Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 12 खनिज पोषण

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 12 खनिज पोषण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 12 खनिज पोषण

Bihar Board Class 11 Biology खनिज पोषण Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
“पौधे में उत्तरजीविता के लिए उपस्थित सभी · तत्वों की अनिवार्यता नहीं है।” टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अभी तक 105 खनिज तत्वों में से 60 से अधिक खनिज तत्व पौधों में पाए गए हैं। लेकिन उनकी उपयोगिता के आधार पर पौधधों के लिए 17 पोषक तत्व अनिवार्य माने जाते हैं। अनिवार्य पोषक तत्वों को उनकी परिमाणात्मक आवश्यकता के आधार पर दो वर्गों में बाँट लेते हैं –
(क) वृहत् या दीर्घमात्रा पोषक तत्व
(ख) सूक्ष्म या लघुमात्रा पोषक तत्व।

(क) वृहत् या दीर्घमात्रा पोषक तत्व (Macronutrient elements):
ये पौधों के शुष्क पदार्थ की 1 से 10 मिलीग्राम/लीटर की सान्द्रता में पाए जाते हैं; जैसे – कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, पोटैशियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, सल्फर।

(ख) सूक्ष्म या लघुमात्रा पोषक तत्व (Micronutrient elements):
ये पौधों के शुष्क पदार्थ की 0.1 मिलीग्राम/लीटर की सान्द्रता या उससे कम मात्रा में पाए जाते हैं; जैसे – क्लोरीन, बोरोन, लौह, मैंगनीज, जिंक, ताँबा, निकिल, मॉलिब्डेनमा।

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प्रश्न 2.
जल संवर्धन में खनिज पोषण हेतु अध्ययन में जल और पोषक लवणों की शद्धता जरूरी क्यों है?
उत्तर:
जुलियस वॉन सॉक्स (J.V Sachs) ने मृदा की अनुपस्थिति में पोषक विलयन में पौधों को वयस्क अवस्था तक उगाया। इस विधि द्वारा पोषक तत्वों की उपयोगिता का अध्ययन किया जा सकता है। इसके लिए शुद्ध जल तथा पोषक पदार्थों का होना आवश्यक है। इस विधि में किसी एक तत्व को डाला जाता है या हटाया जाता है और कमी के कारण प्रदर्शित होने वाले लक्षणों का अध्ययन किया जाता है। अशुद्ध पोषक पदार्थों (तत्वों) का उपयोग करके पोषक तत्वों की अनिवार्यता का अध्ययन करना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 3.
उदाहरण के साथ व्याख्या कीजिए-वृहत् पोषक, सूक्ष्म पोषक, हितकारी पोषक, आविष तत्व और अनिवार्य तत्व।
उत्तर:
1. वृहत् पोषक (Macronutrients):
शुष्क पदार्थ में अधिक सान्द्रता में पाए जाने वाले तत्वों को वृहत् पोषक (macronutrients) कहते हैं; जैसे-कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, सल्फर, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्सियम आदि।

2. सूक्ष्म पोषक (Micronutrients):
शुष्क पदार्थ में कम सान्द्रता में पाए जाने वाले तत्वो को सूक्ष्म पोषक (micronutrients) कहते हैं। ये पौधों को बहुत सूक्ष्म मात्रा (1.0 ppm या इससे कम) में चाहिए; जैसे- क्लोरीन, बोरोन, लौह, ताँबा, जिंक, निकिल, मॉलिब्डेनमा।

3. हितकारी पोषक (Beneficial Elements):
अनिवार्य पोषक तत्रों के अतिरिक्त कुछ लाभदायक तत्व उच्च श्रेणी के पौधों के लिए आवश्यक होते हैं, इन्हें हितकारी पोषक तत्व कहते हैं।

4. आविष या आविषालु तत्व (Toxic Elements):
किसी खनिज आयन की वह जो सान्द्रता ऊतकों के शुष्क भार में 10% की कमी करता है। आविषालु तत्व माना जाता है। विभिन्न पोषक तत्वों का आविषालुंकता स्तर भिन्न-भिन्न होता है; जैसेमैंगनीज (Mn) आविषालु।

5. अनिवार्य तत्व (Essential Elements):
पौधों के लिए 17 खनिज तत्व अनिवार्य होते हैं। इनकी मात्रा के आधार पर अनिवार्य तत्वों को दो समूहों में बाँट लेते हैं –
(क) वृहत् तत्व
(ख) सूक्ष्म तत्व।
वृहत् तत्वों के अन्तर्गत C, H, O, N, S, K, Ca, Mg, P
और सूक्ष्म तत्व के अन्तर्गत CI, B, Fe, Mn, Zn, Cu, Ni, MO सम्मिलित हैं।

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प्रश्न 4.
पौधों में कम-से-कम पाँच अपर्याप्तता के लक्षण दीजिए। उसे वर्णित कीजिए और खनिजों की कमी से उसका सहसम्बन्ध बनाइए।
उत्तर:
1. पोटैशियम की कमी (Deficiency of Potassium):
इससे पत्तियों पर निर्जीव धब्बे बन जाते हैं। पौधे झाड़ी सदृश (bushy) हो जाते हैं। रोगों के लिए प्रतिरोध क्षमता कम हो जाती है।

2. कैल्सियम की कमी (Deficiency of Calcium):
इससे हरितलवक सुचारु रूप से कार्य नहीं करता। पुष्प शीघ्र झड़ जाते हैं। पौधों में बीज नहीं बनते।

3. मैग्नीशियम की कमी (Deficiency of Magnesium):
इससे हरिमहीनता (chlorosis) हो जाती है।

4. बोरोन की कमी (Deficiency of Boron):
इससे जड़ों का विकास कम होता है। पुष्पों की संख्या कम और फलों का आकार छोटा रहता है। तना भंगुर (brittle) हो जाता है। पौधे बौने रह जाते हैं।

5. जिंक की कमी (Deficiency of Zinc):
इससे पत्तियाँ चितकबरी (mottled) व पीली हो जाती है।

6. ताँबे की कमी (Deficiency of Copper):
इससे पत्तियों में हरिमहीनता (chlorosis) मुरझाना और सूखापन के लक्षण विकसित होते हैं। अग्रस्थ कलिकाएँ नष्ट हो जाती हैं तथा पत्तियाँ मुड़ जाती हैं।

7. नाइट्रोजन की कमी (Deficiency of Nitrogen):
इससे पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। इनकी वृद्धि रूक जाती है। पुष्पम देर से होता है तथा अनाज के दाने सिकुड़ जाते हैं।

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प्रश्न 5.
अगर एक पौधे में एक से ज्यादा तत्वों की कमी के लक्षण प्रकट हो रहे हैं तो प्रायोगिक तौर पर आप कैसे पता करेंगे कि अपर्याप्त खनिज तत्व कौन-से हैं?
उत्तर:
किसी तत्व की अपर्याप्तता से कई तत्वों की कमी के लक्षण प्रकट होते हैं। ये लक्षण एक तत्व की कमी से या विभिन्न तत्वों की कमी के कारण प्रकट हो सकते हैं। अतः अपर्याप्त तत्व को पहचानने के लिए पौधे के विभिन्न भागों में प्रकट होने वाले लक्षणों का अध्ययन करना पड़ता है और उपलब्ध तथा मान्य तालिका से उनकी तुलना करनी पड़ती है। समान तत्व की कमी होने पर अलग-अलग पौधों में अलग-अलग लक्षण प्रदर्शित होते हैं।

प्रश्न 6.
कुछ निश्चित पौधों में अपर्याप्तता लक्षण सबसे पहले नवजात भाग में क्यों पैदा होता है, जबकि कुछ अन्य में परिपक्व अंगों में?
उत्तर:
पोषक तत्वों की कमी से पौधों में कुछ आकारिकीय बदलाव (morphological change) आते हैं। ये परिवर्तन अपर्याप्तता को प्रदर्शित करते हैं। ये विबिन्न तत्वों के अनुसार अलग-अलग होते हैं। अपर्याप्तता के लक्षण पोषक तत्वों की गतिशीलता पर निर्भर करते हैं। ये लक्षण कुछ पौधों के नवजात भागों में या पुराने ऊतकों में पहले प्रकट होते हैं।

पादप में जहाँ तत्व सक्रियता से गतिशील रहते हैं तथा तरुण विकासशील ऊतकों में निर्यातित होते हैं। वहाँ अपर्याप्तता के लक्षण पुराने ऊतकों में पहले प्रकट होते हैं; जैसे – N, K, Mg अपर्याप्तता के लक्षण सर्वप्रथम जीर्णमान पत्तियों में प्रकट होते हैं पुरानी पत्तियों से ये तत्व विभिन्न जैव अणुओं के विखण्डित होने से उपलब्ध होते हैं और नई पत्तियों तक गतिशील होते हैं।

जब तत्व अगतिशील होते हैं और वयस्क अंगों से बाहर अभिगमित नहीं होते तो अपर्याप्तता लक्षण नई पत्तियों में प्रकट होते हैं; जैसे-कैल्सियम, सल्फर आसानी से स्थानान्तरित नहीं होते। अपर्याप्तता लक्षणों को पहचानने के लिए पौधे के विभिन्न भागों में प्रकट होने वाले लक्षणों का अध्ययन मान्य तालिका के अनुसार करना होता है।

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प्रश्न 7.
पौधों के द्वारा खनिजों का अवशोषण कैसे होता हैं।
उत्तर:
पौधे खनिज तत्वों का अवशोषण निम्न प्रकार से करते हैं –

1. ऐपोप्लास्ट पथ (Apoplast pathway):
कोशिका के बाह्य स्थलों से आयन्स का निष्क्रिय अवशोषण तीव्र गति से होता है। कोशिका कला प्रोटीन्स से बनी होती है। इसमें छिद्र पाये जाते हैं।

2. सिमप्लास्ट पथ (Symplast Pathway):
कोशिकाओं के आन्तरिक स्थान में आयन का अन्तर्ग्रहण सक्रिय अवशोषण द्वारा होता है। आयन्स के प्रवेश और निष्कासन में उपापचयी ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 8.
राइजोबियम के द्वारा वातावरणीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण के लिए क्या शर्ते हैं तथा N2 स्थिरीकरण में इनकी क्या भूमिका है?
उत्तर:
वायुमण्डलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण की शर्ते (Conditions for Atmospheric Nitrogen Fixation)

  1. नाइट्रोजिनेस एन्जाइम (Nitrogenase enzyme)
  2. लेग्हीमोग्लोबीन (Leghaemoglibin, lb)
  3. ATP
  4. अनॉक्सी वातावरण।

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चित्र – नाइट्रोजन स्थिरीकरण में नाइट्रोजिनेस एन्जाइम की भूमिका।

मुख्यतया मटर कुल के पौधों की जड़ों में ग्रन्थिकाएँ पाई जाती हैं। इनमें राइजोबियम (Rhizobium) जीवाणु पाया जाता है। ग्रन्थिकाओं में नाइट्रोजिनेस (nitrogenase) एन्जाइम एवं लेग्हीमोग्लोबीन (leghaemoglobin) आदि सभी जैवरासायनिक संघटक पाए जाते हैं। नाइट्रोजिनेस एन्जाइम वातावरणीय नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलने के लिए उत्प्रेरित करता है। नाइट्रोजिनेस एन्जाइम की सक्रियता के लिए अनॉक्सी वातावरण आवश्यक होता है।

लेग्हीमोग्लोबीन ऑक्सीजन से नाइट्रोजिनेस एन्जाइम की सुरक्षा करता है। अमोनिया संश्लेषण के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। एक अमोनिया अणु को 8 ATP ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा की आपूर्ति पोषक कोशिकाओं के ऑक्सी श्वसन से होती है। अमोनिया ऐमीनो अम्ल में ऐमीनो समूह के रूप में सम्मिलित हो जाती है।

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प्रश्न 9.
मूल ग्रन्थिका के निर्माण हेतु कौन-कौन से चरण भागीदार हैं?
उत्तर:
मूल ग्रन्थिका निर्माण (Formation of Root Nodules):
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चित्र – सोयाबीन में मूल ग्रन्थिका का विकास –
(A) राइजोबियम जीवाणु मूलरोम के समीप बहुगुणित होते हैं।
(B) संक्रमण के पश्चात् मूलरोम में संकुचन, प्रेरित होता है।
(C) संक्रमित जीवाणु मूलरोम द्वारा वल्कुट कोशिकाओं तक पहुँचता है। वल्कुट एवं परिरम्भ कोशिकाएँ विभाजित होने लगती हैं और ग्रन्थिका का निर्माण हो जाता है।
(D) ग्रन्थिका जीवाणुओं का सम्बन्ध पोषक कोशिका से स्थापित हो जाता है।

पोषक पौधों (सामान्यतया मटर कुल के पौधे) की जड़ एवं राइजोबियम में पारस्परिक प्रक्रिया के कारण ग्रन्थिकाओं का निर्माण निम्नलिखित चरणों में होता है –

राइजोबियम जीवाणु बहुगुणित होकर जड़ के चारों ओर एकत्र होकर मूलरोम एवं मूलीय त्वचा से जुड़ जाते हैं। जीवाणु संक्रमण के कारण जीवाणु मूलरोम से होकर वल्कुट (cortex) में पहुँच जाते हैं। वल्कुट में जीवाणुओं के कारण कोशिकाओं का विशिष्टीकरण नाइट्रोजन स्थिरीकरण कोशिकाओं के रूप में होने लगता है। इस प्रकार ग्रन्थिकाओं (nodules) का निर्माण हो जाता है। ग्रन्थिकाओं के जीवाणुओं का पोषक पादप से पोषक तत्वों के आदान-प्रदान हेतु संवहनी सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।

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प्रश्न 10.
निम्नांकित कथनों में कौन सही हैं? अगर गलत है तो उन्हें सही कीजिए –
(क) बोरोन की अपर्याप्तता से स्थूलकाय अक्ष बनता है।
(ख) कोशिका में उपस्थित प्रत्येक खनिज तत्व उसके लिए अनिवार्य है।
(ग) नाइट्रोजन पोषक तत्व के रूप में पौधे में अत्यधिक अचल है।
(घ) सूक्ष्म पोषकों की अनिवार्यता निश्चित करना अत्यन्त ही आसान है, क्योंकि ये सूक्ष्म मात्रा में लिए जाते हैं।
उत्तर:
(क) सत्य कथन।
(ख) असत्य कथन। 105 खनिज तत्वों में से लगभग 60 तत्व विभिन्न पौधों में पाए गए जिनमें से 17 खनिज तत्व ही अनिवार्य होते हैं।
(ग) असत्य कथन। नाइट्रोजन अत्यधिक गतिमान पोषक खनिज तत्व है।
(घ) असत्य कथन। सूक्ष्म पोषक तत्वों की अनिवार्यता निश्चित करना अत्यन्त कठिन कार्य होता है; क्योंकि ये अति सूक्ष्म मात्रा में प्रयोग किए जाते हैं। सामान्यतया पोषक लवणों में अशुद्धता के कारण इनकी अनिवार्यता स्थापित करना कठिन होता है।

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Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 11 पौधों में परिवहन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology पौधों में परिवहन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
विसरण की दर को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
विसरण की दर को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting Rate of Diffusion):
विसरण की दर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. सान्द्रता की प्रवणता (gradient of concentration)
  2. दो घोलों को पृथक् करने वाली झिल्ली की पारगम्यता (permeability of membrane)
  3. diy (temperature)
  4. दाब (pressure)

विसरण एक सामान्य भौतिक निष्क्रिय क्रिया है। इसमें ऊर्जा व्यय नहीं होती। यह सजीव और निर्जीव दोनों में होती है।

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प्रश्न 2.
पोरीन्स क्या है? विसरण में ये क्या भूमिका निभाते हैं?
उत्तर:
पोरीन्स (Porins):
जीवाणु, माइटोकॉन्ड्रिया, लवक आदि की बाह्य झिल्ली में पोरीन प्रोटीन्स पाई जाती है। यह बाह्य झिल्ली में बड़े छिद्रों का निर्माण करती है। यह झिल्ली अणुओं के आर-पार जाने के लिए रास्ता बनाती है। ये रास्ते हमेशा खुले रहते हैं और कुछ नियन्त्रित भी हो सकते हैं। कुछ रास्ते बड़े होते हैं जिससे अन्य प्रोटीन्स के छोटे अणु इनसे होकर आ-जा सकें।

चित्र से स्पष्ट है कि बाह्य कोशिका अणु परिवहन प्रोटीन पर अनुबन्धित होकर कोशिका झिल्ली की भीतरी सतह पर पहुँचकर अणु को मुक्त कर देती है। तन्त्रिका कोशिकाओं में तन्त्रिका कला से सोडियम-पोटैशियम का आवागमन विद्युत विभव परिवर्तन द्वारा नियन्त्रित होता है। Na+ तथा K+ गेट विद्युत परिवर्तनों के फलस्वरूप खुलते और बन्द होते हैं।
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चित्रं – सुसाध्य विसरण (Faciliated diffusion)

प्रश्न 3.
पादपों में सक्रिय परिवहन के दौरान प्रोटीन पम्प के द्वारा क्या भूमिका निभाई जाती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सक्रिय परिवहन (Active Transport):
सक्रिय परिवहन सान्द्रता प्रवणता (concentration gradient) के विरुद्ध अणुओं को पम्प करता है। इस प्रक्रिया में ऊर्जा व्यय होती है। गतिज ऊर्जा ATP से प्राप्त होती है। सक्रिय परिवहन झिल्ली प्रोटीन्स द्वारा सम्पन्न होता है। अणुओं को ले जाने वाले पम्प प्रोटीन्स पदार्थों को कम सान्द्रता से अधिक सान्द्रता [शिखरोपरि (अपहिल) परिवहन की ओर ले जाते हैं। पम्प या वाहक प्रोटीन्स पदार्थों को झिल्ली के आर-पार ले जाने के लिए एन्जाइम्स की भाँति अति विशिष्ट होते हैं।

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प्रश्न 4.
शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव क्यों होता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है; क्योंकि –

1. जल अणुओं में गति ऊर्जा पायी जाती है। यह तरल और गैस दोनों अवस्था में गति करते हुए पाए जाते हैं। गति स्थिर तथा तीव्र (constant and rapid) दोनों प्रकार की हो सकती है।

2. किसी माध्यम में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसमें गतिज ऊर्जा तथा जल विभव अधिक होगा। शुद्ध जल में सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है।

3. जब दो जल तन्त्र परस्पर सम्पर्क में हों तो पानी के अणु उच्च जल विभव (या तनु घोल) वाले तन्त्र से कम जल विभव (सान्द्र घोल) वाले तन्त्र की ओर जाते हैं।

4. जल विभव को ग्रीक चिह्न Psi or Ψ से चिन्हित करते हैं। इसे पास्कल (pascal) दाब इकाई में व्यक्ति किया जाता है।

5. मानक परिस्थितियों में शुद्ध जल का जल विभव (water potential) शून्य होता है।

6. किसी विलयन यन्त्र का जल विभव उस विलयनन से जल बाहर निकलने की प्रवृत्ति का मापन करता है। यह प्रवृत्ति ताप एवं दाब के साथ बढ़ती जाती है, लेकिन विलेय (solute) की उपस्थिति के कारण घटती है।

7. शुद्ध जल में विलेय को घोलने पर घोल में जल की सान्द्रता और जल विभव कम होता जाता है। अत: सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव कम होता है। जल विभव के कम होने का कारण विलेय विभव (solute potential ys) होता है। इसे परासरण विभव (osmotic potential) भी कहते हैं।

जल विभव तथा विलेय विभव ऋणात्मक होता है। कोशिका द्वारा जल अवशोषित करने के फलस्वरूप कोशिका भित्ति पर दबाव पड़ता है, जिससे यह आशून (स्फीत) हो जाता है। इसे दाब विभव (pressure potential) कहते हैं. दाब विभव प्राय: सकारात्मक होता है। लेकिन जाइलम के जल स्तम्भ में ऋणात्मक दाब विभव रसोरोहण में महत्त्वपूर्ण भूमिक निभाता है।

8. किसी पादप कोशिका में जलीय विभव (Ψ) तीन बलों द्वारा नियन्त्रित होता है-दाब विभव (Ψp) परासरणीय विभव या विलेय विभव (Ψs) मैट्रिक्स विभव (Ψm) मैट्रिक्स विभव प्रायः नगण्य होता है।

अतः कोशिका के जलीय विभव की गणना निम्नलिखित सूत्रानुसार करते हैं –
Ψ = Ψp + ΨS
9. जीवद्रव्यकुंचित कोशिका का जलीय विभव परासरणीय विभव के बराबर होता है; क्योंकि दाब विभव शून्य होता है। पूर्ण स्फीत कोशिका में दाब विभव और परासरणीय विभव के बराबर हो जाने से जलीय विभव शून्य हो जाता है।

10. जल विभव सान्द्रता (concentration), प्रवणता (gravity) और दाब (pressure) से प्रभावित होता है।

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए –
(क) विसरण एवं परासरण
(ख) वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण
(ग) परासारी दाब तथा परासारी विभव
(घ) विसरण एवं अन्तःशोषण
(ङ) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ
(च) बिन्दुस्राव एवं परिवहन (अभिगमन)।
उत्तर:
(क) विसरण एवं परासरण में अन्तर (Difference between Diffusion and Osmosis):
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(ख) वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण में अन्तर (Difference between Evaporation and Transpiration):
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(ग) परासारी दाब तथा परासारी विभव में अन्तर (Difference between Osmotic Pressure and Osmotic Potential):
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(घ) विसरण एवं अन्तःशोषण में अन्तर (Difference between Diffusion and Imbibition):
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(ङ) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ (Difference between Apoplasty, and Symplast Pathways of Water absorption in Plants):
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चित्र – जल एवं पोषक तत्वों का एपोप्लास्ट तथा सिमप्लास्ट पथ तथा जड़ों में प्रवाह

(च) बिन्दु स्राव एवं परिवहन (अभिगमन) में अन्तर (Difference between Guttation and Transporation):
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प्रश्न 6.
जल विभव का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। कौन-से कारक इसे प्रभावित करते हैं? जल विभव, विलेय विभव तथा दाब विभव में आपसी सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है; क्योंकि –

1. जल अणुओं में गति ऊर्जा पायी जाती है। यह तरल और गैस दोनों अवस्था में गति करते हुए पाए जाते हैं। गति स्थिर तथा तीव्र (constant and rapid) दोनों प्रकार की हो सकती है।

2. किसी माध्यम में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसमें गतिज ऊर्जा तथा जल विभव अधिक होगा। शुद्ध जल में सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है।

3. जब दो जल तन्त्र परस्पर सम्पर्क में हों तो पानी के अणु उच्च जल विभव (या तनु घोल) वाले तन्त्र से कम जल विभव (सान्द्र घोल) वाले तन्त्र की ओर जाते हैं।

4. जल विभव को ग्रीक चिह्न Psi or Ψ से चिन्हित करते हैं। इसे पास्कल (pascal) दाब इकाई में व्यक्ति किया जाता है।

5. मानक परिस्थितियों में शुद्ध जल का जल विभव (water potential) शून्य होता है।

6. किसी विलयन यन्त्र का जल विभव उस विलयनन से जल बाहर निकलने की प्रवृत्ति का मापन करता है। यह प्रवृत्ति ताप एवं दाब के साथ बढ़ती जाती है, लेकिन विलेय (solute) की उपस्थिति के कारण घटती है।

7. शुद्ध जल में विलेय को घोलने पर घोल में जल की सान्द्रता और जल विभव कम होता जाता है। अत: सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव कम होता है। जल विभव के कम होने का कारण विलेय विभव (solute potential ys) होता है। इसे परासरण विभव (osmotic potential) भी कहते हैं।

जल विभव तथा विलेय विभव ऋणात्मक होता है। कोशिका द्वारा जल अवशोषित करने के फलस्वरूप कोशिका भित्ति पर दबाव पड़ता है, जिससे यह आशून (स्फीत) हो जाता है। इसे दाब विभव (pressure potential) कहते हैं. दाब विभव प्राय: सकारात्मक होता है। लेकिन जाइलम के जल स्तम्भ में ऋणात्मक दाब विभव रसोरोहण में महत्त्वपूर्ण भूमिक निभाता है।

8. किसी पादप कोशिका में जलीय विभव (Ψ) तीन बलों द्वारा नियन्त्रित होता है-दाब विभव (Ψp) परासरणीय विभव या विलेय विभव (Ψs) मैट्रिक्स विभव (Ψm) मैट्रिक्स विभव प्रायः नगण्य होता है।

अतः कोशिका के जलीय विभव की गणना निम्नलिखित सूत्रानुसार करते हैं –
Ψ = Ψp + ΨS
9. जीवद्रव्यकुंचित कोशिका का जलीय विभव परासरणीय विभव के बराबर होता है; क्योंकि दाब विभव शून्य होता है। पूर्ण स्फीत कोशिका में दाब विभव और परासरणीय विभव के बराबर हो जाने से जलीय विभव शून्य हो जाता है।

10. जल विभव सान्द्रता (concentration), प्रवणता (gravity) और दाब (pressure) से प्रभावित होता है।

प्रश्न 7.
तब क्या होता है जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है।
उत्तर:
जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है तो इसका जल विभव बढ़ जाता है। जब पौधों या कोशिका में जल विसरण द्वारा प्रवेश करता है तो कोशिका आशून (turgid) हो जाती है। इसके फलस्वरूप दाब विभव (pressure potential) बढ़ जाता है। दाब विभव अधिकतर सकारात्मक होता है। इसे (Ψp) से प्रदर्शित करते हैं। जल विभव घुलित तथा दाब विभव से प्रभावित होता है।

प्रश्न 8.
(क) रेखांकित चित्र की सहायता से पौधों में जीवद्रव्यकुंचन की विधि का वर्णन उदाहरण देकर कीजिए।
(ख) यदि पौधे की कोशिका को उच्च जल विभव वाले विलयन में रखा जाए तो क्या होगा?
उत्तर:
(क) रिक्तिकामय पादप कोशिका को अतिपरासारी विलयन (hypertonial solution) में रख देने पर कोशिकारस कोशिका से बाहर आने लगता है। यह क्रिया बहिःपरासरण (exosmosis) के कारण होती है। इसके फलस्वरूप जीवद्रव्य सिकुड़कर कोशिका में एक ओर एकत्र हो जाता है। इस अवस्था में कोशिका पूर्ण श्लथ (fully flaccid) हो जाती है। इस क्रिया का जीवद्रव्यकुंचन (plasmolysis) कहते हैं।

जीवद्रव्यकुंचित कोशिका की कोशिका भित्ति और जीवद्रव्य के मध्य अतिपरासारी विलयन एकत्र हो जाता है, लेकिन यह विलयन कोशिकारिक्तिका में नहीं पहुँचता। इससे यह स्पष्ट होता है कि कोशिका भित्ति पारगम्य होती है और रिक्तिका कला अर्द्धपारगम्य होती है। जीवद्रव्यकुंचित कोशिका को आसुत जल या अल्पपरासारी विलयन (hypotonic solution) में रखा जाए तो कोशिका पुनः अपनी पूर्व स्थिति में आ जाती है। इस प्रक्रिया को जीवद्रव्यविकुंचन (deplasmolysis) कहते हैं।
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चित्र – जीवद्रव्यकुंचन की विभिन्न अवस्थाएँ: (A) आशून कोशिका, (B) तथा (C) जीवद्रव्यकुंचन की क्रमिक अवस्थाएँ, (D) श्लथ दशा

कोशिका को समपरासारी विलयन (isotonic solution) में रखने पर कोशिका में कोई परिवर्तन नहीं होता, जितने जल अणु कोशिका से बाहर निकलते हैं उतने जल अणु कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं।
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चित्र – कोशिका को समपरासारी, अतिपरासारी तथा अल्पपरासारी विलयन में रखने पर परिवर्तन

(ख) अल्पपरासारी विलयन (hypotonic solution):
कोशिकारस या कोशिकाद्रव्य की अपेक्षा तनु (dilute) होता है, इसका जल विभव (water potential) अधिक होता है। अतः पादप कोशिका को अल्पपरासारी विलयन में रखने पर अन्त:परासरण की क्रिया होती है। इस क्रिया के फलस्वरूप अतिरिक्त जल कोशिका में पहुँचकर स्फीति दाब (turgor pressure) उत्पन्न करता है।

स्फीति दाब भित्ति दाब (wall pressure) के बराबर होता है। स्फीति दाब को दाब विभव (pressure potential) भी कहते हैं। कोशिका भित्ति की दृढ़ता एवं स्फीति दाब के कारण कोशिका भित्ति क्षतिग्रस्त नहीं होती। स्फीति या आशूनता के कारण कोशिका में वृद्धि होती है। स्फीति दाब एवं परासरण दाब के बराबर हो जाने पर कोशिका में जल का आना रुक जाता है।

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प्रश्न 9.
पादप में जल एवं खनिज के अवशोषण में माइक्रोराइजलीय (कवकमूल सहजीवन) सम्बन्ध कितने सहायक हैं?
उत्तर:
माइकोराइजल या कवकमूलीय सहजीवन (Mycorrhizal Association):
अनेक उच्च पादपों की जड़ें कवक मूल द्वारा संक्रमित हो जाती है; जैसे-चीड़, देवदार, ओक आदि। कवक तन्तु की जड़ों की सतह पर बाह्यपादपी कवकमूल (ectophytic mycorrhiza) बनाता है। कभी-कभी कवक तन्तु जड़ के अन्दर पहुँच जाते हैं और अन्तः पादपी कवकमूल बनाते हैं।

कवक मूल संगठन में कवक तन्तु अपना भोजन पोषक (host) की जड़ों से प्राप्त करते हैं तथा वातावरण की नमी व भूमि की ऊपरी सतह से लवणों का अवशोषण कर पोषक पौधे को प्रदान करने का कार्य करते हैं। कुछ आवृत्तबीजी पौधे; जैसे-निओशिया (Neottia), मोनोट्रोपा (Monotropa) भी कवकमूल सहजीवन प्रदर्शित करते हैं। इन पौधों को अगर कवच सहजीविता समय पर उपलब्ध नहीं होती तो ये मर जाते हैं। चीड़ के बीज कवक सहजीविता स्थापित न होने की स्थिति में अंकुरित होकर नवोद्भिद् (seedlings) नहीं बना पाते।

प्रश्न 10.
पादप में जल परिवहन हेतु मूलदाब क्या भूमिक निभाता है?
उत्तर:
मूलदाब (Root Pressure):
मूल वल्कुट (root cortex) की कोशिकाओं की स्फीत (आशून) स्थिति में अपने कोशिकाद्रव्य पर पड़ने वाले दाब को मूलदाब (root pressure) कहते हैं। मूलदाब के फलस्वरूप जल (कोशिकारस) जाइलम वाहिकाओं में प्रवेश करके तने में कुछ ऊँचाई तक ऊपर चढ़ता है। मूलदाब शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम स्टीफन हेल्स (Stephans Hales, 1927) ने किया।

स्टॉकिंग (Stocking, 1956) के अनुसार जड़ के जाइलम में उत्पन्न दाब, जो जड़ की उपापचयी क्रियाओं से उत्पन्न होता है, मूलदाब कहलाता है। मूलदाब सामान्यतया +1 से + 2 बार (bars) तक होता है। इससे जल कुछ ऊँचाई तक चढ़ सकता है। शुष्क मृदा में मूलदाब उत्पन्न नहीं होता। बहुत-से पौधों; जैसे-अनावृत्तबीजी (gymnosperms) में मूलदाब उत्पन्न ही नहीं होता। अतः आधुनिक मतानुसार रसारोहण में मूलदाब का विशेष कार्य नहीं है।

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प्रश्न 11.
पादपों में जल परिवहन हेतु वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल की व्याख्या कीजिए। वाष्पोत्सर्जन क्रिया को कौन-सा कारक प्रभावित करता है, पादपों के लिए कौन उपयोगी है?
उत्तर:
रसारोहण या जल परिवहन | (Ascent of Sap or Transport of Water in Plants):
पौधे जड़ों द्वारा जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं। अवशोषित जल गुरुत्वाकर्षण के विपरीत पर्याप्त ऊँचाई तक (पत्तियों तक) पहुँचता है। यह ऊँचाई सिकोया (Sequoia) में 370 फुट होती है। गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जल के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण कहते हैं। सर्वमान्य वाष्पोत्सर्जनाकवर्षण जलीय संसंजक मत (Transpiration Pull Cohesive Force of Water Theory) के अनुसार रसारोहण निम्नलिखित कारणों से होता है –

1. वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल):
पत्तियों की कोशिकाओं से जल के वाष्पन के फलस्वरूप कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता तथा विसरण दाब न्यूनता (Diffusion pressure deficit) अधिक हो जाती है।

इसके फलस्वरूप जल जाइलम से परासरण द्वारा पर्ण कोशिकाओं में पहुँचता रहता है। जलवाष्प रन्ध्रों से वातावरण में विसरित होती रहती है। इसके फलस्वरूप जाइलम में उपस्थित जल स्तम्भ पर एक तनाव उत्पन्न हो जाता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न होने वाले इस तनाव को वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (transpiration pull) कहते हैं।
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चित्र – वाष्पोत्सर्जन के कारण जल का जड़ों से पत्तियों तक पहँचने का प्रदर्शन

2. जल अणुओं का संसंजन बल (Cohesive Force of Water Molecules):
जल अणुओं के मध्य संसंजन बल (cohesive force) होता है। इसी संसंजन बल के कारण जल स्तम्भ 400 वायुमण्डलीय दाब पर भी खण्डित नहीं होता और इसकी निरन्तरता बनी रहती है। संसंजन बल के कारण जल 1500 मीटर ऊँचाई तक चढ़ सकता है।

3. जल तथा जाइलम भित्ति के मध्य आसंजन (Adhesion between Water and wall of Xylem Tissue):
जाइलम ऊतक की कोशिकाओं और जल अणुओं के मध्य आसंजन (adhesion) का आकर्षण होता है। यह आसंजन जल स्तम्भ को सहारा प्रदान करता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न तनाव जल स्तम्भ को ऊपर खींचता है।

वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting Transpiration):
पौधों में वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारकों को दो समूहों में बाँट लेते हैं –

(अ) बाह्य कारक (External Factors)
(ब) आन्तरिक कारक (Internal Factors)
(अ) बाह्य कारक (External Factors)

1. वायुमण्डल की आपेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity of Atmosphere):
वायुमण्डल की आपेक्षिक आर्द्रता कम होने पर वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है। आपेक्षिक आर्द्रता अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

2. प्रकाश (Light):
प्रकाश के कारण रन्ध्र खुलते हैं, तापमान में वृद्धि होती है, अत: वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। रात्रि में रन्ध्र बन्द हो जाने से वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

3. वायु (Wind):
वायु गति अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन दर अधिक हो जाती है।

4. तापक्रम (Temperature):
ताप के बढ़ने से आपेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है और वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। ताप कम होने पर आपेक्षिक आर्द्रता अधिक हो जाती है और वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

5. उपलब्ध जल (Available Water):
वाष्पोत्सर्जन की. दर जल की उपलब्धता पर निर्भर करती है। मृदा में जल की कमी होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

(ब) आन्तरिक कारक (Internal Factors):
पत्तियों की संरचना, रन्ध्रों की संख्या एवं संरचना आदि वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करती है।

वाष्पोत्सर्जन की उपयोगिता (Importance of Transpiration):

  • पौधों में अवशोषण एवं परिवहन के लिए वाष्पोत्सर्जन खिंचाव उत्पन्न करता है।
  • मृदा से प्राप्त खनिजों के पौधों के सभी अंगों (भागों) तक परिवहन में सहायता करता है।
  • पत्ती की सतह को वाष्पीकरण द्वारा 10-15°C तक ठण्डा रखता है।
  • कोशिकाओं को स्फीत रखते हुए पादपों के आकार एवं बनावट को नियन्त्रित रखने में सहायता करता है।

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प्रश्न 12.
पादपों में जाइलम रसारोहण के लिए जिम्मेदार कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
रसारोहण (Ascent of Sap):
गुरुत्वाकर्षण के विपरीत मूलरोम से पत्तियों तक कोशिकारस (cell sap) के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण (ascent of sap) कहते हैं। रसारोहण मुख्य रूप से वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (Transpiration pull) के कारण होता है। यह निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है –

1. संसंजन (Cohesion):
जल के अणुओं के मध्य आकर्षण।

2. आसंजन (Adhesion):
जल अणुओं का ध्रुवीय सतह (जैसे-जाइलम ऊतक) से आकर्षण।

3. पृष्ठ तनाव (Surface Tension):
जल अणुओं की द्रव अवस्थआ में गैसीय अवस्था। जल की उपर्युक्त विशिष्टताएँ जल को उच्च तन्य सामर्थ्य (high tensile strenght) प्रदान करते हैं। वाहिकाएँ एवं वाहिनिकाएँ (tracheids & vessels) केशिका (capillary) के समान लघु व्यास वाली कोशिकाएँ होती हैं।

प्रश्न 13.
पादपों में खनिजों के अवशोषण के दौरान अन्तःत्वचा की आवश्यक भूमिका क्या होती है?
उत्तर:
जड़ों की अन्तस्त्वचा कोशिकाओं की कोशिकाकला पर अनेक वाहक प्रोटीन्स पाई जाती है। ये प्रोटीन्स जड़ों द्वारा अवशोषित किए जाने वाले घुलितों की मात्रा और प्रकार को नियन्त्रित करने वाले ‘बिन्दुओं की भाँति कार्य करती हैं। अन्तस्त्वचा की सुबेरिनमय (suberinised) कैस्पेरी पट्टियों (casparian strips) द्वारा खनिज या घुलित पदार्थों के आयन्स या अणुओं का परिवहन एक ही दिशा (unidirection) में होता है। अत: अन्तस्त्वचा (endodermis) खनिजों की मात्रा और प्रकार (quantity & type) को जाइलम तक पहुँचने को नियन्त्रित करती है। जल तथा खनिजों की गति मूलत्वचा (epiblemma) से अन्तस्त्वचा तक सिमप्लास्टिक (symplastic) होती है।

प्रश्न 14.
जाइलम परिवहन एकदिशीय तथा फ्लोएम परिवहन द्विदिशीय होता है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जाइलम परिवहन (Xylem Transport):
पौधे अपने लिए आवश्यक जल एवं खनिज पोषक मृदा से प्राप्त करते हैं। ये सक्रिय या निष्क्रिय अवशोषण या सम्मिश्रित प्रक्रिया द्वारा अवशोषित होकर जाइलम तक पहुँचते हैं। जाइलम द्वारा जल एवं पोषक तत्वों का परिवहन एकदिशीय (unidirectional) होता है। ये पौधों के वृद्धि क्षेत्र की ओर विसरण द्वारा पहुँचते हैं।

फ्लोएम परिवहन (Phloem Transport):
प्लोएम द्वारा सामान्यतया कार्बनिक भोज्य पदार्थों का परिवहन होता है। कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषणं पत्तियों द्वारा होता है। पत्तियों में निर्मित भोज्य पदार्थों का पौधे के संचय अंगों (कुण्ड-सिंक) तक परिवहन होता है। लेकिन यह स्रोत (पत्तियाँ) और कुण्ड (संचय अंग) अपनी भूमिकाएँ मौसम और आवश्यकतानुसार बदलते रहते हैं; जैसे-जड़ों में संचित अघुलनशील भोज्य पदार्थ वसन्त ऋतु के प्रारम्भ में घुलनशील शर्करा में बदलकर वर्धी और पुष्प कलिकाओं तक पहुँचने लगता है। इससे स्पष्ट है कि संश्लेषण स्रोत और संचय स्थल (कुण्ड-सिंक) का सम्बन्ध बदलता रहता है। अतः फ्लोएम में घुलनशील शर्करा का परिवहन द्विदिशीय या बहुदिशीय (bidirectional or multidirectional) होता है।

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प्रश्न 15.
पादपों में शर्करा के स्थानान्तरण के दाब प्रवाह परिकल्पना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शर्करा के स्थानान्तरण की दाब प्रवाह परिकल्पना (The Pressure Flow or Mass Flow Hypothesis of Sugar Translocation):
खाद्य पदार्थों (शर्करा) के वितरण की सर्वमान्य क्रियाविधि दाब प्रवाह परिकल्पना है। पत्तियों के संश्लेषित, ग्लूकोस, सुक्रोस (sucrose) में बदलकर फ्लोएम की चालनी नलिकाओं और सहज कोशिकाओं द्वारा पौधों के संचय अंगों में स्थानान्तरित होता है। पत्तियों में निरन्तर भोजन निर्माण होता रहता है।
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चित्र – भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण की प्रक्रिया की आरेखीय प्रस्तुति

फ्लोएम ऊतक की चालनी नलिकाओं में जीवद्रव्य के प्रवाहित होते रहने के कारण उसमें घुलित भोज्य पदार्थ के अणु भी प्रवाहित होते रहते हैं। यह स्थानान्तरण अधिक सान्द्रता वाले स्थान से कम सान्द्रता वाले स्थानों की ओर होता है। पत्तियों की कोशिकाओं में निरन्तर भोज्य पदार्थों का निर्माण होता रहता है, इसलिए पत्ती की कोशिकाओं में परासरण दाब अधिक रहता है।

जड़ों तथा अन्य संचय भागों में भोज्य पदार्थों के अघुलनशील पदार्थों में बदल जाने या प्रयोग कर लिए जाने के कारण इन कोशिकाओं का परासरण दाब कम बना रहता है। भोज्य पदार्थों के परिवहन हेतु जल जाइलम ऊतक से प्राप्त होता है। संचय अंगों में मुक्त जल जाइलम ऊतक में वापस पहुँच जाता है। इस प्रकार फ्लोएम द्वारा सुगमतापूर्वक कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संवहन होता रहता है।

प्रश्न 16.
वाष्पोत्सर्जन के दौरान रक्षक द्वार कोशिका खुलने एवं बन्द होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
वाष्पोत्सर्जन (Transpiration):
पौधों के वायवीय भागों से होने वाली जल हानि को वाष्पोत्सर्जन (transpiration) करते हैं। यह सामान्यतया रन्ध्र (stomata) द्वारा होता है। उपचर्म (cuticle) तथा वातरन्ध्र (lenticel) इसके सहायक होते हैं। रन्ध्र रक्षक द्वार कोशिकाओं (guard cellls) से घिरा सूक्ष्म छिद्र होता है। रक्षक कोशिकाएँ सेम के बीज या वृक्क के आकार की होती है। ये चारों ओर से बाह्य त्वचीय कोशिकाओं अथवा सहायक कोशिकाओं से घिरी रहती है। रक्षक द्वार कोशिका में केन्द्रक तथा हरितलवक (chloroplast) पाए जाते हैं। रक्षक द्वार कोशिका की भीतरी सतह मोटी भित्ति वाली तथा बाह्य सतह पतली भित्ति वाली होती है –

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चित्र – (A) पर्ण रन्ध्र की संरचना, (B) खुली अवस्था तथा (C) बन्द

अवस्था रन्ध्र का खुलना या बन्द होना रक्षक द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) पर निर्भर करता है। जब रक्षक कोशिकाएँ स्फीत होती हैं तो रन्ध्र खुला रहता है और जब ये श्लथ (flaccid) होती हैं तो रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। रन्ध्र के खुलने में रक्षक कोशिका की भित्तियों में उपस्थित माइक्रोफाइबिल सहायता करते हैं। ये अरीय क्रम में व्यवस्थित रहते हैं। सामान्यतया रन्ध्र दिन के समय खुले रहते हैं और रात्रि के समय बन्द हो जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन

Bihar Board Class 11 Biology कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
स्तनधारियों की कोशिकाओं की औसत कोशिका चक्र अवधि कितनी होती है?
उत्तर:
स्तनधारियों (मनुष्य) की कोशिकाओं की औसत कोशिका चक्र अवधि 24 घण्टे होती है।

प्रश्न 2.
कोशिकाद्रव्य (जीवद्रव्य) विभाजन व केन्द्रक विभाजन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
कोशिकाद्रव्य विभाजन तथा केन्द्रक विभाजन में अन्तर (Difference between Cytokinesis and Karyokinesis):
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प्रश्न 3.
अन्तरावस्था में होने वाली घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कोशिका चक्र (cell cycle) की दो प्रमुख अवस्थाएँ होती हैं –

