Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

Bihar Board Class 11 Geography सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Text Book Questions and Answers

 

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

सौर विकिरण ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Bihar Board प्रश्न 1.
निम्न में से किस अक्षांश पर 21 जून की दोपहर में सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं?
(क) विषुवत वृत पर
(ख) 23.5° उ०
(ग) 66.5° द०
(घ) 66.5° उ०
उत्तर:
(ख) 23.5° उ०

सौर विकिरण ऊष्मा संतुलन एवं तापमान के प्रश्न-उत्तर Bihar Board प्रश्न 2.
निम्न में से किन शहरों में दिन ज्यादा लंबा होता है?
(क) तिरुवनंतपुरम्
(ख) हैदराबाद
(ग) चंडीगढ़
(घ) नागपुर
उत्तर:
(घ) नागपुर (क)

सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से किस प्रक्रिया द्वारा वायुमण्डल मुख्यतः गर्म होता है?
(क) लघु तरंगदैर्ध्य वाले सौर विकिरण से
(ख) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से
(ग) परावर्तित सौर विकिरण से
(घ) प्रकीर्णित सौर विकिरण से
उत्तर:
(ख) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से

Surya Vikiran Ko Samjhaie Bihar Board प्रश्न 4.
निम्न पदों को उसके उचित विवरण के साथ मिलाएँ –
Surya Vikiran Ko Samjhaie Bihar Board
उत्तर:
(i) (ग)
(ii) (घ)
(iii) (ख)
(iv) (क)

प्रश्न 5.
पृथ्वी के विषुवत् क्षेत्रों की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान अधिकतम होता है, इसका मुख्य कारण है, क्या है ?
(क) विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कम बादल होती है।
(ख) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लंबाई विषुवतीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।
(ग) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ‘ग्रीनहाउस प्रभाव’ विषुवतीय क्षेत्रो की अपेक्षा ज्यादा होती है।
(घ) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा महासागरीय क्षेत्र के ज्यादा करीब है।
उत्तर:
(घ) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा महासागरीय क्षेत्र के ज्यादा करीब है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण किस जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है?
उत्तर:
पृथ्वी की सतह पर तापमान के असमान वितरण से कहीं तो जलवायु बहुत ही गर्म है, कहीं पर बहुत ठंडी है, कहीं पर बहुत शुष्क है तो कहीं पर बहुत नमी वाली है। जलवायु का सीधा प्रभाव वनस्पतियों, जीवो, जन्तुओं और मौसम पर पड़ता है, पृथ्वी की जलवायु कहीं पर बहुत ठंडी है तो कहीं पर बहुत गर्म है और कहीं पर बहुत आई है।

प्रश्न 2.
वे कौन-से कारक हैं जो पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर:
पृथ्वी पर तापमान के वितरण को छह प्रमुख कारण प्रभावित करते हैं –

  1. अक्षांश रेखा से दूरी
  2. समुद्र तल से ऊँचाई
  3. समुद्र से दूरी
  4. वायु संहित का परिसंचरण
  5. कोष्ण तथा ठण्डी महासागरीय धाराओं की उपस्थिति
  6. स्थानीय कारक

प्रश्न 2.
भारत में मई में तापमान सर्वाधिक होता है, लेकिन उत्तर अयनांत के बाद तापमान अधिकतम नहीं होता। क्यों?
उत्तर:
हम जानते हैं कि पृथ्वी पर सूर्यताप के कारणों के प्रमुख कारक अक्षांशीय विस्तार एवं सूर्य के अपने अक्ष पर 23\(\frac { 1 }{ 2 }\) का झुकाव है। मई के महीने में सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्द्ध में सीधी कर्क रेखा पर पड़ती है। जिसके कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ता है। परंतु उत्तर आयनांत के कारण सूर्य की किरणों का नति कोष कम होता है। इस कारण सूर्य की तिरछी किरणें पृथ्वी के ज्यादा भाग पर पड़ती हैं जिसके फलस्वरूप तापमान अधिकतम नहीं होता।

प्रश्न 3.
साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापांतर सर्वाधिक होता है क्यों?
उत्तर:
क्योंकि, समताप रेखाएँ प्रायः अक्षांश के समानांतर होती हैं। कोष्ण महासागरीय धाराएँ गल्फ स्ट्रीम तथा उत्तरी अंधमहासागरीय ड्रिफ्ट की उपस्थिति से उत्तरी अंधमहासागर अधिक गर्म होता है तथा समताप रेखाएँ उत्तर की तरफ मुड़ जाती है। यह साइबेरिया के मैदान पर ज्यादा स्पष्ट होता है। 60°E देशांतर के साथ-साथ 80° उत्तरी एवं 50° उत्तरी दोनों ही अक्षांशों पर जनवरी का मध्य तापमान 20° सेल्यिस पाया जाता है।

प्रश्न 4.
सूर्यताप क्या है? इसे प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन करें।
उत्तर:
सूर्य से पृथ्वी तक पहुंचने वाली विकिरण ऊर्जा से पृथ्वी पर पहुंचती है। सूर्यताप को प्रभावित करने वाले कारक इस प्रकार है

  • सूर्य की किरणों को झुकाव।
  • सूर्यताप पर वायुमंडल का प्रभाव।
  • स्थल एवं जल का प्रभाव।
  • दिन की लम्बाई अथवा धूप की अवधि।
  • सूर्य से पृथ्वी की दूरी।

सूर्य किरणों की झुकाव यदि तिरछी हुई तो उसका फैलाव अधिक होगा और सूर्यताप कम प्राप्त होता । लेकिन जब सूर्य की किरणें लम्बवत पड़ेगी तो कम क्षेत्र गर्म होगा । परिणामतः भूमध्य रेखा पर अधिकतम तथा धूवों पर न्यूनतम सूर्य ताप प्राप्त होता है। वायुमंडल में मेघ, आर्द्रता, धूल-कण आदि परिवर्तनशील दशाएँ सूर्य से आनेवाली सूर्यताप को अवशोषित, परावर्तित तथा प्रकीर्णिन करती है जिससे सूर्यताप में परिवर्तन आ जाता है। स्थलीय धरातल शीघ्रता से गर्म होते हैं जबकि जलीय धरातल धीरे-धीरे कम होते हैं। इसलिए स्थल पर तापांतर काफी अधिक होती है जबकि जल पर यह अंतर साधारण होता है।

गृष्म ऋतु में दिन की लम्बाई अधिक होती है और सूर्यताप अधिक प्राप्त होता है जबकि शीत ऋतु में दिन छोटे होने से सूर्यताप कम प्राप्त होते हैं। भूमध्य रेखा पर वर्ष भर सूर्यताप एक समान होता है जबकि ध्रुवों पर ऐसी बात नहीं होती क्योंकि वहाँ छ: महीने का दिन और छ: महीने का रात होता है। सूर्य पृथ्वी के नजदीक हो तो अधिक और दूर हो तो कम सूर्यताप प्राप्त होता है।

प्रश्न 5.
महासागरों के तापमान को प्रभावित करनेवाले किन्हीं तीन कारकों का परीक्षण करें।
उत्तर:
महासागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारकों में तीन प्रमख हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. अक्षांश – महासागरीय जल का तापमान भूमध्य रेखा पर अधिकतम तथा ध्रुवों पर न्युनतम होता है।
  2. प्रचलित पवनें – ये हवायें अपने साथ समुद्र तल के जल को बहा ले जाती है, जिसकी पूर्ति हेतु समुद्र के निचले भाग से ठण्डा जल उपर आ जाता है। इस प्रकार जिस ओर से वायु चलती है वहाँ समुद्र जल का तापमान कम तथा जिस ओर वायु चलती है वहाँ तापमान अधिक होता है।
  3. लवणता – समुद्रीजल के तापमान पर लवणता का भी प्रभाव पड़ता है। अधिक लवणता वाला जल अधिक उष्मा ग्रहण कर सकता है। अत: उसका तापमान भी अधिक होता है।

(ग) निम्नलिखिल प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष का झुकाव किस प्रकार पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली विकिरण की मात्रा को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
अक्षांश (Latitude) – किसी भी अक्षांश पर तापमान सूर्य की किरणों के कोण पर निर्भर करता है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की तरफ जाते हुए तापमान लगातार कम होता जाता है। भूमध्य रेखा पर सारा वर्ष सूर्य की किरणें लम्बवत पड़ती हैं तथा इन प्रदेशों में उच्च तापमान पाए जाते हैं। ध्रुवों की ओर तिरछी किरणें के कारण कम तापमान पाए जाते हैं।

पृथ्वी गोलाकार (geoid) है। सूर्य की किरणें वायुमण्डल के ऊपरी भाग पर तिरछी पड़ती हैं जिसके कारण पृथ्वी सौर ऊर्जा के बहुत कम अंश को ही प्राप्त कर पाती है। पृथ्वी औसत रूप से वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर 0.5 कैलोरी प्रति वर्ग सेन्टीमीटर। प्रति मिनट ऊर्जा प्राप्त करती है। वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा में प्रतिवर्ष थोड़ा परिवर्तन होता है। यह परिवर्तन पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी में अंतर के कारण होता है। सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 4 जुलाई को सबसे दूर अर्थात् 15 करोड़ 20 लाख किलोमीटर दूर होती है।

पृथ्वी की इस स्थिति को अपसौर (aphelion) कहा जाता है। 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट अर्थात् 14 करोड़ 70 लाख किमी दूर होती है । पृथ्वी की इस स्थिति को ‘उपसौर’ (Perihelion) कहा जाता है। इसलिए पृथ्वी द्वारा प्राप्त वार्षिक सूर्यताप (Insolation) 3 जनवरी की अपेक्षा 4 जुलाई को अधिक होता है फिर भी सूर्यातप की भिन्नता का यह प्रभाव दूसरे कारकों, जैसे स्थल एवं समुद्र का वितरण तथा वायुमण्डल परिसंचरण के द्वारा कम हो जाता है। यही कारण है कि सूर्याताप की यह भिन्नता पृथ्वी की सतह पर होने वाले प्रतिदिन के मौसम परिवर्तन पर अधिक प्रभाव नहीं डाल पाती है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी और वायुमण्डल किस पकार ताप को संतुलित करते हैं? इसकी व्याख्या करें?
उत्तर:
पृथ्वी विद्युत परिपथ में एक ट्रांसफार्मर का कार्य करती है। यह एक तरफ से कर्जा प्राप्त करती है तथा दूसरी तरफ से प्रेक्षित कर देती है। सूर्य पृथ्वी को गर्म करता है और पृथ्वी वायुमण्डल को गर्म करती है। प्रकृति संपूर्ण पृथ्वी पर संतुलन बनाए रखने के लिए ऐसी क्रियाविधि को जन्म देती है जिससे ऊष्मा का स्थानांतरण ऊष्णकटिबंध से उच्च अक्षांशों की ओर वायुमण्डलीय परिसंचरण तथा महासागरीय धाराओं द्वारा सम्पन्न होता है। मान लो वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर प्राप्त होने वाला ताप 100 इकाई है। इसमें से केवल 51 इकाई ताप ही पृथ्वी पर पहुंचता है।

49 इकाई ताप वायुमण्डल तथा अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाता है। 35 इकाई ताप तो पृथ्वी के धरातल पर पहुंचने से पहले ही अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाता है। इसमें से 6 इकाई अंतरिक्ष में प्रकीर्णन द्वारा, 27 इकाई ताप मेघों द्वारा परावर्तित होता है तथा 2 इकाई पृथ्वी द्वारा परावर्तित हो जाता है। सौर विकिरण की इस परावर्तित मात्रा को पृथ्वी का एल्बिडो कहते हैं। शेष 65 इाकईयों में से 14 इाकई ताप वायुमण्डल द्वारा अवशोषित होता है।

इस प्रकार पृथ्वी पर 100 इकाईयों में से 14 इकाई ताप वायुमण्डल द्वारा अवशोषित होता है। इस प्रकार पृथ्वी पर 100 इकाईयों में से 51 इकाई ताप ही पहुंच पाता है। पृथ्वी द्वारा अवशोषित 51 इकाइयाँ भौमिक विकिरण (Terrestrial Radiation) के रूप में लौट जाती है। इनमें से 17 इकाइयाँ तो सीधे अंतरिक्ष में लौट जाती हैं और 34 इकाइयाँ वायुमण्डल द्वारा अवशोषित होती हैं।

वायुमण्डल द्वारा अवशोषित 48 इकाइयाँ (14 इकाइयाँ सूर्याताप से तथा 34 इकाइयाँ भौमिक विकिरण से) पुन: अंतरिक्ष में लौट जाती हैं। इस प्रकार पृथ्वी और उसके वायमुण्डल को प्राप्त उसके वायुमण्डल को प्राप्त हुई उष्मा उनके द्वारा छोड़ी गई उष्मा के बराबर है। पृथ्वी तथा वायुमण्डल द्वारा प्राप्त ताप तथा उसके द्वारा ताप के हास के संतुलन को ऊष्मा संतुलन कहते हैं।

प्रश्न 3.
जनवरी में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के बीच तापमान के विश्वव्यापी वितरण की तुलना करें।
उत्तर:

  1. जनवरी में अधिकतम तापमान महाद्वीपों पर पाया जाता है। दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया के स्थल खंडों पर तापमान 30°C से अधिक होता है। उच्चतम ताप मकर रेखा के साथ-साथ पाया जाता है।
  2. जनवरी मास में न्यूनतम तापमान उत्तर:पूर्वी एशिया में पाया जाता है। साइबेरिया में वरखोयस्क में-32°C तक निम्नतम तापमान पाया जाता है।
  3. उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ महासागरों पर ध्रुवों की ओर तथा महाद्वीपों पर भूमध्य रेखा की ओर झुकी होती है।
  4. दक्षिणी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ महासागरों पर भूमध्य रेखा की ओर तथा महाद्वीपों ध्रुवों की ओर झुकी होती हैं।
  5. दक्षिणी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ नियमित रूप तथा सूर्य-पश्चिम दिशा में अक्षांशों के समानान्तर पाई जाती है, क्योंकि यहाँ जल की अधिकता है, लेकिन उत्तरी गोलार्द्ध में
  6. रेखाएँ अनियमित होती हैं । दक्षिणी गोलार्द्ध में 30°C की समताप रेखा उत्तर:पश्चिमी एजेन्टीना, अफ्रीका के पूर्वी भाग, वोर्नियों तथा आस्ट्रेलिया से होकर गुजरती है।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
अपने शहर के आस-पास की किसी वेधशाला का पता लगाएँ। वेधशाला की मौसम विज्ञान संबंधी सारणी में दिए गए तापमान को तालिकाबद्ध करें।
उत्तर:

  1. वेधशला की तुंगता अक्षांश और उस समय को जिसके लिए माध्य निकाला गया है, लिखें
  2. सारणी में तापमान के संबंध में दिए गये पदों को परिभाषित करें।
  3. एक महीने तक प्रतिदिन के तापमान के माध्य की गणना करें।
  4. ग्राफ द्वारा प्रतिदिन का अधिकतम माध्य तापमान, न्यूनतम माध्य तापमान तथा कुल माध्य तापमान दर्शायें।
  5. वार्षिक तापांतर की गणना करें।
  6. पता लगायें कि किन महीनों का माध्य तापमान सबसे अधिक और सबसे कम है।
  7. उन कारकों को लिखें, जो किसी स्थान को तापमान का निर्धारण करते हैं और जनवरी, मई, जुलाई और अक्टूबर में होने वाले तापमान के अंतर के कारणों को समझाएं।

उदाहरण :
वेधशाला : नई दिल्ली सफदरजंग
अक्षांश : 28°35°N
अवलोकन वर्ष : 1951 से 1980
समुद्री सतह के माध्यम से तुंगता : 216 मी
महीना : जनवरी, मई

प्रतिदिन के अधिकतम तापमान का।
माध्य (°C) : 21.1,39.6

प्रतिदिन के न्यूनतम तापमान का
माध्य (°C) : 73, 259
उच्चतम तापमान (°C) : 293, 472
न्यूनतम तापमान (°C) : 0.6, 175

एक महीने के प्रतिदिन का माध्य तापमान :
जनवरी \(\frac { 211 + 7.3 }{ 2 }\) = 14.2°C
मई \(\frac { 39.6 + 25.9 }{ 2 }\) = 32.25°C

वार्षिक तापांतर:
मई का अधिकतम माध्य ताप-जनवरी का माध्य तापमान
वार्षिक तापांतर = 32.75°C – 14.2C° = 18.55°C

विद्यार्थी शेष भाग स्वयं करें – वार्षिक ताप परिसर – वर्ष में सबसे गर्म तथा सबसे ठण्डे माह के औसत तापमानों के अंतर को वार्षिक ताप परिसर कहते हैं। उत्तरी गोलार्ड के मध्य तथा उच्च अक्षांशों में महाद्वीपों के आंतरिक भागों में वार्षिक ताप परिसा बहुत अधिक होता है। विश्व में सबसे अधिक वार्षिक ताप परिसर 68° से० साइबेरिया के वरखोयास्क नामक स्थान पर होता है। शीत ऋतु में यहाँ पर -50° से. तापमान हो जाता है जिस कारण इसे पृथ्वी का ‘शीत-ध्रुव’ कहा जाता है।

तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक –

  • अक्षांश अथवा भूमध्य रेखा से दूरी
  • स्थल और जल की विषमता अथवा समुद्र तट से दूरी
  • उच्चावच एवं ऊँचाई अथवा समुद्र तल से ऊंचाई
  • महासागर धाराएँ
  • वनस्पति आवरण और
  • भू-तल का स्वभाव

Bihar Board Class 11 Geography सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अभिवहन किसे कहते हैं?
उत्तर:
वायु के क्षैतिज संचलन के माध्यम से ऊष्मा का स्थानान्तरण अभिवन कहलाता है। मध्य अक्षांशों में अधिकांश दैनिक मौसमी परिवर्तन केवल अभिवहन द्वारा उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 2.
संवहन किसे कहते हैं?
उत्तर:
ताप का उर्ध्वाधर मिश्रण या प्रक्षोभ संवहन कहलाता है। यह उष्मा स्थानान्तरण की एक विधि है। यह विधि वायुमण्डल की निचली परतों को गर्म करने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 3.
तापमान क्या है?
उत्तर:
किसी तंत्र में संवेदय या उपलब्ध ऊष्मा को तापमान कहते हैं। यह किसी वस्तु की उष्णता अथवा ठण्डक की माप है।

प्रश्न 4.
तापमान व्युत्क्रमण क्या होता है?
उत्तर:
तापमान ऊंचाई के साथ घटता जाता है, परन्तु जब स्थिति विपरीत हो जाती है, तब इसे तापमान व्युत्क्रमण कहते हैं।

प्रश्न 5.
वायु अपवाह से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
पहाड़ियों तथा पर्वतों पर रात में ठंडी हवा गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से लगभग जल की तरह कार्य करती है और ढाल के साथ ऊपर से नीचे उतरती है। यह घाटी में गर्म हवा के नीचे एकत्र हो जाती है। इसे वायु अफवाह कहते हैं। वायु अपवाह पाले से पौधों की रक्षा करती है।

प्रश्न 6.
सूर्य से विकरित ऊर्जा कहाँ से आती है?
उत्तर:
सूर्य से विकरित ऊर्जा इसके क्रोड में होने वाली आणविक प्रतिक्रियाओं से आती है, जहाँ तापमान 15,000,000°C के लगभग है।

प्रश्न 7.
लघु तरंगें क्या होती हैं ? ..
उत्तर:
पृथ्वी पर सूर्य से विकिरित ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय तरंगों के रूप में प्रसारित होती है, जिन्हें लघु तरंगें कहते हैं। इन तरंगों का वेग लगभग 2,98,000 किमी प्रति सेकेण्ड है।।

प्रश्न 8.
‘सूर्यताप’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी पर आने वाले सूर्य विकिरण को सूर्यातप कहते हैं। सूर्यताप विषुवत् रेखा पर सर्वाधिक होता है तथा ध्रुव की ओर घटता जाता है।

प्रश्न 9.
पार्थिव विकिरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
सूर्य अंतरिक्ष में लघु तरंग विकिरण का उत्सर्जन करता है, पृथ्वी दीर्घ तरंगों में ऊर्जा विकिरित करती है, इसे पार्थिव विकिरण कहते हैं।

प्रश्न 10.
प्रत्यक्ष विकिरण का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सूर्यताप की 100 इकाइयों में केवल 2 इकाइयाँ सीधे भू-पृष्ठ पर पहुँचती हैं। सौर कर्जा वायुमण्डल की ऊपरी सीमा पर पहुंचती है और धीरे-धीरे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी के धरातल पर आती है और अवशोषित हो जाती है। इस कर्जा प्रवाह को प्रत्यक्ष विकिरण कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समताप रेखाएँ मौसम के अनुसार उत्तर और दक्षिण की ओर क्यों खिसकती है?
उत्तर:
समताप रेखाओं की स्थिति सूर्यताप की अधिकतम मात्रा के अनुसार होती है। सूर्य की लम्बवत् किरणें मौसम के अनुसार बदलती रहती है। जून में सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत् चमकता है जबकि दिसम्बर में मकर रेखा पर । परिणामस्वरूप ग्रीष्मकाल में सूर्यताप की अधिकतम मात्रा उत्तरी गोलार्द्ध में शीतकाल में दक्षिणी गोलार्द्ध में होती है। इसलिए समताप रेखाएँ ग्रीष्मकाल में कुछ उत्तर की ओर तथा शीतकाल में दक्षिणी की ओर खिसक जाती है।

समताप रेखाएँ स्थल पर अधिक खिसकती हैं। स्थल तथा जल में गर्म होने की मात्रा में एक असमानता पाई जाती है। स्थल भाग शीघ्र ही गर्म तथा शीघ्र ही ठंडे हो जाते हैं। परन्तु जल भाग देर से गर्म तथा देर से ठंडे होते है। स्थल भाग के तापमान में मौसमों के अनुसार अधिक अंतर पाए जाते हैं, परन्तु सागरों में तापमान में कम अंतर होता है। इसलिए स्थल भाग पर समताप रेखाएँ मौसमों के अनुसार खिसकती हैं।

प्रश्न 2.
दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ अधिक अनियमित क्यों होती हैं?
उत्तर:
जल तथा स्थल के गर्म होने की दर में असमानता के कारण समताप रेखाएँ महासागर से महाद्वीप पर या महाद्वीप से महासागर पर आते समय कुछ मुड़ जाती हैं। ये उत्तर गोलार्द्ध में जुलाई में समताप रेखाएँ महासागरों पर से गुजरते समय भूमध्य रेखा की ओर तथा महाद्वीपों पर से गुजरते समय ध्रुवों की ओर मुड़ जाती हैं। दक्षिणी गोलाद्ध में इसकी विपरीत दिशा होती है। इसके दो कारण हैं

  1. जल तथा स्थल के गर्म होने की मात्रा में असमानता।
  2. जल तथा स्थल खण्डों का असमान वितरण ।

उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल खण्ड का विस्तार अधिक है। इसलिए समताप रेखाएँ अनियमित हो सकती हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में महासागरों का अत्यधिक विस्तार है तथा समताप रेखाएँ लगभग सीधी तथा नियमित होती हैं।

प्रश्न 3.
सूर्यातप की मात्रा सूर्य की किरणों के आयतन कोण से किस प्रकार संबंधित हैं ?
उत्तर:
धरातल पर प्राप्त होने वाले सौर विकिरण को सूर्यातप कहते हैं। सूर्यातप की मात्रा सूर्य को किरणों के आयतन कोण पर निर्भर करती है।

  1. लम्ब किरणें तिरछी किरणों की अपेक्षा कम स्थान घेरती हैं। इस प्रकार प्रति इकाई क्षेत्र प्राप्त ताप अधिक होता है।
  2. लम्ब किरणों को तिरछी किरणों की अपेक्षा वायुमण्डल का थोड़ा भाग पार करना पड़ता है, इसलिए वायुमण्डल में मिली गैसे, जलवाष्प, द्वारा अवशेषण, परावर्तन तथा बिखराव से सूर्याताप की मात्रा कम नष्ट होती है।

प्रश्न 4.
वायुमण्डल सूर्यातप की अपेक्षा भौमिक विकिरण से अधिक कम क्यों होता है?
उत्तर:
सूर्य की किरणें सीधे रूप से वायुमण्डल को गर्म नहीं करती हैं। सूर्य से प्राप्त किरणें लघु तरंगों के रूप में वायुमण्डल से गुजरती हैं। वायमण्डल इन किरणों को अवशोषित नहीं कर पाता । ये किरणें भूतल को गर्म करती हैं। भूतल से विकिरण दीर्घ तरंगों के रूप में होता है। वायुमण्डल इन किरणों का भली प्रकार अवशोषण कर लेता हैं। इस भौमिक विकिरण से ही वायुमण्डल गर्म होता है। इसलिए वायुमण्डल नीचे से ऊपर की ओर गर्म होता है। सूर्य अंतरिक्ष में ऊर्जा का वितरण लघु तरंगों के रूप में करता है, जबकि पृथ्वी दीर्घ तरंगों को अंतरिक्ष में विकरित करती है।

प्रश्न 5.
सूर्य द्वारा विकिरित ऊर्जा का कितना भाग पृथ्वी द्वारा प्राप्त किया जाता है ?
उत्तर:
सौर ऊर्जा का लगभग 51 प्रतिशत भाग पृथ्वी पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पहुँचता है। सूर्य पृथ्वी को गर्म करता है और पृथ्वी वायुमण्डल को गर्म करती हैं।

प्रश्न 6.
धरातल पर पड़ने वाली सूर्य किरणों का कोण किस प्रकार सर्यातप को प्रभावित करता है?
उत्तर:
पृथ्वी का अक्ष कक्ष तल 66° से 30° का कोण बनाते हुए झुका हुआ है। पृथ्वी के अक्ष के झुकाव के कारण भू-पृष्ठ पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों के कोण में भिन्नता होती . है। जब उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुका होता है, तब यह सर्वाधिक सूर्यातप प्राप्त करता है। 21 दिसम्बर को सूर्य मकर रेखा के ठीक ऊपर होता है और दक्षिणी गोलार्द्ध सर्वाधिक प्रकाश प्राप्त करता है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र सर्वाधिक सूर्यातप प्राप्त करते हैं। जैसे-जैसे विषुवत् रेखा की ओर बढ़ते हैं, सूर्यातप की गहनता कम होती जाती है, जिससे तापमान में गिरावट आती है।

प्रश्न 7.
समताप रेखाएँ क्या है ?
उत्तर:
समताप रेखाएँ काल्पनिक रेखाएँ हैं, जो समुद्र तल के अनुसार समान तापमान वाले स्थानों को मिलती हैं। समताप रेखाएँ सामान्यतः अक्षांश वृत्तों का अनुसरण करती हैं, क्योंकि वे तापमान विपर्यास का कारण है।

प्रश्न 8.
सूर्यातप और पार्थिव विकिरण में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
सूर्यातप और पार्थिव विकिरण में अंतर –
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प्रश्न 9.
वायुमण्डल किस प्रकार गर्म होता है?
उत्तर:
पृथ्वी विद्युतज परिपथ में एक ट्रांसफार्मर का कार्य करती है। यह एक तरफ से ऊर्जा प्राप्त करती है तथा दूसरी तरफ से इसे प्रेक्षित कर देती है। सूर्य पृथ्वी को गर्म करता है और पृथ्वी वायुमण्डल को गर्म करती है। अवशोषित सौर ऊर्जा घरातलीय तापमान में वृद्धि करती है और बदले में स्थल एक ऊर्जा विकिरण (रेडियेटर) बन जाता है। सूर्य अंतरिक्ष में लघु तरंग विकिरण का उत्सर्जन करता है, पृथ्वी दीर्घ तरंगों में ऊर्जा विकिरित करती है। सौर ऊप वायुमण्डल की ऊपरी भाग सीमा तक पहुंचती है और वायुमण्डल को गर्म कर देती है।

प्रश्न 10.
अपवहन और संवहन में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
अपवहन और संवहन में अंतर –
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प्रश्न 11.
सामान्य ह्रास दर और तापमान व्युत्क्रमण में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
सामान्य हास दर और तापमान व्युत्क्रमण में अंतर –
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प्रश्न 12.
सूर्यातप और किसी स्थान के तापमान में क्या अंतर है?
उत्तर:
पृथ्वी पर पहुंचने वाले सौर विकिरण को सूर्यातप कहते हैं। यह ऊर्जा लघु तरंगें के रूप में 3 लाख किमी प्रति सकेण्ड की दर से पृथ्वी पर पहुँचती है। पृथ्वी पर सौर विकिरण का केवल 2 अरबवाँ भाग ही पहुँचता है। किसी स्थान के तापमान से अभिप्रायः उस स्थान पर धरातल से एक मीटर की वायु से ऊष्मा की मात्रा है। वह वायुमण्डल का तापमान है। वायु धरातल द्वारा छोड़ी गई ऊर्जा के विकिरण से गर्म होती है।

प्रश्न 13.
तापमान के क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर वितरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
क्षैतिज वितरण-अक्षांशों के अनुसार तापमान घटता-बढ़ता रहता है। अक्षांशों के अनुसार तापमान के वितरण को क्षैतिज वितरण कहते हैं। यह वितरण समताप रेखाओं द्वारा प्रकट किया जाता है। ऊर्ध्वाधर वितरण-वायुमण्डल मुख्यतः नीचे से ऊपर की ओर गर्म होता है। इसलिए ऊँचाई के साथ तापमान कम होता है। तापमान कम होने पर 1°C प्रति 165 मीटर है। इसे सामान्य ह्रास दर कहते हैं।

प्रश्न 14.
विभिन्न अक्षांशों पर सूर्यातप की मात्रा भिन्न-भिन्न क्यों होती है?
उत्तर:
सूर्यातप की मात्रा सूर्य किरणों के आयतन कोण तथा दिन की अवधि पर निर्भर करती है। पृथ्वी की वार्षिक गति तथा पृथ्वी के अक्ष के झकाव के कारण भिन्न अक्षांशों पर सूर्य किरणों का कोण भिन्न-भिन्न होता है तथा दिन की अवधि भी समान नहीं होती। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर सूर्य की किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है तथा दिन की अवधि भी बढ़ती जाती है। इसलिए भिन्न-भिन्न अक्षांशों पर सूर्यातप की मात्रा में भिन्नता पाई जाती है। एक ही अक्षांश पर सूर्यातप की मात्रा अन्य स्थानों पर बराबर होती है।

प्रश्न 15.
दैनिक तथा वार्षिक तापांतर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
दैनिक तापांतर-किसी स्थान पर उस दिन के उच्चतम तथा न्यूनतम तापमान के अंतर को उस स्थान का दैनिक तापांतर कहते हैं। यह तटीय प्रदेशों में कम होता है। दैनिक तापांतर अन्दरुनी भागों तथा मरुस्थलीय प्रदेशों से अधिक होता है। वार्षिक तापांतर-किसी वर्ष के सबसे गर्म तथा सबसे ठंडे महीनों के औसत मासिक तापमान के अंतर को वार्षिक तापांतर कहते हैं। प्रायः जुलाई मास को सबसे गर्म तथा जनवरी मास को सबसे ठंडा मास लिया जाता है। सबसे अधिक वार्षिक तापांतर साइबेरिया में बरखोयास्क में 38°C होता है।

प्रश्न 16.
समताप रेखाओं की दिशा अधिकतर पूर्व-पश्चिम क्यों रहती है?
उत्तर:
किसी अक्षांश रेखा पर स्थित सभी स्थानों पर सूर्य की किरणों का कोण तथा दिन की लम्बाई बराबर होती है इसलिए इन स्थानों पर सूर्यताप की मात्रा समान होती है। इन स्थानों ‘का तापमान भी समान होता है । इस प्रकार समान तापमान वाले स्थानों को आपस में मिलाने वाली रेखा को समताप रेखा कहते हैं। इसी कारण समताप रेखाओं और अक्षांश रेखाओं में अनुरूपता पाई जाती है। समताप रेखाएँ अक्षांश रेखाओं का अनुकरण करते हुए पूर्व से पश्चिम दिशा में फैली होती हैं।

प्रश्न 17.
ऊष्मा बजट किसे कहते हैं ? सूर्यातप की वार्षिक मात्रा का वितरण बताओ।
उत्तर:
पृथ्वी पर औसत तापमान 35°C है। सूर्यातप एवं भौमिक विकिरण के कारण पृथ्वी के ताप में संतुलन रहता है, पृथ्वी जितनी मात्रा में सौर ऊर्जा प्राप्त करती है, उतनी ही मात्रा में ऊर्जा भौमिक विकिरण द्वारा अंतरिक्ष में लौट जाती है। इसे ऊष्मा बजट करते हैं।

सूर्यातप का वार्षिक वितरण –

  • ऊष्ण कटिबन्ध में सूर्यातप की मात्रा सबसे अधिक होती है।
  • 40° अक्षांश पर सूर्यातप की मात्रा कम होकर 75% रहती है।
  • 66\(\frac { 1° }{ 2 }\) – अक्षांश पर सूर्यातप की मात्रा 50° रहती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तापमान प्रतिलोप अथवा व्युत्क्रम पर विचार करें। इसके जलवायुविक आशय क्या-क्या हैं?
उत्तर:
तापमान प्रतिलोम – ऊँचाई के बढ़ने के साथ-साथ 1°C प्रति 165 मीटर की दर से तापमान कम होता है, परन्तु कई बार स्थायी या अस्थाई रूप से ऊंचाई के साथ-साथ रापमान में वृद्धि होती है। ऐसी स्थिति में जब ठंडी वायु धरातल के निकट और गर्म वायु इसके ऊपर हो तो इसे तापमान प्रतिलोम कहते हैं।

तापमान प्रतिलोम के लिए आदर्श दशाएँ –

  • लम्बी रातें – जाड़ों की लम्बी रातों में पृथ्वी से विकिरण अधिक होने से धरातल के निकट ठण्डी परतें पाई जाती हैं।
  • स्वच्छ आकाश – रात को स्वच्छ आकाश तथा ऊँचे मेघों के कारण भी विकिरण अधिक होता है।
  • शांत वायु – शांत वायु के कारण वायु में गति नहीं होती तथा घरातलीय सतह शीघ्र ही ठण्डी हो जाती हैं।
  • शीत – शुष्क वायु-शीत शुष्क वायु पृथ्वी का बहुत-सा ताप सोख कर इसे ठंडा कर देती है।
  • हिमाच्छादित प्रदेश-बर्फ से ढका धरातल नीचे की गर्मी को ऊपर जाने से रोकता है।

तापमान प्रतिलोम के प्रकार –
1. धरातलीय प्रतिलोम – यह तापमान प्रतिलोम वायुमण्डल की निचली परतों में होता है। शीतकाल की लम्बी रातों में शीत-शुष्क वायु तथा स्वच्छ आकाश के धरातल पर विकिरण क्रिया से सारी ऊष्मा समाप्त हो जाती है। धरातल के निकट वायु की परत ठंडी हो जाती है तथा ऊपरी परत गर्म रहती है। तापमान ऊंचाई के साथ घटने की जगह बढ़ने लगता है इस प्रकार का प्रतिलोम ध्रुवीय प्रदेशों, उच्च अक्षांशों में तथा हिम से ढके प्रदेशों में होता है।

2. गत्यात्मक प्रतिलोम – इस प्रतिलोम में शीतल वायु राशियाँ कम ऊंचाई पर गर्म वायु से मिलती हैं तो धरातल के निकट की वायु ठण्डी हो जाती है। यह एक अस्थाई अवस्था होती है जो प्राय: चक्रवातों के प्रदेश में पाई जाती है।

3. वायु अफवाह प्रतिलोम – जब ऊंचे प्रदेशों से शीत वायु के पुंज निचली घाटियों में खिसकर इकट्ठे हो जाते हैं तो घाटी की गर्म वायु ऊपर उठ जाती है। इस प्रतिलोम के कारण पर्वतीय ढलानों पर फलों के बगीचे घाटियों में न लगाकर ढलानों पर लगाए जाते हैं।

4. जलवायुविक महत्त्व – तापमान विलोम का जलवायुविक महत्त्व है। इस स्थिति में वायु में संवाहन तथा मिश्रण क्रिया का अभाव होता है। वायु की ऊपरी परते शुष्क रहती हैं। निचली परतों में कोहरा छा जाता है। स्तरी मेधों का निर्माण होता है, परन्तु ये प्रभाव अस्थायी रूप से पाए जाते हैं।

प्रश्न 2.
समताप रेखाओं से क्या अभिप्राय है? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
धरातल पर समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा को समताप रेखा कहते हैं। किसी अक्षांश रेखा पर स्थित सभी स्थानों पर सूर्य की किरणों का कोण तथा दिन की लम्बाई बराबर होती है। इसलिए इन स्थानों पर सूर्यातप की मात्रा समान होती है। इन स्थानों का तापमान भी समान होता है। इस प्रकार समान तापमान वाले स्थानों को आपस में मिलाने वाली रेखा को समताप रेखा कहते हैं, इसी कारण समताप रेखाओं और अक्षांश रेखाओं में अनुरूपता पाई जाती है। समताप रेखाएँ अक्षांश रेखाओं का अनुकरण करते हुए पूर्व से पश्चिम दिशा में फैली होती है। समताप रेखाओं की स्थिति सूर्यातप की अधिकतम मात्रा के अनुसार होती है।

सूर्य की लम्बवत् किरणें मौसम के अनुसार बदलती रहती है। जून में सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत् चमकता है जबकि दिसम्बर में मकर रेखा पर । परिणामस्वरूप ग्रीष्मकाल में सूर्यातप की अधिकतम मात्रा उत्तरी गोलार्द्ध में शीतकाल में दक्षिणी गोलार्द्ध में होती है। इसलिए समताप रेखाएँ ग्रीष्मकाल में कुछ उत्तर की ओर तथा शीतकाल में कुछ दक्षिणी की ओर खिसक जाती हैं।

इस तापक्रम को समुद्र तल पर घटाकर दिखाया जाता है। इस प्रकार उंचाई के प्रभाव को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है। यह कल्पना की सभी स्थान पर समुद्र तल स्थित है। यदि कोई स्थान 1650°C मीटर ऊंचा है और उसका वास्तविक तापमान 20°C है तो उस स्थान का समुद्र तल पर तापमान 20° + 10°C = 30°C होगा, क्योंकि प्रति 165 मीटर पर 1°C तापमान कम हो जाता है।

विशेषताएँ –

  • ये रेखाएँ पूर्व – पश्चिम दिशा में फैली हुई होती हैं।
  • ये उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा दक्षिणी गोलाई में सीधी हो जाती हैं, क्योंकि यहाँ स्थल भाग की कमी है।
  • ये रेखाएँ ग्रीष्म ऋतु में समुद्रों पर भूमध्य रेखा की ओर, परन्तु शीत ऋतु में धूवों की ओर मुड़ जाती हैं।
  • जलवायु मानचित्रों में तापमान का वितरण समताप रेखा द्वारा दिखाया जाता है।
  • मताप रेखाओं का अंतराल अक्षांश रेखाओं पर तापमान में शीघ्र परिवर्तन तथा दरस्थ अंतराल क्रमिक परिवर्तन का सूचक हैं।

प्रश्न 3.
उच्या स्थानांतरण की मूल क्रियाविधि क्या है? वायुमण्डल के संदर्भ में इन क्रियाविधि के महत्व की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
वायुमण्डल के कष्मा का स्थानांतरण कई प्रकार से होता है –

  • अभिवहन
  • संवहन

1. अभिवहन – यह वायु के क्षैतिज संचलन के माध्यम से ऊष्मा का स्थानांतरण है। वायु का क्षैतिज संचलन इसके उर्ध्वाधर संचलन की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। मध्य अक्षांशों में अधिकांश दैनिक मौसमी परिवर्तन केवल अभिवहन द्वारा उत्पन्न होते हैं। उत्तरी भारत में गर्मियों
अलसा देने वाली गर्म हवा. जिसका स्थानीय नाम ‘ल’ है. अभिवहन प्रक्रिया का परिणाम है। इसी प्रकार शीतोष्ण क्षेत्रों में, सर्दियों में उष्णकटिबंधीय गर्म वायु का अभिवहन मौसम को सुहावना भना देता है। इस प्रकार भूपृष्ठ के समीप वायुमण्डल के तापमान में बड़े पैमाने पर उत्क्रमण अभिवहन प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न किया जाता है।

2. संवहन – ऊर्जा का संवहनी परिवहन केवल क्षोभमण्डल तक सीमित है। वायुमण्डल की निचली परत में वायु या तो पार्थिव विकिरण अथवा चालन द्वारा गर्म होती है। ऊष्मा का प्रवाह गर्म से ठंडी वस्तु की ओर होता है और यह स्थानांतरण तब तक होता रहता है, जब तक दोनों वस्तुओं का तापमान समान न हो जाय । धातु सुचालक है, परन्तु वायु नहीं। चालन वायुमण्डल की निचली परतों को गर्म करने में महत्त्वपूर्ण है। ऊपर की ठण्डी हवा सघन तथा भारी होने के कारण रिक्त स्थान को भरने के लिए नीचे खिसक जाती है, जिससे एक ओर हवा निरन्तर गर्म होकर ऊपर उठती रहती है और दूसरी ओर ठण्डी हवा नीचे उतरकर इसका स्थान लेती रहती है। अत: वायु का परिसंचरण निम्न स्तर से उच्च स्तर की ओर ऊष्मा स्थानांतरण से जुड़ी हुई है।

प्रश्न 4.
तापमान के क्षैतिज विवरण को नियंत्रित करने वाले कारकों की चर्चा विशेष रूप से जुलाई और जनवरी की दशाओं के संदर्भ में कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी पर तापमान के वितरण का विश्लेषण शीत और ग्रीष्म ऋतुओं को समताप रेखा मानगि में की सहायता से किया जा सकता है। तापमान किसी पदार्थ में ताप की मात्रा का सूचक है। किसी स्थान पर छाया में भूतल से 4 फुट की ऊंची वायु की मापी हुई गर्मी को उस स्थान पर तापमान कहा जाता है। प्रत्येक स्थान पर तापमान समान नहीं पाया जाता है। पृथ्वी के धरातल पर तापमान का विवरण निम्नलिखित संघटकों द्वारा नियंत्रित होता है

1. भूमध्य रेखा से दूरी – किसी भी अक्षांश पर तापमान सूर्य की किरणों के कोण पर निर्भर है। भूमध्य रेखा से धूवों की ओर जाते हुए तापमान लगातार कम होता जाता है। भूमध्य रेखा पर सारा वर्ष सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं तथा इन प्रदेशों में उच्च तापमान पाए जाते हैं। ध्रुवों की ओर तिरछी किरणों के कारण कम तापमान पाए जाते हैं।

2. समुद्र तल से ऊंचाई – समुद्र तल से ऊंचाई के साथ तापमान घटता है। ताप के कम होने की दर IF प्रति 300 फुट या 0.6°C प्रति 100 मीटर है। वायुमण्डल धरातल द्वारा छोड़ी गई गर्मी से गर्म होता है। इसलिए निचली परतें पहले गर्म होती हैं तथा ऊपरी बाद में। ऊंचाई के साथ वायु का दाब सघनता, जलवाष्प तथा घूल के कणों की कमी होती है। इसलिए पर्वत मैदानों की अपेक्षा ठण्डे होते हैं।

3. समुद्र से दूरी – समुद्र के समीप के प्रदेशों में सम जलवायु होती है परन्तु समुद्र से दूर प्रदेशों में कठोर जलवायु मिलती है। जल स्थल की अपेक्षा धीरे-धीरे गर्म तथा ठंण्डा होता है। इसलिए तटीय प्रदेशों में जल समीर तथा स्थल समीर के कारण गर्मी तथा सर्दी दोनों ही अधिक नहीं होती।

4. प्रचलित पवनें – समुद्र की ओर से आने वाली पवनें जलवायु को नम तथा आर्द्र बनाती हैं परन्तु स्थल की ओर से आने वाली पवने स्थल के कारण किसी प्रदेश की जलवायु को कठोर तथा शुष्क बनाती हैं। समुद्र से आने वाली पश्चिमी पवनों के कारण शीत-ऋतु में इंग्लैंड का औसतन तापमान 20°F से 30°F ऊँचा रहता है।

5. समुद्री धाराएँ – समुद्री धाराओं का प्रभाव उन पवनों द्वारा होता है जो इन धाराओं के ऊपर से गुजरती हैं। गर्म धाराओं के ऊपर से गुजरने वाली पवनें तटीय प्रदेशों के तापक्रम को ऊँचा कर देती हैं तथा वर्षा में सहायक होती हैं। ठण्डी धाराओं के ऊपर से गुजरने वाली पवनों के प्रभाव से तटीय प्रदेश ठण्डे तथा शुष्क होते हैं।

6. पवनों की दिशा – किसी देश के पर्वतों की स्थिति तथा दिशा तापमान वर्षा पर प्रभाव डालती है। अरावली पर्वत मानसून पवनों के समानांतर स्थित होने के कारण इन्हें रोक नहीं पाता, जिससे राजस्थान शुष्क रहता है। यदि हिमालय पर्वत मानसून के आड़े स्थित न होता तो उत्तरी भारत तक मरुस्थल होता।

7. भू-तल का स्वभाव – मैदानों की चिकनी मिट्टी प्राय: बारीक होती है तथा शनैः शनैः गरम तथा ठंडी होती है, परन्तु रेत जल्दी ही गर्म तथा ठंडा हो जाती है। इसी कारण मरुस्थलों में दिन को अधिक गर्मी तथा रात को अधिक सर्दी होती हैं। तापमान का वितरण मानचित्रों पर समताप रेखाओं द्वारा दिखाया जाता है। यह वितरण वार्षिक होता है। ग्रीष्म ऋतु का तापमान जुलाई तथा शीत ऋतु का तापमान जनवरी के महीनों के मानचित्रों द्वारा प्रकट किया जाता है।

जनवरी में तापमान वितरण के लक्षण –

  • जनवरी में अधिकतम तापमान महाद्वीपों पर पाया जाता है। दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया के स्थल खण्डों पर तापमान 3°C से अधिक होता है। उच्चतम ताप मकर रेखा के साथ-साथ पाया जाता है।
  • जनवरी मास में न्यूनतम तापमान उत्तर:पूर्वी एशिया में पाया जाता है। साइबेरिया में वरखोयास्क में – 32°C तक निम्नतम तापमान पाया जाता है।
  • उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ महासागरों पर ध्रुवों की ओर तथा महाद्वीपों पर भूमध्य रेखा की ओर झुकी होती हैं।
  • दक्षिणी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ महासागरों पर भूमध्य रेखा की ओर तथा महाद्वीपों पर ध्रुवों की ओर झुकी होती हैं।
  • दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान रेखाएँ नियमित रूप तथा पूर्व-पश्चिम दिशा में अक्षांशों के समानांतर पाई जाती है, क्योंकि यहाँ जल की अधिकता है परन्तु उत्तरी गोलार्द्ध में ये रेखाएँ अनियमित होती हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में 30°C की समताप रेखा उत्तर:पश्चिमी अर्जेंटीना, अफ्रीका के पूर्वी भाग, बेर्नियो तथा आस्ट्रेलिया से होकर गुजरती है।

जुलाई में ताप वितरण – जुलाई उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे अधिक गर्म मास तथा दक्षिणी गोलार्ड में सबसे अधिक ठंडा मास होता है।

  • जुलाई में तापमान उत्तरी गोलार्द्ध में तथा मरुस्थलों पर पाया जाता है। निम्नतम तापमान भी उत्तरी गोलाई में ग्रीनलैंड के मध्य पाया जाता है।
  • समताप रेखाएँ समुद्र पार करते समय भूमध्य रेखा की ओर तथा स्थल-खण्ड को पार करते हुए ध्रुवों की ओर मुड़ जाती हैं।
  • समताप रेखाएँ उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा दक्षिणी गोलार्द्ध में अधिक नियमित होती हैं।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें –

  1. स्थल एवं जल का विभेदी तापन
  2. ऊष्मा नट, तथा
  3. अक्षांशीय ऊष्मा संतुलन

उत्तर:
1. स्थल एवं जल का विभेदी तापन – स्थल, जल और बर्फ विभिन्न दरों से गर्म और ठंडे होते हैं। अत: एक ही अक्षांश पर स्थल और जल पर की हवा के तापमान में काफी भिन्नता होती है। महाद्वीपों तथा महासागरों के बीच तापमान का विपर्यास गर्मियों की अपेक्षा सर्दियों में अधिक होता है। स्थल शीघ्र ही गर्म और ठण्डे होते हैं, क्योंकि सौर विकिरण ठोस धरातल में अधिक गहराई तक प्रवेश नहीं कर सकता । इसके विपरीत, जल में यह काफी गहराई तक चला जाता है। इसके अतिरिक्त यदि स्थल और जल का तापमान एक विशेष अंक तक लेना हो, तो स्थल का तापमान बढ़ाने में जल की अपेक्षा तीन गुना अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी। इस विभेदी तापन के फलस्वरूप, महासागरों के ऊपर की हवा स्थल पर की हवा की अपेक्षा गर्मियों में अधिक ठण्डी और सर्दियों में अधिक गर्म रहती है।

2. ऊष्मा बजट – सूर्यातप के अवशोषण, परावर्तन और प्रकीर्णन से वायुमण्डल और पृथ्वी के बजट निर्धारित होते हैं। वायुमण्डल से गुजरने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा सूर्य किरणों के कोण तथा वायुमण्डल की पारदर्शिता पर निर्भर है। पृथ्वी द्वारा अवशोषित सौर ऊर्जा दिन-प्रतिदिन ऊष्मा में परिणत होती रहती है। सूर्य अंतरिक्ष में ऊर्जा का विकिरण लघु तर के रूप में करता है, जबकि दीर्घ तरंगें या अवरक्त विकिरण को अंतरिक्ष में विकरित करती हैं। सौर ऊर्जा वायुमण्डल की ऊपरी सीमा पर पहुँचती है और धीरे-धीरे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी के धरातल पर आती है और अवशोषित कर ली जाती है।

अनुमान है कि सूर्यातप की 100 इकाइयाँ मूल लघु तरंगों के रूप में परिवर्तित और प्रकीर्ण कर दी जाती हैं । इनमें से मेघों द्वारा 24 इकाइयाँ, धूल कणों द्वारा 7 इकाइयाँ तथा भू पृष्ठ द्वारा 4 इकाइयाँ हैं । प्रकीर्ण किरणों का कुछ भाग भूपृष्ठ पर पहुंच जाता है और उनके द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। उन्हें सम्मिलित रूप से विसरित विकिरण कहा जाता है। सूर्यातप की 18 इकाइयाँ, ओजोन वायुमण्डल में जल, धूल और अन्य संघटक तथा मेघ द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं।

कुल मिलाकर सौर ऊर्जा की 47 इकाइयाँ पृथ्वी पर विकिरण के रूप में पहुंचती हैं, जबकि 18 इकाइयाँ वायुमण्डल द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं । बजट का संतुलन बनाए रखने के लिए 65 इकाइयाँ पृथ्वी द्वारा सीधे दीर्घ तरंगों के रूप में, अंतरिक्ष को पुनः विकिरित रूप में वायुमण्डल को वापस हो जाती है।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

3. अक्षांशीय ऊष्मा संतुलन – पृथ्वी का वार्षिक औसत तापमान लगभग एक जैसा रहता है। लेकिन पृथ्वी पर आने वाले विकिरण तथा उससे बाहर आने वाले विकिरण के मध्य संतुलन एक समान नहीं है। यह पृथ्वी के अधिकांश अक्षांशों पर एक से दूसरे अक्षांश पर भिन्न रहता है। निम्न अक्षांशों में (40° उत्तर और 40° दक्षिण के मध्य) लघु तरंग विकिरण के रूप में प्राप्त ऊर्जा दीर्घ तरंगों द्वारा भूपृष्ठ से नष्ट होने वाली ऊष्मा की अपेक्षा दीर्घ तरंगों द्वारा नष्ट होने वाली ऊष्मा की मात्रा अधिक रहती है। ऊष्मा का स्थानांतरण मध्य अक्षांशों में अर्थात् 30° से 50° अक्षांशों की ओर वायुमण्डलीय परिसंचरण तथा महासागरीय धाराओं द्वारा सम्पन्न होता है।

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Bihar Board Class 11 English The Chimney Sweeper Textual Questions and Answers

[A] Work in small groups and discuss their issues :

The Chimney Sweeper Questions And Answers Bihar Board Question 1.
In your locality you might have come across several children working in different fields of life. Do you think it is proper to be engaged in work when one should be studying in school ?
Answer:
Children are called future of a country. In such circumstances it would be inhuman to take work from children as we see today. Children are •the buds of future. They have to work with books not with tools like hammer. So it is not proper to be engaged in manual work. They must be in the school.

The Chimney Sweeper Question Answer Bihar Board Question 2.
Why do these children work ? Is there any compulsion to work or is it sheer ignorance on the part of their parents ?
Answer:
Working class children are poor. They work for bread, because their parents are poor who have nothing to feed them. Their parent are faultless and have no compulsion in sending their children to do manual work.

Chimney Sweeper Questions And Answers Bihar Board Question 3.
Make a list of the kind of work children are usually enraged in. Also, discuss the treatment meted out to them at their work place.
Answer:
Children generally work in hotel, Motor garage, small scale industries etc. Owners of these organisations are rude and they behave with them cruelly.

