Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

Bihar Board Class 11 Philosophy अवलोकन एवं प्रयोग Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आगमन का वास्तविक आधार है –
(क) प्रयोग
(ख) निरीक्षण
(ग) दोनों
(घ) कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 2.
निरीक्षण तथा प्रयोग को आगमन के वास्तविक आधार के रूप में किसने स्वीकार किया है?
(क) मिल ने
(ख) बेन ने
(ग) कार्बेथ रीड ने
(घ) जेवन्स ने
उत्तर:
(ख) बेन ने

प्रश्न 3.
निरीक्षण है –
(क) किसी प्रकार देखना
(ख) प्राकृतिक घटनाओं का उद्देश्यपूर्ण पर्यवेक्षण
(ग) तथ्यों का पर्यवेक्षण
(घ) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(ख) प्राकृतिक घटनाओं का उद्देश्यपूर्ण पर्यवेक्षण

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प्रश्न 4.
प्रयोग है –
(क) प्राकृतिक घटनाओं का निरीक्षण
(ख) मनुष्य द्वारा निर्मित कृत्रिम घटनाओं का निरीक्षण
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ख) मनुष्य द्वारा निर्मित कृत्रिम घटनाओं का निरीक्षण

प्रश्न 5.
प्रयोग से प्राप्त निष्कर्ष होते हैं –
(क) संभाव्य
(ख) अनिश्चित
(ग) निश्चित
(घ) संदिग्ध
उत्तर:
(ग) निश्चित

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प्रश्न 6.
“निरीक्षण में हम तथ्य को पाते हैं तथा प्रयोग में उसको बनाते हैं।” यह कथन है –
(क) बेन का
(ख) बेकन का
(ग) मिल का
(घ) फाउलर का
उत्तर:
(क) बेन का

प्रश्न 7.
निरीक्षण की शर्त नहीं है –
(क) मानसिक
(ख) शारीरिक
(ग) नैतिक
(घ) आध्यात्मिक
उत्तर:
(घ) आध्यात्मिक

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प्रश्न 8.
निरीक्षण की भूलें (Fallacies) होती है –
(क) अनिरीक्षण की
(ख) मिथ्या निरीक्षण की
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

प्रश्न 9.
प्रयोग निरीक्षण से –
(क) अधिक महत्त्वपूर्ण है
(ख) कम महत्त्वपूर्ण है
(ग) दोनों बराबर महत्त्वपूर्ण है
(घ) अनुपयोगी
उत्तर:
(क) अधिक महत्त्वपूर्ण है

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प्रश्न 10.
निरीक्षण है आगमन का –
(क) आकारिका आधार (Formal ground)
(ख) वास्तविक आधार (Material ground)
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) वास्तविक आधार (Material ground)

प्रश्न 11.
किसने कहा था कि आगमन में कल्पना का स्थान प्रमुख नहीं बल्कि गौण है?
(क) जे. एस. मिल
(ख) हेवेल
(ग) पियर्सन
(घ) डेकार्ड
उत्तर:
(क) जे. एस. मिल

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प्रश्न 12.
निरीक्षण में पाया जाता है –
(क) कारण से कार्य की ओर
(ख) कार्य से कारण की ओर
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

प्रश्न 13.
इन्द्रियाँ निरीक्षण का एक –
(क) साधन है
(ख) असाधन है
(ग) शारीरिक शर्त है
(घ) (क) एवं (ग) दोनों
उत्तर:
(ग) शारीरिक शर्त है

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प्रश्न 14.
निरीक्षण के दोष (Fallacy of observation) है –
(क) गलत निरीक्षण (Mal observation) की भूल
(ख) नहीं निरीक्षण (Non-observation) की भूल
(ग) (क) एवं (ख) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) (क) एवं (ख) दोनों का

प्रश्न 15.
सही कथन को चुनें –
(क) गलत निरीक्षण की भूल भावनात्मक दोष है
(ख) नहीं-निरीक्षण की भूल निषेधात्मक है
(ग) गलत निरीक्षण इन्द्रीय दोष का कारण है, जबकि नहीं निरीक्षण पक्षपातपूर्ण होने का कारण है
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

Bihar Board Class 11 Philosophy अवलोकन एवं प्रयोग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निरीक्षण के दोष (Fallacy of observation) कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण के दोष दो प्रकार के होते हैं। वे हैं-गलत निरीक्षण की भूल एवं नहीं निरीक्षण की भूल।

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प्रश्न 2.
निरीक्षण की मानसिक शर्त से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण के लिए मानसिक या बौद्धिक लक्ष्य का होना नितांत आवश्यक है। किसी वस्तु या घटना को जानने की इच्छा से ही वह उसका निरीक्षण करना चाहता है। जानने की इच्छा से मानसिक शर्त का निर्माण होता है।

प्रश्न 3.
प्रयोग (Experiment) क्या है? अथवा, प्रयोग की परिभाषा दें।
उत्तर:
मानव-निर्मित परिस्थितियों में कृत्रिम घटनाओं का निरीक्षण है। फाउलर के अनुसार प्रयोग में हम घटना पर निर्भर नहीं करते हैं। बल्कि घटना हम पर निर्भर करती है तथा हम उसका निर्माण करते हैं। जिस प्रकार की हम घटना चाहें, उपस्थित कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
नहीं-निरीक्षण (Non-Observation) की भूल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नहीं-निरीक्षण की भूल में जिस वस्तु को देखना चाहिए उसे नहीं देखते हैं। जिसे देखना चाहिए उसे नहीं देखना ही नहीं-निरीक्षण की भूल है। यह दोषकर्ता की असावधानी या पक्षपातपूर्ण होने से होता है।

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प्रश्न 5.
गलत निरीक्षण की भूल एवं नहीं-निरीक्षण की भूल में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
गलत-निरीक्षण की भूल में भावात्मक दोष है जबकि नहीं निरीक्षण की भूल में निषेधात्मक दोष है। गलत-निरीक्षण इंद्रिय-दोष के कारण होता है जबकि नहीं-निरीक्षण पक्षपात पूर्ण होने के कारण होता है।

प्रश्न 6.
निरीक्षण की शारीरिक शर्त से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण की शारीरिक शर्त का अभिप्राय है कि इंद्रियाँ निरीक्षण के साधन हैं। अतः निरीक्षण के लिए स्वस्थ शरीर का होना अनिवार्य है क्योंकि शरीर के अस्वस्थ रहने पर निरीक्षण दोषपूर्ण हो जाएगा।

प्रश्न 7.
गलत निरीक्षण (Mal-Observation) की भूल क्या है?
उत्तर:
निरीक्षण में जो वस्तु दी गयी होती है उसे उसके यथार्थ तथा वास्तविक रूप में न देखकर किसी अन्य रूप में देखना ही गलत निरीक्षण की भूल कहलाती है। जैसे-मृगतृष्णा गलत निरीक्षण की भूल है।

प्रश्न 8.
निरीक्षण की परिभाषा दें। अथवा, निरीक्षण क्या है?
उत्तर:
प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच प्राकृतिक घटनाओं के उद्देश्यपूर्ण प्रत्यक्षीकरण को ही निरीक्षण कहते हैं। प्रो. बी. एन. राय के अनुसार निरीक्षण नियमित प्रत्यक्षीकरण है।

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प्रश्न 9.
निरीक्षण एवं प्रयोग में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर:
निरीक्षण प्राकृतिक है जबकि प्रयोग कृत्रिम है। निरीक्षण को निष्क्रिय कहा गया है जबकि प्रयोग को सक्रिय कहा गया है। निरीक्षण में परिस्थितियों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता है जबकि यहाँ परिस्थितियों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण होता है।

प्रश्न 10.
प्रयोग आगमन का कौन-सा आधार है?
उत्तर:
निरीक्षण की तरह ही प्रयोग आगमन का वास्तविक आधार (Material ground of Induction) है।

प्रश्न 11.
आगमन के वास्तविक आधार किसे कहते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण एवं प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
किसी भी तरह के प्रयोग में प्रयोगकर्ता यंत्रों का प्रयोग करता ही है। इसमें इच्छानुसार हेर-फेर करता है। मनचाहे परिवर्तन भी करता है। इन सभी परिवर्तनों के बाद वह घटना का निरीक्षण करता है। परन्तु, निरीक्षण में प्रयोगकर्ता यंत्र का प्रयोग तो करता ही है, किन्तु उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं करता है। परिवर्तन तो मात्र प्रयोग ही में संभव है। चूंकि प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का ही होता है। प्रयोगकर्ता उस घटना को स्वयं बनाकर उसकी जाँच करता है। अतः, निष्कर्ष है कि प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग प्रयोगकर्ता करता है।

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प्रश्न 2.
स्थायी कारण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कारण मुख्यतः दो प्रकार के हैं –

(क) स्थायी कारण और
(ख) अस्थायी कारण

इसमें स्थायी कारण वे हैं जो सृष्टि के समय से ही चले आ रहे हैं। जैसे-सूरज, चाँद, सितारे, पृथ्वी संबंधी। इस तरह बहुत-सी विभिन्न परिस्थितियों में उन स्थायी कारणों से कई तरह के कार्य उत्पन्न होते चले आ रहे हैं। इसका अंत कहाँ और कब होगा, यह मानव के ज्ञानसीमा के बाहर है। मिल साहब ने स्थायी कारण के सत्ता को स्वीकार किया है। उनका कहना है कि यह कोई आवश्यक नहीं है कि स्थायी कारण कोई वस्तु या ठोस पदार्थ ही हो। वह इससे भिन्न भी रह सकता है। पृथ्वी अपनी धूरी पर घुमती है। उसका धूरी पर घुमना एक स्थायी कारण है। इसी तरह सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के स्थायी कारण हैं जो घुमते-घुमते अमावस्या या पूर्णिमा को ही लगेगा।

प्रश्न 3.
अस्थायी कार्य क्या है?
उत्तर:
अस्थायी कार्य कुछ ही क्षणों के लिए रहता है। यह भी कारण से ही उत्पन्न होता है। कुछ क्षणों के बाद इस प्रकार से कार्य समाप्त हो जाते हैं। जैसे-बादलों के संघर्ष से बिजली उत्पन्न होती है या बिजली चमकती है। जो अस्थायी कार्य है। विज्ञान में अस्थायी कार्य को उचित मान्यता नहीं दी गई है। बिजली चमकना और गायब हो जाना क्षणभंगुरता होती है। लेकिन ऐसा सोचना शंकारहित भी नहीं है। बिजली जो एक शक्ति है, वह लुप्त नहीं होती है बल्कि उसका रूप बदल जाता है।

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प्रश्न 4.
प्रगतिशील कार्य क्या है?
उत्तर:
प्रगतिशील कार्य की परिभाषा तार्किक ने दी है। “उस मिश्रित कार्य को प्रगतिशील कार्य कहते हैं जो किसी स्थायी कारण से संचित प्रभाव से उत्पन्न होता है।” किसी वस्तु को एक अवस्था में छोड़ दें। उस पर प्रकाश, हवा, धूप, जल आदि का प्रभाव पड़ता रहता है और वह वस्तु दिन प्रतिदिन क्षीण होती है। कई वर्षों के बाद वह वस्तु टूटकर मिट्टी में मिल जाती है। इस तरह भिन्न-भिन्न कारणांशों के प्रभाव से वस्तु विलीन हो जाती है। यही कार्य प्रगतिशील कार्य कहलाता है। क्योंकि कार्य अपने रूप को धीरे-धीरे प्राप्त करता है। इस प्रकार से प्रगतिशील कार्य आगमन तर्कशास्त्र में कारण-कार्य नियम के अंतर्गत ही आता है।

प्रश्न 5.
निरीक्षण और प्रयोग में अंतर बताएँ।
उत्तर:
आगमन में निरीक्षण और प्रयोग दोनों वास्तविक आधार माने गए हैं। दोनों से वास्तविक सत्य की प्राप्ति होती है। फिर भी दोनों में कुछ अंतर हैं –
1. निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं का होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने प्रस्तुत करती है उसी का निरीक्षण हम करते हैं, जैसे-सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, का निरीक्षण करना, किन्तु प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का प्रयोगशालाएँ होता है। प्रयोग में प्रयोगकर्ता स्वयं घटना को रचकर बनाकर उसका निरीक्षण करता रहता है।

2. निरीक्षण की घटनाएँ जो होती हैं उसकी सभी परिस्थितयाँ प्रकृति के हाथ में रहती है परन्तु, प्रयोग में घटना की सभी स्थितियाँ या परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में रहती हैं।

3. निरीक्षण में यंत्र का व्यवहार कभी-कभी होता है। परन्तु, उसमें परिवर्तन नहीं होता है जबकि प्रयोग में यंत्र का व्यवहार हमेशा होता है तथा उसमें हेर-फेर या परिवर्तन भी होता रहता है। इस तरह निरीक्षण एवं प्रयोग में अंतर अधिक है।

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प्रश्न 6.
क्या निरीक्षण चयनात्मक है?
उत्तर:
निरीक्षण प्रायः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने जिस रूप में प्रस्तुत करती है, उसी का पर्यवेक्षण हम करते हैं। प्रकृति बहुत विशाल एवं जटिल है। इसमें नित्य प्रतिदिन कई प्रकार की घटनाएँ घटती रहती हैं। सभी घटनाओं का निरीक्षण हम नहीं कर पाते हैं। अतः, इसके लिए हमें किसी एक घटना का चयन करना पड़ता है। यदि हम चयन नहीं करें तो निरीक्षण संभव नहीं है। जैसे-रात्रि में हम प्रतिदिन आकाश की ओर तारों को देखते हैं, किन्तु जब किसी तारे को चयन कर देखते हैं, जैसे-ध्रुवतारा तो इसे निरीक्षण कहेंगे। अतः, निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि निरीक्षण चयनात्मक होता है।

प्रश्न 7.
क्या निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित है?
उत्तर:
निरीक्षण मूलतः प्रकृति घटनाओं पर आधारित है, किन्तु कभी-कभी कृत्रिम घटनाओं का भी निरीक्षण होता है। यहाँ पर निरीक्षण का अर्थ या निरीक्षण का विषय अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। जैसे-भूकंप, सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, बाढ़, महामारी आदि का निरीक्षण करते समय प्राकृतिक घटनाओं पर हमारा कुछ अपना दाब नहीं रहता है। बल्कि प्रकृति में घटनाएँ जिस प्रकार से घटती हैं उसका निरीक्षण हम उसी तरह से करेंगे, उसमें परिवर्तन करना हमारे अधिकार में नहीं है। इसलिए निरीक्षण करते समय हम निष्क्रिय और प्रकृति के गुलाम बने रहते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि निरीक्षण अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित होता है।

प्रश्न 8.
क्या प्रयोग कृत्रिम होता है?
उत्तर:
ऐसा कहा जाता है कि प्रयोग कृत्रिम होता है क्योंकि प्रयोगकर्ता स्वयं किसी घटना को प्रयोगशाला में बनाता है और इच्छानुसार उसका निरीक्षण करता है। प्रयोग प्राकृतिक घटनाओं का संभव नहीं है क्योंकि प्राकृतिक घटनाएँ प्रकृति के हाथ में है। जैसे-आकाश में इन्द्र धनुष को हम नहीं बना सकते हैं। यह प्रयोगशाला में भी संभव नहीं है। इसी तरह चन्द्रग्रहण, भूकंप, सूर्यग्रहण, बाढ़ आदि का निर्माण प्रयोगशाला में नहीं किया जा सकता है। अतः, प्राकृतिक घटनाओं पर ही संभव है। क्योंकि प्रयोग में घटना की सारी स्थितियाँ और परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में ही रहती है। अतः, निष्कर्ष निकलता है कि प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का ही होता है।

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प्रश्न 9.
कारण और कार्य की पारस्परिकता का वर्णन करें।
उत्तर:
तार्किकों के अनुसार कारण और कार्य की पारस्परिकता का संबंध कारण-कार्य नियम के अंतर्गत ही पाया गया है। कारण और कार्य के बीच एक प्रकार का संबंध पाया जाता है। यदि कारण है तो कार्य भी होगा। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निर्भर करते हैं। जैसे-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस भी उत्पन्न होता है। फिर उसी पानी से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस भी उत्पन्न किया जाता है। इस तरह की संभावना को ही हम कारण और कार्य की पारस्परिकता कहते हैं।

प्रश्न 10.
कारण के प्रचलित यंत्रों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कारण के प्रचलित यंत्र को जनसाधारण यंत्र भी कहते हैं। कारण वही है जो घटना के पहले आवे। यहाँ कारण का केवल अनुमान किया जाता है। उसका वैज्ञानिक निरूपण नहीं करते हैं। खाली घड़ा देखने पर गाड़ी छूट जाना, तेली को देखने से यात्रा खराब होना, बिल्ली को मार्ग काटने से किसी अशुभ घटना का कारण समझना आदि अंधविश्वास। इसी तरह के प्रचलित कारण के रूप भी हैं। कभी-कभी दैवी प्रकोप भी कारण बनता है, जैसे-हैजा, प्लेग आदि का होना भगवती या काली माँ का प्रकोप कहा जाता है। लेकिन आज वैज्ञानिक युग में ऐसे कारणों का तर्कशास्त्र में उचित स्थान नहीं दिया गया है। क्योंकि ये सब आकस्मिक घटनाएँ हैं। जो कभी होती है कभी नहीं भी होती है।

प्रश्न 11.
क्या प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
किसी भी तरह के प्रयोग में प्रयोगकर्ता यंत्रों का प्रयोग करता ही है। इसमें इच्छानुसार हेर-फेर भी करता ही है। मनचाहे परिवर्तन भी करता हैं इन सभी परिवर्तनों के बाद वह घटना का निरीक्षण करता है। परन्तु, निरीक्षण में प्रयोगकर्ता यंत्र का प्रयोग तो करता ही है, किन्तु उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं करता है। परिवर्तन तो मात्र प्रयोग ही में संभव है। चूँकि प्रयोग कृत्रिम.घटनाओं का ही होता है। प्रयोगकर्ता उस घटना को स्वयं बनाकर उसकी जाँच करता है। अतः, निष्कर्ष है कि प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग प्रयोगकर्ता करता है।

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प्रश्न 12.
आगमन का आकारिक आधार क्या है?
उत्तर:
आगमन तर्कशास्त्र में पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना हेतु आधार की जरूरत होती है। यह आधार दो प्रकार की है-आकारिक आधार और वास्तविक आधार। आकारिक आधार के अंतर्गत प्राकृतिक समरूपता नियम तथा कार्य-कारण नियम दो प्रकार के आधार हैं। प्रकृति में एक प्रकार की समरूपता है, जिसके आधार समान परिस्थितियों में समान घटनाएँ भविष्य में घटती रहती हैं। इसी तरह कारण-कार्य नियम के अनुसार कारण उपस्थित होने पर कार्य भी अवश्य उपस्थित हो जाएगा। जैसे – यदि बादल आता है तो वर्षा होगी। तीसी, सरसों से तेल अवश्य उत्पन्न होगा। इस तरह प्राकृतिक-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य दो आगमन के आकारिक आधार हैं।

प्रश्न 13.
गलत देखने की भूल क्या है?
उत्तर:
तार्किकों ने निरीक्षण में दो तरह की भूलों का वर्णन किया है, जिसमें एक को गलत देखने की भूल कहा जाता है और दूसरे को नहीं देखने का भूल कहा जाता है। निरीक्षण में ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा कार्य किया जाता है। कर्म करने में कभी ज्ञानेन्द्रियाँ धोखा खा जाती हैं क्योंकि हम किसी वस्तु को गलत देख लेते हैं। इसका अर्थ यही हुआ कि वस्तु का जो वास्तविक रूप है उसे नहीं देखकर गलत रूप को देखते हैं। अतः, इसे ही Fallacy of mal observation अर्थात् गलत देखने की भूल कहा जाता है। जैसे अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना, ठूठ पेड़ को भूत या चोर समझ लेना आदि गलत देखने की भूल कहा जाता है।

प्रश्न 14.
क्या निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित हैं?
उत्तर:
निरीक्षण मूलतः प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित है, किन्तु कभी-कभी कृत्रिम घटनाओं का भी निरीक्षण होता है। यहाँ पर निरीक्षण का अर्थ या निरीक्षण का विषय अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। जैसे-भूकंप, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, बाढ़, महामारी आदि का निरीक्षण करते समय प्राकृतिक घटनाओं पर हमारा कुछ अपना दबाव नहीं रहता है। बल्कि प्रकृति में घटनाएँ जिस प्रकार से घटती हैं उसका निरीक्षण हम उसी तरह से करेंगे उसमें परिवर्तन करना हमारे अधिकार में नहीं है। इसलिए निरीक्षण करते समय हम निष्क्रिय और प्रकृति के गुलाम बने रहते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि निरीक्षण अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित होता है।

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प्रश्न 15.
आगमन का वास्तविक आधार क्या है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र में सत्य दो तरह के होते हैं-आकारिक सत्य तथा वास्तविक सत्य। आगमन में वास्तविक सत्य की प्राप्ति के लिए निरीक्षण और प्रयोग दो विधियों की स्थापना की गई है। जबकि आकारिक सत्यता की प्राप्ति के लिए प्राकृतिक समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम दो बताए गए हैं। निरीक्षण और प्रयोग के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है जिसके आधार पर प्राप्त ज्ञान को सत्य समझा जाता है। जो सत्य के साथ ही साथ वास्तविक भी होता है। इस प्राप्त ज्ञान में शंका की गुंजाइश किसी तरह की नहीं होती है। अतः, आगमन का वास्तविक आधार निरीक्षण और प्रयोग दोनों हैं।

प्रश्न 16.
क्या प्रयोग कृत्रिम होता है?
उत्तर:
ऐसा कहा जाता है कि प्रयोग कृत्रिम होता है क्योंकि प्रयोगकर्ता स्वयं किसी घटना को प्रयोगशाला में बनाता है और इच्छानुसार उसका निरीक्षण करता है। प्रयोग प्राकृतिक घटनाओं का संभव नहीं है क्योंकि प्राकृतिक घटनाएँ प्रकृति के हाथ में है। जैसे-आकाश में इन्द्रधनुष को हम नहीं बना सकते हैं। प्रयोगशाला में कभी संभव नहीं है। इसी तरह चन्द्रग्रहण, भूकंप, सूर्यग्रहण, बाढ़ आदि का निर्माण प्रयोगशाला में नहीं किया जा सकता है। अतः, प्राकृतिक घटनाओं पर प्रयोग कृत्रिम रूप से नहीं हो सकता है। यह कृत्रिम घटनाओं पर ही संभव है। क्योंकि प्रयोग में घटना की सारी स्थितियाँ और परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में ही रहती है। अतः निष्कर्ष निकलता है कि प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का ही होता है।

प्रश्न 17.
क्या निरीक्षण चयनात्मक है?
उत्तर:
निरीक्षण प्रायः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने जिस रूप में प्रस्तुत करतो है, उसी का पर्यवेक्षण हम करते हैं। प्रकृति बहुत विशाल एवं जटिल है। इसमें नित्य-प्रतिदिन कई प्रकार की घटनाएँ घटती रहती हैं। सभी घटनाओं का निरीक्षण हम नहीं कर पाते हैं। अतः, इसके लिए हमें किसी एक घटना का चयन करना पड़ता है। यदि हम चयन नहीं करें तो निरीक्षण संभव नहीं है। जैसे रात्रि में हम प्रतिदिन आकाश की ओर तारों को देखते हैं, किन्तु जब किसी तारे को चयन कर देखते हैं, जैसे-ध्रुवतारा तो इसे निरीक्षण कहेंगे। अतः, निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि निरीक्षण चयनात्मक होता है।

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प्रश्न 18.
निरीक्षण और प्रयोग में अंतर बताएँ।
उत्तर:
आगमन में निरीक्षण और प्रयोग दोनों वास्तविक आधार माने गए हैं। दोनों से वास्तविक सत्य की प्राप्ति होती है। फिर भी दोनों में कुछ अंतर हैं –

1. निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं का होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने प्रस्तुत करती है उसी का निरीक्षण हम करते हैं, जैसे सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण का निरीक्षण करना, किन्तु प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का प्रयोगशाला में होता है। प्रयोग में प्रयोगकर्ता स्वयं घटना को रचकर, बनाकर उसका निरीक्षण करता रहता है।

2. निरीक्षण की घटनाएँ जो होती हैं उसकी सभी परिस्थितियाँ प्रकृति के हाथ में रहती हैं परंतु, प्रयोग में घटना की सभी स्थितियाँ या परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में रहती हैं।

3. निरीक्षण में यंत्र का व्यवहार कभी-कभी होता है। परंतु, उसमें परिवर्तन नहीं होता है जबकि प्रयोग में यंत्र का व्यवहार हमेशा होता है तथा उसमें हेर-फेर या परिवर्तन भी होता रहता है। इस तरह निरीक्षण एवं प्रयोग में मात्रा का भेद अधिक है।

प्रश्न 19.
नहीं देखने की भूल क्या है?
उत्तर:
तार्किकों के अनुसार यह भी एक प्रकार से निरीक्षण के दोष के अंतर्गत ही आता है। यह भूल प्रायः तब होती है जब हम उस वस्तु या स्थिति को ठीक से नहीं देखते हैं जिसे हमें देखना चाहिए था। हड़बड़ी, ध्यान का अभाव या पक्षपात के कारण हम बहुत-सी चीजों या परिस्थितियों को नहीं देख पाते हैं जिनके कारण नहीं देखने की भूल होती है। यह दो प्रकार की है –

(क) उदाहरण को नहीं देखने की भूल तथा

(ख) आवश्यक स्थिति या परिस्थिति को नहीं देखने की भूल। कुछ गाढ़े लाल रंग के फूलों को गंधहीन पाकर हम कहते हैं कि सभी गाढ़े लाल रंग के फूल गंधहीन हैं। यहाँ उदाहरण को नहीं देखने की भूल है। इसी तरह कोई गुंडा किसी लड़की के साथ बलात्कार करना चाहता है, किन्तु कोई छात्र उसे बचाने के क्रम में गुंडा उससे चोट खाकर मर जाता है। इस परिस्थिति में यदि उसे सजा मिलती है तो यहाँ आवश्यक परिस्थिति को नहीं देखने की भूल कहा जाएगा।

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प्रश्न 20.
प्रकृति-समरूपता नियम का संक्षिप्त व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राकृतिक समरूपता नियम आगमन का आकारिक आधार है। तार्किकों ने इसकी परिभाषा देकर इसकी व्याख्या किए हैं क्योंकि इसकी परिभाषा देना संभव नहीं है। मूल सिद्धान्त या नियम की परिभाषा नहीं दी जाती है बल्कि उसका वर्णन किया जाता है। प्रकृति में जो भी घटना-घटती है वह समरूपता घटती है। इसमें प्रकार की विभिन्नता नहीं रहती है। अतः प्रकृति एकरूप है। अर्थात् प्राकृतिक घटनाएँ एक समान घटती हैं। भविष्य अतीत की तरह होता है। प्रकृति में घटनाएँ पुनः-पुनः उसी रूप में होती रहती है। भविष्य में घटनेवाली घटना की गारंटी प्राकृतिक समरूपता नियम के कारण ही हैं समान कारण से समान कार्य की उत्पत्ति होती रहती है। प्रकृति में कहीं पक्षपात नहीं है। प्रकृति एकरस है।

प्रश्न 21.
कारण-कार्य नियम की व्याख्या करें।
उत्तर:
कारण-कार्य नियम आगमन का एक प्रबल स्तंभ के रूप में आधार है। इसकी भी परिभाषा तार्किक ने न देकर इसकी व्याख्या किए हैं। कारण-कार्य नियम के अनुसार इस विश्व में कोई घटना या कार्य बिना कारण के नहीं हो सकती है। सभी घटनाओं के पीछे कुछ-न-कुछ कारण अवश्य छिपा रहता है। कारण संबंधी विचार अरस्तू के विचारणीय हैं। अरस्तू के अनुसार चार तरह के कारण हैं –

  1. द्रव्य कारण (Material Cause)
  2. आकारिक कारण (Formal Cause)
  3. निमित कारण (Efficient Cause)
  4. अंतिम कारण (Final Cause)

यही चार कारण मिलकर किसी कार्य को उत्पन्न करते हैं। जैसे-मकान के लिए ईंट, बालू, सीमेंट, द्रव्य कारण हैं। मकान का एक नक्शा बनाना आकारिक कारण है। राजमिस्त्री और मजदूर ईंट, बालू, सीमेंट को तैयार कर उसे एक पर एक खड़ा कर तैयार करते हैं। इसमें एक शक्ति आती है जिसे Efficient Cause या निमित कारण कहते हैं। इसी तरह मकान बनाने का उद्देश्य रहता है-अपना रहना या किराया पर लगाना। जिसे अंतिम कारण (Final Cause) कहते हैं। प्रचलित कारण को स्वीकार नहीं किया गया है।

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प्रश्न 22.
कारण के गुणात्मक लक्षण क्या है?
उत्तर:
कारण के गुणात्मक लक्षण मुख्यतः चार प्रकार के बताए गए हैं –
(क) कारण पूर्ववर्ती होता है
(ख) कारण नियत पूर्ववर्ती होता है
(ग) कारण उपाधिरहित पूर्ववर्ती होता है तथा
(घ) कारण तात्कालिक पूर्ववर्ती होता है।

इन्हीं चारों को आगमन में स्वीकार किया गया है। कारण कार्य की व्याख्या में कहा गया है कि यह एक के उपस्थित में होने पर दूसरा भी उपस्थित होता है। कारण-कार्य के पहले आता है इसलिए इसे पूर्ववर्ती कहा जाता है। कार्य बाद में आता है। इसलिए इसे अनुवर्ती कहा जाता है। कारण नियत पूर्ववर्ती है। क्योंकि हर हालत में बिना कारण के कार्य नहीं होता है। इसके साथ-ही-साथ तार्किकों ने कहा कि कारण उपाधिरहित एवं तात्कालिक पूर्ववर्ती भी होता है।

प्रश्न 23.
कारण के परिमाणात्मक लक्षणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
परिमाण के अनुसार कारण और कार्य के बीच मुख्यतः तीन प्रकार के विचार बताए गए हैं –

(क) कारण-कार्य से परिमाण या मात्रा में अधिक हो सकता है
(ख) कारण-कार्य से परिमाण या मात्रा में कम हो सकता है
(ग) कारण-कार्य से परिमाण या मात्रा में कभी अधिक और कभी कम हो सकता है।

अतः इन तीनों को असत्य साबित किया गया है। यदि कारण अपने कार्य से कभी अधिक और कभी कम होता है तो इसका यही अर्थ है कि प्रकृति में कोई बात स्थिर नहीं है। किन्तु, प्रकृति में स्थिरता एवं समरूपता है, अतः यह संभावना भी समाप्त हो जाता है। इसी तरह पहली और दूसरी संभावना भी समाप्त हो जाती है। ये तीनों संभावनाएँ निराधार हैं। अतः निष्कर्ष यही निकलता है कि कारण-कार्य मात्रा में बराबर होते हैं और यही सत्य भी है।

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प्रश्न 24.
कारण और उपाधि की तुलना करें।
उत्तर:
आगमन में कारण का एक हिस्सा स्थित बतायी गई है। जिस तरह से हाथ, पैर आँख, कान, नाकं आदि शरीर के अंग हैं और सब मिलकर एक शरीर का निर्माण करते हैं। उसी तरह बहुत-सी स्थितियाँ मिलकर किसी कारण की रचना करती हैं। परन्तु, कारण में बहुत-सा अंश या हिस्सा नहीं रहता है। कारण तो सिर्फ एक ही होता है। इसमें स्थिति का प्रश्न ही नहीं रहता है। कारण और उपाधि में तीन तरह के अंतर हैं –
(क) कारण एक है और उपाधि कई हैं
(ख) कारण अंश रूप में रहता है और उपाधि संपूर्ण रूप में आता है
(ग) कारण चार प्रकार के होते हैं जबकि उपाधि दो प्रकार के होते हैं। इस तरह कारण और उपाधि में अंतर है।

प्रश्न 25.
भावात्मक कारणांश या उपाधि क्या है?
उत्तर:
भावात्मक कारणांश उपाधि का एक भेद है। उपाधि प्रायः दो तरह के हैं-भावात्मक तथा अभावात्मक। ये दोनों मिलकर ही किसी कार्य को उत्पन्न करते हैं। यह कारण का वह भाग या हिस्सा है जो प्रत्यक्ष रूप में पाया जाता है। इसके रहने से कार्य को पैदा होने में सहायता मिलती है। जैसे-नाव का डूबना एक घटना है, इसमें भावात्मक उपाधि इस प्रकार है – एकाएक आँधी का आना, पानी का अधिक होना, नाव का पुराना होना तथा छेद रहना, वजन अधिक हो जाना आदि ये सभी भावात्मक उपाधि के रूप है जिसके कारण नाव पानी में डूब गई।

प्रश्न 26.
अभावात्मक कारण या उपाधि क्या है?
उत्तर:
कारणांश या उपाधि के मुख्यतः दो भेद हैं –

(क) भावात्मक कारणांश एवं
(ख) अभावात्मक कारणांश।

इसमें घटना के घटने में जो कारण अनुपस्थित रहते हैं उसे अभावात्मक उपाधि कहते हैं जैसे – नाव डूबना एक घटना है। इसमें भावात्मक तथा अभावात्मक उपाधि मिलकर घटना को घटने में सहायता प्रदान करते हैं। इसमें अभावात्मक उपाधि इस प्रकार है जो अनुपस्थित है – मल्लाह का होशियार नहीं होना, किनारे का नजदीक नहीं होना, नाव का बड़ा नहीं होना। इस प्रकार की अनुपस्थिति उपाधि हैं जिससे नाव को डूबने में अप्रत्यक्ष रूप से सहायता मिलती।

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प्रश्न 27.
कार्यों के सम्मिश्रण का विवेचन करें?
उत्तर:
जब किसी कमरे में बहुत से दीपक या मोमबत्ती जलाते हैं तो उससे अधिक प्रकाश होता है। यहाँ सभी दीपक और मोमबत्ती मिलकर उस प्रकाश को कार्यरूप में पैदा करते हैं। अतः प्रकाश कार्य-सम्मिश्रण के रूप में आता है। ये कार्य-सम्मिश्रण दो प्रकार के होते हैं –

(क) सजातीय कार्य-सम्मिश्रण तथा।
(ख) विविध जातीय कार्य-सम्मिश्रण।

सजातीय कार्य-सम्मिश्रण में हम देखते हैं कि विभिन्न कारणों के मेल से जो कार्य पैदा होता है उसमें समीकरण एक ही तरह या एक ही जाति के होते हैं, जैसे-घर में एक सौ दीपक के जलाने से अधिक प्रकाश होता है। यहाँ सभी दीपक एक ही जाति के हैं, किन्तु जो कार्य विभिन्न कारणों के मेल से बनता है उसे विविध जातीय कार्य सम्मिश्रण कहा जाता है, जैसे-भात, दाल, दूध, दही, घी, सब्जी आदि से खून का बनाना।

प्रश्न 28.
कारणों का संयोग की व्याख्या करें।
उत्तर:
जब बहुत से कारण मिलकर संयुक्त रूप से कार्य पैदा करते हैं तो वहाँ पर कारणों से मेल को कारण-संयोग कहा जाता है। यह भी कारण-कार्य नियम के अंतर्गत पाया जाता है जैसे-भात-दाल, सब्जी, दूध, दही, घी, फल आदि खाने के बाद हमारे शरीर में खून बनता है। इसलिए खून यहाँ बहुत से कारणों के मेल से बनने के कारण कार्य-सम्मिश्रण हुआ तथा दाल, भात आदि कारणों का मेल कारण-संयोग कहा जाता है। अतः कारणों के संयोग और कार्यों के सम्मिश्रण में अंतर पाया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आपके विचार से तूफान और भूकंप प्राकृतिक समरूपता नियम के अनुकूल है? क्या यह कहना सत्य है कि प्रकृति में एक समरूपता नहीं बल्कि अनेक समरूपताए है।
उत्तर:
कुछ तार्किकों का कथन है कि प्रकृति समरूपता नियम के अनुकूल तूफान और भूकंप नहीं है। प्रकृति समरूपता नियम का अर्थ होता है कि प्रकृति के व्यवहार में एकरूपता का होना। प्रकृति में जो घटना आज घटती है हमारा विश्वास है कि भविष्य में भी वही घटना घटेगी। भूकंप, तूफान, आँधी एकाएक आ जाती है। प्रकृति के व्यवहार को एक माना गया तो ऐसी घटनाएँ अचानक नहीं होना चाहिए। 1 जनवरी, 1934 ई. में बिहार में भूकंप हुआ था तो जनवरी 1935-36 के महीने में भूकंप होना चाहिए था, किन्तु नहीं हुआ। अतः, प्रकृति में समरूपता नहीं है।

ऐसा विचार प्रकृति समरूपता नियम का गलत अर्थ लगाने के कारण यह सही लगता है। प्रकृति समरूपता नियम का यह अर्थ नहीं है कि जो घटना आज घटती है वह प्रतिदिन घटनी चाहिए। ऐसा सोचना गलत है कि भूकंप, आँधी रोज आना चाहिए। प्रकृति समरूपता का अर्थ है कि समान परिस्थिति में प्रकृति के व्यवहार में एकरूपता रहती है। भूकंप होने का कारण प्रत्येक . दिन नहीं हो सकता है। इसलिए भूकंप प्रत्येक दिन नहीं होता है। यदि कारण हो और कार्य न हो तो ऐसा कहा जा सकता है कि प्रकृति में समरूपता नहीं है। समान परिस्थिति में प्रकृति के कार्य में समरूपता रहती है न कि प्रत्येक परिस्थिति में।

एकाएक तूफान या भूकंप का होना प्रकृति समरूपता का खंडन नहीं करता है एकाएक हमारी अज्ञानता का द्योतक है न कि प्रकृति समरूपता की असत्यता का। हम आँधी, तूफान के कारण को नहीं जानते हैं इसलिए कह देते हैं कि एकाएक ये घटनाएँ घटती हैं। भूकंप और तूफान, आँधी, भूकंप, बाढ़ इत्यादि का होना प्रकृति समरूपता नियम के विरुद्ध नहीं जाता है बल्कि ये प्रकृति समरूपता नियम के अनुकूल हैं। एक समरूपता या अनेक समरूपताएँ-बेन साहब (Bain) का कहना है कि संसार में एक समरूपता नहीं बल्कि अनेक समरूपताएँ हैं।

बेन तथा अन्य तार्किकों के अनुसार, प्रकृति के अनेक विभाग हैं। प्रत्येक विभाग के अलग-अलग नियम हैं। अतः, प्रकृति में समरूपता नहीं बल्कि अनेक समरूपताएँ हैं। यहाँ विवाद एकवचन और बहुवचन का है प्रकृति में बहुत से विभागों के होते हुए भी उसमें इकाई का रूप पाया जाता है। प्रकृति में अनेकता में भी एकता है। There is unity and wholeness in Nature. हम अपनी सुविधा के लिए प्रकृति को अनेक विभागों में बाँटते हैं और प्रकृति उन विभागों की एक व्यवस्थित समष्टि है। “अनेक समरूपताओं के बीच एक समरूप है”। सभी समरूपताएँ एक समरूपता में आकर मिल जाती है जिस तरह अनेक नदियाँ एक समुद्र में मिल जाती है। अतः, निष्कर्ष यही है कि एक समरूपता है जिसे प्राकृतिक समरूपता नियम कहते हैं।

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प्रश्न 2.
आगमन के आकारिक एवं वास्तविक आधार क्या हैं? उन्हें आकारिक एवं वास्तविक आधार क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
आगमन में हम अंशव्यापी से पूर्णव्यापी की ओर जाते हैं इसमें कुछ उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य नियम की स्थापना करते हैं। प्रश्न है कि किस आधार पर हम ‘कुछ’ से ‘सब’ की ओर जाते हैं? किस आधार पर वर्तमान से भविष्य की ओर जाते हैं? इसका उत्तर है कि हम प्राकृतिक समरूपता नियम के आधार पर कुछ से सब की ओर जाते हैं। हमारा विश्वास प्राकृतिक समरूपता नियम में है। समान परिस्थिति में समान कारण की उत्पत्ति हमेशा होती है। भविष्य की गारंटी इस नियम से मिलती है कि अगर मनुष्य मरणशील है तो भविष्य में भी मरणशील रहेगा। अटूट एवं अनिवार्य संबंध किस आधार पर स्थापित करते हैं? इसका उत्तर है कि कार्य-कारण नियम के आधार पर। कार्य-कारण नियम का अर्थ है कि प्रत्येक घटना का एक कारण होता है। कारण के उपस्थित रहने पर कार्य अवश्य उपस्थित होगा।

अतः, प्राकृतिक समरूपता नियम एवं कार्य कारण नियम आगमन के आकारिक आधार हैं क्योंकि इन नियमों का संबंध आगमन के आकार से है। ये आगमन के स्वरूप को निर्धारित करते हैं। आगमन की आकारिक सत्यता से इन दोनों का संबंध होने के कारण इन्हें आगमन का आकारिक आधार कहते हैं। इसी तरह निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं। अनुमान का विषय वास्तविक रूप से सत्य होता है। विषय कल्पित नहीं रहता है। विषय अनुभव पर आश्रित है।

हम अनुभव में पाते हैं कि आग में ताप है। इसी अनुभव के आधार पर सामान्य नियम बनाते हैं कि “सभी आग में ताप है।” अनुभव के भी दो स्रोत हैं – निरीक्षण और प्रयोग (Observation and experiment) व्यवस्थित एवं नियंत्रित निरीक्षण ही प्रयोग है। निरीक्षण एवं प्रयोग के द्वारा आगमन के विषय की प्राप्ति होती है। इसलिए आगमन निरीक्षण और प्रयोग विषयगत आधार कहलाते हैं। पुनः आगमन के निष्कर्ष की सत्यता की जाँच निरीक्षण और प्रयोग से होती है, इसलिए भी निरीक्षण और प्रयोग को आगमन का वास्तविक आधार कहते हैं। अतः निष्कर्ष निकलता है कि प्राकृतिक समरूपता नियम और कार्य-कारण नियम आगमन के आकारिक आधार हैं तथा निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं। आकारिक आधार का संबंध आगमन के आकस्मिक सत्यता से है और निरीक्षण एवं प्रयोग का संबंध आगमन की वास्तविक सत्यता से है।

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प्रश्न 3.
प्राकृतिक समरूपता नियम एवं कार्य-कारण नियम के बीच संबंध की व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राकृतिक समरूपता नियम एवं कार्य-कारण नियम दोनों आगमन के आकारिक आधार हैं। प्राकृतिक समरूपता नियम के अनुसार, समान परिस्थिति में प्रकृति के व्यवहार में एकरूपता पायी जाती है। समान कारण से समान कार्य की उत्पत्ति होती है। कारण के उपस्थित रहने पर कार्य अवश्य ही उपस्थित रहेगा। दोनों नियमों के संबंध को लेकर तीन मत हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. मिल तथा बेन साहब के अनुसार प्राकृतिक समरूपता नियम मौलिक है तथा कारणता के नियम प्राकृतिक समरूपंता नियम का एकरूप है। बेन के अनुसार समरूपता तीन प्रकार की है। उनमें एक अनुक्रमिक समरूपता है (Uniformities of succession) इसके अनुसार एक घटना के बाद दूसरी घटना समरूप ढंग से आती है। कार्य-कारण नियम अनुक्रमिक समरूपता है। कार्य-कारण नियम के अनुसार भी एक घटना के बाद दूसरी घटना अवश्य आती है। अतः, कार्य-कारण नियम स्वतंत्र नियम न होकर समरूपता का एक भेद है। जैसे-पानी और प्यास बुझाना, आग और गर्मी का होना इत्यादि घटनाओं में हम इसी तरह की समरूपता पाते हैं।

2. जोसेफ एवं मेलोन आदि विद्वानों के अनुसार कार्य-कारण नियम मौलिक है प्राकृतिक समरूपता नियम मौलिक नहीं है स्वतंत्र नहीं है। बल्कि प्राकृतिक समरूपता नियम इसी में समाविष्ट है। कार्य-कारण नियम के अनुसार कारण सदा कार्य को उत्पन्न करता है। कारण के उपस्थित रहने पर कार्य अवश्य ही उपस्थित रहता है। प्राकृतिक समरूपता नियम के अनुसार भी समान कारण समान कार्य को उत्पन्न करता है। अतः कार्य-कारण नियम से जो अर्थ निकलता है। वही प्राकृतिक समरूपता नियम से भी। अतः, कार्य-कारण नियम ही मौलिक है और प्राकृतिक समरूपता नियम उसमें अतभूत (implied) है।

3. वेल्टन, सिगवर्ट तथा बोसांकेट के अनुसार दोनों नियम एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं दोनों मौलिक हैं। दोनों का अर्थ भिन्न हैं। दोनों दो लक्ष्य की पूर्ति करता है। कार्य-कारण नियम से पता चलता है कि प्रकृति में समानता है। अतः, ये दोनों नियम मिलकर ही आगमन के आकारिक आधार बनते हैं। आगमन की क्रिया में दोनों की मदद ली जाती है। जैसे – कुछ मनुष्य को मरणशील देखकर सामान्यीकरण कहते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील है। कुछ से सब की ओर जाने में प्राकृतिक समरूपता नियम का मदद लेते हैं। प्रकृति के व्यवहार में समरूपता है।

इसी विश्वास के साथ कहते हैं कि मनुष्य भविष्य में भी मरेगा। सामान्यीकरण में निश्चितता आने के लिए कार्य-कारण नियम की मदद लेते हैं। कार्य-कारण नियम के अनुसार कारण के उपस्थित रहने पर अवश्य ही कार्य उपस्थित रहता है। मनुष्यता और मरणशीलता में कार्य-कारण संबंध है। इसी नियम में विश्वास के आधार पर कहते हैं कि जो कोई भी मनुष्य होगा वह अवश्य ही मरणशील होगा। अतः दोनों स्वतंत्र होते हुए भी आगमन के लिए पूरक हैं। दोनों के संयोग से आगमन संभव है। अतः दोनों में घनिष्ठ संबंध है।

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प्रश्न 4.
कारण के गुणात्मक लक्षणों की सोदाहरण व्याख्या करें। अथवा, “कारण तात्कालिक अनौपाधिक और नियत पूर्ववर्ती घटना है।” इस – परिभाषा को ध्यान में रखते हुए कारण के विभिन्न लक्षणों का सोदाहरण वर्णन करें।
उत्तर:
गुण के अनुसार हम कारण गुण का वर्णन करने में कार्य-कारण के गुणात्मक स्वरूप का वर्णन करते हैं। इसमें कार्वेथ रीड तथा मिल की परिभाषाओं पर विचार करते हैं। मिल ने कारण में पूर्ववर्ती एवं अनौपाधिक लक्षणों पर बल दिया तो कार्वेथ रीड ने पूर्ववर्तिता, नियतता, अनौपाधिता एवं तात्कालिकता चार लक्षणों पर बल दिया है।

इसमें कार्वेथ रीड के अनुसार – “The cause of an event is qualitatively” the immediate, unconditional invariable anticedent of an effect.” अर्थात् गुणात्मक दृष्टि से किसी भी घटना का कारण “कार्य का तात्कालिक, अनौपाधिक नियतपूर्ववर्ती है तथा मिल साहब के अनुसार – The cause of a phenomenon to be “the anticedent or the concurrence of anticedents on which it is invariably and unconditionally consequent.” अर्थात् किसी घटना का कारण “वह पूर्ववर्ती या पूर्ववर्तियों का समूह है जिसके या जिनके होने के बाद कारण के निम्नलिखित लक्षण पाते हैं –

1. पूर्ववर्ती होना (Anticedent):
कारण और कार्य सापेक्ष पद है। एक के बाद दूसरा एक क्रम में पाया जाता है जिसका आदि और अंत हमें नहीं पता चलता हैं अतः, किसे कारण समझा जाए? इस समस्या को समझने के लिए मिल साहब का कहना है कि किसी घटना के पहले घटनेवाली घटना को कारण समझ लेना ठीक होगा। जैसे-शान्त तालाब में पत्थर फेंकने पर पानी में जो कंपन होता है उसका कारण पत्थर फेंकना ही कहा जाएगा।

यह भी सही है कि कारण और कार्य दोनों अलग-अलग नहीं पाए जाते हैं। इसलिए मेलोन साहब (Mellone) का विचार है कि कारण और कार्य के बीच एक गणित की रेखा है जिसमें चौड़ाई नहीं होती है, “अर्थात् कारण और कार्य एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि एक तथ्य के दो छोर हैं। जो हमें पूर्ववर्ती के रूप में पहले दिखाई पड़ता है उसे कारण कहते हैं और बाद में जो अनुवर्ती के रूप में दिखाई पड़ता है उसे कार्य का रूप देते हैं। अतः, इसके अनुसार कारण-कार्य के पहले आता है।”

2. नियत अनियत होना (Invariable):
पहले घटनेवाली घटना को कारण तो कहा जाता है लेकिन सभी पहले घटने वाली घटना कारण नहीं हो सकता है। ऐसा कहने से अंधविश्वास का जन्म हो सकता है। पहले घटनेवाली घटनाएँ दो तरह की है –

(क) अनियत पूर्ववर्ती (Invariable anticedent)
(ख) नियत पूर्ववर्ती (Variable anticedent)।

(क) अनियत पूर्ववर्ती (Invariable anticedent):
वे घटनाएँ हैं जो कार्य के पहले नियमित रूप से नहीं पायी जाती है। कभी होता है कभी नहीं भी। जैसे-वर्षा के पहले घटनेवाली घटनाओं के रूप में हम फुटबॉल मैच, राम की शादी, कॉलेज में सभा इत्यादि को पा सकते हैं लेकिन नियमित रूप से वर्षा के पहले हमेशा नहीं आते हैं इसलिए ये कारण भी हो सकते हैं। अनियत घटनाएँ कारण कभी नहीं भी हो सकते हैं। अतः, अनियत घटनाएँ कारण कभी नहीं हो सकती है।

(ख) नियत पूर्ववर्ती (Invariable anticedent):
वे घटनाएँ हैं जो किसी कार्य के पहले देखा या निश्चित रूप से पायी जाती है, जैसे-वर्षा के पहले बादल का घिर जाना। जब कभी भी वर्षा होगी आकाश में बादल का रहना जरूरी है। अतः बादल का होना नियत पूर्ववर्ती घटना है। ऐसा विचार ह्यूम (Hume) का है। घटना के पहले जो भी आवे जो कुछ भी घटे सबों को बिना विचारे कारण मान लेना एक दोष पैदा कर सकता है। जिसे हम पूर्ववर्ती घटनाओं के रूप में पाते हैं, परन्तु वे सभी आकस्मिक या परिवर्तनशील हैं। इसलिए अनियत पूर्ववर्ती घटना के कारण बनने का योग कभी भी प्राप्त नहीं होगा। इसलिए ह्यूम साहब ने हमेशा की नियम पूर्ववर्ती घटना को कारण मानना उचित बताया है।

3. अनौपाधिक होना (Unconditional):
कभी-कभी ह्यूम के विचारों को मानने से एक समस्या आ जाती है जिसे Carveth Read ने हमारे सामने दिन और रात का उदाहरण रखा। है। दिन के पहले रात और रात के पहले दिन नियम पूर्ववर्ती घटना के रूप में पाए जाते हैं। यदि हम ह्यूम की बात को न माने तो दिन का कारण रात और रात का कारण दिन का होना ही होगा।

ऐसा कहना हास्यास्पद होगा। क्योंकि दिन और रात का होना एक शर्त पर निर्भर करता है-वह है पृथ्वी का चौबीस घंटे में अपनी कील पर सूरज के चारों तरफ एक बार घूम जाना। वास्तव में यही दिन और रात का अलग-अलग कारण हो सकता है। इस समस्या को दूर करने के लिए मिल साहब कहते हैं कि इसी प्रकार की घटना को नियमपूर्ववर्ती घटना का कारण माना जा सकता है जो किसी शर्त पर निर्भर नहीं करे अर्थात् वह अनौपाधिक (Unconditional) हो।

4. तात्कालिक होना (Immediate):
तात्कालिक कारण का अंतिम गुणात्मक लक्षण तात्कालिकता है। कारण को कार्य तात्कालिक पूर्ववर्ती होना चाहिए। अतः, कारण से तुरन्त पहले आनेवाली पूर्ववर्ती में खोजना चाहिए। दूरस्थपूर्ववर्ती को कारण नहीं मानना चाहिए। जैसे-कॉलेज में सुबह पढ़ना, शाम को टहलना, रात को ओस में सोना इत्यादि घटनाओं के बाद हमें खूब जोर से सर दर्द होता है। यहाँ सर दर्द के पहले ओस में सोना तात्कालिक घटना है और अन्य घटनाएँ दूर की है। इस तरह पूर्ववर्ती नियम अनौपाधिक एवं तात्कालिक मिश्रण है।

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प्रश्न 5.
कारण सभी उपाधियों-भावात्मक एवं अभावात्मक का दर्शन है। इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
मिल साहब के अनुसार हमें कारण और स्थिति (Cause and condition) को ठीक से समझना होगा।

स्थिति उपाधि (Condition):
कारण का एक हिस्सा स्थिति या उपाधि होता है। जिस तरह हाथ, पैर, आँख, नाक, कान इत्यादि मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं उसी तरह बहुत-सी स्थितियाँ मिलकर किसी कारण की रचना करती है। अतः, दोनों में पूर्ण और हिस्से (Whole and part) का संबंध है। स्थिति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में किसी कारण को कार्य के रूप में परिणत होने के लिए सहायक होता है, जैसे यदि बीज (Seed) कारण है और वृक्ष कार्य है तो बीज में धूप हवा, पानी, खाद्य इत्यादि से सहायता मिलती है, जिन्हें हम स्थितियों के रूप में ही पाते हैं।

इसलिए कार्वेथ रीड ने कहा है – “स्थिति कारण का कोई आवश्यकीय भाग है” (Conditions is any necessary factor of the cause) Conditions के दो रूप बताए गए हैं-भावात्मक और अभावात्मक (Positive and Negative)। भावात्मक स्थिति-यह कारण का वह हिस्सा है जो प्रत्यक्ष रूप में पाया जा सकता है। उसके रहने से कार्य को पैदा होने में सहायता मिलती है। जैसे-बीज से वृक्ष होने में खाद्य, पानी, हवा, धूप आदि भावात्मक स्थितियाँ है। नाव से पानी में झांकना और ऐसा करने से पानी में डूबकर मरना भावात्मक स्थिति है। इस तरह भावात्मक स्थिति स्पष्ट रहती है।

अभावात्मक स्थिति (Negative Condition):
यह कारण का वह हिस्सा है जिसकी अनुपस्थिति में कोई कार्य होता है। इसलिए मिल साहब के अनुसार, “बाधा उत्पन्न करनेवाली परिस्थिति का अभाव ही अभावात्मक स्थिति है। जैसे – बीज के वृक्ष होने में हवा, पानी, तूफान का नहीं आना, कड़ी धूप का नहीं होना, जानवरों का नहीं खाना आदि बातें भी अप्रत्यक्ष रूप से कार्य करती रहती है।

इसलिए वे बीज के लिए अभावात्मक स्थितियाँ हैं। इनका अभाव ही कारण के लिए सहायक होता है। इसी तरह नाव से नदी की धारा में गिरना भावात्मक स्थिति है तो उस आदमी को तैरने नहीं आना, और घबड़ा जाना अभावात्मक स्थिति है। अगर वह तैरना जानता तो डूबता नहीं। इसलिए डूबने का कारण उसका तैरना नहीं आना भी होगा। इसे अभावात्मक स्थिति कहते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर भावात्मक और अभावात्मक स्थिति की समान जरूरत है। इसलिए मिल साहब ने कहा कि भावात्मक और अभावात्मक स्थितियों का योगफल ही कारण कहलाता है।

आलोचना –

  1. अभावात्मक स्थितियों को कारण का एक अंश मानना एक उलझन पैदा कर सकता है। क्योंकि जो कारण अनुपस्थित है वह किसी भी कार्य के कारण का एक अंग कैसे बन सकता है?
  2. सभी अभावात्मक स्थितियों का वर्णन करना एक अत्यंत कठिन कार्य है। यह कभी भी पूरा नहीं हो सकता है। सभी अभावात्मक स्थितियों की गणना संभव नहीं है।
  3. भावात्मक उपाधियों में भी एक दिक्कत है सभी गणना संभव नहीं है।

कारण एवं उपाधि में संबंध-उपाधि की परिभाषा से ही संबंध स्पष्ट होता है। उपाधि कारण का अंश है। अनेक उपाधियों के योग से कारण बनता है। अतः, दोनों में वही संबंध है जो संबंध शरीर और अंगों के बीच है। जिस प्रकार भिन्न-भिन्न अंगों के जोड़ से पूर्ण शरीर बनता है उसी प्रकार उपाधियों में है। अंगों के निकाल देने पर शरीर का अंत हो जाता है। उसी प्रकार उपाधियों को हटा देने से कारण नाम की कोई वस्तु नहीं बचती है।

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प्रश्न 6.
कारण और कार्य दोनों बराबर है। इसकी व्याख्या करें। अथवा, कार्य-कारण से अन्तर्निहित है और कारण कार्य में अभिव्यक्त रहता है इस कथन की व्याख्या करें। अथवा, कार्य-कारण नियम के परिमाणगत लक्षणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कारण और कार्य दोनों परिणाम के अनुसार बिल्कुल बराबर होते हैं (A cause is equal to effect quantity) इसका अर्थ यही हुआ कि कारण और कार्य, द्रव की मात्रा हमेशा ही एक समान रहती है। वह कभी घटती-बढ़ती नहीं है बल्कि उसका रूप परिवर्तन होते रहता है। ऑक्सीजन और हाइड्रोजन दो गैस है जिनके मिलाने से पानी बनता है। यहाँ पर भी पानी दोनों गैसों की मात्रा के बराबर रहता है। इसी तरह शक्ति की अविनाशिता का नियम (Law of conservation of Energy) यह कहता है कि दुनिया में शक्ति का विनाश कभी नहीं होता है। वह हमेशा एक ही समान रहती है। केवल उसके रूप में परिवर्तन होता रहता है। शक्ति दो तरह की होती है –

(क) गति संबंधी (Kinetic)
(ख) संभावित शक्ति (Potential Energy)

एक में गति रहती है दूसरे में नहीं। एक किसी वस्तु को गतिशील बनाता है दूसरी स्थिर। इन्हीं दोनों में शक्ति का रूप परिवर्तन होता रहता है। उसका नाश कभी नहीं होता है। दोनों मात्रा में भी बराबर पा सकते हैं।
थोड़ी देर के लिए यदि हम मान लें कि कारण और कार्य बराबर नहीं है तो इसके बाद तीन संभावनाएँ हो सकती है।

(क) कारण-कार्य से मात्रा में बड़ा होता है।
(ख) कारण-कार्य से मात्रा में छोटा होता है।
(ग) कभी कारण बड़ा होता है और कभी छोटा।

इसमें यदि हम पहले को सही मान लें तो बहुत-सी असंभव घटनाएँ हमारे सामने आ जाएँगी। इसी तरह दूसरी संभावना भी गलत है कि जिसमें कारण-कार्य से छोटा कहा गया है। इसी तरह तीसरी संभावना भी नहीं मानी जा सकती है। क्योंकि उसे मान लेने से प्राकृतिक समरूपता नियम का उल्लंघन होता है। प्रकृति की घटनाओं में एकरूपता हो। अतः तीनों को देखने के बाद सही मानना पड़ता है कि कारण और कार्य परिणाम के अनुसार बिल्कुल बराबर होते हैं।

इसे मान लेने के बाद हमें यह भी कहने का अवसर मिलता है कि कारण में कार्य छिपा रहता है और कार्य में कारण का छिपा हुआ रूप रहता है। (Cause is nothing but effect can cealed and effect is nothing but cause evealed) कारण और कार्य परिणामों के अनुसार बराबर होते हैं। कार्य कारण में पहले से ही निवास करता है जैसे-बीज में वृक्ष, सरसों में तेल। वृक्ष बीज का खुला हुआ रूप है और तेल सरसों का। वृक्ष और तेल कोई नया चीज नहीं है। अतः परिणाम के अनुसार कारण और कार्य बिल्कुल बराबर होते हैं केवल उनके रूप में परिवर्तन होता हैं अतः दोनों बराबर है।

कार्य-कारण नियम और प्राकृतिक समरूपता नियम के बीच संबंध (Relation between in law of causation and this Law of uniformity of Nature):
दोनों नियम आगमन की आकस्मिक आधार हैं। इन दोनों की सहायता से ही आगमन में अत्यधिक सत्यता की स्थापना की जाती है। इन दोनों के बीच के संबंध को लेकर विद्वानों में दो मत हैं।

(क) मिल, बेन और वेन आदि विद्वानों के अनुसार कार्य-कारण नियम को प्राकृतिक समरूपता नियम का ही हिस्सा माना गया है। इन लोगों का कहना है कि प्राकृतिक समरूपता नियम एक मूल नियम है जो प्रकृति के सभी क्षेत्रों में पाया जाता है। अतः, कार्य-कारण का नियम भी उसी का एक अंग है।

(ख) Sigwart, Bossanquet, Welton आदि विद्वानों के अनुसार कार्य:
कारण का नियम और प्राकृतिक समरूपता नियम दो अलग-अलग नियम हैं इसमें कोई एक-दूसरे का अंग या अंश नहीं है। ये दोनों नियम अलग-अलग रूप में आगमन की आकारिक सत्यता को पाने में मदद करते हैं। इन दोनों मतों को देखने से पता चलता है कि प्राकृतिक समरूपता नियम सभी प्रकार से आगमन का आधार है और कार्य-कारण नियम वैज्ञानिक आगमन का आधार है। वास्तव में दोनों नियम एक-दूसरे के सहायक एवं पूरक के रूप में हैं।

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प्रश्न 7.
बहुकारणवाद की व्याख्या एवं परीक्षण करते हुए उसकी कठिनाइयों का उल्लेख करें। या एक ही घटना विभिन्न कारणों से विभिन्न समय में उत्पन्न होती है। विवेचना करें।
उत्तर:
बहुकारणवाद के अनुसार एक ही घटना अलग-अलग समय में विभिन्न कारणों से उत्पन्न होती है। एक कार्य को अनेक कारणों का बहुकारणवाद कहते हैं। जैसे-मृत्यु एक कार्य है जिसकी उत्पत्ति अनेक कारणों से होती है। मृत्यु कभी बीमारी से, कभी विष खाने से, कभी गोली लगने से, कभी दुर्घटना होने से और कभी गिरने से होती है। अतः विभिन्न समय के मृत्यु के विभिन्न कारण हैं। रोशनी, सूर्य, चन्द्र, लालटेन, दीपक, बिजली-मोमबत्ती, अनेक कारणों से उत्पन्न होती है। इस पर कार्वेथ रीड ने कहा है The same event may be due at different times to different antecedents, that in fact there may be various cause अर्थात् एक ही घटना भिन्न-भिन्न समय में अलग-अलग पूर्ववर्ती अवस्थाओं से घटती है।

अतः उसके भिन्न-भिन्न कारण हो सकते हैं। मिल साहब ने भी बहुकारणवाद का समर्थन किया है। इनके शब्दों में “Many causes may produce mechanical mot on, many causes may produce. Produce same kind of sensation, many causes may produce death” अर्थात् अनेक कारण यांत्रिक गति उत्पन्न कर सकते हैं, कई कारण समान संवेदना उत्पन्न कर सकते हैं, कई कारणों से मृत्यु हो सकती है। स्पष्ट है कि एक ही घटना विभिन्न समय में विभिन्न कारणों से उत्पन्न होती है। जैसे मृत्यु एक घटना है इसके कई कारण हो सकते हैं नदी में डूबना, टी.बी., हैजा, प्लेग, जहर खाना, ट्रेन से कट जाना आदि इसके अनेक कारण बताए जा सकते हैं।

बहुकारणवाद सिद्धांत की कठिनाइयों की आलोचना-() बहुकारणवाद कारण की नियतता के विरूद्ध है। कारण नियम पूर्ववर्ती है। नियम पूर्ववर्ती का अर्थ है कि वही पूर्ववर्ती कारण है जो अपरिवर्तनशील है, जो किसी घटना के पहले सर्वदा उपस्थित है। इसका अर्थ है कि एक कार्य का संबंध सर्वदा एक कारण से रहता है, परन्तु बहुकारणवाद के अनुसार एक कार्य का संबंध अनेक कारण से रहता है। इस सिद्धांत को मान लेने पर Valiable अनियत हो जाता है। अतः यह सिद्धांत कारण की नियतता के विरुद्ध जाता है।

1. यह सिद्धांत विज्ञान के विरुद्ध जाता हैं। विज्ञान के अनुसार एक घटना का एक कारण होता है तथा एक कारण का एक कार्य होता है। बहुकारणवाद के अनुसार एक कार्य में अनेक कारण होते हैं। अतः, सिद्धांत विज्ञान की मान्यता के विरुद्ध जाता है।

2. यह सिद्धांत प्राकृतिक समरूपता नियम के विरुद्ध भी जाता है। समान परिस्थिति में समान कारण से सफल कार्य की उत्पत्ति होती हैं इसका अर्थ होता है कि एक कार्य का एक कारण होता है। लेकिन बहुकारणवाद के अनुसार एक कार्य के अनेक कारण होते हैं। अतः, यह सिद्धांत प्राकृतिक समरूपता नियम के विरुद्ध जाता है जो कठिनाइयों को दूर कर सकते हैं? बहुकारणवाद में जो सत्यता दिखाई पड़ती है वह वास्तविक सत्यता नहीं है। यह तो हमारी असावधानी और अज्ञानता पर आधारित है। वस्तुतः प्रकृति में एक घटना का एक ही कारण है। बहुकारणवाद की असत्यता को दो तरह से दूर किया जा सकता है।

  • कार्यों का विशेषीकरण (specialisation of effects) तथा
  • कारणों के सामान्यीकरण द्वारा (Generalisation of causes) द्वारा।

(i) कार्यों का विशेषीकरण:
हमलोग प्रायः कारण में भेद करते हैं, किन्तु कार्य में भेद नहीं करते हैं। अलग-अलग कारणों से उत्पन्न कार्य जिसे हम एक समझते हैं वास्तव में एक नहीं बल्कि अनेक प्रकार का है। सूर्य, चन्द्र, लालटेन, बिजली, मोमबत्ती, दीपक से उत्पन्न प्रकाश को एक समझते हैं। परन्तु ध्यान से देखने पर भिन्नता दिखाई पड़ती है। बिजली का प्रकाश दीपक से प्रकाश से भिन्न है। दीपक की रोशनी, लालटेन की रोशनी से भिन्न है जब भिन्नता है तो फिर उसे एक नाम से नहीं परखना चाहिए। हमें सूर्य का प्रकाश, बिजली का प्रकाश, लालटेन की रोशनी, दीपक का प्रकाश अलग-अलग कहना चाहिए। जब ऐसा करते हैं तो एक कार्य का एक कारण होगा न कि अनेक।
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इस तरह एक कार्य का एक ही कारण सिद्ध होता है न कि अनेक। विभिन्न कार्यों की विशेषता बतलाना कार्यों का विशेषीकरण कहलाता है। अतः, कार्य का साफ-साफ व्यक्त करना ही कार्य का विशेषीकरण कहलाता है।

(ii) कार्यों का सामान्यीकरण:
इसका अर्थ है विभिन्न कारणों में निहित सामान्य (Common) तत्त्व का पता लगाना। यदि कारणों में सामान्य तत्त्व का पता लगता है तब एक कार्य का एक कारण होगा। विभिन्न कार्यों की भिन्नता पर ध्यान न देकर उसे एक नाम से पुकारते हैं। यहाँ न्याय का अंतर है कि विभिन्न कारणों की भिन्नता पर ध्यान न देकर उनके सामान्य तत्त्व का पता लगाकर उन्हें एक नाम से जान सकते हैं। जैसे मृत्यु का अनेक कारण कहते हैं-हैजा, प्लेग, विषपान, गोली लगना, नदी में डूबकर आदि, किन्तु ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि उन कारणों में एक सामान्य बात है “हृदय की गति का रुकना या प्राण शक्ति समाप्त होना” यहाँ मृत्यु का एक ही कारण है-प्राण शक्ति का समाप्त हो जाना।

इस तरह कारणों के सामान्यीकरण तथा कार्यों के विशेषीकरण के द्वारा बहुकारणवाद की असत्यता को प्रमाणित किया जा सकता है। बेन ने कहा है “Plurality of causes is more an ancident of our imperfect knowledge than a fact in the nature of things” अर्थात् कारणों की अनेकता वस्तुओं के विषय में कोई सत्यता नहीं हैं बल्कि अधूरे ज्ञान का परिणाम है। इसी तरह जाजेफ के शब्दों में “Plurality is more apparent than real.” अर्थात् अनेक कारण केवल दिखावटी हैं, यथार्थ नहीं। इसी तरह कार्वेथ रीड ने भी कहा है कि “यदि हम तथ्यों को पर्याप्त सूक्ष्मता से समझेंगे तो हम देखेंगे कि प्रत्येक कार्य का एक ही कारण होता है।” अतः, बहुकारणवाद सही सिद्धान्त नहीं है, कार्यों कि यह विज्ञान के विरुद्ध है।

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प्रश्न 8.
कारण-संयोग एवं कार्य सम्मिश्रण की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
जब बहुत से कारण मिलकर संयुक्त रूप में कार्य पैदा करे तो वहाँ पर कारणों से मेल को कारण-संयोग (conjunction of causes) कहते हैं और उनसे उत्पन्न कार्य को कार्य-सम्मिश्रण (Intermixture of effects) कहते हैं। अतः, अनेक कारणों को मिलकर कार्य करना, कारणों का संयोग कहलाता है। B.N. Roy ने कहा है “The acting together of serveral of causes producing a joint effect is called conjunction of causes.” जैसे दाल, भात, दूध, घी, दही, तरकारी खाने के बाद हमारे शरीर में खून बनता है। इसलिए यहाँ पर ‘खून’ बहुत कारणों के मेल से बनने का कारण कार्य-सम्मिश्रण हुआ भात, दाल, दूध, दही, घी, तरकारी आदि कारणों का मेल कारण-संयोग कहलाया।

इसी तरह यदि हम अपने रूम में एक सौ दीपक जला दें तो उससे एक अच्छा प्रकाश होगा। यहाँ सभी दीपक मिलकर उन प्रकाश को कार्य रूप में पैदा करते हैं। इसलिए वे प्रकाश-सम्मिश्रण कार्य और सभी दीपक कारण संयोग के रूप में होगा। कार्य-सम्मिश्रण (Intermixture of Effects) दो तरह के हैं –

  1. सजातीय
  2. विजातीय।

1. सजातीय कार्य सम्मिश्रण (Homogeneous):
इसमें विभिन्न कारणों के मेल से जों कार्य पैदा होता है उसमें समीकरण एक ही तरह या जाति के होते हैं। जैसे-यदि हम अपने कमरे में एक सौ दीपक जला दें तो उससे खूब प्रकाश होगा। यहाँ प्रकाश कार्य है और इसके कारण सभी एक ही तरह के दीपक हैं इसे सजातीय कार्य सम्मिश्रण कहा जाता है।

2. विजातीय कार्य सम्मिश्रण (Heterogeneous):
इसमें कार्य विभिन्न कारणों के मेल से बनता है। वे सभी कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। जैसे ‘खून’ का कार्य-सम्मिश्रण लेने पर पता चलता है कि इसके कारण भात, दाल, दूध, घी, पानी, तरकारी आदि हैं ये सभी भिन्न-भिन्न जाति के हैं फिर भी इन सबों के मेल से ही ‘खून’ बनता है इसलिए यह विविध जाति जातीय कार्य सम्मिश्रण कहलाएगा।

कारण संयोग एवं बहुकारणवाद में अंतर (Difference between conjunction of causes and plurality):
दोनों में निम्नलिखित अंतर हैं –

(i) बहुकारणवाद में बहुत से कारण मिलते हैं, जैसे – मृत्यु के लिए नदी में डूबना, हैजा, प्लेग, ट्रेन से कटना आदि। किन्तु, एक समय में एक ही कारण काम करते हैं। दूसरी तरफ कारण संयोग में जो अनेक कारण मिलते हैं वे सभी एक-दूसरे से मिलकर ही उस कार्य को पैदा करते हैं अकेले नहीं।

(ii) बहुकारणवाद में जो कारण हमें मिलते हैं उनमें एक कारण अकेला ही उस तरह के कार्य को पैदा करने की ताकत रखता हैं जैसे नदी में डूबना या हैजा या प्लेग आदि में कोई एक अकेले वह कार्य पैदा कर सकता है, परन्तु ऐसी व्यक्ति संयोग में एक कारण के पास नहीं मिलती है। अकेले भात या दाल उस तरह का खून नहीं पैदा कर सकता है अकेलें ऑक्सीजन या हाइड्रोजन पानी पैदा नहीं कर सकता है।

(iii) बहुकारणवाद के कार्य में सरलता रहती है, क्योंकि एक समय में सूर्य के लिए एक ही कारण काम करता है दूसरी तरह कारण-संयोग में सभी कारण मिलकर कार्य करता है इसलिए उससे जो कार्य पैदा होता है वह जटिल या मिश्रित होता है।

(iv) बहुकारणवाद की आलोचना करते हुए इसे गलत और अवैज्ञानिक बताया गया है। परन्तु कारण-संयोग सही और वैज्ञानिक होने का दावा कर सकती है।

अतः, बहुकारणवाद में अनेक कारण Separately and independently कार्य को उत्पन्न करते हैं, किन्तु कारण-संयोग में अनेक कारण Jointly कार्य को उत्पन्न करते हैं। जैसे –
कारण संयोग – A + B + C Produce ‘X’
बहुकारणवाद – A or B or C Produces ‘X’

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प्रश्न 9.
कारण और कारणांश क्या है? दोनों में भेद बतावें।
उत्तर:
कारण और कार्य एक सापेक्ष पद है। एक के आने के बाद दूसरा आता है। कारण उपस्थित होने पर कार्य की उपस्थिति होती है। कारण एक घटना है। दो घटनाओं का संबंध इस तरह है कि जो पहले आता है, वह कारण कहा जाता है और जो बाद में आता है उसे कार्य कहा जाता है। बादल और वर्षा दोनों एक प्रकार के घटना हैं। बादल पहले आता है इसलिए बादल कारण है, वर्षा बाद में होती है, इसलिए वर्षा कार्य है। कारण एक हिस्सा है जो एक अर्थ के रूप में रहता है कारणांश एक प्रकार की स्थिति है यह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में किसी कारण को कार्य के रूप में परिणत होने के लिए सहायक होता है जैसे यदि बीज कारण है तो वृक्ष कार्य है। कारणांश के दो भेद हैं –

  1. भावात्मक कारणांश
  2. अभावात्मक कारणांश।

1. भावात्मक कारणांश:
यह कारण का वह भाग है जो प्रत्यक्ष रूप से किसी भी कार्य को होने में सहायक होती है। जैसे बीज से वृक्ष होने में हवा, पानी, धूप, खाद्य आदि भावात्मक स्थितियाँ हैं।

2. अभावात्मक कारणांश:
यह कारण का वह हिस्सा है जो किसी भी कार्य में अनुपस्थित होकर कार्य को करने में सहायता प्रदान करती है। बीज से वृक्ष होने में भावात्मक स्थिति के साथ-साथ अभावात्मक स्थिति का भी होना जरूरी है, जैसे-बीज से वृक्ष होने में धूप, हवा, पानी इत्यादि के साथ-ही-साथ आँधी, तूफान का नहीं आना कड़ी धूप का नहीं होना, जानवरों द्वारा नहीं खाया जाना इत्यादि बातों का भी ध्यान रखना पड़ता है। अतः, कारणांश में भावात्मक और अभावात्मक दोनों के हाथ हैं। कारण और कारणांश दोनों में निम्नलिखित अंतर भी हैं –

  • कारण एक होता है, किन्तु कारणांश में कई कारण मिलकर किसी कार्य को करते हैं।
  • कारण अंश के रूप में रहता है, किन्तु कारणांश संपूर्ण के रूप में रहता है।
  • अरस्तू ने चार प्रकार के कारण बताए हैं-द्रव्य कारण, आकारिक कारण, विभिन्न निमित कारण और अन्तिम कारण। ये चारों प्रकार के कारण एक साथ मिलकर किसी भी कार्य को करते हैं। लेकिन कारणांश दो प्रकार के हैं भावात्मक और अभावात्मक कारणांश।

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प्रश्न 10.
समरूपता के मूल भेद क्या हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
आगमन में प्राकृतिक समरूपता नियम तथा कार्य-कारण नियम आकारिक आधार के दो प्रमुख भेद बताएँ गए हैं। आगमन के दो मुख्य आधार भी हैं-आकारिक आधार तथा वास्तविक आधार। आकारिक आधार के अंतर्गत हम लोग प्राकृतिक समरूपता नियम में विश्वास करते हैं क्योंकि प्रकृति हमेशा एक समान व्यवहार करती है। इसमें कभी किसी तरह का हेर-फेर नहीं होता है। इस नियम की परिभाषा नहीं, किन्तु व्याख्या की गई है। प्रकृति एकरूप है। प्रकृति की घटनाएँ समान रूप से घटती है, जो अनुपस्थित है, वह उपस्थित के बराबर है। प्रकृति अपने आप में निष्पक्ष एवं ईमानदार है।

समानकारण से समान कार्य पैदा होता है इसका अर्थ यही हुआ कि जिस कारण से जो घटना आज घटती है यदि वही कारण कल भी उपस्थित हो जाए तो वही घटना घटेगी, जैसे यदि आज सरसों से तेल निकलता है तो कल भी निकलेगा। प्रकृति में जिस कारण से जो घटनाएँ घटती है वही कारण उपस्थित होने पर वही कार्य अवश्य होगा। इस तरह प्रकृति में किसी तरह की भिन्नता नहीं की गई है। यदि आज पानी में प्यास बुझाने की क्षमता है तो कल भी पानी में प्यास बुझाने की क्षमता रहेगी। इसी तरह आज आग में जलाने की शक्ति है तो भविष्य में भी आग में जलन शक्ति रहेगी। – अतः, संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जिन कारणों से जो घटना, आज घटती है कल भी वही कारण से वही घटना अवश्य घटेगी। इसकी गारंटी हम प्राकृतिक समरूपता से प्राप्त करते हैं। यहाँ समरूपता के मुख्यतः तीन मूल भेदों का वर्णन किया गया है।

  1. अनुक्रमिक समरूपताएँ
  2. समसत्ता की समरूपताएँ
  3. समान घटनाओं की समरूपताएँ।

1. अनुक्रमिक समयरूताएँ (Uniformities of succession):
इसे कारणता कहते हैं। इस प्रकार की समरूपता में जहाँ पहली घटना घटेगी वहाँ दूसरी घटना अवश्य घटेगी। जैसे – पानी और व्यास का बुझाना। आग का होना और गर्मी का होना। ये सब अनुक्रमिक समरूपताएँ हैं। इसमें प्राकृतिक समरूपता है।

2. समसत्ता की समरूपताएँ (Uniformities of co-existence):
प्रकृति में कुछ घटनाएँ इस प्रकार की घटती हैं जिन्हें साथ-साथ पायी जाती है या धातु के साथ पारदर्शिता सर्वदा रहती है। इसी तरह कुछ उदाहरण है जिनमें दो बातों की समसत्ता देखकर यह कहते हैं कि उनमें समसत्ता की एकरूपता पायी जाती है।

3. समान घटनाओं की समरूपताएँ (Uniformities of Equality):
इसके अंतर्गत देखा गया है कि अगर समान वस्तुओं के बराबर जितनी वस्तुएँ हैं ये सभी आपस में बराबर हैं। जैसे-गणित, विज्ञान जो अंकों के संबंध पर आधारित है, वह उसी प्रकार के उदाहरण से मिलता-जुलता नजर आता है। रेखा गणित में भी इस प्रकार के उदाहरण मिलते हैं। जैसे किसी चतुर्भुज के आमने-सामने वाले कोण यदि बराबर हों तो आमने-सामने वाली भुजाएँ भी समांतर और बराबर होंगी।

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प्रश्न 11.
प्रयोग के ऊपर निरीक्षण के लाभ की व्याख्या करें।
उत्तर:
निरीक्षण और प्रयोग में केवल मात्रा का भेद है फिर भी एक का फायदा दूसरे पर दिखलाया जा सकता है। प्रयोग की अपेक्षा निरीक्षण की विशेष सुविधाएँ या प्रयोग के ऊपर निरीक्षण के निम्नलिखित लाभ हैं।

1. निरीक्षण का क्षेत्र प्रयोग से बड़ा और व्यापक है। निरीक्षण सभी घटनाओं का किया जा सकता है, किन्तु सभी घटनाओं पर प्रयोग नहीं किया जा सकता है। जैसे-सामाजिक, राजनीतिक एवं ग्रह-नक्षत्र-संबंधी घटनाओं पर प्रयोग संभव नहीं है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। इसी तरह अपराध, पाप, आत्महत्या, मानसिक रोग आदि को प्रयोग द्वारा उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। इन घटनाओं का केवल निरीक्षण ही संभव है।

2. निरीक्षण में कारण से कार्य तथा कार्य से कारण दोनों की ओर जाते हैं, परन्तु प्रयोग में केवल कारण से कार्य की ओर जाते हैं। जैसे किसी पशु को विष की सूई देकर हम देखते हैं कि इसका क्या प्रभाव पड़ता है। किन्तु, मरे हुए पशु पर प्रयोग कर यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि उसकी मृत्यु किस कारण से हुई। लेकिन निरीक्षण में शव को देखकर उसकी मृत्यु के कारण का अनुमान निरीक्षण के आधार पर कर सकते हैं। यहाँ कार्य से कारण की ओर जाते।

3. आगमन में पूर्णव्यापी वास्तविक वाक्य की स्थापना निरीक्षण के आधार पर की जाती है, जैसे-राम, श्याम, मोहन, यदु को मरते देखकर सभी मनुष्य मरणशील हैं, ऐसा निरीक्षण पर ही हम करते हैं। यहाँ प्रयोग से काम नहीं लेते हैं। प्रयोग तो निरीक्षण का संशोधित एवं नियंत्रित।

4. निरीक्षण का दावा है कि वह प्रयोग से पहले (Prior) आता है। प्रयोग करते समय भी हम निरीक्षण करते हैं। अतः, निरीक्षण प्रयोग के पहले आने का सही अधिकार रखता है। प्रयोग करने के पहले यंत्रों तथा उपादानों का निरीक्षण करने के बाद ही प्रयोग किया जाता है। ज्ञान का. प्रारंभ निरीक्षण से होता है। बाद में बुद्धि विकसित होने पर प्रयोग से काम लेते हैं।

5. निरीक्षण सबों के लिए सुलभ है इसके लिए विशेष योग्यता और कुशलता की जरूरत नहीं है। जबकि प्रयोग के लिए विशेष योग्यता एवं कुशलता की जरूरत रहती है। अतः, प्रयोग सबों के लिए सुलभ नहीं है।

6. निरीक्षण में घटनाओं को स्वाभाविक तथा शुद्ध रूप में देखते हैं। उनमें कृत्रिमता नहीं रहती है। जैसे-सूर्योदय, सूर्यास्त, वर्षा के मौसम में रिमझिम वर्षा का निरीक्षण आनन्ददायक होता है। किन्तु, प्रयोग में घटना को कृत्रिम ढंग से बनाते हैं। इसलिए उसमें स्वाभाविकता नहीं रहता है।

7. निरीक्षण से एक विशेष सुविधा मिलती है जो प्रयोग में नहीं मिलती है। प्रयोग की अपेक्षा निरीक्षण में कम मेहनत करनी पड़ती है। प्रयोग में अधिक परिश्रम करना पड़ता है।

परिस्थितियों एवं प्रयोगशालाओं का प्रबंध करना पड़ता है। इसमें यंत्रों की सहायता ली जाती है। अतः, यंत्रों का प्रबंध भी जरूरी है। इसमें बहुत झंझट एवं परेशानी है जबकि निरीक्षण का कार्य सुविधाजनक एवं आसान है। इस तरह निरीक्षण से विशेष लाभ प्रयोग की अपेक्षा है।

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प्रश्न 12.
निरीक्षण संबंधी दोषों की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
निरीक्षण में घटनाओं को निष्पक्ष होकर देखा जाता है, किन्तु साधारण लोगों के द्वारा निरीक्षण की क्रिया गलत रूप से भी हो जाती है। इसे निरीक्षण का दोष कहते हैं। निरीक्षण में प्रायः दो तरह के दोष होते हैं। गलत निरीक्षण की भूल और नहीं निरीक्षण की भूल।

1. गलत निरीक्षण की भूल या दोष (Fallacy of mal observation):
निरीक्षण में हमारी ज्ञानेन्द्रियों को बहुत ही काम करना पड़ता है जिसमें कभी-कभी धोखा भी हो जाती है जिससे किसी वस्तु या घटना का गलत ज्ञान हो जाता है जिससे निरीक्षण दोषपूर्ण हो जाता है।

जैसे-चाँदनी रात में शांत वातावरण में बालू के सूखी रेत को पानी, या पानी को ही बालू समझना। अंधेरी रात में रस्सी को साँप या साँप को रस्सी समझना ये सब गलत निरीक्षण का नमूना है। साधारण लोग कहते हैं कि सूर्य पूरब उदय होकर धीरे-धीरे चलकर पश्चिमी में डूब जाता है। ऐसा समझना निरीक्षण का दोष है।

(ii) नहीं निरीक्षण की भूल (Fallacy of non observation):
निरीक्षण के समय हम कभी-कभी बहुत असावधान रहते हैं। इसमें उसके पूरे तथ्य को न देखकर उसमें कुछ ही अंश को देखते हैं। इसमें सत्य के एक पहलू को देखा जाता है तथा दूसरे का निरीक्षण बिल्कुल नहीं करते हैं। यह दोष दो तरह के हैं।

(क) उदाहरणों को नहीं देखना (Non-observation of instances):
सही और वैज्ञानिक निरीक्षण के लिए हमें पक्षपात से दूर रहना पड़ता है। किसी व्यक्ति को ठीक से बताने के लिए उसके भावात्मक तथा अभावात्मक गुणों का वर्णन होना चाहिए। उसके अच्छे-बुरे गुणों का वर्णन होना जरूरी है। यदि उसके बुरे गुणों का वर्णन नहीं करते हैं तो वहाँ निरीक्षण का दोष हो जाता है। अभावात्मक उदाहरणों को छोड़ देना वैज्ञानिक निरीक्षण नहीं है।

जैसे-जब कोई शादी हेतु लड़की वाला लड़का वाला के यहाँ जाता है तो लड़के का गुण बताता है कि लड़का एम. ए. पास है, खिलाड़ी है, समाज सेवक है, सुशील है, गायक है, तेज है। ये सभी उसके गुण हैं। किन्तु, वह शराबी है, झगड़ालू है, बीमार अधिक रहता है, गाली देने का स्वभाव एवं मारपीट करने में आगे रहता है। इन सब उदाहरणों को नहीं देखना केवल एक ही पक्ष देखने से निरीक्षण दोष पूर्ण है, जिसे – Non-observation of fallacy कहते हैं।

(ख) आवश्यक वस्तुओं को नहीं देखना (Non observation of the essential circumstances):
किसी घटना के होने में परिस्थिति का बहुत बड़ा हाथ रहता है। यदि परिस्थिति को तुच्छ और बेकार समझकर ध्यान में नहीं लाते हैं तो वहाँ निरीक्षण का दोष हो जाता है। जैसे-एक छात्र शाम को हॉकी खेलकर हाथ में डंडा लेकर सुनसान बगीचे से गुजर रहा है। एक बदमाश आदमी रुपये के लालच में एक लड़की की हत्या करके उसके आभूषणों को लूटना चाहता है। दोनों में भिड़त हो जाती है। छात्र के डंडे से वह गुंडा चोट खाकर मर जाता है।

इस हालत में परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उस छात्र को निर्दोष पाया जाएगा। उसे खून की सजा नहीं मिलेगी। यदि जज उस परिस्थिति को ध्यान में न रखकर सजा दे देता है तो वहाँ निरीक्षण का दोष हो जाता है, जिसे हम आवश्यक अवस्थाओं के नहीं, निरीक्षण का दोष कहेंगे। इस तरह अनेक परिस्थितियाँ चोरी, डकैती, हत्या की वृद्धि के लिए जिम्मेवार है।

गरीबी का बढ़ना, बेरोजगारी का बढ़ना, महँगाई, सरकार की कमजोरी, बेकारी की समस्या। इसमें केवल एक परिस्थिति सरकार की कमजोरी पर ध्यान देते हैं तथा अन्य परिस्थितियों का निरीक्षण नहीं करते हैं। अतः निरीक्षण के दोष के कारण जो सामान्यीकरण किया जाता है वह वैज्ञानिक नहीं है। सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में जो सिद्धान्त स्थापित किये जाते हैं उसमें निश्चितता नहीं रहती है।

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प्रश्न 13.
निरीक्षण के ऊपर प्रयोग के लाभ की व्याख्या करें?
उत्तर:
1. प्रयोग में जितनी बार चाहें उतनी बार घटनाओं को बार-बार दुहरा सकते हैं इसमें घटना हमारे हाथ में रहती है। किन्तु, निरीक्षण हमारे हाथ में नहीं रहता है। ऐसा मौका मिलता भी नहीं है। परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में रहती हैं।

2. प्रयोग में जाँच की जानेवाली घटना का अध्ययन दूसरी घटनाओं या परिस्थितियों से अलग करके कर सकते हैं। प्रकृति जटिल है। एक घटना दूसरी घटना से मिली रहती है। निरीक्षण में यह संभव नहीं है कि एक तत्त्व को दूसरे तत्त्व से अलग कर अध्ययन करें। प्रयोग में परिस्थितियाँ अलग की जा सकती हैं। किन्तु, निरीक्षण में ऐसा संभव नहीं है। हवा में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बनडाऑक्साइड इत्यादि मिले रहते हैं। एक बरतन में नाइट्रोजन रखते हैं और दूसरे बरतन में ऑक्सीजन। एक जलती मोमबत्ती नाइट्रोजन के बरतन के नजदीक जाने पर बुझ जाती है, किन्तु ऑक्सीजन के बरतन के नजदीक जाने पर तेज होकर जलने लगती है।

3. निरीक्षण की तुलना में प्रयोग से लाभ यह है कि घटना की जाँच परिस्थितियों से बदल-बदल कर करते हैं। परिस्थिति के परिवर्तन से बतलाता है कि किस परिस्थितियों का संबंध जाँच की जानेवाली घटना से है। जैसे-वैज्ञानिकों ने परिस्थिति को बदल करके पता लगाया कि नाइट्रिक एसिड, पीतल, लोहा, ताँबा, चाँदी को गला सकता है, परन्तु सोना को नहीं। निरीक्षण में परिस्थिति को बदली जा सकती है।

4. निरीक्षण की तुलना में प्रयोग से लाभ है कि प्रयोग में घटना की जाँच प्रयोगकर्ता धैर्य, सावधानी, सतर्कता एवं स्थिरता से करता है। इसमें जल्दीबाजी नहीं रहती है। किन्तु, निरीक्षण में यह सुविधा नहीं है।

5. प्रयोग से जो निष्कर्ष निकलते हैं वे निश्चित एवं संदेह रहित होते हैं। प्रयोग पर आधारित जाँच विश्वसनीय होता है। किन्तु, निरीक्षण से जो निष्कर्ष प्राप्त होता है वह संभाव्य होता है। वह सत्य भी हो सकता है और असत्य भी।

6. विज्ञान का जो कुछ विकास हुआ है उसमें प्रयोग का बहुत बड़ा हाथ है। निरीक्षण से उतना लाभ विद्वानों को नहीं पहुँच पाता है। इसलिए प्रयोग की वैज्ञानिक महत्ता निरीक्षण से अधिक है। भौतिकी एवं रसायन विज्ञान प्रयोग पर आधारित है इसलिए इसकी उन्नति अधिक हुई है। किन्तु मनोविज्ञान के सभी क्षेत्रों में प्रयोग संभव नहीं है इसलिए इसका विकास कुछ कम हुआ अतः निष्कर्ष निकलता है कि प्रयोग निरीक्षण की अपेक्षा अधिक लाभदायक है। जहाँ प्रयोग संभव है वहाँ प्रयोग की मदद लेनी चाहिए।

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प्रश्न 14.
निरीक्षण की परिभाषा दें। निरीक्षण की मुख्य विशेषताओं की विवेचना करें। अथवा, निरीक्षण क्या है? निरीक्षण के लक्षणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
निरीक्षण का अर्थ प्रायः देखना या प्रत्यक्षीकरण होता है। ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा जो प्रत्यक्षीकरण होता है, उसे निरीक्षण कहते हैं। ये देखना या प्रत्यक्षीकरण दो तरह से होता है। “Observation is the equalited perception of natural events under conditions arrange by natures with an end in view.” अर्थात् प्राकृतिक, स्थितियों के बीच प्राकृतिक घटनाओं के उद्देश्यपूर्ण पर्यवेक्षण को निरीक्षण कहते हैं।” इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं।

1. निरीक्षण उद्देश्यपूर्ण-निरुद्देश्यपूर्ण देखना निरीक्षण नहीं है। जैसे-बाजार में अनेक दुकानों को प्रत्येक दिन देखता हूँ, परन्तु यह देखना साधारण देखना है। यह देखना निरीक्षण नहीं कहला सकता है। यदि किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु किसी दुकान को देखता हूँ। जैसे कपड़ा खरीदने के लिए तो वह निरीक्षण कहलाएगा। अतः, निरीक्षण उद्देश्यपूर्ण होता है।

2. निरीक्षण नियमित एवं व्यवस्थित होता है-लक्ष्य की पूर्ति निरीक्षण को नियमित और व्यवस्थित करती है। जैसे-कोई ज्योतिषी सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी एवं नक्षत्रों को ध्यान से नियमित रूप से उनकी गतिविधि को अध्ययन के विचार से उनका प्रत्यक्षीकरण करता है तो यह निरीक्षण कहलाता है। लेकिन लोग रात में चाँद और तारे को प्रतिदिन अनियमित रूप से देखते हैं, जिसे निरीक्षण नहीं कहा जाएगा। अतः निरीक्षण नियमित प्रत्यक्षीकरण (Regulated perception) है।

3. निरीक्षण चयनात्मक क्रिया (Selective process):
प्रकृति में अनेक घटनाएँ घटती हैं। प्रकृति में अनेक वस्तुएँ हैं। निरीक्षण में हम सभी वस्तुओं पर ध्यान न देकर केवल उन्हीं वस्तुओं या घटनाओं पर ध्यान देते हैं जिससे लक्ष्य की पूर्ति होती है। अतः, प्रकृति में से घटनाओं का चयन करते हैं और उन्हें ध्यानपूर्वक निरीक्षण भी करते हैं, अतः निरीक्षण एक चयनात्मक क्रिया है।

4. स्वाभाविक स्थिति:
निरीक्षण में जिन वस्तुओं या घटनाओं को देखते हैं उन्हें स्वाभाविक स्थिति में देखते हैं। उसे बिना परिवर्तन के देखते हैं। प्रकृति में घटनाएँ जिस रूप में पस्थित होती हैं उन्हें उसी रूप में देखते हैं। सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, सूर्योदय, सूर्यास्त, बाढ़, वर्षा आदि को हम स्वाभाविक स्थिति में ही देखते हैं। अतः, निरीक्षण में प्राकृतिक घटनाओं को प्राकृतिक अवस्था में देखते हैं।

5. निरीक्षणकर्ता की निष्पक्षता:
वैज्ञानिक तटस्थ होकर घटनाओं का निरीक्षण करता है। अपने भाव, संवेग एवं पूर्वाग्रह से अलग होकर वह घटनाओं का अध्ययन करता है। निष्पक्ष हुए बिना निरीक्षण संभव नहीं हो सकता है।

6. ज्ञानेन्द्रियों द्वारा निरीक्षण:
निरीक्षण ज्ञानेन्द्रियों द्वारा किया जाता है और ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति सीमित होती है। अतः निरीक्षण का स्पष्ट एवं प्रभावशाली बनाने के लिए वैज्ञानिक विभिन्न यंत्रों की सहायता भी लेते हैं। जैसे-दूरबीन का व्यवहार, थर्मामीटर, स्टेथेस्कोप का व्यवहार आदि।

7. निरीक्षण बाह्य घटनाओं तक ही सीमित नहीं है:
हम आंतरिक मनोदशा का भी निरीक्षण करते हैं। जैसे-सुख, दुःख, भय, क्रोध, प्रेम, इच्छा, घृणा आदि। मनोविज्ञान में इसे अंतर्निरीक्षण कहते हैं। इस तरह हमें उन तथ्यों को, जिनका हम निरीक्षण करते हैं, उन तथ्यों से भिन्न समझना चाहिए जिनका हम निरीक्षित तथ्यों (Observed facts) से अनुमान करते हैं। Jevons का कथन है कि जबतक हम केवल उन्हीं तथ्यों का वर्णन करते हैं, जिन्हें हमने अपनी ज्ञानेन्द्रियों से निरीक्षित किया है, तो हम त्रुटि नहीं करते हैं, परन्तु जैसे ही हम अन्दाज लगाते हैं या कल्पना करने लगते हैं, वैसे ही गलती कर बैठते हैं।

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प्रश्न 15.
प्रयोग की परिभाषा दें। प्रयोग की विशेषताओं को लिखें।
उत्तर:
प्रयोग भी आगमन का वास्तविक आधार है। यह भी एक प्रकार का निरीक्षण ही है। इसमें भी एक लक्ष्य रहता है, यह भी निरीक्षण की तरह लक्ष्यपूर्ण होती है। यहाँ पर नियंत्रित परिस्थिति में घटना को, कृत्रिम ढंग से उत्पन्न कर अध्ययन किया जाता है। प्रयोग की परिभाषा इस प्रकार दी गई है (Experiment is the observation of this artificial production of events under conditions prearranged by man”) अर्थात् मनुष्यों द्वारा निर्मित स्थितियों में कृत्रिम स्थितियों में कृत्रिम घटनाओं के निरीक्षण को प्रयोग कहते हैं।” इस परिभाषा के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित लक्षण पाते हैं।

  1. प्रयोग भी एक तरह का निरीक्षण ही है। इसमें भी किसी लक्ष्य की पूर्ति हेतु ध्यानपूर्वक किसी घटना या वस्तु को नियंत्रित पर्यवेक्षण (Regulated Perception) कहते हैं।
  2. प्रयोग में घटना को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न किया जाता है। जैसे निश्चित मात्रा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिलाकर पानी बनाया जाता है। यह पानी कृत्रिम होता है। बिजली, बादल को प्रयोग में उत्पन्न करना प्रयोग है, अतः निरीक्षण में घटना पाते हैं, किन्तु प्रयोग में घटना को बनाते हैं।
  3. घटना की उत्पत्ति हेतु जिन परिस्थितियों एवं स्थान की जरूरत पड़ती है उसका प्रबंध एवं चयन प्रयोगकर्ता स्वयं पहले से करता हैं जैसे-पानी या बिजली उत्पन्न करने के लिए प्रयोगकर्ता उनका प्रबंधन पहले करता है, अतः प्रयोग में वातावरण एवं परिस्थिति पर प्रयोगकर्ता का नियंत्रण रहता है। प्रयोगकर्ता अपनी इच्छानुसार परिवर्तन कर घटना का निरीक्षण कर सकता है।
  4. प्रयोग में घटना की उत्पत्ति के बाद उसका निरीक्षण किया जाता है। घटना का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है। प्रयोग के बाद निष्कर्ष निकाला जाता है।
  5. प्रयोग के लिए वैज्ञानिक औजारों तथा विज्ञानशाला का रहना जरूरी है। घास पर बैठकर कोई प्रयोग खाली हाथ नहीं कर सकते हैं।

इस तरह निरीक्षण और प्रयोग को आगमन का वास्तविक आधार कहा जाता है। निरीक्षण और प्रयोग आगमन को विषय प्रदान करते हैं। आगमन में विशिष्ट उदाहरणों के निरीक्षण में आधार पर सामान्य नियम बनाते हैं। निरीक्षण और प्रयोग ही विशिष्ट उदाहरण प्रदान करते हैं जिनके आधार पर सामान्य नियम बनाते हैं।

जैसे-कुछ मनुष्यों को मरते देखकर ही सामान्य नियम बनाते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं। कुछ उदाहरणों के प्रयोग के आधार पर ही विज्ञान में सामान्य नियम बनाते हैं। इसलिए निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार कहलाते हैं। पुनः आगमन के निष्कर्ष की वास्तविक सत्यता की जाँच निरीक्षण और प्रयोग से होती है। इसलिए भी निरीक्षण और प्रयोग को आगमन का वास्तविक आधार कहते हैं। आगमन की वास्तविक सत्यता निरीक्षण और प्रयोग पर निर्भर करती है, इसलिए ये आगमन के वास्तविक आधार कहलाते हैं।

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प्रश्न 16.
निरीक्षण और प्रयोग में प्रकार का भेद नहीं बल्कि मात्रा का है, विवेचन करें। अथवा, निरीक्षण और प्रयोग में अन्तर बताएँ। अथवा, निरीक्षण की तुलना प्रयोग से करें।
उत्तर:
निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं। दोनों के द्वारा आगमन की वास्तविक सत्य निर्धारित होती है। निरीक्षण की विशेषतापूर्ण अवस्था ही प्रयोग है। दोनों मिलकर आगमन के तथ्य की पूर्ति करते हैं फिर भी दोनों में कुछ मुख्य अंतर हैं।

1. निरीक्षण प्राकृतिक है जबकि प्रयोग कृत्रिम है। जो घटना जिस रूप में प्रकृति में घटती है उसे उसी रूप में देखते हैं। घटनाओं में हेर-फेर नहीं करते हैं। जैसे – प्रयोगशाला में बिजली, बादल, पानी कृत्रिम ढंग से बनाते हैं। आकाश में बादल, नक्षत्र, चाँद-सितारों का देखना निरीक्षण है, अतः निरीक्षण प्राकृतिक है, जबकि प्रयोग कृत्रिम है।

2. निरीक्षण में हम प्रकृति के दास रहते हैं, परन्तु प्रयोग में ऐसी बात नहीं है। निरीक्षण में हमें प्रकृति पर निर्भर करना पड़ता है। जब प्रकृति में घटना घटेगी तब हम निरीक्षण कर सकते हैं। प्रकृति में जब चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, भूकम्प होगा तब ही हम उन घटनाओं का निरीक्षण कर सकते हैं। अतः यहाँ हम प्रकृति के दास बने रहते हैं। लेकिन प्रयोग में घटना को उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ हमारे नियंत्रण में रहती हैं। इसलिए इच्छानुसार घटना को उत्पन्न करते हैं। हम प्रकृति पर निर्भर नहीं रहकर प्रकृति को ही प्रयोग के अधीन रखते हैं।

3. निरीक्षण में हम परिस्थितियों को उत्पन्न नहीं करते हैं। परिस्थितियाँ प्रकृति के द्वारा प्रदान की जाती हैं। जिस वातावरण में घटना घटती है, उसी वातावरण और परिस्थिति में घटना का निरीक्षण करना पड़ता है, किन्तु प्रयोग में परिस्थितियों और वातावरण को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न किया जाता है। अतः निरीक्षण और प्रयोग में अंतर परिस्थितियों को उत्पन्न करने के विषय में है। निरीक्षण में परिस्थिति प्राकृतिक है, परन्तु प्रयोग में परिस्थिति कृत्रिम है।

4. निरीक्षण में हम घटना को पाते हैं, परन्तु प्रयोग में घटना को बनाते हैं (Observa tion is finding fact an experiment is making one)

5. निरीक्षण में प्रासंगिक परिस्थिति को अप्रासंगिक परिस्थिति से अलग नहीं कर सकते हैं। प्रयोग में परिस्थिति को अप्रासंगिक परिस्थिति से अलग कर घटना का अध्ययन करते हैं।

6. बेकन का कथन है कि प्रयोग में हम प्रकृति से प्रश्न पूछते हैं।

7. स्टॉक साहब का कथन है कि निरीक्षण निष्क्रिय है और प्रयोग सक्रिय है। निष्क्रिय इसलिए कहा जाता है कि निरीक्षणकर्ता प्रकृति की घटनाओं को घटते हुए मात्र देखता है। उसे घटना को उत्पन्न करने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता है। प्रयोग में सक्रिय इसलिए रहना पड़ता है कि घटना को उत्पन्न करना पड़ता है। उत्पन्न करने में स्वाभाविक है कि प्रयोगकर्ता को सक्रिय रहना पड़ता है।

8. निरीक्षण और प्रयोग में अंतर है कि निरीक्षण प्रयोग से पहले आता है। निरीक्षण के द्वारा जिस सत्य का पता लगता है उसे ही प्रयोग के द्वारा परीक्षण करते हैं, अर्थात् सत्यापन करते हैं। फिर भी इतना अन्तर होते हुए भी तार्किकों ने कहा कि दोनों में प्रकार का नहीं, मात्रा का भेद है। दोनों में जो अन्तर दिखाये गए हैं वे सही नहीं हैं। निरीक्षण को प्राकृतिक और प्रयोग को कृत्रिम कहना ठीक नहीं है। दोनों पूर्णतः प्राकृतिक और कृत्रिम नहीं हैं।

निरीक्षण में भी कृत्रिमता की कुछ मात्रा है और प्रयोग में भी प्राकृतिक की कुछ मात्रा है। जब निरीक्षण में यंत्रों-दूरबीन, स्टेथेस्कोप, थर्मामीटर, माइक्रोस्कोप आदि का व्यवहार करते हैं तब निरीक्षण भी कृत्रिम हो जाता है। प्रयोगकर्ता स्वयं कृत्रिम नहीं है। बल्कि प्राकृतिक जीता-जागता बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति है। जिसे हाथ, पैर, आँख, कान, नाक आदि प्रकृति प्रदत्त हैं।

अतः प्रयोग शुद्ध रूप से कृत्रिम नहीं है इसमें भी प्राकृतिक व्यक्तियों की सहायता की जाती है। निरीक्षण भी शुद्ध रूप से प्राकृतिक नहीं है। अतः निरीक्षण अधिक प्राकृतिक है और कृत्रिम कम है जबकि प्रयोग अधिक कृत्रिम है और कम प्राकृतिक है। अतः, दोनों में प्रकार का भेद नहीं है, बल्कि मात्रा का भेद है।

स्टाक महोदय का विचार है कि निरीक्षण निष्क्रिय और प्रयोग सक्रिय है। ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। निरीक्षण को निष्क्रिय इसलिए कहा गया है कि इसमें हम कुछ करते नहीं हैं, घटना को मात्र घटते हुए देखते हैं। परन्तु, यह कहना ठीक नहीं है। निरीक्षण में मानसिक रूप से सक्रिय रहना पड़ता है। क्योंकि इसमें चुनाव की क्रिया होती है। पुनः निरीक्षण नियमित और व्यवस्थित क्रिया है। इसके लिए सक्रिय होना जरूरी है। निरीक्षण में ध्यान की क्रिया भी सम्मिलित है। ध्यान स्वयं सक्रिय क्रिया है। इसी तरह कुछ वस्तुओं या घटनाओं के लिए हमें शारीरिक रूप से सक्रिय रहना पड़ता है। जैसे, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण के लिए सचेत रहना पड़ता है।

अतः, निरीक्षण पूर्ण रूप से निष्क्रिय नहीं है और प्रयोग पूर्ण रूप से सक्रिय भी नहीं है। प्रयोग में भी प्रयोगकर्ता चुपचाप बैठकर घटना को घटते हुए देखता है। अतः, प्रयोग अधिक सक्रिय है और कम निष्क्रिय। अतः, दोनों में प्रकार का अन्तर नहीं है, बल्कि मात्रा का है। दोनों में विरोध नहीं है दोनों एक ही जाति की दो उपजातियाँ हैं। निरीक्षण जाति है, Genus है। साधारणतः निरीक्षण तथा प्रयोगात्मक निरीक्षण इसका दो उपजातियाँ हैं जिसे हम प्रयोग कहते हैं। यह वास्तव में विशिष्ट निरीक्षण हैं। निरीक्षण को नियमित कर देते हैं तो वह प्रयोग हो जाता है।

प्रयोग में घटना को इच्छानुसार देखना है “Experiment is nothing but observation of facts under condition produced by the observer at will.” पुनः निरीक्षण प्रयोग में बदल जाता है। जब इच्छानुसार परिस्थितियों में लाते हैं, “Observation passes into experiment when we can manipulates the facts as we like.” अतः, निरीक्षण और प्रयोग में प्रकार का भेद नहीं बल्कि मात्रा का है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 17.
प्राकृतिक समरूपता नियम की व्याख्या करें। इसे आगमन का आकस्मिक आधार क्यों कहा जाता है? इसकी महत्ता का वर्णन करें।
उत्तर:
आगमन का लक्ष्य एक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करना है जिसमें वास्तविक सत्यता पायी जाए। आगमन में आजीवन सत्यता का अर्थ है उन व्यापक नियमों का पाना जिनके द्वारा हम पूर्णव्यापी वास्तविक वाक्य की स्थापना करते हैं। उन नियमों के रूप में प्राकृतिक समरूपता नियम (Law of use formality of Nature) की सहायता लेते हैं। यह एक मूल सिद्धान्त है इसकी परिभाषा नहीं दी जा सकती है। बल्कि व्याख्या की जा सकती है। इस व्याख्या में प्राकृतिक समरूपता नियम के निम्नलिखित रूप पाते हैं।

(क) प्रकृति एकरूप है (Nature is uniform) अर्थात् प्रकृति की घटनाएँ एक समान घटती हैं।

(ख) प्रकृति में समान घटनाएँ घटती है (Same events happen in the Nature) आज जिस तरह की घटना घटती है उसी तरह की घटना भविष्य में भी घटेगी।

(ग) भविष्य अतीत के समान होगा (The future will reseneble the past) भूतकाल में जो घटनाएँ घटती हैं, वे भविष्य में भी घटेगी। भूत, वर्तमान और भविष्य में एक मेल पाया जाता है।

(घ) प्रकृति अपनी पुनरावृत्ति करती है (Nature repeats it self) एक तरह की घटना बार-बार घटती हुई दिखाई पड़ती है।

(ङ) अज्ञात ज्ञात के बाद होता है (The unknown is like the known) प्राकृतिक घटनाएँ जो घट चुका है वे तो ज्ञात हैं; किन्तु उसके आधार पर अज्ञात को जान सकते हैं।

(च) ब्रह्माण्ड नियमों द्वारा संचालित हैं (The universe is governed by laws) सारा ब्रह्माण्ड नियमों से संचालित होता है सूर्य, चाँद, ग्रह, ऋतु, तारे, पृथ्वी सभी नियमों में बँधे हुए

(छ) समानकारण से समान कार्य पैदा होता है (The same cause will produce the same effect) इसका अर्थ है कि जिस कारण से जो घटना घटती है घटती रहेगी। प्रकृति में जो घटनाएँ घटेगी वह नियमबद्ध मनमाने ढंग से अंधी घटनाएँ नहीं घट सकती हैं। विभिन्नता इस रूप में नहीं हो तो यही प्राकृतिक समरूपता नियम है।

(ज) जो अनुपस्थित है वह उपस्थित के बराबर है। (The absent is like the present) अर्थात् जो घटना या वस्तु आज अनुपस्थित है, वह समान परिस्थिति में उपस्थिति अवश्य होती है। इस तरह का विश्वास जिस आधार पर चलता है, उसे ही प्राकृतिक नियम कहते हैं।

इन सभी विभिन्न व्याख्याओं का एक ही निचोड़ है कि प्रकृति समान परिस्थिति में समान रूप से व्यवहार का कार्य करती है। (Nature behaves in the same way under similar circumstances) इस तरह प्राकृतिक समरूपता नियम की व्याख्या भिन्न-भिन्न रूपों में की गईं हैं जिसका अर्थ स्पष्ट है कि समान कारण समान कार्य को उत्पन्न करता है। (Same cause will produce same effect) जैसे आग में गर्मी, वर्षा में ठंढक, पानी से प्यास बुझाना, जाड़े के दिनों में जाड़ा, गर्मी के मौसम में गर्मी आदि प्राकृतिक घटनाएँ बिल्कुल नियमित रूप से पायी जाती हैं।

इसलिए तार्किकों ने कह डाला कि “प्रकृति में कोई सनक नहीं है। (There is no such thing as whim or caprice in Nature) इसका समर्थन कुमारी स्टेविंग भी करती हैं। “प्रकृति में जो कुछ भी होता है वह नियमानुकूल होता है और ये नियम इस तरह के होते हैं कि इनका पता लगाया जा सकता है। (What happens, happens in accordance with laws and there laws all such that we can discover them”) प्राकृतिक समरूपता नियम की सत्यता पर कुछ लोग संदेह करते हैं जिसमें पहली आपत्ति है-जब प्रकृति की घटनाएँ एक समान घटती हैं तो कभी कड़ी धूप, कभी भूकंप, कभी गर्मी, कभी खूब वर्षा, कभी कम वर्षा, कभी अकाल, कभी सुखाड़, तो कभी बाढ़ और कभी वे एक दम नहीं पाए जाते हैं।

1934 ई. में बिहार में भूकंप हुआ फिर नहीं हुआ ऐसा क्यों? अतः, प्रकृति में समरूपता नहीं है। Mill साहब कहते हैं कि कोई भी मनुष्य इस बात पर विश्वास नहीं करता है कि इस वर्ष जैसी अच्छी वर्षा और ऋतु हुई आगामी वर्षों में भी ऐसी ही बात पायी जाएगी…कोई भी यह आधार नहीं रखता है कि प्रत्येक रात में मनुष्य एक ही तरह का स्वप्न देखता रहेगा…वस्तुतः प्रकृति की गति केवल एक रूप नहीं बल्कि भिन्न भी है। इसी तरह Carveth Read भी कहते हैं कि-“विभिन्न प्रकार से प्रकृति एक रूप नहीं प्रतीत होती है। वस्तुओं के गुण, आकार, रंग आदि में विभिन्नता पायी जाती है। जलवायु तो अनिश्चित होती है-यहाँ तक कि व्यवसाय और राजनीतिक की घटनाएँ भी एक समान नहीं होती हैं। अतः, प्रकृति में समरूपता पाया जाना असंभव है।

इसका उचित उत्तर है कि ये आपत्तियाँ बेकार हैं। प्रकृति इतना विशाल है कि इसमें विभिन्नताओं का होना जरूरी है। प्रकृति समान परिस्थिति में एक समान व्यवहार करती है (Nature acts or behaves in the same way under similar circumstances”)। भूकंप जिस कारण से 1934 में आया था वही कारण यदि पैदा हो गया तो भूकंप होगा। इसका अर्थ है प्राकृतिक समरूपता अर्थात् कार्य-कारण की समरूपता। प्रकृति के कारण जटिलता ज्ञात नहीं होते हैं। सभी घटनाएँ नियमित और कारणवश ही होती हैं।

