

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प्रश्न 4.
सुनामी प्रभावित क्षेत्र में मकानों का निर्माण कहाँ करना चाहिए?
(क) समुद्र तट के निकट
(ख) समुद्र तट से दूर
(ग) समुद्र तट से ऊंचाई पर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) समुद्र तट से दूर

प्रश्न 5.
बाढ़ से सबसे अधिक हानि होती है
(क) फसल की
(ख) पशुओं की
(ग) भवनों की
(घ) उपरोक्त सभी की
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी की

प्रश्न 6.
कृषि सुखाड़ होता है
(क) जल के अभाव में
(ख) मिट्टी की नमी के अभाव में
(ग) मिट्टी के क्षय के कारण
(घ) मिट्टी की लवणता के कारण
उत्तर-
(क) जल के अभाव में

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लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भूकंप के प्रभावों को कम करने के चार उपायों को लिखिए।
उत्तर-
भूकंप के प्रभावों को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं

  • भवनों का आयताकार होना चाहिए।
  • भवनों के निर्माण ईंट-कंक्रीट से होना चाहिए। .
  • नींव को मजबूत एवं भूकंप अवरोधी होना चाहिए।
  • गलियों एवं सड़कों को चौड़ा होना चाहिए तथा दो भवनों के बीच पर्याप्त दूरी होनी । चाहिए।

प्रश्न 2.
सुनामो संभावित क्षेत्रों में गृह निर्माण पर अपना विचार प्रकट कीजिए। उत्तर-सुनामी प्रभावित क्षेत्रों में गृह निर्माण के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

  • जहाँ सुनामी की लहरें आती हैं वहाँ लोगों को तटीय भाग की अपेक्षा तट से दूर बसना चाहिए।
  • समुद्र तटीय भाग में सघन वृक्षारोपण करना चाहिए।
  • नगरों एवं भवनों को बचाव के लिए कंक्रीट अवरोधक का निर्माण करना चाहिए।
  • प्रभावित क्षेत्रों में ऐसे मकान का निर्माण करना चाहिए जो सुनामी लहरों के प्रभाव को न्यून कर सके।
  • पोताश्रयों को ऊंची बाँधों द्वारा सुरक्षित किया जा सकता है।
  • प्रभावित क्षेत्रों में मकान ऊंचे स्थानों पर और तट से करीब सौ मीटर की दूरी पर बनाना चाहिए।
  • सुनामी रेकॉर्डिग सेन्टर की स्थापना होना चाहिए।
  • उपग्रह प्रौद्योगिकी द्वारा सुनामी की चेतावनी प्राप्त करना चाहिए और संचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा तुरन्त आम लोगों तक पहुँचाना चाहिए।

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प्रश्न 3.
सुखाड़ में मिट्टी की नमी को बनाए रखने के लिए आप क्या करेंगे?
उत्तर-
सूखे जैसे प्राकृतिक आपदा को विभिन्न विधियों को अपनाकर इसकी विभीषिका को . कम किया जा सकता है। जैसे-जल संसाधन का वैज्ञानिक विकास और प्रबंधन द्वारा जल की समस्या का समाधान किया जा सकता है। क्योंकि सुखाड़ के समय जल के अभाव से न केवल मिट्टी की नमी समाप्त हो जाती है, बल्कि सभी प्राणियों को जान तक बचाना मुश्किल हो जाता
है। जल विभाजक के विकास की याजना ऐसी स्थिति में बहुत सहायक होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भूस्खलन अथवा बाढ़ जैसी प्राकृतिक विभीषिकाओं का सामना आप किस प्रकार कर सकते हैं ? विस्तार से लिखिए।
उत्तर-
भूस्खलन के पाँच रूप होते हैं-

  • बारिश के पानी के साथ मिट्टी और कचड़े का नीचे आना,
  • कंकड़-पत्थरों का खिसकना
  • कंकड़-पत्थर का गिरना
  • चट्टानों का खिसकना
  • चट्टानों का गिरना आदि से जानमाल की बर्बादी होती है।

इससे बचाव के लिए निम्न उपाय किए जाने चाहिए-

  • मिट्टी की प्रकृति के अनुरूप उपयुक्त नींव बनाना।
  • ढलवां स्थान पर मकान का निर्माण न करना।
  • सामान्य एवं वैकल्पिक संचार प्रणालियों को समुचित व्यवस्था करना।
  • वनस्पति विहीन ऊपरी ढालों पर उपयुक्त वृक्ष प्रजातियों का सघन रोपण कार्य करना।
  • प्राकृतिक जल की निकासी का अवरुद्ध न होना।
  • पुख्ता दीवारों का निर्माण किया जाना। ..
  • बारिश की पानी और झरनों के प्रवेश सहित भूस्खलनों के संचलन पर काबू पाने के लिए समतल जल निकासी केन्द्र बनाना।
  • भूमि के नीचे बिछाए जाने वाले पाईप लाइन, केबुल आदि लचीले होने चाहिए ताकि भूस्खलन से उत्पन्न दबाव का सामना कर सकें।

बाढ़ एक विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है। इससे निजात पाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं

  • बाढ़ की प्रवणता को कम करने के लिए वनों का विकास से निजात मिल सकती है।
  • नदियों के दोनों तटबंधों पर बाँध बनाना। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा प्रदान किया जा सकता है।
  • मृदा क्षय को भी निर्यात किया जा सकता है।
  • जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  • पर्वतीय भागों में नदियों के ऊपर बाँध और पृष्ठ भाग जलाशय का निर्माण कर जल को नियंत्रित किया जा सकता है
  • बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नहरों का जाल बिछाकर इसकी विभीषिका से बचा जा सकता है साथ ही सिंचाई का काम भी किया जा सकता है।
  • बाढ़ से बचाव के लिए रिंग बांध भी सहायक होता है। नदियों की धाराओं में सुधार तथा नदियों के लिए वैकल्पिक मार्ग का निर्माण द्वारा इस समस्या का समाधान संभव है।
  • बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्थान-स्थान पर खाद्यान्न बैंक का भी विकास होना चाहिए।

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प्रश्न 2.
सुनामी के दौरान उठाये जानेवाले कदम (Preparedness measures during Tsunami Scenario) के बारे में लिखें।
उत्तर-
सुनामी तूफान आने के पहले कुछ उठाये गए कदम निम्नांकित हैं

  • अपने स्कूल/मकान आदिसमुद्र तट से कितनी दूरी पर है इसकी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
  • यह जान लेना आवश्यक है कि आपका स्कूल/घर समुद्र तल से कितनी ऊंचाई पर है।
  • ऐसे स्थान पर चले जायें जो ऊँचाई पर स्थित हो और हर प्रकार से सुरक्षित हो।
  • सुनामी की लहर पहले हल्की और कम ऊंचाई की हो सकती है, परन्तु बाद में भयंकर रूप धारण कर सकती है। इसलिए हल्की लहर को देखते ही समुद्र तट को छोड़ देना चाहिए।
  • कई लोग सुनामी लहरों को देखने के लिए नजदीक चले जाते हैं, परन्तु ऐसा करना बड़ा खतरनाक सिद्ध हो सकता है। .
  • प्रशान्त सुनामी केन्द्र द्वारा दी गई चेतावनी की ओर ध्यान दें। उसे हल्के में ही मत टाल दें। मई 1960 में 61 व्यक्ति की मौत हो गई क्योंकि उनलोगों ने तटीय केन्द्र द्वारा चेतावनी को हवाई टापू पर अनसुनी कर दिया था।
  • रेडियो टेलीविजन द्वारा प्रसारित की गई जानकारी का लाभ उठाएँ और उनके द्वारा दी गई सतह पर अमल करें।

प्रश्न 3.
आकस्मिक प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन एवं स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका का विस्तार से उल्लेख करें।
उत्तर-
मुख्यत: आकस्कि प्रबंधन के तीन घटक हैं-

  1. स्थानीय प्रशासन
  2. स्वयंसेवी संगठन
  3. गाँव अथवा मुहल्ले के लोग।

1. स्थानीय प्रशासन- आकस्मिक प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन की अहम भूमिका होती है। राहत शिविर का निर्माण, प्राथमिक उपचार की सामग्री की व्यवस्था, एम्बुलेंस, डॉक्टर, अग्निशामक इत्यादि की तत्काल व्यवस्था करना इसका प्रमुख कार्य है।

2. स्वयंसेवी संगठन- आकस्मिक प्रबंधन में स्वयंसेवी संस्था महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, अगर गाँव के युवकों तथा पंचायत प्रबंधन के बीच समन्वय हो। ऐसे प्रबंधन में जाति, धर्म, लिंग के भेदभाव का परित्याग करना पड़ता है। स्वयंसेवी संस्था आकस्मिक प्रबंधन में काफी योगदान दे सकती है।

3. गाँव अथवा महल्ले के लोग- आकस्मिक प्रबंधन में गाँव और मुहल्ले के लोग काफी योगदान दे सकते हैं। जैसे—युवकों को मानसिक रूप से सुदृढ़ और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित करना और उनमें साहस का संचार कर सकते हैं।

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क्रियाकलाप

आप अपने गाँव मुहल्ले में शिक्षक के साथ एक आमसभा आयोजित कीजिए और आमलोगों को बताइए कि प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए मिलजुल कर उसका सामना करना चाहिए। इससे विपत्ति और बर्बादी कम होगी।
उत्तर-
छात्र अपने शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 10 Disaster Management आपदा और सह अस्तित्व Notes

  • यद्यपि आपदाएँ और संकट प्राकृतिक क्रियाओं के प्रतिफल हैं, परंतु अविवेकपूर्ण मानवीय क्रियाएँ भी आपदाओं को आमंत्रित करती हैं।
  • आपदा के संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन के लिए हमेशा तैयारी रखनी चाहिए, क्योंकि आपदाएं अप्रत्याशित रूप से घटित होती हैं।
  • बाढ़ और सूखे के संकट का आकलन कर उनसे निपटने की तैयारी सम्यक रूप से करनी ।
    चाहिए।
  • आपदा प्रबंधन में स्थानीय लोगों का सहयोग ही सबसे अधिक कारगर होता है।
  • संचार साधनों का उपयोग आपदा से निपटने में बहुत प्रभावशाली होता है।
  • अभी तक आपदाओं में लाखों-करोड़ों लोगों की मृत्यु तब हुई हैं जब उन क्षेत्रों में एकाधिपत्य शासन रहा है। किसी लोकप्रिय प्रजातांत्रिक देश में बड़ी संख्या में लोगों की ‘ मौत नहीं हुई, क्योंकि वहाँ आपदा से निपटने के लिए उचित प्रयास करना संभव हो सका आपदा प्रबंधन के महत्व को इंगित करने के लिए यह उदाहरण सटीक है।
  • प्रकृति में होनेवाले कुछ परिवर्तन संकट और आपदाओं के कारण होते हैं।
  • अनेक संकटों और आपदाओं का कारण मनुष्य के क्रियाकलाप भी होते हैं।
  • प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ संकटों और आपदाओं को आमंत्रित करती है।
  • संकट धीरे-धीरे उत्पन्न होते हैं और आपदाएँ अकस्मात विकास रूप ले लेती हैं।
  • भारत का उत्तरी तराई भाग भूकंप के लिए अत्यधिक संवेदनशील है।
  • ज्वालामुखी के प्रकोप से भारत प्रायः बचा हुआ है।
  • सुनामी से बंगाल की खाड़ी प्रभावित है, क्योंकि इससे पूर्वी भाग में इंडोनेशिया का तट बहुत अधिक संवेदनशील है।
  • भारत में चक्रवात प्रायः मई-जून तथा अक्टूबर-नवम्बर में अधिक आते हैं।
  • पूर्वोत्तर भारत में बाढ़ प्रायः प्रतिवर्ष आती है और यही व्यापक हानि होती है।
  • पंजाब, हरियाणा जैसे पश्चिमोत्तर से राज्यों में हिमालय की बर्फ पिघलने से बाढ़ आती है।
  • देश के पश्चिमी और दक्षिणी भाग में प्रायः सूखे की स्थिति रहती है; परंतु सभी भाग इसकी चपेट में आ सकते हैं।
  • बाढ़ का दुष्प्रभाव क्षणिक होता है जबकि सूखे से लोगों को लंबे समय तक कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
  • देश में बिहार एक ऐसा राज्य है जो किसी संकट और आपदा से अछूता नहीं है, सिवाय सुनामी के।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

Bihar Board Class 11 Home Science उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जीन प्याजे के अनुसार सभी बच्चे ‘स्कीमा’ से प्रभावित होते है। [B.M. 2009A]
(क) बड़े होने पर
(ख) जन्म से ही
(ग) किशोर होने पर
(घ) दुबले होने पर
उत्तर:
(ख) जन्म से ही

प्रश्न 2.
मानव शरीर में कितने प्रकार के अमीनो अम्ल पाए जाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) 40
(ख) 36
(ग) 22
(घ) 15
उत्तर:
(ग) 22

प्रश्न 3.
‘जीरोपथेल्मिया’ किस विटामिन की कमी के कारण होता है। [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘K’
(ख) विटामिन ‘B’
(ग) विटामिन ‘C’
(घ) विटामिन ‘A’
उत्तर:
(घ) विटामिन ‘A’

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 4.
वसा में घुलनशील विटामिन होता है । [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘डी’
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) विटामिन ‘बी,’
(घ) विटामिन ‘बी,,’
उत्तर:
(क) विटामिन ‘डी’

प्रश्न 5.
ग्राम कार्बाहाइड्रेड के विघटन से कितनी ऊर्जा प्राप्त होती है। [B.M.2009A]
(क) 2 कैलोरी ऊर्जा
(ख) 6 कैलोरी ऊर्जा
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा
(घ) 10 कैलोरी ऊर्जा
उत्तर:
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा

प्रश्न 6.
दुबली-पतली शरीर रचना वाले व्यक्ति कहलाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) मीसोमोरफिक
(ख) एकटोमोरफिक
(ग) इण्डोमोरफिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) एकटोमोरफिक

प्रश्न 7.
एक साधारण कार्य करने वाले व्यस्क पुरुष को प्रतिदिन कितना ग्राम अनाज ग्रहण करना चाहिए। [B.M.2009A]
(क) 175 ग्रा.
(ख) 270 ग्रा
(ग) 380 ग्रा.
(घ) 520 ग्रा.
उत्तर:
(घ) 520 ग्रा.

प्रश्न 8.
खाद्य वर्गों को मिला-जलाकर खाने से – [B.M.2009A]
(क) विभिन्न स्वाद मिलता है
(ख) पकाने में समय की बचत होती है
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है
(घ) पोषक मान अधिक होता है
उत्तर:
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है

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प्रश्न 9.
खाद्य पदार्थों को कितने वर्ग में बाँटा जा सकता है ? [B.M.2009A]
(क) तीन
(ख) आठ
(ग) पाँच
(घ) दो
उत्तर:
(ग) पाँच

प्रश्न 10.
पशु जन्य प्रोटीन में किस तत्त्व की मात्रा अधिक होती है ? [B.M.2009A]
(क) अनिवार्य अमीनो अम्ल
(ख) ऊर्जा
(ग) पेप्टोन
(घ) एंजाइम
उत्तर:
(घ) एंजाइम

प्रश्न 11.
कैल्सियम का उत्तम स्रोत है –
(क) रागी
(ख) मकई
(ग) दाल
(घ) चावल
उत्तर:
(क) रागी

प्रश्न 12.
अंडे से प्राप्त होनेवाले प्रोटीन को प्रोटीन माना जाता है –
(क) A ग्रेड.
(ख) B ग्रेड
(ग) C ग्रेड
(घ) D ग्रेड
उत्तर:
(क) A ग्रेड.

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प्रश्न 13.
वसा वयस्क स्त्री एवं पुरुष को ग्राम में चाहिए –
(क) 20 ग्रा.
(ख) 30 ग्रा.
(ग) 45 ग्रा.
(घ) 50 ग्रा.
उत्तर:
(क) 20 ग्रा.

प्रश्न 14.
इडली डोसा खाया जाता है –
(क) आंध्र प्रदेश
(ख) कर्नाटक
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर:
(घ) तमिलनाडु

प्रश्न 15.
खाद्य वर्ग मुख्यतः [B.M. 2009A]
(क) दो है,
(ख) चार है
(ग) पाँच है
(घ) आठ है
उत्तर:
(ग) पाँच है

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प्रश्न 16.
खाद्य पदार्थों के सही संग्रह की आवश्यकता क्यों है ? [B.M.2009A]
(क) उन्हें अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए
(ख) आर्थिक लाभ के लिए
(ग) गुणवत्ता बढ़ाने के लिए
(घ) सुविधा के लिए
उत्तर:
(घ) सुविधा के लिए

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन का रासायनिक संगठन (Composition of Protein) क्या है ?
उत्तर:
प्रोटीन मुख्यतः कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन का मिश्रण है। प्रोटीन के कुछ समूहों में सल्फर, फॉस्फोरस तथा ताँबा, लोहा आदि लवण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 2.
प्रोटीन का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
प्रोटीन का वर्गीकरण (Classification of Proteins) निम्नलिखित के अनुरूप होता है –
(a) भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ।
(b) अमीनो अम्ल की मात्रा।

(a) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं –

  • साधारण प्रोटीन (Simple)
  • युग्म प्रोटीन (Conjuguated)।
  • प्राप्त प्रोटीन (Derived)।

(b) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं:

  • पूर्ण प्रोटीन (Complete Proteins)।
  • siera: yuf sitzta (Partially Complete)
  • 37 of stata (Incomplete proteins)

प्रश्न 3.
प्रोटीन के कोई तीन कार्य लिखिए।
उत्तर:
प्रोटीन के कार्य (Functions of Proteins):

  • प्रोटीन नए तंतुओं के उत्पादन के लिए अनिवार्य है।
  • यह टूटे-फूटे व पुराने तंतुओं की मरम्मत के लिए भी उत्तरदायी है।
  • ग्लोबिन प्रोटीन रक्त के हीमोग्लोबिन तंतुओं का एक आवश्यक हिस्सा है।

प्रश्न 4.
कार्बोहाइड्रेट को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट कई रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना यौगिक है। यह पदार्थ कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के रासायनिक संयोग से मिलकर बनता है।

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प्रश्न 5.
कार्बोहाइड्रेट का किस आधार पर वर्गीकरण कर सकती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट को परमाणुओं की संख्या के आधार पर निम्न तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)।
  • डाइ-सैक्राइड (DiSaccharide)।
  • पोली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)।

प्रश्न 6.
वसा (Fats) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
यह कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना होता है। वसा में नाइट्रोजन का अभाव होता है। इसमें कार्बन और हाइड्रोजन की मात्रा अधिक होती है लगभग दुगुनी और इसलिए यह कार्बोज से दुगुनी ऊर्जा उत्पादित कर पाते हैं। वसा का सुरक्षित कोष चर्बी के रूप में शारीरिक वजन का लगभग 13.8% होता है।

प्रश्न 7.
संतृप्त वसीय अम्ल (Saturated Fatty Acid) और असंतृप्त वसीय अम्ल (Unsaturated Fatty Acid) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संतृप्त वसीय अम्ल-जिन वसीय अम्ल में कार्बन अणुओं की बराबर संख्या में हाइड्रोजन अणु उपस्थित रहते हैं, उनको संतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, अर्थात् इनके कार्बन हाइड्रोजन ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं। असंतृप्त वसीय अम्ल-वह अम्ल जिनमें हाइड्रोजन तथा कार्बन अणुओं की संख्या असमान हो अर्थात् हाइड्रोजन अणुओं की संख्या कार्बन अणुओं से कम हो, उसे असंतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, जैसे ओलेइक ऐसिड (Oleic Acid)।

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प्रश्न 8.
वसा और तेल में क्या अन्तर है?
उत्तर:
वसायुक्त भोज्य पदार्थों को दो समूहों में बाँटा गया है। 1. वसा, 2. तेल। यह विभाजन तापक्रम से होने वाली क्रियाओं के अनुसार किया गया है। वसायुक्त पदार्थ यदि 20°C पर ठोस हो तो वह वसा कहलाता है। यदि इसी तापक्रम पर पदार्थ तरल हो तो वह तेल कहलाता है।

प्रश्न 9.
विटामिन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
सन्तुलित भोजन में विटामिन आवश्यक पदार्थ हैं । इनके द्वारा शरीर की कोशिकाओं तथा तन्तुओं से अनेक कार्य होते रहते हैं। प्रत्येक विटामिन एक अलग रासायनिक तत्त्व है, इसके अपने निजी गुण होते हैं। ओसर नामक वैज्ञानिक ने विटामिनों की परिभाषा इस प्रकार की है, “यह एक ऐसा सशक्त मिश्रण है जो प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है किन्तु शरीर के लिए अनिवार्य है।”

प्रश्न 10.
विटामिन ‘ए’ पर नोट लिखें।
उत्तर:
विटामिन-‘ए’ पीलापन लिये हुए वह पदार्थ है, जो कि पानी में अघुलनशील, वसा में घुलनशील और आग के प्रति स्थिर (Stable) है । साधारण तापक्रम पर यह नष्ट नहीं होता लेकिन Oxidation की क्रिया से यह नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त सूर्य की किरणों के सम्पर्क से भी यह नष्ट हो जाता है। ऑक्सीजन की उपस्थिति में विटामिन एक साधारण तापक्रम पर भी नष्ट होता रहता है। लेकिन O2 की अनुपस्थिति में विटामिन-‘ए’ युक्त भोज्य पदार्थों को 120°C तक गर्म करने पर इसकी मात्रा और गुण यूँ ही बना रहता है। ”

प्रश्न 11.
विटामिन ‘डी’ के गुण क्या हैं ?
उत्तर:
गुण (Property): शुद्ध विटामिन-डी सफेद रवेदार, गन्ध रहित तथा वसा घुलित पदार्थों में घुलनशील है। आग के प्रति स्थिर, अम्ल तथा क्षार से यह नष्ट नहीं होता । CH तथा C2 के संयोग से यह बनता है। भोजन बनाने की साधारण विधियों में भी विटामिन-डी नष्ट नहीं होता। दूध को उबालने से, पाश्चुरीकरण से तथा पाउडर के रूप से सुखाए जाने पर भी इस विटामिन की मात्रा बनी रहती है।

प्रश्न 12.
जल में घुलनशील विटामिन बताइए।
उत्तर;
इन विटामिनों को हम दो श्रेणी में विभक्त करते हैं :
1. विटामिन बी श्रेणी-थायमिन, राइबोफ्लेविन, नायसिन, पारिडेक्सिन, फोलिक अम्ल, कोबालमिन, पैटोथीन अम्ल, बायोटिन, कोलीन।
2. विटामिन सी श्रेणी-ये जल में घुलने वाले विटामिन हैं। इनका मुख्य कार्य शरीर में ऊर्जा प्राप्ति में सहायक होना है।

ये विटामिन शरीर में उत्पादित नहीं हो सकते, अतः इन्हें प्रतिदिन आहार के द्वारा ही प्राप्त करना आवश्यक है। यदि शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच भी जाते हैं तो जल में घुलनशील होने के कारण जल-निष्कासन द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

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प्रश्न 13.
विटामिन B1 (Thiamine) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यह विटामिन पूर्ण रूप से चावलों के परिस्तर (Pericarp) से सन् 1926 ई० में निकाला गया और 1937.ई० में व्यावसायिक रूप में तैयार किया गया । चूँकि इसमें एमाइन-नाइट्रोजनीय तत्त्व होने के साथ-साथ कुछ थोड़ा-सा अंश गन्धक का भी है, अतः इसे थायमीन कहा गया क्योंकि यह तन्त्रिकाओं (Nerves) पर कार्बोज से उत्पन्न पाइरुविक एसिड के प्रभाव को मिटाता है। इसे एन्युरिन (Aneurin) भी कहा जाता है।

प्रश्न 14.
विटामिन B1 (Riboflavin) के भौतिक गुण क्या हैं ?
उत्तर:
विटामिन के अणु के दो भाग हैं, राइबो (Ribo) शर्करा खण्ड व फ्लेविन (Flavin)। यह कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन (C1, H1, N2) और दो मेथिल समूह से मिलकर बनता है। सन् 1935 ई० से यह प्रयोगशालाओं में बनाया जाने लगा । अम्ल, ताप तथा वायु का प्रभाव इस पर नहीं पड़ता।

प्रश्न 15.
विटामिन ‘सी’ की कमी से कौन-सा रोग होता है ?
उत्तर:
विटामिन सी की कमी से स्कर्वी नामक रोग हो जाता है जिससे मसूड़े कमजोर हो जाते हैं।

प्रश्न 16.
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह केवल ताजे खट्टे रसदार फलों में ही उपस्थित होता है और रखे जाने पर या फलों के बासी हो जाने पर 50% तक नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 17.
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन कौन-सा है ?
उत्तर:
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन आँवला है जिसमें सन्तरे से 20 गुना विटामिन सी अधिक पाया जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 18.
कैल्शियम के भौतिक गुणों का आधार क्या है ?
उत्तर:
कैल्शियम (Calcium): कैल्शियम एक अकार्बनिक पदार्थ है जिससे लवण तैयार किए जा सकते हैं। हमारे शरीर में मुख्यतः हाइड्रोक्सि-ऐपेटाइड Ca10 (Pou)6 (OH)2 के रूप में काम आता है। कार्बोनेट, साइट्रेट, फॉस्फेट और बाईकार्बोनेट काम में आने वाले अन्य लवण हैं। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम लगभग दो किलो और फॉस्फोरस डेढ़ किलो तक पाया जाता है। कैल्शियम का लगभग 99 प्रतिशत भाग हड्डियों और दांतों को सुदृढ़ बनाने में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 19.
एनीमिया रोग किसकी कमी से होता है ?
उत्तर:
एनीमिया या रक्त में हीमोग्लोबिन का कम होना प्रमुखतः लोहे की कमी से होता है। इसके अतिरिक्त यह फोलिक अम्ल व सायनोकोबालामीन’ की कमी से भी होता है।

प्रश्न 20.
कैल्शियम के अवशोषण में कौन-सा विटामिन सहायक है ? बच्चों में इसकी कमी से होने वाले दो प्रमुख लक्षण लिखें।।
उत्तर:
कैल्शियम के अवशोषण हेतु शरीर को विटामिन डी की आवश्यकता पड़ती है। इसकी कमी से बच्चों में रिकेट्स नामक रोग हो जाता है। इसके दो प्रमुख लक्षण निम्न हैं :

  • टांगों की हड्डियाँ नर्म पड़ जाती हैं। शरीर का भार सहन न कर सकने के कारण मुड़कर धनुष के आकार की हो जाती हैं।
  • छाती की हड्डियाँ आगे की ओर बढ़ जाती हैं जिसके कारण वक्ष भाग कबूतरनुमा दिखने लगता है।

प्रश्न 21.
खनिज लवण कैल्शियम पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
कैल्शियम श्वेत खड़िया (Chalk) के पाउडर जैसा होता है। कैल्शियम की मात्रा शारीरिक वजन की 1.5 से 2.0% तक होती है, जिसमें 99% हड्डियों व दाँतों में और शेष 1% अन्य ऊतकों व द्रवों में होता है।

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प्रश्न 22.
कैल्शियम की शरीर में प्रतिदिन की मात्रा बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की प्रतिदिन की मात्रा (Daily intake of Calcium) –
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प्रश्न 23.
रक्त का रंग लाल क्यों होता है ?
उत्तर:
लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन की उपस्थिति ही रक्त को लाल रंग प्रदान करती है।

प्रश्न 24.
लोहे की प्रतिदिन कितनी मात्रा आवश्यक है ?
उत्तर:
शरीर में लोहे की आवश्यकता (Requirement of iron in the body): लोहा प्रतिदिन आहार से प्राप्त करना आवश्यक है। विभिन्न आयु व स्थिति के अनुसार लोहे की प्रतिदिन की मात्रा (mg)
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आकस्मिक दुर्घटना के घटित होने अथवा डॉक्टरी ऑपरेशन के पश्चात् रक्त के ह्रास को प्राकृतिक अवस्था में लाने के लिए कुछ मास तक व्यक्ति के भोजन में लोहे की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 25.
‘लोहे’ के भौतिक गुण (Physical properties) लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे की उपयोगिता के विषय में विस्तत ज्ञान प्राप्त करने के लिए 19वीं शताब्दी में अनेक प्रयोग व अनुसंधान हुए जिससे शरीर में लोहे के महत्त्वपूर्ण कार्यों का पता लग सका। खनिज लवणों में लोहे का विशेष महत्त्व है। यद्यपि लोहा बहुत कम मात्रा में शरीर में पाया जाता है परन्तु शरीर में इसकी उपस्थिति अनिवार्य है। शरीर के कुल वजन का 90.04% भाग आयरन का होता है। इसका 70% भाग रक्त के लाल कण में, 4% मांस-पशियों में, 25% यकृत अस्थिमज्जा, प्लीहा व गुर्दे में संचित भण्डार के रूप में और बाकी 1% रक्त प्लाज्मा व कोशिकाओं के इन्जाइम में रहता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन के मुख्य साधन (Main sources) कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • प्रोटीन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के प्रोटिअस शब्द से हुई है जिसका अर्थ खाद्य पदार्थों में से सर्वोत्तम पदार्थ है।
  • प्रोटीन मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों प्रकार के भोजन में पायी जाती है। सबसे अधिक प्रोटीन मांस, मछली, दूध व पनीर में पाया जाता है। इसके
  • अतिरिक्त सोयाबीन, सभी दालों में, गेहूँ, मटर, चावल, अरारोट, बादाम, मूंगफली आदि में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्रोटीन के अभाव में शरीर में कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन के अभाव में निम्नलिखित लक्षण उत्पन्न होते हैं –

  • उम्र के अनुपात में शारीरिक गठन, वृद्धि व विकास में कमी।
  • मांस-पेशियों की शिथिलता।
  • त्वचा का सूखापन-झुर्रियाँ पड़ना।
  • रक्तहीनता।
  • मानसिक विकास में कमी।
  • चिड़चिड़ापन, क्रोध, भावुकता आदि।
  • बालों का सूखापन और कंघी करने पर अधिक टूटना।
  • नाखून का सूखापन और उन पर सफेद दाग।
  • एन्जाइम्स की कमी के कारण पाचन शक्ति में कमी।
  • जल जमाव-शोफ (Nutritional Oedema)।

प्रश्न 3.
आवश्यक व अनावश्यक अमीनो अम्ल (Essential and Non-essential amino-acid) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
आवश्यक अमीनो अम्ल से तात्पर्य है कि यह अमीनो अम्ल हमें खाद्य पदार्थों द्वारा अनिवार्य रूप से मिलने ही चाहिए क्योंकि इनका हमारे शरीर में संकलन (Synthesis) नहीं हो पाता। इन अमीनो अम्ल की भोजन में कमी होने से बच्चों का विकास रुक जाता है तथा प्रौढ़ों में तोड-फोड की मरम्मत नहीं हो पाती। बच्चों के लिए 10 अमीनो अम्ल आवश्यक होते हैं तथा प्रौढ़ों के लिए 8, क्योंकि हिस्टीडिन (Histidine) व आर्जिनिन (Arginine) को शिशुओं के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल माना जाता है।

सिस्टिन (Cystine) व टाइरोसिन (Tyrosin) को अर्द्ध-आवश्यक अमीनो अम्ल माना गया है। अनावश्यक अम्ल शरीर में होने वाली तोड़-फोड़ की मरम्मत कर सकते हैं। शरीर का निर्माण इनके द्वारा नहीं हो सकता । कुछ अनावश्यक अम्ल शरीर में कुछ आवश्यक अमीनो अम्ल की उपस्थिति में उत्पादित होते हैं।

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प्रश्न 4.
कार्बोज (Carbohydrates) का शरीर में क्या कार्य है ?
उत्तर:

  • कार्बोज ऊर्जा उत्पत्ति में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। शरीर की सारी ऐच्छिक व अनैच्छिक क्रियाओं के लिए गति व शक्ति प्रदान करते हैं।
  • यह वसा के पाचन में सहायक होते हैं।
  • ग्लूकोज अनावश्क अमीनो अम्ल के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • कार्बोज भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं।
  • यह वसा के साथ मिलकर सन्तुष्टि की अनुभूति भी कराते हैं।
  • इसलिए अधिकांश मिष्ठान्न भोजन के अन्तिम दौर में परोसा जाता है।

प्रश्न 5.
कार्बोज की दैनिक मात्रा कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
कार्बोज की मात्रा कोई निश्चित रूप से निर्धारित नहीं की गई है, फिर भी 70% कैलोरीज कार्बोज से प्राप्त कर लेना चाहिए । उदाहरणार्थ एक साधारण काम-काज करने वाले व्यक्ति को कुल 2400 कैलोरी की आवश्यकता होती है तो इसका 70% 1680 कैलोरी हुई और चूँकि 10 ग्राम कार्बोज से 4 कैलोरी प्राप्त होती हैं, अतः उसे 1680 + 4 = 420 ग्राम कैलोरी की आवश्यकता होगी। वैसे भी 400 से 450 ग्राम तक की कार्बोज की मात्रा उपयुक्त समझी जाती है।

प्रश्न 6.
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से क्या हानियाँ होती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से शरीर का भार कम हो जाता है ? उनकी स्फूर्ति जाती रहती है और व्यक्ति आलस्य का शिकार हो जाते हैं और शारीरिक विकास पर भी प्रभाव पड़ता है। शारीरिक कार्यों के लिए ऊर्जा न मिलने पर हर समय थकान महसूस होती है। कार्बोज की कमी होने पर प्रोटीन ऊर्जा के लिए उपयोग होता है और अपने शरीर निर्माण के विशिष्ट कार्य को सम्पन्न नहीं कर पाता है। इसके अतिरिक्त सेल्यूलोज की कमी होने पर मनुष्य कब्ज का शिकार हो जाता है। शरीर में संचित वसा गर्मी व शक्ति उत्पन्न करने हेतु व्यय हो जाता है। परिणामस्वरूप शरीर दुबला हो जाता है, शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, गालों की चमक जाती रहती है तथा व्यक्ति में दुर्बलता के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगते हैं।

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प्रश्न 7.
कार्बोहाइड्रेट्स के प्राप्ति स्रोत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
सभी भोज्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेट्स के अतिरिक्त एक या एक से अधिक पोषक तत्त्व होते हैं। रोटी जो कि कार्बोहाइड्रेट्स की प्राप्ति का मुख्य साधन है उसमें अन्य पोषक तत्त्व भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। कुछ विशेष भोज्य पदार्थों को ज्वलन या ऊर्जा भोजन के नाम से पुकारते हैं। इसका कारण यह है कि उनमें ऊर्जा उत्पादन तत्त्व अधिक होने से उनका मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा प्रदान करना है।

ऐसे पदार्थों में रोटी, आटा, छिलकेदार अनाज, गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, चने आदि हैं। इसके अतिरिक्त सोयाबीन, सूखे मटर की फलियाँ आदि हैं। सूखे फलों में अंजीर, मुनक्का, खजूर, किशमिश, अंगूर, सूखी खुमानी आदि हैं। अन्य पदार्थों में शकरकन्द, अखरोट, शहद, गुड़, पहाड़ी आलू, जड़दार सब्जियाँ, पत्तीदार सब्जियाँ आदि हैं।

प्रश्न 8.
आहार में वसा की दैनिक आवश्यकता क्या होनी चाहिए?
उत्तर:
राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने अनुसंधानों के आधार पर यह अनुशंसा की है कि दैनिक आहार में 30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होनी चाहिए। प्रयुक्त की जाने वाली कुल वसा का 50% भाग वनस्पति तेलों से प्राप्त होना चाहिए ताकि आवश्यक वसीय अम्ल प्राप्त हो सके। विभिन्न आयु के व्यक्तियों के आहार में वसा का निम्नलिखित प्रतिशत होना चाहिए –
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प्रश्न 9.
वसा के मूल स्रोत (Sources) क्या हैं ?
उत्तर:
ऐसे भोज्य पदार्थ बहुत कम हैं जो पूर्णतः वसा तत्त्व से ही निर्मित हुए हैं। सामान्यतः विभिन्न चिकने भोज्य पदार्थों में प्रोटीन, वसा में घुलनशील विटामिन, कार्बोहाइड्रेट और खजिन लवण आदि का संयोग रहता है परन्तु जिन पदार्थों में वसा की पर्याप्त मात्रा रहती है, उन्हें वसा का स्रोत माना जाता है।
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1. पशुजन्य स्रोत के अन्तर्गत माँस, मछली, मुर्गी के अण्डे, अण्डे की जर्दी, दूध और दूध से बने व्यंजन आते हैं।
2. वानस्पतिक स्रोत में वसा बीजों, सूखे मेवों (Nut), अनाजों और फलों से प्राप्त होती है।

प्रश्न 10.
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर निम्न प्रकार हैं  –

वसा विलेय (Fat Soluble)।

  • वसा या वसा को घोलने वाले द्रवों में घुलनशील है।
  • आवश्यकता से अधिक खाये जाने पर शरीर में अधिकांश यकृत में संचित हो जाते हैं।
  • अभाव के दुष्परिणाम या लक्षण काफी विलम्ब से प्रकट होते हैं।
  • इनमें केवल ‘C, H, O अणु होते हैं।
  • अधिकता का शरीर पर कुप्रभाव पड़ता है।
  • यह विटामिन पूर्वगामी (Precursor) रूपों में भी पाए जाते हैं।

वारि विलेय (Water Soluble):

  • केवल वारि जल में घुलनशील है।
  • अधिकांश संचित नहीं होते। मूत्र में निष्कासित हो जाते हैं।
  • अभाव लक्षण तुरत ही प्रकट हो जाते हैं।
  • इनमें C, H, व O के अतिरिक्त N भी होता है, और कुछ में Sulphur व Cobalt भी।
  • अधिकता का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • यह पूर्वगामी रूपों में नहीं पाए जाते हैं।

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प्रश्न 11.
विटामिन ‘D’ के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions):
शरीर की उचित वृद्धि के लिए विटामिन डी की आवश्यकता है। इसकी अनुपस्थिति में विकास की गति रुक जाती है। चूहों के प्रयोग से पता चला है कि जिन चूहों को भोजन द्वारा विटामिन डी उपलब्ध कराई गई उनकी वृद्धि द्वितीय समूह के चूहों जिनके आहार में विटामिन डी अनुपस्थित थी, से बहुत अच्छी हुई।

  • कैल्शियम और फास्फोरस खनिज पदार्थों के अवशोषण में सहायक होते हैं जिससे हड्डियों व दाँतों को खनिज पदार्थ वांछित मात्रा में प्राप्त हो सकें।
  • इन्हीं तत्त्वां विशेषकर फास्फोरस गुर्दे (Kidney) के निकास को नियमित करता है। कैल्शियम उचित अनुपात में बना रहता है, जिससे हड्डियों की मजबूती बनी रहती है।
  • रक्त में भी कैल्शियम की मात्रा को. नियमित बनाए रखता है।
  • रक्त के अल्कंन फॉस्फेट इन्जाइम को नियमित बनाये रखता है जिसमें यह कैल्शियम व फॉस्फोरस को हड्डियों व दाँतों में संचित किए रखता है।

प्रश्न 12.
विटामिन ‘डी’ की दैनिक आवश्यकता क्या है ?
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता (Daily Requirement):

  • इस विटामिन की आवश्यकता जब शरीर में विकास हो रहा होता है, होती है।
  • गर्भवती स्त्री को भी इसकी आवश्यकता होती है।
  • एक स्वस्थ सामान्य वयस्क व्यक्ति.को इसकी थोड़ी आवश्यकता होती है। पोषण विज्ञान परिपद ने 18 वर्ष की आयु तक विभिन्न आयु वर्गों के लिए
  • 200 आई. यू. (I.U) निश्चित किये हैं परन्तु प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए कुछ नहीं बताया।

प्रश्न 13.
विटामिन ‘बी’ (थायमिन) की भोजन में क्या उपयोगिता है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. इस विटामिन का विशेष कार्य कार्बोज के उपापचयन में सहायता करना है। इसके अभाव में शरीर में कार्बोज का पूर्ण अवशोपण नहीं हो पाता।
  2. यह विटामिन तान्त्रिका तंत्र के स्वास्थ्य तन्त्रिका तन्तु में संवेदन संचार तथा आँतों की स्वाभाविक क्रियाशीलता के लिए आवश्यक है।
  3. थायमिन को मौरेल (Morale) विटामिन भी कहा जाता है। इसकी कमी से चिड़चिड़ापन, झगड़ालू प्रवृत्ति, अरुचि आदि लक्षण मनुष्यों में पाए जाते हैं। विलियम ने मनुष्यों पर प्रयोग करके बतलाया कि थायमिन पागलपन को ठीक नहीं करता लेकिन जब पागलों को इसकी कमी का आहार दिया जाता है तो उनके पागलपन की तीव्रता बढ़ जाती है।
  4. इसकी कमी से वृद्धि रुक जाती है। यह विटामिन शरीर की वृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
  5. इसकी कमी से भूख नहीं लगती।
    B, के अभाव से राइबोफ्लेविन (Riboflavin) के संग्रह में कमी हो जाती है।
  6. रक्त में श्वेताणुओं की रोगाणु-भक्षण क्षमता की वृद्धि हेतु भी यह आवश्यक है।
  7. शरीर के आन्तरिक अवयवों की आवश्यक क्रियाशीलता हेतु शक्ति पहुँचाने के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 14.
“विटामिन ‘बी1‘ (थायमिन) की दैनिक आवश्यकता (Daily requirement) निर्धारित कीजिए।
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता-इस विटामिन की मात्रा, कैलारीज की मात्रा के अनुपात में निर्धारित की जाती है, अधिक शारीरिक श्रम करने वाले, अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट की खुराक खाने वाले और अधिक शराव सेवन करने वाले व्यक्ति को सामान्य से कुछ अधिक ही मात्रा की आवश्यकता होती है।
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प्रश्न 15.
विटामिन ‘बी2‘ (Riboflavin) के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions)”:

  • राइबोफ्लेविन प्रोटीनों व वसा के उपापचयन में सहायक है।
  • यह नायसिन के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • यह शारीरिक वृद्धि में सहायक है।
  • राइबोफ्लेविन की कमी से त्वचा स्वस्थ नहीं रह सकती।
  • यह अन्य शारीरिक इन्जाइमों से मिलकर शरीर की विभिन्न क्रियाओं में भाग लेता है।
  • यह ऑक्सीकरण प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है तथा कोशिकाओं के श्वसन के लिए अति आवश्यक है।

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प्रश्न 16.
राइबोफ्लेविन की दैनिक शारीरिक आवश्यकताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
शारीरिक आवश्यकता-(Requirement in the body): राइबोफ्लेविन की आवश्यकता मनुष्य के कार्य तथा आयु पर निर्भर करती है।
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प्रश्न 17.
विटामिन C के भौतिक गुणों (Physical Properties) का वर्णन करें।
उत्तर:
विटामिन सी को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जैसे एस्कार्बिक अम्ल (Ascorbic Acid), सिविटामिस एसिड (Cevitamic Acid) या हेक्जुरोनिक एसिड (Hexuronic Acid) आदि। चूँकि यह स्कर्वी (Scurvy) नामक बीमारी का निराकरण करता है, अतः इसे एण्टी स्कोरब्यूटिक विटामिन (Anti Scorbutic Vitamin) भी कहते हैं। सन् 1932 ई० में इसका नींबू के रस से पृथक्करण किया गया और उसी वर्ष इसे रासायनिक रूप में भी तैयार किया गया।

विटामिन सी का रसायनिक नाम एस्कॉर्बिक अम्ल है। शुद्ध विटामिन सी सफेद स्वेदार, गन्ध रहित, पानी में घुलनशील, आग के प्रति अस्थिर, धूप एवं रोशनी में यह नष्ट हो जाता है। ताप, वायु, धातु में यह स्थिर है लेकिन तरल अवस्था में जबकि पानी के साथ इसका घोल बनाया जाता है, तो यह नष्ट हो जाता है। क्षार के माध्यम में यह अस्थिर है। अम्ल के माध्यम में यह नष्ट नहीं होता। जल में घुलनशील है।

प्रश्न 18.
विटामिन सी की दैनिक मात्रा मानव शरीर में कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
दैनिक मात्रा (Daily Requirement): बालकों के लिए शरीर विकास के साथ इस विटामिन की आवश्यकता बढ़ती रहती है।
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प्रश्न 19.
विटामिन C के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): यह समस्त रसीले फलों में विशेषकर नींबू, सन्तरा, आँवला, कमरख, अमरूद, चकोतरा, टमाटर में पाया जाता है, केले में भी यह पर्याप्त मात्रा में उपस्थित रहता है। हरी शाक-सब्जियों व ताजे फलों में जैसे पालक, सलाद आदि में यह पर्याप्त मात्रा में रहता है। अंकुरित अनाजों से यह अत्यधिक अंशों में प्राप्त किया जा सकता है। सूखे फलों में यह बिल्कुल नहीं रहता।

विभिन्न भोज्य पदार्थों में विटामिन (Vitamins in Different Food Stuffs)
अति उत्तम स्त्रोत – आँवला, अमरूद।
उत्तम स्रोत – नींबू का रस, पका पपीता, सन्तरा, काजू, अनानास, पका टमाटर, पका आम, मूली के पत्ते पालक, हरी पत्ती वाली शाक भाजी। .
सामान्य स्त्रोत – केला, सेब।

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प्रश्न 20.
लोहे के खाद्य स्रोत लिखें।
उत्तर:
खाद्य स्रोत:

  1. प्राणिज पदार्थों में यकृत (Liver) उत्तम स्रोत है। मांस, अण्डे की जर्दी, मछली आदि अन्य स्रोत हैं।
  2. फलों में सेब, आडु, खुबानी, अंगूर आदि से कुछ लोहा मिल जाता है।
  3. पालक व हरी पत्तीदार सब्जी लोहे के स्रोत हैं। पत्ते जितने अधिक हरे होंगे, उतना ही अधिक लोहा उनमें होगा।
  4. साबुत अनाजों व गुड़ में भी लोहा पाया जाता है।
  5. दालों में थोड़ी मात्रा में लोहा पाया जाता है।
  6. दूध, पनीर आदि में लोहा बहुत कम होता है।

प्रश्न 21.
खाद्य सम्मिश्रण क्या है ? उदाहरण देकर स्पष्ट करें । [B.M. 2009 A]
उत्तर:
पर्याप्त पोषण के लिए यदि हम भोज्य पदार्थों को मिलाकर प्रयोग करें तो जो एक दूसरे. के पोषक तत्त्व की कमी को पूरा करते है उसे ही खाद्य सम्मिश्रण कहते हैं। इस विधि से पौष्टिक मान बढ़ाने से सबसे अधिक प्रभाव प्रोटीन की पौष्टिकता पर पड़ता है। अर्थात् प्रोटीन के द्वितीय श्रेणी या तृतीय श्रेणी के स्रोतों को मिलाकर प्रथम श्रेणी का प्रोटीन प्राप्त किया जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर अनाज और दाल को मिलाकर दाल-रोटी दाल-चावल, खिचड़ी, डोसा इडली बड़ा बनाया जा सकता है इसी प्रकार से सब्जी और दूध के बने पदार्थ जैसे-गाजर का हलवा, टोमैटो क्रीम सूप। फल और अनाज से फ्रूट केक फलों का जैम ब्रेड इत्यादि बनाय जा सकता है। इस विधि से भोजन पकाने में पौष्टिकता तो बढ़ती ही साथ ही पकाने एवं खाने दोनों का ही समय कम लगता है और भोजन स्वादिष्ट, आकर्षक एवं रुचिकर भी हो जाता है।

प्रश्न 22.
लोहे की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
अथवा,
एक गर्भवती महिला अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाती। उसको कौन-सा रोग तत्त्वों की कमी से हो सकता है ? उसके दो लक्षण लिखें तथा एक खाद्य पदार्थ सुझाएँ।
उत्तर:
शरीर में कमी का प्रभाव (Effect of deficiency in the body):शरीर में लोहे ‘का अभाव कई कारणों से हो सकता है –

  • भोजन में लोहे की कमी।
  • लोहे का शरीर में पूर्णतः अवशोषण न होना।
  • शरीर में लोहे की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता हो।

लोहे की कमी से रक्तक्षीणता (Anaemia) रोग हो जाता है। इस रोग में लाल रक्त कण संख्या में बहुत कम हो जाते हैं, त्वचा पीली दिखाई देने लगती है, हीमोग्लोबिन का पर्याप्त रूप से निर्माण नहीं हो पाता। रक्त ऑक्सीजन वहन में असमर्थ हो जाता है। ऑक्सीजन की कमी और कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता से शारीरिक क्रियाएँ क्षीण होने लगती हैं।

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ऊर्जा उत्पत्ति की कमी, शारीरिक कमजोरी, थकावट, भूख की कमी, साँस फूलने और हृदय धड़कने की शिकायत, आँखों की पलकों में लाली की कमी, चेहरा पीला, नाखून सफेद से और हाथों-पाँवों पर जल जमाव के कारण सूजन हो जाया करती है। व्यक्ति उत्साहहीन, सुस्त और बेचैन-सा रहने लगता है, वे लक्षण लोहे की कमी के ही लक्षण हैं।

प्रश्न 24.
लोहे की आवश्यकता शरीर में क्यों बढ़ जाती है ?
उत्तर:

  • गर्भकाल में तथा जन्म पश्चात् शिशु और स्वयं के लिए भी माता को आवश्यक मात्रा में लोहा प्रदान करने के लिए।
  • बढ़ते बालकों के विकास के साथ-साथ लोहे की बढ़ती आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए।
  • विभिन्न व्यक्तियों की विशेष परिस्थितियों में लोहे की हानि को पूरा करने के लिए।
  • शरीर में लोहे की पर्याप्त मात्रा संचित करके भविष्य के संभाव्य अभावों के लिए पूर्ण व्यवस्था करने के लिए।

प्रश्न 25.
आयोडीन की शरीर में क्या आवश्यकता है?
उत्तर:
शरीर में आवश्यकता (Requirement in the body)-समुद्रतटीय निवासियों को आयोडीन की अधिक आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उनके भोजन में आयोडीन की अधिक मात्रा उपस्थित रहती है। एक वयस्क व्यक्ति को 0.15 से 0.2 मिली ग्राम, छोटे बच्चे और अन्य बालकों को 0.05 से 0.10 मिलीग्राम एक अच्छे संतुलित आहार द्वारा प्राप्त होती है।

प्रश्न 26.
आप अपने लिए संतुलित भोजन का आयोजन करना चाहते हो। आपको ICMR खाद्य पदार्थ किस प्रकार मदद करेगी?
उत्तर:

  • प्रत्येक आहार में प्रत्येक खाद्य ग्रुप को सम्मिलित करने में।
  • भोजन में विभिन्नता लाने में।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानव शरीर में प्रोटीन के क्या कार्य (Function) हैं ?
उत्तर:
1. मानव शरीर का लगभग 18% भाग प्रोटीन से बना होता है जो शरीर के विभिन्न भागों के कार्यों के अनुसार कई रूपों में पाया जाता है। शरीर में कोशिकाओं और ऊतकों का निर्माण करना प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसीलिए स्त्री को गर्भावस्था व स्तनपान काल में तथा बालक को बाल्यावस्था में शरीर के निर्माण और विकास के लिए प्रोटीन की विशेष रूप से अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

2. मनुष्य की बाह्य क्रियाशीलता तथा शरीर के अन्दर निरन्तर होती रहने वाली क्रियाओं के फलस्वरूप ऊतकों में जो कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती रहती हैं उनकी पूर्ति तथा मरम्मत प्रोटीन द्वारा होती है। अस्थियाँ, दाँत, त्वचा, नाखून, रक्तकण, मांसपेशियां और अन्तःस्रावी ग्रन्थियों आदि की रचना में प्रोटीन का मुख्य भाग होता है। मूत्र और पित्त को छोड़कर शरीर के सभी तरल पदार्थों में अधिक या कम मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है।

3. शरीर की क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में सहायता करना भी प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इन क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में प्रोटीन निम्न प्रकार से सहायता करता है –

(क) हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) इस प्रकार का प्रोटीन है जो रक्त के लाल कणों का एक मुख्य भाग है। इसमें लोहा भी सम्मिलित होता है। इसका कार्य बड़ा महत्त्वपूर्ण है। रक् द्वारा यह ऑक्सीजन को विभिन्न अंगों तक पहुँचाता है जिससे मिलकर कार्बोहाइड्रेट्स और वसा का ज्वलन होता है और परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होती है।
(ख) रक्त में जो प्रोटीन पाए जाते हैं वे रक्त की सामान्य क्षारीय प्रतिक्रिया (alkaline reaction) की स्थिति बनाए रखने में सहायता करते हैं।
(ग) एन्जाइम (enzyme) भी जो पाचन तथा उपापचयन (Matabolism) क्रियाओं में विशेष रूप से सहायक होती है, प्रोटीन से ही बने होते हैं।
(घ) विभिन्न हारमोन (Hormones) भी प्रोटीन से ही निर्मित होते हैं। वे नाइट्रोजन युक्त रासायनिक यौगिक हैं। शरीर की आन्तरिक क्रियाओं को नियंत्रित रखने में इनका बहुत महत्त्व है।
(ङ) प्रोटीन आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव व हारमोन्स की बनावट में भाग लेते हैं। इन्सुलिन (Insulin), एनिलिन (Adrenaline), थायरॉक्सिन (Thyroxine) व अन्य हारमोन्स में विद्यमान रहते हैं।

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4. शरीर में रोगों से बचाव के लिए कुछ प्रतिरोधी (anti bodies) भी पाए जाते हैं। ये पदार्थ प्रोटीन से ही बनते हैं।

5. आवश्यकता पड़ने पर शरीर को काम करने के लिए प्रोटीन शक्ति भी प्रदान कर सकता है, परन्तु सामान्य दशा में प्रोटीन से ऊर्जा उत्पादक पदार्थों का काम लेना लाभकारी नहीं होता। यदि प्रोटीन ऊर्जा की उत्पत्ति के लिए प्रयुक्त कर लिए जाते हैं तो शरीर निर्माण के लिए प्रोटीन नहीं बचते हैं।
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प्रश्न 2.
प्रोटीन की दैनिक आवश्यकता कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर:
प्रोटीन की आवश्यकता कई बातों पर निर्भर करती है –

  • वृद्धि एवं विकास के समय अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • प्रोटीन की प्रतिदिन की आवश्यकता आहार में उपयोग की गई प्रोटीन के गुण पर भी निर्भर करती है। प्रतिदिन के आहार में उपयोग की गई प्रोटीन का आधा भाग प्राणी जगत के साधन से आना चाहिए।
  • प्रोटीन की आवश्यकता आहार में उपस्थित अन्य पौष्टिक तत्त्व जैसे कैलोरीज की मात्रा पर भी निर्भर करती है। आहार में कैलोरीज की कमी से प्रोटीन ऊष्मा प्रदान करने का कार्य करेगी।
  • संक्रामक बीमारियों में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन की दैनिक मात्रा-1 ग्राम प्रतिकिलो वजन के अनुपात से लेना चाहिए। 1 ग्राम प्रोटीन = 4 KCal प्राप्त करता है।
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प्रश्न 3.
कार्बोहाइड्रेट को किस आधार पर वर्गीकृत (Classify) कर सकते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
कार्बोज को परमाणुओं की संख्या के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)
  • डाइ-सैक्राइड (Di-Saccharide)
  • पौली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)

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I. मोनो सैक्राइड (Mono-Saccharide): मोनो सैक्राइड कार्बोज है जिसके अणु में एक शर्करा इकाई है। इन्हें सरल शर्करा भी कहते हैं। इनका अभिपचन इन्हें खाने के पश्चात् तुरन्त ही हो जाता है। यह स्वाद में मीठा और जल में घुलनशील है।

(अ) ग्लूकोज (Glucose): यह मीठे फलों जैसे अंगूर में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। अतः इसको शक्कर (Grape) भी कहते हैं। यह मक्का, चुकन्दर, गन्ना आदि में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। ग्लूकोज श्वेतसार का सबसे महत्त्वपूर्ण पदार्थ है। सभी श्वेतसार पाचन तथा पोषण के पश्चात् ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं।

रक्त में ग्लूकोज की एक निश्चित मात्रा होती है। यह मात्रा घटने तथा बढ़ने से शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में होने से यह मूत्र द्वारा वाहर निकलने लगता है। ये लक्षण डायबिटीज रोग के हैं। ग्लूकोज की आवश्यकता से अधिक मात्रा आहार में लेने से यह शरीर में ग्लाइकोजन (Glycogen) के रूप में एकत्रित हो जाता है।

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ग्लाइकोजन अधिकतर यकृत तथा मांसपेशियों में जमा रहता है । उपवास या बीमारियों में यही ग्लाइकोजन ग्लूकोज में बदल जाता है तथा ऑक्सीजन के पश्चात् ऊर्जा प्रदान करता है। ग्लूकोज की अत्यधिक मात्रा लेने से पाचन के पश्चात् वह वसा में परिवर्तित हो जाता है तथा वसा शरीर में जमा होकर अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न करती है। अत्यन्त दुर्बल रोगियों या मूर्छा आदि की दशा में ग्लूकोज को देने के लिए बाजार से बनी बनाई ग्लूकोज उपलब्ध हो जाती है। यह तुरंत रक्त में पहुँचकर रोगी को शक्ति प्रदान करता है क्योंकि इसे पचाने की आवश्यकता नहीं होती।

(ब) ग्लैक्टोज (Glactose): यह शक्कर ग्लूकोज व फ्रक्टोज की तरह प्राकृतिक रूप में नहीं पाया जाता। यह दूध में पाई जानेवाली शक्कर लैक्टोज के पाचन से प्राप्त होता है। इसको औद्योगिक विधि से भी तैयार किया जाता है।

(स) फ्रक्टोज (Fructose): यह फलों में अधिक मात्रा में पाया जाता है। अत: फलों को शक्कर भी कहते हैं। यह इस समूह की सबसे मीठी शक्कर है। यह शहद, गुड़ आदि में पाया जाता है। फ्रक्टोज भी उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति करता है जिनकी ग्लूकोज करता है। दोनों परस्पर परिवर्तनशील हैं।

II. डाइसैकराइड्स (Disaccharides) (C12 H2 O11 ): इन कार्बोहाइड्रेटों के अणुओं में शर्करा की दो इकाइयाँ होती हैं। इसलिए इन्हें दोहरी शर्करा या द्विशर्करा भी कहते हैं। ये सरल शर्करा से कुछ अधिक मीठी होती हैं तथा पानी मेंघुलनशीलस्फटिक (Crystals) बनने योग्य तथापाचन योग्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत ये सरल शर्कराओं में परिवर्तित हो जाती हैं।

(अ) लैक्टोज (Lactose): यह अन्य दूसरी शर्कराओं की अपेक्षा कम घुलनशील एवं कम मीठी होती है। साधारणतः यह रक्त या शरीर के ऊतकों में नहीं पायी जाती है। इसे दूध शक्कर भीकहते हैं। दूध में लैक्टोज 2 से 8% तक उपस्थित होती है। लैक्टोज का पाचन हो जाने के पश्चात् इसमें ग्लूकोज तथा ग्लैक्टोज बराबर अनुपात में मिलती है। लैक्टोज = ग्लूकोज + ग्लैक्टोज

(ब) सुक्रोज (Sucrose): यह अधिकतर गन्ने की शक्कर और चुकन्दर की शक्कर में पायी जाती है। यह साधारण चीनी का वैज्ञानिक नाम है। अभिपाचन के उपरान्त यह ग्लूकोज में परिवर्तित होकर रक्त द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। इसकी अतिरिक्त मात्रा यकृत में ग्लाइकोजन बनकर संचित हो जाती है। सुक्रोज ग्लूकोज और फ्रक्टोस के संयोग से बनता है। सुक्रोज = ग्लूकोज + फ्रक्टोज

(स) माल्टोज (Maltose): इसे माल्ट या जवा शक्कर भी कहा जाता है। अंकुरित अनाजों में उपस्थित शक्कर है। अंकुरित होने की क्रिया के अन्तर्गत अनाजों के स्टार्च, माल्टोज शर्करा में परिवर्तित होते हैं जो अधिक सुपाच्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत अनाज का स्टार्च पहले माल्टोज में और फिर ग्लूकोज में परिवर्तित होता है। माल्टोज = ग्लूकोज + ग्लूकोज

III. पौली सैकराइड्स (Polysaccharides (C6H10O6): यह एक जटिल पदार्थ है। इस श्वेतसार में दो से ज्यादा शक्कर की इकाई रहती है। इनमें मिठास कम होती है तथा इसका कोई निश्चित आकार नहीं होता।

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(अ) स्टार्च (Starch): जड़, वीज, कन्द अनाजों आदि में ये काफी मात्रा में उपस्थित रहते हैं। स्टार्च पानी में अघुलनशील हैं। गर्म पानी के साथ घोलने पर स्टार्च पेस्ट के रूप में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च पकाने के पश्चात् उसके चारों ओर उपस्थित सेल्यूलोज की दीवार टूट जाती है तथा स्टार्च कण पानी शोषित करके फूल जाते हैं। स्टार्च को अधिक पकाने से वह चिपचिपे पदार्थ में बदल जाता है।

पका हुआ स्टार्च खाने में स्वादिष्ट होता है तथा इसका पाचन शीघ्र ही हो जाता है। कच्चे स्टार्च का पाचन नहीं होता क्योंकि लार में उपस्थित एन्जाइम टायलिन केवल पके स्टार्च पर ही कार्य करता है। स्टार्च के कणों का कोई निश्चित आकार नहीं होता है। इसके कुछ कण गोल, कुछ अण्डाकार तथा कुछ बेढंगी शक्ल के होते हैं।

(ब) डेक्सट्रीन (Dextrin): डेक्सट्रीन प्रकृति में प्रत्यक्ष रूप में नहीं मिलता है। जब स्टार्च युक्त पदार्थों को पकाया या भूना जाता है तो स्टार्च डेक्सट्रिन में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च का उद्विच्छेदन होने से स्टार्च पहले माल्टोज में, फिर डेक्सट्रिन में तथा अन्त में ग्लूकोज के रूप में प्राप्त होता है। इस प्रकार डेक्सट्रिन की प्राप्ति स्टार्च के उविच्छेदन से भी होती है। डबलरोटी या चपाती की बाहरी पपड़ी भीतरी भाग की अपेक्षा अधिक पाचनशील होती है।

(स) सेल्यूलोज (Cellulose): यह स्टार्च कोशिकाओं की बाहरी पर्त पर कड़े आवरण के रूप में उपस्थित रहता है। यह एक अत्यन्त जटिल पदार्थ है। इस कारण इसका शरीर में पाचन नहीं होता। सेल्यूलोज का भोज्य-मूल्य नहीं होता लेकिन भोजन में इसका होना अति आवश्यक है। सेल्यूलोज के रेशे आहार में भूसी की मात्रा बढ़ाते हैं जिससे आंत की मांसपेशियों में कुंचन गति (Penstalistic Movement) तेजी से होती है और मल आँत से आसानी से बाहर निकल जाता है। भूसी आँत में पानी शोषित करके फूल जाती है तथा बड़ी आँत को बली प्रदान करती है जिससे बड़ी आँत में मल आसानी से निकल जाता है। साबुत अनाजों, दालों, ताजे फलों एवं सब्जियाँ, सूखे मेवे आदि में सेल्यूलोज अधिक पाया जाता है। एक व्यक्ति को प्रतिदिन आहार में 4 से 7 मि. रेशा लेना चाहिए।

प्रश्न 4.
आहार द्वारा क्वाशिरक्योर का इलाज तथा मरस्मस रोग के लक्षण बताएँ।
उत्तर:
क्वाशिक्योर के रोगी को आहार देते समय निम्न दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए
1. आहार पाचनशील हो। शुरू के कुछ हफ्ते में सिर्फ तरल आहार देना चाहिए। तरल आहार में प्रोटीन, कैलोरीज तथा विटामिन अधिक मात्रा में हों।
2. जीवाणुनाशक तथा परजीवीनाशक दवाई देनी चाहिए।

आहार (Diet): बच्चे को शुरू में वसा रहित पाउडर दूध देना चाहिए। अच्छी तरह पकाए हुए अनाज, खिचड़ी, दाल का सूप आदि देना चाहिए । वसा युक्त भोज्य पदार्थ दूसरे या तीसरे हफ्ते से शुरू करना चाहिए। बच्चे को हरी पत्ते वाली पीली सब्जियाँ भी देनी चाहिए। इससे बच्चे को लौह, लवण, कैल्शिम, विटामिन ए आदि प्राप्त होंगे।

कैलोरीज (Calories): बच्चे को उसके भार के अनुसार कैलोरीज देनी चाहिए। प्रति किलो भार पर 140-150 कैलोरीज प्रतिदिन आहार में देनी चाहिए। अधिक कैलोरीज देने से बच्चा जल्दी स्वस्थ हो जाता है।

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प्रोटीन (Protein): प्रोटीन उस स्रोत से दी जाए जिसमें सभी आवश्यक अमीनो अम्ल उचित मात्रा में उपस्थित हों। प्रोटीन मुख्य रूप से प्राणी जगत् से दिया जाना चाहिए। प्रतिदिन प्रोटीन 3-5 ग्राम/कि.ग्राम के वजन में दिया जाना चाहिए।

विटामिन (Vitamin): विटामिन ए की कमी क्वाशिक्योर में अधिकांश रूप में देखी गई है। विटामिन ए की कमी की पूर्ति के लिए दवाई के रूप में विटामिन ए जैसे कॉड लिवर तेल (Cod liver oil) देना चाहिए। 50,000 IU विटामिन ए प्रतिदिन देना चाहिए।

अन्य खनिज लवण (Other minerals): मैग्नीशियम तथा पोटैशियम की कमी हो जाती है। प्रतिदिन बच्चे को 3-4 ग्राम पोटैशियम क्लोराइड तथा 5 से 10 ग्राम मैग्नीशियम क्लोराइड देना चाहिए। ये खनिज लवण तब तक देने चाहिए जब तक कि बच्चा पूर्ण रूप से स्वस्थ न हो जाए।

मरास्मस (Marasmus): मरास्मस का मुख्य कारण आहार में प्रोटीन व कैलोरीज दोनों की कमी या अभाव है। एक वर्ष के बच्चे अधिकांशतः इस बीमारी से पीड़ित होते हैं। छ: महीने के पश्चात् बच्चे को पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता अधिक होती है परन्तु उनको उस समय उचित आहार नहीं मिल पाता। इनके आहार में मुख्य रूप से चावल का समावेश रहता है जिससे न तो पूर्ण प्रोटीन मिलता है और न ऊष्मा की आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। इस आयु में बच्चों को अनेक संक्रामक बीमारियाँ भी होती हैं जिसमें डायरिया मुख्य है। डायरिया रोग में भोजन का पोषण ठीक प्रकार से नहीं हो पाता तथा बच्चा कमजोर होता जाता है।

बच्चा दो प्रकार के अभाव से पीड़ित होता है –
1. आहार की कमी।
2. आहार का पोषण उचित न होना। रोग के लक्षण (Symptoms of the disease)

1. माँसपेशियों का कमजोर होना-बच्चे की माँसपेशियाँ धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं तथा शरीर पर केवल अस्थि कंकाल ही रह जाता है। आहार में प्रोटीन की कमी के कारण माँसपेशियों में उपस्थित ग्लाइकोजिन (Glycogen) का निरन्तर उपयोग होता रहता है।

त्वचा में उपस्थित वसा जलकर शरीर को ऊष्मा प्रदान करती है। इस प्रकार शरीर में कार्बोज तथा वसा की कमी होती रहती है जिससे माँसपेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं।

2. वृद्धि रुक जाती है-बच्चे के शरीर का भार तथा लम्बाई अत्यन्त कम हो जाती है। इस दशा को बौनापन भी कहते हैं।

3. अन्य लक्षण-बच्चे का यकृत बढ़ जाता है जिसके कारण उसका पेट बाहर निकल आता है। शरीर में केवल आगे निकला हुआ पेट ही दिखाई पड़ता है। बच्चे की शक्ल बन्दर की तरह भयानक हो जाती है। त्वचा खुरदरी हो जाती है।

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उस पर घाव हो जाते हैं। पानी की कमी से त्वचा सूख जाती है और उस पर दरारें पड़ जाती हैं। त्वचा ढीली पड़ कर लटक जाती है। हाथ-पैर एकदम कमजोर हो जाते हैं। विटामिन ए के अभाव के कारण आँखों में खुरदरापन आ जाता है। बच्चों में रक्तहीनता भी हो जाती है क्योंकि नए रक्त कणों का निर्माण उस समय ठीक प्रकार से नहीं हो पाता।

4. रक्त में परिवर्तन-सीरम एल्ब्यूमिन की मात्रा की रक्त में कमी हो जाती है। आहार द्वारा इलाज (Treatment through diet): इसमें वही आहार तथा पौष्टिक तत्त्व देनी चाहिए. जो क्वाशिक्योर में दिए जाते हैं।
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प्रश्न 5.
विस्तार से प्रोटीन कैलोरी कुपोषण के लक्षण लिखें। उत्तर-प्रोटीन व कैलोरी कुपोषण से निम्न दो बीमारियों के लक्षण दिखाई पड़ते हैं
1. क्वाशिक्योर (Kwashikior) – यह मुख्य रूप से आहार में प्रोटीन की कमी के कारण होता है।
2. मरास्मस (Marasmus) – मरास्मस आहार में प्रोटीन तथा कैलोरी दोनों की कमी के कारण होता है।

1. क्वाशिक्योर (Kwashikior): डॉ. सिसले विलियम (Dr. Cicely William) ने क्वाशिक्योर रोग की खोज की और उन्होंने देखा कि यह रोग अधिकतर 1 से 3 वर्ष की अवस्था के बच्चों को होता है। उन्होंने बताया कि माता का दूध छुड़ाने के पश्चात् जब बच्चों को ऊपरी दूध नहीं मिलता तब उन्हें माँड (Starch) वाले भोजन देने शुरू किए जाते हैं, जिससे उनमें इस रोग के होने की सम्भावना रहती है।

इसके अतिरिक्त जिन बच्चों को शारीरिक आवश्यकता के अनुसार दूध नहीं मिलता और उन्हें जौ का पानी, साबूदाने का पानी या खिचड़ी दी जाती है जिसरं उनकी भूख शान्त नहीं हो पाती। उन्हें भी क्वाशिक्योर रोग हो जाता है। यह रोग अधिकतर गरीब तथा मध्यम वर्ग के बच्चों को जिन्हें शारीरिक आवश्यकतानुसार प्रोटीन नहीं मिल पाता, हो जाता है।

रोग के लक्षण (Symptoms of the disease): इस रोग से पीड़ित बच्चों के शरीर में निम्नलिखित लक्षण देखने में आते हैं –

  1. वृद्धि न्यूनता (Growth Failure): यह रोग का मुख्य लक्षण है। प्रोटीन की कमी के कारण शरीर की लम्बाई तथा भार कम हो जाता है।
  2. सूजन (Oedema): प्रथम पंजों तथा पैरों में सूजन आती है। तत्पश्चात् शरीर के अन्य भाग जैसे जाँघ, हाथ तथा मुख भी सूज जाते हैं । सूजन का मुख्य कारण रक्त में सीरम एल्ब्यूमिन की कमी है।
  3. चन्द्रमा के समान मुख (Moon Face): मुख चन्द्रमा के समान गोल हो जाता है । इसका मुख्य कारण मुख पर सूजन की उपस्थिति है।
  4. मानसिक परिवर्तन (Mental changes): मानसिक परिवर्तन के कारण रोगी में उदासीनता तथा चिड़चिड़ापन आ जाता है। रोग तीव्र होने के कारण रोगी आलसी व उदासीन हो जाता है। अपने आस-पास के वातावरण में किसी प्रकार की रुचि नहीं लेता।
  5. त्वचा तथा बालों में परिवर्तन (Skin and Hair changes): त्वचा रूखी, एवं खुरदरी हो जाती है।
  6. माँसपेशियों का क्षय होना (Muscle Wasting): शरीर की माँस-पेशियों का क्षय होने लगता है। इसका प्रभाव मुख्यतः हाथों पर पड़ता है।
  7. यकृत में परिवर्तन (Liver Changes): यकृत का आकार बढ़ जाता है जो कि Fatty Liver कहलाता है। वसा का पाचन ठीक नहीं हो पाता ।
  8. आमाशयिक आंत्रिक अंग पर प्रभाव (Gastro-Intestinal Tract): भूख कम हो जाती है। वमन तथा अतिसार खास लक्षण हैं। बच्चा. भोजन पचाने में असमर्थ होता है।
  9. रक्तहीनता (Anaemia): रक्तहीनता का मुख्य कारण लौह लवण तथा फेरिक अम्ल की कमी है।
  10. विटामिन की कमी (Vitamin Deficiency): विटामिन ए की कमी के लक्षण सामने आते हैं। राइबोफ्लेविन की कमी से होने वाले लक्षण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 6.
शरीर में वसा के प्रमुख कार्य कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
वसा हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है –
1. शरीर को ऊर्जा प्रदान करना (Give energy to the body): वसा का प्रमुख कार्य व्यक्ति को शक्ति तथा ऊर्जा प्रदान करना है। वसा कार्बोज और प्रोटीन से दुगुनी मात्रा में शक्ति व गर्मी प्रदान करती है। एक ग्राम वसा में 9 कैलोरी मिलती है।

2. अधिक मात्रा होने पर यह शरीर में जमा हो जाती है (Deposit as fat in the body): जब वसा शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच जाती है तो यह एकत्र होती रहती है। यह एडीपस (Adepose) तन्तुओं के रूप में शरीर में एकत्रित होती रहती है। जब कभी उपवास अथवा रुग्णावस्था में शरीर में वसा की कमी हो जाती है तो उस समय संचित की गई वसा ऑक्सीकरण (Oxidation) क्रिया द्वारा शरीर को गर्मी व शक्ति प्रदान करती है।

3. वसा तह का काम करती है (Fat actsas a layer): हमारा शरीर माँस से ढका रहता है, जिसे चर्म कहते हैं। इस चर्म के नीचे वसा एक तह के रूप में एकत्रित होती रहती है। जो ताप कुचालक होने के कारण शरीर की गर्मी का तापक्रम 88.4 FH बनाये रखता है।

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4. कोमल अंगों की रक्षा करना (Protection of delicate organs): शरीर के अन्दर अनेक कोमल अंग पाए जाते हैं, जैसे हृदय, फेफड़े, गुर्दे । इनके ऊपर वसा की दोहरी पर्त चढ़ी
रहती है। यह पर्त कोमल अंगों को झटकों से बचाती है ताकि चोट व आघातों से कोमल अंग सुरक्षित रहें।

5. वसा अनिवार्य अम्ल प्रदान करता है (Provide essential fatty acids): वसा अनिवार्य अम्ल जो स्वास्थ्य एवं शरीर निर्माण के लिए बहुत आवश्यक है, भोजन में उपस्थित वसा द्वारा प्राप्त होता है। यह शारीरिक वृद्धि व उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

6. वसा में घुलनशील विटामिन प्रदान करना (Provide fat soluble vitamin): वसा में घुलनशील विटामिन ए, डी, ई और के अवशोषण में सहायक होते हैं। भोजन में वसा की कमी की स्थिति में यह वसा विलेय विटामिन अवशोषण नहीं हो पाते हैं।

7. शरीर अंगों को स्निग्धता प्रदान करना (Provide lubrication to different organs): वसा हमारे विभिन्न अंगों जैसे पाचन संस्थान के अंगों को स्निग्धता प्रदान करते हैं।

8. भोजन को स्वादिष्ट बनाना (Makes food tasty): वसा का प्रयोग करके जब हम खाद्य पदार्थ पकाते हैं तो स्वादिष्ट होता है।

9. भूख से सन्तुष्टि प्रदान करना (Gives food a satisfy value): वसा का पाचन धीरे-धीरे विलम्ब से होता है जिसके कारण वसायुक्त भोजन अधिक समय तक आमाशय में स्हता है और भूख देर से लगती है।

10. कोशिकाओं की रचना में भाग लेते हैं (Take part in the formation of cell): कोशिका झिल्ली का भाग बनाते हैं। उसे पारगम्यता (Permebility) प्रदान करते हैं, जिससे पोषक तत्त्व उसमें होकर आसानी से अन्दर व बाहर आ-जा सकें।

प्रश्न 7.
विटामिन ‘ए’ के कार्य लिखिए।
उत्तर:
कार्य (Functions):
1. विटामिन ए की अनुपस्थिति में कई प्रकार के आँख से सम्बन्धित रोग हो जाते हैं। इन रोगों में से रात्रि-अन्धापन (night blindness) और जेरोफ्थालमिया Zerophthalmia) मुख्य हैं।

2. शारीरिक वृद्धि में सहायक होता है। इस विटामिन की विद्यमानता में शरीर की हड्डियाँ ठीक से पनपती हैं और उनकी लम्बाई यथोचित हो पाती है, जिससे व्यक्ति की शारीरिक वृद्धि सामान्य हो पाती है। हड्डियों के साथ-साथ यह अन्य अवयवों और अंग-प्रत्यंगों को भी विकसित करने में सहायक होता है। गर्भ में बच्चे के अंग-प्रत्यंगों को बनाने में मददगार होता है। इसीलिए इसे वृद्धिवर्धक कारक (Growth Promoting Factor) भी कहा गया है।

3. पृष्ठाच्छादक तन्तुओं या उपकला (epithelial tissues) के स्वास्थ्य के लिए-उपकला कोशिकाओं को मजबूत बनाने में और उनके पुनर्निर्माण में सहायक होता है। हमारी त्वचा की ऊपरी परत उपकला और शरीर के सभी खोखले अवयवों की भीतरी झिल्लियाँ तन्तुओं की बनी होती हैं।

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बाहरी उपकला धूप, गर्मी, सर्दी से शरीर की रक्षा करती हैं, भीतरी तन्तु श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में से निकलने वाले रसों की क्रियाओं में सहायक हैं। विटामिन ए की कमी से उपकला तन्तुओं की दशा अप्राकृतिक (abnormal) हो जाती है, त्वचा में रुखापन आ जाता है। समस्त त्वचा पर सींग के से उभार (Horny Structure) बन जाते हैं।

4. प्रोटीन को विभक्त करने वाले एन्जाइम्स की उत्पत्ति में सहायक होता है।

5. हार्मोन विशेषकर कोर्टीकोस्टीरान (Corticosteron) हार्मोन बनाने में सहायक होता है।

6. शरीर के अंगों पर कीटाणुओं के संक्रमण से बचाता है।

7. श्वास संस्थान की श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में विटामिन ए की कमी से परिवर्तन के फलस्वरूप मनुष्यों को तथा जानवरों को ब्रकोन्यूमोनिया तथा अन्य संक्रमण जनित रोग होने की बार-बार सम्भावना रहती है।

8. दाँत और मसूढ़े (Teeth & gums) दाँतों के ऊपर एनामेल (enamel) की पर्त चढ़ी रहती है जो दाँतों में चमकीलापन लाती है। यदि यह ठीक प्रकार से नहीं बनता तो दाँत पीले हो जाते हैं। एनामेल के निर्माण के लिए विटामिन ए का भोजन में पाया जाना आवश्यक है। इसके प्रभाव में मसूढ़े अस्वस्थ रहते हैं।

9. मूत्र नलियों (Urinary Tubes) में पथरी बनने की सम्भावना-प्रयोग द्वारा सिद्ध हो चुका है कि भोजन में विटामिन ए की मात्रा ठीक न लेने पर पेशावनलियों में पथरी (Stone) बन जाती है जिससे पेशाब रुक-रुक कर आता है। बाद में इसके परिणाम बड़े घातक सिद्ध होते हैं।

10. स्नायु संस्थान (Nervous System) विटामिन ए की कमी से स्पाइनल कॉर्ड (Spinal Cord) में टॉक्सिन (Toxin) पदार्थ उत्पन्न हो जाते हैं, जिनका प्रभाव सम्पूर्ण संस्थान पर पड़ता है। लैथरिज्म की बीमारी भी इस विटामिन की कमी से बताई जाती है। इस रोग में दोनों पैरों में Paralysis हो जाता है।

11. पाचन संस्थान (Digestive System) विटामिन ए के अभाव में मनुष्य की आमाशय में अम्ल का अभाव पाया जाता है, जिससे भोजन के पाचन में व्यवधान होता है।

12. यह कार्बोहाइड्रेट के उपापचयन में सहायता करता है।

प्रश्न 8.
विटामिन ‘ए’ के अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms) के बारे में विस्तार से लिखिए।
अथवा
यदि एक बच्चा लाल-पीले रंग की फल-सब्जियाँ और हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाता है तो उसे कौन-से तत्त्व की कमी हो जाती है ? उसके लक्षण लिखें।
उत्तर:
1. रात्रि अन्धापन या रतौंधी (Night Blindness): आँख का भीतरी भाग जिसे रेटिना (Retina) कहते हैं वह दो प्रकार के कोषों छड़ (Rods) और सूचियों (Lons) से मिलकर बना है। इसमें रंग देने वाले कण पाए जाते हैं। वह रंग देने वाले कण (Colour pigments) जो छड़ में हैं, उन्हें रोडप्सिन (Rhodopsin) कहते हैं।

सूचियों में पाए जाने वाले रंग कणों को इडाप्सिन (Idopsin) कहते हैं। यह दोनों प्रकार के रंग कण विटामिन ए और प्रोटीन से बनते हैं। छड़ मध्यम रोशनी को ग्रहण करते हैं और सूची तेज रोशनी तथा रंग ग्रहण करते हैं। अन्धेरे से उजाले में देखते हैं, तो प्रोटीन से रोडोप्सिन (Rhodopsin) संयुक्त (Combined) हो जाते हैं। विटामिन ए की थोड़ी-सी मात्रा नष्ट हो जाती है, पुन: रोडोप्सिन की भरपाई के लिए विटामिन ए की आवश्यकता पड़ती है।

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यदि भोजन में विटामिन ए की मात्रा की प्राप्ति उचित प्रकार से शरीर में नहीं हो पाती तो रात्रि अन्धापन का रोग होने की सम्भावना रहती है। तीव्र या मध्यम प्रकाश में देखने के पश्चात् धुंधले प्रकाश में हमें कुछ समय तक चीजें दिखाई नहीं देतीं। यदि इस विटमिन की कमी अधिक हो तो यह समय काफी अधिक हो जाता है और कमी बढ़ने के साथ-साथ धीमी रोशनी में दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जाता है।

2. जेरोफ्थालमिया (Zerophthalmia): इन रोग में अश्रु ग्रन्थियाँ ठीक प्रकार से काम नहीं करतीं। आँखों में शुष्कता (dryness) आ जाती है, जिससे खुजली का अनुभव होता है। आँखों में छोटी-छोटी फुन्सियाँ होकर पस पड़ने की सम्भावना रहती है। आँख का कॉर्निया (Cornea) वाला भाग शुष्क होकर पारदर्शी (Transparent) हो जाता है। आँख की गति में बाधा पहुँचती है।

ऐसी अवस्था में यदि विटामिन A की मात्रा की कमी अधिक बढ़ जाए तो अन्धापन आ जाता है। रोगाणु तीव्र गति से वृद्धि करने लगते हैं, क्योंकि अश्रु ही रोगाणुओं को आँख में प्रवेश नहीं करने देते हैं। संक्रमण के कारण कॉर्निया (काला भाग) में जख्म हो जाता है। आँख के सफेद भाग को ढकने वाली झिल्ली कनजक्टिवा (Conjuctiva) सूख जाती है तथा चमकहीन हो जाती है।

3.बीटोट्स बिन्द (Bitots Spot): कई बार जेरोफ्थाल्मिया के साथ-साथ बीटोट्स बिन्दु भी हो जाते हैं। विटामिन ए की कमी के कारण आँखों के भीतरी भाग की झिल्ली की पर्त पर भूरे अथवा सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। इनका आकार तिकोना होता है और ये कनजक्टिवा (Conjuctiva) से चिपक जाते हैं। कॉर्निया पर छोटी-छोटी फुन्सियाँ निकल आती हैं। उनमें रस पैदा होने लगता है इसलिए पलकें चिपक जाती हैं। बीटोट्स नामक व्यक्ति ने इसके बारे में 1863 ई० में प्रथम बार बताया था।

4 .किराटामलेसिया (Keratamalacia): यह रोग की अन्तिम स्थिति है, कॉर्निया अपारदर्शक हो जाता है, रक्तवाहिनियाँ सम्पूर्ण कॉर्निया को घेर लेती हैं। कॉर्निया लाल होकर सूज जाती है और घाव हो जाता है। संक्रमण (infection) आसानी से हो सकता है। कॉर्निया नष्ट हो जाती है तथा आँखों की रोशनी समाप्त हो जाती है। अश्रु ग्रन्थि ठीक प्रकार से काम नहीं करती, आँखें शुष्क हो जाती हैं और खुजली का अनुभव होता है।

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5. टोड त्वचा (Toad skin): विटामिन ए की कमी होने पर त्वचा में बहुत से परिवर्तन आते हैं जैसे त्वचा शुष्क, खुरदरी और चितकबरी हो जाती है। विशेषकर कन्धों, पेट, पीठ, गर्दन आदि पर बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं और यह मेंढक (Toad) की त्वचा के समान लगने लगती है।

6. अन्य परिवर्तन-नाक, गले, ट्रेकिया (Trachea), ब्रांकिस (Bronchis) की श्लेष्मिक झिल्ली सूख जाती है और उनमें रोगाणु के संक्रमण की आशंका बनी रहती है। पाचक रस कम मात्रा में स्रावित होते हैं तथा सभी पौष्टिक तत्त्वों के अवशोषण में रुकावट होती है।

प्रश्न 9.
विटामिन ‘ए’ के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): विटामिन ए हल्के-पीले रंग का और कैरोटीन लाल-पीले रंग का होता है। कैरोटीन पशु जगत और वनस्पतियाँ दोनों में पाया जाता है। कैरोटीन हरी पत्तेदार सब्जियों में भी पाया जाता है परन्तु इनके हरे रंग में पीला रंग घुल जाता है। डालडा (घी) जो हाइड्रोजनीकरण क्रिया द्वारा तेल से बनता है, ऊपर से विटामिन ए मिलाया जाता है। पशुजन्य पदार्थों में मछली के यकृत के तेल में सर्वाधिक पाया जाता है। दूध, मक्खन, पनीर, दही, यकृत आदि में भी पाया जाता है।

विटामिन
दुध, मक्खन, पनीर, दही, डालडा घी, अण्डे की जर्दी, यकृत, कॉड मछली का तेल।

कैरोटीन
सूखी खुमानी, आडू, शकरकन्द, आम, गाजर, पालक, टमाटर, पोदीना, धनिया की पत्ती, चकन्दर की पत्ती, हरी मटर आदि।

यह उन सब्जियों व फलों में पाया जाता है जो पीले रंग के हों जैसे गाजर, टमाटर, कद्, शकरकन्द, आम, खुमानी, आडू और हरी पत्तेदार सब्जियाँ। फलों व तरकारियों को जितनी अधिक धूप मिलेगी, उतना ही अधिक कैरोटीन उनमें पाया जाएगा।

अति उत्तम साधन (Rich Source): मछली का तेल।
उत्तम साधन (Good Source): मक्खन, घी, अण्डा, दूध का पाउडर।
अच्छे साधन (Fair Source): गाय या भैंस का दूध।

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शरीर में अवशोषण (Utilization in the body): विटामिन ए के शोषण में लगभग 5 घण्टे लगते हैं। भोजन में विटामिन और कैरोटीन प्राप्त होते हैं। छोटी आंत की दीवारों में ही कैरोटीन विटामिन ए में परिवर्तित होता है। विटामिन ए वसा के माध्यम से शरीर में पहुँचता है। इसलिए इसके अवशोषण के साथ-साथ वसा का अवशोषण अनिवार्य है। आवश्यकता से अधिक विटामिन का 99% भाग यकृत में जमा हो जाता है। विटामिन ए का विसर्जन आँखों में व्यर्थ पदार्थ के साथ हो जाता है।

प्रश्न 10.
विटामिन ‘डी’ के अभाव से होने वाली बीमारियों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms):
1. रिकेट्स (Rickets): यह रोग प्रायः पाँच वर्ष तक की आयु के बालकों को होता है। यह रोग भोजन में विटामिन डी, कैल्शियम या फॉस्फोरस लवण की कमी या सूर्य के प्रकाश की कमी के कारण होता है।

कारण:
1. कम या दोषपूर्ण भोजन, शैशवावस्था में डिब्बे के दूध का प्रयोग, ताजे दूध और वसायुक्त भोजन की कमी और माङयुक्त भोजन की अधिकता।
2. घर में अस्वस्थ वातावरण, ताजी शुद्ध वायु तथा सूर्य के प्रकाश की कमी।
3. यदि गुर्दो के कार्य में व्यवधान पहुंचता है तो गुर्दे से सम्बन्धित रोगों के कारण पेशाब के साथ फॉस्फोरस का विसर्जन बढ़ जाता है जिससे खून के फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ जाती है। इससे शरीर की वृद्धि रुक जाती है और अस्थियों (Bones) में विकृति देखने में आती है।

इसमें आँतों में वसा के शोषण की शक्ति नहीं रहती जिससे शरीर में कैल्शियम (Ca) तथा विटामिन डी के शोषण में बाधा होने के कारण अस्थियों का निर्माण नहीं हो पाता।

लक्षण (Symptoms): विटामिन डी की कमी से बालक की अस्थियों में कैल्शियम के एकत्र होने में व्याघात होता है। साधारणत: अस्थि में होने वाले परिवर्तन निम्नलिखित हैं –

1.चौकोर सिर-सिर की अस्थि-विकृत होकर चपटी और चौकोर हो जाती है और ललाट की अस्थि आवश्यकता से अधिक उभर जाती है।

2. कबूतरी वक्ष (Pigeon Chest): संधि-स्थल (Joints) से अस्थियाँ मोटी हो जाती हैं। पसली की अस्थियाँ (Ribs) छाती के दोनों ओर माला की तरह ढाँचा (Beaded Ribs) बना लेती हैं। फलस्वरूप कबूतर-सा सीना दिखाई देने लगता है।

3. झुका मेरुदण्ड (Spinal cord bends): मेरुदण्ड की अस्थि नर्म होकर लचक जाती है और कूबड़ (Kyphosis) निकल आता है, या मेरुदण्ड एक तरफ मुड़ जाता है।

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4. कोमल अस्थियाँ: अस्थियाँ कोमल होकर दबाव के कारण उनके टेढ़े और विकृत हो जाने का भय रहता है। जब बालक चलना आरम्भ करता है तो भार के कारण अस्थियाँ टेढ़ी हो जाती है। चपटे पैर, मोटे घुटने आदि विकृतियाँ इनके परिणाम हैं।

अन्य लक्षण (Other Symptoms):

  • बालक चिड़चिड़ा, थका व अप्रसन्न दिखाई देता है। मस्तिष्क पर पसीना आने लगता है। विशेषकर जब बच्चा सोता रहता है।
  • सामान्य अशक्तता और पीलापन-पेशियों का पूर्ण विकास नहीं होता और वे अशक्त रोगी हो जाते हैं। अस्थि बन्धन भी कमजोर पड़ जाते हैं, दूध के दाँतों के निकलने में देर होती है, और जब वे निकलते हैं तो आसानी से दूषित हो जाते हैं।
  • उभरा हुआ पेट-पाचनतन्त्र में भी गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है और पीले बदबूदार दस्त आने लगते हैं। कोमल तथा अशक्त पेशियों के परिणामस्वरूप पेट बाहर को निकल आता है।
  • रोग से बचने की शक्ति का कम हो जाना-जुकाम, खाँसी, शीघ्र ही हो जाते हैं और तरह-तरह के रोग सरलता से शरीर को जकड़ लेते हैं। विशेषकर फुफ्फुसों के रोग जैसे ब्रोन्काइटिस और निमोनिया आदि।

प्रश्न 11.
विटामिन डी के खाद्य स्रोत कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
विटामिन डी के स्रोत (Food Sources): विटामिन डी दो प्रकार से प्राप्त होता है –
1. विटामिन युक्त भोजन के खाने से।
2. चर्म द्वारा सूर्य की सीधी किरणें ग्रहण करने से।

1. यह केवल पशुजन्य भोज्य पदार्थों में पाया जाता है। यह किसी तरकारी में पर्याप्त मात्रा में नहीं पाया जाता। इसकी प्राप्ति मक्खन, मछली के जिगर के तेल, कुछ मछलियों, माँस तथा अण्डे की जर्दी से होता है। दूध में यह बहुत अल्प मात्रा में पाया जाता है।
कुछ खाद्यों में विटामिन डी:
मछली का यकृत तेल।
कॉड यकृत तेल।
शार्क यकृत तेल।
अन्य भोज्य पदार्थ।
मछली, अण्डा, अण्डे का पीला भाग, मक्खन, घी, दूध।

2. यह विटामिन सबसे अधिक सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें में पाया जाता है। यह किरणें निकलते हुए सूर्य की किरणों में सबसे अधिक होती हैं। प्रातःकाल अपने शरीर पर किरणों को ग्रहण करने से शरीर में विटामिन डी पहुंचता है। चर्म की भीतरी तह में स्थित वसा में एक पदार्थ होता है, जिसे आर्गस्ट्रॉल (Ergasterol) कहते हैं। जब चर्म पर सूरज की किरणें पड़ती हैं, तो वे वस्त्र की तह में प्रवेश कर जाती हैं और आर्गस्ट्रॉल को विटामिन डी में परिवर्तित कर देती हैं।

सूर्य के प्रकाश ग्रहण करने पर इस विटामिन की कमी को कुछ सीमा तक पूरा किया जा सकता है। यही कारण है कि घनीबस्ती वाले शहरों की अपेक्षा पहाड़ी स्थानों, समुद्र तट और गाँवों में रहने वाले व्यक्तियों के शरीर में विटामिन डी का निर्माण अधिक मात्रा में होता है। मुसलमान स्त्रियाँ बन्द अंधेरे कमरों में दिन व्यतीत करती हैं और बुरका पहनकर बाहर जाती हैं परिणामतः वे विटामिन डी के इस स्रोत के लाभ से वंचित रह जाती हैं।

अवशोषण (Absorption): यह चिकनाई में घुलनशील है, यह छोटी आंत से बहुधा वसा के साथ-साथ यकृत में पहुँचकर वहीं संगृहीत हो जाता है। इसका अधिकांश यकृत में और कम भाग अस्थियों, मस्तिष्क और त्वचा में जमा होता है। आवश्यकता होने पर इन भण्डारों से यह विटामिन रक्त में मिलकर सम्पूर्ण शरीर की कमी की पूर्ति करता है। दीर्घकाल तक इस संचित हुईं विटामिन पर निर्भर करना सम्भव नहीं। – पित्त रस (Bile) की उपस्थिति में स्निग्ध Lipid शोषण शीघ्र हो जाता है।

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प्रश्न 12.
विटामिन ‘बी-1’ (थायमिन) की कमी से होने वाले रोग के बारे में बताइए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms): थायमिन की कमी से बेरी-बेरी (Beri-Beri) रोग हो जाता है। प्रायः देखा गया है कि जिन लोगों का मुख्य भोजन चावल है, वे अधिकांश इस रोग से ग्रस्त रहते हैं। इसका कारण है जो चावल खाते हैं, वह मशीन से साफ किया हुआ होता है जिसके कारण यह चावल थायमिन रहित हो जाता है। इसके अतिरिक्त खाद्य तत्त्वों की कमी के कारण, गरीबी, अत्यधिक शारीरिक परिश्रम, संक्रमण जनित रोग, ज्वर, पाचन-सम्बन्धी विकार, गलत आदतें आदि कारणों से इस विटामिन का अभाव हो सकता है व रोग के लक्षण सामने आते हैं।

थायमिन की बहुत कमी होने पर बेरी-बेरी नामक रोग हो जाता है। यह रोग तीन प्रकार का होता है –
1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri)।
2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri)।
(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri)।
(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri)।
3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri)

1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri): फिलीपाइन द्वीप समूह तथा जापान में सर्वप्रथम बच्चों में यह रोग देखा गया । रोग के लक्षण तीसरे व चौथे सप्ताह में प्रकट होते थे। भूख की कमी, वमन, पेशाब कम मात्रा में होना, अतिसार और कब्ज भी हो सकता है। परिणामतः बच्चा निर्बल और बेचैन हो जाता है और पीला पड़ जाता है, शरीर पर मुख्यतः चेहरे, हाथों और पैरों पर सूजन आ जाती है, हृदय दुर्बल हो जाता है। शिशु रोता हुआ प्रतीत होता है परन्तु रोने की आवाज नहीं आती है, सांस लेने में कठिनाई होती है। माँसपेशियाँ सख्त हो जाती हैं और शीघ्र ही ऐंठन से पीड़ित होकर मृत्यु हो सकती है।

2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri): इसके साधारणतः निम्नलिखित लक्षण हैं –

  • पोलीन्यूराइटिसिस (Polyneuritisis)।
  • ओडीमा (Oedema)।
  • दिल की धड़कन बढ़ जाना (Disturbances of the heart)।

(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri): माँसपेशियों में सूजन आ जाती है। हाथों और पैरों में सनसनाहट, जलन तथा चैतन्य शून्यता आ जाती है, त्वचा में संवेदनशीलता नष्ट हो जाती है, रोग के तीव्र रूप धारण कर लेने पर रोगी उठ-बैठ भी नहीं सकता और चल भी नहीं सकता। शुष्क बेरी-बेरी में ओडीमा की सम्भावना अधिक होती है।

(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri): सर्वप्रथम पैरों में सूजन आ जाती है। फिर समस्त शरीर में धीरे-धीरे सूजन आने लगती है। सूजन का कारण कोशिकाओं में जल-जमाव है। सूजा हुआ स्थान दबाने पर वहाँ गड्ढा-सा पड़ जाता है तथा थोड़ी देर पश्चात् वह फिर पहले की तरह हो जाता है । श्वास उथली व धड़कन की गति बढ़ जाती है, शरीर की वृद्धि रुक जाती है तथा शक्ति क्षीण होती जाती है। बेचैनी, वमन या पेचिस भी हो सकती है। सहसा हृदय की गति बन्द हो जाने के कारण मृत्यु भी हो सकती है।

3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri): शराब का अधिक सेवन करने से भूख कम लगती है। विटामिन बी की हीनता हो जाती है जिससे बेरी-बेरी रोग हो जाता है। इस रोग के लक्षण प्रकट होने में साधारणत: दो से तीन महीने लग जाते हैं। प्रारम्भ में पाचन संस्थान संबंधी लक्षण प्रकट होते हैं-भूख न लगना, जी मिचलाना, वमन, पेट में अफारा, मलावरोध तथा दस्त आदि। बाद में रक्ताल्पता भी हो जाती है।

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प्रश्न 13.
विटामिन-‘बी1 (राइबोफ्लेविन) से होने वाले रोगों के बारे में बताइए।
उत्तर:
रोग के लक्षण (Effect of disease): प्रयोगों द्वारा ज्ञात हो गया है कि राइबोफ्लेविन के अभाव में व्यक्ति दुर्बल तथा वृद्ध जैसा दिखाई देने लगता है। यौवन का विकास अवरुद्ध हो जाता है। भोजन करने की इच्छा नष्ट हो जाती है तथा पाचन-शक्ति क्षीण हो जाती है, व्यक्ति अनेक चर्म और नेत्र रोगों का शिकार हो जाता है।

आँखों (Eyes) में-इसके अभाव में कॉर्निया (Cornea) के चारों ओर ललाई पैदा हो जाती है, आँखों में से पानी बहने लगता है, रोशनी अच्छी नहीं लगती। धीरे-धीरे ललाई बढ़ने लगती है और कॉर्निया पर छोटी-छोटी रक्त कोशिकाओं (Capillaries) का फैलाव होने लगता है। हमारे शरीर में कॉर्निया व आँख के लेंस ही ऐसे ऊतक हैं, जिन्हें अपने पोषण के लिए रक्त की आवश्यकता नहीं होती। अतः इनको पोषक तत्त्व अश्रु ग्रन्थि के स्राव ही से प्राप्त होते हैं।

अश्रुस्राव से पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जिससे शरीर की बचाव शक्ति कम हो जाती है। स्वाभाविक तौर पर कॉर्निया को समुचित पोषण प्राप्त कराने के लिए उसके चारों ओर अतिरिक्त रक्त कोशिकाओं का जाल बिछने लगता है और इसी कारण आँख में ललाई, रेतीले कणों के गिरने का सा आभास आदि होने लगता है। पलकें खुरदरी रहती हैं और दृष्टि भी अस्पष्ट होने लगती है।

मुँह (Mouth)पर: होठों के मिलन स्थान पर कटाव होने लगता है। होठों पर सफेद दाग पड़ने लगते हैं, जैसे-कीलोसिस (Cheilosis)। जिह्वा की सतह पर दरारें पड़ जाती हैं और उसमें जलन व दर्द होता रहता है। जुबान का रंग बैंगनी लाल-सा हो जाता है। भोजन खाने पर जीभ में पीड़ा तथा जलन होती है। अन्त में जुबान से श्लैष्मिक झिल्ली हट जाती है। इस अवस्था को ज्योग्रेफिकल रंग कहते हैं।

त्वचा (Skin)पर: त्वचा स्वस्थ नहीं रहती। खुजली, काले दाग व एक प्रकार का त्वकशोध (Dermatitis) होता है जिसमें से पानी निकलता रहता है। ऐसे त्वकशोध ललाट, नाक के दोनों ओर तथा बगल आदि पर होते हैं जिनमें खुजली होने लगती है।

प्राप्ति साधन (Food Sources): कुछ राइबोफ्लेविन आँतों में भी निर्मित होता है। यह विटामिन बहुत से प्राणिज और वानस्पतिक भोज्य पदार्थों में पाया जाता है।

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विभिन्न भोज्य पदार्थों में उपस्थितिः अति उत्तम स्रोत: यकृत (Liver), अण्डे का पाउडर (Egg powder), शुष्क खमीर (Yeast), दूध का पाउडर। उत्तम स्त्रोत: दूध, मछली, अण्डा, साबुत अन्न, मांस, फलियाँ, हरी पत्तेदार सब्जी। सामान्य स्रोत: मिल का अन्न, मूलकन्द, अन्य शाकसब्बी। दूध इस विटामिन का अच्छा साधन है परन्तु मक्खन व घी में यह विटामिन नहीं होता यह पानी में घुलनशील है और छाछ में रह जाता है।

शरीर में अवशोषण (Absorption in the body): इसके अवशोषण के लिए अमाशय में पाया जाने वाला आमाशयिक अम्ल विद्यमान होना अनिवार्य है। इसका शोषण आँतों में होता है, विटामिन का अधिकांश हृदय यकृत में संगृहीत होता है, शेष भाग का संग्रह रक्त तथा तन्तु कोषों में होता है। राइबोफ्लेविन के संग्रह की प्रतिक्रिया भोजन में पैटोथोनिक अम्ल तथा विटामिन बी, की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इसकी संगृहीत मात्रा एक निश्चित मात्रा से अधिक नहीं हो सकती है। मूत्र के माध्यम से यह शरीर से निष्कासित हो जाती है।

प्रश्न 14.
विटामिन सी के कार्य लिखें।
उत्तर:
कार्य (Functions):

