Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 2 भौतिक स्वरूप : संरचना एवं उच्चावच

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : भूमि एवं लोग Chapter 2 भौतिक स्वरूप : संरचना एवं उच्चावच Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Geography Solutions Chapter 2 भौतिक स्वरूप : संरचना एवं उच्चावच

Bihar Board Class 9 Geography भौतिक स्वरूप : संरचना एवं उच्चावच Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

भौतिक स्वरूप संरचना एवं उच्चावच Bihar Board प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी चोटी भारत में स्थित नहीं है ?
(क) के’
(ख) कामेट
(ग) माउण्ट ऐवरेस्ट
(घ) नंदा देवी
उत्तर-
(ग) माउण्ट ऐवरेस्ट

Bihar Board Class 9 Geography Solutions प्रश्न 2.
बिहार के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर हिमालय की कौन-सी श्रेणी है?
(क) महान हिमालय
(ख) शिवालिक
(ग) मध्य हिमालय
(घ) पूर्वी हिमालय
उत्तर-
(ख) शिवालिक

Bihar Board Class 9 Geography Chapter 2 प्रश्न 3.
हिमालय के निर्माण में कौन-सा सिद्धांत सर्वमान्य है ?
(क) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत
(ख) भूमंडलीय गतिशीलता सिद्धांत
(ग) प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 4.
सैडल चोटी की ऊँचाई है-
(क) 515 मी०
(ख) 460 मी०
(ग) 642 मी०
(घ) 730 मी०
उत्तर-
(ग) 642 मी०

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 5.
भारत का सबसे प्राचीन भूखण्ड है
(क) प्रायद्वीपीय पठार
(ख) विशाल मैदान
(ग) उत्तर का पर्वतीय भाग
(घ) तटीय भाग
उत्तर-
(क) प्रायद्वीपीय पठार

लघु उत्तरीय प्रश्न

कक्षा 9 भूगोल अध्याय 2 Question And Answer प्रश्न 1.
हिमालय की तीन समान्तर श्रेणियों का नाम लिखें।
उत्तर-
हिमालय की समान्तर श्रेणियाँ हैं (i) वृहत हिमालय या हिमाद्रि। (ii) लघु हिमालय या मध्य हिमालय। (iii) बाहरी हिमालय या शिवलिक ।

Bihar Board Class 9 Geography Book Solution प्रश्न 2.
काराकोरम के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर का क्या नाम है ?
उत्तर-
गाडविन आस्टीन तथा गौरीनन्दा पर्वत के नाम से जाना जाता है।

Bihar Board Class 9th History Solution प्रश्न 3.
कौन-सा तटीय मैदान अपेक्षाकृत अधिक चौड़ा है ? ।
उत्तर-
पूर्वी, तटीय मैदान, पश्चिमी तटीय मैदान की अपेक्षाकृत अधिक चौड़ाई है। इसकी चौड़ाई 160 से 350 कि०मी० तक है।.

कक्षा 9 भूगोल अध्याय 2 Notes प्रश्न 4.
तटीय मैदान में स्थित तीन झीलों के नाम लिखें।
उत्तर-
तटीय मैदान में स्थित झील हैं(i) चिल्का , (ii) पुलीकट, (iii) वेम्बानद।

Bihar Board Solution Class 9 प्रश्न 5.
पश्चिमी घाट पर्वत का दूसरा नाम क्या है ?
उत्तर-
इसे सहयाद्रि की पहाड़ियाँ भी कहते हैं।

Bihar Board Class 9 Social Science Solution In Hindi प्रश्न 6.
मध्यं गंगा के मैदान की चार विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर-
मध्य गंगा के मैदान की विशेषताएँ

  • यह मैदान 1400 किलोमीटर लम्बा है।
  • इस मैदान की ढाल सामान्यतः उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर है।
  • इसका विस्तार उत्तर भारत के राज्यों यथा-बिहार, उत्तर प्रदेश, तथा पश्चिम बंगाल तक है। .
  • इसका निर्माण जलोढ़ मिट्टी से हुआ है।

कक्षा 9 भूगोल अध्याय 2 प्रश्न उत्तर प्रश्न 7.
हिमालय और प्रायद्वीय पर्वतों के दो प्रमुख अंतर बताएँ।
उत्तर-
दोनों में अंतर इस प्रकार है :
Bihar Board Class 9 History Solution
Bihar Board Class 9th Geography Solution

Bihar Board Class 9th Geography Solution प्रश्न 8.
‘खादर’ तथा ‘बांगर’ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
खादर : गंगा के मैदान में जहाँ नदियाँ नये कछारी भाग में जो निचले मैदान में है और जहाँ बाढ़ की जल प्रतिवर्ष पहुँचकर नयी मिट्टी की परत जमा कर देता है उसे ‘खादर’ कहते हैं।

बांगर : जहाँ नदियों द्वारा पुरानी मिट्टी के ऊँचे मैंदान बन गए हैं वहाँ नदियों के बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता है, उसे ‘बांगर’ कहते हैं।

प्रश्न 9.
पूर्वी घाट तथा पश्चिमी घाट में अन्तर बताएँ।।
उत्तर-
पूर्वी घाट तथा पश्चिमी घाट में निम्नलिखित अंतर है|
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 2 भौतिक स्वरूप संरचना एवं उच्चावच - 3(i)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तर के विशाल मैदान की विशेषताओं को लिखें।
उत्तर-
उत्तर के विशाल मैदान की विशेषताएँ इस प्रकार हैं :
यह मैदान हिमालय पहाड़ के दक्षिण और दक्षिणी पठार के उत्तर तीन प्रमुख नदी प्रणालियों-गंगा, सिन्धु, ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों से बना है इसे सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान कहते हैं । इस मैदान का निर्माण जलोढ़ मिट्टी से हुआ है। . यह मैदान भारत का ही नहीं बल्कि विश्व का सबसे अधिक उपजाऊ और घनी जनसंख्या वाला मैदान है। . यह मैदान 7 लाख वर्ग किलोमीटर से भी अधिक क्षेत्रफल में फैला है। पश्चिम से पूर्व इसकी लम्बाई लगभग 2400 कि०मी० है और 150 से 500 कि०मी० चौड़ा है। यह मैदान समुद्रतल से 240 मीटर से अधि क ऊँचा नहीं है।

इस मैदान के चार उप-भाग हैं
(i) पंजाब का मैदान
(ii) राजस्थान का मैदान
(iii) गंगा का मैदान
(iv) ब्रह्मपुत्र का मैदान

(i) पंजाब का मैदान-सिन्धु और इसकी सहायक नदियों के द्वारा बना है। पंजाब और हरियाणा का भाग इसमें सम्मिलित है। इस मैदान में झेलम, चेनाव, रावी, व्यास तथा सतलुज नदियाँ बहती हैं। इसकी औसत ऊँचाई 150 से 300 मीटर तक है। इस मैदान को दोआब कहते हैं।

(ii) राजस्थान का मैदान-यह मैदान अरावली पर्वत के पश्चिम में है। यहाँ शुष्क प्रदेश की प्रमुख नदी लूनी है। इसमें संवार, डंगना, दिदवाना तथा कुचापन जैसे खारे पानी के झील है।

(iii) गंगा का मैदान-यह मैदान 1400 कि०मी० लम्बा है । इसका विस्तार उत्तर भारत के राज्यों यथा उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के कुछ भाग तथा पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ है । गंगा के मैदान की प्रमुख नदियाँ गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, कोसी तथा महानन्दा है ।

(iv) ब्रह्मपुत्र का मैदान-यह मैदान असम राज्य में सदिया के रनर पूरब से होकर धुवरी स्थान तक फैला है। यह लगभग 650 कि०मी० लम्बा है। इस मैदान में कई ‘भावर’ और ‘तराई’ हैं।

प्रश्न 2.
प्रायद्वीपीय पठार को विभाजित कर किसी एक की चर्चा विस्तार
से करें।
उत्तर-
प्रायद्वीपीय पठार की आकृति त्रिभुजकार है तथा प्राचीन गोंडावाना भूमि का अंश है। इसकी औसत ऊँचाई 600 से 900 मीटर है। इस पठारी भाग के दो प्रमुख भाग हैं- (क) मध्य उच्च भूमि तथा (ख) दक्कन का पठार।

(क) मध्य उच्च भूमि-मध्य उच्च भूमि का अधिकतर भाग मालवा का पठार कहलाता है। यह पठारी भाग पूरब में महादेव श्रृंखला तथा उत्तर-पश्चिम में अरावली और मध्य में विंध्य श्रृंखला से घिरा हुआ है। इसके पश्चिम में राजस्थान का मरूस्थल है। यहाँ बहने वाली नदियों में चंबल, सिंध, बेतवा तथा केन हैं। यह भाग पश्चिम में चौड़ा और पूरब में संकीर्ण है । इसका पूर्वी विस्तार बुन्देलखंड तथा बघेलखंड के नाम से जाना जाता है। इससे दूर पूर्व के विस्तार को मुख्यतः दामोदर और स्वर्णरेखा नदियों द्वारा अपवाहित, छोटा नागपुर का पठार कहा जाता है।

(ख) दक्कन का पठार – छोटानागपुर के पठार का विस्तार गया जिला के दक्षिणी सीमा तक है। इसी भाग में दामोदर, सोन तथा स्वर्णरेखा नदियाँ बहती हैं । इस पठारी भाग का मध्यवर्तीय भाग 1100 मीटर ऊँचा है जो ‘पातक्षेत्र’ कहलाता है। इसके पूरब में राँची का पठार है। इसमें हजारीबाग का पठार है जिसकी ऊँचाई 300 मीटर है। यहाँ पारसानाथ की पहाड़ी 1365 मीटर ऊँची है।

सतपुरा पर्वत के दक्षिण में तापी की घाटी है, इसमें नर्मदा और तापी ‘नदियाँ बहती हैं। अरावली की पहाड़ियाँ दक्षिण-पश्चिम में गुजरात से लेकर उत्तर-पूर्व में दिल्ली तक फैली हैं। अरावली की औसत ऊँचाई 300 से 920 मीटर तक है । लेकिन इसकी प्रसिद्ध चोटी माउन्ट आबू की गुरुशिखर 1722 मीटर ऊंची है।

प्रश्न 3.
हिमालय पर्वत श्रृंखला की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-
भारत की उत्तरी सीमा पर फैली हिमालय पर्वत श्रेणी बनावट के दृष्टिकोण से मोड़दार पर्वत श्रृंखला है। इसकी चौड़ाई कश्मीर में 500 कि०मी० एवं अरुणाचल में मात्र 160 कि०मी० है। इसकी तीन समानान्तर श्रृंखलाएँ है : (i) हिमाद्रि (ii) मध्य हिमालय (iii) बाहरी हिमालय।।

  • हिमाद्रि सर्वोच्च श्रेणी है। सबसे उत्तरी श्रेणी भी यही है। यह भारत का सबसे ऊँचा और संसार की दूसरी सबसे ऊँचा शिखर है जिसकी ऊँचाई 8611 मी० है । इसे गाडविन आस्टीन के नाम से जाना जाता है।
  • मध्य हिमालय-यह हिमालय की सबसे अधिक कटी-छंटी श्रृंखला है। इसकी ऊँचाई 1800 मीटर से 4500 मीटर के बीच है।
  • बाहरी हिमालय-यह निचली श्रृंखला है। इसकी औसत ऊँचाई 900 से 15000 मीटर तक है तथा चौड़ाई 10 से 50 कि० मी. है।

इन श्रृंखलाओं की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  • हिमालय भारत का प्रहरी है जलवायविक दशाओं का नियंत्रक है।
  • मानसून पवनों के मार्ग में खड़ा होकर यह उनसे वर्षा करता है। हिमालय न होता तो उत्तरी विशाल मैदान अस्तित्व में न आता ।
  • हिमालय में कई हिम नदियाँ हैं जिनसे गंगा, सिन्धु, ब्रह्मपुत्र, यमुना, कोसी, सरयू, गंडक महानदी, सतलुज, व्यास, झेलम, रावी, चेनाव आदि प्रमुख हैं। नदियाँ सिंचाई के प्रमुख स्रोत हैं।
  • हिमालय पर कई पर्यटन स्थल भी हैं । यथा-कश्मीर की घाटी, शिमला, मसूरी, नैनीताल, दार्जिलिंग आदि ।
  • इस क्षेत्र में कुछ घास के मैदान भी है जिसे कश्मीर में मर्ग कहते हैं। जैसे-गुलमर्ग, खिलनमर्ग और सोनमर्ग।
  • यहाँ की सभी पर्वत श्रेणियाँ घने सदाबहार वनों से ढकी रहती हैं जिससे उपयोगी लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं।
  • हिमालय पर हिन्दुओं के अनेक तीर्थ स्थल भी है यथा-केदारनाथ, अमरनाथ, केलास मानसरोवर झील आदि ।

ज्ञात करें

प्रश्न 1.
हिमालय में पायी जानेवाली प्रमुख हिमानियाँ एवं दरों के नाम
उत्तर-
हिमालय में पायी जानेवाली प्रमुख हिमानियाँ एवं दरें-

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प्रश्न 2.
भारत के उन राज्यों के नाम बताएँ, जहाँ हिमालय के ऊँचे शिखर स्थित हैं।
उत्तर-
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 2 भौतिक स्वरूप संरचना एवं उच्चावच - 5

प्रश्न 3.
मसूरी, नैनीताल एवं रानीखेत की स्थिति बताएँ और राज्यों के नाम लिखें।
उत्तर –
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 2 भौतिक स्वरूप संरचना एवं उच्चावच - 6

प्रश्न 4.
विश्व का सबसे बड़ा नदीय द्वीप माजोली किस नदी और किस राज्य में है?
उत्तर-
माजोली नदी द्वीप, ब्रह्मपुत्र नदी का द्वीप है जो असम राज्य में है।

प्रश्न 5.
भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी कहाँ स्थित है ?
उत्तर-
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बैरन द्वीप पर स्थित है।

मानचित्र कार्य

भारत के रेखा मानचित्र पर निम्नलिखित को दिखाएँ
(क) (i) पर्वत शिखर-के,
(ii) कंचनजंगा,
(iii) नंगापर्वत,
(iv) नन्दादेवी।

(ख) (i) पठार-छोटानागपुर,
(ii) बुंदेलखंड,
(iii) मालवा ।

(ग) (i) थार मरुस्थल,
(ii) गंगा-यमुना दोआब,
(iii) आरावली पर्वत ।

(घ) (i) पंजाब का मैदान,
(ii) ब्रह्मपुत्र का मैदान ।
उत्तर-
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Bihar Board Class 9 Hindi Solutions गद्य Chapter 2 भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 1 गद्य खण्ड Chapter 2 भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi Solutions गद्य Chapter 2 भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा

Bihar Board Class 9 Hindi भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा Text Book Questions and Answers

भारत का पुरातन विद्यापीठ नालंदा प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
“नालंदा की वाणी एशिया महाद्वीप में पर्वत और समुद्रों के उस पार तक फैल गई थी।” इस वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
नालंदा में ज्ञान-साधना के सुरभित पुष्प खिले हुए थे। एशिया महाद्वीप के विस्तृत भू-भाग में विद्या-संबंधी सूत्र भी उसके साथ जुड़े हुए थे। ज्ञान के क्षेत्र में देश और जातियों के भेद लुप्त हो जाते हैं। इन्हीं सब कारणों के कारण उपर्युक्त बातें कही गयीं हैं।

Bharat Ka Puratan Vidyapith Nalanda Question Answer प्रश्न 2.
मगध की प्राचीन राजधानी का नाम क्या था और वह कहाँ अवस्थित थी?
उत्तर-
मगध की प्राचीन राजधानी का नाम राजगृह था और वह पाँच पर्वतों के । मध्य में बसी हुई गिरिब्रज या राजगृह नाम से प्रसिद्ध थी।

Bharat Ka Puratan Vidyapith Nalanda प्रश्न 3.
बुद्ध के समय नालंदा में क्या था?
उत्तर-
बुद्ध के समय नालंदा के गाँव में प्रवाजिकों का आम्रवन था।

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solution प्रश्न 4.
महावीर और मेखलिपुत्त गोसाल की भेंट किस उपग्राम में हुई थी?
उत्तर-
जैन-ग्रंथों के अनुसार नालंदा के उपग्राम वाहिरिक में महावीर और मेखलिपुत्र की भेंट हुई थी।

Bihar Board Solution Class 9 Hindi प्रश्न 5.
महावीर ने नालंदा में कितने दिनों का वर्षावास किया था? ‘
उत्तर-
महावीर ने नालंदा में चौदह वर्षावास किया था।

Bihar Board 9th Class Hindi Book Solution प्रश्न 6.
तारानाथ कौन थे? उन्होंने नालंदा को किसकी जन्मभूमि बताया है?
उत्तर-
तिब्बत के विद्वान इतिहास लेखक लामा तारानाथ तिब्बत के निवासी थे और उनके अनुसार नालंदा सारिपुत्र की जन्मभूमि थी।

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions प्रश्न 7.
एक जीवंत विद्यापीठ के रूप में नालंदा कब विकसित हुआ?
उत्तर-
नालंदा की प्राचीनता की अनुश्रुति बुद्ध, अशोक दोनों से संबंधित है; किन्तु एक प्राणवंत विद्यापीठ के रूप में उसके जीवन का आरंभ लगभग गुप्तकाल में हुआ।

गोधूलि भाग 1 Class 9 Solution Pdf Bihar Board प्रश्न 8.
फाह्यान कौन थे? वे नालंदा कब आए थे? ।
उत्तर-
फाह्यान चीनी यात्री थे जो चौथी शती में नालंदा आये थे। उन्होंने सारिपुत्र के जन्म और परिनिर्वाण स्थान पर निर्मित स्तूप के दर्शन किए।

Godhuli Class 9 Bihar Board प्रश्न 9.
हर्षवर्दन के समय में कौन चीनी यात्री भारत आया था. उस समय नालंदा की दशा क्या थी?
उत्तर-
हर्षवर्द्धन के समय सातवीं सदी में युवानचांग भारत आए थे। उस समय नालंदा अपनी उन्नति के शिखर पर था।

प्रश्न 10.
नालंदा के नामकरण के बारे में किस चीनी यात्री ने किस ग्रंथ के आधार पर क्या बताया है?
उत्तर-
चीनी यात्री युवानयांग ने एक जातक कहानी का हवाला देते हुए बताया है कि नालंदा का यह नाम इसलिए पड़ा था कि यहाँ अपने पूर्व-जन्म में उत्पन्न भगवान बुद्ध को तृप्ति नहीं होती थी। (न-अल-दा)

प्रश्न 11.
नालंदा विश्वविद्यालय का जन्म कैसे हुआ?
उत्तर-
नालंदा विश्वविद्यालय का जन्म जनता के उदार दान से हुआ। कहा जाता है कि इसका आरंभ पाँच सौ व्यापारियों के दान से हुआ था, जिन्होंने अपने धन से भूमि खरीदकर बुद्ध को दान में दी थी।

प्रश्न 12.
यशोवर्मन के शिलालेख में वर्णित नालंदा का अपने शब्दों में चित्रण कीजिए।
उत्तर-
आठवीं सदी के यशोवर्मन के शिलालेख में नालंदा का बड़ा भव्य वर्णन किया गया है। यहाँ के विहारों की पंक्तियों के ऊँचे-ऊँचे शिखर आकाश में मेघों को छूते थे। उनके चारों ओर नीले जल से भरे हुए सरोवर थे, जिनमें सुनहरे और लाल कमल तैरते थे, बीच-बीच में सघन आम्रकुंजों की छाया थी। यहाँ के भवनों के शिल्प और स्थापत्य को देखकर आश्चर्य होता था। उनमें अनेक प्रकार के अलंकरण और सुन्दर मूर्तियाँ थीं। यों तो भारत वर्ष में अनेक संधाराम हैं, किन्तु नालंदा उन सबमें अद्वितीय है।

प्रश्न 13.
इत्सिंग कौन था? उसने नालंदा के बारे में क्या बताया है?
उत्तर-
इरिसंग, चीनी यात्री था। उसके समय में नालंदा विहार में तीन सौ बड़े कमरे और आठ मंडप थे। पुरातत्व विभाग की खुदाई में नालंदा विश्वविद्यालय के जो अवशेष यहाँ प्राप्त हुए हैं उनसे इन वर्णनों की सच्चाई प्रकट होती है।

प्रश्न 14.
विदेशों के साथ नालंदा विश्वविद्यालय के संबंध का कोई एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
विदेशों के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का जो संबंध था, उसका स्मारक एक ताम्रपत्र खुदाई में मिला है। इससे ज्ञात होता है कि सुवर्ण दीप (सुमात्रा) के शासक शैलेन्द्र सम्राट श्री बालपुत्रदेव ने मगध के सम्राट देवपालदेव के पास अपना दूत भेजकर यह प्रार्थना की कि उनकी ओर से पाँच सौ गाँवों का दान नालंदा विश्वविद्यालय को दिया जाय। ताम्रपत्र के अनुसार नालंदा के गुणों से आकृष्ट होकर यवद्वीप के सम्राट बालपुत्र ने भगवान बुद्ध के प्रति भक्ति प्रदर्शित करते हुए नालंदा में एक बड़े विहार का निर्माण करवाया।

प्रश्न 15.
नालंदा में किन पांच विषयों की शिक्षा अनिवार्य थी?
उत्तर-
नालंदा का शिक्षाक्रम बड़ी व्यावहारिक बुद्धि से तैयार किया गया था। मूल रूप में पाँच विषयों की शिक्षा वहाँ अनिवार्य थी-

  1. शब्द विद्या या व्याकरण, जिससे भाषा का सम्यक ज्ञान प्राप्त हो सके।
  2. हेतु विद्या या तर्कशास्त्र, जिससे विद्यार्थी अपनी बुद्धि की कसौटी पर प्रत्येक बात को परख सके।
  3. चिकित्सा विद्या जिसे सीखकर छात्र स्वयं स्वस्थ रह सकें एवं दूसरों को भी निरोग बना सकें।
  4. शिल्प विद्या, एक न एक शिल्प को सीखना यहाँ अनिवार्य था जिससे छात्रों में व्यवहारिक और आर्थिक जीवन की स्वतंत्रता आ सके।
  5. इसके अतिरिक्त अपनी रुचि के अनुसार लोग धर्म और दर्शन का अध्ययन करते थे।

प्रश्न 16.
नालंदा के कुछ प्रसिद्ध विद्वानों की सूची बनाइए।
उत्तर-
जिस समय धर्मपाल इस संस्था के कुलपति थे उस समय शीलभद्र, ज्ञानचंद, प्रभामित्र, स्थिरमति, गुणमति आदि अन्य आचार्य युवानचांग के समकालीन थे।

प्रश्न 17.
शीलभद्र से युवानचांग (ह्वेनसांग) की क्या बातचीत हुई?
उत्तर-
जब युवानचांग नालंदा से विदा होने लगे, तब आचार्य शीलभद्र एवं अन्य भिक्षुओं ने उनसे यहाँ रह जाने के लिए अनुरोध किया। युवानचांग ने उत्तर में यह वचन कहे-“यह देश बुद्ध की जन्मभूमि है, इसके प्रति प्रेम न हो सकना असंभव है। लेकिन यहाँ आने का मेरा उद्देश्य यही था कि अपने भाइयों के हित के लिए मैं भगवान के महान धर्म की खोज करूँ। मेरा यहाँ आना बहुत ही लाभप्रद सिद्ध हुआ है। अब यहाँ से वापस जाकर मेरी इच्छा है कि जो मैंने पढा-सना है, उसे दूसरों के हितार्थ बताऊँ और अनुवाद रूप में लाऊँ, जिसके फलस्वरूप अन्य मनुष्य भी आपके प्रति उसी प्रकार कृतज्ञ हो सकें जिस प्रकार मैं हुआ हूँ।” इस उत्तर से शीलभद्र को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहा-“यह उदात्त विचार तो बोधिसत्वों जैसे हैं। मेरा हृदय भी तुम्हारी सदाशाओं का समर्थन करता है।”

प्रश्न 18.
विदेशों में ज्ञान-प्रसार के क्षेत्र में नालंदा के विद्वानों के प्रयासों के विवरण दीजिए।
उत्तर-
पहले तो तिब्बत के प्रसिद्ध सम्राट स्त्रोंग छन गप्पो (630 ई.) ने अपने .. देश में भारती लिपि और ज्ञान का प्रचार करने के लिए अपने यहाँ के विद्वान थोन्मिसम्मोट को नालंदा भेजा, जिसने आचार्य देवविदसिंह के चरणों में बैठकर बौद्ध और ब्राह्मण साहित्य की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद आठवीं सदी में नालंदा के कुलपति आचार्य शांतिरक्षित तिब्बती सम्राट के आमंत्रण पर उस देश में गए। नालंदा के तंत्र विद्या के प्रमुख आचार्य कमनशील भी तिब्बत गए थे। इन विद्वानों में आचार्य : पद्मसंभव (749 ई.) और दीपशंकर श्री ज्ञान अतिश (980 ई.) के नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न 19.
ज्ञानदान की विशेषता क्या है?
उत्तर-
ज्ञान के क्षेत्र में जो दान दिया जाता है वह सीमा रहित और अनंत होता है, न उसके बाँटने वालों को तृप्ति होती है और न उसे लेने वालों को। यही ज्ञानदान की विशेषता कही गई है।

निम्नलिखित गद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. नालंदा हमारे इतिहास में अत्यंत आकर्षक नाम है जिसके चारों ओर न केवल भारतीय ज्ञान-साधना के सुरभित पुष्प खिले हैं, अपितु किसी समय एशिया महाद्वीप के विस्तृत भूभाग के विद्या-संबंधी सूत्र भी उसके साथ जुड़े हुए थे। ज्ञान के क्षेत्र में देश और जातियों के भेद लुप्त हो जाते हैं। नालंदा इसका उज्जवल दृष्टांत था। नालंदा की वाणी एशिया महाद्वीप में पर्वत और समुद्रों के उस पार तक फैल गई थी। लगभग छह सौ वर्षों तक नालंदा एशिया का चैतन्य-केंद्र बना रहा।
(क) इस गद्यांश के पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) नालंदा भारतीय इतिहास में क्यों आकर्षक नाम रहा है? उसकी क्या विशेषता रही है?
(ग) नालंदा किसका ज्वलंत दृष्टांत रहा है?
(घ) नालंदा की वाणी के विस्तार और प्रभाव की चर्चा करें।
(ङ) इस गद्यांश का आशय लिखें।
उत्तर-
(क) पाठ-भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा, लेखक-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद।

(ख) नालंदा भारतीय इतिहास में एक आकर्षक नाम रहा है। इसकी यह विशेषता रही है कि इसके चारों ओर न केवल भारतीय ज्ञान साधना का सुबास छाया रहा है, अपितु, उस समय एशिया महादेश के विस्तृत भू-भाग के विद्या के सूत्र यहीं से संचालित और प्रभावित थे। इन्हीं कारणों से नालंदा भारतीय इतिहास में एक आकर्षक नाम रहा है।

(ग) नालंदा इस तथ्य का ज्वलंत उदाहरण रहा है कि ज्ञान की दृष्टि में देश और जाति के भेद लुप्त हो जाते हैं, अर्थात् दोनों में कोई पार्थक्य नहीं रह जाता है और दोनों की संकीर्णता मिट जाती है।

(घ) नालंदा के ज्ञान और शिक्षा की वाणी इस भारत देश की सीमा के अंतर्गत के क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं थी, अपितु वह इस देश से जुड़े पर्वतों और समुद्रों की सीमाओं को पारकर संपूर्ण एशिया महादेश के व्यापक क्षेत्र में फैली हुई थी। इसीलिए सैकड़ों वर्षों तक नालंदा एशिया की समग्र चेतना के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित रहा है।

(ङ) नालंदा का इतिहास और नाम भारतीय इतिहास के आकर्षण का एक स्वर्णिम पृष्ठ रहा है। यह भारतीय ज्ञान-साधना का उस समय का प्रधान केंद्र तो रहा ही है, इसके अतिरिक्त यह एशिया महाद्वीप के विस्तृत भूभाग में फैले विद्या-सूत्र का संचालक भी रहा है। इसके द्वारा फैलाए गए व्यापक ज्ञान-संदेश ने देश और जाति के अंतर और भेद को मिटा दिया था। यही कारण था कि नालंदा की ज्ञान की वाणी भारत देश की सीमा के पार एशिया महादेश के विस्तृत भूभाग तक फैल गई थी और इस रूप में नालंदा उन दिनों छह सौ वर्षों तक महाद्वीप की व्यापक चेतना का केंद्र (चैतन्य-केंद्र) बना हुआ था।

2. नालंदा विश्वविद्यालय का जन्म जनता के उदार दान से हुआ। कहा जाता है कि इसका आरंभ पाँच सौ व्यापारियों के दान से हुआ था, जिन्होंने अपने धन से भूमि खरीदकर बुद्ध को दान में दी थी। युवानचांग के समय में नालंदा विश्वविद्यालय का रूप धारण कर चुका था। यहाँ उस समय छह बड़े विहार थे। आठवीं सदी के यशोवर्धन के शिलालेख में नालंदा का बड़ा भव्य वर्णन किया गया है। यहाँ के विहारों की पंक्तियों के ऊँचे-ऊँचे शिखर आकाश में मेघों को छूते थे। उनके चारों “ ओर नीले जल से भरे हुए सरोवर थे, जिनमें सुनहरे और लाल कमल – तैरते थे। बीच-बीच में सघन आम्रकुंजों की छाया थी। यहाँ के भवनों के शिल्प और स्थापत्य को देखकर आश्चर्य होता था। उनमें अनेक प्रकार के अलंकरण और सुंदर मूर्तियाँ थीं।
(क) गद्यांश के पाठ और इसके लेखक के नाम लिखें।
(ख) नालंदा का जन्म और आरंभ कब और कैसे हुआ था?
(ग) यशोवर्मन के शिलालेख में नालंदा का क्या वर्णन मिलता है?
(घ) उस समय यहाँ के भवनों की क्या विशेषताएँ थीं?
(ङ) इस गद्यांश का आशय लिखें।
उत्तर-
(क) पाठ-भारत का पुरातन-विद्यापीठ : नालंदा, लेखक-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।

(ख) नालंदा का जन्म सामान्य जनता द्वारा दिए गए उदार दान से हुआ था। इसके जन्म के लिए आरंभ में पाँच सौ व्यापारियों ने उदारतापूर्वक दान की राशि दी थी। उसी दान की राशि से उनलोगों ने जमीन खरीदी और उसे खरीदकर भगवान बुद्ध को दान में दे दिया था। उसी जमीन पर नालंदा विश्वविद्यालय का जन्म शिलान्यास के रूप में हुआ जो कालक्रम में विश्वविश्रुत विश्वविद्यालय की गरिमा से विभूषित हुआ।

(ग) आठवीं सदी के यशोवर्मन के शिलालेख में नालंदा का बड़ा भव्य वर्णन मिलता है। उस वर्णन के अनुसार नालंदा में उस समय ऊँचे-ऊँचे गगनचुंबी शिखरों वाले पंक्तिबद्ध कई विहार बने हुए थे। वे सभी विहार चारों ओर से लाल
और सुनहले कमलों से सुशोभित सरोवरों से घिरे हुए थे। उन विहारों के बीच-बीच में आम्रकुंज शोभायमान थे जिनकी छाया बड़ी मनोरम थी।

(घ) उस समय वहाँ के निर्मित भवनों की विशेषताएँ अनुपम थीं। उन भवनों का स्थापत्य और शिल्प-सौंदर्य विलक्षण और आश्चर्यजनक था। उसके विकसित स्थापत्य और सौंदर्य को देखकर सभी लोग आश्चर्य और विस्मय-विमग्ध हो जाते थे।

(ङ) इस गद्यांश में लेखक ने बताया है कि नालंदा का जन्म सामान्य जनों की उदार दान-राशि से हुआ है। उस प्रारंभिक समय में पाँच सौ व्यापारियों ने अपने धन से कुछ जमीन खरीदकर नालंदा के निर्माण के लिए श्रद्धा से भगवान बुद्ध को अर्पित की। बाद के वर्षों में सम्राट हर्षवर्धन के समय युवान-चांग के भारत आगमन-काल में नालंदा ने विश्वविद्यालय का रूप धारण किया। आठवीं सदी में यशोवर्मन के शिलालेख में नालंदा के प्रांगण में कई गगनचुंबी शिखरोंवाले तथा सुनहले और लाल कमलों से शोभित सरोवरों से चारों ओर से घिरे विहार निर्मित थे। स्थापत्य और शिल्प की दृष्टि से उस समय उन भवनों की विशेषता आश्चर्यजनक थी।