दूसरी आपत्ति है कि प्रकृति में कोई एक समरूपता नहीं बल्कि बहुत-सी समरूपताएँ हैं। ऐसा Bain साहब कहते हैं कि The course of the world is not a uniformity but uniformities. प्रकृति में भिन्न-भिन्न नियम हैं नदी, जंगल, पहाड़, कीड़े और मनुष्य में अनेक अलग-अलग नियम हैं और इस तरह नियमों की संख्या भी असंख्य हैं। हमारे सामने आपत्ति के रूप में प्रश्न है कि नियम एक नहीं अनेक हैं। यह झगड़ा एक वचन और बहुवचन का है। दर्पण में तो अनेकताओं में एकता पाना साधारण-सी बात है (One in many) प्राकृतिक का क्षेत्र बहुत ही विशाल और जटिल है। हम उसे संपूर्णता में नहीं जान सकते हैं। उससे कई विभागों में बाँटकर ही उसे उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए एक नियम के अंतर्गत ही अनेक नियम उपनियम बना लेते हैं। प्रकृति में समरूपताएँ बाह्रा हैं वास्तव में समरूपता ही है जिसे Ram of uniformity of Nature कहते।

बेल्टन के अनुसार भी प्रकृति, समरूपता में विविधता एवं अनेकता के लिए स्थान है। महत्त्व-प्रकृति समरूपता को आगमन का आधार माना गया है। इसका महत्त्व इतना अधिक है कि इसे बिना माने आगमन की क्रिया संभव ही नहीं है। आगमन में ‘कुछ’ से ‘सब’ की ओर गणना, भविष्य की गारंटी कहाँ से मिलती हैं? प्राकृतिक समरूपता नियम में विश्वास के आधार पर ही सामान्यीकरण करते हैं। विश्वास पर ही निरीक्षित से अनिरीक्षित की ओर जाते हैं। मिल ने भी इसकी महत्ता स्वीकारा है। विज्ञान भी प्राकृतिक समरूपता नियम पर ही आधारित है। इसी पर आगमन और विज्ञान की क्रियाएँ संभव है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जिस वाक्य में उद्देश्य विधेय पद की गुणवाचकता को व्यक्त न कर उद्देश्य के सम्बन्ध में नया ज्ञान देता है, कहलाता है –
(क) यथार्थ वाक्य
(ख) शाब्दिक वाक्य
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) यथार्थ वाक्य

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प्रश्न 2.
जिस वाक्य में विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता (Connotation) को व्यक्त करता है, उसे कैसा वाक्य कहते हैं?
(क) शाब्दिक वाक्य
(ख) यथार्थ वाक्य
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) शाब्दिक वाक्य

प्रश्न 3.
आगमन का सार (Essence of induction) है –
(क) आगमनात्मक कूद
(ख) सामान्य वाक्य की स्थापना
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आगमनात्मक कूद

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प्रश्न 4.
यथार्थ वाक्य क्या है?
(क) उद्देश्य के सम्बन्ध में नया ज्ञान देनेवाला
(ख) विधेय में उद्देश्य पद की गुणवाचकता को व्यक्त करनेवाला
(ग) विधेय में उद्देश्य पद की गुणवाचकता को व्यक्त नहीं करनेवाला
(घ) (क) एवं (ख) दोनों
उत्तर:
(घ) (क) एवं (ख) दोनों

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction) के मुख्य लक्ष्य क्या हैं?
(क) यथार्थ व्यापक वाक्य की स्थापना
(ख) वैज्ञानिक पद्धति का अवलोकन
(ग) यथार्थ व्यापक वाक्य को परिभाषित करना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) यथार्थ व्यापक वाक्य की स्थापना

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प्रश्न 6.
“विद्वान का सम्बन्ध वैज्ञानिक पद्धति से है न कि अध्ययन विषय से” यह कथन किसका है?
(क) कार्ल पियर्सन
(ख) डिल्थे
(ग) गुडे एवं हाट
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) कार्ल पियर्सन

प्रश्न 7.
प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान का लक्ष्य है –
(क) एक
(ख) अनेक (भिन्न)
(ग) एक-दूसरे का विरोध
(घ) एक-दूसरे का पूरक
उत्तर:
(क) एक

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प्रश्न 8.
कुछ विशेष उदाहरणों के आधार पर पूर्णव्यापी नियम का यथार्थ अनुमान ही आगमन (Induction) है। यह कथन किसका है?
(क) ज्वाइस (Joyce)
(ख) फाउलर (Fowler)
(ग) मिल (Mill)
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ज्वाइस (Joyce)

प्रश्न 9.
वैज्ञानिक आगमन की विशेषताएँ हैं –
(क) किसी वाक्य की स्थापना करता है
(ख) विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करता है
(ग) इसमें आगमनात्मक छलाँग (Inductive leap) होता है
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 10.
सरल गणनामूलक आगमन (Induction per simple Enumeration) में अभाव होता है –
(क) कारण-कार्य नियम का
(ख) प्रकृति समरूपता सिद्धान्त का
(ग) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) कारण-कार्य नियम का

प्रश्न 11.
आगमन एवं सरल गणनामूलक आगमन के आधार में अंतर है –
(क) सिर्फ कारण कार्य नियम का
(ख) प्रकृति समरूपता सिद्धान्त का
(ग) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सिर्फ कारण कार्य नियम का

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प्रश्न 12.
“तर्कशास्त्र” (Logic) तर्क करने की कला एवं विज्ञान दोनों हैं, यह किसने कहा था?
(क) हेटली (Whately) ने
(ख) हैमिल्टन (Hamilton) ने
(ग) थॉमसन (Thomson) ने
(घ) मिल (Mill) ने
उत्तर:
(क) हेटली (Whately) ने

प्रश्न 13.
निगमन एवं आगमन का लक्ष्य –
(क) समान है
(ख) भिन्न है
(ग) एक-दूसरे का विरोधी है
(घ) एक-दूसरे का पूरक है
उत्तर:
(घ) एक-दूसरे का पूरक है

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प्रश्न 14.
“तर्कशास्त्र विचार के आकार सम्बन्धी विषयों का विज्ञान है।” तर्कशास्त्र की यह परिभाषा किसने दी?
(क) ए. सी. मित्रा
(ख) जे. एस. मिल
(ग) थॉमसन
(घ) हैमिल्टन
उत्तर:
(घ) हैमिल्टन

प्रश्न 15.
“तर्कशास्त्र तर्क करने की कला है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(क) हेटली ने
(ख) यूबरबेग
(ग) जे. एस. मिल ने
(घ) एल्ड्रीच ने
उत्तर:
(घ) एल्ड्रीच ने

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प्रश्न 16.
तर्कशास्त्र के अध्ययन का विषय है:
(क) साक्षात् ज्ञान
(ख) परोक्ष ज्ञान
(ग) आध्यात्मिक ज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 17.
तर्कशास्त्र का सम्बन्ध –
(क) वास्तविक सत्यता से है
(ख) आकारिक सत्यता से
(ग) दोनों से है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों से है

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प्रश्न 18.
वास्तविक (Material Truth) का अर्थ है?
(क) विचारों का बाह्य पदार्थ से संगति
(ख) विचारों की संगति
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) विचारों का बाह्य पदार्थ से संगति

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अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
विज्ञान का अंग्रेजी रूपान्तर ‘Science’ की उत्पत्ति किस मूल शब्द से हुई है?
उत्तर:
विज्ञान का अंग्रेजी रूपान्तर Science का मूल शब्द लैटिन भाषा का ‘Scientia’ है, जिसका अर्थ होता है ज्ञान या Knowledge।

प्रश्न 2.
आगमनात्मक कूद क्या है? अथवा, आगमनात्मक छलांग (Inductive leap) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आगमनात्मक कूद (Inductive leap) आगमन का सार (essernce of induction) है। ‘कुछ’ को देखकर जब हम ‘सभी’ के बारे में कहते हैं तो यही आगमनात्मक छलांग है।

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प्रश्न 3.
वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction) का मुख्य लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
यथार्थ व्यापक वाक्य की स्थापना करना वैज्ञानिक आगमन का प्रमुख लक्ष्य है।

प्रश्न 4.
शाब्दिक वाक्य (Verbal proposition) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस वाक्य में विधेय पद की गुणवाचकता (Connotation) को व्यक्त करता है उसे शाब्दिक (Verbal) वाक्य कहते हैं। इस वाक्य से कोई नया ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। जैसे-सभी मनुष्य मरणशील होते हैं।

प्रश्न 5.
यथार्थ (real) वाक्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस वाक्य में विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता को नहीं व्यक्त करता है बल्कि उद्देश्य के सम्बन्ध में कोई नया ज्ञान देता है उसे यथार्थ (real) वाक्य कहते हैं। जैसे – ‘सभी मनुष्य मरणशील होते है’ – यह एक वास्तविक वाक्य है।

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प्रश्न 6.
वैज्ञानिक पद्धति (Scientific method) का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
घटनाओं को समझाना, उनसे संबद्ध सामान्य सिद्धान्तों का निरूपण करना वैज्ञानिक पद्धति के उद्देश्य हैं, इसके साथ ही भविष्यवाणी एवं नियंत्रण भी वैज्ञानिक पद्धति के उद्देश्य हैं।

प्रश्न 7.
विज्ञान क्या है? अथवा, विज्ञान की परिभाषा दें।
उत्तर:
वैज्ञानिक पद्धति द्वारा क्रमबद्ध रूप से ज्ञान का संग्रह ही विज्ञान है।

प्रश्न 8.
वैज्ञानिक आगमन की परिभाषा दें।
उत्तर:
विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के पश्चात् कारण-कार्य नियम एवं प्रकृति-समरूपता के वल पर आगमनात्मक कूद लेकर यथार्थ (सामान्य) वाक्य की स्थापना को वैज्ञानिक आगमन कहते हैं।

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प्रश्न 9.
अवैज्ञानिक आगमन (Unscientific Induction) किसे कहते हैं? अथवा, सरल गणनात्मक आगमन (Induction per simple Enumeration) की परिभाषा दें।
उत्तर:
विशेष उदाहरण के निरीक्षण के पश्चात् अखंडित अनुभव तथा प्रकृति-समरूपता नियम के आधार पर बिना कारण-कार्य सम्बन्ध को जानते हुए जब यथार्थ सामान्य वाक्य की स्थापना की जाती है तो उसे अवैज्ञानिक या सरल गणनात्मक आगमन कहते हैं।

प्रश्न 10.
किसने कहा कि “विज्ञान का संबंध वैज्ञानिक पद्धति से है न कि अध्ययन विषय से”?
उत्तर:
यह कथन कार्ल पियर्सन (Karl Pearson) का है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निगमन एवं आगमन में कौन अधिक मौलिक है? वस्तुवादी तर्कशास्त्रियों के मत की विवेचना करें।
उत्तर:
मिल, बेन आदि वस्तुवादी तर्कशास्त्रियों के मत में निगमनात्मक अनुमान के लिए, कम-से-कम एक सामान्य (universal) वाक्य की आवश्यकता पड़ती है और इस सामान्य वाक्य की स्थापना आगमन को आधार प्रदान करता है। आगमन के द्वारा ही सामान्य नियम की स्थापना होती है और निगमन केवल इसी नियम को व्यक्तिविशेषों पर लागू करता है। जब आगमन के द्वारा यह सामान्य वाक्य स्थापित हो जाता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं, तो निगमन इसे राम, मोहन आदि व्यक्तियों पर प्रयुक्त करके कहता है कि राम भी मनुष्य होने के नाते मरणशील है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आगमन ही अधिक मौलिक (fundamental) है और निगमन गौण (secondary)।

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प्रश्न 2.
“निगमन आगमन का पूर्ववर्ती है।” विवेचना करें।
उत्तर:
जेवन्स (Jevons) के अनुसार निगमन आगमन के पहले आता है। इसकी पुष्टि के लिए इन्होंने अपना तर्क इस प्रकार दिया है-आगमन में सामान्य नियम स्थापित किया जाता है। इसके लिए प्राक्कल्पना का सहारा लेकर सामान्यीकरण कर दिया जाता है। किन्तु, बिना जाँच या परीक्षा के कोई सामान्य नियम नहीं बन जाता। प्राक्कल्पना को सत्य मानकर उससे संभावित निष्कर्ष निकालते हैं और इन निष्कर्षों की जाँच वास्तविक घटनाओं से करते हैं। यदि ये निष्कर्ष इन यथार्थ घटनाओं के अनुकूल होते हैं तो हम अपनी प्राक्कल्पना को सही मान लेते हैं। यदि ये अनुकूल या संगत नहीं होते, तो प्राक्कल्पना असत्य सिद्ध हो जाती है। इस प्रकार, निगमन द्वारा ही प्राक्कल्पना की परीक्षा करके आगमन में सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसीलिए, निगमन को आगमन का पूर्ववर्ती कहा जाता है।

प्रश्न 3.
“निगमन अवरोही क्रिया है और आगमन आरोही क्रिया।” बेकन के इस मत की व्याख्या करें।
उत्तर:
बेकन ने निगमन को ‘उतरनेवाली क्रिया’ (descending process) और आगमन को ‘चढ़नेवाली क्रिया’ (ascending process) कहा है। निगमन में सामान्य से विशेष निष्कर्ष निकालते हैं। इसमें हम अधिक व्यापकता से कम व्यापकता की ओर आते हैं। जैसे, सभी मनुष्यों को मरणशील पाकर राम को मनुष्य होने के नाते मरणशील बताते हैं। इसीलिए निगमन को उतरने की क्रिया कहा जाता है। आगमन में विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के द्वारा सामान्य नियम की स्थापना की जाती है।

इसमें कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर (from less general to more general) जाते हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत पर चढ़कर वहाँ से हमें नीचे का सामान्य रूप दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार आगमन के निष्कर्ष पर पहुँचते ही हमें एक सामान्य नियम दृष्टिगोचर होता है। ज्यों-ज्यों पर्वत से नीचे उतरने लगते हैं, त्यों-त्यों विशेष पर नजर पड़ने लगती है। इसलिए निगमन को उतरनेवाली क्रिया और आगमन को चढ़नेवाली क्रिया कहा गया है।

प्रश्न 4.
“आगमन और निगमन एक-दूसरे में समाविष्ट हैं।” विवेचना करें।
उत्तर:
जेवन्स के अनुसार आगमन विधि का अंत सत्यापन या जाँच में होता है। इसीलिए, ये निगमन को आगमन का पूर्ववर्ती मानते हैं। इसके विपरीत, मिल के अनुसार आगमनिक खोज में सामान्यीकरण अंतिम सोपान है और इसके लिए परीक्षा या जाँच की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी कारण इन्होंने आगमन को निगमन का पूर्ववर्ती कहा है। निगमन और आगमन में वस्तुतः न तो कोई पूर्ववर्ती है और न कोई अनुवर्ती। दोनों में परस्पर विरोध का संबंध नहीं है। दोनों परस्पर पूरक हैं। इनके बीच कोई विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती। दोनों में परस्पर सहयोग अपेक्षित है। इसलिए, यह कहा गया है कि “दोनों एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं।” (Both run into each other)

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प्रश्न 5.
निगमन और आगमन का भेद सिद्धान्त का नहीं बल्कि आरंभ बिन्दु का है। इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
किसी भी विषय का अध्ययन दो तरीके से किया जा सकता है – विश्लेषणात्मक एवं संश्लेषणात्मक तरीके से। निगमन में हम विश्लेषणात्मक विधि को अपनाते हैं और आगमन में संश्लेषणात्मक विधि का सहारा लेते हैं। आगमन में विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य वाक्य की स्थापना करते हैं, जो सत्यापित होने के बाद सामान्य नियम बन जाते हैं। निगमन में सामान्य नियम का विश्लेषण कर उसे विशेष उदाहरणों पर लागू किया जाता है। दोनों विधियों के संयोग एवं सहयोग से ही पूर्ण तत्व का ज्ञान होता है इसलिए यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि आगमन और निगमन दोनों का लक्ष्य एक है, परंतु दोनों के आरंभ बिन्दु में भिन्नता है।

प्रश्न 6.
फाउलर किस प्रकार आगमन और निगमन में भेद करते हैं?
उत्तर:
फाउलर ने आगमन और निगमन में भेद इस आधार पर किया है कि आगमन में हम कार्य से कारण की ओर जाते हैं और निगमन में कारण से कार्य की ओर। आगमन में घटनाविशेष का निरीक्षण करके इसका कारण बताते हैं। इसीलिए आगमन में कार्य से कारण की ओर जाने की बात कही गई है। निगमन में सामान्य नियम यानी कारण से विशेष (कार्य) निष्कर्ष प्राप्त करते हैं। इसलिए निगमन में कारण से कार्य की ओर जाने की बात कही गई है। फाउलर के मत की आलोचना-फाउलर का कहना सही नहीं है। आगमन में केवल कार्य से कारण का पता नहीं लगाया जाता। आगमन में हम दोनों तरफ बढ़ सकते हैं। कार्य ज्ञात रहने पर उसके कारण का पता लगाया जा सकता है और कारण ज्ञात रहने पर आगमन के द्वारा कार्य का भी पता लगाया जा सकता है। अतः, यह कहना भूल है कि आगमन द्वारा केवल कार्य से कारण का पता लगाया जाता है।

प्रश्न 7.
आगमन और निगमन के संबंध में बक्ल के मत की विवेचना करें।
उत्तर:
बक्ल के अनुसार हम आगमन में विशेष तथ्यों से नियमों पर (from facts to laws) जाते हैं और निगमन में नियमों से विशेष तथ्यों पर (from laws to facts) जाते हैं। इसी को दूसरे शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है आगमन में वस्तुविशेष (facts) से विचार (ideas) की ओर जाते हैं और निगमन में विचार से वस्तुविशेष का अनुमान लगाया जाता हैं आगमन द्वारा स्थापित नियम सैद्धान्तिक होते हैं और इनका प्रत्यक्ष घटनाविशेषों के द्वारा होता है। किन्तु, हमें इससे यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि आगमन के निष्कर्ष केवल सैद्धांतिक या मानसिक होते हैं, यथार्थ नहीं। आगमन के निष्कर्ष यथार्थ होते हैं, क्योंकि इनमें वास्तविक सत्यता (material truth) पाई जाती है। निगमन में भी सैद्धांतिक या मानसिक तत्त्व पाए जाते हैं, जिस प्रकार आगमन में यथार्थता के तत्त्व रहते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 8.
आगमन तर्कशास्त्र में ‘आगमनात्मक छलांग’ का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
आगमन तर्कशास्त्र में आगमनात्मक छलांग का बहुत अधिक महत्व है। आगमनात्मक छलांग (inductive leap) में हम ज्ञात से अज्ञात की ओर अथवा कुछ से सब की ओर पहुँचते हैं और यथार्थ वाक्यों की स्थापना करते हैं। आगमनात्मक छलांग के द्वारा ही हम कुछ ही मनुष्यों को मरते देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं। यदि आगमनात्मक छलांग नहीं लगाई जाए तो यथार्थ व्यापक वाक्यों की स्थापना नहीं हो पाएगी।

‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ में मनुष्य जाति के कुछ ही उदाहरणों के आधार पर संपूर्ण मनुष्य जाति के संबंध में जो निष्कर्ष निकाला गया है वह आगमनात्मक छलांग द्वारा ही संभव है। यद्यपि इस छलांग में जोखिम की संभावना रहती है तथापि तर्कशास्त्रियों ने इसे आगमन का प्राण (Essence of Induction) कहा है। जब आगमनात्मक छलांग का निष्कर्ष प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम द्वारा सत्यापित हो जाता है तो कोई भी खतरा नहीं रह जाता। आगमन तर्कशास्त्र में आगमनात्मक छलांग का महत्व मुख्य और सार रूप से इसलिए है कि इसके कारण कुछ निरीक्षित उदाहरणों के आधार पर अनिरीक्षित उदाहरणों के संबंध में सभी सामान्य निष्कर्ष निकल जाता है जो वर्तमान के लिए ही नहीं बल्कि भूत और भविष्य के लिए भी सत्य होता है।

प्रश्न 9.
आगमन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
आगमन का मुख्य उद्देश्य है नए सत्य की खोज करना अर्थात् ज्ञात के आधार पर अज्ञात के संबंध में अथवा ‘कुछ’ के आधार पर ‘सब’ के संबंध में नया ज्ञान प्राप्त करना। संसार में तरह-तरह की वस्तुएँ हैं-ये सभी वस्तुएँ एक-दूसरे से असंबंधित प्रतीत होती हैं, परन्तु वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। सभी वस्तुएँ नियमित हैं। इन वस्तुओं के अपने-अपने नियम हैं। मनुष्य जगत्, वनस्पति जगत्, पशुजगत्, सभी के अपने-अपने निश्चित नियम हैं जिनके द्वारा ये संचालित होते हैं। आगमन का उद्देश्य है वैसे निष्कर्ष-वाक्य को सत्यापित करना जो प्रकृति-समरूपता नियम के पहल कुलतः ज्ञान एवं इसमें सतत् वान इसके अंतर्गत साथ-साथ कारण-कार्य नियम पर भी आधारित होता हो अथवा जिनका सामान्यीकरण इन दोनों नियमों के आधार होता हो।

संसार में प्रत्येक वस्तु की जाति या वर्ग में एक सामंजस्य है, एक निश्चित व्यवस्था है – आगमन का मुख्य उद्देश्य है इसी सामंजस्य और निश्चित व्यवस्था के नियमों की खोज करना तथा उनके आधार पर निष्कर्ष वाक्यों को प्रमाणित करना। आगमन अपने इसी मुख्य उद्देश्य के द्वारा एक तरफ सभी हंसों के (भविष्य में) उजाले होने का संभाव्य बताता है वहीं दूसरी तरफ सभी मनुष्यों के (भविष्य में) मरणशील होने को सत्यापित करता है। आगमन का उद्देश्य है तरह-तरह के यथार्थ सामान्य वाक्यों की स्थापना करना और अंततः कारण-कार्य के आधार पर उनकी त्रैकालिक सत्यता को प्रमाणित करना।

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प्रश्न 10.
विज्ञान क्या है? अथवा, विज्ञान (Science) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हिन्दी के ‘विज्ञान’ शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर ‘Science’ मूल शब्द लैटिन भाषा का ‘Scientia’ है जिसका अर्थ ज्ञान यानि Knowledge होता है। इस प्रकार, विज्ञान ज्ञान से संवद्ध है। इसलिए पद्धतिशास्त्री गुडे एवं हाट ने विज्ञान को एक ‘व्यवस्थित ज्ञान’ के रूप में परिभाषित किया है। विज्ञान के अर्थ के संबंध में दो प्रकार की वैचारिक धारणाएँ हैं। वे हैं स्थिर विचार एवं गत्यात्मक विचार। स्थिर विचार के अनुसार विज्ञान एक ऐसी क्रिया है जिससे विश्व की क्रमबद्ध सूचना प्राप्त होती है।

इस दृष्टि से विज्ञान एक व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ज्ञान है। गत्यात्मक विचार (Dynamic View) के अनुसार, विज्ञान एक क्रिया है, एक पद्धति है, जो वैज्ञानिकों द्वारा संपादित की जाती है। इसके अंतर्गत न केवल ज्ञान की वर्तमान स्थिति पर बल दिया गया है, बल्कि इसमें सतत् वृद्धि एवं निरंतरता पर जोर दिया गया है। मूलतः ज्ञान एवं वैज्ञानिक गतिविधि, जिसके आधार पर ज्ञान का संचय होता है, विज्ञान के पहलू हैं। विज्ञान ज्ञान का संचय भी है और एक निश्चित विधि या पद्धति भी है। ये दोनों पक्ष अंतः सम्बन्धित हैं। विज्ञान का संबंध ऐसे ज्ञान से है, जिसका संचय व्यवस्थित, नियंत्रित एवं आनुभविक ढंग से किया जाता है। वस्तुनिष्ठता, विश्वसनीयता एवं आनुभाविकता विज्ञान की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 11.
यथार्थ वाक्य से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जिस व्यापक अथवा सामान्य वाक्य (general proposition) में विधेय (Predi cate) उद्देश्य (Subject) पद की गुणवाचकता (connotation) को प्रकट नहीं करता है बल्कि उद्देश्य के संबंध में नया ज्ञान देता है, उसे यथार्थ वाक्य कहते हैं। जैसे-‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक यथार्थ वाक्य है, क्योंकि इसमें विधेय’ (मरणशीलता) अपने ‘उद्देश्य’ (मनुष्य) के संबंध में नया ज्ञान देता है। दूसरी तरफ यदि हम यह कहें कि ‘सभी मनुष्य विवेकशील होते हैं तो यह यथार्थ वाक्य नहीं है, क्योंकि इसमें विवेकशीलता’ ‘मनुष्य’ पद के संबंध में कोई नया ज्ञान नहीं देता है।

‘विवेकशीलता’ तो ‘मनुष्य पद में ही निहित है, क्योंकि ‘मनुष्य’ पद का सार गुण ‘विवेकशीलता’ है, जिसे मनुष्य पद की गुणवाचकता (connotation) कहते हैं। चूँकि उपर्युक्त वाक्य (सभी मनुष्य मरणशील हैं) में ‘मरणशीलता’ ‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता को व्यक्त न कर इसके संबंध में नया ज्ञान देता है, इसलिए यह यथार्थ वाक्य है।

‘सभी मनुष्य विवेकशील होते हैं। एक शाब्दिक वाक्य है, क्योंकि ‘विवेकशीलता’ मनुष्य के संबंध में कोई नया ज्ञान नहीं है। शाब्दिक वाक्य की स्थापना आगमन नहीं करता बल्कि यह ऐसे वाक्य की स्थापना करता है जिसमें विधेय अपने उद्देश्य के संबंध में नया ज्ञान देता है और जिसे यथार्थ वाक्य कहते हैं। जिस अनुमान से ज्ञान की वृद्धि होती है उसे आगमनात्मक अनुमान कहते हैं और इसीलिए यथार्थ वाक्य की स्थापना आगमनात्मक अनुमान द्वारा होती है।

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प्रश्न 12.
कारण-कार्य-नियम किस प्रकार वैज्ञानिक आगमन का मुख्य आधार है?
उत्तर:
कारण-कार्य-नियम वैज्ञानिक आगमन का मुख्य आधार इसलिए है क्योंकि आगमन का निष्कर्ष मुख्य रूप से कारण-कार्य-नियम द्वारा ही सत्यापित होता है। सभी आगमनों में वैज्ञानिक आगमन को सबसे अधिक सत्य इसलिए माना गया है क्योंकि इसका सामान्य वाक्य कारण-कार्य-नियम पर आधारित होता है। मनुष्य और मरणशीलता में कारण-कार्य का संबंध है; क्योंकि ‘मनुष्य’ होना ही ‘मरणशीलता’ का कारण है।

यदि मनुष्य होना मरणशीलता का कारण है तो यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यदि भविष्य में भी मनुष्य रहेगा तो वह मरणशील होगा। वैज्ञानिक आगमन का सामान्य वाक्य ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ जब प्रकृति-समरूपता नियम के द्वारा सत्यापित होता है, तब भी यह अवैज्ञानिक ही रह जाता है क्योंकि तबतक निष्कर्ष की सत्यता संभाव्य रहती है।’ परंतु, जब इसका सामान्य वाक्य कारण-कार्य नियम द्वारा सत्यापित हो जाता है, कि मनुष्य होना ही मरणशीलता का कारण है तो यह पूर्ण वैज्ञानिक हो जाता है। इस प्रकार कारण-कार्य-नियम वैज्ञानिक आगमन की मुख्य आधार है।

प्रश्न 13.
अव्याघातक अनुभव क्या है?
उत्तर:
आज तक जो बात सत्य होती आयी है और उसका कोई भी विरोधी उदाहरण नहीं मिला है तो विरोधी उदाहरण का नहीं मिलन अव्याघातक अनुभव (uncontradicted experi ence) कहलाता है जिसके सहारे अनुमान कर लिया जाता है कि यह बात भविष्य में भी सत्य रहेगी। सरल परिगणनात्मक आगमन अथवा अवैज्ञानिक आगमन का निष्कर्ष अव्याघातक अनुभव ही आधारित होता है। अव्याघातक अनुभव पर आधारित वाक्य प्रकृति-समरूपता नियम द्वारा तो सत्य सिद्ध होते हैं, परंतु कारण-कार्य नियम के अभाव में कारण संभाव्य साबित होते हैं अर्थात् निष्कर्ष के संबंध में निश्चितता नहीं रहती कि यह भविष्य में भी सत्य रहेगा या नहीं।

जैसे – सभी काग काले होते हैं अव्याघातक अनुभव पर आधारित निष्कर्ष है। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार यह संभावना रहती है कि भविष्य में सभी काग काले ही होंगे, परंतु इस निष्कर्ष के साथ कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण यह सत्यापित नहीं हो पाता कि भविष्य में काग अवश्य ही काले ही दिखाई पड़ेंगे अथवा होंगे। अतः, अव्याघातक अनुभव पर आधारित यथार्थ सामान्य वाक्य का निष्कर्ष भविष्य में सत्य भी हो सकता है और असत्य भी। अव्याधातक अनुभव पर आधारित निष्कर्ष की सत्य में निश्चितता नहीं रहने के कारण ही इसे अवैज्ञानिक माना गया है। क्योंकि वैज्ञानिक निष्कर्ष की सत्यता में निश्चितता रहती है।

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प्रश्न 14.
मिल के अनुसार आगमन निगमन के पहले आता है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
मिल की यह सुदृढ़ मान्यता है कि आगमन निगमन के पहले आता है। मिल साहब का मत जेवन्स के मत से भिन्न है। इनके अनुसार आगमनिक खोज में सामान्यीकरण का महत्त्व बहुत अधिक है। इसी कारण ये आगमन को निगमन के पहले रखते हैं। न्याय (syllogism) निगमन का मुख्य रूप है और इसके लिए आधार के रूप में कम-से-कम एक पूर्णव्यापी (universal) वाक्य की आवश्यकता होती है और इस वाक्य की स्थापना आगमन द्वारा ही होती है। इस प्रकार आगमन ही निगमन को आधार प्रदान करता है। इसलिए यह कहना उचित है कि आगमन निगमन के पहले आता है (Induction is prior to Deduction)।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“तर्कशास्त्र सभी विज्ञानों का विज्ञान है।” इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
डन्स स्कॉटस (Dunsscotus) ने तर्कशास्त्र को सभी विज्ञानों का विज्ञान कहा है (Logic is the science of all sciences) यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है। इसका कारण है कि सभी विज्ञानों की आधारभूत मौलिक मान्यताओं का अध्ययन तर्कशास्त्र में किया जाता है। तर्कशास्त्र की विषय-वस्तु की सहायता से ही विज्ञान को पद्धति को और अधिक सुसंगत बनाया जाता है। इसीलिए विज्ञान को विज्ञान कहा जाता है। अतः प्रत्येक विज्ञान किसी-न-किसी रूप में तर्कशास्त्र पर निर्भर करता है। अतः तर्कशास्त्र विज्ञानों का विज्ञान है। तर्कशास्त्र को सभी विज्ञानों की सामग्री के रूप में भी स्वीकार किया गया है। प्रत्येक विज्ञान को चाहे वह भौतिक हो या प्राकृतिक तर्कशास्त्र की विषय वस्तु की आवश्यकता होती है। इसी विषय वस्तु को आधार मान कर विज्ञान अपना निष्कर्ष निष्पादित करता है।

विज्ञान दो प्रकार के होते हैं। वे है-यथार्थपरक तथा आदर्शपरक। जब किसी पदार्थ को देखकर उसके सम्बन्ध में हू-ब-हू चित्रण प्रस्तुत किया जाता है तब वह यथार्थपरक कहलाता है। इसका सम्बन्ध वस्तु जिस रूप में होती है, उसी से है। यहाँ पर वास्तविक वर्णन होता है, इसलिए यथार्थपरक विज्ञान को है “है (is) विज्ञान” भी कहा जाता है। जैसे-‘कमल’ लाल है’ यानि कमल को हमने जिस रूप में देखा उसे उसी रूप में चित्रित और वर्णित किया। यथार्थपरक विज्ञान में घटनाओं का अध्ययन उसी रूप में किया जाता है जिस रूप में वे घटती हैं। इसे वस्तुपरक विज्ञान भावात्मक विज्ञान या वर्णनात्मक विज्ञान भी कहा जाता है।

दूसरी ओर आदर्शपरक विज्ञान का सम्बन्ध चाहिए से होता है, क्योंकि यह विज्ञान वस्तुओं का स्वरूप “कैसा होना चाहिए” का अध्ययन करता है। यह विज्ञान उस आदर्श को बताता है जिसके अनुरूप वस्तुओं को होना चाहिए। चूँकि इस विज्ञान का संबंध चाहिए (Cought) से है, इसीलिए इसे ‘चाहिए विज्ञान’ भी कहा जाता है। जैसे-‘हमें सत्य बोलना चाहिए’। यह आदर्श का निरूपन करता है। यह विज्ञान हमें बताता है कि क्या होना चाहिए।

तर्कशास्त्र भी वस्तुतः आदर्शपरक विज्ञान है। यह बताता है कि अनुमान किस प्रकार का होना चाहिए जिससे कि वह सत्य, वास्तविक और यथार्थ हो। वस्तुतः तर्कशास्त्र विज्ञान तथा कला दोनों ही है। विज्ञान और कला में किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है। विज्ञान का संबंध जानने तथा कला का सम्बन्ध करने से है। विज्ञान पदार्थों की वास्तविकता से तथा उसके सुव्यवस्थित ज्ञान से संबंधित है तथा कला इस ज्ञान के द्वारा किसी उद्देश्य की प्राप्ति करती है।

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प्रश्न 2.
सरल परिगणनात्मक आगमन क्यों ‘अपूर्ण आगमन’ कहलाता है? इसे वैज्ञानिक आगमन क्यों नहीं समझा जाता है?
उत्तर:
पूर्ण आगमन के विरोधी अथवा विपरीत अर्थ के रूप में सरल परिगणनात्मक आगमन अपूर्ण आगमन भी कहलाता हैं यह अपूर्ण आगमन इसलिए कहलाता है, क्योंकि इसमें कारण-कार्य सम्बन्ध का अभाव होता है। कारण-कार्य नियम के संबंध नहीं रहने के कारण सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष निश्चित नहीं होता। ‘सभी काग काले होते हैं’ में यह प्रमाणित होता है कि अबतक जितने भी कौए दिखाई पड़े हैं, सभी काले ही दिखाई पड़े हैं।

प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार भविष्य में भी सभी कौए काले ही दृष्टिगोचर होने चाहिए, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन चूँकि कारण-कार्य नियम पर आधारित नहीं होता, इसलिए भविष्य में सभी कौओं के काले होने की केवल संभावना ही होती है, निश्चितता नहीं। अपूर्ण आगमन वह आगमनात्मक आगमन होता है। जिसमें कुछ ही विशेष उदाहरणों की जाँच के बाद पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना कर दी जाती है। इस तरह के निष्कर्ष अपूर्ण इसलिए कहलाते हैं क्योंकि ये कारण-कार्य सम्बन्ध के ज्ञान पर आधारित नहीं होते। सरल परिगणनात्मक आगमन का तर्क अथवा निष्कर्ष इसी प्रकार का होता हैं।

इसी प्रकार हम कह सकते हैं कि सरल परिगणनात्मक आगमन अपूर्ण आगमन इसलिए होता है कि इसका सामान्यीकरण कारण-कार्य सम्बन्ध पर आधारित न होकर अपूर्ण उदाहरणों की गणना पर निर्भर करता है। इसमें पूर्ण आगमन की तरह सभी उदाहरणों की गणना से सामान्यीकरण नहीं किया जाता। चूंकि इसमें कुछ ही उदाहरणों की गणना पर सामान्य यथार्थ वाक्य की स्थापना कर दी जाती है, इसलिए इसे अपूर्ण आगमन कहा जाता है।

अत: सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष ‘सभी हंस सफेद होते हैं’ अपूर्ण आगमन है, क्योंकि वस्तुतः इसमें संसार के सभी हंसों की गणना नहीं की गई है बल्कि कुछ ही हंसों को सफेद देखकर यह निष्कर्ष निकाल लिया गया है कि ‘सभी हंस सफेद होते हैं’ पूर्ण आगमन में पूर्ण उदाहरणों की गणना की जाती है, जैसे-‘सभी विद्यार्थी उपस्थित हैं’ इस सामान्य वाक्य में सभी विद्यार्थियों की गणना की गयी है। अतः सरल परिगणनात्मक आगमन को अपूर्ण आगमन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें पूर्ण आगमन की भाँति सामान्य वाक्य स्थापित करने में सभी उदाहरणों की गणना नहीं की जाती। सरल परिगणनात्मक आगमन को हम वैज्ञानिक आगमन इसलिए नहीं समझते, क्योंकि –

1. यह कारण-कार्य संबंध पर आधारित नहीं है (It is not based on a casual connection):
वैज्ञानिक आगमन कारण-कार्य सम्बन्ध पर आधारित होता है-यह कारण-कार्य नियम के आधार पर किसी घटना की व्याख्या करता है कि यदि कार्य (effect) है तो उसका कोई-न-कोई कारण अवश्य होगा। जैसे – ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ वैज्ञानिक आगमन का सामान्य यथार्थ वाक्य है-इसका विरोधी उदाहरण नहीं मिल सकता क्योंकि मनुष्यता ही मरणशीलता का कारण है अर्थात् मनुष्य जन्म लेगा तो मरेगा अवश्य ही। परन्तु, सरल परिगणनात्मक आगमन कारण-कार्य नियम पर आधारित नहीं होता।

केवल कारण-कार्य नियम के लागू नहीं होने के कारण ही इसका निष्कर्ष वैज्ञानिक नहीं होता। जैसे-“इसके निष्कर्ष ‘सभी काग काले होते हैं’ में ‘काग’ और ‘कालापन’ के बीच कारण-कार्य का सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ‘काग’ का होना ‘कालेपन’ का कारण नहीं है। वैज्ञानिक आगमन में कारण-कार्य का नियम लागू होने के कारण हम निश्चिततापूर्वक कह सकते हैं कि मनुष्य मरता है इसलिए क्योंकि वह जन्म लेता है अर्थात् ‘मृत्यु’ इसलिए है क्योंकि ‘मनुष्य’ है और भविष्य में भी यदि ‘मनुष्य’ रहेंगे तो ‘मृत्यु’ अवश्य ही रहेगी।”

लेकिन सरल परिगणनात्मक आगमन में कारण-कार्य का नियम लागू नहीं होने के कारण हम यह नहीं कह सकते कि काग का होना ही कालेपन का कारण है (अर्थात् काला इसलिए है कि क्योंकि काग है)। यह अवैज्ञानिक आगमन इसलिए है कि क्योंकि इसमें निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि भविष्य में यदि कागों का निरीक्षण किया जाएगा तो वे अवश्य ही काले पाये जाएँगे। अतः कारण-कार्य सम्बन्ध पर आधारित नहीं रहने के कारण सरल परिगणनात्मक आगमन का सामान्य यथार्थ वाक्य वैज्ञानिक सत्यापित नहीं हो पाता, यह अवैज्ञानिक ही रह जाता है।

2. यह वैज्ञानिक आगमन की निश्चितता तक भी नहीं पहुंच सकता (It can never reach the certainty of Scientific Induction):
सरल परिगणनात्मक आगमन को वैज्ञानिक आगमन इसलिए नहीं समझा जाता, क्योंकि इसका निष्कर्ष निश्चित न होकर संभाव्य (prob able) होता है। कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण इसके निष्कर्ष की निश्चितता नहीं रहती और न अनिश्चितता ही अर्थात् निष्कर्ष सत्य भी प्रमाणित हो सकता है और असत्य भी। क्योंकि सरल परिगणनात्मक आगमन में हम मात्र विश्वास कर लेते हैं कि अनिरीक्षित उदाहरण निरीक्षित उदाहरणों के समान ही होंगे।

यदि भविष्य में कोई हंस काला, लाल या पीला दिखाई पड़ जाए तो सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष असत्य प्रमाणित हो जाएगा कि ‘सभी हंस सफेद होते हैं’। परन्तु, भविष्य में यदि हंस का रंग केवल सफेद ही रहे तो यह निष्कर्ष सत्य ही रहेगा। सरल परिगणनात्मक आगमन वैज्ञानिक आगमन की निश्चितता तक इसलिए भी नहीं पहुँच सकता, क्योंकि इसके निष्कर्ष की सत्यता उदाहरणों की गणना पर निर्भर करती है। अतः यह किसी भी हालत में वैज्ञानिक आगमन की निश्चितता तक नहीं पहुंच सकता।

सरल परिगणनात्मक आगमन में हम इस विश्वास पर ‘सभी काग काले होते हैं’, ‘सभी हंस सफेद होते हैं’ आदि सामान्य यथार्थ वाक्यों की स्थापना कर लेते हैं कि काग और कालेपन तथा हंस और उजलेपन में अवश्य ही कोई महत्त्वपूर्ण संबंध है। लेकिन यह संबंध भविष्य में भी रहेगा, इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि सरल परिगणनात्मक आगमन वैज्ञानिक आगमन नहीं कहलाता। यदि इसमें कभी कारण-कार्य संबंध का पता चल जाए तो इसका निष्कर्ष सत्यापित हो जाएगा और तब यह वैज्ञानिक आगमन का रूप ले लेगा। सरल परिगणनात्मक आगमन को अपूर्ण आगमन माना जाता है। जब हम निश्चित रूप से जान जाते हैं कि इसमें कारण-कार्य का संबंध नहीं है तो इसके अनुमान का उचित कारण नहीं बताया जा सकता।

सरल परिगणनात्मक आगमन में हम सन्देह में घिरे रहते हैं क्योंकि हम विश्वास के आधार पर ही निष्कर्ष निकाल लेते हैं ज्ञान के आधार पर नहीं। सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष निश्चितता और अनिश्चितता के दोराहे पर स्थित रहता है। यदि इसमें पूर्णता आ जाए अर्थात् विश्वास ज्ञान में बदल जाए तो यह वैज्ञानिक आगमन बन जाएगा नहीं तो इसकी सामान्यता और यथार्थता समाप्त हो जाएगी। पुनश्चः, सरल परिगणनात्मक आगमन चूँकि वैज्ञानिक आगमन की तरह निश्चित और सत्य निष्कर्षों की स्थापना न कर केवल स्वीकारात्मक (assertory) निष्कर्षों की ही स्थापना करता है, इसलिए इसे वैज्ञानिक आगमन नहीं कहा जा सकता।

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प्रश्न 3.
सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन के बीच के भेद और समानता का वर्णन करें। सरल परिगणनात्मक आगमन का क्या महत्त्व (मूल्य) है?
उत्तर:
निम्नलिखित वर्णन के द्वारा सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन के भेद को स्पष्ट किया जा सकता है –
वैज्ञानिक आगमन प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम पर आधारित होता है, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन केवल प्रकृति-समरूपता नियम पर आधारित होता है, उसमें कारण-कार्य नियम लागू नहीं होता। जब हम वैज्ञानिक आगमन में यह निष्कर्ष स्थापित करते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ तो इस सामान्य वाक्य में ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य संबंध होने का ज्ञान रहता है। लेकिन जब हम परिगणनात्मक आगमन में यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘सभी हंस उजले होते हैं तो इस सामान्य वाक्य में ‘हंस’ और ‘उजलेपन’ में कारण-कार्य का संबंध है या नहीं, इसका हमें निश्चित ज्ञान नहीं रहता। वैज्ञानिक आगमन में सामान्य वाक्यों की स्थापना कारण-कार्य के ज्ञान के आधार पर होती है, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्यों में इस ज्ञान को आधार नहीं बनाया जाता।

जब हम कहते हैं कि ‘सभी काग काले होते हैं तो इस सरल परिगणनात्मक आगमन में हमें यह पता नहीं रहता कि ‘काग’ कालेपन का कारण है या नहीं। ‘काग’ और ‘कालेपन’ के बीच में कारण-कार्य संबंध होने की निश्चितता नहीं रहती। यदि हमें इस बात की जानकारी हो जाए कि सरल गणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्य में कारण-कार्य का संबंध है तो यह वैज्ञानिक आगमन कहलाएगा। सरल गणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्य का सामान्यीकरण प्रकृति-समरूपता नियम की जानकारी के आधार पर होता है, परन्तु वैज्ञानिक आगमन में सामान्यीकरण कारण-कार्य नियम के आधार पर होता है। वैज्ञानिक आगमन के सामान्य वाक्यों पर प्रकृति-समरूपता नियम और कारण-कार्य नियम दोनों ही लागू होते हैं, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्यों पर केवल प्रकृति-समरूपता नियम ही लागू होता है।

सरल गणनात्मक आगमन जब पूर्णता प्राप्त करता है तब वैज्ञानिक आगमन बन जाता है। इसीलिए इसे वैज्ञानिक आगमन का आरम्भ बिन्दु कहा गया है। कारण-कार्य संबंध पर आधारित न होने के कारण सरल गणनात्मक आगमन का निष्कर्ष संभाव्य होता है, परन्तु कारण-कार्य संबंध पर आधारित रहने के कारण वैज्ञानिक आगमन का निष्कर्ष निश्चित होता है। वैज्ञानिक आगमन का निष्कर्ष सदा सत्य होता है, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन के निष्कर्ष के सत्य होने की सम्भावना रहती है, क्योंकि निरीक्षण का क्षेत्र जितना ही अधिक विस्तृत होता है, निष्कर्ष के सत्य होने की सम्भावना उतनी ही बढ़ जाती है। सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन के बीच उपर्युक्त भेद तो हैं ही, इसके अतिरिक्त इनके बीच कुछ समानताएँ भी हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. सरल परिणगनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन दोनों में ही सामान्य यथार्थ वाक्य (general proposition) की स्थापना की जाती है। जैसे-‘सभी काग काले होते हैं’ और ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ – दोनों ही सामान्य यथार्थ वाक्य हैं।

2. दोनों वास्तविक घटनाओं के निरीक्षण पर आधारित होते हैं। जैसे अब तक जितने भी काग दिखाई पड़े हैं, सभी काले ही दिखाई पड़े हैं इसलिए ‘सभी काग काले होते हैं’ वास्तविक घटना के निरीक्षण के आधार पर स्थापित हुआ है। आजतक जितने भी मनुष्य हुए हैं सभी मृत्यु को प्राप्त हुए हैं इसलिए ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ वास्तविक घटना पर आधारित सामान्य यथार्थ वाक्य है।

3. सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन दोनों में ही ‘विशेष’ से ‘सामान्य’ की ओर अथवा ‘कुछ’ से ‘सव’ की ओर आगमनात्मक छलांग (Inductive leap) लगाई जाती है। जैसे-कुछ ही कागों को काला देखकर निष्कर्ष दे दिया जाता है कि ‘सभी काग काले होते हैं’ तथा कुछ ही मनुष्यों को मरते देखकर सामान्य निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ – दोनों में आगमनात्मक छलांग द्वारा निष्कर्ष निकाला जाता है।

4. सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन दोनों में प्रकृति-समरूपता नियम लागू होता है। प्रकृति-समरूपता नियम लागू होने के कारण ही भविष्य में सभी कागों के काला होने तथा सभी मनुष्यों के मरणशील होने की सत्यता पर विश्वास कर लिया जाता है।

सरल परिगणनात्मक आगमन का महत्त्व (मूल्य) (Importance (value) of Induc tion per Simple Enumeration):
यद्यपि सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष सदा सत्य नहीं होता (अर्थात् भविष्य में निष्कर्ष के सत्य होने की केवल संभावना रहती है), तथापि आगमन तर्कशास्त्र में इसका बहुत ही महत्त्व है। व्यावहारिक जीवन में इसका प्रयोग बहुत आसानी से कर लिया जाता है और इसे सत्य मान लिया जाता है, यद्यपि तार्किक दृष्टिकोण से यह सत्य भी हो सकता है और नहीं भी। आगमन तर्कशास्त्र में कई उप-नियमों की स्थापना करने के लिए इसका सहारा लेना पड़ा है। तर्कशास्त्रियों ने सरल परिगणनात्मक आगमन को ‘वैज्ञानिक आगमन तक पहुँचने की आरोहण-शिला’ कहा है।

सरल परिगणनात्मक आगमन को कुछ विद्वानों ने स्वीकारात्मक निष्कर्ष (Assertory Conclusion) कहा है। किसी समूह के सभी उदाहरणों का निरीक्षण करना संभव नहीं है, इसलिए हम दैनिक जीवन में सरल परिगणनात्मक आगमन द्वारा कुछ ही उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकाल लेते हैं। इस तरह निष्कर्ष निकालने में समय की बचत होती है। चूँकि सरल परिगणनात्मक आगमन व्यावहारिक जीवन में उपयोगी साबित होता है, इसलिए तर्कशास्त्रियों ने इसे व्यावहारिक आगमन (Popular Induc tion) भी कहा है। नवीन परिस्थितियों के संबंध में निष्कर्ष निकालने में सरल गणनात्मक आगमन का प्रयोग निष्कर्ष की सत्यता के लिए बहुत ही उपयुक्त होता है।

सरल परिगणनात्मक आगमन का महत्त्व इसलिए भी है कि यह वैज्ञानिक आगमन का आरम्भ बिन्दु है। जैसे ही इसका निष्कर्ष कारण-कार्य नियम पर आधारित हो जाता है वैसे ही इसका निष्कर्ष निश्चित हो जाता है और यह वैज्ञानिक आगमन का रूप ले लेता है। सरल परिगणनात्मक आगमन यद्यपि कारण-कार्य संबंध पर आधारित नहीं होता तथापि यह कारण-कार्य संबंध की ओर संकेत करता है। इसका मुख्य महत्त्व कारण-कार्य संबंध की तरफ संकेत करने में ही है। इस संबंध में Grumley (ग्रमली) का निम्नलिखित कथन उल्लेखनीय है –

“The chief value of the enumerative method lies in its power to suggest casual relation. The condition that two phenomenon (subject and predicate)
are always or very frequently connected seems sufficient ground for enter taining the hypothesis that they are casually related.” “इस गणनात्मक विधि का मुख्य महत्त्व कारण-कार्य संबंध को प्रस्तावित करने की सामर्थ्य में है। दो वस्तुओं (उद्देश्य और विधेय) के हमेशा अथवा प्रायः संबंधित रहने की स्थिति इस अनुमान को स्थापित करने के पर्याप्त आधार जान पड़ते हैं कि वे कारण-कार्य द्वारा संबंधित हैं।”

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प्रश्न 4.
सरल परिगणनात्मक आगमन का क्या तात्पर्य है? इसके मुख्य लक्षणों का वर्णन करें। अथवा, अवैज्ञानिक आगमन को परिभाषित करते हुए इसकी विशिष्टताओं की विवेचना करें।
उत्तर:
सरल परिगणनात्मक आगमन हमारे अव्याघातक अनुभव पर आधारित होता है। अव्याघातक अनुभव (uncontradicted experience) वह अनुभव है जिसमें यह निरीक्षण किया जाता है कि कुछ वस्तुएँ अथवा घटनाएँ ऐसी हैं जिनका विरोधी उदाहरण नहीं मिलता है। सरल परिगणनात्मक आगमन में प्रकृति-समरूपता नियम (The Law of the uniformity of Nature) के आधार पर व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना की जाती है। सरल गणनात्मक आगमन को ‘मिल’ (Mill) ने इस प्रकार परिभाषित किया है –

“इसका संबंध उन सभी वाक्यों की व्यापक सच्चाइयों की प्रकृति का आरोपण करने में है जो उस प्रत्येक उदाहरण के लिए सत्य होती है, जिनके बारे में हम जान पाते हैं।” (“It consists in ascribing the character of general truths to all proposi tions which are true in every instance that we happen to know of”) बी. एन. राय के अनुसार-“सरल परिगणनात्मक आगमन वह है जिसमें विना कारण-कार्य संबंध की व्याख्या का प्रयास किए ही मात्र एक समान अथवा अव्याघातक अनुभव के आधार पर व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना की जाती है।” (“Induction per simple Enumeration is the establishment of a general read proposition on the ground of mere uni form or uncontradicted experience without any attempt at explaining a casual connection”)

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सरल गणनात्मक आगमन में निरीक्षित घटनाओं को एक ही तरह का पाकर तथा उसका विरोधी कभी कुछ नहीं पाकर व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना की जाती है। सरल गणनात्मक आगमन में विपरीत अथवा विरोध का अनुभव नहीं होता। जब हम हंस को देखते हैं तो उसे सफेद पाते हैं तथा इसके विपरीत अथवा विरोधी रंग का कोई हंस दिखाई नहीं पड़ता। इस प्रकार, हम आजतक निरीक्षित हंसों के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि ‘सभी हंस उजले होते हैं। काग को बराबर काला देखकर तथा उसे इसके विरोधी रंग का कभी न देखकर ही सरल गणनात्मक आगमन में व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना कर दी जाती है कि सभी काग काले होते हैं।

परन्तु, जब हम सरल गणनात्मक आगमन के निष्कर्ष की सत्यता को सत्यापित करना चाहते हैं तो यह प्रकृति-समरूपता नियम के आधार पर प्रमाणित हो जाता है लेकिन कारण-कार्य सिद्धान्त द्वारा प्रमाणित नहीं होता। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार यह प्रमाणित होता है कि भूतकाल में सभी हंस सफेद तथा सभी काग काले रहे थे, वर्तमान में हैं तथा भविष्य में रहेंगे। लेकिन कारण-कार्य सिद्धान्त के अनुसार इस निष्कर्ष की त्रैकालिक सत्यता सत्यापित नहीं होती।

चूँकि सरल परिगणनात्मक आगमन के निष्कर्ष पर कारण-कार्य नियम लागू नहीं होता अर्थात् ‘उजलापन’ और ‘हंस’ अथवा ‘कालापन’ और ‘काग’ के बीच कारण-कार्य संबंध स्थापित नहीं होता, इसलिए यह निश्चित रूप से सत्य नहीं माना जा सकता कि भविष्य में सभी हंस उजले ही होंगे अथवा सभी काग काले ही रहेंगे या लाखों वर्ष पहले सभी हंस उजले ही होंगे अथवा सभी काग काले ही रहेंगे या लाखों वर्ष पहले सभी हंस उजले अथवा सभी काग काले ही थे। आगमनात्मक निष्कर्ष तभी त्रैकालिक सत्य माना जाता है, जब वह प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष भविष्य में सत्य रहेगा या नहीं इसके संबंध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है अर्थात् कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण सरल गणनात्मक आगमन का निष्कर्ष संभाव्य रह जाता है, निश्चित नहीं रहता।

वैज्ञानिक आगमन की तरह इसमें, निष्कर्ष की निश्चितत नहीं रहने के कारण ही इसे अवैज्ञानिक आगमन कहा गया है। इसे सरल परिगणनात्मक आगमन इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी विधि उदाहरणों की गणना पर आधारित होती है। ऐसे आगमन के. निष्कर्ष की सत्यता उदाहरणों की संख्या पर निर्भर करती है। जैसे-जितनी ही अधिक संख्या में हंसों को सफेद या कागों को काला देखेंगे उतना ही अधिक उपर्युक्त निष्कर्षों की सम्भाव्यता बढ़ जाएगी। सरल परिगणनात्मक आगमन में अनुमान करने की निम्नलिखित विधि अपनायी जाती है –

अमुक सदा सत्य पाया गया है
इसका एक भी विरोधी उदाहरण नहीं मिला है
∴ अमुक सदा सत्य है
∴ [Such and such has always been found true,
No instance to the contrary has been met with
∴ Such and such is always true]

सरल परिगणनात्मक आगमन अथवा अवैज्ञानिक आगमन के मुख्य लक्षण (Chief characteristics of Induction per simple Enumeration or Unscientific Induction):

सरल परिगणनात्मक़ आगमन की उपर्युक्त विवेचना के आधार पर इसके निम्नलिखित लक्षण परिलक्षित होते हैं –

1. यह सामान्य वाक्य की स्थापना करता है (It establishes a general proposition):
वैज्ञानिक आगमन की तरह सरल परिगणनात्मक आगमन भी सामान्य वाक्य की स्थापना करता है। कुछ कागों को काला देखकर हम सामान्य वाक्य की स्थापना कर देते हैं कि ‘सभी काग काले होते हैं’। ‘सभी काग काले होते हैं’ एक सामान्य वाक्य (general proposition) इसलिए है, क्योंकि इसमें उद्देश्य पद को संपूर्ण वस्तुवाचकता में काला होने का अनुमान किया गया है। इसमें उद्देश्य पद ‘काग’ है और संपूर्ण वस्तुवाचकता सभी ‘काग’ हैं।

2. यह यथार्थ वाक्य की स्थापना करता है (Itestablishes a real proposition):
सरल परिगणनात्मक आगमन वैज्ञानिक आगमन की तरह की यथार्थ वाक्य की स्थापना करता है। ‘सभी काग काले होते हैं’ एक यथार्थ वाक्य भी है। यह यथार्थ वाक्य इसलिए है, क्योंकि इसमें विधेय ‘काला होना’ उद्देश्य पद ‘काग’ की गुणवाचकता को प्रकट नहीं करता। सरल परिगणनात्मक आगमन अव्याघाती अनुभव पर आधारित होता है, इसलिए इसमें जिस सामान्य वाक्य की स्थापना होती है वह यथार्थ या वास्तविक होता है। इस प्रकार यह वास्तविक वस्तुओं का निरीक्षण करता है, और यथार्थ वाक्य (real proposition) की स्थापना करता है। ‘सभी काग काले होते हैं’ एक यथार्थ वाक्य है, क्योंकि वास्तविक रूप से सभी काग काले होते हैं।

3. इसमें आगमनात्मक छलांग होती है (In it, there is an inductive leap):
वैज्ञानिक आगमन की तरह सरल गणनात्मक आगमन में भी ज्ञात से अज्ञात की ओर छलांग लगाई जाती है। जैसे-हमें कुछ कागों का काला होना ही ज्ञात होता है और इसी आधार पर हम अज्ञात की ओर छलांग लगाकर निष्कर्ष स्थापित कर देते हैं कि ‘सभी काग काले होते हैं।

4. यह उदाहरणों की गणना पर आधारित होता है। (It is based on the enumeration of instrances):
सरल परिगणनात्मक आगमन में वस्तुओं के गुणधर्म की जाँच नहीं की जाती बल्कि इसमें उदाहरणों की गणना की जाती है। निरीक्षित उदाहरणों की संख्या जितनी ही अधिक होगी सरल परिगणनात्मक आगमन का सामान्य यथार्थ वाक्य उतना ही सत्य के निकट होगा। हम जितनी ही अधिक संख्या में कागों को काला पाएँगे उतना ही निश्चिय के साथ कह सकेंगे कि सभी काग काले होते हैं।

5. यह प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त पर आधारित है (It is based on the principles of the uniformity of Nature):
प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त यह है कि ‘सामान्य स्थितियों में समान कारण समान कार्य उत्पन्न करता है’ (Under similar conditions the same cause produces the same effect’)। सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त पर आधारित होता है। इसमें हम ‘सभी काग काले होते हैं’ की सत्यता की जाँच प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त के द्वारा करते हैं तो इसकी सत्यता प्रमाणित हो जाती है कि यदि आजतक काग काले पाये गये हैं तो भविष्य में भी काग काले ही पाये जाएँगे, क्योंकि प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त के अनुसार प्रकृति का नियम सभी कालों में एक समान रहता है अर्थात् समान स्थितियों में समान कारण समान कार्य उत्पन्न करता है।

6. यह अव्याघातक अनुभव पर आधारित होता है (It is based on uncontra dicted experience):
आजतक जो बात सत्य होती आयी है तथा उसका कोई भी विरोधी उदाहरण नहीं मिला है, तो वह अव्याघातक अनुभव (uncontradicted experience) कहलाता है। सरल परिगणनात्मक अव्याघातक आगमन अनुभव पर आधारित होता है और इसी अनुभव के आधार पर सामान्य यथार्थ की स्थापना करता है। जैसे-सरल परिगणनात्मक निष्कर्ष (Induction per simple Enumerative conclustion) ‘सभी काग काले होते हैं।

इस अव्याघातक अथवा एक समान (Uniform experience) पर आधारित है कि आजतक जितने भी काग मिले हैं सभी काले रंग के पाए गए हैं और इसके विपरीत या व्याघाती रंग (उजला, पीला आदि) के नहीं पाये गये हैं। सरल परिगणनात्मक आगमन में एक ही तरह का अनुभव होने से अथवा इसके विरोधी अनुभव के अभाव के आधार पर सामान्यीकरण (generalisation) कर सामान्य यथार्थ वाक्य की स्थापना कर दी जाती है। बराबर सफेद हंस को पाकर तथा किसी दूसरे रंग के हंस को नहीं पाकर सामान्यीकरण कर दिया जाता है कि ‘सभी हंस उजले होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि सरल परिगणनात्मक आगमन अव्याघातक अनुभव पर आधारित होता है।

7. यह कारण-कार्य से संबंध नहीं रखता (It does not ascribe in the Law of Causation):
सरल परिगणनात्मक आगमन कारण-कार्य संबंध पर आधारित नहीं होता। सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष यद्यपि सामान्य यथार्थ वाक्य होता है तथापि उसमें विधेय और उद्देश्य पद के बीच कारण-कार्य संबंध स्थापित नहीं होता। उदाहरण के लिए काग काले होते हैं, सामान्य वास्तविक वाक्य में ‘काग’ और ‘काला’ के वीच कारण-कार्य का संबंध नहीं है। सरल परिगणनात्मक आगमन के सामान्य यथार्थ (वास्तविक) वाक्य उदाहरणों की गणना और अव्याघातक अनुभव पर आधारित होते हैं। कारण-कार्य नियम पर सरल परिगणनात्मक आगमन के आधारित नहीं रहने के कारण हम ऐसा नहीं कह सकते कि भविष्य में सभी काग काले ही मिलेंगे।

8. यह संभाव्य निष्कर्ष की स्थापना करता है (It establishes probable conclustion):
सरल परिगणनात्मक आगमन संभाव्य निष्कर्ष की स्थापना करता है अर्थात् इसका निष्कर्ष अनिश्चित होता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि सरल परिगणनात्मक आगमन के निष्कर्ष के सत्य होने की केवल संभावना भर रहती है। कारण-कार्य नियम पर आधारित नहीं रहने के कारण ही इसे अवैज्ञानिक आगमन कहा गया है। अवैज्ञानिक आगमन के निष्कर्ष ‘सभी हंस उजले होते हैं’ में भविष्य में सभी हंसों के उजले होने की केवल संभावना व्यक्त होती है निश्चितता नहीं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक विधि (Scientific method) से आप क्या समझते हैं? वैज्ञानिक विधि की प्रकृति को स्पष्ट करें। अथवा, वैज्ञानिक पद्धति क्या है? वैज्ञानिक पद्धति के लक्ष्यों (aims) को स्पष्ट करें। अथवा, वैज्ञानिक पद्धति के क्या कार्य (functions) हैं?
उत्तर:
वैज्ञानिक पद्धति ही किसी विषय-वस्तु को विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रमुख आधार है। यह पद्धति प्रत्येक विज्ञान में समान है। केवल तथ्य ही विज्ञान नहीं है बल्कि उन तथ्यों का व्यवस्थित संकलन, वर्गीकरण एवं विश्लेषण उन्हें विज्ञान की श्रेणी में रखता है। वस्तुतः वैज्ञानिक पद्धति विज्ञान की समस्त शाखाओं में एक होती है। चाहे वह प्राकृतिक विज्ञान हो अथवा सामाजिक विज्ञान। कार्ल पियर्सन (Karl Pearson) के अनुसार, The scientific method is one and the same in all branches.

वैज्ञानिक पद्धति एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत तथ्यों का संकलन, सत्यापन, वर्गीकरण एवं विश्लेषण किया जाता है। वैज्ञानिक पद्धति का उद्देश्य सामान्य नियमों की खोज या विवरण प्रस्तुत करना है, जिससे विषय-वस्तु को समझा जा सके। नियंत्रित रूप से पूर्वानुमान के लिए प्रयुक्त किया जा सके। स्पष्टतः वैज्ञानिक पद्धति द्वारा संकलित ज्ञान ही विज्ञान है। वैज्ञानिक पद्धति की प्रकृति या लक्ष्य (Nature or aims of Scientific methods) उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर हम वैज्ञानिक पद्धति के निम्नलिखित प्रकृति या उद्देश्य की चर्चा कर सकते हैं।

1. विवरण एवं समझ:
वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किसी भी विषय-वस्तु की व्यापक जानकारी हेतु विवरण (description) एवं समझ (understanding) देने की कोशिश की जाती है। दूसरे शब्दों में विषय-वस्तु को समझने एवं वर्गीकृत करने का प्रयत्न किया जाता है। तथ्यों के संकलन के आधार पर घटनाओं के विभिन्न पक्षों को वर्णित करना, उनके स्वरूपों एवं विविधताओं को स्पष्ट करना प्रत्येक वैज्ञानिक पद्धति का मुख्य कार्य है। किसी भी विषय के विविध स्वरूपों को वर्गीकरण द्वारा स्पष्ट किया जाता है।

2. व्याख्या यानि विश्लेषण (Explanation):
तथ्यों के आधार पर विषय-वस्तु के पारस्परिक सम्बन्धों की अर्थपूर्ण व्याख्या वैज्ञानिक पद्धति का दूसरा महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है। विज्ञान केवल अनेक तथ्यों का संकलन नहीं है बल्कि उन तथ्यों के अर्थपूर्ण सम्बन्धों की खोज भी है, जिससे सामान्य नियमों एवं तथ्यों की खोज की जा सके। वैज्ञानिक पद्धति चरों (variables) के पारस्परिक संबंधों को अर्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।

3. भविष्यवाणी एवं नियंत्रण:
वैज्ञानिक पद्धति की महत्त्वपूर्ण प्रकृति भविष्यवाणी एवं नियंत्रण (prediction and control) भी होती है। जब हम विषय-वस्तु की प्रकृति, स्वरूप एवं विविधताओं को समझकर, स्पष्टकर साथ ही उनके अर्थपूर्ण विश्लेषण एवं सिद्धान्तों के विकास के आधार पर अपनी विषय-वस्तु के बारे में पूर्वानुमान लगा सकते हैं तो उनके सम्बन्ध में भविष्यवाणी कर सकते हैं।

भविष्यवाणी की क्षमता का संबंध वैज्ञानिक ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग से है। विषय-वस्तु से संबंधित विश्लेषण एवं भविष्यवाणी के आधार पर घटनाक्रम पर नियंत्रण भी कर सकते हैं। इसका प्रयोग हम इच्छित उद्देश्य (desired aim) मानव कल्याण की दृष्टि से भी कर सकते हैं। संक्षेप में हम कह सकते कि वैज्ञानिक पद्धति का उद्देश्य घटनाओं की समझ एवं वर्णन, व्याख्या, भविष्यवाणी एवं नियंत्रण है। कहने का अभिप्राय विषय-वस्तु को समझना, संबद्ध सिद्धान्तों का निरूपण, भविष्यवाणी तथा नियंत्रण वैज्ञानिक पद्धति का अंतिम लक्ष्य है।

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प्रश्न 6.
अध्ययन पद्धति की दृष्टि से प्राकृतिक विज्ञान (Natural Science) एवं समाज विज्ञान (Social Science) में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्राकृतिक विज्ञान (Natural Science) एवं सामाजिक विज्ञान (Social Science) के बीच अन्तर का मुख्य आधार यह है कि प्राकृतिक घटनाएँ एवं सामाजिक घटनाएँ एक जैसी नहीं हैं। प्राकृतिक यानि भौतिक विषय-वस्तु का अध्ययन काफी विशिष्टता से किया जाता है। इस वजह से जब भी हम विज्ञान की बात करते हैं तो लोगों का ध्यान भौतिक, रसायन आदि प्राकृतिक विज्ञानों की ओर चला जाता है। यहीं यह सवाल उठता है कि समाज विज्ञान जिसे हम व्यवहार विज्ञान (Behavioural Science) भी कह सकते हैं, का प्राकृतिक विज्ञानों की तरह अध्ययन संभव है कि नहीं। समाज विज्ञान की प्रकृति की भिन्नता के आधार वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग के संबंध में काफी आपत्तियाँ उठाई जाती हैं।

पश्चिमी दार्शनिक डिल्थे (Dilthey) के सामने भी यह प्रश्न था कि सामाजिक घटनाओं का अध्ययन प्राकृतिक विज्ञान की पद्धति से नहीं किया जा सकता है। क्योंकि दोनों की विषय-वस्तु की प्रकृति एवं दृष्टिकोण भिन्न हैं। प्राकृतिक विज्ञान तथ्यों का अध्ययन करते हैं जबकि सामाजिक विज्ञान का संबंध अर्थपूर्ण व्यवहार से है, जिसकी समझकर ही व्याख्या की जा सकती है। डिल्थे के समकालीन रिकर्ट (Rickert) के विचार उनसे भिन्न थे। उनके अनुसार घटना या विषय-वस्तु अलग हो सकते हैं लेकिन उनकी अध्ययन-पद्धति में समानता संभव है। उनकी दृष्टि में प्राकृतिक घटनाओं की तरह सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन संभव है।

प्राकृतिक विज्ञान एवं समाज विज्ञान में अंतर हम निम्नलिखित ढंग से कर सकते हैं –

1. प्राकृतिक विज्ञान की विषय:
वस्तु मूर्त (concrete) एवं वस्तुनिष्ट होती है। जबकि समाज विज्ञान की प्रकृति अमूर्त (Abstract) एवं जटिल होती है। समाजविज्ञान की अमूर्तता एवं व्यक्तिनिष्ठता के कारण सामाजिक घटना का प्रत्यक्ष अवलोकन एवं निश्चित माप थोड़ा कठिन कार्य है।

2. प्राकृतिक विज्ञान की विषय:
वस्तु की जटिलता एवं परिवर्तनशीलता, समाजविज्ञान की तुलना में कम है। लेकिन गहराई से देखें तो किसी भी विषय की जटिलता सापेक्ष होती है, जैसे-जैसे उनका अध्ययन किया जाता है, वे सरल होती जाती हैं। भौतिक विज्ञान में भी तो ऐसे विषय हैं जो जटिल हैं। उदाहरण के लिए अणुकेन्द्र के चारों ओर घूमने वाले परमाणु की गति के बारे में वैज्ञानिक अभी तक निश्चित अनुक्रम ढूँढ नहीं पाए हैं।

3. वैज्ञानिक शुद्धता के लिए आवश्यक है कि विषय:
वस्तु की गणना एवं माप की जाए। भौतिक विज्ञान की वस्तुएँ गणनात्मक (Quantitative) रूप से विश्लेषित की जा सकती हैं, जबकि सामाजिक विज्ञान की प्रकृति गुणात्मक है। उसके गुणात्मक अध्ययन में परेशानी होती है।

4. प्राकृतिक विज्ञान में कार्य:
कारण सम्बन्ध को प्रदर्शित यानि खोजने हेतु प्रयोगशाला है जहाँ नियंत्रित अवस्था में अध्ययन किया जा सकता है। दूसरी ओर, समाज विज्ञान में मानव-व्यवहार के साथ प्रयोग करना कई सांस्कृतिक एवं नैतिक समस्या उत्पन्न कर सकता है।

5. प्राकृतिक विज्ञान में पूर्वानुमान (Prediction) की पूरी क्षमता होती है, दूसरी ओर, समाज विज्ञान में भौतिक विज्ञान की अपेक्षा मानव व्यवहार के संबंध में पूर्वानुमान लगाना अधिक कठिन होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि सामाजिक घटनाओं की जटिलता, परिवर्तनशीलता, अमूर्तता आदि गुणों के कारण उनके संबंध में यथार्थ पूर्वानुमान कठिन है।

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प्रश्न 7.
आगमन क्या है? वैज्ञानिक आगमन की परिभाषा दें तथा इसकी मुख्य विशेषताओं (लक्षणों) का वर्णन करें।
उत्तर:
आगमन सामान्य वाक्यों की स्थापना करता है। एक ओर जहाँ निगमन अपने सर्वव्यापी आधार वाक्य की वास्तविक सत्यता की कल्पना करता है, वहीं दूसरी ओर आगमन उसकी वास्तविक सत्यता को प्रमाणित करता है। सामान्य वाक्यों (general proposition) की वास्तविक सत्यता (Material Truth) को प्रमाणित करने के लिए आगमन विशेष उदाहरणों को खोजता है। कुछ निरीक्षित घटनाओं के अनुभव के आधार पर जिस सर्वव्यापी अथवा पूर्णव्यापी वाक्य (Universal Proposition) की स्थापना की जाती है, उसे सामान्यीकरण (generalisation) कहते हैं। सामान्यीकरण द्वारा स्थापित पूर्णव्यापी वाक्य सामान्य अथवा व्यापक यथार्थ वाक्य (general proposition) होता है।

आगमन में हम अंशव्यापी वाक्य से पूर्णव्यापी वाक्य (Universal Proposition) की ओर बढ़ते हैं। इसमें हम कुछ उदाहरणों का निरीक्षण कर सबों के बारे में निष्कर्ष निकालते हैं। ज्वाइस ने आगमन को परिभाषित करते हुए कहा है, “Induction is the legitimate derivation of universal laws from individual cases.” (कुछ विशेष उदाहरणों के आधार पर पूर्णव्यापी नियम का यथार्थ अनुमान ही आगमन है।) फाउलर ने आगमन की परिभाषा इस प्रकार दी “Induction is the legitimate inference of the general from the particular or of the more general from the less general.” (विशेष के आधार पर सामान्य अथवा कम व्यापक के आधार पर अधिक व्यापक का यथार्थ अनुमान ही आगमन है)

श्याम, गोपाल, राम आदि मनुष्यों को मरते देखकर हम आगमन में यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’। यह एक पूर्णव्यापी वाक्य है और वास्तविक भी। सामान्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) की वास्तविकता आगमनात्मक अनुमान द्वारा प्रमाणित की जाती है। आगमन का मुख्य लक्ष्य है आगमनात्मक अनुमान (Inductive Inference) द्वारा वास्तविक सामान्य वाक्य (Real general proposition) की स्थापना करना। ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक वास्तविक सामान्य वाक्य है, जो पूर्णव्यापी (Universal) है। आगमन प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम के सहारे पूर्णव्यापी वाक्यों की सत्यता को प्रमाणित करता है और उसका निष्कर्ष (Conclusion) वास्तविक पूर्णव्यापी अथवा सामान्य वाक्य (real general proposition) होता है।

वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction):
सामान्य (व्यापक) वाक्यों की स्थापना के कई तरीके हैं जिनमें एक ही तरीका ऐसा है जो वैज्ञानिक (Scientific) है, जिसे वैज्ञानिक आगमन (Scientific induction) कहा जाता है। मिल ने वैज्ञानिक आगमन को परिभाषित करते हुए कहा है – “Scientific Induction is the establishment of a general real proposition, based on the observation of particular instances, in reliance on the Law of Uniformity of Nature and the law of Causation.” (प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य के नियमानुसार विशेष उदाहरणों के निरीक्षण पर आधारित सामान्य वाक्य की स्थापना ही आगमन है।) वैज्ञानिक आगमन का उदाहरण है –

श्याम मर गया
करीम मर गया
जौन मर गया
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं

उपर्युक्त उदाहरण में श्याम, करीम, जौन को मरते हुए देखकर सभी मनुष्यों के मरणशील होने का जो अनुमान किया गया है वह वैज्ञानिक आगमनात्मक अनुमान है। इसमें हम कुछ मनुष्यों को मरते देखकर एक सामान्य निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’। यह एक सामान्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) है। यह वाक्य केवल श्याम, करीम और जौन के लिए ही सत्य नहीं है बल्कि संसार के सभी मनुष्यों के लिए सत्य है।

सभी मनुष्यों की मरणशीलता का ज्ञान प्रत्यक्ष से संभव नहीं है क्योंकि सभी मनुष्यों को मरते हुए देखा नहीं जा सकता। आगमनात्मक अनुमान में प्रत्यक्ष के आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान प्राप्त किया जाता हैं आगमनात्मक अनुमान का निष्कर्ष आधार से अधिक व्यापक होता है। ‘श्याम मर गया’ (आधार वाक्य) से अधिक व्यापक है ‘सभी मनुष्य मरणशील है’ जो निष्कर्ष वाक्य है। ‘सभी मनुष्य मरणशील है’ निष्कर्ष वाक्य एक सामान्य वाक्य है जो वर्तमान, भूत और भविष्यत् सभी कालों के लिए सत्य है। ‘कुछ’ के आधार पर ‘सभी’ के संबंध में सामान्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) की स्थापना करने की क्रिया ही आगमन कहलाती है।

परन्तु आगमनात्मक अनुमान में ज्ञात के आधार पर अज्ञात की ओर अथवा विशेष के आधार पर सामान्य की ओर छलांग लगाने में गलती की संभावना रहती है, जिसे आगमनात्मक खतरा (inductive Risk) कहा जाता है। हम कुछ ही घटनाओं के आधार पर किस प्रकार सबों के संबंध में निष्कर्ष निकाल सकते हैं? प्रत्यक्ष के आधार अप्रत्यक्ष के संबंध में निष्कर्ष निकालने में गलती हो सकती है। ज्ञात के आधार पर अज्ञात के संबंध में निष्कर्ष निकालने के लिए आगमन के ठोस वैज्ञानिक आधार हैं। ये हैं-प्रकृति-समरूपता नियम (Law of the Uniformity of Nature) तथा कारण-कार्य नियम (Law of Causation)।

इन दोनों नियमों के आधार पर जिस सामान्य वाक्य की स्थापना की जाती है वह सभी स्थान और काल के लिए सत्य होता है। यथार्थ उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य वाक्य की स्थापना होती है, इसलिए सामान्य वाक्यों में वास्तविक सत्यता भी होती है। इसलिए इन नियमों पर आधारित सामान्य अथवा व्यापक वाक्य यथार्थ सामान्य वाक्य अथवा वास्तविक व्यापक वाक्य (real general proposition) कहलाते हैं। वैज्ञानिक आगमन में जो बात विशेष उदाहरण के लिए सत्य होती है वह उस तरह के सभी उदाहरणों के लिए सत्य होती है। आगमनात्मक अनुमान के अनुसार यदि ‘मरणशीलता’ कुछ मनुष्यों के लिए सत्य है तो यह मनुष्य जाति के सभी व्यक्तियों के लिए सत्य होगी।

वैज्ञानिक आगमन की विशेषताएँ (Characteristics of Scientific Induction):
वैज्ञानिक आगमन के संबंध में मिल (Mill) ने जो परिभाषा दी है उसके आधार पर इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं –

1. वैज्ञानिक आगमन किसी वाक्य की स्थापना करता है (Scientific Induction establishes a proposition):
आगमनात्मक निष्कर्ष कोई वाक्य होता है। दो प्रत्ययों (ideas) का योग कोई वाक्य होता है। जैसे-‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ में ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ दो प्रत्यय हैं, जिसमें ‘मनुष्य’ उद्देश्य के स्थान पर है तथा ‘मरणशीलता’ विधेय के स्थान पर। इन दोनों प्रत्ययों के बीच आगमनात्मक अनुमान द्वारा संबंध स्थापित करने पर एक वाक्य की स्थापना होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आगमन सर्वप्रथम किसी वाक्य की स्थापना करता है।

2. वैज्ञानिक आगमन सामान्य वाक्य की स्थापना करता है (Scientific Induction establishes a general proposition):
वाक्य दो प्रकार के होते हैं अंशव्यापी (Particu lar) तथा पूर्णव्यापी (Universal)। जैसे-‘कुछ मनुष्य मरणशील हैं’ एक अंशव्यापी वाक्य है, क्योंकि इसमें ‘मरणशील’ कुछ ही व्यक्तियों को कहा गया है। इस वाक्य में विधेय सम्पूर्ण उद्देश्य के संबंध में ज्ञान नहीं देता है। ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं।’ एक पूर्णव्यापी वाक्य है, क्योंकि इस वाक्य में विधेय सम्पूर्ण उद्देश्य के संबंध में ज्ञान देता है। इस वाक्य में ‘मरणशील’ सभी व्यक्तियों को कहा गया है। पूर्णव्यापी वाक्य का ज्ञान अनुभव द्वारा नहीं होता, क्योंकि हम कुछ ही व्यक्तियों को मरते हुए (अनुभव द्वारा) देख सकते हैं सबों को नहीं।

‘सबों’ के संबंध का ज्ञान आगमनात्मक अनुमान द्वारा होता है जिसका निष्कर्ष सर्वव्यापी अथवा पूर्णव्यापी वाक्य होता है। जैसे – ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक पूर्णव्यापी वाक्य है और यही आगमन का निष्कर्ष है। आगमन का निष्कर्ष सामान्य वाक्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) कहलाता है। अतः यह स्पष्ट होता है कि आगमन का संबंध अंशव्यापी वाक्यों से न होकर पूर्णव्यापी वाक्यों से होता है। इस तरह आगमन सामान्य अथवा व्यापक वाक्य की स्थापना करता है। सामान्य वाक्य की पूर्णव्यापी वाक्य अथवा व्यापक वाक्य कहलाता है।

3. वैज्ञानिक आगमन वास्तविक वाक्य की स्थापना करता है (Scientific Induc tion establishes a real proposition):
सामान्य वाक्य अथवा व्यापक वाक्य दो प्रकार के होते हैं-शाब्दिक वाक्य (Verbal proposition) तथा वास्तविक वाक्य (real proposition)। शाब्दिक वाक्य उसे कहा जाता है जिसमें विधेय अपने उद्देश्य के संबंध में कोई नई जानकारी नहीं देता।

शाब्दिक वाक्य में विधेय (predicate) अपने उद्देश्य पद (Subject) की केवल गुणवाचकता को व्यक्त करता है। जैसे – ‘सभी मनुष्य विवेकशील हैं’ एक शाब्दिक वाक्य (Verbal proposition) है, क्योंकि इसमें विधेय अपने उद्देश्य पद के संबंध में कोई नया ज्ञान नहीं देता बल्कि उसकी गुणवाचकता (Connotation) को प्रकट करता है (विवेकशीलता मनुष्य ही गुणवाचकता होती है)। वैज्ञानिक आगमन इस तरह के वाक्यों की स्थापना नहीं करता। वैज्ञानिक आगमन शाब्दिक वाक्यों की स्थापना न कर वास्तविक वाक्यों (real proposition) की स्थापना करता है।

वास्तविक वाक्य (Real proposition) उसे कहते हैं, जिसमें विधेय (predicate) अपने उद्देश्य (Subject) के संबंध में नई जानकारी देता है। जैसे-‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक वास्तविक या यथार्थ वाक्य (real proposition) हैं, क्योंकि ‘मरणशीलता’ ‘सभी मनुष्यों’ के संबंध में एक नवीन ज्ञान है। ‘मरणशीलता’ ‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता नहीं है, मनुष्य पद की गुणवाचकता तो ‘विवेकशीलता’ और पशुता’ है। वास्तविक वाक्य (real proposition) में विधेय अपने उद्देश्य पद की गुणवाचकता को प्रकट न कर उसके संबंध में कोई नया ज्ञान देता है। उपर्युक्त वाक्य में ‘मरणशीलता’ उद्देश्य पद (सभी मनुष्यों) के संबंध में एक नया ज्ञान है। इस तरह वैज्ञानिक आगमन वास्तविक अथवा यथार्थ वाक्य की स्थापना करता है।

4. वैज्ञानिक आगमन विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करता है (Scientific Induc tion observes particular instances):
आगमन सामान्य और वास्तविक वाक्य की स्थापना विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर करता है। किसी सम्पूर्ण जाति या वर्ग के प्रत्येक उदाहरण का निरीक्षण करना संभव नहीं है। इसलिए आगमन कुछ ही या विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करता है जिनके आधार पर सामान्य वास्तविक वाक्य अथवा व्यापक यथार्थ वाक्य (general real proposition) की स्थापना होती है।

5. वैज्ञानिक आगमन में आगमनात्मक छलांग होती है (In Induction there is an Inductive leap):
वैज्ञानिक आगमन में ज्ञात से अज्ञात की ओर छलांग लगाई जाती है, जिसे आगमनात्मक छलांग कहा जाता है। आगमन में किसी जाति या वर्ग के सभी उदाहरणों का निरीक्षण नहीं होता है, फिर भी उस जाति के अनिरीक्षित उदाहरणों के लिए सत्य मान ली जाती है। कुछ ही मनुष्यों को मरते देखना निरीक्षित उदाहरण होते हैं, सभी मनुष्यों को मरते नहीं देखना अनिरीक्षित उदाहरण हैं – हम निरीक्षित उदाहरणों के आधार पर ही अनिरीक्षित उदाहरणों को आगमनात्मक अनुमान में सत्य मान लेते हैं अर्थात् ज्ञात से अज्ञात की ओर छलांग लेते हैं अथवा कुछ के आधार पर सब की ओर छलांग लगाते हैं।

‘सभी मनुष्य मरणशील है’ एक व्यापक वाक्य है, परन्तु यह मनुष्य जाति के सभी उदाहरणों के निरीक्षण पर आधारित नहीं है। इस तरह कुछ ही मनुष्यों को मरते देखकर सभी मनुष्यों की मरणशीलता का व्यापक अथवा सामान्य निष्कर्ष निकालने (ज्ञात से अज्ञात) की ओर छलांग लगाने में गलती होने की संभावना रहती है, जिसे आगमनात्मक जोखिम (Inductive Hazard) कहा जाता है। परन्तु, आगमनात्मक जोखिम को मिल (Mill) ने ‘आगमन का प्राण’ (Essence of Induction) कहा है, क्योंकि इसी के आधार पर अंततः व्यापक वास्तविक वाक्यों की स्थापना होती है।

6. वैज्ञानिक आगमन कारण:
कार्य नियम तथा प्रकृति-समरूपता सिद्धांत पर आधारित होता है (Scientific Induction is based on the Law of Causation and the Principle of the Uniformity of Nature):
विशेष उदाहरणों के आधार पर किसी सामान्य वाक्य की स्थापना करने के लिए आगमन कारण-कार्य नियम तथा प्रकृति-समरूपता नियम को सत्य मानता है। कारण-कार्य नियम के अनुसार प्रत्येक कार्य का कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। जैसे – ‘मनुष्यता’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य का संबंध है और ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ सामान्य वाक्य (general proposition) के रूप में इसी नियम के बल पर प्रतिस्थापित होता है।

आगमन प्रकृति-समरूपता नियम पर भी आधारित होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार समान परिस्थितियों में समान कारण समान कार्य उत्पन्न करता है। जब हम यह देखते हैं कि ‘मनुष्यता’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य का संबंध है तब हम यह मान लेते हैं कि कारण-कार्य का यह संबंध समान परिस्थितियों में सभी घटनाओं के लिए सत्य होगा। “सभी मनुष्य मरणशील हैं’, सामान्य वाक्य में मनुष्य होना ही मरणशीलता का कारण है। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार जो कारण आज तक जो कार्य उत्पन्न करता रहा है, उसे वह भविष्य में भी उत्पन्न करेगा। इस नियम के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यदि आज तक मनुष्य मरणशील रहा है तो वह भविष्य में भी मरणशील रहेगा। इन दोनों नियमों के आधार पर प्रत्यक्ष के द्वारा अप्रत्यक्ष के संबंध में सामान्य निष्कर्ष निकालने में कोई आगमनात्मक जोखिम (inductive hazard) नहीं होता है।

7. वैज्ञानिक आगमन नए तथ्यों की स्थापना करता है (Scientific Induction establishes new facts):
वैज्ञानिक आगमन में ज्ञात के आधार पर अज्ञात का अथवा कुछ के आधार पर सब का जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है वे नए तथ्य होते हैं। तर्कशास्त्रीय दृष्टिकोण से ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक सामान्य वाक्य है जिसमें ‘मरणशीलता’ मनुष्य पद की गुणवाचकता (connotation) नहीं है और जब विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता को प्रकट नहीं करता तो वह उसके संबंध में किसी नए तथ्य की जानकारी देता है ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ सामान्य वाक्य है जिसमें ‘मरणशीलता’ मनुष्य पद की गुणवाचकता connotation नहीं है और जब विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता को प्रकट नहीं करता तो वह उसके संबंध में किसी नए तथ्य की जानकारी देता है ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ सामान्य वाक्य है जो आगमनात्मक अनुमान द्वारा स्थापित किया गया है और इसमें ‘मरणशीलता’ मनुष्य के संबंध में एक नया तथ्य है। इस तरह देखा जाता है कि वैज्ञानिक आगमन अपने सामान्य वास्तविक वाक्य के द्वारा नए तथ्यों की स्थापना करता है।

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प्रश्न 8.
आगमन का परिचय दें तथा इसके प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
आगमन वह अनुमान है जिसमें हम कुछ (some) के आधार पर सब (all) के संबंध में अर्थात् विशेष (Particular) के आधार पर सामान्य (universal) संबंध में ज्ञान प्राप्ति करते हैं। आगमन पूर्णव्यापी वाक्य की वास्तविक सत्यता (material truth) की स्थापना करता है। हम जानते हैं कि पूर्णव्यापी वाक्य हमारे अनुभव पर आधारित होते हैं और हमें अनुभव विशेष घटनाओं का ही होता है सबों का नहीं। न्यूटन ने कुछ . ही फलों को वृक्ष से धरती की ओर गिरते देखा था। हम कुछ ही व्यक्तियों को मरते हुए देख सकते हैं, एक ही साथ सबों को नहीं। इस तरह निगमन में एक ही विशेष घटना के निरीक्षण के आधार पर पूर्णव्यापी वाक्य (universal proposition) की स्थापना कर दी जाती है। उदाहरण के लिए,

रमेश मरणशील है।
सुरेश मरणशील है।
महेश मरणशील है।
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं।

उपर्युक्त उदाहरण में ‘कुछ’ मनुष्यों को मरते देख कर ‘सभी’ मनुष्यों की मरणशीलता के संबंध में अनुमान किया गया है अर्थात् विशेष (Particular) के आधार पर सामान्य (universal) का अनुमान किया गया है। इस तरह के अनुमान को आगमन का अनुमान कहा जाता है। आगमनात्मक अनुमान द्वारा वास्तविक सत्यता की स्थापना होती है। इसमें आकारिक और वास्तविक सत्यता दोनों होती है। निगमनात्मक अनुमान में केवल आकारिक सत्यता होती है तथा इसमें व्यापक वाक्य के आधार पर निष्कर्ष निकालने की विधि बतायी जाती है। परन्तु, आगमनात्मक अनुमान का आकार तथा विषयवस्तु दोनों ही शुद्ध होते हैं। आगमन में ‘विषय’ के दृष्टिकोण से शुद्ध निष्कर्ष निकालने की विधि बतायी जाती है। आगमनात्मक अनुमान वास्तविक सत्यता से संबद्ध होता है और वास्तविक सत्यता विचार की दुनिया तथा वास्तविक जगत् दोनों में सत्य होती है।

उदाहरण के लिए, ‘सोने की अंगूठी’ विचार जगत तथा वास्तविक जगत दोनों में सत्य है। परन्तु ‘सोने का पहाड़’ विचार जगत में सत्य हो सकता है लेकिन वास्तविक जगत में नहीं। इस प्रकार ‘सोने का पहाड़’ निगमनात्मक अनुमान है क्योंकि इसमें – आकारिक सत्यता वास्तविक सत्यता नहीं। परन्तु, ‘सोने की अंगूठी’ ‘पत्थर का पहाड़’ आदि आगमनात्मक अनुमान है, क्योंकि इसमें आकारिक और वास्तविक सत्यता दोनों है। निगमनात्मक अनुमान में विचार और वास्तविक में अनुकूलता नहीं रहती, परन्तु आगमनात्मक अनुमान में विचार और वास्तविकता में अनुकूलता रहती है।

‘दुनिया की सभी वस्तुएँ नाशवान हैं’ – इस परम व्यापक वाक्य को निगमनात्मक अनुमान द्वारा प्रमाणित नहीं किया जा सकता अर्थात् वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना निगमन विधि से नहीं हो सकती; आगमन विधि द्वारा ही पूर्णव्यापी वाक्य की वास्तविक सत्यता की स्थापना हो सकती है। व्यावहारिक जीवन में हम ऐसा अनुमान करना चाहते हैं जो आकार और विषय दोनों दृष्टिकोण से सही हो। अनुमान के द्वारा सत्यता की प्राप्ति तब होती है जब अनुमान करने का तरीका और अनुमान का विषय वास्तविक होता है। जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
मोहन मनुष्य है।
∴ मोहन मरणशील है।

उपर्युक्त उदाहरण में अनुमान के दोनों आधार वाक्य (premises) वास्तविक हैं, इसलिए निष्कर्ष ‘मोहन मरणशील है’ भी सत्य है। अनुमान के निष्कर्ष को सत्य होने के लिए यह आवश्यक है कि उसके आधार वाक्य भी वास्तविक हों। उपर्युक्त उदाहरण न्याय (syllogism) का उदाहरणं है। इसके दोनों आधार वाक्य (‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ ‘मोहन मनुष्य है’) वास्तविक हैं, इसलिए निष्कर्ष भी वास्तविक है। न्याय के आधार वाक्यों में से कम-से-कम एक आधार वाक्य अवश्य ही व्यापक होता है।

व्यापक वाक्य की वास्तविकता को अनुभव से नहीं जाना जा सकता बल्कि इसके लिए आगमनात्मक अनुमान का सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि इसके द्वारा वास्तविक व्यापक वाक्य की स्थापना की जाती है। उपर्युक्त उदाहरण में ‘सभी मनुष्य मरणशील है’ एक व्यापक वाक्य (general proposition) है, जिसके द्वारा वास्तविक व्यापक वाक्य-:मोहन मरणशील हैं’ की स्थापना की गयी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आगमनात्मक अनुमान के द्वारा व्यापक वाक्यों की वास्तविकता को प्रमाणित किया जाता है।

मिल (Mill) ने आगमन के दो प्रकार बतालए हैं उचितार्थक आगमन (induction proper) तथा अनुचितार्थक आगमन (induction improper)। उचितार्थक आगमन वह आगमन होता है, जिसमें ‘कुछ से सब की ओर’ (from ‘some’ to ‘all’) छलांग लगायी जाती है। इसे आगमनात्मक छलाँग (inductive leap) कहा जाता है, जो ज्ञात से अज्ञात की ओर होता है। उचितार्थक आगमन में ज्ञात के आधार पर अज्ञात का अनुमान किया जाता है। अनुचितार्थक आगमन वह है जिसमें उचितार्थक आगमन जैसी छलांग (leap) नहीं पायी जाती; क्योंकि इसके अनुमान वस्तुओं के निरीक्षण पर आधारित नहीं होते। उचितार्थक आगमन (induction proper) के चार भेद किए गए हैं।

ये हैं-वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction), अवैज्ञानिक आगमन (Unscientific Induction), सादृश्यानुमान (Argument from Anal ogy) तथा सम्भावना सिद्धान्त (Argument from probability)। अनुचितार्थक आगमन (Induction improper) के भी तीन भेद किए गए हैं – पूर्ण आगमन (Perfect Induction), तर्कसाम्यमूलक आगमन (Induction by parity of Reasoning) तथा अंश-संकलन आगमन (Induction improper) के भी तीन भेद किए गए हैं – पूर्ण आगमन (Perfect Induction), तर्कसाम्यमूलक आगमन (Induction by parity of Reasoning) तथा अंश-संकलन आगमन (Induction by colligavission of facts)।

उचितार्थक आगमन कार्य-करण सम्बन्ध पर आधारित होता है परन्तु अनुचितार्थक आगमन कार्य-कारण संबंध पर आधारित नहीं होता। आगमन का सही रूप उचितार्थक आगमन (induction proper) आगमन (induction) जैसा लगता है, तथापि इसमें आगमन के मुख्य लक्षणों का सर्वदा अभाव पाया जाता है। वैज्ञानिक आगमन, जो उचितार्थक आगमन का प्रमुख प्रकार होता है, ही आगमन का सर्वोत्तम रूप होला है। वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction) की विधि से जिस सामान्य वाक्य (universal proposition की स्थापना होती है वह आगमन (Induction) का सही निष्कर्ष (valid conclusion) होता है।

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प्रश्न 9.
निगमन और आगमन के बीच क्या संबंध है? दोनों में कौन अधिक मौलिक है? अथवा, निगमन और आगमन की तुलना करें। इनमें पहले कौन आता है?
उत्तर:
निगमन और आगमन में संबंध (Relation between Deduction and Induction):
इन दोनों के बीच संबंध की विवेचना यहाँ की जा रही है। यहाँ मुख्य रूप से दो प्रश्न उठते हैं –

(a) दोनों में अधिक मौलिक कौन है (Which of the two is more fundamental)?
(b) दोनों में प्राथमिक या पूर्ववर्ती कौन है (Which of the two is prior)?

पहले और दूसरे प्रश्नों को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद पाया जाता है तार्किकों के दो दल हैं-एक दल अनुमान में केवल आकारिक सत्यता (formal truth) ढूँढता है और दूसरा दल वास्तविक सत्यता (material truth) पर जोर देता है। इन दोनों दलों के मत प्रस्तुत प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न हैं।

दोनों में अधिक मौलिक कौन है (Which of the two is more fundamental):

1. आकारवादी तार्किकों (Formal logicians) का मत:
इस मत के अनुसार निगमन (Deduction) अधिक मौलिक है और आगमन (Induction) कम मौलिक या गौण है। इस मत के माननेवाले हेटले (Whateley), हेमिल्टन (Hamilton), मैनसेल (Mansel) इत्यादि, आकारवादी तार्किक हैं। इन लोगों के अनुसार, आगमन तीसरे आकार का ही एक योग है; आगमन कोई स्वतंत्र अनुमान नहीं कहा जा सकता। यह निगमन का ही एक रूप है। इसके अतिरिक्त, आगमन में प्रकृति-समरूपता नियम और कार्य-कारण नियम को आधार मानकर हम ‘कुछ’ से ‘सब’ का जो निष्कर्ष निकालते हैं उसे निगमनात्मक ढंग से निकाला जा सकता है।

‘मनुष्यत्व’ और ‘मरणशीलता’ में कार्य-करण संबंध (causal relation) देखकर और इस नियम को प्रकृति में हमेशा समान होने का विश्वास करके ही हम आगमन में ‘कुछ’ (some) से “सब’ (all) की संभावना का अनुमान करते हैं और कहते हैं, ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’। इसीलिए यह कहा जाता है कि आगमन मूल रूप में निगमनात्मक होता है। (Induction in essence is Deduction in nature)

2. वस्तुवादी तार्किकों (Material logicians) का मत:
इस मत के अनुसार आगमन (Induction) ही अधिक मौलिक है और निगमन इसी का एक रूप है। इसके समर्थक मिल (Mill), बेन (Bain) आदि वस्तुवादी तार्किक हैं। निगमनात्मक अनुमान के लिए कम-से-कम एक सामान्य (universal) वाक्य की आवश्यकता पड़ती है और इस सामान्य वाक्य की स्थापना आगमन द्वारा होती है। इस प्रकार, निगमन के आधार के रूप में पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करके आगमन निगमन को आधार प्रदान करता है। आगमन के द्वारा ही सामान्य नियम की स्थापना होती है, और निगमन केवल इसी नियम को व्यक्ति विशेषों पर लागू करता है।

जब आगमन के द्वारा यह सामान्य वाक्य सत्यापित हो जाता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं, तो निगमन इसे राम, मोहन आदि व्यक्तियों पर प्रयुक्त करके कहता है कि राम भी मनुष्य होने के नाते मरणशील है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आगमन ही अधिक मौलिक है और निगमन गौण (secondary)। वास्तव में, निगमन और आगमन के विषय में दिए गए उपर्युक्त दोनों मत एकांगी (one sided) हैं।

इन दोनों में किसी एक को अधिक मौलिक और दूसरे को कम मौलिक या गौण बताना उचित नहीं है। दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। ये एक-दूसरे के पूरक हैं और इनमें अन्योन्याश्रय संबंध है। इनमें किसी एक को दूसरे में परिवर्तित करने से इन दोनों की ही मौलिकता नष्ट हो जाती है। अतः, इनके विषय में अधिक या कम मौलिकता का प्रश्न उठाना व्यर्थ है। दोनों में पूर्ववर्ती कौन है (which of the two is prior)। इस प्रश्न पर तर्कवेत्ताओं में – मतभेद है। यहाँ जेवन्स (Jevons) एवं मिल (Mill) के मतों की विवेचना अपेक्षित है।

जेवन्स (Jevons) का मत:
इनके अनुसार निगमन आगमन के पहले आता है। (Deduc tion is prior to Induction)। इनका तर्क इस प्रकार है-आगमन में सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसके लिए प्राक्कल्पना (Hypothesis) का सहारा लेकर हम सामान्यीकरण (generalisation) कर देते हैं। किन्तु, बिना परीक्षा या जाँच (verification) के कोई सामान्य नियम नहीं बन जाता। प्राक्कल्पना की जाँच निगमनात्मक विधि द्वारा की जाती है।

निर्मित प्राक्कल्पना को सत्य मानकर उससे संभावित निष्कर्ष निकालते हैं और इन निष्कर्षों की जाँच वास्तविक घटनाओं में करते हैं। यदि ये निष्कर्ष इन घटनाओं से मेल खाते हैं, तो हम अपनी प्राक्कल्पना को सही मान लेते हैं और संगति या मेल नहीं बैठने पर प्राक्कल्पना असत्य सिद्ध हो जाती है। इस प्रकार, निगमन विधि के द्वारा ही प्राक्कल्पना की परीक्षा करके आगमन में सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसलिए निगमन का स्थान आगमन से पहले आता है।

मिल का मत:
मिल साहब का मत जेवन्स के मत के भिन्न है। इनके अनुसार, आगमनिक खोज में सामान्यीकरण का महत्त्व बहुत अधिक है। इसी कारण, ये आगमन को निगमन के पहले रखते हैं। न्याय (syllogism) निगमन का मुख्य रूप है और इसके लिए आधार के रूप में कम-से-कम एक पूर्णव्यापी (universal) वाक्य की आवश्यकता होती है और इस वाक्य की स्थापना आगमन द्वारा ही होती है। इस प्रकार आगमन ही निगमन को आधार प्रदान करता है।

इसलिए यह कहना उचित है कि “आगमन निगमन के पहले आता है।” (Induction is prior: to dedaction) वास्तव में, जेवन्स और मिल के कथन में आंशिक सत्यता (partial truth) है, न कि पूर्ण सत्यता। जेवन्स साहब के अनुसार, आगमन विधि का अंत सत्यापन या जाँच (verification) में होता है। इसी कारण वे निगमन को आगमन के पहले मानते हैं। किन्तु, मिल साहब के अनुसार आगमनिक खोज में सामान्यीकरण ही अंतिम सोपान है और इसके लिए परीक्षण या जाँच की कोई आवश्यकता निगमन और आगमन में किसी एक को पूर्ववर्ती बताना उचित नहीं जान पड़ता। निगमन और आगमन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।

निगमन और आगमन के संबंध में कुछ अन्य मत –

1. तार्किकों का कहना है कि निगमन तर्कशास्त्र में विश्लेषणात्मक विधि (analytical method) अपनाई जाती है और आगमन में संश्लेषणात्मक विधि (synthetic method) अपनाई जाती है। आगमन में विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करके सामान्य नियम बनाए जाते हैं और निगमन में सामान्य नियम का विश्लेषण करके विशेष निष्कर्ष प्राप्त किए जाते हैं। पूर्ण सत्य की प्राप्ति के लिए विश्लेषणात्मक और संश्लेषणात्मक दोनों विधियों का उपयोग आवश्यक है। अतः, निगमन और आगमन परस्पर पूरक हैं।

2. जेवन्स का मत:
जेवन्स महोदय के अनुसार निगमन आगमन के पहले आता है और आगमन निगमन का ही उत्क्रमिक (inverse) रूप है। सीधी क्रिया (direct process) और उत्क्रमिक क्रिया (inverse process) गणित से ली गई है। सीधी क्रिया वह है जिसमें निश्चित संख्या (data) दी हुई है और उससे निष्कर्ष निकालना रहता है। जैसे, 2 और 4 दिए हुए हैं जिनका गुणनफल 8 होता है उत्क्रमिक क्रिया में फल या परिणाम (result) पहले से दिया रहता है और उन संख्याओं को निकालना पड़ता है, जिनका वह फल या परिणाम है। जैसे, 8 दिया हुआ है और इसके अवयवों (constituents) को ज्ञात करना है। इसके अवयव हो सकते हैं –

4 × 2. 1 × 8 इत्यादि। सीधी क्रिया द्वारा प्राप्त निष्कर्ष निश्चित होता है, किन्तु, उत्क्रमिक क्रियाओं के अर्थ में आगमन को निगमन की उत्क्रमिक (inverse) रूप कहा जाता है। आगमन को निगमन का उत्क्रमिक रूप मानने का यह भी एक आधार है कि निगमन में हम कारण से कार्य की ओर जाते हैं, किन्तु, आगमन में कार्य से कारण की ओर जाते हैं। कारण (cause) का पता रहने पर इसके निश्चित फल (effect) का पता लगाना अत्यंत कठिन काम है और इसमें दोष होने की संभावना बनी रहती है, क्योंकि एक ही कार्य के कई कारण हो सकते हैं।

जेवन्स के मत की आलोचना:
निगमन को आगमन का पूर्ववर्ती कहना उचित नहीं है। आगमन को निगमन का उत्क्रमिक रूप (inverse process) भी कहना ठीक नहीं है। निगमन और आगमन एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए इनमें पूर्ववर्ती (antecedent) और (conse quent) का प्रश्न उठाना ही व्यर्थ है। जेवन्स का यह कहना भी ठीक नहीं है कि कार्य (effect ज्ञात रहने पर उससे निश्चित कारण (cause) ज्ञात नहीं हो सकता, क्योंकि एक कार्य के कई कारण हो सकते हैं।

यह कहना ही दोषपूर्ण है कि एक कार्य के कई कारण होते हैं। वास्तव में, निगमन और आगमन में विरोध लाकर आगमन को निगमन की उत्क्रमिक क्रिया (inverse process) बताना किसी भी हालत में उचित नहीं कहा जा सकता। आगमनिक खोज (inductive enquiry) में निगमन और आगमन दोनों का समान महत्त्व है। ये दोनों परस्पर पूरक हैं। इन्हें विरोधी कहना इनके सही अर्थ को ठुकराना है। बेकन का मत-बेकन ने निगमन को ‘उतरनेवाली क्रिया’ (descending process) और आगमन को ‘चढ़नेवाली क्रिया’ (ascending process) कहा है। निगमन में सामान्य से विशेष निष्कर्ष निकलते हैं। इसमें हम अधिक व्यापकता से कम व्यापकता की ओर आते हैं।

जैसे, सभी मनुष्यों को मरणशील पाकर राम को मनुष्य होने के नाते मरणशील बताते हैं। इसलिए निगमन को उतरने की क्रिया कहा जाता है। आगमन में विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के द्वारा सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसमें कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर (form less general to more general) जाते हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत पर चढ़कर वहाँ से हमें नीचे का सामान्य रूप दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार, आगमन के निष्कर्ष पर पहुँचते ही हमें एक सामान्य नियम दृष्टिगोचर होता है। ज्यों-ज्यों पर्वत से नीचे उतरने लगते हैं, त्यों-त्यों विशेष वस्तुओं पर नजर पड़ने लगती है। इसलिए निगमन को उतरनेवाली क्रिया और आगमन को चढ़नेवाली क्रिया कहा गया है।

बेकन के मत की आलोचना-बेकन का मत सही नहीं कहा जा सकता। पर्वत पर चढ़ने और उतरने का मार्ग एक ही रह सकता है। इसलिए चढ़ने और उतरने की क्रियाएँ परस्पर विरोधी नहीं कही जा सकती। इसी प्रकार, आगमन और निगमन में भी विरोध नहीं कहा जा सकता। यह सत्य है कि हम आगमन में उदाहरणविशेष से सामान्य नियम पर पहुँचते हैं और निगमन में सामान्य नियम से व्यक्तिविशेष पर पहुंचते हैं। पर, इसका अर्थ यह नहीं होता कि आगमन और निगमन परस्पर विरोधी हैं। इनमें अन्योन्याश्रय संबंध है।

ये एक-दूसरे के सहयोगी एवं पूरक फाउलर (Fowler) का मत-फाउलर ने आगमन और निगमन में भेद इस आधार पर किया है कि आगमन में हम कार्य से कारण की ओर जाते हैं और निगमन में कारण से कार्य की ओर। आगमन में घटनाविशेष का निरीक्षण करके इसका कारण बताते हैं। इसीलिए आगमन ‘में कार्य से कारण की ओर जाने की बात कही गई है।

निगमन में सामान्य नियम यानी कारण से कार्य की ओर जाने की बात कही गई है। फाउलर के मत की आलोचना-फाउलर (Fowler) का कहना सही नहीं है। आगमन में केवल कार्य से कारण का पता नहीं लगाया जाता। आगमन में हम दोनों तरफ बढ़ सकते हैं। कार्य ज्ञात रहने पर उसके कारण का पता लगाया जा सकता है और कारण ज्ञात रहने पर आगमन के द्वारा कार्य का भी पता लगाया जा सकता है। अतः यह कहना भूल है कि आगमन द्वारा केवल कार्य से कारण का पता लगाया जाता है।

बक्कल (Buckle) का मत-इनके अनुसार हम आगमन में विशेष तथ्यों से नियमों पर (from facts to laws) जाते हैं और निगमन में नियमों से विशेष तथ्यों पर (from laws to facts) जाते हैं। इसी को दूसरे शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-आगमन में वस्तुविशेष (facts) से विचार (ideas) की ओर जाते हैं और निगमन में विचार से वस्तुविशेष का अनुमान लगाया जाता है। आगमन द्वारा स्थापित नियम सैद्धांतिक होते हैं और इनका प्रत्यक्ष घटनाविशेषों के द्वारा होता है।

किन्तु, हमें इससे यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि आगमन के निष्कर्ष केवल सैद्धान्तिक या मानसिक होते हैं, यथार्थ नहीं। आगमन के निष्कर्ष यथार्थ होते हैं, क्योंकि इनमें वास्तविक सत्यता (material truth) पाई जाती है। निगमन में भी सैद्धान्तिक या मानसिक तत्त्व पाए जाते हैं, जिस प्रकार आगमन में यथार्थता के तत्त्व रहते हैं। उपर्युक्त मतों की विवेचना करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि आगमन और निगमन में विरोध का संबंध दिखाना भ्रामक है। इन दोनों में पूर्ण सहयोग अपेक्षित है। ये एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं (both run into each other)। इनके बीच कोई कृत्रिम रेखा खींचकर इनको एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।

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प्रश्न 10.
निगमन से आगमन किन-किन बातों में भिन्न है? अथवा, निगमन के बाद आगमन की क्या आवश्यकता है? व्याख्या करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र का लक्ष्य सत्यता की प्राप्ति है। इसकी पूर्ति के लिए अनुमान का सहारा लिया जाता है। सत्यता दो प्रकार की होती है –

  1. आकारिक सत्यता (formal truth) और
  2. वास्तविक सत्यता (material truth)।

निगमन तर्कशास्त्र मुख्यतः आकारिक सत्यता से संबद्ध रहता है। सत्यता का आंशिक अध्ययन ही यहाँ हो पाता है। आगमन तर्कशास्त्र में वास्तविक सत्यता प्राप्त करना हमारा लक्ष्य रहता है। इस प्रकार निगमन और आगमन के संयुक्त प्रयास से ही तर्कशास्त्र का लक्ष्य पूरा हो सकता है। अतः, निगमन और आगमन में अत्यधिक घनिष्ठ संबंध है। फिर भी, दोनों में कई अंतर दीख पड़ते हैं।

निगमन और आगमन में अंतर (Distinction between Deduction and Induction):
दोनों में निम्नलिखित अंतर उल्लेखनीय हैं –

1. निगमन के आधार:
वाक्य मान लिए जाते हैं, किन्तु आगमन के आधार-वाक्य निरीक्षण (observation) तथा प्रयोग (experiment) पर आधृत रहते हैं। निगमन के आधार-वाक्यों को सत्य मानकर उनसे निष्कर्ष निकाला जाता है। यहाँ आधार-वाक्यों को बिना निरीक्षण-परीक्षण के ही आँख मूंदकर सत्य मान लेते हैं और इनसे निष्कर्ष निकालते हैं। जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
राम एक मनुष्य है
∴ राम मरणशील है।

यह निगमनात्मक अनुमान का उदाहरण है। यहाँ ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ और ‘राम एक मनुष्य है’ आधार-वाक्य (premises) हैं, जिन्हें पहले ही सत्य मान लिया गया है और उनसे यह निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘राम मरणशील है’। किन्तु, आगमन के आधार-वाक्य अनुभव द्वारा प्राप्त होते हैं। बिना निरीक्षण-परीक्षण के आधार-वाक्यों को सत्य नहीं माना जा सकता है। जैसे –

राम मरणशील है
यदु मरणशील है
श्याम मरणशील है
केदार मरणशील है
……………………..
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं।

यहाँ सभी आधार-वाक्य अनुभव, अर्थात् निरीक्षण और प्रयोग पर आधृत हैं। हम इन व्यक्तियों को मरते हुए देखकर ही यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं।

2. निगमन में हम सामान्य (universal) से विशेष (particular) या अधिक व्यापक से कम व्यापक की ओर जाते हैं, किन्तु आगमन में कम से सामान्य या विशेष से सामान्य की ओर जाते हैं। निगमन में हम अधिक व्यापकता से कम व्यापकता की ओर जाते हैं, किन्तु आगमन में कम व्यापकता से अधिक व्यापकता की ओर प्रस्थान करते हैं।

उपर्युक्त उदाहरण से यह अंतर स्पष्ट हो जाता है। निगमनात्मक अनुमान में हम सभी मनुष्यों को मरणशील मानकर राम को मरणशील सिद्ध करते हैं। राम की व्यापकता अवश्य ही सभी मनुष्यों की व्यापकता से कम है। इसीलिए निगमन में अधिक से कम की ओर जाने की बात कही गई है। आगमन के उदाहरण से हम देखते हैं कि राम, यदु, श्याम, केदार इत्यादि व्यक्तिविशेषों को मरणशील पाकर सभी मनुष्यों के मरणशील होने का अनुमान किया गया है। अतः, यहाँ विशेष से सामान्य की ओर प्रस्थान किया गया है।

3. निगमन में आधार-वाक्यों की संख्या निश्चित रहती है, किन्तु आगमन में आधार-वाक्यों की संख्या अनिश्चित रहती है। निगमनात्मक अनुमान के मुख्यतः दो प्रकार होते हैं साक्षात अनुमान (immediate inference) और असाक्षात अनुमान (mediate inference)। साक्षात अनुमान में एक आधार-वाक्य रहता है और असाक्षात अनुमान में दो आधार-वाक्य होते हैं। किन्तु, आगमन में आधार-वाक्यों की संख्या कोई निश्चित नहीं है। कभी-कभी कार्य-कारण संबंध का पता चलाने के लिए दो, तीन, चार या इनसे अधिक उदाहरणों को देखने की आवश्यकता पड़ती है।

4. निगमन का संबंध आकारिक सत्यता (formal truth) से है; किन्तु आगमन का संबंध वास्तविक सत्यता (material truth) से रहता है-निगमन में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि दिए हुए आधार-वाक्य से निष्कर्ष नियमानुकूल निकाला गया है कि नहीं। यदि निष्कर्ष निकालने में नियमों का पूर्ण पालन किया गया हो तो उस अनुमान का निष्कर्ष सही माना जाता है। इस निष्कर्ष में वास्तविक सत्यता का रहना कोई आवश्यक नहीं है। जैसे –