  1. अन्तरावस्था (interphase) तथा
  2. सूत्री विभाजन अवस्था (M-phase)।

अन्तरावस्था (Interphase):
इस अवस्था में कोशिका विभाजन के लिए तैयार होती है। इस समय कोशिका वृद्धि तथा D.N.A. द्विगुणन की क्रिया होती है। अन्तरावस्था दो क्रमिक एम-प्रावस्थाओं (M-phase) के मध्य की प्रावस्था को व्यक्त करता है।

अन्तरावस्था को तीन प्रावस्थाओं में विभाजित किया जाता है –

  1. पश्चसूत्री विभाजन अन्तरालकाल प्रावस्था (G1 phase)
  2. संश्लेषण प्रावस्था (S-phase)
  3. पूर्वसूत्री. विभाजन अन्तरालकाल प्रावस्था (G2 phase)

1. पश्चसूत्री विभाजन अन्तरालकाल प्रावस्था (G1 phase):
इस प्रावस्था में R.N.A. तथा प्रोटीन का संश्लेषण, D.N.A. संश्लेषण हेतु आवश्यक एन्जाइम्स का संश्लेषण एवं संग्रह होता है। इसमें कोशिका चक्र का लगभग 30-40% समय लगता है। G1 प्रावस्था के बाद कोशिका के दो विकल्प होते हैं। कोशिका S-phase में प्रवेश करती है अथवा G0 phase (शान्त प्रावस्था) में आ जाता है। G0 phase में कोशिका अविभाजित रहती है; जैसे-हृदय पेशियाँ, तन्त्रिका कोशिका आदि।

2. संश्लेषण प्रावस्था (S-phase or Phase of D.N.A. Synthesis):
इसमें D.N.A. का द्विगुणन होता है। प्रत्येक गुणसूत्र से दो अर्द्धगुणसूत्र (chromatids) बनते हैं। इसमें कोशिका चक्र का लगभग 30-50% समय लगता है।
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चित्र-कोशिका चक्र की विभिन्न प्रावस्थाएँ

3. पूर्वसूत्री विभाजन अन्तरालकाल प्रावस्था (G2 phase):
S-phase के पश्चात् यह प्रावस्था आती है। इसमे कोशिका विभाजन की की तैयारी करती है। इसमें कोशिकाचक्र का कुल 10-20% समय लगता है। कोशिका चक्र का नियमन साइक्लिन निर्भर प्रोटीन काइनेस (cyclin dependent protein kinase) एन्जाइम्स द्वारा होता है।

4. एम-प्रावस्था (Mitotic phase or M – phase):
यह G2 phase के पश्चात् आती है। इसमें केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है। इसमें कोशिकाद्रव्य का कुल 5-10% समय लगता है।

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प्रश्न 4.
कोशिका चक्र का G0 (प्रशान्त प्रावस्था) क्या है।
उत्तर:
G0 (प्रशान्त प्रावस्था-Quiescent phase) इसमें G1 phase के पश्चात् कोशिका S-phase में प्रवेश नहीं करती। कोशिका G1 phase से निष्क्रिय या प्रशान्त प्रावस्था में पहुँच जाती है। ऐसी कोशिका में कोशिका विभाजन नहीं होता, यद्यपि कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है।

प्रश्न 5.
सूत्री विभाजन को समविभाजन क्यों कहते हैं?
उत्तर:
सूत्री विभाजन के फलस्वरूप बनी संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान होती है। संतति कोशिकाएँ संरचना एवं लक्षणों में मातृकोशिका के समान होती हैं। इस कारण सूत्री विभाजन को समविभाजन कहते है।

प्रश्न 6.
कोशिका चक्र की उस अवस्था का नाम बताएँ, जिसमें निम्नलिखित घटनाएँ सम्पन्न होती हैं –

  1. गुणसूत्र तङ मध्य रेखा की तरफ गति करते हैं।
  2. गुणसूत्र बिन्दु का टूटना व अर्द्धगुणसूत्र का पृथक होना।
  3. समजात गुणसूत्रों का आपस में युग्मन होना।
  4. समजात गुणसूत्रों के बीच विनिमय का होना।

उत्तर:

  1. मध्यावस्था।
  2. पश्चावस्था।
  3. अर्द्धसूत्री प्रथम पूर्वावस्था की जाइगोटीन उपअवस्था।
  4. अर्द्धसूत्री प्रथम पूर्वावस्था की पैकीटीन उपअवस्था।

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प्रश्न 7.
निम्न के बारे में वर्णन कीजिए –

  1. सूत्रयुग्मन
  2. युगली
  3. काइऐज्मेटा।

उत्तर:
1. सूत्रयुग्मन (Synapsis):
अर्द्धसूत्री विभाजन की प्रथम पूर्वावस्था (Prophase-I) की युग्मपट्ट (zygotene) उपअवस्था में समजात गुणसूत्र (homologous chromosomes) जोड़े बनाते हैं। इसे सूत्रयुग्मन (synapsis) कहते हैं।

2. युगली (Bivalent):
अर्द्धसूत्री विभाजन की प्रथम पूर्वावस्था की युग्मपट्ट (zygotene) उपअवस्था में समजात गुणसूत्र जोड़े बनाते हैं। गुणसूत्रों के इन जोड़ों (pairs) को युगली गुणसूत्र (bivalent chromosomes) कहते हैं।

3. काइऐज्मेटा (Chiasmata):
अर्द्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था प्रथम उपअवस्था द्विपट्ट (डिप्लोटीन-diplotene) में युग्मित गुणसूत्रों के अर्द्धगुणसूत्र कुछ स्थानों पर क्रॉस (Cross) बनाते हैं। इन स्थानों को काइऐज्मेटा (chiasmata) कहते हैं। इन स्थानों पर गुणसूत्रों के क्रोमैटिड्स टूटकर पुनः जुड़ते हैं। इस प्रक्रिया में समजात गुणसूत्रों के क्रोमैटिड्स परस्पर बदल जाते हैं। इसे पारगमन या विनिमय (crossing over) कहते हैं।

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प्रश्न 8.
पादप व प्राणी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य विभाजन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
पादप और प्राणी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य विभाजन में अन्तर (Difference between Cytokinesis of Plant and Animal Cells):
पादप कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य विभाजन क्रिया में पुत्री केन्द्रकों के मध्य में गॉल्जीकाय के उत्पाद, कुछ कण तथा सूक्ष्म नलिकाएँ एकत्र होकर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं, इन्हें प्रैग्मोप्लास्ट (phragmoplast) कहते हैं।

इससे मध्य पटलिका (middle lamellae) का निर्माण होता है। मध्य पटलिका पर सेलुलोस की भित्ति बन जाने से मातृ कोशिका विभाजित होकर दो संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है। जन्तु कोशिकाओं में पुत्री केन्द्रकों के मध्य भाग में प्लाज्मा कला के अन्तर्वलन (invagination) द्वारा कोशिकाद्रव्य का ‘बँटवारा हो जाता है और मातृ कोशिका दो संतति कोशिकाओं में बँट जाती है।

प्रश्न 9.
अर्द्धसूत्री विभाजन के बाद बनने वाली चार संतति कोशिकाएँ कहाँ आकार में समान और कहाँ भिन्न आकार की होती हैं?
उत्तर:
अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा युग्मक निर्माण होता है। शुक्राणुजनन (spermatogenesis) में मातृ कोशिका के विभाजन से बनने वाली चारों पुत्री कोशिकाएँ समान होती हैं। ये शुक्रकायान्तरण द्वारा शुक्राणु का निर्माण करती हैं। शुक्रजनन में बनने वाली चारों सतति कोशिकाएँ आकार में समान होती हैं। अण्डजनन (oogenesis) में मातृ कोशिका से बनने वाली संतति कोशिकाएँ आकार में भिन्न होती हैं।

अण्डजनन के फलस्वरूप एक अण्डाणु तथा पोलर कोशिकाएँ बनती हैं। पोलर कोशिकाएँ आकार में छोटी होती हैं। पौधों के बीजाण्ड में गुरुबीजाणुजनन (अर्द्धसूत्री विभाजन) के फलस्वरूप गुरुबीजाणु, से चार कोशिकाएँ बनती हैं। इनमें आधारीय कोशिका अन्य कोशिकाओं से भिन्न होती हैं। यह वृद्धि और विभाजन द्वारा भ्रूणकोष (embryo sac) बनाता है। पौधों में लघु-बीजाणु जनन द्वारा लघु बीजाणु या परागकण बनते हैं। ये आकार में समान होते हैं।

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प्रश्न 10.
सूत्री विभाजन की पश्चावस्ता, अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था I में क्या अन्तर है?
उत्तर:
सूत्री विभाजन तथा अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था I में अन्तर (Difference between the Anaphase Stage of Mitosis and Meiosis 1):
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प्रश्न 11.
सूत्री एवं अर्द्ध सूत्री विभाजन में प्रमुख अन्तरों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
समसूत्री तथा अर्द्धसूत्री विभाजन में अन्तर:
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प्रश्न 12.
अर्द्धसूत्री विभाजन का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्त्व

  1. अर्द्धसूत्री विभाजन के कारण पीढ़ी पर पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या निश्चित बनी रहती है।
  2. गुणसूत्रों में विनिमय के कारण गुणसूत्रों की संरचना एवं जीवधारी के लक्षणों में विभिन्नता आ जाती है।
  3. युग्मक के अनियमित रूप से मिलने के कारण गुणसूत्रों के नये संयोग बनते हैं। इससे नये-नये लक्षणों का विकास होता है। ये भिन्नतायें जैव विकास का आधार मानी जाती हैं।

प्रश्न 13.
अपने शिक्षक के साथ निम्नलिखित के बारे में चर्चा कीजिए –

  1. अगुणित कीटों व निम्न श्रेणी के पादपों में कोशिका विभाजन कहाँ सम्पन्न होता है?
  2. उच्च श्रेणी पादपों की कुछ अगुणित कोशिकाओं में कोशिका विभाजन कहाँ नहीं होता है?

उत्तर:
1. नर मधुमक्खियाँ अर्थात् ड्रोन्स (drones) अगुणित होते हैं। इनमें सूत्री विभाजन अनिषेचित अगुणित अण्डों में होता है। निम्न श्रेणी के पादपों; जैसे-एककोशिकीय क्लैमाइडोमोनास (chlamydomonas), बहुकोशिकीय यूलोथ्रिक्स (Ulothrix) आदि में समसूत्री विभाजन द्वारा जनन होता है। इनमें अगुणित युग्मक बनते हैं। युग्मकों के परस्पर मिलने से युग्माणु (zygote) बनते हैं। जाइगोट में अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। इसके फलस्वरूप बने अगुणित बीजाणु समसूत्री विभाजन द्वारा नए पादपों का विकास करते हैं।

2. उच्च श्रेणी के पादपों में द्विगुणित बीजाण्डकाय में गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में अर्द्धसूत्री विभाजन के कारण चार अगुणित गुरुबीजाणु बनते हैं। इनमें से तीन में कोशिका विभाजन नहीं होता। सक्रिय गुरुबीजाणु से भ्रूणकोष (embryo sac) बनता है। भ्रूणकोष की अगुणित प्रतिमुख कोशिकाओं (antipodal cells) तथा सहायक कोशिकाओं (synergids) में कोशिका विभाजन नहीं होता। साइकस के लघुबीजाणुओं (परागकण) के अंकुरण के फलस्वरूप नर युग्मकोद्भिद् बनता है। इसकी प्रोथैलियल chilfgrat (prothallial cell) an africht alleicht (tubecell) में कोशिका विभाजन नहीं होता।

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प्रश्न 14.
क्या S प्रावस्था में बिना डी० एन० ए० प्रतिकृति के सूत्री विभाजन हो सकता है?
उत्तर:
‘S’ प्रावस्था में D.N.A. की प्रतिकृति के बिना सूत्री विभाजन नहीं हो सकता।

प्रश्न 15.
क्या बिना कोशिका विभाजन के डी० एन० ए० प्रतिकृति हो सकती है?
उत्तर:
कोशिका विभाजन के बिना भी D.N.A. प्रतिकृति हो सकती है। सामान्यतया D.N.A. से R.N.A. का निर्माण प्रतिकृति के फलस्वरूप ही होता रहता है।

प्रश्न 16.
कोशिका विभाजन की प्रत्येक अवस्थाओं के दौरान होने वाली घटनाओं का विश्लेषण कीजिए और ध्यान दीजिए कि निम्नलिखित दो प्राचलों में कैसे परिवर्तन होता है?

  1. प्रत्येक कोशिका की गुणसूत्र संख्या (N)
  2. प्रत्येक कोशिका में डी० एन० ए० की मात्रा (C)।

उत्तर:
अन्तरावस्था की G1 प्रावस्था में कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है। इसमें निरन्तर वृद्धि होती रहती है। S-प्रावस्था में D.N.A. की प्रतिकृति होती है। इसके फलस्वरूप D.N.A. की मात्रा दोगुनी हो जाती है। यदि D.N.A. की प्रारम्भिक मात्रा 2C से प्रदर्शित करें तो इसकी मात्रा 4C हो जाती है, जबकि गुणसूत्रों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता।

यदि G, प्रावस्था में गुणसूत्रों की संख्या 2N है तो G2 प्रावस्था में भी इनकी संख्या 2N रहती है। अर्द्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था प्रथम की युग्मपट्ट (जाइगोटीन) अवस्था में समजात गुणसूत्र जोड़े बनाते हैं। पश्चावस्था प्रथम में गुणसूत्रों का बँटवारा होता है। यदि गुणसूत्रों की संख्या 2N है तो अर्द्धसूत्री विभाजन के पश्चात् गुणसूत्रों की संख्या N रह जाती है। जननांगों (2N) में युग्मकजनन अर्द्धसूत्री विभाजन के फलस्वरूप होता है। इसके फलस्वरूप युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या घटकर अगुणित (आधी-N) रह जाती है।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 9 जैव अणु

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 9 जैव अणु Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology जैव अणु Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वृहत् अणु क्या है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वृहत् अणु (Macromolecules):
जीव ऊतक (जैसे – यकृत या सब्जी आदि) को ड्राइक्लोरोऐसीटिक अम्ल के साथ पीसकर जो गाढ़ा तरल (slurry) प्राप्त होता है, उसे कपड़े में रखकर निचोड़ लेते हैं। अम्ल में घुलनशील निस्यंद (filtrate) में जैव अणु (biomolecules) तथा अम्ल अविलेय अंश में वृहत् अणु (macromolecules) पाए जाते हैं; जैसेपॉलीसैकेराइड्स (polysaccharides), प्रोटीन्स (proteins), न्यूक्लीक अम्ल (nucleic acids)। वृहत् अणु बहुलक (polymers) होते हैं। इनका अणुभार बहुत अधिक (दस हजार डाल्टन या अधिक) होता है। लिपिड्स का अणुभार 800 डाल्टन से अधिक नहीं होता; अतः ये वृहत् अणु नहीं कहलाते।

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प्रश्न 2.
ग्लाइकोसिडिक, पेप्टाइड तथा फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ग्लाइकोसिडिक बन्ध (Glycosidic Bonds):
अनेक मोनोसैकेराइड अणु परस्पर ग्लाइकोसिडिक बन्ध से जुड़कर पॉलीसैकेराइड्स बनाते हैं। ग्लाइकोसिडिक बन्ध दो समीपवर्ती मोनोसैकेराइड के मध्य बनता है। यह क्रिया संघनन (condensation) एवं निर्जलीकरण (dehydration) के फलस्वरूप होती है। ग्लाइकोसिडिक बन्ध उत्क्रमणीय होता है, अर्थात् जल अपघटन (hydrolysis) द्वारा जुड़े अणु पृथक् हो जाते हैं।

पेप्टाइड बन्ध (Peptide Bond):
प्रोटीन्स ऐमीनो अम्लो के बहुलक हैं। प्रोटीन अणु में बहुत-से ऐमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्ध (peptide bonds) द्वारा जुड़े रहते हैं। एक ऐमीनो अम्ल का कार्बोक्सिल समूह (-COOH) दूसरे ऐमीनो अम्ल के ऐमीनो समूह (-NH2) से पेप्टाइड बन्ध द्वारा जुड़ा रहता है। यह क्रिया निर्जलीकरण के फलस्वरूप होती है और जल अणु मुक्त होता हैं।

फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध (Phosphodiester Bonds):
न्यूक्लीक अम्ल के न्यूक्लिओटाइड्स (nucleotides) फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों (phosphodiester bonds) द्वारा एक-दूसरे से संयोजित होकर पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला बनाते हैं। फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध समीपवर्ती दो न्यूक्लियोटाइड्स के फॉस्फेट अणुओं के मध्य बनता है। D.N.A. की दोनों पॉलीन्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं के नाइट्रोजन क्षारक हाइड्रोजन बन्धों द्वारा जुड़े होते हैं।

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प्रश्न 3.
प्रोटीन की तृतीयक संरचना से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रोटीन की तृतीयक संरचना (Tertiary Structure of Protein):
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चित्र – एक कल्पित प्रोटीन अणु की तृतीयक संरचना।

पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में त्रिविमीय वलन (three dimensional folding) से बनी सघन गोलाकार आकृतियाँ प्रोटीन की तृतीयक संरचना को प्रदर्शित करती हैं। यह संरचना ग्लोबुलर प्रोटीन्स (globular proteins) में पाई जाती है। इसमें द्वितीयक संरचना वाली लहरदार या α – कुण्डलिनी श्रृंखलाओं का पुन: कुण्डलन एवं वलन होता है।

ये वलन पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में दूर-दूर स्थित ऐमीनो अम्लों के R – समूहों (पार्श्व शृंखलाओं) के बीच में तथा पास-पास आने और मुड़ने से बनते हैं इसके फलस्वरूप ऐमीनो अम्लों के अध्रुवीय जलविरागी (hydrophobic) R – समूह प्रोटीन अणु के अन्दर की ओर छुप जाते हैं तथा जलस्नेही (hydrophilic) ऐमीनो (NH2) समूह प्रोटीन अणु की सतह पर आ जाते हैं।

प्रोटीन के सक्रिय भाग भी सतह पर आ जाते हैं। प्रोटीन अणु के सक्रिय क्षेत्रों को डोमेन (domaiii) कहते हैं। त्रिविन संरचना वाली पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के ऐमीनो अम्लों के R-समहों के मध्य हाइड्रोजन बन्ध, आयनिक बन्ध, कोवैलेन्ट बन्ध (hydrogen, ionic and covalent bonds) आदि पाए जाते हैं। ये प्रोटीन अणु की संरचना को स्थिरता प्रदान करते हैं।

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प्रश्न 4.
10 ऐसे रुचिकर सूक्ष्म जैव अणुओं का पता लगाइए जो कम अणुभार वाले होते हैं व इनकी संरचना बनाइए। ऐसे उद्योगों का पता लगाइए जो इन यौगिकों का निर्माण विलगन द्वारा करते हैं? इनको खरीदने वाले कौन हैं? मालूम कीजिए।
उत्तर:
सूक्ष्म जैव अणु (Micro Biological Molecules):
जीवधारियों में पाए जाने वाले सभी कार्बनिक यौगिकों को जैव अणु कहते हैं।

  1. कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates); जैसे – ग्लूकोस, फ्रक्टोस, राइबोस, डिऑक्सीराबोस शर्करा, माल्टोस आदि।
  2. वसा व तेल (Fat & Oils) – पामिटिक अम्ल, ग्लिसरॉल, ट्राइग्लिसराइड, फॉस्फोलिपिड्स, कोलेस्टेरॉल आदि।
  3. ऐमीनो अम्ल (Amino Acids) – ग्लाइसीन, ऐलेनीन, सीरीन आदि।
  4. नाइट्रोजन क्षारक (Nitrogenous Base) – ऐडेनीन (adenine), ग्वानीन (guanine), थायमीन (thymine), यूरेसिल (uracil), सायटोसीन (cytosine) आदि।

जीव ऊतकों में पाये जाने वाले कम अणुभार के कार्बनिक यौगिकों की संरचनाएँ:
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शर्करा (कार्बोहाइड्रेट्स)
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ऐमीनो अम्ल
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ट्राइग्लिसराइड R2, R2 व R3
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फॉस्फोलिपिड (लेसीथीन)
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वसा व तेल (लिपिड्स)
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शर्करा उद्योग, तेल एवं घी उद्योग, औषधि उद्योग आदि इनका निर्माण करते हैं। मनुष्य इनका उपयोग अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु करता है।

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प्रश्न 5.
प्रोटीन में प्राथमिक संरचना होती है, यदि आपको जानने हेतु ऐसी विधि दी गई है जिसमें प्रोटीन के दोनों किनारों पर ऐमीनो अम्ल है तो क्या आप इस सूचना को प्रोटीन की शुद्धता अथवा समांगता (homogeneity) से जोड़ सकते हैं?
उत्तर:
प्रोटीन्स की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ लम्बी व रेखाकार होती हैं। प्रोटीन कुण्डलन एवं वलन द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृति धारण करती है। इन्हें प्रोटीन्स के प्राकृत संरूपण (native conformation) कहते हैं। प्रोटीन के प्राकृत संरूपण चार स्तर के होते हैं – प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुष्क स्तर। पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े ऐमीनो अम्लों के अनुक्रम प्रोटीन की संरचना का प्राथमिक स्तर प्रदर्शित करते हैं। प्रोटीन से ऐमीनो अम्लों का अनुक्रम इसके जैविक। प्रकार्य का निर्धारण करता है।
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चित्र – कल्पित प्रोटीन के अंश की प्राथमिक संरचना N व C प्रोटीन के दो सिरों को प्रकट करता है। ऐमीनो अम्ल का एकल अक्षरीय कूट तथा 3-अक्षरीय कूट दर्शाया गया है।

पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के एक सिर पर प्रथम ऐमीनो अम्ल का खुला ऐमीनो समूह तथा दूसरे सिरे पर अन्तिम ऐमीनो अम्ल का खुला कार्बोक्सिल समूह (carboxyl group) होता है। अतः इन सिरों को क्रमश: N – छोर तथा C – छोर कहते हैं। इससे प्रोटीन की शुद्धता या समांगता प्रदर्शित होती है।

प्रश्न 6.
चिकित्सार्थ अभिकर्ता (therapeutic agents) के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन का पता लगाइए व सूचीबद्ध कीजिए। प्रोटीन की अन्य उपयोगिताओं को बताइए। (जैसे-सौन्दर्य प्रसाधन आदि)।
उत्तर:
कुछ प्रोटीन्स विषाक्त (toxic) होते हैं; जैसे – रोगजनक जीवाणुओं के प्रोटीन्स, सर्पविष का प्रोटीन, कपास के बीज में पाए जाने वाला प्रोटीन (Gossypiun) रेंडी के बीज का प्रोटीन (ricin) आदि। इन प्रोटीन्स का उपयोग औषधियों के रूप में रोगों के उपचार हेतु किया जाता है।

प्रोटीन्स के अन्य उपयोग (Other Uses of Proteins):

  1. पोषक प्रोटीन्स: दूध का केसीन (casein), पक्षी के अण्डों का ऐल्बुमिन (albumin), अनाज; जैसे – गेहूँ का ग्लूटेलिन, मक्का का जाइन्स (zeins), मटर का फैसिओलिन (phaseolin) प्रोटीन आदि पोषक प्रोटीन हैं।
  2. रेशम कीट की फाइब्रोइन प्रोटीन सूखकर रेशम धागे का निर्माण करता है।
  3. कुछ पौधों द्वारा निर्मित मोनेलिन (monellin) अत्यन्त मीठा होता है। इसका उपयोग मधुमेह रोगियों के लिए कृत्रिम शर्करा के रूप में किया जाता है।
  4. शीतल जल में रहने वाली मछलियों में रुधिर को जमने. से रोकने के लिए प्रतिहिम प्रोटीन (antifreeze protein) पाया जाता है। इसका उपयोग ट्रान्सजेनिक जन्तु एवं पादपों के लिए किया जा रहा है।

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प्रश्न 7.
ट्राइग्लिसराइड के संघटन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ट्राइग्लिसराइड (Triglyceride):
ग्लिसरॉल (glycerol) का एक अणु वसीय अम्लों (fatty acids) के तीन अणुओं से क्रिया करके वसा का एक अणु बनाता है। ग्लिसरॉल तथा वसा अम्ल अणुओं के बीच सहसंयोजन बन्धों को एस्टर बन्ध (ester bonds) कहते है।

ग्लिसरॉल एक ट्राइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल है जिसकी कार्बन शृंखला के तीनों कार्बन परमाणुओं से एक-एक हाइड्रॉक्सिल समूह (-OHgroup) जुड़ा होता है। इसी कारण वसा अणु को ट्राइग्लिसराइड (triglyceride) कहते हैं। यह क्रिया निर्जलीकरण-संघनन संश्लेषण (dehydrationcondensationsynthesis) द्वारा होती है। ट्राइग्लिसराइड अणु के तीनों वसा अम्ल समान या असमान हो सकते हैं।
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ट्राइग्लिसराइड (R1, R2 व R3 वसीय अम्ल हैं।)

प्रश्न 8.
क्या आप प्रोटीन की अवधारणा के आधार पर वर्णन कर सकते हैं कि दूध का दही अथवा योगर्ट में परिवर्तन किस प्रकार होता है?
उत्तर:
दूध की विलेय प्रोटीन केसीनोजन (caseinogen) की अविलेय केसीन (casein) में बदलने का कार्य रेनिन (rennin) एन्जाइम तथा स्ट्रेप्टोकोकस जीवाणु करते हैं। ये किण्वन द्वारा दूध को दही या योगर्ट में बदल देते हैं; क्योंकि केसीनोजन प्रोटीन अवक्षेपित हो जाती है।

प्रश्न 9.
क्या आप व्यापारिक दृष्टि से उपलब्ध परमाणु मॉडल (बॉल व स्टिक नमूना) का प्रयोग करते हुए जैव अणुओं के उन प्रारूपों को बना सकते हैं?
उत्तर:
बॉल व स्टिक नमूना (Ball and Stick Model) के द्वारा जैव अणुओं के प्रारूपों को प्रदर्शित किया जा सकता है।

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प्रश्न 10.
ऐमीनो अम्लों को दुर्बल क्षार से अनुमापन (titrate) कर, ऐमीनो अम्ल में वियोजी क्रियात्मक समूहों का पता लगाने का प्रयास कीजिए।
उत्तर:
ऐमीनो अम्लों का दुर्बल क्षार से अनुमापन करने से कार्बोक्सिल समूह (-COOH) तथा ऐमीनो समूह (-NH2) पृथक हो जाते हैं।

प्रश्न 11.
ऐलैनीन ऐमीनो अम्ल की संरचना बताइए।
उत्तर:
ऐलैनीन एमीनो अम्ल एक उदासीन अम्ल है जिसका निर्माण एक एमीनो समूह तथा कार्बोक्सिल समूह से होता है।
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एमीनो अम्ल

प्रश्न 12.
गोंद किससे बने होते हैं? क्या फेविकोल इससे भिन्न है?
उत्तर:
गोंद (Gum):
यह एक द्वितीयक उपापचयज (secondary metabolite) है। यह एक कार्बोहाइड्रेट बहुलक, (polymer) है। गोंद पौधों की काष्ठ वाहिकाओं (xylem vessels) से प्राप्त होने वाला उत्पाद है। यह कार्बनिक घोलक में अघुलनशील होता है। गोंद जल के साथ चिपचिपा घोल (sticky solution) बनाता है। फेविकोल (fevicol) एक कृत्रिम औद्योगिक उत्पाद है।

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प्रश्न 13.
प्रोटीन, वसा व तेल, ऐमीनो अम्लों का विश्लेषणात्मक परीक्षण बताइए एवं किसी भी फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण कीजिए?
उत्तर:
प्रोटीन एवं अमीनो अम्ल का परीक्षण (Protein and Amino Acid Test):
प्रोटीन के वृहत् अणु (macromolecules) ऐमीनो अम्लों की लम्बी श्रृंखलाएँ होते हैं। ऐमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े रहते हैं। इनका आण्विक भार बहुत अधिक होता है। अण्डे की सफेदी, सोयाबीन, दालों (मटर, राजमा आदि) में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। अण्डे की सफेदी या दालों (सेम, चना, मटर, राजमा) आदि को जल के साथ पोरकर पतली लुगदी बना लेते हैं। इसे जल के साथ उबाल कर छान लेते हैं। निस्वंद द्रव में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) होती है।

प्रयोग 1:
एक परखनली में 3 मिली प्रोटीन निस्यंद लेकर, इसमें 1 मिली सान्द्र नाइट्रिक अम्ल (HNO3) मिलाइए। सफेद अवक्षेप बनता है। परखनली को गर्म करने पर अवक्षेप घुल जाता है तथा विलयन का रंग पीला हो जाता है। अब इसे ठण्डा करके इसमें 10% सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) विलयन मिलाते हैं। परखनली में विलयन का रंग पीले से नारंगी हो जाता है।

प्रयोग 2:
एक परखनली में प्रोटीन निस्यंद की 1 मिली मात्रा लेकर इसमें लगभग 1 मिली मिलन अभिकर्मक (Millon’s Reagent) मिलाने पर हल्के पीले रंग का अवक्षेप बनता है। इस अवक्षेप में 4-5 बूँदे सोडियम नाइट्रेट (NaNO3) की मिलाकर विलयन को गर्म करने पर अवक्षेप का रंग लाल हो जाता है।

वसा व तेल का परीक्षण (Fat and Oil Test):
ये जल में अविलेय और ईथर, पेट्रोल, क्लोरोफार्म आदि में घलनशील (विलेय) होती है। साधारण ताए पर जब वसाएँ ठोस होती हैं तो वसा (चर्बी – Fat) और जब ये तरल होती है तो तेल (oil) कहलाती है। पादप वस्साएँ असंतृप्त (नारियल का तेल तथा ताड़ का तेल संतृप्त) तथा जन्तु वसाएँ संतृप्त होती हैं।

प्रयोग 1:
मूंगफली के कच्चे दाने लेकर उनको सफेद कागज पर रखकर पीस लीजिए। अब इस कागज के टुकड़े को प्रकाश के किसी स्रोत की ओर रखकर देखिए। यह अल्पपारदर्शी नजर आता है। इस पर एक बूंद पानी डालकर देखिए। कागज पर पानी का प्रभाव नहीं होता। यह प्रयोग जन्तु वसा (देशी घी) के साथ भी किया जा सकता है।

प्रयोग 2:
एक परखनली में 0.5 मिली परीक्षण तेल या वसा तथा 0.5 मिली जल (दोनों बराबर मात्रा में) लेते है। अब इसमें 2-3 बूंदे सुडान – III विलयन की डालकर हिलाते हैं तथा पाँच मिनट तक ऐसे ही रख देते हैं। परखनली में जल तथा तेल की पृथक् पतों में, तेल की पर्त लाल नजर आती है। नोट-फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण उपर्युक्त विधियों द्वारा किया जा सकता है।

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प्रश्न 14.
पता लगाइए कि जैवमण्डल में सभी पादपों द्वारा कितने सेलुलोस का निर्माण होता है? इसकी तुलना मनुष्यों द्वारा उत्पादित कागज से करें। मानव द्वारा प्रतिवर्ष पादप पदार्थों की कितनी खपत की जाती है? इसमें वनस्पतियों की कितनी हानि होती है?
उत्तर:
सेलुलोस (cellulose) पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाए जाने वाला कार्बोहाइड्रेट है। यह जटिल बहुलक होता है। पादपों में सेलुलोस की मात्रा सर्वाधिक होती है। यह पादप कोशिकाओं की कोशिका भित्ति को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। पौधों के काष्ठीय भागों व कपास तथा रेशेदार पौधों में इसकी मात्रा बहुत अधिक होती है। काष्ठ में लगभग 50% तथा कपास के रेशे में इसकी मात्रा लगभग 90% होती है। मनुष्य द्वारा सेलुलोस का उपयोग ईधन तथा इमारती लकड़ी के रूप में, तन्तुओं के रूप में वस्त्र निर्माण, कृत्रिम रेशे निर्माण, कागज निर्माण में प्रमुखता से किया जाता है।

नाइट्रोसेलुलोस का उपयोग विस्फोटक पदार्थ के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग पारदर्शी प्लास्टिक सेलुलॉयड (celluloid) बनाने के लिए किया जाता है जिससे खिलौने, कंघे आदि बनाए जाते हैं। मनुष्य सेलुलोस का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनस्पतियों को हानि पहुँचा रहा है। इसके फलस्वरूप प्राकृतिक वन क्षेत्रों में निरन्तर कमी होतो जा रही है। पारितन्त्र के प्रभावित होने के कारण अनेक पादप प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही हैं।

प्रश्न 15.
एन्जाइम के महत्त्वपूर्ण गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एन्जाइम्स की विशेषताएँ (गण) (Characteristics of Enzymes):
एन्जाइम्स के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

  1. एन्जाइम्स कोलॉइडी प्रोटीन्स होते हैं। ये जल, नमक के घोल तथा ग्लिसरीन में विलेय होते हैं।
  2. एन्जाइम्स का कार्य-क्षेत्र अति विशिष्ट होता है। सामान्यतया एक एन्जाइम एक प्रतिक्रिया को ही उत्प्रेरित करता हैं।
  3. एन्जाइम्स 25-35°C पर सर्वाधिक क्रियाशील होते हैं। 60°C से अधिक ताप पर ये नष्ट हो जाते हैं। 0°C ताप पर ये निष्क्रिय हो जाते हैं।
  4. इनकी कार्य-क्षमता अत्यधिक होती है। ये प्रति मिनट लाखों अणुओं को उत्प्रेरित कर सकते हैं।
  5. एन्जाइम्स की सूक्ष्म मात्रा ही क्रिया को प्रेरित कर देती हैं।
  6. एन्जाइम्स की क्रियाशीलता pH मान से प्रभावित होती है। pH मान की अधिकता या कमी इनकी कार्य-क्षमता को प्रभावित या नष्ट कर देती है।
  7. एन्जाइम नष्ट नहीं होते। एन्जाइम क्रिया के पश्चात् जैसे के तैसे बच जाते हैं।
  8. एन्जाइम्स सहकारक (cofactor) की उपस्थिति में क्रियाशील होते हैं। सहकारक प्रोस्थैटिक समूह (prosthetic group), सहएन्जाइम (coenzyme) या अकार्बनिक आयन (inorganic ions) होते हैं।
  9. एन्जाइम की क्रियाएँ प्रायः शृंखलाबद्ध होती हैं। एक एन्जाइम क्रिया का उत्पाद (product) दूसरे एन्जाइम के लिए क्रियाधार (substrate) का कार्य करता है।
  10. एन्जाइम सामान्यतया जल-अपघटन (hydrolysis), कार्बोक्सिलीकरण (decarboxylation), ऑक्सीकरण व अवकरण (oxidation and reduction) आदि रासायनिक क्रियाओं को प्रेरित करते हैं।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 12.1
निम्नलिखित यौगिकों में प्रत्येक कार्बन की संकरण अवस्था बताइए –
CH2 = C = O, CH3CH = CH2, (CH3)2CO.CH2 = CHCN, C6H6
उत्तर:
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प्रश्न 12.2
निम्नलिखित अणुओं में तथा आबन्ध दर्शाइए –
C6H6, C6H12, CH2, Cl2, CH2 = C = CH2, CH3NO2, HCONHCH3
उत्तर:
C6H6
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C6H12
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प्रश्न 12.3
निम्नलिखित यौगिकों के आंबध-रेखा-सूत्र लिखिए।
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल, 2, 3-डाइमेथिल ब्यूटेनेल, हेप्टेन-4-ओन
उत्तर:
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल:
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2,3 – डाइथिल व्यूटेनेल:
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हेप्टेन-4-ओन:
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प्रश्न 12.4
निम्न यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 12.5
निम्नलिखित यौगिकों में से कौन-सा नाम IUPAC पद्धति के अनुसार सही है?
(क) 2, 2 – डाइएथिलपेन्टेन अथवा 2 – डाइमेथिलपेन्टेन
(ख) 2, 4, 7 – ट्राइमेथिलऑक्टेन अथवा 2, 5, 7 ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2 – क्लोरी – 4 – मेथिलपेन्टेन अथवा 4 – क्लोरो – 2 मेथिलपेन्टेन
(घ) ब्यूट – 3 – आइन – 1 – ऑल अथवा ब्यूट – 4 – ऑल – 1 – आइन
उत्तर:
(क) 2, 2 – डाइएथिलपेन्टेन:
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(ख) 2, 4, 7 – ट्राइमेथिल ऑक्टेन:
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(ग) 2 – क्लोरो – 4 – मेथिलपेन्टेन:
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(घ) ब्यूट – 3 – आइन – 1 – ऑल:
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प्रश्न 12.6
निम्नलिखित दो सजातीय श्रेणियों में से प्रत्येक के प्रथम पाँच सजातों के संरचना-सूत्र लिखिए –
(क) H – COOH
(ख) CH3COCH3
(ग) H – CH = CH2
उत्तर:
(क)
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(ख) CH3COCH3
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(ग) H – CH = CH2
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प्रश्न 12.7
निम्नलिखित के संघनित और आबन्ध रेखा-सूत्र लिखिए तथा उनमें यदि कोई क्रियात्मक समूह हो तो उसे पहचानिए –
(क) 2, 2, 4 – ट्राइमेथिलपेन्टेन
(ख) 2 – हाइड्रॉक्सी – 1, 2, 3 – प्रोपेनड्राइ – कार्बोक्सिलिक अम्ल
(ग) हेक्सेनडाइएल
उत्तर:
(क) संघनित सूत्र –
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आबन्ध रेखा सूत्र –
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(ख) संघनित सूत्र –
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आबन्ध रेखा सूत्र –
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क्रियात्मक समूह –
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(ग) संघनित सूत्र –
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आबन्ध रेखा सूत्र –
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क्रियात्मक समूह –
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प्रश्न 12.8
निम्नलिखित यौगिकों में क्रियात्मक समूह पहचानिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 12.9
निम्नलिखित में से कौन अधिक स्थायी है तथा क्यों? O2NCH2CH2O और CH3CH2O
उत्तर:
O2NCH2CH2O में -1 प्रभाव वाला -NO2 समूह ऋणायन पर ऋण-आवेश घटा देता है जिससे यह स्थाई हो जाता है दूसरी ओर CH3CH2O में +1 प्रभाव होता है और ऋणायन पर ऋण-आवेश बढ़ा देता है जिससे यह अस्थाई हो जाता है।

प्रश्न 12.10
निकाय से आबन्धित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन दाता की तरह व्यवहार प्रदर्शित क्यों करते हैं? समझाइए।
उत्तर:
ऐल्किल समूह sp3 – संकरण होता है, जबकि π – निकाय से सम्बन्धित होने पर यह sp2 – संकरण में परिवर्तित हो जाता है जो अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है। अतः ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन दाता की तरह व्यवहार प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 12.11
निम्नलिखित यौगिकों की अनुनाद संरचना लिखिए तथा इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन मुड़े तीरों की सहायता से दशाइए =
(क) C6H5OH
(ख) C6H5NO2
(ग) CH3CH = CHCHO
(घ) C6H5 – CHO
(डं) CH6CH2+
(च) CH3CH+2
उत्तर:
(क)
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(ख)
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(ग)
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(घ)
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(डं)
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(च)
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प्रश्न 12.12
इलेक्ट्रॉनस्नेही तथा नाभिकस्नेही क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही (Nucleophiles and Electrophiles):
इलेक्ट्रॉन-युग्म प्रदान करने वाला अभिकर्मक ‘नाभिकस्नेही’ (nucleophile, Nu:) अर्थात् ‘नाभिक खोजने वाला’ कहलाता है तथा अभिक्रिया ‘नाभिकस्नेही अभिक्रिया’ (nucleophilic reaction) कहलाती है। इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने वाले अभिकर्मक का इलेक्ट्रॉनस्नेही (electrophile E+), अर्थात् ‘इलेक्ट्रॉन चाहने वाला’ कहते हैं और अभिक्रिया ‘इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रिया’ (electrophilic reaction) कहलाती है।

ध्रुवीय कार्बनिक अभिक्रियाओं में क्रियाधारक के इलेक्ट्रॉनस्नेही के केन्द्र पर नाभिकस्नेही आक्रमण करता है। यह क्रियाधारक का विशिष्ट परमाणु अथवा इलेक्ट्रॉन न्यून भाग होता है। इसी प्रकार क्रियाधारकों के इलेक्ट्रॉनधनी नाभिकस्नेही केन्द्र पर इलेक्ट्रॉनस्नेही आक्रमण करता है अतः आबन्धन अन्योन्यक्रिया के फलस्वरूप इलेक्ट्रॉनस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म प्राप्त करता है।

नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉनस्नेही की ओर इलेक्ट्रॉनों का संचलन वक्र तीर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। नाभिकस्नेही के उदाहरणों में हाइड्रॉक्साइड (OH), सायनाइड आयन (CN) तथा कार्बऋणायन (R3C) कुछ आयन सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त कुछ उदासीन अणु (जैसे –Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 12 कार्बनिक रसायन कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें  आदि) भी एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म की उपस्थिति के कारण नाभिकस्नेही की भाँति कार्य करते हैं।

इलेक्ट्रॉनस्नेही के उदाहरणों में कार्बधनायन (C+H3) और कार्बोनिल समूह (>C = 0) अथवा ऐल्किल हैलाइड (R3C – X, X = हैलोजन परमाणु) वाले उदासीन अणु सम्मिलित हैं। कार्बधनायन का कार्बन केवल षष्टक होने के कारण इलेक्ट्रॉन-न्यून होता है तथा नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म, ग्रहण कर सकता है। ऐल्किल हैलाइड का कार्बन आबन्ध ध्रुवता के कारण इलेक्ट्रॉनस्नेही-केन्द्र बन जाता है। जिस पर नाभिकस्नेही आक्रमण कर सकता है।

प्रश्न 12.13
निम्नलिखित समीकरणों में रेखांकित किए गए अभिकर्मकों को नाभिकस्नेही तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही में वर्गीकृत कीजिए –
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उत्तर:
(क) OH नाभिकस्नेही है।
(ख) CN नाभिकस्नेही है।
(ग) CH3CO+ इलेक्ट्रॉनस्नेही है।

प्रश्न 12.14
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को वर्गीकृत कीजिए –
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उत्तर:
(क) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया।
(ख) इलेक्ट्रॉनस्नेही संकलन अभिक्रिया।
(ग) विलोपन अभिक्रिया।
(घ) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया।

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प्रश्न 12.15
निम्नलिखित युग्मों में सदस्य-संरचनाओं के मध्य कैसा सम्बन्ध है? क्या ये संरचनाएँ संरचनात्मक या ज्यामितीय समावयव अथवा अनुनाद संरचनाएँ हैं –
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उत्तर:
(क) ये स्थान समावयव हैं।
(ख) ये ज्यामितीय समावयव हैं।
(ग) ये अनुनादी संरचनाएँ हैं।

प्रश्न 12.16
निम्नलिखित आबन्ध विदलनों के लिए इलेक्ट्रॉन विस्थापन को मुड़े तीरों द्वारा दर्शाइए तथा प्रत्येक विदलन को समांश अथवा विषमांश में वर्गीकृत कीजिए। साथ ही निर्मित सक्रिय मध्यवर्ती उत्पादों में मुक्त-मूलक, कार्बधनायन तथा कार्बऋणायन पहचानिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 12.17
निम्नलिखित कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लता का सही क्रम कौन-सा इलेक्ट्रॉन-विस्थापन वर्णित करता है? प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
(क) Cl3CCOOH > Cl2CHCOOH > ClCH2 COOH
(ख) CH3CH2COOH > (CH3)2 CHCOOH > (CH3)3 C.COOH
उत्तर:
प्रेरणिक प्रभाव (Inductive Effect):
भिन्न विद्युत-ऋणात्मकता के दो परमाणुओं के मध्य सहसंयोजक आबन्ध में इलेक्ट्रॉन असमान रूप से हसभाजित होते हैं। इलेक्ट्रॉन घनत्व उच्च विद्युत ऋणात्मकता के परमाणु के ओर अधिक होता है। इस कारण सहसंयोजक आबन्ध ध्रुवीय हो जाता है। आबन्ध ध्रुवता के कारण कार्बनिक अणुओं में विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव उत्पन्न होते हैं।