3. आर्थिक दृष्टि से नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य और विद्यार्थी
निश्चित बना दिए गए थे। भूमि और भवनों के दान के अतिरिक्त नित्यप्रति के व्यय के लिए सौ गाँवों की आय अक्षयनिधि के रूप में समर्पित की गई थी। इत्सिंग के समय में यह संख्या बढ़कर दो सौ गाँवों तक पहुँच गई थी। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल इन तीनों राज्यों ने नालंदा के निर्माण और अर्थव्यवस्था में पर्याप्त भाग लिया। बंगाल के महाराज धर्मपाल देव और देवपाल देव के समय के ताम्रपत्र और मूर्तियाँ नालंदा की खुदाई में प्राप्त हुई हैं।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) उस समय नालंदा विश्वविद्यालय का आर्थिक स्रोत और
व्यवस्था क्या और कैसे थी?
(ग) उस समय किन प्रदेशों ने नालंदा विश्वविद्यालय को किस रूप में क्या सहयोग किया? ।
(घ) नालंदा की खुदाई में क्या प्राप्त हुई है?
उत्तर-
(क) पाठ-भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा, लेखक-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

(ख) उस समय नालंदा विश्वविद्यालय के आर्थिक स्रोत का साधन वहाँ के गाँवों में बसे लोगों द्वारा दिया गया धन था। उस विद्यापीठ के दैनिक और अन्य खर्चों के लिए सौ गाँवों की आय अक्षय निधि के रूप में समर्पित की जाती थी। इसके अतिरिक्त लोगों द्वारा दान के रूप में भूमि और भवन भी दिए जाते थे। आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए वहाँ के आचार्यों एवं विद्यार्थियों को कोई प्रयास नहीं करना पड़ता था।

(ग) उस समय उत्तरप्रदेश, बिहार और बंगाल इन तीन प्रदेशों ने नालंदा विद्यापीठ को काफी आर्थिक सहयोग किया। उनका यह सहयोग निर्माण तथा आर्थिक व्यवस्थापन के क्षेत्र में विशेष रूप से हुआ।

(घ) नालंदा की खुदाई में बंगाल के महाराज धर्मपालदेव और देवपाल देव के शासनकाल के ताम्रपत्र और मूर्तियाँ प्राप्त हुई थीं।

4. विदेशों के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का जो संबंध था, उसका स्मारक एक ताम्रपत्र नालंदा की खुदाई में मिला है। इससे ज्ञात होता है कि सुवर्णद्वीप (सुमात्रा) के शासक शैलेंद्र सम्राट श्री वालपुत्रदेव ने मगध के सम्राट देवपालदेव के पास अपना दूत भेजकर यह प्रार्थना की कि उनकी ओर से पाँच गाँवों का दान नालंदा विश्वविद्यालय को दिया जाए। ताम्रपत्र के अनुसार नालंदा के गुणों से आकृष्ट होकर यवद्वीप के सम्राट बालपुत्र ने भगवान बुद्ध के प्रति भक्ति प्रदर्शित करते हुए नालंदा में एक बड़े विहार का निर्माण कराया। उन पाँच गाँवों की आय प्रज्ञा, पारमिता आदि का पूजन, चतुर्दिश, अर्थात अंतरराष्ट्रीय आर्य भिक्षु संघ के चीवर, भोजन, चिकित्सा, शयनासन आदि का व्यय, धार्मिक ग्रंथों की प्रतिलिपि एवं विहार की टूट-फूट की मरम्मत आदि के लिए खर्च की जाती थी।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) विदेशों के साथ नालंदा विश्वविद्यालय के कैसे संबंध थे? उसे कुछ उदाहरण देकर बताएँ।
(ग) सुमात्रा और यवद्वीप के सम्राटों द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय को दिए गए सहयोगों की चर्चा करें।
(घ) पाँच गाँवों से प्राप्त दान के धन किन कार्यों में खर्च किए जाते थे?
(ङ) नालंदा विश्वविद्यालय की खुदाई में मिले ताम्रपत्र से हमें क्या जानकारी प्राप्त हुई है?
उत्तर-
(क) पाठ-भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा, लेखक-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ।

(ख) उस समय विदेशों के साथ नालंदा विश्वविः य के संबंध बड़े अच्छे थे। विदेश के देशों से इस विश्वविद्यालय को बिना माँग र सहयोग मिलते थे। इस दिशा में उदाहरण के रूप में सुमात्रा (स्वर्णद्वीप) के राजा और यवद्वीप के सम्राट द्वारा श्रद्धा और स्वेच्छा से दिए गए उदार दान की चर्चा की जा सकती है।

(ग) सुमात्रा और यवद्वीप के सम्राट ने स्वेच्छया श्रद्धा के साथ इस विश्वविद्यालय को दान दिए। सुमात्रा के सम्राट श्री बालपुत्रदेव ने श्रद्धा और निवेदन के साथ अपने पाँच गाँवों की आमदनी अर्पित की थी और यवद्वीप के सम्राट बालपुत्र ने भगवान बुद्ध के प्रति भक्ति प्रदर्शित करते हुए नालंदा में एक बड़े विहार का निर्माण कराया था।

(घ) सुमात्रा के शासक श्री बालपुत्रदेव द्वारा प्रदत्त पाँच गाँवों की आमदनी प्रज्ञा, पारमिता आदि के पूजन, चतुर्दिश, अर्थात् अंतरराष्ट्रीय आर्य भिक्षु संघ के चीवर, भोजन, चिकित्सा, शयनासन आदि के व्यय, धार्मिक ग्रंथों की प्रतिलिपि एवं बिहार के भवनों की मरम्मत आदि में खर्च की जाती थी।

(ङ) नालंदा विश्वविद्यालय की खुदाई से मिले ताम्रपत्र से हमें यह जानकारी मिलती है कि सुमात्रा के शासक श्री बालपुत्रदेव ने मगध के तत्कालीन सम्राट देवपालदेव से यह प्रार्थना की थी कि उनके पाँच गाँवों की आमदनी नालंदा विश्वविद्यालय की सेवा में लगाई जाए। इसी तरह यवपुत्र के सम्राट बालपुत्र ने नालंदा के गुणों से आकृष्ट होकर भगवान बुद्ध के प्रति अपनी भक्ति-भावना प्रकट कर नालंदा में एक बड़े विहार का निर्माण कराया था।

5. नालंदा का शिक्षाक्रम बड़ी व्यावहारिक बुद्धि से तैयार किया गया था।
उसे पढ़कर विद्यार्थी दैनिक जीवन में अधिकाधिक सफलता प्राप्त करते थे। मूल रूप में पाँच लिपियों की शिक्षा वहाँ अनिवार्य थी। शब्द विद्या या व्याकरण जिससे भाषा का सम्यक ज्ञान प्राप्त हो सके, हेतु विद्या या तर्कशास्त्र, जिससे विद्यार्थी अपनी बुद्धि की कसौटी पर प्रत्येक बात को परख सके, चिकित्सा विद्या, जिसे सीखकर छात्र स्वयं स्वस्थ रह सकें एवं दूसरों को भी नीरोग बना सके तथा शिल्प विद्या। एक-न-एक शिल्प को वहाँ सीखना अनिवार्य था जिसके द्वारा छात्रों में व्यावहारिक और आर्थिक जीवन की स्वतंत्रता आ सके। इन चारों के अतिरिक्त अपनी रुचि के अनुसार लोग धर्म और दर्शन का अध्ययन करते थे।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) नालंदा का शिक्षाक्रम बड़ी व्यावहारिक बुद्धि से तैयार किया गया था। इसपर प्रकाश डालें।
(ग) नालंदा के शिक्षाक्रम में किन विषयों की पढ़ाई अनिवार्य रूप से शामिल थी?
(घ) व्याकरण, तर्कशास्त्र तथा चिकित्सा विद्या की पढ़ाई विद्यार्थियों के लिए किस रूप में उपयोगी थी?
(ङ) विद्यार्थियों के लिए शिल्प विद्या के अध्ययन की क्या उपयोगिता
थी?
उत्तर-
(क) पाठ-भारत का पुरात्तन विद्यापीठ : नालंदा, लेखक-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।

(ख) नालंदा के पाठयक्रम में उन्हीं विषयों का अध्ययन आवश्यक बनाया गया था जो विषय विद्यार्थियों के व्यवहारिक जीवन में विशेष उपयोगी थे। इसीलिए उन विषयों में भाषा के उपयोगी ज्ञान के लिए व्याकरण, प्रत्येक बात को अपनी बुद्धि की कसौटी पर कसने के लिए तर्कशास्त्र, स्वयं की और दूसरे को स्वस्थ बनाए रखने के लिए चिकित्सा विद्या की पढ़ाई होती थी। ये सभी विषय व्यवहारिक जीवन के ज्ञान से जुड़े विषय रहे हैं। इसके साथ-साथ व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी शिल्प विद्या तथा धर्म और दर्शन के विषय भी उस पाठ्यक्रम में शामिल थे। लेखक ने इसीलिए कहा कि नालंदा का शिक्षाक्रम व्यावहारिक बुद्धि से तैयार किया गया था।

(ग) नालंदा के शिक्षाक्रम में इन नियमों की पढ़ाई अनिवार्य विषय के रूप , में शामिल थी-व्याकरण या शब्द विद्या की, हेतु विद्या या तर्कशास्त्र की, चिकित्सा विद्या की, शिल्प विद्या की और रुचि-अनुकूल धर्म और दर्शन की।

(घ) व्याकरण या शब्द विद्या की पढ़ाई भाषा के सम्यक ज्ञान के लिए, हेतु विद्या या तर्कशास्त्र की हर बात को बुद्धि की कसौटी पर कसने के लिए, चिकित्सा विद्या की स्वयं को और दूसरों को नीरोग बनाए रखने के लिए उपयोगी थी।

(ङ) शिल्प विद्या की पढ़ाई की अनिवार्यता इस रूप में और इस कारण थी कि विद्यार्थी शिल्प विद्या के ज्ञान और प्रशिक्षण के माध्यम से अपने व्यावहारिक और आर्थिक जीवन को विशेष उन्नत बनाकर स्वावलंबी हो सके और अपने जीवन को व्यावहारिकता के तल पर विशेष सफल और सक्षम बनाने की दिशा में दक्ष हो सके।

6. आचार्य शीलभद योगशास्त्र के उस समय के सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे। उनसे पहले धर्मपाल इस संस्था के प्रसिद्ध कुलपति थे। शीलभद्र, ज्ञानचंद, प्रभामित्र, स्थिरमति, गुणमति आदि अन्य आचार्य युवानचांग के समकालीन थे। जिस समय युवान चांग अपने देश चीन को लौट गए, उस समय में भी अपने भारतीय मित्रों के साथ उनका वैसा ही घनिष्ठ संबंध बना रहा। जब युवान चांग नालंदा से विदा होने लगे, तब आचार्य शीलभ्रद एवं अन्य भिक्षुओं ने उनसे यहाँ रह जाने के लिए अनुरोध किया। युवान चांग ने उत्तर में यह वचन कहे, “यह देश बुद्ध की जन्मभूमि है, इसके प्रति प्रेम न हो सकना असंभव है, लेकिन यहाँ आने का मेरा उद्देश्य यही था कि अपने भाइयों के हित के लिए मैं भगवान के महान धर्म की खोज करूँ। मेरा यहाँ आना बहुत ही लाभप्रद सिद्ध हुआ है।”
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखिए।
(ख) युवानचांग कौन थे? उन्होंने भारत भूमि के बारे में क्या कहा है? ।
(ग) नालंदा के कौन-कौन आचार्य युवान चांग के समकालीन थे?
भारतीय मित्रों के साथ युवान चांग का कैसा व्यवहार और संबंध था?
(घ) युवान चांग का भारत भूमि में आने का क्या उद्देश्य था? क्या
यहाँ आकर उनके उद्देश्य की पूर्ति हुई?
उत्तर-
(क) पाठ-भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा, लेखक-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

(ख) युवानचांग एक चीनी यात्री थे जो भारत के सम्राट हर्षवर्द्धन के शासनकाल में नालंदा आए थे। वहाँ के कई आचार्यों से इनके घनिष्ठ संबंध स्थापित हो गए थे। उन्होने यहाँ से लौटने के समय अपने भारतीय आचार्य मित्रों से यही कहा था कि भारत एक महान देश है, क्योंकि यह भगवान बुद्ध की जन्मभूमि है। इस देश के लिए प्रेमभाव का जग जाना बिलकुल स्वाभाविक है।

(ग) नालंदा विश्वविद्यालय के उस समय के लब्धप्रतिष्ठ आचार्य शीलभद्र, ज्ञानचंद, प्रभामित्र, स्थिरमति, गुणप्रति आदि इनके समकालीन थे। इन सबके साथ और अन्य जुड़े भारतीय मित्रों के साथ इनका सहज, मधुर और मित्रवत व्यवहार था।

(घ) युवानचांग के कथनानुसार उनका भारत देश में आने का उद्देश्य भगवान बुद्ध की इस जन्मभूमि के दर्शन, उनके प्रति श्रद्धार्पण तथा अपने लोगों के कल्याण के लिए भगवान बुद्ध द्वारा स्थापित महान धर्म का अन्वेषण करना था।

7. साहित्य और धर्म के अतिरिक्त नालंदा कला का भी एक प्रसिद्ध केंद्र था, जिसने अपना प्रभाव नेपाल, तिब्बत, हिन्देशिया एवं मध्य एशिया की कला पर डाला। नालंदा की कांस्य मूर्तियाँ अत्यंत सुंदर और प्रभावोत्पादक हैं। विद्वानों का अनुमान है कि कुर्किहर से प्राप्त हुई बौद्ध मूर्तियाँ नालंदा शैली से प्रभावित हैं। वस्तुत: नालंदा की सर्वांगीण उन्नति उस समन्वित साधना का फल था जो शिल्प विद्या और शब्दविद्या एवं धर्म और दर्शन के एक साथ पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने से संभव हुई। हमारी अभिलाषा होनी चाहिए कि भूतकाल के इस प्रबंध से शिक्षा लें
और कला, शिल्प, साहित्य, धर्म, दर्शन और ज्ञान का एक बड़ा केंद्र नालंदा में हम पुनः स्थापित करें।
(क) पाठ और पाठ के लेखक का नाम लिखें।
(ख) नालंदा की कला का विश्व के किन-किन देशों पर प्रभाव पड़ा? वहाँ की काँस्य मूर्तियों की क्या विशेषताएँ हैं?
(ग) नालंदा की सर्वांगीण उन्नति किस समन्वित साधना का फल है?
(घ) लेखक के अनुसार हमारी क्या अभिलाषाएँ होनी चाहिए?
उत्तर-
(क) पाठ-भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा, लेखक-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

(ख) नालंदा की कला का नेपाल, तिब्बत, हिन्देशिया एवं मध्य एशिया के देशों पर प्रभाव पड़ा। नालंदा शैली की कॉस्य मूर्तियाँ अत्यंत सुंदर एवं प्रभावोत्पादक है।

(ग) नालंदा की सर्वांगीण उन्नति शिल्प विद्या, शब्द विद्या एवं धर्म और दर्शन के एक साथ पाठ्यक्रम में सम्मिलित रूप से हुई है। समन्वित रूप से इन विषयों के अध्ययन-अध्यापक से इसे काफी बल मिला है।

(घ) लेखक के अनुसार हमारी अभिलाषा यह होनी चाहिए कि हम नालंदा की भूतकाल की इस समन्वित साधना से शिक्षा लेकर उसी पाठ्यक्रम के अनुरूप कला, शिल्प, साहित्य, धर्म, दर्शन और ज्ञान का एक बड़ा विशाल और भव्य केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय में पुनः स्थापित करें।

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 5 मै नीर भरी दुःख की बदली

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 1 पद्य खण्ड Chapter 5 मै नीर भरी दुःख की बदली Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 5 मै नीर भरी दुःख की बदली

Bihar Board Class 9 Hindi मै नीर भरी दुःख की बदली Text Book Questions and Answers

मैं नीर भरी दुख की बदली व्याख्या Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 1.
महादेवी अपने को ‘नीर भरी दुख की बदली’ क्यों कहती हैं?
उत्तर-
महादेवी वर्मा का जीवन सदैव वेदनामय रहा है। उनकी वेदना में ही विश्व की वेदना सन्निहित है। विश्व के जन जीवन की पीड़ा यातना, कष्ट, दुख आदि का संबंध महादेवी जी की व्यक्तिगत पीड़ा से है। कवयित्री ने अपने काव्य प्रतिभा द्वारा अपनी असहय वेदना और पीड़ा को मूर्त रूप दिया है। महादेवी जी की पीडा वेदना सार्वजनीन पीडा है वेदना है। इसी कारण वे अपने व्यक्तिगत जीवन की पीड़ा को नीर से भरी हुई बदली से तुलना करते हुए अन्तर्मन की भावना को व्यक्त किया है। ‘बदली’ यहाँ प्रतीक प्रयोग है। बदली जिस प्रकार जल कण के घनीभूत होने से अपने यथार्थ रूप को पाती है ठीक उसी प्रकार महादेवी जी का भी जीवन घनीभूत पीड़ाओं से व्यथित है। यह पीड़ा लौकिक भी है और अलौकिक भी। महादेवी रहस्यवादी कवियित्री हैं, इसी कारण उनपर भारतीय संतों एवं दार्शनिकों का भी प्रभाव है। इसी से प्रभावित होकर प्रकृति को माध्यम बनाकर महादेवी जी अपने हृदय के संवेदनशील उद्गारों को शब्द-बद्ध किया है।

उन्होंने प्रकृति के माध्यम से विभिन्न रूपों द्वारा अपने मन की घनीभूत वेदना को मूर्त रूप में चित्रण किया है। यह महादेवी जी की सांसारिक पीड़ा तो है ही, आध्यात्मिक पीड़ा भी है। महादेवी जी अंत:करण से ब्रह्म के प्रति भी समर्पित भाव से अपनी मुक्ति के लिए काव्य-सृजन द्वारा निवेदन प्रस्तुत करती हैं।

महादेवी जी ने अपनी प्रेम साधना की सफलता के लिए प्रकृति के व्यापक क्षेत्र को चुना। महादेवी जी के काव्य और जीवन में वेदनाधिक्य है। महादेवी जी अपने व्यथित हृदय की पीड़ा को सुनाने के लिए प्रकृति को ही सहृदय और उपयुक्त पात्र माना है।

मैं नीर भरी दुख की बदली कविता की व्याख्या Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 2.
निम्नांकित पंक्तियों का भाव स्पष्ट करें:
(क) मैं क्षितिज-भृकुटी पर घिर धूमिल,
चिंता का. भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव-जीवन अंकुर बन निकली।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘यामा’ काव्य कृति से संकलित की गई हैं। ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ काव्य पाठ का शीर्षक है। उपरोक्त पंक्तियों में महादेवी जी ने प्रकृति के माध्यम से जीवन की वेदना, पीड़ा एवं नए जीवन के अंकुरण की कामना व्यक्त की है। कवयित्री का कहना है कि क्षितिज के भृकुटी पर जो धूमिल घिरा हुआ है वह अविरल चिंता रूपी भार से व्यथित है। यानि चिंता की रेखाएँ सदैव उभरी हुई दिखाई पड़ती हैं। इस क्षितिज-भृकुटी की चिंता की समानता महादेवी जी की मन-मस्तिष्क की चिंता से की गई है। इसमें चिंता के अविरल और व्यापक रूप का वर्णन किया गया है।

महादेवी जी के हृदय रूपी क्षितिज में अनेक विषाद घिरे हुए हैं और कवयित्री के मानस पटल पर चिंता की रेखाएँ उभर आई हैं। जिस प्रकार, धूल के कण पर जल की वारिश होते ही उसमें छिपा बीज (जीवन) नव अंकुर रूप लेकर प्रगट हो जाता है। यहाँ कवयित्री के कहने का भाव यह है कि विषाद युक्त इस संसार में जब प्रकृति की कृपा होती है तब रजकण में छिपे हुए बीज भी नवजीवन को प्राप्त होते हैं। ये पंक्तियाँ रहस्यवादी भाव को अपने में समेटे हुए है। इस नश्वर संसार में सुख-दुख के बीच सारा जन-जीवन पीड़ित है। चिंताओं के मार से व्यथित है। लेकिन कवयित्री की दृष्टि में प्रकृति ही संतुलन रखने में समर्थ है। उपरोक्त पंक्तियों में अविरल चिंता खुद महादेवी जी का है। महादेवी जी कहती हैं कि मैं इस संसार में सदैव भार बनी रहीं। लेकिन प्रकृति ने ही इस वेदना को नए जीवन के नवांकुर के रूप में परिवर्तित कर सुखद क्षण प्रदान किया।

यहाँ प्रकृति के गुणों का भी चर्चा हुई है। जड़-चेतन, विश्व-वेदना, व्यक्तिगत वेदना, विश्व की चिंता ये सारी बातें महादेवी की जीवन वेदना से संपृक्त हैं। इस प्रकार महादेवी ने नवांकुर की सुखद कामना की है। विषाद युक्त वेदना से पीड़ित इस नश्वर संसार में प्रकृति का ही सहारा है। उसी का संबल है। इस प्रकार ब्रह्म और जीव के अटूट संबंधों को व्याख्यायित करते हुए महादेवी जी ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा, वेदना, चिंता को सार्वजनीन स्वरूप प्रदान करते हुए कविता को विस्तृत भाव भूमि प्रदान की है।
नव सृजन की परिकलपना भी कवयित्री के मन में है।

(ख) सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिरहन हो अंत खिली!
उत्तर-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ काव्य पाठ से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवयित्री ने अपने विषय में कहते हुए भावोद्गार को प्रकट किया कि इस जग में मेरे आने की याद में सुख की अनुभूति हुई है। लेकिन उस सुख में भी एक सिहरन थी क्योंकि महादेवी जी कन्या रूप में अवतरित हुई थीं। इन पंक्तियों में महादेवी जी ने अपने बारे में लिखा है कि उनके जन्म लेने पर जग में सुख की चर्चा तो हुई लेकिन उसमें भीतर ही भीतर एक विषाद भाव भी छिपा हुआ था।

इन पंक्तियों के द्वारा अपने होने के प्रति यानि स्वयं के अस्तित्व पर ध्यान आकृष्ट करते हुए कवयित्री ने जग के सुख-दुख की भी परिकल्पना की है। इन पंक्तियों में महादेवी जी की स्मृति तो जग खुशी-खुशी याद रखा किंतु अन्त:करण में यह सिहरन सुख का होते हुए कष्टप्रद था। रहस्यवादी भावनाओं के माध्यम से राग, सुख, सिहरन, जीवन, आगम और अंत पर महादेवी जी ने प्रकाश डाला है। इस भौतिक जगत में जीवन की गति यही है। सुख में भी दुख की छाया परिव्याप्त है। इस प्रकार आंतरिक मन में एक भय है, सिहरन है उसके अंत का कामना कवयित्री करती हैं। प्रकारान्तर से प्रकृति द्वारा जीवन और जगत के बीच हर्ष-विषाद का सूक्ष्म चित्रण करते हुए कवयित्री ने अपने व्यक्तिगत पीड़ा को भी व्यक्त किया है।

मैं नीर भरी दुःख की बदली कविता का सारांश Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 3.
‘क्रंदन में आहत विश्व हँसा’ से कवयित्री का क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियों में महादेवी जी ने विश्व वेदना की ओर सबका ध्यान आकृष्ट किया है। इस विश्व में सभी जन आहत हैं। वे रो रहे हैं, तड़प रहे हैं लेकिन इस तडपन या रुदन में भी हँसी छिपी हई है। कहने का अर्थ यह है कि यह विश्व जनजीवन के करुण क्रंदन से परिव्याप्त है। इससे निजात पाने के लिए प्रकृति ही संबल है। यहाँ कवयित्री ने स्वयं अपने हृदय में परिव्याप्त विकल वेदना को समग्र विश्व की वेदना का रूप देकर चित्रित किया है।

महादेवी जी का सारा जीवन वेदनाधिक्य से भरा हुआ है। जड़-चेतन की महत्ता की ओर भी कवयित्री ने हमारा ध्यान खींचा है। जिस प्रकार दीपक जलते हैं और विश्व को आलोकित करते हैं किन्त दीपक का स्वयं का जलना कितना चिंतनीय हैं इस पीड़ा को तो दीपक ही जान सकता है। इस प्रकार महादेवी जी की पीड़ा सर्वव्यापी है। विश्वजनीन है। उनकी व्यक्तिगत वेदना जन वेदना का रूप धारण करते हुए समग्र विश्व की वेदना का स्वरूप ले लेती है। क्रंदन में भी एक आनंद है, पीड़ा भी है लेकिन उस पीड़ा में जीनेवाले को जिस यथार्थ का दर्शन होता है वह दूसरा क्या जाने? इस प्रकार महादेवी की परिकल्पना विराट है। वह विराट सत्ता के साथ स्वयं को जोड़ते हुए अपनी पीड़ा को भी विराट स्वरूप प्रदान करती हैं। इस प्रकार महादेवी जी ने उक्त पंक्तियों में क्रंदन से आहत विश्व का चित्रण करते हुए उसमें छिपे हुए सूक्ष्म भाव तत्व की ओर हमारा ध्यान खींचा है।

मैं नीर भरी दुख की बदली कविता का सारांश Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 4.
कवयित्री किसे मलिन नहीं करने की बात करती है?
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाकवि महादेवी द्वारा रचित काव्य पाठ ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ से ली गई हैं।
इन पंक्तियों में कवयित्री ने अपने पवित्र मन के भाव को व्यक्त किया है। उन्होंने स्वयं के बारे में कहा है कि मैं जिस पथ पर चली, उसे मलिन नहीं होने दिया। यानि यहाँ कवयित्री की आंतरिक भावना से जुड़ा हुई ये पंक्तियाँ हैं। कवयित्री की यह इच्छा है, आकांक्षा है कि वह जिस राह पर चले वह स्वच्छ पर सुंदर हो। वह पथ भी चिन्ह रहित हो।

कहने का भाव यह है कि अपने को ब्रह्म से जोड़ने की लालसा ही कवयित्री की आंतरिक आकांक्षा है। वही एक पथ है जो मलिन नहीं है वह राग, द्वेष, रूप-रंग, गंधहीन है। ईश्वर की आराधना, पूजा में ही प्रकृति का जुड़ाव है। महादेवी जी प्रकृति प्रेमी कवयित्री हैं। इसी कारण उन्होंने अपनी इन पंक्तियों के माध्यम से इस भौतिक जगत को बुराइयों से स्वयं को मुक्त रखते हुए सत्कर्मों की ओर ध्यान खींचा है। इसमें महादेवी जी की निर्मल हृदय का भावोद्गार है जो अत्यंत ही सराहनीय और – वंदनीय है। कवयित्री को भौतिक आशा-आकांक्षा अपने पाश में बाँधने में असमर्थ है वह चिरंतन सत्य मार्ग का अनुसरण करना चाहती है।

इन पंक्तियों में लौकिक एवं अलौकिक दोनों जगत की चर्चा है। निर्मलता, स्वच्छता और राग-द्वेष रहित जीवन जीने की इच्छा व्यक्त की गई है। इस प्रकार महादेवी जी के चिंतन का धरातल ऊँचा और पवित्र है। उसमें सांसारिकता का लेशमात्र भी जगह नहीं है। इसमें निर्मल साधना एवं कर्मनिष्ठता पर चिंतन किया गया है।

मैं नीर भरी दुःख की बदली कविता का भावार्थ Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 5.
सप्रसंग व्याख्या करें:
“विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही।
उमड़ी कल थी मिट आज चली।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाट्य पुस्तक महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ काव्य पाठ से ली गई हैं। इन पंक्तियों का प्रसंग स्वयं महादेवी जी के जीवन से जुड़ा हुआ है।

उपरोक्त पंक्तियों में महादेवी जी ने अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय देते हुए लिखा है कि इस विस्तृत जग में मेरा कोई नहीं है। मेरा इतिहास यही है कि मैं कल थी और आज नहीं हूँ। इन पंक्तियों में कवयित्री ने भौतिक जगत की नश्वरता पर ध्यान आकृष्ट किया है। उनका कहना है कि इस नश्वर संसार के किसी भी कोने में मेरा अपना कोई नहीं है। मेरा अस्तित्व कल था लेकिन आज नहीं है। कहने का सूक्ष्म भाव यह है कि मानव इस धराधाम पर आकर अपनी यशस्वी कृर्तियों के बल पर ही अमर बन सकता है। इतिहास रच सकता है। इन पंक्तियों में भौतिक और आध्यात्मिक जगत का यथार्थता का चित्रण करते हुए महादेवी जी ने अपना मंतव्य प्रकट किया है। इस प्रकार कर्म की ही प्रधानता है। नाम की नहीं।

इन पंक्तियों में महादेवी जी ने जीवन के यथार्थ पर प्रकाश डाला है। इस नश्वर जगत में सुर्कीर्तियों का ही इतिहास रहा है। नाम का नहीं। यह जगत कर्म प्रधान है। नाम प्रधान नहीं। इतिहास भी उसी को याद करता है जो कर्मवीर होते हैं।

मैं नीर भरी दुःख की बदली की व्याख्या Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 6.
‘नयनों में दीपक से जलते में ‘दीपक’ का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक से महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘मैं नीर भरी दुख की बदली, काव्य-पाठ से ली गई हैं। इन पंक्तियों में ‘दीपक’ का प्रयोग स्वयं महादेवी जी के लिए हुआ है। जिस प्रकार दीपक सदैव जलता रहता है लेकिन दीपक के जलने की पीड़ा से वेदना से दुनिया वाकिफ नहीं होती और उसी तरह महादेवी जी की वेदना है, पीड़ा है। महादेवी जी जीवन भर दीपक की तरह जलती रही लेकिन उस भाव को दुनिया ने नहीं पकड़ा।

नयनों में दीपक से जलते यहाँ प्रतीक प्रयोग है महादेवी के नयनों में ही दीपक जल रहा है। कहने का भाव यह है कि अपने प्रियतम की प्रेम साधना में महादेवी जी की आँखों में अनवरत आशा का दीप जल रहा है। उसकी उन्हें प्रतीक्षा है उसके लिए तड़पन है, बेचैनी है पीड़ा है। इस प्रकार महादेवी जी की प्रेम-साधना को दीपक के सदृश चित्रित किया गया है। यहाँ दीपक का जलना, नयनों के दीपक से जलने के साथ तुलना की गई है। आँखों में भी मिलने की लालसा है। जलने की अनवरत क्रिया चल रही है। इस प्रकार तुलनात्मक चित्रण द्वारा कवियित्री अपने भावों को मूर्त रूप देने में सफल रही है। इसमें वेदना, आशा, मिलन की आकांक्षा का संकेत मिलता है। महादेवी जी की ये पंक्तियाँ रहस्यवादी है। इसमें प्रभु मिलन के लिए पीड़ा है, बेचैनी है। व्यग्रता है। यही कारण है कि नयनों में दीपक की भाँति ही दीपक जल रहा है। उसे प्रभु के आगमन एवं मिलन की उत्कट प्रतीक्षा है। इन पंक्तियों में सूक्ष्म भाव निहित है।

मैं नीर भरी दुःख की बदली का सारांश Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 7.
कविता के अनुसार कवियित्री अपना परिचय किस रूप में दे रही हैं?
उत्तर-
‘मैं नीर भरी दुख की बदली ‘काव्य में महादेवी जी ने अपने पूरे जीवन की वेदना, पीड़ा को अभिव्यक्ति देकर एक नयी भावभूमि की स्थापना की है। महादेवी जी का जीवन मेघ से भरी हुई बदली के समान है। जिस प्रकार जल-कण से संघन होकर बादल वेदना से जम गया है ठीक उसी प्रकार महादेवी जी का भी जीवन है। उसके सिहरन है तो कभी निष्क्रियता भी झलकता है। महादेवी ने अपने जीवन की तुलना बादल से प्रतीक रूप में की है। वह कहती है कि बादल को देखकर मन प्रसन्न हो उठता है। मिलकर रोने से मन हल्का हो जाता है। ठीक उसी प्रकार आँख में जलते दीपक के समान पलकों से आँसू भरने के बूंद के रूप में निकलता है।

मेरे पग ऐसे चल रहे हैं जैसे मन में संगीत की लहरें उठ रहीं हों और श्वास में मधुरता का अहसास हो।
आकाश की नवरंगी घटाओं में ऐसा लगता है जैसे छाया में मलय बयार की खुशबू आ रही है।

कवियित्री का मानना है कि कन्या के जन्म होते ही हमेशा से जग की मुख पर चिंता की रेखाएँ उभर आती हैं। अर्थात् कन्या का जन्म लेना ही चिंता का विषय रहता है।

धूल के कण पर जल की बारिश होते ही उसमें छिपा बीज (जीवन) नया रूप धारण कर धरा पर अवतरित हो जाता है। ठीक उसी प्रकार महादेवी जी का भी जीवन है।

कवियित्री की कल्पना या आकांक्षा यह है कि वह जिस पथ पर चल रही हैं वह सुंदर और स्वच्छ हो, मलिन नहीं हो। वह पथ चिन्ह रहित भी हो।
अंत में कवियित्री कहती है कि इस विस्तृत जग में मेरा कोई नहीं है। मेरा इतिहास यही है कि मैं कल थी और आज नहीं हूँ। इन पंक्तियों में कवियित्री ने जीवन को दार्शनिक स्वरूप देते हुए तुलनात्मक पक्षों पर चिंतन किया है। यह जगत नश्वर और विषाद से भरा हुआ है। इस संसार में अमर रहने के लिए यशकामी होना होगा। यानि सुकर्म ही इतिहास में स्थान सुरक्षित रखेगा।