सभी विद्यार्थी बंदर है,
मोहन एक विद्यार्थी है,
∴ मोहन एक बंदर है।

इस अनुमान में अनुमान के नियमों का पालन किया गया है। इसलिए इसका निष्कर्ष आकारिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही है। इस निष्कर्ष में वास्तविक सत्यता का पूर्ण अभार है; क्योंकि इसके आधार अनुभवसिद्ध नहीं हैं। आगमन का लक्ष्य वास्तविक सत्यता को प्राप्त करना है। इसके आधार-वाक्य निरीक्षण और प्रयोग पर आधृत होने के कारण ऐसे निष्कर्ष देते हैं जो वास्तविक दृष्टिकोण से सही होते हैं। आगमन में आकारिक सत्यता को भी ठुकराया नहीं जाता। आकारिक और वास्तविक दोनों सत्यता की प्राप्ति आगमन में होती है।

5. निगमन के निष्कर्ष आधार-वाक्यों से कम व्यापक (universal) होते हैं, किन्तु आगमन के निष्कर्ष अपने आधार-वाक्यों से सदा अधिक व्यापक होते हैं। इसका कारण यह है कि निगमन के आधार-वाक्यों में ही इसका निष्कर्ष निहित रहता है, किन्तु आगमन के निष्कर्ष में ही इसके आधार-वाक्य चले जाते हैं।

6. निगमन और आगमन के आधारों में भी भिन्नता रहती है-विचार के नियमों (laws of thought) पर निगमन आधृत है। विचार के नियम ये हैं-व्याघातक नियम (law of contradiction), तादात्म्य नियम (law of identity) और मध्यदशा-निषेध नियम (law of excluded middle)। आगमन के आधारस्वरूप के दो नियम हैं-प्रकृति-समरूपता नियम (law of uniformity of nature) और कार्य-कारण नियम (law of causation)।

उपर्युक्त अंतरों को ध्यानपूर्वक देखने से यह संकेत मिल जाता है कि निगमन के बार आगमन की क्या आवश्यकता है। निगमन अनुमान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। परन्तु. अकेले निगमन द्वारा सत्य की प्राप्ति संभव नहीं है। इसमें कुछ कमियाँ रह जाती हैं, जिनकी पूर्ति आगमन द्वारा की जाती है। आगमन की कुछ अपनी विशेषताएँ हैं, जिनका निगमन में अभाव रहता है। निगमन के बाद आगमन की आवश्यकता इसीलिए और अधिक बढ़ जाती है।

निगमन तथा आगमन दोनों का लक्ष्य सत्य की स्थापना करना है। इस प्रयास में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। निगमनात्मक अनुमान सत्य की स्थापना के लिए आगमनात्मक अनुमान पर आश्रित रहता है। यह बात निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है –

(a) निगमन तर्कशास्त्र साधारणतः
आकारिक सत्यता से संबद्ध है। यदि निष्कर्ष निगमन तर्कशास्त्र के नियमों के अनुकूल है, तो इसमें आकारिक सत्यता रहती है। परन्तु, अनुमान में केवल आकारिक सत्यता (formal truth) से काम नहीं चल सकता। इसमें वास्तविक सत्यता (material truth) का होना भी आवश्यक है। इसके निष्कर्ष को यथार्थ घटनाओं से मेल खाना चाहिए। आगमन तर्कशास्त्र में वास्तविक सत्यता की प्राप्ति हमारा प्रमुख लक्ष्य रहता है। इसमें आकारिक सत्यता की उपेक्षा नहीं की जाती। यहाँ वास्तविक सत्यता के साथ-साथ आकारिक सत्यता की प्राप्ति के प्रयत्न किए जाते हैं। इस प्रकार, निगमन के साथ-साथ आगमन का उपयोग करने से संपूर्ण सत्यता की प्राप्ति संभव है।

(b) निगमन के आधार:
वाक्य आँख मूंदकर बिना किसी छानबीन के सत्य मान लिए जाते हैं और उनसे निष्कर्ष निकाले जाते हैं। ऐसे आधार-वाक्यों से विश्वसनीय निष्कर्ष नहीं प्राप्त हो सकते। आगमन तर्कशास्त्र में आधार-वाक्य निरीक्षण एवं प्रयोग द्वारा प्राप्त होते हैं। इन्हें यों ही सत्य नहीं मानलिया जाता।

(c) निगमन में निष्कर्ष इसके आधार:
वाक्यों में ही पहले से छिपा रहता है। ऐसा होने से अनुमान में नयापन की मात्रा कम हो जाती है। आगमन इस कमी को दूर करता है। इसके आधार-वाक्यों में निष्कर्ष निहित नहीं रहता। अनुभव द्वारा प्राप्त आधार-वाक्यों से प्राप्त निष्कर्ष में नयापन रहता है।

(d) निगमन द्वारा किसी सामान्य वाक्य या नियम की स्थापना नहीं होती। यह सामान्य वाक्य को पहले ही सत्य मानकर आगे बढ़ता है। यहाँ सामान्य से विशेष की ओर अथवा अधिक व्यापक से कम व्यापक की ओर जाते हैं। आगमन विशेष तथ्यों का अवलोकन करके सामान्य वाक्य या नियम की स्थापना करता है। इससे अनुमान या तर्क का महत्त्व अधिक हो जाता है।

(e) निगमन तर्कशास्त्र का कोई आधार नहीं दीख पड़ता। बिना आधार के इसका महत्त्व उतना अधिक नहीं रहता। आगमन के दो प्रकार के आधार (grounds) हैं – आकारिक आधार (formal grounds) और वास्तविक दोनों प्रकार की सत्यता पाई जाती है।

(f) निगमन में वैज्ञानिक नियमों का सहारा नहीं लिया जाता। इसीलिए इसके निष्कर्षों में वास्तविक सत्यता एवं प्रामाणिकता का अभाव रहता है। आगमन तर्कशास्त्र इस कमी को महसूस करते हुए प्रकृति-समरूपता नियम एवं कार्य-कारण नियम का सहारा लेता है। इसलिए इसके निष्कर्षों में विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता की मात्रा अधिक रहती है। किसी भी न्याय (syllogism) में निष्कर्ष की सत्यता उसके आधार-वाक्यों की सत्यता पर आधृत है। प्रश्न उठता है कि यह कैसे जाना जा सकता है कि आधार-वाक्य सत्य है। यदि निगमन के आधार पर आधार-वाक्य की सत्यता स्थापित की जाए तो हमारे चिंतन आकारिक मात्र रहता है और उसमें वास्तविक सत्यता का अभाव रहता है।

आगमन के आधार पर हमें वास्तविक सत्यता की प्राप्ति होती है। आगमन हमारे अनुभव पर निर्भर है। निगमन आगमन के बिना संभव प्रतीत नहीं होता। यहीं पर निगमन से आगमन में प्रवेश की आवश्यकता होती है। फ्रांसिस बेंकन आगमनात्मक विधि के प्रणेता माने जाते हैं। उनसे पूर्व अरस्तू ने निगमन को प्रतिपादित किया था। बेकन ने निगमन के आगमन में प्रवेश पर बल दिया, क्योंकि निगमन के सामान्य वाक्य आगमन से ही प्राप्त होते हैं। आगमन में वास्तविक सत्यता पर पहुँचने के लिए विशेष घटनाओं की जाँच की जाती है। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि निगमन के बाद आगमन की आवश्यकता रह ही जाती है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 11.
क्या स्वयंसिद्ध वाक्यों तथा निगमन के द्वारा वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना हो सकती है? वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना में आगमन की क्या भूमिका है?
उत्तर:
वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना स्वयंसिद्ध वाक्यों तथा निगमन के द्वारा नहीं हो सकती –

स्वयंसिद्ध (Axioms):
कुछ ही वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य स्वयंसिद्ध होते हैं। जैसे-‘कोई वस्तु एक ही समय और स्थान में दो विरोधात्मक गुणों को नहीं रख सकती है। यह वाक्य स्वयंसिद्ध है। ऐसे वाक्य के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अधिकांश वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य (real universal proposition) स्वयं सिद्ध नहीं होते। जैसे-‘पृथ्वी में आकर्षण शक्ति’, ‘पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है’ आदि। जो वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य स्वयं सिद्ध नहीं होते, उनकी स्थापना नहीं होती है। चूंकि अधिकांश वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य स्वयं सिद्ध नहीं होते, इसलिए उनकी स्थापना स्वयंसिद्ध वाक्यों द्वारा नहीं हो सकती।

निगमन (Deduction):
एक निगमनात्मक अनुमान का आधार-वाक्य दूसरे निगमनात्मक अनुमान का निष्कर्ष होता है। उदाहरणस्वरूप यदि हमें यह प्रमाणित करना है कि ‘सभी कवि मरणशील हैं तो निगमनात्मक अनुमान के द्वारा हम इसे इस तरह प्रमाणित कर सकते हैं –

सभी मनुष्य मरणशील हैं,
सभी कवि मनुष्य हैं,
∴ सभी कवि मरणशील हैं।

लेकिन अब प्रश्न उठता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ कैसे प्रमाणित होगा ? इसे हम दूसरे निगमनात्मक अनुमान द्वारा निम्नलिखित ढंग से प्रमाणित कर सकते हैं –

सभी जानवर मरणशील हैं,
सभी मनुष्य जानवर हैं,
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं।

फिर प्रश्न उठता है कि ‘सभी जानवर मरणशील हैं’ कैसे प्रमाणित होगा ? निगमनात्मक अनुमान के द्वारा यह इस तरह प्रमाणित होगा –

सभी जीव मरणशील हैं,
सभी जानवर जीव हैं,
∴ सभी जानवर मरणशील हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि निगमन में एक व्यापक वाक्य की स्थापना करने के लिए दूसरे अधिक व्यापक वाक्य का सहारा लेना पड़ता है और फिर दूसरे व्यापक वाक्य को स्थापित करने के लिए तीसरे अधिक व्यापक वाक्य का सहारा लेना पड़ता है। उपर्युक्त उदाहरणों में हम देखते हैं कि ‘सभी कवि मरणशील हैं’ को प्रमाणित करने के लिए इससे अधिक व्यापक वाक्य ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ की सहायता ली गई है। फिर ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ को प्रमाणित करने के लिए इससे अधिक व्यापक वाक्य ‘सभी जीव मरणशील हैं’ का सहारा लिया गया है।

इसी तरह यदि. ‘सभी जीव मरणशील हैं’ व्यापक वाक्य को प्रमाणित करना हो, तो हम परम व्यापक वाक्य ‘संसार की सभी वस्तुएँ नाशवान हैं’ का सहारा लेते हैं। फिर यदि यह प्रश्न उठे कि इस परम व्यापक वाक्य का क्या प्रमाण है, तो इसका उत्तर निगमनात्मक अनुमान द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस प्रकार हम पाते हैं कि सभी वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना निगमन के द्वारा नहीं हो सकती है।

आगमन की भूमिका (The role of Induction):
वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना स्वयंसिद्धि वाक्यों तथा निगमनात्मक अनुमान द्वारा नहीं हो सकती; आगमनात्मक अनुमान के द्वारा ही वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्यों की स्थापना हो सकती। आगमन में प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण कार्य नियम के आधार पर वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्यों की स्थापना होती है। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार प्रकृति का व्यवहार समान परिस्थिति में सदा समान होता है तथा कारण-कार्य नियम के अनुसार संसार में जो भी घटना घटित होती है उसका कुछ-न-कुछ कारण अवश्य होता है।

ये दोनों नियम आगमनात्मक अनुमान में प्रयुक्त होते हैं जिनके द्वारा आगमन विशेष घटनाओं के आधार पर वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करता है। कारण-कार्य नियम के अनुसार यदि ‘मृत्यु’ है तो उसका वास्तविक सर्वव्यापी कारण अवश्य होगा। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार प्रकृति का व्यवहार सदा समान रहता है यदि जीव है तो वह मरेगा अवश्य ही। आगमन में इन दोनों नियमों के आधार पर वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना की जाती है जिसकी सत्यता में कोई सन्देह नहीं रह जाता।

मानलिया कि हमें परम व्यापक वाक्य ‘संसार की सभी वस्तुएँ नाशवान हैं’ को प्रमाणित करना है। संसार की सभी वस्तुएँ समाप्त हो जाती हैं’ – यदि यह कार्य है तो इसका कारण अवश्य ही होना चाहिए। आगमनात्मक अनुमान के द्वारा कारण निर्धारित करने का जो तरीका है उससे यह निष्कर्ष निकलता है कि संसार में वस्तुओं का होना ही उनके समाप्त होने का कारण है। मनुष्य या किसी जीव का होना ही मर जाने का कारण है।

‘वस्तु’ और ‘नाशवान’ में कारण-कार्य का संबंध है-अर्थात् वस्तु है तो वह नाशवान होगी ही। ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य का संबंध है और यह संबंध भविष्य में भी रहेगा, क्योंकि प्रकृति समरूप है। चूंकि प्रकृति का व्यवहार समान परिस्थिति में समान होता है, यदि आज मनुष्य होना मर जाने का कारण है तो भविष्य में भी मनुष्य होना मर जाने का कारण होगा। इस तरह इन दोनों नियमों के आधार पर आगमनात्मक अनुमान के द्वारा वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्यों की स्थापना की जाती है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

Bihar Board Class 11 Psychology अभिप्रेरणा एवं संवेग Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
अभिप्रेरणा के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अभिप्रेरणा का संप्रत्यय इस बात पर प्रकाश डालता है कि किसी व्यक्ति के व्यवहार में गति कैसे आती है? किसी विशेष लक्ष्य की ओर निर्दिष्ट सतत व्यवहार की प्रक्रिया, जो किन्हीं अंतर्नाद शक्तियों का नतीजा होती है, उसे अभिप्रेरणा कहते हैं। अभिप्रेरणा के लिए प्रयुक्त अभिप्रेरक वे सामान्य स्थितियाँ होती हैं जिनके आधार पर विभिन्न प्रकार के व्यवहारों के लिये पूर्वानुमान लगा सकते हैं। इसी कारण अभिप्रेरणा को व्यवहारों का निर्धारक माना जाता है। मूल प्रवृत्तियाँ, अंतर्नाद, आवश्यकताएँ, लक्ष्य एवं उत्प्रेरक अभिप्रेरणा के विस्तृत दायरे में आते हैं।

किसी आवश्यक वस्तु का अभाव (भूख, प्यास, तृष्णा) या न्यूनता ही आवश्यकता कहलाते हैं। आवश्यकता अन्तर्नाद (आन्तरिक बल) को जन्म देती है। किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किए गए प्रयासों अथवा उत्पन्न तनाव या उद्वेलन को अन्तर्नाद रूपी बल की तरह प्रयोग करके लक्ष्य की प्राप्ति की जाती है। लक्ष्य मिलने के बाद आवश्यकता की तीव्रता शून्य हो जाती है, प्रयास घट जाता है। अर्थात् व्यक्ति सामान्य स्थिति में पहुँच जाता है।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग img 1
चित्र: अभिप्रेरणात्मक चक्र

जैसे-एक छात्र बरसात में कीचड़ भरे रास्ते से होकर पैदल विद्यालय चला जाता है। विद्यालय जाने की इच्छा जताने का कारण किसी प्रकार के लक्ष्य की पूर्ति करना है। ज्ञान प्राप्ति, मित्र से मिलना, घर के कामों से मुक्त होना, माता-पिता को खुश करना आदि में से किसी लक्ष्य की प्राप्ति इच्छा से एक आंतरिक बल का आभास होता है जिसके प्रभाव में छात्र विद्यालय जाने को तत्पर हो जाता है। जहाँ क्रियाशील आंतरिक बल को ही अभिप्रेरणा मान सकते हैं।

अर्थात् अभिप्रेग्णा एक आन्तरिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के व्यवहार को अभीष्ट दिशा या गति के साथ बदलने के लिए शक्ति प्रदान करता है तथा किसी विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति की ओर व्यक्ति के व्यवहार को मोड़ने का कार्य करता है। भूखे के द्वारा भोजन खोजने के लिए, प्यासे को पानी नीचे के लिए जो आन्तरिक बल उकसाता है, प्रोत्साहित करता है, उसे अभिप्रेरणा मान सकते हैं। जीवन में अधिकांश व्यवहारों की व्याख्या अभिप्रेरणा या अभिप्रेरकों के आधार पर की जाती है। अभिप्रेरक व्यवहारों का पूर्वानुमान करने में भी सहायता करते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 2.
भूख और प्यास की आवश्यकताओं के जैविक आधार क्या हैं?
उत्तर:
किसी भी प्राणी की आवश्यकताएँ अंतर्नाद उत्पन्न करती है। व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति कुछ कार्य करने के अंत:प्रेरण को प्रदर्शित करता है। मूल प्रवृत्ति का एक बल यह आवेग होता है जो प्राणी को कुछ ऐसी क्रिया करने के लिए चालित करता है जो उस बल या आवेग को कम कर सके। भूख और प्यास दो प्रमुख जैविक आवश्यकताएँ हैं।

भूख:
जीवधारियों के शरीर में किसी चीज की कमी को आवश्यकता कहा जाता है। जीवन रक्षा तथा शक्ति संचार के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन की आवश्यकता को भूख का कारण माना जा सकता है। भूख लगने पर व्यक्ति को भोजन प्राप्त करने तथा उसे खाने के लिए अभिप्रेरणा करती है। भूख के उद्दीपकों में अमाशय का संकुचन, ग्लुकोज की सान्द्रता में कमी, वस्त्र के स्तर में गिरावट, ईंधन की कमी के प्रति यकृत की प्रतिक्रिया अहम भूमिका अदा करते हैं। यकृत के उपाचचयी क्रियाओं में होने वाला परिवर्तन को भूख की अनुभूति कराने वाला माना जाता है। भोज्य पदार्थों की उपलब्धता, रंग, स्वाद, उपयोग आदि भूख की तीव्रता बढ़ाने वाले कारक माने जाते हैं। हमारी भूख अधश्चेतक में स्थित पोषण तृप्ति की जटिल व्यवस्था, यकृत और शरीर के कुछ अन्य अंगों तथा परिवेशीय कारकों के द्वारा नियंत्रित होती है।

पाश्विक अधश्चेतक भूख संदीपन को समझता है जबकि मध्य अधश्चेतक भूख के अंतर्नाद को विरुद्ध बनाकर भूख को नियंत्रित रखता है। अतः सारांशतः यह माना जा सकता है कि भूख को शान्त करके हम जीवन की सुरक्षा के साथ संतुलित शरीर के लिए आवश्यक तत्त्वों को ग्रहण करके भूख के कारण होनेवाले कष्ट को मिटा पाने में समर्थ होते हैं। प्यास-शरीर को जब पानी की आवश्यकता महसूस होती है तो हम प्यास का अनुभव करते हैं। प्यास को जन्मजात प्रेरक माना जा सकता है।

प्यास लगने पर हमारा मुँह और गला सूखने लगता है और शरीर के उत्तकों में निर्जलीकरण की अवस्था आ जाती है। इन कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए प्यास बुझाने के लिए पानी पीना आवश्यक हो जाता है। पानी नहीं पीने से कोशिकाओं से.पानी का क्षय होना जारी हो जाता है तथा रक्त में पानी का अनुमान लगाकर घटने लगता है। पानी पी लेने के परिणामस्वरूप आमाशय में उत्पन्न उद्दीपन रुक जाता है, परसारग्राही के द्वारा निर्जलीकरण नियंत्रित हो जाता है। प्यास की अवस्था में कोई भी व्यक्ति अधिक कार्यशील बन जाता है। लार का अभाव उसे बेचैन कर देते हैं। अर्थात् प्यास की जैविक आवश्यकता के रूप में संतोषप्रद जीवन जीने के साथ-साथ निर्जलीकरण से मुक्ति के लिए उपाय ढूँढ़ना है। शरीर के उत्तकों को स्वाभाविक कार्य करते रहने के योग्य बनाया जाता है।

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प्रश्न 3.
किशोरों के व्यवहारों को उपलब्धि, संबंधन तथा शक्ति की आवश्यकताएँ कैसे प्रभावित करती हैं? उदाहरणों के साथ समझाइये।
उत्तर:
बाल्यावस्था तथा प्रौढ़ावस्था के मध्य का संक्रमण काल (11 से 21 वर्ष तक की उम्र) किशोरावस्था कहलाता है। इसे जैविक तथा मानसिक दोनों ही रूप से तीव्र परिवर्तन की अवधि माना जाता है। इस अवस्था की एक मुख्य विशेषता मौन परिपक्वता है। यह भी माना जाता है कि किशोर के विचार अधिक अमूर्त, तर्कपूर्ण एवं आदर्शवादी होते हैं। प्रयत्न-त्रुटि उपागम के विपरीत समस्या समाधन करने में किशोरों का चिंतन अधिक व्यवस्थित होता है। किशोर वैकल्पिक नैतिक संहिता को भी जानते हैं। किशोरों के व्यवहारों में लचीलापन, प्रदर्शन, प्रतियोगिता जैसी भावनाओं का प्रभाव देखने को मिलता है। किशोरों के व्यवहारों को उपलब्धि, संबंधन तथा शक्ति की आवश्यकताओं को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

1. उपलब्धि अभिप्रेरक:
उत्कृष्टता के मापदंड को प्राप्त कर लेने की आवश्यकता उपलब्धि अभिप्रेरक कहलाते हैं। किशोर अपने माता-पिता, मित्र, पड़ोसी, शुभचिंतक जैसे व्यवहार-निपुण लोग से प्रेरित होकर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव का उपयोग करके व्यवहारों का अर्जन तथा निर्देशन की युक्ति सोखते हैं। उपलब्धि को पाने के लिए किशोर चुनौती भरे कठिन कार्यों को भी पूरा कर लेना चाहते हैं। जैसे-वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए किशोर अध्ययन के विकास के लिए तरह-तरह के प्रस्तावों का अध्ययन करते हैं, साथियों से सहयोग माँगते हैं।

माता-पिता से उचित परामर्श तथा आर्थिक सहयोग चाहते हैं। कई समस्याओं से घिरे होने पर भी किशोर अपने संकल्प की दृढ़ता का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते हैं। अंत में वे वर्ग में प्रथम स्थान पाकर स्वयं तो खुश होते ही हैं और वे प्रशंसा के शब्द भी सुनते हैं। अर्थात् किशोर अपने व्यवहारों में किसी भी तरह का परिवर्तन स्वीकारते हैं जिससे उनका लक्ष्य उपलब्धि के रूप में उन्हें अवश्य मिल जाए।

2. संबंधी:
समूहों का निर्माण मानव व्यवहार की एक विशेषता होती है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किशोर का प्रयास किस प्रकार से संबंध बनाना होता है। किशोर कभी भी अकेला रहना पसंद नहीं करता है। सच तो यह है कि दूसरों को चाहना तथा भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक रूप से उनके निकट आने की चाह को संबंधन माना जाता है। संबंधन में सामाजिक सम्पर्क की अभिप्रेरणा अंतनिर्हित होती है। संबंधन की आवश्यकता उस समय उद्दीपन कहलाती है जब कोई किशोर अपने को खतरे में अथवा असहाय अवस्था में पाता है। कभी-कभी अपनी खुशी को प्रकट करने केलिए भी संबंधन की आवश्यकता महसूस करते हैं।

किशोरों को ऐसे अवसर आते हैं जब वे मित्रातापूर्ण संबंधन के महत्त्व मानते हैं। जैसे, मोटरसायकिल से गिरने के बाद उसे मानव सहायता की आवश्यकता होती है। नौकरी पाने के लिए सही स्थान या मार्गदर्शन बतलाने वाले मित्रों की आवश्यकता होती है। सफलता के कारण मिलने वाले पदक को दिखलाने या अपनी कविता को सुनाने हेतु मित्रों की याद आती है। किसी भी कठिन परस्थितियों (चोर, आतंकवादी, चेकिंग) में किशोर संबंधन का उपयोग करना चाहता है।

3. शक्ति अभिप्रेरक:
शक्ति की आवश्यकता व्यक्ति की वह योग्यता है जिसके कारण वह दूसरों के संवर्गों तथा व्यवहारों पर अभिप्रेत प्रभाव डालता है। डेविड मैकक्लीलैंड ने शक्ति अभिप्रेरक की अभिव्यक्ति के चार सामान्य बताए हैं –

(क) शक्ति पर बाहरी स्रोतों का प्रभाव
(ख) शक्ति पर व्यक्ति को आंतरिक क्षमता का प्रभाव
(ग) शक्ति के प्रयोग में प्रदर्शन की झलक
(घ) संगठन के द्वारा शकित प्रदर्शन का प्रभाव अर्थात् किशोर अपनी शक्ति को समझने के लिए बाहरी साधनों का उपयोग करता है।

जैसे, पत्र-पत्रिकाओं में छपे स्तंभों के पढ़कर किसी लोकप्रिय व्यक्ति के सम्बन्ध में सब कुछ जान लेना चाहता है। कभी-कभी किशोर शारीरिक गठन करके अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना चाहता है। इसमें किशोरों को भावना या संवेग पर नियंत्रण रखना के समीप होता है। प्रतियोगिता, खेल, परीक्षा, इन्टरव्यू, राजनीतिक दल जैसी विभिन्न स्थितियों में किशोर अपनी योग्यता, समझ अथवा निर्णय को सर्वश्रेष्ठ बनाना चाहता है ताकि लोग उससे प्रभावित हो जाएँ। अर्थात् किशोरों के व्यवहार में नया मोड़ लाने के लिए उपलब्धि (जैसे-एम. ए. की डिग्री), संबंधन (मित्र या शुभचिंतक) और शक्ति, (प्रभाव और प्रदर्शन) की आवश्यकता वांछनीय प्रतीत होती है।

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प्रश्न 4.
मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम के पीछे प्राथमिक विचार क्या हैं? उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
‘भूखे भजन न होय गोपाला’ अर्थात् भोजन की तुलना में भजन निरर्थक है चाहे वह कितना भी गरिमामयी क्यों न हो। मैस्लो ने भी आवश्यकताओं को महत्त्व के आधार पर श्रेणीबद्ध करके बतलाना चाहा है कि जीवन निर्वाह के लिए मूल शरीर क्रियात्मक मूल आवश्यकता है। मैस्लो का पिरामिड संप्रतययित रूप है एक लोकप्रिय मॉडल का जिसमें पदानुक्रम के तल में मूल जैविक आवश्यकताओं को जगह मिली है।
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चित्र: अभिप्रेरणात्मक चक्र

मैक्लो (1968, 1970) ने मानव व्यवहार को चित्रित करने के लिए आवश्यकताओं को एक पदानुक्रम में व्यवस्थित किया है। आवश्यकताओं की व्यवस्था से पता चलता है कि मानव अपने स्वभाव से महत्त्वाकांक्षी होता है। भूख समाप्त होते ही वह सुरक्षा की चिन्ता करने लगता है। सुरक्षा की उचित व्यवस्था पाकर वह शुभचिंतकों का समूह पाना चाहता है। इसके बाद सम्मान और आत्मसिद्धि की इच्छा जागती है। मैस्लो के पदानुक्रम के पीछे प्राथमिक विचार बहुत ही स्वाभाविक है। पदानुक्रम में व्यवस्थित निम्न स्तर की आवश्यकता जब नहीं हो जाती तब तक कोई व्यक्ति उच्चस्तरीय आवश्यकता की ओर सोचता तक नहीं है। किसी आवश्यकता की पूर्ति से ज्योंहि व्यक्ति संतुष्ट हो जाता है, क्योंकि उच्चस्तरीय आवश्यकता उसकी चिंता का कारण बन जाती है।

जैसे, भूखे व्यक्ति को रडियो नहीं चाहिए, क्योंकि वह तो रोटी की खोज में व्यस्त है। खा-पीकर जब आदमी संतुष्ट हो जाता है तो उसे मनोरंजन, नाच-गाना सभी कुछ अच्छा लगने लगता है। एक व्यक्ति टमटम चलाता है। सबसे पहले उसे यात्री मिलने की चिन्ता रहती है। ज्योहि उसे एक साथ पाँच यात्री मिल जाते हैं तो वह घर से मिलने के बारे में सोचने लगना है। घर के बच्चे के लिए मिठाई का चयन उसे परेशान कर देते हैं। जब मिठाई लेकर घर पहुँचता है तो किवाड़ नहीं बंद हो सकने की चिन्ता हो जाती है। अत: उसकी चिन्ता बदलती रहती है लेकिन वह पूर्णतः समाप्त नहीं हो पाती है।

प्रश्न 5.
क्या शरीर क्रियात्मक उद्वेलन सांवेगिक अनुभव के पूर्व या पश्चात घटित होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक एवं परिष्कृत उपकरणों की सहायता से शरीर क्रियात्मक परिवर्तनों (क्रोध से शरीर का काँपना, पसीना निकलना, हृदय गति का तेज होना) का यथार्थ मापन किया जा सकता है जो संवेग की शरीर क्रियात्मक सक्रियकरण की श्रृंखला पर निर्भर करता है, जिसमें चेतक, अधश्चेतक, उपवल्कुटीय व्यवस्था का प्रमस्तिष्कीय वल्कुट महत्त्वपूर्ण रूप से अंतर्निहित हो जाते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी विचार या घटना के बारे में सोचते ही उत्तेजित या क्रुद्ध होते हैं तो उसकी हृदय गति बढ़ जाती है। मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में चयनात्मक सक्रियकरण, भिन्न-भिन्न संवेगों का उद्वेलन प्रदर्शित करता है।

जेम्स लांजे सिद्धांत के अनुसार पर्यावरणी उद्दीपक हृदय या फेफड़े जैसे आंतरिक अंग में शरीर क्रियात्मक अनुक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं जो पेशीय गति से सम्बद्ध होते हैं। जैसे अचानक तीव्र शोर या उच्च तीव्रता वाली ध्वनि सुनने के साथ ही अंत- संगी तथा पेशीय अंगों में सक्रियकरण उत्पन्न हो जाता है जिसका अनुसरण संवेगात्मक उद्वेलन करता है। जेम्स लांजे का तर्कना कि शारीरिक परिवर्तनों का व्यक्ति द्वारा किया गया प्रत्यक्षण (साँस का तेज होना, अंगों का हिलना) संवेगात्मक उद्वेलन उत्पन्न करता है। अर्थात् विशिष्ट घटनाएँ या उद्दीपक विशिष्ट शरीर क्रियात्मक परिवर्तनों के उत्तेजित करती है जो प्रत्यक्षण और संवेगों की अनुभूति से ताल-मेल करता है।

कैननबार्ड सिद्धांत के अनुसार संवेगों की सारी प्रक्रिया की मध्यस्थता चेतक के द्वारा की जाती है जो कि संवेग उद्दीपक करने वाले उद्दीपकों के प्रत्यक्षण के पश्चात् यह सूचना सहकालिक रूप से प्रमस्तिष्कीय वल्कुट, कंकाल पेशियों तथा अनुरूपी तंत्रिका तंत्र को देता है। इसके बाद प्रत्यक्षित अनुभव की प्रकृति का पता लगाया जाता है। स्वायत्त तंत्रिका के द्वारा शरीर की क्रियात्मक उद्वेलन उत्प्रेरित होता है। आजकल जेम्स-लांजे सिद्धांत की अपेक्षा कैननबार्ड सिद्धांत पर ज्यादा विश्वास किया जाता है। कैननबार्ड सिद्धांत के अनुसार अत: अनुकंपी एवं परानुकंपी तंत्र यद्यपि परस्पर विरोधी तरीके से कार्य करते हैं, किन्तु वे संवेगों के अनुभव और अभिव्यक्ति की प्रक्रिया को पूरा करने में परस्पर पूरक हैं।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग img 1
चित्र: कैनन-बार्ड का संवेग सिद्धांत

अर्थात् अन्ततः यही सच है कि संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार साथ-साथ होता है। कैननबार्ड ने भी माना है कि सबसे पहले संवेगात्मक उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण, उसके बाद संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार दोनों साथ-साथ होता है। स्टैनली शैक्टर तथा जेरोम सिंगार ने संवेगों के द्विकारक सिद्धांत के माध्यम से माना है कि हमारे संवेगों में शरीर क्रियात्मक समानता होती है, क्योंकि हृदय तभी धड़कता है जब हम भयभीत होते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 6.
क्या संवेगों की चेतन रूप से व्याख्या तथा नामकरण करना उनको समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है? उपयुक्त उदाहरण देते हुए चर्चा कीजिए।
उत्तर:
हमारे संज्ञान अर्थात् हमारे प्रत्यक्षण, स्मृतियाँ एवं व्याख्याएँ हमारे संवेग के आवश्यक हैं। संवेग और उसके कारण और प्रभाव का पता बताने के लिए संवेगात्मक क्रिया-कौशल की व्याख्या संवेगों को स्पष्टतः समझने में सहायक होता है। स्टैनली शैक्टर तथा जेरोम सिंगर ने शारीरिक और संज्ञानात्मक संवेगों का अध्ययन कर बताया कि संवेगों की अनुभूति हमारे तात्कालिक उद्वेलन के प्रति जागरुकता के द्वारा उत्पन्न होती है। उन दोनों का मत है कि किसी संवेगात्मक अनुभव के लिए उद्वेलन की चेतना व्याख्या की आवश्यकता होती है।

माना कोई व्यक्ति किसी कविता की रचना करके श्रोता को संगीत-स्वर में सुनाता है। वह अपनी करनी से बहुत खुश और गौरवान्वित है। इसी क्रम में कोई श्रोता उसके प्रयास को फूहर प्रदर्शन कह डाला। व्यक्ति, श्रोता और आलोचना के बीच संवेगात्मक दशा में अंतर आना स्वाभाविक है। हमें इसके कारण, प्रभाव और परिणाम की स्पष्ट जानकारी के लिए सम्पूर्ण घटना की विस्तृत व्याख्या करनी चाहिए।

इसी आवश्यकता अथवा प्रयास के सम्बन्ध में शैक्टर तथा सिंगर (1962) ने प्रतिभागियों को उच्च स्तर का उद्वेलन उत्पन्न करने वाली दवा ‘एपाइनफ्राइन’ की सूई देकर उसे दूसरे से व्यवहारों का प्रेक्षण करने को कहा गया। प्रेक्षण के क्रम में उल्लासोन्माद को व्यक्त करने वाला रद्दी को टोकरी पर कागज फेंक कर अपनी खुशी को व्यक्त किया तथा दूसरा क्रोध का प्रदर्शन करते हुए पैर पटकते हुए कमरे से बाहर निकल गया। इस तरह का व्यवहार संवेगों की चेतना व्याख्या का अवसर जुटा दिया।

संवेगों का नामकरण-कुछ मूल संवेग (भूख, प्यास) सभी लोगों में समान रूप से अभिव्यक्ति का अवसर देता है। चाहे व्यक्ति किसी उम्र, जाति या श्रेणी का हो किन्तु कुछ संवेग विशिष्ट होते हैं। विशिष्ट संवेगों के लक्षणों पर पर्यावरण, स्थान, समझ तथा संस्कार का प्रभाव मिलता है। जैसे-सुख, दुख, प्रसन्नता, क्रोध, घृणा आदि को मूल संवेग और आश्चर्य, अवमानना, शर्म तथा अपराध को विशिष्ट संवेग के रूप में जाना जाता है। क्योंकि भारत में जिस क्रिया के लिए शर्म या आश्चर्य प्रकट किया जाता है, अमेरिका में उसे आधुनिकता मान-लिया जाता है।

संवेगों के स्वरूप की सही पहचान के लिए उनका नामकरण वांछनीय है। जैसे–पत्र-पत्रिकाओं से लगभग दो सौ चित्रों को काटकर उन्हें कूट पर चिपका कर चित्रकार्ड का रूप दे दिया गया। अब उन्हें अलग-अलग संवेगों पर आधारित चित्रों का समुच्चय बना लिया गया। माना हँसता हुआ 20 कार्ड, रोता हुआ 50 कार्ड, क्रोध का मुद्रा वाला 80 चित्र तथा अन्यान्य मुद्रा वाले शेष चित्रों का समूह बनाकर संचित कर लिया गया। अब हमें किस समूह की आवश्यकता है उसे बिना नामकरण का कैसे व्यक्त करना संभव है। अर्थात् संवेगों की चेतन रूप से व्याख्या तथा नामकरण करना उन्हें समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

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प्रश्न 7.
संस्कृति संवेगों की अभिव्यक्ति को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
संवेगों की अभिव्यक्ति में पूरी शक्ति से प्रभाव डालती है। चूंकि संवेग एक आन्तरिक अनुभूति होती है, अतः संवेगों का अनुमान वाचिक तथा अवाचिक अभिव्यक्तियों के द्वारा ही होती है। वाचिक तथा अवाचित अभिव्यक्तियाँ संचार माध्यम का कार्य करती हैं। संचार के वाचिक माध्यम में स्वरमान और बोली का ऊँचापन, दोनों सन्निहित होते हैं।

अवाचिक माध्यकों में चेहरे का हाव-भाव, मुद्रा, भंगिमा तथा शरीर की गति तथा समीपस्थ व्यवहार शामिल रहते हैं। चेहरे के हाव-भावों से होने वाली अभिव्यक्ति सांवेगिक संचार का सबसे अधिक प्रचलित माध्यम है। व्यक्ति के संवेगों का सुखद या दुखद होना, क्रोधित होना, काफी खुश रहना, गौरव महसूस करना, आदि चेहरे को देखकर समझा जा सकता है। भूख द्वारा अभिव्यक्तियों में हर्ष, भय, क्रोध, विरुचि, दुख तथा आश्चर्य आदि जन्मजात तथा सार्वभौम होती है।

शारीरिक गति अर्थात् हाथ:
पैर हिलाना, संवेगों के संचार को अधिक सरल बना देती है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य शरीर की गति के माध्यम से अपनी भावनाओं को सरलता से पेश करने में समर्थ होता है। संवेगों में अन्तर्निहित प्रक्रियाएँ संस्कृति द्वारा काफी प्रभावित होती हैं। स्मृति शोध, मुख की अभिव्यक्ति, जटिलता से मुक्त प्रदर्शन आदि संवेगों का स्वाभाविक चित्र दिखाते हैं। संवेग के आत्मनिष्ठ अनुभव तथा प्रकट अभिव्यक्ति के बीच मुख का प्रदर्शन एक कड़ी का काम करता है।

संवेगों की अभिव्यक्ति में अन्य अवाचिक माध्यमों का प्रभावों भी असरदार होती है। जैसे-टकटकी लगाकर देखने, तरह-तरह की चेष्टा (शारीरिक भाव) का प्रदर्शन, पराभाषा तथा समीपस्थ व्यवहार इत्यादि के माध्यम से भी संवेगों की अभिव्यक्त की जा सकती है। चीन में ताली बजाना आकुलता या निराशा का सूचक है तथा क्रोध को विचित्र हँसी के द्वारा व्यक्त किया जाता है। भारत में मौन रहकर गहरे संवेग को अभिव्यक्ति किया जाता है। संवेगात्मक आदान-प्रदान के दौरान, शारीरिक दूरी (सान्निध्य) विभिन्न प्रकार के संवेगात्मक अर्थों को व्यक्त करती है।

जैसे- भारत के लोग खुशी जाहिर करने के लिए गले मिलते हैं। स्पर्श से संवेगात्मक उष्णता का बोध होता है। कभी विमुखता महसूस करने वाला व्यक्ति दूर से ही अंतःक्रिया करना चाहता है। सारांशतः माना जा सकता है कि संवेगों की अभिव्यक्ति में संस्कृति का प्रबल योगदान है। यह सच है कि संस्कृति की भिन्नता के कारण स्थान बदलने से उनके अर्थ एवं विधियाँ बदल जाते हैं। संवेगों की अभिव्यक्ति मुख, संकेत, हाव-भाव तथा शारीरिक क्रिया के माध्यम से सरलता से संभव होता है। जैसे-कृपया कहने वाला, गाली देने वाले से अलग-संवेग का प्रदर्शन करता है।

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प्रश्न 8.
निषेधात्मक संवेगों का प्रबंधन क्यों महत्त्वपूर्ण है? निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन हेतु उपाय सुझाएँ।
उत्तर:
संवेग हमारे दैनिक जीवन तथा अस्तित्व के अंश हैं एवं संवेग एक सांतात्मक के प्रमुख हिस्सा बनकर हमें तरह-तरह के अनुभवों से परिचित कराता है। दैनिक जीवन में कई द्वन्द्वात्मक दशाओं तथा कठिन और दबावमय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। भय, दुश्चिता, विरुचि जैसी प्रवृत्ति उत्पन्न होकर निषेधात्मक संवेग के घनत्व को बढ़ा देती है।

यदि निषेधात्मक संवेगों को लम्बी अवधि तक किनारों के अनवरत चलते रहने दिया जाए, तो सम्बन्धित व्यक्ति के शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। हीनता की भावना, द्वेष, क्रोध, चिड़चिड़ापन, रक्तचाप, भोजन से अरुचि जैसी विषय तथा कष्टदायक स्थिति उत्पन्न होने लगती है। संवेगों के उत्तम प्रबंधन के द्वारा निषेधात्मक संवेगों में कमी तथा विध्यात्मक संवेगों (भरोसा, आशा, खुशी, सर्जनात्मकता, साहस, उमंग, उल्लास) में वृद्धि लाने का प्रयास करना प्रमुख लक्ष्य माना जाता है।

क्रोध, भय, दुश्चिता, असमर्थता, हीनता की भावना जैसे निषेधात्मक संवेगों से मौन मुक्ति तथा क्रियाकलापों को आशा, उत्साह, खुशी, उमंग आदि से जोड़कर पूरा कर लेने की प्रवृत्ति का सराहनीय विकास निषेधात्मक संवेगों से उत्पन्न होने वाले शारीरिक एवं मानसिक विकारों से यथासंभव मुक्ति मिल सकती है। आजकल सफल संवेग प्रबंधन को प्रभावी सामाजिक प्रबंधन का मुख्य आधार माना जा रहा है ताकि समाज में मनोविकार वाले व्यक्तियों की संख्या में होने वाली वृद्धि को रोका जा सके।

निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन हेतु उपाय-निषेधात्मक संवेगों में कमी तथा विध्यात्मक संवेगों में वृद्धि करके वांछित प्रबंधन को सुपरिणामी और सार्थक स्वरूप प्रदान किया जा सकता है जिसके लिए निम्नलिखित युक्तियाँ सफल हो सकती हैं –

1. आत्म-जागरुकता में वृद्धि:
किसी भी परिस्थिति को समझकर उससे संबंधित धनात्मक या ऋणात्मक प्रभावों को जानने तथा उसके प्रति अनुकूलता प्रदर्शित करने के लिए सदा जागरुक रहना खतरा से मुक्ति दिलाने में तथा संभावित लाभप्रद परिणामों के सदुयोग में सरल मार्ग मिल जाता है।

2. परिस्थिति की सम्पूर्ण पहचान:
कोई परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई, इसका क्या-क्या प्रभाव पड़ सकता है, इसका उपयोग किस स्थिति में लाभप्रद या हानिकारक होगा जैसे जिज्ञासु प्रश्नों के. सही उत्तर जानकर उत्पन्न परिस्थिति का डटकर मुकाबला करने की प्रवृत्ति को बढ़ाना चाहिए।

3. आत्म-परीक्षण:
व्यक्ति को अपनी दक्षता, कौशल या योग्यता का सही अनुमान होना चाहिए। अपने विचारों तथा कला-कौशल को पहचानकर उसके सही प्रयोग की ओर उचित ध्यान देने से ऋणात्मक प्रभाव से मुक्ति मिल सकती है।

4. ऋणात्मक प्रवृत्तियों से मुक्ति:
अपने आपको आत्मग्लानि, भय, चिंता, अवसाद जैसी भावनाओं से मुक्त रखकर सृजनात्मक कार्यों में जुट जाइए। अपनी रुचि या शौक के अनुसार किसी अच्छे कार्य का चयन करके उसे पूरा करने में व्यस्त रहिए।

5. शुभचिंतकों की संख्या में वृद्धि:
अपनी भाषा एवं व्यवहार से लोगों को प्रभावित करके उन्हें शुभचिंतकों की श्रेणी में लाकर लाभ उठाने का प्रयास कीजिए।

6. उत्तम आदत:
पूजा, व्यायाम, निद्रा, सफाई, भोजन आदि से संबंधित अच्छी आदतों को अपनाकर शेष व्यक्तियों के लिए आदर्श बन जाइए। लोगों की प्रशंसा, खुशामद, श्रद्धा के कारण आपका मनोबल बढ़ेगा और आपकी सोच सर्जनात्मक हो जाएगी।

निषेधात्मक संवेगों के कुप्रभाव से बचाने के लिए सबसे सरल उपाय है कि किसी भी प्रभाव को आप स्वाभाविक क्रिया मानकर स्वीकार कीजिए। यह मानकर चलिए कि बहुत से लोग हैं जो हारते हैं, बहुतों के घर में चोरी हुई है। आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुए सहयोग, परोपकार, दया, कर्मठता, चिंतन आदि को अपने जीवन में जगह देकर आप अपनी जिन्दगी को गति दे सकते हैं। जमाना बदल रहा है, आप भी बदलिये। किसी को दोषी मानने के पहले, अपनी गलतियों को पहचानिये। अभ्यास और चिंतन समस्याओं से निबटने का महामार्ग है।

Bihar Board Class 11 Psychology अभिप्रेरणा एवं संवेग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रेरणा से उत्पन्न व्यवहार कब तक जारी रहता है?
उत्तर:
प्रेरणा से उत्पन्न व्यवहार प्रोत्साहन की प्राप्ति तक जारी रहता है।

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प्रश्न 2.
प्रेरणा प्राणी की किस प्रकार की अवस्था है?
उत्तर:
प्रेरणा प्राणी की आन्तरिक अवस्था है जो व्यक्ति को व्यवहार करने के लिए शक्ति प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
प्रेरणा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रेरणा एक आन्तरिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति को व्यवहार करने के लिए शक्ति प्रदान करती है तथा किसी विशेष उद्देश्य की ओर व्यवहार को ले जाती है।

प्रश्न 4.
प्रेरण-चक्र क्या है?
उत्तर:
आवश्यकता-प्रणोदन और प्रोत्साहन-सूत्र को प्रेरण-चक्र कहते हैं।

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प्रश्न 5.
प्रेरणा की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर:
प्रेरणा की उत्पत्ति आवश्यकता से होती है।

प्रश्न 6.
संवेग की उत्पत्ति किस ढंग से होती है?
उत्तर:
संवेग की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक ढंग से होती है।

प्रश्न 7.
संवेग में क्या सन्निहित होता है?
उत्तर:
संवेग में चेतन अनुभव व्यवहार और अन्तरावयव संबंधी कार्य सन्निहित होता है।

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प्रश्न 8.
संवेग की क्या विशेषता होती है?
उत्तर:
संवेग सतत होता है, संवेग सम्पूर्ण रूप से होता है, संवेग संचयी होता है तथा संवेग का स्वरूप प्रेरणात्मक होता है।

प्रश्न 9.
संवेग का कौन सिद्धांत है जिसमें हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र माना गया है?
उत्तर:
कैनन-बार्ड ने अपने सिद्धांत में हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र माना है।

प्रश्न 10.
वाटसन ने किस संवेग को मौलिक माना है?
उत्तर:
वाटसन ने क्रोध, भय और प्रेम को मौलिक संवेग माना है।

प्रश्न 11.
विलियन जेम्स और कार्ल कहाँ के निवासी थे?
उत्तर:
विलियन जेम्स अमेरिका तथा कार्ल लाँजे डेनमार्क के निवासी थे।

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प्रश्न 12.
संवेग के जेम्स-लांजे सिद्धांत के विरोध में किस सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ है?
उत्तर:
संवेग के जेम्स-लांजे सिद्धांत के हाइपोथैलेमिक सिद्धांत का प्रतिपादन कैनन-बार्ड ने किया है।

प्रश्न 13.
जेम्स-लाँजे के अनुसार संवेग का क्रम क्या है?
उत्तर:
जेम्स-लाँजे के अनुसार सबसे पहले संवेगात्मक उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण, उसके बाद शारीरिक परिवर्तन और अन्य में संवेगात्मक अनुभूति होती है।

प्रश्न 14.
कैनन-बार्ड के अनुसार संवेग का क्रम क्या है?
उत्तर:
कैनन-बार्ड के अनुसार सबसे पहले संवेगात्मक उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण, उसके बाद संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार दोनों साथ-साथ होता है।

प्रश्न 15.
प्रो. मैस्लो द्वारा आवश्यकता के सम्बन्ध में दिये गये विचार को बतायें।
उत्तर:
प्रो. मैसलो ने आवश्यकता पर अधिक बल दिया। उसने आवश्यकता की तीव्रता को आधार बनाया है। उनके अनुसार कुछ आवश्यकताएँ ऐसी होती हैं जिन्हें तुरंत पूरा करना होता है। कुछ आवश्यकताएँ ऐसी होती हैं जो फुर्सत से पूरी की जा सकती है।

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प्रश्न 16.
प्रो. मैस्लो ने अभिप्रेरकों को कितने भागों में बाँटा है?
उत्तर:
प्रो. मैस्लो ने अभिप्रेरकों को दो भागों में बाँटा है-जन्मजात अभिप्रेरक और अर्जित अभिप्रेरक।

प्रश्न 17.
प्रेरकों का द्वन्द्व क्या है?
उत्तर:
प्रेरकों का द्वन्द्व का अर्थ उस अवस्था से है जिसमें दो से अधिक बेमेल व्यवहार प्रकट होते हैं जो एक समय में पूर्ण रूप से संतुष्टि नहीं पा सकते।

प्रश्न 18.
प्रेरणा की विफलता क्या है?
उत्तर:
मनुष्य को कभी-कभी विलम्ब से लक्ष्य की प्राप्ति होती है। कभी-कभी अपने बहुत प्रयासों के बाद भी व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति नहीं कर पाता है। इसे ही प्रेरणा की विफलता कहते हैं।

प्रश्न 19.
सम्प्रत्यय क्या है?
उत्तर:
सम्प्रत्यय व्यक्ति के मानसिक संगठन में एक प्रकार का चयनात्मक तंत्र है जो पूर्व अनुभूतियों तथा वर्तमान उत्तेजना में एक संबंध स्थापित करता है।

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प्रश्न 20.
संचार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
भाषा, संकेत एवं चिह्नों आदि के माध्यम से अपने चिंतन एवं विचार को दूसरों तक पहुँचाने एवं दूसरों के चिंतन एवं विचार से अवगत होना ही संचार है।

प्रश्न 21.
अन्तर्नाद या प्रणोदन क्या हैं?
उत्तर:
अन्तर्नोद या प्रणोदन एक ऐसी अवस्था है, जिससे प्राणी में क्रियाशीलता आती है और उसका व्यवहार एक निश्चित दिशा की ओर क्रियाशील हो जाता है।

प्रश्न 22.
प्रेरणा में प्रोत्साहन क्या है?
उत्तर:
प्रोत्साहन एक बाह्य लक्ष्य या वस्तु है, जिससे ऐसी उत्तेजना प्राप्त होती है जो प्राणी को लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है और जिससे आवश्यकताओं की संतुष्टि होती है।

प्रश्न 23.
प्रेरणा कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
अभिप्रेरकों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-जन्मजात अभिप्रेरक तथा अर्जित अभिप्रेरक।

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प्रश्न 24.
जैविक अभिप्रेरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
जैविक या जन्मजात अभिप्रेरक वैसे अभिप्रेरक को कहा जाता है जो प्राणी में जन्म के समय से ही वर्तमान रहता है।

प्रश्न 25.
सामाजिक या अर्जित अभिप्रेरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
सामाजिक या अर्जित अभिप्रेरक से तात्पर्य उन प्रेरकों से है, जिसे व्यक्ति अपने जीवन काल में अर्जित करता है; क्योंकि इसके अभाव में उसका सामाजिक जीवन अर्थहीन हो जाता है।

प्रश्न 26.
जैविक अभिप्रेरक कौन-कौन हैं?
उत्तर:
जैविक अभिप्रेरक के अन्तर्गत भूख, प्यास, यौन, मातृक प्रणोदन आदि आते हैं।

प्रश्न 27.
अर्जित प्रेरक के अन्तर्गत कौन-कौन प्रेरक आते हैं?
उत्तर:
अर्जित प्रेरक के अन्तर्गत सामुदायिक, अर्जनात्मकता, कलह, आत्म स्थापना आदि आते हैं।

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प्रश्न 28.
उपलब्धि अभिप्रेरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
उपलब्धि अभिप्रेरक से तात्पर्य श्रेष्ठता का एक खास स्तर प्राप्त करने की इच्छा से है।

प्रश्न 29.
कोई व्यक्ति किस प्रकार के अभिप्रेरक के कारण विभिन्न परिस्थितियों में कठोर श्रम करेगा?
उत्तर:
कोई व्यक्ति तीव्र उपलब्धि अभिप्रेरक के कारण विद्यालय में, खेल में, संगीत में तथा अन्य कई भिन्न परिस्थितियों में कठोर श्रम करेगा।

प्रश्न 30.
आवश्यकता की उत्पत्ति कब होती है?
उत्तर:
मानव जीवन के लिए किसी वांछनीय वस्तु का अभाव या न्यूनता आवश्यकता की उत्पत्ति का कारण होता है।

प्रश्न 31.
यादृच्छिक क्रिया-कलाप को किसके कारण ऊर्जा उपलब्ध होती है?
उत्तर:
आवश्यकता के कारण उत्पन्न तनाव या उद्वेलन के रूप में जो अंतर्नाद जन्म लेता है, उसी के कारण यादृक्षिक क्रिया-कलाप को ऊर्जा मिलती है।

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प्रश्न 32.
अभिप्रेरक के दो प्रकार क्या हैं?
उत्तर:

  1. जैविक तथा
  2. मनोसामाजिक अभिप्रेरक।

प्रश्न 33.
सामान्य मानवीय मूल प्रवृत्ति के चार उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. जिज्ञासा
  2. पलायन
  3. प्रतिकर्षण और
  4. प्रजनन।

प्रश्न 34.
भूख की अनुभूति को तीव्र बनाने में किन बाह्य कारकों का हाथ होता है?
उत्तर:
भोजन का स्वाद, रंग, सुगंध तथा दूसरे को भोजन करते हुए देखना आदि खाने की इच्छा को बढ़ाने वाले कारक हैं।

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प्रश्न 35.
जैविक प्रेरकों का मापन किस विधि से होता है?
उत्तर:
जैविक प्रेरक को मापने की कई विधियाँ हैं जिनमें पसंद विधि, अवरोधन विधि, शिक्षण विधि, क्रिया पिंजड़ा विधि आदि मुख्य हैं।

प्रश्न 36.
संवेग की समुचित परिभाषा क्या है?
उत्तर:
संवेग व्यक्ति में एक तीव्र उपद्रव की अवस्था है, जिसका प्रभाव उस पर संपूर्ण रूप से पड़ता है । इसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक ढंग से होती है और जिसमें चेतन अनुभव, व्यवहार और अन्तरावयव संबंधी कार्य सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 37.
प्रभावशाली संचार की बाधाओं से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वैसे कारक जो संचार को प्रभावशाली बनने में बाधा उत्पन्न करती है उसे संचार की बाधाएँ कहा जाता है।

प्रश्न 38.
प्रभावशाली संचार की बाधाएँ क्या हैं?
उत्तर:
सूचना में अस्पष्टता, ग्रहणकर्ता के क्षमता की सीमाएँ, भौतिक बाधाएँ, माध्यम में गुणवत्ता का अभाव, वैयक्तिक बाधाएँ आदि प्रभावशाली संचार की बाधाएँ हैं।

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प्रश्न 39.
संचार स्रोत की क्या विशेषताएँ होती हैं?
उत्तर:
संचार स्रोत की विशेषताओं में विश्वसनीयता, आकर्षण तथा समानता आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 40.
संचार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
सूचना भेजने वाले तथा सूचना प्राप्त करने वाले के बीच विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम को संचार कहा जाता है।

प्रश्न 41.
प्रभावशाली संचार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जिस संचार से लक्ष्य की प्राप्ति हो उसे प्रभावशाली संचार कहा जाता है।

प्रश्न 42.
संचार के माध्यम क्या हैं?
उत्तर:
संचार के माध्यम का मतलब यह होता है कि सूचना किस तरह से स्रोत द्वारा व्यक्ति या सूचना प्राप्तकर्ता को दिया जाता है।

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प्रश्न 43.
द्विवैयक्तिक संचार किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब दो व्यक्तियों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता है तो उसे द्विवैयक्तिक संचार कहते हैं।

प्रश्न 44.
संचार को कितने भागों में बांटा गया है?
उत्तर:
संचार को दो मुख्य भागों में बाँटा गया है-शाब्दिक संचार एवं अशाब्दिक संचार।

प्रश्न 45.
अशाब्दिक संचार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अशाब्दिक संचार का मतलब वैसे संचार से है जिसमें व्यक्ति अशाब्दिक संकेतों का उपयोग कर अपने विचारों एवं भावों को अभिव्यक्त करता है।

प्रश्न 46.
शाब्दिक संचार किसे कहते हैं?
उत्तर:
शाब्दिक संचार उस संचार को कहते हैं जिसमें विचारों एवं भावों की अभिव्यक्ति लिखित या मौखिक रूप से शब्दों या वाक्यों को बोलकर किया जाता है।

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प्रश्न 47.
आनन अभिव्यक्ति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
चेहरे में परिवर्तन के आधार पर अपने भावों को अभिव्यक्त करना आनन अभिव्यक्ति है।

प्रश्न 48.
संचार की प्रभावशीलता को कौन-कौन कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
सूचना को विषय-वस्तु स्रोत की विशेषता, संचार का माध्यम, ग्रहणकर्ता की विशेषताएँ संचार की प्रभावशीलता. को प्रभावित करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आवश्यकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी भी अभिप्रेरणात्मक व्यवहार की उत्पत्ति आवश्यकता (need) से होती है। प्राणी के शरीर में किसी चीज की कमी या अति की अवस्था को आवश्यकता (need) कहा जाता है। जब व्यक्ति के शरीर में पानी की कमी हो जाती है तब उसमें प्यास की आवश्यकता (need) का अनुभव होता है। उसी तरह जब शरीर में अनावश्यक चीजों जैसे मल-मूत्र का जमाव अधिक हो जाता है तब मल-मुत्र त्यागने की आवश्यकता उत्पन्न होती है।

ये सभी जैविक आवश्यकता (biological need) के उदाहरण हैं। इन जैविक आवश्यकताओं के अलावा कुछ मनोवैज्ञानिक आवश्यकता (Psychological need) भी होते हैं। जैसे, धन कमाने की आवश्यकता, सामाजिक प्रतिष्ठा पाने की आवश्यकता, स्नेह पाने की आवश्यकता मनोवैज्ञानिक आवश्यकता के उदाहरण हैं जिनसे भी व्यक्ति का व्यवहार अभिप्रेरित होता है।

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प्रश्न 2.
अभिप्रेरणा का अर्थ बतायें।
उत्तर:
अभिप्रेरणा एक ऐसा आंतरिक बल (intermal force) होता है जो व्यक्ति को किसी उद्देश्य (goal) की ओर व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है। जैसे, एक भूखे व्यक्ति का उदाहरण लें। भूखे व्यक्ति को होटल या किसी ऐसी जगह जहाँ उसे भोजन मिल सकता है, की ओर ले जाता है। जबतक उसे भोजन नहीं मिल जाता है, उसका व्यवहार भोजन खोजने में लगा रहता है।

इस उदाहरण में भूख आवश्यकता (need) है। इससे व्यक्ति में जो तनाव (tension) की अवस्था उत्पन्न होती है जिसके कारण वह भोजन ढूँढने का व्यवहार करता है, प्रणोद (drive) कहलाता है। भोजन एक प्रोत्साहन (incentive) है जिसके पाने से प्रणोद में कमी तथा आवश्यकता की तुष्टि हो जाती है। इस तरह, प्रत्येक अभिप्रेरण में आवश्यकता-प्रणोद-प्रोत्साहन (need-drive-incentive) का एक क्रम पाया जाता है।

प्रश्न 3.
जन्मजात अभिप्रेरक का अर्थ उदाहरण सहित बताएँ।
उत्तर:
जन्मजात अभिप्रेरक से तात्पर्य वैसे अभिप्रेरक से है जो व्यक्ति में जन्म से ही पाए जाते हैं तथा इनके अभाव में व्यक्ति का अस्तित्व संभव नहीं है। भूख, प्यास, काम जन्मजात अभिप्रेरक के उदाहरण हैं। इन तीनों के अभाव में व्यक्ति का अस्तित्व संभव नहीं है। कोई भी व्यक्ति भूख, प्यास तथा काम की आवश्यकता को संतुष्टि किये बिना जिन्दा नहीं रह सकता है।

प्रश्न 4.
प्रणोद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रणोद (drive) एक ऐसी मानसिक तनाव की अवस्था है जो आवश्यकता के कारण उत्पन्न होती है तथा जो व्यक्ति को क्रियाशील बना देती है। जैसे, भूख की आवश्यकता में व्यक्ति भोजन खोजने के लिए क्रियाशील हो उठता है तथा उसमें एक मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। प्रणोद का स्वरूप जैविक तथा मनोवैज्ञानिक कुछ भी हो सकता है। जब जैविक आवश्यकता अर्थात् भूख, प्यास, काम आदि द्वारा प्रणोद उत्पन्न होता है तो उसका स्वरूप जैविक होता है, परंतु यदि अर्जित आवश्यकता जैसे संबंधन (affiliation) की आवश्यकता, उपलब्धि की आवश्यकता आदि द्वारा प्रणोद उत्पन्न होता है जब उसका स्वरूप मनोवैज्ञानिक या सामाजिक होता है।

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प्रश्न 5.
आवश्यकता-प्रणोदन-प्रोत्साहन सूत्र का वर्णन करें।
उत्तर:
किसी भी अभिप्रेरित व्यवहार में तीन महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय होता है-आवश्यकता, प्रणोदन तथा प्रोत्साहन। आवश्यकता से तात्पर्य कमी या अति की शारीरिक अवस्था से होता है। जैसे, प्यास की आवश्यकता उत्पन्न होने पर व्यक्ति के शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी पायी जाती है। प्रणोदन जो आवश्यकता से उत्पन्न होता है, एक ऐसी मानसिक तनाव की अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति अपनी प्यास बुझाने के लिए जल की तलाश में तरह-तरह का व्यवहार करता है। जैसे, एक प्यासा व्यक्ति अपनी प्यास बुझाने के लिए जल की तलाश में इधर-उधर भटकता है। प्रोत्साहन से तात्पर्य उस लक्ष्य से होता है जिसकी प्राप्ति से प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति होती है। जैसे प्यासे व्यक्ति के लिए जल एक प्रोत्साहन है, जिससे प्रणोदन में कमी होती है तथा आवश्यकता की संतुष्टि होती है।

प्रश्न 6.
जन्मजात अभिप्रेरक तथा अर्जित अभिप्रेरक में अंतर बतायें।
उत्तर:
जन्मजात अभिप्रेरक वैसे अभिप्रेरक को कहा जाता है जो प्राणी में जन्म से ही मौजूद होते हैं। ऐसे अभिप्रेरकों का मुख्य कार्य प्राणी के दैहिक अस्तित्व (physiological existence) को कायम रखना है। भूख, प्यास, काम (sex) तथा मल-मूत्र त्यागना आदि जन्मजात अभिप्रेरक के उदाहरण हैं। अर्जित अभिप्रेरकरक इनसे भिन्न होते हैं। अर्जित अभिप्रेरक वैसे अभिप्रेरक को कहा जाता है जो व्यक्ति में जन्म से तो मौजूद नहीं रहते हैं, परंतु उन्हें व्यक्ति जन्म के बाद अन्य लोगों से सामाजिक अंत:क्रिया (interactions) करने पर विकसित कर लेते हैं। उपलब्धि की आवश्यकता सत्ता तथा सम्मान की आवश्यकता, संबंधन या सामुदायिकता की आवश्यकता अर्जित आवश्यकता के कुछ उदाहरण हैं।

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प्रश्न 7.
प्यास की अभिप्रेरक में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्यास एक ऐसा अभिप्रेरक है जिसमें स्पष्टतः कुछ शारीरिक परिवर्तन (bodily changes) होते हैं। कुछ शारीरिक परिवर्तन बाह्य (external) होते हैं तथा कुछ शारीरिक परिवर्तन आन्तरिक (internal) होते हैं। बाह्य शारीरिक परिवर्तनों में जीभ चटपटाना, कंठ सूखना तथा पानी के लिए दौड़-धूप करना प्रमुख हैं। आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन में लार-ग्रन्थियों से कम लार स्राव होना, प्राणी के शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी होना, रक्त की मात्रा (volume) में कमी आना प्रधान है। सामान्यतः तीव्र प्यास की स्थिति में रक्तचाप (blood pressure) में भी कमी आ जाती है।

प्रश्न 8.
अर्जित अभिप्रेरक का अर्थ उदाहरण सहित बतलाएँ।
उत्तर:
अर्जित अभिप्रेरक से तात्पर्य वैसे अभिप्रेरक से होता है जो व्यक्ति में जन्मजात नहीं होते हैं, परंतु जिसे व्यक्ति जीवनकाल में अर्जित करता है। वह सामाजिक मूल्यों के अनुरूप तरह-तरह के व्यवहार करने की प्रेरणा विकसित कर लेता है, इसे ही अर्जित अभिप्रेरक कहते हैं। आक्रमणशीलता, सामुदायिकता, संग्रहशीलता, उपलब्धि अभिप्रेरक, आदत, आकांक्षास्तर, मनोवृत्ति, अभिरुचि आदि अर्जित अभिप्रेरक के उत्तम उदाहरण हैं। इन अभिप्रेरकों से व्यक्ति का सामाजिक जीवन अधिक प्रभावशाली हो पाता है।

प्रश्न 9.
संवेग का अर्थ बतलाएँ।
उत्तर:
संवेग एक भावात्मक मानसिक प्रक्रिया है। साधारण अर्थ में संवेग व्यक्ति की उत्तेजित अवस्था का दूसरा नाम है। लेकिन मनोवैज्ञानिकों ने संवेग का अर्थ इससे भिन्न बतलाया है। इस विशिष्ट अर्थ में संवेग व्यक्ति में समग्र रूप से तीव्र उपद्रव की अवस्था है जिसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिकों कारकों से होती है तथा जिसमें व्यवहार, चेतनानुभूति तथा अन्तरावयवी कार्य होते हैं। इस परिभाषा से संवेग के कई पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है, जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

  1. संवेग में तीव्र उपद्रव की अवस्था होती है।
  2. संवेग में समग्र रूप से शारीरिक उपद्रव होता है।
  3. संवेग की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है।
  4. संवेग में चेतना, अनुभव, व्यवहार तथा अन्तरांगों के कार्यों में परिवर्तन होता है। भय, क्रोध, प्रेम आदि संवेग के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 10.
उपलब्धि अभिप्रेरक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
उपलब्धि अभिप्रेरक से तात्पर्य श्रेष्ठता का विशेष स्तर प्राप्त करने से होता है। जिस व्यक्ति में यह अभिप्रेरक अधिक होता है, वह जिन्दगी में अधिक-से-अधिक सफलता प्राप्त करने में सक्षम होता है। सभी व्यक्तियों में उपलब्धि अभिप्रेरक एक समान नहीं होता है। कुछ में कम होता है तो कुछ में अधिक होता है। जिन व्यक्तियों को बचपन में स्वतंत्र प्रशिक्षण (independent training) अधिक मिली होती है, वयस्कावस्था में आने पर उनमें उपलब्धि अभिप्रेरक (achievement motive) अधिक होता है।

प्रश्न 11.
संवेग में होनेवाले शारीरिक मुद्रा में परिवर्तन की व्याख्या करें।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने यह स्पष्टतः दिखलाया है कि प्रत्येक संवेग में एक खास प्रकार की शारीरिक मुद्रा (bodily posture) होती है। विभिन्न संवेगों में विभिन्न तरह की शारीरिक मुद्राएँ पायी जाती हैं। इन शारीस्कि मुद्राओं को देखकर संबंधित संवेग का अनुमान लगाया जाता है। जैसे, दु:ख के संवेग में व्यक्ति का शरीर कुछ झुका हुआ तथा क्रोध में उसका शरीर कुछ अकड़ा एवं तना हुआ दिखाई पड़ता है। भय के संवेग में व्यक्ति भागने की मुद्रा बना लेता है। स्पष्ट हुआ कि संवेग में कई तरह के शारीरिक परिवर्तन व्यक्ति में होते पाये जाते हैं।

प्रश्न 12.
संवेग में होने वाले आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों का अर्थ. उदाहरणसहित बतलाएँ।
उत्तर:
संवेग में कुछ शारीरिक परिवर्तन ऐसे होते हैं जिसे व्यक्ति बाहर से नहीं देख सकता है। इसका प्रेक्षण करने के लिए विशेष यंत्र या उपकरण की जरूरत होती है, क्योंकि ऐसे परिवर्तन शरीर के भीतर में होते हैं। ऐसे परिवर्तनों को आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन कहा जाता है। जैसे, क्रोध के संवेग में यह अन्य संवेगों, जैसे-डर, प्रेम आदि में व्यक्ति के रक्तचाप का स्तर सामान्य से भिन्न हो जाता है। उसी तरह से हृदय की गति, नाड़ी की गति, श्वसन गति आदि में परिवर्तन हो जाते हैं, जिसका सही-सही प्रेक्षण विशेष उपकरण से किया जाता है। ये सभी आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन के उदाहरण हैं।

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प्रश्न 13.
कैनन-बार्ड सिद्धांत का स्वरूप बतलाएँ।
उत्तर:
कैनन-बार्ड सिद्धांत के अनुसार संवेग का केन्द्र हाइपोथैलेमस (hypothalamus) होता है। जब व्यक्ति किसी ऐसे उद्दीपन (stimulus) को देखता है, जिससे संवेग उत्पन्न हो सकता है, तो उससे उसका हाइपोथैलेमस उत्तेजित हो उठता है। हाइपोथैलेमस से एक ही साथ कुछ स्नायु प्रवाह (nerve impulse), प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुंचते हैं तथा कुछ स्नायु-प्रवाह अन्तरावयव (visceral organs) तथा मांसपेशियों में एक साथ पहुंचते हैं। प्रमस्तिष्क में स्नायु-प्रवाह के पहुँचने से संवेगात्मक व्यवहार होते हैं। अतः इस सिद्धांत के अनुसार संवेगात्मक अनुभूति तथा संवेगात्मक व्यवहार एक-दूसरे पर निर्भर नहीं होते हैं बल्कि दोनों ही एक साथ उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 14.
जेम्स-लांजे सिद्धांत का स्वरूप बतलाएँ।
उत्तर:
संवेग के जेम्स-लांजे सिद्धांत के अनुसार जब व्यक्ति किसी ऐसे उद्दीपन को देखता है जिससे संवेग उत्पन्न होता है, तो उस उद्दीपन को देखने से उसमें संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) पहले होता है तथा संवेगात्मक व्यवहार बाद में होता है। इसका मतलब यह हुआ कि संवेगात्मक व्यवहार का होना संवेगात्मक अनुभूति के होने पर निर्भर करता है। जैसे, व्यक्ति भालू देखता है, डर जाता है इसलिए भाग जाता है। स्पष्टतः इस सिद्धांत की यह व्याख्या संवेग के सामान्य व्याख्या के विपरीत है।

प्रश्न 15.
अभिप्रेरक के प्रकार बतलाइये।
उत्तर:
अभिप्रेरकों का वर्गीकरण कई प्रकार से किया जाता है। थामसन के अनुसार अभिप्रेरकों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। ये निम्न प्रकार हैं –

  1. प्राकृतिक, एवं
  2. कृत्रिम।

थामसन ने अभिप्रेरकों को चार भागों में बाँटा है –

  1. सुरक्षा
  2. प्रतिक्रिया
  3. प्रतिष्ठा और
  4. नई अनुभूतियाँ

शेफर महोदय ने अभिप्रेरकों को निम्न चार भागों में बाँटा है –

  1. पुष्टिकरण
  2. विशिष्टता
  3. आदत और
  4. संवेग

विभिन्न प्रकार का वर्गीकरण दो वर्गों में इस प्रकार दिया जा सकता है –

1. जैविक अभिप्रेरक:
वह हैं जो जैविक आवश्यकताओं के कारण उत्पन्न होते हैं। वे हैं-भूख, प्यास, काम, विश्राम, मलमूत्र त्यागने की इच्छा, तापक्रम इत्यादि। इन अभिप्रेरकों का आधार शारीरिक होता है।

2. सामाजिक अभिप्रेरक:
यह सामाजिक अभिप्रेरणा के कारण उत्पन्न होते हैं। ये हैं-प्रतिष्ठा, सुरक्षा, संग्रहता, विशिष्टता, सामाजिकता, पुष्टिकरण, सामाजिक मूल्य, समुदाय के साथ एकीकरण इत्यादि।

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प्रश्न 16.
संवेग में हाइपोथैलेमस की क्रियाओं के महत्त्व को बताएँ।
उत्तर:
संवेग की अवस्था में हाइपोथैलेमस की क्रियाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कैनन (Cannon), बार्ड (Bard) इत्यादि ने भी प्रयोगात्मक आधारों पर इस भाग के महत्व पर बल दिया है। देखा गया है कि जिन जानवरों के मस्तिष्क में से हाइपोथैलेमस भाग निकाल दिया गया वे संवेगात्मक प्रकार्य करने में असमर्थ रहे। यह भी देखा गया कि जब मस्तिष्क के दूसरे भाग हटाए गए तो यह असमर्थता रही नहीं।

यह पाया गया कि जब मस्तिष्क के दूसरे भाग को हटाया गया तो हटाने से इस प्रकार की असमर्थता नहीं रही। इस प्रकार संवेगात्मक प्रकाशन में यह भाग अत्यन्त महत्त्व का सिद्ध हुआ। परंतु यहाँ यह याद रखना चाहिए कि संवेग की अवस्था में केवल यही भाग महत्त्वपूर्ण नहीं है। बल्कि वृहत मस्तिष्कीय ब्लॉक तथा स्वतः चालित नाड़ीमण्डल भी संवेगात्मक अनुभूति के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 17.
प्रेरणा की परिभाषा दें तथा उसके प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रेरणा का शाब्दिक अर्थ, जो प्रेरित करें वह प्रेरक है, परंतु यह प्रेरणा का पूर्ण अर्थ स्पष्ट नहीं करता अतः प्रेरणा की परिभाषा तक जारी रखती है। उपरोक्त परिभाषा से निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं –

  1. प्रेरणा एक आंतरिक अवस्था है।
  2. प्रेरणा से क्रिया की उत्पत्ति होती है।
  3. प्रेरणा की क्रिया खास दिशा में होती है।
  4. प्रेरणा का संबंध किसी उद्देश्य से रहता है।
  5. प्रेरणा उद्देश्य प्राप्ति तक जारी रहती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अभिप्रेरणा क्या है? अभिप्रेरणा की परिभाषा दीजिये।
उत्तर:
अभिप्रेरणा के दो महत्त्वपूर्ण सिद्धांत हैं –

1. अभिप्रेरणा व्यक्ति की आन्तरिक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया ज्ञान हमें निरीक्षित व्यवहार की व्याख्या भी देता है और व्यक्ति के भविष्य सम्बन्धी व्यवहार के सम्बन्ध में जानकारी देता है।

2. हम अभिप्रेरणा की प्रकृति निरीक्षित व्यवहार से अनुमान लगाकर. निर्धारित करते हैं। इस अनुमान की सत्यता हमारे निरीक्षणों की विश्वसनीयता पर निर्भर है। यह सत्यता उस समय स्थापित हो जाती है, जब हम दूसरे व्यवहार की व्याख्या करने में उसका प्रयोग कर सकते हैं।

अभिप्रेरणा की परिभाषा (Definition of Motivation):
अभिप्रेरणा की अनेक परिभाषायें विद्वानों ने दी है, जो निम्न प्रकार हैं –

1. बर्नार्ड:
“अभिप्रेरणा द्वारा उन विधियों का विकास कियण जाता है जो व्यवहार के पहलुओं को प्रभावित करती हैं”

2. जानसन:
“अभिप्रेरणा सामान्य क्रिया-कलापों का प्रभाव है जो मानव के व्यवहार को उचित मार्ग पर ले जाती हैं।”

3. मैगोच:
“अभिप्रेरणा शरीर की वह दशा है जो कि दिय गये कार्य के अभ्यास की ओर संकेत करती है और उसके संतोषजनक समापन को परिभाषित करती है।”

4. वुडवर्थ:
“अभिप्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह भग है जो किसी निश्चित उद्देश्य की शर्त के लिये निश्चित व्यवहार को स्पष्ट करती है।’

5. शेफर तथा अन्य:
“अभिप्रेरणा क्रिया की एक ऐसी प्रकृति है जो कि प्रणोदन द्वारा उत्पन्न होती है एवं समायोजन द्वारा समाप्त होती है।”

6. मेग्डूगाल:
“अभिप्रेरणा वे शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक दशाएँ हैं जो किसी कार्य को करने के लिये प्रेरित करती हैं।”

7. थामसन:
“अभिप्रेरणा आरम्भ से लेकर अन्त तक मानव व्यवहार के प्रत्येक प्रतिकारक को प्रभावित करती है, जैसे अभिवृत्ति, आधार, इच्छा, रुचि, प्रणोदन, तीव्र इच्छा आदि जो उद्देश्यों से सम्बन्धित होती है।”

8. गिलफोर्ड:
“अभिप्रेरणा कोई भी एक विशेष आन्तरिक कारक अथवा दशा है जो क्रिया को आरम्भ करने अथवा बनाये रखने के लिए प्रेरित होती है।”

यदि हम इन परिभाषाओं का विश्लेषण करें तो निम्नलिखित आधार प्रकट होंगे –

  • अभिप्रेरणा साध्य नहीं साधन है। वह साध्य तक पहुंचने का मार्ग प्रस्तुत करती है।
  • अभिप्रेरणा अधिगम का मुख्य नहीं सहायक अंग है।
  • अभिप्रेरणा व्यक्ति के व्यवहार को स्पष्ट करती है।
  • अभिप्रेरणा से क्रियाशीलता प्रकट होती है।
  • अभिप्रेरणा पर शारीरिक तथा मानसिक, बाह्य एवं आन्तरिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है।
  • अभिप्रेरणा व्यक्ति के अंदर शक्ति परिवर्तन से प्रारम्भ होती है।
  • अभिप्रेरणा अभिप्रेरणों भावात्मक जागृति द्वारा वर्णित होती है।
  • अभिप्रेरणा पूर्वानुमान द्वारा वर्णित होती है।

अभिप्रेरणा प्रणाली को संगठित उद्देश्य तक पहुँचाने के लिए व्यवहार करने के लिये प्रेरित करती है। अभिप्रेरणा के तीन पक्ष हैं –

  1. प्राणी में निहित प्रेरक अवस्था गति में होती है, शारीरिक आवश्यकता वातवरणीय उद्दीपक, घटनाएँ तथा शृंखला अभिप्रेरणा के लिये उत्तरदायी हैं।
  2. इस अवस्था में व्यवहार उत्पन्न होता है और वांछित दिशा में उसका अग्रेषण होता है।
  3. वांछित उद्देश्य प्राप्ति हेतु व्यवहार उत्पन्न होता है।

अभिप्रेरित व्यक्ति कुछ क्रियाएँ करता है जो उसको अपने उद्देश्य की ओर ले जाती हैं। इन प्रतिक्रियाओं द्वारा व्यक्ति में वह तनाव कम हो जाता है जो शक्ति परिवर्तन से उत्पन्न होता है।

  1. “अभिप्रेरण एक शब्दावली है जो व्यक्ति को शक्ति प्रदान करने में उसके कार्यों को निर्देशित करने को वर्णित करती है।”
  2. “अभिप्रेरण की तुलना कभी-कभी एक इंजन तथा स्वचालित यंत्र के चलाने वाले पहिये से की जाती है।”
  3. “शक्ति एवं निर्देशन अभिप्रेरणा के केन्द्र हैं।”

अभिप्रेरणा:
विभिन्न मत (Motivation : Different Views):
अभिप्रेरणा के विषय में अनेक मत तथा धारणाएँ समाज में प्रचलित रही हैं। उनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं –

1. भग्यवादी मत:
मनुष्य किसी भी कार्य को इसलिये करता है कि वह उसके भाग्य में है। यह मत दैवी शक्तियों और उसके प्रभाव पर आधारित इस बात पर बल देता है कि “मानव दैवी शक्तियों के हाथ की कठपुतली है और अभिप्रेरणा व्यक्ति की बाह्यशक्ति है।” यह मत भाग्य लेखे पर बल देता है।

2. मानव विवेकशील है:
मानव में समय के विकास के साथ-साथ वह विचार भी विकसित हुआ कि वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। इस मत का आधार मानव मस्तिष्क है।

3. मानव एक यंत्र है:
वैज्ञानिकों ने मनुष्य को एक यंत्र माना है। इस यंत्र का संचालन उद्दीपनों द्वारा होता है। मनुष्य, वातावरण के विभिन्न उद्दीपनों से क्रियाशील होता है।

4. मानव पशु:
इस मत का प्रतिपादन डार्पिन ने किया था। उसके अनुसार पशुओं और मनुष्य की क्रियाओं में भेद नहीं है। मानव का विकास पशुओं से हुआ है। डार्विन “शक्तिशाली की विजय” पर विश्वास करता है। डार्विन के अनुसार तीन बातें प्रमुख हैं –

  • शारीरिक प्रणोदन (Biological) प्रेरक जो व्यक्ति को क्रियाशील बनाते हैं-भूख, प्यास, भय आदि इसी प्रेरक से दूर होते हैं।
  • अर्जित प्रेरक (Acquired Drives) जो शारीरिक प्रेरक से ही उत्पन्न होते हैं।
  • पशु और मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ एक-सी हैं।
  • मानव सामाजिक प्राणी है-मनुष्य का जन्म समाज में होता है और समाज में ही उसकी मान्यताओं के अनुसार वह अपना विकास करता है। मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामाजिक प्रभावों के कार्य करने के लिए अभिप्रेरित होता है।
  • अचेतन का मत-फ्रायड ने इस मत का प्रतिपादन किया था। मानव की क्रियाशीलता का एक मात्र कारण उसकी अचेतन अभिप्रेरणा है। उसके व्यवहार को अचेतन शक्तियाँ नियंत्रित करती हैं। इस मत के अनुसार अभिप्रेरणा का स्रोत व्यक्ति स्वयं ही है।

अभिप्रेरणा: सम्बन्धित शब्द (Motivation : Glossary):
अभिप्रेरण की विवेचना में कई शब्छ बार-बार आते हैं। इन शब्दों की व्याख्या एवं जानकारी आवश्यक है। ये शब्द इस प्रकार हैं –

1. मानसिक स्थिति (Mental Set):
इस शब्द का अर्थ है व्यक्ति का मानसिक रूप से स्वस्थ होना। मनुष्य जब तक मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं होगा तब तक किसी भी कार्य को करने के लिए अभिप्रेरित नहीं होगा।

2. प्रेरक (Drives):
प्रेरक अभिप्रेरकों को विकसित करने में बहुत सहयोग देते हैं। प्रेरक का सम्बन्ध कार्य या वस्तुओं से होता है। प्रेरक का सम्बन्ध बाह्य परिस्थितियों से होता है। प्रेरकों को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा जा सकता।

3. प्रणोद (Incentive):
प्राणी की आवश्यकताओं से प्रणोदन का उत्पत्ति होती है। पानी की आवश्यकता से प्यास की और भोजन की आवश्यकता से भूख की उत्पत्ति होती है। इसीलिये प्रणोदन के बारे में विद्वानों ने कहा है –

(अ) गिबनर एवं सेहोन-“प्रणोदन वह शक्तिशाली उद्दीपन है जो माँग एवं उसकी अनुक्रिया उपस्थित करता है।”
(ब) लैगफील्ड एवं वील्ड-“प्रणोदन आन्तरिक, शारीरिक क्रिया या दशा है जो उद्दीपन के द्वारा विशेष प्रकार का व्यवहार उत्पन्न करती है।”
(स) डैशिल-“मानव जीवन में प्रणोदन शक्ति का मूल स्रोत है जो कि जीव को किसी क्रिया के करने के लिये प्रेरित करता है।”

मनोवैज्ञानिकों ने प्रणोद का वर्गीकरण इस प्रकार किया है –

1. साइमॉड द्वारा किया गया वर्गीकरण –

  • सामूहिकता
  • अवधान केन्द्रितता
  • सुरक्षा
  • प्रेम तथा
  • उत्सुकता

2. कैसल द्वारा किया गया वर्गीकरण:

  • संवेगात्मक सुरक्षा
  • ज्ञान प्राप्ति
  • समाज में स्थान प्राप्त करना
  • शारीरिक संतोष

3. थोर्प द्वारा किया गया वर्गीकरण:

  • शारीरिक क्रियायें
  • जीवन का उद्देश्य एवं कार्य तथा
  • कार्य में स्वतंत्रता

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 2.
जेम्स-लॉर्ज सिद्धांत की व्याख्या करें।
उत्तर:
संवेग का यह एक लोकप्रिय सिद्धांत है जिसका प्रतिपादन विलियम जेम्स (William James) तथा कार्ल-लांजे (Kari Lange) द्वारा स्वतंत्र रूप से अलग-अलग किया गया था। चूँकि संवेग के बारे में इन दोनों मनोवैज्ञानिकों के विचार लगभग एक समान थे, अतः इस सिद्धांत का नाम जेम्स-लॉजे रखा गया।

इस सिद्धांत द्वारा संवेग की व्याख्या संवेग के सामान्य व्याख्या के विपरीत है। सामान्यतः हम यही समझते हैं कि व्यक्ति जब कभी भी संवेदन उत्पन्न करने वाला उद्दीपन (Stimulus) को देखता है, तो पहले उसमें संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) होता है तब संवेगात्मक व्यवहार होता है। जैसे, व्यक्ति भालू या बाघ (संवेगात्मक व्यवहार) है।

जेम्स-लॉजे सिद्धांत की व्याख्या ठीक इसके विपरीत है। इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति बाघ या भूल को देखता है, भाग जाता है इसलिए डर जाता है। इससे स्पष्ट है कि इस सिद्धांत के अनुसार किसी संवेगात्मक उद्दीपन को देखने के बाद व्यक्ति में पहले संवेगात्मक अनुभूति होती है और तब संवेगात्मक व्यवहार होता है। संक्षेप में, इस सिद्धांत द्वारा संवेग की व्यख्या का विस्तृत इस प्रकार है –

  1. संवेग की उत्पत्ति के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति संवेग उत्पन्न करने वाले उद्दीपन (stimuls) का प्रत्यक्षण करें। इसके फलस्वरूप ज्ञानेन्द्रियों में स्नायु-प्रवाह (nerve impulse) पैदा होती है।
  2. जब स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क में पहुँचता है, तो यहाँ से वह फ़िर शरीर के अन्तरावयवों (visceral organs) तथा मांसपेशियों (muscles) में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति संवेगात्मक व्यवहार (emotional behaviour) करता है।
  3. संवेगात्मक व्यवहार उत्पन्न होने के बाद उसकी सूचना स्नायु-प्रवाह द्वारा मस्तिष्क में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) होती है।

जेम्स-लाँजे सिद्धांत की कुछ आलोचनाएँ हैं जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. इस सिद्धांत के अनुसार संवेग की अनुभूति अर्थात् संवेगात्मक अनुभूति संवेग के व्यवहार अर्थात् संवेगात्मक व्यवहार पर निर्भर करता है। परंतु वास्तविकता ऐसी नहीं है। प्रायः यह देखा जाता है कि कई तरह के संवेगों में व्यक्ति में लगभग एक ही समान का व्यवहार पाया जाता है। यदि संवेग का अनुभव शारीरिक व्यवहार पर निर्भर करता तो एक तरह के शारीरिक व्यवहार से एक ही तरह के संवेग का अनुभव होना चाहिए था। परंतु एक ही तरह के शारीरिक व्यवहार से भिन्न-भिन्न प्रकार की संवेगात्मक अनुभूति का होना इस बात का द्योतक है कि संवेगात्मक व्यवहार या संवेगात्मक परिवर्तन पर निर्भर नहीं करता है।

2. इस सिद्धांत के अनुसार संवेगात्मक अनुभूति शारीरिक परिवर्तनों पर आधारित होता है। अगर यह बात सच्ची होती तो जब-जब व्यक्ति में किसी कारण से शारीरिक परिवर्तन होता, उसमें संबंधित संवेग की अनुभूति होती। ब्रेडी (Brady, 1958) द्वारा किये गये अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि प्राणी में जब-जब शारीरिक परिवर्तन होता है, तब-तब उसमें संवेग की अनुभूति नहीं होती है। इसका मतलब यह हुआ कि इस सिद्धांत का दावा गलत है।

3. मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गये अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि व्यक्ति को संवेगात्मक अनुभव शरीर के भीतरी अंगों में परिवर्तन होने के कुछ पहले ही हो जाता है। इसका स्पष्ट मतलब यह हुआ कि संवेगात्मक अनुभव पहले हो जाते हैं तथा संवेगात्मक परिवर्तन बाद में होते हैं। ऐसी हालत में इस सिद्धांत का यह दावा कि संवेगात्मक अनुभूति संवेगात्मक परिवर्तन द्वारा उत्पन्न होता है, ठीक एवं अर्थपूर्ण नहीं लगता है।

4. इस सिद्धांत के अनुसार, यदि शारीरिक परिवर्तन न हो या उसकी सूचना मस्तिष्क को किसी कारण से नहीं मिलता है, तो संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) नहीं होती है अर्थात् व्यक्ति में किसी प्रकार संवेग नहीं होता है। परंतु कुछ लोगों, जैसे शेरिंगटन (Sherriangton) द्वारा कुत्ते पर किये गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हो चुका है कि सिद्धांत का यह दावा गलत है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि यद्यपि जेम्स-लाँजे सिद्धांत की आलोचना की गयी है, फिर भी यह सिद्धांत संवेग का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 3.
अभिप्रेरणा का वर्गीकरण क्या है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढंग से अभिप्रेरणा का वर्गीकरण किया है। आगे कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा प्रतिपादित वर्गीकरण प्रस्तुत कर रहे हैं –

1. थामसन द्वारा किया गया वर्गीकरण (Classication by Thomson):
थामसन ने अभिप्रेरकों को दो भागों में विभाजित किया है –

(i) प्राकृतिक अभिप्रेरक (Natural Motives):
वे अभिप्रेरक हैं जो जन्म से ही व्यक्ति में पाये जाते हैं। भूख, प्यास, सुरक्षा आदि अभिप्रेरकों से मानव जीवन का विकास होता है।

(ii) कृत्रिम अभिप्रेरक (Artificial Motives):
वे अभिप्रेरक होते हैं, जो वातावरण में विकसित होते हैं। इनका आधार तो प्राकृतिक अभिप्रेरणा होते हैं, परंतु सामाजिकता के आवरण में इनकी अभिव्यक्ति का रूप बदल जाता है। जैसे समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करना, सामाजिक सम्बन्ध बनाना आदि।

2. मैस्लो द्वारा किया गया वर्गीकरण (Classification by Maslow):
मैस्लो ने आवश्यकताओं पर अधिक बल दिया है। उसने आवश्यकताओं की तीव्रता को आधार बनाया है। कुछ आवश्यकताओं ऐसी होती हैं जिन्हें तुरंत पूरा करना पड़ता है। कुछ आवश्यकतायें ऐसी होती हैं जो फुसत से पूरी की जा सकती है। उदाहरणार्थ-भूखा व्यक्ति पहले अपने भोजन की व्यवस्था करता है। भूख मिट जाने के पश्चात् वह सुरक्षा या अन्य किसी आवश्यकता की पूर्ति करता है।

मैस्लो ने अभिप्रेरकों को दो भागों में बाँटा है –

(i) जन्मजात अभिप्रेरक (Inborm Moties):
इसके अन्तर्गत भूख, प्यास, सुरक्षा यौन आदि आ जाते हैं।

(ii) अर्जित अभिप्रेरक (Acquired Motives):
इसके अन्तर्गत वातावरण से प्राप्त अभिप्रेरक आते हैं इनको भी उसने सामाजिक तथा व्यक्तिगत (Social and individual) भागों में बाँटा है। सामाजिक अभिप्रेरकों के अन्तर्गत सामाजिकता, ययुत्सा और आत्मस्थापना एवं व्यक्तिगत अभिप्रेरकों में आदत, रुचि, अभिवृत्ति तथा अचेतन अभिप्रेरक आते हैं।

3. क्रेच एवं क्रचफील्ड द्वारा किया गया वर्गीकरण (Classification by Krech and Crutchfied):
इस प्रकार का वर्गीकरण अभिप्रेरकों की न्यूनता तथा अधिकता पर आधारित है –

(i) न्यूनता (Deficiency) अभिप्रेरक:
अभिप्रेरक मानव के अभाव तथा कमियों को दूर करने में सहायक होते हैं। क्रेच एवं क्रचफील्ड के अनुसार, “न्यूनता का अभिप्रेरक आवश्यकताओं से सम्बन्धित है जिनके द्वारा चिन्ता, डर, धमकी या और कोई मानसिक द्वन्द्व दूर हो जाता है।”

इसका ध्येय मानव का संसार में रहना एवं सुरक्षा प्राप्त करना है। इस प्रकार इन अभिप्रेरकों को चार प्रमुख रूपों में बाँटा गया है –

  • शरीर से सम्बन्धित
  • वातावरण से सम्बन्धित
  • समय से सम्बन्धित और
  • स्वयं से सम्बन्धित

(ii) अधिकता (Abundancy) अभिप्रेरक:
इन अभिप्रेरकों का ध्येय संतोष एवं उत्साह है। क्रेच एवं क्रचफील्ड के अनुसार-“अधिकता के अभिप्रेरक का उद्देश्य संतोष प्राप्ति, सीखना, अवबोध, अन्वेषण तथा अनुसंधान रचना एवं प्राप्ति है।”

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प्रश्न 4.
अभिप्रेरणा की अवधारणाएँ तथा प्रकार बताइये।
उत्तर:
अभिप्रेरणा की अवधारणायें (Concepts of Motivation)-अभिप्रेरणा की एक विस्तृत अवधारणा है जो शक्ति एवं व्यवहार के निर्देशन के कारकों से जोड़ दी जाती है। जैसे-अभिरुचि, आवश्यकता, मूल्य, प्रवृत्ति, आकांक्षायें, लक्ष्य आदि।

अभिप्रेरणा का व्यवहार प्रभाव –

  1. अभिप्रेरणा व्यवहार को शक्तिशाली बनाती है।
  2. अभिप्रेरणा व्यवहार को उद्देश्य के प्रति निर्देशित करती है।
  3. अभिप्रेरणा व्यवहार के विभिन्न कार्यों की पूर्ति के लिये समय की मात्रा को निर्धारित करती है।

अभिप्रेरणा के प्रकार –

  1. एक-मात्र अभिप्रेरक अवधारणा-फ्रायड के अनुसार मानव के अंदर काम वासना शक्ति का होना है। दूसरे मनोवैज्ञानिकों द्वारा कहा गया है कि मानव व्यवहार चाहे भूख, प्यास, प्रेम आदि से प्रेरित हो इनमें कोई अंतर नहीं आता। तीसरे वह अवधारणा जी सब अभिप्रेरकों को मिलाकर एक सामान्य चिन्ता में बदल देती है।
  2. द्वि-अभिप्रेरक अवधारणा-दो मुख्य विरोधी शक्तियों के रूप में बताया गया है, जैसे-जन्म-मृत्यु, पुरुषत्व-स्त्रीत्व आदि।
  3. बहु-अभिप्रेरक अवधारणा-मेडसन, मेर आदि अनेक विद्वानों ने आवश्यकताओं को मनोवैज्ञानिक प्रकार से सम्मिलित करके उदाहरण प्रस्तुत किया।

प्रश्न 5.
अभिप्रेरणा के व्यवहार के लक्षण बतलाइये।
उत्तर:
अभिप्रेरणा: व्यवहार के लक्षण (Motivation : Behaviour Patterns) अभिप्रेरणा देने के पश्चात् कैसे ज्ञात करेंगे कि उत्प्रेरित व्यक्ति किसी कार्य के लिये तैयार हो गया अथवा नहीं। यह ज्ञात करने के साधन अथवा लक्षण इस प्रकार हैं –

1. उत्सकता (Eagermess):
जब बालक क्रिया को करने के लिये अभिप्रेरित किये जाते हैं तो क्रिया के प्रति उत्सुकता दिखाई देती है। जब उत्सुकता दिखाई दे तो समझे कि बालक क्रियाशील हो गया।

2. शक्ति संचालन (Energy mobilisation):
अभिप्रेरणा प्राप्त होत ही व्यक्ति में अतिरिक्त शक्ति उत्पन्न होती है। अभिप्रेरणा प्राप्त होते ही व्यक्ति घंटों तक बिना थकान के काम करते हैं। शक्ति संचालन में व्यक्ति में बड़े-बड़े कार्य करने की क्षमता पैदा हो जाती है। अभिप्रेरणा प्राप्त करके व्यक्ति श्रेष्ठतम कार्य कर सकते हैं।

3. निरन्तरता (Consistency):
जब तक व्यक्ति को अभिप्रेरणा प्राप्त होती है, तब तक वे कार्य में निरंतर लगे रहते हैं।

4. लक्ष्य प्राप्ति से बैचेनी दूर होना (Reduction of Tension by Achievement of Goal):
अभिप्रेरणा से जो व्यवहार प्रकट होते हैं वे लक्ष्य प्राप्ति के बाद संतोष अनुभव करते हैं। समस्या होते ही बेचैनी दूर हो जाती है।

5. केन्द्रित ध्यान (Concentrated Attention):
अभिप्रेरणा प्राप्त करते ही व्यक्ति क्रिया में ध्यानरत हो जाता है। अभिप्रेरित व्यवहार में व्यक्ति कई प्रकार से उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।

अभिप्रेरणात्मक व्यवहार (Motivated Behaviour):
इस प्रकार के. व्यवहार की विशेषतायें निम्न प्रकार हैं –

  • अभिप्रेरकों का निर्माण किया जाता है। इससे शक्ति के विकास तथा वृद्धि में गति मिलती है।
  • अभिप्रेरित व्यवहार में आन्तरिक परिवर्तन होता है। भूख के अभिप्रेरक से शरीर में रासायनिक क्रिया होती है और मुख मुद्रा तथा शरीर के अवयवों में परिवर्तन प्रतीत होता है।
  • भूख के प्रेरक के समान ही यौन अथवा सेक्स का अभिप्रेरक होता है। यौन के प्रति आकर्षण से शरीर में उत्तेजना उत्पन्न होती है। व्यक्ति किसी भी प्रकार से उसे शान्त करने का प्रयास करता है। अभिप्रेरित व्यवहार में व्यक्ति-व्यक्ति तथा संस्कृति-संस्कृति की भिन्नता पाई जाती है।
  • मनोवैज्ञानिकों अभिप्रेरकों में समस्या की कठिनाई, वर्गीकरण तथा विश्लेषण निहित होता है।
  • मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरक व्यवहार में व्यवहार की दशा का निर्धारण करते हैं।
  • संग्रह करने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
  • व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा तथा ऐश्वर्य प्राप्त के लिये प्रयत्न करता है।
  • अभिप्रेरित व्यवहार में प्राथमिकता पाई जाती है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 6.
अभिप्रेरकों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अभिप्रेरकों से तात्पर्य (Meaning of Motives) अभिप्रेरक वह शक्ति है जो एक व्यक्ति को कार्य करने के लिये उत्तेजित करती है। वे व्यक्ति के व्यवहार की दिशाओं को निर्धारित करते हैं और उनकी क्रियाओं की गति का संचालन करते हैं। जब किसी व्यक्ति को अभिप्रेरक मिलते हैं तो वह एक तनाव एवं असंतुलन अनुभव करता है। व्यक्ति की लगभग सभी क्रियाएँ अभिप्रेरकों से ही होती हैं। अभिप्रेरक तीन प्रकार से कार्य करते हैं –

  1. यह कार्य का प्रारम्भ करते हैं।
  2. क्रियाओं को गतिशीलता देते हैं और
  3. जब तक उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होती, क्रियाओं को एक निश्चित दिशा की ओर प्रेरित किये रहते हैं।

इस प्रकार हम एक अभिप्रेरक की परिभाषा इस तरह दे सकते हैं-“यह क्रिया करने की वह प्रवृत्ति है जो एक उद्दीपन द्वारा प्रारम्भ होती है तथा अनुकूलन द्वारा समाप्त होती है।” आवश्यकता, अन्तर्नोद, प्रोत्साहन तथा अभिप्रेरकों में अंतर-वास्तव में अभिप्रेरक के सम्बन्ध में बहुत से शब्द प्रयोग किये जाते हैं-क्षुधा, आवश्यकतायें, अन्तर्नाद एवं अभिप्रेरक।

अन्तर्नोद शब्द उस समय प्रयोग किया जाता है जब हमें शरीर की आवश्यकताओं से उत्पन्न मानसिक तनाव की अनुभूति हो, जैसे-भूख, प्यास आदि। वातावरण का वह तत्त्व जो एक अन्तर्नाद को सन्तुष्टि करता है, प्रोत्साहन कहलाता है। “भूख” के अन्तर्नोद के लिये भोजन “प्रोत्साहन” है। अभिप्रेरक में “आवश्यकता” और “अन्तर्नाद” के साथ-साथ लक्ष्य की प्राप्ति की भावना का समावेश हो जाता है। इस अवस्था को “अभिप्रेरक” की संज्ञा देते हैं।

अभिप्रेरक के आवश्यक अंग निम्नलिखित हैं –

  1. आवश्यकता एवं अन्तर्नाद जो व्यक्ति में सक्रियता उत्पन्न करती है।
  2. उद्देश्य-प्राप्ति के ओर व्यवहारों की दिशा का नियंत्रण।
  3. उद्देश्य प्राप्त कर लेने के पश्चात् क्रियाओं का अन्त।

प्रश्न 7.
जेम्स-लॉजे सिद्धांत की सीमाओं का वर्णन करें।
उत्तर:
जेम्स-लॉजे सिद्धांत की कड़ी आलोचना की गई है और इसके अनेकों दोषों का उल्लेख किया गया है –

  1. इस सिद्धांत की आलोचना Cannon तथा Bard ने कड़े शब्दों में की है उन्होंने कहा है कि संवेग का आधार सहानुभूतिक मंडल नहीं है बल्कि Hypothalamus है। बिल्ली पर प्रयोग करते हुए इन्होंने जेम्स लौपे के सिद्धांत को खंडित किया।
  2. इस सिद्धांत की आलोचना Cannon ने करते हुए कहा है कि संवेगात्मक अनुभूति तथा । संवेगात्मक व्यवहार एक ही साथ होते हैं। अतः जेम्स-लॉजे का यह विचार गलत है कि संवेगात्मक व्यवहार पर संवेगात्मक अनुभूति आधारित है।
  3. इस सिद्धांत की आलोचनात्मक रोरिंगटन ने भी की है। उन्होंने अपने प्रयोगों के आधार पर प्रमाणित किया कि सहानुभूतिक मंडल वास्तव में संवेग का केन्द्र का केन्द्र ही है।
  4. शारीरिक परिवर्तनों की चेतना के अभाव में संवेगात्मक अनुभूति संभव नहीं है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 8.
अभिप्रेरणा के प्रभावक प्रतिकारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
अभिप्रेरणा: प्रभावक प्रतिकारक (Motivation : Influencing Factors):
अभिप्रेरणा किस प्रकार प्रभावशाली कार्य करती है, इसका निणर्य अनेक प्रभावक प्रतिकारक करते हैं। अभिप्रेरणा पर कई बातें प्रभाव डालती हैं। प्रमुख प्रभावक तत्त्व निम्न प्रकार हैं –

1. आवश्यकतायें (Needs):
आवश्यकता आविष्कार की जननी है। बालकों तथा बड़ों की भी यही प्रवृत्ति होती है कि वे आवश्यकता के वशीभूत होकर कार्य करते हैं। कार्य से पूर्व आवश्यकता महसूस कराई जाये।

2. अभिवृत्ति (Attitudes):
अभिप्रेरणा व्यक्ति में अभिवृत्ति का विकास करने में सहायक करती है। अभिवृत्ति का विकास होने से वे कार्य को अच्छी तरह करते हैं।

3. रुचि (Interest):
व्यक्ति की जिस काम में रुचि होती है उसे वह तुरंत सीख लेते हैं। प्रस्तुतीकरण से पूर्व व्यक्ति में रुचि पैदा करना आवश्यक है।

4. आदतें (Habits):
आदतें नये ज्ञान को प्रदत्त करने में सहायक होती हैं। नया ज्ञान पूर्व ज्ञान पर आधारित होना चाहिये।

5. संवेगात्मक (Emotional):
स्थिति-संवेगात्मक स्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है। सीखे जाने वाले ज्ञान का संवेगात्मक सम्बन्ध स्थापित करने के पश्चात् अभिप्रेरण प्राप्त करने में सफलता प्राप्त करेगा।

6. पुरस्कार एवं दण्ड (Reward and Punishment):
पुरस्कार एवं दण्ड का अभिप्रेरणा में अधिक महत्त्व है। ये भावी व्यवहार पर असर डालते हैं। कार्य में अभिवृत्ति उत्पन्न होने से पुरस्कार के प्रति लालच पैदा नहीं होता। पुरस्कार से लाभ इस प्रकार है –

  • पुरस्कार से आनन्द प्राप्त होता है।
  • पुरस्कार व्यक्ति को कार्य की अभिप्रेरणा देते हैं।
  • पुरस्कार रुचिवर्द्धक एवं उत्साहवर्द्धक होते हैं।
  • पुरस्कार मनोबल उत्पन्न करते हैं एवं व्यक्ति के अहंकार को सन्तुष्ट करते हैं।

पुरस्कार से हानियाँ इस प्रकार हैं –

  • पुरस्कारों से कार्य में अभिरुचि पैदा नहीं होती है।
  • पुरस्कार प्राप्ति के लिये धोखा भी दिया जा सकता है।
  • बिना त्याग प्राप्ति के भावना को प्रोत्साहन मिलता है।
  • केवल पुरस्कार प्राप्ति के लिये कार्य किया जाता है।

विद्यार्थियों में दण्ड के लाभ कुछ इस प्रकार हैं –

  • दण्ड अवांछित कार्य करते से रोकते हैं।
  • अनुशासन का स्वरूप होते हैं।
  • बच्चों को अवांछनीयता. का विश्वास दिलाते हैं।

दण्ड की हानियाँ भी इस प्रकार हैं –

  • दण्ड का आधर भय होता है।
  • दण्ड ग्रहण करने को तैयार व्यक्ति के लिये दण्ड का महत्त्व समाप्त हो जाता है।
  • इससे अप्रिय एवं दुखद अनुभूति पैदा होती है।
  • दण्ड के परिणाम स्थायी नहीं होते।
  • दण्ड से दुर्भावना पैदा होती है।
  • दण्ड की कठोरता की कोई माप नहीं है।

वास्तव में पुरस्कार एवं दण्ड, दोनों का उद्देश्य एक ही है, यानी भावी व्यवहार पर अनुकूल प्रभाव डालना। पुरस्कार व्यवहार पर वांछित प्रभाव डालने के लिये तथा दण्ड एक अवांछित कार्य को रोकने के लिये उसके साथ एक अप्रिय अनुभूति को जोड़ता है।

7. प्रतियोगिता (Competition):
प्रतियोगितायें ज्ञान प्राप्ति की अभिप्रेरणा दे सकती है। प्रतियोगितयों दो प्रकार की होती हैं –

  • व्यक्तिगत प्रतियोगिता एवं
  • सामूहिक प्रतियोगिता

8. प्रगति का ज्ञान (Knowledge of Progress):
व्यक्ति को अपने ज्ञानार्जन की प्रगति को बताये रहना चाहिये। ऐसा करने से क्रियाशीलता आती है।

9. असफलता का भय (Threat of Fear):
व्यक्ति को कभी उसकी असफलताओं का भय भी दिखाते रहना चाहिये।

10. आकांक्षा का स्तर (Level of Aspiration):
व्यक्ति को यह अभिप्रेरित करना चाहिये कि उसकी आकांक्षाओं का आधार उसकी शारीरिक, मानसिक परिपक्वता के अनुकूल होना चाहिये। स्तर से ऊपर होने से कार्य में अरुचि एवं अनिच्छा विकसित हो जाती है।

11. परिचर्चायें तथा सम्मेलन (Seminars and Conferences):
सामूहिक कार्य करने के लिये सीखने पर अधिक बल दिया जाता है। समूह में अधिक ज्ञान प्राप्त किया जाता है। परिचर्चायें एवं सम्मेलन ज्ञानवर्धन के लिये अतिआवश्यक हैं।

12. वातावरण (Environment):
वातावरण इतना आकर्षण हो कि सीखने वाले को स्वयं अभिप्रेरणा प्राप्त हो। व्यक्ति तथा समूह ही वातावरण का निर्माण करते हैं।

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प्रश्न 9.
संवेग के कैनन-बार्ड सिद्धांत की व्याख्या करें।
उत्तर:
संवेग के इस सिद्धांत की व्यख्या कैनन (Canon) तथा बॉर्ड (Bard) द्वारा किया गया है। इस सिद्धांत द्वारा प्रदत्त व्याख्या जेम्स-लांजे सिद्धांत की व्याख्या के विपरीत है। इस सिद्धांत के अनुसार हाइपोथैलेमस (hypothalamus) ही संवेग का केन्द्र (centre) होता है। संवेग में हाइपोथैलेमस के इस महत्त्व के कारण ही इसे हाइपोथैलेमिक सिद्धांत (hyphothamic theory) भी कहा जाता है। इस सिद्धांत द्वारा संवैग की व्याख्या निम्नांकित चरणों में की गयी है –

  • संवेग उत्पन्न करने वाला उद्दीपन (stimulus) को व्यक्ति प्रत्यक्षण करता है जिसके परिणामस्वरूप तंत्रिका आवेग (nerve impuse) व्यक्ति में उत्पन्न होता है।
  • तंत्रिका आवेग हाइपोथैलेमस (hypothalamus) होते हुए मस्तिष्क वल्क (cerebral cortex) में पहुँचता है। इससे हाइपोथैलेमस में हल्का-फुल्का उत्तेजना उत्पन्न हाता है।
  • प्रमस्तिष्क वल्क से विशेष तंत्रिका आवेग पुनः हाइपोथैलेमस (hypothalamus) में पहुँचता है। इस तंत्रिका आवेग के पहुँचते ही पहले से क्रियाशील हाइपोथैलेमस पर से प्रमिस्तिष्क वल्क का नियंत्रण पूर्णतः हट जाता है जिसके परिणामस्वरूप हाइपोथैलेमस पूर्णतः क्रियाशील या उत्तेजित हो उठता है।
  • हाइपोथैलेमस के क्रियाशील होने से वहाँ से एक समय तंत्रिका आवेग दो दिशाओं में जाता है-ऊपरी दिशा तथा निचली दिशा।
  • ऊपरी दिशा में जाने वाला तंत्रिका का आवेग प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुँचता है तथा निचली दिशा में जाने वाला तंत्रिका आवेग अन्तरावयव (visceral organs) तथा मांसपेशियों में पहुंचता है।
  • प्रमस्तिष्क में तंत्रिका आवेग को पहुँचने के परिणामस्वरूप व्यक्ति को संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) होता है तथा अन्तरावयव एवं मांसपेशियों में पहुंचने वाले तंत्रिका आवेग से व्यक्ति में संवेगात्मक व्यवहार दोनों ही एक साथ उत्पन्न होते हैं न कि इसमें से संवेगात्मक अनुभूति का होना संवेगात्मक व्यवहार पर निर्भर करता है, जैसा कि जेम्स-लाँजे सिद्धांत की मान्यता है।

इस सिद्धांत के समर्थन में कैनन तथा बार्ड द्वारा स्वतंत्र रूप से कुत्ता पर प्रयोग किया गया। प्रयोग काफी सरल था। प्रयोग में कुत्ते के मस्तिष्क से हाइपोथैलेमस को काटकर निकाल दिया गया या कुछ कुत्ते के हाइपोथैलेमस में घाव (wound) उत्पन्न कर दिया गया। इसके बाद इन कुत्तों के सामने बिल्ली (cat) लायी गयी। परिणाम में देखा गया कि कुत्ता शांतभाव से बिना क्रोध दिखलाये चुपचाप बैठा रहा। इन प्रयोगों के परिणाम के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संवेग का केन्द्र हाइपोथैलेमस होता है।

इस सिद्धांत की कुछ आलोचनाएँ हैं जिसमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. मासरमैन (Masserman) द्वारा किये गये प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ है कि हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र मानना अधिक वैज्ञानिक नहीं है। उन्होंने बिल्ली पर प्रयोग करके यह दिखला दिया है कि सिर्फ हाइपोथैलेमस को उत्तेजित करने से जो संवेग उत्पन्न होता है, वह अस्पष्ट, विकीर्ण, यांत्रिक तथा लगभग अर्थहीन होता है।

इनके प्रयोग में देखा गया कि बिल्ली के हाइपोथैलेमस को बिजली से उत्तेजित करने से उसके शरीर के बाल खड़े हो गए मानो वह क्रोधित हो गयी है। परंतु सचमुच में क्रोध या अन्य कोई संवेग के उत्पन्न होने का कोई निश्चित लक्षण उसमें नहीं था जिसका सबूत यह था कि बिल्ली लगभग सामान्य अवस्था में समान भोजन कर रही थी।

2. कुछ मनोवैज्ञानिकों जैसे किंग तथा मेयर (King & Mayer) द्वारा किये गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ है कि हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र मानना उचित नहीं है, क्योंकि मस्तिष्क के अन्य भाग जैसे लिम्बिक तंत्र, ऐमिगडाला आदि को उत्तेजित करने से भी प्राणी में संवेग उत्पन्न होता है। इन आलोचनाओं के बावजूद कैनन-बार्ड सिद्धांत संवेग का एक प्रमुख सिद्धांत है तथा अनेक मनोवैज्ञानिकों द्वारा इस सिद्धांत की मान्यता स्वीकार की गयी है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

Bihar Board Class 11 Home Science उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जीन प्याजे के अनुसार सभी बच्चे ‘स्कीमा’ से प्रभावित होते है। [B.M. 2009A]
(क) बड़े होने पर
(ख) जन्म से ही
(ग) किशोर होने पर
(घ) दुबले होने पर
उत्तर:
(ख) जन्म से ही

प्रश्न 2.
मानव शरीर में कितने प्रकार के अमीनो अम्ल पाए जाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) 40
(ख) 36
(ग) 22
(घ) 15
उत्तर:
(ग) 22

प्रश्न 3.
‘जीरोपथेल्मिया’ किस विटामिन की कमी के कारण होता है। [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘K’
(ख) विटामिन ‘B’
(ग) विटामिन ‘C’
(घ) विटामिन ‘A’
उत्तर:
(घ) विटामिन ‘A’

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प्रश्न 4.
वसा में घुलनशील विटामिन होता है । [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘डी’
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) विटामिन ‘बी,’
(घ) विटामिन ‘बी,,’
उत्तर:
(क) विटामिन ‘डी’

प्रश्न 5.
ग्राम कार्बाहाइड्रेड के विघटन से कितनी ऊर्जा प्राप्त होती है। [B.M.2009A]
(क) 2 कैलोरी ऊर्जा
(ख) 6 कैलोरी ऊर्जा
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा
(घ) 10 कैलोरी ऊर्जा
उत्तर:
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा

प्रश्न 6.
दुबली-पतली शरीर रचना वाले व्यक्ति कहलाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) मीसोमोरफिक
(ख) एकटोमोरफिक
(ग) इण्डोमोरफिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) एकटोमोरफिक

प्रश्न 7.
एक साधारण कार्य करने वाले व्यस्क पुरुष को प्रतिदिन कितना ग्राम अनाज ग्रहण करना चाहिए। [B.M.2009A]
(क) 175 ग्रा.
(ख) 270 ग्रा
(ग) 380 ग्रा.
(घ) 520 ग्रा.
उत्तर:
(घ) 520 ग्रा.