  1. कोलेगन (Collagen) का निर्माण-कोलेगन (Collagen) का निर्माण एवं उसे उचित अवस्था में रखने का कार्य विटामिन सी का ही है। कोलेगन शरीर में बनाने वाले कोषों को पारस्परिक सम्बद्ध करने का साधन है। यह लम्बी हड्डियों के सिरे तथा दाँत के भीतर सीमेंट वाला भाग बनाता है। साधारण कोषों के बन्धक तन्तुओं को कोलेगन की आवश्यकता है। यह जख्म को भरने का भी कार्य करता है। विटामिन सी के अभाव में जख्म देर से भरता है।
  2. अमीनो अम्ल (Amino Acid) जैसे फिनाइल एलानिन व टाइरोसीन (Alanine & Tyrosin) का ऑक्सीकरण करने में सहायक होता है।
  3. लोहे (Iron) व कैल्शियम के अवशोषण कराने में सहायक होता है।
  4. एड्रिनल व थायराइड ग्रंथि (Thyroid gland) का स्राव बढ़ाने और अन्य ग्रन्थियों के हारमोन्स (Hormones) पैदा कराने में सहायक होता है। .
  5. रक्त धमनियों की भीतरी भित्तियों पर कोलेस्टेरॉल के जमाव को रोकता है।
  6. त्वचा प्रतिरोपण (Skin Grafting) की सफलता में अत्यधिक सहायक होता है।
  7. नाक, गले व सांस नलिकाओं की कोशिकाओं को दृढ़ता प्रदान करता है जिससे बार-बार नजला, जुकाम, खाँसी आदि न हों।
  8. यह विटामिन अस्थियों के स्वरूप, विकास और निर्माण के लिए अत्यन्त आवश्यक है। स्कर्वी रोग में अस्थियों के अन्तिम सिरे प्रभावित होते हैं।
  9. इसके अभाव में पुराने भरे हुए घावों के पुनः खुल जाने की सम्भावना रहती है।
  10. दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है। यह दाँतों के निर्माण एवं विकास में भी सहायता करता है।
  11. यह विटामिन मनुष्य को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।

प्रश्न 15.
जल में घुलनशील विटामिनों की प्राप्ति, आवश्यकता एवं प्रभाव के परिणाम लिखें।
उत्तर:
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प्रश्न 16.
कैल्शियम के कार्य विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
कैल्शियम के कार्य (Functions of Calcium)
1. फॉस्फोरस के साथ हड्डियाँ बनाने, बढ़ाने और ठोस व दृढ़ करने में काम आता है।

2. दाँतों की रचना में भी यह ऐसी ही भूमिका निभाता है।

3. शरीर वृद्धि कराता है। हड्डियों में जब वृद्धि होती है तो स्वाभाविक है कि शरीर वृद्धि भी हो।

4. सोडियम, पोटैशियम व मैग्नीशियम के साथ माँसपेशियों में संकुचन (Contraction) पैदा करता है, जिससे हमारे हाथ, पाँव, गर्दन, कमर व अन्य सभी अंग कार्य कर सकते हैं।

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5. आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव-निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है और एन्जाइम्स निर्माण में भी सहायक का कार्य करता है।

6. कोशिका झिल्ली की पारगम्यता पैदा करने में सहायक होता है।

7. रक्त का थक्के के रूप में जमना-रक्त में पायी जाने वाली सीरम में 100 मिली लीटर रक्त में 10 ग्राम कैल्शियम पाया जाता है। रक्त थक्के के रूप में परिवर्तित होने के लिए फाइब्रिन को फाइब्रीनोजन में बदलना पड़ता है।

इस परिवर्तन के लिए थ्रॉम्बिन एन्जाइम की आवश्यकता पडती है। यह थ्रॉम्बिन एन्जाइम प्रोथ्राम्बिन (Prothrombin) के रूप में निष्क्रिय दशा (Inactive Form) में रक्त में पाया जाता है। प्रोथ्राम्बिन को थ्रॉम्बिन में बदलने की क्रिया के लिए कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है।

8. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त हो तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स कहते हैं।

9. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है। इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाती हैं। इस दशा को आस्टोमलेश्यिा (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है।

10. दाँत सुडौलता रहित और कमजोर हो जाते हैं।

11. रक्त जमने में अधिक समय लगता है।

12. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

13. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

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प्रश्न 17.
कैल्शियम प्राप्ति के कौन-कौन-से साधन हैं ?
उत्तर:
कैल्शियम के साधन (Sources of Calcium): कैल्शियम की प्राप्ति निम्न वस्तुओं से होती है :

  • दूध और दूध से बनी चीजों में कैल्शियम पाया जाता है, क्योंकि दूध में कैल्शियम अकार्बनिक लवण के रूप में मिलता है।
  • यह अण्डे विशेषकर अण्डे की जर्दी वाले भाग में उपस्थित रहता है।
  • हरी पत्तीदार तरकारियों में प्रचुर मात्रा में मिलता है। पालक में आक्जेलिक अम्ल की मात्रा . अधिक होने से शरीर में कैल्शियम का शोषण नहीं हो पाता है।
  • कुछ मछलियों में भी कैल्शियम पाया जाता है। .. 5. सूखे फलों, मेवों जैसे बादाम गिरी में भी यह लवण उपस्थित रहता है।
  • दालों में थोड़ी मात्रा में पाया जाता है लेकिन तेल निकालने वाले बीजों में यह काफी मात्रा में पाया जाता है।
  • कुछ मात्रा में अनाजों द्वारा भी प्राप्त होता है। इनमें से रागी उत्तम साधन है।
  • अम्ल और क्षार की मात्रा को शरीर में एक-सा बनाए रखने का कार्य कैल्शियम करता है। शरीर में क्षार की मात्रा में वृद्धि हो जाने से अपच हो जाती है।

प्रश्न 18.
कैल्शियम की कमी से हानियाँ बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की कमी से हानि (Effect of Calcium deficiency):

1. कैल्शियम की कमी से शरीर छोटा रह जाता है।

2. हड्डियों का कैल्सीकरण अपूर्ण रहता है, जिसके फलस्वरूप वे निर्बल व लचकदार रहती हैं।

3. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त होत तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स (Rickets) कहते हैं।

4. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में कैल्शियम की माँग बढ़ जाती है। जब इसकी आवश्यकता की पूर्ति भोज्य पदार्थों द्वारा नहीं हो पाती तो इनकी पूर्ति के लिए गर्भवती तथा दूध पिलाती माँ की अस्थियों में से कैल्शियम का प्रत्याहरण होने लगता है। बच्चा अपने शरीर की वृद्धि के लिए कैल्शियम की आवश्यकता की पूर्ति माँ के शरीर में से कर लेता है।

इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाता । इसी दशा को आस्टोमलेशिया (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होती है।

5. दाँत सुडौलतारहित और कमजोर हो जाते हैं।

6. रक्त ‘जमने में अधिक समय लगता है।

7. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

8. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में से निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

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प्रश्न 19.
शरीर में लोहे के कार्य लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे के कार्य (Functions of iron in the body) :

  • यह रक्त में पाए जाने वाले तत्त्व हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है। जब रक्त की लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन समुचित मात्रा में होता है तब वह वांछित मात्रा में ऑक्सीजन अवशोषित कर कोशिकाओं में पहुँचाता है और कार्बनडाइऑक्साइड को शरीर के बार निकालता है
  • यह मांसपेशियों (Muscles) में पाए जाने वाले तत्त्व मायोग्लोबिन (Myoglobin) का आवश्यक तत्त्व है। मायोग्लोबिन में 3% लोहा रहता है।
  • लोहा प्रत्येक कोष में उपस्थित क्रोमेटीन पदार्थ का एक आवश्यक तत्त्व है।
  • शरीर में पाए जाने वाले कुछ एन्जाइम का लोहा एक आवश्यक भाग है।
  • लोहा तन्तुओं के ऑक्सीकरण (Oxidation) तथा कटौती (Reduction) की क्रियाओं में उत्प्रेरक के रूप में भाग लेता है।

प्रश्न 20.
आयोडीन (Iodine) के शरीर में क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
आयोडीन के कार्य (Functions of Iodine):

  • मनुष्यों के उचित शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए थाइरॉक्सिन (Thyroxin) अनिवार्य है। शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइरॉइड ग्रन्थि (Thyroid gland) में ये हारमोन न निकलने पर शारीरिक और मानसिक विकास की गति में बाधा पहुँचती है।
  • शरीर के कोषों में होने वाली ऑक्सीकरण की क्रिया की दर को थाइरॉक्सिन प्रभावित करता है। थाइरॉक्सिन आवश्यकता से अधिक निकलने पर शक्ति की दर की गति बढ़ जाती है जिससे शरीर दुबला हो जाता है। इसके विपरीत जब थाइरॉक्सिन शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइराइड ग्रन्थि में से नहीं निकलता तो शक्ति उपापचयन की दर की गति कम हो जाती है। अतः शरीर मोटा हो जाता है।
  • मनुष्यों और जानवरों की सन्तानोत्पादन शक्ति के लिए आयोडीन आवश्यक है।
  • आयोडीन की कमी से बालों की वृद्धि नहीं हो पाती अथवा बाल उगते ही नहीं।
  • आयोडीन के अभाव से प्रौढ़ व्यक्ति भी प्रभावित हो जाते हैं। वे सुस्त हो जाते हैं। उनके हाथ-पाँव सूज जाते हैं।

प्रश्न 21.
आयोडीन की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
उत्तर:
रोग (Diseases):
1. गलगण्ड (Goiter): आयोडीन की आवश्यकता शरीर में स्थित थायराइड ग्रन्थि (Thyroid Gland) की क्रियाशीलता को बनाए रखने के लिए होती है। इस ग्रन्थि से थायरॉक्सिन नामक हारमोन्स स्रावित होता है। शरीर में आयोडीन की कमी से यह हारमोन स्रावित होना बन्द हो जाता है और गले में घेघा निकल आता है, जिसे घेघा रोग कहते हैं। यह स्थिति अधिकतर किशोरावस्था या वयस्क महिलाओं में ही होती है। थायराइड ग्रन्थि का औसत वजन 25 ग्राम होता है, वह रोग की अवस्था में बढ़कर 200 से 500 ग्राम भी हो सकता है। घेघा बढ़ने पर यह दूर से ही दिख जाता है।

2. क्रोटिन (Cretinism): आयोडीन की कमी से बच्चों को क्रोटीन अथवा बौनापन (Cretinism) का रोग हो जाता है। बच्चों की वृद्धि, शारीरिक एवं मानसिक विकास रुक जाता है। त्वचा. मोटी और खुरदरी हो जाती है। चेहरे और समस्त शरीर में सूजन आ जाती है, त्वचा कार्य म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) गृह विज्ञान, वर्ग-119135 में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, चेहरे का भाव बिगड़ जाता है, जबान बड़ी हो जाती है, होंठ मोटे हो जाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी अवस्था में होठों का बन्द करना भी कठिन होता है।

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बच्चों की तरह बड़ों को मिक्सोडीमा (Myxoedema) का रोग हो जाता है। चेहरा भावहीन हो जाता है, हाथ-पाँव तथा चेहरे में सूजन आ जाती है। रोगी आलसी तथा सुस्त हो जाता है। आयोडीन की कमी से शरीर व दिमाग में और भी कई खराबियाँ पैदा हो सकती हैं जिनमें कुछ मामूली होती हैं तो कुछ खतरनाक जैसे, मानसिक विकृति, बहरा, गूंगापन, ठीक से खड़े न होना आदि।

प्रश्न 22.
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोग कौन से हैं?
उत्तर:
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोगपोषक तत्त्व | प्राप्ति स्रोत कमी से होने वाले रोग
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प्रश्न 23.
विभिन्न खाद्य वर्ग कौन-कौन से हैं वर्णन करें? [B.M. 2009 A]
उत्तर:
खाद्य पदार्थों में पौष्टिक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर उन्हें विभिन्न वर्ग में बाँटा गया है। जो निम्न प्रकार हैं-

  1. वर्ग-खाद्यान्न, अनाज-गेहूँ चावल, ज्वार बाजरा मक्का रागी एवं
  2. वर्ग-दाल एवं मेवा फलियाँ-सभी प्रकार की साबुत एवं घुली जाने तथा फलिया सूखी मेवा, मूंगफली, तिल बादाम इत्यादि।
  3. वर्ग-दूध और माँस-दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे पनीर, खोया, दही। मांस, मछली, अंडा।
  4.  वर्ग-फल और सब्जियाँ-फल विभिन्न प्रकार के विटामिन ‘ए’ एवं विटामिन ‘सी’ भरपूर होते हैं। सब्जियों को तीन भाग में बाँटा जा सकता है।
    (a) हरी पत्तेदार सब्जियाँ,
    (b) गहरी पीली एवं लाल सब्जियाँ,
    (c) जड़ वाली सब्जियाँ
  5.  वर्ग-चीनी और वसा-चीनी, शक्कर, गुड़, वसा, घी, तेल, मक्खन।

वर्ग 1 – कार्बोज शक्ति प्राप्त करने का सबसे उत्तम साधन है।
वर्ग 2 – प्रोटीन प्राप्ति का वानस्पतिक साधन है। दालों में 40 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। मेवे से प्राप्त प्रोटीन उत्तम कोटि का होता है।
वर्ग 3 – पशु से पाये जाने वाले प्रोटीन के आधार पर, बनाया गया है। इस वर्ग से प्राप्त प्रोटीन उत्तम श्रेणी का है । अंडा से प्राप्त प्रोटीन को ‘ए’ ग्रेड का प्रोटीन माना गया है।।
वर्ग 4 – फल इनसे विटामिन खनिज लवण पाया जाता है। सब्जियाँ इनसे विटामिन ‘ए’ बी तथा सी से प्राप्त किया जा सकता है । जड़ वाली सब्जियाँ में कार्बन अधिक पाया जाता है। इनमें विटामिन एवं खनिज लवण कम होता है।
वर्ग 5 – इस वर्ग के खाद्य समूह से ऊर्जा प्राप्त होती है। गुड़ से लौह तत्त्व प्राप्त होता है।

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प्रश्न 24.
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting selection of food)-उत्तम पोषण का महत्त्वपूर्ण आधार विभिन्न भोज्य पदार्थों का चुनाव होता है। अतः आहार में ऐसे भोज्य पदार्थों का समावेश आवश्यक है जो परिवार की पौष्टिक आवश्यकताओं के साथ-साथ पूर्ण सन्तुष्टि भी प्रदान कर सकें। किन्हीं दो परिवारों का आहार समान नहीं होता। भिन्न प्रान्तों, देश-विदेश में यह अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है। विभिन्न परिवारों की आहार-सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भिन्न खाद्य पदार्थों का चयन इसका एक प्रमुख कारण है।

यह चयन कई कारकों पर आधारित है, जो निम्न हैं –
1. परिवार के आहार सम्बन्धी मूल्य (Family Food Values): किसी खाद्य पदार्थ को अपने आहार में सम्मिलित करना न करना परिवार के आहार-सम्बन्धी मूल्यों पर आधारित होता है। आहार-सम्बन्धी मूल्य भौगोलिक स्थिति या जलवायु, धार्मिक विश्वास, परम्परा, दूसरों की नकल आदि के कारण बनते हैं। उदाहरणार्थ किसी प्रान्त में अनाज यदि जलवायु उत्तम होने से काफी मात्रा में पैदा होता है तो वहाँ रहने वाले लोगों को शाकाहारी भोजन (अनाज) से लगाव हो जाता है।

इसमें भी यदि गेहूँ अधिक होता है तो रोटी खाने की आदत पड़ जाती है, जैसे पंजाबियों में । आदिवासी तथा बंगाली इलाकों में मांस, मछली, शराब आदि की ओर लोगों का अधिक झुकाव रहता है। दक्षिण में चावल अधिक खाया जाता है। प्रत्येक परिवार की जीवन-शैली (Life-style) भी भिन्न होती है जो आहार-सम्बन्धी मूल्यों को प्रभावित करती है। जैसे एक दिन में खाए जाने वाले आहारों की संख्या व समय । किसी परिवार में तीन समय भोजन पकता है तो किसी में दो समय । यह मूल्य किसी भी परिवार के शाकाहारी या मांसाहारी होने को भी प्रभावित करते हैं।

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2. खाद्य पदार्थों की उपलब्धता (Availability of Food Stuffs): बहुत से खाद्य पदार्थों, विशेषकर फल और सब्जियों की उपलब्धता मौसम पर निर्भर करती है। मौसमी चीजें सस्ती होती हैं और पौष्टिक भी। सर्दियों में गाजर, मटर, गोभी, साग, शलगम आदि अधिक मात्रा में मिलते हैं तो गर्मियों में घीया, तोरी, पेठा, अरबी, टिंडा, शिमला मिर्च, करेले आदि। मौसम के अतिरिक्त स्थानीय उपज का प्रभाव भी खाद्य पदार्थों के चयन पर पड़ता है।

यह पदार्थ सस्ते, स्वादयुक्त और जलवायु के अनुकूल होते हैं। उदाहरणार्थ तटवर्ती क्षेत्रों में मछली तथा अन्य समुद्री पदार्थ आसानी से और सस्ते मिल जाते हैं। इसलिए यह इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के आहार का मुख्य अंग बन जाते हैं। आज यातायात के साधनों में वृद्धि, उचित संरक्षण और संग्रह के तरीकों के कारण खाद्य पदार्थों की उपलब्धि हर जगह काफी बढ़ गई है।

3. क्रय शक्ति (Purchasing Power): भोज्य पदार्थों का चुनाव उन्हें खरीदने की सामर्थ्य पर काफी हद तक निर्भर करता है। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, वैसे-वैसे व्यक्ति खाद्य पदार्थों चाहे वह मौसम के हों या बिना मौसम के, स्थानीय हों या अन्य प्रान्तों के, में से अपनी पसन्द के खाद्य पदार्थों का चयन कर सकता है, परन्तु निम्न आय वर्ग वाले व्यक्ति अपने भोजन में अधिक महँगे खाद्य पदार्थ सम्मिलित नहीं कर सकते, जैसे-दूध, मांस, फल आदि। इसलिए उन्हें ऐसे उपाय अपनाना आवश्यक है जिनसे कम कीमत में पौष्टिक आहार की प्राप्ति हो सके, जैसे-चीनी के स्थान पर गुड़, बादाम के स्थान पर मूंगफली का प्रयोग करना।

4. मिथ्या धारणाएँ: भोजन सम्बन्धी अन्ध-विश्वास कुछ ऐसी मान्यताओं को जन्म देते हैं जो गलत होती हैं । खाद्य पदार्थों का पोषक तत्त्वों के बारे में अज्ञानता के कारण विकास होता है। परम्परा से चले आए विश्वासों के कारण बातें अभी भी मान्य हैं। उदाहरणार्थ मछली खाने के बाद दूध पीने से चर्म रोग हो जाता है, चावल खाने से मोटापा बढ़ता है, सर्दी को भोजन से और बुखार को भूख से ठीक किया जा सकता है आदि। इस तरह की मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसके कारण हम भोजन का पूरा लाभ नहीं उठा पाते।

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5. संस्कृति (Culture): खाद्य पदार्थों का चयन धर्म, जाति व संस्कृति से प्रभावित होता है। जैसे पंजाबी के भोजन में मक्की की रोटी और साग, बंगाली के भोजन में चावल, मछली, दक्षिण भारतीय भोजन में सांभर, इडली आदि का अपना एक विशिष्ट स्थान है। – भोज्य पदार्थों की स्वीकृति में धर्म भी अपनी विशेष भूमिका निभाता है। जैसे कुछ सम्प्रदायों में मांसाहारी खाद्य पदार्थ खाने की सख्त पाबंदी है। कुछ में लहसुन, प्याज खाना मना है। इस्लाम धर्म में लोग सूअर का मांस नहीं खाते, हिन्दू धर्म में गौ का मांस नहीं खाते । धार्मिक त्योहारों पर विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। शुभ अवसरों पर कुछ मीठा बनाया जाता है आदि।

6. समवयस्कों या मित्रों का प्रभाव (Peer Group): भोजन के विषय में मित्रों और जान-पहचान वाले लोगों की स्वीकृति बहुत महत्त्व रखती है, विशेष रूप से किशोरों के लिए। कई खाद्य पदार्थ व्यक्ति केवल इसलिए खाता है क्योंकि उसके साथी खाते हैं। जैसे आजकल किशारों में अनुपयोगी व्यंजन (Junk goods), जल्द तैयार किये जाने वाले व्यंजन (Fast Foods), जैसे-पिज्जा, नूडल्ज आदि खाये जाते हैं।

मित्रगणों के प्रभाव से व्यक्ति दूसरे प्रान्तों, दूसरे देशों के लोगों द्वारा खाये जाने वाले खाद्य पदार्थ भी अपने आहार में शामिल कर लेते हैं। उत्तर भारत में इडली, डोसा, सांभर का अधिक प्रचलन तथा मांसाहारी व्यक्ति का शाकाहारी और शाकाहारी व्यक्ति का मांसाहारी हो जाना इसके उदाहरण हैं।

6. संचार माध्यम (Media): टी.वी., रेडियो, फिल्म, समाचार-पत्र, गोष्ठियों आदि के माध्यम से पोषण-सम्बन्धी जानकारी आम जनता तक पहुँचाई जाती है। लोग, विशेष रूप से गृहिणियाँ इन्हें पढ़ती, सुनती या देखती हैं। उनके ऊपर इनका काफी प्रभाव देखने को मिलता है। वह अपने परिवार के पोषण स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करती हैं और उत्तम पोषक पदार्थों को अपने आहार में शामिल करती हैं।

इन संचार माध्यमों का कई बार विपरीत प्रभाव भी देखने को मिलता है। आकर्षित विज्ञापनों से प्रभावित होकर कई बार बच्चे, किशोर आदि अपने आहार में उन वस्तुओं को ग्रहण करते हैं, जिनसे लाभ न होकर केवल धन का अपव्यय ही होता है। जैसे ठण्डे पेय पदार्थ (Soft Drinks), नूडल्स (Noodles), टॉफी और चॉकलेट आदि।

प्रश्न 25.
संतुलित आहार किसे कहते हैं ? भिन्न-भिन्न खाद्य वर्गों का भोजन में क्या योगदान है ?
उत्तर:
संतुलित आहार वह आहार है जिसमें सभी पोषक तत्त्व-कार्बोज, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, विटामिन और जल उचित मात्रा में प्राप्त हों । आहार मनुष्य की केवल भूख ही नहीं मिटता बल्कि उसे पूर्णतः स्वस्थ, नीरोग एवं पुष्ट बनाए रखता है। इसके अतिरिक्त कुछ अधिक पोषक तत्त्व भी शरीर को मिलते हैं जो आपातकाल में प्रयोग किए जाते हैं। परिभाषा के अनुसार, संतुलित भोजन अधिक पोषक तत्त्व एकत्र कर देता है ताकि कभी-कभी असंतुलित भोजन का प्रभाव न पड़े।

खाद्य वर्ग (Food Groups): भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने खाद्य पदार्थों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा है :
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वर्ग 1. खाद्यान्न, अनाज और इसके उत्पाद (Cereals, grains and its products): अनाज कई प्रकार का होता है तथा गुणवत्ता और पसंद के अनुसार चुना जा सकता है। भारत में आमतौर से प्रयोगों में आने वाले अनाज गेहूँ, चावल, रागी, ज्वार और बाजरा हैं। खाद्यान्न में तीन हिस्से हैं, जैसे भूसा, बीज और भ्रूणपोष। अधिकतर भोजमों में खाद्यान्न की मात्रा अधिक होती है और इस प्रकार यह भोजन में कैलोरी देने वाला मुख्य साधन है। – खाद्यान्नों में अलग-अलग प्रोटीन की मात्रा होती है।

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आमतौर पर प्रयोग में लिये जाने वाले खाद्यान्नों की प्रोटीन निम्नलिखित हैं –
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खाद्यान्नों के प्रोटीन शारीरिक क्रिया के लिए उत्तम नहीं हैं क्योंकि उनमें लाइसिन, मिथियोनिन, ट्रिप्टोफन और थ्रीओनिन जैसे अमीनो अम्ल बहुत कम होते हैं। खाद्यान्न की प्रोटीन मात्रा सुधर जाती है जब इनको प्रोटीनयुक्त खाद्यों के साथ मिलाया जाए, जैसे चावल और दाल, चावल और मांस या रोटी और दाल इत्यादि। खाद्यान्नों से काफी मात्रा में खनिज लवण मिल जाते हैं। हड्डियों और दांतों को स्वस्थ रखने के लिए ये कैल्शियम और फॉस्फोरस देते हैं। रागी तो कैल्शियम का भरपूर स्रोत है। हर 100 ग्राम वाले खाने के हिस्से में 344 मि० ग्राम कैल्शियम होता है।

बाजरा में लोहा होता है तथा अक्सर भोजन में लेने से लाभदायक सिद्ध हो सकता है। खाद्यान्न में विटामिन A और C की कमी होती है। पीली मक्की में कैरोटीन होती है। खाद्यान्नों को अंकुरित करने से उनमें विटामिन सी की मात्रा बढ़ जाती है। भूसी और बीज में बी-समूह के विटामिन काफी मात्रा में होते हैं। खाद्यान्नों को दलने, पालिश करने से बी-समूह के विटामिन नष्ट हो जाते हैं। सेला करते समय विटामिन अंदर के हिस्से में चला जाता है तथा दलने के समय अधिक विटामिन नष्ट नहीं होता। भूसी रूक्षांश देता है जो शरीर के उपापचय क्रिया में सहायक होता है।

कुछ कंदमूल हैं-आलू, शकरकंद, टपायका, जिमीकंद और कचालू। ये सभी स्टार्चयुक्त खाद्य आसानी से पच जाते हैं। ताप उसकी रासायनिक संरचना बदल देता है। स्वाद व आकार भी बदल जाता है। कंद और मूल कुछ समय के लिए खाद्यान्न का स्थान ले सकते हैं। भगवान राम अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान कंद-मूल-फल खाकर ही जिये थे। यहां पर कन्द का अर्थ है टपायका, यह केरल में अधिक मात्रा में उगता है तथा इसमें स्टार्च और कैलोरी की मात्रा भरपूर होती है। आलू सबसे सामान्य कंद-मूल है तथा विश्व भर में लोग इसे पसन्द करते हैं। भोजन की अधिकांश कैलोरी इसी वर्ग में पायी जाती है।

वर्ग – 2. दालें और फलियाँ (Pulses and Legumes): दालों के प्रोटीन स्तर में तथा मात्रा में खाद्यान्न की प्रोटीन से बेहतर होती है। दालों में मिथिओनीन अमीनो अम्ल की कमी होती है। अरहर में तो ट्रिपटोफन भी कम होती है। जब दालों को खाद्यान्नों के साथ खाया जाता है तो इनका पौष्टिक स्तर बढ़ जाता है। लगभग 40 प्रतिशत दालों में थायमिन और फोलिक अम्ल जैसे विटामिन काफी मात्रा में पाए जाते हैं। चीनी लोग सोयाबीन की कई प्रकार की चटनी तथा पेस्ट प्रयोग करते हैं।

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सोयाबीन की थोड़ी मात्रा भी शारीरिक क्रिया के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो सकती है। दालों में विटामिन C की कमी होती है। अंकुरित करने से दालों में विटामिन C की मात्रा बढ़ जाती है तथा उनका आकार बदल जाता है, पाचन क्षमता सहज हो जाती है तथा लोहा और बी-समूह के विटामिन’ भी बढ़ जाते हैं। गिरियां और तेल के बीज वसा और प्रोटीन की मात्रा से भरपूर होते हैं । गिरियों में से वसा निकल जाने के बाद प्रोटीन अधिक हो जाते हैं। यह वर्ग मरम्मत के लिए प्रोटीन देते हैं। यह प्रोटीन के सस्ते स्रोत हैं।

वर्ग – 3. दूध और मांस के उत्पाद (Milk and Meat Products): स्तनधारियों के दूध लैक्टोज, लैक्टलबूमिन और लैक्टोग्लोबिन की मात्रा से भरपूर होते हैं । दूध में सारे आवश्यक पोषक तत्त्व होते हैं। इसीलिए इसे पूर्ण आहार कहा जाता है। दूध में विटामिन सी और लोहा कम होता है । लैक्टोज कम मीठा तो होता है, किन्तु लैक्टिक अम्ल जीवाणु की वृद्धि में भी सहायक है। इस प्रकार रोगग्रस्त जीवाणु की वृद्धि को यह रोकता है। दूध से बी-समूह के विटामिन अच्छी मात्रा में मिल जाते हैं विशेषकर थायमिन, राइबोफ्लेविन और पायरीडोक्सिन। बी-समूह के विटामिन रोशनी में नष्ट हो जाते हैं।

इसलिए यह अच्छी आदत है कि दूध को साफ, ठंडे, ढके हुए और अंधेरी जगह में रखा जाए। आप अपनी आवश्यकता के अनुसार सम्पूर्ण क्रीमयुक्त, मानक और टोन्ड दूध ले सकते हैं। उपभोग के लिए पाश्चुराइज्ड या मानकीकृत दूध लेना सुरक्षित है। दही-दूध को ‘जमने’ के लिए थोड़ी दही डालकर कमरे के ताप पर 4-12 घंटे तक रखने से दही बन जाता है। दही किसी भी प्रकार के दूध से बनाया जा सकता है। पाउडर से दूध बनाकर उसकी दही बना सकते हैं। दही को मथने से मक्खन बनाया जा सकता है। मक्खन दूध की अपेक्षा आसानी से पच जाता है। पनीर-दूध को दही, नींबू जूस, सिरका या सिट्रिक अम्ल से क्रिया करके पनीर प्राप्त होता है।

पनीर अवक्षेपित प्रोटीन है तथा इसमें वसा और लैक्टोज लगभग बिल्कुल नहीं होता। पनीर को पचाने की आवश्यकता नहीं होती तथा वह आसानी से पच जाता है। पनीर निकलने के बाद बचे हुए तरल को दही का पानी या छाछ (Whey) कहते हैं। छाछ में खनिज लवणों व दूध की वसा की भरपूर मात्रा होती है। इससे करी या ग्रेवी बनाना अच्छा तरीका है। प्रोसेस्ड पनीर वह पनीर है जो सन्तुलित अवस्था में बनाया जाता है। प्रोसेस्ड पनीर में पनीर से अधिक मात्रा में वसा होती है। इसलिए मोटे व्यक्तियों को इससे परहेज करना चाहिए। दूध और दूध के उत्पाद भोजन में कैल्शियम और विटामिन A का योगदान देते हैं।

मांस. उत्पाद (Meat Products): अंडे, मांस और मछली में उत्तम प्रकार के प्रोटीन होते हैं। हर प्रकार के मांस में रेशेदार जुड़ने वाले तन्तु होते हैं जो कोलेगन से भरपूर होते हैं। मीट को पकाने पर कोलेगन जैलेटिन में बदल जाता है। माँस में लोहा और फॉस्फोरस भी काफी मात्रा में होते हैं। अंगों के माँस (यकृत, हृदय, गुर्दे) विटामिन A की अधिक मात्रा उपलब्ध कराते हैं। अंडों का प्रोटीन आसानी से शरीर में एकत्र हो जाता है।

सफेद माँस यानि कि मछली और मुर्गा को लाल माँस से बेहतर समझता जाता है और रोगियों तथा हृदय रोगियों के लिए उचित होता है। सामान्य माँस पदार्थ, हैम (ham), सौसेजिस (Sausages), सलामी (salami) और मछली होते हैं। इस वर्ग से उत्तम प्रोटीन मिलता है जो कि शारीरिक विकास और तन्तुओं की मरम्मत की योग्यता रखती है। अंडे व अंगों का मीट लोहे का भरपूर स्रोत है, इसलिए यह रक्त का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। यह ऑक्सीकरण क्रियाओं के लिए उत्तरदायी है।

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वर्ग 4. फल और सब्जियाँ (Fruits and Vegetables): फलों का भोजन में एक विशेष स्थान है। भिन्न-भिन्न प्रकार के स्वाद व सुगन्धों वाले फल उपलब्ध हैं। पके आम, पपीता और अंजीर विशेषकर कैरोटीन से भरपूर फल हैं। संतरे तथा नीबू प्रजाति के फलों में विटामिन C की मात्रा भरूपर होती है। ताजे फलों का रस स्वस्थ मसूड़ों, दांतों के लिए है। इसके अतिरिक्त घाव को शीघ्रता से भरना तथा साफ चेहरे के लिए भी फलों का रस आवश्यक है।

केला कार्बोज का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। अफ्रीका में बच्चे अधिक केले खाते हैं और इसलिए क्वाशियोरकर रोग से ग्रस्त होते हैं। सेबों व आलू बुखारों में पैक्टिन की भरपूर मात्रा होती है जो जैम और जैली बनाने के लिए आवश्यक है। फलों से फल-शर्करा औरे लैवरोलोज मिलता है। वह कुछ रूक्षांश भी देते हैं जो शारीरिक क्रिया संतुलित करता है। फलों की तरह सब्जियों में भी कई किस्में होती हैं।

सब्जियाँ आकार में, स्वाद में, सुगंध में और पोषक तत्त्वों की मात्रा में भिन्न-भिन्न होती हैं। वह मौसम के कारण भी भिन्न होती हैं। पौधों के विभिन्न हिस्से सब्जियों की तरह खाए जाते हैं। पत्ते-पालक, चौलाई, पुदीना, धनिया, मेथी और सलाद इत्यादि । कंद और मूल-प्याज, शलजम, मूली और आलू। फल-बैंगन, भिंडी, खीरा, चिचिण्डा और अन्य कदू वर्गीय पदार्थ। फूल-फूल गोभी, कचनार और केले के फूल । हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्शियम और लोहे के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

इनकी पर्याप्त मात्रा इन सब्जियों से प्राप्त हो जाती है। अधिकतर पत्तेदार सब्जियों में राइबोफ्लेविन भरपूर मात्रा में होती है। इनके सेवन से मुखपाक अर्थात् होठों के फटने (Cracking of lipsat-the cover of mouth) की चिन्ता नहीं रहती। अधिक रेशों की मात्रा होने के कारण हरी पत्तेदार सब्जियां सारक का काम करती हैं। इनमें ऑक्जीलेट की मात्रा बहुत अधिक होती है जो कि लोहा, कैल्शियम, तांबा व मैग्नीशियम के अवशोषण में बाधा डालते हैं। जड़ वाली सब्जियों में कार्बोज व कैरोटीन की भरपूर मात्रा होती है। सब्जियों में विटामिन C भी भरपूर होता है। विटामिन A और C दालों में कम होता है। दालों व अनाज के साथ सब्जियों का खाना भोजन की पौष्टिकता बढ़ा देता है। सब्जियां भिन्नता देती हैं तथा भोजन को आकर्षक बनाती हैं।

वर्ग 5. वसा और शर्करा (Fats and Sugars): वसा, मक्खन और घी की तरह भोजन को स्वादिष्ट तो बनाती ही है, वसा में घुलनशीन विटामिन भी हैं तथा यह कैलोरी भी देती है। कुछ लोग पशुजन्य वसा को भी पकाने का माध्यम बनाते हैं। तेल व वसा महंगे होते हैं। इसी कारण गरीब लोग 20 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा इनसे नहीं लेते। भोजन में वसा अमीर लोग अधिक खाते हैं जिससे अक्सर मोटापा तथा हृदय रोग पनपते हैं। अधिकतर तेलों में विटामिन नहीं होते।

लाल खजूर का तेल अलग है तथा उसमें विटामिन A (कैरोटीन) होता है। आर्थिक कारणों से तेल का भोजन में अधिक प्रयोग होता जा रहा है। तेलों में रक्त के कालेस्ट्रॉल स्तर को कम करने की क्षमता भी होती है। शर्करा-सुक्रोज साफ, सफेद पदार्थ है जिसमें न कोई अशुद्धता है और न ही कोई पोषक तत्त्व। अधिक शर्करा के प्रयोग से दाँतों के रोग में वृद्धि होती है। गुड़ में प्राकृतिक सुगंध होती है तथा कुछ मात्रा में खनिज लवण और विटामिन भी होते हैं तथा अधिक कैलोरी देती है। मिठाइयाँ अपने स्वाद के लिए मशहूर हैं, इसीलिए भोजन के बाद मीठा खाने की महत्ता है।
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यह अति आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रतिदिन भोजन में इन सभी खाद्य वर्गों से पदार्थ मिलाए । ऐसे भोजन में सभी पोषक तत्त्व अपना संतुलन बनाए रखते हैं। ऐसे भोजन को संतुलित आहार कहते हैं।

प्रश्न 26.
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting nutritional requirement) :
1. आयु (Age): बच्चों को उनके शरीर-भार को देखते हुए प्रौढ़ों की अपेक्षा अधिक मात्रा में भोज्य तत्त्वों की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनका शरीर वृद्धि की अवस्था में होता है। वृद्धावस्था में आहार की मात्रा और पोषक तत्वों की आवश्यकता कम हो जाती है क्योंकि शारीरिक क्रियाएँ शिथिल पड़ जाती हैं।

2. लिंग (Sex): सामान्यतः स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा कम आहार की आवश्यकता होती है क्योंकि वह पुरुषों की अपेक्षा लम्बाई व भार में कम होती हैं तथा शारीरिक श्रम भी कम करती हैं।

3.  शरीर का आकार और बनावट (Size and Composition of the Body): लम्बे व भारी मनुष्य के शरीर में मांसपेशियाँ और ऊतक अधिक होते हैं, अतः उनकी भोजन की आवश्यकता ठिगने व दुबले-पतले मनुष्य की अपेक्षा अधिक होती है।

4. जलवायु (Climate): ठण्डे प्रदेशों में आहार की आवश्यकता गर्म प्रदेशों की अपेक्षा अधिक होती है क्योंकि शरीर के ताप को बनाए रखने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता अधिक होती है। यही कारण है कि हम सर्दियों में अधिक खाते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

5. व्यवसाय (Occupation): अधिक शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्तियों को कम श्रम करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत मानसिक श्रम अधिक रखने वाले व्यक्तियों को अधिक प्रोटीन और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

6. विशेष शारीरिक अवस्थाएँ (Specific Body Conditions): कुछ विशेष शारीरिक अवस्थाएँ पोषक तत्त्वों की आवश्यकता को प्रभावित करती हैं। जैसे-गर्भावस्था तथा स्तनपान की अवस्था में पोषक तत्त्वों की माँग काफी बढ़ जाती है।

ऑपरेशन के बाद की अवस्था व जल जाने की अवस्था में शरीर-निर्माणक तत्त्वें विशेष रूप से प्रोटीन की आवश्यकता अधिक रहती है। सन्तुलित आहार सर्वोत्तम आहार है परन्तु इसका तात्पर्य महँगा आहार नहीं है क्योंकि खाद्य पदार्थों की कीमत उनके उपलब्ध होने पर और मौसम पर निर्भर करती है न कि पौष्टिकता पर। अतः कम धन से भी सन्तुलित आहार की प्राप्ति की जा सकती है।

इसके लिए आवश्यकता है समान पोषक मूल्यों के सस्ते साधनों को जानने की। जैसे बादाम की जगह मूंगफली का प्रयोग करना। दूध की जगह दालों से प्रोटीन प्राप्त करना। महँगे भोजन भी असन्तुलित हो सकते हैं, जैसे बेमौसमी खाद्य पदार्थ। सन्तुलित आहार ग्रहण करने पर शरीर द्वारा उसका उपयोग हो सके इसके लिए यह ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है कि आहार पाचनशील, स्वादयुक्त, ताजा और दूषण रहित हो।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 11 भोजन के कार्य

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 11 भोजन के कार्य Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 11 भोजन के कार्य

Bihar Board Class 11 Home Science भोजन के कार्य Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक ग्राम प्रोटीन शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग कैलोरी उत्पन्न करता है –
(क) 4 कैलोरी
(ख) 2 कैलोरी
(ग) 6 कैलोरी।
(घ) 8 कैलोरी
उत्तर:
(क) 4 कैलोरी

प्रश्न 2.
विटामिन ‘C’ का सबसे बढ़िया स्रोत है –
(क) आँवला
(ख) संतरा
(ग) नींबू
(घ) दूध
उत्तर:
(क) आँवला

प्रश्न 3.
मानव शरीर में अमीनो अम्ल होते हैं –
(क) 22
(ख) 23
(ग) 25
(घ) 26
उत्तर:
(क) 22

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प्रश्न 4.
अंडे की सफेदी में मिलता है –
(क) अल्बुमिन
(ख) ग्लोबिन
(ग) फाइबरिन
(घ) जेलिटिन
उत्तर:
(क) अल्बुमिन

प्रश्न 5.
चांवल में उपस्थित प्रोटीन –
(क) ओराजेनिन है
(ख) होरडेनिन है
(ग) ग्लूटेनिन
(घ) ग्लायडिन
उत्तर:
(क) ओराजेनिन है

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शरीर वर्धक तत्त्व कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन, खनिज लवण व जल शरीर की वृद्धि एवं मरम्मत हेतु आवश्यक हैं इसलिए इन्हें शरीरवर्धक तत्त्व भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर:
बाहरी व आन्तरिक क्रियाओं को सम्पादित करने हेतु शरीर को ऊर्जा चाहिए।

प्रश्न 3.
1 ग्राम कार्बोज, वसा व प्रोटीन हमारे शरीर में कितनी ऊर्जा देती हैं ?
उत्तर:
1 ग्राम कार्बोज, वसा व प्रोटीन हमारे शरीर में क्रमशः 4 कैलोरी, 9 कैलोरी व 4 . कैलोरी ऊर्जा देते हैं।

प्रश्न 4.
भोजन के स्वरूप का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
1. शारीरिक कार्य।
2. मनोवैज्ञानिक कार्य।
3. सामाजिक व सांस्कृतिक कार्य।

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प्रश्न 5.
शरीर में ऊर्जा की आवश्यकता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यक्ति की जीवन क्रियाएँ, जैसे सांस लेना, परिसंचरण, पाचन और चूसना, सोखना के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
शारीरिक कार्यों के आधार पर चार विभिन्न तरह के भोजन कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • ऊर्जा प्रदान करने के लिए भोजन
  • शरीर के निर्माण के लिए भोजन
  • संरक्षात्मक भोजन
  •  नियंत्रित भोजन।

प्रश्न 7.
मनोवैज्ञानिक कार्य का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
भोजन व्यक्ति की भावात्मक आवश्यकता को पूरा करता है। जब कोई प्रसन्न होता है या मित्रों की संगति में होता है तो वह अधिक खाना खाता है।

प्रश्न 8.
शरीर की सुरक्षा तथा नियंत्रण में किन तत्त्वों का विशेष महत्त्व है ?
उत्तर:
शरीर की सुरक्षा तथा नियंत्रण हेतु विटामिन, खनिज लवण, जल और प्रोटीन का विशेष महत्त्व है। इसके अतिरिक्त शरीर के नियंत्रण हेतु फोक का अपना विशेष स्थान है।

प्रश्न 9.
हमें अपने आहार में अधिकांश वसायुक्त पदार्थों को क्यों नहीं सम्मिलित करना चाहिए?
उत्तर:
वसायुक्त पदार्थ सबसे अधिक ऊर्जा देते हैं। 1 ग्राम वसा 9 कैलोरी यानि कार्बोज से सवा दो गुणा अधिक कैलोरी देता है। यदि हम कैलोरी प्राप्ति हेतु शरीर की आवश्यकता वसा द्वारा पूरी कर लें तो अन्य तत्त्वों का अभाव रह जाएगा और हम रोगग्रस्त हो जाएंगे।

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प्रश्न 10.
भोजन में दीर्घजीवी और नैतिकता का परस्पर संबंध लिखें।
उत्तर:
अच्छा भोजन ज्यादा जीवन जीने के अवसर बढ़ा देता है। गन्दा भोजन बीमारियाँ फैलाता है। अस्वस्थ जीवन मृत्यु का कारण बन सकता है।

प्रश्न 11.
भोजन को पौष्टिक तत्त्वों के कार्यों के आधार पर किस प्रकार विभाजित किया जा सकता है ?
उत्तर:
पौष्टिक तत्त्व – कार्य
1. प्रोटीन – शारीरिक वृद्धि
2. कार्बोज, वसा – ऊर्जा देना
3. विटामिन – रोगों से बचाव
4. खनिज लवण – शारीरिक कार्यों पर नियंत्रण

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन व हमारी भावनाओं (Food & Emotions) में आपसी क्या सम्बन्ध है ?
अथवा
भोजन हमें मानसिक संतोष (Mental Satisfaction) कैसे प्रदान करता है ?
उत्तर:
भोजन न केवल शारीरिक व सामाजिक कार्य ही अदा करता है परन्तु यह मनोवैज्ञानिक कार्य करने में भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि हमारे लिए कोई भी व्यक्ति मनपसन्द वस्तु बना कर परोसता है तो हमें प्रसन्नता होती है। भोजन के माध्यम से वह अपने प्रेमभाव और मैत्री को व्यक्त करता है। अतः भोजन हमें मानसिक संतोष भी प्रदान करता है। जैसे एक बच्चा माँ की गोद में दूध पीकर सुरक्षित महसूस करता है।

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प्रश्न 2.
भोजन व त्यौहार (Food & festivals) का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
प्रत्येक त्यौहार में भोजन का अपना विशिष्ट महत्त्व है क्योंकि भोजन उत्सवों और त्यौहारों का अभिन्न अंग है। प्रत्येक त्यौहार में विशेष पकवान बना कर ही त्यौहार मनाने की प्रथा है। इन पकवानों का आदान-प्रदान कर सभी परिवार अपनी मैत्री की भावनाएँ व्यक्त करते हैं। रीति-रिवाजों को इतना नहीं याद करते जितना उन त्यौहारों पर बने पकवानों को। होली के त्यौहार पर गुझिया, संक्रान्ति व लोहड़ी पर तिल व गुड़ के व्यञ्जन, बैसाखी पर पीले केसरिया चावल, ईद पर सेवइयों की खीर आदि बनाने का प्रचलन है।

प्रश्न 3.
भोजन व कोशिकाओं का पुनर्निर्माण (Food and cell formation) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
शरीर की वृद्धि व टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत हेतु भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन में उपस्थित प्रोटीन, खनिज लवण व जल यही कार्य करते हैं। व्यक्ति शैशवकाल से प्रौढ़ावस्था तक वृद्धि और विकास की दिशा में अग्रसर होता है। शरीर का भार व ऊँचाई में वृद्धि इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं।

प्रश्न 4.
भोजन व कार्यक्षमता (Food & work efficiency) का परस्पर क्या . सम्बन्ध है ?
उत्तर:
भोजन व कार्यक्षमता-अच्छा भोजन अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है और अच्छे स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्षण है, शरीर की उत्तम क्रियाशीलता या शरीर की कार्यक्षमता। अत: भोजन पर शरीर की कार्यक्षमता निर्भर करती है। सुपोषित व्यक्ति की कार्यक्षमता कुपोषित व्यक्ति की कार्यक्षमता से निश्चित ही अधिक होती है। अमेरिका में एक अध्ययन में यह देखा गया कि कारखाने के कर्मचारी जो उत्तम नाश्ता करके आते थे, अधिक काम कर पाते थे। उन्हें थकावट भी कम और देर से होती थी।

प्रश्न 5.
कार्यों के आधार पर भोजन का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
कार्यों के आधार पर भोजन का वर्गीकरण –
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प्रश्न 6.
पोषण और मृत्यु-दर से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
पोषण और मृत्यु दर (Nutrition and mortality): कुपोषण के कारण आवश्यक पोषक तत्त्व आवश्यक मात्रा व अनुपात में प्राप्त नहीं होता है। शरीर क्षीण पड़ जाता है और अंततः मृत्यु हो जाती है। दिशाभारती 2 नवम्बर, 1975 के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग दस लाख बच्चों की पोषक आहार के अभाव में मृत्यु हो जाती है।

पौष्टिक आहार संबंधी हैदराबाद के राष्ट्रीय संस्थान द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार निम्न आय वर्ग वाले भारतीयों के 65 प्रतिशत बच्चे साधारणतः और 18 प्रतिशत बच्चे गम्भीर रूप से पौष्टिक आहार के अभाव में पीड़ित रहते हैं और कालान्तर में सूख-सूख कर मर जाते हैं। हरियाणा जैसे खुशहाल प्रदेश में भारतीय चिकित्सा शोध परिषद और राज्य सरकार द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार 50 प्रतिशत बच्चों को प्रोटीन और पर्याप्त पौष्टिक आहार उपलब्ध नहीं होते।

डॉक्टर हिंगोरानी के अनुसार, कुपोषित शरीर रोगाणुओं से जूझने के लिए निर्बल प्रतिपिण्ड बनाता है जिसके कारण शरीर रोगी हो जाता है तथा अंततः मृत्यु हो जाती है । मृत्यु दर विकसित देशों में कम होने का प्रमुख कारण उनका उच्च पोषक स्तर है। भारत जैसे विकासशील देश में भी अब कुपोषण के कारण होने वाली मृत्यु-दर में भारी कमी हुई है।

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प्रश्न 7.
पोषण और मानसिक स्तर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पोषण और मानसिक स्तर (Nutrition and Psychological status)
मानसिक स्थिरचित्तता (Static Mental Tension)-उन सैनिकों में जिनको प्रयोग के लिए 6 माह तक कम खाना दिया गया था, मानसिक दृष्टि से भी बहुत परिवर्तन पाया गया। वे अधीर, चिड़चिड़े, उदास व हठी थे तथा संकल्प-शक्ति को खो बैठते थे। जब प्रतिबंध हटा तो उनका व्यवहार सामान्य हो गया।

मानसिक संलग्नता (Mental Imbalance): कुपोषण के कारण पाया गया कि बालक अपनी पढ़ाई में पूर्णरूपेण ध्यान नहीं दे रहे थे। मानसिक संलग्नता की कमी के कारण वे पाठ की गहराई तक पहुँचकर उसके गूढ अर्थ को नहीं समझ पा रहे थे। अधिक समय तक एकाग्रचित्तता भी उनके लिए संभव नहीं थी क्योंकि वे मानसिक दृष्टि से शीघ्र ही थक जाते थे। अतः संक्षेप में संतुलित भोजन के अभाव में मानसिक स्तर पर असाधारण प्रभाव पाया गया जिससे कि कार्यक्षमता और कुशलता पर विपरीत प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 8.
पोषण और शारीरिक स्तर का क्या संबंध है?
उत्तर:
पोषण और शारीरिक स्तर (Nutrition and Physical Status): डील-डौल-जापानी प्रायः छोटे कद के होते हैं। यह निश्चित रूप से जानने के लिए कि क्या उनका छोटा डील-डौल उनके भोजन का प्रभाव है, कैलिफोर्निया शहर में 6 से 9 वर्ष के उन जापानी बालकों का जो अमेरीका में जन्मे और वहीं पले, अध्ययन किया गया और परिणामों की तुलना उसी आयु के जापान में जन्मे तथा वहीं रहने वाले बालकों से की गयी तो कैलीफोर्निया के बालकों का कद और शारीरिक भार अपेक्षाकृत अधिक पाया गया। यह अंतर दोनों वर्गों के भोजन की पौष्टिकता में अन्तर के कारण सिद्ध हुआ।

हड्डियाँ (Bones): जर्मन के एक स्कूल में विशेष आहार दिया गया। अतः आहार को विटामिन डी युक्त बनाया गया जिससे इन बालकों का विकास तीव्र हुआ ।
त्वचा (Skin): चर्बी की तह जो बाह्य त्वचा के नीचे होती है, उसकी मोटाई से शारीरिक स्तर का ज्ञान भली-भाँति हो सकता है।
माँसपेशियाँ (Muscles): मांसपेशियों का विकास एवं उनके ठोसपन की स्थिति से भी यह पता लगता है कि पोषण स्तर कैसा है।

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प्रश्न 9.
शरीर निर्माण के मुख्य खाद्य पदार्थ कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
शरीर निर्माण के मुख्य खाद्य पदार्थ निम्नलिखित हैं :
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन के कार्य विस्तारपूर्वक समझाइए।
भोजन के कार्य (Functions of Food): शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कार्यों को सम्पन्न करने हेतु भोजन हमारे दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग है।
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I. शारीरिक कार्य (Physical functions): भोजन के शारीरिक कार्यों को मुख्य चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –
(क) ऊर्जा प्रदान करना
(ख) तन्तुओं का निर्माण करना
(ग) रोगों से बचाना
(घ) शारीरिक कार्यों का सुसंचालन करना।
भोजन में उपस्थित छः पोषक तत्त्व कार्बोज, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण तथा जल इन कार्यों को सम्पन्न करते हैं। उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए मनुष्य के आहार में इन पोषक तत्त्वों का उचित मात्रा में होना बहुत आवश्यक है।

(क) ऊर्जा प्रदान करना (Providing energy): जीवित प्राणियों के आन्तरिक व बाह्य शारीरिक कार्यों के संचालन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो उन्हें भोजन द्वारा प्राप्त होती है। अतः भोजन का एक मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा देना है। विभिन्न बाह्य कार्यों जैसे खाना पकाने, खेलने, पढ़ने तथा अन्य दैनिक कार्यों के लिए आवश्यक ऊर्जा भोजन से ही प्राप्त होती है।

विभिन्न आन्तरिक कार्यों, जैसे-श्वसन, भोजन का पाचन, रक्त का परिसंचरण आदि के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। शरीर के ये आन्तरिक कार्य निरन्तर चलते रहते हैं तथा हमारी इच्छा व अनिच्छा का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः जब हम सो रहे होते हैं या आराम कर रहे होते हैं तब भी हमें इन अनैच्छिक रूप से कार्यरत अंगों, जैसे हृदय, फेफड़े आंत, गुर्दे आदि के आंतरिक कार्यों के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

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1. कार्बोज (Carbohydrates): जैसे अनाज (गेहूँ, चावल, बाजरा, आदि), शक्कर, ग्लूकोज, शहद, गुड़, आलू आदि। एक ग्राम कार्बोज शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 4 कैलोरी उत्पन्न करता है।

2. प्रोटीन (Proteins): जैसे दालें, दूध और दूध से बने पदार्थ, मांस, मछली आदि। प्रोटीन निम्न स्थितियों में शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है

  • जब आहार में कार्बोज की कमी हो।
  • जब आहार में प्रोटीन शारीरिक आवश्यकताओं से अधिक हो।।
  • जब भोजन की प्रोटीन घटिया किस्म की हो और शारीरिक प्रोटीन बनाने में असमर्थ हो। एक ग्राम प्रोटीन शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 4 कैलोरी उत्पन्न करता है।

3. वसा (Fats): जैसे घी, तेल, मक्खन, क्रीम आदि। यह कार्बोज से सवा दो (214) गुना अधिक ऊर्जा देता है तथा एक ग्राम वसा शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 9 कैलोरी उत्पन्न करता है।
(ख) तन्तुओं का निर्माण करना (Building tissues): मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन काल अर्थात् जन्म से लेकर मृत्यु तक तन्तुओं का निर्माण होता रहता है। इन नए तन्तुओं का निर्माण निम्नलिखित कार्यों के लिए होता है –

  • शारीरिक वृद्धि।
  • टूटे-फूटे तन्तुओं के पुनः निर्माण अथवा मरम्मत।

एक छोटा-सा शिशु आयु बढ़ने पर पूर्ण प्रौढ़ बन जाता है तथा उसके शारीरिक नाप व भार में परिवर्तन नए तन्तुओं के निर्माण के कारण होता है। मनुष्य के शारीरिक अंग हर समय कार्य करते रहते हैं जिसके कारण शरीर के तन्तु टूटते-फूटते रहते हैं। इन पुराने टूटे-फूटे तन्तुओं के पुनः निर्माण अथवा मरम्मत का कार्य भी भोजन करता है।

हमारे शरीर में तन्तुओं के निर्माण का कार्य भोजन में उपस्थित निम्न पोषक तत्त्व करते हैं:
1. प्रोटीन (Proteins): जैसे दूध, दूध से बने पदार्थ, अण्डा, मांस, मछली, दालें, सोयाबीन आदि का प्रोटीन शरीर के निर्माण में सर्वोच्च स्थान पर आता है।
2. खनिज लवण (Minerals): नए तन्तुओं के निर्माण कार्य में कुछ खनिज लवणों का विशेष स्थान है। यह प्रमुख खनिज लवण हैं कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा आदि, जो दांतों, अस्थियों तथा रक्त के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। ये खनिज लवण हमें दूध से बने पदार्थ मांस, मछली, कलेजी, अण्डा, दालें, अनाज आदि से प्राप्त होते हैं।

(ग) रोगों से बचाव (Protection against diseases): भोजन के विभिन्न कार्यों में एक कार्य शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करना है। हम जानते हैं कि एक कमजोर व्यक्ति को एक स्वस्थ व्यक्ति की अपेक्षा बीमारियाँ जल्दी घेरती हैं। हमारे शरीर को रोगों से बचाव क्षमता निम्न पोषक तत्त्वों द्वारा प्राप्त होती है।

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1. विटामिन (Vitamins): इनकी आवश्यकता हमें बहुत ही न्यून मात्राओं में होती है। यह कई प्रकार के होते हैं तथा प्रायः सभी भोज्य पदार्थों द्वारा प्राप्त होते हैं, परन्तु प्रत्येक भोज्य पदार्थों में कोई एक विटामिन अधिक मात्रा में होता है तो कोई दूसरा विटामिन कम मात्रा में होता है। जैसे विटामिन-ए दूध, दूध से बने पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जियों, गहरी पीली सब्जियों, अण्डा, मांस आदि में अधिक होता है परन्तु दालों में यह कम मात्रा में पाया जाता है। इसी प्रकार विटामिन-सी आंवला, सन्तरा, नींबू आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है और अनाज, दालों, दूध आदि में इसकी मात्रा कम होती है।

2. खनिज लवण (Minerals): विटामिनों की भाँति खनिज लवणों की आवश्यकता भी कम मात्रा में होती है परन्तु रोगों से बचाव क्षमता के लिए यह शरीर हेतु अति आवश्यक हैं। खजिन लवण कई प्रकार के होते हैं तथा यह भी प्रायः सभी भोज्य पदार्थों में पाए जाते हैं। दूध, फल तथा सब्जियों में सभी प्रकार के खनिज लवण अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

विभिन्न अंगों के सुसंचालन के लिए खनिज लवणों तथा विटामिनों की आवश्यकता होती है क्योंकि शरीर की विभिन्न रासायनिक प्रतिक्रियाएँ इनके द्वारा नियन्त्रित होती हैं। इसी कारण इन पोषक तत्त्वों के नियमित प्रयोग से शरीर स्वस्थ बनता है तथा बीमारियों से मुक्त रखता है। यही कारण है कि विटामिन और खनिज लवण संरक्षक पोषक तत्त्वों के नाम से जाने जाते हैं।

(घ) शरीर को सुचारू रूप से चलाना (Monitoring the body): जिस प्रकार शरीर को विभिन्न पोषक तत्त्वों जैसे कार्बोज, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज लवणों की आवश्यकता होती है ठीक उसी प्रकार शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए जल और फोक की भी आवश्यकता होती है। शारीरिक क्रियाओं के नियमन के लिए जल अति आवश्यक है तथा मल निर्माण एवं निष्कासन के लिए आहार में फोक का होना आवश्यक है। फोक हमें हरी पत्तेदारसब्जियों, दालों तथा अनाजों के छिलकों से प्राप्त होता है।

II. मनोवैज्ञानिक कार्य (Psychological functions): शारीरिक कार्यों को पूर्ण करने के साथ-साथ भोजन हमें मानसिक सन्तोष और सुरक्षा भी प्रदान करता है। बच्चा सदैव अपनी मां की गोद में दूध पीकर ही अधिक सुरक्षित और प्रसद अनुभव करता है। बाजार में नाना प्रकार के पकवान खाकर भी मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हो पाती जो घर के सात्विक व सादे भोजन के खाने से प्राप्त हो जाती है। भूख की सन्तुष्टि करके भोजन मनुष्य को मानसिक सन्तुष्टि प्रदान करता है जो पौष्टिक तत्त्वों की गोलियां खाने से कदापि प्राप्त नहीं हो सकती । मनुष्य का खान-पान उसकी संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं भोजन संबंधी आदतों पर निर्भर करता है।

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जो मनुष्य चावल खाना अधिक पसन्द करता है उसे यदि रोटी दी जाए तो उसे मानसिक सन्तुष्टि नहीं मिलती है और वह चावल प्राप्त करने की कोशिश करता है जिसे वह वर्षों से खाता आया है। मनुष्य को वही भोजन अधिक मानसिक सन्तुष्टि प्रदान करता है जो वह प्रतिदिन खाता है और यही कारण है कि मनुष्य किसी भी प्रकार के परिवर्तन या नए भोजन को अपनाने में संकोच महसूस करता है।

III. सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य (Socio-cultural functions): भोजन के सामाजिक कार्य का महत्त्व शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कार्यों से किसी भी प्रकार कम नहीं है। भोजन व्यक्तियों में आपसी संबंध बढ़ाकर उनकी मैत्री सुदृढ़ करने में सहायक होता है। प्राचीन युग से ही खाना बांटकर खाना मित्रता का प्रतीक माना गया है जो आज के आधुनिक युग में भी यथावत है।

हम सभी घर पर आए अतिथि का सत्कार भोजन से करते हैं और अतिथि के लिए अच्छे-से-अच्छा भोजन ही परोसा जाता है। बच्चे के जन्म दिन, शादी आदि के उत्सव पर भी भोजन परोसा जाता है जिससे सामाजिक सम्बन्ध बढ़ते हैं। प्रायः किसी नए परिचित व्यक्ति से मैत्री बढ़ाने के लिए उसे घर पर भोजन के लिए ही आमंत्रित किया जाता है।

बड़े-बड़े भोजों पर व्यक्तियों को आमंत्रित करना सामाजिक प्रतिष्ठा का सूचक है। इसके अतिरिक्त अनेक त्यौहारों जैसे दीवाली, होली, रक्षाबन्धन आदि पर मिठाईयों का आदान-प्रदान मैत्री का सूचक माना जाता है। सामाजिक उत्सवों के लिए भी भोजन का आयोजन करना अनिवार्य-सा हो गया है। हमारे देश के भिन्न-भिन्न प्रान्त में भिन्न-भिन्न जातियों के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजन खाते हैं।

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य के प्रकार (Dimensions of Health) कौन-से हैं ?
उत्तर:
आज के युग में पूर्ण स्वस्थता (Complete well being) की स्थिति के लिए आध्यात्मिक पहलू के महत्त्व को भी नकारा नहीं जा सकता।
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1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health): स्वास्थ्य के शारीरिक पक्ष से हम सब भली-भाँति परिचित हैं। जब हम यह कहते हैं कि वह व्यक्ति स्वस्थ है तो हम साधारणतया स्वास्थ्य के इसी पक्ष की बात करते हैं। कोई भी व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ माना जाता है यदि वह सक्रिय, चुस्त व फुर्तीला है।
वह किसी शारीरिक रोग से ग्रस्त नहीं है तथा उसमें निम्न शारीरिक लक्षण पाए जाते हैं –

  • आयु के अनुपात में वजन और लम्बाई।
  • मांसपेशियाँ सुदृढ़ और विकसित।
  • हड्डियाँ मजबूत और वृद्धि सामान्य।
  • त्वचा स्वस्थ, सुन्दर व चिकनी।
  • आँखें स्वस्थ और दोषरहित।
  • बाल चमकीले और चिकने।
  • दाँत साफ, सामान्य एवं दोषरहित।
  • चाल-ढाल सीधी तनी हुई, पेट अन्दर।
  • गहरी नींद।
  • भूख सामान्य।
  • रोग निरोधक क्षमता उत्तम ।
  • उत्साही, सक्रिय एवं शक्ति से भरपूर ।

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health): कोई भी व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ माना जाता है, यदि उसमें निम्न लक्षण पाए जाते हैं –

  • तनाव तथा चिन्ता से. गुक्त।
  • मानसिक रूप से सके और क्रियाशील।
  • दिमागी रोगों से मुक्त।
  • दूसरों के प्रति भातुक।
  • आन्तरिक अन्त से मुक्त।
  • विभिन्न लोगों और विभिन्न परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सक्षम।
  • अच्छी मानसिक योग्यता।
  • संवेगात्मक स्थिरता।

मानसिक स्वास्थ्य का अनुमान लगाना शारीरिक स्वास्थ्य की तुलना में कठिन है। यह कहा जाता है कि “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क रहता है।” (Healthy mind lives in a healthy body) इस परिभाषा से स्पष्ट है कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आपस में सीधा सम्बन्ध है। मानसिक अस्वस्थता के कारण शारीरिक अस्वस्थता उत्पन्न हो सकती है।

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उदाहरणार्थ, अधिक चिन्ता और तनाव से शरीर में उच्च रक्तचाप अथवा हृदय रोग हो जाता है। इसके विपरीत स्थिति में शारीरिक अस्वस्थता से मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न हो सकती है। उदाहरणार्थ एक पोलियो से ग्रस्त बच्चा खुद को सामान्य बच्चों से हीन अनुभव करता है और यही भावना उसे डर या आत्म-दयनीयता (Self-pity) की स्थिति में पहुँचा देती है । यह स्थिति मानसिक अस्वस्थता की स्थिति है।

3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social Health): सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में निम्न लक्षण पाए जाते हैं।

  • वह समाज के दूसरे लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी अनुभव करता है।
  • वह सबके साथ सहयोग और सहनशीलता से रहता है।
  • उसका व्यवहार आनन्ददायक होता है।
  • वह आस-पास के लोगों से प्रेम से मिलता है।

मानसिक स्वास्थ्य के बिना सामाजिक स्वास्थ्य के लक्ष्य को प्राप्त करना असम्भव है। उदाहरणार्थ, यदि व्यक्ति अपनी परेशानियों से चिन्ताग्रस्त और तनावयुक्त है, तो वह दूसरों की सहायता करने में सक्षम नहीं हो सकता। इसी प्रकार प्रायः शारीरिक अस्वस्थता भी सामाजिक स्वस्थता में बाधक होती है। उदाहरणार्थ शारीरिक रोग व्यक्ति को चिड़चिड़ा, मायूस और दूसरों के साथ सामान्य व्यवहार के अयोग्य बना देता है। अपराधी व्यक्ति जैसे चोर, डाकू आदि सामाजिक अस्वस्थता के उदाहरण हैं। उनका व्यवहार समाज द्वारा मान्य नहीं होता इसीलिए उन्हें असामाजिक तत्त्व कहा जाता है।

4. आध्यात्मिक स्वास्थ्य (Spiritual Health): आध्यात्मिक स्वास्थ्य को परिभाषित कर पाना सबसे कठिन है। आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अधिकतर नैतिक सिद्धांतों का पालन करता है, जैसे-सच बोलना, भलाई करना, अपने कर्तव्यों का दृढ़ता से पालन करना, दूसरों को दुख न देना आदि। धैर्य और आत्मिक शांति आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लक्षण हैं। उन्हें प्रार्थना, चिन्तन और कर्तव्यपरायणता से प्राप्त किया जा सकता है। एक स्वस्थ व्यक्ति परिवार, समाज व देश के लिए सम्पत्ति होता है जबकि अस्वस्थ व्यक्ति एक बोझ।

प्रश्न 3.
उत्तम स्वास्थ्य के क्या लक्षण हैं ?
उत्तर:
उत्तम स्वास्थ्य के लक्षण (Signs of good health): उत्तम स्वास्थ्य से अभिप्राय है कि व्यक्ति शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ हो। एक उत्तम पोषित व्यक्ति का ही उत्तम स्वास्थ्य हो सकता है। मानव कल्याण के लिए वैज्ञानिक पोषण विज्ञान से सम्बन्धित क्षेत्रों में निरन्तर अनुसंधान, अध्ययन व अन्वेषण कर रहे हैं। इसी के फलस्वरूप व्यक्ति के शरीर की बनावट, सबलता, आयु अवधि तथा मानसिक व व्यावहारिक लक्षणों में अनेक सकारात्मक परिवर्तन आए हैं, जिनका उल्लेख आगे किया गया है –

1. शारीरिक विकास एवं वृद्धि (Body growth and development) : एन.सी.एच.एस. के अनुसार बच्चों व किशोरों की अपेक्षित ऊँचाई व भार (Expected Height & Weight of Children & Adolescents according to N.C.H.S)
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(क) शारीरिक भार व ऊँचाई (Body weight & height): किसी भी व्यक्ति के शारीरिक भार व ऊँचाई को प्रभावित करने वाले अनेक कारकों में से उत्तम पोषण का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि उत्तम पोषण के अभाव में व्यक्ति के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है तो उसका शरीर भार एवं ऊँचाई सामान्य स्तर से कम रह जाता है।

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इसी प्रकार अत्यधिक पोषण भी व्यक्ति के लिए अत्यन्त हानिकारक है क्योंकि इससे शारीरिक भार सामान्य स्तर से अधिक होने के कारण मोटापा आ जाता है। तालिका में विभिन्न आयु वर्गों के लिए सामान्य शरीर भार एवं ऊँचाई का उल्लेख किया गया है। आप इस तालिका की सहायता से अपने शरीर का भार व ऊँचाई की तुलना सामान्य स्तर से करके अपने स्वास्थ्य की दशा ज्ञात कर सकते हैं तथा प्रयत्न करके अपने शरीर के भार को सामान्य स्तर में रख सकते हैं।

(ख) अस्थियों का ढाँचा (Skeletal system): एक स्वस्थ व्यक्ति की हड्डियाँ मजबूत होती हैं। भोजन में उपस्थित कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन डी हड्डियों का कैल्सीकरण करके उन्हें .मजबूत बनाते हैं। अतः एक सुपोषित स्वस्थ व्यक्ति का डील-डौल प्रभावित होता है। उसका सिर तना हुआ, छाती चौड़ी व उठी हुई, कन्धे सपाट व पेट अन्दर होता है।

(ग) त्वचा (Skin): स्वस्थ व्यक्ति की.त्वचा मुलायम व चमकीली होती है। बाहरी त्वचा के नीचे की तह की मोटाई से पोषण की स्थिति ज्ञात हो जाती है। इस निचली तह की मोटाई वसा के कारण होती है। जब व्यक्ति को उपयुक्त मात्रा में भोजन नहीं मिलता तब यह वसा जल कर उसे ऊर्जा प्रदान करती है और यह निचली तह पतली होती जाती है। इसके विपरीत जब व्यक्ति आवश्यकता से अधिक मात्रा में भोजन ग्रहण करता है तो वसा त्वचा की निचली तह में चर्बी के रूप में जम जाती है।

(घ) मांसपेशियां (Muscles): एक स्वस्थ व्यक्ति की मांसपेशियां पूर्ण रूप से विकसित व सुगठित होती हैं। उत्तम पोषण के अभाव में व्यक्ति की मांसपेशियां पूर्ण रूप से विकसित नहीं होती तथा ढीली पड़ जाती हैं।

(ङ) रक्त (Blood): भोजन में उपस्थित पोषक तत्त्व पाचन के पश्चात् रक्त में अवशोषित होते हैं तथा रक्त ही इन पोषक तत्त्वों को शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाकर उनका पोषण करता है। अतः रक्त में उपस्थित पोषक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर किसी भी व्यक्ति के पोषण स्तर तथा स्वास्थ्य स्तर का पता लगाया जा सकता है। शरीर पोषण के अतिरिक्त व्यक्ति के फेफड़ों से ऑक्सीजन लेने तथा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने का कार्य रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन द्वारा सम्पन्न किया जाता है।

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एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति में सामान्यतः लगभग 1214 ग्राम हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) प्रति 100 मिली रक्त में होता है। उससे कम हीमोग्लोबिन की मात्रा अस्वस्थता का प्रतीक है जिससे व्यक्ति को जल्दी थकावट आती है और उसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। सारांश में एक स्वस्थ व्यक्ति (जिसका पोषण स्तर बाल्यावस्था से ही उचित रहा हो) का पूर्ण विकसित अस्थि कंकाल, टांगें व बाँहें सुडौल, दाँत सुन्दर व सुदृढ, त्वचा चिकनी तथा मांसपेशियां ठोस व सबल होती हैं।

2. शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता (Physical efficiency and capability): अनुसंधानों एवं प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि पोषण का प्रत्यक्ष प्रभाव व्यक्ति की शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता पर पड़ता है। अमेरिका में कुछ सैनिकों को सीमित आहार देने पर ज्ञात हुआ कि उनकी कार्यक्षमता बहुत कम हो गयी है। इसी प्रकार एक कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के प्रात:कालीन नाश्ते का अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि सन्तुलित प्रात:कालीन नाश्ता खाने वाले मजदूरों की शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता अन्य मजदूरों की अपेक्षा अधिक है।

3. मानसिक स्थिरचित्तता (Constant mental tension): उत्तम स्वास्थ्य का मनुष्य के व्यवहार से सीधा सम्बन्ध है। एक अस्वस्थ व्यक्ति प्रायः उदांस, अधीर, चिड़िचिड़ा, खिन्न व हठी होता है तथा वह किसी भी कार्य में रुचि नहीं लेता है और उसकी संकल्प-शक्ति भी कम हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों के भोजन में सुधार लाने पर. उनका व्यवहार धीरे-धीरे सामान्य हो जाता है। बच्चों में अस्थिर चित्त, अधीरता व उदण्डता का कारण भी अस्वस्थता है। एक स्वस्थ बच्चा अधिक सतर्क, क्रियाशील तथा उत्साही होता है। अनुसंधानों द्वारा व्यक्ति के मानसिंक . सन्तुलन में विटामिनों की भूमिका का अत्यधिक महत्त्व सिद्ध हुआ है।

4. मानसिक संलग्नता (Mental concentration): किसी भी बच्चे की मानसिक क्षमता अथवा बुद्धि उसकी अनुवांशिकता पर निर्भर करती है परन्तु उसका मानसिक विकास पूर्ण रूप से हो यह उसके पोषण पर निर्भर करता है। जिन बच्चों को उचित आहार नहीं मिलता वह अपनी पढ़ाई पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते हैं, वे अधिक समय तक एकाग्रचित नहीं रह सकते हैं और मानसिक दृष्टि से शीघ्र ही थक जाते हैं। अध्ययनों द्वारा यह पूर्ण रूप से सिद्ध हो चुका है कि उचित पोषण का प्रभाव बच्चों की पढ़ाई पर सर्वाधिक पड़ता है। एक स्वस्थ बच्चा एकाग्रचित होकर पढ़ाई में पूर्ण रुचि लेता है।

5. मृत्यु आंकड़े व दीर्घ आयु (Death rate & Longivity): यदि सम्पन्न देशों के मृत्यु आंकड़ों एवं आयु की तुलना विकासशील देशों से की जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उत्तम स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध दीर्घ आयु व मृत्यु-दर में कमी से है। भारत में भी माता व शिशु को पौष्टिक आहार मिलने से मातृ व शिशु मृत्यु-दर में कमी आई है तथा आयु अवधि में बढ़ोतरी हुई है। प्रौढ़ व्यक्तियों के जीवन का अकाल अन्त बहुधा हृदय सम्बन्धी रोगों के कारण होता है जिसका सीधा सम्बन्ध आहार से है क्योंकि अधिक कोलेस्ट्रॉल युक्त भोजन करने से धमनियों में धीरे-धीरे विकार आने लगते हैं जिसके कारण हृदय की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 4.
उत्तम स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन के अतिरिक्त स्वास्थ्य पर और किन बातों का प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
उत्तम स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन के महत्त्व के बारे में तुम्हें पूर्ण जानकारी हो गई है परन्तु पौष्टिक भोजन के साथ-साथ निम्नलिखित बातें भी हमारे स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं –
1. शुद्ध वायु (Fresh Air): अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुद्ध वायु में श्वास लेना अति आवश्यक है। वायु में कार्बनिक पदार्थ व विषैली गैसों जैसे कार्बनडाइ ऑक्साइड (Carbon dioxide), कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon Mono-oxide), मीथेन (Methane), हाइड्रोजन सल्फाइड (Hydrogen Sulphide) आदि की मात्रा कम से कम तथा ऑक्सीन (Oxygen) की मात्रा लगभग 20.96 प्रतिशत तक होनी चाहिए। यदि वायु में कार्बनिक पदार्थों व विपैली गैसों की मात्रा अधिक होती है तो व्यक्ति को सिरदर्द, बदनदर्द, आलस्य व थकावट की शिकायत होती है। अशुद्ध वायु जिसमें मिट्टी के कणों व रोग के जीवाणुओं की अधिकता.होती है, में सांस लेने से व्यक्ति कई रोगों से ग्रस्त हो सकता है।

2. शुद्ध जल (Fresh Water): हमारे देश में पीने के लिए जल विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त किया जाता है, जैसे-तालाब, कुएँ, नदियाँ, नलकूप, नल आदि । जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ तथा रोगाणु पाए जाते हैं जिनके द्वारा व्यक्ति को अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। अतः हमें इस वात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि जल चाहे किसी भी स्रोत द्वारा लिया जाए स्वच्छ तथा. रोगाणुरहित हो।

3. व्यक्तिगत एवं वातावरण की स्वच्छता (Personal & Environmental sanitation): प्रकृति में रोग उत्पन्न करने वाले अनेक जातियों के सूक्ष्म रोगाणु होते हैं जो अंधेरी जगह, नमी तथा गन्दगी में शीघ्रता से बढ़ते हैं और विभिन्न माध्यमों द्वारा संक्रमण फैलाते हैं। अतः गन्दगी के कारण मनुष्य अनेक रोगों का शिकार हो सकता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ-साथ वातावरण की स्वच्छता का भी पूर्ण ध्यान रखना आवश्यक है।

4. व्यायाम (Exercise): अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन अपनी आयु, कार्य व निजी आवश्यकतानुसार शुद्ध वायु में नियमित रूप से व्यायाम करना आवश्यक है क्योंकि व्यायाम द्वारा फेफड़ों में शुद्ध वायु पहुँचती है, रक्त परिसंचरण की गति तेज होती है, जिससे विभिन्न अंगों में पोषक तत्त्व तीव्रता से पहुंचते हैं और व्यर्थ पदार्थों का निष्कासन भी तीव्रता से होता है।

5. नियमित विश्राम व निद्रा (Regular Rest & Sleep): दैनिक कार्यों से होने वाली थकावट को दूर करने तथा दोबारा कार्य करने के लिए ऊर्जा अर्जित करने के लिए उचित मात्रा में विश्राम व निद्रा आवश्यक है क्योंकि इन अवस्थाओं में शरीर में होने वाले मरम्मत के कार्य सुचारु रूप से होते हैं। यही कारण है कि बच्चों, बूढों व कमजोर व्यक्तियों को अधिक विश्राम व निद्रा की आवश्यकता होती है। एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए प्रतिदिन 6 घण्टे से 8 घण्टे तक की नियमित निद्रा आवश्यक है। इसके विपरीत आवश्यकता से अधिक विश्राम व निद्रा भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

6. रोगों से रक्षा (Protection against diseases): प्राय: देखा गया है कि हम चाहे अपने स्वास्थ्य का कितना भी ध्यान रखें फिर भी कोई न कोई रोग हमें घेर लेता है। अतः रोगों जैसे तपेदिक, हैजा, टाइफाइड, पोलियो आदि से बचने के लिए बच्चों को नियमित रूप से टीके लगवाकर रोगों से रक्षा प्रदान करनी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

Bihar Board Class 11 Psychology मानव व्यवहार के आधार Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
विकासवादी परिप्रेक्ष्य व्यवहार के जैविक आधार का किस प्रकार व्याख्या करता है।
उत्तर:
संसार में जीवों की करोड़ों विभिन्न प्रजातियाँ हैं जो अपने पूर्ववर्ती प्रारूपों से आज के रूप में विकसित हुई हैं। जैविकीय परिवर्तन किसी प्रजाति के पूर्ववर्ती प्रारूपों में पर्यावरण की परिवर्तित हुई अनुकूलन की आवश्यकताओं के प्रति उसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होती है। जीवों में व्यवहारात्मक परिवर्तन इतना मंद होते हैं कि सैकड़ों पीढ़ियों के बाद ही दिखाई पड़ता है।

आधुनिक मानवों के तीन महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण उन्हें अपने पूर्वजों से अलग करते हैं –

  1. बड़ा और विकसित मस्तिष्क जिसमें संज्ञानात्मक व्यवहार (प्रत्यक्षण, स्मृति, तर्कन) तथा भाषा के उपयोग करने की क्षमता का पाया जाना।
  2. काम करने योग्य विपरी अंगूठे के साथ मुक्त हाथ रखने वाला प्राणी बन जाना। मानव का व्यवहार बहुत जटिल और विकसित होता है। मस्तिष्क का वजन हमारे शरीर के सम्पूर्ण वजन का 2.35 प्रतिशत होता है जो सर्वाधिक होता है। मनुष्य का प्रमस्तिष्क के अन्य भागों से अधिक विकसित होता है।

हमारे व्यवहार को प्रभावित करने शारीरिक संरचना के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति अनुकूलन और आनुवंशिकता का सामूहिक योगदान रहता है। आहार जुटाने की योग्यता, पूरे परिवार की सुरक्षा, परभक्षों को अपने से अलग रखने की प्रवृत्ति जैसे अनेक प्रक्रियाएँ एवं विधियाँ हैं जो जीवों के व्यवहार को बदलने का कारण बने हुए हैं। जीवों के व्यवहार में अन्तर लाने का कार्य मुख्यत: पर्यावरण और जीन की योग्यता से करते रहता है। जीन के माध्यम से व्यवहार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवर्तन होता रहता है।

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प्रश्न 2.
तंत्रिका कोशिकाएँ सूचना को किस प्रकार संचारित करती हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तंत्रिका कोशिकाएँ सूचना को विद्युत संकेतों के रूप में ग्रहण करने, संवहन करने तथा अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य निपुणता के साथ पूरा करती है। ये संबंधित अंगों के माध्यम से सूचना प्राप्त करके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक ले जाती है जो प्राप्त सूचना को पेशीय अंगों तक ले जाती है।

तंत्रिका तंत्र के प्रमुख घटक पार्श्व तंतु विद्युत रासायनिक या जैव रासायनिक संकेत के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं और प्राप्त संकेतों को दूसरे घटक काय कोशिका में भेज देते हैं। अक्ष तंतु के अंतिम सिरे पर स्थित अंतस्थ वहन प्राप्त संकेतों को अन्य ग्रन्थियों और मांसपेशियों को दे देते हैं। पेशीय तंत्रिका स्नायविक आदेशों का संवहन करती है।
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चित्र: तंत्रिका कोशिका की संरचना
अर्थांत तंत्रिका तंत्र में सूचनाएं तंत्रिका आवेगा के रूप में प्रवाहित होती है जो उपिहक ऊर्ज के रूप में ग्राहकों तक पहुंचती है

प्रश्न 3.
प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के चार पालियों के नाम बताइये। ये क्या कार्य करते हैं?
उत्तर:
मस्तिष्क के चार प्रमुख भागों में से एक प्रमस्तिष्क कहलाने वाले भाग को प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के नाम से भी समझा जाता है। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट सभी उच्चस्तरीय संज्ञानात्मक प्रकार्यों (अवधान, प्रत्यक्षण, अधिगम, स्मृति, भाषा-व्यवहार, तर्कना, समस्या समाधान) को नियमित करने का कार्य करता है।

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की संरचना को चार मुख्य पालियों में बाँटा जा सकता है –

  1. ललाट या अग्र पालि
  2. पाश्विक या मध्य पालि
  3. शंख पालि तथा
  4. पश्वकपाल पालि

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की चार पालियों के कार्य भिन्न माने जाते हैं जो निम्न वर्णित हैं –

1. ललाट अथवा अग्र पालि-ललाट पालि मुख्यतः
संज्ञानात्मक कार्यों (चिंतन, स्मृति, तर्कना, अधिगम, अवधान आदि) में सहायता करता है। किन्तु स्वायत्त और संवेगात्मक अनुक्रियाओं पर अवरोधात्मक प्रभाव डालता है।

2. पार्श्विक पालि या मध्य पालि:
पार्श्विक पालि त्वचीय संवेदनाओं और उनका चाक्षुष और श्रवण संवेदनाओं के साथ समन्वय स्थापित करने का कार्य करता है। अर्थात् गर्मी, ठंढक, ददे आदि की अनुभूति इसी पालि पर आधारित होता है।
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चित्र: प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

3. शंख पालि:
शंख पालि का सीधा संबंध श्रवणात्मक सूचनाओं से होता है। प्रतीकात्मक शब्दों तथा भिन्न-भिन्न ध्वनियों का सही अर्थ समझने का कार्य शंख पालि का ही है। यह लिखित भाषा और वाणी का अर्थ समझने में निपुण होता है। अर्थात् शंख पालि के द्वारा श्रवण संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

4. पश्च कपाल पालि या पृष्ठ पालि:
पश्च कपाल पालि मुख्यतः चाक्षुष सूचनाओं से संबद्ध रहता है। इसी पालि के द्वारा चाक्षुष आवेगों की व्याख्या, चाक्षुष उद्दीपकों की स्मृत्ति और रंग चाक्षुष उन्मुखता आदि सम्पन्न की जा सकती है। इसके नष्ट होने से अंधापन का भय उत्पन्न हो जाता है। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के प्रमुख पालियों के कार्य को कार चलाने के उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है। कार चलाते समय बालक पश्च कपाल की सहायता से सड़क और अन्य गाड़ियों को देखता है, शंख पालि की मदद से हार्न या सचेतक की ध्वनि को सुन लेता है।

पार्श्विक पालि की सहायता से चालक गाड़ी को नियंत्रित रखने के लिए पेशीय क्रियाकलाप करता है। गाड़ी को रोकना या ओवरटेक करना आदि जैसे निर्णय के लिए ललाट पालि की मदद लेता है। इस तरह माना जा सकता है कि मस्तिष्क की कोई भी गतिविधि वल्कुट के केवल एक हिस्से के द्वारा ही संपादित होते हैं। प्रत्येक पालि की अपनी विशिष्ट कार्य-क्षमता होती है।

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प्रश्न 4.
विभिन्न अंतःस्त्रावी ग्रंथियों और उनसे निकलने वाले अन्तःस्त्रावों के नाम बताएँ। अंतःस्त्रावी तंत्र हमारे व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
विभिन्न अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (नलिकाविहीन ग्रन्थियों) के नाम तथा उनसे निकलने वाले अन्तःस्रावों के नाम क्रमानुसार अंकित किए गए हैं –
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अन्तःस्रावी तंत्र हमारे व्यवहार को प्रत्यक्षतः प्रभावित करते हैं – पीयूष ग्रंथि मूल और गौण लैंगिक परिवर्तन को प्रभावित करके हमें व्यवहार में अन्तर लाने को बाध्य कर देते हैं। अवटु ग्रंथि से निकलने वाला थाइरॉक्सिन नामक हॉर्मोन शरीर में चयापचय की दर को प्रभावित करता है जिसके कारण ऊर्जा का उत्पादन होता है। इसकी सक्रियता बढ़ जाती है। इसके विपरीत थाइरॉक्सिन की कमी से शारीरिक और मानसिक सुस्ती आ जाती है। अधिवृक्क ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोनों के कारण तंत्रिका तंत्र के प्रकार्यों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यह अधश्चेतक को उद्दीप्त करते हैं जिससे व्यक्ति का संवेग घटता बढ़ता –
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चित्र: मुख्य अंतःस्त्रावी ग्रंथियाँ
अग्नाशय से निकलनेवाले इन्सुलिन में यह क्षमता होती है कि वह भूख और दर्द से निश्चित रखकर खुश रहने की प्रवृत्ति जगाता है। इसके विपरीत मधुमेह से ग्रसित व्यक्ति इन्सुलिन के उपयोग में गड़बड़ी को मुख्य कारण मानता है। जनन ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोन के कारण हमारा व्यवहार उत्तेजित तथा आक्रामक हो जाता है। हमारे व्यवहार में सुन्दर, समर्थ एवं विकसित व्यक्ति कहलाने के लिए कृत्रिम प्रदर्शन के द्वारा आकर्षन उत्पन्न करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

सभी अन्तःस्रावों का सामान्य प्रकार्य हमारे व्यवहारपरक कल्याण के लिए निर्णायक होता है। शरीर का आंतरिक संतुलन बनाये रखने के लिए हमारे व्यवहार को दवाब मुक्त, भय मुक्त, विकसित रखने में हमारी सहायता करता है। सारांशतः अंतःस्रावी ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन के चलते हम अपने व्यवहार पर मानसिक असंतुलन उत्तेजना, भूख, रक्तचाप, उदासीनता, संवेग, सक्रियता, मोटापन, बेचैनी, चिन्ता आदि प्रभावकारी कारकों का कुप्रभाव नहीं पड़ने देते हैं और इस सर्वप्रिय व्यवहार के प्रदर्शन के योग्य बने रहते हैं।

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प्रश्न 5.
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र किस प्रकार आपातकालीन स्थितियों में कार्य-व्यवहार में हमारी सहायता करता है?
उत्तर:
आपातकाल की स्थिति में हम भय, अनहोनी, अशांति, दुर्घटना आदि के प्रभाव के कारण अव्यवस्थित हो जाते हैं। हमारी शारीरिक क्रिया स्वाभाविक कार्य नहीं कर पाती है और हम कई रोग अथवा विषमताओं के चक्कर में पड़ जाते हैं। ज्ञात है कि स्वायत्त तंत्र, जो तंत्रिका तंत्र का एक प्रमुख घटक होता है, उन क्रियाओं का संचालन करता है जिनपर हमारे प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होते हैं। जैसे, सॉस लेना, रक्त संचार, लार स्राव, उदर संकुचन और प्रायोगिक प्रतिक्रियाओं का नियंत्रण हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करता है। आपातकाल में तेजी से हृदय का धड़कना, कई वीभत्स घटनाओं को देखना, रक्तचाप का बढ़ जाना, मुँह सूखना, भूख न लगना, बार-बार प्यास लगना, चिड़चिड़ापन का बढ़ जाना जैसी अस्वाभाविक स्थितियाँ आ जाती हैं।

स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ऐसी स्थिति में अपनी स्वाभाविक वृत्ति को छोड़कर हमारी सहायता करते हैं। अधिक ऊर्जा का संचार करके, अनुकंपी तंत्र की सक्रियता को कम करके, पाचन-क्रिया की गड़बड़ी को सुधार कर प्रभावित व्यक्ति को शांत कर उसे सामान्य स्थिति में लाता है। स्वायत्त तंत्रिका के दोनों प्रमुख खण्ड-अनुकम्पी और परानुकम्पी खण्ड अपने विपरीत प्रभाव की प्रवृत्ति को छोड़कर मानवीय व्यवहार में संतुलन बनाये रखने के लिए मिल-जुलकर कार्य करने लगते हैं। स्वायत्त तंत्र के दोनों खण्डों के सामूहिक प्रयास से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा सभी शारीरिक क्रियाएँ (हृदय गति, श्वास गति, रक्तचाप, रक्त की संरचना) आदि सामान्य स्तर में आ जाती है। अर्थात् स्वायत्त् तंत्र की सक्रियता से प्रबल और त्वरित कार्यवाही के माध्यम से प्रभावित व्यक्ति परिस्थिति से जूझने की क्षमता बढ़ा पाता है।

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प्रश्न 6.
संस्कृति का क्या अर्थ है? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संस्कृति का सामान्य अर्थ एक विशिष्ट अवधारणा मानी जाती है जहाँ अच्छे व्यवहार या आचरण करने वाले को सुसंस्कृत कहा जाता है। संस्कृति का सही अर्थ जानने के लिए भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने-अपने तरह से संस्कृति को परिभाषित किया है जिनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नवत हैं –

1. वूम और सेल्जनिक:
समाज में संस्कृति का अर्थ मनुष्य की सामाजिक विरासत से लिया जाता है जिसमें सभी प्रकार के ज्ञान, विश्वास, प्रथाएँ एवं प्रथा आती हैं जिसे व्यक्ति समाज के एक सदस्य के रूप में ग्रहण करता है। आज संस्कृति लोगों की जीवन-शैली के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसे परम्परा की धरोहर के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित किए जाते रहे हैं।

2. टॉयलर (Taylor):
“संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, आचार, कानून, प्रथा तथा ऐसी ही अन्य क्षमताओं और आदतों का समावेश रहता है जिसे मनुष्य समाज के सदस्य के रूप में प्राप्त करता है।” टॉयलर की इस परिभाषा में भौतिक तत्वों को संस्कृति में शामिल नहीं किया गया है। आज के मानवशास्त्रियों ने संस्कृति में भौतिक तत्वों को भी शामिल किया है।

3. पिडिंग्टन (R. Piddington):
“मानव संस्कृति उन भौतिक और बौद्धिक साधनों और उपकरणों का संपूर्ण योग है जिसके द्वारा मानव अपनी जैविकीय और सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और साथ ही अपने को पर्यावरण के अनुकूल बनाता है।” पिडिंग्टन की इस परिभाषा में –

  • भौतिक और बौद्धिक साधनों और उपकरणों को संस्कृति का अंग माना गया है।
  • मनुष्य संस्कृति के माध्यम से अपने को पर्यावरण (Environment) के अनुकूल बनाता है।
  • संस्कृति के तत्वों को मनुष्यमात्र की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन माना गया है।

4. डॉ. श्यामचरण दूबे:
प्रसिद्ध भारतीय विद्वान डॉ. दूबे के शब्दों में, “सीखे हुए व्यवहार-प्रकारों की उस समग्रता को जो किसी समूह को विशिष्टता प्रदान करती है, संस्कृति की संज्ञा दी जा सकती है। दूसरे शब्दों में, किसी समूह के ऐतिहासिक विकास में जीवन-यापन के जो विशिष्ट स्वरूप विकसित होते हैं, वे ही उस समूह की संस्कृति हैं।” पिडिंग्टन तथा दूबे के अनुसार मानव द्वारा निर्मित सभी भौतिक एवं अभौतिक वस्तुएँ संस्कृति में आती हैं।

5. रॉबर्ट बीयस्टेंड (Robert Bierstedt):
“संस्कृति एक जटिल समग्रता (the com plex whole) है जिसमें उन सभी चीजों का समावेश हैं जिनपर हम सोचते हैं, कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते उन्हें अपने पास रखते हैं।”

6. हस्कोविट्स (Herskovits):
“संस्कृति पर्यावरण का मानव-निर्मित व्यवहार है।”

7. मेकाइवर तथा पेज (Maclver and Page):
मेकाइवर तथा पेज ने संस्कृति को सभ्यता से अलग माना है। उनका कहना है कि “हमारी संस्कृति वही है जो हम हैं और हम प्रयोग करते हैं, वही हमारी सभ्यता है” (Our culture is what we are, our civilization is what we use)। उन्होंने कलम, घड़ी, टाइपराइटर मशीन आदि को सभ्यता माना है जबकि ज्ञान, नैतिक आचार शास्त्र, कला, धर्म आदि को संस्कृति का तत्व स्वीकार किया है।

संस्कृति की विशेषताएँ:
संस्कृति के सम्बन्ध में प्राप्त अवधारणों तथा अनेक परिभाषाओं के आधार पर संस्कृति के सम्बन्ध में कुछ विशिष्ट विशेषताओं की संभावना मिलती है जो इस प्रकार व्यक्त किये जा सकते हैं –

  1. संस्कृति उन लोगों के व्यवहारात्मक उत्पादों को सम्मिलित करती है जो हमसे पहले आ चुके हैं। अर्थात् जैसे ही हम जीवन प्रारम्भ करते हैं, संस्कृति वहाँ पहले से ही उपस्थित होती है।
  2. संस्कृति एक जीवन-पद्धति है जो किसी निश्चित परिवेश में रहने वाले लोगों द्वारा अपनाई जाती है।
  3. संस्कृति को कुछ प्रतीकों में अभिव्यक्त अर्थों के रूप में समझा जाता है जो कि ऐतिहासिक रूप से लोगों में संचालित होते हैं।
  4. संस्कृति समय, स्थान, पर्यावरण और परिस्थिति के कारण भिन्नता बनाए रह सकती है।
  5. संस्कृति एक समाज से दूसरे समाज के मनुष्यों के व्यवहारों का निरूपण करती है।

इन विशेषताओं को स्पष्टतः व्यक्त करने के उपरान्त निम्न विशेषताओं को भी व्यक्त किए जा सकते हैं –

1. संस्कृति सीखे हुए आचरणों का नाम है:
जैसे-अभिवादन, गायन, वस्त्र पहनना, नृत्य करना आदि सीखे हुए आचरण कहलायेंगे; क्योंकि हम इन्हें समाज से सीखते हैं। गैर सीखे हुए आचरण वे कहलायेंगे जो कि स्वाभाविक प्रवृत्ति से सम्बन्धित होते हैं। जैसे-रोना, क्रोध करना आदि। समस्त सीखे हुए आचरण एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं; जैसे कि गुरु-शिष्य का आचरण, मालिक-मजदूर का आचरण आदि और इन्हीं के आध पर पर हम आचरणों के प्रतिमान निर्धारित करते हैं, जैसे-बच्चों का आचरण, स्त्रियों का आचरण, शिष्यों का आचरण इत्यादि।

2. संस्कृति के छिपे हुए आचरण संगठित प्रतिमानों के रूप होते हैं:
किसी भी व्यक्ति के आचरण का स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता है वरन् इनका महत्त्व अन्य लोगों के सम्बन्धों में’ ही होता है। एक आचरण अन्य आचरणों से भी सम्बन्धित होता है। हर व्यक्ति के आंचरण निर्धारित हो जाने पर समाज तथा उनकी संस्कृति उससे यह आशा करती है कि वह उसी के अनुसार आचरण करें। इसी के आधार पर उनके आचरणों का नामांकन होता है। जैसे कि बच्चों की तरह आचरण करने वाले युवक के कार्यों को बचकाना आचरण कहा जायगा। कुछ विशेष आचरण तथा संस्कृति द्वारा स्त्री तथा पुरुषों के लिए निर्धारित किये गये हैं। यदि कोई पुरुष स्त्रियो के अनुसार आचरण करते हैं तो उसे जनाना आचरण कहते हैं।

3. संस्कृति प्रतिमान आदर्शात्मक होते हैं:
भला-बुरा, सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, विचार की शिक्षा छोटे को बड़े से मिलती है। उचित-अनुचित की धारणा परिणाम पर निर्भर करता है। किसी व्यक्ति के कार्य का परिणाम यदि अच्छा होता है तो मनुष्य उसका अनुसरण करते हैं। इस प्रकार जनरीति, प्रथा, परम्परा, संस्था का रूप लेकर वह विचार संस्कृति का अंग बन जाता है।

4. संस्कृति के प्रतिमान भौतिक एवं अभौतिक दोनों ही होते हैं:
वस्तुवादी चीजें भौतिकवादी प्रतिमान में आयेंगी और विचारवादी सम्बन्धों को प्रभावित करने वाली अभौतिक प्रतिमान में आयेंगी। इस प्रकार से रेडियो, टेलीविजन के आचरण, विचार, प्रथा, परम्परा आदि वस्तुएँ अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत आयेंगी, क्योंकि ये निराकार होती हैं।

5. सार्वभौमिक स्वीकृति:
कोई भी आचरण संस्कृति का अंग तभी कहलाता है जबकि पर्याप्त लोग उसे स्वीकार कर लेते हैं।

6. व्यवहार के प्रतिमान हस्तांतरति होते हैं:
एक पीढ़ी अपने आचरण दूसरी पीढ़ी को सिखाती है और युग-युग से यह हस्तांतरण चल रहा है। माता-पिता, वयोवृद्धों तथा शिक्षकों के माध्यम से अभौतिक, भौतिक संस्कृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं।

7. संस्कृति का स्वरूप हमेशा परिवर्तनशील होता है:
संस्कृति समाज तथा व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों का नाम है। इसलिये यह हमेशा परिवर्तनशील होती है।

8. संस्कृति सामाजिक है:
संस्कृति सामाजिक है; क्योंकि व्यक्ति समूह के बाहर किसी भी प्रकार की सृष्टि नहीं कर सकता। यह समूह का आदर्शात्मक गुण होता है, व्यक्ति उसे अपनाने का प्रयत्न करता है।

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प्रश्न 7.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि “जैविक कारक हमें समर्थ बनाने की भूमिका निभाती है जबकि व्यवहार के विशिष्ट पहलू सांस्कृतिक कारकों से जुड़े हैं।” अपने उत्तर के समर्थन के लिए कारण दीजिए।
उत्तर:
दिये गये कथन में सच्चाई है, क्योंकि जैवकीय उत्तराधिकारी जीन के माध्यम से घटित होते हैं जबकि सांस्कृतिक उत्तराधिकार पर्यावरण की भिन्न-भिन्न घटनाओं के कारण उत्पन्न होता है। जैविक कारक प्रकृति प्रदत्त होते हैं जबकि व्यवहार को परिवेश के आधार पर कृत्रिम दशा में उपलब्ध किया जाता है। जैविक कारक मनुष्य को ही नहीं बल्कि सभी जीवों को भी जीवन-संबंधी क्रियाकलाप (सांस लेना, भोजन खोजना, स्वयं को सुरक्षित रखना, स्वतंत्र एवं न्यायपूर्ण जीवन जीना) के प्रति समर्थ बनाता है।

सभी जीवों में माता-पिता से मिले जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक बनने का अवसर मिलता है तथा वह विभिन्न प्रतिक्रियाओं के प्रति स्वयं को समर्थ बना पाता है। जीन के रूप में प्राप्त होने वाले गुणसूत्र शरीर के आनुवंशिक तत्व के रूप में सहयोग करता है। गुणसूत्र के माध्यम से जीनोटाइप और फीनोटाइप जैसे लक्षण प्रकट होते हैं तथा जैविक कारक में सुरक्षा सम्बन्धी गुण उत्पन्न हो जाते हैं। इस तरह माना जा सकता है कि जैविक कारकों को उपलब्ध सामर्थ्य आनुवंशिक कारणों से संभव होते हैं।

सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव में जीवन अनुकूलन के लिए अपने व्यवहार में परिस्थिति के अनुसार अन्तर उत्पन्न कर लेता है। हम कुछ विचार, संप्रत्यय और मूल्यों को सीखकर काम व्यवहार सम्बन्धी नियमों, मूल्यों तथा कानूनों की रचना कर परिवेश में अनुकूल परिवर्तन लाने का प्रयास करते रहते हैं। पर्यावरण के विभिन्न घटकों से प्रभावित होकर जीवन अपनी जीव-पद्धति को बदलकर जीने का प्रयास करता है।

मानव का स्वभाव प्राकृतिक दशा के अधीन होती है जबकि शारीरिक क्षमता उसे बचपन से ही उपलब्ध रहती है। माँ-बाप की क्षमता, पालन-पोषण के लिए प्रयुक्त विधि और साधन जीवों को समर्थ बनाता है जो स्वाभाविक वृत्ति मानी जाती है। व्यवहार एक कृत्रिम प्रक्रिया होती है जो परिस्थितिवश उदंड, नम्र, सर्वप्रिय, कटु, किसी श्रेणी में रूपान्तरित हो सकता है।

प्रश्न 8.
समाजीकरण के प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समाज के हित में किये जाने वाले कार्य – विधि को जो हमें सीखने की विधि या अवसर प्रदान करता है उन्हें समाजीकरण के कारक कहते हैं। समाजीकरण के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. माता-पिता
  2. विद्यालय
  3. समसमूह और
  4. जनसंचार का प्रभाव

1. माता-पिता:
बालक के विकास पर सबसे अधिक प्रत्यक्ष और महत्त्वपूर्ण प्रभाव माता-पिता का पड़ता है। वे विभिन्न स्थितियों में माता-पिता के प्रति भिन्न प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं। माता-पिता उनके कुछ व्यवहारों को, शाब्दिक रूप से पुरस्कृत करके जैसे-प्रशंसा करना या अन्य मूर्त तरह से पुरस्कृत करके जैसे-चॉकलेट, खिलौने या बच्चे की पसंद की वस्तु खरीदना प्रोत्साहित करते हैं। वे कुछ अन्य व्यवहारों का अनुमोदन करके, निरुत्साहित करते हैं। वे बच्चों को भिन्न प्रकार की स्थितियों में रखके उन्हें विध्यात्मक अनुभव, सीखने के अवसर और चुनौतियाँ प्रदान करते हैं।

बच्चों से अन्योन्यक्रिया करते समय माता-पिता विभिन्न युक्तियाँ अपनाते हैं जिन्हें पैतृक शैली कहा जाता है। माता-पिता के अपने बच्चों के प्रति व्यवहारों में स्वीकृति और नियंत्रण की हद के विषय में बहुत भिन्नताएँ होती हैं। माता-पिता अपने बच्चों को समाजीकृत करने के लिए जो शैली अपनाते हैं वे उनकी आर्थिक दशा, स्वास्थ्य, कार्य-दबाव, परिवार का स्वरूप आदि से प्रभावित होते हैं। दादा-दादी एवं नाना-नानी के समीपता तथा सामाजिक संबंधों का ढाँचा, बच्चे के समाजीकरण में प्रत्यक्षतः या माता-पिता के माध्यम से बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं।

2. विद्यालय:
बच्चे विद्यालय में लंबा समय व्यतीत करते हैं, जो उन्हें अपने शिक्षकों और समकक्षियों के साथ अन्योन्यक्रिया करने का एक सुसंगठित ढाँचा प्रदान करता है। विद्यालय में बच्चे न केवल संज्ञानात्मक कौशल जैसे-पढ़ना, लिखना, गणित को करना ही नहीं सीखते हैं बल्कि बहुत से सामाजिक कौशल जैसे-बड़ों तथा समवयस्कों के साथ व्यवहार करने के ढंग, भूमिकाएँ स्वीकारणा, उत्तरदायित्व निभाना भी सीखते हैं।

वे समाज के नियमों और मानकों को भी सीखते हैं और उनका आंतरीकरण भी करते हैं। स्वयं पहल करना, आत्म-नियंत्रण, उत्तरदायित्व लेना और सर्जनात्मकता आदि गुण भी बच्चे विद्यालय में सीखते हैं। ये गुण बच्चे को अधिक आत्मनिर्भर बनाते हैं। वास्तव में, एक अच्छा विद्यालय बच्चे के व्यक्तित्व के पूर्णतया ही रूपांतरण कर सकता है।

3. समसमूह:
समसमूह बच्चे के समाजीकरण का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है। यह बच्चों को न केवल दूसरों के साथ होने का अवसर प्रदान करता है बल्कि अपनी उम्र के साथियों के साथ सामूहिक रूप से विभिन्न क्रियाकलापों जैसे-खेल को आयोजित करने का भी अवसर प्रदान करती है। ऐसे गुण; जैसे-सहभाजन, विश्वास, आपसी समझ, भूमिका स्वीकृति एवं निर्वहन भी समकक्षियों के साथ अन्योन्यक्रिया के दौरान विकसित होते हैं। बच्चे, अपने दृष्टिकोण को दृढ़तापूर्वक रखना और दूसरों के दृष्टिकोण को स्वीकार करना और उनसे अनुकूलन करना भी सीखते हैं। समसमूह के कारण आत्म-तादाम्य का विकास बहुत सुगम हो जाता है।

4. जनसंचार का प्रभाव:
दूरदर्शन, समाचारपत्रों, पुस्तकों और चलचित्रों के माध्यम से बच्चे बहुत सारी बातें सीखते हैं। किशोर और युवा प्रौढ़ अक्सर इन्हीं में से अपना आदर्श प्राप्त करते हैं, विशेषकर दूरदर्शन और चलचित्रों से। दूरदर्शन और चलचित्रों में दिखाई जानेवाली हिंसा बच्चों में आक्रामक व्यवहार को बढ़ाता है। अतः समाजीकरण के इस कारक को अधिक तरह से उपयोग करने की आवश्यकता है जिससे बच्चों में अवांछित व्यवहारों के विकास को रोका जा सके।

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प्रश्न 9.
संस्कृतिकरण और समाजीकरण में हम किस प्रकार विभेद कर सकते हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संस्कृतिकरण का संदर्भ उन समस्त अधिगमों से है जो बिना किसी प्रत्यक्ष और सोद्देश्य शिक्षण के होता है जबकि समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति ज्ञान, कौशल और शील गुण अर्जित करते हैं जो उन्हें समाज एवं समूहों में प्रभावशाली सदस्यों की तरह भाग लेने में सक्षम बनाती है।

  1. संस्कृतिकरण के मुख्य तत्व प्रेक्षण द्वारा सीखना है जबकि सबसे महत्त्वपूर्ण समाजीकरण कारक माता-पिता, विद्यालय समसमूह, जन-संचार आदि होते हैं।
  2. संस्कृतिकरण के प्रभाव काफी स्पष्ट दिखाई देते है तथापि लोग सामान्यतः इन प्रभावों के प्रति सजग नहीं हो पाते हैं। समाजीकरण के प्रभाव के रूप में माता-पिता का व्यवहार, विद्यालय का कार्यक्रम, सामाजिक जालक्रम का विस्तार, अवांछित व्यवहारों का विकास आदि से जुड़े होते हैं।
  3. संस्कृतिकरण का प्रत्यक्ष विरोधाभास को जन्म देता है जबकि समाजीकरण किसी व्यक्ति में सुरक्षा, देखभाल, पालन-पोषण, योग्यता का विकास आदि को समझने तथा अपनाने का अवसर जुटाता है।
  4. पूर्ववर्ती पीढ़ियों के माध्यम से चीजों का सांस्कृतिक निरूपण किया जाता है जबकि समाजीकरण सदस्यों के व्यवहार, विकास, अनुप्रयोग आदि पर ध्यान देता है।
  5. संस्कृतिकरण पूरी जीवन विस्तृति तक निरन्तर चलती रहती है जबकि समाजीकरण आवश्यकता एवं दशा पर आश्रित होता है।
  6. संस्कृतिकरण एक प्रकार का सजग एवं उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है जबकि समाजीकरण समाजीकृत करने की शक्ति रखता है जो भाषिक व्यवहार के रूप में जाना जाता है।
  7. अर्थात् संस्कृतिकरण और समाजीकरण में विभेद बतलाने के लिए उनकी प्रकृति एवं विशेषताओं (लक्षण एवं प्रभाव) को इंगित करना होता है।

प्रश्न 10.
परसंस्कृति ग्रहण से क्या तात्पर्य है? क्या परसंस्कृति ग्रहण एक निर्बाध प्रक्रिया है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
दो भिन्न संस्कृतियों में से कोई एक जब दूसरी के सम्पर्क में आता है तो सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आना परसंस्कृति ग्रहण के सामान्य धारणा है। अभीष्ट सम्पर्क प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कुछ भी हो सकता है। परसंस्कृति ग्रहण की रूप में नयी संस्कृति में स्थानांतरण अथवा जन-संचार के माध्यमों से होनेवाले में प्रयुक्त माध्यमों में हो सकता है। उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना, प्रशिक्षण, नौकरी या व्यापार के लिए स्थान बदलना ऐच्छिक ग्रहण माना जाता है। औपनिवेशिक अनुभव, आक्रमण या राजनीतिक शरण के द्वारा अनैच्छिक ग्रहण कहलाता है।

परसंस्कृति ग्रहण को स्पष्टतः समझने के लिए कुछ नया सीखने की आवश्यकता हो जाती है। अर्थात् परसंस्कृति ग्रहण की स्थिति में कोई व्यक्ति समस्यारहित माना जाता है। इसमें यदा-कदा द्वन्द्व की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

व्यवहार संबंधी ज्ञान की पुनरावृत्ति को जारी रखने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया है। इसे परिवर्तन मुक्त भी रखा जा सकता है। अर्थात् परसंस्कृति ग्रहण का तात्पर्य दूसरी संस्कृतियों के साथ सम्पर्क के परिणामस्वरूप आए हुए सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों से है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष; ऐच्छिक अथवा अनैच्छिक किसी भी श्रेणी में रहकर कुछ नया सीखने के लिए बाध्य कर देता है।

दूसरी संस्कृति के लोगों से मिलने पर उसकी संस्कृति को समझना तथा उसके साथ जीवन व्यतीत करने की सही स्थिति का पता लगाना परसंस्कृति ग्रहण की प्रमुख विशेषता है। ब्रिटिश शासनकाल में लोग इसी कारण इसके लक्षणों एवं आदर्शों को ग्रहण करना सरल, सत्य एवं अभीष्ट माना गया। इस प्रकार ब्रिटिश संस्कृति के साथ रह जाने से उसकी जीवन-शैली संबंधी प्रेक्षण किया जाता है।

परसंस्कृति ग्रहण की व्याख्या पर्यावरण को रूपान्तरित करना होता है। यह निर्बाध प्रतिक्रिया को नकारते हुए किसी के जीवन में किसी भी समय घटित हो सकती है। यह जब कभी भी घटित होता है तब इसमें मानकों, मूल्यों, गुणों और व्यवहार के प्रारूपों को पुनः सीखना होता है। इसकी सफल-व्याख्या करने के लिए समाजीकरण की मदद ली जाती है। परिवर्तन की दिशा एवं प्रभाव के बदलने से परसंस्कृति ग्रहण के प्रति समझ भी बदल जाती है।

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प्रश्न 11.
परसंस्कृतिग्रहण के दौरान लोग किस प्रकार की परसंस्कृतिग्राही युक्तियाँ अपनाते हैं? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
परसंस्कृतिकरण के अवसर पर अक्सर कुछ द्वन्द्व उत्पन्न हो जाते हैं जिससे मुक्ति पाना आवश्यक हो जाता है। अध्ययन से ज्ञात है कि लोगों के पास परसंस्कृतिग्राही परिवर्तन का मार्ग बदल जा सकता है। लोगों के पास परसंस्कृति ग्रहण से संबंधित कई विकल्प होते हैं। परसंस्कृति ग्रहण एक विशिष्ट नैतिक घटना है जिसका अध्ययन आत्मनिष्ठ तथा वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। भाषा, वेशभूषा, जीवन-शैली, जीवन-यापन के साधन, घर का प्रबंध, घर के साधन (आभूषण, फर्नीचर, रेडियो, टी.वी.), यात्रा के अनुभव, चलचित्रों का प्रदर्शन इत्यादि जीवन-यापन में अपनाये जाने वाले परिवर्तनों की सूचना देते हैं।

परिवर्तनों का परीक्षण या अभिवृतियाँ द्वन्द्व की समस्या से छुटकारा दिलाने में समर्थ हैं। इन्हें एक प्रमुख युक्ति माना जाता है। जीवन पद्धति से जुड़े परिवर्तनों के प्रति सजग रहना परसंस्कृति ग्रहण का मार्ग खोल देता है। साथ ही साथ समाकलन, आत्मसात्करण, पृथक्करण तथा सीमांतकरण नामक चार युक्तियों का उपयोग करके परसंस्कृति ग्रहण की संभावना को और अधिक पुष्ट बनाया जा सकता है। समाकलन नामक युक्ति में दो भिन्न संस्कृतियों को समान मूल्य दिया जाता है। आत्म सात्करण नामक युक्ति के द्वारा अपनी सांस्कृतिक अनन्यता को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।

पृथक्करण:
लोगों को दूसरे सांस्कृतिक समूहों के अन्यान्य क्रिया से बचना चाहिए।

सीमांतकरण:
अनिश्चय की स्थिति में रहने वाले लोग दो तरह के प्रश्नों के उत्तर जानने को उत्सुक रहते हैं।

(क) उन्हें क्या करना चाहिए?
(ख) वे क्यों दयनीय स्थिति में कैसे बने रहते हैं?