यह कविता रहस्यवादी भावों से भरी हुई है जिसमें महादेवी के व्यक्तिगत वेदना, पीड़ा का चित्रण तो है ही साथ ही विश्व के विराट स्वरूप की नश्वरता, क्षणभंगुरता की ओर भी ध्यान खींचा गया है।

Mai Nir Bhari Dukh Ki Badli Summary In Hindi Bihar Board प्रश्न 8.
‘मेरा न कभी अपना होना’ से कवयित्री का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
उपरोक्त पंक्तियों में महादेवी जी ने इस लौकिक जगत की नश्वरता के बारे में ध्यान आकष्ट करते हए अपने व्यक्तिगत जीवन पर भी प्रकाश डाला है। महादेवी जी सरल एवं निष्कपट भाव से कहती हैं कि इस विस्तत संसार में मेरा अपना कोई नहीं है। इस विराट जगत के किसी भी कोना में मेरा कुछ नही है और न मेरा अपना कोई है। कहने का सूक्ष्म भाव यह है कि यह संसार नश्वर है। माया बंधन से यक्त है। कोई भी किसी का नहीं है। सबको एक न एक दिन मर जाना है। यह जीवन नश्वर है अतः इसके लिए सबसे सरल मार्ग है-सुकर्म और सुपथगामी बनना। इसमें रहस्यवादी भाव भरा हआ है। महादेवी जी ने अपने जीवन की नश्वरता और क्षणभंगरता की ओर सबका ध्यान आकष्ट किया है। महादेवी जी ने अपने व्यक्तिगत जीवन-कर्म को विश्व के जीवन-धर्म से जोड़कर अपनी कविताओं में वर्णन किया है।

Main Neer Bhari Dukh Ki Badli Summary In Hindi Bihar Board प्रश्न 9.
कवियित्री ने अपने जीवन में आँसू को अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण साधन माना है। कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत काव्य पाठ में महादेवी जी ने अपनी भावनाओं को प्रबल रूप में प्रस्तुत करने के लिए आँसू को आधार बनाया है। आँसू महत्वपूर्ण साधन इसीलिए माना गया है क्योंकि आँसू जब बहता है तब यह साफ दृष्टिगत होता है कि भीतर कोई न कोई घनीभूत पीड़ा है वेदना है।

अपनी कविता में महादेवी जी ने क्रंदन में आहत विश्व हँमा, पलकों में निर्झरिणी मचली द्वारा आँस की महत्ता को प्रतिष्ठा दी है। जब व्यक्ति अत्यधिक । पीड़ित होता है। असह्य कप्ट से पीड़ित होता है तो उसकं आँखों सं बरबस आँसू बह चलते हैं आँसू व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा को प्रकट करने में महत्वपूर्ण साधन है। इस प्रकार रज-कण पर जल-कणा हो बरसी में भी हृदय की वेदना को आँसू रूप में व्यक्त करते हुए कविता के सृजन में सफलता प्राप्त की है।

मैं नीर भरी दुख की बदली का भावार्थ Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 10.
इस कविता में ‘दख’ और ‘आँसू’ कहाँ-कहाँ, किन-किन रूपों में आते हैं? उनकी सार्थकता क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत काव्य-पाठ में कवयित्री ने दु:ख और ‘आँसू’ के लिए कई काव्य पंक्तियों की रचना की हैं। उन्होंन ‘आँसू’ को कई रूपों में व्याख्यायित किया है। ‘स्पंदन में चिर निस्पंद’ में दुख की व्याख्या की है। ‘क्रदन में आहत विश्व’ पंक्ति में अपनी मनोव्यथा के साथ चिर विश्व व्यथा को वर्णन करते हुए ‘आँसू’ एवं दुख के विश्वजनीन रूप को प्रकट किया है। कवियित्री की व्यक्तिगत पीड़ा साव की पीड़ा है, वेदना है। ठीक उसी प्रकार कवियित्री के आँसू सकल जगत के आँसू हैं, उनका रूप विश्वव्यापी है।।

नयनों में दीपक से जलते पंक्तियों में जलन एवं तड़पन के साथ पिघलते आँसू के ज्वालामय रूप का चित्र खींचा गया है। इसमें हृदय की जलन भी है, तड़पन भी है। उसी जलन की पीड़ा से पीड़ित मन जब विकल-व्यथित हो जाता है तब पलकों से आँसू की नदी बहने लगते है।
इस प्रकार कवयित्री ने अपनी कविता में स्पंदन में चिर निस्पंद जीवन की वेदना, विवशता, दुख की व्याख्या की है। क्रंदन में विश्व की विराटता का दर्शन कराया है। सारा विश्व चित्कार कर रहा है। आहत है, शोक संतप्त है। विरल व्यथित है। नयनों में दीपक जलने का अर्थ घनीभूत पीड़ा हृदय में अवस्थित है जो नयनों में जलन के रूप में दीपक की तरह चित्रित किया गया है। पलकों में उमड़े आँसू के सैलाव ने नदी का रूप धारण कर लिए है।

रज-कण पर जल-कण हो बरसी यानि बारिश के रूप में आँसू को चित्रित किया गया है। इस प्रकार कवयित्री का दुख विश्वव्यापी रूप को अख्तियार कर लिया है। कवयित्री का इस नश्वर संसार में आना भी सिहरन यानि चिंता का कारण बन गया है। परिचय इतना इतिहास यही उमड़ा कल था मिट आज चली यानि अस्तित्व के मिटने का गम भी दुख का चित्रित रूप है। इस संसार में अपना कोई नहीं होना यानि अकेलापन भी दुख का ही चित्रित रूप है। इस प्रकार आँसू और दुःख को कई रूपों में चित्रित करते हुए कवयित्री ने अपने हृदयोद्गार को प्रकट किया है।

नीचे लिख्ने पद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखें।

1. मेरा पग-पग संगीत भरा,
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय-बयार पली! :
मैं क्षितिज-भृकुटी पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
(क) कवि और कविता के नाम लिखें।
(ख) ‘मेरा पग-पग संगीत भरा’ से कवयित्री का क्या अर्थ है?
(ग) ‘श्वासों से स्वप्न-पराग झरा’ का अर्थ स्पष्ट करें।
(घ) “मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल’ से कवयित्री क्या कहना चाहती है?
(ङ) ‘नवजीवन अंकुर बन निकली’का तात्पर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कवि-महादेवी वर्मा, कविमा-मैं नीर-भरी दुःख की बदली

(ख) इस कथन से कवयित्री के कहने का आशय यह है कि जिस प्रकार जल से भरी बदली रह-रहकर मंद स्वर में गरजकर अपने सजग संगीत का परिचय देती है उसी तरह कवयित्री के जीवन का क्षण-क्षण भी प्रियतम के रहस्मय प्रेम के संगीत से भरा हुआ है।

(ग) यहाँ महादेवी वर्मा यह कहना चाहती है कि उसकी हर साँस से सपनों का पराग झरता रहता है, अर्थात् उसकी साँसों में सुखद कल्पनाओं और प्रेम की सुगंध विद्यमान रहती है। इस सुखद कल्पना और प्रेम के कारण महादेवी वर्मा का संपूर्ण जीवन सुगंध से, अर्थात् प्रेममय मधुर अनुभूति से भरा हुआ है।

(घ) कवयित्री अपनी तुलना नीर-भरी बदली से करती है। नीर-भरी बदली का जन्म क्षितिज के तल पर धुंधली लकीर के रूप में सर्वप्रथम होता है। उसका भी जन्म इस संसार के एक कोने में एक लघु अस्तित्व के रूप में हुआ है। नीर-भरी बदली धूलकणों पर बरसकर वहाँ नवांकुरों के रूप में नवजीवन का संचार करती है। उसी तरह जब महादेवी वर्मा की वेदना आँसुओं के रूप में बरस पड़ती है तब फिर से उसके नए जीवन में नई चेतना का नव संसार बस जाता है।

(ङ) इस प्रश्न के उत्तर के लिए ऊपर लिखित प्रश्नोत्तर ‘घ’ के अंतिम खंड को पढ़ें।

2. पथ को न मलिन करता आना,
पद-चिन्ह दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन को अंत खिली!
विस्तृत नभ को कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली!
(क) कवि और कविता के नाम लिखें।
(ख) “पथ को न मलिन करता आना’, पद-चिन्ह दे जाता जाना’ पद्य-पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट करें।
(ग) कवयित्री ने इस पद्यांश में संसार से अपना कैसा संबंध बताया है? स्पष्ट करें।
(घ) कवयित्री के जीवन का परिचय और इतिहास क्या है?
(ङ) ‘उमड़ी कल थी मिट आज चली’ प्रध-पंक्ति में जीवन के किस
सत्य और दर्शन की व्याख्या की गई है? स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कवयित्री-महादेवी वर्मा कविता-मैं नीर भरी दुख की बदली ।

(ख) कवयित्री अपनी तुलना नीर-भरी बदली से करती है। बदली कुछ देर के लिए आकाश में छाती है और फिर बरसकर अस्तित्वविहीन हो जाती है। वहाँ आकाश में उसके आने और फिर उसके वहाँ से चले जाने के इस आवागमन का कोई चिन्ह नहीं रह जाता है जिससे कि आकाश का पथ मलिन या गंदा हो जाए। इसी तरह महादेवी वर्मा के इस जीवन-तल पर जन्म और मृत्यु के रूप में आवागमन से उनके जीवन-पथ पर कोई अस्तित्व चिन्ह उसे गंदा करने के लिए नहीं रह जाता है

(ग) कवयित्री के अनुसार उसका इस संसार से एकदम वैसा ही अस्थायी संबंध है जिस प्रकार नीर-भरी बदली का आकाश से अस्थायी संबंध रहता है।
कवयित्री केवल अपने जीवनकाल तक ही अस्थायी रूप से इस संसार से जुड़ी हुई है। जन्म के रूप में आना और फिर मौत के रूप में चला जाना-इसी जन्म और मरण के बीच की लघु अवधि कवयित्री के संसार से अस्थायी संबंध की अस्थायी अवधि है।

(घ) कवयित्री के जीवन का परिचय और जीवन का इतिहास यही है कि उसने इस संसार में जन्म लिया और कुछ वर्षों के बाद यहाँ समय बिताकर यहाँ ये उसे चला जाना है। उसके जन्म और मरण के बीच की अवधि ही उसके जीवन का परिचय और इतिहास है।

(ङ) इस कथन के माध्यम से कवयित्री जीवन के इस शाश्वत सत्य और दर्शन का उद्घाटन करती है कि मानव का इस धरती से अस्थायी संबंधी है। यहाँ जो जन्मा है, उसे अवश्य ही मौत का वरण करना है। हमारा जीवन स्थायी और शाश्वत नहीं है जैसे नीर-भरी बदली का आकाश से स्थायी संबंध नहीं है। जो घटा घिरी उसे फिर अस्तित्वविहीन हो ही जाना है।

Bihar Board Class 9 History Solutions Chapter 3 फ्रांस की क्रान्ति

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions History इतिहास : इतिहास की दुनिया भाग 1 Chapter 3 फ्रांस की क्रान्ति Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science History Solutions Chapter 3 फ्रांस की क्रान्ति

Bihar Board Class 9 History फ्रांस की क्रान्ति Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

फ्रांस की क्रांति प्रश्न उत्तर Class 9 Bihar Board प्रश्न 1.
फ्रांस की राजक्रांति किस ई० में हुई ?
(क) 1776
(ख) 1789
(ग) 1776
(घ) 1832
उत्तर-
(ख) 1789

फ्रांस की क्रांति प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 2.
बैस्टिल का पतन कब हुआ?
(क) 5 मई, 1789
(ख) 20 जून, 1789
(ग) 14 जुलाई, 1789
(घ) 27 अगस्त, 1789
उत्तर-
(ग) 14 जुलाई, 1789

Bihar Board Class 9 History Solution Chapter 3 प्रश्न 3.
प्रथम एस्टेट में कौन आते थे?
(क) सर्वसाधारण
(ख) किसान
(ग) पादरी
(घ) राजा
उत्तर-
(ग) पादरी

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 4.
द्वितीय एस्टेट में कौन आते थे?
(क) पादरी
(ख) राजा
(ग) कुलीन
(घ) मध्यमवर्ग
उत्तर-
(ग) कुलीन ।

Bihar Board 9th Class Social Science Book Pdf प्रश्न 5.
तृतीय एस्टेट में इनमें से कौन थे?
(क) दार्शनिक
(ख) कुलीन
(ग) पादरी
(घ) न्यायाधीश
उत्तर-
(क) दार्शनिक

फ्रांस की क्रांति प्रश्न उत्तर Pdf Bihar Board प्रश्न 6.
बोल्टेमर क्या था?
(क) वैज्ञानिक
(ख) गणितज्ञ
(ग) लेखक
(घ) शिल्पकार
उत्तर-
(ग) लेखक

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 7.
रूसो किस सिद्धान्त का समर्थक था?
(क) समाजवाद
(ख) जनता की इच्छा
(ग) शक्ति पृथक्करण
(घ) निरंकुशता (General Will)
उत्तर-
(ख) जनता की इच्छा

Itihas Ki Duniya Class 9 Bihar Board प्रश्न 8.
मांटेस्क्यू ने कौन-सी पुस्तक लिखी?
(क) समाजिक संविदा
(ख) विधि का आत्मा
(ग) दास केपिटल
(घ) वृहत ज्ञानकोष
उत्तर-
(ख) विधि का आत्मा

फ्रांस की क्रांति के परिणामों का उल्लेख करें Bihar Board प्रश्न 9.
फ्रांस की राजक्रांति के समय वहाँ का राजा कौन था ?
(क) नेपोलियन
(ख) लुई चौदहवाँ
(ग) लुई सोलहवाँ
(घ) मिराब्यो
उत्तर-
(ग) लुई सोलहवाँ

फ्रांस की क्रांति के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 10.
फ्रांस में स्वतंत्रता दिवस कब मनाया जाता है ?
(क) 4 जुलाई
(ख) 14 जुलाई
(ग) 21 अगस्त
(घ) 31 जुलाई
उत्तर-
(ख) 14 जुलाई

I. रिक्त स्थान की पूर्ति करें-

1. लुई सोलहवाँ सन् …………… ई० में फ्रांस की गद्दी पर बैठा।
2. …………… लुई सोलहवाँ की पत्नी थी। 3. फ्रांस की संसदीय संस्था को …………… कहते थे।
4. ठेका पर टैक्स वसूलने वाले पूँजीपतियों को …………… कहा जाता था।
5. …………. के सिद्धन्त की स्थापना मांटेस्क्यू ने की।
6. ………….. की प्रसिद्ध पुस्तक ‘सामाजिक संविदा’ है।
7. 27 अगस्त, 1789 को फ्रांस की नेशनल एसेम्बली ने …………… की घोषणा थी।
8. जैकोबिन दल का प्रसिद्ध नेता …………… था।
9. दास प्रथा का अंतिम रूप से उन्मूलन …………… ई० में हुआ।
10. फ्रांसीसी महिलाओं को मतदान का अधिकार सन् ……….. ई० में मिला।
उत्तर-
1.1774,
2. मेरी अन्तोयनेत,
3. स्टेट जेनरल,
4. टैक्सफार्मर,
5. शक्ति पृथक्करण,
6. रूसो,
7. मानव और नागरिकों के अधिकार,
8. मैक्समिलियन राब्स पियर,
9. 1848,
10. 1946

लघु उत्तरीय प्रश्न

Bihar Board Solution Class 9 History प्रश्न 1.
फ्रांस की क्रांति के राजनैतिक कारण क्या थे?
उत्तर-
फ्रांस की क्रान्ति के राजनैतिक कारण निम्नलिखित थे।
(i) निरंकुश राजशाही। (ii) राज-दरबार की विलासिता । (iii) प्रशासनिक भ्रष्टाचार। (iv) संसद की बैठक 175 वर्षों तक नहीं बुलाई गयी। (v) अत्यधिक केन्द्रीयकरण की नीति। (vi) स्वायत्त शासन का अभाव। (vii) मेरी अन्तोयनेत का प्रभाव।
इन्हीं कारणों से फ्रांस की राज्य क्रान्ति हुई।

फ्रांसीसी क्रांति पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 2.
फ्रांस की क्रांति के सामाजिक कारण क्या थे?
उत्तर-
फ्रांस में समाज तीन वर्गों में विभक्त था- (i) प्रथम एस्टेट में पादरी (ii) दूसरे एस्टेट में अभिजात वर्ग । (iii) तीसरे एस्टेट में सर्वसाधारण । प्रथम और द्वितीय वर्ग करों से मुक्त थे। फ्रांस की कुल भूमि का 40% इन्हीं के पास थी। 90 प्रतिशत जनता तीसरे एस्टेट में थी, जिनको कोई भी विशेषाधिकार प्राप्त नहीं था वे अपने स्वामी की सेवा घर एवं खेतों में काम करना । डाक्टर, वकील, जज, अध्यापक भी इसी वर्ग में थे। इन लोगों में भारी असंतोष था। यही वर्ग क्रांति का कारण बना।

France Ki Kranti Class 9 Question Answer Bihar Board प्रश्न 3.
क्रांति के आर्थिक कारणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर-

  • फ्रांस की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी जिसे सुधारने के लिए वहाँ की जनता पर करों का बोझ लाद दिया गया था।
  • करों का विभाजन दोष पूर्ण था । प्रथम और द्वितीय वर्ग करों से मुक्त था, जबकि जनसाधारण को कर चुकाने पड़ते थे ।
  • किसानों पर भूमि पर, धार्मिक कर, सामन्ती कर आदि लगे थे। दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर भी कर देने पड़ते थे।
  • औद्योगिक क्रांति शुरू होने से मशीनों का उपयोग शुरू हुआ और बेरोजगारों की संख्या बढ़ने लगी।
  • व्यापारियों पर अनेक तरह के कर लगाए गए थे। जैसे—गिल्ड की पाबन्दी, सामन्ती कर, प्रान्तीय आयात कर इत्यादि । इस कारण यहाँ का व्यापार का विकास नहीं हो पाया। ये सभी कारण क्रांति को प्रोत्साहित किया।

Class 9 फ्रांस की क्रांति प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
फ्रांस की क्रांति के बौद्धिक कारणों का उल्लेख करें।
उत्तर-
फ्रांसीसी क्रान्ति के विषय में कहा जाता है कि यह एक मध्यम वर्गीय क्रान्ति थी । फ्रांस की स्थिति बड़ी गंभीर थी इस स्थिति को समझने या स्पष्ट करने में दार्शनिकों ने बड़ा योगदान दिया। फ्रांस के अनेक दार्शनिक, विचारक और लेखक हुए । इन लोगों ने तत्कालीन व्यवस्था पर करारा प्रहार किया । जनता इनके विचारों से गहरे रूप से प्रभावित हुए और क्रांति के लिए तैयार हो गई। इनमें प्रमुख मांटेस्क्यू, वाल्टेयर और रूसो थे।

  • मांटेस्क्यू ने अपनी पुस्तक ‘विधि की आत्मा’ में सरकार के तीनों अंगों-कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका–को एक ही हाथ । में केन्द्रित नहीं होनी चाहिए ऐसा होने से शासन निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी नहीं होगा। ऐसा बताकर उन्होंने शक्ति पृथक्करण सिद्धान्त का पोषण किया।
  • रूसो पूर्ण परिवर्तन चाहते थे। उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सामाजिक संविदा’ में जनमत को ही सर्व शक्तिशाली माना । अतः जनतंत्र का समर्थक था।
  • अन्य बुद्धिजीवी जिनमें ददरों प्रमुख थे । इन्होंने ‘वृहत ज्ञानकोष’ के लेखों से फ्रांस में क्रांन्तिकारी विचारों का प्रचार किया। फ्रांस के अर्थशास्त्रियों क्वेजनों एवं तुर्गों ने समाज में आर्थिक शोषण एवं नियंत्रण की आलोचना की और मुक्त व्यापार का समर्थन किया ।

Bihar Board Solution Class 9 Social Science Objective प्रश्न 5.
‘लेटर्स-डी-केचेट’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
लेटर्स-डी-केचेट’ से फ्रांस में बिना अभियोग के गिरफ्तारी वारंट होता था । फ्रांस में सभी तरह की स्वतंत्रताओं का अभाव था। भाषण, लेखन, विचार की अभिव्यक्ति तथा धार्मिक स्वतंत्रता का पूर्ण अभाव था । वहाँ राजधर्म कैथोलिक था और प्रोटेस्टेंट धर्म के मानने वालों को कठोर सजा दी जाती थी। ऐसे धर्मावलवियों को राजा बिना अभियोग के रिरफ्तारी वारंट देता था। उसे ही लेटर्स-द-केचेट (Letters-decachet) कहते थे।

प्रश्न 6.
अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का फ्रांस की क्रांति पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का फ्रांस की क्रांति पर बहुत प्रभाव पड़ा। अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में लफायते के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना ने इंग्लैण्ड के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया था। उन्होंने वहाँ देखा था कि अमेरिका के 13 उपनिवेशों ने कैसे औपनिवेशिक शासन को समाप्त कर लोकतंत्र की स्थापना की थी। स्वदेश वापस लौटकर उनलोगों ने देखा कि जिन सिद्धान्तों की रक्षा के लिए वे अमेरिका में युद्ध कर रहे थे उनका अपने देश में ही अभाव था। वे सैनिक फ्रांस में क्रांति का अग्रदूत बनकर लोकतंत्र का संदेश फैलाने लगे । जनसाधारण पर इसका बहुत प्रभाव पड़ा अंत में वह फ्रांस की क्रान्ति का तात्कालिक कारण बन गया ।

प्रश्न 7.
‘मानव एवं नागरिकों के अधिकार से’ आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
14 जुलाई, 1789 के बाद लुई सोलहवाँ नाम मात्र के लिए राजा बना रहा और नेशनल एसेम्बली देश के लिए अधिनियम बनाने लगी। इसी सभी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी.27 अगस्त, 1789 को ‘मानव और नागरिकों के अधिकार’ (The Declaration of the rights of man and citizen)इसमें समानता, स्वतंत्रता, संपत्ति की सुरक्षा तथा अत्याचारों से मुक्ति के अधिकार को नैसर्गिक और अहरणीय’ माना गया । व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ प्रेस एवं भाषण की स्वतंत्रता भी मानी गयी । अब राज्य किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए गिरफ्तार नहीं कर सकता था। तथा मुआवजा दिए बिना उसके जमीन पर कब्जा नहीं कर सकता था। इन अधिकारों की सुरक्षा करना राज्य का दायित्व माना गया । मध्यम वर्ग के लिए सबसे महत्वूपर्ण घोषणाएँ थीं। 90% सामान्य जनता को उन समस्याओं से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया गया जिनका सामना उन्हें निरंकुश राजशाही में करना पड़ता था।

प्रश्न 8.
फ्रांस की क्रांति का इंग्लैण्ड पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
फ्रांस की क्रान्ति का प्रभाव सिर्फ फ्रांस पर ही नहीं बल्कि यूरोप के अन्य देशों पर भी पड़ा । नेपोलियन फ्रांस में सुधार के कार्यों को करते हुए अपने विजय अभियान के दौरान जब इटली और जर्मनी आदि देशों में पहुँचा, तब उसे वहाँ की जनता भी ‘क्रांति का अग्रदूत’ कहकर स्वागत किया । इसने इन देशों के नागरिकों को राष्ट्रीयता का संदेश देने का कार्य किया। इंग्लैण्ड पर प्रभाव-नेपोलियन का विजय अभियान इंग्लैण्ड पर भी हुआ, क्रान्ति का इतना अधिक असर इंग्लैण्ड में दिखा कि वहाँ की जनता ने भी सामन्तवाद के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी । फलस्वरूप सन् 1832 ई० में इंग्लैण्ड में ‘संसदीय सुधार अधिनियम’ पारित हुआ; जिसके द्वारा वहाँ के जमींदारों की शक्ति समाप्त कर दी गयी और जनता के लिए अनेक सुधारों का मार्ग खुल गया । भविष्य में, इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के विकास में इस क्रांति का बहुत योगदान रहा ।

प्रश्न 9.
फ्रांस की क्रांति ने इटली को प्रभावित किया, कैसे?
उत्तर-
फ्रांस की क्रान्ति ने इटली को बहुत प्रभावित किया । इटली इस समय कई भागों में बँटा हुआ था । फ्रांस की इस क्रान्ति के बाद इटली के विभिन्न भागों में नेपोलियन ने अपनी सेना एकत्रित कर लड़ाई की तैयारी की और ‘इटली राज्य’ स्थापित किया। एक साथ मिलकर युद्ध करने से उनमें राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ और इटली में भावी एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

प्रश्न 10.
फ्रांस की क्रांति से जर्मनी कैसे प्रभावित हुआ?
उत्तर-
फ्रांस की क्रान्ति से जर्मनी भी अछूता नहीं रहा। जर्मनी भी उस समय छोटे-छोटे 300 राज्यों में विभक्त था, जो नेपोलियन के ही प्रयास से 38 राज्यों में सिमट गया । इस क्रान्ति में ‘स्वतंत्रता’, ‘समानता’ एवं ‘बन्धुत्व’ की भावना को जर्मनी के लोगों ने अपनाया और आगे चलकर इससे जर्मनी के एकीकरण करने में बल प्राप्त हुआ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांस की क्रांति के क्या कारण थे?
उत्तर-
फ्रांस की क्रान्ति 1789 ई० में हुई। इसके निम्नलिखित कारण थे
(i) सामाजिक कारण-फ्रांस में समाज तीन वर्गों-उच्च मध्यम तथा निम्न । प्रथम दोनों श्रेणियों में बडे सामन्त, पादरी तथा कुलीन वर्ग के व्यक्ति थे । इन्हें किसी भी प्रकार का कोई कर नहीं देना पड़ता था और 40% जमीन के भी यही मालिक थे। तृतीय श्रेणी वालों के जिसमें सर्वसाधारण व्यक्ति डाक्टर, वकील, व्यापारी आदि थे जिन्हें सभी प्रकार का कर देना पड़ता था। फलतः यह वर्ग जिनकी संख्या 90% थी परिवर्तन चाहते थे।

(ii) राजनीतिक कारण-फांस का राजा अपने को ही राज्य मानता था। उसका कथन था ‘मैं ही राज्य हूँ।” यह कथन लुई चौदहवाँ का कथन था। शासन की एकरूपता नहीं थी 1 पादरी और कुलीन लोगों के लिए कानून अलग थे । जनसाधारण के लिए अलग । सेना असंतुष्ट थी । शासन भ्रष्टाचारी हो चुका था।

(iii) आर्थिक कारण-
(क) फ्रांस का राजा और रानी मेरी अन्तोयनेत अत्यन्त खर्चीले थे । राज्यकोष खाली हो गया था ।
(ख) धनी लोग कर्ज से मुक्त थे जन साधारण को हर तरह के कर्ज देने पड़ते थे। अतः विधि दोष पूर्ण थी।
(ग) फ्रांस में 15000 बड़े पदाधिकारी अपार धन वेतन में पाते थे।
(घ) इस प्रकार फ्रांस का खजाना खाली हो गया था।

(iv) बौद्धिक कारण-फ्रांस की स्थिति तो खराब थी ही, परन्तु इस स्थिति को स्पष्ट करने में योगदान दिया फ्रांस के दार्शनिकों ने ।
(क) रूसो अपनी पुस्तक “सामाजिक संविदा” में राजा के दैवी अधिकार पर प्रहार किया।
(ख) वाल्टेयर ने चर्च, समाज और राजतंत्र के दोषों का पर्दाफास किया।
(ग) मांटेस्क्यू ने अपनी पुस्तक ‘विधि का आत्मा’ में सरकार के अंदर विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बीच सत्ता विभाजन की बात कही।

(v) तात्कालिक कारण-इस प्रकार उपर्युक्त कारणों के कारण फ्रांस की क्रान्ति हुई।

प्रश्न 2.
फ्रांस की क्रांति के परिणामों का उल्लेख करें।
उत्तर-
फ्रांस की क्रान्ति के निम्नलिखित परिणाम हुए

  • पुरातन व्यवस्था का अन्त-इस क्रान्ति ने पुरातन व्यवस्था (Anceient Regime) को समाप्त कर दिया । आधुनिक युग का आरम्भ हुआ जिसमें स्वतंत्रता’, ‘समानता’ तथा ‘बन्धुत्व’ को प्रोत्साहन मिला। सामन्तवाद का अंत हो गया।
  • धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना-क्रान्ति के फलस्वरूप धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना हुई। बुद्धिवाद का उदय हुआ और जनता को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई।
  • जनतंत्र की स्थापना-फ्रांस की क्रान्ति ने राजा के दैवी अधिकार के सिद्धान्त को समाप्त कर दिया तथा जनतंत्र की स्थापना की।
  • व्यक्ति की महत्ता-1791 ई० में फ्रांस के नेशनल एसेम्बली ने पहली बार नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की घोषणा की तथा स्वतंत्रता एवं समानता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  • समाजवाद का आरम्भ-फ्रांसीसी क्रान्ति ने समाजवाद का बीजारोपण किया । जैकोबिनों ने बहुसंख्यक गरीबों को अनेक सुविधाएँ दी। अमीरी-गरीबी का भेद मिटाने का प्रयास हुआ। खाद्य-पदार्थों के मूल्य निर्धारित किए गए।
  • वाणिज्य व्यापार में वृद्धि-क्रान्ति के फलस्वरूप गिल्ड प्रथा, प्रान्तिक आयात कर तथा अन्य व्यापारिक प्रतिबंध व्यापारियों पर से हटा दिए गए, जिससे वाणिज्य एवं व्यापार का विकास हुआ । यही कारण था कि उन्नीसवीं शताब्दी में व्यापार के क्षेत्र में फ्रांस इंग्लैण्ड के बाद द्वितीय स्थान पर था।
  • दास प्रथा का उन्मूलन-सन 1794 ई० में कन्वेशन ने ‘दास मुक्ति कानून’ पारित किया । पुनः 1848 ई० में अंतिम रूप में फ्रांसीसी उपनिवेशों से दास प्रथा का अंत हो गया।
  • महिला आन्दोलन-क्रान्ति में महिलाएं भी शामिल हुई थी उन्होंने ‘The society of Revolutionary and Republican women’ नामक संस्था का गठन किया जिसमें ओलम्प दे गूज नामक नेत्री की अहम भूमिका थी। इनके नेतृत्व में महिलाओं को पुरुषों के समान राजनैतिक अधिकार की मांग को स्वीकार लिया गया। आन्दोलन चलता रहा और अन्त में 1946 ई० में महिलाओं को मताधि कार प्राप्त हो गया ।
  • सरकार पर शिक्षा का उत्तरदायित्व-फ्रांस में अभी तक चर्च में शिक्षा का प्रबन्ध था। अब इसकी जिम्मेवारी सरकार पर आ गयी। फलस्वरूप पेरिस विश्वविद्यालय तथा कई शिक्षण संस्थान एवं शोध संस्थान फ्रांस में खोले गए।
  • राष्ट्रीय कैलेंडर भी लागू कर दिया गया जिसका नया नाम ब्रुमेयर, थर्मिडर आदि रखा गया।

प्रश्न 3.
फ्रांस की क्रांति एक मध्यमवर्गीय क्रांति थी, कैसे?
उत्तर-
फ्रांस में सबसे अधिक असंतोष मध्यम वर्ग में था जिसका सबसे बड़ा कारण यह था कि सुयोग्य एवं सम्पन्न होते हुए भी उन्हें कुलीनों जैसा सामाजिक सम्मान प्राप्त नहीं था । सम्पन्नता और उन्नति के बावजूद भी वे सभी तरह के राजनैतिक अधिकारों से वंचित थे । राज्य में सभी बड़े पद कुलीनों के लिए सुरक्षित थे । उनका मानना था कि सामाजिक ओहदे का आधार योग्यता होनी चाहिए, न कि वंश ।

मध्यम वर्ग के साथ कुलीन वर्ग के लोग बहुत बुरा और असमानता का व्यवहार करते थे। यह बात उन्हें बहुत अपमानजनक लगती थी। इसी वजह से फ्रांस की क्रांति का सबसे महत्त्वपूर्ण नारा ‘समानता’ था जिसे मध्यम वर्ग ने आगाज किया। मध्यम वर्ग में शिक्षित वर्ग के लोगों ने तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दोषों को पर्दाफाश किया और जनमानस में आक्रोश पैदा किया । फ्रांसीसी बुद्धिजीवियों ने फ्रांस में बौद्धिक आन्दोलन का सूत्रपात किया । इनमें मांटेस्क्यू, वोल्टेयर और रूसो थे । मांटेस्क्यू ने अपनी पुस्तक ‘विधि की आत्मा’ में सरकार के तीनों अंगों को पृथक-पृथक करने पर बल दिया रूसो । पूर्ण परिवर्तन चाहते थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘सामाजिक संविदा’ में राज्य को व्यक्ति द्वारा निर्मित संस्था और सामान्य इच्छा को संप्रभु माना है। अत: जनतंत्र का समर्थक था।