B. 1. Answer the following questions briefly :

The Chimney Sweeper Questions And Answers Class 10 Bihar Board Question 1.
Who is “I” in the first line ?
Answer:
‘I in the first line of the poem is “The speaker”, the boy who is a Chimney Sweeper.

The Chimney Sweeper Class 10 Exercise Bihar Board Question 2.
Who sold the speaker and in what circumstances ?
Answer:
The speaker’s father sold him after his mother’s death. The speaker was sold as his mother had died and due to his poverty as well.

The Chimney Sweeper Questions And Answers Pdf Bihar Board Question 3.
What does “my tongue/could scarcely (lines 2-3) signify ?
Answer:
My tongue scarcely cry, signifies that childhood is not a time to cry.

The Chimney Sweeper Exercises Bihar Board Question 4.
Who is Tom Dacre ? What has been done to him ?
Answer:
Tom Dacre is a little child working in the chimney. His curling hair is being clean saved. Tom starts crying. His hair was very beautiful

The Chimney Sweeper Class 10 Bihar Board Question 5.
What was the consolation given to Tom by the speaker ?
Answer:
The speaker, gave consolation to Tom that when his head will remain clean shaved, his white hair would not be spoiled by the soot.

The Chimney Sweeper Questions Bihar Board Question 6.
What does Tom see in his dream about thousands of sweepers ?
Answer:
Tom sees in his dream that there are thousands of sweepers like Dick, Jco, Ned and Jack, who are suffering like him because they have been unwillingly engaged in their job of chimney-sweeping.

The Chimney Sweeper Comprehension Questions Bihar Board Question 7.
What does the phrase “Coffins of black” signify here ?
Answer:
“Coffins of black” means job of chimney-sweeping. It signifies that chimmey sweepers work near chimney that carries off smoke or steam of fire from furnace, engine etc. Their work is not without dagger. Any time they may be runied. It also means that they are comforted in the chimney to work.

B. 2. Answer the following questions briefly :

The Chimney Sweeper Answer Key Bihar Board Question 1.
Who has a bright key ? What does he do with it ?
Answer:
An angel has a bright key. He opens the coffins with it and sets all the children free from the coffins.

Question Answer Of Chimney Sweeper Bihar Board Question 2.
What change does the arrival of an Angel bring in the life of chimney sweepers ?
Answer:
The arrival of an Angel who sets chimney sweepers free from the coffins leads a happy life, breathe in fresh air. They are free from the compulsion of hard work like chimney sweeping.

Question 3.
The Angel tells Tom something about God. What is it ?
Answer:
The Angel tells Tom to look up to the Divine father and trust in His assurance and security. They (chimney sweepers) will never be unhappy in life.

Question 4.
What does the phrase ‘never want joy’ mean here ?
Answer:
The phrase ‘never want joy means the sweet grace of Almighty. God is with them. Now they will never be unhappy in life any more.

Question 5.
“We rose in the dark”—who does ‘We’ stand for ?
Answer:
Here in ‘We rose in the dark ‘ ‘We” stands for the children who were set free from the coffins by the Angel.

Question 6.
Why was Tom feeling happy and warm though ‘the morning was cold’ ?
Answer:
Inspite of the cold morning Tom was in tune with the Infinite and could rise above the physical conditions of life which appeared as a light of gossamer.

No harm comes to him who does h’s work as divine worship. So Tom was happy and warm even in the cold morning.

C. Long Answer Type Questions :

Question 1.
What does Tom see in his dream ? Describe in details.
Answer:
Tom sees in his dream that there are thousands of sweepers like Dick, Joe, Ned and Jack, who are suffering like him because they have been unwillingly engaged in their job of chimney-sweeping. All of them are busy working as chimney sweeper. They are also facing trouble while working near chimney that carries off smoke or steam of fire from furnace, engine etc. Their work is not without danger. Any time they may be ruined. Suddenly an Angel comes to them. He gets them free from their dirty and troublesome work. Now they have become free and happy children relieved of their burdensome work.

Question 2.
In what way is Tom’s dream significant ?
Answer:
Tom works as a chimney sweeper, amidst smoke or steam of fire, furnace and unhealthy gas of a chimney. He is spending a very miserable time there. Several other children are also unwillingly working there as chimney sweepers like him. One night Tom sees in his dream that an Angel arrives there and sets them free of their sufferings. Their agony becomes over now. They are free to move anywhere they like.

It is significant, in the sense, that a dream of release from the drudgery and dirt of chimney-sweeping, emboldens the children to continue their job.

Question 3.
What picture of the 18th century England does the poem create ?
Answer:
The poem presents the picture of the 18th century. It throws light upon the Wretched conditions of die children employed as chimney-sweeper by factories and industries! The children were required to work hard. Their heads were clean-shaved so that the soots (black powder from smoke) of smoldering pockers of fire from the furnaces may not bum them. They had to live and sleep under inhuman-conditions.

Question 4.
What is the theme of the poem? Does the theme have any particular ve’evance in our state or country ?
Answer:
The theme of the poem is most impressive and appealing. It touches the sentiments of mankind, throwing light upon the wretched conditions of the children employed as chimney-sweepers by factories and industries. The cluldrenriiad to work hard. Their heads were clean-shaved so that the dirty black smoke of shouldering pokets of fire from the furnaces may not harm them. They had to live and sleep under inhuman conditions. It is a subject of discussion which invites human sentiments and attention on the issue (problem). To treat him like a beast is really shameful and unfortunate.

Of course, in our country and states such sorts of torture and inhuman act is prevalent. In factories and industries child labours are employed and brutally treated. In tea stalls, hotels and restaurants, child labours are engaged in good numbers.

Question 5.
Narrate the gist of the poem in your own words.
Answer:
The gist of the poem is perfectly meaningful which touches the sentiments of the readers (poeple). If relates to the supression and evils of the child-labour and deserves the sympathy on their miserable condition and victimization. It very well throw slight on how brutally they were being treated in the eighteenth century. A child had to work as a chimney-sweeper close to the furance of a chimney. They had to sleep in the soot under inhuman condition.

Question 6.
Explain the paradox in line 23.
Answer:
Tom was not happy to work as a chimney-sweeper, like many other children, working in a factory. He was living in wretched condition. He had to work hard. He had to sleep in the soot of smoldering pockets of fire from the furnaces under inhuman conditions.

But in line 23 it is mentioned, “Tho’ the morning was cold, Tom was happy and warm”. It is a paradox. ‘A paradox is a statement which is apparently self-contradictory or absurd but it has a valid and more significant meaning.’

So why in such unpleasant and adverse circumstances (condition), Tom was happy ? As such here it seems contradiction. Going deeper to the situation (condition), we find that the previous night he had a dream. An angel came and freed all the children working as chimney sweeper in the factory. They got rid of their victimization forever. The dream made him to feel so. That is why, he was happy though the morning was cold.

C. 3. Composition :

Question a.
You have been asked by your teacher to deliver a speech on the occasion of Children’s Day. Prepare a speech on the occasion of Children’s Day. Prepare a speech with the help of your fiends in about 150 words on ‘the ways to deal with child labour in our society’.
Answer:
The Ways to Deal With Child Labour in our society: Children are the most precious property of every nation. But unfortunately India probably has the largest child labour force in the world. It is a matter of shame for all of us ? Our little children just eight to fifteen years old who should be studying in schools, have to work at meagre wages or for mere bread in factories and industrial concerns more or less as bonded labour. In spite of court rulings and efforts of humanitarians like Swami Agnivesh, the situation doesn’t seem to have much improved.

Let us think about its reason. In my view poverty is its main reason. A poor man with many children are compelled to send their children on work to earn livelihood. First of all we should do away with poverty. Then guardians should be encouraged. They need to make conscious. Variety in mid-day meal is essential. The poor child students should be given scholarship. The child labour system must be banned by our government followed by physical punishment. In my view these are ways to deal with child labour prevailing in our society.

Question b.
Write a short essay in about 200 words on ‘The Success of Sarva Shikha Abhiyan depends heavily on the abolition.
The success of Sarva-Shiksha Abhiyan.
Answer:
The problem of child labour is a burning problem of India. Children are the backbones and the future of a nation. But unfortunately India probably has the largest child labour force in the world. Our backbones are compelled to leave their studies. They have to earn due to poverty. Poverty is in its root. Though our courts have already banned.it, it is going on.

Several steps have been taken to abolish it. The present ‘Sarva Shikha Abhiyan’ is one step among them. Under this programme, the poor are made concious of the advantage of education. They are encouraged to send their children to .school. To attract and entice the child-students even mid-day meal is given. The District Magistrate of the concerned district presides this programme. He generally requests intellectuals to contribute in it. Now-a-days it is running in every block. Majority is contributing in it. Despite it, its success it heavily depends on the abolition of child labour.

Therefore Sa’va Shikha Abhiyan programme will be success only when the Government will take stem step against child-labour with necessary arrangement for their eduation.

D. 1. Word Study :

Ex. 1. Look up a dictionary and write two meanings of each of the following words-the one in which it is used in the lesson and the other which is more common:
Answer:
young — (i ) child, (ii) in the prime of life
want — (i) to lack, (ii) to need
sport — (i) to be happy, (ii) to play/make merry
warm — (i) comfortable, (ii) zealous/ardent
coffin — (i) soot bodies of the chimney sweepers, (ii) cloth to enclose corpse

D. 2. Form Adverbs from the Verbs and Nouns given below: new, fresh, wake, jar, foot
Answer:
new — anew/newly; fresh — afresh/freshly; wake — watchfully; jar — ajar; foot — afoot;

D. 3. Word-meaning :

Question 1.
Match the words given in coloumn ‘A’ with their meaning given in column‘B’:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 3 The Chimney Sweeper 1
Answer:
(1) – (b)
(2) – (d)
(3) – (a)
(4) – (e)
(5) – (c)

E. Grammar :

Question 1.
Join the following sentences using ‘though’ or ‘although’:

  1. Mamta was hungry. She gave her food to a beggar.
  2. Safdar had little time to spare. He came to see my ailing father.
  3. Birju laboured hard. He did not secure very good marks.
  4. Chhabi loved him very much. She could not tell him so.
  5. Mr. Lai knows very little. He is very popular among students.

Answer:

  1. Though/although Mamta is hungry, she gave her food to a beggar.
  2. Thou jjh/Although Safdar had little has little time, he came to see my ailing father.
  3. Though/Although Birju laboured hard, he did not secure good marks.
  4. Though/Although Chhabi loved him very mcuh, she could not tell him so
  5. Though/Although Mr. lal knows very little, he is very popular among students.

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Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 1 Where The Mind is Without Fear

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Bihar Board Class 11 English Where The Mind is Without Fear Textual Questions and Answers

A. Work in Small groups and discuss these questions :

Where The Mind Is Without Fear Question Answer Class 11 Question 1.
Do you think birds and animals in cages are happy ?
Answer:
I think birds and animals which are kept in cages are not happy. They cannot move freely. They can neither take flight nor can they run freely.

Question Answer Of Where The Mind Is Without Fear Question 2.
Would any of you like to live a life of slavery ?
Answer:
No body can like to live a life of slave. Everybody wants freedom. But freedom does not mean any type of anarchy or encroachment. Freedom accompanied with safety and discipline is preferred by all.

Where The Mind Is Without Fear Poem Questions And Answers Question 3.
Would you like to live a life of freedom. Why ?
Answer:
I would prefer the life of freedom where we can have the freedom of speech. We can speak truth fearlessly. We can enjoy with whatever our own. We feel safe. We can have the freedom of mind. We can express our thought in writing.

Where The Mind Is Without Fear Solutions Question 4.
How would you interpret the freedom of a nation ?
Answer:
The freedom of nation means the nation should have its own language, constitution, emblem flag. Its people have love and respect for it. Its people may sacrifice their all for its protection. The people of the nation should have pride for the glory of their nation.

B. Answer the following questions briefly :

Where The Mind Is Without Fear Questions And Answers Question 1.
What do you think is special about the composition of the poem ?
Answer:
This poem is covered with patriotic note. The poem seems to be the work of that time when our country was not free. The poet Rabindranath Tagore wants to say that our freedom is not perfect. We have to struggle for achieving heaven of freedom on this land. He says that our society is full of narrow domestic walls. It is shaking the integrity of the nation. He wants that his country should win freedom and progress in the path of peace and progress.

Where The Mind Is Without Fear Question Answer Question 2.
What does the poet pray to God with regard to the state of mind of the Indians ?
Answer:
The poet was pained to think of the economic and social backwardness of the Indian people. He was not only a nationalish but a great spiritualist as well. He had firm faith in India. He prayed to God for spiritual, moral and economic freedom for the Indian people. He prayed further that his country should grow up in an atmosphere of fearlessness.

Where The Mind Is Without Fear Poem Question 3.
What docs ‘Narrow domestic walls’ refer to in the poem ? What do the walls do ?
Answer:
‘Narrow domestic walls’ suggest narrow division of state and country. Artificial barriers of caste, creed and language are dividing the country into small units. Such walls divide artificially man from man. Thus narrowness must be knocked down to create a world of free from narrow mindedness.

Question Answer Of The Poem Where The Mind Is Without Fear Question 4.
What sort of a place is the poet talking about in the first two lines ?
Answer:
In the first two lines the poet Rabindranath Tagore has written about the ideal state of freedom. Where the mind of its people is free all fear and humiliation. Where they do not have to bow their heads before their master. Such a feeling will progress rapidly.

Where The Mind Is Without Fear Explanation Question 5.
How concerned is the poet about the nation’s state of affairs ?
Answer:
India is a developing country but is hoplessly divided against it self. There are disputes and conflicts among various regligious, linguistic and ethnic groups. But poet Tagore wants a state of peace where all are equal. There must be brotherhood and unity. Only then a state will get perfection.

Where The Mind Is Without Fear Poem Question Answer Question 6.
How can perfection be achieved ?
Answer:
People make constant effort to take their country to the highest place, perfection can be achieved through fearless mind, free knowledge and deep philosophical wisdom. Above all it can be achieved through tireless effort.

Where The Mind Is Without Fear Poem Pdf Question 7.
What does Tagore mean by ‘deary desert sand of dead habit’ ?
Answer:
The power of reasoning has been compared to a clear stream because where there is no clearity there can be no reason. This clear stream of reason is likely to get lost and dried in the dreary desert sand of dead habit. The Nation occupies the highest place which has fresh and clear thinking and not the barencess of dead habit.

C. 1. Long Answer Type Questions :

Where The Mind Is Without Fear Question Answer Class 10 Question 1.
Narrate the gist of the poem in your own words.
Answer:
This is a deeply patriotic poem. The poet Rabindranath Tagore says that his country is not yet free. It is sleeping in the darkness of salvery and bondage. He prays to God to awaken his country of his countrymen from this sleep of slavery. He wants his country to be awakened into a state of ideal freedom which he. calls ‘ ‘the heaven of freedom’. In this state of ideal freedom his countrymen will have no fear or humiliation. They can walk with their heads held high and genuine pride. In such a country knowledge will be freely available to all and not only to a few people of the ruling class.

It will be a country which will have true unity. There will be wisdom and honest and tireless efforts towards progress. There will be fresh and clear thinking free from fear. The countrymen will be able to devote themselves to their rapid progress of their nation though though and action. The poet prays to God to let his countrymen awaken into such an awareness of ideal freedom.

Where The Mind Is Without Fear In Hindi Question 2.
What does the poet mean by “heaven of freedom” ? What are its constituents ?
Answer:
Freedom according to the poet has a larger meaning. The freedom, which he have got is political freedom only. He wants his countrymen to be awakened into the state of ideal freedom/which he calls the “heaven of freedom”. In this state of freedom, his country-men will have no fear or humiliation. They can walk with their heads held high. In such a country knowledge will freely available to all. It will be a country which will have true unity. There will be wisdom and honest and tirless efforts towards progress. There will fresh and clear thinking free from fear. In brief the poet wishes for a heaven of freedom on this land. The poet is praying to God for bringing to freedom on this land.

So, according to the poet there are many constituents of heaven of freedom, such as free from slavery, state of ideal freedom, no fear, no humliation. Sence of high pride free knowledge, tr ie unity, wisdom, honesty, honest labour of the people, national thinking.

Where The Mind Is Without Fear Full Poem Question 3.
Does the title of the poem convey Tagore’s vision of India ? Explain.
Answer:
The title of the poem “Where the Mind is Without Fear” the poet has successfully conveyed Tagore’s vision of India. Rabindranath Tagore wants his country free from slavery and bondage. He wants his country free from humiliation. This countrymen should be without fear. There should be knowledge and wisdom in the people. A country with unity, progress, free from fear. This he calls a ideal freedom. He prays to God that the heaven of freedom should come on this land (India).

The whole poem revolves round the title “Where the Mind is Without Fear”. Each and every aspect of the poem indicates the sence of present title. The title of the poem has very successfully conveyed the poets vision of India. So the title of the poem is suitable and proper.

Where The Mind Is Without Fear Summary In Hindi Question 4.
How far does India of today resemble Tagor’s vision of free country ?
Answer:
To our mind India of today does not resemble Tagore’s vision of a free country. Rabindranath Tagore was a patriotic nationalist. He has a special vision of independent India. He was of the view that our country should awakened into a state of ideal freedom which he calls ‘ ‘the heaven of freedom”. In the state of ideal freedom his country men will have no fear, no humuliation. People should walk with their heads high. A country full of knowledge, wisdom, unity, progress, devotionwas the desire of the poet Rabindranath Tagore.

But after freedom this did not happen. India is stilf backward. Million of people in India are still poor and illitrate. This country is hopelessly divided into many relegious, linguistic and ethenic groups. People have lost their power of national thinking. “Tagore” dream of a heaven of freedom for India remains unrealished. In fact India is passing through the worst period in her history. Corruption is prevelant in all sheres of life. If tagore had being alive to study the condition of life in free India, he would have been deeply shoolked.

Where The Mind Is Without Fear Meaning In Hindi Question 5.
Why does Tagore use ‘where’ seven times in the poem ? Explain
Answer:
The poem “Where the Mind is Without Fear” The poet Rabindranath Tagore has used the word “Where seven times each and every sentence starts with fear. It means that all the sentences starting with where are dependents sentences. We may call it subordinate sentences. Only the last sentence is a principal sentence that is ‘ ‘Into that heaven of freedom, my father, let me country awake”. In this sentence “let my country is a principle clause.”

Question 6.
What is partriotism ? Discuss “Where the Mind is Without Fear’ as a patriotic poem ?
Answer:
Patrotism means love for the country. The poet “Where the Mind is Without Fear” a man who is patriot is always ready to sacrifice everything for the well being of the country. A patriot man calls his country, ‘ ‘Motherland’ ’

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs

(a) Freedom is our birth right.
(b) ‘Narrow domestic walls’ have to be done away with if we want to live amicably.
Answer:
(a) Freedom is our birthright. We have been granted the fundamental rights as the right to speak truth, right to education, right to keep property from genuine means, right to get justice, etc. These rights were not granted to all when there was British rule in India. No body could speak truth. The right of justice was not equal for all because we were slave of the Britishers.

(b) Narrow domestic walls’ means the confinement within one’s family, caste, creed and a small society. For the welfare of the society and country we should break such narrow domestic walls and we should widen our views. If we think for the welfare of all,- they will also think for our welfare. The life becomes easy and beautiful with the help of each others co-operation and help. Thus by the co-operative hands we can get a rid of any type of problem. We alone cannot succeed in this life.

C. 3. Composition:

Write a paragraph in about 100 words on the following :
(a) India of our dream
(b) Importance of intellectual freedom
Answer:
(a) India of our dream

We are Indian. India is our identity. We must save our identity. Our languages and cultures are different still we are known as Indian. Our nationality is one, we all are Indian. It is our duty to save our country. We should make every effort to make our country prosperous rich in culture and advanced in science and technology. Our dream for India should be to make it glorious and developed in the world. For all these all Indians should have the facility of food, clothes and sheltre. They should have economic freedom. They should have equal right education and employment.

There should be no discrimination on the basis of caste or creed, community or religion. Educational and medical facilities should be granted to all free of charge. Justice should be equally granted to all. People should not the measured in terms of money. They all should work, together for the development of the country. Our joint effort should be made to make our country super power.

(b) Importance of Intellectual freedom.
Intellectual freedom means the freedom of mind. Man does not require only food, clothes and shelter. He also requires to exercise his mind freely. He can think, and exercise his though in independent way. Man is a national animal. The requirements of food, clothes and shelter are for animals also. Animals fulfill all their these requirement, in their own way. But the man required something more than all these things. Their mind are creative. They want to express their thoughts either in verbal or graphic way. They want to do something for the welfare of all.

They want to invent something. They write something to enlighten. The way of the human being. So they must be granted the intellectual freedom so that they may create or invent something for human being. All the scientific inventions like aeroplane, train, bus, radio, television and computer are the result of intellectual freedom.

D. Word study:
D. 1. Dictionary Use

Ex. 1. Correct the Spelling of the following words :
Knowdedge, strech, widningh, even country
Answer:
Knowledge, stretch widening heaven-country.

Ex. 2. Look up a dictionary and write two meanings of each of the following words-the one in which it is used in the lesson and the other which is more common:
fear mind free narrow desert forward
Answer:
fear: (i) feeling of danger or evil (ii) dread or reverence.
mind: (i) couscious though (ii) take care of
narrow: (i) limited (ii) carefully
desert: (i) barren land (ii) to leave
forward : (i) directed towards the front (ii) send (utter, etc.)

D. 2. Word-Formation

Ex. Read the following lines carefully
Where words come out from the depth df truth;
Where knowledge is free.

In the above lines the words ‘depth’ and ‘knowledge ’ are abstract nouns which hake been derived from adjective ‘deep’ and verb ‘know ’ respectively. Now, from abstract nouns from the verbs and objectives given below:
high true free perfect think act lose
Answer:
high-height
think-thinking
true-truth
act-action
free-freedom
lose-losing
perfect-perfection.

D. 3. Word-Meaning

Ex. 1. Find from the lesson words the meanings of which have been given in ‘column A’. The last part of each word is given in ‘column B’:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 1 Where The Mind is Without Fear 1
Answer:
range of information, understanding—knowledge
part broken off, separated—fragment
to pull something to make it longer or wider—stretch
small in width or limited in outlook—narrow
the nation as a whole with territory—country

Ex. 2. Fill in the blanks with suitable words given below :
mind fragments words country father
(i) Several languages are spoken in our ……………….
(ii) His ………………. was a minister.
(iii) Arya was trying to put the ………………. of a broken were together.
(iv) Pragya has made up her ………………. to be a doctor.
(v) When we speak we put our thoughts into ……………….
Answer:
(i) country
(ii) father
(iii) fragments
(iv) mind
(v) words.

E. Grammar:

Ex. 1. Read the following sentences carefully :

My father, let may country awake into that heaven of freedom where the mind is without fear.

In the sentence given above ‘where ’ is a relative pronoun that joins two sentence (clauses): ‘My father, let my country awake into that heaven of freedom’ and ‘The mind is without fear in that heaven of freedom. ‘Note also how the relative pronoun comes immediately after its antecdent, noun.

Join the following sentences using, ‘when’, ‘whom’ and ‘who’

(i) I know the person. He has come to meet me.
(ii) Amandeep liked that shop. He got everything there.
(iii) Gyandero came to my house in the evening. I was away that time.
(iv) I met A mod on the road. He was coming from Indore.
(v) Subject handled the situation wonderfully. I had given him timely advice.
Answer:
(i) I know the person who had come to meet me.
(ii) Amandeep liked that shop when he got everything there.
(iii) Gyandeo came to my house in the evening when I was away.
(iv) I met Amod on the road who was coming from Indore.
(v) Subject handled the situation wonderfully whom I had given timely advice.

F. Activities:

Read the following lines carefully and tell if you notice anything special about the sound:

(a) ‘Where the mind is without fear and the had is held height;’
(b) ‘Where tireless striving stretches its ames towards perfection; ’
(c) ‘Into that heaven of freedom, my father, let my country awake’
Answer:
(a) In this sentence there is the use of alliteration. Repeated use of ‘h’ makes the line very specific.
(b) In this line also there is the use of alliteration in words’ striving stretches’. There is also the use of hyperbole.
(c) This sentence is also hyperbolic. Freedom has been compared to heaven. This concluding line has been highly emphatic.

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Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 4 Stopping by Woods on a Snowy Evening

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Rainbow English Book Class 11 Solutions Poem 4 Stopping by Woods on a Snowy Evening

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Bihar Board Class 11 English Stopping by Woods on a Snowy Evening Textual Questions and Answers

A. Work in Small groups and discuss these questions :

Stopping By Woods On A Snowy Evening Questions And Answers Class 11 Bihar Board Question 1.
You arc going somewhere for a very important work On the way you come across a beautiful landscape. You wish you could spend a day or two there. What would you choose-the landscape or the work ?
Answer:
[Hints]: I would choose the work because without the work is over. I could not enjoy the beauty of the landscape. It may be possible that I might stay there at the time of returning when the work is finished successfully.

B. 1. Write T for True and F for false statement :

  1. The speaker is passing through a jungle.
  2. The speaker is riding a horse.
  3. He sees a farmhouse in the jungle.
  4. He certainly knows the owner of the jungle.
  5. It is snowing.
  6. The speaker is riding the horse in the morning.
  7. The speaker shakes the harness bell.
  8. The wind is blowing hard.
  9. The horse is very big.

Answer:

  1. True
  2. True
  3. False
  4. True
  5. True
  6. False
  7. False
  8. False
  9. False

B.1.2. Answer the following questions briefly :

Stopping By Woods On A Snowy Evening Questions And Answers Bihar Board Question 1.
Why does the horse find the situation strange ?
Answer:
This is unusual, because the horse usually stops a farm house, and at that moment no house is near by that is why the horse wonders as to why, why his master, the rider, should stop there at such a lonely place.

Stopping By Woods On A Snowy Evening Question Answer Class 11 Bihar Board Question 2.
The speaker refers to the owner of the woods in the opening stanza. Who does the owner stand for here ?
Answer:
According to the poet the owner of the woods lives in a nearby village. He is a villager.

Stopping By Woods On A Snowy Evening Questions And Answers Class 11 Odisha Board Question 3.
Does the speaker like the scene ? Which words or phrases suggest this ?
Answer:
The speaker likes the scene. The scene is full of natural beauty. The phrase suggests the scene in the phrase ‘woods’ and flake.

Stopping By Woods On A Snowy Evening Question Answer Bihar Board Question 4.
How many times does the speaker use the word ‘woods’ ? Which adjective does he use for woods ?
Answer:
The word “woods” has been used four times ‘Dark’ adjective has been used for the word ‘Woods’.

Stopping By Woods On A Snowy Evening Question Answer Class 11 Odisha Board Question 5.
What does ‘Sleep’ mean in this poem ?
Answer:
In this poem ‘Sleep’ mean ‘to take rest’, or, ‘to die’.

Stopping By The Woods On A Snowy Evening Question Answer Question 6.
Which promises is the speaker talking about ?
Answer:
The speaker is talking about his promises and his obligations at home where he has to reach without delay.

Stopping By Woods On A Snowy Evening Answers Question 7.
What does ‘And miles to go before I sleep’ suggest ?
Answer:
The poet reminded himself that he had to travel long before he might take rest. So, he resumed his journey. He thought that he had to keep his promises. He had thus to go miles before he could take rest. He had to cover a long distance before he could enjoy sleep. In this connection the seance of duty ‘ became stronger. He altogether, rejected temptation of stopping there.

Question Answers Of Stopping By Woods On A Snowy Evening Question 8.
Find out the rhymes scheme of the poem ?
Answer:
The poem is imaginative and suggestive. It is highly inspiring and motivating. The rhyming of the poem is very impressive. In the first stanza, the first line rhymes with the forth line. In the second stanza the first line rhymes with the forth line. In the second stanza, the first, second and forth line, rhyme. In the third stanza the first line rhymes with the second line and the third line. In the fourth and the last stanza all the four lines rhyme with one another.

Stopping By Woods Questions And Answers Question 9.
Which words evoke the sense of sound ? Make a list of such words.
Answer:
The following words evoke the sense of sound ag given here-woods, know, though, snow, lake, darkest, shake, mistake, black, dark, deep, keep and sleep.

C. 1. Long Answer Type Questions :

Question And Answer Of Stopping By Woods On A Snowy Evening Question 1.
Does the horse in the poem suggest anything about the speaker ? What and how ?
Answer:
The horse is surprised about the speaker. There is no farm house in the woods. The horse is very much disturbed why his rider has stopped at that place where there is no farm house. Here the horse represents the commonsense of a man who sees only the obvicus and visible realities. The speaker stands for wisdom knowledge and insight.

Stopping By Woods On A Snowy Evening Poem Answer Question 2.
What function does the repetition in the last two lines of the poem serve ?
Answer:
The poet Robert Frost composed by the poem ‘Stopping by Wood on A snowy Evening’ the poet has repeated the same line in the last stanza. The whole theme of the poem revolves round the last two lines. These two last lines reveal the main ideas of the poem.

The poet has come to a lonely forest where the master of the woods was not present. But the poet was so charmed with the beauty of the nature that he did not want to leave that place. The horse of the poet reminds the poet not to stay there because there was no form house there. The poet too reminds of his duties. He had to cover a long distance. He is fully aware o the responsibilities that he had. He is not .o rest unless the goal of life fully achieved.

The poet here in the last two lines stands for wisdom, knowledge and insight. Hence the poem more impassive and praise worthy. The hole theme of the poem revolves round these two lines. The dual meaning of these lines is quite suggestive. The lines are very simple. But the ideas, are very high. The lines are highly inspiring and motivating. The reader wants to read these lines again and again.

Stopping By Woods On A Snowy Evening Poem Questions Answers Question 3.
What does ‘harness bell’ suggest here ?
Answer:
Here in this poem the ‘harness bell’ is very indicative and suggestive. These two words indicate the true motto of the poem. The poet is staying in the woods, the master of the woods is not present there. But the poet is so charmed with the beauty of the nature that he wants to stay there at night. But his horse was standing there. The horse was very much disturbed. Why his master was not marching ahead.

The horse here stands for man who sees the realities. The harness bell of the horse gives the sound. It means the sound suggests that the poet is forgetting his duties to life. He has to do a lot of work. He should not stay there. He should remember his responsibilities. The poet becomes conscious as soon as he hears the harness bell. So, the harness bell is very suggestive and indicative. It suggests the duties and responsibilities of life.

Questions And Answers Of Stopping By Woods On A Snowy Evening Question 4.
‘The woods are lovely, dark and deep’. Explain.
Answer:
This line has been taken from the poem ‘Stopping by Woods on a Snowy Evening’ composed by Learned English poet Robert Frost. He was the great lover of nature. Here the poet describes the beautyness of the woods.

The poem narrates the story of a rider who was marching through the woods on a snowy evening. He was very much impressed by the beauty and loveliness of the natural objects. He stopped there for a short time to enjoy the beauties of nature.

There was no farm house anywhere nearby where the rider could spend some time. There was no shelter from the bac weeather. There were the woods on one side and the frozen lake on the other side of the road. It was the darkest scene of the woods. In this way the beauty of nature was more lovely, dark and deep. The scene was very lovely. It was the month of December. So night was very dark. The forest was very big. It was spreading upto very deep areas.

Stopping By Woods On A Snowy Evening Question Answers Question 5.
The path of life abounds in temptations of every sort, you cannot carry out your mission unless you overcome these temptations. Do you agree ? Illustrate with examples.
Answer:
The path of life abounds in temptation of every short, one cannot carry out his mission unless one over comes these temptations. That is the true fact of life. We agree to this point. Man’s life is full of temptation. Every man likes to live a glorious life. The same thing is found in the present poem “Stop ping by Woods A Snowy Evening” written by Robert Frost. The poet is charmed with the beauty of nature. He does not want to leave the woods. He wants to enjoy the happiness in nature. He has forgotten all his duties to life. But he did do not so in order to live happy and real life. A man must overcome the temptations and glories of life. Temptations and glories are not everlasting. A man must leave a real and responsible life.

Question 6.
If you have to choose between worldly pleasures and the goal of your life, what will you choose ? Why ? Give reasons.
Answer:
If I have to choose between worldly pleasures and the goal of my life. I would prefer to live a real life. Worldly pleasures are purely temporary. They are not everlasting. They do not give real pleasure of life. The real goal of life is everlasting and for well being of the masses. The real goal of life is to discharge one’s responsibilities and duties to the society.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs :

Question a.
Resolution and determination bad us to our goal but deprive us of worldly pleasures. Do you agree ? Give example in favour of your arguments.
Answer:
It we are determined to do some work we forget to enjoy the worldly pleasure. We have intoxication to achieve our goal nothing else is seen before our work. Once I resolve to bring 88% marks in the matriculation examination. Though I was an average student ever then I laboured hard. Even I forget to live in proper manner or to take meal in time. I had only goal in my mind. I forget all the pleasure and entertainment. I left to see even. T.V. ultimately I achieved my goal. I secured 88% marks and got place in the merit list of B.S. S.E. Board. I topped in my school.

Question b.
Can work and pleasure go together ? Why or why not ? If yes, how ?
Answer:
Work and pleasure cannot go together. Work is a serious performance which requires devotion, seriousness and labour. Pleasure is, on the other hand, the thing of relaxation. A man forgets every pain and problem at the moment of pleasure. The achievement of goal after serious and hard labour gives pleasure to a dedicated man. None of the worldly pleasure can be so much pleasure some for a dedicated man.

C. 3. Composition :

Expand the ideas contained in the following in about 100 words.

(a) Work is worship
(b) The world is too much with us.
Answer:
(a) ‘Work is worship is a famous saying. It is also truth. Without work worship has no meaning. If you only worship to pan the examination without reading according to the syllabus, you cannot in fair way. The truit of labour is sweet. Only worship without accompanied with work is futile. If one works hard and also prays to God for right direction and success in the work it will bad you to a grand success.

In Bhagwad Geeta also Lord Shree Krishna has advocated in favour of work. He says that dedicated work without desire of its fruit leads a man to solution and brings him to. Him (Lord Krishna). So to pay attention to our duty should be our first mission. If we spare time to worship after performing our duty it is much better in our life because work and worship both go together option becomes meaningless.

(b) We are worldly being. We live with the worldly material. In life there is too much importance of the worldly thing. At every step of life the world is with us. We require bread, cloth and sheltre as our basic requirement of life. These things cannot be fulfilled without the help of worldly being. One man can do nothing. If he is kept out from the worldly co-operation, he will be bound to spend his life like an animal. World provides us essential things for our survival, it provides us a society in which our requirements are fulfilled. We get education and get a job to maintain our life in good manner.

One man can do one work. If he is an agriculturist he requires plough to cultivate the field which is made with the help of a carpenter and a blacks with. He require spade. It is also made with the help of both of them. He also requires the help of bulls and many hands. All these things are provided by the world So, the world is the inseparable part of our life.

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Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 8 चिंतन

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 8 चिंतन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 8 चिंतन

Bihar Board Class 11 Psychology चिंतन Text Book Questions and Answers

चिंतन के सिद्धांत Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
चिंतन के स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सम्पूर्ण प्राणी जगत में मानव ही एक ऐसा जीवधारी है जिसमें सोचने, निर्णय लेने तथा तर्क करने की विशिष्ट क्षमता होती है। चिंतन प्रतीकात्मक स्वरूप की विचारात्मक प्रक्रिया होती है, जो सभी संज्ञानात्मक गतिविधियों या प्रतिक्रियाओं का आधार होता है। चिंतन में वातावरण से प्राप्त सूचनाओं का प्रहस्तन एवं विश्लेषण सम्मिलित होती है।

किसी शिल्पकार की कृति को सामने पाकर कोई व्यक्ति उसके रंग-रूप, स्वरूप, चमक और चिकनापन के अतिरिक्त कला में सन्निहित भाव एवं उद्देश्य को भी समझना चाहता है। कला के सम्बन्ध में मनन करने के उपरान्त उस व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि होती है। अपने परिवेश की परख से उत्पन्न अनुभूति या संवदेना तथा प्राप्त होनेवाले अनुभव को मानवीय चिंतन का परिणाम माना जाता है। अत: कहा जा सकता है कि चिंतन एक उच्चतर मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम अर्जित अथवा वर्तमान सूचना का प्रहस्तन एवं विश्लेषण करते हैं।

चिंतन को व्यावहारिक स्वरूप देने के क्रम में हमें प्रस्तुत करने, कल्पना करने, तर्क देने तथा किसी समस्या के लिए सही समाधान करने की योग्यता में वृद्धि होती है। हम किसी कार्य को करके वांछित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए योजना बनाते हैं अथवा पूर्व करने का प्रयोग करते हैं। कार्य के सफल सम्पादन में रचना-कौशल का सक्रिय योगदान होता है। अत: चिंतन को प्रायः संगठित और लक्ष्य निर्देशित माना जाता है। ताश अथवा शतरंज का खिलाड़ी खेल में जीत पाने के लिए सदा सोच-सोच कर आगे बढ़ता है।

वह प्रत्येक चाल के लिए संभावित परिणाम या प्रतिक्रिया का सही अनुमान लगाना चाहता है। वह अपनी सोच में नयापन लाकर लगाई गई युक्तियों का मूल्यांकन करना चाहता है। अतः चिंतन को एक मानसिक क्रिया कह सकते हैं। ऊपर वर्णित तथ्यों के आधार पर चिंतन का स्वरूप मानसिक प्रक्रिया, लक्ष्य निर्देशन, संज्ञानात्मक गतिविधियों का आधार, ज्ञान का उपयोग एवं विश्लेषण, कल्पना, तर्क जैसे पदों के समूह के द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।

चिंतन का अर्थ Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
संप्रत्यय क्या है? चिंतन प्रक्रिया में संप्रत्यय की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संप्रत्यय-ज्ञान-परिधान की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई संप्रत्यय है। संप्रत्यय उन वस्तुओं एवं घटनाओं के मानसिक संवर्ग हैं जो कई प्रकार से एक-दूसरे के समान हैं। अर्थात् संप्रत्यय निर्माण हमें अपने ज्ञान को व्यवस्थित या संगठित करने में सहायता करता है।

चिंतन प्रक्रिया में संप्रत्यय की भूमिका:
चिंतन हमारे पूर्व अर्जित ज्ञान पर निर्भर करता है। जब हम एक परिचित अथवा अपरिचित वस्तु या घटना को देखते हैं तो उनके लक्षणों को पूर्व ज्ञान से जोड़कर उन्हें जानना-पहचानना चाहते हैं। यही कारण है कि हमें सेब को फल कहने में कुत्ता को जानवर मानने में, औरत को दया की प्रतिमा कहने में कोई कठिनाई या झिझक नहीं होती है। संप्रत्यय एक संवर्ग का मानस चित्रण है। यह एक समान या उभयनिष्ठ विशेषता रखने वाली वस्तु, विचार या घटना को वर्गीकृत करने में हमारी मदद करता है।

संप्रत्यय के कारण व्यवस्थित एवं संगठित ज्ञान के द्वारा हम अपने ज्ञान का उपयोग ऐच्छिक तौर पर करके कम समय और प्रयास के बल पर अच्छे परिणाम पा लेते हैं। छिपे सामानों को खोजने में संप्रत्यय हमारी मदद करता है। संप्रत्यय के सहयोग से हम अपने ज्ञान और अनुभव को अधिक उपयोगी और दक्ष बना पाते हैं। संप्रत्यय का निर्माण हमें श्रम और समय संबंधी सुविधा प्रदान करता है। अत: चिंतन प्रक्रिया में संप्रत्यय की भूमिका सहयोगी मित्र तथा तकनीकी साधनों के अनुरूप होती है, जो श्रम, ज्ञान, प्रयास तथा समय संबंधी प्रक्रियाओं में अपनी उत्कृष्ट व्यवस्था जैसे गुणों के कारण जिज्ञासु समस्याओं का सही समाधान कम समये में उपलब्ध करा देता है।

चिंतन का महत्व Bihar Board Class 11 प्रश्न 3.
समस्या समाधान की बाधाओं की पहचान कीजिए। अथवा, समस्या समाधान से क्या तात्पर्य है? इसके अवरोधों को वर्णन करें।
उत्तर:
कोई व्यक्ति समस्या समाधान के लिए समस्या की पहचान के साथ-साथ लक्ष्य, कार्य-विधि एवं निरीक्षण को भी महत्त्व देता है। यह भी ज्ञात है कि मानसिक विन्यास को ही समस्या समाधान की सर्वोत्तम प्रवृत्ति मानता है। लेकिन कभी-कभी यह प्रवृति मानसिक दृढ़ता को जिद्द के रूप में बदलकर नए नियमों या युक्तियों के पता लगाने का अवसर ही नहीं देता है। जैसे 5 कलमों का मूल्य 20 रु. जानकर एक कलम का मूल्य जानने के लिए 20 में 5 से भाग देकर उसका पता लगाता है।

किन्तु जब उसे कहा जाता है 5 मजदूर एक गड्ढा को 20 दिनों में खोद सकते हैं तो 1 मजदूर को गड्ढा खोदने में कितना समय लगेगा। उत्तर के लिए यदि पुनः 2015 की क्रिया करके तो 4 दिन के रूप में परिणाम मिलेगा जो बिल्कुल अस्वाभाविक है। इस तरह ज्ञात नियमों में आवश्यक संशोधन किये बिना प्रयोग में लाना गलत परिणाम का कारण बन जाता है। अर्थात् किसी पूर्व ज्ञान के प्रयोग सम्बन्धी हठधर्मिता समस्या समाधान में अवरोधक सिद्ध होता है। समस्या समाधान में प्रकार्यात्मक स्थिरता को अपनाने वाला समाधान प्राप्त करने में विफल हो जाता है।

रेडियो बजाने की विधि का प्रयोग यदि हारमोनियम बजाने में किया जाएगा तो पूर्व अर्जित ज्ञान समाधान पाने में विफल रह जाएगा। किसी विशिष्ट समस्या के समाधान करने में कुशल व्यक्ति भी अभिप्रेरणा के अभाव में अपनी दक्षता एवं योग्यता का सही लाभ उठा नहीं पाता है। कभी ऐसा भी होता काम प्रारम्भ करने के तुरन्त बाद ही कर्ता अपने को असहाय मानकर काम करना छोड़ देता है। यह संदिग्ध सोच समस्या समाधान का बाधक बन जाता है।

सारांशतः माना जा सकता है कि समस्या समाधान के लिए मानसिक विन्यास, कार्यात्मक स्थिरता, अधिप्रेरणा का अभाव तथा दृढ़ता प्रमुख अवरोधक माने जाते हैं। कोई भी कर्ता समस्या समाधान के क्रम में उचित परिणाम का अभाव पाते ही अवरोध के रूप में प्रयुक्त साधनों या विधियों को अवरोधक मान लेता है। अतः समस्या समाधान के दो प्रमुख अवरोधक के रूप में मानसिक विन्यास तथा अभिप्रेरणा का अभाव अपनी पहचान गलत परिणाम के कारण पहचान लिये जाते हैं।

चिन्तन का अर्थ Bihar Board Class 11 प्रश्न 4.
समस्या समाधान में तर्कना किस प्रकार सहायक होती है?
उत्तर:
किसी के घर में आग की लपेटों को देखकर बहू का जलाया जाना सदा सत्य नहीं होता है। आग की लपटें कई कारणों से देखी जा सकती हैं। बहू का जलाया जाना मात्र एक अनुमान है। जब हम यह जान लेते हैं कि उस घर में कोई बहू है ही नहीं तो अपने अनुमान को वहीं लुप्त कर देते हैं। समस्या के लक्षणे के आधार पर अनुमान लगाना और समस्या के सही कारणों का पता लगाना अलग-अलग बात है। हम समस्या जानकर तर्क के आधार पर परिणाम पाने का प्रयास करते हैं जिसमें तर्कना हमारा काफी सहयोग करता है।

तर्कना एक निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए सूचनाओं को एकत्रित एवं विस्तारित करने की एक प्रक्रिया है। अतः तर्कना के माध्यम से कोई व्यक्ति अपने चिन्तन को क्रमबद्ध बनाता है तथा तर्क-वितर्क के आधार पर एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचता है। इस अर्थ में तर्कना समस्या समाधान की एक सफल विधि है। तर्कना के द्वारा ही हम प्राप्त सूचनाओं को सही निष्कर्ष में रूपान्तरित कर सकते हैं। तर्कना की शुरुआत पूर्वज्ञान अथवा अनुभव पर आधारित अनुमान से होती है।

जो तर्कना एक अभिग्रह या पूर्वधारणा से प्रारम्भ होता है उसे निगमनात्मक तर्कना कहते हैं। कुछ तर्कना विशिष्ट तथ्यों एवं प्रेक्षण पर आधारित होता है, उसे आगमनात्मक तर्कना के रूप में पहचानते हैं। तर्कना हमें क्रमबद्ध अनुमानों पर सोचने-समझने का अवसर देता है और सही निष्कर्ष पाने में सहयोग देता है। आग की लपटें देखकर पहला अनुमान किया गया कि लगता है बहू जला दी गई। लेकिन जब पता चला कि घर में कोई बहू नहीं है तो पहला अनुमान प्राप्त सूचना के कारण असत्य माना गया। दूसरा अनुमान किया गया कि कोई अंगीठी जलाया होगा। सूचना मिली कि गर्मी के मौसम में कौन अंगीठी जलायेगा।

फलत: इसका अनुमान भी गलत सिद्ध हो गया। इसी प्रकार खाना बनाने, कच्चा कोयला जलाने, रद्दी कागज को नष्ट करने जैसी कल्पनाएँ की गईं लेकिन तर्क के द्वारा सबके सब अनुमान असत्य निकले। सम्बन्धित घर जाकर पता लगाया गया। सूचना प्राप्त हुई कि आतिशबाजी का खेल खेला जा रहा था। इस प्रकार असंख्य उदाहरण हैं जो इस बात के साक्षी हैं कि समस्या समाधान के लिए अनुमान को तर्क-वितर्क के द्वारा परखने के बाद ही निर्णय लिया जाना चाहिए। काले रंग से कोयला और पूर्ववत वर्ण से तर्क का माना जाना कोरी कल्पना भी हो सकती है। सही निष्कर्ष तर्कना के माध्यम से ही संभव होता है।

चिंतन का स्वरूप Bihar Board Class 11 प्रश्न 5.
क्या निर्णय लेना एवं निर्णयन अंत: संबंधित प्रक्रियाएँ हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निर्णय लेना एवं निर्णयन अंतः संबंधित प्रक्रियाएँ हैं। निर्णय लेने में ज्ञात जानकारियों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है। धारणा स्थापित किये जाते हैं और संबधित वस्तुओं और घटनाओं का मूल्यांकन किए जाते हैं। कुछ निर्णय स्वचालित भी होते हैं। तमाम संभव परिणामों के मूल्यांकन पर अंतिम निर्णय लेना उचित माना जाता है। निर्णयन में पूर्व ज्ञात विभिन्न समाधान या विकल्पों में से एक का चयन कर लिया जाता है। चयनित विकल्प कभी-कभी व्यक्तिगत स्वार्थ, समझ और रुचि पर आधारित होता है। विकल्पों में से. लागत-लाभ के आधार पर किसी एक को चयन करने की विधि प्रचलित है।

निर्णय अस्थायी तथा अस्वाभाविक भी हो सकता है। जैसे, एक सज्जन पुरुष को पहली मुलाकात में पोशाक के आधार पर हमारे होने का गलत निर्णय ले लिया जा सकता है। निर्णयन में भी. विकल्पों के चयन में गलत परामर्श के कारण गलत विकल्प को सही निष्कर्ष माना जा सकता है। अतः निर्णय लेने तथा निर्णयन समस्या समाधान के क्रम में सम्पादित की जाने वाली क्रियाएँ हैं। दोनों के पास कुछ प्रेरक विशेषताएँ होती हैं तो कुछ दोषपूर्ण स्थितियाँ भी दोनों के साथ जुड़ी रहती हैं। फिर भी, दोनों को अंत: संबंधित मानना सही निर्णय है, क्योंकि दोनों विचारों को प्राथमिकता देने या कार्यरूप में परिणत करने का साधन माना जा सकता है।

चिंतन के प्रकार Bihar Board Class 11 प्रश्न 6.
सर्जनात्मक चिंतन प्रक्रिया में अपसारी चिंतन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
दृष्य और साध्य अपनी नवीनता लिए स्वरूप के कारण दर्शनीय बन जाते हैं। तरह-तरह की आकृति, संरचना एवं उपयोगिता के साथ लोग पुराने मोबाइल सेट के बदले नया सेट लेने को उत्सुक हो जाते हैं। यह प्रवृत्ति सृजनात्मक चिंतन के कारण ही उत्पन्न होती है। निर्माता अपनी संरचना में सृजनात्मक चिन्तन का प्रयोग करके उपभोक्ताओं को कुछ नया कमाल दिखाना चाहते हैं। किसी चिंतन को तब सर्जनात्मक माना जाता है जब वास्तविकता की ओर उन्मुख उपयुक्त, रचनात्मक तथा सामाजिक रूप से वांछित हो।

सर्जनात्मकता शोध के अग्रणी जे. पी. जिलफर्ड के मतानुसार सृजनात्मक चिंतन दो प्रकार के होत हैं –

  1. अभिसारी चिंतन तथा
  2. अपसारी चिंतन

1. अभिसारी चिंतन:
अभिसारी चिंतन की आवश्यकता वैसी समस्या को हल करने में पड़ती है जिसका मात्र एक सही उत्तर होता है। जैसे-1,4,9, 16 के बाद 25 ही होगा।

2. अपसारी चिंतन:
अपसारी चिंतन को एक मुक्त चिंतन माना जाता है जिसमें किसी समस्या के समाधान हेतु कई संभावित उत्तर हो सकते हैं। जैसे-नदी से क्या लाभ है के लिए कई सही उत्तर होते हैं। अपसारी चिंतन नवीन एवं मौलिक विचारों को उत्पन्न करने में सहायक होता है। अपसारी चिंतन योग्यता के अन्तर्गत सामान्य तथा –

  • चिंतन प्रवाह
  • लचीलापन और
  • विस्तारण आते है जिन विशेषताओं के कारण अपसारी चिंतन को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

अपसारी चिंतन के महत्त्वपूर्ण कहलाने के कारण:
अपसारी चिंतन में मौलिक विचारों को प्राथमिकता दी जाती है। निम्न वर्णित विशेषताओं के कारण इसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है –

1. चिंतन प्रवाह:
किसी विशिष्ट चिंतन के कारण उत्पन्न समस्याओं के लिए अनेक विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता रहती है। कोई व्यक्ति किसी समस्या के समाधान हेतु अपनी योग्यतानुसार अन्य व्यक्तियों की तुलना में कई संभावनाओं को प्रकट कर सकता है। जैसे-बाढ़ की विभीषिका से बचने के कई उपाय सुझाये जा सकते हैं। विचारों की संख्या के बढ़ने से चिंतन प्रवाह को अधिक होना माना जायेगा।

2. लचीलापन:
किसी एक ही वस्तु, घटना या समस्या के संबंध में अलग-अलग राय प्रकट की जाती है। एक ही फिल्म के दर्शकों में से कोई संगीत को पसन्द करता है तो कोई मार-धाड़ के दृश्यों से प्रभावित होता है। अर्थात् एक ही समस्या के समाधान हेतु विविध विधियों, व्याख्याओं तथा साधनों के संबंध में चिंतन किया जा सकता है।

3. मौलिकता:
परम्परागत विचारों को सम्मान देते हुए नये विचारों की व्याख्या करना अथवा नवीन संबंधों का प्रत्यक्षण, चीचों को भिन्न परिप्रेक्ष्य में देखना आदि मौलिकता को बनाए रखने में सहायक होते हैं। चिंतन की इस विशेषता के द्वारा दुर्लभ या असाधारण विचारों को उत्पन्न किया जा सकता है। कोई व्यक्ति मौलिकता को बनाये रखते हुए जितने अधिक एवं विविध विचार प्रस्तुत करता है, उसमें उतनी ही अधिक योग्यता या क्षमता मानी जाती है।

4. विस्तरण:
अपसारी चिंतन की एक विशेषता विस्तरण भी है जो किसी व्यक्ति को नए विचार को विस्तार (पल्लवित) करने तथा उसके निहितार्थ को स्पष्टतः समझने का अवसर जुटाती है। अर्थात् अपसारी चिंतन में विविध प्रकार के ऐसे विचारों को उत्पन्न करना सुगम हो जाता है जो एक-दूसरे से संबंधित होते हैं।

जैसे, फसल की वृद्धि के लिए आवश्यक साधनों, उपायों एवं पद्धतियों के सम्बन्ध में तरह-तरह के विचारों (खाद, खरपतवार, सिंचाई) को प्रकट करने की क्षमता तथा आवश्यकता उभरकर सामने आती है। अपसारी चिंतन की महत्ता को बचाने के लिए विचारों को स्थिर एवं उपयोगी बनाकर रखना वांछनीय है। अतः अपसारी चिंतन विविध प्रकार के विचार को उत्पन्न करने के लिए अति आवश्यक है।