उदाहरणार्थ-क्लोरोएथेन (CH3CH2Cl) में C – Cl बन्ध ध्रुवीय है। इसकी ध्रुवता के कारण कार्बन क्रमांक-1 पर आंशिक धनावेश (δ+) तथा क्लोरीन पर आंशिक ऋणावेश (δ) उत्पन्न हो जाता है। आंशिक आवेशों को दर्शाने के के लिए (डेल्टा) चिह्न प्रयुक्त करते हैं। आबन्ध में इलेक्ट्रॉन-विस्थापन दर्शाने के लिए तीर (→) का उपयोग किया जाता है, जो δ+ से δ की ओर आमुख होता है।
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कार्बन-1 अपने आंशिक धनावेश के कारण पास के C – C आबन्ध के इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करने लगता है। फलस्वरूप कार्बन – 2 पर भी कुछ धनावेश (∆+) उत्पन्न हो जाता है। C – 1 स्थित धनावेश की तुलना में ∆+ अपेक्षाकृत कम धनावेश दर्शाता है। दूसरे शब्दों में C – Cl की ध्रुवता के कारण पास के आबन्ध में ध्रुवता उत्पन्न हो जाती है। समीप के σ – आबन्ध के कारण अगले-आबन्ध की ध्रुवीय होने की प्रक्रिया प्रेरणिक प्रभाव (inductive effect) कहलाती है।

यह प्रभाव आगे के आबन्धों में भी जाता है, लेकिन आबन्धों में की संख्या बढ़ने के साथ-साथ यह प्रभाव कम होता जाता है और तीन आबन्धों के बाद लगभग लुप्त हो जाता है। प्रेरणिक प्रभाव का सम्बन्ध प्रतिस्थापी से बन्धित कार्बन परमाणु को इलेक्ट्रॉन प्रदान करने अथवा अपनी ओर आकर्षित कर लेने की योग्यता से है।

इस योग्यता के आधार पर प्रतिस्थापित को हाइड्रोजन के सापेक्ष इलेक्ट्रॉन-आकर्षी (electron-with-drawing) या इलेक्ट्रॉनदाता समूह के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। हैलोजने तथा कुछ अन्य समूह; जैसे-नाइट्रो (-NO2), सायनों (-CN), कार्बोनिक (-COOH), एस्टर (-COOR), ऐरिलॉक्सी (-OAr) इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह हैं; जबकि ऐल्किाल समूह जैसे-मेथिल (-CH3), एथिल (-CH2 -CH3) आदि इलेक्ट्रॉनदातासमूह हैं।

इलेक्ट्रोमेरी अथवा (E प्रभाव) (Electromeric Effect, E-effect):
यह एक अस्थायी प्रभाव है। केवल आक्रमणकारी अभिकारकों की उपस्थिति में यह प्रभाव बहुआबन्ध (द्विआबन्ध अथवा त्रिआबन्ध) वाले कार्बनिक यौगिकों में प्रदर्शित होता है। इस प्रभाव में आक्रमण करने वाले अभिकारक की माँग के कारण बहु-आबन्ध से बन्धित परमाणुओं में एक सहभाजित π – इलेक्ट्रॉन युग्म का पूर्ण विस्थापन होता है। अभिक्रिया की परिधि से आक्रमणकारी अभिकारक को हटाते ही यह प्रभाव शून्य हो जाता है। इसे E द्वारा दर्शाया जाता है, जबकि इलेक्ट्रॉन के संचलन को वक्र तीर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

स्पष्टः दो प्रकार के इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव होते हैं –

1. धनात्मक इलेक्ट्रोमरी प्रभाव (+ E प्रभाव):
इस प्रभाव में बहुआबन्ध के π – इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित होता है। उदाहरणार्थ –
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2. ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरी-प्रभाव (-E प्रभाव):
इस प्रभाव में बहु-आबन्ध के π – इलेक्ट्रॉनों कर स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित नहीं होता है। इसका उदाहरण निम्नलिखित है –
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जब प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव एक-दूसरे की विपरीत दिशाओं में कार्य करते हैं, तब इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव प्रबल होता है।

(क) Cl3CCOOH > Cl2CHCOOH > ClCH2COOH
यह इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रेरणिक प्रभाव (-I) दर्शाता है।

(ख) CH3CH2COOH > (CH3)2 CHCOOH > (CH3)3 C.COOH
यह इलेक्ट्रॉन दाता प्रेरणिक प्रभाव (+I) दर्शाता है।

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प्रश्न 12.18
प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित प्रक्रमों के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण दीजिए –
(क) क्रिस्टलन
(ख) आसवन,
(ग) क्रामैटोग्रैफी
उत्तर:
(क) क्रिस्टलन:
यह ठोस कार्बनिक पदार्थों के शोधन की प्रायः प्रयुक्त विधि है। यह विधि कार्बनिक यौगिक तथा अशुद्ध की किसी उपयुक्त विलायक में इसकी विलेयताओं में निहित अन्तर पर आधारित होती है। अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं, जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय (sparingly soluble) होता है, परन्तु उच्चतर ताप पर यथेष्ट मात्रा में वह घुल जाता है। तत्पश्चात् विलयन को इतना सान्द्रित करते हैं कि वह लगभग संतृपत (saturate) हो जाए। विलयन को ठण्डा करने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टलित हो जाता है, जिसे निस्पन्दन द्वारा पृथक् कर लेते हैं।

निस्पन्द (मातृ द्रव) में मुख्य रूप से अशुद्धियाँ तथा यौगिक की अल्प मात्रा रह जाती है। यदि यौगिक किसी एक विलायक में अत्यधिक विलेय तथा किसी अन्य विलायक में अल्प विलेय होता है, तब क्रिस्टलन उचित मात्रा में इन विलायकों को मिश्रित करके किया जाता है। सक्रियित काष्ठ कोयले (activated charcoal) की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाली जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धियों की विलेयताओं में कम अन्तर होने की दशा में बार-बार क्रिस्टलन द्वारा शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।

(ख) आसवन:
इस महत्वपूर्ण विधि की सहायता से (i) वाष्पशील (volatile) द्रवों को अवाष्पशील अशुद्धियों से एवं (ii) ऐसे द्रवों, जिनके क्वथनांकों में पर्याप्त अन्तर हो, को पृथक् कर सकते हैं। ‘भिन्न क्वथनांकों वाले द्रव भिन्न ताप पर वाष्पित होते हैं। वाष्पों को ठण्डा करने से प्राप्त द्रवों को अलग-अलग एकत्र कर लेते हैं। क्लोरोफॉर्म (क्वथनांक 334K) और ऐनिलीन (क्वथनांक 457K) को आसवन विधि द्वारा आसानी से पृथक् कर सकते हैं।

द्रव-मिश्रण को गोल पेंदे वाले फ्लास्क में लेकर हम सावधानीपूर्वक गर्म करते हैं। उबालने पर कम क्वथनांक वाले द्रव की वाष्प पहले बनती है। वाष्प को संघनित्र की सहायता से संघनित करके प्राप्त द्रव को ग्राही में एकत्र कर लेते हैं उच्च क्वथनांक वाले घटक के वाष्प बाद में बनते हैं। इनमें संघनन से प्राप्त द्रव को दूसरे ग्राही में एकत्र कर लेते हैं।

(ग) क्रोमैटोग्रैफी (वर्णलेखन):
‘वर्णलेखन’ (क्रोमैटोग्रैफी) शोधन की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तकनीक है, जिसका उपयोग यौगिकों का शोधन करने में, किसी मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने तथा यौगिकों की शुद्धता की जाँच करने के लिए विस्तृत रूप से किया जाता है। क्रोमैटोग्रैफी विधि का उपयोग सर्वप्रथम पादपों में पाए जाने वाले रंगीन पदार्थों को पृथक् करने के लिए किया गया था।

‘क्रामैटोग्रैफी’ शब्द ग्रीक शब्द ‘क्रोमा’ (chroma) से बना है, जिसका अर्थ है ‘रंग’। इस तकनीक में सर्वप्रथम यौगिकों के मिश्रण को स्थिर प्रावस्था (stationary phase) पर अधिशोषित कर दिया जाता है। स्थिर प्रावस्था ठोस अथवा द्रव हो सकती है। इसके पश्चात् स्थिर प्रावस्था में से उपयुक्त विलायक, विलायकों के मिश्रण अथवा गैस को धीरे-धीरे प्रवाहित किया जाता है। इस प्रकार मिश्रण के अवयव क्रमश: एक-दूसरे से पृथक् हो जाते हैं। गति करने वाली प्रावस्था को ‘गतिशील प्रावस्था’ (mobile phase) कहते हैं।

अन्तर्ग्रस्त सिद्धान्तों के आधार पर वर्णलेखन को विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से दो हैं –

1. अधिशोषण-वर्णलेखन (Adsorption chromatography):
यह इस सिद्धान्त पर आधारित है कि किसी विशिष्ट अधिशोषक (adsorbent) पर विभिन्न यौगिक भिन्न अंशों में अधिशोषित होते हैं। साधारणत: ऐल्यूमिना तथा सिलिका जेल अधिशोषक के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। स्थिर प्रावस्था (अधिशोषक) पर गतिशील प्रावस्था प्रवाहित करने के उपरान्त मिश्रण के अवयव स्थिर प्रावस्था पर अलग-अलग दूरी तय करते हैं। निम्नलिखित दो प्रकार की वर्णलेखन-तकनीकें हैं, जो विभेदी-अधिशोषण सिद्धान्त पर आधारित हैं –

(क) कॉलम-वर्णलेखन, अर्थात् स्तभ-वर्णलेखन (Columan Chrmnatogrophy)
(ख) पतली पर्त वर्णलेखन (Thin Lay of Chromatography)

2. वितरण क्रोमैटोग्रैफी (Partition Chromatography):
वितरण क्रोमैटोग्रैफी स्थिर तथा गतिशील प्रावस्थाओं के मध्य मिश्रण के अवयवों के सतत विभेदी वितरण पर आधारित है। कागज वर्णलेखन (paper chromatography) इसका एक उदाहरण है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार के क्रोमैटोग्रैफी कागज का इस्तेमाल किया जाता है। इस कागज में छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं।

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प्रश्न 12.19
ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक s, में भिन्न हैं,को पृथक करने की विधि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक s, में भिन्न हैं, को पृथक् करने के लिए क्रिस्टलन विधि प्रयोग की जाती है। इस विधि में अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय उच्च ताप पर विलेय होता है। इसके पश्चात् विलयन को सान्द्रित करते हैं जिससे वह लगभग संतृप्त हो जाए।

अब अल्प-विलेय घटक पहले क्रिस्टलीकृत हो जाएगा तथा अधिक विलेय घटक पुनः गर्म करके ठण्डा करने पर क्रिस्टलीकृत होगा। इसके अतिरिक्त सक्रियित काष्ट कोयले की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाल दी जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धि की विलेयताओं में कम अन्तर होने पर बार-बार क्रिस्टलन करने पर शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 12.20
आसवन, निम्न दाब पर आसवन तथा भाप आसवन में क्या अन्तर है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
आसवन (Distillation):
इस विधि को क्वथनांक में अधिक अन्तर वाले द्रवों को पृथक्कृत करने में प्रयोग किया जाता है। निम्न दाब पर आसवन (Distillation under reduced pressure):
इस विधि को उन द्रवों के शोधन में प्रयुक्त किया जाता है जो अपने साधारण क्वथनांक पर या उससे नीचे अपघटित हो जाते हैं।

भाप आसवन (Steam distillation):
यह तकनीक उन पदार्थों के शोधन के लिए प्रयुक्त की जाती है, जो भाप वाष्पशील हों, परन्तु जल में अमिश्रणीय हों इस विधि द्वारा इन पदार्थों को भाप-अवाष्पशील अशुद्धियों से पृथक्कृत किया जा सकता है।

प्रश्न 12.21
लासेग्ने-परीक्षण का रसायन-सिद्धान्त समझाइए।
उत्तर:
किसी कार्बन यौगिक में उपस्थित नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजन तथा फॉस्फोरस की पहचान ‘लासेग्ने-परीक्षण’ (Lassigne’s Test) द्वारा की जाती है। यौगिक को सोडियम धातु के साथ संगलित करने पर ये तत्त्व सहसंयोजी रूप से आयनिक रूप से परिवर्तित हो जाते हैं इनमें निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं –
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C, N, S तथा X कार्बनिक यौगिक में उपस्थित तत्व हैं। सोडियम संगलन से प्राप्त आवशेष को आसुत जल के साथ उबालने पर सोडियम सायनाइड सल्फाइड तथा हैलाइड जल में घुल जाते हैं। इस निष्कर्ष को ‘सोडियम संगलन निष्कर्ष’ (Sodium Fusion Extract) कहते हैं।

प्रश्न 12.22
किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन के आकलन की –

  1. ड्यूमा विधि तथा
  2. कैल्डाल विधि के सिद्धान्त की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर:
नाइट्रोजन में परिमाणात्मक निर्धारण की निम्नलिखित दो विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं –

1. ड्यूमा विधि (Duma’s Method):
नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक क्यूप्रिक ऑक्साइड के साथ गर्म करने पर इसमें उपस्थित कार्बन, हाइड्रोजन, गन्धक तथा नाइट्रोजन क्रमश:
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चित्र-ड्यमा विधि। कार्बनिक यौगिक को CO2 गैस की उपस्थिति में Cu(0) ऑक्साइड के साथ गर्म करने पर नाइट्रोजन मोटीमों के मिश्रण को पोटैशियम हाइडॉक्साइड विलयन में से प्रवाहित किया जाता है, जहाँ CO2 अवशोषित हो जाती है तथा नाइट्रोजन का आयतन नाप लिया जाता है।

CO2, H2O, SO2 और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों (NO2, NO, N2O) के रूप में ऑक्सीकृत हो जाते हैं। इस गैसीय मिश्रण को रक्त तप्त कॉपर की जाल के ऊपर प्रवाहित करने पर नाइट्रोजन के ऑक्साइडों का नाइट्रोजन में अपचयन हो जाता है।
4Cu + 2NO2 → 4CuO + N2
2Cu + 2NO → 2CuO + N2
Cu + N2O → CuO + N2

इस प्रकार N2, CO2, H2O तथा SO2 युक्त गैसीय मिश्रण को KOH से भरी नाइट्रोमीटर नामक अंशांकित नली से प्रवाहित करने पर जाता है और बची हुई N2 गैस को नाइट्रोमीटर में जल के ऊपर एकत्र कर लिया जाता है। इस नाइट्रोजन का आयतन वायुमण्डल के दाब तथा ताप पर नोट कर लेते हैं। फिर इस आयतन को गैस समीकरण की सहायता से सामान्य ताप व दाब (N.T.P) पर परिवर्तित कर लेते हैं।
मान लिया, m ग्राम कार्बनिक यौगिक में N.T.P पर x मिली नाइट्रोजन प्राप्त होती है।

∵ N.T.P पर 22,400 मिली नाइट्रोजन (N2) की मात्रा = 28 ग्राम (N2 का ग्राम अणुभार)
∴ N.T.P पर x मिली नाइट्रोजन (N2) की मात्रा = \(\frac{28x}{22,400}\) ग्राम
∵ m ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन (N2) की मात्रा = \(\frac{28x}{22,400}\) ग्राम
∴100 ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन (N2) की मात्रा = \(\frac{28x×100}{22,400×m}\) ग्राम
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2. कैल्डाल विधि (Kjeldahl’s Method):
यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि जब किसी नाइट्रोजनयुक्त कार्बन यौगिक को पोटैशियम सल्फेट की उपस्थिति में सान्द्र H2SO4 के
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चित्र-कैल्डाल विधि-नाइट्रोजनयुक्त यौगिक को सान्द्र। सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर अमोनियम सल्फेट बनता है, जो – NaOH द्वारा अभिकृत करने पर अमोनिया मुक्त करता है। इसे मानक अम्ल के अम्ल आयतन में अवशोषित किया जाता है।

साथ गर्म करते हैं तो उसमें उपस्थित नाइट्रोजन पूर्णरूप से अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। इस प्राप्त अमोनियम सल्फेट को सान्द्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करने पर अमोनिया गैस निकलती हैं, जिसको ज्ञात सान्द्रण वो H2SO4 के निश्चित आयतन में अवशोषित कर लेते हैं। इस अम्ल का मानक NaOH के साथ अनुमापन करके गणना द्वारा अवशोषित हुई अमोनिया की मात्रा ज्ञात की जाती है। फिर नाइट्रोजन के आयतन की गणना कर ली जाती है।

(NH4)2 SO4 + 2NaOH + Na2SO4 + 2H2O + 2NH3
2NH3 + H2SO4 —-> (NH4)2SO4
मान लिया कार्बनिक यौगिक का भार = m
ग्राम प्रयुक्त अम्ल का आयतन = V
मिली प्रयुक्त अम्ल की नार्मलता =N
V मिली N नार्मलता का अम्ल = V

मिली M नार्मलता की अमोनिया 1000 मिली N नार्मलता वाली अमोनिया में 17 ग्राम अमोनिया या 14 ग्राम नाइट्रोजन होगी।
V3 मिली N – NH3 में नाइट्रोजन की मात्रा = 0.014 NV ग्राम
∴ 100 ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की मात्रा
= \(\frac{0.014NV×100}{m}\)
= \(\frac{1.4 NV}{m}\) ग्राम

नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा –
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प्रश्न 12.23
किसी यौगिक में हैलोजेन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के आकलन के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1. हैलोजेन का आकलन (Estimation of Halogens):
कार्बनिक यौगिक के ज्ञात भार को सधूम HNO3 के कुछ क्रिस्टलों के साथ केरियस नली का ऊपरी सिरा बन्द कर दिया जाता है। केरियस नली को विद्युत भट्टी में रखकर 180° – 200° C पर लगभग 3 – 4 घण्टे गर्म करते हैं।

यौगिक में उपस्थित हैलोजन (Cl, Br, I), सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप में बदल जाते हैं। सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप को धोकर तथा सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार प्राप्त सिल्वर हैलाइड के भार से हैलोजन की प्रतिशत मात्रा निम्नलिखित गणना की सहायता से ज्ञात कर लेते हैं –
अभिक्रियाएँ –
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चित्र – केरियस विधि-हैलोजेनयुक्त कार्बनिक यौगिक को सिल्वर नाइट्रेट की उपस्थिति में सधूम नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है।
मान लिया कि m ग्राम पदार्थ से x ग्राम AgCl प्राप्त होता है। (AgCl का अणुभार = 108 + 35.5 = 143.5)
∵ 143.5 ग्राम AgCl में क्लोरीन की मात्रा = 35.5 ग्राम
∴ x ग्राम ABCl में क्लोरीन की मात्रा = \(\frac{35.5}{143.5}\) × x ग्राम
∴ m ग्राम कार्बनिक यौगिक में क्लोरीन की मात्रा = \(\frac{35.5}{143.5}\) × x ग्राम
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इसी प्रकार,
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2. सल्फर का आकलन (Estimation of Sulphur):
इस सिद्धान्त के अनुसार, सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक को सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर यौगिक में उपस्थित समस्त गनधक, सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाती है। इसमें BaCl2 विलयन मिलाकर इससे BaSO4 अवक्षेपित कर लिया जाता है। इस अवक्षेप को छानकर, धोकर और सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार BaSO4 के भार की सहायता से गन्धक की प्रतिशत मात्रा की गणना कर लेते हैं।
अभिक्रियाएँ –
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माना, m ग्राम कार्बनिक यौगिक से x ग्राम BaSO4 बनता है।
∵ 233 ग्राम BaSO4 में की मात्रा = 32 ग्राम
∴ x ग्राम BaSO4 में S की मात्रा = \(\frac{32}{233}\) × ग्राम
∵ m प्राम कार्बनिक यौगिक में s की मात्रा = \(\frac{32}{233}\) × \(\frac{x}{m}\) × 100
S की मात्रा(%) = \(\frac{32}{233}\) × \(\frac{x}{m}\) × 100
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3. फॉस्फोरस का आकलन (Estimation of Phosphorus):
कार्बनिक यौगिक की एक ज्ञात मात्रा को सधूम नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर उनमें उपस्थित फॉस्फोरस, फॉस्फोरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाता है।

इसे अमोनिया तथा अमोनियम मॉलिब्डेट मिलाकर अमोनियम फॉस्फोटोमॉलिब्डेट, (NH4)3 PO4.12MoO3, के रूप में हम अवक्षेपित कर लेते हैं, अन्यथा फॉस्फोरिक अम्ल में मैग्नीशिया मिश्रण मिलाकर MgNH4PO4 के रूप में अवक्षेपित किया जा सकता है, जिसके ज्वलन से Mg2P2O7 प्राप्त होता है।
माना कि कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = m ग्राम और
अमोनियम फॉस्फोमॉलिब्डेट = m1 ग्राम
(NH4)PO4.12MoO3 का मोलर द्रव्यमान = 1877 ग्राम है।
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यदि फॉस्फोरस का Mg2P2O7 के रूप में आकलन किया जाए तो
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जहाँ Mg2P2O7 का मोलर द्रव्यमान 222u, लिए गए कार्बनिक पदार्थ का द्रव्यमान m, बने हुए Mg2P2O7 का द्रव्यमान m1 तथा Mg2P2O7 यौगिक में उपस्थित दो फॉस्फोरस परमाणुओं का द्रव्यमान 62 है।

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प्रश्न 12.24
पेपर क्रोमैटोग्रैफी के सिद्धान्त को समझाइए।
उत्तर:
पेपर क्रोमैटोग्रफी:
पेपर या क्रोमैटोग्रैफी वितरण क्रोमैटोग्रैफी पर आधारित है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार का कामैटोग्रैफी पेपर प्रयोग किया जाता है। इस पेपर के छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं। क्रोमैटोग्रैफी कागज की एक पट्टी (strip) के आधार पर मिश्रण का बिन्दु लगाकर उसे जार से लटका देते हैं (चित्र में)।
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जार में कुछ ऊँचाई तक उपयुक्त विलायक अथवा विलायकों का मिश्रण भरा होता है, जो गतिशील प्रावस्था का कार्य करता है। कोशिका क्रिया के कारण पेपर की पट्टी पर विलायक ऊपर की ओर बढ़ता है तथा बिन्दु पर प्रवाहित होता है। विभिन्न यौगिकों का दो प्रावस्थाओं में वितरण भिन्न-भिन्न होने के कारण वे अलग-अलग दूरियों तक आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार विकसित पट्टी को ‘क्रोमैटोग्राम’ (chromatogram) कहते हैं। पतली पर्त की भाँति पेपर की पट्टी पर विभिन्न बिन्दुओं की स्थितियों को या तो पराबैंगनी प्रकाश के नीचे रखकर या उपयुक्त अभिकर्मक के विलयन को छिड़ककर हम देख लेते हैं।

प्रश्न 12.25
‘सोडियम संगलन निष्कर्ष’ में हैलोजेन के परीक्षण के लिए सिल्वर नाइट्रेट मिलाने से पूर्व नाइट्रिक अम्ल क्यों मिलाया जाता है?
उत्तर:
हैलोजेन के परीक्षण में सोडियम निष्कर्ष को सान्द्र HNO3 के साथ इसलिये गर्म करते हैं कि विलयन में उपस्थित NaCN तथा Na2S अघटित हो जाए और हैलोजेन के परीक्षण में बाधा न डालें। अन्यथा AgCN या Ag2S के अवक्षेप बनेंगे।
NaCN + HNO3 → HCN + NaNO3
Na2S + 2HNO3 → H2S + 2NaNO3

प्रश्न 12.26
नाइट्रोजन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के परीक्षण के लिए सोडियम के साथ कार्बनिक यौगिक का संगलन क्यों किया जाता है?
उत्तर:
कार्बनिक यौगिकों को सोडियम के साथ संकलित करने पर उसमें उपस्थित तत्त्व (N. S.P आदि) अपने सोडियम लवणों में परिवर्तित हो जाते हैं जो कि आयनिक यौगिक हैं। ये आयनिक लवण अधिक क्रियाशील होते हैं। अतः इनकी उपयुक्त अभिकारक की सहायता से परीक्षा कर सकते हैं।

प्रश्न 12.27
कैल्शियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने के लिए एक उपयुक्त तकनीक बताइए।
उत्तर:
इस मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने के लिए ऊर्ध्वपातन तकनीय उपयुक्त है क्योंकि कपूर का ऊर्ध्वपातन हो जाता है और कैल्शियम सल्फेट का नहीं।

प्रश्न 12.28
भाप-आसवन करने पर एक कार्बनिक द्रव अपने क्वथनांक से निम्न ताप पर वाष्पीकृत क्यों हो जाता है?
उत्तर:
वास्तव में भाप-आसवन कम दाब होता है। आसवन फ्लास्क में रखे गये जलवाष्प तथा कार्बनिक द्रव दोनों का कुल वाष्पदाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर होना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि दोनों अपने सामान्य क्वथनांक पर वाष्पित हो जायेंगे।

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प्रश्न 12.29
क्या CCl4, सिल्वर नाइट्रेट के साथ गर्म करने पर AgCl का श्वेत अवक्षेप देगा? अपने उत्तर को कारण सहित समझाइए।
उत्तर:
CCl4 अध्रुवीय यौगिक है जो जलीय विलयन में आयन नहीं देता है जबकि AgNO3 का आयनन हो जाता है। अतः ये परस्पर क्रिया नहीं करते हैं जिससे AgCl का सफेद अवक्षेप प्राप्त नहीं होगा।

प्रश्न 12.30
किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन का आकलन करते समय उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
ऐसा इसलिए किया जाता है; क्योंकि पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड प्रबल क्षार है तथा CO2 का पूर्णतया अवशोषण कर सकता है। इस प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करके पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलेय पोटैशियम कार्बोनेट बना लेता है जिसका आकलन किया जा सकता है।

प्रश्न 12.31
सल्फर के लेड ऐसीटेट द्वारा परीक्षण में ‘सोडियम संगलन निष्कर्ष’ को ऐसीटिक अम्ल द्वारा उदासीन किया जाता है, न कि सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा, क्यों?
उत्तर:
ऐसीटिक अम्ल के स्थान पर सल्फ्यूरिक अम्ल के प्रयोग से लेड ऐसीटेटं सल्फ्यूरिक अम्ल से क्रिया करके लेउ सल्फेट (PbSO4) का सफेद अवक्षेप देगा जो सल्फर के परीक्षण में बाधा उत्पन्न करेगा। (CH3COO2)2 Pb + H2SO4 → PbSO4↓+ 2CH3COOH

प्रश्न 12.32
एक कार्बनिक यौगिक में 69% कार्बन, 4.8% हाइड्रोजन तथा शेष ऑक्सीजन है। इस यौगिक के 0.20g के पूर्ण दहन के फलस्वरूप उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल की मात्राओं की गणना कीजिए।
उत्तर:
उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा की गणना –
यौगिक की मात्रा = 0.20g
कार्बन का प्रतिशत = 69%
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उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा
= \(\frac{69×44×(0.20)g}{12×100}\) = 0.506g
उत्पन्न जल की मात्रा की गणना –
यौगिक की मात्रा 0.20g
हाइड्रोजन का प्रतिशत = 4 8%
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प्रश्न 12.33
0.50g कार्बनिक यौगिक को कैल्डॉल विधि के अनुसार उपचारित करने पर प्राप्त अमोनिया को 0.5M H2SO4 के 50 mL में अवशोषित किया गया। अवशिष्ट अम्ल के उदासीनीकरण केलिए0.5M NaOH के 50 mL की आवश्यकता हुई। यौगिक में नाइट्रोजन प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर:
अवशिष्ट अम्ल के आयतन की गणना –
NaOH विलयन का आवश्यक आयतन = 50mL
NaOH विलयन की मोलरता = 0.5M
H2SO4 विलयन की मोलरता = 0.5M
अवशिष्ट अम्ल के आयतन की गणना के लिए मोलरता समीकरण का प्रयोग करना होगा।
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प्रयुक्त अम्ल के आयतन की गणना –
मिलाए गए अम्ल का आयतन = 50 mL
अवशिष्ट अम्ल का आयतन = 25 mL
प्रयुक्त अम्ल का आयतन = (50 – 25)
= 25 mL
यौगिक की मात्रा = 0.50g
प्रयुक्त अम्ल का आयतन = 25 mL
प्रयुक्त अम्ल की मोलरता = 0.5M
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प्रश्न 12.34
केरिअस आकलन में 0.3780g कार्बनिक क्लोरो यौगिक से 0.5740g सिल्वर क्लोराइड प्राप्त हुआ। यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशता की गणना कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार, यौगिक की मात्रा = 0.3780g
सिल्वर क्लोराइड की मात्रा = 0.5740g
क्लोरीन की प्रतिशतता
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प्रश्न 12.35
केरिअस विधि द्वारा सल्फर के आकलन में 0468g सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक से 0.686g बेरियम सल्फेट प्राप्त हुआ। दिए गए कार्बन यौगिक में सल्फर की प्रतिशता की गणना कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
बेरियम सल्फेट की मात्रा = 0.668g
सल्फर की प्रतिशतता
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प्रश्न 12.36
CH2 = CH – CH2 – CH2 – C = CH, कार्बनिक यौगिक में C2 – C3 आबन्ध किन संकरित कक्षकों के युग्म से निर्मित होता है?
(क) sp – sp2
(ख) sp – sp3
(ग) sp2 – sp3
(घ) sp3 – sp3
उत्तर:
(ग) sp2 – sp3

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प्रश्न 12.37
किसी कार्बनिक यौगिक में लासेग्नेपरीक्षण द्वारा नाइट्रोजन की जाँच में प्रशियन ब्लू रंग निम्नलिखित में से किसके कारण प्राप्त होता है?
(क) Na4 [Fe(CN)6]
(ख) Fe4 [Fe(CN)6]3
(ग) Fe2 [Fe(CN)6]
(घ) Fe3[Fe (CN)6]4
उत्तर:
(ख) Fe4[Fe(CN)6]3

प्रश्न 12.38
निम्नलिखित कार्बधनायनों में से कौन-सा सबसे अधिक स्थायी है?
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प्रश्न 12.39
कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण और शोधन की सर्वोत्तम तथा आधुनिकतम तकनीक कौन-सी है?
(क) क्रिस्टलन
(ख) आसवन
(ग) ऊर्ध्वपातन
(घ) क्रोमैटोग्रैफी
उत्तर:
(घ) क्रोमैटोग्रैफी।

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प्रश्न 12.40
CH3CH2I + KOH(aq) → CH3CH2OH + KI अभिक्रिया को नीचे दिए गए प्रकार में वर्गीकृत कीजिए –
(क) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ग) विलोपन
(घ) संकलन
उत्तर:
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन

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Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 11.1
(क) B से Tl तक तथा
(ख) C से Pb तक की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की भिन्नता के क्रम की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(क) B से Tl तक (बोरॉन परिवार) ऑक्सीकरण अवस्था [Oxidation state from B to Tl (Boron family)]
बोरॉन परिवार (वर्ग 13) के तत्वों का विन्यास ns2p1 होता है। इसका तात्पर्य यह है कि बन्ध निर्माण के लिए तीन संयोजी इलेक्ट्रॉन उपलब्ध हैं। इन इलेक्ट्रॉनों का त्याग करके ये परमाणु अपने यौगिकों में +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। यद्यपि इन तत्वों की ऑक्सीकरण-अवस्था में निम्नलिखित प्रवृत्ति प्रेक्षित होती है –

1. प्रथम दो तत्व बोरॉन तथा ऐलुमिनियम यौगिकों में केवल +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं, परन्तु शेष तत्वगैलियम, इण्डियम तथा थैलियम +3 ऑक्सीकरण अवस्था के साथ-साथ +1 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करते हैं अर्थात् से परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।

2. +3 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व ऐलुमिनियम से आगे जाने पर घटता है तथा अन्तिम तत्व थैलियम की स्थिति में, +1 ऑक्सीकरण अवस्था, +3 ऑक्सीकरण अवस्था से अधिक स्थायी होती है। इसका अर्थ यह है कि TICI, TIC15 से अधिक स्थायी होता है।

(ख) से Pb तक (कार्बन परिवार) ऑक्सीकरण अवस्था [Oxidation state from C to Pb (Carbon family)]
कार्बन परिवार (समूह-14) के तत्वों का विन्यास ns2p2 होता है। स्पष्ट है कि इन तत्वों के परमाणुओं के बाह्यतम कोश में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं। इन तत्वों द्वारा सामान्यतः +4 तथा +2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाई जाती है। कार्बन ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करता है।

चूंकि प्रथम चार आयनन एन्थैल्पी का योग अति उच्च होता है; अतः +4 ऑक्सीकरण अवस्था में अधिकतर यौगिक सहसंयोजक प्रकृति के होते हैं। इस समूह के गुरुतर तत्वों में Ge < Sn < Pb क्रम में +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।

सहसंयोजक कोश में ns2 इलेक्ट्रॉन के बन्धन में भाग नहीं लेने के कारण यह होता है। इन दो ऑक्सीकरण अवस्थाओं का सापेक्षिक स्थायित्व वर्ग में परिवर्तित होता है। कार्बन तथा सिलिकन मुख्यत: +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। जर्मेनियम की +4 ऑक्सीकरण अवस्था स्थायी होती है, जबकि कुछ यौगिकों में +2 ऑक्सीकरण अवस्था भी मिलती है।

टिन ऐसी दोनों अवस्थाओं में यौगिकों बनाता है (+2 ऑक्सीकरण अवस्था में टिन अपचायक के रूप में कार्य करता है)। +2 ऑक्सीकरण अवस्था में लेड के यौगिक स्थायी होते हैं, जबकि इसकी +4 अवस्था प्रबल ऑक्सीकरण है। इस आधार पर स्पष्ट है कि –

  1. SnCl4 तथा PbCl4 की तुलना में SnCl2 तथा PbCl2 अधिक सरलता से बनते हैं।
  2. PbCl2, SnCl2, से अधिक स्थायी होता है चूँकि इसमें अक्रिय युग्म प्रभाव का परिमाण अधिक होता है।

चतुः संयोजी अवस्था में अणु के केन्द्रीय परमाणु पर आठ इलेक्ट्रॉन होते हैं। इलेक्ट्रॉन परिपूर्ण अणु होने के कारण सामान्यतया इलेक्ट्रॉनग्राही या इलेक्ट्रॉनदाता स्पीशीज की अपेक्षा इनसे नहीं की जाती है। यद्यपि कार्बन अपनी सहसंयोजकता +4 का अतिक्रमण नहीं कर सकता है, परन्तु समूह के अन्य तत्व ऐसा करते हैं।

यह उन तत्वों में d – कक्षकों की उपस्थिति के कारण होता है। यही कारण है कि ऐसे तत्वों के हैलाइड जल-अपघटन के उपरान्त दाता स्पीशीज (donor species) से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके संकुल बनाते हैं। उदाहरणार्थ-कुछ स्पीशीज; जैसे –
(SiF6)2-, (GeCl6)2- तथा Sn(OH)62- ऐती होती हैं, जिनके केन्द्रीय परमाणु sp3d2 संकरित होते हैं।

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प्रश्न 11.2
TlCl3 की तुलना में BCl3 के उच्च स्थायित्व को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
बोरॉन (B) परमाणु की स्थिति में, अक्रिय युग्म प्रभाव नगण्य होता है। इसका अर्थ है कि इसके तीनों संयोजी इलेक्ट्रॉन (2s2px1) क्लोरीन परमाणुओं के साथ बन्ध बनाने के लिए उपलब्ध हैं। इसलिए BCl3 स्थायी होती है। यद्यपि थैलियम (Tl) की स्थिति में, संयोजी s-इलेक्ट्रॉन (6s2) अधिकतम अक्रिय युग्म प्रभाव अनुभव करते हैं। अतः केवल संयोजी p – इलेक्ट्रॉन (6p1) बन्ध के लिए उपलब्ध होते हैं। इन परिस्थितियो में TlCl अत्यधिक स्थायी होता है, जबकि TlCl3 अपेक्षाकृत बहुत कम स्थायी होता है। निष्कर्ष रूप में स्पष्ट है कि TlCl3 की तुलना में BCl, उच्च स्थायी होता है।

प्रश्न 11.3
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड लूईस अम्ल के समान व्यवहार क्यों प्रदर्शित करता है?
उत्तर:
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड BF3 अणु में F परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों से साझा करके केन्द्रीय बोरॉन परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों की संख्या 6 (तीन युग्म) होती है। अतः यह एक इलेक्ट्रॉन-न्यून अणु है तथा यह स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके लूईस अम्ल के समान व्यवहार प्रदर्शित करता है।

उदाहरणार्थ –
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड सरलतापूर्वक अमोनियाम से एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके BE3.NH3 उपसहसंयोजक यौगिक बनाता है।
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प्रश्न 11.4
BCl3 तथा CCl4 यौगिकों का उदहारण देते हए जल के प्रति इनके व्यवहार के औचित्य को समझाइए।
उत्तर:
BCl3 में (B परमाणु ap2 – संकरित हैं), B परमाणु का अष्टक अपूर्ण है तथा इसका असंकरित 2p – कक्षक जल अणु से इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करके योगात्मक उत्पाद बना सकता है।
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इस प्रकार जल से अभिक्रिया करने पर एक Cl परमाणु -OH समूह से प्रतिस्थापित हो जाता है। इसी प्रकार अन्य दो Cl परमाणु भी -OH समूहों से प्रतिस्थापित हो जाते हैं।
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इससे प्रदर्शित होता है कि बोरॉन ट्राइक्लोराइड का जल-अपघटन हो जाता है, परन्तु यह CCl4 के साथ सम्भव नहीं है। कार्बन परमाणु का अष्टक पूर्ण होता है तथा H2O अणुओं के साथ योगात्मक उत्पाद बनने की कोई सम्भावना नहीं है। परिणामस्वरूप कार्बन टेट्राक्लोराइड जल-अपघटित नहीं होता। जल में मिलाने पर यह उसमें मिश्रित भी नहीं होता, अपितु एक पृथक तैलीय पर्त बनाता है।

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प्रश्न 11.5
क्या बोरिक अम्ल प्रोटोनी अम्ल है? समझाइए।
उत्तर:
बोरिक अम्ल प्रोटोनी अम्ल नहीं है। यह एक लूईस अम्ल है तथा H2O अणु के हाइड्रॉक्सिल आयन से इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करता है।
B(OH)3 + 2HOH → B(OH4)] + H3O+

प्रश्न 11.6
क्या होता है, जब बोरिक अम्ल को गर्म किया जाता है?
उत्तर:
370K से अधिक ताप गर्म किए जाने पर बोरिक अम्ल (ऑर्थोबोरिक अम्ल) मेटाबोरिक अम्ल (HBO2) बनाता है, जो और अधिक गर्म करने पर बोरिक ऑक्साइड (B2O3) में परिवर्तित हो जाता है।
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प्रश्न 11.7
BF3 तथा BH4 की आकृति की व्याख्या कीजिए। इन स्पीशीज में बोरॉन के संकरण को निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर:
बोरॉन ट्राइफ्लु ओराइड (Boron trifluoridie, BF3):
इसमें केन्द्रीय परमाणु बोरॉन है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2, 2s2 2p1 है। तलस्थ अवस्था में इसमें केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है जिसके आधार पर केवल एक सहसंयोजक बन्ध ही बन सकता है। अतः BF3 अणु बनने में यह अवश्य ही उत्तेजित अवस्था में होगा जिस स्थिति में एक s – इलेक्ट्रॉन p – कक्षक में उन्नत हो जाएगा –
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उत्तेजित बोरॉन में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं जिससे यह तीन. सहसंयोजक बन्ध बना सकता है। तीन फ्लुओरीन BF3 में युग्मन के लिए तीन इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं।
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इसमें एक बन्ध s – इलेक्ट्रॉन के माध्यम से है तथा अन्य दो बन्ध दो p – इलेक्ट्रॉनों के माध्यम से है। अतः तीनों बन्ध समान नहीं होने चाहिए। ऽ तथा px व py कक्षकों की ऊर्जा का संचय होकर तीनों कक्षकों में बराबर राशि में वितरित हो जाता है। इस प्रकार तीन sp2 संकर कक्षकों का उद्भव होता है। इन कक्षकों के बीच 120° का कोण होता है जिससे इलेक्ट्रॉन युग्मों में पारस्परिक प्रतिकर्षण न्यूनतम रहता है।
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चित्र – sp2 – संकरण।

ये sp2 संकर कक्षक F परमाणुओं के कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके बन्ध बनाते हैं। इस प्रकार BF3 में बन्ध कोण 120° होता है तथा अणु त्रिकोणीय व समतल होता है।
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चित्र-बोरॉन ट्राइफ्जुओराइड की आकृति।

बोरॉन टेट्रा हाइड्राइडो ऋणायन (BH4):
वर्ग -13 के तत्व MH3 प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं। ये हाइड्राइड दुर्बल लूईस अम्ल होते हैं तथा प्रबल लूईस क्षारकों (:B) के साथ MH3 : B प्रकार के योग-उत्पाद बनाते हैं (M = B, Al, Ga)। इन हाइड्राइडों का निर्माण इनके बाह्यतम कोश में उपस्थित रिक्त p – कक्षकों के कारण होता है। जो हाइड्राइड आयन (H) से तुरन्त इलेक्ट्रॉन युग्म लेकर टेट्रा हाइड्राइडो ऋणायन बनाते हैं। BH4 की संरचना संकरण के प्रकार के आधार पर निर्धारित की जा सकती है। संकरण का प्रकार निम्नलिखित सूत्र से ज्ञात किया जा सकता है –
H = \(\frac{1}{2}\) [V + M – C + A]

जहाँ H = संकरण में सम्मिलित कक्षकों की संख्या
V = केन्द्रीय परमाणु के संयोजी कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या
M = एकल संयोजी परमाणुओं की संख्या
C = धनायन पर आवेश
A = ऋणायन पर आवेश
इस प्रकार
H = \(\frac{1}{2}\) [3 + 4 – 0 + 1] = 4

चूँकि संकरण में भाग लेने वाले कक्षकों की संख्या 4 है; अत: यह sp3 संकरण है। sp3 संकरण में एक s – कक्षक तथा तीन p – कक्षकों के सम्मिश्रण से चार समतुल्य संकर कक्षक बनते हैं। इन चारों कक्षकों में अल्पतम प्रतिकर्षण होने के लिए वे एक। समचतुष्फलक के चारों कोनों की ओर दिष्ट होते हैं तथा परस्पर 109°28′ का कोण बनाते हैं। अतः BH4 की आकृति निम्नवत्
होगी –
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चित्र – [BH4] की आकृति।

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प्रश्न 11.8
एल्यूमीनियम के उभयधर्मी व्यवहार दर्शाने वाली अभिक्रियाएँ दीजिए।
उत्तर:
चूँकि एल्यूमीनियम अम्लों तथा ‘क्षारों दोनों से अभिक्रिया कर सकता है, अतः यह उभयधर्मी प्रवृत्ति का होता है; जैसे –
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प्रश्न 11.9
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक क्या होते हैं? क्या BCl3 तथा SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक हैं? समझाइये।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक-ऐसे यौगिक जिनके अणुओं में केन्द्रीय परमाणु या अधिक इलेक्ट्रॉन-युग्मों को ग्रहण, करने की प्रवृत्ति हो, इलेक्ट्रॉन-न्यून यौगिक कहलाते हैं। इन्हें लूईस अम्ल भी कहते हैं।

BCl3 तथा SiCl4 दोनों इलेक्ट्रॉन-न्यून यौगिक हैं। B और Si परमाणुओं में क्रमशः रिक्त 2p – कक्षक तथा रिक्त 3d – कक्षक होते हैं। ये दोनों परमाणु इलेक्ट्रॉन-दाता स्पीशीज से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं। अत: BCl3 तथा SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक है।