Bihar Board Class 11 Psychology मानव व्यवहार के आधार Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तंत्रिका-कोष सन्धि का परिचय दें।
उत्तर:
किसी सूचना के प्रसारण की स्थिति में तंत्रिका आवेग को संचारित करना होता है। इस प्रक्रिया में एक तंत्रिका कोशिका निकटवर्ती तंत्रिका कोशिका को संदेश दे देती है। पूर्ववर्ती तंत्रिका कोशिका के अक्ष तंतु से प्रकार्यात्मक संबंध या तंत्रिका कोष-संधि बनाते हैं।

प्रश्न 2.
तंत्रिका तंतु का क्रमबद्ध प्रतिरूपण एक आरेख के रूप में किस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है।
उत्तर:
मानव तंत्रिका तंत्र सर्वाधिक जटिल एवं विकसित तंत्र है जिसके प्रमुख अंश अलग-अलग तरह से व्यवस्थित रहकर विभिन्न प्रकार्यों से संलग्न रहते हैं। जैसे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र कठोर हड्डी के खोल (कपाल) के अन्दर पाया जाता है। स्वायत्त तंत्रिका तंत्र का कार्य ऐच्छिक नियंत्रण से बाहर होता है।

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प्रश्न 3.
परिधीय तंत्रिका तंत्र में क्या पाए जाते हैं?
उत्तर:
परिधीय तंत्रिका तंत्र में वे समस्त तंत्रिका कोशिकाएँ तथा तंत्रिका तंतु पाए जाते हैं जो केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को पूरे शरीर से जोड़ते हैं। कायिक तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र इसके प्रमुख भाग होते हैं।

प्रश्न 4.
कायिक तंत्रिका तंत्र के तीन प्रमुख हिस्से क्या हैं?
उत्तर:
कायिक अथवा कपालीय तंत्रिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं –

  1. संबेदी: जो संवेदी सूचनाओं का संग्रह करती है।
  2. पेशीय: जो पेशीय आवेगों को सिर के क्षेत्र में पहुँचाती है।
  3. मिश्रित: जो मेरुरज्जू के 31 समुच्चयों के रूप में संवेदी तथा संवहन दो तरह के कार्यों को पूरा करती है।

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प्रश्न 5.
स्वायत्त तंत्रिका के दो खण्ड क्या हैं? उनका तुलनात्मक अध्ययन किस रूप में किया जाता है?
उत्तर:
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र के दो प्रमुख खण्ड हैं –

  1. अनुकम्पी खण्ड तथा
  2. परानुकंपी खण्ड विपरीत प्रभाव डालने वाले दोनों खण्डों का संतुलन बनाये रखने के लिए मिलकर कार्य करने होते हैं। परानुकंपी खण्ड मुख्यतः ऊर्जा के संरक्षण से सम्बद्ध होते हैं। अनुकंपी खण्ड आपातकालीन स्थितियों को नियंत्रित रखता है।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र किनकी सहायता से तथा किस प्रकार के कार्य करते हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क और मेरुरज्जु की सहायता से समस्त संवेदी सूचनाओं को संगठित करके मांसपेशियों तथा ग्रंथियों को प्रेरक आदेश देने का काम करता है।

प्रश्न 7.
मस्तिष्क के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात क्या है?
उत्तर:
एक वयस्क मस्तिष्क का भार 1.36 किग्रा होता है तथा इसमें 100 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं। उसकी मानव व्यवहार और विचार को दिशा प्रदान करने की योग्यता आश्चर्यजनक मानी जाती है।

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प्रश्न 8.
तंत्रिक तंत्र को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र को तीन भागों में विभाजित किया गया है-केंद्रीय तंत्रिकातंत्र, स्वचालित तंत्रिकातंत्र एवं परिधीय तंत्रिकातंत्र।

प्रश्न 9.
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के कौन-कौन भाग होते हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को दो भागों में विभाजित किया गया है-सुषुम्ना नाड़ी एवं मस्तिष्क।

प्रश्न 10.
संवेदी तंत्रिकाएँ कहाँ अवस्थित होती हैं तथा इसके क्या कार्य हैं?
उत्तर:
संवेदी तंत्रिका शरीर के सभी भागों में स्थित होती है। इसका मुख्य कार्य ज्ञानेन्द्रियों रे स्नायु-प्रवाहों को ग्रहण करके मस्तिष्क तक पहुँचाना है।

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प्रश्न 11.
गति तंत्रिका कहाँ अवस्थित होती है तथा इसके क्या कार्य हैं?
उत्तर:
गति तंत्रिका पूरे शरीर में पायी जाती है। यह मस्तिष्क से उत्पन्न हुए तंत्रिका आवेगों को मस्तिष्क या सुषुम्ना से ग्रहण करके माँसपेशियों, ग्रंथियों तथा शरीर के विभिन्न केन्द्रों तक ले जाने का कार्य करता है।

प्रश्न 12.
मस्तिष्क को किन तीन प्रमुख हिस्सों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर:
मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग हैं –

  1. पश्च मस्तिष्क
  2. मध्य मस्तिष्क तथा
  3. अग्र मस्तिष्क उनके उपभागों के नाम मेडुला, ऑबलांगाटा, सेतु अनुमस्तिष्क आदि होते हैं।

प्रश्न 13.
प्रतिवर्ती क्रिया किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी आकस्मिक उद्दीपनों के प्रति संवेदी अंगों के द्वारा अनैच्छिक क्रिया के रूप में प्रकट की जाने वाली प्रतिक्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं। जैसे-आँख झपकने की क्रिया।

प्रश्न 14.
साहचर्य तंत्रिका का क्या कार्य है?
उत्तर:
साहचर्य तंत्रिका का स्थान मस्तिष्क में तथा कुछ सुषुम्ना नाड़ी में होता है। इसका मुख्य कार्य संवेदी तंत्रिका से स्नायु-प्रवाहों को ग्रहण करके दूसरे साहचर्य तंत्रिका या गति तंत्रिका तक पहुँचाना होता है।

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प्रश्न 15.
अंतःस्रावी ग्रन्थि (Endocrine gland) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनुष्य के शरीर में वैसी ग्रन्थियाँ जिनसे स्राव निकलकर सीधे खून में मिल जाते हैं और व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। ऐसी ग्रन्थियों को अन्तःस्रावी ग्रन्थि कहा जाता है।

प्रश्न 16.
आनुवंशिकता की विशेषताएं बतायें।
उत्तर:
हम अपने माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार में जीन के रूप में पाते हैं। अपने पूर्वजों से प्राप्त उत्तराधिकार में शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ मिली रहती हैं। आनुवांशिक तत्व के प्रमुख तत्व गुणसूत्र होते हैं। गुणसूत्र मुख्यत: DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवांशिक निर्देश जीन के रूप में उपस्थित रहते हैं। जीन में उत्परिवर्तन की क्षमता होती है।

प्रश्न 17.
हमारे व्यवहार किससे प्रभावित होते हैं?
उत्तर:
हमारे कई व्यवहार अंत:स्रावों से प्रभावित होते हैं तो कई व्यवहार प्रतिवर्ती अनुक्रियाओं के कारण होते हैं। हालाँकि हार्मोन तथा प्रतिवर्ती हमारे व्यवहार में आनेवाले अन्तरों की स्पष्ट व्याख्या नहीं कर पाती हैं। हमारे व्यवहार पर सांस्कृतिक शक्तियों का प्रभाव भी स्वाभाविक है। मानव काम-व्यवहार अनेक नियमों, मान, मूल्यों और कानूनों से नियंत्रित रहते हैं।

प्रश्न 18.
समाजीकरण के प्रमुख कारकों की चर्चा करें।
उत्तर:

  1. माता-पिता तथा घर के अन्य सदस्य
  2. विद्यालय
  3. समसमूह
  4. जन-संचार आदि समाजीकरण के प्रमुख कारक माने जाते हैं

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प्रश्न 19.
परसंस्कृति ग्राही युक्तियों को किन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:
परसंस्कृति ग्रहण के मार्ग में लोगों द्वारा जो परसंस्कृति ग्राही युक्तियाँ अपनाई जाती हैं वे हैं –

  1. समाकलन
  2. आत्मसात्करण
  3. पृथक्करण तथा
  4. सीमांतकरण

प्रश्न 20.
अंतःस्रावी ग्रन्थियों के नाम लिखें।
उत्तर:
अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. थाइरायड ग्रन्थि
  2. पाराथायरायड ग्रंथि
  3. पिट्यूटरी ग्रन्थि
  4. एड्रीनल ग्रन्थि
  5. गोनाड्स (यौन ग्रन्थि)

प्रश्न 21.
लोग शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। क्यों?
उत्तर:
लोगों की विशिष्टताएँ, उनकी आनुवांशिक और पर्यावरण की माँगों के बीच अंतःक्रिया का परिणाम होती है। अर्थात् किसी प्रजाति के पूर्ववर्ती प्रारूपों में पर्यावरण की परिवर्तित होती हुई अनुकूलन की आवश्यकताओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप जैविकीय परिवर्तन तथा विकास होता रहता है।

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प्रश्न 22.
आधुनिक मानव के किन तीन महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों के कारण वे अपने पूर्वजों से अलग प्रतीत होते हैं?
उत्तर:

  1. बड़ा और विकसित मस्तिष्क
  2. दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलने की क्षमता तथा
  3. काम करने योग्य विपरीत अँगूठे के साथ मुक्त हाथ

प्रश्न 23.
हमारे व्यवहार का महत्त्वपूर्ण निर्धारक किसे माना जा सकता है?
उत्तर:
हमारी जैविकीय संरचना, जो हमें हमारे पूर्वजों से एक विकसित शरीर और मस्तिष्क के रूप में प्राप्त हुई है, हमारे व्यवहार का निर्धारक बनकर हमारी सहायता करती है। हम अनुभव एवं ज्ञान के आधार पर पर्यावरण से समझौता करते हुए जीवन की विकास पथ अग्रसरित करते है।

प्रश्न 24.
तंत्रिका कोशिकाएँ क्या हैं?
उत्तर:
तंत्रिका कोशिका हमारे तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाई है। ये उद्दीपकों को विद्युतीय आवेग में बदलती है तथा प्राप्त सूचना को विद्युत रासायनिक संकेतों में बदलकर अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य करती है।

प्रश्न 25.
मानव तंत्रिका तंत्र में कितनी कोशिकाएँ हैं?
उत्तर:
मानव तंत्रिका तंत्र में आकार, संरचना एवं कार्य करने की प्रवृत्ति और क्षमता की दृष्टि से भिन्न मानी जानेवाली लगभग बारह अरब तंत्रिका कोशिकाएँ हैं।

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प्रश्न 26.
वे तीन मूलभूत घटक क्या हैं जो तंत्रिका कोशिकाओं में भिन्नता पाई जाने पर भी समान रूप से पाए जाते हैं?
उत्तर:
सभी तंत्रिका कोशिकाओं में समान रूप से पाए जाने वाली तीन घटक हैं –

  1. काय (soma)
  2. पार्श्व तंतु (dendrites) तथा
  3. असतंतु (axon) ये कार्य की दृष्टि से अलग-अलग महत्त्व रखते हैं।

प्रश्न 27.
तंत्रिका आवेग क्या है?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र में प्रवाहित होने वाली सूचनाओं के परिवर्तित रूप को तंत्रिका आवेग कहते हैं जो उद्दीपक ऊर्जा के सशक्त होने पर ही उत्पन्न होती है। इसकी शक्ति तंत्रिका तंतु के साथ-साथ स्थिर रहती है।

प्रश्न 28.
सम्पूर्ण या बिल्कुल नहीं का नियम (All or non law) क्या है?
उत्तर:
जब कोई स्नायु-प्रवाह चलता है अर्थात एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन में जाता है तो अपनी पूरी शक्ति के साथ जाता है, अन्यथा रुक जाता है। इसे ही सम्पूर्ण या बिल्कुल नहीं का नियम कहते हैं।

प्रश्न 29.
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक किसमें होती है?
उत्तर:
नयूरॉन का वह हिस्सा जो तांत्रिक आवेग को दूसरे न्यूरॉन में छोड़ता है, उसे एक्सॉन कहा जाता है।

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प्रश्न 30.
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक किसमें होती है?
उत्तर:
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक मस्तिष्क में होती है।

प्रश्न 31.
संस्कृति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संस्कृति उन प्रतीकात्मक एवं सीखे हुए पक्षों को बिंबित करती है जिसमें भाषा, प्रथा, परम्पराओं आदि का समावेश किया जाता है।

प्रश्न 32.
संस्कृति की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
संस्कृति की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है – एक समाज विशेष के सदस्यों के सम्पूर्ण व्यवहार प्रतिमानों और समग्र जीवन विधि को ही संस्कृति कहा जाता है जो सामाजिक विरासत के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है।

प्रश्न 33.
भौतिक संस्कृति क्या है?
उत्तर:
भौतिक संस्कृति का संबंध उन बुनियादी दशाओं से है जिसमें भौतिक वस्तुएँ होती. हैं, जिन्हें समाज के सदस्यों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है तथा जिन्हें देखा जा सकता है।

प्रश्न 34.
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम क्या हैं?
उत्तर:
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम में नियम, अपेक्षाएँ और मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।

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प्रश्न 35.
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम क्या हैं?
उत्तर:
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम का अभिप्राय मिथकों, अंधविश्वासों, वैज्ञानिक तथ्यकलाओं एवं धर्म से जुड़े हुए विचार हैं।

प्रश्न 36.
समाजीकरण का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक नवजात शिशु जो जन्म के समय न सामाजिक होता है और न असामाजिक, किसी विशिष्ट समाज का क्रियाशील सदस्य बन जाता है जो जन्म के बाद प्रारंभ होता है।

प्रश्न 37.
संस्कृति और मानवीय व्यवहार का क्या संबंध है?
उत्तर:
संस्कृति मनुष्य को विरासत में प्राप्त होती है इसलिये जिस संस्कृति में मनुष्य जीवन-यापन करता है उसी के अनुसार उसका सम्पूर्ण सामाजिक व्यवहार भी हो जाता है। इस पर मनोवैज्ञानिक व्यवहार का प्रभाव अवश्य पड़ता है।

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प्रश्न 38.
संस्कृतिकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संस्कृतिकरण सामाजिक परिवर्तन का एक स्वाभाविक आयाम है। अपनी संस्कृति के सभ्य लोगों के अनुरूप अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन लाने और उनकी संस्कृति के मानदण्डों के अनुरूप व्यवहार करने को संस्कृतिकरण कहा जाता है।

प्रश्न 39.
आधुनिकीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आधुनिकीकरण मानवीय सामाजिक व्यवहार की एक ऐसी क्रिया है जिसमें मनुष्य आधुनिक विचारों और तकनीक के आधार पर सामाजिक व्यवहार करता है। मनुष्य आधुनिक विचारों से प्रभावित हो जाता है।

प्रश्न 40.
मस्तिष्क को कितने मुख्य भागों में बांटा गया है?
उत्तर:
मस्तिष्क को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है-पश्च मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क तथा अग्र मस्तिष्क।

प्रश्न 41.
पश्च मस्तिष्क में मस्तिष्क के कौन-कौन से भाग आते हैं?
उत्तर:
पश्च मस्तिष्क के अन्तर्गत मेडुला, सेतु एवं लघु मस्तिष्क आते हैं।

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प्रश्न 42.
मस्तिष्क का सबसे निचला हिस्सा कौन होता है?
उत्तर:
मस्तिष्क का सबसे नीचे तथा पीछे सुषुम्ना शीर्ष (Medulla) अवस्थित होते हैं !

प्रश्न 43.
लघु मस्तिष्क का क्या कार्य है?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क का सबसे प्रमुख कार्य शारीरिक संतुलन को बनाए रखना होता है।

प्रश्न 44.
लघु मस्तिष्क कितने खण्डों में बँटा होता है तथा इसे मिलाने का कार्य कौन करता है?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क दो खण्डों में विभाजित रहता है जिसे मिलाने का काम सेतु करता है।

प्रश्न 45.
मध्य मस्तिष्क को कितने भागों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर:
मध्य मस्तिष्क को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। इसके ऊपरी भाग को रूफ या टेक्टम कोने हैं तथा नीचे का भाग फ्लोर कहलाता है।

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प्रश्न 46.
पश्च मस्तिष्क (Hind brain) तथा मध्य मस्तिष्क को एक साथ मिलाकर क्या कहा जाता है?
उत्तर:
पश्च मस्तिष्क और मध्य मस्तिष्क को एक साथ मिलाकर मस्तिष्क स्तम्भ कहा जाता है।

प्रश्न 47.
किसके द्वारा लघु मस्तिष्क (Cerebelum) तथा प्रमस्तिष्क (Cerebrum) आपस में मिलते हैं?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क तथा प्रमस्तिष्क हाइपोथैलेमस द्वारा आपस में मिलते हैं।

प्रश्न 48.
प्रमस्तिष्क (Cerebrum) में कितने गोलार्द्ध (Hemisphere) होते हैं?
उत्तर:
प्रमस्तिष्क में दो गोलार्द्ध होते हैं।

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प्रश्न 49.
संधि-स्थल (Synapse) क्या है?
उत्तर:
जहाँ दो या दो से अधिक तंत्रिकाएं आपस में मिलती हैं उस स्थान को संधि-स्थल कहते हैं।

प्रश्न 50.
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई किसे कहा जाता है?
उत्तर:
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई को न्यूरॉन कहा जाता है।

प्रश्न 51.
मनुष्य में तंत्रिका आवेग की गति सामान्य रूप से कितनी होती है?
उत्तर:
मनुष्य में तंत्रिका आवेग की गति सामान्य रूप से 100 मीटर प्रति सेकेण्ड होती है।

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प्रश्न 52.
थैलेमस का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
थैलेमस का मुख्य कार्य शरीर के विभिन्न भागों से आए हुए स्नायु-प्रवाहों को मस्तिष्क में निश्चित स्थान पर भेजना है। इसका संबंध संवेगों से भी होता है।

प्रश्न 53.
न्यूरॉन में शाखिकाएं (Dendrites) कहाँ होती हैं?
उत्तर:
शाखिकाएँ कोश शरीर के चारों तरफ शाखा की तरह फैल जाती हैं। इसका आकार बहुत छोटा होता है तथा इसकी भी कई उप-शाखाएँ होती हैं।

प्रश्न 54.
ऐक्सॉन (Axon) क्या है?
उत्तर:
यह न्यूरॉन का एक पतला लम्ब भाग है। इसका एक छोर कोश शरीर से जुड़ा होता है तथा दूसरे छोर पर अनेक छोटे-छोटे तंतु होते हैं जिसे एण्डल ब्रम कहते हैं।

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प्रश्न 55.
समाजीकरण की प्रक्रिया जन्मजात होती है या अर्जित?
उत्तर:
समाजीकरण की प्रक्रिया अर्जित होती है, क्योंकि मनुष्य समाज में होनेवाले परिवर्तन के अनुसार अपने-आपको समायोजित करने का प्रयत्न करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रत्येक की स्थिति बतावें –
(क) साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ
(ख) पार्श्व तंतु
(ग) अवटु ग्रंथि
(घ) मेडुला
उत्तर:
(क) साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ:
मेरुरज्जु के मध्य में उपस्थित तितली के आकार के धूसर रंग के द्रव्य के ढेर में साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं।

(ख) पावं तंतु:
मानव तंत्रिका तंत्र के तीन मूलभूत घटकों में से एक पार्श्व तंतु का नाम लिया जाता है। तंत्रिका कोशिका का अधिकांश कोशिका द्रव्य काय (soma) कोशिका में होती है। पार्श्व तन्तु (Dendrites) शाखाओं की तरह की विशिष्ट संरचना के साथ काय कोशिका से निकलते हैं। पाव तंतु में विशिष्ट ग्राहक होते हैं जो किसी विद्युत-रासायनिक या जैव रासायनिक संकेत के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं।

(ग) अवटु ग्रंथि:
अवटु ग्रन्थि गले में स्थित होती है। यह भाइरॉक्सिन नामक अंतःस्राव उत्पन्न करती है जो शरीर में चपापचय की दर को प्रभावित करता है।

(घ) मेडुला आबलांगाटा:
पश्च मस्तिष्क का एक प्रमुख हिस्सा बनकर मेडुला आबलांगाटा मूलभूत जीवन सहायक गतिविधियों को नियमित करने में सहायक होते हैं। मेडुला मस्तिष्क का सबसे निचला हिस्सा है। इसे मस्तिष्क का जीवनधार केन्द्र माना जाता है।

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प्रश्न 2.
आनुवंशिकता के प्रति जीवन एवं गुणसूत्र के व्यवहार का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
एक बच्चा अपने जन्म के समय.अपने माता-पिता से प्राप्त जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक होता है। उसे माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार में जीन के रूप में मिलता है। यह उत्तराधिकार व्यक्ति के विकास को जैविक नक्शा और समय सारणी प्रदान करता है। आनुवंशिकी की रूप में बच्चा को कुछ शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ उपलब्ध हो जाती हैं। निषेचित युग्मनज के गुणसूत्र प्रत्येक कोशिका के केन्द्र में होता है। गुणसूत्र को शरीर का आनुवंशिक तत्व माना जाता है। गुणसूत्र की संरचना धागे जैसी होती है। युग्मक-कोशिकाओं। में 23 गुणसूत्र पाए जाते हैं।

जीन अथवा DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। गुणसूत्र के एक विशेष जोड़े के प्रत्येक गुणसूत्र पर एक जीन स्थित होता है। लिंग गुणसूत्रों का जोड़ा आनेवाले बच्चे का लिंग निर्धारण करता है। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवांशिक निर्देश जीन के रूप में होते हैं। कुछ विशिष्ट जीन नियंत्रक जैसा कार्य करता है। जीनोटाइप और फीनोटाइप के माध्यम से वह कायिक संरचना तथा व्यवहार की कुशलता का निर्धारण करता है। उत्परिवर्तन कहलाने वाली क्रिया के माध्यम से जीन में रूपान्तरण संभव होता है। फलतः नयी जातियों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार आनुवंशिक नामक प्रवृत्ति के विकास में जीन और गुणसूत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। किसी व्यक्ति का कद, स्मृति, चेहरा, क्रोध जैसे गुण जीन अथवा गुणसूत्रों की देन होती है।

प्रश्न 3.
समाज जीव विज्ञान का क्षेत्र बतलावें।
उत्तर:
जीव विज्ञान और समाज की अन्योन्य क्रिया से संबंधित आधुनिक विद्याशाखा को समाज मनोविज्ञान कहकर संबोधित करते हैं। समावेशी उपयुक्तता के आधार पर यह विद्याशाखा मनुष्य के सामाजिक व्यवहार की व्याख्या करता हैं। समाज के प्रति सर्वप्रिय व्यवहार की कला को प्रभावित करने वाले जैविक कारकों का समुचित अध्ययन करके ही संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। इसी कारण हम संस्कृति के संदर्भ में उपलब्ध कुछ विचारों तथा मूल्यों को सामाजिक परिवेश में सीखना-समझना चाहते हैं।

माता-पिता, विद्यालय, समसमूह, जनसंचार के अतिरिक्त पर्यावरण की विविधता हमें समाज जीवन विज्ञान के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है। सफल जीवन के लिए हमें संस्कृतिकरण और समाजीकरण की विधियों, नियमों, मूल्यों की दृष्टि से स्पष्टतः समझना होगा। अध्ययन की प्रगाढ़ता के क्रम में हमें पता लगेगा कि प्रत्येक जीवन से अच्छे व्यवहार की प्रत्याशा की जाती है जिससे प्रजनन और पालन-पोषण से सम्बन्धित सभी प्रकार की जानकारियाँ मिल सकें।

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प्रश्न 4.
“हमारे व्यवहार दूसरी प्रजातियों की तुलना में बहुत जटिल और विकसित हैं।” कैसे?
उत्तर:
हमारे पास बड़ा और अधिक विकसित मस्तिष्क है। हमारे मस्तिष्क का वर्जन हमारे शरीर के कुल भार का 2.35 प्रतिशत है जो अन्य प्रजातियों की तुलना में सर्वाधिक है। मनुष्य के प्रमस्तिष्क को अन्य भागों की तुलना में अधिक विकसित और उपयोगी माना जाता है। मानव अपने व्यवहार से पर्यावरण के साथ संतुलन बनाते हुए जीवन-क्रिया को आगे बढ़ा लेता है।

हम अपने सार्थक एवं विकसित व्यवहार के कारण आहार की व्यवस्था करने में, परभक्षी से स्वयं को सुरक्षित रखने में, बच्चों को शिक्षा एवं सुरक्षा प्रदान करने में अन्य प्रजातियों की तुलना में स्थिति के अनुसार विधियों एवं साधनों को बदल लेने की क्षमता अधिक विकसित रूप में रखते हैं।

आनुवांशिकता, जीन, गुणसूत्र आदि के महत्व को समझाते हुए सांस्कृतिक दशा के अनुकूल बनाने में हम सक्षम हैं। अनुभव प्राप्त करने अथवा कुछ सीखने-समझने की प्रवृत्ति हममें अपेक्षाकृत अधिक होती है। हमारे पास न केवल समान जैविकीय तंत्र, बल्कि निश्चित सांस्कृतिक तंत्र भी होते हैं। उत्तरजीविता से सम्बन्धित उद्देश्यों को पूरा करने में हमारी सतर्कता एकाधिकार रखती है।

प्रश्न 5.
अंतस्थ बटन (Terminal buttons) किसे कहते हैं? कार्य के आधार पर परिचय दें।
उत्तर:
मेरुरज्जु के अंतिम सिरे पर अक्ष तंतु छोटी-छोटी कई शाखाओं में बँट जाती है जिन्हें अंतस्थ बटन कहा जाता है। अंतस्थ बटन में अन्य तंत्रिका कोशिकाओं, ग्रन्थियों और मांसपेशियों में सूचना भेजने की क्षमता होती है। अक्षतन्तु अपनी लम्बाई के साथ-साथ सूचना का संवहन करता है जो मेरुरज्जु में कई फीट तक और मस्तिष्क में एक मिली मीटर से कम हो सकते हैं। इस असमर्थता की स्थिति में अंतस्थ बटन सूचना संवहन में निर्णायक कार्य करता है।

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प्रश्न 6.
तंत्रिका तंत्र का कौन-सा भाग ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध होता है?
उत्तर:
सभी प्राणियों में मानव तंत्रिका तंत्र सर्वाधिक जटिल एवं विकसित तंत्र होता है। यद्यपि तंत्रिका तंत्र समग्र रूप से कार्य करता है फिर भी इसके अलग-अलग विभागों में अलग-अलग तरह के कार्य करने की प्रवृत्ति होती है। केन्द्रीय तंत्रिका के साथ परिधीय तंत्रिका तंत्र के अस्तित्व को पहचानने के बाद कायिक तंत्रिका तंत्र तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध होता है।

कायिक तंत्रिका तंत्र में कपालीय तथा मेरु तंत्रिका संलग्न होते हैं। संवेदी, पेशीय और मिश्रित तंत्रिकाओं के द्वारा देखने, सुनने के क्रम में नियंत्रण की आवश्यकता पूरी की जाती है। कपालीय तंत्रिकाओं के 12 समुच्चय होते हैं जबकि मेरु तंत्रिकाओं के 31 समुच्चय मिलते हैं। ये दोनों मिलकर संवाद का संवहन तथा संचरण करते हैं। अर्थात् कायिक तंत्रिका तंत्र संवेदी और पेशीय होने के साथ-साथ ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध माने जाते हैं।

प्रश्न 7.
मस्तिष्क की प्राचीनतम तथा नवीनतम संरचनाओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
मस्तिष्क की प्राचीनतम संरचनाएँ उपवल्कुटीय यंत्र, मस्तिष्क स्तम्भ तथा अनुमस्तिष्क को प्राचीनतम संरचनाएँ मानी जाती हैं। लगातार चलनेवाली विकासात्मक प्रक्रियाओं के कारण प्रमस्तिष्कीय वल्कुट नामक परिवर्धन का पता चला है जो मस्तिष्क की नवीनतम परिवर्धन माना जाता है। विकास क्रम में यह भी पता चला है कि एक वयस्क मस्तिष्क का भार लगभग 1.36 किग्रा. है जिसमें 100 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ सक्रिय रहती हैं। मस्तिष्कीय क्रम वीक्षण से पता चलता है कि कुछ मानसिक प्रकार्य मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में वितरित हैं। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट को चार पालियों में विभक्त किया गया है –

  1. ललाट पालि
  2. पार्विक पालि
  3. शंख पालि और
  4. पश्च कपाल पालि

अवधान, चिंतन, स्मृति, तर्कना, देखना, सुनना, सूचनाओं का संवहन, चाक्षुष आवेगों की व्याख्या करना प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की विभिन्न पालियों के माध्यम से सरलता से पूरी की जा सकती है।

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प्रश्न 8.
संधिस्थल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक न्यूरोन के एक्सॉन तथा दूसरे न्यूरोन की शाखिकाओं के मिलन-स्थल को संधिस्थल कहा जाता है। संधिस्थल की विशेषता यह होती है कि एक्सॉन तथा शाखिकाएँ एक-दूसरे से सटी हुई नहीं होती फिर भी तंत्रिका आवेग का संचरण एक्सॉन से शाखिकाओं में हो जाता है। ऐसा संभव इसलिए हो पाता है, क्योंकि एक्सॉन की छोटी-छोटी पुस्तिकाओं से एक विशेष रासायनिक तरल पदार्थ जिसे न्यूरोट्रांसमीटर (neurotransmitter) कहा जाता है, निकलता है जिसके कारण यह स्थान गीला हो जाता है तथा दोनों में संबंध स्थापित हो जाता है। फलस्वरूप, आसानी से तंत्रिका आवेग आगे बढ़ जाता है। इस तरह, संधिस्थल तंत्रिका आवेग को पहले रोकता है तथा फिर उसका मार्ग प्रशस्त कर आगे बढ़ने देता है।

प्रश्न 9.
पूर्ण या शून्य नियम क्या है?
उत्तर:
पूर्ण या शून्य नियम तंत्रिका आवेग (nerve impulse) के संचरण (conduction) का एक नियम है जो यह बताता है कि जब कोई न्यूरोन किसी उपयुक्त उद्दीपन से उत्तेजित होता है तब वह या तो अपनी पूरी शक्ति के साथ उत्तेजित होता है या फिर बिल्कुल ही उत्तजित नहीं होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि उद्दीपन की शक्ति काफी कमजोर होती है जो न्यूरोन में तंत्रिका आवेग उत्पन्न ही नहीं कर पाती है। परंतु, यदि उससे नयूरोन में तंत्रिका आवेग उत्पन्न हो गया तो वह अपनी पूर्ण शक्ति के साथ उत्पन्न होगा न कि उद्दीपन की शक्ति के समान क्षीण मात्रा में।

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प्रश्न 10.
प्रतिवर्त क्रिया किसे कहा जाता है?
उत्तर:
प्रतिवर्त क्रिया या सहज क्रिया वह स्वचालित (automatic) या अनैच्छिक (invol untary) अनुक्रिया है जो किसी उद्दीपन (stimulus) द्वारा उत्पन्न होती है। जैसे, आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने पर पलक का अपने-आप बंद हो जाना, गर्म वायु से अंगुली का स्पर्श होने पर हाथ को झट पीछे खींच लेना आदि प्रतिवर्त क्रिया के उदाहरण हैं। प्रतिवर्त क्रिया की मुख्य विशेषताएँ निम्नांकित हैं –

  1. प्रतिवर्त क्रिया अर्जित (acquired) न होकर जन्मजात होती है।
  2. यह स्वचालित या अनैच्छिक होती है।
  3. इस क्रिया की उत्पत्ति के लिए उद्दीपन (stimulus) का होना अनिवार्य है।
  4. प्रतिवर्त क्रियाओं का संचालन मस्तिष्क से न होकर सुषुम्ना से ही होता है।

प्रश्न 11.
प्रतिवर्त अनुक्रिया तथा प्रतिवर्त धनु में अंतर बताएँ।
उत्तर:
प्रतिवर्त अनुक्रिया या सहज अनुक्रिया (reflex action) किसी उद्दीपन के प्रति किया गया एक स्वचालित (automatic) जन्मजात अनुक्रिया है। जैसे आँख पर तीव्र रोशनी पड़ते ही आँख के पटल का अपने आप बंद हो जाना, हाथ में पिन चुभने या किसी के द्वारा चुभाये जाने पर हाथ का झट से पीछे खींच लेना एक प्रतिवर्त अनुक्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रिया के संचालन में तंत्रिका आवेग (nerve impulse) जिन प्रक्रियाओं एवं अंगों से होकर गुजरता है उसे ही प्रतिवर्ष धनु (reflex arc) कहा जाता है। इसमें ज्ञानेन्द्रिय, संवेदी न्यूरॉन, सुषुम्ना तथा विशेष भाग, साहचर्य न्यूरॉन, कर्मेन्द्रिय आदि अंग सम्मिलित रहते हैं।

प्रश्न 12.
अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों से आप क्या समझते हैं? मानव शरीर की विभिन्न अंतःस्त्रावी ग्रन्थियों का नाम बतायें।
उत्तर:
शरीर के विभिन्न भागों में उपस्थित नलिकाविहीन ग्रन्थिं जो हार्मोन को अन्तःस्रावित करता है, अन्तःस्रावी ग्रन्थि कहलाता है। शरीर में निम्नलिखित अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ हैं –

  1. पीयूष ग्रन्थि
  2. थायराइड ग्रंथि
  3. पाराथायरायड ग्रन्थि
  4. अधिवृक्क ग्रन्थि

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प्रश्न 13.
बहिःस्त्रावी ग्रंथि तथा अंतःस्रावी ग्रंथि में अंतर करें।
उत्तर:
बहिःस्रावी ग्रंथि वैसी ग्रंथि को कहा जाता है जिसके स्राव को निकलने के लिए विशेष मार्ग या नली बनी होती है। यही कारण है कि इसे नलिका विहीन ग्रंथि भी कहा जाता है। अंतःस्रावी ग्रंथि से तात्पर्य वैसी ग्रंथि से होता है जिसका स्त्राव निकलने के लिए किसी तरह की नली या मार्ग नहीं होता है। फलस्वरूप इसका स्राव सीधे खून में मिल जाता है तथा महत्त्वपूर्ण शारीरिक एवं मानसिक प्रभाव उत्पन्न करता है। शारीरिक एवं मानसिक विकास के दृष्टिकोण से अंतःस्रावी ग्रंथियाँ बहिःस्रावी ग्रंथियों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं।

प्रश्न 14.
तंत्रिका तंत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राणी जब कोई अनुक्रिया करता है तब इसमें तीन तरह के अंगों का समन्वय होता है-ग्राहक (receptor) या ज्ञानेन्द्रिय, प्रभावक (effectors) अर्थात् मांसपेशियाँ एवं ग्रंथि तथा समायोजक (adjustor)। समायोजक का काम ज्ञानेन्द्रियों तथा प्रभावक के बीच संबंध स्थापित करना होता है। समायोजक का दूसरा नाम तंत्रिका (nerve) है। अनेक तंत्रिकाएँ आपस में मिलकर ग्राहक तथा प्रभावक में विशेष संबंध स्थापित करती हैं और व्यक्ति सही-सही अनुक्रिया कर पाता है। इन तंत्रिकाओं के समूह या गुच्छा को तंत्रिका तंत्र या स्नायुमंडल (nervous system) कहा जाता है।

प्रश्न 15.
तंत्रिका आवेग क्या है?
उत्तर:
प्रत्येक न्यूरोन एक छोटी पतली आवरण से ढंका होता है। जब कोई उपयुक्त उद्दीपन उस आवरण को उत्तेजित करता है तब उससे न्यूरोन भी उत्तेजित हो जाता है। इससे एक तरह का वैद्यत रासायनिक आवेग (electro chemical impulse) पैदा होता है जिसे तंत्रिका आवेग (nerve impulse) कहा जाता है। तंत्रिका आवेग की गति सामान्यतः 100 मीटर प्रति सेकंड होती है।

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प्रश्न 16.
सुषुम्ना की संरचना का वर्णन करें।
उत्तर:
सुषुम्ना (spinal cord) केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) का एक प्रमुख भाग है। रीढ़ की हड्डी जो गर्दन से कमर तक फैली हुई है, में एक विशेष तरल पदार्थ भरा हुआ होता है और उसमें एक मोटा तंतु (Fibres) होता है। इसे सुषुम्ना कहा जाता है। रीढ़ की हड्डी में 31 जोड़ (Joints) होते हैं और प्रत्येक जोड़ के बाएँ तथा दाएँ भाग से एक-एक तंतु सुषुम्ना तंत्रिका के भी 31 जोड़ होते हैं। प्रत्येक जोड़ा में एक संवेदी तंत्रिका (sensory nerve) तथा दूसरा गतिवाही तंत्रिका (motor nerve) होती है।

संवेदी तंत्रिका का संबंध ज्ञानेन्द्रियों से तथा गतिवाही तंत्रिका का संबंध कर्मेन्द्रिय (motor organs) से होता है। सुषुम्ना को कहीं से भी काटकर देखा जाए तो इसकी भीतरी संरचना (internal structure) एक ही समान दीख पड़ती है।सुषुम्ना के इस कटे हुए बीच के भाग का आकार तितली (butter fly) के समान होता है और इस भाग का रंग भूसर (gray) होता है। इसके बीच के भाग के चारों तरफ तरल पदार्थ होते हैं जिसे अनेक तंत्रिका तंत्र ऊपर से नीचे तथा नीचे से ऊपर की ओर आते-जाते दिखलाई पड़ते हैं। ऊपर से नीचे आनेवाले तंत्रिका तंतु द्वारा मस्तिष्क से सुषुम्ना को तथा नीचे से ऊपर जाने वाले तंत्रिका तंतु द्वारा सुषुम्ना से मस्तिष्क को सूचनाएँ मिलती हैं।

प्रश्न 17.
शाखिका तथा एक्सॉन में अंतर बतलाएँ।
उत्तर:
न्यूरॉन के दो महत्त्वपूर्ण भाग (dendrite) तथा एक्सॉन (axon) हैं। शाखिका के आकार पेड़ की टहनियों तथा शाखाओं के समान होते हैं जिसमें कई छोटी-छोटी उपशाखाएँ होती हैं। इसके द्वारा न्यूरॉन दूसरे न्यूरॉन से आनेवाले तंत्रिका आवेग को ग्रहण करता है। न्यूरॉन के उस भाग को एक्सॉन कहा जाता है जो कोश शरीर (cell body) से निकलकर आगे की ओर लम्बत: बढ़ा हुआ होता है। यह एक ऐसे परत या आवरण से ढंका होता है जो प्रत्येक दो मिलीमीटर पर कुछ दबा हुआ-सा होता है। एक्सॉन द्वारा तंत्रिका आवेग न्यूरॉन से निकलकर दूसरे न्यूरॉन की शाखिका में जाते हैं। अत: एक्सॉन न्यूरॉन का एक सुपुर्दगी केन्द्र (delivery centre) होता है।

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प्रश्न 18.
तंत्रिका कोशिका क्या कार्य करती है?
उत्तर:
तंत्रिका कोशिका हमारे तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाई मानी जाती है। तंत्रिका कोशिकाएँ विशिष्ट कोशिकाओं के रूप में विभिन्न प्रकार के उद्दीपकों को विद्युतीय आवेग में बदलती है। ये सूचना को विद्युत-रासायनिक संकेतों के रूप में ग्रहण करने, संवहन करने तथा अन्य कोशिकाओं तक भेजने में भी निपुण होते हैं। ये ज्ञानेन्द्रियों से सूचना प्राप्त करती है तथा उसे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक ले जाती है।

प्रश्न 19.
मानव तंत्रिका तंत्र के कौन-कौन से तीन मूलभूत घटक पाये जाते हैं?
उत्तर:
मानव तंत्रिका में 12 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं जिनकी आकृति, आकार, रासायनिक संरचना और प्रकार्य में काफी भिन्नता होती है। इन भिन्नताओं के मिलने पर भी तीन मूलभूत घटक समान रूप से पाए जाते हैं –

(क) काय (Soma):
निकटवर्ती तंत्रिका कोशिका से आनेवाले तंत्रिका आवेग को ग्रहण करते हैं। ये पार्श्व तन्तु शाखाओं की तरह विशिष्ट संरचना वाले होते हैं।

(ख) पार्श्व तन्तु (Dendrites):
इसमें विशिष्ट ग्राहक होते हैं जो जैव रासायनिक संकेत (विद्युत रासायनिक) के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं।

(ग) अक्ष तन्तु (Axon):
अक्ष तंतु अपनी लम्बाई के साथ-साथ सूचना का संवहन करता है। इसके अंतिम सिरे पर अंतस्थ बटन के रूप में छोटी-छोटी शाखाओं के पुंज होते हैं।

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प्रश्न 20.
तंत्रिका कोष सन्धि का निर्माण किस प्रकार से होता है?
उत्तर:
पूर्ववर्ती तंत्रिका कोशिका के अग्र तंतु के संकेत दूसरी तंत्रिका के पार्श्व तंतु से प्रकार्यात्मक संबंध बनाते हैं जिसे तंत्रिका कोष सन्धि भी कहते हैं। सन्धि स्थलीय संचरण की प्रकृति रासायनिक होती है जो रासायनिक पदार्थ तंत्रिका-संचारक कहलाते हैं। तंत्रिका कोष सन्धि के मध्य भाग में पाये जाने वाले खाली स्थान को सन्धि स्थलीय खण्ड कहा जाता है।

प्रश्न 21.
परिधीय तंत्रिका तंत्र का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका को पूरे शरीर से जोड़ने वाले समस्त तंत्रिका कोशिकाओं तथा तंत्रिका तन्तु को परिधीय तंत्रिका तंत्र कहते हैं।

प्रश्न 22.
मस्तिष्क की संरचना उसके तीन प्रमुख हिस्सों में स्थित भिन्न-भिन्न उपभागों के नाम के साथ लिखें।
उत्तर:
मस्तिष्क के तीन प्रमुख हिस्से होते हैं –

  1. पश्च मस्तिष्क-इसके उपभाग मेडुला ऑबलांगाटा सेतु तथा अनुमस्तिष्क होते हैं। इनके कारण श्वास प्रक्रिया, स्वमित क्रिया, श्रवण क्रिया, शारीरिक मुद्रा आदि वांछनीय विधि से उपयुक्त कार्य करते हैं।
  2. मध्य मस्तिष्क-इसमें रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम (R.A.S.) भाव प्रबंधन में सहयोग देता है। पर्यावरण से मिलने वाली सूचनाओं के चयन में भी यह सहायक होता है।
  3. अन मस्तिष्क-मस्तिष्क के इस भाग के चार उपविभाग होते हैं –

(क) अधश्चेतक-सांवेगिक तथा अभिप्रेरणात्मक व्यवहारों को नियमित रखने में मदद करता है।
(ख) चेतक-यह सूचना प्रसारण केन्द्र की तरह कार्य करता है।
(ग) उपवल्कुटीय तंत्र-यह तापमान, रक्तचाप और रक्तशर्करा के स्तर को समस्थिति में रखकर शारीरिक क्रिया को संतुलित रखता है। इसमें हिप्पोकेम्पस और गल तुडिका भी समाविष्ट हैं जो दीर्घकालिक स्मृति और संवेगात्मक व्यवहार को नियंत्रित रखता है।

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प्रश्न 23.
कारपस कैलोजम किसे कहा जाता है?
उत्तर:
प्रमस्तिष्क में दो गोलार्द्ध होते हैं:
बायाँ गोलार्द्ध (left hemisphere) तथा दायाँ गोलार्द्ध (right hemisphere)। ये दोनों गोलार्द्ध एक-दूसरे से तंत्रिका के एक विशेष गुच्छा से जुड़े होते हैं। इसी विशेष गुच्छा (bundle) का नाम कारपस कैलोजम है।

प्रश्न 24.
प्रमस्तिष्क का विभिन्न पालियों के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रमस्तिष्क के दोनो गोलार्द्ध केंद्रीय सुलकस तथा लेट्रल दरार की मदद से चार पालियों में बँटे हैं जिनके कार्यों का वर्णन निम्नांकित हैं –

  1. अग्रपालि (Frontal lobe): यह केन्द्रीय सुलकस के आगे तथा लेट्रल दरार के ऊपर का भाग होता है तथा इसके द्वारा उच्च मानसिक प्रक्रियाओं (higher mental processes) का ज्ञान होता है।
  2. मध्यपालि (Parietal lobe): यह पालि केन्द्रीय सुलकस के आगे तथा लेट्रल दरार के ऊपर होता है । इसके द्वारा मूलतः त्वक संवेदन (touch sensation) अर्थात् ठंड, गर्म, दर्द आदि का ज्ञान होता है।
  3. शंखपालि (Temporal lobe): यह पालि लेट्रल दरार के नीचे जिसे हम कन्पट्टी कहते हैं, में होती है तथा इसके द्वारा श्रवण संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

प्रश्न 25.
न्यूरॉन किसे कहते हैं?
उत्तर:
तंत्रिकातंत्र (nervous system) की सबसे छोटी इकाई को न्यूरॉन (neuron) या तंत्रिका कोश कहा जाता है। इसके द्वारा तंत्रिका आवेग प्राणी में एक जगह से दूसरे जगह संचारित होते हैं। अध्ययनों के अनुसार पूरे मानव में न्यूरॉन की संख्या 12.5 अरब (Billion) है जिसमें से करीब 10 अरब सिर्फ मस्तिष्क में ही है। शाखिका (dendrite), जीवकोश (cell body) तथा एक्सॉन (axon) न्यूरॉन के तीन प्रमुख संरचना होते हैं। शाखिका तंत्रिका आवेग को ग्रहण करता है और शरीर (cell body) के ओर भेज देता है। कोश शरीर उसे एक्सॉन (axon) की ओर भेज देता है जो तंत्रिका आवेग को बाहर निकालकर दूसरे न्यूरॉन के शाखिका को सुपुर्द कर देता है।

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प्रश्न 26.
न्यूरॉन के कितने प्रकार होते हैं? संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
(क) संवेदी न्यूरॉन (Sensory of afferent neuron):
इसे ज्ञानवाही न्यूरॉन भी कहा जाता है। संवेदी या ज्ञानवाही न्यूरॉन वैसे न्यूरॉन को कहा जाता है जो तंत्रिका आवेश (nerve impulse) को ज्ञानेंद्रीय (sense organ) से सुषुम्ना एवं मस्तिष्क तक पहुँचता है।

(ख) साहचर्य न्यूरॉन (Association neuron):
इस तरह का न्यूरॉन सुषुम्ना तथा मस्तिष्क में पाया जाता है। साहचर्य न्यूरॉन संवेदी न्यूरॉन तथा गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन (motor impulse) से साहचर्य स्थापित करता है। संवेदी न्यूरॉन से तंत्रिका आवेश को ग्रस्त करके साहचर्य न्यूरॉन उसे गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन में छोड़ता है।

(ग) गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन (Motor neuron):
गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन वैसे न्यूरॉन को कहा जाता है जो तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना या मस्तिष्क से केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई वांछित अनुक्रिया कर पाता है।

प्रश्न 27.
न्यूरॉन तथा तंत्रिका में अंतर करें।
उत्तर:
न्यूरॉन स्नायुमंडल (nervous neuron) की सबसे छोटी इकाई (smallest unit) है जिसमें शाखिका (dendrite), कोश शरीर (cell body), तथा एक्सॉन (axon) होता है। न्यूरॉन संवदी (sensory), पेशीय (motor) या साहचर्य (association) किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। तंत्रिका (nerve) की संरचना इससे भिन्न होती है। सैकड़ों या हजारों न्यूरॉन के एक्सॉन (axon) आपस में मिलकर एक गुच्छा.(bundle) तैयार करते हैं जिसे तंत्रिका (nerve) कहा जाता है। एक ही तंत्रिका में संवेदी तथा पेशीय दोनों तरह के न्यूरोन के एक्सॉन सम्मिलित हो सकते हैं।

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प्रश्न 28.
आनुवंशिकता के लिए जीन एवं गुणसूत्र की क्या भूमिका होती है?
उत्तर:
माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार के रूप में जीन के माध्यम से मिलता है। बच्चा जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक होता है। युग्मनज के मध्य भाग में केन्द्रक होता है जिसमें गुणसूत्र होते हैं। गुणसूत्र शरीर के आनुवंशिक तत्व माने जाते हैं जो मुख्यत: DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों जीन होते हैं।

एक शुक्राणु कोशिका और एक अंडाणु कोशिका के मिलने से एक नयी पीढ़ी का जन्म होता है। गर्भ धारण के समय जीवन 3 गुणसूत्र माता से और 23 गुणसूत्र पिता से प्राप्त करता है। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवंशिक निर्देश जीन के रूप में होते हैं। जीव के विकास में जीन से संयुक्त प्रोटीन महत्त्वपूर्ण काम करते हैं। जीन कई भिन्न रूपों में जीवित रह सकते हैं। जीन के रूपान्तरण को उत्परिवर्तन कहा जाता है। उत्परिवर्तन जीन में पुनः संयोजन के अवसर जुटाती है।

प्रश्न 29.
व्यवहार का जैवकीय आधार तथा सांस्कृतिक आधार को स्पष्ट करें।
उत्तर:
मनुष्य को जीवन-रक्षा एवं समान रक्षा के लिए कई प्रकार के व्यवहार का कर्त्ता बनना होता है। आहार ढूँढने की योग्यता, परभक्षी से दूर रहने की प्रवृत्ति, छोटे बच्चों का संरक्षण एवं पालन-पोषण पर आधारित जैवकीय व्यवहार में अपनी रुचि एवं क्रियाशीलता का प्रदर्शन करना होता है। अतिथियों को पसन्द का भोजन ऐच्छिक परिवेश में कराना हमारे लिए सांस्कृतिक व्यवहार माना जाता है। निर्धारित साधन के अभाव में उचित विकास को खोजकर प्रबंधक की मदद करना हमारा नैतिक व्यवहार है। वर्ग में बैठने की कला, प्रश्न पूछने का तरीका, खेल को खेल की भावना से खेलना, दुखी व्यक्ति को सांत्वना दे देना आदि सांस्कृतिक व्यवहार के अन्तर्गत माने जा सकते हैं।

प्रश्न 30.
संस्कृतिकरण या परसंस्कृतिकरण में क्या अंतर है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
संस्कृतिकरण-उन सभी प्रकार के अधिगम को कहते हैं जो बिना किसी प्रत्यक्ष और सुविचारित शिक्षण के होता है। परसंस्कृतिकरण-परसंस्कृतिकरण का अर्थ है किसी अन्य संस्कृति की धारणा, विचार तथा व्यवहार को स्वीकारना तथा उसे अपनाना। जब व्यक्ति दूसरी संस्कृति की भाषा, विश्वास को अपनाता है तो इसे परसंस्कृतिग्रहण कहते है।

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प्रश्न 31.
संस्कृतिकरण का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
संस्कृतिकरण उन सभी प्रकार के अधिगमों को कहते हैं जो व्यक्ति के जीवन में बिना किसी प्रत्यक्ष और सुविचारित शिक्षण के इसलिए घटित होता है कि वे हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भो में हमें प्राप्त होते हैं। संस्कृतिकरण के दो मुख्य आधार हैं –

  1. प्रेक्षण और
  2. सीखना परिवारों, पूर्वजों अथवा पड़ोसियों के उत्तम व्यवहारों को पता लगाकर उसे ग्रहण करना संस्कृतिकरण माना जाता है। हम कुछ विचार, संप्रत्यय और मूल्यों को सीखते हैं।

प्रश्न 32.
प्रमस्तिष्क पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
प्रमस्तिष्क को प्रमस्तकीय वल्कुट भी कहा जाता है। यह अवधान, अधिगम, स्मृति एवं भाषा व्यवहार जैसे उच्चस्तरीय संज्ञानात्मक प्रकार्यों को नियमित करता है। इसमें तंत्रिका कोशिकाएँ, अक्ष तंतुओं के समूह और तंत्रिका जाल होते हैं। प्रमस्तिष्क दो अर्ध भागों में विभक्त है। बायाँ गोलार्ध भाषा संबंधी व्यवहारों को तथा दायाँ गोलार्द्ध प्रारूप प्रत्यभिज्ञान को संभालते हैं।

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट चार पालियों में बँटा रहता है –

  1. ललाट पालि
  2. पाश्विक पालि
  3. शंख पालि तथा
  4. पश्च कपाल पालि जो चिंतन, स्मृति, दृष्टि, श्रवण, सूचनाओं के प्रक्रमण, उद्दीपकों का नियंत्रण जैसे कार्यों में संलग्न रहते हैं।

मस्तिष्क की कोई भी गतिविधि वल्कुट के केवल एक हिस्से के द्वारा ही संपादित नहीं होती। किन्तु एक विशेष कार्य के लिए वल्कुट का कोई एक विशेष भाग, दूसरे भागों की अपेक्षा अधिक निपुणता से कार्य पूरा कर लेता है।

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प्रश्न 33.
मेरुरज्जु की संरचना और कार्य बतावें।
उत्तर:
मेरुरज्जु की संरचना एक लम्बी रस्सी की तरह का होती है जो मेरुदंड के अन्दर पूरी लम्बाई में फैला रहता है। मेरुरज्जु का एक सिरा मेडुला से जुड़ा होता है जबकि दूसरा सिरा मुक्त रहता है। मेरुरज्जु के मध्य में उपस्थित तितली के आकार के धूसर रंग के प्रत्येक ढेर में साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं। मेरुरज्जु के दो प्रमुख को हैं –

  1. शरीर के निचले भागों से आनेवाले संवेदी आवेगों को मस्तिष्क तक पहुँचाना और
  2. मस्तिष्क में उत्पन्न होनेवाले पेशीय आवेगों को सारे शरीर तक पहुँचाना।

प्रश्न 34.
परिवर्ती क्रिया को समझने के लिए एक स्पष्ट उदाहरण दें।
उत्तर:
परिवर्ती क्रिया उद्दीपन के प्रतिक्रिया स्वरूप घटित होनेवाली अनैच्छिक क्रिया है। प्रतिवर्ती क्रियाएँ हमारे तंत्रिका तंत्र में विकासवादी प्रक्रिया के माध्यम से वंशानुगत होती है।

उदाहरण:
तेज प्रकाश के आने के कारण आँखों की पलकों का झपकना अथवा बहुत गर्म या ठंढा पिण्ड पर हाथ पड़ते ही हाथ को झटके के साथ हटाना परिवर्ती क्रिया कहलाती है। इसी प्रकार सांस लेना, अंगों को फैलाना, घुटनों में झटका लगना आदि परिवर्ती क्रिया मेरुरज्जु के द्वारा सम्पादित होती है जिनमें मस्तिष्क भाग नहीं लेता है। प्रतिवर्ती क्रियाएँ जीव को किसी भी संभावित खतरे से बचाकर जीवन की रक्षा करता है।

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प्रश्न 35.
अन्तःस्रावी तंत्र में सन्निहित विभिन्न ग्रन्थियों के नाम एवं कार्य बतावें।
उत्तर:
मानव शरीर की मुख्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. पीयूष ग्रन्थि-संवृद्धि, अंत:स्राव के माध्यम से मूल और गौण लैंगिक परिवर्तन को नियंत्रित किया जाता है।
  2. अवटु ग्रन्थि-थाइरॉक्सिन नामक अन्तःस्राव उत्पन्न करके शरीर कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पन्न करता है।
  3. अधिवृक्क ग्रन्थियाँ-इसके दो प्रमुख भाग अधिवृक्क वल्कुट और अधिवृक्क मध्यांश कहे जाते हैं जो क्रमशः ACTH और कार्टिकोयड के माध्यम से तंत्रिका तंत्र में उद्दीपन उत्पन्न करता है।
  4. अग्नाशय-यह इन्सुलिन के माध्यम से यकृत में ग्लुकोज का विखंडन करता है। इसकी अनियमित आचरण के कारण मधुमेह नामक रोग से मनुष्य ग्रसित हो जाता है।
  5. जनन ग्रन्थियाँ-शुक्र ग्रन्थि और डिंब ग्रन्थि के संयोजन से प्रजनन सम्बन्धी क्रिया सम्पादित होती है। इसके लिए एस्ट्रोजन, पोजेस्ट्रान, एण्ड्रोजन और टेस्टोस्ट्रोन प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 36.
परसंस्कृतिकरण से क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी अन्य संस्कृति के संपर्क में आकर जो भी सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों के प्रभाव में पड़ते हैं उन्हें परसंस्कृतिकरण कहते हैं। परसंस्कृतिकरण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अथवा स्थायी या अस्थायी रूप में, ऐच्छिक या अनैच्छिक रूप में घटित होता रहता है। ये लाभ और हानि दोनों के कारण होते हैं। परसंस्कृतिकरण के माध्यम से नई विधियों या नये संस्कार से मुलाकात होती है। यह कभी-कभी कष्ट और कठिनाइयाँ उत्पन्न करती हैं। यदि इसे हानिकारक परिणाम वाला समझकर छोड़ने की इच्छा होती है तो कई विकल्प मिल जाते हैं।

प्रश्न 37.
परसंस्कृति ग्राही युक्तियाँ क्या-क्या हैं?
उत्तर:
निम्नलिखित चार युक्तियों के द्वारा परसंस्कृतिकरण सरलता से संभव हो जाता है –

  1. समाकलन-नई-पुरानी दोनों संस्कृति के प्रति रुचि रखना।
  2. आत्मसात्करण-अपनी संस्कृति का त्याग कर नई संस्कृति को अपनाना।
  3. पृथक्करण-दोनों संस्कृतियों को मिश्रित प्रभाव।
  4. सीमांतकरण-अनिश्चित स्थिति में।

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प्रश्न 38.
संस्कृति और समाज में क्या अंतर है?
उत्तर:
संस्कृति समाज में जीने एवं सामूहिक व्यवहार करने का ढंग है यह मानव-निर्मित होता है जिसके अंतर्गत धार्मिक विश्वास, रीति-रिवाज, रहन-सहन, मूल्य, रूढियाँ एवं परंपरा आती हैं। समाज-समाज लोगों का एक समूह है जिसकी एक विशेष सीमा होती है। वे एक सामान्य भाषा होती है जो उनके पड़ोसी लोग नहीं समझ पाते हैं एक समाज एकल राष्ट्र हो सकता है या नहीं हो सकता है।

प्रश्न 39.
समाजीकरण किसे कहते हैं? समाजीकरण के प्रमुख कारक क्या-क्या हैं?
उत्तर:
समाजीकरण-समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोग ज्ञान, कौशल और शीलगुण अर्जित करते हैं जो उन्हें समाज और समूहों के प्रभावी सदस्यों के रूप में भाग लेने के योग्य बनाते हैं। समाजीकरण नामक प्रक्रिया एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सामाजिक-सांस्कृतिक संचरण का आधार तैयार करता है। जैसे कई भाषाओं की जानकारी रखनेवाले को किसी निश्चित क्षेत्र में जाकर उसी क्षेत्र की भाषा का व्यवहार करना होता है। समाजीकरण के प्रमुख कारक-समाज के हित में किये जाने वाले कार्य-विधि को जो हमें सीखने की विधि या अवसर प्रदान करता है उन्हें समाजीकरण के कारण कहते हैं। समाजीकरण के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. माता-पिता
  2. विद्यालय
  3. समसमूह और
  4. जनसंचार का प्रभाव

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘मानव व्यवहार जानवरों के व्यवहार से अधिक जटिल होते हैं। इस कथन को सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर:
मानव व्यवहार की एक महत्त्वपूर्ण निर्धारिका हमारी जैवकीय संरचना है जो पूर्वजों से उत्तराधिकार के रूप में विकसित शरीर और मस्तिष्क के साथ मिलती है। हमारे व्यवहार दूसरी प्रजातियों की तुलना में बहुत जटिल और विकसित हैं क्योंकि हमारे पास एक बड़ा और विकसित मस्तिष्क है । हमें पर्यावरण को समझने तथा उसके प्रभाव के प्रति अनुकूलित होने की क्षमता है। एक मनुष्य होने के कारण हमारे पास न केवल जैवकीय तंत्र है बल्कि निश्चित सांस्कृतिक क्षेत्र भी होते हैं।

हम जानवरों की तुलना में अधिक सरलता से सीखे सकते हैं, अवसर को पहचान कर व्यवहार निश्चित कर सकते हैं। विविध माँगें, अनुभव और अवसर हमारे व्यवहार को अत्यन्त प्रभावित करते हैं। मानवीय व्यवहार के लिए जैविकीय आधार के अलावा सांस्कृतिक आधार भी होते हैं। अर्थात् मानव के व्यवहार की जटिलता का एक प्रमुख कारण यह है कि मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए एक संस्कृति है जो जानवरों में नहीं है।

उदाहरणार्थ, भूख से उत्पन्न वेदना के प्रति किये जाने वाले व्यवहार को समझा जा सकता है। मानव भूख की शांति के लिए विवेकपूर्ण विधि अपनाता है। शाकाहारी और मांसाहारी मानव अपनी भूख को अलग-अलग तरीके शान्त करके सन्तुष्ट होते हैं। खाद्य सामग्रियों के संग्रह और संरक्षण करना केवल मनुष्य के वश की बात है। मानव अपनी भूख की शान्ति के लिए सभ्य तरीका अपनाता है जबकि जानवर भूखा होने पर हिंसक और भयानक बन जाता है। मानव काम-व्यवहार कई नियमों, मानकों, मूल्यों और कानूनों से नियंत्रित होता है जबकि जानवर भोजन पाने के क्रम में किसी नियम और मूल्यों को नहीं अपनाता है।

मानव अपने काम-व्यवहार के लिए भरोसेमन्द साथी का चयन कर लेता है लेकिन जानवर मिल-जुल कर कोई व्यवस्था नहीं कर पाता है। अत: जैविकीय और सांस्कृतिक शक्तियों की परस्पर-क्रिया के द्वारा मानव प्रकृति विकसित होती है जिसके कारण मानव अपना स्वभाव निश्चित करके उचित व्यवहार करता है। मानव अपने व्यवहार को प्रयोगात्मक बनाने के लिए भौतिक वस्तुओं (औजार मूत्तियाँ), विचार (श्रेणियाँ, मानक, परोपकार, दया, धर्म) तथा सामाजिक संस्थान (परिवार, विद्यालय, सहाकारिता विभाग, पंचायत भवन) का उपयोग करने की क्षमता रहता है जो जानवरों को नसीब नहीं होता है।

भवन निर्माण हो या उपस्कर का निर्माण हो हम परिणामी उत्पाद के प्रति सुरक्षा और उपयोग की दृष्टि से सदा सतर्क व्यवहार करते हैं। हम किसी व्यवहार के लिए पूर्व निर्धारित साधनों या विधियों का इन्तजार नहीं करते हैं। वाशिंग मशीन के अभाव में हम बाल्टी-पानी के द्वारा ही सफाई का काम निबटाना जानते हैं। कुर्सी के अभाव में हम शिक्षण कार्य या यात्रा की योजना को बन्द नहीं कर देते हैं।

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प्रश्न 2.
जैवकीय तथा सांस्कृतिक मूल का सामान्य अर्थ एवं उद्देश्य बतावें।
उत्तर:
कोई बच्चा अपने पूर्वजों से एक विकसित शरीर और उन्नत मस्तिष्क पाकर अच्छे व्यवहार के प्रदर्शन के योग बनता है। अर्थात् हमारे व्यवहार का महत्वपूर्ण निर्धारक हमारी जैवकीय संरचना होती है। व्यवहार सम्बन्धी कला एवं आदतें हमें आनुवंशिक रूप में उपलब्ध होती हैं। जैसे माता-पिता के अशक्त रहने के कारण मंद बुद्धि वाले बच्चे जन्म लेते हैं तथा असामान्य लक्षण प्रकट करते हैं। किसी कारण मस्तिष्क की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त हो जाने पर जैवकीय आधारों का महत्त्व जानने का अवसर मिलता है।

किसी व्यक्ति का व्यवहार जैवकीय यंत्र के अलावे सांस्कृतिक तंत्र से भी प्रभावित होता है। पूर्वज से मिला संस्कृति से समझौता करते हुए हम अपने व्यावहारिक आचरण का निर्धारण करते हैं। विकट स्थितियों का मुकाबला करना, आकस्मिक घटना के बाद भी धैर्य बनाए रखना, प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहने की युक्ति सोचना आदि ऐसी परिस्थिति है जहाँ जैविकीय ज्ञान के साथ-साथ सांस्कृतिक सहायता की आवश्यकता महसूस होने लगती है।

माँगें, अभाव, अनुभव, अवसर, लोगों की प्रतिक्रिया, मिलने वाला पुरस्कार आदि हमारे व्यवहार को प्रभावित किए बिना रहते हैं। ज्यों-ज्यों बच्चा बड़ा होने लगता है, इसकी समय विकसित होने लगती है और वह उक्त प्रभावों के स्पष्ट लक्षण और क्षमता को समझने लगता है। कई स्थितियाँ ऐसी आती हैं जब सांस्कृतिक ज्ञान से ही हम समस्या को सरलता से सुलक्षा लेते हैं। मनोवैज्ञानिक की मानें तो जैवकीय आधार के अलावा सांस्कृतिक आधार भी व्यवहार के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। दोनों का साक्षा प्रयास हमारे व्यवहार को उन्नत दर्जा दिलाने में हमारी सहायता करते हैं।

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प्रश्न 3.
स्वतः संचालित स्नायु संस्थान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
स्वतंत्र स्नायु संस्थान मस्तिष्क का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। केन्द्रीय स्नायु संस्थान का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह केन्द्रीय स्नायु संस्थान स्वतंत्र रहकर क्रिया करता है। शरीर में संवेगावस्था में होनेवाले अनेक परिवर्तनों को स्वतंत्र स्नायु संस्थान ही संचालित करता है। इस संचालन में केन्दीय स्नायु संस्थान का कोई हाथ नहीं रहता है।

परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि स्वतंत्र स्नायु संस्थान का केन्द्रीय स्नायु संस्थान से कोई सम्बन्ध नहीं है। केन्द्रीय स्नायु संस्थान के भाग सुषुम्ना का स्वतंत्र स्नायु संस्थान में महत्वपूर्ण स्थान है। अतएव इस स्नायु संस्थान को स्वतंत्र केवल इसलिए समझा जाता है, क्योंकि जिन क्रियाओं के संचालन एवं नियंत्रण में मस्तिष्क काम नहीं करते वे स्वतंत्र स्नायु संस्थान द्वारा संचालित एवं नियंत्रित होती हैं।

इस संस्थान के कार्य को रोका नहीं जा सकता। यह संस्थान स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करता है। यह मानव शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं में समायोजन करता है। इसकी बहुत-सी नाड़ियाँ मस्तिष्क और सुषुम्ना से चलकर आमाशय और रक्तवाहिनी नाड़ियों से आकर मिलती हैं। इन नाड़ियों द्वारा आन्तरिक एवं बाह्य मांसपेशियों की क्रियाओं का संचालन होता है।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान द्वारा स्राव ग्रन्थियों तथा आमाशंय और रक्त कोषों आदि की क्रिया का संचालन होता है। इसी से फेफड़े, दिल, यकृत, तित्ली, आमाशय, बड़ी आँत, प्रस्वेद ग्रन्थियाँ आदि की क्रिया चलती हैं। वस्तुतः यह संस्थान क्रियावाहक स्नायु संस्थान के बाहर स्थित है और उनकी क्रिया में केन्द्रीय स्नायु संस्थान कोई हाथ नहीं बँटांता। स्वतंत्र स्नायु संस्थान के बायें भाग को तीन भागों में बाँटा गया हैं –

  1. कापालिक
  2. माध्यमिक स्नायु तंत्र या थौरेको लम्बर और
  3. अनुब्रिका

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चित्र चित्र में सबसे ऊपर कापालिक है।

इससे जुड़े स्नायु कापालिक स्नायु कहलाते हैं। इसके नीचे सुषुम्ना है। इससे सम्बन्धित स्नायु सुषुम्ना स्नायु कहलाते हैं। सुषुम्ना शीर्ष से लेकर अनुत्रिका का भाग थौरेका लम्बर अथवा माध्यमिक स्नायु तंत्र कहलाता है। इसे थौरेका लम्बर इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस भाग में स्नायु सुषुम्ना चलकर थोरेक्स तक पहुँचता है। सुषुम्ना का अंतिम भाग अनुत्रिका कहलाता है। स्वतंत्र स्नायु कोष गुच्छिका तथा शरीर के विभिन्न अंग सुषुम्ना से जुड़े होते हैं।

स्वतंत्र स्नायु का फैलाव नेत्र, रालवाही ग्रन्थियाँ, मुख, त्वचा और रक्त कोष, हृदय, श्वासनली, यकृत, आमाशय, क्लोम, आँत, अभिवृक्क, गुर्दे, थैली, कोलोन और गुर्दा तथा जननेन्द्रियों तक है। ये पसीने की ग्रन्थियों तथा त्वचा कोशों में भी फैले हुए हैं। ये पुच्छिंका लड़ी तथा सुषुम्ना को स्नायु सूत्र में जोड़ते हैं। जिन सूत्रों से ये इन्हें जोड़ते हैं वे सूत्र सुषुम्ना से निकलकर पुच्छिकाओं तक जाते हैं। पुच्छिकाओं की लड़ी में 22 अनुकम्पिक पुच्छिकायें होती हैं। मेंगेलियन लड़ी सुषुम्ना के समानान्तर में उसकी लम्बाई में होती है। अनुकम्पिक पुच्छिका लड़ी में माइलीन नामक श्वेत पदार्थ ऊपर से लिपटे रहते हैं। पुच्छिका लड़ी से निकलकर लागूल सूत्र वापस सुषुम्ना के स्नायु में जाकर मिलते है।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान के दो भाग हैं –

  1. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान तथा
  2. परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान। ये दोनों भाग एक-दूसरे के विपरीत क्रियायें करते हैं।

अनुकम्पिक स्नायु संस्थान शरीर को कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है और खतरे का सामना करने के लिए तैयार करता है। यह संस्थान शरीर की खतरे से रक्षा भी करता है। संवेग की दशा में संस्थान अधिक क्रियाशील रहता है। इसकी क्रियाशीलता से ही खतरे के समय आँखों की पुतलियाँ फैल जाती हैं और आमाशय की रक्तवाहिनी नाड़ियाँ क्रियाशील हो जाती है। ये नाड़ियाँ आमाशय को रक्त न पहुँचाकर माँसपेशियों और मस्तिष्क को अधिक रक्त पहुँचाती हैं। परिणामस्वरूप आमाशय में भोजन पचना बन्द हो जाता है, भूख नहीं लगती है।

मांसपेशियों एवं मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। आँत निष्क्रिय हो जाती है। आमाशय को रस प्रदान करने वाली ग्रन्थियाँ रस देना बन्द कर देती हैं। हृदय अधिक तेजी से रक्त फेंकने लगता है जिससे उसकी गति में तीव्रता आ जाती है। अभिवृक्क ग्रन्थियाँ अभिवृक्की रस का अधिकांश खून में पहुँचाने लगती हैं। परिणामस्वरूप रक्त शर्करा बढ़ जाती है। मनुष्य की शक्ति में वृद्धि हो जाती है।

आवेश के कारण कोश अधिक नष्ट होते हैं। साँस की गति तीव्र हो जाती है, हाँफने की क्रिया होने लगती है और कभी-कभी तो मल-मूत्र भी निकलने लगता है। लार ग्रन्थियों से रस निकलना बंद हो जाता है। गला और मुख सूख जाता है। ये क्रियायें कलह की अवस्था में, क्रोध एवं भय की अवस्था में देखी जाती है। संवेग की अवस्था में त्वचा की विद्युत-प्रतिशोधन शक्ति में भी कमी आ जाती है जिसे हम गाल्वनिक त्वचा अनुक्रिया के नाम से जानते हैं।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान का दूसरा भाग परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान है। इसका सम्बन्ध कापालिक तथा अनुत्रिक से है। यह संस्थान एनाबोलिज्म की क्रिया करता है। यह संस्थान शरीर की शक्ति का संचय कर शरीर के विभिन्न भागों के पदार्थ को पुष्ट करता है। इस संस्थान की क्रिया में हृदय की धड़कन कम होती है और रक्त-चाए कम हो जाता है।

परिणामस्वरूप शरीर में भोजन की मात्रा कम खर्च होती है, लार ग्रन्थियों की क्रिया बढ़ जाती है, जिससे भोजन पचने की क्रिया में सहायता मिलती है। फलतः शरीर का वजन बढ़ जाता है, आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ जाती हैं। फलतः आँख में कम प्रकाश प्रवेश कर पाता है और आँखों को लाभ होता है। यह संस्थान अनुत्रिका विभाग के कार्य का संचालन करता है। यह ब्लेडर और कोलन तथा बड़ी आँतों को स्वस्थ रखता है। इसकी सहायता से शरीर से मल-मूत्र तथा विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं। अनुकम्पिक और परिअनुकम्पिक संस्थान में अन्तर है जो निम्न हैं –

1. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान में स्नायु कोश गुच्छिका सुषुम्ना के अन्दर होती है अथवा शरीर के उन आन्तरिक अंगों के पास होती है जिनको वे उत्तेजित करती है। परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान के कोश गुच्छिकायें सुषुम्ना के अन्दर न होकर अंगों के पास ही होती हैं।

2. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान की क्रिया में सम्पूर्ण संस्थान काम करता है। परिअनुकम्पिक संस्थान की क्रिया में उस स्थान के विभिन्न भाग स्वतंत्र होते हैं। परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि ये दोनों संस्थान एक-दूसरे के विरुद्ध ही हैं, इनमें कोई पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है। वास्तव में ये एक-दूसरे के सहयोगी होते हैं। मॉगर्न के अनुसार ये दोनों संस्थान कभी भी एक-दूसरे से स्वतंत्र कार्य नहीं करते बल्कि परिस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न मात्रा में सहयोग करते हैं। पर्यावरण में संघर्ष के समय जीव में अनुकम्पिक संस्थान की क्रिया अधिक और परिअनुकम्पिक संस्थान की कमी हो जाती है। इस सहयोग से शरीर में कार्य और विश्राम दोनों अवस्थाओं में संतुलन रहता है।

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प्रश्न 4.
मानव मस्तिष्क की संरचना या बनावट तथा कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग मस्तिष्क है जिसके माध्यम से व्यक्ति सभी तरह की क्रियाओं का संचालन करता है। शरीर में मस्तिष्क का स्थान सुषुम्ना के ऊपर तथा खोपड़ी (skull) के भीतर होता है। मस्तिष्क की बनावट तथा उसके कार्यों का अध्ययन निम्नांकित सात प्रमुख भाग में बाँटकर कर सकते हैं –

  1. मेडुला शीर्श (medulla oblongata)
  2. सेतु (pons)
  3. लघुमस्तिष्क (cerebellum)
  4. थैलेमस (thalamus)
  5. हाइपोथैलेमस (hypothalamus)
  6. मध्यमस्तिष्क (midbrain)
  7. प्रमस्तिष्क या प्रमस्तिष्कीय वल्कुट (cerebrum or cerebral cortex)

इन सबों का वर्णन निम्नांकित है –

1. मेडुला शीर्श (medulla oblongata):
मेडुला सुषुम्ना के ठीक ऊपर होता है। इसकी लम्बाई लगभग एक इंच होती है। यह मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को जोड़ता है। इसके द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं। जैसे, यह सुषुम्ना का मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों से सम्पर्क स्थापित करता है, क्योंकि सुषुम्ना से मस्तिष्क की ओर जानेवाले सभी तंत्रिका आवेग मेडुला होकर ही गुजरते हैं। यह शरीर की रक्षा-संबंधी सभी क्रियाओं का जैसे रक्त-संचालन, साँस की गति, निगलने, हृदय की धड़कन आदि का संचालन एवं नियंत्रण करता है। यह शरीर में कुछ हद तक संतुलन भी बनाए रखने में मदद करता है तथा अपने क्षेत्र की प्रतिवर्त क्रियाओं को भी कुछ हद तक नियंत्रित करता है।

2. सेतु (pons):
यह मेडुला शीर्ष के ठीक ऊपर से होता है। इसमें कई तरह के तंतु पाए जाते हैं जिनके माध्यम से यह लघुमस्तिष्क (cerebellum) तथा प्रमस्तिष्क (cerebrum) के भागों को आपस में मिलाता है। इस तरह, यह वास्तविक अर्थ में सेतु या पुल का कार्य करता है। यह श्रवण कार्यों (auditory functions) के लिए एक तरह का प्रसारण स्टेशन (relay station) का कार्य करता है। इसमें कुछ ऐसे केन्द्रक (nuclei) भी होते हैं जिनमें प्रमुख श्वसन गति तथा आनन अभिव्यक्तियों (facial expressions) की क्रियाएँ प्रभावित होती हैं।
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चित्र: मानव मस्तिष्क के भागों का चित्र

3. लघुमस्तिष्क (cerebellum):
लघुमस्तिष्क या अनुमस्तिष्क प्रमस्तिष्क (cerebrum) या वृहत मस्तिष्क के नीचे और पीछे की ओर होता है। कुछ स्नायुतंतुओं द्वारा लघुमस्तिष्क का संबंध एक आरे प्रमस्तिष्क से तथा दूसरी ओर सुषुम्ना (spinal cord) से होता है। इसकी ऊपरी सतह पर धूसर पदार्थ (grey matter) होता है तथा उजला पदार्थ उसकी भीतर तह पर होता है। लघु मस्तिष्क का मुख्य कार्य शारीरिक संतुलन (bodily balance) बनाए रखना होता है। शराब के नशे में हो जाने पर लघुमस्तिष्क प्रभावित हो जाता है। फलस्वरूप, व्यक्ति की चाल-ढाल में लड़खड़ाहट आ जाती है।

4. थैलेमस (thalamus):
थैलेमस प्रमस्तिष्क (cerebrum) के नीचे और हाइपोथैलेमस के बगल में होता है। थैलेमस दोनों प्रमस्तिष्कीय गोलार्डों (cerebral hemispheres) के बीच एक अंडाकार संरचना है जिसे ऊपर से देखा नहीं जाता है। इसका कार्य बिजली के स्विचबोर्ड के समान है। जैसे स्विचबोर्ड का स्विच दबातें हैं, बिजली की धारा उपयुक्त जगह पर पहुंचकर बल्ब को प्रकाशमय कर देती है या पंखे को चला देती है, ठीक उसी प्रकार थैलेमस में जो तंत्रिका आवेग पहुँचते हैं, वह उन्हें मस्तिष्क के उचित स्थान पर पहुँचा देता है।

अतः थैलेमस का मुख्य कार्य भिन्न-भिन्न संवेदी प्रक्रियाओं (sensory processes) से संबंधित आवेग को ग्रहण करके प्रमस्तिष्क (cerebrum) के उपर्युक्त केन्द्रों में प्रसारण (relay) करना होता है। इतना ही नहीं, यह लघुमस्तिष्क से भी आवेगों को ग्रहण करके उन्हें प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुँचाता है।

5. हाइपोथैलेमस (hypothalamus):
थैलेमस के नीचे एक छोटा परंतु अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण तंतु है जिसे हाइपोथैलेमस (hypothalamus) कहा जाता है। यह थैलेमस तथा मध्यमस्तिष्क (midbrain) को एक तरह एक जोड़ता है। हाइपोथैलेमस द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं। इसके द्वारा जैविक अभिप्रेरकों जैसे भूख, प्यास, काम आदि को समजित (regulate) किया जाता है। शरीर के भीतर सामान्य संतुलन बनाए रखने में भी यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाइपोथैलेमस संवेग की उत्पत्ति एवं नियंत्रण का मुख्य केन्द्र माना गया है। इसके द्वारा अंतःस्रावी ग्रन्थियों (endocrine glands) को भी समंजित किया जाता है।

6. मध्यमस्तिष्क (midbrain):
मध्यमस्तिष्क का स्थान मस्तिष्क के बीच में होता है। इसमें दो सतहें होती हैं-निचली सतह (floor) तथा ऊपरी सतह (roof or tectum)। निचली सतह संवेदी तंत्रिका आवेगों (sensory nerve impulses) को मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों में आने-जाने का काम करता है। जहाँ तक ऊपरी सतह या टेक्टम (tectum) का प्रश्न है, इसके द्वारा दृष्टि तथा श्रवण क्रियाओं के संचालन में मदद मिलती है।

जब मस्तिष्क का दृष्टिक्षेत्र या श्रवणक्षेत्र क्षतिग्रस्त हो जाता है तो इन क्रियाओं का संचालन यहीं से होता है। मध्यमस्तिष्क का एक विशिष्ट भाग जो घना एवं मोटा जाल-सा दिखता है, उसे रेटिकुलर फॉरमेशन (reticular formation) कहा जाता है जो व्यक्ति में सतर्कता की अवस्था को बनाए रखने में सक्षम होता है। इसमें नींद आदि के संचालन में भी मदद मिलती है।

7. प्रमस्तिष्क (cerebrum):
मानव मस्तिष्क का सबसे बड़ा तथा सबसे प्रमुख भाग प्रमस्तिष्क या वृहत मस्तिष्क है। इसे प्रमस्तिष्कीय वल्कुट (cerebral cortex) भी कहा जाता है। एक विशेष दरार (fissure), जिसे अनुदैर्ध्य दरार (longitudinal fissure) कहा जाता है, द्वारा प्रमस्तिष्क दो गोलार्डों (hemispheres) में बँटा होता है – बायाँ गोलार्द्ध (left hemisphere) तथा दायाँ गोलार्द्ध (right hemisphere), इन दोनों गोलार्डों के ऊपर न्यूरोन का एक पतला आवरण होता है जिसकी मोटाई लगभग 3 मिलीमीटर होती है।

इस आवरण का रंग धूसर (grey) होता है। बायाँ गोलार्द्ध तथा दायाँ गोलार्द्ध तंत्रिका तंतु (nerve fibre) के एक विशेष गुच्छा या बंडल (bundle) से जुड़े होते हैं जिसे कारपस कैलोजम (corpus callosum) कहा जाता है। यह उजले पदार्थ (white matter) का बना होता है। प्रत्येक गोलार्द्ध दो गहरी दरारों (fissure) अर्थात् रोलैण्डो की दरार (fissure of Rolando) या केन्द्रीय सुलकस (central sulcus) तथा सिलभियस की दरार (fissure of Sylvius) या लेट्रल दरार (lateral fissure) की मदद से निम्नांकित चार पालियों (lobes) में बँटा होता है –

  1. अग्रपालि (frontal lobe)
  2. मध्यपालि (parietal lobe)
  3. शंखपालि (temporal lobe)
  4. पृष्ठपालि (occipital lobe)

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चित्र : प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

इन खंडों के कार्य अलग-अलग हैं। इन्हें इन कार्यों के विभाजन के दृष्टिकोण से निम्नांकित तीन क्षेत्रों में बाँटा गया है –

  1. संवेदी या ज्ञानवाही क्षेत्र (sensory area)
  2. क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र (motor area)
  3. साहचर्य क्षेत्र (association area)

1. संवेदी या ज्ञानवाही क्षेत्र के कार्य (Functions of sensory area):
इस क्षेत्र द्वारा संवेदी क्रियाएँ होती हैं जिसके फलस्वरूप हमें तरह-तरह के उद्दीपकों का ज्ञान होता है। इसके क्षेत्र द्वारा निम्नांकित तीन तरह के ज्ञान या संवेदनाएँ होती हैं –

(a) दृष्टि संवेदन (Visual sensation):
दृष्टि संवेदन का ज्ञान हमें पृष्ठपालि (occipital lobe) द्वारा होता है। इसलिए पृष्ठपालि की दृष्टि ज्ञानपालि कहा जाता है। आँख में जो तंत्रिका आवेग उत्पन्न होते हैं वे दृष्टि तंत्रिका (optic nerve) द्वारा पृष्ठपालि में पहुँचते हैं जिससे व्यक्ति में दृष्टि संवेदन का ज्ञान होता है। यदि किसी कारण से पृष्ठपालि नष्ट हो जाए तो व्यक्ति को दृष्टि संवेदन नहीं होगा।

(b) श्रवण संवेदन (Auditory sensation):
सुनने की क्रिया का नियंत्रण शंखपालि (temporal lobe) से होता है। अतः, शंखपालि को श्रवण ज्ञानकेन्द्र भी कहा जाता है। जब ध्वनि या आवाज कान में श्रवण तंत्रिका आवेग उत्पन्न करता है, तब वह शंखपालि में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को श्रवण संवेदन होता है। यदि यह शंखपालि पूर्णत: नष्ट हो जाए तब व्यक्ति को इससे श्रवण-संबंधी संवेदन या ज्ञान नहीं हो सकता है।

(c) त्वक संवेदन (Cutaneous sensation):
व्यक्ति को स्पर्श का ज्ञान या त्वक संबेदन का ज्ञान मध्यपालि (parietal lobe) से होता है। जब हमारे त्वक को कोई चीज उत्तेजित करता है, तब इससे तंत्रिका आवेग उत्पन्न होकर मध्यपालि (parietal lobe) में पहुँचता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को स्पर्श ज्ञान होता है।

2. क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र के कार्य (Functions of motor area):
व्यक्ति जो भी शारीरिक क्रिया या व्यवहार स्वेच्छा से करता है, उसका आदेश प्रमस्तिष्क के जिस भाग से मिलता है, उसे क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र कहा जाता है। क्रियावाही क्षेत्र रोलैण्डो की दरार के बगल में एक लंबा-सा हिस्सा में अवस्थित है।

इस क्षेत्र में पिरामिड के आकार के बड़े-बड़े कोश (cells) पाए जाते हैं जिनके सहारे शारीरिक क्रियाओं एवं व्यवहारों का नियंत्रण होता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि पेशीय क्षेत्र के सबसे ऊपर का भाग शरीर के सबसे निचले हिस्से जैसे पैर की अंगुलियों तथा पैर की मांसपेशियों आदि का नियंत्रण एवं संचालन करता है और सबसे नीचे का भाग शरीर के ऊपर के हिस्से जैसे मुँह, गर्दन, चेहरा आदि की क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण करता है।

3. साहचर्य क्षेत्र के कार्य (Functions of association area):
अग्रपालि में एक बड़ा-सा साहचर्य क्षेत्र है जिसके द्वारा उत्त्व मानसिक क्रियाओं (higher mental processes) जैसे सोचना, तर्क करना, चिंतन करना, कल्पना करना, स्मरण करना आदि का संचालन एवं नियंत्रण होता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि यह क्षेत्र किसी कारण से क्षतिग्रस्त हो जाने से प्राणी वर्तमान संबद्ध सभी बातों, घटनाओं एवं अर्थों को भूल जाता है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि मानव मस्तिष्क की संरचना काफी जटिल है तथा इसके द्वारा प्राणी की सभी तरह की शारीरिक क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण होता है।

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प्रश्न 5.
स्नायुकोश या तंत्रिका कोश या न्यूरोन की संरचना तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
मानव शरीर में बहुत तरह के जीवित कोश (living cells) हैं जिनके अलग-अलग कार्य हैं। इनमें एक विशेष तरह के जीवित कोश का कार्य स्नायु आवेग (nerve impulse) को ढोना है। इस तरह के जीवित कोश को स्नायुकोश या तंत्रिका कोश (neuron) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, तंत्रिका कोश या जिसे न्यूरोन (neuron) कहा जाता है, एक ऐसा कोश होता है जिसके माध्यम से तंत्रिका आवेग के रूप में सूचनाएँ शरीर के एक अंग से दूसरे अंग में जाती हैं। न्यूरोन तंत्रिका तंत्र की सबसे छोटी इकाई (smallest unit) होती है।

संरचना या बनावट के दृष्टिकोण से तंत्रिका कोश को निम्नांकित तीन भागों में बाँटा गया है –

  1. शाखिकाएँ (dendrites)
  2. कोश शरीर (cell body)
  3. एक्सॉन (axon)

1. शाखिकाएँ (dendrites):
शाखिका की संरचना पेड़ की टहनियों तथा शाखाओं के समान होती है जिसमें कई छोटी-छोटी उपशाखाएँ होती हैं (जैसा कि चित्र में दिखाया गया है)। शाखिका दो तरह के कार्य करती है। पहला, यह तंत्रिका आवेगों (nerve impulse) को ग्रहण करती है तथा दूसरी उसे जीवकोश (cell body) की ओर भेज देती है। इस तरह, शाखिका कि मुख्य कार्य तंत्रिका आवेग को ग्रहण करना और उसे कोशशरीर की ओर भेजना होता है।

2. कोश शरीर (cell body):
कोशशरीर न्यूरोन का दूसरा प्रमुख भाग है। इसे सोमा (soma) भी कहा जाता है। कोशशरीर चारों तरफ से एक झिल्ली से ढंका होता है जिसे कोश की झिल्ली (membrane) कहा जाता है। इस झिल्ली के भीतर एक तरल पदार्थ होता है जिसे साइटोप्लाज्म (cytoplasm) कहा जाता है। कोशशरीर के बीच में केंद्रक (nucleus) होता है जो कोशशरीर का सबसे प्रधान भाग है। कोशशरीर के मुख्य दो कार्य होते हैं। पहला, शाखिका द्वारा लाए गए तंत्रिका आवेग को ग्रहण कर उसे आगे की ओर अर्थात एक्सॉन की ओर बढ़ाना तथा दूसरा कार्य न्यूरोन को स्वस्थ तथा जीवित रखना है।
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3. एक्सॉन (axon):
एक्सॉन तंत्रिका कोश या न्यूरोन के उस भाग को कहा जाता है जो कोशशरीर (cell body) से निकलकर आगे की कला हुआ दिखाई पडता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, इसका आकार छोटा भी होता है तथा बड़ा भी। एक्सॉन एक विशेष तरह की उजली परत या आवरण से ढंका होता है। यह परत सतत (continuous) नहीं होती है। बल्कि कुछ-कुछ दूर पर लगभग समाप्त हो जाती है या पतली हो जाती है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। एक्सॉन के अंतिम छोर पर अनेक छोटे-छोटे तंतु होते हैं जिन्हें एण्डब्रश (endbrush) या एण्डप्लेट (endplate) कहा जाता है।

एक्सॉन का मुख्य कार्य तंत्रिका आवेग को शरीर से निकालकर न्यूरोन के अंतिम छोर अर्थात् एण्डब्रश तक पहुँचा देना होता है। इस तरह, तंत्रिका आवेग एक्सॉन द्वारा बाहर निकल जाता है। इस तरह एक न्यूरोन इस क्रम में कार्य करता है-तंत्रिका आवेग (nerve impulse) को पहले शाखिका (dendrite) द्वारा ग्रहण किया जाता है और उसे कोशशरीर (cell body) की ओर भेज दिया जाता है। कोशशरीर उसे ग्रहण कर लेता है तथा एक्सॉन कोशशरीर से आ रहे तंत्रिका आवेग को एण्डब्रश होते हुए बाहर निकाल देता है अर्थात् दूसरे न्यूरोन में भेज देता है। स्पष्ट हुआ कि शाखिका तंत्रिका आवेग का एक ग्रहण केन्द्र (receiving centre) है जबकि एक्सॉन (axon) एक सुप्दगी केन्द्र (delivery centre) है।

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प्रश्न 6.
मस्तिष्क के कार्यों के अध्ययन के लिए किन-किन विधियों का उपयोग होता है। उनकी विवेचना करें।
उत्तर:
स्नायुमंडल या तंत्रिका तंत्र या मस्तिष्क की रचना एवं इसके कार्य के अध्ययन के लिए कई प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है। इनमें से कुछ प्रमुख विधियों का वर्णन यहाँ किया जा रहा है –