Pind Meaning In Hindi Bihar Board Class 11 प्रश्न 7.
सर्जनात्मक चिंतन में विभिन्न प्रकार के अवरोधक क्या हैं?
उत्तर:
सामान्य या साधारण मनुष्य भी सृजनात्मक चिंतन करके उपयोगी उपाय, विधि, नियम आदि को प्रस्तुत करने की क्षमता रखता है। व्यक्ति बदलने से अभिव्यक्ति में अंतर आ सकता है। लेकिन उन्हें प्रोत्साहन देने के साथ-साथ अवरोध मुक्त रहने की आवश्यकता होती है। सृजनात्मक चिंतन में अवरोध उत्पन्न करने वाले कारणों को कई भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

  1. आभ्यासिक
  2. प्रात्यक्षिक
  3. अभिप्रेरणात्मक
  4. संवेगात्मक तथा
  5. सांस्कृतिक

1. आभ्यासिक अवरोध:
आदतों के अधीन होकर सोचने की विधि पाने का प्रयास हानिकारक हो सकती है। पूर्व अर्जित ज्ञान के अधिक प्रचलित व्यवहार के कारण नई विधियों की आवश्यकताओं पर कोई चिंतन करना नहीं चाहता है। शीघ्रता से निष्कर्ष पाने की प्रवृत्ति, समस्याओं को नया स्वरूप देने में अरुचि, पुरानी विधि का अत्यधिक कार्य करने के सामान्य एवं घिसे-पिटे तरीके से संतुष्ट हो जाना आदि सृजनात्मक चिंतन के लिए नया रास्ता पाने में अवरोधक का काम करते हैं। हमारी पुरानी धारणाएँ एवं पुरानी कुशलता नये प्रयास के प्रति हमारी रुचि का हनन करने में सक्रिय भूमिका निभाते है।

2. प्रात्यक्षिक अवरोध:
प्रात्यक्षिक अवरोध हमें नए और मौलिक विचारों के प्रति खुला दृष्टिकोण रखने से रोकते हैं। विचारों अथवा विधियों पर प्रतिबन्ध लगाकर सृजनात्मक चिंतन पर रोक लगा दी जाती है। मवेशियों को बिना लाठी का चराना इसी तरह के प्रतिबन्ध का एक उदाहरण है।

3. अभिप्रेरणात्मक अवरोध:
किसी नये काम को पूरा करने से सक्रिय व्यक्ति बाहरी व्यक्ति के परामर्श से परेशान होकर काम करना बन्द कर देते हैं। कोई उसे गड्ढा खोदने से रोकता है, कोई माता-पिता के जानने का काम करता है। इस प्रकार उचित अभिप्रेरणा का अभाव चिंतन के लिए बाधक बन जाता है।

4. संवेगात्मक अवरोध:
किसी काम से जुड़े, व्यक्ति को असफलता की गारंटी बताकर हतोत्साह करना, हँसी का पात्र बन जाने की संभावना बताना, दुर्बल धारणा को जन्म देकर चिंतन क्षमता में कमी लाने का प्रयास है। स्वयं के प्रति नकारात्मक विचार, असमर्थता का बोध, निन्दा की चिन्ता आदि संवेगात्मक अवरोध बनकर सृजनात्मक चिंतन को विराम की स्थिति में ला देते हैं।

5. सांस्कृतिक अवरोध:
सृजनात्मक चिंतन के क्रम में पारस्परिक विधियों का अत्यधिक अनुपालन, अस्वाभाविक अपेक्षाएँ, अनुरूपता दबाव, रूढ़िवादी विचार, साधारण लोगों से भिन्न प्रतीत हो जाने का भय, यथास्थिति बनाये रखने की प्रवृत्ति, सुरक्षा का संचरण, सामाजिक दबाव, दूसरों पर अत्यधिक निर्भरता आदि के प्रभाव में पड़कर सृजनात्मक चिंतन से विमुख हो जाते हैं। अतः सृजनात्मक चिंतन के लिए स्वतंत्र रूप से आशावादी दृष्टिकोण के साथ विचार प्रकट करने की सुविधा मिलनी चाहिए।

प्रश्न 8.
सर्जनात्मक चिंतन को कैसे बढ़ाया जाता है?
उत्तर:
सर्जनात्मक चिंतन को बढ़ाने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण अभिवृत्तियों, प्रवृत्तियों तथा कौशल के प्रति सतर्कता निभाने की आवश्यकता होती है। कुछ प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं –

  1. अपने परिवेश (अनुभूतियों, दृश्यों, ध्वनियों, रचना, गुणों) के प्रति सदा सतकर्ता बरतना चाहिए तथा संवेदनशील बनकर समस्याओं, सूचनाओं, असंगतियों, कमियों, अपूर्णताओं पर जिज्ञासु नजर रखना चाहिए।
  2. विस्तृत अध्ययन, सूचना, संग्रह, आदतों में सुधार, प्रश्नोत्तर विधि से परिस्थितियाँ तथा वस्तुओं के रहस्य को जानकर अपने चिंतन का विकास किया जा सकता है।
  3. योजना, परामर्श, प्रतिक्रिया, प्रबंधन, व्यवस्था सम्बन्धी समस्याओं को चातुर्यपूर्ण तरीके से हल कर लेना चाहिए।
  4. किसी कार्य को बहुविधीय पद्धति से परीक्षण करते रहना चाहिए।
  5. बुरी आदतों, क्रोधी मित्रों, असहाय व्यक्तियों से उत्तम व्यवहार करना चाहिए।
  6. विचारों को मूल्यांकन के बाद ही सार्वजनिक कराना चाहिए।
  7. विचार-प्रवाह के लचीलेपन को कायम रखना चाहिए।
  8. शान्त चित्त से स्वतंत्र अवस्था में रहकर चिंतन करना चाहिए।
  9. विचारों में नए संयोजन को विकसित करना चाहिए।
  10. अभ्यास एवं उपयोग के प्रति निरन्तरता और सावधानी बनाए रखना चाहिए।
  11. जीवन में साहित्य एवं भाषा ज्ञान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  12. सूचनाओं का भंडार बनाकर उपयोगी सूचनाओं के सम्बन्ध में ही चिंतन करना चाहिए।
  13. अपने विचार को उद्भावित होने का अवसर देना चाहिए।
  14. सदा असफलता से सामंजस्य स्थापित करके चिंतन करना चाहिए।
  15. कारणों और परिणामों को परिस्थितियों से जोड़कर पहचानना चाहिए।
  16. समस्या से जुड़े भय या संकट से मुक्ति का सर्वमान्य तरीका अपनाना चाहिए।
  17. आत्मविश्वासी, धैर्यवान, शांत प्रकृति वाला एक योग्य चिंतक बनकर नित्य अभ्यास और चिंतन में लगा रहना चाहिए।

प्रश्न 9.
क्या चिंतन भाषा के बिना होता है? परिचर्चा कीजिए।
उत्तर:
भाषा के अभाव में चिंतन लगभग असंभव ही होता है, क्योंकि भाषा चिंतन सामग्री को जुटाने में सहायता करता है। भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी इच्छाओं, विचारों आदि को सामाजिक रूप से स्वीकृत मानकों के रूप में अभिव्यक्त करता है। मनुष्य की अभिव्यक्ति के लिए शब्द या भाषा का होना अतिआवश्यक है। चिंतन और भाषा के पारस्परिक संबंधों को तीन विभिन्न दृष्टिकोणों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है जो इस प्रकार हैं –

  1. विचार के निर्धारक के रूप में भाषा
  2. भाषा निर्धारक के रूप में विचार तथा
  3. भाषा एवं चिन्तन के भिन्न उद्गम

1. विचार के निर्धारक के रूप में भाषा:
हमारी चिंतन प्रक्रिया पूर्णता भाषा की समृद्धि पर निर्भर करती है। बेंजामिन ली व्हार्फ का मानना था कि भाषा विचार की अंतर्वस्तु का निर्धारण करती है। इस दृष्टिकोण को ‘भाषाई सापेक्षता प्राक्कल्पना’ के नाम से जाना जाता है। अतः व्यक्ति संभवतः क्या और किस प्रकार सोच सकता है, इसका निर्धारण उस व्यक्ति के द्वारा प्रयुक्त भाषा-भाषाई वर्गों के भाषा ‘नियतित्ववाद’ से होता है। सच तो यह है कि सभी भाषाओं में विचार की गुणवत्ता एवं महत्व का समान स्तर पाया जाना स्वाभाविक होता है। भले किसी भाषा में विचार प्रकट करना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।

2. भाषा निर्धारक के रूप में विचार:
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे का मानना था कि भाषा न केवल विचार का निर्धारण करती है, बल्कि यह इसके पहले भी उत्पन्न होती है। उसके अनुसार बच्चे संसार का आंतरिक निरूपण चिंतन के माध्यम से ही करते हैं। बच्चों में अनुकरण की स्वाभाविक वृत्ति में भाषा के प्रयोग आवश्यक नहीं होता है। बच्चों के व्यवहार में चिंतन का उपयोग संभव होता है। सही है कि चिंतन के साधनों में से भाषा भी एक साधन मात्र होता है। पियाजे का मानना था कि बच्चों को भाषा का ज्ञान दिया जा सकता है, किन्तु ज्ञान का होना भी आवश्यक होता है। भाषा को समझने के लिए विचार (चिंतन) आधारभूत एवं आवश्यक कारक (तत्व) होते हैं।

3. भाषा एवं चिन्तन के भिन्न स्वरूप:
रूसी मनोवैज्ञानिक लेल पायगोत्संकी ने बच्चों की प्रवृत्ति पर विशेष ध्यान करने के उपरान्त बतलाया था कि लगभग दो वर्ष की उम्र तक बच्चों में भाषा और विचार का विकास अलग-अलग स्तरों पर होता है। इस अवस्था में बच्चों को पूर्ववाचिक माना जाता है। बच्चे अपने हाव-भाव के द्वारा अपने विचार को प्रकट किया करते हैं। बच्चे ध्वनिरहित भाषा के माध्यम से अपने विचार को तार्किक रूप से प्रस्तुत करने की क्षमता रखते हैं। जब चिंतन का माध्यम अवाचित होता है तो विचार का उपयोग बिना भाषा के किया जा सकता है।

भाषा का उपयोग बिना चिंतन या विचार के तब किया जाता है जब भावना (खुशी, गम, दिल्लगी) को अभिव्यक्त करना होता है। क्रिया और प्रतिक्रिया एक-दूसरे में व्याप्त होती है। इस दशा में विचार एवं तार्किक भाषा को उत्पन्न करने में वाचक और श्रोता समान रूप से भागीदारी निभाते हैं। अर्थात् दो वर्षों से अधिक उम्र वाले बच्चों में संप्रत्ययात्मक चिंतन का विकास आंतरिक भाषा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, क्योंकि बड़े बच्चे अपने विचार को वाणी के माध्यम से व्यक्त करने लगता हैं।

अतः विभिन्न आयु वाले व्यक्तियों में भाषा अर्जन करने तथा अपने विचारों को व्यक्त करने का तरीका अलग-अलग होता है। भाषा के अभाव में अपनी अनुभूतियों को संप्रेषित करना बहुत ही अस्वाभाविक या कठिन कार्य माना जाता है। दूसरों के विचार को पूर्णत: समझ पाना भी भाषा के माध्यम से ही सरल होता है।

बच्चे, भाषा की जगह प्रतीकों अथवा इशारों का प्रयोग करना सीख जाते हैं। यही कारण है कि छोटे बच्चे (नवजात शिशु) तरह-तरह की ध्वनियों के माध्यम से माता-पिता को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। बच्चों के द्वारा बलबलाना या छोटे शब्दों का प्रयोग करना स्पष्ट करता है कि वे भाषा-ज्ञान की प्राप्ति एवं प्रयोग के लिए बेचैनी महसूस कर रहे हैं। प्रस्तुत परिचर्चा से स्पष्ट हो जाता है कि भाषा और चिंतन जटिल रूप से संबंधित होते हैं।

प्रश्न 10.
मनुष्य में भाषा का अर्जन किस प्रकार होता है?
उत्तर:
मनुष्य में भाषा अर्जन में प्रकृति और परिपोषण का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है। व्यवहारवादी बी. एम. स्किनर के साथ-साथ अनेक विद्वानों का मानना है कि साहचर्य, अनुकरण तथा पुनर्बलन को अपनाकर ही भाषा अर्जन का आरम्भ किया जा सकता है। सामान्य तौर पर भाषा के अर्जन के लिए भाषा में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ जानना, कथन को समझाने की क्षमता बढ़ाना, शब्दावली का निर्माण, वाक्यों की संरचना एवं आशय को पहचानना तथा शुद्ध उच्चारण की कला सीखना आदि शामिल है। दूसरे दृष्टिकोण से यह भी माना जा सकता है कि भाषा अर्जन के लिए उत्तम स्वास्थ्य, उचित बुद्धि का विकास, सामाजिक प्रथाओं अथवा नियमों का ज्ञान, आर्थिक दशायें, सम्पन्नता, परिवेश, जन्म-क्रम, आयु, यौन आदि कारकों पर भी ध्यान रखना अनिवार्य होता है।

भाषा अर्जन का आरम्भ जन्म क्रन्दन से होता है। इसके बाद विस्फोटक ध्वनियाँ, बलबलाना, हाव-भाव के साथ अस्पष्ट ध्वनि के द्वारा विचार प्रकट करना आदि पाये जाते हैं। शिशुओं की मौन अवस्था के पश्चात् एक वर्ष की उम्र में वह पहला शब्द बोलता है। दो वर्ष की उम्र तक भाषा एवं विचार का विकास अलग-अलग स्तर पर होता है।

भाषा अर्जन में अगल-बगल में उत्पन्न ध्वनियों का अनुकरण क्रमिक रूप से वांछित अनुक्रिया के समीप ले आता है। फलतः प्रभाव में आने वाला बच्चा सार्थक वाक्य के रूप में भावना को व्यक्त करना सीख लेता है। बड़े होकर मनुष्य कहानी, साहित्य, नाटक, वार्तालाप, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भाषा सम्बन्धी ज्ञान का अर्जन करता है। किसी विशिष्ट भाषा से सम्बन्धित व्याकरण का ज्ञान, शब्द-युग्मों का प्रयोग, पर्यायवाची शब्द, अलंकार आदि को जानकर कोई व्यक्ति भाषा ज्ञान को समृद्ध बनाता है।

Bihar Board Class 11 Psychology चिंतन Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रचनात्मक चिंतन में प्रमाणीकरण से क्या तात्पर्य हैं?
उत्तर:
प्रमाणीकरण से तात्पर्य समस्या के हल के लिए मिले समाधान के विश्वसनीयता एवं वैधता की जाँच से है।

प्रश्न 2.
चिंतन के क्षेत्र में सबसे पराना सिद्धान्त कौन है?
उत्तर:
चिंतन के क्षेत्र में सबसे पुराना सिद्धान्त केन्द्रीय सिद्धान्त है।

प्रश्न 3.
चिंतन के केन्द्रीय सिद्धान्त के विरोध में किस सिद्धान्त का विकास हुआ है।
उत्तर:
चिंतन के केन्द्रीय सिद्धान्त के विरोध में परिधीय सिद्धान्त का विकास हुआ है।

प्रश्न 4.
चिंतन को किसने संवेदनाजन्य माना है?
उत्तर:
विलहेल्स बुण्ट ने चिंतन को संवेदनाजन्य माना है।

प्रश्न 5.
चिंतन की प्रक्रिया में किसने प्रतिमा को आवश्यक माना है?
उत्तर:
बुण्ट, टिचनर, बर्कले आदि मनोवैज्ञानिकों ने चिंतन की प्रक्रिया में प्रतिमा को आवश्यक माना है।

प्रश्न 6.
किसने कहा कि चिंतन में प्रयास एवं भूल की प्रक्रिया होती है?
उत्तर:
थॉर्नडाइक ने कहा है कि चिंतन में प्रयास एवं भूल की प्रक्रिया होती है।

प्रश्न 7.
किसने चिंतन को विचारात्मक स्वरूप की प्रतीकात्मक प्रक्रिया कहा है?
उत्तर:
बारेन ने चिंतन को विचारात्मक स्वरूप की प्रतिकात्मक प्रक्रिया कहा है।

प्रश्न 8.
चिंतन में भाषा के महत्त्व को किसने स्वीकार किया है?
उत्तर:
जे. बी. वाटसन ने चिंतन में भाषा के महत्त्व को स्वीकार किया है।

प्रश्न 9.
किस मनोवैज्ञानिक ने चिंतन के लिए भाषा को आवश्यक नहीं माना है?
उत्तर:
ब्राउन ने चिंतन के लिए भाषा को आवश्यक नहीं माना है।

प्रश्न 10.
व्यक्ति के चिंतन में कौन-कौन तत्व शामिल होते हैं?
उत्तर:
व्यक्ति के चिंतन में प्रयत्न एवं भूल, पूर्व दृष्टि, अन्तर्दृष्टि, पश्चात् आदि तत्व होते हैं।

प्रश्न 11.
बच्चों में चिंतन की क्रिया किस काल में प्रारम्भ होती है?
उत्तर:
बच्चों में चिंतन की प्रक्रिया बाल्यकाल में प्रारम्भ होती है।

प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिकों ने किस प्रकार के चिंतन को प्रतिमाहीन चिंतन कहा है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने अमूर्त चिंतन को प्रतिमाहीन चिंतन कहा है।

प्रश्न 13.
रचनात्मक चिंतन की सबसे पहली अवस्था क्या है?
उत्तर:
रचनात्मक चिंतन की सबसे पहली अवस्था तथ्यों का संग्रह है।

प्रश्न 14.
रचनात्मक चिंतन की सबसे अन्तिम अवस्था क्या है?
उत्तर:
रचनात्मक चिंतन की सबसे अन्तिम अवस्था गर्भीकरण की जाँच है।

प्रश्न 15.
चिंतन को दिशा देने में महत्त्वपूर्ण योगदान कौन करता है?
उत्तर:
चिंतन को दिशा देने का काम तत्परता करता है।

प्रश्न 16.
तार्किक चिंतन की क्या धारणा है?
उत्तर:
तार्किक चिंतन को चिन्तन का तीसरा रूप माना जाता है। तार्किक चिन्तन की कल्पना उस चिन्तन से है जो तर्कशास्त्र के नियमों पर आधारित है। चिन्तन यदि निगमन होता है तो वह तार्किक चिन्तन कहलाता है।

प्रश्न 17.
रचनात्मक चिन्तन की समुचित परिभाषा दें।
उत्तर:
रचनात्मक चिन्तन की समुचित परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है – रचनात्मक चिन्तन एक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें किसी समस्या को नये ढंग से हल करने के लिये व्यक्ति में नये विचार और नयी अनुक्रिया की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार के चिन्तन के माध्यम से व्यक्ति रचनात्मक कार्यों को करता है।

प्रश्न 18.
चिन्तन क्या है?
उत्तर:
मनोविज्ञान के अनुसार किसी भी समस्या के समाधान के लिए सोचने की प्रक्रिया चिन्तन कहलाती है।

प्रश्न 19.
चिन्तन की धारणा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
चिन्तन की धारणा एक ऐसी जटिल मानसिक प्रक्रिया है जो किसी समस्या के उपस्थित होने पर सोचने की क्रिया शुरू होती है। प्राणी या जीव के सोचने की प्रक्रिया की धारणा ही चिन्तन है। समस्या के समाधान होने पर चिन्तन की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 20.
चिन्तन की समुचित परिभाषा क्या है?
उत्तर:
चिन्तन एक विचारात्मक प्रक्रिया है जो प्रतीकात्मक स्वरूप का होता है और जिसका प्रारम्भ व्यक्ति के सामने उपस्थित किसी समस्या से होता है। इसमें व्यक्ति की समस्या एवं मानसिक वृत्ति से संबंद्ध प्रयल और भूल की क्रिया देखी जाती है और अंत में समस्या का समाधान हो जाता है।

प्रश्न 21.
चिंतन किस प्रकार की प्रक्रिया है?
उत्तर:
चिंतन प्रतीकात्मक स्वरूप की विचारात्मक प्रक्रिया है।

प्रश्न 22.
चिंतन की समस्या का समाधान किस प्रकार होता है?
उत्तर:
चिंतन में समस्या का समाधान प्रयत्न एवं भूल के आधार पर होता है।

प्रश्न 23.
चिंतन में कौन-कौन प्रक्रियाएँ संलग्न होती हैं?
उत्तर:
चिंतन में सबसे पहली प्रक्रिया है समस्या का उपस्थित होना, उसके बाद विभिन्न विचारों का आना, प्रयत्न एवं भूल का होना, सक्रिय रहना, आंतरिक संभाषण होना तथा समस्या समाधान के साथ चिन्तन क्रिया सम्पन्न होती है।

प्रश्न 24.
चिंतन में प्रयत्न एवं भूल क्या है?
उत्तर:
चिंतन के समय व्यक्ति समस्या से सम्बन्धित विभिन्न विचारों को समस्या के निदान के लिए लागू करता है। यदि वह एक विचार से समाधान नहीं कर पाता तो दूसरे विचार की सहायता लेता है। यह क्रम तबतक चलता है जबतक समस्या का समाधान नहीं हो जाता है।

प्रश्न 25.
चिंतन में आंतरिक संभाषण क्या है?
उत्तर:
चिंतन की प्रक्रिया में व्यक्ति मन-ही-मन भाषा एवं प्रतिमा का प्रयोग करता है। उसके कण्ठ में गतियाँ होती हैं। यही आंतरिक संभाषण है।

प्रश्न 26.
रचनात्मक एवं सृजनात्मक चिंतन क्या है?
उत्तर:
रचनात्मक चिंतन एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिससे किसी समस्या को नए ढंग से हल करने के लिए व्यक्ति में नये विचार या नयी अनुक्रिया की उत्पत्ति होती है।

प्रश्न 27.
चिंतन में तत्परता से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तत्परता का अर्थ किसी कार्य विशेष या अनुभव के प्रति प्रारम्भिक आयोजन या तैयारी है।

प्रश्न 28.
चिंतन में उद्भवन या गर्भीकरण की अवस्था क्या है?
उत्तर:
चिंतन में उद्भवन एक विश्राम की अवस्था है। जब व्यक्ति को समाधान नहीं मिलता है तो वह निष्क्रय हो जाता है और समस्या के हल की दिशा में प्रयास करना छोड़ कर किसी अन्य कार्य में लग जाता है।

प्रश्न 29.
रचनात्मक चिंतन में स्फुरण क्या है?
उत्तर:
स्फुरण से तात्पर्य अचानक सफलता से है। यह उद्भवन के तुरन्त बाद होता है। यह व्यक्ति को समस्या का समाधान करने के लिए समर्थ बनाता है।

प्रश्न 30.
समस्या समाधान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समस्या समाधान वह प्रक्रिया है जिसमें प्राथमिक ज्ञानात्मक परिस्थितियों से प्रारम्भ होकर इच्छित लक्ष्य तक पहुँचना अपेक्षित रहता है। समस्या समाधान चिन्तन का एक विशिष्ट रूप है। इसमें मनुष्य चिन्तन करके प्रस्तुत समस्या का समाधान करता है।

प्रश्न 31.
सम्प्रत्यय क्या है?
उत्तर:
सम्प्रत्यय व्यक्ति के मानसिक संगठन में एक प्रकार का चयनात्मक तंत्र है जो पूर्व अनुभूतियों तथा वर्तमान उत्तेजना में एक संबंध स्थापित करता है।

प्रश्न 32.
किस मनोवैज्ञानिक ने भाषा को आन्तरिक रूप में चिंतन कहा है?
उत्तर:
वाटसन ने भाषा को आन्तरिक रूप में चिंतन माना है।

प्रश्न 33.
निर्णय और निर्णयन में अन्तर बतायें।
उत्तर:
निर्णय तमाम संभव परिणामों के मूल्यांकन पर आधारित होती है जबकि निर्णयन में पूर्व ज्ञात विकल्पों में से सही विकल्प का चयन करना होता है।

प्रश्न 34.
वनस्पतिशास्त्री ए. डी. कार्ब को क्यों और कहाँ ऊर्जा पुरस्कार मिला था।
उत्तर:
डॉ. कार्ब को धुआँ रहित चूल्हा बनाने के लिए यू. के. का सर्वोच्च ऊर्जा पुरस्कार दिया गया था।

प्रश्न 35.
आशिष पवार का नाम क्यों प्रसिद्ध हुआ?
उत्तर:
आशिष पवार ने ग्लासगो में आयोजित प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय रोबोटिक ओलम्पियाड में एक पाँच फुट ऊँचा यंत्र मानव (रोबोट) को प्रस्तुत किया था।

प्रश्न 36.
अभिसारी और अपसारी नामक दो रूप किसके हैं?
उत्तर:
जे. पी. गिलफर्ड ने चिंतन को दो रूपों में प्रास्तावित किया था –

  1. अभिसारी और
  2. अपसारी चिंतन।

प्रश्न 37.
अपसारी चिन्तन में सन्निहित प्रमुख तत्व क्या हैं?
उत्तर:
अपसारी चिंतन योग्यताओं के अन्तर्गत सामान्य तथा चिंतन प्रवाह, लचीलापन, मौलिकता एवं विस्तरण आते हैं।

प्रश्न 38.
अपसारी चिंतन से संबंद्ध पाँच विषयों का चुनाव करें जो वैविध्यपूर्ण चिंतन करने योग्य हों।
उत्तर:

  1. यायायात व्यवस्था
  2. भ्रष्टाचार
  3. अशिक्षा
  4. गरीबी तथा
  5. भ्रूण-हत्या

प्रश्न 39.
भाषा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी इच्छाओं, विचारों आदि को एक सामाजिक रूप से स्वीकृत मानकों के रूप में अभिव्यक्त करता है।

प्रश्न 40.
भाषा का क्या महत्व है?
उत्तर:
भाषा मानव संस्कृति की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। भाषा के बिना किसी संस्कृति का अस्तित्व और कार्य नहीं हो सकता है। भाषा के द्वारा मनुष्य अपने संचित ज्ञान को दूसरे मनुष्य तक पहुंचाता है।

प्रश्न 41.
भाषा विकास की कौन-कौन अवस्थाएँ हैं?
उत्तर:
भाषा विकास की अवस्थाओं में दूसरों की भाषा को समझना, शब्दावली का निर्माण, शब्दों द्वारा वाक्यों का गठन, उच्चारण आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 42.
भाषा पर किस तत्व का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
मानव के भाषा विकास पर स्वास्थ्य, बुद्धि, सामाजिक, आर्थिक स्थिति, जन्म-क्रम यौन, उम्र आदि कारकों का प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 43.
नवजात शिशुओं का पहला उच्चारण क्या होता है?
उत्तर:
नवजात शिशुओं द्वारा पहला उच्चारण जन्म-क्रंदन होता है।

प्रश्न 44.
चिंतन का स्वरूप क्या है?
उत्तर:
चिन्तन प्रायः संगठित और लक्ष्य निर्धारित होता है।

प्रश्न 45.
चिंतन के आधारभूत तत्व किसे कहते हैं?
उत्तर:
चिन्तन मानसिक प्रतिमा या शब्द और लक्ष्य प्राप्ति के क्रम में पूर्वज्ञान पर आधारित होता हैं।

प्रश्न 46.
मानसिक प्रतिमा किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानसिक प्रतिमा वैदी अनुभवों का एक मानस चित्रण है।

प्रश्न 47.
मानचित्र में स्थानों का निर्धारण किस आधार पर किया जाता है?
उत्तर:
मस्तिष्क में बने सम्पूर्ण स्थिति की प्रतिमा के आधार पर मानचित्र में स्थानों को न्हित करना संभव होता है।

प्रश्न 48.
संप्रत्यय किस कारण सहायक माना जाता है?
उत्तर:
संप्रत्यय अर्जित ज्ञान को व्यवस्थित या संगठित करने में सहायता करता है।

प्रश्न 49.
संप्रत्यय की व्यावहारिक प्रकृति कैसी होती है?
उत्तर:
अधिकांश संप्रत्यय जिनका उपयोग चिंतन में किया जाता है वे न तो स्पष्ट होते हैं और न ही असंदिग्ध।

प्रश्न 50.
संप्रत्यय निर्माण की आवश्यकता हमें क्यों पड़ती है?
उत्तर:
संप्रत्यय निर्माण हमें व्यवस्थित विचारक के द्वारा एच्छिक तौर पर ज्ञान का प्रयोग करने का अवसर जुटाता है।

प्रश्न 51.
चिंतन के तरीके को प्रभावित करने वाले कारक क्या हैं?
उत्तर:
चिंतन करने के तरीके को विश्वास, मूल्य एवं सामाजिक प्रचलन प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 52.
समग्र चिंतन किसे कहते हैं?
उत्तर:
एशियाई लोग वस्तु एवं पृष्ठभूमि के संबंध के बारे में अधिक सोचते हैं जिसे समग्र चिंतन कहा जाता है।

प्रश्न 53.
चिंतन के आधार के रूप में किसका उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
मानसिक प्रतिमाओं एवं संप्रत्ययों का उपयोग चिंतन के आधार के रूप में होता है।

प्रश्न 54.
समस्या समाधान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
समस्या समाधान ऐसा चिंतन है जो लक्ष्य निर्दिष्ट होता है।

प्रश्न 55.
समस्या का लक्षण क्या होता है?
उत्तर:
समस्या हमेशा व्यक्ति द्वारा सामना किए जाने वाले अवरोध या बाधा के रूप में नहीं आती है। यह एक निश्चित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संपादित कोई सरल कार्य भी हो सकता है।

प्रश्न 56.
समस्या समाधान में अवरोध क्या है?
उत्तर:
समस्या समाधान में मानसिक विन्यास तथा अभिप्रेरणा का अभाव दो प्रमुख अवरो है।

प्रश्न 57.
प्रकार्यात्मक स्थिरता कब उत्पन्न होती है?
उत्तर:
समस्या समाधान में क्रियाशील व्यक्ति जब समाधान पाने में स्वयं को अयोग्य तथा असहाय मान लेता है तो वह काम समाप्त होने के पहले ही काम करना बन्द कर देता है। काम होने की क्रिया में आने वाली स्थिरता को प्रकार्यात्मक स्थिरता कहते हैं।

प्रश्न 58.
तर्कना के दो रूप क्या-क्या हैं?
उत्तर:

  1. निगमनात्मक तर्कना तथा
  2. आगमनात्मक तर्कना।

प्रश्न 59.
तर्कना के किस रूप पर ज्यादा भरोसा किया जाता है?
उत्तर:
वैज्ञानिक तर्कना की अधिकांश स्थितियाँ आगमनात्मक होती हैं। विचारों में उत्पन्न सम या द्वन्द्व को हटाकर व्यक्ति को सक्रिय बनाने का काम भी आगमनात्मक तर्कना से ही संभव होता है।

प्रश्न 60.
बच्चों के भाषा विकास का सबसे पहला स्तर क्या है?
उत्तर:
बच्चों के भाषा विकास का सबसे पहला स्तर भाषा बोध की अवस्था है।

प्रश्न 61.
बच्चों में प्रथम शब्द का उच्चारण किस उम्र में होता है?
उत्तर:
बच्चों में प्रथम शब्द का उच्चारण लगभग एक वर्ष की उम्र में होता है।

प्रश्न 62.
सार्थक भाषा व्यवहार से पूर्व शिशुओं में भाषा अभिव्यक्ति का मुख्य माध्यम क्या है?
उत्तर:
सार्थक भाषा व्यवहार से पूर्व शिशु हाव-भाव, संकेत एवं रुदन के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति करते हैं?

प्रश्न 63.
गुप्त भाषा का विकास कितनी उम्र में होता है?
उत्तर:
गुप्त भाषा का विकास आठ साल से पंद्रह साल की उम्र में होता है। गुप्त भाषा का प्रयोग बच्चों से ज्यादा बच्चियाँ करती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चिंतन में समस्या समाधान की प्रक्रिया का उल्लेख करें।
उत्तर:
चिंतन का प्रारंभ किसी समस्या के साथ ही होता है जो समाधान तक जारी रहता है। अतः समस्या समाधान चिंतन का केन्द्र-बिन्दु है। व्यक्ति के सामने जब कोई समस्या आती है तो वह समाधान खोजने के लिए तत्पर हो जाता है। यदि समस्या आसान है तो समाधान जल्द मिलता है, परन्तु यदि समस्या जटिल होती है तो उसका समाधान अत्यन्त जटिल होता है। समस्या के समाधान के लिए व्यक्ति शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर प्रयास एवं भूल को आधार बनाता है। जब समस्या का समाधान हो जाता है तो चिंतन की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। थॉर्नडाइक ने समस्या समाधान के लिए प्रयास एवं भूल को आवश्यक माना है।

लेकिन गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिक बर्दाइमर ने समस्या समाधान के लिए अन्तर्दृष्टि को महत्त्वपूर्ण माना है। उन्होंने समस्या समाधान का आधार सूझ को माना है। उनका मानना है कि व्यक्ति के सामने जब समस्या उपस्थित होती है तो वह पहले उसका पूरी तरह से निरीक्षण करता है। यदि समस्या समाधान में सफलता नहीं मिलती है तो उसमें तनाव उत्पन्न होता है।

वह तरह-तरह से समस्या को समझने का प्रयास करता है, जिससे समस्या और समाधान के बीच सम्पर्क स्थापित होने लगता है और अचानक समस्या का समाधान मिल जाता है। स्पष्ट है कि इसमें प्रयास एवं भूल नहीं बल्कि अन्तर्दृष्टि का हाथ होता है। कोहलर एवं कोफ्का ने इस बात की पुष्टि के लिए वनमानुष पर प्रयोग किया जिसमें वनमानुष ने छड़ियों को जोड़कर केला प्राप्त कर लिया। इनके प्रयोगों से इस बात की पुष्टि होती है कि समस्या का समाधान प्रयास एवं भूल के माध्यम से नहीं बल्कि सूझ के माध्यम से होता है।

गेस्टाल्टवादियों के विरोध में व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों ने अलग विचार व्यक्त किया है। व्यवहारवादियों ने बताया कि समस्या समाधान में व्यक्ति गतअनुभूतियों का सहारा लेता है तथा प्रयत्न एवं भूल की क्रिया भी देखी जाती है। सबसे पहले उसकी क्रिया लक्ष्य की ओर निर्देशित होती है और सफलता नहीं मिलने पर दूसरे तरह से प्रयास करता है। इस प्रकार समस्या का समाधान एकाएक नहीं बल्कि क्रमिक रूप से होती है।

प्रश्न 2.
तार्किक चिंतन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तार्किकं चिंतन की संकल्पना उस चिंतन से है जो तर्कशास्त्र के नियमों पर आधारित होता है। वह चिंतन का तीसरा रूप है। इन नियमों पर आधारित चिंतन को ही तार्किक चिंतन के नाम से जाना जाता है। इसमें तर्कशास्त्र के नियमों के आधार पर चिंतन करके महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला जाता है। चिंतन यदि निगमन का होता है तो वह तार्किक चिंतन है। तर्कशास्त्र सही निष्कर्ष निकालने के नियमों या तरीकों को निर्धारित करता है।

तर्कशास्त्र में यदि न्याय वाक्य है तो उसके दो आधार वाक्य होते हैं, उन्हीं दोनों आधार वाक्यों के अनुरूप निष्कर्ष निकाले जाते हैं। तर्कशास्त्र में यदि न्याय वाक्य के लिए कुछ निश्चित नियम पहले से बने होते हैं तो उसके आधार पर सही और विश्वसनीय निष्कर्ष निकाला जा सकता है। परन्तु यदि उन नियमों का उल्लंघन कर देते हैं तो निष्कर्ष गलत हो जाता है। उदाहरण के लिए, दो आधार वाक्य को देखें-सभी मुनष्य मरणशील है, रमेश एक मनुष्य है। इन दोनों आधार वाक्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना हो तो कहा जा सकता है कि रमेश मरणशील है। परन्तु यदि आधार वाक्य ही गलत होगा तो निष्कर्ष का गलत होना स्वाभाविक है।

पहले के दार्शनिकों का ऐसा विचार था कि सभी प्रकार के चिंतन तार्किक नियमों पर ही आधारित होते हैं। लेकिन उनके विचार सही नहीं हैं। चिंतन के स्वरूप से स्पष्ट पता चलता है कि दार्शनिकों का विचार गलत था। इस बात को माना जा सकता है कि सही निष्कर्ष प्राप्त करने में तार्किक नियमों से मदद मिलती है, परन्तु सभी प्रकार की चिंतन प्रक्रिया तार्किक नियमों के आधार पर नहीं होती है कि चिंतन के लिए तार्किक नियमों को जानना आवश्यक नहीं है। परन्तु सही निष्कर्ष निकालने के लिए तार्किक नियम का सहारा लेना उचित होता है।

प्रश्न 3.
चिन्तन की परिभाषा दें।
उत्तर:
चिंतन एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है जो उच्च स्तर के प्राणियों में देखा जाता है। यह एक विचारात्मक स्वरूप की मानसिक क्रिया है, जिसकी उत्पत्ति किसी समस्याजन्य परिस्थिति में होती है। व्यक्ति उस समस्या का समाधान प्रतीकों के माध्यम से करता है। उस क्रिया में वह भाषा, प्रयत्न एवं भूल की सहायता लेता है।

चिंतन की क्रिया तबतक चलती है जबतक समस्या का समाधान नहीं हो जाता है। चिंतन की परिभाषा देते हुए कैगन एवं हैवमैन (Kagan and Haverman) ने कहा है-“प्रतिमाओं, प्रतीकों, संप्रत्ययों, नियमों एवं अन्य मध्यस्थ इकाइयों के मानसिक व्यवस्थापन को चिंतन कहा जाता है।” सिलवरमैन (Silverman) के अनुसार, “चिंतन एक ऐसी प्रक्रिया है जो उद्दीपक तथा घटनाओं के प्रतीकात्मक निरूपण के द्वारा किसी समस्या का समाधान करने में हमारी सहायक होती है।

प्रश्न 4.
सृजनात्मक या रचनात्मक चिंतन के संदर्भ में अभिसारी और वैविध्यतापूर्ण चिंतन के बीच क्या अन्तर है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने चिंतन को दो भागों में बाँटा है, जिन्हें अभिसारी और वैविध्यतापूर्ण चिंतन कहते हैं। अभिसारी चिंतन का अर्थ परम्परावादी चिंतन है। इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति पुराने ढंग से अपनी समस्या का समाधान करता है। समस्या का समाधान करते समय उसके विचार रूढिबद्ध होते हैं। मानसिक स्तर पर वह लकीर का फकीर होता है। दूसरी ओर वैविध्यतापूर्ण चिंतन का अर्थ अपरम्परावादी होता है। इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति किसी समस्या का समाधान नए ढंग से करता है। इस तरह के चिंतन का उल्लेख गिलफोर्ड (1967) ने किया है और कहा है कि वैविध्यतापूर्ण चिंतन की मुख्य दो विशेषताएँ होती हैं।

एक विशेषता यह है कि इसके माध्यम से किसी नई चीज का आविष्कार किया जाता है। न्यूटन का चिंतन वास्तव में वैविध्यतापूर्ण चिंतन था, जिसके माध्यम से उसने अपनी समस्या का समाधान करते हुए गुरुत्वाकर्षण के नियम का आविष्कार किया। यह विशेषता अभिसारी चिंतन में नहीं होती है। वैविध्यतापूर्ण चिंतन की दूसरी विशेषता यह है कि इसके माध्यम से व्यक्ति किसी पुरानी समस्या का समाधान नए ढंग से करता है। रात-दिन क्यों होते हैं, इस समस्या का समाधान किसी ने इस आधार पर किया कि इसका कारण पृथ्वी के चारों और सूर्य का गतिशील रहना है।

लेकिन बाद में इस पुरानी समस्या का समाधान किसी दूसरे व्यक्ति ने नए ढंग से किया और कहा कि रात-दिन होने का मुख्य आधार सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का चक्कर काटना है। यह विशेषता भी अभिसारी चिंतन में नहीं पायी जाती है। गिलफोर्ड के अनुसार बुद्धि तथा सृजनात्मकता के लिए अभिसारी चिंतन की तुलना में वैविध्यतापूर्ण चिंतन अधिक आवश्यक है। इनके अनुसार बुद्धि तथा वैविध्यतापूर्ण चिंतन के बीच एवं सृजनात्मक तथा वैविध्यतापूर्ण चिंतन के बीच उच्च धनात्मक सह-सम्बन्ध पाया जाता है।

प्रश्न 5.
भाषा विकास से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भाषा विकास से तात्पर्य एक ऐसी क्षमता से होता है जिसके द्वारा बच्चे अपने भावों, विचारों तथा इच्छाओं को दूसरों तक पहुंचाते हैं तथा दूसरों के भावों एवं इच्छाओं को प्राण करते हैं। बच्चे भाषा विकास के लिए कई तरह के शब्दावली (Vocabulary) विकसित करते हैं। उसके लिए उन्हें माता-पिता से पर्याप्त प्रशिक्षण भी मिलता है। भाषा विकास के लिए अन्य बातों के अलावा यह आवश्यक है कि बालक में श्रवण-शक्ति अर्थात् सुनकर भाषा समझने की शक्ति विकसित हो तथा उसमें सार्थक ढंग से ध्वनि उत्पन्न कर भाषा बोलने की पर्याप्त शक्ति हो।

प्रश्न 6.
प्राक्-भाषा अवस्था में बच्चे द्वारा दिखलाये जाने वाले हाव-भाव का महत्त्व सोदाहरण बतलाएँ।
उत्तर:
प्राक-भाषा अवस्था जो जन्म से प्रथम 15 महीनों का होता है, में बच्चे हाव-भाव द्वारा अपनी आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति करते पाये जाते हैं। हाव-भाव से तात्पर्य शरीर के अंगों द्वारा की गयी उन क्रियाओं से होता है जिसमें कुछ अर्थ निकलता है। इस अवस्था में बच्चे द्वारा किये गये कई तरह के हाव-भाव दिखलाये जाते हैं जिनका कुछ स्पष्ट अर्थ होता है।

जैसे-मुँह से दूध को बाहर आने देना का अर्थ भूखा न होना या भूख की संतुष्टि होना होता है। किसी चीज की और हाथ फैलाना का अर्थ उसे चाहना होता है। जीभ निकालना यां होंठ के सहारे चटकारा भरने का अर्थ भूख व्यक्त करना होता है। नहाने या कपड़ा पहनाने के दौरान फड़फड़ाना या काफी हिलना-डुलना, चिल्लाना का अर्थ शारीरिक क्रियाओं पर प्रतिबंध के प्रति नाराजगी व्यक्त करना आदि होता है।

प्रश्न 7.
एक से अधिक भाषा के उपयोग (Bilingualism) पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
जिस परिवार में दो प्रकार की भाषा बोली जाती है, वहाँ के बच्चों का भाषा-विकास समुचित ढंग का नहीं होता। इस संबंध में अनेक मनोवैज्ञानिकों द्वारा अध्ययन किए गए हैं। स्मिथ (Smith) ने पाया कि दो प्रकार की भाषा बोलने वाले परिवार के बच्चों का भाषा-विकास उस परिवार के बच्चों की अपेक्षा कम होता है, जहाँ एक ही भाषा बोली जाती है। थॉम्पसन ने भी स्मिथ के विचार का समर्थन किया है।

प्रश्न 8.
बलबलाना किसे कहा जाता है? उदाहरण सहित वर्णन करें।
उत्तर:
जब बच्चे की आयु तीन-चार महीने की हो जाती है तो उनका स्वतंत्र इतना अधिक परिपक्व हो जाता है कि वह पहले से अधिक ध्वनियाँ उत्पन्न करने लगता है। इस अवस्था में वह स्वर तथा व्यंजन ध्वनि को एक साथ मिलाकर बोलता है। जैसे-दा, ना, बा, पा, माँ आदि। सात-आठ महीने की आयु में वह इन ध्वनियों को तुरत-तुरत दोहराता है जो सुनने में अर्थपूर्ण लगते हैं, परंतु फिर भी उन्हें भाषा की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, क्योंकि शिशु स्वयं इसका अर्थ नहीं समझता है। जैसे-बा-बा, ना-ना, मा-मा, दा-दा आदि। इसे ही बलबलाना (babbling) कहा जाता है। 10-12 महीने के बच्चे के लिए इस तरह का बलबलाना एक खेल होता है, क्योंकि वे जितना ही बलबलाते हैं उतना ही खुश होते हैं।

प्रश्न 9.
बच्चों के साधारण शब्दावली का अर्थ उदाहरण सहित बतलायें।
उत्तर:
सामान्य शब्दावली में वैसे शब्दों को बच्चे सीखते हैं जिनका प्रयोग बालक भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में सामान्य रूप से करता है। जैसे-कुर्सी, आदमी, हँसना आदि। इस तरह के शब्दावली में बच्चे पहले संज्ञा शब्दों को, फिर क्रिया, विशेषण, क्रिया-विशेषण, संबंध बोधक तथा अन्त में सर्वनाम (pronoun) शब्दों को सीखता है। चूँकि सामान्य शब्दावली के शब्दों का प्रयोग बच्चे अधिक करते हैं, अत: बालक इन शब्दों को पहले सीखते है तथा प्रत्येक उम्र पर सामान्य शब्दावली विशिष्ट शब्दावली से बड़ा होता है।

प्रश्न 10.
बिक्रीकर्ता की नौकरी के सबसे उपयुक्त व्यक्ति का चुनाव किस आधार पर किया जायगा?
उत्तर:
बिक्रीकर्ता के प्रति चयनकर्ता निम्नलिखित धारणा बना लेता है –

  1. अमुक व्यक्ति बहुत वाचाल है।
  2. चयनित व्यक्ति लोगों से मिलना पसंद करता है तथा
  3. अभीष्ट व्यक्ति दूसरों की सरलता से सहमत कर लेता है।

प्रश्न 11.
चिंतन से सम्बंधित सांस्कृतिक अवरोधों का परिचय दें।
उत्तर:
चिंतन के अवरोधकों में सांस्कृतिक अवरोध भी चर्चित है। सांस्कृति अवरोधों का सम्बन्ध परम्परा का अत्यधिक अनुपालन, अपेक्षाएँ, अनुरूपता, दबाव तथा रूढ़ियों से है। परम्परागत संस्कार के कारण व्यक्ति जो सोचना चाहता है वह निम्न स्तरीय अधार्मिक होने के कारण विचार से बाहर कर दिये जाते हैं। दूसरों की सहायता अथवा परामर्श पर आधारित चिन्तक स्वतंत्र होकर कुछ सोच नहीं पाता है। कुछ विचारों पर सामाजिक दबाव बढ़ने से भी सांस्कृतिक अवरोध उत्पन्न हो जाते हैं। चिन्तक को स्वयं की रूढ़िवादिता उसे नये विचार की ओर जाने से रोक लेते हैं।

प्रश्न 12.
सर्जनात्मक चिंतन के विकास के लिए एक स्थिति ऐसी प्रस्तुत करें जिसमें उसे प्रोत्साहन दिया जाए तथा दूसरा जिसमें रोक लगाया जाए।
उत्तर:
अपने दिनचर्या को नियमित रखते हुए शौक, रुचि एवं व्यस्तता का पक्षधर बनकर चिंतन करना चाहिए। घर को सजाना, रद्दी वस्तुओं से सजावट का समान तैयार करना, अधूरे कार्यों को पूरा करना, कहानियों तथा पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप का अध्ययन करना जैसी प्रक्रियाओं पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। प्रथम विचार या समाधान को प्रामाणिक मानने की भूल मत करें। मूर्खतापूर्ण परामर्श पर ध्यान न दें।

प्रश्न 13.
भाषा एवं चिंतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
चिंतन और भाषा-भाषा चिंतन सामग्री को जुटाने में सहायता करती है, क्योंकि प्रत्यास्मरण में इससे आसानी होती है। जिन तथ्यों और सिद्धान्तों का शब्दों के रूप में वर्णन किया जाता है उनको याद करना आसान हो जाता है। एक समस्या को सुलझाने के सिलसिले में जो सिद्धान्त दिया जाता है तो उसी तरह की समस्या के पुनः सामने आने पर आप इस सिद्धान्त को प्रत्यास्मरण बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इसका कारण कुछ तो यह है कि सुन्दर शब्द रचना वाले वाक्यों को रटना और याद करना सरल होता है।

और, कुछ कारण यह है कि यदि किसी सिद्धन्त को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्ति करना है तो पहले उसे स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। एक विद्यार्थी व्याख्यान रटकर सभा-मंच पर बोलने के लिए चला जाता है। वह यह अनुभव नहीं करता कि वह क्या बोल रहा है और रटी हुई सामग्री को शब्दशः उगल देता है। जो मूक वाणी (Silent speech) विचार के साथ रहती है वह सार्थक वाणी होती है। विचार अर्थ के साथ संबंधित होता है, शब्दों के साथ नहीं जबकि सतर्क चिंतन के लिए शब्दों का भी बहुत महत्व हो सकता है।

चिंतन के समय में पेशियों में गतियाँ होने लगती हैं जिनको देखा या सुना नहीं जा सकता। ये गतियाँ केवल जबान की पेशियों में नहीं होतीं अपितु अन्य पेशियों में भी होती हैं। मान लिया एक प्रयोगकर्ता अपकी स्वीकृति से आपके बाहु पर विद्युत वर्ग लगा देता है जिससे आपकी पेशयों से विद्युत की अनुक्रिया की माप की जा सके। आपकी बाहु पर विद्युत वर्ग लगा देता है। जिससे आपकी पेशियों से विद्युत की अनुक्रिया की माप की जा सके।

आपकी बाहु विश्राम की स्थिति में होती है, तब वह आप से कहता है कि आप अपने दाएँ हाथ से दो बार हथौड़ा चलाने का विचार करें। यह कल्पना करने पर उपकरण (Instrument) में आपके दाएँ हाथ की पेशियों से विद्युत् आवेगों के दो विचलन दिखलाई देते हैं। बहरे, गूंगे जो चिन्ह-भाषा का उपयोग करते समय अपनी बाहु पेशियों को काम में लाते हैं, सामान्य विषयों की अपेक्षा स्वप्नावस्था में पेशियों में अधिकतर क्रिया दिखाते हैं।

प्रश्न 14.
भाषा का उपयोग किस प्रकार लाभप्रद माना जाता है?
उत्तर:
भाषा के उपयोग में संप्रेषण के सामाजिक रूप से उपयुक्त तरीकों की जानकारी रखना सम्मिलित है। किसी भाषा के शब्दकोश तथा वाक्य विन्यास का ज्ञान उसे आकर्षक, उपयोगी और कर्णप्रिय बनाता है। अनुरोध, पूछना, परामर्श देना, धन्यवाद ज्ञापन आदि से सम्बन्धित भाषान्तरण और प्रयोग शैली में अन्तर लाकर कुशल वक्ता कहला सकता है।

प्रश्न 15.
बच्चों के विशिष्ट शब्दावली का अर्थ उदाहरण सहित बतलाएँ।
उत्तर:
विशिष्ट शब्दावली में वैसे शब्द आते हैं जिन्हें बच्चे विभिन्न परिस्थितियों में खास-खास वस्तुओं या क्रियाओं के लिए प्रयोग करते हैं। विशिष्ट शब्दावली में बच्चे कई तरह के शब्दावली विकसित करते हैं, जिसमें प्रमुख हैं-रंग-संबंधी शब्दावली (लाल, हरा, पीला आदि), संख्या-संबंधी शब्दावली (दस, बीस, पचास आदि), समय-समय शब्दावली (सुबह, दोपहर, रात, जनवरी आदि), ट्रिक शब्दावली (रोटी, पानी आदि), शिष्टाचार-संबंधी शब्दावली (महाशय, धन्यवाद, नमस्ते आदि), मुद्रा-संबंधी शब्दावली (दस नया पैसा, 25 नया पैसा, पचास पैसा आदि), गँवारुबोली-संबंधी मुद्रा-संबंधी शब्दावली (चोट्टा, साला, खचड़ा, हरामी आदि) गुप्त शब्दावली आदि। इन विभिन्न तरह के शब्दावली के माध्यम से बच्चे अपनी इच्छाओं एवं आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संप्रत्यय की परिभाषा दें। संप्रत्यय का निर्माण किस तरह से होता है?
उत्तर:
संप्रत्यय चिन्तन का एक प्रमुख साधन (tool) है। जब वस्तुओं के एक समूह जिनमें समान विशेषताएं होती हैं, के प्रति व्यक्ति एक ही तरह की अनुक्रिया करता है, तो इसे ही संप्रत्यय कहा जाता है। जैसे, यदि कोई बच्चा अपने घर के कुत्ते, दोस्त के कुत्ते तथा सड़क पर के कुत्ते को देखकर ‘कुत्ता’ शब्द का प्रयोग करता है तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि बच्चे में कुत्ता का संप्रत्यय (concept) विकसित हो गया है। कुछ मनोविज्ञानियों द्वारा संप्रत्यय की दी गई परिभाषा इस प्रकार है –

हुल्स, डीज एवं इगेथ (Hulse, Deese and Egeth) के अनुसार:
“कुछ नियमों द्वारा कई गुणों का आपस में मिलना ही संप्रत्यय कहलाता है।” (A concept is a set of features connected by some rules)

भूटानी तथा उनके सहयोगियों (Bhutaini etal) के अनुसार:
“वस्तुओं या घटनाओं का वर्ग या श्रेणी जिसे एक नियम द्वारा संयोजित किया जाता है जिससे संगत विशेषताओं का उल्लेख होता है, संप्रत्यय कहलाता है।” (A concept is a category or class of objects or events grouped or combined on the basis of a rule which specifies the relevant features) यदि हम इन परिभाषाओं का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि संप्रत्यय में निम्नांकित दो महत्त्वपूर्ण तथ्य सम्मिलित होते हैं –