प्रश्न 8.
खाद्य वर्गों को मिला-जलाकर खाने से – [B.M.2009A]
(क) विभिन्न स्वाद मिलता है
(ख) पकाने में समय की बचत होती है
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है
(घ) पोषक मान अधिक होता है
उत्तर:
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है

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प्रश्न 9.
खाद्य पदार्थों को कितने वर्ग में बाँटा जा सकता है ? [B.M.2009A]
(क) तीन
(ख) आठ
(ग) पाँच
(घ) दो
उत्तर:
(ग) पाँच

प्रश्न 10.
पशु जन्य प्रोटीन में किस तत्त्व की मात्रा अधिक होती है ? [B.M.2009A]
(क) अनिवार्य अमीनो अम्ल
(ख) ऊर्जा
(ग) पेप्टोन
(घ) एंजाइम
उत्तर:
(घ) एंजाइम

प्रश्न 11.
कैल्सियम का उत्तम स्रोत है –
(क) रागी
(ख) मकई
(ग) दाल
(घ) चावल
उत्तर:
(क) रागी

प्रश्न 12.
अंडे से प्राप्त होनेवाले प्रोटीन को प्रोटीन माना जाता है –
(क) A ग्रेड.
(ख) B ग्रेड
(ग) C ग्रेड
(घ) D ग्रेड
उत्तर:
(क) A ग्रेड.

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प्रश्न 13.
वसा वयस्क स्त्री एवं पुरुष को ग्राम में चाहिए –
(क) 20 ग्रा.
(ख) 30 ग्रा.
(ग) 45 ग्रा.
(घ) 50 ग्रा.
उत्तर:
(क) 20 ग्रा.

प्रश्न 14.
इडली डोसा खाया जाता है –
(क) आंध्र प्रदेश
(ख) कर्नाटक
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर:
(घ) तमिलनाडु

प्रश्न 15.
खाद्य वर्ग मुख्यतः [B.M. 2009A]
(क) दो है,
(ख) चार है
(ग) पाँच है
(घ) आठ है
उत्तर:
(ग) पाँच है

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प्रश्न 16.
खाद्य पदार्थों के सही संग्रह की आवश्यकता क्यों है ? [B.M.2009A]
(क) उन्हें अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए
(ख) आर्थिक लाभ के लिए
(ग) गुणवत्ता बढ़ाने के लिए
(घ) सुविधा के लिए
उत्तर:
(घ) सुविधा के लिए

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन का रासायनिक संगठन (Composition of Protein) क्या है ?
उत्तर:
प्रोटीन मुख्यतः कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन का मिश्रण है। प्रोटीन के कुछ समूहों में सल्फर, फॉस्फोरस तथा ताँबा, लोहा आदि लवण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 2.
प्रोटीन का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
प्रोटीन का वर्गीकरण (Classification of Proteins) निम्नलिखित के अनुरूप होता है –
(a) भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ।
(b) अमीनो अम्ल की मात्रा।

(a) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं –

  • साधारण प्रोटीन (Simple)
  • युग्म प्रोटीन (Conjuguated)।
  • प्राप्त प्रोटीन (Derived)।

(b) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं:

  • पूर्ण प्रोटीन (Complete Proteins)।
  • siera: yuf sitzta (Partially Complete)
  • 37 of stata (Incomplete proteins)

प्रश्न 3.
प्रोटीन के कोई तीन कार्य लिखिए।
उत्तर:
प्रोटीन के कार्य (Functions of Proteins):

  • प्रोटीन नए तंतुओं के उत्पादन के लिए अनिवार्य है।
  • यह टूटे-फूटे व पुराने तंतुओं की मरम्मत के लिए भी उत्तरदायी है।
  • ग्लोबिन प्रोटीन रक्त के हीमोग्लोबिन तंतुओं का एक आवश्यक हिस्सा है।

प्रश्न 4.
कार्बोहाइड्रेट को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट कई रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना यौगिक है। यह पदार्थ कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के रासायनिक संयोग से मिलकर बनता है।

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प्रश्न 5.
कार्बोहाइड्रेट का किस आधार पर वर्गीकरण कर सकती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट को परमाणुओं की संख्या के आधार पर निम्न तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)।
  • डाइ-सैक्राइड (DiSaccharide)।
  • पोली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)।

प्रश्न 6.
वसा (Fats) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
यह कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना होता है। वसा में नाइट्रोजन का अभाव होता है। इसमें कार्बन और हाइड्रोजन की मात्रा अधिक होती है लगभग दुगुनी और इसलिए यह कार्बोज से दुगुनी ऊर्जा उत्पादित कर पाते हैं। वसा का सुरक्षित कोष चर्बी के रूप में शारीरिक वजन का लगभग 13.8% होता है।

प्रश्न 7.
संतृप्त वसीय अम्ल (Saturated Fatty Acid) और असंतृप्त वसीय अम्ल (Unsaturated Fatty Acid) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संतृप्त वसीय अम्ल-जिन वसीय अम्ल में कार्बन अणुओं की बराबर संख्या में हाइड्रोजन अणु उपस्थित रहते हैं, उनको संतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, अर्थात् इनके कार्बन हाइड्रोजन ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं। असंतृप्त वसीय अम्ल-वह अम्ल जिनमें हाइड्रोजन तथा कार्बन अणुओं की संख्या असमान हो अर्थात् हाइड्रोजन अणुओं की संख्या कार्बन अणुओं से कम हो, उसे असंतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, जैसे ओलेइक ऐसिड (Oleic Acid)।

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प्रश्न 8.
वसा और तेल में क्या अन्तर है?
उत्तर:
वसायुक्त भोज्य पदार्थों को दो समूहों में बाँटा गया है। 1. वसा, 2. तेल। यह विभाजन तापक्रम से होने वाली क्रियाओं के अनुसार किया गया है। वसायुक्त पदार्थ यदि 20°C पर ठोस हो तो वह वसा कहलाता है। यदि इसी तापक्रम पर पदार्थ तरल हो तो वह तेल कहलाता है।

प्रश्न 9.
विटामिन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
सन्तुलित भोजन में विटामिन आवश्यक पदार्थ हैं । इनके द्वारा शरीर की कोशिकाओं तथा तन्तुओं से अनेक कार्य होते रहते हैं। प्रत्येक विटामिन एक अलग रासायनिक तत्त्व है, इसके अपने निजी गुण होते हैं। ओसर नामक वैज्ञानिक ने विटामिनों की परिभाषा इस प्रकार की है, “यह एक ऐसा सशक्त मिश्रण है जो प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है किन्तु शरीर के लिए अनिवार्य है।”

प्रश्न 10.
विटामिन ‘ए’ पर नोट लिखें।
उत्तर:
विटामिन-‘ए’ पीलापन लिये हुए वह पदार्थ है, जो कि पानी में अघुलनशील, वसा में घुलनशील और आग के प्रति स्थिर (Stable) है । साधारण तापक्रम पर यह नष्ट नहीं होता लेकिन Oxidation की क्रिया से यह नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त सूर्य की किरणों के सम्पर्क से भी यह नष्ट हो जाता है। ऑक्सीजन की उपस्थिति में विटामिन एक साधारण तापक्रम पर भी नष्ट होता रहता है। लेकिन O2 की अनुपस्थिति में विटामिन-‘ए’ युक्त भोज्य पदार्थों को 120°C तक गर्म करने पर इसकी मात्रा और गुण यूँ ही बना रहता है। ”

प्रश्न 11.
विटामिन ‘डी’ के गुण क्या हैं ?
उत्तर:
गुण (Property): शुद्ध विटामिन-डी सफेद रवेदार, गन्ध रहित तथा वसा घुलित पदार्थों में घुलनशील है। आग के प्रति स्थिर, अम्ल तथा क्षार से यह नष्ट नहीं होता । CH तथा C2 के संयोग से यह बनता है। भोजन बनाने की साधारण विधियों में भी विटामिन-डी नष्ट नहीं होता। दूध को उबालने से, पाश्चुरीकरण से तथा पाउडर के रूप से सुखाए जाने पर भी इस विटामिन की मात्रा बनी रहती है।

प्रश्न 12.
जल में घुलनशील विटामिन बताइए।
उत्तर;
इन विटामिनों को हम दो श्रेणी में विभक्त करते हैं :
1. विटामिन बी श्रेणी-थायमिन, राइबोफ्लेविन, नायसिन, पारिडेक्सिन, फोलिक अम्ल, कोबालमिन, पैटोथीन अम्ल, बायोटिन, कोलीन।
2. विटामिन सी श्रेणी-ये जल में घुलने वाले विटामिन हैं। इनका मुख्य कार्य शरीर में ऊर्जा प्राप्ति में सहायक होना है।

ये विटामिन शरीर में उत्पादित नहीं हो सकते, अतः इन्हें प्रतिदिन आहार के द्वारा ही प्राप्त करना आवश्यक है। यदि शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच भी जाते हैं तो जल में घुलनशील होने के कारण जल-निष्कासन द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

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प्रश्न 13.
विटामिन B1 (Thiamine) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यह विटामिन पूर्ण रूप से चावलों के परिस्तर (Pericarp) से सन् 1926 ई० में निकाला गया और 1937.ई० में व्यावसायिक रूप में तैयार किया गया । चूँकि इसमें एमाइन-नाइट्रोजनीय तत्त्व होने के साथ-साथ कुछ थोड़ा-सा अंश गन्धक का भी है, अतः इसे थायमीन कहा गया क्योंकि यह तन्त्रिकाओं (Nerves) पर कार्बोज से उत्पन्न पाइरुविक एसिड के प्रभाव को मिटाता है। इसे एन्युरिन (Aneurin) भी कहा जाता है।

प्रश्न 14.
विटामिन B1 (Riboflavin) के भौतिक गुण क्या हैं ?
उत्तर:
विटामिन के अणु के दो भाग हैं, राइबो (Ribo) शर्करा खण्ड व फ्लेविन (Flavin)। यह कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन (C1, H1, N2) और दो मेथिल समूह से मिलकर बनता है। सन् 1935 ई० से यह प्रयोगशालाओं में बनाया जाने लगा । अम्ल, ताप तथा वायु का प्रभाव इस पर नहीं पड़ता।

प्रश्न 15.
विटामिन ‘सी’ की कमी से कौन-सा रोग होता है ?
उत्तर:
विटामिन सी की कमी से स्कर्वी नामक रोग हो जाता है जिससे मसूड़े कमजोर हो जाते हैं।

प्रश्न 16.
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह केवल ताजे खट्टे रसदार फलों में ही उपस्थित होता है और रखे जाने पर या फलों के बासी हो जाने पर 50% तक नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 17.
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन कौन-सा है ?
उत्तर:
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन आँवला है जिसमें सन्तरे से 20 गुना विटामिन सी अधिक पाया जाता है।

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प्रश्न 18.
कैल्शियम के भौतिक गुणों का आधार क्या है ?
उत्तर:
कैल्शियम (Calcium): कैल्शियम एक अकार्बनिक पदार्थ है जिससे लवण तैयार किए जा सकते हैं। हमारे शरीर में मुख्यतः हाइड्रोक्सि-ऐपेटाइड Ca10 (Pou)6 (OH)2 के रूप में काम आता है। कार्बोनेट, साइट्रेट, फॉस्फेट और बाईकार्बोनेट काम में आने वाले अन्य लवण हैं। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम लगभग दो किलो और फॉस्फोरस डेढ़ किलो तक पाया जाता है। कैल्शियम का लगभग 99 प्रतिशत भाग हड्डियों और दांतों को सुदृढ़ बनाने में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 19.
एनीमिया रोग किसकी कमी से होता है ?
उत्तर:
एनीमिया या रक्त में हीमोग्लोबिन का कम होना प्रमुखतः लोहे की कमी से होता है। इसके अतिरिक्त यह फोलिक अम्ल व सायनोकोबालामीन’ की कमी से भी होता है।

प्रश्न 20.
कैल्शियम के अवशोषण में कौन-सा विटामिन सहायक है ? बच्चों में इसकी कमी से होने वाले दो प्रमुख लक्षण लिखें।।
उत्तर:
कैल्शियम के अवशोषण हेतु शरीर को विटामिन डी की आवश्यकता पड़ती है। इसकी कमी से बच्चों में रिकेट्स नामक रोग हो जाता है। इसके दो प्रमुख लक्षण निम्न हैं :

  • टांगों की हड्डियाँ नर्म पड़ जाती हैं। शरीर का भार सहन न कर सकने के कारण मुड़कर धनुष के आकार की हो जाती हैं।
  • छाती की हड्डियाँ आगे की ओर बढ़ जाती हैं जिसके कारण वक्ष भाग कबूतरनुमा दिखने लगता है।

प्रश्न 21.
खनिज लवण कैल्शियम पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
कैल्शियम श्वेत खड़िया (Chalk) के पाउडर जैसा होता है। कैल्शियम की मात्रा शारीरिक वजन की 1.5 से 2.0% तक होती है, जिसमें 99% हड्डियों व दाँतों में और शेष 1% अन्य ऊतकों व द्रवों में होता है।

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प्रश्न 22.
कैल्शियम की शरीर में प्रतिदिन की मात्रा बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की प्रतिदिन की मात्रा (Daily intake of Calcium) –
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प्रश्न 23.
रक्त का रंग लाल क्यों होता है ?
उत्तर:
लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन की उपस्थिति ही रक्त को लाल रंग प्रदान करती है।

प्रश्न 24.
लोहे की प्रतिदिन कितनी मात्रा आवश्यक है ?
उत्तर:
शरीर में लोहे की आवश्यकता (Requirement of iron in the body): लोहा प्रतिदिन आहार से प्राप्त करना आवश्यक है। विभिन्न आयु व स्थिति के अनुसार लोहे की प्रतिदिन की मात्रा (mg)
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आकस्मिक दुर्घटना के घटित होने अथवा डॉक्टरी ऑपरेशन के पश्चात् रक्त के ह्रास को प्राकृतिक अवस्था में लाने के लिए कुछ मास तक व्यक्ति के भोजन में लोहे की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 25.
‘लोहे’ के भौतिक गुण (Physical properties) लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे की उपयोगिता के विषय में विस्तत ज्ञान प्राप्त करने के लिए 19वीं शताब्दी में अनेक प्रयोग व अनुसंधान हुए जिससे शरीर में लोहे के महत्त्वपूर्ण कार्यों का पता लग सका। खनिज लवणों में लोहे का विशेष महत्त्व है। यद्यपि लोहा बहुत कम मात्रा में शरीर में पाया जाता है परन्तु शरीर में इसकी उपस्थिति अनिवार्य है। शरीर के कुल वजन का 90.04% भाग आयरन का होता है। इसका 70% भाग रक्त के लाल कण में, 4% मांस-पशियों में, 25% यकृत अस्थिमज्जा, प्लीहा व गुर्दे में संचित भण्डार के रूप में और बाकी 1% रक्त प्लाज्मा व कोशिकाओं के इन्जाइम में रहता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन के मुख्य साधन (Main sources) कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • प्रोटीन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के प्रोटिअस शब्द से हुई है जिसका अर्थ खाद्य पदार्थों में से सर्वोत्तम पदार्थ है।
  • प्रोटीन मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों प्रकार के भोजन में पायी जाती है। सबसे अधिक प्रोटीन मांस, मछली, दूध व पनीर में पाया जाता है। इसके
  • अतिरिक्त सोयाबीन, सभी दालों में, गेहूँ, मटर, चावल, अरारोट, बादाम, मूंगफली आदि में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्रोटीन के अभाव में शरीर में कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन के अभाव में निम्नलिखित लक्षण उत्पन्न होते हैं –

  • उम्र के अनुपात में शारीरिक गठन, वृद्धि व विकास में कमी।
  • मांस-पेशियों की शिथिलता।
  • त्वचा का सूखापन-झुर्रियाँ पड़ना।
  • रक्तहीनता।
  • मानसिक विकास में कमी।
  • चिड़चिड़ापन, क्रोध, भावुकता आदि।
  • बालों का सूखापन और कंघी करने पर अधिक टूटना।
  • नाखून का सूखापन और उन पर सफेद दाग।
  • एन्जाइम्स की कमी के कारण पाचन शक्ति में कमी।
  • जल जमाव-शोफ (Nutritional Oedema)।

प्रश्न 3.
आवश्यक व अनावश्यक अमीनो अम्ल (Essential and Non-essential amino-acid) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
आवश्यक अमीनो अम्ल से तात्पर्य है कि यह अमीनो अम्ल हमें खाद्य पदार्थों द्वारा अनिवार्य रूप से मिलने ही चाहिए क्योंकि इनका हमारे शरीर में संकलन (Synthesis) नहीं हो पाता। इन अमीनो अम्ल की भोजन में कमी होने से बच्चों का विकास रुक जाता है तथा प्रौढ़ों में तोड-फोड की मरम्मत नहीं हो पाती। बच्चों के लिए 10 अमीनो अम्ल आवश्यक होते हैं तथा प्रौढ़ों के लिए 8, क्योंकि हिस्टीडिन (Histidine) व आर्जिनिन (Arginine) को शिशुओं के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल माना जाता है।

सिस्टिन (Cystine) व टाइरोसिन (Tyrosin) को अर्द्ध-आवश्यक अमीनो अम्ल माना गया है। अनावश्यक अम्ल शरीर में होने वाली तोड़-फोड़ की मरम्मत कर सकते हैं। शरीर का निर्माण इनके द्वारा नहीं हो सकता । कुछ अनावश्यक अम्ल शरीर में कुछ आवश्यक अमीनो अम्ल की उपस्थिति में उत्पादित होते हैं।

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प्रश्न 4.
कार्बोज (Carbohydrates) का शरीर में क्या कार्य है ?
उत्तर:

  • कार्बोज ऊर्जा उत्पत्ति में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। शरीर की सारी ऐच्छिक व अनैच्छिक क्रियाओं के लिए गति व शक्ति प्रदान करते हैं।
  • यह वसा के पाचन में सहायक होते हैं।
  • ग्लूकोज अनावश्क अमीनो अम्ल के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • कार्बोज भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं।
  • यह वसा के साथ मिलकर सन्तुष्टि की अनुभूति भी कराते हैं।
  • इसलिए अधिकांश मिष्ठान्न भोजन के अन्तिम दौर में परोसा जाता है।

प्रश्न 5.
कार्बोज की दैनिक मात्रा कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
कार्बोज की मात्रा कोई निश्चित रूप से निर्धारित नहीं की गई है, फिर भी 70% कैलोरीज कार्बोज से प्राप्त कर लेना चाहिए । उदाहरणार्थ एक साधारण काम-काज करने वाले व्यक्ति को कुल 2400 कैलोरी की आवश्यकता होती है तो इसका 70% 1680 कैलोरी हुई और चूँकि 10 ग्राम कार्बोज से 4 कैलोरी प्राप्त होती हैं, अतः उसे 1680 + 4 = 420 ग्राम कैलोरी की आवश्यकता होगी। वैसे भी 400 से 450 ग्राम तक की कार्बोज की मात्रा उपयुक्त समझी जाती है।

प्रश्न 6.
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से क्या हानियाँ होती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से शरीर का भार कम हो जाता है ? उनकी स्फूर्ति जाती रहती है और व्यक्ति आलस्य का शिकार हो जाते हैं और शारीरिक विकास पर भी प्रभाव पड़ता है। शारीरिक कार्यों के लिए ऊर्जा न मिलने पर हर समय थकान महसूस होती है। कार्बोज की कमी होने पर प्रोटीन ऊर्जा के लिए उपयोग होता है और अपने शरीर निर्माण के विशिष्ट कार्य को सम्पन्न नहीं कर पाता है। इसके अतिरिक्त सेल्यूलोज की कमी होने पर मनुष्य कब्ज का शिकार हो जाता है। शरीर में संचित वसा गर्मी व शक्ति उत्पन्न करने हेतु व्यय हो जाता है। परिणामस्वरूप शरीर दुबला हो जाता है, शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, गालों की चमक जाती रहती है तथा व्यक्ति में दुर्बलता के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगते हैं।

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प्रश्न 7.
कार्बोहाइड्रेट्स के प्राप्ति स्रोत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
सभी भोज्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेट्स के अतिरिक्त एक या एक से अधिक पोषक तत्त्व होते हैं। रोटी जो कि कार्बोहाइड्रेट्स की प्राप्ति का मुख्य साधन है उसमें अन्य पोषक तत्त्व भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। कुछ विशेष भोज्य पदार्थों को ज्वलन या ऊर्जा भोजन के नाम से पुकारते हैं। इसका कारण यह है कि उनमें ऊर्जा उत्पादन तत्त्व अधिक होने से उनका मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा प्रदान करना है।

ऐसे पदार्थों में रोटी, आटा, छिलकेदार अनाज, गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, चने आदि हैं। इसके अतिरिक्त सोयाबीन, सूखे मटर की फलियाँ आदि हैं। सूखे फलों में अंजीर, मुनक्का, खजूर, किशमिश, अंगूर, सूखी खुमानी आदि हैं। अन्य पदार्थों में शकरकन्द, अखरोट, शहद, गुड़, पहाड़ी आलू, जड़दार सब्जियाँ, पत्तीदार सब्जियाँ आदि हैं।

प्रश्न 8.
आहार में वसा की दैनिक आवश्यकता क्या होनी चाहिए?
उत्तर:
राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने अनुसंधानों के आधार पर यह अनुशंसा की है कि दैनिक आहार में 30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होनी चाहिए। प्रयुक्त की जाने वाली कुल वसा का 50% भाग वनस्पति तेलों से प्राप्त होना चाहिए ताकि आवश्यक वसीय अम्ल प्राप्त हो सके। विभिन्न आयु के व्यक्तियों के आहार में वसा का निम्नलिखित प्रतिशत होना चाहिए –
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प्रश्न 9.
वसा के मूल स्रोत (Sources) क्या हैं ?
उत्तर:
ऐसे भोज्य पदार्थ बहुत कम हैं जो पूर्णतः वसा तत्त्व से ही निर्मित हुए हैं। सामान्यतः विभिन्न चिकने भोज्य पदार्थों में प्रोटीन, वसा में घुलनशील विटामिन, कार्बोहाइड्रेट और खजिन लवण आदि का संयोग रहता है परन्तु जिन पदार्थों में वसा की पर्याप्त मात्रा रहती है, उन्हें वसा का स्रोत माना जाता है।
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1. पशुजन्य स्रोत के अन्तर्गत माँस, मछली, मुर्गी के अण्डे, अण्डे की जर्दी, दूध और दूध से बने व्यंजन आते हैं।
2. वानस्पतिक स्रोत में वसा बीजों, सूखे मेवों (Nut), अनाजों और फलों से प्राप्त होती है।

प्रश्न 10.
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर निम्न प्रकार हैं  –

वसा विलेय (Fat Soluble)।

  • वसा या वसा को घोलने वाले द्रवों में घुलनशील है।
  • आवश्यकता से अधिक खाये जाने पर शरीर में अधिकांश यकृत में संचित हो जाते हैं।
  • अभाव के दुष्परिणाम या लक्षण काफी विलम्ब से प्रकट होते हैं।
  • इनमें केवल ‘C, H, O अणु होते हैं।
  • अधिकता का शरीर पर कुप्रभाव पड़ता है।
  • यह विटामिन पूर्वगामी (Precursor) रूपों में भी पाए जाते हैं।

वारि विलेय (Water Soluble):

  • केवल वारि जल में घुलनशील है।
  • अधिकांश संचित नहीं होते। मूत्र में निष्कासित हो जाते हैं।
  • अभाव लक्षण तुरत ही प्रकट हो जाते हैं।
  • इनमें C, H, व O के अतिरिक्त N भी होता है, और कुछ में Sulphur व Cobalt भी।
  • अधिकता का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • यह पूर्वगामी रूपों में नहीं पाए जाते हैं।

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प्रश्न 11.
विटामिन ‘D’ के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions):
शरीर की उचित वृद्धि के लिए विटामिन डी की आवश्यकता है। इसकी अनुपस्थिति में विकास की गति रुक जाती है। चूहों के प्रयोग से पता चला है कि जिन चूहों को भोजन द्वारा विटामिन डी उपलब्ध कराई गई उनकी वृद्धि द्वितीय समूह के चूहों जिनके आहार में विटामिन डी अनुपस्थित थी, से बहुत अच्छी हुई।

  • कैल्शियम और फास्फोरस खनिज पदार्थों के अवशोषण में सहायक होते हैं जिससे हड्डियों व दाँतों को खनिज पदार्थ वांछित मात्रा में प्राप्त हो सकें।
  • इन्हीं तत्त्वां विशेषकर फास्फोरस गुर्दे (Kidney) के निकास को नियमित करता है। कैल्शियम उचित अनुपात में बना रहता है, जिससे हड्डियों की मजबूती बनी रहती है।
  • रक्त में भी कैल्शियम की मात्रा को. नियमित बनाए रखता है।
  • रक्त के अल्कंन फॉस्फेट इन्जाइम को नियमित बनाये रखता है जिसमें यह कैल्शियम व फॉस्फोरस को हड्डियों व दाँतों में संचित किए रखता है।

प्रश्न 12.
विटामिन ‘डी’ की दैनिक आवश्यकता क्या है ?
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता (Daily Requirement):

  • इस विटामिन की आवश्यकता जब शरीर में विकास हो रहा होता है, होती है।
  • गर्भवती स्त्री को भी इसकी आवश्यकता होती है।
  • एक स्वस्थ सामान्य वयस्क व्यक्ति.को इसकी थोड़ी आवश्यकता होती है। पोषण विज्ञान परिपद ने 18 वर्ष की आयु तक विभिन्न आयु वर्गों के लिए
  • 200 आई. यू. (I.U) निश्चित किये हैं परन्तु प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए कुछ नहीं बताया।

प्रश्न 13.
विटामिन ‘बी’ (थायमिन) की भोजन में क्या उपयोगिता है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. इस विटामिन का विशेष कार्य कार्बोज के उपापचयन में सहायता करना है। इसके अभाव में शरीर में कार्बोज का पूर्ण अवशोपण नहीं हो पाता।
  2. यह विटामिन तान्त्रिका तंत्र के स्वास्थ्य तन्त्रिका तन्तु में संवेदन संचार तथा आँतों की स्वाभाविक क्रियाशीलता के लिए आवश्यक है।
  3. थायमिन को मौरेल (Morale) विटामिन भी कहा जाता है। इसकी कमी से चिड़चिड़ापन, झगड़ालू प्रवृत्ति, अरुचि आदि लक्षण मनुष्यों में पाए जाते हैं। विलियम ने मनुष्यों पर प्रयोग करके बतलाया कि थायमिन पागलपन को ठीक नहीं करता लेकिन जब पागलों को इसकी कमी का आहार दिया जाता है तो उनके पागलपन की तीव्रता बढ़ जाती है।
  4. इसकी कमी से वृद्धि रुक जाती है। यह विटामिन शरीर की वृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
  5. इसकी कमी से भूख नहीं लगती।
    B, के अभाव से राइबोफ्लेविन (Riboflavin) के संग्रह में कमी हो जाती है।
  6. रक्त में श्वेताणुओं की रोगाणु-भक्षण क्षमता की वृद्धि हेतु भी यह आवश्यक है।
  7. शरीर के आन्तरिक अवयवों की आवश्यक क्रियाशीलता हेतु शक्ति पहुँचाने के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 14.
“विटामिन ‘बी1‘ (थायमिन) की दैनिक आवश्यकता (Daily requirement) निर्धारित कीजिए।
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता-इस विटामिन की मात्रा, कैलारीज की मात्रा के अनुपात में निर्धारित की जाती है, अधिक शारीरिक श्रम करने वाले, अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट की खुराक खाने वाले और अधिक शराव सेवन करने वाले व्यक्ति को सामान्य से कुछ अधिक ही मात्रा की आवश्यकता होती है।
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प्रश्न 15.
विटामिन ‘बी2‘ (Riboflavin) के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions)”:

  • राइबोफ्लेविन प्रोटीनों व वसा के उपापचयन में सहायक है।
  • यह नायसिन के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • यह शारीरिक वृद्धि में सहायक है।
  • राइबोफ्लेविन की कमी से त्वचा स्वस्थ नहीं रह सकती।
  • यह अन्य शारीरिक इन्जाइमों से मिलकर शरीर की विभिन्न क्रियाओं में भाग लेता है।
  • यह ऑक्सीकरण प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है तथा कोशिकाओं के श्वसन के लिए अति आवश्यक है।

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प्रश्न 16.
राइबोफ्लेविन की दैनिक शारीरिक आवश्यकताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
शारीरिक आवश्यकता-(Requirement in the body): राइबोफ्लेविन की आवश्यकता मनुष्य के कार्य तथा आयु पर निर्भर करती है।
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प्रश्न 17.
विटामिन C के भौतिक गुणों (Physical Properties) का वर्णन करें।
उत्तर:
विटामिन सी को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जैसे एस्कार्बिक अम्ल (Ascorbic Acid), सिविटामिस एसिड (Cevitamic Acid) या हेक्जुरोनिक एसिड (Hexuronic Acid) आदि। चूँकि यह स्कर्वी (Scurvy) नामक बीमारी का निराकरण करता है, अतः इसे एण्टी स्कोरब्यूटिक विटामिन (Anti Scorbutic Vitamin) भी कहते हैं। सन् 1932 ई० में इसका नींबू के रस से पृथक्करण किया गया और उसी वर्ष इसे रासायनिक रूप में भी तैयार किया गया।

विटामिन सी का रसायनिक नाम एस्कॉर्बिक अम्ल है। शुद्ध विटामिन सी सफेद स्वेदार, गन्ध रहित, पानी में घुलनशील, आग के प्रति अस्थिर, धूप एवं रोशनी में यह नष्ट हो जाता है। ताप, वायु, धातु में यह स्थिर है लेकिन तरल अवस्था में जबकि पानी के साथ इसका घोल बनाया जाता है, तो यह नष्ट हो जाता है। क्षार के माध्यम में यह अस्थिर है। अम्ल के माध्यम में यह नष्ट नहीं होता। जल में घुलनशील है।

प्रश्न 18.
विटामिन सी की दैनिक मात्रा मानव शरीर में कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
दैनिक मात्रा (Daily Requirement): बालकों के लिए शरीर विकास के साथ इस विटामिन की आवश्यकता बढ़ती रहती है।
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प्रश्न 19.
विटामिन C के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): यह समस्त रसीले फलों में विशेषकर नींबू, सन्तरा, आँवला, कमरख, अमरूद, चकोतरा, टमाटर में पाया जाता है, केले में भी यह पर्याप्त मात्रा में उपस्थित रहता है। हरी शाक-सब्जियों व ताजे फलों में जैसे पालक, सलाद आदि में यह पर्याप्त मात्रा में रहता है। अंकुरित अनाजों से यह अत्यधिक अंशों में प्राप्त किया जा सकता है। सूखे फलों में यह बिल्कुल नहीं रहता।

विभिन्न भोज्य पदार्थों में विटामिन (Vitamins in Different Food Stuffs)
अति उत्तम स्त्रोत – आँवला, अमरूद।
उत्तम स्रोत – नींबू का रस, पका पपीता, सन्तरा, काजू, अनानास, पका टमाटर, पका आम, मूली के पत्ते पालक, हरी पत्ती वाली शाक भाजी। .
सामान्य स्त्रोत – केला, सेब।

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प्रश्न 20.
लोहे के खाद्य स्रोत लिखें।
उत्तर:
खाद्य स्रोत:

  1. प्राणिज पदार्थों में यकृत (Liver) उत्तम स्रोत है। मांस, अण्डे की जर्दी, मछली आदि अन्य स्रोत हैं।
  2. फलों में सेब, आडु, खुबानी, अंगूर आदि से कुछ लोहा मिल जाता है।
  3. पालक व हरी पत्तीदार सब्जी लोहे के स्रोत हैं। पत्ते जितने अधिक हरे होंगे, उतना ही अधिक लोहा उनमें होगा।
  4. साबुत अनाजों व गुड़ में भी लोहा पाया जाता है।
  5. दालों में थोड़ी मात्रा में लोहा पाया जाता है।
  6. दूध, पनीर आदि में लोहा बहुत कम होता है।

प्रश्न 21.
खाद्य सम्मिश्रण क्या है ? उदाहरण देकर स्पष्ट करें । [B.M. 2009 A]
उत्तर:
पर्याप्त पोषण के लिए यदि हम भोज्य पदार्थों को मिलाकर प्रयोग करें तो जो एक दूसरे. के पोषक तत्त्व की कमी को पूरा करते है उसे ही खाद्य सम्मिश्रण कहते हैं। इस विधि से पौष्टिक मान बढ़ाने से सबसे अधिक प्रभाव प्रोटीन की पौष्टिकता पर पड़ता है। अर्थात् प्रोटीन के द्वितीय श्रेणी या तृतीय श्रेणी के स्रोतों को मिलाकर प्रथम श्रेणी का प्रोटीन प्राप्त किया जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर अनाज और दाल को मिलाकर दाल-रोटी दाल-चावल, खिचड़ी, डोसा इडली बड़ा बनाया जा सकता है इसी प्रकार से सब्जी और दूध के बने पदार्थ जैसे-गाजर का हलवा, टोमैटो क्रीम सूप। फल और अनाज से फ्रूट केक फलों का जैम ब्रेड इत्यादि बनाय जा सकता है। इस विधि से भोजन पकाने में पौष्टिकता तो बढ़ती ही साथ ही पकाने एवं खाने दोनों का ही समय कम लगता है और भोजन स्वादिष्ट, आकर्षक एवं रुचिकर भी हो जाता है।

प्रश्न 22.
लोहे की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
अथवा,
एक गर्भवती महिला अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाती। उसको कौन-सा रोग तत्त्वों की कमी से हो सकता है ? उसके दो लक्षण लिखें तथा एक खाद्य पदार्थ सुझाएँ।
उत्तर:
शरीर में कमी का प्रभाव (Effect of deficiency in the body):शरीर में लोहे ‘का अभाव कई कारणों से हो सकता है –

  • भोजन में लोहे की कमी।
  • लोहे का शरीर में पूर्णतः अवशोषण न होना।
  • शरीर में लोहे की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता हो।

लोहे की कमी से रक्तक्षीणता (Anaemia) रोग हो जाता है। इस रोग में लाल रक्त कण संख्या में बहुत कम हो जाते हैं, त्वचा पीली दिखाई देने लगती है, हीमोग्लोबिन का पर्याप्त रूप से निर्माण नहीं हो पाता। रक्त ऑक्सीजन वहन में असमर्थ हो जाता है। ऑक्सीजन की कमी और कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता से शारीरिक क्रियाएँ क्षीण होने लगती हैं।

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ऊर्जा उत्पत्ति की कमी, शारीरिक कमजोरी, थकावट, भूख की कमी, साँस फूलने और हृदय धड़कने की शिकायत, आँखों की पलकों में लाली की कमी, चेहरा पीला, नाखून सफेद से और हाथों-पाँवों पर जल जमाव के कारण सूजन हो जाया करती है। व्यक्ति उत्साहहीन, सुस्त और बेचैन-सा रहने लगता है, वे लक्षण लोहे की कमी के ही लक्षण हैं।

प्रश्न 24.
लोहे की आवश्यकता शरीर में क्यों बढ़ जाती है ?
उत्तर:

  • गर्भकाल में तथा जन्म पश्चात् शिशु और स्वयं के लिए भी माता को आवश्यक मात्रा में लोहा प्रदान करने के लिए।
  • बढ़ते बालकों के विकास के साथ-साथ लोहे की बढ़ती आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए।
  • विभिन्न व्यक्तियों की विशेष परिस्थितियों में लोहे की हानि को पूरा करने के लिए।
  • शरीर में लोहे की पर्याप्त मात्रा संचित करके भविष्य के संभाव्य अभावों के लिए पूर्ण व्यवस्था करने के लिए।

प्रश्न 25.
आयोडीन की शरीर में क्या आवश्यकता है?
उत्तर:
शरीर में आवश्यकता (Requirement in the body)-समुद्रतटीय निवासियों को आयोडीन की अधिक आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उनके भोजन में आयोडीन की अधिक मात्रा उपस्थित रहती है। एक वयस्क व्यक्ति को 0.15 से 0.2 मिली ग्राम, छोटे बच्चे और अन्य बालकों को 0.05 से 0.10 मिलीग्राम एक अच्छे संतुलित आहार द्वारा प्राप्त होती है।

प्रश्न 26.
आप अपने लिए संतुलित भोजन का आयोजन करना चाहते हो। आपको ICMR खाद्य पदार्थ किस प्रकार मदद करेगी?
उत्तर:

  • प्रत्येक आहार में प्रत्येक खाद्य ग्रुप को सम्मिलित करने में।
  • भोजन में विभिन्नता लाने में।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानव शरीर में प्रोटीन के क्या कार्य (Function) हैं ?
उत्तर:
1. मानव शरीर का लगभग 18% भाग प्रोटीन से बना होता है जो शरीर के विभिन्न भागों के कार्यों के अनुसार कई रूपों में पाया जाता है। शरीर में कोशिकाओं और ऊतकों का निर्माण करना प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसीलिए स्त्री को गर्भावस्था व स्तनपान काल में तथा बालक को बाल्यावस्था में शरीर के निर्माण और विकास के लिए प्रोटीन की विशेष रूप से अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

2. मनुष्य की बाह्य क्रियाशीलता तथा शरीर के अन्दर निरन्तर होती रहने वाली क्रियाओं के फलस्वरूप ऊतकों में जो कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती रहती हैं उनकी पूर्ति तथा मरम्मत प्रोटीन द्वारा होती है। अस्थियाँ, दाँत, त्वचा, नाखून, रक्तकण, मांसपेशियां और अन्तःस्रावी ग्रन्थियों आदि की रचना में प्रोटीन का मुख्य भाग होता है। मूत्र और पित्त को छोड़कर शरीर के सभी तरल पदार्थों में अधिक या कम मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है।

3. शरीर की क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में सहायता करना भी प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इन क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में प्रोटीन निम्न प्रकार से सहायता करता है –

(क) हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) इस प्रकार का प्रोटीन है जो रक्त के लाल कणों का एक मुख्य भाग है। इसमें लोहा भी सम्मिलित होता है। इसका कार्य बड़ा महत्त्वपूर्ण है। रक् द्वारा यह ऑक्सीजन को विभिन्न अंगों तक पहुँचाता है जिससे मिलकर कार्बोहाइड्रेट्स और वसा का ज्वलन होता है और परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होती है।
(ख) रक्त में जो प्रोटीन पाए जाते हैं वे रक्त की सामान्य क्षारीय प्रतिक्रिया (alkaline reaction) की स्थिति बनाए रखने में सहायता करते हैं।
(ग) एन्जाइम (enzyme) भी जो पाचन तथा उपापचयन (Matabolism) क्रियाओं में विशेष रूप से सहायक होती है, प्रोटीन से ही बने होते हैं।
(घ) विभिन्न हारमोन (Hormones) भी प्रोटीन से ही निर्मित होते हैं। वे नाइट्रोजन युक्त रासायनिक यौगिक हैं। शरीर की आन्तरिक क्रियाओं को नियंत्रित रखने में इनका बहुत महत्त्व है।
(ङ) प्रोटीन आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव व हारमोन्स की बनावट में भाग लेते हैं। इन्सुलिन (Insulin), एनिलिन (Adrenaline), थायरॉक्सिन (Thyroxine) व अन्य हारमोन्स में विद्यमान रहते हैं।

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4. शरीर में रोगों से बचाव के लिए कुछ प्रतिरोधी (anti bodies) भी पाए जाते हैं। ये पदार्थ प्रोटीन से ही बनते हैं।

5. आवश्यकता पड़ने पर शरीर को काम करने के लिए प्रोटीन शक्ति भी प्रदान कर सकता है, परन्तु सामान्य दशा में प्रोटीन से ऊर्जा उत्पादक पदार्थों का काम लेना लाभकारी नहीं होता। यदि प्रोटीन ऊर्जा की उत्पत्ति के लिए प्रयुक्त कर लिए जाते हैं तो शरीर निर्माण के लिए प्रोटीन नहीं बचते हैं।
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प्रश्न 2.
प्रोटीन की दैनिक आवश्यकता कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर:
प्रोटीन की आवश्यकता कई बातों पर निर्भर करती है –

  • वृद्धि एवं विकास के समय अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • प्रोटीन की प्रतिदिन की आवश्यकता आहार में उपयोग की गई प्रोटीन के गुण पर भी निर्भर करती है। प्रतिदिन के आहार में उपयोग की गई प्रोटीन का आधा भाग प्राणी जगत के साधन से आना चाहिए।
  • प्रोटीन की आवश्यकता आहार में उपस्थित अन्य पौष्टिक तत्त्व जैसे कैलोरीज की मात्रा पर भी निर्भर करती है। आहार में कैलोरीज की कमी से प्रोटीन ऊष्मा प्रदान करने का कार्य करेगी।
  • संक्रामक बीमारियों में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन की दैनिक मात्रा-1 ग्राम प्रतिकिलो वजन के अनुपात से लेना चाहिए। 1 ग्राम प्रोटीन = 4 KCal प्राप्त करता है।
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प्रश्न 3.
कार्बोहाइड्रेट को किस आधार पर वर्गीकृत (Classify) कर सकते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
कार्बोज को परमाणुओं की संख्या के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)
  • डाइ-सैक्राइड (Di-Saccharide)
  • पौली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)

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I. मोनो सैक्राइड (Mono-Saccharide): मोनो सैक्राइड कार्बोज है जिसके अणु में एक शर्करा इकाई है। इन्हें सरल शर्करा भी कहते हैं। इनका अभिपचन इन्हें खाने के पश्चात् तुरन्त ही हो जाता है। यह स्वाद में मीठा और जल में घुलनशील है।

(अ) ग्लूकोज (Glucose): यह मीठे फलों जैसे अंगूर में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। अतः इसको शक्कर (Grape) भी कहते हैं। यह मक्का, चुकन्दर, गन्ना आदि में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। ग्लूकोज श्वेतसार का सबसे महत्त्वपूर्ण पदार्थ है। सभी श्वेतसार पाचन तथा पोषण के पश्चात् ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं।

रक्त में ग्लूकोज की एक निश्चित मात्रा होती है। यह मात्रा घटने तथा बढ़ने से शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में होने से यह मूत्र द्वारा वाहर निकलने लगता है। ये लक्षण डायबिटीज रोग के हैं। ग्लूकोज की आवश्यकता से अधिक मात्रा आहार में लेने से यह शरीर में ग्लाइकोजन (Glycogen) के रूप में एकत्रित हो जाता है।

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ग्लाइकोजन अधिकतर यकृत तथा मांसपेशियों में जमा रहता है । उपवास या बीमारियों में यही ग्लाइकोजन ग्लूकोज में बदल जाता है तथा ऑक्सीजन के पश्चात् ऊर्जा प्रदान करता है। ग्लूकोज की अत्यधिक मात्रा लेने से पाचन के पश्चात् वह वसा में परिवर्तित हो जाता है तथा वसा शरीर में जमा होकर अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न करती है। अत्यन्त दुर्बल रोगियों या मूर्छा आदि की दशा में ग्लूकोज को देने के लिए बाजार से बनी बनाई ग्लूकोज उपलब्ध हो जाती है। यह तुरंत रक्त में पहुँचकर रोगी को शक्ति प्रदान करता है क्योंकि इसे पचाने की आवश्यकता नहीं होती।

(ब) ग्लैक्टोज (Glactose): यह शक्कर ग्लूकोज व फ्रक्टोज की तरह प्राकृतिक रूप में नहीं पाया जाता। यह दूध में पाई जानेवाली शक्कर लैक्टोज के पाचन से प्राप्त होता है। इसको औद्योगिक विधि से भी तैयार किया जाता है।

(स) फ्रक्टोज (Fructose): यह फलों में अधिक मात्रा में पाया जाता है। अत: फलों को शक्कर भी कहते हैं। यह इस समूह की सबसे मीठी शक्कर है। यह शहद, गुड़ आदि में पाया जाता है। फ्रक्टोज भी उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति करता है जिनकी ग्लूकोज करता है। दोनों परस्पर परिवर्तनशील हैं।

II. डाइसैकराइड्स (Disaccharides) (C12 H2 O11 ): इन कार्बोहाइड्रेटों के अणुओं में शर्करा की दो इकाइयाँ होती हैं। इसलिए इन्हें दोहरी शर्करा या द्विशर्करा भी कहते हैं। ये सरल शर्करा से कुछ अधिक मीठी होती हैं तथा पानी मेंघुलनशीलस्फटिक (Crystals) बनने योग्य तथापाचन योग्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत ये सरल शर्कराओं में परिवर्तित हो जाती हैं।

(अ) लैक्टोज (Lactose): यह अन्य दूसरी शर्कराओं की अपेक्षा कम घुलनशील एवं कम मीठी होती है। साधारणतः यह रक्त या शरीर के ऊतकों में नहीं पायी जाती है। इसे दूध शक्कर भीकहते हैं। दूध में लैक्टोज 2 से 8% तक उपस्थित होती है। लैक्टोज का पाचन हो जाने के पश्चात् इसमें ग्लूकोज तथा ग्लैक्टोज बराबर अनुपात में मिलती है। लैक्टोज = ग्लूकोज + ग्लैक्टोज

(ब) सुक्रोज (Sucrose): यह अधिकतर गन्ने की शक्कर और चुकन्दर की शक्कर में पायी जाती है। यह साधारण चीनी का वैज्ञानिक नाम है। अभिपाचन के उपरान्त यह ग्लूकोज में परिवर्तित होकर रक्त द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। इसकी अतिरिक्त मात्रा यकृत में ग्लाइकोजन बनकर संचित हो जाती है। सुक्रोज ग्लूकोज और फ्रक्टोस के संयोग से बनता है। सुक्रोज = ग्लूकोज + फ्रक्टोज

(स) माल्टोज (Maltose): इसे माल्ट या जवा शक्कर भी कहा जाता है। अंकुरित अनाजों में उपस्थित शक्कर है। अंकुरित होने की क्रिया के अन्तर्गत अनाजों के स्टार्च, माल्टोज शर्करा में परिवर्तित होते हैं जो अधिक सुपाच्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत अनाज का स्टार्च पहले माल्टोज में और फिर ग्लूकोज में परिवर्तित होता है। माल्टोज = ग्लूकोज + ग्लूकोज

III. पौली सैकराइड्स (Polysaccharides (C6H10O6): यह एक जटिल पदार्थ है। इस श्वेतसार में दो से ज्यादा शक्कर की इकाई रहती है। इनमें मिठास कम होती है तथा इसका कोई निश्चित आकार नहीं होता।

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(अ) स्टार्च (Starch): जड़, वीज, कन्द अनाजों आदि में ये काफी मात्रा में उपस्थित रहते हैं। स्टार्च पानी में अघुलनशील हैं। गर्म पानी के साथ घोलने पर स्टार्च पेस्ट के रूप में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च पकाने के पश्चात् उसके चारों ओर उपस्थित सेल्यूलोज की दीवार टूट जाती है तथा स्टार्च कण पानी शोषित करके फूल जाते हैं। स्टार्च को अधिक पकाने से वह चिपचिपे पदार्थ में बदल जाता है।

पका हुआ स्टार्च खाने में स्वादिष्ट होता है तथा इसका पाचन शीघ्र ही हो जाता है। कच्चे स्टार्च का पाचन नहीं होता क्योंकि लार में उपस्थित एन्जाइम टायलिन केवल पके स्टार्च पर ही कार्य करता है। स्टार्च के कणों का कोई निश्चित आकार नहीं होता है। इसके कुछ कण गोल, कुछ अण्डाकार तथा कुछ बेढंगी शक्ल के होते हैं।

(ब) डेक्सट्रीन (Dextrin): डेक्सट्रीन प्रकृति में प्रत्यक्ष रूप में नहीं मिलता है। जब स्टार्च युक्त पदार्थों को पकाया या भूना जाता है तो स्टार्च डेक्सट्रिन में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च का उद्विच्छेदन होने से स्टार्च पहले माल्टोज में, फिर डेक्सट्रिन में तथा अन्त में ग्लूकोज के रूप में प्राप्त होता है। इस प्रकार डेक्सट्रिन की प्राप्ति स्टार्च के उविच्छेदन से भी होती है। डबलरोटी या चपाती की बाहरी पपड़ी भीतरी भाग की अपेक्षा अधिक पाचनशील होती है।

(स) सेल्यूलोज (Cellulose): यह स्टार्च कोशिकाओं की बाहरी पर्त पर कड़े आवरण के रूप में उपस्थित रहता है। यह एक अत्यन्त जटिल पदार्थ है। इस कारण इसका शरीर में पाचन नहीं होता। सेल्यूलोज का भोज्य-मूल्य नहीं होता लेकिन भोजन में इसका होना अति आवश्यक है। सेल्यूलोज के रेशे आहार में भूसी की मात्रा बढ़ाते हैं जिससे आंत की मांसपेशियों में कुंचन गति (Penstalistic Movement) तेजी से होती है और मल आँत से आसानी से बाहर निकल जाता है। भूसी आँत में पानी शोषित करके फूल जाती है तथा बड़ी आँत को बली प्रदान करती है जिससे बड़ी आँत में मल आसानी से निकल जाता है। साबुत अनाजों, दालों, ताजे फलों एवं सब्जियाँ, सूखे मेवे आदि में सेल्यूलोज अधिक पाया जाता है। एक व्यक्ति को प्रतिदिन आहार में 4 से 7 मि. रेशा लेना चाहिए।

प्रश्न 4.
आहार द्वारा क्वाशिरक्योर का इलाज तथा मरस्मस रोग के लक्षण बताएँ।
उत्तर:
क्वाशिक्योर के रोगी को आहार देते समय निम्न दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए
1. आहार पाचनशील हो। शुरू के कुछ हफ्ते में सिर्फ तरल आहार देना चाहिए। तरल आहार में प्रोटीन, कैलोरीज तथा विटामिन अधिक मात्रा में हों।
2. जीवाणुनाशक तथा परजीवीनाशक दवाई देनी चाहिए।

आहार (Diet): बच्चे को शुरू में वसा रहित पाउडर दूध देना चाहिए। अच्छी तरह पकाए हुए अनाज, खिचड़ी, दाल का सूप आदि देना चाहिए । वसा युक्त भोज्य पदार्थ दूसरे या तीसरे हफ्ते से शुरू करना चाहिए। बच्चे को हरी पत्ते वाली पीली सब्जियाँ भी देनी चाहिए। इससे बच्चे को लौह, लवण, कैल्शिम, विटामिन ए आदि प्राप्त होंगे।

कैलोरीज (Calories): बच्चे को उसके भार के अनुसार कैलोरीज देनी चाहिए। प्रति किलो भार पर 140-150 कैलोरीज प्रतिदिन आहार में देनी चाहिए। अधिक कैलोरीज देने से बच्चा जल्दी स्वस्थ हो जाता है।

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प्रोटीन (Protein): प्रोटीन उस स्रोत से दी जाए जिसमें सभी आवश्यक अमीनो अम्ल उचित मात्रा में उपस्थित हों। प्रोटीन मुख्य रूप से प्राणी जगत् से दिया जाना चाहिए। प्रतिदिन प्रोटीन 3-5 ग्राम/कि.ग्राम के वजन में दिया जाना चाहिए।

विटामिन (Vitamin): विटामिन ए की कमी क्वाशिक्योर में अधिकांश रूप में देखी गई है। विटामिन ए की कमी की पूर्ति के लिए दवाई के रूप में विटामिन ए जैसे कॉड लिवर तेल (Cod liver oil) देना चाहिए। 50,000 IU विटामिन ए प्रतिदिन देना चाहिए।

अन्य खनिज लवण (Other minerals): मैग्नीशियम तथा पोटैशियम की कमी हो जाती है। प्रतिदिन बच्चे को 3-4 ग्राम पोटैशियम क्लोराइड तथा 5 से 10 ग्राम मैग्नीशियम क्लोराइड देना चाहिए। ये खनिज लवण तब तक देने चाहिए जब तक कि बच्चा पूर्ण रूप से स्वस्थ न हो जाए।

मरास्मस (Marasmus): मरास्मस का मुख्य कारण आहार में प्रोटीन व कैलोरीज दोनों की कमी या अभाव है। एक वर्ष के बच्चे अधिकांशतः इस बीमारी से पीड़ित होते हैं। छ: महीने के पश्चात् बच्चे को पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता अधिक होती है परन्तु उनको उस समय उचित आहार नहीं मिल पाता। इनके आहार में मुख्य रूप से चावल का समावेश रहता है जिससे न तो पूर्ण प्रोटीन मिलता है और न ऊष्मा की आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। इस आयु में बच्चों को अनेक संक्रामक बीमारियाँ भी होती हैं जिसमें डायरिया मुख्य है। डायरिया रोग में भोजन का पोषण ठीक प्रकार से नहीं हो पाता तथा बच्चा कमजोर होता जाता है।

बच्चा दो प्रकार के अभाव से पीड़ित होता है –
1. आहार की कमी।
2. आहार का पोषण उचित न होना। रोग के लक्षण (Symptoms of the disease)

1. माँसपेशियों का कमजोर होना-बच्चे की माँसपेशियाँ धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं तथा शरीर पर केवल अस्थि कंकाल ही रह जाता है। आहार में प्रोटीन की कमी के कारण माँसपेशियों में उपस्थित ग्लाइकोजिन (Glycogen) का निरन्तर उपयोग होता रहता है।

त्वचा में उपस्थित वसा जलकर शरीर को ऊष्मा प्रदान करती है। इस प्रकार शरीर में कार्बोज तथा वसा की कमी होती रहती है जिससे माँसपेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं।

2. वृद्धि रुक जाती है-बच्चे के शरीर का भार तथा लम्बाई अत्यन्त कम हो जाती है। इस दशा को बौनापन भी कहते हैं।

3. अन्य लक्षण-बच्चे का यकृत बढ़ जाता है जिसके कारण उसका पेट बाहर निकल आता है। शरीर में केवल आगे निकला हुआ पेट ही दिखाई पड़ता है। बच्चे की शक्ल बन्दर की तरह भयानक हो जाती है। त्वचा खुरदरी हो जाती है।

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उस पर घाव हो जाते हैं। पानी की कमी से त्वचा सूख जाती है और उस पर दरारें पड़ जाती हैं। त्वचा ढीली पड़ कर लटक जाती है। हाथ-पैर एकदम कमजोर हो जाते हैं। विटामिन ए के अभाव के कारण आँखों में खुरदरापन आ जाता है। बच्चों में रक्तहीनता भी हो जाती है क्योंकि नए रक्त कणों का निर्माण उस समय ठीक प्रकार से नहीं हो पाता।

4. रक्त में परिवर्तन-सीरम एल्ब्यूमिन की मात्रा की रक्त में कमी हो जाती है। आहार द्वारा इलाज (Treatment through diet): इसमें वही आहार तथा पौष्टिक तत्त्व देनी चाहिए. जो क्वाशिक्योर में दिए जाते हैं।
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प्रश्न 5.
विस्तार से प्रोटीन कैलोरी कुपोषण के लक्षण लिखें। उत्तर-प्रोटीन व कैलोरी कुपोषण से निम्न दो बीमारियों के लक्षण दिखाई पड़ते हैं
1. क्वाशिक्योर (Kwashikior) – यह मुख्य रूप से आहार में प्रोटीन की कमी के कारण होता है।
2. मरास्मस (Marasmus) – मरास्मस आहार में प्रोटीन तथा कैलोरी दोनों की कमी के कारण होता है।

1. क्वाशिक्योर (Kwashikior): डॉ. सिसले विलियम (Dr. Cicely William) ने क्वाशिक्योर रोग की खोज की और उन्होंने देखा कि यह रोग अधिकतर 1 से 3 वर्ष की अवस्था के बच्चों को होता है। उन्होंने बताया कि माता का दूध छुड़ाने के पश्चात् जब बच्चों को ऊपरी दूध नहीं मिलता तब उन्हें माँड (Starch) वाले भोजन देने शुरू किए जाते हैं, जिससे उनमें इस रोग के होने की सम्भावना रहती है।

इसके अतिरिक्त जिन बच्चों को शारीरिक आवश्यकता के अनुसार दूध नहीं मिलता और उन्हें जौ का पानी, साबूदाने का पानी या खिचड़ी दी जाती है जिसरं उनकी भूख शान्त नहीं हो पाती। उन्हें भी क्वाशिक्योर रोग हो जाता है। यह रोग अधिकतर गरीब तथा मध्यम वर्ग के बच्चों को जिन्हें शारीरिक आवश्यकतानुसार प्रोटीन नहीं मिल पाता, हो जाता है।

रोग के लक्षण (Symptoms of the disease): इस रोग से पीड़ित बच्चों के शरीर में निम्नलिखित लक्षण देखने में आते हैं –

  1. वृद्धि न्यूनता (Growth Failure): यह रोग का मुख्य लक्षण है। प्रोटीन की कमी के कारण शरीर की लम्बाई तथा भार कम हो जाता है।
  2. सूजन (Oedema): प्रथम पंजों तथा पैरों में सूजन आती है। तत्पश्चात् शरीर के अन्य भाग जैसे जाँघ, हाथ तथा मुख भी सूज जाते हैं । सूजन का मुख्य कारण रक्त में सीरम एल्ब्यूमिन की कमी है।
  3. चन्द्रमा के समान मुख (Moon Face): मुख चन्द्रमा के समान गोल हो जाता है । इसका मुख्य कारण मुख पर सूजन की उपस्थिति है।
  4. मानसिक परिवर्तन (Mental changes): मानसिक परिवर्तन के कारण रोगी में उदासीनता तथा चिड़चिड़ापन आ जाता है। रोग तीव्र होने के कारण रोगी आलसी व उदासीन हो जाता है। अपने आस-पास के वातावरण में किसी प्रकार की रुचि नहीं लेता।
  5. त्वचा तथा बालों में परिवर्तन (Skin and Hair changes): त्वचा रूखी, एवं खुरदरी हो जाती है।
  6. माँसपेशियों का क्षय होना (Muscle Wasting): शरीर की माँस-पेशियों का क्षय होने लगता है। इसका प्रभाव मुख्यतः हाथों पर पड़ता है।
  7. यकृत में परिवर्तन (Liver Changes): यकृत का आकार बढ़ जाता है जो कि Fatty Liver कहलाता है। वसा का पाचन ठीक नहीं हो पाता ।
  8. आमाशयिक आंत्रिक अंग पर प्रभाव (Gastro-Intestinal Tract): भूख कम हो जाती है। वमन तथा अतिसार खास लक्षण हैं। बच्चा. भोजन पचाने में असमर्थ होता है।
  9. रक्तहीनता (Anaemia): रक्तहीनता का मुख्य कारण लौह लवण तथा फेरिक अम्ल की कमी है।
  10. विटामिन की कमी (Vitamin Deficiency): विटामिन ए की कमी के लक्षण सामने आते हैं। राइबोफ्लेविन की कमी से होने वाले लक्षण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 6.
शरीर में वसा के प्रमुख कार्य कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
वसा हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है –
1. शरीर को ऊर्जा प्रदान करना (Give energy to the body): वसा का प्रमुख कार्य व्यक्ति को शक्ति तथा ऊर्जा प्रदान करना है। वसा कार्बोज और प्रोटीन से दुगुनी मात्रा में शक्ति व गर्मी प्रदान करती है। एक ग्राम वसा में 9 कैलोरी मिलती है।

2. अधिक मात्रा होने पर यह शरीर में जमा हो जाती है (Deposit as fat in the body): जब वसा शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच जाती है तो यह एकत्र होती रहती है। यह एडीपस (Adepose) तन्तुओं के रूप में शरीर में एकत्रित होती रहती है। जब कभी उपवास अथवा रुग्णावस्था में शरीर में वसा की कमी हो जाती है तो उस समय संचित की गई वसा ऑक्सीकरण (Oxidation) क्रिया द्वारा शरीर को गर्मी व शक्ति प्रदान करती है।

3. वसा तह का काम करती है (Fat actsas a layer): हमारा शरीर माँस से ढका रहता है, जिसे चर्म कहते हैं। इस चर्म के नीचे वसा एक तह के रूप में एकत्रित होती रहती है। जो ताप कुचालक होने के कारण शरीर की गर्मी का तापक्रम 88.4 FH बनाये रखता है।

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4. कोमल अंगों की रक्षा करना (Protection of delicate organs): शरीर के अन्दर अनेक कोमल अंग पाए जाते हैं, जैसे हृदय, फेफड़े, गुर्दे । इनके ऊपर वसा की दोहरी पर्त चढ़ी
रहती है। यह पर्त कोमल अंगों को झटकों से बचाती है ताकि चोट व आघातों से कोमल अंग सुरक्षित रहें।

5. वसा अनिवार्य अम्ल प्रदान करता है (Provide essential fatty acids): वसा अनिवार्य अम्ल जो स्वास्थ्य एवं शरीर निर्माण के लिए बहुत आवश्यक है, भोजन में उपस्थित वसा द्वारा प्राप्त होता है। यह शारीरिक वृद्धि व उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

6. वसा में घुलनशील विटामिन प्रदान करना (Provide fat soluble vitamin): वसा में घुलनशील विटामिन ए, डी, ई और के अवशोषण में सहायक होते हैं। भोजन में वसा की कमी की स्थिति में यह वसा विलेय विटामिन अवशोषण नहीं हो पाते हैं।

7. शरीर अंगों को स्निग्धता प्रदान करना (Provide lubrication to different organs): वसा हमारे विभिन्न अंगों जैसे पाचन संस्थान के अंगों को स्निग्धता प्रदान करते हैं।

8. भोजन को स्वादिष्ट बनाना (Makes food tasty): वसा का प्रयोग करके जब हम खाद्य पदार्थ पकाते हैं तो स्वादिष्ट होता है।

9. भूख से सन्तुष्टि प्रदान करना (Gives food a satisfy value): वसा का पाचन धीरे-धीरे विलम्ब से होता है जिसके कारण वसायुक्त भोजन अधिक समय तक आमाशय में स्हता है और भूख देर से लगती है।

10. कोशिकाओं की रचना में भाग लेते हैं (Take part in the formation of cell): कोशिका झिल्ली का भाग बनाते हैं। उसे पारगम्यता (Permebility) प्रदान करते हैं, जिससे पोषक तत्त्व उसमें होकर आसानी से अन्दर व बाहर आ-जा सकें।

प्रश्न 7.
विटामिन ‘ए’ के कार्य लिखिए।
उत्तर:
कार्य (Functions):
1. विटामिन ए की अनुपस्थिति में कई प्रकार के आँख से सम्बन्धित रोग हो जाते हैं। इन रोगों में से रात्रि-अन्धापन (night blindness) और जेरोफ्थालमिया Zerophthalmia) मुख्य हैं।

2. शारीरिक वृद्धि में सहायक होता है। इस विटामिन की विद्यमानता में शरीर की हड्डियाँ ठीक से पनपती हैं और उनकी लम्बाई यथोचित हो पाती है, जिससे व्यक्ति की शारीरिक वृद्धि सामान्य हो पाती है। हड्डियों के साथ-साथ यह अन्य अवयवों और अंग-प्रत्यंगों को भी विकसित करने में सहायक होता है। गर्भ में बच्चे के अंग-प्रत्यंगों को बनाने में मददगार होता है। इसीलिए इसे वृद्धिवर्धक कारक (Growth Promoting Factor) भी कहा गया है।

3. पृष्ठाच्छादक तन्तुओं या उपकला (epithelial tissues) के स्वास्थ्य के लिए-उपकला कोशिकाओं को मजबूत बनाने में और उनके पुनर्निर्माण में सहायक होता है। हमारी त्वचा की ऊपरी परत उपकला और शरीर के सभी खोखले अवयवों की भीतरी झिल्लियाँ तन्तुओं की बनी होती हैं।

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बाहरी उपकला धूप, गर्मी, सर्दी से शरीर की रक्षा करती हैं, भीतरी तन्तु श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में से निकलने वाले रसों की क्रियाओं में सहायक हैं। विटामिन ए की कमी से उपकला तन्तुओं की दशा अप्राकृतिक (abnormal) हो जाती है, त्वचा में रुखापन आ जाता है। समस्त त्वचा पर सींग के से उभार (Horny Structure) बन जाते हैं।

4. प्रोटीन को विभक्त करने वाले एन्जाइम्स की उत्पत्ति में सहायक होता है।

5. हार्मोन विशेषकर कोर्टीकोस्टीरान (Corticosteron) हार्मोन बनाने में सहायक होता है।

6. शरीर के अंगों पर कीटाणुओं के संक्रमण से बचाता है।

7. श्वास संस्थान की श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में विटामिन ए की कमी से परिवर्तन के फलस्वरूप मनुष्यों को तथा जानवरों को ब्रकोन्यूमोनिया तथा अन्य संक्रमण जनित रोग होने की बार-बार सम्भावना रहती है।

8. दाँत और मसूढ़े (Teeth & gums) दाँतों के ऊपर एनामेल (enamel) की पर्त चढ़ी रहती है जो दाँतों में चमकीलापन लाती है। यदि यह ठीक प्रकार से नहीं बनता तो दाँत पीले हो जाते हैं। एनामेल के निर्माण के लिए विटामिन ए का भोजन में पाया जाना आवश्यक है। इसके प्रभाव में मसूढ़े अस्वस्थ रहते हैं।

9. मूत्र नलियों (Urinary Tubes) में पथरी बनने की सम्भावना-प्रयोग द्वारा सिद्ध हो चुका है कि भोजन में विटामिन ए की मात्रा ठीक न लेने पर पेशावनलियों में पथरी (Stone) बन जाती है जिससे पेशाब रुक-रुक कर आता है। बाद में इसके परिणाम बड़े घातक सिद्ध होते हैं।

10. स्नायु संस्थान (Nervous System) विटामिन ए की कमी से स्पाइनल कॉर्ड (Spinal Cord) में टॉक्सिन (Toxin) पदार्थ उत्पन्न हो जाते हैं, जिनका प्रभाव सम्पूर्ण संस्थान पर पड़ता है। लैथरिज्म की बीमारी भी इस विटामिन की कमी से बताई जाती है। इस रोग में दोनों पैरों में Paralysis हो जाता है।

11. पाचन संस्थान (Digestive System) विटामिन ए के अभाव में मनुष्य की आमाशय में अम्ल का अभाव पाया जाता है, जिससे भोजन के पाचन में व्यवधान होता है।

12. यह कार्बोहाइड्रेट के उपापचयन में सहायता करता है।

प्रश्न 8.
विटामिन ‘ए’ के अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms) के बारे में विस्तार से लिखिए।
अथवा
यदि एक बच्चा लाल-पीले रंग की फल-सब्जियाँ और हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाता है तो उसे कौन-से तत्त्व की कमी हो जाती है ? उसके लक्षण लिखें।
उत्तर:
1. रात्रि अन्धापन या रतौंधी (Night Blindness): आँख का भीतरी भाग जिसे रेटिना (Retina) कहते हैं वह दो प्रकार के कोषों छड़ (Rods) और सूचियों (Lons) से मिलकर बना है। इसमें रंग देने वाले कण पाए जाते हैं। वह रंग देने वाले कण (Colour pigments) जो छड़ में हैं, उन्हें रोडप्सिन (Rhodopsin) कहते हैं।

सूचियों में पाए जाने वाले रंग कणों को इडाप्सिन (Idopsin) कहते हैं। यह दोनों प्रकार के रंग कण विटामिन ए और प्रोटीन से बनते हैं। छड़ मध्यम रोशनी को ग्रहण करते हैं और सूची तेज रोशनी तथा रंग ग्रहण करते हैं। अन्धेरे से उजाले में देखते हैं, तो प्रोटीन से रोडोप्सिन (Rhodopsin) संयुक्त (Combined) हो जाते हैं। विटामिन ए की थोड़ी-सी मात्रा नष्ट हो जाती है, पुन: रोडोप्सिन की भरपाई के लिए विटामिन ए की आवश्यकता पड़ती है।

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यदि भोजन में विटामिन ए की मात्रा की प्राप्ति उचित प्रकार से शरीर में नहीं हो पाती तो रात्रि अन्धापन का रोग होने की सम्भावना रहती है। तीव्र या मध्यम प्रकाश में देखने के पश्चात् धुंधले प्रकाश में हमें कुछ समय तक चीजें दिखाई नहीं देतीं। यदि इस विटमिन की कमी अधिक हो तो यह समय काफी अधिक हो जाता है और कमी बढ़ने के साथ-साथ धीमी रोशनी में दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जाता है।

2. जेरोफ्थालमिया (Zerophthalmia): इन रोग में अश्रु ग्रन्थियाँ ठीक प्रकार से काम नहीं करतीं। आँखों में शुष्कता (dryness) आ जाती है, जिससे खुजली का अनुभव होता है। आँखों में छोटी-छोटी फुन्सियाँ होकर पस पड़ने की सम्भावना रहती है। आँख का कॉर्निया (Cornea) वाला भाग शुष्क होकर पारदर्शी (Transparent) हो जाता है। आँख की गति में बाधा पहुँचती है।

ऐसी अवस्था में यदि विटामिन A की मात्रा की कमी अधिक बढ़ जाए तो अन्धापन आ जाता है। रोगाणु तीव्र गति से वृद्धि करने लगते हैं, क्योंकि अश्रु ही रोगाणुओं को आँख में प्रवेश नहीं करने देते हैं। संक्रमण के कारण कॉर्निया (काला भाग) में जख्म हो जाता है। आँख के सफेद भाग को ढकने वाली झिल्ली कनजक्टिवा (Conjuctiva) सूख जाती है तथा चमकहीन हो जाती है।

3.बीटोट्स बिन्द (Bitots Spot): कई बार जेरोफ्थाल्मिया के साथ-साथ बीटोट्स बिन्दु भी हो जाते हैं। विटामिन ए की कमी के कारण आँखों के भीतरी भाग की झिल्ली की पर्त पर भूरे अथवा सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। इनका आकार तिकोना होता है और ये कनजक्टिवा (Conjuctiva) से चिपक जाते हैं। कॉर्निया पर छोटी-छोटी फुन्सियाँ निकल आती हैं। उनमें रस पैदा होने लगता है इसलिए पलकें चिपक जाती हैं। बीटोट्स नामक व्यक्ति ने इसके बारे में 1863 ई० में प्रथम बार बताया था।

4 .किराटामलेसिया (Keratamalacia): यह रोग की अन्तिम स्थिति है, कॉर्निया अपारदर्शक हो जाता है, रक्तवाहिनियाँ सम्पूर्ण कॉर्निया को घेर लेती हैं। कॉर्निया लाल होकर सूज जाती है और घाव हो जाता है। संक्रमण (infection) आसानी से हो सकता है। कॉर्निया नष्ट हो जाती है तथा आँखों की रोशनी समाप्त हो जाती है। अश्रु ग्रन्थि ठीक प्रकार से काम नहीं करती, आँखें शुष्क हो जाती हैं और खुजली का अनुभव होता है।

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5. टोड त्वचा (Toad skin): विटामिन ए की कमी होने पर त्वचा में बहुत से परिवर्तन आते हैं जैसे त्वचा शुष्क, खुरदरी और चितकबरी हो जाती है। विशेषकर कन्धों, पेट, पीठ, गर्दन आदि पर बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं और यह मेंढक (Toad) की त्वचा के समान लगने लगती है।

6. अन्य परिवर्तन-नाक, गले, ट्रेकिया (Trachea), ब्रांकिस (Bronchis) की श्लेष्मिक झिल्ली सूख जाती है और उनमें रोगाणु के संक्रमण की आशंका बनी रहती है। पाचक रस कम मात्रा में स्रावित होते हैं तथा सभी पौष्टिक तत्त्वों के अवशोषण में रुकावट होती है।

प्रश्न 9.
विटामिन ‘ए’ के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): विटामिन ए हल्के-पीले रंग का और कैरोटीन लाल-पीले रंग का होता है। कैरोटीन पशु जगत और वनस्पतियाँ दोनों में पाया जाता है। कैरोटीन हरी पत्तेदार सब्जियों में भी पाया जाता है परन्तु इनके हरे रंग में पीला रंग घुल जाता है। डालडा (घी) जो हाइड्रोजनीकरण क्रिया द्वारा तेल से बनता है, ऊपर से विटामिन ए मिलाया जाता है। पशुजन्य पदार्थों में मछली के यकृत के तेल में सर्वाधिक पाया जाता है। दूध, मक्खन, पनीर, दही, यकृत आदि में भी पाया जाता है।

विटामिन
दुध, मक्खन, पनीर, दही, डालडा घी, अण्डे की जर्दी, यकृत, कॉड मछली का तेल।

कैरोटीन
सूखी खुमानी, आडू, शकरकन्द, आम, गाजर, पालक, टमाटर, पोदीना, धनिया की पत्ती, चकन्दर की पत्ती, हरी मटर आदि।

यह उन सब्जियों व फलों में पाया जाता है जो पीले रंग के हों जैसे गाजर, टमाटर, कद्, शकरकन्द, आम, खुमानी, आडू और हरी पत्तेदार सब्जियाँ। फलों व तरकारियों को जितनी अधिक धूप मिलेगी, उतना ही अधिक कैरोटीन उनमें पाया जाएगा।

अति उत्तम साधन (Rich Source): मछली का तेल।
उत्तम साधन (Good Source): मक्खन, घी, अण्डा, दूध का पाउडर।
अच्छे साधन (Fair Source): गाय या भैंस का दूध।

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शरीर में अवशोषण (Utilization in the body): विटामिन ए के शोषण में लगभग 5 घण्टे लगते हैं। भोजन में विटामिन और कैरोटीन प्राप्त होते हैं। छोटी आंत की दीवारों में ही कैरोटीन विटामिन ए में परिवर्तित होता है। विटामिन ए वसा के माध्यम से शरीर में पहुँचता है। इसलिए इसके अवशोषण के साथ-साथ वसा का अवशोषण अनिवार्य है। आवश्यकता से अधिक विटामिन का 99% भाग यकृत में जमा हो जाता है। विटामिन ए का विसर्जन आँखों में व्यर्थ पदार्थ के साथ हो जाता है।

प्रश्न 10.
विटामिन ‘डी’ के अभाव से होने वाली बीमारियों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms):
1. रिकेट्स (Rickets): यह रोग प्रायः पाँच वर्ष तक की आयु के बालकों को होता है। यह रोग भोजन में विटामिन डी, कैल्शियम या फॉस्फोरस लवण की कमी या सूर्य के प्रकाश की कमी के कारण होता है।

कारण:
1. कम या दोषपूर्ण भोजन, शैशवावस्था में डिब्बे के दूध का प्रयोग, ताजे दूध और वसायुक्त भोजन की कमी और माङयुक्त भोजन की अधिकता।
2. घर में अस्वस्थ वातावरण, ताजी शुद्ध वायु तथा सूर्य के प्रकाश की कमी।
3. यदि गुर्दो के कार्य में व्यवधान पहुंचता है तो गुर्दे से सम्बन्धित रोगों के कारण पेशाब के साथ फॉस्फोरस का विसर्जन बढ़ जाता है जिससे खून के फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ जाती है। इससे शरीर की वृद्धि रुक जाती है और अस्थियों (Bones) में विकृति देखने में आती है।

इसमें आँतों में वसा के शोषण की शक्ति नहीं रहती जिससे शरीर में कैल्शियम (Ca) तथा विटामिन डी के शोषण में बाधा होने के कारण अस्थियों का निर्माण नहीं हो पाता।

लक्षण (Symptoms): विटामिन डी की कमी से बालक की अस्थियों में कैल्शियम के एकत्र होने में व्याघात होता है। साधारणत: अस्थि में होने वाले परिवर्तन निम्नलिखित हैं –

1.चौकोर सिर-सिर की अस्थि-विकृत होकर चपटी और चौकोर हो जाती है और ललाट की अस्थि आवश्यकता से अधिक उभर जाती है।

2. कबूतरी वक्ष (Pigeon Chest): संधि-स्थल (Joints) से अस्थियाँ मोटी हो जाती हैं। पसली की अस्थियाँ (Ribs) छाती के दोनों ओर माला की तरह ढाँचा (Beaded Ribs) बना लेती हैं। फलस्वरूप कबूतर-सा सीना दिखाई देने लगता है।

3. झुका मेरुदण्ड (Spinal cord bends): मेरुदण्ड की अस्थि नर्म होकर लचक जाती है और कूबड़ (Kyphosis) निकल आता है, या मेरुदण्ड एक तरफ मुड़ जाता है।

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4. कोमल अस्थियाँ: अस्थियाँ कोमल होकर दबाव के कारण उनके टेढ़े और विकृत हो जाने का भय रहता है। जब बालक चलना आरम्भ करता है तो भार के कारण अस्थियाँ टेढ़ी हो जाती है। चपटे पैर, मोटे घुटने आदि विकृतियाँ इनके परिणाम हैं।

अन्य लक्षण (Other Symptoms):

  • बालक चिड़चिड़ा, थका व अप्रसन्न दिखाई देता है। मस्तिष्क पर पसीना आने लगता है। विशेषकर जब बच्चा सोता रहता है।
  • सामान्य अशक्तता और पीलापन-पेशियों का पूर्ण विकास नहीं होता और वे अशक्त रोगी हो जाते हैं। अस्थि बन्धन भी कमजोर पड़ जाते हैं, दूध के दाँतों के निकलने में देर होती है, और जब वे निकलते हैं तो आसानी से दूषित हो जाते हैं।
  • उभरा हुआ पेट-पाचनतन्त्र में भी गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है और पीले बदबूदार दस्त आने लगते हैं। कोमल तथा अशक्त पेशियों के परिणामस्वरूप पेट बाहर को निकल आता है।
  • रोग से बचने की शक्ति का कम हो जाना-जुकाम, खाँसी, शीघ्र ही हो जाते हैं और तरह-तरह के रोग सरलता से शरीर को जकड़ लेते हैं। विशेषकर फुफ्फुसों के रोग जैसे ब्रोन्काइटिस और निमोनिया आदि।

प्रश्न 11.
विटामिन डी के खाद्य स्रोत कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
विटामिन डी के स्रोत (Food Sources): विटामिन डी दो प्रकार से प्राप्त होता है –
1. विटामिन युक्त भोजन के खाने से।
2. चर्म द्वारा सूर्य की सीधी किरणें ग्रहण करने से।

1. यह केवल पशुजन्य भोज्य पदार्थों में पाया जाता है। यह किसी तरकारी में पर्याप्त मात्रा में नहीं पाया जाता। इसकी प्राप्ति मक्खन, मछली के जिगर के तेल, कुछ मछलियों, माँस तथा अण्डे की जर्दी से होता है। दूध में यह बहुत अल्प मात्रा में पाया जाता है।
कुछ खाद्यों में विटामिन डी:
मछली का यकृत तेल।
कॉड यकृत तेल।
शार्क यकृत तेल।
अन्य भोज्य पदार्थ।
मछली, अण्डा, अण्डे का पीला भाग, मक्खन, घी, दूध।

2. यह विटामिन सबसे अधिक सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें में पाया जाता है। यह किरणें निकलते हुए सूर्य की किरणों में सबसे अधिक होती हैं। प्रातःकाल अपने शरीर पर किरणों को ग्रहण करने से शरीर में विटामिन डी पहुंचता है। चर्म की भीतरी तह में स्थित वसा में एक पदार्थ होता है, जिसे आर्गस्ट्रॉल (Ergasterol) कहते हैं। जब चर्म पर सूरज की किरणें पड़ती हैं, तो वे वस्त्र की तह में प्रवेश कर जाती हैं और आर्गस्ट्रॉल को विटामिन डी में परिवर्तित कर देती हैं।

सूर्य के प्रकाश ग्रहण करने पर इस विटामिन की कमी को कुछ सीमा तक पूरा किया जा सकता है। यही कारण है कि घनीबस्ती वाले शहरों की अपेक्षा पहाड़ी स्थानों, समुद्र तट और गाँवों में रहने वाले व्यक्तियों के शरीर में विटामिन डी का निर्माण अधिक मात्रा में होता है। मुसलमान स्त्रियाँ बन्द अंधेरे कमरों में दिन व्यतीत करती हैं और बुरका पहनकर बाहर जाती हैं परिणामतः वे विटामिन डी के इस स्रोत के लाभ से वंचित रह जाती हैं।

अवशोषण (Absorption): यह चिकनाई में घुलनशील है, यह छोटी आंत से बहुधा वसा के साथ-साथ यकृत में पहुँचकर वहीं संगृहीत हो जाता है। इसका अधिकांश यकृत में और कम भाग अस्थियों, मस्तिष्क और त्वचा में जमा होता है। आवश्यकता होने पर इन भण्डारों से यह विटामिन रक्त में मिलकर सम्पूर्ण शरीर की कमी की पूर्ति करता है। दीर्घकाल तक इस संचित हुईं विटामिन पर निर्भर करना सम्भव नहीं। – पित्त रस (Bile) की उपस्थिति में स्निग्ध Lipid शोषण शीघ्र हो जाता है।

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प्रश्न 12.
विटामिन ‘बी-1’ (थायमिन) की कमी से होने वाले रोग के बारे में बताइए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms): थायमिन की कमी से बेरी-बेरी (Beri-Beri) रोग हो जाता है। प्रायः देखा गया है कि जिन लोगों का मुख्य भोजन चावल है, वे अधिकांश इस रोग से ग्रस्त रहते हैं। इसका कारण है जो चावल खाते हैं, वह मशीन से साफ किया हुआ होता है जिसके कारण यह चावल थायमिन रहित हो जाता है। इसके अतिरिक्त खाद्य तत्त्वों की कमी के कारण, गरीबी, अत्यधिक शारीरिक परिश्रम, संक्रमण जनित रोग, ज्वर, पाचन-सम्बन्धी विकार, गलत आदतें आदि कारणों से इस विटामिन का अभाव हो सकता है व रोग के लक्षण सामने आते हैं।

थायमिन की बहुत कमी होने पर बेरी-बेरी नामक रोग हो जाता है। यह रोग तीन प्रकार का होता है –
1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri)।
2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri)।
(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri)।
(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri)।
3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri)

1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri): फिलीपाइन द्वीप समूह तथा जापान में सर्वप्रथम बच्चों में यह रोग देखा गया । रोग के लक्षण तीसरे व चौथे सप्ताह में प्रकट होते थे। भूख की कमी, वमन, पेशाब कम मात्रा में होना, अतिसार और कब्ज भी हो सकता है। परिणामतः बच्चा निर्बल और बेचैन हो जाता है और पीला पड़ जाता है, शरीर पर मुख्यतः चेहरे, हाथों और पैरों पर सूजन आ जाती है, हृदय दुर्बल हो जाता है। शिशु रोता हुआ प्रतीत होता है परन्तु रोने की आवाज नहीं आती है, सांस लेने में कठिनाई होती है। माँसपेशियाँ सख्त हो जाती हैं और शीघ्र ही ऐंठन से पीड़ित होकर मृत्यु हो सकती है।

2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri): इसके साधारणतः निम्नलिखित लक्षण हैं –

  • पोलीन्यूराइटिसिस (Polyneuritisis)।
  • ओडीमा (Oedema)।
  • दिल की धड़कन बढ़ जाना (Disturbances of the heart)।

(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri): माँसपेशियों में सूजन आ जाती है। हाथों और पैरों में सनसनाहट, जलन तथा चैतन्य शून्यता आ जाती है, त्वचा में संवेदनशीलता नष्ट हो जाती है, रोग के तीव्र रूप धारण कर लेने पर रोगी उठ-बैठ भी नहीं सकता और चल भी नहीं सकता। शुष्क बेरी-बेरी में ओडीमा की सम्भावना अधिक होती है।

(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri): सर्वप्रथम पैरों में सूजन आ जाती है। फिर समस्त शरीर में धीरे-धीरे सूजन आने लगती है। सूजन का कारण कोशिकाओं में जल-जमाव है। सूजा हुआ स्थान दबाने पर वहाँ गड्ढा-सा पड़ जाता है तथा थोड़ी देर पश्चात् वह फिर पहले की तरह हो जाता है । श्वास उथली व धड़कन की गति बढ़ जाती है, शरीर की वृद्धि रुक जाती है तथा शक्ति क्षीण होती जाती है। बेचैनी, वमन या पेचिस भी हो सकती है। सहसा हृदय की गति बन्द हो जाने के कारण मृत्यु भी हो सकती है।

3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri): शराब का अधिक सेवन करने से भूख कम लगती है। विटामिन बी की हीनता हो जाती है जिससे बेरी-बेरी रोग हो जाता है। इस रोग के लक्षण प्रकट होने में साधारणत: दो से तीन महीने लग जाते हैं। प्रारम्भ में पाचन संस्थान संबंधी लक्षण प्रकट होते हैं-भूख न लगना, जी मिचलाना, वमन, पेट में अफारा, मलावरोध तथा दस्त आदि। बाद में रक्ताल्पता भी हो जाती है।

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प्रश्न 13.
विटामिन-‘बी1 (राइबोफ्लेविन) से होने वाले रोगों के बारे में बताइए।
उत्तर:
रोग के लक्षण (Effect of disease): प्रयोगों द्वारा ज्ञात हो गया है कि राइबोफ्लेविन के अभाव में व्यक्ति दुर्बल तथा वृद्ध जैसा दिखाई देने लगता है। यौवन का विकास अवरुद्ध हो जाता है। भोजन करने की इच्छा नष्ट हो जाती है तथा पाचन-शक्ति क्षीण हो जाती है, व्यक्ति अनेक चर्म और नेत्र रोगों का शिकार हो जाता है।

आँखों (Eyes) में-इसके अभाव में कॉर्निया (Cornea) के चारों ओर ललाई पैदा हो जाती है, आँखों में से पानी बहने लगता है, रोशनी अच्छी नहीं लगती। धीरे-धीरे ललाई बढ़ने लगती है और कॉर्निया पर छोटी-छोटी रक्त कोशिकाओं (Capillaries) का फैलाव होने लगता है। हमारे शरीर में कॉर्निया व आँख के लेंस ही ऐसे ऊतक हैं, जिन्हें अपने पोषण के लिए रक्त की आवश्यकता नहीं होती। अतः इनको पोषक तत्त्व अश्रु ग्रन्थि के स्राव ही से प्राप्त होते हैं।

अश्रुस्राव से पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जिससे शरीर की बचाव शक्ति कम हो जाती है। स्वाभाविक तौर पर कॉर्निया को समुचित पोषण प्राप्त कराने के लिए उसके चारों ओर अतिरिक्त रक्त कोशिकाओं का जाल बिछने लगता है और इसी कारण आँख में ललाई, रेतीले कणों के गिरने का सा आभास आदि होने लगता है। पलकें खुरदरी रहती हैं और दृष्टि भी अस्पष्ट होने लगती है।

मुँह (Mouth)पर: होठों के मिलन स्थान पर कटाव होने लगता है। होठों पर सफेद दाग पड़ने लगते हैं, जैसे-कीलोसिस (Cheilosis)। जिह्वा की सतह पर दरारें पड़ जाती हैं और उसमें जलन व दर्द होता रहता है। जुबान का रंग बैंगनी लाल-सा हो जाता है। भोजन खाने पर जीभ में पीड़ा तथा जलन होती है। अन्त में जुबान से श्लैष्मिक झिल्ली हट जाती है। इस अवस्था को ज्योग्रेफिकल रंग कहते हैं।

त्वचा (Skin)पर: त्वचा स्वस्थ नहीं रहती। खुजली, काले दाग व एक प्रकार का त्वकशोध (Dermatitis) होता है जिसमें से पानी निकलता रहता है। ऐसे त्वकशोध ललाट, नाक के दोनों ओर तथा बगल आदि पर होते हैं जिनमें खुजली होने लगती है।

प्राप्ति साधन (Food Sources): कुछ राइबोफ्लेविन आँतों में भी निर्मित होता है। यह विटामिन बहुत से प्राणिज और वानस्पतिक भोज्य पदार्थों में पाया जाता है।

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विभिन्न भोज्य पदार्थों में उपस्थितिः अति उत्तम स्रोत: यकृत (Liver), अण्डे का पाउडर (Egg powder), शुष्क खमीर (Yeast), दूध का पाउडर। उत्तम स्त्रोत: दूध, मछली, अण्डा, साबुत अन्न, मांस, फलियाँ, हरी पत्तेदार सब्जी। सामान्य स्रोत: मिल का अन्न, मूलकन्द, अन्य शाकसब्बी। दूध इस विटामिन का अच्छा साधन है परन्तु मक्खन व घी में यह विटामिन नहीं होता यह पानी में घुलनशील है और छाछ में रह जाता है।

शरीर में अवशोषण (Absorption in the body): इसके अवशोषण के लिए अमाशय में पाया जाने वाला आमाशयिक अम्ल विद्यमान होना अनिवार्य है। इसका शोषण आँतों में होता है, विटामिन का अधिकांश हृदय यकृत में संगृहीत होता है, शेष भाग का संग्रह रक्त तथा तन्तु कोषों में होता है। राइबोफ्लेविन के संग्रह की प्रतिक्रिया भोजन में पैटोथोनिक अम्ल तथा विटामिन बी, की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इसकी संगृहीत मात्रा एक निश्चित मात्रा से अधिक नहीं हो सकती है। मूत्र के माध्यम से यह शरीर से निष्कासित हो जाती है।

प्रश्न 14.
विटामिन सी के कार्य लिखें।
उत्तर:
कार्य (Functions):

  1. कोलेगन (Collagen) का निर्माण-कोलेगन (Collagen) का निर्माण एवं उसे उचित अवस्था में रखने का कार्य विटामिन सी का ही है। कोलेगन शरीर में बनाने वाले कोषों को पारस्परिक सम्बद्ध करने का साधन है। यह लम्बी हड्डियों के सिरे तथा दाँत के भीतर सीमेंट वाला भाग बनाता है। साधारण कोषों के बन्धक तन्तुओं को कोलेगन की आवश्यकता है। यह जख्म को भरने का भी कार्य करता है। विटामिन सी के अभाव में जख्म देर से भरता है।
  2. अमीनो अम्ल (Amino Acid) जैसे फिनाइल एलानिन व टाइरोसीन (Alanine & Tyrosin) का ऑक्सीकरण करने में सहायक होता है।
  3. लोहे (Iron) व कैल्शियम के अवशोषण कराने में सहायक होता है।
  4. एड्रिनल व थायराइड ग्रंथि (Thyroid gland) का स्राव बढ़ाने और अन्य ग्रन्थियों के हारमोन्स (Hormones) पैदा कराने में सहायक होता है। .
  5. रक्त धमनियों की भीतरी भित्तियों पर कोलेस्टेरॉल के जमाव को रोकता है।
  6. त्वचा प्रतिरोपण (Skin Grafting) की सफलता में अत्यधिक सहायक होता है।
  7. नाक, गले व सांस नलिकाओं की कोशिकाओं को दृढ़ता प्रदान करता है जिससे बार-बार नजला, जुकाम, खाँसी आदि न हों।
  8. यह विटामिन अस्थियों के स्वरूप, विकास और निर्माण के लिए अत्यन्त आवश्यक है। स्कर्वी रोग में अस्थियों के अन्तिम सिरे प्रभावित होते हैं।
  9. इसके अभाव में पुराने भरे हुए घावों के पुनः खुल जाने की सम्भावना रहती है।
  10. दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है। यह दाँतों के निर्माण एवं विकास में भी सहायता करता है।
  11. यह विटामिन मनुष्य को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।

प्रश्न 15.
जल में घुलनशील विटामिनों की प्राप्ति, आवश्यकता एवं प्रभाव के परिणाम लिखें।
उत्तर:
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प्रश्न 16.
कैल्शियम के कार्य विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
कैल्शियम के कार्य (Functions of Calcium)
1. फॉस्फोरस के साथ हड्डियाँ बनाने, बढ़ाने और ठोस व दृढ़ करने में काम आता है।

2. दाँतों की रचना में भी यह ऐसी ही भूमिका निभाता है।

3. शरीर वृद्धि कराता है। हड्डियों में जब वृद्धि होती है तो स्वाभाविक है कि शरीर वृद्धि भी हो।

4. सोडियम, पोटैशियम व मैग्नीशियम के साथ माँसपेशियों में संकुचन (Contraction) पैदा करता है, जिससे हमारे हाथ, पाँव, गर्दन, कमर व अन्य सभी अंग कार्य कर सकते हैं।

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5. आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव-निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है और एन्जाइम्स निर्माण में भी सहायक का कार्य करता है।

6. कोशिका झिल्ली की पारगम्यता पैदा करने में सहायक होता है।

7. रक्त का थक्के के रूप में जमना-रक्त में पायी जाने वाली सीरम में 100 मिली लीटर रक्त में 10 ग्राम कैल्शियम पाया जाता है। रक्त थक्के के रूप में परिवर्तित होने के लिए फाइब्रिन को फाइब्रीनोजन में बदलना पड़ता है।

इस परिवर्तन के लिए थ्रॉम्बिन एन्जाइम की आवश्यकता पडती है। यह थ्रॉम्बिन एन्जाइम प्रोथ्राम्बिन (Prothrombin) के रूप में निष्क्रिय दशा (Inactive Form) में रक्त में पाया जाता है। प्रोथ्राम्बिन को थ्रॉम्बिन में बदलने की क्रिया के लिए कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है।

8. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त हो तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स कहते हैं।

9. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है। इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाती हैं। इस दशा को आस्टोमलेश्यिा (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है।

10. दाँत सुडौलता रहित और कमजोर हो जाते हैं।

11. रक्त जमने में अधिक समय लगता है।

12. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

13. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

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प्रश्न 17.
कैल्शियम प्राप्ति के कौन-कौन-से साधन हैं ?
उत्तर:
कैल्शियम के साधन (Sources of Calcium): कैल्शियम की प्राप्ति निम्न वस्तुओं से होती है :

  • दूध और दूध से बनी चीजों में कैल्शियम पाया जाता है, क्योंकि दूध में कैल्शियम अकार्बनिक लवण के रूप में मिलता है।
  • यह अण्डे विशेषकर अण्डे की जर्दी वाले भाग में उपस्थित रहता है।
  • हरी पत्तीदार तरकारियों में प्रचुर मात्रा में मिलता है। पालक में आक्जेलिक अम्ल की मात्रा . अधिक होने से शरीर में कैल्शियम का शोषण नहीं हो पाता है।
  • कुछ मछलियों में भी कैल्शियम पाया जाता है। .. 5. सूखे फलों, मेवों जैसे बादाम गिरी में भी यह लवण उपस्थित रहता है।
  • दालों में थोड़ी मात्रा में पाया जाता है लेकिन तेल निकालने वाले बीजों में यह काफी मात्रा में पाया जाता है।
  • कुछ मात्रा में अनाजों द्वारा भी प्राप्त होता है। इनमें से रागी उत्तम साधन है।
  • अम्ल और क्षार की मात्रा को शरीर में एक-सा बनाए रखने का कार्य कैल्शियम करता है। शरीर में क्षार की मात्रा में वृद्धि हो जाने से अपच हो जाती है।

प्रश्न 18.
कैल्शियम की कमी से हानियाँ बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की कमी से हानि (Effect of Calcium deficiency):

1. कैल्शियम की कमी से शरीर छोटा रह जाता है।

2. हड्डियों का कैल्सीकरण अपूर्ण रहता है, जिसके फलस्वरूप वे निर्बल व लचकदार रहती हैं।

3. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त होत तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स (Rickets) कहते हैं।

4. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में कैल्शियम की माँग बढ़ जाती है। जब इसकी आवश्यकता की पूर्ति भोज्य पदार्थों द्वारा नहीं हो पाती तो इनकी पूर्ति के लिए गर्भवती तथा दूध पिलाती माँ की अस्थियों में से कैल्शियम का प्रत्याहरण होने लगता है। बच्चा अपने शरीर की वृद्धि के लिए कैल्शियम की आवश्यकता की पूर्ति माँ के शरीर में से कर लेता है।

इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाता । इसी दशा को आस्टोमलेशिया (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होती है।

5. दाँत सुडौलतारहित और कमजोर हो जाते हैं।

6. रक्त ‘जमने में अधिक समय लगता है।

7. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

8. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में से निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

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प्रश्न 19.
शरीर में लोहे के कार्य लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे के कार्य (Functions of iron in the body) :

  • यह रक्त में पाए जाने वाले तत्त्व हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है। जब रक्त की लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन समुचित मात्रा में होता है तब वह वांछित मात्रा में ऑक्सीजन अवशोषित कर कोशिकाओं में पहुँचाता है और कार्बनडाइऑक्साइड को शरीर के बार निकालता है
  • यह मांसपेशियों (Muscles) में पाए जाने वाले तत्त्व मायोग्लोबिन (Myoglobin) का आवश्यक तत्त्व है। मायोग्लोबिन में 3% लोहा रहता है।
  • लोहा प्रत्येक कोष में उपस्थित क्रोमेटीन पदार्थ का एक आवश्यक तत्त्व है।
  • शरीर में पाए जाने वाले कुछ एन्जाइम का लोहा एक आवश्यक भाग है।
  • लोहा तन्तुओं के ऑक्सीकरण (Oxidation) तथा कटौती (Reduction) की क्रियाओं में उत्प्रेरक के रूप में भाग लेता है।

प्रश्न 20.
आयोडीन (Iodine) के शरीर में क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
आयोडीन के कार्य (Functions of Iodine):

  • मनुष्यों के उचित शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए थाइरॉक्सिन (Thyroxin) अनिवार्य है। शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइरॉइड ग्रन्थि (Thyroid gland) में ये हारमोन न निकलने पर शारीरिक और मानसिक विकास की गति में बाधा पहुँचती है।
  • शरीर के कोषों में होने वाली ऑक्सीकरण की क्रिया की दर को थाइरॉक्सिन प्रभावित करता है। थाइरॉक्सिन आवश्यकता से अधिक निकलने पर शक्ति की दर की गति बढ़ जाती है जिससे शरीर दुबला हो जाता है। इसके विपरीत जब थाइरॉक्सिन शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइराइड ग्रन्थि में से नहीं निकलता तो शक्ति उपापचयन की दर की गति कम हो जाती है। अतः शरीर मोटा हो जाता है।
  • मनुष्यों और जानवरों की सन्तानोत्पादन शक्ति के लिए आयोडीन आवश्यक है।
  • आयोडीन की कमी से बालों की वृद्धि नहीं हो पाती अथवा बाल उगते ही नहीं।
  • आयोडीन के अभाव से प्रौढ़ व्यक्ति भी प्रभावित हो जाते हैं। वे सुस्त हो जाते हैं। उनके हाथ-पाँव सूज जाते हैं।

प्रश्न 21.
आयोडीन की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
उत्तर:
रोग (Diseases):
1. गलगण्ड (Goiter): आयोडीन की आवश्यकता शरीर में स्थित थायराइड ग्रन्थि (Thyroid Gland) की क्रियाशीलता को बनाए रखने के लिए होती है। इस ग्रन्थि से थायरॉक्सिन नामक हारमोन्स स्रावित होता है। शरीर में आयोडीन की कमी से यह हारमोन स्रावित होना बन्द हो जाता है और गले में घेघा निकल आता है, जिसे घेघा रोग कहते हैं। यह स्थिति अधिकतर किशोरावस्था या वयस्क महिलाओं में ही होती है। थायराइड ग्रन्थि का औसत वजन 25 ग्राम होता है, वह रोग की अवस्था में बढ़कर 200 से 500 ग्राम भी हो सकता है। घेघा बढ़ने पर यह दूर से ही दिख जाता है।

2. क्रोटिन (Cretinism): आयोडीन की कमी से बच्चों को क्रोटीन अथवा बौनापन (Cretinism) का रोग हो जाता है। बच्चों की वृद्धि, शारीरिक एवं मानसिक विकास रुक जाता है। त्वचा. मोटी और खुरदरी हो जाती है। चेहरे और समस्त शरीर में सूजन आ जाती है, त्वचा कार्य म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) गृह विज्ञान, वर्ग-119135 में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, चेहरे का भाव बिगड़ जाता है, जबान बड़ी हो जाती है, होंठ मोटे हो जाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी अवस्था में होठों का बन्द करना भी कठिन होता है।

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बच्चों की तरह बड़ों को मिक्सोडीमा (Myxoedema) का रोग हो जाता है। चेहरा भावहीन हो जाता है, हाथ-पाँव तथा चेहरे में सूजन आ जाती है। रोगी आलसी तथा सुस्त हो जाता है। आयोडीन की कमी से शरीर व दिमाग में और भी कई खराबियाँ पैदा हो सकती हैं जिनमें कुछ मामूली होती हैं तो कुछ खतरनाक जैसे, मानसिक विकृति, बहरा, गूंगापन, ठीक से खड़े न होना आदि।

प्रश्न 22.
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोग कौन से हैं?
उत्तर:
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोगपोषक तत्त्व | प्राप्ति स्रोत कमी से होने वाले रोग
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प्रश्न 23.
विभिन्न खाद्य वर्ग कौन-कौन से हैं वर्णन करें? [B.M. 2009 A]
उत्तर:
खाद्य पदार्थों में पौष्टिक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर उन्हें विभिन्न वर्ग में बाँटा गया है। जो निम्न प्रकार हैं-

  1. वर्ग-खाद्यान्न, अनाज-गेहूँ चावल, ज्वार बाजरा मक्का रागी एवं
  2. वर्ग-दाल एवं मेवा फलियाँ-सभी प्रकार की साबुत एवं घुली जाने तथा फलिया सूखी मेवा, मूंगफली, तिल बादाम इत्यादि।
  3. वर्ग-दूध और माँस-दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे पनीर, खोया, दही। मांस, मछली, अंडा।
  4.  वर्ग-फल और सब्जियाँ-फल विभिन्न प्रकार के विटामिन ‘ए’ एवं विटामिन ‘सी’ भरपूर होते हैं। सब्जियों को तीन भाग में बाँटा जा सकता है।
    (a) हरी पत्तेदार सब्जियाँ,
    (b) गहरी पीली एवं लाल सब्जियाँ,
    (c) जड़ वाली सब्जियाँ
  5.  वर्ग-चीनी और वसा-चीनी, शक्कर, गुड़, वसा, घी, तेल, मक्खन।

वर्ग 1 – कार्बोज शक्ति प्राप्त करने का सबसे उत्तम साधन है।
वर्ग 2 – प्रोटीन प्राप्ति का वानस्पतिक साधन है। दालों में 40 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। मेवे से प्राप्त प्रोटीन उत्तम कोटि का होता है।
वर्ग 3 – पशु से पाये जाने वाले प्रोटीन के आधार पर, बनाया गया है। इस वर्ग से प्राप्त प्रोटीन उत्तम श्रेणी का है । अंडा से प्राप्त प्रोटीन को ‘ए’ ग्रेड का प्रोटीन माना गया है।।
वर्ग 4 – फल इनसे विटामिन खनिज लवण पाया जाता है। सब्जियाँ इनसे विटामिन ‘ए’ बी तथा सी से प्राप्त किया जा सकता है । जड़ वाली सब्जियाँ में कार्बन अधिक पाया जाता है। इनमें विटामिन एवं खनिज लवण कम होता है।
वर्ग 5 – इस वर्ग के खाद्य समूह से ऊर्जा प्राप्त होती है। गुड़ से लौह तत्त्व प्राप्त होता है।

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प्रश्न 24.
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting selection of food)-उत्तम पोषण का महत्त्वपूर्ण आधार विभिन्न भोज्य पदार्थों का चुनाव होता है। अतः आहार में ऐसे भोज्य पदार्थों का समावेश आवश्यक है जो परिवार की पौष्टिक आवश्यकताओं के साथ-साथ पूर्ण सन्तुष्टि भी प्रदान कर सकें। किन्हीं दो परिवारों का आहार समान नहीं होता। भिन्न प्रान्तों, देश-विदेश में यह अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है। विभिन्न परिवारों की आहार-सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भिन्न खाद्य पदार्थों का चयन इसका एक प्रमुख कारण है।

यह चयन कई कारकों पर आधारित है, जो निम्न हैं –
1. परिवार के आहार सम्बन्धी मूल्य (Family Food Values): किसी खाद्य पदार्थ को अपने आहार में सम्मिलित करना न करना परिवार के आहार-सम्बन्धी मूल्यों पर आधारित होता है। आहार-सम्बन्धी मूल्य भौगोलिक स्थिति या जलवायु, धार्मिक विश्वास, परम्परा, दूसरों की नकल आदि के कारण बनते हैं। उदाहरणार्थ किसी प्रान्त में अनाज यदि जलवायु उत्तम होने से काफी मात्रा में पैदा होता है तो वहाँ रहने वाले लोगों को शाकाहारी भोजन (अनाज) से लगाव हो जाता है।

इसमें भी यदि गेहूँ अधिक होता है तो रोटी खाने की आदत पड़ जाती है, जैसे पंजाबियों में । आदिवासी तथा बंगाली इलाकों में मांस, मछली, शराब आदि की ओर लोगों का अधिक झुकाव रहता है। दक्षिण में चावल अधिक खाया जाता है। प्रत्येक परिवार की जीवन-शैली (Life-style) भी भिन्न होती है जो आहार-सम्बन्धी मूल्यों को प्रभावित करती है। जैसे एक दिन में खाए जाने वाले आहारों की संख्या व समय । किसी परिवार में तीन समय भोजन पकता है तो किसी में दो समय । यह मूल्य किसी भी परिवार के शाकाहारी या मांसाहारी होने को भी प्रभावित करते हैं।

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2. खाद्य पदार्थों की उपलब्धता (Availability of Food Stuffs): बहुत से खाद्य पदार्थों, विशेषकर फल और सब्जियों की उपलब्धता मौसम पर निर्भर करती है। मौसमी चीजें सस्ती होती हैं और पौष्टिक भी। सर्दियों में गाजर, मटर, गोभी, साग, शलगम आदि अधिक मात्रा में मिलते हैं तो गर्मियों में घीया, तोरी, पेठा, अरबी, टिंडा, शिमला मिर्च, करेले आदि। मौसम के अतिरिक्त स्थानीय उपज का प्रभाव भी खाद्य पदार्थों के चयन पर पड़ता है।

यह पदार्थ सस्ते, स्वादयुक्त और जलवायु के अनुकूल होते हैं। उदाहरणार्थ तटवर्ती क्षेत्रों में मछली तथा अन्य समुद्री पदार्थ आसानी से और सस्ते मिल जाते हैं। इसलिए यह इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के आहार का मुख्य अंग बन जाते हैं। आज यातायात के साधनों में वृद्धि, उचित संरक्षण और संग्रह के तरीकों के कारण खाद्य पदार्थों की उपलब्धि हर जगह काफी बढ़ गई है।

3. क्रय शक्ति (Purchasing Power): भोज्य पदार्थों का चुनाव उन्हें खरीदने की सामर्थ्य पर काफी हद तक निर्भर करता है। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, वैसे-वैसे व्यक्ति खाद्य पदार्थों चाहे वह मौसम के हों या बिना मौसम के, स्थानीय हों या अन्य प्रान्तों के, में से अपनी पसन्द के खाद्य पदार्थों का चयन कर सकता है, परन्तु निम्न आय वर्ग वाले व्यक्ति अपने भोजन में अधिक महँगे खाद्य पदार्थ सम्मिलित नहीं कर सकते, जैसे-दूध, मांस, फल आदि। इसलिए उन्हें ऐसे उपाय अपनाना आवश्यक है जिनसे कम कीमत में पौष्टिक आहार की प्राप्ति हो सके, जैसे-चीनी के स्थान पर गुड़, बादाम के स्थान पर मूंगफली का प्रयोग करना।

4. मिथ्या धारणाएँ: भोजन सम्बन्धी अन्ध-विश्वास कुछ ऐसी मान्यताओं को जन्म देते हैं जो गलत होती हैं । खाद्य पदार्थों का पोषक तत्त्वों के बारे में अज्ञानता के कारण विकास होता है। परम्परा से चले आए विश्वासों के कारण बातें अभी भी मान्य हैं। उदाहरणार्थ मछली खाने के बाद दूध पीने से चर्म रोग हो जाता है, चावल खाने से मोटापा बढ़ता है, सर्दी को भोजन से और बुखार को भूख से ठीक किया जा सकता है आदि। इस तरह की मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसके कारण हम भोजन का पूरा लाभ नहीं उठा पाते।

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5. संस्कृति (Culture): खाद्य पदार्थों का चयन धर्म, जाति व संस्कृति से प्रभावित होता है। जैसे पंजाबी के भोजन में मक्की की रोटी और साग, बंगाली के भोजन में चावल, मछली, दक्षिण भारतीय भोजन में सांभर, इडली आदि का अपना एक विशिष्ट स्थान है। – भोज्य पदार्थों की स्वीकृति में धर्म भी अपनी विशेष भूमिका निभाता है। जैसे कुछ सम्प्रदायों में मांसाहारी खाद्य पदार्थ खाने की सख्त पाबंदी है। कुछ में लहसुन, प्याज खाना मना है। इस्लाम धर्म में लोग सूअर का मांस नहीं खाते, हिन्दू धर्म में गौ का मांस नहीं खाते । धार्मिक त्योहारों पर विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। शुभ अवसरों पर कुछ मीठा बनाया जाता है आदि।

6. समवयस्कों या मित्रों का प्रभाव (Peer Group): भोजन के विषय में मित्रों और जान-पहचान वाले लोगों की स्वीकृति बहुत महत्त्व रखती है, विशेष रूप से किशोरों के लिए। कई खाद्य पदार्थ व्यक्ति केवल इसलिए खाता है क्योंकि उसके साथी खाते हैं। जैसे आजकल किशारों में अनुपयोगी व्यंजन (Junk goods), जल्द तैयार किये जाने वाले व्यंजन (Fast Foods), जैसे-पिज्जा, नूडल्ज आदि खाये जाते हैं।

मित्रगणों के प्रभाव से व्यक्ति दूसरे प्रान्तों, दूसरे देशों के लोगों द्वारा खाये जाने वाले खाद्य पदार्थ भी अपने आहार में शामिल कर लेते हैं। उत्तर भारत में इडली, डोसा, सांभर का अधिक प्रचलन तथा मांसाहारी व्यक्ति का शाकाहारी और शाकाहारी व्यक्ति का मांसाहारी हो जाना इसके उदाहरण हैं।

6. संचार माध्यम (Media): टी.वी., रेडियो, फिल्म, समाचार-पत्र, गोष्ठियों आदि के माध्यम से पोषण-सम्बन्धी जानकारी आम जनता तक पहुँचाई जाती है। लोग, विशेष रूप से गृहिणियाँ इन्हें पढ़ती, सुनती या देखती हैं। उनके ऊपर इनका काफी प्रभाव देखने को मिलता है। वह अपने परिवार के पोषण स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करती हैं और उत्तम पोषक पदार्थों को अपने आहार में शामिल करती हैं।

इन संचार माध्यमों का कई बार विपरीत प्रभाव भी देखने को मिलता है। आकर्षित विज्ञापनों से प्रभावित होकर कई बार बच्चे, किशोर आदि अपने आहार में उन वस्तुओं को ग्रहण करते हैं, जिनसे लाभ न होकर केवल धन का अपव्यय ही होता है। जैसे ठण्डे पेय पदार्थ (Soft Drinks), नूडल्स (Noodles), टॉफी और चॉकलेट आदि।

प्रश्न 25.
संतुलित आहार किसे कहते हैं ? भिन्न-भिन्न खाद्य वर्गों का भोजन में क्या योगदान है ?
उत्तर:
संतुलित आहार वह आहार है जिसमें सभी पोषक तत्त्व-कार्बोज, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, विटामिन और जल उचित मात्रा में प्राप्त हों । आहार मनुष्य की केवल भूख ही नहीं मिटता बल्कि उसे पूर्णतः स्वस्थ, नीरोग एवं पुष्ट बनाए रखता है। इसके अतिरिक्त कुछ अधिक पोषक तत्त्व भी शरीर को मिलते हैं जो आपातकाल में प्रयोग किए जाते हैं। परिभाषा के अनुसार, संतुलित भोजन अधिक पोषक तत्त्व एकत्र कर देता है ताकि कभी-कभी असंतुलित भोजन का प्रभाव न पड़े।

खाद्य वर्ग (Food Groups): भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने खाद्य पदार्थों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा है :
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वर्ग 1. खाद्यान्न, अनाज और इसके उत्पाद (Cereals, grains and its products): अनाज कई प्रकार का होता है तथा गुणवत्ता और पसंद के अनुसार चुना जा सकता है। भारत में आमतौर से प्रयोगों में आने वाले अनाज गेहूँ, चावल, रागी, ज्वार और बाजरा हैं। खाद्यान्न में तीन हिस्से हैं, जैसे भूसा, बीज और भ्रूणपोष। अधिकतर भोजमों में खाद्यान्न की मात्रा अधिक होती है और इस प्रकार यह भोजन में कैलोरी देने वाला मुख्य साधन है। – खाद्यान्नों में अलग-अलग प्रोटीन की मात्रा होती है।

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आमतौर पर प्रयोग में लिये जाने वाले खाद्यान्नों की प्रोटीन निम्नलिखित हैं –
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खाद्यान्नों के प्रोटीन शारीरिक क्रिया के लिए उत्तम नहीं हैं क्योंकि उनमें लाइसिन, मिथियोनिन, ट्रिप्टोफन और थ्रीओनिन जैसे अमीनो अम्ल बहुत कम होते हैं। खाद्यान्न की प्रोटीन मात्रा सुधर जाती है जब इनको प्रोटीनयुक्त खाद्यों के साथ मिलाया जाए, जैसे चावल और दाल, चावल और मांस या रोटी और दाल इत्यादि। खाद्यान्नों से काफी मात्रा में खनिज लवण मिल जाते हैं। हड्डियों और दांतों को स्वस्थ रखने के लिए ये कैल्शियम और फॉस्फोरस देते हैं। रागी तो कैल्शियम का भरपूर स्रोत है। हर 100 ग्राम वाले खाने के हिस्से में 344 मि० ग्राम कैल्शियम होता है।

बाजरा में लोहा होता है तथा अक्सर भोजन में लेने से लाभदायक सिद्ध हो सकता है। खाद्यान्न में विटामिन A और C की कमी होती है। पीली मक्की में कैरोटीन होती है। खाद्यान्नों को अंकुरित करने से उनमें विटामिन सी की मात्रा बढ़ जाती है। भूसी और बीज में बी-समूह के विटामिन काफी मात्रा में होते हैं। खाद्यान्नों को दलने, पालिश करने से बी-समूह के विटामिन नष्ट हो जाते हैं। सेला करते समय विटामिन अंदर के हिस्से में चला जाता है तथा दलने के समय अधिक विटामिन नष्ट नहीं होता। भूसी रूक्षांश देता है जो शरीर के उपापचय क्रिया में सहायक होता है।