फ्रांस में क्वेजनों एवं तुर्गो जैसे अर्थशास्त्रियों ने समाज में अधिक शोषण एवं आर्थिक नियंत्रण की आलोचना करते हुए मुक्त व्यापार का
समर्थन किया।

इस प्रकार मध्यमवर्गीय लोगों में राजा एवं कुलीन वर्ग के लोगों के प्रति घृणा की भावना थी जो क्रान्ति का रूप ले लिया। इसीलिए फ्रांस की क्रान्ति को मध्यमवर्गीय क्रान्ति कहा जाता है।

प्रश्न 4.
फ्रांस की क्रांति में वहाँ के दार्शनिकों का क्या योगदान था?
उत्तर-
फ्रांस की क्रान्ति में वहाँ के दार्शनिकों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। फ्रांस में अनेक दार्शनिक हुए जिन्होंने तत्कालीन व्यवस्था पर करारा प्रहार किया। उनमें मांटेस्क्यू, वाल्टेयर और रूसो प्रमुख थे।
(i) मांटेस्क्य-यह उदार विचारों वाला दार्शनिक था । इसने राज्य और चर्च दोनों की कटु आलोचना की वे जानते थे कि जीवन, संपत्ति एवं स्वतंत्रता मानव के जन्मसिद्ध अधिकार है। मॉटेस्क्यू की सबसे बड़ी देन शक्ति के पृथक्करण का सिद्धान्त है। अपनी पुस्तक ‘विधि की आत्मा’ । इसके अनुसार राज्य की शक्तियाँ कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका-एक ही हाथ में केन्द्रित नहीं होनी चाहिए । इस जनता भलीभाँति समझ रही थी। अतः इनके विचार क्रान्ति का कारण था।

(ii) वाल्टेयर-इसने भी चर्च की आलोचना की। अपने क्रान्ति विचारों के कारण वह जाना जाता था। उसका सिद्धन्त था कि राजतंत्र प्रजाहित में होना चाहिए।

(iii) रूसो-रूसो फ्रांस का सबसे बड़ा दार्शनिक था । वह लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था का समर्थक था। अपनी पुस्तक ‘सामाजिक संविदा’ (Social contract) में उसने ‘जनमत’ को ही सर्वशक्तिशाली माना । राज्य जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बनी थी। अत: वह वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट था । रूसो के अनुसार व्यक्ति द्वारा निर्मित संस्था और सामान्य इच्छा को संप्रभु माना । अतः वह जनतंत्र का समर्थक था । रूसा के क्रान्तिकारी विचारों ने फ्रांस में क्रान्ति के विस्फोट के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

(iv) दिदरो-दिदरो के ‘वृहत् ज्ञान कोष’ (eucyclopaedia) के लेखों के द्वारा इसने निरंकुश राजतंत्र, सामंतवाद एवं जनता के शोषण की घोर भर्त्सना की। इसका भी प्रभाव फ्रांसीसी जनता पर खूब पड़ा।

(v) क्वेजनों एवं तुर्गो-इन अर्थशास्त्रियों ने समाज में आर्थिक शोषण एवं आर्थिक नियंत्रण की आलोचना करते हुए मुक्त व्यापार का समर्थन किया।

इन सभी का फ्रांस की जनता पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 5.
फ्रांस की क्रांति की देनों का उल्लेख करें।
उत्तर-
फ्रांस की क्रान्ति 1789 ई० में हुई थी। इस क्रान्ति से न केवल फ्रांस बल्कि संसार के समस्त देश इसके देनों से स्थाई रूप से प्रभावित हुए । वास्तव में इस क्रान्ति के कारण एक नये युग का उदय हुआ। इसके तीन प्रमुख सिद्धान्त समानता, स्वतंत्रता और मातृत्व की भावना पूरे विश्व के लिए अमर वरदान सिद्ध हुए । इन्हीं आधारों पर संसार के अनेक देशों में एक नये समाज की स्थापना का प्रयत्न किया गया । यह महान देन है ।

  •  स्वतंत्रता-स्वतंत्रता फ्रांसीसी क्रान्ति का एक मूल सिद्धान्त था । इस सिद्धान्त से यूरोप के लगभग सभी देश बड़े प्रभावित हुए । फ्रांस में मानव अधिकारों की घोषणा पत्र द्वारा सभी लोगों को उनके अधिकारी से परिचित कराया गया। देश में आर्द्धदोस (Serfdom) का अंत कर दिया गया। इस प्रकार निर्धन किसानों को सामंतों से छुटकारा मिल सका।
  • समानता-सभी के लिए समान कानून बना । वर्ग भेद मिट गया ।
  • लोकतंत्र-फ्रांस की क्रान्ति ने निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी शासन का अंत कर दिया और इसके स्थान पर लोकतंत्रात्मक शासन की स्थापना हुई।
  • दार्शनिक-फ्रांस की क्रान्ति के समय में ही फ्रांस के महान दार्शनिकों की पुस्तकें सामने आईं जैसे मांटेस्क्यू की पुस्तक ‘विधि का आत्मा’ । रूसो की पुस्तक ‘सामाजिक संविदा’ तथा दिदरो केलोस ‘वृहत् ज्ञान कोष’। ये सभी असाधारण पुस्तकें हैं जो क्रान्ति की महान देन है।

प्रश्न 6.
फ्रांस की क्रांति ने यूरोपीय देशों को किस तरह प्रभावित किया।
उत्तर-
फ्रांस की क्रान्ति का विश्वव्यापि प्रभाव पड़ा संसार का कोई भी देश अछूता न रहा । खासकर यूरोप तो इसके व्यापक प्रभाव में आया ।

  • फ्रांस की क्रान्ति की देखा-देखी सामंती व्यवस्था को मिटाने के लिए एवं समानता के सिद्धान्त को लागू करने का प्रयास किया गया ।
  • नेपोलियन ने यूरोपीय राष्ट्रों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत कर दी। इसलिए इटली के भावी एकीकरण की नीव पड़ी।
  • नेपोलियन ने पोलैंड के लोगों के सामने भी एक संयुक्त तस्वीर रखी जो प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पूरी हुई।
  • जर्मनी में कुल 300 राज्य थे । नेपोलियन के प्रयास से 38 राज्य रह गए सबों को मिलाकर एक कर दिया ।
  • द्वितीय ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना में भी फ्रांसीसी क्रान्ति का योगदान था । इससे प्रेरणा लेकर ही इंग्लैण्ड में 1832 ई० का रिफार्म एक्ट (Reform Act) पारित हुआ । इससे संसदीय प्रणाली में सुधार हुआ ।

प्रश्न 7.
‘फ्रांस की क्रांति एक युगान्तकारी घटना थी’ इस कथन की पुष्टि
करें।
उत्तर-
सन् 1789 की फ्रांस की क्रांन्ति यूरोप के इतिहास में एक युगान्तकारी घटना थी, जिसने एक युग का अंत और दूसरे युग के आगमन का मार्ग प्रशस्त किया और दूसरे युग के आगमन का मार्ग प्रशस्त किया । सन 1789 के पूर्व फ्रांस में जो स्थिति व्याप्त थी उसे प्राचीन राजतंत्र के नाम से जाना जाता है इस समय सामन्ती व्यवस्था थी। समाज तीन वर्गों में विभाजित था

(i) कुलीन वर्ग (ii) पादरी वर्ग (iii) साधारण वर्ग । इसमें प्रथम और द्वितीय वर्ग को किसी प्रकार के टैक्स नहीं देने पड़ते थे। राजा स्वेच्छाचारी था । फ्रांस में प्रतिनिधि संस्थाओं का सर्वथा अभाव था। यद्यपि स्टेट्स जेनरल नामक प्रतिनिधि सभा थी तथापि 1614 के बाद इसकी बैठक ही नहीं हुई थी।

राज्य में कानूनी एकरूपता का अभाव था । राजा की इच्छा ही कानून थी राजा कहता था ‘मैं ही राज्य हूँ’ राजा की इच्छा को चुनौती नहीं दी जा सकती थी। राजा और कुलीन वर्ग ऐश-आराम की जिंदगी व्यतीत करते थे। चर्च भी राज्य में एक प्रभावशाली संस्था थी। 90 प्रतिशत जनता किसान थी जो विभिन्न प्रकार के कर से परेशान थी महँगाई की मार से ‘जीविका का संकट’ का उत्पन्न हो गया था।

उधर गिल्ड (व्यापारिक संगठन) प्रान्तीय क्रान्ति कानून अवाध रूप से व्यापार की प्रगति नहीं होने देते थे। इस तरह फ्रांस की पुरातन व्यवस्था को समाप्त कर स्वतंत्र विचार करने वाले समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया । चूँकि फ्रांस ने इस युद्ध में ब्रिटेन के खिलाफ अमेरिका की. मदद की थी, अत: अमेरिका के बाद स्वतंत्रता की लहर फ्रांस में आई जो यूरोप के इतिहास में एक युगान्तकारी घटना कहलाई।

प्रश्न 8.
फ्रांस की क्रांति के लिए लुई सोलहवाँ किस तरह उत्तरदायी था?
उत्तर-
लुई चौदहवाँ के बाद फ्रांस की गद्दी पर लुई सोलहवाँ गद्दी पर बैठा, जो अयोग्य और निरंकुश था । फ्रांस की क्रान्ति के लिए निम्नलिखित बातों के कारण उत्तरदायी था
(i) निरंकुश राजशाही-फ्रांस की क्रान्ति के समय में लुई सोलहवाँ गद्दी पर था । राजा के हाथों में सारी शक्ति केन्द्रित थी लुई सोलहवाँ का कहना था कि ‘मेरी इच्छा ही कानून है।’ इस व्यवस्था में राजा की आज्ञा नहीं मानना एक अपराध था। फ्रांस में राजा की निरंकुशता को नियंत्रित करने के लिए ‘पार्लमा’ नामक एक संस्था थी। यह एक प्रकार का न्यायालय था । इसमें केवल कुलीन वर्ग वाले ही न्यायाधीश थे। जो राजा का ही सर्मथन करती थी।

(ii) मेरी अन्तोयनेत का प्रभाव-लुई सोलहवाँकी पत्नी मेरी अन्तोयनेन थी जो फिजूलखर्ची के लिए प्रसिद्ध थी। यह उत्सवों में काफी रुपये लुटाती थी, और अपने खास आदमियों को ओहदे दिलाने के लिए राजकार्य में दखल देती रहती थी। रानी निर्ममतापूर्वक अपने भोग विलास पर खर्च करती थी।

(iii) प्रशासनिक भ्रष्टाचार-राजा के सलाहकार और अधिकारी भ्रष्ट थे । राजा के वर्साय स्थित राजा महल में पन्द्रह हजार अधिकारी एसे थे जो को भी काम नहीं करते थे, मगर अपार धन राशि वेतन के रूप में लेते थे । राजस्व का 1 प्रतिशत इन्हीं पर व्यय होता था । इससे प्रशासन पर बुरा प्रभाव पड़ा।

(iv) स्वायत्त शासन का अभाव-इसका सर्वथा अभाव था । फ्रांस में हर जगह वर्साय के राजमहल की ही प्रधानता थी। राजा के अलावे मेरी अन्तोयनेत के द्वारा शासन का दुरुपयोग किया जाता था, जिससे जन साधारण की धारणाएँ राजतंत्र के बिलकुल खिलाफ हो गयी।
इसे हर तरफ से देखने से पता चलता है कि लुई सोलहवाँ एक मात्र दोषी थी। अतः 1789 ई० तक आते-आते जन साधारण शासन में भाग लेने के लिए उतावला होने लगे।

प्रश्न 9.
फ्रांस की क्रांति में जैकोबिन दल का क्या भूमिका थी?
उत्तर-
सन् 1791 ई० में नेशनल एसेम्बली ने संविधान का प्रारूप तैयार किया। इसमें शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त को अपनाया गया। यद्यपि लुई सोलहवाँ ने इस सिद्धान्त को मान लिया, परन्तु मिराव्या की मृत्यु के बाद देश में हिंसात्मक विद्रोह की शुरुआत हो गयी। इसमें समानता के सिद्धान्त की अवहेलना की गई बहुसंख्यकों को मतदान से वंचित रखा गया था सिर्फ धनी लोगों को ही यह अधिकार दिया गया । इस तरह बुर्जुआ वर्ग का प्रभाव बढ़ा इस बढ़ते असंतोष की अभिव्यक्ति नागरिक राजनीतिक क्लबों में जमा होकर करते थे। इन लोगों ने अपना एक दल बनाया जो ‘जैकोबिन दल’ कहलाया इन लोगों ने अपने मिलने का स्थान पेरिस के ‘कॉन्वेंट ऑफ सेंट जेक्ब’ को बनाया । यह आगे चलकर ‘जैकोबिन क्लब’ के नाम से जाना जाने लगा। इस क्लब के सदस्य थे-छोटे दुकानदार, कारीगर, मजदूर आदि । इसका नेता मैक्स मिलियन रॉब्सपियर था। इसने 1792 ई० में खाद्यानों की कमी एवं महंगाई को मुद्दा बनाकर जगह-जगह विद्रोह करवाए ।

जैकोबिन के कार्य-रॉब्सपियर वामपंथी विचारधारा का समर्थक था। इसने आंतक का राज्य स्थापित किया चौदह महीने में लगभग 17 हजार व्यक्तियों पर मुकदमे चलाये गए और उनहें फाँसी दे दी गई।

प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का पोषक रॉब्सपियर प्रजातंत्र का पोषक था । 21 वर्ष से अधिक उम्र वालों को मतदान का अधिकार देकर, चाहे उनके पास सम्पत्ति हो या न हो, चुनाव कराया गया । 21 सितम्बर, 1792 ई० को नव निर्वाचित एसेम्बली को कन्वेंशन नाम दिया गया तथा राजा की सत्ता को समाप्त कर दिया गया । देशद्रोह के अपराध में लुई सोलहवाँ पर मुकदमा चलाया गया और 21 जनवरी, 1793 ई० को उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया।

रॉब्सपियर का अंत-रॉब्सपियर का आतंक राज्य 1793 ई० तक उत्कर्ष पर था । राष्ट्र का कलेन्डर 22 सितम्बर, 1792 को लागू किया गया । इन सभी को रॉब्सपीयर ने सर्वोच्च सता की प्रतिष्ठा के रूप में स्थापित किया लेकिन सभी अस्थाई सिद्ध हुए । उनकी हिंसात्मक कार्रवाइयों की वजह से विशेष न्यायालय ने जुलाई 27, 1794 को उसे मृत्यु दंड दिया गया । इस तरह ‘जैकोबिन का फ्रांस की क्रान्ति पर प्रभाव देखने को मिलता है।

प्रश्न 10.
नेशनल एसेम्बली और नेशनल कन्वेंशन ने फ्रांस के लिए कौन-कौन से सुधार पारित किए ?
उत्तर-
(क) नेशनल एसेम्बली द्वारा किये गए सुधार इस प्रकार हैं-14 जुलाई, सन् 1789 के बाद लुई सोलहवाँ नाम मात्र का राजा रह गया और नेशनल एसेम्बली देश के लिए अधिनियम बनाने लगी।

  • 21 अगस्त, 1789 को ‘मानव और नागरिकों के अधिकार’ (The Declaration of the rights of Man and citizen) की स्वीकार कर लिया । इस घोषणा से प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार प्रकट करने और अपनी इच्छानुसार धर्मपालन करने के अधिकार का मान्यता मिली।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ प्रेस पक्ष भाषण की स्वतंत्रता भी मानी गयी।
  • संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना-एक संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई। अब राज्य में किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाये गिरफ्तार नहीं कर सकते थे, तथा मुआवजा दिए बिना उसके जमीन पर कब्जा नहीं कर सकते थे।
  • निजी सम्पत्ति का अधिकार-सभी नागरिकों को निजी सम्पत्ति रखने का अधिकार दिया गया ।
  • शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त को अपनाया गया। ये सभी घोषणाएँ अत्यधिक महत्वपूर्ण थी।
    (ख)नेशनल कन्वेंशन द्वारा किये गए सुधार-21 सितम्बर, 1792 को नव निर्वाचित एसेम्बली को कन्वेंशन नाम दिया गया। इस कन्वेंशन ने निम्नलिखित सुविधाएँ प्रदान की।
  • मतदान का अधिकार-21 वर्ष से अधिक उम्र वालों को मतदान का अधिकार मिला । चाहे उसके पास सम्पति हो या न हो।
  • गणतंत्र की स्थापना-कन्वेंशन का प्रमुख कार्य राजतंत्र का अंत कर फ्रांस में गणतंत्र की स्थापना करना । यह कार्य प्रथम अधिवेशन के पहले ही पूरा कर दिया गया ।

Bihar Board Class 9 Economics Solutions Chapter 1 बिहार के एक गाँव की कहानी

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Economics अर्थशास्त्र : हमारी अर्थव्यवस्था भाग 1 Chapter 1 बिहार के एक गाँव की कहानी Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Economics Solutions Chapter 1 बिहार के एक गाँव की कहानी

Bihar Board Class 9 Economics बिहार के एक गाँव की कहानी Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

निर्देश : नीचे दिये गये प्रश्न में चार संकेत चिह्न हैं जिनमें एक सही या सबसे उपयुक्त हैं । प्रश्नों का उत्तर देने के लिए प्रश्न संख्या के सामने वह संकेत चिह्न (क, ख, ग, घ) लिखें जो सही अथवा सबसे उपयुक्त हों।

Bihar Board Class 9 Economics Solution प्रश्न 1.
उत्पादन के प्रमुख साधन कितने हैं ?
(क) तीन
(ख) चार
(ग) पाँच
(घ) दो
उत्तर-
(ग) पाँच

Bihar Board Class 9th Economics Solution प्रश्न 2.
उत्पादन का अर्थ
(क) नयी वस्तु का सृजन
(ख) उपयोगिता का सृजन
(ग) उपयोगिता का नाश
(घ) लाभदायक होना
उत्तर-
(ख) उपयोगिता का सृजन

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 3.
उत्पादन का निष्क्रिय साधन है ?
(क) श्रम
(ख) संगठन
(ग) साहसी
(घ) भूमि
उत्तर-
(घ) भूमि

Bihar Board Solution Class 9 Economics प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से भूमि की विशेषता कौन-सी है ? .
(क) वह नाशवान है
(ख) वह मनुष्य निर्मित है
(ग) उसमें गतिशीलता का अभाव है।
(घ)उसमें समान उर्वरता है
उत्तर-
(क) वह नाशवान है

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र में भूमि का तात्पर्य क्या है ?
(क) प्रकृति प्रदत्त सभी नि:शुल्क वस्तुएँ
(ख) जमीन की ऊपरी सतह
(ग) जमीन की निचली सतह
(घ) केवल खनिज सम्पत्ति
उत्तर-
(क) प्रकृति प्रदत्त सभी नि:शुल्क वस्तुएँ

Bihar Board 9th Class Social Science Book Pdf प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन उत्पादक है ?
(क) बढ़ई
(ख) भिखारी
(ग) ठग
(घ) शराबी
उत्तर-
(क) बढ़ई

Bihar Board Class 9 Economics Notes प्रश्न 7.
उत्पादन का साधन है
(क) वितरण
(ख) श्रम
(ग) विनिमय
(घ) उपभोग
उत्तर-
(ख) श्रम

अर्थशास्त्र कक्षा 9 Chapter 1 Solution प्रश्न 8.
निम्नलिखित में कौन उत्पादन का साधन नहीं है ?
(क) संगठन
(ख) उद्यम
(ग) पूँजी
(घ) उपभोग
उत्तर-
(घ) उपभोग

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन पूँजी है ?
(क) फटा हुआ वस्त्र ।
(ख) बिना व्यवहार में लायी जाने वाली मशीन ।
(ग) किसान का हल ।
(घ) घर के बाहर पड़ा पत्थर ।
उत्तर-
(ग) किसान का हल ।

Bihar Board Class 9 Civics Solution प्रश्न 10.
जो व्यक्ति व्यवसाय में जोखिम का वहन करता है, उसे कहते हैं ?
(क) व्यवस्थापक
(ख) पूँजीपति
(ग) साहसी
(घ) संचालक मंडल
उत्तर-
(ग) साहसी

Bihar Board Class 9 Social Science Solution In Hindi प्रश्न 11.
निम्नलिखित में कौन श्रम के अन्तर्गत आता है ?
(क) सिनेमा देखना
(ख) छात्र द्वारा मनोरंजन के लिए क्रिकेट खेलना
(ग) शिक्षक द्वारा अध्यापन
(घ) संगीत का अभ्यास आनन्द के लिए करना
उत्तर-
(ग) शिक्षक द्वारा अध्यापन

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

1. श्रम को उत्पादन का ………………….. साधन कहा जाता है।
2. शिक्षक के कार्य को ………………….. श्रम कहा जाता है ।
3. ……. अर्थव्यवस्था के भौतिक अथवा पूँजीगत साधन है ।
4. सभ्यता के विकास के साथ ही मनुष्य की …………. बहुत बढ़ गई है।
5. वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन विभिन्न साधनों के ………………… से होता है।
6. उत्पादन की नयी तकनीक की वजह से उत्पादन क्षमता में अपेक्षाकृत……….होती है।
उत्तर-
1. सक्रिय
2. मानसिक
3. मशीन एवं यंत्र
4. आवश्यकताएँ
5. सहयोग
6. वृद्धि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

Bihar Board Class 9th Social Science Solution प्रश्न 1.
उत्पादन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
उत्पादन का अर्थ उपयोगिता का सृजन करना है।

Bihar Board Class 9 History Chapter 1 प्रश्न 2.
उत्पादन तथा उपभोग में अन्तर कीजिए।
उत्तर-
उत्पादन में उपयोगिता का सृजन होता है लेकिन उपभोग में उत्पादित वस्तुओं का प्रत्यक्ष रूप से मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए उपयोग होता है।

अर्थशास्त्र कक्षा 9 Chapter 1 Question Answer प्रश्न 3.
उत्पादन के विभिन्न साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर-
उत्पादन के विभिन्न साधन हैं-भूमि, पूँजी, श्रम, संगठन और उद्यम या साहस ।

Bihar Board 9th Class Social Science Book प्रश्न 4.
फतेहपुर गाँव के लोगों का मुख्य पेशा क्या है ?
उत्तर-
मुख्य पेशा कृषि है।

Economics Class 9 Chapter 1 Question Answer In Hindi प्रश्न 5.
भूमि तथा पूँजी में अन्तर करें।
उत्तर-
प्रकृति प्रदत्त यथा पहाड़, नदी, जंगल, सागर सभी भूमि हैं पर प्रकृति प्रदत वस्तुओं को छोड़कर जिससे आय प्राप्त होती है वह पूँजी है।

प्रश्न 6.
क्या सिंचित क्षेत्र को बढ़ाना महत्वपूर्ण है क्यों ?
उत्तर-
सिंचित क्षेत्र को बढ़ाना महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की कृषि मानसून पर आश्रित है जो एक जुआ का खेल है।

प्रश्न 7.
उत्पादन में पूँजी का क्या महत्व है ?
उत्तर-
बिना पूँजी के किसी भी वस्तु या सेवाओं का उत्पादन कर पाना संभव नहीं है । जैसे-बीज के बिना फ़सल का उत्पादन संभव नहीं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्पादन की परिभाषा दीजिए । उत्पादन के कौन-कौन से साधन हैं ? व्याख्या करें।
उत्तर-
अर्थशास्त्र में उत्पादन का अर्थ उपयोगिता का सृजन करना है। जैसे-जब एक बढ़ई लकड़ी को काट-छाँट कर उससे टेबुल चा कुर्सी बनाता है, तब लकड़ी की उपयोगिता बढ़ जाती है, यही उत्पादन है। .
उत्पादन के साधन-

  • भूमि-प्रकृति प्रदत्त सारे मुफ्त उपहार जैसे-नदी, सागर, हवा, धूप खनिज़ आदि सभी भूमि हैं।
  • श्रम-श्रम का मतलब मनुष्य के आर्थिक कार्य से है चाहे वह हाथ से किया जाय या मस्तिष्क से । यह एक सक्रिय साधन है।
  • पूँजी-प्रकृति की निःशुल्क देन को छोड़कर वह सब सम्पत्ति जिससे आय प्राप्त होती है, पूँजी कहलाती है। जैसे-किसान के लिए बीज, कारखानों में कच्चा माल, मशीन आदि।
  • संगठन-उत्पादन का सक्रिय साधन है । विभिन्न साधनों को एकत्रित कर उन्हें उत्पादन में लगाने की क्रिया व्यवस्था या संगठन है।
  • साहस-उत्पादन में जोखिम उठाने के कार्य को साहस कहते हैं और जो व्यक्ति इसे करता है उसे साहंसी कहते हैं जैसे-कारखाने का मालिक ।

प्रश्न 2.
उत्पादन के साधनों में संगठन एवं-साहस की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर-
उत्पादन के साधनों में संगठन एवं साहसी की अहम भूमिका है। क्योंकि भूमि, श्रम तथा पूँजी के होते हुए भी समुचित संगठन और साहसी के बिना उत्पादन संभव नहीं है। पहले संगठन पर विचार करें-भूमि, श्रम तथा पूँजी को एकत्रित कर संगठनकर्ता उसे व्यवस्थित ढंग से उपयोग करता है और उत्पादन का कार्य होता है । इसीलिए संगठन को उत्पादन प्रक्रिया का एक सक्रिय साधन माना गया है।

उत्पादन का कार्य जोखिम भरा हुआ होता है । उत्पादन में लाभ होगा या हानि एक साहसी ऐसा नहीं सोचता है यदि उत्पादन में लगातार घाटा ही होता रहे तो साहसी उत्पादन करने का साहस नहीं छोड़ेगा। साहसी सोच समझकर उत्पादन में पूँजी लगाता है।

प्रश्न 3.
फतेहपुर गाँव में कृषि कार्यों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
फतेहपुर गाँव में खेती ही मुख्य क्रिया है। अन्य कार्यों में पशुपालन, मुर्गी पालन, डेयरी, दुकानदारी. आदि क्रियाएँ हैं । गाँव में अधि कांश लोग भू-स्वामी हैं। इनमें से कुछ बड़े परिवार के हैं जो कृषि कार्य मजदूर किसानों से बातें करवाते हैं । गाँवों में नलकूप भी हैं। नलकूपों से सिंचाई का कार्य होता है। चूँकि फतेहपुर गाँव पटना शहर से बिलकुल , नजदीक है इसलिए कृषि संत आधुनिक यंत्रों का प्रयोग कर अच्छा उत्पादन करता है। पर्याप्त पत्रा या यों कहें कि अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्नों का उ दन करते हैं तभी तो वे बैल गाड़ियों और ट्रैक्टरों में अनाजों को भरकर विक्रय हेतु बाजार में ले जाते हैं । जो पाठ्यपुस्तक में अंकित चित्र से पता चलता है।

प्रश्न 4.
मंझोले एवं बड़े किसान कृषि से कैसे पूँजी प्राप्त करते हैं ? वे छोटे किसानों से कैसे भिन्न हैं ?
उत्तर-
मंझोले एवं बड़े किसानों के पास अधिक भूमि होती है अर्थात् उनकी जोतों का आकार काफी बड़ा होता है जिससे वे उत्पादन अधिक करते हैं। उत्पादन अधिक होने से वे इसे बाजार में बेच कर काफी पूँजी जमा करते हैं जिसका प्रयोग वे उत्पादन की आधुनिक विधियों में करते हैं । इनकी पूँजी छोटे किसानों से भिन्न होती हैं क्योंकि छोटे किसानों के पास भूमि कम होने के कारण उत्पादन उनके भरण-पोषण के लिए भी कम पड़ता हैं । उन्हें भूमि में अधिकार प्राप्त नहीं होने के कारण बचत नहीं होती इसलिए खेती के लिए उन्हें पूँजी बड़े किसानों या साहकारों से उधार लेना होता है जिस पर उन्हें व्याज भी चुकाना पड़ता है।

Bihar Board Class 9 History Solutions Chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions History इतिहास : इतिहास की दुनिया भाग 1 Chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science History Solutions Chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम

Bihar Board Class 9 History अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
अमेरिका की राजधानी कहाँ है ?
(क) न्यूयार्क
(ख) कैलिफोर्निया
(ग) वाशिंगटन
(घ) कोई नहीं
उत्तर-
(ग) वाशिंगटन

अमेरिका की क्रांति के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 2.
‘कामनसेंस’ की रचना किसने की थी?
(क) जैफर्सन
(ख) टॉमस पेन
(ग) वाशिंगटन
(घ) लफायते
उत्तर-
(ख) टॉमस पेन

Bihar Board Class 9 History Chapter 2 प्रश्न 3.
स्टांप एक्ट किस वर्ष पारित हुआ था ?
(क) 1765
(ख) 1764
(ग) 1766
(घ) 1767 ।
उत्तर-
(क) 1765

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 4.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों का सेनापति कौन था?
(क) वाशिंगटन
(ख) वेलेजली
(ग) कार्नवालिस
(घ) कर्जन
उत्तर-
(ग) कार्नवालिस

Bihar Board Class 9th History Solution प्रश्न 5.
अमेरिकी संविधान कब लागू हुआ?
(क) 1787
(ख) 1789
(ग) 1791
(घ) 1793
उत्तर-
(ख) 1789

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 6.
विश्व में प्रथम लिखित संविधान किस देश में लागू हुआ?
(क) इंग्लैण्ड
(ख) फ्रांस
(ग) अमेरिका
(घ) स्पेन
उत्तर-
(ग) अमेरिका

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम Bihar Board प्रश्न 7.
किस संधि के द्वारा अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम को मान्यता मिली?
(क) पेरिस की संधि
(ख) विलाफ्रका की संधि
(ग) न्यूली की संधि
(घ) सेब्रे की संधि
उत्तर-
(क) पेरिस की संधि

Bihar Board Solution Class 9 History प्रश्न 8.
अमेरिकी स्वतंत्रता में अमेरिका का सेनापति कौन था?
(क) ग्रेनविले
(ख) जैफर्सन
(ग) लफाएते
(घ) वाशिंगटन
उत्तर-
(घ) वाशिंगटन

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 9.
अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति कौन थे?
(क) जार्ज वाशिंगटन
(ख) अब्राहम लिंकन
(ग) रूजवेल्ट
(घ) अलगोर
उत्तर-
(क) जार्ज वाशिंगटन

Bihar Board Class 9 History Solution प्रश्न 10.
सप्तवर्षीय युद्ध किन दो देशों के बीच हुआ था?
(क) ब्रिटेन-अमेरिका
(ख) फ्रांस-कनाडा
(ग) ब्रिटेन-फ्रांस
(घ) अमेरिका-कनाडा
उत्तर-
(ग) ब्रिटेन-फ्रांस

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

1. लैसेज फेयर का सिद्धांत ……………. ने दिया थान
2. शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत …………… ने दिया था।
3. सेनापति लफाएते …………… का रहने वाला था।
4. जार्ज तृतीय इंग्लैण्ड का …………… था।
5. धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना, सर्वप्रथम …………… में हुई।
6. नई दुनिया (अमेरिका) का पता …………… ने लगाया था।
7. अमेरिका में अंग्रेजों के …………… उपनिवेश थे।
8. सर्वप्रथम आधुनिक गणतंत्रात्मक शासन की स्थापना ………. में हुई ।
9. अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का तात्कालिक कारण …………… था ।
10. ‘राइट्स ऑफ मैन’ की रचना …………… ने की थी।
उत्तर-
1. एडमस्मिथ,
2. माँटेस्क्यू,
3. फ्रांस,
4. शासक,
5. अमेरिका,
6. कोलम्बस,
7. 13,
8. अमेरिका,
9. बोस्टन की टी पार्टी,
10. टामॅस जेफर्सन ।

सही और गलत :

प्रश्न 1.
जार्ज वाशिंगटन अमेरिका के प्रथम प्रधानमंत्री थे।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
अमेरिका यूरोप महादेश में स्थित है।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 3.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वाधीनता के पुत्र एवं पुत्री नामक संगठन का निर्माण हुआ था।
उत्तर-
सही

प्रश्न 4.
अमेरिका की खोज कोलम्बस ने नहीं किया था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 5.
अमेरिका स्वतंत्रता संग्राम में फ्रांस ने इंग्लैण्ड का साथ दिया था ।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 6.
अमेरिका स्वतंत्रता का घोषणा पत्र जैफर्सन ने तैयार किया था।
उत्तर-
सही