1. वस्तुओं या घटनाओं के गुण या विशेषताओं का समूह (Set of features of objects or events):
संप्रत्यय के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि वस्तुओं में कुछ विशेषताएँ या गुण हों। इस तरह के गुण या विशेषता के दो लक्ष्य होते हैं-पहला गुण ऐसा होना चाहिए जो समान प्रकार की वस्तुओं की समता दिखा सके तथा दूसरा गुण ऐसा होना चाहिए जो असमान वस्तुओं की विषमता (constrast) दिखलाएँ। जैसे, यदि यह कहा जा सकता है कि घास हरी है तो यहाँ हरापन (greenish) जो विशेषता है, उसमें उक्त दोनों गुण सम्मिलित है। हरापन के गुण को निश्चित रूप से हम अन्य रंगों से पृथक कर पा रहे हैं तथा यह हरापन अन्य दूसरी वस्तुओं के हरापन से भिन्न भी है।

2. नियम (Rule):
संप्रत्यय के निर्माण के लिए यह भी आवश्यक है कि वस्तु या वस्तुओं की उपलब्ध विशेषताएँ या गुण आपस में कुछ विशेष नियम द्वारा संबंधित हों। ऐसे नियम के दो सामान्य प्रकार हैं-गणितीय नियम (Algorithmic rule) तथा स्वतः शोध नियम (Heuristic rule)। गणितीय नियम वैसे नियम को कहा जाता है जिसका उपयोग करने से (feedback) के आलोक में प्रयोज्य अपने मन में जो प्राक्कल्पना विकसित करता है, उसकी संपुष्टि करता है या उसे अस्वीकृत (reject) करता है।

उपर्युक्त दोनों विधियों में चयन विधि द्वारा संप्रत्यय का निर्माण तुलनात्मक रूप से अधिक आसान होता है। विधि चाहे जो भी हो, मनोवैज्ञानिकों का सामान्य निष्कर्ष यह रहा है कि सही उदाहरण (correct examples) से प्रयोज्यों को गलत उदाहरणों (incorrect examples) की तुलना में अधिक संगत सूचनाएँ प्राप्त होती है और संप्रत्यय सीखने में उनसे तीव्रता आती है। निष्कर्ष यह है कि संप्रत्यय-निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जो कुछ नियमों द्वारा निर्धारित होती है। प्रयोगात्मक अध्ययनों से यह पता चलता है कि संप्रत्यय-निर्माण में गुणों या विशेषताओं की खोज तथा उपर्युक्त नियमों की खोज के अलावा यदि चयन विधि का उपयोग होता है तो उससे संप्रत्यय निर्माण में काफी सहूलियत होती है।

प्रश्न 2.
चिन्तन से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चिन्तन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Thinking) मनुष्य विवेकशील प्राणी है। विचारशीलता के गुण के कारण ही मनुष्य विश्व के समस्त प्राणियों में प्रगतिशील और विचारवान माना जाता है। विचार एक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें संवेदना (Sensation), प्रत्यक्षीकरण (Perception), ध्यान (Attention),स्मरण (Memory) एवं कल्पना (Imagination) का समावेश होता है।

विचार की क्रिया का प्रारम्भ व्यक्ति के सम्मुख किसी समस्या के उपस्थित होने के साथ होता है। किन्हीं समस्याओं के उपस्थिति होने पर व्यक्ति उसके समाधान के लिए विचार करना प्रारम्भ कर देता है। कभी-कभी विशेष परिस्थितियाँ ऐसी समस्या उपस्थित करती हैं, जिनके विपरीत व्यक्ति अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर सफलतापूर्वक अभियोजन करने में असमर्थ होता है।

जब व्यक्ति इन्हीं समस्याओं का समाधान करने का विचार करता है तो समाधान करने की क्रिया चिन्तन कहलाती है। इस प्रकार हम कह सकते है कि विचार अथवा चिन्तन व्यक्ति की समस्याओं का समाधान करने की मानसिक क्रिया प्रक्रिया है। इसमें व्यक्ति वस्तुओं के स्थान पर उनके प्रतीकों (Symbols) का मानसिक प्रहस्तन करता है। चिन्तन का सार तत्व का हल निकालता है, इसमें समस्याओं के समाधान के लिए प्रयत्न एवं भूल की विधि का उपयोग किया जाता है।

इसमें समस्याओं के समाधान के लिए प्रयत्न एवं भूल की विधि का उपयोग किया जाता है। आविष्कार में चिन्तन की प्रक्रिया में विश्लेषण एवं संश्लेषण दोनों प्रकार के तत्वों का समावेश किया जा सकता है। अत: यह स्पष्ट है कि चिन्तन की प्रक्रिया है जो किसी समस्या के उपस्थित होने पर उसके समाधान के लिए प्रयुक्त की जाती है। चिन्तन के अर्थ को समझने के पश्चात् इसके लिए प्रस्तुत की गई विभिन्न परिभाषाओं का अवलोकन करना भी आवश्यक है। ‘चिन्तन’ की मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

1. वारेन की परिभाषा:
वारेन के अनुसार, “विचार किसी व्यक्ति के सम्मुख उपस्थित समस्या के समाधान के लिए निर्णायक प्रवृत्ति है जो कुछ अंशों में प्रयत्न एवं भूल से असंयुक्त प्रतीकात्मक स्वरूप की प्रत्ययात्मक प्रक्रिया है।”

2. कौलिन्स एवं ड्रेवर (Collins and Drever) की परिभाषा:
“विचार को जीव के वातारण के प्रति चैतन्य समायोजन कहा जाता है।” इस प्रकार विचार समस्त. मानसिक स्तर पर हो सकता है, जैसे प्रत्यक्षानुभव एवं प्रत्ययानुभव।

3. डीवी (Dewey) के अनुसार:
“विचार या चिन्तन क्रियाशील, यत्नशील और सावध नीपूर्वक की गई समस्या की विवेचना है जिसके द्वारा उपस्थित समस्या का समाधान है।”

4. बी0 एन0 झा (B.N. Jha) की परिभाषा:
“विचार सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें मस्तिष्क विचार की गति का नियंत्रण एवं नियमन एक सप्रयोजित ढंग से करता है।”

5. रॉस के अनुसार:
“चिन्तन ज्ञानात्मक रूप में एक मानसिक प्रक्रिया है।”

6. वुडवर्थ (Woodworth) के अनुसार:
“चिन्तन का ढंग है जिसके द्वारा किसी बाधा पर विजय पाई जाती है।”

7. एल. मन (L. Munn) के शब्दों में:
“चिन्तन प्रत्यात्मक अनुक्रमिक जागृति है।”

चिन्तन के तत्व (Factors of Thinking):
चिन्तन की उपरोक्त परिभाषाओं के अनुसार चिन्तन की प्रक्रिया में निम्नलिखित तत्व होते हैं –

1. समस्या का उपस्थित होना:
विचार की प्रक्रिया का प्रारम्भ किसी भी समस्या की उपस्थिति से होता है। अतः चिन्तन का प्रथम तत्व ‘समस्या’ है अर्थात् चिन्तन की प्रक्रिया तभी आरम्भ होती है जब व्यक्ति के सम्मुख वातावरण से अभियोजन संबंधी कोई समस्या उपस्थित होती है।

2. समस्या समाधान हेतु अनेक विकल्प:
समस्या के उपस्थित होने पर व्यक्ति की चिन्तन प्रक्रिया प्रारम्भ होती है तथा उस समस्या के समाधान के अनेक तरीके उसके सामने आ जाते हैं जिनमें से उसे विचारपूर्वक एक का चुनाव करना होता है।

3. विकल्पों का एक लक्ष्य की ओर निर्देशन:
जब समस्या के समाधान के अनेक तरीके सम्मुख होते हैं तब व्यक्ति उन सभी तरीकों को एक लक्ष्य की ओर निर्देशित करता है। ताकि उन सबको एक ही लक्ष्य की ओर मोड़ देने से समस्या का समाधान हो सके।

4. प्रयत्न एवं भूल विधि का प्रयोग:
चिन्तन की प्रक्रिया में प्रयत्न एवं भूल विधि का प्रयोग एक महत्वपूर्ण तत्व है। समस्या समाधान करने के लिए व्यक्ति अनेक विकल्पों में से सही हल प्राप्त करने के लिए ‘प्रयत्न एवं भूल’ के कारण प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ही वह अपनी समस्या को सुलझाने के लिए अनेक प्रकार के सम्भावित साधन खोज निकालता है।

5. सम्भावित निर्णय प्राप्त करना:
चिन्तन प्रक्रिया समस्या की उपस्थिति से प्रारम्भ होती है। उसके समाधान के सम्भावित हल के निर्णय के साथ इसका समापन होता है। व्यक्ति प्रयत्न एवं भूल विधि का प्रयोग करके उसमें की गई भूलों पर मन ही मन कुछ बातचीत करता है तथा समस्या के समाधान का सम्भावित निर्णय ले लेता है।

वुडवर्थ द्वारा प्रतिपादित चिन्तन के तत्व-उपरोक्त चिन्तन के तत्वों के अतिरिक्त प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ने निम्नलिखित चिन्तन के तत्वों का उल्लेख किया है –

  • किसी उद्देश्य की ओर उन्मुख होना (Orientation towards a goal)।
  • उद्देश्य प्राप्ति के लिए इधर-उधर मार्ग खोजना (Seeking this way or that for realising the goal)।
  • पूर्व निरीक्षित किय हुए तत्वों का पुनः स्मरण करना (Recell of previously observed facts)।
  • स्मृति तथ्यों को नवीन नमूने में बाँधनी (Grouping these recalled facts in new pattern)।
  • मन ही मन बातचीत करना तथा हरकत करना (Inner speech movements and gestures)।

अतः संक्षेप में हम कह सकते हैं कि विचार एक मानसिक प्रक्रिया है, जिसमें किसी समस्या का समाधान किया जाता है। इसके मुख्य तत्व हैं समस्या की उपस्थिति, समस्या के समाधान के मार्ग खोजना, पूर्व निरीक्षित तत्वों का पुनः स्मरण, प्रयत्न एवं भूल विधि का प्रयोग तथा सम्भावित निर्णय लेना।

चिन्तन के प्रकार (Kinds of Thinking):
साधारणतः मानव-प्रयत्नों द्वारा चलने वाली मानसिक क्रिया को चिन्तन कहा जाता है। किन्तु मनोवैज्ञानिकों ने चेतना के स्तर पर होनेवाली क्रिया से भिन्न भी चिंतन की सम्भावना को माना है। उन्होंने ‘चिन्तन’ के चार प्रकार बताये, जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार है –

(i) प्रत्यक्षात्मक विचार (Perceptual Thinking):
प्रत्यक्षात्मक चिन्तन एक निम्न कोटि का चिन्तन होता है। इसमें व्यक्ति की संवेदना और प्रत्यक्षीकरण ज्ञान के काम में आते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इसमें भी पूर्व अनुभवों का उपयोग किया जाता है, क्योंकि उन्हीं के आधार पर व्यक्ति कुछ निश्चय करता है। पशुओं का चिन्तन केवल प्रत्यक्षात्मक चिन्तन तक ही सीमित होता है।

उदाहरणार्थ-एक कुत्ता रोटी पाने के लिए घर में घुसता है, किन्तु घर के स्वामी को हाथ में डण्डा लेकर आता देखकर भाग खड़ा होता है। कुत्ते के भागने के कारण उसका प्रत्यक्षात्मक चिन्तन ही है जिसमें उसका पूर्व अनुभव भी सम्मिलित होता है। उसी के आधार पर कुत्ता यह निश्चय करता है कि घर के स्वामी ने इसी प्रकार से उसके घर में घुसने पर पूर्व समय में भी डण्डा मारा था, इसलिए आज भी मारेगा और वह भाग खड़ा होता है। पशुओं के अतिरिक्त बच्चों का चिन्तन भी प्रत्यक्षात्मक होता है।

(ii) कल्पनात्मक विचार (Imaginative Thinking):
कल्पनात्मक विचार अनुभवों के द्वारा मस्तिष्क में अंकित प्रतिमाओं के आधार पर किये जाते हैं। इस प्रकार के चिंतन में प्रत्यक्ष अनुभव का अभाव रहता है। यह चिन्तन बालकों द्वारा भी किया जाता है। इस प्रकार के चिंतन में प्रत्यक्षीकरण एवं प्रत्ययों का अभाव रहता है। इसमें केवल स्मृति का ही सहयोग रहता है।

(iii) प्रत्ययात्म विचार (Conceptual Thinking):
यह विचार प्रत्ययों के सहारे चलता है। इस प्रकार के विचार में कल्पनाओं का स्थान प्रत्यय ग्रहण कर लेते हैं। पदार्थों की साक्षात् अनुभूति, विश्लेषण, वर्गीकरण तथा नामकरण द्वारा प्रत्यय का ज्ञान सम्भव होता है। इस प्रकार पुराने अनुभवों के आधार पर भविष्य पर ध्यान रखते हुए किसी निश्चय पर पहुँचना प्रत्ययात्मक चिन्तन कहलाता है।

(iv) तार्किक विचार (Logical Thinking):
किसी जटिल समस्या के उपस्थित होने पर अपने अनुभवों के आधार पर तर्क-वितर्क द्वारा समस्या का समाधान करना तार्किक चिन्तन होता है।

प्रश्न 3.
मैस्लो के आत्म-सिद्धि सिद्धांत की व्याख्या करें।
उत्तर:
मैस्लों ने मानव व्यवहार को चित्रित करने के लिए आवश्यकताओं को एक पदानुक्रम में व्यवस्थित किया है जिसे उन्होंने ‘आत्म-सिद्धि’ का सिद्धांत कहा है मैस्लो का मॉडल एक पिरामिड के रूप में संप्रत्यायित किया जा सकता है जिसमें पदानुक्रम के तल में समूह में जैविक आवश्यकताएँ है जो कि जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक है-जैसे भूख जब इन आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती हैं तभी व्यक्ति में खतरे से सुरक्षा की आवश्यकता उत्पन्न होती है इसके पश्चात दूसरों का उनसे प्रेम करना तथा उनका प्रेम प्राप्त करना आता है जब व्यक्ति इस आवश्यकता को पूरा करने में सफल हो जाता है तब हम स्वयं आत्म-सम्मान तथा दूसरे से सम्मान प्राप्त करने की ओर बढ़ते हैं।

इसके ऊपर आत्म-सिद्धि की आवश्यकता है जो एक व्यक्ति की अपनी सम्भाव्यताओं को पूर्ण रूप से विकसित करने के अभिप्रेरण में लक्षित होती है। आत्म-सिद्ध व्यक्ति आत्म-जागरूक नवीनता एवं चुनौती के प्रति मुनत होता हैं ऐसे व्यक्ति में हास्य-भावना होती है तथा गहरे अंतवैयक्ति संबंध बनाने की क्षमता होती है। पदानुक्रम में निम्न स्तर की आवश्यकताएं जब तक संतुष्ट नहीं हो जाती तब तक प्रभावी रहती हैं एकबार जब वे पर्याप्त रूप में संतुष्ट हो जाती है तब उच्च स्तर की आवश्यकताएँ व्यक्ति के ध्ययन एवं प्रयास में केन्द्रित हो जाती हैं। किंतु यह उल्लेखनीय है कि अधिकांश व्यक्ति निम्न-स्तर की आवश्यकताओं के लिए अत्यधिक सरोकार होने के कारण सर्वोच्य स्तर तक पहुंच ही नहीं पाते।

प्रश्न 4.
तर्कणा के अर्थ एवं स्वरूप का वर्णन करें।
उत्तर:
तर्कणा एक प्रकार का वास्तविक चिन्तन (realistic thinking) है। व्यक्ति तर्कणा के माध्यम से अपने चिन्तन को क्रमबद्ध (systematic) बनाता है तथा तर्क-वितर्क के आधार पर एक निश्चित निष्कर्ष पर है पहुँचता है। रेबर (Reber) ने तर्कणा के दो अर्थ बताए हैं – सामान्य अर्थ में, तर्कणा एक प्रकार का चिन्तन है जिसकी प्रक्रिया तार्किक (logical) तथा संगत (coherent) होती है। विशिष्ट अर्थ में (specifically) तर्कणा समस्या समाधान व्यवहार है जहाँ अच्छी तरह से निर्मित प्राक्कल्पनाओं की क्रमबद्ध रूप से जांच की जाती है तथा समाधान तार्किक ढंग से निगमित (deduce) किया जाता है।

रेबर के इस विचार से यह स्पष्ट हो जाता है कि तर्कणा में व्यक्ति किसी घटना या विषय के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क करते हुए एक परिणाम पर पहुँचता है। उदाहरणार्थ, मान लिया जाए कि कोई छात्र कमरे में टेबुल लैम्प की रोशनी में पढ़ रहा है। अचानक रोशनी बुझ जाती है। अब छात्र के सामने वह समस्या उठ खड़ी होती है कि रोशनी कहाँ से आए कि पढ़ाई जारी रखा जा सके। छात्र अपने मन में कई तरह के तर्क करते हुए चिन्तन कर सकता है। यह सोच सकता है कि संभवतः बिजली मीटर के बगल का फ्यूज तार (Fuse wire) जल गया हो। फिर यह सोच सकता है कि चूंकि बगल के कमरे का बल्ब जल रहा है, अत: जरूर ही लैम्प का बल्ब फ्यूज कर गया है।

अत: छात्र बल्ब की जाँच करेगा और उसके बाद यदि वह यह पाता है कि बल्ब भी ठीक है तो स्पष्टतः वह इस निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि टेबुल लैम्प का स्विच (switch) खराब हो गया है। परन्तु जब वह यह पाता है कि स्विच भी ठीक है तो इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि टेबुल लैम्प का होल्डर (holder) जिसमें बल्ब लगा है, वहीं कुछ खराबी होगी। इस उदाहरण में तर्कणा की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से झलकती है। छात्र क्रमबद्ध रूप से तर्क करते हुए एक खास परिणाम पर पहुँचता है। इससे तर्कणा के स्वरूप (nature) के बारे में हमें निम्नांकित तथ्य प्राप्त होते हैं –

  1. तर्कणा चिन्तन एक प्रक्रिया है।
  2. तर्कणा में क्रमबद्धता (systematization) पाई जाती है।
  3. तर्कणा में व्यक्ति पक्ष-विपक्ष में तर्क करते हुए एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचता है।

तर्कणा के प्रकार (Kinds of reasoning) मनोवैज्ञानिकों ने तर्कणा के निम्नांकित चार प्रकार बताए हैं –

1. निगमनात्मक तर्कणा (Deductive reasoning):
निगमनात्मक तर्कणा वैसी तर्कणा को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति पहले से ज्ञात नियमों एवं तथ्यों के आधार पर एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश करता है। इस ढंग की तर्कणा मानव एवं पशु दोनों ही द्वारा की जाती है। निगमनात्मक तर्कणा इस तरह के न्यायवाक्यों (syllogism) के आधार पर निकाले गए परिणाम में स्पष्ट रूप से झलकता है जहाँ जहाँ धुआँ होता है, आग होती है।

पहाड़ पर धुआँ है।
∴ पहाड़ पर आग है।
सभी मनुष्य मरणशील है।
∴ मोहन एक मनुष्य है।
मोहन मरणशील है।

2. आगमनात्मक तर्कणा (Inductive reasoning):
आगमनात्मक तर्कणा वैसी तर्कणा को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति दिए तथ्यों में अपनी ओर से नये तथ्य जोड़कर एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचता है। जबतक व्यक्ति इन नए तथ्यों को अपनी ओर से उसमें नहीं जोड़ता, अर्थात् इन तथ्यों का सर्जन (create) नहीं करता, समस्या का समाधान नहीं हो पाता है। रूक (Ruch) ने आगमनात्मक चिन्तन को परिभाषित करते हुए कहा है, “आगमनात्मक प्रस्तुत आंकड़ों से सीधे ज्ञात नहीं कर लिया जा सकते थे।” इस तरह की तर्कणा सर्जनात्मक चिन्तक (Creative thinkder) द्वारा अधिक प्रयोग में लाई जाती है।

3. आलोचनात्मक तर्कणा (Inductive reasoning):
इस प्रकार की तर्कणा में व्यक्ति किसी वस्तु, घटना के बारे सोचते समय या किसी समस्या का समाधान करते समय प्रत्येक उपाय के गुण एवं दोष की परख कर लेता है। यह प्रत्येक विचार (idea) की प्रभावशीलता (effectiveness) को ठीक ढंग से जाँच करके ही एक अन्तिम निर्णय लेता है। दूसरों द्वारा किसी तथ्य या विचार को दिए जाने पर भी उसे वह हू-ब-हू स्वीकार नहीं करता। उसके गुण-दोष की परख के बाद ही वह किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचता है।

4. सादृश्यवाची तर्कणा (Analogical reasoning):
इस तरह की तर्कणा में उपमा के आधार पर तर्क-वितर्क करते हुए चिन्तक किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है। जैसे, मान लिया जाय कि शिक्षक छात्र से यह प्रश्न पूछते हैं कि रानी लक्ष्मीबाई राणा प्रताप के समान एक वीरांगना कैसे थी? इस समस्या के समाधान के लिए छात्र यह सोच सकता है कि रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से हार नहीं मानी थी और ठीक उसी तरह राणा प्रताप ने भी सम्राट अकबर से हार स्वीकार करना अपने मान के खिलाफ समझा था।

सचमुच राणा प्रताप जैसे वीर पुरुष के समान ही रानी लक्ष्मीबाई भी एक मशहूर वीरांगना थी। इस तरह के चिन्तन को सादृश्यवाची तर्कणा कहा जाता है। इस तरह हम देखते हैं कि तर्कणा (reasoning) के कई प्रकार हैं शिक्षकों को चाहिए कि वे बालकों में इस ढंग से शिक्षा दें कि उनमें उपर्युक्त तरह की तर्कणा (reasoning) का स्वस्थ विकास (health development) बाल्यावस्था में ही हो जाए।

तर्कणा में महत्त्वपूर्ण कदम या सोपान (Important Steps in Reasoning):
तर्कणा (reasoning) की एक प्रमुख विशेषता यह बताई गई कि इनमें क्रमबद्धता (systematization) होती है। चिन्तक कुछ खास-खास सोपानों या चरणों से होते हुए क्रमबद्ध ढंग से किसी समस्या के समाधान के लिए चिन्तन करता है। अध्ययनों से यह पता चलता है कि तर्कणा में निम्नांकित प्रमुख सोपान (steps) होते हैं –

  • समस्या की पहचान (Recognition of problem)
  • आँकड़ों के संग्रहण (Collection of data)
  • अनुमान पर पहुँचना (Drawing inference)
  • अनुमान के अनुसार प्रयोग करना (To do experiment according to interfer ence)
  • निर्णय करना (Decision making)

प्रश्न 5.
समस्या समाधान की विधियाँ या उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:
किसी समस्या का समाधान करने के लिए व्यक्ति कई तरह की विधियों या उपायों को अपनाता है। इनमें से कुछ विधि ऐसी है जिसमें समय तो अधिक लगता है, परन्तु इससे समाधान निश्चित रूप से होता है। कुछ विधि ऐसी है जिसमें समय तो कम लगता है, परन्तु उनसे समस्या का समाधान होना निश्चित नहीं है। इस क्षेत्र में किये गए अध्ययनों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि समस्या समाधान की निम्नांकित दो विधियाँ हैं जो काफी महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. यदृच्छिक अन्वेषण विधि (radom search method or strategies)
  2. स्वतः शोध अन्वेषण विधि (beuristic search method or strategies)

स्वतः शोध अन्वेषण विधि के तहत निम्नांति तीना प्रविधियों पर सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है –

  1. साधन-साध्य विश्लेषण (means-ends analysis)
  2. पश्चगामी अन्वेषण (backward search)
  3. योजना विधि (planning stragege or methods)

इन सबों का वर्णन निम्नांकित है –

1. यदृच्छिक अन्वेषण विधि (Radom search method or strategies):
इस विधि में व्यक्ति समस्या के समाधान के लिए प्रयल एवं त्रुटि (trial and error) उपायों का सहारा लेता है। दूसरे शब्दों में, समस्या के समाधान के लिए वह एक तरह का यादृच्छिक अन्वेषण (random search) करता है जो दो प्रकार का होता है – अक्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण (unsystematic tandom search) तथा क्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण (syatematicrandom search) अक्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण में व्यक्ति समस्या के समाधान के लिए सभी तरह की संभावित अनुक्रियाओं को करता है, परंतु ऐसा करने में वह कोई निश्चित क्रम (sequence) को नहीं अपनाता है और न ही पहले किये गए प्रयासों का रेकार्ड ही रखता है।

क्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण में व्यक्ति समस्या के समाधान के लिए संभावित अनुक्रियाओं को एक क्रम में करता है तथा पहले की गई अनुक्रियाओं को रेकार्ड भी रखता है ताकि वह पहले की गलत अनुक्रियाओं को पुनः दोहरा न सके। क्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण द्वारा समस्या के समाधान में तुलनात्मक रूप से समय अधिक लगता है, परन्तु यह विधि अक्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण से अधिक प्रभावी (efficient) है।

जैसे, मान लिया जाय कि व्यक्ति को NSO वर्णविपयर्य (anagram) देकर उसके क्रम को ठीक करके सार्थक शब्दं बनाने के लिए कहा जाय, तो क्रमबद्ध अन्वेषण विधि के अनुसार वह ‘NSO’, फिर ‘ONS’ और अन्त में ‘SON’ बना लेगा और इस तरह से समस्या का समाधान कर लेगा। इससे इस बात का अंदाज लग ही जाता है कि यदि कोई लम्बा वर्णविपयर्य (anagram) जैसे सात या उससे भी अधिक अक्षरों का हो, तो क्रमबद्ध यादृच्छिक अन्वेषण द्वारा उसका समाधान करने में काफी समय लगेगा।

यादृच्छिक अन्वेषण चाहे क्रमबद्ध हो या अक्रमबद्ध हो, यह एल्गोरिथ्य (algorithm) का उदाहरण है। एल्गोरिथ्म एक ऐसी विधि है जो तुरंत या थोड़े समय के बाद किसी समस्या का समाधान पाने की गारंटी दिलाता है। एल्गोरिथ्म में समय तो थोड़ा अवश्य लगता है, परन्तु समस्या का समाधान निश्चित रूप से होता है। गुणा के नियम या कोई गणितीय सूत्र एल्गोरिथ्म के ही उदाहरण हैं जिनसे समस्या का समाधान या तो तुरंत या कुछ समय के बाद ही होता है, परन्तु होता है अवश्य।

2. स्वतः शोध अन्वेषण विधि (Heuristic search strategies or method):
इस विधि में व्यक्ति समस्या का समाधान करने के लिए सभी विकल्पों को नहीं ढूँढ़ता है बल्कि सिर्फ उन्हीं विकल्पों का चयन करके समस्या समाधान करने की कोशिश करता है जो उन्हें संगत (relevant) प्रतीत होते हैं।

रिटमैन (Reitman) के अनुसार ऐसी अन्वेषण विधि एक लघु नियम (short cut rule) के समान होती है जिससे किसी समस्या का समाधान जल्द हो जाता है। एल्गोरिथ्म की तुलना में इसमें कम समय लगता है। परन्तु जहाँ एल्गोरिथ्म में समस्या समाधान की गारंटी होती है, वहाँ स्वतः शोध विधि में समाधान की गारंटी तो नहीं होती है, परन्तु समाधान निकल आने की संभावना अधिक बनी होती है। इसके तहत आनेवाली तीन प्रविधियों का वर्णन निम्नांकित है –

1. साधन-साध्य विश्लेषण (Means-ends analysis):
साधन-साध्य विश्लेषण एक लोकप्रिय उपाय है जिसका उपयोग व्यक्ति किसी समस्या के समाधान में प्रायः करता है। इस तरह की विधि में व्यक्ति समस्या को कई छोटी-छोटी उपसमस्याओं (subproblems) में बाँट देता है। इनमें से प्रत्येक उपसमस्या का समाधान करके समस्या की मौलिक अवस्था (original state) तथा लक्ष्य अवस्था (goal state) के बीच के अंतर को कम कर दिया जाता है अर्थात् समस्या एवं समाधान की दूरी को कम कर दिया जाता है।

इस विधि की उपयोगिता कई क्षेत्रों जैसे शतरंज की समस्या समाधान में, गणितीय समस्याओं के समाधान में एवं कम्प्यूटर द्वारा किसी समस्या का समाधान करने के लिए कार्यक्रम तैयार करने में सिद्ध हो चुकी है। नीवेल एवं साईमन (Newell & Simon) द्वारा साधन-साध्य विश्लेषण का उपयोग कम्प्यूटर अनुरूपण (computer stimulation) उपागम में काफी किया गया है।

2. पश्चगामी अन्वेषण (Backward search):
वह एक ऐसा स्वतः शोध अन्वेषण (heuristic search) है जिसमें समस्या समाधान करने के ख्याल से व्यक्ति लक्ष्य अवस्था (goal sate) से अपना प्रयास प्रारंभ करता है और पश्चगामी दिशा में कार्य करते हुए प्रारंभिक मौलिक अवस्था तक आता है। इस तरह का अन्वेषण निम्नांकित दो परिस्थितियों में अधिक लाभप्रद साबित हुआ हैं –

(a) जब समस्या का स्वरूप कुछ ऐसा होता है जहाँ उसके लक्ष्य अवस्था में मौलिक अवस्था की तुलना में अधिक सूचनाएँ सम्मिलित होती हैं।
(b) जब समस्या का स्वरूप कुछ ऐसा होता है कि उसके समाधान के लिए प्रयास अग्रगामी (forward) तथा पश्चगामी (backward) दोनों ही दिशा में संभव है।

पश्चगामी अन्वेषण शैक्षिक समस्याओं एवं मनोरंजन समस्याओं के समाधानों में अक्सर किया जाता है। जैसे, मान लिया जाए कि कोई व्यक्ति मानव भूल-भुलैया (human maze) में सही पथ की खोज कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में वह लक्ष्य बिन्दु से सही पथ की ओर आगे बढ़ते हुए कुछ दूर तक आने पर वहाँ उसे छोड़कर वह फिर प्रारंभ बिन्दु से सही पथ की ओर आगे बढ़ते हुए उस बिन्दु पर आकर रुक सकता है जहाँ वह लक्ष्य बिन्दु से आगे चलते हुए आकर रुका था। इस तरह से भूल-भूलैया में सही पथ की खोज निकाल सकने में समर्थ हो पायेगा।

3. योजना विधि (Planning strategy or method):
इस विधि द्वारा समस्या के समाधान में व्यक्ति समस्या को मुख्य रूप से दो भागों में बाँट देता है-साधारण पहलू (simple aspect) तथा जटिल पहलू (complex aspect)। पहले व्यक्ति साधारण पहलू का समाधान करता है तथा जटिल पहलू को छोड़ देता है। उसके बाद वह जटिल पहलू की ओर अग्रसर होता है और फिर उसका समाधान करता है। योजना विधि का एक सामान्य प्रकार सादृश्यता (analogy) है। सादृश्यता में पहले की समस्या के समाधान को ही वर्तमान समस्या के समाधान में एक मदद के रूप में उपयोग किया जाता है।

जैसे, मान लिया जाय कि एक शिशु ने अंग्रेजी के शब्द ‘समर्थ’ का उच्चारण करना सीखा है। यदि वह बाद में ‘असमर्थ’ शब्द को कहीं देखता है तो उसे भी वह ‘समर्थ’ ही करता है। स्पष्टतः यहाँ शिशु दूसरी समस्या के समाधान में सादृश्यता (analogy) का उपयोग कर रहा है जो एक तरह की योजना विधि है। कई मनोवैज्ञानिकों ने सादृश्यता की उपयोगिता का प्रयोगात्मक अध्ययन किया है और कहा है कि सादृश्यता की योजना कुछ विशेष अवस्था में ही सफल हो पाती है। स्पष्ट है कि समस्या समाधान की कई विधियाँ हैं जिनका उपयोग करके व्यक्ति समस्या का समाधान करता है तथा समस्या की मौलिक अवस्था तथा लक्ष्य अवस्था के बीच की दूरी को कम करता है।

प्रश्न 6.
चिंतन के स्वरूप का विवेचन करें तथा चिंतन में विन्यास की भूमिका की व्याख्या करें।
उत्तर:
चिंतन का स्वरूप-चिंतन का अर्थ होता है सोचना। जब हमारे सामने कोई समस्या उत्पन्न होती है तो हम उसको हल करने के लिए सोच-विचार करने लगते हैं। किसी समस्या के बारे में सोच-विचार करने की क्रिया को ही चिंतन कहते हैं। एक चालक (Driver) की गाड़ी एकाएक रुक जाती है और गाड़ी स्टार्ट नहीं होती है तो यह घटना उसके लिए एक समस्या बन जाती है। समस्या का अर्थ है उस घटना से या परिस्थिति से जिसका कोई तात्कालिक हल उपलब्ध न हो। (“Generally speaking a problemexists when there is no available answer to some equation”) अब वह गाड़ी के बन्द होने के संभव कारणों तथा इस स्टार्ट करने के उपायों के संबंध में सोचने लगता है।

सोचने की यह क्रिया तबतक चलती है जबतक कि समस्या का समाधान नहीं हो जाता है। जैसे ही गाड़ी स्टार्ट हो जाती है इस संबंध में चालक में सेचने की क्रिया समाप्त हो जाती है और समस्या समाधान के मिल जाने के साथ ही इसका अन्त हो जाता है। इसलिए चिंतन को समस्या समाधान प्रक्रिया (problem solving) भी कहा जाता है। चिंतन या समस्या समाधान में मानसिक तत्परता का बहुत बड़ा हाथ होता है। किसी समस्या के समाधान के पहले व्यक्ति एक मानसिक तैयारी करता है कि वह अपनी समस्या के समाधान के लिए किस प्रकार का व्यवहार करे। उसकी इसी मानसिक प्रक्रिया को तत्परता कहते हैं। चैपलिन (Chaplin, 1975) के अनुसार तत्परता (se.) प्राणी की वह अवस्था अस्थायी है जो उसे एक विशेष ढंग से प्रतिक्रिया करने के लिए तत्पर कर देती है।

इसी प्रकार, हिल्गार्ड आदि के अनुसार तत्परता का अर्थ किसी कार्य-विशेष या अनुभव के प्रति एक प्रारंभिक आयोजन की तैयारी है। तत्परता का व्यवहार दिशा (Direction) के अर्थ में भी किया जाता है। मायर (Maier) ने तत्परता का व्यवहार इसी अर्थ में किया है। उनके अनुसार समस्या का समाधान करते समय सम्भवतः प्राणी अनुमान करता है कि इस समस्या का समाधान अमुक दिशा में व्यवहार करने से हो सकता है। दूसरे शब्दों में, वह अनुमान करता है कि लक्ष्य अमुक दिशा में उपलब्ध हो सकता है। तत्परता की उत्पत्ति कभी तो अभ्यास करने से और कभी प्रयोगकर्ता द्वारा दिये गये अभ्यास से होती है। अधिक समय तक अभ्यास करने से प्राणी में एक विशाल तत्परता उत्पन्न हो जाता है। इसी तरह अध्ययन के समय प्रयोगकर्ता कुछ विशेष निर्देश देता है, जिससे प्रयोज्य में एक खास तरह की तत्परता उत्पन्न हो जाती है।

चिंतन या समस्या समाधान में तत्परता का महत्त्वपूर्ण स्थान देखा जाता है। जब तत्परता सही होती है तो समस्या का समाधान सरल बन जाता है। लेकिन गलत तत्परता (wrong set) के कारण समस्या का समाधान कठिन तथा विलम्बित हो जाता है। अत: तत्परता से एक ओर समस्या समाधान में सहायता मिलती है तो दूसरी ओर इससे हानि भी होती है। हम यहाँ तत्परता के दोनों पक्षों की अलग-अलग व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं, जो इस प्रकार है –

(A) तत्परता के लाभ (Advantage of set):
तत्परता का धनात्मक मूल्य सरलीकरण के रूप में देखा जाता है। समस्या का समाधान करते समय जब प्राणी में सही तत्परता का निर्माण होता है तो प्राणी को सही प्रतिक्रिया करने तथा गलत प्रतिक्रिया से बचने का लाभ होता है। तत्परता के धनात्मक मूल्य को प्रमाणित करने के लिए एक प्रारंभिक अध्ययन वाट ने किया। उन्होंने अपने अध्ययन में देखा कि नियंत्रित समूह की अपेक्षा प्रयोगात्मक समूह के प्रयोज्यों को अपनी समस्या के समाधान में अधिक सुविधा का अनुभव हुआ। इसकी व्याख्या करते हुए वाट ने कहा कि प्रयोगकर्ता समूह के प्रयोज्यों में अभ्यास के कारण सही तत्परता उत्पन्न हुई जिससे समस्या के समाधान में आसानी हुई। मेयर ने भी वाट के प्रयोग को थोड़े परिमार्जन के साथ दोहराया और यह निष्कर्ष निकाला कि समस्या समाधान में सही तत्परता से काफी सुविधा होती है। इन प्रयोगों में अंत:निरीक्षण का व्यवहार किया गया।

मोसर (Moier) ने अपने अध्ययन में देखा कि सही दिशा का ज्ञान हो जाने पर समस्या का समाधान बहुत आसान हो जाता है। लेकिन, यदि प्राणी गलत दिशा का अनुमान लगा लेता है और उसे अपनी दिशा में परिवर्तन लाना पड़ता है और सभी समस्या हल हो जाता है। उन्होंने कई समस्याओं पर अध्ययन करके अपनी इस परिकल्पना को प्रमाणित करने का प्रयास किया। हम यहाँ सिर्फ एक समस्या से संबंधित प्रयोग का उल्लेख करना चाहेंगे। इसे दोलक समस्या कहते हैं। प्रयोज्यों को लड़की की सट्टी (Strips), शिकन्जे, तार, चित्रांकन, एक भारी टेबुल आदि सामाग्रियाँ दी गईं।

प्रयोज्यों से इन सामग्रियों द्वारा दो दोलक बनाने तथा इस प्रकार झुलाने के लिए कहा गया कि वे निश्चित स्थानों पर चिन्ह बना सकें। एक समूह के प्रयोज्यों को सही दिशा का संकेत दे दिया गया। प्रयेगकर्ता ने उनसे कहा कि छत में दो कीलों के सहारे दोलक को लटका सके तो समस्या आसान बन जाएगी। दूसरे समूह के प्रयोज्यों को किसी तरह की दिशा का संकेत नहीं दिया गया। देखा गया कि पहले समूह के लगभग 35% और दूसरे समूह के केवल लगभग 2% प्रयोज्यों ने अपनी समस्या का समाधान किया, हालाँकि दोनों समूहों के प्रयोज्यों को समस्या समाधान के लिए आवश्यक पूर्वअनुभव समान था। इससे स्पष्ट हुआ कि सही तत्परता मिल जाने पर समस्या का समाधान आसान बन जाता है।

वीवर एवं मैडेन (Weaver and Madden, 1949) ने मेयर के प्रयोग को दोहराया और देखा कि कुछ प्रयोज्यों में प्रयेगकर्ता से बिना किसी संकेत मिले भी सही दिशा या तत्परता उत्पन्न हो गई। देखा गया कि किसी खास दिशा में प्रयास करने पर प्रयोज्यों को सफलता की कोई आशा नजर नहीं आई तो वे अपने पहले प्रयास को छोड़कर दूसरी दिशा में प्रयत्नशील हो गये और अंत में सफलता मिल गई। चाहे जो भी हो, इस अध्ययन से भी इतना अवश्य ही स्पष्ट हो जाता है कि सही तत्परता मिल जाने पर समस्या को हल करने में आसानी होती है।

(B) तत्परता की हानि (Disadvantages of set):
गलत तत्परता अथवा गलत दिशा से समस्या समाधान में बड़ी हानि होती है। इसे तत्परता का अवरोधक प्रभाव अथवा नकारात्मक मूल्य कहते हैं। इस प्रकार की तत्परता उत्पन्न होने पर प्राणी गलत दिशा में प्रयास करने लगता है, जिससे समस्या का समाधान कठिन हो जाता है और समस्या तबतक समाप्त नहीं हो पाता है जबतक कि वह उस तत्परता को छोड़कर सही दिशा में सक्रिय नहीं होता है। डंकर ने तत्परता के इस अवरोधक प्रभाव को कार्यात्मक स्थिरता की संज्ञा दी है।

कारण यह है कि गलत तत्परता के उत्पन्न हो जाने पर प्राणी एक ही दिशा में स्थिर होकर व्यवहार करने लगेंगे। वह दूसरी दिशा के प्रति उदासीन बन जाता है। वह समस्या के समाधान के दूसरे उपायों के प्रति मानो अंधा बन जाता है। रेबर (Rebber, 1987) ने भी कहा कि कार्यात्मक स्थिरता के कारण व्यक्ति को समस्या का विकल्पी समाधान सुझायी नहीं देता है। इस तरह गलत तत्परता वास्तव में समस्या के समाधान में बाधा उत्पन्न करने लगती है।

गलत तत्परता के बाधक प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए एडमसन ने एक प्रयोग का उल्लेख इस प्रकार किया है जिसमें प्रयोज्यों को मोमबत्ती, छोटे-छोटे दफ्ती बक्से, पाँच दियासलाई आदि सामग्रियाँ दी गयीं। उन्हें आदेश दिया गया कि वे मोमबत्तियों को उदग्र दीवार की सतह पर जलती हुई अवस्था में लगा दें। समस्या अधिक जटिल नहीं थी। करना था कि मोम के सहारे बक्से पर मोमबत्तियों को मोड़कर टाँगों की मदद से दीवार पर लगा दिया जाए। प्रयोगकर्ता समूह के प्रयोज्यों में कार्यात्मक स्थिरता उत्पन्न की गई। इसके लिए तीनों बक्सों में मोमबत्तियाँ, दियासलाई तथा टाँगों को भरकर प्रयोज्यों को दिया गया।

इससे उनमें यह विचार विकसित किया गया कि बक्से प्रायः पात्र का काम करते हैं, चबूतरा का नहीं। नियंत्रित समूह के प्रयोज्यों में इस तरह की कार्यात्मक स्थिरता उत्पन्न नहीं की गई। उन्हें तीन खाली बक्से आदि दिये गये बाकी सभी सामग्रियों को टेबुल पर रख दिया गया। देखा गया कि प्रयोगात्मक समूह के 29 प्रयोज्यों में से केवल 12(42%) प्रयोज्यों ने और नियंत्रित समूह के 28 प्रयोज्यों में से 24(86%) प्रयोज्यों ने सीमित समय (20 मिनट) के भीतर अपनी समस्या का समाधान किया।

इस अध्ययन से प्रमाणित होता है कि कार्यात्मक स्थिरता समस्या समाधान में बाधक है। तत्परता के अंधकार प्रभाव को और भी स्पष्ट करने के लिए लूचिन्स (Luchins) के प्रयोग का उल्लेख आवश्यक है। उन्होंने छात्रों पर प्रयोग किया। प्रयोज्यों को तीन प्रकार के बर्तन दिये गये और उनकी सहायता से एक निश्चित मात्रा में पानी नापने के लिए कहा गया। इस प्रकार की 11 समस्याएँ दी गईं जो अग्रांकित हैं –

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 8 चिंतन img 1

दो बर्तन वाली पहली समस्या की जानकारी प्रयोज्यों को दे दी गयी। इन्हें आदेश दे दिया गया कि वे 29 क्वार्ट बर्तन को पानी से भर लें और 3 क्वार्ट बर्तन से तीन बार पानी निकाल लें। इस तरह 29 क्वार्ट पानी मिल जाएगा। फिर दूसरी समस्या दी गयी कि तीन मिनट के बाद उसे भी समझा दिया गया। दूसरी समस्या से लेकर अंतिम समस्या तक (समस्या 9 को छोड़कर) का समाधान B, A, 2-C से सूत्र के आधार पर संभव था। परन्तु छठी समस्या के बाद सभी समस्याओं का समाधान सबसे बड़े बर्तन के बिना भी संभव था। देखना यह था कि तीन बर्तन कार्य-प्रणाली से उत्पन्न तत्परता के कारण प्रयोज्यों में दो वर्तन कार्य-प्रणाली के प्रति अंधकार प्रभाव विकसित होता है या नहीं।

देखा गया कि प्रयोगात्मक समूह के अधिकांश प्रयोज्य इस प्रभाव से प्रभावित हुए। दूसरी ओर नियंत्रित समूह को केवल प्रथम दो बर्तन समस्या की जानकारी दी गयी। फिर उन्हें 7 से 11 तक की समस्याओं को हल करने के लिए कहा गया। देखा गया कि उन्होंने केवल दो बर्तनों की सहायता से समस्याओं का समाधान किया। इस तरह स्पष्ट हुआ कि प्रयोगात्मक समूह के प्रयोज्यों में एक ही तत्परता पूरे प्रयोग में दृढ़ता के साथ जारी रही, जिस कारण समस्याओं का समाधान सुझायी नहीं पड़ा। लूचिन्स तथा लूचिन्स के अध्ययन में भी लगभग इसी तरह के निष्कर्ष मिले। इस प्रकार के कई दूसरे प्रयोग भी हूए हैं जिनमें यूज किलर, ग्रीनवर्ग तथा रिचमैन आदि के अध्ययन महत्त्वपूर्ण हैं। इन अध्ययनों से भी गलत तत्परता का अंधकार प्रभाव सिद्ध होता है।

प्रश्न 7.
समस्या समाधान की सैद्धान्तिक व्याख्या करें।
उत्तर:
समस्या समाधान की सैद्धान्तिक व्याख्या तीन दृष्टिकोणों के आधार पर की जा सकती है, जो निम्न प्रकार से है –

1. व्यवहारवादी व्याख्या (Behaviouristic Interpretation):
वाचिक अधिगम और अनुबन्धन संबंधी विवरण में पहले बताया जा चुका है कि अधिगम उद्दीपक और अनुक्रिया के बीच साहचर्य स्थापित होता है। व्यवहारवादियों ने इसी दृष्टिकोण को अपनाकर समस्या समाधान की व्याख्या निम्न चरणों के माध्यम से की है –

(i) अनुक्रिया-पदानुक्रम (Response Hierarchy):
समस्या समाधान की मेकेनिज्म का भाव यह है कि प्रयोज्य की अनेक अनुक्रियाएँ एक उद्दीपक-स्थिति से अनुधित होती हैं। इन अनुक्रियाओं में कोई अनुक्रिया एक ही उद्दीपक स्थिति से अधिक मात्रा में और कोई कम मात्रा में अनुबन्धित होती है। दूसरे शब्दों में, प्रयोज्य की अनेक अनुक्रियाएँ एक ही उद्दीपक स्थिति के साथ भिन्न-भिन्न साहचर्य प्रबलता स्तर पर संबंधित हो सकती हैं। अतः ऐसा माना जा सकता है कि ये अनुक्रियाएँ पदानुक्रम (Hierarchy) में व्यवस्थित होती हैं। इन अनुक्रियाओं को Habit Family Hierarchy भी कहा जाता है। उद्दीपक से संबंधित ये अनुक्रियाएँ समस्या समाधान के समय शीघ्र उत्पन्न होती हैं जिनका उद्दीपक स्थिति के साथ प्रबल साहचर्य रहा है।

(ii) अप्रकट प्रयल और भूल (Impact Trial and Error):
समस्या समाधान संबंधी प्रयोगों में मानव प्रयोज्य भी अप्रकट और भूल अनुक्रियाएँ करते हैं, परन्तु इनकी अनुक्रियाएँ बहुधा प्रतीकात्मक (Symbolic) स्तर पर होती हैं। उदाहरण के लिए, यदि प्रयोजन के सामने यह समस्या है कि डिब्बे और टेप की सहायता से किस प्रकार दीवार पर मोमबती लगा कर जलाये कि दीवार और फर्श पर जलती हुई मोमबत्ती का मोम न गिरे। सर्वप्रथम प्रयोज्य कल्पना और चिन्तन के माध्यम से उपाय सोचेगा और प्रत्येक उपाय की उपयोगिता की जाँच करेगा। उसे जो उपाय त्रुटिपूर्ण लगेगा उसे वह छोड़ देगा फिर चिंतन स्तर पर प्रयत्न करके अगला उपाय सोचेगा। इस तरह अन्त में प्रकट प्रयत्न और भूल के आधार पर चिन्तन करते-करते समस्या समाधान के अन्तिम उपाय पर पहुँच सकता है।

(iii) मध्यस्थताकारी सामान्यीकरण (Mediated Generalization):
व्यवहारवादियों ने समस्या समाधान की व्याख्या के लिए इस प्रक्रिया का भी उपयोग किया है। यह एक प्रकार का प्रत्यक्षपरक प्रक्रिया (Perceptual process) है। यह देखा गया है कि भौतिक उद्दीपक यद्यपि एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, परन्तु इनमें कुछ-न-कुछ मात्रा में अथवा किसी प्रकार की सामान्यता पायी जा सकती है। उदाहरण के लिए, गोभी, टमाटर और बैगन यद्यपि स्वाद, आकृति और रंग में एक-दूसरे से भिन्न हैं फिर भी हम इनका प्रत्यक्षीकरण सब्जी के रूप में करते हैं। यदि इन सब्जियों में से ऐसी सब्जी व्यक्ति के सामने उपस्थित होती है तो उस सब्जी से संबंधित अप्रकट अनुक्रिया दूसरी सब्जी के लिए उद्दीपन संकेत प्रस्तुत कर सकती है और दूसरी सब्जी के प्रति अनुक्रिया उद्दीपन हो सकती है।

(iv) व्यवहार खण्डों का समन्वय (Integration of Behaviour Segments):
समस्या समाधान की इस मेकेनिज्म में यह बताया गया है कि प्रयोज्य समस्या का समाधान विभिन्न अनुक्रियाओं को समन्वित करके भी करता है। प्रश्न यह उठता है कि जो प्रयोज्य इस मेकेनिज्म के आधार पर समस्या समाधान करते हैं तो उनके लिए समस्या क्यों उत्पन्न होती है। समस्या उत्पन्न होने के कारण यही प्रतीत होता है कि जिन व्यवहार खण्डों के समन्वय की सहायता से प्रयोज्य समस्या का समाधान कर रहा है, ऐसे व्यवहार खण्डों का समन्वय पहले कभी नहीं हुआ है। उपरोक्त समस्या समाधान की सैद्धांतिक व्याख्या जो व्यवहारवादियों ने प्रस्तुत की हैं, उनके अध्ययन से स्पष्ट होता है कि समस्या समाधान अधिगम का सरल रूप न होकर जटिल रूप है।

2. गेस्टाल्टवादी व्याख्या (Insight Mechanism):
गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों में कोहलर ने अधिगम के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण अध्ययन किए हैं जिनका संबंध समस्या समाधान से है। गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार प्रत्यक्षपरक पुनर्गठन (Perceptual Re-Organization) का परिणाम ही समस्या समाधान है। जब प्राणी स्थिति का प्रत्यक्षीकरण सही ढंग से नहीं करता है तभी उसके सामने समस्या उत्पन्न होती है। गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि प्राणी समस्यात्मक स्थिति का प्रत्यक्षीकरण अन्त:दृष्टि के आधार पर करता है। समस्या समाधान की व्याख्या गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के अनुसार निम्न प्रकार से है। जब प्राणी किसी लक्ष्य तक पहुँचने में बाधा अनुभव करता है तब समस्या उत्पन्न होती है।

समस्या के कारण व्यक्ति तनाव का अनुभव करता है। व्यक्ति तनाव को दूर करने के लिए कितना सक्रिय होकर लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रयास करता है। व्यक्ति लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कितना सक्रिय होगा अथवा तनाव दूर करने के लिए कितना सक्रिय होगा, इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें तनाव की मात्रा कितनी है और लक्ष्य उसके लिए कितना सार्थक, आवश्यक तथा कितना स्पष्ट है। प्राणी समस्यात्मक स्थिति का संगठन और पुनर्गठन तबतक करता रहता है जबतक प्राप्त कराने वाले समाधान का प्रत्यक्षीकरण की सूझ या अन्तर्दृष्टि (Insight) है। किसी समस्यात्मक स्थिति में प्राणी कितनी और किस प्रकार अन्तर्दृष्टि से समस्या का समाधान करेगा, वह मुख्यतः इस बात पर निर्भर करता है कि वह प्राणी किस जाति का है। क्योंकि भिन्न-भिन्न प्राणियों में तथा भिन्न-भिन्न जाति के प्राणियों में अन्तर्दृष्टि की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है।

3. सूचना-संसाधन सिद्धांत (Information Processing Theory):
सूचना-संसाधन सिद्धांत आधुनिक सिद्धांत है। यह व्याख्या व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों और गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों की समस्या समाधान की व्याख्या से पूर्णत: भिन्न है। इस सिद्धांत के समर्थकों का विचार है कि जिन नियमों के आधार पर इलेक्ट्रोनिक कम्प्यूटर्स कार्य करते हैं ठीक उन्हीं नियमों के आधार पर प्राणी का नाड़ी संस्थान कार्य करता है। विचार यह है कि व्यक्ति में समस्यात्मक स्थिति से सूचना ग्रहण कर सूचना के आधार पर कार्य (Operation) करने की क्षमता होती है।