1. वर्णनात्मक विधि या अभिरंजन विधि (Staining method):
यह विधि तंत्रिका तंत्र की रचना के अध्ययन की सबसे प्राचीन विधि है। इस विधि का व्यवहार गोल्गी (Golgi) ने स्नायु-मंडल के भिन्न-भिन्न भागों की रचना तथा उनके कार्य के अध्ययन में किया। इस विधि में स्नायु-कोश को रजित करने (रंगने) का प्रयास किया जाता है। चूँकि स्नायु-कोश पर किसी रंग का प्रभाव जल्दी नहीं पड़ता है, इसलिए स्नायु के माइलीन आवरण को रंगने का प्रयास किया जाता है। रंगों का व्यवहार दो प्रकार से किया जाता है। एक तो यह कि केवल तन्तुओं (Fibres) को रंगा जाता है और दूसरे प्रकार के रंग से केवल कोशिका-शरीर (Cell body) को रजित किया जाता है।

पहले प्रकार की कार्य-विधि को वेगर्ट विधि कहते हैं और दूसरे प्रकार की कार्य-विधि को नीसिल विधि (Nissil method) कहते हैं। रेजित तंतु या कोशिका-शरीर को माइक्रोस्कोप की मदद से देखा जाता है। रंगे हुए तन्तु या कोशिका-शरीर को देखने में आसानी होती है और इस आधार पर उनकी रचना को समझने का प्रयास किया जाता है। इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसके द्वारा तंतुओं तथा कोशिका-शरीर का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से संभव होता है। लेकिन इस विधि का दोष यह है कि इसके द्वारा सभी तन्तुओं का अध्ययन नहीं किया जा, सकता है। कारण यह है कि कुछ ऐसे तंतु हैं जिन पर माइलिन आवरण नहीं होता है। अत: इस प्रकार के तन्तुओं पर रंगों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

2. मस्तिष्क परिवर्तन-विधि (Brain changes method):
मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न भागों की रचना तथा इनके कार्यों के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार किया जाता है। यहाँ यह देखने का प्रयास किया जाता है कि मनोवैज्ञानिक परिचालन (Manipulation) के कारण प्राणी के मस्तिष्क में कोई परिवर्तन होता है या नहीं और यदि परिवर्तन होता है तो मस्तिष्क के किस भाग में होता है। प्राणी को संवेदी वचन या संवेदी समृद्धि (Sensory Enrichment) से प्रभावित किया जाता है और यह देखने का प्रयास किया जाता है कि प्राणी के मस्तिष्क में कोई रचनात्मक या रसायन परिवर्तन होता है या नहीं।

लेकिन, इस विधि के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इसका उण्योग मनुष्य पर नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के मस्तिष्क में वातावरण के कारण होनेवाले रसायन-परिवर्तन तथा संरचनात्मक परिवर्तन का अध्ययन कठिन है। इसीलिए इस विधि का उपयोग केवल चूहे आदि छोटे-छोटे पशुओं पर किया जाता है। लेकिन पशुओं पर प्राप्त निष्कर्ष को मनुष्यों पर उसी रूप में लागू करना पूरी तरह सही नहीं हो पाता है।

3. विद्युत अभिलेखन-विधि (Electrical recording method):
स्नायुमंडल और खासकर मस्तिष्क के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार बड़े पैमाने पर होता है। इस विधि में स्नायुकोष या मस्तिष्क के किसी भाग में होने वाले विद्युत-प्रवाह को रेकार्ड (Record) कर लिया जाता है। प्राणी को किसी उत्तेजना से प्रभावित किया जाता है और मस्तिष्क के किसी भाग में उत्पन्न विद्युत-परिवर्तन को एलेक्ट्रोड (Electrode) द्वारा रेकार्ड कर लिया जाता है। इस प्रकार के विद्युत परिवर्तन को उत्पन्न अन्तःशक्ति (Evoke Potential) कहते हैं।

यह विधि स्नायु मंडल या मस्तिष्क के अध्ययन के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हुई है। टोवे ने इस विधि का उपयोग बिल्ली पर किया और ज्ञानवाही कॉर्टेक्स के कार्य को देखने का प्रयास किया। उन्होंने बिल्ली के ज्ञानवाही कॉर्टेक्स में एक बड़े आकार का एलेक्ट्रोड लगा दिया, फिर उसके ज्ञानवाही मार्ग (Sensory Path) को उत्तेजित करके अन्तःशक्ति जमा हो गयी। इससे पता चला कि ज्ञानवाही कार्य वास्तव में ज्ञानवाही कॉर्टेक्स द्वारा नियंत्रित होता है। लेकिन, यह विधि खतरनाक है। इसलिए मनुष्य पर इसका व्यवहार करना कठिन है। दूसरी बात यह है कि इस विधि के उपयोग के लिए बड़े प्रशिक्षित तथा योग्य स्नायु-विशेषज्ञ (Neurologist) की आवश्यकता होती है। इसके अभाव में अध्ययन के गलत हो जाने की संभावना बढ़ जाती है।

4. उत्तेजना-विधि (Stimulation method):
स्नायुमंडल और विशेष रूप से मस्तिष्क की रचना तथा कार्य के अध्ययन के लिए उत्तेजना करके यह देखने का प्रयास किया जाता है कि इससे प्राणी के व्यवहार में कोई परिवर्तन होता है या नहीं। उत्तेजन को स्वतंत्र चर (Independent Variable) और इससे उत्पन्न प्रतिक्रिया को आश्रित चर माना जाता है। साधारण अर्थ में उत्तेजन को कारण तथा प्रतिक्रिया को प्रभाव माना जाता है। इसी आधार पर कॉर्टेक्स के भिन्न-भिन्न भागों के कार्यों को जानने का प्रयास किया जाता है और देखा जाता है कि इससे प्राणी में कौन-सी नई प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई।

विश्वास कर लिया जाता है कि उस प्रतिक्रिया का नियंत्रण कॉर्टेक्स के उसी भाग द्वारा होता है। जैसे-किसी चूहे के पृष्ठ-खण्ड (Occipital Lobe) को बिजली द्वारा उत्तेजित करने से यदि चूहे में देखने संबंधी क्रिया का आधार कॉर्टेक्स का पृष्ठ-खण्ड है। लेकिन इस विधि के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इसको व्यवहार में लाने के लिए कुशल तथा प्रशिक्षित शारीरिक मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है।

5. क्षति-विधि (Lesion method):
स्नायु-मंडल या मस्तिष्क की रचना तथा कार्य के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार व्यापक रूप से होता रहा है। फ्लोरेंस तथा रोलैन्डो को इस विधि का पथप्रदर्शक समझा जाता है। इस विधि में मस्तिष्क के किसी खास भाग को नष्ट कर दिया जाता है और देखा जाता है कि इसके कारण प्राणी की कौन-सी क्रिया क्षतिग्रस्त होती है। जैसे-कॉर्टेक्स के पृष्ठ-खण्ड को काट देने पर यदि प्राणी में देखने की क्षमता समाप्त हो जाती है तो समझा जाता है कि दृष्टि-संवेदना का नियंत्रण पृष्ठ-खण्ड द्वारा होता है। इसी तरह मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न भागों द्वारा होने वाले कार्यों को निर्धारित कर लिया जाता है।

6. क्यूरेर-विधि (Curare method):
मस्तिष्क के अध्ययन के लिए हार्लो एवं स्टेगनर (Halow and Stegner) ने 1933 में एक विधि निकाली जिसको क्यूरेर-विधि कहते हैं। क्यूरेर एक प्रकार की औषधि है जो मध्य अमेरिका तथा दक्षिण अमेरिका में अधिक व्यवहार किया जाता है। इसके उपयोग से दैहिक मांसपेशियाँ निष्क्रिय (Inactive) हो जाती हैं। इसका प्रभाव उप-कॉर्टेक्स पर नहीं पड़ता है। इसलिए जब उप-कॉर्टेक्स से संबंधित कार्य का अध्ययन करना होता है तो कॉर्टेक्स को क्यूरेर के प्रभाव से निष्क्रिय बना दिया जाता है। इससे कॉर्टेक्स से होनेवाली क्रियाएँ रुक जाती हैं। फिर प्राणी को कोई क्रिया सिखाई जाती है।

प्राणी जब उस क्रिया को सीखने में सफल होता है तो इससे साबित हो जाता है कि उस क्रिया का नियंत्रण उप-कॉर्टेक्स द्वारा होता है। क्यूरेर के प्रभाव के समाप्त हो जाने के बाद भी यदि वह क्रिया जारी रहती है तो समझा जाता है कि उस क्रियापर कॉर्टेक्स का कोई बाधक प्रभाव नहीं है तो समझा जाता है कि उस पर उप-कॉर्टेक्स के साथ-साथ कॉर्टेक्स का भी नियंत्रण रहता है। इसी आधार पर कॉर्टेक्स तथा उप-कॉर्टेक्स द्वारा होनेवाले कार्यों का अध्ययन किया जाता है।

इस विधि का एक लाभ यह है कि इससे पशु को कोई हानि नहीं होती है। कारण यह है कि क्यूरेर का प्रभाव जब समाप्त हो जाता है तो मस्तिष्क का वह भाग पहले की तरह काम करने लगता है। यह गुण ‘उन्मूलन या क्षति-विधि’ में नहीं है, क्योंकि उस विधि में स्नायु को एक बार जब काट दिया जाता है तो फिर वह काम के लायक नहीं हो पाता है। इस प्रकार, क्यूरेर विधि में पशुओं की क्षति नहीं होती है, जबकि उन्मूलन विधि में पशुओं की क्षति होती है। लेकिन, इतना होने पर भी क्यूरेर-विधि की उपयोगिता बहुत सीमित है।

7. अपकर्षण विधि (Degeneration method):
स्नायु-मंडल के अध्ययन के लिए अपकर्षण-विधि या अप-विकार विधि का भी व्यवहार किया जाता है। अपकर्षण का अर्थ यह है कि जब स्नायु-मंडल के किसी क्षेत्र को नष्ट किया जाता है या काटा जाता है तो उस क्षेत्र से सम्बद्ध क्षेत्र भी विघटित या अपकर्षित हो जाता है। उस क्षेत्र के बर्बाद होने से या विघटित होने से यदि कोई क्रिया रुक जाती है तो समझा जाता है कि उस क्रिया का नियंत्रण उसी क्षेत्र द्वारा होता है। इस प्रकार, स्नायुओं के अपकर्षण के आधार पर स्नायु-कोशों के संबंधों का पता लगाया जाता है और उनके द्वारा संचालित होनेवाली क्रियाओं का निरूपण किया जाता है।

8. रासायनिक विधि (Chemical method):
स्नयु-मंडल अथवा मस्तिष्क के अध्ययन के लिए रसायन-विधि का व्यवहार भी किया जाता है। वास्तव में यह विधि विद्युत-उत्तेजन विधि का ही एक रूप है। इस विधि में मस्तिष्क के किसी खास भाग को बिजली से उत्तेजित न करके किसी रासायनिक पदार्थ से उत्तेजित किया जाता है। जैसे-कुचालक एक काफी प्रभावशाली रासायनिक पदार्थ है जिसके द्वारा मस्तिष्क के किसी भाग को उत्तेजित किया जाता है और इससे जो परिवर्तन होता है उसे एलेक्ट्रोड द्वारा रेकार्ड कर लिया जाता है।

कभी-कभी एलेक्ट्रोड के बदले छोटे पिपेट से होकर रासायनिक पदार्थ को थोड़ी मात्रा में मस्तिष्क के किसी विशेष भाग पर डालकर उसे उत्तेजित करता है तथा उससे संचालित होनेवाली क्रिया का अध्ययन करता है। इस विधि का उपयोग भिन्न-भिन्न प्रेरक संरचना (Mechanism) से संबंधित प्रयोग में किया गया है।

ग्रौसमैन (Grossman 1960) ने इस विधि का व्यवहार प्यास तथा भूख प्रेरकों को संचालित करनेवाले मस्तिष्क के भागों को निर्धारित करने के लिए किया और देखा कि इस तरह के अध्ययन के लिए यह विधि काफी उपयोगी है। इस प्रकार, मस्तिष्क या स्नायु मंडल के अध्ययन के लिए कई विधियों का व्यवहार किया जाता है। प्रत्येक विधि के अपने गुण-दोष हैं। अत: आवश्यकता के अनुसार अधिक-से-अधिक विधियों का व्यवहार करके विश्वसनीय निष्कर्ष प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 7.
प्रतिवर्त धनु से आप क्या समझते हैं? इस धनु में सम्मिलित शारीरिक अंगों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रतिवर्त क्रिया या सहज क्रिया (reflex action) किसी उद्दीपन के प्रति एक एक स्वचालित (automatic) एवं जन्मजात अनुक्रिया है। आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने से पलक का बंद हो जाना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रिया के शारीरिक आधार (bodily base) को प्रतिवर्त धनु (reflex arc) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, प्रतिवर्त क्रिया के संचालन में स्नायु प्रवाह स्नायुओं और अंगों से होकर गुजरता है, उन सभी को प्रतिवर्त धनु के अंदर समझा जाता है।

वास्तव में सहज क्रिया एक सरलतम मानसिक क्रिया है। इसके होने के लिए सर्वप्रथम उद्दीपन ज्ञानेन्द्रिय (sense organ) को उत्तेजित करता है जिससे ज्ञानेन्द्रिय में तंत्रिका आवेग (nerve impulse) उत्पन्न होता है। यह तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका (sensory nerve) से होता हुआ सुषुम्ना में पहुँचता है। सुषुम्ना में साहचर्य तंत्रिका (association nerve) होते हैं। वे तंत्रिका आवेग को गतिवाही या क्रियावाही तंत्रिका (motor nerve) में छोड़ देते हैं।

तंत्रिका आवेग गतिवाही या क्रिया न्यूरोन द्वारा मांसपेशियों तथा ग्रन्थियों या कर्मेन्द्रियों में पहुँचाए जाते हैं। इसके फलस्वरूप व्यक्ति सहज क्रिया कर पाता है। इस प्रक्रिया में ज्ञानेन्द्रिय (sense organ) से सुषुम्ना तथा सुषुम्ना से कर्मेन्द्रियों तक के सभी रास्तों को प्रतिवर्त धनु (reflex arc) कहा जाता है। प्रतिवर्त धनु के उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसके संचालन में शरीर के निम्नांकित छह अंगों की भूमिका प्रधान होती है –

1. ज्ञानेन्द्रिय (Sense organ):
मानव शरीर में कुछ खास-खास अंग हैं जो विभिन्न प्रकार की उत्तेजनाओं को ग्रहण करते हैं। इन अंगों को ज्ञानेन्द्रिय या ग्राहक (receptor) कहा जाता है। व्यक्ति की प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय द्वारा एक विशेष प्रकार की उत्तेजना ग्रहण की जाती है जिसके कारण ही संबंधित उद्दीपण (stimulus) का ज्ञान होता है। जैसे, आँख द्वारा प्रकाश या रोशनी को, कान द्वारा आवाज को, नाक द्वारा गंध को, जीभ द्वारा स्वाद को तथा त्वचा द्वारा स्पर्श को ग्रहण किया जाता है।

2. संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका (Sensory nerve):
ज्ञानेन्द्रिय से सुषुम्ना तथा मस्तिष्क तक आने वाली तंत्रिका को संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका कहा जाता हैं। प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय का संबंध ऐसी तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना से होता है। जब उपयुक्त उद्दीपन (appropriate stimulus) किसी ज्ञानेन्द्रियों को उत्तेजित करता है, तब उसमें तंत्रिका आवेग उत्पन्न होता है जो संबद्ध संवेदी तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है। जैसे, वस्तु से हमारी त्वचा जब छू जाती है तब त्वचा में उत्पन्न तंत्रिका आवेग वेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुबुन्ना में पहुँचता है।

3. साहचर्य तंत्रिका (Association nerve):
साहचर्य तंत्रिका सुषुम्ना तथा मस्तिष्क में पाया जाता है। इसका मुख्य कार्य संवेदी तथा गति तंत्रिकाओं से संबंध स्थापित करना है, क्योंकि कार्यात्मक रूप से इनका एक छोर संवेदी तंत्रिका से तथा दूसरा छोर गति तंत्रिका से मिला होता है। सुषुम्ना इन्हीं के द्वारा प्रतिवर्त क्रियाओं का संचालन करता है। तब तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है तब साहचर्य तंत्रिका उसे सुषुम्ना गतिवाही तंत्रिका (motor nerve) में छोड़ देता है।

4. गतिवाही तंत्रिका (Motor nerve):
गतिवाही तंत्रिका मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को कर्मेन्द्रियों (motor organs) से जोड़ता है। जब सुषुम्ना में साहचर्य तंत्रिका द्वारा तत्रिका आवेग गतिवाही तंत्रिका में छोड़ दिया जाता है, तब गतिवाही तंत्रिका उसे तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना से कर्मेन्द्रियों (मांसपेशियों) तक ले जाता है। फलस्वरूप, सुषुम्ना का आदेश कर्मेन्द्रिय को प्राप्त होता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई अनुक्रिया करता है।

5. कर्मेन्द्रिय (Motor organ):
कर्मेन्द्रियों द्वारा व्यक्ति अनुक्रियाएँ करता है। कर्मेन्द्रियों में सामान्यत: पेशियों एवं ग्रन्थियों को रखा जाता है। इन्हें प्रभावक (effectors) भी कहा जाता है। प्रतिवर्त क्रिया में सुषुम्ना का आदेश इन कर्मेन्द्रियों तक पहुँचता है और व्यक्ति अनुक्रिया कर बैठता है। प्रतिवर्त धनु में इस तरह से शरीर के छह अंगों की क्रियाशीलता होती है जिसे एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मान लिया जाए कि रात्रि में हम कहीं जा रहे हैं।

अचानक कोई व्यक्ति आँख पर टॉर्च से तीव्र रोशनी डालता है। ऐसी परिस्थिति में आँख का पलक स्वतः बंद हो जाएगा जो एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। इस उदाहरण में सर्वप्रथम टॉर्च की रोशनी आँखों पर पड़ती है जिससे आँखें उत्तेजित हो जाती हैं और तंत्रिका आवेग (nerve impulse) उत्पन्न हो जाता है।

यह तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है। सुषुम्ना में स्थित साहचर्य तंत्रिका के द्वारा यह तंत्रिका आवेग गतिवाही या क्रियावाही तंत्रिका में छोड़ दिया जाता है जो इसे आँख एवं पलक की मांसपेशियों (muscles) तक पहुँचा देता है और उसके फलस्वरूप पलक बंद हो जाता है। टॉर्च की रोशनी आँख पर पड़ने के बाद पलक बंद होने की अनुक्रिया इतनी तेजी से होती है कि यह पता नहीं चलता कि इसका संचालन तथा नियंत्रण कहीं से (अर्थात सुषुम्ना से) हो रहा है।

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प्रश्न 8.
सुषुम्ना या मेरुरज्जु की संरचना या बनावट तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) को दो भागों में बाँटा गया है सुषुम्ना (spinal cord) तथा मस्तिष्क (brain):
सुषुम्ना की संरचना-सुषुम्ना रीढ़ की हड्डी, जो कमर से गर्दन तक फैली है, के भीतर उपस्थित होती है। इस हड्डी के भीतर एक तरल पदार्थ भरा होता है जिसमें लगभग 18 इंच लंबा एक मोटा तंतु है। इसे ही सुषुम्ना कहा जाता है। इसका रंग ऊपर से उजला तथा भीतर से धूसर (grey) होता है। ऊपर से नीचे तक सुषुम्ना में कुल 3 भाग (divisions) होते हैं। प्रत्येक भाग से मेरुदण्डीय तंत्रिका (spinal nerves) का एक जोड़ा (pair) निकलता है। इस जोड़े में एक तंत्रिका भाग शरीर के बाएँ भाग से स्नायुप्रवाह आते हैं तथा दूसरी तंत्रिका द्वारा शरीर के दाएँ भाग से स्नायुप्रवाह आते हैं।
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चित्र: सुषुम्ना का कटा हुआ भाग का चित्र

सुषुम्ना को यदि कहीं से काटा जाए, तब इसकी भीतरी संरचना या बनावट एक ही समान दीख पड़ती है। चित्र में सुषुम्ना के एक ऐसे कटे हुए भाग को दिखाया गया है। इस चित्र में गौर करने से यह स्पष्ट हो जाता है। सुषुम्ना के बीच का भाग, जिसका रंग धूसर (grey) होता है, एक तितली के समान होता है। सुषुम्ना के बीच के भाग के चारों तरफ उजला पदार्थ (white matter) होता है जिससे होकर अनेक तंत्रिका तंतु ऊपर से नीचे की ओर और नीचे से ऊपर की ओर आते-जाते दिखाई पड़ते हैं। ऊपर से नीचे आनेवाले तंत्रिका तंतु द्वारा मस्तिष्क से सूचनाएँ सुषुम्ना में आती हैं तथा नीचे से ऊपर जानेवाली तंत्रिका तंतु से सूचनाएँ सुषुम्ना से मस्तिष्क में जाती हैं।

सुषुम्ना द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. तंत्रिका आवेग का संरचण (Transmission of nerve impulse):
सुषुम्ना का प्रधान काम तंत्रिका आवेग का संचरण करना है। ऐसे संचरण के माध्यम से वह मस्तिष्क का संबंध शरीर के अन्य भागों से जोड़ पाता है। संचरण का अर्थ होता है शरीर से आनेवाले तंत्रिका आवेगों को मांसपेशियों तथा ग्रथियों से भेजना। शरीर के भिन्न-भिन्न भागों (सिर एवं गर्दन को छोड़कर) से आनेवाले तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना ग्रहण करता है तथा उसे मस्तिष्क में पहुँचाता है।

फिर मस्तिष्क द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों को भेजी जानेवाली सूचनाओं को सुषुम्ना ग्रहण करता है तथा उपयुक्त अंगों में ले जाने के लिए उन्हें पेशीय या गति न्यूरोन (motor neuron) में छोड़ देता है। इस तरह, सुषुम्ना द्वारा तंत्रिक आवेग के संचरण का कार्य संपन्न होता है।

2. प्रतिवर्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संरचण (Conduct and control of reflex action):
प्रतिवर्त क्रिया का नियंत्रण एवं संचालन भी सुषुम्ना द्वारा किया जाता है। प्रतिवर्त क्रिया से तात्पर्य एक ऐसी जन्मजात, सरल एवं अनैच्छिक (involuntary) क्रिया से होती है जो किसी उद्दीपन के प्रति की जाती है।

जैसे किसी गर्म वस्तु से अंगुली स्पर्श हो जाने से अंगुली. को खींच लेना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। उसी तरह आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने पर पलक बंद होना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रियाएँ इतनी जल्दी हो जाती हैं कि लगता है मानो वे अपने-आप हो गईं। परंतु, सच्चाई यह है कि इसका नियंत्रण एवं संचालन इसी सुषुम्ना द्वारा होता है।

चूँकि सुषुम्ना ऐसी क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण अपने स्तर से मस्तिष्क से मिलनेवाली सूचना के बिना इंतजार किए ही करता है, अतः यह स्वचालित (automatic) होता प्रतीत होता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि सुषुम्ना की संरचना तथा बनावट में थोड़ी जटिलता है तथा इसके द्वारा तंत्रिका आवेगों का संचरण तथा प्रतिवर्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संचालन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

प्रश्न 9.
वृहत मस्तिष्क की बनावट और क्रियाओं का वर्णन करें।
Or, मानव वृहत मस्तिष्क की ज्ञानवाही एवं गतिवाही क्रियाओं की व्याख्या कीजिए।
Or, प्रमस्तिष्क की बनावट या कार्यवाही की व्याख्या करें।
उत्तर:
वृहत मस्तिष्क बल्क (Cerebral Cortex) मनुष्य मस्तिष्क का सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख भाग मस्तिष्क है जिसे मस्तिष्क बल्क (Cerebral Cortex) भी कहते हैं। हमारी सभी चेतन क्रियाओं का संचालन और विभिन्न मानसिक अनुभवों का नियंत्रण प्रमस्तिष्क के ही द्वारा होता है। उदाहरणार्थ, प्रत्यक्षण, सोचना, विचारना, तर्क करना, कल्पना करना आदि हमारी सभी मानसिक क्रियाओं का संचालन प्रमस्तिष्क का उद्गम स्थान है। ऊपर की सतह को देखने से मस्तिष्क का यह भाग कहीं दबा हुआ तो कहीं उभरा हुआ मालूम होता है।

दबे हुए भाग को दरार या फिसर या सलकस (Fissure or Sulcus) कहते हैं। इस तरह के दो दबे हुए भागों के बीच के भाग को ‘गाइरस’ (Gyrus) की संज्ञा दी जाती है। उभरे हुए भागों को रीजेज (Ridges) कहते हैं। कोर्टेक्स की दरारें या फिसर दो भागों में बँटती हैं। दो भागों में बाँटने वाली लम्बी दरार का नाम रोलैण्डो या मध्य दरार (Rolando or central) है। एक दूसरी दरार या फिसर भी है, जिसे सिलभीयस (Fissure or Sylvius) की दरार कहते हैं। इन दरारों द्वारा कोर्टेक्स चार भागों में बँटा है –

  1. पृष्ठ पालि (Occipital lobe)
  2. मध्यपालि (Pariental lobe)
  3. अग्र-पालि (Frontal lobe) तथा
  4. शंख पालि (Temporal lobe)

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चित्र: प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

वृहत मस्तिष्क के विभिन्न भागों के कार्यों को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. संवेदी कार्य (Sensory functions)
  2. पेशीय कार्य (Motor functions) तथा
  3. साहचर्यात्मक कार्य (Associative functions)

इन तीनों प्रकार के कार्यों का संचालन एवं नियंत्रण प्रमस्तिष्क के कुछ खास केन्द्रों के द्वारा होता है।

(I) मस्तिष्क द्वारा संचालित ज्ञानात्मक क्रियाएँ (Sensory functions of the cortex):
किसी भी उद्दीपन का ज्ञान होने के पीछे कुछ खास क्रियाएँ होती हैं। सबसे पहले उद्दीपन किसी ज्ञानेन्द्रिय के सहारे ग्रहण किया जाता है। फलतः ज्ञानेन्द्रिय तंत्रिका आवेग उत्पन्न होता है। यह तंत्रिका आवेग जब किसी खास तरह की तंत्रियों के सहारे वृहत मस्तिष्क या प्रमस्तिष्क के किसी भाग में पहुँचता है तो प्रमस्तिष्क के सहारे उस उद्दीपन का संवदेन और ज्ञान होता है। इस प्रकार किसी भी उद्दीपन का ज्ञान प्रमस्तिष्क के द्वारा ही होता है।

प्राणी के वर्तमान सम्पूर्ण ज्ञानात्मक अनुभवों को तीन वर्गों में रखा गया है –

(क) शारीरिक परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न अनुभव जिसके अन्तर्गत ताप, स्पर्श एवं शारीरिक गति का अनुभव रखा गया है।
(ख) दृष्टि-सम्बन्धी अनुभव, जैसे-रंग को देखना या रंगों को ठीक से नहीं पहचानना आदि।
(ग) श्रवण-सम्बन्धी अनुभव (Auditory Sensitivity), जैसे-ठीक से सुनना या सुनने में कमजोरी आदि।

इन तीन वर्गों का ज्ञानात्मक अनुभव या आधार-स्थान भी मस्तिष्क में अलग-अलग पाया गया है। उदाहरणार्थ, शारीरिक परिवर्तन में उत्पन्न अनुभव का आधार मस्तिष्क का वह भाग है जो रोलैण्डों के फीसर के ठीक पीछे पैरीटल कौर्टेक्स में स्थित है। शरीर के विभिन्न भागों की त्वचा में स्थित ग्राहक कोशों से चलकर जो स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क के इस भाग में पहुँचते हैं वे हममें ताप एवं स्पर्श के अनुभव को उत्पन्न करते हैं। साथ ही साथ, शारीरिक अंगों के संचालन से उत्पन्न अनुभव की भी आधारशिला पैरीटल कौर्टेक्स का वही भाग है जो रोलैंडो के ठीक पीछे है। पैरीटल कौर्टेक्स के इस भाग को हम सोमेस्थेटिक (Somesthetic) भाग कहते हैं।

सोमेस्थेटिक भाग के कार्य –

1.  सोमेस्थेटिक भाग ताप एवं स्पर्श की संवेदनाओं का नियंत्रण एवं संचालन करता है। पीड़ा के अनुभव के लिए कौर्टेक्स का नहीं, बल्कि थैलेमस की आवश्यकता होती है।

2. दाहिने सोमेस्थेटिक भाग के द्वारा शरीर के बायें भाग में उत्पन्न ताप एवं गति के अनुभव नित्रित एवं संचालित होते हैं। बायें सोमेस्थेटिक भाग का सम्बन्ध शरीर के बायें भाग से रहता है।

3. त्वचा सम्बन्धी उत्तेजनाओं की शक्ति के लिए कौर्टेक्स की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कि थैलेमस की है, कारण कि थैलेमस में इतनी सामर्थ्य है कि वह त्वचा सम्बन्धी संवेदनाओं को उत्पन्न, नियंत्रण एवं संचालित कर सकता है। इसलिए असाधारण स्थिति में कौर्टेक्स का सहयोग त्वचा संबंधी संवेदना की उत्पत्ति एवं नियंत्रण में रहते हुए भी इसके अभाव से उनकी उत्पत्ति एवं नियंत्रण में किसी प्रकार की बाधा नहीं होती है।

4. दृष्टि सम्बन्धी संवेदना प्रमस्तिष्क की पृष्ठ-पालि के द्वारा होती है। यही कारण है कि पृष्ठ-पालि को दृष्टि-संवेदन क्षेत्र कहा गया है। आँख में आनेवाले तंत्रिका आवेग प्रमस्तिष्क के इसी खण्ड से आते हैं जिनके फलस्वरूप हमें दृष्टि संबंधी प्रेरणा होती है। पृष्ठ-पालि के दो भाग हैं-बायाँ भाग और दाहिना भाग। दोनों आँखों में बायीं ओर आने वाला तंत्रिका आवेग पृष्ठ-पालि के बायें भाग में जाता है और दोनों आँखों की दाहिनी ओर से उत्पन्न तंत्रिका आवेग पृष्ठ-पालि के दाहिने भाग में जाता है।

अतः पृष्ठ-पालि का यदि कोई एक भाग क्षतिग्रस्त हो जाय तो दोनों आँखों की आधी रोशनी समाप्त हो जायेगी। पेनफील्ड एवं इरीक्शन महोदय ने अपने प्रयोग द्वारा मस्तिष्क के दृष्टि भाग और दृष्टि सम्बन्धी अनुभवों के बीच स्पष्ट सम्बन्ध दिखलाया है। एक औरत जिसका दृष्टि भाग कौर्टेक्स को चीर-फाड़ के लिए खोला गया था, उसके उस दृष्टि भाग के विभिन्न हिस्सों पर बिजली से उत्तेजनाएँ हो गयीं। इस प्रकार उन हिस्सों को बिजली द्वारा उत्तेजित किये जाने पर औरत ने लाल, नीले आदि रंगों के अनुभव को प्राप्त किया। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कोर्टेक्स की दृष्टि भाग का सम्बन्ध दृष्टि सम्बन्धी अनुभवों से है।

5. श्रवण:
सम्बन्धी अनुभवों का आधार मस्तिष्क की शंख-पालि (Temporal lobe) है। यही कारण है कि इसे मस्तिष्क का श्रवण-संवेदी क्षेत्र भी कहते हैं। यह शंख-पालि दो भागों में बँटी रहती है, किन्तु प्रत्येक भाग में दोनों कानों से तंत्रिका आवेग पहुँचते हैं। इसलिए शंख पालि के किसी एक भाग के क्षतिग्रस्त होने से श्रवण सम्बन्धी संवेदना में कुछ कमी आ जाती है। किन्तु, इससे व्यक्ति पूर्णतः बहरा नहीं हो जाता है। जबकि शंख पालि के दोनों भागों के क्षतिग्रस्त हो जाने पर व्यक्ति पूर्णतः बहरा हो जाता है।

(II) कौटॅक्स द्वारा नियंत्रित एवं संचालित गतिवाही क्रियाएँ (Motor functions of the cortex):
मनुष्यों के गतिवाही क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण रौलेंडो दरार (Fissure of Rolando) के अग्र भाग से लगे पतले से लम्बे भाग द्वारा होता है। इन कोशों से लगे हुए मुख्य तंतु (Axon) होते हैं। पिरामिड की शक्ल के इन कोशों को अगर नष्ट कर दिया जाता है तो वे मुख्य तंतु जो बिल्कुल इनसे सटे रहते हैं, मरने लगते हैं। ऐसे मरे हुए स्नायु तंतु सुषुम्ना एवं सुषुम्नाशीर्ष में भी पाये जाते हैं। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि पिरामिड की शक्ल के जीव कोशों का सम्बन्ध सुषुम्ना एवं सुषुम्ना शीर्ष में पाये जानेवाले स्नायु-तंतुओं से भी है।

मस्तिष्क के दायें अर्द्धखण्ड में स्थित गतिवाही क्षेत्र (Motor area) के नष्ट होने से शरीर के बायें अंग में होने वाली ऐच्छिक क्रियाओं में ह्रास देखा जाता है। इसी प्रकार दायें अंगों में होनेवाली ऐच्छिक क्रियाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस प्रकार क्रियाओं का संचालन सहज धनु ही करता है। जिसके लिए वर्तमान सभी शारीरिक अवयव, जैसे-ग्राहक इन्द्रिय ज्ञानवाही स्नायु कोश, सुषुम्ना, गतिवाही स्नायु कोष, मांसपेशियाँ एवं पिंड अपने कार्यों के बिना किसी रुकावट के करतें ‘घाये जाते हैं। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि मस्तिष्क के गतिवाही क्षेत्रों को नष्ट कर देने पर कुछ क्रियाओं का सम्पन्न होना बिल्कुल असम्भव-सा हो गया है। किन्तु व्यक्ति में यह अवस्था बहुत दिनों तक नहीं रहती है। धीरे-धीरे ऐसा होता है कि विनष्ट भाग के निकट जीव-कोष नष्ट हुये जीव कोशों के कार्य-भार को स्वयं ग्रहण कर लेते हैं, जिससे वे असम्पन्न हुई क्रियाएँ भी सम्पन्न होने लगती हैं।

मस्तिष्क के गतिवाही क्षेत्रों को जब बिजली द्वारा उत्तेजित किया गया तो इससे निम्नलिखित परिणाम निकले –

(क) जब मस्तिष्क के ऊपरी गतिवाही क्षेत्रों को उत्तेजित किया जाता है तो शरीर के निचले अंगों में क्रियाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। दाहिने अर्द्ध-मस्तिष्क के ऊपरी भाग की सहायता से शरीर के बायें हिस्से के निचले अंगों की क्रियाओं का संचालन होता है तथा बायें अर्द्ध-मस्तिष्क के ऊपरी भाग की सहायता से शरीर के दाहिने भाग के अंगों का संचालन एवं नियंत्रण होता है।

(ख) मस्तिष्क के निचले भाग का गतिवाही क्षेत्र चेहरे से सम्बन्धित रहता है। अतः इसके उत्तेजित किये जाने पर चेहरा का फड़कना, मुँह का खुलना और बन्द हो जाना आदि क्रियाएँ शुरू हो जाती हैं। ऊपर के वर्णन से यह स्पष्ट है कि दाहिने गतिवाही क्षेत्र का सम्बन्ध शरीर के बायें भाग से और बायें गतिवाही क्षेत्र का सम्बन्ध शरीर के दाहिने भाग से रहता है। साथ ही साथ ऊपरी गतिवाही क्षेत्रों का सम्बन्ध शरीर के निचले अंगों से और निचले गतिवाही क्षेत्रों का सम्बन्ध शरीर के ऊपरी भागों से रहता है।

(III) कौटॅक्स द्वारा सम्पादित एवं नियंत्रित साहचर्य क्रियाएँ (Associative functions of the cortex):
प्रामाणिक अग्रपालि (Frontal lobe) में जो बड़ा-सा क्षेत्र पाया जाता है उसका कार्य हमारे उच्च मानसिक प्रक्रमों के सम्पादन में सहायता करता है। कौर्टेक्स के विभिन्न भाग जटिल मानसिक-क्रियाओं का सम्पादन करते हैं। पढ़ने के बाद समझने की क्रिया का सम्पादन दृष्टि साहचर्य भाग (Visual associative area) करता है, सार्थक रूप से बोलने और लिखने की क्रिया का सम्पादन गतिवाही साहचर्य (frontal association) करता है।

इस सभी भागों में किसी एक भाग को ही अगर नष्ट कर दिया जाय तो उसपर आश्रित क्रियाएँ सम्पादित नहीं हो सकेंगी। अन्य प्रकार की क्रियाओं का सम्पादन बड़ी आसानी से हो जाता है। अत: गतिवाही साहचर्य क्षेत्र के नष्ट करने पर व्यक्ति आवाज पैदा कर सकता है, हाथों में कलम देने पर इधर-उधर चला जा सकता है, परन्तु वह सार्थक शब्द-समूह को नहीं उत्पन्न कर सकता है और न ही कलम से दो-चार-दस शब्द लिख ही सकता है, जिसका कोई अर्थ हो। इस प्रकार साहचर्य भाग के विनाश के साथ-साथ जटिल मानसिक क्रियाओं की सार्थकता भी जाती रहती है।

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प्रश्न 10.
परिधीय स्नायु-मंडल क्या है? इसके कौन-कौन प्रकार हैं?
उत्तर:
स्नायु-मंडल का यह भाग शरीर के परिधीय भागों में रहता है। इसलिए इसे हम परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। यह मस्तिष्क एवं सुषुम्ना से बाहर सीमान्त प्रदेशों या शरीर की परिधि में फैले हुए हैं। इसी कारण शरीर की परिधि में पाये जाने वाले स्नायु कोशों के संगठन को परिधीय स्नायु-मण्डल कहा जाता है। इस स्नायु-मण्डल का सम्बन्ध ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों से रहता है। यह ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों का सम्बन्ध केन्द्रीय स्नायु-मण्डल से ज्ञानवाही एवं क्रियावाही स्नायु-कोशों द्वारा स्थापित करता हैं। इस प्रकार परिधीय स्नायु-मण्डल के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं –

(क) ग्राहकेन्द्रियाँ
(ख) ज्ञानवाही स्नायु-कोश
(ग) कर्मेन्द्रियाँ-माँसपेशियाँ और ग्रन्थियाँ तथा
(घ) गतिवाही स्नायु-कोश

परिधीय स्नायु-मण्डल को उसके कार्यों के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है –

  1. ज्ञानवाही परिधीय.स्नायु-मण्डल
  2. गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल

1. ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल-परिधीय स्नायु-मण्डल के इस भाग का सम्बन्ध शरीर के विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों से रहता है। यह ज्ञानेन्द्रियों का संबंध केन्द्रिय स्नायु-मण्डल से स्थापित करता है। इस बात के स्पष्टीकरण के लिए एक उदाहरण लें। किसी मंदिर में घंटी बजती है। हम उस घंटी की आवाज को कान से सुनते हैं। कान ही आवाज को ग्रहण करते हैं। अतः कान आवाज के ग्राहक हैं। परन्तु इस आवाज का ज्ञान हमें मस्तिष्क से प्राप्त होता है।

कान और मस्तिष्क के बीच ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कार्य करता है। जब कान आवाज को ग्रहण करते हैं तब कान के ग्राहक कोष उत्तेजित हो जाते हैं। फलतः ज्ञानवाही स्नायु-प्रवाह उत्पन्न होते हैं। इस स्नायु-प्रवाह को मस्तिष्क में पहुँचाने का काम ज्ञानवाही स्नायु करता है। इन क्रियाओं के बाद ही हमें मंदिर की घंटी की आवाज का ज्ञान होता है। ज्ञानवाही स्नायु-कोष स्नायु प्रवाहों को ज्ञानेन्द्रियों से मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं इसलिए इसे ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल अन्य ज्ञानेन्द्रियों का भी सम्बन्ध सुषुम्ना और मस्तिष्क के साथ स्थापित करता है।

2. गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल:
परिधीय स्नायु-मण्डल का जो भाग मस्तिष्क एवं सुषुम्ना को कर्मेन्द्रियों तथा मांसपेशियों और ग्रन्थियों से सम्बन्धित करता है उसे हम गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। इस स्नायु-मण्डल का कार्य मस्तिष्क या सुषुम्ना के आदेश को कर्मेन्द्रियों तक पहुँचाना है। इसके ऐसा करने पर ही व्यक्ति कुछ क्रियाएँ करता है। इसे एक उदाहरण की सहायता से हम स्पष्ट कर सकते हैं। मान लीजिए आप पढ़ रहे हैं। कोई व्यक्ति दरवाजा खटखटाता है।

दरवाजा खटखटाने की आवाज को आपके कान ग्रहण करते हैं। ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल द्वारा स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क में पहुँचता है। मस्तिष्क दरवाजा खोलने का आदेश देता है। यह आदेश गतिवाही स्नायु-प्रवाह के रूप में गतिवाही स्नायु-कोश द्वारा मांसपेशियों तथा ग्रन्थियों तक पहुँचता है। तदुपरान्त आप दरवाजा खोलने की क्रिया करते हैं। इस प्रकार गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल द्वारा मस्तिष्क एवं सुषुम्ना के क्रियात्मक आवेग गतिवाही अवयवों, मांसपेशियों और ग्रन्थियों तक पहुँचाये जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप प्रतिक्रियाएँ होती हैं।

परिधीय स्नायु-मण्डल के कुछ ज्ञानवाही और गतिवाही स्नायुओं का कार्य मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध स्थापित कराना है और कुछ को सुषुम्ना के साथ। मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध स्थापित करानेवाले परिधीय स्नायु को मस्तिष्क-स्नायु तथा सुषुम्ना के साथ सम्बन्ध स्थापित करानेवाले परिधीय स्नायु को सुषुम्ना-स्नायु कहते हैं। चूँकि स्नायु कोश पूर्णत: स्वतंत्र होकर कार्य करते हैं अतः परिधीय स्नायुमण्डल को दो भागों में बाँटा गया है –

  1. परिधीय दैहिम स्नायुमंडल तथा
  2. परिधीय स्वतः संचालित स्नायुमण्डल।

परिधीय दैहिक स्नायुमण्डल के स्नायु-कोशों की क्रियाएँ मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों द्वारा संचालित होती हैं। परन्तु ये स्नायु कोश मस्तिष्क एवं सुषुम्ना से बाहर शरीर के परिधीय भागों में स्थित हैं। व्यक्ति को इन स्नायुओं द्वारा होनेवाली समस्त क्रियाओं का ज्ञान होता है। व्यक्ति इन क्रियाओं पर अपना नियंत्रण भी रखता है। ये स्नायु बाहरी वातावरण से सम्बन्धित रहते हैं। प्रत्येक स्नायु कोश स्वतंत्र एवं व्यक्तिगत रूप से कार्य करता है। इसमें ज्ञानवाही तथा गतिवाही दोनों प्रकार के स्नायु रहते हैं।

परिधीय स्वतः
संचालित स्नायु-मण्डल का निर्माण ऐसे स्नायु कोशों से हुआ है जिनकी क्रियाएँ मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों के अधीन नहीं रहती हैं। अत: व्यक्ति को इन स्नायुकोशों द्वारा होनेवाली क्रियाओं का ज्ञान नहीं होता। व्यक्ति का इन पर नियंत्रण भी नहीं रहता है। ये मस्तिष्क और सुषुम्ना के बाहर ही रहते हैं। ये शरीर के आंतरिक वातावरण से सम्बन्धित रहते हैं। इनके स्नायु-कोश सामूहिक रूप से कार्य करते हैं। इसमें केवल गतिवाही स्नायुकोश ही रहते हैं।

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प्रश्न 11.
अन्तःस्रावी ग्रंथि से आप क्या समझते हैं? इसके प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
व्यक्ति के शरीर में कुछ ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं, जिससे स्राव निकलकर सीधे खून में मिल जाते हैं और व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। इस तरह की ग्रंथियों को अंतःस्रावी ग्रंथि तथा इससे निकलने वाले स्राव को हॉरमोन्स कहते हैं। व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाली ग्रंथियों में निम्नलिखित प्रमुख हैं –

1. थाइरॉयड ग्रंथि:
जब ग्रंथि का स्थान कण्ठ के निकट होता है। इससे थाइरॉक्सिन का स्राव होता है। थायरॉयड ग्रंथि से जब स्राव बहुत कम मात्रा में निकलता है तो व्यक्ति में मानसिक मन्दता तथा उदासीनता छा जाती है। जब इससे स्राव अधिक मात्रा में निकलता है तो व्यक्ति अधिक क्रियाशील रहता है। उसका रक्तचाप बढ़ा रहता है, भूख अधिक लगती है, ऐसा व्यक्ति चिड़चिड़ा स्वभाव का हो जाता है।

2. पाराथायरॉयड ग्रंथि:
पारा थायरॉयड ग्रन्थि का स्थान भी कण्ठ के समीप ही रहता है जिसमें चार छोटी-छोटी ग्रंथियों होती हैं। पाराथायरॉयड का स्राव शरीर में कैलसियम की मात्रा को निर्धारित करता है। इस ग्रंथि से अधिक मात्रा में स्राव होता है, जिससे व्यक्ति में शिथिलता बढ़ जाती है तथा कम मात्रा में स्राव होने से तनाव होती है। व्यक्ति में घबराहट होती है तथा चिड़चिड़ा हो जाता है।

3. पिट्यूटरी ग्रंथि:
पिट्यूटरी ग्रंथि का स्थान मस्तिष्क में होता है। यह ग्रंथि शरीर के सभी ग्रंथियों को नियंत्रित करती है, इसीलिए इसे Master gland भी कहा जाता है। यदि किसी बच्चे के पिट्यूटरी ग्रंथि का स्राव कम मात्रा में होता है तो उसका शारीरिक विकास रुक जाता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः बौना रह जाता है। उसमें आलसी के लक्षण विकसित हो जाते हैं तथा यौन अंगों का विकास अवरुद्ध हो जाता है और यदि अधिक मात्रा में स्राव होता है, तो व्यक्ति का कद काफी लम्बा हो जाता है और उसमें क्रियाशीलता अधिक हो जाती है।

4. एड्रिनल ग्रंथि:
एड्रिनल ग्रंथि किडनी के ठीक ऊपर होता है। यह एक महत्त्वपूर्ण ग्र!ि है। इसे Emergency gland भी कहा जाता है। एड्रिनल ग्रंथि से दो प्रकार के स्राव निकल है जिसको कार्टिन तथा एड्रीनलिन कहा जाता है । एड्रीनलिन हमारे शरीर के लिए काफी महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इससे रक्तचाप, हृदय गति, शरीर में रक्त की आपूर्ति अधिक होती है। इसमें संवेग की अवस्था में समायोजन में सहायता मिलती है।

5. गोनाड्स ग्रंथि:
गोनाड्स को यौन-ग्रंथि भी कहा जाता है। यह स्त्रियों और पुरुषों में अलग-अलग होता है। पुरुषों के यौन-ग्रंथि को Testes तथा स्त्रियों के यौन-ग्रंथि को Ovary कहा जाता है। पुरुषों में पुरुषों के गुण तथा स्त्री में स्त्रियों के गुणों का विकास होना इन्हीं ग्रंथियों पर निर्भर करता है। पुरुषों में मूंछों का निकलना, आवाज का मोटा होना तथा स्त्रियों में स्तनों का विकास, जाँघों की गोलाई इसी के स्राव पर निर्भर करता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यवहारवाद की नींव किसने डाली –
(a) वुण्ट
(b) कोहल
(c) वाटसन
(d) मैस्लो
उत्तर:
(c) वाटसन

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प्रश्न 2.
गुणसूत्र किस पदार्थ से बने होते हैं –
(a) जीन
(b) डी एन ए
(c) खत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) डी एन ए

प्रश्न 3.
हमारी आँखों कितनी परतों से बनी होती है –
(a) 1
(b) 2
(c) 3
(d) 4
उत्तर:
(c) 3

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प्रश्न 4.
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई है –
(a) न्यूरोन
(b) कपाल
(c) टेक्टम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) कपाल

प्रश्न 5.
मानव शरीर में कोशों की संख्या है –
(a) लगभग 1 करोड़
(b) लगभग 10 करोड़
(c) लगभग 10 अरब
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) लगभग 10 अरब

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प्रश्न 6.
मानव मस्तिष्क में संधि की संख्या कितनी होती है?
(a) 1 लाख
(b) 1 करोड़
(c) 10 करोड
(d) 1 अरब
उत्तर:
(c) 10 करोड

प्रश्न 7.
कान के नली की लंबाई होती है –
(a) 20 मी०मी०
(b) 25 मी०मी०
(c) 30 मी०मी०
(d) 32 मी०मी०
उत्तर:
(b) 25 मी०मी०

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प्रश्न 8.
आँख में पटलों की संख्या कितनी होती है?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पाँच
उत्तर:
(c) चार

प्रश्न 9.
जो प्रयोग करता है उसे कहा जाता है –
(a) प्रयोगकर्ता
(b) प्रयोग
(c) चर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) प्रयोगकर्ता

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

Bihar Board Class 11 Psychology मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वैज्ञानिक जाँच के लक्ष्य क्या होते हैं?
उत्तर:
अनुभवों, व्यवहारों तथा मानसिक प्रक्रियाओं के माध्यम से अर्जित ज्ञान को मानव-हित में अधिक-से-अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान करना ही वैज्ञानिक जाँच का सार्थक लक्ष्य होना चाहिए। वैज्ञानिक जाँच के लक्ष्य करने के क्रम में प्राप्त सिद्धांतों एवं नियमों के माध्यम से मानव को सुखमय जीवन प्रदान किया जा सकता है।
वैज्ञानिक जाँच के माध्यम से वांछनीय के पाने के लिए निम्नांकित चरणों में सम्पूर्ण प्रक्रिया को समाप्त किया जाता है –

  1. वर्णन
  2. पूर्वकथन
  3. व्याख्या
  4. नियंत्रण और
  5. अनुप्रयोग

1. वर्णन:
किसी निर्धारित विषय से सम्बन्धित समस्याओं से जुड़ी सभी सूचनाओं का सही रूप से संग्रह किया जाता है। चूँकि व्यक्ति के बदलने से व्यवहार बदल जाता है। अर्थात् व्यवहार और अनुभवं अनगिनत होते हैं। शोधकर्ता प्राप्त सूचनाओं के आधार पर व्यवहार और अनुभव का वर्णन उपस्थित करता है।

उदाहरणार्थ विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास चाहने वाले को पता लगाना होता है कि उपस्थिति, वर्ग-कार्य, गृह-कार्य समय और योजना का कार्यान्वयन आदि विद्यार्थी के लिए कितना उचित या अनुचित होता है। विद्यार्थियों से जुड़ी आदतों, नियमों, व्यवहारों, विचारों को प्रतिशत रूप में प्रस्तुत करके उनका अध्ययन किया जाता है। प्रस्तुत विवरण में व्यवहार विशेष का उल्लेख आवश्यक होता है, जो उसको समझने में सहायता करता है।

2. पूर्वकथन:
वैज्ञानिक जाँच के प्रथम चरण (वर्णन) से प्राप्त जानकारियों के आधार पर से जुड़े अन्य व्यवहारों, घटनाओं अथवा गोचरों से सम्बन्ध के सूक्ष्म अध्ययन से पता किया जा सकता है कि परिणाम अच्छा होगा या बुरा, दोषरहित व्यवहार के लिए क्या परिवर्तन करना। चाहिए। समय, आदत, योजना, स्थिति में से किस दशा में अंतर लाने की गुंजाइश तथा आवश्यकता है।

उदाहरणार्थ, समय और कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए यदि कोई छात्र अध्ययन के लिए अच्छी व्यवस्था के अधीन जिज्ञासु बनकर पढ़ता है तो विश्वास से कहा जा सकता है कि वह परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करेगा। अधिक-से-अधिक लोगों का प्रेक्षण किए जाने पर पूर्वकथन के सत्य प्रमाणित होने की आशा बढ़ जाती है।

3. व्याख्या:
प्रदत्त सूचनाओं के आधार पर प्रस्तुत किये गये पूर्वकथन के कारणों तथा सत्य होने की आशा पर आवश्यक ध्यान दिया जाता है। किसी भी व्यवहार के कारणों तथा प्रेरक कारकों के लक्ष्यों का अध्ययन करके पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि पूर्वकथन कितना प्रतिशत सही होगा। उदाहरणार्थ, भय या दंड से प्रभाव छात्र परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करेगा ही, इसमें संदेह है। पूर्वकथनों की व्याख्या करने अथवा पहचान करने में कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करना होता है। जैसे, उचित नियंत्रण तथा साधन, समय, प्रवृत्ति, आदत में उत्पन्न दोष के कारण कोई छात्र बार-बार असफल होता रहता है।

4. नियंत्रण:
प्राप्त सूचनाओं के आधार पर प्राप्त पूर्वकथन की व्याख्या से पता लग जाता है कि प्रकार्य के किस अंश में परिवर्तित की आवश्यकता है। किसी कार्य के प्रति उत्पन्न व्यवहार को मनोनुकूल स्थिति में लाकर को नियंत्रित किया जा सकता है। व्यवहार के नियंत्रण के लिए –
(क) उसे पूर्ववत दशा में रख जाता है या
(ख) उसे वर्तमान दाशा में बढ़ाया जाता है अथवा
(ग) उसकी तीव्रता में कमी लाया जाता है
उदाहरणार्थ, किसी छात्र के अध्ययन का समय बढ़ाकर उसे सफलता का हकदार बनाया जा सकता है। औषधि एवं सेवा में अंतर लाकर किसी रोगी का अच्छा उपचार किया जा सकता है।

5. अनुप्रयोग:
वैज्ञानिक जाँच का अंतिम लक्ष्य लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। वैज्ञानिक जाँच नए सिद्धांतों अथवा विसंगतियों का पता लगाकर उनमें सुधार या विकास करके मानव-हित में प्रयुक्त करता है। जैसे, यह पता लग चुका है कि योग अथवा ध्यान से मनुष्य को रोगमुक्त या चिंतामुक्त बनाया जा सकता है। कार्यस्थल तथा साधनों के विकास के द्वारा कार्यकर्ता की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

प्रश्न 2.
वैज्ञानिक जाँच करने में अंतर्निहित विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैज्ञानिक विधि में किसी घटना विशेष अथवा गोचर की जाँच के लिए उसे तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है –

(क) वस्तुनिष्ठ:
वैसी घटना, जिसकी माप प्रेक्षणकर्ता के बदलने पर भी अंतर रहे। जैसे किसी बाँस की लम्बाई यदि 2 मीटर है तो कोई भी नापकर 2 मीटर लम्बा ही बतायेगा।

(अ) व्यवस्थित:
किसी घटना विशेष या गोचर की जाँच निर्धारित चरणों में निश्चित क्रम को बनाये रखते हुए पूरा करते हैं।

(ग) परीक्षण:
वैज्ञानिक जाँच की सफलता उसके बार-बार प्रयोग करने पर समान परिणाम के मिलने पर निर्भर करता है। वैज्ञानिक जाँच करने में क्रमबद्ध यानी निश्चित चरणों में जाँच पूरा करना, सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। वैज्ञानिक जाँच के लिए चार वांछनीय चरण निम्नवत हैं –
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(क) समस्या का संप्रत्ययन:
वैज्ञानिक जाँच के लिए सर्वप्रथम अध्ययन के लिए एक निश्चित कथ्य या विषय का निर्धारण करता है। अभीष्ट विषय के सम्बन्ध में अधिक-से-अधिक गुण-अवगुण, लक्षण, विशेषता, अनुक्रिया आदि का पता लगाता है जिससे निर्धारित समस्या का वैसा प्रश्न सामने आता है जिसके द्वारा, जिसके लिए जाँच प्रारम्भ किया जाता है जिसमें अर्जित ज्ञान, पूर्व में किए गए जाँच परिणाम, समीक्षा, अनुभव आदि का भरपूर उपयोग किया जाता है।

समस्या के निर्धारण और पहचान के बाद शोधकर्ता अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर समस्या के समाधान का एक सुलभ विधि की कल्पना करता है। शोधकर्ता की परिकल्पना एक ठोस निर्णय की स्थिति की खोज में जुट जाता है।

उदाहरणार्थ, शोधकर्ता दूरदर्शन को विषय मानकर यह सोच लेता है कि आज जो भी अप्रिय घटनाएँ (लूट, बैंक कांड, हत्या, अपहरण, बलात्कार) होती हैं वे दूरदर्शन के कार्यक्रमों का दुष्परिणाम है। टेलीविजन पर हिंसा के दृश्यों को देखकर बच्चों में आक्रामकता आती है। शोधकर्ता की इस प्रकार की समझ को परिकल्पना कह सकते हैं जिसे गलत या सही प्रमाणित करने के लिए शोध कार्य को आगे बढ़ाया जाता है।

(ख) प्रदत्त-संग्रह:
निर्धारित विषय के सम्बन्ध में प्रस्तुत की गई परिकल्पना की परख के लिए चार पहलुओं पर विचार करके उचित निर्णय लिया जाता है।

1. अध्ययन के प्रतिभागी:
सूचना उपलब्ध कराने वाले प्रतिभागी (छात्र, अध्यापक, कर्मचारी, संगठन) की पहचान उम्र, कार्य, पेशा, स्थिति आदि दृष्टिकोण से की जाती है। पता लगाया जाता है कि दी गई सूचना लोभ, द्वेष, प्रेम या पक्षपात पर आधारित तो नहीं है। भावना में बहकर दी गई सूचना प्रायः गलत होती है।

2. प्रदत्त संग्रह से सम्बन्धित विधियाँ:
समस्या के समाधन के लिए उचित विधि का उपयोग किया जाता है जिसके अन्तर्गत प्रेक्षण विधि, प्रायोगिक विधि, सहसंबंधात्मक विधि, व्यक्ति अध्ययन आदि प्रमुख हैं।

3. उपकरण:
उचित विधियों से परिणाम पाने के लिए तरह-तरह के साधनों (मानचित्र, शब्दचित्र, आँकड़ा, प्रश्नावली, साक्षात्कार, प्रेक्षण अनुसूची आदि) की मदद लेनी होती है।

4. प्रदत्त संग्रह की प्रक्रिया:
समस्या के लक्षणों के अनुरूप विभिन्न विधियों और साधनों के प्रयोग से अधिकतम जानकारी प्राप्त की जाती है। इस क्रम में शोधकर्ता निर्णय लेता है कि विधियों और उपकरणों का किस प्रकार वैयक्तिक या सामूहिक उपयोग में लाया जाना हितकर होगा।

(ग) निष्कर्ष निकालना:
सही सूचनाओं के संग्रह एवं परिकल्पना की सहायता से सांख्यिकी से जुड़े चित्रालेख या वृत्तखंड या दंड आरेख, तोरण तैयार किया जाता है। सांख्यिकी विधियों के उपयोग से प्रदत्त-संग्रह का अध्ययन एवं दृष्टि में पूरा करके उचित निष्कर्ष निकाला जाता है। सांख्यिकीय विधियों से सूचनाओं का विश्लेषण का उद्देश्य परिकल्पना की जाँच करके तदनुसार निष्कर्ष निकालना है।

(घ) शोध निष्कर्षों का पुनरीक्षण:
निर्धारित विषय से सम्बन्धित परिकल्पना, प्रदत्त संग्रह और ज्ञात निष्कर्ष का उपयोग भिन्न-भिन्न स्थानों एवं दशाओं में दुहराकर निष्कर्ष की सत्यता को परखा जाता है। नकारात्मक परिणाम मिलने पर पुनः वैकल्पिक परिकल्पना तथा सिद्धांत को स्थापित करके सही निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है। उदाहरणार्थ, यदि टेलीविजन देखने वाले बच्चों में कुछ आक्रामक नहीं बनते हैं तो परिकल्पना असत्य मान लिया जाता है। अनुसंधान और परीक्षण की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है चाहे शोधकर्ता बदल भी जाये। नया शोधकर्ता प्रमाणित निष्कर्षों को आगे की जाँच का आधार बना लेता है।

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प्रश्न 3.
मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों के स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मानवीय व्यवहार, अनुभव और मानसिक प्रक्रियाओं का उपयोगी अध्ययन पर आधारित मनोवैज्ञानिक दार्शनिक अध्ययन के क्रम में मानव चेतना, स्व, मन-शरीर के सम्बन्ध, संज्ञान, प्रत्यक्षण, श्रम, अवधान, तर्कना आदि की समुचित परख में करने में सक्षम है। मनोविज्ञान की सफलता एवं विकास मानवीय खोजों पर आधारित होती हैं। मनोवैज्ञानिक विविध स्रोतों से भिन्न-भिन्न विधियों द्वारा अपनी समस्या से सम्बन्धित सूचनाओं अथवा प्रदत्तों का संग्रह करता है।

मनोवैज्ञानिक प्रदत्त (सामान्यतया सूचना) व्यक्तियों अव्यक्त अथवा व्यक्त व्यवहारों, आत्मपरक अनुभवों एवं मानसिक प्रक्रियाओं से जुड़ी होती हैं। ज्ञात है कि प्रदत्त कोई स्वतंत्र सत्व नहीं होते हैं बल्कि वे एक संदर्भ में प्राप्त किए जाते हैं जो निश्चित नियम या सिद्धांत के अनुसार कार्य करते हैं। कोई व्यक्ति दशा परिवर्तन के साथ-साथ अपनी शारीरिक प्रदर्शन में भी अंतर ला देता है। जैसे शादी के लिए दिखलाई जानेवाली एक लड़की नम्र स्वभाव वाली, संकोची कन्या की तरह साड़ी में लिपटी हुई देखी जाती है जबकि वह सामान्य जिन्दगी में पैंट-शर्ट पहनकर डिस्को करती है।

मानव-हित में हम मनोविज्ञान से सम्बन्धित तरह-तरह की सूचनाओं (प्रदत्तों) का संग्रह कर उसका सामूहिक अध्ययन करके उचित निष्कर्ष निकालते हैं। मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों (सूचनाओं) के अलग-अलग स्वरूप होते हैं जो निम्न वर्णित हैं –

  1. जनांकिकीय
  2. भौतिक
  3. दैहिक
  4. मनोवैज्ञानिक

1. जनांकिकीय सूचनाएँ:
व्यक्तिगत सूचनाओं (नाम, आयु, लिंग, जन्मक्रम, सहोदरों की संख्या, शिक्षा, व्यवसाय, वैवाहिक स्थिति, बच्चों की संख्या, आवास की भौगोलिक स्थिति, जाति, धर्म, माता-पिता की शिक्षा और व्यवसाय, परिवार की आय आदि) को जनांकिकीय सूचना माना जाता है।

2. भौतिक सूचनाएँ:
भौतिक सूचनाओं का सम्बन्ध पारिस्थितिक सम्बन्धी जानकारियों से है। इसके अन्तर्गत क्षेत्र (पहाड़ी, रेगिस्तानी, जंगली, तराई आदि) आर्थिक दशा, आवास की दशा, शैक्षणिक एवं सामाजिक स्थितियों (विद्यालय, पड़ोस से सम्बन्ध) यातायात के साधन आदि से सम्बन्धित सूचनाएँ ली जाती हैं।

3. दैहिक सूचनाएँ (प्रदत्त):
किसी व्यक्ति के शरीर की रचना (रक्त, तापमान, त्वचा, मस्तिष्क की संरचना) के सम्बन्ध में सभी जानकारियाँ ली जाती हैं। कोई व्यक्ति कितना उछल सकता है? कितना दौड़ सकता है? उसके रक्त में कितना हिमोग्लोबिन है? वह कितना सोता है? वह कैसा स्वप्न देखता है? उसे कितना क्रोध, धैर्य, प्रतिरोध क्षमता, सहन शक्ति है? क्या वह लार की मात्रा से परेशान रहता है? इस प्रकार के दैहिक स्थिति को बतलाने वाली सूचनाओं को दैहिक प्रदत्त माना जाता है।

4. मनोवैज्ञानिक सूचनाएँ:
बुद्धि, परत्युत्पन्नमति, रुचि, सर्जनशीलता, अभिप्रेरणा, वैचारिक, विकार, भ्रम, चिन्ता, अवसाद बोधन, प्रत्यक्षिक निर्णय, चिंतन प्रतिक्रियाएँ, चेतना, व्यक्तिपरक अनुपात आदि की जानकारी मनोवैज्ञानिक सूचना के अधीन माने जाते हैं।

मापन की दृष्टि से मनोवैज्ञानिक प्रदत्त को श्रेणियों (उच्च/निम्न, हाँ/नहीं) के रूप में कोटियों (प्रथम, द्वितीय) के रूप में लब्धांकों (15, 20, 30, 40,60) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक प्रदत्त से वाचिक आख्याएँ, प्रक्षेपण अभिलेख, व्यक्तिगत दैनिकी क्षेत्र टिप्पणियाँ, पुरालेखीय प्रदत्त आदि भी उपलब्ध हो सकते हैं।

मनोवैज्ञानिक प्रदत्त के स्वरूप इस तरह के होते हैं कि उनके उपयोग में गुणात्मक विधि का प्रयोग किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों का पृथक रूप से विश्लेषण करना संभव होता है। इन सभी स्वरूपों की सहायता से किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में लगभग पूरी जानकारी मिल जाती है।

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प्रश्न 4.
प्रायोगिक तथा नियंत्रित समूह एक-दूसरे से कैसे भिन्न होते हैं? एक उदाहरण की सहायता से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रायोगिक समूह में समूह सदस्यों को अनाश्रित परिवर्त्य प्रहस्तन के लिए प्रस्तुत किया जाता है जबकि नियंत्रित समूह प्रायोगिक समूह के सफल संचालन हेतु वांछनीय कारक जुटाने का कार्य करते हुए मात्र एक तुलना समूह बनकर जो प्रहस्तित परिवर्त्य से स्वयं को स्वतंत्र, रखता है। उदाहरणार्थ घटनास्थ अपने आपको अकेला पाकर स्वयं के निर्णय के आधार पर कार्य करना. नियंत्रित समूह के अन्तर्गत माना जाता है जबकि किसी अन्य की उपस्थिति में स्वयं के कुछ करने से रोक लेने की स्थिति प्रायोगिक समूह माना जाता है।

नियंत्रित समूह के निस्पादन की तुलना प्रायोगिक समूह से की जाती है। नियंत्रित समूह से प्राप्त परिणामों की गणना करने पर वह प्रायोगिक समूह से अधिक प्रभावकारी पाया जाता है। किसी प्रयोग से संबद्ध परिवों को नियंत्रित रखकर ही वांछनीय फल प्राप्त किया जाता है जिसके लिए आश्रित परिवर्त्य ही प्रभाव में रखा जाता है। जैसे किसी एक ही कक्षा के छात्रों पर शिक्षण कार्य का प्रभाव अलग-अलग पाया जाना बतलाता है कि जिन छात्रों पर विशिष्ट कारकों (शोर-गुल, गर्मी, नटखट साथी, मन का भटकना, ललक की कमी) का प्रभाव पड़ रहा हो, उसे शिक्षण कार्य से कम लाभ मिलता है।

प्रायः बहुत नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में प्रयोग किये जाते हैं तथा दो घटनाओं या परिवों के मध्य कार्य-करण संबंध स्थापित करके किसी एक कारक में परिवर्तन लाकर अन्य अचर कारकों पर प्रभाव का अध्ययन करते हैं। अनुसंधानकर्ता दो परिवर्त्य के मध्य संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। प्रायोगिक दशा में अनाश्रित परिवयों को कारण माना जाता है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव के अधीन माना जाता है। प्रायोगिक अध्ययनों में सभी संबद्ध सार्थक परिवर्त्य को नियंत्रण में रखना होता है ताकि अच्छा परिणाम प्राप्त हो।

उदाहरणार्थ:
तापमान के नियंत्रण के लिए पंखा, कूलर, ए.सी. का उपयोग किया जाता है। वाद्य साधनों पर रोक लगाकर ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित रखा जा सकता है। सड़कों पर ठोकरों की ऊँचाई एवं संख्या बढ़ाकर वेतहासा भागती गाड़ी की चाल को नियंत्रित किया जा सकता है। इस प्रकार माना जा सकता है कि लाभकारी परिणाम देने के लिए प्रायोगिक समूह-उत्तरदायी होता है जबकि परिणाम को यथाशीघ्र सुधरे स्वरूप में प्रदान करने की स्थिति नियंत्रित समूह उत्पन्न करता है।

उदाहरणार्थ एक सभा संचालन की स्थिति ली जाए तो वक्ता अपने कथन से श्रोता को तभी लाभ पहुँचा सकता है जब भीड़ नियंत्रित हो, वे अनुशासित रहें, विद्युत व्यवस्था सही हो, शान्ति बनाकर रखी जाए। नियंत्रण समूह में परिवयों का निरसन, प्राणिगत परित्वों के साथ प्रयोग-स्थल तथा प्रयोगकर्ता के विचार आदि को प्रमुख स्थान मिला है। सारांशतः माना जाता है कि प्रायोगिक विधि कार्य-कारण सम्बन्ध की स्थापना करती है। प्रायोगिक एवं नियंत्रण समूह का उपयोग करके अनाश्रित परिवों की उपस्थिति का प्रभाव आश्रित परिवर्त्य पर देखा जाता है।

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प्रश्न 5.
एक अनुसंधानकर्ता साइकिल चलाने की गति एवं लोगों की उपस्थिति के मध्य संबंध का अध्ययन कर रहा है। एक उपयुक्त परिकल्पना का निर्माण कीजिए तथा अनाश्रित एवं आश्रित परिवों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक अध्ययन के क्रम में कोई अनुसंधानकर्ता कम-से-कम परिवयों के मध्य संबंध स्थापित करके सह संबंधात्मक अनुसंधान के परिणाम के रूप में उपयुक्त परिकल्पना का निर्माण करता है। दी गई स्थिति में साइकिल चलाने की गति पर लोगों की उपस्थिति के मध्य सम्बन्ध जोड़ने की बात कही गई है।

अनेक बार के प्रेक्षण के आधार पर एक परिकल्पना प्रस्तुत की जाती है जिसके अनुसार, “लोगों की उपस्थिति के दर बढ़ते जाने पर साइकिल चलाने की गति घटती जाती है, क्योंकि भीड़ के बढ़ने के फलस्वरूप पथ अवरोधी स्थिति में आ जाता है।” अनुसंधन की इस दशा को ऋणात्मक सहसम्बन्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है जिसमें एक परिवर्त्य (x) का मान बढ़ने से दूसरे अपवर्त्य () का मान कम हो जाता है।

साइकिल की गति और जुटने वाली भीड़ को क्रमशः आश्रित और अनाश्रित परिवर्त्य माना जा सकता है। प्रायोगिक दशा में अनाश्रित परिवर्त्य कारण होता है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव को माना जाता है। यह भी माना जाता है कि आश्रित परिवर्त्य से उस गोचर का बोध होता है जिसकी अनुसंधानकर्ता व्याख्या करना चाहता है जो मात्र अनाश्रित परिवर्त्य में परिवर्तन के परिणामस्वरूप व्यवहार में आनेवाला परिवर्तन मात्र है। इस आधार पर साइकिल की गति आश्रित परिवर्त्य तथा परिवर्तन के कारण का कारक लोगों की उपस्थिति अनाश्रित परिवर्त्य माना जा सकता है।

प्रश्न 6.
जाँच की विधि के रूप में प्रायोगिक विधि के गुणों एवं अवगुणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जाँच की विधि के रूप में प्रायोगिक विधि सतर्कतापूर्वक संचालित प्रक्रिया पर आधारित भिन्न-भिन्न प्रयोग के कारण सुपरिणामी माने जाते हैं। नियंत्रित दशा में दो घटनाओं या परित्वों के मध्य कार्य-कारण संबंध स्थापित करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। प्रयोग में एक कारक में ऐच्छिक परिवर्तन लाकर दूसरे कारक पर पड़नेवाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है जबकि अन्य संबंधित कारक स्थिर रखे जाते हैं।
प्रायोगिक विधि अपने साथ कुछ गुणों तथा कुछ अवगुणों को साथ लेकर चलती है।

प्रायोगिक विधि के गुण:

  1. वैज्ञानिक विधि – सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन करने में प्रायोगिक विधि क्रमबद्धता पर अधिक ध्यान देता है।
  2. नियंत्रक – यह प्रयोग की तीव्रता को प्रदूषण मुक्त रखता है तथा उसे अव्यावहारिक होने से बचाता है।
  3. वस्तुनिष्ठता – प्रायोगिक विधि द्वारा प्राप्त सभी प्रदत्त वस्तुनिष्ठ तथा पूर्वधारणा मक्त होते हैं।
  4. सहजता – प्रायोगिक विधि से प्राप्त परिणामों को सांख्यिकीय निरूपण के माध्यम से तुलनात्मक अध्ययन के लिए सहज माना जाता है।
  5. अनुसंधानकर्ता के लिए रुचिकर – अनुसंधानकर्ता किसी संदर्भ में आश्रित एवं अनाश्रित परित्वयों का चयन अपनी रुचि के अनुसार करता है।
  6. स्पष्ट व्याख्या – अनुसंधानकर्ता आश्रित एवं अनाश्रित परित्वयों के मध्य कार्य-करण सम्बन्ध की स्पष्ट व्याख्या करने में सक्षम होता है।
  7. बहुआयामी क्षेत्र – प्रायोगिक विधि के माध्यम से मानव-जीवन से जुड़े भिन्न-भिन्न क्षेत्रों (व्यवहार, संवेदना, दक्षता) का सरल अध्ययन करता है।

प्रायोगिक विधि के अवगुण:

  1. अक्षमता – किसी विशिष्ट समस्या का अध्ययन प्रायोगिक विधि से सदैव संभव नहीं होता है। जैसे-बुद्धि स्तर पर पौष्टिक आहार के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किसी को भूखा रखना संभव नहीं है।
  2. जानकारी का अभाव – समस्त प्रासंगिक परिवयों को पूर्णत: जानना और उनका नियंत्रण करना कठिन होता है।
  3. प्रतिकूल दशा – प्रयोग प्रायः बहुत नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में किए जाते हैं जो वास्तविक व्यवहार में सुलभ नहीं हो पाते हैं। जैसे, तापमान, आँधी, प्रकाश, ध्वनि आदि प्रतिकूल दशा भी उत्पन्न कर सकते हैं।
  4. क्षेत्र प्रयोग के कारण उत्पन्न कठिनाई – शोधकर्ताओं को अव्यवस्थित किए बिना क्षेत्र प्रयोग संभव नहीं होता।
  5. प्रयोग कल्प विधि की बाध्यता – भूकंप, बाढ़, अकाल, अपहरण जैसी विपदाओं से जूझते बच्चों को प्रयोगशला के माध्यम से मदद नहीं किया जा सकता है।

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प्रश्न 7.
डॉ. कृष्णन व्यवहार को बिना प्रभावित अथवा नियंत्रित किए एक नर्सरी विद्यालय में बच्चों के खेल-कूद वाले व्यवहार का प्रेक्षण करने एवं अभिलेख तैयार करने जा रहे हैं। इसमें अनुसंधान की कौन-कौन सी विधि प्रयुक्त हुई है? इसकी प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए तथा उसके गुणों और अवगुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बच्चों के खेलकूद बदले व्यवहार का प्रेक्षण करने एवं व्यवहार को बिना प्रभावित अथवा नियत्रित किए अभिलेख तैयार करने हेतु प्रकृतिवादी तथा असहभागी प्रेक्षण-प्रक्रिया को अपनाना सहज, स्वाभाविक एवं वस्तुनिष्ठ होता है। चूंकि प्रेक्षण मनोवैज्ञानिक जाँच का एक सशक्त उपकरण है जिसे व्यवहार के वर्णनं की प्रभावकारी विधि मानी गयी है। अतः बच्चों के व्यवहार की परख के लिए हमें सदा सतर्क एवं जागरूक रहना होता है। प्रकृतिवादी प्रेक्षण के क्रम में प्रेक्षणकर्ता परिस्थिति का न तो प्रहस्तन करता है और न ही उसको नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

असहभागी प्रेक्षण की प्रक्रिया में किसधी व्यक्ति या घटना का प्रेक्षण दूर से किया जाता है जिसमें वीडियो कैमरा तथा अभिलेख संरचना अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। अनुसंधानकर्ता अभिलेख तैयार करते समय व्यवहार की व्याख्या करने में अपनी रुचि एवं जागरूकता को नष्ट होने से बचाये रहता है। निरीक्षण विधि द्वारा बालकों के व्यवहार का निरीक्षण स्वाभाविक परिस्थिति में होता है। इनमें बच्चों की प्रतिक्रियाओं का क्रमबद्ध और योजनाबद्ध रूप में अध्ययन करके वांछनीय व्यवहार का पता लगाना सरल होता है, क्योंकि निरीक्षण विधि का स्वरूप वस्तुनिष्ठ होता है। प्रेक्षण के पश्चात् तैयार अभिलेखों का विश्लेषण करके सही अर्थ पाने का प्रयास किया जाता है।

खेलकूद वाले व्यवहार के अन्तर्गत रुचि, स्वभाव, जिज्ञासा, जीत की ललक, कला, प्रयास आदि तत्वों का सामूहिक प्रेक्षण किया जाता है। इसमें प्रतिभागियों की स्वैच्छिक सहभागिता, उनकी सूचित सहमति तथा परिणामों के विषय में प्रतिभागियों से भागीदारी करने जैसी नैतिक सिद्धांतों को अनुसंधान मूलतः परखने का प्रयास किया जाता है। सांख्यिकीय प्रक्रियाओं का उपयोग करके उचित निष्कर्ष को प्राप्त कर लिया जाता है।

प्रेक्षण विधि के युग:

  1. समय की बचत – बच्चों के व्यवहार का सामूहिक अध्ययन करने से दक्षतापूर्ण सूचनाओं के आधार पर सर्वेक्षण शीघ्रता से पूरा कर लिए जा सकते हैं।
  2. वस्तुनिष्ठता – मनोवैज्ञानिक परीक्षण से प्राप्त परिणाम में वस्तुनिष्ठता एवं प्रमाणीकरण बना रहता है।
  3. आयु वर्ग का विस्तार – परीक्षण किसी आयु वर्ग विशेष के लिए।
  4. सहसंबंधात्मक अनुसंधान की प्रवृत्ति का विकास – कार्यरत प्रवत्यों द्वारा प्राप्त सहसंबंध गुणांक के द्वारा यथासंभव व्यावहारिक एवं उपयोगी निष्कर्ष की प्राप्ति होती है।
  5. अर्थद्वन्द्व से मुक्ति – विशेषता की खोज में किया जाने वाला अनुसंधान स्पष्ट रूप से बिना किसी अर्थद्वन्द्व के परिभाषित किया जा सकता है।
  6. गणना अथवा मापन में सहजता – अभिलेखों तथा आँकड़ों या पठनों के आधार पर प्रतिक्रियादाताओं की गणना की विधि सरल बनायी जा सकती है।
  7. गति एवं शक्ति का महत्त्व – प्रतिभागियों की गति एवं शक्ति की पहचान करने में परीक्षण विधि अनुकूल माना जाता है।
  8. पूर्वाग्रह से मुक्ति – व्यवहार की परख करने वाले अनुसंधान में पूर्वाग्रह को शामिल नहीं किया जा सकता है।
  9. निष्पक्षता – व्यवहार सम्बन्धी सही सूचना पाने में निष्पक्षता से गणना की जाती है।
  10. स्वाभाविक परिणाम – अनुसंधानकर्ता की सतर्कता के फलस्वरूप व्यवहार का स्वाभाविक स्वरूप जानने का अहसास मिलता है।
  11. विश्वसनीयता एवं पुनरावृत्ति की सुविधा-अनुसंधान क्रम में किये गये अध्ययन को दुहराया जा सकता है और परिणाम की विश्वसनीयता कायम रखी जा सकती है।

अनुसंधान प्रक्रिया के अवगुण:

  • प्रदत्तों का अभाव – निरीक्षण क्रम में सभी वांछनीय सूचनाएँ तथा साधन सरलता से सभी स्थितियों में उपलब्ध नहीं होते हैं।
  • समय का अभाव – परीक्षण के लिए निर्धारित प्रक्रिया कब प्रारम्भ होगी और कब समाप्त हो जाएगी यह अनुसंधानकर्ता नहीं जान पाता है। समय के अभाव में सम्पूर्ण अभिलेख प्राप्त नहीं होते हैं।
  • अपूर्ण निष्कर्ष – साधनों की कमी, समय की अनिश्चितता, परिकल्पना की स्थिति से तालमेल का नहीं होना आदि ऐसे कारण हैं जिससे निष्कर्ष अपूर्ण रह जाता है जिससे अनुसंधान की प्रक्रिया सत्य और विश्वसनीय नहीं रह पाती।
  • मानसिक प्रक्रियाओं के सामूहिक अध्ययन की बाध्यता – एक प्रकार के व्यवहार में जुड़े प्रतिभागियों की सामूहिक मानसिक क्रियाओं का आकलन संभव नहीं होता है। शारीरिक, वैचारिक एवं मानसिक दशाओं में भिन्नता के कारण प्रतिभागियों (बच्चों) के संवेगों की जानकारी सही-सही नहीं मिल पाती है।
  • श्रमसाध्यता – प्रेक्षण करके सही अभिलेख तथा निष्कर्ष प्राप्त करना बहुत ही बुद्धि और श्रम चाहता है। प्रेक्षण विधि श्रमसाध्य होता है जो अधिक समय लेती है तथा प्रेक्षक के पूर्वाग्रह के कारण गलत सूचना संग्रह करने का कारण बन जाता है।
  • पूर्वाग्रह – हम चीजों को उसी ढंग से देखते हैं जैसा कि हम स्वयं होते हैं न कि जैसी चीजें होती हैं। अर्थात् पूर्वाग्रह के कारण हम किसी घटना या प्रक्रिया की व्याख्या करने में गलती कर बैठते हैं। वास्तविक व्यवहार पर आधारित सूचना संग्रह में हमसे भूल हो जाती है।
  • समय और नियंत्रण या परियोजना की असुविधा – समय और साधन से संतुलन बनाने वाली क्रिया का हमेशा मिल जाना लगभग असंभव होता है।
  • निरसन की समस्या – प्रेक्षण के क्रिया-स्थल को उचित वातावरण बनाये रखने के लिए तापमान और ध्वनि जैसे परिवों का निरसन कठिन कार्य है।
  • प्रतिसंतुलनकारी तकनीक और यादृक्षिक वितरण – सम्बन्धी दोष समूहों के बीच विभवपरक अंतर लाकर वांछनीय परिणामों को प्रभावित करते हैं, क्योंकि कार्यों को निश्चित क्रम में सजाकर अध्ययन करना तथा प्रायोगिक और नियंत्रित समूहों में प्रतिभागियों का वितरण दोनों अच्छे परिणाम के लिए आवश्यक होते हैं।
  • क्षेत्र प्रयोग एवं प्रयोग कल्प – प्रेक्षण के लिए उपलब्ध क्षेत्र या विधि अनुसंधान के मनोनुकूल नहीं हो सकता है तथा भूकंप, बाढ़ जैसी विपदाओं से त्रस्त प्रतिभागियों के लक्षण अस्वाभाविक बन जाते हैं। प्रतिभागियों की दशा को उत्साहित, भयमुक्त अथवा चिन्तारहित बनाये रखना कठिन कार्य है।
  • नैतिक मुद्दे – मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के क्रम में अनुसंधानकर्ता तथा प्रतिभागियों में से प्रत्येक नैतिक सिद्धांत (निजता, रुचि, उपकार, सुरक्षा) का पालन करेगा ही, यह मानना कठिन है।

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प्रश्न 8.
उन दो स्थितियों का उदाहरण दीजिए जहाँ सर्वेक्षण विधि का उपयोग किया जा सकता है? इस विधि की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
परिष्कृत तकनीकों का उपयोग करके लोगों की अभिवृत्ति का पता लगाना तथा विभिन्न प्रकार के कारण-कार्य सम्बन्धों को पूर्वानुमान प्रस्तुत करना सर्वेक्षण विधि का प्रधान उद्देश्य होता है। उदाहरणार्थ –

  1. चुनाव के समय यह जानने के लिए सर्वेक्षण किया जाता है कि मतदाता किस राजनीतिक दल विशेष को वोट देंगे अथवा वे किस प्रत्याशी के पक्ष में अपना विश्वास प्रकट करते हैं।
  2. सर्वेक्षण अनुसंधान लोगों के मत, अभिवृत्ति और सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करने के लिए निम्न. प्रश्नों का मौलिक उत्तर जानना चाहता है –
    • भारत के लोगों को किन चीजों से प्रसन्नता मिलती है।
    • लोग परिवार नियोजन, पंचायती राज, स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवस्था, शिक्षा सम्बन्धी कार्यक्रम आदि के. सम्बन्ध में किस स्तर की जानकारी रखते हैं।

सर्वेक्षण विधि की सीमाएँ –
विविध प्रकार के कारण-कार्य सम्बन्धों से जुड़े पूर्वानुमान को उपयोगी स्तर प्रदान करने के लिए प्रयोग तथा अनुसंधानकर्ता से सम्बन्धित कुछ सीमाएँ निर्धारित हैं –

1. अनुसंधानकर्ता:
अनुसंधनकर्ता को विषय तथा तकनीकों का ज्ञान होना चाहिए। उन्हें निःस्वार्थ, निर्भय एवं जिज्ञासु होना चाहिए। पूर्वानमान व्यक्त करने में उन्हें कुशल होना चाहिए।

2. मनोवैज्ञानिक प्रदत्त:
निर्धारित विषयों से सम्बन्धित सूचनाओं का ही संग्रह करना चाहिए। संग्रह की गई सूचना सत्य, मानक एवं उपयोगी होनी चाहिए।

3. विधियाँ और उपकरण:
सर्वेक्षण अनुसंधान के लिए सरल विधियाँ एवं वांछनीय उपकरणों का उपयोग किया जाना चाहिए।

4. स्वाभाविक प्रक्रियाएँ:
सर्वेक्षण अनुसंधान की सफलता के लिए आधुनिक तकनीकों पर आधारित प्रक्रियाओं को अपनाना चाहिए।

5. वैयक्तिक साक्षात्कार:
साक्षात्कार के लिए पूर्व निर्धारित प्रश्नों को ही प्रयोग में लाना चाहिए। साक्षात्कारकर्ता को प्रश्नों की शब्दावली में अथवा उसके पूछे जाने के क्रम में कोई भी परिवर्तन करने की स्वतंत्रता नहीं होती है। प्रतिक्रियादाता जो संवेदनशील तथा सहज दशा में रहकर इष्टतम उत्तर देने के लिए स्वतंत्र रहता है, समय-सीमा की छूट रहती है। साक्षात्कार के समय सभी परिस्थितियों को लचीला एवं अनुकूलित होना आवश्यक होता है।

6. प्रश्नावली सर्वेक्षण:
मुक्त तथा अमुक्त प्रश्नों के उत्तर लिखित या मौखिक रूप में देने की भी छूट होती है। इस विधि में पढ़ने योग्य प्रतिक्रियादाता ही भाग ले सकते हैं। प्रश्नावली का उपयोग पृष्ठभूमि सम्बन्धी एवं जनांकिकीय सूचनाओं, भूतकाल के व्यवहारों, अभिवृत्तियों एवं अधिमतों, किसी विषय विशेष के ज्ञान तथा व्यक्तियों की प्रत्याशाओं एवं आकांक्षाओं की जानकारी पर आधारित प्रश्नों के माध्यम से सर्वेक्षण किया जा सकता है। इसमें आमने-सामने बैठकर या डाक द्वारा लोगों की प्रतिक्रियाएँ जानने की छूट होती हैं।

7. दूरभाष सर्वेक्षण:
गलत सूचनाओं तथा अवांछनीय प्रतिक्रिया से बचे रहने की आवश्यकता होती है। विधि का चयन करने में सावधानी रखनी होती है।

8. मनोवैज्ञानिक परीक्षण:
जिस विशेषता के लिए परीक्षण की व्यवस्था की जाती है उसके स्पष्ट रूप से बिना किसी अर्रद्वन्द्व को परिभाषित किया जाना चाहिए तेथा सभी प्रयुक्त प्रश्नों को विषय से सम्बन्धित होना चाहिए। आयु वर्ग तथा समय-सीमा की छूट रहती है। विभिन्न पाठकों के लिए समान अर्थ देने वाले शब्दों का उपयोग किया जाना जरूरी है। अनुसंधानकर्ता को परिणाम की विश्वसनीयता, वैधता तथा मानकों पर सही आकलन करके शुद्ध रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।

9. विविध:
विषय एवं विधि के चयन में सावधनी रखते हुए निष्पादन सम्बन्धी सही सूचना प्राप्त करनी चाहिए। सही योजना, अनेक विधियों से प्राप्त प्रामाणिकता आदि का ध्यान महत्वपूर्ण होता है।

10. वास्तविक शून्य बिन्द का अभाव:
मनोवैज्ञानिक अध्ययन में जो कुछ लब्धांक मिलते हैं वे अपने आप में निरपेक्ष नहीं होती बल्कि उनका सापेक्ष मूल्य होता है।

11. मनोवैज्ञानिक उपकरणों का सापेक्षिक स्वरूप:
किसी विषय से सम्बन्धित गुणात्मक अध्ययन के लिए दो या अधिक शोधकर्ताओं को अवसर दिया जाना चाहिए। प्रत्येक से प्राप्त प्रेक्षणों पर सामुदायिक तर्क-वितर्क करके अतिम स्वरूप प्रदान करना चाहिए।

12. नैतिक मुद्दे:
प्रतिभागियों तथा अनुसंधानकर्ता के लिए रुचि, सहयोग, परोपकार, सुरक्षा, प्रोत्साहन तथा भागीदारी से सम्बन्धित सभी सुविधाएं जुटाने का नैतिक कर्तव्य बनता है। फलतः स्वैच्छिक सहभागिता, सूचित सहमति स्पष्टीकरण, अध्ययन के परिणाम की भागीदारी और प्रदत्त स्रोतों की गोपनीयता प्रमुख विचार के योग्य माने जाते हैं।

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प्रश्न 9.
साक्षात्कार एवं प्रश्नावली में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सर्वेक्षण अनुसंधन सूचना –
संग्रह हेतु विभिन्न तकनीकों की सहायता लेते हैं। प्रयुक्त तकनीकों में से साक्षात्कार और प्रश्नावली दो प्रचलित विधियाँ हैं। इन दोनों के स्वरूप, प्रभेद एवं निर्णय क्षमताओं में कुछ सूक्ष्म अंतर होते हैं जो निम्न वर्णित हैं –
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प्रश्न 10.
एक मानकीकृत परीक्षण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एक मानकीकृत (संरचित) परीक्षण एक विशिष्ट प्रकार का मनोवैज्ञानिक परीक्षण होता है जिसका उपयोग मानसिक अथवा व्यावहारपरक विशेषताओं के संबंध में किसी व्यक्ति की स्थिति के मूल्यांकन में करते हैं। परीक्षण की रचना एक व्यवस्थित प्रक्रिया है तथा इसके कुछ निश्चित चरण होते हैं। इसके अन्तर्गत एकांशों के विस्तृत विश्लेषण तथा समग्र परीक्षण की विश्वसनीयता, वैधता एवं मानकों के आकलन आते हैं।

विश्वसनीयता की परख परीक्षण पुनः परीक्षण के आधार पर संभव होता है। परीक्षण के उपयोग योग्य होने के लिए उसकी वैधता भी आवश्यकता होता है। इससे पता चलता है कि क्या परीक्षण गणितीय उपलब्धि का मापन कर रहा है अथवा भाषा दक्षता का इसके बाद कोई परीक्षण प्रामाणिक तब माना जाता है जब परीक्षण के लिए मानक विकसित कर लिए जाते हैं। इससे किसी परीक्षण पर व्यक्तियों के प्राप्त लब्धांक की भी व्याख्या करने में सहायता मिलती है।

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प्रश्न 11.
मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमा निम्न वर्णित है:

  1. मनोवैज्ञानिक जाँच के क्रम में संग्रह किए जानेवाले व्यवहार अथवा किसी घटना का यथासंभव सही-सही वर्णन प्राप्त किया जाता है।
  2. प्राप्त सूचनाओं के विवरण से सम्बन्धित पूर्वकथन की रचना की जाती है।
  3. व्यवहार के कारणों की जानकारी प्राप्त करनी होती है।
  4. वैज्ञानिक जाँच के क्रम में सूचनाओं का विश्लेषण तथा अनुप्रयोग आवश्यक होते हैं।
  5. भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदत्तों को निश्चित क्रम में सजाना होता है।
  6. जाँच की विधियों का चयन और अनुप्रयोग में सतर्कता रखनी होती है।
  7. प्रेक्षण और अभिलेख की व्याख्या सहज होनी चाहिए।
  8. कार्य-करण सम्बन्धों की जानकारी एवं अनुप्रयोग आवश्यक होता है।
  9. प्रेक्षण सम्बन्धी गलत सूचनाओं एवं प्रतिक्रियाओं से बचा रहना चाहिए।
  10. समय सीमा पर ध्यान देना वांछनीय होता है।
  11. अनुसंधानकर्ता को अधिक विधियों का उपयोग करना चाहिए।
  12. लब्धांकों की तुलना करके सहसंबंध गुणांक का अनुमान लगाया जाता है।
  13. मनोवैज्ञानिक मापन सम्बन्धी समस्याओं (शून्य विधि का अभाव, मनोवैज्ञानिक उपकरणों का सापेक्षिक स्वरूप, गुणात्मक प्रदत्तों की आत्मपरक व्याख्या) के समाधान के बाद ही निष्कर्ष तय करना होता है। इन समस्याओं को मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमा माना जाता है।

प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक जाँच करते समय एक मनोवैज्ञानिक को किन नैतिक मार्गदर्शी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक जाँच करते समय एक मनोवैज्ञानिक को निम्न वर्णित मार्गदर्शी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए –

नैतिक सिद्धांत:
अध्ययन में भाग लेने के लिए व्यक्ति की निजता एवं रुचि का सम्मान, अध्ययन के प्रतिनिधियों को उपकार अथवा किसी खतरे से उसकी सुरक्षा तथा अनुसंधान के लाभ में सभी प्रतिभागियों की भागीदारी वांछनीय है। इसके पक्ष में निम्न बिन्दुओं पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है –

1. स्वैच्छिक सहभागिता:
अध्ययन में जुटे प्रतिभागियों को अध्ययन के लिए विषय को चयन करने में तथा समय निर्धारण में बिल्कुल स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए। प्रतिभागियों के निर्णय पर प्रलोभन, दंड, त्याग का प्रभाव नहीं डालना चाहिए।

2. सूचित सहमति:
प्रतिभागियों की दक्षता का उपयोग, प्रदत्त संगणक का प्रयोग, विचार को बदलने के लिए बाध्य करना आदि नैतिक सिद्धांत के विरुद्ध किया है। अच्छा तो यह होगा कि प्रतिभागियों को संभावित घटनाओं अथवा त्रुटियों की सूचना देकर उनकी सहमति ले लेनी चाहिए। प्रतिभागियों को अनायास शारीरिक या मानसिक उलझन में नहीं डालना चाहिए।

3. स्पष्टीकरण:
अध्ययन के विषय एवं विधियों का स्पष ज्ञान प्रतिभागियों को अवश्य दे देना चाहिए। झूठा भरोसा देना प्रतिभागियों से धोखा करना माना जाएगा।

4. अध्ययन के परिणाम की भागीदारी:
प्रदत्त संग्रह, प्रेक्षणों का अध्ययन, निष्कर्ष निकालना तथा अध्ययन के परिणाम की सही-सही सूचना प्रतिभागियों को मिल जानी चाहिए। अध्ययन के परिणाम के कारण कौन चिंतित है, कौन खुश है, कौन उससे फायदा उठाना चाहता है आदि अंधकार में रखने वाली स्थिति नहीं है। प्रतिभागियों की प्रत्याशा पर विशेष ध्यान रखना चाहिए।

5. प्राप्त स्रोत की गोपनीयता:
प्रतिभागियों से संबंधित सभी सूचनाओं को अत्यन्त गोपनीय रखा जाना चाहिए। प्राप्त स्रोत की गोपनीयता के अभाव में बाहरी व्यक्तियों के द्वारा सुरक्षा खतरे में पड़ सकता है। उसके लिए संकेत संख्या, शब्द संकेत
की रचना की जानी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Psychology मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
परिकल्पना किसे कहते हैं?
उत्तर:
समस्या की पहचान के बाद शोधकर्ता समस्या समाधान के लिए संभावित हल खोजते है, काल्पनिक समाधान हेतु प्रस्तुत कथन को परिकल्पना कहा जाता है। जैसे, टेलीविजन पर हिंसा का दृश्य देखने से बच्चों में आक्रामकता आती है अथवा प्रतियोगिता या परीक्षा में असफल हो जाने से उत्साह मंद पड़ जाता है आदि।

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प्रश्न 2.
प्रदत्त संग्रह से सम्बन्धित किन चार पहलुओं के बारे में उचित निर्णय लेना होता है?
उत्तर:
(क) अध्ययन के प्रतिभागी (बच्चे, किशोर, कर्मचारी)
(ख) प्रदत्त संग्रह की विधि (प्रेक्षण, विधि, प्रायोगिक विधि)
(ग) अनुसंधान में प्रयुक्त उपकरण (साक्षात्कार, प्रश्नावली) तथा
(घ) प्रदत्त संग्रह की प्रक्रिया (वैयक्तिक, सामूहिक)।

प्रश्न 3.
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान किस लिए किए जाते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान विवरण, पूर्वकथन, व्याख्या, व्यवहार नियंत्रण तथा वस्तुनिष्ठ तरीके से उत्पादित ज्ञान के अनुप्रयोग के लिए किए जाते हैं।

प्रश्न 4.
मनोवैज्ञानिक जांच के विभिन्न लक्ष्यों में से किसे सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक जांच का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य अनुप्रयोग को माना जाता है जो लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाकर उत्पन्न समस्याओं के समाधान के लिए सुगम मार्ग बनाते हैं।

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प्रश्न 5.
अनुसंधान के वैकल्पिक प्रतिमान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मानव व्यवहार का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है जिसका प्रेक्षण, मापन तथा नियंत्रण किया जा सकता है। आधुनिक व्याख्यात्मक परम्परा के अनुसार समझ को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। फलतः प्राकृतिक आपदाओं और असाध्य रोगों की पहचान और उससे राहत पाने की युक्ति खोजी जाती है।

प्रश्न 6.
मनोवैज्ञानिक पूछताछ की विभिन्न विधियों का नाम लिखें।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक पूछताछ अथवा मनोविज्ञान की विभिन्न विधियाँ हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. निरीक्षण विधि
  2. साक्षात्कार विधि
  3. प्रयोगात्मक विधि
  4. व्यक्ति इतिहास विधि
  5. प्रश्नावली विधि इत्यादि

प्रश्न 7.
निरीक्षण विधि क्या है?
उत्तर:
निरीक्षण विधि एक ऐसी विधि है जिसमें पूर्व योजना के अनुसार क्रमबद्ध, पूर्वाग्रह मुक्त नियंत्रित एवं वस्तुनिष्ठ अध्ययन होता है। बाल मनोविज्ञान की समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन में निरीक्षण विधि एक महत्वपूर्ण विधि है।

प्रश्न 8.
निरीक्षण विधि के जन्मदाता कौन थे?
उत्तर:
निरीक्षण विधि के जन्मदाता जे. बी. वाटसन थे।

प्रश्न 9.
निरीक्षण विधि का स्वरूप कैसा है?
उत्तर:
निरीक्षण विधि का स्वरूप वस्तुनिष्ठ है।

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प्रश्न 10.
निरीक्षण विधि का मूल उद्देश्य बतायें।
उत्तर:
निरीक्षण विधि द्वारा बालकों के व्यवहार का निरीक्षण स्वाभाविक परिस्थिति में होता है। इसमें बच्चों की प्रतिक्रियाओं का क्रमबद्ध और योजनाबद्ध रूप में अध्ययन होता है।

प्रश्न 11.
साक्षात्कार विधि क्या है?
उत्तर:
साक्षात्कार विधि वैसी विधि है जिसमें साक्षात्कार करनेवाले विशेषज्ञों का एक समूह होता है जिसे साक्षात्कार बोर्ड कहते हैं। साक्षात्कार आमने-सामने होता है। इस विधि में सूचनाओं एवं तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रश्न-उत्तर पद्धति को अपनाया जाता है।

प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक प्रदत्त किसे कहते हैं?
उत्तर:
व्यक्तियों के व्यक्त या अव्यक्त व्यवहारों, आत्मपरक अनुभवों एवं मानसिक प्रक्रियाओं से सम्बन्धित जानकारियों के संग्रह को वैज्ञानिक प्रदत्त (सूचनाएँ) कहा जाता है। प्रदत्त कोई स्वतंत्र सत्व नहीं होते बल्कि वे एक संदर्भ में प्राप्त होते हैं तथा उस सिद्धांत एवं विधि से आबद्ध होते हैं।

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प्रश्न 13.
मनोविज्ञान के प्रदत्तों को किन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:

  1. जनांकिकीय
  2. भौतिक
  3. दैहिक
  4. मनोवैज्ञानिक सूचनाएँ

प्रश्न 14.
मनोविज्ञान की महत्वपूर्ण विधियों की ओर संकेत करें।
उत्तर:

  1. प्रेक्षण
  2. प्रायोगिक
  3. सहसंबंधात्मक
  4. सर्वेक्षण
  5. मनोवैज्ञानिक प्रेक्षण तथा
  6. व्यक्ति अध्ययन

प्रश्न 15.
प्रकृतिवादी परीक्षण की एक प्रमुख विशेषता बतायें।
उत्तर:
प्रेक्षणकर्ता परिस्थिति का न तो प्रहस्तन करता है और न ही उसको नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

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प्रश्न 16.
असहभागी प्रेक्षण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस प्रेक्षण में किसी व्यक्ति या घटना का प्रेक्षण दूर से करते हैं। गतिविधियों में बिना भाग लिए किये गये प्रेक्षण को असहभागी प्रेक्षण कहते हैं।

प्रश्न 17.
प्रेक्षण विधि से होनेवाले लाभ का उल्लेख करें।
उत्तर:
प्रेक्षण विधि में अनुसंधानकर्ता लोगों एवं उनके व्यवहारों का प्राकृतिक स्थिति जैसे वह घटित होती है, में अध्ययन कर सकता है।

प्रश्न 18.
प्रेक्षण की प्रायोगिक विधि से किस सम्बन्ध की व्याख्या संभव है?
उत्तर:
प्रायोगिक विधि एक नियंत्रित दशा में दो घटनाओं या परिवों के मध्य कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करने के लिए किया जाता है।

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प्रश्न 19.
सहसंबंधात्मक अनुसंधान किन-किन स्थितियों में पाया जाता है?
उत्तर:

  1. धनात्मक (गुणांक + 1.00 के निकट)
  2. ऋणात्मक (गुणांक 0 और – 1.0 के बीच) तथा
  3. शून्य सहसंबंध (गुणांक – 0.02 अथवा + 0.03)।

प्रश्न 20.
सर्वेक्षण अनुसंधानकर्ता सूचना एकत्रित करने के लिए किन प्रमुख तकनीकों का उपयोग करता है?
उत्तर:

  1. साक्षात्कार
  2. प्रश्नावली
  3. दूरभाष तथा
  4. नियंत्रित प्रेक्षण

प्रश्न 21.
साक्षात्कार के दो रूपों के नाम बतावें।
उत्तर:

  1. संरचित या मानकीकृत तथा
  2. असंरचित या अमानकीकृत

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प्रश्न 22.
सर्वेक्षण की सीमा क्या होती है?
उत्तर:

  1. गलत सूचनाओं के द्वारा वास्तविक विचार को छिपाने की प्रवृत्ति
  2. लोग कभी-कभी वैसी प्रतिक्रियाएँ देते हैं जैसा शोधकर्ता जानना चाहता है।

प्रश्न 23.
शब्दावली के प्रयोग में क्या सावधानी रखनी होती है?
उत्तर:
किसी भी परीक्षण के एकांशों की शब्दावली ऐसी होनी चाहिए कि वह विभिन्न पाठकों को समान अर्थ का बोध कराए।

प्रश्न 24.
परीक्षण की सफलता के क्रम में किन तीन तत्वों पर ध्यान रखा जाता है?
उत्तर:

  1. परीक्षण की विश्वसनीयता
  2. परीक्षण की वैधता तथा
  3. परीक्षण के लिए प्रामाणिक मानक।

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प्रश्न 25.
प्रमाणिक साक्षात्कार क्या है?
उत्तर:
प्रमाणिक साक्षात्कार में प्रश्नों की सूची पहले से तैयार कर ली जाती है। इन प्रश्नों को साक्षात्कार देने वाले के क्रमानुसार पूछा जाता है। सभी लोगों के लिये एक ही तरह के प्रश्न होते हैं।

प्रश्न 26.
परिवर्त्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
अधीक्षण या घटना के भिन्न मान होते हैं जिसके मापन को परिवर्त्य कहा जाता है।

प्रश्न 27.
परिवर्त्य के दो प्रमुख वर्गों के नाम और लक्षण बतायें।
उत्तर:

  1. अनाश्रित परिवर्त्य – जिसका प्रहस्तन संभव होता है –
  2. आश्रित परिवर्त्य – जिसकी व्याख्या. वांछनीय होती है। प्रायोगिक दशा में, अनाश्रित परिवर्त्य कारण है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव।

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प्रश्न 28.
प्रायोगिक एवं नियंत्रित समूहों में प्रतिभागियों का वितरण किस रूप में किया जाता है?
उत्तर:
समान लक्षण वाले (सार्थक, जैविक, पर्यावरणीय, अनुक्रमिक) परिवयों का वितरण यादृक्षिक (random) रूप में किया जाता है।

प्रश्न 29.
एक ऐसी समस्या का उल्लेख करें जिसका अध्ययन प्रायोगिक रूप में नहीं किया जा सकता है?
उत्तर:
बच्चों के बुद्धि स्तर पर पौष्टिकता की कमी के प्रभाव का अध्ययन बच्चों को बार-बार भूखा रखकर करना अनैतिक एवं अव्यावहारिक कार्य कहलाता है।

प्रश्न 30.
क्षेत्र-प्रयोग से क्या समझते हैं?
उत्तर:
कुछ विशिष्ट स्थितियों (फसल चक्र) का अध्ययन प्रयोगशाला में संभव नहीं होता है तथा जिसके लिए अनुसंधानकर्ता को सम्बन्धित क्षेत्र में जाना आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न 31.
प्रयोग-कल्प किसे कहते हैं?
उत्तर:
भूकंप, बाढ़, अतिवृष्टि जैसे प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित बच्चों की दशा का अध्ययन करने के लिए अनुसंधानकर्ता प्रयोग-कल्प की विधि अपनाता है जिसमें अनाश्रित परिवर्त्य का चयन करके उसे प्रहस्तित करने का प्रयास किया जाता है।

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प्रश्न 32.
स्वतंत्र साक्षात्कार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्वतंत्र साक्षात्कार में साक्षात्कार लेनेवाले स्वतंत्र रूप से विषय से संबंधित प्रश्नों को पूछते हैं।

प्रश्न 33.
साक्षात्कार विधि में किन सूचनाओं को एकत्र किया जाता है?
उत्तर:
साक्षात्कार विधि में आमने-सामने की परिस्थिति में बच्चों की व्यवहार सम्बन्धी सूचनाओं को एकत्र किया जाता है। इस विधि में प्रश्न और उत्तर के आधार पर सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।

प्रश्न 34.
प्रयोगात्मक विधि क्या है?
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि एक ऐसी विधि है जिसमें निरीक्षण कार्य प्रयोग पर आधारित होता है। इस विधि का प्रयोग बच्चों के अध्ययन के लिये नियंत्रित वातावरण से होता है।

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प्रश्न 35.
प्रयोगात्मक विधि में किन उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है?
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि में मनोवैज्ञानिक उपकरणों एवं यंत्रों की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 36.
प्रयोगात्मक निरीक्षण के लिए किन तकनीकों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
बाल मनोविज्ञान के अध्ययन में प्रयोगात्मक निरीक्षण के लिये विभिन्न तकनीक का प्रयोग किया जाता है जो इस प्रकार हैं –

  1. फोटोग्राफिक डोम तकनीक
  2. वन वे स्क्रीन तकनीक
  3. सिनेमाटोग्राफिक तकनीक
  4. प्रयोगात्मक कैबिनेट

प्रश्न 37.
प्रश्नावली विधि का निर्माण किस मनोवैज्ञानिक ने किया?
उत्तर:
प्रश्नावली विधि का निर्माण सबसे पहले स्टेनले हॉल ने किया।

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प्रश्न 38.
परीक्षणों का वर्गीकरण किस आधार पर किया जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का वर्गीकरण भाषा, उसके देने की रीति तथा जटिलता-स्तर के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 39.
भाषा के आधार पर तीन प्रकार के परीक्षण की गुंजाइश रहती है। नाम लिखें।
उत्तर:

  1. वाचक
  2. अवाचित तथा
  3. निष्पादन

प्रश्न 40.
देने की रीति के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों को किस प्रकार विभाजित किया जाता है?
उत्तर:

  1. वैयक्तिक तथा
  2. सामूहिक परीक्षण

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प्रश्न 41.
समय सीमा से बंधे परीक्षण के मूल आधार क्या हैं?
उत्तर:

  1. गति परीक्षण और
  2. शक्ति परीक्षण

प्रश्न 42.
अनुसंधानकर्ता को परीक्षण की किसी एक विधि पर निर्भर नहीं रहने की सलाह क्यों दी जाती है?
उत्तर:
प्रत्येक विधि की अपनी विशेषताएँ एवं सीमाएँ होती हैं। दो या अधिक विधियों से समान परिणाम मिलते हैं तो परिणाम को प्रामाणिकता एवं उपयोगी करार दिया जाता है।

प्रश्न 43.
प्रदत्त विश्लेषण के दो प्रकार के विधिपरक उपागमों का उपयोग किया जाता है। उनके नाम बतावें
उत्तर:

  1. परिणामात्मक विधि और
  2. गुणात्मक विधि

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प्रश्न 44.
मनोवैज्ञानिक मापन की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?
उत्तर:

  1. वास्तविक शून्य बिन्दु का अभाव
  2. मनोवैज्ञानिक उपकरणों का सापेक्षिक स्वरूप तथा
  3. गुणात्मक प्रदत्तों की आत्मपरक व्याख्या

प्रश्न 45.
नैतिक सिद्धांत में किन बातों पर ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है?
उत्तर:
अध्ययन में भाग लेनेवाले व्यक्ति को जिज्ञासु, उत्साही तथा संशयमुक्त रखने के लिए उसकी सुरक्षा, गोपनीयता, निजता, रुचि पर ध्यान रखना होता है। स्वैच्छिक सहभागिता, सूचित सहमति तथा स्पष्टीकरण, भागीदारी जैसे बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है।

प्रश्न 46.
असंरचित प्रश्न से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
असंरचित प्रश्नावली का निर्माण पहले से नहीं होता है बल्कि अध्ययन के समय व्यवहार-संबंधी प्रश्न पूछे जाते हैं। बच्चे स्वतंत्र होकर उत्तर देते हैं।

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प्रश्न 47.
प्रतिबंधित प्रश्नावली का अर्थ बतायें।
उत्तर:
प्रतिबंधित प्रश्नावली वैसी प्रश्नावली है जिसमें बच्चे लिखित उत्तरों में किसी एक के बारे में हाँ-ना, सहमत-असहमत इत्यादि कहकर उत्तर देते हैं।

प्रश्न 48.
प्रश्नावली विधि क्या है?
उत्तर:
प्रश्नावली विधि एक ऐसी विधि है जिसमें बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं की जानकारी के लिये प्रश्न बनाये जाते हैं। प्रश्नों द्वारा बच्चों के व्यवहार-सम्बन्धी उत्तर अंकित किये जाते हैं।

प्रश्न 49.
संरचित प्रश्न से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संरचित प्रश्न वैसे प्रश्न हैं जिसमें बच्चों के व्यवहार-सम्बन्धी बातों की जानकारी से संबंधित प्रश्न होते हैं जो पहले से ही तैयार कर लिये जाते हैं। बच्चों से प्रश्न पूछा जाता है और उत्तर अंकित किये जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान प्रदत्त के स्वरूप में किन विशेषताओं का होना आवश्यक माना जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रदत्त कोई स्वतंत्र सत्व नहीं होते हैं। वह स्वयं सत्यता के विषय में कुछ नहीं कहता बल्कि शोधकर्ता उसकी मदद से सही अनुमान पाने की स्थिति में पहुंचता है। शोधकर्ता प्रदत्त.को एक संदर्भ विशेष में रखकर अर्थवान बनाता है। प्रदत्तों को निम्न वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

  1. जनांकिकीय
  2. भौतिक
  3. दैहिक तथा
  4. मनोवैज्ञानिक सूचना मापन की दृष्टि से मनोवैज्ञानिक सूचनाएँ (प्रदत्त) अनपढ़ हो सकती है जिनका विश्लेषण मुणात्मक विधि का उपयोग करके पूरा किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
किन विशेषता के कारण वैज्ञानिक दिन-प्रतिदिन के प्रेक्षणों से भिन्न माने जाते हैं?
उत्तर:
(क) चयन:
वैज्ञानिक प्रेक्षण किसी एक निर्धारित विषय का (चयनित व्यवहार) का प्रेक्षण करता है तथा यथासंभव सभी प्रकार से संबद्ध प्रश्नों का संतोषप्रद हल खोज लेता है।

(ख) अभिलेखन:
अनुसंधानकर्ता चयनित विषय (व्यवहारों) का विभिन्न साधनों (पूर्व अर्जित ज्ञान एवं अनुभव का प्रयोग करते हुए प्राप्त परिणाम के आधार पर एक संतुलित अभिलेख तैयार करता है।

(ग) प्रदत्त विश्लेषण:
प्रेक्षण किसका, कब, कहां और कैसे किया जाता है, अनुसंधानकर्ता सभी पहलुओं पर ध्यान देते हुए अभिलेखों का विश्लेषण करता है जिसके माध्यम से वह अभिलेख से सही अर्थ प्राप्त करने का प्रयास करता है। दिन-प्रतिदिन के प्रेक्षणों में इनमें से किसी भी विधि का उपयोग करना संभव नहीं होता है जिसके कारण इसे वैज्ञानिक प्रेक्षण से भिन्न माना जाता है।

प्रश्न 3.
प्रेक्षण कितने प्रकार के होते हैं ? किसी एक प्रकार के प्रेक्षण को स्पष्टता समझायें।
उत्तर:
प्रेक्षण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –

(क) प्रकृतिवादी बनाम नियंत्रित प्रेक्षण
(ख) असहभागी बनाम सहभागी प्रेक्षण

असहभागी बनाम सहभागी प्रेक्षण-किसी व्यक्ति या घटना का प्रेक्षण दूर रहकर किया जा सकता है। कभी-कभी प्रेक्षण स्वयं प्रेक्षण करनेवाले समूह का एक सदस्य बनकर प्रेक्षण करता है। ज किसी प्रक्रिया में भाग किये बिना अथवा बिना कोई अवरोध उत्पन्न किए प्रेक्षण करना असहभागी प्रेक्षण कहलाता है। जैसे विडियोग्राफी करके या स्वयं किसी वर्ग में चुपके से कोने में बैठकर सम्पूर्ण प्रक्रिया का अध्ययन करना असहभागी प्रेक्षण कहलाता है।

सहभागी प्रेक्षण करने के लिए प्रेक्षक को समूह के साथ मिलकर अध्ययन करना होता है। जैसे प्रेक्षक अध्यापक या छात्र के रूप में वर्ग कार्य में सम्मिलित होकर सम्पूर्ण शैक्षणिक कार्यों का अध्ययन करता है। असहभागी प्रेक्षण श्रमसाध्य होता है तथा अधिक समय लेता है। इसमें प्रेक्षण के पूर्वाग्रह के कारण गलती होने पर डर बना रहता है। इससे बचने के लिए अभिलेख तैयार करके प्रेक्षण के बाद उसके अध्ययन करने की सलाह दी जाती है।

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प्रश्न 4.
परिवर्त्य की सार्थकता को स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रायोगिक विधि में अनुसंधानकर्ता मापन किये जाने योग्य घटना या उद्दीपक (परिवर्त्य) के मध्य संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। परिवर्त्य भिन्न-भिन्न मान वाले उद्दीपक घटना को कहते हैं जो स्वयं में अंतर लाने की क्षमता रखता है।

उदाहरणार्थ, हम जिस एक कलम का उपयोग करते हैं वह एक अपवर्त्य नहीं है लेकिन भिन्न-भिन्न आकारों एवं रंगों वाली कलमें सामूहिक रूप में अपवर्त्य मानी जाती हैं। विभिन्न कदवाले व्यक्ति अपवर्त्य हैं। इसी प्रकार बाल का रंग, बुद्धि, वर्ग में छात्रों की उपस्थिति सभी अपवर्त्य हैं। अतः अपवर्त्य कहलाने वाली वस्तुओं अथवा घटनाओं की मात्रा अथवा गुणवत्ता में परिवर्तन होना वांछनीय तत्व हैं।

परिवर्त्य को दो श्रेणियाँ होती हैं –

1. अनाश्रित परित्वर्य:
जिसका हस्तान्तरण संभव है।

2. आश्रित परिवर्त्य:
जिस व्यवहार पर अनाश्रित परिवर्त्य के प्रभाव का प्रेक्षण किया जा सकता है। आश्रित परिवर्त्य उस गोचर को बतलाता है जिसकी व्याख्या करना अनुसंधानकर्ता का उद्देश्य है। यह मात्र अनाश्रित परिवर्त्य के परिवर्तन के परिणामस्वरूप व्यवहार में आनेवाला अंतर मात्र है।

प्रायोगिक दशा में अनाश्रित परिवर्त्य कारण है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव। दोनों प्रकार के परिवर्त्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं। अनुसंधानकर्ता अपनी रुचि एवं बुद्धि के अनुसार परिवयों का चयन करके कार्य-कारण सम्बन्ध की व्याख्या करने में सफल होना चाहता है।

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प्रश्न 5.
सर्वेक्षण विधि का एक स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करें।
उत्तर:
अनुसंधानकर्ता कई प्रकार के प्रश्नों को पूछकर प्राप्त उत्तरों के आधर पर मानव के स्वाभाविक व्यवहार का अध्ययन करता है। उदाहरणार्थ, कुछ प्रमुख प्रश्न निम्नवत हैं –

  1. भारत के लोगों को किन चीजों से प्रसन्नता मिलती है?
  2. क्या आप प्रसन्न हैं?
  3. लोगों को अत्यधिक प्रसन्नता किससे मिलती है?
  4. लोग अप्रसन्न अथवा दुखी होने पर क्या करते हैं? उपर्युक्त प्रश्नों में विभिन्न प्रकार के उत्तर प्राप्त हुए; जैसे कुछ ने अपने आपको प्रसन्न माना। कुछ ने संतुलित जीवन की सूचना दिया। कुछ ने स्वयं को दुखी माना। कुछ ने प्रसन्नता का कारण पैसों की उपलब्धि माना।

कुछ ने प्रसन्न रहने के लिए मन की शांति को कारक माना । कुछ लोगों ने सफलता को प्रसन्नता से तथा असफलता को अप्रसन्नता से जोड़कर बताया। दुखी मानव में कोई संगीत सुनता है, कोई मित्रों से मिलकर दुख को भूलना चाहता है, कम लोग थे जो अपनी अप्रसन्नता को सिनेमा देखकर भुलाना चाहता है।

इस तरह स्पष्ट होता है कि मनुष्यों में व्यवहार अथवा प्रतिक्रिया व्क्त करने की अलग-अलग विधियाँ होती हैं। प्रश्नोत्तर के प्रतिशत मान के आधार पर परिणामी निर्णय लिये जाते हैं। चोर-चोर का हल्ला सुनकर कोई छिप बैठता है तो कोई बाहर निकलकर चोर को पकड़ना चाहता है। कोई घरवाले को सांत्वना देने लगते हैं तो कुछ ने ईर्ष्यावश घटना को अपनी आकांक्षा के अनुकूल बताया।

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प्रश्न 6.
अंतर्निरीक्षण विधि से क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोविज्ञान की वह पहली विधि है। इस विधि का क्या व्यवहार सर्वप्रथम उण्ट ने किया। जिन्होंने 1879 ई. में लिपजिग में मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला की स्थापना की और चेतन अनुभूति का अध्ययन अन्तर्निरीक्षण-विधि द्वारा किया। उन्होंने चेतन अनुभूति को मनोविज्ञान का अध्ययन विषय-वस्तु और अन्तर्निरीक्षण विधि को विधि माना।

अन्तर्निरीक्षण – विधि का अर्थ अपने भीतर देखना (To look within) है। अंतनिरीक्षण विधि वह विधि है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी चेतना अनुभूतियों का निरीक्षण स्वयं करता है और उन्हें अपने शब्दों में व्यक्त करता है। चेपलिन ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि अंतनिरीक्षण चेतन घटक के तत्वों तथा गुणों के वस्तुनिष्ठ विवरण को कहते हैं। इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि अंतर्निरीक्षण के लिए दो बातें आवश्क हैं –

1. इस विधि में व्यक्ति अपने चेतन अनुभव का वर्णन उसी रूप में करता है जिस रूप में अनुभव होता रहता है और वर्णन की प्रक्रिया उसी समय तक चलती है जब तक अनुभव की क्रिया चलती रहती है। इस विधि के निरीक्षण की चेतन अनुभूति के रचनात्मक तत्वों का वर्णन करना होता है। उण्ट के अनुसार चेतन अनुभूति के तीन रचनात्मक तत्व हैं जिन्हें संवेदना, भाव तथा प्रतिबिम्ब कहते हैं।

प्रश्न 7.
किसी विषय अथवा घटना से सम्बन्धित प्रस्तुत किये जाने वाले पूर्व कथनों पर किन बातों का प्रभाव देखा जाता है?
उत्तर:
निर्धारित विषय के सम्बन्ध में ज्ञान और स्वयं के अनुभव की प्रवृत्ति के द्वारा व्यवहार सम्बन्धी घटनाओं का सफल अध्ययन किया जा सकता है। थोड़ी-सी सतर्कता रखने पर व्यवहार विशेष के अन्य व्यवहारों, घटनाओं अथवा गोचरों के संबंध को सरलतापूर्वक जाना जा सकता है। व्यवहार के सही मूल्यांकन के आधार पर लगभग सही पूर्वकथन प्रस्तुत किया जा सकता है। विषयों के अध्ययन, समय की मात्रा एवं उपलब्धियों के बीच धनात्मक संबंध की स्थापना की जा सकती है। पूर्वकथन, प्रेक्षण किए गए व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि होने पर अधिक सही होता है। जितने अधिक लोगों का प्रेक्षण किया जाएगा, पूर्वकथन के सही होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

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प्रश्न 8.
खोज की व्यवस्थित प्रक्रिया किन कारकों पर आधारित होती है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान विवरण, पूर्वकथन, व्याख्या, व्यवहार-नियंत्रण तथा वस्तुनिष्ठ तरीके से उत्पादित ज्ञान के अनुप्रयोग के लिए किए जाते हैं। इसके मुख्यतः चार चरण होते हैं –

  1. समस्या का संप्रत्ययन
  2. प्रदत्त संग्रह
  3. प्रदत्त विश्लेषण तथा
  4. अनुसंधान निष्कर्ष। निकालना और उसका पुनरीक्षण करना।

मनोविज्ञान में व्यवहार एवं अनुभव से संबंधित समस्याओं का समाधान करना होता है जिसके लिए उचित कार्य अथवा विषय का चयन किया जाता है। अच्छे परिणाम की प्राप्ति के लिए –

(क) अपने व्यवहार को समझने
(ख) दूसरे के व्यवहार को समझने
(ग) समूह से प्रभावित वैयक्तिक व्यवहार
(घ) समूह व्यवहार तथा
(ङ) संगठनात्मक स्तर पर तुलनात्मक अध्ययन करना होता है। जिज्ञासा की तरह विविध पक्षों का समुचित अध्ययन करने के परिणामस्वरूप एक काल्पनिक समाधान (परिकल्पना) की खोज की जाती है। साक्ष्य एवं प्रेक्षण के आधार पर परिकल्पना को सत्य स्थिति में लाने का प्रयास किया जाता है।

परिकल्पना स्थापना के बाद वास्तविक प्रदत्त संग्रह किया जाता है। सांख्यिकी सिद्धांत के द्वारा परिकल्पना एवं प्रदत्त संग्रह की जाँच और निष्कर्ष प्राप्त करने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। प्राप्त किये गये निष्कर्षों को परखने के लिए उसे दोषमुक्त बनाने का प्रयास किया जाता है। निष्कर्षों का सफल पुनरीक्षण करके उसका अनुप्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 9.
सहभागी प्रेक्षण तथा असहभागी प्रेक्षण में मौलिक अंतर बतायें।
उत्तर:
सहभागी प्रेक्षण तथा असहभागी प्रेक्षण मुख्य दो प्रकार के प्रेक्षण हैं। सहभागी प्रेक्षण वैसे प्रेक्षण को कहा जाता है जिसमें अध्ययनकर्ता प्रयोज्यों द्वारा किए जा रहे व्यवहारों या क्रियाओं को करने में हाथ बंटाते हुए उनका प्रेक्षण करता है। परंतु, असहभागी प्रेक्षण इससे भिन्न होता है, क्योंकि इसमें अध्ययनकर्ता प्रयोज्यों द्वारा किए जा रहे व्यवहारों में बिना हाथ बटाएँ ही उनका निरीक्षण करता है।

प्रश्न 10.
मनोविज्ञान के प्रयोगों में कारण-परिणाम संबंध से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रयोगों में स्वतंत्र चर तथा आश्रित चर में उस विशेष संबंध को कारण-परिणाम संबंध कहा जाता है जिसमें स्वतंत्र चर में किए गए जोड़-तोड़ (कारण) से आश्रित चर में कुछ स्पष्ट परिवर्तन (परिणाम) होता है। मनोवैज्ञानिक प्रयोगों का उद्देश्य इस तरह के संबंध की सत्यता की जाँच करना होता है।

प्रश्न 11.
प्रकृतिवादी प्रेक्षण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रकृतिवादी प्रेक्षण वैसे प्रेक्षण को कहा जाता है जिसमें अध्ययनकर्ता प्राणियों जैसे पशुओं, पक्षियों तथा अन्य इसी तरह के विशेष प्राणी के व्यवहारों का अध्ययन उनके स्वाभाविक स्थानों (Natural settings) जिनमें वे रहते हैं, पर जाकर करता है।

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प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण के उद्देश्य की पूर्ति किन दशाओं में संभव होता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न मानवीय विशेषताओं (बुद्धि, अतिक्षमता, व्यक्तिगत रुचि, अभिवृत्ति, मूल्य शैक्षिक उपलब्धि आदि) के सही मूल्यांकन हेतु विभिन्न परीक्षणों का निर्माण करता है जिसका उपयोग वांछित उद्देश्यों (कार्मिक चयन, प्रशिक्षण, निर्देशन, निदान, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य) को पूरा करने में लगाने का प्रयास करता है।

परोक्षण को अर्थद्वन्द्व से बचाना, समय सीमा के बंधन को तोड़ना, मानवीकृत एवं वस्तुनिष्ठ उपकरणों का प्रयोग करना आदि परीक्षण की सफलता के मूल तत्व हैं। परीक्षण के उद्देश्यों के अनुकूल शब्दावली, पर्यावरणीय दशाओं का होना आवश्यक होता है। प्रतिक्रियादाताओं की प्रतिक्रियाओं की गणना की विधि का भी उल्लेख किया जाना वांछनीय होता है। अनुसंधान के सभी एकांशों की विशेषताओं का सही उपयोग परीक्षण की कामयाबी के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 13.
प्रयोगात्मक विधि से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि एक ऐसी विधि होती है जिसमें स्वतंत्र चर (Independent variable) तथा आश्रित चर (Dependent variable) के बीच कारण-परिणाम संबंध (Cause effect relationship) का एक नियंत्रित परिस्थिति (Controlled situation) में अध्ययन किया जाता है। स्वतंत्र चर से तात्पर्य वैसे चर से होता है जिसमें जोड़-तोड़ (Manipulation) किए जाने का दूसरे चर पर पड़नेवाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। आश्रित चर वैसे चर को कहा जाता है जिस पर स्वतंत्र चर का प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 14.
वैयक्तिक साक्षात्कार से क्या समझते हैं इसके प्रकार का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
वैयक्तिक साक्षात्कार उसे कहते हैं जिसमें 2 व्यक्ति आमने-सामने बैठे होते हैं। इनमें एक साक्षात्कारकर्ता होता है तथा दूसरा साक्षात्कारी होते हैं इसमें 2 प्रकार होते हैं –

  1. संरचित साक्षात्कार – इसमें प्रश्नों को स्पष्ट रूप से अनुसूची में एक क्रम लिखा जाता है।
  2. असरंचित साक्षात्कार – इसमें साक्षात्कारकर्ता को प्रश्नों के पूछे जाने के क्रम में परिवर्तन की स्वतंत्र रहती है।

प्रश्न 15.
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान में नैतिकता के सिद्धांत को स्पष्ट करें।
उत्तर:
नैतिकता के सिद्धांत निम्न है –

  1. स्वैच्छिक सहभागिता – मनोवैज्ञानिक अध्ययन में जिस व्यक्ति का अध्ययन किया उनकी स्वैच्छिक सहभागिता होनी चाहिए।
  2. प्रदत्त की गोपनीयता – प्रतिभागियों से प्राप्त सूचना की गोपनीयता बनाए रखना चाहिए।
  3. अध्ययन – परिणाम में भागीदारी अध्ययन से प्राप्त परिणाम की सूचना प्रयोज्य को देना चाहिए।
  4. तटस्थता एवं ईमानदारी – अध्ययनकर्ता को अध्ययन से प्राप्त परिणाम के प्रति तटस्थ एवं ईमानदार होना चाहिए।
  5. स्पष्टीकरण – अध्ययन समाप्त हो जाने के बाद प्रतिभागियों को वे सब सूचना देनी चाहिए, जिससे वे अनुसंधान को ठीक से समझ सकें।

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प्रश्न 16.
स्वतंत्र चर तथा आश्रित चर के अंतर को एक उदाहरण से समझायें।
उत्तर:
स्वतंत्र चर वैसे चर को कहा जाता है जिसमें प्रयोगकर्ता जोड़-तोड़ (Manipulation) करके उसके पड़नेवाले प्रभाव का अन्य चर पर अध्ययन करता है। आश्रित चर वैसे चर को कहा जाता है जिस पर स्वतंत्र चर में किए गए जोड़-तोड़ का प्रभाव पड़ता है तथा साथ-ही-साथ जिसके बारे में प्रयोगकर्ता प्रयोग करके भविष्यवाणी करना चाहता है।

जैसे-मान लिया जाए कि प्रयोगकर्ता पुरस्कार का सीखने पर पड़नेवाले प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एक प्रयोज्य को कुछ विशेष सामग्री विशेष इनाम की घोषणा के साथ यदि करने के लिए देता है और फिर वही सामग्री दूसरे प्रयोज्य को बिना किसी के इनाम की घोषणा के बाद करने के लिए देता है। यदि पहला प्रयोज्य दूसरे प्रयोज्य की तुलना में जल्द सामग्री को सीख लेता है तो यहाँ स्पष्टतः कहा जाएगा कि पुरस्कार से सीखने पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इस उदाहरण में सीखना आश्रित चर तथा पुरस्कार स्वतंत्र चर का उदाहरण है।

प्रश्न 17.
प्रयोगात्मक विधि तथा प्रेक्षण विधि में अचर बतलायें।
उत्तर”
समाज मनोविज्ञन में प्रयोगात्मक विधि तथा प्रेक्षण विधि दोनों का उपयोग होता है। फिर भी, इन दोनों में कुछ अंतर हैं जो निम्नांकित है –

  1. प्रयोगात्मक विधि में परिस्थिति हमेशा कृत्रिम (artificial) होती है जबकि प्रेक्षण विधि में परिस्थिति कृत्रिम न होकर स्वाभाविक (natural) होती है।
  2. प्रयोगात्मक विधि में स्वतंत्र चर को जोड़-तोड़ (manipulation) किया जाता है जबकि प्रेक्षण विधि में स्वतंत्र चर में वैसा प्रत्यक्ष जोड़-तोड़ नहीं किया जाता है।
  3. प्रयोगात्मक विधि में कारण-परिणाम संबंध (Cause-effect relation) स्थापित करना संभव है, परंतु प्रेक्षण विधि में इस तरह का संबंध सामान्यतः स्थापित नहीं हो पाता है।
  4. प्रयोगात्मक विधि की विश्वसनीयता तथा वैधता (validity) प्रेक्षण विधि की विश्वसनीयता तथा वैधता से अधिक होती है।

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प्रश्न 18.
नियंत्रित चर से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रयोगों में यह विशेष रूप से प्रेक्षण किया जाता है कि स्वतंत्र चर में किए गए जोड़-तोड़ से आश्रित चर किस तरह से प्रभावित होता है। इसके अलावा प्रयोगकर्ता कुछ ऐसे चरों, जो स्वतंत्र चर के समान होते हैं तथा जिनसे आश्रित चर प्रभावित हो सकते हैं, के प्रभाव को नियंत्रित करके रखता है। ऐसे चरों को नियंत्रित चर कहा जाता है।

प्रश्न 19.
निरीक्षण विधि के गुणों का वर्णन करें।
उत्तर:
निरीक्षण विधि के निम्नलिखित गुण हैं –
(क) यह विधि बच्चों की क्रियाओं का वस्तुनिष्ठ एवं अवैयक्तिक अध्ययन करती है। अध्ययन पूर्वाग्रहमुक्त एवं निष्पक्ष होता है।
(ख) इस विधि द्वारा स्वाभाविक अध्ययन होता है। सामूहिक व्यवहार का अध्ययन संभव है।
(ग) इस विधि द्वारा एक साथ अनेकानेक बच्चों का अध्ययन संभव होता है। बहरे, गूंगे, पागल, पशु-पक्षी सबके व्यवहार का अध्ययन संभव है।
(घ) इस विधि में उपकरणों एवं यंत्रों की सहायता ली जाती है।
(ङ) इस विधि में अध्ययन को दुहराया जाता है और उसकी विश्वसनीयता की जांच की जाती है।
(च) इस विधि द्वारा प्राप्त सामग्री का निरूपण संभव है। चूँकि सामग्रियाँ परिमाण में मिलती हैं, अत: उनकी सांख्यिकीय व्याख्या संभव है। निष्कर्ष की वैधता एवं विश्वसनीयता की जाँच हो सकती है।

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प्रश्न 20.
साक्षात्कार विधि के गुणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
साक्षात्कार विधि के गुण निम्नांकित हैं –
(क) इस विधि का पहला गुण यह है कि इस विधि द्वारा बच्चों की मनोवृत्तियों एवं जीवन-मूल्यों को समझने में सहायता मिलती है।
(ख) यह सामान्य, असामान्य, असमंजित (maladjusted) बच्चों के अध्ययन में उपयोगी है।
(ग) इस विधि का तीसरा गुण यह है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों (data) की सत्यता एवं प्रतिपन्नता अधिक है।
(घ) स्वतंत्र साक्षात्कार में बच्चे खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ करते हैं। इसका नैदानिक महत्व (clinical value) ज्यादा है।
(ङ) जिन बच्चों में भाषा-विकास हुआ रहता है वे प्रश्नों के उत्तर लिखकर अथवा बोलकर सफल ढंग से दे पाते हैं। यह भी इस विधि की विशेषता है।
(च) समालापक (interviewer) साक्षात्कार के समय अपना निष्पक्ष अध्ययन करता है और पूर्वधारणा का असर नहीं होने देता, अतः सूचनाएँ पूर्वधारणा मुक्त होती हैं।
(छ) इस विधि का यह भी गुण है कि समालापक प्रशिक्षित होते हैं, अतः बच्चों की प्रतिक्रियाएँ अच्छी तरह अंकित कर लेते हैं।
(ज) इस विधि की यह विशेषता है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकी निरूपण (statistical treatment) संभव है।

प्रश्न 21.
साक्षात्कार विधि के दोषों का विवेचन करें।
उत्तर:
साक्षात्कार विधि के निम्नलिखित दोष हैं –
(क) इस विधि का पहला दोष यह है कि यह विधि एक खास उम्र के बच्चों के अध्ययन तक ही सीमित है, क्योंकि साक्षात्कार के लिए भाषा का ज्ञान जरूरी है।
(ख) साक्षात्कार विधि में प्रतिक्रियाओं का अवरोधन (resistance) हानिकारक है। यह इस विधि का अवगुण है।
(ग) इस विधि में यह भी दोष है कि प्रशिक्षित समालापक भी कभी-कभी अपने अध्ययन में अपनी पूर्वधारणा की छाप छोड़ देते हैं जिससे अध्ययन दोषपूर्ण हो जाता है।
(घ) इसका चौथा दोष यह है कि गूंगे (dumb) और बहरे (deaf) बच्चों की मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में असफल है।
(ङ) यह विधि पूर्वपाठशालीय बालक के अध्ययन में भी असफल है।

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प्रश्न 22.
प्रश्नावली विधि के गुणों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रश्नावली विधि के गुण इस प्रकार हैं –

  1. इस विधि का पहला गुण है कि यह विधि वस्तुनिष्ठ है। इससे प्राप्त प्रदत्त वस्तुनिष्ठ होते हैं।
  2. इसका दूसरा गुण यह है कि वैसे बच्चे जिनकी भाषा विकसित होती है वे खुलकर स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बातों को अध्ययनकर्ता के सामने रख देते हैं।
  3. इस विधि की तीसरी विशेषता यह है कि इससे असामान्य, असमंजित एवं समस्याजन्य सभी प्रकार के बच्चों का अध्ययन संभव है।
  4. इसकी चौथी विशेषता यह है कि इस विधि द्वारा सामूहिक रूप से बच्चों का अध्ययन संभव है जिससे समय और पैसे की बचत होती है।
  5. इसकी पाँचवीं विशेषता यह है कि इससे प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकीय विश्लेषण संभव है।

प्रश्न 23.
प्रश्नावली विधि के दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
इस विधि में निम्नांकित दोष हैं –

  1. यह मात्र उन्हीं बच्चों पर लागू हो सकती है जिन्हें भाषा एवं प्रत्यय का ज्ञान हो। अतः यह विधि सीमित है।
  2. इसका दूसरा दोष यह है कि इस विधि द्वारा गूंगे एवं बहरे बच्चे का अध्ययन संभव नहीं है।
  3. इस विधि में तीसरा दोष यह है कि बच्चे प्रश्नों के उत्तर देने में अवरोध (resistance) दिखाते हैं।
  4. पाँचवाँ दोष यह है कि अध्ययनकर्ता अपनी पूर्वधारणा की छाप अध्ययन पर छोड़ देते हैं जिससे निष्कर्ष सही नहीं आता।

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प्रश्न 24.
विकासात्मक मनोविज्ञान की अध्ययन विधि के रूप में निरीक्षण विधि के दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
इस विधि के निम्नांकित दोष हैं –
(क) वस्तुगत अध्ययन के बावजूद अध्ययन से प्राप्त सामग्रियों में निरीक्षणकर्ता की पूर्वधारणा तथा उसके वैयक्तिक दृष्टिकोण का समावेश हो जाता है। अतः निष्कर्ष की सत्यता एवं विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। यह एक महत्वपूर्ण आरोप इस विधि के खिलाफ है।

(ख) इस विधि का यह दोष भी है कि एक प्रकार के व्यवहासर के आधार पर संबंधित ‘मानसिक क्रियाओं का आकलन संभव नहीं है। जैसे बच्चों के संवेग में होनेवाली शारीरिक क्रियाओं के आधार पर हम निश्चित रूप से संवेग की जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। बच्चों के कन्दन की क्रिया में कौन-सा संवेग है, यह पता लगाना कठिन है।

प्रश्न 25.
प्रयोगात्मक विधि के गुणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि की समीक्षा करने पर हम देखते हैं कि इस विधि में यद्यपि काफी बियाँ हैं, तथापि यह दोषमुक्त नहीं कही जा सकती। इस विधि की निम्नांकित खूबियाँ हैं –

  1. इस विधि का पहला गुण यह है कि यह विधि सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन क्रमबद्ध एवं नियंत्रित वातावरण में करता है। यह वैज्ञानिक विधि है।
  2. इस विधि द्वारा प्राप्त प्रदत्त (data) वस्तुनिष्ठ एवं पूर्वधारणामुक्त होता है।
  3. समस्या से संबंधित प्रयोग को निष्कर्ष की जाँच के लिए दुहराया जा सकता है। एक या अनेक शोधकर्ता प्रयोग को दुहरा सकते हैं।
  4. इसकी यह भी खूबी है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकीय निरूपण संभव है। प्रदत्तों की विश्वसनीयता एवं प्रतिपन्नता की जाँच हो सकती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रयोगविधि की परिभाषा दें एवं इनके गुण दोषों को लिखें।
उत्तर:
प्रयोग का अर्थ ऐसे प्रेक्षण से है जो नियंत्रित परिस्थिति में किया जाता है। किसी परिकल्पना की सत्यता को प्रमाणित करने के उद्देश्य से जो प्रेक्षण नियंत्रित परिस्थिति में किया जाता है उसे प्रयोग कहते हैं। यह मनोविज्ञान की आधुनिक विधि है। चैपलिन के शब्दों में-“प्रयोग प्रेक्षणों” की एक श्रृंखला है जो एक परिकल्पना की जाँच के उद्देश्यों से नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाता है।” चैपलिन ने प्रयोगात्मक विधि की परिभाषा इस प्रकार दी है –
“प्रयोगात्मक विधि वह प्रविधि है जिसके द्वारा प्रयोग के आधार पर सूचनाओं की खोज की जाती है।” प्रयोगात्मक विधि में प्रयुक्त आवश्यक अंग –

  1. प्रयोगकर्ता
  2. प्रयोज्य
  3. नियंत्रित प्रयोगशाला
  4. यंत्र – उपकरण विज्ञान प्रयोगों पर आधारित होता है। मनोविज्ञान का आधार भी प्रयोग है।
  5. मनोविज्ञान की प्रयोग विधि दूसरी सभी विधियों से अधिक वैज्ञानिक है। सच तो यह है कि उसी विधि के बल पर मनोविज्ञान विज्ञान होने का दावा करता है। अतः हम यहाँ देखना चाहेंगे कि मनोविज्ञान की प्रयोग-विधि में कौन-कौन से वैज्ञानिक गुण है।

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प्रश्न 2.
सहसंबंधात्मक अनुसंधान के क्रम में सहसंबंध गुणांक का निर्धारण क्यों किया जाता है?
उत्तर:
सहसंबंधात्मक अनुसंधान प्रयोगात्मक विधि से भिन्न होता है, क्योंकि इसमें अध्ययन के समय तथा उपलब्धियों पर किसी भी तरह का प्रभाव डालने की छूट नहीं होती है। पूर्वकथन। की स्पष्टता के लिए दो परिवयों के बीच सम्बन्ध का निर्धारण करना प्रमुख उद्देश्य होता है। चयनित दोनों परिवों में सम्बन्ध की शक्ति एवं दिशा एक गणितीय लब्धांक (सहसम्बन्ध गुणांक) द्वारा प्रस्तुत करने की प्रथा बन चुकी है। सहसंबंध गुणांक का विस्तार + 1.00, 0.2 से – 1.0 तक होता है।

धनात्मक सहसंबंध में जब एक परिवर्त्य का मान बढ़ता है तो दूसरे परिवर्त्य का मान भी बढ़ता है। जैसे, पढ़ने का समय बढ़ाने से छात्र का लब्धांक भी बढ़ जाता है। इस स्थिति में दोनों परित्वों के बीच जितना अधिक साहचर्य होगा वह गुणांक (+1.00) से उतना ही निकट होगा। सामान्य छात्रों के लिए अध्ययन में लागत समय और लब्धांक के लिए सहसंबंध गुणांक सामान्यतया +0.85 मिलता है। ऋणात्मक सहसंबंध में जब एक परिवर्त्य (x) का मान बढ़ता है तो दूसरे परिवर्त्य का मान घटता है। जैसे अध्ययन के लिए समय में होनेवाली वृद्धि से खेलने के समय के मान में कमी आ जाती है।

इस स्थिति में गुणांक विस्तार 0 और – 1.0 के मध्य मिलता है। चयनित दो परिवों के बीच जब कोई सहसंबंध नहीं होता है तो उसे शून्य सहसंबंध कहा जाता है। जैसे-अध्ययन के समय बदलने के प्रभाव के कारण छात्र के पैंट की लम्बाई में कोई अंतर नहीं आता है। इस स्थिति में गुणों का विस्तार – 0.2 अथवा + 0.3 के मध्य मिलता है जबकि नियमत: उसे शून्य होना चाहिए। अतः परिवों के लक्षण, व्यवहार, प्रभाव तथा अनुप्रयोग की दृष्टि से सहसंबंध गुणांक अ अति उपयोगी विधि बनती जा रही है।

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प्रश्न 3.
साक्षात्कार क्या है? इसके कौन-कौन गुण तथा दोष हैं? विवेचना करें।
उत्तर:
इस विधि में साक्षात्कार करनेवाले विशेषज्ञों का एक समूह होता है जिसे साक्षात्कार बोर्ड के नाम से जाना जाता है। जो लोग साक्षात्कार के लिए सामने आते हैं उन्हें समालाप्य (interviewee) कहते हैं। साक्षात्कार आमने-सामने बैठकर होता है। यह विधि सूचनाओं एवं तथ्यों की जानकारी के लिए ‘प्रश्न-उत्तर’ पद्धति को अपनाती है।

इसमें समालाप्य तथा समालापक (interviewer) के बीच आत्मिक संबंध (rapport) करना, सधमालापक का प्रशिक्षित (trained) होना, पूर्वधारणामुक्त होना, पूछे गए प्रश्नों की बनावट एवं भाषा पर ध्यान रखना, समालाप्य को भाषा का ज्ञान होना, उसे मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ होना इत्यादि बातों पर ध्यान रखना जरूरी हो जाता है। साक्षात्कार के मुख्य दो रूप सामने आते हैं –

1. प्रामाणिक साक्षात्कार (Standardized interview):
इसमें प्रश्नों की सूची पहले से तैयार कर ली जाती है। इन प्रश्नों को समालाप्य से क्रमानुसार पूछा जाता है। सभी लोगों के लिए एक ही तरह के प्रश्न होते हैं।

2. स्वतंत्र साक्षात्कार (Free interview):
इसमें समलापक स्वतंत्र रूप से विषय से संबंधित प्रश्नों को पूछते हैं।

गुण (Meritis):
साक्षात्कार विधि के गुण निम्नांकित हैं –
(क) इस विधि का पहला गुण यह है कि इस विधि द्वारा बच्चों की मनोवृत्तियों एवं जीवन-मूल्यों को समझने में सहायता मिलती है।
(ख) यह सामान्य, असामान्य, असमंजित (maladjusted) बच्चों के अध्ययन में उपयोगी है।
(ग) इस विधि का तीसरा गुण यह है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों (data) की सत्यता एवं: प्रतिपन्नता अधिक है।
(घ) स्वतंत्र साक्षात्कार में बच्चे खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ करते हैं। इसका नैदानिक महत्व (clinical value) ज्यादा है।
(ङ) जिन बच्चों में भाषा विकास हुआ रहता है वे प्रश्नों के उत्तर लिखकर अथवा बोलकर सफल ढंग से दे पाते हैं। यह भी इस विधि की विशेषता है।
(च) समालापक साक्षात्कार के समय अपना निष्पक्ष अध्ययन करता है और पूर्वधारणा का असर नहीं होने देता, अत: सूचनाएँ पूर्वधारणामुक्त होती हैं।
(छ) इस विधि का यह भी गुण है कि समालापके प्रशिक्षित होते हैं, अत: बच्चों की प्रतिक्रियाएँ अच्छी तरह अंकित कर लेते हैं।
(ज) इस विधि की यह विशेषता भी है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकीय निरूपण (statistical treatment) संभव है।

दोष (Demerits):
(क) इस विधि का पहला दोष यह है कि यह विधि एक खास उम्र के बच्चों के अध्ययन तक ही सीमित है, क्योंकि साक्षात्कार के लिए भाषा का ज्ञान जरूरी है।
(ख) साक्षात्कार विधि में प्रतिक्रियाओं का अवरोधन (resistance) हानिकारक है। यह भी इस विधि का अवगुण है।
(ग) इस विधि में यह भी दोष है कि प्रशिक्षित समालापक भी कभी-कभी अपने अध्ययन में अपनी पूर्वधारणा की छाप छोड़ देते हैं जिससे अध्ययन दोषपूर्ण हो जाता है।
(घ) इसका चौथा दोष यह है कि यह गूंगे (dumb) और बहरे (deaf) बच्चों की मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में असफल है।
(ङ) यह विधि पूर्वपाठशीय बालकों के अध्ययन में भी असफल है।

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प्रश्न 4.
प्रयोगात्मक विधि या प्रयोगात्मक निरीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं? इसके गुण एवं दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
प्रयोगात्मक या प्रयोगात्मक निरीक्षण विधि बाह्य निरीक्षण विधि का ही एक प्रमुख रूप है। यह प्रयोग विधि भी एक प्रकार का निरीक्षण है। इस विधि का प्रयोग बच्चों के अध्ययन के लिए नियंत्रित वातावरण (controlled condition) में होता है। अध्ययन पूर्वयोजनानुसार क्रमबद्ध होता है। यह निरीक्षण प्रयोग पर आधारित है। इस विधि द्वारा अध्ययन के क्रम में मनोवैज्ञानिक उपकरणों एवं यंत्रों की सहायता ली जाती है। इस विधि में प्रयोगात्मक परिस्थिति का निर्माण किया जाता है जो नियंत्रित होती है। बच्चों के व्यवहार-संबंधी समस्या पर प्रयोग किए जाते हैं।

जैसे-बाल-मनोविज्ञान के अंतर्गत यह समस्या है कि विटामिन A बच्चों की आँखों की रोशनी को प्रभावित करता है या नहीं, तो ऐसी स्थिति में हम समान उम्र के बच्चों को दो समूहों में बाँटकर एक समूह को विटामिन A देते हैं और दूसरे को नियंत्रित रखते हैं। यहाँ प्रयोगात्मक समूह के बच्चों की आँख की रोशनी की नियंत्रित समूह के बच्चों की आँख की रोशनी से तुलना करते हैं। यदि अंतर आता है तो हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि विटामिन A से आँख की रोशनी बढ़ती है। Gesell के अनुसार नियंत्रित निरीक्षण ही प्रयोग विधि है।

बाल –
मनोविज्ञान के अध्ययन में प्रयोगात्मक निरीक्षण के अंतर्गत कई प्रविधियों (tech niques) का इस्तेमाल किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं –

  1. फोटोग्राफिक डोम तकनीक (photographic dome technique)
  2. वन-वे स्क्रीन विधि (one-way screen technique)
  3. सिनेमाटोग्राफिक तकनीक (cinematographic technique)
  4. प्रयोगात्मक भवन (experimental cabinet)

1. फोटोग्राफिक डोम तकनीक:
इस प्रविधि द्वारा बच्चों के व्यवहारों का चित्र लिया जाता है। Gesell ने इस विधि द्वारा बच्चों की प्रतिक्षेप की क्रियाओं (reflex actions) का अध्ययन किया है।

2. वन-वे स्क्रीन विधि:
इस प्रविधि द्वारा पर्दे की ओट से बच्चों के व्यवहारों का निरीक्षण किया जाता है। यहाँ भी स्वाभाविक निरीक्षण संभव हो पाता है। इस प्रविधि को निरीक्षण के लिए Gesell ने भी अपनाया था।

3. सिनेमाटोग्राफिक तकनीक:
बच्चों की स्वाभाविक क्रियाओं का अध्ययन चलचित्रों के माध्यम से किया जाता है। खासकर, संवेग एवं सामाजिक प्रतिक्रियाओं में यह कारगर प्रविधि है।

4. प्रयोगात्मक भवन:
इसके द्वारा बच्चों को कमरे में रखकर लगातार बच्चों के व्यवहारों का निरीक्षण काफी समय तक किया जाता है। Ohio State University में इस प्रविधि का इस्तेमाल शुरू हुआ। उपर्युक्त प्रविधियाँ स्वतंत्र रूप से कारगर हैं और सम्मिलित रूप से भी। अतः ये एक-दूसरे के पूरक हैं।

गुण (Merits):
इसके गुण या विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
(क) इस विधि का यह गुण है कि इस विधि से प्रदत्त (data) पूर्वधारणामुक्त, निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ (objective) होता है।
(ख) इस विधि द्वारा अध्ययन की जाँच के लिए प्रयोग को दुहराया जा सकता है और प्रदत्तों की सत्यता की जाँच की जा सकती है।
(ग) इस विधि द्वारा प्रदत्तों की सांख्यिकीय निरूपण (statistical analysis) संभव है। इसके द्वारा परिणाम की सत्यता एवं प्रतिपन्नता (reliability and validity) जाँची जा सकती है।
(घ) इस विधि द्वारा मानव व्यवहार का अध्ययन योजनानुसार क्रमबद्ध ढंग से नियंत्रित वातावरण में किया जाता है। वस्तुगत अध्ययन के कारण प्रदत्त में एकत्र होते हैं।

दोष (Demerits):
इस विधि में निम्नलिखित कमियाँ हैं –
(क) यह विधि बच्चों की सभी मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में असफल है। जैसे-अचेतन की क्रियाएँ।
(ख) यह विधि नियंत्रित वातावरण में सभी प्रकार की मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों को उत्पन्न नहीं कर सकती। जैसे-भीड़-व्यवहार, सामाजिक तनाव, क्रांति इत्यादि।
(ग) यह विधि इसलिए भी दोषपूर्ण है कि नियंत्रित वातावरण में स्वाभाविक प्रतिक्रिया संभव नहीं है।
(घ) यह विधि सीमित भी है, क्योंकि सभी तरह के प्रयोग सभी प्रकार के प्राणियों पर प्रयोगशाला के नियंत्रित वातावरण में संभव नहीं है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

प्रश्न 5.
वस्तुनिष्ठ निरीक्षण विधि क्या है? इसके गुण एवं दोषों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रेक्षण या निरीक्षण विधि (Observation method) –
मनोविज्ञान की एक प्रमुख विधि है। जब वाटसन (Watson) ने पहली बार यह कहा कि मनोविज्ञान चेतन अनुभूति का विज्ञान नहीं है बल्कि व्यवहार के अध्ययन का विज्ञान है, तब उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मनोविज्ञान की विषय-वस्तु अर्थात् व्यवहार के अध्ययन करने की सबसे उत्तम विधि वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण (Objective observation) है। वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण वह विधि है जिसमें प्राणियों के व्यवहारों का अध्ययन किसी विशेष परिस्थिति में किया जाता है।

व्यवहार से तात्पर्य प्राणी की उन सभी क्रियाओं से होता है जो उद्दीपन (Stimulus) के प्रभावों के फलस्वरूप वह करता है। व्यवहार बाह्य (Extermal) तथा आंतरिक दोनों तरह के हो सकते हैं। रोना, दौड़ना आदि बाह्य व्यवहार के तथा साँस की गति में परिवर्तन, रक्तचाप में परिवर्तन आदि आंतरिक व्यवहार के उदाहरण हैं। जब कोई निरीक्षक या प्रेक्षक प्राणी के व्यवहारों का निरीक्षण किसी भी परिस्थिति में करके एकसमान निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, तब ऐसे निरीक्षण को वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण या निरीक्षण (Objective observation) कहा जाता है।

मनोवैज्ञानिकों द्वारा वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण को निम्नांकित तीन प्रमुख भागों में बाँटा गया है –

(a) सहभागी प्रेक्षण (Participant observation):
इस प्रेक्षण में प्रेक्षक घटना या व्यवहार को करने में स्वयं हाथ भी बँटाता है तथा उसका प्रेक्षण द्वारा अध्ययन भी करता है।

(b) असहभागी प्रेक्षण (Non-participant observation):
इस तरह के प्रेक्षण में प्रेक्षक घटना या व्यवहार का मात्र निरीक्षण करता है, उसके करने में हाथ नहीं बँटाता है।

(c) प्रकृतिवादी प्रेक्षण (Naturalistic observation):
इस विधि में प्राणी के व्यवहारों का अध्ययन उनकी स्वाभाविक परिस्थिति जैसे बंदरों, चिड़ियों, मधुमक्खियों के व्यवहारों का उनके स्वाभाविक रहने के स्थानों में प्रेक्षण किया जाता है।

गुण (Merits):
(a) वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण विधि में वस्तुनिष्ठता (Objectivity) अधिक होती है। फलतः इससे प्राप्त निष्कर्ष अधिक विश्वसनीय होते हैं। जैसे-किसी व्यक्ति को जोर-जोर से बोलते, आँख लाल किए तथा उसके नथुने फड़कते देखते हैं, तो इस प्रेक्षण के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि व्यक्ति क्रोधित है।

(b) इस विधि का प्रयोग बच्चे, प्रौढ़, पशु-पक्षी, असामान्य व्यक्तियों आदि सभी पर किया जा सकता है। अतः इस विधि ने अंतर्निरीक्षण विधि की तुलना में निश्चित रूप से मनोविज्ञान के कार्यक्षेत्र (Scope) को विस्तृत कर दिया है।

(c) इस विधि द्वारा एक समय में एक से अधिक व्यक्तियों के व्यवहारों का प्रेक्षण आसानी से किया जा सकता है। समूह, भीड़ व्यवहार आदि का अध्ययन जो अंतर्निरीक्षण विधि से संभव नहीं है, इस विधि द्वारा आसानी से किया जा सकता है।

(d) इस विधि द्वारा किसी व्यवहार से प्राप्त तथ्यों की सांख्यिकीय व्याख्या किया जाना संभव है। सांख्यिकीय व्याख्या करने से मनोविज्ञान का स्वरूप अधिक वस्तुनिष्ठ तथा वैज्ञानिक हो जाता है।

दोष:
(a) इस विधि में प्राणी के व्यवहारों का प्रेक्षण करके उसकी मानसिक स्थिति का पता लगाया जाता है। मानसिक स्थिति के बारे में इस तरह का अनुमान लगाना हमेशा सही नहीं हो पाता है। जैसे-खुशी और दुख दोनों ही अवस्थाओं में व्यक्ति की आँख में आँसू निकल आते हैं। इस प्रकार, व्यक्ति की आँसू को देखकर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि व्यक्ति में हर्ष की मानसिक स्थिति है या विवाद की।

(b) इस विधि का अन्य दोष यह है कि प्रेक्षक तथा उसकी व्याख्या करते समय पूर्वधारणा या पूर्वाग्रह तथा अपने अन्य निजी अनुभवों द्वारा काफी प्रभावित हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है प्राप्त निष्कर्ष गलत एवं अविश्वसनीय हो जाते हैं।

(c) सामान्यतः प्रेक्षक (Observer) परिस्थिति में स्वयं उपस्थित होकर ही व्यवहारों का प्रेक्षण तथा व्याख्या करता है। ऐसा देखा गया है कि परिस्थिति में प्रेक्षक की उपस्थिति से व्यक्तियों के वास्तविक व्यवहार में कुछ कृत्रिमता या विकृति आ जाती है जिससे किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना संभव नहीं हो पाता है। इस दोष को दूर करने के लिए प्रेक्षक प्रायः अपनी पहचान छिपा लेते हैं या एक-तरफा पर्दा (One-way screen) का उपयोग करते हैं।

(d) कभी-कभी देखा गया है कि प्रेक्षक इस विधि द्वारा पागलों, पशुओं, बच्चों आदि के व्यवहारों का प्रेक्षण अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण से करते हैं जिसके कारण इनके संबंध में प्राप्त परिणाम विश्वसनीय एवं वैध (Valid) नहीं हो पाते हैं। जैसे-यदि प्रेक्षक बच्चों के व्यवहारों का प्रेक्षण को दोषपूर्ण होना ही है और प्राप्त निष्कर्ष को अयथार्थ होना ही है। वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण विधि के गुण-दोषों पर विचार करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह विधि मनोविज्ञान के लिए काफी उपयोगी है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

प्रश्न 6.
प्रश्नावली विधि के गुण तथा दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
G. Stanlet Hall ने सर्वप्रथम इस विधि का निर्माण विकासात्मक मनोविज्ञान के अध्ययन के लिए किया। इस विधि में बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं की जानकारी के लिए प्रश्न बनाए जाते हैं। प्रश्नों द्वारा बच्चों के व्यवहार-संबंधी उत्तर अंकित किए जाते हैं। इस विधि का प्रयोग कम उम्र के बच्चों के अध्ययन में नहीं हो पाता है, क्योंकि प्रश्नों के उत्तर के लिए भाषा विकसित होना चाहिए।

प्रतिमाओं के अध्ययन में Galton ने इस विधि को अपनाया। वैसे, बच्चों की मनोवृत्ति एवं जीवन-मूल्यों के अध्ययन में यह विधि सफल रही है। ऊपर के विवेचन से यह स्पष्ट है कि इस विधि में प्रश्नों की भूमिका महत्वपूर्ण है। यहाँ हमें इस बात पर विचार करना होगा कि प्रश्नों की सूची कैसी होती है, प्रश्न किस स्वरूप के होते हैं। प्रश्नों के बारे में विचार करने पर पाया गया है कि प्रश्न मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –

1. संरचित प्रश्न-इस प्रकार की प्रश्नावली में बच्चों के व्यवहार:
संबंधी बातों की जानकारी से संबंधित प्रश्न होते हैं, जो पहले से ही तैयार कर लिए जाते हैं। बच्चों से प्रश्न पूछा जाता है और उत्तर अंकित किए जाते हैं। इस प्रश्नावली को उन्हीं बच्चों से पूछा जाता है जिन्हें भाषा एवं प्रत्यय की समझ होती है।

2. असंरचित प्रश्न:
इस प्रश्नावली का निर्माण पहले से नहीं होता है, बल्कि अध्ययन के समय व्यवहार-संबंधी प्रश्न पूछे जाते हैं। बच्चे स्वतंत्र होकर उत्तर देते हैं। इस संबंध में एक और बात ध्यान देने योग्य है कि अध्ययन के क्रम में प्रश्नों के उत्तर को सीमित रखा जाए अथवा असीमित। अर्थात्, बच्चे कुछ उत्तरों में से एक उत्तर चुनें अथवा स्वतंत्रतापूर्वक अपनी इच्छानुसार उत्तर दें। इस संदर्भ में भी दो प्रकार के उत्तर-उन्मुखं प्रश्नावली का व्यवहार होता है –

  • प्रतिबंधित प्रश्नावली – इसमें बच्चे लिखित उत्तरों में किसी एक के बारे में हाँ, ना, सहमत, असहमत इत्यादि कहकर उत्तर देते हैं।
  • अप्रतिबंधित प्रश्नावली – इसमें बच्चे स्वतंत्र होकर प्रश्नों के उत्तर देते हैं। बच्चे अपनी मनोवृत्ति, शिक्षा, मनोभावों, मनोवेगों एवं विचारों को खुलकर उत्तर के रूप में व्यक्त कर पाते हैं।

गुण (Merits):
प्रश्नावली विधि के गुण इस प्रकार हैं –

  1. इस विधि का पहला गुण यह है कि यह विधि वस्तुनिष्ठ है। इससे प्राप्त प्रदत्त वस्तुनिष्ठ होते हैं।
  2. इसका दूसरा गुण यह है कि वैसे बच्चे जिनकी भाषा विकसित होती है वे खुलकर स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बातों को अध्ययनकर्ता के सामने रख देते हैं।
  3. इस विधि की तीसरी विशेषता यह है कि इससे असामान्य, असमंजित एवं समस्याजन्य सभी प्रकार के बच्चों का अध्ययन संभव है।
  4. इसकी चौथी विशेषता यह है कि इस विधि द्वारा सामूहिक रूप से बच्चों का अध्ययन संभव है जिससे समय और अर्थ की बचत होती है।
  5. इसकी पाँचवी विशेषता यह है कि इससे प्राप्त प्रदत्तों (data) का सांख्यिकीय विश्लेषण (statistical analysis) संभव है।

दोष (Demerits):
इस विधि में निम्नांकित दोष हैं –

  1. यह मात्र उन्हीं बच्चों पर लागू हो सकती है जिन्हें भाषा एवं प्रत्यय का ज्ञान हो। अतः यह विधि सीमित है।
  2. इसका दूसरा दोष यह है कि इस विधि द्वारा गूंगे एवं बहरे बच्चे का अध्ययन संभव नहीं है।
  3. इस विधि में तीसरा दोष यह है कि बच्चे प्रश्नों के उत्तर देने में अवरोध (resistance) दिखाते हैं।
  4. चौथा दोष यह है कि कभी-कभी प्रश्नों का चुनाव सही नहीं हो पाता है। प्रश्न अस्पष्ट एवं कठिन होते हैं। अतः बच्चे सही-सही उत्तर नहीं दे पाते।
  5. पाँचवाँ दोष यह है कि अध्ययनकर्ता अपनी पूर्वधारण की छाप-अध्ययन पर छोड़ देते हैं जिससे निष्कर्ष सही नहीं आता।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समस्या पहचान के बाद शोधकर्ता समस्या का एक काल्पनिक उत्तर ढूँढता है उसे कहा जाता है:
(a) कल्पना
(b) परिकल्पना
(c) चर
(d) प्रयोग
उत्तर:
(b) परिकल्पना

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प्रश्न 2.
मनोविश्लेषण की नींव किसने डाली
(a) फ्रायड
(b) उण्ट
(c) टिचनर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) टिचनर

प्रश्न 3.
संरचनावादी सिद्धांत की स्थापना हुई?
(a) 1880 ई. में
(b) 1890 ई. में
(c) 1896 ई. में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 1896 ई. में

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य : परिभाषा एवं संबंध

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य: परिभाषा एवं संबंध Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य : परिभाषा एवं संबंध

Bihar Board Class 11 Home Science आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य : परिभाषा एवं संबंध Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जब किसी खाद्य-पदार्थ में कुछ अतिरिक्त पोषण तत्त्व मिलाए जाते हैं तो उसे कहते -[B.M.2009A]
(क) सम्मिश्रण
(ख) खमीरीकरण
(ग) अंकुरण
(घ) फॉरटीकिकेशन
उत्तर:
(घ) फॉरटीकिकेशन

प्रश्न 2.
आहार नष्ट होने के मुख्य कारण इनमें से कौन-सा है ? [B.M.2009A]
(क) बैक्टीरिया
(ख) वातावरण
(ग) खुला रखना
(घ) जल
उत्तर:
(क) बैक्टीरिया

प्रश्न 3.
‘अन्नत भवति भूतानी’ धार्मिक ग्रंथ का कथन है –
(क) रामायण
(ख) महाभारत
(ग) गीता
(घ) पुराण
उत्तर:
(ग) गीता

प्रश्न 4.
एना बोलिक और कैटाबोटिक के सम्मिलित रूप को कहते है –
(क) Metabolism
(ख) Catabolism
(ग) Ribolism
(घ) Cynololism
उत्तर:
(क) Metabolism

प्रश्न 5.
विटामिन ‘A’ ‘ए’ की कमी से होता है –
(क) मोटापापन
(ख) दुबला
(ग) अंधापन
(घ) सुखापन
उत्तर:
(ग) अंधापन

प्रश्न 6.
रिकेट्स होता है – [B.M.2009A]
(क) विटामिन A की कमी से
(ख) विटामिन B की कमी से
(ग) विटामिन C की कमी से
(घ) विटामिन D की कमी से
उत्तर:
(ग) विटामिन C की कमी से

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प्रश्न 7.
WHO के अनुसार स्वास्थ्य के पक्ष है –
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(घ) चार

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य (Health) की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य से तात्पर्य शरीर की विशेष प्रकार की स्थिति या दशा से है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) के अनुसार स्वास्थ्य की परिभाषा इस प्रकार है: “स्वास्थ्य व्यक्ति विशेष की पूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक निरोगता की स्थिति है, केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं।”

प्रश्न 2.
भोजन से आपका क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
भोजन (Food): शब्दकोष के अनुसार भोजन वह चीज है जिससे शरीर का पालन-पोषण होता है। भोजन को इस तरह से परिभाषित किया जा सकता है “कोई भी ऐसा पदार्थ (ठोस या तरल) जिसके खाने से शरीर में कार्य करने की शक्ति आती है, उसकी क्षतिपूर्ति और वृद्धि होती है तथा मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है, भोजन कहलाता है।”

प्रश्न 3.
संतुलित भोजन की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
संतुलित भोजन (Balance diet): भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (Indian Council for Medical Research) के अनुसार “संतुलित आहार वह आहार है जिसमें सभी पोषक तत्त्व उतनी मात्रा तथा अनुपात में हों जिनसे ऊर्जा, अमीनो एसिड, विटामिन्स, खनिज लवण, वसा, कार्बोहाइड्रेट तथा अन्य तत्त्वों की आवश्यकता शरीर की जैविक क्रियाओं तथा स्वास्थ्य को संतुलित बनाए रखने के लिए सही अनुपात में मिल जाए तथा साथ ही पोषक तत्त्वों का बहुत बड़ा-सा भाग शरीर में एकत्रित हो सके जिससे कि भूखा रहने पर शरीर को कुछ समय तक चलाया जा सके।”

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प्रश्न 4.
पोषण (Nutrition) को परिभाषित करें।
उत्तर:
पोषण वह क्रिया है जिसके द्वारा ग्रहण किया गया भोजन शरीर में सूक्ष्म इकाई में परिवर्तित होता है व उपयोगी बनकर इसके द्वारा सम्पादित कार्य कर सकता है। सरल भाषा में शरीर में कार्य करता हुआ भोजन पोषण कहलाता है।

प्रश्न 5.
रोग (Disease) को परिभाषित करें।
उत्तर:
रोग शरीर की वह स्थिति है जब मनुष्य शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप से पूर्णतया स्वस्थ नहीं होता । उसकी सामान्य शारीरिक, मानसिक या सामाजिक कार्यक्षमता में विकार उत्पन्न हो जाता है। ये विकार सूक्ष्म जीवाणुओं के प्रवेश से असामान्य, मानसिक, भावनात्मक या सामाजिक परिस्थितियों के उत्पन्न होने से हो सकते हैं।

प्रश्न 6.
पोषण (Nutrition) तत्त्व क्या हैं ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
भोज्य पदार्थों के वे छोटे-छोटे रासायनिक घटक जो शरीर के कार्यों को सम्पादित . करते हैं, पोषक तत्त्व कहलाते हैं। ये संख्या में छः होते हैं-कार्बोज, वसा, प्रोटीन, खनिज लवण, विटामिन व जल जो शरीर को क्रियाशील बनाते हैं।

प्रश्न 7.
पोषण स्तर (Nutrition status) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
पोषण स्तर-“भोजन द्वारा प्राप्त पौष्टिक तत्त्वों से शरीर का निर्माण करने की दशा को पोषण स्तर कहते हैं।”

प्रश्न 8.
कैलोरी (Calorie) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
भोजन द्वारा शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती है जो शरीर के कार्यों को करने के लिए आवश्यक होती है। इस ऊर्जा को मापने की इकाई को कैलोरी कहते हैं।

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प्रश्न 9.
गरीबी रेखा (Poverty line) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
“गरीबी रेखा वह काल्पनिक रेखा है जो मनुष्य की कैलोरी की कम से कम आवश्यकता को दर्शाती है।

प्रश्न 10.
WHO के अनुसार उत्तम स्वास्थ्य की क्या परिभाषा है ?
उत्तर:
WHO के अनुसार, शरीर में केवल रोग का ही नहीं होना अच्छा स्वास्थ्य नहीं हैं बल्कि शरीर की ऐसी स्थिति जिसमें मनुष्य के शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप से पूर्णतया संतुष्ट होने को उत्तम स्वास्थ्य कहते हैं।

प्रश्न 11.
पोषण कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर:
पोषण चार प्रकार का होता है –

  • अल्प पोषण
  • संतुलित पोषण
  • अत्यधिक पोषण
  • असंतुलन।

प्रश्न 12.
मोहन को हमेशा आलू के चिप्स खाने की आदत है। उन दो स्रोतों के नाम बताइए, जहाँ से उसने यह आदत ग्रहण की होगी?
उत्तर:

  • मित्र समूह (Peer Group)।
  • विज्ञापन-टी.बी., रेडियो व अखबार से (Media)।
  • घर में बड़े और भाई-बहन से (Adults/Siblings in the family) ।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य के आयाम (Dimensions of Health) कौन-से हैं ?
उत्तर:
स्वास्थ्य के आयाम-एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य के चार पक्ष हैं शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व आध्यात्मिक । इन चारों को स्वास्थ्य का आयाम कहा जाता है।

प्रश्न 2.
भोजन को पोषकों के आधार पर किस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है ?
उत्तर:
भोजन को पोषकों के आधार पर निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है(क) पोषक तत्त्वों के आधार पर (Based on Nutrients)। (ख) कार्यात्मक आधार पर (Based on their functions)।

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प्रश्न 3.
सुपोषण (Good Nutrition) और कुपोषण (Mal Natritions) में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सुपोषण-जब भोजन द्वारा मनुष्य को अपनी आवश्यकतानुसार सभी पोषक तत्त्व उचित मात्रा में मिलते हैं तो इस स्थिति को सुपोषण अथवा उत्तम पोषण की स्थिति कहते हैं। उत्तम पोषण द्वारा ही व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य ग्रहण करता है। कुपोषण-कुपोषण का शाब्दिक अर्थ है “अव्यवस्थित पोषण”। जब मनुष्य को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा में सभी पौष्टिक तत्त्व नहीं मिलते या आवश्यकता से अधिक मिलते हैं तो उसे कुपोषण कहते हैं। कुपोषण के कारण मनुष्य के शरीर की वृद्धि, विकास एवं कार्यशीलता पर कुप्रभाव पड़ता है। गन्दा वातावरण, संक्रमण आदि कुपोषण की स्थिति को और उग्र कर देते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आहार संरक्षण से आप क्या समझते हैं ? इनके सिद्धान्तों का वर्णन करें। [B.M.2009A]
उत्तर:
आहार संरक्षण का अर्थ होता है भोजन को इस ढंग से पकाना या ऐसे वातावरण में रखना, जिससे भोजन के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करके, एक निश्चित समय तक अंतर्गत खाद्य पदार्थ को लंबे समय तक रोग वाहक जीवाणुओं व रासायनिक पदार्थों के प्रभाव से मुक्त . रखा जाता है । साथ ही उनका रंग, रचना, स्वाद, सुगंध व पोषक मूल्य को भी बनाए रखा जाता है।

आहार संरक्षण के सिद्धान्त (Principles of food-preseravation): आहार संरक्षण के मूल सिद्धान्त निम्नलिखित होते हैं
(a) जीवाणु से भोजन खराब होने की क्रिया को रोक कर या कम करके (To prevent or delay decomposition by microbes): आहार संरक्षण के द्वारा भोजन खराब होने की क्रिया को निम्नलिखित विधियों के द्वारा रोका या कम किया जाता है।

  • जीवाणुओं को भोजन से बाहर रखना (Keeping the micro oraganism out of food product): भोजन को पोलिथिन के लिफाफे, सेलोफिन पेपर, एल्यूमिनियम फायल, वायुरहित डिब्बा इत्यादि में पैक करके जीवाणुओं से सुरक्षित किया जाता है।
  • जीवाणुओं को भोज्य पदार्थ से हटाकर (Removel of micro organism from product): इस विधि में बैक्टोरिया प्रूफ फिल्टर से छानकर संरक्षण किया जाता है पानी, फलो का जूस, बियर, शराब इस विधि से संरक्षित किए जाते हैं ।
  • जीवाणुओं की क्रियाशीलता एवं वृद्धि को रोककर (By hindening the growth and activity of micro oraganism): इसके लिए भोजन को सुखाकर, नमक-तेल या सिरका का प्रयोग करके भोजन को संरक्षित किया जाता है।

(b) जीवाणुओं को नष्ट करना (By killing the micro organisms): इसमें जीवाणुओं को उच्च ताप में नष्ट करके लम्बी अवधि तक संरक्षित किया जाता है इसके लिए निम्नलिखित उपाय होते हैं।

  1. भोजन को पकाना
  2. पास्चुरीकरण
  3. किरणन
  4. स्टेरीलाइजेशन
  5. टीमबंदी
  6. बोतल.बंदी
  7. फलों का मुरब्बा, जैम, जैली बनाना इत्यादि।

(c) भोजन को स्वयं दृषित होने से बचाना (To prevent food from self decomposition): भोजन को ब्लाचिंग प्रक्रिया द्वारा नमक के घोल या हल्के ताप के प्रभाव से उसमें होने वाले एंजाईम के प्रभाव को रोका जाता है।

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(d) खाद्य पदार्थों को कीड़े से बचाना (To save from insects pests etc): इसके लिए भोज्य पदार्थ को अच्छी तरह से पैक करके संग्रहित किया जाता है।
इस प्रकार से विभिन्न विधियों के द्वारा भोजन को संरक्षित किया जाता है और उसके पोषक मूल्य एवं स्वाद को बनाए रखा जाता है। उचित विधि से भोज्य पदार्थों को संरक्षित एवं संग्रहित करने से वह महीनों सुरक्षित रह सकते हैं।

प्रश्न 2.
पोषण की विभिन्न स्थितियों से आपका क्या अभिप्राय है ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पोषण की स्थिति की परिभाषा (Definition of Nutritional Status): प्रत्येक जीवित प्राणी भोजन ग्रहण करता है और पोषण प्रक्रिया द्वारा उसका शरीर में उपयोग करता है, जिससे उसके शरीर का निर्माण व विकास होता है। अतः पोषण की स्थिति उस व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति से सम्बन्धित है और इसका अनुमान व्यक्ति के शरीर भार, डील-डौलं, आकार आदि से लगाया जा सकता है।

पोषण की दो स्थितियाँ होती हैं –
1. सुपोषण
2. कुपोषण

1. सपोषण (Good Nutrition): जब भोजन द्वारा मनुष्य को अपनी आवश्यकतानुसार सभी पोषक तत्त्व उचित मात्रा में मिलते हैं तो इस स्थिति को सुपोषण अथवा उत्तम पोषण की स्थिति कहते हैं। उत्तम पोषण द्वारा ही व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य ग्रहण करता है।
उत्तम पोषित व्यक्ति के निम्नलिखित लक्षण हैं (Characteristics of Good Nutrition) :

  • व्यक्ति का शरीर भार, आकार व अनुपात सामान्य होता है।
  • व्यक्ति की मांसपेशियाँ पूर्ण रूप से विकसित, सुदृढ़ व सुगठित होती हैं।
  • व्यक्ति के बाल चिकने, चमकीले व स्वस्थ होते हैं।
  • व्यक्ति की आँखें स्वस्थ, आशावान व चमकीली होती हैं।
  • व्यक्ति के दांत व अस्थियाँ मजबूत व स्वस्थ होती हैं।
  • व्यक्ति की त्वचा व श्लेष्मिक झिल्ली पूर्ण रूप से स्वस्थ व कान्तिमान होती है।
  • व्यक्ति का आसन (Posture) स्वस्थ, सिर तना हुआ, सीना उठा हुआ, कन्धे सपाट व पेट अन्दर होता है।
  • व्यक्ति की भूख अच्छी व पाचन संस्थान सामान्य रूप से कार्य करता है।
  • व्यक्ति सदैव प्रसन्नचित्त व खुश रहता है।
  • व्यक्ति को गहरी, बिना टूटने वाली स्वप्नरहित नींद आती है।
  • व्यक्ति में रोग प्रतिरोधक क्षमता पर्याप्त होती है।
  • व्यक्ति किसी भी कार्य को उत्साहपूर्वक व एकाग्रचित्त होकर कर सकता है।

2. कुपोषण (Mal Nutrition): कुपोषण का शाब्दिक अर्थ है-अव्यवस्थित पोषण’। जब मनुष्य को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा में सभी पौष्टिक तत्त्व नहीं मिलते या आवश्यकता से अधिक मिलते हैं तो उसे कुपोषण कहते हैं। कुपोषण के कारण मनुष्य के शरीर की वृद्धि, विकास एवं कार्यशीलता पर कुप्रभाव पड़ता है। गन्दा वातावरण, संक्रमण आदि कुपोषण की स्थिति को और उग्र कर देते हैं।
इसके तीन लक्षण हैं –

  • अत्यधिक पोषण
  • अपर्याप्त पोषण
  • असन्तुलन।

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1. अत्यधिक पोषण (Under nutrition): जब मनुष्य को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा से कम पौष्टिक तत्त्व मिलते हैं तो उसे अपर्याप्त पोषण कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप शरीर की अपेक्षित वृद्धि और विकास नहीं हो पाता और पौष्टिक तत्त्वों की हीनता-जनित रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

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2. अपर्याप्त पोषण (Over nutrition): जब मनुष्य को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा से अधिक पौष्टिक तत्त्व मिले तो उसे अत्यधिक पोषण कहते हैं। कुछ विशेष पौष्टिक तत्त्वों की अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है, जैसे विटामिन ए, विटामिन डी, लोहा आदि। इनके अतिरिक्त मोटापा भी अत्यधिक पोषण के परिणामस्वरूप होता है। अत्यधिक पोषण सम्पन्न वर्गों के लोगों में अधिक पाया जाता है और कई बार भयंकर रूप ले लेता है।

3. असन्तुलन (Imbalance): जब मनुष्य में विभिन्न पौष्टिक तत्त्वों की मात्रा सन्तुलित नहीं होती तो इस असन्तुलन के कारण भी स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2.
भोजन, पोषण तथा स्वास्थ्य का आपसी सम्बन्ध क्या है ? समझाइए।
उत्तर:
भोजन, पोषण तथा स्वास्थ्य का. आपसी सम्बन्ध (Relationship between food, nutrition and health): भोजन, पोषण तथा स्वास्थ्य की निम्न परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि. इनका आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजामल पी० देवदास (Rajamal P. Devdas) के अनुसार “पोषण.ऐसी अवस्था है जो सर्वोत्तम स्वास्थ्य को विकसित करे।” यद्यपि स्वास्थ्य और पोषण समानार्थक नहीं हैं तथापि अच्छे पोषण के अभाव में स्वस्थ रहना असम्भव है।

भोजन स्वयं पोषण का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। अत: व्यक्ति जो भोजन करता है तथा जिस प्रकार करता है, पोषण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के तौर पर भोजन और पोषण में परिवर्तन करके विभिन्न रोगों की रोकथाम की जा सकती है, जीवन आयु में वृद्धि की जा सकती है। सक्रिय और प्रभावी जीवन के लिए तथा विकसित शरीर के लिए उत्तम पोषण अति आवश्यक है जो भोजन से प्राप्त किया जा सकता है।

भोजन, पोषण और स्वास्थ्य का सम्बन्ध नीचे चित्र द्वारा समझाया गया है –
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य परिभाषा एवं संबंध

प्रश्न 4.
गरीबी रेखा का निर्धारण किस आधार पर किया जाता है ? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
गरीबी रेखा निर्धारण का आधार: पोषण स्तर एवं ऊर्जा खपत (Nutritional status and calorie intake as a basis of poverty line): किसी भी देश की गरीबी रेखा का निर्धारण उस देश के वासियों के औसत ऊर्जा खपत व पोषण स्तर द्वारा किया जाता है। खुराक सर्वेक्षण प्रायः घर-घर जाकर किए जाते हैं तथा इन सर्वेक्षणों द्वारा परिवार की भोजन की खपत, सदस्यों की संख्या, स्वरूप तथा आय के विषय में सूचना एकत्रित की जाती है। समस्त देश में इस प्रकार के विस्तृत सर्वेक्षण किए जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य : परिभाषा एवं संबंध

देश के विभिन्न क्षेत्रों के आहार-संघटन पर उपलब्ध आंकड़ों द्वारा स्पष्ट है कि भारत में परिवारों का आहार मुख्यतः खाद्यान्न आधारित है। अधिकांश भारतीयों के आहार में खाद्यान्न का एक बहुत बड़ा भाग होता है। विशेषकर निम्नतर सामाजिक आर्थिक वर्गों के परिवारों के आहार में खाद्यान्नों का बहुतायत होता है। यही कारण है कि निम्नतर सामाजिक-आर्थिक वगों के परिवारों का पोषण स्तर उत्तम नहीं है और उनका आहार मात्रा व गुणात्मक रूप से अपर्याप्त है।

इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि जीवन शक्ति की कमी और कमजोरी होने पर भी मनुष्य अपर्याप्त खुराक का आदी बन जाता है और इस बात का अनुमान ही नहीं होता कि वह आवश्यकता से कम भोजन ले रहा है क्योंकि मानव शरीर में अपने को स्थिति के अनुकूल बना लेने की विलक्षण क्षमता है। – स्पष्ट है कि देश की औसत ऊर्जा खपत तथा देशवासियों के पोषण स्तर के आधार पर ही गरीबी रेखा का निर्धारण किया जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 9 जनसंख्या शिक्षा

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 9 जनसंख्या शिक्षा Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 9 जनसंख्या शिक्षासमस्याएँ

Bihar Board Class 11 Home Science जनसंख्या शिक्षा Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आज भारतवर्ष में कितनी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे है। [B.M.2009A]
(क) 20%
(ख) 40%
(ग) 15%
(घ) 50% से अधिक
उत्तर:
(घ) 50% से अधिक

प्रश्न 2.
‘गरीबी रेखा’ इनमें से किस पर आधारित है। [B.M.2009A]
(क) कल्पित रेखा
(ख) कम-से-कम कैलोरीज पर
(ग) सामाजिक एवं सांस्कृतिक मतभेद
(घ) आर्थिक स्थिति
उत्तर:
(ख) कम-से-कम कैलोरीज पर

प्रश्न 3.
भारत में लड़कियों की संख्या घटने का मुख्य कारण [B.M.2009A]
(क) दहेज प्रथा
(ख) पुत्र की लालसा
(ग) गरीबी
(घ) सोच में कमी
उत्तर:
(क) दहेज प्रथा

प्रश्न 4.
12 वर्ष की लड़कियों की पोषणिक आवश्यकता क्या है ? [B.M. 2009A]
(क) 1970 कैलोरी
(ख) 2200 कैलोरी
(ग) 1800 कैलोरी
(घ) 2026 कैलोरी
उत्तर;
(घ) 2026 कैलोरी

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प्रश्न 5.
जनसंख्या विस्फोट का मुख्य कारण [B.M.2009A]
(क) धन
(ख) पुत्र की कामना
(ग) कम आयु में विवाह
(घ) ज्ञान का अभाव
उत्तर:
(ग) कम आयु में विवाह

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जनसंख्या विस्फोट (Population Explosion) क्या है ?
उत्तर:
जनसंख्या एक गतिशील तथ्य है। इसके आकार में किसी भी कमी या वृद्धि का देश के सामाजिक, आर्थिक विकास के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि को ही जनसंख्या विस्फोट कहा जाता है।

प्रश्न 2.
जनसंख्या विस्फोट के मुख्य प्रभाव क्या हैं ?
उत्तर:
जनसंख्या विस्फोट की अर्थव्यवस्था और उपलब्ध संसाधनों पर गंभीर प्रतिक्रिया होता है।

प्रश्न 3.
जनसंख्या विस्फोट की क्या समस्याएँ हैं ?
उत्तर:

  • भोजन की कमी।
  • स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ।
  • आश्रय और पीने के पानी की समस्या।
  • परिवहन व संचार की समस्याएँ।
  • अपर्याप्त कपड़ा और चिकित्सा सुविधाएँ।
  • आम बेरोजगारी और शोषण।

प्रश्न 4.
भारत में जनसंख्या विस्फोट (Population Explosion in India) का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर:
भारत में जनसंख्या विस्फोट का प्रमुख कारण जनसंख्या की अधिक वृद्धि दर है।

प्रश्न 5.
हमारे देश में पुत्र प्राप्ति की तीव्र इच्छा (Desire for male child) किस मान्यता पर निर्भर है ?
उत्तर:
हमारे देश में पुत्र प्राप्ति की तीव्र इच्छा इस मान्यता पर आधारित है कि पुत्र वंश चलाता है और मृत्योपरांत आत्मा की मुक्ति के लिए क्रिया-कर्म करता है।

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प्रश्न 6.
जनसंख्या-शिक्षा (Population Education) का तात्पर्य समझाएँ।
उत्तर:
जनसंख्या शिक्षा वह कार्यक्रम है जिसमें परिवार, जाति, देश तथा विश्व की जनसंख्या की स्थिति का अध्ययन किया जाता है ताकि विद्यार्थी वर्ग में मूलाधार व उत्तरदायी रुख पैदा किया जा सके जो इस स्थिति से निपट सके।

प्रश्न 7.
सन् 1947 में देश की जनसंख्या (Population) कितनी थी?
उत्तर:
सन् 1947 में जब भारतवर्ष स्वतंत्र हुआ तो देश की जनसंख्या लगभग 34 करोड़ थी।

प्रश्न 8.
जनसंख्या नियंत्रित (Population control) करने में छोटे परिवार (small family) की क्या भूमिका है ?
उत्तर;
जनसंख्या को रोकने का एक उपाय है सीमित अथवा छोटा परिवार । छोटे परिवार का लाभ केवल देश को ही नहीं वरन् स्वयं को भी है। छोटा परिवार अपनी सभी आवश्यकताओं को भाँति-भाँति पूरी करने में समर्थ होता है, इस कारण बच्चे स्वस्थ व परिपोषित होते हैं। शिक्षित हो सकते हैं तथा बड़े होकर छोटे परिवार को अपना सकते हैं। अतः परिवार फिर सीमित रहते हैं और जनसंख्या नियंत्रित हो सकती है।

प्रश्न 9.
जनसंख्या आधिक्य (Over population) के प्रमुख कारण क्या हैं ?
उत्तर:
हमारे रीति-रिवाज, पुत्र की अभिलाषा, निरक्षरता व अज्ञानता, गरीबी व बेरोजगारी आदि जनसंख्या आधिक्य के प्रमुख कारण हैं।

प्रश्न 10.
जनसंख्या नियंत्रण (Population control) देश के लिए किस प्रकार हितकारी है ?
उत्तर:
जनसंख्या नियंत्रण द्वारा देश में अधिक उत्पादन, प्रति व्यक्ति अधिक आय, उच्च जीवन स्तर, कम बेरोजगारी, कम सामाजिक तनाव, बेहतरीन नागरिक सुविधाएँ व स्वस्थ वातावरण तथा उच्च आर्थिक स्तर सम्भव है।

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प्रश्न 11.
अत्यधिक शिशु मृत्युदर को कम करने के सुझाव दीजिए।
उत्तर:
अच्छा भोजन (Good Food), सही समय पर टीकाकरण (Immunization at proper time), माता की सही देखभाल (Proper care of Mother), साफ-सुथरी सुविधाओं को बेहतर करना (Improving sanitary conditions), जनसंख्या नियंत्रण (Population Control)।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अत्यधिक जनसंख्या का क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
अत्यधिक जनसंख्या का प्रभाव (Effect of over population): मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो परस्पर एक-दूसरे से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से संबंधित है। अपने

जीवन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए उसकी मूलभूत आवश्यकताओं में भरपेट भोजन, रहने के लिए मकान, तन ढकने के लिए कपड़े, स्वच्छ वायु तथा शुद्ध जल आदि सम्मिलित हैं। इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति तभी संभव है, जब मनुष्यों की संख्या सीमित हो। अतः जैसे-जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ती जाती है वैसे-वैसे सभी मनुष्यों की आवश्यकताएँ पूरी नहीं होती हैं।
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आज हमारी आवश्यकताओं की मांग के अनुपात में पूर्ति बहुत कम है। हर वर्ष बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की व्यवस्था करना आसान काम नहीं है। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं से हुई प्रगति के बाद भी आवश्यकताओं की मात्रा हर समय बढ़ती जा रही है। फलस्वरूप देश में भोजन, वस्त्र, आवास, जलापूर्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, बेरोजगारी, गरीबी आदि की अनेक समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। आज यदि हम गहराई से विचार करें तो वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, भूमि-प्रदूषण, खाद्य एवं पेय पदार्थों का प्रदूषण, नैतिक-प्रदूषण आदि बढ़ती जनसंख्या के कारण हैं।

प्रश्न 2.
अधिक जनसंख्या द्वारा उत्पन्न समस्याएँ कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर:
अधिक जनसंख्या द्वारा उत्पन्न समस्याएँ (Problems arising due to overpopulation)-भारत में जनसंख्या की वृद्धि से कई समस्याएँ खड़ी हो गई हैं जिनका दबाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। ये निम्नलिखित हैं –

  1. भूमि पर जनसंख्या का बढ़ता दबाव।
  2. प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय में मूल्यों की अपेक्षा कम वृद्धि।
  3. खाद्य पदार्थों की घटती आपूर्ति।
  4. घटती पूँजी निर्माण क्षमता।
  5. समाज पर दबाव अर्थात् अनुत्पादक उपभोक्ताओं का बढ़ता भार।
  6. बेरोजगारी।
  7. जल आपूर्ति और स्वच्छ वातावरण सम्बन्धी समस्याएँ।
  8. स्वास्थ्य-सम्बन्धी समस्याएँ।
  9. शिक्षा की समस्याएँ।

प्रश्न 3.
जनसंख्या-शिक्षा (Population Education) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जनसंख्या शिक्षा की परिभाषा:
चन्द्रशेखर (1970): “जनसंख्या-शिक्षा जनसंख्या वृद्धि के विभिन्न आयामों आर्थिक, सामाजिक तथा सांख्यिकीय जनसंख्या वितरण, जीवन-स्तर से सम्बद्ध तथा कल्याणकारी राज्य अर्थव्यवस्था में इसके आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में अन्तिम परिणामों के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान करती है।”

यूनेस्को (UNESCO, 1978): “जनसंख्या शिक्षा एक शैक्षिक कार्यक्रम है जो परिवार, समूह, राष्ट्र, विश्व की जनसंख्या स्थिति के संदर्भ में विद्यार्थियों में आदर्श एवं जिम्मेदारी पूर्ण अभिवृत्ति तथा व्यवहार विकसित करती है।” प्रोफेसर वाडिया तथा मर्जेंट कहते हैं, “कोई भी जिसने भारत में जनसंख्या समस्या के इतिहास का अध्ययन सजग होकर उसके विभिन्न सोपानों में किया है, इस कथन से पृथक् अपनी . राय नहीं रख सकता कि भारत में भूमि और उसकी उत्पादन क्षमता की अपेक्षा लोगों की संख्या बहुत अधिक है।

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परिणामस्वरूप भारतीय मानव-शक्ति का विशाल भाग अर्ध-पोषित, रोगी, निरक्षर और अकुशल रह जाता है। यहाँ तक कि हिन्दू सभ्यता के पुरातन आदर्श, सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए भी कोई आवश्यक रूप से इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि भारत में आज भी वर्तमान औद्योगिक कुशलता की अवस्था में जनसंख्या का आकार उस आकार के दुगुने से भी ज्यादा है जिसे नैतिक एवं राष्ट्रीय विकास के अवसर सामान्य मात्रा में उपलब्ध हो सकते हैं।”

प्रश्न 4.
पुत्र की इच्छा जनसंख्या वृद्धि का कारण क्यों है ?
उत्तर:
पुत्र की इच्छा (Desire for male child): भारत में जनसंख्या वृद्धि का एक कारण पुत्र की इच्छा के वशीभूत होकर बार-बार गर्भाधारण तथा शिशु जन्म भी है। यह भारतीय समाज के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण कारण बन जाता है। प्रत्येक परिवार यदि पुत्र के लोभ में दो भी अतिरिक्त बच्चों को उत्पन्न करता है तो इस हिसाब से बढ़ने वाली जनसंख्या का अनुमान स्वतः ही लग जाता है।

पारिवारिक जीवन में पुत्र प्राप्ति की स्थिति का विचार करते समय यह जान लेना आवश्यक है कि हिन्दू शास्त्रकारों द्वारा पुत्र की प्राप्ति को वैवाहिक जीवन के एक प्रमुख ध्येय के ही रूप में देखा गया है। शास्त्रों में बताया गया है कि पुत्र से ही मृतक पूर्वजों की आत्माओं का उद्धार होता है और उसके अभाव में उन्हें नरक में ही रहना पड़ता है। उसे पुत्र इसीलिए कहा गया है क्योंकि वह पूर्वजों को ‘पुम्’ नामक नरक में जाने से बचाता है।

प्रश्न 5.
छोटे परिवार का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
छोटा परिवार (Small family): परिवार के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए ‘छोटा परिवार’ एक बेहतरीन उपाय है क्योंकि परिवार के बढ़ने के साथ-साथ उनकी आवश्यकताओं में भी वृद्धि होती है और यदि आपूर्ति में उसी हिसाब से बढ़ोत्तरी न की जाए तो निश्चित ही प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध होने वाले विभिन्न पदार्थ या साधन कम हो जाते हैं और यही पारिवारिक वातावरण को तनावपूर्ण बना देते हैं, जिसके कारण सभी सदस्यों के व्यक्तिगत विकास में नकारात्मक भूमिका अदा करते हैं।

प्रश्न 6.
परिवार नियोजन (Family planning) के क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
परिवार नियोजन के प्रमुख लाभ संक्षेप में निम्न प्रकार हैं:
1. रहन-सहन के स्तर में सुधार (Improvement in standard of living): परिवार में कम संख्या होने पर प्रति व्यक्ति पर किए जाने वाले व्यय की मात्रा बढ़ जाएगी। इससे परिवार के सदस्यों की अपेक्षाकृत आवश्यकताओं की पूर्ति संभव हो सकेगी। परिणामस्वरूप उनके रहन-सहन का स्तर सुधरेगा।

2.शिशु व मातृ-मृत्यु दर में कमी (Decline in death rate of child or mother): परिवार नियोजन के कारण संतानोत्पत्ति में कमी होगी तथा रहन-सहन का स्तर सुधरने से नवजात शिशु तथा गर्भिणी दोनों को ही भोजन, स्वास्थ्य आदि से सम्बन्धित सुविधाएँ मिल सकेंगी जिससे शिशु तथा मातृ-मृत्यु दर में कमी होगी।

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प्रश्न 7.
हमारे देश में लड़की-शिशु का क्या स्थान है ?
उत्तर:
लड़की-शिशु का स्थान (Status of Girl-child)-कुपोषण की स्थिति के कारण प्रतिवर्ष 120 लाख पैदा होने वाली लड़कियों में से 30 लाख लड़कियाँ 15 वर्ष की आयु तक पहुँचने से पहले ही मर जाती हैं। लगभग 5 लाख लड़कियाँ ठीक तरह न पालन होने के कारण मर जाती हैं। कितनी ही लड़कियाँ जन्म पूर्व ही मार दी जाती हैं। लड़कियाँ गर्भ से ही गिरा दी जाती हैं तथा उस समय नैतिक और चिकित्सकीय महत्त्वों को भी ताक पर रख दिया जाता है। इन सबका परिणाम है, स्त्री-पुरुष के अनुपात में असंतुलन आना। 1901 में 1000 पुरुषों के अनुपात में 972 स्त्रियाँ थीं परन्तु यह अनुपात 2001 में कम होकर 933 हो गया है।

प्रश्न 8.
परिवार नियोजन (Family Planning) से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
परिवार नियोजन (Family Planning): सभी व्यक्तियों के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने की दृष्टि से परिवार नियोजन का अत्यधिक महत्त्व है। निर्धनता, अज्ञानता आदि रहन-सहन के स्तर को प्रभावित करने वाले कारक प्रत्यक्ष रूप से परिवारों की अत्यधिक वृद्धि से सम्बन्धित हैं। आज जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है, उस गति से आय के साधनों में प्रगति नहीं हो पा रही है। प्रो. माल्थस के अनुसार, जनसंख्या गुणात्मक तथा भोज्य-सामग्री योगात्मक गति से बढ़ते हैं।

इस प्रकार बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति सीमित साधनों से नहीं हो सकती। इसलिए रहन-सहन का स्तर और भी नीचे गिरता जाएगा। भारत में निर्धनता और अज्ञानता के कारण जनसंख्या वृद्धि विश्व के उन्नत देशों की अपेक्षा तीव्र गति से बढ़ रही है। परिवार नियोजन का प्रधान उद्देश्य माता के स्वास्थ्य तथा बच्चों की उत्तम देखभाल और लालन-पालन के विचार पर आधारित है। इसमें कई समस्याएँ भी हैं, जैसे-लोगों को इसके प्रति कैसे अभिप्रेरित किया जाए, स्वीकार्य कराया जाए तथा स्वीकार्य, सफल, हानिरहित तथा मितव्ययी तरीकों पर आधारित परामर्श एवं सेवाएँ किस प्रकार उपलब्ध कराई जाएँ आदि।

प्रश्न 9.
पुत्र की लालसा (Desire for son) किस प्रकार जनसंख्या वृद्धि का कारण है ?
उत्तर:
पुत्र की लालसा (Desire for son): भारतीय परिवार में पुत्र प्राप्ति की लालसा या इच्छा बहुत तीव्र होती है। अधिकांश परिवार छोटे परिवार की महत्ता को जानते भी हैं, मानते भी हैं, परन्तु प्रायः सभी दंपत्ति एक पुत्र अवश्य चाहते हैं। मानते हैं कि पुत्र का होना गर्व का विषय माना जाता है। माता-पिता की मृत्यु उपरान्त बेटा ही उनकी आत्माओं को मुक्ति दिला सकता है, क्रियाओं और श्राद्ध कर सकता है, ऐसी धारणा है।

पितृ प्रधान समाज में वही वंश चलाता है। पुत्र से ही मृतक पूर्वजों की आत्माओं का उद्धार होता है और उसके अभाव में नरक में ही पड़े रहना पड़ता है। पुत्र का जन्म उन्हें स्वर्ग में जाने योग्य बनाता है। इस कारण परिवार पुत्र प्राप्ति की चाह में अनगिनत बच्चे पैदा करते चले जाते हैं जो जनसंख्या वृद्धि का एक प्रमुख कारण है।
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प्रश्न 10.
जनसंख्या व्यवस्था (Population Management) से परिवार, उद्योग तथा देश के लिए क्या लाभ है ?
उत्तर:
छोटा परिवार सुखी परिवार (Small Family Happy Family)
परिवार के लिए (for family):

  1. बेहतर आवास
  2. उचित पोषण और बेहतर स्वास्थ्य
  3. अधिक आय

उद्योग के लिए (for Industries) :

  1. कम अनुपस्थिति
  2. अधिक उत्पादन
  3. कम कीमत
  4. अधिक लाभ

देश के लिए (for Country) :

  1. अधिक उत्पादन
  2. अधिक प्रति व्यक्ति आय
  3. उच्च जीवन-स्तर
  4. कम बेरोजगारी
  5. कम सामाजिक तनाव
  6. बेहतर नागरिक सुविधाएँ
  7. स्वस्थ वातावरण।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जन्म-दर को प्रभावित करने वाले कारण लिखें।
उत्तर:
जन्म-दर को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारण हैं:
1. सामाजिक कारण (Social Factors): हमारी मान्यताएँ, रीति-रिवाज, आदर्श आदि जन्मदर ऊँचा रखने में प्रोत्साहन देते हैं। उदाहरण के लिए, हिन्दू सामाजिक जीवन में धर्मशास्त्रों के अनुसार विवाह जीवन का एक अनिवार्य धार्मिक कर्म है। विवाह स्वयं की मुक्ति के लिए तथा पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए आवश्यक है।

विवाह सन्तानोत्पत्ति के लिए है। हमारे यहाँ बाल विवाह की भी प्रथा है जिससे कम आयु में शादी हो जाने पर प्रजनन का समय बढ़ जाता है। हमारे देश में प्रत्येक दम्पत्ति, पुत्र की इच्छा रखता है। वंशबल बढ़ाने, अन्तिम संस्कार करने, श्राद्ध करने तथा मुक्ति प्राप्ति के लिए पुत्र का होना जरूरी है।

2. आर्थिक कारण (Economic Factors): हमारे देश में पिता के पश्चात् पुत्र ही व्यवसाय को आगे बढ़ाता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति पुत्र चाहता है। एक पुत्र की कामना में वह न जाने कितनी लड़कियों को जन्म दे डालता है। गरीब लोग इस आशा से अधिक बच्चे पैदा करते हैं कि वे उनकी आय में वृद्धि करेंगे। वे सोचते हैं कि जो पेट लेकर आता है उसके पास उसे भरने के लिए दो हाथ और दो पैर भी होते हैं। भारत के लगभग 70 प्रतिशत लोग गाँव में रहते हैं तथा 30 प्रतिशत नगरों में रहते हैं। नगरों में गाँवों की अपेक्षा जन्म-दर कम है क्योंकि वे अधिक बच्चों से होने वाली समस्याओं को समझते हैं।

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3. अशिक्षा (Illiteracy): यह बात स्पष्ट है कि स्त्री परतंत्रता एवं स्त्री अशिक्षा ही जनसंख्या वृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए समाज व परिवार में स्त्री का शिक्षित होना आवश्यक है। केवल स्त्रियाँ ही जनसंख्या वृद्धि की गंभीरता को समझकर इस संकट को आगे बढ़ने से रोक सकती हैं। गाँधीजी ने कहा था, एक लड़के को शिक्षा देने से एक व्यक्ति शिक्षित होता है परंतु एक लड़की की शिक्षा से एक परिवार शिक्षित होता है। लड़की की शिक्षा का अर्थ माँ की शिक्षा और उसके बच्चों की शिक्षा होती है।

4. स्त्रियों की सामाजिक स्थिति (Female Status): भारत में स्त्रियों का सर्वत्र सम्मान रहा है। माता, बहन और पुत्री के रूप में नारी का स्वरूप विदित है, परन्तु किन्हीं कारणों से और स्वार्थ से प्रेरित होकर पुरुष ने सदैव उसे अपने से हीन माना है। भारत में प्राचीन काल से ही नारी जाति की दशा सुधारने के प्रयत्न होते रहे हैं। वैदिक काल में बाल विवाह के प्रचलन ने उसकी शिक्षा में बाधा उत्पन्न कर दी।