प्रश्न 11.10
CO32- तथा HCO3, की अनुनादी संरचनाएँ लिखिए।
उत्तर:
CO32- की अनुनादी संरचना
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HCO2-3 की अनुनादी संरचना
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प्रश्न 11.11
(क) CO32-, (ख) हीरा तथा (ग) ग्रेफाइट में कार्बन की संकरण-अवस्था क्या होती है?
उत्तर:
(क) CO32- में कार्बन की संकरण-अवस्था sp2 है।
(ख) हीरे में कार्बन की संकरण-अवस्था sp3 है।
(ग) ग्रेफाइट में कार्बन की संकरण-अवस्था sp2 है।

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प्रश्न 11.12
संरचना के आधार पर हीरा तथा ग्रेफाइट के गुणों में निहित भिन्नता को समझाइए।
उत्तर:
हीरा तथा ग्रेफाइट में अन्तर:
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प्रश्न 11.13
निम्नलिखित कथनों को युक्तिसंगत कीजिए तथा रासायनिक समीकरण दीजिए –
(क) लेड (II) क्लोराइड Cl2 से क्रिया करके PbCl4 देता है।
(ख) लेड (IV) क्लोराइड ऊष्मा के प्रति अत्यधिक अस्थायी है।
(ग) लेड एक आयोडाइड Pbl4 नहीं बनाता है।
उत्तर:
(क) लेड (II) क्लोराइड Cl2 से क्रिया करके लेड (IV) क्लोराइड, PbCl4 देता है क्योंकि क्लोरीन एक प्रबलतम ऑक्सीकारक हैं।
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(ख) चूँकि लेड IV ऑक्सीकरण अवस्था की तुलना में II ऑक्सीकरण अवस्था में अधिक स्थायी होता है; अत: लेड (IV) क्लोराइड ऊष्मा के प्रति अत्यधिक अस्थायी होता है। Pb (IV) क्लोराइड अपघटित होकर Pb (II) क्लोराइड बनाता है और Cl2 गैस मुक्त होती है।
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(ग) चूँकि I आयन के प्रबल अपचायक हैं और यह विलयन में Pb4+ आयन Pb2+ आयन में अपचयित कर देता हैं, अतः लेड एक आयोडाइड PbI4 नहीं बनाता है।
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प्रश्न 11.14
BF3 में BF4 में बन्ध लम्बाई क्रमशः 130 pm तथा 143 pm होने के कारण बताइए।
उत्तर:
BF3 में तथा BF4 में बोरॉन की संकरण – अवस्था निम्नवत् है –
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अतः दिए गए दो फ्लुओराइडों के बन्ध लम्बाइयों में अन्तर बोरॉन की संक्रमण अवस्था में अन्तर के कारण होता है।

प्रश्न 11.15
B – Cl आबन्ध द्विध्रुव आघूर्ण रखता है, किन्तु BCl3 अणु का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है, क्यों?
उत्तर:
B – Cl बन्ध में एक निश्चित द्विध्रुव आघूर्ण होता है। दूसरी ओर BCl3 का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है क्योंकि इसका अणु समतलीय होता है जिसमें आबन्ध ध्रुवताएँ परस्पर निरस्त हो जाती हैं।

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प्रश्न 11.16
निर्जलीय (HF) में एल्यूमीनियम ट्राइफ्लुओराइड अविलेय हैं, परन्तु NaF मिलाने पर घुल जाता है। गैसीय BF3 को प्रवाहित करने पर परिणामी विलयन में से एल्यूमीनियम ट्राइफ्लुओराइड अवक्षेपित हो जाता है। इसका कारण बताइए।
उत्तर:
चूँकि एल्यूमीनियम ट्राइफ्लुओराइड (AIF3) की प्रकृति सहसंयोजी होती है, अत: यह निर्जलीय (HF) अधुलनशील है। यह NaF से अभिक्रिया के पश्चात् एक संकुल यौगिक बनाता है जो जल में विलेय है।
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यह संकुल यौगिक को जलीय विलयन BF3 की वाष्प प्रवाहित करने पर तोड़ा जा सकता है। फलत: AIF3 पुन: अवक्षेपित हो जाता है।
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प्रश्न 11.17
CO के विषैली होने का एक कारण बताइए।
उत्तर:
CO की अत्यंत विषैली प्रकृति हीमोग्लोबिन के साथ एक संकुल बनाने के कारण होती है जो ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन संकुल से 300 गुना अधिक स्थाई होता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं में उपस्थित हीमोग्लोबिन को शरीर में ऑक्सीजन प्रवाह को रोकती है। इससे दम घुटने लगता है और अंततः मृत्यु हो जाती है।

प्रश्न 11.18
CO2 की अधिक मात्रा भूमण्डलीय ताप वृद्धि के लिए उत्तरदायी कैसे है?
उत्तर:
CO2 में CH4 की तरह ऊष्मा अवशोषित करने की प्रवृत्ति होती है, जिसे हरित-ग्रह गैस करते हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण CO2 की अधिक मात्रा भूमण्डलीय ताप वृद्धि के लिए उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 11.19
डाइबोरेन तथा बोरिक अम्ल की संरचना समझाइए।
उत्तर:
(क) डाइबोरेन की संरचना:
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चित्र – (क) डाइबोरेन (B2H6 ) की संरचना।
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चित्र – (क) डाइबोरेन में बन्धन। डाइबोरेन में प्रत्येक बोरॉन परमाणु sp3 – संकरित होता है। इन चार sp3 – संकरित कक्षकों में से एक इलेक्ट्रॉन रहित होता है, जिसे बिन्दुकृत रेखाओं (Dotted Lines) द्वारा दर्शाया गया है। सिर वाले B – H समान्य द्विकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (2e – 2e) बन्ध हैं, जबकि दो सेतुबन्ध B – H – B त्रिकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (3e – 3e) है। इसे ‘केलाबन्ध’ (Banana Bond) भी कहते हैं।

डाइबोरेन की संरचना को चित्र (क) द्वारा दर्शाया गया है। इससे सिरे वाले चार हाइड्रोजन परमाणु तथा दो बोरॉन परमाणु एक ही तल में होते हैं। इस तल के ऊपर तथा नीचे दो सेतुबन्ध (bridging) हाइड्रोजन परमाणु होते हैं। सिरे वाले चार B-H बन्ध सामान्य द्विकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (two centre-two electron) बन्ध भिन्न प्रकार के होते हैं, जिन्हें ‘त्रिकेन्द्रीयद्विइलेक्ट्रॉन बन्ध’ कहते हैं चित्र (ख)।

(ख) बोरिक अम्ल की संरचना:
ठोस अवस्था में बोरिक अम्ल की पीय संरचना होती है, जहाँ समतलीय BO3 की इकाइयाँ हाइड्रोजन बन्ध द्वारा एक-दूसरे से 3.18pm की दूरी पर जुड़ी रहती हैं।
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चित्र – (ख) बोरिक अम्ल की संरचना में बिन्दुकृत रेखाएँ हाइड्रोजन आबन्ध को प्रदर्शित करती हैं।

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प्रश्न 11.20
क्या होता है, जब –
(क) बोरेक्स को अधिक गर्म किया जाता है।
(ख) बोरिक अम्ल को जल में मिलाया जाता है।
(ग) एल्यूमीनियम की तनु NaOH से अभिक्रिया कराई जाती है।
(घ) BF3 की क्रिया अमोनिया से की जाती है।
उत्तर:
(क) पहले यह जल के अणु का निष्कासन करके फूल जाता है। पुनः गर्म करने पर यह एक पारदर्शी द्रव में परिवर्तित हो जाता है, जो काँच के समान एक ठोस में परिवर्तित हो जाता है। इसे बोरेक्स मनका कहते हैं।
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(ख) यह जल में घुल जाता है। क्योंकि यह इलेक्ट्रॉन-न्यून प्रकृति का होता है।
B(OH)3 + H – OH → [B(OH)4] + H+

(ग) एल्यूमीनियम NaOH विलयन में घुलकर एक विलेय संकुल बनाता है तथा हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है।
2Al (s) + 2NaOH (aq) + 6H2O (l) → 2Na+[Al(OH)4] (aq) + 3H2 (g)

(घ) BF3 (लूईस अम्ल) NH3 (लूईस-क्षार) के साथ योगत्मक यौगिक बनाता है।
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प्रश्न 11.21
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को समझाइए –
(क) कॉपर की उपस्थिति में उच्च ताप पर सिलिकन को मेथिल क्लोराइड के साथ गर्म किया जाता है।
(ख) सिलिकॉन डाऑक्साइड की क्रिया हाइड्रोजन फ्लु ओराइड के साथ की जाती है।
(ग) CO को ZnO के साथ गर्म किया जाता है।
(घ) जलीय ऐलुमिना की क्रिया जलीय NaOH के साथ की जाती है।
उत्तर:
(क) सिलिकन कॉपर (उत्प्रेरक) की उपस्थिति में मेथिल क्लोराइड के साथ 570K पर गर्म करने पर डाइमेथिल डाइक्लोरोसिन बनाता है। इसके जल अपघटन पर संघनन बहुलीकरण द्वारा श्रृंखला बहुलक प्राप्त होते हैं।
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(ख) सिलिकन टेट्राफ्लुओराइड (SiF4) बनाता है।
SiO2 + 4HF → SiF4 + 2H2O

(ग) CO (प्रबल अपचायन) द्वारा ZnO का अपचयन Zn में हो जाता है।
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(घ) क्रिया करके एक घुलनशील संकुल बनाते हैं।
Al2O3 (s) + 2NaOH(aq) + 3H22 (l) → 2Na [AI(OH)4] (aq)

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प्रश्न 11.22
कारण बताइए –
(क) सान्द्र HNO3 का परिवहन ऐलुमिनियम के पात्र द्वारा किया जा सकता है।
(ख) तनु NaOH तथा ऐलुमिनियम के टुकड़ों के मिश्रण का प्रयोग अपवाहिका खोलने के लिए किया जाता है।
(ग) ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है।
(घ) हीरा का प्रयोग अपघर्षक के रूप में होता है।
(ङ) वायुयान बनाने में ऐलुमिनियम मिश्रधातु का उपयोग होता है।
(घ) जल को ऐलुमिनियम पात्र में पूरी रात नहीं रखना चाहिए।
(छ) संचरण केवल बनाने में ऐलुमिनियम तार का प्रयोग होता है।
उत्तर:
(क) सान्द्र HNO3 प्रारम्भ में ही ऐलुमिनियम से क्रिया करके ऐलुमिनियम ऑक्साइड (Al2O3) बना लेता है। जो पात्र के भीतर एक रक्षी-लेपन कर देता है। इस प्रकार धात्विक पात्र निष्क्रिय (passive) हो जाता है तथा फिर अम्ल से क्रिया नहीं करता। इसलिए अम्ल का परिवहन ऐलुमिनियम के पात्र द्वारा सुरक्षापूर्वक किया जा सकता है।

(ख) ऐलुमिनियम तनु NaOH में घुलकर H2 मुक्त करता है। यह हाइड्रोजन गैस अपवाहिका खोलने में सहायता करती
2Al + 2NaOH + 2H2O → 2NaAlO2 + 3H2

(ग) प्रेफाइट में sp2 – संकरित कार्बन होता है तथा इसकी पीय संरचना होती है। व्यापक पृथक्करण तथा दुर्बल अन्तरपीय बन्धों के कारण इसकी दो समीपवर्ती पर्ते एक-दूसरे पर सरलतापूर्वक फिसल जाती हैं। इस कारण इसे शुष्क स्नेहक की भाँति उन मशीनों में प्रयुक्त किया जा सकता है जिनमें किसी कारणवश तैलीय स्नेहक प्रयुक्त न किए जा सकते हों।

(घ) हीरा समस्त ज्ञात पदार्थों में कठोरतम पदार्थ होता है। अतः इसका प्रयोग अपघर्षक (abrasive) तथा काँच काटने में किया जाता है।

(ङ) ऐलुमिनियम मिश्रधातु – मैग्नोलियम तथा ड्यूरैलियम जिनमें लगभग 95% धातु होती है, को वायुयान बनाने में प्रयोग किया जाता है। इसका कारण यह है कि ये हल्के, परन्तु मजबूत होते हैं। इसके अतिरिक्त इन पर जंग भी नहीं लगता है।

(च) जल को ऐलुमिनियम पात्र में पूरी रात नहीं रखना चाहिए, क्योंकि लम्बे समय तक नमी तथा ऑक्सीजन से धातु संक्षारित हो सकती है।

(छ) ऐलुमिनियम सामान्यतया वायु तथा नमी से प्रभावित नहीं होती तथा इसकी विद्युत-चालकता कॉपर से दोगुनी होती है। इसलिए संचरण केबल बनाने में ऐलुमिनियम तार का प्रयोग होता है।

प्रश्न 11.23
कार्बन से सिलिकॉन तक आयनीकरण एन्थैल्पी में प्रघटनीय कमी होती है। क्यों?
उत्तर:
कार्बन से सिलिकन तक आयनीकरण में प्रघटनीय कमी होती है; क्योंकि कार्बन की परमाणु त्रिज्या (77pm) की तुलना में सिलिकन की परमाणु त्रिज्या अधिक (118 pm) होती है। इसलिए इलेक्ट्रॉनों का निष्कासन सरलतापूर्वक हो जाता है। सिलिकन से जर्मेनियम तक आयनन एन्थैल्पी में कमी प्रघटनीय नहीं होती; क्योंकि तत्वों के परमाणु आकार एकसमान रूप से बढ़ते हैं।

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प्रश्न 11.24
Al की तुलना में Ga की कम परमाणवीय त्रिज्या को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
समूह में नीचे जाने पर प्रत्येक क्रमागत सदस्य में इलेक्ट्रॉनों का एक कोश जुड़ता है। आंतरिक कोड के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास यह देखा जा सकता है कि Ga में उपस्थित 10d इलेक्ट्रॉन बढ़े हुए नाभिकीय आवेश की तुलना में बाह्य इलेक्ट्रॉनों पर दुर्बल परीक्षण प्रभाव डाले हैं। फलत: Ga की परमाणवीय त्रिज्या AI की तुलना में कम होती है।

प्रश्न 11.25
अपररूप क्या होता है? कार्बन के दो महत्त्वपूर्ण अपररूप हीरा तथा ग्रेफाइट की संरचना का चित्र बनाइए। इन दोनों अपररूपों के भौतिक गुणों पर संरचना का क्या प्रभाव पड़ता है।
उत्तर:
अपररूप:
प्रकृति में शुद्ध कार्बन दो रूपों में पाया जाता है:
हीरा तथा ग्रेफाइट। यदि हीरे अथवा ग्रेफाइट को वायु में अत्यधिक गर्म किया जाए तो यह पूर्ण ग्रेफाइट की समान मात्रा दहन की जाती है, तब कार्बन डाइ-ऑक्साइड की बराबर मात्रा उत्पन्न होती है तथा कोई अवशेष नहीं बचता। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि हीरा तथा ग्रेफाइट रासायनिक रूप से एकसमान है तथा केवल परमाणु से बने हैं। इनके भौतिक गुण अत्यधिक भिन्न होते हैं। अतः प्रकार के गुणों को प्रदर्शित करने वाले तत्त्वों को अपररूप कहते हैं।

हीरा:
हीरा में क्रिस्टलीय जालक होता है। इसमें प्रत्येक परमाणु sp3 – संकरित होता है तथा चतुष्फलकीय ज्यामिति से अन्य चार कार्बन परमाणु से जुड़ा रहता है। इसमें कार्बन-कार्बन बन्ध लम्बाई 154 pm होती है। कार्बन परमाणु द्विक (space) में दृढ़ त्रिविमीय जालक (rigid three dimensional network) का निर्माण करते हैं।

इस संरचना में सम्पूर्ण जालक में दिशात्मक सहसंयोजक बन्ध उपस्थित रहते हैं। इस प्रकार विस्तृत सहसंयोजक बन्ध को तोड़ना कठिन कार्य होता है। अतः हीरा पृथ्वी पर पाया जाने वाला सर्वाधिक कठोर पदार्थ है। इसका उपयोग धार तेज करने के लिए अपघर्षक (abrasive) के रूप में, रूपदा (dies) बनाने में तथा विद्युत-प्रकाश लैम्प में टंगस्टन तन्तु (filament) बनाने में होता है।
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चित्र-हीरे की संरचना।

ग्रेफाइट ग्रेफाइट की परतीय संरचना (layered structure) होती है। ये पर्ते वान्डरवाल बल द्वारा जुड़ी रहती हैं। इस कारण ग्रेफाइट चिकना (slippery) तथा मुलायम (soft) होता है। दो पर्तों के मध्य की दूरी 340pm होती है। प्रत्येक पर्त में कार्बन परमाणु षट्कोणीय वलय (hexagonal rings) के रूप में व्यवस्थित होते हैं, जिसमें C – C बन्ध लम्बाई 141.5pm होती है। षट्कोणीय वलय में प्रत्येक परमाणु (sp2) संकरित होता है।

प्रत्येक कार्बन परमाणुओं से तीन सिग्मा बन्ध बनाता है। इसका चौथा इलेक्ट्रॉन π – बन्ध बनता है। सम्पूर्ण परत में इलेक्ट्रॉन विस्थानीकृत होते हैं। इलेक्ट्रॉन गतिशील होते हैं; अत: ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है। उच्च ताप पर जिन मशीनों में तेल का प्रयोग स्नेहक (lubricant) के रूप में नहीं हो सकता है, उनमें ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक का कार्य करता है।
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प्रश्न 11.26
(क) निम्नलिखित ऑक्साइड को उदासीन, अम्लीय, क्षारीय तथा उभयधर्मी ऑक्साइड के रूप में वर्गीकृत कीजिए –
CO, B2O3, SiO2, CO2, Al2O3, PbO2, Tl2O3
(ख) इनकी प्रकृति को दर्शाने वाली रासायनिक अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
(क) उदासीन ऑक्साइड : Co
अम्लीय ऑक्साइड : SiO2, CO2, B2O3
क्षारीय ऑक्साइड : Tl2O3 + PbO2
उभयधर्मी ऑक्साइड : Al2O3

(ख) CO – उदासीन
B2O3 – अम्लीय
B2O3 + Cu0 → Cu(BO2)2

SiO2 – अम्लीय
SiO2 + CaO → CaSiO3

CO2 – अम्लीय
NaOH + CO2 → NaHCO3
2NaOH + CO2 → Na2CO3 + H2O

Al2O3 – उभयधर्मी
Al2O3 + 6HCl → 2AlCl3 + 3H2O
Al2O3 + 2NaOH → 2NaAlO2 + H2O

PbO2 – क्षारीय
PbO2 + HCl → PbCl4 + 2H20

Tl2O3 – क्षारीय
Tl2O3 + 8H2SO4 → Tl2(SO4)3 + 3H2O

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प्रश्न 11.27
कुछ अभिक्रियाओं में थैलियम, ऐलुमिनियम से समानता दर्शाता है, जबकि अन्य में यह समूह I के धातुओं से समानता दर्शाता है। इस तथ्य को कुछ प्रमाणों के द्वारा सिद्ध करें।
उत्तर:
थैलियम की ऐलुमिनियम से समानता (Similarities of Thallium with Aluminium):
ऐलुमिनियम अपने यौगिकों में +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। थैलियम, वर्ग-13 का अन्तिम तत्व, अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण + 3 तथा +1 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है। अतः ये धातुएँ +3 ऑक्सीकरण अवस्था में समानता रखती हैं। यद्यपि ये +1 ऑक्सीकरण अवस्था में भिन्नता दर्शाती हैं। इनमें समानता के कुछ बिन्दु निम्नलिखित हैं –

  1. दोनों का बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2np1 होता है।
  2. दोनों वायु में ऑक्साइड बनने के कारण धूमिल पड़ जाती है।
  3. Al तथा Tl दोनों के फ्लुओराइड आयनिक होते हैं तथा इनका गलनांक उच्च होता है।

थैलियम की समूह – I के धातुओं से समानता (Similarities of Thallium with group – I metals):
थैलियम + 1 ऑक्सीकरण अवस्था में समूह – I की धातुओं से समानता दर्शाता है। इनमें समानता के कुछ बिन्दु निम्नलिखित –

  1. NaOH के समान, Tl(OH) जल में विलेय होकर प्रबल क्षारीय विलयन देता है।
  2. क्षार धातुओं के समान, थैलियम (TI) ऐलुमिनियम लवणों के साथ द्विक-लवण बनाता है।
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प्रश्न 11.28
जब धातु x की क्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ की जाती है तो श्वेत अवक्षेप (A) प्राप्त होता है, जो NaOH के आधिक्य में विलेय होकर विलेय संकुल (B) बनाता है। यौगिक (A) तनु HCl में घुलकर यौगिक (C) बनाता है। यौगिक (A) को अधिक गर्म किए जाने पर यौगिक (D) बनता है, जो एक निष्कर्षित धातु के रूप में प्रयुक्त होता है। X, A, B, C तथा D को पहचानिए तथा इनकी पहचान के समर्थन में उपयुक्त समीकरण दीजिए।
उत्तर:
1. एल्यूमीनियम (X) को NaOH के साथ गर्म करने पर यह Al(OH)3 का सफेद अवक्षेप बनाता है अर्थात् यौगिक (A) बनाता है, जो NaOH के आधिक्य में घुलकर विलेय संकर (B) बनाता है।
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2. यौगिक (A) तनु HCl में घुलकर एल्यूमीनियम क्लोराइड (C) बनाता है।
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3. यौगिक (A) अर्थात् Al(OH), को गर्म करने पर ऐलुमिना (D) में बदल जाता है।
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प्रश्न 11.29
निम्नलिखित से आप क्या समझते हैं?
(क) अक्रिय युग्म प्रभाव
(ख) अपररूप
(ग) श्रृंखलन।
उत्तर:
(क) अक्रिय युग्म प्रभाव (Inert pair effect):
कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, (n-1)d10 ns2 np1 वाले तत्व में, d – कक्षक के इलेक्ट्रॉन दुर्बल परिरक्षण प्रभाव प्रस्तावित करते हैं। इसलिए ns2 इलेक्ट्रॉन नाभिक के धनावेश द्वारा अधिक दृढता से बँधे रहते हैं। इस प्रबल आकर्षण के परिणामस्वरूप, ns2 इलेक्ट्रॉन युग्मित रहते हैं तथा बन्ध में भाग नहीं लेते हैं अर्थात् अक्रिय रहते हैं। यह प्रभाव अक्रिय युग्म प्रभाव कहलाता है। इस स्थिति में, ns2np1 विन्यास में, तीन इलेक्ट्रॉनों में से केवल एक इलेक्ट्रॉन बन्ध-निर्माण में भाग लेता है।

(ख) अपररूप (Allotropes):
किसी तत्व का समान रासायनिक अवस्था में दो या अधिक भिन्न-रूपों में पाया जाना अपररूपता कहलता है। तत्व के ये विभिन्न रूप अपररूप कहलाते हैं। किसी तत्व के सभी अपररूपों के समान रासायनिक गुण होते हैं, परन्तु इनके भौतिक गुणों में अन्तर होता है।

(ग) श्रृंखलन (Catenation):
कार्बन में अन्य परमाणुओं के साथ सहसंयोजक बन्ध द्वारा जुड़कर लम्बी श्रृंखला या वलय बनाने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को श्रृंखलन कहते हैं। C – C बन्ध अधिक प्रबल होने के कारण ऐसा होता है।

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प्रश्न 11.30
एक लवण x निम्नलिखित परिणाम देता है –
(क) इसका जलीय विलयन लिटमस के प्रति क्षारीय होता है।
(ख) तीव्र गर्म किए जाने पर यह काँच के समान ठोस में स्वेदित हो जाता है।
(ग) जब x के गर्म विलयन में सान्द्र H2SO4 मिलाया जाता है तो एक अम्ल Z का श्वेत क्रिस्टल बनता है।
उपरोक्त अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए और X, Y तथा Z को पहचानिए।
उत्तर:
उपरोक्त परिणामों से स्पष्ट है कि लवण X बोरेक्स (Na2B4O7) है।
(क) बोरेक्स का जलीय विलयन क्षारीय प्रकृति का होता है, जो लाल लिटमस को नीला कर देता है।
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(ख) बोरेक्त तीव्र गर्म किए जाने पर यह स्वेदित हो जाता है, जो क्रिस्टलन जल के अणु खोकर ठोस (Y) बनाता है।
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(ग) बोरेक्स सान्द्र H2SO4 के साथ अभिक्रिया करने पर बोरिक अम्ल (H3BO3) बना है। जब इसे क्रिस्टलीकृत किया जाता है तो यह श्वेत क्रिस्टलों (Z) के रूप में प्राप्त है।
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प्रश्न 11.31
सन्तुलित समीकरण दीजिए –
(क) BF3 + LIH →
(ख) B2H6 + H2O →
(ग) NaH + B2H6
(घ)
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(ङ) Al + NaOH →
(च) B2H6 + NH3
उत्तर:
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प्रश्न 11.32
CO तथा CO2 प्रत्येक के संश्लेषण के लिए एक प्रयोगशाला तथा एक औद्योगिक विधि दीजिए।
उत्तर:
1. कार्बन मोनो-ऑक्साइड (CO)
प्रयोगशाला विधि:
सान्द्र H2SO4 का 273K पर फार्मिक अम्ल के द्वारा निर्जलीकरण कराने पर अल्प मात्रा में शुद्ध CO प्राप्त होती हैं।
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औद्योगिक विधि:
औद्योगिक रूप से कोक पर भाप प्रवाहित करके बनाया जाता है। इस प्रकार CO तथा N2 का मिश्रण प्राप्त होता है। इसे प्रोड्यूसर गैस कहते हैं।
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2. कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)
प्रयोगशाला विधि:
प्रयोगशाला में इसे कैल्शियम कार्बोनेट पर तनु HCl की अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है।
CaCO3 (g) + 2HCl (aq) → CaCl2 (aq) + CO2 (g) + H2O (l)

औद्योगिक विधि:
इसे चूना पत्थर को गर्म करके बनाया जाता है।
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प्रश्न 11.33
बोरेक्स के जलीय विलयन की प्रकृति कौन-सी होती है –
(क) उदासीन
(ख) उभयधर्मी
(ग) क्षारीय
(घ) अम्लीय
उत्तर:
(ग) क्षारीय।

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प्रश्न 11.34
बोरिक अम्ल के बहुलकीय होने का कारण –
(क) इसकी अम्लीय प्रकृति है।
(ख) इसमें हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति है।
(ग) इसकी एकक्षारीय प्रकृति है।
(घ) इसकी ज्यामिति है।
उत्तर:
(ख) इसमें हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति है।

प्रश्न 11.35
डाइबोरेन में बोरॉन का संक्रमण कौन-सा होता है –
(क) sp
(ख) sp2
(ग) sp3
(घ) dsp2
उत्तर:
(ग) sp3

प्रश्न 11.36
ऊष्मागतिकीय रूप से कार्बन का सर्वाधिक स्थायी रूप कौन-सा है –
(क) हीरा
(ख) ग्रेफाइट
(ग) फुलरीन्स
(घ) कोयला
उत्तर:
(ख) ग्रेफाइट।

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प्रश्न 11.37
निम्नलिखित में से समूह – 14 के तत्वों के लिए कौन-सा कथन सत्य है –
(क) +4 ऑक्सीकरण प्रदर्शित करते हैं।
(ख) +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं
(ग) M2- तथा M4- आयन बनाते हैं
(घ) M2+ तथा M4+ आयन बनाते हैं
उत्तर:
(ख) +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 11.38
यदि सलिकॉन निर्माण में प्रारम्भिक पदार्थ RSiCl3 है तो बनने वाले उत्पाद की संरचना बताइए।
उत्तर:
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Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 10.1
क्षार धातुओं के सामान्य भौतिक तथा रासायनिक गुण क्या हैं?
उत्तर:
वर्ग 1 के तत्व : क्षार धातुएँ (Elements of Group 1 : Alkali Metals):
क्षार धातुओं के भौतिक तथा रासायनिक गुणों में परमाणु-क्रमांक के साथ एक नियमित प्रवृति पाई जाती है। इन तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणों की व्याख्या निम्नलिखित हैं –

भौतिक गुण (Physical Properties):
क्षार धातु-परिवार के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण भौतिक गुण सारणी-1 में सूचीबद्ध है।

सारणी-1 : क्षार धातुओं के भौतिक गुण (Physical Properties of the Alkali Metals):
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

1. परमाणु त्रिज्या (Atomic radii):
क्षार धातुओं की परमाणु त्रिज्या (धात्विक त्रिज्या का मान अपने आवर्तों में सबसे अधिक होता है तथा ये मान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते जाते हैं। किसी परमाणु के नाभिक के केन्द्र से संयोजकता कोश में उपस्थित बाह्यतम इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी परमाणु त्रिज्या कहलाती है। क्षार धातुएँ, आवर्त का प्रथम तत्व होते हुए, सर्वाधिक परमाणु त्रिज्या रखती है, चूँकि इनके संयोजकता कोश में केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है। परिणामस्वरूप नाभिक के साथ आकर्षण बल का परिमाण न्यूनतम होता है।

वर्ग में नीचे जाने पर इलेक्ट्रॉन कोशों की क्रमिक वृद्धि के कारण परमाणु त्रिज्या बढ़ती है। इसके अतिरिक्त आवरण प्रभाव का परिमाण भी बढ़ता है जो परमाणु के नाभिक के साथ संयोजी 5-इलेक्ट्रॉनों के आकर्षण को कम कर देता है, इसके साथ-साथ नाभिकीय आवेश भी बढ़ता है जो नाभिक तथा इलेक्ट्रॉनों के मध्य आकर्षण को बढ़ा देता है। परन्तु इसका परिमाण आवरण प्रभाव की तुलना में अत्यन्त कम होता है। इस प्रकार परमाणु आकार पर कुल परिमाण द्वारा यह प्रेक्षित होता है – कि वर्ग में नीचे जाने पर तत्वों के परमाणु आकार बढ़ते हैं।

2. आयनिक त्रिज्या (Ionic radii):
क्षार धातु परमाणु संयोजी s (ns1)इलेक्ट्रॉन खोकर एकल-संयोजी धनायन बनाते हैं। ये धनायनी त्रिज्या मूल परमाणु की तुलना में छोटी होती हैं। सारणी-1 के अनुसार आयनिक त्रिज्या के मान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते हैं। चूँकि एकलसंयोजी धनायनों का निर्माण परमाण के संयोजकता कोश में उपस्थित केवल एक इलेक्ट्रॉन के निष्कासन पर होता है; अतः शेष इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक द्वारा अधिक आकर्षित होकर उसके समीप हो जाते हैं। परिणामस्वरूप धनायनों का आकार कम हो जाता है। जैसा कि आयनों का आकर अपने मूल परमाणुओं से सम्बद्ध होता है; इसलिए आयनिक त्रिज्या भी परमाणु त्रिज्या के समान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ती है।

3. आयनन एन्थैल्पी (Ionisation enthalpies):
गैसीय अवस्था में किसी उदासीन विलगित परमाणु से सर्वाधिक शिथिल बद्ध (loosely bound) इलेक्ट्रॉन हटाने के लिए आवश्यक ऊर्जा की न्यूनतम मात्रा, आयनन एन्थैल्पी कहलाती है। इसे kJ mol-1 या eV इकाइयों में व्यक्त किया जा सकता है।

1eV = 96.472kJmol-1

क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी अपने आवर्तों में न्यूनतम होती है तथा वर्ग में नीचे जाने पर यह घटती है। इन तत्वों के प्रथम आयनन ऊर्जा के मान सारणी-1 में दिए गए हैं। क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी के मान कम होने का कारण इनका परमाणु आकार अधिक होना है जिसके कारण संयोजी s-इलेक्ट्रॉन (ns1) को सरलता से निकाला जा सकता है। आयनन एन्थैल्पी के मान वर्ग में नीचे जाने पर भी घटते हैं; क्योंकि परमाणु त्रिज्या के बढ़ने तथा आवरण प्रभाव का परिमाण अधिक होने पर नाभि के आकर्षण बल का परिमाण घट जाता है। इसके अतिरिक्त एक ही तत्व के लिए प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों में बहुत अधिक अन्तर होता है।

उदाहरणार्थ-सोडियम के लिए प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान 496kJmol-1 है, जबकि इसकी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी का मान 4562kJmol-1 है। इसका प्रमुख कारण है कि एक इलेक्ट्रॉन खोकर बनने वाला एकलसंयोजी धनायन (M+) उच्च सममिताकार तथा समीपवर्ती उत्कृष्ट गैस की स्थायी संरचना को प्राप्त कर लेता है। परिणामस्वरूप दूसरे इलेक्ट्रॉन का निष्कासन अत्यन्त कठिन प्रक्रिया हो जाती है जैसा कि उपर्युक्त उदाहरण में दिए सोडियम के प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों से स्पष्ट हो जाता है।

4. विद्युत-ऋणात्मकता (Electronegativity):
किसी तत्व की विद्युत-ऋणात्मकता इसके परमाणु की इलेक्ट्रॉनों (बन्ध के साझे युग्म के लिए) को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता को कहते हैं। क्षार धातुओं की विद्युत-ऋणात्मकता कम होती है जिसका अर्थ है कि इनकी इलेक्ट्रॉन आकर्षित करने की क्षमता कम होती है। विद्युत-ऋणात्मकता के मान वर्ग में नीचे जाने पर घटते क्षार धातु परमाणुओं का ns1 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है जिसका अर्थ है कि इनकी प्रवृत्ति इलेक्ट्रॉन त्यागने की होती है न कि ग्रहण करने की। अतः इनकी विद्युत-ऋणात्मकता के मान कम होते हैं। चूँकि वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ते हैं; अतः परमाणु की संयोजी इलेक्ट्रॉन को थामे रखने की क्षमता में क्रमिक कमी आती है। इसलिए वर्ग में नीचे जाने पर विद्युत-ऋणात्मकता घटती है।

5. ऑक्सीकरण-अवस्था एवं धन विद्युती गुण (Oxidation states and electropositive characters):
क्षार धातु परिवार के सभी सदस्य अपने यौगिकों में +1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं तथा प्रबल धन-विद्युती होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर धन-विद्युती गुण बढ़ता है। क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी के मान बहुत कम होने के कारण इनके परमाणुओं में संयोजी इलेक्ट्रॉन खोकर एकलसंयोजी धनायन बनाने की प्रवृति बहुत अधिक होती है। परिमाणस्वरूप एन्थैल्पी का मान घटता है; अतः धन-विद्युती गुण बढ़ता है।
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6. धात्विक लक्षण (Metallic character):
वर्ग 1 के तत्व प्रारूपिक धातुएँ हैं तथा अत्यन्त कोमल हैं। इन्हें चाकू द्वारा सरलता से काटा जा सकता है। वर्ग में ऊपर नीचे जाने पर इनके धात्विक लक्षणों में अत्यधिक वृद्धि होती है। किसी तत्व का धानित्व गुण उसके इलेक्ट्रॉन त्याग कर धनायन बनाने की प्रवृत्ति से सम्बन्धित होता है। धात्विक बन्ध की प्रबलता इलेक्ट्रॉन समुद्र (electron sea) में उपस्थित संयोजी इलेक्ट्रॉनों तथा करनेल (kernal) के मध्य आकर्षण बल पर निर्भर करती है।

करनेल का आकार जितना छोटा होगा तथा संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या जितनी अधिक होगी, धात्विक बन्ध उतना ही प्रबल होगा। दूसरे शब्दों में धातु की कठोरता धात्विक बन्ध के प्रबल होने पर अधिक होगी। क्षार धातुओं में करनेल बड़े आकार के होते हैं तथा इनमें केवल एक संयोजी इलेक्ट्रॉन होता है। अतः क्षार धातुओं में धात्विक बन्ध दुर्बल होते हैं तथा क्षार धातुएँ कोमल होती हैं। लीथियम सबसे कठोर होता है, चूँकि इसका करनेल सबसे छोटे आकार का होता है।

7. गलनांक तथा क्वथनांक (Melting and boiling points):
क्षार धातुओं के गलनांक तथा क्वथांक अत्यन्त कम होते हैं, जो वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटते हैं। क्षार धातुओं के परमाणुओं का आकार अधिक होता है; अतः क्रिस्टल-जालक में इनकी बन्धन ऊर्जा बहुत कम होती है। परिणामस्वरूप इनके गलनांक कम होते हैं। वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार में वृद्धि के साथ-साथ गलनांक के मान घटते हैं। क्वथनांक कम होने का कारण भी यही होता है।

8. घनत्व (Density):
क्षार धातुएँ अत्यन्त हल्की होती हैं। इस परिवार के पहले तीन सदस्य जल से भी हल्के होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घनत्व बढ़ता है। क्षार धातुओं के परमाणुओं का आकार अधिक होता है; अतः वे अन्तराकाश से अधिक संकुलित (closely packed) नहीं होते हैं तथा इनका घनत्व कम होता है। वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के कारण घनत्व कम होना चाहिए; परन्तु यह बढ़ता है। चूंकि परमाणु आकार के साथ-साथ परमाणु भार भी बढ़ता है जिसका प्रभाव अधिक है; अतः घनत्व (भार/आयतन) वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ता है। इसका एक अपवाद पोटेशियम (K) है जिसका घनत्व सोडियम से कम है। इसका मुख्य कारण पोटैशियम के परमाणु आकार तथा परमाणु आयतन में असामान्य वृद्धि है।

9. जलयोजन एन्थैल्पी (Hydration enthalpy):
जलयोजन एन्थैल्पी (∆Hhyd) वह ऊर्जा है जो जलीय विलयन में आयनों के जलयोजित होने पर मुक्त होती है। क्षार धातु आयनों की जलयोजन एन्थैल्पी निम्नलिखित क्रम में होती है –
Li+ > Na+ > K+ > RB+ > Cs+

जलयोजन में आयनों तथा चारों ओर उपस्थित जल अणुओं के मध्य आकर्षण होता है। अत: आयन का आकार छोटा होने पर, इस पर आवेश का परिमाण अधिक होगा तथा इनकी जलयोजित होने की क्षमता उतनी ही अधिक होगी। क्षार धातुओं में Li+ आयन की जलयोजन एन्थैलपी सर्वाधिक होती है। इसलिए लीथियम के लवण अधिकतर जलयोजी प्रवृत्ति के होते हैं (LiCl.2H2O)

10. ज्वाला में रंग देना (Colouration to the flame):
क्षार धातुओं के यौगिकों (मुख्य रूप से क्लोराइड) को प्लैटिनम के तार पर गर्म करने पर ये ज्वाला को विशिष्ट रंग प्रदान करते हैं। उदाहरणार्थ –
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चूँकि क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी बहुत कम होती है; अत: इनके इलेक्ट्रॉनों को उच्च ऊर्जा स्तर तक उत्तेजित करना सरल होता है। जब इन धातुओं को प्लैटिनम की तार पर रखकर ज्वाला दी जाती है तो ज्वाला की ऊर्जा से इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर उच्च ऊर्जा स्तर पर पहुँच जाते हैं। पुनः जब ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर पर आते है तो विकिरण के रूप में दृश्य प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। फलस्वरूप क्षार धातुएँ ज्वाला को विशिष्ट रंग प्रदान करती हैं।

11. प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric effect):
लीथियम के अतिरिक्त सभी क्षार धातुएँ प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रदर्शित करती हैं। प्रकाश-विद्युत प्रभाव को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है-“जब किसी धातु की सतह पर निश्चित आवृत्ति की किरणें टकराती हैं तो धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होकर निकलते हैं। इसे प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहते हैं।” दूसरे शब्दों में धातु की सतह पर फोटॉन के प्रहार से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहलाता है।

प्रकाश-विद्युत प्रभाव का कारण क्षार धातुओं की न्यूनतम आयनन एन्थैल्पो है। धातु की सतह पर गिरने वाले फोटॉनों के पास इतनी ऊर्जा होती है कि वे इलेक्ट्रॉनों को धातु की सतह से उत्सर्जित कर देते हैं। चूँकि लीथियम के छोटे आकार के कारण इसकी आयनन ऊर्जा अधिक होती है; अत: इस धातु पर गिरने वाला फोटॉन नाभिक और इलेक्ट्रॉनों के बीच आकर्षण बल को कम करने में सक्षम नहीं होता है। इस प्रकार प्रकाश के दृश्य क्षेत्र में यह धातु प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रदर्शित नहीं करती।

रासायनिक गुण (Chemical Properties):
क्षार धातुएँ बड़े आकार तथा कम आयनन एन्थैल्पी के कारण अत्यधिक क्रियाशील होती हैं। इनकी क्रियाशीलता वर्ग में ऊपर से न नीचे क्रमश: बढ़ती जाती है। इस वर्ग के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण रासायनिक गुण निम्नलिखित हैं –

(1) वायु के साथ अभिक्रियाशीलता (Reactivity with air):
क्षार धातुएँ वायु की उपस्थिति में मलिन (exposed) हो जाती हैं, क्योंकि वायु की उपस्थिति में इन पर ऑक्साइड तथा हाइड्रॉसाइड की पर्त बन जाती है। ये ऑक्सीजन में तीव्रता से जलकर ऑक्साइड बनाती हैं। लीथियम और सोडियम क्रमशः मोनोक्साइड तथा परॉक्साइड का निर्माण करती हैं, जबकि अन्य धातुओं द्वारा सुपर ऑक्साइड आयन का निर्माण होता है। सुपर ऑक्साइड O2, बड़े धनायनों; जैसे – K+, Rb+ या Cs+ की उपस्थिति में स्थायी होता है।
4Li + O2 → 2Li2O (ऑक्साइड)
2Na + O2 → Na2O2 (परॉक्साइड)
M + O2 → MO2 (सुपर ऑक्साइड) (M =K,Rb,Cs)
इन सभी ऑक्साइडों में क्षार की ऑक्सीकरण अवस्था +1 होती है। लीथियम अपवादस्वरूप वायु में उपस्थित नाइट्रोजन से ‘अभिक्रिया करके नाइट्राइड, Li3 N बना लेता है। इस प्रकार लीथियम भिन्न स्वभाव दर्शाता है। क्षार धातुओं को वायु एवं जल के प्रति उनकी अति सक्रियता के कारण साधारणतया रासायनिक रूप से अक्रिय विलायकों; जैसे-किरोसिन में रखा जाता है।

(2) जल के साथ अभिक्रियाशीलता (Reactivity with water):
क्षार धातुएँ, इनके ऑक्साइड, परॉक्साइड तथा सुपर ऑक्साइड भी जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड, जो घुलनशील होते हैं तथा क्षार (alkalies) कहलाते हैं, बनाती हैं।
2Na + 2H2O → 2Na+ + 20H + H2
Li2O + H2O → 2LiOH
Na2O2 + 2H2O → 2NaOH + H2O2
2KO2 + 2H2O → 2KOH + H2O2 + O2

यद्यपि लीथियम के मानक इलेक्ट्रोड विभव (EΘ) का मान अधिकतम ऋणात्मक होता है, परन्तु जल के साथ इसकी अभिक्रियाशीलता सोडियम की तुलना में कम है, जबकि सोडियम के EΘ का मान अन्य क्षार धातुओं की अपेक्षा न्यून ऋणात्मक होता है। लीथियम के इस व्यवहार का कारण इसके छोटे आकार तथा अत्यधिक जलयोजन ऊर्जा का होना है। अन्य क्षार धातुएँ जल के साथ विस्फोटी अभिक्रिया करती हैं। चूँकि अभिक्रिया उच्च ऊष्माक्षेपी होती है तथा विमुक्त होने वाली हाइड्रोजन आग पकड़ लेती है, इसलिए क्षार धातुओं को जल के सम्पर्क में नहीं रखते। क्षार धातुएँ प्रोटॉनदाता (जैसे-ऐल्कोहॉल, गैसीय अमोनिया, ऐल्काइन आदि) से भी अभिक्रियाएँ करती हैं।