प्रश्न 7.
स्टांप एक्ट ग्रेनविले के समय पारित हुआ था।
उत्तर-
सही

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
(i) गणतंत्र (ii) मौलिक अधिकार (iii) मताधिकार (iv) उपनिवेश (v) राजतंत्र
उत्तर-
(i) गणतंत्र-जनता का शासन जनता के लिए जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ।
(ii) मौलिक अधिकार-संविधान द्वारा देश के नागरिकों को दिया गया अधिकार ।
(iii) मताधिकार-प्रत्येक वयस्क को शासन के प्रतिनिधि चुनने का मताधिकार प्राप्त है।
(iv) उपनिवेश-शक्ति सम्पन्न देशों द्वारा कमजोर देशों के भू-भाग पर बस जाना।
(v) राजतंत्र-राजा द्वारा शासित राज्य को राजतंत्र कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमेरिका,या नई दुनिया की खोज क्यों हुई?
उत्तर-
अमेरिका या नई दुनिया की खोज स्पेन की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इससे यूरोप और अमेरिका के बीच समुद्री यात्रा को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 2.
नई दुनिया को खोज इंग्लैण्ड के लिए वरदान साबित हुआ कैसे ?
उत्तर-
नई दुनिया की खोज के कारण इंग्लैण्ड ने अपने 13 उपनिवेश स्थापित कर लिए । इनका प्रशासन इंग्लैण्ड में प्रचलित प्रशासनिक-व्यवस्था के अनुरूप होता था। इसने अमेरिका का भरपूर दोहन किया जिससे उनकी आर्थिक स्थिति समृद्ध होती गई।

प्रश्न 3.
मुक्त व्यापार के सिद्धांत ने उपनिवेशवासियों को क्रांति के लिए प्रेरित किया कैसे?
उत्तर-
उपनिवेशवाद का बुनियादी सिद्धान्त उपनिवेशियों के आर्थिक शोषण एवं उनके संसाधनों का दोहन करना था। इसी के विरोध में मुक्त व्यापार की धारणा विकसित हो रही थी जिसमें राज्य द्वारा व्यापार को नियंत्रित करने का विरोध किया गया था। इस सिद्धान्त के अनुसार उपनिवेशवासी अपने व्यापार एवं अन्य क्रिया-कलापों में इंग्लैण्ड के हस्तक्षेप को नापसंद करते थे। इसी ने उपनिवेशवासियों को क्रान्ति के लिए प्रेरित किया।

प्रश्न 4.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम ने फ्रांस पर भी प्रभाव डाला है- कैसे ?
उत्तर-
अमेरिकी स्वतंत्रा संग्राम ने फ्रांस पर भी प्रभाव डाला है । इस संग्राम में लफायते के नेतृत्व में फ्रांसीसी सैनिकों ने भी भाग लिया था। युद्ध के बाद जब वे अपने देश लौटे तब उन्होंने वहाँ की जनता को निरंकुश राजतंत्र के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया और दूसरी ओर फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई।

प्रश्न 5.
क्या अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के परिणामों ने औपनिवेशिक विश्व को प्रभावित किया?
उत्तर-
हाँ, प्रभावित किया । अब सभी उपनिवेश अपनी-अपनी स्वतंत्रता की प्राप्ति तथा अपनी आजादी के लिए व्यग्र हो उठे । यह एक ऐसा विद्रोह था जिसने उपनिवेशवासियों में नव चेतना का संचार किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के तीन प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसके निम्नलिखित कारण थे

(i) उपनिवेशों में राजनीतिक स्वायत्तता का अभाव-अमेरिकी उपनिवेशों में अधिकतर अंगरेज लोग थे जिन्होंने इंग्लैण्ड की संसदीय व्यवस्था एवं विधि-विधान को देखा था। अतः वे अपने उपनिवेश में भी उसी तरह की प्रजातांत्रिक व्यवस्था एवं विधि-विधान चाहते थे । उपनिवेशों के गवर्नर इंग्लैण्ड के राजा के द्वारा मनोनित किए जाते थे, जो उदार नहीं होते थे। अतः संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी। उपनिवेशवासियों को शासन के योग्य नहीं माना जाता था इसलिए इनमें भारी असंतोष था।

(ii) सप्तवर्षीय युद्ध का प्रभाव-सप्तवर्षीय युद्ध इंग्लैण्ड एवं फ्रांस में 1756 ई० से 1763 ई० के बीच हुआ था। इस युद्ध से पूर्व तक उपनिवेशवासी इंग्लैण्ड से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे क्योंकि वे कनाडा में फ्रांसीसियों के विरूद्ध अकेले अपनी रक्षा करने में असमर्थ थे। लेकिन इस युद्ध में फ्रांस की पराजय के साथ ही यह भय समाप्त हो गया । अब उपनिवेशवासियों का एक मात्र लक्ष्य इंग्लैण्ड को बेदखल करना था। प्रो० पोलार्ड ने कहा था-“फ्रांस की पराजय ने अमेरिकावासियों की स्वतंत्रता की इच्छा को भड़काया”।

(iii) बोस्टन की चाय पार्टी-1773 ई० में चाय कानून द्वारा कंपनी के चाय से लदे जहाज अमेरिका के बोस्टन बन्दरगाह पर पहुँचे । उपनिवेशवासी सरकार द्वारा चाय पर कर लगाए जाने से क्रुद्ध थे। अतः वहाँ के नागरिकों ने रेड इंडियन के वेश में चाय की पेटियाँ समुद्र में फेंक दी। यह घटना बोस्टन की चाय पार्टी के नाम से विख्यात है। ब्रिटिश सरकार ने बन्दरगाह पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिया । इस तरह अमेरिकी उपनिवेश को विद्रोह की आग में धकेल दिया।

प्रश्न 2.
लोकतांत्रिक स्तर पर अमेरिकी संग्राम ने विश्व को कैसे प्रभावित . किया है ?
उत्तर-
अमेरिकी संग्राम का प्रभाव न केवल 13 उपनिवेशों पर पड़ा, बल्कि विश्व स्तर पर प्रभाव डाला।

लोकतांत्रिक स्तर पर इसका प्रभाव :

(i) एक नये राष्ट्र का उदय-13 उपनिवेशों ने आपस में मिलकर सेयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना की । विश्व के मानचित्र पर नए राष्ट्र का उदय हुआ । नए राष्ट्र के लिए 1787 में नया संविधान बना इसे 1789. ई० में लागू किया गया। इसने गणतंत्रात्मक व्यवस्था अपनाई ।
अमेरिका में ही पहली बार लिखित संविधान लागू किया गया धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना भी पहली बार यहीं हुई।

(ii) प्रथम जनतंत्र की स्थापना-संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का पहला राष्ट्र बना जिसने प्रचलित राजतंत्रात्मक-व्यवस्था के स्थान पर जनतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था को अपनाया। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी जार्ज वाशिंगटन को अमेरिका का प्रथम निर्वाचित राष्ट्रपति बनाया गया।
इस प्रकार लोकतांत्रिक स्तर पर विश्व भर में यह प्रभाव पड़ा, अन्य उपनिवेश भी अपनी स्वतंत्रता की कल्पना करने लगे ।

प्रश्न 3.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के परिणामों की आलोचनात्मक परीक्षण करें।
उत्तर-
अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है । पहली बार 13 उपनिवेशों ने ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ राष्ट्र का निर्माण किया। अमेरिका पहला राष्ट्र बना जहाँ गणतंत्रात्मक व्यवस्था अपनाई गई । अमेरिका में ही पहली बार लिखित संविधान लागू किया गया। धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना भी पहली बार यहीं हुई । अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा लेकर अनेक राष्ट्रों में क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठीं।

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से समाज पर भी प्रभाव पड़ा । स्वतंत्रता संग्राम ने अमेरिकी समाज पर प्रभाव डाला । नई परिस्थिति में ब्रिटेन के राज भक्तों को अमेरिका छोड़कर पड़ोसी राष्ट्र कनाडा जाने को विवश होना पड़ा । केवल गणतंत्रात्मक विचार धारा से प्रभावित लोग ही अमेरिका में रह गए । युद्ध में प्रमुखता से भाग लेने के कारण स्त्रियों का समाज  में सम्मान बढ़ा इसलिए उनके नागरिक और आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा की व्यवस्था की गई।

प्रश्न 4.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के पराजय के क्या कारण थे ?
उत्तर-
अंग्रेजों के पराज्य के निम्नलिखित कारण थे :

  • इंग्लैण्ड की दूरी-अमेरिकी उपनिवेश अटलांटिक महासागर के पार 3000 मील की दूरी पर था। इससे युद्ध के सामान और रसद पहुँचाने में कठिनाई होती थी। दूसरी ओर अमेरिका की भौगोलिक स्थिति से भी अंग्रेज सैनिक अपरिचित थे ।
  • अमेरिका की शक्ति को नजरअंदाज किया गया एवं अधिकांश __ अंग्रेज इसे गृहयुद्ध ही समझते रहे ।
  • उपनिवेशवासियों में उत्साह था । वे स्वतंत्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार थे।
  • ब्रिटिश सेनापतियों ने कुछ सामरिक भूले की।
  • ब्रिटिश राजनेताओं के बीच गंभीर मतभेद था। जार्ज तृतीय की हठधर्मिता की नीति के कारण योग्य एवं अनुभवी नेता सरकार से अलग रहे।
  • इंग्लैण्ड का अकेले युद्ध लड़ना-यह इंग्लैण्ड की पराजय का मुख्य कारण था। उसे अन्य देशों का सहयोग नहीं मिल सका। जबकि अमरिकी उपनिवेशों को विदेशी सहायता प्राप्त हुई विशेषकर फ्रांस से । इसने धन और सेवा से काफी मदद पहुँचाई।
  • जार्ज वाशिंगटन जैसा सुयोग्य सेना नायक मिल गया जिसने बड़े धैर्य, साहस एवं कुशलता के साथ अंग्रेजी सेना को पराजित किया।

Bihar Board Class 9 English Book Solutions Chapter 2 Yayati

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Bihar Board Class 9 English Yayati Text Book Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss the following:

Yayati Class 9 Questions And Answers Bihar Board Question 1.
Which is the golden period of life – childhood, youth or old age? Give reasons for your choice?
Answer:
I consider youth as the golden period of life. This is the period when a man works for himself or for the country. In this stage, a person assumes the role of a lover. He is passionately in love with his beloved. He is sad when he is separated from his darling. He heaves sighs like the bellows of a furnace. He sings sorrowful songs composed in the praise of the beauty of his beloved. At this stage, he acts like a soldier. He has learnt many swearing terms. His beard is like that of a leopard. He saves the honour of his country at the risk of his life. He fights in the article. He tries to earn fame how so ever short-lived by jumping before the mouth of a firing cannon. So this is the age for doing something. For example, Alexander the great who died at the age of 32 only. Napolian, J. C. Bose, they all did at his youth.

Yayati Question Answer Bihar Board Question 2.
Why does the man want to remain always young?
Answer:
A man always wants to be young, because this is the age when one can enjoy this life in various ways. I consider youth as the golden period of life. This is the period when a man works for himself or for the country. In this stage, a person assumes the role of a lover. He is passionately in love with his beloved. He is sad when he is separated from his darling. He heaves sighs like the bellows of a furnace. He sings sorrowful songs composed in the praise of the beauty of his beloved. At this stage, he acts like a soldier. He has learnt many swearing terms. His beard is like that of a leopard. He saves the honour of his country at the risk of his life. He fights in the article. He tries to earn fame how so ever short-lived by jumping before the mouth of a firing cannon. So this is the age for doing something. For example, Alexander the great who died at the age of 32 only. Napolian, J.C. Bose, they all did at his youth.

B. 1.1. Answer the following questions briefly:

Yayati Story In Hindi Class 9 Bihar Board Question 1.
Who was Emperor Yayati?
Answer:
Emperor Yayati was one of the ancestors of the Pandavas.

Yayati Class 9 In Hindi Bihar Board Question 2.
How did Yayati become old? Who cursed him?
Answer:
Yayati became prematurely old for having wronged his wife Devayani, Sukracharya cursed him.

Question 3.
Was Yayati devoid of sensual desires?
Answer:
No, Yayati was not devoid of sensual desires.

Question 4.
What was the reply of his eldest son?
Answer:
Yayati, eldest son replied that if he took upon himself his old age women and servants would mock at him. So he could not do so.

Question 5.
Why did he become angry?
Answer:
He became angry as his three sons had declined to do as he wished.

B.1.2. Answer the following questions briefly:

Question 1.
What are the symptoms of an old man?
Answer:
In the old age strength and beauty are destroyed. His face wrinkles, his hair becomes grey. He can’t ride on a horse or an elephant. His speech falters. He has to seek the help of others even to keep his body clean. These are the symptoms of an old man.

Question 2.
Who was Puru? Did he accept his father’s proposal?
Answer:
Puru was the youngest son of Yayati. Yes, he gladly accepted his father’s proposal.

Question 3.
Sensual desire is everlasting. Whose thought is this?
Answer:
This is Indian ancient thought. This is Yayati’s thought here.

Question 4.
Why did Yayati resume his old age?
Answer:
When Yayati realised that sensual desire cannot be quenched he took back his old age and went to the forest to live a life of austere.

Question 5.
Do corn, gold, cattle and woman satisfy the desire of a man?
Answer:
No, corn, gold, cattle and woman do not satisfy the desire of a man.

B. 1.3. Answer the following questions briefly:

Question 1.
What was Yayati famous for?
Answer:
Yayati was famous as a ruler devoted to the welfare of his subjects.

Question 2.
Why did Yayati call his sons?
Answer:
Yayati found himself suddenly an old man. But was still haunted by the desire for sensual enjoyment. So he called his five sons hoping that one of them would bear the burden of his old age and give his youth in return so that he might enjoy his life.

Question 3.
What did he say to them?
Answer:
He piteously appealed to the affection of his sons and asked one of them to exchange his youth with his old age so that he might enjoy his life in the full vigour of youth.

Question 4.
Which son agreed to give Yayati his youth and take his old age?
Answer:
Puru, the youngest son agreed to give Yayati his youth and take his old age.

Question 5.
Why did Yayati go to the garden of Kubera?
Answer:
Yayati went to Kubera’s garden to get more sensual satisfaction with an apsara maiden because his desire could not be launched on the earth.

Long Answer Type Questions

C.1. Answer the following questions briefly:

Question 1.
Why did Yayati become prematurely old? Why did he dis¬like it?
Answer:
Yayati became prematurely old by the curse of Sukracharya. his father-in-law, having wronged his wife, Devayani. Yayati disliked it because old age destroyed beauty and brought on miseries. He wanted to enjoy the desire of sensual enjoyment in the full vigour of youth. That was not possible in old age so he disliked it.

Question 2.
In order to enjoy the pleasures of youth, Yayati wished to take the youth of one of his sons. Was he right in doing so? Explain with the argument of your own.
Answer:
Yayati became old due to curse. This was not good, that brought him miseries. Everyone has the right to enjoy his life vigorously. But wished to take the youth of one of his sons for his sake and send the son in miseries was not good in any way. As an old man, Yayati should accept as truth because no pleasure can quench the desire.

Question 3.
Write in your own words the responses of the first three sons to their father’s request.
Answer:
When Yayati asked his sons to exchange their youth with his old age the eldest son said that the women and servants would mock at him. The second son declined the proposal by saying that old age destroys not only strength and beauty but also wisdom and he was not strong enough to do that. The third son opined that an old man can not ride a horse or an elephant. His speech is faltered his plight is helpless.

Question 4.
How did the fourth son respond to his father’s appeal? How would you have responded if you were the fourth son?
Answer:
The fourth son begged to be forgiven, as this was a thing he could by no means consent to. An old man has to seek the help of others even to keep his body clean a most pitiful plight. No, much as he loved his father he could not do it. If I were the fourth son. I took pity on him. I would speak to him politely and did not use hard words at least…

Question 5.
Why did Puru agree to give his youth to his father and take his father’s old age in the bargain? Did he do the right thing?
Answer:
Puru was fifth and last son of Yayati who had never yet opposed his father’s wishes. He moved by Filial love and agreed to give his youth to his father. He took his father’s old age in the bargain. He could not see his mighty father begging for anything and relieved him of the sorrow of old age and the cares of state, to be happy. Yes, as a son he did the right thing. It was his duty to protect his father.

Question 6.
Is it right for a father to make such a request to his sons as Yayati did?
Answer:
No, it is not morally right for a father to make such a request to his sons as Yayati did. He should have accepted his old age gracefully and ruled his kingdom more and more wisely.

Question 7.
Were the four sons justified in refusing their father’s request? If yes, give reasons.
Answer:
Yes, the four sons were fully justified in refusing their father’s request. I think every individual has the right. As enjoy his share of pleasure, who wants to become an old man in his full youth. None, the old age destroys beauty and brings on miseries and it is needless to describe the misery of vigorous youth sud¬denly plighted into old ages so the four sons rightly to refuse their father’s desires.

Question 8.
What lesson do you learn from this story?
Answer:
The story Yayati tells us a very good lesson that youth is the best time of life. It is full of beauty, strength and sensual pleasures. This is the period when a young man can do for himself or for the welfare of the country. But it also tells us it is in vain efforts to quench desire by indulgence. Sensual desire is never quenched by indulgence, any more than fire is by putting ghee in it. No, the object of desire corn, gold, cattle and women nothing can ever satisfy the desires of man. So mental peace and balance are the only remedy which beyond likes and dislikes. Such is the state of Brahman.

Comprehension Based Questions with Answers

1. Emperor Yayati was one of the ancestors of the Pandavas. He had never known defeat. He followed the dictates of the Sastras, adored the gods and venerated his ancestors with intense devotion. He became famous as a ruler devoted to the welfare of his subjects. He became prematurely old by the curse of Sukracharya for having wronged his wife Devayani. In the words of the poet of the Mahabharata, “Yayati attained that old age which destroys beauty and brings on miseries.” It is needless to describe the misery of vigorous youth suddenly blighted into age, where the horrors of loss are accentuated by pangs of recollection.

Questions:

  1. Name the lesson and its writer.
  2. Who was Yayati? Why was he famous for?
  3. How did he become old prematurely?
  4. According to the poet of the Mahabharata, what does the old age do?
  5. Why is it needless to describe the misery of vigorous youth?

Answers:

  1. The name of the lesson is Yayati and the writer is C. Raj Gopala Chari.
  2. Yayati was an emperor and was one of the ancestors of the Pandavas. He became famous as a ruler devoted to the welfare of his subjects.
  3. He became prematurely old by the curse of Sukracharya . for having wronged his wife Devayani.
  4. According to the poet of the Mahabharata old age destroys beauty and brings on miseries.
  5. It is needless to describe the misery of vigorous youth suddenly blighted into age, where the horrors of loss are accentuated by pangs of recollection.

2. Yayati, who found himself suddenly an old man. was still haunted by the desire for sensual enjoyment. He had five beautiful sons, all virtuous and accomplished. Yayati called them and appealed piteously to their affection. ’’The curse of your grandfather Sukracharya has made me unexpectedly and prematurely old. I have not had my feel of the joys of life; for not knowing what was in store for me. I lived a life of restraint, denying myself even lawful pleasures. One of you ought to bear the burden of my old age and give his youth in return. He who agrees to this and bestows his youth on me will be the ruler of my kingdom. I desire to enjoy life in the full vigour of youth”.

Questions:

  1. What was the desire of Yayati after becoming an old man?
  2. How many sons had Yayati?
  3. What did Yayati tell his sons?
  4. Find out the word from the passage which is an antonym to ‘ugly’.

Answers:

  1. Yayati found himself suddenly an old man, was still haunted by the desire for sensual enjoyment.
  2. Yayati had five sons. They were beautiful, virtuous and accomplished.
  3. Yayati told his sons that curse of their grandfather Sukracharya had made him unexpectedly and prematurely old. He had not his feel of the joys of life and further said that one of them ought to bear the burden of his old age and give his youth in return. He who agreed to that would be the ruler of his kingdom.
  4. Beautiful.

3. He first asked his eldest son to do his bidding. That son replied: “O great king, women and servants will mock at me if 1 were to take upon myself your old age. I cannot do so. Ask of my younger brothers who are dearer to you than myself.”
When the second son was asked, he gently refused with the word; “Father, you ask me to take up old age which destroys not only strength and beauty but also as I see wisdom. I am not strong enough to do so.”
The third son replied: “An old man cannot ride a horse or an elephant. His speech will falter. What can 1 do in such a helpless plight? I cannot agree.”
The king grew angry when he saw that his three sons had declined to do as he wished. He hoped for better from his fourth son, to whom he said: “You should take up my old age. If you exchange your youth with me, I shall give it back to you after some time and take back the old age with which I have been cursed.”

Questions:

  1. What was the reply of the eldest son? When he asked him his bidding.
  2. What did the second son reply?
  3. What did the third son reply?
  4. Why did the king grow angry with his sons?

Answers:

  1. When the king asked his eldest son to do his bidding, he replied that women and servants would mock at him if he had been to take upon himself his old age. So he could not do and advised him to ask him youngest brothers who were dearer to him.
  2. The second Yon gently refused to take up old age because it destroys strength, beauty and wisdom.
  3. The third son replied that old age destroys strength to ride a horse or an elephant and to speak clearly.
  4. The king saw that his three sons had declined to do as he wished, he grew angry.

4. The fourth son begged to be forgiven, as this was a thing he could by no means consent to. An old man has to seek the help of others even to keep his body clean, a most pitiful plight. No, much as he loved his father, he could not do it. Yayati was struck with sorrow’ at the refusal of the four sons. He paused for some time and then supplicated his last son,’ who had never yet opposed his wishes; “You must save me. I have got this old age with its wrinkles, debility and grey hairs as a result of the curse of Sukaracharya. I cannot bear it. If you take upon yourself these infirmities, I shall enjoy life for just a while more and then give you back your youth and resume my old age and all its sorrows. Puru. do not refuse as your elder brothers have done.” Puru. the youngest son, moved by filial love, said: “Father, I gladly give you my youth and relieve you of the sorrow’s of old age and the cares of State. Be happy.” Hearing these words Yayati became a youth. Puru, who accepted the old age of his father, ruled the kingdom and acquired great renown.

Questions:

  1. Why was Yayati struck with sorrow?
  2. What was the reply of the fourth.son?
  3. Why did the king get his old age?
  4. Who was Puru? Why did he accept his father’s proposal?
  5. What happened to Puru?

Answers:

  1. Yayati was struck with sorrow at the refusal of the four sons.
  2. The fourth son replied that an old man had to seek the help of others even to keep his body clean. It looked a most pitiful plight so he begged not to accept the proposal.
  3. The king got this old age as a result of the curse of Sukracharya, his father-in-law.
  4. Puru was the fifth and last son of Yayati. who moved by filial love of his father he gladly accepted his father’s proposal.
  5. Puru became old but ruled the kingdom and acquired great renown.

5. Yayati enjoyed life for long and, not satisfied, went later to the garden of Kubera and spent many years with an apsara ‘maiden. After long years spent in vain efforts to quench desire by indulgence, the truth dawned on him. Returning to furu, he said: “Dear son, sensual desire is never quenched by indulgence, any more than fire is by pouring ghee in it. I had heard and read this, but till now I had not realised it. No object of desire corn, gold, cattle and women nothing can ever satisfy the desires of man. We can reach peace only by a mental pose beyond likes and dislikes. Such is the state of Brahman. Take back your youth and rule kingdom wisely and well.” With these words, Yayati took back his old age. Puru, who regained his youth, was made king by Yayati who retired to the forest. He spent his time there in austerities and in due course attained heaven.

Questions:

  1. How long did Yayati enjoy his life?
  2. Why did he go to the garden of Kubera?
  3. When did the truth dawn on him?
  4. Why did he return to Puru?
  5. What did he say to his son Puru after returning to him?
  6. How can he get mental peace?
  7. Find out the word in the passage which means ‘get again’.

Answers:

  1. Yayati enjoyed life for a long time.
  2. Yayati went to the garden of Kubera and spent many years with an apsara maiden.
  3. The truth dawned on him-after long years spent in vain efforts to quench by indulgence in an apsara maiden.
  4. After long years spent in vain efforts to quench desire by indulgence, he returned to Puru.
  5. He said to Puru. “Sensual desire is never quenched so take your youth back and rule the kingdom wisely and well.”
  6. He can get peace only by a mental pose beyond likes and dislikes. Such is the state of Brahman.
  7. Regained.

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Bihar Board Class 9 Hindi Solutions गद्य Chapter 3 ग्रीम-गीत का मर्म

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 1 गद्य खण्ड Chapter 3 ग्रीम-गीत का मर्म Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi Solutions गद्य Chapter 3 ग्रीम-गीत का मर्म

Bihar Board Class 9 Hindi ग्रीम-गीत का मर्म Text Book Questions and Answers

 

ग्राम गीत का मर्म Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 1.
‘ग्राम-गीत का मर्म’ निबंध में व्यक्त सुधांशुजी के विचारों को सार रूप में प्रस्तुत करें।
उत्तर-
पाठ का सारांश देखें।

Gram Geet Ka Marm Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 2.
जीवन का आरंभ जैसे शैशव है, वैसे ही कला-गीत का ग्राम-गीत है। लेखक के इस कथन का क्या आशय है।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ लक्ष्मी नारायण सुधांशु द्वारा लिखित ‘ग्राम-गीत का मर्म’ – पाठ से उद्धृत हैं। इसमें लेखक ने कला-गीत .और ग्राम-गीत का संबंध जीवन से उद्घाटित किया है।

सुधांशु जी ने बताया है कि ग्राम-गीत संभवतः वह जातीय आशु कवित्व है, जो कर्म या क्रीड़ा के तल पर रचा गया है। गीत का उपयोग जीवन के महत्वपूर्ण समाधान के अतिरिक्त साधारण मनोरंजन भी है। इस तथ्य के माध्यम से सुधांशुजी ने दार्शनिक विचारों को हमारे सामने रखकर सत्य को उजागर किया है।

Gram Geet Ka Marm Question Answer प्रश्न 3.
गार्हस्थ्य कर्म विधान में स्त्रियाँ किस तरह के गीत गाती हैं?
उत्तर-
चक्की पीसते समय, धान कूटते समय, चर्खा काटते समय, अपने शरीरी श्रम को हल्का करने के लिए स्त्रियाँ गीत गाती हैं।

Gram Git Ka Marm Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 4.
मानव जीवन में ग्राम-गीतों का क्या महत्व है?
उत्तर-
मानव जीवन में ग्राम-गीतों का महत्व मुख्य रूप से पारिवारिक जीवन से है। ग्राम-गीतों का महत्व मानव जीवन में पुरुष और स्त्रियों में अलग-अलग है। पुरुष और स्त्रियों के गीतों के तुलनात्मक अध्ययन में ग्राम-गीतों की प्रकृति स्त्रैण ही रही. परुषत्व का आक्रमण उन पर नहीं किया जा सका। स्त्रियों ने जहाँ कोमल भावों की अभिव्यक्ति की वहाँ पुरुषों ने अवश्य ही अपने संस्कारवश प्रेम को प्राप्त करने के लिए युद्ध-घोषणा की। इस प्रकार मनुष्य की दो सनातन प्रवृत्तियों-प्रेम और युद्ध का वर्णन भी ग्राम-गीतों में मिलता है। तत्वतः ग्राम-गीत हृदय की वाणी है, मस्तिष्क की ध्वनि है। इसलिए मानव जीवन में ग्राम-गीतों का बहुत ही व्यापक महत्व है।

ग्राम गीत का मर्म निबंध Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 5.
“ग्राम-गीत हृदय की वाणी है, मस्तिष्क की ध्वनि नहीं।” आशय । स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ लक्ष्मी नारायण सुधांशु लिखित “ग्राम-गीत का मर्म” पाठ से उद्धृत है। इसमें लेखक ने ग्रामगीत के उद्गम स्थान की खोज बड़े ही मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक ढंग से की है।

लेखक का कहना है कि ग्राम-गीत हृदय की वाणी है। जैसी परिस्थिति आई इसकी उद्भावना व्यक्तिगत जीवन के उल्लास-विषाद को लेकर हुई। मानव जातीयता में उसकी सारी वैयक्तिक विशेषता अंतर्निहित हो गई। वह व्यक्ति को साथ लेकर भी उसको, प्रधान न रख, उपलक्ष्य बनाकर भावों की स्वाभाविक मार्मिकता के साथ अग्रसर हुए।

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solution प्रश्न 6.
ग्राम-गीत की प्रकृति क्या है?
उत्तर-
ग्राम-गीत में रचना की जो प्रकृति स्त्रैण थी भी वह कला-गीत में आकर पौरुषपूर्ण हो गई। लेकिन मुख्य रूप से ग्राम-गीत की पद्धति स्त्रैण ही रही।

Gram Geet Ki Prakriti Kya Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 7.
कला-गीत और ग्राम-गीत में क्या अंतर है?
उत्तर-
ग्राम-गीत की रचना में जिस पद्धति और संकल्प का विधान था, कला-गीत में उसकी उपेक्षा करना समुचित न माना गया। अत्यधिक संस्कृत तथा परिष्कत होने के बाद भी कला-गीत अपने मल ग्राम-गीत से कला-गीत के परि
परिवर्तन में एक बात उल्लेखनीय है कि ग्राम-गीत में रचना की जो प्रकृति स्त्रैण थी, वह कला-गीत में आकर पौरुषपूर्ण हो गई। स्त्री और पुरुष रचयिता के दृष्टिकोण में जो सूक्ष्म और स्वाभाविक भेद हो सकता है, वह ग्राम-गीत और कला-गीत की अंतप्रकृति में बना रहा ग्राम-गीत में स्त्री की ओर से पुरुष के प्रति प्रेम की जो आसन्नता थी, वह कला-गीत में बहुधा पुरुष के उपक्रम के रूप में परिवर्तित होने लगी।

Bihar Board 9th Class Hindi Book Solution प्रश्न 8.
‘ग्राम-गीत का ही विकास कला-गीत में हुआ है।’ पठित निबंध को ध्यान में रखते हुए उसकी विकास-प्रक्रिया पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
कला-गीत के अंतर्गत मुक्तक और प्रबंध काव्य दोनों का समावेश है। इनके इतिहास का अनुसंधान करने पर ग्राम-गीतों पर ही आकर ठहरना पड़ता है। इसमें संन्देह नहीं कि ग्राम-गीतों से ही काल्पनिक तथा वैचित्र्यपूर्ण कविताओं का विकास हुआ है। यही ग्राम-गीत क्रमशः सभ्य जीवन के अनुक्रम से कला-गीत के रूप में विकसित हो गया है, जिसका संस्कार अब तक वर्तमान है। ग्राम-गीत भी प्रथमतः व्यक्तिगत उच्छवास और वेदना को लेकर उद्गीत किया गया; किन्तु इन भावनाओं ने समष्टि का इतना प्रतिनिधित्व किया कि उनकी सारी वैयक्तिक सत्ता समाविष्ट में ही तिरोहित हो गई और इस प्रकार उसे लोक-गीत की संज्ञा प्राप्त हुई। ग्राम-गीत को कला-गीत के रूप में आते-आते कुछ समय तो लगा ही, पर उसमें सबसे मुख्य बात यह रही कि कला-गीत अपनी रूढ़ियाँ बनाकर चले।।

Godhuli Bhag 1 Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 9.
ग्राम-गीतों में प्रेम-दशा की क्या स्थिति है? पठित निबंध के आधार पर उदाहरण देते हुए समझाइए।
उत्तर-
प्रेम-दशा जितनी व्यापकत्व विधायनी होती है, जीवन में उतनी और कोई स्थिति नहीं। प्रेम या विरह में समस्त प्रकृति के साथ जीवन की जो समरूपता देखी जाती है वह क्रोध, शोक, उत्साह, विस्मय, जुगप्सा में नहीं।

गोधूलि भाग 1 Class 9 Bihar Board Hindi प्रश्न 10.
‘प्रेम या विरह में समस्त प्रकृति के साथ जीवन की जो समरूपता देखी जाती है, वह क्रोध, शोक, विस्मय, उत्साह, जुगुप्सा आदि में नहीं।” आशय स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ लक्ष्मी नारायण सुधांशु द्वारा लिखित ‘ग्राम-गीत का मर्म’ शीर्षक से उद्धृत की गई हैं। इसमें लेखक ने प्रेम की क्या-क्या दशा होती है उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण बड़े ही मार्मिक ढंग से किया है।

लेखक का कहना है कि विरहाकुल पुरुष पशु, पक्षी, लता-द्रुम सबसे अपनी वियुक्त प्रिय का पता पूछ सकता है, किन्तु क्रुद्ध, मनुष्य अपनी शत्रु का पता प्रकृति से नहीं पूछता पाया जाता। यही कारण है कि प्रेमिका या प्रेमी प्रकृति के साथ अपने जीवन का जैसा साहचर्य मानते हैं, वैसा और कोई नहीं। मनोविज्ञान का यह तथ्य काव्य में एक प्रणाली के रूप में समाविष्ट कर लिया गया है। प्रिय के अस्तित्व की सृष्टि-व्यापिनी भावना से जीवन और जगत की कोई वस्तु अलग नहीं कर सकती। यही लेखक का आशय है जो दार्शनिक आधार पर सत्य साबित होता है।

प्रश्न 11.
ग्राम-गीतों में मानव-जीवन के किन प्राथमिक चित्रों के दर्शन होते हैं?
उत्तर-
ग्राम-गीतों में मानव जीवन के उन प्राथमिक चित्रों के दर्शन होते हैं जिनमें मनुष्य साधारणतः अपनी लालसा, वासना, प्रेम, घृणा, उल्लास, विषाद को समाज की मान्य धारणाओं से ऊपर नहीं उठा-सका है और अपनी हृदयगत भावनाओं को प्रकट करने में उसने कृत्रिम शिष्टाचार का प्रतिबंध भी नहीं माना है।