वह धार्मिक संस्कारों में भाग नहीं ले सकती थी। उसका प्रमुख कर्त्तव्य पति की आज्ञा का पालन करना था। वह परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी। बचपन में माता-पिता के आधिपत्य में, युवावस्था में अपने पति के तथा वृद्धावस्था में अपने पुत्र के संरक्षण में रहना पड़ता है। भारत की स्वतंत्रता के उपरांत स्त्रियों की उन्नति के द्वार खुले, उसे व्यक्तिगत संपत्ति का अधिकार, पर्दा-प्रथा से स्वतंत्रता, विधवा-विवाह की छूट और बाल-विवाह से मुक्ति मिली। वर्तमान युग चेतना का युग है।

आज उन्हें वैज्ञानिक, सामाजिक और व्यावसायिक सभी. प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता है। सरकार भी इस ओर जागृत है, उसने स्त्रियों को नि:शुल्क शिक्षा, छात्रवृत्तियाँ, सहशिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा जैसी सुविधाएँ प्रदान की हैं। शिक्षा सुधार से नारी विकास की स्थिति में बहुत ही आशापूर्ण परिणाम पाए गए हैं। अब वह अबला न रहकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने की स्थिति में है। हर क्षेत्र में उसने अपना स्थान प्राप्त करके श्रेष्ठता पायी है।

प्रश्न 2.
छोटे परिवार का क्या महत्त्व है ? विस्तार से लिखें?
उत्तर:
छोटे परिवार का महत्त्व (Importance of small family): शिक्षित तथा कामकाजी महिलाओं का परिवार सीमित होता है। इसके कारण हैं बहुत अधिक व्यस्तता, जीवन की गुणवत्ता के महत्त्व की जानकारी, बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, आधुनिक उपचारों का ज्ञान, सभी तरह के बच्चों के मानसिक तथा शारीरिक विकास का पूरा ध्यान देना। इन बातों को मस्तिष्क में रखकर वह एक या दो बच्चे होने पर ही विश्वास रखती है।

बच्चों की सही देखभाल से उनकी मृत्यु दर में कमी रहती है। दो बच्चों की दूरी तथा परिवार नियोजन साधनों का ज्ञान व उपयोग से उनका अपना स्वास्थ्य तो ठीक रहता ही है साथ ही वह सुखी तथा खुशहाल परिवार का निर्माण करने में भी जिम्मेदार होती है। महिलाओं का स्तर भी परिवार की सीमितता का निर्णायक है। कामकाजी महिलाओं के इस पहलू पर विचार करने के लिए सर्वेक्षण करने पर महिलाओं को चार वर्गों में बाँटा जा सकता है

(क) अधिक शिक्षित कामकाजी महिलाएँ।
(ख) अधिक शिक्षित घरेलू महिलाएँ।
(ग) कम शिक्षित कामकाजी महिलाएँ।
(घ) कम शिक्षित घरेलू महिलाएँ।

यह देखा गया है कि अधिक पढ़ी-लिखी कामकाजी महिलाओं का परिवार बहुत सीमित होता है। इसके कारण हैं, देर से विवाह, उच्च शिक्षा स्तर की वजह से अधिक व्यस्तता, परिवार नियोजन के साधन तथा आधुनिक उपचारों का ज्ञान, बच्चों की उत्तम देखभाल से मृत्यु दर में कमी। सभी साधनों की उपलब्धि तथा सुख समृद्धि की वजह से इन परिवारों में तनाव कम होता है। घर में मैत्रीपूर्ण व्यवहार से आपस में सभी सदस्य स्नेह की कड़ी से बंधे रहते हैं।

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इस वातावरण में बच्चे मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं, वे गुणवान तथा अच्छे नागरिक बनते हैं। इसके विपरीत यह देखा गया है कि कम पढ़ी-लिखी तथा निम्न स्तर वाले कार्यों में कार्यरत महिलाओं के बच्चों में मृत्यु-दर अधिक होता है। अधिक जीवित संतान रहे, इस आशा में परिवार बढ़ता रहता है।

प्रश्न 3.
जनसंख्या वृद्धि द्वारा उत्पन्न होने वाली समस्याओं की श्रृंखला का वर्णन करें।
उत्तर:
जनसंख्या वृद्धि द्वारा उत्पन्न होने वाली समस्याओं की श्रृंखला (Chain of problems arise due to population explosion)
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प्रश्न 4.
बालिका की पोषण-सम्बन्धी व शिक्षा-सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्णता पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
हमारे देश में परिवारों में बालिकाओं की स्थिति काफी दयनीय है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की देखभाल अच्छी प्रकार से कदापि नहीं होती। बालिका को उसकी आवश्यकतानुसार पौष्टिक भोजन भी पूरी मात्रा में उपलब्ध नहीं होता। जन्म से पाँच वर्ष तक मरने वाले बच्चों में लड़कियों की संख्या का अधिक होना स्पष्ट करता है कि जन्म के पश्चात् भोजन, स्वास्थ्य सम्बन्धी उनकी जरूरतें पूरी नहीं होती। बालिका की शिक्षा प्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

यदि भेज भी दिया जाए तो पाँचवीं कक्षा से पहले ही उसका विद्यालय से नाम कटवा दिया जाता है। सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में कुल 45 % लड़कियाँ ही पाँचवीं पास कर पाती हैं और केवल 4.24% लड़कियाँ बारहवीं पास कर पाती हैं क्योंकि एक मेधावी बालिका की शिक्षा के लिए भी माता-पिता हतोत्साहन तथा असहयोग की भावना रखते हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि बालिका की पोषण व शिक्षा सम्बन्धी आवश्यकताएँ सरलता से पूरी नहीं हो पातीं।

प्रश्न 5.
जनसंख्या विस्फोट को प्रभावित करने वाले कारक लिखें।
उत्तर:
जनसंख्या विस्फोट को प्रभावित करने वाले कारक (Factors responsible for over-population):
भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकने में निम्नलिखित कारक बाधा डालते हैं –

सामाजिक मूल्य (Social norms): जनसंख्या विस्फोट के लिए उत्तरदायी पहला कारण हमारे अपने समाज के रीति-रिवाज हैं। वे बड़े परिवार को समर्थन देते हैं। छोटी आयु में विवाह तथा लम्बे जनन वर्ष का परिणाम होता है अधिक बच्चे। यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब औसतन भारतीय का विश्वास है कि बच्चे ईश्वर की देन हैं। भारत में कुछ धर्म परिवार नियोजन के विरुद्ध हैं। इस प्रकार सामाजिक मूल्य बड़े परिवार का समर्थन करते हैं।

पुत्र की इच्छा (Desire for male child): आर्थिक स्तर का ध्यान किए बिना हर जाति में पुत्र प्राप्ति की इच्छा प्रबल होती है। पुत्र पाने की आशा में परिवार के सदस्य बढ़ते जाते हैं। लड़का वंश-परिवार के नाम को आगे बढ़ाता है। अधिक लोगों के अनुसार पुत्र न होने से परिवार वहीं समाप्त हो जाता है तथा यह उनको स्वीकार नहीं है। परन्तु, शैक्षिकता बढ़ने से छोटे परिवार को मान्यता दी जाने लगी है और इस प्रकार लिंग-भेद भी कम हो गया है। बहुत से युवा दंपत्ति, लिंग का ध्यान किए बिना, केवल एक या दो स्वस्थ बच्चे ही चाहते हैं।

अज्ञानता और निरक्षरता (Ignorance and Illiteracy): निरक्षरता देश की जनसंख्या रोकने में अवरोधक है तथा रुकावट पैदा करती है। निरक्षर जातियाँ सदियों से यह मानती आई हैं कि बच्चे भगवान के दिए हुए उपहार हैं, इसलिए वह परिवार नियोजन के तरीकों को नहीं मानतीं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 8 किशोरों की कुछ समस्याएँ

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी भी कार्य को सफल होने के लिए क्या आवश्यक है ? [B.M.2009A]
(क) नैतिकता
(ख) अनुशासन
(ग) जानकारी
(घ) भावना
उत्तर:
(ख) अनुशासन

प्रश्न 2.
किशोरावस्था की सामाजिक समस्याओं को भागों में बाँटा गया है –
(क) 2 भागों में
(ख) 4 भागों में
(ग) 6 भागों में
(घ) 8 भागों में
उत्तर:
(ख) 4 भागों में

प्रश्न 3.
किशोर अपराध के कारणों को मुख्यतः वर्गों में बाँटा गया –
(क) 2
(ख) 4
(ग) 6
(घ) 8
उत्तर:
(क) 2

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प्रश्न 4.
“समस्याओं की आयु” कहा जाता है –
(क) बाल्यावस्था
(ख) किशोरावस्था
(ग) युवावस्था
(घ) प्रोढ़ावास्था
उत्तर:
(ख) किशोरावस्था

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अवनतिशील तथा अग्रशील स्मृतिलोप क्या है ?
उत्तर;
अवनतिशील (Retrograde) तथा अग्रशील (Anterograde) स्मृतिलोपअवनतिशील स्मृति लोप का परिणाम भूतकाल की बातें भूलने वाला होता है जबकि अग्रशील का परिणाम. कुछ नया सीखने की अयोग्यता है। दोनों को मिलाकर Global Amnsia होता है, जिससे स्मरण-शक्ति पर अग्रशील प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2.
नशीली दवा क्या होती है ?
उत्तर:
नशीली दवाएँ (Drugs)-दवा एक रासायनिक पदार्थ है। जब इसका दुरुपयोग किया जाता है तब वह शारीरिक क्रियाओं पर प्रभाव डालती है। दुष्प्रभाव डालने वाली दवाएँ नशीली दवाएँ कहलाती हैं।

प्रश्न 3.
किन्हीं दो नशीली दवाओं के नाम बताएँ जिनसे किशोरों को नशे की आदत हो सकती है।
उत्तर:
1. Opium
2. Heroin

प्रश्न 4.
‘किशोर-अपराध’ (Juvenile Delinquency) से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
किसी भी प्रकार के असामाजिक व्यवहार को किशोर-अपराध कहा जा सकता है। किशोर, जो समाज की सुविधाओं का प्रयोग तो करता है किन्तु समाज द्वारा जिस व्यवहार की उससे आशा की जाती है, वह नहीं करता। ऐसे ही किशोर को किशोर-अपराधी कहा जाता है। अतः सामाजिक व्यवहार में असफलता ही ‘किशोर-अपराध’ है।

प्रश्न 5.
उदासीनता (Depression) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जब किशोर जीवन के प्रति नकारात्मक रवैया अपनाता है तो ऐसी स्थिति को उदासीनता कहा जाता है।

प्रश्न 6.
ऐसी दो परिस्थितियों के नाम लिखें जब किशोर दबाव या तनाव (Tension) का अनुभव करते हैं।
उत्तर:
किशोरावस्था में आते ही किशोरों को प्रौढ़ावस्था के उत्तरदायित्व निभाने के लिए तैयार होना पड़ता है। इस कारण बढ़ता हुआ किशोर तनाव में रहने लगता है।

दो परिस्थितियाँ निम्न हैं जब वे तनाव का अनुभव करते हैं –

  • जब उसका आकार आवश्यकता से अधिक बढ़ने लगता है।
  • जब वह अपने माता-पिता की आकांक्षा के अनुरूप शैक्षिक जीवन स्तर पर खरा नहीं उतर पाता।

प्रश्न 7.
किशोरावस्था की सामाजिक समस्याओं को कितने भागों में बाँटा गया है ?
उत्तर:
किशोरावस्था की सामाजिक समस्याओं (Social Problems of Adolescence) को चार वर्गों में बाँटा जा सकता है

  • प्रतिष्ठा की समस्या (Problem of Fame)।
  • स्वतन्त्रता की समस्या (Problem of Independence)।
  • जीवन दर्शन की समस्या (Problem of Philosophy) ।
  • कार्य-सम्बन्धी समस्याएँ (Problem of Profession)।

प्रश्न 8.
बालक को अपराधी कब कहते हैं ?
उत्तर:
जिस बालक के कार्य इतना गंभीर रूप ले लें कि उसे उस कुमार्ग से हटाने के लिए दण्ड देना पड़े ताकि अन्य बालक उससे शिक्षा ग्रहण कर सके। उस बालक को अपराधी कहा जाता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
बाल अपराध कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर:
बाल अपराध के प्रकार (Kinds of Delinquenents)
(क) चुनौती देने वाली बालोपराधिक प्रवृत्तियाँ (Challenging nature of Delinquenents):
किशोरों में इस प्रकार की प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति निम्न रूपों में पायी जाती हैं –

  1. चोरी करना।
  2. झूठ बोलना।
  3. उद्देश्यहीन घूमना।
  4. तंग करना।
  5. लड़ना-झगड़ना।
  6. धूम्रपान करना।
  7. शेखी हांकना।
  8. पलायनशीलता (घर अथवा विद्यालय में)।
  9. दीवार पर लिखना।
  10. स्कूल की चीजें नष्ट करना।

(ख) यौन अपराध (Sex Delinquency): इनको भी दो भागों में बाँटा जा सकता है –

1. भिन्न लिंग अपराध (Different Sex Delinquency):
इसके दो रूप होते हैं –
(क) इच्छा रखने वाले समान अवस्था के सदस्य के साथ।
(ख) इच्छा न रखने वाले छोटी अवस्था के सदस्य के साथ।

2. वे प्रयास अपराध (Same sex Delinquent):
इसके तीन रूप होते हैं –
(क) समलिंग अपराध।
(ख) हस्तमैथुनी।
(ग) निर्लज्ज प्रदर्शन तथा नंगापन।

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प्रश्न 2.
किशोरों में “स्वतंत्रता एवं नियंत्रण” (Independence and Control) की समस्या पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
किशोरावस्था को प्रायः संघर्ष एवं तनाव का काल कहा जाता है क्योंकि किशोरों के सामने कुसमायोजन की अनेक समस्याएँ होती हैं।
किशोरावस्था की एक प्रमुख समस्या है स्वतंत्रता प्राप्त करने की समस्या । जिस कारण कई बार किशोर घर की पाबंदियों के विरुद्ध विद्रोह करते हैं और अपने भाग्य को कोसते हैं।

प्रश्न 3.
‘मानसिक तनाव’ (Mental Tension) या ‘निराशा’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
जब किशोर जीवन के प्रति नकारात्मक रवैया अपनाने लगता है तो इस स्थिति को मानसिक तनाव या निराशा की स्थिति कहते हैं।
मानसिक तनाव, निराशा या उदासीनता के कारण वह अप्रसन्न रहने लगता है, किसी भी काम में दिलचस्पी नहीं लेता, अपने-आपको कोसता है तथा उसके मन में आत्मघाती विचार आने की संभावना भी बढ़ जाती है।

किशोरों में उदासीनता या निराशा आने के दो निम्न कारण हो सकते हैं –
1. जब किशोर-किशोरी अपने महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयत्न करके भी असफल रहते हैं तो मानसिक कुंठा उत्पन्न होती है जो निराशा का कारण है।
2. प्रौढ़ावस्था के उत्तरदायित्व निभाने के लिए जो तैयारी किशोर को करनी पड़ती है, उसका तनाव किशोर के मन पर पड़ता है। वह अपनी पहचान बनाने के लिए चिन्तित रहते हैं और उसके कारण ‘निराशा’ से ग्रस्त हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
शराब के कुप्रभाव क्या हैं ?
उत्तर:
कुप्रभाव (Negative Effects):
इन आदतों का बालकों के तन व मन दोनों पर कुप्रभाव पड़ता है। सांस व हृदय की बीमारियाँ कम आयु में ही घेर लेती हैं। आत्म-विश्वास व आत्म-नियन्त्रण कम हो जाता है। वह अपनी जिम्मेदारी सम्भालने योग्य नहीं रहता । मानसिक व शारीरिक दोनों ही शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। शराब से यकृत (Liver) खराब हो जाता है।

प्रश्न 5.
नशे (Drugs) के कुप्रभाव क्या हैं ?
उत्तर:
नशे से कुछ देर तो व्यक्ति बहुत हल्का महसूस करता है। अपनी परेशानियाँ भूल जाता है पर धीरे-धीरे ये उसके शरीर को खोखला कर देते हैं। नशा न मिलने पर वह भयानक पीड़ा से ग्रस्त होता है व अपनी सुध-बुध खो बैठता है। इसे प्राप्त करने के लिए वह भयंकर से भयंकर अपराध भी कर सकता है। अपने अच्छे-बुरे की उसे पहचान नहीं रहती। इस गलत आदत से छुटकारा भी आसान नहीं है।

प्रश्न 6.
किशोरों में नशे की आदत के क्या कारण हैं ?
उत्तर:
आज की युवा पीढ़ी की एक गम्भीर समस्या नशे की है। किशोरों में प्रायः नशे की आदत निम्न कारणों से लगती है

  1. हीन भावना।
  2. माता-पिता का कठोर अनुशासन।
  3. अनुचित साथी-समूह की संगति व उनका दबाव।
  4. मित्रों व समाज द्वारा किशोरों की शारीरिक, सामाजिक एवं मानसिक आवश्यकताओं को न समझा जाना।
  5. उत्सुकता।
  6. माता-पिता के कटु सम्बन्धों के कारण अनुभव किया गया तनाव व निराशा।

प्रश्न 7.
किशोर अवस्था में सेक्स संबंधी अपराध किस प्रकार विकसित होते हैं ?
उत्तर:
सेक्स सम्बन्धी अपराध (Sex related delinquency): किशोर इस समय सेक्स के बारे में जानने को बहुत उत्सुक होते हैं। उन्हें इस विषय में सही जानकारी माता-पिता या किसी अन्य से नहीं मिल पाती है । वे अपने साथियों या गलत साहित्य पढ़कर यह जानकारी प्राप्त करते हैं । सिनेमा व टी० वी० पर दिखाए गए अश्लील दृश्यों का भी उन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। किशोरियाँ बिन ब्याही माँ बन जाती हैं व गलत लोगों की संगत में वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर हो जाती हैं। लड़के छेड़खानी, बलात्कार आदि करके अपना भविष्य हमेशा के लिए खराब कर बैठते हैं।

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प्रश्न 8.
पारिवारिक सदस्यों द्वारा अपराध रोकने के कौन-कौन से उपाय हैं ?
उत्तर:
पारिवारिक सदस्यों द्वारा अपराध रोकने के उपाय (Ways to control delinquency by the family members) :

  1. सबका व्यवहार बालकों के प्रति उचित होना चाहिए।
  2. बालकों को दुरुपयोग करने के लिए पैसा न दें।
  3. घर में लड़ाई-झगड़े आदि जैसा गंदा वातावरण नहीं होना चाहिए।
  4. घर में परिवार सीमित रखना चाहिए ताकि प्रत्येक बालक को उचित लालन-पालन दिया जा सके।
  5. बालक को बुरी संगति में नहीं जाने देना चाहिए। उन्हें आवश्यकता से अधिक स्वतंत्रता भी नहीं दी जानी चाहिए तथा उनकी उम्र में पड़ सकने वाली बुरी आदतों से सतर्क रहना चाहिए।

प्रश्न 9.
कुसमायोजन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
कुसमायोजन (Maladjustment): किशोर अचानक अपने को अपने साथियों से अलग पाते हैं। उनमें शारीरिक परिवर्तन आने शुरू हो जाते हैं और वे सोचते हैं कि उनके साथी वैसे ही हैं जिससे वे अपने प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पैदा कर लेते हैं और अपने को सबसे दूर कर लेते हैं। अपनी बेचैनी के कारण वे बहुत जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, झगड़ालू प्रवृत्ति के हो जाते हैं। दोस्ती व परिवार दोनों जगह वे समायोजन स्थापित नहीं कर पाते। इससे वे स्वयं व उनके परिवार के सदस्य सभी कठिनाई महसूस करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नशीले पदार्थों से अपनी युवा पीढ़ी को किन साधनों द्वारा बचाया जा सकता है ?
उत्तर:
नशे के भयंकर परिणामों को देखते हुए नशीले पदार्थों से अपनी युवा पीढ़ी को निम्नलिखित साधनों से बचाया जा सकता है।
1. किशोरों के लिए अवकाशकाल के सदुपयोग के लिए आवश्यक साधन जुटाना-किशोरों के पास अत्यधिक ऊर्जा होती है जिसका सही ढंग से प्रयोग करना जरूरी है अन्यथा वह अनेक बुराइयों में फंस सकते हैं। यह परिवार, विद्यालय व समाज का उत्तरदायित्व है कि वह किशोरों के स्वस्थ मनोरंजन के लिए आवश्यक साधन जुटाने का प्रबन्ध करें।

2. जनसाधारण को प्रचार माध्यमों द्वारा नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले कुप्रभावों से अवगत कराना-प्रायः किशोर नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले प्रभावों से अनभिज्ञ होते हैं और उन्हें इनका ज्ञान तभी होता है जब वह इसके प्रभाव में इतना आ जाते हैं कि वह उनकी आवश्यकता बन चुकी होती है। प्रसार माध्यमों, जैसे रेडियो, दूरदर्शन, सिनेमा आदि द्वारा बहुत। ही प्रभावी तरीके से नशीले पदार्थों से होने वाले कुप्रभावों को दर्शाया जा सकता है।

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3. नशाबंदी सम्बन्धी नियमों को लागू करना-सरकार ने नशीले पदार्थों के कुप्रभावों को ध्यान में रखते हुए नशाबन्दी सम्बन्धी कई नियम बनाए हैं जो निम्नलिखित हैं

  • नशे से सम्बन्धित सभी चीजों जैसे सिगरेट, शराब आदि का प्रचार करते समय तथा उनके पैकटों पर चेतावनी लिखना अनिवार्य है कि यह पदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
  • सार्वजनिक स्थानों जैसे होटलों, क्लबों, समारोहों आदि में शराब पीने पर प्रतिबन्ध है। सिनेमाघरों तथा अन्य स्थानों जहाँ पर भीड़ होती है वहाँ धूम्रपान करने की भी मनाही होती है।
  • किशारों को नशीले पदार्थों से बचाने के लिए विद्यालयों, कॉलेजों, छात्रावासों आदि. के निकट इनकी बिक्री पर प्रतिबंध है।
  • नशीली दवाइयों को बेचने वालों, संग्रह करने वालों तथा खरीदने वालों को कड़ा दंड दिया जाता है, जिसमें जमानत नहीं दी जाती है।

परिवार के सदस्यों व समाज को इन नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले किशोरों के साथ सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए तथा यह समझना चाहिए कि यह एक रोग है, जिसका निवारण सम्भव है। इन युवकों को इन नशीले पदार्थों को छोड़ने के लिए प्रेरित करना तथा उसकी सहायता करना आवश्यक है।

कई स्वयंसेवी संस्थाओं एवं सरकारी अस्पतालों में इन किशोरों को दवाइयाँ देकर तथा कड़ी निगरानी में रखकर इस रोग से मुक्ति दिलाई जाती है। किशोरों में नशे की आदत को केवल सरकारी कानूनों से रोकना सम्भव नहीं है। इसके लिए किशोरों के माता-माता, मित्रों, अन्य परिवारजनों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को मिलकर एक आन्दोलन के रूप में नशाबन्दी के लिए कार्य करना चाहिए।

प्रश्न 2.
किशोर-अपराध से आप क्या समझती हैं ? किशोर-अपराध के कारणों को किन वर्गों में बाँटा गया है ?
उत्तर:
किशोर-अपराध (Juvenile Delinquency): किसी भी प्रकार के असामाजिक व्यवहार को किशोर-अपराध कहा जा सकता है। किशोर, जो समाज की सुविधाओं का प्रयोग तो करता है किन्तु समाज द्वारा जिस व्यवहार की उससे आशा की जाती है, वह नहीं करता।

ऐसे ही किशोर को ‘किशोर: अपराधी’ कहा जाता है। अतः सामाजिक व्यवहार में असफलता ही किशोर-अपराध है। उदाहरण के लिए ऐसे किशोरों को भी अपराधी माना जाता है जो घर से भाग कर आवारागर्दी करते हैं, माता-पिता अथवा संरक्षकों की आज्ञा का पालन नहीं करते हैं, गन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं, चरित्रहीन व्यक्तियों के सम्पर्क में रहते हैं, स्कूल से बिना किसी उचित कारण के अनुपस्थित रहते हैं तथा अनैतिक व अनधिकृत क्षेत्रों में घूमते पाए जाते हैं। किशोर-अपराध अनेक जटिल कारणों के फलस्वरूप होता है तथा इसकी रोकथाम इतनी सरल नहीं है।

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किशोर-अपराध के कारणों को मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है –
1. व्यक्तिगत कारण (Individual factors)
2. सामाजिक कारण (Social factors)

1. व्यक्तिगत कारण (Individual factors): किशोरों में ऐसे कुछ व्यक्तिगत कारण होते हैं जो उनमें अपराधी प्रवृत्ति जागृत करते हैं, जैसे –

(क) शारीरिक दोष (Physical Defects): किसी भी प्रकार के शारीरिक दोष से ग्रस्त किशोर अपने में कुछ कमी समझने लगता है और हीन भावना से ग्रस्त हो जाता है और जब उसके दोष पर व्यंग्य किया जाता है तो वह प्रायः असामाजिक व्यवहार अपना लेता है। उसमें समाज के विरुद्ध प्रतिनिया का विकास होता है क्योंकि वह अपने दोष का उत्तरदायी समाज को ही समझने लगता है।

(ख) मन्द बुद्धि होना (Slow mental development): मन्द बुद्धि किशोर प्रायः अनैतिक व्यवहार की ओर सरलता से और शीघ्रता से खिंचते हैं क्योंकि उनमें यह समझने की शक्ति क्षीण होती है कि उचित सामाजिक व्यवहार क्या हैं।

(ग) जल्दी या देर से परिपक्वता होना (Early or late maturity): जब किसी किशोर में अपनी आयु की अपेक्षा जल्द या देर से परिपक्वता आती है तो उसमें समायोजन की कठिनाई होती है क्योंकि ऐसे किशोर अपनी आयु वाले किशोरों से बड़े या छोटे प्रतीत होते हैं। इससे किशोर में असन्तोष उत्पन्न होता है और वह असामाजिक व्यवहार करने लगता है।

2. सामाजिक कारण (Social factors): सामाजिक वातावरण सम्बन्धी अनेक कारण ऐसे हैं जो किशोर में अपराध की प्रवृत्ति जागृत करते हैं। कुछ सामाजिक कारणों का उल्लेख नीचे किया गया है

(क) माता-पिता का व्यवहार (Behaviour of parents): माता-पिता के अवहेलनात्मक व्यवहार से भी किशोरों को कुण्ठाएँ घेर लेती हैं जो उनमें उन्मुक्त व्यवहार को बढ़ावा देती हैं तथा जिससे किशोर अपराधी बन जाते हैं। अध्ययन द्वारा यह स्पष्ट है कि अपराधी किशोरों के माता-पिता, घर तथा बाहर कड़ा अनुशासन रखते हैं और तर्क के स्थान पर दण्ड देने में विश्वास रखते हैं।

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(ख) घर का वातावरण (Home Environment): किशोर अपराध का एक मुख्य कारण घर का अनुचित वातावरण है, जिससे प्रायः परिवार के प्रत्येक सदस्य के सम्मुख समायोजन की समस्या होती है। घर के वातावरण के अनुचित होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं माता-पिता के आपसी झगड़े, बिखरा हुआ परिवार, बड़ा परिवार, किशोरों को आवश्यकता से अधिक नियंत्रण में रखना या बिल्कुल स्वतंत्र छोड़ना, घर में अनुशासन का अभाव, परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होना जिससे किशोर की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती, किशोर का हीन भावना से ग्रस्त होना या फिर किशोर में श्रेष्ठ होने की भावना का पनपना आदि।

(ग) घर के बाहर का वातावरण (Environment outside home): घर ही नहीं अपितु घर के बाहर का वातावरण भी किशोरों में अपराध प्रवृत्ति जागृत करता है। अध्ययनों द्वारा ज्ञात हुआ है कि घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अपराध प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है। प्रायः ऐसे क्षेत्रों में भारी संख्या में प्रौढ़ अपराधी पाए जाते हैं, भीड़-भाड़ अधिक होती है, आस-पास अधिक कारखाने होते हैं या झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्र होते हैं, जिससे किशोरों का विकास उचित प्रकार से नहीं हो पाता है और अपराध की प्रवृत्ति उनमें पनपने लगती है।

प्रश्न 3.
किशोरों की यौन-सम्बन्धी समस्याओं (Problems related to sex) का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यौन सम्बन्धी समस्याएँ (Problems related to sex): मनुष्यों की अनेक नैसर्गिक प्रवृत्तियों (instincts) में से एक प्रवृत्ति काम (sex) की भी है। काम भावना किशोर के जीवन में अत्यधिक महत्त्व रखती है, अतः उसका उचित विकास आवश्यक है। किशोरावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें किशोरों को अपनी लैंगिक भूमिका समझनी, सीखनी व स्वीकारनी होती है।

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अध्ययनों द्वारा यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि किशोरों में यौन-सम्बन्धी समस्याएँ, यौन-सम्बन्धी जिज्ञासा के बढ़ने तथा यौन सम्बन्धी ज्ञान के अभाव से उत्पन्न होती हैं। किशोरों में लिंगीय भेद एवं काम-भावना की सही-सही जानकारी होना तथा काम के प्रति उनका स्वच्छ दृष्टिकोण होना आवश्यक है जिससे वह सुन्दर एवं सफल सामाजिक जीवन व्यतीत कर सकें तथा बुराइयों से बच सकें।

किशोरावस्था में जब किशोर तारुण्य को प्राप्त होते हैं तब उनमें यौन-सम्बन्धी जननेन्द्रियों का विकास एवं किशोरों में शुक्राणु एवं उसके स्राव होते हैं तथा किशोरियों में रजःस्राव होता है जिससे वे अनेक प्रकार की भयभीत करने वाली कल्पनाएँ करते हैं। इन विभिन्न कल्पनाओं से अपने को दोषी ठहराते हैं और लिंग अवयवों के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की ऐसी धारणाएँ बना लेते हैं जो बिल्कुल ही भ्रान्त एवं अशुद्ध होती हैं। कई बार तो किशोरों को यह विश्वास हो जाता है कि वे किसी विशेष रोग से पीडित हैं और हीनभावना के शिकार हो जाते हैं।

यही हीनभावनाएँ किशोरों में अनेक प्रकार की यौन-सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न करती हैं जिनका यदि समय पर निवारण न किया जाए तो किशोर के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है और उसमें अपराध प्रवृत्ति पनपने लगती है। हमारे देश में यौन-सम्बन्धी भ्रान्त धारणाओं व झूठे मानसिक कष्टों तथा हीन-भावना से ग्रस्त किशोर हैं जिन्हें उचित लिंग-सम्बन्धी जानकारी देकर यौन सम्बन्धी समस्याओं से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
किशोर-अपराध की रोकथाम में परिवार और विद्यालय की क्या भूमिका है ?
उत्तर:
किशोर-अपराध की रोकथाम (Control of children delinquency): रोग चाहे शारीरिक हो अथवा मानसिक प्रायः चिकित्सा से रोकथाम बेहतर होती है। किशोर-अपराध भी एक मानसिक रोग है। जहाँ एक अपराधी किशोर को सुधारना कठिन है वहाँ उचित वातावरण एवं देखभाल से एक किशोर को अपराधी बनने से सहज ही रोका जा सकता है।

किशोर-अपराध रोकने में परिवार की भूमिका (Role of family in the control of child delinquency):
किशोर अपराध रोकने के लिए :

  1. घर का परिवेश स्वस्थ होना चाहिए तथा माता-पिता व अन्य सम्बन्धियों में प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होने चाहिए।
  2. किशोरों के प्रति उचित दृष्टिकोण रखना चाहिए। उन्हें न तो अत्यधिक नियंत्रण में रखना चाहिए और न ही खुली छूट देनी चाहिए। इन्हें न तो आवश्यकता से अधिक लाड़-प्यार करना चाहिए और न ही अधिक कठोर व्यवहार करना चाहिए। किशोरों की समस्याएँ हल करने में उनकी सहायता करनी चाहिए तथा सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए।
  3. माता-पिता को किशोर के मनोविज्ञान को समझकर उन्हें उचित निर्देशन देना चाहिए।
  4. किशोरों की बुरी आदतों पर नजर रखनी चाहिए तथा अंकुश लगाना चाहिए।
  5. यौन जिज्ञासा होना किशोर में स्वाभाविक है। किशोरों को आवश्यक यौन शिक्षा देकर उनमें यौन के प्रति स्वस्थ धारणा बनानी चाहिए।
  6. किशोरों के मित्रों का ध्यान रखना चाहिए जिससे वह अपराधियों व बिगड़े हुए लोगों की संगति न कर पाए।
  7. परिवार नियोजित रखना चाहिए। छोटे परिवार में किशोर की उचित देखभाल कर सकते हैं।
  8. किशोर को आवश्यकता से अधिक जेब खर्च नहीं देना चाहिए।

किशोर अपराध रोकने में विद्यालय की भूमिका (Role of school in the control of child delinquency): किशोरों को उपयोगी एवं योग्य नागरिक बनाने में विद्यालय एक शक्तिशाली संस्था है। विद्यालय को केवल शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था न बनाकर, एक ऐसी व्यावहारिक संस्था का रूप देना चाहिए जिसमें किशोर विद्यार्थी शिक्षकों को अपना मित्र समझे, स्वयं अनुशासन (Self discipline) में रहना सीखे, उत्तम जीवन मूल्यों व जीवन लक्ष्यों का निर्धारण करे तथा समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों एवं कर्तव्यों को समझे, परन्तु जब किशोरों को विद्यालयों में उपयुक्त वातावरण नहीं मिलता तथा विद्यालय के पास उनके लिए पर्याप्त कार्यक्रम नहीं होते हैं और बाहर की दुनिया उन्हें अधिक आकर्षक लगती है तो अपराध की दुनिया में उनका पहला कदम उठता है-विद्यालय से भाग खड़े होने का अर्थात् भगोड़ापन (Truancy)। किशोरों में भगोड़ेपन को रोकने के लिए विद्यालयों को ऐसे सुनियोजित एवं व्यावहारिक कार्यक्रम बनाने चाहिए जिससे समाज व विद्यालय के मूल्यों में टकराव न हो तथा शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के सम्बन्ध मधुर एवं प्रजातान्त्रिक हों।

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प्रश्न 5.
किशोर अवस्था में बढ़ती हुई जिज्ञासा और अपूर्ण ज्ञान किस प्रकार बेचैनी उत्पन्न करता है?
उत्तर:
बढ़ती हुई जिज्ञासा और अपूर्ण ज्ञान (Increased curiosity and inadequate knowledge): इस अवस्था में काम (sex) संबंधी अनेक भावनाएँ उत्पन्न होने के कारण, शारीरिक परिवर्तनों के कारण, संबंधों में बदलाव के कारण, बच्चों में अपने संबंध में अनेक जिज्ञासाएँ होती हैं। उन जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए उनको कोई औपचारिक शिक्षा (formal education) नहीं मिलती इसलिए अपनी काम (sex) संबंधी जानकारी के लिए वह घनिष्ठ मित्रों से बात करते हैं।

घनिष्ठ मित्रों से उनकी बातचीत का विषय प्रेम, प्यार, सच्चा प्यार, लैंगिक-संबंध, लैंगिक-क्रियाएं, लैंगिक परिपक्वता लैंगिक-आकर्षण, रजःस्राव, शिश्न (penis), वासना इत्यादि होता है। अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए कुछ ऐसे खेल भी खेलते हैं जिसमें लैंगिक संतुष्टि मिलती हो जैसे चुंबन लेना (Kiss)। उनकी बढ़ी हुई जिज्ञासा और अपूर्ण ज्ञान उनमें बेचैनी उत्पन्न करता है और उनके संबंधों में अनेक ऐसे परिवर्तन लाता है जो लैंगिक असंतुष्टि उत्पन्न करते हैं, जैसे दीवानापन। उनकी लैंगिक असंतुष्टि शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है, जैसे उनमें भूख न लगना, नींद न आना आदि।

समय से उनकी जिज्ञासाएँ शांत हो जाएं, उनके स्वास्थ्य पर लैंगिक परिपक्वता बुरा प्रभाव छोड़ने के बजाय अच्छा प्रभव छोड़े इसके लिए आवश्यक है कि उपयुक्त समय पर उन्हें यौन-संबंधी शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा प्रदान की जाए। सिर्फ यौन-संबंधी शिक्षा प्रदान करने से उनमें कामुकता की जागृति होती है अत: नैतिक शिक्षा द्वारा वे जागृत कामुकता पर नियंत्रण कर सकारात्मक कार्यों में स्वयं ही अपना ध्यान लगा कर अपराधी होने से बच सकते हैं। इस प्रकार उन्हें अपराधी बनने से पहले ही उचित निर्देशन देकर प्रजातांत्रिक ढंग से नियन्त्रित कर उन्हें उत्तम नागरिक बनाया जा सकता है क्योंकि निवारण ही इलाज से ज्यादा बेहतर है (Prevention is better than cure)

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 7 किशोरों को कुछ विशेष आवश्यकताएँ

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 7 किशोरों को कुछ विशेष आवश्यकताएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतवर्ष एक देश है –
(क) विकसित देश
(ख) विकासशील देश
(ग) अर्द्ध-विकासशील देश
(घ) पिछड़ा
उत्तर:
(ख) विकासशील देश

प्रश्न 2.
पूर्व किशोरावस्था में लड़के को प्रतिदिन आवश्यक कैलोरी चाहिए –
(क) 2190
(ख) 2060
(ग) 1640
(घ) 2070
उत्तर:
(क) 2190

प्रश्न 3.
पूर्व किशोरावस्था में लड़कियों को आवश्यक कैलोरी चाहिए –
(क) 2450
(ख) 2660
(ग) 2640
(घ) 1970
उत्तर:
(घ) 1970

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प्रश्न 4.
पूर्व किशोरावस्था को प्रभावित करने वाले कारक हैं –
(क) 5
(ग) 6
(घ) 7
उत्तर:
(घ) 7

प्रश्न 5.
संतुलित आहार (Balance Diet) मिलता है – [B.M.2009A]
(क) दूध में
(ख) माँस
(ग) सोयाबीन में
(घ) पालक में
उत्तर:
(क) दूध में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किशोरावस्था की विशेष आवश्यकताओं से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर-किशोरावस्था जीवनकाल का वह महत्त्वपूर्ण हिस्सा है जिसमें जटिल समस्याओं के समाधान हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण विशेष आवश्यकताएँ होती हैं।

प्रश्न 2.
किशोरावस्था की आवश्यकताओं में लड़के और लड़कियों में अन्तर क्यों होता है ?
उत्तर:
किशोरावस्था में लड़के और लड़कियों में कई भौतिक अन्तर स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं तथा इनमें कई आन्तरिक अन्तर भी आ जाते हैं जिससे उनकी शारीरिक आवश्यकताओं में भिन्नता आ जाती है।

प्रश्न 3.
किशोरावस्था में लड़के और लड़कियों में शारीरिक वृद्धि में क्या भिन्नता होती है ?
उत्तर:
लड़कों में लड़कियों की अपेक्षा बढ़ोत्तरी अधिक समय तक होती रहती है। लड़कियों में वृद्धि सामान्यत: 15 वर्ष की आयु तक समाप्त हो जाती है परन्तु लड़कों में इस आयु में बढ़ोत्तरी और तीव्र हो जाती है।

प्रश्न 4.
किशोरों में निम्न पोषण के मुख्य कारण क्या हैं ?
उत्तर:
किशोरों में निम्न पोषण के मुख्य कारण हैं-निर्धनता, अज्ञानता एवं परम्परागत भोजन सम्बन्धी आदतें, मानसिक अस्थिरता आदि।

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प्रश्न 5.
किशोरों के लिए प्रतिदिन व्यायाम करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
व्यायाम करने से मांसपेशियाँ क्रियाशील रहती हैं व उनकी कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा आलस्य एवं निष्क्रियता दूर होती है और स्फूर्ति उत्पन्न होती है।

प्रश्न 6.
किशोरावस्था में मनोरंजन का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
किशोरावस्था में मनोरंजन से व्यक्तित्व का विकास होता है तथा मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

प्रश्न 7.
माता-पिता द्वारा किशोरों को समझना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
किशोरावस्था में किशोरों को अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक व सामाजिक समस्याएँ घेरती हैं जिनका उचित समाधान करना आवश्यक है। इसलिए माता-पिता द्वारा किशोरों को समझना आवश्यक है।

प्रश्न 8.
किशोरावस्था में होने वाले कुपोषण के दो प्रमुख कारण लिखें।
उत्तर:
किशोरावस्था अत्यन्त तीव्र व आकस्मिक गति से वृद्धि होने का काल है। इस कारण यदि उचित व पौष्टिक भोजन न मिले तो प्रायः किशोर कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। कुपोषण के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • तीव्र वृद्धि के कारण बढ़ती हुई आवश्यकताएँ सामान्य आहार द्वारा पूरी न हो पाना ।
  • दिनचर्या नियमित न होने के कारण निश्चित समय पर भोजन न कर पाना ।

प्रश्न 9.
किशोरावस्था में आहार में लोहे की मात्रा को क्यों बढ़ाया जाना चाहिए?
उत्तर:
ऊतकों के निर्माण एवं रक्त की बढ़ोत्तरी के लिए लोहे की आवश्यकता किशोरावस्था में वयस्कों की अपेक्षा अधिक होती है। शारीरिक वृद्धि हेतु अतिरिक्त ऊर्जा चाहिए और ऊर्जा उत्पत्ति के लिए रक्त की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता अधिक होनी चाहिए । ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता हीमोग्लोबिन की मात्रा पर निर्भर करती है जो एक प्रकार का लोहे का यौगिक होता है।

प्रश्न 10.
“किशोरावस्था में पोषण” से तात्पर्य समझाएँ।
उत्तर:
किशोरावस्था में तीव्र विकास एवं वृद्धि के कारण आहार में पर्याप्त व गुणात्मक पोषक तत्त्वों का दिया जाना “किशोरावस्था में पोषण” कहलाता है।

प्रश्न 11.
किशोरावस्था में ऊर्जा की आवश्यकता क्यों बढ़ जाती है ?
उत्तर:
किशोरावस्था अत्यन्त तीव्र व आकस्मिक वृद्धि की अवधि है। शारीरिक वृद्धि एवं अधिक क्रियाशीलता के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 12.
शारीरिक व्यायाम करने से शरीर पर कौन-से दो प्रमुख प्रभाव पड़ते हैं ?
उत्तर:
शारीरिक व्यायाम करने से शरीर पर निम्नलिखित दो प्रभाव पड़ते हैं
(क) पुष्टिकर प्रभाव-नियमित रूप से व्यायाम करने से मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं।
(ख) सुधारात्मक प्रभाव-व्यायाम से मानसिक थकान कम होती है, अनुचित आसन की आदत में सुधार होता है।

प्रश्न 13.
किशोरावस्था में संतुलित आहार की प्राप्ति न होने के दो मुख्य कारण लिखें।
उत्तर:
किशोरावस्था तनाव व तूफान का काल माना जाता है। इसमें संतुलित आहार न मिलने के दो कारण निम्नलिखित हैं :

  • तीव्र वृद्धि स्फुरण के कारण शरीर की पौष्टिक आवश्यकताएँ बढ़ जाती हैं और उसके अनुरूप भोजन नहीं मिल पाता।
  • पोषण सम्बन्धी अज्ञानता के कारण भी पोषण संतोषजनक नहीं होता।

प्रश्न 14.
किशोरावस्था में कुपोषण से बचने हेतु कौन-कौन-से दो मुख्य उपाय हैं ?
उत्तर:

  • किशोरावस्था में संतुलित आहार सम्बन्धी प्रशिक्षण देना।
  • वृद्धि स्फुरण के कारण बढ़ती हुई प्रोटीन, कैल्शियम सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उत्तम प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ सम्मिलित करना ।

प्रश्न 15.
किशोरावस्था में कैल्शियम अधिक मात्रा में क्यों दिया जाना चाहिए?
उत्तर:
किशोरावस्था में तीव्र वृद्धि के कारण हड्डियों के बढ़ने हेतु व दाँतों की पुष्टता के लिए व शारीरिक क्रियाओं के लिए अधिक मात्रा में कैल्शियम दिया जाना चाहिए। कैल्शियम की पूर्ति के साथ फॉस्फोरस की पूर्ति स्वतः ही हो जाती है।

प्रश्न 16.
किशोरावस्था में. उचित वृद्धि हेतु कौन-कौन-से दो मुख्य उपाय हैं ?
उत्तर:
किशोरावस्था में उचित वृद्धि हेतु दो महत्त्वपूर्ण कारक हैं :

  • सन्तुलित एवं पौष्टिक भोजन
  • उचित व्यायाम।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किशोरों के लिए आहार योजना (Meal Planning) करते समय किन प्रमुख बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
किशोरों के लिए आहार योजना करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  • उन्हें उत्तम व सन्तुलित भोजन उपलब्ध कराना व उसका उत्तम स्वास्थ्य से सम्बन्ध का ज्ञान कराना अति आवश्यक है। सामान्य भार सन्तुलित आहार का सूचक है। यदि कुपोषण है तो मुरझाया हुआ चेहरा व आँखें स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं, परन्तु सुपोषण खिले हुए चेहरे का द्योतक है।
  • भोजन की पौष्टिकता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सभी वर्गों के पदार्थ बदल-बदल कर सम्मिलित किये जाने चाहिए।
  • वृद्धि स्फुरण के कारण बढ़ती हुई हड्डियों के लिए उत्तम प्रोटीन व दूध से बने पदार्थ सम्मिलित किये जाने चाहिये।
  • भोजन करने का समय नियमित रखना चाहिए।
  • तलना, भूनना व मिर्च मसालों का प्रयोग कम करना चाहिए।

प्रश्न 2.
भारतवर्ष में किशोरों के निम्न पोषण स्तर (Nutrition level) के क्या
मारतवर्ष एक विकासशील देश है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न प्रति व्यक्ति उपलब्ध नहीं हो पाते। को ज

किशोरों का पोषण स्तर निम्न होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  • निर्धनता के कारण सन्तुलित आहार का उपलब्ध न होना।
  • पोषण सम्बन्धी अज्ञानता के कारण व परम्परागत कई त्रुटिपूर्ण भोजन सम्बन्धी रीति-रिवाजों के कारण आवश्यकतानुसार पोषण तत्त्व न मिल पाना।
  • दिनचर्या नियमित न होने के कारण उचित समय पर भोजन न ग्रहण कर पाना।
  • मानसिक अस्थिरता एवं चिड़चिड़ेपन के कारण सन्तुलित आहार ग्रहण करने में असमर्थता।
  • लड़कियों के स्थूल होने के भय से ‘डायटिंग’ की प्रथा जिसमें पौष्टिक पदार्थों विशेषतः दूध का समावेश न करना।
  • मानसिक तनावों व भावनात्मक दबावों के कारण पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता में बढ़ोत्तरी होना व उनके अनुरूप पोषक तत्त्व ग्रहण न कर पाना।

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प्रश्न 3.
किशोरावस्था में निर्देशन (Guidance) का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
1. निर्देशन (Guidance):

1. व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance): किशोर की व्यक्तिगत समस्याओं की खोज और समाधान से सम्बन्धित निर्देशन ।

2. सामूहिक निर्देशन (Group Guidance): यह सामूहिक क्रिया है जिसका मुख्य उद्देश्य समूह में प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार व्यक्तिगत सहायता पहुँचाना होता है कि वह अपनी समस्याओं को सुलझा सके और समायोजन स्थापित कर सके। कई बार कोई समस्या एक किशोर की नहीं बल्कि पूरे समूह की होती है। तब इस प्रकार के निर्देशन की आवश्यकता होती है।

3. शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance): वह सहायता जो किशोरों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने लिए उपयुक्त विद्यालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य-विषय तथा अन्य क्रियाओं का चयन कर सकें और उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।

4. व्यावसायिक निर्देशन (Occupational Guidance): वह निर्देशन जिसके द्वारा किशोर अपने लिए उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव कर पाता है, उसके लिए तैयारी करता है और उस व्यवसाय में प्रवेश करके उन्नति करता है।

5. स्वास्थ्य निर्देशन (Health Guidance): स्वास्थ्य निर्माण तथा उसकी रक्षा के लिए दिया गया निर्देशन जिसका पालन करके किशोर शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहता है।

प्रश्न 4.
मनोरंजन और व्यायाम का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
मनोरंजन और व्यायाम (Entertainment and Exercise) पूर्व किशोरावस्था के आरम्भ तक बालक काफी खेलता-कूदता है और उसी से उसका पर्याप्त व्यायाम हो जाता है, परन्तु धीरे-धीरे वह एकांतप्रिय तथा साथी-समूह से दूर होता जाता है जिसके कारण उसके खेल-कूद में भारी कमी आ जाती है। इससे उसका शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य भी बिगड़ सकता है। अत: उन्हें इसके लिए प्रेरित किया जाना आवश्यक है।

स्वयं को. सम्मिलित करके उनके आत्मविश्वास को दृढ़ किया जा सकता है। साधारणतया लड़कियों के रजःस्राव के कारण वे मानसिक रूप से खिन्न तथा चिंतित हो जाती हैं और बाहर निकल कर अपने साथीसमूह में मिलकर खेलों में भाग नहीं ले पातीं और स्वयं को एकान्त में कैद करने की कोशिश करती हैं। उचित मार्ग प्रशस्त करके तथा उनकी सुविधाओं का आवश्यकतानुसार ध्यान रखकर उन्हें इस तनाव की स्थिति से बाहर निकालने में माता तथा शिक्षिका का अद्भुत योगदान हो सकता है।

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खेल के द्वारा व्यायाम होता है इसमें कोई शंका नहीं, परन्तु सक्रिय खेल ही व्यायाम करा पाते हैं। निष्क्रिय या मन बहलाव के खेल ज्यादा श्रम नहीं कराते तथा उनमें बालक कम से कम गतियाँ करके न्यूनतम ऊर्जा खर्च करता है । अतः उन्हें सक्रिय खेलों में भाग लेने के लिए उत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए सबसे अच्छा उपाय उन्हें उनके मनपसंद कार्य में संलग्न कर देना है जैसे कुछ किशोरों को बाजार जाकर वयस्कों की भाँति खरीदारी करना आदि।

प्रश्न 5.
मनोरंजन के कोई तीन स्रोतों का वर्णन करें जो आपको सबसे अधिक रुचिकर लगते हैं।
उत्तर:
जिस प्रकार शारीरिक विकास के लिए उचित व्यायाम महत्त्वपूर्ण है ठीक उसी प्रकार मानसिक, सामाजिक एवं संवेगात्मक विकास के लिए स्वस्थ मनोरंजन आवश्यक है। मनोरंजन सभी के लिए अनिवार्य है और किशोरावस्था में इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि बिना मनोरंजन के सन्तुलित व्यक्तित्व को बनाये रखना सम्भव नहीं। किशोरों के लिए मनोरंजन का अर्थ पूर्णतया बदल जाता है । वही खेल तथा कार्यकलाप जो बाल्यावस्था में आनंददायी होते थे अब बचकाने तथा समय नष्ट करने वाले बन जाते हैं। उनकी मनोरंजन सम्बन्धी रुचियाँ भी बदल जाती हैं। इस अवस्था में मनोरंजन के तरीके बदल जाते हैं।

मनोरंजन जिनमें अधिक शक्ति व्यय होती है के स्थान पर ऐसे मनोरंजन पसंद किये जाने लगते हैं जिनमें खिलाड़ी निष्क्रिय दर्शक होता है। मनोरंजन के तीन स्रोत जो अधिक रुचिकर लगते हैं वे हैं पढ़ना, सिनेमा और रेडियो व टेलीविजन सुनना व देखना आदि। पढ़ने में लड़कियाँ रोमांस वाली व लड़के विज्ञान और आविष्कारों की पुस्तकें एढ़ना पसन्द करते हैं। प्रेमप्रधान, साहसिक तथा हँसी-मजाक वाले सिनेमा पसन्द किये जाते हैं। रेडियो व टेलीविजन.सबसे प्रिय मनोरंजन का साधन बन गये हैं क्योंकि ये सभी आर्थिक स्थिति के लोगों के लिए सुविधापूर्ण मनोरंजन के साधन हैं।

प्रश्न 6.
माता-पिता को अपने किशोर बच्चों को समझना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
माता-पिता को अपने किशोर बच्चों को समझना अति आवश्यक है ताकि उसका विकास सही दिशा में हो और उसका व्यक्तित्व एक संतुलित व्यक्तित्व बन सके। किशोरों की समस्याओं का समाधान केवल तभी सम्भव है जब माता-पिता उनकी समस्याओं को समझें तथा उनके समाधान में सहायता करें। कई बार माता-पिता की नासमझी किशोर को पथभ्रष्ट भी कर सकती है क्योंकि वे अपनी समस्याओं के समाधान हेतु किसी गलत व्यक्ति की भी सलाह ले सकते हैं। यदि माता-पिता अपने किशोर की रुचियों एवं विश्वासों को भली प्रकार जान लें तो उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की जा सकती है।

यदि बच्चे की विज्ञान में रुचि नहीं है तो उसे विज्ञान लेने के लिए कभी भी बाध्य नहीं करना चाहिए। माता-पिता उनकी अभिवृत्तियों को प्रोत्साहित करके उनकी योग्यताओं और कुशलताओं में वृद्धि कर सकते हैं। माता-पिता के लिए यह आवश्यक है कि वह किशोरों के मित्रों के बारे में पूर्ण जानकारी रखें। उस गुट की भी पूर्ण जानकारी रखें जिसमें किशोर उठता-बैठता है और अपने अवकाश का समय बिताता है। किशोर अपराध को रोकने के लिए माता-पिता को अपने किशोरों की आवश्यकताओं को समझना अति आवश्यक है।

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प्रश्न 7.
पूर्व किशोरावस्था (Early Maturity) में माता-पिता के प्रति किशोर किस प्रकार का व्यवहार करता है ?
उत्तर:
नव किशोर का अपने माता-पिता के प्रति आरम्भ में मधुर सम्बन्ध नहीं होता। नव किशोर माता-पिता द्वारा ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं करता जैसे उसके बचपन में वे उससे करते रहे हैं। माता-पिता यदि किशोर की आवश्यकताओं या समस्याओं को ठीक प्रकार से न समझें तो किशोर माता-पिता को चिढ़ाने वाली सभी करतूतें करता है।

जैसे-सबसे तर्क करना, सबकी बातों की नुक्ताचीनी करते रहना, कर्त्तव्यों का पालन न करना, माता-पिता की आज्ञाओं का उल्लंघन करना आदि। इस कारण माता-पिता उसे टोकते हैं, या बिना सजा दिये स्वीकार नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप किशोरावस्था में संघर्ष और अधिक बढ़ जाता है। माता-पिता व नवकिशोर के सम्बन्ध तनावपूर्ण हो जाते हैं। परन्तु यदि अभिभावक समझदारी का रवैया अपनाएँ तो किशोरों की उन्नति का :मार्ग स्वयं ही प्रशस्त हो जाता है।

प्रश्न 8.
भोजन नियंत्रण के कारण किशोर में हुई दो कठिनाइयों के बारे में बताइए। अत्यधिक भार को कम करने के लिए किशोर को दो उपाय समझाइए।
उत्तर:

  • ऊर्जा का ह्रास (Loss of Energy)
  • कमी के रोग (Defficiency Disease)
  • तनाव (Depression)।

सुझाव (Suggestion)

  • संतुलिता 4769 (Balanced Diet)
  • व्यायाम (Exercise)।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किशोरावस्था में व्यायाम के महत्त्व को समझाएं।
उत्तर:
किशोरावस्था तीव्र व असमान वृद्धि की अवधि है जिसमें शरीर अत्यन्त तीव्र गति से बढ़ोत्तरी करता है। अतः इस अवस्था में व्यायाम का महत्त्व भी बढ़ जाता है। आधुनिक युग में जब हाथों द्वारा कम व मशीनों द्वारा अधिक काम किया जाता है, तब उचित व्यायाम द्वारा ही शारीरिक स्वस्थता को बनाये रखा जा सकता है। शारीरिक व्यायाम तीन प्रभावों के कारण जीवन में महत्त्व रखता है –
(क) पुष्टिकर प्रभाव
(ख) सुधारात्मक प्रभाव
(ग) विकासात्मक प्रभाव (Health Effect)

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(क) पुष्टिकर प्रभाव: नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर के समस्त अंग समान रूप से पुष्ट होते हैं। शरीर में शीघ्र ऊष्मा उत्पन्न होने के कारण रक्त प्रवाह में तीव्रता आती है। तन्तुओं को ऑक्सीजन अधिक मात्रा में मिलते हैं, परिणामस्वरूप मांसपेशियों में दृढ़ता आती है। इतना ही नहीं पाचन संस्थान, शक्ति संस्थान शक्तिशाली होता है जिससे भोजन के पाचन, अवशोषण और निष्कासन में तीव्रता आती है।

(ख) सुधारात्मक प्रभाव (Improvemental Effect): व्यायाम से मानसिक थकान कम होती है। अनुचित आसन की आदत में सुधार होता है। व्यायाम से अनुचित शरीर जैसे कन्धों का झुका होना, पैर की हड्डी का झुकाव इत्यादि में सुधार लाया जा सकता है।

(ग) विकासात्मक प्रभाव (Developmental Effect): निरन्तर व्यायाम से चहुँमुखी विकास पर प्रभाव पड़ता है। शारीरिक वृद्धि सामान्य होती है, मानसिक शक्ति बढ़ती है, इच्छाओं पर नियन्त्रण होता है और व्यक्ति नियमों का पालन कर अनुशासित होकर जीना सीखता है।

प्रश्न 2.
किशोरावस्था को कितने भागों में बाँटा जा सकता है ? – [B.M. 2009A]
उत्तर:
से 18 वर्ष के बीच के अवस्था को किशोरावस्था कहते हैं। हर व्यक्ति के जीवन में अवस्था सर्वाधिक मा.त्वपूर्ण होती है। जी स्टेनेल हॉल ने इसे तूफान और तनाव की अवस्था कहा है। किशोरावस्था के अध्ययन करने के लिए इसे तीन अवधियों में बाँटा जा सकता है।

  • पूर्व किशोरावस्था
  • मध्य किशोरावस्था
  • उत्तर किशोरावस्था

1. पूर्व किशोरावस्था-पूर्व किशोरावस्था 12 से 15 वर्ष की आयु की व्युवटि पिरीयड कहते है इस अवधि में शारीरिक परिवर्तन शुरू होता है क्या किशोर इन परिवर्तन के कारण सजग हो जाते है। इस अवस्था में हार्मोनल परिवर्तन के कारण लैंगिक परिपक्वता आरंभ होती है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का विकास तीव्र गति से होता है। यही कारण कि वे लड़कों के मुकाबले बड़ी होती है।

पूर्व किशोरावस्था को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं –

  • अंत:स्रावी ग्रंथियों की क्रियाएँ
  • अनुवांशिक
  • पोषक एवं स्वास्थ्य
  • सामाजिक स्तर,
  • आर्थिक स्तर,
  • क्षेत्र का तापमान
  • व्यक्तिगत भिन्नता

2. मध्य किशोरावस्था: 15 से 16 वर्ष की आयु को मध्य किशोरावस्था कहते हैं। इस अवस्था में हो रहे परिवर्तन को जल्दी स्वीकार नहीं किया जाता है। इस अवस्था को. ‘टिन्स’ अवस्था भी कहते हैं। टीन्स अवस्था में हो रहे परिवर्तन का असर किशोरों की सोच सामाजिक संबंध पर पड़ता है। यह उनके नए व्यक्तित्व की नींव का आधार बनता है।

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3. उत्तर किशोरावस्था: इस अवस्था में किशोर की आयु 16 से 18 वर्ष की होती है तथा परिवर्तन लगभग पूर्ण हो जाते हैं। इस आयु में सभी प्रकार के विकास, शारीरिक मानसिक, संवेगात्मक विकास एक साथ चलते हैं। 16 से 18 वर्ष की आयु को ‘सुनहरी अवस्था’ भी कहतें हैं। लड़कियों के परिपक्व होने की अधिकतम आयु सीमा 18 वर्ष एवं लड़कों की 21 वर्ष निध रिक्त की गई है।

प्रश्न 3.
किशोरावस्था की दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएँ क्या हैं?
उत्तर:
किशोरावस्था की दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं:

किशोरावस्था की. दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएँ –
(Daily Nutritional Requirement of Adolescent)
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1. ऊर्जा की आवश्यकता (Requirement of Energy): किशोरावस्था में शारीरिक वृद्धि एवं अधिक क्रियाशीलता के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। 13-14 वर्ष के लड़कों को 2450 कैलोरी तथा 16-18 वर्ष के लड़कों को 2640 कैलोरी की आवश्यकता होती है। लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। किशोर लड़कियों को केवल 2060 कैलोरी की आवश्यकता होती है।

2. प्रोटीन की आवश्यकता (Requirement of Protein): किशोरावस्था में प्रोटीन की आवश्यकता अत्यधिक होती है। 13-15 वर्ष के लड़कों को 70 ग्राम तथा 16-18 वर्ष के लड़कों को 78 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है। 13-15 वर्ष की लड़कियों के लिए 65 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है, जो 16-18 वर्ष की लड़कियों के लिए घट कर 63 ग्राम हो जाती है।

3.विटामिनों की आवश्यकता (Requirement of vitamins): ‘बी’ समूह के विटामिनों के अतिरिक्त अन्य विटामिनों की आवश्यकता किशोरों को वयस्कों के समान होती है। किशोरावस्था में कैलोरी की मात्रा बढ़ने के कारण थायमिन, राइबोफ्लेविन एवं निकोटिनिक अम्ल की आवश्यकता बढ़ जाती है।

4. खनिज लवणों की आवश्यकता (Requirement of Minerals): किशोरावस्था में लड़के और लड़कियाँ दोनों के लिए कैल्शियम की आवश्यकता अधिक होती है। हड्डियों के बढ़ने, दांतों की पुष्टता और अनेक शारीरिक क्रियाओं के लिए उचित मात्रा में कैल्शियम की प्राप्ति अनिवार्य है। ऐसा विश्वास किया गया है कि किशोरों में मानसिक द्वन्द्व एवं तनावों के कारण शरीर में कैल्शियम संचित नहीं हो पाता है। अतः आहार में प्रतिदिन कैल्शियमयुक्त पदार्थ सम्मिलित करना अति आवश्यक है।

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13-15 वर्ष के किशोरों को 600 मिग्रा कैल्शियम तथा 1618 वर्ष के किशोरों को 500 मिग्रा कैल्शियम की आवश्यकता होती है। कैल्शियम की पूर्ति के साथ फास्फोरस की पूर्ति स्वतः हो जाती है। न किशोरावस्था में ऊतकों के निर्माण एवं रक्त की बढ़ोत्तरी के लिए लोहे की आवश्यकता वयस्कों से अधिक होती है।

किशोर लड़के को लड़कियों की अपेक्षा अधिक लोहे की आवश्यकता होती है क्योंकि इनमें शारीरिक वृद्धि तीव्र गति से होती है। 13-15 वर्ष के लड़कों को 41 मिग्रा. तथा 16-18 वर्ष के लड़कों को 50 मिग्रा. लोहे की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार 13-15 वर्ष की लड़कियों को 28 मिग्रा. तथा 16-18 वर्ष की लड़कियों को 30 मिग्रा. लोहे की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4.
मनोरंजन द्वारा व्यक्तित्व का निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर:
मनोरंजन द्वारा व्यक्तित्व का निर्माण (Personality development through entertainment)

  1. मनोरंजन द्वारा मानसिक संतुष्टि मिलती है जिससे व्यक्ति अपने तनावों इत्यादि को भूलता है।
  2. शारीरिक खेलों द्वारा मनोरंजन करने से शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है।
  3. कार्य करने की नई शक्ति तथा क्षमता मिलती है।
  4. मनोरंजन द्वारा अपने मित्रों, बड़ों तथा छोटों से सम्बन्ध बनाने में सहायता मिलती है।
  5. मानसिक खेलों जैसे चेस (Chess) आदि द्वारा मनोरंजन करने से मानसिक व्यायाम हो . जाता है।
  6. विषमलिंगियों से सम्बन्ध बनाने में सहायता मिलती है।
  7. मनोरंजन के लिए किताबें पढ़ने, टी.वी. देखने, अखबार पढ़ने तथा रेडियो सुनने से ज्ञान भी बढ़ता है।
  8. मनोरंजन की विभिन्न स्थितियों द्वारा विभिन्न लोगों से मिलना-जुलना तथा समाज के नियमों और कानूनों जैसे चौराहे पर लाल बत्ती (Red light) को जानने का अवसर मिलता है।
  9. अकेले रहकर मनोरंजन करनेवाले किशोरों को एकांत की महत्ता का ज्ञान होता है और वे कम आयु में अधिक विचारने वाले और अधिक दार्शनिक प्रवृत्ति के हो जाते हैं।
  10. मनोरंजन से किशोरों की कुंठाएं (Frustration) दूर होती हैं और वे फिर से अपनी सामान्य अवस्था में आ जाते हैं।
  11. मनोरंजन किशोरों के बहुमुखी विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण टॉनिक (Tonic) का कार्य करता है।

प्रश्न 5.
शारीरिक व्यायाम का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
शारीरिक व्यायाम का प्रभाव (Effect of Physical exercise):
(क) पुष्टिकर प्रभाव
(ख) सुधारात्मक प्रभाव
(ग) विकासात्मक प्रभाव

(क) पुष्टिकर प्रभाव (Health Effect): नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर के समस्त अंग समान रूप से पुष्ट होते हैं। इससे शरीर में शीघ्र ही ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है। हृदय गति तीव्र हो जाती है। इस प्रकार रक्त प्रवाह में तीव्रता आ जाती है। समस्त शरीर के तन्तुओं को ऑक्सीजन और ग्लाइकोजन अधिक मात्रा में प्राप्त होता रहता है। परिणामस्वरूप मांसपेशियों में दृढ़ता आती है।

व्यायाम करते समय श्वास की गति तेज हो जाती है जिससे फेफड़े अधिक स्वस्थ रहते हैं और शरीर की शक्ति में वृद्धि होती है। शरीर अधिक मात्रा में श्वसन द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण करता है तथा अशुद्धियों का कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में निष्कासन करता है। व्यायाम से पाचन संस्थान शक्तिशाली होता है, पाचन शक्ति बढ़ती है तथा शरीर के मल निष्कासन में सहायता मिलती है और अपच, कब्ज आदि रोग दूर हो जाते हैं।

(ख) सुधारात्मक प्रभाव (Improvement Effect): व्यायाम से मानसिक थकान कम होती है, अनुचित आसन की आदत में सुधार होता है और शारीरिक विकृतियों जैसे झुके कन्धे, रीढ़ की हड्डी का झुकाव व चपटे पैर आदि में पूर्णतः सुधार लाया जा सकता है।

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(ग) विकासात्मक प्रभाव (Development Effect): निरन्तर नियमित रूप से व्यायाम करने से मांसपेशियों के आकार तथा शक्ति में विकास होता है और मांसपेशियों पर इच्छा-शक्ति का नियंत्रण बढ़ जाता है।

व्यायाम सम्बन्धी कुछ नियम (Laws of Exercise):
व्यायाम सम्बन्धी निम्नलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है –

  • व्यायाम ऐसा होना चाहिए जिससे शरीर के समस्त अंग जिन्हें विकास की आवश्यकता हो, समान रूप से लाभ उठा सकें।
  • व्यायाम धीरे-धीरे सरल से कठिन की ओर करने चाहिए । अत्यन्त कठिन व्यायाम नहीं करने चाहिए क्योंकि इससे हृदय पर जोर पड़ने का भय पाता है। व्यायाम की मात्रा धीरे-धीरे नित्य प्रति बढ़ानी चाहिए।
  • व्यायाम करने के कम-से-कम एक घण्टा पश्चात् पसीना सूखने पर स्नान अवश्य करना चाहिए । पसीना सूखने पर त्वचा पर मैल जमा रह जाता है जिसे स्वच्छ करना अत्यन्त आवश्यक
  • व्यायाम नियमित रूप से खुले हवादार स्थान में करना चाहिए जिससे फेफड़ों में शुद्ध वायु द्वारा ऑक्सीजन अधिक मात्रा में पहुँचे।
  • अस्वस्थ व्यक्तियों को व्यायाम नहीं करना चाहिए।
  • व्यायाम के बाद थोड़ी देर आराम करना आवश्यक है।
  • मानसिक कार्य करने वालों को हल्के व्यायाम करने चाहिए जैसे टेनिस, फुटबॉल, बॉलीवल आदि खेलना उनके लिए उचित व्यायाम है।
  • व्यायाम करने से पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए या भोजन करने के तुरत बाद व्यायाम नहीं करना चाहिए।
  • व्यायाम करने का सर्वोत्तम समय प्रात:काल का है। सायंकाल खेलकूदों में भाग लेकर व्यायाम किया जा सकता है।
  • व्यायाम हर आयु के व्यक्ति के लिए भिन्न होना चाहिए। बालकों, किशोरों, प्रौढ़ों तथा वृद्धों का व्यायाम अलग-अलग प्रकार का होना चाहिए। किशोर बालकों तथा प्रौढ़ों की अपेक्षा तेज व्यायाम कर सकते हैं।

प्रश्न 6.
माता-पिता द्वारा किशोरों को समझे जाने की आवश्यकता क्यों है ?
उत्तर:
माता-पिता द्वारा समझे जाने की आवश्यकता (Understanding of Parents)किशोरों के पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए यह अति आवश्यक है कि माता-पिता उसे भली प्रकार समझें और उसके विकास में सहायक हों।

1. माता-पिता द्वारा किशोरों की समस्याओं को समझना (Understanding the problems of adolescents by the parents): किशोरों की समस्याओं का समाधान केवल तभी सम्भव है जब माता-पिता उनकी समस्याओं को समझें तथा उनके समाधान में सहायता करें।

किशोरावस्था में किशोरों को अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक व सामाजिक समस्याएँ घेरती हैं जिनका उचित समाधान करना आवश्यक है। माता-पिता ही अपने बच्चों के सबसे बड़े शुभचिन्तक होते हैं और वे ही उनकी समस्याओं को भली प्रकार समझकर उनका समाधान निकाल सकते हैं। कई बार माता-पिता की नासमझी के कारण किशोर अपनी समस्याओं के समाधान हेतु गलत व्यक्तियों का सहरा लेते हैं और अनेक उलझनों में फंस जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 7 किशोरों को कुछ विशेष आवश्यकताएँ

2. माता-पिता को किशोरों के मित्रों व उसके समूह को समझना (Understanding the friends and their group of adolescents): माता-पिता के लिए आवश्यक है कि वह किशोरों के मित्रों के बारे में पूर्ण जानकारी रखें तथा उस गुट की भी जानकारी रखें जिसमें किशोर उठता-बैठता है और अपने अवकाश का समय बिताता है । कई बार किशोर गलत मित्रों का चयन करके अनेक असामाजिक तत्त्वों से प्रभावित हो जाते हैं जिससे उनमें अपराध की प्रवृत्ति आती है। किशोर-अपराध को रोकने के लिए माता-पिता को अपने किशोरों की आवश्यकताओं को समझना अति आवश्यक है।

3. माता-पिता द्वारा किशोरों की रुचियों, अभिवृत्तियों एवं विश्वासों को समझना (Understanding the interest, taste and confidence of adolescents): माता-पिता को अपने किशोर बच्चों की रुचियों एवं विश्वासों को भली प्रकार समझना बहुत आवश्यक है क्योंकि इन्हीं के आधार पर किशोर अपने भविष्य का निर्माण करता है।

कई बार माता-पिता बिना सोचे-समझे किशोरों के भविष्य के बारे में ऐसे निर्णय ले लेते हैं जो उनकी रुचियों, अभिवृत्तियों आदि से भिन्न होते हैं जिससे किशोरों के सामने समायोजन की समस्याएँ आती हैं। उदाहरण के लिए कई बार विज्ञान में रुचि न होते हुए भी माता-पिता की नासमझी के कारण बच्चे को विज्ञान पढ़ना पड़ता है जिससे किशोर कक्षा में पिछड़ा हुआ रहता है तथा हीनभावना से ग्रस्त भी हो सकता है।

माता-पिता को किशोरों की शारीरिक, मानसिक व सामाजिक आवश्यकताओं की जानकारी प्राप्त करके उन्हें उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ऐसा घर व वातावरण प्रयुक्त करवाना चाहिए जिसमें परिवार के सदस्यों में परस्पर स्नेह, मैत्री, सभी के अधिकारों व आवश्यकताओं को समझने की क्षमता हो, जिससे उनके व्यक्तित्व का विकास हो सके। घर ऐसा होना चाहिए जिसमें प्रजातांत्रिक वातावरण तथा माता-पिता के मध्य उचित समायोजन हो।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 6 वैयक्तिक भिन्नताएँ

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 6 वैयक्तिक भिन्नताएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 6 वैयक्तिक भिन्नताएँ

Bihar Board Class 11 Home Science वैयक्तिक भिन्नताएँ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
बाल्यावस्था के विकास की कितनी अवस्थाएँ हैं। [B.M.2009A]
(क) तीन
(ख) पाँच
(ग) चार
(घ) दो
उत्तर:
(ग) चार

प्रश्न 2.
‘पीढ़ियों का अंतर’ किस अवस्था में अधिक प्रभावित करता है –
(क) बाल्यावस्था
(ख) वृद्धावस्था में
(ग) किशोरावस्था में
(घ) प्रौढ़ावस्था में
उत्तर:
(ग) किशोरावस्था में

प्रश्न 3.
वैयक्तिक भिन्नता के मुख्य कारक हैं –
(क) दो
(ख) एक
(ग) चार
(घ) छ:
उत्तर:
(क) दो

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प्रश्न 4.
गुणसूत्र में होता है –
(क) R.N.A.
(ख) D.N.A
(ग) Rh factor
(घ) Nucleus
उत्तर:
(ख) D.N.A

प्रश्न 5.
पुरुष में गुणसूत्र होते हैं –
(क) X
(ख) XY
(ग) XP
(घ) XT
उत्तर:
(ख) XY

प्रश्न 6.
मानव में रक्त समूह की संख्या होती है –
(क) दो
(ख) चार
(ग) छः
(घ) तीन
उत्तर:
(ख) चार

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वैयक्तिक भिन्नताएँ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैयक्तिक भिन्नताएँ (Individual differences) वे भिन्नताएँ हैं जिनके कारण एक ही समूह के सदस्य एक-दूसरे से शारीरिक, मानसिक व सामाजिक गुणों में भिन्न होते हैं।

प्रश्न 2.
व्यक्तिगत भिन्नताओं के आधार क्या हैं ?
उतर:
व्यक्तिगत भिन्नताएँ (Individual differences) के आधार:

  • वंशानुक्रम (Heredity)।
  • वातावरण (Environment)

प्रश्न 3.
आनुवंशिकता (Heredity) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यह माता-पिता की विषमताओं को बच्चों में अवतरण करने की प्रक्रिया है। गुण सूत्र में उपस्थित जीन माता-पिता की विशेषताओं के अवतरण के लिए उत्तरदायी हैं।

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प्रश्न 4.
समलिंगीय किशोरों के विकास में दो भिन्नताओं के नाम बताएँ।
उत्तर:

  • शीघ्र परिपक्व होने वाले किशोर (Early maturers)।
  • देर से परिपक्व होने वाले किशोर (Late Maturers)।

प्रश्न 5.
वातावरण (Environment) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
हमारे आस-पास जो कुछ भी है, उसे वातावरण कहते हैं। माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, मित्र, पड़ोसी, अध्यापक, भौतिक वस्तुएँ आदि सभी वातावरण के अवयव हैं।।

प्रश्न 6.
वातावरण की भिन्नताओं के आधार कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
परिवार (Family), साथी (Pear), विद्यालय (School), सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहर (Socio-cultural heritage)।

प्रश्न 7.
किशोर-किशोरी को क्या-क्या सुविधाएँ व अवसर मिलेंगे यह किस बात पर निर्भर करता है ?
उत्तर:
किशोर-किशोरी को सुविधाओं व अवसर का मिलना उसके परिवार के आर्थिक स्तर या सामाजिक वर्ग पर निर्भर करता है।

प्रश्न 8.
व्यक्तिगत भिन्नता के मुख्य आधार हैं ?
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नता के प्रमुख आधार आनुवंशिकता और वातावरण हैं।

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प्रश्न 9.
माता-पिता के गुण बच्चों में कैसे आते हैं ?
उत्तर:
माता-पिता के गुण बच्चों में ‘जीन्स’ के द्वारा आते हैं जो गुणसूत्रों में उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 10.
बच्चे के लिंग निर्धारण का उत्तरदायी कौन होता है ?
उत्तर:
बच्चे के लिंग निर्धारण का उत्तरदायी नर (पिता) है।

प्रश्न 11.
शीघ्र परिपक्व होने वाले किशोर समाज के साथ अधिक समायोजित क्यों होते हैं?
उत्तर:
यौवनारम्भ शीघ्र होने के कारण इनका बाल्यकाल तो छोटा हो जाता है परन्तु किशोरावस्था लम्बी हो जाती है। अतः इन्हें समाज के साथ समायोजन के लिए अधिक समय मिल जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आनुवंशिक गड़बड़ी (Heredity Disorders) को स्पष्ट करें।
उत्तर:
कई प्रकार के रोग व अवगुण माता-पिता से बच्चों को विरासत में मिलते हैं, जैसे हीमोफीलिया, मधुमेह, गठिया आदि।

प्रश्न 2.
शीघ्र तथा देर से आने वाली परिपक्वता (Maturity) से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
जब गोनैडों के असामान्य विकास के कारण यौवनारंभ होने में विलम्ब हो जाता है, उसे देर से आने वाली परिपक्वता कहते हैं। जब गोनैडों की अति क्रियाशीलता से यौवनारंभ समय से पूर्व आता है तो उसे शीघ्र आने वाली परिपक्वता कहते हैं।

प्रश्न 3.
माता-पिता के गुण बालकों में कैसे आते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
बालकों में माता-पिता के गुण (Qualities): मानव शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना है। माता व पिता के अण्डाणु व शुक्राणु की कोशिका में जो केन्द्रक (Nucleus) होता है, उनमें गुणसूत्र पाए जाते हैं। उन्हीं पर बहुत-से बिंदु, जिन्हें हम जीन्स कहते हैं, पाए जाते हैं। ये ही विभिन्न गुणों को माता-पिता से बालकों तक भेजते हैं। जब अण्डाणु व शुक्राणु का मेल होता है तो दोनों के केन्द्रक आपस में मिल जाते हैं। इसी मेल में जो जीन्स अधिक ताकतवर हो जाते हैं, उनके गुण बालकों के व्यक्तित्व का निर्धारण करते हैं। यह मिलन अनेक संयोजनों (Combination) की संभावना रखता है।

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प्रश्न 4.
शीघ्र तथा विलम्ब से होने वाली परिपक्वता से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
शीघ्र तथा विलम्ब से होने वाली परिपक्वता (Early and late maturers): विकास की दर में भिन्नता होने के कारण कुछ किशोर शीघ्र परिपक्व हो जाते हैं तो कुछ किशोर देर से परिपक्व होते हैं। किशोरावस्था में विकास की दर बहुत कुछ यौन परिपक्वता पर निर्भर करती है क्योंकि यौन परिपक्वता के साथ किशोर की शारीरिक विकास की गति का सीधा सम्बन्ध है। जिन किशोर बालकों में यौन परिपक्वता शीघ्र आती है उनका शारीरिक गठन, ऊँचाई एवं भार उन किशोरों की अपेक्षा भिन्न होता है जिनमें यौन परिपक्वता देर से आती है।

शीघ्र परिपक्व होने वाले किशोर लड़कों का शारीरिक आकार जैसे कूल्हे चौड़े और टांगें छोटी होती हैं जबकि देर से परिपक्व होने वाले किशोर लड़कों का शारीरिक आकार पतला, कंधे चौड़े और टांगे लम्बी होती हैं। इसका मुख्य कारण है कि देर से परिपक्वता प्राप्त करने वाले किशोरों की वृद्धि प्रायः अनियमित और असंयमित होती है, जबकि शीघ्र परिपक्वता प्राप्त करने वाले किशोरों की वृद्धि अधिक नियमित होती है और अंगों की वृद्धि में भी कम असन्तुलन होता है।

प्रश्न 5.
समलिंगियों एवं विषमलिंगियों की भिन्नताओं में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
समलिंगियों एवं विषमलिंगियों में भिन्नताएँ (Interdifference between same sex and opposite sex)-प्रायः विकास के सभी पहलू जैसे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व संवेगात्मक में समलिंगियों एवं विषमलिंगियों में भिन्नताएँ पायी जाती हैं। शारीरिक परिपक्वता की आयु में विभिन्नताएँ अंत:स्रावी ग्रन्थियों की क्रियाओं की भिन्नताओं के कारण होती हैं। अंत:स्रावी ग्रन्थियों पर भी व्यक्ति की आनुवंशिकता, बुद्धि तथा उसके सामान्य स्वास्थ्य का प्रभाव पड़ता है।

मानवीय विकास का क्रम बिना टूटे लगातार चलता रहता है। गर्भाधान के क्षण से लेकर मरने तक परिवर्तन निरन्तर होते रहते हैं। इन परिवर्तनों की गति कभी धीमी होती है और कभी तेज होती है। विकास के क्रम के अन्दर शारीरिक और मानसिक विकास में गहरा सम्बन्ध होता है। एक ही आयु एवं लिंग के व्यक्तियों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में भिन्नता होती है। सभी व्यक्तियों में विकास का क्रम एक-सा होता है परन्तु उनमें विकास की गति भिन्न होती है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वैयक्तिक भिन्नताओं के दो कारण क्या हैं ? इनकी सूची बनाएँ।
उत्तर:
वैयक्तिक भिन्नताओं के दो मुख्य कारण हैं –
1. आनुवंशिकता
2. वातावरण या परिवेश।

1. आनुवंशिकता (Heredity): वैयक्तिक भिन्नताओं का पहला कारक है, आनुवंशिकता, जिसका सम्बन्ध जन्मजात विशेषताओं और लक्षणों से है। ये वे गुण हैं जो माता-पिता से बच्चों को मिलते हैं। शरीर की बनावट, आंख, त्वचा का रंग, ऊँचाई, मानसिक गुण जैसे, मानसिक योग्यता और निपुणता विरासत में मिलते हैं।

2. वातावरण/परिवेश (Environment): वातावरण अर्थात् समस्त बाह्य शक्तियों, प्रभावों और परिस्थितियों का सामूहिक प्रभाव जो व्यक्ति के जीवन, स्वभाव, व्यवहार, अभिवृद्धि, विकास तथा प्रौढ़ता पर पड़ता है। वस्तुतः वातावरण में वह सभी कुछ सम्मिलित हैं, जिनका व्यक्ति के मानसिक, नैतिकता व आध्यात्मिक जीवन से सम्बन्ध है।

इसमें व्यक्ति विशेष का आहार, आस-पास का वातावरण, रहने का स्थान, परिवार और साथियों से परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया, अनुभव व उपलब्ध अवसर, विद्यालय तथा सामाजिक वर्ग सम्मिलित हैं। जन्मजात गुण परिवेश के बिना विकसित नहीं होते और कितना भी अच्छा परिवेश क्यों न हो वह आनुवंशिक गुणों को पैदा नहीं कर सकता।

प्रश्न 2.
अपने वातावरण (Environment) के चार कारक लिखें जिससे आप अच्छा कार्य-प्रदर्शन (Performance) कर पाएँ।
उत्तर:
व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में परिवेश या वातावरण का प्रमुख स्थान है। आनुवंशिकता के साथ यदि उचित वातावरण न मिले तो उच्चतम सीमा तक नहीं पहुंचा जा सकता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। अच्छे कार्य-प्रदर्शन हेतु उचित वातावरण अति आवश्यक है।

  • पौष्टिक आहार की उपलब्धि (Availability of Nutritous food): आहार का शारीरिक परिपक्वता व वृद्धि पर अत्यन्त प्रभाव पड़ता है। पौष्टिक आहार से स्वास्थ्य का स्तर ऊँचा हो जाता है जो अच्छे कार्य प्रदर्शन के लिए अति आवश्यक है।
  • परिवार का सहयोग (Co-operation of the family): माता-पिता का सहयोग, प्रेम व व्यवहार अच्छे कार्य प्रदर्शन हेतु अति आवश्यक है। स्वतंत्रता के गुणों के प्रदर्शन हेतु सही मार्गदर्शन व माता-पिता का प्रोत्साहन एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • विद्यालय का प्रभाव (Influence of School): जो व्यक्ति शिक्षाकाल में बच्चों के साथ सम्पर्क स्थापित करते हैं, उनका प्रभाव कशोर पर काफी गहरा पड़ता है। विद्यालय में वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं जो किशोर के समुचित विकास के लिए आवश्यक हैं। पुस्तकालय, संघ, गोष्ठियाँ आदि किशोर में स्वस्थ प्रतियोगिता विकसित करते हैं जो अच्छे कार्य प्रदर्शन के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं।
  • साथीसमूह (Peer group): किशोर के साथी जो प्रायः उसके साथ उठते-बैठते, खेलते कूदते हैं, उसके व्यक्तित्व पर प्रभाव डालते हैं। अच्छी संगति किशोर को अच्छे कार्य प्रद नि हेतु प्रोत्साहित करती है, व काफी हद तक उत्तरदायी भी है।

प्रश्न 3.
व्यक्तिगत भिन्नता का महत्त्वपूर्ण कारण जीन्स हैं। संक्षेप में लिखिा’
उत्तर:
जीन्स-हर गुण के लिए अलग जीन्स होते हैं, जैसे आँख, बाल, त्वचा, लम्बाई, ड्राई, चेहरे की बनावट, बुद्धि, सृजनात्मकता व अन्य गुण। जिस समय दोनों (अंडाणु और शुक्राए। के केन्द्रकों का मिलन होता है उस समय जो संयोजन जीन्स का बनता है उसी के अनुरूप शिर् का व्यक्तित्व बनता है। इसी कारण भाई-बहन भी आपस में मिलते हैं क्योंकि उन्हें उन्हीं माता – रता के जीन्स प्राप्त होते हैं पर संयोजन में थोड़ा-सा अन्तर हो जाता है (कलाईडियोस्कोप जैसे)। वह आपस में मिलते-जुलते हैं पर बिल्कुल एक नहीं होते हैं। वैयक्तिक भिन्नता का यही एक महत्त्वपूर्ण कारण है।

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प्रश्न 4.
शीघ्र परिपक्व होने वाले किशोर और देर से परिपक्व होने वाले किशोर में क्या अन्तर हैं ?
उत्तर:
शीघ्र परिपक्व होने वाले किशोर (Early Maturers):

  • हमउम्र समलिंगियों से बड़े दिखाई देते हैं।
  • शारीरिक वृद्धि एवं विकास के लिए अपेक्षाकृत कम समय मिलता है।
  • इनकी बाल्यावस्था छोटी तथा किशोरावस्था लम्बी होती है।
  • इन्हें प्रौढ़ जीवन की तैयारी के लिए अधिक समय मिलता है और प्रौढ़ावस्था में यह अपने दायित्व अच्छी तरह निभाते हैं।
  • इनमें यौन परिपक्वता शीघ्र आती है।

देर से परिपक्व होने वाले किशोर (Late Maturers):

  • हमउम्र समलिंगियों से छोटे दिखाई देते हैं।
  • शारीरिक वृद्धि एवं विकास के लिए अपेक्षाकृत अधिक समय मिलता है।
  • इनकी बाल्यावस्था बड़ी तथा किशोरावस्था छोटी होती है।
  • इन्हें प्रौढ़ जीवन की तैयारी के लिए कम समय मिलता है। यह अधिक समय तक बच्चे बने रहते हैं।
  • इनमें यौन परिपक्वता देर से आती है।

प्रश्न 5.
वंशानुक्रम नियम क्या है ? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
वंशानुक्रम नियम (Laws of heredity) वंशानुक्रम के कुछ सामान्य नियम निर्धारित किये जा सकते हैं, जो इस प्रकार हैं
(क) समान समान को ही जन्म देती है
(ख) भिन्नता का नियम और
(ग) प्रत्यागमन।

(क) समान समान को जन्म देती है (Like begets like): इस नियम से तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार के माता-पिता होते हैं, उसी प्रकार की उनकी सन्तान होती है। बुद्धिमान माता-पिता के बच्चे बुद्धिमान, सामान्य बुद्धिवाले माता-पिता की संतान मन्दबुद्धि वाले होती है। इसी प्रकार गोरे रंग के माता-पिता के बच्चे गोरे और श्याम रंग के माता-पिता के बालक श्याम रंग के होते हैं।

इस नियम को हम पूर्ण रूप से सत्य मानकर नहीं चल सकते क्योंकि इसके भी अपवाद मिलते हैं। यह देखा गया है कि कभी-कभी गोरे रंग के माता-पिता की संतान काली होती है और काले माता-पिता की गोरे रंग की सन्तान होती है। इस अनियमितता और अपवाद के कारणों की व्याख्या वंशानुक्रम के दूसरे भिन्नता के नियम द्वारा की गई है।

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(ख) भिन्नता का नियम (Laws of Variation): बच्चे अपने माता-पिता की सच्ची प्रतिकृति नहीं हुआ करते। वे अपनी आकृति और बनावट में माता-पिता से कुछ-न-कुछ भिन्न – अवश्य होते हैं। इस भिन्नता का कारण माता-पिता के बीज-कोषों की विशिष्टताएँ हुआ करती हैं। बीज-कोषों के अन्दर पित्राक या जीन्स होते हैं जो विभिन्न संयोजनों में मिलते हैं तथा आपस . में भिन्न होने के कारण ऐसी संतानों को जन्म देते हैं जो आपस में भिन्न होती हैं।

एक ही माता-पिता के बालक में भिन्न-भिन्न पित्राक-संयोजन के कारण उनमें आपस में। भिन्नता आ. जाती हैं। यह भी देखा गया है कि एक ही माता-पिता कभी गोरी सन्तान और कभी काली सन्तान को जन्म देते हैं। गोरेपन और कालेपन का निश्चय पित्राकों के संयोग से होता है। भिन्नता का नियम हमें यह बतलाता है कि एक ही परिवार के बालकों में शारीरिक, मानसिक और रंग-रूप की भिन्नता क्यों है, किन्तु यह निश्चित है कि वे आपस में अधिक समानता रखते हैं।

(ग) प्रत्यागमन (Regression): सारेनसन के अनुसार “प्रतिभाशाली माता-पिता के कम प्रतिभाशाली सन्तान होने की प्रवृत्ति और निम्न कोटि के माता-पिता के कम निम्न कोटि की सन्तान होने की प्रवृति ही प्रत्यागमन है।” प्रकृति में कुछ ऐसा नियम है कि वह प्रत्येक गुण (Trait) को सामान्य रूप में प्रकट करना चाहती है इसलिए एक प्रतिभाशाली माता-पिता की सन्तान में ‘सामान्य बुद्धि’ की ही प्रवृत्ति के गुण पाये जाएंगे। इससे तात्पर्य यह नहीं है कि सदैव ही सब प्राणियों में ‘प्रत्यागमन’ होता है किन्तु यह प्रवृत्ति पाई जाती है : यह तो प्रायः देखा जाता है कि अत्यन्त मेधावी माता-पिता की संतान उतनी मेधावी नहीं होती है। प्रत्यागमन के कारण इस प्रकार हैं

1. माता-पिता जो अत्यन्त प्रतिभाशाली होते हैं, उनके अन्दर अपने पितरों से प्राप्त बीजकोषों का संयोग होता है जो उन्हें प्रतिभा सम्पन्न बना देता है। पिता के सर्वोतम गुण (Best Trait) जब माता के सर्वोत्कृष्ट गुण वाहक पित्राकों से मिलते हैं तो प्रतिभा सम्पन्न बालक का जन्म होता है परन्तु इस प्रकार उत्पन्न प्रतिभावान माता-पिता में सामान्य अथवा न्यून कोटि के बीजकोष होते हैं जो उस संयोग की अपेक्षा जिससे उनका जन्म हुआ, हीन होते हैं, अत: इन माता-पिता के संयोग से बालक उत्पन्न होते हैं जिनमें निम्न कोटि के गुणों का प्रादुर्भाव हो जाता है।

2. प्रतिभावान माता अथवा पिता का दूसरे ऐसे व्यक्ति से समागम होता है जिसमें उसी के समान प्रतिभा उत्पादक तत्त्व नहीं होते तो इस समागम में उस प्रकार के उत्कृष्ट बीजकोषों का मेल नहीं हो सकता जैसा कि दो प्रतिभावान व्यक्तियों के संयोग से होता है। फलस्वरूप बालक उतना प्रतिभावान नहीं होगा।

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प्रश्न 6.
विषमलिंगीय किशोरों के विकास में क्या भिन्नताएँ पायी जाती हैं ?
उत्तर:
विषमलिंगीय किशोरों के विकास में भिन्नताएँ (Inter differences between opposit sex): किशोर एवं किशोरियों के विकास में भी अनेक भिन्नताएँ पाई जाती हैं जो कि उनके विकास दर में भिन्नताओं के कारण होती हैं।

किशोर लड़कियाँ (Adolescent Girls)

  • किशोर लड़कियों में विकास की दर आरम्भ में तीव्र होती है जो कुछ समय पश्चात् धीमी हो जाती है।
  • लड़कियों में पतली आवाज बदलकर भरी हुई और सुरीली हो जाती है। स्वर परिवर्तन लड़कों की अपेक्षाकृत स्वर में भारीपन आ जाता है।
  • लड़कियों को पूर्ण रूप से परिपक्व होने में लगभग तीन वर्ष तक का समय लगता है।
  • किशोर लड़कियों में यौन परिपक्वता शीघ्र आती है जिसके कारण उनका लड़कों के प्रति आकर्षण जल्दी होता है।
  • प्रारम्भिक किशोरावस्था में लड़कियाँ अपनी आयु के लड़कों से बड़ी दिखाई देती हैं।
  • उत्तर किशोरावस्था में आते-आते लड़कियाँ विकसित हो जाती हैं और अपनी आयु के लड़कों से अपेक्षाकृत छोटी लगने लगती हैं।

किशोर लड़के (Adolescent Boys)

  • किशोर लड़कों में विकास की दर आरम्भ में धीमी होती है जो बाद में तीव्र हो जाती है।
  • लड़कों में किशोरावस्था में आरम्भ में स्वर में परिवर्तन आने लगते हैं। उनके कम होता है।
  • लड़कों को पूर्ण रूप से परिपक्व होने में लगभग दो से चार वर्ष तक का समय लगता है।
  • किशोर लड़कों में यौन परिपवक्ता देर से आती है। प्रायः किशोरावस्था के अन्त में लड़के लैंगिक रूप से परिपक्व होते हैं।
  • प्रारम्भिक किशोरावस्था में लड़के अपनी आयु की लड़कियों से छोटे दिखाई देते हैं।
  • किशोरावस्था में लड़के पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं और अपना शारीरिक रूप व गठन प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 7.
व्यक्तियों में वातावरण किन आधारों से बनता है ?
उत्तर:
वातावरण (Environment): डारविन के सिद्धान्त ने यह बताया है कि वातावरण के अनुकूल अपने को व्यवस्थित करने के प्रयास में प्राणियों में कुछ स्वाभाविक शारीरिक परिवर्तन आ जाते हैं। ये परिवर्तन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संक्रमित होते हैं और दृढ़ होते हैं। कालान्तर में जीव का स्वरूप अपने मौलिक रूप से एकदम भिन्न हो सकता है। साधारण बोलचाल की भाषा में हम वातावरण का अर्थ अपने चारों तरफ की परिस्थितियों से लगाते हैं।

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डगलस (Dougles) और हालैण्ड (Holland) ने अपनी पुस्तक “एजूकेशनल साइकोलॉजी” में वातावरण शब्द की व्याख्या इस प्रकार की है-“वातावरण वह शब्द है जो समस्त बाह्यशक्तियों, प्रभावों और परिस्थितियों का सामूहिक रूप से वर्णन करता है, जो जीवधारी के जीवन, स्वभाव, व्यवहार, अभिवृद्धि विकास और प्रौढ़ता पर प्रभाव डालता है।”

वस्तुतः वातावरण के अन्तर्गत वह सभी कुछ सम्मिलित हैं जिनका व्यक्ति के मानसिक, नैतिक व आध्यात्मिक जीवन से सम्बन्ध है। किसी भी व्यक्ति के वातावरण के निम्नलिखित संघटक होते हैं, जो व्यक्तिगत भिन्नताओं के आधार हैं –

  • परिवार (Family)
  • साथी (Peer)
  • विद्यालय (School)
  • पास-पड़ोस (Neighbourhood)।

इन सबसे मिलकर ही व्यक्ति को सर्वांगीण विकास के लिए उचित मानसिक वातावरण (Mental Environment) तथा सामाजिक दायरा प्राप्त होता है।

मानसिक वातावरण (Mental Environment): बालक कुछ सहज योग्यताएँ लेकर जन्म लेता है। यदि उसे अनुकूल वातावरण के द्वारा कोई उपयुक्त उद्दीपन नहीं प्रदान किया जाता तो वे योग्याताएँ अपने प्राकृत स्वरूप में विकसित होती हैं। यद्यपि एक व्यक्ति की शारीरिक रचना, जैसे-लम्बाई, ठिगनापन आदि उसके वंशानुक्रम से निर्धारित होती हैं किन्तु यदि वे गन्दे वातावरण में कार्य करता है, जहाँ उसके शरीर को स्वस्थ वायु नहीं मिलती तो उसकी जीवन शक्ति के मर्म पर आघात होता है।

इसी प्रकार से बालक में किसी भी प्रकार की सम्भावनाएँ और योग्यताएँ क्यों न हों, जब तक उसे उचित मानसिक वातावरण नहीं मिलेगा वह उनका समुचित विकास नहीं कर सकता है। मानसिक वातावरण से हमारा तात्पर्य उन सभी परिस्थितियों से है जिनमें बालक का वांछित विकास हो सके और जो उसके मन पर प्रभाव डाल सके। एक छोटा परिवार जिसमें माता-पिता अपने बच्चों को प्यार करते हैं और उनकी सभी समस्याओं को दूर करने का प्रयत्न करते हैं बच्चों के व्यक्तित्व के विकास के लिए उत्तम मानसिक वातावरण प्रदान करते हैं।

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माता-पिता के पारस्परिक सम्बन्धों, आचरणों एवं विचारों का प्रभाव भी बच्चों पर पड़ता है। टूटे हुए परिवारों, माता-पिता के झगड़ों आदि का बच्चों के व्यक्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। विद्यालय के वातावरण का भी बच्चे पर बहुत प्रभाव पड़ता है। विद्यालय की वे सभी वस्तुएँ मानसिक वातावरण के अन्तर्गत आती हैं जिनसे बच्चे का समुचित विकास होता है।

बच्चे के समुचित विकास के लिए विद्यालय को बच्चे के शारीरिक विकास हेतु उचित वातावरण (खेलकूद, व्यायाम आदि) का प्रबन्ध करना चाहिए तथा मानसिक विकास के लिए उचित ‘मानसिक वातावरण का प्रबन्ध पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ, संघ या गोष्ठी द्वारा बच्चों में स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना पैदा की जा सकती है।

प्रत्येक शिक्षण संस्थान को अपने विद्यार्थियों के लिए एक स्वस्थ उपयुक्त मानसिक वातावरण प्रदान करना बहुत आवश्यक है क्योंकि केवल इसी से बच्चों का पूर्ण विकास सम्भव है। मानसिक वातावरण पर बच्चे के साथियों एवं पास-पड़ोस का प्रभाव भी पड़ता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह घर के बाहर पास-पड़ोस में तथा विद्यालय में साथी बनाता है। इन साथियों का समूह बनता है जो प्रायः आपस में एक साथ उठते-बैठते व खेलते हैं।

एक समूह में नियमित सदस्यों के अतिरिक्त एक नेता होता है जो समूह का नेतृत्व करता है। इन समूहों का उनके सदस्यों के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विद्यालय में भी बच्चे का जो समूह होता है उसका उसके व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। कई बार गलत संगति में पड़कर बच्चा कई असामाजिक कार्यों में भी फंस सकता है और उसमें अपराध की प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है। इसके विपरीत जिन बच्चों को अच्छा समूह और अच्छे साथी मिल जाते हैं, वे अपने जीवन में सफल होते हैं।

सामाजिक धरोहर (Social Heritage): किसी समाज की प्राचीन एवं अर्वाचीन संस्कृति ही उस सामाजिक समुदाय की धरोहर कहलाती है। वही उसकी सामाजिक सम्पत्ति होती है। यह सामाजिक धरोहर जाति की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित होती रहती है, किन्तु यह माता-पिता के बीजकोषों द्वारा संक्रमित न होकर रीति-रिवाजों, परम्पराओं, भाषा, साहित्य, शिष्टाचार और जातीय दर्शन द्वारा होती है।

किसी भी जाति की सामाजिक धरोहर उसके लिए गर्व का विषय होती है। जाति की प्रत्येक पीढ़ी इसे आगामी पीढ़ी में संक्रमित करती है और अपने सामाजिक जीवन को उनके अनुरूप बनाने की चेष्टा करती है, किन्तु इस हस्तान्तरण में प्रत्येक पीढ़ी में उस सामाजिक धरोहर में कुछ-न-कुछ और जुड़ जाता है।इस प्रकार संस्कृत का विकास होता रहता है और हर पीढ़ी के योगदान से उस जाति की संस्कृति का विकास होता रहता है। संस्कृति समृद्धशाली बनती है जो पुनः आगे की पीढ़ियों में संक्रमितहो जाती है।

व्यक्ति को सामाजिक धरोहर उसे उसके परिवार, शिक्षक अथवा साथियों द्वारा प्राप्त होती है। जिन बच्चों को उनके माता-पिता व शिक्षकों द्वारा उत्तम सांस्कृतिक दृष्टिकोण के कारण अपनी संस्कृति की वीरतापूर्ण गाथाएँ, साहित्य एवं कविताओं का ज्ञान प्राप्त होता है उनका व्यक्तित्व, उन बच्चों की अपेक्षा जिन्हें अपनी सांस्कृतिक धरोहर अथवा सामाजिक धरोहर का ज्ञान प्राप्त नहीं होता, बहुत उत्तम व सन्तुलित होता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Psychology संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
ज्ञानेन्द्रियों की प्रकार्यात्मक सीमाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
परिवेशीय ज्ञान अर्जित करने वाले सहायक के रूप में हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) के कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। ये परिवेश से प्राप्त सभी प्रकार की संवेदनाओं को मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्रों तक पहुंचाने का कार्य करती हैं, जहाँ संवेदनाओं की परिणामी व्याख्या की जाती है। हमारी ज्ञानेन्द्रियों की प्रकार्यात्मक सीमा पूर्व निर्धारित होती है। यह संवेदनाओं को अति उच्च एवं अति निम्न प्रखरता अथवा प्रबलता के कारण उन्हें ग्रहण नहीं कर पाती है।

अर्थात् ज्ञानेन्द्रियाँ कुछ सीमाओं में कार्य करने की क्षमता रखती है। जैसे हमारी आँख अति तीव्र प्रकाश से चमकने वाली वस्तुओं के सामने चकाचौंध में पड़कर स्पष्ट दृष्टि ज्ञान से वंचित रह जाती है तथा कम प्रकाश के कारण धूंधली आकृति वाली वस्तु को स्पष्टतः देख नहीं पाती है। दृष्टि की न्यूनतम दूरी 25 सेमी से नजदीक वाली वस्तु की देख पाने में असमर्थ हो जाती है। अतः ज्ञानेन्द्रियों के सफल उपयोग के लिए उद्दीपक में इस्टतम तीव्रता अथवा परिणाम का होना वांछनीय होता है।

मनोभौतिकी में संवेदनाओं तथा संवेदनग्राही के बीच के सम्बन्ध का अध्ययन करने की व्यवस्था रहती है। उद्दीपक का वह न्यूनतम मान या वचन जो किसी संवही तंत्र को क्रियाशील करने के लिए आवश्यक होता है उसे निरपेक्ष सीमा अथवा निरपेक्ष (A.L.) कहा जाता है। निरपेक्ष सीमा किसी निश्चित मान के रूप में प्रसारित नहीं की जा सकती है क्योंकि यह व्यक्तियों की आंतरिक दशाओं के आधार पर बदल भी सकते हैं। जैसे, चीनी के निश्चिन कणों क जल में मिलाने पर किसी व्यक्ति को वह मीठा प्रतीत होता है तो कुछ व्यक्तियों को मीठा का आभास भी नहीं होता है।

अत: उद्दीपकों (अथवा ज्ञानेन्द्रियों) के लिए प्रकार्यात्मक सीमा के लिए कोई सर्वमान्य पठन-संभव नहीं होता है। प्रकार्यात्मक सीमा के निर्धारण के लिए हमें परीक्षण के रूप में किये जाने वाले प्रयासों को कई बार प्रयुक्त किये जाने पर एक औसत मान के रूप में स्वीकार कर लेना होता है।

दो भिन्न उद्दीपकों के लिए प्रकार्यात्मक सीमा के मान में भिन्नता पाई जाती है जो उनकी पहचान बन जाती है जैसे, चुटकी भर नमक गलने का पानी खारा हो जाता है लेकिन उसी परिणाम में डाली गई चीनी का प्रभाव महसूस भी नहीं होता है। उद्दीपकों के लिए निर्धारित प्रकार्यात्मक सीमा का सही उपयोग तभी संभव होता है जब व्यक्ति के तंत्रिका तंत्र की प्रकृति का सही ज्ञान उपलब्ध नहीं होता है। ग्राही.अंग, तंत्रिका मार्ग, मस्तिष्क क्षेत्र का संरचनात्मक या प्रकार्यात्मक गुण-दोष के आधार पर ही ज्ञानेन्द्रियों के लिए प्रकार्यात्मक सीमा का निर्धारण उद्देश्यपूर्ण माना जाता है।

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प्रश्न 2.
प्रकाश अनुकूलन एवं तम-व्यनुकूलन का क्या अर्थ है? वे कैसे घटित होते हैं?
उत्तर:
प्रकाश पर आधारित दृष्टि नामक संवेदना हमारे लिए महत्त्वपूर्ण होता है। दृष्टि के लिए दंड और शंकु दृष्टि के ग्राही माने जाते हैं जहाँ दंड के लिए निम्न तीव्रता वाला प्रकाश चाहिए तो शंकु की क्रियाशीलता उच्च तीव्रता वाले प्रकाश में सक्रिय होती है। प्रकाश अनुकूलन तथा तम-व्यनुकूलन चाक्षुष व्यवस्था के दो रोचक गोचर हैं। पिण्ड पर पड़नेवाले प्रकाश के परिमाण अथवा तीव्रता में आनेवाले आकस्मिक परिवर्तन या अन्तर को नेत्र तुरंत स्वीकार नहीं करता है।

खुले मैदान से बन्द कमरे में पहुंचते ही वस्तु ठीक-ठीक दिखाई नहीं पड़ता है जबकि कुछ देर बाद हम किताब पढ़ने लग जाते हैं। इस प्रकार अधिकार में बैठा व्यक्ति बल्ब के जला दिये जाने पर कुछ क्षण तक चकाचौंध के चक्कर में पड़ जाता है। उसे बल्ब के प्रकाश में कुछ भी देखने की क्षमता समाप्त होती हुई प्रतीत होती है। प्रकाश की तीव्रता के परिवर्तन का नेत्र स्नायु पर पड़ने वाले प्रभाव से जुड़ा यह (चाक्षुष अनुकूलन) प्रकाश अनुकूलन तथा तम-व्यनुकूलन है। प्रकाश की विभिन्न तीव्रताओं के साथ सर्मजन करने की प्रक्रिया को ‘चाक्षुष अनूकूलन’ कहते हैं।

1. प्रकाश अनुकूलन:
प्रकाश की तीव्रता के बढ़ जाने से उत्पन्न प्रभाव के साथ नेत्र स्नायु का सामयोजन करने की प्रक्रिया को प्रकाश अनुकूलन कहा जाता है। अंधकार से प्रकाश में आने पर इस प्रकार के समायोजन की आवश्यकता होती है। प्रकाश समायोजन की इस प्रकार की प्रक्रिया में लगभग एक से दो मिनट का समय लग जाता है।

2. तम-व्यनुकूलन:
प्रकाश की तीव्रता के हठात घट जाने से उत्पन्न प्रभाव के साथ नेत्र-स्नायु का समायोजन करने की प्रक्रिया को तम-व्यनुकूलन कहा जाता है। तीव्र प्रकाश के प्रभावन के बाद मंद प्रकाश वाले वातावरण से समायोजन की स्थिति हम-व्यनुकूलन का एक प्रमुख लक्षण है। इस श्रेणी के समायोजन में लगभग आधा घंटा का समय लग जाता है। चाक्षुष अनुकूलन (प्रकाश अनुकूलन तथा तम-व्यनुकूलन) के कारण-चाक्षुष अनुकूलन के भौतिक कारण पुतली के छिद्रों के बढ़ने या घटने से रेटीना पर पहुँचने वाले प्रकाश का परिमाण है।

तीव्र या मंद प्रकाश का किसी स्थायी स्थिति में नेत्र की पुतली का छिद्र प्राप्त होने वाले प्रकाश की तीव्रता के आधार पर अपना आकार निश्चित कर लेता है। प्रकाश की तीव्रता में द्रुत परिवर्तन होने से पुतली का बढ़ा छेद अधिक प्रकाश को भेजकर चकाचौंध की स्थिति ला देता है तथा पुतली का छोटा छेद कम प्रकाश पाने के कारण अंधकार की स्थिति उत्पन्न कर देता है। प्रकाश की तीव्रता की नई स्थिति में पुनः समायोजन की आवश्यकता हो जाती है जिसमें कुछ समय लग जाता है।

प्राचीन मत के अनुसार चाक्षुष अनुकूलन का कारण प्रकाश-रासायनिक प्रक्रिया है। दृष्टि पटल में स्थित प्रकाश संवदी कोशिकाओं से बना दण्ड (rods) एक प्रकाश संवदेनशील पदार्थ (रेडोप्सिन या चाक्षुष पर्पल) से युक्त होता है। प्रकाश के प्रभाव में आकर रोडोप्सिन के अणु टूट जाते हैं। इन दशाओं में प्रकाश अनुकूलन की क्रिया सम्पन्न होती है। प्रकाश की कमी होने पर विटामिन ‘ए’ की सहायता से दंडों में वर्णक पुनरुत्पादित करने हेतु पुनःस्थापन की प्रक्रिया चलने लगती है। इसी कारण विटामिन ‘ए’ की कमी से रतौंधी रोग हो जाते हैं। शंकुओं में आयडोप्सिन नामक रासायनिक पदार्थ पाये जाते हैं।

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प्रश्न 3.
रंग दृष्टि क्या है तथा रंगों की विमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
परिवेश में देखी जाने वाली वस्तुओं की पहचान में उसका रंग एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। रंग हमारी संवेदी अनुभवों में एक विशिष्ट स्थान रखता है। रंग की पहचान तो नेत्रानुभव की बात है किन्तु उसे व्यक्त करने के लिए अलग-अलग रंगों के लिए उनके तरंगदैर्घ्य को बताना स्पष्ट परिचय देने में सहयोग करता है। बात है कि दृश्य वर्णपट का ऊर्जा परास 300-380 नैनोमीटर होता है जो विस्तृत क्षेत्र का सूचक हे। इस तुलना में हमारे नेत्र की क्षमता ही कम होती है।

दृश्य वर्णपट के रंगों के तरंगदैर्ध्य से कम या अधिक मान वाले तरंगदैर्घ्य वाली किरणें आँखों को नुकसान पहुंचा सकती है। जैसे अवरक्त किरणें तथा पराबैगनी किरणों के तरंगदैर्ध्य क्रमशः दृश्य किरणों से कम तथा अधिक होती है। सूर्य के प्रकाश में संयुक्त सात रंगों (वैनीआहपीनाला या VIBGYOR) को आधार मानकर हम वस्तुओं को विभिन्न रंगों से पहचानते हैं। रंग दृष्टि का सामान्य अर्थ है दृश्य किरणों, अवरक्त किरणों तथा पराबैगनी किरणों में अन्तर समझना तथा दृश्य वस्तुओं को देखकर उनके रंगों की व्याख्या करना या प्रभाव बतलाना।

प्रकाश की किरणों के रंगों में एक रोचक संबंध होता है। तीन मूल रंगों (लाल, नीला तथा पीला) से उत्पन्न अनेक रंगों (बैंगनी, आसमानी, हरा आदि) की उपस्थिति का भी प्रभाव हम पर पड़ता है। फोन से भेजे गये संदेशों के लिए उत्पन्न आवाज की प्रकृति तथा उसके रंग हमारे जीवन पद्धति में अन्तर कर सकते हैं। किसी वस्तु को ध्यान से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि रंगों की सही उपयोगिता क्या है? दृष्टि स्नायु के द्वारा ग्रहण किये गये प्रकाशीय अंश अपने रंगों के आधार पर रंग की विशेषताओं को व्यक्त करता है।

प्रश्न 4.
श्रवण संवेदना कैसे घटित होता है?
उत्तर:
श्रवण एक महत्त्वपूर्ण संवेदन प्रकारता है जहाँ ध्वनि कान के लिए उद्दीपक की उत्पत्ति बाह्य वातावरण में दाब विभिन्नता के कारण होती है। यह वायु में एक विशेष प्रकृति का विक्षोभ (बाधा) उत्पन्न करते हुए वायु अणुओं को आगे-पीछे करके दाब में परिवर्तन को जारी रखती है। सामान्य ध्वनि तरंग एकल रूप में दाब में अनुक्रमिक परिवर्तन करती है। ध्वनि तरंग शृंग तथा गर्न की रचना करते हुए फैलाता है।
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कुछ विशेष दशाओं में ध्वनि तरंगों का निर्माण मूल रूप से संपीडन और विसंपीडन (विरलन) के कारण होता है। संपीडन से विरलन पुनः विरलन से संपीडन की आवृत्ति के कारण वायु के दाब में पूर्ण परिवर्तन से एक तरंग चक्र का निर्माण होता है। श्रवण संवेदना के घटित होने का प्रमुख कारण श्रृंग, गर्त अथवा संपीडन-विरलन के द्वारा किये जाने वाला दाब-परिवर्तन को माना जा सकता है। ज्ञात है कि ये एकान्तर क्रम में सक्रिय होकर दाब परिवर्तन के द्वारा संवेदना के प्रभावित करते हैं जहाँ आवृत्ति तथा तरंगदैर्ध्य में प्रतिलोम संबंध होता है। इस घटना का सीधा संबंध ध्वनि की तीव्रता, तारत्व तथा स्वर विशेषता से होती है। आवृत्ति ध्वनि तरंगों के तारत्व को निर्धारित करता है।

श्रवण संवेदना तब प्रारम्भ होती है जब ध्वनि हमारे कान में प्रवेश करती है तथा सुनने के प्रमुख अंगों को उद्दीप्त करती है। कान श्रवण उद्दीपकों का प्राथमिक ग्राही होता है। पिन्ना ध्वनि कंपन को एकत्रित करके श्रवण द्वारा कर्ण पटल तक पहुँचाती है। टिम्पैनिक गुहिका में स्थित तीन छोटी-छोटी अस्तिकाओं (निहाई, टिकाव और हथोड़ा) को प्रभावित करते हुए ध्वनि तरंग आंतरिक कान तक पहुँच जाती है।

कॉक्लिया के द्वारा ग्रहण किया गया ध्वनि तरंग कंपन के रूप में अंतर्लसिका में गतिमान होता है जो कोर्ती अंक में उत्पन्न कंपन का कारण भी होता है। उत्पन्न कम्पन्न से श्रवण तंत्रिका और श्रवण वल्कुट भी प्रभावित होता है। इस प्रकार हमें श्रवण संवेदनाओं का स्पष्ट ज्ञान मिल जाता है ओर आवेग की व्याख्या करके संवाद को समझते हैं।

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प्रश्न 5.
अवधान को परिभाषित कीजिए। इसके गुणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अवधान की परिभाषा-दो या अधिक उद्दीपकों में से कुछ वांछनीय उद्दीपकों के चयन से संबंधित मानसिक प्रक्रिया को अवधान कहा जाता है। अतः अवधान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक विशेष शारीरिक मुद्रा बनाकर किसी वस्तु को चेतना केन्द्र में लाने के लिए तत्परता दिखाता है। अवधान के गुण-अवधान की प्रमुख विशेषताएँ अथवा उसके गुण निम्नलिखित हैं –

  1. अवधान का संबंध तीन प्रमुख तत्वों सतर्कता, एकाग्रता तथा खोज से पूर्णत: स्थापित रहता है।
  2. अवधान का एक केन्द्र और एक किनारा होता है जहाँ जानकारी को क्रमशः केन्द्रित रूप में तथा धुंधले रूप में माना जाता है।
  3. अवधान का स्वरूप चयनात्मक होता है।
  4. अवधान में विभाजन का गुण होता है।
  5. अवधान में अस्थिरता तथा उच्चलन का गुण भी मन्मिाहत होता है।
  6. अवधान की विस्तृति सीमित होती है।
  7. अवधान में व्यक्ति की प्रेरणा तथा इच्छा का प्रमुख स्थान होता है।
  8. अवधान के दो रूप प्रमुख हैं-चयनात्मक तथा संधृत अवधान।
  9. अवधान के लिए आकस्मिक एवं तीव्र उद्दीपकों में ध्यानाकर्षण की अद्भुत क्षमता होती है।

प्रश्न 6.
चयनात्मक अवधान के निर्धारण का वर्णन कीजिए। चयनात्मक अवधान संधृत अवधान से किस प्रकार भिन्न होता है?
उत्तर:
चयनात्मक अवधान का सामान्य उद्देश्य उद्दीपकों में से कुछ उद्दीपकों का चयन करना होता है। किसी समय विशेष में हम सीमित संख्या में उद्दीपकों पर विशिष्ट ध्यान रख सकते हैं। उद्दीपकों में से कुछ को अधिक महत्त्व देकर चयन तथा प्रकरण करने के क्रम में निम्नलिखित निर्धारण प्रभावकारी कारक की भूमिका निभाते हैं। चयनात्मक अवधान को प्रभावित करने वाले कारक-सामान्य उद्दीपकों की विशेषताओं तथा संबंधित व्यक्तियों की दक्षता पर निर्धारक के दो रूप होते हैं –
(क) बाह्य कारक तथा
(ख) आंतरिक कारक

(क) बाह्य कारक (वस्तुनिष्ठ निर्धारक):

(i) आकार:
जो उद्दीपक आकार में बड़ा होता है व्यक्ति के अवधान में शीघ्रता से आ जाता है। यही कारण है कि समाचार-पत्रों में समाचार के मुख्य बिन्दुओं को बड़े आकार वाले अक्षरों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। ग्राहकों को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए बड़े नमूने बड़े साइनबोर्ड तथा बड़े दरवाजे का उपयोग किया जाता है।

(ii) उद्दीपन की तीव्रता:
द्युतिमान (चमकता हुआ) पिण्ड लोगों को सरलता से आकृष्ट कर लेते हैं। अधिक तीव्र उद्दीपन कम तीव्र उद्दीपन की अपेक्षा व्यक्ति का ध्यान जल्द और सरलता से अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। भिन्न-भिन्न रंगों वाले प्रकाश, नये चमकीले पोशाक, देहरे की द्युति, सफेद कपड़े को नील देकर चमकाना आदि अधिक आकर्षक बने होने का प्रमाण है जिससे लोग नहीं चाहकर भी उन वस्तुओं की ओर देख ही लेते हैं।

(iii) गतिशील उद्दीपक:
गतिशील उद्दीपक हमारे अवधान में शीघ्रता से आ जाते हैं। मंच को सजाने के लिए ऐसे बल्बों को निश्चित क्रम में जोड़ा जाता है जिससे वे घूमते हुए प्रतीत हों। आसमान में गतिमान जहाज देखने के लिए लोगों का ध्यान आकाश की ओर चला जाता है। सिनेमाघरों में चलते-नाचते चित्रों को देखने के लिए भारी भीड़ जुटती है।

(iv) उद्दीपन का स्वरूप:
बन्दूक के आकार वाली पिचकारी, शेर की आकृति वाला लेमन जूस, अप्सरा के स्वरूप वाली गुड़िया आदि इस बात के प्रमाण हैं कि व्यक्ति की वस्तु की आकृति या स्वरूप भी ध्यान खींचने का काम करता है।

(v) आकस्मिक एवं तीव्रता:
सहसा परिवर्तन से व्यक्ति चौंक जाता है। मेघ गर्जन, वाहन का हॉर्न, अचानक रेडियों का बजना आदि की तरह अचानक उत्पन्न ध्वनि या प्रकाश लोगों को उस ओर कुछ देखने को प्रेरित कर देते हैं। अचानक गाड़ी के रुकने या किसी पड़ोसी के घर में हल्ला की आवाज सुनना अवधान का कारण बन जाता है।

(vi) उद्दीपन की अवधि:
मालिक के इनकार किये जाने पर भी कर्मचारी का खड़ा रह जाना मालिक को उसके बारे में कुछ अधिक सोचने को मजबूर होना पड़ता है। अतः किसी विशेष उद्दीपन का देर तक उपस्थित रह जाना गहरे प्रभाव का कारण बन जाता हैं।

(vii) उद्दीपन की नवीनता:
ग्रामीण क्षेत्र में मारुति कार को देखने बच्चे दौड़ पड़ते हैं। यदि किसी पदाधिकारी को खेत में कुदाल चलाते पाया जाता है, सदैव धोती-कुरता पहनने वाला पैंट-शर्ट पहनकर बाहर निकल जाता है, उन नई स्थितियों के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ जाता है। अत: कोई व्यक्ति एकरसता से बचने के लिए नया दृश्य देखने में अधिक रुचि प्रकट करता है।

(viii) उद्दीपन की पुनरावृत्ति:
दरवाजे पर किसी लड़के का बार-बार आना, टी.वी. किसी पर निश्चित विज्ञापन को बार-बार दिखाना उसके महत्त्व को बढ़ाने का कारण बन जाता है। अत: किसी उद्दीपन की पुनरावृत्ति भी ध्यान खींचने का एक प्रत्यक्ष कारण है।

(ix) मानसिक तत्परता:
किसी के आने की प्रतीक्षा में बैठा व्यक्ति थोड़ी-सी आहट पाकर सतर्क हो जाता है। परीक्षा के निकट आते ही प्रमुख प्रश्नों के उत्तर को दुहरा लेने के लिए छात्र तत्परता दिखाते हैं।

(ख) चयनात्मक अवधान के आंतरिक कारक:

(i) अभिप्रेरणात्मक कारक:
जैविक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की ओर व्यक्ति का ध्यान आकर्षित हो जाता है। घर से भागा हुआ बालक, भूख से तडपता भिखारी किसी भी व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर खींचने में समर्थ होता है। चुनाव के समय किसी विशिष्ट नेता को देखने तथा उसके भाषण सुनने निजी काम को छोड़कर भी उमड़ती भीड़ में शामिल हो जाते हैं।

(ii) संज्ञानात्मक कारक:
संज्ञानात्मक कारक के तीन प्रबल पक्ष होते हैं-अभिरुचि, अभिवृत्ति तथा पूर्व विन्यास।

(क) अभिरुचि:
देहाती मेले में बच्चे मनपसन्द खिलौने की दुकान खोजते हैं, मनोरंजन प्रेमी व्यक्ति किसी शहर में पहुँचकर सबसे पहले सिनेमा की खबर जानना चाहता है। अर्थात् व्यक्ति अपनी अभिरुचि की वस्तुओं की ओर जल्द और जरूर आकर्षित होते हैं।

(ख) अभिवृत्ति:
जिन वस्तुओं अथवा घटनाओं के प्रति अनुकूल दृष्टि रखते हैं, उन पर शीघ्रता से ध्यान चला जाता है। खेल में रुचि रखनेवाला कमेन्ट्री सुनकर संचार साधनों के प्रति आकर्षण प्रकट करता है।

(ग) पूर्व विन्यास:
पूर्व विन्यास के अन्तर्गत एक प्रेरक दशा के द्वारा ध्यानाकर्षण के लिए प्रेरित बल लगाना माना जाता है। यदि एक साथी दूसरे से कहता है अमुक गाँव में आज नाटक खेला जा रहा है तो श्रोता साथी साथ चलने की तैयार हो जाता है। इसके अतिरिक्त, अवधान को प्रभावित करने वाले कारकों में आंतरिक कारकों के रूप में मनोवृत्ति, आवश्यकता, जिज्ञासा, अर्थ, लक्ष्य, प्रशिक्षण, मनोभाव आदि का भी प्रभाव देखने को मिलता है। आवेगशीलता, अधिक पेशीय सक्रियता तथा अवधान की अयोग्यता जैसे विकार की प्रमुख विशेषता संधृत अवधान में मिलती है।

चयनात्मक अवधान और संधृत अवधान में भिन्नता-प्रक्रिया-उन्मुख विचार की दृष्टि से अवधान को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया जा सकता है –

(क) चयनात्मक अवधान और
(ख) संधृत अवधान

अवधान के दोनों प्रमुख वर्गों में निम्नलिखित भिन्नता पाई जाती है –
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प्रश्न 7.
चाक्षुष क्षेत्र के प्रत्यक्षण के संबंध में गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों की प्रमुख प्रतिज्ञाप्ति क्या है?
उत्तर:
चाक्षुष क्षेत्र विविध प्रकार के अंशों (बिन्दु; रेखा, रंग आदि) का समूह होता है किन्तु इन अंशों को संगठित रूप में देखा जाता है। गेस्टाल्ट (एक नियमित आकृति) मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हम विभिन्न उद्दीपकों को विविक्त अंशों के रूप में नहीं देखते हैं, बल्कि एक संगठित समग्र के रूप में देखते हैं। किसी वस्तु का रूप उसके समग्र में होता है जो उनके अंशों के योग से भिन्न होता है क्योंकि हमारी प्रमस्तिष्कीय प्रक्रियाएँ हमेशा अच्छी आकृति का प्रत्यक्षण करने के लिए उन्मुख होती है।

आकृति की कुछ विशेषताएँ उल्लेखनीय होती हैं, जैसे –

  1. आकृति का एक निश्चित रूप होता है।
  2. आकृति अपनी पृष्ठभूमि की अपेक्षा अधिक संगठित होता है।
  3. आकृति की स्पष्ट परिरेखा होती है।
  4. आकृति अधिक स्पष्ट होती है।

गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों ने चाक्षुष क्षेत्र में उद्दीपक को अर्थवान बनाने तथ संगठित रूप से देखे जाने के संबंध में कुछ महत्त्वपूर्ण नियमों अथवा सिद्धान्तों को प्रतिज्ञप्ति के रूप में प्रस्तुत किया है जो निम्नलिखित हैं –

1. निकटता का सिद्धान्त:
परस्पर निकट पाने वाली वस्तुएँ एक समूह के रूप में दिखाई देती हैं। अंकित चित्र में बिन्दुओं को श्रृंखला के रूप में देखा जा सकता है, अर्थात् ये बिन्दुओं के एक समूह के रूप में प्रकट होते हैं।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ img 3
चित्र: निकटता

2. समानता का सिद्धान्त:
कुछ विशिष्ट बिन्दुओं को समान क्रम में सजाने पर वे एक समूह के रूप में प्रत्यक्षित होते हैं यदि वे बिन्दुएँ आकृति और विशेषताओं में समान होते हैं। प्रस्तुत चित्र में छोटे वृत्तों एवं वर्गों को इस प्रकार सजाकर रखा गया है ताकि वे संगठित रूप में एक वर्ग दिखाई दें।
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चित्र: समानता
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ img 5
चित्र: निरंतरता

3. निरंतरता का सिद्धान्त:
एक सतत प्रतिरूप में वस्तुओं को सजाकर रखा जाता है तो उनका प्रत्यक्षण एक-दूसरे से संबंधित के रूप में प्राप्त किये जाते हैं। परस्पर काटती हुई दो रेखाएँ अ-ब तथा स-द को देखने पर यह अभ्यास होता है कि चार रेखाओं का मिलन-बिन्दु ‘स’ है।

4. लघुता का सिद्धान्त:
बड़े पृष्ठभूमि की तुलना में कोई छोटी आकृति स्पष्टतः देखी जा सकती है।

5. सममिति का सिद्धान्त:
असममिति पृष्ठभूमि की तुलना में सममिति क्षेत्र आकृति के रूप में देखी जा सकती है।

6. अविच्छिनता का सिद्धान्त:
जब एक क्षेत्र कई अन्य क्षेत्रों के मध्य घिरा होता है तो वह क्षेत्र एक स्पष्ट आकृति के रूप में देखी जा सकती है।

7. पूर्ति का सिद्धान्त:
किसी उद्दीपन में यदि कुछ अंश में अस्पष्ट या लुप्त रह जाते हैं तो उसे पूरा कर देने पर उनकी आवलेति अलग-अलग भागों की जगह एक समग्र आकृति के रूप में दिखाई देती है। प्रस्तुत चित्र में तीन छोटे-छोटे कोणों को इस प्रकार सजाकर रखा गया है कि वे निकट होने के बावजूद अलग-अलग दिखें जिसमें उनके छोटे-छोटे खाली अंश कारण है। यदि इन छोटे अंशों को पूरा कर दिया जाये तो ये तीनों आकृतियों मिलकर एक त्रिभुज के रूप में देखे जा सकते हैं।
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चित्र: पूर्ति

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प्रश्न 8.
स्थान-प्रत्यक्ष कैसे घटित होता है?
उत्तर:
हमारी प्रमस्तिष्कीय प्रक्रियाएँ हमेशा अच्छी आकृति का प्रत्यक्ष करने के लिए उन्मुख होते हैं। मानव जाति जगत का एक संगठित समग्र के रूप में देखती है। उसे पता है कि आकृति का एक निश्चित रूप होता है तथा वे पृष्ठभूमि से अलग दिखने के लिए प्रस्तुत रहते हैं। चाक्षुष क्षेत्र या सतह जहाँ वस्तुएँ रहती हैं वह तीन विमाओं से संगठित होता है।

प्रत्यक्षण कारक किसी स्थान पर रखी वस्तु को जब देखती है तो वह विभिन्न वस्तुओं को मात्र आकार, रूप, दिशा (स्थानिक अभिलक्षण) पर ही ध्यान नहीं देता बल्कि अपनी बुद्धि एवं चेतना के माध्यम से उस स्थान में पाई जानेवाली सभी वस्तुओं के बीच की दूरी को भी महसूस करके निर्धारित वस्तुओं की एक सच्ची प्रतिमा का निर्माण करने में सफल हो जाता है।

यद्यपि हमारे दृष्टि पटल पर वस्तुओं की प्रक्षेपित प्रतिमाएँ समतल तथा द्विविम होती हैं जिसके चलते हम वस्तुओं के बाएँ, दाएँ, ऊपर, नीचे की वस्तुस्थिति से अवगत होते हैं, परन्तु प्रत्यक्ष के अधिक उद्देयपूर्ण बनाने के लिए हम स्थान में तीन विमाओं का प्रत्यक्ष करते हैं। चूंकि हम द्विविम दृष्टिपटलीय दृष्टि को त्रिविम अर्थात् स्थान प्रत्यक्षण को सफल बनाने हेतु मनोवैज्ञानिक संकेतों तथा अर्जित अनुभवों का प्रयोग करके सभी तीन विमाओं के सम्बन्ध में वांछनीय जानकारियों को जमा करते हैं।

प्रश्न 9.
गहनता प्रत्यक्षण के एकनेत्री संकेत क्या हैं? गहनता प्रत्यक्षण में द्विनेत्री संकेतों की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
किसी वस्तु के प्रत्यक्ष के क्रम में जगत को तीन विमाओं से देखने की प्रक्रिया को दूरी अथवा गहनता प्रत्यक्षण कहते हैं जो दैनिक जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। जैसे ध्पनि की तीव्रता के आधार पर श्रोता भी वक्ता के बीच की दूरी का अन्दाज लगाया जाता है। किसी वस्तु को एक नेत्र के देखने के क्रम में गहनता प्रत्यक्षण के लिए एकनेत्री संकेत प्रभावी होता है। द्विविस सतहों में गहराई अथवा दूरी का निर्णय लेने में एकनेत्री संकेत उपयोगी होता है। एकनेत्री संकेतन से संबंधित कुछ विशिष्ट लक्षण निम्नलिखित होते हैं –

1. सापेक्ष आकार:
वस्तु के दूर जाते समय दूरी के बढ़ने के साथ-साथ दृष्टि पटलीय प्रतिमा का आकार छोटा होता है। अतः छोटी दिखने वाली वस्तु के लिए दूर में स्थित के रूप में उसका प्रत्यक्षण करते हैं।

2. आच्छादन अथवा अतिव्याप्ति:
जो वस्तु आच्छादित होती है वह दूर तथा जो वस्तु आच्छादन करती है वह निकट दिखाई देती है।

3. रेखीय परिप्रेक्ष्य:
रेल की पटरियां, बीच की दूरी के समान होने पर भी दूरी बढ़ने पर एक-दूसरे से मिलती हुई प्रतीत होती है।

4. आकाशी परिपेक्ष्य:
दूर की वस्तुएँ धुंधली या अस्पष्ट दिखती है।

5. प्रकाश एवं छाया:
वस्तु के प्रकाशित भाग एवं छाया के आधार पर उसकी दूरी या स्थिति की जानकारी मिलती है।

6. सापेक्ष ऊँचाई:
जो वस्तु बड़ी प्रतीत होती है वह छोटी दिखाई देने वाली वस्तु से अधिक लम्बी होती है।

7. रचना गुण प्रवणता:
जिस चाक्षुष क्षेत्र में कोई वस्तु सघनता के साथ प्रकट होती है वह विरल प्रतीत होने वाली वस्तु की अपेक्षा अधिक दूरी पर होती है।

8. गति दिगंतराभास:
गति दिगंतराभास को एक गतिम एकनेत्री संकेत माना जाता है निकट की वस्तुओं की अपेक्षा दूरस्थ वस्तुएँ धीरे-धीरे गति करती हुई प्रतीत होती हैं। अत: वस्तुओं की गति की दर उसकी दूरी का एक संकेत प्रदान करती है। गहनता प्रत्यक्षण में द्विनेत्री संकेत की भूमिका-किसी वस्तु को दोनों नेत्रों से देखने पर त्रिविम स्थान में गहनता प्रत्यक्षण के कुछ संकेत मिलते हैं। द्विनेत्री संकेत के तीन प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं:

9. दृष्टि परीक्षण अथवा द्विनेत्री असमता:
दोनों आँखों से किसी वस्तु को देखने पर संभव है कि दोनों रेटिना पर प्रक्षेपित प्रतिमाएँ कुछ भिन्न हों। दूर की वस्तुओं के लिए प्रतिमाओं की असमता कम होती है जबकि निकट की वस्तुओं की असमता अधिक होती है।

10. अभिसरण:
निकट की वस्तुओं को दोनों आँखों से देखने पर हमारी आँखें अन्दर की और अभिसरित होती हैं जिससे प्रतिमा प्रत्येक आँख की गर्तिका पर आ सके। जैसे-जैसे वस्तु प्रेक्षक से दूर होती जाती है, वैसे-वैसे अभिसरणं की मात्रा घटती जाती है।

11. समंजन:
दोनों नेत्रां के प्रयोग से सम्बन्धित एक विशिष्ट प्रक्रिया, जिसमें पक्ष्माभिकी पेशियों की सहायता से हम प्रतिमा को दृष्टि पटल पर फोकस करते हैं। जैसे ही वस्तु निकट आती है, मांसपेशियों में संकुचन की क्रिया होने लगती है तथा लेन्स की सघनता बढ़ती जाती है। दूरी बढ़ने पर मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं।

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प्रश्न 10.
भ्रम क्यों उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
किसी वस्तु के लिए प्रत्यक्षण से प्राप्त जानकारी तथा ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त सूचनाओं में भिन्नता प्रकट होने को भ्रम माना जाता है। जैसे-रस्सी को साँप मान लो, मालिक समझकर नौकर का पैर छू लेना भ्रंश का उदाहरण माना जा सकता है। संवेदी सूचनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाने के कारण भ्रम नामक गलतफहमी उत्पन्न हो जाती है। गलत प्रत्यक्षण अथवा बाह्य उद्दीपन की स्थिति में दोष, अनुभव की कमी अथवा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त सूचनाओं की गलत व्याख्या से प्राप्त होनेवाले गलत प्रत्यक्ष के कारण भ्रम उत्पन्न होते हैं।

प्रेक्षक की योग्यता, अनुभव और सही समझ का अभाव भी भ्रम उत्पन्न होने के कारण माने जाते हैं। कुछ शारीरिक कमजोरियों तथा परिवार का अस्वाभाविक हो जाना (अंधकार, वर्षा) भ्रम के कारण बन जाते हैं। कभी-कभी पूर्वनिर्धारित योजना या समय में अन्तर आने से भी भ्रम उत्पन्न हो जाते हैं। जैसे, नियत समय रोज आनेवाले डाकिया के बदले कोई दूसरे व्यक्ति को भी डाकिया समझ लेना, घंटी बजाने पर रोज भोजन की थाली मिलते रहने की स्थिति में घंटी बजने पर नौकर के हाथ की किताब को भी थाली समझ लेना स्वाभाविक भ्रम है। अर्थात् भ्रम कारण प्रेक्षक, ज्ञानेन्द्रियों, स्थितियों में आनेवाले अन्तर के साथ-साथ प्राप्त सूचनाओं की गलत व्याख्या भी है।

प्रश्न 11.
सामाजिक-सांस्कृतिक कारण हमारे प्रत्यक्षण को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ अपने बाह्य अथवा आंतरिक जगत के संबंध में मूल सूचना प्रदान करती हैं। प्राप्त ज्ञान के आधार पर अनेक भौतिक उद्दीपकों के संबंध में वांछनीय जानकारी संग्रह करते हैं। ज्ञानेन्द्रियों के उद्दीपनों के परिणामस्वरूप हम प्रकाश की क्षण दीप्ति अथवा ध्वनि अथवा घ्राण का अनुभव करते हैं। ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त सूचनाओं के बारे में उचित व्याख्या करके सूचना को अर्थवान बनाने का प्रयास किया जाता है जिसमें सामाजिक-सांस्कृतिक कारक की सहायता ली जाती है। वस्तुओं अथवा घटनाओं को पूर्णतः पहचानने के क्रम में निम्न बातें स्पष्ट होती हैं –

  1. प्रत्यक्षणकर्ता की आवश्यकताएँ एवं इच्छाएँ उसके प्रत्यक्षण को अत्यधिक प्रभावित करती हैं।
  2. किसी दी गई स्थिति में हम जिसका प्रत्यक्षण कर सकते हैं उसकी प्रत्याशाएँ भी हमारे प्रत्यक्षण को प्रभावित करती हैं।
  3. हम जिस तरह पर्यावरण का प्रत्यक्षण करते हैं, उसे प्रयोग में लाई जाने वाली शैली (संज्ञानात्मक) भी प्रभावित करती है।
  4. विभिन्न सांस्कृतिक परिवेशों में लोगों को उपलब्ध विविध अनुभव एवं अधिगम के अवसर पर भी उनके प्रत्यक्षण को प्रभावित करते हैं। जैसे, चरित्रविहीन परिवेश से आनेवाले लोग कलात्मक चित्रों के माध्यम से प्रकट किये जाने वाले भावनात्मक संदेश को नहीं समझ पाते हैं।
  5. स्थान, क्षेत्र, योग्यता, दशा, स्थिति आदि मानवीय विषमताओं से भी प्रत्यक्षण स्पष्टता प्रभावित करता है। जैसे, शहरी लोगों की तुलना में जंगली लोग कंम्प्यूटर के संबंध में बहुत कम जानकारी व्यक्त करते हैं। संगीत का जानकार किसी वाद्य-यंत्रों से उत्पन्न ध्वनि में लय का पता लगा सकता है। भूखा व्यक्ति दो और दो का योगफल चार रोटियाँ बतलाना है, चार कलम नहीं।
  6. प्रत्यक्षण की प्रक्रिया में प्रत्यक्षणकर्ता की अहम भूमिका होती है। उनमें इतना क्षमता तो होनी ही चाहिए कि लोगों के द्वारा व्यक्त प्रत्युत्तरों में से सार्थक सूचनाओं को छोर सके।
  7. लोग अपनी व्यक्तिगत, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों के आधार पर उद्दीपकों का प्रक्रमण एवं व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। इनमें उचित संशोधन की आवश्यकता होती है।
  8. गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के द्वारा दिये गये सिद्धान्तों (निकटता, समानता, निरंतरता, लघुता, सममिति का सिद्धान्त) प्रत्यक्षण के लिए आवश्यक तत्त्वों की जानकारी देते हैं।
  9. प्रत्यक्षण के लिए एकनेत्री संकेत तथा द्विनेत्री संकेतों की उपयोगिता आवश्यक मनोवैज्ञानिक संकेत है।
  10. प्रत्यक्षण के लिए द्विविम तथा त्रिविम सतहों का अध्ययन उपयोगी सिद्ध होता है।
  11. प्रत्यक्षण पर लोगों की रुचि और संस्कार के साथ-साथ आवास तथा पेशा (नौकरी, दूकानदारी) से प्राप्त अनुभव और प्रतिक्रिया का ध्यान रखना आवश्यक होता है।

अतः सामाजिक-सांस्कृतिक कारक हमारे प्रत्यक्षण को प्रत्यक्षतः प्रभावित करते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संवेदना किस प्रकार की मानसिक प्रक्रिया है?
उत्तर:
संवेदना सरल एवं ज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 2.
संवेदना के गुण कौन-कौन हैं?
उत्तर:
टिचनर से संवेदना के चार गुणों की चर्चा की है। प्रकार, तीव्रता, स्पष्टता तथा संताकाल इसके अलावा स्टाउट ने दो और गुणों की चर्चा की है-विस्तार तथा स्थानीय चिन्ह।

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प्रश्न 3.
श्रवण संवेदन का संबंध किससे रहता है?
उत्तर:
श्रवण संवेदन का संबंध शंखपालि से रहता है।

प्रश्न 4.
कोई संवेदना किस न्यूरॉन से प्राप्त होती है?
उत्तर:
कोई संवेदना संवेदी न्यूरॉन से प्राप्त होती है।

प्रश्न 5.
किसी उद्दीपन के प्रति प्राणी की प्रथम अनुक्रिया को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
किसी उद्दीपन के प्रति की प्रथम अनुक्रिया संवेदना है।

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प्रश्न 6.
मस्तिष्क का कौन हिस्सा श्रवण संवेदना के लिए जिम्मेवार होता है?
उत्तर:
श्रवण संवेदना के लिए मस्तिष्क में संशपालि जिम्मेवार होता है।

प्रश्न 7.
संवेदन प्रकारताओं की उपयोगिता बतावें।
उत्तर:
संवेदन प्रकारताएँ भिन्न-भिन्न प्रकार के उद्दीपकों से प्राप्त सूचनाओं के परस्पर संबंध के द्वारा विशिष्ट जानकारियों का पता लगाते हैं।

प्रश्न 8.
ज्ञानेन्द्रियों की प्रकार्यात्मक सीमाओं को बतलाने वाले उदाहरण दें।
उत्तर:
हमारी आँखें वैसी वस्तुओं को देखने में असमर्थ हो जाती है जो बहुत ही धुंधला हो या बहुत ही चमकदार हो। पानी में चीनी का एक निश्चित परिमाण मिलाने पर ही उसका स्वाद मीठा प्रतीत होता है।

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प्रश्न 9.
वस्तु को दृश्यमान बनाने के लिए आरोपित प्रकाश के तरंगदैर्ध्य का परास क्या होना चाहिए?
उत्तर:
हमारी आँखें 380 नैनीमीटर से 780 नैनीमीटर तक के तरंगदैर्ध्य वाले प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनकर वस्तु को दृश्यमान बनाता है।

प्रश्न 10.
मानव आँख की गोलक की सबसे ऊपरी परत को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
श्वेत पटल।

प्रश्न 11.
मानव आँख के किस हिस्से में खून की आपूर्ति नहीं होती है?
उत्तर:
कॉर्निया तथा लेंस दोनों में खून की आपूर्ति नहीं होती है।

प्रश्न 12.
आँख के (नेत्र गोलक के) बाहर भाग को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
नेत्र गोलक के बाहरी भाग को बाह्य पटल या श्वेत पटल कहते हैं।

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प्रश्न 13.
नेत्र गोलक के बीच में कौन-सा तरल पदार्थ भरा होता है?
उत्तर:
नेत्र गोलक के बीच में काँच द्रव्य भरा होता है।

प्रश्न 14.
रेटिना पर कौन-कौन सेल पाया जाता है?
उत्तर:
रेटिना पर दण्ड एवं सूचियाँ पायी जाती हैं?

प्रश्न 15.
फेबिया पर किस सेल की मात्रा अधिक होती है?
उत्तर:
फेबिया पर सूचियों की मात्रा अधिक होती है।

प्रश्न 16.
अंध बिन्दु किसे कहते हैं?
उत्तर:
अन्तः पटल पर फेबिया के बगल में एक ऐसा स्थान है जहाँ न तो दण्ड होती है और न सूचियाँ, उस स्थान को अंध बिन्दु कहते हैं। इस स्थान पर प्रकाश पड़ने से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है।

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प्रश्न 17.
दण्ड और सूचियाँ क्या हैं?
उत्तर:
दण्ड और सूचियाँ ग्राहक कोष हैं जो आँखों में रेटिना पर होती है। तेज प्रकाश में सूचियाँ सक्रिय होती हैं जबकि मन्द प्रकाश में दण्ड सक्रिय होता है।

प्रश्न 18.
जगत की ज्ञान हमें किस तरह मिलता है?
उत्तर:
जगत में पाई जानेवाली तरह-तरह की वस्तुओं का ज्ञान हमें ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा दी गई सूचनाओं के आधार पर मिलता है।

प्रश्न 19.
हमारे पास कुल कितनी ज्ञानेन्द्रियाँ हैं?
उत्तर:
हमारे पास कुल सात ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। पाँच संवेदन ग्राही (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा तथा दो (गतिसंवेदी और प्रधान तंत्र) गहन इन्द्रियाँ हैं।

प्रश्न 20.
वस्तुओं की सही पहचान के प्रमुख आधार हैं?
उत्तर:
वस्तुओं की सही पहचान उसके आकार, रंग, आकृति, स्वभाव, कठोरता आदि की परख के आधार पर की जाती है।

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प्रश्न 21.
जगत का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें किन-किन प्रक्रियाओं पर निर्भर रहना होता है?
उत्तर:
संवेदना, अवधान और प्रत्यक्षण तीन ऐसी प्रक्रिया है जिन पर हम वस्तुओं के वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति के लिए निर्भर रहते हैं।

प्रश्न 22.
उद्दीपक के स्वरूप और विविधता को एक-एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें।
उत्तर:

  1. देखे जाने योग्य उद्दीपक-घर, मन्दिर।
  2. सुने जा सकते हैं-संगीत, कोलाहल
  3. जिन्हें हम सूंघ कर गन्ध जान सकते हैं-फूल, इत्र।
  4. जिसका स्वाद ग्रहण कर सकते हैं-मिठाई, चटनी।
  5. जिससे स्पर्श का अनुभव होता है-चिकनी सतह, रुखड़ा टेबुल।
  6. जो स्वभाव का बोध करता है-द्युतिमान, धुंधला।
  7. जो कानों को प्रभावित करता है-श्रुतिमधुर, कर्णप्रिय।

प्रश्न 23.
संवेदन की परिभाषा दें।
उत्तर:
संवेदन की परिभाषा देते हुए यह कहा जा सकता है कि संवेदन एक सरलतम संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से उपस्थित उद्दीपनों का केवल आभास होता है।

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प्रश्न 24.
स्पष्ट संवेदन के होने के लिए कौन तत्त्व आवश्यक है?
उत्तर:
स्पष्ट संवेदन के होने के उद्दीपनों में स्पष्टता और तीव्रता होना आवश्यक है। साथ ही उद्दीपन कुछ विशेष अवधि के लिए व्यक्ति के सामने उपस्थित होना चाहिए।

प्रश्न 25.
संवेदना की परिभाषा क्या है?
उत्तर:
संवेदना एक सरल ज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें उपस्थित उत्तेजना का तात्कालिक ज्ञान प्राप्त होता है।

प्रश्न 26.
तरंगदैर्ध्य क्या होती है?
उत्तर:
दो क्रमागत शृंगों के बीच की दूरी को तरंगदैर्ध्य कहते हैं।

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प्रश्न 27.
तरंगदैर्ध्य, आवृत्ति और ध्वनि किस मात्रक से मापा जता है?
उत्तर:
तरंगदैर्ध्य का मात्रक एंगस्ट्रम है। आवृत्ति का मात्रक हर्ट्स (Hz) है। ध्वनि की तीव्रता डेसिबल में मापी जाती है।

प्रश्न 28.
अवधान किसे कहते हैं?
उत्तर”
कई उद्दीपकों का एक साथ सक्रिय हो जाने पर किसी एक को अध्ययन अथवा कार्य हेतु चुनकर उस पर ध्यान केन्द्रित करना अवधान कहलाता है।

प्रश्न 29.
अवधान या ध्यान का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अवधान या ध्यान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक विशेष शारीरिक मुद्रा बनाकर किसी वस्तु को चेतना केन्द्र में लाने के लिए कोशिश करता है।

प्रश्न 30.
अवधान के वस्तुनिष्ठा निर्धारक का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अवधान के वस्तुनिष्ठ निर्धारण का अर्थ उद्दीपन की उन विशेषताओं या गुणों से होता है जिनके कारण व्यक्ति का ध्यान उस उद्दीपन को ओर चला जाता है।

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प्रश्न 31.
अवधान के आत्मनिष्ठा निर्धारक का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अवधान या ध्यान के आत्मनिष्ठ निर्धारक का अर्थ उन आत्मगत तथा व्यक्तिगत कारकों से होता है जिनके कारण व्यक्ति किसी वस्तु या उद्दीपन पर ध्यान देता है।

प्रश्न 32.
अवधान के अतिरिक्त कौन-सा बिन्दु है जो सहायक माने जाते हैं?
उत्तर:
चयन के अतिरिक्त अवधान अन्य गुणों जैसे-सतकर्ता, एकाग्रता तथा खोज से भी संबंधित होते हैं।

प्रश्न 33.
अवधान के दो मुख्य रूप क्या हैं?
उत्तर:
(क) चयनात्मक अवधान और
(ख) संधृत अवधान।

प्रश्न 34.
चयनात्मक अवधान से संबंधित बाह्य कारक के प्रमुख तत्त्व (आधार) क्या हैं?
उत्तर:
उद्दीपकों के आकार, तीव्रता और गति अवधान के प्रमुख आधार माने जाते हैं।

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प्रश्न 35.
चयनात्मक अवधारणा से संबंधित आंतरिक कारक के दो मुख्य रूप क्या हैं?
उत्तर:
(क) अभिप्रेरणात्मक तथा
(ख) संज्ञानात्मक

प्रश्न 36.
संज्ञानात्मक कारक के लिए किन विशेषताओं पर अधिक बल दिया जाता है?
उत्तर:
अवधान से संबंधित संज्ञानात्मक कारक की सफलता अभिव्यक्ति और पूर्वविन्यास पर आधारित होती है।

प्रश्न 37.
निम्न सिद्धान्तों का विकास किसने और कब किया?
(क) निस्पंदन क्षीणन सिद्धान्त
(ख) बहुविधिक सिद्धान्त
उत्तर:
(क) ट्रायसमैन के द्वारा सन् 1962 में और
(ख) जॉनसटन के द्वारा सन् 1978 में विकास किया गया था।

प्रश्न 38.
संधृत अवधान के प्रभावित कारक कौन-कौन हैं?
उत्तर:

  1. संवेदन प्रकारता
  2. उद्दीपन की स्पष्टता
  3. स्थानिक अनिश्चितता।

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प्रश्न 39.
प्रत्यक्ष की परिभाषा दें।
उत्तर:
प्रत्यक्षण को परिभाषित करते हुए यह कहा जा सकता है कि यह एक जटिल संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा वातावरण में उपस्थित उद्दीपन का तात्कालिक ज्ञान होता है।

प्रश्न 40.
दृष्टि-संवेदना मस्तिष्क के किस भाग से सम्पन्न होती है?
उत्तर:
दृष्टि-संवेदना ऑक्सीविटल लोब से सम्पन्न होती है।

प्रश्न 41.
तेज रोशनी आँख पर पड़ने से पुतली का आकार कैसा हो जाता है?
उत्तर:
तेज रोशनी आँख पर पड़ने से पुतली का आकार छोटा हो जाता है।

प्रश्न 42.
प्रकाश ग्राही की दृष्टि से दंड और शंकु की विशेषता बतावें।
उत्तर:
दण्ड-शलाका दृष्ट (रात्रि दृष्टि, मंद प्रकाश) के ग्राही होते हैं जबकि शंकु को प्रकाशानुकूली (दिवा प्रकाश) के ग्राही मानते हैं। अर्थात् दण्ड प्रकाश की निम्न तीव्रता में कार्य करते हैं तथा शंकु उच्च स्तर के तेज प्रकाश में सक्रिय रहते हैं।

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प्रश्न 43.
प्रकाश एवं अंधकार अनुकूलन के प्रकाश-रासायनिक आधार क्या है?
उत्तर:
दण्ड में संयुक्त रोडोप्सिन नामक रासायनिक पदार्थ के अणु प्रकाश के प्रतिकूल परिमाण के कारण टूट जाते हैं जिससे आँख प्रकाश अनुकूलन में सक्षम हो जाता है। तम-व्यनुकूलन को विटामिन ‘ए’ की सहायता से आँखों को पुनः स्थापित किया जाता है।

प्रश्न 44.
रंगों के तीन मूल विमाओं के नाम बतावें।
उत्तर:
रंगों के तीन मूल विमाएँ हैं-वर्ण, संतृप्ति तथा द्युति।

प्रश्न 45.
लाल, नीला और हरा रंग के लिए तरंगदैर्घ्य का औसत मान बतावें।
उत्तर:
लाल रंग का तरंगदैर्घ्य – 780 नैनीमीटर
नीले रंग का तरंगदैर्घ्य – 465 नैनीमीटर
हरे रंग का तरंगदैर्घ्य – 500 नैनीमीटर

प्रश्न 46.
उत्तर प्रतिमाएँ क्या होती हैं?
उत्तर”
किसी दृष्टि क्षेत्र से चाक्षुष उद्दीपन के हट जाने पर भी कुछ समय तक उद्दीपक का प्रभाव बना रहता है। इसी विशिष्ट प्रभाव को उत्तर प्रतिमा कहते हैं।

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प्रश्न 47.
श्रवण संवेदना कब प्रारम्भ होता है?
उत्तर:
भाषित सम्प्रेषण से सम्बन्धित श्रवण संवेदना का प्रारम्भ तब होता है जब कोई ध्वनि तरंग हमारे कान में प्रवेश करती है।

प्रश्न 48.
बाहरी कान का हिस्सा क्या कहलाता है?
उत्तर:
बाहरी कान का हिस्सा पिन्ना कहलाता है।

प्रश्न 49.
मध्यकाल में स्थित तीन छोटी-छोटी हड्डियों को क्या कहा जाता है।
उत्तर:
मध्यकाल में तीन छोटी-छोटी हड्डियों को निहाई, रिकाव एवं हथौड़ा कहा जाता है।

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प्रश्न 50.
अन्दरुनी कान की शुरुआत किससे होती है?
उत्तर:
अन्दरंनी कान की शुरुआत कर्णपट्ट से होती है।

प्रश्न 51.
मध्य कर्ण का प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर:
कध्य कर्ण का प्रमुख कार्य ध्वनि-तरंगों की तीव्रता के बढ़ाना है।

प्रश्न 52.
कर्ण दोल का स्थान कहाँ है?
उत्तर:
कर्ण दोल या कर्ण पटल बाह्य कान एवं मध्य कान के बीच में होता है।

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प्रश्न 53.
अर्द्धवृत्ताकार नालिका का क्या लाभ है?
उत्तर:
अर्द्धवृत्ताकार नालिका अन्तः कर्ण में स्थित होती है जो शारीरिक संतुलन बनाए रखने का काम करती है।

प्रश्न 54.
कोकलिया का आकार किस तरह का होता है?
उत्तर:
कोकलिया का आकार शंख या धूंधे के समान होता है।

प्रश्न 55.
ध्वनि का संचरण किस प्रकार होता है?
उत्तर:
ध्वनि कान के लिए उद्दीपक होती है जो बाहरी परिवेश में दाब में भिन्नता आने से प्रकट होता है। ध्वनि का संरचना शृंग ओर गर्त के एकान्तर क्रम से होता है। कभी-कभी खासकर गैसीय माध्यम में ध्वनि संपीडन और विरलन का माध्यम से आगे बढ़ता है।

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प्रश्न 56.
देश प्रत्यक्षीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
देश प्रत्यक्षीकरण विस्तार प्रत्यक्ष मुख्य रूप से तीन तत्त्वों पर आधारित होता है-व्याप्ति, स्थानीय चिन्ह और गीत। इन तीनों के द्वारा जो प्रत्यक्षीकरण होता है उसे देश प्रत्यक्षीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 57.
प्रत्यक्षीकरण की समुचित परिभाषा क्या है?
उत्तर:
प्रत्यक्षीकरण एक जटिल ज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें उपस्थित उद्दीपन का तात्कालिक ज्ञान प्राप्त होता है।

प्रश्न 58.
प्रत्यक्षीकरण किस प्रकार की मानसिक प्रक्रिया है?
उत्तर:
प्रत्यक्षीकरण जटिल एवं ज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 59.
प्रत्यक्षीकरण में कौन-कौन प्रक्रिया शामिल रहती है?
उत्तर:
प्रत्यक्षीकरण में चार उप-प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं-ग्राहक प्रक्रिया, प्रतीकात्मक प्रक्रिया, एकीकरण की प्रक्रिया एवं भावात्मक प्रक्रिया।

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प्रश्न 60.
प्रत्यक्षीकरण में प्रतीकात्मक प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:
व्यक्ति जब किसी उत्तेजना का प्रत्यक्षीकरण करता है तो अपने पूर्व अनुमति के कारण उस उत्तेजना से संबंधित कुछ अनुभव उसे प्रतीक के रूप में स्वतः आ जाते हैं जिसे प्रतीकात्मक प्रक्रिया कहते हैं।

प्रश्न 61.
प्रत्यक्षीकरण में भावात्मक प्रक्रिया किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण के पश्चात् व्यक्ति उस वस्तु के प्रति सुखद या दुखद भाव का अनुभव करता है जिसे भावात्मक प्रक्रिया कहते हैं।

प्रश्न 62.
संज्ञानात्मक शैली से क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी विषय, घटना अथवा उद्दीपकों के संबंध में किए जाने वाले अध्ययनों में व्यापक रूप से प्रयुक्त शैली (क्षेत्र आश्रित या क्षेत्र अनाश्रित) को मनोवैज्ञानिक शैली कहते हैं।

प्रश्न 63.
गेस्टाल्ट क्या है?
उत्तर:
गेस्टाल्ट एक नियमित आकृति या रूप को कहते हैं।

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प्रश्न 64.
गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों ने वस्तु को किस रूप में देखा?
उत्तर:
गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के अनुसार किसी वस्तु का रूप उसके सम्र में होता है।

प्रश्न 65.
प्रमस्तिष्कीय प्रक्रियाएँ किस ओर उन्मुख होती है?
उत्तर:
गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार प्रमस्तिष्कीय प्रक्रियाएँ सदैव अच्छी आकृति की ओर उन्मुख होती हैं।

प्रश्न 66.
गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के द्वारा दिये गये पूर्ति का सिद्धान्त का कथन क्या है?
उत्तर:
उद्दीपन के आकृति निरूपण में जो अंश रिक्त (लुप्त या अधूरे) रह जाता है उसे पूरा करने पर वस्तुओं का प्रत्यक्षण करके अलग-अलग भागों के रूप के बदले समग्र आकृति का बोध कराता है।

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प्रश्न 67.
एकनेत्री संकेत किस प्रकार के निर्णय लेने में हमारी सहायता करता है?
उत्तर:
एकनेत्री संकेत द्विविम सतहों में गहराई एवं दूरी का निणर्य लेने में हमारी सहायता करते हैं।

प्रश्न 68.
रचना गुण प्रवणता से क्या अभिप्राय निकलता है?
उत्तर:
रचना गुण प्रवणता एकनेत्री संकेत से सम्बन्धित एक ऐसा गोचर है जिसके द्वारा हमारे चाक्षुष क्षेत्र, जिनमें तत्वों की सघनता अधिक होती है, दूरी पर होने का आभास देते हैं।

प्रश्न 69.
भ्रम किसे कहते हैं?
उत्तर:
ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त सूचनाओं की गलत व्याख्या से उत्पन्न गलत प्रत्यक्षण को सामान्यतया भ्रम कहते हैं।

प्रश्न 70.
विभ्रम किसे कहते है?
उत्तर:
विभ्रम एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति को उद्दीपन की अनुपस्थिति में हो उसकी ज्ञान या अनुमान होता है।

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प्रश्न 71.
प्रत्यक्षण पर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव को स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रत्यक्षण पर लोगों के निवास स्थान, भाषा, आदत, पेशा, आर्थित स्थिति, सामाजिक व्यवहार आदि का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। इसके कारण लोगों में प्रात्यक्षिक अनुमान की कुछ आदतों एवं उद्दीपकों की प्रमुखता के प्रति विभेदक अंतरंगता उत्पन्न कर कार्य करते हैं।

प्रश्न 72.
कुछ प्रात्यायिक भ्रम सार्वभौम होते हैं। उदाहरण देकर स्पष्ट करें।
उत्तर:
कुछ प्रात्यायिक भ्रम सब लोगों के लिए समान अर्थ बतलाते हैं। जैसे दूरी बढ़ते जाने पर रेल की पटरियाँ परस्पर एक-दूसरे के निकट आती हुई प्रतीत होती हैं तब दोनों पटरियों के बीच की दूरी सब जगह समान होती है। इसी प्रकार ऊँचाई से देखने पर पिण्ड का आकार छोटा हो जाता है।

प्रश्न 73.
संवेदना और प्रत्यक्षीकरण में क्या अंतर है?
उत्तर:
संवेदना में उपस्थित उद्दीपन का सही अर्थरहित ज्ञान होता है, जबकि प्रत्यक्षीकरण में उपस्थित उद्दीपन का अर्थ सहित ज्ञान होता है।

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प्रश्न 74.
विपर्यय से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
विपर्यय एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति को उपस्थिति उद्दीपन का गलत ज्ञान प्राप्त होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भेद सीमा अथवा भेद देहली (DL) से क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोभौतिकी के अध्ययन से पता चलता है कि ज्ञानेन्द्रियों तथा उद्दीपकों के कार्य करने के लिए उत्तेजक को एक निर्धारित सीमा के अन्दर पहुँचाना आवश्यक है। जैसे, धुंधले प्रकाश में अथवा बहुत ही तीव्र रोशनी के कारण हम पढ़ नहीं पाते हैं। शोर या कोलाहल की तीव्रता के कारण हम किसी कथन का सही अर्थ समझ नहीं पाते हैं। किसी विशेष संवेदी तंत्र को क्रियाशील करने के लिए जो न्यूनतम मूल्य अपेक्षित होता है उसे निरपेक्ष सीमा अथवा निरपेक्ष देहली कहते हैं।

जैसे, एक ग्लास पानी को मीठा बनाने के लिए कम-से-कम कितनी चीनी की आवश्कता होती है। यह मिठास की निरपेक्ष सीमा कहलाती है। निरपेक्ष सीमा व्यक्तियों अथवा परिस्थितियों के बदलने से बदल जा सकती है। उद्दीपकों के मध्य अन्तर कर पाना भी संभव नहीं होता है। इसके लिए इतना तो जानना आवश्यक हो जाता है कि उद्दीपकों के मान में न्यूनतम अन्तर क्या होना चाहिए। आवश्यक न्यूनतम अन्तर को भेद सीमा अथवा भेद देहली माना जाता है। ज्ञातव्य है कि विविध प्रकार के उद्दीपकों (चाक्षुष, श्रवण) की निरपेक्ष देहली को समझे बिना संवेदना को समझना असंभव हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 2.
जगत का ज्ञान प्राप्त करने में हमारी सहायता कौन करता है?
उत्तर:
सम्पूर्ण जगत वस्तुओं, लोगों तथा घटनाओं की विविधता, से पूर्ण है। हम उनमें से प्रत्येक कारक के संबंध में सब कुछ जान लेना चाहते हैं। विविध वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करने में हमारी सहायता सात ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, गति संवेदी तथा प्रधान तंत्र) करती हैं। हमारी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा दी गई सूचनाएँ ही हमारे समस्त ज्ञान का आधार है। ज्ञानेन्द्रियों वस्तुओं के आकार, आकृति, रंग के साथ-साथ अन्य विशेषताओं का अनुभव पाने का अवसर देती हैं। जगत का ज्ञान तीन प्रमुख प्रक्रियाओं-संवेदन, अवधान तथा प्रत्यक्षण पर निर्भर करता है। ये तीनों प्रक्रियाएँ परस्पर अंतर्संबंधित होती हैं। फलतः इन्हें एक ही प्रक्रिया-संज्ञान के विभिन्न अंशों के रूप में समझ लिया जाता है।

देखना (नेत्र), सुनना (कान), सूंघना (नाक), चखना (जीभ), स्पर्श (त्वचा) से जुड़े, अनुभवों के साथ हमें संगीत का लय, कपड़े की चिकनाहट, धुंधला प्रकाश, शक्तिशाली बिजली, असह्य गर्मी, भयानक चेहरा, क्रोधाग्नि, खुशी, हँसी-मजाक आदि का अनुभव पाने में ज्ञानेन्द्रियाँ हमारी सहायता करता है क्योंकि हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ मात्र बाह्य जगत से ही नहीं बल्कि हमारे अपने शरीर से भी सूचनाएँ संग्रह कर लेती हैं। बाह्य अथवा आंतरिक जगत के संबंध में प्राप्त होनेवाली सूचनाओं से हमें तरह-तरह के अनुभव मिलते हैं और हम उद्दीपकों के विविध गुणों को पहचानने लगते हैं। अनुभव ही ज्ञान के रूप में हमें निखारता हैं।

प्रश्न 3.
श्वेत पटल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
श्वेत पटल (Selerotic covat):
श्वेत पटल नेत्र गोलक की सबसे ऊपरी सतह है। यह कड़ा तथा इसका रंग उजला होता है। यह अपारदर्शी है, अतः इससे होकर प्रकाश अन्दर नहीं आता। कड़ा होने के कारण यह बाहर के किसी भी प्रकार के आधात से आँख की रक्षा करता है। साथ ही, इसके अपारदर्शी होने के कारण प्रकाश चारों ओर से आँख में प्रवेश नहीं करता, फलतः किसी चीज को हम ठीक से देख पाते हैं। श्वेत-पटल का अगला भाग उभरा तथा पारदर्शी है। इसी के द्वारा प्रकाश आँख में प्रवेश करता है। श्वेत-पटल के इस पारदर्शी भाग को कोर्निया कहते हैं।

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प्रश्न 4.
मध्य पटल का वर्णन करें?
उत्तर:
मध्य पटल (Choroid) यह आँख का दूसरा आवरण है। यह प्रायः काले और भूरे रंग का होता है। यह भी पूर्णतः अपारदर्शी होता है अतः इससे भी प्रकाश का अन्दर प्रवेश करना संभव नहीं है। इसके आगे भाग को उपतारा (Iris) कहते हैं। उपतारा कनीनिका (Comea) के पीछे होता है। इसका प्रधान कार्य प्रकाश ग्रहण करना है। कनीनिका और उपतारा के बीच का स्थान जल द्रव से भरा रहता है। उपतारा के मध्य में पुतली है। उपतारा एवं पुतली से सटे पीछे लेंस है। पुतली से जो प्रकाश आँखों में प्रवेश करता है उसकों अक्षि-पटल में यथास्थान पहुंचाने का काम लेंस का है।

लेंस नजदीक की चीजों को देखने के लिए छोटा तथा दूर की चीजों को बड़ा होकर देखता है। लेंस का छोटा, उभरा एवं बाहर निकलना या बड़ा, चिपटा होना इसके दोनों ओर लगे मांसपेशियों पर निर्भर करता है। यह सिलियरी पेशियों के साथ-साथ कुछ और पतली-पतली तार जैसी माँसपेशियाँ सिलियरी पेशी से निकलकर लेंस से मिली हुई हैं। ये माँसपेशियाँ साइकिल के ‘स्कोप’ की तरह लगी हैं। इनमें सस्पेंसरी लिगामेंट रहते हैं। इनका प्रमुख कार्य लेंस को उनकी जगह पर संतुलित रूप में रखना है। लेंस के पीछे की जगह में काँच द्रव भरा रहता है। यह एक पारदर्शी द्रव है। इसका कार्य आँख के स्वरूप या नेत्रगोलक को कायम रखना है। आँख के फूट जाने पर यह द्रव बाहर निकल जाता है जिससे दृष्टि-संवेदना नहीं होती है।

प्रश्न 5.
दृष्टि पटल का वर्णन करें।
उत्तर:
अक्षि-पटल या दृष्टि-पटल (Retina):
मध्य के नीचे आँख की तीसरी और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण सतह दृष्टि-पटल है। इसका प्रधान कार्य प्रकाश को ग्रहण करना है। श्वेत-पटल तथा मध्य-पटल का काम मात्र प्रकाश को यहाँ तक पहुँचा देने का है। प्रकाश को ग्रहण करने के लिए दृष्टि-पटल में कुछ खास कोष (Cells) हैं, जिन्हें ग्राहक-कोशिकाएँ कहते हैं। दृष्टि-पटल की ग्राहक कोशिकाएँ दो प्रकार की होती है-एक को शलाका (Rods) कहते हैं तथा दूसरे को सूचियाँ (Cones)। शलाकाएँ आकार में लम्बी और पतली होती हैं। दूसरी ओर, सूवियाँ कुछ मोटी और छोटी होती हैं। रचना में इनमें अन्तर तो है ही, साथ ही इनके कार्य में भी अन्तर है। शलाकाएँ अन्धकार या धूमिल प्रकाश में क्रियाशील होती हैं।

और सूचियाँ तेज प्रकाश में कार्य करती हैं हम ऐसे व्यक्तियों को जानते हैं जिन्हें रात में नजर नहीं आता। इनकी आँख की शलाकाएँ कमजोर अथवा क्षतिग्रस्त हुई रहती है। उसी तरह चमगादड़ या उल्लू को दिन में नजर नहीं आता। इसका कारण भी यही है कि इनमें सूचियों का अभाव रहता है। शलाका और सूचियों के कार्य में एक अन्तर है। लाल, हरा, नीला, पीला आदि तरह-तरह के रंगों की संवेदना सूचियों के क्रियाशील होने से होती है। रंगविहीन का अर्थ उजली, काली और भूरी चीजों से है। इसी तरह प्रकाश और रंग के अनुसार हम शलाका या सूचियों के द्वारा किसी चीज को ग्रहण करते हैं। संक्षेप में हम कह सकते है कि प्रकाश और रंगों का संवेदन सूचियों के सहारे होता है और अन्धकार तथा रंगहीन चीजों की संवेदना शलाकाओं की मदद से होती है।

दृष्टि पटल के बीच थोड़ी-सी एक धंसी हुई जगह है जिसे फोबिया कहते हैं। फोबिया में केवल सूचियाँ पायी जाती हैं। फलस्वरूप जब किसी देखी जानेवाली चीज की प्रतिमा फोबिया पर पड़ती है तो वह बहुत अधिक स्पष्ट दीख पड़ती है। यही कारण है कि इसे स्पष्टतम दृष्टि-बिन्दु कहते हैं। फोबियां से बाहर ज्यो-ज्यों हम दृष्टि-पटल के छोर की ओर बढ़ते हैं, शलांकाओं की संख्या बढ़ती जाती है और सूचियों की संख्या कम होती जाती है। पक्षमाभिकी पेशियों के निकट तो सूचियाँ इतनी कम हैं कि वहाँ केवल शलाकाएँ मालूम पड़ती है।

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प्रश्न 6.
संवेदन का अर्थ बतावें।
उत्तर:
संवेदन एक सरलतम संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से उपस्थित उद्दीपनों का आभासमात्र होता है। इससे स्पष्ट है कि संवेदन में अर्थहीनता तथा अस्पष्टता होती है। इसके द्वारा उद्दीपनों का यथार्थ ज्ञान न होकर मात्र उनका आभास होता है। संवेदन चूँकि एक सरलतम आरंभिक मानसिक प्रक्रिया है, अतः इसका विश्लेषण संभव नहीं है। यही कारण है कि बच्चे, वयस्क तथा बूढ़े किसी को भी शुद्ध संवेदन (pure sensation) नहीं हो पाता है।

प्रश्न 7.
क्या व्यक्ति को शुद्ध संवेदन होता है?
उत्तर:
शुद्ध संवेदन का संप्रत्यय (concept) एक सैद्धांतिक संप्रत्यय है। हमलोग यह मान लेते हैं कि प्रत्यक्षण, चिंतन आदि के पहले उद्दीपनों का शुद्ध संवेदन होता है और जब उसमें कुछ विशेष अर्थ जोड़ दिया जाता है, तो उसका प्रत्यक्ष होता है। लेकिन, व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं होता है। सच्चाई यह है कि हमें किसी वस्तु या उद्दीपन का अर्थहीन ज्ञान या शुद्ध संवेदन नहीं होता है। हम जैसे ही किसी उद्दीपन पर ध्यान देते हैं, तो एक अर्थपूर्ण ज्ञान होता है न कि पहले उसका शुद्ध संवेदन और तब उसके अर्थ का ज्ञान। कुछ लोगों का मत है कि बच्चे को शुद्ध संवेदन होता है। परंतु उनका यह मत भी सही नहीं है। क्योंकि बच्चे जब भी किसी उद्दीपन या वस्तु पर ध्यान देते हैं तो उसका कोई-न-कोई अर्थ अवश्य लगाते हैं, भले ही वह अर्थ गलत ही क्यों न हो। निष्कर्ष यह है कि बच्चे, वयस्क तथा बूढा कोई भी व्यक्ति क्यों न हो उसमें शुद्ध संवेदन नहीं होता है।

प्रश्न 8.
दृष्टिपटल की बनावट तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
दृष्टिपटल (retina) आँख का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग होता है। इससे दो तरह की प्रकाशग्राही कोशिकाएँ (light-receptor cells) होती हैं:
शलाकाएँ (rods) तथा सूचियाँ (cones)। शलाकाओं के उत्तेजित होने पर रंगहीन संवेदन होते हैं तथा सूचियों के उत्तेजित होने पर रंगीन संवेदन होते हैं। शलाकाएँ धूमिल रोशनी तथा रात में देखने में मदद करती हैं तथा सूचियाँ तीव्र रोशनी एवं दिन में देखने में मदद करती हैं। दृष्टितम का वह स्थान जहाँ केवल सूचियाँ (cones) ही पाई जाती हैं, को फोबिया (fovea) कहा जाता है। इसे स्पष्टतम दृष्टि बिन्दु भी कहा जाता है। दृष्टिपटलं का वह भाग जहाँ से दृष्टि तंत्रिका निकलकर मस्तिष्क में पहुँचती है, उसे अंधबिन्दु (blind spot) कहा जाता है जहाँ से देखन संभव नहीं हो पाता है। दृष्टि तंत्रिका आवेग इसी तंत्रिका से होकर मस्तिष्क में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को दृष्टि संवेदन या प्रत्यक्षण होता है।

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प्रश्न 9.
लेंस की बनावट या संरचना तथा कार्य पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
लेंस मानव आँख के मध्य पटल (choroid) का एक प्रमुख हिस्सा है। लेंस का स्थान पुतली के पीछे होता है। लेंस में खून की आपूर्ति (supply) नहीं होती है। फलतः यह अपना पोषक पदार्थ जल द्रव (aqueous hurmour) से ही प्राप्त करता है। इसका प्रधान कार्य पुतली द्वारा भीतर आनेवाली रोशनी को आँख की भीतरी सतह की एक विशेष जगह पर पहुंचा देना होता है। लेंस की विशेषता यह कि यह फोटो खींचनेवाले कैमरा के लेंस के समान ही यह लेंस भी किसी वस्तु की प्रतिमा को उल्टा करके आँख के भीतरी भाग की निर्धारित जगह पहुँचा देता है। इसका छोटा या बड़ा होना इसके दोनों किनारों पर स्थित मांसपेशियों जिन्हें पक्ष्माभिकी मांसपेशियाँ (ceiliary muscles) कहा जाता है, पर निर्भर करता है। सामान्यतः लेंस नजदीक की चीजों को देखने के लिए छोटा हो जाता है तथा दूर की चीजों के देखने के लिए बड़ा हो जाता है।

प्रश्न 10.
मध्य-कर्ण का वर्णन करें।
उत्तर:
मध्य-कर्ण (Middle Ear) कान के मध्य भाग की सीमा का प्रारम्भ कान की नली जहाँ जाकर रुक जाती है वहाँ से होता है। कर्णढोल मध्यकर्ण का सबसे पतला भाग है। वह मियटस से जुड़ा हुआ है। ‘मियटस’ ध्वनि को कर्णढोल तक पहुँचाती है। एक बहुत ही झिल्लीदार पर्दा जैसा है। इस कर्ण-ढोल से सटी हड्डियाँ जो तीन प्रकार की हैं-मुग्दर (Hummer), निहाई (Anvil or incus) और रकाब (stirrup) ये तीनों हड्डियाँ परस्पर सटी हुई हैं।

मुग्दर का एक छोर कान की झिल्ली (कर्णपट्ट) से सटा है और दूसरा भाग निहाई से मिला है। निहाई से सटी हुई रकाब नामक हड्डी है। रकाब का आखिरी भाग एक छेद से लगा है। इस छेद को हम अण्डाकार खिड़की कहते हैं। इसी की बगल में एक दूसरा गोल छेद भी है, जिसे गोल खिड़की कहते हैं। इन खिड़कियों के बाद से ही अन्त:कर्ण शुरू होता है। मध्य-कर्ण की तीनों हड्डियाँ एक-दूसरी से सटी हुई हैं। ध्वनि-तरंगें (Sound waves) कर्णढोल को प्राकम्पित करती है।

इसके प्रकम्पन के फलस्वरूप इससे सटी इन तीनों हड्डियों में भी कम्पन्न शुरू होता है। मुग्दर प्रकम्पित होने से उनमें लगी हुई निहाई से भी प्रकम्पन होता है जिसके परिणामस्वयप रकाब, जो निहाई से लगा हुआ है, भी प्रकम्पिक हो उठता है चूँकि रकाब मध्य-कर्ण की दूसरी सीमा अंडाकार खिड़की (Oval window) से लगा हुआ है। अतः यह वह प्रकम्पन है जो सबसे पहले कर्ण-ढोल में उत्पन्न हुआ था। वह क्रमश: मुग्दर, निहाई तथा रकाब से होता हुआ अण्डाकार खिड़की तक पहुँचता है।

वह अण्डाकार खिड़की के सहारे अन्तःकर्ण में प्रवेश कर जाता है। हड्डियों में प्रकम्पन होने से ध्वनि की तीव्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है। अनुमान किया जाता है कि उसकी तीव्रता में पच्चीस या तीस गुनी वृद्धि होती है। मध्यकर्ण में कर्ण-कण्ठनली भी है। यह नली मध्यकर्ण से कण्ठ तक गयी है। बहुत तेज आवाज होने पर अक्सर हमारा मुंह खुल जाता है, क्योंकि वैसी हालत में कान के भीतर का प्रकम्पन इस नली के सहारे कण्ठ तक चल जाता है। यदि वह नली नहीं रहती तो जोरों की आवाज होने पर कर्णपट्ट फट जाता। यह नली कर्ण पट्ट नली (पतली झिल्ली) की रक्षा करती है।

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प्रश्न 11.
बाह्य कर्ण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
बाह्य कर्ण (Outer Ear):
बाह्य कर्ण कान का वह भाग है जो बाहर से दिखाई पड़ता है। इसके दो भाग हैं –

1. एक वह जो बाहर की ओर निकला हुआ है। इसे पिन्ना या आरीक्ल या ग्राहक कोष्ठक भी कहते हैं। यह कार्टिलेज का बना होता है। पहले यह विचार था कि पिन्ना ध्वनि-तरंगों को संग्रहित कर ग्रहण करने में सहायता पहुंचाता है, परंतु बाद में किये गये प्रयोगों से यह पता चला है कि पिन्ना को जड़ से काट देने पर भी श्रवण-संवेदना में किसी प्रकार की क्षति नहीं आती है। बाह्य कर्ण का दूसरा भाग कर्णांजली का बाह्य मियटस (External meatus) है।

यह पिन्ना की जड़ से शुरू होकर कर्ण ढोल तक फैली है। इसे कान की नली (Auditory meatus) भी कहा जाता है। पिन्ना से टकराकर अथवा इकट्ठी होकर ध्वनि तरंगें कान की नली में प्रवेश करती हैं। यह नली बाहर से दिखती है। इस नली की लम्बाई 25 मिलीमीटर है। इनमें छोटे-छोटे बाल तथा कान के मैल भरे रहते हैं। यह मैल इतना जहरीला होता है कि यदि भूल से भी कोई कीड़ा कान की नली में चला जाता है तो यह मैल उसकी जान ही ले सकता है।

इस प्रकार इससे कान की रक्षा होती है। कान की नली अन्दर में एक पतली झिल्ली से बन्द है। इसे कान की झिल्ली अथवा कर्ण पट्ट कहते हैं। कान की नली से जो ध्वनि तरंगें अन्दर प्रवेश करती हैं वे इस झिल्ली से टकराती हैं। यह झिल्ली बहुत कोमल और संवेदनशील होती है, अत: तरंग की चोट से बहुत अधिक प्रकम्पित होने लगती है। इसी झिल्ली या कर्ण पट्ट के बाद से ही मध्य-कर्ण की शुरुआत होती है।

प्रश्न 12.
कोक्लिया की संरचना तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
कोक्लिया अंत:कर्ण (inner rear) का सबसे प्रमुख भाग है। देखने में कोक्लिया का आकार शंख या घोंघे के तरह दाई लपेटे के समान होता है। इसके भीतर में तीन नलिकाएं अर्थात् वेस्टीब्यलर नलिका कोक्लियर नलिका तथा टवैनिक नलिका होती है जो एक-दूसरे से विशेष झिल्ली (membrance) से अलग होती है। इन नलिकाओं में तरल पदार्थ भरा रहता है। कोक्लियर नलिका तथा टिम्पैनिक नलिका के बीच एक विशेष प्रकार की झिल्ली होती है जिसे बेसीलर झिल्ली (basilar membrance) कहा जाता है।

इस बेसीलर झिल्ली पर आर्गन ऑफ कोर्टी (organ of corti) होती है जिसमें पतली-पतली केश कोशिकाएँ (haircells) होती हैं जो सेवार के घास के समान दिखती है। जब ध्वनि तरंगों द्वारा वेस्टीब्युलर नलिका, के तरल पदार्थ में हलचल उत्पन्न होती है तो इससे टिम्पैनिक नली के तरल पदार्थ में हलचल पैदा हो जाती है और फिर उस हलचल से बेसीलर झिल्ली प्रकाशित हो जाती है जिससे कोशिकाएँ उत्तेजित हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप तंत्रिका आवेग उत्पन्न होकर तंत्रिका द्वारा शंखपालि (temporal lobe) में पहुँचता है और उससे फलस्वरूप व्यक्ति को श्रवण संवेदन हो पाता है।

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प्रश्न 13.
अवधान या ध्यान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ कई तरह के उद्दीपकों से प्रभावित होता रहती हैं। उनमें हम कुछ ही उद्दीपनों के प्रति चुनकर प्रतिक्रिया कर पाते हैं। मनोविज्ञान में इस तरह की चयनात्मक प्रक्रिया को अवधान या ध्यान कहा जाता है। अत: यह कहा जा सकता है कि अवधान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक विशेष शारीरिक मुद्रा (bodily posture) बनाकर किसी वस्तु को चेतना केन्द्र में लाने के लिए तत्परता दिखाता है।

प्रश्न 14.
अन्तः कर्ण क्या है? बतायें।
उत्तर:
अन्तः कर्ण (Inner Ear):
अन्त:कर्ण अण्डाकार खिड़की से शुरू होकर कोर्टी-इन्द्रिय (Organ of corti) एवं अर्द्धचक्राकार नली तक फैला है। यह कनपट्टी की हड्डी के भीतर स्थित है। अन्तः कर्ण की दीवार एक पतली झिल्ली से ढंकी रहती है जिसमें निरन्तर एक तरल पदार्थ फैला रहता है। जब तरल पदार्थ में किसी तरह की गति होती है तो व्यक्ति का शारीरिक संतुलन नष्ट हो जाता है। जब कोई व्यक्ति एक ही स्थान पर खड़ा होकर तेजी से चक्कर लगाता है तब उसकी अर्द्ध चक्राकार नलिका के तरल पदार्थ में गति उत्पन्न हो जाती है। परिणामस्वरूप उसका शारीरिक संतुलन बिगड़ जाता है। रुक जाने पर भी उसे लगता है जैसे अभी शरीर घूम रहा है, स्थिर खड़ा रहना मुश्किल हो जाता है, वह लड़खड़ाने लगता है। इस प्रकार, अर्द्धचक्राकार नलिका का विशेष महत्त्व शारीरिक संतुलन बनाये रखने में है, श्रवण-संवेदना में नहीं।

प्रश्न 15.
प्रत्यक्षण तथा संवेदन में अंतर करें।
उत्तर:

  1. संवेदन एक सरलतम मानसिक प्रक्रिया है जबकि प्रत्यक्षण एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है।
  2. प्रत्यक्षण में चार तरह की उपक्रियाएँ अर्थात् बाहर प्रक्रिया, प्रतीकात्मक प्रक्रिया, एकीकरण प्रक्रिया तथा भावात्मक प्रक्रिया सम्मिलित होती हैं, परंतु संवेदन में मात्र ग्राहक प्रक्रिया होती है।
  3. संवेदन द्वारा उद्दीपन का अर्थहीन ज्ञान होता है जबकि प्रत्यक्षण द्वारा उद्दीपन का अर्थपूर्ण ज्ञान होता है।
  4. संवेदन की प्रक्रिया का विश्लेषण संभव नहीं है जबकि प्रत्यक्षण की प्रक्रिया का विश्लेषण संभव है।
  5. एक ही उद्दीपन भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में समान संवेदन तो पैदा करता है, परंतु अनेक कारणों से एकसमान प्रत्यक्षण नहीं उत्पन्न कर पाता है।

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प्रश्न 16.
भ्रम क्या है? भ्रम तथा विभ्रम में अंतर बतावें।
उत्तर:
भ्रम में अयथार्थ प्रत्यक्षण (false perception) होता है। रस्सी को साँप समझ बैठना क भ्रम का उदाहरण है। विभ्रम में बिना किसी उद्दीपन के ही व्यक्ति की उद्दीपन का प्रत्यक्षण होता है। जैसे-बिना किसी के पुकारे ही यह लगे कि कोई पुकार रहा है, तो यह विभ्रम का उदाहरण होगा। इन दोनों में मुख्य अंतर निम्नांकित हैं –

  1. भ्रम में उद्दीपन उपस्थित रहता है जबकि विभ्रम में उद्दीपन अनुपस्थिति रहता है।
  2. भ्रम सामान्य तथा व्यक्तिगत दोनों ही होते हैं जबकि विभ्रम का स्वरूप सिर्फ व्यक्तिगत होता है।
  3. भ्रम सामान्य तथा असामान्य दोनों तरह के व्यक्तियों को होता है जबकि विभ्रम अधिकतर असामान्य व्यक्तियों को ही होता है।

प्रश्न 17.
विभ्रम का उदाहरणसहित अर्थ बतावें।
उत्तर:
विभ्रम एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति को उद्दीपन की अनुपस्थिति में ही उसके बारे में ज्ञान होता है। जैसे-बिना किसी के द्वारा पुकारे यदि किसी व्यक्ति को यह लगता है कि कोई उसे पुकार रहा है तो यह विभ्रम का उदाहरण होगा। इसी तरह अँधेरे कमरे में यदि व्यक्ति को यह महसूस होता है कि कोई आदमी खड़ा है जबकि वास्तव में कोई खड़ा नहीं है तो यह भी एक विभ्रम का उदाहरण होगा। उद्दीपनरहित होने के कारण विभ्रम का स्वरूप क्षणिक होता है।

प्रश्न 18.
मूलर-लायर भ्रम किसे कहते हैं?
उत्तर:
मूलर-लायर भ्रम एक तरह का सर्वव्यापी भ्रम (universal illusion) है जिसमें तीर रेखा तथा पंख रेखा को साथ-साथ उपस्थित करने पर व्यक्ति तीर रेखा को पंख रेखा से छोटा समझता है, हालाँकि दोनों की लम्बाई बराबर-बराबर होती है।

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प्रश्न 19.
स्वचालित प्रक्रमण की तीन प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
एक ही साथ कई उद्दीपनों पर ध्यान देने के लिए बाध्य हो जाने पर किसी मुख्य उद्दीपकों के प्रति विशेष ध्यान का देना स्वतः निर्धारित हो जाता है। जैसे कार चलाते समय टेपरिकार्डर बजाना, मोबाइल सुनना, कमीज का बटन लगाना, सिगरेट सुलगाना गौण हो जाता है और व्यक्ति का ध्यान मूलतः गाड़ी चलाने पर होता है। इसे स्वचालित प्रक्रमण का एक उदाहरण माना जा सकता है। स्वचालित प्रक्रमण की तीन प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. स्वचालित प्रक्रमण का कोई पूर्व निर्धारित अभिप्राय नहीं होता है।
  2. यह अचेतन रूप में क्रियाशील नहीं होती है।
  3. इसमें विचार प्रक्रियाओं की आवश्यकता नहीं होती है। जैसे-पुस्तक को रहते समय जूतों की फीते का बाँध लेना।

प्रश्न 20.
अवधान विस्तृति से क्या समझते हैं?
उत्तर:
हमारे अवधान में उद्दीपकों को ग्रहण करने की क्षमता सीमित होती है। किन्तु कभी-कभी मूल उद्दीपक के साथ-साथ कुछ अन्य उद्दीपकों पर क्षणिक ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। कार के चालक को पीछे से किसी आवाज को सुनने पर उस और झाँकना पड़ता है। वस्तुओं की संख्या, जिन पर कोई व्यक्ति क्षणिक ध्यान देने के लिए वाध्य हो जाता है, उसे अवधान विस्तृति कहा जाता है।

अर्थात् अवधान विस्तृति का सामान्य अर्थ यह है कि कोई व्यक्ति मुख्य उद्दीपकों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त उद्दीपकों की झलक पाने के लिए अपना ध्यान अस्थायी रूप से अल्प तो बाँट सकता है। अनेक प्रयोगों के आधार पर मिलर ने बताया है कि हमारी अवधान विस्तृति सात से दो अधिक या दो कम की सीमा के भीतर बदलती रहती है। अवधान विस्तृति का निर्धारण ‘टैनुस्टों स्कोप’ नामक यंत्र की सहायता से की जा सकती है।

प्रश्न 21.
अवधान या ध्यान की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
अवधान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक विशेष शारीरिक मुद्रा बनाकर किसी वस्तु को चेतना केन्द्र में लाने के लिए तत्परता दिखाता है। अवधान की कुछ विशेषताएँ हैं जिनसे इसका स्वरूप स्पष्ट होता है –

  1. अवधान का स्वरूप चयनात्मक (selective) होता है।
  2. अवधान में विशेष शारीरिक मुद्रा होती है।
  3. अवधान उद्देश्यपूर्ण होता है।
  4. अवधान की विस्तृति (span) सीमित होती है।
  5. अवधान में तत्परता की स्थिति होती है।
  6. अवधान में विभाजन का भी गुण होता है।
  7. अवंधान में अस्थिरता (fluctuation) तथा उच्चलन (shifting) का गुण होता है।

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प्रश्न 22.
अवधान के वस्तुनिष्ठ निर्धारक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अवधान के निर्धारण से तात्पर्य उन कारकों से होता है जिनसे यह पता चलता है कि व्यक्ति किसी उद्दीपन पर ध्यान क्यों देता है। वस्तुनिष्ठ निर्धारक (objective condition) से तात्पर्य उद्दीपन की उन विशेषताओं या गुणों से होता है जिनके कारण व्यक्ति का ध्यान उस उद्दीपन की ओर चला जाता है। जैसे-उद्दीपन का आकार, तीव्रता, परिवर्तन, रंग, नवीनता, स्थिति, गति, पुनरावृत्ति (repetition), विलगन (isolation), अवधि तथा विरोध (contrast) आदि को अवधान के वस्तुनिष्ठ निर्धारक की श्रेणी में रखा गया है। वस्तुनिष्ठ निर्धारक की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें उद्दीपन की विशेषता महत्त्वपूर्ण होती है न कि ध्यान देनेवाले व्यक्ति का वैयक्तिक गुण (personal characteristic)।

प्रश्न 23.
अवधान के आत्मनिष्ठ निर्धारण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अवधान के निर्धारण से तात्पर्य उन कारकों से होता है जिससे यह पता चलता है कि व्यक्ति किसी उद्दीपन (stimulus) पर ध्यान क्यों देता है। आत्मनिष्ठ निर्धारक से तात्पर्य उन आत्मगत तथा वैयक्तिक (individual) कारकों से होता है जिनके कारण किसी वस्तु या उद्दीपन पर ध्यान देता है। आत्मनिष्ठा निर्धारण की विशेषता यह होती है कि इसमें ध्यान देनेवाले की आत्मगत या व्यक्ति (personal) कारकों की प्रधानता होती है न कि उद्दीपन के गुणों का। व्यक्ति की अभिरुचि, आदत, जिज्ञासा, आवश्यकता, मनोवृत्ति, अर्थ, मानसिक तत्परता तथा प्रशिक्षण आदि को ध्यान के आत्मनिष्ठ निर्धारक की श्रेणी में रखा जाता है।

प्रश्न 24.
प्रत्यक्षण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रत्यक्षण एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति को उपस्थित उद्दीपनों का ज्ञान होता है। अतः प्रत्यक्षण को परिभाषित करते हुए यह कहा जाता है कि यह एक जटिल संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा वातावरण में उपस्थित उद्दीपन का तात्कालिक ज्ञान होता है। इससे प्रत्यक्षण के बारे में निम्नांकित तथ्य प्राप्त होते हैं –

  1. प्रत्यक्षण एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है।
  2. प्रत्यक्षण एक संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है।
  3. प्रत्यक्षण में उद्दीपनों का तात्कालिक ज्ञान होता है।
  4. प्रत्यक्षण के लिए उद्दीपन की उपस्थिति अनिवार्य है।

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प्रश्न 25.
गति दिगंतराभास किसे कहते हैं?
उत्तर:
गति दिगंतराभास एक गतिक एक नेत्री संकेत होता है। इसके अनुसार सापेक्ष गति से गतिमान पिण्डों में से जो निकट होता है उसकी तुलना में दूरस्थ पिण्ड धीरे-धीरे गति करती हुई प्रतीत होती है। जैसे बस का यात्री निकट की वस्तुओं को विपरीत दिशा में तथा दूर की वस्तुओं को बस के गति की दिशा के साथ गतिमान देखता है।

प्रश्न 26.
फ्राई-घटना किसे कहा जाता है?
उत्तर:
फ्राई-घटना का संबंध आभासी गति भ्रम से है। जब कई क्रमिक चित्रों को लगातार जल्दी-जल्दी दिखाई जाती है तो स्थिर चित्र चलता-फिरता हुआ प्रतीत होता है। सिनेमा में कलाकारों को दौड़ते, बोलते देख पाना आभासी गति भ्रम के कारण ही संभव होता है। जलते-बुझते बिजली के बल्बों को एक निश्चित क्रम में संयोजित करके आभासी गति भ्रम उत्पन्न की जा सकती है। इस आभासी गति भ्रम के कारण होने वाली घटना को फ्राई-घटना कहते हैं।

प्रश्न 27.
उर्ध्वगामी तथा अधोगामी प्रक्रमण के लक्षण बतावें।
उत्तर:
उद्दीपकों के संबंध में प्राप्त सूचनाओं के प्रत्यक्षण के क्रम में प्रत्यभिज्ञान प्रक्रिया उपयोगी सिद्ध हुई है। जब प्रत्यभिज्ञान प्रक्रिया अंशों से प्रारम्भ होती है और जो समग्र प्रत्यभिज्ञान का आधार बनती है, उसे उर्ध्वगामी प्रक्रमण कहते हैं। जब प्रत्यभिज्ञान प्रक्रिया समग्र से प्रारम्भ होती है और उसके आधार पर विभिन्न घटकों की पहचान की जाती है, तो उसे अधोगामी प्रक्रमण कहा जाता है। उर्ध्वगामी उपगाम प्रत्यक्षण उद्दपकों के विविध लक्षणों पर ध्यान देता है जबकि अधोगामी उपागम प्रत्यक्षण करने वालों को महत्त्व देता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 28.
आकृति प्रत्यक्षण की परिभाषा निरूपित करें।
उत्तर:
शरीर हो या कोई उपकरण उसका निर्माण विभिन्न अंगों के समूह के रूप में होता है। जैसे साइकिल कहलाने वाले साधन का निर्माण, सीट, पहिया, हैण्डिल, टायर, ट्यूब आदि के संयोग के रूप में होता है। सभी भाग या अंग मिलकर सम्पूर्ण साइकिल का निर्माण करता है। चाक्षुष क्षेत्र को अर्थयुक्त समग्र के रूप में संगठित करने को प्रत्यक्षण कहते हैं। गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के अनुसार किसी वस्तु का रूप उसके समग्र में होता है जो उनके अंशों के योग से भिन्न होता है। प्रमस्तिष्कीय प्रक्रियाएँ हमेशा अच्छी आकृति का प्रत्यक्षण करने के लिए उन्मुख होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रत्यक्षीकरण संगठन के नियम कौन-कौन हैं? उदाहरण सहित विवेचना कीजिए। या, प्रात्यक्षिक संगठन के गेस्टाल्ट नियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रमुख गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों ने, जिनमें वाइपर, कोफ्का, कोहलर आते हैं, प्रत्यक्षीकरण के दौरान उद्दीपक विशेषताओं के समूहीकरण का अध्ययन किया है। इन वैज्ञानिकों की धारणा है कि उद्दीपकों को पृथकीकरण अथवा समूहीकरण कुछ आन्तरिक एवं बाह्य विशेषताओं के कारण हो पाता है और प्रात्यक्षिक क्षेत्र में विद्यमान उद्दीपक विशेषताएँ कुछ सीमित इकाइयों के रूप में संगठित हो जाती हैं। प्रात्यक्षिक क्षेत्र में रहने वाले विभिन्न अवयव अलग-अलग नहीं दिखाई पड़ते बल्कि पारस्परिक संबंधों के आधार पर संगठित हो जाते हैं और इस प्रकार जब भी संभव होता है आकृतियाँ स्वत: समूहों के रूप में ही प्रत्यक्षित होती हैं।

समूहीकरण सदैव आकृति की सुन्दरता या सुधरता (goodness) की दिशा में होती है। गैस्टाल्ट मनोविज्ञान की भाषा में इसे “प्रॉग्नान्ज का नियम” (Law of Prognans) कहते हैं। प्राग्नान का नियम यह बतलाता है कि यदि उद्दीपक अवयवों का समूहीकरण कई तरह से संभव हो तो समूहीकरण अनिश्चित या यादृच्छिक न होकर उस रूप में होता है जो उपलब्ध संगठनों में सर्वाधिक सुन्दर हो। यही कारण है कि प्रात्यक्षिक संगठन नियमित (regukar), एकरूप (unified), सहज (simplified) तथा समानरूपी (similar) होते हैं। प्रात्यक्षिक संगठन के नियम इसी प्रकार प्राग्नान को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। ये नियम उद्दीपक विशेषताओं के आधार पर आंतरिक एवं बाह्य दो प्रकारों में विभाजित किए जा सकते हैं।

प्रात्यक्षिक संगठन के नियम (Law of Perceptual Organization):
प्रात्यक्षिक संगठन के वे नियम जो उद्दीपक में अन्तर्निहित विशेषताओं से सम्बन्धित हैं और जो अनुभवों पर आश्रित नहीं होते हैं, आन्तरिक नियम के रूप में जाने जाते हैं। इन नियमों के द्वारा ऐसे समरूपों का निर्माण संभव होता है जिनसे प्रत्यक्षीकरण में प्राग्नान बना रहता है। ये नियम निम्नलिखित हैं –

1. निकटता का नियम (Law of Proximity):
प्रात्यधिक क्षेत्र के वे अंग या अवयव जो समय की दृष्टि से जल्दी प्रस्तुत किए जा रहे हों अथवा स्थान की दृष्टि से पास में स्थित हों वे सदैव उपसमूहों में संगठित हो जाते हैं और उनका प्रत्यक्षीकरण उनकी निकटता के आधार पर निर्णित होता है। यदि अन्य विशेषताएँ उद्दीपकों के प्रत्यक्षीकरण में सहायक न हो सके तो निकटता के कारण उद्दीपकों का समूहीकरण हो जाता है।

2. समानता का नियम (Law of Similarity):
यदि प्रत्यक्षिक क्षेत्र विभिन्न अंग विभिन्न रूप वाले हों और निकटता के कारण उनका समूहीकरण कठिन हो रहा हो तो उन उद्दीपकों का संगठन समानता के आधार पर होता है। ऐसा होने के लिए यह जरूरी होता है कि समान उद्दीपक पर्याप्त मात्रा में प्रस्तुत किए जाएँ ताकि उनका पृथक संगठन बन सके।

3. निरंतरता तथा दिशा का नियम (Continuity and Direction):
इस नियम के अनुसार प्रत्यक्षीकरण सदैव निरंतर और अविच्छिन दिशा की ओर उन्मुख होता है। विच्छिन्न और खण्डित उद्दीपकों की अपेक्षा अविच्छिन और निरन्तर दिशा के उद्दीपक ज्यादा प्रभावी होते हैं। इस नियम के अनुसार उद्दीपकों का ऐसा संगठन बनता है जो निरंतर हो और यदि कोई संगठन विद्यमान है तो अन्य सम्बद्ध उद्दीपक भी उसी के साथ जुड़ जाते हैं।

4. पूर्ति का नियम (Law of Closure):
अधूरी या अंशतः अपूर्ण आकृति ‘पूर्ति के नियम’ के अनुसार समूह बनाती है और अधूरी आकृति भी पूर्ण जैसी लगती है। इस प्रकार यह नियम अपूर्ण को पूर्ण करते हुए प्रत्यक्ष करने पर जोर देता है।

5. समान नियति का नियम (Law of Common Fate):
उद्दीपक की कोई शृंखला जब एक साथ समान वेग से समान दिशा में विद्यमान रहती है तो उन अवयवों में संगठन बन जाता है। समान नियति का अर्थ है समान वातावरण में उपस्थित उद्दीपक एक जैसी नियति के कारण परस्कर आबद्ध हो जाते हैं। डेम्बर (1960) के अनुसार वातावरण से पूरी तरह घुला-मिला डद्दीपक भी जब पृष्ठभूमि से भिन्न रूप में उभरता है तो परस्पर असंबद्ध अंशों का समूहीकरण हो जाता है।

6. समावेश का नियम (Law of Inclusion):
संगठित पूर्ण आकृति के अन्तर्गत विद्यमान आंशिक पूर्ण आकृति की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं रह जाती है। वह अंश अलग न दिखाई देकर पूर्ण आकृति में समाविष्ट हो जाता है।

7. सममितता का नियम (Law of Symmetry):
उद्दीपक का वह अंश जो ज्याद सुडोल और सममित होता है आसानी से समूह बना डालता है। समान प्रकार की आकृतियाँ यदि किसी चित्र में समान भाव से वितरित की गयी हों तो वे परस्पर संगठन बना लेने के कारण सुगठित हो जाती है।

8. विन्यास का नियम (Law of Orientation):
उद्दीपन का एक दिशा का होना उद्दीपक के निर्धारण के लिए सहायक हो सकता है। यदि दो चित्र हो जिनमें से एक में कोई आकृति उर्ध्व (Vertical) और क्षैतिज किनारों को सम्मिलित करते हुए बनाई गई हो और दूसरे चित्र में तिरछे किनारों का उपयोग आकृति के लिए किया गया हो तो पहली आकृति अधिक स्पष्टता से और सरलता से होगी दूसरी नहीं, क्योंकि उर्ध्व और क्षैतिज (vertocal and horizonral) रेखाएँ हमेशा चित्र के लिए सहायक मानी गई हैं न कि तिरछी (Oblique), लम्बवत् किनारे वाली (Limbs) रेखाएँ। हमारे स्वयं के विन्यास का प्रभाव यह नहीं है वरन् चित्र जो विन्यास बनाता है उसका निर्देशन इस प्रकार होता है।

ऊपर वर्णित आंतरिक नियमों के अतिरिक्त कुछ बाह्य नियम भी गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों ने प्रतिपादित किए हैं, क्योंकि जब उद्दीपक की संरचनात्मक विशेषताएँ अस्पष्ट सी रहती हैं तब आकृति का प्रत्यक्षीकरण केवल आंतरिक विशेषताओं के कारण नहीं हो पाता। उद्दीपक आकृति की संरचनात्मक अस्पष्टता (Structural ambiguity) की स्थिति में प्रयोज्य का पूर्वानुमान (Past experience), परिचय (Familarity), मनोविन्यास (set) आदि दिशाएँ निर्धारण का कार्य करती हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 2.
संवेदन से आप क्या समझते हैं? उसके प्रमुख गुणों का विशेषताओं का वर्णन करें। या, संवेदन की परिभाषा दें और इसकी विशेषताओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
संवेदन एक सरलतम मानसिक प्रक्रिया है जिसकी उत्पत्ति के लिए किसी-न-किसी तरह का उद्दीपन (stimulus) का होना अनिवार्य हैं। परंतु, संवेदनं द्वारा उद्दीपन का ज्ञान नहीं होता है, मात्र उसका आभास होता है। मस्तिष्क के इस प्रारंभिक एवं सरलतम मानसिक प्रक्रिया का बहुत सूक्ष्म विश्लेषण नहीं किया जा सकता है अतः, शुद्ध संवेदन (pure sensation) का होना असंभव है। कोई भी सामान्य वयस्क व्यावहारिक रूप से शुद्ध संवेदन कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता है क्योंकि जैसे ही वह संवेदन प्राप्त करता है, वह अपनी पूर्व अनुभूति के आधार पर चेतन या अचेतन रूप में उसमें अर्थ जोड़ने का भरसक प्रयास करता है।