(3) डाइहाइड्रोजन से अभिक्रियाशीलता (Reactivity with dihydrogen):
लगभग 673K (लीथियम के लिए 1073K) पर क्षार धातुएँ डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया कर हाइड्राइड बनाती हैं। सभी क्षार धातुओं के हाइड्राइड रंगहीन, क्रिस्टली एवं आयनिक होते हैं। इन हाइड्राइडों के गलनांक उच्च होते हैं।
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हाइड्राइडों का आयनिक गुण Li से Cs तक बढ़ता है। क्षार धातुओं की कम आयनन एन्थैल्पी के कारण इनके परमाणु सरलता से संयोजी इलेक्ट्रॉन खोकर आयनिक हाइड्राइड (M+H) बनाते हैं। चूँकि आयनन एन्थैल्पी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटती है; अत: धनात्मक आयन बनाने की प्रवृत्ति उसी अनुसार बढ़ती है। इसलिए हाइड्राइडों का आयनिक गुण भी बढ़ता है।

(4) हैलोजेन से अभिक्रियाशीलता (Reactivity with halogens):
क्षार धातुएँ हैलोजेन से शीघ्र प्रबल अभिक्रिया करके आयनिक ऑक्साइड हैलाइड M+ X बनाती हैं।
2M + X2 → 2M+X
यद्यपि लीथियम के हैलाइड आंशिक रूप से सहसंयोजक होते हैं। इसका कारण लीथियम की उच्च ध्रुवण-क्षमता है। (धनायन के कारण ऋणायन के इलेक्ट्रॉन अभ्र का विकृत होना ‘धुवणता’ (polarisation) कहलाता है।) लीथियम आयन का आकार छोटा है; अत: यह हैलाइड आयन के इलेक्ट्रॉन अभ्र को विकृत करने की अधिक क्षमता दर्शाता है। चूंकि बड़े आकार का ऋणायन आसानी से विकृत हो जाता है, इसलिए लीथियम आयोडाइड सहसंयोजक प्रकृति सबसे अधिक दर्शाते हैं। अन्य क्षार धातुएँ आयनिक प्रवृत्ति की होती हैं। इनके गलनांक तथा क्वथनांक उच्च होते हैं। गलित हैलाइड विद्युत के सुचालक होते हैं। इनके प्रयोग क्षार धातुएँ बनाने में किया जाता है।

(5) अपचायक प्रकृति (Reducing nature):
क्षार धातुएँ प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करती हैं, जिनमें लीथियम प्रबलतम एवं सोडियम दुर्बलतम अपचायक है। मानक इलेट्रोड विभव (EΘ), जो अपचायक क्षमता का मापक है, सम्पूर्ण परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है –
M(s) →M(g) ऊर्ध्वपातन एन्थैल्पी
M(g) → M+ (g) + e
M+ (g) + H2O → M+ (aq) जलयोजन एन्थैल्पी
स्पष्ट है कि EΘ का मान जितना कम होगा अपचायक गुण उतना ही अधिक होगा। लीथियम आयन का आकार छोटा होने के कारण इसकी जलयोजन एन्थैल्पी का मान अधिकतम होता है, जो इसके उच्च ऋणात्मक E मान तथा इसके प्रबल अपचायक होने की पुष्टि करता है।

(6) द्रव अमोनिया में विलयन (Solution in liquid ammonia):
क्षार धातुएँ द्रव अमोनिया में घुलनशील हैं। अमोनिया में इनके विलयन का रंग गहरा नीला होता है एवं विलयन प्रकृति में विद्युत का सुचालक होता है।
M + (x + y)NH3 → [M(NH3)x] + [e(NH3)y] विलयन का नीला रंग अमोनीकृत इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है, जो दृश्य प्रकाश क्षेत्र की संगत ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं। अमोनीकृत विलयन अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है, जो कुछ समय पड़े रहने पर हाइड्रोजन को मुक्त करता है। फलस्वरूप विलयन में ऐमाइड बनता है।
M+ (am) + e + NH3 (l) → MNH2 (am) + 1/2H2 (g)
जहाँ ‘am’ अमोनीकृत विलयन दर्शाता है। सान्द्र विलयन में नीला रंग ब्रॉन्ज रंग में बदल जाता है और विलयन प्रतिचुम्बकीय (diamagnetic) हो जाता है।

(7) सल्फर तथा फॉस्फोरस के साथ अभिक्रिया (Reaction with sulphur and phosphorus):
क्षार धातुएँ सल्फर तथा फॉस्फोरस से गर्म करने पर अभिक्रिया करके सम्बन्धित सल्फाइड तथा फॉस्फाइड बनाती हैं।
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सोडियम फॉस्फाइड सल्फाइड तथा फॉस्फाइड दोनों जल द्वारा जल अपघटित हो जाते हैं।
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प्रश्न 10.2
क्षारीय मृदा धातुओं के सामान्य अभिलक्षण एवं गुणों में आवर्तिता की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
वर्ग 2 के तत्व :क्षारीय मृदा धातुएँ (Elements of Group 2 : Alkaline Earth Metals):
आवर्त सारणी के वर्ग 2 के तत्व हैं – बेरिलियम (Be), मैग्नीशियम (Mg), कैल्सियम (Ca), स्ट्रॉन्शियम (Sr), बेरियम (Ba) एवं रेडियम (Ra) बेरिलयम के अतिरिक्त अन्य तत्व संयुक्त रूप में मृदा धातुएँ’ कहलाती हैं। प्रथम तत्व बेरिलियम वर्ग के अन्य तत्वों से भिन्नता दर्शाता है एवं ऐलुमिनियम के साथ विकर्ण सम्बन्ध (diagonal relationship) दर्शाता है। वर्ग का अन्तिम तत्व रेडियम रेडियोऐक्टिव प्रकृति का है। इन तत्वों को विशिष्ट नाम निम्नलिखित कारणों से दिया जाता है –

  1. इन तत्वों के ऑक्साइड क्षार धातुओं के समान जल में घुलकर हाइड्रॉसाइड अथवा क्षार बनाते हैं।
  2. “मृदा” नाम इन्हें इसलिए दिया गया; क्योंकि ऐलुमिना (Al2O3) जैसे पदार्थ ऊष्मा के प्रति अधिक स्थायी होते हैं।

कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियम तथा बेरियम के ऑक्साइड भी ऊष्मा के प्रति स्थायी होते हैं तथा अत्यधिक गर्म किए जाने पर भी अपघटित नहीं होते। ये धातु ऑक्साइड तथा धातुएँ भी क्षारीय मृदा कहलाती हैं।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration):
इन तत्वों के संयोजकता-कोश के s – कक्षक में 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इनका सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (उत्कृष्ट गैस) ns2 होता है। क्षार धातुओं के सामन ही इनके यौगिक भी मुख्यतः आयनिक प्रकृति के होते हैं।
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क्षारीय मृदा धातुओं के सामान्य अभिलक्षण तथा गुणों में आवर्तिता इनके भौतिक तथा रासायनिक गुणों से स्पष्ट होती है। इनकी विवेचना निम्नवत् है –

भौतिक गुण (Physical Properties):
क्षारीय मृदा धातु-परिवार के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण भौतिक गुण सारणी-2 में सूचीबद्ध हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

1. परमाण्वीय एवं आयनिक त्रिज्या (Atomic and ionic radii):
आवर्त सारणी के संगत आवर्तों में क्षार धातुओं की तुलना में क्षारीय मृदा धातुओं की परमाण्वीय एवं आयनिक त्रिज्याएँ छोटी होती हैं। ये वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ती हैं। इसका कारण इन तत्वों के नाभिकीय आवेशों में वृद्धि होना है।

2. आयनन एन्थैल्पी (Ionisation enthalpies):
क्षारीय मृदा धातुओं के परमाणुओं के बड़े आकार के कारण इनकी आयनन एन्थैल्पी के मान न्यून होते हैं। चूँकि वर्ग में आकार ऊपर से नीचे क्रमश: बढता जाता है; अतः इनकी आयनन एन्थैल्पी के मान कम होते जाते हैं जैसा कि सारणी में स्पष्ट है। क्षारीय मृदा धातुओं के प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान क्षार धातुओं के प्रथम आयनन एन्थैल्पी के मानों की तुलना में अधिक है। यह इनकी क्षार धातुओं की संगत तुलनात्मक रूप से छोटे आकार होने के कारण होती है, परन्तु इनके द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मान क्षार धातुओं के द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों की तुलना में कम हैं।

उदाहरणार्थ:
Mg के प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान Na से अधिक है जिसका कारण Mg का छोटा आकार तथा सममिताकार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है। परन्तु एक इलेक्ट्रॉन खोकर Na+ आयनन उत्कृष्ट गैस निऑन का विन्यास (1s2, 2s2 2p6 प्राप्त कर लेता है, जबकि Mg के संयोजकता कोश में अभी भी एक इलेक्ट्रॉन शेष रह जाता है (1s2, 2s2 2p6, 3s1)। सोडियम के द्वितीयक आयनन एन्थैल्पी का उच्च मान इसके सममितकार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के कारण होता है।

3. जलयोजन एन्थैल्पी (Hydration enthalpy):
क्षार धातुओं के समान इसमें भी वर्ग में ऊपर से नीचे आयनिक आकार बढ़ने पर इनकी जलयोजन एन्थैल्पी के मान कम होते जाते हैं।
Be2+ > Mg2+ > Ca2+ > Sr2+ > Ba2+

क्षारीय मृदा धातुओं की जलयोजन एन्थैल्पी क्षार धातुओं की जलयोजन एन्थैल्पी की तुलना में अधिक होती है। इसीलिए मृदा धातुओं के यौगिक क्षार धातुओं के यौगिकों की तुलना में अधिक जलयोजित होते हैं, जैसे –
MgCl2 एवं CaCl2 जलयोजित अवस्था MgCl2.6H2O एवं CaCl2.6H2O में पाए जाते हैं, जबकि NaCl एवं KCl ऐसे हाइड्रेट नहीं बनाते हैं।

4. धात्विक गुण (Metallic character):
क्षारीय मृदा धातुएँ सामान्यतया चाँदी की भाँति सफेद चमकदार एवं नर्म, परन्तु अन्य धातुओं की तुलना में कठोर होती हैं। बेरिलियम तथा मैग्नीशियम लगभग धूसर रंग (greyish) के होते हैं। क्षारीय मृदा धातुओं में समान आवर्त में उपस्थित क्षार धातुओं की तुलना में प्रबल धात्विक बन्ध होते हैं। उदाहरणार्थ-मैग्नीशियम, सोडियम की तुलना में अधिक कठोर तथा सघन होता है।

5. गलनांक तथा क्वथनांक (Melting and boiling points):
इनके गलनांक एवं क्वथनांक क्षार धातुओं की तुलना में उच्च होते हैं; क्योंकि इनके आकार छोटे होने के कारण ये निबिड़ संकुलित (closely packed) होते हैं तथा इनमें प्रबल धात्विक बन्ध होते हैं। फिर भी इनके गलनांकों तथा क्वथनांकों में कोई नियमित परिवर्तन नहीं दिखता है।

6. धन-विद्युती गुण (Electro-positive character):
निम्न आयनन एन्थैल्पी के कारण क्षारीय मृदा धातुएँ प्रबल धन-विद्युती होती हैं। धन-विद्युती गुण ऊपर से नीचे Be से Ba तक बढ़ता है।

7. ज्वाला को रंग प्रदान करना (Colouration to the flame):
कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियम एवं बेरियम ज्वाला को क्रमश: ईंट जैसा लाल (brick red) रंग, किरमिजी लाल (crimson red) एवं हरा (apple green) रंग प्रदान करते हैं। ज्वाला में उच्च ताप पर वाष्प-अवस्था में क्षारीय मृदा धातुओं के बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा-स्तर पर चले जाते हैं। ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन जब पुनः अपनी तलस्थ अवस्था में लौटते हैं, तब दृश्य प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सार्जित होती है। परिणामस्वरूप ज्वाला रंगीन दिखने लगती है।

बेरिलियम तथा मैग्नीशियम के बाह्यतम कोशों के इलेक्ट्रॉन इतनी प्रबलता से बँधे रहते है कि ज्वाला की ऊर्जा द्वार इनका उत्तेजित होना कठिन हो जाता है। अतः ज्वाला में इन धातुओं का अपना कोई अभिलाक्षणिक रंग नहीं होता है। गुणात्मक विश्लेषण में Ca, Sr एवं Ba मूलकों की पुष्टि ज्वाला-परीक्षण के आधार पर की जाती है तथा इनकी सान्द्रता का निर्धारण ज्वाला प्रकाशमापी द्वारा किया जाता है। क्षारीय मृदा धातुओं की क्षार धातुओं की तरह विद्युत एवं ऊष्मीय चालकता उच्च होती है। यह इनका अभिलाक्षणिक गुण होता है।

सारणी-2 : क्षारीय मृदा धातुओं के परमाण्वीय एवं भौतिक गुण (Atomic and Physical Properties of the Alkaline Earth Metals):
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8. विद्युत-ऋणात्मकता (Electronegtativity):
क्षारीय मृदा धातुओं के विद्युत-ऋणात्मकता मान क्षार धातुओं के लगभग समान होते हैं (कुछ अधिक)। विद्युत-ऋणात्मकता मान बेरिलियम से रेडियम तक घटते हैं तथा आयनिक यौगिक बनाने की प्रवृति में वृद्धि व्यक्त करते हैं। बेरिलियम का उच्च विद्युतऋणात्मकता मान (1.5) प्रदर्शित करता है कि यह धातु आयनिक यौगिक बनाती है।

रासायनिक गुण (Chemical Properties):
क्षारीय मृदा धातुएँ क्षार धातुओं से कम क्रियाशील होती हैं। _इन तत्वों की अभिक्रियाशीलता वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ती है –

(1) वायु एवं जल के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with air and water):
बेरिलियम एवं मैग्नीशियम गतिकीय रूप से ऑक्सीजन तथा जल के प्रति निष्क्रिय हैं; क्योंकि इन धातुओं के पृष्ठों (surfaces) पर ऑक्साइड की फिल्म जम जाती है। फिर भी, बेरिलियम चूर्ण रूप में वायु में जलने पर BeO एवं Be3N2 बना लेता है। मैग्नीशियम अधिक धनविद्युतीय है, जो वायु में अत्यधिक चमकीले प्रकाश के साथ जलते हुए MgO तथा Mg3N2 बना लेता है। कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियम एवं बेरियम वायु से शोघ्र अभिक्रिया करके ऑक्साइड तथा नाइट्राइड बनाते हैं। ये जल से और भी अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करते है; यहाँ तक कि ठण्डे जल से अभिक्रिया कर हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं।

(2) हैलोजेन के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with halogens):
सभी क्षारीय मृदा धातुएँ हैलोजन के साथ उच्च ताप पर अभिक्रिया करके हैलाइड बना लेती हैं –
M + X2 → MX2 (X = F, Cl, Br, I)
BeF2 बनाने की सबसे सरल विधि (NH4), BeF4 का तापीय अपघटन है, जबकि BeCl2, ऑक्साइड से सरलतापूर्वक बनाया जा सकता है –
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इन धातुओं के ऑक्साइडों, हाइड्रॉक्साइडों तथा कार्बोनेटों पर हैलोजेन अम्लों (HX) की प्रतिक्रिया द्वारा भी हैलाइड बनाए जा सकते हैं।
M + 2HX → MX2 + H2
MO + 2HX → MX2 + H2O
M(OH)2 + 2HX → MX2 + 2H2O
MCO3 + 2HX → MX2 + H2O + CO2

(3) हाइड्रोजन के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with dihydrogen):
बेरिलियम के अतिरिक्त सभी क्षारीय मृदा धातुएँ गर्म करने पर डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया करके हाइड्राइड बनाती हैं।
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BeH2 को BeCl2 एवं LiAlH4 की अभिक्रिया से बनाया – जा सकता है –
2BeCl2 + LiAlH4 → 2BeH2 + LiCl + AlCl3

BeH2 तथा MgH2 प्रवृत्ति में सहसंयोजी होते हैं, जबकि अन्य धातुओं के हाइड्राइडों की आयनिक संरचना होती है। आयनिक हाइड्राइड; जैसे – CaH2 (यह हाइड्रोलिथ भी कहलाता है।) जल से क्रिया करके डाइहाइड्रोजन गैस मुक्त करता है।
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(4) अम्लों के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with acids):
क्षारीय मृदा धातुएँ शीघ्र ही अम्लों से अभिक्रिया कर डाइहाड्रोजन गैस मुक्त करती हैं।
M + 2HCl → MCl2 + H2

(5) अपचायक प्रकृति (Reducing nature):
प्रथम वर्ग की धातुओं के समान क्षारीय मृदा धातुएँ प्रबल अपचायक हैं। इसका बोध इनके अधिक ऋणात्मक अपचयन विभव के मानों से होता है। यद्यपि इनकी अपचयन-क्षमता क्षार धातुओं की तुलना में कम होती है। बेरिलियम के अपचयन विभव का मान अन्य क्षारीय मृदा धातुओं से कम ऋणात्मक होता है फिर भी इसकी अपचयन-क्षमता का कारण Be2+ आयन के छोटे आकार, इसकी उच्च जलयोजन ऊर्जा एवं धातु की उच्च परमाण्वीयकरण ‘एन्थैल्पी का होना है।

(6) द्रव अमोनिया में विलयन (Solution in liquid ammonia):
क्षार धातुओं की भाँति क्षारीय मृदा धातुएँ भी द्रव अमोनिया में विलेय होकर गहरे नीले-काले रंग का विलयन बना लेती हैं। इस वियलन से धातुओं के अमोनीकृत आयन प्राप्त होते है –
M + (x + y)NH3 → [M(NH3)x]2+ + 2[e(NH3)y]
इन विलयनों से पुन: अमोनिएट्स (ammoniates) [M(NH3)6]2+ प्राप्त किए जा सकते हैं।

(7) कार्बोनेटों का बनना (Formation of carbonates):
धातु के हाइड्रॉक्साइडों के जलीय विलयनों में CO2 की वाष्प की सीमित मात्रा प्रवाहित करने पर धातुओं के कार्बोनेट सफेद अवक्षेप के रूप में प्राप्त किए जा सकते हैं।
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प्रश्न 10.3
क्षार धातुएँ प्रकृति में क्यों नहीं पाई जाती हैं?
उत्तर:
क्षार धातुएँ प्रबल धन विद्युती तथा कम आयनन एन्थैल्पी गुण के कारण अधिक क्रियाशील होती हैं। ये अन्य तत्वों के साथ संयुक्त अवस्था में पाई जाती हैं। अत: ये प्रकृति में नहीं पाई जाती हैं।

प्रश्न 10.4
Na2O2 में सोडियम की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माना Na2O2 में Na की आ०सं० x है।
∴ 2x + 2(-1) = 0
या 2x = 2 या x = +1

प्रश्न 10.5
पोटैशियम की तुलना में सोडियम कम अभिक्रियाशील क्यों है? बताइए।
उत्तर:
चूँकि पोटैशियम की तुलना में सोडियम की आयन एन्थैल्पी कम है, अतः सोडियम पोटैशियम अधिक धन-विद्युती तथा प्रबल अपचायक हैं। सोडियम की तुलना में पोटैशियम जल से अधिक तीव्रता से क्रिया करता है। अतः पोटैशियम की तुलना में सोडियम कम अभिक्रियाशील है।

प्रश्न 10.6
निम्नलिखित के सन्दर्भ में क्षार धातुओं एवं क्षारीय मृदा धातुओं की तुलना कीजिए –
(क) आयनन एन्थैल्पी
(ख) ऑक्साइडों की क्षारकता
(ग) हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता।
उत्तर:
(क) आयनन एन्थैल्पी (lonisation enthaply):
क्षारीय मृदा धातुओं (वर्ग 2) की आयनन एन्थैल्पी समान आवर्त में उपस्थित क्षार धातुओं (वर्ग 1) की तुलना में अधिक होती है। इसका कारण क्षारीय मृदा धातुओं के परमाणुओं का छोटा आकार तथा अधिक सममिताकार विन्यास है।

उदाहरणार्थ –
सोडियम (Na) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी = 496 kJmol-1
मैग्नीशियम (Mg) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी = 737 kJmol-1

(ख) ऑक्साइडों की क्षारकता (Basicity of oxides):
क्षार धातुओं के ऑक्साइड समान आवर्त में उपस्थित क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइडों की तुलना में प्रबल क्षारक होते हैं। उदाहरणार्थ-जब Na2O को जल में घोला जाता है, NaOH प्राप्त होता है जो एक प्रबल क्षारक है, जबकि MgO को जल में घोलने पर दुर्बल क्षारक, Mg(OH2) प्राप्त होता है।

(ग) हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता (Solubility of hydroxides):
क्षार धातु हाइड्रॉसाइड समान आवर्त में उपस्थित क्षारीय मृदा धातु हाइड्रॉसाइड की तुलना में जल में अधिक विलेय होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि क्षारीय मृदा धातुओं के हाइड्रॉक्साइडों की जालक ऊर्जा (lattice energy) क्षार धातुओं के हाइड्रॉक्साइडों की तुलना में उच्च होती है।

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प्रश्न 10.7
लीथियम किस प्रकार मैग्नीशियम से रासायनिक गुणों में समानताएँ दर्शाता है?
उत्तर:
लीथियम तथा मैग्नीशियम के रासायनिक गुणों में समानताएँ –
1. लीथियम तथा मैग्नीशियम दोनों के कार्बोनेट गर्म करने पर अपघटित हो जाते हैं।
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2. दोनों नाइट्रोजन में जलकर नाइट्राइड बनाते हैं।
6Li + N2 → 2Li3N
3Mg + N2 → Mg3M2

3. LiCl तथा MgCl2 दोनों ही प्रस्वेद्य यौगिक हैं। ये जलीय विलयन में LiCl.2H2O तथा MgCl2. 8H2O के रूप में क्रिस्टलीकरण होते हैं।

प्रश्न 10.8
क्षार धातुएँ तथा क्षारीय मृदा धातुएँ रासायनिक अपचयन विधि से क्यों नहीं प्राप्त की जा सकती हैं? समझाइए।
उत्तर:
क्षार धातुएँ तथा क्षारीय मृदा धातुएँ परिवार के प्रबल अपचायक होते हैं, अतः इनके ऑक्साइडों को साधारण अपचायकों; जैसे-कार्बन (कोक), जिंक आदि की अभिक्रिया द्वारा अपचयित नहीं किया जा सकता है। इनके लवणों को गलित अवस्था में विद्युत-अपघटन कराने पर किया जा सकता है।

प्रश्न 10.9
प्रकाश-विद्युत सेल में लीथियम के स्थान पर पोटैशियम एवं सीजियम क्यों प्रयुक्त किए जाते हैं?
उत्तर:
लीथियम की आयनन एन्थैल्पी अत्यन्त उच्च होती है। इस कारण प्रकाश के फोटॉन लीथियम धातु की सतह से इलेक्टॉन निष्कासित नहीं कर पाते हैं। अतः लीथियम धातु को प्रयोग करने पर प्रकाश-विद्युत प्रभाव नहीं देखा जाता है। पोटैशियम तथा सीजियम की आयनन एन्थैल्पी अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए जब निश्चित न्यूनतम आवृत्ति के फोटॉन इन धातुओं की सतह से टकराते हैं तो इन धातुओं की सतह से इलेक्ट्रॉन सरलता से उत्सर्जित हो जाते हैं। इस कारण प्रकाश-विद्युत सेल में लीथियम के स्थान पर पोटैशियम एवं सीजियम प्रयुक्त किए जाते हैं।

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प्रश्न 10.10
जब एक क्षार धातु को द्रव अमोनिया में घोला जाता है, तब विलयन विभिन्न रंग प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार के रंग-परिवर्तन का कारण बताइए।
उत्तर:
क्षार धातुएँ द्रव अमोनिया में घुलनशील हैं अमोनिया में इनके विलयन का रंग गहरा नीला होता है एवं विलयन प्रकृति में विद्युत का सुचालक होता है –
M + (x + y)NH3 → [M(NH3)x]+ + [e(NH3)y]
विलयन का नीला रंग अमोनीकृत इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है, जो दृश्य प्रकाश क्षेत्र की संगत ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं। अमोनीकृत विलयन अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है, जो कुछ समय पड़े रहने पर हाइड्रोजन को मुक्त होता है। फलस्वरूप विलयन में ऐमाइड बनता है।
M+ (am) + e + NH3 (l) → MNH2 (am) + \(\frac{1}{2}\)H2 (g) (यहाँ ‘am’ अमोनीकृत विलयन दर्शाता है।) सान्द्र विलयन का नीला रंग ब्रॉन्ज में बदल जाता है और विलयन प्रतिचुम्बकीय हो जाता हैं।

प्रश्न 10.11
ज्वाला को बेरिलियम एवं मैग्नीशियम कोई रंग नहीं प्रदान करते हैं, जबकि अन्य क्षारीय मृदा धातुएँ ऐसा करती हैं, क्यों?
उत्तर:
Be तथा Mg परमाणुओं का आकार छोटा होता है। इससे इन दोनों के बाह्यतम कोशों के इलेक्ट्रॉन इतनी प्रबलता से बँधे रहते हैं जिससे ज्वाला की ऊर्जा द्वारा इनका उत्तेजित होना कठिन होता है। अतः ज्वाला को Be तथा Mg कोई रंग प्रदान नहीं करते हैं।

Be तथा Mg के अतिरिक्त क्षय मृदा धातु परिवार के अन्य सदस्य, कैल्शियम, स्ट्रॉन्शियम एवं बेरियम ज्वाला को क्रमशः ईंट जैसा लाल (brick red) रंग, किरमिची लाल (crimson red) एवं हरा (apple green) रंग प्रदान करते हैं। ज्वाला में उच्च ताप पर वाष्प-अवस्था में क्षारीय मृदा धातुओं के बाह्यतम कोश में इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तर पर चले जाते हैं। ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन जब पुन: अपनी तलस्थ अवस्था में लौटते हैं, तब दृश्य प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित होती है। फलस्वरूप ज्वाला रंगीन दिखाई देने लगती है।

प्रश्न 10.12
सॉल्वे प्रक्रम में होने वाली विभिन्न अभिक्रियाओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
नमक के विलयन (ब्राइन विलयन) को अमोनिया से संतृप्त करके इसमें CO2 गैस प्रवाहित करने पर सोडियम बाइकार्बोनेट बनता है जिसे गर्म करने पर सोडियम कार्बोनेट प्राप्त हो जाता है।
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इस प्रक्रम में NH4Cl विलयन को Ca(OH)2 की अभिक्रिया से अमोनिया को पुनः प्राप्त कर सकते हैं।
2NH4Cl + Ca(OH)2 → CaCl2 + 2H2O + 2NH3

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प्रश्न 10.13
पोटैशियम कार्बोनेट सॉल्वे विधि द्वारा नहीं बनाया जा सकता है, क्यों?
उत्तर:
चूँकि पोटैशियम बाइकार्बोनेट के जल में अधिक विलेय होने के कारण इसे KCl के संतृप्त विलयन में अमोनियम बाइकार्बोनेट के संयोग द्वारा अवक्षेपित करना सम्भव नहीं है अतः साल्वे विधि द्वारा पोटैशियम कार्बोनेट नहीं बनाया जा सकता।

प्रश्न 10.14
Li2CO3 कम ताप पर एवं Na2CO3 उच्च ताप पर क्यों विघटित होता है?
उत्तर:
गर्म करने पर Li2CO3 विघटित होने पर Li2O तथा CO2 देता है। Li+ आयन का आकार छोटा होता है जिससे Li2O के जालक को Li2CO3 के जालक से अधिक स्थायी बनाता है जबकि Na+ आयन का आकार बड़ा होने के कारण Na2O के जालक को Na2CO3 के जालक से कम स्थायी बनाता है। अतः Li2CO3 कम ताप पर और Na2CO3 अधिक ताप पर विघटित होते हैं।

प्रश्न 10.15
क्षार धातुओं के निम्नलिखित यौगिकों की तुलना क्षारीय मृदा धातुओं के संगत यौगिकों से विलेयता एवं तापीय स्थायित्व के आधार पर कीजिए –
(क) नाइट्रेट
(ख) कार्बोनेट
(ग) सल्फेट।
उत्तर:
विलेयता एवं तापीय स्थायित्व के आधार पर क्षार धातुओं के यौगिकों की तुलना क्षारीय मृदा धातुओं के संगत यौगिकों से निम्नलिखित प्रकार की जा सकती है –
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प्रश्न 10.16
सोडियम क्लोराइड से प्रारम्भ करके निम्नलिखित को आप किस प्रकार बनाएँगे?

  1. सोडियम धातु
  2. सोडियम हाइड्रॉक्साइड
  3. सोडियम परॉक्साइड
  4. सोडियम कार्बोनेट।

उत्तर:
1. सोडियम क्लोराइड से सोडियम धातु प्राप्त करना:
सोडियम क्लोराइड लवण का गलित अवस्था में विद्युत-अपघटनी अपचयन करने पर सोडियम धातु पर सोडियम धातु कैथोड पर प्राप्त होती है।
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कैथोड पर: Na+ + e → Na
ऐनोड पर: Cl → Cl + e
Cl + Cl → Cl2

2. सोडियम क्लोराइड से सोडियम हाइड्रॉक्साइड प्राप्त करना-सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन का नेलसन सेल विद्युत अपघटन पर प्राप्त होता है।
NaCl → Na+ + Cl
H2O ⇄ H+ + OH
Na+ + OH → NaOH

3. सोडियम क्लोराइड से सोडियम परॉक्साइड प्राप्त करना-सर्वप्रथम सोडियम क्लोराइड के विद्युत अपघटनी अपचयन द्वारा सोडियम प्राप्त करते हैं। फिर धातु को 573K पर ऑक्सीजन के आधिक्य के साथ नमी तथा CO2 से मुक्त वायुमण्डल में गर्म करने पर सोडियम परॉक्साइड बनता है।
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4. सोडियम क्लोराइड से सोडियम कार्बोनेट प्राप्त करना:
सर्वप्रथम सोडियम क्लोराइड के सान्द्र विलयन (लगभग 30%) CO2 में प्रवाहित करने पर सोडियम बाइकार्बोनेट का अवक्षेप प्राप्त हो जाता है।
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विलयन में Na+ आयनों की उपस्थिति में सोडियम बाइकार्बोनेट है। अवक्षेप को छानकर अलग करके गर्म करने पर सोडियम कार्बोनेट प्राप्त होता है।
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प्रश्न 10.17
क्या होता है, जब –

  1. मैग्नीशियम को हवा में जलाया जाता है –
  2. बिना बुझे चूने को सिलिका के साथ गर्म किया जाता है।
  3. क्लोरीन बुझे चुने से अभिक्रिया करती है।
  4. कैल्शियम नाइट्रेट को गर्म किया जाता है।

उत्तर:
1. मैग्नीशियम ऑक्साइड तथा मैग्नीशियम नाइट्राइड बनते हैं।
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2. कैल्शियम सिलिकेट प्राप्त होता है।
CaO + SiO2 → CasiO3

3. कैल्शियम ऑक्सी-क्लोराइड (विरंजक चूर्ण) बनता है।
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4. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन मुक्त होती है।
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प्रश्न 10.18
निम्नलिखित में से प्रत्येक के दो-दो उपयोग बताइए –

  1. कॉस्टिक सोडा
  2. सोडियम कार्बोनेट
  3. बिना बुझा चूना।

उत्तर:
1. कॉस्टिक सोडा के उपयोग –
(क) साबुन, कुछ, कृत्रिम रेशम तथा कई अन्य रसायनों के निर्माण में।
(ख) पेट्रोलियम के परिष्करण में।
(ग) प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में।

2. सोडियम कार्बोनेट के उपयोग –
(क) जल के मृदुकरण, धुलाई एवं निर्मलन में।
(ख) काँच, साबुन बोरेक्स एवं कॉस्टिक सोडा के निर्माण में।
(ग) प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में।

3. बिना बुझा चूना के उपयोग –
(क) सीमेण्ट के निर्माण के लिए प्राथमिक पदार्थ के रूप में तथा क्षार के सबसे सस्ते रूप में।
(ख) शर्करा के शुद्धिकरण में एवं रंजकों के निर्माण में।
(ग) शर्करा के शुद्धिकरण में तथा रंजकों के निर्माण में।

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प्रश्न 10.19
निम्नलिखित की संरचना बताइए –

  1. BeCl2 (वाष्प)
  2. BeCl2 (ठोस)।

उत्तर:
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प्रश्न 10.20
सोडियम एवं पोटैशियम के हाइड्रॉक्साइड एवं कार्बोनेट जल में विलेय हैं, जबकि मैग्नीशियम एवं कैल्शियम के संगत लवण जल में अल्प विलेय हैं,समझाइए।
उत्तर:
दिए गए सभी यौगिक क्रिस्टलीय ठोस हैं तथा इनकी जल में विलेयता जालक एन्थैल्पी तथा जलयोजन एन्थैल्पी दोनों के द्वारा निर्धारित होती है। सोडियम तथा पोटैशियम यौगिकों की स्थिति में जालक एन्थैल्पी का परिमाण जलयोजन एन्थैल्पी की तुलना में अत्यन्त कम होता है। चूंकि धनायनों का आकार बड़ा होता है, इसलिए सोडियम तथा पोटैशियम के यौगिक जल में तुरन्त विलेय हो जाते हैं।

यद्यपि संगत मैग्नीशियम तथा कैल्शियम यौगिकों की स्थिति में धनायनों का आकार कम होता है तथा धनावेश का परिमाण अधिक होता है। इसका अर्थ है कि इनकी जलाक ऊर्जा (एन्थैल्पी) सोडियम तथा पोटैशियम के यौगिकों की तुलना में अधिक होती है। इसलिए इन धातुओं के हाइड्रॉक्साइड तथा कार्बोनेट जल में अल्प विलेय होते हैं।

प्रश्न 10.21
निम्नलिखित की महत्ता बताइए –

  1. चूना पत्थर
  2. सीमेण्ट
  3. प्लास्टर ऑफ पेरिस।

उत्तर:
1. चूना पत्थर की महत्ता:

  • संगमरमर के रूप में भवन के निर्माण में।
  • बुझे चूने के निर्माण में।
  • कैल्शियम काबोंनेट को मैग्नीशियम कार्बोनेट के साथ लोहे जैसी धातुओं के निष्कर्षण में फ्लक्स (flux) के रूप में।
  • विशेष रूप में अवक्षेपित CaCO3 के प्रयोग से वृहद् रूप में गुणवत्ता वाले कारज के निर्माण में।
  • ऐन्टासिड, टूथपेस्ट में अपमार्जक के रूप में, च्यूइंगम के संघटक एवं सौन्दर्य प्रसाधनों में पूरक के रूप में।

2. सीमेण्ट की महत्ता:
लोहा तथा स्टील के पश्चात् सीमेण्ट ही एक ऐसा पदार्थ है, जो किसी राष्ट्र की उपयोगी वस्तुओं की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसका उपयोग कंक्रीट (concrete), प्रबलित कंक्रीट (Reinforced concrete), प्लास्टरिंग, पुल-निर्माण आदि में किया जाता है।

3. प्लास्टर ऑफ पेरिस की महत्ता प्लास्टर ऑफ पेरिस का वृहत्तर उपयोग भवन निर्माण उद्योग के साथ-साथ टूटी हुई हड्डियों के प्लास्टर में भी होता है। इसका उपयोग दन्त-चिकित्सा-अलंकरण-कार्य एवं मूर्तियों तथा अर्द्ध-प्रतिमाओं को बनाने में भी होता है।

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प्रश्न 10.22
लीथियम के लवण साधारणतया जलयोजित होते हैं, जबकि अन्य क्षार धातुओं के लवण साधारणतया निर्जलीय होते हैं, क्यों?
उत्तर:
लीथियम लवणों में Li+ आयन का आकार छोटा होता है। इस कारण ये लवण जल के साथ सम्पर्क में आने पर तुरन्त जलयोजित हो जाते हैं। परन्तु आयन क्षार धातु आयन अपेक्षाकृत बड़े आकार के होने के कारण जलयोजित नहीं होते हैं। अतः ये लवण निर्जलीय होते हैं।

प्रश्न 10.23
LiF जल में लगभग अविलेय होता है, जबकि LiCl न सिर्फ जल में, बल्कि ऐसीटोन में भी विलेय होता है। कारण बताइए।
उत्तर:
जल में LiF की अल्प विलेयता इसकी उच्च जालक एंथैल्पी के कारण होती है क्योंकि F आयन का आकार बहुत छोटा होता है। दूसरी ओर LiCl में जालक एंथैल्पी कम Cl के अपेक्षाकृत बड़े आकार के कारण होती है। इससे यह तात्पर्य है कि जलयोजन एंथैल्पी का परिमाण अधिक है। यह LiCl द्विध्रुवीय आकर्षण के कारण जल एवं ऐसीटोन दोनों में घुल जाता है।

प्रश्न 10.24
जैव-द्रवों में सोडियम, पोटैशियम मैग्नीशियम एवं कैल्शियम की सार्थकता बताइए।
उत्तर:
सोडियम एवं पोटैशियम का जैव-द्रवों में सार्थकता:
70 किग्रा भार वाले एक सामान्य व्यक्ति में लगभग 90 ग्राम सोडियम एवं 170 ग्राम पोटैशियम होता है, जबकि लोहा केवल 5 ग्राम तथा ताँबा 0.06 ग्राम होता है। सोडियम आयन मुख्यत: अन्तराकाशीय द्रव में उपस्थित रक्त प्लाज्मा जो कोशिकाओं को घेरे रहता है, में पाया जाता है। ये आयन शिरा संकेतों के संचरण में भाग लेते हैं, जो कोशिका झिल्ली में जलप्रवाह को नियमित करते हैं तथा कोशिकाओं में शर्करा और ऐमीनों अम्लों के प्रवाह को भी नियन्त्रित करते हैं।

सोडियम एवं पोटैशियम रासायनिक रूप में समान होते हुए भी कोशिका झिल्ली को पार करने की क्षमता एवं एन्जाइम को सक्रिय करने में मात्रात्मक रूप से भिन्न हैं। इसीलिए कोशिकाद्रव्य में पोटैशियम धनायन बहुतायत में होते हैं, जहाँ ये एन्जाइम को सक्रिय करते हैं तथा ग्लूकोस के ऑक्सीकरण से ATP बनने में भाग लेते हैं। सोडियम आयन शिरा-संकेतों के संचरण के लिए उत्तरदायी हैं।

कोशिका झिल्ली के अन्य भागों में पाए जाने वाले सोडियम एवं पोटैशियम आयनों की सान्द्रता से अत्यधिक भिन्नता पाई जाती है। उदाहरण के लिए-रक्त प्लाज्मा में लाल रक्त कोशिकाओं में सोडियम की मात्रा 143 mmol L-1 है, जबकि पोटैशियम का स्तर केवल 5mmol L-1 है। यह सान्द्रता 10mmol L-1 (Na+) एवं 105mmol L-1 (K+) तक परिवर्तित हो सकती है।

यह असाधारण आयनिक उतार-चढ़ाव, जिसे सोडियम-पोटैशियम पम्प कहते हैं, कोशिका झिल्ली पर कार्य करता है, जो मनुष्य की विश्रामावस्था के कुल उपभोगित ATP को एक-तिहाई से ज्यादा का उपयोग कर लेता है, जो मात्र लगभग 15 किलो जूल प्रति 24 घण्टे तक हो सकती है।

मैग्नीशियम एवं कैल्शियम की जैव द्रवों में सार्थकता:
एक वयस्क व्यक्ति में लगभग 25 ग्राम मैग्नीशियम एवं 1200 ग्राम कैल्शियम होता है, जबकि लोहा मात्रा 5 ग्राम एवं ताँबा 0.06 ग्राम होता है। मानव-शरीर में इनकी दैनिक आवश्यकता 200-300 मिग्रा अनुमानित की गई है। समस्त.एन्जाइम, जो फॉस्फेट के संचरण में ATP का उपयोग करते हैं, मैग्नीशियम का उपयोग सह-घटक के रूप में करते हैं। पौधों में प्रकाश-अवशोषण के लिए मुख्य रंजक (pigments) क्लोरोफिल में भी मैग्नीशियम होता है।

शरीर का 99% कैल्शियम दाँतों तथा हड्डियों में होता है। यह अन्तरतांत्रिकीय पेशीय कार्यप्रणाली, अन्तरतांत्रिकीय प्रेषण, कोशिका झिल्ली अखण्डता (cell membrane integrity) तथा रक्त-स्कन्दन (blood-coagulation) में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्लाज्मा में कैल्शियम की सान्द्रता लगभग 100mg L-1 होती है। दो हॉर्मोन कैल्सिटोनिन एवं पैराथायरॉइड इसे बनाए रखते हैं। चूँकि हड्डी अक्रिय तथा अपरिवर्तनशील पदार्थ नहीं है, यह किसी मनुष्य में लगभग 400 मिग्रा प्रतिदिन के अनुसार विलेयित और निक्षेपित होती है। इसका सारा कैल्शियम प्लाज्मा में से ही गुजरता है।

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प्रश्न 10.25
क्या होता है जब –

  1. सोडियम धातु को जल में डाला जाता है।
  2. सोडियम धातु को हवा की अधिकता में गर्म किया जाता है।
  3. सोडियम परॉक्साइड को जल में घोला जाता है।

उत्तर:
1. हाइड्रोजन गैस मुक्त होती है।
2Na + 2H2O → 2NaOH + H2

2. सोडियम परॉक्साइड बनाता है।
2Na + O2 → Na2O2

3. ऑक्सीजन मुक्त होती है।
2Na2O2 + 2H2O → 4NaOH + O2

प्रश्न 10.26
निम्नलिखित में से प्रत्येक प्रेक्षण पर टिप्पणी लिखिए –
(क) जलीय विलयनों में क्षार धातु आयनों की गतिशीलता Li+ < Na+ < K+ < Rb+ < Cs+ क्रम में होती है।
(ख) लीथियम ऐसी एकमात्र क्षार धातु है, जो नाइट्राइड बनाती है।
(ग) M2+ (aq) + 2e → M(S) हेतु EΘ (जहाँ M = Ca, Sr या Ba) लगभग स्थिरांक है।
उत्तर:
(क) जलीय विलयनों में क्षार धातु आयनों की गतिशीलता निम्नलिखित क्रम में होती है –
Li+ < Na+ < K+ < Rb+ < Cs+
इसे धनायनों के जल में जलयोजित होने के आधार पर समझाया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप धनायन का आकार बढ़ने पर इसकी गतिशीलता घटती है। Li+ आयन छोटे आकार के कारण अधिकतम जलयोजित होता है तथा न्यूनतम गतिशीलता रखता है, जबकि Cs+ न्यूतनम जलयोजन के कारण अधिकतम गतिशीलता रखता है।

(ख) लीथियम एक प्रबल अपचायक है; अत: यह नाइट्रोजन से सीधे संयोग करे नाइट्राइड (Li3N) बनाता है।
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(ग) क्षार धातुओं के इलेक्ट्रोड विभव (EΘ), जो M(s) से M+ (aq) तक सभी परिवर्तनों में अन्य धातुओं द्वारा प्रदर्शित अपचायक क्षमता को मापते हैं, तीन कारकों पर निर्भर करते हैं –
(a) ऊर्ध्वपातन
(b) आयनन तथा
(c) जलयोजन एन्थैल्पी। समीकरण
M2+ (aq) + 2e → M(s)
प्रदर्शित करती है कि Ca, Sr तथा Ba के मानक इलेक्ट्रोड विभव सदैव समान होते हैं।

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प्रश्न 10.27
समझाइए कि क्यों –
(क) Na2CO3 का विलयन क्षारीय होता है।
(ख) क्षार धातुएँ उनके संगलित क्लोराइडों के विद्युत-अपघटन से प्राप्त की जाती हैं।
(ग) पोटैशियम की तुलना में सोडियम अधिक उपयोगी हैं।
उत्तर:
(क) Na2CO3 का जलीय विलयन जल अपघटन पर प्रबल क्षार तथा दुर्बल अम्ल देता है।
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(ख) चूँकि क्षार धातुओं का मानक अपचयन विभव ऋणात्मक होता है, अतः क्षार धातुओं के क्लोराइड केवल गलित अवस्था में विद्युत अपघटन के रूप में से अपचयित होते हैं। अतः क्षार धातुएँ उनके संगलित क्लोराइडों के विद्युत अपघटन से प्राप्त की जाती है।