प्रश्न 12.
गीत का उपयोग जीवन के महत्वपूर्ण समाधान के अतिरिक्त साधारण मनोरंजन भी है। निबंधकार ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर-
मनोरंजन के विविध रूप और विधियाँ हैं। स्त्री प्रकृति में गार्हस्थ्य कर्म-विधान की जो स्वाभाविक प्रेरणा है, उससे गीतों की रचना का अटूट संबंध है। चक्की पिसते, समय, धान कूटते समय, चर्खा कातते समय अपने शरीरश्रम को हल्का करने के लिए स्त्रियाँ गीत गाती हैं जिसमें उसका अभिप्रायः यह रहता है कि परिश्रम के कारण जो थकावट आई है उससे ध्यान हटाकर अन्यथा मनोरंजन में चित्त संलग्न किया जा सके।

प्रश्न 14.
किसी विशिष्ट वर्ग के नायक को लेकर जो काव्य रचना की जाती थी। किन स्वाभाविक गुणों के कारण साधारण जनता के हृदय पर उनके महत्व की प्रतिष्ठा बनती थी?
उत्तर-
राजा-रानी, राजकुमार या राजकुमारी या ऐसे ही समाज के किसी विशिष्ट वर्ग के नायक को लेकर काव्य रचना की जो प्रणाली बहुत प्राचीन काल से चली आ रही थी और जिसका संस्कृत साहित्य में विशेष महत्व था। उसका प्रधान कारण यह था कि वैसे विशिष्ट व्यक्तियों के लिए साधारण जनता के हृदय पर उनके महत्व की प्रतिष्ठा बनी हुई थी। उनमें धीरोदात्त, दक्षता, तेजस्विता, रूढ़वंशता, वाग्मिता आदि गुण स्वभाविक माने जाते थे।

प्रश्न 15.
ग्राम-गीत की कौन-सी प्रवृत्ति अब काव्य गीत में चलने लगी है?
उत्तर-
बच्चे अब भी राजा, रानी, राक्षस, भूत, जानवर आदि की कहानियाँ सुनने को ज्यादा उत्कठित रहते हैं। साधारण तथा प्रत्यक्ष जीवन में जो घटनाएँ होती रहती हैं, उनके अतिरिक्त जो जीवन से दूर तथा अप्रत्यक्ष है, उनके संबंध में कुछ जानने की लालसा तथा उत्कंठा अधिक बनी रहती है। मानव जीवन का पारस्परिक संबंध सूत्र कुछ ऐसा विचित्र है कि जिस बात को हम एक काल और एक देश में बुरा समझते हैं उसी बात को दूसरे काल और दूसरे देश अच्छा मान लेते हैं। यही बात ग्राम-गीत की प्रकृति से काव्यगीत की है।

प्रश्न 16.
ग्राम-गीत के मेरूदण्ड क्या हैं?
उत्तर-
हमारी दरिद्रता के बीच में भी संपत्तिशालीनता का यह रूप हमारे भाव को उद्दीप्त करने के लिए ही उपस्थित किया गया है। ऐसे वर्णन कला-गीत में चाहे विशेष महत्व प्राप्त न करें, किन्तु ग्राम-गीत के वे मेरुदण्ड समझे जाते हैं।

प्रश्न 17.
‘प्रेम दशा जितनी व्यापक विधायिनी होती है, जीवन में उतनी और कोई स्थिति नहीं।’ प्रेम के इस स्वरूप पर विचार करें तथा आशय स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ लक्ष्मी नारायण सुधांशु द्वारा लिखित ‘ग्राम-गीत का मर्म’ शीर्षक से उद्धृत की गई हैं। इसमें लेखक ने प्रेम-दशा का जो रूप होता है उसका बड़ा ही सुन्दर रूप प्रस्तुत किया है।
लेखक ने बताया है कि प्रेम या विरह में समस्त प्रकृति के साथ जीवन की जो समरूपता देखी जाती है वह क्रोध, शोक, उत्साह, विस्मय, जुगुप्सा आदि में नहीं। विरहाकुल. पुरुष पशु, पक्षी, लता, द्रुम सबसे अपनी वियुक्त प्रिया का पता पूछ सकता है किन्तु क्रुध मनुष्य अपने शत्रु का पता प्रकृति से नहीं पूछ सकता। प्रेम के इस स्वरूप पर लेखक ने दार्शनिकता की छाप छोड़ी है।

प्रश्न 18.
‘कला-गीतों में पशु-पक्षी, लता-दुम आदि से जो प्रश्न पूछे गए हैं, उनके उत्तर में, वे प्राय मौन रहे हैं। विरही यक्ष मेघदूत भी मौन ही रहा है। लेखक के इस कथन से क्या आप सहमत हैं? यदि हैं तो अपने विचार दें।
उत्तर-
हाँ. मैं लेखक के मत से सहमत हूँ क्योंकि कला-गीतों में कलात्मकता की भावना ऐसी है कि बहुत से प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं लेकिन ग्राम-गीत मौन नहीं रहता। क्योंकि ग्राम-गीतों में ऐसे वर्णन बहुत हैं जहाँ नायिका अपने प्रेमी की खोज में बाघ, भालू, साँप आदि से उसका पता पूछती चलती है। आदिकवि वाल्मीकि ने विरह-विह्वल राम के मुख से सीता की खोज के लिए न जाने कितने पशु-पक्षी, लता-द्रुम आदि से पता पुछवाया है। इसके अतिरिक्त सीता के अनुसंधान तथा उनके पास राम का प्रणय संदेश पहुँचाने के लिए, जो हनुमान को दूत बनाकर तैयार किया, वह काव्य में इस परिपाटी का मार्ग-दर्शक ही हो गया।

प्रश्न 19.
‘ग्राम-गीत का मर्म’ निबंध के इस शीर्षक में लेखक ने ‘मर्म’ ‘ शब्द का प्रयोग क्यों किया है? विचार कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत निबंध में लेखक ने ग्राम-गीत के मर्म का उद्घाटन करते हुए। काव्य और जीवन में उसके महत्व का निरूपण किया है। ग्राम-गीत का उद्भव और उसकी प्रवृत्ति का अनुसंधान करते हुए उन्होंने प्रतिपादित किया है कि जीवन की शुद्धता और गांवों की सरलता का जितना मार्मिक वर्णन ग्राम-गीतों में मिलता है उनका परवर्ती कला-गीतों में नहीं।

निम्नलिखित गद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. ग्राम-गीतों में मानव-जीवन के उन प्राथमिक चित्रों के दर्शन होते हैं, जिनमें मनुष्य साधारणतः अपनी लालसा, वासना, प्रेम, घृणा, उल्लास, विषाद को समाज की मान्य धारणाओं से ऊपर नहीं उठा सका है और अपनी हृदयगत भावनाओं को प्रकट करने में उसने कृत्रिम शिष्टाचार का प्रतिबंध भी नहीं माना है। उनमें सर्वत्र रूढ़िगत जीवन ही नहीं है, प्रत्युत्त कहीं-कहीं प्रेम, वीरता, क्रोध, कर्तव्य का भी बहुत रमणीय वाह्म तथा अंतर्विरोध दिखाया गया है। जीवन की शुद्धता और भावों की सरलता का जितना मार्मिक वर्णन ग्राम-गीतों में मिलता है, उतना परवर्ती कलागीतों में नहीं।
(क) इसके पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) ग्राम-गीतों में किन चित्रों के दर्शन होते हैं?
(ग) ग्राम-गीतों में आए चित्रों की क्या विशेषताएँ हैं?
(घ) “कृत्रिम शिष्टाचार के प्रतिबंध” और ‘रूढ़िगत जीवन’ का क्या अभिप्राय है?
(ङ) ग्राम-गीतों की मूल विशेषता का परिचय दें।
उत्तर-
(क) पाठ-ग्राम-गीत का मर्म, लेखक-लक्ष्मी नारायण सुधांशु।

(ख) ग्राम-गीत हमारे प्रारंभिक जीवन से जुड़े होते हैं। उन गीतों में मानव जीवन के विभिन्न प्रकार के वैसे प्राथमिक चित्रों का अंकन मिलता है जिनमें सामान्य और साधारण रूप से आम आदमी की सामाजिक मान्य धारणाओं में बँधी लालसाओं, वासनाओं, प्रेम-घृणा, उल्लास तथा विषाद की भावनाएँ प्रतिबिंबित रहती

(ग) ग्राम-गीतों में आए चित्र हमारे प्राथमिक जीवन से जुड़े होते हैं। उन चित्रों में आम आदमी की सामान्य दुःख-सुख, हर्ष-विषाद, क्रोध, घृणा आदि की वैसी सामान्य भावनाएँ अंकित रहती हैं जो सामान्य रूप से सामाजिक मान्य धारणाओं से नियंत्रित रहती हैं। ऐसी भावनाओं को प्रकट करने में ग्राम-गीतकार बनावटी शिष्टाचार के प्रतिबंध से अपने-आपको मुक्त रखते हैं। फलत: वे भावनाएँ स्वाभाविक रूप से अभिव्यंजित होती है।

(घ) ‘कृत्रिम शिष्टाचार के प्रति-ध’ का यहाँ यह मतलब है कि ग्राम-गीतों में आम आदमी की सामान्य भावनाओं को प्रकट करने का जो रूप है वह बिल्कुल स्वाभाविक और मनुष्य की सामान्य कृति के अनुरूप है। उसमें किसी प्रकार की शिष्टाचारगत अस्वाभाविकता और कृत्रिमता, अर्थात बनावटीपन नहीं मिलता। इसी तरह रूढ़िगत जीवन का यहाँ अर्थ है-परंपरागत जीवन की मान्यताओं, जीवन-शैलियों और जीवन-पद्धतियों से जुड़ा जीवन।

(ङ) ग्राम-गीतों की मूल विशेषता यह होती है कि उन गीतों में मानव-जीवन की सरलता और शुद्धता का बड़ा ही मार्मिक चित्रण मिलता है। ये गीत कृत्रिम जीवन-शैली की कलुषित छाया से बिल्कुल. मुक्त होते हैं। इसीलिए इन गीतों में सामान्य जीवन के स्वाभाविक और निष्कलुष सौंदर्य के अंकन अपने मौलिक रूप में मिलते हैं। ग्राम-गीतों की यह मौलिक और दुर्लभ विशेषता कलागीतों में भी नहीं मिलती, क्योंकि वहाँ किसी-न-किसी रूप में कृत्रिमता के प्रभाव की छाया विद्यमान रहती ही है।

2. जीवन का आरंभ जैसे शैशव है, वैसे ही कला-गीत का ग्राम-गीत है। ग्राम-गीत संभवतः वह जातीय आशु कवित्व है, जो कर्म या क्रीड़ा के ताल पर रचा गया है। गीत का उपयोग जीवन के महत्त्वपूर्ण समाधान के अतिरिक्त साधारण मनोरंजन भी है, ऐसा कहना अनुपयुक्त न होगा। मनोरंजन के विविध रूप और विधियाँ हैं। स्त्री प्रकृति में गार्हस्थ्य कर्म-विधान की जो स्वाभाविक प्रेरणा है, उससे गीतों की रचना का अटूट संबंध है। चक्की पीसते समय, धान कूटते समय, चर्खा कातते समय, अपने शरीर-श्रम को हल्का करने के लिए स्त्रियाँ गीत गाती हैं। उस समय उनका अभिप्राय साधारणतः यही रहता है कि परिश्रम के कारण जो थकावट आई रहती है, उससे ध्यान हटाकर अन्यथा मनोरंजन – में चित्त संलग्न किया जा मैके। इनके, अतिरिक्त कुछ ऐसे गीत भी हैं, जो भाव के उमंग में गाए जाते हैं। जन्म, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह, पर्व-त्योहार आदि के अवसर पर जो गीत गाए जाते हैं, उनमें उल्लास और उमंग की ही प्रधानता रहती है।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) कला-गीत और ग्राम-सीत में क्या संबंध है?
(ग) गीत का उपयोग किस रूप में और किस क्षेत्र में किया जाता
(घ) ग्राम-गीत गायन में स्त्रियों का साधारणतः अभिप्राय क्या रहता है?
(ङ) भाव की उमंग में किस प्रकार के गीत गाए जाते हैं?
उत्तर-
(क) पाठ-ग्राम-गीत का मर्म, लेखक-लक्ष्मी नारायण सुधांशु।

(ख) कला-गीत और ग्राम-गीत में वही संबंध है जो जीवन और शैशव के बीच का संबंध है। ग्राम-गीत, कला-गीत के प्रारंभिक स्वरूप होते हैं। ग्राम-गीत वस्तुतः काल क्रमशः सभ्य जीवन के अनुक्रम से कला-गीत के रूप में विकसित हो जाते हैं।

(ग) गीत का उपयोग एक ओर जीवन के महत्वपूर्ण समाधान के रूप में किया जाता है तो दसरी ओर साधारण मनोरंजन के क्षेत्र में भी वे उपयोगी प्रमाणित होते हैं। मनोरंजन के कई रूप और विधियाँ हैं। गार्हस्थ जीवन में स्त्रियाँ जो कर्म विधान करती हैं उससे गीतों की रचना का बड़ा निकट का संबंध है।

(घ) ग्राम-गीत गायन के ये कई अवसर होते हैं, जैसे-चक्की पीसते समय, धान. कूटते समय, चरखा काटते समय, स्त्रियाँ ग्राम-गीत गाती है। उस समय गीत गायन का उनका साधारणतः अभिप्राय यही रहता है कि उन कार्यों से उत्पन्न थकावट से आये ध्यान को हटाकर मन को मनोरंजन में लगा सके।

(ङ) कुछ ऐसे ग्राम-गीत होते हैं जो विशुद्ध रूप से भाव की उमंग के क्रम में गाए जाते हैं। इन गीतों के गायन में परिश्रम और थकावट की कोई बात ही नहीं उठती है। भाव की उमंग में गाए जानेवाले वे गीत हैं जो जन्म, मुंडन. यज्ञोपवीत, विवाह, पर्व-त्योहार आदि के अवसर पर गाए जाते हैं। इन गीतों में उल्लास और उमंग की ही प्रधानता होती है।

3. किंतु सब मिलाकर ग्राम-गीतों की प्रकृति स्त्रैणं ही रही, पुरुषत्व का ‘आक्रमण उनपर नहीं किया जा सका। स्त्रियों ने जहाँ कोमल भावों की ही अभिव्यक्ति की, वहाँ पुरुषों ने अवश्य ही अपने संस्कारवश प्रेम को प्राप्त करने के लिए युद्ध घोषणा की। इस प्रकार मनुष्य की दो सनातन प्रवृत्तियों-प्रेम और युद्ध-का वर्णन भी ग्राम-गीतों में मिलता है। तत्त्वतः ग्राम-गीत हृदय की वाणी है, मस्तिष्क की ध्वनि नहीं। इनकी उद्भावना व्यक्तिगत जीवन के उल्लास-विषाद को लेकर भले ही हुई हो, किंतु मानव-जातीयता में उसकी सारी वैयक्तिक विशेषता अंतर्निहित. हो गई है। उनकी अपूर्वता इसी बात में है कि वे व्यक्ति को साथ लेकर भी उसको, प्रधान न रख, उपलक्ष्य बनाकर भावों की स्वाभाविक मार्मिकता के साथ अग्रसर हुए हैं।
(क) इस गद्यांश के पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) सब मिलाकर ग्राम-गीतों की प्रकृति “स्त्रैण” ही रही। इस कथन का क्या मतलब है?
(ग) ग्राम-गीतों से पुरुषों का कैसा संबंध रहा है?
(घ) ग्राम-गीतों की क्या विशेषताएँ हैं और उनकी उद्भावना कैसे
(ङ) ग्राम-गीतों की अपूर्वता किस बात में है?
उत्तर-
(क) पाठ-ग्राम-गीत का मर्म, लेखक का नाम-लक्ष्मी नारायण सुधांशु।

(ख) इस कथन से लेखक का मतलब यह है कि ग्राम-गीतों से प्रायः स्त्रियों का स्वर ही जुड़ा रहता है और उन गीतों में स्त्री-प्रकृति की ही कार्यशीलता का प्राधान्य मिलता है। लेखक के अनुसार ग्राम-गीतों का मुख्य विषय पारिवारिक जीवन होता है और उसमें स्त्रियों की भूमिका अधिक होती है। दूसरी बात यह है कि ग्राम-गीतों में जो भी कोमल भावों की अभिव्यक्ति मिलती है वह स्त्रियों की ही देन है।

(ग) ग्राम-गीतों से कुछ हद तक पुरुषों का भी संबंध रहा है। यह बात सर्वविदित है कि ग्राम-गीतों में प्रेम ऐसे कोमल भाव के साथ-साथ न्यूनाधिक्य मात्रा में क्रोध और युद्ध के भी वर्णन मिलत हैं। ये कठोर भाव और दृश्य संस्कारवश पुरुषों से जुड़े होते हैं, क्योंकि प्रेम को पाने के लिए युद्ध की घोषणा पुरुष ही करता है।

(घ) ग्राम-गीतों की यह विशेषता है कि वे भाव-प्रधान होते हैं। भाव का प्रत्यक्ष संबंध हृदय से होता है। इसलिए ग्राम-गीतों को हृदय की वाणी कहा जाता है। वहाँ बुद्धि की प्रखरता, अर्थात् मस्तिष्क की ध्वनि के लिए कोई स्थान नहीं है। इन गीतों की उद्भावना जीवन के उल्लास, विषाद से प्रेरित होने के साथ-साथ मानव जातीयता में अंतर्निहित वैयक्तिक विशेषता के कारण होती है।

(ङ) इन गीतों की अपूर्वता इस बात में है कि ये गीत वैयक्तिक भावना को साथ लेकर भी उसको प्रधान स्थान नहीं देते। उनकी खासियत, भावों की स्वाभाविक मार्मिकता की अभिव्यंजना के साथ जुड़ी हुई है।

4. इसमें संदेह नहीं कि ग्राम-गीतों से ही काल्पनिक तथा वैचित्र्यपूर्ण
कविताओं का विकास हुआ है। यही ग्राम-गीत क्रमशः सभ्य जीवन के अनुक्रम से कला-गीत के रूप में विकसित हो गया है, जिसका संस्कार अब तक वर्तमान है। ग्राम-गीत भी प्रथमतः व्यक्तिगत उच्छ्वास और वेदना को लेकर उद्गीत किया गया, किंतु इन भावनाओं ने समष्टि का इतना प्रतिनिधित्व किया कि उनकी सारी वैयक्तिक सत्ता समष्टि में ही तिरोहित हो गई और इस प्रकार उसे लोक-गीत की संज्ञा प्राप्त हुई। ग्राम गीत को कला-गीत के रूप में आते-आते कुछ समय तो लगा ही, पर उसमें सबसे मुख्य बात यह रही कि कला-गीत अपनी रूढ़ियाँ बनकर चले।
(क) लेखक और पाठ के नाम लिखिए।
(ख) ग्राम-गीत कला-गीत के रूप में कैसे विकसित हो गए हैं?
(ग) ग्राम-गीत को लोकगीत की संज्ञा कैसे प्राप्त हुई?
(घ) कला-गीत की क्या विशेषताएँ होती हैं?
(ङ) प्रस्तुत गद्यांश का आशय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
(क) पाठ-ग्राम-गीत का मर्म, लेखक का नाम-लक्ष्मी नारायण सुधांशु।

(ख) लेखक के अनुसार ग्राम. गीतों के द्वारा ही काल्पनिक एवं विचित्र कविताओं को विकास का आधार मिला है। ये ग्राम-गीत जब क्रमशः सभ्य जीवन का अनुक्रमन करते हैं तब उस अनुक्रम की प्रक्रिया से वे कला-गीत के रूप में विकसित होते हैं।

(ग) सामान्य रूप से ग्राम-गीतों में व्यक्तिगत उच्छ्वास और वेदनाओं का प्राधान्य होता है, लेकिन उन व्यक्त भावनाओं में समष्टि का बड़ा सबल प्रतिनिधित्व हो जाता है। जब इस प्रक्रिया में वैयक्तिक सत्ता की चेतना समष्टि में ही विलीन हो जाती है तब अपने इस नये स्वरूप में उन गीतों को लोक-गीतों की संज्ञा मिलती है।

(घ) ग्राम-गीतों को कला-गीतों के स्वरूप धारण में कुछ समय तो लग ही जाता है, लेकिन वहाँ प्रधान बात यह परिलक्षित होती है। कि कला-गीत अपनी रूढ़ियों, दूसरे शब्दों में परम्पराओं से मुक्त होकर नहीं चलते। रूढ़ियाँ उनके साथ जुड़ी ही रहती है।

(ङ) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक के कथन का आशय यह है कि ग्राम-गीतों द्वारा ही काल्पनिकता तथा विचित्र कथाओं का जन्म और विकास संभव है। आज के ये ग्राम-गीत ही जीवन के अनुक्रम को माध्यम के रूप में पाकर कल जाकर कला-गीत के रूप में विकिसित होते हैं। ग्राम-गीतों में व्यक्त वैयक्तिक चेतना या भावना ही समष्टि का प्रतिनिधित्व पाकर लोक-गीत की संज्ञा-प्राप्त करती है।

5. ग्राम-गीत की रचना में जिस प्रकृति और संकल्प का विधान था, कला-गीत में उसकी उपेक्षा करना समुचित न माना गया। अत्यधिक । संस्कृत तथा परिष्कृत होने के बाद भी कला-गीत अपने मूल ग्राम-गीत के संस्कार से कुछ बातों में मुक्ति पा सका और यह उस समय तक संभव नहीं; जब तक मानव-प्रकृति को ही विषय मानकर काव्य रचनाएँ की जाती रहेंगी। ग्राम गीत से कला-गीत के परिवर्तन में एक बात । उल्लेखनीय रही कि ग्राम-गीत में रचना की जो प्रकृति स्त्रैण थी, वह कला-गीत में आकर कुछ पौरुषपूर्ण हो गई। स्त्री और पुरुष-रचयिता के दृष्टिकोण में जो सूक्ष्म और स्वाभाविक भेद हो सकता है, वह ग्राम-गीत और कला-गीत की अंतः प्रकृति में बना रहा। ग्राम-गीत में स्त्री की ओर से पुरुष के प्रति प्रेम की जो आसन्नता थी, वह कला-गीत में बहुधा पुरुष के उपक्रम के रूप में परिवर्तित होने लगी।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) कला-गीत में किसकी उपेक्षा करना समुचित नहीं माना गया और क्यों?
(ग) ग्राम-गीत से कला-गीत के परिवर्तन में कौन-सी बात उल्लेखनीय
(घ) ग्राम-गीत तथा कला-गीत की अंतः प्रकृति में कौन-सी बात बनी रही?
(ङ) ग्राम-गीत और कला-गीत में व्यंजित प्रेम के स्वरूप का अंतर बतलाएँ।
उत्तर-
(क) पाठ-ग्राम-गीत का मर्म, लेखक-लक्ष्मी नारायण सुधांशु।

(ख) ग्राम-गीत की रचना की जो अपनी खास प्रकृति थी और संकल्प का जो विधान था, कला-गीत में उसकी उपेक्षा करना या उसे छोड़कर चलना समुचित नहीं माना गया। इसका कारण यह था कि वे कला-गीत के अपरिहार्य अंग थे।

(ग) ग्राम-गीत से कला-गीत के परिवर्तन में यह एक बात उल्लेखनीय रही कि ग्राम-गीत में रचना की जो प्रकृति स्त्रैण थी वहाँ कला-गीत में कुछ हद तक बदलकर पौरुषपूर्ण हो गई।

(घ) ग्राम-गीत और कला-गीत के रचयिता क्रमशः स्त्री और पुरुष थे। इन दोनों प्रकार के रचयिताओं के दृष्टिकोण में जो कुछ सूक्ष्म और स्वाभाविक भेद थे, वे कला-गीत और ग्राम-गीत की अंतः प्रकृति में बने रहे।

(ङ) ग्राम-गीत और कला-गीत के व्यंजित प्रेम में अंतर यह था कि ग्राम-गीतों में पुरुषोन्मुख स्त्री-प्रेम की निकटता की व्यंजना अधिक थी, और कला-गीतों में प्रेम की वह निकटता पुरुष के उपक्रम, अर्थात् प्रारंभिक प्रेमावस्था के रूप में बदलती चली गईं।

6. राजा-रांनी, राजकुमार या राजकुमारी या ऐसे समाज के किसी विशिष्ट वर्ग के नायक को लेकर काव्य रचना की जो प्रणाली बहुत प्राचीन काल से चली आ रही थी और जिसका संस्कृत-साहित्य में विशेष महत्त्व था, उसका प्रधान कारण यह था कि वैसे विशिष्ट व्यक्तियों के लिए साधारण जनता के हृदय पर उसके महत्त्व की प्रतिष्ठा बनी हुई थी। उनमें धीरोदात्तता, दक्षता, तेजस्विता, रूढ़वंशता, वाग्मिता आदि गुण स्वाभाविक माने जाते थे। मानव होते हुए भी उनकी महत्ता, विशिष्टता, प्रतिष्ठा आदि का प्रभावनोत्पादक संस्कार जनता के चित्त पर पड़ा था। ऐसे चरित्र को लेकर काव्य-रचना करने में रसोत्कर्ष का काम, बहुत-कुछ सामाजिक धारणा के बल पर ही चल जाता था, किंतु साधारण जीवन के चित्रण में कवि की प्रतिभा का बहुत-सा अंश, अपने चरित्र नायक में विशिष्टता प्राप्त कराने की चेष्टा में ही खर्च हो जाता है।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) काव्य-रचना की कौन-सी प्रणाली बहुत दिनों से चली आ रही
थी और कहाँ उसकी महत्ता बहुत ज्यादा थी?
(ग) उस महत्त्व के विशिष्ट कारण क्या थे?
(घ) विशिष्ट व्यक्तियों में कौन-से चारित्रिक गुण स्वाभाविक माने जाते थे?
(ङ) साधारण जीवन के चित्रण में कवि का क्या प्रयास रहता है?
उत्तर-
(क) पाठ-ग्राम-गीत का मर्म, लेखक-लक्ष्मी नारायण सुधांशु

(ख) हमारे समाज में बहुत दिनों से ऐसी काव्य-प्रणाली चली आ रही थी जिसमें राजा, रानी, राजकुमार ऐसे समाज के विशिष्ट वर्ग के लोगों को केंद्र में रखकर काव्य की रचना की जाती थी। संस्कृत साहित्य में इसी काव्य-प्रणाली का विशेष महत्त्व था।

(ग) उस काव्य-प्रणाली की महत्ता का कारण यह था कि वैसे तथाकथित विशिष्ट व्यक्तियों के लिए समाज के सभी वर्गों के लोगों के दिल-दिमाग में उनके महत्व की प्रतिष्ठा बनी हुई थी।

(घ) उन विशिष्ट व्यक्तियों के चरित्र में इन चारित्रिक गुणों को स्वाभाविक माना जाता था-उनकी धीरोदात्तता, दक्षता, तेजस्विता, रूढ़वंशता, वाग्मिता आदि। सामान्य लोगों के दिलों पर उन विशिष्ट व्यक्तियों की प्रतिष्ठा, महत्ता तथा विशिष्टता आदि का प्रभावपूर्ण संस्कार जमा हुआ था।

(ङ) साधारण जीवन के चित्रण में कवि का प्रयास यही रहता था कि वे अपनी प्रतिभा का ज्यादा उपयोग अपने चरित्र नायक को विशिष्टता प्रदान करने में ही करते थे। वे यही चाहते थे कि उनके चरित्र नायक की सामान्य लोगों के बीच विशेष स्थिति बनी रहे और वे विशेष सम्मान के पात्र बने रहें।

7. बच्चे अब भी राजा-रानी, राक्षस, भूत, जानवर आदि की कहानियाँ सुनने को ज्यादा उत्कंठित रहते हैं। नानी की कहानियाँ ऐसी ही हुआ करती हैं। साधारण तथा प्रत्यक्ष जीवन में जो घटनाएं होती रहती हैं, उनके अतिरिक्त जो जीवन से दूर तथा अप्रत्यक्ष हैं, उनके संबंध में कुछ जानने की लालसा तथा उत्कंठा अधिक बनी रहती हैं। बच्चों की भाँति उन मनुष्यों को भी, जिनका मानसिक विकास नहीं हुआ रहता, वैसी कहानियाँ ज्यादा रुचिकर मालूम होती हैं। ग्राम-गीतों की रचना में ऐसी प्रवृत्ति प्रायः सर्वत्र पाई जाती है। मानव-जीवन का पारस्परिक संबंध-सूत्र कुछ ऐसा विचित्र है कि जिस बात को हम एक काल और एक देश में बुरा समझते हैं, उसी बात को हम दूसरे काल और दूसरे देश में अच्छा मान लेते हैं।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) बच्चे अब भी क्या सुनने के लिए ज्यादा उत्कंठित रहते हैं?
(ग) ग्राम-गीतों में कैसी प्रवृत्ति प्रायः सर्वत्र पाई जाती है?
(घ) मानव-जीवन के संबंध-सूत्र की क्या विचित्रता होती है?
(ङ) इस गद्यांश का आशय लिखें।
उत्तर-
(क) पाठ-ग्राम-गीत का मर्म, लेखक-लक्ष्मी नारायण सुधांशु।

(ख) बच्चे अब भी राजा-रानी, राक्षस, भूत, जानवर आदि की कहानियाँ सुनने को ज्यादा उत्कठित रहते हैं। नानी की कहानियाँ इसीलिए उनके लिए ज्यादा प्रिय होती हैं क्योंकि इनमें ऐसे ही पात्रों की कहानियाँ ज्यादा होती हैं। वे पात्र जीवन से दूर के और अप्रत्यक्ष होते हैं।

(ग) ग्राम-गीतों में साधारण और प्रत्यक्ष जीवन की घटित घटनाओं तथा जीवन से दूर की और अप्रत्यक्ष बातों को जानने की प्रवृत्ति ज्यादा होती है।

(घ) मानव-जीवन के पारस्परिक संबंध-सूत्र की कुछ ऐसी विचित्रता होती है कि आज जो बात किसी देश और कालविशेष में ग्राह्य या अच्छी लगती है, कल वही बात दूसरे देश और समयांतर में अग्राह्य और बुरी लगने लग जाती है। मनुष्य की इस मानसिक वृत्ति की विचित्रता का परिचय ग्राम-गीतों में वर्णित देवी-देवताओं, भूत-प्रेतों तथा राजा-रानियों की कहानियों के संदर्भ में ज्यादा मिलता है।

(ङ) इस गद्यांश में लेखक ने ग्राम-गीतों की रचना की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है। इस क्रम में लेखक का यह कथन है कि बच्चे ग्राम-गीतों में आई राजा-रानी भत-प्रेत राजकमार-राजकमारी की कहानियों को सनने के लिए ज्यादा व्यग्र और उत्कठित रहते हैं। इसी कारण नानी की या दूर की कहानियाँ उनके लिए विशेष प्रिय होती हैं। मानसिक दृष्टि से अविकसित लोगों की भी यही बच्चों वाली मानसिकता होती है। हाँ, कालक्रम में समय और स्थान में परिवर्तन के साथ लोगों की यह प्रवृत्ति बदल भी जाती है।

8. उच्च वर्ग के लोगों के प्रति समाज में विशिष्टता की धारणा ज्यों-ज्यों कम होने लगी, त्यों-त्यों निम्न वर्ग के प्रति हमारे हृदय में आदर का भाव जमने लगा और इस प्रकार काव्य में ऐसे पात्रों को सामान्य स्थान प्राप्त होने लगा। हृदय की उच्चता-विशालता किसी में हो, चाहे वह राजा हो या भिखारी, उसका वर्णन करना ही कवि-कर्म है। ग्राम-गीत में दशरथ, राम, कौशल्या, सीता, लक्ष्मण, कृष्ण, यशोदा के नाम बहुत आए हैं और उनसे जन-समाज के बीच संबंध का प्रतिनिधित्व कराया गया है। श्वसुर के लिए दशरथ, पति के लिए राम या कृष्ण, सास के लिए कौशल्या या यशोदा, देवर के लिए लक्ष्मण आदि सर्वमान्य हैं। इसका कारण हमारा वह पिछला संस्कार भी है, जो धार्मिक महाकाव्यों ने हमारे चित्त पर डाला है।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) काव्य में कब और कैसे निम्न वर्ग के पात्रों को सामान्य स्थान प्राप्त होने लगा?
(ग) कवि-कर्म क्या है?
(घ) ग्राम-गीतों में दशरथ, राम, कौशल्या, कृष्ण और लक्ष्मण को समाज के बीच किन संबंधों का प्रतिनिधित्व कराया गया है?
(ङ) धार्मिक महाकाव्यों ने हमारे चित्त पर क्या प्रभाव डाला है?
उत्तर-
(क) पाठ-ग्राम-गीत का मर्म, लेखक-लक्ष्मी नारायण सुधांशु।