कुछ कंदमूल हैं-आलू, शकरकंद, टपायका, जिमीकंद और कचालू। ये सभी स्टार्चयुक्त खाद्य आसानी से पच जाते हैं। ताप उसकी रासायनिक संरचना बदल देता है। स्वाद व आकार भी बदल जाता है। कंद और मूल कुछ समय के लिए खाद्यान्न का स्थान ले सकते हैं। भगवान राम अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान कंद-मूल-फल खाकर ही जिये थे। यहां पर कन्द का अर्थ है टपायका, यह केरल में अधिक मात्रा में उगता है तथा इसमें स्टार्च और कैलोरी की मात्रा भरपूर होती है। आलू सबसे सामान्य कंद-मूल है तथा विश्व भर में लोग इसे पसन्द करते हैं। भोजन की अधिकांश कैलोरी इसी वर्ग में पायी जाती है।

वर्ग – 2. दालें और फलियाँ (Pulses and Legumes): दालों के प्रोटीन स्तर में तथा मात्रा में खाद्यान्न की प्रोटीन से बेहतर होती है। दालों में मिथिओनीन अमीनो अम्ल की कमी होती है। अरहर में तो ट्रिपटोफन भी कम होती है। जब दालों को खाद्यान्नों के साथ खाया जाता है तो इनका पौष्टिक स्तर बढ़ जाता है। लगभग 40 प्रतिशत दालों में थायमिन और फोलिक अम्ल जैसे विटामिन काफी मात्रा में पाए जाते हैं। चीनी लोग सोयाबीन की कई प्रकार की चटनी तथा पेस्ट प्रयोग करते हैं।

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सोयाबीन की थोड़ी मात्रा भी शारीरिक क्रिया के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो सकती है। दालों में विटामिन C की कमी होती है। अंकुरित करने से दालों में विटामिन C की मात्रा बढ़ जाती है तथा उनका आकार बदल जाता है, पाचन क्षमता सहज हो जाती है तथा लोहा और बी-समूह के विटामिन’ भी बढ़ जाते हैं। गिरियां और तेल के बीज वसा और प्रोटीन की मात्रा से भरपूर होते हैं । गिरियों में से वसा निकल जाने के बाद प्रोटीन अधिक हो जाते हैं। यह वर्ग मरम्मत के लिए प्रोटीन देते हैं। यह प्रोटीन के सस्ते स्रोत हैं।

वर्ग – 3. दूध और मांस के उत्पाद (Milk and Meat Products): स्तनधारियों के दूध लैक्टोज, लैक्टलबूमिन और लैक्टोग्लोबिन की मात्रा से भरपूर होते हैं । दूध में सारे आवश्यक पोषक तत्त्व होते हैं। इसीलिए इसे पूर्ण आहार कहा जाता है। दूध में विटामिन सी और लोहा कम होता है । लैक्टोज कम मीठा तो होता है, किन्तु लैक्टिक अम्ल जीवाणु की वृद्धि में भी सहायक है। इस प्रकार रोगग्रस्त जीवाणु की वृद्धि को यह रोकता है। दूध से बी-समूह के विटामिन अच्छी मात्रा में मिल जाते हैं विशेषकर थायमिन, राइबोफ्लेविन और पायरीडोक्सिन। बी-समूह के विटामिन रोशनी में नष्ट हो जाते हैं।

इसलिए यह अच्छी आदत है कि दूध को साफ, ठंडे, ढके हुए और अंधेरी जगह में रखा जाए। आप अपनी आवश्यकता के अनुसार सम्पूर्ण क्रीमयुक्त, मानक और टोन्ड दूध ले सकते हैं। उपभोग के लिए पाश्चुराइज्ड या मानकीकृत दूध लेना सुरक्षित है। दही-दूध को ‘जमने’ के लिए थोड़ी दही डालकर कमरे के ताप पर 4-12 घंटे तक रखने से दही बन जाता है। दही किसी भी प्रकार के दूध से बनाया जा सकता है। पाउडर से दूध बनाकर उसकी दही बना सकते हैं। दही को मथने से मक्खन बनाया जा सकता है। मक्खन दूध की अपेक्षा आसानी से पच जाता है। पनीर-दूध को दही, नींबू जूस, सिरका या सिट्रिक अम्ल से क्रिया करके पनीर प्राप्त होता है।

पनीर अवक्षेपित प्रोटीन है तथा इसमें वसा और लैक्टोज लगभग बिल्कुल नहीं होता। पनीर को पचाने की आवश्यकता नहीं होती तथा वह आसानी से पच जाता है। पनीर निकलने के बाद बचे हुए तरल को दही का पानी या छाछ (Whey) कहते हैं। छाछ में खनिज लवणों व दूध की वसा की भरपूर मात्रा होती है। इससे करी या ग्रेवी बनाना अच्छा तरीका है। प्रोसेस्ड पनीर वह पनीर है जो सन्तुलित अवस्था में बनाया जाता है। प्रोसेस्ड पनीर में पनीर से अधिक मात्रा में वसा होती है। इसलिए मोटे व्यक्तियों को इससे परहेज करना चाहिए। दूध और दूध के उत्पाद भोजन में कैल्शियम और विटामिन A का योगदान देते हैं।

मांस. उत्पाद (Meat Products): अंडे, मांस और मछली में उत्तम प्रकार के प्रोटीन होते हैं। हर प्रकार के मांस में रेशेदार जुड़ने वाले तन्तु होते हैं जो कोलेगन से भरपूर होते हैं। मीट को पकाने पर कोलेगन जैलेटिन में बदल जाता है। माँस में लोहा और फॉस्फोरस भी काफी मात्रा में होते हैं। अंगों के माँस (यकृत, हृदय, गुर्दे) विटामिन A की अधिक मात्रा उपलब्ध कराते हैं। अंडों का प्रोटीन आसानी से शरीर में एकत्र हो जाता है।

सफेद माँस यानि कि मछली और मुर्गा को लाल माँस से बेहतर समझता जाता है और रोगियों तथा हृदय रोगियों के लिए उचित होता है। सामान्य माँस पदार्थ, हैम (ham), सौसेजिस (Sausages), सलामी (salami) और मछली होते हैं। इस वर्ग से उत्तम प्रोटीन मिलता है जो कि शारीरिक विकास और तन्तुओं की मरम्मत की योग्यता रखती है। अंडे व अंगों का मीट लोहे का भरपूर स्रोत है, इसलिए यह रक्त का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। यह ऑक्सीकरण क्रियाओं के लिए उत्तरदायी है।

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वर्ग 4. फल और सब्जियाँ (Fruits and Vegetables): फलों का भोजन में एक विशेष स्थान है। भिन्न-भिन्न प्रकार के स्वाद व सुगन्धों वाले फल उपलब्ध हैं। पके आम, पपीता और अंजीर विशेषकर कैरोटीन से भरपूर फल हैं। संतरे तथा नीबू प्रजाति के फलों में विटामिन C की मात्रा भरूपर होती है। ताजे फलों का रस स्वस्थ मसूड़ों, दांतों के लिए है। इसके अतिरिक्त घाव को शीघ्रता से भरना तथा साफ चेहरे के लिए भी फलों का रस आवश्यक है।

केला कार्बोज का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। अफ्रीका में बच्चे अधिक केले खाते हैं और इसलिए क्वाशियोरकर रोग से ग्रस्त होते हैं। सेबों व आलू बुखारों में पैक्टिन की भरपूर मात्रा होती है जो जैम और जैली बनाने के लिए आवश्यक है। फलों से फल-शर्करा औरे लैवरोलोज मिलता है। वह कुछ रूक्षांश भी देते हैं जो शारीरिक क्रिया संतुलित करता है। फलों की तरह सब्जियों में भी कई किस्में होती हैं।

सब्जियाँ आकार में, स्वाद में, सुगंध में और पोषक तत्त्वों की मात्रा में भिन्न-भिन्न होती हैं। वह मौसम के कारण भी भिन्न होती हैं। पौधों के विभिन्न हिस्से सब्जियों की तरह खाए जाते हैं। पत्ते-पालक, चौलाई, पुदीना, धनिया, मेथी और सलाद इत्यादि । कंद और मूल-प्याज, शलजम, मूली और आलू। फल-बैंगन, भिंडी, खीरा, चिचिण्डा और अन्य कदू वर्गीय पदार्थ। फूल-फूल गोभी, कचनार और केले के फूल । हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्शियम और लोहे के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

इनकी पर्याप्त मात्रा इन सब्जियों से प्राप्त हो जाती है। अधिकतर पत्तेदार सब्जियों में राइबोफ्लेविन भरपूर मात्रा में होती है। इनके सेवन से मुखपाक अर्थात् होठों के फटने (Cracking of lipsat-the cover of mouth) की चिन्ता नहीं रहती। अधिक रेशों की मात्रा होने के कारण हरी पत्तेदार सब्जियां सारक का काम करती हैं। इनमें ऑक्जीलेट की मात्रा बहुत अधिक होती है जो कि लोहा, कैल्शियम, तांबा व मैग्नीशियम के अवशोषण में बाधा डालते हैं। जड़ वाली सब्जियों में कार्बोज व कैरोटीन की भरपूर मात्रा होती है। सब्जियों में विटामिन C भी भरपूर होता है। विटामिन A और C दालों में कम होता है। दालों व अनाज के साथ सब्जियों का खाना भोजन की पौष्टिकता बढ़ा देता है। सब्जियां भिन्नता देती हैं तथा भोजन को आकर्षक बनाती हैं।

वर्ग 5. वसा और शर्करा (Fats and Sugars): वसा, मक्खन और घी की तरह भोजन को स्वादिष्ट तो बनाती ही है, वसा में घुलनशीन विटामिन भी हैं तथा यह कैलोरी भी देती है। कुछ लोग पशुजन्य वसा को भी पकाने का माध्यम बनाते हैं। तेल व वसा महंगे होते हैं। इसी कारण गरीब लोग 20 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा इनसे नहीं लेते। भोजन में वसा अमीर लोग अधिक खाते हैं जिससे अक्सर मोटापा तथा हृदय रोग पनपते हैं। अधिकतर तेलों में विटामिन नहीं होते।

लाल खजूर का तेल अलग है तथा उसमें विटामिन A (कैरोटीन) होता है। आर्थिक कारणों से तेल का भोजन में अधिक प्रयोग होता जा रहा है। तेलों में रक्त के कालेस्ट्रॉल स्तर को कम करने की क्षमता भी होती है। शर्करा-सुक्रोज साफ, सफेद पदार्थ है जिसमें न कोई अशुद्धता है और न ही कोई पोषक तत्त्व। अधिक शर्करा के प्रयोग से दाँतों के रोग में वृद्धि होती है। गुड़ में प्राकृतिक सुगंध होती है तथा कुछ मात्रा में खनिज लवण और विटामिन भी होते हैं तथा अधिक कैलोरी देती है। मिठाइयाँ अपने स्वाद के लिए मशहूर हैं, इसीलिए भोजन के बाद मीठा खाने की महत्ता है।
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यह अति आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रतिदिन भोजन में इन सभी खाद्य वर्गों से पदार्थ मिलाए । ऐसे भोजन में सभी पोषक तत्त्व अपना संतुलन बनाए रखते हैं। ऐसे भोजन को संतुलित आहार कहते हैं।

प्रश्न 26.
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting nutritional requirement) :
1. आयु (Age): बच्चों को उनके शरीर-भार को देखते हुए प्रौढ़ों की अपेक्षा अधिक मात्रा में भोज्य तत्त्वों की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनका शरीर वृद्धि की अवस्था में होता है। वृद्धावस्था में आहार की मात्रा और पोषक तत्वों की आवश्यकता कम हो जाती है क्योंकि शारीरिक क्रियाएँ शिथिल पड़ जाती हैं।

2. लिंग (Sex): सामान्यतः स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा कम आहार की आवश्यकता होती है क्योंकि वह पुरुषों की अपेक्षा लम्बाई व भार में कम होती हैं तथा शारीरिक श्रम भी कम करती हैं।

3.  शरीर का आकार और बनावट (Size and Composition of the Body): लम्बे व भारी मनुष्य के शरीर में मांसपेशियाँ और ऊतक अधिक होते हैं, अतः उनकी भोजन की आवश्यकता ठिगने व दुबले-पतले मनुष्य की अपेक्षा अधिक होती है।

4. जलवायु (Climate): ठण्डे प्रदेशों में आहार की आवश्यकता गर्म प्रदेशों की अपेक्षा अधिक होती है क्योंकि शरीर के ताप को बनाए रखने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता अधिक होती है। यही कारण है कि हम सर्दियों में अधिक खाते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

5. व्यवसाय (Occupation): अधिक शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्तियों को कम श्रम करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत मानसिक श्रम अधिक रखने वाले व्यक्तियों को अधिक प्रोटीन और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

6. विशेष शारीरिक अवस्थाएँ (Specific Body Conditions): कुछ विशेष शारीरिक अवस्थाएँ पोषक तत्त्वों की आवश्यकता को प्रभावित करती हैं। जैसे-गर्भावस्था तथा स्तनपान की अवस्था में पोषक तत्त्वों की माँग काफी बढ़ जाती है।

ऑपरेशन के बाद की अवस्था व जल जाने की अवस्था में शरीर-निर्माणक तत्त्वें विशेष रूप से प्रोटीन की आवश्यकता अधिक रहती है। सन्तुलित आहार सर्वोत्तम आहार है परन्तु इसका तात्पर्य महँगा आहार नहीं है क्योंकि खाद्य पदार्थों की कीमत उनके उपलब्ध होने पर और मौसम पर निर्भर करती है न कि पौष्टिकता पर। अतः कम धन से भी सन्तुलित आहार की प्राप्ति की जा सकती है।

इसके लिए आवश्यकता है समान पोषक मूल्यों के सस्ते साधनों को जानने की। जैसे बादाम की जगह मूंगफली का प्रयोग करना। दूध की जगह दालों से प्रोटीन प्राप्त करना। महँगे भोजन भी असन्तुलित हो सकते हैं, जैसे बेमौसमी खाद्य पदार्थ। सन्तुलित आहार ग्रहण करने पर शरीर द्वारा उसका उपयोग हो सके इसके लिए यह ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है कि आहार पाचनशील, स्वादयुक्त, ताजा और दूषण रहित हो।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 11 भोजन के कार्य

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 11 भोजन के कार्य Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 11 भोजन के कार्य

Bihar Board Class 11 Home Science भोजन के कार्य Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक ग्राम प्रोटीन शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग कैलोरी उत्पन्न करता है –
(क) 4 कैलोरी
(ख) 2 कैलोरी
(ग) 6 कैलोरी।
(घ) 8 कैलोरी
उत्तर:
(क) 4 कैलोरी

प्रश्न 2.
विटामिन ‘C’ का सबसे बढ़िया स्रोत है –
(क) आँवला
(ख) संतरा
(ग) नींबू
(घ) दूध
उत्तर:
(क) आँवला

प्रश्न 3.
मानव शरीर में अमीनो अम्ल होते हैं –
(क) 22
(ख) 23
(ग) 25
(घ) 26
उत्तर:
(क) 22

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प्रश्न 4.
अंडे की सफेदी में मिलता है –
(क) अल्बुमिन
(ख) ग्लोबिन
(ग) फाइबरिन
(घ) जेलिटिन
उत्तर:
(क) अल्बुमिन

प्रश्न 5.
चांवल में उपस्थित प्रोटीन –
(क) ओराजेनिन है
(ख) होरडेनिन है
(ग) ग्लूटेनिन
(घ) ग्लायडिन
उत्तर:
(क) ओराजेनिन है

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शरीर वर्धक तत्त्व कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन, खनिज लवण व जल शरीर की वृद्धि एवं मरम्मत हेतु आवश्यक हैं इसलिए इन्हें शरीरवर्धक तत्त्व भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर:
बाहरी व आन्तरिक क्रियाओं को सम्पादित करने हेतु शरीर को ऊर्जा चाहिए।

प्रश्न 3.
1 ग्राम कार्बोज, वसा व प्रोटीन हमारे शरीर में कितनी ऊर्जा देती हैं ?
उत्तर:
1 ग्राम कार्बोज, वसा व प्रोटीन हमारे शरीर में क्रमशः 4 कैलोरी, 9 कैलोरी व 4 . कैलोरी ऊर्जा देते हैं।

प्रश्न 4.
भोजन के स्वरूप का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
1. शारीरिक कार्य।
2. मनोवैज्ञानिक कार्य।
3. सामाजिक व सांस्कृतिक कार्य।

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प्रश्न 5.
शरीर में ऊर्जा की आवश्यकता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यक्ति की जीवन क्रियाएँ, जैसे सांस लेना, परिसंचरण, पाचन और चूसना, सोखना के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
शारीरिक कार्यों के आधार पर चार विभिन्न तरह के भोजन कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • ऊर्जा प्रदान करने के लिए भोजन
  • शरीर के निर्माण के लिए भोजन
  • संरक्षात्मक भोजन
  •  नियंत्रित भोजन।

प्रश्न 7.
मनोवैज्ञानिक कार्य का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
भोजन व्यक्ति की भावात्मक आवश्यकता को पूरा करता है। जब कोई प्रसन्न होता है या मित्रों की संगति में होता है तो वह अधिक खाना खाता है।

प्रश्न 8.
शरीर की सुरक्षा तथा नियंत्रण में किन तत्त्वों का विशेष महत्त्व है ?
उत्तर:
शरीर की सुरक्षा तथा नियंत्रण हेतु विटामिन, खनिज लवण, जल और प्रोटीन का विशेष महत्त्व है। इसके अतिरिक्त शरीर के नियंत्रण हेतु फोक का अपना विशेष स्थान है।

प्रश्न 9.
हमें अपने आहार में अधिकांश वसायुक्त पदार्थों को क्यों नहीं सम्मिलित करना चाहिए?
उत्तर:
वसायुक्त पदार्थ सबसे अधिक ऊर्जा देते हैं। 1 ग्राम वसा 9 कैलोरी यानि कार्बोज से सवा दो गुणा अधिक कैलोरी देता है। यदि हम कैलोरी प्राप्ति हेतु शरीर की आवश्यकता वसा द्वारा पूरी कर लें तो अन्य तत्त्वों का अभाव रह जाएगा और हम रोगग्रस्त हो जाएंगे।

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प्रश्न 10.
भोजन में दीर्घजीवी और नैतिकता का परस्पर संबंध लिखें।
उत्तर:
अच्छा भोजन ज्यादा जीवन जीने के अवसर बढ़ा देता है। गन्दा भोजन बीमारियाँ फैलाता है। अस्वस्थ जीवन मृत्यु का कारण बन सकता है।

प्रश्न 11.
भोजन को पौष्टिक तत्त्वों के कार्यों के आधार पर किस प्रकार विभाजित किया जा सकता है ?
उत्तर:
पौष्टिक तत्त्व – कार्य
1. प्रोटीन – शारीरिक वृद्धि
2. कार्बोज, वसा – ऊर्जा देना
3. विटामिन – रोगों से बचाव
4. खनिज लवण – शारीरिक कार्यों पर नियंत्रण

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन व हमारी भावनाओं (Food & Emotions) में आपसी क्या सम्बन्ध है ?
अथवा
भोजन हमें मानसिक संतोष (Mental Satisfaction) कैसे प्रदान करता है ?
उत्तर:
भोजन न केवल शारीरिक व सामाजिक कार्य ही अदा करता है परन्तु यह मनोवैज्ञानिक कार्य करने में भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि हमारे लिए कोई भी व्यक्ति मनपसन्द वस्तु बना कर परोसता है तो हमें प्रसन्नता होती है। भोजन के माध्यम से वह अपने प्रेमभाव और मैत्री को व्यक्त करता है। अतः भोजन हमें मानसिक संतोष भी प्रदान करता है। जैसे एक बच्चा माँ की गोद में दूध पीकर सुरक्षित महसूस करता है।

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प्रश्न 2.
भोजन व त्यौहार (Food & festivals) का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
प्रत्येक त्यौहार में भोजन का अपना विशिष्ट महत्त्व है क्योंकि भोजन उत्सवों और त्यौहारों का अभिन्न अंग है। प्रत्येक त्यौहार में विशेष पकवान बना कर ही त्यौहार मनाने की प्रथा है। इन पकवानों का आदान-प्रदान कर सभी परिवार अपनी मैत्री की भावनाएँ व्यक्त करते हैं। रीति-रिवाजों को इतना नहीं याद करते जितना उन त्यौहारों पर बने पकवानों को। होली के त्यौहार पर गुझिया, संक्रान्ति व लोहड़ी पर तिल व गुड़ के व्यञ्जन, बैसाखी पर पीले केसरिया चावल, ईद पर सेवइयों की खीर आदि बनाने का प्रचलन है।

प्रश्न 3.
भोजन व कोशिकाओं का पुनर्निर्माण (Food and cell formation) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
शरीर की वृद्धि व टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत हेतु भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन में उपस्थित प्रोटीन, खनिज लवण व जल यही कार्य करते हैं। व्यक्ति शैशवकाल से प्रौढ़ावस्था तक वृद्धि और विकास की दिशा में अग्रसर होता है। शरीर का भार व ऊँचाई में वृद्धि इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं।

प्रश्न 4.
भोजन व कार्यक्षमता (Food & work efficiency) का परस्पर क्या . सम्बन्ध है ?
उत्तर:
भोजन व कार्यक्षमता-अच्छा भोजन अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है और अच्छे स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्षण है, शरीर की उत्तम क्रियाशीलता या शरीर की कार्यक्षमता। अत: भोजन पर शरीर की कार्यक्षमता निर्भर करती है। सुपोषित व्यक्ति की कार्यक्षमता कुपोषित व्यक्ति की कार्यक्षमता से निश्चित ही अधिक होती है। अमेरिका में एक अध्ययन में यह देखा गया कि कारखाने के कर्मचारी जो उत्तम नाश्ता करके आते थे, अधिक काम कर पाते थे। उन्हें थकावट भी कम और देर से होती थी।

प्रश्न 5.
कार्यों के आधार पर भोजन का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
कार्यों के आधार पर भोजन का वर्गीकरण –
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प्रश्न 6.
पोषण और मृत्यु-दर से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
पोषण और मृत्यु दर (Nutrition and mortality): कुपोषण के कारण आवश्यक पोषक तत्त्व आवश्यक मात्रा व अनुपात में प्राप्त नहीं होता है। शरीर क्षीण पड़ जाता है और अंततः मृत्यु हो जाती है। दिशाभारती 2 नवम्बर, 1975 के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग दस लाख बच्चों की पोषक आहार के अभाव में मृत्यु हो जाती है।

पौष्टिक आहार संबंधी हैदराबाद के राष्ट्रीय संस्थान द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार निम्न आय वर्ग वाले भारतीयों के 65 प्रतिशत बच्चे साधारणतः और 18 प्रतिशत बच्चे गम्भीर रूप से पौष्टिक आहार के अभाव में पीड़ित रहते हैं और कालान्तर में सूख-सूख कर मर जाते हैं। हरियाणा जैसे खुशहाल प्रदेश में भारतीय चिकित्सा शोध परिषद और राज्य सरकार द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार 50 प्रतिशत बच्चों को प्रोटीन और पर्याप्त पौष्टिक आहार उपलब्ध नहीं होते।

डॉक्टर हिंगोरानी के अनुसार, कुपोषित शरीर रोगाणुओं से जूझने के लिए निर्बल प्रतिपिण्ड बनाता है जिसके कारण शरीर रोगी हो जाता है तथा अंततः मृत्यु हो जाती है । मृत्यु दर विकसित देशों में कम होने का प्रमुख कारण उनका उच्च पोषक स्तर है। भारत जैसे विकासशील देश में भी अब कुपोषण के कारण होने वाली मृत्यु-दर में भारी कमी हुई है।

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प्रश्न 7.
पोषण और मानसिक स्तर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पोषण और मानसिक स्तर (Nutrition and Psychological status)
मानसिक स्थिरचित्तता (Static Mental Tension)-उन सैनिकों में जिनको प्रयोग के लिए 6 माह तक कम खाना दिया गया था, मानसिक दृष्टि से भी बहुत परिवर्तन पाया गया। वे अधीर, चिड़चिड़े, उदास व हठी थे तथा संकल्प-शक्ति को खो बैठते थे। जब प्रतिबंध हटा तो उनका व्यवहार सामान्य हो गया।

मानसिक संलग्नता (Mental Imbalance): कुपोषण के कारण पाया गया कि बालक अपनी पढ़ाई में पूर्णरूपेण ध्यान नहीं दे रहे थे। मानसिक संलग्नता की कमी के कारण वे पाठ की गहराई तक पहुँचकर उसके गूढ अर्थ को नहीं समझ पा रहे थे। अधिक समय तक एकाग्रचित्तता भी उनके लिए संभव नहीं थी क्योंकि वे मानसिक दृष्टि से शीघ्र ही थक जाते थे। अतः संक्षेप में संतुलित भोजन के अभाव में मानसिक स्तर पर असाधारण प्रभाव पाया गया जिससे कि कार्यक्षमता और कुशलता पर विपरीत प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 8.
पोषण और शारीरिक स्तर का क्या संबंध है?
उत्तर:
पोषण और शारीरिक स्तर (Nutrition and Physical Status): डील-डौल-जापानी प्रायः छोटे कद के होते हैं। यह निश्चित रूप से जानने के लिए कि क्या उनका छोटा डील-डौल उनके भोजन का प्रभाव है, कैलिफोर्निया शहर में 6 से 9 वर्ष के उन जापानी बालकों का जो अमेरीका में जन्मे और वहीं पले, अध्ययन किया गया और परिणामों की तुलना उसी आयु के जापान में जन्मे तथा वहीं रहने वाले बालकों से की गयी तो कैलीफोर्निया के बालकों का कद और शारीरिक भार अपेक्षाकृत अधिक पाया गया। यह अंतर दोनों वर्गों के भोजन की पौष्टिकता में अन्तर के कारण सिद्ध हुआ।

हड्डियाँ (Bones): जर्मन के एक स्कूल में विशेष आहार दिया गया। अतः आहार को विटामिन डी युक्त बनाया गया जिससे इन बालकों का विकास तीव्र हुआ ।
त्वचा (Skin): चर्बी की तह जो बाह्य त्वचा के नीचे होती है, उसकी मोटाई से शारीरिक स्तर का ज्ञान भली-भाँति हो सकता है।
माँसपेशियाँ (Muscles): मांसपेशियों का विकास एवं उनके ठोसपन की स्थिति से भी यह पता लगता है कि पोषण स्तर कैसा है।

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प्रश्न 9.
शरीर निर्माण के मुख्य खाद्य पदार्थ कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
शरीर निर्माण के मुख्य खाद्य पदार्थ निम्नलिखित हैं :
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन के कार्य विस्तारपूर्वक समझाइए।
भोजन के कार्य (Functions of Food): शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कार्यों को सम्पन्न करने हेतु भोजन हमारे दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग है।
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I. शारीरिक कार्य (Physical functions): भोजन के शारीरिक कार्यों को मुख्य चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –
(क) ऊर्जा प्रदान करना
(ख) तन्तुओं का निर्माण करना
(ग) रोगों से बचाना
(घ) शारीरिक कार्यों का सुसंचालन करना।
भोजन में उपस्थित छः पोषक तत्त्व कार्बोज, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण तथा जल इन कार्यों को सम्पन्न करते हैं। उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए मनुष्य के आहार में इन पोषक तत्त्वों का उचित मात्रा में होना बहुत आवश्यक है।

(क) ऊर्जा प्रदान करना (Providing energy): जीवित प्राणियों के आन्तरिक व बाह्य शारीरिक कार्यों के संचालन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो उन्हें भोजन द्वारा प्राप्त होती है। अतः भोजन का एक मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा देना है। विभिन्न बाह्य कार्यों जैसे खाना पकाने, खेलने, पढ़ने तथा अन्य दैनिक कार्यों के लिए आवश्यक ऊर्जा भोजन से ही प्राप्त होती है।

विभिन्न आन्तरिक कार्यों, जैसे-श्वसन, भोजन का पाचन, रक्त का परिसंचरण आदि के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। शरीर के ये आन्तरिक कार्य निरन्तर चलते रहते हैं तथा हमारी इच्छा व अनिच्छा का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः जब हम सो रहे होते हैं या आराम कर रहे होते हैं तब भी हमें इन अनैच्छिक रूप से कार्यरत अंगों, जैसे हृदय, फेफड़े आंत, गुर्दे आदि के आंतरिक कार्यों के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

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1. कार्बोज (Carbohydrates): जैसे अनाज (गेहूँ, चावल, बाजरा, आदि), शक्कर, ग्लूकोज, शहद, गुड़, आलू आदि। एक ग्राम कार्बोज शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 4 कैलोरी उत्पन्न करता है।

2. प्रोटीन (Proteins): जैसे दालें, दूध और दूध से बने पदार्थ, मांस, मछली आदि। प्रोटीन निम्न स्थितियों में शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है

  • जब आहार में कार्बोज की कमी हो।
  • जब आहार में प्रोटीन शारीरिक आवश्यकताओं से अधिक हो।।
  • जब भोजन की प्रोटीन घटिया किस्म की हो और शारीरिक प्रोटीन बनाने में असमर्थ हो। एक ग्राम प्रोटीन शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 4 कैलोरी उत्पन्न करता है।

3. वसा (Fats): जैसे घी, तेल, मक्खन, क्रीम आदि। यह कार्बोज से सवा दो (214) गुना अधिक ऊर्जा देता है तथा एक ग्राम वसा शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 9 कैलोरी उत्पन्न करता है।
(ख) तन्तुओं का निर्माण करना (Building tissues): मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन काल अर्थात् जन्म से लेकर मृत्यु तक तन्तुओं का निर्माण होता रहता है। इन नए तन्तुओं का निर्माण निम्नलिखित कार्यों के लिए होता है –

  • शारीरिक वृद्धि।
  • टूटे-फूटे तन्तुओं के पुनः निर्माण अथवा मरम्मत।

एक छोटा-सा शिशु आयु बढ़ने पर पूर्ण प्रौढ़ बन जाता है तथा उसके शारीरिक नाप व भार में परिवर्तन नए तन्तुओं के निर्माण के कारण होता है। मनुष्य के शारीरिक अंग हर समय कार्य करते रहते हैं जिसके कारण शरीर के तन्तु टूटते-फूटते रहते हैं। इन पुराने टूटे-फूटे तन्तुओं के पुनः निर्माण अथवा मरम्मत का कार्य भी भोजन करता है।

हमारे शरीर में तन्तुओं के निर्माण का कार्य भोजन में उपस्थित निम्न पोषक तत्त्व करते हैं:
1. प्रोटीन (Proteins): जैसे दूध, दूध से बने पदार्थ, अण्डा, मांस, मछली, दालें, सोयाबीन आदि का प्रोटीन शरीर के निर्माण में सर्वोच्च स्थान पर आता है।
2. खनिज लवण (Minerals): नए तन्तुओं के निर्माण कार्य में कुछ खनिज लवणों का विशेष स्थान है। यह प्रमुख खनिज लवण हैं कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा आदि, जो दांतों, अस्थियों तथा रक्त के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। ये खनिज लवण हमें दूध से बने पदार्थ मांस, मछली, कलेजी, अण्डा, दालें, अनाज आदि से प्राप्त होते हैं।

(ग) रोगों से बचाव (Protection against diseases): भोजन के विभिन्न कार्यों में एक कार्य शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करना है। हम जानते हैं कि एक कमजोर व्यक्ति को एक स्वस्थ व्यक्ति की अपेक्षा बीमारियाँ जल्दी घेरती हैं। हमारे शरीर को रोगों से बचाव क्षमता निम्न पोषक तत्त्वों द्वारा प्राप्त होती है।

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1. विटामिन (Vitamins): इनकी आवश्यकता हमें बहुत ही न्यून मात्राओं में होती है। यह कई प्रकार के होते हैं तथा प्रायः सभी भोज्य पदार्थों द्वारा प्राप्त होते हैं, परन्तु प्रत्येक भोज्य पदार्थों में कोई एक विटामिन अधिक मात्रा में होता है तो कोई दूसरा विटामिन कम मात्रा में होता है। जैसे विटामिन-ए दूध, दूध से बने पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जियों, गहरी पीली सब्जियों, अण्डा, मांस आदि में अधिक होता है परन्तु दालों में यह कम मात्रा में पाया जाता है। इसी प्रकार विटामिन-सी आंवला, सन्तरा, नींबू आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है और अनाज, दालों, दूध आदि में इसकी मात्रा कम होती है।

2. खनिज लवण (Minerals): विटामिनों की भाँति खनिज लवणों की आवश्यकता भी कम मात्रा में होती है परन्तु रोगों से बचाव क्षमता के लिए यह शरीर हेतु अति आवश्यक हैं। खजिन लवण कई प्रकार के होते हैं तथा यह भी प्रायः सभी भोज्य पदार्थों में पाए जाते हैं। दूध, फल तथा सब्जियों में सभी प्रकार के खनिज लवण अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

विभिन्न अंगों के सुसंचालन के लिए खनिज लवणों तथा विटामिनों की आवश्यकता होती है क्योंकि शरीर की विभिन्न रासायनिक प्रतिक्रियाएँ इनके द्वारा नियन्त्रित होती हैं। इसी कारण इन पोषक तत्त्वों के नियमित प्रयोग से शरीर स्वस्थ बनता है तथा बीमारियों से मुक्त रखता है। यही कारण है कि विटामिन और खनिज लवण संरक्षक पोषक तत्त्वों के नाम से जाने जाते हैं।

(घ) शरीर को सुचारू रूप से चलाना (Monitoring the body): जिस प्रकार शरीर को विभिन्न पोषक तत्त्वों जैसे कार्बोज, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज लवणों की आवश्यकता होती है ठीक उसी प्रकार शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए जल और फोक की भी आवश्यकता होती है। शारीरिक क्रियाओं के नियमन के लिए जल अति आवश्यक है तथा मल निर्माण एवं निष्कासन के लिए आहार में फोक का होना आवश्यक है। फोक हमें हरी पत्तेदारसब्जियों, दालों तथा अनाजों के छिलकों से प्राप्त होता है।

II. मनोवैज्ञानिक कार्य (Psychological functions): शारीरिक कार्यों को पूर्ण करने के साथ-साथ भोजन हमें मानसिक सन्तोष और सुरक्षा भी प्रदान करता है। बच्चा सदैव अपनी मां की गोद में दूध पीकर ही अधिक सुरक्षित और प्रसद अनुभव करता है। बाजार में नाना प्रकार के पकवान खाकर भी मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हो पाती जो घर के सात्विक व सादे भोजन के खाने से प्राप्त हो जाती है। भूख की सन्तुष्टि करके भोजन मनुष्य को मानसिक सन्तुष्टि प्रदान करता है जो पौष्टिक तत्त्वों की गोलियां खाने से कदापि प्राप्त नहीं हो सकती । मनुष्य का खान-पान उसकी संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं भोजन संबंधी आदतों पर निर्भर करता है।

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जो मनुष्य चावल खाना अधिक पसन्द करता है उसे यदि रोटी दी जाए तो उसे मानसिक सन्तुष्टि नहीं मिलती है और वह चावल प्राप्त करने की कोशिश करता है जिसे वह वर्षों से खाता आया है। मनुष्य को वही भोजन अधिक मानसिक सन्तुष्टि प्रदान करता है जो वह प्रतिदिन खाता है और यही कारण है कि मनुष्य किसी भी प्रकार के परिवर्तन या नए भोजन को अपनाने में संकोच महसूस करता है।

III. सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य (Socio-cultural functions): भोजन के सामाजिक कार्य का महत्त्व शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कार्यों से किसी भी प्रकार कम नहीं है। भोजन व्यक्तियों में आपसी संबंध बढ़ाकर उनकी मैत्री सुदृढ़ करने में सहायक होता है। प्राचीन युग से ही खाना बांटकर खाना मित्रता का प्रतीक माना गया है जो आज के आधुनिक युग में भी यथावत है।

हम सभी घर पर आए अतिथि का सत्कार भोजन से करते हैं और अतिथि के लिए अच्छे-से-अच्छा भोजन ही परोसा जाता है। बच्चे के जन्म दिन, शादी आदि के उत्सव पर भी भोजन परोसा जाता है जिससे सामाजिक सम्बन्ध बढ़ते हैं। प्रायः किसी नए परिचित व्यक्ति से मैत्री बढ़ाने के लिए उसे घर पर भोजन के लिए ही आमंत्रित किया जाता है।

बड़े-बड़े भोजों पर व्यक्तियों को आमंत्रित करना सामाजिक प्रतिष्ठा का सूचक है। इसके अतिरिक्त अनेक त्यौहारों जैसे दीवाली, होली, रक्षाबन्धन आदि पर मिठाईयों का आदान-प्रदान मैत्री का सूचक माना जाता है। सामाजिक उत्सवों के लिए भी भोजन का आयोजन करना अनिवार्य-सा हो गया है। हमारे देश के भिन्न-भिन्न प्रान्त में भिन्न-भिन्न जातियों के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजन खाते हैं।

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य के प्रकार (Dimensions of Health) कौन-से हैं ?
उत्तर:
आज के युग में पूर्ण स्वस्थता (Complete well being) की स्थिति के लिए आध्यात्मिक पहलू के महत्त्व को भी नकारा नहीं जा सकता।
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1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health): स्वास्थ्य के शारीरिक पक्ष से हम सब भली-भाँति परिचित हैं। जब हम यह कहते हैं कि वह व्यक्ति स्वस्थ है तो हम साधारणतया स्वास्थ्य के इसी पक्ष की बात करते हैं। कोई भी व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ माना जाता है यदि वह सक्रिय, चुस्त व फुर्तीला है।
वह किसी शारीरिक रोग से ग्रस्त नहीं है तथा उसमें निम्न शारीरिक लक्षण पाए जाते हैं –

  • आयु के अनुपात में वजन और लम्बाई।
  • मांसपेशियाँ सुदृढ़ और विकसित।
  • हड्डियाँ मजबूत और वृद्धि सामान्य।
  • त्वचा स्वस्थ, सुन्दर व चिकनी।
  • आँखें स्वस्थ और दोषरहित।
  • बाल चमकीले और चिकने।
  • दाँत साफ, सामान्य एवं दोषरहित।
  • चाल-ढाल सीधी तनी हुई, पेट अन्दर।
  • गहरी नींद।
  • भूख सामान्य।
  • रोग निरोधक क्षमता उत्तम ।
  • उत्साही, सक्रिय एवं शक्ति से भरपूर ।

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health): कोई भी व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ माना जाता है, यदि उसमें निम्न लक्षण पाए जाते हैं –

  • तनाव तथा चिन्ता से. गुक्त।
  • मानसिक रूप से सके और क्रियाशील।
  • दिमागी रोगों से मुक्त।
  • दूसरों के प्रति भातुक।
  • आन्तरिक अन्त से मुक्त।
  • विभिन्न लोगों और विभिन्न परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सक्षम।
  • अच्छी मानसिक योग्यता।
  • संवेगात्मक स्थिरता।

मानसिक स्वास्थ्य का अनुमान लगाना शारीरिक स्वास्थ्य की तुलना में कठिन है। यह कहा जाता है कि “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क रहता है।” (Healthy mind lives in a healthy body) इस परिभाषा से स्पष्ट है कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आपस में सीधा सम्बन्ध है। मानसिक अस्वस्थता के कारण शारीरिक अस्वस्थता उत्पन्न हो सकती है।

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उदाहरणार्थ, अधिक चिन्ता और तनाव से शरीर में उच्च रक्तचाप अथवा हृदय रोग हो जाता है। इसके विपरीत स्थिति में शारीरिक अस्वस्थता से मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न हो सकती है। उदाहरणार्थ एक पोलियो से ग्रस्त बच्चा खुद को सामान्य बच्चों से हीन अनुभव करता है और यही भावना उसे डर या आत्म-दयनीयता (Self-pity) की स्थिति में पहुँचा देती है । यह स्थिति मानसिक अस्वस्थता की स्थिति है।

3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social Health): सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में निम्न लक्षण पाए जाते हैं।

  • वह समाज के दूसरे लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी अनुभव करता है।
  • वह सबके साथ सहयोग और सहनशीलता से रहता है।
  • उसका व्यवहार आनन्ददायक होता है।
  • वह आस-पास के लोगों से प्रेम से मिलता है।

मानसिक स्वास्थ्य के बिना सामाजिक स्वास्थ्य के लक्ष्य को प्राप्त करना असम्भव है। उदाहरणार्थ, यदि व्यक्ति अपनी परेशानियों से चिन्ताग्रस्त और तनावयुक्त है, तो वह दूसरों की सहायता करने में सक्षम नहीं हो सकता। इसी प्रकार प्रायः शारीरिक अस्वस्थता भी सामाजिक स्वस्थता में बाधक होती है। उदाहरणार्थ शारीरिक रोग व्यक्ति को चिड़चिड़ा, मायूस और दूसरों के साथ सामान्य व्यवहार के अयोग्य बना देता है। अपराधी व्यक्ति जैसे चोर, डाकू आदि सामाजिक अस्वस्थता के उदाहरण हैं। उनका व्यवहार समाज द्वारा मान्य नहीं होता इसीलिए उन्हें असामाजिक तत्त्व कहा जाता है।

4. आध्यात्मिक स्वास्थ्य (Spiritual Health): आध्यात्मिक स्वास्थ्य को परिभाषित कर पाना सबसे कठिन है। आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अधिकतर नैतिक सिद्धांतों का पालन करता है, जैसे-सच बोलना, भलाई करना, अपने कर्तव्यों का दृढ़ता से पालन करना, दूसरों को दुख न देना आदि। धैर्य और आत्मिक शांति आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लक्षण हैं। उन्हें प्रार्थना, चिन्तन और कर्तव्यपरायणता से प्राप्त किया जा सकता है। एक स्वस्थ व्यक्ति परिवार, समाज व देश के लिए सम्पत्ति होता है जबकि अस्वस्थ व्यक्ति एक बोझ।

प्रश्न 3.
उत्तम स्वास्थ्य के क्या लक्षण हैं ?
उत्तर:
उत्तम स्वास्थ्य के लक्षण (Signs of good health): उत्तम स्वास्थ्य से अभिप्राय है कि व्यक्ति शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ हो। एक उत्तम पोषित व्यक्ति का ही उत्तम स्वास्थ्य हो सकता है। मानव कल्याण के लिए वैज्ञानिक पोषण विज्ञान से सम्बन्धित क्षेत्रों में निरन्तर अनुसंधान, अध्ययन व अन्वेषण कर रहे हैं। इसी के फलस्वरूप व्यक्ति के शरीर की बनावट, सबलता, आयु अवधि तथा मानसिक व व्यावहारिक लक्षणों में अनेक सकारात्मक परिवर्तन आए हैं, जिनका उल्लेख आगे किया गया है –

1. शारीरिक विकास एवं वृद्धि (Body growth and development) : एन.सी.एच.एस. के अनुसार बच्चों व किशोरों की अपेक्षित ऊँचाई व भार (Expected Height & Weight of Children & Adolescents according to N.C.H.S)
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(क) शारीरिक भार व ऊँचाई (Body weight & height): किसी भी व्यक्ति के शारीरिक भार व ऊँचाई को प्रभावित करने वाले अनेक कारकों में से उत्तम पोषण का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि उत्तम पोषण के अभाव में व्यक्ति के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है तो उसका शरीर भार एवं ऊँचाई सामान्य स्तर से कम रह जाता है।

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इसी प्रकार अत्यधिक पोषण भी व्यक्ति के लिए अत्यन्त हानिकारक है क्योंकि इससे शारीरिक भार सामान्य स्तर से अधिक होने के कारण मोटापा आ जाता है। तालिका में विभिन्न आयु वर्गों के लिए सामान्य शरीर भार एवं ऊँचाई का उल्लेख किया गया है। आप इस तालिका की सहायता से अपने शरीर का भार व ऊँचाई की तुलना सामान्य स्तर से करके अपने स्वास्थ्य की दशा ज्ञात कर सकते हैं तथा प्रयत्न करके अपने शरीर के भार को सामान्य स्तर में रख सकते हैं।

(ख) अस्थियों का ढाँचा (Skeletal system): एक स्वस्थ व्यक्ति की हड्डियाँ मजबूत होती हैं। भोजन में उपस्थित कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन डी हड्डियों का कैल्सीकरण करके उन्हें .मजबूत बनाते हैं। अतः एक सुपोषित स्वस्थ व्यक्ति का डील-डौल प्रभावित होता है। उसका सिर तना हुआ, छाती चौड़ी व उठी हुई, कन्धे सपाट व पेट अन्दर होता है।

(ग) त्वचा (Skin): स्वस्थ व्यक्ति की.त्वचा मुलायम व चमकीली होती है। बाहरी त्वचा के नीचे की तह की मोटाई से पोषण की स्थिति ज्ञात हो जाती है। इस निचली तह की मोटाई वसा के कारण होती है। जब व्यक्ति को उपयुक्त मात्रा में भोजन नहीं मिलता तब यह वसा जल कर उसे ऊर्जा प्रदान करती है और यह निचली तह पतली होती जाती है। इसके विपरीत जब व्यक्ति आवश्यकता से अधिक मात्रा में भोजन ग्रहण करता है तो वसा त्वचा की निचली तह में चर्बी के रूप में जम जाती है।

(घ) मांसपेशियां (Muscles): एक स्वस्थ व्यक्ति की मांसपेशियां पूर्ण रूप से विकसित व सुगठित होती हैं। उत्तम पोषण के अभाव में व्यक्ति की मांसपेशियां पूर्ण रूप से विकसित नहीं होती तथा ढीली पड़ जाती हैं।

(ङ) रक्त (Blood): भोजन में उपस्थित पोषक तत्त्व पाचन के पश्चात् रक्त में अवशोषित होते हैं तथा रक्त ही इन पोषक तत्त्वों को शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाकर उनका पोषण करता है। अतः रक्त में उपस्थित पोषक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर किसी भी व्यक्ति के पोषण स्तर तथा स्वास्थ्य स्तर का पता लगाया जा सकता है। शरीर पोषण के अतिरिक्त व्यक्ति के फेफड़ों से ऑक्सीजन लेने तथा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने का कार्य रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन द्वारा सम्पन्न किया जाता है।

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एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति में सामान्यतः लगभग 1214 ग्राम हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) प्रति 100 मिली रक्त में होता है। उससे कम हीमोग्लोबिन की मात्रा अस्वस्थता का प्रतीक है जिससे व्यक्ति को जल्दी थकावट आती है और उसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। सारांश में एक स्वस्थ व्यक्ति (जिसका पोषण स्तर बाल्यावस्था से ही उचित रहा हो) का पूर्ण विकसित अस्थि कंकाल, टांगें व बाँहें सुडौल, दाँत सुन्दर व सुदृढ, त्वचा चिकनी तथा मांसपेशियां ठोस व सबल होती हैं।

2. शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता (Physical efficiency and capability): अनुसंधानों एवं प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि पोषण का प्रत्यक्ष प्रभाव व्यक्ति की शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता पर पड़ता है। अमेरिका में कुछ सैनिकों को सीमित आहार देने पर ज्ञात हुआ कि उनकी कार्यक्षमता बहुत कम हो गयी है। इसी प्रकार एक कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के प्रात:कालीन नाश्ते का अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि सन्तुलित प्रात:कालीन नाश्ता खाने वाले मजदूरों की शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता अन्य मजदूरों की अपेक्षा अधिक है।

3. मानसिक स्थिरचित्तता (Constant mental tension): उत्तम स्वास्थ्य का मनुष्य के व्यवहार से सीधा सम्बन्ध है। एक अस्वस्थ व्यक्ति प्रायः उदांस, अधीर, चिड़िचिड़ा, खिन्न व हठी होता है तथा वह किसी भी कार्य में रुचि नहीं लेता है और उसकी संकल्प-शक्ति भी कम हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों के भोजन में सुधार लाने पर. उनका व्यवहार धीरे-धीरे सामान्य हो जाता है। बच्चों में अस्थिर चित्त, अधीरता व उदण्डता का कारण भी अस्वस्थता है। एक स्वस्थ बच्चा अधिक सतर्क, क्रियाशील तथा उत्साही होता है। अनुसंधानों द्वारा व्यक्ति के मानसिंक . सन्तुलन में विटामिनों की भूमिका का अत्यधिक महत्त्व सिद्ध हुआ है।

4. मानसिक संलग्नता (Mental concentration): किसी भी बच्चे की मानसिक क्षमता अथवा बुद्धि उसकी अनुवांशिकता पर निर्भर करती है परन्तु उसका मानसिक विकास पूर्ण रूप से हो यह उसके पोषण पर निर्भर करता है। जिन बच्चों को उचित आहार नहीं मिलता वह अपनी पढ़ाई पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते हैं, वे अधिक समय तक एकाग्रचित नहीं रह सकते हैं और मानसिक दृष्टि से शीघ्र ही थक जाते हैं। अध्ययनों द्वारा यह पूर्ण रूप से सिद्ध हो चुका है कि उचित पोषण का प्रभाव बच्चों की पढ़ाई पर सर्वाधिक पड़ता है। एक स्वस्थ बच्चा एकाग्रचित होकर पढ़ाई में पूर्ण रुचि लेता है।

5. मृत्यु आंकड़े व दीर्घ आयु (Death rate & Longivity): यदि सम्पन्न देशों के मृत्यु आंकड़ों एवं आयु की तुलना विकासशील देशों से की जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उत्तम स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध दीर्घ आयु व मृत्यु-दर में कमी से है। भारत में भी माता व शिशु को पौष्टिक आहार मिलने से मातृ व शिशु मृत्यु-दर में कमी आई है तथा आयु अवधि में बढ़ोतरी हुई है। प्रौढ़ व्यक्तियों के जीवन का अकाल अन्त बहुधा हृदय सम्बन्धी रोगों के कारण होता है जिसका सीधा सम्बन्ध आहार से है क्योंकि अधिक कोलेस्ट्रॉल युक्त भोजन करने से धमनियों में धीरे-धीरे विकार आने लगते हैं जिसके कारण हृदय की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 4.
उत्तम स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन के अतिरिक्त स्वास्थ्य पर और किन बातों का प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
उत्तम स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन के महत्त्व के बारे में तुम्हें पूर्ण जानकारी हो गई है परन्तु पौष्टिक भोजन के साथ-साथ निम्नलिखित बातें भी हमारे स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं –
1. शुद्ध वायु (Fresh Air): अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुद्ध वायु में श्वास लेना अति आवश्यक है। वायु में कार्बनिक पदार्थ व विषैली गैसों जैसे कार्बनडाइ ऑक्साइड (Carbon dioxide), कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon Mono-oxide), मीथेन (Methane), हाइड्रोजन सल्फाइड (Hydrogen Sulphide) आदि की मात्रा कम से कम तथा ऑक्सीन (Oxygen) की मात्रा लगभग 20.96 प्रतिशत तक होनी चाहिए। यदि वायु में कार्बनिक पदार्थों व विपैली गैसों की मात्रा अधिक होती है तो व्यक्ति को सिरदर्द, बदनदर्द, आलस्य व थकावट की शिकायत होती है। अशुद्ध वायु जिसमें मिट्टी के कणों व रोग के जीवाणुओं की अधिकता.होती है, में सांस लेने से व्यक्ति कई रोगों से ग्रस्त हो सकता है।

2. शुद्ध जल (Fresh Water): हमारे देश में पीने के लिए जल विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त किया जाता है, जैसे-तालाब, कुएँ, नदियाँ, नलकूप, नल आदि । जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ तथा रोगाणु पाए जाते हैं जिनके द्वारा व्यक्ति को अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। अतः हमें इस वात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि जल चाहे किसी भी स्रोत द्वारा लिया जाए स्वच्छ तथा. रोगाणुरहित हो।

3. व्यक्तिगत एवं वातावरण की स्वच्छता (Personal & Environmental sanitation): प्रकृति में रोग उत्पन्न करने वाले अनेक जातियों के सूक्ष्म रोगाणु होते हैं जो अंधेरी जगह, नमी तथा गन्दगी में शीघ्रता से बढ़ते हैं और विभिन्न माध्यमों द्वारा संक्रमण फैलाते हैं। अतः गन्दगी के कारण मनुष्य अनेक रोगों का शिकार हो सकता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ-साथ वातावरण की स्वच्छता का भी पूर्ण ध्यान रखना आवश्यक है।

4. व्यायाम (Exercise): अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन अपनी आयु, कार्य व निजी आवश्यकतानुसार शुद्ध वायु में नियमित रूप से व्यायाम करना आवश्यक है क्योंकि व्यायाम द्वारा फेफड़ों में शुद्ध वायु पहुँचती है, रक्त परिसंचरण की गति तेज होती है, जिससे विभिन्न अंगों में पोषक तत्त्व तीव्रता से पहुंचते हैं और व्यर्थ पदार्थों का निष्कासन भी तीव्रता से होता है।

5. नियमित विश्राम व निद्रा (Regular Rest & Sleep): दैनिक कार्यों से होने वाली थकावट को दूर करने तथा दोबारा कार्य करने के लिए ऊर्जा अर्जित करने के लिए उचित मात्रा में विश्राम व निद्रा आवश्यक है क्योंकि इन अवस्थाओं में शरीर में होने वाले मरम्मत के कार्य सुचारु रूप से होते हैं। यही कारण है कि बच्चों, बूढों व कमजोर व्यक्तियों को अधिक विश्राम व निद्रा की आवश्यकता होती है। एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए प्रतिदिन 6 घण्टे से 8 घण्टे तक की नियमित निद्रा आवश्यक है। इसके विपरीत आवश्यकता से अधिक विश्राम व निद्रा भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

6. रोगों से रक्षा (Protection against diseases): प्राय: देखा गया है कि हम चाहे अपने स्वास्थ्य का कितना भी ध्यान रखें फिर भी कोई न कोई रोग हमें घेर लेता है। अतः रोगों जैसे तपेदिक, हैजा, टाइफाइड, पोलियो आदि से बचने के लिए बच्चों को नियमित रूप से टीके लगवाकर रोगों से रक्षा प्रदान करनी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

Bihar Board Class 11 Psychology मानव व्यवहार के आधार Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
विकासवादी परिप्रेक्ष्य व्यवहार के जैविक आधार का किस प्रकार व्याख्या करता है।
उत्तर:
संसार में जीवों की करोड़ों विभिन्न प्रजातियाँ हैं जो अपने पूर्ववर्ती प्रारूपों से आज के रूप में विकसित हुई हैं। जैविकीय परिवर्तन किसी प्रजाति के पूर्ववर्ती प्रारूपों में पर्यावरण की परिवर्तित हुई अनुकूलन की आवश्यकताओं के प्रति उसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होती है। जीवों में व्यवहारात्मक परिवर्तन इतना मंद होते हैं कि सैकड़ों पीढ़ियों के बाद ही दिखाई पड़ता है।

आधुनिक मानवों के तीन महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण उन्हें अपने पूर्वजों से अलग करते हैं –

  1. बड़ा और विकसित मस्तिष्क जिसमें संज्ञानात्मक व्यवहार (प्रत्यक्षण, स्मृति, तर्कन) तथा भाषा के उपयोग करने की क्षमता का पाया जाना।
  2. काम करने योग्य विपरी अंगूठे के साथ मुक्त हाथ रखने वाला प्राणी बन जाना। मानव का व्यवहार बहुत जटिल और विकसित होता है। मस्तिष्क का वजन हमारे शरीर के सम्पूर्ण वजन का 2.35 प्रतिशत होता है जो सर्वाधिक होता है। मनुष्य का प्रमस्तिष्क के अन्य भागों से अधिक विकसित होता है।

हमारे व्यवहार को प्रभावित करने शारीरिक संरचना के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति अनुकूलन और आनुवंशिकता का सामूहिक योगदान रहता है। आहार जुटाने की योग्यता, पूरे परिवार की सुरक्षा, परभक्षों को अपने से अलग रखने की प्रवृत्ति जैसे अनेक प्रक्रियाएँ एवं विधियाँ हैं जो जीवों के व्यवहार को बदलने का कारण बने हुए हैं। जीवों के व्यवहार में अन्तर लाने का कार्य मुख्यत: पर्यावरण और जीन की योग्यता से करते रहता है। जीन के माध्यम से व्यवहार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवर्तन होता रहता है।

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प्रश्न 2.
तंत्रिका कोशिकाएँ सूचना को किस प्रकार संचारित करती हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तंत्रिका कोशिकाएँ सूचना को विद्युत संकेतों के रूप में ग्रहण करने, संवहन करने तथा अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य निपुणता के साथ पूरा करती है। ये संबंधित अंगों के माध्यम से सूचना प्राप्त करके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक ले जाती है जो प्राप्त सूचना को पेशीय अंगों तक ले जाती है।

तंत्रिका तंत्र के प्रमुख घटक पार्श्व तंतु विद्युत रासायनिक या जैव रासायनिक संकेत के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं और प्राप्त संकेतों को दूसरे घटक काय कोशिका में भेज देते हैं। अक्ष तंतु के अंतिम सिरे पर स्थित अंतस्थ वहन प्राप्त संकेतों को अन्य ग्रन्थियों और मांसपेशियों को दे देते हैं। पेशीय तंत्रिका स्नायविक आदेशों का संवहन करती है।
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चित्र: तंत्रिका कोशिका की संरचना
अर्थांत तंत्रिका तंत्र में सूचनाएं तंत्रिका आवेगा के रूप में प्रवाहित होती है जो उपिहक ऊर्ज के रूप में ग्राहकों तक पहुंचती है

प्रश्न 3.
प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के चार पालियों के नाम बताइये। ये क्या कार्य करते हैं?
उत्तर:
मस्तिष्क के चार प्रमुख भागों में से एक प्रमस्तिष्क कहलाने वाले भाग को प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के नाम से भी समझा जाता है। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट सभी उच्चस्तरीय संज्ञानात्मक प्रकार्यों (अवधान, प्रत्यक्षण, अधिगम, स्मृति, भाषा-व्यवहार, तर्कना, समस्या समाधान) को नियमित करने का कार्य करता है।

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की संरचना को चार मुख्य पालियों में बाँटा जा सकता है –

  1. ललाट या अग्र पालि
  2. पाश्विक या मध्य पालि
  3. शंख पालि तथा
  4. पश्वकपाल पालि

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की चार पालियों के कार्य भिन्न माने जाते हैं जो निम्न वर्णित हैं –

1. ललाट अथवा अग्र पालि-ललाट पालि मुख्यतः
संज्ञानात्मक कार्यों (चिंतन, स्मृति, तर्कना, अधिगम, अवधान आदि) में सहायता करता है। किन्तु स्वायत्त और संवेगात्मक अनुक्रियाओं पर अवरोधात्मक प्रभाव डालता है।

2. पार्श्विक पालि या मध्य पालि:
पार्श्विक पालि त्वचीय संवेदनाओं और उनका चाक्षुष और श्रवण संवेदनाओं के साथ समन्वय स्थापित करने का कार्य करता है। अर्थात् गर्मी, ठंढक, ददे आदि की अनुभूति इसी पालि पर आधारित होता है।
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चित्र: प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

3. शंख पालि:
शंख पालि का सीधा संबंध श्रवणात्मक सूचनाओं से होता है। प्रतीकात्मक शब्दों तथा भिन्न-भिन्न ध्वनियों का सही अर्थ समझने का कार्य शंख पालि का ही है। यह लिखित भाषा और वाणी का अर्थ समझने में निपुण होता है। अर्थात् शंख पालि के द्वारा श्रवण संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

4. पश्च कपाल पालि या पृष्ठ पालि:
पश्च कपाल पालि मुख्यतः चाक्षुष सूचनाओं से संबद्ध रहता है। इसी पालि के द्वारा चाक्षुष आवेगों की व्याख्या, चाक्षुष उद्दीपकों की स्मृत्ति और रंग चाक्षुष उन्मुखता आदि सम्पन्न की जा सकती है। इसके नष्ट होने से अंधापन का भय उत्पन्न हो जाता है। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के प्रमुख पालियों के कार्य को कार चलाने के उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है। कार चलाते समय बालक पश्च कपाल की सहायता से सड़क और अन्य गाड़ियों को देखता है, शंख पालि की मदद से हार्न या सचेतक की ध्वनि को सुन लेता है।

पार्श्विक पालि की सहायता से चालक गाड़ी को नियंत्रित रखने के लिए पेशीय क्रियाकलाप करता है। गाड़ी को रोकना या ओवरटेक करना आदि जैसे निर्णय के लिए ललाट पालि की मदद लेता है। इस तरह माना जा सकता है कि मस्तिष्क की कोई भी गतिविधि वल्कुट के केवल एक हिस्से के द्वारा ही संपादित होते हैं। प्रत्येक पालि की अपनी विशिष्ट कार्य-क्षमता होती है।

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प्रश्न 4.
विभिन्न अंतःस्त्रावी ग्रंथियों और उनसे निकलने वाले अन्तःस्त्रावों के नाम बताएँ। अंतःस्त्रावी तंत्र हमारे व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
विभिन्न अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (नलिकाविहीन ग्रन्थियों) के नाम तथा उनसे निकलने वाले अन्तःस्रावों के नाम क्रमानुसार अंकित किए गए हैं –
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अन्तःस्रावी तंत्र हमारे व्यवहार को प्रत्यक्षतः प्रभावित करते हैं – पीयूष ग्रंथि मूल और गौण लैंगिक परिवर्तन को प्रभावित करके हमें व्यवहार में अन्तर लाने को बाध्य कर देते हैं। अवटु ग्रंथि से निकलने वाला थाइरॉक्सिन नामक हॉर्मोन शरीर में चयापचय की दर को प्रभावित करता है जिसके कारण ऊर्जा का उत्पादन होता है। इसकी सक्रियता बढ़ जाती है। इसके विपरीत थाइरॉक्सिन की कमी से शारीरिक और मानसिक सुस्ती आ जाती है। अधिवृक्क ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोनों के कारण तंत्रिका तंत्र के प्रकार्यों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यह अधश्चेतक को उद्दीप्त करते हैं जिससे व्यक्ति का संवेग घटता बढ़ता –
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चित्र: मुख्य अंतःस्त्रावी ग्रंथियाँ
अग्नाशय से निकलनेवाले इन्सुलिन में यह क्षमता होती है कि वह भूख और दर्द से निश्चित रखकर खुश रहने की प्रवृत्ति जगाता है। इसके विपरीत मधुमेह से ग्रसित व्यक्ति इन्सुलिन के उपयोग में गड़बड़ी को मुख्य कारण मानता है। जनन ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोन के कारण हमारा व्यवहार उत्तेजित तथा आक्रामक हो जाता है। हमारे व्यवहार में सुन्दर, समर्थ एवं विकसित व्यक्ति कहलाने के लिए कृत्रिम प्रदर्शन के द्वारा आकर्षन उत्पन्न करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

सभी अन्तःस्रावों का सामान्य प्रकार्य हमारे व्यवहारपरक कल्याण के लिए निर्णायक होता है। शरीर का आंतरिक संतुलन बनाये रखने के लिए हमारे व्यवहार को दवाब मुक्त, भय मुक्त, विकसित रखने में हमारी सहायता करता है। सारांशतः अंतःस्रावी ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन के चलते हम अपने व्यवहार पर मानसिक असंतुलन उत्तेजना, भूख, रक्तचाप, उदासीनता, संवेग, सक्रियता, मोटापन, बेचैनी, चिन्ता आदि प्रभावकारी कारकों का कुप्रभाव नहीं पड़ने देते हैं और इस सर्वप्रिय व्यवहार के प्रदर्शन के योग्य बने रहते हैं।

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प्रश्न 5.
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र किस प्रकार आपातकालीन स्थितियों में कार्य-व्यवहार में हमारी सहायता करता है?
उत्तर:
आपातकाल की स्थिति में हम भय, अनहोनी, अशांति, दुर्घटना आदि के प्रभाव के कारण अव्यवस्थित हो जाते हैं। हमारी शारीरिक क्रिया स्वाभाविक कार्य नहीं कर पाती है और हम कई रोग अथवा विषमताओं के चक्कर में पड़ जाते हैं। ज्ञात है कि स्वायत्त तंत्र, जो तंत्रिका तंत्र का एक प्रमुख घटक होता है, उन क्रियाओं का संचालन करता है जिनपर हमारे प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होते हैं। जैसे, सॉस लेना, रक्त संचार, लार स्राव, उदर संकुचन और प्रायोगिक प्रतिक्रियाओं का नियंत्रण हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करता है। आपातकाल में तेजी से हृदय का धड़कना, कई वीभत्स घटनाओं को देखना, रक्तचाप का बढ़ जाना, मुँह सूखना, भूख न लगना, बार-बार प्यास लगना, चिड़चिड़ापन का बढ़ जाना जैसी अस्वाभाविक स्थितियाँ आ जाती हैं।

स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ऐसी स्थिति में अपनी स्वाभाविक वृत्ति को छोड़कर हमारी सहायता करते हैं। अधिक ऊर्जा का संचार करके, अनुकंपी तंत्र की सक्रियता को कम करके, पाचन-क्रिया की गड़बड़ी को सुधार कर प्रभावित व्यक्ति को शांत कर उसे सामान्य स्थिति में लाता है। स्वायत्त तंत्रिका के दोनों प्रमुख खण्ड-अनुकम्पी और परानुकम्पी खण्ड अपने विपरीत प्रभाव की प्रवृत्ति को छोड़कर मानवीय व्यवहार में संतुलन बनाये रखने के लिए मिल-जुलकर कार्य करने लगते हैं। स्वायत्त तंत्र के दोनों खण्डों के सामूहिक प्रयास से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा सभी शारीरिक क्रियाएँ (हृदय गति, श्वास गति, रक्तचाप, रक्त की संरचना) आदि सामान्य स्तर में आ जाती है। अर्थात् स्वायत्त् तंत्र की सक्रियता से प्रबल और त्वरित कार्यवाही के माध्यम से प्रभावित व्यक्ति परिस्थिति से जूझने की क्षमता बढ़ा पाता है।

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प्रश्न 6.
संस्कृति का क्या अर्थ है? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संस्कृति का सामान्य अर्थ एक विशिष्ट अवधारणा मानी जाती है जहाँ अच्छे व्यवहार या आचरण करने वाले को सुसंस्कृत कहा जाता है। संस्कृति का सही अर्थ जानने के लिए भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने-अपने तरह से संस्कृति को परिभाषित किया है जिनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नवत हैं –

1. वूम और सेल्जनिक:
समाज में संस्कृति का अर्थ मनुष्य की सामाजिक विरासत से लिया जाता है जिसमें सभी प्रकार के ज्ञान, विश्वास, प्रथाएँ एवं प्रथा आती हैं जिसे व्यक्ति समाज के एक सदस्य के रूप में ग्रहण करता है। आज संस्कृति लोगों की जीवन-शैली के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसे परम्परा की धरोहर के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित किए जाते रहे हैं।

2. टॉयलर (Taylor):
“संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, आचार, कानून, प्रथा तथा ऐसी ही अन्य क्षमताओं और आदतों का समावेश रहता है जिसे मनुष्य समाज के सदस्य के रूप में प्राप्त करता है।” टॉयलर की इस परिभाषा में भौतिक तत्वों को संस्कृति में शामिल नहीं किया गया है। आज के मानवशास्त्रियों ने संस्कृति में भौतिक तत्वों को भी शामिल किया है।

3. पिडिंग्टन (R. Piddington):
“मानव संस्कृति उन भौतिक और बौद्धिक साधनों और उपकरणों का संपूर्ण योग है जिसके द्वारा मानव अपनी जैविकीय और सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और साथ ही अपने को पर्यावरण के अनुकूल बनाता है।” पिडिंग्टन की इस परिभाषा में –

  • भौतिक और बौद्धिक साधनों और उपकरणों को संस्कृति का अंग माना गया है।
  • मनुष्य संस्कृति के माध्यम से अपने को पर्यावरण (Environment) के अनुकूल बनाता है।
  • संस्कृति के तत्वों को मनुष्यमात्र की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन माना गया है।

4. डॉ. श्यामचरण दूबे:
प्रसिद्ध भारतीय विद्वान डॉ. दूबे के शब्दों में, “सीखे हुए व्यवहार-प्रकारों की उस समग्रता को जो किसी समूह को विशिष्टता प्रदान करती है, संस्कृति की संज्ञा दी जा सकती है। दूसरे शब्दों में, किसी समूह के ऐतिहासिक विकास में जीवन-यापन के जो विशिष्ट स्वरूप विकसित होते हैं, वे ही उस समूह की संस्कृति हैं।” पिडिंग्टन तथा दूबे के अनुसार मानव द्वारा निर्मित सभी भौतिक एवं अभौतिक वस्तुएँ संस्कृति में आती हैं।

5. रॉबर्ट बीयस्टेंड (Robert Bierstedt):
“संस्कृति एक जटिल समग्रता (the com plex whole) है जिसमें उन सभी चीजों का समावेश हैं जिनपर हम सोचते हैं, कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते उन्हें अपने पास रखते हैं।”

6. हस्कोविट्स (Herskovits):
“संस्कृति पर्यावरण का मानव-निर्मित व्यवहार है।”

7. मेकाइवर तथा पेज (Maclver and Page):
मेकाइवर तथा पेज ने संस्कृति को सभ्यता से अलग माना है। उनका कहना है कि “हमारी संस्कृति वही है जो हम हैं और हम प्रयोग करते हैं, वही हमारी सभ्यता है” (Our culture is what we are, our civilization is what we use)। उन्होंने कलम, घड़ी, टाइपराइटर मशीन आदि को सभ्यता माना है जबकि ज्ञान, नैतिक आचार शास्त्र, कला, धर्म आदि को संस्कृति का तत्व स्वीकार किया है।

संस्कृति की विशेषताएँ:
संस्कृति के सम्बन्ध में प्राप्त अवधारणों तथा अनेक परिभाषाओं के आधार पर संस्कृति के सम्बन्ध में कुछ विशिष्ट विशेषताओं की संभावना मिलती है जो इस प्रकार व्यक्त किये जा सकते हैं –

  1. संस्कृति उन लोगों के व्यवहारात्मक उत्पादों को सम्मिलित करती है जो हमसे पहले आ चुके हैं। अर्थात् जैसे ही हम जीवन प्रारम्भ करते हैं, संस्कृति वहाँ पहले से ही उपस्थित होती है।
  2. संस्कृति एक जीवन-पद्धति है जो किसी निश्चित परिवेश में रहने वाले लोगों द्वारा अपनाई जाती है।
  3. संस्कृति को कुछ प्रतीकों में अभिव्यक्त अर्थों के रूप में समझा जाता है जो कि ऐतिहासिक रूप से लोगों में संचालित होते हैं।
  4. संस्कृति समय, स्थान, पर्यावरण और परिस्थिति के कारण भिन्नता बनाए रह सकती है।
  5. संस्कृति एक समाज से दूसरे समाज के मनुष्यों के व्यवहारों का निरूपण करती है।

इन विशेषताओं को स्पष्टतः व्यक्त करने के उपरान्त निम्न विशेषताओं को भी व्यक्त किए जा सकते हैं –

1. संस्कृति सीखे हुए आचरणों का नाम है:
जैसे-अभिवादन, गायन, वस्त्र पहनना, नृत्य करना आदि सीखे हुए आचरण कहलायेंगे; क्योंकि हम इन्हें समाज से सीखते हैं। गैर सीखे हुए आचरण वे कहलायेंगे जो कि स्वाभाविक प्रवृत्ति से सम्बन्धित होते हैं। जैसे-रोना, क्रोध करना आदि। समस्त सीखे हुए आचरण एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं; जैसे कि गुरु-शिष्य का आचरण, मालिक-मजदूर का आचरण आदि और इन्हीं के आध पर पर हम आचरणों के प्रतिमान निर्धारित करते हैं, जैसे-बच्चों का आचरण, स्त्रियों का आचरण, शिष्यों का आचरण इत्यादि।

2. संस्कृति के छिपे हुए आचरण संगठित प्रतिमानों के रूप होते हैं:
किसी भी व्यक्ति के आचरण का स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता है वरन् इनका महत्त्व अन्य लोगों के सम्बन्धों में’ ही होता है। एक आचरण अन्य आचरणों से भी सम्बन्धित होता है। हर व्यक्ति के आंचरण निर्धारित हो जाने पर समाज तथा उनकी संस्कृति उससे यह आशा करती है कि वह उसी के अनुसार आचरण करें। इसी के आधार पर उनके आचरणों का नामांकन होता है। जैसे कि बच्चों की तरह आचरण करने वाले युवक के कार्यों को बचकाना आचरण कहा जायगा। कुछ विशेष आचरण तथा संस्कृति द्वारा स्त्री तथा पुरुषों के लिए निर्धारित किये गये हैं। यदि कोई पुरुष स्त्रियो के अनुसार आचरण करते हैं तो उसे जनाना आचरण कहते हैं।

3. संस्कृति प्रतिमान आदर्शात्मक होते हैं:
भला-बुरा, सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, विचार की शिक्षा छोटे को बड़े से मिलती है। उचित-अनुचित की धारणा परिणाम पर निर्भर करता है। किसी व्यक्ति के कार्य का परिणाम यदि अच्छा होता है तो मनुष्य उसका अनुसरण करते हैं। इस प्रकार जनरीति, प्रथा, परम्परा, संस्था का रूप लेकर वह विचार संस्कृति का अंग बन जाता है।

4. संस्कृति के प्रतिमान भौतिक एवं अभौतिक दोनों ही होते हैं:
वस्तुवादी चीजें भौतिकवादी प्रतिमान में आयेंगी और विचारवादी सम्बन्धों को प्रभावित करने वाली अभौतिक प्रतिमान में आयेंगी। इस प्रकार से रेडियो, टेलीविजन के आचरण, विचार, प्रथा, परम्परा आदि वस्तुएँ अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत आयेंगी, क्योंकि ये निराकार होती हैं।

5. सार्वभौमिक स्वीकृति:
कोई भी आचरण संस्कृति का अंग तभी कहलाता है जबकि पर्याप्त लोग उसे स्वीकार कर लेते हैं।

6. व्यवहार के प्रतिमान हस्तांतरति होते हैं:
एक पीढ़ी अपने आचरण दूसरी पीढ़ी को सिखाती है और युग-युग से यह हस्तांतरण चल रहा है। माता-पिता, वयोवृद्धों तथा शिक्षकों के माध्यम से अभौतिक, भौतिक संस्कृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं।

7. संस्कृति का स्वरूप हमेशा परिवर्तनशील होता है:
संस्कृति समाज तथा व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों का नाम है। इसलिये यह हमेशा परिवर्तनशील होती है।

8. संस्कृति सामाजिक है:
संस्कृति सामाजिक है; क्योंकि व्यक्ति समूह के बाहर किसी भी प्रकार की सृष्टि नहीं कर सकता। यह समूह का आदर्शात्मक गुण होता है, व्यक्ति उसे अपनाने का प्रयत्न करता है।

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प्रश्न 7.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि “जैविक कारक हमें समर्थ बनाने की भूमिका निभाती है जबकि व्यवहार के विशिष्ट पहलू सांस्कृतिक कारकों से जुड़े हैं।” अपने उत्तर के समर्थन के लिए कारण दीजिए।
उत्तर:
दिये गये कथन में सच्चाई है, क्योंकि जैवकीय उत्तराधिकारी जीन के माध्यम से घटित होते हैं जबकि सांस्कृतिक उत्तराधिकार पर्यावरण की भिन्न-भिन्न घटनाओं के कारण उत्पन्न होता है। जैविक कारक प्रकृति प्रदत्त होते हैं जबकि व्यवहार को परिवेश के आधार पर कृत्रिम दशा में उपलब्ध किया जाता है। जैविक कारक मनुष्य को ही नहीं बल्कि सभी जीवों को भी जीवन-संबंधी क्रियाकलाप (सांस लेना, भोजन खोजना, स्वयं को सुरक्षित रखना, स्वतंत्र एवं न्यायपूर्ण जीवन जीना) के प्रति समर्थ बनाता है।

सभी जीवों में माता-पिता से मिले जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक बनने का अवसर मिलता है तथा वह विभिन्न प्रतिक्रियाओं के प्रति स्वयं को समर्थ बना पाता है। जीन के रूप में प्राप्त होने वाले गुणसूत्र शरीर के आनुवंशिक तत्व के रूप में सहयोग करता है। गुणसूत्र के माध्यम से जीनोटाइप और फीनोटाइप जैसे लक्षण प्रकट होते हैं तथा जैविक कारक में सुरक्षा सम्बन्धी गुण उत्पन्न हो जाते हैं। इस तरह माना जा सकता है कि जैविक कारकों को उपलब्ध सामर्थ्य आनुवंशिक कारणों से संभव होते हैं।

सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव में जीवन अनुकूलन के लिए अपने व्यवहार में परिस्थिति के अनुसार अन्तर उत्पन्न कर लेता है। हम कुछ विचार, संप्रत्यय और मूल्यों को सीखकर काम व्यवहार सम्बन्धी नियमों, मूल्यों तथा कानूनों की रचना कर परिवेश में अनुकूल परिवर्तन लाने का प्रयास करते रहते हैं। पर्यावरण के विभिन्न घटकों से प्रभावित होकर जीवन अपनी जीव-पद्धति को बदलकर जीने का प्रयास करता है।

मानव का स्वभाव प्राकृतिक दशा के अधीन होती है जबकि शारीरिक क्षमता उसे बचपन से ही उपलब्ध रहती है। माँ-बाप की क्षमता, पालन-पोषण के लिए प्रयुक्त विधि और साधन जीवों को समर्थ बनाता है जो स्वाभाविक वृत्ति मानी जाती है। व्यवहार एक कृत्रिम प्रक्रिया होती है जो परिस्थितिवश उदंड, नम्र, सर्वप्रिय, कटु, किसी श्रेणी में रूपान्तरित हो सकता है।

प्रश्न 8.
समाजीकरण के प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समाज के हित में किये जाने वाले कार्य – विधि को जो हमें सीखने की विधि या अवसर प्रदान करता है उन्हें समाजीकरण के कारक कहते हैं। समाजीकरण के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. माता-पिता
  2. विद्यालय
  3. समसमूह और
  4. जनसंचार का प्रभाव

1. माता-पिता:
बालक के विकास पर सबसे अधिक प्रत्यक्ष और महत्त्वपूर्ण प्रभाव माता-पिता का पड़ता है। वे विभिन्न स्थितियों में माता-पिता के प्रति भिन्न प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं। माता-पिता उनके कुछ व्यवहारों को, शाब्दिक रूप से पुरस्कृत करके जैसे-प्रशंसा करना या अन्य मूर्त तरह से पुरस्कृत करके जैसे-चॉकलेट, खिलौने या बच्चे की पसंद की वस्तु खरीदना प्रोत्साहित करते हैं। वे कुछ अन्य व्यवहारों का अनुमोदन करके, निरुत्साहित करते हैं। वे बच्चों को भिन्न प्रकार की स्थितियों में रखके उन्हें विध्यात्मक अनुभव, सीखने के अवसर और चुनौतियाँ प्रदान करते हैं।

बच्चों से अन्योन्यक्रिया करते समय माता-पिता विभिन्न युक्तियाँ अपनाते हैं जिन्हें पैतृक शैली कहा जाता है। माता-पिता के अपने बच्चों के प्रति व्यवहारों में स्वीकृति और नियंत्रण की हद के विषय में बहुत भिन्नताएँ होती हैं। माता-पिता अपने बच्चों को समाजीकृत करने के लिए जो शैली अपनाते हैं वे उनकी आर्थिक दशा, स्वास्थ्य, कार्य-दबाव, परिवार का स्वरूप आदि से प्रभावित होते हैं। दादा-दादी एवं नाना-नानी के समीपता तथा सामाजिक संबंधों का ढाँचा, बच्चे के समाजीकरण में प्रत्यक्षतः या माता-पिता के माध्यम से बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं।

2. विद्यालय:
बच्चे विद्यालय में लंबा समय व्यतीत करते हैं, जो उन्हें अपने शिक्षकों और समकक्षियों के साथ अन्योन्यक्रिया करने का एक सुसंगठित ढाँचा प्रदान करता है। विद्यालय में बच्चे न केवल संज्ञानात्मक कौशल जैसे-पढ़ना, लिखना, गणित को करना ही नहीं सीखते हैं बल्कि बहुत से सामाजिक कौशल जैसे-बड़ों तथा समवयस्कों के साथ व्यवहार करने के ढंग, भूमिकाएँ स्वीकारणा, उत्तरदायित्व निभाना भी सीखते हैं।

वे समाज के नियमों और मानकों को भी सीखते हैं और उनका आंतरीकरण भी करते हैं। स्वयं पहल करना, आत्म-नियंत्रण, उत्तरदायित्व लेना और सर्जनात्मकता आदि गुण भी बच्चे विद्यालय में सीखते हैं। ये गुण बच्चे को अधिक आत्मनिर्भर बनाते हैं। वास्तव में, एक अच्छा विद्यालय बच्चे के व्यक्तित्व के पूर्णतया ही रूपांतरण कर सकता है।

3. समसमूह:
समसमूह बच्चे के समाजीकरण का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है। यह बच्चों को न केवल दूसरों के साथ होने का अवसर प्रदान करता है बल्कि अपनी उम्र के साथियों के साथ सामूहिक रूप से विभिन्न क्रियाकलापों जैसे-खेल को आयोजित करने का भी अवसर प्रदान करती है। ऐसे गुण; जैसे-सहभाजन, विश्वास, आपसी समझ, भूमिका स्वीकृति एवं निर्वहन भी समकक्षियों के साथ अन्योन्यक्रिया के दौरान विकसित होते हैं। बच्चे, अपने दृष्टिकोण को दृढ़तापूर्वक रखना और दूसरों के दृष्टिकोण को स्वीकार करना और उनसे अनुकूलन करना भी सीखते हैं। समसमूह के कारण आत्म-तादाम्य का विकास बहुत सुगम हो जाता है।

4. जनसंचार का प्रभाव:
दूरदर्शन, समाचारपत्रों, पुस्तकों और चलचित्रों के माध्यम से बच्चे बहुत सारी बातें सीखते हैं। किशोर और युवा प्रौढ़ अक्सर इन्हीं में से अपना आदर्श प्राप्त करते हैं, विशेषकर दूरदर्शन और चलचित्रों से। दूरदर्शन और चलचित्रों में दिखाई जानेवाली हिंसा बच्चों में आक्रामक व्यवहार को बढ़ाता है। अतः समाजीकरण के इस कारक को अधिक तरह से उपयोग करने की आवश्यकता है जिससे बच्चों में अवांछित व्यवहारों के विकास को रोका जा सके।

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प्रश्न 9.
संस्कृतिकरण और समाजीकरण में हम किस प्रकार विभेद कर सकते हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संस्कृतिकरण का संदर्भ उन समस्त अधिगमों से है जो बिना किसी प्रत्यक्ष और सोद्देश्य शिक्षण के होता है जबकि समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति ज्ञान, कौशल और शील गुण अर्जित करते हैं जो उन्हें समाज एवं समूहों में प्रभावशाली सदस्यों की तरह भाग लेने में सक्षम बनाती है।

  1. संस्कृतिकरण के मुख्य तत्व प्रेक्षण द्वारा सीखना है जबकि सबसे महत्त्वपूर्ण समाजीकरण कारक माता-पिता, विद्यालय समसमूह, जन-संचार आदि होते हैं।
  2. संस्कृतिकरण के प्रभाव काफी स्पष्ट दिखाई देते है तथापि लोग सामान्यतः इन प्रभावों के प्रति सजग नहीं हो पाते हैं। समाजीकरण के प्रभाव के रूप में माता-पिता का व्यवहार, विद्यालय का कार्यक्रम, सामाजिक जालक्रम का विस्तार, अवांछित व्यवहारों का विकास आदि से जुड़े होते हैं।
  3. संस्कृतिकरण का प्रत्यक्ष विरोधाभास को जन्म देता है जबकि समाजीकरण किसी व्यक्ति में सुरक्षा, देखभाल, पालन-पोषण, योग्यता का विकास आदि को समझने तथा अपनाने का अवसर जुटाता है।
  4. पूर्ववर्ती पीढ़ियों के माध्यम से चीजों का सांस्कृतिक निरूपण किया जाता है जबकि समाजीकरण सदस्यों के व्यवहार, विकास, अनुप्रयोग आदि पर ध्यान देता है।
  5. संस्कृतिकरण पूरी जीवन विस्तृति तक निरन्तर चलती रहती है जबकि समाजीकरण आवश्यकता एवं दशा पर आश्रित होता है।
  6. संस्कृतिकरण एक प्रकार का सजग एवं उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है जबकि समाजीकरण समाजीकृत करने की शक्ति रखता है जो भाषिक व्यवहार के रूप में जाना जाता है।
  7. अर्थात् संस्कृतिकरण और समाजीकरण में विभेद बतलाने के लिए उनकी प्रकृति एवं विशेषताओं (लक्षण एवं प्रभाव) को इंगित करना होता है।

प्रश्न 10.
परसंस्कृति ग्रहण से क्या तात्पर्य है? क्या परसंस्कृति ग्रहण एक निर्बाध प्रक्रिया है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
दो भिन्न संस्कृतियों में से कोई एक जब दूसरी के सम्पर्क में आता है तो सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आना परसंस्कृति ग्रहण के सामान्य धारणा है। अभीष्ट सम्पर्क प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कुछ भी हो सकता है। परसंस्कृति ग्रहण की रूप में नयी संस्कृति में स्थानांतरण अथवा जन-संचार के माध्यमों से होनेवाले में प्रयुक्त माध्यमों में हो सकता है। उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना, प्रशिक्षण, नौकरी या व्यापार के लिए स्थान बदलना ऐच्छिक ग्रहण माना जाता है। औपनिवेशिक अनुभव, आक्रमण या राजनीतिक शरण के द्वारा अनैच्छिक ग्रहण कहलाता है।

परसंस्कृति ग्रहण को स्पष्टतः समझने के लिए कुछ नया सीखने की आवश्यकता हो जाती है। अर्थात् परसंस्कृति ग्रहण की स्थिति में कोई व्यक्ति समस्यारहित माना जाता है। इसमें यदा-कदा द्वन्द्व की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

व्यवहार संबंधी ज्ञान की पुनरावृत्ति को जारी रखने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया है। इसे परिवर्तन मुक्त भी रखा जा सकता है। अर्थात् परसंस्कृति ग्रहण का तात्पर्य दूसरी संस्कृतियों के साथ सम्पर्क के परिणामस्वरूप आए हुए सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों से है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष; ऐच्छिक अथवा अनैच्छिक किसी भी श्रेणी में रहकर कुछ नया सीखने के लिए बाध्य कर देता है।

दूसरी संस्कृति के लोगों से मिलने पर उसकी संस्कृति को समझना तथा उसके साथ जीवन व्यतीत करने की सही स्थिति का पता लगाना परसंस्कृति ग्रहण की प्रमुख विशेषता है। ब्रिटिश शासनकाल में लोग इसी कारण इसके लक्षणों एवं आदर्शों को ग्रहण करना सरल, सत्य एवं अभीष्ट माना गया। इस प्रकार ब्रिटिश संस्कृति के साथ रह जाने से उसकी जीवन-शैली संबंधी प्रेक्षण किया जाता है।

परसंस्कृति ग्रहण की व्याख्या पर्यावरण को रूपान्तरित करना होता है। यह निर्बाध प्रतिक्रिया को नकारते हुए किसी के जीवन में किसी भी समय घटित हो सकती है। यह जब कभी भी घटित होता है तब इसमें मानकों, मूल्यों, गुणों और व्यवहार के प्रारूपों को पुनः सीखना होता है। इसकी सफल-व्याख्या करने के लिए समाजीकरण की मदद ली जाती है। परिवर्तन की दिशा एवं प्रभाव के बदलने से परसंस्कृति ग्रहण के प्रति समझ भी बदल जाती है।

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प्रश्न 11.
परसंस्कृतिग्रहण के दौरान लोग किस प्रकार की परसंस्कृतिग्राही युक्तियाँ अपनाते हैं? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
परसंस्कृतिकरण के अवसर पर अक्सर कुछ द्वन्द्व उत्पन्न हो जाते हैं जिससे मुक्ति पाना आवश्यक हो जाता है। अध्ययन से ज्ञात है कि लोगों के पास परसंस्कृतिग्राही परिवर्तन का मार्ग बदल जा सकता है। लोगों के पास परसंस्कृति ग्रहण से संबंधित कई विकल्प होते हैं। परसंस्कृति ग्रहण एक विशिष्ट नैतिक घटना है जिसका अध्ययन आत्मनिष्ठ तथा वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। भाषा, वेशभूषा, जीवन-शैली, जीवन-यापन के साधन, घर का प्रबंध, घर के साधन (आभूषण, फर्नीचर, रेडियो, टी.वी.), यात्रा के अनुभव, चलचित्रों का प्रदर्शन इत्यादि जीवन-यापन में अपनाये जाने वाले परिवर्तनों की सूचना देते हैं।

परिवर्तनों का परीक्षण या अभिवृतियाँ द्वन्द्व की समस्या से छुटकारा दिलाने में समर्थ हैं। इन्हें एक प्रमुख युक्ति माना जाता है। जीवन पद्धति से जुड़े परिवर्तनों के प्रति सजग रहना परसंस्कृति ग्रहण का मार्ग खोल देता है। साथ ही साथ समाकलन, आत्मसात्करण, पृथक्करण तथा सीमांतकरण नामक चार युक्तियों का उपयोग करके परसंस्कृति ग्रहण की संभावना को और अधिक पुष्ट बनाया जा सकता है। समाकलन नामक युक्ति में दो भिन्न संस्कृतियों को समान मूल्य दिया जाता है। आत्म सात्करण नामक युक्ति के द्वारा अपनी सांस्कृतिक अनन्यता को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।

पृथक्करण:
लोगों को दूसरे सांस्कृतिक समूहों के अन्यान्य क्रिया से बचना चाहिए।

सीमांतकरण:
अनिश्चय की स्थिति में रहने वाले लोग दो तरह के प्रश्नों के उत्तर जानने को उत्सुक रहते हैं।

(क) उन्हें क्या करना चाहिए?
(ख) वे क्यों दयनीय स्थिति में कैसे बने रहते हैं?

Bihar Board Class 11 Psychology मानव व्यवहार के आधार Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तंत्रिका-कोष सन्धि का परिचय दें।
उत्तर:
किसी सूचना के प्रसारण की स्थिति में तंत्रिका आवेग को संचारित करना होता है। इस प्रक्रिया में एक तंत्रिका कोशिका निकटवर्ती तंत्रिका कोशिका को संदेश दे देती है। पूर्ववर्ती तंत्रिका कोशिका के अक्ष तंतु से प्रकार्यात्मक संबंध या तंत्रिका कोष-संधि बनाते हैं।

प्रश्न 2.
तंत्रिका तंतु का क्रमबद्ध प्रतिरूपण एक आरेख के रूप में किस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है।
उत्तर:
मानव तंत्रिका तंत्र सर्वाधिक जटिल एवं विकसित तंत्र है जिसके प्रमुख अंश अलग-अलग तरह से व्यवस्थित रहकर विभिन्न प्रकार्यों से संलग्न रहते हैं। जैसे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र कठोर हड्डी के खोल (कपाल) के अन्दर पाया जाता है। स्वायत्त तंत्रिका तंत्र का कार्य ऐच्छिक नियंत्रण से बाहर होता है।

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प्रश्न 3.
परिधीय तंत्रिका तंत्र में क्या पाए जाते हैं?
उत्तर:
परिधीय तंत्रिका तंत्र में वे समस्त तंत्रिका कोशिकाएँ तथा तंत्रिका तंतु पाए जाते हैं जो केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को पूरे शरीर से जोड़ते हैं। कायिक तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र इसके प्रमुख भाग होते हैं।

प्रश्न 4.
कायिक तंत्रिका तंत्र के तीन प्रमुख हिस्से क्या हैं?
उत्तर:
कायिक अथवा कपालीय तंत्रिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं –

  1. संबेदी: जो संवेदी सूचनाओं का संग्रह करती है।
  2. पेशीय: जो पेशीय आवेगों को सिर के क्षेत्र में पहुँचाती है।
  3. मिश्रित: जो मेरुरज्जू के 31 समुच्चयों के रूप में संवेदी तथा संवहन दो तरह के कार्यों को पूरा करती है।

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प्रश्न 5.
स्वायत्त तंत्रिका के दो खण्ड क्या हैं? उनका तुलनात्मक अध्ययन किस रूप में किया जाता है?
उत्तर:
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र के दो प्रमुख खण्ड हैं –

  1. अनुकम्पी खण्ड तथा
  2. परानुकंपी खण्ड विपरीत प्रभाव डालने वाले दोनों खण्डों का संतुलन बनाये रखने के लिए मिलकर कार्य करने होते हैं। परानुकंपी खण्ड मुख्यतः ऊर्जा के संरक्षण से सम्बद्ध होते हैं। अनुकंपी खण्ड आपातकालीन स्थितियों को नियंत्रित रखता है।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र किनकी सहायता से तथा किस प्रकार के कार्य करते हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क और मेरुरज्जु की सहायता से समस्त संवेदी सूचनाओं को संगठित करके मांसपेशियों तथा ग्रंथियों को प्रेरक आदेश देने का काम करता है।

प्रश्न 7.
मस्तिष्क के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात क्या है?
उत्तर:
एक वयस्क मस्तिष्क का भार 1.36 किग्रा होता है तथा इसमें 100 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं। उसकी मानव व्यवहार और विचार को दिशा प्रदान करने की योग्यता आश्चर्यजनक मानी जाती है।

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प्रश्न 8.
तंत्रिक तंत्र को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र को तीन भागों में विभाजित किया गया है-केंद्रीय तंत्रिकातंत्र, स्वचालित तंत्रिकातंत्र एवं परिधीय तंत्रिकातंत्र।

प्रश्न 9.
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के कौन-कौन भाग होते हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को दो भागों में विभाजित किया गया है-सुषुम्ना नाड़ी एवं मस्तिष्क।

प्रश्न 10.
संवेदी तंत्रिकाएँ कहाँ अवस्थित होती हैं तथा इसके क्या कार्य हैं?
उत्तर:
संवेदी तंत्रिका शरीर के सभी भागों में स्थित होती है। इसका मुख्य कार्य ज्ञानेन्द्रियों रे स्नायु-प्रवाहों को ग्रहण करके मस्तिष्क तक पहुँचाना है।

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प्रश्न 11.
गति तंत्रिका कहाँ अवस्थित होती है तथा इसके क्या कार्य हैं?
उत्तर:
गति तंत्रिका पूरे शरीर में पायी जाती है। यह मस्तिष्क से उत्पन्न हुए तंत्रिका आवेगों को मस्तिष्क या सुषुम्ना से ग्रहण करके माँसपेशियों, ग्रंथियों तथा शरीर के विभिन्न केन्द्रों तक ले जाने का कार्य करता है।

प्रश्न 12.
मस्तिष्क को किन तीन प्रमुख हिस्सों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर:
मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग हैं –

  1. पश्च मस्तिष्क
  2. मध्य मस्तिष्क तथा
  3. अग्र मस्तिष्क उनके उपभागों के नाम मेडुला, ऑबलांगाटा, सेतु अनुमस्तिष्क आदि होते हैं।

प्रश्न 13.
प्रतिवर्ती क्रिया किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी आकस्मिक उद्दीपनों के प्रति संवेदी अंगों के द्वारा अनैच्छिक क्रिया के रूप में प्रकट की जाने वाली प्रतिक्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं। जैसे-आँख झपकने की क्रिया।

प्रश्न 14.
साहचर्य तंत्रिका का क्या कार्य है?
उत्तर:
साहचर्य तंत्रिका का स्थान मस्तिष्क में तथा कुछ सुषुम्ना नाड़ी में होता है। इसका मुख्य कार्य संवेदी तंत्रिका से स्नायु-प्रवाहों को ग्रहण करके दूसरे साहचर्य तंत्रिका या गति तंत्रिका तक पहुँचाना होता है।

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प्रश्न 15.
अंतःस्रावी ग्रन्थि (Endocrine gland) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनुष्य के शरीर में वैसी ग्रन्थियाँ जिनसे स्राव निकलकर सीधे खून में मिल जाते हैं और व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। ऐसी ग्रन्थियों को अन्तःस्रावी ग्रन्थि कहा जाता है।

प्रश्न 16.
आनुवंशिकता की विशेषताएं बतायें।
उत्तर:
हम अपने माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार में जीन के रूप में पाते हैं। अपने पूर्वजों से प्राप्त उत्तराधिकार में शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ मिली रहती हैं। आनुवांशिक तत्व के प्रमुख तत्व गुणसूत्र होते हैं। गुणसूत्र मुख्यत: DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवांशिक निर्देश जीन के रूप में उपस्थित रहते हैं। जीन में उत्परिवर्तन की क्षमता होती है।

प्रश्न 17.
हमारे व्यवहार किससे प्रभावित होते हैं?
उत्तर:
हमारे कई व्यवहार अंत:स्रावों से प्रभावित होते हैं तो कई व्यवहार प्रतिवर्ती अनुक्रियाओं के कारण होते हैं। हालाँकि हार्मोन तथा प्रतिवर्ती हमारे व्यवहार में आनेवाले अन्तरों की स्पष्ट व्याख्या नहीं कर पाती हैं। हमारे व्यवहार पर सांस्कृतिक शक्तियों का प्रभाव भी स्वाभाविक है। मानव काम-व्यवहार अनेक नियमों, मान, मूल्यों और कानूनों से नियंत्रित रहते हैं।

प्रश्न 18.
समाजीकरण के प्रमुख कारकों की चर्चा करें।
उत्तर:

  1. माता-पिता तथा घर के अन्य सदस्य
  2. विद्यालय
  3. समसमूह
  4. जन-संचार आदि समाजीकरण के प्रमुख कारक माने जाते हैं

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प्रश्न 19.
परसंस्कृति ग्राही युक्तियों को किन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:
परसंस्कृति ग्रहण के मार्ग में लोगों द्वारा जो परसंस्कृति ग्राही युक्तियाँ अपनाई जाती हैं वे हैं –

  1. समाकलन
  2. आत्मसात्करण
  3. पृथक्करण तथा
  4. सीमांतकरण

प्रश्न 20.
अंतःस्रावी ग्रन्थियों के नाम लिखें।
उत्तर:
अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. थाइरायड ग्रन्थि
  2. पाराथायरायड ग्रंथि
  3. पिट्यूटरी ग्रन्थि
  4. एड्रीनल ग्रन्थि
  5. गोनाड्स (यौन ग्रन्थि)

प्रश्न 21.
लोग शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। क्यों?
उत्तर:
लोगों की विशिष्टताएँ, उनकी आनुवांशिक और पर्यावरण की माँगों के बीच अंतःक्रिया का परिणाम होती है। अर्थात् किसी प्रजाति के पूर्ववर्ती प्रारूपों में पर्यावरण की परिवर्तित होती हुई अनुकूलन की आवश्यकताओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप जैविकीय परिवर्तन तथा विकास होता रहता है।

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प्रश्न 22.
आधुनिक मानव के किन तीन महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों के कारण वे अपने पूर्वजों से अलग प्रतीत होते हैं?
उत्तर:

  1. बड़ा और विकसित मस्तिष्क
  2. दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलने की क्षमता तथा
  3. काम करने योग्य विपरीत अँगूठे के साथ मुक्त हाथ

प्रश्न 23.
हमारे व्यवहार का महत्त्वपूर्ण निर्धारक किसे माना जा सकता है?
उत्तर:
हमारी जैविकीय संरचना, जो हमें हमारे पूर्वजों से एक विकसित शरीर और मस्तिष्क के रूप में प्राप्त हुई है, हमारे व्यवहार का निर्धारक बनकर हमारी सहायता करती है। हम अनुभव एवं ज्ञान के आधार पर पर्यावरण से समझौता करते हुए जीवन की विकास पथ अग्रसरित करते है।

प्रश्न 24.
तंत्रिका कोशिकाएँ क्या हैं?
उत्तर:
तंत्रिका कोशिका हमारे तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाई है। ये उद्दीपकों को विद्युतीय आवेग में बदलती है तथा प्राप्त सूचना को विद्युत रासायनिक संकेतों में बदलकर अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य करती है।

प्रश्न 25.
मानव तंत्रिका तंत्र में कितनी कोशिकाएँ हैं?
उत्तर:
मानव तंत्रिका तंत्र में आकार, संरचना एवं कार्य करने की प्रवृत्ति और क्षमता की दृष्टि से भिन्न मानी जानेवाली लगभग बारह अरब तंत्रिका कोशिकाएँ हैं।

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प्रश्न 26.
वे तीन मूलभूत घटक क्या हैं जो तंत्रिका कोशिकाओं में भिन्नता पाई जाने पर भी समान रूप से पाए जाते हैं?
उत्तर:
सभी तंत्रिका कोशिकाओं में समान रूप से पाए जाने वाली तीन घटक हैं –

  1. काय (soma)
  2. पार्श्व तंतु (dendrites) तथा
  3. असतंतु (axon) ये कार्य की दृष्टि से अलग-अलग महत्त्व रखते हैं।

प्रश्न 27.
तंत्रिका आवेग क्या है?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र में प्रवाहित होने वाली सूचनाओं के परिवर्तित रूप को तंत्रिका आवेग कहते हैं जो उद्दीपक ऊर्जा के सशक्त होने पर ही उत्पन्न होती है। इसकी शक्ति तंत्रिका तंतु के साथ-साथ स्थिर रहती है।

प्रश्न 28.
सम्पूर्ण या बिल्कुल नहीं का नियम (All or non law) क्या है?
उत्तर:
जब कोई स्नायु-प्रवाह चलता है अर्थात एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन में जाता है तो अपनी पूरी शक्ति के साथ जाता है, अन्यथा रुक जाता है। इसे ही सम्पूर्ण या बिल्कुल नहीं का नियम कहते हैं।

प्रश्न 29.
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक किसमें होती है?
उत्तर:
नयूरॉन का वह हिस्सा जो तांत्रिक आवेग को दूसरे न्यूरॉन में छोड़ता है, उसे एक्सॉन कहा जाता है।

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प्रश्न 30.
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक किसमें होती है?
उत्तर:
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक मस्तिष्क में होती है।

प्रश्न 31.
संस्कृति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संस्कृति उन प्रतीकात्मक एवं सीखे हुए पक्षों को बिंबित करती है जिसमें भाषा, प्रथा, परम्पराओं आदि का समावेश किया जाता है।

प्रश्न 32.
संस्कृति की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
संस्कृति की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है – एक समाज विशेष के सदस्यों के सम्पूर्ण व्यवहार प्रतिमानों और समग्र जीवन विधि को ही संस्कृति कहा जाता है जो सामाजिक विरासत के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है।

प्रश्न 33.
भौतिक संस्कृति क्या है?
उत्तर:
भौतिक संस्कृति का संबंध उन बुनियादी दशाओं से है जिसमें भौतिक वस्तुएँ होती. हैं, जिन्हें समाज के सदस्यों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है तथा जिन्हें देखा जा सकता है।

प्रश्न 34.
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम क्या हैं?
उत्तर:
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम में नियम, अपेक्षाएँ और मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।

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प्रश्न 35.
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम क्या हैं?
उत्तर:
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम का अभिप्राय मिथकों, अंधविश्वासों, वैज्ञानिक तथ्यकलाओं एवं धर्म से जुड़े हुए विचार हैं।

प्रश्न 36.
समाजीकरण का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक नवजात शिशु जो जन्म के समय न सामाजिक होता है और न असामाजिक, किसी विशिष्ट समाज का क्रियाशील सदस्य बन जाता है जो जन्म के बाद प्रारंभ होता है।

प्रश्न 37.
संस्कृति और मानवीय व्यवहार का क्या संबंध है?
उत्तर:
संस्कृति मनुष्य को विरासत में प्राप्त होती है इसलिये जिस संस्कृति में मनुष्य जीवन-यापन करता है उसी के अनुसार उसका सम्पूर्ण सामाजिक व्यवहार भी हो जाता है। इस पर मनोवैज्ञानिक व्यवहार का प्रभाव अवश्य पड़ता है।

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प्रश्न 38.
संस्कृतिकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संस्कृतिकरण सामाजिक परिवर्तन का एक स्वाभाविक आयाम है। अपनी संस्कृति के सभ्य लोगों के अनुरूप अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन लाने और उनकी संस्कृति के मानदण्डों के अनुरूप व्यवहार करने को संस्कृतिकरण कहा जाता है।

प्रश्न 39.
आधुनिकीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आधुनिकीकरण मानवीय सामाजिक व्यवहार की एक ऐसी क्रिया है जिसमें मनुष्य आधुनिक विचारों और तकनीक के आधार पर सामाजिक व्यवहार करता है। मनुष्य आधुनिक विचारों से प्रभावित हो जाता है।

प्रश्न 40.
मस्तिष्क को कितने मुख्य भागों में बांटा गया है?
उत्तर:
मस्तिष्क को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है-पश्च मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क तथा अग्र मस्तिष्क।

प्रश्न 41.
पश्च मस्तिष्क में मस्तिष्क के कौन-कौन से भाग आते हैं?
उत्तर:
पश्च मस्तिष्क के अन्तर्गत मेडुला, सेतु एवं लघु मस्तिष्क आते हैं।

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प्रश्न 42.
मस्तिष्क का सबसे निचला हिस्सा कौन होता है?
उत्तर:
मस्तिष्क का सबसे नीचे तथा पीछे सुषुम्ना शीर्ष (Medulla) अवस्थित होते हैं !