(ग) सोडियम के निम्नलिखित उपयोग हैं –

  • इसे रंजक उद्योग में प्रयुक्त करते हैं।
  • द्रव सोडियम धातु को नाभिकीय रिएक्टर में शीतलक के रूप में प्रयुक्त करते हैं।
  • इसे प्रबल अपचायक सोडियम अमलगम के रूप में प्रयुक्त करते हैं।
  • इसका उपयोग कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन सल्फर तथा हैलोजनों तत्त्वों की उपस्थिति के निर्धारण में करते हैं। पोटैशियम की जैवीय क्रियाओं में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है।

प्रश्न 10.28
निम्नलिखित के मध्य क्रियाओं के संतुलित समीकरण लिखिए –
(क) Na2CO3 एवं जल
(ख) KO2 एवं जल
(ग) Na2O एवं CO2
उत्तर:
(क) Na2CO3 + H2O → 2NaOH + H2O + CO2
(ख) 2KO2 + 2H2O → 2KOH + H2O + O2
(ग) Na2O + CO2 → Na2CO3

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

प्रश्न 10.29
आप निम्नलिखित तथ्यों को कैसे समझाएँगे –
(क) BeO जल में अविलेय है, जबकि BeSO4 विलेय है।
(ख) BaO जल में विलेय है, जबकि BaSO4 अविलेय है।
(ग) एथेनॉल में LIL, KI की तुलना में अधिक विलेय है।
उत्तर:
(क) BeO की जालक ऊर्जा BesO4 की तुलना में उच्च होती है; क्योंकि O2- आयन का आकार छोटा होता है, जबकि SO42- आयन बड़े आकार का होता है। चूंकि उच्च जालक ऊर्जा पदार्थ के जल में विलेय होने का विरोध करती है; इसलिए BeO लगभग अविलेय होता है, जबकि BeSO4 जल में विलेय होता है।

(ख) बेरियम ऑक्साइड (BaO) जल में विलेय होता है; क्योंकि इसकी जलयोजन ऊर्जा इसकी जालक ऊर्जा से अधिक होती है। दूसरी ओर BaSO4 की जालक ऊर्जा इसके द्विसंयोजी आवेशों के कारण उच्च होती है; इसलिए मुक्त होने वाली जलयोजन ऊर्जा जालक ऊर्जा से अधिक नहीं हो पाती तथा बन्ध टूट नहीं पाते हैं। इस कारण BaSO4 अविलेय होता है।

(ग) लीथियम आयोडाइड प्रवृत्ति में थोड़ा सहसंयोजी होता है। इसका कारण इसकी ध्रुवणता है (Li+ छोटे आकार के कारण सर्वाधिक ध्रुवण-क्षमता रखता है तथा आयोडाइड आयन बड़े आकार के कारण अधिकतम ध्रुवित किया जा सकता है)। Li+ आयन की जलयोजन ऊर्जा K+ आयन से अधिक होती है; अत: Li+ आयन K+ आयन से बहुत अधिक जलयोजित हो जाते हैं। इसलिए LiI, KI की तुलना में अधिक विलेय है।

प्रश्न 10.30
इसमें से किस क्षार-धातु का गलनांक न्यूनतम है?
(क) Na
(ख) K
(ग) Rb
(घ) Cs
उत्तर:
(घ) Cs

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

प्रश्न 10.31
निम्नलिखित में से कौन-सी क्षार धातु जलयोजित लवण देती है?
(क) Li
(ख) Na
(ग) K
(घ) Cs
उत्तर:
(क) Li

प्रश्न 10.32
निम्नलिखित में से कौन-सी क्षारीय मृदा धातु कार्बोनेट ताप के प्रति सबसे अधिक स्थायी है?
(क) MgCO3
(ख) CaCO3
(ग) SrCO3
(घ) BaCO3
उत्तर:
(घ) BaCO3

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन

Bihar Board Class 11 Chemistry हाइड्रोजन Text Book Questions and Answers

अभ्याम के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 9.1
हाइड्रोजन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में इसकी स्थिति को युक्तिसंगत ठहराइए।
उत्तर:
हाइड्रोजन एक विशिष्ट तत्व है, जो आवर्त सारणी के वर्ग 1 की क्षार धातुओं तथा वर्ग 17 के हैलोजेन गैसों के गुण प्रदर्शित करता है। इस दोहरे गुण का कारण हाइड्रोजन की आवर्त सारणी में स्थिति विवादास्पद बनी हुई है।

हाइड्रोजन के दोहरे व्यवहार का कारण इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है। हाइड्रोजन s – ब्लॉक का प्रथम तत्व है। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s1 है अर्थात् हाइड्रोजन परमाणु के बाहरी कोश, जो पहला कोश भी है, में केवल एक इलेक्ट्रॉन है। हाइड्रोजन एक इलेक्ट्रॉन त्याग कर H+ आयन या धनायन अर्थात् प्रोटॉन दे सकता है और एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके H आयन या ऋणायन बना सकता है।
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 9 हाइड्रोजन

हाइड्रोजन के सन्दर्भ में उपर्युक्त तथ्य से आवर्त सारणी में इसकी स्थिति निम्नलिखित बिन्दुओं से समझी जा सकती है –
हाइड्रोजन की क्षार धातुओं (वर्ग 1 के तत्वों) से समानता (Similarities of Hydrogen with Alkali Metals)

1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration):
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान है और इनके अन्तिम कोश में एक इलेक्ट्रॉन s1 है।
1H = 1s1 11Na = 1s2, 2s2 2p6, 3s1

2. विद्युत-धनात्मक गुण (Electropositive character):
एक इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन देते हैं।
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 9 हाइड्रोजन
इस व्यवहार को इस तथ्य से प्रबल समर्थन मिलता है कि जब अम्लीकृत जल का विद्युत-अपघटन किया जाता है तो कैथोड पर हाइड्रोजन मुक्त होती है। इसी प्रकार गलित सोडियम क्लोराइड के विद्युत अपघटन पर कैथोड पर सोडियम (क्षार धातु) मुक्त होती

3. Berita PUT STARIT (Oxidation state):
हाइड्रोजन तथा क्षार धातु अपने यौगिकों में +1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं।
उदाहरणार्थ:
HCl, NaCl आदि।

4. रासायनिक बन्धुता (Chemical affinity):
हाइड्रोजन तथा क्षार धातुएँ विद्युत धनात्मक प्रकृति के होते हैं। अतः इनमें विद्युत-ऋणी तत्वों के प्रति बन्धुता पाई जाती है अर्थात् ये तीव्रता से इनकी साथ संयोग करते हैं।
उदाहरणार्थ –
सोडियम के यौगिक: Na2O, NaCl, Na2S
हाइड्रोजन के यौगिक: H2O, HCl, H2S

5. अपचायक प्रकृति (Reducing nature):
हाइड्रोजन तथा अन्य क्षार धातु वर्ग के सदस्य प्रबल अपचायक होते हैं; क्योंकि वे उनके यौगिकों से ऑक्सीजन को हटाते हैं।
उदाहरणार्थ –
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क्षार धातुओं से असमानता (Dis-similarities with Alkali Metals)
हाइड्रोजन क्षार धातुओं से भिन्न भी दर्शाता है। इनका वर्णन निम्नवत् है –

  • क्षार धातुएँ प्रारूपिक धातुएँ (typical metals) होती हैं, जबकि हाइड्रोजन एक अधातु है।
  • हाइड्रोजन द्विपरमाणुक (diatomic) होती है, जबकि क्षार धातुएँ एकपरमाणुक होती हैं।
  • क्षार धातुओं की आयनन ऊर्जा (सोडियम की आयनन ऊर्जा = 496 kJmol-1) हाइड्रोजन (1312 kJmol-1) की तुलना में बहुत कम होती है।
  • हाइड्रोजन के यौगिक सामान्यतः सहसंयोजक होते हैं (जैसे – HCI, H,O आदि), जबकि क्षार धातुओं के यौगिक सामान्यत: आयनिक होते हैं (जैसे – NaCl, KF आदि)।

हाइड्रोजन तथा हैलोजेन की समानता (Similarities of Hydrogen & Halogens):

1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration):
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस कारण से समान होते हैं कि इनके बाहरी कोश में अक्रिय गैस से एक इलेक्ट्रॉन कम होता है और ये एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके अक्रिय गैस की स्थायी संरचना प्राप्त कर लेते हैं।
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2. विद्युत्-ऋणात्मक गुण. (Electronegative character):
ये एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणायन देते हैं।
H + e → H, X = e → X (X = हैलोजेन)

3. द्विपरमाणुक प्रकृति (Diatomic nature):
हाइड्रोजन तथा हैलोजेन दोनों द्वि-परमाणुक अणु बनाते हैं, जिसमें सहसंयोजक बन्ध होते हैं।
H – H या H2, Cl – C या Cl2

4. ऐनोड पर विमुक्ति (Liberation at anode):
हैलाइडों के जलीय विलयन विद्युत्-अपघटन पर ऐनोड पर ऋणायन देते हैं। इसी प्रकार NaH विद्युत्-अपघटन पर ऐनोड पर H आयन देता है।
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5. आयनन एन्थैल्पी (Ionisation enthalpy):
आयनन ऊर्जा लगभग समान होती है, किन्तु क्षार धातुओं से अधिक होती हैं।
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6. ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation state):
हैलोजेन यौगिकों में -1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं तथा हाइड्रोजन भी अपने यौगिकों में (धातुओं के साथ) -1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है।
उदाहरणार्थ –
Na+ H तथा Na+F I

7. अधात्विक प्रकृति (Non-metallic nature):
हाइड्रोजन तथा हैलोजेनों का सबसे महत्त्वपूर्ण सामान्य गुण अधात्विक प्रकृति है। दोनों प्रारूपिक अधातु हैं।

8. Aiiftant atyronta (Nature of compounds):
हाइड्रोजन तथा हैलोजन के अनेक यौगिक सहसंयोजी प्रकृति के होते हैं।
उदाहरणार्थ –
हाइड्रोजन के सहसंयोजक यौगिक: CH4, SiH4, GeH4
क्लोरीन के सहसंयोजक यौगिक: CCl4, SiCl4, GeCl4

यहाँ यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि हाइड्रोजन तथा हैलोजेन परमाणु सरलता से प्रतिस्थापित किए जा सकता हैं।
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हैलोजेनों से असमानता (Dis-similarities with Halogens):
निम्नलिखित गुणधर्मों में हाइड्रोजन हैलोजेनों से भिन्नता रखता है –
1. हैलोजेन तीव्रता से हैलाइड आयन (X) बना लेते हैं, परन्तु हाइड्रोजन केवल क्षार तथा क्षारीय मृदा धातुओं के साथ यौगिकों में हाइड्राइड आयन (H) बनाता है।

2. आण्विक रूप में, H परमाणुओं पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म नहीं होता, जबकि X परमाणुओं पर ऐसे तीन युग्म होते हैं। उदाहरणार्थ –
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3. हैलोजेन के ऑक्साइड सामान्यतयां अम्लीय होते हैं, जबकि हाइड्रोजन के ऑक्साइड उदासीन होते हैं।

निष्कर्षतः
हाइड्रोजन दोनों समूहों के साथ समान लक्षण रखता है। अतः इसे आवर्त सारणी में एक निश्चित स्थान देना कठिनाई का विषय है। चूँकि तत्वों के आवर्ती वर्गीकरण का आधार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है; अतः हाइड्रोजन को क्षार धातुओं के साथ वर्ग 1 में सबसे ऊपर रखा गया है, परन्तु हाइड्रोजन की यह स्थिति पूर्ण रूप से न्यायोचित नहीं है।

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प्रश्न 9.2
हाइड्रोजन के समस्थानिकों के नाम लिखिए तथा बताइए कि इन समस्थानिकों का द्रव्यमान अनुपात क्या है?
उत्तर:
हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक हैं जिनके नाम प्रोटियम \(\left({ }_{1}^{1} \mathrm{H}\right)\) ड्यूटीरियम \(\left({ }_{2}^{1} \mathrm{H}\right)\) तथा ट्राइटियम \(\left({ }_{3}^{1} \mathrm{H}\right)\) हैं। इन समस्थानिकों का द्रव्यमान अनुपात निम्नवत् है –
\(\left({ }_{1}^{1} \mathrm{H}\right)\) : \(\left({ }_{2}^{1} \mathrm{H}\right)\) : \(\left({ }_{3}^{1} \mathrm{H}\right)\) : : 1.008 : 2.014 : 3.016

प्रश्न 9.3
सामान्य परिस्थितियों में हाइड्रोजन एक परमाण्विक की अपेक्षा द्विपरमाण्विक रूप में क्यों पाया जाता है।
उत्तर:
एक-परमाणु रूप में हाइड्रोजन के पास K कोश में केवल एक इलेक्ट्रॉन (1s1) होता है, जबकि द्विपरमाणुक अवस्था में K कोश पूर्ण (1s2) होता है। इससे तात्पर्य है कि द्विपरमाणुक रूप में हाइड्रोजन (H2) उत्कृष्ट गैस हीलियम का विन्यास प्राप्त कर लेती है। अतः यह स्थायी होती है और यह एक परमाण्विक अस्थाई होता है।

प्रश्न 9.4
‘कोल गैसीकरण’ से प्राप्त डाइ-हाइड्रोजन का उत्पादन कैसे बढ़ाया जा सकता है?
उत्तर:
कोल से संश्लेषण गैस या सिन्गैस का उत्पादन करने की क्रिया कोलगैसीकरण कहलाती है।
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सिन्गैस की उपस्थिति CO को आयरन क्रीमेट उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप से क्रिया कराने पर डाइ-हाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
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यह भाप अंगार गैस सृति-अभिक्रिया कहलाती है।

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प्रश्न 9.5
विद्युत-अपघटन विधि द्वारा डाइहाइड्रोजन वृहद् स्तर पर किस प्रकार बनाई जा सकती है? इस प्रक्रम में विद्युत-अपघट्य की क्या भूमिका है?
उत्तर:
विद्युत-अपघटन विधि द्वारा डाइहाइड्रोजन का निर्माण (Formation of Dihydrogen by electrolytic process):
सर्वप्रथम शुद्ध जल में अम्ल तथा क्षारक की कुछ बूंदें मिलाकर इसे विद्युत का सुचालक बना लेते हैं। अब इसकी विद्युत-अपघटन (वोल्टामीटर में) करते हैं। जल के विद्युत अपघटन से ऋणोद (कैथोड) पर डाइहाइड्रोजन और धनोद (ऐनोड) पर ऑक्सीजन (सहउत्पाद के रूप में) एकत्रित होती है। ऐनोड तथा कैथोड को एक ऐस्बेस्टस डायफ्राम की सहायता से पृथक्कृत कर दिया जाता है जो मुक्त होने वाली हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन को मिश्रित नहीं होने देता।
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चित्र-अम्लीय जल के विद्युत-अपघटन द्वारा H2 प्राप्त करना।
H2O ⇄ H+ + OH
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इस प्रकार प्राप्त डाइहाइड्रोजन पर्याप्त रूप से शुद्ध होती है।

विद्युत-अपघट्य की भूमिका (Role of electrolyte):
शुद्ध जल विद्युत-अपघट्य नहीं होता और न ही विद्युत का चालक होता है। शुद्ध जल में अम्ल या क्षार की कुछ मात्रा मिलाकर इसे विद्युत अपघट्य बनाया जाता है।

प्रश्न 9.6
निम्नलिखित समीकरणों को पूरा कीजिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 9.7
डाइहाइड्रोजन की अभिक्रियाशीलता के पदों में H – H बन्ध की उच्च एन्थैल्पी के परिणामों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
डाइहाइड्रोजन की अभिक्रियाशीलता के पदों में H – H बन्ध की उच्च एन्थैल्पी के परिणाम की विवेचना निम्न प्रकार की जा सकती है-
H – H बन्ध वियोजन एन्थैल्पी किसी तत्व के दो परमाणुओं के एकल बन्ध के लिए अधिकतम है। इसका कारण डाइहाइड्रोजन का इसके परमाणुओं में वियोजन केवल 2000K के ऊपर लगभग 0.081 प्रतिशत ही होता है, जो 5000K पर बढ़कर 955 प्रतिशत तक पहुँच जाता है। उच्च H – H बन्ध एन्थैल्पी के कारण कक्ष ताप पर डाइहाइड्रोजन अपेक्षाकृत निष्क्रिय है। यह केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही रासायनिक क्रिया में भाग लेता है।

प्रश्न 9.8
हाइड्रोजन के –

  1. इलेक्ट्रॉन न्यून
  2. इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध तथा
  3. इलेक्ट्रॉन समृद्ध यौगिकों से आप क्या समझते हैं? उदाहरणों द्वारा समझाइए।

उत्तर:
1. इलेक्ट्रॉन न्यून:
इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड, जैसा नाम से पता चलता है, परम्परागत लूईस-संरचना लिखने के लिए इनमें इलेक्ट्रॉन की संख्या अपर्याप्त होती है। इसका उदाहरण डाइबोरेन (B2H6) है। वस्तुतः आवर्त सारणी के 13 वें वर्ग के सभी तत्व इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक बनाते हैं। ये लूईस अम्ल की भाँति कार्य करते हैं अर्थात् ये इलेक्ट्रॉनग्राही होते हैं।

2. इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध:
इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध हाइड्राइड में परम्परागत लूईस संरचना के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉन की संख्या होती है। आवर्त सारणी के 14 वें वर्ग के सभी तत्व इस प्रकार के यौगिक (जैसे – CH4) बनाते हैं, जो चतुष्फलकीय ज्यामिति (tetrahedral geometry) के होते हैं।

3. इलेक्ट्रॉन समृद्ध:
इलेक्ट्रॉन समृद्ध हाइड्राइड इलेक्ट्रॉन आधिक्य एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म के रूप में उपस्थिति होते हैं। आवर्त सारणी के 15 वें से 17 वें वर्ग तक के तत्व इस प्रकार के यौगिक बनाते हैं –

(NH3 के एकाकी युग्म, H2O में दो तथा HF में तीन एकाकी युग्म होते हैं)। ये लूईस क्षार के रूप में व्यवहार करते हैं। ये इलेक्ट्रॉनदाता होते हैं। उच्च विद्युत-ऋणात्मकता वाले परमाणु जैसे-नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा फ्लुओरीन के हाइड्राइड पर एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म होने के कारण अणुओं में हाइड्रोजन बन्ध बनता है, जिनके कारण अणुओं में संगुणन होता है।

प्रश्न 9.9
संरचना एवं रासायनिक अभिक्रियाओं के आधार पर बताइए कि इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड के कौन-कौन से अभिलक्षण होते हैं?
उत्तर:
वे आण्विक हाइड्राइड जिनमें केन्द्रीय परमाणु पर अष्टक नहीं होता, इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइस कहलाते हैं। वर्ग 13 के तत्वों हाइड्राइड; जैसे –
B2H6, (AlH3)n, आदि, इलेक्ट्रॉन न्यून अणु होते हैं तब इसीलिए किसी दाता अणु; जैसे – NR3, PF3, CO आदि से इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृति रखते हैं तथा योगात्मक यौगिक बनाते हैं। इन योगात्मक यौगिकों के निर्माण में इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड लूईस अम्लों को भाँति तथा दाता अणु लूइस क्षारकों की भाँति व्यवहार करते हैं।
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प्रश्न 9.10
क्या आप आशा करते हैं कि (CnH2n+2) कार्बनिक हाइड्राइड लूईस अम्ल या क्षार की भाँति कार्य करेंगे? अपने उत्तर को युक्तिसंगत ठहराइए।
उत्तर:
यदि दिए गए अणु के केन्द्रीय परमाणु की संयोजकता-कोश में रिक्त d – कक्षक नहीं होते तो यह दाता परमाणु अथवा दाता आयन से इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्मों को ग्रहण करके योगात्मक यौगिकों का निर्माण नहीं कर सकता; अतः यह लूईस अम्ल की भाँति व्यवहार प्रदर्शित नहीं करता।

अब चूँकि CnH2n+2 में C – परमाणु (2s2 \(2 p_{x}^{1}\) \(2 p_{y}^{1}\) \(2 p_{z}^{0}\) को संयोजकता कोश में d – कक्षक नहीं हैं; इसलिए CnH2n+2 में यह परमाणु इलेक्ट्रॉनों का एकाकी युग्म ग्रहण करने योग्य नहीं है तथा लूईस अम्ल व्यवहार प्रदर्शित नहीं करता। ये हाइड्राइड सामान्य सहसंयोजी हाइड्राइडों की भाँति व्यवहार करते हैं। ये लूईस अम्ल अथवा क्षारक की भाँति कार्य नहीं करेंगे। ये इलेक्ट्रॉन-परिशुद्ध हाइड्राइड होते हैं।

प्रश्न 9.11
अरसमीकरणमितीय हाइड्राइड (nonstochiometric hydride) से आप क्या समझते हैं? क्या आप क्षारीय धातुओं से ऐसे यौगिकों की आशा करते हैं? अपने उत्तर को न्यायसंगत ठहराइए।
उत्तर:
अरसमीकरणमितीय हाइड्राइड-ऐसे हाइड्राइड जिनका निश्चित संघटन नहीं होता, अरसमीकरणमितीय हाइड्राइड कहलाते हैं। ये स्थिर अनुपात के नियम का पालन नहीं करते चूँकि इनमें रिक्त कक्षक होते हैं, अतः ये संक्रमण धातुओं द्वारा बनाए जाते हैं।

प्रश्न 9.12
हाइड्रोजन भण्डारण के लिए धात्विक हाइड्राइड किस प्रकार उपयोगी है? समझाइए।
उत्तर:
हाइड्रोजन के उच्च ज्वलनशील होने के कारण इसका भण्डारण करना एक कठिनाई का विषय है। इस कठिनाई का एक हल यह है कि हाइड्रोजन का भण्डारण इसके मैग्नीशियम, मैग्नीशियम – निकिल तथा आयरन-टाइटेनियम मिश्र-धातु के साथ बने यौगिक के टैंक (tank) के रूप में किया जाए। ये धातु-मिश्रधातु छिद्रों की भाँति हाइड्रोजन की वृहद् मात्रा को अवशोषित कर लेती हैं तथा धात्विक हाइड्राइड बनाती हैं।

धात्विक हाइड्राइड तन्त्र को जलाना अथवा इसका विस्फोट होना सम्भव नहीं होता; अतः इसे हाइड्रोजन भण्डारण की सुरक्षित युक्ति माना. जा सकता है। चूँकि हाइड्रोजन इन धातुओं से रासायनिक रूप से जुड़ी रहती है तथा यह धातु में तब तक भण्डारित रहती है जब तक कि इसे अतिरिक्त ऊर्जा न दी जाए। अतः हाइड्रोजन भण्डारण के लिए धात्विक हाइड्राइड अत्यन्त उपयोगी होते हैं।

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प्रश्न 9.13
कर्तन और वेल्डिंग में परमाण्वीय हाइड्रोजन अथवा ऑक्सी हाइड्रोजन टॉर्च किस प्रकार कार्य करती है? समझाइए।
उत्तर:
परमाण्विक हाइड्रोजन तथा ऑक्सी – हाइड्रोजन टॉर्च का उपयोग कर्तन तथा वेल्डिंग में होता है। परमाण्विक हाइड्रोजन परमाणु (जो विद्युत आर्क की सहायता से डाइहाइड्रोजन के वियोजन से बनते हैं) का पुनर्संयोग वेल्डिंग की जाने वाली धातुओं की सतह पर लगभग 4000K तक ताप उत्पन्न कर देता है ऑक्सी-हाइड्रोजन टॉर्च की ज्वाला अत्यन्त उच्च ताप (3000K से भी अधिक) उत्पन्न करती है जो वेल्डिंग कार्य में प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 9.14
NH3, H2O तथा HF में से किसका हाइड्रोजन बन्ध का परिमाण उच्चतम अपेक्षित है और क्यों?
उत्तर:
हाइड्रोजन बन्ध HF अणुओं में अधिक परिमाण का होता है क्योंकि फ्लुओरीन सर्वाधिक विद्युत ऋणी तत्व है। इस कारण H – F बन्ध प्रबल ध्रुवी होने के कारण प्रबल अन्तर-आण्विक हाइड्रोजन बन्ध प्रदर्शित करता है।
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गैसीय अवस्था में भी HF अणु H-बन्ध द्वारा संगुणित रहते हैं।

प्रश्न 9.15
लवणीय हाइड्राइड जल के साथ प्रबल अभिक्रिया करके आग उत्पन्न करती है। क्या इसमें CO2 (जो एक सुपरिचित अग्निशामक है) का उपयोग हम कर सकते हैं? समझाइए।
उत्तर:
जब लवणीय हाइड्राइड जल के साथ प्रबल अभिक्रिया करता है तो अभिक्रिया उच्च ऊष्माक्षेपी होने के कारण इसमें उत्पन्न हाइड्रोजन आग पकड़ लेती है। इस अभिक्रिया का समीकरण निम्नवत् है –
NaH(s) + H2O(aq) → NaOH(aq) + H2 (q)
CO2 को सामान्यतया अग्निशामक की तरह प्रयोग करते हैं। क्योंकि इसमें बने हाइड्रॉक्साइड से क्रिया कर काबोनेट बनाती है,
अत: CO2 को प्रयुक्त कर सकते हैं।
2NaOH(aq) + CO2 (g) → Na2SO3 (aq) + H2O (aq)

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प्रश्न 9.16
निम्नलिखित को व्यवस्थित कीजिए –

  1. CaH2, BeH2 तथा TiH2 को उनकी बढ़ती हुई विधुतचालकता के क्रम में।
  2. LiH, NaH तथा CSH को आयनिक गुण के बढ़ते हुए क्रम में।
  3. H – H, D – D तथा F – F को उनके बन्ध-वियोजन एन्थैल्पी के बढ़ते हुए क्रम में।
  4. NaH, MgH2, तथा H2O को बढ़ते हुए अपचायक गुण के क्रम में।

उत्तर:

  1. BeH2 < TiH2 < CaH2: विद्युत चालकता का बढ़ता क्रम।
  2. LiH < NaH < CSH: आयनिक गुण का बढ़ता क्रम।
  3. F – F < H – H < D – D: बन्ध-वियोजन एन्थैल्पी का बढ़ता क्रम।
  4. H2O < MgH2 < NaH: अपचायक गुण का बढ़ता क्रम।

प्रश्न 9.17
H2O तथा H2O2 की संरचनाओं की तुलना कीजिए।
उत्तर:
जल की संरचना:
गैस-प्रावस्था में जल एक बंकित अणु है। आबन्ध कोण तथा O – H आबन्ध दूरी के मान क्रमश: 104.5° तथा 95.7pm हैं, जैसा चित्र (a) में प्रदर्शित किया गया है।
अत्यधिक ध्रुवित अणु चित्र – (b) में तथा चित्र – (c) में जल के अणु में ऑर्बिटल अतिव्यापन दर्शाया गया है।
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चित्र:
(a) जल की बंकित संरचना, (b) जल-अणु द्विधुव के रूप में और (c) जल के अणु में ऑर्बिटल अतिव्यापन

हाइड्रोजन परॉक्साइड की संरचना:
हाइड्रोजन परॉक्साइड की संरचना असमतलीय (खुली पुस्तक के समान) होती है। गैसीय प्रावस्था तथा ठोस में इसकी आण्विक संरचना को चित्र में दर्शाया गया है।
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चित्र –
(a) गैसीय प्रावस्था में H2O2 की संरचना द्वितल, कोण 111.5° है।
(b) ठोस, प्रावस्था में 110K ताप पर H2O2, की संरचना द्वितल, कोण 90.2 है।

प्रश्न 9.18
जल के स्वतः प्रोटीनीकरण से आप क्या समझते हैं? इनका क्या महत्व है?
उत्तर:
जल कर स्वतः
प्रोटीनीकरण:
ऐसी अभिक्रिया जिसमें एक जल-अणु किसी दूसरे जल-अणु से प्रोटॉन ग्रहण करके H3O+ तथा OH बनाता है। जल का स्वत: प्रोटोनीकरण कहलाती है।
H2O(l) + H2O(l) → H3O+ (aq) + OH (aq)
महत्व: जल अम्ल क्षार दोनों तरह कार्य करता है। उपर्युक्त अभिक्रिया को एक साम्य स्थिरांक अर्थात् आयनिक गुणनफल (Kw) द्वारा निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है –
Kw = [H3O+] [OH]
298K पर Kw = 1.0 × 10-14 mol2 L-2
इसका अम्ल-क्षार रसायन में बहुत अधिक महत्त्व है।

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प्रश्न 9.19
F2 के साथ जल की अभिक्रिया में ऑक्सीकरण तथा अपचयन के पदों पर विचार कीजिए एवं बताइए कि कौन-सी स्पीशीज ऑक्सीकृत/अपचयित होती है।
उत्तर:
फ्लुओरीन की जल के साथ अभिक्रिया निम्नवत् है –
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चूँकि F की आ० सं० 0 से -1 तक घटती है तथा O की आ० सं० -1 से 0 तक बढ़ती है, अत: F2 ऑक्सीकरण है तथा H2O अपचायक है। H2O का O2, में ऑक्सीकरण होता है। और F2 का HF में अपचयन होता है।

प्रश्न 9.20
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए –

  1. PbS (s) + H2O2 (aq) →
  2. MnO4 (aq) + H2O2 (aq) →
  3. CaO(s) + H2O (g) →
  4. AlCl3 (g) + H2O (l) →
  5. Ca3N2 (s) + H2O (l) →

उपर्युक्त को (क)जल – अपघटन
(ख) अपचयोपचय (redox) तथा
(ग) जलयोजन अभिक्रियाओं में वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर:

  1. PbS (s) + 4H2O2 (aq) → PbSO4 (s) + 4H2O (aq)
  2. 2MnO4- (aq) + 3H2O2 (aq) → 2MnO2 (aq) + 3O2 (g) + 2H2O (l) + 2OH (aq)
  3. CaO(s) + H2O (g) → Ca(OH)2 (s)
  4. AlCl3 (g) + 3H2O (l) → Al(OH)3 (s) + 3HCl (l)
  5. Ca3N2 (s) + 6H2O(l) → 3Ca(OH)2 (aq) + 2NH2 (g)

उपर्युक्त अभिक्रियाओं को इस प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है –
(क) जल अपघट –
AlCl3 (g) 3H2O → (l) Al(OH)3 (s) + 3HCl (l)
Ca3N2 (s) + 6H2 O (l) → 3Ca(OH)2 (aq) + 2NH2 (g)

(ख) अपचयोपचक अभिक्रिया –
Pbs(s) + 4H2O2 (aq) → PbSO4 (s) + 4H2O (aq)
2MnO4 (aq) + 3H2O2 (aq) → 2MnO2 (aq) + 3O2 (g) + 2H2O (l) + 2OH (aq)

(ग) जलयोजन अभिक्रिया –
CaO(s) + H2O (g) → Ca(OH)2 (s)

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प्रश्न 9.21
बर्फ के साधारण रूप की संरचना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बर्फ की संरचना:
बर्फ एक अतिव्यवस्थित, त्रिविम, हाइड्रोजन आबन्धित संरचना (highly ordered, three dimensional, hydrogen bonded structure) है –
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चित्र-बर्फ की संरचना
x – किरणों द्वारा परीक्षण से पता चला है कि बर्फ क्रिस्टल में ऑक्सीजन परमाणु चार अन्य हाइड्रोजन परमाणुओ से 276pm दूरी पर चतुष्फलकीय रूप से घिरा रहता है।
हाइड्रोजन आबन्ध बर्फ में बृहद् छिद्र एक प्रकार की खुली संरचना बनाते हैं। ये छिद्र उपयुक्त आकार के कुछ दूसरे अणुओं का अन्तरांकाश में ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 9.22
जल की अस्थायी एवं स्थायी कठोरता के क्या कारण हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अस्थायी कठोरता:
अस्थायी कठोरता जल में कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के हाइड्रोजन कार्बोनेट की उपस्थिति के कारण होती है। इसे उबालकर दूर किया जा सकता है।

स्थायी कठोरता:
स्थायी कठोरता जल में विलेयशील कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के क्लोराइड तथा सल्फेट के रूप में घुले रहने के कारण होती है। इसे धावन सोडा की क्रिया से दूर किया जा सकता है।

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प्रश्न 9.23
संश्लेषित आयन विनिमयक विधि द्वारा कठोर जल के मृदुकरण के सिद्धान्त एवं विधि की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
संश्लेषित आयन विनिमयक विधि (Synthetic lon-Exchange Method):
संश्लेषित आयन विनिमयक विधि द्वारा जल में विद्यमान कठोरता के लिए उत्तरदायी आयनों को उन अन्य आयनों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है जो जल की कठोरता के लिए उत्तरदायी नहीं होते। इस विधि में दो प्रकार के आयन विनिमयक प्रयोग किए जाते हैं –

  1. अकार्बनिक आयन विनिमयक तथा
  2. कार्बनिक आयन विनिमयक।

1. अकार्बनिक आयन विनिमयकःपरम्यूटिट विधि (Inorganic lon-Exchanger: Permutit Method)
इस विधि को ‘जियोलाइट/परम्पटिट विधि’ भी कहते हैं। यह व्यापारिक मात्रा में कठोर जल का मृदु करने की विधि है। इस विधि में सोडियम जियोलाइट का प्रयोग किया जाता है। यह वास्तव में सोडियम ऐलुमिनियम सिलिकेट नामक पदार्थ है। इसका सूत्र Na2 Al2 Si2 O8 है। यह या तो प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है अथवा इसे सोडे की राख (Na2CO3), सिलिका (SiO2) तथा ऐलुमिना (Al2O3) के मिश्रण से कृत्रिम रूप से बनाया जा सकता है।

इस मिश्रण के संगलित पदार्थ को जल से धोकर शेष बचे छिद्रित पदार्थ को ही परम्यूटिट कहते हैं। सरलता की दृष्टि से ऐलुमिनियम सिलिकेट अथवा जियोलाइट आयन (Ai2 Si2 O8) के स्थान पर ‘Z’ लिखकर सोडियम जियोलाइट को Na2Z सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। परम्यूटिट विधि से दोनों प्रकार की कठोरता दूर कर सकते हैं। सोडियम जियोलाइट में उपस्थिति सोडियम लवणों का यह गुण है कि ये अन्य आयनों द्वारा विस्थापित हो जाते हैं।
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चित्र – परम्यूटिट विधि से कठोर जल को मृदु बनाना।

परम्यूटिट को एक विशेष बेलनाकार पात्र में रखते हैं जिसमें मोटी रेत तथा परम्यूटिट भरा होता है। कठोर जल को इसमें से प्रवाहित करते हैं तो जल में उपस्थित कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के लवण इसके साथ क्रिया करते हैं। सोडियम परमाणुओं के स्थान पर कैल्सियम मैग्नीशियम परमाणु आ जाते हैं तथा कैल्सियम या मैग्नीशियम परम्यूटिट बन जाता है।
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वह जल जो परम्यूटिट पर से ऊपर उठता है, वह Ca2+ व Mg2+ आयनों से मुक्त होता है; अतः वह मृदु जल होता है जिसे पाइप द्वारा बाहार निकाला जा सकता है।

परम्यूटिट का पुनः
निर्माण (Regeneration of Permutit):
कुछ समय बाद सम्पूर्ण Na2Z, CaZ व MgZ में परिवर्तित हो जाता है, परन्तु परम्यूटिट लम्बे समय तक कार्य नहीं करता। Na2Z के पुननिर्माण के लिए कठोर जल के प्रवेश को रोककर इसके स्थान पर 10% NaCl विलयन मिला दिया जाता है, तब Ca2+ व Mg2+ आयन Na+ आयनों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं, जिससे परम्यूटिट का पुनः निर्माण हो जाता है।
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Ca+ व Mg2+ आयन जल द्वारा धो दिए जाते हैं तथा पुनर्निर्मित परम्यूटिट का उपयोग पुनः कठोर जल को मृदु करने में किया जा सकता है।

2. कार्बनिक आयन विनिमयक: संश्लेषित रेजिन विधि (Organic Ion-Exchanger : Synthetic Resin Method):
आजकल इस अधुनिक विधि का प्रयोग काफी हो रहा है। परम्यूटिट केवल उन लवण के धनायनों (Ca2+ व Mg2+) को हटाता है जो जल को कठोर बनाते हैं। कार्बनिक रसायनज्ञों ने कुछ विशेष पदार्थ विकसित किए हैं, इन्हें आयन विनिमयक रेजिन (ion-exchanger resins) कहते हैं। ये लवण में उपस्थित ऋणायनों को भी हटा सकते हैं। जो धनायनों की भाँति ही जल की कठोरता के लिए उत्तरादायी होते हैं। इस विधि से जल के मृदुकरण में निम्नलिखित दो प्रकार की रेजिन प्रयोग की जाती है –

(i) ऋणायन-विनिमयक रेजिन (Anion-exchanger resins):
वे रेजिन ऋणायन विनिमयक रेजिन कहलाते हैं, जिनमें हाइड्रोकार्बन समूह के साथ क्षारीय समूह – OH अथवा -NH2 जुड़े रहते हैं, जिन्हें – OH रेजिन के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
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चित्र-आयन-विनिमय रेजिन द्वारा जल की कठोरता का निवारण।

(ii) धनायन-विनिमयक रेजिन (Cation-exchanger resins):
ये हाइड्रोजन समूह ही हैं जिनके साथ अम्लीय समूह; जैसे – COOH या -SO3H समूह जुड़े रहते हैं तथा इन्हें धनायन विनिमयक रेजिन (H+ रेजिन) कहते हैं। धनायन रेजिन, जल की कठोरता के उत्तरदायी धनायनों का विनिमय करते हैं, जबकि ऋणायन रेजिन, कठोरता के लिए उत्तरदायी ऋणायनों को हटाते हैं।

इसमें एक टंकी को एक रेजिन R से लगभग आधा भरकर उसमें ऊपर से जल प्रवाहित करते हैं। रेजिन धनायनों को अवशोषित कर लेता है तथा टंकी से बाहर निकलने वाले जल में कैल्सियम और मैग्नीशियम धनायन नहीं होते; अतः जल मृदु हो जाता है। यह जल अलवणीकृत जल या अनआयनीकृत जल (demineralised water or deionised water) कहलाता है। इसके पश्चात् इस मृदु जल को दूसरे ऐसे रेजिन R+ में प्रवाहित करते हैं जो ऋणायनों को अवशोषित कर लेता है।

कार्यविदी (Working procedure):
रेजिन R विशाल कार्बनिक अणु होते हैं तथा उनमें अम्लीय क्रियात्मक समूह (-COOH, कार्बोक्सिलिक समूह) सम्मिलित रहते हैं। कठोर जल में उपस्थित धनायन Ca2+, Mg2+ इन अम्लीय क्रियात्मक समूहों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं तथा अम्ल से जल में H+ आयन आ जाते हैं।
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अब पात्र में से जो जल निकलता है, वह धनायनों से मुक्त होता है, परन्तु इसमें ऋणात्मक आयन होते हैं। रेजिन R+ में विशाल कार्बनिक अणुओं के बीच विस्थापित अमोनियम हाइड्रॉक्साइड के दाने होते हैं जिनसे क्रियात्मक हाइड्रॉक्सिल समूह (OH) संलग्न रहते हैं। कठोर जल में उपस्थित लवणों के ऋण विद्युती आयन, रेजिन R+ के अमोनियम आयनों (NH4+) से संयुक्त हो जाते हैं।
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H+ आयन; जो धनायन रेजिन टैंक से आते हैं, इन OH आयनों के साथ जुड़कर जल-अणु बना लेते हैं। अत: इस प्रकार प्राप्त जल उन सभी आयनों से मुक्त होता है जो कि जल को कठोर बनाते हैं।

रेजिन का पुनः निर्माण (Regeneration of resins):
कुछ समय बाद दोनों टैंकों में उपस्थित रेजिन पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं; क्योंकि H+ व OH पूरी तरह प्रतिस्थापित हो जाते हैं। वे लम्बे समय तक जल की कठोरता को दूर नहीं कर सकते। इन्हें पुन: प्राप्त करने के लिए कठोर जल का प्रवेश रोक देते हैं। प्रथम टैंक में तनु HCl की धारा प्रवाहित करते हैं।

अम्ल के H+ आयन्स समाप्त हो चुके रेजिन (exhausted resin) में Ca2+ व Mg2+ को प्रतिस्थापित कर H+, रेजिन का निर्माण करते हैं।
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इसी प्रकार दूसरे टैंक में समाप्त हो चुके रेजिन को तुन सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में प्रवेश करा कर पुनर्निर्मित किया जा सकता है।
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जब दोनों टैंकों में रेजिन पुनर्निर्मित हो जाता है तो अम्ल व क्षारक का प्रवेश रोक दिया जाता है। इनके स्थान पर पुनः धनायन रेजिन टैंक में कठोर जल को प्रवेश कराया जाता है। इस प्रकार एकान्तर क्रम में क्रियाएँ चलती हैं तथा मृदु जल प्राप्त होता रहता है।

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प्रश्न 9.24
जल के उभयधर्मी स्वभाव को दर्शाने वाले रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर:
जल अम्ल तथा क्षार दोनो रूपों में कार्य करता है। अतः यह उभयधर्मी है। ब्रान्स्टेड की अवधारणा के अनुसार जल NH3 के साथ अम्ल के रूप में तथा H2S के साथ क्षार के रूप में कार्य करता
है –
H2O (l) + NH3 (aq) → NH4+ (aq) + OH (aq) … (i)
H2O (l) + H2S (aq) → H3O+ (aq) + HS (aq) … (ii)
अभिक्रिया (i) के अनुसार जल अणु एक प्रोटॉन त्यागता है जिसे NH3 ग्रहणं करके NH4+ आयन बनाता है। अभिक्रिया (ii) के अनुसार जल अणु H2O+ आयन बनाता है।

प्रश्न 9.25
हाइड्रोजन परॉक्साइड के ऑक्सीकारक एवं अपचायक रूप को अभिक्रियाओं द्वारा समझाइए।
उत्तर:
चूँकि H2O2 में ऑक्सीजन परमाणु की आ० सं० में वृद्धि तथा कमी होने के कारण, यह ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों का कार्य करता है। इसे निम्नलिखित अभिक्रियाओं द्वारा समझाया जा सकता है –
1. अम्लीय माध्यम में H2O2 ऑक्सीकारक के रूप में –
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2. अम्लीय माध्यम में अपचायक के रूप में –
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3. क्षारीय माध्यम में ऑक्सीकारक के रूप में –
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4. क्षारीय माध्यम में अपचायक के रूप में –
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प्रश्न 9.26
विखनिजित जल से क्या अभिप्राय है? यह कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर:
वह जल जो सभी विलेयशील खनिज अशुद्धियों से पूर्णतया मुक्त हो, विखनिजित जल (demineralised water) कहलाता है। दूसरे शब्दों में धनायनों (Ca2+, Mg2+ आदि) तथा ऋणायनों (Cl, SO42-, HCO3 आदि) से पूर्णतया विमुक्त जल विखनिजित जल कहलाता है।

विखनिजित जल को आयन-विनिमयक रेजिन विधि से प्राप्त किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत आयन-विनिमयक रेजिनों द्वारा जल में उपस्थित सभी धनायनों तथा ऋणायनों को हटा दिया जाता है। इसके लिए सर्वप्रथम कठोर जल को धनायन विनियम परिवर्तक (रेजिनयुक्त) में प्रवाहित किया जाता है, यहाँ SO3H तथा – COOH समूहों वाले विशाल काबनिक अणु (रेजिन), Na+, Ca2+, Mg2+ तथा अन्य धनायनों को हटाकर H+ आयनों को प्रतिस्थापित कर देते हैं।

इस प्रकार प्राप्त जल को पुनः ऋणायन विनिमय परिवर्तक से गुजारा जाता है, जहाँ – NH2 समूह वाले विशाल कार्बनिक अणु (रेजिन) Cl SO42-, HCO3 आदि ऋणायनों को हटाकर OH आयनों को प्रतिस्थापित कर देते हैं। जल के उत्तरोत्तर धनायन-विनिमयक (H+ आयन के रूप में) तथा ऋणायन-विनिमयक (OH के रूप में) रेजिन से प्रवाहित करने पर शुद्ध विखनिजित तथा विआयनित जल प्राप्त किया जाता है।

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प्रश्न 9.27
क्या विखनिजित या आसुत जल पेय-प्रयोजनों में उपयोगी हैं? यदि नहीं तो इसे उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर:
विखनिजित या आसुत जल पेय-प्रयोजनों में उपयोगी नहीं है। यह स्वादहीन होता है। इसके अतिरिक्त कुछ आयन जैसे –
Na+, K+ आदि शरीर के लिए अनिवार्य हैं। इसे उपयोगी बनाने के लिए इसमें कुछ लवण; जैसे-सोडियम क्लोराइड, पोटैशियम क्लोराइड आदि मिलाने चाहिए।

प्रश्न 9.28
जीवमण्डल एवं जैव-प्रणालियों में जल की उपादेयता को समझाइए।
उत्तर:
जीवमण्डल एवं जैव-प्रणालियों में जल की उपादेयता (Usefulness of Water in Bio-sphere and Biological systems):
सभी सजीवों का एक वृहद् भाग जल द्वारा निर्मित है। मानव शरीर में लगभग 65 प्रतिशत एवं कुछ पौधों में लगभग 95 प्रतिशत जल होता है। जीवों को जीवित रखने के लिए जल एक महत्त्वपूर्ण यौगिक है। संघनित प्रावस्था (द्रव तथा ठोस अवस्था) में जल के असामान्य गुणों का कारण तथा अन्य तत्वों के हाइड्राइड H2S तथा H2Se की तुलना में जल का उच्च हिमांक, उच्च क्वथनांक, उच्च वाष्पन ऊष्मा, उच्च संलयन ऊष्मा का कारण इसमें हाइड्रोजन-बन्धन का उपस्थित होना है।

अन्य द्रवों की तुलना में जल की विशिष्ट ऊष्मा, तापीय चालकता, पृष्ठ-तनाव, द्विध्रुव आघूर्ण तथा पराविधुतांक के मान उच्च होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण जीवमण्डल में जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। जल की उच्च वाष्पन ऊष्मा उच्च ऊष्माधारिता ही जीवों के शरीर तथा जलवायु के सामान्य ताप को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है। वनस्पतियों एवं प्राणियों के उपापचय (metabolism) में अणुओं के अभिगमन के लिए जल एक उत्तम विलायक का कार्य करता है। जल ध्रुवीय अणुओं के साथ हाइड्रोजन बन्ध बनाता है जिससे सहसंयोजक यौगिक; जैसेऐल्कोहॉल तथा कार्बोहाइड्रेट यौगिक जल में विलेय होते हैं। अत: जैव-प्रणालियों के लिए भी यह आवश्यक होता है।

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प्रश्न 9.29
जल का कौन-सा गुण इसे विलायक के रूप में उपयोगी बनाता है? यह किस प्रकार के यौगिक –

  1. घोल सकता है और
  2. जल-अपघटन कर सकता है?