(ख) उच्च वर्ग के तथाकथित सम्मानित लोगों के प्रति समाज में जैसे-जैसे विशिष्टता की धारणा कमने लगी, वैसे-वैसे हमारे हृदय में निम्न वर्ग के लोगों के प्रति आदर और सम्मान का भाव पुष्ट होने लगा और इस रूप में काव्य में निम्न वर्ग के पात्रों को सामान्य स्थान प्राप्त होने लगा।

(ग) लेखक के अनुसार कवि-कर्म यह है कि वह (कवि) अपनी कविता में ऐसे लोगों के वर्णन को स्थान दे जिनका चरित्र उदात्त हो तथा जो हृदय की उदारता, उच्चता और विशालता के गुणों से भूषित हों। कवि इस कर्म के अनुष्ठान में यह नहीं देखता है कि उसके काव्य में वर्णित व्यक्ति उच्च वर्ग का है या निम्न वर्ग का दीन-हीन भिखारी। आर्थिक स्थिति और स्तर की बात का कवि-कर्म में कोई स्थान नहीं है।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 1 स्थिति एवं विस्तार

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : भूमि एवं लोग Chapter 1  स्थिति एवं विस्तार Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Geography Solutions Chapter 1 स्थिति एवं विस्तार

Bihar Board Class 9 Geography स्थिति एवं विस्तार Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

निर्देश : नीचे दिये गये प्रश्न में चार संकेत चिह्न हैं जिनमें एक सही या सबसे उपयुक्त हैं। प्रश्नों का उत्तर देने के लिए प्रश्न संख्या के सामने वह संकेत चिह्न (क, ख, ग, घ) लिखें जो सही अथवा सबसे उपयुक्त हों।

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 1.
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है ?
(क) 7 वाँ
(ख) 9 वाँ
(ग) 5 वाँ
(घ) 8 वाँ
उत्तर-
(क) 7 वाँ

Bihar Board Class 9 Geography Solutions प्रश्न 2.
भारत के अक्षांशीय एवं देशान्तरीय विस्तार में लगभग कितने डिग्री ‘का अंतर है ?
(क) 45°
(ख) 40°
(ग) 30°
(घ) 35°
उत्तर-
(ग) 30°

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 3.
भारत की मानक मध्याह्न रेखा का मान है
(क) 83930′
(ख) 81°53′
(ग) 82°30′
(घ) 80°30′
उत्तर-
(ग) 82°30′

Bihar Board Class 9 Geography Solution प्रश्न 4.
भारत की स्थलीय सीमा रेखा तटीय सीमा रेखा से लगभग कितनी बड़ी है ?
(क) आधी
(ख) दुगुनी
(ग) तिगुनी
(घ) चौगुनी
उत्तर-
(ख) दुगुनी

Bihar Board Class 9 Geography Chapter 1 प्रश्न 5.
भारत एवं चीन के बीच की सीमा रेखा का नाम है
(क) रेडक्लिफ लाइन
(ख) मैकमोहन लाइन
(ग) ग्रीनवीच लाइन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) मैकमोहन लाइन

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

1. भारत का क्षेत्रफल ………………… वर्ग कि०मी० है जो विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का ………………….. % है।
2. भारत का मुख्य भू-भाग …………………… उत्तर से …………….. उत्तर – अक्षांश तथा ……………. पूर्व देशांतर से ……. .. पूर्व
देशांतर तक है।
3. भारत में कुल ….. …. राज्य एवं ………. केन्द्र शासित प्रदेश हैं।
4. श्रीलंका भारत से ……….. एवं ……. द्वारा अलग हुआ है।
5. कोसी नदी को बिहार का ……….. कहते हैं जो हिमालय के ।
……………..: पर्वत से निकलती है।
उत्तर-
1. 23.8 लाख,
2.4 2. 894′, 37°6′, 68°7′, 97225′
3. 28.7,
4. मन्नार की खाड़ी, पाक जल संधि
5. शोक, कैलाश।

कारण बताएँ

Bihar Board 9th Class Social Science Book Pdf प्रश्न 1.
भारत का अक्षांशीय एवं देशांतरीय विस्तार लगभग समान है किन्तु भूमि पर दोनों की वास्तविक दूरी समान नहीं है, क्यों ?
उत्तर-
इसका कारण यह है कि पृथ्वी पर अंतरअक्षांशीय दूरी समान रहती है किन्तु अंतरदेशीय दूरी जैसे-जैसे ध्रुव की ओर जाती हैं कम होती जाती है।

Bihar Board Class 9th History Solution प्रश्न 2.
भारत के अरुणाचल प्रदेश के निवासी सौराष्ट्र के निवासियों की तुलना में सूर्योदय होने से 2 घंटा पहले ही उठ जाते हैं, क्यों?
उत्तर-
इसका कारण है

  • अरूणाचल प्रदेश के पूर्वी भाग की अंतिम देशान्तर रेखा 97225′ पूर्व है जबकि सौराष्ट्र के पश्चिमी भाग की अंतिम देशान्तर रेखा 6827′ पूर्व है। इनमें लगभग 30 देशान्तर रेखाओं का अन्तर है।
  • सूर्य पूरब में निकलता है। अतः पूरब में समय आगे होगा, पश्चिम की अपेक्षा।
  • हर देशान्तर रेखा पर सूर्य निकलने के समय में 4 मिनट
    \(\left(\frac{24 \times 60}{360}\right)\) का अंतर आता है
  • इस प्रकार सौराष्ट्र के पश्चिमी भाग में अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी भाग की अपेक्षा समय 2 घंटे पीछे है, (4 × 30 = 120 मिनट अर्थात् 2 घंटे। .
  • देश की घड़ियाँ 80°30′ पूरब हैं। यह इलाहाबाद से होकर गुजरती है, तो जब इलाहाबाद में दिन का 12 बजता है तो सम्पूर्ण देश की घड़ियों में 12 बजता है।

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 3.
भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य में जाड़े की ऋतु में जहाँ लोग गर्म कपड़े में लिपटे रहते हैं वहीं दक्षिण राज्य केरल के निवासी खुले बदन एवं लुंगी में रहते हैं, क्यों?
उत्तर-
इसका कारण यह है कि भारत का उत्तरी किनारा जम्मू-कश्मीर राज्य 37°6′ अक्षांश रेखा इसके उत्तरी किनारे से गुजरती है । अतः विषुवत रेखा से यह काफी दूरी पर है तथा सूर्य की किरणें यहाँ अत्यन्त तिरछी पड़ती हैं। फलतः यहाँ सूर्य ताप कम मिलता है और जाड़े की ऋतु में अत्यधिक ठंढक पड़ती है। इसके विपरीत भारत का दक्षिणी भाग-केरल विषुवत रेखा के काफी निकट है । अतः यहाँ सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत सीधी पड़ती है और सूर्य ताप अधिक मिलता है। इस तरह जाड़े में जम्मू-कश्मीर में पुरुष गर्म कपड़े और चादरों में लिपटे रहते हैं वहीं केरल का किसान लुंगी पहने नंगे वदन खेती करता है।

Bihar Board Class 9 Geography Book Solution प्रश्न 4.
भारत की तटीय सीमा रेखा काफी लंबी है, क्यों?
उत्तर-
कारण यह है कि भारत के दक्षिण में हिन्द महासागर, पूरब में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर है । यह तीनों और समुद्र से घिरा है। इसी प्रायद्वीपीय आकार के कारण भारत की तटीय सीमा काफी लंबी है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

Bihar Board 9th Class Geography Book प्रश्न 1.
भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत से बड़े सभी देशों का नाम क्रमवार लिखें। उत्तर-भौगोलिक क्षेत्रफल से भारत से बड़े सभी देशों के नाम क्रमवार इस प्रकार हैं
उत्तर-
(i) रूस – 170 लाख वर्ग किमी० ।
(ii) कनाडा – 99.7 लाख वर्ग किमी० ।
(iii) संयुक्त राज्य अमेरिका – 98 लाख वर्ग किमी० ।
(iv) चीन – 95.9 लाख वर्ग किमी०
(v) ब्राजील – 85.4 लाख वर्ग किमी० ।
(vi) आस्ट्रेलिया – 76.8 लाख वर्ग किमी० ।

Bharti Bhawan Book Class 9 Geography प्रश्न 2.
बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में स्थित भारत के द्वीप समूहों के नाम लिखें।
उत्तर-
बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूह है–अंडमान और निकोबार द्वीप समूह । अरब सागर में स्थित द्वीप समूह हैं-लक्षद्वीप तथा मालदीव द्वीप समूह ।

Bharati Bhawan Class 9 Geography Solutions प्रश्न 3.
भारत की स्थलीय सीमा रेखा को छूने वाले सभी पड़ोसी देशों के नाम लिखें।
उत्तर-
भारत की स्थलीय सीमा रेखा को छूने वाले देश हैं-पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, बंगलादेश तथा म्यांमार हैं।

Bihar Board Class 9 Geography Chapter 1 Solution प्रश्न 4.
भारत के कौन से राज्य अंतरराष्ट्रीय सीमा तथा समुद्र तट को स्पर्श नहीं करते हैं।
उत्तर-
भास्त के राज्यों में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, हरियाणा, दिल्ली तथा असम है जो अंतर्राष्ट्रीय सीमा तथा समुद्र तट को स्पर्श नहीं करते हैं।

प्रश्न 5.
जलसंधि किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जलसंधि जल का वह संकीर्ण हिस्सा है जो दो सागरों को विभाजित करता है। जैसे पाक जलसंधि द्वारा भारत और श्रीलंका अलग होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के अक्षांशीय एवं देशान्तरीय विस्तार का इसके समय पर क्या प्रभाव पड़ता है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
भारत के अक्षांशीय विस्तार से समय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । इसके विस्तार से सर्दी गर्मी का प्रभाव पड़ता है। समय पर प्रभाव देशान्तरीय विस्तार के कारण होता है। भारत में अरुणाचल प्रदेश और कच्छ के बीच स्थानीय समय में 2 घंटों का अन्तर है। इन दोनों में 30° देशान्तरीय बिस्तार है। भारत की मानक देशान्तर रेखा 82°30′ पूवी देशान्तर है, जो इलाहाबाद के नैनी से होकर गुजरती
पृथ्वी 24 घंटे में 360° देशान्तर घूम जाती है । अतः 1° देशान्तर पार करने में पृथ्वी को 4 मिनट का समय लगता है और अरुणाचल प्रदेश के बीच 30° देशानतर का अंतर है। अतः 30°x 4 मिनट = 120 मिनट अर्थात् 2 घंटे हुए। यानी दोनों स्थानों के समय में दो घंटों का अंतर है।

यह अंतर स्थानीय समय का है । पर पूरे देश में एक समय निर्धारित रहता है। भारत में मानक समय है 829-30′ अर्थात् नैनी का समय । यहाँ जब सूर्य ठीक सिर पर आता है तो दिन का 12 बजता है और वही समय पूरे देश में लागू होता है, ताकि समय की एकरूपता बनी रहे ।

मानचित्र कौशल

मानचित्र की सहायता से निम्नलिखित की पहचान करें-
(i) भारत के सभी राज्यों की राजधानियाँ ।
(ii) केन्द्र शासित प्रदेशों की राजधानियाँ।
(iii) सबसे लंबी तटरेखा वाला राज्य ।
(iv) भारत का दक्षिणतम बिन्दु ।
(v) भारत की मुख्य भूमि का दक्षिण शीर्ष बिन्दु ।
(vi) भारत और श्रीलंका को अलग करने वाली जलसंधि ।
(vii) भारतीय उपमहाद्वीप किन देशों से मिल कर बनता है।
(viii) सार्क सदस्यों को चिह्नित करें।
उत्तर-
(i) भारत के सभी राज्यों की राजधानियाँ-
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 1 स्थिति एवं विस्तार - 1
नोट : राजधानियों को उत्तर के क्रम में दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 1 स्थिति एवं विस्तार - 2

(ii) केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्यालय :
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 1 स्थिति एवं विस्तार - 3

(iii) सबसे लंबी तटरेखा वाला राज्य है–गुजरात।
(iv) भारत का दक्षिणतम बिन्दु-इंदिरा प्वाइंट ।
(v) भारत की मुख्य भूमि का दक्षिण शीर्ष बिन्दु-कन्याकुमारी ।
(vi) भारत और श्रीलंका को अलग करने वाली जलसंधि-पाक जलसंधि।
(vii) भारतीय उपमहाद्वीप निम्नांकित देशों से मिलकर बनता हैउत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान, मध्य में भारत, उत्तर में नेपाल, उत्तर-पूर्व में भूटान और पूर्व में बंगलादेश ।.
(viii) सार्क सदस्य देश हैं-भारत, नेपाल, बंगलादेश, श्रीलंका,. भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मालदीव ।

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions गद्य Chapter 4 लाल पान की बेगम

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 1 गद्य खण्ड Chapter 4 लाल पान की बेगम Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi Solutions गद्य Chapter 4 लाल पान की बेगम

Bihar Board Class 9 Hindi लाल पान की बेगम Text Book Questions and Answers

Lal Pan Ki Begam Question Answer Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 1.
बिरजू की माँ को लालपान की बेगम क्यों कहा गया है?
उत्तर-
नाच की तैयारी के संदर्भ में जिस तरह की तैयारियाँ हो रही हैं और जो उमंग छाया हुआ है उसमें बिरजू के माँ के गौने की साड़ी से एक खास किस्म की गंध निकल रही है जिससे बिरजू की माँ को बेगम ही नहीं ‘लालपान की बेगम’ कहा गया है।

लाल पान की बेगम का प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 2.
“नवान्न के पहले ही नया धान जुठा दिया।” इस कथन से बिरजू की माँ का कौन-सा मनोभाव प्रकट हो रहा है।?
उत्तर-
जब बिरजू ने धान की एक बाली से एक धान लेकर मुँह में डाल लिया तो बिरजू की माँ ने बिरजू को बहुत डाँटा और कहा कि नेम-धेम की भी चिंता करो, इसकी रक्षा करो। तू तो गँवार है। मूर्ख है। इसपर बिरजू के पिता ने पूछा-क्या हुआ? क्यों डाँटती हो? इसपर बिरजू ने पिता से बिरजू की माँ ने कहा देखते नहीं नवाल के पहले ही अन्न को जूठा कर दिया। इस कथन में बिरजू की माँ ने मन में धर्म के प्रति जो आस्था छिपी है वह प्रकट हो रहा है। वह भारतीय नारी है। धार्मिक विधि विधान की पक्षधर है इसीलिए नवाल के पहले अन्न जूठा करने पर नाराज होकर बिरजू को डाँटती है।

Lal Pan Ki Begam Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 3.
बिरजू की माँ बैठी मन-ही-मन क्यों कुढ़ रही थी?
उत्तर-
गाँव के लोग नाच देखने जा रहे थे। बिरजू की माँ बैलगाड़ी से नाच देखने बलरामपुर जायगी वह बैलगाड़ी उसके पति लाने गये हैं जिसमें देरी हो रही है और बहुत देरी होने से वह कुढ़ जाती है।, यहाँ तक कि वह घर की बत्ती बुझा देती है, बच्चों को सोने के लिए विवश कर देती है।

Lal Pan Ki Begam Ka Question Answer Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 4.
‘लालपान की बेगम’ शीर्षक कहानी की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखित ‘लाल पान की बेगम’ कहानी एक आंचलिक और मनोवैज्ञानिक कहानी है। इसमें ग्रामीण परिवेश की गंध छिपी हुई है। नाच-गान देखने-दिखाने के बहाने कहानीकार ने ग्रामीण जीवन के अनेक रंग-वेशे की गहरी संवेदना के साथ प्रकट किया है। गाँव के लोग-बाग किस तरह एक-दूसरे के साथ ईर्ष्या-द्वेष, राग-विराग, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद के गहरे आवर्त में बँधे रहते हैं, उसकी जीवंत बानगी है-लाल पान की बेगम।

रेण ने इस आंचलिक कहानी में अंचल विशेष की संस्कृति, भाषा, मुहावरे एवं लोक नीतियों, रीतियों का सफल चित्रण किया है। इस प्रकार ‘लाल पान की बेगम’ अपने आप में सार्थक शीर्षक है।

सप्रसंग व्याख्या

लाल पान की बेगम स्टोरी Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 5.
(क) “चार मन पाट (जूट) का पैसा क्या हुआ है, धरती पर पाँव ही नहीं पड़ते।”
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तिया फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखित ‘लालपान की बेगम’ शीर्षक कहानी से उद्धृत हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने गरीबों की समस्यायों और उसमें पर समुचित प्रकाश डाला है। उनके जीवन में जो बदलाव आता है उसका ग्रामीण परिवेश में बड़ा ही सुन्दर और सटीक वर्णन प्रस्तुत किया है।

भखनी फुआ पानी भरकर लौटती हुई पनभरनियों से अपनी भाषा में कल की छटपटाहट और अच्छी फसल पाट (जूट) की कमाई से होनेवाले बदलाव का वर्णन करते कहती है कि कल तक तो बिरजू की माँ अकुलाहट में थी, और आज गली-मुहल्ले में लोगों से कहती फिरती है कि बिरजू के वप्पा ने कहा है कि मैं बैलगाड़ी पर बिठाकर तुझे बलरामपुर का नाच दिखाऊँगा।

लोगों की मानसिकता किस प्रकार समय के साथ बदल जाती है, रेणु जी ने इस कहानी में उसका सटीक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

लाल पान की बेगम Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 6.
“दस साल की चंपिया जानती है कि शकरकंद छीलते समय कम-से-कम बार-बार माँ उसे बाल पकड़कर झकझोरेगी, छोटी-छोटी खोट निकालकर गालियां देगी।” इस कथन से चंपिया के प्रति माँ की किस मनोभावना की अभिव्यक्ति होती है?
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियां ‘लालपान की बेगम’ शीर्षक कहानी से उद्धृत की गई है। प्रस्तुत पंक्तियों में श्री फणीश्वरनाथ ने ग्रामीण समाज और जो साक्षर नहीं है उसकी मानसिकता का बड़ा ही सुंदर चित्र खींचा है।

इस पाठ में रेणुजी ने शकर कंद का उदाहरण देकर समझाया है कि चंपिया नस्ल से बेटी है और छोटी है। शकरकंद कच्चा भी मीठा होता है और पका हुआ तो और मीठा हो जाता है। बच्चा उसे खाने के लिए ललचता है। वह माँ से शकरकंद छीलने के लिए मांगती है तो माँ कहती है कि नहीं, तू एक छीलेगी और तीन पेट में। चंपिया भी जानती है कि उस काम के लिए उसे कितनी प्रताड़ना सहनी होगी। शकरकंद छीलने के बदले वह पड़ोसिन से कड़ाही माँगकर लाने को कहती है जो उससे एक दिन के लिए मांगकर ले गयी थी। उपरोक्त पंक्तियों में चंपिया के प्रति अविश्वास का भाव उसकी माँ के मन में छिपा है। वह शकरकंद छिलने के बहाने चोरी-छिपे कुछ शकरकंद खा जाएगी।

लाल पान की बेगम कहानी का सारांश Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 7.
“बिरजू की माँ का भाग ही खराब है, जो ऐसा गोबर गणेश घरवाला उसे मिला। कौन-सा सौरव-मौज दिया है उसके मर्द ने। कोल्हू के बैल की तरह खरा सारी उम्र काट दी इसके यहाँ।” प्रस्तुत कथन से बिरज की माँ और के संबंधों में कड़वाहट दिखाई पड़ती है। कड़वाहट स्थायी है या अस्थाई? इसके कारणों पर विचार कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखित ‘लालपान की बेगम’ कहानी से उद्धृत है। रेणु ने प्रस्तुत पंक्तियों में ग्रामीण नारी की निरक्षरता का वर्णन करते हुए उसके चरित्र की मनोदशा का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है।

इस कहानी में रेणुजी ने ग्रामीण नारी की मनोदशा का बड़ा ही सचित्र चित्र खींचा है। समय पर नाच देखने के लिए बैलगाड़ी के नहीं पहुँचने पर बिरजू की माँ । की झुंझलाहट का सहसा आभास हो जाता है कि वह अपनी बेटी से कहती है कि चुल्हा में पानी डाल दे, बत्ती बुझा दे। हमारी मनोकामना कब की पूरी होने वाली। खपच्ची गिरा दे, बप्पा बुलाये तो जवाब मत देना।

रेणुजी ने इस अस्थायी कडुवाहट को इतने सटीक ढंग से सजाया है कि कहानी में चार चाँद लग गये हैं। इस कथन में भारतीय नारी की सहजता, सहृदयता, पति के प्रति उलाहना का भाव एवं मूक पीड़ा की अभिव्यक्ति मिलती है।

Lal Pan Ki Begum Summary In Hindi Bihar Board Class 9 प्रश्न 8.
गाँव की गरीबी तथा आपसी क्रोध और ईर्ष्या के बीच भी वहाँ एक प्राकृतिक प्रसन्नता निवास करती है। इस पाठ के आधार पर बताएं।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘लालपान की बेगम’ शीर्षक कहाने से उद्धृत की गयी है। श्री फणीश्वरनाथ रेण द्वारा लिखित ‘लालपान की बेगम’ ग्रामीण परिवेश की कहानी है। प्रस्तुत पंक्तियों में रेणु जी ने गांव के वातावरण का सचित्र चित्र खींचा है।

रेणु जी ग्रामीण परिवेश के रचनाकार हैं। उन्होंने वहाँ की भाषा एवं बोली का प्रयोग अपनी रचना में इस तरह किया है कि लगता है कि यह कहानी गांवमय हो गया है। गाँव के लोग छोटी-छोटी बातों में भी राग-द्वेष, बैर-भाव से भर जाते हैं, एक दूसरे से चिढ़ते हैं लेकिन कुछ समय ऐसा भी आता है जब लोग इन सभी बातों को भुलाकर एक साथ हो जाते हैं। जैसे एक-दूसरे के प्रति राग-द्वेष रहते हुए भी जब बिरजू की माँ बैलगाड़ी में बैठती है तो पास-पड़ोस के औरतों को पुकार-पुकारकर बैलगाड़ी पर विठाती है और प्राकृतिक प्रसन्नता का आभास कराती है।

लाल पान की बेगम Pdf Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 9.
कहानी में बिरजू और चंपिया की चंचलता और बालमन के कुछ उदाहरण प्रस्तुत करें।
उत्तर-
प्रस्तुत कहानी में रेणुजी ने ग्रामीण परिवेश में बालमन की चंचलता, डरावनापन और उल्लास का ऐसा रूप रखा है कि कहानी में आकर्षण पैदा हो गया है।

इस कहानी में चंपिया जो बिरजू की बहन है उसका हलुआइन के दुकान से सामान जल्द न लाने पर माँ की झुंझलाहट, बिरजू द्वारा बांगड़ को मारने पर मां की कड़वाहट, बिरजू और चंपिया द्वारा शकरकंद खाने की लालसा के प्रति मां की गुस्सा करातो आदि बातें ग्रामीण यथार्थ का परिचय है। बालसुलभ मन की अकुलाहट का चित्रण सुक्ष्य ढंग से हुआ है। मार खा लेने बाद भी वह लेने पर दृढ़ है। रेणुजी उचित सुन्दर शब्दों का प्रयोग कर कहानी को रोचक बना दिया है।

Lalpan Ki Begam Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 10.
‘लाल पान की बेगम’ कहानी का सारांश लिखें।
उत्तर-
लाल पान की बेगम’ में रेणुजी ने गाँव की धरती का जो सुंदर चित्र खींचा है, वह सबके दिमाग पर अमिट छाप छोड़ जाता है। रेणु ने अपनी गहरी संवदेना का परिचय देते हुए गाँवों के संपूर्ण अंतर्विरोधों और अंगड़ाई लेती हुई चेतना को कथारूप दिया है। उनके गाँव में एक तरफ पुरातन जड़ता और नवीन गत्यात्मकता ही टकराहट है तो दूसरी ओर विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों के अंतर्विरोध है, बिरादरीवाद की कड़वाहट है तो तीसरी तरफ इनके बीच बजती हुई लोक संस्कृति की शहनाई भी है।

प्रस्तुत कहानी ‘लाल पान की बेगम’ ग्रामीण परिवेश की कहानी है। नाच देखने-दिखाने के बहाने कहानीकार ने ग्रामीण जीवन के अनेक रंग-देश को गहरी संवेदना के साथ प्रकट किया है। गाँव में लोग-बाग किस तरह एक दूसरे के साथ ईर्ष्या-द्वेष, राग-विराग, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद के गहरे आर्वत में बँधे होते है इसकी बानगी उक्त कहानी में मिलती है। नाच-देखने और शकरकंद खाने की इच्छा उसकी जीवंत बानगी है-‘लाल पान की बेगम।

प्रश्न 11.
कहानी के पात्रों का परिचय अपने शब्दों में दीजिए।
उत्तर-
‘लाल पान की बेगम’ कहानी में पात्रों की संख्या अधिक है मगर इसमें बिरजू की माँ, बिरजू, चंपिया, मखनी फुआ, बागड़, सहुआइन इत्यादि प्रमुख पात्र हैं। इन पात्रों में बिरजू की माँ सबसे विशिष्ट पात्र है।

सभी पात्रों में बिरजू की माँ का दबदवा बना हुआ है तो चंपिया और बिरजू उसके डर से सहमे हुए रहते है। सबसे विकट समस्या उस समय उपस्थित होता है जब रात बीत रही है बैलगाड़ी नहीं आयी है तो बिरजू की माँ तानाशाह बन बिरजू और चंपिया को आदेश देती है कि, बती बुझा दे। खप्पर गिरा दे, कोई आवाज दे तो जवाब मत देना। चंपिया और बिरजू भोले बाबा और हनुमान जी को मनौती दूनी करने का वादा करती है।

रेणु जी ने ग्रामीण पात्रों का इतना सुंदर नामकरण और चरित्र को सजाया है कि कहानी रोचक, बन गई है। यह कहानी जनमानस का कंठहार बन गई है सार्थक कहानी है ‘लालपान की बेगम’।

प्रश्न 12.
रेण वातावरण और परिस्थिति का सम्मोहक और जीवंत चित्रण करने में निपुण हैं। इस दृष्टि से रेणु की विशेषताएँ अपने शब्दों में बताइए।
उत्तर-
फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म औराही हिंगना नामक गाँव, जिला अररिया (बिहार) में हुआ था। वे विशुद्ध ग्रामीण परिवेश से जुड़े रहे। वे महान क्रांतिकारी भी थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने प्रमुख सेनानी की भूमिका निभाई और 1950 ई. में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहाँ की सशस्त्र क्रांति और राजनीति में सक्रिय योगदान दिया। वे दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्ष करते रहे। सत्ता के दमनचक्र के विरोध में उन्होंने पद्मश्री की उपाधि का त्याग कर दिया।

हिन्दी कथा साहित्य में जिन कथाकारों ने युगांतर उपस्थित किया है, फणीश्वरनाथ रेणु उनमें से एक हैं। उन्होंने कथा साहित्य के अतिरिक्त, संस्मरण रेखाचित्र. रिपोर्ताज आदि विधाओं को नई ऊँचाई दी। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं-‘मैला आंचल’, ‘परती परिकथा, (दीर्घतपा, ‘कलंक मुक्ति’, ‘जुलूस’, ‘पल्टू बाबू रोड’, उन्होंने उपन्यास, कहानी संग्रह, रिपोर्ताज लिखकर समाज और देश को एक नई दिशा दी है।

रेणुजी का ‘मैला आचंल ‘ ने हिंदी कथा साहित्य में आंचलिकता को एक पारिभाषिक अभिधा दी। उपन्यास और कहानी दोनों कथा रूपों में अपनी लेखनी से गाँव की धरती का जो चित्र खींचा है वह रूबपर आपकी अमिट छाप छोड़ जाता है।

रेणु ने अपनी गहरी संवदेना का परिचय देते हुए गाँव के संपूर्ण अंतविसेधों और अंगड़ाई लेती हुई चेतना को जीवंत कथा रूप दिया।
इन्हीं सारी विशेषताओं के कारण रेणु जी हिन्दी कथा साहित्य में अग्रणी स्थान बना सके।

निम्नलिखित गद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. बिरजू की माँ शकरकंद उबालकर बैठी मन-ही-मन कुढ़ रही थी। अपने
आँगन में सात साल का लड़का बिरजू शकरकंद के बदले तमाचे खाकर आँगन में लोट-लोटकर सारी देह में मिट्टी मल रहा था। चंपिया के सर भी चुडैल मँडरा रही है। आधा आँगन धूप रहते जो गई है सहुआइन दूकान पर छोवा-गुड़ लाने, सो अभी तक नहीं लौटी, दीया-बाती की बेला हो गई। आए आज लौट के जरा। बागड़ बकरे की देह में कुकुरमाछी लगी थी, इसलिए बेचारा बागड़ रह-रहकर कूद-फाँद रहा था। बिरजू की माँ बागड़ पर मन का गुस्सा उतारने का बहाना ढूँढ़ चुकी थी। पिछवाड़े की मिर्च की फूली गाछ। बागड़ के सिवा और किसने कलेवा किया होगा।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) बिरजू की माँ मन की कुढ़न किस रूप में उतार रही है?
(ग) “चंपिया के सर भी चुडैल मँडरा रही है”, का अर्थ स्पष्ट करें।
(घ) बागड़ क्यों और किस रूप में परेशान था? बिरजू की माँ ने उसपर मन के गुस्से उतारने के लिए कौन-सा बहाना बनाया था?
(ङ) प्रस्तुत गद्यांश का आशय/सारांश लिखें।
उत्तर-
(क) पाठ-लालपान की बेगम, लेखक-फणीश्वरनाथ रेणु।

(ख) बिरजू की माँ कूढ़न की मनः स्थिति में थी। वह अपने बेटे को थप्पड़ मारकर आँगन में उसे धूल में लोटने के लिए बाध्य करने, सहुआइन की दुकान से छोवा और गुड़ लाने गई अपनी बेटी चंपिया के नहीं लौटने पर, क्रोध प्रकट करने और बागड़ पर मिर्च के पौधे के खाने के कार्यों पर आग-बबूला होने के रूप में अपने मन की कुढ़न उतार रही थी।

(ग) पाठ में आए इस कथन का मतलब यह है कि चंपिया की माँ अपनी बेटी चंपिया पर बहुत क्रोध प्रकट कर रही है इसलिए कि वह अपराह्न में ही संहुआइन की दुकान से छोवा और गुड़ लाने गई थी और शाम ढलने पर भी वह अभी तक दुकान से लौटकर घर नहीं आई है। घर लौटने पर उसकी खैर नहीं है। उसे माँ की पिटाई लगनी ही है।

(घ) बागड़ बकरे की देह में कुकरमाछी लग गई थी इससे वह बहुत परेशान था और वह बेचारा कूद-फाँद कर अपनी इस परेशानी को प्रकट कर रहा था। बिरजू की माँ ने इसपर अपना गुस्सा उतारने के लिए यही बहाना बनाया था कि उसके घर के पिछवाड़े में लगी मिर्च की फूली गाछ को बागड़ बकरे ने ही खाया है, इसीलिए उसकी पिटाई करनी है।

(ङ) बिरजू की माँ आज काफी खिन्न और क्रोध की मुद्रा में है। उसे आज शाम में बलरामपुर में होने वाले नाच के आयोजन में सपरिवार दर्शक के रूप में जाना है। उसके पति द्वारा यह कार्यक्रम पूर्व में ही निर्धारित किया गया है कि वह सबको बैलगाड़ी से वहाँ ले जाएगा। उस दिन घर में मीठी रोटी बनेगी और सभी लोग अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर घर से चलेंगे। लेकिन आज वहाँ जाने के लिए उसके पति बैलगाड़ी लेकर अभी तक. आए नहीं है। शाम की वेला भी ढलती जा रही है। नाच देखने के कार्यक्रम की इस अनिश्चितता के कारण वह खिन्न और क्रोधित हो गई है और अपने बेटे को पीटकर तथा अपनी बेटी और घर के बकरे पर आग-बबूला होकर मन की खीझ और क्रोध को बहाना बनाकर उतार रही है।

2. मडैया के अंदर बिरजू की माँ चटाई पर पड़ी करवटें ले रही थीं। ऊहूँ, पहले से किसी बात का मनसूबा नहीं बाँधना चाहिए किसी को। भगवान ने मनसूबा तोड़ दिया। उसको सबसे पहले भगवान से पूछना चा हए, यह किस चूक का फल दे रहे हो भोला बाबा। अपने जानते उसने किसी देवता-पित्तर की मान-मनौती बाकी नहीं रखी। सर्वे के समय जमीन के लिए जितनी मनौतियाँ की थीं ठीक ही तो। महावीरजी का रोट तो बाकी ही है। हाय रे दैव! भूल-चूक माफ करो महावीर बाबा। मनौती दूनी करके चढ़ाएगी बिरजू की माँ।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) बिरजू की माँ ने कौन-सा मनसूबा बाँधा था? भगवान ने उसका मनसूबा कैसे तोड़ दिया?
(ग) पठित अंश के आधार पर बिरजू की माँ की धार्मिक आस्था का परिचय दें।
(घ) बिरजू की माँ कौन-सी भूल-चूक के लिए किस देवता से क्या कहकर माफी माँगती है?
(ङ) इस गद्यांश का आशय लिखें।
उत्तर-
(क) पाठ-लालपान की बेगम, लेखक-फणीश्वर नाथ रेणु।