प्रश्न 8.
चिन्तन के स्वरूप का वर्णन करें। चिन्तन और स्मरण में भेद बताएँ।
उत्तर:
सामान्य रूप से चिन्तन का अभिप्राय है-सोचना या विचार करना, परन्तु मनोविज्ञानवेता चिन्तन को केवल इतना ही नहीं समझते। उनका कथन है कि चिंतन का संबंध किसी न किसी समस्या से रहना चाहिए। इसे एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया जायेगा। हरिश की लड़की सुषमा ने इस वर्ष बी.ए. परीक्षा पास की है। वह विवाह करना चाहता है, परन्तु वर मिल नहीं रहा। ऐसी स्थिति में उसके सामने एक समस्या उपस्थित होती है कि-वह लड़की को एम.ए. में प्रवेश दिलाए या बी. एड. कराए? एम.ए. में दो वर्ष लगेंगे, व्यय भी बहुत होगा और एक समस्या पैदा हो जाएगी-वह यह कि लड़की से अधिक योग्यता का वर खोजना होगा। अतः यही अच्छा है कि लड़की को बी.एड. कराया जाय।

यदि एक वर्ष में वर नहीं मिला तो, वर न मिलने तक नौकरी करती रहेगी। इससे वह अपने दहेज के लिए भी कुछ धन जुटा लेगी। यह सोचकर वह अपनी बेटी सुषमा को बी.एड. में प्रवेश दिला देता है। समस्या समाधान हेतु सोचने की यह प्रक्रिया ‘चिन्तन’ कहलायेगी। भिन्न-भिन्न मनोवैज्ञानिकों ने चिन्तन की परिभाषा इन शब्दों में दी है वारेन-“चिन्तन एक ऐसी प्रत्ययात्मक क्रिया है, जो किसी समस्या से प्रारम्भ होती है और अन्त में समस्या के एक निष्कर्ष के रूप में समाप्त होती है।”

(“Thinking is an ideational activity, initiated by a problem and ultimately leading to a conclusion or solution of the problem.” Warren)

कॉलिन्स तथा ड्रेवर:
“किसी प्राणी या जीव का वातावरण के प्रति जो अचेतन समायोजन होता है, वही चिन्तन है। चिन्तन मानसिक प्रत्ययात्मक तथा प्रत्यक्षात्मक आदि कई स्तरों पर हो सकता है।”

(“Thinking may be described as the conscious adjustment of an organism to a situation. Thinking may obviously take place at all levels of mental, i.e. preceptual and conceptual level.”- Collins and Drever)

डिवी:
“चिन्तन को हम एक विश्वास या अनुमानित ज्ञात कह सकते हैं।”

(“Thinking is an active persistent and careful consideration of any belief or supposed form of knowledge.”- Dewey)

वुडवर्थ:
“चिन्तन करना एक कठिनाई को दूर करने का ढंग है।” (“Thinking is one way of overcoming an abstacle.”- Woodworth)

चिंतन वह जटिल मानसिक प्रक्रिया है जो किसी समस्या के उपस्थित होने पर प्रारम्भ होती है और उसके समाधान होने पर समाप्त हो जाती है। अब प्रश्न यह उठता है कि चिन्तन का स्वरूप क्या है? दूसरे शब्दों में चिन्तन में क्या व्यक्ति ‘प्रयत्न और भूल’ विधि का व्यवहार करता है या अन्तर्दृष्टि विधि का। इस सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों में एकमत का अभाव है। थॉर्नडाइक, पिल्सबरी, मार्गन आदि विद्वानों के अनुसार चिन्तन की क्रिया में व्यक्ति समस्या के समाधान के लिए प्रयत्न और भूल विधि का व्यवहार करता है और कोहलर, डंकन, यर्कस आदि विद्वानों का कहना है कि चिन्तन-क्रिया में व्यक्ति समस्या समाधान के लिए अंत:दृष्टि विधि का व्यवहार करता है।

थॉर्नडाइक का कहना है कि चिन्तन की प्रक्रिया में समस्या समाधान करने के लिए व्यक्ति के मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार आते रहते हैं। व्यक्ति उन विचारों पर क्रमश: सोचता है। जो समाधान गलत प्रतीत होता है उसे व्यक्ति एक-एक कर छोड़ता जाता है और जो समस्या समाधान से सम्बन्धित होता है उसे अपने चेतना केन्द्र में ग्रहण करता जाता है।

इस तरह के सम्भव समाधानों के सहारे समस्या को सुलझाने का क्रम कबतक जारी रहता है जबतक उसे समस्या के सही-सही समाधान करने का तरीका नहीं मिल जाता। उदाहरणार्थ, जब किसी विद्यार्थी के सामने गणित-सम्बन्धी कोई समस्या उपस्थित होती है तब उसके मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार उठते हैं। वह एक सूत्र के असफल होने पर दूसरे और दूसरे के बाद तीसरे का तबतक उपयोग करता है जबतक कि वह उसे हले करने में ठीक-ठीक समर्थ नहीं हो जाता। इस प्रकार स्पष्ट है कि चिन्तन में समस्या समाधान के लिए “प्रयत्न और भूल” को अपनाया जाता है।

परन्तु अन्तर्दृष्टि सिद्धांत के प्रतिपादन में मूलर महोदय का कहना है कि व्यक्ति समस्या समाधान में प्रयत्न और भूल विधि का नहीं, अपितु अन्तर्दृष्टि-विधि का व्यवहार करता है। व्यक्ति चिन्तन क्रिया में समस्या से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर क्रमशः विचार नहीं करता, वरन उन पर सामूहिक रूप से विचार करता है। ऐसा करने में अचानक व्यक्ति में उस परिस्थिति की अन्तर्दृष्टि उत्पन्न होती है और वह तुरन्त सही प्रक्रिया कर डालता है।

उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि व्यक्ति समस्या के समाधान में न सिर्फ प्रयत्न और भूल विधि का उपयोग करता है और न सिर्फ अन्तर्दृष्टि-विधि का, अपितु दोनों का उपयोग करता है। प्राय: व्यक्ति कठिन समस्याओं के उपस्थिति होने पर प्रयत्न और भूल का सहारा लेता है, लेकिन सरल समस्याओं के समाधान में विशेषकर अन्तर्दृष्टि विधि का ही उपयोग करता है। चिन्तन और स्मरण में अन्तर-चिन्तन और स्मरण दोनों ही जटिल ज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ हैं, क्योंकि प्रत्येक का विश्लेषण करने पर अनेक उपक्रियाएँ उपलब्ध होती हैं। फिर भी, दोनों में पर्याप्त भिन्नताएँ हैं जिनका अध्ययन इस प्रकार किया जा सकता है –

1. चिन्तन की क्रिया के लिए किसी समस्या का होना नितान्त आवश्यक है, परन्तु स्मरण में ऐसी बात नहीं है। स्मृति की क्रिया समस्याओं के अभाव में उत्पन्न हो जाती है। उदाहरणार्थ, किसी प्रश्न का उत्तर समझ में न आने पर एक समस्या उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण प्रश्नोत्तर के लिए चिन्तन क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। दूसरी ओर, बिना ऐसी समस्या के किसी दुर्घटना को देखकर हमें उसी प्रकार की अन्य दुर्घटनाओं का स्मरण हो जाता है।

2. चिन्तन की क्रिया में प्रतीकों के सहारे समस्या को सुलझाया जाता है। लेकिन स्मरण की क्रिया में हम अपनी पूर्वानुभूतियों को वर्तमान चेतना का विषय बनाते हैं। यही कारण है कि चिन्तन की क्रिया में समस्या समाधान के लिए अनेक प्रकार की शारीरिक और मानसिक प्रयत्न और भूल की क्रियाएँ होती हैं। परन्तु स्मरण में कोई विशेष प्रयत्न और भूल करने की आवश्यकता नहीं महसूस होती। उदाहरणार्थ, गणित-सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर समझ में न आना एक समस्या है, जिसके समाधान के लिए हम विभिन्न सूत्रों को व्यवहृत करते हुए प्रयत्न और भूल करते हैं। दूसरी ओर किसी पठित पाठ्य-विषय का प्रत्याह्वान करने में कोई विशेष प्रयत्न और भूल करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

3. चिन्तन एक मूल उद्देश्य को लेकर होता है। चिन्तन के क्षेत्र में जो भी हम मानसिक क्रिया करते हैं, वह उद्देश्य को सामने रखकर ही। लेकिन स्मृति के अन्तर्गत कोई उद्देश्य नहीं होता। दूसरी बात यह है कि चिन्तन का अंतिम लक्ष्य किसी समस्या का समाधान करना है जबकि स्मरण का लक्ष्य सीखे गये विषय को सफलतापूर्वक चेतना में लाना है। अतः इन दोनों के लक्ष्य में भी भिन्नता है। उदाहरणार्थ, हिसाब नहीं बनने की समस्या उत्पन्न होने पर जैसे ही हमें उसका उचित हल सूझ जाता है, चिन्तन समाप्त हो जाता है। दूसरी ओर, कविता का स्मरण करते समय हमारा यही लक्ष्य रहता है कि जहाँ तक हो सके पूरी कविता वर्तमान चेतना में चली आये।

4. चिन्तन की क्रिया नियंत्रित ढंग से होती है, परन्तु स्मरण की क्रिया में नियंत्रण का अभाव पाया जाता है। उदाहरणार्थ, जब एक इन्जीनियर पुल निर्माण करने के सम्बन्ध में चिन्तन करता है तो उसका सम्पूर्ण चिन्तन पुल-निर्माण सम्बन्धी विभिन्न अनुभूतियों से ही सम्बन्धित रहता है। दूसरी और स्मरण की क्रिया में हम एक विषय का स्मरण करते समय उससे सम्बन्धित दूसरी-दूसरी घटनाओं और विषयों का भी स्मरण कर लेते हैं।

5. चिन्तन की क्रिया स्मरण की क्रिया पर आश्रित है पर स्मृति की क्रिया चिन्तन की क्रिया पर आश्रित नहीं है। दूसरे शब्दों में, चिन्तन की क्रिया में स्मरण की क्रिया पायी जाती है, परन्तु स्मरण की क्रिया में चिन्तन की क्रिया नहीं पायी जाती। अतः चिन्तन की क्रिया स्मरण की अपेक्षा अधिक जटिल है। इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि चिन्तन और स्मृति दो मानसिक प्रक्रियाएँ हैं जिनमें घनिष्ठता होते हुए भी पर्याप्त भिन्नता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चिंतन का स्वरूप होता है।
(A) संगठित
(B) असंगठित
(C) दिशाहीन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) संगठित

प्रश्न 2.
रेल की पटरी का आपस में मिलना किस भ्रम का उदाहरण है:
(A) व्यक्तिगत
(B) सार्वभौम
(C) आभासी
(D) ज्यामितीय
उत्तर:
(B) सार्वभौम

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

Bihar Board Class 11 Political Science चुनाव और प्रतिनिधित्व Textbook Questions and Answers

चुनाव और प्रतिनिधित्व पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सबसे नजदीक बैठता है?
(क) परिवार की बैठक में हाने वाली चर्चा
(ख) कक्षा-संचालक (क्लास-मॉनीटर) का चुनाव
(ग) किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने उम्मीदवार का चयन
(घ) ग्राम सभा द्वारा निर्णय लिया जाना
(ङ) मीडिया द्वारा करवाये गए जनमत-संग्रह
उत्तर:
उपरोक्त सभी कथनों में से (घ) ग्राम सभा द्वारा निर्णय लिया जाना प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का सर्वोत्तम उदाहरण है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व के प्रश्न-उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
इनमें कौन-सा कार्य चुनाव आयोग नहीं करता?
(क) मतदाता-सूची तैयार करना
(ख) उम्मीदवारों का नामांकन
(ग) मतदान-केन्द्रों की स्थापना
(घ) आचार संहिता लागू करना
(ङ) पंचायत के चुनाव का पर्यवेक्षण
उत्तर:
पंचायत के चुनाव का पर्यवेक्षण चुनाव आयोग नहीं करता।

चुनाव और प्रतिनिधित्व Question Answer Bihar Board Class 11 प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सी राज्य सभा और लोकसभा के सदस्यों के चुनाव की प्रणाली में समान हैं?
(क) 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य हैं।
(ख) विभिन्न प्रत्याशियों के बारे में मतदाता अपनी पंसद को वरीयता क्रम में रख सकता है।
(ग) प्रत्येक मत का सामान्य मूल्य होता है।
(घ) विजयी उम्मीदवार को आधे से अधिक मत प्राप्त होना चाहिए।
उत्तर:
जैसा कि हम जानते हैं राज्य के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष चुनाव की श्रेणी में आता है। इस चुनाव में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। राज्यों की विधान सभाओं के सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं, और वे सदस्य या विधायक राज्य सभा सदस्यों का चुनाव करते हैं। हमारे संविधान में संघीय इकाईयों को राज्य सभा में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर दिया गया है।

जिस संघीय क्षेत्रों में विधान सभाएँ नहीं होती वहाँ पर राज्य सभा के सदस्यों के चुनाव हेतु एक विशेष निर्वाचन मण्डल गठित किया जाता है। इस प्रकार अन्ततः मतदाता भारतीय नागरिक ही है, जो लोकसभा के सदस्यों को प्रत्यक्ष रूप से तथा राज्यसभा सदस्यों को अप्रत्यक्ष रूप से चुनता है। अतः उपरोक्त चारों बातों में से प्रथम अर्थात् (क) भाग वाला कथन सही है, कि राज्य सभा और लोक सभा के चुनाव में यह सामान्य है, कि प्रत्येक नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है वह योग्य मतदाता है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व कक्षा 11 प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ प्रणाली में वही प्रत्याशी विजेता घोषित किया जाता है जो –
(क) सर्वाधिक संख्या में मत अर्जित करता है।
(ख) देश में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले दल का सदस्य हो।
(ग) चुनाव-क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत हासिल करता है।
(घ) 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है।
उत्तर:
सर्वाधिक वोट से जीतने वाला उम्मीदवार विजयी घोषित किया जाता है, जो उस निर्वाचन क्षेत्र में किसी भी दूसरे उम्मीदवार से अधिक मत प्राप्त करता है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व प्रश्न-उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 5.
पृथक निर्वाचन-मंडल और आरक्षित चुनाव-क्षेत्र के बीच क्या अंतर है? संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मंडल को क्यों स्वीकार नहीं किया?
उत्तर:
आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र व्यवस्था से अभिप्राय है, कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में सभी मतदाता वोट डालेंगे लेकिन प्रत्याशी उसी समुदाय या सामाजिक वर्ग का होगा जिसके लिए यह सीट आरक्षित है। पृथक निर्वाचन मण्डल की स्थापना अंग्रेज सरकार ने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को कमजोर करने के लिए की थी। इसका अर्थ यह था, कि किसी समुदाय के प्रतिनिधि के चुनाव में केवल उसी समुदायी के लोग वोट डाल सकेंगे। संविधान सभा में अनेक सदस्यों ने इस व्यवस्था को दोषपूर्ण बताया और कहा कि इससे समाज में एकता नहीं हो पाएगी।

पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था भारत के लिए अभिशाप रही है। भारत का विभाजन कराने में इस व्यवस्था का भी सहयोग रहा है। पृथक निर्वाचन मंडल उम्मीदवार (प्रत्याशी) केवल अपने समुदाय या वर्ग का हित ही सोच पाता है, और एकीकृत समाज के भावों की उपेक्षा करने लगता है। परन्तु आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र व्यवस्था में विजयी प्रत्याशी अपने क्षेत्र के अन्तर्गत समाज के सभी वर्गों के हित की बात सोचने को बाध्य रहता है।

यही कारण है, कि संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन मंडल की पद्धति को अस्वीकार कर दिया। प्रत्येक राज्य में आरक्षण के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का एक कोटा होता है, जो उस राज्य में उसके वर्ग या समुदाय की जनसंख्या के अनुपात में होता है। परिसीमन आयोग इन निर्वाचन क्षेत्रों में परिवर्तन कर सकता है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व के प्रश्न-उत्तर Class 11 Bihar Board प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन गलत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द अथवा पद को बदलकर, जोड़कर अथवा नये क्रम में सजाकर इसे सही करें।
(क) एक फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली (“सबसे आगे वाला जीते प्रणाली’) का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।
(ख) चुनाव आयोग पंचायत और नगर पालिकाओं के चुनाव का पर्यवेक्षण नहीं करता।
(ग) भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता।
(घ) चुनाव आयोग में एक से ज्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य है।
उत्तर:
(क) भारत में सभी चुनाव ‘सर्वाधिक वोट से जीत’ प्रणाली से कराए जाते हैं। भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा और विधान परिषदों के सदस्यों को छोड़कर बाकी सभी चुनाव ‘सर्वाधिक वोट से जीत’ प्रणाली (FPTP) से सम्पन्न कराए जाते हैं।
(ख) निर्वाचन आयोग स्थानीय निकायों के चुनाव का सुपरविजन (पर्यवेक्षण) नहीं करता।
(ग) भारत का राष्ट्रपति निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटा सकता है।
(घ) निर्वाचन आयोग में एक से अधिक निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति विधिक आदेश सूचक है।

चुनाव और प्रतिनिधि पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 7.
भारत की चुनाव-प्रणाली का लक्ष्य समाज के कमजोर तबके की नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना है। लेकिन अभी तक हमारी विधायिका में महिला सदस्यों की संख्या 10 प्रतिशत तक भी नहीं पहुँचती । इस स्थिति में सुधार के लिए आप क्या उपाय सुझाएँगे?
उत्तर:
भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। परन्तु संविधान में इसी प्रकार की आरक्षण व्यवस्था समाज के अन्य कमजोर और उपेक्षित वर्गों के लोगों के लिए नहीं की गई। जैसा कि हम देखते हैं, कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के अन्दर महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण अभी तक नहीं किया गया है।

विभिन्न राजनीतिक दल महिलाओं की सीटों के आरक्षण की बात करते हैं, परन्तु इस प्रकार का विधेयक संसद में लाने का प्रयास किया जाता है, तो कोई दल विचारधारा को तथा कोई दल तकनीकी कमियों को प्रकट करने की कोशिश के आधार पर विधेयक का विरोध करने लगता है। इस प्रकार अभी तक महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पारित नहीं होने दिया गया है, यद्यपि माँग सभी दल करते हैं, कि महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए।

चुनाव और प्रतिनिधित्व Bihar Board Class 11 प्रश्न 8.
एक नये देश के संविधान के बारे में आयोजित किसी संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्मलिखित आशाएँ जतायीं। प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि उनके लिए फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली) उचित होगी या समानुपातिक प्रतिनिधित्व वाली प्रणाली?
(क) लोगों को इस बात की साफ-साफ जानकारी होनी चाहिए कि उनका प्रतिनिधि कौन है, ताकि वे उसे निजी तौर पर जिम्मेदार ठहरा सकें।
(ख) हमारे देश में भाषाई रूप से अल्पसंख्यक छोटे-छोटे समुदाय हैं और देश भर में फैले हैं, हमें इनकी ठीक-ठीक नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना चाहिए।
उत्तर:
(क) EPT.P
(ख) समानुपातिक प्रतिनिधित्व

प्रश्न 9.
एक भूतपूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस मसले पर कई विचार सामने आए। एक विचार यह था कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतन्त्र नागरिक है। उसे किसी राजनीतिक दल में होने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसे विकल्प की संभावना कायम रखने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होगी। इस कारण, भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयोग की निष्पक्षता को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप इसमें किस पक्ष से सहमत हैं, और क्यों?
उत्तर:
किसी भी चुनाव प्रणाली को सही रूप से कार्य करने के लिए यह आवश्यक है, कि स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए। यदि लोकतंत्र को वास्तविक रूप देना है तो यह अत्यावश्यक है, कि चुनाव प्रणाली निष्पक्ष व पारदर्शी हो। भारत के संविधान में अनुच्छेद 324 (1) में यह व्यवस्था की गयी है, कि संसद और प्रत्येक राज्य विधान मण्डल के लिए कराए जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने और उन सभी निर्वाचनों के संचालन अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण एक आयोग में निहित होगा (जिसे इस संविधान में निर्वाचन आयोग कहा गया है) भारत का निर्वाचन आयोग एक सदस्यीय अथवा बहुसदस्यीय हो सकता है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों को ईमानदारी से स्वतन्त्रतापूर्वक अपने कार्यों एवं दायित्वों को निर्वाह करना चाहिए। स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव कराया जाना ही लोकतंत्र की सफलता का सूचक है, और अनिवार्य शर्त भी। यदि लोकतंत्र को वास्तविक रूप देना चाहते हैं, तो यह आवश्यक है, कि चुनाव स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष हो। चुनाव प्रणाली निष्पक्ष और पारदशी होना चाहिए। मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका इस कार्य में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है। यदि शासक दल किसी पक्षपात करने वाले व्यक्ति को मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त्त करे तो निर्वाचन में निष्पक्षता संदिग्ध हो सकती है। अतः आजकल एक धारणा यह भी है कि मुख्य निर्वाचन में विपक्ष के नेता एवं सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाए ताकि निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता बनी रहे।

इस प्रश्न के अनुसार यदि सेवानिवृत्ति के बाद चुनाव आयुक्त के किसी राजनीतिक दल के साथ मिलने और चुनाव लड़ने की छूट होने की संभावना बनती है, तो वह अपने कार्यकाल में उस राजनीतिक दल के पक्ष में निर्वाचन कार्य को प्रभावित करना शुरू कर सकता है। अत: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को रिटायर होने के बाद भी राजनीतिक दल का सदस्य बनने और चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए।

प्रश्न 10.
भारत का लोकतंत्र अब अनगढ़ ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार हो चुका है क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
जब भारत का संविधान बनाया गया तो वहाँ इस बात पर विवाद होने के पश्चात् कि भारत की परिस्थितियों को देखते हुए भारत के चुनाव में ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ अर्थात् सर्वाधिक वोट से जीत वाली प्रणाली को अपनाया गया। केवल राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति तथा राज्यसभा और विधान परिषद के सदस्यों के निर्वाचन में समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाया गया। उस समय सर्वाधिक मत जीत वाली प्रणाली को अपनाने से एक दल का वर्चस्व रहा जिसके साथ-साथ अनेक छोटे दल भी उभर कर आए। 1989 ई. के बाद भारत में बहुदलीय गठबन्धन की कार्यप्रणाली प्रचलन में आई।

यद्यपि सर्वाधिक मत जीत प्रणाली को अपनाने का कारण इसके सरल प्रणाली होने के साथ-साथ इस बात की सम्भावना को भी ध्यान में रखा गया था, कि समानुपातिक प्रणाली में किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिलने में कठिनाई आ सकती है। पर आज जबकि FPTP प्रणाली से ही हम पाते हैं, कि भारत में गठबन्धन सरकारें बनाना अनिवार्य हो गया है। इसके साथ ही जो पार्टी चुनाव के समय लोकसभा में कांग्रेस ने 48% मत प्राप्त करके 415 सीटें प्राप्त की थीं, जबकि भाजपा ने 24% मत प्राप्त किया और केवल दो सीटें प्राप्त की।

इस प्रकार इस प्रणाली में जहाँ मतों के अनुपात में सीटें उपलब्ध नहीं होती वहीं यह भी एक अत्यधिक विचारणीय प्रश्न है कि एक निर्वाचन क्षेत्र में कई उम्मीदवार होने के कारण विजयी उम्मीदवार यदि 30 प्रतिशत मत प्राप्त करता है, तो 70 प्रतिशत मत हारने वाले उम्मीदवारों में बँट जाते हैं। इस प्रकार विजयी उम्मीदवार उस जनता का प्रतिनिधित्व करता है, जो अल्पमत में है।

अतः आज के युग में सही प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के लिए यदि समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाया जाए तो यह अधिक हितकर हो सकता है। भारत जो विविधताओं का देश है, उसमें प्रत्येक वर्ग, समुदाय और विचारधाराओं का उचित प्रतिनिधित्व हो पाएगा और संसद या राज्य विधानमण्डल में प्रत्येक नागरिक को अपने प्रतिनिधित्व दिखाई देगा जिससे वह अपने को असहाय महसूस नहीं करेंगे।

Bihar Board Class 11 Political Science चुनाव और प्रतिनिधित्व Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत में गुप्त मतदान किस प्रकार सुनिश्चित किया जाता है?
उत्तर:
भारत में मतदाता के लिए गुप्त मतदान की व्यवस्था की गयी है। मतदान केन्द्र पर मतदाता को एक मत पत्र (अब कम्प्यूटराइज मशीन) दिया जाता है, जिस पर सभी उम्मीदवारों के नाम अकिंत होते हैं। मतदाता एक ऐसे स्थान पर जाकर, जहाँ वह अकेला ही होता है, और कोई अन्य व्यक्ति उसे देख नहीं सकता, अपनी पसन्द के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगाता है, (अब बटन दबाता है) मत पत्र को मोड़कर मतपेटी में डाला जाता है, उसे (या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को) सील कर दिया जाता है। इस प्रकार किसी को भी यह पता नहीं चल पाता कि मतदाता ने अपना मत किस उम्मीदवार को दिया है।

प्रश्न 2.
भारत में वयस्क मताधिकार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर:
भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 में कहा गया है, कि लोकसभा तथा राज्य विधान सभाओं के सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा। 18 वर्ष की आयु प्राप्त भारत का नागरिक मताधिकार का प्रयोग करेगा। भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को जाति, पंथ, धर्म, लिंग, जन्म स्थान के भेदभाव के बिना समान मतदान का अधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 3.
“सर्वाधिक वोट से जीत’ व्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब पूरे देश को कुल उतने निर्वाचन क्षेत्रो में बाँट जाता है, जितने कि कुल सदस्य चुने जाने हों और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है, तो उस निर्वाचन क्षेत्र में जिस प्रत्याशी को सबसे अधिक वोट प्राप्त होते हैं, उसे विजयी (निर्वाचत) घोषित किया जाता है। विजयी प्रत्याशी के लिए यह जरूरी नहीं कि उसे कुल मतों का बहुमत मिले। इस विधि को सर्वाधिक वोट से जीत कहते हैं। इसे बहुलवादी व्यवस्था भी कहा जाता है।

प्रश्न 4.
समानुपातिक प्रतिनिधित्व से आप क्या समझते है?
उत्तर:
प्रत्येक पार्टी चुनाव से पहले अपने प्रत्याशियों की एक प्राथमिकता सूची जारी कर देती है, और अपने उतने ही प्रत्याशियों को उम्र प्राथमिकता सूची से चुन लेती है, जितनी सीटों का कोटा उसे मिलता है। चुनावों की इस व्यस्था को समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली कहते हैं। इस प्रणाली में किसी पार्टी को उतने ही प्रतिशत सीटें प्राप्त होती हैं जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं। इजरायल में इसी प्रणाली से चुनाव किया जाता है।

प्रश्न 5.
चुनाव घोषणा पत्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्रायः आम चुनाव के समय प्रत्येक राजनीतिक दल लोगों के साथ कुछ ऐसे वायदे करता है कि यदि वह सत्तारूढ़ हो अर्थात् चुनाव में यदि जनता उसके दल को विजय दिलाती है, तो वह दल देश व जनता के हित के लिए क्या-क्या कार्य करेगा। अतः जिस लेख में कोई राजनीतिक दल अपने कार्यक्रमों, नीतियों तथा उद्देश्यों को बतलाता है, उसे चुनाव घोषणा पत्र कहते हैं।

प्रश्न 6.
भारतीय निर्वाचन प्रणाली की किन्हीं दो कमियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय निर्वाचन प्रणाली की दो प्रमुख कमजोरियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारतीय निर्वाचन प्रणाली का एक प्रमुख दोष यह है, कि यहाँ धन तथा बाहुबल का प्रयोग किया जाता है, जिस कारण योग्य तथा ईमानदार व्यक्ति चुनाव में भाग लेने से बचना चाहते हैं।
  2. भारतीय चुनाव व्यवस्था का दूसरा प्रमुख दोष है, कि जाली मतदान, सरकारी तंत्र का दुरुपयोग अथवा अन्य किसी प्रकार की असंवैधानिक गतिविधि द्वारा चुनाव जीतने वाले प्रत्याशी के विरुद्ध चुनाव याचिकाओं का न्यायालय में शीघ्र निपटारा नहीं होता और तब तक नया चुनाव आ जाता है।

प्रश्न 7.
अल्पसंख्यकों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व की किन्हीं दो पद्धतियों के नाम बताओ।
उत्तर:
अल्पसंख्यकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए जो पद्धतियाँ अपनायी जाती हैं, उनमें से दो प्रमुख पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली: जिसमें दो तरीके हैं-एक एकल संक्रमणीय मत प्रणाली तथा दूसरी सूची प्रणाली।
  2. संचित मत प्रणाली: इसके अनुसार मतदाता चाहे तो अपने सारे मत एक ही उम्मीदवार को दे सकता है।

प्रश्न 8.
स्थगित चुनाव से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब किसी चुनाव क्षेत्र में किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार की अचानक मतदान शुरू होने से पूर्व मृत्यु जो जाती है, तो चुनाव आयोग उस क्षेत्र विशेष में चुनाव को स्थगित कर देता है। परन्तु निर्दलीय प्रत्याशी की मृत्यु होने पर चुनाव स्थगित नहीं किया जाएगा।

प्रश्न 9.
निर्वाचन व्यवस्था से क्या अभिप्राय हैं?
उत्तर:
आधुनिक युग में जनता के प्रतिनिधियों द्वारा शासन चलाया जाता है। जनता अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन करती हैं, और वे प्रतिनिधि सरकार का निर्माण करते हैं। ये प्रतिनिधि जनता से शक्ति प्राप्त करके देश में शासन चलाते हैं। भातर के संविधान द्वारा प्रतिनिधियों को चुने जाने का तरीका निश्चित किया गया है, जिसे निर्वाचन प्रणाली या निर्वाचन व्यवस्था कहा जाता है।

प्रश्न 10.
प्राचीन यूनान (ग्रीक) के नगर-राज्यों में प्रचलित प्रत्यक्ष लोकतंत्र के स्वरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन यूनान में प्रचलित लोकतंत्र का स्वरूप लोकतंत्र से भिन्न था। प्राचीन लोकतंत्र का स्वरूप प्रत्यक्ष था; परन्तु इसमें जो वयस्क व्यक्ति भाग लेते थे, वे यूनान की जनसंख्या के 15 प्रतिशत से भी कम होते थे। दासों, स्त्रियों, बच्चों तथा विदेशियों को मताधिकार नहीं था। लोकतंत्र प्रणाली कुछ इस प्रकार की थी कि एक मतदाता सिपाही भी था, न्यायाधीश प्रशासी सभा का सदस्य भी होता था। प्रायः प्रत्यक्ष लोकतंत्र आधारित सरकारें भीड़ तंत्र की और झुक जाती थीं।

प्रश्न 11.
लोकतंत्र में वयस्क के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मताधिकार का अर्थ है, मत देने का अधिकार। वयस्क मताधिकार प्रणाली के अनुसार लोकतंत्रीय देशों में प्रत्येक उस नागरिक को मतदान का अधिकार दिया जाता है, जो एक निश्चित आयु सीमा को पार करके वयस्क हो चुका है। व्यस्क मताधिकार देते समय जाति, धर्म, भाषा या लिंग आदि का भेदभाव नहीं किया जाता। लोकतंत्रीय देशों में वयस्क मताधिकार का बहुत महत्त्व है। लोकतंत्र का मुख्य आधार समानता है, और वयस्क मताधिकार में सभी को समान समझा जाता है। इससे सभी नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा प्राप्त होती है, और उनमें आत्मश्विास तथा स्वाभिमान जागृत होता है।

प्रश्न 12.
निर्वाचन आयोग के दो कार्य बताइए।
उत्तर:
चुनाव आयोग के दो कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. मतदाता सूची तैयार करता
  2. निष्पक्ष चुनाव कराना।

प्रश्न 13.
निर्वाचन व्यवस्था में तीन प्रस्तावित सुधार बताइए।
उत्तर:

  1. निर्वाचन की घोषणा तथा निर्वाचन प्रक्रिया पूर्ण होने तक मंत्रियों द्वारा सरकारी तंत्र के प्रयोग पर पाबन्दी।
  2. निर्वाचन से पूर्व अधिकारियों की नियुक्ति व स्थानान्तरण पर प्रतिबन्ध।
  3. मतदाता पहचान पत्र के प्रयोग की अनिवार्यता।

प्रश्न 14.
भारत में मतदाता की योग्यताएँ क्या हैं?
उत्तर:
मतदाता की योग्यताएँ –

  1. वह भारत का नागरिक हो
  2. वह 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो
  3. उसका नाम मतदाता सूची में हो

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था के गुण तथा दोषों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
देश के शासन में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए जिस चुनाव प्रणाली का प्रयोग किया जाता हैं, उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली कहते हैं। इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को उनकी जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व देना है। इसके निम्नलिखित गुण हैं –
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के गुण –

1. प्रत्येक वर्ग या दल को उचित प्रतिनिधित्व:
इस प्रथा के अनुसार समाज का कोई भी वर्ग या देश का कोई भी दल प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं रहता। जिस वर्ग या दल के पीछे जितने मतदाता होते हैं, उसको उसी अनुपात से विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व मिल जाता है।

2. अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा:
इस प्रणाली में अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व मिल जाता है।

3. कोई वोट व्यर्थ नहीं जाता:
इस प्रणाली के अधीन प्रत्येक मत गिना जाता है। यदि कोई उम्मीदवार सफल नहीं होता तो उसके मत दूसरे उम्मीदवारों को हस्तान्तरित कर दिए जाते हैं, और इस प्रकार कोई भी मत व्यर्थ नहीं जाता।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के दोष –

  1. यह प्रक्रिया जटिल हैं। मतदाता के लिए अपने मत का उचित प्रयोग करना कठिन है।
  2. बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण जनता का अपने प्रतिनिधित्व से सीधा सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाता है।
  3. इस प्रणाली में प्रत्येक वर्ग के प्रतिनिधि विधान मंडल पहुँचकर अपने-अपने वर्गीय हितों को महत्त्व देते हैं, जिससे राष्ट्रीय हितों की हानि होती है।

प्रश्न 2.
चौदहवीं लोकसभा में विभिन्न दलों की स्थिति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
चौदहवीं लोकसभा में दलों की स्थिति (मई 2005 ई.)
Bihar Board Class 11 Political Science Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व Part - 2 Image 1

प्रश्न 3.
भारत में चुनाव आयोग के अधिकार एवं कार्य क्या है?
उत्तर:
निर्वाचन आयोग के अधिकार एवं कार्य-चुनाव व्यवस्था लोकतान्त्रिक प्रणाली का प्राण है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारतीय संविधान में एक ऐसे सांविधानिक आयोग की स्थापना की गई है, जिसका प्रमुख कार्य भारतीय संघ के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा, राज्यसभा एवं भारतीय संघ के सभी राज्यों के विधान मंडलों के चुनाव संपन्न कराना है।

इसी सांविधानिक आयोग को निर्वाचन आयोग के नाम से जाना जाता है। निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्त से संबधित व्यवस्था अनुच्छेद-324 में की गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की अवधि तथा अन्य आयुक्त का 6 वर्ष या 62 वर्ष के लिए की जाती है। आयोग निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन मतदाता सूची तैयार करना, राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना एवं चुनाव करवाना है।

प्रश्न 4.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से आप क्या समझते हैं? लोकतंत्र में इसके महत्त्व की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सार्वभौम वयस्क मताधिकार:
लोकतंत्र में जनता ही शासन का आधार होती है। जनता के मत से सरकार चुनी जाती है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का अर्थ यह है कि मत देने का अधिकार बिना जाति, धर्म, वर्ग अथवा लिंग भेद किए, सभी वयस्क नागरिकों को दिया जाना चाहिए। इसमें शिक्षा या सम्पत्ति आदि की कोई शर्त नहीं होती है। 1988 ई. तक भारत में वयस्कों की आयु 21 वर्ष परन्तु एक संशोधन के द्वारा अब यह 18 वर्ष कर दी गयी है।

वयस्क मताधिकार का लोकतंत्र में महत्त्व –

1. मानव स्वतन्त्रता की रक्षा का एक उपाय सभी नागरिकों को मताधिकार देना है। लास्की का कहना है-“प्रत्येक वयस्क नागरिक का अधिकार है वह यह बतलाए कि शासन का संचालन किन लोगों से कराना है।” इस प्रकार प्रजातंत्र में वयस्क मताधिकार मिलने से समाज के प्रत्येक नागरिक राजनीतिक जागरुकता बनाए रखते हैं। सरकार पूरे समाज के कल्याण के लिए बाध्य होती है।

प्रश्न 5.
भारत में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किस प्रकार चुनाव प्रक्रिया को हानि पहुँचाता है? इसे दूर करने के कोई दो सुझाव दीजिए।
उत्तर:
भारत में चुनाव के समय सत्ता दल द्वारा सांकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया जाता है। निर्वाचन से ठीक पहले महत्त्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में मनमाने ढंग से व्यापक संख्या में अधिकारियों का स्थानान्तरण किया जाता है, जिससे सत्तारूढ़ दल को मदद मिल सके। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के मंत्री सरकारी कार्य के नाम पर चुनाव के लिए दौरे तथा सरकारी पद व सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करते हैं।

सुधार:
सरकारी मशोनरी का दुरुपयोग रोकने के दो प्रमुख सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. चुनाव की घोषणा से लेकर चुनावों के परिणाम घोषित होने तक की अवधि में मंत्रियों के सभी प्रकार के सरकारी दौरों पर प्रतिबन्ध लगाया जाए।
  2. निर्वाचन से ठीक पहले सरकार द्वारा अधिकारियों के स्थानांतरण व नियुक्तियों पर रोक लगा दी जाए।

प्रश्न 6.
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का क्या अर्थ है? क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की किन्हीं दो विशेषताओं तथा किन्हीं दो सीमाओं की व्याख्या कीजिए। अथवा, बहुलवादी निर्वाचन व्यवस्था के दो गुण तथा दो दोषों का परिक्षण कीजिए।
उत्तर:
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व-इस व्यवस्था को सर्वाधिक वोट से जीत व्यवस्था भी कहते हैं। इस व्यवस्था में पूरे देश को प्रादेशिक क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। ये निर्वाचन क्षेत्र लगभग बराबर-बराबर आकार में होते हैं। उम्मीदवार में से निर्वाचक अपनी पसन्द के उम्मीदवार को मत देता है, और इस प्रकार जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं वह विजयी घोषित किया जाता है। इस व्यवस्था में यह आवश्यक नहीं है कि विजयी उम्मीदवार को आधे से अधिक मत मिले। केवल उसे अन्य उम्मीदवारों से अलग-अलग प्रत्येक से अधिक मत मिलना आवश्यक होता है। क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के चार प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

  1. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का आकार छोटा होता है। अत: मतदाताओं और प्रतिनिधि में सम्पर्क बना रहता है।
  2. निर्वाचन क्षेत्र छोटा होने के कारण खर्च भी कम होता है।
  3. यह प्रणाली सरल है। मतदाता एक मत का ही प्रयोग करता है। मतों की गिनती करना भी आसान होता है।
  4. निर्वाचन क्षेत्र छोटा होने के कारण संसद में प्रत्येक क्षेत्र के हितों का प्रतिनिधित्वं होता रहता है। राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ स्थानीय हितों की भी पूर्ति होती रहती है।

क्षेत्रीय अथवा बहुलवादी प्रतिनिधित्व के दो दोष (सीमाएँ) –

  1. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व स्पष्ट तथा सही ढंग से लोगों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करता।
  2. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व या प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की सोच तथा आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सर्वाधिक मत जीत प्रणाली के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए। अथवा, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली अथवा क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व प्रणाली में पूरे देश को समान जनसंख्या के अनुपात में विभिन्न क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है, जितने कि सदस्य चुने जाते हैं। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ समय-समय पर बदली जाती हैं। ऐसा जनसंख्या के घटने या बढ़ने के कारण किया जाता है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली की सीटों पर जनसंख्या अनुपात में असमानता होने से निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या असमान है। इसमें सुधार हेतु पुनर्सीमन किया जा रहा है।

क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के गुण –

  1. यह प्रणाली सरल तथा व्यावहारिक है। इस चुनाव प्रणाली में मतदाता को कई उम्मीदवारों में से किसी एक को ही चुनना होता है। मतदाता को अपनी पसन्द का उम्मीदवार चुनने में कोई कठिनाई नहीं होती।
  2. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का एक गुण यह भी है, कि इससे राष्ट्र का आर्थिक विकास होता है।
  3. इस प्रणाली के कारण जनता के हितों की रक्षा होती है। प्रत्येक प्रतिनिधि एक राजनीतिज्ञ होता है । वह देश की राजनीति में अपनी रुचि रखता है, और दोबारा चुने जाने के उद्देश्य से अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता के हितों की पूर्ति कराता है।
  4. राष्ट्रीय एकता में वृद्धि होती है। प्रतिनिधि राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर कार्य करते हैं।
  5. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति उत्तरदायी होता है। यदि प्रतिनिधि जनता के हित में कार्य नहीं करता है, तो जनता अगले चुनाव में उसे अपना समर्थन नहीं देती। इस भय के कारण प्रतिनिधि अपने उत्तरदायित्व को पूरा करने का प्रयास करते रहते हैं।
  6. इस प्रणाली में मतदाता और प्रतिनिधि के बीच सीधा सम्पर्क बना रहता है। साधारणतया एक निर्वाचन क्षेत्र मे एक प्रतिनिधि चुना जाता है। इसमें मतदाता अपनी शिकायतों को अपने प्रतिनिधि तक आसानी से पहुंचा सकता है, और प्रतिनिधि उन शिकायतों का निराकरण करता है।
  7. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों पर आधारित है। लोकतन्त्र का प्रमुख सिद्धान्त है कि सभी मनुष्य समान हैं। किसी के प्रति भी जाति, धर्म, लिंग, वर्ण या नस्ल आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
  8. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के पक्ष में एक तर्क यह भी कि इसमें प्रतिनिधि मंत्रिमंडल का निर्माण आसानी से कर लेते हैं।
  9. यह प्रणाली कम खर्चीली है, क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र अधिक बड़ा होता। उम्मीदवारों को अपने चुनाव प्रचार में अधिक पैसा खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के दोष –

  1. इस प्रकार की प्रणाली में यह दोष है, कि प्रतिनिधि राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा अपने क्षेत्र के हितों पर अधिक ध्यान देता है। इस प्रकार राष्ट्रीय हितों की अवहेलना होने लगती है।
  2. मतदाताओं की पसन्द सीमित हो जाती है, क्योंकि उम्मीदवार उसी निर्वाचन क्षेत्र से होते हैं, और यदि उनमें कोई भी योग्य उम्मीदवार नहीं है, तो भी मतदाता को उन्हीं में से एक को मत देना होता है।
  3. मतदाताओं की आवश्यकताओं और हितों में भिन्नता होती है। इस कारण एक प्रतिनिधि के लिए यह संभव नहीं कि वह सभी के हितों का प्रतिनिधित्व कर सके।
  4. इस प्रणाली में अल्पसंख्यकों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता।
  5. इस प्रणाली का एक दोष यह भी है, कि इसमें उम्मीदवार सभी वर्गों का मत प्राप्त करने के लिए झूठे आश्वासन देने लगते हैं।
  6. मतदाताओं को भ्रष्ट किए जाने की संभावना रहती है।

प्रश्न 2.
व्यावसायिक प्रतिनिधित्व प्रणाली किसे कहते हैं? उसके गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक प्रतिनिधित्व प्रणाली-प्रादेक्षिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को त्रुटिपूर्ण मानते हुए कुछ राजनीतिशास्त्रियों ने विकल्प के रूप में व्यावसायिक या प्रकार्यात्मक पद्धति का सुझाव दिया है। व्यावसायिक प्रतिनिधित्व का आधार पेशा या व्यवसाय होता है, न कि प्रादेशिक क्षेत्र। एक ही व्यवसाय में लगे लोगों के हित एक समान होते हैं, न कि एक प्रदेश में रहने वाले लागों के। श्रमिकों का प्रतिनिधित्व श्रमिक, वकीलों का प्रतिनिधित्व वकील, डॉक्टरों का प्रतिनिधित्व डॉक्टर, किसानों का प्रतिनिधित्व किसान तथा व्यापारियों का प्रतिनिधित्व व्यापारी ही करें तो देश में सच्चा लोकतन्त्र स्थापित होगा। व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के गुण –

  1. यह प्रणाली क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व प्रणाली के दोषों को दूर करती है। इस प्रणाली से चुने गए प्रतिनिधियों वाला विधानमण्डल वास्तव में लोगों के विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व करेगा।
  2. गिल्ड समाजवादी कोल का कथन है, कि “वास्तविक लोकतंत्र एक सर्वशक्तिमान प्रतिनिधि सभा में संगठन में पाया जाता है।” उयुग्वी ने कहा है कि “विभिन्न गुटों को प्रतिनिधित्व प्रदान करके जन इच्छा को उपयुक्त अभिव्यक्ति प्रदान की जा सकती है।”
  3. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व में क्योंकि प्रतिनिधि व्यवसाय के आधार पर चुने जाते हैं, अतः इसमें अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का प्रश्न नहीं होता।
  4. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व प्रणाली एक व्यावहारिक प्रणाली है। यदि निम्न सदन के प्रतिनिधि प्रादेशिक प्रतिनिधित्व के आधार पर चुने जाएँ तो सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा।

व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के दोष –

  1. इसके फलस्वरूप राष्ट्रीय विधायिका वर्गीय और ‘विशेष हितों की सभा बन जाएगी और ये प्रतिनिधि राष्ट्रीय हितों का उचित ध्यान नहीं रखेंगे।
  2. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व सामाजिक गुटों की स्वायत्तता पर अधिक बल देता है, जो राज्य के सर्वाच्च सत्तात्मक प्रधिकरण के लिए चुनौती बन जाती है।
  3. राष्ट्रीय एकता को हानि पहुँचती है।
  4. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व से आर्थिक पक्ष का प्रतिनिधित्व तो ठीक-ठाक हो जाता है परन्तु मानव जीवन के अन्य पक्षों की अवहेलना होती है।

प्रश्न 3.
भारत के विगत 14 आम चुनावों के दौरान मतदाताओं के प्रतिमानों व रुझानों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विगत चौदह आम चुनावों के दौरान भारतीय मतदाताओं के द्वारा मतदान व्यवहार के जो प्रतिमान व रुझान प्रकट हुए हैं, उनका विवरण इस प्रकार है – मतदाताओं के निर्णय अपने सामाजिक समूह, दीर्घव्यवस्था की दशा, दल का नेतृत्व करने वाले नेताओं तथा दल की छवि, चुनाव अभियान तथा राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान देते हुए मतदान किया गया है। भारतीय मतदाता के बारे में जो प्रारम्भ में आशंकाएँ प्रकट की गयी थीं उन्हें मतदाता ने निर्मूल सिद्ध किया और लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करते हुए भारतीय मतदाता ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया है। समय के साथ निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका और उनका भाग्य अन्धकारमय बना है।

1951-52 ई. से लेकर 1969 ई. तक पहले आम चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया है। 1971 ई. में इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व और उनके द्वारा दिए गए ‘गरीबी हटाओं’ के नारे का सम्मान करते हुए कांग्रेस (ई) को भारी बहुमत से चुनाव जिताया। 1977 ई. में इन्दिरा गाँधी की नीतियों को ठुकराते हुए भारतीय मतदाता ने जनता पार्टी को सत्तारूढ़ किया परन्तु उसके घटक दलों में एकता और समन्वय की भावना न रहने के कारण 1980 ई. में भारतीय मतदाता ने फिर से राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखते हुए श्रीमती इन्दिरा गाँधी को कांग्रेस (ई.) को भारी बहुमत से चुनाव जिताया।

1984 ई. में इन्दिरा गाँधी की हत्या से उत्पन्न सहानुभूति और भ्रष्टाचार समाप्त करने की आशा में राजीव गाँधी को पूर्ण बहुमत दिया। इसके बाद से स्थानीय हितों की उपेक्षा से नाराज होकर भारतीय मतदाता किसी एक दल को पूर्ण बहुमत न देते हुए गठबन्धन का जनादेश देता आया है। 1989, 1991, 1996, 1998, 1999,2004 ई. इन सभी आम चुनावों में भारतीय मतदाता का सम्मान गठबन्धन सरकारों की और उन्मुख हुआ है। स्वतंत्र निर्दलीय उम्मीदवारों की ओर मतदाताओं का झुकाव अब बहुत ही कम रह गया है।

प्रश्न 4.
भारत की निर्वाचन पद्धति के दोषों का वर्णन करते हुए उनके सुधार के उपाय बताइए।
उत्तर:
भारत में अब तक 14 आम चुनाव हो चुके हैं। यद्यपि ये सभी चुनाव सामान्यतः शान्तिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुए परन्तु कुछ ऐसी त्रुटियाँ आ गयी हैं, जिनके कारण जनता की आस्था चुनावों में कम होने लगी है। अतः प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान चुनाव में सुधार की ओर आकर्षित हुआ है। 1983-84 ई. में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त श्री आर. के त्रिवेदी ने चुनाव प्रक्रिया की येकमियाँ बताई। एक चुनाव में धन का बढ़ता प्रयोग, दो फर्जी मतदान, तीन चुनाव में बाहुबल का प्रयोग और चार मतदान केन्द्रों पर कब्जा।

1990 में दिनेश गोस्वामी समिति ने निम्नलिखित सुझाव दिए –

  1. मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने की घटनाओं को रोकने के लिए पुनर्मतदान कराया जाए।
  2. आरक्षित सीटों के लिए रोटेशन पद्धति अपनायी जाए।
  3. सभी मतदाताओं को फोटो पहचान पत्र दिए जाए।
  4. चुनाव याचिकाओं का शीघ्र निपटारा किया जाए।
  5. इलेक्ट्रोनिक मतदान मशीनों का प्रयोग किया जाए।
  6. किसी भी रिक्त स्थान के लिए 6 माह के अन्दर उपचुनाव कराया जाए।

विविध पक्षों द्वारा दिए गए सुझावों में से अधिकांश स्वीकार किए जा चुके हैं परन्तु अभी भी चुनाव प्रक्रिया में अनेक त्रुटियाँ हैं, और इन त्रुटियों का उपचार निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

(क) FPTP के स्थान पर PR पद्धति अपनायी जानी चाहिए तभी राजनीतिक दलों को प्राप्त जन समर्थन और प्राप्त सीटों की संख्या में अन्तर को समाप्त किया जा सकता है।
(ख) चुनाव में धन के अत्यधिक प्रयोग पर अंकुश लगाना जरूरी है। इसके लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं –

  • राजनीतिक दलों के आय-व्यय की विधिवत जाँच हो।
  • संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों।
  • चुनाव अवधि में सार्वजनिक संस्थाओं को अनुदान देने पर रोक लगे।
  • चुनाव खर्च राज्य सरकार द्वारा वहन करना।

(ग) चुनाव में बाहुबल और हिंसा का प्रयोग रोकने के कदम उठाये जाएं। इसके लिए संबधित राज्य से बाहर के राज्यों की पुलिस और अर्धसैनिक बल पर्याप्त मात्रा में बुलाए जाएँ। हथियारों के लाने ले जाने पर प्रतिबन्ध लगाया जाए।

(घ) जाली मतदान रोकने के लिए फोटो पहचान पत्र अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए।

(ङ) चुनाव में अपराधी तत्वों को खड़ा होने से रोकने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में परिवर्तन किया जाना चाहिए।

(च) निर्दलीय उम्मीदवारों की बड़ी संख्या को कम करने के लिए 1996 में जमानत की राशि दस गुना बढ़ा दी गयी है।

(छ) सत्तादल द्वारा प्रशासनिक तन्त्र का दुरुपयोग रोकने के लिए चुनाव शुरू होने के दिन से लेकर नयी सरकार का गठन होने तक कामचलाऊ सरकार कार्य करे।

(ज) निर्वाचन याचिकाओं की सुनवाई शीघ्रता से की जानी चाहिए।

(झ) प्रत्येक 10 वर्ष बाद निर्वाचन क्षेत्रों का अनिवार्य तौर पर परिसीमन कराया जाए।

प्रश्न 5.
लोकतंत्र में चुनाव क्यों आवश्यक है? चुनाव सुधार के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को लिखें।
उत्तर:
लोकतंत्र में लोग दो तरह से शासन में भागीदारी निभाते हैं। एक प्रत्यक्ष ढंग से और दूसरा अप्रत्यक्ष ढंग से अप्रत्यक्ष ढंग से लोकतंत्र में भागीदारी अपने प्रतिनिधि के माध्यम से निभाते हैं। लोग अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते है। चुने गये प्रतिनिधि ही शासन और प्रशासन को चलाने में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। सुयोग्य प्रतिनिधि ही लोगों की इच्छा, आवश्यकता और समस्याओं को भली भाँति समझ सकते हैं, इसलिए लोकतंत्र में चुनाव आवश्यक है।

लोकतंत्र में चुनाव में हमेशा गड़बड़ी होती रही है या गड़बड़ी होने की आशंका बनी रहती है। भारत भी इससे अछ्ता नहीं है। भारत में 1951 में प्रथम आम चुनाव हुए तब से लेकर आज तक चुनावों में व्यापक धांधली हुई है, जो लोकतंत्र को कलंकित किया है। इसलिए भारत सरकार चुनाव सुधार के लिए कई प्रयास किये हैं। इसके लिए कई समितियाँ भी बनाई जैसे-तारा कुण्डे समिति, 1975 गोस्वामी समिति 1990, आदि।

इसके अलावे भी चुनाव सुधार के लिए सरकार द्वारा अनेक उपाय किये हैं जैसे – 1983 ई. में चुनाव आयोग सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठक की जिसमें निष्पक्ष चुनाव पर सहमती बनी, 1996 में जन प्रतिनिधि कानून में कई संशोधन किए 1997 में राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी नियमों में परिवर्तन किया। 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश जारी किया की अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोका जाय। न्यायालय के निर्देश के बाद सरकार ने यह निर्णय किया कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद कोई भी पार्टी कोई ऐसी घोषणी या निर्देश नहीं जारी कर सकता है, जिसे निष्पक्ष चुनाव होने में समस्या उत्पन्न हो सकती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रपति चुनाव में उत्पन्न विवादों को कौन निपटाता है?
(क) उपराष्ट्रपति
(ख) चुनाव आयोग
(ग) उच्चतम न्यायालय
(घ) प्रधानमंत्री
उत्तर:
(ग) उच्चतम न्यायालय

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य चुनाव आयोग का नहीं है –
(क) मतदाता सुची तैयार करना
(ख) पंचायत चुनावों का पर्यवेक्षण करना
(ग) विधान सभा में निर्वाचन की व्यवस्था करना
(घ) राज्यसभा के उम्मीदवारों का नामांकन की जांच करना
उत्तर:
(ख) पंचायत चुनावों का पर्यवेक्षण करना

प्रश्न 3.
निम्न में से उस व्यक्ति का नाम बताइए जिसने लोकसभा का विश्वास मत प्राप्त किये बिना ही प्रधानमंत्री पद पर कार्य किया।
(क) चरण सिंह
(ख) चन्द्रशेखर
(ग) वी. पी. सिंह
(घ) मोरारजी देसाई
उत्तर:
(घ) मोरारजी देसाई

प्रश्न 4.
लोकतंत्र जनता का जनता के लिए और जनता की सरकार है, किसने कहा है?
(क) अब्राहम लिंकन
(ख) राजेन्द्र प्रसाद
(ग) नेहरू
(घ) महात्मा गाँधी
उत्तर:
(क) अब्राहम लिंकन

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View

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Bihar Board Class 11 English The Scientific Point of View Textual Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions :

The Scientific Point Of View Questions And Answers Bihar Board Question 1.
The people of older generation or the rural people cover their head with a towel when they have to walk in the scorching sun. Why ?
Answer:
The people of older generation or the rural people cover their head with a towel when they have to walk in the scorching sun because they find some relief. They feel some cold on their head even in scorching sun. It is because evaporation takes place very fast in scorching sun through head. Water as well as minerals from the body passes out in the process of evaporation through head. If people cover their head with towel the process of evaporation is minimised and they do. not lose their energy very fast.