उत्तर:
जल के गुण (Properties of Water):
जल के निम्नलिखित गुण इसे विलायक के रूप में अतिमहत्त्वपूर्ण बनाते हैं –

  1. इसकी वाष्पन एन्थैल्पी तथा ऊष्मा-धारिता उच्च होती है।
  2. यह ताप की एक दीर्घ परास (0°C से 100° C तक) के अन्तर्गत द्रव-अवस्था में होता है।
  3. यह ध्रुवी प्रकृति का होता है तथा इसका पराविद्युतांक उच्च (78.39) होता है।
  4. अन्य यौगिकों के साथ हाइड्रोजन बन्ध बना सकता है।

जल विलायक के रूप में (Water as a Solvent):

  1. यह हाइड्रोजन बन्ध के कारण ध्रुवी पदार्थों तथा कुछ कार्बनिक यौगिकों को घोल सकता है। यह आयनिक पदार्थों तथा उन यौगिकों को घोल सकता है जो इसके साथ H – बन्ध बनाते हैं।
  2. इसमें उपस्थित ऑक्सीजन की अनेक तत्वों से अत्यधिक बन्धुता के कारण यह सहसंयोजी यौगिकों को जल-अपघटित कर देता है। यह ऑक्साइडों, हैलाइडों, फॉस्फाइडों, नाइट्राइडों आदि को जल-अपघटित कर देता है।

प्रश्न 9.30
H2O एवं D2O के गुणों को जानते हुए क्या आप मानते हैं कि D2O का उपयोग पेय-प्रयोजनों के रूप में लाया जा सकता है?
उत्तर:
नहीं, भारी जल (D2O) पेय-प्रयोजनों के रूप में उपयोगी नहीं होता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं –

  1. भारी अणु होने के कारण, D2O में आयनन H2O की तुलना में एक-तिहाई ही होता है।
  2. D2O में बन्ध H2O की तुलना में अत्यन्त धीमी गति से टूटते हैं।
  3. कम पराविद्युतांक के कारण इसमें आयनिक पदार्थ जल की तुलना में कम विलेय होते हैं।

उपर्युक्त कारणों से भारी जल शरीर में होने वाली अपचयोपचयी अभिक्रियाओं को साधारण जल की तुलना में अति मन्द दर से करता है जिससे से असन्तुलित हो जाती हैं। अतः यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इसके अतिरिक्त इससे बीजों का अंकुरण रुक जाता है, इसमें रहने वाले टैडपोल तथा अन्य छोटे-छोटे जीव मर जाते हैं तथा यह पेड़-पौधों का विकास रोक देता है।

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प्रश्न 9.31
‘जल अपघटन’ (Hydrolysis) तथा ‘जल योजन’ (Hydration) पदों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
जल-अपघटन:
ऐसी अभिक्रिया जिसमें एक पदार्थ अम्लीय अथवा क्षारीय अथवा उदासीन माध्यमों में जल से क्रिया करे, जल-अपघटन कहलाता है।

उदाहरणार्थ:
एल्यूमीनियम क्लोराइड (AlCl3) जल अपघटित हो जाता है।
ACl3 + 3H2O → Al(OH)3 + 3HCl
अभिक्रिया के पश्चात् प्राप्त विलयन का pH बदल जाता है।

जल-योजन:
किसी पदार्थ के ऐसे गुण को जिसमें क्रिस्टलन जल के अणु ग्रहण करके जल योजित हो जाये, जल-योजन कहते हैं।

उदाहरणार्थ:
सफेद रंग का निर्जलीय कॉपर सल्फेट (CuSO4) जल के पाँच अणु ग्रहण करके नीले रंग का जलयोजित कॉपर सल्फेट (AuSO4.5H2O) बनाता है। अभिक्रिया पश्चात् प्राप्त विलयन का pH अपरिवर्तित रहता है।

प्रश्न 9.32
लवणीय हाइड्राइड किस प्रकार कार्बनिक यौगिकों से अति सूक्ष्म जल की मात्रा को हटा सकते हैं?
उत्तर:
लवणीय हाइड्राइडों में H2O के लिए अत्यधिक बन्धुता होती है। लवणीय हाइड्राइड जैसे – NaH, H आयनों को मुक्त करता है जो प्रबल ब्रान्स्टेड क्षारकों की भाँति कार्य करते हैं (H4O एक दुर्बल ब्रान्स्टेड अम्ल होता है)। NaH जल से संयुक्त होकर हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है। लवणीय हाइड्राइडों का यह गुण कार्बनिक यौगिकों से अति सूक्ष्म जल की मात्रा को हटाने में प्रयुक्त होता है।
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प्रश्न 9.33
परमाणु क्रमांक 15,19, 23 तथा 44 वाले तत्व यदि डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया कर हाइड्राइड बनाते हैं तो उनकी प्रकृति से आप क्या आशा करेंगे? जल के प्रति इनके व्यवहार की तुलना कीजिए।
उत्तर:
परमाणु क्रमांक 15 वाला तत्व फॉस्फोरस (P) है। इसका हाइड्राइड PH3 है जो सहसंयोजी होता है। परमाणु क्रमांक 19 वाला तत्व पोटैशियम (K) है। इसका हाइड्राइड KH3 है जो आयनिक होता है। परमाणु क्रमांक 23 वाला तत्व वैनेडियम (V) है। इसका हाइड्राइड धात्विक है। परमाणु क्रमांक 44 वाला तत्व रूथेनियम (Ru) है। इसका हाइड्राइड धात्विक है।

जल के प्रति व्यवहार:
P का सहसंयोजी हाइड्राइड PH3 है जो जल में अल्प विलेय है –
K का आयनिक हाइड्राइड KH है जो जल से क्रिया करके डाइहाइड्रोजन गैस देता है।
KH(s) + H2O (aq) → KOH(aq) + H2 (g)
V तथा Ru धात्विक हाइड्राइड बनाते हैं जो जल को संगुणित करते हैं।

प्रश्न 9.34
जल एल्यूमीनियम (III) क्लोराइड एवं पोटैशियम क्लोराइड को अलग-अलग –

  1. सामान्य जल
  2. अम्लीय जल
  3. क्षारीय जल से अभिकृत कराया जाएगा तो आप किन-किन विभिन्न उत्पादों की आशा करेंगे? जहाँ आवश्यक हो, वहाँ रासायनिक समीकरण दीजिए।

उत्तर:
1. सामान्य जल में:
एल्यूमीनियम (III) क्लोराइड निम्नलिखित अभिक्रिया देता है –
AlCl3 + 3H2O → Al(OH)3 + 3HCI
KCI जल में घुल कर जलयोजित आयन बनायेगा।
KCl (s) + H2O → K+ (aq) + Cl (aq)

2. अम्लीय जल में:
एल्यूमीनियम (III) क्लोराइड अम्लीय जल अपघटित होकर Al3+ तथा Cl आयन बनायेगा।
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3. क्षारीय जल में:
एल्यूमीनियम (III) क्लोराइड क्षारीय जल में अपघटित होकर टेट्राऑक्साइड-ऐल्यूमिनेट बनाता है।
AlCl3 + 2KOH → Al(OH)3 + 3KCI
Al(OH)3 + OH → [Al(OH)4]
KCl पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

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प्रश्न 9.35
H2O2 विरंजन कारक के रूप में कैसे व्यवहार करता है? लिखिए।
उत्तर:
H2O2 अपघटित होकर नवजात ऑक्सीजन देता है, जो रंगीन पदार्थों को रंगहीन कर देती है। इसकी विरंजन क्रिया ऑक्सीकरण गुण के कारण है।
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ऊन, पंख, बाल, रेशम आदि इसकी सहायता से रंगहीन हो जाते हैं।

प्रश्न 9.36
निम्नलिखित पदों से आप क्या समझते हैं –

  1. हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था
  2. हाइड्रोजनीकरण
  3. सिन्गैस
  4. भाप अंगार गैस सृति अभिक्रिया तथा
  5. ईंधन सेल।

उत्तर:
1. हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था:
दहन के फलस्वरूप अनेक विषाक्त गैसें –
CO2N2 तथा सल्फर के ऑक्साइड वायुमण्डल में मिल जाते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए भावी विकल्प ‘हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था’ है। हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का मूल सिद्धान्त ऊर्जा का द्रव हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का मूल सिद्धान्त ऊर्जा का द्रव हाइड्रोजन अथवा गैसीय हाइड्रोजन के रूप में अभिगमन तथा भण्डारण है।

हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का मुख्य ध्येय तथा लाभ-ऊर्जा का संचरण विद्युत ऊर्जा के रूप में न होकर हाइड्रोजन के रूप में होना है। हमारे देश में पहली बार अक्टूबर, 2005 में आरम्भ परियोजना में डाइहाइड्रोजन से चालित वाहनों के ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया गया। प्रारम्भ में चौपहिया वाहन के लिए 5% डाइहाइड्रोजन मिश्रित CNG को प्रयोग किया गया। बाद में डाइहाइड्रोजन की प्रतिशतता धीरे-धीरे अनुकूलतम स्तर तक बढ़ाई जाएगी।

2. हाइड्रोजनीकरण:
ऐसी अभिक्रिया जिसमें असंतृप्त कार्बनिक यौगिक हाइड्रोजन के संयोग से संतृप्त यौगिक बनाते हैं, हाइड्रोजनीकरण अभिक्रिया कहलाती है। यह अभिक्रिया उत्प्रेरक की उपस्थिति में होती है। इस अभिक्रिया का उपयोग निम्नवत् है –

वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण:
473K पर Ni उत्प्रेरक की उपस्थिति में वनस्पति तेलों में H2 गैस प्रवाहित करने पर वनस्पति घी बनता है –
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3. सिन्गैस:
हाइड्रोकार्बन अथवा कोक की उच्च ताप पर एवं उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप से अभिक्रिया कराने पर डाइहाइड्रोजन प्राप्त होती है।
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CO एवं H2 के मिश्रण को वाटर गैस कहते हैं। CO एवं H2 का यह मिश्रण मेथेनॉल तथा अन्य कई हाइड्रोकार्बनों के संश्लेषण में काम आता है। अत: इसे ‘संश्लेषण गैस’ या ‘सिन्गैस’ (Syngas) भी कहते हैं। आजल सिन्गैस वाहितमल (sewage waste), अखबार, लकड़ी का बुरादा, लकड़ी की छीलन आदि से प्राप्त की जाती है। कोल से सिन्गैस का उत्पादन करने की प्रक्रिया को ‘कोलगैसीकरण’ (Coal-gasification)
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4. भाप अंगार गैस साति अभिक्रिया:
सिनस CO गैस तथा आयरन क्रोमेट उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप की क्रिया कराने पर डाइहाइड्रोजन के उत्पादन की वृद्धि की जा सकती है।
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इस अभिक्रिया को भाप-अंगार गैस सृति अभिक्रिया कहते हैं। डाइहाइड्रोजन के उत्पाद स्रोत शैल रसायन, जलविलयनों के विद्युत-अपघटन आदि हैं।

5. ईंधन सेल:
ऐसा प्रक्रम जिसमें ईंधन को रासायनिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदलता है, ईंधन सेल कहलाता है। इसका उपयोग ईंधन सेलों में विद्युत उत्पादन में करते हैं।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Chemistry अपचयोपचय अभिक्रियाएँ Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 8.1
निम्नलिखित स्पीशीज में प्रत्येक रेखांकित तत्व की ऑक्सीकरण – संख्या का निर्धारण कीजिए –
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उत्तर:
(क) माना NaH2PO4 में P की आ० सं० x है।
1 + 2 × 1 + x + 4 × (-2) = 0
1 + 2 + x – 8 = 0
या x – 5 = 0 या x = +5

(ख) माना NaHSO4 में S की आ० सं० x है।
1 + 1 + x4(-2) = 0
या x = + 6

(ग) माना N4P2O7 में P की आ० सं० x है।
4 × 1 + 2 × x + 7(-2) = 0
या 2x – 10 = 0
या x = +5

(घ) माना K2MNO4 में Mn की आ० सं० x है।
2 × 1 + x + 4(-2) = 0
या x – 6 = 0
या x = +6

(ङ) माना CaO2 में O की आ० सं० x है।
2 + 2x = 0
x = -1

(च) माना NaHB4 में S की आ० सं० x है।
1 + x + 4(-1) = 0
x = +3

2 × 1 + 2 × x + 7(-2) = 0

(छ) माना H2S2O7 में S की आ० सं० x है।
2 × 1 + 2 × x + 7(-2) = 0
या 2x – 12 = 0
या x = +6

(ज) माना KAI(SO4)2.12H2O में S की आ० सं० x
1 + 3 + 2(x – 8) + 12 × 2 + 12(-2) = 0
या 4 + 2x – 16 = 0
या x = +6

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

प्रश्न 8.2
निम्नलिखित यौगिकों के रेखांकित तत्वों की ऑक्सीकरण-संख्या क्या है तथा इन परिणामों को आप कैसे प्राप्त करते हैं?
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उत्तर:
(क) माना KI3 में I की ऑक्सीकरण संख्या x है।
+ 1 + 3x = 0
या x = –\(\frac{1}{3}\)

(ख) माना H2S4O6 में माना S की ऑक्सीकरण संख्या x है।
या 2(+1) + 4x + 6(-2) = 0
4x – 10 = 0
या x = \(\frac{+5}{2}\) या 2.5

(ग) माना Fe3O4 में माना Fe की ऑक्सीकरण संख्या x है।
या 3x + 4(-2) = 0
3x – 8 = 0
या x = +\(\frac{8}{3}\)

(घ) माना CH3CH2OH में C की ऑक्सीकरण संख्या x है।
या x + 3(+1) + x + 2(+1) + 1(-2) + 1 = 0
x – 4 = 0
x = 2

(ङ) माना CH3COOH में C की ऑक्सीकरण संख्या x है।
या x + 3(+1) + x + (-2) + (-2) + 1 = 0
या 2x + 4 – 4 = 0
या x = 0

उपर्युक्त यौगिकों में निर्दिष्ट तत्व की ऑक्सीकरण संख्या भिन्नात्मक होती है। परन्तु हमें ज्ञात है कि भिन्नात्मक ऑक्सीकरण संख्या स्वीकार्य नहीं है; क्योकि इलेक्ट्रॉनों का सहभाजन अथवा स्थानान्तरण आंशिक नहीं हो सकता।

वास्तव में भिन्नात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रेक्षित किए जा रहे तत्व की ऑक्सीकरण संख्याओं का औसत होता है तथा संरचना प्राचलों से ज्ञात होता है कि वह तत्व जिसकी भिन्नात्मक ऑक्सीकरण अवस्था होती है, अलग-अलग ऑक्सीकरण अवस्था में उपस्थित होता है। अतः उपर्युक्त ऑक्सीकरण संख्याओं से औसत ऑक्सीकरण अवस्थाएँ व्यक्त होती हैं।

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प्रश्न 8.3
निम्नलिखित अभिक्रियाओं का अपचयोपचय अभिक्रियाओं के रूप में औचित्य स्थापित करने का प्रयास कीजिए –
(क) CuO(s) + H2(g) → Cu(s) + H2O(g)
(ख) Fe2O3(s) + 3CO(g) → 2Fe(s) + 3CO2(g)
(ग) 4BCl3(g) + 3 LiAIH4(s) → 2B2H6(g) + 3LiCl(s) + 3AlCl3(s)
(घ) 2K(s) + F2(g) → 2K+F(s)
(ङ) 4NH3(g) + 5O2(g) → 4NO(g) + 6H2O(g)
उत्तर:
(क)
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चूँकि यहाँ \(\mathrm{Cu}^{2+}\) की आ० सं० की +2 से 0 में कमी और H2 की आ० सं० की 0 से +1 तक वृद्धि हो रहीं, अतः \(\mathrm{Cu}^{2+}\) की Cu(s) में अपचयन तथा H2 का ऑक्सीकरण होता है।
अत: यह अभिक्रिया एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।

(ख)
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चूँकि यहाँ \(\mathrm{Fe}^{3+}\) का Fe(s) में अपचयन तथा C2+ का C4+ में ऑक्सीकरण हो रहा है; अत: यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।
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(ग)
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चूँकि इस अभिक्रिया में आ० सं० में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है, अत: यह अपचयोपचय अभिक्रिया नहीं है।

(घ)
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चूँकि यहाँ K(s) का K+ में ऑक्सीकरण और F2(g) का F में अपचयन हो रहा है, अतः यह अभिक्रिया एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।

(ङ)
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चूंकि इस अभिक्रिया में O2(g) का O2- में अपचयन और N3- का N+ में ऑक्सीकरण हो रहा है, अतः यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।

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प्रश्न 8.4
फ्लुओरीन बर्फ से अभिक्रिया करके यह परिवर्तन लाती है –
H2O(s) + F2(g) → HF(g) + HOF (g)
इस अभिक्रिया का अपचयोपचय औचित्य स्थापित कीजिए –
उत्तर:
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चूँकि फ्लुओरीन, ऑक्सीकरण तथा अपचयन दोनों प्रदर्शित करता है, अतः यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।

प्रश्न 8.5
H2SO5, \(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) तथा \(\mathrm{NO}^{3-}\) में सल्फर, क्रोमियम तथा नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या की गणना कीजिए। साथ ही इन यौगिकों की संरचना बताइए तथा इसमें हेत्वाभास (fallacy) का स्पष्टीकरण दीजिए।
उत्तर:
H2SO5 में सल्फर की आ० सं० की गणना:
माना H2SO5 में S की आ० सं० x है।
2(+1) + x + 5(-2) = 0
x – 8 = 0
x = +8
यह ऑक्सीकरण संख्या ठीक नहीं है। चूंकि सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या +6 से अधिक नहीं हो सकती। चूंकि H2SO5 में दो ऑक्सीजन परमाणु परॉक्साइड के रूप में होते हैं; अतः इनकी ऑक्सीकरण संख्या -1 होगी।
∴ 2(+1) + x + 3(-2) + 2(-1) = 0
2 + x – 6 – 2 = 0
x = 6

∴ H2SO5 की संरचना निम्नवत् है –
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\(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) में क्रोमियम की आ० सं० की गणना:
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\(\mathrm{NO}^{3-}\) में नाइट्रोजन की आ० सं० की गणना:
माना \(\mathrm{NO}^{3-}\) में N की आ० सं० x है।
x + 3(-2) = -1
या x = +5
प्राप्त आ० सं० का मान सही है।

अत: \(\mathrm{NO}^{3-}\) की संरचना निम्नवत् है –
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प्रश्न 8.6
निम्नलिखित यौगिकों के सूत्र लिखिए –
(क) मरक्यूरी (II) क्लोराइड
(ख) निकिल (II) सल्फेट
(ग) टिन (IV) ऑक्साइड
(घ) थैलियम (I) सल्फेट
(ङ) आयरन (III) सल्फेट
(च) क्रोमियम (II) ऑक्साइड
उत्तर:
(क) HgCl2
(ख) NiSO4
(ग) SnO2
(घ) TI2SO4
(ङ) Fe2(S4)3
(च) Cr2O3

प्रश्न 8.7
उन पदार्थों की सूची तैयार कीजिए, जिनमें कार्बन -4 से +4 तक की तथा नाइट्रोजन -3 से + 5 तक की ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
उत्तर:
कार्बन की आ० सं० (-4 से +4 तक) वाले यौगिक निम्नवत् हैं –
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नाइट्रोजन की आ० सं० -3 से +3 तक वाले यौगिक निम्नवत् हैं –
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प्रश्न 8.8
अपनी अभिक्रियाओं में सल्फर डाइऑक्साइड तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड ऑक्सीकारक तथा अपचायकदोनों ही रूपों में क्रिया करते हैं, जबकि ओजोन तथा नाइट्रिक अम्ल केवल ऑक्सीकारक के रूप में ही क्यों?
उत्तर:
सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड (H2O2) में सल्फर तथा ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्रमश: +4 तथा -1 हैं। चूँकि इन यौगिकों की रासायनिक अभिक्रियाओं में ऑक्सीकरण में वृद्धि या कमी हो सकती है, अतः ये ऑक्सीकारक तथा अपचायक दो रूपों में कार्य करते हैं।

उदाहरणार्थ –
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ओजोन (O3) में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है तथा नाइट्रिक अम्ल में नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण अवस्था +5 है। चूँकि ये दोनों आ० सं० में कमी तो प्रदर्शित करते हैं, परन्तु वृद्धि नहीं करते, अत: ये केवल ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करते हैं, अपचायक के रूप में नहीं।

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प्रश्न 8.9
इन अभिक्रिया को देखिए –
(क) 6CO2(g) + 6H2O(l) → C6H12O6(aq) + 6O2(g)
(ख) O3(g) + H2O2 → H2O(l) + 2O2(g)
बताइए कि इन्हें निम्नलिखित ढंग से लिखना ज्यादा उचित क्यों है?
(क) 6CO2(g) + 12H2O(l) → C6H12O6(aq) + 6H2O(l) + 6O2(g)
(ख) O3(g) + H2O2(l) → H2O(l) + O2(g) + O2(g)
उपरोक्त अपचयोपचय अभिक्रियाओं (क) तथा (ख) के अन्वेषण की विधि सुझाइए।
उत्तर:
(क) 6CO2(g) + 6H2O(l) → C6H12O6(aq) + 6O2(g)
इस समीकरण को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा सन्तुलित करते हैं –
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ऑक्सीकरण तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रियाएँ लिखने पर,
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ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को सन्तुलित करने पर,
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उपर्युक्त दोनों सन्तुलित अर्द्ध-अभिक्रियाएँ जोड़ने पर,
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यह अभिक्रिया के अन्वेषण की विधि सुझाता है अर्थात् किस प्रकार इलेक्ट्रॉन त्यागे अथवा ग्रहण किया जाते हैं। इसके साथ-साथ अभिक्रिया को उपर्युक्त संशोधित रूप में लिखने का उचित कारण स्पष्ट करता है।

(ख) O3(g) + H2O2(l) → H2O(l) + 2O2(g)
इस समीकरण को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा सन्तुलित करते हैं –
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सन्तुलित ऑक्सीकरण तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रियाएँ लिखकर उन्हें जोड़ने पर,
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* इस अभिक्रिया में O3 ऑक्सीकारक की भाँति तथा H2O2 अपचायक की भाँति कार्य करते हैं।
* यदि दो समान परमाणुओं के मध्य एक उपसहसंयोजी आबन्ध उपस्थित होता है तो दाता परमाणु +2 ऑक्सीकरण संख्या प्राप्त करता है तथा ग्राही -2 ऑक्सीकरण संख्या प्राप्त करता है। इस प्रकार अभिक्रिया के अन्वेषण की विधि स्पष्ट हो जाती है तथा इसे संशोधित रूप में लिखने का कारण भी स्पष्ट हो जाता है।

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प्रश्न 8.10
AgF2 एक अस्थिर यौगिक है। यदि यह बन जाए तो यह यौगिक एक अतिशक्तिशाली ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है? क्यों?
उत्तर:
AgF2 वियोजित होकर Ag+ तथा 2F देता है।
Ag2+ एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके Ag+ में अपचयित हो जाता हैं –
Ag2+ + e → Ag+
Ag+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नवत् है –
1s2, 2s22p6, 3s2 3p6 3d10, 4s2 4p6 4d10
चूंकि यह इलेक्ट्रॉनिक विन्यास d – कक्षकों के पूर्णतया भरे होने के स्थाई है, अत: AgF2 एक अतिशक्तिशाली ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है।

प्रश्न 8.11
“जब भी एक ऑक्सीकारक तथा अपचायक के बीच अभिक्रिया सम्पन्न की जाती है, तब अपचायक के आधिक्य में निम्नतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक तथा ऑक्सीकारक के आधिक्य में उच्चतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक बनता है।” इस वक्तव्य का औचित्य तीन उदाहरण देकर दीजिए।
उत्तर:
1. Fe तथा O2 के मध्य अभिक्रिया –
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2. Fe तथा Cl2 के मध्य अभिक्रिया –
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3. NH3 तथा Cl2 के मध्य अभिक्रिया –
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प्रश्न 8.12
इन प्रेक्षणों की अनुकूलता को कैसे समझाएँगे?
(क) यद्यपि क्षारीय पोटेशियम परमैंगनेट तथा अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट दोनों ही ऑक्सीकारक हैं। फिर भी टॉलूईन से बेन्जोइक अम्ल बनाने के लिए हम ऐकोहॉलिक पोटैशियम परमैंगनेट का प्रयोग ऑक्सीकारक के रूप में क्यों करते हैं? इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित अपचयोपचय समीकरण दीजिए।
(ख) क्लोराइडयुक्त अकार्बनिक यौगिक में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल डालने पर हमें तीक्ष्ण गन्ध वाली HCl गैस प्राप्त होती है, परन्तु यदि मिश्रण में ब्रोमाइड उपस्थिति हो तो हमें ब्रोमीन की लाल वाष्प प्राप्त होती है, क्यों?
उत्तर:
(क) उदासीन माध्यम में KMnO4 निम्नलिखित प्रकार से ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है –
Mn\(\mathrm{O}^{4-}\) + 2H2O + 3e2- → MnO2 + 4OH
प्रयोगशाला में टॉलूईन को बेन्जोइक अम्ल में ऑक्सीकृत करने के लिए क्षारीय KMnO4 का प्रयोग किया जाता है –
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औद्योगिक निर्माण के दौरान ऐल्कोहॉलिक KMnO4 को प्रयोग करने के निम्नलिखित दो कारण हैं –
1. अभिक्रिया के दौरान क्षार (OH आयन) स्वत: उत्पन्न हो जाता है; अतः क्षार मिलाने का अतिरिक्त व्यय नहीं होता।
2. एक कार्बनिक ध्रुवी विलायक, एथिल ऐल्कोहॉल, दोनों अभिकारकों, KMnO4 (इसकी ध्रुवी प्रकृति के कारण) तथा टॉलूईन (इसके कार्बनिक यौगिक होने के कारण) का मिक्षित करने में सहायता प्रदान करता है।

(ख) एक क्लोराइडयुक्त अकार्बनिक यौगिक; जैसे –
NaCl, जब सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया करता है, तब हाइड्रोजन क्लोराइड गैस उत्पन्न होती है।
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ब्रोमाइड (जैसे – NaBr) की H2SO4 से अभिक्रिया पर भी HBr की वाष्प उत्पन्न होती हैं, परन्तु HBr के प्रबल अपचायक होने के कारण, यह सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा ऑक्सीकृत होकर ब्रोमीन की लाल वाष्प मुक्त करता है।
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प्रश्न 8.13
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में ऑक्सीकृत, अपचयित, ऑक्सीकारक तथा अपचायक पदार्थ पहचानिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 8.14
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में एक ही अपचायक थायोसल्फेट, आयोडीन तथा ब्रोमीन से अलग-अलग प्रकार से अभिक्रिया क्यों करता है?
\(2 \mathrm{S}_{2} \mathrm{O}_{3}^{2-}\) (aq) + I2(s) → \(2 \mathrm{S}_{4} \mathrm{O}_{6}^{2-}\) (aq) + 2I (aq)
\(\mathbf{s}_{2} \mathbf{o}_{3}^{2-}\) (aq) + 2Br2(l) + 5H2O(l) → \(2 \mathrm{S}_{2} \mathrm{O}_{4}^{2-}\) (aq) + 4Br (aq) + 10H+ (aq)
उत्तर:
चूँकि \(2 \mathrm{S}_{2} \mathrm{O}_{3}^{2-}\) में S की ऑक्सीकरण संख्या +2 से \(2 \mathrm{S}_{4} \mathrm{O}_{6}^{2-}\) आयन में S की ऑक्सीकरण संख्या +\(\frac{5}{2}\) में परिवर्तित हो जाती है, अत: आयोडीन थायोसल्फेट आयन को टेट्राथायेनेट आयन में ऑक्सीकृत कर देती है –
चूँकि S की ऑक्सीकरण संख्या +2(\(2 \mathrm{S}_{2} \mathrm{O}_{3}^{2-}\) में) से +6(\(\mathrm{SP}_{4}^{2-}\) आयन में) परिवर्तित हो जाती है, अत: ब्रोमीन (Br2) थायोसल्फेट आयन को सल्फेट आयन में ऑक्सीकृत कर देती है।
अतः ब्रोमीन, आयोडीन की तुलना में प्रबल ऑक्सीकारक है –
(E0Br2/2\(\overrightarrow{\mathrm{Br}}\) = 1.09V तथा E0I2/2I = 0.54V)

प्रश्न 8.15
अभिक्रिया देते हुए सिद्ध कीजिए कि हैलोजनों में फ्लुओरीन श्रेष्ठ ऑक्सीकारक तथा हाइड्रोहैलिक ‘यौगिकों में हाइड्रोआयोडिक अम्ल श्रेष्ठ अपचायक है।
उत्तर:
हैलोजेनों की इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति प्रबल होती है। अतः ये शक्तिशाली ऑक्सीकारक होते हैं। हैलोजेनों की ऑक्सीकारक क्षमता का आपेक्षिक क्रम निम्नलिखित है –
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हैलोजेनों में फ्लुओरीन श्रेष्ठ ऑक्सीकारक है, इस तथ्य की पुष्टि इस प्रकार हो सकता है कि यह अन्य हैलोजेनों को उनके यौगिकों से मुक्त कर देता है। उदाहरणार्थ –
2KCl + F2 → 2KF + Cl2
2KBr + F2 → 2KF + Br2
2KI + F2 → 2KF + I2
हाइड्रोहैलिक अम्लों में हाइड्रोआयोडिक अम्ल श्रेष्ठ अपचायक है; क्योंकि इसकी आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी न्यूनतम (299kJmol-1) होती है।
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मेथेन का आयोडीनीकरण (iodination) उत्क्रमणीय प्रकृति का होता है; क्योंकि अभिक्रिया में उत्पन्न HI, प्रबलतम अपचायक होने के कारण आयोडो-मेथेन को पुनः मेथेन में परिवर्तित कर देता है।
या CH4 + I2 → CH3I + HI
CH3 + HI → CH4 + I2
CH4 + I2 ⇄ CH2I + HI

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प्रश्न 8.16
निम्नलिखित अभिक्रिया क्यों होती है?
\(\mathrm{XeO}_{6}^{4-}\) (aq) + 2F (aq) + 6H+ (aq) → XeO3(g) + F2(g) + 3H2O(l)
यौगिक Na4XeO6 (जिसका एक भाग \(\mathrm{XeO}_{6}^{4-}\) है) के बारे में आप इस अभिक्रिया में क्या निष्कर्ष निकाल सकते है।
उत्तर:
\(\mathrm{XeO}_{6}^{4-}\) (aq) + 2F (aq) + 6H+ (aq) → XeO3(g) + F2(g) + 3H2O(l)
यह अभिक्रिया F2 के रासायनिक विधियों द्वारा निर्माण की हाल ही में विकसित की गई रासायिकन विधियों की श्रेणी में से एक है। यह प्रचलित विद्युत-रासायनिक विधि नहीं है। इस अभिक्रिया में \(\mathrm{XeO}_{6}^{4-}\) एक प्रबल ऑक्सीकरण के रूप में कार्य करते हुए F को F2 में ऑक्सीकृत कर देता है जो विद्युत-रासायनिक श्रेणी में सर्वाधिक अपचायक क्षमता वाला तत्व है।
F2 के निर्माण की एक अन्य रासायनिक विधि में अन्य प्रबल ऑक्सीकारक K2MnF6 प्रयुक्त होता है –
2K2MDF6 + 4SbF5 → 4KSbF6 + 2MnF3 + F2

प्रश्न 8.17
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में –
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उत्तर:
(क) Ag+ आयन Ag में अपचयित हो अवक्षेपित हो जाते हैं।
(ख) Cu2+ आयन Cu में अपचयित हो जाता हैं अवक्षेपित हो जाता है।
(ग) संकर में उपस्थित Ag+ (aq).Ag में अपचयित हो जाते हैं जो अवक्षेपित हो जाता है।
(घ) Cu2+ (aq) आयतन (CH6H5OCHO) द्वारा अपचयित नहीं होते एक दुर्बल अपचायक है।

प्रश्न 8.18
आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा निम्नलिखित रेडॉक्स अभिक्रियाओं को सन्तुलित कीजिए –
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उत्तर:
(क) दी हुई अभिक्रिया है –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + I (aq) → MnO2(s) + I2(s)

पद 1.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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पद 2.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में I परमाणु का सन्तुलन करने पर इस प्रकार लिखते हैं –
2I (aq) → I2(s)

पद 3.
O परमाणुओं के सनतुलन करने के लिए अपचयन अभिक्रिया में दाईं ओर 2 जल-अणु जोड़ते हैं –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) → MnO2(s) + 2H2O(l)

H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए बाईं ओर चार H+ आयन जोड़ते हैं –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 4H+ (aq) → MnO2 (s) + 2H2O(l)

चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है, अत: 4H+ के लिए समीकरण के दोनों ओर हम 4OH जोड़ देते हैं।
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 4H+ (aq) + OH (aq) → MnO2 (s) 2H2O(l) + 4H (aq)

H+ तथा OH आयनों के योग को H2O से बदलने पर परिणामी समीकरण इस प्रकार है –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 2H2O(l) + 3e → MnO2 (s) + 4OH (aq)

पद 5.
दोनों अभिक्रियाओं के आवेशों द्वारा संतुलित करते हैं जिसे निम्न प्रकार से दर्शाया गया है –
2I (a) → I2 (s) + 2e
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 2H2O(l) + 3e → MnO2 (s) + 4OH (aq)

अब दोनों इलेक्ट्रॉनों की संख्या को बराबर करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को 3 से तथा अपचयन अर्द्ध अभक्रिया को 2 से गुणा करके जोड़ने पर –
6l (aq) + \(\mathrm{2MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 4H2O(l) → 3l2 (s) + 2MnO2 (s) + 8OH (aq) जो कि अभीष्ट संतुलित समीकरण है।

(ख) दी हुई अभिक्रिया है –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 2SO2 (g) → Mn2+ (aq) + \(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq)

पद 1.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं –

1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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पद 2.
ऑक्सीजन परमाणु के सन्तुलन के लिए अर्द्ध ऑक्सीकरण अभिक्रिया (i) में बाईं ओ 2 जल अणु जोड़ने पर –
SO2 (g) + 2H2O(l) → \(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq)

हाइड्रोजन परमाणुओं के सन्तुलन के लिए ऑक्सीकरण अभिक्रिया (ii) में दाईं ओर 3H+ आयन जोड़ने पर
SO2 (g) + 2H2O(l) → \(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq) + 3H+ (aq)

पद 3.
ऑक्सीजन परमाणुओं के सन्तुलन के लिए अपचयन अभिक्रिया के दाईं ओर चार जल-अणु जोड़ने पर –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) → Mn2+ (aq) + 4H2O(l)

हाइड्रोजन परमाणुओं के सन्तुलन के लिए अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया के बाईं ओर 8H+ आयन जोड़ने पर –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 8H+ (aq) → Mn2+ (aq) + 4H2O(l)

पद 4.
दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेशों का संतुलन इलेक्ट्रॉनों द्वारा करते हैं –
SO2 (g) + 2H2O(l) → \(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq) + 3H+ (aq) + 2e
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 8H+ (aq) + 5e → Mn2+ (aq) + 4H2O(l)

दोनों इलेक्ट्रॉनों की संख्या एकसमान बनाने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को 5 से तथा अपचयन अर्द्धअभिक्रिया को 2 से गुणा करके जोड़ने पर –
\(\mathrm{2MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 5SO2 (g) + 2H2O (l) + H+ (aq) → 5\(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq) + 2Mn2+ (aq) जो अभीष्ट संतुलित समीकरण है।

(ग)
पद 1. पहले हम ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
H2O2 (aq) + Fe2+ (aq) → Fe3+ (aq) + H2O (l)

पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में Fe परमाणु का सन्तुलन करने पर हम लिखते हैं –
Fe2+ (aq) → Fe3+ (aq)

पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम समीकरणं को इस प्रकार लिखते हैं –
H2O2 (aq) → 2H2O (l)

H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम बाईं ओर दो H+ आयन जोड़ देते हैं –
H2O2 (aq) + 2H+ (aq) → 2H2O (l)

पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन दर्शाई गई विधि द्वारा करते हैं –
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इलेक्ट्रॉन की संख्या को एकसमान बनाने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को 2 से गुणा करते हैं –
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पद 6.
दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
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अन्तिम अत्यापन दर्शाता है कि दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

(घ)
पद 1.
पहले हम ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –

1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणओं के सन्तुलन के लिए हम बाईं ओर दो जल अणु जोड़ते हैं –
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H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दाईं ओर 4H+ आयन जोड़ देते हैं –
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पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दाईं ओर सात जल अणु जोड़ते हैं तथा Cr परमाणु को भी सन्तुलित करते हैं –
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H परमाणु के सन्तुलन के लिए हम बाईं ओर चौदह H+ आयन जोड़ देते हैं –
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पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन इस प्रकार करते हैं –
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पद 6.
दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
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अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

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प्रश्न 8.19
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के समीकरणों को आयन-इलेक्ट्रॉन तथा ऑक्सीकरण संख्या विधि (क्षारीय माध्यम में) द्वारा सन्तुलित कीजिए तथा इनमें ऑक्सीकरण और अपचायकों की पहचान कीजिए –
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उत्तर:
(क) आयन इलेक्ट्रॉन विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
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पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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P ऑक्सीकारक अपचायक दोनों की भाँति कार्य करता

पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में पहले P परमाणुओं को सन्तुलित करके O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम बाई ओर आठ जल अणु जोड़ते हैं।
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इस अभिक्रिया में H परमाणु सन्तुलित करने के लिए आठ H+ आयन दाईं ओर जोड़ते हैं।
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अब चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है; अत: दोनों ओर OH आयन जोड़ते हैं –
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पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में P परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं –
P4 → 4PH3 (g)

H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम उपर्युक्त अभिक्रिया में बाईं ओर बारह H+ आयन जोड़ देते हैं –
P4 (s) + 12H+ (aq) → 4PH3 (g)

क्योंकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है; अत: 12H+ आयनों के लिए 12OH आयन समीकरण के दोनों ओर जोड़ते –
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H+ तथा OH+ के संयोग से जल अणु बनाने के कारण परिणामी समीकरण निम्नलिखित प्रकार से होगी –
P4 (s) + 12H2O (l) → 4PH3 (g) + 12OH (aq)

पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन निम्नवत् करते हैं –
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पद 6.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
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अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि समीकरण में दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

ऑक्सीकरण संख्या विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
अभिक्रिया का ढाँचा इस प्रकार है –
P4 (s) + OH (aq) → PH3 (g) + H2PO2 (aq)

पद 2.
अभिक्रिया में P की ऑक्सीकरण संख्या लिखते हैं –
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यह इस बात का सूचक है कि P ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों रूपों में कार्य करता है।

पद 3.
P की ऑक्सीकरण अवस्था 3 घटती है तथा 1 बढ़ती है। अतः हमें H2PO2 की गुणा 3 से करनी होगी।
P4 (s) + OH (aq) → PH3 (g) + 3H2PO2 (aq)

पद 4.
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है तथा दोनों ओर के आयनों का आवेश एकसमान नहीं है। अत: हम बाई ओर दो OH आयन जोड़ेंगे जिससे आवेश एकसमान हो जाए।
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पद 5.
इस पद में हाइड्रोजन आयनों को सन्तुलित करने के लिए हम तीन जल अणुओं को बाईं ओर जोड़ते हैं –
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(ख) आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
N2H4 (l) + ClO3 (aq) → NO(g) + Cl (g)

पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –

1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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(N2H4 अपचायक तथा ClO3 ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है।)

पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में N – परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं –
N2H4(l) → 2NO(g)
अब O परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण में बाईं ओर दो जल अणु जोड़ते हैं –
N2H4(l) + 2H2O(l) → 2NO(g)
अब H परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण में दाईं ओर 8H+ जोड़ते हैं –
N2H4(l) + 2H2O(l) → 2NO(g) + 8H+(aq)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है; अतः समीकरण के दोनों ओर 8OH आयन जोड़ते हैं –
N2H4(l) + 8OH(aq) → 2NO(g) + 8H+ + 8OH(aq)
H+ तथा OH+ आयनों के संयोग पर जल अणु बनने के कारण समीकरण निम्नवत होगी –
N2H4(l) + 8OH(aq) → 2NO(g) + 6H2O(aq)

पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए समीकरण के दाईं ओर तीन जल अणु जोड़ते हैं –
ClO3 (aq) → Cl (g) + 3H2O(l)
H परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण के बाईं ओर छह H+ आयन जोड़ते हैं –
ClO3 (aq) + 6H+ (aq) → Cl (g) + 3H2O(l)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है; अतः समीकरण में दोनों ओर छह OH आयन जोड़ते हैं –
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पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं के आवेश का सन्तुलन निम्नवत् करते हैं –
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इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को 3 से तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया को 4 से गुणा करते हैं –
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पद 6.
दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
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अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि उपर्युक्त समीकरण परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से सन्तुलित है।

ऑक्सीकरण संख्या विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
अभिक्रिया का ढाँचा इस प्रकार है –
N2H4(l) + ClO3 (aq) → NO(g) + Cl (g)

पद 2.
अभिक्रिया में N तथा Cl की ऑक्सीकरण संख्या लिखते हैं –
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स्पष्ट है कि N2H4 अपचायक तथा ClO3 ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करते हैं।