प्रश्न 43.
लघु मस्तिष्क का क्या कार्य है?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क का सबसे प्रमुख कार्य शारीरिक संतुलन को बनाए रखना होता है।

प्रश्न 44.
लघु मस्तिष्क कितने खण्डों में बँटा होता है तथा इसे मिलाने का कार्य कौन करता है?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क दो खण्डों में विभाजित रहता है जिसे मिलाने का काम सेतु करता है।

प्रश्न 45.
मध्य मस्तिष्क को कितने भागों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर:
मध्य मस्तिष्क को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। इसके ऊपरी भाग को रूफ या टेक्टम कोने हैं तथा नीचे का भाग फ्लोर कहलाता है।

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प्रश्न 46.
पश्च मस्तिष्क (Hind brain) तथा मध्य मस्तिष्क को एक साथ मिलाकर क्या कहा जाता है?
उत्तर:
पश्च मस्तिष्क और मध्य मस्तिष्क को एक साथ मिलाकर मस्तिष्क स्तम्भ कहा जाता है।

प्रश्न 47.
किसके द्वारा लघु मस्तिष्क (Cerebelum) तथा प्रमस्तिष्क (Cerebrum) आपस में मिलते हैं?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क तथा प्रमस्तिष्क हाइपोथैलेमस द्वारा आपस में मिलते हैं।

प्रश्न 48.
प्रमस्तिष्क (Cerebrum) में कितने गोलार्द्ध (Hemisphere) होते हैं?
उत्तर:
प्रमस्तिष्क में दो गोलार्द्ध होते हैं।

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प्रश्न 49.
संधि-स्थल (Synapse) क्या है?
उत्तर:
जहाँ दो या दो से अधिक तंत्रिकाएं आपस में मिलती हैं उस स्थान को संधि-स्थल कहते हैं।

प्रश्न 50.
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई किसे कहा जाता है?
उत्तर:
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई को न्यूरॉन कहा जाता है।

प्रश्न 51.
मनुष्य में तंत्रिका आवेग की गति सामान्य रूप से कितनी होती है?
उत्तर:
मनुष्य में तंत्रिका आवेग की गति सामान्य रूप से 100 मीटर प्रति सेकेण्ड होती है।

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प्रश्न 52.
थैलेमस का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
थैलेमस का मुख्य कार्य शरीर के विभिन्न भागों से आए हुए स्नायु-प्रवाहों को मस्तिष्क में निश्चित स्थान पर भेजना है। इसका संबंध संवेगों से भी होता है।

प्रश्न 53.
न्यूरॉन में शाखिकाएं (Dendrites) कहाँ होती हैं?
उत्तर:
शाखिकाएँ कोश शरीर के चारों तरफ शाखा की तरह फैल जाती हैं। इसका आकार बहुत छोटा होता है तथा इसकी भी कई उप-शाखाएँ होती हैं।

प्रश्न 54.
ऐक्सॉन (Axon) क्या है?
उत्तर:
यह न्यूरॉन का एक पतला लम्ब भाग है। इसका एक छोर कोश शरीर से जुड़ा होता है तथा दूसरे छोर पर अनेक छोटे-छोटे तंतु होते हैं जिसे एण्डल ब्रम कहते हैं।

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प्रश्न 55.
समाजीकरण की प्रक्रिया जन्मजात होती है या अर्जित?
उत्तर:
समाजीकरण की प्रक्रिया अर्जित होती है, क्योंकि मनुष्य समाज में होनेवाले परिवर्तन के अनुसार अपने-आपको समायोजित करने का प्रयत्न करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रत्येक की स्थिति बतावें –
(क) साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ
(ख) पार्श्व तंतु
(ग) अवटु ग्रंथि
(घ) मेडुला
उत्तर:
(क) साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ:
मेरुरज्जु के मध्य में उपस्थित तितली के आकार के धूसर रंग के द्रव्य के ढेर में साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं।

(ख) पावं तंतु:
मानव तंत्रिका तंत्र के तीन मूलभूत घटकों में से एक पार्श्व तंतु का नाम लिया जाता है। तंत्रिका कोशिका का अधिकांश कोशिका द्रव्य काय (soma) कोशिका में होती है। पार्श्व तन्तु (Dendrites) शाखाओं की तरह की विशिष्ट संरचना के साथ काय कोशिका से निकलते हैं। पाव तंतु में विशिष्ट ग्राहक होते हैं जो किसी विद्युत-रासायनिक या जैव रासायनिक संकेत के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं।

(ग) अवटु ग्रंथि:
अवटु ग्रन्थि गले में स्थित होती है। यह भाइरॉक्सिन नामक अंतःस्राव उत्पन्न करती है जो शरीर में चपापचय की दर को प्रभावित करता है।

(घ) मेडुला आबलांगाटा:
पश्च मस्तिष्क का एक प्रमुख हिस्सा बनकर मेडुला आबलांगाटा मूलभूत जीवन सहायक गतिविधियों को नियमित करने में सहायक होते हैं। मेडुला मस्तिष्क का सबसे निचला हिस्सा है। इसे मस्तिष्क का जीवनधार केन्द्र माना जाता है।

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प्रश्न 2.
आनुवंशिकता के प्रति जीवन एवं गुणसूत्र के व्यवहार का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
एक बच्चा अपने जन्म के समय.अपने माता-पिता से प्राप्त जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक होता है। उसे माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार में जीन के रूप में मिलता है। यह उत्तराधिकार व्यक्ति के विकास को जैविक नक्शा और समय सारणी प्रदान करता है। आनुवंशिकी की रूप में बच्चा को कुछ शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ उपलब्ध हो जाती हैं। निषेचित युग्मनज के गुणसूत्र प्रत्येक कोशिका के केन्द्र में होता है। गुणसूत्र को शरीर का आनुवंशिक तत्व माना जाता है। गुणसूत्र की संरचना धागे जैसी होती है। युग्मक-कोशिकाओं। में 23 गुणसूत्र पाए जाते हैं।

जीन अथवा DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। गुणसूत्र के एक विशेष जोड़े के प्रत्येक गुणसूत्र पर एक जीन स्थित होता है। लिंग गुणसूत्रों का जोड़ा आनेवाले बच्चे का लिंग निर्धारण करता है। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवांशिक निर्देश जीन के रूप में होते हैं। कुछ विशिष्ट जीन नियंत्रक जैसा कार्य करता है। जीनोटाइप और फीनोटाइप के माध्यम से वह कायिक संरचना तथा व्यवहार की कुशलता का निर्धारण करता है। उत्परिवर्तन कहलाने वाली क्रिया के माध्यम से जीन में रूपान्तरण संभव होता है। फलतः नयी जातियों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार आनुवंशिक नामक प्रवृत्ति के विकास में जीन और गुणसूत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। किसी व्यक्ति का कद, स्मृति, चेहरा, क्रोध जैसे गुण जीन अथवा गुणसूत्रों की देन होती है।

प्रश्न 3.
समाज जीव विज्ञान का क्षेत्र बतलावें।
उत्तर:
जीव विज्ञान और समाज की अन्योन्य क्रिया से संबंधित आधुनिक विद्याशाखा को समाज मनोविज्ञान कहकर संबोधित करते हैं। समावेशी उपयुक्तता के आधार पर यह विद्याशाखा मनुष्य के सामाजिक व्यवहार की व्याख्या करता हैं। समाज के प्रति सर्वप्रिय व्यवहार की कला को प्रभावित करने वाले जैविक कारकों का समुचित अध्ययन करके ही संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। इसी कारण हम संस्कृति के संदर्भ में उपलब्ध कुछ विचारों तथा मूल्यों को सामाजिक परिवेश में सीखना-समझना चाहते हैं।

माता-पिता, विद्यालय, समसमूह, जनसंचार के अतिरिक्त पर्यावरण की विविधता हमें समाज जीवन विज्ञान के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है। सफल जीवन के लिए हमें संस्कृतिकरण और समाजीकरण की विधियों, नियमों, मूल्यों की दृष्टि से स्पष्टतः समझना होगा। अध्ययन की प्रगाढ़ता के क्रम में हमें पता लगेगा कि प्रत्येक जीवन से अच्छे व्यवहार की प्रत्याशा की जाती है जिससे प्रजनन और पालन-पोषण से सम्बन्धित सभी प्रकार की जानकारियाँ मिल सकें।

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प्रश्न 4.
“हमारे व्यवहार दूसरी प्रजातियों की तुलना में बहुत जटिल और विकसित हैं।” कैसे?
उत्तर:
हमारे पास बड़ा और अधिक विकसित मस्तिष्क है। हमारे मस्तिष्क का वर्जन हमारे शरीर के कुल भार का 2.35 प्रतिशत है जो अन्य प्रजातियों की तुलना में सर्वाधिक है। मनुष्य के प्रमस्तिष्क को अन्य भागों की तुलना में अधिक विकसित और उपयोगी माना जाता है। मानव अपने व्यवहार से पर्यावरण के साथ संतुलन बनाते हुए जीवन-क्रिया को आगे बढ़ा लेता है।

हम अपने सार्थक एवं विकसित व्यवहार के कारण आहार की व्यवस्था करने में, परभक्षी से स्वयं को सुरक्षित रखने में, बच्चों को शिक्षा एवं सुरक्षा प्रदान करने में अन्य प्रजातियों की तुलना में स्थिति के अनुसार विधियों एवं साधनों को बदल लेने की क्षमता अधिक विकसित रूप में रखते हैं।

आनुवांशिकता, जीन, गुणसूत्र आदि के महत्व को समझाते हुए सांस्कृतिक दशा के अनुकूल बनाने में हम सक्षम हैं। अनुभव प्राप्त करने अथवा कुछ सीखने-समझने की प्रवृत्ति हममें अपेक्षाकृत अधिक होती है। हमारे पास न केवल समान जैविकीय तंत्र, बल्कि निश्चित सांस्कृतिक तंत्र भी होते हैं। उत्तरजीविता से सम्बन्धित उद्देश्यों को पूरा करने में हमारी सतर्कता एकाधिकार रखती है।

प्रश्न 5.
अंतस्थ बटन (Terminal buttons) किसे कहते हैं? कार्य के आधार पर परिचय दें।
उत्तर:
मेरुरज्जु के अंतिम सिरे पर अक्ष तंतु छोटी-छोटी कई शाखाओं में बँट जाती है जिन्हें अंतस्थ बटन कहा जाता है। अंतस्थ बटन में अन्य तंत्रिका कोशिकाओं, ग्रन्थियों और मांसपेशियों में सूचना भेजने की क्षमता होती है। अक्षतन्तु अपनी लम्बाई के साथ-साथ सूचना का संवहन करता है जो मेरुरज्जु में कई फीट तक और मस्तिष्क में एक मिली मीटर से कम हो सकते हैं। इस असमर्थता की स्थिति में अंतस्थ बटन सूचना संवहन में निर्णायक कार्य करता है।

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प्रश्न 6.
तंत्रिका तंत्र का कौन-सा भाग ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध होता है?
उत्तर:
सभी प्राणियों में मानव तंत्रिका तंत्र सर्वाधिक जटिल एवं विकसित तंत्र होता है। यद्यपि तंत्रिका तंत्र समग्र रूप से कार्य करता है फिर भी इसके अलग-अलग विभागों में अलग-अलग तरह के कार्य करने की प्रवृत्ति होती है। केन्द्रीय तंत्रिका के साथ परिधीय तंत्रिका तंत्र के अस्तित्व को पहचानने के बाद कायिक तंत्रिका तंत्र तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध होता है।

कायिक तंत्रिका तंत्र में कपालीय तथा मेरु तंत्रिका संलग्न होते हैं। संवेदी, पेशीय और मिश्रित तंत्रिकाओं के द्वारा देखने, सुनने के क्रम में नियंत्रण की आवश्यकता पूरी की जाती है। कपालीय तंत्रिकाओं के 12 समुच्चय होते हैं जबकि मेरु तंत्रिकाओं के 31 समुच्चय मिलते हैं। ये दोनों मिलकर संवाद का संवहन तथा संचरण करते हैं। अर्थात् कायिक तंत्रिका तंत्र संवेदी और पेशीय होने के साथ-साथ ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध माने जाते हैं।

प्रश्न 7.
मस्तिष्क की प्राचीनतम तथा नवीनतम संरचनाओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
मस्तिष्क की प्राचीनतम संरचनाएँ उपवल्कुटीय यंत्र, मस्तिष्क स्तम्भ तथा अनुमस्तिष्क को प्राचीनतम संरचनाएँ मानी जाती हैं। लगातार चलनेवाली विकासात्मक प्रक्रियाओं के कारण प्रमस्तिष्कीय वल्कुट नामक परिवर्धन का पता चला है जो मस्तिष्क की नवीनतम परिवर्धन माना जाता है। विकास क्रम में यह भी पता चला है कि एक वयस्क मस्तिष्क का भार लगभग 1.36 किग्रा. है जिसमें 100 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ सक्रिय रहती हैं। मस्तिष्कीय क्रम वीक्षण से पता चलता है कि कुछ मानसिक प्रकार्य मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में वितरित हैं। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट को चार पालियों में विभक्त किया गया है –

  1. ललाट पालि
  2. पार्विक पालि
  3. शंख पालि और
  4. पश्च कपाल पालि

अवधान, चिंतन, स्मृति, तर्कना, देखना, सुनना, सूचनाओं का संवहन, चाक्षुष आवेगों की व्याख्या करना प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की विभिन्न पालियों के माध्यम से सरलता से पूरी की जा सकती है।

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प्रश्न 8.
संधिस्थल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक न्यूरोन के एक्सॉन तथा दूसरे न्यूरोन की शाखिकाओं के मिलन-स्थल को संधिस्थल कहा जाता है। संधिस्थल की विशेषता यह होती है कि एक्सॉन तथा शाखिकाएँ एक-दूसरे से सटी हुई नहीं होती फिर भी तंत्रिका आवेग का संचरण एक्सॉन से शाखिकाओं में हो जाता है। ऐसा संभव इसलिए हो पाता है, क्योंकि एक्सॉन की छोटी-छोटी पुस्तिकाओं से एक विशेष रासायनिक तरल पदार्थ जिसे न्यूरोट्रांसमीटर (neurotransmitter) कहा जाता है, निकलता है जिसके कारण यह स्थान गीला हो जाता है तथा दोनों में संबंध स्थापित हो जाता है। फलस्वरूप, आसानी से तंत्रिका आवेग आगे बढ़ जाता है। इस तरह, संधिस्थल तंत्रिका आवेग को पहले रोकता है तथा फिर उसका मार्ग प्रशस्त कर आगे बढ़ने देता है।

प्रश्न 9.
पूर्ण या शून्य नियम क्या है?
उत्तर:
पूर्ण या शून्य नियम तंत्रिका आवेग (nerve impulse) के संचरण (conduction) का एक नियम है जो यह बताता है कि जब कोई न्यूरोन किसी उपयुक्त उद्दीपन से उत्तेजित होता है तब वह या तो अपनी पूरी शक्ति के साथ उत्तेजित होता है या फिर बिल्कुल ही उत्तजित नहीं होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि उद्दीपन की शक्ति काफी कमजोर होती है जो न्यूरोन में तंत्रिका आवेग उत्पन्न ही नहीं कर पाती है। परंतु, यदि उससे नयूरोन में तंत्रिका आवेग उत्पन्न हो गया तो वह अपनी पूर्ण शक्ति के साथ उत्पन्न होगा न कि उद्दीपन की शक्ति के समान क्षीण मात्रा में।

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प्रश्न 10.
प्रतिवर्त क्रिया किसे कहा जाता है?
उत्तर:
प्रतिवर्त क्रिया या सहज क्रिया वह स्वचालित (automatic) या अनैच्छिक (invol untary) अनुक्रिया है जो किसी उद्दीपन (stimulus) द्वारा उत्पन्न होती है। जैसे, आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने पर पलक का अपने-आप बंद हो जाना, गर्म वायु से अंगुली का स्पर्श होने पर हाथ को झट पीछे खींच लेना आदि प्रतिवर्त क्रिया के उदाहरण हैं। प्रतिवर्त क्रिया की मुख्य विशेषताएँ निम्नांकित हैं –

  1. प्रतिवर्त क्रिया अर्जित (acquired) न होकर जन्मजात होती है।
  2. यह स्वचालित या अनैच्छिक होती है।
  3. इस क्रिया की उत्पत्ति के लिए उद्दीपन (stimulus) का होना अनिवार्य है।
  4. प्रतिवर्त क्रियाओं का संचालन मस्तिष्क से न होकर सुषुम्ना से ही होता है।

प्रश्न 11.
प्रतिवर्त अनुक्रिया तथा प्रतिवर्त धनु में अंतर बताएँ।
उत्तर:
प्रतिवर्त अनुक्रिया या सहज अनुक्रिया (reflex action) किसी उद्दीपन के प्रति किया गया एक स्वचालित (automatic) जन्मजात अनुक्रिया है। जैसे आँख पर तीव्र रोशनी पड़ते ही आँख के पटल का अपने आप बंद हो जाना, हाथ में पिन चुभने या किसी के द्वारा चुभाये जाने पर हाथ का झट से पीछे खींच लेना एक प्रतिवर्त अनुक्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रिया के संचालन में तंत्रिका आवेग (nerve impulse) जिन प्रक्रियाओं एवं अंगों से होकर गुजरता है उसे ही प्रतिवर्ष धनु (reflex arc) कहा जाता है। इसमें ज्ञानेन्द्रिय, संवेदी न्यूरॉन, सुषुम्ना तथा विशेष भाग, साहचर्य न्यूरॉन, कर्मेन्द्रिय आदि अंग सम्मिलित रहते हैं।

प्रश्न 12.
अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों से आप क्या समझते हैं? मानव शरीर की विभिन्न अंतःस्त्रावी ग्रन्थियों का नाम बतायें।
उत्तर:
शरीर के विभिन्न भागों में उपस्थित नलिकाविहीन ग्रन्थिं जो हार्मोन को अन्तःस्रावित करता है, अन्तःस्रावी ग्रन्थि कहलाता है। शरीर में निम्नलिखित अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ हैं –

  1. पीयूष ग्रन्थि
  2. थायराइड ग्रंथि
  3. पाराथायरायड ग्रन्थि
  4. अधिवृक्क ग्रन्थि

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प्रश्न 13.
बहिःस्त्रावी ग्रंथि तथा अंतःस्रावी ग्रंथि में अंतर करें।
उत्तर:
बहिःस्रावी ग्रंथि वैसी ग्रंथि को कहा जाता है जिसके स्राव को निकलने के लिए विशेष मार्ग या नली बनी होती है। यही कारण है कि इसे नलिका विहीन ग्रंथि भी कहा जाता है। अंतःस्रावी ग्रंथि से तात्पर्य वैसी ग्रंथि से होता है जिसका स्त्राव निकलने के लिए किसी तरह की नली या मार्ग नहीं होता है। फलस्वरूप इसका स्राव सीधे खून में मिल जाता है तथा महत्त्वपूर्ण शारीरिक एवं मानसिक प्रभाव उत्पन्न करता है। शारीरिक एवं मानसिक विकास के दृष्टिकोण से अंतःस्रावी ग्रंथियाँ बहिःस्रावी ग्रंथियों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं।

प्रश्न 14.
तंत्रिका तंत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राणी जब कोई अनुक्रिया करता है तब इसमें तीन तरह के अंगों का समन्वय होता है-ग्राहक (receptor) या ज्ञानेन्द्रिय, प्रभावक (effectors) अर्थात् मांसपेशियाँ एवं ग्रंथि तथा समायोजक (adjustor)। समायोजक का काम ज्ञानेन्द्रियों तथा प्रभावक के बीच संबंध स्थापित करना होता है। समायोजक का दूसरा नाम तंत्रिका (nerve) है। अनेक तंत्रिकाएँ आपस में मिलकर ग्राहक तथा प्रभावक में विशेष संबंध स्थापित करती हैं और व्यक्ति सही-सही अनुक्रिया कर पाता है। इन तंत्रिकाओं के समूह या गुच्छा को तंत्रिका तंत्र या स्नायुमंडल (nervous system) कहा जाता है।

प्रश्न 15.
तंत्रिका आवेग क्या है?
उत्तर:
प्रत्येक न्यूरोन एक छोटी पतली आवरण से ढंका होता है। जब कोई उपयुक्त उद्दीपन उस आवरण को उत्तेजित करता है तब उससे न्यूरोन भी उत्तेजित हो जाता है। इससे एक तरह का वैद्यत रासायनिक आवेग (electro chemical impulse) पैदा होता है जिसे तंत्रिका आवेग (nerve impulse) कहा जाता है। तंत्रिका आवेग की गति सामान्यतः 100 मीटर प्रति सेकंड होती है।

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प्रश्न 16.
सुषुम्ना की संरचना का वर्णन करें।
उत्तर:
सुषुम्ना (spinal cord) केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) का एक प्रमुख भाग है। रीढ़ की हड्डी जो गर्दन से कमर तक फैली हुई है, में एक विशेष तरल पदार्थ भरा हुआ होता है और उसमें एक मोटा तंतु (Fibres) होता है। इसे सुषुम्ना कहा जाता है। रीढ़ की हड्डी में 31 जोड़ (Joints) होते हैं और प्रत्येक जोड़ के बाएँ तथा दाएँ भाग से एक-एक तंतु सुषुम्ना तंत्रिका के भी 31 जोड़ होते हैं। प्रत्येक जोड़ा में एक संवेदी तंत्रिका (sensory nerve) तथा दूसरा गतिवाही तंत्रिका (motor nerve) होती है।

संवेदी तंत्रिका का संबंध ज्ञानेन्द्रियों से तथा गतिवाही तंत्रिका का संबंध कर्मेन्द्रिय (motor organs) से होता है। सुषुम्ना को कहीं से भी काटकर देखा जाए तो इसकी भीतरी संरचना (internal structure) एक ही समान दीख पड़ती है।सुषुम्ना के इस कटे हुए बीच के भाग का आकार तितली (butter fly) के समान होता है और इस भाग का रंग भूसर (gray) होता है। इसके बीच के भाग के चारों तरफ तरल पदार्थ होते हैं जिसे अनेक तंत्रिका तंत्र ऊपर से नीचे तथा नीचे से ऊपर की ओर आते-जाते दिखलाई पड़ते हैं। ऊपर से नीचे आनेवाले तंत्रिका तंतु द्वारा मस्तिष्क से सुषुम्ना को तथा नीचे से ऊपर जाने वाले तंत्रिका तंतु द्वारा सुषुम्ना से मस्तिष्क को सूचनाएँ मिलती हैं।

प्रश्न 17.
शाखिका तथा एक्सॉन में अंतर बतलाएँ।
उत्तर:
न्यूरॉन के दो महत्त्वपूर्ण भाग (dendrite) तथा एक्सॉन (axon) हैं। शाखिका के आकार पेड़ की टहनियों तथा शाखाओं के समान होते हैं जिसमें कई छोटी-छोटी उपशाखाएँ होती हैं। इसके द्वारा न्यूरॉन दूसरे न्यूरॉन से आनेवाले तंत्रिका आवेग को ग्रहण करता है। न्यूरॉन के उस भाग को एक्सॉन कहा जाता है जो कोश शरीर (cell body) से निकलकर आगे की ओर लम्बत: बढ़ा हुआ होता है। यह एक ऐसे परत या आवरण से ढंका होता है जो प्रत्येक दो मिलीमीटर पर कुछ दबा हुआ-सा होता है। एक्सॉन द्वारा तंत्रिका आवेग न्यूरॉन से निकलकर दूसरे न्यूरॉन की शाखिका में जाते हैं। अत: एक्सॉन न्यूरॉन का एक सुपुर्दगी केन्द्र (delivery centre) होता है।

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प्रश्न 18.
तंत्रिका कोशिका क्या कार्य करती है?
उत्तर:
तंत्रिका कोशिका हमारे तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाई मानी जाती है। तंत्रिका कोशिकाएँ विशिष्ट कोशिकाओं के रूप में विभिन्न प्रकार के उद्दीपकों को विद्युतीय आवेग में बदलती है। ये सूचना को विद्युत-रासायनिक संकेतों के रूप में ग्रहण करने, संवहन करने तथा अन्य कोशिकाओं तक भेजने में भी निपुण होते हैं। ये ज्ञानेन्द्रियों से सूचना प्राप्त करती है तथा उसे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक ले जाती है।

प्रश्न 19.
मानव तंत्रिका तंत्र के कौन-कौन से तीन मूलभूत घटक पाये जाते हैं?
उत्तर:
मानव तंत्रिका में 12 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं जिनकी आकृति, आकार, रासायनिक संरचना और प्रकार्य में काफी भिन्नता होती है। इन भिन्नताओं के मिलने पर भी तीन मूलभूत घटक समान रूप से पाए जाते हैं –

(क) काय (Soma):
निकटवर्ती तंत्रिका कोशिका से आनेवाले तंत्रिका आवेग को ग्रहण करते हैं। ये पार्श्व तन्तु शाखाओं की तरह विशिष्ट संरचना वाले होते हैं।

(ख) पार्श्व तन्तु (Dendrites):
इसमें विशिष्ट ग्राहक होते हैं जो जैव रासायनिक संकेत (विद्युत रासायनिक) के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं।

(ग) अक्ष तन्तु (Axon):
अक्ष तंतु अपनी लम्बाई के साथ-साथ सूचना का संवहन करता है। इसके अंतिम सिरे पर अंतस्थ बटन के रूप में छोटी-छोटी शाखाओं के पुंज होते हैं।

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प्रश्न 20.
तंत्रिका कोष सन्धि का निर्माण किस प्रकार से होता है?
उत्तर:
पूर्ववर्ती तंत्रिका कोशिका के अग्र तंतु के संकेत दूसरी तंत्रिका के पार्श्व तंतु से प्रकार्यात्मक संबंध बनाते हैं जिसे तंत्रिका कोष सन्धि भी कहते हैं। सन्धि स्थलीय संचरण की प्रकृति रासायनिक होती है जो रासायनिक पदार्थ तंत्रिका-संचारक कहलाते हैं। तंत्रिका कोष सन्धि के मध्य भाग में पाये जाने वाले खाली स्थान को सन्धि स्थलीय खण्ड कहा जाता है।

प्रश्न 21.
परिधीय तंत्रिका तंत्र का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका को पूरे शरीर से जोड़ने वाले समस्त तंत्रिका कोशिकाओं तथा तंत्रिका तन्तु को परिधीय तंत्रिका तंत्र कहते हैं।

प्रश्न 22.
मस्तिष्क की संरचना उसके तीन प्रमुख हिस्सों में स्थित भिन्न-भिन्न उपभागों के नाम के साथ लिखें।
उत्तर:
मस्तिष्क के तीन प्रमुख हिस्से होते हैं –

  1. पश्च मस्तिष्क-इसके उपभाग मेडुला ऑबलांगाटा सेतु तथा अनुमस्तिष्क होते हैं। इनके कारण श्वास प्रक्रिया, स्वमित क्रिया, श्रवण क्रिया, शारीरिक मुद्रा आदि वांछनीय विधि से उपयुक्त कार्य करते हैं।
  2. मध्य मस्तिष्क-इसमें रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम (R.A.S.) भाव प्रबंधन में सहयोग देता है। पर्यावरण से मिलने वाली सूचनाओं के चयन में भी यह सहायक होता है।
  3. अन मस्तिष्क-मस्तिष्क के इस भाग के चार उपविभाग होते हैं –

(क) अधश्चेतक-सांवेगिक तथा अभिप्रेरणात्मक व्यवहारों को नियमित रखने में मदद करता है।
(ख) चेतक-यह सूचना प्रसारण केन्द्र की तरह कार्य करता है।
(ग) उपवल्कुटीय तंत्र-यह तापमान, रक्तचाप और रक्तशर्करा के स्तर को समस्थिति में रखकर शारीरिक क्रिया को संतुलित रखता है। इसमें हिप्पोकेम्पस और गल तुडिका भी समाविष्ट हैं जो दीर्घकालिक स्मृति और संवेगात्मक व्यवहार को नियंत्रित रखता है।

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प्रश्न 23.
कारपस कैलोजम किसे कहा जाता है?
उत्तर:
प्रमस्तिष्क में दो गोलार्द्ध होते हैं:
बायाँ गोलार्द्ध (left hemisphere) तथा दायाँ गोलार्द्ध (right hemisphere)। ये दोनों गोलार्द्ध एक-दूसरे से तंत्रिका के एक विशेष गुच्छा से जुड़े होते हैं। इसी विशेष गुच्छा (bundle) का नाम कारपस कैलोजम है।

प्रश्न 24.
प्रमस्तिष्क का विभिन्न पालियों के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रमस्तिष्क के दोनो गोलार्द्ध केंद्रीय सुलकस तथा लेट्रल दरार की मदद से चार पालियों में बँटे हैं जिनके कार्यों का वर्णन निम्नांकित हैं –

  1. अग्रपालि (Frontal lobe): यह केन्द्रीय सुलकस के आगे तथा लेट्रल दरार के ऊपर का भाग होता है तथा इसके द्वारा उच्च मानसिक प्रक्रियाओं (higher mental processes) का ज्ञान होता है।
  2. मध्यपालि (Parietal lobe): यह पालि केन्द्रीय सुलकस के आगे तथा लेट्रल दरार के ऊपर होता है । इसके द्वारा मूलतः त्वक संवेदन (touch sensation) अर्थात् ठंड, गर्म, दर्द आदि का ज्ञान होता है।
  3. शंखपालि (Temporal lobe): यह पालि लेट्रल दरार के नीचे जिसे हम कन्पट्टी कहते हैं, में होती है तथा इसके द्वारा श्रवण संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

प्रश्न 25.
न्यूरॉन किसे कहते हैं?
उत्तर:
तंत्रिकातंत्र (nervous system) की सबसे छोटी इकाई को न्यूरॉन (neuron) या तंत्रिका कोश कहा जाता है। इसके द्वारा तंत्रिका आवेग प्राणी में एक जगह से दूसरे जगह संचारित होते हैं। अध्ययनों के अनुसार पूरे मानव में न्यूरॉन की संख्या 12.5 अरब (Billion) है जिसमें से करीब 10 अरब सिर्फ मस्तिष्क में ही है। शाखिका (dendrite), जीवकोश (cell body) तथा एक्सॉन (axon) न्यूरॉन के तीन प्रमुख संरचना होते हैं। शाखिका तंत्रिका आवेग को ग्रहण करता है और शरीर (cell body) के ओर भेज देता है। कोश शरीर उसे एक्सॉन (axon) की ओर भेज देता है जो तंत्रिका आवेग को बाहर निकालकर दूसरे न्यूरॉन के शाखिका को सुपुर्द कर देता है।

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प्रश्न 26.
न्यूरॉन के कितने प्रकार होते हैं? संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
(क) संवेदी न्यूरॉन (Sensory of afferent neuron):
इसे ज्ञानवाही न्यूरॉन भी कहा जाता है। संवेदी या ज्ञानवाही न्यूरॉन वैसे न्यूरॉन को कहा जाता है जो तंत्रिका आवेश (nerve impulse) को ज्ञानेंद्रीय (sense organ) से सुषुम्ना एवं मस्तिष्क तक पहुँचता है।

(ख) साहचर्य न्यूरॉन (Association neuron):
इस तरह का न्यूरॉन सुषुम्ना तथा मस्तिष्क में पाया जाता है। साहचर्य न्यूरॉन संवेदी न्यूरॉन तथा गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन (motor impulse) से साहचर्य स्थापित करता है। संवेदी न्यूरॉन से तंत्रिका आवेश को ग्रस्त करके साहचर्य न्यूरॉन उसे गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन में छोड़ता है।

(ग) गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन (Motor neuron):
गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन वैसे न्यूरॉन को कहा जाता है जो तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना या मस्तिष्क से केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई वांछित अनुक्रिया कर पाता है।

प्रश्न 27.
न्यूरॉन तथा तंत्रिका में अंतर करें।
उत्तर:
न्यूरॉन स्नायुमंडल (nervous neuron) की सबसे छोटी इकाई (smallest unit) है जिसमें शाखिका (dendrite), कोश शरीर (cell body), तथा एक्सॉन (axon) होता है। न्यूरॉन संवदी (sensory), पेशीय (motor) या साहचर्य (association) किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। तंत्रिका (nerve) की संरचना इससे भिन्न होती है। सैकड़ों या हजारों न्यूरॉन के एक्सॉन (axon) आपस में मिलकर एक गुच्छा.(bundle) तैयार करते हैं जिसे तंत्रिका (nerve) कहा जाता है। एक ही तंत्रिका में संवेदी तथा पेशीय दोनों तरह के न्यूरोन के एक्सॉन सम्मिलित हो सकते हैं।

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प्रश्न 28.
आनुवंशिकता के लिए जीन एवं गुणसूत्र की क्या भूमिका होती है?
उत्तर:
माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार के रूप में जीन के माध्यम से मिलता है। बच्चा जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक होता है। युग्मनज के मध्य भाग में केन्द्रक होता है जिसमें गुणसूत्र होते हैं। गुणसूत्र शरीर के आनुवंशिक तत्व माने जाते हैं जो मुख्यत: DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों जीन होते हैं।

एक शुक्राणु कोशिका और एक अंडाणु कोशिका के मिलने से एक नयी पीढ़ी का जन्म होता है। गर्भ धारण के समय जीवन 3 गुणसूत्र माता से और 23 गुणसूत्र पिता से प्राप्त करता है। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवंशिक निर्देश जीन के रूप में होते हैं। जीव के विकास में जीन से संयुक्त प्रोटीन महत्त्वपूर्ण काम करते हैं। जीन कई भिन्न रूपों में जीवित रह सकते हैं। जीन के रूपान्तरण को उत्परिवर्तन कहा जाता है। उत्परिवर्तन जीन में पुनः संयोजन के अवसर जुटाती है।

प्रश्न 29.
व्यवहार का जैवकीय आधार तथा सांस्कृतिक आधार को स्पष्ट करें।
उत्तर:
मनुष्य को जीवन-रक्षा एवं समान रक्षा के लिए कई प्रकार के व्यवहार का कर्त्ता बनना होता है। आहार ढूँढने की योग्यता, परभक्षी से दूर रहने की प्रवृत्ति, छोटे बच्चों का संरक्षण एवं पालन-पोषण पर आधारित जैवकीय व्यवहार में अपनी रुचि एवं क्रियाशीलता का प्रदर्शन करना होता है। अतिथियों को पसन्द का भोजन ऐच्छिक परिवेश में कराना हमारे लिए सांस्कृतिक व्यवहार माना जाता है। निर्धारित साधन के अभाव में उचित विकास को खोजकर प्रबंधक की मदद करना हमारा नैतिक व्यवहार है। वर्ग में बैठने की कला, प्रश्न पूछने का तरीका, खेल को खेल की भावना से खेलना, दुखी व्यक्ति को सांत्वना दे देना आदि सांस्कृतिक व्यवहार के अन्तर्गत माने जा सकते हैं।

प्रश्न 30.
संस्कृतिकरण या परसंस्कृतिकरण में क्या अंतर है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
संस्कृतिकरण-उन सभी प्रकार के अधिगम को कहते हैं जो बिना किसी प्रत्यक्ष और सुविचारित शिक्षण के होता है। परसंस्कृतिकरण-परसंस्कृतिकरण का अर्थ है किसी अन्य संस्कृति की धारणा, विचार तथा व्यवहार को स्वीकारना तथा उसे अपनाना। जब व्यक्ति दूसरी संस्कृति की भाषा, विश्वास को अपनाता है तो इसे परसंस्कृतिग्रहण कहते है।

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प्रश्न 31.
संस्कृतिकरण का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
संस्कृतिकरण उन सभी प्रकार के अधिगमों को कहते हैं जो व्यक्ति के जीवन में बिना किसी प्रत्यक्ष और सुविचारित शिक्षण के इसलिए घटित होता है कि वे हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भो में हमें प्राप्त होते हैं। संस्कृतिकरण के दो मुख्य आधार हैं –

  1. प्रेक्षण और
  2. सीखना परिवारों, पूर्वजों अथवा पड़ोसियों के उत्तम व्यवहारों को पता लगाकर उसे ग्रहण करना संस्कृतिकरण माना जाता है। हम कुछ विचार, संप्रत्यय और मूल्यों को सीखते हैं।

प्रश्न 32.
प्रमस्तिष्क पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
प्रमस्तिष्क को प्रमस्तकीय वल्कुट भी कहा जाता है। यह अवधान, अधिगम, स्मृति एवं भाषा व्यवहार जैसे उच्चस्तरीय संज्ञानात्मक प्रकार्यों को नियमित करता है। इसमें तंत्रिका कोशिकाएँ, अक्ष तंतुओं के समूह और तंत्रिका जाल होते हैं। प्रमस्तिष्क दो अर्ध भागों में विभक्त है। बायाँ गोलार्ध भाषा संबंधी व्यवहारों को तथा दायाँ गोलार्द्ध प्रारूप प्रत्यभिज्ञान को संभालते हैं।

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट चार पालियों में बँटा रहता है –

  1. ललाट पालि
  2. पाश्विक पालि
  3. शंख पालि तथा
  4. पश्च कपाल पालि जो चिंतन, स्मृति, दृष्टि, श्रवण, सूचनाओं के प्रक्रमण, उद्दीपकों का नियंत्रण जैसे कार्यों में संलग्न रहते हैं।

मस्तिष्क की कोई भी गतिविधि वल्कुट के केवल एक हिस्से के द्वारा ही संपादित नहीं होती। किन्तु एक विशेष कार्य के लिए वल्कुट का कोई एक विशेष भाग, दूसरे भागों की अपेक्षा अधिक निपुणता से कार्य पूरा कर लेता है।

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प्रश्न 33.
मेरुरज्जु की संरचना और कार्य बतावें।
उत्तर:
मेरुरज्जु की संरचना एक लम्बी रस्सी की तरह का होती है जो मेरुदंड के अन्दर पूरी लम्बाई में फैला रहता है। मेरुरज्जु का एक सिरा मेडुला से जुड़ा होता है जबकि दूसरा सिरा मुक्त रहता है। मेरुरज्जु के मध्य में उपस्थित तितली के आकार के धूसर रंग के प्रत्येक ढेर में साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं। मेरुरज्जु के दो प्रमुख को हैं –

  1. शरीर के निचले भागों से आनेवाले संवेदी आवेगों को मस्तिष्क तक पहुँचाना और
  2. मस्तिष्क में उत्पन्न होनेवाले पेशीय आवेगों को सारे शरीर तक पहुँचाना।

प्रश्न 34.
परिवर्ती क्रिया को समझने के लिए एक स्पष्ट उदाहरण दें।
उत्तर:
परिवर्ती क्रिया उद्दीपन के प्रतिक्रिया स्वरूप घटित होनेवाली अनैच्छिक क्रिया है। प्रतिवर्ती क्रियाएँ हमारे तंत्रिका तंत्र में विकासवादी प्रक्रिया के माध्यम से वंशानुगत होती है।

उदाहरण:
तेज प्रकाश के आने के कारण आँखों की पलकों का झपकना अथवा बहुत गर्म या ठंढा पिण्ड पर हाथ पड़ते ही हाथ को झटके के साथ हटाना परिवर्ती क्रिया कहलाती है। इसी प्रकार सांस लेना, अंगों को फैलाना, घुटनों में झटका लगना आदि परिवर्ती क्रिया मेरुरज्जु के द्वारा सम्पादित होती है जिनमें मस्तिष्क भाग नहीं लेता है। प्रतिवर्ती क्रियाएँ जीव को किसी भी संभावित खतरे से बचाकर जीवन की रक्षा करता है।

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प्रश्न 35.
अन्तःस्रावी तंत्र में सन्निहित विभिन्न ग्रन्थियों के नाम एवं कार्य बतावें।
उत्तर:
मानव शरीर की मुख्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. पीयूष ग्रन्थि-संवृद्धि, अंत:स्राव के माध्यम से मूल और गौण लैंगिक परिवर्तन को नियंत्रित किया जाता है।
  2. अवटु ग्रन्थि-थाइरॉक्सिन नामक अन्तःस्राव उत्पन्न करके शरीर कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पन्न करता है।
  3. अधिवृक्क ग्रन्थियाँ-इसके दो प्रमुख भाग अधिवृक्क वल्कुट और अधिवृक्क मध्यांश कहे जाते हैं जो क्रमशः ACTH और कार्टिकोयड के माध्यम से तंत्रिका तंत्र में उद्दीपन उत्पन्न करता है।
  4. अग्नाशय-यह इन्सुलिन के माध्यम से यकृत में ग्लुकोज का विखंडन करता है। इसकी अनियमित आचरण के कारण मधुमेह नामक रोग से मनुष्य ग्रसित हो जाता है।
  5. जनन ग्रन्थियाँ-शुक्र ग्रन्थि और डिंब ग्रन्थि के संयोजन से प्रजनन सम्बन्धी क्रिया सम्पादित होती है। इसके लिए एस्ट्रोजन, पोजेस्ट्रान, एण्ड्रोजन और टेस्टोस्ट्रोन प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 36.
परसंस्कृतिकरण से क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी अन्य संस्कृति के संपर्क में आकर जो भी सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों के प्रभाव में पड़ते हैं उन्हें परसंस्कृतिकरण कहते हैं। परसंस्कृतिकरण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अथवा स्थायी या अस्थायी रूप में, ऐच्छिक या अनैच्छिक रूप में घटित होता रहता है। ये लाभ और हानि दोनों के कारण होते हैं। परसंस्कृतिकरण के माध्यम से नई विधियों या नये संस्कार से मुलाकात होती है। यह कभी-कभी कष्ट और कठिनाइयाँ उत्पन्न करती हैं। यदि इसे हानिकारक परिणाम वाला समझकर छोड़ने की इच्छा होती है तो कई विकल्प मिल जाते हैं।

प्रश्न 37.
परसंस्कृति ग्राही युक्तियाँ क्या-क्या हैं?
उत्तर:
निम्नलिखित चार युक्तियों के द्वारा परसंस्कृतिकरण सरलता से संभव हो जाता है –

  1. समाकलन-नई-पुरानी दोनों संस्कृति के प्रति रुचि रखना।
  2. आत्मसात्करण-अपनी संस्कृति का त्याग कर नई संस्कृति को अपनाना।
  3. पृथक्करण-दोनों संस्कृतियों को मिश्रित प्रभाव।
  4. सीमांतकरण-अनिश्चित स्थिति में।

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प्रश्न 38.
संस्कृति और समाज में क्या अंतर है?
उत्तर:
संस्कृति समाज में जीने एवं सामूहिक व्यवहार करने का ढंग है यह मानव-निर्मित होता है जिसके अंतर्गत धार्मिक विश्वास, रीति-रिवाज, रहन-सहन, मूल्य, रूढियाँ एवं परंपरा आती हैं। समाज-समाज लोगों का एक समूह है जिसकी एक विशेष सीमा होती है। वे एक सामान्य भाषा होती है जो उनके पड़ोसी लोग नहीं समझ पाते हैं एक समाज एकल राष्ट्र हो सकता है या नहीं हो सकता है।

प्रश्न 39.
समाजीकरण किसे कहते हैं? समाजीकरण के प्रमुख कारक क्या-क्या हैं?
उत्तर:
समाजीकरण-समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोग ज्ञान, कौशल और शीलगुण अर्जित करते हैं जो उन्हें समाज और समूहों के प्रभावी सदस्यों के रूप में भाग लेने के योग्य बनाते हैं। समाजीकरण नामक प्रक्रिया एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सामाजिक-सांस्कृतिक संचरण का आधार तैयार करता है। जैसे कई भाषाओं की जानकारी रखनेवाले को किसी निश्चित क्षेत्र में जाकर उसी क्षेत्र की भाषा का व्यवहार करना होता है। समाजीकरण के प्रमुख कारक-समाज के हित में किये जाने वाले कार्य-विधि को जो हमें सीखने की विधि या अवसर प्रदान करता है उन्हें समाजीकरण के कारण कहते हैं। समाजीकरण के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. माता-पिता
  2. विद्यालय
  3. समसमूह और
  4. जनसंचार का प्रभाव

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘मानव व्यवहार जानवरों के व्यवहार से अधिक जटिल होते हैं। इस कथन को सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर:
मानव व्यवहार की एक महत्त्वपूर्ण निर्धारिका हमारी जैवकीय संरचना है जो पूर्वजों से उत्तराधिकार के रूप में विकसित शरीर और मस्तिष्क के साथ मिलती है। हमारे व्यवहार दूसरी प्रजातियों की तुलना में बहुत जटिल और विकसित हैं क्योंकि हमारे पास एक बड़ा और विकसित मस्तिष्क है । हमें पर्यावरण को समझने तथा उसके प्रभाव के प्रति अनुकूलित होने की क्षमता है। एक मनुष्य होने के कारण हमारे पास न केवल जैवकीय तंत्र है बल्कि निश्चित सांस्कृतिक क्षेत्र भी होते हैं।

हम जानवरों की तुलना में अधिक सरलता से सीखे सकते हैं, अवसर को पहचान कर व्यवहार निश्चित कर सकते हैं। विविध माँगें, अनुभव और अवसर हमारे व्यवहार को अत्यन्त प्रभावित करते हैं। मानवीय व्यवहार के लिए जैविकीय आधार के अलावा सांस्कृतिक आधार भी होते हैं। अर्थात् मानव के व्यवहार की जटिलता का एक प्रमुख कारण यह है कि मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए एक संस्कृति है जो जानवरों में नहीं है।

उदाहरणार्थ, भूख से उत्पन्न वेदना के प्रति किये जाने वाले व्यवहार को समझा जा सकता है। मानव भूख की शांति के लिए विवेकपूर्ण विधि अपनाता है। शाकाहारी और मांसाहारी मानव अपनी भूख को अलग-अलग तरीके शान्त करके सन्तुष्ट होते हैं। खाद्य सामग्रियों के संग्रह और संरक्षण करना केवल मनुष्य के वश की बात है। मानव अपनी भूख की शान्ति के लिए सभ्य तरीका अपनाता है जबकि जानवर भूखा होने पर हिंसक और भयानक बन जाता है। मानव काम-व्यवहार कई नियमों, मानकों, मूल्यों और कानूनों से नियंत्रित होता है जबकि जानवर भोजन पाने के क्रम में किसी नियम और मूल्यों को नहीं अपनाता है।

मानव अपने काम-व्यवहार के लिए भरोसेमन्द साथी का चयन कर लेता है लेकिन जानवर मिल-जुल कर कोई व्यवस्था नहीं कर पाता है। अत: जैविकीय और सांस्कृतिक शक्तियों की परस्पर-क्रिया के द्वारा मानव प्रकृति विकसित होती है जिसके कारण मानव अपना स्वभाव निश्चित करके उचित व्यवहार करता है। मानव अपने व्यवहार को प्रयोगात्मक बनाने के लिए भौतिक वस्तुओं (औजार मूत्तियाँ), विचार (श्रेणियाँ, मानक, परोपकार, दया, धर्म) तथा सामाजिक संस्थान (परिवार, विद्यालय, सहाकारिता विभाग, पंचायत भवन) का उपयोग करने की क्षमता रहता है जो जानवरों को नसीब नहीं होता है।

भवन निर्माण हो या उपस्कर का निर्माण हो हम परिणामी उत्पाद के प्रति सुरक्षा और उपयोग की दृष्टि से सदा सतर्क व्यवहार करते हैं। हम किसी व्यवहार के लिए पूर्व निर्धारित साधनों या विधियों का इन्तजार नहीं करते हैं। वाशिंग मशीन के अभाव में हम बाल्टी-पानी के द्वारा ही सफाई का काम निबटाना जानते हैं। कुर्सी के अभाव में हम शिक्षण कार्य या यात्रा की योजना को बन्द नहीं कर देते हैं।

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प्रश्न 2.
जैवकीय तथा सांस्कृतिक मूल का सामान्य अर्थ एवं उद्देश्य बतावें।
उत्तर:
कोई बच्चा अपने पूर्वजों से एक विकसित शरीर और उन्नत मस्तिष्क पाकर अच्छे व्यवहार के प्रदर्शन के योग बनता है। अर्थात् हमारे व्यवहार का महत्वपूर्ण निर्धारक हमारी जैवकीय संरचना होती है। व्यवहार सम्बन्धी कला एवं आदतें हमें आनुवंशिक रूप में उपलब्ध होती हैं। जैसे माता-पिता के अशक्त रहने के कारण मंद बुद्धि वाले बच्चे जन्म लेते हैं तथा असामान्य लक्षण प्रकट करते हैं। किसी कारण मस्तिष्क की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त हो जाने पर जैवकीय आधारों का महत्त्व जानने का अवसर मिलता है।

किसी व्यक्ति का व्यवहार जैवकीय यंत्र के अलावे सांस्कृतिक तंत्र से भी प्रभावित होता है। पूर्वज से मिला संस्कृति से समझौता करते हुए हम अपने व्यावहारिक आचरण का निर्धारण करते हैं। विकट स्थितियों का मुकाबला करना, आकस्मिक घटना के बाद भी धैर्य बनाए रखना, प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहने की युक्ति सोचना आदि ऐसी परिस्थिति है जहाँ जैविकीय ज्ञान के साथ-साथ सांस्कृतिक सहायता की आवश्यकता महसूस होने लगती है।

माँगें, अभाव, अनुभव, अवसर, लोगों की प्रतिक्रिया, मिलने वाला पुरस्कार आदि हमारे व्यवहार को प्रभावित किए बिना रहते हैं। ज्यों-ज्यों बच्चा बड़ा होने लगता है, इसकी समय विकसित होने लगती है और वह उक्त प्रभावों के स्पष्ट लक्षण और क्षमता को समझने लगता है। कई स्थितियाँ ऐसी आती हैं जब सांस्कृतिक ज्ञान से ही हम समस्या को सरलता से सुलक्षा लेते हैं। मनोवैज्ञानिक की मानें तो जैवकीय आधार के अलावा सांस्कृतिक आधार भी व्यवहार के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। दोनों का साक्षा प्रयास हमारे व्यवहार को उन्नत दर्जा दिलाने में हमारी सहायता करते हैं।

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प्रश्न 3.
स्वतः संचालित स्नायु संस्थान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
स्वतंत्र स्नायु संस्थान मस्तिष्क का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। केन्द्रीय स्नायु संस्थान का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह केन्द्रीय स्नायु संस्थान स्वतंत्र रहकर क्रिया करता है। शरीर में संवेगावस्था में होनेवाले अनेक परिवर्तनों को स्वतंत्र स्नायु संस्थान ही संचालित करता है। इस संचालन में केन्दीय स्नायु संस्थान का कोई हाथ नहीं रहता है।

परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि स्वतंत्र स्नायु संस्थान का केन्द्रीय स्नायु संस्थान से कोई सम्बन्ध नहीं है। केन्द्रीय स्नायु संस्थान के भाग सुषुम्ना का स्वतंत्र स्नायु संस्थान में महत्वपूर्ण स्थान है। अतएव इस स्नायु संस्थान को स्वतंत्र केवल इसलिए समझा जाता है, क्योंकि जिन क्रियाओं के संचालन एवं नियंत्रण में मस्तिष्क काम नहीं करते वे स्वतंत्र स्नायु संस्थान द्वारा संचालित एवं नियंत्रित होती हैं।

इस संस्थान के कार्य को रोका नहीं जा सकता। यह संस्थान स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करता है। यह मानव शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं में समायोजन करता है। इसकी बहुत-सी नाड़ियाँ मस्तिष्क और सुषुम्ना से चलकर आमाशय और रक्तवाहिनी नाड़ियों से आकर मिलती हैं। इन नाड़ियों द्वारा आन्तरिक एवं बाह्य मांसपेशियों की क्रियाओं का संचालन होता है।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान द्वारा स्राव ग्रन्थियों तथा आमाशंय और रक्त कोषों आदि की क्रिया का संचालन होता है। इसी से फेफड़े, दिल, यकृत, तित्ली, आमाशय, बड़ी आँत, प्रस्वेद ग्रन्थियाँ आदि की क्रिया चलती हैं। वस्तुतः यह संस्थान क्रियावाहक स्नायु संस्थान के बाहर स्थित है और उनकी क्रिया में केन्द्रीय स्नायु संस्थान कोई हाथ नहीं बँटांता। स्वतंत्र स्नायु संस्थान के बायें भाग को तीन भागों में बाँटा गया हैं –

  1. कापालिक
  2. माध्यमिक स्नायु तंत्र या थौरेको लम्बर और
  3. अनुब्रिका

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चित्र चित्र में सबसे ऊपर कापालिक है।

इससे जुड़े स्नायु कापालिक स्नायु कहलाते हैं। इसके नीचे सुषुम्ना है। इससे सम्बन्धित स्नायु सुषुम्ना स्नायु कहलाते हैं। सुषुम्ना शीर्ष से लेकर अनुत्रिका का भाग थौरेका लम्बर अथवा माध्यमिक स्नायु तंत्र कहलाता है। इसे थौरेका लम्बर इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस भाग में स्नायु सुषुम्ना चलकर थोरेक्स तक पहुँचता है। सुषुम्ना का अंतिम भाग अनुत्रिका कहलाता है। स्वतंत्र स्नायु कोष गुच्छिका तथा शरीर के विभिन्न अंग सुषुम्ना से जुड़े होते हैं।

स्वतंत्र स्नायु का फैलाव नेत्र, रालवाही ग्रन्थियाँ, मुख, त्वचा और रक्त कोष, हृदय, श्वासनली, यकृत, आमाशय, क्लोम, आँत, अभिवृक्क, गुर्दे, थैली, कोलोन और गुर्दा तथा जननेन्द्रियों तक है। ये पसीने की ग्रन्थियों तथा त्वचा कोशों में भी फैले हुए हैं। ये पुच्छिंका लड़ी तथा सुषुम्ना को स्नायु सूत्र में जोड़ते हैं। जिन सूत्रों से ये इन्हें जोड़ते हैं वे सूत्र सुषुम्ना से निकलकर पुच्छिकाओं तक जाते हैं। पुच्छिकाओं की लड़ी में 22 अनुकम्पिक पुच्छिकायें होती हैं। मेंगेलियन लड़ी सुषुम्ना के समानान्तर में उसकी लम्बाई में होती है। अनुकम्पिक पुच्छिका लड़ी में माइलीन नामक श्वेत पदार्थ ऊपर से लिपटे रहते हैं। पुच्छिका लड़ी से निकलकर लागूल सूत्र वापस सुषुम्ना के स्नायु में जाकर मिलते है।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान के दो भाग हैं –

  1. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान तथा
  2. परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान। ये दोनों भाग एक-दूसरे के विपरीत क्रियायें करते हैं।

अनुकम्पिक स्नायु संस्थान शरीर को कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है और खतरे का सामना करने के लिए तैयार करता है। यह संस्थान शरीर की खतरे से रक्षा भी करता है। संवेग की दशा में संस्थान अधिक क्रियाशील रहता है। इसकी क्रियाशीलता से ही खतरे के समय आँखों की पुतलियाँ फैल जाती हैं और आमाशय की रक्तवाहिनी नाड़ियाँ क्रियाशील हो जाती है। ये नाड़ियाँ आमाशय को रक्त न पहुँचाकर माँसपेशियों और मस्तिष्क को अधिक रक्त पहुँचाती हैं। परिणामस्वरूप आमाशय में भोजन पचना बन्द हो जाता है, भूख नहीं लगती है।

मांसपेशियों एवं मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। आँत निष्क्रिय हो जाती है। आमाशय को रस प्रदान करने वाली ग्रन्थियाँ रस देना बन्द कर देती हैं। हृदय अधिक तेजी से रक्त फेंकने लगता है जिससे उसकी गति में तीव्रता आ जाती है। अभिवृक्क ग्रन्थियाँ अभिवृक्की रस का अधिकांश खून में पहुँचाने लगती हैं। परिणामस्वरूप रक्त शर्करा बढ़ जाती है। मनुष्य की शक्ति में वृद्धि हो जाती है।

आवेश के कारण कोश अधिक नष्ट होते हैं। साँस की गति तीव्र हो जाती है, हाँफने की क्रिया होने लगती है और कभी-कभी तो मल-मूत्र भी निकलने लगता है। लार ग्रन्थियों से रस निकलना बंद हो जाता है। गला और मुख सूख जाता है। ये क्रियायें कलह की अवस्था में, क्रोध एवं भय की अवस्था में देखी जाती है। संवेग की अवस्था में त्वचा की विद्युत-प्रतिशोधन शक्ति में भी कमी आ जाती है जिसे हम गाल्वनिक त्वचा अनुक्रिया के नाम से जानते हैं।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान का दूसरा भाग परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान है। इसका सम्बन्ध कापालिक तथा अनुत्रिक से है। यह संस्थान एनाबोलिज्म की क्रिया करता है। यह संस्थान शरीर की शक्ति का संचय कर शरीर के विभिन्न भागों के पदार्थ को पुष्ट करता है। इस संस्थान की क्रिया में हृदय की धड़कन कम होती है और रक्त-चाए कम हो जाता है।

परिणामस्वरूप शरीर में भोजन की मात्रा कम खर्च होती है, लार ग्रन्थियों की क्रिया बढ़ जाती है, जिससे भोजन पचने की क्रिया में सहायता मिलती है। फलतः शरीर का वजन बढ़ जाता है, आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ जाती हैं। फलतः आँख में कम प्रकाश प्रवेश कर पाता है और आँखों को लाभ होता है। यह संस्थान अनुत्रिका विभाग के कार्य का संचालन करता है। यह ब्लेडर और कोलन तथा बड़ी आँतों को स्वस्थ रखता है। इसकी सहायता से शरीर से मल-मूत्र तथा विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं। अनुकम्पिक और परिअनुकम्पिक संस्थान में अन्तर है जो निम्न हैं –

1. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान में स्नायु कोश गुच्छिका सुषुम्ना के अन्दर होती है अथवा शरीर के उन आन्तरिक अंगों के पास होती है जिनको वे उत्तेजित करती है। परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान के कोश गुच्छिकायें सुषुम्ना के अन्दर न होकर अंगों के पास ही होती हैं।

2. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान की क्रिया में सम्पूर्ण संस्थान काम करता है। परिअनुकम्पिक संस्थान की क्रिया में उस स्थान के विभिन्न भाग स्वतंत्र होते हैं। परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि ये दोनों संस्थान एक-दूसरे के विरुद्ध ही हैं, इनमें कोई पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है। वास्तव में ये एक-दूसरे के सहयोगी होते हैं। मॉगर्न के अनुसार ये दोनों संस्थान कभी भी एक-दूसरे से स्वतंत्र कार्य नहीं करते बल्कि परिस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न मात्रा में सहयोग करते हैं। पर्यावरण में संघर्ष के समय जीव में अनुकम्पिक संस्थान की क्रिया अधिक और परिअनुकम्पिक संस्थान की कमी हो जाती है। इस सहयोग से शरीर में कार्य और विश्राम दोनों अवस्थाओं में संतुलन रहता है।

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प्रश्न 4.
मानव मस्तिष्क की संरचना या बनावट तथा कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग मस्तिष्क है जिसके माध्यम से व्यक्ति सभी तरह की क्रियाओं का संचालन करता है। शरीर में मस्तिष्क का स्थान सुषुम्ना के ऊपर तथा खोपड़ी (skull) के भीतर होता है। मस्तिष्क की बनावट तथा उसके कार्यों का अध्ययन निम्नांकित सात प्रमुख भाग में बाँटकर कर सकते हैं –

  1. मेडुला शीर्श (medulla oblongata)
  2. सेतु (pons)
  3. लघुमस्तिष्क (cerebellum)
  4. थैलेमस (thalamus)
  5. हाइपोथैलेमस (hypothalamus)
  6. मध्यमस्तिष्क (midbrain)
  7. प्रमस्तिष्क या प्रमस्तिष्कीय वल्कुट (cerebrum or cerebral cortex)

इन सबों का वर्णन निम्नांकित है –

1. मेडुला शीर्श (medulla oblongata):
मेडुला सुषुम्ना के ठीक ऊपर होता है। इसकी लम्बाई लगभग एक इंच होती है। यह मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को जोड़ता है। इसके द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं। जैसे, यह सुषुम्ना का मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों से सम्पर्क स्थापित करता है, क्योंकि सुषुम्ना से मस्तिष्क की ओर जानेवाले सभी तंत्रिका आवेग मेडुला होकर ही गुजरते हैं। यह शरीर की रक्षा-संबंधी सभी क्रियाओं का जैसे रक्त-संचालन, साँस की गति, निगलने, हृदय की धड़कन आदि का संचालन एवं नियंत्रण करता है। यह शरीर में कुछ हद तक संतुलन भी बनाए रखने में मदद करता है तथा अपने क्षेत्र की प्रतिवर्त क्रियाओं को भी कुछ हद तक नियंत्रित करता है।

2. सेतु (pons):
यह मेडुला शीर्ष के ठीक ऊपर से होता है। इसमें कई तरह के तंतु पाए जाते हैं जिनके माध्यम से यह लघुमस्तिष्क (cerebellum) तथा प्रमस्तिष्क (cerebrum) के भागों को आपस में मिलाता है। इस तरह, यह वास्तविक अर्थ में सेतु या पुल का कार्य करता है। यह श्रवण कार्यों (auditory functions) के लिए एक तरह का प्रसारण स्टेशन (relay station) का कार्य करता है। इसमें कुछ ऐसे केन्द्रक (nuclei) भी होते हैं जिनमें प्रमुख श्वसन गति तथा आनन अभिव्यक्तियों (facial expressions) की क्रियाएँ प्रभावित होती हैं।
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चित्र: मानव मस्तिष्क के भागों का चित्र

3. लघुमस्तिष्क (cerebellum):
लघुमस्तिष्क या अनुमस्तिष्क प्रमस्तिष्क (cerebrum) या वृहत मस्तिष्क के नीचे और पीछे की ओर होता है। कुछ स्नायुतंतुओं द्वारा लघुमस्तिष्क का संबंध एक आरे प्रमस्तिष्क से तथा दूसरी ओर सुषुम्ना (spinal cord) से होता है। इसकी ऊपरी सतह पर धूसर पदार्थ (grey matter) होता है तथा उजला पदार्थ उसकी भीतर तह पर होता है। लघु मस्तिष्क का मुख्य कार्य शारीरिक संतुलन (bodily balance) बनाए रखना होता है। शराब के नशे में हो जाने पर लघुमस्तिष्क प्रभावित हो जाता है। फलस्वरूप, व्यक्ति की चाल-ढाल में लड़खड़ाहट आ जाती है।

4. थैलेमस (thalamus):
थैलेमस प्रमस्तिष्क (cerebrum) के नीचे और हाइपोथैलेमस के बगल में होता है। थैलेमस दोनों प्रमस्तिष्कीय गोलार्डों (cerebral hemispheres) के बीच एक अंडाकार संरचना है जिसे ऊपर से देखा नहीं जाता है। इसका कार्य बिजली के स्विचबोर्ड के समान है। जैसे स्विचबोर्ड का स्विच दबातें हैं, बिजली की धारा उपयुक्त जगह पर पहुंचकर बल्ब को प्रकाशमय कर देती है या पंखे को चला देती है, ठीक उसी प्रकार थैलेमस में जो तंत्रिका आवेग पहुँचते हैं, वह उन्हें मस्तिष्क के उचित स्थान पर पहुँचा देता है।

अतः थैलेमस का मुख्य कार्य भिन्न-भिन्न संवेदी प्रक्रियाओं (sensory processes) से संबंधित आवेग को ग्रहण करके प्रमस्तिष्क (cerebrum) के उपर्युक्त केन्द्रों में प्रसारण (relay) करना होता है। इतना ही नहीं, यह लघुमस्तिष्क से भी आवेगों को ग्रहण करके उन्हें प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुँचाता है।

5. हाइपोथैलेमस (hypothalamus):
थैलेमस के नीचे एक छोटा परंतु अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण तंतु है जिसे हाइपोथैलेमस (hypothalamus) कहा जाता है। यह थैलेमस तथा मध्यमस्तिष्क (midbrain) को एक तरह एक जोड़ता है। हाइपोथैलेमस द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं। इसके द्वारा जैविक अभिप्रेरकों जैसे भूख, प्यास, काम आदि को समजित (regulate) किया जाता है। शरीर के भीतर सामान्य संतुलन बनाए रखने में भी यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाइपोथैलेमस संवेग की उत्पत्ति एवं नियंत्रण का मुख्य केन्द्र माना गया है। इसके द्वारा अंतःस्रावी ग्रन्थियों (endocrine glands) को भी समंजित किया जाता है।

6. मध्यमस्तिष्क (midbrain):
मध्यमस्तिष्क का स्थान मस्तिष्क के बीच में होता है। इसमें दो सतहें होती हैं-निचली सतह (floor) तथा ऊपरी सतह (roof or tectum)। निचली सतह संवेदी तंत्रिका आवेगों (sensory nerve impulses) को मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों में आने-जाने का काम करता है। जहाँ तक ऊपरी सतह या टेक्टम (tectum) का प्रश्न है, इसके द्वारा दृष्टि तथा श्रवण क्रियाओं के संचालन में मदद मिलती है।

जब मस्तिष्क का दृष्टिक्षेत्र या श्रवणक्षेत्र क्षतिग्रस्त हो जाता है तो इन क्रियाओं का संचालन यहीं से होता है। मध्यमस्तिष्क का एक विशिष्ट भाग जो घना एवं मोटा जाल-सा दिखता है, उसे रेटिकुलर फॉरमेशन (reticular formation) कहा जाता है जो व्यक्ति में सतर्कता की अवस्था को बनाए रखने में सक्षम होता है। इसमें नींद आदि के संचालन में भी मदद मिलती है।

7. प्रमस्तिष्क (cerebrum):
मानव मस्तिष्क का सबसे बड़ा तथा सबसे प्रमुख भाग प्रमस्तिष्क या वृहत मस्तिष्क है। इसे प्रमस्तिष्कीय वल्कुट (cerebral cortex) भी कहा जाता है। एक विशेष दरार (fissure), जिसे अनुदैर्ध्य दरार (longitudinal fissure) कहा जाता है, द्वारा प्रमस्तिष्क दो गोलार्डों (hemispheres) में बँटा होता है – बायाँ गोलार्द्ध (left hemisphere) तथा दायाँ गोलार्द्ध (right hemisphere), इन दोनों गोलार्डों के ऊपर न्यूरोन का एक पतला आवरण होता है जिसकी मोटाई लगभग 3 मिलीमीटर होती है।

इस आवरण का रंग धूसर (grey) होता है। बायाँ गोलार्द्ध तथा दायाँ गोलार्द्ध तंत्रिका तंतु (nerve fibre) के एक विशेष गुच्छा या बंडल (bundle) से जुड़े होते हैं जिसे कारपस कैलोजम (corpus callosum) कहा जाता है। यह उजले पदार्थ (white matter) का बना होता है। प्रत्येक गोलार्द्ध दो गहरी दरारों (fissure) अर्थात् रोलैण्डो की दरार (fissure of Rolando) या केन्द्रीय सुलकस (central sulcus) तथा सिलभियस की दरार (fissure of Sylvius) या लेट्रल दरार (lateral fissure) की मदद से निम्नांकित चार पालियों (lobes) में बँटा होता है –

  1. अग्रपालि (frontal lobe)
  2. मध्यपालि (parietal lobe)
  3. शंखपालि (temporal lobe)
  4. पृष्ठपालि (occipital lobe)

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चित्र : प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

इन खंडों के कार्य अलग-अलग हैं। इन्हें इन कार्यों के विभाजन के दृष्टिकोण से निम्नांकित तीन क्षेत्रों में बाँटा गया है –

  1. संवेदी या ज्ञानवाही क्षेत्र (sensory area)
  2. क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र (motor area)
  3. साहचर्य क्षेत्र (association area)

1. संवेदी या ज्ञानवाही क्षेत्र के कार्य (Functions of sensory area):
इस क्षेत्र द्वारा संवेदी क्रियाएँ होती हैं जिसके फलस्वरूप हमें तरह-तरह के उद्दीपकों का ज्ञान होता है। इसके क्षेत्र द्वारा निम्नांकित तीन तरह के ज्ञान या संवेदनाएँ होती हैं –

(a) दृष्टि संवेदन (Visual sensation):
दृष्टि संवेदन का ज्ञान हमें पृष्ठपालि (occipital lobe) द्वारा होता है। इसलिए पृष्ठपालि की दृष्टि ज्ञानपालि कहा जाता है। आँख में जो तंत्रिका आवेग उत्पन्न होते हैं वे दृष्टि तंत्रिका (optic nerve) द्वारा पृष्ठपालि में पहुँचते हैं जिससे व्यक्ति में दृष्टि संवेदन का ज्ञान होता है। यदि किसी कारण से पृष्ठपालि नष्ट हो जाए तो व्यक्ति को दृष्टि संवेदन नहीं होगा।

(b) श्रवण संवेदन (Auditory sensation):
सुनने की क्रिया का नियंत्रण शंखपालि (temporal lobe) से होता है। अतः, शंखपालि को श्रवण ज्ञानकेन्द्र भी कहा जाता है। जब ध्वनि या आवाज कान में श्रवण तंत्रिका आवेग उत्पन्न करता है, तब वह शंखपालि में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को श्रवण संवेदन होता है। यदि यह शंखपालि पूर्णत: नष्ट हो जाए तब व्यक्ति को इससे श्रवण-संबंधी संवेदन या ज्ञान नहीं हो सकता है।

(c) त्वक संवेदन (Cutaneous sensation):
व्यक्ति को स्पर्श का ज्ञान या त्वक संबेदन का ज्ञान मध्यपालि (parietal lobe) से होता है। जब हमारे त्वक को कोई चीज उत्तेजित करता है, तब इससे तंत्रिका आवेग उत्पन्न होकर मध्यपालि (parietal lobe) में पहुँचता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को स्पर्श ज्ञान होता है।

2. क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र के कार्य (Functions of motor area):
व्यक्ति जो भी शारीरिक क्रिया या व्यवहार स्वेच्छा से करता है, उसका आदेश प्रमस्तिष्क के जिस भाग से मिलता है, उसे क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र कहा जाता है। क्रियावाही क्षेत्र रोलैण्डो की दरार के बगल में एक लंबा-सा हिस्सा में अवस्थित है।

इस क्षेत्र में पिरामिड के आकार के बड़े-बड़े कोश (cells) पाए जाते हैं जिनके सहारे शारीरिक क्रियाओं एवं व्यवहारों का नियंत्रण होता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि पेशीय क्षेत्र के सबसे ऊपर का भाग शरीर के सबसे निचले हिस्से जैसे पैर की अंगुलियों तथा पैर की मांसपेशियों आदि का नियंत्रण एवं संचालन करता है और सबसे नीचे का भाग शरीर के ऊपर के हिस्से जैसे मुँह, गर्दन, चेहरा आदि की क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण करता है।

3. साहचर्य क्षेत्र के कार्य (Functions of association area):
अग्रपालि में एक बड़ा-सा साहचर्य क्षेत्र है जिसके द्वारा उत्त्व मानसिक क्रियाओं (higher mental processes) जैसे सोचना, तर्क करना, चिंतन करना, कल्पना करना, स्मरण करना आदि का संचालन एवं नियंत्रण होता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि यह क्षेत्र किसी कारण से क्षतिग्रस्त हो जाने से प्राणी वर्तमान संबद्ध सभी बातों, घटनाओं एवं अर्थों को भूल जाता है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि मानव मस्तिष्क की संरचना काफी जटिल है तथा इसके द्वारा प्राणी की सभी तरह की शारीरिक क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण होता है।

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प्रश्न 5.
स्नायुकोश या तंत्रिका कोश या न्यूरोन की संरचना तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
मानव शरीर में बहुत तरह के जीवित कोश (living cells) हैं जिनके अलग-अलग कार्य हैं। इनमें एक विशेष तरह के जीवित कोश का कार्य स्नायु आवेग (nerve impulse) को ढोना है। इस तरह के जीवित कोश को स्नायुकोश या तंत्रिका कोश (neuron) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, तंत्रिका कोश या जिसे न्यूरोन (neuron) कहा जाता है, एक ऐसा कोश होता है जिसके माध्यम से तंत्रिका आवेग के रूप में सूचनाएँ शरीर के एक अंग से दूसरे अंग में जाती हैं। न्यूरोन तंत्रिका तंत्र की सबसे छोटी इकाई (smallest unit) होती है।

संरचना या बनावट के दृष्टिकोण से तंत्रिका कोश को निम्नांकित तीन भागों में बाँटा गया है –

  1. शाखिकाएँ (dendrites)
  2. कोश शरीर (cell body)
  3. एक्सॉन (axon)

1. शाखिकाएँ (dendrites):
शाखिका की संरचना पेड़ की टहनियों तथा शाखाओं के समान होती है जिसमें कई छोटी-छोटी उपशाखाएँ होती हैं (जैसा कि चित्र में दिखाया गया है)। शाखिका दो तरह के कार्य करती है। पहला, यह तंत्रिका आवेगों (nerve impulse) को ग्रहण करती है तथा दूसरी उसे जीवकोश (cell body) की ओर भेज देती है। इस तरह, शाखिका कि मुख्य कार्य तंत्रिका आवेग को ग्रहण करना और उसे कोशशरीर की ओर भेजना होता है।

2. कोश शरीर (cell body):
कोशशरीर न्यूरोन का दूसरा प्रमुख भाग है। इसे सोमा (soma) भी कहा जाता है। कोशशरीर चारों तरफ से एक झिल्ली से ढंका होता है जिसे कोश की झिल्ली (membrane) कहा जाता है। इस झिल्ली के भीतर एक तरल पदार्थ होता है जिसे साइटोप्लाज्म (cytoplasm) कहा जाता है। कोशशरीर के बीच में केंद्रक (nucleus) होता है जो कोशशरीर का सबसे प्रधान भाग है। कोशशरीर के मुख्य दो कार्य होते हैं। पहला, शाखिका द्वारा लाए गए तंत्रिका आवेग को ग्रहण कर उसे आगे की ओर अर्थात एक्सॉन की ओर बढ़ाना तथा दूसरा कार्य न्यूरोन को स्वस्थ तथा जीवित रखना है।
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3. एक्सॉन (axon):
एक्सॉन तंत्रिका कोश या न्यूरोन के उस भाग को कहा जाता है जो कोशशरीर (cell body) से निकलकर आगे की कला हुआ दिखाई पडता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, इसका आकार छोटा भी होता है तथा बड़ा भी। एक्सॉन एक विशेष तरह की उजली परत या आवरण से ढंका होता है। यह परत सतत (continuous) नहीं होती है। बल्कि कुछ-कुछ दूर पर लगभग समाप्त हो जाती है या पतली हो जाती है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। एक्सॉन के अंतिम छोर पर अनेक छोटे-छोटे तंतु होते हैं जिन्हें एण्डब्रश (endbrush) या एण्डप्लेट (endplate) कहा जाता है।

एक्सॉन का मुख्य कार्य तंत्रिका आवेग को शरीर से निकालकर न्यूरोन के अंतिम छोर अर्थात् एण्डब्रश तक पहुँचा देना होता है। इस तरह, तंत्रिका आवेग एक्सॉन द्वारा बाहर निकल जाता है। इस तरह एक न्यूरोन इस क्रम में कार्य करता है-तंत्रिका आवेग (nerve impulse) को पहले शाखिका (dendrite) द्वारा ग्रहण किया जाता है और उसे कोशशरीर (cell body) की ओर भेज दिया जाता है। कोशशरीर उसे ग्रहण कर लेता है तथा एक्सॉन कोशशरीर से आ रहे तंत्रिका आवेग को एण्डब्रश होते हुए बाहर निकाल देता है अर्थात् दूसरे न्यूरोन में भेज देता है। स्पष्ट हुआ कि शाखिका तंत्रिका आवेग का एक ग्रहण केन्द्र (receiving centre) है जबकि एक्सॉन (axon) एक सुप्दगी केन्द्र (delivery centre) है।

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प्रश्न 6.
मस्तिष्क के कार्यों के अध्ययन के लिए किन-किन विधियों का उपयोग होता है। उनकी विवेचना करें।
उत्तर:
स्नायुमंडल या तंत्रिका तंत्र या मस्तिष्क की रचना एवं इसके कार्य के अध्ययन के लिए कई प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है। इनमें से कुछ प्रमुख विधियों का वर्णन यहाँ किया जा रहा है –

1. वर्णनात्मक विधि या अभिरंजन विधि (Staining method):
यह विधि तंत्रिका तंत्र की रचना के अध्ययन की सबसे प्राचीन विधि है। इस विधि का व्यवहार गोल्गी (Golgi) ने स्नायु-मंडल के भिन्न-भिन्न भागों की रचना तथा उनके कार्य के अध्ययन में किया। इस विधि में स्नायु-कोश को रजित करने (रंगने) का प्रयास किया जाता है। चूँकि स्नायु-कोश पर किसी रंग का प्रभाव जल्दी नहीं पड़ता है, इसलिए स्नायु के माइलीन आवरण को रंगने का प्रयास किया जाता है। रंगों का व्यवहार दो प्रकार से किया जाता है। एक तो यह कि केवल तन्तुओं (Fibres) को रंगा जाता है और दूसरे प्रकार के रंग से केवल कोशिका-शरीर (Cell body) को रजित किया जाता है।

पहले प्रकार की कार्य-विधि को वेगर्ट विधि कहते हैं और दूसरे प्रकार की कार्य-विधि को नीसिल विधि (Nissil method) कहते हैं। रेजित तंतु या कोशिका-शरीर को माइक्रोस्कोप की मदद से देखा जाता है। रंगे हुए तन्तु या कोशिका-शरीर को देखने में आसानी होती है और इस आधार पर उनकी रचना को समझने का प्रयास किया जाता है। इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसके द्वारा तंतुओं तथा कोशिका-शरीर का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से संभव होता है। लेकिन इस विधि का दोष यह है कि इसके द्वारा सभी तन्तुओं का अध्ययन नहीं किया जा, सकता है। कारण यह है कि कुछ ऐसे तंतु हैं जिन पर माइलिन आवरण नहीं होता है। अत: इस प्रकार के तन्तुओं पर रंगों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

2. मस्तिष्क परिवर्तन-विधि (Brain changes method):
मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न भागों की रचना तथा इनके कार्यों के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार किया जाता है। यहाँ यह देखने का प्रयास किया जाता है कि मनोवैज्ञानिक परिचालन (Manipulation) के कारण प्राणी के मस्तिष्क में कोई परिवर्तन होता है या नहीं और यदि परिवर्तन होता है तो मस्तिष्क के किस भाग में होता है। प्राणी को संवेदी वचन या संवेदी समृद्धि (Sensory Enrichment) से प्रभावित किया जाता है और यह देखने का प्रयास किया जाता है कि प्राणी के मस्तिष्क में कोई रचनात्मक या रसायन परिवर्तन होता है या नहीं।

लेकिन, इस विधि के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इसका उण्योग मनुष्य पर नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के मस्तिष्क में वातावरण के कारण होनेवाले रसायन-परिवर्तन तथा संरचनात्मक परिवर्तन का अध्ययन कठिन है। इसीलिए इस विधि का उपयोग केवल चूहे आदि छोटे-छोटे पशुओं पर किया जाता है। लेकिन पशुओं पर प्राप्त निष्कर्ष को मनुष्यों पर उसी रूप में लागू करना पूरी तरह सही नहीं हो पाता है।

3. विद्युत अभिलेखन-विधि (Electrical recording method):
स्नायुमंडल और खासकर मस्तिष्क के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार बड़े पैमाने पर होता है। इस विधि में स्नायुकोष या मस्तिष्क के किसी भाग में होने वाले विद्युत-प्रवाह को रेकार्ड (Record) कर लिया जाता है। प्राणी को किसी उत्तेजना से प्रभावित किया जाता है और मस्तिष्क के किसी भाग में उत्पन्न विद्युत-परिवर्तन को एलेक्ट्रोड (Electrode) द्वारा रेकार्ड कर लिया जाता है। इस प्रकार के विद्युत परिवर्तन को उत्पन्न अन्तःशक्ति (Evoke Potential) कहते हैं।

यह विधि स्नायु मंडल या मस्तिष्क के अध्ययन के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हुई है। टोवे ने इस विधि का उपयोग बिल्ली पर किया और ज्ञानवाही कॉर्टेक्स के कार्य को देखने का प्रयास किया। उन्होंने बिल्ली के ज्ञानवाही कॉर्टेक्स में एक बड़े आकार का एलेक्ट्रोड लगा दिया, फिर उसके ज्ञानवाही मार्ग (Sensory Path) को उत्तेजित करके अन्तःशक्ति जमा हो गयी। इससे पता चला कि ज्ञानवाही कार्य वास्तव में ज्ञानवाही कॉर्टेक्स द्वारा नियंत्रित होता है। लेकिन, यह विधि खतरनाक है। इसलिए मनुष्य पर इसका व्यवहार करना कठिन है। दूसरी बात यह है कि इस विधि के उपयोग के लिए बड़े प्रशिक्षित तथा योग्य स्नायु-विशेषज्ञ (Neurologist) की आवश्यकता होती है। इसके अभाव में अध्ययन के गलत हो जाने की संभावना बढ़ जाती है।

4. उत्तेजना-विधि (Stimulation method):
स्नायुमंडल और विशेष रूप से मस्तिष्क की रचना तथा कार्य के अध्ययन के लिए उत्तेजना करके यह देखने का प्रयास किया जाता है कि इससे प्राणी के व्यवहार में कोई परिवर्तन होता है या नहीं। उत्तेजन को स्वतंत्र चर (Independent Variable) और इससे उत्पन्न प्रतिक्रिया को आश्रित चर माना जाता है। साधारण अर्थ में उत्तेजन को कारण तथा प्रतिक्रिया को प्रभाव माना जाता है। इसी आधार पर कॉर्टेक्स के भिन्न-भिन्न भागों के कार्यों को जानने का प्रयास किया जाता है और देखा जाता है कि इससे प्राणी में कौन-सी नई प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई।

विश्वास कर लिया जाता है कि उस प्रतिक्रिया का नियंत्रण कॉर्टेक्स के उसी भाग द्वारा होता है। जैसे-किसी चूहे के पृष्ठ-खण्ड (Occipital Lobe) को बिजली द्वारा उत्तेजित करने से यदि चूहे में देखने संबंधी क्रिया का आधार कॉर्टेक्स का पृष्ठ-खण्ड है। लेकिन इस विधि के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इसको व्यवहार में लाने के लिए कुशल तथा प्रशिक्षित शारीरिक मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है।

5. क्षति-विधि (Lesion method):
स्नायु-मंडल या मस्तिष्क की रचना तथा कार्य के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार व्यापक रूप से होता रहा है। फ्लोरेंस तथा रोलैन्डो को इस विधि का पथप्रदर्शक समझा जाता है। इस विधि में मस्तिष्क के किसी खास भाग को नष्ट कर दिया जाता है और देखा जाता है कि इसके कारण प्राणी की कौन-सी क्रिया क्षतिग्रस्त होती है। जैसे-कॉर्टेक्स के पृष्ठ-खण्ड को काट देने पर यदि प्राणी में देखने की क्षमता समाप्त हो जाती है तो समझा जाता है कि दृष्टि-संवेदना का नियंत्रण पृष्ठ-खण्ड द्वारा होता है। इसी तरह मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न भागों द्वारा होने वाले कार्यों को निर्धारित कर लिया जाता है।

6. क्यूरेर-विधि (Curare method):
मस्तिष्क के अध्ययन के लिए हार्लो एवं स्टेगनर (Halow and Stegner) ने 1933 में एक विधि निकाली जिसको क्यूरेर-विधि कहते हैं। क्यूरेर एक प्रकार की औषधि है जो मध्य अमेरिका तथा दक्षिण अमेरिका में अधिक व्यवहार किया जाता है। इसके उपयोग से दैहिक मांसपेशियाँ निष्क्रिय (Inactive) हो जाती हैं। इसका प्रभाव उप-कॉर्टेक्स पर नहीं पड़ता है। इसलिए जब उप-कॉर्टेक्स से संबंधित कार्य का अध्ययन करना होता है तो कॉर्टेक्स को क्यूरेर के प्रभाव से निष्क्रिय बना दिया जाता है। इससे कॉर्टेक्स से होनेवाली क्रियाएँ रुक जाती हैं। फिर प्राणी को कोई क्रिया सिखाई जाती है।

प्राणी जब उस क्रिया को सीखने में सफल होता है तो इससे साबित हो जाता है कि उस क्रिया का नियंत्रण उप-कॉर्टेक्स द्वारा होता है। क्यूरेर के प्रभाव के समाप्त हो जाने के बाद भी यदि वह क्रिया जारी रहती है तो समझा जाता है कि उस क्रियापर कॉर्टेक्स का कोई बाधक प्रभाव नहीं है तो समझा जाता है कि उस पर उप-कॉर्टेक्स के साथ-साथ कॉर्टेक्स का भी नियंत्रण रहता है। इसी आधार पर कॉर्टेक्स तथा उप-कॉर्टेक्स द्वारा होनेवाले कार्यों का अध्ययन किया जाता है।

इस विधि का एक लाभ यह है कि इससे पशु को कोई हानि नहीं होती है। कारण यह है कि क्यूरेर का प्रभाव जब समाप्त हो जाता है तो मस्तिष्क का वह भाग पहले की तरह काम करने लगता है। यह गुण ‘उन्मूलन या क्षति-विधि’ में नहीं है, क्योंकि उस विधि में स्नायु को एक बार जब काट दिया जाता है तो फिर वह काम के लायक नहीं हो पाता है। इस प्रकार, क्यूरेर विधि में पशुओं की क्षति नहीं होती है, जबकि उन्मूलन विधि में पशुओं की क्षति होती है। लेकिन, इतना होने पर भी क्यूरेर-विधि की उपयोगिता बहुत सीमित है।

7. अपकर्षण विधि (Degeneration method):
स्नायु-मंडल के अध्ययन के लिए अपकर्षण-विधि या अप-विकार विधि का भी व्यवहार किया जाता है। अपकर्षण का अर्थ यह है कि जब स्नायु-मंडल के किसी क्षेत्र को नष्ट किया जाता है या काटा जाता है तो उस क्षेत्र से सम्बद्ध क्षेत्र भी विघटित या अपकर्षित हो जाता है। उस क्षेत्र के बर्बाद होने से या विघटित होने से यदि कोई क्रिया रुक जाती है तो समझा जाता है कि उस क्रिया का नियंत्रण उसी क्षेत्र द्वारा होता है। इस प्रकार, स्नायुओं के अपकर्षण के आधार पर स्नायु-कोशों के संबंधों का पता लगाया जाता है और उनके द्वारा संचालित होनेवाली क्रियाओं का निरूपण किया जाता है।

8. रासायनिक विधि (Chemical method):
स्नयु-मंडल अथवा मस्तिष्क के अध्ययन के लिए रसायन-विधि का व्यवहार भी किया जाता है। वास्तव में यह विधि विद्युत-उत्तेजन विधि का ही एक रूप है। इस विधि में मस्तिष्क के किसी खास भाग को बिजली से उत्तेजित न करके किसी रासायनिक पदार्थ से उत्तेजित किया जाता है। जैसे-कुचालक एक काफी प्रभावशाली रासायनिक पदार्थ है जिसके द्वारा मस्तिष्क के किसी भाग को उत्तेजित किया जाता है और इससे जो परिवर्तन होता है उसे एलेक्ट्रोड द्वारा रेकार्ड कर लिया जाता है।

कभी-कभी एलेक्ट्रोड के बदले छोटे पिपेट से होकर रासायनिक पदार्थ को थोड़ी मात्रा में मस्तिष्क के किसी विशेष भाग पर डालकर उसे उत्तेजित करता है तथा उससे संचालित होनेवाली क्रिया का अध्ययन करता है। इस विधि का उपयोग भिन्न-भिन्न प्रेरक संरचना (Mechanism) से संबंधित प्रयोग में किया गया है।

ग्रौसमैन (Grossman 1960) ने इस विधि का व्यवहार प्यास तथा भूख प्रेरकों को संचालित करनेवाले मस्तिष्क के भागों को निर्धारित करने के लिए किया और देखा कि इस तरह के अध्ययन के लिए यह विधि काफी उपयोगी है। इस प्रकार, मस्तिष्क या स्नायु मंडल के अध्ययन के लिए कई विधियों का व्यवहार किया जाता है। प्रत्येक विधि के अपने गुण-दोष हैं। अत: आवश्यकता के अनुसार अधिक-से-अधिक विधियों का व्यवहार करके विश्वसनीय निष्कर्ष प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 7.
प्रतिवर्त धनु से आप क्या समझते हैं? इस धनु में सम्मिलित शारीरिक अंगों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रतिवर्त क्रिया या सहज क्रिया (reflex action) किसी उद्दीपन के प्रति एक एक स्वचालित (automatic) एवं जन्मजात अनुक्रिया है। आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने से पलक का बंद हो जाना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रिया के शारीरिक आधार (bodily base) को प्रतिवर्त धनु (reflex arc) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, प्रतिवर्त क्रिया के संचालन में स्नायु प्रवाह स्नायुओं और अंगों से होकर गुजरता है, उन सभी को प्रतिवर्त धनु के अंदर समझा जाता है।

वास्तव में सहज क्रिया एक सरलतम मानसिक क्रिया है। इसके होने के लिए सर्वप्रथम उद्दीपन ज्ञानेन्द्रिय (sense organ) को उत्तेजित करता है जिससे ज्ञानेन्द्रिय में तंत्रिका आवेग (nerve impulse) उत्पन्न होता है। यह तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका (sensory nerve) से होता हुआ सुषुम्ना में पहुँचता है। सुषुम्ना में साहचर्य तंत्रिका (association nerve) होते हैं। वे तंत्रिका आवेग को गतिवाही या क्रियावाही तंत्रिका (motor nerve) में छोड़ देते हैं।

तंत्रिका आवेग गतिवाही या क्रिया न्यूरोन द्वारा मांसपेशियों तथा ग्रन्थियों या कर्मेन्द्रियों में पहुँचाए जाते हैं। इसके फलस्वरूप व्यक्ति सहज क्रिया कर पाता है। इस प्रक्रिया में ज्ञानेन्द्रिय (sense organ) से सुषुम्ना तथा सुषुम्ना से कर्मेन्द्रियों तक के सभी रास्तों को प्रतिवर्त धनु (reflex arc) कहा जाता है। प्रतिवर्त धनु के उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसके संचालन में शरीर के निम्नांकित छह अंगों की भूमिका प्रधान होती है –

1. ज्ञानेन्द्रिय (Sense organ):
मानव शरीर में कुछ खास-खास अंग हैं जो विभिन्न प्रकार की उत्तेजनाओं को ग्रहण करते हैं। इन अंगों को ज्ञानेन्द्रिय या ग्राहक (receptor) कहा जाता है। व्यक्ति की प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय द्वारा एक विशेष प्रकार की उत्तेजना ग्रहण की जाती है जिसके कारण ही संबंधित उद्दीपण (stimulus) का ज्ञान होता है। जैसे, आँख द्वारा प्रकाश या रोशनी को, कान द्वारा आवाज को, नाक द्वारा गंध को, जीभ द्वारा स्वाद को तथा त्वचा द्वारा स्पर्श को ग्रहण किया जाता है।

2. संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका (Sensory nerve):
ज्ञानेन्द्रिय से सुषुम्ना तथा मस्तिष्क तक आने वाली तंत्रिका को संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका कहा जाता हैं। प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय का संबंध ऐसी तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना से होता है। जब उपयुक्त उद्दीपन (appropriate stimulus) किसी ज्ञानेन्द्रियों को उत्तेजित करता है, तब उसमें तंत्रिका आवेग उत्पन्न होता है जो संबद्ध संवेदी तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है। जैसे, वस्तु से हमारी त्वचा जब छू जाती है तब त्वचा में उत्पन्न तंत्रिका आवेग वेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुबुन्ना में पहुँचता है।

3. साहचर्य तंत्रिका (Association nerve):
साहचर्य तंत्रिका सुषुम्ना तथा मस्तिष्क में पाया जाता है। इसका मुख्य कार्य संवेदी तथा गति तंत्रिकाओं से संबंध स्थापित करना है, क्योंकि कार्यात्मक रूप से इनका एक छोर संवेदी तंत्रिका से तथा दूसरा छोर गति तंत्रिका से मिला होता है। सुषुम्ना इन्हीं के द्वारा प्रतिवर्त क्रियाओं का संचालन करता है। तब तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है तब साहचर्य तंत्रिका उसे सुषुम्ना गतिवाही तंत्रिका (motor nerve) में छोड़ देता है।

4. गतिवाही तंत्रिका (Motor nerve):
गतिवाही तंत्रिका मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को कर्मेन्द्रियों (motor organs) से जोड़ता है। जब सुषुम्ना में साहचर्य तंत्रिका द्वारा तत्रिका आवेग गतिवाही तंत्रिका में छोड़ दिया जाता है, तब गतिवाही तंत्रिका उसे तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना से कर्मेन्द्रियों (मांसपेशियों) तक ले जाता है। फलस्वरूप, सुषुम्ना का आदेश कर्मेन्द्रिय को प्राप्त होता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई अनुक्रिया करता है।

5. कर्मेन्द्रिय (Motor organ):
कर्मेन्द्रियों द्वारा व्यक्ति अनुक्रियाएँ करता है। कर्मेन्द्रियों में सामान्यत: पेशियों एवं ग्रन्थियों को रखा जाता है। इन्हें प्रभावक (effectors) भी कहा जाता है। प्रतिवर्त क्रिया में सुषुम्ना का आदेश इन कर्मेन्द्रियों तक पहुँचता है और व्यक्ति अनुक्रिया कर बैठता है। प्रतिवर्त धनु में इस तरह से शरीर के छह अंगों की क्रियाशीलता होती है जिसे एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मान लिया जाए कि रात्रि में हम कहीं जा रहे हैं।

अचानक कोई व्यक्ति आँख पर टॉर्च से तीव्र रोशनी डालता है। ऐसी परिस्थिति में आँख का पलक स्वतः बंद हो जाएगा जो एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। इस उदाहरण में सर्वप्रथम टॉर्च की रोशनी आँखों पर पड़ती है जिससे आँखें उत्तेजित हो जाती हैं और तंत्रिका आवेग (nerve impulse) उत्पन्न हो जाता है।

यह तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है। सुषुम्ना में स्थित साहचर्य तंत्रिका के द्वारा यह तंत्रिका आवेग गतिवाही या क्रियावाही तंत्रिका में छोड़ दिया जाता है जो इसे आँख एवं पलक की मांसपेशियों (muscles) तक पहुँचा देता है और उसके फलस्वरूप पलक बंद हो जाता है। टॉर्च की रोशनी आँख पर पड़ने के बाद पलक बंद होने की अनुक्रिया इतनी तेजी से होती है कि यह पता नहीं चलता कि इसका संचालन तथा नियंत्रण कहीं से (अर्थात सुषुम्ना से) हो रहा है।

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प्रश्न 8.
सुषुम्ना या मेरुरज्जु की संरचना या बनावट तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) को दो भागों में बाँटा गया है सुषुम्ना (spinal cord) तथा मस्तिष्क (brain):
सुषुम्ना की संरचना-सुषुम्ना रीढ़ की हड्डी, जो कमर से गर्दन तक फैली है, के भीतर उपस्थित होती है। इस हड्डी के भीतर एक तरल पदार्थ भरा होता है जिसमें लगभग 18 इंच लंबा एक मोटा तंतु है। इसे ही सुषुम्ना कहा जाता है। इसका रंग ऊपर से उजला तथा भीतर से धूसर (grey) होता है। ऊपर से नीचे तक सुषुम्ना में कुल 3 भाग (divisions) होते हैं। प्रत्येक भाग से मेरुदण्डीय तंत्रिका (spinal nerves) का एक जोड़ा (pair) निकलता है। इस जोड़े में एक तंत्रिका भाग शरीर के बाएँ भाग से स्नायुप्रवाह आते हैं तथा दूसरी तंत्रिका द्वारा शरीर के दाएँ भाग से स्नायुप्रवाह आते हैं।
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चित्र: सुषुम्ना का कटा हुआ भाग का चित्र

सुषुम्ना को यदि कहीं से काटा जाए, तब इसकी भीतरी संरचना या बनावट एक ही समान दीख पड़ती है। चित्र में सुषुम्ना के एक ऐसे कटे हुए भाग को दिखाया गया है। इस चित्र में गौर करने से यह स्पष्ट हो जाता है। सुषुम्ना के बीच का भाग, जिसका रंग धूसर (grey) होता है, एक तितली के समान होता है। सुषुम्ना के बीच के भाग के चारों तरफ उजला पदार्थ (white matter) होता है जिससे होकर अनेक तंत्रिका तंतु ऊपर से नीचे की ओर और नीचे से ऊपर की ओर आते-जाते दिखाई पड़ते हैं। ऊपर से नीचे आनेवाले तंत्रिका तंतु द्वारा मस्तिष्क से सूचनाएँ सुषुम्ना में आती हैं तथा नीचे से ऊपर जानेवाली तंत्रिका तंतु से सूचनाएँ सुषुम्ना से मस्तिष्क में जाती हैं।

सुषुम्ना द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. तंत्रिका आवेग का संरचण (Transmission of nerve impulse):
सुषुम्ना का प्रधान काम तंत्रिका आवेग का संचरण करना है। ऐसे संचरण के माध्यम से वह मस्तिष्क का संबंध शरीर के अन्य भागों से जोड़ पाता है। संचरण का अर्थ होता है शरीर से आनेवाले तंत्रिका आवेगों को मांसपेशियों तथा ग्रथियों से भेजना। शरीर के भिन्न-भिन्न भागों (सिर एवं गर्दन को छोड़कर) से आनेवाले तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना ग्रहण करता है तथा उसे मस्तिष्क में पहुँचाता है।

फिर मस्तिष्क द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों को भेजी जानेवाली सूचनाओं को सुषुम्ना ग्रहण करता है तथा उपयुक्त अंगों में ले जाने के लिए उन्हें पेशीय या गति न्यूरोन (motor neuron) में छोड़ देता है। इस तरह, सुषुम्ना द्वारा तंत्रिक आवेग के संचरण का कार्य संपन्न होता है।

2. प्रतिवर्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संरचण (Conduct and control of reflex action):
प्रतिवर्त क्रिया का नियंत्रण एवं संचालन भी सुषुम्ना द्वारा किया जाता है। प्रतिवर्त क्रिया से तात्पर्य एक ऐसी जन्मजात, सरल एवं अनैच्छिक (involuntary) क्रिया से होती है जो किसी उद्दीपन के प्रति की जाती है।

जैसे किसी गर्म वस्तु से अंगुली स्पर्श हो जाने से अंगुली. को खींच लेना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। उसी तरह आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने पर पलक बंद होना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रियाएँ इतनी जल्दी हो जाती हैं कि लगता है मानो वे अपने-आप हो गईं। परंतु, सच्चाई यह है कि इसका नियंत्रण एवं संचालन इसी सुषुम्ना द्वारा होता है।

चूँकि सुषुम्ना ऐसी क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण अपने स्तर से मस्तिष्क से मिलनेवाली सूचना के बिना इंतजार किए ही करता है, अतः यह स्वचालित (automatic) होता प्रतीत होता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि सुषुम्ना की संरचना तथा बनावट में थोड़ी जटिलता है तथा इसके द्वारा तंत्रिका आवेगों का संचरण तथा प्रतिवर्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संचालन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं।

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प्रश्न 9.
वृहत मस्तिष्क की बनावट और क्रियाओं का वर्णन करें।
Or, मानव वृहत मस्तिष्क की ज्ञानवाही एवं गतिवाही क्रियाओं की व्याख्या कीजिए।
Or, प्रमस्तिष्क की बनावट या कार्यवाही की व्याख्या करें।
उत्तर:
वृहत मस्तिष्क बल्क (Cerebral Cortex) मनुष्य मस्तिष्क का सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख भाग मस्तिष्क है जिसे मस्तिष्क बल्क (Cerebral Cortex) भी कहते हैं। हमारी सभी चेतन क्रियाओं का संचालन और विभिन्न मानसिक अनुभवों का नियंत्रण प्रमस्तिष्क के ही द्वारा होता है। उदाहरणार्थ, प्रत्यक्षण, सोचना, विचारना, तर्क करना, कल्पना करना आदि हमारी सभी मानसिक क्रियाओं का संचालन प्रमस्तिष्क का उद्गम स्थान है। ऊपर की सतह को देखने से मस्तिष्क का यह भाग कहीं दबा हुआ तो कहीं उभरा हुआ मालूम होता है।

दबे हुए भाग को दरार या फिसर या सलकस (Fissure or Sulcus) कहते हैं। इस तरह के दो दबे हुए भागों के बीच के भाग को ‘गाइरस’ (Gyrus) की संज्ञा दी जाती है। उभरे हुए भागों को रीजेज (Ridges) कहते हैं। कोर्टेक्स की दरारें या फिसर दो भागों में बँटती हैं। दो भागों में बाँटने वाली लम्बी दरार का नाम रोलैण्डो या मध्य दरार (Rolando or central) है। एक दूसरी दरार या फिसर भी है, जिसे सिलभीयस (Fissure or Sylvius) की दरार कहते हैं। इन दरारों द्वारा कोर्टेक्स चार भागों में बँटा है –

  1. पृष्ठ पालि (Occipital lobe)
  2. मध्यपालि (Pariental lobe)
  3. अग्र-पालि (Frontal lobe) तथा
  4. शंख पालि (Temporal lobe)

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चित्र: प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

वृहत मस्तिष्क के विभिन्न भागों के कार्यों को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. संवेदी कार्य (Sensory functions)
  2. पेशीय कार्य (Motor functions) तथा
  3. साहचर्यात्मक कार्य (Associative functions)

इन तीनों प्रकार के कार्यों का संचालन एवं नियंत्रण प्रमस्तिष्क के कुछ खास केन्द्रों के द्वारा होता है।

(I) मस्तिष्क द्वारा संचालित ज्ञानात्मक क्रियाएँ (Sensory functions of the cortex):
किसी भी उद्दीपन का ज्ञान होने के पीछे कुछ खास क्रियाएँ होती हैं। सबसे पहले उद्दीपन किसी ज्ञानेन्द्रिय के सहारे ग्रहण किया जाता है। फलतः ज्ञानेन्द्रिय तंत्रिका आवेग उत्पन्न होता है। यह तंत्रिका आवेग जब किसी खास तरह की तंत्रियों के सहारे वृहत मस्तिष्क या प्रमस्तिष्क के किसी भाग में पहुँचता है तो प्रमस्तिष्क के सहारे उस उद्दीपन का संवदेन और ज्ञान होता है। इस प्रकार किसी भी उद्दीपन का ज्ञान प्रमस्तिष्क के द्वारा ही होता है।

प्राणी के वर्तमान सम्पूर्ण ज्ञानात्मक अनुभवों को तीन वर्गों में रखा गया है –

(क) शारीरिक परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न अनुभव जिसके अन्तर्गत ताप, स्पर्श एवं शारीरिक गति का अनुभव रखा गया है।
(ख) दृष्टि-सम्बन्धी अनुभव, जैसे-रंग को देखना या रंगों को ठीक से नहीं पहचानना आदि।
(ग) श्रवण-सम्बन्धी अनुभव (Auditory Sensitivity), जैसे-ठीक से सुनना या सुनने में कमजोरी आदि।

इन तीन वर्गों का ज्ञानात्मक अनुभव या आधार-स्थान भी मस्तिष्क में अलग-अलग पाया गया है। उदाहरणार्थ, शारीरिक परिवर्तन में उत्पन्न अनुभव का आधार मस्तिष्क का वह भाग है जो रोलैण्डों के फीसर के ठीक पीछे पैरीटल कौर्टेक्स में स्थित है। शरीर के विभिन्न भागों की त्वचा में स्थित ग्राहक कोशों से चलकर जो स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क के इस भाग में पहुँचते हैं वे हममें ताप एवं स्पर्श के अनुभव को उत्पन्न करते हैं। साथ ही साथ, शारीरिक अंगों के संचालन से उत्पन्न अनुभव की भी आधारशिला पैरीटल कौर्टेक्स का वही भाग है जो रोलैंडो के ठीक पीछे है। पैरीटल कौर्टेक्स के इस भाग को हम सोमेस्थेटिक (Somesthetic) भाग कहते हैं।

सोमेस्थेटिक भाग के कार्य –

1.  सोमेस्थेटिक भाग ताप एवं स्पर्श की संवेदनाओं का नियंत्रण एवं संचालन करता है। पीड़ा के अनुभव के लिए कौर्टेक्स का नहीं, बल्कि थैलेमस की आवश्यकता होती है।

2. दाहिने सोमेस्थेटिक भाग के द्वारा शरीर के बायें भाग में उत्पन्न ताप एवं गति के अनुभव नित्रित एवं संचालित होते हैं। बायें सोमेस्थेटिक भाग का सम्बन्ध शरीर के बायें भाग से रहता है।

3. त्वचा सम्बन्धी उत्तेजनाओं की शक्ति के लिए कौर्टेक्स की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कि थैलेमस की है, कारण कि थैलेमस में इतनी सामर्थ्य है कि वह त्वचा सम्बन्धी संवेदनाओं को उत्पन्न, नियंत्रण एवं संचालित कर सकता है। इसलिए असाधारण स्थिति में कौर्टेक्स का सहयोग त्वचा संबंधी संवेदना की उत्पत्ति एवं नियंत्रण में रहते हुए भी इसके अभाव से उनकी उत्पत्ति एवं नियंत्रण में किसी प्रकार की बाधा नहीं होती है।

4. दृष्टि सम्बन्धी संवेदना प्रमस्तिष्क की पृष्ठ-पालि के द्वारा होती है। यही कारण है कि पृष्ठ-पालि को दृष्टि-संवेदन क्षेत्र कहा गया है। आँख में आनेवाले तंत्रिका आवेग प्रमस्तिष्क के इसी खण्ड से आते हैं जिनके फलस्वरूप हमें दृष्टि संबंधी प्रेरणा होती है। पृष्ठ-पालि के दो भाग हैं-बायाँ भाग और दाहिना भाग। दोनों आँखों में बायीं ओर आने वाला तंत्रिका आवेग पृष्ठ-पालि के बायें भाग में जाता है और दोनों आँखों की दाहिनी ओर से उत्पन्न तंत्रिका आवेग पृष्ठ-पालि के दाहिने भाग में जाता है।

अतः पृष्ठ-पालि का यदि कोई एक भाग क्षतिग्रस्त हो जाय तो दोनों आँखों की आधी रोशनी समाप्त हो जायेगी। पेनफील्ड एवं इरीक्शन महोदय ने अपने प्रयोग द्वारा मस्तिष्क के दृष्टि भाग और दृष्टि सम्बन्धी अनुभवों के बीच स्पष्ट सम्बन्ध दिखलाया है। एक औरत जिसका दृष्टि भाग कौर्टेक्स को चीर-फाड़ के लिए खोला गया था, उसके उस दृष्टि भाग के विभिन्न हिस्सों पर बिजली से उत्तेजनाएँ हो गयीं। इस प्रकार उन हिस्सों को बिजली द्वारा उत्तेजित किये जाने पर औरत ने लाल, नीले आदि रंगों के अनुभव को प्राप्त किया। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कोर्टेक्स की दृष्टि भाग का सम्बन्ध दृष्टि सम्बन्धी अनुभवों से है।

5. श्रवण:
सम्बन्धी अनुभवों का आधार मस्तिष्क की शंख-पालि (Temporal lobe) है। यही कारण है कि इसे मस्तिष्क का श्रवण-संवेदी क्षेत्र भी कहते हैं। यह शंख-पालि दो भागों में बँटी रहती है, किन्तु प्रत्येक भाग में दोनों कानों से तंत्रिका आवेग पहुँचते हैं। इसलिए शंख पालि के किसी एक भाग के क्षतिग्रस्त होने से श्रवण सम्बन्धी संवेदना में कुछ कमी आ जाती है। किन्तु, इससे व्यक्ति पूर्णतः बहरा नहीं हो जाता है। जबकि शंख पालि के दोनों भागों के क्षतिग्रस्त हो जाने पर व्यक्ति पूर्णतः बहरा हो जाता है।

(II) कौटॅक्स द्वारा नियंत्रित एवं संचालित गतिवाही क्रियाएँ (Motor functions of the cortex):
मनुष्यों के गतिवाही क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण रौलेंडो दरार (Fissure of Rolando) के अग्र भाग से लगे पतले से लम्बे भाग द्वारा होता है। इन कोशों से लगे हुए मुख्य तंतु (Axon) होते हैं। पिरामिड की शक्ल के इन कोशों को अगर नष्ट कर दिया जाता है तो वे मुख्य तंतु जो बिल्कुल इनसे सटे रहते हैं, मरने लगते हैं। ऐसे मरे हुए स्नायु तंतु सुषुम्ना एवं सुषुम्नाशीर्ष में भी पाये जाते हैं। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि पिरामिड की शक्ल के जीव कोशों का सम्बन्ध सुषुम्ना एवं सुषुम्ना शीर्ष में पाये जानेवाले स्नायु-तंतुओं से भी है।

मस्तिष्क के दायें अर्द्धखण्ड में स्थित गतिवाही क्षेत्र (Motor area) के नष्ट होने से शरीर के बायें अंग में होने वाली ऐच्छिक क्रियाओं में ह्रास देखा जाता है। इसी प्रकार दायें अंगों में होनेवाली ऐच्छिक क्रियाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस प्रकार क्रियाओं का संचालन सहज धनु ही करता है। जिसके लिए वर्तमान सभी शारीरिक अवयव, जैसे-ग्राहक इन्द्रिय ज्ञानवाही स्नायु कोश, सुषुम्ना, गतिवाही स्नायु कोष, मांसपेशियाँ एवं पिंड अपने कार्यों के बिना किसी रुकावट के करतें ‘घाये जाते हैं। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि मस्तिष्क के गतिवाही क्षेत्रों को नष्ट कर देने पर कुछ क्रियाओं का सम्पन्न होना बिल्कुल असम्भव-सा हो गया है। किन्तु व्यक्ति में यह अवस्था बहुत दिनों तक नहीं रहती है। धीरे-धीरे ऐसा होता है कि विनष्ट भाग के निकट जीव-कोष नष्ट हुये जीव कोशों के कार्य-भार को स्वयं ग्रहण कर लेते हैं, जिससे वे असम्पन्न हुई क्रियाएँ भी सम्पन्न होने लगती हैं।

मस्तिष्क के गतिवाही क्षेत्रों को जब बिजली द्वारा उत्तेजित किया गया तो इससे निम्नलिखित परिणाम निकले –

(क) जब मस्तिष्क के ऊपरी गतिवाही क्षेत्रों को उत्तेजित किया जाता है तो शरीर के निचले अंगों में क्रियाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। दाहिने अर्द्ध-मस्तिष्क के ऊपरी भाग की सहायता से शरीर के बायें हिस्से के निचले अंगों की क्रियाओं का संचालन होता है तथा बायें अर्द्ध-मस्तिष्क के ऊपरी भाग की सहायता से शरीर के दाहिने भाग के अंगों का संचालन एवं नियंत्रण होता है।

(ख) मस्तिष्क के निचले भाग का गतिवाही क्षेत्र चेहरे से सम्बन्धित रहता है। अतः इसके उत्तेजित किये जाने पर चेहरा का फड़कना, मुँह का खुलना और बन्द हो जाना आदि क्रियाएँ शुरू हो जाती हैं। ऊपर के वर्णन से यह स्पष्ट है कि दाहिने गतिवाही क्षेत्र का सम्बन्ध शरीर के बायें भाग से और बायें गतिवाही क्षेत्र का सम्बन्ध शरीर के दाहिने भाग से रहता है। साथ ही साथ ऊपरी गतिवाही क्षेत्रों का सम्बन्ध शरीर के निचले अंगों से और निचले गतिवाही क्षेत्रों का सम्बन्ध शरीर के ऊपरी भागों से रहता है।

(III) कौटॅक्स द्वारा सम्पादित एवं नियंत्रित साहचर्य क्रियाएँ (Associative functions of the cortex):
प्रामाणिक अग्रपालि (Frontal lobe) में जो बड़ा-सा क्षेत्र पाया जाता है उसका कार्य हमारे उच्च मानसिक प्रक्रमों के सम्पादन में सहायता करता है। कौर्टेक्स के विभिन्न भाग जटिल मानसिक-क्रियाओं का सम्पादन करते हैं। पढ़ने के बाद समझने की क्रिया का सम्पादन दृष्टि साहचर्य भाग (Visual associative area) करता है, सार्थक रूप से बोलने और लिखने की क्रिया का सम्पादन गतिवाही साहचर्य (frontal association) करता है।

इस सभी भागों में किसी एक भाग को ही अगर नष्ट कर दिया जाय तो उसपर आश्रित क्रियाएँ सम्पादित नहीं हो सकेंगी। अन्य प्रकार की क्रियाओं का सम्पादन बड़ी आसानी से हो जाता है। अत: गतिवाही साहचर्य क्षेत्र के नष्ट करने पर व्यक्ति आवाज पैदा कर सकता है, हाथों में कलम देने पर इधर-उधर चला जा सकता है, परन्तु वह सार्थक शब्द-समूह को नहीं उत्पन्न कर सकता है और न ही कलम से दो-चार-दस शब्द लिख ही सकता है, जिसका कोई अर्थ हो। इस प्रकार साहचर्य भाग के विनाश के साथ-साथ जटिल मानसिक क्रियाओं की सार्थकता भी जाती रहती है।

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प्रश्न 10.
परिधीय स्नायु-मंडल क्या है? इसके कौन-कौन प्रकार हैं?
उत्तर:
स्नायु-मंडल का यह भाग शरीर के परिधीय भागों में रहता है। इसलिए इसे हम परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। यह मस्तिष्क एवं सुषुम्ना से बाहर सीमान्त प्रदेशों या शरीर की परिधि में फैले हुए हैं। इसी कारण शरीर की परिधि में पाये जाने वाले स्नायु कोशों के संगठन को परिधीय स्नायु-मण्डल कहा जाता है। इस स्नायु-मण्डल का सम्बन्ध ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों से रहता है। यह ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों का सम्बन्ध केन्द्रीय स्नायु-मण्डल से ज्ञानवाही एवं क्रियावाही स्नायु-कोशों द्वारा स्थापित करता हैं। इस प्रकार परिधीय स्नायु-मण्डल के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं –

(क) ग्राहकेन्द्रियाँ
(ख) ज्ञानवाही स्नायु-कोश
(ग) कर्मेन्द्रियाँ-माँसपेशियाँ और ग्रन्थियाँ तथा
(घ) गतिवाही स्नायु-कोश

परिधीय स्नायु-मण्डल को उसके कार्यों के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है –

  1. ज्ञानवाही परिधीय.स्नायु-मण्डल
  2. गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल

1. ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल-परिधीय स्नायु-मण्डल के इस भाग का सम्बन्ध शरीर के विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों से रहता है। यह ज्ञानेन्द्रियों का संबंध केन्द्रिय स्नायु-मण्डल से स्थापित करता है। इस बात के स्पष्टीकरण के लिए एक उदाहरण लें। किसी मंदिर में घंटी बजती है। हम उस घंटी की आवाज को कान से सुनते हैं। कान ही आवाज को ग्रहण करते हैं। अतः कान आवाज के ग्राहक हैं। परन्तु इस आवाज का ज्ञान हमें मस्तिष्क से प्राप्त होता है।

कान और मस्तिष्क के बीच ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कार्य करता है। जब कान आवाज को ग्रहण करते हैं तब कान के ग्राहक कोष उत्तेजित हो जाते हैं। फलतः ज्ञानवाही स्नायु-प्रवाह उत्पन्न होते हैं। इस स्नायु-प्रवाह को मस्तिष्क में पहुँचाने का काम ज्ञानवाही स्नायु करता है। इन क्रियाओं के बाद ही हमें मंदिर की घंटी की आवाज का ज्ञान होता है। ज्ञानवाही स्नायु-कोष स्नायु प्रवाहों को ज्ञानेन्द्रियों से मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं इसलिए इसे ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल अन्य ज्ञानेन्द्रियों का भी सम्बन्ध सुषुम्ना और मस्तिष्क के साथ स्थापित करता है।

2. गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल:
परिधीय स्नायु-मण्डल का जो भाग मस्तिष्क एवं सुषुम्ना को कर्मेन्द्रियों तथा मांसपेशियों और ग्रन्थियों से सम्बन्धित करता है उसे हम गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। इस स्नायु-मण्डल का कार्य मस्तिष्क या सुषुम्ना के आदेश को कर्मेन्द्रियों तक पहुँचाना है। इसके ऐसा करने पर ही व्यक्ति कुछ क्रियाएँ करता है। इसे एक उदाहरण की सहायता से हम स्पष्ट कर सकते हैं। मान लीजिए आप पढ़ रहे हैं। कोई व्यक्ति दरवाजा खटखटाता है।

दरवाजा खटखटाने की आवाज को आपके कान ग्रहण करते हैं। ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल द्वारा स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क में पहुँचता है। मस्तिष्क दरवाजा खोलने का आदेश देता है। यह आदेश गतिवाही स्नायु-प्रवाह के रूप में गतिवाही स्नायु-कोश द्वारा मांसपेशियों तथा ग्रन्थियों तक पहुँचता है। तदुपरान्त आप दरवाजा खोलने की क्रिया करते हैं। इस प्रकार गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल द्वारा मस्तिष्क एवं सुषुम्ना के क्रियात्मक आवेग गतिवाही अवयवों, मांसपेशियों और ग्रन्थियों तक पहुँचाये जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप प्रतिक्रियाएँ होती हैं।

परिधीय स्नायु-मण्डल के कुछ ज्ञानवाही और गतिवाही स्नायुओं का कार्य मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध स्थापित कराना है और कुछ को सुषुम्ना के साथ। मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध स्थापित करानेवाले परिधीय स्नायु को मस्तिष्क-स्नायु तथा सुषुम्ना के साथ सम्बन्ध स्थापित करानेवाले परिधीय स्नायु को सुषुम्ना-स्नायु कहते हैं। चूँकि स्नायु कोश पूर्णत: स्वतंत्र होकर कार्य करते हैं अतः परिधीय स्नायुमण्डल को दो भागों में बाँटा गया है –

  1. परिधीय दैहिम स्नायुमंडल तथा
  2. परिधीय स्वतः संचालित स्नायुमण्डल।

परिधीय दैहिक स्नायुमण्डल के स्नायु-कोशों की क्रियाएँ मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों द्वारा संचालित होती हैं। परन्तु ये स्नायु कोश मस्तिष्क एवं सुषुम्ना से बाहर शरीर के परिधीय भागों में स्थित हैं। व्यक्ति को इन स्नायुओं द्वारा होनेवाली समस्त क्रियाओं का ज्ञान होता है। व्यक्ति इन क्रियाओं पर अपना नियंत्रण भी रखता है। ये स्नायु बाहरी वातावरण से सम्बन्धित रहते हैं। प्रत्येक स्नायु कोश स्वतंत्र एवं व्यक्तिगत रूप से कार्य करता है। इसमें ज्ञानवाही तथा गतिवाही दोनों प्रकार के स्नायु रहते हैं।

परिधीय स्वतः
संचालित स्नायु-मण्डल का निर्माण ऐसे स्नायु कोशों से हुआ है जिनकी क्रियाएँ मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों के अधीन नहीं रहती हैं। अत: व्यक्ति को इन स्नायुकोशों द्वारा होनेवाली क्रियाओं का ज्ञान नहीं होता। व्यक्ति का इन पर नियंत्रण भी नहीं रहता है। ये मस्तिष्क और सुषुम्ना के बाहर ही रहते हैं। ये शरीर के आंतरिक वातावरण से सम्बन्धित रहते हैं। इनके स्नायु-कोश सामूहिक रूप से कार्य करते हैं। इसमें केवल गतिवाही स्नायुकोश ही रहते हैं।

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प्रश्न 11.
अन्तःस्रावी ग्रंथि से आप क्या समझते हैं? इसके प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
व्यक्ति के शरीर में कुछ ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं, जिससे स्राव निकलकर सीधे खून में मिल जाते हैं और व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। इस तरह की ग्रंथियों को अंतःस्रावी ग्रंथि तथा इससे निकलने वाले स्राव को हॉरमोन्स कहते हैं। व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाली ग्रंथियों में निम्नलिखित प्रमुख हैं –

1. थाइरॉयड ग्रंथि:
जब ग्रंथि का स्थान कण्ठ के निकट होता है। इससे थाइरॉक्सिन का स्राव होता है। थायरॉयड ग्रंथि से जब स्राव बहुत कम मात्रा में निकलता है तो व्यक्ति में मानसिक मन्दता तथा उदासीनता छा जाती है। जब इससे स्राव अधिक मात्रा में निकलता है तो व्यक्ति अधिक क्रियाशील रहता है। उसका रक्तचाप बढ़ा रहता है, भूख अधिक लगती है, ऐसा व्यक्ति चिड़चिड़ा स्वभाव का हो जाता है।

2. पाराथायरॉयड ग्रंथि:
पारा थायरॉयड ग्रन्थि का स्थान भी कण्ठ के समीप ही रहता है जिसमें चार छोटी-छोटी ग्रंथियों होती हैं। पाराथायरॉयड का स्राव शरीर में कैलसियम की मात्रा को निर्धारित करता है। इस ग्रंथि से अधिक मात्रा में स्राव होता है, जिससे व्यक्ति में शिथिलता बढ़ जाती है तथा कम मात्रा में स्राव होने से तनाव होती है। व्यक्ति में घबराहट होती है तथा चिड़चिड़ा हो जाता है।

3. पिट्यूटरी ग्रंथि:
पिट्यूटरी ग्रंथि का स्थान मस्तिष्क में होता है। यह ग्रंथि शरीर के सभी ग्रंथियों को नियंत्रित करती है, इसीलिए इसे Master gland भी कहा जाता है। यदि किसी बच्चे के पिट्यूटरी ग्रंथि का स्राव कम मात्रा में होता है तो उसका शारीरिक विकास रुक जाता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः बौना रह जाता है। उसमें आलसी के लक्षण विकसित हो जाते हैं तथा यौन अंगों का विकास अवरुद्ध हो जाता है और यदि अधिक मात्रा में स्राव होता है, तो व्यक्ति का कद काफी लम्बा हो जाता है और उसमें क्रियाशीलता अधिक हो जाती है।

4. एड्रिनल ग्रंथि:
एड्रिनल ग्रंथि किडनी के ठीक ऊपर होता है। यह एक महत्त्वपूर्ण ग्र!ि है। इसे Emergency gland भी कहा जाता है। एड्रिनल ग्रंथि से दो प्रकार के स्राव निकल है जिसको कार्टिन तथा एड्रीनलिन कहा जाता है । एड्रीनलिन हमारे शरीर के लिए काफी महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इससे रक्तचाप, हृदय गति, शरीर में रक्त की आपूर्ति अधिक होती है। इसमें संवेग की अवस्था में समायोजन में सहायता मिलती है।

5. गोनाड्स ग्रंथि:
गोनाड्स को यौन-ग्रंथि भी कहा जाता है। यह स्त्रियों और पुरुषों में अलग-अलग होता है। पुरुषों के यौन-ग्रंथि को Testes तथा स्त्रियों के यौन-ग्रंथि को Ovary कहा जाता है। पुरुषों में पुरुषों के गुण तथा स्त्री में स्त्रियों के गुणों का विकास होना इन्हीं ग्रंथियों पर निर्भर करता है। पुरुषों में मूंछों का निकलना, आवाज का मोटा होना तथा स्त्रियों में स्तनों का विकास, जाँघों की गोलाई इसी के स्राव पर निर्भर करता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यवहारवाद की नींव किसने डाली –
(a) वुण्ट
(b) कोहल
(c) वाटसन
(d) मैस्लो
उत्तर:
(c) वाटसन

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प्रश्न 2.
गुणसूत्र किस पदार्थ से बने होते हैं –
(a) जीन
(b) डी एन ए
(c) खत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) डी एन ए

प्रश्न 3.
हमारी आँखों कितनी परतों से बनी होती है –
(a) 1
(b) 2
(c) 3
(d) 4
उत्तर:
(c) 3

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प्रश्न 4.
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई है –
(a) न्यूरोन
(b) कपाल
(c) टेक्टम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) कपाल

प्रश्न 5.
मानव शरीर में कोशों की संख्या है –
(a) लगभग 1 करोड़
(b) लगभग 10 करोड़
(c) लगभग 10 अरब
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) लगभग 10 अरब

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प्रश्न 6.
मानव मस्तिष्क में संधि की संख्या कितनी होती है?
(a) 1 लाख
(b) 1 करोड़
(c) 10 करोड
(d) 1 अरब
उत्तर:
(c) 10 करोड

प्रश्न 7.
कान के नली की लंबाई होती है –
(a) 20 मी०मी०
(b) 25 मी०मी०
(c) 30 मी०मी०
(d) 32 मी०मी०
उत्तर:
(b) 25 मी०मी०

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प्रश्न 8.
आँख में पटलों की संख्या कितनी होती है?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पाँच
उत्तर:
(c) चार