Scientific Point Of View Questions And Answers Bihar Board Question 2.
What do you understand by science ? What are the basic tools of Science.
Answer:
Science is an arranged and systematic knowledge of a specific subject. If one knows systematically about everything of a subject, he may be able to bring something new in that particular science. If he is an expert is natural science, he may invent something new. The basic tools of science are

  1. one’s own growing mind
  2. hobby to experiment by combining one thing with another
  3. hobby to search new thing
  4. reading the books on the subject by eminent authors and scientists
  5. the critical and scientific mind.

The Scientific Point Of View Bihar Board Question 3.
What is scientific point of view ? Is science different from scientific point of view ?
Answer:
Scientific point of view means the ideas which are critical and experimented. They are applied to the events of daily life. They are supported by reasoning. They are not mere hypothesis or prediction. They are based on the methods of science which lead to the success, development and easy going life for the human being.

The difference between science and scientific point of view is that science gives us inventions, discovery for the easy going life. It creates miracles with its inventions like computer, television, mobile phone, aeroplane etc. The scientific point of view is just an idea based on experimental truth and critical mind. A man having scientific point of view may not invent anything in his life. But his ideas are clearcut and reasonable. But a scientist can be recognised only with his inventions, discovery or scientific theories.

B. 1.1. Complete the following sentences :
Answer:

  1. Driving in a motor ca- is the example of the benefits by The application of science.
  2. An example of the impact of science on our opinion is inculcation of scepticism.
  3. The object of the author in this essay is to make man take things from scientific point of view.
  4. The best utilisation of science is to apply it to the events of daily life.
  5. The two charges against science are being deaf to moral consideration and for interfering in ethical problem which do not concern them.

B. 1.2. Answer the following questions briefly :

The Scientific Point Of View Pdf Bihar Board Question 1.
Name two ways in which science affects average man and woman ?
Answer:
Science affects the average man and woman in two ways, in the first instance it allows them to use its inventions and discoveries; secondly it influences their opinion. Man now uses a car instead of horse-drawn carriage. He approaches a physician or a surgeon in case of illness and not a witch doctor. And he believes that the earth is round, the heavens are empty and that monkeys are the ancestors of men.

The Scientific Point Of View Prose Bihar Board Question 2.
What do you understand by scientific point of view ? Can it help us in our daily life ?
Answer:
Scientific point of view is far bigger for the human mind than substitution of one set of beliefs for another or implanting disbelief regarding accepted opinions. Scientific point of view can help us if we are to control our own and one .’mother’s actions, in the same way as we are learning to control nature. The scientific point of view will help us. It will be applied to the events of life.

The Scientific Point Of View Summary Bihar Board Question 3.
What does ‘impartiality’ mean in connection with scientific stand Points ?
Answer:
The characteristics of scientific stand point to make efforts to be truthful. It is but natural that due to its truthfulness it must be impartial. We can understand it through the following example by comparing this with the in partiality maintained in legal matter. A good judge will try to be impartial between. Mr. John Smith and Mr. Chang Sing i.e. to both the parties in the case, where as a good scientist will be impartial between Mr. Smith, a tape worm and the solar system. It means he will treat all of them, impartially.

The Scientific Point Of View Is Written By Bihar Board Question 4.
How impartiality in scientific point of view different from point of view
Answer:
The impartiality shown in scientific point of view is different from legal point of view. Both have got their own characteristics and qualities.

Haldane has very deeply studied the outcome of both the impartialities. As regards impartiality his statement is worth quoting : “a good judge will try be impartial between Mr. John Smith and Mr. Chang Singh. A good scientist will be impartial between Mr. Smith, a tape worm and the Solar System. “The implication is clear. A good judge will not allow his specific nationality to interfere with in the legal examination of a person who belongs to his country and of another person who is a foreigner. He will eschew his sympathy and pass a judgement strictly in accordance with law.

But a scientist surpasses the impartiality of judge. He makes no distinction between a tape worm and the solar system. The former is almost a worthless insect, the latter is the most awful system of the universe making even a scientist. Look small and significant. But the scientist studies both of them with equal attention and care. The scientific view is therefore impartial.

Thus the scientific point of view “impartiality is different from legal point of view impartiality. Scientist studies both of the’m with equal attention.

Class 11 English What I Require From Life Exercise Bihar Board Question 5.
What leads the scientists to pride and humanity ?
Answer:
Being engaged in search that few people are capable of conducting a scientist develops pride in his knowledge and distinction. This knowledge grows from year to year and in one are at least a scientist surpasses every other. Researches in areas that are vast such as space and solar system also give a scientist a sense of self-importance.

Class 11 English Chapter 5 Question Answer Bihar Board Question 6.
What makes it difficult to the scientist to understand his mind ?
Answer:
Scientist’s carefully studying of the things as a statue or a symphony and his awe for the solar system, which led his prodecessors either to worship its constituent or at least regard them as inscrutable servants of the almighty too exalted for human comprehension. Such an attitude leads the scientist to a curious mixture of pride and humility. The system turns out to be a group of bodies rather small in comparison with many of their neighbours, and executing their movements according to simple and easily intelligible laws. But he himself is a rather abberant member of the same order as the monkey, while his mind is at the mercy of a member of chemical processes in body, which he can understand but little and control hardly at all. So this makes it difficult to the scientists to understand his mind.

Question 7.
What do you understand by “God’s eye-view” ? When or how may scientific point of view be called “God’s eye-view” ?
Answer:
To a scientist all phenomena is of the same emotional level. Therefore whether any thing is individually small or big it is the same to scientist. For instance, to a scientist a tape worm is not contemptible nor is solar system aweinspiring. In one case he has to overcome his contempt and in another he has to transcend his fears. And in both cases there is a check of one’s feeling.

So far God’s love and compassion is concerned it is fairly distributed on the universe. To God a beggar is as much important as a king though they belong to two different social strata. Thus in this respect the scientific point of view is comparable to God’s eye-view.

Question 8.
Can science determine what is right or wrong ?
Answer:
Science cannot determine what is right and wrong. It is not possible for it to do so. It can work out the consequences of various actions, but it cannot pass judgement on them. The bacteriologist can simply express his view regarding the ill effects of pollution of public water supply. He may compare the deaths caused by water-pollution with letting of a bomb is the public street. But he is no better equipped than any one else in of the knowledge he has gained, to determine whether these two acts are equally wrong. Hence science cannot determine what is right or wrong.

B. 2.1. Complete the following sentences :
Answer:

(a) The average man dwells on the emotional and ethical side of a case rather than an facts
(b) The scientists are interested in finding out the truthful and impartial facts of objects /nature.
(c) Negroes are not interior to American because they are very laborious and enjoys the equal rights.
(d) The death-rate of the Negroes exceeds the birth rate is southern towns, and all through the north.
(e) The Negroes’ original home is the west Coast of Africa.
(f) The birth-rate of the Negroes exceeds the death-rate in the country districts of the southern states.
(g) The Negroes live healthy and breed rapidly in southern states cotton fields.
(h) We do not care whether our beliefs are rational when we are emotional about a subject.
(i) According to the pre-christian attitude, a case of disease is a punishment for a sin.
(j) According to the scientists, a case disease is a manifestation of a natural law.
(k) The first step in return to nature would be to discard clothes and to invite pneumonia.
(l) In comparison to the savage men, the life expectancy of the uncivilized men is shorter.

B. 2.2. Answer the following questions briefly :

Question 1.
How is the tendency of the average man different from that of the scientists ?
Answer:
An average man is influenced by emotions and has a moral notion in every case. This leads him to ignore plain facts about things. For example, since the white American dislikes Negroes, he pushes then south wards. And in case of diseases man cares more for his whims and moods than scientific understanding. Formerly people believed that diseases were punishment inflicted by angry Gods.

A scientist attach importance to the Value of systematic study of facts. He tends to be impartial. Whether he works in a laboratory or outside, he subjects a chemical process or a particular object to a strict examination. in the records of the results he is always factual. He is always impartial and truthful in his acts and behaviour. In short the scientific approach places value on systematic study of facts and tends to be impartial. On the other hand the tendency of an age man is controlled by emotions, personal prejudice and normal notions at is why the tendency of the average man different from that of the scientist

Question 2.
Does environment affect the death rate ? Give examples from tin as well as from your surroundings ?
Answer:
Environment plays a dominant role to effect the death rate. It is not necessary that the environment of a particular place will be suitable to the of different places. It depends on their nature and the way they As an example the environment in southern states is more suitable to Negroes than the northern states. As such their birth rate in the southern s in comparatively higher than northern states. Their Haldane narrates that high death rates are due to the fact, in an environment suitable to a white man, they (Negroes) die of consumption and other diseases. Likewise the white man dies on the west coast of Africa, the Negro’s original home.

Question 3.
What does the author mean by “reservoir of diseases germs” ?
Answer:
Negroes lives most unhygienically. They also have a dirty surrounding. They have not followed the methods of modem science. As such they have suffered from a number of.diseases. The author throws light over the infection of diseases. He also explains that certain diseases are prevalent in Negroes. He has further added that these diseases may be transferred to one another by raw emotions of the unreasonable belief than scientific thought

Question 4.
How did the American civil war affect the Negroes ?
Answer:
The American civil war was aimed at to raise’the Negroes’ death rate and lower their birth rate. The purpose was to check their population. Between 1910 and 1920 the number of Negroes in the United States increased as much as it had done in the decade before the civil war. The number of Negroes killed in the civil war far greater than the casualty list of the civil war. It shows the ill-effect of American civil war caused to Negroes.

Question 5.
Jesus Christ’s attitude to disease is close to the attitude of the scientists. How can you say this ?
Answer:
Before Christ people believed that a disease was a punishment from a deity for a sin committed either by that person or any member of the person’s family. Christ did not accept this view. When a blind person was brought before him and people asked “Who is the sinner ? Is it this person or his father on his mother ? Jesus replied. “No body has sinned neither this man nor his parents.

His blindness is simply a manifestation of God’s power. This was a radical view that enabled people to take care of the patient. So long as sickness was considered a result of sin the patient was neglacted attempt was made to please the deity by sacrifice and other rituals. In the modern age the clonical view comes closer to the view of Christ. The present day doctor do not say that disease is manifestation of God’s power, but’ they believe that is manifestation of a natural law.

Question 6.
How will the discarding of cloth affect mankind ?
Answer:
Many people believe that diseases could be prevented by a return to nature. But the author thinks that the first step in a return to nature would be th| discarding of clothes, which would at once increases the morality from pneumonia about a hundred fold. According to the author the phrase “Live according to nature” is quite meaningless. Civilized and savage man, health and sickness are equally parts of nature, some features of civilization are bad for health, but for all that, such statistics as are available show that civilized men live longer than uncivilized.

B. 3. Answer the following questions briefly :

Question 1.
Name the important causes which help civilized men to live longer than the uncivilized ?
Answer:
There are several reasons that help civilized men to live longer than the uncivilized. Research in medicine has developed many vaccines and drugs that can keep a man healthy and free from illness. But because of then casual approach large number of people, mostly uncivilized, fail to improve their conditions; Most of those people are still careless. They neither try to obtain completes medical information the disease they suffer from nor are they regular in taking medicine and proper diet. Individual attention is therefore very important in matters of diseases. A civilized man of a scientific outlook will keep away his personal likes and dislikes and strictly follow medical advice. An uncivilized man cannot determine. What is right and wrong though he can conclude how bacteria causes a disease.

Among such diseases are diptharia, small pox, measles and airbom disease. They require a control over environment which only the government can manage and a civilized man becomes benefitted by following it and seeking assistance of the government.

Thus civilized men live longer than the uncivilized due to their awareness, and following the modem research as well as advice.

Question 2.
Why does the author compare a human body to a system ?
Answer:
Human body is a system obeying quite definite laws, J.B.S. Haldane had a very keen observation of human nature. He was a leading scientist. He iias come to a very right conclusion that human body is just like a system. This can be seen in diabetics. Few diabetics are regular in use of insulin that can alone keep them fit. The author advises diabetics to understand that their physical system can work only when they regularly take injections of insulin. If they are casual in their approach they invite only more troubles. The worst sufferers from diabetes can regain full health and keep themselves indefinately all right if they follow this direction.

Question 3.
Why has the discovery of insuling not made any appreciable difference to the morality in England ?
Answer:
Haldane had disclosed the reality that the discovery of insulin did not make any appreciable difference to the mortality in England. He revealed this fact through a typical example of two diabetic patients. One of them did not bothre to replace her broken syringe and the other neglected her insulin injection because she thought that she would be hospitalised soon, in which case murses would take care of diabetes as well. What is the use of discover) of insulin as the preventive of diabetes for such people. The author observed that most of the pxrple are still careless.

Question 4.
Name the Infection which can effectively be dealth with by public control of water supply.
Answer:
There are certain diseases which are caused by water pollution. Haldane had rightly disclosed the fact that typhoid infection can only be dealt witn adequately by public control of the water supply, which involves no effort by individual citizen. Individual attention is very important in this matter. In a country where typhoid fever is common, it is hard always to drink beer or wine or personally to see that one’s water is boiled and annual vaccination involves a day mild illness.

Question 5.
Name any three airborne diseases.
Answer:
Diphtheria, small box and measles are the three main airborne diseases They are most dreadful and curse to human life. It is fatal too.

Individual efforts is not enough to fight with these diseases. They require a control over environment which the government can manage.

Question 6.
Why does the author demand the general adoption of the scientific points of view ?
Answer:
J.B.S. Haldane, in this essay expresses the need to adopt the scientific point of view in our life. According to the author all phenomena is of the same emotional level to a scientific. Hence whether anything is individually small or big, it is the same to the scientist. For instance, a tape worm is not contemptible nor is solar system awe-inspiring for a scientist.

Mr. Haldane emphasises on the general adoption of the scientific point of view because in its absence human efforts is so largely devoted to conflicts with fellow men, in which one, if not both, of the disputants must inevitably suffer.

Question 7.
Explain the phrase “The rulers of the darkness of this world”.
Answer:
J.B.S. Haldane has used the phrase “the rulers of the darkness of the world” in his essay. The rulers of the darkness of this world is a typical phrase which means the invisible creature, “The Demon”. They are supposed to be the ruler of the darkness. St. Paul has called the demon as the power of the darkness.

C. 1. Long Answer Types Questions :

Question 1.
“Science cannot determine what is right or wrong, and should not try to”. Why does the author say so ? Give reasons.
Answer:
Science can work out the consequences of various actions, but it cannot pass judgement on them. The bacteriologist can simply express his view regarding the ill-effect of pollution of the water supply. He may compare the deaths caused by water pollution with letting of a bomb in the public street. But he is not better equipped than any one else in possession of the knowledge, he has gained to determine whether these two acts are equally wrong.

To a scientist all phenomena is of the same emotional level. Therefore, whether anything is individually small or big it is the same to scientist. For instance, to a scientist a tape worm is not contemptible nor, is solar system awespring. In one case he has to overcome his contempt and in another help has to trenscend his fears. And in both cases there is a check of one’s feeling.

Question 2.
Do you agree with the author’s view that science should not try to determine what is right or wrong ?
Answer:
A scientist’s view and action is to find out the facts. He is curious to work out the consequence of various actions, but at the same time he does not pass on Judgement on them.

Haldane has expressed his opinion on the basis of a close study of the methodology adopted by a scientist, that he cannot and does not determine, “What is right or wrong. He further adds that the scientists should not, even indulge themselves in such activities. They need not bother to know the outcome of what happens with their scientific research. The scientific approach places value on systemetic study of facts and tends to be empartial. To a scientist all phenomena is of the same emotional value. Whether anything is individually. Small or big it is the same to the scientist. For instance, a tape worm is not contemptible nor is solar system awe-spring, to a scientist.

In one case he has to overcome his contempt and in another he has to transcend his fears. In both cases there is a check of one’s feeling. The bacteriologist can simply express his views regarding the ill effects of pollution of the water supply. He may compare the death caused by water pollution with letting of a bomb in the public streets. But he is no better equipped than anyone else in possession of the knowledge, he has gained to determine whether these two acts are equally wrong.

In view of the facts the author comes to the conclusion that science should not try to determine what is right or wrong ?

Question 3.
What do you mean by “ethically neutral” ? Who is ethically natural ? Can science be ethically neutral ?
Answer:
Mr. J.B.S. Haldane in his spirited essay, underlines the real characteristics of a scientist. He narrates on the basis of a close study of the methodology adopted by a scientist by dislosing that a scientist can not determine what is right or wrong. Thus the author has come up with frank statements regarding the nature of science by telling that “Science cannot determine what is right or wrong, that is science is ethically neutral. It occurs immediately after the scientist has compared scientific point of view with that of God’s eye view. Lets people should confuse the scientific point of view with the religious point of view. The learned author adds further that a scientist is prefecdy neutral.

He cited two example to illustrate this. The first example is that of a bacteriolist who, after making a study of the bacteria present in water can say prescisely that it will cause the same number of deaths as can be caused by a bomb. But he can never say which is right or wrong or whether both the methods of killing are equally wrong. The other example is more complex based on the practice of racial discrimination. A white man can drink that he is superior to a Negro, but a scientists can only point out the biological difference between the two. He can also Say clearly that in certain climates a Negro’s family is boosted and in the same climatic pattern a white may find it difficult to survive. Nevertheless the scientist will never share the political views of either. He will restrict himself to pronouncing merely on the basis of biological evidence and nothing else.

Question 4.
Why does the author feel that the discovery of drugs does not protect the people very much ?
Answer:
Haldane feels that the discovery of drugs is not much helpful to protect human life. It may be a preventive measure but not a permanent cure of the diseases. There must be some substantial measures based on scientific reasoning. The cause of typhoid infection is water pollution. As such to deal with public control of water properly would be helpful iti this direction. Diphtheria, measles and smallpox and some other diseases are airborne -diseases and could be stamped out by a public effort.

Such an effort would involve the individual assistance and self-sacrifice of sick persons and their relatives as well as international co-operation. It is impossible until people realize its importance in this direction. The environmental pollution must be dealt with strong will and eo-operation. Then only we may be able to fight with diseases. The use of drungs (Drug medicine) alone can not be much helpful to protect human life from diseases.

Question 5.
What are the findings of the biologists on the Negro problems in America ?
Answer:
Mr. Haldane in his essay has come up with the issue of the findings of the biologists on the Negro problem. The author has wisefully explained this issue. The wite Americans hold that the American Negro is definitely inferior to the white man and should as far as separated from him. Some of them feel that he should enjoy the same right. But the biologists can not dicide it. He can point out that the Negro’s skull is more ape-like than the white’s but his hairless skinless so, and so forth. The biologists also finds that the birthrate of the Negro pollution exceeds the death rate in the country district of southern state’s, where as in the southern towns and all through the north their death is higher to birth rate. Their high death rates are due to the facts that in an environment suitable to white many they (Negro) die of consumption and other diseases. The white man dies on the west coast of Africa in the same way. This place is Negro’s original home.

Question 6.
Who are the real enemies of man and how are they to be conquered ?
Answer:
Man has formed a wrong idea about such misunderstanding. One of his colleagues translated a french paper on chemotherapy, sometimes back. He quoted a phrase “tue par I’ enemi” in reference to a deceased pharmaclogist. According to the author he has inteipreted it that the deceased pharmacologist died of an accidental infection. The author found his version not exactly true , and the corrected it stating German national as the enemy. The idea of pharmacologist’s death due to the action of germ’s seems to be untrue and the real cause might be the action of Germans. It is presumed that scientists take care through their training. Like St. Paul the scientists of today believe that the worst enemies of man are demos, “the power of darkness”, invisible creatures. The difference, however, is that for St. Paul they were devils, where as to the scientists today they are microbes.

Question 7.
Will a return to nature help overcome diseases ?
Answer:
Many persons believe that diseases could be prevented and controlled by a return to nature. It may be correct to some extent but in the age of modem research and invention this theory has lost its importance. The learned author of the essay “The Scientific Point of View” J.B.S. Haldane does not agree to this view. According to him this idea to return to nature is force and far from reality. He further adds that return to nature means to reject putting on cloths which led to unnatural and immatured death from Pneumonia in large number. As such the phrase “Live according to nature” is quite meaningless. Civilized and uncivilized (wild) man, health and sickness, are equally parts of nature. It reflects in this expression as if the author has placed civilized person as a symbol of health and the uncivilized that of sickness. He also realises, that some features of civilization are bad for health. But for all that such statistics as are available, show that civilized men live longer than uncivilized.

Question 8.
“Live according to nature” is quite meaningless. Do you agree with this opinion ? Give reasons.
Answer:
Even in the modem age there are many who believe that man was better when he was not civilized. Therefore they want a reversal of the total process of civilization. They want men to live according to nature. However, Haldane has a serious objection to this slogan. According to him the first step towards adopting this principle would be to give up the wearing of clothes. But this will immediately inflict a’person with pneumonia.

Haldane concedes that there are many things in the modem civilization that are injurious to health. But considering the overall situation, people are better off in matters of health than ever. Therefore “Live according to nature” is a meaningless phrase.

Question 9.
” The study of medicine apart from its scientific basic creates neurotics rather than scientists”. What does the author mean by this ?
Answer:
The author is taking about the effects and result caused by the study of medicine without adopting scientific method. Haldane does not seem to be statisfied with its outcome. He expresses his views that people realize that the germs of diseases are foreigners and much more likely to kill one. Nothing tangible will be achieved unless we should stop thinking in this direction. He narrates that typhoid infection is the result of water pollution and it can be dealth with adequately by public control of the water. Diphtheria, small pox, measles and some other diseases are airboren disease and could be stamped out (eradicated) by public efforts. Individual assistance as well as self sacrifice of sick persons and their relatives would be helpful in solving this problem. International assistance is highly essential too.

Therefore, keeping it jn view the above facts, the study of medicine without the assistance of scientific method will be of no use. To adopt scientific method in the study of medicine would be an idea of a sound mind otherwise it will create nervous illness and the very objective of its usefulness would not be materialised.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs:

Question a.
Should science be given the privilege to decide what is right or wrong ? Give your owh opinions.
Answer:
Science should not be given the privilege to decide what is right or wrong. Science deals with natural phenomena. It thinks human mind works as a result of chemical processes. It does not believe in soul. The whole universe came into being as a big bang. Life on earth evolved through chemical reactions.was not created by God, because there is no God. But man is not a robot. Science cannot decide what makes human beings happy. Human behaviour does not follov’ a set pattern. Science cannot decide what is right or what is wrong. It cannot deci ie what kind of clothes we should wear. It cannot decide whether going to temple is right or wrong. It cannot decide whether helping a man in need is right or wrong. In short science cannot decide what is right or what is wrong.

(b) Is science deaf to moral consideration ? How ? Give examples in favour of your arguments.
Answer:
In theory science is totally deaf to moral consideration. It invents things. It discovers facts. But it is not concerned to what use her discoveries are put to. For example science has discovered how kidneys can be transplanted. But it is deaf to its applications. A man’s kidney may be removed by fraud. Science is not concerned. Science discovered fission of atoms. It was not concerned if nuclear weapons of mass destruction are made. Now science has found a way to clone humans. Now they are happy at their discovery. But they are blind to the consequences this discovery can lead to. They leave this to society and governments to decide. But, since science is not an abstract idea, it is practised by humans. So they do show their concern about moral consideration.

C. 3. Composition :

Write a paragraph in about 100 words on the following:

Question a.
Science and morality
Answer:
Scientists have always tried to avoid getting involved into moral issues. They have been trying to understand the ways of nature and how to control them. The discoveries in old time did not have as far reaching consequences as they do now. Now the world is like a small village. The application of science affects the whole humanity. Now the scientist must keep moral questions in mind. He cannot be amoral. And now we see that scientists do raise moral questions. They raise their voice against use of animals for research. They want that their discoveries should do good to humanity, and are not used immorally.

Question b.
Racial discrimination or apartheid and human rights.
Answer:
God has created all human beings alike. Human dignity demands that they should enjoy equal human rights. But powerful people wherever they are, have created division between man and man. In India it has been practised by powerful upper castes against dalits. In America the African- Americans have been sold and bought as slaves. Though Abraham Lincoln set the Negroes free, still many white Americans look down upon them. They are not allowed to go in many restaurants. In South Africa apartheid was strictly enforced by the government till through the sacrifices and struggle by men like Nelson Mandela it was done away with. Racial discrimination or apartheid is a gross violation of human rights.

Question c.
How far the scientific point of view has been adopted in India ?
Answer:
India has entered the 21st century but we have adopted scientific point of view only to a small extent. Even today people believe in stars and astrology. Marriages are fixed after the horoscopes of the boys and girls have | been matched. Astrologers are consulted for most favourable time for auspicious functions. Even Prime Ministers have taken oaths of their offices | in consultations with astrologers and gurus, pillions of people still consult ’ witch doctors to treat ailments. No aspect of our life is untouched by unfounded beliefs and unscientific attitude. Even some TV channels have begiun to invite astrologers to foretell future and answer the questions of the viewers.

D. Word Study :
D. 1. Dictionary Use

Ex. 1. Correct the spellings of the following words:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View 1
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View 2

Ex. 2. Look at the following examples:

It is foolish to think that the outlook ……………. (Para-2) …………….

which has already banished under-feeding as a cause of ill-health (Para-II)

You sec that in the first example the word outlook is made of two words out and look. In the second example, the word under-feeding is made of under and feeding and ill-health of ill and health. These are called compound words. The less frequently used compound words have hypen between the words which compound together where as the more frequently used can be used without any hyphen.

Pick up the compound words from the lesson and look up a dictionary to find out their meanings.
Answer:
omnilbus – bus
horse-drawn – pulled by a horses
automatic pistol – One that continues to fire
standpoint – an opinion
truthful – saying only what is true
careful – with care
truthful – saying only what is true
carefully – with care
God’s eye-view – the attitude of being completely unbiased and neutral
bacteriologist – an expert on bacteria or germs
death-rate – the number of death per year per thousand
birth-rate – the number of birth per year per thousand
water-borne – born in water
under-feeding – having little food to eat
ill-health – poor health
public effort – the effort made by the people
self-sacrifice – self-negligence
co-operation – to work mutually
human effort – effort made by mankind
scepticism – disbelief

D. 2. Word-formation :

Look at the following examples:

Preventive medicine could be made into the moral equivalent of war. A colleague of mine was recently translating a French paper …………………

You see that in the first example, adjective preventive is derived from the verb prevent in the second example, Present Participle translating is derived from the verb translate. In fact, a number of words can be derived from a verb as illustrated below.

apply (v) : applied (adj) application (n) appliance (n) applicable (adj.) applicability

Ex. Write as many words derived from the following verbs as possible as illustrated above.
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View 3
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View 4

D. 3. Word-meaning :

Ex. 1. Match the words give in Column-A with their meanings given in Column-B.
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View 5
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View 6
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View 7

Ex. 2. Read the lesson carefully and find out the sentences in which the following words have been used. Then make sentences using them first an nouns and then as adverbs:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View 8
Answer:
He or she benefits by its application, …………………. (Para-2)
…………………. or a shell in place of a danger or a battle-axe. (Para-1)
…………………. the point of view that prevails among research workers, (Para-2)
…………………. but it cannot pass judgement on them. (Para-5)
…………………. as many deaths as letting of a bomb in the public street. (Para-5)
The enemies of science alternately abuse its exponents …………………. (Para-5)
…………………. which interest the scientist. (Para-6)
…………………. but his hairless skin less so, …………………. (Para-6)

Sentences:

benefits (n) — It will be to your benefit to arrive early.
(adv.) — You should spend the money on something that will benefit much everyone.
place (n) — You cannot be in two places at once.
(adv.) — The parking areas in the town are few, but strategi-cally placed.
view (n) — We take the view that it would be wrong to interfere.
(adv.) — The design of the house was viewed as highly original.
pass (n) — The pass mark is 50 per cent.
(adv.) — He speaks passably good English.
bomb (n) — Hundreds of bombs were dropped on the city.
(adv.) — They were bombing down the road at about 80 miles an hour.
abuse (n) — He was suspended on charges of corruption and abuse of power.
(adv.) — Taking wine he behaved abusively.
interest (n) — I read with interest.
(adv.) — Interestingly, there are very few recorded cases of such attacks.
skin (n) — Th snake sheds its skin once a year.
(adv.) — The dead animals are skinned off quickly.

D. 4. Phrases :

Ex. 1. Read the lessons carefully and find out the sentences in which the following phrases have been used. Then use them in sentences of your own :
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 5 The Scientific Point of View 9
Above mentioned phrases are used in the lesson in the following lines :

…………….. driving in a motor-car or omnibus instead of a horse-drawn vehicle.
…………….. being treated for disease by a doctor or surgeon rather than a witch ……………..
…………….. a shell in place of a dagger or a battle-axe.
…………….. and the heavens nearly empty, instead of solid.
It can gradually spread among humanity as a whole he point of view that prevails among research workers, ……………..
…………….. the scientific point of view must come out of the laboratory ……………..
In so far as it places all phenomena on the same emotional level ……………..
…………….. but it cannot pass judgement on them.
The bacteriologist can merely point out that pollution of public water supply is likely to cause as many deaths as letting off a bomb in the public street.
But he is no better equipped than anyone else in possession of Roman knowledge he has gained ……………..
…………….. the Negro is definitely inferior to the white man,
…………….. the political dogma rather than scientific thought.
…………….. but for all that, such statistics as are available show that civilized men live longer than uncivilized.
…………….. but it is becoming harder and harder to apply its results in practice.
…………….. because she was coming to hospital in any case for another complaint.
It has saved a few intelligent people, but that is all.
It is impossible until people realise that microbes are every bit as real as foreigners, and much more likely to kill one.

instead of — He wasted his time instead of working hard,
in place of — He was doing his duty in place of wasting time,
rather than — It is better to do something rather than waiting for major work.
as a whole — A terrorist affects the community as a whole.
so far as — So far as my opinion about education is concerned, it must be job-oriented.
to pass judgement — To pass a judgement raitionality is a foremost requirement.
point of view — Racial discrimination is bad from scientific point of view.
to let off — Terrorists create havoc letting off bombs at public places.
inferior to — Blacks are not inferior to whites.
for all that — Racial differences are continuing even today, but for all that, our political parties are not less responsible.
in possession of — We should not try to transfer everything in possession of our own kith and kin.
in practice — The community of caste and community should not be in practice.
in any case — We should not be partial in any case.
that is all — That is all the news at night.
every bit — Our every bit should be devoted to national development.

Grammar :

Ex. 1. Put the verbs in brackets into Simple Past or Past Perfect.

(a) Kavita (want) to know what her husband (do) last week.
(b) Mahesh (is) unable to tell his teacher where he (get) the money.
(c) My friends (ask) me what countries I (visit).
(d) The doctor (tell) me that he (go) to Goa for a holiday.
(e) My father (lose) his new shoes shortly after he (buy) them.
Answer:
(a) Kavita wanted to know what her husband did last week.
(b) Mahesh was unable to tell his teacher where he got the money.
(c) My friends asked me what countries I visited.
(d) The doctor told me that he gone to Goa for a holiday.
(e) My father lost his new shoes shortly after he bought them.

Ex. 2. Complete the following sentences:

(a) If the weather is fine, Naghaz …………………
(b) If it rains in the evening the match …………………
(c) If you eat too much, you …………………
(d) If Ajeet helps me, I …………………
(e) If you don’t hurry, you …………………
Answer:
(a) will come
(b) will be postponed
(c) will min your health
(d) will get the job
(e) will succeed.

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 1 विद्यापति के पद

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 1 विद्यापति के पद

 

विद्यापति के पद पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

Class 11th Hindi Book Bihar Board प्रश्न 1.
राधा को चन्दन भी विषम क्यों महसूस होता है?
उत्तर-
मैथिल कोकिल विद्यापति विरह-बाला राधा की विरह वेदना का चित्रण करते हुए कहते हैं कि सपना में भी श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं होता है। श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं होने से राधा का हृदय आतुर और व्याकुल है। इस विरह-वेदना में चन्दन जो शीतल और आनन्ददायक है वह भी विष के समान होकर उसके शरीर को तीष्ण और उष्ण कर रहा है। विरह-वेदना ने उसकी मानसिक पीड़ा को बढ़ा दिया है।

Class 11 Hindi Book Bihar Board प्रश्न 2.
राधा की साड़ी मलिन हो गयी है। यह स्थिति कैसे उत्पन्न हो गयी?
उत्तर-
कृष्ण-सखा उद्धव के कहे अनुसार मथुरा से कृष्ण आने वाले हैं। अतः राधा श्रृंगार कर नयी साड़ी पहन कर कृष्ण के आने की बाट जोह रही है किन्तु विरह की अवधि जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, राधा की बेचैनी और बढ़ती जाती है। वह धीरे-धीरे विस्तृति की अवस्था को प्राप्त हो जाती है। उसे अपने शरीर की सुध-बुध भी नहीं रहती। फलतः उसकी साड़ी रास्ते की धूल, हवा, पानी आदि के प्रभाव से मलिन हो जाती है, गन्दी हो जाती है।

Bihar Board Class 11th Hindi Book प्रश्न 3.
“चन्द्रबदनि नहि जीउति रे, बध लागत काहे।” इस पंक्ति,का क्या आशय है?
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्ति मैथिल कोकिल विद्यापति द्वारा विरचित पद-1 से ली गई है। कवि ने श्रीकृष्ण के विरह में राधा की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया। मैथिल कोकिल विद्यापति ने राधा के विरह की उत्कट व्यंजना की है। श्रीकृष्ण के गोकुल आने के इन्तजार में राधा को चन्दन भी विष के समान प्रतीत होता है। शरीर पर किए गए गहने से उसे भारी पड़ रहे हैं। इसका कारण श्रीकृष्ण के साक्षात् दर्शन की बात तो दूर है, वह सपने में भी उसे दिखाई नहीं देते हैं। उनके आने के इन्तजार में विरह-बाला राधा कदम्ब के पेड़ के नीचे अकेली खड़ी है। उसकी साड़ी का रंग मलिन को रहा है। उसे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विरह-वेदना उसके प्राण को हर लेगी। वह उद्धव जी से व्याकुल होकर कहती है-हे उद्धव भी आप मथुरा जाकर श्रीकृष्ण को कहें कि चन्द्रबदनि (जिसका शरीर चन्द्रमा के समान हो अर्थात राधा) अब नहीं जिएगी और इस वध का पाप श्रीकृष्ण .. को ही लगेगा क्योंकि उन्हीं से प्रेम-मिलन न होने के कारण राधा जीवित नहीं रहेगी।

Bihar Board Hindi Book Class 11 Pdf Download प्रश्न 4.
विद्यापति विरहिणी नायिका से क्या कहते हैं? उनके कथन का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
शृंगार रस के सिद्धहस्त कवि विद्यापति के अनुसार राधा कृष्ण-विरह की अग्नि में दग्ध होती, राधा जो अपनी सुध-बुध खो चुकी है, निराश हो चुकी है। विरह की दस दशाओं में अन्तिम दशा मरण को प्राप्त सी हो गयी है। ऐसी परिस्थिति में उसके भीतर आशा का, जीवन का संचार करने के उद्देश्य से विद्यापति कहते हैं कि आज कृष्ण गोकुल आने वाले हैं। ऐसी सूचना मिली है कि कृष्ण मथुरा से गोकुल के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। अतः तुम शीघ्रता से कृष्ण मग में जाकर उनकी प्रतीक्षा करो। कहीं मिलन, संयोग की यह अनुपम, विलक्षण घड़ी से तुम वंचित न रह जाओ।

कवि विद्यापति के ऐसा कहने के पीछे एक उद्देश्य यह निहित है कि प्रेम में विरह की अनिवार्यता तो है, किन्तु वास्तविक मरण तक यह विरह यदि जारी रहता है तो फिर प्रेम की समाप्ति निश्चित है। अत: कवि राधा को प्रबोध देते हुए अशान्वित करते हुए कृष्ण के आगमन की सूचना देता है ताकि मिलन की आकांक्षा में निराशा का भाव कुछ कम हो जाए और प्रेम की यह पवित्र क्रीड़ा अनवरत चलती रहे।

Bihar Board Hindi Book Class 11 Pdf प्रश्न 5.
प्रथम पद का भावार्थ अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
प्रथम पद का भावार्थ देखें।

Bihar Board Class 11 Hindi Book Solution प्रश्न 6.
नायिका के मुख की उपमा विद्यापति ने किस उपमान से दी है। प्रयुक्त उपमान से विद्यापति क्यों संतुष्ट नहीं हैं?
उत्तर-
महाकवि विद्यापति ने “सरस बसंत समय भल पाओल” में नायिका राधा के शरीर (मुख) की उपमा देने के लिए चन्द्रमा जैसे विश्व प्रसिद्ध उपमान का प्रयोग किया है। किन्तु अपने ही प्रयुक्त उपमान से कवि संतुष्ट नहीं है। इसका कारण है कि चन्द्र की नित्य प्रति बदलने वाली स्थिति। विधि, विधाता ने अनेक बार इस चन्द्र में काट-छाट की। इसे बढ़ाया, घटाया फिर भी यह वह योग्यता नहीं प्राप्त कर सका कि विद्यापति की नायिका के शरीर के लिए उपमान – बन सके। वस्तुतः विद्यापति की नायिका “श्यामा” नायिका है, जिसका सौन्दर्य लावण्य “तिल-तिल, नूतन होय” वाला है। अतः उसके आगे चन्द्रमा जैसा उपमान भी कैसे टिक सकता है।

Bihar Board 11th Hindi Book Pdf प्रश्न 7.
कमल आँखों के समान क्यों नहीं हो सकता? कविता के आधार पर बताएँ। आँखों के लिए आप कौन-कौन सी उपमाएँ देंगे। अपनी उपमाओं से आँखों का गुण साम्य भी दर्शाएँ।
उत्तर-
महाकवि विद्यापति ने “सरस बसंत समय भल पाओल” पद में नायिका के रूप में सौन्दर्य का वर्णन करते हुए उसकी आँखों के लिए कमल की उपमा दी है। किन्तु अगली ही पंक्ति में इस उपमान को वे समीचीन मानने से अस्वीकार कर देते हैं। क्योंकि कमल का जीवन क्षणिक है। साथ ही सूर्य के उदीयमान अवस्था में ही वह प्रस्फुटित होता है। रात्रि में उसकी पंखुड़ियाँ बंद हो जाती हैं।

आँखों के लिए काव्य जगत् में कई उपमान प्रचलित है। खंजन एक पक्षी है उसमें चापल्य होता है, उसका आँखों से गुण-साम्य होता है।

इसी तरह हिरण से आँखों की उपमा स्निग्धता के आधार पर दी जाती है। कवि बिहारी लाल ने तुरंत (घोड़ा) से आँखों को उपमित करते हुए कहते हैं लाज लगाम न मानई नैना मो बस नाहि ऐ मुँह जोर तुरंग लौ ऐचत हूँ चलि जाहि।

आँखों के लिए वाण, झील, दीप, मय के प्याले जैसे उपमानों का भी प्रयोग हुआ है जो क्रमशः आँखों की वेधन शक्ति गहराई, निर्द्वन्द्वता, नशादि गुणों में साम्य के कारण हैं।

Bihar Board Class 11 Hindi Book प्रश्न 8.
निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट करें:

(क) भनई विद्यापति मन दए रे, सुनु गुनमति नारी,
आज आओत हरी गोकुल रे, पथ चलु झट-झारी।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ मैथिल कोकिल अभिनव जयदेव एवं नवकवि शेखर जैसी उपाधियों से विभूषित महाकवि विद्यापति के पद से उद्धृत हैं। इसमें कवि ने वीर-विदग्धा नायिका को प्रबोध दिया है। वे कहते हैं कि हे गुणवती नारी (राधा)! तुम ध्यानपूर्वक मेरी बातें सुनो। आज हरि (श्रीकृष्ण) गोकुल से आने वाले हैं। इसलिए तुम झटपट उनसे मिलने के लिए चल पड़ो।

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि विद्यापति की विलक्षण प्रतिभा प्रस्फुटित हुई है। ‘आज आओत’ तथा ‘झट-झारी’ में निहित अनुप्रास अलंकार बड़े स्वाभाविक बन पड़े हैं। इस प्रकार भाव-संपदा एवं कला-सौष्ठव की दृष्टि से ये पंक्तियाँ अत्यंत उत्कृष्ट हैं।

(ख) लोचन-तूल कमल नहिं भए सक, से जग के नहिं जाने।
से फेरि जाए नुकाएल जल भए, पंकज निज अपमाने ॥
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हिन्दी के अमर महाकवि विद्यापति के पद से अवतरित हैं। इस पद में कवि ने नायिका के सौंदर्य के सामने कवि-जगत में प्रसिद्ध सुंदरता के प्रसिद्ध उपमानों को फीका दिखाया है। यहाँ कवि ने कहा है कि कमल, जो सुंदरता के लिए जाना जाता है, वह भी तेरे नेत्रों की सुंदरता की समानता न कर सका, कदाचित इसी अपमान और लज्जा के कारण वह जग की आँखों से दूर जल में छिप गया है।

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि की कल्पना-शक्ति का चमत्कार देखते ही बनता है। कमल को नायिका के नेत्रों में हीनतर सिद्ध किया गया है। अतः इसका काव्य-सौंदर्य सर्वथा सराहनीय है।

Class 11 Bihar Board Hindi Book प्रश्न 9.
द्वितीय पद (सरस बसंत समय भल पाओल) का भावार्थ प्रस्तुत करें।
उत्तर-
द्वितीय पद का भावार्थ देखें।

विद्यापति के पद भाषा की बात

Bihar Board 11th Hindi Book Pdf Download प्रश्न 1.
प्रथम पद से अनुप्रास अलंकार के उदाहरण चुनें।
उत्तर-
एक ही वर्ण की अनेकशः आवृत्ति को अनुप्रास अलंकार कहते हैं।
यहाँ “भूषण भेल भारी” में ‘भ’ वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है। इसी तरह देह-दग्ध, जाह जाह……….मधु पुर जाहे आज आओत और झट-झारी में अनुप्रास अलंकार है।

Bihar Board Class 11 Hindi Book Name प्रश्न 2.
चन्द्रवदनी में रूपक अलंकार है। रूपक और उपमा में क्या अंतर है? उदाहरण के साथ स्पष्ट करें।
उत्तर-
जहाँ दो भिन्न पदार्थों के बीच सादृश्य या साधर्म्य की स्थापना की जाती है वहाँ उपमा अलंकार होता है। किसी भी वस्तु के विषय में अपनी भावना का अधिक सबलता सुन्दरता और स्पष्टता से अभिव्यक्त करने के लिए हम किसी दूसरी वस्तु से जिसकी वह विशेषता ख्यात हो उसका सादृश्य दिखाते हैं।

उपमा में चार तत्त्व होते हैं-
(क) उपमेय,
(ख) उपमान,
(ग) साधारण धर्म तथा
(घ) वाचक।

उपमा का उदाहरण-तरुवर की छायानुवाद-सी/उपमा-सी, भावुकता-मी अविदित भावाकुल भाषा-सी/कटी-छटी नव कविता-सी।

रूपक-जहाँ प्रस्तुत (उपमेय) में अप्रस्तुत (उपमान) का निषेध-रहित आगेप व अभेद स्थापना किया जाए वहाँ रूपक अलंकार होता है।

उदाहरण-
रुणित भृग घंटावली, झरत दान मधु नीर
मंद-मंद आवतु चल्यो कुंजर कुंज समीर।

रूपक-ऊपमा में अन्तर-उपमा में उपमेय और उपमान में सादृश्य दिखाया जाता है। अमुक वस्तु अमुक वस्तु की तरह/जैसी है। जबकि रूपक में उपमेय और उपमान के बीच तादात्म्य अथवा अभेद की स्थापना होती है। सादृश्यवाचक शब्द रूपक में नहीं होते हैं।

प्रश्न 3.
दूसरे पद में कवि ने नायिका के सौन्दर्य के लिए कई उपमाएँ दी हैं। प्रयुक्त उपमेयं की उपमानों के साथ सूची बनाएँ।
उत्तर-
विद्यापति रचित पद ‘सरस बसंत समय भल पाओल’ में नायिका राधा के लिए निम्नलिखित उपमान प्रयुक्त किये गये हैं।

  • उपमेय – उपमान
  • बदन (मुख) – चन्द्रमा (चान)
  • लोचन (नयन) – कमल

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखें हरि, देह, चन्द्रमा, पथ, पवन, कमल, लोचन, जल।
उत्तर-
हरि-विष्णु, देह-शरीर, चन्द्रमा-निशाकर, पथ-रास्ता, पवन-हवा, कमल-पंकज, लोचन-आँख, जल-पानी। .

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के शुद्ध रूप लिखें दगध, भूषन, गुनमति, दछिन, पवन, जौबति, बचन, लछमी।
उत्तर-
दगध-दग्ध, भूषण-भूषण, जनमति-गुणमति, दछिन-दक्षिण,
पबन पवन, यौवति-युवति, वचन-वचन, लक्ष्मी-लक्ष्मी।

प्रश्न 6.
दोनों पदों में प्रयुक्त मैथिली शब्दों की सूची तैयार करें और उनके संगीत अर्थ एवं रूप स्पष्ट करें तथा वाक्यों में प्रयोग करें। .
उत्तर-

  • चानन (चंदन) – चंदन शीतलता देता है।
  • ‘सर (सिर, माथा) – उसका सिर भारी है।
  • भूषण (गहना) – आभूषण कीमती है।
  • भारी (भारस्वरूप) – यह भारी जवाबदेही है।
  • एकसरि (अकेला) – वह अकेला इस सम्पत्ति का स्वामी है।
  • पथ हेरथि (रास्ता देख रही है) – विरहिणी प्रेम का रास्ता देख रही है।
  • दगध (दग्ध) – मेरा हृदय विरह ज्वाला से दग्ध है।
  • झामर (मलिन) – गर्मी से चेहरा मलिन हो गया है।
  • जाह (जाओ) – अब तुम यहाँ से चले जाओ।
  • जीउति (जीवित रहेगी) – पानी बिना मछली कब तक जीवित रहेगी।
  • बध (वध) – किसी का भी वध करना पाप है।
  • काहे (क्यों) – तुम यह बात क्यों पूछ रहे हो?
  • झटझारी (झटक कर) – गाड़ी पकड़नी है तो झटक कर चलो।
  • पाओल (पाया) – आपने अन्त में क्या पाया?
  • बदन (मुख) – आपका मुख सुन्दर है।  Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 1 विद्यापति के पद
  • चान (चन्द्र) – आप पूर्णिमा का चन्द्र उदित है।
  • जइयो (जितना) – जितना तुम करोगे उतना ही पाओगे।
  • जतन (यत्न) – आपको विशेष यत्न करना पड़ेगा।
  • बिहि (विधि) – विधि के अनुकूल होने पर ही भाग्योदय निर्भर है।
  • कए (कितने) – बारात में कितने लोग आये हैं?
  • तुलित (तुल्य) – सागर के तुल्य तो सागर ही है।
  • लोचन (आँख) – आपके लोचन अप्रतिम है।
  • नुकाएल (छिप गये) – सारे तारे छिप गये।
  • पंकज (कमल) – पंकज का अर्थ केवल कमल ही नहीं है।।
  • जौवति (युवती) – युवती पर बुरी नजर डालना भी बुरी बात है।
  • लखिमादेइ (लखिमा देवी) – मिथिला की रानी थी।
  • रमाने (रमण) – रमण प्रसंग हमेशा उचित नहीं होता है।
  • ई सभ (यह सब) – यह सब करने की क्या आवश्यकता है।
  • मधुपुर (मथुरा) – मथुरा में आज भी होली लठमार ही होती है।
  • गोकुल (ब्रज-वृंदावन) – राधा आज भी ब्रज में प्रतीक्षारत है।
  • चीर (वस्त्र) – द्रौपदी का चीर हरण अब भी जारी है।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

विद्यापति के पद लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यापति की सौन्दर्य-दृष्टि पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
विद्यापति की दृष्टि में सौन्दर्य नित नूतन होता है। वह किसी भी लौकिक उपमान से तुलनीय नहीं होता। अपनी नायिका की उपमा हेतु चाँद और कमल को अयोग्य मानकर कवि ने इस तथ्य को व्यक्त किया है। कवि ने सुन्दर नारी को लक्ष्मी के समान कहा है। अत: उसके अनुसार सौन्दर्य ऐश्वर्यपूर्ण कल्याणप्रद होता है।

प्रश्न 2.
राधा के मरने का पाप किसे लगेगा?
उत्तर-
राधा विरह का दंश झेल रही है। अतः उसके मरने का पाप कृष्ण को लगेगा। उद्धव समाचार लेने आये हैं। यदि वे जाकर राधा की दशा कृष्ण को नहीं बतायेंगे तो राधा के मरने का पाप उन्हें ही लगेगा। अत: उद्धव राधा की हालत को कृष्ण को बताने के लिए व्यग्र हो जाते

प्रश्न 3.
कमल जल में जाकर क्यों छिप गया है?
उत्तर-
विद्यापति की दृष्टि में कमल को नायिका के मुख की समानता करने लायक या उपमान बनने लायक क्षमता नहीं प्राप्त है। अतः वह अपने अपमान के कारण जल में जाकर छिप गया है। वास्तव में, कमल जल में ही खिलता और पनपता है।

विद्यापति के पद अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राधा कदम्ब के नीचे क्या कर रही है?
उत्तर-
राधा विरह में व्याकुल खड़ी है। वह कदम्ब के नीचे अकेले खड़ी होकर कृष्ण के मथुरा से गोकुल लौटने की प्रतीक्ष कर रही है।

प्रश्न 2.
कृष्ण के बिना राधा की दशा कैसी है?
उत्तर-
कृष्ण के बिना राधा का हृदय दग्ध हो रहा है। उसे भूषण भार स्वरूप प्रतीत हो रहे हैं तथा शरीर पर लगा चन्दन का प्रलेप तीक्ष्ण बाणों की तरह चुभ रहा है।

प्रश्न 3.
विद्यापति गोपियों और राधा को क्या आश्वासन देते हैं?
उत्तर-
विद्यापति आश्वासन देते हैं कि कृष्ण आज गोकुल वापस लौटेंगे। अतः तुम लोग शीघ्र गोकुल लौट जाओ।

प्रश्न 4.
चाँद नायिका के मुख के समान क्यों सुन्दर नहीं है?
उत्तर-
चाँद को कई बार काट-छाँट कर विधाता ने अधिक-से-अधिक सुन्दर बनाने का प्रयास किया है लेकिन वह नायिका के सौन्दर्य की तरह नित-नूतनता धारण नहीं कर पाया है।

प्रश्न 5.
स्वप्न पुरुष नायिका के मुख से चीर हटाने के लिए क्यों कहता है?
उत्तर-
स्वप्न पुरुष नायिका का रूप देखना चाहते हैं। वस्तुत: नायिका अवगुंठन में है। अतः विद्यापति स्वयं उसका सौन्दर्य देखने हेतु स्वप्न पुरुष के बहाने की उसकी प्रशंसा कर रहे हैं।

प्रश्न 6.
विद्यापति की दृष्टि में सौन्दर्य कैसा होता है?
उत्तर-
विद्यापति की दृष्टि में सौन्दर्य अनुपम होता है जो लक्ष्मी की तरह ऐवW, शोभ और मंगल से युक्त होने के कारण त्रिवेदी होता है। वस्तुतः सुन्दरता गुण में परिलक्षित होता है।

प्रश्न 7.
विद्यापति के प्रथम पद में श्रृंगार के किस पक्ष को उद्घाटित किया गया है?
उत्तर-
विद्यापति के प्रथम पद में श्रृंगार के वियोग पक्ष को उद्घाटित किया गया है।

प्रश्न 8.
विद्यापति ने मूख की तुलना किससे की है?
उत्तर-
विद्यापति ने मुख की तुलना चन्द्रमा से की है।

प्रश्न 9.
विद्यापति कैसे कवि हैं?
उत्तर-
विद्यापति शृंगारी, भक्त और जन कवि हैं।

विद्यापति के पद वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
विद्यापति किस भाषा के कवि हैं?
(क) मैथिली
(ख) ब्रजभाषा
(ग) भोजपुरी
(घ) अवधी
उत्तर-
(क)

प्रश्न 2.
विद्यापति एक महान कवि हैं
(क) सौन्दर्य
(ख) प्रेम
(ग) भक्ति
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 3.
‘दछिन पवन’ किस ऋतु में बहती है?
(क) ग्रीष्म ऋतु
(ख) वसंत ऋतु।
(ग) शिशिर ऋतु
(घ) हेमन्त ऋतु
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 4.
चन्द्रबदनि राधा किसके विरह में नहीं जीवित रह पायगी?
(क) श्रीकृष्ण के
(ख) सखियों के
(ग) माता-पिता के
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क)

प्रश्न 5.
‘चन्द्रबदनि’ में कौन-सा अलंकार है?।
(क) उपमा
(ख) उत्पेक्षा
(ग) रूपक
(घ) व्याजोक्ति
उत्तर-
(ग)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न 1.
हरि बिनु देह दगध भेल रे…………….भेल भारी
उत्तर-
कमल

प्रश्न 2.
लोचन-तूल…………….नहि भए सक, से जग के नहिं जाने।
उत्तर-
झामर

विद्यापति पद कवि परिचय – (1360-1448)

विद्यापति का जन्म 1360 ई. के आसपास विहार के मधुबनी जिले के बिस्पी नामक गाँव में हुआ था। यद्यपि उनके जन्म काल के संबंध में प्रमाणिक सूचना उपलब्ध नहीं है तथा उनके आश्रयदाता मिथिला नरेश राजा शिव सिंह के राज्य-काल के आधार पर उनके जन्म और मृत्यु के समय का अनुमान किया गया है। विद्यापति साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, न्याय, भूगोल आदि के प्रकांड विद्वान थे। सन् 1448 ई. में उनका देहावसान हो गया।

विद्यापति बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और तर्कशील व्यक्ति थे। उनके विषय में यह विवाद रहा है कि वे हिंदी के कवि है या बंगला भाषा के, किंतु अब यह स्वीकार्य तथ्य है कि वे मैथिली भाषा के कवि थे। वे हिंदी साहित्य के मध्यकाल के ऐसे कवि हैं जिनके काव्य में जनभाषा के माध्यम से जनसंस्कृति को अभिव्यक्ति मिली है। वे साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, भूगोल आदि विविध विषयों का गंभीर ज्ञान रखते थे। उन्होंने संस्कृत, अपभ्रंश और मैथिली तीन भाषाओं में काव्य-रचना की है। इसके साथ ही उन्हें अपने समकालीन कुछ अन्य बोलियो अथवा भाषाओं का ज्ञान था। वे दरबारी कवि थे, अतः दरबारी संस्कृति का प्रभाव उनकी महत्त्वपूर्ण रचनाओं-‘कीर्तिलता व कीर्तिपताका’ पर देखा जा सकता है। उनकी पदावली ही उनको यशस्वी कवि सिद्ध करती है।

रचनाएं-विद्यापति की महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं-कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष-परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली और विद्यापति-पदावली।

भाषा-शैली-विद्यापति मूलत: मैथिली के कवि हैं। उन्होंने संस्कृत और अपभ्रंश भाषाओं में भी पर्याप्त साहित्य की रचना की है। उनकी भाषा लोक-व्यवहार की भाषा है। वास्तव में, उनकी रचनाओं में जन भाषा में जन संस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है। उनकी भाषा में आम बोलचाल के मैथिली शब्दों का पर्याप्त प्रयोग हुआ है।

विद्यापति के पद काव्य-सौंदर्य-

विद्यापति के पद मिथिल-क्षेत्र के लोक-व्यवहार व सांस्कृतिक अनुष्ठान में खुलकर प्रयुक्त होते हैं। उन पदों में लोकानुरंजन व मानवीय प्रेम के साथ व्यावहारिक जीवन के विविध रूपों को बड़े मनोरम व आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया है। राधा-कृष्ण को माध्यम बनाकर लौकिक प्रेम के विभिन्न रूपों को वर्णित किया गया है, किंतु साथ ही विविध देवी-देवताओं की भक्ति से संबंधित पद भी लिखे हैं जिससे एक विवाद ने जन्म लिया कि विद्यापति शृंगारी कवि – हैं या भक्त कवि। विद्यापति को आज शृंगारी-कवि के रूप में मान्यता प्राप्त है।

विद्यापति के काव्य में प्रकृति के मनोरम रूप भी देखने को मिलते हैं। ऐसे पदों में पद-लालित्य के साथ कवि के अपूर्व कौशल, प्रतिभा तथा कल्पनाशीलता के दर्शन होते हैं। समस्त काव्य में प्रेम व सौंदर्य की निश्छल व अनूठी अभिव्यक्ति देखने को मिलती है.। विद्यापति मूलत शृंगार के कवि हैं, माध्यम राधा व कृष्ण हैं। इन पदों में अनुपम माधुर्य है। ये पद गीत-गोविर के अनुकरण करते हुए लिखे गए प्रतीत होते हैं। उन्होंने भक्ति व श्रृंगार का ऐसा सम्मिश्रण प्रस्तुत किया है जैसा अन्यत्र मिलना संभव नहीं है। निष्कर्ष रूप में कहें तो यह कहना अनुचित न होगा कि विद्यापति के वर्ण्य-विषय के तीन क्षेत्र हैं।

अधिकांश पदों में राधा और कृष्ण के प्रेम के विविध पक्षों का वर्णन हुआ है कि कुछ पद शुद्ध रूप से प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन करते हैं और कुछ पद विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुति में लिखे गए हैं।

विशेष-इन पंक्तियों की भाषा ब्रज है। इसमें छंद दोहा है। श्लेष व अनुप्रास अलंकार है। केशों की श्यामलता से उत्पन्न अंधकार और आत्मा पर पड़े अज्ञान के आवरण की समता की गई है।

विद्यापति के पदों का भावार्थ

प्रथम पद मैथिल कोकिल, अभिनव जयदेव के नाम से प्रतिष्ठित महाकवि विरचित प्रस्तुत गीत वियोग शृंगार की एक स्थिति विशेष का ज्ञापक है। विरहिणी नायिका (राधा) प्रियतम (कृष्ण) के विरह में पागल है। उसकी एकमात्र कामना है कृष्ण से मिलने की। वह बासक सज्जा नायिका की तरह शृंगार कर कृष्ण के आने के मार्ग में आँखें बिछाये हुए, पथ को अपलक निहार रही है।

परंतु जैस-जैसे समय बीतता जाता है, शरीर में लेपित चंदन, जो शीतलता प्रदान करने के लिए विख्यात है, अब सूख कर बाण की तरह चुभने लगे हैं। सौन्दय वर्द्धन करने वाले आभूषण अब भार लगने लगे हैं। गोकुल गिरिधारी श्रीकृष्ण इतने निष्ठुर निर्मोही हो गये हैं कि उनकी प्रतीक्षा करती नायिका के स्वप्न में भी नहीं आये। विरह विदग्धा, मिलनातुर कदम्ब के वृक्ष के नीचे अकेली खड़ी-खड़ी कृष्ण का मार्ग देख रही है।

कृष्ण वियोग की ज्वाला से उसका हृदय दग्ध (जल) हो रहा है। शरीर की सुध-बुध खो देने से वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये हैं। पिछले कई दिनों से पहनी हुई साड़ी मलिन-गंदी हो चुकी है। नायिका वस्त्र बदलना तक भूल चुकी है।

विरहिणी नायिका राधा की सखी उद्धव को सम्बोधित करते हुए कहती है.कि वे उद्धव ! अब आप मथुरा जाएँ और नायिका (राधा) की वर्तमान विचित्र, परिवर्तित स्थिति से कृष्ण को अवगत कराएँ। अब चन्द्रचवदनी राधा आपके बिना जीवित नहीं रह सकेगी और अगर राधा मर गयी तो यह स्वाभाविक मृत्यु नहीं होगी, वध होगा और इसका पाप तुम्हें ही लगेगा।

महाकवि विद्यापति प्रबोध देते हुए कहते हैं कि हे गुणवना स्त्री। तू ध्यान से मेरी बात सुनो, आज कृष्ण का गोकुल आगमन होने वाला है। अत: तू झटक कर चल और कृष्ण मग में उनकी प्रतीक्षा का पति रचित प्रपदोनों विच विद्यापति रचित प्रस्तुत पद में विरहिणी नायिका का कारुणिक वर्णन हुआ है.। विरह वेदना की गहनता और तीव्रता दोनों विचारणीय हैं। नायिका में दैन्य और औत्सुक्य दोनों भाव सबल . होकर उभरे हैं। अतिशयोक्ति वीप्सा, लुप्तोपमा, परिकर आदि अलंकार पद के सौन्दर्य को ओर वर्द्धित करते हैं।

दिताय पद भक्ति और श्रृंगार दोनों रसों के सिद्धहस्त मैथिल कोकिल कवि विद्यापति रचित प्रस्तुत पद में नायिका (राधा) के देह सौष्ठव का वर्णन सखी या दूती के द्वारा हुआ है।

बसंत ऋतु का सुहाना मौसम है। दक्षिण दिशा में मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित हवा पोरे-धीरे वह रही है। मैंने ऐसी परिस्थिति में तुम्हें देखा मानो जैसे स्वप्न में तेरा रूप-सौन्दर्य देखने को मिला हो। तुम अपने आनन से, चेहरे से आँचल हटाओ।

सच मानो तुम्हारे शरीर की गोराई और लुनाई ऐसी है कि उसके समान चन्द्रमा को मानना मूर्खता होगी। तुम्हें विधाता ने यत्नपूर्वक बनाया है, गढ़ा है। ईश्वर ने चन्द्रमा को अनेक बार काटा, बनाया, कतर-ब्योंत की, फिर भी वह तुम्हारे सौन्दर्य से तुलनीय नहीं है।

तुम्हारी आँखें इतनी सुन्दर मोहक हैं कि संसार प्रसिद्ध उपमान कमल भी इनसे तुलित नहीं हो सका। इसी लज्जा और संकोच से अपमानित होकर कमल पुनः जल में जा छिपा।

विद्यापति कहते हैं कि हे बुद्धिमती युवती। तुम्हें जो रूप राशि प्राप्त है, वह लक्ष्मी के समान है। महाराज शिवसिंह, रूप नारायण हैं, साक्षात् सौन्दर्य के स्वामी हैं जो अपनी रानी लखिमा देवी के साथ रमण करते हैं, ठीक उसी तरह हे बुद्धिमती युवती ! तुम्हारा रूप-सौन्दर्य भी महाराजा के उपभोग के लिए है।

प्रस्तुत पद में विद्यापति ने नायिका के सौन्दर्य को अतिरंजित रूप में प्रस्तुत किया है। उसका सौन्दर्य लोकप्रसिद्ध उपमानों से भी श्रेष्ठ है।

विद्यापति के पद कठिन शब्दों का अर्थ

चानन-चंदन। सर-सिर, माथा। भूषण-गहना, अलंकार। भारी-भार स्वरूप। एकसरि-अकेले। पथ हेरथि-रास्ता देख रही है। दगध-दग्ध, झुलसा हुआ। झामर-मलिन। जाह-जाओ। जीउति-जीवित रहेगी। बध-वध। काहे-क्यों। झट-झारी-झटक कर। पाओल-पाया। बदन-मुख। चान-चंद्रमा। जइओ-जितना भी। जतन-यत्न, उपाय। बिहि-विधि, विधाता, ब्रह्मा। कए-कितने। तुलित-तुल्य। लोचन-आँख, नयन। नुकाएल-छिप गए। पंकज-कमल। जैवति-युवती। लाखिमा देई-लखिमा देवी। रमाने-रमण। इ सभ-यह सब। मधुपुर-मथुरा। गोकुल-ब्रज, वृंदावन। चीर-वस्त्र।

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. चानन भेल विषय सर…………….गिरधारी।
व्याख्या-
प्रस्तुत पद विद्यापति द्वारा रचित है। पूरे पद के अवलोकन से ज्ञात होता है कि यह गोपी-उद्धव संवाद के रूप में रचित है। इसके अनुसार उद्धव की जिज्ञासा के उत्तर में गोपियाँ राधा की विरह-दशा का वर्णन कर रही हैं। वे बताती हैं कि कृष्ण के वियोग में राधा के शरीर में लगा चन्दन-प्रलेप शीतलता प्रदान करने के बदले तीक्ष्ण बाण की तरह चुभ रहा है। शारीरिक दुर्बलता के कारण अथवा प्रसाधनों की नि:सारता अनुभव करने के कारण आभूषण बोझ की तरह लग रहे हैं। पर्वत धारण कर गोकुल की रक्षा करने वाले दयालु कृष्ण अब इतने निष्ठुर हो गये हैं कि राधा को सपने में भी दर्शन नहीं देते। इस तरह वियोग-व्यथिता राधा की दशा अत्यन्त विषम है।

2. एकसरि ठाढ़ि कदम-तरे रे………………..झामर भेल सारी।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में गोपियों उद्धव से बता रही हैं कि राधा अकेले कदम्ब के वृक्ष के नीचे खड़ी होकर कृष्ण के आगमन की प्रतीक्षा कर रही है। कृष्ण के न आने से उत्पन्न निराशा और वियोग के ताप से उनका हृदय दग्ध हो रहा है, जल रहा है। वियोग के कारण श्रृंगार प्रसाधन के प्रति कोई रुचि नहीं है, उत्साह नहीं है। अत: वस्त्र बदलने की भी सुधि नहीं है। फलतः साड़ी झामर अर्थात् मलिन हो गयी है। यहाँ कवि ने राधा के मन की पीड़ा और प्रसाधन के प्रति उत्साह के अभाव को व्यक्त करने का प्रयास किया है। ‘हृदय दग्ध’ और ‘झामर साड़ी’ के द्वारा मन और तन दोनों की वेदना अभिव्यक्त हुई है।

3. जाह जाह तोहें उपव है……………बध लागत काहे।
व्याख्या-
विद्यापति रचित इन पंक्तियों में गोपियों उद्धव से कह रही हैं कि हे उद्धव तुम मथुरा लौट जाओ। वहाँ कृष्ण को राधा की दशा बता देना कि चन्द्रमा के समान मुखवाली राधा जीवित नहीं रह पायेगी। यदि उन्हें दया लगेगी तो आकर बचा लेंगे। तब उन्हें राधा के मरने का पाप क्यों लगेगा? दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि तुम मथुरा लौट कर कृष्ण को सारी बातें बात यो। ऐसा करने पर तुम अपने दायित्व का निर्वाह कर लोगे और तुम्हें राधा के मरने का पाप नहीं लगेगा। तब पाप कृष्ण को लगेगा तुम्हें नहीं। यहाँ कवि ने विरह में मरण-दशा का उल्लेख किया है।

4. भनइ विद्यापति मन दए…………..झट-झारी।
व्याख्या-
विद्यापति ने अपने पद की पूर्व पंक्तियों में विरह मरण का वर्णन किया है। यह तत्त्व शृंगार का विरोधी होता है। मरण शोक का विषय है जो वरुण रस का स्थायी भाव होता है। इसका परिमार्जन करने के लिए कवि ने इन पंक्तियों में कृष्ण के आगमन की सूचना देकर आशा का. आलम्बन थमा दिया है।

कवि गोपियों तथा राधा दोनों को सम्बोधित कर कहता है कि हे गुणवती नारियों तन मन देकर अर्थात् ध्यान देकर सुनो। आज कृष्ण मथुरा से गोकुल आवेंगे। अतः तुम पंग झाड़कर अर्थात् शीघ्रता से गोकुल चलो। यहाँ कवि द्वारा एक मनोवैज्ञानिक झटका दिया गया है। कृष्ण के आने की सूचना से राधा के मन की निराश-भाव लगेगा और उसकी मनोदशा बदलेगी। गोपियाँ राधा को लेकर गोकुल लौटेंगी और इस प्रक्रिया में जो परिवर्तन होगा वह विरहिणी को थोड़ी गहत दे सकेगा। अत: इन पंक्तियों में कवि द्वारा आशावाद के सहारे मनोवैज्ञानिक परिवर्तन लाने की चेष्टा की गयी है।

5. सरस वसंत समय भल…………….दुरि करु चीरे।
व्याख्या-
महाकवि विद्यापति ने अपने पद की इन पक्तियों में एक पृष्ठभूमि का निर्माण किया है। पृष्ठभूमि यह है कि बसंत ऋतु का सुन्दर समय आ गया है। दक्षिण पवन बहने लगा है। यह हवा बसंत ऋतु में बहती है और प्रायः दक्षिण से उत्तर की ओर इसकी गति होती है। यह पवन शील, मन्द और सुखद होता है। इसी भौतिक परिवेश में नायिका सोयी हुई है। उसने सपने में देखा कि कोई सुन्दर पुरुष आकर उससे कह रहा है कि तुमने साड़ी से अपने सुन्दर मुख को क्यों हँक रखा है। मुख पर से चीर हटाओ। अभिप्राय है कि इस सरस मनोरस वासन्ती समय में जब दक्षिण पवन बह रहा है तब सुन्दर मुख को ढकने का नहीं रूप को प्रदर्शित करने का समय है अतः अपना सुन्दर रूप मुझे देखने दो।

6. तोहर बदन सन चान होअथि…………तुलित नहिं भेला।
व्याख्या-
अपने शृंगारिक पद की इन पंक्तियों में विद्यापति कहते हैं कि उस स्वप्न पुरुष ने उस सुन्दरी नायिका से कहा है कि तुम्हारा रूप अनुपम है। तुम्हारे मुख के समान चाँद भी नहीं है। विधाता ने सुन्दरता के प्रतिमान के रूप में चाँद को कई बार काट-छाँट कर नया बनाया ताकि वह तुम्हारे मुख का उपमान बन सके। लेकिन इतना करने पर भी वह तुम्हारे मुख की उपमा के योग्य नहीं बन सका। यहाँ कविं स्वप्न पुरुष के कथन के माध्यम से नायिका को यह बताना चाहता है कि तुम्हारा मुख चाँद से अधिक सुन्दर है।

7. लोचन-तूल कमल नहि भए सक……………निज अपमाने।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि नायिका के नेत्रों की उपमा हेतु कमलों को अयोग्य ठहराते हुए कहता है कि तुम्हारे नेत्रों की सुन्दरता के समान कमल पुष्प नहीं है, इस बात को कौन नहीं जानता? अर्थात् सब जानते हैं। अपनी इस अक्षमता को कमल भी जानता है। तभी तो अपने अपमान में व्यक्ति झेकर वह जल में जाकर छिपा गया है। यहाँ कवि प्रतीप अलंकार के सहारे यह कहना चाहता है कि नायिका के नेत्र कमल के पष्पों से अधिक मन्दर हैं।

8. भनई विद्यापति…………देइ रमाने।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ विद्यापति रचित पद की हैं। यहाँ कवि अपनी नायिका को यह बताना चहाता है कि तुम श्रेष्ठ युवती हो अर्थात् सामान्य नहीं हो, क्योंकि तुम्हारा रूप अनुपम है। कवि की दृष्टि में रूप लक्ष्मी का प्रतीक होता है। उसमें सौन्दर्य, ऐश्वर्य और मंगल तीनों का भाव मिला होता है। जिस तरह लक्ष्मी किसी-किसी सौभाग्यशाली पर कृपा-करती हैं उसी तरह विधाता द्वारा सौन्दर्य-रूप-वैभव किसी-किसी को दिया जाता है।

कवि विद्यापति ने अपने अधिकतर पदों में अपने आश्रयदाता राजा शिवसिंह और उनकी रूपसी पत्नी लखिमा देवी का सादर स्मरण किया है। यहाँ वे कहना चाहते हैं कि मैंने सौन्दर्य को जो लक्ष्मी-तुल्य कहा है कि इस बात को राजा शिव सिंह (जो रूपनारायण की उपाधि धारण करते हैं) और उनकी पत्नी लखिमा (या लछिमा) देवी भी जानते हैं। इन पंक्तियों में विद्यापति ने एक विशेष बात यह कही है कि सौन्दर्यवान स्त्री लक्ष्मी की तरह ऐश्वर्यशालिनी होती है।

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 4 बेजोड़ गायिका : लता मंगेशकर

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 4 बेजोड़ गायिका : लता मंगेशकर (कुमार गंधर्व)

 

बेजोड़ गायिका : लता मंगेशकर पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

Bihar Board Hindi Book Class 11 Pdf Download प्रश्न 1.
लता मंगेशकर की आवाज सुनकर लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
जब लेखक की रेडियों पर पहले-पहल लता मंगेशकर की आवाज सुनाई पड़ी तो उन्हें उस स्वर में एक दुर्निवार आकर्षण प्रतीत हुआ। स्वर का जादुई प्रभाव उन्हें बरबस अपनी ओर खींच ले गया। वे विस्मय-विमुग्ध हो उसके श्रवण-मनन में तन्मय-तल्लीन हो गये।

Class 11 Hindi Book Bihar Board प्रश्न 2.
‘लता मंगेशकर ने नई पीढ़ी के संगीत को संस्कारित किया है। संगीत की लोकप्रियता, उसका प्रसार और अभिरुचि के विकास का श्रेय लता को ही देना पड़ेगा।’ क्या आप इस कथन से सहमत हैं? यदि हाँ, तो अपना पक्ष प्रस्तुत करें।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में महान् गायक और संगीत मनीषी कुमार गंधर्व ने विलक्षण गायिका, स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर की गानविद्या के विभिन्न पक्षों पर सूक्ष्मतापूर्वक विचार किया है और संगीत क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदानों को उद्घाटित किया है। इस क्रम में उनका स्पष्ट अभिमत है कि अदभूत और अपूर्व गायिका लतामंगेशकर में नई पीढ़ी के संगीत को संस्कारित किया है। उसकी लोकप्रियता, उसके प्रसार और जनरुचि के विकास का सर्वाधिक श्रेय उन्हें ही है।

लेखक का उपर्युक्त मंतव्य हमें सर्वथा सार्थक और समीचीन प्रतीत होता है। यद्यपि लता से पहले भी अनेक अच्छी गायिकाएं हुई और उनमें नूरजहाँ जैसी श्रेष्ठ चित्रपट संगीत गायिका भी हों, पर लता के आगमन से चित्रपट संगीत की लोकप्रियता में अप्रत्याशित अभिवृद्धि हुई। साथ ही इससे शास्त्रीय संगीत के प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी बदला। लता के संगीत के प्रभाव से नन्हे-मुन्ने बच्चे भी अब स्वर में गाते-गुनगुनाते हैं। वास्तव में लता का स्वर ही ऐसा है, जिसे निरंतर सुनते रहने से सुननेवाला सहज रूप से अनुकरण करने लगता है।

लता मंगेशकर ने चित्रपट संगीत को काफी ऊँचाई दी है, जिससे लोगों के कनों की सुन्दर-सुन्दर स्वर लहरियाँ सुनाई पड़ रही हैं। संगीत के विविध प्रकारों से उनका परिचय और प्रेम बढ़ रहा है। साधारण लोगों में भी संगीत की सुक्ष्मता की समझ आ रही है। इन सारी बातों के लिए निस्संदिग्ध रूप से लता भंगेशकर ही श्रेय की योग्य अधिकारिणी हैं।

Bihar Board Class 11 Hindi Book Solution प्रश्न 3.
शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत में क्या अंतर है? आप दोनों में किसे बेहतर प्रानते हैं, और क्यों? उत्तर दें।
उत्तर-
महान गायक एवं संगीत मनीषी कुमार गंधर्व ने शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत सष्ट पार्थक्य माना है और दोनों की पारस्परिक तुलना को निरर्थक एवं निस्सार बताया है।

शास्त्रीय संगीत का स्थायीभाव जहाँ गंभीरता है, वहीं जलदय और चपलता चित्रपट संगीत का मुख्य गुण है। चित्रपट संगीत का ताल जहाँ प्राथमिक अवस्था का ताल होता है, तहाँ शास्त्रीय संगीत में ताल अपने परिष्कृत में विद्यमान होता है। चित्रपट में आधे तालों का उपयोग किया जाता है, उसकी लयकारी अपेक्षाकृत आसान होती है। इस प्रकार, शास्त्रीय संगीत जहाँ नियमानुरूपता में संगीत की उच्च एवं गंभीर अवस्था से संबंध रखता है, वहाँ चित्रपट संगीत की संभावित उन्मुक्तता में विचरण करता है।

बेजोड़ गायिका : लता मंगेशकर लेखक परिचय कुमार गंधर्व (1924-1992)

भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान् गायक एवं संगीतज्ञ कुमार गंधर्व का जन्म 8 अप्रैल, 1924 ई. को कर्नाटक के गेलगाँव जिलान्तर्गत सुलेभावी ग्राम में हुआ था। उनका मूल नान शिवपुत्र कोमकली था, जब से श्री गुरुकुल स्वामी ने उन्हें देवमायक गंधर्व का अवतार बताया, तब से वे कुमार गंधर्व के नये नाम से ही प्रसिद्ध हो गये। उनके पिता सिद्धरमैय्या कोमकली भी एक अच्छे गायक और कोमकली मठ के प्रधान थे। बचपन से ही अपने पिता और परिवेश से प्राप्त नैसर्गिक गायन संस्कारों के बल पर कुमार गंधर्व ने अपनी गायन प्रतिभा से संगीतज्ञों को विस्मय-विमुग्ध कर दिया था।

उन्होंने 11 वर्षों तक महाराष्ट्र के संगीताचार्य प्रो. बी. आर. देवधर तथा प्रसिद्ध गायिका एवं संगीत गुरु अंजनीबाई से संगीत की शिक्षा पाई। 1947 से 52 तक वे बुरी तरह अस्वस्थ रहे। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से वे मध्यप्रदेश के देवास नामक स्थान पर सपरिवार रहते हुए यद्यपि औपचारिक रूप में संगीत सभाओं से कट-से गये, पर संगीत संबंधी उनकी अन्वेषी प्रतिभा ओर कल्पना रुग्णावस्था में भी निरंतर सक्रिय रही। उनका निधन 1992 ई. में हुआ।

कोई-कोई यद्यपि कुमार गंधर्व को संगीत क्षेत्र में परंपराभंजक विद्राही के रूप में देखते रहे, किन्तु वास्तव में वे एक स्वच्छंद गायक थे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में भी अनेक रे साहसपूर्ण प्रयोग किये हैं। यद्यपि औपचारिक रूप से उनका संबंध ग्वालियर घराने से था, तथा वे गायकी को संगीत घरानों में ही सीमित रखने के पक्ष में कदापि न थे। वे संगीत में स्वाभाविक रूप से सार्वभौम विशेषताओं और मूल्यों के पक्षधर थे।

वस्तुतः उनकी गायकी की अपनी विशिप.. शैली थी, जिसमें शास्त्रीय और लोक शैली का अद्भुत मिश्रण था। उनकी स्पष्ट मान्यता : कि शास्त्रीय संगीत को नित्य नूतन और स्फूर्तिमय बने रहने के लिए लोक संगीत के नैसर्गिक स्रोत में संबद्ध रहना आवश्यक है। ऐसा होकर ही वह रूढ़ और वह रूढ़ और एक रस हाने से बचा रह सकता है। लोक संगीत के आधार पर कुमार गंधर्व ने नए-नए रागों की खोज और रचना भी की यथा-अहिमोहिनी, मालवती, निंदयारी, लग्नगंधार, भावमत भैरव, सहेली, तोड़ी आदि।

वस्तुतः कुमार गंधर्व 20वीं शती के उत्तरार्द्ध में हिंदुस्तानी शैली के भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान् गायक और संगीत मनीषी थे। उनकी सर्वप्रमुखी रचना ‘अनूप राग विलास’ है। इसके अतिरिक्त उनके अनेक लेख, निबंध और टिप्पणियाँ, पत्र-पत्रिकाओं में यत्र-तत्र बिखरी हैं और अनेक म्यूजिक कंपनियों द्वारा उनके गान के रिकार्ड तथा कैसेट भी जारी किये गये हैं। उन्होंने अपनी विलक्षण संगीत-प्रतिभा के बलपर अनेक पुरस्कार, सम्मान और अलंकरण प्राप्त किये थे। वे भारत सरकार की संगीत नाटक अकादमी के सदस्य तथा ‘भारत भवन’ भोपाल के स्थानीय सदस्त थे। उन्हें राष्ट्रपति ने ‘पदनभूपण एवं विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन ने डी. लिट् की उपाधि प्रदान कर सम्मानित-विभूषित किया था। इस प्रकार भारतीय संगीत संसार में कुमार गंधर्व एक अविस्मरणीय एवं आदरणीय नाग है।

बेजोड़ गायिका : लता मंगेशकर पाठ का सारांश

हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘बेजोड़ गायिका : लता मंगेशकर’ के लेखक प्रख्यात गायक और संगीत मनीषी कुमार गंधर्व है। उन्होने इस पाठ में हमारे समय की अप्रतिम गायिका लता मंगेशकर की गायन-कला का बड़ी बारीकी से विवचेन-विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इस प्रकार यह पाठ एक महान् गायक द्वारा दूसरी महान गायिका पर लिखित होने के कारण विशेष महत्वपूर्ण है।

पाठ का आरंभ बड़ा ही रोचक, आकर्षक और जिज्ञासावर्द्धक है। लेखक एक दिन रेडियों सुन रहे थक कि अचानक उन्हें एक अद्वितीय स्वर सुनाई पड़ा। यह स्वर उनके मर्म को छू गया। वे मंत्रमुग्ध हो उस स्वर को सुनते रहे। गाना सामाप्ति पर जब गायिका का नाम घोषित हुआ तो वे दंग रह गये। वह जादुई स्वर लता मंगेशकर का था। लेखक को स्वाभाविक रूप से लता के पिता सुप्रसिद्ध दीनानाथ मंगेशकर याद आ गये।

लेखक ने आगे बताया है कि वह गाना ‘बरसात’ फिल्म के पहले की किसी फिल्म का था। तब से लता निरंतर गाती चली आ रही हैं और आज तो वे इस क्षेत्र में शीर्ष पर विराजमान हैं। यद्यपि उनसे पूर्व प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ का चित्रपट संगीत में अपना विशिष्ट स्थान था, पर बाद में आकर भी लता उनसे कहीं आगे निकल गई। लेखक की निभ्रांत स्थापना है कि भारतीय गायिकाओं में लता अद्वितीय हैं, उनके समान कोई दूसरी गायिका नहीं हुई। अपनी इस स्थापना की पुष्टि में लेखक बड़ी बारीकी से और विस्तारपूर्वक लता मंगेशकर की गायन-कला की विशिष्टताओं को उद्घाटित किया है और संगीत क्षेत्र में उनके बहुमूल्य योगदानों को मूल्यांकित करने का प्रयास किया है।

लेखक के अनुसार लता मंगेशकर के कारण चित्रपट संगीत को विलक्षण लोकप्रियता प्राप्त हुई। इतना ही नहीं, लोगों का शास्त्रीय संगीत की ओर देखने का दृष्टिकोण भी परिवर्तित हुआ है। उनके जादुई प्रभाव से छोटे-छोटे बच्चे भी अब स्वर में गुनगुनाते हैं। संक्षेप में कहें तो लता ने नई पीढ़ी के संगीत को संस्कारित किया है और साधारण मनुष्य की संगीत विषयक अभिरुचि में अभिवृद्धि की है।

लेखक ने लता. की लोकप्रियता के कारणों की चर्चा के क्रम में उनके गीतों में मौजूद गानपन को सर्वप्रमुख माना है। दूसरी विशेषता के रूप में उनके स्वरों की निर्मलता की बात कही गई है। इसके अतिरिक्त नादमय उच्चारण भी लता के गाने की एक मुख्य विशेषता है। इसी क्रम में लेखक द्वारा यह बात उठायी गई कि प्रायः लोग लता के गाने में करुण रस का प्रभावशाली प्रकटीकरण पाते हैं, पर सच यह है कि उन्होने उस रस के साथ उतना न्याय नहीं किया है। लेखक की दृष्टि में लता के गायन में एक और भारी कमी यह है कि उनका गाना सामान्यतः ऊँची पट्टी में रहता है।

लेखक के अनुसार यह प्रश्न बेतूका है कि शास्त्रीय गायन में लता का क्या स्थान है? इसी क्रम में उन्होंने शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत के वैषम्यों को स्पष्ट किया है। वे मानते हैं कि संगीत चाहे जिस प्रकार का हो, उसका महत्व रसिकों को आनंद प्रदान करने की सामर्थ्य पर निर्भर है। आगे लेखक ने चित्रपट तों के कारण संगीत क्षेत्र में आये परिवर्तनों और उसके सामयिक महत्व के बिन्दुओं को भरसक स्पष्ट करने का प्रयास किया है। वे स्पष्ट मानते हैं कि चित्रपट संगीत ने लोगों की संगीत विषयक अभिरुचि में प्रभावशाली मोड़ लाया है।

वस्तुत: संगीत का क्षेत्र अत्यंत विस्तीर्ण हैं, जिसमें नित्य नयी-नयी बातों की अन्वेषण और उद्भावना की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। निष्कर्ष रूप में लेखक का यह अभिमत स्थापित हुआ है कि लता मंगेशकर चित्रपट संगीत के क्षेत्र में वास्तव में अनभिषिक्त साम्राज्ञी हैं। अन्य गायक-गायिकाओं से विलग एवं विशिष्ट लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर विरजमान हैं। देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग उनका गाना सुनकर विमुग्ध हो उठते हैं। यह हमारा परम सौभाग्य है कि वे हमारे अपने हैं, अपने देश के हैं।

बेजोड़ गायिका : लता मंगेशकर कठिन शब्दों का अर्थ

अद्वितीय-अनुपम। चित्रपट-सिनेमा। विलक्षण-अद्भूत, अपूर्व। हुकमुशाही-एकाधिकार। अभिजात संगीत-शास्त्रीय संगीत। चौकस वृत्ति-सावधानी। अनभिषिक्त-जिसका अभिषेक अभी नहीं हुआ हो, बेताज। अलक्षित-जिसे देखा-परख न गया हो। तन्मयता-लीन होने का भाव। सितारिए-सितार बजाने वाला। कोकिला-कोयल जैसी मीठे स्वर वाली। अभिरुचि-पसंद। दिग्दर्शक-दिशा दिखाने वाला, डायरेक्टर। रंजक-प्रसन्न करने वाला। अवलंबित-आश्रित। सुसंगत-संगतिपूर्ण, मेल का। अव्वल दर्जे का-ऊँचे या प्रथम स्तर का। रसोत्कटता-रस की प्रधानता, तीव्र रसमयता। कौतुक-कुतूहल। निर्जल-बिना जल के, रूखा। असंशोधित-संशोधन के। अदृष्टपूर्व-जो पहले नहीं देखा गया हो। शताब्दी-सौ वर्ष।

महत्त्वपूर्ण पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या

1. जिस प्रकार मनुष्यता हो तो मनुष्य वैसे ही गानपन हो तो वह संगीत है।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्ति कुमार गंधर्व रचित आलेख से ली गयी है। इस सूक्ति वाक्य में कुमार गन्धर्व ने कहना चाहा है कि मानवीय गुणों की वह विशेषता जो दूसरों को प्रभावित करती है या दूसरों के काम आती है व मनुष्यता कहलाती है। इस मनुष्यता से जो युक्त है वही मनुष्य है शेष लोग तन से मनुष्य हैं गुण से पशु। इसी तरह संगीत की पहचान गानपन है। गानपन से तात्पर्य गाने का वह अंदाज जो एक सामान्य आदमी को भी आकृष्ट करके भाव विभोर कर दे, झूमा दे। इस गान-पन के नहीं होने पर संगीत नीरस और रचना का कंकाल भर होता है।

कंकाल पर ही शरीर खड़ा होता है लेकिन कंकाल के ऊपर चढ़े माँस और सुडौल आकार प्रकार से सुन्दरता का बोध होता कंकाल से नहीं। अतः गाने का अंदाज और श्रोता को विभोर करने की क्षमता ही गानपन है और इसी से संगीत की पहचान होती है, ताल, लय, मात्रा, स्वर और राग-रागिनियाँ संगीत का कंकाल है संगीत का सौन्दर्य नहीं। संगीत का सौन्दर्य तो भाव विभोर करने की क्षमता ही है।

2. जहाँ गंभीरता शास्त्रीय संगीत का स्थायी भाव है, वहीं जलद लय और चपलता चित्रपट संगीत का मुख्य गुणधर्म है।
व्याख्या-
लता मंगेशकर पर लिखित कुमार गंधर्व के लेख से यह पंक्ति ली गयी है। इसमें लेखक ने शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत के एक अन्तर की ओर संकेत किया है। लेखक के अनुसार राग-रागिनियों के अनुसार स्वर लिपि में आबद्ध तथा ताल, लय, मात्रा आदि से युक्त होने के कारण शास्त्रीय संगीत पूरी तरह अनुशासित होता है। इस अनुशासन के कारण और केवल पारखी लोगों के ही मन पर प्रभाव डालने की सीमा के कारण लेखक ने गंभीरता को शास्त्रीय संगीता का विशिष्ट लक्षण माना है। चूंकि यह लक्षण अपरिवर्तनशील होता है इसलिए इसे स्थायी भाव कहा है।

इसके विपरीत चित्रपट संगीत की दो विशेषताओं की ओर संकेत किया है। प्रथम उसमें जलद की सत्ता होती है। जलदलय का अर्थ होता है द्रुत या तेज लय। संगीत में तीन लय होती है। प्रथम विलम्बित अर्थात् धीमी, द्वितीय द्रुत अर्थात् तेज और तृतीय मध्यम अर्थात् द्रुत और धीमी के बीच की स्थितवाली। चित्रपट संगीत में तेज लय वाले गाने होते हैं जो अपनी आवेशपूर्ण शक्ति से श्रोता को बहा ले जाते हैं।

दूसरी विशेषता है चपलता। इसके कारण तरह-तरह के भाव तुरंत-तुरंत परिवर्तित होकर श्रोता को हल्केपन की मिठास से कभी गुदगुदाते है, कभी चंचलता पैदा करते हैं और कभी मनोदशा में परिवर्तन लाते है। दूसरे शब्दों में कह सकते है कि गंभीरता दो कारण शास्त्रीय संगीत सर्व स्वीकृत नहीं होता जबकि तीव्र गति और चंचलता के कारण चित्रपट संगीत अधिक पसन्द किया जाता है।

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 7 सिक्का बदल गया

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 7 सिक्का बदल गया (कृष्णा सोबती)

 

सिक्का बदल गया पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

सिक्का बदल गया कहानी के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11th प्रश्न 1.
शाहनी के मन में किस बात की पीड़ा है, फिर भी वह शेरा और हसैना के समक्ष हल्के से हंस पड़ती है। क्यों?
उत्तर-
भारत विभाजन का समय है। पाकिस्तान से हिन्दू घरबार छोड़ कर भारत आ रहे हैं। उन लोगों में शाहनी भी एक महिला है जो अपना घर-द्वार छोड़ने की तैयारी में हैं। उनका सब कुछ छूट रहा है। हरे-भरे खेत, विशाल महल सब कुछ छूट रहा है। इसी बात की पीड़ा है शाहनी के मन में।

जब शाहनी चनाब नदी से स्नान कर लौट रही है, उस समय उसकी भेंट शेरा और हसैना स होती है। दोनों आपस में झगड़ने लगते हैं। शाहनी बीच-बचाव करती है। शाहनी को यह भी पता है कि रात में कुल्लूवाल के लोग वहाँ आये थे। शेरा भी उस बैठक में सम्मिलित था। शाहनी को मारने की जिम्मेदारी उसे ही सौंपी गई थी। शाहनी यह सब कुछ समझती है बावजूद वह दोनों को अपना स्नेह देती है और हँस पड़ती है।

सिक्का बदल गया कहानी की समीक्षा Bihar Board Class 11th प्रश्न 2.
शेरा कौन है और उसके साथ साहनी का क्या संबंध है?
उत्तर-
शेरा ‘सिक्का बदल गया’ प्रस्तुत कहानी का एक प्रमुख पात्र तथा शाहनी का नौकर है। कथानायिका शाहनी के साथ उसका नजदीकी संबंध है। वह शाहनी का मातहत रहा है और अपनी माँ जैना के मरने के बाद शाहनी के पास ही रहकर पला-बढ़ा है।

सिक्का बदल गया Bihar Board Class 11th प्रश्न 3.
शेरा के भीतर प्रतिहिंसा की आग क्यों है?
उत्तर-
शेरा मुसलमान है। वह उन दंगाइयों में सम्मिलित है जो पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं को मारते थे और कुछ को घर-द्वार, जमीन-जायदाद, सोना-चाँदी, रुपये-पैसे छोड़ कर देश छोड़ने को मजबूर करते थे। भारत में बसे मुसलमान भी मारे जा रहे थे एवं भारत से निकाले जा रहे थे। शेरा के मन में प्रतिहिंसा का भाव था।

शेरा के मन में शाहनी के प्रति भी हिंसा का भाव है। वह सोचता है कि शाहनी को अपना घर-द्वार छोड़ना ही है। शाहनी को वह मारना भी चाहता है। उसके मन में यह भाव भी आता है कि शाहजी (शाहनी के स्वर्गवासी पति) ने भी उनलोगों से सूदखोरी करके धन कमाया है। ऐसा सोचते हुए प्रतिहिंसा की आग शेरे की आँखों में उतर आई। गड़ासे की याद आ गई। लेकिन शाहनी की ओर देखकर रूक गया। शाहनी ने उसे अपने बेटे के समान पाला था। यह बात उसे याद आ गई।

सिक्का बदल गया कहानी का सारांश Bihar Board Class 11th प्रश्न 4.
शाहनी अपना घर छोड़ते हुए भी विरोध में एक स्वर नहीं निकाल पाती। ऐसा क्यों।
उत्तर-
शाहनी को मालूम है कि भारत का विभाजन हो गया है। शाहनी को अपना घर छोड़ते हुए अपार दुःख और कष्ट होता है। उसने इस दिन की कभी कल्पना भी नहीं की थी। फिर भी, वह विरोध में एक स्वर भी नहीं निकाल पाती है तो इसका कारण यह है कि वह भीतर से पूरी तरह टूट चुकी है ओर सामने आयी विपरीत एवं अपरिवर्तनीय परिस्थिति की हकीकत भली-भाँति समझ चुकी है।

Sikka Badal Gaya Kahani Ka Saransh Bihar Board Class 11th प्रश्न 5.
शाहनी के हाथ शेरा की आँखों में क्यों तैर गये?
उत्तर-
शेरा अपनी माँ मृत्यु के पश्चात् शाहनी के पास रहकर ही पला-बढ़ा है। किन्तु, कठिन कालचक्र के फेर में फंसकर वह फिरोज के साथ उसकी हत्या करने एवं उसके सारे सामानों को लूटने की दुरभिसंधि कर लेता है। किन्तु, उसके अंदर मानवता अभी शेष है। अतः उस भयानक कृत्य के पूर्व उसकी आँखों में शाहनी के हाथ तैर जाते हैं, जिन हाथों से वह कटोरा भर दूध पिया करता था।

सिक्का बदल गया कहानी की समीक्षा Pdf Bihar Board Class 11th प्रश्न 6.
शेरा की फिरोज के साथ क्या बात हुई थी?
उत्तर-
शेरा की फिरोज के साथ यह बातचीत हुई थी कि वह शाहनी को मार देगा और . . उसके सारे सामनों को आधे-आधे बाँट लेगा।

सिक्का बदल गया कहानी Pdf Bihar Board Class 11th प्रश्न 7.
जबलपुर में आग क्यों लगाई गई थी? धुआँ देख साहनी क्यों चिंतित हो गई थी?
उत्तर-
जबलपुर में लगी आग सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा थी। वह आग दहशत फैलाने के उद्देश्य से लगाई गई थी। जब वहाँ आग लग गई, तो आसमान में उठे धुओं को देखकर शाहनी पोर्ट गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट अत्यंत चिंतित हो गई, क्योंकि उसके सगे-संबंधी, नाते-रिश्तेदार सब वहीं रहते थे।

सिक्का बदल गया कहानी की मूल संवेदना Pdf Bihar Board Class 11th प्रश्न 8.
दाऊद खाँ की कैसी स्मृतियाँ शाहनी से जुड़ी हैं?
उत्तर-
दाऊद खाँ एक थानेदार है। ट्रक पर हिन्दू जमा हो रहे हैं। उन्हें हिन्दुस्तान की सीमा पर पहुँचना दाऊद खाँ की ड्यूटी है। जब ट्रक शाहनी की हवेली के सामने खड़ी हुई तो दाऊद खाँ पुलिस की अकड़ के साथ शाहनी के दरवाजे पर पहुंचा। सहसा दाऊद खाँ ठिठक गया। वही शाहनी है जिसके शाहनी उसके लिए दरिया के किनारे खेमे लगावा दिया करते थे। यह तो वही शाहनी है, जिसने उसकी मंगेतर को सोने के कनफूल मुँह दिखाई में दिये थे। यही स्मृतियाँ दाऊद खाँ की शाहनी से जुड़ी हैं।

Sikka Badal Gaya Question Answer Bihar Board Class 11th प्रश्न 9.
भागोवाल मसीत के लिए शाहनी ने दाऊद खाँ को क्या दिया था?
उत्तर-
दाऊद खाँ थानेदार था। एकदिन वह शाहनी के घर आया। भागोवाल मसीत (मस्जिद) के लिए शाहनी ने दाऊद खाँ को मांगने पर पूरी की पूरी राशि तीन सौ रुपये दे दिये थे।

Sikka Badal Gaya Kahani Bihar Board Class 11th प्रश्न 10.
थानेदार दाऊद खाँ बार-बार शाहनी से नकद रखने का आग्रह करता है। तब भी शाहनी नहीं रखती है। क्यों?
उत्तर-
शाहनी अपना घर छोड़ हिन्दुस्तान आ रही है। वह अपनी हवेली से बेहद प्यार करती है। बिना कुछ लिए वह घर छोड़ देती है। इस पर दाऊद खाँ जो थानेदार है, बार-बार शाहनी से कुछ नकद रख लेने का आग्रह करता है। लेकिन शाहनी नकद नहीं रखती है। वह दाऊद खाँ को जवाब देती है-“नहीं बच्चा, मुझे इस घर से नकदी प्यारी नहीं। यहाँ की नकदी यही रहेगी।” शाहनी के इस उत्तर से दाऊद खाँ निरुत्तर हो गया। शाहनी अपनी हवेली से बेहद प्यार करती थी।

सिक्का बदल गया कहानी Bihar Board Class 11th प्रश्न 11.
दाऊद खाँ क्यों चाहता है कि शाहनी हवेली छोड़ते हुए कुछ साथ रख ले।
उत्तर-
थानेदार दाऊद खाँ शाहनी का बहुत आभारी और उपकृत है। शाहनी ने समय-समय पर उसकी मदद की थी। अत: वह भी अपनी सलाह से शाहनी को भविष्य के संकटों से निबटने हेतु कुछ नकद साथ रखने को कहता है। उसकी व्यावहारिक बुद्धि जानती है कि संकट के समय में पास की पूँजी बड़ी काम आती है। इसी सदिच्छा और आत्मीयता वश दाऊद खाँ चाहता है कि शाहनी हवेली छोड़ते हुए कुछ नकद पैसे साथ रख ले।

Class 11 Hindi Book Bihar Board प्रश्न 12.
दाऊद खाँ को शाहनी के पास खड़े देखकर शेरा ने क्यों कहा-“खाँ साहिब, देर हो रही है।”
उत्तर-
शाहनी हवेली छोड़ने वाली थी। घर से निकलने में ममता आ रही थी। अपना घर सदा के लिए छोड़ना था। पाकिस्तान छोड़कर भारत आना था। शाहनी हवेली की ड्योढ़ी पर आकर खड़ी थी। इसी बीच थानेदार दाऊद खाँ को बीती हुई बातें याद आ जाती हैं। शाहनी ने उसकी मंगेतर को सोने के कनफूल मुँह दिखाई में दिये थे। यह स्मृति दाऊद खाँ झकझोर देती है। दाऊद को सहानुभूति आ जाती है।

वह बार-बार शाहनी को कुछ साथ लेने की सलाह देती है। जब वह सोना चाँदी साथ ले लेने को कहता है तो शाहनी जवाब देती है है-“सोना चाँदी। मेरा सोना तो एक-एक जमीन में बिछा है।” दाऊद खाँ निरूत्तर हो जाता है। वह फिर कहता है-शाहनी, कुछ नकदी जरूरी है। इस पर शाहनी कहती है-“नहीं बच्चा, मुझे इस घर से नकदी प्यारी नहीं। यहाँ की नकदी यहीं रहेगी।”

सिक्का बदल गया कहानी की व्याख्या Bihar Board Class 11th प्रश्न 13.
शाहनी किसके सुख-दुख की साथिन थी?
उत्तर-
शाहनी अपनी हवेली छोड़ने जा रही हैं। गाँव के सभी लोग इकट्ठा होने लगे। शाहनी गाँव के सभी बड़े-बूढ़ों, बूढी-बूढ़ियों के सुख-दुख की साथी थी। जब शाहनी ने अपनी ड्योढ़ी के बाहर पैर रखा तो सभी बुढ़ियाँ रो पड़ी क्योंकि शाहनी सबके सुख-दुख में हाथ बँटाती थी।

Bihar Board Hindi Book Class 11 Pdf Download प्रश्न 14.
चलते समय इस्माइल ने शाहनी से क्या कहा?
उत्तर-
हवेली छोड़कर जाते समय शाहनी से इस्माइल ने यह कहा कि “शाहनी, कुछ कह जाओ। तुम्हारे मुँह से निकली (अ) सीस झूठी नहीं हो सकती।” इस्माइल के इस कथन से साहनी के बारे में लोगों की धारणा का पता चलता है।

प्रश्न 15.
खूनी शेरे का दिल क्यों टूट रहा था?
उत्तर-
शेरा शाहनी का नौकर था। खूनी शेरे का दिल इसलिए टूट रहा था कि माँ के मरने के बाद शाहनी ने ही उसे दूध पिलाकर पाला-पोसा था। उसके सामने उसे दूध पिलाकर पालने वाली, उस पर प्यार का हाथ फेरने वाली शाहनी जा रही थी और वह चाहकर भी कुछ न कर सकता था।

प्रश्न 16.
शाहनी शेरे को क्या आशीवाद देती है?
उत्तर-
ट्रक पर बैठते समय शाहनी के पीछे गाँव के लोग शोकाकुल थे। सारा वातावरण गमगीन हो गया था। कोई आशीर्वाद माँग रहा था। कोई पछता रहा था। उसी बीच शेरे आगे बढ़कर शाहनी का पाँव छूता है और कहता है-‘शाहनी, कोई कुछ नहीं कर सका। राज भी पलट गया।’ शाहनी ने काँपता हुआ हाथ शेरे के सिर पर रखा और रूक-रूक कर कहा-

“तैनू भाग ‘जगण चन्ना (ओ चाँद तेरे भाग्य जागे)। शाहनी का यह आशीर्वाद सांकेतिक था। शाहनी की सम्पत्ति शेरे को ही मिलने वाली थी। शेरे ने दंगाइयों के साथ बहुत कत्ल किये थे। शाहनी की मृत्यु भी उसे ही करनी थी, लेकिन वह कर न सका। तब भी शेरे के भाग जगने वाले थे। शाहनी का आशीर्वाद भी उसे मिला।