पद 3.
ऑक्सीकरण संख्या में होने वाली वृद्धि तथा कमी की गणना करते हैं तथा इन्हें एकसमान बनाते हैं।
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पद 4.
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है तथा अभिक्रिया आवेश की दृष्टि से सन्तुलित है; अतः O तथा H परमाणु के सन्तुलन के लिए अभिक्रिया में दाईं ओर 6 जल अणु जोड़ देने पर पूर्णतया सन्तुलित समीकरण प्राप्त हो जाएगी।
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यह सन्तुलित समीकरण है।

(ग) आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
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पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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(H2O2 आपचायक तथा Cl2O7 ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करते हैं।)

पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दो H+ दाईं ओर जोड़ते हैं –
H2O2 (aq) → O2 (g) + 2H+ (aq)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में सम्पन्न होती है; अतः दोनों ओर OH आयन जोड़ने पर –
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H+ तथा OH आयन के संयोग से जल अणु बनने पर परिणामी समीकरण निम्नवत् होगी –
H2O2 (aq) + 20H (aq) → O2 (g) + 2H2O (l)

पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में सर्वप्रथम Cl परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं –
Cl2O7 (g) → 2ClO2 (aq)
O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दाईं ओर तीन जल-अणु जोड़ते हैं –
Cl2O7 (g) → 2ClO2 (aq) + 3H2O (l)
H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम 6H+ बाईं ओर जोड़ते हैं –
Cl2O7 (g) + 6H+ (aq) → 2ClO2 (aq) + 3H2O (l)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में सम्पन्न होती है; अत: 6H+ के लिए दोनों ओर 6OH+ जोड़ते हैं –
Cl2O7 (g) + 6H+ (aq) + 6OH (aq) → 2ClO2 (aq) + 3H2O(l) + 6OH (aq)
H+ तथा OH के संयोग से जल अणु बनने पर परिणामी समीकरण निम्नवत् करते हैं –
Cl2O7 (g) + 3H2O (l) → 2ClO2(aq) + 6OH (aq)

पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन निम्नवत् करते हैं –
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इलेक्ट्रॉनों की संख्या एकसमान करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया की गुणा 4 से करते हैं।
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पद 6.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ
अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि समीकरण में दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

ऑक्सीकरण संख्या विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
अभिक्रिया का ढाँचा इस प्रकार है –
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पद 2.
अभिक्रिया में Cl तथा O की ऑक्सीकरण संख्या लिखते हैं –
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स्पष्ट है कि H2O2 अपचायक तथा Cl2O7 ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करते हैं।

पद 3.
ऑक्सीकरण संख्या में होने वाली कमी तथा वृद्धि की गणना करते हैं तथा उन्हें एकसमान बनाते हैं –
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पद 4.
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है तथा दोनों ओर के आयनों का आवेश एकसमान नहीं है; अतः हम दो OH आयन बाईं ओर जोड़ देते हैं –
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H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए दाईं ओर पाँच जल-अणु जोड़ते हैं।
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प्रश्न 8.20
निम्नलिखित अभिक्रिया से आप कौन-सी सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं –
(CN)2 (g) + 20H (aq) → CN (aq) + CNO (aq) + H2O
उत्तर:
दी हुई अभिक्रिया से निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त होती हैं –
(a) अभिक्रिया में क्षारीय माध्यम में सायनोजन (CN2) का वियोजन हो रहा हैं।
(b) (CN)2 तथा CN दोनों प्रकृति में छद्म हैलोजन (pseudo halogen) हैं।
(c) यह एक असमानुपातन अभिक्रिया है। क्योंकि सायनोजन (CN)2 का CNO में ऑक्सीकरण तथा CN में अपचयन होता है।

प्रश्न 8.21
Mn3+ आयन विलयन में अस्थायी होता है तथा असमानुपातन द्वारा Mn2+, MNO2, और H+ आयन देता है। इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित आयनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर:
असमानुपातन अभिक्रिया का प्रमुख समीकरण हैं –
Mn3+ (aq) → Mn2+ (aq) + MnO2 (s) + H+ (aq)

पद 1.
दो अर्द्ध समीकरण निम्नवत हैं –

1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
Mn3+ → MnO2

2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
Mn3+ → Mn2+

पद 2.
अर्द्ध-अभिक्रिया (i) में O परमाणुओं को संतुलित करने के लिए बाईं ओर 2 जल अणु जोड़ते हैं –
Mn3+ + 2H2O → MnO2

अर्द्ध समीकरण (ii) में H परमाणुओं को संतुलित करने के लिए 4H+ दाईं ओर जोड़ते हैं –
Mn3+ + 2H2O → MnO2 + 4H+

पद 3.
उपर्युक्त अर्द्ध समीकरणों में आवेशों का इलेक्ट्रॉनों द्वारा संतुलन निम्न प्रकार से करते हैं –
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पद 4.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध समीकरणों को जोड़ने पर
2Mn3+ + 2H2O → MnO2 + Mn2+ + 4H+ जो अभीष्ट संतुलित समीकरण है।

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प्रश्न 8.22
Cs, Ne, I तथा F में ऐसे तत्व की पहचान कीजिए, जो –
(क) केवल ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) केवल धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(घ) न ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
उत्तर:
(क) F केवल ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) Cs केवल धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) I ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(घ) Ne न ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 8.23
जल के शुद्धिकरण में क्लोरीन को प्रयोग में लाया जाता है। क्लोरीन की अधिकता हानिकारक होती है। सल्फर डाइऑक्ससाइड से अभिक्रिया करके इस अधिकता को दूर किया जाता है। जल में होने वाले इस अपचयोपचय परिवर्तन के लिए सन्तुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर:
पद 1.
अभिक्रिया का ढांचा समीकरण निम्नवत् –
Cl2 + SO2 → Cl + \(\mathrm{SO}_{4}^{2-}\)

पद 2.
दो अर्द्ध समीकरण इस प्रकार हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध अभिक्रिया:
SO2 → \(\mathrm{SO}_{4}^{2-}\)

2. अपचयन अर्द्ध अभिक्रिया:
Cl2 → Cl

पद 3.
अर्द्ध अभिक्रिया (i) में O परमाणुओं को संतुलित करने के लिए समीकरण में बाई ओर 2 जल अणु जोड़ते हैं –
SO2 + 2H2O → \(\mathrm{SO}_{4}^{2-}\) + 4H+

पद 4.
अभिक्रिया (ii) की संतुलित अर्द्ध-अभिक्रिया इस प्रकार है –
Cl2 → 2Cl

पद 5.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेशों का संतुलन इस प्रकार करते हैं –
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पद 6.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध अभिक्रियाओं के समीकरणों को जोड़ने पर
Cl2 + SO2 + 2H2O → 2Cl + \(\mathrm{SO}_{4}^{2-}\) + 4H+ जो अभीष्ट संतुलित समीकरण है।

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प्रश्न 8.24
इस पुस्तक में दी गई आवर्त सारणी की सहायता से निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –
(क) सम्भावित अधातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन की अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
(ख) किन्ही तीन धातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
उत्तर:
(क) ऐसा अधातुएँ जो परिवर्ती ऑक्सीकरण संख्याओं में रह सकती हैं, असमानुपातन की अभिक्रिया कर सकती हैं। उदाहरणार्थ: फॉस्फोरस, क्लोरीन तथा सल्फर।
(ख) संक्रमण श्रेणी (d – बलॉक तत्व) से सम्बद्ध धातुएँ असमानुपातन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित कर सकती हैं। उदाहरणार्थमैगनीज, आयरन तथा कॉपर।

प्रश्न 8.25
नाइट्रिक अम्ल निर्माण की ओस्टवाल्ड विधि के प्रथम पद में अमोनिया गैस के ऑक्सीजन गैस द्वारा ऑक्सीकरण से नाइट्रिक ऑक्साइड गैस तथा जलवाष्प बनती है। 10.0g अमोनिया तथा 20.00g ऑक्सीजन द्वारा नाइट्रिक ऑक्साइड की कितनी अधिकतम मात्रा प्राप्त हो सकती है?
उत्तर:
नाइट्रिक अम्ल की ओस्टवाल्ड विधि के प्रथम पद में अमोनिया गैस के ऑक्सीजन गैस द्वारा ऑक्सीजन से नाइट्रिक ऑक्साइड गैस तथा जलवाष्प का बनना निम्नलिखित अभिक्रिया के अनुसार है –
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∵ 68g NH2 के लिए आवश्यक ऑक्सीजन = 160g
∴ 10g MH3 के लिए आवश्यक ऑक्सीजन = \(\frac{160}{68}\) × 10
= 23.6g
चूँकि ऑक्सीजन की उपलब्ध मात्रा 20g आवश्यक मात्रा 23.6g से कम है, अत: ऑक्सीजन सीमान्त अभिकर्मक है।
∵ 160g O2 से NO बनी है = 120g
∴ 20g O2 से NO बनेगी = \(\frac{120}{160}\) × 20
= 15g

प्रश्न 8.26
पाठ्य-पुस्तक की सारणी 8.1 में दिए गए मानक विभवों की सहायता से अनुमान लगाइए कि क्या इन अभिकारकों के बीच अभिक्रिया सम्भव है?
(क) Fe3+ तथा I (aq)
(ख) Ag+ तथा Cu(s)
(ग) Fe3+ (aq) तथा Br (aq)
(घ) Ag(s) तथा Fe3+ (aq)
(ङ) Br2 (aq) तथा Fe2+
उत्तर:
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प्रश्न 8.27
निम्नलिखित में से प्रत्येक के विद्युत अपघटन से प्राप्त उत्पादों के नाम बताइए –
(क) सिल्वर इलेक्ट्रोड के साथ AgNO3 का जलीय विलयन
(ख) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ AgNO3 का जलीय विलयन
(ग) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ H2SO4 का तनु विलयन
(घ) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ CuCl2 का जलीय विलयन।
उत्तर:
(क) सिल्वर इलेक्ट्रोड के साथ AgNO3 का जलीय विलयन देता है –
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प्रश्न 8.28
निम्नलिखित धातुओं को उनके लवणों के विलयन में से विस्थापन की क्षमता के क्रम में लिखिए –
Al, Cu, Fe Mg तथा Zn
उत्तर:
Mg > AI > Zn > Fe > Cu

प्रश्न 8.29
नीचे दिए गए मानक इलेक्ट्रोड विभवों के आधार पर धातुओं को उनकी बढ़ती अपचायक क्षमता के क्रम में लिखिए –
K+ / K = -2.93 V, Ag+ / Ag = 0.80V,
Hg2+ / Hg = 0 79V,
Mg2+ / Mg = -2.37V, Cr3+ / Cr = -0.74V
उत्तर:
Ag < Hg < Cr < Mg < K

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प्रश्न 8.30
उस गैल्वेनी सेल को चित्रित कीजिए, जिसमें निम्नलिखित अभिक्रिया होती है –
Zn(s) + 2Ag+ (aq) → Zn2+ (aq) + 2Ag(s) अब बताइए कि –
(क) कौन-सा इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है?
(ख) सेल में विद्युत-धारा के वाहक कौन हैं?
(ग) प्रत्येक इलेक्ट्रोड पर होने वाली अभिक्रियाएँ क्या है?
उत्तर:
Zn(s)|Zn2+(aq)||Ag+ (aq)|Ag(s)
(क) Zn इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है।
(ख) इलेक्ट्रॉन।
(ग)
ऐनोड पर: Zn → Zn2+ + 2e
कैथोड पर: Ag+ + e → Ag

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 4 प्राणि जगत

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 4 प्राणि जगत Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology प्राणि जगत Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों तो प्राणियों के वर्गीकरण में आप क्या परेशानियाँ महसूस करेंगे?
उत्तर:
विश्व में लगभग 10 लाख प्रकार के जन्तुओं को पहचाना जा चुका है। इतनी अधिक विविधता वाले जीवों का अलग-अलग अध्ययन किसी के लिए भी सम्भव नहीं है; अतः जीवधारियों को कुछ महत्त्वपूर्ण लक्षणों के आधार पर इस प्रकार वर्गीकृत करते हैं कि एक समूह के मुख्य लक्षण उस समूह के. सभी जीवों में पाए जाते हैं।

इस प्रकार किसी एक जीव का विस्तृत अध्ययन कर लेने से उस समूह के अन्य जीवों का सामान्य ज्ञान हो जाता है। जिन लक्षणों के आधार पर जन्तुओं को वर्गीकृत करते हैं, वे लक्षण उनके मूलभूत लक्षण कहलाते हैं; जैसे – संगठन का स्तर, सममिति, कोशिका संगठन, गुहा की प्रकृति, खण्डीभवन, पाचन तन्त्र, परिसंचरण तन्त्र, जनन तन्त्र, पृष्ठ रज्जु आदि।

मूलभूत लक्षणों के ज्ञात न होने पर प्राय: ऐसे जीव जिनका आपस में दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं होता, एक ही समूह में वर्गीकृत हो जाते हैं; जैसे-पंखों के आधार पर कीट, उड़ने वाली छिपकली, पक्षी चमगादड़ को उड़ने वाले जन्तुओं के समूह में वर्गीकृत किया जाता है, लेकिन इनमें परस्पर कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाता।

इसी प्रकार अनेक आर्थोपोडा, मोलस्का जन्तुओं, मछलियों, जलसर्प, व्हेल, हॉल्फिन आदि को जलीय जीवों के अन्तर्गत वर्गीकृत करते हैं, जबकि उनमें परस्पर अनेक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। अतः आधुनिक समय में प्राणियों का वर्गीकरण उनके मूलभूत लक्षणों के आधार पर ही किया जाता है।

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प्रश्न 2.
यदि आपको एक नमूना (स्पेसिमेन) दे दिया जाए तो वर्गीकरण हेतु आप क्या कदम अपनाएँगे?
उत्तर:
किसी नमूने या स्पेसिमेन का वर्गीकरण करने के लिए हम उसके मुख्य लक्षणों का प्रेक्षण करेंगे। इसके पश्चात् उसका वर्गीकरण निम्नलिखित मूलभूत लक्षणों के आधार पर करेंगे–कोशिका व्यवस्था, संगठन का स्तर, शारीरिक सममिति, प्रगुहा की प्रकृति, पाचन तन्त्र, परिसंचरण तन्त्र, श्वसन तन्त्र, जनन तन्त्र, पृष्ठ रज्जु आदि।

प्रश्न 3.
देहगुहा एवं प्रगुहा का अध्ययन प्राणियों के वर्गीकरण में किस प्रकार सहायक होता है?
उत्तर:
देहगुहा प्रगुहा (Body Cavity or Coelome):
शरीर भित्ति तथा आहारनाल के मध्य तरल से भरी गुहा को देहगुहा या प्रगुहा (coelome) कहते हैं। यह भी भ्रूणीय परिवर्धन के समय मीसोडर्म (mesoderm) से बनती है। देहगुहा (सीलोम) शरीर को लचीलापन प्रदान करती है और इसमें स्थित अंगों को बाह्य आघातों से बचाती है।

इससे युक्त प्राणियों को प्रगुही (coelomate) कहते हैं, और जिनमें इसका अभाव होता है उन्हें अगुहीय कहते हैं। देहगुहा (सीलोम) की प्रकृति के आधार पर जन्तुओं को निम्नलिखित तीन समूहों में बाँटा जा सकता है –
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चित्र – (क) प्रगुहीय, (ख) कूटगुहिक, (ग) अगुहीय की अनुप्रस्थ काट का रेखाचित्र

1. अगुहीय या एसीलोमेट (Acoelomate):
पोरोफेरा, सीलेन्ट्रेटा तथा प्लेटीहेल्मिन्थीज (platyhelminthes) में देहगुहा का अभाव होता है। इन जन्तुओं को अगुहीय या एसीलोमेट कहते हैं। स्पंज की गुहा को स्पंजगुहा, सीलेन्ट्रेटा जन्तुओं की गुहा को सीलेन्ट्रॉन कहते हैं। प्लेटीहेल्मिन्थीज कृमियों में देहभित्ति तथा आहारनाल के मध्य मृदूतकीय स्पंजी ऊतक भरा होता है।

2. कूटगुहिक या स्यूडोसीलोमेट (Pseudocoe lomate):
कुछ जन्तुओं में देहभित्ति तथा आहारनाल के मध्य कूटगुहा या स्यूडोसील (pseudocoel) होती है, जो भ्रूण की ब्लास्टोसील (blastocoel) से विकसित होती है। इस पर मीसोडर्म का स्तर नहीं होता; जैसे-ऐस्केल्मिन्थीज (aschelminthes) कृमियों में।

3. प्रगुहीय या सीलोमेट (Coelomate):
जिन जन्तुओं में वास्तविक देहगुहा (सीलोम) होती है उन्हें प्रगुहीय (सीलोमेट) कहते हैं। यह मीसोडर्म से आच्छादित होती है; जैसे-ऐनेलिडा, मोलस्का, आर्थोपोडा इकाइनोडर्मेटा तथा हेमीकॉर्डेटा तथा कॉडेंटा जन्तुओं में।

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प्रश्न 4.
अन्तःकोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में विभेद कीजिए।
उत्तर:
अन्तःकोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में अन्तर (Difference between Intracellular and Extracellular Digestion)
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प्रश्न 5.
प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में अन्तर (Difference between Direct and Indirect Development)
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प्रश्न 6.
परजीवी प्लेटीहेल्मिन्थीज के विशेष लक्षण बताइए।
उत्तर:
परजीवी प्लेटीहेल्मिन्थीज के विशेष लक्षण (Peculiar Characters of Parasitic Platyhelminthes)
परजीवी प्लेटीहेल्मिन्थीज के विशेष लक्षण निम्नवत् हैं –

  1. शारीरिक संगठन ऊतक-अंग स्तर का होता है।
  2. शरीर त्रिस्तरीय (triploblastic), द्विपार्श्वसममित, अगुहिकीय (acoelomate) होता है। देहभित्ति या आहारनाल के मध्य मृदूतकीय स्पंजी ऊतक भरा होता है।
  3. शरीर पृष्ठधारी रूप से चपटा होता है। यह खण्डयुक्त या पत्ती सदृश होता है।
  4. इनमें आसंजक अंग (adhesive organs) चूषक, हुक आदि पाए जाते हैं।
  5. आहार-नाल अपूर्ण या अनुपस्थित होती है। ये पोषक से पोषक पदार्थों का अवशोषण करते हैं।
  6. ज्वाला कोशिकाएँ (flame cells) उत्सर्जी संरचनाएँ होती हैं। ये जल सन्तुलन में सहायक होती हैं।
  7. कंकाल, श्वसन और परिसंचारी तन्त्र का अभाव होता
  8. जनन तन्त्र जटिल होता है। अधिकतर द्विलिंगी होते हैं। इनमें उच्च जनन दर पाई जाती है।
  9. निषेचन (fertilization) आन्तरिक होता है।

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चित्र – प्लेटीहेल्मिन्थीज के उदाहरण – (अ) फीताकृमि (टीनिया) – (ब) यकृतकृमि (फैसियोला)

10. परिवर्धन (development) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष। जीवन-चक्र जटिल तथा दो या अधिक चक्रों में पूर्ण होता है।

उदाहरण:
फीताकृमि (Taenia solium), यकृतकृमि (Fasciola hepatica)

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प्रश्न 7.
आर्थोपोडा प्राणी समूह का सबसे बड़ा वर्ग है, इस कथन के प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर:
संघ आर्थोपोडा (Phylum-Arthropoda):
यह जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ है। 2/3 जन्तु प्रजातियाँ संघ आर्थोपोडा में आती है। इसके सदस्य सभी प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं; जैसे – स्थल, जल, वायु, मृदा के नीचे वृक्षों पर आदि। अन्य प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  1. इनका शरीर त्रिस्तरीय, द्विपार्श्व सममित, प्रगुहीय, समखण्डों में विभक्त होता है।
  2. शरीर का संगठन अंग तंत्र स्तर का होता है।
  3. शरीर पर बाह्य कंकाल पाया जाता है।
  4. शरीर पर विविध कार्यों के लिए रूपान्तरित सन्धियुक्त उपांग पाए जाते हैं।
  5. देहगुहा को हीमोसिल (haemocoel) तथा इसमें पाए जाने वाले तरल को हीमोलिम्फ (hemolymph) कहते हैं। यह रक्त तथा लसीका दोनों का कार्य करता है।
  6. रक्त परिसंचरण तन्त्र खुले प्रकार (open type) का होता है।
  7. श्वसन अंग क्लोम, बुक-लंग्स (Book-lungs), ट्रेकिया (trachea) होते हैं।
  8. उत्सर्जन मैल्पीघी नलिकाओं (Malpighian tubules), ग्रीन ग्रन्थियों (green) द्वारा होता है।
  9. संयुक्त नेत्र (compound eyes) पाए जाते हैं।
  10. जन्तु एकलिंगी, अण्डज (oviparous) होते हैं। परिवर्धन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष होता है।

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चित्र – आर्थोपोडा के उदाहरण – (A) टिड्डा, (B) तितली, (C) बिच्छू, (D) झींगा

उदाहरण:
बिच्छु (पैलेम्निअस – Palamnaeus), झींगा मछली (पैलीमोन – Palaemon), टिड्डा (सिसटोसिर्का| Schistocerca), तितली (butterfly) आदि।

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प्रश्न 8.
जल संवहन तन्त्र किस वर्ग का मुख्य लक्षण है?
(अ) पोरीफेरा
(ब) टीनोफोरा
(स) इकाइनोडर्मेटा
(द) कॉर्डेटा।
उत्तर:
(स) इकाइनोडर्मेटा (Echinodermata)।

प्रश्न 9.
सभी कशेरुकी (वर्टीब्रेट्स) रज्जुकी (कॉर्डेट्स) हैं, लेकिन सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं है। इस कथन को सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
सभी कशेरुकी (वर्टीब्रेट्स) रज्जुकी (कॉडेंट्स) है; क्योंकि इनमें रज्जुकी या कॉडेंट्स के समान निम्नलिखित तीन मुख्य लक्षण पाए जाते हैं –

  1. सभी रज्जुकी या कॉडेंट्स जन्तुओं के जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में छड़नुमा, लचीला नोटोकार्ड (notochord) पाई जाती है।
  2. सभी रज्जु की कार्डेट्स में शरीर की मध्य पृष्ठ रेखा पर पृष्ठीय नाल तन्त्रिका रज्जु स्थिर होता है, यह नोटोकार्ड के ऊपर स्थित होती है।
  3. जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में ग्रसनीय क्लोम दरारें (pharyngeal gill cleft) पाई जाती हैं।

सभी रज्जुकी कशेरुकी (वर्टीब्रेट्स-vertebrates) नहीं होते; क्योंकि –
वर्टीब्रेट्स में कशेरुकदण्ड (vertebral column) पूर्ण विकसित होता है, जबकि प्रोटोकॉर्डेटा (protochordata) तथा एग्नैथा (agnatha) प्राणियों में कशेरुकदण्ड अनुपस्थित या अविकसित होता है। कशेरुकदण्ड का निर्माण नोटोकार्ड से होता है।

प्रश्न 10.
मछलियों में वायु आशय-एयर ब्लैडर की उपस्थिति का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
अस्थिल मछलियों में वायु आशय पाया जाता है। वायु आशय के कारण मछलियों का सन्तुलन बना रहता है, और इनको निरन्तर तैरना नहीं पड़ता। वायु आशय के अभाव में मछलियों को निरन्तर तैरते रहना होता है, जिससे वे डूबने से बची रहती है। कुछ मछलियों में वायु आशय श्वसन में भी सहायता करती है।

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प्रश्न 11.
पक्षियों में उड़ने हेतु क्या-क्या रूपान्तरण हैं?
उत्तर:
पक्षियों में उड़ने के लिए रूपान्तरण (Modifications in Birds that help in Flying):

  1. पक्षियों का शरीर धारारेखित, सिर छोटा, गर्दन लचीली होती है।
  2. पक्षियों के अग्रपाद पंखों में रूपान्तरित हो जाते हैं। पंख परयुक्त (feathered) होते हैं। पंख उड़ने में सहायक होते हैं। पक्षी उड्डयन पेशियों (flight muscles) की क्रियाशीलता के कारण उड़ते हैं।
  3. पूँछ उड़ते समय दिशा-परिवर्तन में सहायक होती है।
  4. शरीर पर परों (feathers) से बना बाह्य कंकाल होता है। यह शरीर ताप नियमन में सहायक होता है।
  5. पक्षियों के नेत्र बड़े तथा पार्श्व में स्थित होते हैं।
  6. पक्षियों की अस्थियाँ खोखली तथा मजबूत होती हैं।
  7. स्टर्नम नौकाकार होता है, उड़ने में सहायक होता है।
  8. पक्षियों के फेफड़ों से वायुकोश जुड़े रहते हैं। ये श्वसन में सहायता करने के अतिरिक्त शरीर को हल्का रखकर उड़ने में सहायता करते हैं।
  9. पश्चपाद पर शल्क पाए जाते हैं। पश्चपाद की नखरयुक्त अंगुलियाँ वृक्षीय जीवन के अनुकूल होती हैं।
  10. हृदय चार वेश्मी होता है। शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त पृथक् रहते हैं।
  11. मुख पर चोंच होती है। चोंच में दाँत नहीं होते।
  12. ये उत्सर्जी पदार्थ यूरिक अम्ल को ठोस के रूप में मल के साथ त्याग देते हैं।
  13. ये एकलिंगी (unisexual) तथा अण्डज (oviparous) होते हैं।
  14. पक्षी अण्डों को सेते हैं।
  15. शुतुरमुर्ग (स्टुथियो), कैसोवरी (Cassowary), ईमू (Emu), रीआ (Rhea), कीवी (Apteryx) आदि न उड़ने वाले पक्षी हैं।

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चित्र – कुछ पक्षी – (A) चील, (B) शतुरमुर्ग, (C) तोता, (D) मोर

प्रश्न 12.
अण्डजनक तथा जरायुज द्वारा उत्पन्न अण्डे या बच्चे संख्या में बराबर होते हैं? यदि हाँ तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों?
उत्तर:
अण्डजनक (oviparous) प्राय: अधिक संख्या में अण्डे देते हैं; क्योंकि अण्डे परभक्षी जन्तुओं द्वारा आहार के रूप में खा लिए जाते हैं अथवा विपरीत परिस्थितियों में अण्डे नष्ट हो जाते हैं। जरायुज (viviparous) पूर्ण विकसित शिशुओं को जन्म देते हैं। इनके जीवित रहने की सम्भावनाएँ अधिक होती है। इस कारण जरायुज प्राणी कम संख्या में सन्तान उत्पन्न करते हैं।

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प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से शारीरिक खण्डीभवन किसमें पहले देखा गया?
(अ) प्लेटीहेल्मिन्थीज
(ब) ऐस्केल्मिन्थीज
(स) ऐनेलिडा
(द) आर्थोपोडा।
उत्तर:
(स) ऐनेलिडा (Annelida)

प्रश्न 14.
निम्नलिखित का मिलान कीजिए –
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उत्तर:

  1. (घ) ऑस्टिक्थीज
  2. (क) ऐनेलिडा
  3. (द) रेप्टीलिया
  4. (अ) टीनोफेरा
  5. (ब) मोलस्का
  6. (ग) मैमेलिया
  7. (स) पोरीफेरा
  8. (ख) साइक्लोस्टोमेटा एवं कॉन्ड्रिक्थीज।

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प्रश्न 15.
मनुष्यों पर पाए जाने वाले कुछ परजीवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मनुष्यों के शरीर में पाए जाने वाले परजीवी (Parasites of Human body):
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Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

Bihar Board Class 11 Biology जीव जगत का वर्गीकरण Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वर्गीकरण की पद्धतियों में समय के साथ आए परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जीवों के वर्गीकरण की पद्धतियाँ (Systems of Classification of livings):
अरस्तू ने जीवधारियों को दो समूहों-जन्तुओं एवं वनस्पतियों में विभाजित किया। लीनियस ने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी (Systema Naturae) नामक पुस्तक में द्विजगत पद्धति प्रस्तुत की। जन्तु जगत में एककोशिकीय प्रोटोजोआ एवं बहुकोशिकीय जन्तुओं को तथा पादप जगत में हरे पौधे, मॉस, समुद्री घास-पात, मशरूम, लाइकेन; कवक, जीवाणु आदि को रखा गया है। द्विजगत पद्धति में प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिका वाले जीवों को एक साथ रखा गया है।

इस वर्गीकरण में हरे पादपों एवं कवकों को, एककोशिकीय एवं बहुकोशिकीय जीवों को तथा प्रकाश संश्लेषी एवं अप्रकाश संश्लेषी जीवों को एक साथ रखा गया है। युग्लीना, क्लैमाइडोमोनास, माइकोप्लाज्मा आदि को कुछ वैज्ञानिक जन्तु जगत में और कुछ पादप जगत में वर्गीकृत करते हैं। इसलिए जीव-वैज्ञानिक हीकल (Haeckal 1886) ने तीसरे जगत प्रोटिस्टा (protista) का प्रस्ताव रखा। इसमें जीवाणुओं, कवक, शैवाल तथा प्रोटोजोआ को सम्मिलित किया गया।

आर० एच० हीटेकर ने दो और तीन जगत वाले वर्गीकरण की कमियों को दूर करने के लिए पाँच जगत वाली प्रणाली का प्रस्ताव किया। जीवधारियों को पाँच जगत –

  1. मोनेरा
  2. प्रोटिस्टा
  3. प्लान्टी
  4. फंजाई
  5. एनिमेलिया में वर्गीकृत किया। यह वर्गीकरण कोशिका के प्रकार, कोशिकीय या शारीरिक संगठन, कोशिका भित्ति, पोषण, प्रचलन, पारिस्थितिक भूमिका, जनन एवं जातिवृत्तीय सम्बन्धों पर आधारित है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित के बारे में आर्थिक दृष्टि से दो महत्त्वपूर्ण उपयोगों को लिखिए –
(क) परपोषी बैक्टीरिया
(ख) आद्य बैक्टीरिया।
उत्तर:
(क) परपोषी बैक्टीरिया (Heterotrophic Bacteria):
ये प्रकृति में बहुतायत में पाए जाते हैं। इनमें से अधिकतर अपघटक (decomposers) होते हैं। ये मृतजीवी होते हैं। ये पौधों और जन्तुओं के मृत शरीर पर आक्रमण करके उनके जटिल यौगिकों को सरल पदार्थों में बदल देते हैं। इसके फलस्वरूप खनिज तत्वों का पुन: चक्रीकरण होता रहता है।

अनेक परजीवी बैक्टीरिया मृदा की स्वतन्त्र नाइट्रोजन को नाइट्रोजन यौगिकों में बदलकर भूमि की उर्वरता को बनाए रखने में सहायक होते हैं। जीवाणु दूध को दही में बदलने में, चाय तथा तम्बाकू की पत्तियों के किण्वन द्वारा स्वाद और सुगन्ध को बढ़ाने में; जूट, पटसन, सन आदि से रेशे प्राप्त करने; चमड़ा तैयार करने में प्रतिजैविक औषधियाँ तैयार करने आदि क्रियाओं में सहायक होते हैं।

अनेक परपोषी बैक्टीरिया रोगजनक होते हैं। ये परजीवी होते हैं। इनसे मनुष्य में तपेदिक, निमोनिया, टाइफॉइड, हैजा, पेचिश, कुष्ठरोग, सिफलिस आदि रोग हो जाते हैं। अनेक मृतजीवी हानिकारक जीवाणु खाद्य पदार्थों को नष्ट करते हैं। संक्रमित खाद्य पदार्थों के उपयोग से खाद्य विषाक्तता (food poisoning) हो जाती है।

(ख) आद्य बैक्टीरिया (Archaebacteria):
ये विशिष्ट प्रकार के बैक्टीरिया होते हैं। ये अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहते हैं; जैसे-अत्यन्त लवणीय क्षेत्र (हैलोफी), गर्म जल स्रोतों (थर्मोएसिडोफिलस) एवं कच्छ क्षेत्र (मेथेनोजन) आदि में। मेथेनोजन अनेक जुगाली करने वाले पशुओं (रूमिनेट) की आंत्र में पाए जाते हैं। ये गोबर से मेथेन (methane) का उत्पादन करते हैं। मेथेन को बायोगैस कहते हैं।

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प्रश्न 3.
डायटम की कोशिका भित्ति के क्या लक्षण हैं?
उत्तर:
डायटम की कोशिका भित्ति दो अविछादित कवच बनाती है। कोशिका भित्ति में सिलिका पाया जाता है। मृतडायटम के अवशेष डायटमी मृदा बनाते हैं।

प्रश्न 4.
‘शैवाल पुष्पन’ (Algal Bloom) तथा ‘लाल तरंगे’ (red-tides) क्या दर्शाती हैं?
उत्तर:
शैवाल पुष्पन:
जलाशयों में पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा के कारण शैवालों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि को शैवाल पुष्पन कहते हैं। यह जलाशय के अन्य छोटे जन्तुओं के लिए हानिकारक होता है क्योंकि रात्रि में ऑक्सीजन की कमी होने से जन्तुओं की मृत्यु हो जाती है।

लाल तरंगे:
अधिकतर लाल डायनोफ्लैजिलेट में तेजी से जनन के कारण संख्या में वृद्धि होती है, जिससे समुद्र का जल लाल दिखाई देने लगता है। इसे लाल तरंग कहते हैं।

प्रश्न 5.
वाइरस से विरोइड कैसे भिन्न होते हैं?
उत्तर:
वाइरस तथा विरोइड में अन्तर (Difference between Virus and Viroid):
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प्रश्न 6.
प्रोटोजोआ के चार प्रमुख समूहों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रोटोजोआ जन्तु (Protozoans):
ये जगत प्रोटिस्टा (protista) के अन्तर्गत आने वाले यूकैरियोटिक, सूक्ष्मदर्शीय, परपोषी सरलतम जन्तु हैं। ये एककोशिकीय होते हैं। कोशिका में समस्त जैविक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। ये परपोषी होते हैं। कुछ प्रोटोजोआ परजीवी होते हैं। इन्हें चार प्रमुख समूहों में बाँटा जाता है –
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चित्र-अमीबा

(क) अमीबीय प्रोटोजोआ (Amoebic Protozoa):
ये स्वच्छ जलीय या समुद्री होते हैं। कुछ नम मृदा में भी पाए जाते हैं। समुद्री प्रकार के अमीबीय प्रोटोजोआ की सतह पर सिलिका का कवच होता है। ये कूटपाद (pseudopodia) की सहायता से प्रचलन तथा पोषण करते हैं। एण्टअमीबा जैसे कुछ अमीबीय प्रोटोजोआ परजीवी होते हैं। मनुष्य में एण्टअमीबा हिस्टोलाइटिका के कारण अमीबीय पेचिश रोग होता है।

(ख) कशाभी प्रोटोजोआ (Flagellate Protozoa):
इस समूह के सदस्य स्वतन्त्र अथवा परजीवी होते हैं। इनके शरीर पर रक्षात्मक आवरण पेलिकल होता है। प्रचलन तथा पोषण में कशाभ (flagella) सहायक होता है। ट्रिपैनोसोमा (Trypanosoma) परजीवी से निद्रा रोग, लीशमानिया से कालाअजार रोग होता है।

(ग) पक्ष्माभी प्रोटोजोआ (Ciliate Protozoa):
इस समूह के सदस्य जलीय होते हैं एवं इनमें अत्यधिक पक्ष्माभ (cilia) पाए जाते हैं। शरीर दृढ़ पेलिकल से घिरा होता है। इनमें स्थायी कोशिकामुख (cytostome) व कोशिकागुद (cytopyge) पाई जाती हैं। पक्ष्माभों में लयबद्ध गति के कारण भोजन कोशिकामुख में पहुँचता है। उदाहरण-पैरामीशियम (Paramecium)।
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चित्र-पैरामीशियम

(घ) स्पोरोजोआ प्रोटोजोआ (Sporozoans):
ये अन्त:परजीवी होते हैं। इनमें प्रचलनांग का अभाव होता है। कोशिका पर पेलिकल का आवरण होता है। इनके जीवन चक्र में संक्रमण करने योग्य बीजाणुओं का निर्माण होता है। मलेरिया परजीवी-प्लाज्मोडियम (Plasmodium) के कारण कुछ दशक पूर्व होने वाले मलेरिया रोग से मानव आबादी पर कुप्रभाव पड़ता था।

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प्रश्न 7.
पादप स्वपोषी हैं। क्या आप ऐसे कुछ पादपों को बता सकते हैं, जो आंशिक रूप से परपोषित हैं?
उत्तर:
पादप स्वपोषी यूकैरियोटिक होते हैं। इनमें पर्णहरित पाया जाता है। सौर प्रकाश तथा पर्णहरित की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा ये अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। कुछ पौधे परपोषी होते हैं। ये परजीवी, मृतजीवी, सहजीवी या कीटभक्षी होते हैं।

परजीवी पौधे (Parasitic plants):
ये पूर्ण आंशिक परजीवी होते हैं। अमरबेल (Cuscuta); रैफ्लीसिया (Rafflesia), गँठवा (Orabanche) पूर्ण परजीवी होते हैं। विस्कम (Viscum), चन्दन (Santalum) अपूर्ण परजीवी होते हैं। स्प्लेक्नम (Splachnum), निओशिया (Neotia) मृतपोषी होते हैं। लाइकेन, मटरकुल के पौधों की जड़ों पाए जाने वाले राइजोबियम जीवाणु, सहजीवी (symbiont) पादप के उदाहरण हैं। कीटभक्षी पौधे; जैसे-नेपेन्थीस (Nepenthes), ड्रोसेरा (Drosera), यूट्रीकुलेरिया (Utricularia) आदि नाइट्रोजन की पूर्ति हेतु कीटों का भक्षण करते हैं।

प्रश्न 8.
शैवालांश तथा कवकांश शब्दों से क्या पता लगता है?
उत्तर:
लाइकेन सहजीवी पादप होते हैं, जो शैवाल तथा कवक के परस्पर सहयोग से बनते हैं। शैवलांश लाइकेन में शैवाल घटक है। यह लाइकेन का स्वपोषी भाग है जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करता है। कवकांश लाइकेन में कवक घटक है। यह परपोषी भाग है जो शैवाल को सुरक्षा प्रदान करता है और खनिज लवण तथा जल का अवशोषण करता है।

प्रश्न 9.
कवक (फंजाई) जगत के वर्गों का तुलनात्मक विवरण निम्नलिखित बिन्दुओं पर करो –
(क) पोषण की विधि
(ख) जनन की विधि।
उत्तर:
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प्रश्न 10.
यूग्लीनॉइड के विशिष्ट चारित्रिक लक्षण कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
यूग्लीनॉइड के चारित्रिक लक्षण (Characteristic Features of Euglenoids)

  1. अधिकांश स्वच्छ, स्थिर जल (stagnant fresh water) में पाए जाते हैं।
  2. इनमें कोशिका भित्ति का अभाव होता है।
  3. कोशिका भित्ति के स्थान पर रक्षात्मक प्रोटीनयुक्त लचीला आवरण पेलिकल (pellicle) पाया जाता है।
  4. इनमें 2 कशाभ (flagella) होते हैं, एक छोटा तथा दूसरा बड़ा कशाभा।
  5. इनमें क्लोरोप्लास्ट पाया जाता है।
  6. सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ये प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा भोजन निर्माण कर लेते हैं और प्रकाश के अभाव में जन्तुओं की भाँति सूक्ष्मजीवों का भक्षण करते हैं अर्थात् परपोषी की तरह व्यवहार करते हैं। उदाहरण-यूग्लीना (Euglena)।

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प्रश्न 11.
संरचना तथा आनुवंशिक पदार्थ की प्रकृति के संदर्भ में वाइरस का संक्षिप्त विवरण दो। वाइरस से होने वाले चार रोगों के नाम भी लिखें।
उत्तर:
वाइरस (Virus):
ये अकोशिकीय सजीव संरचनाएँ हैं। ये जीवित कोशिका को संक्रमित करके पोषद् कोशिका की उपापचय क्रियाओं को नियन्त्रित करके अपनी प्रतिकृति बनाते हैं, अर्थात् जनन करते हैं। वाइरस न्यूक्लियोप्रोटीन्स से बने होते हैं। इनमें DNA या RNA आनुवंशिक पदार्थ पाया जाता है। न्यूक्लिक अम्ल (DNA या RNA) चारों ओर से प्रोटीन के आवरण से घिरा रहता है। किसी भी वाइरस में DNA तथा RNA दोनों नहीं पाए जाते।
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चित्र – टोबैको मोजेोक वाइरस
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चित्र – जीवाणुभेजी

सभी पादप वाइरस में एकरज्जुकी (single stranded) RNA होता है। सभी जन्तु वाइरस में एक अथवा दो रज्जुकी RNA अथवा DNA होता है। जीवाणुभोजी या जीवाणु वाइरस में द्विरज्जुकी (double stranded) DNA अणु होता है। वाइरस में पाए जाने वाला DNA या RNA आनुवंशिक होता है।

वाइरस से होने वाले रोग (Disease caused by Virus):
मनुष्य में एड्स, हिपैटाइटिस, चेचक, मम्प्स (mumps), हपीज, इन्फ्लु एन्जा (influenza) नामक रोग वाइरस के कारण होते हैं। पौधों में मोजैक रोग, अवरूद्ध वृद्धि, पत्तियों का मुड़ना तथा कुंचन आदि वाइरस के कारण होने वाले रोग हैं।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

प्रश्न 12.
अपनी कक्षा में इस शीर्षक “क्या वाइरस सजीव है अथवा निर्जीव”, पर चर्चा करें।
उत्तर:
वाइरस (Virus):
इनकी खोज सर्वप्रथम इवानोवस्की (Iwanovsky, 1892), ने की थी। ये प्रूफ फिल्टर से भी छन जाते हैं। एम० डब्ल्यू. बीजेरिन्क (M.W. Beijerinck, 1898) ने पाया कि संक्रमित (रोगग्रस्त) पौधे के रस को स्वस्थ पौधों की पत्तियों पर रगड़ने से स्वस्थ पौधे भी रोगग्रस्त हो जाते हैं। इसी आधार पर इन्हें तरल विष या संक्रामक जीवित तरल कहा गया। डब्ल्यू० एम० स्टैनले (W. M. Stanley, 1935) ने वाइरस को क्रिस्टलीय अवस्था में अलग किया। डार्लिंगटन (Darlington, 1944) ने खोज की कि वाइरस न्यूक्लियोप्रोटीन्स से बने होते हैं।

वाइरस को सजीव तथा निर्जीव के मध्य की कड़ी (connecting link) मानते हैं।

वाइरस के सजीव लक्षण (Living Characters of Virus):

  1. वाइरस प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल (DNA या RNA) से बने होते हैं।
  2. जीवित कोशिका के सम्पर्क में आने पर सक्रिय हो जाते हैं। वाइरस का न्यूक्लिक अम्ल पोषक कोशिका में पहुंचकर कोशिका की उपापचयी क्रियाओं पर नियन्त्रण स्थापित करके स्वद्धिगुणन करने लगता है और अपने लिए आवश्यक प्रोटीन का संश्लेषण भी कर लेता है।
  3. इसके फलस्वरूप विषाणु की संख्या की वृद्धि अर्थात् जनन होता है।
  4. वाइरस में प्रवर्धन केवल जीवित कोशिकाओं में ही होता है।
  5. इनमें उत्परिवर्तन (mutation) के कारण आनुवंशिक विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।
  6. वाइरस ताप, रासायनिक पदार्थ, विकिरण तथा अन्य उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया दर्शाते हैं।

वाइरस के निर्जीव लक्षण (Non-living Characters of Virus):

  1. इनमें एन्जाइम्स के अभाव में कोई उपापचयी क्रिया स्वतन्त्र रूप से नहीं होती।
  2. वाइरस केवल जीवित कोशिकाओं में पहुँचकर ही सक्रिय होते हैं। जीवित कोशिका के बाहर ये निर्जीव रहते हैं।
  3. वाइरस में कोशा अंगक तथा दोनों प्रकार के न्यूक्लिक अम्ल (DNA और RNA) नहीं पाए जाते।
  4. वाइरस को रवों (crystals) के रूप में निर्जीवों की भाँति सुरक्षित रखा जा सकता है। रवे (crystal) की अवस्था में भी इनकी संक्रमण शक्ति कम नहीं होती।