प्रश्न 9.
जो प्रयोग करता है उसे कहा जाता है –
(a) प्रयोगकर्ता
(b) प्रयोग
(c) चर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) प्रयोगकर्ता

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

Bihar Board Class 11 Psychology मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वैज्ञानिक जाँच के लक्ष्य क्या होते हैं?
उत्तर:
अनुभवों, व्यवहारों तथा मानसिक प्रक्रियाओं के माध्यम से अर्जित ज्ञान को मानव-हित में अधिक-से-अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान करना ही वैज्ञानिक जाँच का सार्थक लक्ष्य होना चाहिए। वैज्ञानिक जाँच के लक्ष्य करने के क्रम में प्राप्त सिद्धांतों एवं नियमों के माध्यम से मानव को सुखमय जीवन प्रदान किया जा सकता है।
वैज्ञानिक जाँच के माध्यम से वांछनीय के पाने के लिए निम्नांकित चरणों में सम्पूर्ण प्रक्रिया को समाप्त किया जाता है –

  1. वर्णन
  2. पूर्वकथन
  3. व्याख्या
  4. नियंत्रण और
  5. अनुप्रयोग

1. वर्णन:
किसी निर्धारित विषय से सम्बन्धित समस्याओं से जुड़ी सभी सूचनाओं का सही रूप से संग्रह किया जाता है। चूँकि व्यक्ति के बदलने से व्यवहार बदल जाता है। अर्थात् व्यवहार और अनुभवं अनगिनत होते हैं। शोधकर्ता प्राप्त सूचनाओं के आधार पर व्यवहार और अनुभव का वर्णन उपस्थित करता है।

उदाहरणार्थ विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास चाहने वाले को पता लगाना होता है कि उपस्थिति, वर्ग-कार्य, गृह-कार्य समय और योजना का कार्यान्वयन आदि विद्यार्थी के लिए कितना उचित या अनुचित होता है। विद्यार्थियों से जुड़ी आदतों, नियमों, व्यवहारों, विचारों को प्रतिशत रूप में प्रस्तुत करके उनका अध्ययन किया जाता है। प्रस्तुत विवरण में व्यवहार विशेष का उल्लेख आवश्यक होता है, जो उसको समझने में सहायता करता है।

2. पूर्वकथन:
वैज्ञानिक जाँच के प्रथम चरण (वर्णन) से प्राप्त जानकारियों के आधार पर से जुड़े अन्य व्यवहारों, घटनाओं अथवा गोचरों से सम्बन्ध के सूक्ष्म अध्ययन से पता किया जा सकता है कि परिणाम अच्छा होगा या बुरा, दोषरहित व्यवहार के लिए क्या परिवर्तन करना। चाहिए। समय, आदत, योजना, स्थिति में से किस दशा में अंतर लाने की गुंजाइश तथा आवश्यकता है।

उदाहरणार्थ, समय और कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए यदि कोई छात्र अध्ययन के लिए अच्छी व्यवस्था के अधीन जिज्ञासु बनकर पढ़ता है तो विश्वास से कहा जा सकता है कि वह परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करेगा। अधिक-से-अधिक लोगों का प्रेक्षण किए जाने पर पूर्वकथन के सत्य प्रमाणित होने की आशा बढ़ जाती है।

3. व्याख्या:
प्रदत्त सूचनाओं के आधार पर प्रस्तुत किये गये पूर्वकथन के कारणों तथा सत्य होने की आशा पर आवश्यक ध्यान दिया जाता है। किसी भी व्यवहार के कारणों तथा प्रेरक कारकों के लक्ष्यों का अध्ययन करके पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि पूर्वकथन कितना प्रतिशत सही होगा। उदाहरणार्थ, भय या दंड से प्रभाव छात्र परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करेगा ही, इसमें संदेह है। पूर्वकथनों की व्याख्या करने अथवा पहचान करने में कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करना होता है। जैसे, उचित नियंत्रण तथा साधन, समय, प्रवृत्ति, आदत में उत्पन्न दोष के कारण कोई छात्र बार-बार असफल होता रहता है।

4. नियंत्रण:
प्राप्त सूचनाओं के आधार पर प्राप्त पूर्वकथन की व्याख्या से पता लग जाता है कि प्रकार्य के किस अंश में परिवर्तित की आवश्यकता है। किसी कार्य के प्रति उत्पन्न व्यवहार को मनोनुकूल स्थिति में लाकर को नियंत्रित किया जा सकता है। व्यवहार के नियंत्रण के लिए –
(क) उसे पूर्ववत दशा में रख जाता है या
(ख) उसे वर्तमान दाशा में बढ़ाया जाता है अथवा
(ग) उसकी तीव्रता में कमी लाया जाता है
उदाहरणार्थ, किसी छात्र के अध्ययन का समय बढ़ाकर उसे सफलता का हकदार बनाया जा सकता है। औषधि एवं सेवा में अंतर लाकर किसी रोगी का अच्छा उपचार किया जा सकता है।

5. अनुप्रयोग:
वैज्ञानिक जाँच का अंतिम लक्ष्य लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। वैज्ञानिक जाँच नए सिद्धांतों अथवा विसंगतियों का पता लगाकर उनमें सुधार या विकास करके मानव-हित में प्रयुक्त करता है। जैसे, यह पता लग चुका है कि योग अथवा ध्यान से मनुष्य को रोगमुक्त या चिंतामुक्त बनाया जा सकता है। कार्यस्थल तथा साधनों के विकास के द्वारा कार्यकर्ता की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

प्रश्न 2.
वैज्ञानिक जाँच करने में अंतर्निहित विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैज्ञानिक विधि में किसी घटना विशेष अथवा गोचर की जाँच के लिए उसे तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है –

(क) वस्तुनिष्ठ:
वैसी घटना, जिसकी माप प्रेक्षणकर्ता के बदलने पर भी अंतर रहे। जैसे किसी बाँस की लम्बाई यदि 2 मीटर है तो कोई भी नापकर 2 मीटर लम्बा ही बतायेगा।

(अ) व्यवस्थित:
किसी घटना विशेष या गोचर की जाँच निर्धारित चरणों में निश्चित क्रम को बनाये रखते हुए पूरा करते हैं।

(ग) परीक्षण:
वैज्ञानिक जाँच की सफलता उसके बार-बार प्रयोग करने पर समान परिणाम के मिलने पर निर्भर करता है। वैज्ञानिक जाँच करने में क्रमबद्ध यानी निश्चित चरणों में जाँच पूरा करना, सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। वैज्ञानिक जाँच के लिए चार वांछनीय चरण निम्नवत हैं –
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(क) समस्या का संप्रत्ययन:
वैज्ञानिक जाँच के लिए सर्वप्रथम अध्ययन के लिए एक निश्चित कथ्य या विषय का निर्धारण करता है। अभीष्ट विषय के सम्बन्ध में अधिक-से-अधिक गुण-अवगुण, लक्षण, विशेषता, अनुक्रिया आदि का पता लगाता है जिससे निर्धारित समस्या का वैसा प्रश्न सामने आता है जिसके द्वारा, जिसके लिए जाँच प्रारम्भ किया जाता है जिसमें अर्जित ज्ञान, पूर्व में किए गए जाँच परिणाम, समीक्षा, अनुभव आदि का भरपूर उपयोग किया जाता है।

समस्या के निर्धारण और पहचान के बाद शोधकर्ता अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर समस्या के समाधान का एक सुलभ विधि की कल्पना करता है। शोधकर्ता की परिकल्पना एक ठोस निर्णय की स्थिति की खोज में जुट जाता है।

उदाहरणार्थ, शोधकर्ता दूरदर्शन को विषय मानकर यह सोच लेता है कि आज जो भी अप्रिय घटनाएँ (लूट, बैंक कांड, हत्या, अपहरण, बलात्कार) होती हैं वे दूरदर्शन के कार्यक्रमों का दुष्परिणाम है। टेलीविजन पर हिंसा के दृश्यों को देखकर बच्चों में आक्रामकता आती है। शोधकर्ता की इस प्रकार की समझ को परिकल्पना कह सकते हैं जिसे गलत या सही प्रमाणित करने के लिए शोध कार्य को आगे बढ़ाया जाता है।

(ख) प्रदत्त-संग्रह:
निर्धारित विषय के सम्बन्ध में प्रस्तुत की गई परिकल्पना की परख के लिए चार पहलुओं पर विचार करके उचित निर्णय लिया जाता है।

1. अध्ययन के प्रतिभागी:
सूचना उपलब्ध कराने वाले प्रतिभागी (छात्र, अध्यापक, कर्मचारी, संगठन) की पहचान उम्र, कार्य, पेशा, स्थिति आदि दृष्टिकोण से की जाती है। पता लगाया जाता है कि दी गई सूचना लोभ, द्वेष, प्रेम या पक्षपात पर आधारित तो नहीं है। भावना में बहकर दी गई सूचना प्रायः गलत होती है।

2. प्रदत्त संग्रह से सम्बन्धित विधियाँ:
समस्या के समाधन के लिए उचित विधि का उपयोग किया जाता है जिसके अन्तर्गत प्रेक्षण विधि, प्रायोगिक विधि, सहसंबंधात्मक विधि, व्यक्ति अध्ययन आदि प्रमुख हैं।

3. उपकरण:
उचित विधियों से परिणाम पाने के लिए तरह-तरह के साधनों (मानचित्र, शब्दचित्र, आँकड़ा, प्रश्नावली, साक्षात्कार, प्रेक्षण अनुसूची आदि) की मदद लेनी होती है।

4. प्रदत्त संग्रह की प्रक्रिया:
समस्या के लक्षणों के अनुरूप विभिन्न विधियों और साधनों के प्रयोग से अधिकतम जानकारी प्राप्त की जाती है। इस क्रम में शोधकर्ता निर्णय लेता है कि विधियों और उपकरणों का किस प्रकार वैयक्तिक या सामूहिक उपयोग में लाया जाना हितकर होगा।

(ग) निष्कर्ष निकालना:
सही सूचनाओं के संग्रह एवं परिकल्पना की सहायता से सांख्यिकी से जुड़े चित्रालेख या वृत्तखंड या दंड आरेख, तोरण तैयार किया जाता है। सांख्यिकी विधियों के उपयोग से प्रदत्त-संग्रह का अध्ययन एवं दृष्टि में पूरा करके उचित निष्कर्ष निकाला जाता है। सांख्यिकीय विधियों से सूचनाओं का विश्लेषण का उद्देश्य परिकल्पना की जाँच करके तदनुसार निष्कर्ष निकालना है।

(घ) शोध निष्कर्षों का पुनरीक्षण:
निर्धारित विषय से सम्बन्धित परिकल्पना, प्रदत्त संग्रह और ज्ञात निष्कर्ष का उपयोग भिन्न-भिन्न स्थानों एवं दशाओं में दुहराकर निष्कर्ष की सत्यता को परखा जाता है। नकारात्मक परिणाम मिलने पर पुनः वैकल्पिक परिकल्पना तथा सिद्धांत को स्थापित करके सही निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है। उदाहरणार्थ, यदि टेलीविजन देखने वाले बच्चों में कुछ आक्रामक नहीं बनते हैं तो परिकल्पना असत्य मान लिया जाता है। अनुसंधान और परीक्षण की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है चाहे शोधकर्ता बदल भी जाये। नया शोधकर्ता प्रमाणित निष्कर्षों को आगे की जाँच का आधार बना लेता है।

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प्रश्न 3.
मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों के स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मानवीय व्यवहार, अनुभव और मानसिक प्रक्रियाओं का उपयोगी अध्ययन पर आधारित मनोवैज्ञानिक दार्शनिक अध्ययन के क्रम में मानव चेतना, स्व, मन-शरीर के सम्बन्ध, संज्ञान, प्रत्यक्षण, श्रम, अवधान, तर्कना आदि की समुचित परख में करने में सक्षम है। मनोविज्ञान की सफलता एवं विकास मानवीय खोजों पर आधारित होती हैं। मनोवैज्ञानिक विविध स्रोतों से भिन्न-भिन्न विधियों द्वारा अपनी समस्या से सम्बन्धित सूचनाओं अथवा प्रदत्तों का संग्रह करता है।

मनोवैज्ञानिक प्रदत्त (सामान्यतया सूचना) व्यक्तियों अव्यक्त अथवा व्यक्त व्यवहारों, आत्मपरक अनुभवों एवं मानसिक प्रक्रियाओं से जुड़ी होती हैं। ज्ञात है कि प्रदत्त कोई स्वतंत्र सत्व नहीं होते हैं बल्कि वे एक संदर्भ में प्राप्त किए जाते हैं जो निश्चित नियम या सिद्धांत के अनुसार कार्य करते हैं। कोई व्यक्ति दशा परिवर्तन के साथ-साथ अपनी शारीरिक प्रदर्शन में भी अंतर ला देता है। जैसे शादी के लिए दिखलाई जानेवाली एक लड़की नम्र स्वभाव वाली, संकोची कन्या की तरह साड़ी में लिपटी हुई देखी जाती है जबकि वह सामान्य जिन्दगी में पैंट-शर्ट पहनकर डिस्को करती है।

मानव-हित में हम मनोविज्ञान से सम्बन्धित तरह-तरह की सूचनाओं (प्रदत्तों) का संग्रह कर उसका सामूहिक अध्ययन करके उचित निष्कर्ष निकालते हैं। मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों (सूचनाओं) के अलग-अलग स्वरूप होते हैं जो निम्न वर्णित हैं –

  1. जनांकिकीय
  2. भौतिक
  3. दैहिक
  4. मनोवैज्ञानिक

1. जनांकिकीय सूचनाएँ:
व्यक्तिगत सूचनाओं (नाम, आयु, लिंग, जन्मक्रम, सहोदरों की संख्या, शिक्षा, व्यवसाय, वैवाहिक स्थिति, बच्चों की संख्या, आवास की भौगोलिक स्थिति, जाति, धर्म, माता-पिता की शिक्षा और व्यवसाय, परिवार की आय आदि) को जनांकिकीय सूचना माना जाता है।

2. भौतिक सूचनाएँ:
भौतिक सूचनाओं का सम्बन्ध पारिस्थितिक सम्बन्धी जानकारियों से है। इसके अन्तर्गत क्षेत्र (पहाड़ी, रेगिस्तानी, जंगली, तराई आदि) आर्थिक दशा, आवास की दशा, शैक्षणिक एवं सामाजिक स्थितियों (विद्यालय, पड़ोस से सम्बन्ध) यातायात के साधन आदि से सम्बन्धित सूचनाएँ ली जाती हैं।

3. दैहिक सूचनाएँ (प्रदत्त):
किसी व्यक्ति के शरीर की रचना (रक्त, तापमान, त्वचा, मस्तिष्क की संरचना) के सम्बन्ध में सभी जानकारियाँ ली जाती हैं। कोई व्यक्ति कितना उछल सकता है? कितना दौड़ सकता है? उसके रक्त में कितना हिमोग्लोबिन है? वह कितना सोता है? वह कैसा स्वप्न देखता है? उसे कितना क्रोध, धैर्य, प्रतिरोध क्षमता, सहन शक्ति है? क्या वह लार की मात्रा से परेशान रहता है? इस प्रकार के दैहिक स्थिति को बतलाने वाली सूचनाओं को दैहिक प्रदत्त माना जाता है।

4. मनोवैज्ञानिक सूचनाएँ:
बुद्धि, परत्युत्पन्नमति, रुचि, सर्जनशीलता, अभिप्रेरणा, वैचारिक, विकार, भ्रम, चिन्ता, अवसाद बोधन, प्रत्यक्षिक निर्णय, चिंतन प्रतिक्रियाएँ, चेतना, व्यक्तिपरक अनुपात आदि की जानकारी मनोवैज्ञानिक सूचना के अधीन माने जाते हैं।

मापन की दृष्टि से मनोवैज्ञानिक प्रदत्त को श्रेणियों (उच्च/निम्न, हाँ/नहीं) के रूप में कोटियों (प्रथम, द्वितीय) के रूप में लब्धांकों (15, 20, 30, 40,60) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक प्रदत्त से वाचिक आख्याएँ, प्रक्षेपण अभिलेख, व्यक्तिगत दैनिकी क्षेत्र टिप्पणियाँ, पुरालेखीय प्रदत्त आदि भी उपलब्ध हो सकते हैं।

मनोवैज्ञानिक प्रदत्त के स्वरूप इस तरह के होते हैं कि उनके उपयोग में गुणात्मक विधि का प्रयोग किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों का पृथक रूप से विश्लेषण करना संभव होता है। इन सभी स्वरूपों की सहायता से किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में लगभग पूरी जानकारी मिल जाती है।

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प्रश्न 4.
प्रायोगिक तथा नियंत्रित समूह एक-दूसरे से कैसे भिन्न होते हैं? एक उदाहरण की सहायता से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रायोगिक समूह में समूह सदस्यों को अनाश्रित परिवर्त्य प्रहस्तन के लिए प्रस्तुत किया जाता है जबकि नियंत्रित समूह प्रायोगिक समूह के सफल संचालन हेतु वांछनीय कारक जुटाने का कार्य करते हुए मात्र एक तुलना समूह बनकर जो प्रहस्तित परिवर्त्य से स्वयं को स्वतंत्र, रखता है। उदाहरणार्थ घटनास्थ अपने आपको अकेला पाकर स्वयं के निर्णय के आधार पर कार्य करना. नियंत्रित समूह के अन्तर्गत माना जाता है जबकि किसी अन्य की उपस्थिति में स्वयं के कुछ करने से रोक लेने की स्थिति प्रायोगिक समूह माना जाता है।

नियंत्रित समूह के निस्पादन की तुलना प्रायोगिक समूह से की जाती है। नियंत्रित समूह से प्राप्त परिणामों की गणना करने पर वह प्रायोगिक समूह से अधिक प्रभावकारी पाया जाता है। किसी प्रयोग से संबद्ध परिवों को नियंत्रित रखकर ही वांछनीय फल प्राप्त किया जाता है जिसके लिए आश्रित परिवर्त्य ही प्रभाव में रखा जाता है। जैसे किसी एक ही कक्षा के छात्रों पर शिक्षण कार्य का प्रभाव अलग-अलग पाया जाना बतलाता है कि जिन छात्रों पर विशिष्ट कारकों (शोर-गुल, गर्मी, नटखट साथी, मन का भटकना, ललक की कमी) का प्रभाव पड़ रहा हो, उसे शिक्षण कार्य से कम लाभ मिलता है।

प्रायः बहुत नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में प्रयोग किये जाते हैं तथा दो घटनाओं या परिवों के मध्य कार्य-करण संबंध स्थापित करके किसी एक कारक में परिवर्तन लाकर अन्य अचर कारकों पर प्रभाव का अध्ययन करते हैं। अनुसंधानकर्ता दो परिवर्त्य के मध्य संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। प्रायोगिक दशा में अनाश्रित परिवयों को कारण माना जाता है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव के अधीन माना जाता है। प्रायोगिक अध्ययनों में सभी संबद्ध सार्थक परिवर्त्य को नियंत्रण में रखना होता है ताकि अच्छा परिणाम प्राप्त हो।

उदाहरणार्थ:
तापमान के नियंत्रण के लिए पंखा, कूलर, ए.सी. का उपयोग किया जाता है। वाद्य साधनों पर रोक लगाकर ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित रखा जा सकता है। सड़कों पर ठोकरों की ऊँचाई एवं संख्या बढ़ाकर वेतहासा भागती गाड़ी की चाल को नियंत्रित किया जा सकता है। इस प्रकार माना जा सकता है कि लाभकारी परिणाम देने के लिए प्रायोगिक समूह-उत्तरदायी होता है जबकि परिणाम को यथाशीघ्र सुधरे स्वरूप में प्रदान करने की स्थिति नियंत्रित समूह उत्पन्न करता है।

उदाहरणार्थ एक सभा संचालन की स्थिति ली जाए तो वक्ता अपने कथन से श्रोता को तभी लाभ पहुँचा सकता है जब भीड़ नियंत्रित हो, वे अनुशासित रहें, विद्युत व्यवस्था सही हो, शान्ति बनाकर रखी जाए। नियंत्रण समूह में परिवयों का निरसन, प्राणिगत परित्वों के साथ प्रयोग-स्थल तथा प्रयोगकर्ता के विचार आदि को प्रमुख स्थान मिला है। सारांशतः माना जाता है कि प्रायोगिक विधि कार्य-कारण सम्बन्ध की स्थापना करती है। प्रायोगिक एवं नियंत्रण समूह का उपयोग करके अनाश्रित परिवों की उपस्थिति का प्रभाव आश्रित परिवर्त्य पर देखा जाता है।

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प्रश्न 5.
एक अनुसंधानकर्ता साइकिल चलाने की गति एवं लोगों की उपस्थिति के मध्य संबंध का अध्ययन कर रहा है। एक उपयुक्त परिकल्पना का निर्माण कीजिए तथा अनाश्रित एवं आश्रित परिवों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक अध्ययन के क्रम में कोई अनुसंधानकर्ता कम-से-कम परिवयों के मध्य संबंध स्थापित करके सह संबंधात्मक अनुसंधान के परिणाम के रूप में उपयुक्त परिकल्पना का निर्माण करता है। दी गई स्थिति में साइकिल चलाने की गति पर लोगों की उपस्थिति के मध्य सम्बन्ध जोड़ने की बात कही गई है।

अनेक बार के प्रेक्षण के आधार पर एक परिकल्पना प्रस्तुत की जाती है जिसके अनुसार, “लोगों की उपस्थिति के दर बढ़ते जाने पर साइकिल चलाने की गति घटती जाती है, क्योंकि भीड़ के बढ़ने के फलस्वरूप पथ अवरोधी स्थिति में आ जाता है।” अनुसंधन की इस दशा को ऋणात्मक सहसम्बन्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है जिसमें एक परिवर्त्य (x) का मान बढ़ने से दूसरे अपवर्त्य () का मान कम हो जाता है।

साइकिल की गति और जुटने वाली भीड़ को क्रमशः आश्रित और अनाश्रित परिवर्त्य माना जा सकता है। प्रायोगिक दशा में अनाश्रित परिवर्त्य कारण होता है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव को माना जाता है। यह भी माना जाता है कि आश्रित परिवर्त्य से उस गोचर का बोध होता है जिसकी अनुसंधानकर्ता व्याख्या करना चाहता है जो मात्र अनाश्रित परिवर्त्य में परिवर्तन के परिणामस्वरूप व्यवहार में आनेवाला परिवर्तन मात्र है। इस आधार पर साइकिल की गति आश्रित परिवर्त्य तथा परिवर्तन के कारण का कारक लोगों की उपस्थिति अनाश्रित परिवर्त्य माना जा सकता है।

प्रश्न 6.
जाँच की विधि के रूप में प्रायोगिक विधि के गुणों एवं अवगुणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जाँच की विधि के रूप में प्रायोगिक विधि सतर्कतापूर्वक संचालित प्रक्रिया पर आधारित भिन्न-भिन्न प्रयोग के कारण सुपरिणामी माने जाते हैं। नियंत्रित दशा में दो घटनाओं या परित्वों के मध्य कार्य-कारण संबंध स्थापित करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। प्रयोग में एक कारक में ऐच्छिक परिवर्तन लाकर दूसरे कारक पर पड़नेवाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है जबकि अन्य संबंधित कारक स्थिर रखे जाते हैं।
प्रायोगिक विधि अपने साथ कुछ गुणों तथा कुछ अवगुणों को साथ लेकर चलती है।

प्रायोगिक विधि के गुण:

  1. वैज्ञानिक विधि – सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन करने में प्रायोगिक विधि क्रमबद्धता पर अधिक ध्यान देता है।
  2. नियंत्रक – यह प्रयोग की तीव्रता को प्रदूषण मुक्त रखता है तथा उसे अव्यावहारिक होने से बचाता है।
  3. वस्तुनिष्ठता – प्रायोगिक विधि द्वारा प्राप्त सभी प्रदत्त वस्तुनिष्ठ तथा पूर्वधारणा मक्त होते हैं।
  4. सहजता – प्रायोगिक विधि से प्राप्त परिणामों को सांख्यिकीय निरूपण के माध्यम से तुलनात्मक अध्ययन के लिए सहज माना जाता है।
  5. अनुसंधानकर्ता के लिए रुचिकर – अनुसंधानकर्ता किसी संदर्भ में आश्रित एवं अनाश्रित परित्वयों का चयन अपनी रुचि के अनुसार करता है।
  6. स्पष्ट व्याख्या – अनुसंधानकर्ता आश्रित एवं अनाश्रित परित्वयों के मध्य कार्य-करण सम्बन्ध की स्पष्ट व्याख्या करने में सक्षम होता है।
  7. बहुआयामी क्षेत्र – प्रायोगिक विधि के माध्यम से मानव-जीवन से जुड़े भिन्न-भिन्न क्षेत्रों (व्यवहार, संवेदना, दक्षता) का सरल अध्ययन करता है।

प्रायोगिक विधि के अवगुण:

  1. अक्षमता – किसी विशिष्ट समस्या का अध्ययन प्रायोगिक विधि से सदैव संभव नहीं होता है। जैसे-बुद्धि स्तर पर पौष्टिक आहार के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किसी को भूखा रखना संभव नहीं है।
  2. जानकारी का अभाव – समस्त प्रासंगिक परिवयों को पूर्णत: जानना और उनका नियंत्रण करना कठिन होता है।
  3. प्रतिकूल दशा – प्रयोग प्रायः बहुत नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में किए जाते हैं जो वास्तविक व्यवहार में सुलभ नहीं हो पाते हैं। जैसे, तापमान, आँधी, प्रकाश, ध्वनि आदि प्रतिकूल दशा भी उत्पन्न कर सकते हैं।
  4. क्षेत्र प्रयोग के कारण उत्पन्न कठिनाई – शोधकर्ताओं को अव्यवस्थित किए बिना क्षेत्र प्रयोग संभव नहीं होता।
  5. प्रयोग कल्प विधि की बाध्यता – भूकंप, बाढ़, अकाल, अपहरण जैसी विपदाओं से जूझते बच्चों को प्रयोगशला के माध्यम से मदद नहीं किया जा सकता है।

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प्रश्न 7.
डॉ. कृष्णन व्यवहार को बिना प्रभावित अथवा नियंत्रित किए एक नर्सरी विद्यालय में बच्चों के खेल-कूद वाले व्यवहार का प्रेक्षण करने एवं अभिलेख तैयार करने जा रहे हैं। इसमें अनुसंधान की कौन-कौन सी विधि प्रयुक्त हुई है? इसकी प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए तथा उसके गुणों और अवगुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बच्चों के खेलकूद बदले व्यवहार का प्रेक्षण करने एवं व्यवहार को बिना प्रभावित अथवा नियत्रित किए अभिलेख तैयार करने हेतु प्रकृतिवादी तथा असहभागी प्रेक्षण-प्रक्रिया को अपनाना सहज, स्वाभाविक एवं वस्तुनिष्ठ होता है। चूंकि प्रेक्षण मनोवैज्ञानिक जाँच का एक सशक्त उपकरण है जिसे व्यवहार के वर्णनं की प्रभावकारी विधि मानी गयी है। अतः बच्चों के व्यवहार की परख के लिए हमें सदा सतर्क एवं जागरूक रहना होता है। प्रकृतिवादी प्रेक्षण के क्रम में प्रेक्षणकर्ता परिस्थिति का न तो प्रहस्तन करता है और न ही उसको नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

असहभागी प्रेक्षण की प्रक्रिया में किसधी व्यक्ति या घटना का प्रेक्षण दूर से किया जाता है जिसमें वीडियो कैमरा तथा अभिलेख संरचना अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। अनुसंधानकर्ता अभिलेख तैयार करते समय व्यवहार की व्याख्या करने में अपनी रुचि एवं जागरूकता को नष्ट होने से बचाये रहता है। निरीक्षण विधि द्वारा बालकों के व्यवहार का निरीक्षण स्वाभाविक परिस्थिति में होता है। इनमें बच्चों की प्रतिक्रियाओं का क्रमबद्ध और योजनाबद्ध रूप में अध्ययन करके वांछनीय व्यवहार का पता लगाना सरल होता है, क्योंकि निरीक्षण विधि का स्वरूप वस्तुनिष्ठ होता है। प्रेक्षण के पश्चात् तैयार अभिलेखों का विश्लेषण करके सही अर्थ पाने का प्रयास किया जाता है।

खेलकूद वाले व्यवहार के अन्तर्गत रुचि, स्वभाव, जिज्ञासा, जीत की ललक, कला, प्रयास आदि तत्वों का सामूहिक प्रेक्षण किया जाता है। इसमें प्रतिभागियों की स्वैच्छिक सहभागिता, उनकी सूचित सहमति तथा परिणामों के विषय में प्रतिभागियों से भागीदारी करने जैसी नैतिक सिद्धांतों को अनुसंधान मूलतः परखने का प्रयास किया जाता है। सांख्यिकीय प्रक्रियाओं का उपयोग करके उचित निष्कर्ष को प्राप्त कर लिया जाता है।

प्रेक्षण विधि के युग:

  1. समय की बचत – बच्चों के व्यवहार का सामूहिक अध्ययन करने से दक्षतापूर्ण सूचनाओं के आधार पर सर्वेक्षण शीघ्रता से पूरा कर लिए जा सकते हैं।
  2. वस्तुनिष्ठता – मनोवैज्ञानिक परीक्षण से प्राप्त परिणाम में वस्तुनिष्ठता एवं प्रमाणीकरण बना रहता है।
  3. आयु वर्ग का विस्तार – परीक्षण किसी आयु वर्ग विशेष के लिए।
  4. सहसंबंधात्मक अनुसंधान की प्रवृत्ति का विकास – कार्यरत प्रवत्यों द्वारा प्राप्त सहसंबंध गुणांक के द्वारा यथासंभव व्यावहारिक एवं उपयोगी निष्कर्ष की प्राप्ति होती है।
  5. अर्थद्वन्द्व से मुक्ति – विशेषता की खोज में किया जाने वाला अनुसंधान स्पष्ट रूप से बिना किसी अर्थद्वन्द्व के परिभाषित किया जा सकता है।
  6. गणना अथवा मापन में सहजता – अभिलेखों तथा आँकड़ों या पठनों के आधार पर प्रतिक्रियादाताओं की गणना की विधि सरल बनायी जा सकती है।
  7. गति एवं शक्ति का महत्त्व – प्रतिभागियों की गति एवं शक्ति की पहचान करने में परीक्षण विधि अनुकूल माना जाता है।
  8. पूर्वाग्रह से मुक्ति – व्यवहार की परख करने वाले अनुसंधान में पूर्वाग्रह को शामिल नहीं किया जा सकता है।
  9. निष्पक्षता – व्यवहार सम्बन्धी सही सूचना पाने में निष्पक्षता से गणना की जाती है।
  10. स्वाभाविक परिणाम – अनुसंधानकर्ता की सतर्कता के फलस्वरूप व्यवहार का स्वाभाविक स्वरूप जानने का अहसास मिलता है।
  11. विश्वसनीयता एवं पुनरावृत्ति की सुविधा-अनुसंधान क्रम में किये गये अध्ययन को दुहराया जा सकता है और परिणाम की विश्वसनीयता कायम रखी जा सकती है।

अनुसंधान प्रक्रिया के अवगुण:

  • प्रदत्तों का अभाव – निरीक्षण क्रम में सभी वांछनीय सूचनाएँ तथा साधन सरलता से सभी स्थितियों में उपलब्ध नहीं होते हैं।
  • समय का अभाव – परीक्षण के लिए निर्धारित प्रक्रिया कब प्रारम्भ होगी और कब समाप्त हो जाएगी यह अनुसंधानकर्ता नहीं जान पाता है। समय के अभाव में सम्पूर्ण अभिलेख प्राप्त नहीं होते हैं।
  • अपूर्ण निष्कर्ष – साधनों की कमी, समय की अनिश्चितता, परिकल्पना की स्थिति से तालमेल का नहीं होना आदि ऐसे कारण हैं जिससे निष्कर्ष अपूर्ण रह जाता है जिससे अनुसंधान की प्रक्रिया सत्य और विश्वसनीय नहीं रह पाती।
  • मानसिक प्रक्रियाओं के सामूहिक अध्ययन की बाध्यता – एक प्रकार के व्यवहार में जुड़े प्रतिभागियों की सामूहिक मानसिक क्रियाओं का आकलन संभव नहीं होता है। शारीरिक, वैचारिक एवं मानसिक दशाओं में भिन्नता के कारण प्रतिभागियों (बच्चों) के संवेगों की जानकारी सही-सही नहीं मिल पाती है।
  • श्रमसाध्यता – प्रेक्षण करके सही अभिलेख तथा निष्कर्ष प्राप्त करना बहुत ही बुद्धि और श्रम चाहता है। प्रेक्षण विधि श्रमसाध्य होता है जो अधिक समय लेती है तथा प्रेक्षक के पूर्वाग्रह के कारण गलत सूचना संग्रह करने का कारण बन जाता है।
  • पूर्वाग्रह – हम चीजों को उसी ढंग से देखते हैं जैसा कि हम स्वयं होते हैं न कि जैसी चीजें होती हैं। अर्थात् पूर्वाग्रह के कारण हम किसी घटना या प्रक्रिया की व्याख्या करने में गलती कर बैठते हैं। वास्तविक व्यवहार पर आधारित सूचना संग्रह में हमसे भूल हो जाती है।
  • समय और नियंत्रण या परियोजना की असुविधा – समय और साधन से संतुलन बनाने वाली क्रिया का हमेशा मिल जाना लगभग असंभव होता है।
  • निरसन की समस्या – प्रेक्षण के क्रिया-स्थल को उचित वातावरण बनाये रखने के लिए तापमान और ध्वनि जैसे परिवों का निरसन कठिन कार्य है।
  • प्रतिसंतुलनकारी तकनीक और यादृक्षिक वितरण – सम्बन्धी दोष समूहों के बीच विभवपरक अंतर लाकर वांछनीय परिणामों को प्रभावित करते हैं, क्योंकि कार्यों को निश्चित क्रम में सजाकर अध्ययन करना तथा प्रायोगिक और नियंत्रित समूहों में प्रतिभागियों का वितरण दोनों अच्छे परिणाम के लिए आवश्यक होते हैं।
  • क्षेत्र प्रयोग एवं प्रयोग कल्प – प्रेक्षण के लिए उपलब्ध क्षेत्र या विधि अनुसंधान के मनोनुकूल नहीं हो सकता है तथा भूकंप, बाढ़ जैसी विपदाओं से त्रस्त प्रतिभागियों के लक्षण अस्वाभाविक बन जाते हैं। प्रतिभागियों की दशा को उत्साहित, भयमुक्त अथवा चिन्तारहित बनाये रखना कठिन कार्य है।
  • नैतिक मुद्दे – मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के क्रम में अनुसंधानकर्ता तथा प्रतिभागियों में से प्रत्येक नैतिक सिद्धांत (निजता, रुचि, उपकार, सुरक्षा) का पालन करेगा ही, यह मानना कठिन है।

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प्रश्न 8.
उन दो स्थितियों का उदाहरण दीजिए जहाँ सर्वेक्षण विधि का उपयोग किया जा सकता है? इस विधि की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
परिष्कृत तकनीकों का उपयोग करके लोगों की अभिवृत्ति का पता लगाना तथा विभिन्न प्रकार के कारण-कार्य सम्बन्धों को पूर्वानुमान प्रस्तुत करना सर्वेक्षण विधि का प्रधान उद्देश्य होता है। उदाहरणार्थ –

  1. चुनाव के समय यह जानने के लिए सर्वेक्षण किया जाता है कि मतदाता किस राजनीतिक दल विशेष को वोट देंगे अथवा वे किस प्रत्याशी के पक्ष में अपना विश्वास प्रकट करते हैं।
  2. सर्वेक्षण अनुसंधान लोगों के मत, अभिवृत्ति और सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करने के लिए निम्न. प्रश्नों का मौलिक उत्तर जानना चाहता है –
    • भारत के लोगों को किन चीजों से प्रसन्नता मिलती है।
    • लोग परिवार नियोजन, पंचायती राज, स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवस्था, शिक्षा सम्बन्धी कार्यक्रम आदि के. सम्बन्ध में किस स्तर की जानकारी रखते हैं।

सर्वेक्षण विधि की सीमाएँ –
विविध प्रकार के कारण-कार्य सम्बन्धों से जुड़े पूर्वानुमान को उपयोगी स्तर प्रदान करने के लिए प्रयोग तथा अनुसंधानकर्ता से सम्बन्धित कुछ सीमाएँ निर्धारित हैं –

1. अनुसंधानकर्ता:
अनुसंधनकर्ता को विषय तथा तकनीकों का ज्ञान होना चाहिए। उन्हें निःस्वार्थ, निर्भय एवं जिज्ञासु होना चाहिए। पूर्वानमान व्यक्त करने में उन्हें कुशल होना चाहिए।

2. मनोवैज्ञानिक प्रदत्त:
निर्धारित विषयों से सम्बन्धित सूचनाओं का ही संग्रह करना चाहिए। संग्रह की गई सूचना सत्य, मानक एवं उपयोगी होनी चाहिए।

3. विधियाँ और उपकरण:
सर्वेक्षण अनुसंधान के लिए सरल विधियाँ एवं वांछनीय उपकरणों का उपयोग किया जाना चाहिए।

4. स्वाभाविक प्रक्रियाएँ:
सर्वेक्षण अनुसंधान की सफलता के लिए आधुनिक तकनीकों पर आधारित प्रक्रियाओं को अपनाना चाहिए।

5. वैयक्तिक साक्षात्कार:
साक्षात्कार के लिए पूर्व निर्धारित प्रश्नों को ही प्रयोग में लाना चाहिए। साक्षात्कारकर्ता को प्रश्नों की शब्दावली में अथवा उसके पूछे जाने के क्रम में कोई भी परिवर्तन करने की स्वतंत्रता नहीं होती है। प्रतिक्रियादाता जो संवेदनशील तथा सहज दशा में रहकर इष्टतम उत्तर देने के लिए स्वतंत्र रहता है, समय-सीमा की छूट रहती है। साक्षात्कार के समय सभी परिस्थितियों को लचीला एवं अनुकूलित होना आवश्यक होता है।

6. प्रश्नावली सर्वेक्षण:
मुक्त तथा अमुक्त प्रश्नों के उत्तर लिखित या मौखिक रूप में देने की भी छूट होती है। इस विधि में पढ़ने योग्य प्रतिक्रियादाता ही भाग ले सकते हैं। प्रश्नावली का उपयोग पृष्ठभूमि सम्बन्धी एवं जनांकिकीय सूचनाओं, भूतकाल के व्यवहारों, अभिवृत्तियों एवं अधिमतों, किसी विषय विशेष के ज्ञान तथा व्यक्तियों की प्रत्याशाओं एवं आकांक्षाओं की जानकारी पर आधारित प्रश्नों के माध्यम से सर्वेक्षण किया जा सकता है। इसमें आमने-सामने बैठकर या डाक द्वारा लोगों की प्रतिक्रियाएँ जानने की छूट होती हैं।

7. दूरभाष सर्वेक्षण:
गलत सूचनाओं तथा अवांछनीय प्रतिक्रिया से बचे रहने की आवश्यकता होती है। विधि का चयन करने में सावधानी रखनी होती है।

8. मनोवैज्ञानिक परीक्षण:
जिस विशेषता के लिए परीक्षण की व्यवस्था की जाती है उसके स्पष्ट रूप से बिना किसी अर्रद्वन्द्व को परिभाषित किया जाना चाहिए तेथा सभी प्रयुक्त प्रश्नों को विषय से सम्बन्धित होना चाहिए। आयु वर्ग तथा समय-सीमा की छूट रहती है। विभिन्न पाठकों के लिए समान अर्थ देने वाले शब्दों का उपयोग किया जाना जरूरी है। अनुसंधानकर्ता को परिणाम की विश्वसनीयता, वैधता तथा मानकों पर सही आकलन करके शुद्ध रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।

9. विविध:
विषय एवं विधि के चयन में सावधनी रखते हुए निष्पादन सम्बन्धी सही सूचना प्राप्त करनी चाहिए। सही योजना, अनेक विधियों से प्राप्त प्रामाणिकता आदि का ध्यान महत्वपूर्ण होता है।

10. वास्तविक शून्य बिन्द का अभाव:
मनोवैज्ञानिक अध्ययन में जो कुछ लब्धांक मिलते हैं वे अपने आप में निरपेक्ष नहीं होती बल्कि उनका सापेक्ष मूल्य होता है।

11. मनोवैज्ञानिक उपकरणों का सापेक्षिक स्वरूप:
किसी विषय से सम्बन्धित गुणात्मक अध्ययन के लिए दो या अधिक शोधकर्ताओं को अवसर दिया जाना चाहिए। प्रत्येक से प्राप्त प्रेक्षणों पर सामुदायिक तर्क-वितर्क करके अतिम स्वरूप प्रदान करना चाहिए।

12. नैतिक मुद्दे:
प्रतिभागियों तथा अनुसंधानकर्ता के लिए रुचि, सहयोग, परोपकार, सुरक्षा, प्रोत्साहन तथा भागीदारी से सम्बन्धित सभी सुविधाएं जुटाने का नैतिक कर्तव्य बनता है। फलतः स्वैच्छिक सहभागिता, सूचित सहमति स्पष्टीकरण, अध्ययन के परिणाम की भागीदारी और प्रदत्त स्रोतों की गोपनीयता प्रमुख विचार के योग्य माने जाते हैं।

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प्रश्न 9.
साक्षात्कार एवं प्रश्नावली में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सर्वेक्षण अनुसंधन सूचना –
संग्रह हेतु विभिन्न तकनीकों की सहायता लेते हैं। प्रयुक्त तकनीकों में से साक्षात्कार और प्रश्नावली दो प्रचलित विधियाँ हैं। इन दोनों के स्वरूप, प्रभेद एवं निर्णय क्षमताओं में कुछ सूक्ष्म अंतर होते हैं जो निम्न वर्णित हैं –
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प्रश्न 10.
एक मानकीकृत परीक्षण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एक मानकीकृत (संरचित) परीक्षण एक विशिष्ट प्रकार का मनोवैज्ञानिक परीक्षण होता है जिसका उपयोग मानसिक अथवा व्यावहारपरक विशेषताओं के संबंध में किसी व्यक्ति की स्थिति के मूल्यांकन में करते हैं। परीक्षण की रचना एक व्यवस्थित प्रक्रिया है तथा इसके कुछ निश्चित चरण होते हैं। इसके अन्तर्गत एकांशों के विस्तृत विश्लेषण तथा समग्र परीक्षण की विश्वसनीयता, वैधता एवं मानकों के आकलन आते हैं।

विश्वसनीयता की परख परीक्षण पुनः परीक्षण के आधार पर संभव होता है। परीक्षण के उपयोग योग्य होने के लिए उसकी वैधता भी आवश्यकता होता है। इससे पता चलता है कि क्या परीक्षण गणितीय उपलब्धि का मापन कर रहा है अथवा भाषा दक्षता का इसके बाद कोई परीक्षण प्रामाणिक तब माना जाता है जब परीक्षण के लिए मानक विकसित कर लिए जाते हैं। इससे किसी परीक्षण पर व्यक्तियों के प्राप्त लब्धांक की भी व्याख्या करने में सहायता मिलती है।

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प्रश्न 11.
मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमा निम्न वर्णित है:

  1. मनोवैज्ञानिक जाँच के क्रम में संग्रह किए जानेवाले व्यवहार अथवा किसी घटना का यथासंभव सही-सही वर्णन प्राप्त किया जाता है।
  2. प्राप्त सूचनाओं के विवरण से सम्बन्धित पूर्वकथन की रचना की जाती है।
  3. व्यवहार के कारणों की जानकारी प्राप्त करनी होती है।
  4. वैज्ञानिक जाँच के क्रम में सूचनाओं का विश्लेषण तथा अनुप्रयोग आवश्यक होते हैं।
  5. भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदत्तों को निश्चित क्रम में सजाना होता है।
  6. जाँच की विधियों का चयन और अनुप्रयोग में सतर्कता रखनी होती है।
  7. प्रेक्षण और अभिलेख की व्याख्या सहज होनी चाहिए।
  8. कार्य-करण सम्बन्धों की जानकारी एवं अनुप्रयोग आवश्यक होता है।
  9. प्रेक्षण सम्बन्धी गलत सूचनाओं एवं प्रतिक्रियाओं से बचा रहना चाहिए।
  10. समय सीमा पर ध्यान देना वांछनीय होता है।
  11. अनुसंधानकर्ता को अधिक विधियों का उपयोग करना चाहिए।
  12. लब्धांकों की तुलना करके सहसंबंध गुणांक का अनुमान लगाया जाता है।
  13. मनोवैज्ञानिक मापन सम्बन्धी समस्याओं (शून्य विधि का अभाव, मनोवैज्ञानिक उपकरणों का सापेक्षिक स्वरूप, गुणात्मक प्रदत्तों की आत्मपरक व्याख्या) के समाधान के बाद ही निष्कर्ष तय करना होता है। इन समस्याओं को मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमा माना जाता है।

प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक जाँच करते समय एक मनोवैज्ञानिक को किन नैतिक मार्गदर्शी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक जाँच करते समय एक मनोवैज्ञानिक को निम्न वर्णित मार्गदर्शी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए –

नैतिक सिद्धांत:
अध्ययन में भाग लेने के लिए व्यक्ति की निजता एवं रुचि का सम्मान, अध्ययन के प्रतिनिधियों को उपकार अथवा किसी खतरे से उसकी सुरक्षा तथा अनुसंधान के लाभ में सभी प्रतिभागियों की भागीदारी वांछनीय है। इसके पक्ष में निम्न बिन्दुओं पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है –

1. स्वैच्छिक सहभागिता:
अध्ययन में जुटे प्रतिभागियों को अध्ययन के लिए विषय को चयन करने में तथा समय निर्धारण में बिल्कुल स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए। प्रतिभागियों के निर्णय पर प्रलोभन, दंड, त्याग का प्रभाव नहीं डालना चाहिए।

2. सूचित सहमति:
प्रतिभागियों की दक्षता का उपयोग, प्रदत्त संगणक का प्रयोग, विचार को बदलने के लिए बाध्य करना आदि नैतिक सिद्धांत के विरुद्ध किया है। अच्छा तो यह होगा कि प्रतिभागियों को संभावित घटनाओं अथवा त्रुटियों की सूचना देकर उनकी सहमति ले लेनी चाहिए। प्रतिभागियों को अनायास शारीरिक या मानसिक उलझन में नहीं डालना चाहिए।

3. स्पष्टीकरण:
अध्ययन के विषय एवं विधियों का स्पष ज्ञान प्रतिभागियों को अवश्य दे देना चाहिए। झूठा भरोसा देना प्रतिभागियों से धोखा करना माना जाएगा।

4. अध्ययन के परिणाम की भागीदारी:
प्रदत्त संग्रह, प्रेक्षणों का अध्ययन, निष्कर्ष निकालना तथा अध्ययन के परिणाम की सही-सही सूचना प्रतिभागियों को मिल जानी चाहिए। अध्ययन के परिणाम के कारण कौन चिंतित है, कौन खुश है, कौन उससे फायदा उठाना चाहता है आदि अंधकार में रखने वाली स्थिति नहीं है। प्रतिभागियों की प्रत्याशा पर विशेष ध्यान रखना चाहिए।

5. प्राप्त स्रोत की गोपनीयता:
प्रतिभागियों से संबंधित सभी सूचनाओं को अत्यन्त गोपनीय रखा जाना चाहिए। प्राप्त स्रोत की गोपनीयता के अभाव में बाहरी व्यक्तियों के द्वारा सुरक्षा खतरे में पड़ सकता है। उसके लिए संकेत संख्या, शब्द संकेत
की रचना की जानी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Psychology मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
परिकल्पना किसे कहते हैं?
उत्तर:
समस्या की पहचान के बाद शोधकर्ता समस्या समाधान के लिए संभावित हल खोजते है, काल्पनिक समाधान हेतु प्रस्तुत कथन को परिकल्पना कहा जाता है। जैसे, टेलीविजन पर हिंसा का दृश्य देखने से बच्चों में आक्रामकता आती है अथवा प्रतियोगिता या परीक्षा में असफल हो जाने से उत्साह मंद पड़ जाता है आदि।

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प्रश्न 2.
प्रदत्त संग्रह से सम्बन्धित किन चार पहलुओं के बारे में उचित निर्णय लेना होता है?
उत्तर:
(क) अध्ययन के प्रतिभागी (बच्चे, किशोर, कर्मचारी)
(ख) प्रदत्त संग्रह की विधि (प्रेक्षण, विधि, प्रायोगिक विधि)
(ग) अनुसंधान में प्रयुक्त उपकरण (साक्षात्कार, प्रश्नावली) तथा
(घ) प्रदत्त संग्रह की प्रक्रिया (वैयक्तिक, सामूहिक)।

प्रश्न 3.
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान किस लिए किए जाते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान विवरण, पूर्वकथन, व्याख्या, व्यवहार नियंत्रण तथा वस्तुनिष्ठ तरीके से उत्पादित ज्ञान के अनुप्रयोग के लिए किए जाते हैं।

प्रश्न 4.
मनोवैज्ञानिक जांच के विभिन्न लक्ष्यों में से किसे सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक जांच का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य अनुप्रयोग को माना जाता है जो लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाकर उत्पन्न समस्याओं के समाधान के लिए सुगम मार्ग बनाते हैं।

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प्रश्न 5.
अनुसंधान के वैकल्पिक प्रतिमान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मानव व्यवहार का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है जिसका प्रेक्षण, मापन तथा नियंत्रण किया जा सकता है। आधुनिक व्याख्यात्मक परम्परा के अनुसार समझ को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। फलतः प्राकृतिक आपदाओं और असाध्य रोगों की पहचान और उससे राहत पाने की युक्ति खोजी जाती है।

प्रश्न 6.
मनोवैज्ञानिक पूछताछ की विभिन्न विधियों का नाम लिखें।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक पूछताछ अथवा मनोविज्ञान की विभिन्न विधियाँ हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. निरीक्षण विधि
  2. साक्षात्कार विधि
  3. प्रयोगात्मक विधि
  4. व्यक्ति इतिहास विधि
  5. प्रश्नावली विधि इत्यादि

प्रश्न 7.
निरीक्षण विधि क्या है?
उत्तर:
निरीक्षण विधि एक ऐसी विधि है जिसमें पूर्व योजना के अनुसार क्रमबद्ध, पूर्वाग्रह मुक्त नियंत्रित एवं वस्तुनिष्ठ अध्ययन होता है। बाल मनोविज्ञान की समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन में निरीक्षण विधि एक महत्वपूर्ण विधि है।

प्रश्न 8.
निरीक्षण विधि के जन्मदाता कौन थे?
उत्तर:
निरीक्षण विधि के जन्मदाता जे. बी. वाटसन थे।

प्रश्न 9.
निरीक्षण विधि का स्वरूप कैसा है?
उत्तर:
निरीक्षण विधि का स्वरूप वस्तुनिष्ठ है।

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प्रश्न 10.
निरीक्षण विधि का मूल उद्देश्य बतायें।
उत्तर:
निरीक्षण विधि द्वारा बालकों के व्यवहार का निरीक्षण स्वाभाविक परिस्थिति में होता है। इसमें बच्चों की प्रतिक्रियाओं का क्रमबद्ध और योजनाबद्ध रूप में अध्ययन होता है।

प्रश्न 11.
साक्षात्कार विधि क्या है?
उत्तर:
साक्षात्कार विधि वैसी विधि है जिसमें साक्षात्कार करनेवाले विशेषज्ञों का एक समूह होता है जिसे साक्षात्कार बोर्ड कहते हैं। साक्षात्कार आमने-सामने होता है। इस विधि में सूचनाओं एवं तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रश्न-उत्तर पद्धति को अपनाया जाता है।

प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक प्रदत्त किसे कहते हैं?
उत्तर:
व्यक्तियों के व्यक्त या अव्यक्त व्यवहारों, आत्मपरक अनुभवों एवं मानसिक प्रक्रियाओं से सम्बन्धित जानकारियों के संग्रह को वैज्ञानिक प्रदत्त (सूचनाएँ) कहा जाता है। प्रदत्त कोई स्वतंत्र सत्व नहीं होते बल्कि वे एक संदर्भ में प्राप्त होते हैं तथा उस सिद्धांत एवं विधि से आबद्ध होते हैं।

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प्रश्न 13.
मनोविज्ञान के प्रदत्तों को किन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:

  1. जनांकिकीय
  2. भौतिक
  3. दैहिक
  4. मनोवैज्ञानिक सूचनाएँ

प्रश्न 14.
मनोविज्ञान की महत्वपूर्ण विधियों की ओर संकेत करें।
उत्तर:

  1. प्रेक्षण
  2. प्रायोगिक
  3. सहसंबंधात्मक
  4. सर्वेक्षण
  5. मनोवैज्ञानिक प्रेक्षण तथा
  6. व्यक्ति अध्ययन

प्रश्न 15.
प्रकृतिवादी परीक्षण की एक प्रमुख विशेषता बतायें।
उत्तर:
प्रेक्षणकर्ता परिस्थिति का न तो प्रहस्तन करता है और न ही उसको नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

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प्रश्न 16.
असहभागी प्रेक्षण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस प्रेक्षण में किसी व्यक्ति या घटना का प्रेक्षण दूर से करते हैं। गतिविधियों में बिना भाग लिए किये गये प्रेक्षण को असहभागी प्रेक्षण कहते हैं।

प्रश्न 17.
प्रेक्षण विधि से होनेवाले लाभ का उल्लेख करें।
उत्तर:
प्रेक्षण विधि में अनुसंधानकर्ता लोगों एवं उनके व्यवहारों का प्राकृतिक स्थिति जैसे वह घटित होती है, में अध्ययन कर सकता है।

प्रश्न 18.
प्रेक्षण की प्रायोगिक विधि से किस सम्बन्ध की व्याख्या संभव है?
उत्तर:
प्रायोगिक विधि एक नियंत्रित दशा में दो घटनाओं या परिवों के मध्य कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करने के लिए किया जाता है।

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प्रश्न 19.
सहसंबंधात्मक अनुसंधान किन-किन स्थितियों में पाया जाता है?
उत्तर:

  1. धनात्मक (गुणांक + 1.00 के निकट)
  2. ऋणात्मक (गुणांक 0 और – 1.0 के बीच) तथा
  3. शून्य सहसंबंध (गुणांक – 0.02 अथवा + 0.03)।

प्रश्न 20.
सर्वेक्षण अनुसंधानकर्ता सूचना एकत्रित करने के लिए किन प्रमुख तकनीकों का उपयोग करता है?
उत्तर:

  1. साक्षात्कार
  2. प्रश्नावली
  3. दूरभाष तथा
  4. नियंत्रित प्रेक्षण

प्रश्न 21.
साक्षात्कार के दो रूपों के नाम बतावें।
उत्तर:

  1. संरचित या मानकीकृत तथा
  2. असंरचित या अमानकीकृत

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प्रश्न 22.
सर्वेक्षण की सीमा क्या होती है?
उत्तर:

  1. गलत सूचनाओं के द्वारा वास्तविक विचार को छिपाने की प्रवृत्ति
  2. लोग कभी-कभी वैसी प्रतिक्रियाएँ देते हैं जैसा शोधकर्ता जानना चाहता है।

प्रश्न 23.
शब्दावली के प्रयोग में क्या सावधानी रखनी होती है?
उत्तर:
किसी भी परीक्षण के एकांशों की शब्दावली ऐसी होनी चाहिए कि वह विभिन्न पाठकों को समान अर्थ का बोध कराए।

प्रश्न 24.
परीक्षण की सफलता के क्रम में किन तीन तत्वों पर ध्यान रखा जाता है?
उत्तर:

  1. परीक्षण की विश्वसनीयता
  2. परीक्षण की वैधता तथा
  3. परीक्षण के लिए प्रामाणिक मानक।

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प्रश्न 25.
प्रमाणिक साक्षात्कार क्या है?
उत्तर:
प्रमाणिक साक्षात्कार में प्रश्नों की सूची पहले से तैयार कर ली जाती है। इन प्रश्नों को साक्षात्कार देने वाले के क्रमानुसार पूछा जाता है। सभी लोगों के लिये एक ही तरह के प्रश्न होते हैं।

प्रश्न 26.
परिवर्त्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
अधीक्षण या घटना के भिन्न मान होते हैं जिसके मापन को परिवर्त्य कहा जाता है।

प्रश्न 27.
परिवर्त्य के दो प्रमुख वर्गों के नाम और लक्षण बतायें।
उत्तर:

  1. अनाश्रित परिवर्त्य – जिसका प्रहस्तन संभव होता है –
  2. आश्रित परिवर्त्य – जिसकी व्याख्या. वांछनीय होती है। प्रायोगिक दशा में, अनाश्रित परिवर्त्य कारण है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव।

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प्रश्न 28.
प्रायोगिक एवं नियंत्रित समूहों में प्रतिभागियों का वितरण किस रूप में किया जाता है?
उत्तर:
समान लक्षण वाले (सार्थक, जैविक, पर्यावरणीय, अनुक्रमिक) परिवयों का वितरण यादृक्षिक (random) रूप में किया जाता है।

प्रश्न 29.
एक ऐसी समस्या का उल्लेख करें जिसका अध्ययन प्रायोगिक रूप में नहीं किया जा सकता है?
उत्तर:
बच्चों के बुद्धि स्तर पर पौष्टिकता की कमी के प्रभाव का अध्ययन बच्चों को बार-बार भूखा रखकर करना अनैतिक एवं अव्यावहारिक कार्य कहलाता है।

प्रश्न 30.
क्षेत्र-प्रयोग से क्या समझते हैं?
उत्तर:
कुछ विशिष्ट स्थितियों (फसल चक्र) का अध्ययन प्रयोगशाला में संभव नहीं होता है तथा जिसके लिए अनुसंधानकर्ता को सम्बन्धित क्षेत्र में जाना आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न 31.
प्रयोग-कल्प किसे कहते हैं?
उत्तर:
भूकंप, बाढ़, अतिवृष्टि जैसे प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित बच्चों की दशा का अध्ययन करने के लिए अनुसंधानकर्ता प्रयोग-कल्प की विधि अपनाता है जिसमें अनाश्रित परिवर्त्य का चयन करके उसे प्रहस्तित करने का प्रयास किया जाता है।

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प्रश्न 32.
स्वतंत्र साक्षात्कार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्वतंत्र साक्षात्कार में साक्षात्कार लेनेवाले स्वतंत्र रूप से विषय से संबंधित प्रश्नों को पूछते हैं।

प्रश्न 33.
साक्षात्कार विधि में किन सूचनाओं को एकत्र किया जाता है?
उत्तर:
साक्षात्कार विधि में आमने-सामने की परिस्थिति में बच्चों की व्यवहार सम्बन्धी सूचनाओं को एकत्र किया जाता है। इस विधि में प्रश्न और उत्तर के आधार पर सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।

प्रश्न 34.
प्रयोगात्मक विधि क्या है?
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि एक ऐसी विधि है जिसमें निरीक्षण कार्य प्रयोग पर आधारित होता है। इस विधि का प्रयोग बच्चों के अध्ययन के लिये नियंत्रित वातावरण से होता है।

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प्रश्न 35.
प्रयोगात्मक विधि में किन उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है?
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि में मनोवैज्ञानिक उपकरणों एवं यंत्रों की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 36.
प्रयोगात्मक निरीक्षण के लिए किन तकनीकों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
बाल मनोविज्ञान के अध्ययन में प्रयोगात्मक निरीक्षण के लिये विभिन्न तकनीक का प्रयोग किया जाता है जो इस प्रकार हैं –

  1. फोटोग्राफिक डोम तकनीक
  2. वन वे स्क्रीन तकनीक
  3. सिनेमाटोग्राफिक तकनीक
  4. प्रयोगात्मक कैबिनेट

प्रश्न 37.
प्रश्नावली विधि का निर्माण किस मनोवैज्ञानिक ने किया?
उत्तर:
प्रश्नावली विधि का निर्माण सबसे पहले स्टेनले हॉल ने किया।

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प्रश्न 38.
परीक्षणों का वर्गीकरण किस आधार पर किया जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का वर्गीकरण भाषा, उसके देने की रीति तथा जटिलता-स्तर के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 39.
भाषा के आधार पर तीन प्रकार के परीक्षण की गुंजाइश रहती है। नाम लिखें।
उत्तर:

  1. वाचक
  2. अवाचित तथा
  3. निष्पादन

प्रश्न 40.
देने की रीति के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों को किस प्रकार विभाजित किया जाता है?
उत्तर:

  1. वैयक्तिक तथा
  2. सामूहिक परीक्षण

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प्रश्न 41.
समय सीमा से बंधे परीक्षण के मूल आधार क्या हैं?
उत्तर:

  1. गति परीक्षण और
  2. शक्ति परीक्षण

प्रश्न 42.
अनुसंधानकर्ता को परीक्षण की किसी एक विधि पर निर्भर नहीं रहने की सलाह क्यों दी जाती है?
उत्तर:
प्रत्येक विधि की अपनी विशेषताएँ एवं सीमाएँ होती हैं। दो या अधिक विधियों से समान परिणाम मिलते हैं तो परिणाम को प्रामाणिकता एवं उपयोगी करार दिया जाता है।

प्रश्न 43.
प्रदत्त विश्लेषण के दो प्रकार के विधिपरक उपागमों का उपयोग किया जाता है। उनके नाम बतावें
उत्तर:

  1. परिणामात्मक विधि और
  2. गुणात्मक विधि

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प्रश्न 44.
मनोवैज्ञानिक मापन की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?
उत्तर:

  1. वास्तविक शून्य बिन्दु का अभाव
  2. मनोवैज्ञानिक उपकरणों का सापेक्षिक स्वरूप तथा
  3. गुणात्मक प्रदत्तों की आत्मपरक व्याख्या

प्रश्न 45.
नैतिक सिद्धांत में किन बातों पर ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है?
उत्तर:
अध्ययन में भाग लेनेवाले व्यक्ति को जिज्ञासु, उत्साही तथा संशयमुक्त रखने के लिए उसकी सुरक्षा, गोपनीयता, निजता, रुचि पर ध्यान रखना होता है। स्वैच्छिक सहभागिता, सूचित सहमति तथा स्पष्टीकरण, भागीदारी जैसे बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है।

प्रश्न 46.
असंरचित प्रश्न से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
असंरचित प्रश्नावली का निर्माण पहले से नहीं होता है बल्कि अध्ययन के समय व्यवहार-संबंधी प्रश्न पूछे जाते हैं। बच्चे स्वतंत्र होकर उत्तर देते हैं।

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प्रश्न 47.
प्रतिबंधित प्रश्नावली का अर्थ बतायें।
उत्तर:
प्रतिबंधित प्रश्नावली वैसी प्रश्नावली है जिसमें बच्चे लिखित उत्तरों में किसी एक के बारे में हाँ-ना, सहमत-असहमत इत्यादि कहकर उत्तर देते हैं।

प्रश्न 48.
प्रश्नावली विधि क्या है?
उत्तर:
प्रश्नावली विधि एक ऐसी विधि है जिसमें बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं की जानकारी के लिये प्रश्न बनाये जाते हैं। प्रश्नों द्वारा बच्चों के व्यवहार-सम्बन्धी उत्तर अंकित किये जाते हैं।

प्रश्न 49.
संरचित प्रश्न से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संरचित प्रश्न वैसे प्रश्न हैं जिसमें बच्चों के व्यवहार-सम्बन्धी बातों की जानकारी से संबंधित प्रश्न होते हैं जो पहले से ही तैयार कर लिये जाते हैं। बच्चों से प्रश्न पूछा जाता है और उत्तर अंकित किये जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान प्रदत्त के स्वरूप में किन विशेषताओं का होना आवश्यक माना जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रदत्त कोई स्वतंत्र सत्व नहीं होते हैं। वह स्वयं सत्यता के विषय में कुछ नहीं कहता बल्कि शोधकर्ता उसकी मदद से सही अनुमान पाने की स्थिति में पहुंचता है। शोधकर्ता प्रदत्त.को एक संदर्भ विशेष में रखकर अर्थवान बनाता है। प्रदत्तों को निम्न वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

  1. जनांकिकीय
  2. भौतिक
  3. दैहिक तथा
  4. मनोवैज्ञानिक सूचना मापन की दृष्टि से मनोवैज्ञानिक सूचनाएँ (प्रदत्त) अनपढ़ हो सकती है जिनका विश्लेषण मुणात्मक विधि का उपयोग करके पूरा किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
किन विशेषता के कारण वैज्ञानिक दिन-प्रतिदिन के प्रेक्षणों से भिन्न माने जाते हैं?
उत्तर:
(क) चयन:
वैज्ञानिक प्रेक्षण किसी एक निर्धारित विषय का (चयनित व्यवहार) का प्रेक्षण करता है तथा यथासंभव सभी प्रकार से संबद्ध प्रश्नों का संतोषप्रद हल खोज लेता है।

(ख) अभिलेखन:
अनुसंधानकर्ता चयनित विषय (व्यवहारों) का विभिन्न साधनों (पूर्व अर्जित ज्ञान एवं अनुभव का प्रयोग करते हुए प्राप्त परिणाम के आधार पर एक संतुलित अभिलेख तैयार करता है।

(ग) प्रदत्त विश्लेषण:
प्रेक्षण किसका, कब, कहां और कैसे किया जाता है, अनुसंधानकर्ता सभी पहलुओं पर ध्यान देते हुए अभिलेखों का विश्लेषण करता है जिसके माध्यम से वह अभिलेख से सही अर्थ प्राप्त करने का प्रयास करता है। दिन-प्रतिदिन के प्रेक्षणों में इनमें से किसी भी विधि का उपयोग करना संभव नहीं होता है जिसके कारण इसे वैज्ञानिक प्रेक्षण से भिन्न माना जाता है।

प्रश्न 3.
प्रेक्षण कितने प्रकार के होते हैं ? किसी एक प्रकार के प्रेक्षण को स्पष्टता समझायें।
उत्तर:
प्रेक्षण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –

(क) प्रकृतिवादी बनाम नियंत्रित प्रेक्षण
(ख) असहभागी बनाम सहभागी प्रेक्षण

असहभागी बनाम सहभागी प्रेक्षण-किसी व्यक्ति या घटना का प्रेक्षण दूर रहकर किया जा सकता है। कभी-कभी प्रेक्षण स्वयं प्रेक्षण करनेवाले समूह का एक सदस्य बनकर प्रेक्षण करता है। ज किसी प्रक्रिया में भाग किये बिना अथवा बिना कोई अवरोध उत्पन्न किए प्रेक्षण करना असहभागी प्रेक्षण कहलाता है। जैसे विडियोग्राफी करके या स्वयं किसी वर्ग में चुपके से कोने में बैठकर सम्पूर्ण प्रक्रिया का अध्ययन करना असहभागी प्रेक्षण कहलाता है।

सहभागी प्रेक्षण करने के लिए प्रेक्षक को समूह के साथ मिलकर अध्ययन करना होता है। जैसे प्रेक्षक अध्यापक या छात्र के रूप में वर्ग कार्य में सम्मिलित होकर सम्पूर्ण शैक्षणिक कार्यों का अध्ययन करता है। असहभागी प्रेक्षण श्रमसाध्य होता है तथा अधिक समय लेता है। इसमें प्रेक्षण के पूर्वाग्रह के कारण गलती होने पर डर बना रहता है। इससे बचने के लिए अभिलेख तैयार करके प्रेक्षण के बाद उसके अध्ययन करने की सलाह दी जाती है।

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प्रश्न 4.
परिवर्त्य की सार्थकता को स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रायोगिक विधि में अनुसंधानकर्ता मापन किये जाने योग्य घटना या उद्दीपक (परिवर्त्य) के मध्य संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। परिवर्त्य भिन्न-भिन्न मान वाले उद्दीपक घटना को कहते हैं जो स्वयं में अंतर लाने की क्षमता रखता है।

उदाहरणार्थ, हम जिस एक कलम का उपयोग करते हैं वह एक अपवर्त्य नहीं है लेकिन भिन्न-भिन्न आकारों एवं रंगों वाली कलमें सामूहिक रूप में अपवर्त्य मानी जाती हैं। विभिन्न कदवाले व्यक्ति अपवर्त्य हैं। इसी प्रकार बाल का रंग, बुद्धि, वर्ग में छात्रों की उपस्थिति सभी अपवर्त्य हैं। अतः अपवर्त्य कहलाने वाली वस्तुओं अथवा घटनाओं की मात्रा अथवा गुणवत्ता में परिवर्तन होना वांछनीय तत्व हैं।

परिवर्त्य को दो श्रेणियाँ होती हैं –

1. अनाश्रित परित्वर्य:
जिसका हस्तान्तरण संभव है।

2. आश्रित परिवर्त्य:
जिस व्यवहार पर अनाश्रित परिवर्त्य के प्रभाव का प्रेक्षण किया जा सकता है। आश्रित परिवर्त्य उस गोचर को बतलाता है जिसकी व्याख्या करना अनुसंधानकर्ता का उद्देश्य है। यह मात्र अनाश्रित परिवर्त्य के परिवर्तन के परिणामस्वरूप व्यवहार में आनेवाला अंतर मात्र है।

प्रायोगिक दशा में अनाश्रित परिवर्त्य कारण है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव। दोनों प्रकार के परिवर्त्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं। अनुसंधानकर्ता अपनी रुचि एवं बुद्धि के अनुसार परिवयों का चयन करके कार्य-कारण सम्बन्ध की व्याख्या करने में सफल होना चाहता है।

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प्रश्न 5.
सर्वेक्षण विधि का एक स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करें।
उत्तर:
अनुसंधानकर्ता कई प्रकार के प्रश्नों को पूछकर प्राप्त उत्तरों के आधर पर मानव के स्वाभाविक व्यवहार का अध्ययन करता है। उदाहरणार्थ, कुछ प्रमुख प्रश्न निम्नवत हैं –

  1. भारत के लोगों को किन चीजों से प्रसन्नता मिलती है?
  2. क्या आप प्रसन्न हैं?
  3. लोगों को अत्यधिक प्रसन्नता किससे मिलती है?
  4. लोग अप्रसन्न अथवा दुखी होने पर क्या करते हैं? उपर्युक्त प्रश्नों में विभिन्न प्रकार के उत्तर प्राप्त हुए; जैसे कुछ ने अपने आपको प्रसन्न माना। कुछ ने संतुलित जीवन की सूचना दिया। कुछ ने स्वयं को दुखी माना। कुछ ने प्रसन्नता का कारण पैसों की उपलब्धि माना।

कुछ ने प्रसन्न रहने के लिए मन की शांति को कारक माना । कुछ लोगों ने सफलता को प्रसन्नता से तथा असफलता को अप्रसन्नता से जोड़कर बताया। दुखी मानव में कोई संगीत सुनता है, कोई मित्रों से मिलकर दुख को भूलना चाहता है, कम लोग थे जो अपनी अप्रसन्नता को सिनेमा देखकर भुलाना चाहता है।

इस तरह स्पष्ट होता है कि मनुष्यों में व्यवहार अथवा प्रतिक्रिया व्क्त करने की अलग-अलग विधियाँ होती हैं। प्रश्नोत्तर के प्रतिशत मान के आधार पर परिणामी निर्णय लिये जाते हैं। चोर-चोर का हल्ला सुनकर कोई छिप बैठता है तो कोई बाहर निकलकर चोर को पकड़ना चाहता है। कोई घरवाले को सांत्वना देने लगते हैं तो कुछ ने ईर्ष्यावश घटना को अपनी आकांक्षा के अनुकूल बताया।

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प्रश्न 6.
अंतर्निरीक्षण विधि से क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोविज्ञान की वह पहली विधि है। इस विधि का क्या व्यवहार सर्वप्रथम उण्ट ने किया। जिन्होंने 1879 ई. में लिपजिग में मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला की स्थापना की और चेतन अनुभूति का अध्ययन अन्तर्निरीक्षण-विधि द्वारा किया। उन्होंने चेतन अनुभूति को मनोविज्ञान का अध्ययन विषय-वस्तु और अन्तर्निरीक्षण विधि को विधि माना।

अन्तर्निरीक्षण – विधि का अर्थ अपने भीतर देखना (To look within) है। अंतनिरीक्षण विधि वह विधि है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी चेतना अनुभूतियों का निरीक्षण स्वयं करता है और उन्हें अपने शब्दों में व्यक्त करता है। चेपलिन ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि अंतनिरीक्षण चेतन घटक के तत्वों तथा गुणों के वस्तुनिष्ठ विवरण को कहते हैं। इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि अंतर्निरीक्षण के लिए दो बातें आवश्क हैं –

1. इस विधि में व्यक्ति अपने चेतन अनुभव का वर्णन उसी रूप में करता है जिस रूप में अनुभव होता रहता है और वर्णन की प्रक्रिया उसी समय तक चलती है जब तक अनुभव की क्रिया चलती रहती है। इस विधि के निरीक्षण की चेतन अनुभूति के रचनात्मक तत्वों का वर्णन करना होता है। उण्ट के अनुसार चेतन अनुभूति के तीन रचनात्मक तत्व हैं जिन्हें संवेदना, भाव तथा प्रतिबिम्ब कहते हैं।

प्रश्न 7.
किसी विषय अथवा घटना से सम्बन्धित प्रस्तुत किये जाने वाले पूर्व कथनों पर किन बातों का प्रभाव देखा जाता है?
उत्तर:
निर्धारित विषय के सम्बन्ध में ज्ञान और स्वयं के अनुभव की प्रवृत्ति के द्वारा व्यवहार सम्बन्धी घटनाओं का सफल अध्ययन किया जा सकता है। थोड़ी-सी सतर्कता रखने पर व्यवहार विशेष के अन्य व्यवहारों, घटनाओं अथवा गोचरों के संबंध को सरलतापूर्वक जाना जा सकता है। व्यवहार के सही मूल्यांकन के आधार पर लगभग सही पूर्वकथन प्रस्तुत किया जा सकता है। विषयों के अध्ययन, समय की मात्रा एवं उपलब्धियों के बीच धनात्मक संबंध की स्थापना की जा सकती है। पूर्वकथन, प्रेक्षण किए गए व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि होने पर अधिक सही होता है। जितने अधिक लोगों का प्रेक्षण किया जाएगा, पूर्वकथन के सही होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

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प्रश्न 8.
खोज की व्यवस्थित प्रक्रिया किन कारकों पर आधारित होती है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान विवरण, पूर्वकथन, व्याख्या, व्यवहार-नियंत्रण तथा वस्तुनिष्ठ तरीके से उत्पादित ज्ञान के अनुप्रयोग के लिए किए जाते हैं। इसके मुख्यतः चार चरण होते हैं –

  1. समस्या का संप्रत्ययन
  2. प्रदत्त संग्रह
  3. प्रदत्त विश्लेषण तथा
  4. अनुसंधान निष्कर्ष। निकालना और उसका पुनरीक्षण करना।

मनोविज्ञान में व्यवहार एवं अनुभव से संबंधित समस्याओं का समाधान करना होता है जिसके लिए उचित कार्य अथवा विषय का चयन किया जाता है। अच्छे परिणाम की प्राप्ति के लिए –

(क) अपने व्यवहार को समझने
(ख) दूसरे के व्यवहार को समझने
(ग) समूह से प्रभावित वैयक्तिक व्यवहार
(घ) समूह व्यवहार तथा
(ङ) संगठनात्मक स्तर पर तुलनात्मक अध्ययन करना होता है। जिज्ञासा की तरह विविध पक्षों का समुचित अध्ययन करने के परिणामस्वरूप एक काल्पनिक समाधान (परिकल्पना) की खोज की जाती है। साक्ष्य एवं प्रेक्षण के आधार पर परिकल्पना को सत्य स्थिति में लाने का प्रयास किया जाता है।

परिकल्पना स्थापना के बाद वास्तविक प्रदत्त संग्रह किया जाता है। सांख्यिकी सिद्धांत के द्वारा परिकल्पना एवं प्रदत्त संग्रह की जाँच और निष्कर्ष प्राप्त करने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। प्राप्त किये गये निष्कर्षों को परखने के लिए उसे दोषमुक्त बनाने का प्रयास किया जाता है। निष्कर्षों का सफल पुनरीक्षण करके उसका अनुप्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 9.
सहभागी प्रेक्षण तथा असहभागी प्रेक्षण में मौलिक अंतर बतायें।
उत्तर:
सहभागी प्रेक्षण तथा असहभागी प्रेक्षण मुख्य दो प्रकार के प्रेक्षण हैं। सहभागी प्रेक्षण वैसे प्रेक्षण को कहा जाता है जिसमें अध्ययनकर्ता प्रयोज्यों द्वारा किए जा रहे व्यवहारों या क्रियाओं को करने में हाथ बंटाते हुए उनका प्रेक्षण करता है। परंतु, असहभागी प्रेक्षण इससे भिन्न होता है, क्योंकि इसमें अध्ययनकर्ता प्रयोज्यों द्वारा किए जा रहे व्यवहारों में बिना हाथ बटाएँ ही उनका निरीक्षण करता है।

प्रश्न 10.
मनोविज्ञान के प्रयोगों में कारण-परिणाम संबंध से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रयोगों में स्वतंत्र चर तथा आश्रित चर में उस विशेष संबंध को कारण-परिणाम संबंध कहा जाता है जिसमें स्वतंत्र चर में किए गए जोड़-तोड़ (कारण) से आश्रित चर में कुछ स्पष्ट परिवर्तन (परिणाम) होता है। मनोवैज्ञानिक प्रयोगों का उद्देश्य इस तरह के संबंध की सत्यता की जाँच करना होता है।

प्रश्न 11.
प्रकृतिवादी प्रेक्षण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रकृतिवादी प्रेक्षण वैसे प्रेक्षण को कहा जाता है जिसमें अध्ययनकर्ता प्राणियों जैसे पशुओं, पक्षियों तथा अन्य इसी तरह के विशेष प्राणी के व्यवहारों का अध्ययन उनके स्वाभाविक स्थानों (Natural settings) जिनमें वे रहते हैं, पर जाकर करता है।

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प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण के उद्देश्य की पूर्ति किन दशाओं में संभव होता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न मानवीय विशेषताओं (बुद्धि, अतिक्षमता, व्यक्तिगत रुचि, अभिवृत्ति, मूल्य शैक्षिक उपलब्धि आदि) के सही मूल्यांकन हेतु विभिन्न परीक्षणों का निर्माण करता है जिसका उपयोग वांछित उद्देश्यों (कार्मिक चयन, प्रशिक्षण, निर्देशन, निदान, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य) को पूरा करने में लगाने का प्रयास करता है।

परोक्षण को अर्थद्वन्द्व से बचाना, समय सीमा के बंधन को तोड़ना, मानवीकृत एवं वस्तुनिष्ठ उपकरणों का प्रयोग करना आदि परीक्षण की सफलता के मूल तत्व हैं। परीक्षण के उद्देश्यों के अनुकूल शब्दावली, पर्यावरणीय दशाओं का होना आवश्यक होता है। प्रतिक्रियादाताओं की प्रतिक्रियाओं की गणना की विधि का भी उल्लेख किया जाना वांछनीय होता है। अनुसंधान के सभी एकांशों की विशेषताओं का सही उपयोग परीक्षण की कामयाबी के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 13.
प्रयोगात्मक विधि से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि एक ऐसी विधि होती है जिसमें स्वतंत्र चर (Independent variable) तथा आश्रित चर (Dependent variable) के बीच कारण-परिणाम संबंध (Cause effect relationship) का एक नियंत्रित परिस्थिति (Controlled situation) में अध्ययन किया जाता है। स्वतंत्र चर से तात्पर्य वैसे चर से होता है जिसमें जोड़-तोड़ (Manipulation) किए जाने का दूसरे चर पर पड़नेवाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। आश्रित चर वैसे चर को कहा जाता है जिस पर स्वतंत्र चर का प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 14.
वैयक्तिक साक्षात्कार से क्या समझते हैं इसके प्रकार का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
वैयक्तिक साक्षात्कार उसे कहते हैं जिसमें 2 व्यक्ति आमने-सामने बैठे होते हैं। इनमें एक साक्षात्कारकर्ता होता है तथा दूसरा साक्षात्कारी होते हैं इसमें 2 प्रकार होते हैं –

  1. संरचित साक्षात्कार – इसमें प्रश्नों को स्पष्ट रूप से अनुसूची में एक क्रम लिखा जाता है।
  2. असरंचित साक्षात्कार – इसमें साक्षात्कारकर्ता को प्रश्नों के पूछे जाने के क्रम में परिवर्तन की स्वतंत्र रहती है।

प्रश्न 15.
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान में नैतिकता के सिद्धांत को स्पष्ट करें।
उत्तर:
नैतिकता के सिद्धांत निम्न है –

  1. स्वैच्छिक सहभागिता – मनोवैज्ञानिक अध्ययन में जिस व्यक्ति का अध्ययन किया उनकी स्वैच्छिक सहभागिता होनी चाहिए।
  2. प्रदत्त की गोपनीयता – प्रतिभागियों से प्राप्त सूचना की गोपनीयता बनाए रखना चाहिए।
  3. अध्ययन – परिणाम में भागीदारी अध्ययन से प्राप्त परिणाम की सूचना प्रयोज्य को देना चाहिए।
  4. तटस्थता एवं ईमानदारी – अध्ययनकर्ता को अध्ययन से प्राप्त परिणाम के प्रति तटस्थ एवं ईमानदार होना चाहिए।
  5. स्पष्टीकरण – अध्ययन समाप्त हो जाने के बाद प्रतिभागियों को वे सब सूचना देनी चाहिए, जिससे वे अनुसंधान को ठीक से समझ सकें।

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प्रश्न 16.
स्वतंत्र चर तथा आश्रित चर के अंतर को एक उदाहरण से समझायें।
उत्तर:
स्वतंत्र चर वैसे चर को कहा जाता है जिसमें प्रयोगकर्ता जोड़-तोड़ (Manipulation) करके उसके पड़नेवाले प्रभाव का अन्य चर पर अध्ययन करता है। आश्रित चर वैसे चर को कहा जाता है जिस पर स्वतंत्र चर में किए गए जोड़-तोड़ का प्रभाव पड़ता है तथा साथ-ही-साथ जिसके बारे में प्रयोगकर्ता प्रयोग करके भविष्यवाणी करना चाहता है।

जैसे-मान लिया जाए कि प्रयोगकर्ता पुरस्कार का सीखने पर पड़नेवाले प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एक प्रयोज्य को कुछ विशेष सामग्री विशेष इनाम की घोषणा के साथ यदि करने के लिए देता है और फिर वही सामग्री दूसरे प्रयोज्य को बिना किसी के इनाम की घोषणा के बाद करने के लिए देता है। यदि पहला प्रयोज्य दूसरे प्रयोज्य की तुलना में जल्द सामग्री को सीख लेता है तो यहाँ स्पष्टतः कहा जाएगा कि पुरस्कार से सीखने पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इस उदाहरण में सीखना आश्रित चर तथा पुरस्कार स्वतंत्र चर का उदाहरण है।

प्रश्न 17.
प्रयोगात्मक विधि तथा प्रेक्षण विधि में अचर बतलायें।
उत्तर”
समाज मनोविज्ञन में प्रयोगात्मक विधि तथा प्रेक्षण विधि दोनों का उपयोग होता है। फिर भी, इन दोनों में कुछ अंतर हैं जो निम्नांकित है –

  1. प्रयोगात्मक विधि में परिस्थिति हमेशा कृत्रिम (artificial) होती है जबकि प्रेक्षण विधि में परिस्थिति कृत्रिम न होकर स्वाभाविक (natural) होती है।
  2. प्रयोगात्मक विधि में स्वतंत्र चर को जोड़-तोड़ (manipulation) किया जाता है जबकि प्रेक्षण विधि में स्वतंत्र चर में वैसा प्रत्यक्ष जोड़-तोड़ नहीं किया जाता है।
  3. प्रयोगात्मक विधि में कारण-परिणाम संबंध (Cause-effect relation) स्थापित करना संभव है, परंतु प्रेक्षण विधि में इस तरह का संबंध सामान्यतः स्थापित नहीं हो पाता है।
  4. प्रयोगात्मक विधि की विश्वसनीयता तथा वैधता (validity) प्रेक्षण विधि की विश्वसनीयता तथा वैधता से अधिक होती है।

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प्रश्न 18.
नियंत्रित चर से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रयोगों में यह विशेष रूप से प्रेक्षण किया जाता है कि स्वतंत्र चर में किए गए जोड़-तोड़ से आश्रित चर किस तरह से प्रभावित होता है। इसके अलावा प्रयोगकर्ता कुछ ऐसे चरों, जो स्वतंत्र चर के समान होते हैं तथा जिनसे आश्रित चर प्रभावित हो सकते हैं, के प्रभाव को नियंत्रित करके रखता है। ऐसे चरों को नियंत्रित चर कहा जाता है।

प्रश्न 19.
निरीक्षण विधि के गुणों का वर्णन करें।
उत्तर:
निरीक्षण विधि के निम्नलिखित गुण हैं –
(क) यह विधि बच्चों की क्रियाओं का वस्तुनिष्ठ एवं अवैयक्तिक अध्ययन करती है। अध्ययन पूर्वाग्रहमुक्त एवं निष्पक्ष होता है।
(ख) इस विधि द्वारा स्वाभाविक अध्ययन होता है। सामूहिक व्यवहार का अध्ययन संभव है।
(ग) इस विधि द्वारा एक साथ अनेकानेक बच्चों का अध्ययन संभव होता है। बहरे, गूंगे, पागल, पशु-पक्षी सबके व्यवहार का अध्ययन संभव है।
(घ) इस विधि में उपकरणों एवं यंत्रों की सहायता ली जाती है।
(ङ) इस विधि में अध्ययन को दुहराया जाता है और उसकी विश्वसनीयता की जांच की जाती है।
(च) इस विधि द्वारा प्राप्त सामग्री का निरूपण संभव है। चूँकि सामग्रियाँ परिमाण में मिलती हैं, अत: उनकी सांख्यिकीय व्याख्या संभव है। निष्कर्ष की वैधता एवं विश्वसनीयता की जाँच हो सकती है।

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प्रश्न 20.
साक्षात्कार विधि के गुणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
साक्षात्कार विधि के गुण निम्नांकित हैं –
(क) इस विधि का पहला गुण यह है कि इस विधि द्वारा बच्चों की मनोवृत्तियों एवं जीवन-मूल्यों को समझने में सहायता मिलती है।
(ख) यह सामान्य, असामान्य, असमंजित (maladjusted) बच्चों के अध्ययन में उपयोगी है।
(ग) इस विधि का तीसरा गुण यह है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों (data) की सत्यता एवं प्रतिपन्नता अधिक है।
(घ) स्वतंत्र साक्षात्कार में बच्चे खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ करते हैं। इसका नैदानिक महत्व (clinical value) ज्यादा है।
(ङ) जिन बच्चों में भाषा-विकास हुआ रहता है वे प्रश्नों के उत्तर लिखकर अथवा बोलकर सफल ढंग से दे पाते हैं। यह भी इस विधि की विशेषता है।
(च) समालापक (interviewer) साक्षात्कार के समय अपना निष्पक्ष अध्ययन करता है और पूर्वधारणा का असर नहीं होने देता, अतः सूचनाएँ पूर्वधारणा मुक्त होती हैं।
(छ) इस विधि का यह भी गुण है कि समालापक प्रशिक्षित होते हैं, अतः बच्चों की प्रतिक्रियाएँ अच्छी तरह अंकित कर लेते हैं।
(ज) इस विधि की यह विशेषता है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकी निरूपण (statistical treatment) संभव है।

प्रश्न 21.
साक्षात्कार विधि के दोषों का विवेचन करें।
उत्तर:
साक्षात्कार विधि के निम्नलिखित दोष हैं –
(क) इस विधि का पहला दोष यह है कि यह विधि एक खास उम्र के बच्चों के अध्ययन तक ही सीमित है, क्योंकि साक्षात्कार के लिए भाषा का ज्ञान जरूरी है।
(ख) साक्षात्कार विधि में प्रतिक्रियाओं का अवरोधन (resistance) हानिकारक है। यह इस विधि का अवगुण है।
(ग) इस विधि में यह भी दोष है कि प्रशिक्षित समालापक भी कभी-कभी अपने अध्ययन में अपनी पूर्वधारणा की छाप छोड़ देते हैं जिससे अध्ययन दोषपूर्ण हो जाता है।
(घ) इसका चौथा दोष यह है कि गूंगे (dumb) और बहरे (deaf) बच्चों की मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में असफल है।
(ङ) यह विधि पूर्वपाठशालीय बालक के अध्ययन में भी असफल है।

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प्रश्न 22.
प्रश्नावली विधि के गुणों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रश्नावली विधि के गुण इस प्रकार हैं –

  1. इस विधि का पहला गुण है कि यह विधि वस्तुनिष्ठ है। इससे प्राप्त प्रदत्त वस्तुनिष्ठ होते हैं।
  2. इसका दूसरा गुण यह है कि वैसे बच्चे जिनकी भाषा विकसित होती है वे खुलकर स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बातों को अध्ययनकर्ता के सामने रख देते हैं।
  3. इस विधि की तीसरी विशेषता यह है कि इससे असामान्य, असमंजित एवं समस्याजन्य सभी प्रकार के बच्चों का अध्ययन संभव है।
  4. इसकी चौथी विशेषता यह है कि इस विधि द्वारा सामूहिक रूप से बच्चों का अध्ययन संभव है जिससे समय और पैसे की बचत होती है।
  5. इसकी पाँचवीं विशेषता यह है कि इससे प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकीय विश्लेषण संभव है।

प्रश्न 23.
प्रश्नावली विधि के दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
इस विधि में निम्नांकित दोष हैं –

  1. यह मात्र उन्हीं बच्चों पर लागू हो सकती है जिन्हें भाषा एवं प्रत्यय का ज्ञान हो। अतः यह विधि सीमित है।
  2. इसका दूसरा दोष यह है कि इस विधि द्वारा गूंगे एवं बहरे बच्चे का अध्ययन संभव नहीं है।
  3. इस विधि में तीसरा दोष यह है कि बच्चे प्रश्नों के उत्तर देने में अवरोध (resistance) दिखाते हैं।
  4. पाँचवाँ दोष यह है कि अध्ययनकर्ता अपनी पूर्वधारणा की छाप अध्ययन पर छोड़ देते हैं जिससे निष्कर्ष सही नहीं आता।

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प्रश्न 24.
विकासात्मक मनोविज्ञान की अध्ययन विधि के रूप में निरीक्षण विधि के दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
इस विधि के निम्नांकित दोष हैं –
(क) वस्तुगत अध्ययन के बावजूद अध्ययन से प्राप्त सामग्रियों में निरीक्षणकर्ता की पूर्वधारणा तथा उसके वैयक्तिक दृष्टिकोण का समावेश हो जाता है। अतः निष्कर्ष की सत्यता एवं विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। यह एक महत्वपूर्ण आरोप इस विधि के खिलाफ है।

(ख) इस विधि का यह दोष भी है कि एक प्रकार के व्यवहासर के आधार पर संबंधित ‘मानसिक क्रियाओं का आकलन संभव नहीं है। जैसे बच्चों के संवेग में होनेवाली शारीरिक क्रियाओं के आधार पर हम निश्चित रूप से संवेग की जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। बच्चों के कन्दन की क्रिया में कौन-सा संवेग है, यह पता लगाना कठिन है।

प्रश्न 25.
प्रयोगात्मक विधि के गुणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि की समीक्षा करने पर हम देखते हैं कि इस विधि में यद्यपि काफी बियाँ हैं, तथापि यह दोषमुक्त नहीं कही जा सकती। इस विधि की निम्नांकित खूबियाँ हैं –

  1. इस विधि का पहला गुण यह है कि यह विधि सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन क्रमबद्ध एवं नियंत्रित वातावरण में करता है। यह वैज्ञानिक विधि है।
  2. इस विधि द्वारा प्राप्त प्रदत्त (data) वस्तुनिष्ठ एवं पूर्वधारणामुक्त होता है।
  3. समस्या से संबंधित प्रयोग को निष्कर्ष की जाँच के लिए दुहराया जा सकता है। एक या अनेक शोधकर्ता प्रयोग को दुहरा सकते हैं।
  4. इसकी यह भी खूबी है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकीय निरूपण संभव है। प्रदत्तों की विश्वसनीयता एवं प्रतिपन्नता की जाँच हो सकती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रयोगविधि की परिभाषा दें एवं इनके गुण दोषों को लिखें।
उत्तर:
प्रयोग का अर्थ ऐसे प्रेक्षण से है जो नियंत्रित परिस्थिति में किया जाता है। किसी परिकल्पना की सत्यता को प्रमाणित करने के उद्देश्य से जो प्रेक्षण नियंत्रित परिस्थिति में किया जाता है उसे प्रयोग कहते हैं। यह मनोविज्ञान की आधुनिक विधि है। चैपलिन के शब्दों में-“प्रयोग प्रेक्षणों” की एक श्रृंखला है जो एक परिकल्पना की जाँच के उद्देश्यों से नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाता है।” चैपलिन ने प्रयोगात्मक विधि की परिभाषा इस प्रकार दी है –
“प्रयोगात्मक विधि वह प्रविधि है जिसके द्वारा प्रयोग के आधार पर सूचनाओं की खोज की जाती है।” प्रयोगात्मक विधि में प्रयुक्त आवश्यक अंग –

  1. प्रयोगकर्ता
  2. प्रयोज्य
  3. नियंत्रित प्रयोगशाला
  4. यंत्र – उपकरण विज्ञान प्रयोगों पर आधारित होता है। मनोविज्ञान का आधार भी प्रयोग है।
  5. मनोविज्ञान की प्रयोग विधि दूसरी सभी विधियों से अधिक वैज्ञानिक है। सच तो यह है कि उसी विधि के बल पर मनोविज्ञान विज्ञान होने का दावा करता है। अतः हम यहाँ देखना चाहेंगे कि मनोविज्ञान की प्रयोग-विधि में कौन-कौन से वैज्ञानिक गुण है।

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प्रश्न 2.
सहसंबंधात्मक अनुसंधान के क्रम में सहसंबंध गुणांक का निर्धारण क्यों किया जाता है?
उत्तर:
सहसंबंधात्मक अनुसंधान प्रयोगात्मक विधि से भिन्न होता है, क्योंकि इसमें अध्ययन के समय तथा उपलब्धियों पर किसी भी तरह का प्रभाव डालने की छूट नहीं होती है। पूर्वकथन। की स्पष्टता के लिए दो परिवयों के बीच सम्बन्ध का निर्धारण करना प्रमुख उद्देश्य होता है। चयनित दोनों परिवों में सम्बन्ध की शक्ति एवं दिशा एक गणितीय लब्धांक (सहसम्बन्ध गुणांक) द्वारा प्रस्तुत करने की प्रथा बन चुकी है। सहसंबंध गुणांक का विस्तार + 1.00, 0.2 से – 1.0 तक होता है।

धनात्मक सहसंबंध में जब एक परिवर्त्य का मान बढ़ता है तो दूसरे परिवर्त्य का मान भी बढ़ता है। जैसे, पढ़ने का समय बढ़ाने से छात्र का लब्धांक भी बढ़ जाता है। इस स्थिति में दोनों परित्वों के बीच जितना अधिक साहचर्य होगा वह गुणांक (+1.00) से उतना ही निकट होगा। सामान्य छात्रों के लिए अध्ययन में लागत समय और लब्धांक के लिए सहसंबंध गुणांक सामान्यतया +0.85 मिलता है। ऋणात्मक सहसंबंध में जब एक परिवर्त्य (x) का मान बढ़ता है तो दूसरे परिवर्त्य का मान घटता है। जैसे अध्ययन के लिए समय में होनेवाली वृद्धि से खेलने के समय के मान में कमी आ जाती है।

इस स्थिति में गुणांक विस्तार 0 और – 1.0 के मध्य मिलता है। चयनित दो परिवों के बीच जब कोई सहसंबंध नहीं होता है तो उसे शून्य सहसंबंध कहा जाता है। जैसे-अध्ययन के समय बदलने के प्रभाव के कारण छात्र के पैंट की लम्बाई में कोई अंतर नहीं आता है। इस स्थिति में गुणों का विस्तार – 0.2 अथवा + 0.3 के मध्य मिलता है जबकि नियमत: उसे शून्य होना चाहिए। अतः परिवों के लक्षण, व्यवहार, प्रभाव तथा अनुप्रयोग की दृष्टि से सहसंबंध गुणांक अ अति उपयोगी विधि बनती जा रही है।

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प्रश्न 3.
साक्षात्कार क्या है? इसके कौन-कौन गुण तथा दोष हैं? विवेचना करें।
उत्तर:
इस विधि में साक्षात्कार करनेवाले विशेषज्ञों का एक समूह होता है जिसे साक्षात्कार बोर्ड के नाम से जाना जाता है। जो लोग साक्षात्कार के लिए सामने आते हैं उन्हें समालाप्य (interviewee) कहते हैं। साक्षात्कार आमने-सामने बैठकर होता है। यह विधि सूचनाओं एवं तथ्यों की जानकारी के लिए ‘प्रश्न-उत्तर’ पद्धति को अपनाती है।

इसमें समालाप्य तथा समालापक (interviewer) के बीच आत्मिक संबंध (rapport) करना, सधमालापक का प्रशिक्षित (trained) होना, पूर्वधारणामुक्त होना, पूछे गए प्रश्नों की बनावट एवं भाषा पर ध्यान रखना, समालाप्य को भाषा का ज्ञान होना, उसे मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ होना इत्यादि बातों पर ध्यान रखना जरूरी हो जाता है। साक्षात्कार के मुख्य दो रूप सामने आते हैं –

1. प्रामाणिक साक्षात्कार (Standardized interview):
इसमें प्रश्नों की सूची पहले से तैयार कर ली जाती है। इन प्रश्नों को समालाप्य से क्रमानुसार पूछा जाता है। सभी लोगों के लिए एक ही तरह के प्रश्न होते हैं।

2. स्वतंत्र साक्षात्कार (Free interview):
इसमें समलापक स्वतंत्र रूप से विषय से संबंधित प्रश्नों को पूछते हैं।

गुण (Meritis):
साक्षात्कार विधि के गुण निम्नांकित हैं –
(क) इस विधि का पहला गुण यह है कि इस विधि द्वारा बच्चों की मनोवृत्तियों एवं जीवन-मूल्यों को समझने में सहायता मिलती है।
(ख) यह सामान्य, असामान्य, असमंजित (maladjusted) बच्चों के अध्ययन में उपयोगी है।
(ग) इस विधि का तीसरा गुण यह है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों (data) की सत्यता एवं: प्रतिपन्नता अधिक है।
(घ) स्वतंत्र साक्षात्कार में बच्चे खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ करते हैं। इसका नैदानिक महत्व (clinical value) ज्यादा है।
(ङ) जिन बच्चों में भाषा विकास हुआ रहता है वे प्रश्नों के उत्तर लिखकर अथवा बोलकर सफल ढंग से दे पाते हैं। यह भी इस विधि की विशेषता है।
(च) समालापक साक्षात्कार के समय अपना निष्पक्ष अध्ययन करता है और पूर्वधारणा का असर नहीं होने देता, अत: सूचनाएँ पूर्वधारणामुक्त होती हैं।
(छ) इस विधि का यह भी गुण है कि समालापके प्रशिक्षित होते हैं, अत: बच्चों की प्रतिक्रियाएँ अच्छी तरह अंकित कर लेते हैं।
(ज) इस विधि की यह विशेषता भी है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकीय निरूपण (statistical treatment) संभव है।

दोष (Demerits):
(क) इस विधि का पहला दोष यह है कि यह विधि एक खास उम्र के बच्चों के अध्ययन तक ही सीमित है, क्योंकि साक्षात्कार के लिए भाषा का ज्ञान जरूरी है।
(ख) साक्षात्कार विधि में प्रतिक्रियाओं का अवरोधन (resistance) हानिकारक है। यह भी इस विधि का अवगुण है।
(ग) इस विधि में यह भी दोष है कि प्रशिक्षित समालापक भी कभी-कभी अपने अध्ययन में अपनी पूर्वधारणा की छाप छोड़ देते हैं जिससे अध्ययन दोषपूर्ण हो जाता है।
(घ) इसका चौथा दोष यह है कि यह गूंगे (dumb) और बहरे (deaf) बच्चों की मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में असफल है।
(ङ) यह विधि पूर्वपाठशीय बालकों के अध्ययन में भी असफल है।

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प्रश्न 4.
प्रयोगात्मक विधि या प्रयोगात्मक निरीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं? इसके गुण एवं दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
प्रयोगात्मक या प्रयोगात्मक निरीक्षण विधि बाह्य निरीक्षण विधि का ही एक प्रमुख रूप है। यह प्रयोग विधि भी एक प्रकार का निरीक्षण है। इस विधि का प्रयोग बच्चों के अध्ययन के लिए नियंत्रित वातावरण (controlled condition) में होता है। अध्ययन पूर्वयोजनानुसार क्रमबद्ध होता है। यह निरीक्षण प्रयोग पर आधारित है। इस विधि द्वारा अध्ययन के क्रम में मनोवैज्ञानिक उपकरणों एवं यंत्रों की सहायता ली जाती है। इस विधि में प्रयोगात्मक परिस्थिति का निर्माण किया जाता है जो नियंत्रित होती है। बच्चों के व्यवहार-संबंधी समस्या पर प्रयोग किए जाते हैं।

जैसे-बाल-मनोविज्ञान के अंतर्गत यह समस्या है कि विटामिन A बच्चों की आँखों की रोशनी को प्रभावित करता है या नहीं, तो ऐसी स्थिति में हम समान उम्र के बच्चों को दो समूहों में बाँटकर एक समूह को विटामिन A देते हैं और दूसरे को नियंत्रित रखते हैं। यहाँ प्रयोगात्मक समूह के बच्चों की आँख की रोशनी की नियंत्रित समूह के बच्चों की आँख की रोशनी से तुलना करते हैं। यदि अंतर आता है तो हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि विटामिन A से आँख की रोशनी बढ़ती है। Gesell के अनुसार नियंत्रित निरीक्षण ही प्रयोग विधि है।

बाल –
मनोविज्ञान के अध्ययन में प्रयोगात्मक निरीक्षण के अंतर्गत कई प्रविधियों (tech niques) का इस्तेमाल किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं –

  1. फोटोग्राफिक डोम तकनीक (photographic dome technique)
  2. वन-वे स्क्रीन विधि (one-way screen technique)
  3. सिनेमाटोग्राफिक तकनीक (cinematographic technique)
  4. प्रयोगात्मक भवन (experimental cabinet)

1. फोटोग्राफिक डोम तकनीक:
इस प्रविधि द्वारा बच्चों के व्यवहारों का चित्र लिया जाता है। Gesell ने इस विधि द्वारा बच्चों की प्रतिक्षेप की क्रियाओं (reflex actions) का अध्ययन किया है।

2. वन-वे स्क्रीन विधि:
इस प्रविधि द्वारा पर्दे की ओट से बच्चों के व्यवहारों का निरीक्षण किया जाता है। यहाँ भी स्वाभाविक निरीक्षण संभव हो पाता है। इस प्रविधि को निरीक्षण के लिए Gesell ने भी अपनाया था।

3. सिनेमाटोग्राफिक तकनीक:
बच्चों की स्वाभाविक क्रियाओं का अध्ययन चलचित्रों के माध्यम से किया जाता है। खासकर, संवेग एवं सामाजिक प्रतिक्रियाओं में यह कारगर प्रविधि है।

4. प्रयोगात्मक भवन:
इसके द्वारा बच्चों को कमरे में रखकर लगातार बच्चों के व्यवहारों का निरीक्षण काफी समय तक किया जाता है। Ohio State University में इस प्रविधि का इस्तेमाल शुरू हुआ। उपर्युक्त प्रविधियाँ स्वतंत्र रूप से कारगर हैं और सम्मिलित रूप से भी। अतः ये एक-दूसरे के पूरक हैं।

गुण (Merits):
इसके गुण या विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
(क) इस विधि का यह गुण है कि इस विधि से प्रदत्त (data) पूर्वधारणामुक्त, निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ (objective) होता है।
(ख) इस विधि द्वारा अध्ययन की जाँच के लिए प्रयोग को दुहराया जा सकता है और प्रदत्तों की सत्यता की जाँच की जा सकती है।
(ग) इस विधि द्वारा प्रदत्तों की सांख्यिकीय निरूपण (statistical analysis) संभव है। इसके द्वारा परिणाम की सत्यता एवं प्रतिपन्नता (reliability and validity) जाँची जा सकती है।
(घ) इस विधि द्वारा मानव व्यवहार का अध्ययन योजनानुसार क्रमबद्ध ढंग से नियंत्रित वातावरण में किया जाता है। वस्तुगत अध्ययन के कारण प्रदत्त में एकत्र होते हैं।

दोष (Demerits):
इस विधि में निम्नलिखित कमियाँ हैं –
(क) यह विधि बच्चों की सभी मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में असफल है। जैसे-अचेतन की क्रियाएँ।
(ख) यह विधि नियंत्रित वातावरण में सभी प्रकार की मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों को उत्पन्न नहीं कर सकती। जैसे-भीड़-व्यवहार, सामाजिक तनाव, क्रांति इत्यादि।
(ग) यह विधि इसलिए भी दोषपूर्ण है कि नियंत्रित वातावरण में स्वाभाविक प्रतिक्रिया संभव नहीं है।
(घ) यह विधि सीमित भी है, क्योंकि सभी तरह के प्रयोग सभी प्रकार के प्राणियों पर प्रयोगशाला के नियंत्रित वातावरण में संभव नहीं है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

प्रश्न 5.
वस्तुनिष्ठ निरीक्षण विधि क्या है? इसके गुण एवं दोषों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रेक्षण या निरीक्षण विधि (Observation method) –
मनोविज्ञान की एक प्रमुख विधि है। जब वाटसन (Watson) ने पहली बार यह कहा कि मनोविज्ञान चेतन अनुभूति का विज्ञान नहीं है बल्कि व्यवहार के अध्ययन का विज्ञान है, तब उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मनोविज्ञान की विषय-वस्तु अर्थात् व्यवहार के अध्ययन करने की सबसे उत्तम विधि वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण (Objective observation) है। वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण वह विधि है जिसमें प्राणियों के व्यवहारों का अध्ययन किसी विशेष परिस्थिति में किया जाता है।

व्यवहार से तात्पर्य प्राणी की उन सभी क्रियाओं से होता है जो उद्दीपन (Stimulus) के प्रभावों के फलस्वरूप वह करता है। व्यवहार बाह्य (Extermal) तथा आंतरिक दोनों तरह के हो सकते हैं। रोना, दौड़ना आदि बाह्य व्यवहार के तथा साँस की गति में परिवर्तन, रक्तचाप में परिवर्तन आदि आंतरिक व्यवहार के उदाहरण हैं। जब कोई निरीक्षक या प्रेक्षक प्राणी के व्यवहारों का निरीक्षण किसी भी परिस्थिति में करके एकसमान निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, तब ऐसे निरीक्षण को वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण या निरीक्षण (Objective observation) कहा जाता है।

मनोवैज्ञानिकों द्वारा वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण को निम्नांकित तीन प्रमुख भागों में बाँटा गया है –

(a) सहभागी प्रेक्षण (Participant observation):
इस प्रेक्षण में प्रेक्षक घटना या व्यवहार को करने में स्वयं हाथ भी बँटाता है तथा उसका प्रेक्षण द्वारा अध्ययन भी करता है।

(b) असहभागी प्रेक्षण (Non-participant observation):
इस तरह के प्रेक्षण में प्रेक्षक घटना या व्यवहार का मात्र निरीक्षण करता है, उसके करने में हाथ नहीं बँटाता है।

(c) प्रकृतिवादी प्रेक्षण (Naturalistic observation):
इस विधि में प्राणी के व्यवहारों का अध्ययन उनकी स्वाभाविक परिस्थिति जैसे बंदरों, चिड़ियों, मधुमक्खियों के व्यवहारों का उनके स्वाभाविक रहने के स्थानों में प्रेक्षण किया जाता है।

गुण (Merits):
(a) वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण विधि में वस्तुनिष्ठता (Objectivity) अधिक होती है। फलतः इससे प्राप्त निष्कर्ष अधिक विश्वसनीय होते हैं। जैसे-किसी व्यक्ति को जोर-जोर से बोलते, आँख लाल किए तथा उसके नथुने फड़कते देखते हैं, तो इस प्रेक्षण के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि व्यक्ति क्रोधित है।

(b) इस विधि का प्रयोग बच्चे, प्रौढ़, पशु-पक्षी, असामान्य व्यक्तियों आदि सभी पर किया जा सकता है। अतः इस विधि ने अंतर्निरीक्षण विधि की तुलना में निश्चित रूप से मनोविज्ञान के कार्यक्षेत्र (Scope) को विस्तृत कर दिया है।

(c) इस विधि द्वारा एक समय में एक से अधिक व्यक्तियों के व्यवहारों का प्रेक्षण आसानी से किया जा सकता है। समूह, भीड़ व्यवहार आदि का अध्ययन जो अंतर्निरीक्षण विधि से संभव नहीं है, इस विधि द्वारा आसानी से किया जा सकता है।

(d) इस विधि द्वारा किसी व्यवहार से प्राप्त तथ्यों की सांख्यिकीय व्याख्या किया जाना संभव है। सांख्यिकीय व्याख्या करने से मनोविज्ञान का स्वरूप अधिक वस्तुनिष्ठ तथा वैज्ञानिक हो जाता है।

दोष:
(a) इस विधि में प्राणी के व्यवहारों का प्रेक्षण करके उसकी मानसिक स्थिति का पता लगाया जाता है। मानसिक स्थिति के बारे में इस तरह का अनुमान लगाना हमेशा सही नहीं हो पाता है। जैसे-खुशी और दुख दोनों ही अवस्थाओं में व्यक्ति की आँख में आँसू निकल आते हैं। इस प्रकार, व्यक्ति की आँसू को देखकर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि व्यक्ति में हर्ष की मानसिक स्थिति है या विवाद की।

(b) इस विधि का अन्य दोष यह है कि प्रेक्षक तथा उसकी व्याख्या करते समय पूर्वधारणा या पूर्वाग्रह तथा अपने अन्य निजी अनुभवों द्वारा काफी प्रभावित हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है प्राप्त निष्कर्ष गलत एवं अविश्वसनीय हो जाते हैं।

(c) सामान्यतः प्रेक्षक (Observer) परिस्थिति में स्वयं उपस्थित होकर ही व्यवहारों का प्रेक्षण तथा व्याख्या करता है। ऐसा देखा गया है कि परिस्थिति में प्रेक्षक की उपस्थिति से व्यक्तियों के वास्तविक व्यवहार में कुछ कृत्रिमता या विकृति आ जाती है जिससे किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना संभव नहीं हो पाता है। इस दोष को दूर करने के लिए प्रेक्षक प्रायः अपनी पहचान छिपा लेते हैं या एक-तरफा पर्दा (One-way screen) का उपयोग करते हैं।

(d) कभी-कभी देखा गया है कि प्रेक्षक इस विधि द्वारा पागलों, पशुओं, बच्चों आदि के व्यवहारों का प्रेक्षण अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण से करते हैं जिसके कारण इनके संबंध में प्राप्त परिणाम विश्वसनीय एवं वैध (Valid) नहीं हो पाते हैं। जैसे-यदि प्रेक्षक बच्चों के व्यवहारों का प्रेक्षण को दोषपूर्ण होना ही है और प्राप्त निष्कर्ष को अयथार्थ होना ही है। वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण विधि के गुण-दोषों पर विचार करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह विधि मनोविज्ञान के लिए काफी उपयोगी है।

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प्रश्न 6.
प्रश्नावली विधि के गुण तथा दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
G. Stanlet Hall ने सर्वप्रथम इस विधि का निर्माण विकासात्मक मनोविज्ञान के अध्ययन के लिए किया। इस विधि में बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं की जानकारी के लिए प्रश्न बनाए जाते हैं। प्रश्नों द्वारा बच्चों के व्यवहार-संबंधी उत्तर अंकित किए जाते हैं। इस विधि का प्रयोग कम उम्र के बच्चों के अध्ययन में नहीं हो पाता है, क्योंकि प्रश्नों के उत्तर के लिए भाषा विकसित होना चाहिए।

प्रतिमाओं के अध्ययन में Galton ने इस विधि को अपनाया। वैसे, बच्चों की मनोवृत्ति एवं जीवन-मूल्यों के अध्ययन में यह विधि सफल रही है। ऊपर के विवेचन से यह स्पष्ट है कि इस विधि में प्रश्नों की भूमिका महत्वपूर्ण है। यहाँ हमें इस बात पर विचार करना होगा कि प्रश्नों की सूची कैसी होती है, प्रश्न किस स्वरूप के होते हैं। प्रश्नों के बारे में विचार करने पर पाया गया है कि प्रश्न मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –

1. संरचित प्रश्न-इस प्रकार की प्रश्नावली में बच्चों के व्यवहार:
संबंधी बातों की जानकारी से संबंधित प्रश्न होते हैं, जो पहले से ही तैयार कर लिए जाते हैं। बच्चों से प्रश्न पूछा जाता है और उत्तर अंकित किए जाते हैं। इस प्रश्नावली को उन्हीं बच्चों से पूछा जाता है जिन्हें भाषा एवं प्रत्यय की समझ होती है।

2. असंरचित प्रश्न:
इस प्रश्नावली का निर्माण पहले से नहीं होता है, बल्कि अध्ययन के समय व्यवहार-संबंधी प्रश्न पूछे जाते हैं। बच्चे स्वतंत्र होकर उत्तर देते हैं। इस संबंध में एक और बात ध्यान देने योग्य है कि अध्ययन के क्रम में प्रश्नों के उत्तर को सीमित रखा जाए अथवा असीमित। अर्थात्, बच्चे कुछ उत्तरों में से एक उत्तर चुनें अथवा स्वतंत्रतापूर्वक अपनी इच्छानुसार उत्तर दें। इस संदर्भ में भी दो प्रकार के उत्तर-उन्मुखं प्रश्नावली का व्यवहार होता है –

  • प्रतिबंधित प्रश्नावली – इसमें बच्चे लिखित उत्तरों में किसी एक के बारे में हाँ, ना, सहमत, असहमत इत्यादि कहकर उत्तर देते हैं।
  • अप्रतिबंधित प्रश्नावली – इसमें बच्चे स्वतंत्र होकर प्रश्नों के उत्तर देते हैं। बच्चे अपनी मनोवृत्ति, शिक्षा, मनोभावों, मनोवेगों एवं विचारों को खुलकर उत्तर के रूप में व्यक्त कर पाते हैं।

गुण (Merits):
प्रश्नावली विधि के गुण इस प्रकार हैं –

  1. इस विधि का पहला गुण यह है कि यह विधि वस्तुनिष्ठ है। इससे प्राप्त प्रदत्त वस्तुनिष्ठ होते हैं।
  2. इसका दूसरा गुण यह है कि वैसे बच्चे जिनकी भाषा विकसित होती है वे खुलकर स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बातों को अध्ययनकर्ता के सामने रख देते हैं।
  3. इस विधि की तीसरी विशेषता यह है कि इससे असामान्य, असमंजित एवं समस्याजन्य सभी प्रकार के बच्चों का अध्ययन संभव है।
  4. इसकी चौथी विशेषता यह है कि इस विधि द्वारा सामूहिक रूप से बच्चों का अध्ययन संभव है जिससे समय और अर्थ की बचत होती है।
  5. इसकी पाँचवी विशेषता यह है कि इससे प्राप्त प्रदत्तों (data) का सांख्यिकीय विश्लेषण (statistical analysis) संभव है।