प्रश्न 17.
शाहनी के जाने पर लोगों के मन में क्या अफसोस होता है?
उत्तर-
शाहनी पाकिस्तान छोड़कर भारत आ रही हैं। वह अपना सब कुछ गंवा चुकी हैं। गाँव के लोग भी दु:खी हैं। लोग अफसोस कर रहे हैं। शेरे कहता है-कोई कुछ नहीं कर सका। अर्थात् शाहनी को कोई रोक नहीं सका क्योंकि राज ही पलट गया था। दाऊद खाँ सोच रहा है-“कहाँ जायेगी कैसे रहेगी? कितना अच्छा व्यवहार था उसका हम सबके साथ। वह सबों का खबर रखती थी और सबकी मदद करती थी।” लोग बोल रहे थे-“शाहनी मन में मैल न लाना। कुछ कर सकते तो उठा न रखते। वक्त ही ऐसा है, राज पलट गया है।”

प्रश्न 18.
‘शाहनी चौंक पड़ी। देर-मेरे घर में मुझे देर। आँसुओं की भंवर में न जाने कहाँ से विद्रोह उमड़ पड़ा।’-इस उद्धरण की सप्रसंग व्याख्या करें।
उत्तर-
सप्रसंग व्याख्या-प्रस्तुत व्याख्या पंक्तियाँ कृष्णा सोबती रचित हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत, भाग-1’ में संकलित कहानी ‘सिक्का बदल गया’ से उद्धृत हैं। वातावरण बड़ा गमहीन है। सद्विचारों एवं सद्व्यवहारों से युक्त बड़ी हवेली की एकमात्र स्वामिनी शाहनी अन्यत्र जाने को विवश-बाध्य है। थानेदार दाऊद खाँ उससे बुरे समय के लिए कुछ नकद साथ रख लेने का भाव भरा आग्रह कर रहा है। पर, शेरा इस शक के कारण कि वह कुछ माल मार रहा है, देर होने की बात उठाता है। इसी पर शाहनी की दो-टूक होती मन:स्थिति को व्यजित करने वाली प्रस्तुत पंक्तियाँ आयी हैं।

शाहनी हवेली की एकमात्र स्वामिनी रही है, पर आज उसे छोड़ जाना है। क्योंकि . परिस्थितियों के कठिन संघात से देश बँट चुका है। अब किसी के करने से कुछ होने जानेवाला नहीं। देश की सीमा के विभाजन के साथ ही लोगों के दिल भी बँट चुके हैं। उक्त परिस्थितियों . में मन में आवेगों के तूफान को संभाले शाहनी के दिल में शेरा का यह कथन तीर-सा चुभता है। ओह? यह भी कैसा दिन? अपने ही घर में उसे देर हो रही है और वह कुछ नहीं कर सकती। वह आँसुओं की भँवर में डूब-उतरा रही है। थोड़ी देर के लिए उस शांत-संयत दिल में भी विद्रोह उमड़ पड़ता है।

उसे लगता है कि वह इन सबके प्रति विद्रोह कर दे, जाने से इनकार कर दे, पर अंततोगत्वा परिस्थितियों के कठोर यथार्थ के आगे कुछ नहीं कर पाती है, आँसूओं के घूट पीकर रह जाती है।

यह प्रसंग बड़ा ही मार्मिक है। शाहनी अपने पुरखों के घर में है। वह एक बड़े घर की रानी है। शेरे जैसे लोग उसके ही अन्न पर पले हैं और उसे ही उसके ही घर में देर होने की बात कहते हैं। ‘देर हो रही है।’ यह वाक्य शाहनी के कानों में गूंजने लगता है। अपना वतन, अपनी जमीन अपना घर छोड़ने का यह दृश्य बड़ा ही मार्मिक है।

प्रश्न 19.
घर छोड़ते समय शाहनी की मनोदशा का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर-
कृष्णा सोबती लिखित कहानी ‘सिक्का बदल गया’ शीर्षक के केन्द्र में शाहनी नामक पात्रा है। इसी के इर्द-गिर्द सारी कहानी घटित होती है। वह स्वभाव से अत्यंत उदार और उच्चाशय है। वह शाहनी की पत्नी के रूप में आपार वैभव की स्वामिनी रह चुकी है, किन्तु उसका मानव-सुलभ सत्वगुण सदा जाग्रत रहा है। वह सबों से हिल-मिलकर रहनेवाली है। पर, कालचक्र में पाकर जब भारत का विभाजन होता है तो उसे वह स्थान छोड़ने को मजबूर होना पड़ता है। उस हवेली और उसके आस-पास की सारी-चीजों से उसका हार्दिक अपनत्व और ममत्व है।

अत: उन्हें छोड़ते समय वह दुःख एवं करुण भावनाओं की उत्ताल तरंगों में गिरती-पछड़ती है। भाग्य ने भी कैसा दिन दिखाया है उसे? जो हवेली, खेत-खलिहान, बाग-बगीचे सहित तमाम लोग उसके अपने थे, आज सभी बेगाने हैं। साथ में पति और पुत्र तक नहीं। इस प्रकार लेखिका ने घर छोड़ते समय शाहनी की मनोदशा अत्यंत करुण, पीड़ित एवं दयनीय है।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित वाक्यों की सप्रसंग व्याख्या करें:
(क) जी छोटा हो रहा है, पर जिनके सामने हमेशा बड़ी बनी रही है, उनके सामने वह छोटी न होगी।

सप्रसंग व्याख्या-
प्रस्तुत सारगर्भित पंक्तियाँ सोबती लिखित कहानी गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत, भाग-1’ में संकलित ‘सिक्का बदल गया’ से अवतरित है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के साथ ही भारत का विभाजन भी हो गया। कहानी की सर्वप्रमुख पात्रा शाहनी विभाजन-जन्य मारक स्थितियों की शिकार है। उसे अपनी हवेली छोड़नी पड़ रही है। लोगों का हुजूम उमड़ा पड़ा है। उसके मन में एक बार पुनः हवेली को अंदर से देख की तीव्र इच्छा होती है, पर वह. अपनी कमजोरी को प्रकट नहीं होने देती। प्रस्तुत वाक्य वहीं का है।

अपनी हवेली को अंतिम, बार फिर से देख लेने की लालसा के बावजूद उसकी देहरी से बाहर निकली शाहनी के मन में तीव्र अंतर्द्वन्द्व है। एक ओर यदि वह उसे जीभर पुनः देखना चाहती है तो दूसरी ओर उसके ध्यान में वहाँ जुटे वे सभी लोग भी हैं जो कभी उसकी मातशाती करते थे। उनके सामने वह हमेशा बड़ी बनी रही है और अपना बड़प्पन दिखाती रही है। सभी उसकी उँगलियों पर नाचते थे। यह सारा कुछ उसका अपना था। उसके समान वहाँ कोई न था। पर आज स्थिति की विडंबना है उसे अपना सारा कुछ छोड़ कर जाना पड़ रहा है।

कितनी दारुण और दयनीय दशा है यह फिर भी वह उन लोगों के सामने अपनी कमजोरी नहीं दिखाएगी। यह उसके स्वभाव के अनुकूल नहीं वह हमेशा बड़ी रही है तो आज भी अपनी दीनता प्रदर्शित न करेगी और दया की भीख न माँगेगी और न ही हवेली के प्रति अपनी कोमल भावनाओं का इजहार करेगी। यद्यपि उसका जी अपने-ही-आप छोटा हो रहा है। प्रस्तुत पंक्तियों में शाहनी का स्वाभिमान एवं बड़प्पन झलकता है।।

(ख) आस-पास के हरे-हरे खेतों में से घिरे गाँवों में रात खून बरसा रही थी।
सप्रसंग व्याख्या-
प्रस्तुत सारगर्भित पंक्ति में देश-विभाजन की त्रासदी पर लिखित बहुचर्चित एवं बहुप्रशंसित कहानी ‘सिक्का बदल गया’ से उद्धत है। सुप्रसिद्ध लेखिका कृष्णा सोबती ने कहानी के अंत में इस पंक्ति के माध्यम से दिल हिलाकर रख देने वाली उस स्थिति को साकार कर दिया है, जो भारत-विभाजन के फलस्वरूप उत्पन्न हुई थी और जिसकी टीस एवं कसक आज भी यथावत है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही भारत का विभाजन हो चुका है, मुल्क बँट गया है, सिक्का बदल गया है। कथानायिका शाहनी इस दुःसह वेदना से दुःखी है। वह अपनी बहुमूल्य निधि हवेली, जिसके साथ उसकी न जाने कितनी स्मृतियाँ, कितने संवेदन स्थायी रूप से संयुक्त हैं, छोड़कर चली गई या कहिए ले जाई गई। उपस्थित जन समूह निर्वाक और निस्पंद है। मानों जीवन का स्त्रोत सूख गया और निर्जीवता ही शेष है।

उसी समय की हृदयविदारक स्थिति को अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से उकेरती हुई लेखिका कहती है कि तब जब सबकी श्रद्धा भाजन शाहनी चली गई चारों ओर अँधेरा छा गया। गाँव हरे-भरे खेतों से घिरे थे लेकिन हरे खेतों के बीच बसे हिन्दू गाँवों में रात के खून बरसा रही थी, अर्थात् रात में हिन्दुओं का कत्ल हो रहा था। गाँव में खून की होली खेली जा रही थी। कहीं कोई जीवन की हलचल नहीं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि राज पटल गया और सिक्का भी बदल गया था। लोग भी बदल गये हैं।

प्रश्न 21.
प्रस्तुत कहानी का शीर्षक “सिक्का बदल गया’ कहाँ तक सार्थक है? अपना मत दें।
उत्तर-
किसी भी रचना का शीर्षक उसका द्वार होता है जिसे देखकर ही अन्दर आने की इच्छा-अनिच्छा होती है। अगर द्वार आकर्षक है तो अंदर झाँकने या अन्दर की बात जानने की उत्सुकता स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। अत: रचना का शीर्षक आकर्षक होना अत्यावश्यक है। दूसरी बात है रचना की संक्षिप्तता और रचना के मूल भाव का संवहन करना।।

उक्त दोनों ही दृष्टि से ‘सिक्का बदल गया’ कहानी शीर्षक अत्यन्त ही उपयुक्त है। कहानी का शीर्षक पढ़ते ही यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि ‘सिक्का बदल गया’ आखिर है क्या? यह शीर्षक आकर्षक है और कहानी का भाव जानने के लिए पाठक को बाध्य करता है। कहानी का शीर्षक यह स्पष्ट करता है कि राज बदल गया है। परिस्थितियाँ बदल गई हैं। कहानी की शुरूआत भी इसी भाव से होती है कि परिस्थितियाँ बदल गई हैं, राज्य बदल गया है। शाहनी को अनुभव हो गया है कि उसे अपना घर-द्वार, जमीन-जायदाद सबकुछ छोड़ना होगा। ऐसा होता भी है। कहानी अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचती है। शाहनी घर छोड़ ट्रक पर बैठ जाती है, सिक्का बदल गया है पूर्णतः सार्थक समचीन और सटीक है यह शीर्षक।

सिक्का बदल गया भाषा की बात

प्रश्न 1.
इस कहानी में पंजाबी भाषा के कई वाक्य हैं। उन्हें हिन्दी में अनूदित करें।
उत्तर-
(a) ऐ मर गई एँ-रब्ब तैनू मौत दे।
ऐ मर गई क्या, भगवान, तुझको मौत दे।

(b) ऐ आई यां-क्यों छावेले तड़पना एं?
यह यहाँ आई, क्यों सबेरे-सबेरे तड़पते हो।

(c) रब्बू ने एही मंजूरसी-भगवान को यही मंजूर है।
(d) रब्ब तुहानू सलामत रक्खे बच्चा खुशियाँ बक्शे………..भगवान तुम्हें सुरक्षित रखें, खुशियाँ दें।
(e) तैनू भाग जगण चन्नाः-ओ चाँद, तेरे भाग्य जागें।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची लिखें। दरिया, आसमान, सूर्य, आँख, पानी, सोना, पुत्र, घर
उत्तर-

  • शब्द – पर्यायवाची शब्द
  • दरिया – प्रवाहिता, नदी, सरिता
  • आसमान – आकाश, नभ, गगन
  • सूर्य – दिनकर, भास्कर, दिवाकर आँख
  • आँख – लोचन, नयन, नेत्र पानी
  • पानी – जल, नीर, अंबू सोना
  • सोना – स्वर्ण, कंचन
  • पुत्र – बेटा, लड़का, सुत
  • घर – गृह, निकेतन, आलय

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के बहुवचन बनाइए दुलहन, नजर, हवेली, कोठरी, साथी, आँसू, देवता
उत्तर-

  • एकवचन – बहुवचन
  • नजर – नजरें।
  • हवेली – हवेलियाँ
  • कोठरी – कोठरियाँ
  • साथी – साथियों
  • आँसू – आँसू (हमेशा बहुवचन)
  • देवता – देवताओं

प्रश्न 4.
‘पर-पर वह ऐसा नहीं-सामने बैठी शाहनी नहीं, शाहनी के माथ उसकी आँखों में तैर गए।’ यहाँ ‘आँखों मैं तैर गए’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
यहाँ ‘आँखों में तैर गए’ का अर्थ है-याद आ गय।

प्रश्न 5.
‘शाहनी, आज तक ऐसा न हुआ, न कभी सुना, गजब हो गया, अंधेर पड़ गया। यहाँ ‘अंधेर पड़ गया’ मुहावरा है। मुहावरे के प्रयोग के बिना इसी वाक्य को इस प्रकार लिखें कि अर्थ परिवर्तित न हो।
उत्तर-
‘शाहनी, आज तक ऐमा न हुआ न कभी सुना, गजब हा गया, अनर्थ हो गया’

प्रश्न 6.
‘जमीन तो सोना उगलती है।’ यहाँ सोना उगलने में क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
‘जमीन सोना उगलती है’ से तात्पर्य यह है कि जमीन से धन-धान्य, फसलें, आदि उपजती हैं।

प्रश्न 7.
सलामत एक भाववाचक संज्ञा है। इसका विशेषण रूप हुआ सलीम। ऐसे ही नीचे के शब्दों के विशेषण रूप लिखें
महारत, रहमत, तिजारत, शराफत, शरारत
उत्तर-

  • संज्ञा – विशेषण
  • महारत – महारती
  • रहमत – रहीम
  • तिजारत – तिजारती
  • शराफत – शरीफ
  • शरारत – शरारती

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

सिक्का बदल गया लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सिक्का बदल गया कहानी का देश-काल लिखें।
उत्तर-
इस कहानी का काल अर्थात् समय आजादी मिलने के साथ हुआ। भारत-विभाजन है। इस घटना के कारण धर्म के आधार पर आबादी का स्थानान्तरण हुआ। भारत के अनेक मुस्लिम परिवार पाकिस्तान गये और पाकिस्तान क्षेत्र की पूरी हिन्दू-सिक्ख आबादी भारत आ गयी। इस कहानी का स्थान पश्चिमी पंजाब है, जहाँ चिनाब नदी के किनारे एक गाँव में बसे धनाढ्य परिवार की अकेली विधवा महिला को अपना सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ता है, क्योंकि, उस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी अधिक है और वह क्षेत्र विभाजन के क्रम में पाकिस्तान के हिस्से में चला जाता है। अतः इस कहानी का देश अर्थात् स्थान पंजाब का पश्चिमी भाग है और काल . अर्थात् समय भारत-विभाजन, अर्थात् 15 अगस्त, 1947 के तुरंत बाद का।

प्रश्न 2.
‘सिक्का बदल गया’ का अभिप्राय या कहानी के शीर्षक की सार्थकता बतावें।
उत्तर-
इस कहानी में सिक्का सत्ता का प्रतीक है। आजादी देने के साथ अंग्रेजों ने भारत को दो टुकड़ों में बाँटने का इन्तजाम कर दिया। इसका प्रभाव यह पड़ा कि पाकिस्तान क्षेत्र के हिन्दुओं को भारत आना पड़ा। यहाँ सिक्का बदलने का अर्थ है राजपाट बदलना, राजपाट अंग्रेनों का नहीं रहा और भमि दा गष्ट्रों में बँट गयो। जहाँ कल तक हिन्दू-मुसलमान दोनों थे वहाँ अब मुसलमानों का इम्लामी शासन-कायम हा गया। अतः हिन्दुओं के लिए तीन विकल्प शेष रह गये-

  • मुसलमान बनकर रहो,
  • भारत जाओ,
  • कत्ल हो जाओ।

इसी के कारण मुस्लिम आबादी वाले गाँव की अकली मालकिन साहनी को अपनी जमीन, हवेली और अपार धन छोड़कर चला जाना पड़ता है।

सिक्का बदल गया अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शाहनी के प्रति शेरा के भाव क्या हैं?
उत्तर-
शेरा दुविधाग्रस्त है। वह अपने साथियों के साथ होकर शाहनी को मारकर हवेली लूट लेना चाहता है। लेकिन शाहनी के द्वारा बचपन में दिये गये स्नेह का स्मरण आते ही उसके हाथ रुक आते हैं।

प्रश्न 2.
गाँव वाले शाहनी को किस दृष्टि से देखते हैं?
उत्तर-
गाँव वाले शाहनी को अपने और प्रेम की दृष्टि से देखते हैं। वे नहीं चाहते हैं कि शाहनी जैसी स्नेहमयी मालकिन जाये लेकिन वे परिस्थिति के आगे विवश हैं।

प्रश्न 3.
गाँव छोड़ने के समय शाहनी की मनःस्थिति कैसी है?
उत्तर-
शाहनी के मन में कभी-कभी पुराना शासिका भाव और मोह उभरता है, लेकिन वह यथार्थ परिस्थिति को समझ रही है। अतः भीतर से दुःखी और मोहग्रस्त होते हुए भी ऊपर से निर्विकार होकर चली जाती है।

प्रश्न 4.
सिक्का बदलने का अभिप्राय क्या है?
उत्तर-
कल तक शाहनी गाँव की मालकिन थी। आज उसका गाँव भिन्न धर्म वाले देश का भाग बन गया है। अतः उसे भिखारिन की तरह अपना सब कुछ छोड़ना पड़ रहा है। समय का यही परिवर्तन सिक्का बदलने का अर्थ है।

प्रश्न 5.
सिक्का बदल गया नामक पाठ किसकी रचना है?
उत्तर-
सिक्का बदल गया कृष्णा सोबती द्वारा लिखित रचना है।

प्रश्न 6.
सिक्का बदल गया नामक पाठ किस प्रकार की रचना है?
उत्तर-
सिक्का बदल गया पाठ एक संस्मरण है।

प्रश्न 7.
साहनी ने हवेली क्यों छोड़ा?
उत्तर-
जब भारत का विभाजन हुआ तो साहनी ने भारत आने के लिए अपना घर छोड़ दिया।

प्रश्न 8.
दाझुद खाँ क्या चाहता था?
उत्तर-
दाद खाँ यह चाहता था कि साहनी हवेली को न छोड़े। साथ ही वह यह भी चाहता था कि यदि साहनी हवेली छोड़ती है तो वह अपने साथ कुछ आवश्यकता की वस्तु रख लें क्योंकि दाझुद खाँ को साहनी के प्रति सहानुभूति थी।

सिक्का बदल गया वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
‘सिक्का बदल गया’ किनकी रचना है?
(क) कृष्णा सोबती
(ख) भोला पासवान शास्त्री
(ग) कृष्ण कुमार
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क)

प्रश्न 2.
‘सिक्का बदल गया’ की पृष्ठभूमि है
(क) आजादी की लड़ाई
(ख) भारत का विभाजन
(ग) भारत-पाक संबंध
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 3.
शेरा कौन था?
(क) शाहनी का बेटा
(ख) शाहनी का नौकर
(ग) दाऊद खाँ का पुत्र
(घ) इनमें से कोई नहीं
उतर-
(ख)

प्रश्न 4.
किसने कहा-‘मेरा सोना तो एक-एक जमीन में बिछा है।’
(क) दाऊद खाँ
(ख) शेरा
(ग) शाहनी
(घ) फिरोज
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 5.
शाहनी के मन में किस बात की पीड़ा थी?
(क) नि:संतान होने की
(ख) जन्मभूमि छोड़ने की।
(ग) पति की मृत्यु की
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 6.
शेरा शाहनी को क्यों मारना चाहता था?
(क) शाहनी की सम्पत्ति हथियाने के लिए
(ख) पुरानी दुश्मनी के कारण
(ग) अपनी बात मनवाने के लिए
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न 1.
……………..की आग शेरे की आँखों में उतर आई।
उत्तर-
प्रतिहिंसा

प्रश्न 2.
…………………कुआँ भी आग नहीं चल रहा।
उत्तर-
जम्मीवाला

प्रश्न 3.
मेरा सोना तो एक-एक……………..में बिछा है।
उत्तर-
जमीन

प्रश्न 4.
आस-पास के हरे-हरे खेतों से घिरे गाँवों में रात……………बरसा रही थी।
उत्तर-
खून

प्रश्न 5.
लेकिन…………….यह नहीं जानती कि सिक्का बदल गया है।
उत्तर-
बूढ़ी शाहनी।

सिक्का बदल गया लेखक परिचय कृष्णा सोबती (1925)

आधुनिकता बोध की श्रेष्ठा कथाकार एवं महिला लेखिका (पं० पंजाब, जो अभी पाकिस्तान का हिस्सा है) में सन् 1925 में हुआ था। वे अपनी आजीविका के लिए नौकरी पेशा आदि न अगनाकर स्वतंत्र लेखन में ही लगी रही। सम्प्रति, वे नई दिल्ली के निवासी हैं और एकांतभाव से साहित्य-रचना का कार्य कर रही हैं। उनके उल्लेखनीय साहित्यिक अवदानों के लिए उन्हें अनेक पुस्कारों एवं सम्मानों से पुरस्कृत एवं विभूषित किया गया है। जैसे-साहित्य अकादमी सम्मान, हिन्दी अकादमी का शलाका सम्मान, साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता, बिहार का राजेन्द्र शिखर सम्मान सहित अन्य अनेक राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें प्राप्त हैं।

वस्तुतः स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य में कृष्णा सोबती का अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट स्थान है। उनका नाम हिन्दी के एक बड़े, समर्थ एवं सशक्त रचनाकारों में लिया जाता है। यद्यपि कृष्णा एक महिला कथाकार हैं, तथापि ऐसा नहीं कि उनका कथाकार व्यक्तित्व महिला होने की किसी रियासत या खासियत पर जिन्दा है। वास्तव में उनके कथा-साहित्य की मूलभूत शक्ति, सामर्थ्य एवं वैशिष्ट्य उनके महिला होने पर मुनहसर नहीं, प्रत्युत स्त्रोत और जड़ें, उनके विशाल एवं गहरे जीवनानुभाव, कल्पनाशील कथात्मक प्रतिभा, अद्भुत भाषा-सामर्थ्य, कलात्मक अंतर्दृष्टि और मनस्वी बौद्धिकता में हैं।

यह शक्ति-सामर्थ्य उनकी रचनाधर्मिता को कभी बासी नहीं होने देती। वे नित्य नई ताजगी और उत्साह के साथ अपने नये-पुराने अनुभवों के भीतर से नई भाव-भंगिमा के साथ नई कृति प्रस्तुत कर देती हैं। उनके कथा-साहित्य में नारी सुलभ कोमल भावनाओं एवं संवेदनाओं की स्वाभाविक रूप से भरपूर अभिव्यक्ति हुई हैं। उनका व्यक्ति, समाज, परिवेश और प्रकृति के साथ नित्य नया संबंध है, जिससे वे हमेशा अपने समय के साथ बनी रहती हैं।

उनमें परिवेश और मानवचरित्रों के अंतर्मन में बैठने तथा मानव-संबंधों के नये-नये रूपों, भंगिमाओं को समझने और तदनुरूप लेखन के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अद्भुत शक्ति है। यही कारण है कि उन्होंने हिन्दी तथा साहित्य को कई अविस्मरणीय चरित्र प्रदान किये हैं।

कृष्णा सोबती की कथा भाषा विविधतापूर्ण और बहुरूपिणी है। उसमें संस्कृत, उर्दू, पंजाबी और अन्य देशज विरासतों का सम्यक् सम्मिश्रण है। वे अपनी भाषा को पात्र, परिवेश एवं परिस्थिति के अनुरूप कलात्मक रूप देने में दक्ष हैं। इससे पाठकों को उसमें वास्तविक जीवन – प्रतीति होती है।

निश्चय ही कृष्णा सोबती आज की हिन्दी कहानी-लेखिकाओं के बीच अत्युच्च स्थान और दिशिष्ट मान-सम्मान की अधिकारिणी हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं

उपन्यास-यारों के यार, जिन्दगी नामा (साहित्य अकादमी से पुरस्कृत), दिलो दानिश, ऐ लड़की, समय सरगम आदि।

कनी-संग्रह-डार से बिछुड़ी, मित्रों मर जानी, बादलों के घेरे सूरजमुखी, अंधेरे के आदि। शब्दचित्र-संस्मरण-हम हशमत, शब्दों के आलोक में आदि।

सिक्का बदल गया पाठ का सारांश

कृष्णा सोबती द्वारा रचित कहानी “सिक्का बदल गया” हिन्दी की प्रसिद्ध कहानी है। कृष्णा सोबती के पास भारत विभाजन का दर्द भरा निजी अनुभव है। कृष्णा सोबती के कथा . साहित्य में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों रूपों में भारत विभाजन एक त्रासदी के रूप में उपस्थित पाते हैं। वास्तव में भारत विभाजन एक राष्ट्रीय त्रासदी है जिसकी स्मृति लोक-मानस में अमिट है।

प्रस्तुत कहानी “सिक्का बदल गया” भारत विभाजन की इसी पीड़ा भरी पृष्ठभूमि को लेकर लिखी गई है। कहानी में भारत के उस हिस्से (पाकिस्तान) की रहने वाली शाहनी अपनी दु:खद स्मृतियाँ, संबंध, खेत, हवेली और जैसे अपनी पूरी जिन्दगी को छोड़ शरणार्थी होकर इस पार (शेष भारत) आती हैं क्योंकि सिक्का बदल चुका है, मुल्क बँट गया है। निजाम बदल गया है।

शाहनी बूढी हो चली है। दंगाइयों ने उसकी हवेली की सारी सम्पत्ति लूट ली है। वह घर में अकेली है। उसे यह अनुभव हो गया है कि उसके स्वयं अपने असमियों ने ही उससे मुख मोड़ लिया है। वे ही उसके खून के प्यासे हो गये हैं। शेर उसका आसामी है। वह भी दंगाइयों से जा मिला है। शाहनी का कत्ल करने की जिम्मेदारी उसे सौंपी गई है। . शाहनी चिनाब के किनारे भोर में ही अंतिम दर्शन को जाती है। चिनाब की रेत आज खामोश नजर आ रही है। दूर तक कही कोई नजर नहीं आ रहा था। पर नीचे रेत में अगणित पाँवों के निशान थे।

शाहनी कुछ सहज-सी गई। सब कुछ भयानक-सा लग रहा था। शाहनी पिछले पचास वर्षों से यहाँ नहाती आ रही है। पचास वर्ष पहले एक दिन यही वह दुल्हन बनकर उतरी थी। स्नान कर वह घर की ओर चलती है। रास्ते में दूर तक फैला हुआ उसका हरा-भरा खेत है। वहीं शेरे और उसकी बीबी हसैना दोनों रहते हैं। शाहनी को देखते शेरा अपनी पत्नी से झगड़ने लगता है। शेरा अपने पास गडाँसा रखे हुए है, लेकिन शाहनी को देखते वह सहम जाता है।

उसे बचपन के दिन याद आ जाते हैं। वह शाहनी के उन दोनों हाथों को देखकर सहम जाता है जिन हाथों ने उसे जगा-जगाकर दूध पिलाया था। शेरा अपना निर्णय बदल देता है। वह शाहनी को घर पहुँचा देता है। शाहनी सब कुछ चुपचाप समझती हुई अपनी हवेली के पास पहुँचती है। उस गाँव में उसके रिश्तेदार रहते थे। वह समझ जाती है कि जबलपुर गाँव को जलाया जा रहा है।

हवेली पहुँच शाहनी ने शून्य मन से ड्योरी पर कदम रखा। शाहनी दिन भर वहीं पड़ी रही। मानो पत्थर हो गई है। अचानक रसूली की आवाज सुनकर चौंक गई। पता चला कि शरणार्थियों को लेने ट्रकें आ रही हैं। रसूली ने शाहनी का हाथ थाम लिया। शाहनी धीरे-धीरे खड़ी हो गई। सारा गाँव हवेली के पास खड़ा था। सभी शाहनी के आसानी ही थे। लेकिन आज उसका कोई नहीं था। आज वह अकेली है। बेगू और इस्माइल दोनों शाहनी के निकट पहुँचते हैं। वे कहते हैं कि शाहनी, अल्लाह को यही मंजूर था। शाहनी के कंदम डोल गये। चक्कर आया और दीवार से जा ठहराई। वह बेजान-सी हो गई थी।

शाहनी का गाँव से निकलता छोटी-सी बात नहीं थी। पूरे गाँव के लोग खड़े थे शाहनी की हवेली के सामने। शाहनी ने किसी का बुरा नहीं किया था। लेकिन समय बदल चुका था। कोई उसकी सहायता के लिए आगे नहीं बढ़ा। इसी बीच थानेदार दाऊद खाँ आता है। ट्रक के आने का संदेश पहुँचाता है। दाऊद खाँ भी थोड़ी देर के लिए शाहनी को देख ठिठक जाता है।

हिम्मत जुटा कर वह शाहनी को अपने साथ कुछ नकदी रख लेने की सलाह देता है। लेकिन शाहनी इनकार कर देती है। यहाँ शाहनी के दो वाक्य बड़े ही मार्मिक हैं। जब दाऊद खाँ कुछ सोना-चाँदी अपने साथ रख लेने की सलाह देता है तो शाहनी जवाब देती हैं- “सोना-चाँदी? बच्चा वह सब तुम लोगों के लिए है। मेरा सोना तो एक-एक जमीन में बिछा है।” जब कुछ नकदी रख लेने की सलाह देता है तो शाहनी जवाब देती है-

“नहीं बच्चा, मुझे इस घर से नकदी प्यारी नहीं। यहाँ की नकदी यहीं रहेगी।”

भा इसी बीच शेरा आता है और दाऊद खाँ से बोलता है-“खाँ साहिब, देर हो रही है।” शेरा की यह बात सुनकर शाहनी चौंक जाती है। उसका मन बोल उठता है-“देर-मेरे घर में मुझे दे !” शाहनी अपने पुरखों का घर छोड़ते समय थोड़ा-सा भी विचलित नहीं होती। सोचती है-जिस घर में मैं रानी बनकर आयी थी उस घर से रोकर नहीं शान से निकलूंगी। अपने पुरखों के घर की शान एवं मान को कायम रखेगी। उसने ऐसा ही किया। उसने अपने पुरखों की हवेली को अंतिम बार देखा और दोनों हाथ जोड़ लिये-यही अंतिम दर्शन था, यही अंतिम प्रणाम था।

शाहनी ट्रक पर जाकर बैठ गई। सबों को आशीर्वाद दिया। ट्रक चल दी। शाहनी को कुछ पता नहीं-ट्रक चल रही है या वह स्वयं चल रही है। आँखें बरस रही हैं। हवेली के एक-एक भाग उसकी आँखों के सामने घूम रहे हैं। शाहनी सब कुछ समझ रही थी कि राज बदल गया है, सिक्का बदल गया है।

इस प्रकार प्रस्तुत कहानी एक शरणार्थी की दारूण-व्यथा की करुण कहानी है। इस दारूण यथार्थ के आगे हिंदू और मुसलमान होना सचमुच कितना सतही और कुछ तुच्छ लगता है। सचमुच में, यह कहानी एक साथ कई कोणों से सोचने और महसूस करने के लिए हमारे आगे बहुत कुछ रख देती है।

कठिन शब्दों का अर्थ खद्दर-खादी। दरिया-नदी। अंजलि-दोनों हथेलियों की मिलाकर बनाया हुआ गड्ढ़ा। अगणित-जिसकी गिनती न की जा सके। नीरवता-शान्ति। असामियाँ-वह जिसने लगान पर जोतने के लिए खेत लिया हो। शटाले-फसल की डंठलों का पूला। ड्योढ़ी-दरवाजा। खेमे-शिविर। मसीत-मस्जिद। कगारे-किनारे। जिगरा-कलेजा, उदारक। दारे-द्वार। लीग-मुस्लिम लीग के संदर्भ में। सीस-अशीर्वाद, आशीष। पसार-घर के आगे का मैदान, अहाता। साफा-पगड़ी जिसकी छोर छटक रही हो। बरकत-वृद्धि, इजाफा। सलामत-सुरक्षित।

महत्त्वपूर्ण पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या

1. आज शाहनी नहीं उठ पा रही। जैसे उसका अधिकार आज स्वयं ही उससे छूट रहा है। शाह जी के घर की मालकिन………….लेकिन नहीं, आज मोह नहीं हो रहा। मानो पत्थर हो गयी हो।
व्याख्या-
सिक्का बदल गया शीर्षक कहानी से ये पंक्तियाँ ली गयी हैं। लेखिका हैं कृष्णा सोबती। नदी से स्नान कर शाहनी अपनी हवेली आती है। आज वातावरण बदला हुआ है। भारत विभाजन ने हिन्दू-मुस्लिम दोनों को एक-दूसरे का शत्रु बना दिया है। कहानी उस क्षेत्र की है जहाँ मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है, वातावरण में हिंसा और आगजनी से उत्पन्न भय व्याप्त है। शाहनी इस बात को भाँप रही है। वह आकर अपनी हवेली में लेट जाती है और शाम तक लेटी रह जाती है। आज उठने की चेतना मरी हुई सी है।

उसे लगता है कि आज तक घर, खेत, फसल और सोने-चाँदी की बोरियाँ उसकी मुट्ठी में थीं। लेकिन आज यह अधिकार-भाव स्वयं उसे छोड़ रहा है। एक क्षण के लिए अधिकार भाव सजग होता है-वह शाहजी के घर की मालकिन है, लेकिन दूसरे क्षण यह भाव भी उड़ जाता है। वह धन और ऐश्वर्य के मोह से आविष्ट नहीं हो पाती है। वह लगभग पत्थर की तरह जड़ हो गयी है। मानो यह इन सब चीजों को पकड़ कर रखने वाली ताकतों से वह परिपक्ष हो गयी है।

ये पंक्तियाँ वस्तुतः परिस्थिति से उत्पन्न विवशता और वृद्धावस्थाजन्य शक्तिहीनता से उत्पन्न निर्विकार मन:स्थिति को सूचित करती हैं।

2. यह नहीं कि शाहनी कुछ न जानती हो। वह जानकर भी अनजान बनी रही। उसने कभी बैर नहीं जाना। किसी का बुरा नहीं किया। लेकिन बूढी-शाहनी यह नहीं जानती कि सिक्का बदल गया है।
व्याख्या-
‘सिक्का बदल गया’ शीर्षक कहानी की इन पंक्तियों में कहानीकार ने बड़े मार्मिक ढंग से अपनी कहानी के शीर्षक की अर्थवत्ता को अभिव्यक्ति दी है। शाहनी ने वातावरण को सूंघ कर अनुमान कर लिया था कि हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो रहा है और वह असुरक्षित है। लेकिन वह जानकर भी अनजान बनी रही। क्योंकि एक जो उसकी विवशता थी कि कहाँ जाये? क्या करे, तय नहीं कर पा रही थी, दूसरे, उसके भीतर मानवता का विश्वास था कि उसने किसी से कभी बैर नहीं किया।

किसी का बुरा नहीं किया, हिन्दू-मुसलमान का भेद उसके मन में नहीं आया, अपने मुसलमान आसामियों को पुत्रवत्-स्नेह किया। तब उसे कोई क्यों पराया समझेगा। लेकिन लेखिका का कहना है कि ये बातें तो ठीक हैं लेकिन शाहनी एक बात से अनभिज्ञ थी कि जब सत्ता बदल जाती है तब मानवता का कोई मूल्य नहीं रह जाता। राजनीति और धर्म के उन्माद की आँधी मनुष्यता ओर अपनापन के सारे मूल्यों को उड़ाकर फेंक देती है। केवल पशुता रह जाती है और पशुता के व्यक्ति के गुण या भावना से मतलब नहीं होता।

3. देर-मेरे घर में मुझे देर ! आँसुओं के भंवर में न जाने कहाँ से विद्रोह उमड़ पड़ा। मैं पुरखों के इस बड़े घर की रानी और यह मेरे ही अन पर पले हुए….नहीं, यह सब कुछ नहीं।
व्याख्या-
व्याख्या की इन पंक्तियों में कृष्णा सोबती ने शाहनी के भावों के उतार-चढ़ाव को चित्रित किया है। अल्पसंख्यक हिन्दुओं को सुरक्षित कैम्प में ले जाने के लिए ट्रक आ गया है। विदा करने वाले लोग जल्दी करने के लिए कह रहे हैं। शाहनी सब कुछ छूटने की पीड़ा से आँसुओं में डूब-उतर रही है। बार-बार देर हो रही है सुनकर एकाएक उसका तेज जाग उठता है।

ये मेरे ही अन्न पर पले हुए आसामी मुझे मेरी ही सम्पदा छोड़कर जाने हेतु देर-देर रट रहे हैं। मैं इस सम्पदा की मालकिन और ये अतिथि समझ रहे हैं। उसका अधिकार भाव विद्रोह के रूप में फूट पड़ना चहता है, आँसुओं का भंवर विलुप्त हो जाता है। लेकिन दूसरे क्षण वह अपने पर नियंत्रण कर लेती है। वास्तविकता को स्वीकार कर समझौता कर लेती है। नहीं यह विद्रोह एक स्वामिनी भाव व्यर्थ, अपुयोगी है असत्य हैं।

4.शाहनी रो-रोकर शान से………….ड्योढ़ी से बाहर हो गयी।
व्याख्या-
इन पंक्तियों में लेखिका ने शाहनी के चरित्र की निर्णायक स्थिति और स्वाभिमानी मुद्रा का चित्रण किया है। शाहनी तय कर लेती है कि जब जाना निश्चित है, यहाँ रहना मृत्यु को गले लगाना है, तब वह तय करती है कि वह शान से मालकिन भाव से घर छोड़ेगी ताकि वे उसके आसामी उसे जाते हुए भी मालकिन समझें कायर, कमजोर और भिखारिन नहीं। अतः वह अपने लड़खड़ाते कदमों को संभालती है और दुपट्टे से आँखें पोंछकर अपने भीतर निहित नारी सुलभ दुर्बलता और अनिश्चित भविष्य की पीड़ा को झटक कर भाग देती है और अंतिम बार हवेली को देखकर प्रणाम की मुद्रा में हाथ जोड़कर गर्वदीप्त भाव से मन को बल प्रदान करती हुई चल पड़ती है।

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 4 On The Rule of the Road

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Bihar Board Class 11 English On The Rule of the Road Textual Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions :

On The Rule Of The Road Questions And Answers Bihar Board Question 1.
Does democracy have anything to do with freedom ?
Answer:
Yes. Democracy without freedom is meaningless. Democracy means freedom of people to choose their government. For this they must have freedom of speech and freedom of movement with fear.

The Rule Of The Road Questions And Answers Bihar Board Question 2.
In democracy citizen’s role is of utmost importance. How ?
Answer:
In democracy citizens have the power to choose their representatives. It is very important that they use this power most judiciously. They should also see that their representatives are doing their duty in the right way.

The Rule Of The Road Class 11 Bihar Board Question 3.
Why are fundamental rights important to us ?
Answer:
A citizens has fundamental rights. They are important to be a free citizen of a country. If a person has no fundamental rights he is not a citizen. He/she is a slave.

On The Rule Of The Road Mcq Questions Bihar Board Question 4.
Have you ever wondered what keeps the traffic move smoothly without running into one another ?
Answer:
Yes, I know it moves smoothly because it obeys the rule of the road. If vehicles and pedestrians did not obey the rule of the road, there would be confusion and accidents.

B. 1. Answer the following questions briefly :

The Rule Of The Road Class 11 Questions And Answers Question 1.
Why did the old lady refuse to walk on the pavement ?
Answer:
She refused to walk on the pavement because she believed she had got the liberty to walk where she liked.

The Rule Of The Road Question Answer Bihar Board Question 2.
How did she cause a chaos ?
Answer:
By walking in the middle of the road she disobeyed the rule of the road and caused confusion. Everybody was getting in everybody else’s way.

Rules Of The Road Questions And Answers Pdf Bihar Board Question 3.
How has the author defined liberty ?
Answer:
The author has defined liberty as a social contract. It is an adjustment of interests.

Class 11 The Rule Of The Road Question Answer Bihar Board Question 4.
‘You have submitted to a curtailment of private liberty in order that you man enjoy a social order which makes your liberty a reality.’ What does the author mean ?
Answer:
Liberty is not entirely a private matter. We live in society. So no man’s liberty should take away another man’s liberty. By so doing everybody will enjoy a social order and peace.

The Rule Of The Road Textual Questions And Answers Question 5.
What is the ‘danger’ the author is referring to in paragraph 2 ?
Answer:
The author is referring to the danger of a chaos like the one the old lady caused by disobeying the rule of the road. If everybody wants unlimited liberty, there will be chaos.

The Rules Of The Road Question Answer Bihar Board Question 6.
How is liberty a social contract ?
Answer:
Liberty is a social contract in the sense that no individual will trample over the liberty of anyone else.

B. 2. Answer the following questions briefly :

On The Rule Of The Road Bihar Board Question 1.
Are the rights of the people less important than the rights of the nations ?
Answer:
No. The rights of the people are as important as the rights of the nations.

The Rule Of The Road By Ag Gardiner Question And Answers Question 2.
Why couldn’t the author read his book during his rail journey ?
Answer:
He could not read his book because one of the passengers was talking to his friend in a loud and pompous voice.

Rule Of The Road Questions And Answers Bihar Board Question 3.
What does the author want to convey through the illustration of a trombone ?
Answer:
The author wants to say that everybody has a right to enjoy themselves so long as they do not disturb others.

Bihar Board Class 4 English Solution Question 4.
What two types of reading does the author refer to ? How are they different ?
Answer:
The author refers to reading for pleasure and reading as a task. The two are different. You won’t mind noise if you are reading for pleasure. But if you are reading as a task, you will expect reasonable quiet.

Rules Of The Road Questions And Answers Bihar Board Question 5.
List the actions for which we “ask no one’s leave”.
Answer:
Some of the actions referred to in the lesson are :

  1. Walking down a street in a dressing gown.
  2. Wearing long hair,
  3. Walking barefoot,
  4. Dyeing one’s hair,
  5. Waxing one’s moustache,
  6. Wearing tall hat, frock coat and sandals,
  7. Going to bed late,
  8. Getting up early, etc.

C. 1. Long Answer Questions :

The Rule Of The Road Question Answers Bihar Board Question 1.
What does the rule of the road mean ? Give examples to show how necessary it is to preserve order in society.
Answer:
The rule of the road means the regulations concerning the smooth and orderly movement of vehicles and pedestrians on roads without causing accidents. For example, in India we are supposed to keep to our left. If we want to overtake a vehicle or a pedestrian, we must do it from the right side. In cities, there are different lanes for pedestrians, light vehicles and heavy vehicles, so that no accidents take place. On crossroads there is a policeman or signal lights to regulate the traffic. When the policemen raises his hand or the red light is on, every vehicle must stop so that vehicles from the other channel may move.

Sometimes some people do not care for these rules because they are in a hurry. But they are likely to cause confusion and accidents. Then hurry proves to be very costly. So these rules are meant to help people and not to harass them. The rules are meant for all. If somebody does not obey these rules, no body will follow them. Then there will be confusion and anarchy.

Bihar Board Class 4 English Book Solution Question 2.
Who, according to A. G. Gardiner, is a civilized man ?
Answer:
A man who is conscious of his conduct, so as not to interfere in the liberty of his neighbours is a truly civilised man. A civilised man obeys the rules even in small matters. A man is at liberty to enjoy and recreate himself in his house. But a civilised man makes sure that his enjoyment does not interfere with the right of his neighbour to enjoy himself. It does not need doing great – and heroic deeds that makes a man civilised. It is his conduct in small matters of daily life that shows whether a man is civilised or uncivilised.

Question Answer Of The Rule Of The Road Bihar Board Question 3.
Unchecked personal liberty would lead to social anarchy. Elaborate giving examples.
Answer:
Unchecked personal liberty is neither feasible nor desirable. If everybody had their way to do what they liked, there would be chaos. Let us take the example of the traffic on the public highway. Everybody has a right to use it. But if there were no rules, every one would like to walk or drive in the middle of the road. These,,would be collisions not only between vehicles coming from opposite side, but even between slow and fast moving vehicles moving in the same direction. Even now we see that whenever people flout the rule of the road there are jams and accidents. In our daily life we will have no peace. If someone liked to use a loud speaker, his neighbour may have no rest. Students will not be able to concentrate on their studies, or everybody will try to outdo the other in making a noise. That is why there are laws to curtail individual freedom to the extent that there is order in society.

Class 11 English Chapter 4 Question Answer Bihar Board Question 4.
“Our personal liberty of action is restricted by other people’s liberty.” How ? Give three examplse.
Answer:
As A. G. Gardiner has rightly pointed out, liberty is not an entirely personal affair. It is a social contract. It is an adjustment of interests. If a person has his liberty, so do others. So we all have to reach a compromise. Everybody agrees to curtail their liberty so that others may enjoy their liberty. For example, a passenger in a train has the liberty to talk to his friend. But another passenger has a right to do some serious reading. So the former passenger should not speak so loudly that the other passenger is unable to concentrate. A person wants to listen to songs on his radio at night. He has an absolute right to do so. But he must see that his enjoyment does not disturb his neighbours.

Similarly, while walking or driving on the road we should let others drive and walk too. No one has a right to block the road and hinder other from using the road. He has to walk or drive in such a way that others may enjoy their liberty and use it also.

The Rule Of The Road Textual Questions And Answers Class 11 Question 5.
How can we enjoy personal liberty and also respect the liberty of our neighbours ? Give examples.
Answer:
We live in a civilised society and we enjoy some rights. We are free citizens and not slaves. Our freedom and rights are protected by our Constitution. But being civilised citizens, we have some duties also. We have a right to life. So do all the people. So we must respect the others’ right to life also. It is our duty to see that our enjoyment of our liberty does not interfere with other’s. No doubt there are so many things that we can do as we please without causing inconvenience to others. We can dress ourselves the way we like.

But we should not make so much noise as to disturb others. If a person wants to smoke, it is his personal choice. He can smoke at home. But he should see that his smoking in a bus or a public place does not offend or harm others. Whether there is a law or no law against an. action, a civilised person respects the feelings of his neighbours and respects their liberty by restraining himself.

On The Rule Of The Road Questions And Answers Class 9 Question 6.
A reasonable consideration for the rights or feelings of others is the foundation of social conduct. How ?
Answer:
No elaborate laws can be made to regulate our social conduct. Our social conduct is governed by traditions and personal behaviour. For example, someone in my neighbour’s family is seriously ill. There is no law to stop me from celebrating my birthday with fun and frolic. But being a good neighbour, I must have a reasonable consideration for the feelings of my neighbour. I should tone down my celebrations in such a way that my neighbours feelings are not hurt. There are so many things that we can do, or avoid doing, just not to hurt others’ feelings. Sometimes there are riots between two groups or communities over trifles which can be avoided. If they have reasonable consideration for each others’ feelings, many quarrels and conflicts can easily be avoided.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups of pairs:

Question a.
What makes life a pleasant experience : the awareness of one’s rights or consciousness of one’s duties ?
Answer:
Hints: Rights and duties go hand in hand. If a person is not aware of his rights, he/she is likely to be exploited. In olden days, traders exploited consumers. Now consumers have the right to get what he/she pays for. So he/ she can have his/her rights enforced through consumer courts. Awareness of one’s rights is important in life.

Duties are as important as our rights. Often people want to enjoy their rights but ignore their duties. To keep the environment clean is the duty of every citizen. To stop an illegal activity is the duty of not only the police but every citizen’s duty also. Even our Constitution has assigned certain duties to the citizens. If we want life to be a pleasant experience, we must do our duty to society, to our institution, to our family, to our nation and to the whole humanity.

Question b.
Little knowledge is a dangerous thing.
Answer:
Hints : In our times knowledge is so enormous that we can hope to get only a little of it. Unless we have a little knowledge about everything we cannot use it. So a little knowledge about how to keep fit, how to use the computer, how to drive and how to travel is useful. But sometimes we try to use our little knowledge in such a way as if we know all. We may have a little knowledge of medicines. But to act as a doctor to oneself or to others can be dangerous.

C. 3. Composition :

Write a paragraph in about 100 words on each of the following:

Question a.
Duties of a citizen
Answer:
A citizen, has his duties. Our Constitution has assigned some fundamental duties to all citizens of India. Every citizen should try to keep the environment clean. He/she should try to protect forests and not to degrade them. Our rivers and water bodies are getting polluted. It is the duty of every citizen to avoid polluting them. They should not dump garbage etc. into them. There are several monuments in our country. They are our national heritage. Every citizen should protect them from being vandalised. Public ‘ property like trains, buildings, buses, parks are for our welfare. We should protect them. All of in should try to be kind to animals. We should be good citizens and respect the feelings and practices, of all people to whatever religion, region or sex they belong to. Above all we should try to improve our personality and character to be able to serve our nation better.

Question b.
Role of police in civil society
Answer:
Every modem civil society needs police for the enforcement of laws and to help the law-abiding citizens. The police is needed to maintain law and order. They keep watch on illegal and immoral activities and bring the culprits to book. But the police should help the people, and it should be fair and free from corruption. The police force should behave and act in a manner that even the poorest and the most helpless person feels free to ask for help. Police is meant to help the citizens and not to harass them. Police should be free from any pressures so that it can work independently without fear or favour.

D. Word-Study :

Ex. 1. Correct the spelling of the following words:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 4 On The Rule of the Road 1

Ex. 2. Look up a dictionary and write two meanings of each of the following words—the one in which it is used in the lesson and the other which is more common:.
foot – general – right – complete – conduct
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 4 On The Rule of the Road 2

Ex. 2.
Foot: (i) pace
(ii) the lower part of the leg, measure of twelve inches general

General: (i) usual
(ii) ordinary

Right: (i) authority
(ii) truth

Complete: (i) entire
(ii) finished

Conduct: (i) behavior
(ii) mode of action

D. 2. Word-formation :

Read the following sentences carefully:
It is an adjustment of interest

In the above sentence, ‘adjustment’ which is an Abstract Noun has been derived from ‘adjust’ which is a Verb. More words can be derived from ‘adjust’, such as:

adjust adjusted adjusting adjustment adjustable

Write as many words derived from the following verbs as possible in the same way.
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 4 On The Rule of the Road 3
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 4 On The Rule of the Road 4

D. 3. Word-meaning :

Ex. 1. Find from the lesson, words the meaning of which have been given on the left hand side. The last part of each words is given on the right hand side.
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 4 On The Rule of the Road 5
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 4 On The Rule of the Road 6

Ex. 2. Fill in the blanks with suitable words given below: violence mistake peace curse purpose

  1. Children make …………. while learning.
  2. Imperialism is a danger for world ………….
  3. Environment pollution is a …………. for us.
  4. Explain the …………. of vocational education.
  5. Gandhiji was against ………….

Answers:

  1. mistake
  2. peace
  3. curse
  4. purpose
  5. violence

D. 4. Phrases :

Ex. 1. Read the lessons carefully and find out the sentences in which the following phrases have been used. Then use them in sentences of your own :
get in – hang on – settle down
step out – remind of – conscious of
Answer:
Everybody would be getting in everybody else’s way (Para-1)
…………… the politicians submerged my poor attempts to hang on to my job (Para-7)
I got into a railway carriage at a country station the other morning and settled down for what (Para-6)
But directly we step out of that kingdom …………. (Para-4)
………….. it is just as well to remind ourselves of what the rule of the road means (Para-2)
We are much more conscious of the imperfections of others in this respect than of our own ………….. (Para-5)

Sentences with the use of the said phrases:
We should never try to get in other’s way.
I am hanging on my father.
They have settled down in Mumbai.
She stepped out of the house first time.
The loneliness of my life always remind me of her absence.
I am conscious of my duties.

E. Grammar :

Read the following sentences carefully :

a. If I went on to the top of Helvelly to do it I could please myself but If I do it out in the streets the neighbours will remind me that my liberty to blow the trombone must interfere with their liberty to sleep in quiet.
b. If I had asked him to be good enough to talk in a lower tone I dare to say he would have thought I was a rude fellow.

Ex. 1. Mark the different structures of ‘If-Clausef in the sentences abve and complete the following sentences:

  1. If Saurnya laboured hard, she ……………..
  2. If were a bird, I ……………
  3. If Manish had informed me in time, I …………..
  4. If it rains today, the farmers ……………..
  5. If the Indian cricketers had shown greater application, India ……………..
  6. If Nikhat read it carefuly,she ……………..

Answer:

  1. If Saurnya laboured hard, she could pass.
  2. If were a bird, I would fly to you.
  3. If Manish had informed me in time, I would have saved his life. ,
  4. If it rains today, the farmers will do their work in the field.
  5. If the Indian cricketers had shown greater application, India would /wove won the match.
  6. If Nikhat read it carefuly, she could understand.

F. Activity :

Ex. 1. Look at the example carefully and fill in the blanks accordingly,
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 4 On The Rule of the Road 7
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 4 On The Rule of the Road 8

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