शैशवावस्था में जब शिशुओं में पूर्व अनुभूति की कमी होती है तो शायद वे शुद्ध संवेदन का अनुभव करते हों, परंतु इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है बल्कि हकीकत यह है कि शिशु भी उद्दीपन का कोई-न-कोई अर्थ अवश्य ही लगा लेते हैं भले ही वह अर्थ गलत ही क्यों न हो। यदि हम संवेदन की एक परिभाषा देना चाहें तो इस प्रकार दे सकते हैं – “संवेदन एक ऐसी सरल मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हमें उद्दीपनों का एक आभासमात्र होता है क्योंकि इसमें अर्थहीनता तथा अस्पष्टता होती है।” इस परिभाषा का विश्लेषण करने पर हमें संवेदन के स्वरूप के बारे में निम्नांकित चार प्रमुख तथ्य। प्राप्त होते हैं –

  1. संवेदन एक सरल मानसिक प्रक्रिया है।
  2. संवेदन एक संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया (cognitive mental process) है; क्योंकि इसके द्वारा हमें उपस्थित उद्दीपनों के बारे में इसका आभास या ज्ञान अवश्य प्राप्त होता है।
  3. संवेदन में उद्दीपन का अर्थहीन ज्ञान होता है।
  4. संवेदन के लिए उद्दीपन का होना अनिवार्य है।

संवेदन के गुण:
संवेदन के कई गुण (attributes) होते हैं। इन गुणों या विशेषताओं के अभाव में संवेदन का अस्तित्व ही कायम नहीं रह सकता है टिचेनर (Titchener) ने संवेदन के चार गुणों का उल्लेख किया है-प्रकार (quality), तीव्रता (intensity), अवधि (duration) तथा स्पष्टता (clearness)। स्टाउट (Stout) ने संवेदन के उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त दो और गुण भी बताए हैं-विस्तार (extensity) तथा स्थानीय चिन्ह (local sign)।

इस तरह, संवेदन छह गुण हो जाते हैं जिनकी व्याख्या निम्नांकित है –

1. प्रकार (Quality):
प्रत्येक संवेदन एक निश्चित प्रकार का होता है। कोई श्रवण संवेदन होता है तो कोई दृष्टि संवेदन और कोई स्पर्श संवेदन आदि-आदि। इस तरह, संवेदन का सबसे प्रमुख गुण यह होता है कि इसका कोई-न-कोई प्रकार होता है। ऐसा कोई भी उदाहरण नहीं दिया जा सकता है जिसमें संवेदन हो परंतु उसमें प्रकार का कोई गुण नहीं हो। संवेदन का ‘प्रकार’ गुण दो तरह का होता है – जातीय प्रकार (generic quality) तथा विशिष्ट प्रकार (specific quality)।

संवेदनाओं की उत्पत्ति अलग-अलग ज्ञानेन्द्रियों से होती है, तो इसे उसका जातीय प्रकार कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, किसी एक ज्ञानेन्द्रिय से उत्पन्न संवेदन दूसरे ज्ञानेन्द्रिय से उत्पन्न संवेदन से भिन्न होते हैं। संवेदन के इस गुण को जातीय प्रकार का गुण कहा जाता है। जैसे, सभी देखी जानेवाली वस्तुओं के संवेदन को दृष्टि संवेदन कहा जाता है। जो एक खास जातीय प्रकार के गुण का उदाहरण है। एक ही ज्ञानेन्द्रिय से भिन्न-भिन्न तरह के भी संवेदन उत्पन्न होते हैं।

ऐसे संवेदन का विशिष्ट प्रकार (specific quality) कहा जाता है। जैसे, मान लिया जाए कि हम पिता की आवाज सुनते हैं तथा मामा की भी आवाज सुनते हैं। ये दोनों ही श्रवण संवेदन के उदाहरण हैं। परंतु, दोनों में अंतर है। यह अंतर संवेदन के विशिष्ट प्रकार के गुण का एक उदाहरण है क्योंकि दोनों ही संवेदन विशिष्ट प्रकार के हैं।

2. तीव्रता (Intensity):
संवेदन का अन्य गुण उसकी तीव्रता है। संवेदन की तीव्रता अलग-अलग होती है। कोई संवेदन अधिक तीव्र होता है तो कोई संवेदन कम तीव्र होता है। इस तरह, एक ही संवेदन मात्र तीव्रता के अंतर के कारण व्यक्ति में विभिन्न ढंग की अनुभूतियाँ उत्पन्न करता है। एक भोजन की वस्तु में कम नमक डालने से जो स्वाद का संवेदन होगा, वह अधिक नमक डाले हुए भोजन के स्वाद से भिन्न होगा। संवेदन की तीव्रता दो बातों पर आधारित होती है –

उद्दीपन की तीव्रता (intensity of stimulus) तथा उत्तेजित ज्ञानेन्द्रिय। तीव्र उद्दीपन से उत्पन्न संवेदन की मात्रा एक मंद उद्दीपन से उत्पन्न संवेदन की मात्रा से भिन्न होती है। जैसे, यदि व्यक्ति की त्वचा पर सूई की नोक को हल्के ढंग से गड़ाया जाए तथा फिर जोर से गड़ाए जाए, तो स्पष्टतः दो तरह के स्पर्श संवेदन होंगे। एक ही ज्ञानेन्द्रिय के अन्दर के ग्राहक कोशों (receptor cells) की संवेदनशीलता में भी विभिन्नता पाई जाती है जिसके कारण विशेष तीव्रता के एक उद्दीपन को यदि हाथ पर स्पर्श किया जाए तथा फिर उसी से होठ पर स्पर्श कराया जाए तो उत्पन्न संवेदन की मात्रा में विभिन्नता पाई जाएगी। यहाँ पर दोनों संवेदनाओं में विभिन्न कारण उद्दीपन की तीव्रता नहीं है बल्कि त्वचा में स्थित विभिन्न प्रकार के ग्राहक कोशों की संवेदनशीलता में अंतर का होना है।

3. अवधि (Duration):
संवेदन का अन्य गुण उसकी अवधि होता है। संवेदन जितना ही समय के लिए होता है, उसे संवेदन की अवधि कहा जाता है। प्रत्येक संवेदन एक खास समय तक के लिए होता है। ऐसा नहीं होता है कि संवेदन भी हो और उसमें कुछ समय न लगे। संवेदन की अवधि छोटी भी हो सकती है या बड़ी भी। छोटी अवधि तक हुआ संवेदन बड़ी अवधि तक हुए संवेदन से भिन्न होता है। जैसे, यदि हमें कोई ध्वनि संवेदन पाँच सेकंड तक होता है तथा वही संवेदन उसी हालत में 15 सेकंड के लिए होता है तब दोनों प्रकार के संवेदनों में हमें अंतर महसूस होता है। यह अंतर अवधि (duration) में अन्तर के कारण होता है।

4. स्पष्टता (Clearmess):
स्पष्टता संवेदन का एक अन्य गुण है। कोई संवेदन अधिक स्पष्ट होता है तो कम। सच पूछा जाए तो स्पष्टता संवेदन का कोई स्वतंत्र गुण नहीं है और यह बहुत कुछ तीव्रता तथा अवधि के गुण पर आधारित होता है। जो संवेदन अधिक तीव्र होगा, वह व्यक्ति के सामने बहुत देर तक रहेगा तथा वह अधिक स्पष्ट भी होगा। यदि किसी उद्दीपन को धुंधली रोशनी में बहुत समय के लिए दिखाया जाए और फिर उसी वस्तु को तीव्र रोशनी में अधिक समय तक के लिए दिखाया जाए तो दूसरी परिस्थिति में पहली परिस्थिति की तुलना में अधिक स्पष्ट संवेदन होगा। स्पष्ट हुआ कि संवेदन की स्पष्टता बहुत हद तक संवेदन की तीव्रता तथा उसकी अवधि पर आधारित होती है।

5. प्रसार (Extensity):
संवेदन में विस्तार का भी गुण पाया जाता है। किसी भी संवेदन की उत्पत्ति में ज्ञानेन्द्रिय का जितना भाग उत्तेजित होता है, उसे संवेदन का प्रसार कहा जाता है। जैसे, एक अंगुली को गर्म पानी में डालने से संवेदन का विस्तार कम होगा, परन्तु पूरा हाथ डालने से संवेदन का विस्तार अधिक होगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि गर्म पानी में एक अंगुली डालने से ज्ञानेन्द्रिय (त्वचा) का कम भाग उत्तेजित हुआ पूरा हाथ डालने से अधिक भाग उत्तेजित हुआ। अतः, विस्तार संवेदन का एक अन्य मुख्य गुण है।

6. स्थानीय चिन्ह (Local sign):
स्थानीय चिन्ह भी संवेदन का एक प्रमुख गुण होता है। व्यक्ति किसी भी संवेदन का अनुभव तो करता ही है, साथ-ही-साथ उसका स्थान-निर्धारण (localization) भी करता है। जैसे, यदि हमारे शरीर के किसी भाग में दर्द हो रहा है तो हमें ज्ञान हो जाता है कि यह दर्द शरीर के किस भाग में हो रहा है।

उसी तरह यदि पीठ पर पीछे से कोई व्यक्ति हाथ रखे देता है तो हम बिना देखे ही अनुभव कर पाते हैं कि कोई व्यक्ति उसकी पीठ के अमुक हिस्से पर हाथ रखे हुए है। ऐसा इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि संवेदन में स्थान-निर्धारण का गुण होता है। दूसरे शब्दों में, संवेदन में स्थानीय चिन्ह का गुण होता है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि संवेदन, जो एक सरलतम संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है, की अपनी कुछ विशेषताएँ या गुण होते हैं जिनके कारण उसकी अपनी विशिष्टता बनी रहती है।

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प्रश्न 3.
मानव आँख की संरचना या बनावट तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
मानव शरीर में ग्राहक (receptor) या ज्ञानेन्द्रिय (sense organ) एक महत्त्वपूर्ण भाग है। इन ज्ञानेन्द्रियों में आँख का स्थान सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। मानव आँख की संरचना या बनावट फोटो खींचनेवाले कैमरे की संरचना से मिलती है। आँखं ऊपर से देखने में गोलाकार लगता है। इस गोल आकार के कारण इसे नेत्रगोलक (eyeball) कहा जाता है। नेत्रगोलक में तीन तहें या परतें होती हैं जिनकी संरचना या बनावट तथा कार्य का वर्णन निम्नांकित है –

(क) श्वेत पटल (Sclerotic coat)
(ख) मध्य पटल (Choroid) (ग) दृष्टि पटल (Retina)

इन तीनों का वर्णन निम्नांकित है –

(क) श्वेत पटल (Sclerotic coat):
मानव आँख की सबसे बाहरी परत को श्वते पटल कहा जाता है। यह चारों ओर से अपारदर्शी होता है तथा सामने से पारदर्शी होता है। इसका रंग उजला होता है तथा यह परत अधिक ठोस एवं कड़ा होता है। यह अपारदर्शी होत है, इसलिए इससे होकर रोशनी अंदर नहीं जा सकती है। ठोस एवं कड़ा होने के कारण यह आँख के भीतर भागों जैसे लेंस, रेटिना, परितारिका, पुतली आदि की रक्षा भी करता है। श्वेत पटल का वह भार जो आगे की ओर उभरा होता है तथा साथ-ही-साथ पारदर्शी भी, उसे कॉर्निया (cormea) कहा जाता है। कॉर्निया द्वारा ही रोशनी आँख में प्रवेश करती है।

(ख) मध्य पटल (Choroid):
मध्य पटल आँख की दूसरी परत है जिसका रंग काला या भूरा होता है। मध्य पटल का आगे का भाग भी थोड़ा उभरा हुआ होता है जिसे उपतारा या पारितारिका (iris) कहा जाता है। यह कॉर्निया के थोड़ा पीछे होता है। इसका काम प्रकाश का ग्रहण करना होता है। कॉर्निया तथा परितारिक के बीच की जगह में एक प्रकार का तरल पदार्थ भरा रहता है जिसे जलद्रव (aqueous humour) कहा जाता है। इसका द्रव प्रत्येक चार घंटे पर अपने-आप परिवर्तित होता रहता है। कॉर्निया में खून की आपूर्ति (supply) नहीं होती है।

परिणामतः यह अपना पोषक पदार्थ इसी जलद्रव से प्राप्त करता है। परितारिका के बीच एक गोल छेद होता है जिसे पुतली (pupil) कहा जाता है। पुतली के द्वारा ही कॉयिी से आती हुई रोशनी आँख के भीतरी भाग में प्रवेश करती है। पुतली का काम आँख के भीतर प्रवेश करनेवाली रोशनी पर नियंत्रण रखना है।

तीव्र रोशनी की स्थिति में पुतली सिकुड़ जाती है तथा कम रोशनी की स्थिति में पुतली फैल जाती है ताकि उपयुक्त तथा सही मात्रा में रोशनी भीतर प्रवेश कर सके। पुतली के पीछे लेंस (lens) होता है। लेंस में भी खून की आपूर्ति (supply) नहीं होता है और वह अपना पोषक जलद्रव से प्राप्त करता है। पुतली से होकर जब प्रकाश आँख में प्रवेश करता है तब लेंस ही उसे दृष्टिपटल या अक्षिपटल (retina) में सही जगह पर पहुंचा देता है। लेंस अत्यंत ही लचीला होता है तथा इसका आकार छोटा-बड़ा होता है। इसका छोटा या बड़ा होना।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ img 7
मानव आँख का चित्र

सिलियरी मांसपेशी (ciliary muscles) जो लेंस के दोनों किनारों पर होती है, पर निर्भर करता है। दूर की वस्तुओं को देखते समय मांसपेशियाँ फैल जाती हैं जिससे लेंस बड़ा हो जाता है तथा नजदीक की वस्तुओं को देखते समय मांसपेशियाँ सिकुड़ जाती हैं जिससे लेंस छोटा हो जाता है।

(ग) दृष्टि पटल (Retina):
नेत्रगोलक की सबसे भीतरी और तीसरी परत दृष्टिपटल (retina) है। यह वह पटल है जिसपर वस्तु की प्रतिमा बनती है। इसमें दो तरह के प्रकाशग्राही कोशिकाएँ (light-receptor cells) होती हैं-शलाकाएँ (rods) तथा सूचियाँ (cones)। शलाकाएँ कुछ लंबी तथा सूचियाँ कुछ छोटी मोटी होती हैं। शलाकाओं द्वारा व्यक्ति धूमिल रोशनी तथा रात में देख पाता है जबकि सूचियों द्वारा दिन तथा तीव्र प्रकाश में व्यक्ति देख पाता है। शलाकाओं द्वारा व्यक्ति को रंगीन वस्तुओं अर्थात् काले, श्वेत तथा धूसर रंग का ज्ञान होता है तथा रंगीन वस्तुओं का ज्ञान सूचियों द्वारा होता है।

दृष्टिपटल में एक विशेष धंसा स्थान है जहाँ सिर्फ सूचियों की संख्या काफी अधिक होती हैं। इस स्थान को फोबिया (fovea) कहा जाता है। अतः, जब कभी किसी वस्तु की प्रतिमा फोबिया पर पड़ती है तब वह बहुत ही स्पष्ट दिखाई पड़ती है। यही कारण है कि इसे स्पष्टतम दृष्टि बिन्दु (point of clearest vision) भी कहा जाता है।

फोबिया के बाहर शलाकाएँ तथा सूचियाँ दोनों ही असमान संख्या में पाई जाती हैं। जब शलाकाएँ या सूचियाँ प्रकाश को ग्रहण करती हैं तो उनमें दृष्टि तंत्रिका (optive nerve) के सहारे दृष्टिपटल में मस्तिष्क में पहुँचता है। दृष्टिपटल का वह भाग जहाँ से दृष्टि तंत्रिका निकलकर मस्तिष्क में जाती हैं, उसे अंधबिन्दु (blind spot) कहा जाता है जहाँ न तो शलाकाएँ होती हैं और न सूचियाँ ही। इसके परिणामस्वरूप यहाँ से देखना संभव नहीं है। स्पष्ट हुआ कि मानव आँख की बनावट काफी जटिल है तथा इसकी संरचनाओं एवं कार्यो में विशिष्टता पाई जाती है।

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प्रश्न 4.
चयनात्मक अवधान का स्वरूप क्या है? वर्णन करें।
उत्तर:
चयानात्मक अवधान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति कुछ खास क्रिया उद्दीपक पर अपनी मानसिक एकाग्रता (mental concentration) दिखलाता है तथा अन्य क्रियाओं या उद्दीपकों पर न के बराबर ध्यान देता है। मैटलिन (Matilin) के शब्दों में चयनात्मक अवधान को इस प्रकार परिभाषित किया जाता है – “चयनात्मक अवधान एक ऐसी घटना है जिसमें हमलोग एक क्रिया पर अपनी मानसिक क्रियसाशीलता को एकाग्रचित करते हैं तथा अन्य क्रियाओं के बारे में बहुत ही कम ध्यान दे पाते हैं।” जैसे यदि एक साथ कई व्यक्ति मिलकर बगल के कमरे में बातचीत कर रहे हों और आप उनमें से किसी एक व्यक्ति की बात पर ध्यान दे रहो हों तो इसमें आप उस व्यक्ति के बात को ठीक ढंग से सुन पायेंगे तथा अन्य व्यक्तियों के बातों को यदा-कदा। यह चयनात्मक अवधान का उदाहरण होगा।

चयनात्मक अवधान का विशेष गुण या लाभ यह है कि इसमें व्यक्ति एक तरह के कार्य पर दूसरों कार्यों से बिना किसी तरह का अवरोध अनुभव किये एकाग्रचित (concentrate) कर सकता है। इससे मानसिक निष्पादन (mental performance) की उत्कृष्टता बढ़ जाती है। परन्तु चयनात्मक अवधान में कुछ हानि (disadvantages) भी होती है। चयनात्मक अवधान व्यक्ति में कुछ विशेष परिस्थिति में खासकर उस परिस्थिति में कुंठा (frustration) उत्पन्न करने लगता है जब उसे एक ही साथ कई क्रियाओं पर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में लाचारी में व्यक्ति को अन्य क्रियाओं को अवहेलना करनी पड़ती है।

चयनात्मक अवधान के क्षेत्र में सबसे महत्त्वपूर्ण अध्ययन चेरी (Cherry) द्वारा किया गया। इस प्रयोग में उन्होंने छायाभासी प्रविधि (shadowing technique) का प्रतिपादन किया जिसमें प्रयोज्य को सुने हुए शब्दों को ठीक उसी रूप में बोलने के लिए कहा जाता है। चेरी ने एक प्रवक्ता (speaker) की आवाज में दो अलग-अलग सूचनाओं (message) का अभिलिखित किया। प्रयोज्यों को आकर्णक यंत्र (earphone) लगा लेने के लिए कहा गया तथा प्रत्येक कान में अलग-अलग सूचनाओं को दिया गया तथा उन्हें किसी एक सूचना को ठीक उसी ढंग से बोलकर दोहराने के लिए कहा गया है इस तरह के कार्य को द्विभाजित सुनना (diachotic listening) कहा जाता है।

परिणाम में देखा गया कि प्रयोज्यों द्वारा दोनों में से एक ही सूचना, जिसपर वे ध्यान दे सके थे, का प्रत्याव्हान (recal) किया गया। दूसरी सूचना जिसपर वे ध्यान नहीं दे सके (unattended message), से वे बहुत कम प्रत्याव्हान कर सकने में समर्थ हुए। हाँ, जब इस दूसरे तरह की सूचना में कुछ परिवर्तन कर दिया जाता या जैसे इसे पुरुष की आवाज में न कहकर महिला की आवाज में कहा जाता था, तो वैसी परिस्थिति में प्रयोज्यों का ध्यान उस ओर चला जाता था।

इस प्रयोग से स्पष्ट होता है कि व्यक्ति को जब कई तरह की सूचनाओं पर एक साथ ध्यान देने के लिए कहा जाता है उसमें कुछ सूचना पर वह न दे पाता है तथा कुछ पर एक साथ ध्यान नहीं दे पाता है। हाँ, जिन सूचनाओं पर वह ध्यान नहीं दे पाता है अगर उसके स्वरूप में कुछ परिवर्तन कर दिया जाता है (जैसे पुरुष से महिला से पुरुष की आवाज में परिवर्तन होने से तो उस व्यक्ति का ध्यान चला जाता है।) मोरे (Moray) ने अपने एक प्रयोग में पाया कि जिन सूचनाओं पर प्रयोज्य ध्यान नहीं दे पाता है उनमें यदि प्रयोज्य का नाम कहीं-कहीं पर जोड़ दिया जाता है, तो वह उस पर ध्यान देने में समर्थ हो पाता है। चयनात्मक अवधान की व्याख्या करने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने कई तरह के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

  1. मार्गविरोधी सिद्धान्त (Bottleneck theories)
  2. नॉरमैन एवं बोवरो मॉडल (Normm& Bobrow’s model)
  3. नाईसर मॉडल (Neisser model)

स्पष्ट हुआ कि चयनात्मक अवधान (selective attention) की व्याख्या करने के लिए कई तरह के मॉडल का विकास किया गया है। इन विभिन्न मॉडल या सिद्धान्त में कौन सबसे अच्छा है, इसका उत्तर सही-सही ढंग से नहीं दिया जा सकता है।

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प्रश्न 5.
अवधान की परिभाषा दें। अवधान के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या सोदाहरण करें।
उत्तर:
अवधान की परिभाषा-व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियाँ किसी भी समय अनेक तरह के उद्दीपनों से प्रभावित होती रहती है। वह इनमें सबों के प्रति अनुक्रिया न करके कुछ खास-खास उद्दीपन को उनमें से चुनकर उनके प्रति अवश्य ही अनुक्रिया करता है। मनोविज्ञान में इस तरह की चयनात्मक प्रक्रिया को अवधान (attention) कहा जाता है। यदि हम अवधान की एक उत्तम परिभाषा देना चाहें तो इसे प्रकार दे सकते हैं-“अवधान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति विशेष शारीरिक मुद्रा (bodily posture) बनाकर किसी उद्दीपन की चेतना केन्द्र में ला पाता है।”

उक्त परिभाषा का विश्लेषण करने पर हमें अवधान के स्वरूप के बारे में निम्नांकित तथ्य निश्चित रूप से मिलते हैं –

  1. अवधान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है।
  2. अवधान में विशेष शारीरिक मुद्रा (bodily posture) होती है।
  3. अवधान में सिर्फ कुछ ही उद्दीपन चेतना केन्द्र में होते हैं।

अवधान का स्वरूप चयनात्मक (selective) इसलिए होता है, क्योंकि व्यक्ति किसी भी समय में उपस्थित कई उद्दीपनों में सिर्फ कुछ ही उद्दीपन को चुनकर उनपर ध्यान दे पाता है। जब भी व्यक्ति किसी उद्दीपन या वस्तु पर ध्यान देता है तो उस समय शरीर के अंगों द्वारा एक विशेष मुद्रा (posture) अपना ली जाती है। अवधान में व्यक्ति सिर्फ उपस्थित बहुत सारे उद्दीपनों में से कुछ उद्दीपन का चयन ही नहीं करता बल्कि व्यक्ति चुने हुए उद्दीपन को चेतना केन्द्र में भी लाता है। जब उद्दीपन चेतना केन्द्र में आ जाते हैं, तब उसकी स्पष्टता अधिक बढ़ जाती है।

अवधान कई प्रकार के होते हैं जो निम्नांकित हैं –

(क) ऐच्छिक अवधान (Voluntary attention):
ऐच्छिक ध्यान वह ध्यान है जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छा, आवश्यकता, उद्देश्य आदि के अनुकूल किसी उद्दीपन या वस्तु पर ध्यान देता है। इस तरह ऐसे ध्यान में व्यक्ति की इच्छा की प्रधानता होती है तथा व्यक्ति जान-बुझकर किसी वस्तु या उद्दीपन पर ध्यान देता है। इसमें कुछ बाधा भी उपस्थित हो सकती है। फिर भी, व्यक्ति उस उद्दीपन या वस्तु की ओर ध्यान देने के लिए काफी प्रयत्नशील रहता है। जैसे, परीक्षा के समय छात्र मनोरंजन के साधनों सिनेमा, दूरदर्शन आदि पर ध्यान न देकर पढ़ाई पर ध्यान अधिक देते हैं यद्यपि पढ़ाई उन्हें नीरस ही क्यों न लगे। इस तरह, ऐच्छिक अवधान की कुछ स्पष्ट विशेषताएँ हैं जिन्हें बिन्दुवार इस प्रकार बताया जा सकता है –

  • ऐच्छिक अवधान में व्यक्ति की प्रेरणा तथा इच्छा की प्रधानता होती है।
  • ऐच्छिक अवधान में कोई-न-कोई निश्चित उद्देश्य होता है।
  • ऐच्छिक अवधान में व्यक्ति जान-बुझकर उपस्थित कई उद्दीपनों में कुछ भी अवहेलना करके किसी इच्छित एवं वांछित वस्तु या उद्दीपन पर ध्यान देता है।

(ख) अनैच्छिक अवधान (Involuntary attention):
अनैच्छिक अवधान वैसे अवधान को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति की इच्छा या प्रेरणा की प्रधानता नहीं होती है सचमुच अनैच्छिक अवधान न केवल व्यक्ति की इच्छा या प्रेरणा के बिना ही होता है बल्कि कभी-कभी उसके विरुद्ध भी होता है। इस तरह के ध्यान में उद्दीपन (stimulus) का महत्त्व काफी होता है। उद्दीपन अपनी विशेषताओं या गुणों के कारण व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं। अतः, यह कहा जा सकता है कि जब कोई उद्दीपन अपने विशेष गुण या विशेषता के कारण व्यक्ति को अपनी ओर खींच लेता है तो उस ध्यान को अनैच्छिक ध्यान (involuntary attention) की संज्ञा दी जाती है।

जैसे, यदि कोई छात्र अपने कमरे में पढ़ने में तल्लीन है और बगल में बम का धमाका हो तो उसका ध्यान न चाहने पर भी धमाके की ओर चला जाता है। वहाँ उद्दीपन (बम) की विशेषता अर्थात् तीव्रता एक विशेष गुण है जिसके कारण व्यक्ति का ध्यान उस ओर चला जाता है।

(ग) अभ्यस्त या स्वाभाविक अवधान (Habitual attention):
इस तरह के ध्यान में व्यक्ति की इच्छा की कोई खास प्रधानता नहीं होती है बल्कि इसमें व्यक्ति की अभिरुचि, प्रशिक्षण, आदत अदि की प्रधानता होती है और इसी के कारण वह किसी वस्तु या उद्दीपन पर ध्यान दे पाता है। जैसे, शराबी का ध्यान शराब की दुकान की ओर, पान खानेवालों का ध्यान पान की दुकान की ओर, बिल्ली का ध्यान चूहे की ओर, डॉक्टर का ध्यान रोगी की ओर जाना एक अभ्यस्त-अवधान का उदाहरण है।

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि अभ्यस्त अवधान में व्यक्ति अपनी, आदत, अभिरुचि के कारण ही किसी उद्दीपन या वस्तु पर ध्यान दे पाता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि अवधान की प्रक्रिया. एक चयनात्मक प्रक्रिया (selective process) है जिससे व्यक्ति कुछ उद्दीपनों को अपने चेतना केन्द्र में लाता है। अवधान के तीन प्रकार हैं जिनकी कुछ अपनी विशेषताएँ होती हैं।

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प्रश्न 6.
मानव कान की बनावट तथा कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
कान द्वारा हम सुनते हैं। अतः, कान ध्वनि का ज्ञानेन्द्रिय है। मानव कौन की बनावट को तीन भागों में बाँटा गया है –
(क) बाह्य कर्ण (outer ear)
(ख) मध्य कर्ण (middle ear) (ग) अंत: कर्ण (inner ear)

(क) बाह्य कर्ण (Outer ear):
कान का जो भाग बाहर से दिखाई देता है, उसे बाह्य कर्ण कहा जाता है। बाह्य कर्ण के दो भागों में बाँटा गया है –

  • पिन्ना (pinna) तथा
  • कान की नली (auditory canal)।

इन दोनों का वर्णन इस प्रकार है –

1. पिन्ना (Pinna):
कान का सबसे ऊपरी भाग जो सीप के आकर का होता है, उसे पिन्ना कहा जाता है। यह भाग मुलायम हड्डियों से बना होता है। पिन्ना का मुख्य कार्य ध्वनि तरंगों को इकट्ठा करके उसे कान की नली में भोजन होता है। मानव के लिए यह भाग कोई खास महत्त्वपूर्ण नहीं होता है, क्योंकि ऐसा देखा गया है कि इसे नष्ट हो जाने पर भी सुनने में कोई कमी नहीं आती है। इसका स्पष्ट मतलब यह हुआ कि सुनने में पिन्ना का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं होता है।
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मानव कान का चित्र

  • कान की नली
  • कर्णपट
  • मुगदर
  • निहाई
  • रकाब
  • गाल खिड़की
  • अंडाकार खिड़की
  • अर्द्धवृत्ताकार नालिका
  • काक्लिया
  • श्रवण तंत्रिका
  • कर्णकंठ नली

2. कान की नली (Auditory canal):
बाह्यकर्ण का दूसरा भाग कान की नली (auditory tube) होती है। यह करीब एक इंच लम्बी होती है। यह नली कुछ टेढ़ी-मेढ़ी होती

(ख) मध्य कर्ण (Middle ear):
मध्यकर्ण का प्रारम्भ कर्णपट्ट में होता है। मध्यकर्ण में एक छोटी-सी जगह होती है जिसे कोटर typmanic cavity) कहा जाता है। इसमें तीन हड्डियाँ होती हैं-मुग्दर (hummer), निहाई (anvil) तथा रकाब (stirrup) ये तीनों हड्डियों एक-दूसरे से सटी होती हैं। इनमें जो हड्डी कर्णपट्ट से सटी होती है, उसे मुग्दर कहा जाता है। मुग्दर दूसरी ओर निहाई का छोर रकाब से सटा होता है। रकाब का दूसरा छोर अंत:कर्ण की अंडाकार खिड़की (oval window) से सटा होता है। जब कोई ध्वनि तरंग कर्णपट्ट को प्रकपित करता है, जब मुग्दर, निहाई तथा रकाब तीनों ही प्रकपित हो जाते हैं जहाँ से अंत:कर्ण (inner ear) की शुरुआत होती है।

(ग) अंतः कर्ण (Inner ear):
अंत:कर्ण कान का सबसे प्रमुख भाग है। इसकी शुरुआत अंडाकार खिड़की (oval window) से होती है। अंत:कर्ण की बनावट तथा कार्य को ठीक ढंग से समझने के लिए भागों में बाँटा गया है –

(i) अर्द्धवृत्ताकार नलिका (Semi-circular canal):
जब व्यक्ति किसी ध्वनि को सुनने को कोशिश करता है, तो उस समय उसके शरीर का एक विशेष मुद्रा (posture) की जरूरत पड़ती है ताकि कान उस ध्वनि तरंग को ठीक ढंग से ग्रहण कर सके। अर्द्धवृत्ताकार नलिका वैसी मुद्रा बनाए रखने में काफी मदद करती है। इसका मतलब यह हुआ कि अर्द्धवृत्ताकार नलिका यद्यपि कान में अवस्थित है, फिर भी इसका संबंध सुनने से प्रत्यक्ष रूप से नहीं है। इसका विशेष महत्त्व शारीरिक संतुलन बनाए रखने से होता है। इस नलिका में एक तरह पदार्थ होता है जिसमें किसी तरह की गति उत्पन्न हो जाने से व्यक्ति का शारीरिक संतुलन नष्ट हो जाता है तथा वह लड़खड़ाने भी लगता है।

(ii) कोक्लिया (Chochlea):
कोक्लिया अंत:कर्ण का सबसे प्रमुख भाग होता है। सुनने की क्रिया में इस भाग का महत्त्व सबसे अधिक है। यह घोंघे या शंख के आकार का होता है। इसके भीतर तीन नलिकाएँ होती हैं जिनमें तरल पदार्थ भरा रहता है। ये तीन नलिकाएँ हैं-वेस्टीब्युलर नलिका, कोक्लियर नलिका तथा टिपैनिक नलिका। कोक्लियर नलिका तथा टिपैनिक नलिका के बीच की झिल्ली होती है जिसे बेसीलर झिल्ली (basilar membrance) कहा जाता है।

इस बेसिलर झिल्ली पर आर्गन ऑफ कोर्टी (organ of corti) होती है जिसमें सेवार के घास के समान पतली-पतली केश कोशिकाएँ होती हैं। जब ध्वनि तरंगें अंडाकार खिड़की में प्रकंपन उत्पन्न करती हैं तो इससे वेस्टीब्युलर नलिका के तरल पदार्थ में भी कंपन उत्पन्न हो जाती है।

इससे टिंपैनिक नलिका के तरल पदार्थ भी प्रकापत हो उठते हैं। इस हलचल से बेसीलर झिल्ली भी प्रकपित हो जाती है जिसके परिणामस्वयप झिल्ली की कोशिकाएँ भी उत्तेजित हो जाती हैं और उनमें श्रवण तंत्रिका आवेग उत्पन्न हो जाता है जो श्रवण तंत्रिका (auditory nerve) द्वारा मस्तिष्क में पहुँचता है और उसके बाद व्यक्ति ध्वनि को सुन पाता है तथा उसका अर्थ समझ पाता है।

इस तरह, स्पष्ट है कि बाह्य कर्ण का मुख्य कार्य ध्वनि तरंगों को ग्रहण करके कान के भीतर भेजना होता है। मध्यकर्ण का मुख्य कार्य ध्वनि तरंग द्वारा उत्पन्न प्रकंपन को कई गुना तेज कर देना होता है तथा अंत:कर्ण का मुख्य कार्य श्रवण तंत्रिका आवेग (auditory nerve impulse) को उत्पन्न करके उसे मस्तिष्क में भेज देना होता है।

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प्रश्न 7.
ध्यान के वस्तुनिष्ठ निर्धारकों को बतायें।
उत्तर:
ध्यान या अवधान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक विशेष शारीरिक मुद्रा बनाकर किसी वस्तु को चेतना केन्द्र में लाने के लिए तत्पर रहता है। व्यक्ति जब उद्दीपन की विशेषताओं के कारण. उनपर ध्यान देता है, तब इस स्थिति को ध्यान का वस्तुनिष्ठ निर्धारक (objective determinant) कहा जाता है। वस्तुनिष्ठ निर्धारकों में निम्नलिखित कारकों (factors) की भूमिका प्रधान है –

1. उद्दीपन का आकार (Size of stimulus):
ध्यान को आकृष्ट करने में उद्दीपन के आकार का हाथ काफी महत्त्वपूर्ण है। मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि छोटे आकार के उद्दीपन की अपेक्षा बड़े आकार के उद्दीपन की ओर व्यक्ति का ध्यान तेजी से खींच जाता है।

इसलिए पुस्तकों, समाचारपत्रों आदि में मुख्य विषयों तथा खबरों को अधिक मोटे-मोटे अक्षरों में दिया जाता है। खासकर अखबारों में जी विज्ञापन दिया जाता है, वह बहुत ही बड़े-बड़े अक्षरों में रहता है जिससे पाठकों का ध्यान सबसे पहले उसी ओर जाता है। ठीक इसी तरह दुकानदार भी लोगों के ध्यान को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए बड़े आकार का साइनबोर्ड दुकान में लगाते हैं।

2. उद्दीपन की तीव्रता (Intensity of stimulus):
अधिक तीव्र उद्दीपन कम तीव्र उद्दीपन की अपेक्षा व्यक्ति का ध्यान जल्द अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। शायद यही कारण है कि बिजली के बल्ब की तीव्र रोशनी पर हमारा ध्यान लालटेन की रोशनी की अपेक्षा जल्द चला जाता है। उसी तरह यदि कोई व्यक्ति अपने कमरे में रेडियों सुन रहा है और पड़ोसी के यहाँ लाउडस्पीकर बजना प्रारम्भ हो जाता है, तो उस व्यक्ति का ध्यान बरबस लाउडस्पीकर की आवाज की ओर चला जाता है। इसका कारण लाउडस्पीकर की आवाज का रेडियों की आवाज से अधिक तीव्र होना है।

3. उद्दीपन का स्वरूप (Nature of stimulus):
किसी उद्दीपन पर ध्यान देने का एक कारण उसका स्वरूप भी होता है। उद्दीपन के स्वरूप से तात्पर्य उसके प्रकार (kinds) से होता है। जैसे, दृष्टि उद्दीपन (visual stimulus), श्रवण उद्दीपन (auditory stimulus), घ्राण उद्दीपन (olfactory stimulus), स्पर्श उद्दीपन (touch stimulus) आदि।

श्रवण उद्दीपन में भाषण, संगीत, बाद्य यंत्रों की आवाज आदि प्रमुख हैं। यदि किसी जगह मधुर संगीत हो रहा है, तो व्यक्ति का ध्यान उसकी ओर अपने-आप चला जाता है। इसी तरह दृष्टि उद्दीपन भी हमारे ध्यान को आकृष्ट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि फिल्मी सितारों के चित्र साधारण व्यक्ति की अपेक्षा आधुनिक नवयुवकों एवं नवयुवतियों का ध्यान अपनी ओर जल्द आकृष्ट कर लेते हैं।

4. उद्दीपन की अवधि (Duration of stimulus):
जो उद्दीपन देर तक व्यक्ति को ज्ञानेन्द्रिय को प्रभावित करता है, उसपर व्यक्ति का ध्यान उन उद्दीपनों की अपेक्षा जल्द चला जाता है जो व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रिय को क्षणभर के लिए प्रभावित करता है। जैसे, यदि किसी चित्र को क्षणभर हमारे सामने रखकर हटा लिया जाए तो संभव है कि उसपर हमारा ध्यान नहीं भी जाय, परन्तु यदि उसी चित्र को कुछ मिनट तक हमारे सामने रखा जाता है, तो हमारा ध्यान उस ओर निश्चित रूप से जाता है। अतः, उद्दीपन की अवधि निश्चित रूप से व्यक्ति के ध्यान का निर्धारण करती है।

5. उद्दीपन का रंग (Colour of stimulus):
व्यक्ति का ध्यान उद्दीपन पर उसके रंग के कारण भी जाता है। शायद यही कारण है कि रंगीन विज्ञापनों पर व्यक्ति का ध्यान काले-उजले (black-and-white) में किए गए विज्ञापनों की अपेक्षा से जाता है। सिनेमाघर तथा सिनेमा के पोस्टरों को विभिन्न रंगों से सजाने के पीछे छिपा तर्क यही होता है कि ऐसे उद्दीपन व्यक्ति के ध्यान को आसानी से अपनी ओर आकृष्ट कर सकने में सफल हो सकेंगे।

6. उद्दीपन में परिवर्तन (Change in stimulus):
व्यक्ति का ध्यान किसी उद्दीपन की ओर इसलिए भी चला जाता है, क्योंकि उसमें सहसा परिवर्तन आ जाता है। सड़क पर चलती मोटरगड़ी यदि अचानक रुक जाती है, तो सड़क पर चल रहे व्यक्ति का ध्यान उसपर तुरंत चला जाता है। ठीक उसी प्रकार कमरा में बज रहा रेडियो यदि अचानक बंद हो जाता है, तो कमरे में बैठे सभी व्यक्तियों का ध्यान उस ओर चला जाता है। इस तरह उद्दीपन में परिवर्तन भी ध्यान आकृष्ट करने का एक प्रमुख कारक है। उद्दीपन में सहसा परिवर्तन की ओर क्रमिक परिवर्तन की अपेक्षा ध्यान तेजी से जाता है।

7. उद्दीपन की गति (Movement of stimulus):
गतिशील उद्दीपन स्थिर उद्दीपन की अपेक्षा व्यक्ति का ध्यान जल्द हो अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। सिनेमाघरों की उन सजावटों की ओर व्यक्ति का ध्यान जल्द चला जाता है जो गति का आभास प्रदान करते हैं। सड़क पर चलती मोटरगाड़ी खड़ी मोटरगाड़ी की अपेक्षा का ध्यान जल्द आकृष्ट कर लेती है, क्योंकि चलती मोटरगाड़ी में गति होती है।

8. उद्दीपन की नवीनता (Novelty of stimulus):
जब व्यक्ति के सामने कोई नया उद्दीपन या पुराना उद्दीपन नए रूप में आता है, तो व्यक्ति का ध्यान उसकी ओर अनायास ही चला जाता है। सचमुच, व्यक्ति ऊब एवं एकरसता से बचने के लिए इस नवीनता की ओर ध्यान देता है। जैसे, देहाती इलाके में यदि कोई अंगरेज महिला चली जाए तो पूरे गाँवभर के लागों का ध्यान उसकी ओर इसलिए चला जाता है कि वैसी महिला उस परिस्थिति के लिए एक नवीन उद्दीपन होती है। उसी प्रकार कोई युवती पैंट ओर शर्ट या कुरता पहनकर देहाती इलाके में जाती है तो उस ओर लोगों का ध्यान अपने-आप चला जाता है।

9. उद्दीपन की पुनरावृत्ति (Repetition of stimulus):
जो उद्दीपन बार-बार एक व्यक्ति के सामने आता है, उस ओर उसका ध्यान शीघ्र चला जाता है। परन्तु, यदि उसी उद्दीपन को सिर्फ एक बाद व्यक्ति के सामने लाया जाए तो हो सकता है कि उसकी ओर उसका ध्यान न जाए। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर किसी चीज का विज्ञापन बार-बार किया जाता है। खासकर, चुनाव प्रचार करते समय लोगों का ध्यान अपने उम्मीदवार की ओर आकृष्ट करने के लिए प्रचारक लाउडस्पीकर द्वारा उसके नाम और चुनाव चिन्ह को बार-बार दोहराता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर रेडियों से अमुक्त फिल्म तथा वस्तु के बारे में थोड़े-थोड़े समय अंतराल के बाद बार-बार पुनरावृत्ति की जाती है।

10. उद्दीपन में विरोध (Contrast in stimulus):
जब दो या दो से अधिक उद्दीपनों में। आपस में विरोध होता है, तब इस कारण भी व्यक्ति का ध्यान उस उद्दीपन की ओर अनायास चला जाता है। इस विरोध के कारण ही बहुत काली लड़कियों के बी एक गोरी लड़की पर या. गोरी लड़कियों के बीच एक काली लड़की पर हमारा ध्यान तेजी से चला जाता है। इसी प्रकार किसी सुंदरी के गोरे गाल पर काला तिल छोटा होने पर भी विरोध के कारण ध्यान आकृष्ट कर लेता है। घोर अँधेरे में टिमटिमाता दीपक हमारे ध्यान को अपनी ओर खींच लेता है।

11. उद्दीपन का विलगन (Isolation of atimulus):
उद्दीपन का विलगन भी एक कारक है जो ध्यान को प्रभावित करता है। विलगन का अर्थ किसी उद्दीपन का अन्य उद्दीपनों से अलग होने से होता है। इस तथ्य को मद्देनजर रखते हुए सिगरेट आदि के प्रचारक बहुत बड़े बैलून में सिगरेट के ब्रांड का नाम लिखकर उसे एक डोर से बाँधने के बाद आकाश में कुछ ऊँचाई पर छोड़ देते हैं।

जो लोग भी उधर से गुजरते हैं, उनका ध्यान उस ओर अवश्य चला जाता है। फिर किसी क्लास में बैठे छात्रों के बीच से कोई एक छात्र खड़ा हो जाता है, तो सबका ध्यान उस ओर चला जाता है। इन सबका कारण उद्दीपन का विगलन है। स्पष्ट हुआ कि उद्दीपन की कई ऐसी विशेषताएँ होती हैं जिनके कारण व्यक्ति का प्रयास अनायास उनकी ओर चला जाता है।

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प्रश्न 8.
ध्यान की परिभाषा दें। इसकी विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
ध्यान की परिभाषा-व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियाँ किसी भी समय अनेक तरह के उद्दीपनों से प्रभावित होती रहती है। वह इनमें सबों के प्रति अनुक्रिया न करके कुछ खास-खास उद्दीपन को उनमें से चुनकर उनके प्रति अवश्य ही अनुक्रिया करता है। मनोविज्ञान में इस तरह की चयनात्मक प्रक्रिया को अवधान (attention) कहा जाता है। यदि हम अवधान की एक उत्तम परिभाषा देना चाहें तो इस प्रकार दे सकते हैं-“अवधान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति विशेष शारीरिक मुद्रा (bodily posture) बनाकर किसी उद्दीपन की चेतना केन्द्र में ला पाता है।”

ध्यान की विशेषताएँ (Characteristics of attention):
ध्यान की परिभाषा का विश्लेषण करने पर हमें ध्यान की कुछ निश्चित विशेषताओं का पता चलता है जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. ध्यान या अवधान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है (Attention is a selective mental process):
वातावरण में उपस्थित अनेक उद्दीपन हर समय हमारी ज्ञानेन्द्रियों की प्रभावित करते रहते हैं। लेकिन, उनमें कुछ ही उद्दीपन हमारे चेतना केन्द्र (focus of consciousness) में आते हैं, बाकी सभी उपेक्षित हो जाते हैं। व्यक्ति इन उद्दीपनों में से किसी एक को चुन लेता है और उसी पर ध्यान देता है। इसलिए ध्यान को चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया कहा जाता है।

2. ध्यान एक प्रेरणात्मक प्रक्रिया है (Attention is a motivational process):
ध्यान तथा प्रेरणा (motivation) में घनिष्ठ संबंध है। खासकर उत्तेजनाओं के चयन में प्रेरणा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं, अभिरुचियों, मनोवृत्तियों आदि से प्रेरित होकर किसी उद्दीपन को चेतना केन्द्र में लाता है अर्थात् उसपर ध्यान देता है।

3. ध्यान का विस्तार सीमित होता है (Span of attention is limited):
एक समय में उपस्थित कई उद्दीपनों में व्यक्ति जितने अधिक-से-अधिक उद्दीपनों पर ध्यान दे पाता है, उसे ही ध्यान का विस्तार कहा जाता है। प्रयोगों द्वारा यह स्पष्ट है कि एक क्षण में सीमित वस्तुओं पर ही ध्यान केन्द्रित हो पाता है। इन प्रयोगों में यह स्पष्ट है कि क्षणभर में 6 से 11 अक्षरों या अंकों पर ही ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है। अर्थपूर्ण अक्षरों के ध्यान का विस्तार 11 तक होता है –

और निरर्थक शब्दों का ध्यान का विस्तार 6 से 8 तक का होता है। जिस उपकरण से ध्यान विस्तार का अध्ययन किया जाता है, उसे “टैचिस्टोस्कोप’ (tachistoscope) कहा जाता है। इससे स्पष्ट है कि ध्यान का विस्तार तो सीमित होता ही है, साथ-ही-साथ विभिन्न प्रकार के उद्दीपनों के लिए ध्यान-विस्तार अलग-अलग होता है।

4. ध्यान उद्देश्यपूर्ण होता है (Attention is purposive):
हम एक साथ अनेक उद्दीपनों या वस्तुओं पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते। जब हम अनेक उद्दीपनों में से चुनकर किसी एक उद्दीपन पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तब उसके पीछे किसी उद्देश्य की पूर्ति का भाव छिपा रहता है। जैसे, यदि कोई छात्र परीक्षा के समय खेलकूद से ध्यान हटाकर पुस्तकों की ओर केन्द्रित करता है तब इसके पीछे उसका उद्देश्य परीक्षा में अधिक अंक लाकर उच्च स्थान प्राप्त करना होता है। इस तरह ध्यान उद्देश्यपूर्ण होता है।

5. ध्यान में अस्थिरता तथा उच्चलन का गुण होता है (Attention has the property of fluctuation and shifting)”
ध्यान में अस्थिरता तथा उच्चलन दोनों का गुण होता है। ऐसा देखा गया है कि व्यक्ति का ध्यान प्रायः एक ही उद्दीपन के एक पहलू से दूसरे पहलू पर परिवर्तित होता रहता है। यह गुण का ध्यान अस्थिरता (fluctuation of attention) कहा जाता है।

जैसे, यदि कोई व्यक्ति किसी सुन्दर चित्रकारी पर देखता है, तो उसका ध्यान चित्रकारी के एक बूटे से दूसरे बूटे तथा फिर दूसरे बूटे से तीसरे बूटे पर अपने-आप जाता है। ध्यान के इस गुण को ध्यान एक अस्थिरता (fluctuation of attention) कहा जाता है। ऐसा भी होता है कि व्यक्ति का ध्यान एक उद्दीपन से दूसरे उद्दीपन तथा दूसरे से तीसरे उद्दीपन पर परिवर्तित होता है। ध्यान के इस गुण को ध्यान उच्चलन (shifting of attention) कहा जाता है। जैसे, कपड़ा की दुकान में जब व्यक्ति का ध्यान एक कपड़े से दूसरे कपड़े तथा दूसरे से तीसरे कपड़े पर जाता है, त वह ध्यान उच्चलन (shifting of attention) का उत्तम उदाहरण बनता है।

6. ध्यान में विभाजन का गुण होता है (There occurs division in attention):
ध्यान में विभाजन संभव है। सामान्यतः जब एक ही समय में व्यक्ति दो भिन्न कार्यों को करने लगता है तब इस प्रक्रिया में उसका ध्यान उन दोनों कार्यों पर होता है। अवधान की इस स्थिति को अवधान विभाजन (division of attention) कहा जाता है। अक्सर देखा जाता है कि छात्र किताब पढ़ते समय धीमा करके अपना रेडियो भी चालू रखते हैं। इस तरह, उनका ध्यान कुछ किताब पर तथा कुछ रेडियो पर होता है। इस,उदाहरण से यह स्पष्ट है कि ध्यान में विभाजन का गुण होता है।

7. ध्यान में एक विशेष तरह की शारीरिक मुद्रा होती है (Attention involves particular bodily posture):
जब भी व्यक्ति किसी वस्तुया उद्दीपन पर ध्यान देता है तो इसमें एक विशेष शारीरिक मुद्रा भी होती है ताकि वह उद्दीपन का ठीक ढंग से प्रत्यक्षण करे। जैसे, वर्ग में शिक्षक का भाषण सुनते समय छात्र अपने सिर, हाथ, पैर आदि को विशेष ढंग से कर लेते हैं जिसे देखने से यह लगता है कि वे ध्यानमग्न होकर उनका भाषण सुन रहे हैं। इस तरह, प्रत्येक ध्यान में एक विशेष शारीरिक मुद्रा होती है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि ध्यान की कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जिनके आधार पर इसके स्वरूप को भनीभांति समझा जाता है।

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प्रश्न 9.
भ्रम से आप क्या समझते हैं? या, भ्रम कितने तरह के होते हैं?
उत्तर:
एक उत्तेजना के उपस्थित होने पर ज्ञानेन्द्रियों का सम्पर्क उस उत्तेजना का एक सामाजिक और सर्वमान्य अर्थ होता है। पर कभी-कभी प्राणी उत्तेजनाओं के सम्पर्क में आने के पश्चात् भी उनके सामाजिक एवं सर्वमान्य अर्थ को समझने में भूल कर जाता है। ऐसी अवस्थाओं को ही विपर्यय या भ्रम की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार मनोविज्ञान का दृष्टि से भ्रम का मानसिक क्रिया है जिसके द्वारा किसी उपस्थित उद्दीपन का गलत ज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रकार भ्रम के सम्बन्ध में तीन बातें उल्लेखनीय हैं।

1. भ्रम एक मानसिक क्रिया है।

2. भ्रम के लिए किसी उद्दीपन का उपस्थित रहना जरूरी है। किसी को अंधेरे में पेड़ के उपस्थित रहने पर चोर का भ्रम होता है। ठीक उसी प्रकार रस्सी के उपस्थित रहने पर साँप का भ्रम होता है, किसी मुसाफिर को देखकर मित्र का भ्रम होता है। यदि पेड़, रस्सी और मुसाफिर न रहें, तो क्रमशः चोर, साँप और मित्र का भ्रम नहीं होगा।

3. भ्रम से उद्दीपन का गलत ज्ञान प्राप्त होता है। यही भ्रम होता है। यही भ्रम की सबसे प्रमुख विशेषता है जो इसे प्रत्यक्षीकरण से भिन्न करती है। रस्सी को देखकर साँप समझना रस्सी का गलत ज्ञान है। भ्रम या विपर्यय के प्रकार (Kinds of Illusion) विपर्यय प्रायः सभी सामान्य व्यक्तियों में होता है। विपर्यय क्षणिक तथा स्थायी दोनों हो सकता है। यह भौतिक तथा. मानसिक दोनों प्रकार की परिस्थितियों के कारण हो सकता है। इस दृष्टिकोण से विपर्यय के दो प्रकार हो सकते हैं –

(अ) वैयक्तिक विपर्यय (Personal Illusion):
मानसिक परिस्थिति के कारण समुत्पन्न विपर्यय वैयक्तिक कोटि का होता है। यह परिस्थिति के अनुसार क्षणिक अथवा स्थायी दोनों हो सकता है। जैसे, रस्सी को साँप समझ लेना या पेड़ को आदमी समझ लेना, पेड़ को चोर समझ लेना अथवा पानी को सूखा समझ लेना आदि वैयक्तिक विपर्यक के उदाहरण हैं। यह नितांत क्षणिक-कोटि का दोष उससे दूर चला जाता है। जैसे, चिराग आते ही रस्सी को रस्सी तथा चटाई को चटाई समझ लेना अथवा पाँव पड़ते ही पानी और सूखी जमीन का सही ज्ञान हो जाना इसके प्रमाण हैं। इस प्रकार विपर्यय में वैयक्तिक भिन्नता होती है। एक ही व्यक्ति में भी यह देश, काल तथा संदर्भ में परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है। इसका आधार पूर्णतः मानसिक होता है।

(ब) विश्वजनीय विपर्यय (Universal Illusion):
इसे सामान्य विपर्यय भी कहा जाता है। यह स्थायी होता है। इसका कारण भौतिक होता है। अपनी बुद्धि से ही सही अर्थ लगा लेने पर उसमें विशेष परिवर्तन नहीं होता। सचेष्ट रहने पर भी इस प्रकार की गलती होती है। इस प्रकार की गलती प्राय: सभी आदमी करते हैं। अत: इस कारण किसी को असामान्य नहीं कहा जा सकता। इसका अपवाद सामान्यतः कोई नहीं हो सकतः। इसके अनेक प्रमाण हमारे दैनिक जीवन में मिलते हैं। उदाहणार्थ –

  • पृथ्वी स्थिर है और सूर्य चलता हुआ नजर आता है।
  • जहाँ कहीं भी खड़े होरक आप अपनी आँखें फैलायें तो चारों ओर आकाश जमीन को छूता हुआ नजर आता है।
  • चलती रेलगाड़ी की खिड़कियों से झाँकने पर ऐसा लगता है मानो अलग-अलग के वृक्ष तथा बिजली के खम्भे पीछे की ओर भागते हों।
  • स्टेशन पर किसी एक गाड़ी में आप बैठे हैं। यदि बगल की दूसरी गाड़ी चलने लगे तो आपको ऐसा लगेगा मानों आपकी ही गाड़ी चल रही है।
  • रेल की दो पटरियों के बीच बैठकर आगे की ओर देखने पर ऐसा लगता है मानो दोनों पटरियाँ कुछ दूरी पर जाकर बिल्कुल सट रही हों।

इस प्रकार के वस्तुगत तत्त्वों से समुत्पन्न स्थायी विपर्यय सभी सामान्य व्यक्तियों में पाये जाते हैं। कभी-कभी पूर्ण वैयक्तिक स्तर का भी अस्थायी विपर्यय होते देखा जाता है। माँ-बाप, गुरु तथा हितैषी, अभिभावक के डाँट-फटकार, भर्त्सना आदि का गलत अर्थ लगाकर आत्महत्या कर लेना, अथव उन्हें अपना जानी दुश्मन समझकर उनसे बदला लेने का प्रयास करना इसका व्यावहारिक प्रमाण है। प्रयोगशाला में इस व्यवहार का विशेष अध्ययन किया गया है। इसका महत्त्वपूर्ण प्रमाण दृष्टिगम विपर्यय में मिलता है। इसे ज्यामितिय विपर्यय भी कहते हैं।

(स) दृष्टिगत विपर्यय:
दृष्टिगत विपर्यय को हम पाँच भागों में बाँट सकते हैं –

  • दूरी सम्बन्धी
  • लम्बाई सम्बन्धी
  • भरा स्थान
  • मूलर लायर और
  • विपरीत

अब हम इन पर विचार करेंगे –

1. दरी सम्बन्धी विपर्यय:
इसमें किसी रेखा की लम्बाई अथवा चित्र के आकार को समझने में कठिनाई हो सकती है।

2. लम्बाई विपर्यय:
समान लम्बाई की रेखाओं में खड़ी रेखा पड़ी रेखा से लम्बी मालूम पड़ती है। वण्ट के अनुसार खड़ी रेखा को देखने पर पड़ी रेखा की अपेक्षा अधिक समय और श्रम लगता है, इसमें आँख को अधिक गति करनी पड़ती है इसलिए उनका अधिक मूल्यांकन हो जाता है। हेल्महोज ने इसमें आदत का मान भी है।

3. भरा स्थान विपर्यय:
समान लम्बाई की दो रेखाएँ लीजिए। एक को बराबर दूरी पर चार जगह काट दीजिए। दूसरी को यों ही भरा पूरा छोड़ दीजिए। आप देखेंगे कि भरा स्थान रिक्त की अपेक्षा लम्बा पड़ता है।

4. मूलर लायर विपर्यय:
समान लम्बाई को एक पंख पड़ी. रेखा तथा दूसरी बाण रेखा को एक साथ देखने से पंख रेखा बाण रेखा से बड़ी मालूम होती है। थायरी महोदय ने इसकी व्याख्या दृश्य के आधार पर की है। उनके मुताबिक खुली रेखा विस्तृत होने के कारण अधिक जगह का ढंक लेती है। बन्द रेखा सीमित रहती है। अत: वास्तविक लम्बाई समझने में गलती होती है।

5. विपरीत विपर्यय:
दो समान क्षेत्रफल के वृत्तों को लीजिए। एक को छोटे तथा दूसरे को बड़े वृत्त के क्षेत्रफल में रख दीजिये। यहाँ छोटे वृत्तों के बीच वाला वृत्त अपेक्षाकृत बड़ा मालूम होगा। इस प्रकार लम्बे व्यक्ति के साथ खड़ा रहने पर नाटा व्यक्ति बहुत ही नाटा लगता है।

कोण विपर्यय:
कोण से दिशा का बोध होता है। जीलनर, हेरिंग, वुण्ट तथा पोंगेनजर्फ के चित्रों में इनका विशेष प्रमाण मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि एक समकोण से कमवाले कोण का अधिक मूल्यांकन होता है तथा एक समकोण से अधिक वाले कोण का कम मूल्यांकन होता है। इनके अतिरिक्त लिपिशोधक भ्रम तथा चलिचत्र भ्रम के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। ये भी सामान्य कोटि के स्थायी विपर्यय हैं। ये विश्वजनीन होते हैं।

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प्रश्न 10.
प्रत्यक्षीकरण में पूर्वानुभव का क्या हाथ है? वर्णन करें। या, प्रत्यक्षीकरण में गत अनुभव का महत्त्व बतलायें।
उत्तर:
पूर्व अनुभूति का प्रत्यक्षीकरण में स्थान के विषय में मनोवैज्ञानिक विचारकों में दो श्रेणियाँ हैं। कुछ विचारकों के अनुसार, पूर्व अनुभूति मनुष्य में एक मानसिक अवस्था को उत्पन्न करती है। फलत: मनुष्य पूर्व में देखी हुई वस्तुओं को पूर्व की तरह देखता है। प्रत्यक्षीकरण से जो ज्ञानात्मक व्यवहार या अनुभव उत्पन्न होते हैं उनका आधार पूर्व अनुभूति ही होती है। इन मनोवैज्ञानिकों का मत है कि मनुष्य पूर्व-अनुभूति के अभाव में किसी भी चीज का प्रत्यक्षीकरण नहीं कर सकता। इस विचार की पुष्टि के लिए मनोवैज्ञानिकों ने अनेक प्रयोग किये हैं। थाउलैंस महोदय ने एक प्रयोग किया है जिसमें व्यक्ति को कुर्सी दिखलाई।

कुर्सी जिस व्यक्ति को दिखाई गयी, उस व्यक्ति की आँखों में अक्षिपट पर विशेष प्रबन्ध द्वारा उस कुर्सी का प्रतिबिम्ब इस प्रकार गिराया गया कि यह प्रतिबिम्ब कुर्सी उलट कर देखने पर होने वाले प्रतिबिम्ब की तरह था। ऐसी अवस्था में व्यक्ति को कुर्सी उल्टी हुई नजर आनी आवश्यक थी, पर ऐसा न हुआ। कुर्सी उस व्यक्ति को सीधी ही जान पड़ती थी। कुर्सी को सीधा रख देखने का एकमात्र कारण मनुष्य की पूर्व अनुभूति थी, जिसने मनुष्य में एक मानसिक स्थिति को उत्पन्न कर पूर्व की देखी वस्तु को पहले की ही तरह देखने की प्रवृत्ति का सम्पन्न किया।

अर्थात् उसने कभी भी उलटी हुई कुर्सी का उस अवस्था में देखने की अनुभव नहीं किया था। पूर्व का अनुभव कुर्सी को सीधा देखने का था फलतः उसने कुर्सी को सीधा हो रखा देना। इस प्रयोग से यह स्पष्ट है कि पूर्व-अनुभूति के अभाव में प्रत्यक्षीकरण संभव नहीं है एक दुसरा प्रयोग एक जमान्ध व्यक्ति पर भी किया गया था जन्मान्ध व्यक्ति की आँखों को ऑपरशन म ठीक करने पर जब उसकी आँखों में रोशनी आ गयी त उसे त्रिभुज और वन क आकार की दा भिन्न आकृतियाँ दिखलाई गयी। उस व्यक्ति ने पहले कभी इन आकृतियों को नहीं देखा था। परिणामस्वरूप यह पाया गया कि वह व्यक्ति इन दोनों चीजों के आपसी अन्तर को पहचानने में असमर्थ था। इसकी दष्टि में वत्त एवं त्रिभज में कोई अन्तर नहीं था। इस प्रयोग से भी पूर्व अनुभूति की महत्ता स्पष्ट हो जाती है।

दूसरे वर्ग के विचारक गेस्टाल्टवादी हैं। गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार प्रत्येक प्रत्यक्षीकरण में आकार और पृष्ठभूमि का सम्बन्ध रहता है। अर्थात् मनुष्य के अनुभवों में भी पृष्ठभूमि और सम्बन्ध देखने को मिलता है। इसके अनुसार प्रत्यक्षीकरण संवेदना और अर्थ का योग नहीं है। दूसरे शब्दों में, ऐसा नहीं होता कि किसी उद्दीपन के सम्बन्ध में जो अर्थ हमें मालूम है उसकी वही अर्थ हम हमेशा लगावें। हमेशा अर्थ पहले से निश्चित नहीं रहता है।

प्रत्यक्षीकरण प्राप्त करते समय परिस्थिति का महत्त्वपूर्ण हाथ रहता है। किसी भी वस्तु का प्रत्यक्षीकरण किसी पृष्ठभूमि में होता है। यह पृष्ठभूमि वस्तु के प्रत्यक्षीकरण में परिवर्तन ला सकती है। उदाहरणार्थ, हमें यह अनुभव है कि पेड़ स्थिर रहते हैं, ये चल नहीं सकते। लेकिन जब चलती रेलगाड़ी में सफर करते हैं तो अगल-बगल के पेड़-पौधे विपरीत दिशा में भागते हुए दीख पड़ते हैं।

इसी तरह दौड़ते हुए बादल की पृष्ठभूमि में चाँद दौड़ता हुआ लगता है। अतः उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण हमेशा पूर्व निश्चित दिशा में ही नहीं होता। कभी-कभी गत अनुभव पृष्ठभूमि के रूप में काम करते हैं। इस प्रकार प्रत्यक्षीकरण में गत अनुभव का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कभी तो गत अनुभव किए मानसिक वृत्ति का काम करता है जिसके परिणामस्वरूप किसी उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण पूर्व निश्चित रूप में होता है और कभी यह पृष्ठभूमि का भी काम करता है जिसके फलस्वरूप प्रत्यक्षीकरण एक खास तरह का होता है।

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प्रश्न 11.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखें –
(क) उत्तेजना
(ख) प्रत्यक्षीकरण के निर्धारक
(ग) प्रत्यक्षीकरण के आकार तथा पृष्ठभूमि।
उत्तर:
(क) उत्तेजना (Stimulus):
मस्तिष्क में वर्तमान संगठन करने की क्रिया कार्यशील – होना उत्तेजना पर निर्भर है। वातावरण की उत्तेजनाएँ मस्तिष्क में संगठन करने की क्रिया उत्पन्न करती है। यह क्रिया जब मस्तिष्क में उत्पन्न होती है तो व्यक्ति की मानसिक अवस्था कुछ खास तरह की हो जाती है। व्यक्ति को प्रत्यक्षीकरण मस्तिष्क की इस अवस्था के ही अनुरूप.होता है। इस प्रकार गेस्टाल्टवादियों के अनुवाद वातावरण में, उपस्थित उत्तेजना एवं प्रत्यक्षीकरण में कोई अनुरूपता नहीं रहती, किन्तु व्यक्ति के अनुभव और मानसिक क्रियाओं में काफी अनुरूपता देखी जाती है।

गेस्टाल्टवादियों ने यह पूर्णतः स्पष्ट कर दिया है कि भौतिक वातावरण में उपस्थित उत्तेजनाएँ हमारे अनुभव में पूर्णरूपेण नहीं मिलती हैं। व्यक्ति का वातावरण-सम्बन्धी ज्ञान का अनुभव स्नायुमण्डल के स्तर पर हुए संगठन की देन है। इस संगठन के फलस्वरूप ही व्यक्ति संवेदनाओं के द्वारा प्राप्त प्रदत्ता को ज्यों का त्यों ग्रहण नहीं करता, बल्कि उन प्रदत्तों का एक भिन्न अनुभव इसे होता है, जिसको अभिव्यक्ति वह अपने व्यवहारों में करता है। स्नायुमण्डल पर हुए संगठन के फलस्वरूप व्यक्ति वातावरण का संगठित अनुभव करता है तथा वातावरण की उत्तेजनाओं का प्रत्यक्षीकरण वह आकार एवं पृष्ठभूमि में करता है।

(ख) प्रत्यक्षीकरण के निर्धारक (Factors of perception):
गेस्टाल्टवादियों के अनुसार प्रत्यक्षीकरण संवेदनाओं और गत अनुभवों के आधार पर व्याख्या नहीं की जा सकती। वस्तु का वास्तविक रूप पूर्ण में है। जर्मनी में इसको गेस्टाल्टन (Gestaltan) और अंग्रेजी में गेस्टाल्ट या जेस्टाल्ट (Gestalt) कहा जाता है। वस्तु के प्रत्यक्षण में उसके इन जेस्टाल्ट का बड़ा महत्व है।

गेस्टाल्ट के प्रभाव से ही चेहरा सुन्दर दिखलाई पड़ता है। प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों ने किया था। 1912 में बर्दाईमर ने प्रयोगों के आधार पर यह बतलाा कि उत्तेजना का प्रत्यक्षीकरण उसको पूर्ण रूप में होता है। इस प्रकार आँख, नाक, कान, जिह्वा आदि विभिन्न इन्द्रियों से जो प्रत्यक्षीकरण होता है वह पूर्ण रूप से ही होता है। हारमोनियम से निकली लय (Tune) बड़ी मोहक लगती है, परन्तु इस लय के सा, रे, ग, म, को अलग-अलग कर दिया जाय तो वह लय गायब हो जायगी।

गेस्टाल्टवादियों के अनुसार, प्रत्यक्षीकरण भौतिक पदार्थों की उत्तेजना के फलस्वरूप प्राणी के स्नायु-संस्थान में होने वाली शारीरिक क्रियाओं से निर्धारित होता है। व्यक्ति को जो कुछ दिखाई पड़ता है वह बहुत कुछ उसे दिखलाई देने वाली वस्तु से उत्पन्न संवेदनाओं पर निर्भर होता है। वातावरण में उपस्थित उत्तेजनाओं का प्रत्यक्षीकरण गेस्टाल्टवादियों के अनुसार मस्तिष्क द्वारा वातावरण को संगठित करने पर आश्रित है। यह सत्य है कि उत्तेजनाओं के उपस्थित होने पर संवेदनाएँ प्राप्त होती हैं, किन्तु व्यक्ति केवल इन संवेदनाओं के आधार पर ही प्रत्यक्षीकरण नहीं करता। वह मस्तिष्क में स्थित संगठन-क्रिया के सहारे वातावरण को देखता है जिससे उसके सामने उपस्थित होनेवाली उत्तेजनाएँ अर्थपूर्ण एवं संगठित होती हैं।

इस प्रकार गेस्टाल्टवादियों के मतानुकूल स्पष्टतः प्रत्यक्षीकरण एक जन्मजात क्रिया है। इस क्रिया के प्रमुख उद्देश्य-संगठन पर ही वस्तु का ज्ञान आश्रित है। ज्ञान के क्षेत्र में विशिष्ट संगठन को निर्धारित करने वाले स्वतंत्र संवेदनात्मक अंग प्रत्यक्ष क्रिया के रचनात्मक अंग कहलाते हैं। इन्हीं के आधार पर गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों ने संगठन के कुछ नियम निकाले हैं। मुख्य निम्नलिखित हैं –

1. समग्रता का नियम:
गेस्टाल्टवादियों ने समग्रता के नियम को संगठन का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना है। इस नियम के अनुसार प्रत्यक्षीकरण में समस्त परिस्थिति का एक साथ प्रत्यक्ष होता है। संवेदन-समूह प्राणी के मस्तिष्क पर संगठित आकार के रूप में असर डालता है। यह संगठित आकार ही जर्मन भाषा में जेस्टाल्टन कहलाता है। किसी चित्र को देखने पर आप का ध्यान सबसे पहले समग्र संगठन की ओर जाता है और आप यह नोट करते हैं कि कुछ बिन्दु जोड़े में दिए गए हैं।

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पूरे चित्र में जितने बिन्दु हैं उनकी संख्या की ओर आपका ध्यान बाद में जाता है और किसी विशेष बिन्दू की ओर तो आप कठिनता से ही ध्यान दे पाते हैं। अर्थात् एक अकेले बिन्दु को आप शायद ही कभी देखते हैं। समग्रता के नियम का मतलब है कि प्रत्यक्षीकरण में समग्रता सबसे पहले दिखाई पड़ती है। इसी कारण कभी-कभी देखने वाले का ध्यान चित्र के छोटे-मोटे दोष की ओर नहीं जाता।

यदि हम कोशिश करके देखें तो हमको आपने जाने-पहचाने व्यक्तियों के चेहरे में भी आँख, नाक आदि की अलग-अलग विशेषताएँ याद नहीं आयेंगी जबकि हमने कभी जान-बूझकर उसकी ओर गौर नहीं किया हो। इसका कारण यह है कि हमने समग्र चेहरे को एक साथ देखा है। चेहरे के विशेष अंगों की ओर ध्यान नहीं दिया है। समग्रता के नियम को जेस्टाल्टवादियों ने कई तरह के विपर्ययों से सिद्ध किया है।

2. आकृति और पृष्ठभूमि का नियम (Law of Figure and Black-ground):
व्यक्ति के सामने उसके वातावरण में अनेक उत्तेजनाएँ रहती हैं। व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप वातावरण में उपस्थित इन उत्तेजनाओं में से किसी को अपने सामने आकार के रूप में रखता है। अन्य उत्तेजनाओं सामने आकार के रूप में रहने वाली उत्तेजना की पृष्ठभूमि में रहती हैं। आकार और पृष्ठभूमि का सम्बन्ध वातावरण को संगठित करने में आवश्यक सहयोग देता है। रूबिन महोदय ने कहा है कि उत्तेजना के उपस्थित होने पर प्रथम तो व्यक्ति को उत्तेजनाओं के साथ सम्बन्ध परिलक्षित होने लगता है। अर्थात् व्यक्ति सामने की वर्तमान एक उत्तेजना के अतिरिक्त अन्य उत्तेजनाओं को भी सम्बन्धित पाता है।

प्रत्यक्षीकरण की इस दूसरी अवस्था के उपरान्त व्यक्ति इन अनेक उत्तेजनाओं को एक-दूसरे से पृथक करने लगता है। इस पृथक्कीकरण की क्रिया के फलस्वरूप एक उत्तेजना अत्यन्त स्पष्ट एवं सामने अन्य उत्तेजनों की पृष्ठभूमि में उपस्थित होती है। इस प्रकार आकार और पृष्ठभूमि का सम्बन्ध प्रत्येक प्रत्यक्षीकरण की क्रियाओं में परिलक्षित होती है। एक सामान्य अनुभव को हम लें, हम वर्ग में बैठे पढ़ रहे हैं। सामने दिवाल में लगे ब्लैक बोर्ड को दिवाल से अलग नहीं देखते। यहाँ ब्लैक बोर्ड पीछे फैली दिवाल के ऊपर उभरा हुआ होता है।

इस प्रकार दिवाल पृष्ठभूमि के रूप में और ब्लैक बोर्ड आकार के रूप में उपस्थित होता है। सेण्डर महोदय ने ‘आकार और पृष्ठभूमि’ के रूप में प्रत्यक्षीकरण करने की प्रवृत्ति को जन्मजात माना है। इन्होंने एक प्रयोग जन्मान्ध व्यक्ति पर किया। इस जन्मान्ध व्यक्ति की आँखें इलाज के बाद ठीक हो जाने के पश्चात् उसके सामने कुछ उत्तेजनाओं को उपस्थित किया गया। उत्तेजनाओं की उपस्थिति के बाद व्यक्ति में आकार और पृष्ठभूमि का अनुभव एक प्राथमिक अनुभव है जिसके अभाव में प्रत्यक्षीकरण असंभव हो जायेगा।

(क) आकार देखने में उभरा हुआ एवं ऊपर निकला हुआ मालूम होता है, परन्तु पृष्ठभूमि आकार के पीछे दूर तक फैली रहती है।
(ख) आकार का स्थानीयकरण संभव है, परन्तु पृष्ठभूमि के फैले रहने के कारण उसका स्थान निरूपण नहीं कर सकते।
(ग) आकार का अपना रंग होता है जो सतह पर केन्द्रीभूत रहता है। किन्तु पृष्ठभूमि का रंग अस्पष्ट एवं परिवर्तनशील रहता है।
(घ) आकार मध्य चेतना में रहने के कारण अधिक दिनों तक स्मृति में रहता है। परन्तु पृष्ठभूमि चेतना के मध्य में नहीं होती, अत: इसकी स्मृति व्यक्ति को अधिक दिनों तक नहीं रहती।

गेस्टाल्टवादियों ने केवल संगठन के नियम ही नहीं बतलाये बल्कि बहुत से प्रयोगों के आधार पर आकृति और पृष्ठभूमि निर्धारित करने वाले नियम भी बतलाये हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. समानता का नियम (Law of Similarity): पहला नियम समानता क नियम है। रंग, आकृति, विस्तार आदि किसी भी प्रकार की समान्ता रखनेवाले अंगों में परस्पर संगठित होने की प्रवृत्ति रहती है।
  2. समीपता का नियम (law of Proximity): आकृति तथा पृष्ठभूमि का निर्धारक दूसरे नियम समीपता का नियम है। देश-काल में एक-दूसरे के नजदीक के अंगों में संगठित होने की प्रवृत्ति होती है और उनका समग्र प्रत्यक्षीकरण होता है।
  3. संगति का नियम Haw of symmetry): तीसरा नियम स्गति का नियम है। संगति से सभी अंग संगठित ह जात हैं और उनका समग्र से प्रत्यक्षाकरण हाता है। इतना प्रभाव समीपता और समानता का भी नहीं मालम पड़ता जितना कि संगति का है।
  4. सजातीयता का नियम (‘.aw of Homogenity): आकृति तथा पृष्ठभूमि का निर्धारक तीसरा नियम सजातीयता का निगम है। समान तीव्रता अथवा दीप्ति रखने वाले अंग संगठित हो। जाते हैं।
  5. निरन्तरता: निरन्तरता क भी संगठन पर प्रभाव पड़ता है। निरन्तरता के आधार पर सत्यता का नियम बना है।
  6. आच्छादन (Closure): निरन्तरता के समान ही आच्छादन का भी विभिन्न अंगों के संगठन पर प्रभाव पड़ता है।

उपर्युक्त छः बाह्य कारकों (Peripheral Factors) के अलावा बर्दाईमर आदि गेस्टाल्टवादियों ने संगठन में सहायक कुछ केन्द्रीय कारक (Central Factors) भी बतलाये हैं। ये केन्द्रीय कारक व्यक्ति में होते हैं। इसके कारण व्यक्ति को मिली उत्तेजनाएँ एक खास तरह से संगठित हो जाती हैं वे केन्द्रीय कारक निम्नलिखित हैं –

1. परिचय (Familiarity):
जिस तरह के संगठन से व्यक्ति का परिचय हो जाता है वह उसको शीघ्र और आसानी से दिखाई टने लगता है। किसी परिचित चित्र पहेली को दोबारा देखने पर हम उसकी वास्तविकता को एकदम जान जाते हैं और बाकी आकृति से इसमें कोई बाधा नहीं पड़ती। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को यह चित्र दिखाया जाय जिसने उसे पहले कभी न देखा हो तो उसकी वास्तविकत. को नहीं पहचान पायेगा। अत: जेस्टाल्टबादियों के अनुसार यह जरूरी नहीं कि परिचय से प्रत्यक्षीकरण पर जरूर असर पड़े।

2. मानसिक तत्परता (Mental set):
दूसरा केन्द्रीय कारक मानसिक तत्परता है। मानसित तत्परता से उत्तेजनाओं के संगठन पर बड़ा असर पड़ता है। मानसिक तत्परता का एक कारण आदत हो सकती है। उदाहरणार्थ, दार्शनिक जगत के तात्विक पक्ष की ओर देखता है और व्यापारी दुनिया तत्परता किसी विशेष परिस्थिति में भी बन जाती है, जैसे-जब कोई व्यक्ति किसी स्थान:पर बहुत जल्दी पहुँचाना चाहता है तो उसको तेज से तेज सवारी की गति भी धीमी जान पड़ती है।

मानसिक तत्परता के भेद के कारण ही अलग-अलग तरह की दिखाई पड़ती है। बाह्य तथा केन्द्रीय कारक के अलावा गेस्टाल्टवादियों ने संगठन के सहायक तत्त्वों में प्रोत्साहक कारकों (Reinforcing factors) को भी माना है। इससे उभार तथा अच्छी आकृति को गिना जाता है। अधूरे को पूरा करना मस्तिष्क की प्रवृत्ति है, इसी कारण टूटीं रेखाओं से बना वृत्त पूरा दिखाई पड़ता है और उनके अन्तर की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता । किसी चित्र में उभरे हुए अंगों की ओर सबसे पहले हमारा ध्यान जाता है।

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प्रश्न 12.
विपर्यय और विभ्रम में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
विपर्यय की तरह विभ्रम (Hallucination) में भी अयथार्थ प्रत्यक्षीकरण होता है। लेकिन फिर भी इन दोनों में अन्तर है। विपर्यय और विभ्रम में पहला भेद यह है कि विपर्यय के लिए बाह्य उत्तेजा की उपस्थिति अनविर्या है। जब हमारे सामने कोई वस्तु उत्तेजना के रूप में उपस्थित की जाती है और हमें उसका यथार्थ प्रत्यक्षीकरण होता है, तब उसको विपर्यय कहते हैं, जैसे-अंधेरी रात में जमीन में पड़ी रस्सी को देखकर उसे साँप समझना, ठूठे पेड़ को देखकर उसे चोर या भूत समझना हमारा विपर्यय है।

किन्तु विभ्रम तो कभी-कभी प्रत्यक्ष बाह्य उत्तेज: से भी होता है। उदाहरणार्थ, सुनसान स्थान में कभी-कभी किसी के पुकारने की आवाज सुनाई पड़ती है अथवा ऐसा जान पड़ता है कि कोई हमारा पीछा कर रहा है। वास्तव में, वहाँ न तो:कोई आवाज ही होती है और न कोई पीछा करनेवाला ही। वस्तुतः यह हमारा विभ्रम है।

विपर्यय का अनुभव प्रायः सभी व्यक्तियों को होता है, किन्तु विभ्रम का अनुभव बहुत थोड़े से व्यक्तियों को ही होता है। विभ्रम प्रायः मानसिक रोगयुक्त तथा नशे में चूर व्यक्तियों को होता है। हाँ, कभी-कभी सामान्य व्यक्तियों (Normal persons) में भी विभ्रम पाया जाता है। किसी-किसी मानसिक रोगी व्यक्ति को ऐसा अनुभव होता है कि किसी ने पीछे से आकर उसकी गर्दन दबा दी। वैसे ही, नशे में चूर व्यक्ति को ऐसा लगता है कि वह राजा है और सभी लोग उसकी प्रजा। वस्तुतः ये मानसिक प्रतिमा मात्र हैं।

एक तरह की परिस्थिति सभी व्यक्तियों में एक तरह का ही विपर्यय उत्पन्न करती है, किन्तु विभ्रम के साथ ऐसी बात नहीं है। उदाहरण के लिए हम मूलर-लायर-विपर्यय (Muller-Lyer Illusion) को ले सकते हैं, जिसकी विशद व्याख्या विपर्यय के प्रकार की चर्चा करते समय की जायगी। जहाँ तक विभ्रम का सम्बन्ध है, यह कहा जा सकता है कि एक ही परिस्थिति विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार के विभ्रम उत्पन्न कर सकती है। उदाहरणार्थ, सुनसान रात में किसी को अपना नाम सुनने का विभ्रम होता है, तो किसी को चोरों की आहट का, किसी को भूत का विभ्रम होता है, तो किसी को हत्यारे का।

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प्रश्न 13.
अंतर बतावें –
(क) प्रत्यक्षण तथा विपर्यय
(ख) प्रत्यक्षण तथा विभ्रम
(ग) विपर्यय तथा विभ्रम
उत्तर:
(क) प्रत्यक्षण तथा विपर्यय में अन्तर (Distinction beteen Perception and Illusion):
प्रयत्क्षण तथा विपर्यय दोनों ही मानसिक प्रक्रियाएँ हैं जिनके द्वारा उपस्थित उद्दीपनों के बारे में ज्ञान होता है। इस समानता के बावजूद दोनों में अन्तर है जो निम्नांकित हैं –

(i) प्रत्यक्षण में उद्दीपन का सही ज्ञान होता है, परन्तु विपर्यय में उद्दीपन का गलत ज्ञान होता है। जैसे, यदि कोई व्यक्ति कलम को देखकर कलम समझता है, तब यह प्रत्यक्षण का उदाहरण है परन्तु कारण से यह कलम को पेंसिल समझ बैठता है या अंधेरे में रस्सी को साँप समझ बैठता है, तो यह विपर्यय का उदाहरण होगा।

(ii) प्रत्यक्षण का स्वरूप स्थायी होता है जबकि विपर्यय का स्वरूप अस्थायी होता है। जैसे, जब किसी व्यक्ति को सामने रखे कलम का प्रत्यक्षण हो रहा है, तब वह उसका हमेशा कलम के रूप में ही प्रत्यक्षण करेगा। उसी तरह कोई व्यक्ति आम देख रहा है, तो वह उसका हमेशा आम के रूप में ही प्रत्यक्षण करेगा। परन्तु, अँधेरे में पड़े रस्सी को साँप समझ लेना एक विपर्यय का उदाहरण है जो तबतक बना रहता है जबतक कि रोशनी का अभाव होता है। पर्याप्त रोशनी पड़े ही व्यक्ति का यह विपर्यय समाप्त हो जाता है और वह उस रस्सी का रस्सी के ही रूप में प्रत्यक्षण करने लगता है।

(iii) किसी उद्दीपन का प्रत्यक्षण सभी को एक समान होता है, परन्तु एक ही उद्दपन का विपर्यय विभिन्न व्यक्तियों में अलग-अलग हो सकता है। जैसे, बकरी को देखने पर सभी व्यक्ति उसका बकरी के रूप में तो कोई भूत-प्रेत के रूप में भी प्रत्यक्षण कर सकता है। स्पष्टतः, एक ही खंभे (उद्दीपन) विभिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न विपर्यय उत्पन्न कर रहा है। स्पष्ट हुआ कि प्रत्यक्षण तथा विपर्यय में अन्तर कर रहा है।

(ख) प्रत्यक्षण तथा विभ्रम में अन्तर (Distiction between Perception and Hallucination):
प्रत्यक्षण तथा विभ्रम दोनों ही मानसिक प्रक्रियाएं हैं। फिर भी, दोनों में अन्तर है जो निम्नांकित हैं –

(i) प्रत्यक्षण में उद्दीपन उपस्थित होता है जबकि विभ्रम में उद्दीपन होता ही नहीं है बल्कि इसमें उद्दीपन की उपस्थिति का मात्र आभास होता है। जैसे, ‘नारंगी’ का फल रख देने पर व्यक्ति उसका नारंगी के रूप में प्रत्यक्षण करता है। परन्तु, जब किसी व्यक्ति को बिना किसी के द्वारा पुकारे यह लगे कि कोई उसे पुकार रहा है या रात्रि के अँधेरे में यह लगे कि कोई उसके पीछे-पीछे आ रहा है, तो विभ्रम का उदाहरण होगा।

(ii) प्रत्यक्षण में उद्दीपन का अनुभव सभी व्यक्तियों को समान रूप से होता है जबकि विभ्रम में उद्दीपन का चूँकि अभाव होता है, इसलिए विभिन्न व्यक्तियों में विभ्रम अलग-अलग प्रकार के होते हैं।

(iii) प्रत्यक्षण सामान्य व्यक्तियों के लिए होता है जिसके लिए सामान्य और स्वस्थ मस्तिष्क। की जरूरत होती है। दूसरी तरफ, विभ्रम अधिकतर मानसिक रोग से ग्रसित व्यक्तियों, नशे में चूर व्यक्तियों, थके-माँदे व्यक्तियों को ही होता है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्यक्षण सामान्य अवस्था में होता है जबकि विभ्रम असामान्य अवस्थाओं में ही अधिक होता है।

(iv) प्रत्यक्षण का स्वरूप स्थायी होता है है जबकि विभ्रम का स्वरूप अस्थायी होता है। चूँकि प्रत्यक्षण में किसी उद्दीपन का सही ज्ञान होता है, इसलिए इसका स्वरूप स्थायी होता है। परन्तु, विभ्रम का स्वरूप हमेशा अस्थायी होता है। जैसे, यदि किसी व्यक्ति को यह महसूस होता है कि कोई उसके पीछे-पीछे आ रहा है और वह यदि पीछे मुड़कर देखता है, तो उसका विभ्रम तुरन्त ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि उसके पीछे तो कोई व्यक्ति होता ही नहीं है।

(v) प्रत्यक्षण में उद्दीपन वास्तविक एवं मूर्त होता है, परन्तु विभ्रम में उद्दीपन अमूर्त एवं काल्पनिक होता है। सच्चाई यह है कि विभ्रम में उद्दीपन नहीं बल्कि उद्दीपन की मात्र कल्पना होती है।

(vi) प्रत्यक्षण में उद्दीपन का सही या यथार्थ ज्ञान होता है, परन्तु विभ्रम में अनुपस्थित उद्दीपन का मिथ्या या गलत एहसास होता है।

(ग) विपर्यय या भ्रम तथा विभ्रम में अंतर (Distinction between Illusion and Hallucination):
भ्रम तथा विभ्रम दोनों ही मानसिक प्रक्रियाएँ हैं। भ्रम एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें उद्दीपन का अयथार्थ ज्ञान होता है तथा विभ्रम एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें उद्दीपन की अनुपस्थिति में ही उसका ज्ञान होता है। फिर भी; इन दोनों में अन्तर है जो निम्नांकित हैं –

(i) विपर्यय में उद्दीपन उपस्थित रहता है, परन्तु विभ्रम में उद्दीपन अनुपस्थित रहता है।

(ii) विपर्यय में उपस्थित उद्दीपन का गलत प्रत्यक्षण होता है, परन्तु विभ्रम में उद्दीपन नहीं रहने पर भी उसका ज्ञान व्यक्ति को हो जाता। अँधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना विपर्यय का उदाहरण है तथा अँधेरे में बिना किसी के पीछा किए ही यह समझ लेना कि कोई उसका पीछा कर रहा है, एक विभ्रम का उदाहरण है।

(iii) विपर्यय के दो मुख्य प्रकार होते हैं-सामान्य या सर्वव्यापी विपयर्य (common or universal illusion) तथा व्यक्तिगत विपर्यय (Personal illusion)। आगे अधिक दूरी पर देखने पर धरती और आकाश सटा हुआ नजर आना एक सामान्य विपर्यय का उदाहरण है तथा अँधेरे में रस्सी को साँप समझना एक व्यक्तिगत विपर्यय का उदाहरण है। विभ्रम का कोई ऐसा प्रकार नहीं होता है। हाँ, ज्ञानेन्द्रिय के अनुभव के आधार पर इसे दृष्टि विभ्रम, श्रवण विभ्रम आदि श्रेणियाँ में बाँटा जा सकता है।

(iv) सामान्य विपर्यय (common illusion) सभी व्यक्तियों में एक समान होता है, परन्तु विभ्रम का स्वरूप हमेशा व्यक्तिगत (personal) ही होता है। रेल की पटरियों को काफी दूर तक देखने में एक बिन्दु पर सटा हुआ नजर आना एक सामान्य विपर्यय का उदाहरण है जो सभी व्यक्तियों में होता है।

उसी तरह आगे अधिक दूरी पर देखने से धरतो और आकाश का सटा हुआ नजर आना भी एक सामान्य विपर्यय का उदाहरण है जो सभी व्यक्तियों को होता है। इसका स्वरूप व्यक्तिगत ही होता है। सुनसान अँधेरी रात में बिना किसी आवाज के दिए जाने का विभ्रम यदि किसी व्यक्ति को होता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उस परिस्थिति में ऐसा अनुभव सभी व्यक्तियों को हो। अतः, विभ्रम का स्वरूप हमेशा व्यक्तिगत ही होता है। स्पष्ट हुआ कि विपर्यय तथा विभ्रम में अन्तर है।

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प्रश्न 14.
प्रत्यक्षण की परिभाषा दें। प्रत्यक्षीकरण में सन्निहित प्रक्रियाओं की व्याख्या करें। या, किसी वस्तु के प्रत्यक्षण में निहित प्रक्रियाओं की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
प्रत्यक्षण की परिभाषा (Definition of Perception):
प्रत्यक्षण एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति को उद्दीपन का ज्ञान होता है। स्पष्टतः प्रत्यक्षणं एक संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया (cognitie mental process) है। यदि हम प्रत्यक्षण की एक परिभाषा देना चाहें, तो इस प्रकार दे सकते हैं – “प्रत्यक्षण एक जटिल संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा पर्यावरण में किसी उपस्थित उद्दीपन का तात्कालिक ज्ञान होता है।” इस परिभाषा का विश्लेषण करने पर हमें प्रत्यक्षण के स्वरूप के बारे में निम्नांकित तथ्य प्राप्त होते हैं –

1. प्रत्यक्षण एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है (Perception is a complex mental process):
प्रत्यक्षण को एक जटिल मानसिक प्रक्रिया इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें कई तरह की उपप्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।

2. प्रत्यक्षण एक संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है (Perception is a cognitive mental process):
प्रत्यक्षण को एक संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा व्यक्ति को बाह्य तथा आंतरिक दोनों तरह के उद्दीपनों का अर्थपूर्ण ज्ञान होता है।

3. प्रत्यक्षण में उद्दीपनों का तात्कालिक ज्ञान होता है (Perception gives immediate knowledge of stimulus):
प्रत्यक्षण में वातावरण में उपस्थित उद्दीपनों का तात्कालिक ज्ञान होता है। दूसरे शब्दों में, जब व्यक्ति के सामने कोई उद्दीपन उपस्थित रहता है, तब उसका ज्ञान उसे तात्कालिक होता है न कि उसके बारे में कुछ देर तक सोचने के बाद।

4. प्रत्यक्षण के लिए उद्दीपन की उपस्थिति अनिवार्य होती है (For perception the presence of stimulus is essential):
प्रत्यक्षण के लिए यह आवश्यक है कि उद्दीपन व्यक्ति के सामने उपस्थित हो। जो उद्दीपन व्यक्ति के सामने उपस्थित नहीं रहता है, व्यक्ति उसके बारे में मात्र चिंतन कर सकता है, प्रत्यक्षण नहीं। प्रत्यक्षण में सन्निहित उपप्रक्रियाएँ (subprocesses involved in perception) प्रत्यक्षण में कई तरह की उपप्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। इन उपप्रक्रियाओं में निम्नांकित प्रमुख हैं –

  • ग्राहक प्रक्रिया (receptor process)
  • प्रतीकात्मक प्रक्रिया (symbolic process)
  • एकीकरण की प्रक्रिया (unification process)
  • भावात्मक प्रक्रिया (affective process)

इन चारों का वर्णन निम्नांकित है –

1. ग्राहक प्रक्रिया (Receptor process):
प्रत्यक्षण की यह सबसे पहली तथा प्रमुख प्रक्रिया है। इसमें दो चीजों का रहना आवश्यक है-उद्दीपन तथा ज्ञानेन्द्रिय। प्रत्यक्षण के लिए जब कोई उद्दीहपन व्यक्ति के सामने उपस्थित होता है तब समुचित ज्ञानेन्द्रिय उसे ग्रहण करती है। इसमें उसमें तंत्रिका आवेग (nerve impulse) पैदा होता है जो संवेदी तंत्रिका (sensory nerve) द्वारा सुषुम्ना तथा मस्तिष्क में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को उस उद्दीपन का ज्ञान होता है। ज्ञानेन्द्रिय से प्रारभ होकर मस्तिष्क तक होनेवाली इस पूरी प्रक्रिया को ग्राहक प्रक्रिया (receptor process) की संज्ञा दी जाती है।

2. प्रतीकात्मक प्रक्रिया (Symbolic process):
किसी उद्दीपन के प्रत्यक्षण में गत अनुभूतियों (Past expriences) के कारण उस उद्दीपन से संबंधित कुछ अन्य अनुभव प्रतीक (symbol) के रूप में याद आ जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति उस उद्दीपन का प्रत्यक्षण और भी स्पष्ट ढंग से करता है। जैसे, गुलाब के फूल को देखकर अपनी फुलवारी का याद आ जाना प्रतीकात्मक प्रक्रिया का उदाहरण है। उपहार में प्राप्त कलम को देखकर उसके देनेवाले व्यक्ति का याद आ जाना प्रतीकात्मक प्रक्रिया का एक उत्तम उदाहरण है।

3. एकीकरण की प्रक्रिया (Unification process):
जब व्यक्ति किसी उद्दीपन का प्रत्यक्षण करता है, तब वह उसके विभिन्न पहलुओं का अलग-अलग प्रत्यक्षण न करके उसका समग्र रूप से (as a whole) प्रत्यक्षण करता है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति उस उद्दीपन का एक सम्पूर्ण इकाई के रूप में प्रत्यक्षण करता है।

जैसे, जब व्यक्ति किसी साइकिल का प्रत्यक्षण करता है, तब वह उसका हैंडिल, पहिया, घंटी आदि का अलग-अलग प्रत्यक्षण न करके उसका एक सम्पूर्ण इकाई (अर्थात् साइकिल) के रूप में प्रत्यक्षण करता है। उसी तरह यदि हम किसी व्यक्ति के चेहरे पर देखते हैं, तो उसके नाक, होंठ, मुँह, भौंह, गाल आदि का अलग-अलग प्रत्यक्षण न करके एक साथ एक इकाई के रूप में प्रत्यक्षण करते हैं।

4. भावात्मक प्रक्रिया (Affective process):
प्रत्यक्षण में भावात्मक प्रक्रिया भी सम्मिलित होती है। किसी उद्दीपन को देखने के बाद व्यक्ति में सुखद या दुःखद या तटस्थ भाव. अवश्य ही उत्पन्न होते हैं। व्यक्ति के अंदर इस प्रकार की होनेवाली प्रक्रिया को भावात्मक प्रक्रिया कहा जाता है। जैसे, हम दोस्त को देखते हैं तो हम में सुखद भाव तथा दुश्मन को देखते हैं तो दुःखद भाव उत्पन्न होता है।

परन्तु, अपने घर के सदस्य को जिन्हें रोज देखते हैं, देखने पर न तो सुखद भाव और न ही दुःखद भाव बल्कि तटस्थ भाव (neutral affect) उत्पन्न होते हैं। इस उदाहरण से यह स्पष्ट है कि प्रत्यक्षण में भावात्मक प्रक्रिया भी सम्मिलित होती है। उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्यक्षण में कई तरह की उपक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं जिनसे इसका स्वरूप जटिल हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 15.
प्रत्यक्षण का अर्थ बतायें। प्रत्यक्षण तथा संवेदन में अंतर करें।
उत्तर:
प्रत्यक्षण की परिभाषा (Definition of perception):
प्रत्यक्षण एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है कि जिसके द्वारा व्यक्ति को उद्दीपन का ज्ञान होता है। स्पष्टतः प्रत्यक्षण एक संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया (cognitive mental process) हैं। यदि हम प्रत्यक्षण की एक परिभाषा देना चाहे, तो इस प्रकार दे सकते हैं-“प्रत्यक्षण एक जटिल संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा पर्यावरण में किसी, उपस्थित उद्दीपन का तात्कालिक ज्ञान होता है।”

प्रत्यक्षण तथा संवेदन में अंतर (Distinction between sensation and percep tion):
प्रत्यक्षण तथा संवेदन में प्रमुख अंतर निम्नांकित हैं –

1. संवेदन एक सरलतम संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है जबकि प्रत्यक्षण एक जटिल संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है। जब कोई उद्दीपन ज्ञानेन्द्रिय को उत्तेजित करता है, तब उसमें तंत्रिका आवेग उत्पन्न हो जाते हैं। तंत्रिका आवेग जब मस्तिष्क में पहुँचता है, तब सबसे पहली जो मानसिक प्रक्रिया होती है, उसे संवेदन कहा जाता है जिसमें उद्दीपन का आभासमात्र होता है। लेकिन, प्रत्यक्षण इतनी सरल मानसिक प्रक्रिया नहीं है। इसमें जटिलताएँ होती हैं, क्योंकि इसमें अनेक उपप्रक्रियाएँ (subprocesses) सम्मिलित होती हैं।

2. संवेदन द्वारा उद्दीपन (stimulus) का आभासमात्र अर्थात अर्थहीन ज्ञान होता है। लेकिन, प्रत्यक्षण में उद्दीपन का अर्थपूर्ण ज्ञान होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि संवेदन में उद्दीपन का मात्र आभास मिलता है, उसका पूर्ण ज्ञान नहीं होता है। परन्तु, प्रत्यक्षण में उस उद्दीपन का पूर्ण ज्ञान हमें प्राप्त होता है जिसके परिणामस्वयप हम यह पहचान कर पाते हैं कि अमुक उद्दीपन क्या है। इसका कारण यह है कि संवेदन में मस्तिष्क का मात्र संवेदी क्षेत्र (sensory area) ही कार्य करता है जबकि प्रत्यक्षण में संवेदी क्षेत्र के साथ-ही-साथ साहचर्य क्षेत्र (association area) भी कार्य करता है।

3. संवेदन में मुख्य रूप से ग्राहक प्रक्रिया (receptor process) ही होती है, लेकिन प्रत्यक्षण में ग्राहक प्रक्रिया के अलावा एकीकरण की प्रक्रिया, भावात्मक प्रक्रिया तथा प्रतीकात्मक प्रक्रिया भी होती है। संवेदन की उत्पत्ति के लिए ज्ञानेन्द्रिय का उद्दीपन द्वारा प्रभावित होकर उसमें तंत्रिका आवेग उत्पन्न होना और फिर उसे संवेदी तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना होते हुए मस्तिष्क में पहुँचना ही पर्याप्त होता है।

परन्तु, प्रत्यक्षण के लिए इतना ही काफी नहीं है बल्कि इसके आगे की क्रियाएँ, जैसे भावात्मक प्रक्रिया, प्रतीकात्मक प्रक्रिया तथा एकीकरण की प्रक्रिया आदि भी सम्मिलित होती है। यही कारण है कि जब हम किसी उद्दीपन का प्रत्यक्षण करते हैं, तब हममें सुख या दु:ख का भाव, उस उद्दीपन से संबंधित कुछ अन्य चीजों की याद तथा उस उद्दीपन का समग्र एवं समन्वित प्रत्यक्षण होता है।

4. एक ही उद्दीपन भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में लगभग एक समान संवेदन उत्पन्न करता है। परन्तु, कई कारणों से वही उद्दीपन सभी व्यक्तियों में एक समान प्रत्यक्षण उत्पन्न नहीं कर पाता है। जैसे, यदि एक उजले कागज पर अस्पष्ट चित्र व्यक्ति को थोड़ी देर के लिए दिखाया जाय, तो उससे भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में संवेदन (आभासमात्र) लगभग एक समान होगा। परन्तु, इसका प्रत्यक्षण सभी व्यक्तियों में एक समान नहीं होगा। अपनी आवश्यकता (need), अभिप्रेरणा (motive) आदि के अनुसार उस अस्पष्ट चित्र का प्रत्यक्षण व्यक्ति अलग-अलग ढंग से करेगा।

5. संवेदन की प्रक्रिया इतनी प्रारंभिक है कि इसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता है और यदि कोशिश की भी गई तो खुद संवेदन ही समाप्त हो जाएगा, परन्तु, प्रत्यक्षण की प्रक्रिया ऐसी नहीं होती है। इसका विश्लेषण संभव है। इस गुण के कारण ही प्रत्यक्षण को एक जटिल एवं मूर्त (complex and concrete) प्रक्रिया कहा जाता है जबकि संवेदन को एक प्रारंभिक एवं अमूर्त (abstract) प्रक्रिया कहा जाता है।

6. संवेदन में ज्ञानेन्द्रिय की प्रधानता अधिक होती है। इसमें मस्तिष्क की प्रधानता उतनी नहीं होती है। तंत्रिका आवेग (nerve impulse) मस्तिष्क में ज्योति पहुँचता है, संवेदन उत्पन्न हो जाता है। लेकिन, प्रत्यक्षण में मस्तिष्क का कार्य इसके बाद प्रारंभ होता है जिसके परिणामस्वरूप प्रतीक, भाव एवं संगठन से संबंधित प्रक्रियाएँ हो पाती हैं। स्पष्ट है कि प्रत्यक्षण में मस्तिष्क की क्रियाशीलता संवेदन की क्रियाशीलता की अपेक्षा अधिक होती है। स्पष्ट हुआ कि संवेदन तथा प्रत्यक्षण एक-दूसरे से भिन्न है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अवधान के कितने प्रकार हैं –
(a) 1
(b) 3
(c) 2
(d) 4
उत्तर:
(c) 2