दोष (Demerits):
इस विधि में निम्नांकित दोष हैं –

  1. यह मात्र उन्हीं बच्चों पर लागू हो सकती है जिन्हें भाषा एवं प्रत्यय का ज्ञान हो। अतः यह विधि सीमित है।
  2. इसका दूसरा दोष यह है कि इस विधि द्वारा गूंगे एवं बहरे बच्चे का अध्ययन संभव नहीं है।
  3. इस विधि में तीसरा दोष यह है कि बच्चे प्रश्नों के उत्तर देने में अवरोध (resistance) दिखाते हैं।
  4. चौथा दोष यह है कि कभी-कभी प्रश्नों का चुनाव सही नहीं हो पाता है। प्रश्न अस्पष्ट एवं कठिन होते हैं। अतः बच्चे सही-सही उत्तर नहीं दे पाते।
  5. पाँचवाँ दोष यह है कि अध्ययनकर्ता अपनी पूर्वधारण की छाप-अध्ययन पर छोड़ देते हैं जिससे निष्कर्ष सही नहीं आता।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समस्या पहचान के बाद शोधकर्ता समस्या का एक काल्पनिक उत्तर ढूँढता है उसे कहा जाता है:
(a) कल्पना
(b) परिकल्पना
(c) चर
(d) प्रयोग
उत्तर:
(b) परिकल्पना

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प्रश्न 2.
मनोविश्लेषण की नींव किसने डाली
(a) फ्रायड
(b) उण्ट
(c) टिचनर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) टिचनर

प्रश्न 3.
संरचनावादी सिद्धांत की स्थापना हुई?
(a) 1880 ई. में
(b) 1890 ई. में
(c) 1896 ई. में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 1896 ई. में

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य : परिभाषा एवं संबंध

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य: परिभाषा एवं संबंध Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य : परिभाषा एवं संबंध

Bihar Board Class 11 Home Science आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य : परिभाषा एवं संबंध Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जब किसी खाद्य-पदार्थ में कुछ अतिरिक्त पोषण तत्त्व मिलाए जाते हैं तो उसे कहते -[B.M.2009A]
(क) सम्मिश्रण
(ख) खमीरीकरण
(ग) अंकुरण
(घ) फॉरटीकिकेशन
उत्तर:
(घ) फॉरटीकिकेशन

प्रश्न 2.
आहार नष्ट होने के मुख्य कारण इनमें से कौन-सा है ? [B.M.2009A]
(क) बैक्टीरिया
(ख) वातावरण
(ग) खुला रखना
(घ) जल
उत्तर:
(क) बैक्टीरिया

प्रश्न 3.
‘अन्नत भवति भूतानी’ धार्मिक ग्रंथ का कथन है –
(क) रामायण
(ख) महाभारत
(ग) गीता
(घ) पुराण
उत्तर:
(ग) गीता

प्रश्न 4.
एना बोलिक और कैटाबोटिक के सम्मिलित रूप को कहते है –
(क) Metabolism
(ख) Catabolism
(ग) Ribolism
(घ) Cynololism
उत्तर:
(क) Metabolism

प्रश्न 5.
विटामिन ‘A’ ‘ए’ की कमी से होता है –
(क) मोटापापन
(ख) दुबला
(ग) अंधापन
(घ) सुखापन
उत्तर:
(ग) अंधापन

प्रश्न 6.
रिकेट्स होता है – [B.M.2009A]
(क) विटामिन A की कमी से
(ख) विटामिन B की कमी से
(ग) विटामिन C की कमी से
(घ) विटामिन D की कमी से
उत्तर:
(ग) विटामिन C की कमी से

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प्रश्न 7.
WHO के अनुसार स्वास्थ्य के पक्ष है –
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(घ) चार

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य (Health) की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य से तात्पर्य शरीर की विशेष प्रकार की स्थिति या दशा से है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) के अनुसार स्वास्थ्य की परिभाषा इस प्रकार है: “स्वास्थ्य व्यक्ति विशेष की पूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक निरोगता की स्थिति है, केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं।”

प्रश्न 2.
भोजन से आपका क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
भोजन (Food): शब्दकोष के अनुसार भोजन वह चीज है जिससे शरीर का पालन-पोषण होता है। भोजन को इस तरह से परिभाषित किया जा सकता है “कोई भी ऐसा पदार्थ (ठोस या तरल) जिसके खाने से शरीर में कार्य करने की शक्ति आती है, उसकी क्षतिपूर्ति और वृद्धि होती है तथा मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है, भोजन कहलाता है।”

प्रश्न 3.
संतुलित भोजन की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
संतुलित भोजन (Balance diet): भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (Indian Council for Medical Research) के अनुसार “संतुलित आहार वह आहार है जिसमें सभी पोषक तत्त्व उतनी मात्रा तथा अनुपात में हों जिनसे ऊर्जा, अमीनो एसिड, विटामिन्स, खनिज लवण, वसा, कार्बोहाइड्रेट तथा अन्य तत्त्वों की आवश्यकता शरीर की जैविक क्रियाओं तथा स्वास्थ्य को संतुलित बनाए रखने के लिए सही अनुपात में मिल जाए तथा साथ ही पोषक तत्त्वों का बहुत बड़ा-सा भाग शरीर में एकत्रित हो सके जिससे कि भूखा रहने पर शरीर को कुछ समय तक चलाया जा सके।”

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प्रश्न 4.
पोषण (Nutrition) को परिभाषित करें।
उत्तर:
पोषण वह क्रिया है जिसके द्वारा ग्रहण किया गया भोजन शरीर में सूक्ष्म इकाई में परिवर्तित होता है व उपयोगी बनकर इसके द्वारा सम्पादित कार्य कर सकता है। सरल भाषा में शरीर में कार्य करता हुआ भोजन पोषण कहलाता है।

प्रश्न 5.
रोग (Disease) को परिभाषित करें।
उत्तर:
रोग शरीर की वह स्थिति है जब मनुष्य शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप से पूर्णतया स्वस्थ नहीं होता । उसकी सामान्य शारीरिक, मानसिक या सामाजिक कार्यक्षमता में विकार उत्पन्न हो जाता है। ये विकार सूक्ष्म जीवाणुओं के प्रवेश से असामान्य, मानसिक, भावनात्मक या सामाजिक परिस्थितियों के उत्पन्न होने से हो सकते हैं।

प्रश्न 6.
पोषण (Nutrition) तत्त्व क्या हैं ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
भोज्य पदार्थों के वे छोटे-छोटे रासायनिक घटक जो शरीर के कार्यों को सम्पादित . करते हैं, पोषक तत्त्व कहलाते हैं। ये संख्या में छः होते हैं-कार्बोज, वसा, प्रोटीन, खनिज लवण, विटामिन व जल जो शरीर को क्रियाशील बनाते हैं।

प्रश्न 7.
पोषण स्तर (Nutrition status) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
पोषण स्तर-“भोजन द्वारा प्राप्त पौष्टिक तत्त्वों से शरीर का निर्माण करने की दशा को पोषण स्तर कहते हैं।”

प्रश्न 8.
कैलोरी (Calorie) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
भोजन द्वारा शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती है जो शरीर के कार्यों को करने के लिए आवश्यक होती है। इस ऊर्जा को मापने की इकाई को कैलोरी कहते हैं।

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प्रश्न 9.
गरीबी रेखा (Poverty line) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
“गरीबी रेखा वह काल्पनिक रेखा है जो मनुष्य की कैलोरी की कम से कम आवश्यकता को दर्शाती है।

प्रश्न 10.
WHO के अनुसार उत्तम स्वास्थ्य की क्या परिभाषा है ?
उत्तर:
WHO के अनुसार, शरीर में केवल रोग का ही नहीं होना अच्छा स्वास्थ्य नहीं हैं बल्कि शरीर की ऐसी स्थिति जिसमें मनुष्य के शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप से पूर्णतया संतुष्ट होने को उत्तम स्वास्थ्य कहते हैं।

प्रश्न 11.
पोषण कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर:
पोषण चार प्रकार का होता है –

  • अल्प पोषण
  • संतुलित पोषण
  • अत्यधिक पोषण
  • असंतुलन।

प्रश्न 12.
मोहन को हमेशा आलू के चिप्स खाने की आदत है। उन दो स्रोतों के नाम बताइए, जहाँ से उसने यह आदत ग्रहण की होगी?
उत्तर:

  • मित्र समूह (Peer Group)।
  • विज्ञापन-टी.बी., रेडियो व अखबार से (Media)।
  • घर में बड़े और भाई-बहन से (Adults/Siblings in the family) ।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य के आयाम (Dimensions of Health) कौन-से हैं ?
उत्तर:
स्वास्थ्य के आयाम-एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य के चार पक्ष हैं शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व आध्यात्मिक । इन चारों को स्वास्थ्य का आयाम कहा जाता है।

प्रश्न 2.
भोजन को पोषकों के आधार पर किस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है ?
उत्तर:
भोजन को पोषकों के आधार पर निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है(क) पोषक तत्त्वों के आधार पर (Based on Nutrients)। (ख) कार्यात्मक आधार पर (Based on their functions)।

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प्रश्न 3.
सुपोषण (Good Nutrition) और कुपोषण (Mal Natritions) में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सुपोषण-जब भोजन द्वारा मनुष्य को अपनी आवश्यकतानुसार सभी पोषक तत्त्व उचित मात्रा में मिलते हैं तो इस स्थिति को सुपोषण अथवा उत्तम पोषण की स्थिति कहते हैं। उत्तम पोषण द्वारा ही व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य ग्रहण करता है। कुपोषण-कुपोषण का शाब्दिक अर्थ है “अव्यवस्थित पोषण”। जब मनुष्य को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा में सभी पौष्टिक तत्त्व नहीं मिलते या आवश्यकता से अधिक मिलते हैं तो उसे कुपोषण कहते हैं। कुपोषण के कारण मनुष्य के शरीर की वृद्धि, विकास एवं कार्यशीलता पर कुप्रभाव पड़ता है। गन्दा वातावरण, संक्रमण आदि कुपोषण की स्थिति को और उग्र कर देते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आहार संरक्षण से आप क्या समझते हैं ? इनके सिद्धान्तों का वर्णन करें। [B.M.2009A]
उत्तर:
आहार संरक्षण का अर्थ होता है भोजन को इस ढंग से पकाना या ऐसे वातावरण में रखना, जिससे भोजन के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करके, एक निश्चित समय तक अंतर्गत खाद्य पदार्थ को लंबे समय तक रोग वाहक जीवाणुओं व रासायनिक पदार्थों के प्रभाव से मुक्त . रखा जाता है । साथ ही उनका रंग, रचना, स्वाद, सुगंध व पोषक मूल्य को भी बनाए रखा जाता है।

आहार संरक्षण के सिद्धान्त (Principles of food-preseravation): आहार संरक्षण के मूल सिद्धान्त निम्नलिखित होते हैं
(a) जीवाणु से भोजन खराब होने की क्रिया को रोक कर या कम करके (To prevent or delay decomposition by microbes): आहार संरक्षण के द्वारा भोजन खराब होने की क्रिया को निम्नलिखित विधियों के द्वारा रोका या कम किया जाता है।

  • जीवाणुओं को भोजन से बाहर रखना (Keeping the micro oraganism out of food product): भोजन को पोलिथिन के लिफाफे, सेलोफिन पेपर, एल्यूमिनियम फायल, वायुरहित डिब्बा इत्यादि में पैक करके जीवाणुओं से सुरक्षित किया जाता है।
  • जीवाणुओं को भोज्य पदार्थ से हटाकर (Removel of micro organism from product): इस विधि में बैक्टोरिया प्रूफ फिल्टर से छानकर संरक्षण किया जाता है पानी, फलो का जूस, बियर, शराब इस विधि से संरक्षित किए जाते हैं ।
  • जीवाणुओं की क्रियाशीलता एवं वृद्धि को रोककर (By hindening the growth and activity of micro oraganism): इसके लिए भोजन को सुखाकर, नमक-तेल या सिरका का प्रयोग करके भोजन को संरक्षित किया जाता है।

(b) जीवाणुओं को नष्ट करना (By killing the micro organisms): इसमें जीवाणुओं को उच्च ताप में नष्ट करके लम्बी अवधि तक संरक्षित किया जाता है इसके लिए निम्नलिखित उपाय होते हैं।

  1. भोजन को पकाना
  2. पास्चुरीकरण
  3. किरणन
  4. स्टेरीलाइजेशन
  5. टीमबंदी
  6. बोतल.बंदी
  7. फलों का मुरब्बा, जैम, जैली बनाना इत्यादि।

(c) भोजन को स्वयं दृषित होने से बचाना (To prevent food from self decomposition): भोजन को ब्लाचिंग प्रक्रिया द्वारा नमक के घोल या हल्के ताप के प्रभाव से उसमें होने वाले एंजाईम के प्रभाव को रोका जाता है।

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(d) खाद्य पदार्थों को कीड़े से बचाना (To save from insects pests etc): इसके लिए भोज्य पदार्थ को अच्छी तरह से पैक करके संग्रहित किया जाता है।
इस प्रकार से विभिन्न विधियों के द्वारा भोजन को संरक्षित किया जाता है और उसके पोषक मूल्य एवं स्वाद को बनाए रखा जाता है। उचित विधि से भोज्य पदार्थों को संरक्षित एवं संग्रहित करने से वह महीनों सुरक्षित रह सकते हैं।

प्रश्न 2.
पोषण की विभिन्न स्थितियों से आपका क्या अभिप्राय है ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पोषण की स्थिति की परिभाषा (Definition of Nutritional Status): प्रत्येक जीवित प्राणी भोजन ग्रहण करता है और पोषण प्रक्रिया द्वारा उसका शरीर में उपयोग करता है, जिससे उसके शरीर का निर्माण व विकास होता है। अतः पोषण की स्थिति उस व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति से सम्बन्धित है और इसका अनुमान व्यक्ति के शरीर भार, डील-डौलं, आकार आदि से लगाया जा सकता है।

पोषण की दो स्थितियाँ होती हैं –
1. सुपोषण
2. कुपोषण

1. सपोषण (Good Nutrition): जब भोजन द्वारा मनुष्य को अपनी आवश्यकतानुसार सभी पोषक तत्त्व उचित मात्रा में मिलते हैं तो इस स्थिति को सुपोषण अथवा उत्तम पोषण की स्थिति कहते हैं। उत्तम पोषण द्वारा ही व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य ग्रहण करता है।
उत्तम पोषित व्यक्ति के निम्नलिखित लक्षण हैं (Characteristics of Good Nutrition) :

  • व्यक्ति का शरीर भार, आकार व अनुपात सामान्य होता है।
  • व्यक्ति की मांसपेशियाँ पूर्ण रूप से विकसित, सुदृढ़ व सुगठित होती हैं।
  • व्यक्ति के बाल चिकने, चमकीले व स्वस्थ होते हैं।
  • व्यक्ति की आँखें स्वस्थ, आशावान व चमकीली होती हैं।
  • व्यक्ति के दांत व अस्थियाँ मजबूत व स्वस्थ होती हैं।
  • व्यक्ति की त्वचा व श्लेष्मिक झिल्ली पूर्ण रूप से स्वस्थ व कान्तिमान होती है।
  • व्यक्ति का आसन (Posture) स्वस्थ, सिर तना हुआ, सीना उठा हुआ, कन्धे सपाट व पेट अन्दर होता है।
  • व्यक्ति की भूख अच्छी व पाचन संस्थान सामान्य रूप से कार्य करता है।
  • व्यक्ति सदैव प्रसन्नचित्त व खुश रहता है।
  • व्यक्ति को गहरी, बिना टूटने वाली स्वप्नरहित नींद आती है।
  • व्यक्ति में रोग प्रतिरोधक क्षमता पर्याप्त होती है।
  • व्यक्ति किसी भी कार्य को उत्साहपूर्वक व एकाग्रचित्त होकर कर सकता है।

2. कुपोषण (Mal Nutrition): कुपोषण का शाब्दिक अर्थ है-अव्यवस्थित पोषण’। जब मनुष्य को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा में सभी पौष्टिक तत्त्व नहीं मिलते या आवश्यकता से अधिक मिलते हैं तो उसे कुपोषण कहते हैं। कुपोषण के कारण मनुष्य के शरीर की वृद्धि, विकास एवं कार्यशीलता पर कुप्रभाव पड़ता है। गन्दा वातावरण, संक्रमण आदि कुपोषण की स्थिति को और उग्र कर देते हैं।
इसके तीन लक्षण हैं –

  • अत्यधिक पोषण
  • अपर्याप्त पोषण
  • असन्तुलन।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य परिभाषा एवं संबंध
1. अत्यधिक पोषण (Under nutrition): जब मनुष्य को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा से कम पौष्टिक तत्त्व मिलते हैं तो उसे अपर्याप्त पोषण कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप शरीर की अपेक्षित वृद्धि और विकास नहीं हो पाता और पौष्टिक तत्त्वों की हीनता-जनित रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 10 आहार, पोषण तथा स्वास्थ्य : परिभाषा एवं संबंध

2. अपर्याप्त पोषण (Over nutrition): जब मनुष्य को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा से अधिक पौष्टिक तत्त्व मिले तो उसे अत्यधिक पोषण कहते हैं। कुछ विशेष पौष्टिक तत्त्वों की अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है, जैसे विटामिन ए, विटामिन डी, लोहा आदि। इनके अतिरिक्त मोटापा भी अत्यधिक पोषण के परिणामस्वरूप होता है। अत्यधिक पोषण सम्पन्न वर्गों के लोगों में अधिक पाया जाता है और कई बार भयंकर रूप ले लेता है।

3. असन्तुलन (Imbalance): जब मनुष्य में विभिन्न पौष्टिक तत्त्वों की मात्रा सन्तुलित नहीं होती तो इस असन्तुलन के कारण भी स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2.
भोजन, पोषण तथा स्वास्थ्य का आपसी सम्बन्ध क्या है ? समझाइए।
उत्तर:
भोजन, पोषण तथा स्वास्थ्य का. आपसी सम्बन्ध (Relationship between food, nutrition and health): भोजन, पोषण तथा स्वास्थ्य की निम्न परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि. इनका आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजामल पी० देवदास (Rajamal P. Devdas) के अनुसार “पोषण.ऐसी अवस्था है जो सर्वोत्तम स्वास्थ्य को विकसित करे।” यद्यपि स्वास्थ्य और पोषण समानार्थक नहीं हैं तथापि अच्छे पोषण के अभाव में स्वस्थ रहना असम्भव है।

भोजन स्वयं पोषण का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। अत: व्यक्ति जो भोजन करता है तथा जिस प्रकार करता है, पोषण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के तौर पर भोजन और पोषण में परिवर्तन करके विभिन्न रोगों की रोकथाम की जा सकती है, जीवन आयु में वृद्धि की जा सकती है। सक्रिय और प्रभावी जीवन के लिए तथा विकसित शरीर के लिए उत्तम पोषण अति आवश्यक है जो भोजन से प्राप्त किया जा सकता है।

भोजन, पोषण और स्वास्थ्य का सम्बन्ध नीचे चित्र द्वारा समझाया गया है –
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प्रश्न 4.
गरीबी रेखा का निर्धारण किस आधार पर किया जाता है ? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
गरीबी रेखा निर्धारण का आधार: पोषण स्तर एवं ऊर्जा खपत (Nutritional status and calorie intake as a basis of poverty line): किसी भी देश की गरीबी रेखा का निर्धारण उस देश के वासियों के औसत ऊर्जा खपत व पोषण स्तर द्वारा किया जाता है। खुराक सर्वेक्षण प्रायः घर-घर जाकर किए जाते हैं तथा इन सर्वेक्षणों द्वारा परिवार की भोजन की खपत, सदस्यों की संख्या, स्वरूप तथा आय के विषय में सूचना एकत्रित की जाती है। समस्त देश में इस प्रकार के विस्तृत सर्वेक्षण किए जाते हैं।

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देश के विभिन्न क्षेत्रों के आहार-संघटन पर उपलब्ध आंकड़ों द्वारा स्पष्ट है कि भारत में परिवारों का आहार मुख्यतः खाद्यान्न आधारित है। अधिकांश भारतीयों के आहार में खाद्यान्न का एक बहुत बड़ा भाग होता है। विशेषकर निम्नतर सामाजिक आर्थिक वर्गों के परिवारों के आहार में खाद्यान्नों का बहुतायत होता है। यही कारण है कि निम्नतर सामाजिक-आर्थिक वगों के परिवारों का पोषण स्तर उत्तम नहीं है और उनका आहार मात्रा व गुणात्मक रूप से अपर्याप्त है।

इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि जीवन शक्ति की कमी और कमजोरी होने पर भी मनुष्य अपर्याप्त खुराक का आदी बन जाता है और इस बात का अनुमान ही नहीं होता कि वह आवश्यकता से कम भोजन ले रहा है क्योंकि मानव शरीर में अपने को स्थिति के अनुकूल बना लेने की विलक्षण क्षमता है। – स्पष्ट है कि देश की औसत ऊर्जा खपत तथा देशवासियों के पोषण स्तर के आधार पर ही गरीबी रेखा का निर्धारण किया जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 9 जनसंख्या शिक्षा

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 9 जनसंख्या शिक्षा Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 9 जनसंख्या शिक्षासमस्याएँ

Bihar Board Class 11 Home Science जनसंख्या शिक्षा Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आज भारतवर्ष में कितनी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे है। [B.M.2009A]
(क) 20%
(ख) 40%
(ग) 15%
(घ) 50% से अधिक
उत्तर:
(घ) 50% से अधिक

प्रश्न 2.
‘गरीबी रेखा’ इनमें से किस पर आधारित है। [B.M.2009A]
(क) कल्पित रेखा
(ख) कम-से-कम कैलोरीज पर
(ग) सामाजिक एवं सांस्कृतिक मतभेद
(घ) आर्थिक स्थिति
उत्तर:
(ख) कम-से-कम कैलोरीज पर

प्रश्न 3.
भारत में लड़कियों की संख्या घटने का मुख्य कारण [B.M.2009A]
(क) दहेज प्रथा
(ख) पुत्र की लालसा
(ग) गरीबी
(घ) सोच में कमी
उत्तर:
(क) दहेज प्रथा

प्रश्न 4.
12 वर्ष की लड़कियों की पोषणिक आवश्यकता क्या है ? [B.M. 2009A]
(क) 1970 कैलोरी
(ख) 2200 कैलोरी
(ग) 1800 कैलोरी
(घ) 2026 कैलोरी
उत्तर;
(घ) 2026 कैलोरी

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प्रश्न 5.
जनसंख्या विस्फोट का मुख्य कारण [B.M.2009A]
(क) धन
(ख) पुत्र की कामना
(ग) कम आयु में विवाह
(घ) ज्ञान का अभाव
उत्तर:
(ग) कम आयु में विवाह

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जनसंख्या विस्फोट (Population Explosion) क्या है ?
उत्तर:
जनसंख्या एक गतिशील तथ्य है। इसके आकार में किसी भी कमी या वृद्धि का देश के सामाजिक, आर्थिक विकास के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि को ही जनसंख्या विस्फोट कहा जाता है।

प्रश्न 2.
जनसंख्या विस्फोट के मुख्य प्रभाव क्या हैं ?
उत्तर:
जनसंख्या विस्फोट की अर्थव्यवस्था और उपलब्ध संसाधनों पर गंभीर प्रतिक्रिया होता है।

प्रश्न 3.
जनसंख्या विस्फोट की क्या समस्याएँ हैं ?
उत्तर:

  • भोजन की कमी।
  • स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ।
  • आश्रय और पीने के पानी की समस्या।
  • परिवहन व संचार की समस्याएँ।
  • अपर्याप्त कपड़ा और चिकित्सा सुविधाएँ।
  • आम बेरोजगारी और शोषण।

प्रश्न 4.
भारत में जनसंख्या विस्फोट (Population Explosion in India) का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर:
भारत में जनसंख्या विस्फोट का प्रमुख कारण जनसंख्या की अधिक वृद्धि दर है।

प्रश्न 5.
हमारे देश में पुत्र प्राप्ति की तीव्र इच्छा (Desire for male child) किस मान्यता पर निर्भर है ?
उत्तर:
हमारे देश में पुत्र प्राप्ति की तीव्र इच्छा इस मान्यता पर आधारित है कि पुत्र वंश चलाता है और मृत्योपरांत आत्मा की मुक्ति के लिए क्रिया-कर्म करता है।

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प्रश्न 6.
जनसंख्या-शिक्षा (Population Education) का तात्पर्य समझाएँ।
उत्तर:
जनसंख्या शिक्षा वह कार्यक्रम है जिसमें परिवार, जाति, देश तथा विश्व की जनसंख्या की स्थिति का अध्ययन किया जाता है ताकि विद्यार्थी वर्ग में मूलाधार व उत्तरदायी रुख पैदा किया जा सके जो इस स्थिति से निपट सके।

प्रश्न 7.
सन् 1947 में देश की जनसंख्या (Population) कितनी थी?
उत्तर:
सन् 1947 में जब भारतवर्ष स्वतंत्र हुआ तो देश की जनसंख्या लगभग 34 करोड़ थी।

प्रश्न 8.
जनसंख्या नियंत्रित (Population control) करने में छोटे परिवार (small family) की क्या भूमिका है ?
उत्तर;
जनसंख्या को रोकने का एक उपाय है सीमित अथवा छोटा परिवार । छोटे परिवार का लाभ केवल देश को ही नहीं वरन् स्वयं को भी है। छोटा परिवार अपनी सभी आवश्यकताओं को भाँति-भाँति पूरी करने में समर्थ होता है, इस कारण बच्चे स्वस्थ व परिपोषित होते हैं। शिक्षित हो सकते हैं तथा बड़े होकर छोटे परिवार को अपना सकते हैं। अतः परिवार फिर सीमित रहते हैं और जनसंख्या नियंत्रित हो सकती है।

प्रश्न 9.
जनसंख्या आधिक्य (Over population) के प्रमुख कारण क्या हैं ?
उत्तर:
हमारे रीति-रिवाज, पुत्र की अभिलाषा, निरक्षरता व अज्ञानता, गरीबी व बेरोजगारी आदि जनसंख्या आधिक्य के प्रमुख कारण हैं।

प्रश्न 10.
जनसंख्या नियंत्रण (Population control) देश के लिए किस प्रकार हितकारी है ?
उत्तर:
जनसंख्या नियंत्रण द्वारा देश में अधिक उत्पादन, प्रति व्यक्ति अधिक आय, उच्च जीवन स्तर, कम बेरोजगारी, कम सामाजिक तनाव, बेहतरीन नागरिक सुविधाएँ व स्वस्थ वातावरण तथा उच्च आर्थिक स्तर सम्भव है।

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प्रश्न 11.
अत्यधिक शिशु मृत्युदर को कम करने के सुझाव दीजिए।
उत्तर:
अच्छा भोजन (Good Food), सही समय पर टीकाकरण (Immunization at proper time), माता की सही देखभाल (Proper care of Mother), साफ-सुथरी सुविधाओं को बेहतर करना (Improving sanitary conditions), जनसंख्या नियंत्रण (Population Control)।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अत्यधिक जनसंख्या का क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
अत्यधिक जनसंख्या का प्रभाव (Effect of over population): मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो परस्पर एक-दूसरे से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से संबंधित है। अपने

जीवन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए उसकी मूलभूत आवश्यकताओं में भरपेट भोजन, रहने के लिए मकान, तन ढकने के लिए कपड़े, स्वच्छ वायु तथा शुद्ध जल आदि सम्मिलित हैं। इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति तभी संभव है, जब मनुष्यों की संख्या सीमित हो। अतः जैसे-जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ती जाती है वैसे-वैसे सभी मनुष्यों की आवश्यकताएँ पूरी नहीं होती हैं।
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आज हमारी आवश्यकताओं की मांग के अनुपात में पूर्ति बहुत कम है। हर वर्ष बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की व्यवस्था करना आसान काम नहीं है। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं से हुई प्रगति के बाद भी आवश्यकताओं की मात्रा हर समय बढ़ती जा रही है। फलस्वरूप देश में भोजन, वस्त्र, आवास, जलापूर्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, बेरोजगारी, गरीबी आदि की अनेक समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। आज यदि हम गहराई से विचार करें तो वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, भूमि-प्रदूषण, खाद्य एवं पेय पदार्थों का प्रदूषण, नैतिक-प्रदूषण आदि बढ़ती जनसंख्या के कारण हैं।

प्रश्न 2.
अधिक जनसंख्या द्वारा उत्पन्न समस्याएँ कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर:
अधिक जनसंख्या द्वारा उत्पन्न समस्याएँ (Problems arising due to overpopulation)-भारत में जनसंख्या की वृद्धि से कई समस्याएँ खड़ी हो गई हैं जिनका दबाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। ये निम्नलिखित हैं –

  1. भूमि पर जनसंख्या का बढ़ता दबाव।
  2. प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय में मूल्यों की अपेक्षा कम वृद्धि।
  3. खाद्य पदार्थों की घटती आपूर्ति।
  4. घटती पूँजी निर्माण क्षमता।
  5. समाज पर दबाव अर्थात् अनुत्पादक उपभोक्ताओं का बढ़ता भार।
  6. बेरोजगारी।
  7. जल आपूर्ति और स्वच्छ वातावरण सम्बन्धी समस्याएँ।
  8. स्वास्थ्य-सम्बन्धी समस्याएँ।
  9. शिक्षा की समस्याएँ।

प्रश्न 3.
जनसंख्या-शिक्षा (Population Education) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जनसंख्या शिक्षा की परिभाषा:
चन्द्रशेखर (1970): “जनसंख्या-शिक्षा जनसंख्या वृद्धि के विभिन्न आयामों आर्थिक, सामाजिक तथा सांख्यिकीय जनसंख्या वितरण, जीवन-स्तर से सम्बद्ध तथा कल्याणकारी राज्य अर्थव्यवस्था में इसके आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में अन्तिम परिणामों के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान करती है।”

यूनेस्को (UNESCO, 1978): “जनसंख्या शिक्षा एक शैक्षिक कार्यक्रम है जो परिवार, समूह, राष्ट्र, विश्व की जनसंख्या स्थिति के संदर्भ में विद्यार्थियों में आदर्श एवं जिम्मेदारी पूर्ण अभिवृत्ति तथा व्यवहार विकसित करती है।” प्रोफेसर वाडिया तथा मर्जेंट कहते हैं, “कोई भी जिसने भारत में जनसंख्या समस्या के इतिहास का अध्ययन सजग होकर उसके विभिन्न सोपानों में किया है, इस कथन से पृथक् अपनी . राय नहीं रख सकता कि भारत में भूमि और उसकी उत्पादन क्षमता की अपेक्षा लोगों की संख्या बहुत अधिक है।

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परिणामस्वरूप भारतीय मानव-शक्ति का विशाल भाग अर्ध-पोषित, रोगी, निरक्षर और अकुशल रह जाता है। यहाँ तक कि हिन्दू सभ्यता के पुरातन आदर्श, सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए भी कोई आवश्यक रूप से इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि भारत में आज भी वर्तमान औद्योगिक कुशलता की अवस्था में जनसंख्या का आकार उस आकार के दुगुने से भी ज्यादा है जिसे नैतिक एवं राष्ट्रीय विकास के अवसर सामान्य मात्रा में उपलब्ध हो सकते हैं।”

प्रश्न 4.
पुत्र की इच्छा जनसंख्या वृद्धि का कारण क्यों है ?
उत्तर:
पुत्र की इच्छा (Desire for male child): भारत में जनसंख्या वृद्धि का एक कारण पुत्र की इच्छा के वशीभूत होकर बार-बार गर्भाधारण तथा शिशु जन्म भी है। यह भारतीय समाज के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण कारण बन जाता है। प्रत्येक परिवार यदि पुत्र के लोभ में दो भी अतिरिक्त बच्चों को उत्पन्न करता है तो इस हिसाब से बढ़ने वाली जनसंख्या का अनुमान स्वतः ही लग जाता है।

पारिवारिक जीवन में पुत्र प्राप्ति की स्थिति का विचार करते समय यह जान लेना आवश्यक है कि हिन्दू शास्त्रकारों द्वारा पुत्र की प्राप्ति को वैवाहिक जीवन के एक प्रमुख ध्येय के ही रूप में देखा गया है। शास्त्रों में बताया गया है कि पुत्र से ही मृतक पूर्वजों की आत्माओं का उद्धार होता है और उसके अभाव में उन्हें नरक में ही रहना पड़ता है। उसे पुत्र इसीलिए कहा गया है क्योंकि वह पूर्वजों को ‘पुम्’ नामक नरक में जाने से बचाता है।

प्रश्न 5.
छोटे परिवार का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
छोटा परिवार (Small family): परिवार के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए ‘छोटा परिवार’ एक बेहतरीन उपाय है क्योंकि परिवार के बढ़ने के साथ-साथ उनकी आवश्यकताओं में भी वृद्धि होती है और यदि आपूर्ति में उसी हिसाब से बढ़ोत्तरी न की जाए तो निश्चित ही प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध होने वाले विभिन्न पदार्थ या साधन कम हो जाते हैं और यही पारिवारिक वातावरण को तनावपूर्ण बना देते हैं, जिसके कारण सभी सदस्यों के व्यक्तिगत विकास में नकारात्मक भूमिका अदा करते हैं।

प्रश्न 6.
परिवार नियोजन (Family planning) के क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
परिवार नियोजन के प्रमुख लाभ संक्षेप में निम्न प्रकार हैं:
1. रहन-सहन के स्तर में सुधार (Improvement in standard of living): परिवार में कम संख्या होने पर प्रति व्यक्ति पर किए जाने वाले व्यय की मात्रा बढ़ जाएगी। इससे परिवार के सदस्यों की अपेक्षाकृत आवश्यकताओं की पूर्ति संभव हो सकेगी। परिणामस्वरूप उनके रहन-सहन का स्तर सुधरेगा।

2.शिशु व मातृ-मृत्यु दर में कमी (Decline in death rate of child or mother): परिवार नियोजन के कारण संतानोत्पत्ति में कमी होगी तथा रहन-सहन का स्तर सुधरने से नवजात शिशु तथा गर्भिणी दोनों को ही भोजन, स्वास्थ्य आदि से सम्बन्धित सुविधाएँ मिल सकेंगी जिससे शिशु तथा मातृ-मृत्यु दर में कमी होगी।

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प्रश्न 7.
हमारे देश में लड़की-शिशु का क्या स्थान है ?
उत्तर:
लड़की-शिशु का स्थान (Status of Girl-child)-कुपोषण की स्थिति के कारण प्रतिवर्ष 120 लाख पैदा होने वाली लड़कियों में से 30 लाख लड़कियाँ 15 वर्ष की आयु तक पहुँचने से पहले ही मर जाती हैं। लगभग 5 लाख लड़कियाँ ठीक तरह न पालन होने के कारण मर जाती हैं। कितनी ही लड़कियाँ जन्म पूर्व ही मार दी जाती हैं। लड़कियाँ गर्भ से ही गिरा दी जाती हैं तथा उस समय नैतिक और चिकित्सकीय महत्त्वों को भी ताक पर रख दिया जाता है। इन सबका परिणाम है, स्त्री-पुरुष के अनुपात में असंतुलन आना। 1901 में 1000 पुरुषों के अनुपात में 972 स्त्रियाँ थीं परन्तु यह अनुपात 2001 में कम होकर 933 हो गया है।

प्रश्न 8.
परिवार नियोजन (Family Planning) से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
परिवार नियोजन (Family Planning): सभी व्यक्तियों के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने की दृष्टि से परिवार नियोजन का अत्यधिक महत्त्व है। निर्धनता, अज्ञानता आदि रहन-सहन के स्तर को प्रभावित करने वाले कारक प्रत्यक्ष रूप से परिवारों की अत्यधिक वृद्धि से सम्बन्धित हैं। आज जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है, उस गति से आय के साधनों में प्रगति नहीं हो पा रही है। प्रो. माल्थस के अनुसार, जनसंख्या गुणात्मक तथा भोज्य-सामग्री योगात्मक गति से बढ़ते हैं।

इस प्रकार बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति सीमित साधनों से नहीं हो सकती। इसलिए रहन-सहन का स्तर और भी नीचे गिरता जाएगा। भारत में निर्धनता और अज्ञानता के कारण जनसंख्या वृद्धि विश्व के उन्नत देशों की अपेक्षा तीव्र गति से बढ़ रही है। परिवार नियोजन का प्रधान उद्देश्य माता के स्वास्थ्य तथा बच्चों की उत्तम देखभाल और लालन-पालन के विचार पर आधारित है। इसमें कई समस्याएँ भी हैं, जैसे-लोगों को इसके प्रति कैसे अभिप्रेरित किया जाए, स्वीकार्य कराया जाए तथा स्वीकार्य, सफल, हानिरहित तथा मितव्ययी तरीकों पर आधारित परामर्श एवं सेवाएँ किस प्रकार उपलब्ध कराई जाएँ आदि।

प्रश्न 9.
पुत्र की लालसा (Desire for son) किस प्रकार जनसंख्या वृद्धि का कारण है ?
उत्तर:
पुत्र की लालसा (Desire for son): भारतीय परिवार में पुत्र प्राप्ति की लालसा या इच्छा बहुत तीव्र होती है। अधिकांश परिवार छोटे परिवार की महत्ता को जानते भी हैं, मानते भी हैं, परन्तु प्रायः सभी दंपत्ति एक पुत्र अवश्य चाहते हैं। मानते हैं कि पुत्र का होना गर्व का विषय माना जाता है। माता-पिता की मृत्यु उपरान्त बेटा ही उनकी आत्माओं को मुक्ति दिला सकता है, क्रियाओं और श्राद्ध कर सकता है, ऐसी धारणा है।

पितृ प्रधान समाज में वही वंश चलाता है। पुत्र से ही मृतक पूर्वजों की आत्माओं का उद्धार होता है और उसके अभाव में नरक में ही पड़े रहना पड़ता है। पुत्र का जन्म उन्हें स्वर्ग में जाने योग्य बनाता है। इस कारण परिवार पुत्र प्राप्ति की चाह में अनगिनत बच्चे पैदा करते चले जाते हैं जो जनसंख्या वृद्धि का एक प्रमुख कारण है।
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प्रश्न 10.
जनसंख्या व्यवस्था (Population Management) से परिवार, उद्योग तथा देश के लिए क्या लाभ है ?
उत्तर:
छोटा परिवार सुखी परिवार (Small Family Happy Family)
परिवार के लिए (for family):

  1. बेहतर आवास
  2. उचित पोषण और बेहतर स्वास्थ्य
  3. अधिक आय

उद्योग के लिए (for Industries) :

  1. कम अनुपस्थिति
  2. अधिक उत्पादन
  3. कम कीमत
  4. अधिक लाभ

देश के लिए (for Country) :

  1. अधिक उत्पादन
  2. अधिक प्रति व्यक्ति आय
  3. उच्च जीवन-स्तर
  4. कम बेरोजगारी
  5. कम सामाजिक तनाव
  6. बेहतर नागरिक सुविधाएँ
  7. स्वस्थ वातावरण।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जन्म-दर को प्रभावित करने वाले कारण लिखें।
उत्तर:
जन्म-दर को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारण हैं:
1. सामाजिक कारण (Social Factors): हमारी मान्यताएँ, रीति-रिवाज, आदर्श आदि जन्मदर ऊँचा रखने में प्रोत्साहन देते हैं। उदाहरण के लिए, हिन्दू सामाजिक जीवन में धर्मशास्त्रों के अनुसार विवाह जीवन का एक अनिवार्य धार्मिक कर्म है। विवाह स्वयं की मुक्ति के लिए तथा पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए आवश्यक है।

विवाह सन्तानोत्पत्ति के लिए है। हमारे यहाँ बाल विवाह की भी प्रथा है जिससे कम आयु में शादी हो जाने पर प्रजनन का समय बढ़ जाता है। हमारे देश में प्रत्येक दम्पत्ति, पुत्र की इच्छा रखता है। वंशबल बढ़ाने, अन्तिम संस्कार करने, श्राद्ध करने तथा मुक्ति प्राप्ति के लिए पुत्र का होना जरूरी है।

2. आर्थिक कारण (Economic Factors): हमारे देश में पिता के पश्चात् पुत्र ही व्यवसाय को आगे बढ़ाता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति पुत्र चाहता है। एक पुत्र की कामना में वह न जाने कितनी लड़कियों को जन्म दे डालता है। गरीब लोग इस आशा से अधिक बच्चे पैदा करते हैं कि वे उनकी आय में वृद्धि करेंगे। वे सोचते हैं कि जो पेट लेकर आता है उसके पास उसे भरने के लिए दो हाथ और दो पैर भी होते हैं। भारत के लगभग 70 प्रतिशत लोग गाँव में रहते हैं तथा 30 प्रतिशत नगरों में रहते हैं। नगरों में गाँवों की अपेक्षा जन्म-दर कम है क्योंकि वे अधिक बच्चों से होने वाली समस्याओं को समझते हैं।

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3. अशिक्षा (Illiteracy): यह बात स्पष्ट है कि स्त्री परतंत्रता एवं स्त्री अशिक्षा ही जनसंख्या वृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए समाज व परिवार में स्त्री का शिक्षित होना आवश्यक है। केवल स्त्रियाँ ही जनसंख्या वृद्धि की गंभीरता को समझकर इस संकट को आगे बढ़ने से रोक सकती हैं। गाँधीजी ने कहा था, एक लड़के को शिक्षा देने से एक व्यक्ति शिक्षित होता है परंतु एक लड़की की शिक्षा से एक परिवार शिक्षित होता है। लड़की की शिक्षा का अर्थ माँ की शिक्षा और उसके बच्चों की शिक्षा होती है।

4. स्त्रियों की सामाजिक स्थिति (Female Status): भारत में स्त्रियों का सर्वत्र सम्मान रहा है। माता, बहन और पुत्री के रूप में नारी का स्वरूप विदित है, परन्तु किन्हीं कारणों से और स्वार्थ से प्रेरित होकर पुरुष ने सदैव उसे अपने से हीन माना है। भारत में प्राचीन काल से ही नारी जाति की दशा सुधारने के प्रयत्न होते रहे हैं। वैदिक काल में बाल विवाह के प्रचलन ने उसकी शिक्षा में बाधा उत्पन्न कर दी।

वह धार्मिक संस्कारों में भाग नहीं ले सकती थी। उसका प्रमुख कर्त्तव्य पति की आज्ञा का पालन करना था। वह परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी। बचपन में माता-पिता के आधिपत्य में, युवावस्था में अपने पति के तथा वृद्धावस्था में अपने पुत्र के संरक्षण में रहना पड़ता है। भारत की स्वतंत्रता के उपरांत स्त्रियों की उन्नति के द्वार खुले, उसे व्यक्तिगत संपत्ति का अधिकार, पर्दा-प्रथा से स्वतंत्रता, विधवा-विवाह की छूट और बाल-विवाह से मुक्ति मिली। वर्तमान युग चेतना का युग है।

आज उन्हें वैज्ञानिक, सामाजिक और व्यावसायिक सभी. प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता है। सरकार भी इस ओर जागृत है, उसने स्त्रियों को नि:शुल्क शिक्षा, छात्रवृत्तियाँ, सहशिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा जैसी सुविधाएँ प्रदान की हैं। शिक्षा सुधार से नारी विकास की स्थिति में बहुत ही आशापूर्ण परिणाम पाए गए हैं। अब वह अबला न रहकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने की स्थिति में है। हर क्षेत्र में उसने अपना स्थान प्राप्त करके श्रेष्ठता पायी है।

प्रश्न 2.
छोटे परिवार का क्या महत्त्व है ? विस्तार से लिखें?
उत्तर:
छोटे परिवार का महत्त्व (Importance of small family): शिक्षित तथा कामकाजी महिलाओं का परिवार सीमित होता है। इसके कारण हैं बहुत अधिक व्यस्तता, जीवन की गुणवत्ता के महत्त्व की जानकारी, बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, आधुनिक उपचारों का ज्ञान, सभी तरह के बच्चों के मानसिक तथा शारीरिक विकास का पूरा ध्यान देना। इन बातों को मस्तिष्क में रखकर वह एक या दो बच्चे होने पर ही विश्वास रखती है।

बच्चों की सही देखभाल से उनकी मृत्यु दर में कमी रहती है। दो बच्चों की दूरी तथा परिवार नियोजन साधनों का ज्ञान व उपयोग से उनका अपना स्वास्थ्य तो ठीक रहता ही है साथ ही वह सुखी तथा खुशहाल परिवार का निर्माण करने में भी जिम्मेदार होती है। महिलाओं का स्तर भी परिवार की सीमितता का निर्णायक है। कामकाजी महिलाओं के इस पहलू पर विचार करने के लिए सर्वेक्षण करने पर महिलाओं को चार वर्गों में बाँटा जा सकता है

(क) अधिक शिक्षित कामकाजी महिलाएँ।
(ख) अधिक शिक्षित घरेलू महिलाएँ।
(ग) कम शिक्षित कामकाजी महिलाएँ।
(घ) कम शिक्षित घरेलू महिलाएँ।

यह देखा गया है कि अधिक पढ़ी-लिखी कामकाजी महिलाओं का परिवार बहुत सीमित होता है। इसके कारण हैं, देर से विवाह, उच्च शिक्षा स्तर की वजह से अधिक व्यस्तता, परिवार नियोजन के साधन तथा आधुनिक उपचारों का ज्ञान, बच्चों की उत्तम देखभाल से मृत्यु दर में कमी। सभी साधनों की उपलब्धि तथा सुख समृद्धि की वजह से इन परिवारों में तनाव कम होता है। घर में मैत्रीपूर्ण व्यवहार से आपस में सभी सदस्य स्नेह की कड़ी से बंधे रहते हैं।

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इस वातावरण में बच्चे मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं, वे गुणवान तथा अच्छे नागरिक बनते हैं। इसके विपरीत यह देखा गया है कि कम पढ़ी-लिखी तथा निम्न स्तर वाले कार्यों में कार्यरत महिलाओं के बच्चों में मृत्यु-दर अधिक होता है। अधिक जीवित संतान रहे, इस आशा में परिवार बढ़ता रहता है।

प्रश्न 3.
जनसंख्या वृद्धि द्वारा उत्पन्न होने वाली समस्याओं की श्रृंखला का वर्णन करें।
उत्तर:
जनसंख्या वृद्धि द्वारा उत्पन्न होने वाली समस्याओं की श्रृंखला (Chain of problems arise due to population explosion)
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प्रश्न 4.
बालिका की पोषण-सम्बन्धी व शिक्षा-सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्णता पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
हमारे देश में परिवारों में बालिकाओं की स्थिति काफी दयनीय है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की देखभाल अच्छी प्रकार से कदापि नहीं होती। बालिका को उसकी आवश्यकतानुसार पौष्टिक भोजन भी पूरी मात्रा में उपलब्ध नहीं होता। जन्म से पाँच वर्ष तक मरने वाले बच्चों में लड़कियों की संख्या का अधिक होना स्पष्ट करता है कि जन्म के पश्चात् भोजन, स्वास्थ्य सम्बन्धी उनकी जरूरतें पूरी नहीं होती। बालिका की शिक्षा प्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

यदि भेज भी दिया जाए तो पाँचवीं कक्षा से पहले ही उसका विद्यालय से नाम कटवा दिया जाता है। सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में कुल 45 % लड़कियाँ ही पाँचवीं पास कर पाती हैं और केवल 4.24% लड़कियाँ बारहवीं पास कर पाती हैं क्योंकि एक मेधावी बालिका की शिक्षा के लिए भी माता-पिता हतोत्साहन तथा असहयोग की भावना रखते हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि बालिका की पोषण व शिक्षा सम्बन्धी आवश्यकताएँ सरलता से पूरी नहीं हो पातीं।

प्रश्न 5.
जनसंख्या विस्फोट को प्रभावित करने वाले कारक लिखें।
उत्तर:
जनसंख्या विस्फोट को प्रभावित करने वाले कारक (Factors responsible for over-population):
भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकने में निम्नलिखित कारक बाधा डालते हैं –

सामाजिक मूल्य (Social norms): जनसंख्या विस्फोट के लिए उत्तरदायी पहला कारण हमारे अपने समाज के रीति-रिवाज हैं। वे बड़े परिवार को समर्थन देते हैं। छोटी आयु में विवाह तथा लम्बे जनन वर्ष का परिणाम होता है अधिक बच्चे। यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब औसतन भारतीय का विश्वास है कि बच्चे ईश्वर की देन हैं। भारत में कुछ धर्म परिवार नियोजन के विरुद्ध हैं। इस प्रकार सामाजिक मूल्य बड़े परिवार का समर्थन करते हैं।

पुत्र की इच्छा (Desire for male child): आर्थिक स्तर का ध्यान किए बिना हर जाति में पुत्र प्राप्ति की इच्छा प्रबल होती है। पुत्र पाने की आशा में परिवार के सदस्य बढ़ते जाते हैं। लड़का वंश-परिवार के नाम को आगे बढ़ाता है। अधिक लोगों के अनुसार पुत्र न होने से परिवार वहीं समाप्त हो जाता है तथा यह उनको स्वीकार नहीं है। परन्तु, शैक्षिकता बढ़ने से छोटे परिवार को मान्यता दी जाने लगी है और इस प्रकार लिंग-भेद भी कम हो गया है। बहुत से युवा दंपत्ति, लिंग का ध्यान किए बिना, केवल एक या दो स्वस्थ बच्चे ही चाहते हैं।

अज्ञानता और निरक्षरता (Ignorance and Illiteracy): निरक्षरता देश की जनसंख्या रोकने में अवरोधक है तथा रुकावट पैदा करती है। निरक्षर जातियाँ सदियों से यह मानती आई हैं कि बच्चे भगवान के दिए हुए उपहार हैं, इसलिए वह परिवार नियोजन के तरीकों को नहीं मानतीं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 8 किशोरों की कुछ समस्याएँ

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 8 किशोरों की कुछ समस्याएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 8 किशोरों की कुछ समस्याएँ

Bihar Board Class 11 Home Science किशोरों की कुछ समस्याएँ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी भी कार्य को सफल होने के लिए क्या आवश्यक है ? [B.M.2009A]
(क) नैतिकता
(ख) अनुशासन
(ग) जानकारी
(घ) भावना
उत्तर:
(ख) अनुशासन

प्रश्न 2.
किशोरावस्था की सामाजिक समस्याओं को भागों में बाँटा गया है –
(क) 2 भागों में
(ख) 4 भागों में
(ग) 6 भागों में
(घ) 8 भागों में
उत्तर:
(ख) 4 भागों में

प्रश्न 3.
किशोर अपराध के कारणों को मुख्यतः वर्गों में बाँटा गया –
(क) 2
(ख) 4
(ग) 6
(घ) 8
उत्तर:
(क) 2

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प्रश्न 4.
“समस्याओं की आयु” कहा जाता है –
(क) बाल्यावस्था
(ख) किशोरावस्था
(ग) युवावस्था
(घ) प्रोढ़ावास्था
उत्तर:
(ख) किशोरावस्था

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अवनतिशील तथा अग्रशील स्मृतिलोप क्या है ?
उत्तर;
अवनतिशील (Retrograde) तथा अग्रशील (Anterograde) स्मृतिलोपअवनतिशील स्मृति लोप का परिणाम भूतकाल की बातें भूलने वाला होता है जबकि अग्रशील का परिणाम. कुछ नया सीखने की अयोग्यता है। दोनों को मिलाकर Global Amnsia होता है, जिससे स्मरण-शक्ति पर अग्रशील प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2.
नशीली दवा क्या होती है ?
उत्तर:
नशीली दवाएँ (Drugs)-दवा एक रासायनिक पदार्थ है। जब इसका दुरुपयोग किया जाता है तब वह शारीरिक क्रियाओं पर प्रभाव डालती है। दुष्प्रभाव डालने वाली दवाएँ नशीली दवाएँ कहलाती हैं।

प्रश्न 3.
किन्हीं दो नशीली दवाओं के नाम बताएँ जिनसे किशोरों को नशे की आदत हो सकती है।
उत्तर:
1. Opium
2. Heroin

प्रश्न 4.
‘किशोर-अपराध’ (Juvenile Delinquency) से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
किसी भी प्रकार के असामाजिक व्यवहार को किशोर-अपराध कहा जा सकता है। किशोर, जो समाज की सुविधाओं का प्रयोग तो करता है किन्तु समाज द्वारा जिस व्यवहार की उससे आशा की जाती है, वह नहीं करता। ऐसे ही किशोर को किशोर-अपराधी कहा जाता है। अतः सामाजिक व्यवहार में असफलता ही ‘किशोर-अपराध’ है।

प्रश्न 5.
उदासीनता (Depression) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जब किशोर जीवन के प्रति नकारात्मक रवैया अपनाता है तो ऐसी स्थिति को उदासीनता कहा जाता है।

प्रश्न 6.
ऐसी दो परिस्थितियों के नाम लिखें जब किशोर दबाव या तनाव (Tension) का अनुभव करते हैं।
उत्तर:
किशोरावस्था में आते ही किशोरों को प्रौढ़ावस्था के उत्तरदायित्व निभाने के लिए तैयार होना पड़ता है। इस कारण बढ़ता हुआ किशोर तनाव में रहने लगता है।

दो परिस्थितियाँ निम्न हैं जब वे तनाव का अनुभव करते हैं –

  • जब उसका आकार आवश्यकता से अधिक बढ़ने लगता है।
  • जब वह अपने माता-पिता की आकांक्षा के अनुरूप शैक्षिक जीवन स्तर पर खरा नहीं उतर पाता।

प्रश्न 7.
किशोरावस्था की सामाजिक समस्याओं को कितने भागों में बाँटा गया है ?
उत्तर:
किशोरावस्था की सामाजिक समस्याओं (Social Problems of Adolescence) को चार वर्गों में बाँटा जा सकता है

  • प्रतिष्ठा की समस्या (Problem of Fame)।
  • स्वतन्त्रता की समस्या (Problem of Independence)।
  • जीवन दर्शन की समस्या (Problem of Philosophy) ।
  • कार्य-सम्बन्धी समस्याएँ (Problem of Profession)।

प्रश्न 8.
बालक को अपराधी कब कहते हैं ?
उत्तर:
जिस बालक के कार्य इतना गंभीर रूप ले लें कि उसे उस कुमार्ग से हटाने के लिए दण्ड देना पड़े ताकि अन्य बालक उससे शिक्षा ग्रहण कर सके। उस बालक को अपराधी कहा जाता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
बाल अपराध कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर:
बाल अपराध के प्रकार (Kinds of Delinquenents)
(क) चुनौती देने वाली बालोपराधिक प्रवृत्तियाँ (Challenging nature of Delinquenents):
किशोरों में इस प्रकार की प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति निम्न रूपों में पायी जाती हैं –

  1. चोरी करना।
  2. झूठ बोलना।
  3. उद्देश्यहीन घूमना।
  4. तंग करना।
  5. लड़ना-झगड़ना।
  6. धूम्रपान करना।
  7. शेखी हांकना।
  8. पलायनशीलता (घर अथवा विद्यालय में)।
  9. दीवार पर लिखना।
  10. स्कूल की चीजें नष्ट करना।

(ख) यौन अपराध (Sex Delinquency): इनको भी दो भागों में बाँटा जा सकता है –

1. भिन्न लिंग अपराध (Different Sex Delinquency):
इसके दो रूप होते हैं –
(क) इच्छा रखने वाले समान अवस्था के सदस्य के साथ।
(ख) इच्छा न रखने वाले छोटी अवस्था के सदस्य के साथ।

2. वे प्रयास अपराध (Same sex Delinquent):
इसके तीन रूप होते हैं –
(क) समलिंग अपराध।
(ख) हस्तमैथुनी।
(ग) निर्लज्ज प्रदर्शन तथा नंगापन।

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प्रश्न 2.
किशोरों में “स्वतंत्रता एवं नियंत्रण” (Independence and Control) की समस्या पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
किशोरावस्था को प्रायः संघर्ष एवं तनाव का काल कहा जाता है क्योंकि किशोरों के सामने कुसमायोजन की अनेक समस्याएँ होती हैं।
किशोरावस्था की एक प्रमुख समस्या है स्वतंत्रता प्राप्त करने की समस्या । जिस कारण कई बार किशोर घर की पाबंदियों के विरुद्ध विद्रोह करते हैं और अपने भाग्य को कोसते हैं।

प्रश्न 3.
‘मानसिक तनाव’ (Mental Tension) या ‘निराशा’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
जब किशोर जीवन के प्रति नकारात्मक रवैया अपनाने लगता है तो इस स्थिति को मानसिक तनाव या निराशा की स्थिति कहते हैं।
मानसिक तनाव, निराशा या उदासीनता के कारण वह अप्रसन्न रहने लगता है, किसी भी काम में दिलचस्पी नहीं लेता, अपने-आपको कोसता है तथा उसके मन में आत्मघाती विचार आने की संभावना भी बढ़ जाती है।

किशोरों में उदासीनता या निराशा आने के दो निम्न कारण हो सकते हैं –
1. जब किशोर-किशोरी अपने महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयत्न करके भी असफल रहते हैं तो मानसिक कुंठा उत्पन्न होती है जो निराशा का कारण है।
2. प्रौढ़ावस्था के उत्तरदायित्व निभाने के लिए जो तैयारी किशोर को करनी पड़ती है, उसका तनाव किशोर के मन पर पड़ता है। वह अपनी पहचान बनाने के लिए चिन्तित रहते हैं और उसके कारण ‘निराशा’ से ग्रस्त हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
शराब के कुप्रभाव क्या हैं ?
उत्तर:
कुप्रभाव (Negative Effects):
इन आदतों का बालकों के तन व मन दोनों पर कुप्रभाव पड़ता है। सांस व हृदय की बीमारियाँ कम आयु में ही घेर लेती हैं। आत्म-विश्वास व आत्म-नियन्त्रण कम हो जाता है। वह अपनी जिम्मेदारी सम्भालने योग्य नहीं रहता । मानसिक व शारीरिक दोनों ही शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। शराब से यकृत (Liver) खराब हो जाता है।

प्रश्न 5.
नशे (Drugs) के कुप्रभाव क्या हैं ?
उत्तर:
नशे से कुछ देर तो व्यक्ति बहुत हल्का महसूस करता है। अपनी परेशानियाँ भूल जाता है पर धीरे-धीरे ये उसके शरीर को खोखला कर देते हैं। नशा न मिलने पर वह भयानक पीड़ा से ग्रस्त होता है व अपनी सुध-बुध खो बैठता है। इसे प्राप्त करने के लिए वह भयंकर से भयंकर अपराध भी कर सकता है। अपने अच्छे-बुरे की उसे पहचान नहीं रहती। इस गलत आदत से छुटकारा भी आसान नहीं है।

प्रश्न 6.
किशोरों में नशे की आदत के क्या कारण हैं ?
उत्तर:
आज की युवा पीढ़ी की एक गम्भीर समस्या नशे की है। किशोरों में प्रायः नशे की आदत निम्न कारणों से लगती है

  1. हीन भावना।
  2. माता-पिता का कठोर अनुशासन।
  3. अनुचित साथी-समूह की संगति व उनका दबाव।
  4. मित्रों व समाज द्वारा किशोरों की शारीरिक, सामाजिक एवं मानसिक आवश्यकताओं को न समझा जाना।
  5. उत्सुकता।
  6. माता-पिता के कटु सम्बन्धों के कारण अनुभव किया गया तनाव व निराशा।

प्रश्न 7.
किशोर अवस्था में सेक्स संबंधी अपराध किस प्रकार विकसित होते हैं ?
उत्तर:
सेक्स सम्बन्धी अपराध (Sex related delinquency): किशोर इस समय सेक्स के बारे में जानने को बहुत उत्सुक होते हैं। उन्हें इस विषय में सही जानकारी माता-पिता या किसी अन्य से नहीं मिल पाती है । वे अपने साथियों या गलत साहित्य पढ़कर यह जानकारी प्राप्त करते हैं । सिनेमा व टी० वी० पर दिखाए गए अश्लील दृश्यों का भी उन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। किशोरियाँ बिन ब्याही माँ बन जाती हैं व गलत लोगों की संगत में वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर हो जाती हैं। लड़के छेड़खानी, बलात्कार आदि करके अपना भविष्य हमेशा के लिए खराब कर बैठते हैं।

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प्रश्न 8.
पारिवारिक सदस्यों द्वारा अपराध रोकने के कौन-कौन से उपाय हैं ?
उत्तर:
पारिवारिक सदस्यों द्वारा अपराध रोकने के उपाय (Ways to control delinquency by the family members) :

  1. सबका व्यवहार बालकों के प्रति उचित होना चाहिए।
  2. बालकों को दुरुपयोग करने के लिए पैसा न दें।
  3. घर में लड़ाई-झगड़े आदि जैसा गंदा वातावरण नहीं होना चाहिए।
  4. घर में परिवार सीमित रखना चाहिए ताकि प्रत्येक बालक को उचित लालन-पालन दिया जा सके।
  5. बालक को बुरी संगति में नहीं जाने देना चाहिए। उन्हें आवश्यकता से अधिक स्वतंत्रता भी नहीं दी जानी चाहिए तथा उनकी उम्र में पड़ सकने वाली बुरी आदतों से सतर्क रहना चाहिए।

प्रश्न 9.
कुसमायोजन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
कुसमायोजन (Maladjustment): किशोर अचानक अपने को अपने साथियों से अलग पाते हैं। उनमें शारीरिक परिवर्तन आने शुरू हो जाते हैं और वे सोचते हैं कि उनके साथी वैसे ही हैं जिससे वे अपने प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पैदा कर लेते हैं और अपने को सबसे दूर कर लेते हैं। अपनी बेचैनी के कारण वे बहुत जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, झगड़ालू प्रवृत्ति के हो जाते हैं। दोस्ती व परिवार दोनों जगह वे समायोजन स्थापित नहीं कर पाते। इससे वे स्वयं व उनके परिवार के सदस्य सभी कठिनाई महसूस करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नशीले पदार्थों से अपनी युवा पीढ़ी को किन साधनों द्वारा बचाया जा सकता है ?
उत्तर:
नशे के भयंकर परिणामों को देखते हुए नशीले पदार्थों से अपनी युवा पीढ़ी को निम्नलिखित साधनों से बचाया जा सकता है।
1. किशोरों के लिए अवकाशकाल के सदुपयोग के लिए आवश्यक साधन जुटाना-किशोरों के पास अत्यधिक ऊर्जा होती है जिसका सही ढंग से प्रयोग करना जरूरी है अन्यथा वह अनेक बुराइयों में फंस सकते हैं। यह परिवार, विद्यालय व समाज का उत्तरदायित्व है कि वह किशोरों के स्वस्थ मनोरंजन के लिए आवश्यक साधन जुटाने का प्रबन्ध करें।

2. जनसाधारण को प्रचार माध्यमों द्वारा नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले कुप्रभावों से अवगत कराना-प्रायः किशोर नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले प्रभावों से अनभिज्ञ होते हैं और उन्हें इनका ज्ञान तभी होता है जब वह इसके प्रभाव में इतना आ जाते हैं कि वह उनकी आवश्यकता बन चुकी होती है। प्रसार माध्यमों, जैसे रेडियो, दूरदर्शन, सिनेमा आदि द्वारा बहुत। ही प्रभावी तरीके से नशीले पदार्थों से होने वाले कुप्रभावों को दर्शाया जा सकता है।

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3. नशाबंदी सम्बन्धी नियमों को लागू करना-सरकार ने नशीले पदार्थों के कुप्रभावों को ध्यान में रखते हुए नशाबन्दी सम्बन्धी कई नियम बनाए हैं जो निम्नलिखित हैं

  • नशे से सम्बन्धित सभी चीजों जैसे सिगरेट, शराब आदि का प्रचार करते समय तथा उनके पैकटों पर चेतावनी लिखना अनिवार्य है कि यह पदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
  • सार्वजनिक स्थानों जैसे होटलों, क्लबों, समारोहों आदि में शराब पीने पर प्रतिबन्ध है। सिनेमाघरों तथा अन्य स्थानों जहाँ पर भीड़ होती है वहाँ धूम्रपान करने की भी मनाही होती है।
  • किशारों को नशीले पदार्थों से बचाने के लिए विद्यालयों, कॉलेजों, छात्रावासों आदि. के निकट इनकी बिक्री पर प्रतिबंध है।
  • नशीली दवाइयों को बेचने वालों, संग्रह करने वालों तथा खरीदने वालों को कड़ा दंड दिया जाता है, जिसमें जमानत नहीं दी जाती है।

परिवार के सदस्यों व समाज को इन नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले किशोरों के साथ सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए तथा यह समझना चाहिए कि यह एक रोग है, जिसका निवारण सम्भव है। इन युवकों को इन नशीले पदार्थों को छोड़ने के लिए प्रेरित करना तथा उसकी सहायता करना आवश्यक है।

कई स्वयंसेवी संस्थाओं एवं सरकारी अस्पतालों में इन किशोरों को दवाइयाँ देकर तथा कड़ी निगरानी में रखकर इस रोग से मुक्ति दिलाई जाती है। किशोरों में नशे की आदत को केवल सरकारी कानूनों से रोकना सम्भव नहीं है। इसके लिए किशोरों के माता-माता, मित्रों, अन्य परिवारजनों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को मिलकर एक आन्दोलन के रूप में नशाबन्दी के लिए कार्य करना चाहिए।

प्रश्न 2.
किशोर-अपराध से आप क्या समझती हैं ? किशोर-अपराध के कारणों को किन वर्गों में बाँटा गया है ?
उत्तर:
किशोर-अपराध (Juvenile Delinquency): किसी भी प्रकार के असामाजिक व्यवहार को किशोर-अपराध कहा जा सकता है। किशोर, जो समाज की सुविधाओं का प्रयोग तो करता है किन्तु समाज द्वारा जिस व्यवहार की उससे आशा की जाती है, वह नहीं करता।

ऐसे ही किशोर को ‘किशोर: अपराधी’ कहा जाता है। अतः सामाजिक व्यवहार में असफलता ही किशोर-अपराध है। उदाहरण के लिए ऐसे किशोरों को भी अपराधी माना जाता है जो घर से भाग कर आवारागर्दी करते हैं, माता-पिता अथवा संरक्षकों की आज्ञा का पालन नहीं करते हैं, गन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं, चरित्रहीन व्यक्तियों के सम्पर्क में रहते हैं, स्कूल से बिना किसी उचित कारण के अनुपस्थित रहते हैं तथा अनैतिक व अनधिकृत क्षेत्रों में घूमते पाए जाते हैं। किशोर-अपराध अनेक जटिल कारणों के फलस्वरूप होता है तथा इसकी रोकथाम इतनी सरल नहीं है।

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किशोर-अपराध के कारणों को मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है –
1. व्यक्तिगत कारण (Individual factors)
2. सामाजिक कारण (Social factors)

1. व्यक्तिगत कारण (Individual factors): किशोरों में ऐसे कुछ व्यक्तिगत कारण होते हैं जो उनमें अपराधी प्रवृत्ति जागृत करते हैं, जैसे –

(क) शारीरिक दोष (Physical Defects): किसी भी प्रकार के शारीरिक दोष से ग्रस्त किशोर अपने में कुछ कमी समझने लगता है और हीन भावना से ग्रस्त हो जाता है और जब उसके दोष पर व्यंग्य किया जाता है तो वह प्रायः असामाजिक व्यवहार अपना लेता है। उसमें समाज के विरुद्ध प्रतिनिया का विकास होता है क्योंकि वह अपने दोष का उत्तरदायी समाज को ही समझने लगता है।

(ख) मन्द बुद्धि होना (Slow mental development): मन्द बुद्धि किशोर प्रायः अनैतिक व्यवहार की ओर सरलता से और शीघ्रता से खिंचते हैं क्योंकि उनमें यह समझने की शक्ति क्षीण होती है कि उचित सामाजिक व्यवहार क्या हैं।

(ग) जल्दी या देर से परिपक्वता होना (Early or late maturity): जब किसी किशोर में अपनी आयु की अपेक्षा जल्द या देर से परिपक्वता आती है तो उसमें समायोजन की कठिनाई होती है क्योंकि ऐसे किशोर अपनी आयु वाले किशोरों से बड़े या छोटे प्रतीत होते हैं। इससे किशोर में असन्तोष उत्पन्न होता है और वह असामाजिक व्यवहार करने लगता है।

2. सामाजिक कारण (Social factors): सामाजिक वातावरण सम्बन्धी अनेक कारण ऐसे हैं जो किशोर में अपराध की प्रवृत्ति जागृत करते हैं। कुछ सामाजिक कारणों का उल्लेख नीचे किया गया है

(क) माता-पिता का व्यवहार (Behaviour of parents): माता-पिता के अवहेलनात्मक व्यवहार से भी किशोरों को कुण्ठाएँ घेर लेती हैं जो उनमें उन्मुक्त व्यवहार को बढ़ावा देती हैं तथा जिससे किशोर अपराधी बन जाते हैं। अध्ययन द्वारा यह स्पष्ट है कि अपराधी किशोरों के माता-पिता, घर तथा बाहर कड़ा अनुशासन रखते हैं और तर्क के स्थान पर दण्ड देने में विश्वास रखते हैं।

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(ख) घर का वातावरण (Home Environment): किशोर अपराध का एक मुख्य कारण घर का अनुचित वातावरण है, जिससे प्रायः परिवार के प्रत्येक सदस्य के सम्मुख समायोजन की समस्या होती है। घर के वातावरण के अनुचित होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं माता-पिता के आपसी झगड़े, बिखरा हुआ परिवार, बड़ा परिवार, किशोरों को आवश्यकता से अधिक नियंत्रण में रखना या बिल्कुल स्वतंत्र छोड़ना, घर में अनुशासन का अभाव, परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होना जिससे किशोर की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती, किशोर का हीन भावना से ग्रस्त होना या फिर किशोर में श्रेष्ठ होने की भावना का पनपना आदि।

(ग) घर के बाहर का वातावरण (Environment outside home): घर ही नहीं अपितु घर के बाहर का वातावरण भी किशोरों में अपराध प्रवृत्ति जागृत करता है। अध्ययनों द्वारा ज्ञात हुआ है कि घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अपराध प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है। प्रायः ऐसे क्षेत्रों में भारी संख्या में प्रौढ़ अपराधी पाए जाते हैं, भीड़-भाड़ अधिक होती है, आस-पास अधिक कारखाने होते हैं या झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्र होते हैं, जिससे किशोरों का विकास उचित प्रकार से नहीं हो पाता है और अपराध की प्रवृत्ति उनमें पनपने लगती है।

प्रश्न 3.
किशोरों की यौन-सम्बन्धी समस्याओं (Problems related to sex) का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यौन सम्बन्धी समस्याएँ (Problems related to sex): मनुष्यों की अनेक नैसर्गिक प्रवृत्तियों (instincts) में से एक प्रवृत्ति काम (sex) की भी है। काम भावना किशोर के जीवन में अत्यधिक महत्त्व रखती है, अतः उसका उचित विकास आवश्यक है। किशोरावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें किशोरों को अपनी लैंगिक भूमिका समझनी, सीखनी व स्वीकारनी होती है।

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अध्ययनों द्वारा यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि किशोरों में यौन-सम्बन्धी समस्याएँ, यौन-सम्बन्धी जिज्ञासा के बढ़ने तथा यौन सम्बन्धी ज्ञान के अभाव से उत्पन्न होती हैं। किशोरों में लिंगीय भेद एवं काम-भावना की सही-सही जानकारी होना तथा काम के प्रति उनका स्वच्छ दृष्टिकोण होना आवश्यक है जिससे वह सुन्दर एवं सफल सामाजिक जीवन व्यतीत कर सकें तथा बुराइयों से बच सकें।

किशोरावस्था में जब किशोर तारुण्य को प्राप्त होते हैं तब उनमें यौन-सम्बन्धी जननेन्द्रियों का विकास एवं किशोरों में शुक्राणु एवं उसके स्राव होते हैं तथा किशोरियों में रजःस्राव होता है जिससे वे अनेक प्रकार की भयभीत करने वाली कल्पनाएँ करते हैं। इन विभिन्न कल्पनाओं से अपने को दोषी ठहराते हैं और लिंग अवयवों के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की ऐसी धारणाएँ बना लेते हैं जो बिल्कुल ही भ्रान्त एवं अशुद्ध होती हैं। कई बार तो किशोरों को यह विश्वास हो जाता है कि वे किसी विशेष रोग से पीडित हैं और हीनभावना के शिकार हो जाते हैं।

यही हीनभावनाएँ किशोरों में अनेक प्रकार की यौन-सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न करती हैं जिनका यदि समय पर निवारण न किया जाए तो किशोर के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है और उसमें अपराध प्रवृत्ति पनपने लगती है। हमारे देश में यौन-सम्बन्धी भ्रान्त धारणाओं व झूठे मानसिक कष्टों तथा हीन-भावना से ग्रस्त किशोर हैं जिन्हें उचित लिंग-सम्बन्धी जानकारी देकर यौन सम्बन्धी समस्याओं से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
किशोर-अपराध की रोकथाम में परिवार और विद्यालय की क्या भूमिका है ?
उत्तर:
किशोर-अपराध की रोकथाम (Control of children delinquency): रोग चाहे शारीरिक हो अथवा मानसिक प्रायः चिकित्सा से रोकथाम बेहतर होती है। किशोर-अपराध भी एक मानसिक रोग है। जहाँ एक अपराधी किशोर को सुधारना कठिन है वहाँ उचित वातावरण एवं देखभाल से एक किशोर को अपराधी बनने से सहज ही रोका जा सकता है।

किशोर-अपराध रोकने में परिवार की भूमिका (Role of family in the control of child delinquency):
किशोर अपराध रोकने के लिए :

  1. घर का परिवेश स्वस्थ होना चाहिए तथा माता-पिता व अन्य सम्बन्धियों में प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होने चाहिए।
  2. किशोरों के प्रति उचित दृष्टिकोण रखना चाहिए। उन्हें न तो अत्यधिक नियंत्रण में रखना चाहिए और न ही खुली छूट देनी चाहिए। इन्हें न तो आवश्यकता से अधिक लाड़-प्यार करना चाहिए और न ही अधिक कठोर व्यवहार करना चाहिए। किशोरों की समस्याएँ हल करने में उनकी सहायता करनी चाहिए तथा सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए।
  3. माता-पिता को किशोर के मनोविज्ञान को समझकर उन्हें उचित निर्देशन देना चाहिए।
  4. किशोरों की बुरी आदतों पर नजर रखनी चाहिए तथा अंकुश लगाना चाहिए।
  5. यौन जिज्ञासा होना किशोर में स्वाभाविक है। किशोरों को आवश्यक यौन शिक्षा देकर उनमें यौन के प्रति स्वस्थ धारणा बनानी चाहिए।
  6. किशोरों के मित्रों का ध्यान रखना चाहिए जिससे वह अपराधियों व बिगड़े हुए लोगों की संगति न कर पाए।
  7. परिवार नियोजित रखना चाहिए। छोटे परिवार में किशोर की उचित देखभाल कर सकते हैं।
  8. किशोर को आवश्यकता से अधिक जेब खर्च नहीं देना चाहिए।

किशोर अपराध रोकने में विद्यालय की भूमिका (Role of school in the control of child delinquency): किशोरों को उपयोगी एवं योग्य नागरिक बनाने में विद्यालय एक शक्तिशाली संस्था है। विद्यालय को केवल शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था न बनाकर, एक ऐसी व्यावहारिक संस्था का रूप देना चाहिए जिसमें किशोर विद्यार्थी शिक्षकों को अपना मित्र समझे, स्वयं अनुशासन (Self discipline) में रहना सीखे, उत्तम जीवन मूल्यों व जीवन लक्ष्यों का निर्धारण करे तथा समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों एवं कर्तव्यों को समझे, परन्तु जब किशोरों को विद्यालयों में उपयुक्त वातावरण नहीं मिलता तथा विद्यालय के पास उनके लिए पर्याप्त कार्यक्रम नहीं होते हैं और बाहर की दुनिया उन्हें अधिक आकर्षक लगती है तो अपराध की दुनिया में उनका पहला कदम उठता है-विद्यालय से भाग खड़े होने का अर्थात् भगोड़ापन (Truancy)। किशोरों में भगोड़ेपन को रोकने के लिए विद्यालयों को ऐसे सुनियोजित एवं व्यावहारिक कार्यक्रम बनाने चाहिए जिससे समाज व विद्यालय के मूल्यों में टकराव न हो तथा शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के सम्बन्ध मधुर एवं प्रजातान्त्रिक हों।

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प्रश्न 5.
किशोर अवस्था में बढ़ती हुई जिज्ञासा और अपूर्ण ज्ञान किस प्रकार बेचैनी उत्पन्न करता है?
उत्तर:
बढ़ती हुई जिज्ञासा और अपूर्ण ज्ञान (Increased curiosity and inadequate knowledge): इस अवस्था में काम (sex) संबंधी अनेक भावनाएँ उत्पन्न होने के कारण, शारीरिक परिवर्तनों के कारण, संबंधों में बदलाव के कारण, बच्चों में अपने संबंध में अनेक जिज्ञासाएँ होती हैं। उन जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए उनको कोई औपचारिक शिक्षा (formal education) नहीं मिलती इसलिए अपनी काम (sex) संबंधी जानकारी के लिए वह घनिष्ठ मित्रों से बात करते हैं।

घनिष्ठ मित्रों से उनकी बातचीत का विषय प्रेम, प्यार, सच्चा प्यार, लैंगिक-संबंध, लैंगिक-क्रियाएं, लैंगिक परिपक्वता लैंगिक-आकर्षण, रजःस्राव, शिश्न (penis), वासना इत्यादि होता है। अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए कुछ ऐसे खेल भी खेलते हैं जिसमें लैंगिक संतुष्टि मिलती हो जैसे चुंबन लेना (Kiss)। उनकी बढ़ी हुई जिज्ञासा और अपूर्ण ज्ञान उनमें बेचैनी उत्पन्न करता है और उनके संबंधों में अनेक ऐसे परिवर्तन लाता है जो लैंगिक असंतुष्टि उत्पन्न करते हैं, जैसे दीवानापन। उनकी लैंगिक असंतुष्टि शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है, जैसे उनमें भूख न लगना, नींद न आना आदि।

समय से उनकी जिज्ञासाएँ शांत हो जाएं, उनके स्वास्थ्य पर लैंगिक परिपक्वता बुरा प्रभाव छोड़ने के बजाय अच्छा प्रभव छोड़े इसके लिए आवश्यक है कि उपयुक्त समय पर उन्हें यौन-संबंधी शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा प्रदान की जाए। सिर्फ यौन-संबंधी शिक्षा प्रदान करने से उनमें कामुकता की जागृति होती है अत: नैतिक शिक्षा द्वारा वे जागृत कामुकता पर नियंत्रण कर सकारात्मक कार्यों में स्वयं ही अपना ध्यान लगा कर अपराधी होने से बच सकते हैं। इस प्रकार उन्हें अपराधी बनने से पहले ही उचित निर्देशन देकर प्रजातांत्रिक ढंग से नियन्त्रित कर उन्हें उत्तम नागरिक बनाया जा सकता है क्योंकि निवारण ही इलाज से ज्यादा बेहतर है (Prevention is better than cure)

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 7 किशोरों को कुछ विशेष आवश्यकताएँ

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 7 किशोरों को कुछ विशेष आवश्यकताएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 7 किशोरों को कुछ विशेष आवश्यकताएँ

Bihar Board Class 11 Home Science किशोरों को कुछ विशेष आवश्यकताएँ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतवर्ष एक देश है –
(क) विकसित देश
(ख) विकासशील देश
(ग) अर्द्ध-विकासशील देश
(घ) पिछड़ा
उत्तर:
(ख) विकासशील देश

प्रश्न 2.
पूर्व किशोरावस्था में लड़के को प्रतिदिन आवश्यक कैलोरी चाहिए –
(क) 2190
(ख) 2060
(ग) 1640
(घ) 2070
उत्तर:
(क) 2190

प्रश्न 3.
पूर्व किशोरावस्था में लड़कियों को आवश्यक कैलोरी चाहिए –
(क) 2450
(ख) 2660
(ग) 2640
(घ) 1970
उत्तर:
(घ) 1970

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प्रश्न 4.
पूर्व किशोरावस्था को प्रभावित करने वाले कारक हैं –
(क) 5
(ग) 6
(घ) 7
उत्तर:
(घ) 7

प्रश्न 5.
संतुलित आहार (Balance Diet) मिलता है – [B.M.2009A]
(क) दूध में
(ख) माँस
(ग) सोयाबीन में
(घ) पालक में
उत्तर:
(क) दूध में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किशोरावस्था की विशेष आवश्यकताओं से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर-किशोरावस्था जीवनकाल का वह महत्त्वपूर्ण हिस्सा है जिसमें जटिल समस्याओं के समाधान हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण विशेष आवश्यकताएँ होती हैं।

प्रश्न 2.
किशोरावस्था की आवश्यकताओं में लड़के और लड़कियों में अन्तर क्यों होता है ?
उत्तर:
किशोरावस्था में लड़के और लड़कियों में कई भौतिक अन्तर स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं तथा इनमें कई आन्तरिक अन्तर भी आ जाते हैं जिससे उनकी शारीरिक आवश्यकताओं में भिन्नता आ जाती है।

प्रश्न 3.
किशोरावस्था में लड़के और लड़कियों में शारीरिक वृद्धि में क्या भिन्नता होती है ?
उत्तर:
लड़कों में लड़कियों की अपेक्षा बढ़ोत्तरी अधिक समय तक होती रहती है। लड़कियों में वृद्धि सामान्यत: 15 वर्ष की आयु तक समाप्त हो जाती है परन्तु लड़कों में इस आयु में बढ़ोत्तरी और तीव्र हो जाती है।

प्रश्न 4.
किशोरों में निम्न पोषण के मुख्य कारण क्या हैं ?
उत्तर:
किशोरों में निम्न पोषण के मुख्य कारण हैं-निर्धनता, अज्ञानता एवं परम्परागत भोजन सम्बन्धी आदतें, मानसिक अस्थिरता आदि।

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प्रश्न 5.
किशोरों के लिए प्रतिदिन व्यायाम करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
व्यायाम करने से मांसपेशियाँ क्रियाशील रहती हैं व उनकी कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा आलस्य एवं निष्क्रियता दूर होती है और स्फूर्ति उत्पन्न होती है।

प्रश्न 6.
किशोरावस्था में मनोरंजन का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
किशोरावस्था में मनोरंजन से व्यक्तित्व का विकास होता है तथा मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

प्रश्न 7.
माता-पिता द्वारा किशोरों को समझना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
किशोरावस्था में किशोरों को अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक व सामाजिक समस्याएँ घेरती हैं जिनका उचित समाधान करना आवश्यक है। इसलिए माता-पिता द्वारा किशोरों को समझना आवश्यक है।

प्रश्न 8.
किशोरावस्था में होने वाले कुपोषण के दो प्रमुख कारण लिखें।
उत्तर:
किशोरावस्था अत्यन्त तीव्र व आकस्मिक गति से वृद्धि होने का काल है। इस कारण यदि उचित व पौष्टिक भोजन न मिले तो प्रायः किशोर कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। कुपोषण के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • तीव्र वृद्धि के कारण बढ़ती हुई आवश्यकताएँ सामान्य आहार द्वारा पूरी न हो पाना ।
  • दिनचर्या नियमित न होने के कारण निश्चित समय पर भोजन न कर पाना ।

प्रश्न 9.
किशोरावस्था में आहार में लोहे की मात्रा को क्यों बढ़ाया जाना चाहिए?
उत्तर:
ऊतकों के निर्माण एवं रक्त की बढ़ोत्तरी के लिए लोहे की आवश्यकता किशोरावस्था में वयस्कों की अपेक्षा अधिक होती है। शारीरिक वृद्धि हेतु अतिरिक्त ऊर्जा चाहिए और ऊर्जा उत्पत्ति के लिए रक्त की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता अधिक होनी चाहिए । ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता हीमोग्लोबिन की मात्रा पर निर्भर करती है जो एक प्रकार का लोहे का यौगिक होता है।

प्रश्न 10.
“किशोरावस्था में पोषण” से तात्पर्य समझाएँ।
उत्तर:
किशोरावस्था में तीव्र विकास एवं वृद्धि के कारण आहार में पर्याप्त व गुणात्मक पोषक तत्त्वों का दिया जाना “किशोरावस्था में पोषण” कहलाता है।

प्रश्न 11.
किशोरावस्था में ऊर्जा की आवश्यकता क्यों बढ़ जाती है ?
उत्तर:
किशोरावस्था अत्यन्त तीव्र व आकस्मिक वृद्धि की अवधि है। शारीरिक वृद्धि एवं अधिक क्रियाशीलता के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 12.
शारीरिक व्यायाम करने से शरीर पर कौन-से दो प्रमुख प्रभाव पड़ते हैं ?
उत्तर:
शारीरिक व्यायाम करने से शरीर पर निम्नलिखित दो प्रभाव पड़ते हैं
(क) पुष्टिकर प्रभाव-नियमित रूप से व्यायाम करने से मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं।
(ख) सुधारात्मक प्रभाव-व्यायाम से मानसिक थकान कम होती है, अनुचित आसन की आदत में सुधार होता है।

प्रश्न 13.
किशोरावस्था में संतुलित आहार की प्राप्ति न होने के दो मुख्य कारण लिखें।
उत्तर:
किशोरावस्था तनाव व तूफान का काल माना जाता है। इसमें संतुलित आहार न मिलने के दो कारण निम्नलिखित हैं :

  • तीव्र वृद्धि स्फुरण के कारण शरीर की पौष्टिक आवश्यकताएँ बढ़ जाती हैं और उसके अनुरूप भोजन नहीं मिल पाता।
  • पोषण सम्बन्धी अज्ञानता के कारण भी पोषण संतोषजनक नहीं होता।

प्रश्न 14.
किशोरावस्था में कुपोषण से बचने हेतु कौन-कौन-से दो मुख्य उपाय हैं ?
उत्तर:

  • किशोरावस्था में संतुलित आहार सम्बन्धी प्रशिक्षण देना।
  • वृद्धि स्फुरण के कारण बढ़ती हुई प्रोटीन, कैल्शियम सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उत्तम प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ सम्मिलित करना ।

प्रश्न 15.
किशोरावस्था में कैल्शियम अधिक मात्रा में क्यों दिया जाना चाहिए?
उत्तर:
किशोरावस्था में तीव्र वृद्धि के कारण हड्डियों के बढ़ने हेतु व दाँतों की पुष्टता के लिए व शारीरिक क्रियाओं के लिए अधिक मात्रा में कैल्शियम दिया जाना चाहिए। कैल्शियम की पूर्ति के साथ फॉस्फोरस की पूर्ति स्वतः ही हो जाती है।

प्रश्न 16.
किशोरावस्था में. उचित वृद्धि हेतु कौन-कौन-से दो मुख्य उपाय हैं ?
उत्तर:
किशोरावस्था में उचित वृद्धि हेतु दो महत्त्वपूर्ण कारक हैं :

  • सन्तुलित एवं पौष्टिक भोजन
  • उचित व्यायाम।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किशोरों के लिए आहार योजना (Meal Planning) करते समय किन प्रमुख बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
किशोरों के लिए आहार योजना करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  • उन्हें उत्तम व सन्तुलित भोजन उपलब्ध कराना व उसका उत्तम स्वास्थ्य से सम्बन्ध का ज्ञान कराना अति आवश्यक है। सामान्य भार सन्तुलित आहार का सूचक है। यदि कुपोषण है तो मुरझाया हुआ चेहरा व आँखें स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं, परन्तु सुपोषण खिले हुए चेहरे का द्योतक है।
  • भोजन की पौष्टिकता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सभी वर्गों के पदार्थ बदल-बदल कर सम्मिलित किये जाने चाहिए।
  • वृद्धि स्फुरण के कारण बढ़ती हुई हड्डियों के लिए उत्तम प्रोटीन व दूध से बने पदार्थ सम्मिलित किये जाने चाहिये।
  • भोजन करने का समय नियमित रखना चाहिए।
  • तलना, भूनना व मिर्च मसालों का प्रयोग कम करना चाहिए।

प्रश्न 2.
भारतवर्ष में किशोरों के निम्न पोषण स्तर (Nutrition level) के क्या
मारतवर्ष एक विकासशील देश है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न प्रति व्यक्ति उपलब्ध नहीं हो पाते। को ज

किशोरों का पोषण स्तर निम्न होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  • निर्धनता के कारण सन्तुलित आहार का उपलब्ध न होना।
  • पोषण सम्बन्धी अज्ञानता के कारण व परम्परागत कई त्रुटिपूर्ण भोजन सम्बन्धी रीति-रिवाजों के कारण आवश्यकतानुसार पोषण तत्त्व न मिल पाना।
  • दिनचर्या नियमित न होने के कारण उचित समय पर भोजन न ग्रहण कर पाना।
  • मानसिक अस्थिरता एवं चिड़चिड़ेपन के कारण सन्तुलित आहार ग्रहण करने में असमर्थता।
  • लड़कियों के स्थूल होने के भय से ‘डायटिंग’ की प्रथा जिसमें पौष्टिक पदार्थों विशेषतः दूध का समावेश न करना।
  • मानसिक तनावों व भावनात्मक दबावों के कारण पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता में बढ़ोत्तरी होना व उनके अनुरूप पोषक तत्त्व ग्रहण न कर पाना।

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प्रश्न 3.
किशोरावस्था में निर्देशन (Guidance) का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
1. निर्देशन (Guidance):

1. व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance): किशोर की व्यक्तिगत समस्याओं की खोज और समाधान से सम्बन्धित निर्देशन ।

2. सामूहिक निर्देशन (Group Guidance): यह सामूहिक क्रिया है जिसका मुख्य उद्देश्य समूह में प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार व्यक्तिगत सहायता पहुँचाना होता है कि वह अपनी समस्याओं को सुलझा सके और समायोजन स्थापित कर सके। कई बार कोई समस्या एक किशोर की नहीं बल्कि पूरे समूह की होती है। तब इस प्रकार के निर्देशन की आवश्यकता होती है।

3. शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance): वह सहायता जो किशोरों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने लिए उपयुक्त विद्यालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य-विषय तथा अन्य क्रियाओं का चयन कर सकें और उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।

4. व्यावसायिक निर्देशन (Occupational Guidance): वह निर्देशन जिसके द्वारा किशोर अपने लिए उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव कर पाता है, उसके लिए तैयारी करता है और उस व्यवसाय में प्रवेश करके उन्नति करता है।

5. स्वास्थ्य निर्देशन (Health Guidance): स्वास्थ्य निर्माण तथा उसकी रक्षा के लिए दिया गया निर्देशन जिसका पालन करके किशोर शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहता है।

प्रश्न 4.
मनोरंजन और व्यायाम का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
मनोरंजन और व्यायाम (Entertainment and Exercise) पूर्व किशोरावस्था के आरम्भ तक बालक काफी खेलता-कूदता है और उसी से उसका पर्याप्त व्यायाम हो जाता है, परन्तु धीरे-धीरे वह एकांतप्रिय तथा साथी-समूह से दूर होता जाता है जिसके कारण उसके खेल-कूद में भारी कमी आ जाती है। इससे उसका शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य भी बिगड़ सकता है। अत: उन्हें इसके लिए प्रेरित किया जाना आवश्यक है।

स्वयं को. सम्मिलित करके उनके आत्मविश्वास को दृढ़ किया जा सकता है। साधारणतया लड़कियों के रजःस्राव के कारण वे मानसिक रूप से खिन्न तथा चिंतित हो जाती हैं और बाहर निकल कर अपने साथीसमूह में मिलकर खेलों में भाग नहीं ले पातीं और स्वयं को एकान्त में कैद करने की कोशिश करती हैं। उचित मार्ग प्रशस्त करके तथा उनकी सुविधाओं का आवश्यकतानुसार ध्यान रखकर उन्हें इस तनाव की स्थिति से बाहर निकालने में माता तथा शिक्षिका का अद्भुत योगदान हो सकता है।

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खेल के द्वारा व्यायाम होता है इसमें कोई शंका नहीं, परन्तु सक्रिय खेल ही व्यायाम करा पाते हैं। निष्क्रिय या मन बहलाव के खेल ज्यादा श्रम नहीं कराते तथा उनमें बालक कम से कम गतियाँ करके न्यूनतम ऊर्जा खर्च करता है । अतः उन्हें सक्रिय खेलों में भाग लेने के लिए उत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए सबसे अच्छा उपाय उन्हें उनके मनपसंद कार्य में संलग्न कर देना है जैसे कुछ किशोरों को बाजार जाकर वयस्कों की भाँति खरीदारी करना आदि।

प्रश्न 5.
मनोरंजन के कोई तीन स्रोतों का वर्णन करें जो आपको सबसे अधिक रुचिकर लगते हैं।
उत्तर:
जिस प्रकार शारीरिक विकास के लिए उचित व्यायाम महत्त्वपूर्ण है ठीक उसी प्रकार मानसिक, सामाजिक एवं संवेगात्मक विकास के लिए स्वस्थ मनोरंजन आवश्यक है। मनोरंजन सभी के लिए अनिवार्य है और किशोरावस्था में इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि बिना मनोरंजन के सन्तुलित व्यक्तित्व को बनाये रखना सम्भव नहीं। किशोरों के लिए मनोरंजन का अर्थ पूर्णतया बदल जाता है । वही खेल तथा कार्यकलाप जो बाल्यावस्था में आनंददायी होते थे अब बचकाने तथा समय नष्ट करने वाले बन जाते हैं। उनकी मनोरंजन सम्बन्धी रुचियाँ भी बदल जाती हैं। इस अवस्था में मनोरंजन के तरीके बदल जाते हैं।

मनोरंजन जिनमें अधिक शक्ति व्यय होती है के स्थान पर ऐसे मनोरंजन पसंद किये जाने लगते हैं जिनमें खिलाड़ी निष्क्रिय दर्शक होता है। मनोरंजन के तीन स्रोत जो अधिक रुचिकर लगते हैं वे हैं पढ़ना, सिनेमा और रेडियो व टेलीविजन सुनना व देखना आदि। पढ़ने में लड़कियाँ रोमांस वाली व लड़के विज्ञान और आविष्कारों की पुस्तकें एढ़ना पसन्द करते हैं। प्रेमप्रधान, साहसिक तथा हँसी-मजाक वाले सिनेमा पसन्द किये जाते हैं। रेडियो व टेलीविजन.सबसे प्रिय मनोरंजन का साधन बन गये हैं क्योंकि ये सभी आर्थिक स्थिति के लोगों के लिए सुविधापूर्ण मनोरंजन के साधन हैं।

प्रश्न 6.
माता-पिता को अपने किशोर बच्चों को समझना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
माता-पिता को अपने किशोर बच्चों को समझना अति आवश्यक है ताकि उसका विकास सही दिशा में हो और उसका व्यक्तित्व एक संतुलित व्यक्तित्व बन सके। किशोरों की समस्याओं का समाधान केवल तभी सम्भव है जब माता-पिता उनकी समस्याओं को समझें तथा उनके समाधान में सहायता करें। कई बार माता-पिता की नासमझी किशोर को पथभ्रष्ट भी कर सकती है क्योंकि वे अपनी समस्याओं के समाधान हेतु किसी गलत व्यक्ति की भी सलाह ले सकते हैं। यदि माता-पिता अपने किशोर की रुचियों एवं विश्वासों को भली प्रकार जान लें तो उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की जा सकती है।

यदि बच्चे की विज्ञान में रुचि नहीं है तो उसे विज्ञान लेने के लिए कभी भी बाध्य नहीं करना चाहिए। माता-पिता उनकी अभिवृत्तियों को प्रोत्साहित करके उनकी योग्यताओं और कुशलताओं में वृद्धि कर सकते हैं। माता-पिता के लिए यह आवश्यक है कि वह किशोरों के मित्रों के बारे में पूर्ण जानकारी रखें। उस गुट की भी पूर्ण जानकारी रखें जिसमें किशोर उठता-बैठता है और अपने अवकाश का समय बिताता है। किशोर अपराध को रोकने के लिए माता-पिता को अपने किशोरों की आवश्यकताओं को समझना अति आवश्यक है।

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प्रश्न 7.
पूर्व किशोरावस्था (Early Maturity) में माता-पिता के प्रति किशोर किस प्रकार का व्यवहार करता है ?
उत्तर:
नव किशोर का अपने माता-पिता के प्रति आरम्भ में मधुर सम्बन्ध नहीं होता। नव किशोर माता-पिता द्वारा ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं करता जैसे उसके बचपन में वे उससे करते रहे हैं। माता-पिता यदि किशोर की आवश्यकताओं या समस्याओं को ठीक प्रकार से न समझें तो किशोर माता-पिता को चिढ़ाने वाली सभी करतूतें करता है।

जैसे-सबसे तर्क करना, सबकी बातों की नुक्ताचीनी करते रहना, कर्त्तव्यों का पालन न करना, माता-पिता की आज्ञाओं का उल्लंघन करना आदि। इस कारण माता-पिता उसे टोकते हैं, या बिना सजा दिये स्वीकार नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप किशोरावस्था में संघर्ष और अधिक बढ़ जाता है। माता-पिता व नवकिशोर के सम्बन्ध तनावपूर्ण हो जाते हैं। परन्तु यदि अभिभावक समझदारी का रवैया अपनाएँ तो किशोरों की उन्नति का :मार्ग स्वयं ही प्रशस्त हो जाता है।

प्रश्न 8.
भोजन नियंत्रण के कारण किशोर में हुई दो कठिनाइयों के बारे में बताइए। अत्यधिक भार को कम करने के लिए किशोर को दो उपाय समझाइए।
उत्तर:

  • ऊर्जा का ह्रास (Loss of Energy)
  • कमी के रोग (Defficiency Disease)
  • तनाव (Depression)।

सुझाव (Suggestion)

  • संतुलिता 4769 (Balanced Diet)
  • व्यायाम (Exercise)।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किशोरावस्था में व्यायाम के महत्त्व को समझाएं।
उत्तर:
किशोरावस्था तीव्र व असमान वृद्धि की अवधि है जिसमें शरीर अत्यन्त तीव्र गति से बढ़ोत्तरी करता है। अतः इस अवस्था में व्यायाम का महत्त्व भी बढ़ जाता है। आधुनिक युग में जब हाथों द्वारा कम व मशीनों द्वारा अधिक काम किया जाता है, तब उचित व्यायाम द्वारा ही शारीरिक स्वस्थता को बनाये रखा जा सकता है। शारीरिक व्यायाम तीन प्रभावों के कारण जीवन में महत्त्व रखता है –
(क) पुष्टिकर प्रभाव
(ख) सुधारात्मक प्रभाव
(ग) विकासात्मक प्रभाव (Health Effect)

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(क) पुष्टिकर प्रभाव: नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर के समस्त अंग समान रूप से पुष्ट होते हैं। शरीर में शीघ्र ऊष्मा उत्पन्न होने के कारण रक्त प्रवाह में तीव्रता आती है। तन्तुओं को ऑक्सीजन अधिक मात्रा में मिलते हैं, परिणामस्वरूप मांसपेशियों में दृढ़ता आती है। इतना ही नहीं पाचन संस्थान, शक्ति संस्थान शक्तिशाली होता है जिससे भोजन के पाचन, अवशोषण और निष्कासन में तीव्रता आती है।

(ख) सुधारात्मक प्रभाव (Improvemental Effect): व्यायाम से मानसिक थकान कम होती है। अनुचित आसन की आदत में सुधार होता है। व्यायाम से अनुचित शरीर जैसे कन्धों का झुका होना, पैर की हड्डी का झुकाव इत्यादि में सुधार लाया जा सकता है।

(ग) विकासात्मक प्रभाव (Developmental Effect): निरन्तर व्यायाम से चहुँमुखी विकास पर प्रभाव पड़ता है। शारीरिक वृद्धि सामान्य होती है, मानसिक शक्ति बढ़ती है, इच्छाओं पर नियन्त्रण होता है और व्यक्ति नियमों का पालन कर अनुशासित होकर जीना सीखता है।

प्रश्न 2.
किशोरावस्था को कितने भागों में बाँटा जा सकता है ? – [B.M. 2009A]
उत्तर:
से 18 वर्ष के बीच के अवस्था को किशोरावस्था कहते हैं। हर व्यक्ति के जीवन में अवस्था सर्वाधिक मा.त्वपूर्ण होती है। जी स्टेनेल हॉल ने इसे तूफान और तनाव की अवस्था कहा है। किशोरावस्था के अध्ययन करने के लिए इसे तीन अवधियों में बाँटा जा सकता है।

  • पूर्व किशोरावस्था
  • मध्य किशोरावस्था
  • उत्तर किशोरावस्था

1. पूर्व किशोरावस्था-पूर्व किशोरावस्था 12 से 15 वर्ष की आयु की व्युवटि पिरीयड कहते है इस अवधि में शारीरिक परिवर्तन शुरू होता है क्या किशोर इन परिवर्तन के कारण सजग हो जाते है। इस अवस्था में हार्मोनल परिवर्तन के कारण लैंगिक परिपक्वता आरंभ होती है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का विकास तीव्र गति से होता है। यही कारण कि वे लड़कों के मुकाबले बड़ी होती है।

पूर्व किशोरावस्था को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं –

  • अंत:स्रावी ग्रंथियों की क्रियाएँ
  • अनुवांशिक
  • पोषक एवं स्वास्थ्य
  • सामाजिक स्तर,
  • आर्थिक स्तर,
  • क्षेत्र का तापमान
  • व्यक्तिगत भिन्नता

2. मध्य किशोरावस्था: 15 से 16 वर्ष की आयु को मध्य किशोरावस्था कहते हैं। इस अवस्था में हो रहे परिवर्तन को जल्दी स्वीकार नहीं किया जाता है। इस अवस्था को. ‘टिन्स’ अवस्था भी कहते हैं। टीन्स अवस्था में हो रहे परिवर्तन का असर किशोरों की सोच सामाजिक संबंध पर पड़ता है। यह उनके नए व्यक्तित्व की नींव का आधार बनता है।

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3. उत्तर किशोरावस्था: इस अवस्था में किशोर की आयु 16 से 18 वर्ष की होती है तथा परिवर्तन लगभग पूर्ण हो जाते हैं। इस आयु में सभी प्रकार के विकास, शारीरिक मानसिक, संवेगात्मक विकास एक साथ चलते हैं। 16 से 18 वर्ष की आयु को ‘सुनहरी अवस्था’ भी कहतें हैं। लड़कियों के परिपक्व होने की अधिकतम आयु सीमा 18 वर्ष एवं लड़कों की 21 वर्ष निध रिक्त की गई है।

प्रश्न 3.
किशोरावस्था की दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएँ क्या हैं?
उत्तर:
किशोरावस्था की दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं:

किशोरावस्था की. दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएँ –
(Daily Nutritional Requirement of Adolescent)
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1. ऊर्जा की आवश्यकता (Requirement of Energy): किशोरावस्था में शारीरिक वृद्धि एवं अधिक क्रियाशीलता के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। 13-14 वर्ष के लड़कों को 2450 कैलोरी तथा 16-18 वर्ष के लड़कों को 2640 कैलोरी की आवश्यकता होती है। लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। किशोर लड़कियों को केवल 2060 कैलोरी की आवश्यकता होती है।

2. प्रोटीन की आवश्यकता (Requirement of Protein): किशोरावस्था में प्रोटीन की आवश्यकता अत्यधिक होती है। 13-15 वर्ष के लड़कों को 70 ग्राम तथा 16-18 वर्ष के लड़कों को 78 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है। 13-15 वर्ष की लड़कियों के लिए 65 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है, जो 16-18 वर्ष की लड़कियों के लिए घट कर 63 ग्राम हो जाती है।

3.विटामिनों की आवश्यकता (Requirement of vitamins): ‘बी’ समूह के विटामिनों के अतिरिक्त अन्य विटामिनों की आवश्यकता किशोरों को वयस्कों के समान होती है। किशोरावस्था में कैलोरी की मात्रा बढ़ने के कारण थायमिन, राइबोफ्लेविन एवं निकोटिनिक अम्ल की आवश्यकता बढ़ जाती है।

4. खनिज लवणों की आवश्यकता (Requirement of Minerals): किशोरावस्था में लड़के और लड़कियाँ दोनों के लिए कैल्शियम की आवश्यकता अधिक होती है। हड्डियों के बढ़ने, दांतों की पुष्टता और अनेक शारीरिक क्रियाओं के लिए उचित मात्रा में कैल्शियम की प्राप्ति अनिवार्य है। ऐसा विश्वास किया गया है कि किशोरों में मानसिक द्वन्द्व एवं तनावों के कारण शरीर में कैल्शियम संचित नहीं हो पाता है। अतः आहार में प्रतिदिन कैल्शियमयुक्त पदार्थ सम्मिलित करना अति आवश्यक है।

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13-15 वर्ष के किशोरों को 600 मिग्रा कैल्शियम तथा 1618 वर्ष के किशोरों को 500 मिग्रा कैल्शियम की आवश्यकता होती है। कैल्शियम की पूर्ति के साथ फास्फोरस की पूर्ति स्वतः हो जाती है। न किशोरावस्था में ऊतकों के निर्माण एवं रक्त की बढ़ोत्तरी के लिए लोहे की आवश्यकता वयस्कों से अधिक होती है।

किशोर लड़के को लड़कियों की अपेक्षा अधिक लोहे की आवश्यकता होती है क्योंकि इनमें शारीरिक वृद्धि तीव्र गति से होती है। 13-15 वर्ष के लड़कों को 41 मिग्रा. तथा 16-18 वर्ष के लड़कों को 50 मिग्रा. लोहे की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार 13-15 वर्ष की लड़कियों को 28 मिग्रा. तथा 16-18 वर्ष की लड़कियों को 30 मिग्रा. लोहे की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4.
मनोरंजन द्वारा व्यक्तित्व का निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर:
मनोरंजन द्वारा व्यक्तित्व का निर्माण (Personality development through entertainment)

  1. मनोरंजन द्वारा मानसिक संतुष्टि मिलती है जिससे व्यक्ति अपने तनावों इत्यादि को भूलता है।
  2. शारीरिक खेलों द्वारा मनोरंजन करने से शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है।
  3. कार्य करने की नई शक्ति तथा क्षमता मिलती है।
  4. मनोरंजन द्वारा अपने मित्रों, बड़ों तथा छोटों से सम्बन्ध बनाने में सहायता मिलती है।
  5. मानसिक खेलों जैसे चेस (Chess) आदि द्वारा मनोरंजन करने से मानसिक व्यायाम हो . जाता है।
  6. विषमलिंगियों से सम्बन्ध बनाने में सहायता मिलती है।
  7. मनोरंजन के लिए किताबें पढ़ने, टी.वी. देखने, अखबार पढ़ने तथा रेडियो सुनने से ज्ञान भी बढ़ता है।
  8. मनोरंजन की विभिन्न स्थितियों द्वारा विभिन्न लोगों से मिलना-जुलना तथा समाज के नियमों और कानूनों जैसे चौराहे पर लाल बत्ती (Red light) को जानने का अवसर मिलता है।
  9. अकेले रहकर मनोरंजन करनेवाले किशोरों को एकांत की महत्ता का ज्ञान होता है और वे कम आयु में अधिक विचारने वाले और अधिक दार्शनिक प्रवृत्ति के हो जाते हैं।
  10. मनोरंजन से किशोरों की कुंठाएं (Frustration) दूर होती हैं और वे फिर से अपनी सामान्य अवस्था में आ जाते हैं।
  11. मनोरंजन किशोरों के बहुमुखी विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण टॉनिक (Tonic) का कार्य करता है।

प्रश्न 5.
शारीरिक व्यायाम का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
शारीरिक व्यायाम का प्रभाव (Effect of Physical exercise):
(क) पुष्टिकर प्रभाव
(ख) सुधारात्मक प्रभाव
(ग) विकासात्मक प्रभाव

(क) पुष्टिकर प्रभाव (Health Effect): नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर के समस्त अंग समान रूप से पुष्ट होते हैं। इससे शरीर में शीघ्र ही ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है। हृदय गति तीव्र हो जाती है। इस प्रकार रक्त प्रवाह में तीव्रता आ जाती है। समस्त शरीर के तन्तुओं को ऑक्सीजन और ग्लाइकोजन अधिक मात्रा में प्राप्त होता रहता है। परिणामस्वरूप मांसपेशियों में दृढ़ता आती है।

व्यायाम करते समय श्वास की गति तेज हो जाती है जिससे फेफड़े अधिक स्वस्थ रहते हैं और शरीर की शक्ति में वृद्धि होती है। शरीर अधिक मात्रा में श्वसन द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण करता है तथा अशुद्धियों का कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में निष्कासन करता है। व्यायाम से पाचन संस्थान शक्तिशाली होता है, पाचन शक्ति बढ़ती है तथा शरीर के मल निष्कासन में सहायता मिलती है और अपच, कब्ज आदि रोग दूर हो जाते हैं।

(ख) सुधारात्मक प्रभाव (Improvement Effect): व्यायाम से मानसिक थकान कम होती है, अनुचित आसन की आदत में सुधार होता है और शारीरिक विकृतियों जैसे झुके कन्धे, रीढ़ की हड्डी का झुकाव व चपटे पैर आदि में पूर्णतः सुधार लाया जा सकता है।

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(ग) विकासात्मक प्रभाव (Development Effect): निरन्तर नियमित रूप से व्यायाम करने से मांसपेशियों के आकार तथा शक्ति में विकास होता है और मांसपेशियों पर इच्छा-शक्ति का नियंत्रण बढ़ जाता है।

व्यायाम सम्बन्धी कुछ नियम (Laws of Exercise):
व्यायाम सम्बन्धी निम्नलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है –

  • व्यायाम ऐसा होना चाहिए जिससे शरीर के समस्त अंग जिन्हें विकास की आवश्यकता हो, समान रूप से लाभ उठा सकें।
  • व्यायाम धीरे-धीरे सरल से कठिन की ओर करने चाहिए । अत्यन्त कठिन व्यायाम नहीं करने चाहिए क्योंकि इससे हृदय पर जोर पड़ने का भय पाता है। व्यायाम की मात्रा धीरे-धीरे नित्य प्रति बढ़ानी चाहिए।
  • व्यायाम करने के कम-से-कम एक घण्टा पश्चात् पसीना सूखने पर स्नान अवश्य करना चाहिए । पसीना सूखने पर त्वचा पर मैल जमा रह जाता है जिसे स्वच्छ करना अत्यन्त आवश्यक
  • व्यायाम नियमित रूप से खुले हवादार स्थान में करना चाहिए जिससे फेफड़ों में शुद्ध वायु द्वारा ऑक्सीजन अधिक मात्रा में पहुँचे।
  • अस्वस्थ व्यक्तियों को व्यायाम नहीं करना चाहिए।
  • व्यायाम के बाद थोड़ी देर आराम करना आवश्यक है।
  • मानसिक कार्य करने वालों को हल्के व्यायाम करने चाहिए जैसे टेनिस, फुटबॉल, बॉलीवल आदि खेलना उनके लिए उचित व्यायाम है।
  • व्यायाम करने से पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए या भोजन करने के तुरत बाद व्यायाम नहीं करना चाहिए।
  • व्यायाम करने का सर्वोत्तम समय प्रात:काल का है। सायंकाल खेलकूदों में भाग लेकर व्यायाम किया जा सकता है।
  • व्यायाम हर आयु के व्यक्ति के लिए भिन्न होना चाहिए। बालकों, किशोरों, प्रौढ़ों तथा वृद्धों का व्यायाम अलग-अलग प्रकार का होना चाहिए। किशोर बालकों तथा प्रौढ़ों की अपेक्षा तेज व्यायाम कर सकते हैं।

प्रश्न 6.
माता-पिता द्वारा किशोरों को समझे जाने की आवश्यकता क्यों है ?
उत्तर:
माता-पिता द्वारा समझे जाने की आवश्यकता (Understanding of Parents)किशोरों के पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए यह अति आवश्यक है कि माता-पिता उसे भली प्रकार समझें और उसके विकास में सहायक हों।

1. माता-पिता द्वारा किशोरों की समस्याओं को समझना (Understanding the problems of adolescents by the parents): किशोरों की समस्याओं का समाधान केवल तभी सम्भव है जब माता-पिता उनकी समस्याओं को समझें तथा उनके समाधान में सहायता करें।

किशोरावस्था में किशोरों को अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक व सामाजिक समस्याएँ घेरती हैं जिनका उचित समाधान करना आवश्यक है। माता-पिता ही अपने बच्चों के सबसे बड़े शुभचिन्तक होते हैं और वे ही उनकी समस्याओं को भली प्रकार समझकर उनका समाधान निकाल सकते हैं। कई बार माता-पिता की नासमझी के कारण किशोर अपनी समस्याओं के समाधान हेतु गलत व्यक्तियों का सहरा लेते हैं और अनेक उलझनों में फंस जाते हैं।

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2. माता-पिता को किशोरों के मित्रों व उसके समूह को समझना (Understanding the friends and their group of adolescents): माता-पिता के लिए आवश्यक है कि वह किशोरों के मित्रों के बारे में पूर्ण जानकारी रखें तथा उस गुट की भी जानकारी रखें जिसमें किशोर उठता-बैठता है और अपने अवकाश का समय बिताता है । कई बार किशोर गलत मित्रों का चयन करके अनेक असामाजिक तत्त्वों से प्रभावित हो जाते हैं जिससे उनमें अपराध की प्रवृत्ति आती है। किशोर-अपराध को रोकने के लिए माता-पिता को अपने किशोरों की आवश्यकताओं को समझना अति आवश्यक है।

3. माता-पिता द्वारा किशोरों की रुचियों, अभिवृत्तियों एवं विश्वासों को समझना (Understanding the interest, taste and confidence of adolescents): माता-पिता को अपने किशोर बच्चों की रुचियों एवं विश्वासों को भली प्रकार समझना बहुत आवश्यक है क्योंकि इन्हीं के आधार पर किशोर अपने भविष्य का निर्माण करता है।

कई बार माता-पिता बिना सोचे-समझे किशोरों के भविष्य के बारे में ऐसे निर्णय ले लेते हैं जो उनकी रुचियों, अभिवृत्तियों आदि से भिन्न होते हैं जिससे किशोरों के सामने समायोजन की समस्याएँ आती हैं। उदाहरण के लिए कई बार विज्ञान में रुचि न होते हुए भी माता-पिता की नासमझी के कारण बच्चे को विज्ञान पढ़ना पड़ता है जिससे किशोर कक्षा में पिछड़ा हुआ रहता है तथा हीनभावना से ग्रस्त भी हो सकता है।

माता-पिता को किशोरों की शारीरिक, मानसिक व सामाजिक आवश्यकताओं की जानकारी प्राप्त करके उन्हें उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ऐसा घर व वातावरण प्रयुक्त करवाना चाहिए जिसमें परिवार के सदस्यों में परस्पर स्नेह, मैत्री, सभी के अधिकारों व आवश्यकताओं को समझने की क्षमता हो, जिससे उनके व्यक्तित्व का विकास हो सके। घर ऐसा होना चाहिए जिसमें प्रजातांत्रिक वातावरण तथा माता-पिता के मध्य उचित समायोजन हो।