(ख) बिरजू की माँ ने यह मनसूबा बाँध रखा था कि आज के दिन वह सपरिवार मीठी रोटी के साथ, अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर बैलगाड़ी से बलरामपुर में आयोजित नाच देखने जाएगी और काफी खुशी मनाएगी। लेकिन बिरजू का बाप अभी तक बैलगाड़ी लेकर आया नहीं था और वहाँ जाने का समय बीत चला था। इसलिए उसे लगा कि नाच देखने का उसका मनसूबा टूट चुका है। उसका सरल दिल कह रहा था कि भगवान ने ही उसका मनसूबा तोड़ दिया है।

(ग) सरलहृदया बिरजू की माँ बड़ी भोली-भाली और सच्ची धार्मिक आस्थावाली औरत है। भगवान शंकर और हनुमान (महावीर) में उसकी श्रद्धा, भक्ति, विश्वास और निष्ठा बड़ी गहरी, स्वच्छ और बलवती है। इसीलिए तो वह यह मानकर चलती है कि जीवन का सारा कार्य भोले बाबा और महावीरजी की इच्छा से संचालित होता है। उसकी यह धारणा बन गई है कि किसी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए इन देवताओं को चढ़ावा चढ़ाकर खुश करना जरूरी है। अगर किसी कारण से चढ़ावा नहीं चढ़ाया गया तो वह अपनी गलती स्वयं मान लेती है · और इस गलती के लिए वह अपने आराध्य से चटपट माफी भी माँग लेती है-“भूल चूक माफ करो महावीर बाबा! मनौती दूनी करके चढ़ाएगी बिरजू की माँ।” ।

(घ) बिरज की माँ ने जमीन के सेटलमेंट के सर्वे के कार्य में भोले बाबा से जो मनौती माँगी थी, वह तो उसने पूरी कर दी थी। किसी देवी-देवता से जुड़ी कोई मनौती उसने बाकी नहीं रखी है। आज नाच देखने की उसकी लालसा पूरी नहीं हो रही है। इसमें जरूर महावीर जी की मनौती बाकी रह गई है। वह अपनी इस गलती के लिए महावीरजी से माफी माँगती है और उनसे यह वादा करती है कि अब वह मनौती दुगुनी कर देगी।

(ङ) प्रस्तुत गद्यांश में कहानीकार रेणुजी ने सरल हृदया और भोले-भाले स्वभाव वाली बिरजू की माँ की सरल-स्वाभाविक धार्मिक आस्था और विश्वास का परिचय दिया है। साथ ही, इस गद्यांश के द्वारा उसने बिरजू की माँ ऐसी ग्रामीण संस्कृति में पली ग्रामीण स्त्रियों के अंधविश्वास, भगवान में गहरी आस्था और सामान्य धार्मिक मानसिकता का चित्रण किया है। लेखक ने बताया है कि ग्रामीण स्त्रियाँ भोली-भाली होती हैं। अपने आराध्यदेव की महानता और क्षमता में उनकी अंधभक्ति और श्रर्धा केंद्रित होती है। उनका यह विश्वास है कि उनके आराध्यदेव के पूजन तथा मनौती के अर्पण से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। इसीलिए, वे कार्य में सफलता प्राप्त करने और मनोवांछित इच्छा की पूर्ति के लिए बराबर . मनौती माँगकर तत्परतापूर्वक उसकी पूर्ति कर देती है, अन्यथा वह क्षमा माँगकर ही मन के भार को हल्का करती हैं। बिरजू की माँ ऐसी ही ग्रामीण स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है।

3. बिरजू की माँ के मन में रह-रहकर जंगी की पतोहु की बातें चुभती हैं, भक्-भक बिजली बत्ती!……..चोरी-चमारी करनेवाले की बेटी-पतोहु जलेगी नहीं। पाँच बीघा जमीन क्या हासिल की है, बिरजू के बप्पा ने, गाँव की भाई खौकियों की आँखों में किरकिरी पड़ गई है। खेत में पाट लगा देखकर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी, धरती फोड़कर पाट, लगा है, वैशाखी बादलों की तरह उमड़ते आ रहे हैं पाट के पौधे। तो अलान तो फलान। तनी आँखों की धार भला फसल सहे। जहाँ पंद्रह मन पाट होना चाहिए, सिर्फ दस मन पाट काँटा पर तौल का ओजन हुआ रब्बी भगत के यहाँ।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) गाँव की भाई खौकियों की आँखों में क्यों किरकिरी पड़ गई है? भाई खौकियों का क्या अर्थ है?
(ग) किस बात पर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी है?
(घ) तनी आँखों की धार भला फसल सहे। इस कथन का अर्थ या आशय लिखें।
(ङ) इस गद्यांश का आशय लिखिए।
उत्तर-
(क) पाठ-लालपान की बेगम, लेखक-फणीश्वरनाथ रेणु।

(ख) गाँव की भाई खौकियों की आँखों में इसलिए किरकिरी पड़ गई है, क्योंकि बिरजू के बप्पा सर्वे के समय गाँव के बाबू साहेब की इच्छा और प्रयास का विरोध कर पाँच बीघे जमीन अपने नाम पर चढ़वाकर अपना स्वामित्व कायम किए हुए हैं। इसी पर गाँव की पड़ोस की ईर्ष्यालु स्त्रियों की आँख में किरकिरी का कारण वह पाँच बीघा जमीन बनी हुई है। भाई खौकियों का सामान्य अर्थ है-भाई को खानेवाली। यह शब्द ग्रामीण क्षेत्र में एक गाली के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। यहाँ बिरजू की माँ ने इस शब्द का प्रयोग वैसी (डहजड़त) ग्रामीण स्त्रियों के लिए किया है जो उसकी हासिल पाँच बीघे जमीन पर ईर्ष्या और डाह की आँच में जलती रहती हैं।

(ग) सर्वे में सेटलमेंट में प्राप्त बिरजू के बप्पा की पाँच बीघे जमीन में पाट की अच्छी फसल को देख-देखकर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी है। एक तो वह जमीन बिरजू के बप्पा को मुफ्त में फबी है और दूसरा यह कि उस जमीन में पटसन की बड़ी अच्छी फसल लगी हुई है। ईर्ष्यालु गाँव के लोगों की छाती तो फटेगी ही इस बात पर।

(घ) तनी आँखों की धार भला फसल सहे। का अर्थ है फसलों को नजर, लग जाना। ग्रामीण क्षेत्र में सामान्य रूप से लोगों की यह अवधारणा बनी हुई है कि जिस अच्छी चीज पर किसी की नजर गड़ जाती है उस चीज की दुर्गति हो ही जाती है। बिरजू की माँ इस संदर्भ में रब्बी भगत की पटसन की लहलहाती फसल की दुर्गति का उदाहरण देती है।

(ङ) प्रस्तुत गद्यांश में ग्रामीण अंचल के सफल-सक्षम चित्रकार-कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु ने ग्रामीण जीवन में लोगों के पारस्परिक संबंधों की चर्चा की है। इस संदर्भ में लेखक ने यह बताया है कि ग्रामीण महिला वर्ग विशेष रूप से, अपने पड़ोसियों की उन्नति और हँसी-खुशी पर ईर्ष्या और डाह से जलने लगती है। ग्रामीण पुरुष भी इसके अपवाद नहीं होते। वहाँ के तथाकथित सहज, सरल तथा शांत जीवन में बैठे-बैठाए लोगों में ईर्ष्या-द्वेष की यह प्रवृत्ति विशेष रूप से पाई जाती है।

4. बिरजू के बाप पर बहुत तेजी से गुस्सा चढ़ता है। चढ़ता ही जाता है। बिरजू की माँ का भाग ही खराब है, जो ऐसा गोबर-गणेश घरवाला उसे मिला। कौन-सा सौख-मौज दिया है उसके मर्द ने। कोल्हू के बैल की तरह खटकर सारी उम्र काट दी इसके यहाँ, कभी एक पैसे की जलेबी भी लाकर दी है उसके खसम ने? पाट का दाम भगत के यहाँ से लेकर बाहर-ही-बाहर बैल-हट्टा चले गए। बिरजू की माँ को एक बार लमरी नोट भी देखने नहीं दिया अपनी आँख से। बैल खरीद आए। उसी दिन से गाँव में ढिंढोरा पीटने लगे, “बिरजू की माँ इस बार बैलगाड़ी पर चढ़कर जाएगी नाच देखने।’ दूसरे की गाड़ी के भरोसे नाच दिखाएगा!
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) बिरजू के बाप पर किसका गुस्सा चढ़ा और चढ़ता जा रहा है और क्यों?
(ग) बिरजू की माँ को बिरजू के बाप से क्या शिकायत रही है?
(घ) इस गद्यांश में ग्रामीण जीवन में जी रहे पति-पत्नियों के पारिवारिक प्रेम के स्वरूप की चर्चा करें।
उत्तर-
(क) पाठ-लालपान की बेगम, लेखक-फणीश्वरनाथ रेणु।

(ख) यहाँ बिरजू के बाप पर उसकी पत्नी का गुस्सा चढ़ा है और चढ़ता जा रहा है। इसका कारण यह है कि जिस दिन बिरजू का बाप बैल खरीदकर बैल के साथ घर आया था, उसी दिन उसने यह ढिंढोरा पीट दिया था कि इस बार बलरामपुर में होनेवाले नाच को देखने के लिए वह अपने परिवार को बैलगाड़ी से ले जाएगा। उसके पास तो अब अपने बैल हो ही गए हैं और गाड़ी तो माँगने से आसानी से मिल ही जाएगी। उसी दिन से बिरजू की माँ नाच में जाने के आज के दिन का बेसब्री से इंतजार कर रही है। लेकिन आज वह गाड़ी की खोज में जो सबेरे निकला है, सो अभी तक नहीं आया है। संध्या क्या, रात भी दो पहर बीत गई है। अतः बिरजू की माँ अब विश्वस्त हो गई है कि नाच देखने का उसका कार्यक्रम फेल हो गया है। उसे इस बात की चिंता ज्यादा है कि कल गाँव की औरतें जब ताना मार-मारकर इस बात को मजाक का विषय बना देंगी तो उसका क्या हाल होगा। इसी कारण से उत्पन्न मनः स्थिति में अपने पति पर वह जल भुन रही है और उपर्युक्त कथन के रूप में अपने पति की मन-ही-मन शिकायत कर रही है।

(ग) बिरजू की माँ को बिरजू के बाप से कई शिकायतें रही हैं। उसकी पहली शिकायत यह है कि वह चुस्त, चालाक और होशियार न होकर गोबर-गणेश है। उसकी दूसरी शिकायत है कि उस बेचारी ने कोल्हू के बैल की तरह खट-खटकर उसे हर तरह का सुख दिया है लेकिन उसने इसके इस कष्ट और बलिदान के प्रति तनिक भी संवेदनशीलता नहीं दिखाई है। उसकी तीसरी शिकायत यह रही है कि उसके पति ने उसकी सुख-सुविधा तथा इच्छा की पूर्ति की ओर कभी कुछ ध्यान नहीं दिया और इसीलिए उसे आज तक एक पैसे की जलेबी भी लाकर नहीं दी हैं। उसकी चौथी शिकायत अपने पति से इस रूप में है कि उसने उसे बिना कुछ कहे, चुपचाप अपने मन से अपने खेत के पाट के पैसे से बैल खरीद लिया और अपनी पत्नी को एक सौ रुपए के नोट देखने का भी सौभाग्य नहीं दिया, और अंतिम शिकायत यह है कि उसने वादा कर और ढिंढोरा पीटकर उसे बलरामपुर के नांच के कार्यक्रम में ले चलने के लिए कहा था, लेकिन समय बीत जाने पर भी अभी तक गाड़ी लेकर नहीं आया।

(घ) प्रस्तुत गद्यांश में ग्रामीण जीवन जी रहे पति-पत्नियों के बीच पल और चल रहे प्रेम के सहज खट्टे-मीठे स्वरूप का लेखक ने बड़ा स्वाभाविक चित्र प्रस्तुत किया है। दैनिक जीवन में स्वाभाविक रूप से जी रहे जीवन में पत्नी को अपने पति से इस ढंग की शिकायत रहना बिल्कुल स्वाभाविक बात है। पत्नी नारी होने के कारण विशेष भावुक और भावमयी होती है। इसलिए सामान्य-सी बात तथा पति के व्यवहार पर मन पर ठेस-सा लग जाना-यह कोई बड़ी बात नहीं हैं। यह दांपत्य जीवन में प्रेमसूत्र से बँधी पत्नी के नारी मनोविज्ञान के बिलकुल अनुकूल है। इसे हम शिकायत मानकर पत्नी का उपालंभ ही कहेंगे जो प्रेम के क्षेत्र का एक शाश्वत स्वरूप होता है।

5. अंत में उसे अपने-आप क्रोध आया। वह खुद भी कुछ कम नहीं। उसकी जीभ में आग लगे। बैलगाड़ी पर चढ़कर नाच देखने की लालसा किस . कुसमय में उसके मुंह से निकली थी, भगवान जाने। फिर सुबह से लेकर आज दोपहर तक किसी-न-किसी बहाने उसने अट्ठारह बार बैलगाड़ी पर नाच देखने जाने की चर्चा छेड़ी है। लो खूब देख लो नाचा वाह रे ‘नाच! कथरी के नीचे दुशाले का सपना! कल भोरे जब पानी भरने जाएगी, पतली जीभ वाली पतुरिया सब हँसती आएँगी, हँसती जाएंगी। सभी जलते हैं उससे हाँ भगवान दाढ़ी जार भी। दो बच्चे की माँ होकर वह जस-की-तस है। उसका घरवाला उसकी बात में रहता है। वह बालों में गरी का तेल डालती है। उसकी अपनी जमीन है। है किसी के पास एक धूर जमीन भी अपनी इस गाँव में! जलेंगे नहीं, तीन बीघे में धान लगा हुआ है, अगहनी। लोगों की बिखदीठ से बचे तब तो।
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) उसे अर्थात् किसे अपने-आप पर क्या सोचकर क्रोध आया?
(ग) “कथरी के नीचे दुशाले का सपना’-इस कथन का आशय लिखिए।
(घ) पतली जीभवाली पतुरिया सब हँसती आएँगी और हँसती जाएँगी-प्रसंग के साथ इस कथन का अर्थ स्पष्ट करें।
(ङ) सभी जलते हैं उससे भगवान दाढ़ी जार भी! यह कथन किसका है? सभी किन बातों (कारणों) पर उससे जलते हैं?
उत्तर-
(क) पाठ-लालपान की बेगम, लेखक-फणीश्वरनाथ रेणु।

(ख) यह कथन ‘लालपान की बेगम’ शीर्षक कहानी की नायिका बिरजू की माँ का है। वह क्रोध और खीझ की मन स्थिति में अपने दोषगत स्वभाव पर दोष लगा रही है कि उसे बैलगाड़ी से नाच देखने जाने की बात की चर्चा नहीं करनी चाहिए थी। वह नाच देखने जाने में बैलगाड़ी के अभाव में बिलकुल लाचार है। उसके पहले से प्रचारित नाच में जाने के कार्यक्रम का हल्ला भी हो गया और वह गई भी नहीं। गांववालों के बीच उसकी यह कैसी बेइज्जती और अपमान की बात – है। यही सब सोचकर उसे अपने ऊपर क्रोध आया।

(ग) आलोच्य कथन बड़ा सटीक, प्रसंगानुकूल और सार्थक है। यह कथन कहानी की नायिका बिरजू की माँ का है। वह खीझ और क्रोध की मन:स्थिति में यह कथन वाक्य बोलती है। उसने बैलगाड़ी द्वारा सपरिवार सजी-धजी पोशाक में नाच देखने जाने का मनसूबा बनाया था। उस मनसूबे को पति द्वारा बैलगाड़ी न लाने के कारण बिखरते देख वह खीझ और क्रोध से भर गई और अपने आपको इस व्यंग्यभरे कथन से कोसने लगी कि साधनहीन गरीब आदमी को बड़े आदमी वाला सपना नहीं देखना चाहिए। यह सपना तो ऐसा ही है जैसे कोई दीन-हीन चिथड़े में लिपटा आदमी दुशाला ओढ़ने का सपना देखे।

(घ) यह कथन ‘लालपान की बेगम’ शीर्षक कहानी की नायिका बिरजू की माँ का है। उसका बैलगाड़ी से नाच देखने जाने का जो कार्यक्रम था, वह उसके पति द्वारा बैलगाड़ी नहीं लाने के कारण, स्थगित होने को था। उसने नाच में बैलगाड़ी से जाने के कार्यक्रम का प्रचार ढोल पीटकर किया था। उसे लगा कि इस बात पर सभी लोग सहानुभूति जताने के बदले उसकी हँसी उड़ाएँगे क्योंकि सभी लोग इन कारणों से उससे जले रहते हैं। वे कारण हैं कि दो बच्चे की माँ होकर भी अभी उसका शरीर सौंदर्य और आकर्षण का केंद्र बना हुआ ही है। उसका पति उसके अनुकूल चलता है। उसके पास धान की फसलवाली तीन बीघे की और अन्य अपनी जमीन है।

Bihar Board Class 9 History Solutions Chapter 1 भौगोलिक खोजें

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions History इतिहास : इतिहास की दुनिया भाग 1 Chapter 1 भौगोलिक खोजें Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science History Solutions Chapter 1 भौगोलिक खोजें

Bihar Board Class 9 History भौगोलिक खोजें Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

निर्देश : नीचे दिये गये प्रश्न में चार संकेत चिह्न हैं जिनमें एक सही या सबसे उपयुक्त हैं । प्रश्नों का उत्तर देने के लिए प्रश्न संख्या के सामने वह संकेत चिह्न (क, ख, ग, घ) लिखें जो सही अथवा सबसे उपयुक्त हों।

भौगोलिक खोजें Bihar Board Class 9 History प्रश्न 1.
वास्कोडिगामा कहाँ का यात्री था ?
(क) स्पेन
(ख) पुर्तगाल
(ग) इंग्लैण्ड
(घ) अमेरिका
उत्तर-
(ख) पुर्तगाल

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 2.
यूरोपवासियों ने दिशासूचक यंत्र का प्रयोग किनसे सीखा?
(क) भारत से
(ख) रोम से
(ग) अरबों से
(घ) चीन से
उत्तर-
(ग) अरबों से

Bhogolik Khoj 9th Class Bihar Board प्रश्न 3.
उत्तमाशा अंतरीप (Cape of good hope) की खोज किसने की?
(क) कोलम्बस
(ख) वास्कोडिगामा
(ग) मैग्लेन
(घ) डियाज बार्थोलोमियो
उत्तर-
(घ) डियाज बार्थोलोमियो

Bihar Board Class 9th History Solution प्रश्न 4.
अमेरिका की खोज किस वर्ष की गई ?
(क) 1453
(ख) 1492
(ग) 1498
(घ) 1519
उत्तर-
(ख) 1492

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 5.
कुस्तुनतुनिया का पतन किस वर्ष हुआ?
(क) 1420
(ख) 1453
(ग) 1510
(घ) 1498
उत्तर-
(क) 1420

Bihar Board Solution Class 9 History प्रश्न 6.
विश्व का चक्कर किस यात्री ने सर्वप्रथम लगाया ?
(क) मैग्लेन
(ख) कैप्टनं कुक
(ग) वास्कोडिगामा
(घ) मार्कोपोलो
उत्तर-
(क) मैग्लेन

सही और गलत

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 1.
भारत के मूल निवासियों को रेड इंडियन कहा जाता है।
उत्तर-
गलत

Bihar Board Class 9 History Chapter 1 प्रश्न 2.
उत्तमाशा अंतरीप की खोज ने भारत तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त किया।
उत्तर-
सही

Bihar Board 9th Class Social Science Book Pdf प्रश्न 3.
भारत अटलांटिक महासागर के पूर्वी तट पर स्थित है।
उत्तर-
गलत

Bihar Board Solution Class 9 प्रश्न 4.
मोर्कोपोलो ने भारत की खोज की।
उत्तर-
गलत

Bihar Board Class 9 History Solution प्रश्न 5.
जेरूशलम वर्तमान ‘इजरायल’ में है।
उत्तर-
सही

प्रश्न 6.
लिस्बन दास-व्यापार का बहुत बड़ा केन्द्र था।
उत्तर-
सही

प्रश्न 7.
अमेरिगु ने नई दुनिया को विस्तार से खोजा ।
उत्तर-
सही

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत आने में किस भारतीय व्यापारी ने वास्कोडिगामा की मदद की?
उत्तर-
अब्दुल मजीद ने ।

प्रश्न 2.
न्यूफाउन्डलैंड का पता किसने लगाया ?
उत्तर-
सर जान और सेवास्टिन केवेट ने न्यूफाउन्डलैंड का पता लगाया ।

प्रश्न 3.
यूरोपियों द्वारा निर्मित तेज चलने वाले जहाज को क्या कहा जाता था?
उत्तर-
केरावल कहा जाता था।

प्रश्न 4.
दक्षिण अफ्रिका का दक्षिणतम बिंदु कौन-सा स्थल है ?
उत्तर-
दक्षिण अफ्रिका का दक्षिणतम बिन्दु उत्तमाशा अंतरीप (Cape of good hope) है।

प्रश्न 5.
11वीं-12वीं शताब्दी में ईसाई एवं मुसलमानों के बीच धर्मयुद्ध क्यों हुआ था ?
उत्तर-
11वीं-12वीं शताब्दी में जेरूशलम पर अधिकार के मुद्दे को लेकर धर्मयुद्ध हुआ था।

प्रश्न 6.
1453 में कस्तुनतुनिया पर किसने आधिपत्य जमाया ?
उत्तर-
तुर्की ने।

प्रश्न 7.
पुर्तगाल एवं स्पेन किस महासागर के पास अवस्थित हैं ?
उत्तर-
पुर्तगाल एवं स्पेन अटलांटिक महासागर के पास अवस्थित है।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
यूरोप में मध्यकाल को अंधकार का युग क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
मध्यकालीन यूरोप को अंधकार युग इसलिए कहा गया है कि यह काल सामंती प्रवृत्तियों का काल था। इस काल में न तो व्यापार-वाणिज्य गतिशील था और न ही धर्म का स्वरूप ही मानवीय था। पृथ्वी के बारे । में ज्ञान अत्यल्प था और अंधविश्वास से युक्त था।

प्रश्न 2.
भौगोलिक खोजों में वैज्ञानिक उपकरणों का क्या योगदान था ?
उत्तर-
इस काल में हुए नये-नये वैज्ञानिक उपकरणों के आविष्कारों ने समुद्री यात्रा अर्थात् भौगोलिक खोजों को आसान कर दिया। जैसे दिशासूचक यंत्र, दूरबीन तथा मानचित्र के सुधार एवं, नई किस्म के हल्केऔर तेज चाल से चलने वाले जहाज ‘केरावल’ के बनने से भौगोलिक खोज आसान हो गए । इन सभी का बड़ा ही योगदान रहा।

प्रश्न 3.
भौगोलिक खोजों ने व्यापार-वाणिज्य पर किस प्रकार प्रभाव डाले?
उत्तर-
भौगोलिक खोजों ने नये देशों की खोज एवं नये व्यापारिक संपर्कों ने यूरोपीय व्यापार-वाणिज्य में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाये । उपनिवेशों के आर्थिक शोषण से यूरोपीय देश समृद्ध होने लगे । इस प्रगति ने यूरोपीय व्यापार को चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया । अतः मुद्रा व्यवस्था का विकास हुआ। हुंडी, ऋणपत्र आदि व्यापारिक साख का विकास हुआ । व्यापार अपने स्थानीय स्वरूप से विकसित होकर वैश्विक रूप लेने लगा।

प्रश्न 4.
भौगोलिक खोजों ने किस प्रकार भ्रांतियों को तोड़ा?
उत्तर-
भौगोलिक खोजों ने भौगोलिक ज्ञान के संदर्भ में पर्याप्त भ्रांतियों को तोड़ने का कार्य किया । इससे चर्च द्वारा प्रसारित अवधारणाओं पर अंगुली उठने लगी। कालान्तर में यह यूरोप में धर्म सुधार आंदोलन का कारण बना। नए गोलार्द्ध के आविष्कार से यूरोप की क्षुद्रता और दुनिया की महत्ता की अभूतपूर्व जानकारी ने मनुष्य को नए-नए आविष्कारों के रास्ते पर खड़ा कर दिया । इसका संदेश स्पेनिश सिक्के ‘सामने और भी है’ से स्पष्ट होता है।

प्रश्न 5.
भौगोलिक खोजों ने किस प्रकार विश्व के मानचित्र में परिवर्तन लाया?
उत्तर-
भौगोलिक खोजों के पहले समाज अंधविश्वास से युक्त था। अमेरिका अर्थात नई दुनिया की खोज, भारत की खोज तथा आस्ट्रेलिया की खोज से उपनिवेशों की स्थापना होने लगी। फलस्वरूप साम्राज्यवाद का विकास होने लगा। यूरोपीय देशों की सभ्यता, संस्कृति, धर्म आदि का विस्तार हुआ। सारे देश सिमट कर एक हो गए। इससे दुनिया का एकीकरण यूरोपीकरण के द्वारा हुआ। अतः विश्व के मौलिक मानचित्र में परिवर्तन तो नहीं हुआ पर राजनैतिक परिवर्तन अवश्य हो गया ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भौगोलिक खोजों का क्या तात्पर्य है ? इसने किस प्रकार विश्व की दूरियाँ घटाईं ?
उत्तर-
विश्व की प्रारम्भिक सभ्यताओं के काल से ही व्यापार-एवं वाणिज्य परस्पर सम्पर्क का कारण रहा है । यह व्यापार मुख्यतः एक निश्चित मार्ग के माध्यम से होता था । परन्तु विश्व के कई ऐसे क्षेत्र थे, जिनमें जन जीवन तो विद्यमान था लेकिन शेष विश्व से उनका जुड़ाव नहीं था, जैसे-अमेरिका, अफ्रिका, आस्ट्रेलिया तथा एशिया के कुछ हिस्से । इन्हीं क्षेत्रों की समुद्री मार्ग द्वारा खोज हुई या समुद्री यात्रा से इन नए-नए देशों का पता लगा जिसे भौगोलिक खोज कहते हैं।

भौगोलिक खोजों के कारण विश्व की दूरियाँ कम हो गई। इस घटना ने पहली बार लोगों को संसार के वृहत भूखण्ड से परिचित कराया और विश्व के देश एक-दूसरे के सम्पर्क में आये। एशिया और यूरोप की विभिन्न सभ्यताओं का जो पहले से अलग थी, परस्पर संपर्क स्थापित हुआ। यूरोप वालों ने अपनी सभ्यता-संस्कृति, धर्म एवं साहित्य का प्रचार-प्रसार किया । इसके कारण लोगों में आपसी भेद-मतभेद दोनों तरह की भावनाओं का विकास हुआ; फलत: इसी प्रकार की दूरियाँ कम हुईं।

प्रश्न 2.
भौगोलिक खोजों के कारणों की व्याख्या करें। उत्तर-भौगोलिक खोजों के निम्नलिखित कारण थे-
उत्तर-

  • धर्मयुद्ध-धर्मयुद्ध 11वीं-12वीं शताब्दी में जेरूशलम की घटनाक्रम थी। इसके दौरान ही यूरोपियनों को यह महसूस होने लगा था कि दुनिया के हर पहलू को समझा जाए । अतः भौगोलिक खोजों को प्रोत्साहन मिला।
  • कस्तुनतुनिया पर तुर्की का आधिपत्य-कस्तुनतुनिया पर तुर्की का आधिपत्य होने से यूरोपीय व्यापारियों के लिए इस मार्ग से व्यापार करना ठीक नहीं रहा क्योंकि तुर्कों ने इस मार्ग से व्यापार के बदले भारी कर वसूलना शुरू किया था, जिसका हल ढूढ़ना यूरोपियनों के लिए आवश्यक था।
  • नये-नये आविष्कार-इस काल में हुए नये-नये आविष्कारों ने समुद्री यात्रा एवं नौ सेना के विकास को आसान कर दिया । कम्पास, दूरबीन, हल्के, मजबूत और तेज जहाज बने इन नये उपकरणों एवं साहस के बल पर यूरोपीय नाविकों ने अटलांटिक एवं भूमध्यसागर में अपने जहाज उतारे । फलस्वरूप भौगोलिक खोजें हुईं।
  • पुर्तगाल के राजकुमार और स्पेन की महारानी का सहयोग-पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी-द-नेवीगेटर तथा स्पेन की महारानी ईसावेला ने भौगोलिक खोजों को प्रोत्साहन दिया तथा जाने का खर्च आदि देकर बिदा किया।

प्रश्न 3.
नये अन्वेषित भूभागों को विश्व के मानचित्र पर अंकित करें औरयह बतादें कि भौगोलिक खोजों से पूर्व आप यदि यूरोप में होते तो भारत से किस-प्रकार व्यापार करते?
उत्तर-
नये अन्वेशित भूभागों में-
Bihar Board Class 9 History Solutions Chapter 1 भौगोलिक खोजें - 1

  • कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की 1942 में।
  • बार्थो० ने Cape of good hope का 1488 में खोज की।
  • वास्कोडिगामा ने कालीकट (भारत) में 1498 में प्रवेश किया।
  • कैप्टन कुक ने आस्ट्रेलिया की खोज की।

भौगोलिक खोजों से पूर्व यदि मैं यूरोप में होता तो वही मा: जिस कोलम्बस ने अपनाया था, चलकर जहाज द्वारा भारत आता ।

प्रश्न 4.
अंधकार युग से क्या समझते हैं ? अंधकार युग से बाहर आने में भौगोलिक खोजों ने किस प्रकार मदद की ?
उत्तर-
मध्यकालीन यूरोपीय इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि यह काल सामंती प्रवृतियों का काल था। इस काल 1 न तो. व्यापार-वाणिज्य गतिशील था और न ही धर्म का स्वरूप उदार एवं मानवीय था । पृथ्वी के विषय में ज्ञान अत्यल्प एवं अंधविश्वास से युक्त था । भौगोलिक ज्ञान सीमित था अतः सामुद्रिक व्यापार भी सीमित था। उस समय लोगों को विश्वास था कि अधिकतम दूरी पर जाने पर पृथ्वी के किनारों से गिरकर अनन्त में विलीन हो जाना पड़ेगा । यही युग अंध कार युग के नाम से जाना जाता है ।

अंधकार युग से बाहर आने में भौगोलिक खोजों का महत्वपूर्ण स्थान है । भौगोलिक खोजों के कारण आपसी जानकारी मिली, लोग एक दूसरे के निकट आए । एशिया और यूरोप की सभ्यताओं का मेल हुआ और एक दूसरे की सभ्यता और संस्कृति से परिचय हुआ। ईसाई धर्म का प्रचार अफ्रिका, एशिया तथा अमेरिका में किया गया । इस धर्म के व्यापक प्रचार ने चर्च की प्रभुसत्ता को कम किया । भौगोलिक खोजों के कारण हुई ज्ञान में वृद्धि से धर्म पर भी प्रभाव पड़ा कितने ही स्थलों पर अंधविश्वासों का खंडन हुआ। इस प्रकार लोग अंधकार युग से बाहर आए।

प्रश्न 5.
भौगोलिक खोजों के परिणामों का वर्णन करें। इसने विश्व पर क्या प्रभाव डाला?
उत्तर-
भौगोलिक खोजों के दूरगामी परिणाम हुए । ते निम्नलिखित हैं :

  • व्यापार-वाणिज्य पर प्रभाव-नये देशों की खोज में नय व्यापारिक संपर्कों ने यूरोपीय व्यापार-वाणिज्य शोषण से यूरोपीय देश समृद्ध होने लगे। हुंडी, ऋणपत्र आदि का व्यापारिक साख का विकास हुआ। इसमें 80 वर्षों तक यूरोपीय अर्थव्यवस्था चाँदी पर रही।
  • औपनिवेशिक साम्राज्यों का विकास-साम्राज्यवाद का विकास जारी रहा। इंग्लैण्ड, हॉलैंड, स्वीडेन, डेनमार्क, फ्रांस आदि देशों में कम्पनियां स्थापित हुईं।
  • वाणिज्यवाद का विकास-इसके फलस्वरूप आधुनिक पूँजीवाद । का विकास हुआ। अंतराष्ट्रीय स्तर पर सोने चाँदी की लूट हुई।
  • दास व्यापार का विकास-व्यापार में ‘मानव-श्रम’ की महत्ता ने दास व्यापार को प्रोत्साहित किया । गुलामों को जंगल काटने, कृषि कार्य कराने के लिए मजदूरों की खरीद-बिक्री होती थी।
  • ईसाई धर्म का प्रसार-यूरोप वाले उपनिवेशों में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया ।