Bihar Board 12th Psychology Important Questions Long Answer Type Part 5

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Bihar Board 12th Psychology Important Questions Long Answer Type Part 5

प्रश्न 1.
प्रेक्षण का मूल्यांकन एक मनोवैज्ञानिक कौशल के रूप में करें।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक चाहे किसी भी क्षेत्र में कार्य कर रहे हो वह अधिक-से-अधिक समय ध्यान से सुनने तथा प्रेक्षण कार्य करने में लगा देते हैं। मनोवैज्ञानिक अपनी संवेदनाओं का प्रयोग देखने, सुनने, स्वाद लेने या स्पर्श करने में लेते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मनोवैज्ञानिक एक उपकरण है। जो अपने परिवेश के अन्तर्गत आनेवाली समस्त सचनाओं का अवशोषण कर लेता है।

मनोवैज्ञानिक व्यक्ति के भौतिक परिवेश के उन हिस्सों के प्रेक्षण के उपरांत शीक्त तथा उसके व्यवहार का भी प्रेक्षण करता है। मनोवैज्ञानिक व्यक्ति के भौतिक परिवेश में इन हिस्सों के प्रेक्षण के उपरांत व्यक्ति तथा उसके व्यवहार का भी प्रेक्षण करता है। जिसके अन्तर्गत व्यक्ति की आय, लिंग, कद, उसका दूसरे से व्यवहार करने का तरीका आदि सम्मिलित होते हैं।

प्रेक्षण के दो प्रमुख कारण हैं-

  1. प्रकृतिवादी प्रेक्षण
  2. सहभागी प्रेक्षण।

(i) प्रकृतिवादी प्रेक्षण-उस प्रेक्षण के माध्यम से हम यह सीखते हैं कि लोग अलग-अलग परिस्थितियों में किस प्रकार व्यवहार करते हैं। यह सबसे प्राथमिक तरीका है।

(ii) सहभागी प्रेक्षण- इस प्रेक्षण में प्रेक्षक प्रेक्षण की प्रक्रिया में एक सक्रिय सदस्य के रूप में संलग्न होता है अर्थात प्रेक्षक जो प्रेक्षण कर रहा है। वह खुद अपने ऊपर भी ऐसा प्रेक्षण कर सकता है।

मनोवैज्ञानिक सेवाओं की दशा में विशिष्ट कौशल एक मूल कौशल है। मुख्यतः विशिष्ट कौशल की आवश्कताएँ विशिष्ट व्यावसायिक कार्यों को करने में होती है। उदाहरणार्थ, नैदानिक परिस्थितियों में काम करने वाले मनोवैज्ञानिक को चिकित्सापरक तकनीक मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन एवं परामर्श में पूर्ण रूप जानकारी प्राप्त होनी चाहिए। इसी प्रकार से संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक जो केवल संगठन के क्षेत्र में कार्य करते हैं। उन मनोवैज्ञानिकों को भी शोध, कौशलों के अतिरिक्त मूल्यांकन सुगमीकरण, परामर्श तथा व्यावहारपरक कौशलों की भी आवश्यकता होती है। जिसके परिणामस्वरूप वह व्यक्ति, संगठनों समूहों के विकास की प्रक्रिया को सरलता से जान लें। ये सभी कौशल आपस में एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। विशिष्ट कौशलों के अन्तर्गत सक्षमताओं के आधार पर उन्हें निम्नवत वर्गीकृत किया जा सकता है-

  1. मनोवैज्ञानिक परीक्षण कौशल
  2. साक्षात्कार कौशल
  3. परीक्षण कौशल
  4. परामर्श कौशल
  5. सम्प्रेषण कौशल।

प्रश्न 2.
चिन्ता विकृति के लक्षण एवं कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
चिन्ता मनः स्नायुविकृति एक ऐसा मानसिक रोग है, जिसमें रोगी हमेशा अज्ञात कारणों से चिन्तित रहा करता है। सामान्य चिन्ता एक सामान्य, स्वाभाविक औ. सर्वसाधारण मानसिक अवस्था है। जीवन में जटिल परिस्थितियों में यह अनिवार्य रूप से होता है। वर्तमान भयावह परिस्थिति से डरना या चिन्तित होना सामान्य अनुभव है। इसके लिए व्यक्ति डर की प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। जैसे-बाघ को सामने आता देखकर व्यक्ति सामान्य चिंता के फलस्वरूप भयभीत होने या भागने की क्रिया करता है। व्यक्ति में ऐसी भयावह परिस्थिति की अवगति रहती है। उसी के संतुलन के लिए वह किसी प्रकार की प्रतिक्रिया करता है। सामान्य चिन्ता का संबंध वर्तमान भयावह परिस्थितियों से रहता है। लेकिन सामान्य चिन्ता से असामान्य चिन्ता पूर्णतः भिन्न है। इसमें व्यक्ति चिन्तित या भयभीत रहता है, लेकिन सामान्य चिन्ता के समाने उसकी चिन्ता का विषय नहीं रहता। उसकी अपनी चिन्ता का कारण ज्ञात नहीं रहता।

उसकी चिन्ता पदार्थहीन होती है। अतः अपने विभिन्न शारीरिक उपद्रवों को व्यक्त करता है। वस्तुतः उसे अपने मानसिक उपद्रव का ज्ञान नहीं रहता। इसके अतिरिक्त उसकी चिन्ता का संबंध हमेशा भविष्य से रहता है, वर्तमान से नहीं। इसलिए उसमें निराकरणात्मक सामान्य चिन्ता की तरह प्रतिक्रिया देखने में नहीं आती है, अत: हम कह सकते हैं कि सामान्य चिन्ता भयावह परिस्थितियों की प्रतिक्रिया है। सामान्य चिन्ता के संबंध में असामान्य चिन्ता आन्तरिक भयावह परिस्थितियों की प्रतिक्रिया है।

सामान्य चिन्ता के संबंध में फिशर (Fisher) ने कहा-“सामान्य चिन्ता उन उलझी हुई कठिनाइयों की प्रतिक्रिया है जिसका परित्याग करने में व्यक्ति अयोग्य रहता है।” (Normal anxiety is a reaction to an unapprochable difficults which the individual is unable to avoid.) vafot 37H14R fantil के संबंध में उनका विचार है कि ‘असामान्य चिन्ता उन आन्तरिक या व्यक्तिगत उलझी हुई कठिनाइयों की प्रतिक्रिया है, जिसका ज्ञान व्यक्ति को नहीं रहता।” (Neurotic anxiety is a reaction to an unapproachable inner or sub-jective difficult of which the individual has no idea.)

चिन्ता मनःस्नायु विकृति (Symptoms of anxiety neurosis)-चिन्ता मनःस्नायु विकृति में शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के लक्षण देखे जाते हैं। मानसिक लक्षण में भय और आशंका की प्रधानता रहती है, जबकि शारीरिक लक्षण में हृदय गति, रक्तचाप, श्वास गति, पाचन-क्रिया आदि. में परिवर्तन देखे जाते हैं। उनका वर्णन निम्नलिखित हैं-

1. मानसिक लक्षण (Mental symptoms)-मानसिक लक्षणों में अतिरजित भय और शंका की प्रधानता रहती है। यह अनिश्चित और विस्तृत होता है। इसका रोगी तर्कयुक्त प्रमाण नहीं कर सकता, किन्तु पूरे विश्वास के साथ जानता है कि उसका सोचना सही है। उसकी शंका किसी दुर्घटना से संबंध होती है। घर में आग लगने, महामारी फैलने, गाड़ी उलटने, दंगा होने या इसी प्रकार की अन्य घटनाओं के प्रति वह चिंतिन रहता है। वह हमेशा अनुभव करता है कि बहुत जल्द ही कुछ होनेवाला है। इस संबंध में अनेक काल्पनिक विचार उसके मन में आते रहते हैं। वह दिन-रात इसी विचार से परेशान रहता है उसमें उत्साह की कमी हो जाती है और मानसिक अंतर्द्वन्द्व बहुत अधिक हो जाता है। चिन्ता से या तो वह अनिद्रा का शिकार हो जाता है या नींद लगने पर तुरन्त जाग जाता है। ऐसे रोगियों में मृत्यु, अपमान आदि भयावह स्वप्नों की प्रधानता रहती है, उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। इसका रोगी कभी-कभी आत्महत्या का भी प्रयास करता है।

2. शारीरिक लक्षण (Physical symptoms)-चिन्ता मन:स्नायु विकृति के रोगियों में शारीरिक लक्षण भी बड़ी उग्र होते हैं। रोगी के हृदय की गति, रक्तचाप, पाचन-क्रिया आदि में परिवर्तन हो जाते हैं। पूरे शरीर में दर्द का अनुभव करता है। कभी-कभी चक्कर भी आता है। रोगी के शरीर से बहुत अधिक पसीना निकलता है। वह बोलने में हलकाता है तथा बार-बार पेशाब करता है, उसे शारीरिक वजन घटता हुआ मालूम पड़ता है। यौन भाव की कमी हो जाती है। इसके रोगी तरह-तरह की आवाजें सुनते हैं। कुछ लोगों को शिश्न छोआ होने का भय बना रहता है।

इस प्रकार के रोगियों में दो प्रकार की चिन्ता देखी जाती है-तात्कालिक चिन्ता तथा दीर्घकालिक चिन्ता। तात्कालिक चिन्ता रोगी में बहुत तीव्र तथा उग्र होती है। यह चिन्ता तुरन्त की होती है। इसमें रोगी चिल्लाता है तथा पछाड़ खाकर गिरता है। दीर्घकालिक चिन्ता पुरानी होती है। रोगी अज्ञात भावी दुर्घटनाओं के प्रति चिन्तित रहता है। वह निरंतर इस चिन्ता से बेचैन रहता है और त्रस्त रहता है। इस रोग का लक्षण के आधार पर ही विद्वानों ने दो भागों में विभाजित किया है -मुक्तिचारी चिन्ता तथा निश्चित चिन्ता। चिन्ता के कारण का अभाव नहीं रहने पर भी जब रोगी बराबर बेचैन रहता है तो उसे free floating anxiety कहते हैं, लेकिन जब रोगो किसी परिस्थिति विशेष से अपनी चिन्ता का संबंध स्थापित कर लेता है तो उसे bound anxiety कहा गया है प्रारंभ में रोगी में मक्तिचारी चिन्ता हो रहता है, लेकिन क्रमशः स्थायी रूप धारण कर लेने पर उसे निश्चित चिन्ता बन जाती है।

चिन्ता मनःस्नायु विकृति के कारण (Etiology)-अन्य मानसिक रोगों की तरह चिन्ता पनःस्नायु विकाते के कारणों को लेकर भी मनोवैज्ञानिकों में एकमत का अभाव है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा जो कारण बताये गये हैं, उनमें कुछ मुख्य निम्न हैं-

1. लैंगिक वासना का दमन (Repression of sexual desire)-सुप्रसिद्ध मनोविश्लेषक फायड ने लैंगिक इच्छाओं के दमन को इस मानसिक रोग का कारण माना है। व्यक्ति में लैंगिक आवेग उत्पन्न होता है और यदि वह आवेग की पूर्ति में असफल हो जाता है, उसमें चिन्ता उत्पन्न होती है। यही इस रोग के लक्षणों को विकसित करती है। अत:स्रावित लैंगिक शक्ति को इस रोग का कारण माना जा सकता है। किसी पति की यौन सामर्थता या स्त्री में यौन उत्तेजना होने पर चलनात्मक स्रात नहीं होने से वह इस रोग से पीड़ित हो जाता है। इसी प्रकार पुरुष अपनी असमर्थता या स्त्री दोषी होने के कारण इस रोग से पीड़ित हो सकता है।

फ्रायड के उपर्युक्त मत से मनोवैज्ञानिक सहमत नहीं है। इस संबंध में गार्डेन का विचार है कि कामेच्छा का दमन और उसका प्रतिबंध हो इस रोग का कारण नहीं, बल्कि दो संवेगों के संघर्ष के फलस्वरूप इस रोग के लक्षण विकसित होते हैं। इस बात का पैकडुवल ने भी समर्थन किया है।

2. हीन भावना (Inferiority complex)-इस संबंध के फ्रायड के शिष्य एडलर ने भी अपना विचार व्यक्त किया है। उनका कहना है कि मनुष्य में आत्म प्रतिष्ठा की भावना प्रबल होती है, किन्तु बचपन में आश्वासन की शिथिलता के कारण जब व्यक्ति के Ego का समुचित रूप से विकास नहीं हो पाता है, तो वह हीनता की भावना से पीड़ित रहने लगता है। उसमें आत्म प्रतिष्ठा की भावना का दमन हो जाता है और व्यक्ति चिन्ता गनःस्नायु विकृति से पीड़ित हो जाता है।

3. मानसिक संघर्ष एवं निराशा (Mental conflict and frustration)-ओकेली का ऐसा मानना है कि इस रोग का कारण मानसिक संघर्ष एवं कुंठा है। इस संबंध में और भी मनोवैज्ञानिकों ने अपना अध्ययन किया है और ओकेली के मत का समर्थन किया है।
इस तरह हम देखते हैं कि चिन्ता मनःस्नायु विकृति के कारणों को लेकर सभी मनोवैज्ञानिक एक मत नहीं है। इस रोग के कारण के रूप में मुख्य रूप से लैंगिक वासना का दमन, हीनभावना तथा मानसिक संघर्ष एवं निराशा को माना जा सकता है।

प्रश्न 3.
प्रेक्षण कौशल के दो प्रमुख उपागमों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रक्षेपण के दो प्रमुख उपागम हैं

  1. प्रकृतिवादी प्रेक्षण
  2. सहभागी प्रेक्षण।

(1) प्रकृतिवादी प्रेक्षण-एक प्राथमिक तरीका है जिससे हम सीखते हैं कि लो भिन्न स्थिति में कैसे व्यवहार करते हैं। मान लजिए, कोई चाहता है कि जब कोई कंपनी अपनी उत्पाद की घोषणा करती है तो उसकी प्रतिक्रियास्वरूप लोग शॉपिंग मॉल जाने पर कैसा व्यवहार करते है। इसके लिए वह उस शॉपिंग मॉल में जा सकता है जहाँ इन छूट वाली वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। क्रमबद्ध ढंग से यह प्रेक्षण कर सकता है। कि लोग खरीददारी के पहले या बाद में क्या कहते या करते हैं। उनके तुलनात्मक अध्ययन से वहाँ क्या हो रहा है, इसके बारे में रुचिकर सुझाव बना सकता है।

(2) सहभागी पेक्षण-प्रकृतिवादी प्रेक्षण का ही एक प्रकार है। इसमें प्रेक्षक प्रेक्षण की प्रक्रिया में सक्रिय सदस्य के रूप में संलग्न होता है। इसके लिए वह स्थिति में स्वयं भी सम्मिलित हो सकता है जहाँ प्रेक्षण करना है। उदाहरण के लिए ऊपर दी गई समस्या में, प्रेक्षणकर्ता उसी शॉपिंग मॉल की दुकान में अंशकालिक नौकरी कर अंदर का व्यक्ति बनकर ग्राहकों के व्यवहार में विभिन्नताओं का प्रेक्षण कर सकता है। इस तकनीक या मानवशास्त्री बहुतायत से उपयोग करते हैं जिनका उद्देश्य होता है कि उस सामाजिक व्यवस्था का प्रथमतया दृष्टि से एक परिपेक्ष्य विकसित कर सके जो एक बाहरी व्यक्ति को सामान्यता उपलब्ध नहीं होता है।

प्रश्न 4.
मनोवृत्ति को परिभाषित करें। इसके तत्वों की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
समाज मनोविज्ञान में मनोवृत्ति की अनेक परिभाषाएँ दी गयी हैं। सचमुच में मनोवृत्ति भावात्मक तत्त्व (affective component), व्यवहारपरक तत्त्व (behavioural component) तथा संज्ञानात्मक तत्त्व (congnitive component) का एक तंत्र या संगठन (organization) होता है। इस तरह से मनोवृत्ति ए.बी.सी (a.b.c) तत्त्वों का एक संगठन होता है। इन तत्त्वों की व्याख्या इस प्रकार है-

  1. संज्ञानात्मक तत्त्व (Cognitive component)-संज्ञानात्मक तत्त्व से तात्पर्य व्यक्ति में मनोवृत्ति वस्तु के प्रति विश्वास (belief) से होता है।
  2. भावात्मक तत्त्व (Affective component)-भावात्मक तत्त्व से तात्पर्य व्यक्ति में वस्तु के प्रति सुखद या दुःखद भाव से होता है।
  3. व्यवहारपरक तत्त्व (Behavioural component)-व्यवहार परक तत्त्व से तात्पर्य व्यक्ति में मनोवृत्ति के पक्ष तथा विपक्ष में क्रिया या व्यवहार करने से होता है। मनोवृत्ति के इन तीनों तत्त्वों (components) की कुछ विशेषताएँ (characteristics) हैं जो इस प्रकार हैं।

(i) कर्षणशक्ति (Valence)-मनोवृत्ति के तीनों तत्त्वों में कर्षणशक्ति होता है। कर्षणशक्ति से तात्पर्य मनोवृत्ति की अनुकूलता (favourableness) तथा प्रतिकूलता (unfavourableness) की मात्रा से होता है। जैसे, यदि कोई व्यक्ति सह शिक्षा (coeducation) को उत्तम समझता है, तो उसके मनोवृत्ति के तत्वों की अनुकूलता स्वभावत: अधिक होगी।

(ii) बहविधता (Multiflexity)-बहुविधता की विशेषता यह बतलाती है कि मनोवृत्ति के किसी तत्त्व में कितने कारक (factors) होते हैं। किसी तत्त्व में जितने अधिक कारक होंगे, उसमें जटिलता भी उतनी ही अधिक होगी। जैसे-सहशिक्षा के प्रति व्यक्ति की मनोवृत्ति के संज्ञानात्मक तत्त्व में कई कारक सम्मिलित हो सकते हैं-सहशिक्षा किस स्तर से प्रारंभ होनी चाहिए, सहशिक्षा के क्या लाभ हैं, सहशिक्षा नगर में अधिक लाभप्रद होता है या शहर में आदि। बहुविधता को जटिलता (complexity) भी कहा जाता है।

(iii) आत्यन्तिकता (extremeness)-आत्यन्तिकता से तात्पर्य इस बात से होता है कि व्यक्ति की मनोवृत्ति के तत्त्व कितने अधिक मात्रा में अनुकूल (favourable) या प्रतिकूल (unfavourable) है। जैसे अगर सहशिक्षा के प्रति मनोवृत्ति को अभिव्यक्ति यदि कोई व्यक्ति 5-बिन्दु मापनी पर (पूर्ण सहमत, सहमत, तटस्थ, असहमत तथा पूर्णतः असहमत) पूर्णत: सहमत या पूर्णतः असहमत पर करता है तथा दूसरा व्यक्ति तटस्थ पर करता है तो यह कहा जाएगा कि पहले व्यक्ति की मनोवृत्ति दूसरे व्यक्ति को मनोवृत्ति से अधिक आन्यन्तिक (extremes) है।

(iv) केन्द्रित (centrality)-इससे तात्पर्य मनोवृत्ति की किसी खास तत्त्व के विशेष भूमिका से होता है। मनोवृत्ति के तीन तत्त्वों में कोई एक या दो तत्त्व अधिक प्रबल हो सकता है और तब वह अन्य दो तत्त्वों को भी अपनी ओर मोड़कर एक विशेष स्थिति उत्पन्न कर सकता है। जैसे, यदि किसी व्यक्ति को सहशिक्षा की गुणवत्ता में बहुत अधिक विश्वास है अर्थात् उसका संज्ञानात्मक तत्त्व प्रबल है तो अन्य दो तत्त्व भी इस प्रबलता के प्रभाव में आकर एक अनुकूल मनोवृत्ति के विकास में मदद करने लगेगा। स्पष्ट हुआ कि मनोवृत्ति के तत्वों की कुछ अपनी विशेषता होती है। इन तत्त्वों की विशेषताओं पर मनोवृत्ति को अनुकूल या प्रतिकूल होना प्रत्यक्ष रूप से आधृत होता है।

प्रश्न 5.
व्यक्तित्व अध्ययन के एब्राहम मैसलो का मानवतावादी सिद्धान्त का वर्णन करें।
उत्तर:
एब्राहम मैसलो ने व्यक्तित्व के सर्वांगीण स्वरूप को स्पष्ट करने के उद्देश्य से अपने मानवतावादी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उन्होंने व्यक्तित्व सिद्धान्त के प्रतिपादन के लिए स्वस्थ एवं सजीनात व्यक्तियों का अध्ययन किया। मैसलो ने मानवीय अभिप्रेरणा का सिद्धान्त प्रतिपादित कर व्यक्तित्व गत्यात्मकता को प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। उन्होंने अपने इस सिद्धान्त में आवश्यकताओं को पदानुक्रम में व्यवस्थित कर यह बताने का प्रयास किया है कि प्रत्येक व्यक्ति में उच्च स्तरीय आवश्यक को प्राप्त करने की सभावनाएँ रहता है। लेकिन व्यक्ति की उच्च स्तरीय आवश्यकताओं की पूर्ति तभी संभव होता है जब निम्न स्तरीय आवयकताओं की पूर्ति हो जाती है।

मैसलो के अनुसार निम्नस्तरीय आवश्यकताओं में भूख, प्यास, सुरक्षा, सम्बन्धन तथा सम्मान आते हैं जबकि उच्च स्तरीय आवश्यकताओं में न्याय, अच्छाई, सुन्दरता तथा एकता आदि आते हैं। आवश्यकता की पूर्ति वास्तव में व्यक्ति के जीवन का चरम बिन्दु होता है। मैसलो ने इसे ही आत्मस्ति की आवश्यकता कहा है, जिसे आवश्यकता पदानुक्रम में सर्वोच्च आवश्यकता माना गया है। जब आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती है तो व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है और अलगाव, पीड़ा, उदासीन सनकीपन आदि से ग्रस्त हो जाता है।

इस प्रकार निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि मैसलो का व्यक्तित्व सिद्धान्त अत्यधिक आशावादी, मानवतावादी एवं सर्वांगपूर्ण है। इसने व्यक्तित्व के स्वरूप का निरूपण करते हुए व्यक्ति पूर्णता के लिए आत्मसिद्धि को आवश्यक माना है।

प्रश्न 6.
गार्डनर के द्वारा पहचान की गई बहु-बुद्धि की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
गार्डनर ने बहु-बुद्धि का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार बुद्धि एक तत्त्व नहीं है बल्कि कई भिन्न-भिन्न प्रकार की बुद्धियों का अस्तित्व होता है। प्रत्येक बुद्धि एक-दूसरे से स्वतंत्र रहकर कार्य करती है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी व्यक्ति में किसी एक बुद्धि की मात्रा अधिक है तो यह अनिवार्य रूप से इसका संकेत नहीं करता कि उस व्यक्ति में किसी अन्य प्रकार की बुद्धि अधिक होगी, कम होगी या कितनी होगी। गार्डनर ने यह भी बताया कि किसी समस्या का समाधान खोजने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की बुद्धियाँ आपस में अंत:क्रिया करते हुए साथ-साथ कार्य करती हैं। अपने-अपने क्षेत्रों में असाधारण योग्यताओं का प्रदर्शन करने वाले अत्यन्त प्रतिभाशाली व्यक्तियों के आधार पर गार्डनर ने बुद्धि को आठ प्रकार में विभाजित किया।

ये आठ प्रकार की बुद्धि इस प्रकार से हैं-

(i) भाषागत (Linguistic)-यह अपने विचारों को प्रकट करने तथा दूसरे व्यक्तियों के विचारों को समझने हेतु प्रवाह तथा नम्यता के साथ भाषा का उपयोग करने की क्षमता है। जिन व्यक्तियों में यह बुद्धि अधिक होती है वे ‘शब्द-कुशल’ होते हैं। ऐसे व्यक्ति शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थों के प्रति संवेदनशील होते हैं, अपने मन में भाषा के बिंबों का निर्माण कर सकते हैं और स्पष्ट तथा परिशुद्ध भाषा का उपयोग करते हैं। लेखकों तथा कवियों में यह बुद्धि अधिक मात्रा में होती है।

(ii) तार्किक-गणितीय (Logical & mathematical)-इस प्रकार की बुद्धि की अधिक मात्रा रखने वाले व्यक्ति तार्किक तथा आलोचनात्मक चिंतन कर सकते हैं। वे अमूर्त तर्कना कर लेते हैं और गणितीय समस्याओं के हल के लिए प्रतीकों का प्रहस्तन अच्छी प्रकार से कर लेते हैं। वैज्ञानिकों तथा नोबेल पुरस्कार विजेताओं में इस प्रकार की बुद्धि अधिक पाई जाने की संभावना रहती है।

(iii) देशिक (Spatial)-यह मानसिक बिंबों को बनाने, उनका उपयोग करने तथा उनमें मानसिक धरातल पर परिमार्जन करने की योग्यता है। इस बुद्धि को अधिक मात्रा में रखने वाला व्यक्ति सरलता से देशिक सूचनाओं को अपने मस्तिष्क में रख सकता है। विमान-चालक, नाविक, मूर्तिकार, चित्रकार, वास्तुकार, आंतरिक साज-सज्जा के विशेषज्ञ, शल्य-चिकित्सा आदि में इस बुद्धि के अधिक पाए जाने की संभावना होती है।

(iv) संगीतात्मक (Musical)-सांगीतिक अभिरचनाओं को उत्पन्न करने, उनका सर्जन तथा प्रहस्तन करने की क्षमता सांगीतिक योग्यता कहलाती है। इस बुद्धि की उच्च मात्रा रखने वाले लोग ध्वनियों, स्पंदनों तथा ध्वनियों की नई अभिरचनाओं के सर्जन के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

(v) शारीरिक-गतिसंवेदी (bodily-kinesthetic)-किसी वस्तु अथवा उत्पाद के निर्माण के लिए अथवा मात्र शारीरिक प्रदर्शन के लिए संपूर्ण शरीर अथवा उसके किसी एक अथवा एक से अधिक अंग की लोच तथा पेशीय कौशल की योग्यता शारीरिक गतिसंवेदी योग्यता कही जाती है। धावकों, नर्तकों, अभिनेताओं/अभिनेत्रियों, खिलाड़ियों, जिमनास्टों तथा शल्य-चिकित्सकों में इस बुद्धि की अधिक मात्रा पाई जाती है।

(vi) अंतर्वैयक्तिक (Interpersonal)–इस योग्यता द्वारा व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों की अभिप्रेरणाओं या उद्देश्यों, भावनाओं तथा व्यवहारों का सही बोध करते हुए उनके साथ मधुर संबंध स्थापित करता है। मनोवैज्ञानिक, परामर्शदाता, राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता तथा धार्मिक नेता आदि में उच्च अंतर्वैयक्तिक बुद्धि पाए जाने की संभावना होती है।

(vii) अंत:व्यक्ति (Interperson)-इस योग्यता के अंतर्गत व्यक्ति को अपनी शक्ति तथा कमजोरियों का ज्ञान और उस ज्ञान का दूसरे व्यक्तियों के साथ सामाजिक अंत:क्रिया में उपयोग करने का ऐसा कौशल सम्मिलित है जिससे वह अन्य व्यक्तियों से प्रभावी संबंध स्थापित करता है। इस बुद्धि की अधिक मात्रा रखने वाले व्यक्ति अपनी अनन्यता या पहचान, मानव अस्तित्व और जीवन के अर्थों को समझने में अति संवेदनशील होते हैं। दार्शनिक तथा आध्यात्मिक नेता आदि में इस प्रकार की उच्च बुद्धि देखी जा सकती है।

(viii) प्रकृतिवादी (Naturalistic)-इस बुद्धि का तात्पर्य प्राकृतिक पर्यावरण से हमारे संबंधों की पूर्ण अभिज्ञता से है। विभिन्न पशु-पक्षियों तथा वनस्पतियों के सौंदर्य का बोध करने में तथा प्राकृतिक पर्यावरण में सूक्ष्म विभेद करने में यह बुद्धि सहायक होती है। शिकारी, किसान, पर्यटक, वनस्पति-विज्ञानी, प्राणीविज्ञानी और पक्षीविज्ञानी आदि में प्रकृतिवादी बुद्धि अधिक मात्रा में होती है।

प्रश्न 7.
अभिक्षमता’ अभिरुचि और बुद्धि से कैसे भिन्न है? अभिक्षमता का मापन कैसे किया जाता है?
उत्तर:
अभिक्षमता क्रियाओं के किसी विशेष क्षेत्र की विशेष योग्यता को कहते हैं। अभिक्षमता विशेषताओं का ऐसा संयोजन है जो व्यक्ति द्वारा प्रशिक्षण के उपरांत किसी विशेष क्षेत्र के ज्ञान अथवा कौशल के अर्जन की क्षमता को प्रदर्शित करता है। अभिक्षमताओं का मापन कुछ विशिष्ट परीक्षणों द्वारा किया जाता है। किसी व्यक्ति की अभिक्षमता के मापन से इसमें उसके द्वारा भविष्य में किए जाने वाले निष्पादन का पूर्वकथन करने में सहायता मिलती है।

बुद्धि का मापन करने की प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिकों को यह ज्ञान होता है कि समाज बुद्धि रखने वाले व्यक्ति भी किसी विशेष क्षेत्र के ज्ञान अथवा कौशलों की भिन्न-भिन्न रक्षता के साथ अर्जित करते हैं। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट योग्यताएँ तथा कौशल ही अभिक्षमताएँ कहलाती हैं। उचित प्रशिक्षण देकर उन योग्यताओं में पर्याप्त अभिवृद्धि की जा सकती है।

किसी विशेष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति में अभिक्षमता के साथ-साथ अभिरुचि (Interest) का होना भी आवश्यक है। अभिरुचि किसी विशेष कार्य को करने की वरीयता या तरजीह को कहते हैं जबकि अभिक्षमता उस कार्य को करने की संभाव्यता या विभवता को कहते हैं। किसी व्यक्ति में किसी कार्य को करने की अभिरुचि हो सकती है परन्तु हो सकता है कि उसे करने की अभिक्षमता उसमें न हो। इसी प्रकार यह भी संभव है कि किसी व्यक्ति में किसी कार्य को करने की अभिक्षमता हो परंतु उसमें उसकी अभिरुचि न हो। उन दोनों ही दशाओं में उसका निष्पादन संतोषजनक नहीं होगा। एक ऐसे विद्यार्थी की सफल यांत्रिक अभियंता बनने की अधिक संभावना है जिसमें उच्च यांत्रिक अभिक्षमता हो और अभियांत्रिकी में उसकी अभिरुवि भी हो।

अभिक्षमता परीक्षण दो रूपों में प्राप्त होते हैं–स्वतंत्र (विशेषीकृत) : अभिक्षमता परीक्षण तथा बहुल (सामान्यीकृत) अभिक्षमता परीक्षण। लिपिकीय अभिक्षमता, यांत्रिक अभिक्षमता, आकिक अभिक्षमता तथा टंकण अभिक्षमता आदि के परीक्षण स्वतंत्र अभिक्षमता परीक्षण है! बहुल अभिक्षमता परीक्षणों में एक परीक्षणमाला होती है जिससे अनेक भिन्न-भिन्न प्रकार की परंतु समजातीय क्षेत्रों में अभिक्षमता का मापन किया जाता है। विभेदन अभिक्षमता परीक्षण (डी. ए. टी.), सामान्य अभिक्षमता परीक्षणमाला (जी. ए. टी. बी.) तथा आर्ड सर्विसेस व्यावसायिक अभिक्षमता परीक्षणमाला (ए. एस. बी. ए. बी) आदि प्रसिद्ध अभिक्षमता परीक्षण मालाएँ हैं। इनमें से शैक्षिक पर्यावरण में विभेदक अभिक्षमता परीक्षण का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है । इस परीक्षण में 8 स्वतंत्र उप परीक्षण हैं। ये हैं-

  1. शब्द तर्कना।
  2. आकिक तर्कना।
  3. अमूर्त तर्कना।
  4. लिपिकीय गति एवं परिशुद्धता।
  5. यांत्रिक तर्कना।
  6. देशिक या स्थानिक संबंध।
  7. वर्तनी।
  8. भाषा का उपयोग।

प्रश्न 8.
आत्म-सम्मान से आपका क्या तात्पर्य है? आत्म-सम्मान का हमारे दैनिक जीवन के व्यवहारों से किस प्रकार संबंधित है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आत्म-सम्मान हमारे आत्म का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। व्यक्ति के रूप में हम सदैव अपने मूल्य या मान और अपनी योग्यता के बारे में निर्णय का आकलन करते रहते हैं। व्यक्ति का अपने बारे में यह मूल्य-निर्णय ही आत्म-सम्मान कहा जाता है। कुछ लोगों में आत्म-सम्मान उच्च स्तर का जबकि कुछ अन्य लोगों में आत्म-सम्मान निम्न स्तर का पाया जाता है।

किसी व्यक्ति के आत्म-सम्मान का मूल्यांकन करने के लिए व्यक्ति के समक्ष विविध प्रकार के कथन प्रस्तुत किये जाते हैं और उसके संदर्भ में सही है, यह बताइए। उदाहरण के लिए, किसी बालक/बालिका से ये पूछा जा सकता है कि “मैं गृह कार्य करने में अच्छा हूँ” अथवा “मुझे अक्सर विभिन्न खेलों में भाग लेने के लिए चुना जाता है” अथवा “मेरे सहपाठियों द्वारा मुझे बहुत पसंद किया जाता है” जैसे कथन उसके संदर्भ में किस सीमा तक सही हैं। यदि बालक/बालिका यह बताता/बताती है कि ये कथन उसके संदर्भ में सही है तो उसका आत्म-सम्मान उस दूसरे बालक/बालिका की तुलना में अधिक होगा जो यह बताता/बताती है कि यह कथन उसके बारे में सही नहीं हैं।

छः से सात वर्ष तक के बच्चों में आत्म-सम्मान चार क्षेत्रों में निर्मित हो जाता है-शैक्षिक क्षमता, सामाजिक क्षमता, शारीरिक/खेलकूद संबंधी क्षमता और शारीरिक रूप जो आयु के बढ़ने के साथ-साथ और अधिक परिष्कृत होता जाता है। अपनी स्थिर प्रवृत्तियों के रूप में अपने प्रति धारणा बनाने की क्षमता हमें भिन्न-भिन्न आत्म-मूल्यांकनों को जोड़कर अपने बारे में एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रतिमा निर्मित करने का अवसर प्रदान करती है। इसी को हम आत्म-सम्मान की समग्र भावना के रूप में जानते हैं।

आत्म-सम्मान हमारे दैनिक जीवन के व्यवहारों से अपना घनिष्ठ संबंध प्रदर्शित करता है। उदाहरण के लिए जिन बच्चों में उच्च शैक्षिक आत्म-सम्मान होता है उनका निष्पादन विद्यालयों में निम्न आत्म-सम्मान रखने वाले बच्चों की तुलना में अधिक सम्मान होता है और जिन बच्चों में उच्च सामाजिक आत्म-सम्मान होता है उनको जिन बच्चों में उच्च सामाजिक आत्म-सम्मान होता है उनको निम्न सामाजिक आत्म-सम्मान रखने वाले बच्चों की तुलना में सहपाठियों द्वारा अधिक पसंद किया जाता है। दूसरी तरफ, जिन बच्चों में सभी क्षेत्रों में निप्न आत्म-सम्मान होता है उनमें दुश्चिता, अवसाद और समाजविरोधी व्यवहार पाया जाता है! अध्ययनों द्वारा प्रदर्शित किया गया है कि जिन माता-पिता द्वारा स्नेह के साथ सकारात्मक ढंग से बच्चों का पालन-पोषण किया गया है ऐसे बालकों में उच्च आत्म-सम्मान विकसित होता है। क्योंकि ऐसा होने पर बच्चों द्वारा सहायता न माँगने पर भी यदि उनके निर्णय स्वयं लेते हैं तो ऐसे बच्चों में निम्न आत्म-सम्मान पाया जाता है।

प्रश्न 9.
व्यक्तित्व के मानवतावादी उपागम की प्रमुख प्रतिज्ञप्ति क्या है? आत्मसिद्धि से मैस्लो का क्या तात्पर्य था?
उत्तर:
मानवतावादी सिद्धांत मुख्यतः फायड के सिद्धांत के प्रत्युत्तर में विकसित हुए। व्यक्तित्व के संदर्भ में मानवतावादी परिप्रेक्ष्य के विकास में लार्य रोजर्स और अब्राहम मैस्लो ने विशेष रूप से योगदान किया है। रोजर्स द्वारा प्रस्तावित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विचार एक पूर्णतः प्रकार्यशील व्यक्ति का है। उनका विश्वास है कि व्यक्तित्व के विकास के लिए संतुष्टि अभिप्रेरक शक्ति है। लोग अपनी क्षमताओं, संभाव्यताओं और प्रतिभाओं को संभव सवोत्कृष्ट तरीके से अभिव्यक्त करने का प्रयास करते हैं! व्यक्तियों में एक सहज प्रवृत्ति होती है जो उन्हें अपने वंशागत प्रकृति की सिद्धि या प्राप्ति के लिए निर्दिष्ट करती है।

मानव व्यवहार के बारे में रोजर्स ने दो आधारभूत अभिगृह निर्मित किए हैं। एक यह लि व्यवहार लक्ष्योन्मुख और सार्थक होता है और दूसरा यह कि लोग (जो सहज रूप से अच्छे होते हैं) सदैव अनुकली तथा आत्मसिद्धि वाले व्यवहार का चयन करेंगे।

रोजर्स का सिद्धांत उनके निदानशाला में रोगियों को सुनते हुए प्राप्त अनुभवों से विकसित हुआ है। उन्होंने यह ध्यान दिया कि उनके सेवार्थियों के अनुभव में आत्म एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व था। इस प्रकार, उनका सिद्धांत आत्म के संप्रत्यय के चतुर्दिक संरचित है ! उनके सिद्धांत का अभिग्रह है कि लोग सतत अपने वास्तविक आत्म की सिद्धि या प्राप्ति की प्रक्रिया में लगे रहते हैं।

रोजर्स ने सुझाव दिया है कि प्रत्येक व्यक्ति के पास आदर्श अहं या आत्म का एक संप्रत्यय होता है। एक आदर्श आत्म वह आत्म होता है जो कि एक व्यक्ति बनना अथवा होना चाहता है। जब वास्तविक आत्म और आदर्श आत्म के बीच समरूपता होती है तो व्यक्ति सामान्यतया प्रसन्न रहता है, किन्तु दोनों प्रकार के आत्म के बीच विसंगति के कारण प्रायः अप्रसन्नता और असंतोष की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। रोजर्स का एक आधारभूत सिद्धांत है कि लोगों में आत्मसिद्धि के माध्यम से आत्म-संप्रत्यय को अधि कतम सीमा तक विकसित करने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रक्रिया में आत्म विकसित, विस्तारित और अधिक सामाजिक हो जाता है।

रोजर्स व्यक्तित्व-विकास को एक सतत् प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। इसमें अपने आपका मूल्यांकन करने का अधिगम और आत्मसिद्धि को प्रक्रिया में प्रवीणता सन्निहित होती है। आत्म-संप्रत्यय के विकास में सामाजिक प्रभावों की भूमिका को उन्होंने स्वीकार किया है। जब सामाजिक दशाएँ अनुकूल होती हैं, तब आत्म-संप्रत्यय और आत्म-सम्मान उच्च होता है। इसके विपरीत, जब सामाजिक दशाएँ प्रतिकूल होती हैं, तब आत्म-संप्रत्यय और आत्म-सम्मान निम्न होता है। उच्च आत्म-संप्रत्यय
और आत्म-सम्मान रखने वाले लोग सामान्यता नम्य एवं नए अनुभवों के प्रति मुक्त भाव से ग्रहणशील होते हैं ताकि वे अपने सतत् विकास और आत्मसिद्धि में लगे रह सकें।

मैस्लो ने आत्मसिद्धि की लब्धि या प्राप्ति के रूप में मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ लोगों की एक विस्तृत व्याख्या दी है। आत्मसिद्धि वह अवस्था होती है जिसमें लोग अपनी संपूर्ण संभाव्यताओं को विकसित कर चुके होते हैं। मैस्लो ने मनुष्यों का एक आशावादी और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है जिसके अंतर्गत मानव में प्रेम, हर्ष और सर्जनात्मक कार्यों को करने की आत्मसिद्धि को प्राप्त करने में स्वतंत्र माने गए हैं। अभिप्रेरणाओं, जो हमारे जीवन को नियमित करती हैं, के विश्लेषण के द्वारा आत्यसिद्धि को संभव बनाया जा सकता है हम जानते हैं कि जैविक सुरक्षा और आत्मीयता की आवश्यकताएँ (उत्तरजीविता आवश्यकताएँ) पशुओं और मनुष्यों दोनों में पाई जाती हैं। अतएव किसी व्यक्ति का मात्र पुनः आवश्यकताओं की संतुष्टि में संलग्न होना उसे पशुओं के स्तर पर ले आता है। मानव जीवन की वास्तविक यात्रा आत्म-सम्मान और.आत्मसिद्धि जैसी आवश्यकताओं के अनुसरण से आरंभ होती है। मानवतावादी उपागम जीवन के सकारात्मक पक्षों के महत्त्व पर बल देता है।

प्रश्न 10.
व्यक्तित्व के अध्ययन के प्रमुख उपागमों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
व्यक्तित्व के अध्ययन के प्रमुख उपागम निम्न हैं-
(i) प्रारूप उपागम- व्यक्ति के प्रेक्षित व्यवहारपरक विशेषताओं के कुछ व्यापक स्वरूपों का परीक्षण कर मानव व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करता है। प्रत्येक व्यवहारपरक स्वरूप व्यक्तित्व के किसी एक प्रकार को इंगित करता है जिसके अंतर्गत उस स्वरूप की व्यवहारपरक विशेषता की समानता के आधार पर व्यक्तियों को रखा जाता है।

(ii) विशेषक उपागम-विशिष्ट मनोवैज्ञानिक गुणों पर बल देता है जिसके आधार पर व्यक्ति संगत और स्थिर रूपों में भिन्न होते हैं। उदाहरणार्थ, एक व्यक्ति कम शर्मीला हो सकता है जबकि दूसरा अधिक; एक व्यक्ति अधिक मैत्रीपूर्ण व्यवहार कर सकता है और दूसरा कम। यहाँ ‘शर्मीलापन’ और ‘मैत्रीपूर्ण व्यवहार’ विशेषकों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके आधार पर व्यक्तियों में संबंधित व्यवहारपरक गुणों या विशेषकों की उपस्थिति या अनुपस्थिति की मात्रा का मूल्यांकन किया जा सकता है।

(iii) अंतःक्रियात्मक उपागम- इसके अनुसार स्थितिपरक विशेषताएँ हमारे व्यवहारों को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लोग स्वतंत्र अथवा आश्रित प्रकार का व्यवहार करेंगे यह उनके
आंतरिक व्यक्तित्व विशेषक पर निर्भर नहीं करता है बल्कि इस पर निर्भर करता है कि किसी विशिष्ट स्थिति में बाह्य पुरस्कार अथवा खतरा उपलब्ध है कि नहीं। भिन्न-भिन्न स्थितियों में विशेषकों को लेकर संगति अत्यंत निम्न पाई जाती है। बाजार में न्यायालय में अथवा पूजास्थलों पर लोगों के व्यवहारों का प्रेक्षण कर स्थितियों के अप्रतिरोध्य प्रभाव को देखा जा सकता है।

प्रश्न 11.
व्यक्तित्व के पंच-कारक मॉडल का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पॉल कॉस्टा तथा राबर्ट मैक्रे ने सभी संभावित व्यक्तित्व विशेषकों की जाँच कर पाँच कारकों के एक समुच्चय के बारे में जानकारी दी है। इनको वृहत् पाँच कारकों के नाम से जाना जाता है। ये पाँच कारक निम्न हैं-

  • अनुभवों के लिए खुलापन- जो लोग इस कारक पर उच्च अंक प्राप्त करते हैं वे कल्पनाशील, उत्सुक, नए विचारों के प्रति उदारता एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों में अभिरुचि लेने वाले व्यक्ति होते हैं। इसके विपरीत, कम अंक प्राप्त करने वाले व्यक्तियों में अनन्मयता पाई जाती है। –
  • बहिर्मुर्खता- यह विशेषता उन लोगों में पाई जाती है जिनमें सामाजिक सक्रियता, आग्रहित, बर्हिगमन, बातूनीपन और आमोद-प्रमोद के प्रति पसंदगी पाई जाती है। इसके विपरीत ऐसे लोग होते हैं जो शर्मीले और संकोची होते हैं।
  • सहमतिशीलता- यह कारक लोगों की उन विशेषताओं को बताता है जिनमें सहायता करने, सहयोग करने, मैत्रीपूर्ण व्यवहार करने, देखभाल करने एवं पोषण करने जैसे व्यवहार सम्मिलित होते हैं। इसके विपरीत वे लोग होते हैं जो आक्रामक और आत्म-केंद्रित होते हैं।
  • तंत्रिकाताप- इस कारक पर उच्च अंक प्राप्त करने वाले लोग सांवेगिक रूप से अस्थिर, परेशान, भयभीत, दुःखी, चिड़चिड़े और तनावग्रस्त होते हैं। इसके विपरीत प्रकार के लोग सुसमायोजित होते हैं।
  • अंतर्विवेकशीलता- इस कारक पर उच्च अंक प्राप्त करने वाले लोगों में उपलब्धि उन्मुखता, निर्भरता, उत्तरदायित्व, दूरदर्शिता, कर्मठता और आत्म-नियंत्रता पाया जाता है। इसके विपरीत, कम अंक प्राप्त करने वाले लोगों में आवेग पाया जाता है।

व्यक्तित्व के क्षेत्र में यह पंच-कारक मॉडल एक महत्त्वपूर्ण सैद्धांतिक विकास का प्रतिनिधित्व करते हैं। विभिन्न संस्कृतियों में लोगों के व्यक्तित्व को समझने के लिए यह मॉडल अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है। विभिन्न संस्कृतियों एवं भाषाओं में उपलब्ध व्यक्तित्व विशेषकों के विश्लेषण से यह मॉडल संगत है और विभिन्न विधियों से किए गए व्यक्तित्व के अध्ययन भी मॉडल का समर्थन करते हैं। अतएव आज व्यक्तित्व के अध्ययन के लिए यह मॉडल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण आनुभविक उपागम माना जाता है।

प्रश्न 12.
दबाव के लक्षणों तथा स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दबाव के लक्षण- हर व्यक्ति की दबाव के प्रति अनुक्रिया उसके व्यक्तित्व पालन-पोषण तथा जीवन के अनुभवों के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। प्रत्येक व्यक्ति के दबाव अनुक्रियाओं के अलग-अलग प्रतिरूप होते हैं। अतः चेतावनी देने वाले संकेत तथा उनकी तीव्रता भी भिन्न-भिन्न होती है। हममें से कुछ व्यक्ति अपनी दबाव अनुक्रियाओं को पहचानते हैं तथा अपने लक्षणों की गंभीरता तथा प्रकृति के आधार पर अथवा व्यवहार में परिवर्तन के आधार पर समस्या की गहनता का आकलन कर लेते हैं। दबाव के ये लक्षण शारीरिक, संवेगात्मक तथा व्यवहारात्मक होते हैं। कोई भी लक्षण,दबाव की प्रबलता को ज्ञापित कर सकता है, जिसका यदि निराकरण न किया जाए तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

दबाव के स्रोत- दबाव के निम्नलिखित स्रोत हो सकते हैं-
(i) जीवन घटनाएँ- जब से हम पैदा होते हैं, तभी से बड़े और छोटे, एकाएक उत्पन्न होने वाले और धीरे-धीरे घटित होने वाले परिवर्तन हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। हम छोटे तथा दैनिक होने वाले परिवर्तनों का सामना करना तो सीख लेते हैं किन्तु जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ दबावपूर्ण हो सकती हैं। क्योंकि वे हमारी दिनचर्या को बाधित करती हैं और उथल-पुथल मचा देती हैं। यदि इस प्रकार ही कई घटनाएँ चाहे वे योजनाबद्ध हों (जैसे-घर बदलकर नए घर में जाना) या पूर्वानुमानित न हो (जैसे-किसी दीर्घकालिक संबंध का टूट जाना) कम समय अवधि में घटित होती हैं, तो हमें उनका सामना करने में कठिनाई होती है तथा हम दबाव के लक्षणों के प्रति अधिक प्रवीण होते हैं।

(ii) परेशान करने वाली घटनाएँ- इस प्रकार के दबावों की प्रकृति व्यक्तिगत होती है, जो अपने दैनिक जीवन में घटने वाली घटनाओं के कारण बनी रहती है। कोलाहलपूर्ण परिवेश, प्रतिदिन का आना-जाना, झगड़ालू पड़ोसी, बिजली-पानी की कमी, यातायात की भीड़-भाड़ इत्यादि ऐसी कष्टप्रद घटनाएँ हैं। एक गृहस्वामिनी को भी अनेक ऐसी आकस्मिक कष्टप्रद घटनाओं का अनुभव करना पड़ता . है। कभी-कभी ऐसी परेशानियों का बहुत तबाहीपूर्ण परिणाम उस व्यक्ति के लिए होता है जो उन
घटनाओं का सामना करता है क्योंकि बाहरी दूसरे व्यक्तियों को इन परेशानियों की जानकारी भी नहीं होती। जो व्यक्ति इन परेशानियों के कारण जितना ही अधिक दबाव अनुभव करता है उतना ही अधिक उसका मनोवैज्ञानिक कुशल-क्षेम निम्न स्तर का होता है।

(iii) अभिघातज घटनाएँ- इनके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की गंभीर घटनाएँ जैसे-अग्निकांड, रेलगाड़ी या सड़क दुर्घटना, लूट, भूकंप, सुनामी इत्यादि सम्मिलित होती हैं। इस प्रकार की घटनाओं का प्रभाव कुछ समय बीत जाने के बाद दिखाई देता है तथा कभी-कभी ये प्रभाव दुश्चिता, अतीतावलोकन, स्वप्न तथा अंतर्वेधी विचार इत्यादि के रूप में सतत रूप से बने रहते हैं। तीव्र अभिघातों के कारण संबंधों में भी तनाव उत्पन्न हो जाते हैं। इनका सामना करने के लिए विशेषज्ञों की सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है, विशेष रूप से जब वे घटना के पश्चात् महीनों तक सतत् रूप से बने रहें।

प्रश्न 13.
दबाव शब्द से आपका क्या तात्पर्य है? दबाव की प्रकृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दबाव अंग्रेजी भाषा के शब्द स्ट्रेस (Stress) की व्युत्पत्ति, लैटिन शब्द ‘स्ट्रिक्टस’ (Strictus) जिसका अर्थ है तंग या संकीर्ण, तथा ‘स्ट्रिन्गर’ (Stringer) जो क्रियापद है, जिसका अर्थ है कसना, से हुई है। यह मूल शब्द अनेक व्यक्तियों द्वारा दबाव अवस्था में वर्णित मांसपेशियों तथा श्वसन की कसावट तथा संकुचन की आंतरिक भावनाओं को प्रतिबिंबित करना है। प्राय: दबाव को पर्यावरण की उन विशेषताओं के द्वारा भी समझाया जाता है जो व्यक्ति के लिए विघटनकारी होती हैं। दबावकारक वे घटनाएँ हैं जो हमारे शरीर में दबाव उत्पन्न करती हैं। ये शोर, भीड़,खराब संबंध या रोज स्कूल अथवा दफ्तर जाने की घटनाएँ हो सकती हैं।

दबाव कारण तथा प्रभाव दोनों से संबद्ध हो गया है तथापि दबाव का यह दृष्टिकोण भ्रांति उत्पन्न कर सकता है। हेंस सेल्ये (Hans Selye), जो आधुनिक दबाव शोध के जनक कहे जाते हैं, ने दबाव को इस प्रकार परिभाषित किया है कि यह “किसी भी माँग के प्रति शरीर की अविशिष्ट अनुक्रिया है”

अर्थात खतरे का कारण चाहे जो भी हो व्यक्ति प्रतिक्रियाओं के समान शरीर क्रियात्मक प्रतिरूप से अनुक्रिया करेगा। अनेक शोधकर्ता इस परिभाषा से सहमत नहीं हैं क्योंकि उनका अनुभव है कि दबाव के प्रति अनुक्रिया उतनी सामान्य तथा अविशिष्ट नहीं होती है जितना सेल्ये का मत है। भिन्न-भिन्न दबावकारक दबाव प्रतिक्रिया के भिन्न-भिन्न प्रतिरूप उत्पन्न कर सकते हैं एवं भिन्न व्यक्तियों की अनुक्रियाएँ विशिष्ट प्रकार की हो सकती हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति परिस्थिति को अपनी दृष्टि से देखेगा और माँगों तथा उनका सामना करने की हमारी क्षमता का प्रत्यक्षण ही यह निर्धारित करेगा कि हम दबाव महसूस कर रहे हैं अथवा नहीं।

दबाव कोई ऐसी घटक नहीं है जो व्यक्ति के भीतर या पर्यावरण में पाया जाता है। इसके बजाय, यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया में सन्निहित है जिसके अंतर्गत व्यक्ति अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरणों में कार्य संपादन करता है। इन संघों का मूल्यांकन करता है तथा उनसे उत्पन्न होने वाली विभिन्न समस्याओं का सामना करने का प्रयास करता है। दबाव एक गत्यात्मक. मानसिक/संज्ञानात्मक अवस्था है। वह समस्थिति को विघटित करता है या एक ऐसा असंतुलन उत्पन्न करता है जिसके कारण उस असंतुलन के समाधान अथवा समस्थिति को पुनःस्थापित करने की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
Bihar Board 12th Psychology Important Questions Long Answer Type Part 5 1

प्रश्न 14.
मनोवैज्ञानिक प्रकार्यों पर दबाव के प्रभाव की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रकार्यों पर दबाव के निम्नलिखित प्रभाव है-
(i) संवेगात्मक प्रभाव-वे व्यक्ति जो दबावग्रस्त होते हैं प्राय: आकस्मिक मन:स्थिति परिवर्तन का अनुभव करते हैं तथा सनकी की तरह व्यवहार करते हैं, जिसके कारण वे परिवार तथा मित्रों से विमुख हो जाते हैं। कुछ स्थितियों में इसके कारण एक दुश्चक्र प्रारंभ होता है जिससे विश्वास में कमी होती है तथा जिसके कारण फिर और भी गंभीर संवेगात्मक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं । उदाहरण के लिए, दुश्चिता तथा अवसाद की भावनाएँ, शारीरिक तनाव में वृद्धि, मनोवैज्ञानिक तनाव में वृद्धि तथा आकस्मिक मन:स्थिति परिवर्तन।

(ii) शरीर-क्रियात्मक प्रभाव-जब शारीरिक या मनोवैज्ञानिक दबाव मनुष्य के शरीर पर क्रियाशील होते हैं तो शरीर में कुछ हार्मोन, जैसे-एड्रिनलीन तथा कॉर्टिसोल का स्राव बढ़ जाता है। ये हार्मोन हृदयगति, रक्तचाप स्तर, चयापचय तथा शारीरिक क्रिया में विशिष्ट परिवर्तन कर देते हैं। जब हम थोडे समय के लिए दबावग्रस्त हों तो ये शारीरिक प्रतिक्रियाएँ कुशलतापूर्वक कार्य करने में सहायता करती हैं, किन्तु दीर्घकालिक रूप से यह शरीर को अत्यधिक नुकसान पहुंचा सकती हैं। एपिनेफरीन तथा नॉरएपिनेफरीन छोड़ना, पाचक-तंत्र की धीमी गति, फेफड़ों में वायुमार्ग का विस्तार, हृदयगति में वृद्धि तथा रक्त वाहिकाओं का सिकुड़ना, इस प्रकार के शरीर क्रियात्मक प्रभावों के उदाहरण हैं।

(iii) संज्ञानात्मक प्रभाव-यदि दबाव के कारण दाब (प्रेशर) निरंतर रूप से बना रहता है तो व्यक्ति मानसिक अतिभार से ग्रस्त हो जाता है। उच्च दबाव के कारण उत्पन्न यह पीड़ा, व्यक्ति में ठोस निर्णय लेने की क्षमता को तेजी से घट सकती है। घर में, जीविका में, अथवा कार्य स्थान में लिए गए गलत निर्णयों के द्वारा तर्क-वितर्क, असफलता, वित्तीय घाटा, यहाँ तक कि नौकरी की क्षति भी इसके परिणामस्वरूप हो सकती है। एकाग्रता में कमी तथा न्यूनीकृत अल्पकालिक स्मृति क्षमता भी दबाव के . संज्ञानात्मक प्रभाव हो सकते हैं।

(iv) व्यवहारात्मक प्रभाव-दबाव का प्रभाव हमारे व्यवहार पर कम पौष्टिक भोजन करने, उत्तेजित करने वाले पदार्थों, जैसे केफीन को अधिक सेवन एवं सिगरेट, मद्य तथा अन्य औषधियों; जैसे-उपशामकों इत्यादि के अत्यधिक सेवन करने में परिलक्षित होता है। उपशामक औषधियाँ व्यसन बन सकती हैं तथा उनके अन्य प्रभाव भी हो सकते हैं। जैसे-एकाग्रता में कठिनाई, समन्वय में कमी तथा घूर्णी या चक्कर आ जाना। दबाव के कुछ ठेठ या प्रारूपी व्यवहारात्मक प्रभाव, निद्रा-प्रतिरूपों में व्याघात, अनुपस्थिता में व्याघात, अनुपस्थिता में वृद्धि तथा कार्य निष्पादन में ह्रास हैं।

प्रश्न 15.
विभिन्न जीवन कौशलों का वर्णन कीजिए। इन जीवन कौशलों से जीवन की चुनौतियों का सामना करने में किस प्रकार मदद मिलती है?
उत्तर:
निम्नलिखित जीवन-कौशलों द्वारा जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलती है-
(i)आग्रहिता- आग्रहिता एक ऐसा व्यवहार या कौशल है जो हमारी भावनाओं, आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा विचारों के सुस्पष्ट तथा विश्वासपूर्ण संप्रेषण में सहायक होता है। यह ऐसा योग्यता है कि जिसके द्वारा किसी के निवेदन को अस्वीकार करना, किसी विषय पर बिना आत्मचेतना के अपने मत को अभिव्यक्त करना या फिर खुलकर ऐसे संवेगों; जैसे-प्रेम, क्रोध इत्यादि को अभिव्यक्त करना संभव होता है। यदि कोई आग्रही हैं तो उसमें उच्च आत्म-विश्वास एवं आत्म-सम्मान तथा अपनी अस्मिता की एक अटूट भावना होती है।

(ii) समय प्रबंधन- कोई अपना समय जैसे व्यतीत करता है वह उसके जीवन की गुणवत्ता को निर्धारित करता है । समय का प्रबंधन तथा प्रत्यायोजित करना सीखने से, दबाव-मुक्त होने में परिवर्तन लाना है । समय दबाव कम करने का एक प्रमुख तरीका, समय के प्रत्यक्षण में परिवर्तन लाना है । समय प्रबंधन का प्रमुख नियम यह है कि हम जिन कार्यों को महत्त्व देते हैं, उनका परिपालन करने में समय लगाएँ या उन कार्यों को करने में जो हमारे लक्ष्य प्राप्ति में सहायक हों। हमें अपने जानकारियों की वास्तविकता का बोध हो तथा कार्य को निश्चित समयावधि मैं करें । यह स्पष्ट होना चाहिए कि हम क्या करना चाहते हैं तथा हम अपने जीवन में इन दोनों बातों में सामंजस्य स्थापित कर सकें, इन पर समय प्रबंधन निर्भर करता है।

(iii) सविवेक चिंतन- दबाव संबंधी अनेक. समस्याएँ विकृत चिंतन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती हैं। व्यक्ति के चिंतन और अनुभव करने के तरीकों में घनिष्ठ संबंध होता है। जब हम दबाव का अनुभव करते हैं तो हमें अंत:निर्मित वर्णात्मक अभिनति होती है जिससे हमारा ध्यान भूतकाल के नकारात्मक विचारों तथा प्रतिमाओं पर केंद्रित हो जाता है, जो हमारे वर्तमान तथा भविष्य के प्रत्यक्षण को प्रभावित करता है । सविवेक चिंतन के कुछ नियम इस प्रकार हैं अपने विकृत चिंतन तथा अविवेकी विश्वासों को चुनौती देना, संभावित अंतर्वेधी दुश्चिता उत्तेजक विचारों को मन से निकालना तथा सकारात्मक कथन करना।

(iv) संबंधों में सुधार- संप्रेषण सदृढ और स्थायी संबंधों की कुंजी है। इसके अंतर्गत तीन अत्यावश्यक कौशल निहित हैं-सुनना कि दूसरा व्यक्ति क्या कह रहा है, अभिव्यक्त करना कि कोई कैसा सोचता है और महसूस करता है तथा दूसरों की भावनाओं और मतों को स्वीकारना चाहे वे स्वयं उसके अपने से भिन्न हों। इसमें हमें अनुचित ईर्ष्या और नाराजगीयुक्त व्यवहार से दूर रहने की जरूरत होती है।

(v) स्वयं की देखभाल- यदि हम स्वयं को स्वस्थ, दुरुस्त तथा विश्रांत रखते हैं तो हमें दैनिक जीवन के दबावों का सामना करने के लिए शारीरिक एवं सांवेगिक रूप से और अच्छी तरह तैयार रहते हैं। हमारे श्वसन का प्रतिरूप हमारी मानसिक तथा सांवेगिक स्थिति को परिलक्षित करता है जब हम दबावग्रस्त अथवा दुश्चितित होते हैं तो हमारा श्वसन और तेज हो जाता है, जिसके बीच-बीच में अक्सर आँहें भी निकलती रहती हैं। सबसे अधिक विश्रांत श्वसन मंद, मध्यपट या डायफ्रम, अर्थात सीना और उदर गुहिका के बीच.एवं गुंबदकार पेशी से उदर-केंद्रित श्वसन होता है। पर्यावरणी दबाव, जैसे-शेर, प्रदूषण, दिक् प्रकार, वर्ण इत्यादि सब हमारी मन:स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं। इनका निश्चित प्रभाव दबाव का सामना करने की हमारी क्षमता तथा कुशल-क्षेम पर पड़ता है।

Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3

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Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3

प्रश्न 1.
चार क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह को समझाइए।
उत्तर:
चार क्षेत्रीय मॉडल खुली अर्थव्यवस्था को प्रदर्शित करता है। चार क्षेत्रीय चक्रीय प्रवाह मॉडल में विदेशी क्षेत्र या शेष विश्व क्षेत्र को सम्मिलित किया जाता है। वर्तमान समय में अर्थव्यवस्था का स्वरूप खुली अर्थव्यवस्था का है जिसमें वस्तुओं का आय एवं निर्याता होता है।

y = C + I + G + (X – M)
यहाँ y = आय या उत्पादन
C = उपभोग व्यय
I = निवेश व्यय
G = सरकारी व्यय
(X – M) = शुद्ध निर्यात (यहाँ X = निर्यात तथा M = आयात)

खुली अर्थव्यवस्था में आय प्रवाह के पाँच स्तम्भ होते हैं-
1. परिवार क्षेत्र- यह क्षेत्र उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है। यह क्षेत्र अपनी सेवा के बदले मजदूरी लगान, ब्याज, लाभ के रूप में आय प्राप्त करते हैं। वे सरकार से कुछ निश्चित हस्तारण भी प्राप्त करते हैं। यह क्षेत्र उत्पादक क्षेत्रक द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद पर अपनी आय खर्च करता है और सरकार को कर भुगतान भी करता है। यह क्षेत्र अपनी आय का कुछ भाग बचा लेता है जो पूँजी बाजार में चला जाता है।

2. उत्पादक क्षेत्र- उत्पादक क्षेत्रक वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करता है जिसका उपयोग परिवार तथा सरकार द्वारा किया जाता है। फर्मे वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री से आय प्राप्त करती है। यह क्षेत्र निर्यात आय की प्राप्त करती है।

फर्मे साधन सेवाएँ प्राप्त करती हैं तथा उन्हें भुगतान करती हैं। फर्मों को अपनी वस्तुओं की बिक्री एवं उत्पादन पर सरकार को कर भुगतान करना पड़ता है। कुछ फर्मे सरकार से अनुदान भी प्राप्त करती हैं। फर्म अपनी आय का एक भाग बचाती है जो पूँजी बाजार में जाता है।

3. सरकारी क्षेत्र- सरकार परिवार एवं उत्पादक दोनों क्षेत्रों से कर वसुलता है। सरकार परिवारों का हस्तांतरण भुगतान तथा फर्मों को आर्थिक सहायता प्रदान करती है। अन्य क्षेत्रक की भाँति सरकारी क्षेत्रक भी बचत करता है जो कि पूँजी बाजार में जाता है।

4. शेष विश्व- शेष विश्व निर्यात के लिए भुगतान प्राप्त करता है। यह क्षेत्र सरकारी खातों पर भुगतान प्राप्त करता है।

5. पूँजी बाजार- पूँजी बाजार तीनों क्षेत्रकों परिवार, फर्मों तथा सरकार की बचतें एकत्रित करता है। यह क्षेत्र परिवार, फर्म तथा सरकार को पूँजी उधार देकर निवेश करता है। पूँजी बाजार में अन्तर्प्रवाह तथा बाह्य प्रवाह बराबर होते हैं।

प्रश्न 2.
समष्टि अर्थशास्त्र में अत्यधिक माँग का अर्थ बताइए। इसके सुधार के लिए किन्हीं चार मौद्रिक नीति उपायों की व्याख्या करें।
उत्तर:
यदि अर्थव्यवस्था में सामूहिक माँग एवं सामूहिक पूर्ति में संतुलन पूर्ण रोजगार स्तर के बाद होता है तो यह अतिरेक या अत्यधिक माँग की स्थिति होती है। अन्य शब्दों में अतिरेक माँग तब उत्पन्न होती है जब सामूहिक माँग पूर्ण रोजगार स्तर पर सामूहिक पूर्ति से अधिक होती है। अर्थात् AD > AS

अतिरेक माँग में सुधार के लिए चार मौद्रिक उपाय निम्नलिखित हैं-

  • बैंक दर को बढ़ाया जाना चाहिए ताकि साख विस्तार का संकुचन हो और माँग में कमी हो सके।
  • केन्द्रीय बैंक को खुले बाजार में प्रतिभूतियाँ बेचनी चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था में क्रयशक्ति कम हो।
  • नकद कोष अनुपात में वृद्धि की जानी चाहिए ताकि साख का कम विस्तार हो।
  • तरलता अनुपात को बढ़ाया जाना चाहिए ताकि साख के विस्तार को कम किया जा सके।

प्रश्न 3.
लोचशील विनिमय दर प्रणाली के गुण तथा दोषों की व्याख्या करें।
उत्तर:
लोचशील विनिमय दर प्रणाली के निम्नलिखित गुण हैं-

  • सरल प्रणाली- यह एक सरल प्रणाली है जिसमें विनिमय दर वहाँ निर्धारित होती है जहाँ माँग एवं पूर्ति में साम्य स्थापित हो जाता है। इसमें बाहरी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती है।
  • सतत समायोजन- इसमें सतत समायोजन की गुंजाइश होती है। इस प्रकार दीर्घकालीन असंतुलन के विपरीत प्रभावों से बचा जा सकता है।
  • भुगतान संतुलन में सुधार- लोचपूर्ण विनिमय दर होने पर भुगतान शेष में संतुलन आसानी से पैदा किया जा सकता है।
  • संसाधनों का कुशलतम उपयोग- लोचपूर्ण विनिमय दर साधनों के कुशलतम उपयोग के अवसर प्रदान करती है। इस प्रकार अर्थव्यवस्था में कार्य कुशलता के स्तर को बढ़ाती है।

लोचपूर्ण विनिमय दर प्रणाली के कुछ दोष भी हैं जो निम्नलिखित हैं-

  • निम्न लोच के दुष्परिणाम- यदि विनिमय दरों की लोच काफी कम है तो विदेशी विनिमय बाजार अस्थिर होगा जिसके फलस्वरूप दुर्लभ मुद्रा के केवल मूल्य ह्रास से ही भुगतान संतुलन की स्थिति बिगड़ जाएगी।
  • अनिश्चितता- लोचपूर्ण विनिमय दर अनिश्चितता उत्पन्न करने वाली होती है जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और पूँजी की गतिशीलता के लिए घातक है।।
  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अस्थिरता- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अस्थिरता अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अस्थिरता का कारण बनती है। आयात तथा निर्यात संबंधी दीर्घकालीन नीतियाँ बनाना कठिन हो जाता है।

प्रश्न 4.
विनिमय दर से क्या अभिप्राय है ? विनिमय दरों को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का वर्णन करें।
उत्तर:
विनिमय दर का अभ्रिपाय : विनियम दर वह दर है जिस पर एक देश की एक मुद्रा इकाई का दूसरे देश की मुद्रा में विनिमय किया जाता है। दूसरे शब्दों में, विदेशी विनिमय दर यह बताती है किसी देश की मुद्रा की एक इकाई के बदले में दूसरे देश की मुद्रा की कितनी इकाइयाँ मिल सकती हैं।

इस प्रकार विनिमय दर घरेलू मुद्रा के रूप में दी जाने वाली वह कीमत जो विदेशी मुद्रा की, एक इकाई के बदले दी जाती है।

क्राउथर के अनुसार, “विनिमय दर, एक देश की इकाई मुद्रा के बदले दूसरे देश की मुद्रा को मिलने वाली इकाइयों की एक माप है।”

विनिमय दरों को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक :
(i) व्यापार परिवर्तन : विदेशी विनिमय की माँग तथा पूर्ति, निर्यातों तथा आयातों के परिवर्तन पर निर्भर करती है। यदि निर्यात, आयातों से अधिक हैं तो घरेलू मुद्रा की माँग बढ़ती है जिससे विनिमय दर घरेलू देश के पक्ष में परिवर्तित होती है किन्तु यदि आयात, निर्यातों से अधिक है तो विदेशी मुद्रा की माँग बढ़ती है तथा विनिमय दर देश के प्रतिकूल हो जाती है।

(ii) पूँजी प्रवाह : अल्पकालीन अथवा दीर्घकालीन पूँजी प्रवाह भी विनिमय दरों को प्रभावित करता है। यदि अमेरिका भारत में निवेश के लिए पूँजी का प्रवाह है तो विनिमय बाजार में भारतीय रुपए की माँग बढ़ेगी जिससे भारतीय रुपए का अमरीकन डॉलर में मूल्य बढ़ जाएगा।

(iii) प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय : स्टॉक एक्सचेंज के सौदे, विदेशी प्रतिभूतियों-शेयर्स ऋण-पत्रों आदि के लेन-देन विदेशी विनिमय तथा विनिमय दर को प्रभावित करते हैं।

(iv) बैंक दर : बैंक दर भी विनिमय दरों को प्रभावित करती है। यदि बैंक दर को बढ़ाया जाता है तो देश में विदेशों से ऊँची ब्याज की दर कमाने के उद्देश्य से अधिक कोषों का प्रवाह होगा। इससे विदेशी विनिमय की पूर्ति बढ़ेगी तथा विनिमय दर, विदेशी मुद्रा के प्रतिकूल होगी। बैंक दर के कम होने से इसके विपरीत प्रभाव पडेगा।

(v) सट्टेबाजी क्रियाएँ : विनिमय बाजार में सट्टे की क्रियाएँ विनिमय दर को प्रभावित करती हैं। यदि सट्टेबाज, विदेशी मुद्रा के मूल्य में कमी की सम्भावना रखते हैं तो वह उसे बेचना आरम्भ * कर देंगे जिससे विनिमय दर विदेशी मुद्रा के प्रतिकूल तथा घरेलू मुद्रा के पक्ष में परिवर्तित होगी।

प्रश्न 5.
अवसर लागत की अवधारणा की व्याख्या करें।
उत्तर:
अवसर लागत (Opportunity cost)- अवसर लागत की अवधारणा लागत की आधुनिक अवधारणा है। किसी साधन की अवसर लागत से अभिप्राय दूसरे सर्वश्रेष्ठ प्रयोग में उसके मूल्य से है। दूसरे शब्दों में किसी साधन को अवसर लागत वह लागत है जिसका उस साधन को किसी एक कार्य में कार्यरत होने के फलस्वरूप दूसरे वैकल्पिक कार्य को नहीं कर पाने के कारण त्याग करना पड़ता है। प्रो० लैपटविच के अनुसार किसी वस्तु की अवसर लागत उन परित्याक्त (छोड़े गये) वैकल्पिक पदार्थों का मूल्य होती है, जिन्हें इस वस्तु के उत्पादन में लगाये गये साधनों द्वारा उत्पन्न किया जा सकता है। अवसर लागत की अवधारणा के संबंध में दो बातें ध्यान देने योग्य हैं-

  • अवसर लागत किसी वस्त को उत्पादन लागत के सर्वोत्तम विकल्प के लगने की लागत है।
  • अवसर लागत का आकलन साधनों की मात्रा के आधार पर न करके उसके मौद्रिक मूल्य के आधार पर किया जाना चाहिए। अवसर लागत को साधन की हस्तान्तरण आय भी कहा जाता है।

अवसर लागत की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए हम एक उदाहरण लेते हैं। माना कि भूमि के एक टुकड़े पर गेहूँ, चने, आलू व मटर की खेती की जा सकती है। एक किसान उस टुकड़े पर साधनों की एक निश्चित मात्रा का प्रयोग करते हुए 400 रुपए के मूल्य के गेहूँ का उत्पादन करता है। इस प्रकार वह चने, आलू तथा मटर के उत्पादन का त्याग करता है। जिनका मूल्य क्रमशः 3200, 2000 तथा 1500 रुपए है। इन तीनों विकल्पों में चने का उत्पादन सर्वोत्तम विकल्प है। अतः गेहूँ उत्पादन की अवसर लागत 3200 रुपए होगी।

प्रश्न 6.
माँग के निर्धारक तत्त्वों की विवेचना करें।
उत्तर:
बाजार माँग किसी वस्तु की विभिन्न कीमतों पर बाजार के सभी उपभोक्ताओं द्वारा माँगी गई मात्राओं को प्रकट करता है। व्यक्तिगत माँग वक्रों के समस्त जोड़ के द्वारा बाजार माँग वक्र खींचा जा सकता है।

बाजार माँग को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक हैं-
(i) वस्तु की कीमत (Price of a commodity)- सामान्यतः किसी वस्तु की माँग की मात्रा उस वस्तु की कीमत पर आश्रित होती है। अन्य बातें पूर्ववत् रहने पर कीमत कम होने पर वस्तु की माँग बढ़ती है और कीमत के बढ़ने पर माँग घटती है। किसी वस्तु की कीमत और उसकी माँग में विपरीत सम्बन्ध होता है।

(ii) संबंधित वस्तुओं की कीमतें (Prices of related goods)- संबंधित वस्तुएँ दो प्रकार की होती हैं-
पूरक वस्तुएँ तथा स्थानापन्न वस्तुएँ- पूरक वस्तुएँ वे वस्तुएँ होती हैं जो किसी आवश्यकता को संयुक्त रूप से पूरा करती हैं और स्थानापन्न वस्तुएँ वे वस्तुएँ होती हैं जो एक दूसरे के स्थान पर प्रयोग की जा सकती हैं। पूरक वस्तुओं में यदि एक वस्तु की कीमत कम हो जाती है तो उसकी पूरक वस्तु की माँग बढ़ जाती है। इसके विपरीत यदि स्थानापन्न वस्तुओं में किसी एक की कीमत कम हो जाती है तो दूसरी वस्तु की मांग भी कम हो जाती है।

(iii) उपभोक्ता की आय (Income of Consumer)- उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर सामान्यतया उसके द्वारा वस्तुओं की माँग में वृद्धि होती है।

आय में वृद्धि के साथ अनिवार्य वस्तुओं की माँग एक सीमा तक बढ़ती है तथा उसके बाद स्थिर हो जाती है। कुछ परिस्थितियों में आय में वृद्धि का वस्तु की माँग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसा खाने-पीने की सस्ती वस्तुओं में होता है। जैसे नमक आदि।
विलासितापूर्ण वस्तुओं की माँग आय में वृद्धि के साथ-साथ लगातार बढ़ती रहती है।

घटिया (निम्नस्तरीय) वस्तुओं की माँग आय में वृद्धि के साथ-साथ कम हो जाती है लेकिन सामान्य वस्तुओं की माँग आय में वृद्धि के साथ बढ़ती है और आय में कमी से कम हो जाती है।

(iv) उपभोक्ता की रुचि तथा फैशन (Interest of Consumer and Fashion)- परिवार या उपभोक्ता की रुचि भी किसी वस्तु की माँग को कम या अधिक कर सकती है। किसी वस्तु का फैशन बढ़ने पर उसकी माँग भी बढ़ती है।

(v) विज्ञापन तथा प्रदर्शनकारी प्रभाव (Advertisement and Demonstration Effect)- विज्ञापन भी उपभोक्ता को किसी विशेष वस्तु को खरीदने के लिए प्रेरित कर सकता है। यदि पड़ोसियों के पास कार या स्कूटर है तो प्रदर्शनकारी प्रभाव के कारण एक परिवार की कार । या स्कूटर की माँग बढ़ सकती है।

(vi) जनसंख्या की मात्रा और बनावट (Quantity and Composition of Population) अधिक जनसंख्या का अर्थ है परिवारों की अधिक संख्या और वस्तुओं की अधिक माँग। इसी प्रकार जनसंख्या की बनावट से भी विभिन्न वस्तुओं की माँग निर्धारित होती है।

(vii) आय का वितरण (Distribution of Income)- जिन अर्थव्यवस्थाओं में आय का वितरण समान है वहाँ वस्तुओं की माँग अधिक होगी तथा इसके विपरीत जिन अर्थव्यवस्थाओं में आय का वितरण असमान है, वहाँ वस्तुओं की माँग कम होगी।

(viii) जलवायु तथा रीति-रिवाज (Climate and Customs)- मौसम, त्योहार तथा विभिन्न परम्पराएँ भी वस्तु की माँग को प्रभावित करती हैं। जैसे-गर्मी के मौसम में कूलर, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक आदि की माँग बढ़ जाती है।

प्रश्न 7.
मुद्रा-पदार्थ के गुणों का वर्णन करें।
उत्तर:
मुद्रा वास्तव में किसी देश की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है। किसी देश की आर्थिक प्रगति मुद्रा पर निर्भर करती है इसलिए ट्रेस्काट ने कहा है कि “यदि मुद्रा हमारी अर्थव्यवस्था का हृदय नहीं तो रक्त प्रवाह अवश्य है।”

मुद्रा के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  • मुद्रा आधुनिक अर्थव्यवस्था का आधार है।
  • मुद्रा से उपभोक्ता को लाभ पहुँचता है।
  • मुद्रा से विनिमय व्यवस्था का आधार है।
  • मुद्रा से विनिमय के क्षेत्र में लाभ होता है।
  • ऋणों के लेनदेन तथा अग्रिम भुगतान में सुविधा।
  • पूँजी निर्माण को प्रोत्साहन।
  • मुद्रा की गतिशीलता प्रदान करती है।
  • मुद्रा साख का आधार है।

प्रश्न 8.
एकाधिकार क्या है ? इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
एकाधिकार बाजार की वह स्थिति है जिसमें एक वस्तु का एक ही उत्पादक अथवा एक ही विक्रेता होता है तथा उसकी वस्तु का कोई निकट स्थानापन्न नहीं होता है।

एकाधिकार बाजार की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं-

  • एक विक्रेता तथा अधिक क्रेता।
  • एकाधिकारी फर्म और उद्योग में अन्तर नहीं होता।
  • एकाधिकारी बाजार में नई फर्मों के प्रवेश पर बाधाएँ होती हैं।
  • वस्तु की कोई निकट प्रतिस्थापन्न वस्तु नहीं होती।
  • कीमत नियंत्रण एकाधिकारी द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 9.
संतुलित बजट, बचत बजट और घाटे के बजट में भेद कीजिए।
उत्तर:
बजट के मुख्यतः तीन प्रकार हैं-

  1. संतुलित बजट,
  2. बचत बजट,
  3. घाटे का बजट

1. संतुलित बजट (Balanced Budget)- संतुलित बजट वह बजट है जिसमें सरकार की आय तथा व्यय दोनों बराबर होते हैं।
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 1

संतुलित बजट का आर्थिक क्रियाओं के स्तर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसके कारण न तो संकुचनकारी शक्तियाँ और न ही विस्तारवादी शक्तियाँ काम कर पाती हैं। प्रो० केज के अनुसार विकसित देशों में महामन्दी तथा बेरोजारी के समाधान हेतु और अर्द्धविकसित देशों के विकास के लिए संतुलित बजट उपयुक्त नहीं है क्योंकि संतुलित बजट द्वारा इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता।

2. बचत बजट (Surplus Budget)- यह वह बजट है जिसमें सरकार की अनुमानित आय सरकार के अनुमानित व्यय से अधिक होती है।
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 2
स्फीतिक दशाओं में बचत का बजट वांछनीय होता है क्योंकि बचत का बजट अर्थव्यवस्था में सामूहिक माँग के स्तर को घटाकर स्फीतिक अन्तराल को कम करने में सहायक होता है। बचत के बजट में सरकारी व्यय के सरकारी आय से कम हो जाने के कारण यह मंदी की दशाओं में वांछनीय नहीं है।

3. घाटे का बजट (Deficit Budget)- घाटे का बजट वह बजट है जिसमें सरकार की अनुमानित आय सरकार के अनुमानित व्यय से कम होती है।
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 3
घाटे के बजट का तात्पर्य यह है कि सरकार जितनी मात्रा में मुद्रा अर्थव्यवस्था में खप सकती है, उससे अधिक मात्रा में मुद्रा अर्थव्यवस्था में प्रवाहित कर दी जाती है। फलतः अर्थव्यवस्था में विस्तारवादी शक्तियाँ बलवती हो उठती हैं।

प्रश्न 10.
उत्पादन फलन से आप क्या समझते हैं ? इसकी मुख्य विशेषताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
उत्पादन का अभिप्राय आगतों अथवा आदानों को निर्गत में बदलने की प्रक्रिया से है। भूमि, श्रम, पूँजी तथा उद्यम उत्पादन के साधन या कारक हैं। उत्पादन या निर्गत इन साधनों के संयुक्त प्रयोग का परिणाम होता है। उत्पादन के साधनों को आगत तथा उत्पादन की मात्रा को निर्गत की संज्ञा दी जाती है। उत्पादन फलन एक दी हुई तकनीक के अंतर्गत आगतों एवं निर्गतों के संबंध की व्याख्या करता है। निर्गत को आगतों का फल या परिणाम कहा जा सकता है। इस प्रकार उत्पादन फलन इस तथ्य को व्यक्त करता है कि एक दी हुई प्रौद्योगिकी में आगतों के विभिन्न संयोग से निर्गत को कितनी अधिकतम मात्रा का उत्पादन संभव है।

मान लें कि हम उत्पादन के दो साधनों भूमि और श्रम का प्रयोग करते हैं। इस स्थिति में हम उत्पादन फलन को निम्नांकित रूप में व्यक्त कर सकते हैं। q = f(x1, x2)

इससे यह पता चलता है कि हम आगत x1 और x2 का प्रयोग कर वस्तु की अधिकतम मात्रा q का उत्पादन कर सकते हैं।

माँग फलन की तीन मुख्य विशेषताएँ निम्नांकित हैं।

  • उत्पादन फलन विभिन्न आगतों के अनुकूलतम प्रयोग से निर्गत के अधिकतम स्तर को दर्शाता है।
  • यह एक निश्चित अवधि के अंतर्गत आगत और निर्गत के संबंध की व्याख्या करता है।
  • उत्पादन फलन वर्तमान तकनीकी ज्ञान से निर्धारित होता है।

प्रश्न 11.
राष्ट्रीय आय की कठिनाइयों का वर्णन करें।
उत्तर:
राष्ट्रीय आय की माप करने में प्रायः कई कठिनाइयाँ होती हैं जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं-

  • राष्ट्रीय आय की गणना के लिए कोई भी प्रणाली क्यों न अपनाई जाए, पर्याप्त एवं विश्वसनीय आँकड़ों की हमेशा कमी रहती है।
  • राष्ट्रीय आय की गणना करते समय कई बार एक ही आय को दुबारा गिन लिया जाता है। उदाहरण के लिए एक वकील की आय में उसकं सहायक की आय भी सम्मिलित रहती है तथा इन दोनों की पृथक रूप से गणना नहीं होनी चाहिए।
  • प्राय: कुछ वस्तुओं का उत्पादन स्वयं उपभोग कर लेते हैं या उनका अदल-बदल अर्थात् अन्य वस्तुओं से विनिमय करते हैं। राष्ट्रीय आय को मापने में ऐसी वस्तुओं के मूल्यांकन की भी कठिनाई उत्पन्न होती है।

प्रश्न 12.
पूर्णतया लोचदार माँग और पूर्णतया बेलोचदार माँग में अंतर कीजिए।
उत्तर:
जब किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन नहीं होने पर भी अथवा बहुत सूक्ष्म परिवर्तन होने पर माँग में बहुत अधिक परिवर्तन हो जाता है तब उस वस्तु की माँग पूर्णतया लोचदार कही जाती है। पूर्ण लोचदार माँग को अनंत लोचदार माँग भी कहते हैं। इस स्थिति में एक दी हुई कीमत पर वस्तु की माँग असीम या अनंत होती है तथा कीमत में नाममात्र की वृद्धि होने पर शून्य हो जाती है। माँग पूर्ण लोचदार होने पर माँग वक्र X-अक्ष के समानांतर होता है जिसे नीचे के रेखाचित्र में दर्शाया गया है-
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 4
जब किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर भी उसको माँग में कोई परिवर्तन नहीं होता है तो इसे पूर्णतया बेलोचदार माँग कहते हैं। इस स्थिति में माँग की लोच शून्य होती है जिसके फलस्वरूप माँग वक्र Y-अक्ष के समानांतर होता है। नीचे के रेखाचित्र में दर्शाया गया है-
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 5

प्रश्न 13.
पूर्ति की कीमत लोच का क्या अर्थ है ? प्रतिशत प्रणाली द्वारा पूर्ति की लोच को कैसे मापा जाता है ?
उत्तर:
पूर्ति की लोच अथवा पूर्ति की कीमत लोच, वस्तु की कीमत में परिवर्तनों के कारण उसकी पूर्ति की प्रतिक्रियाशीलता को प्रदर्शित करता है। पूर्ति की कीमत लोच की धारणा हमें यह बताती है कि कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप किसी वस्तु की पूर्ति में किस दर या अनुपात में परिवर्तन होता है। सरल शब्दों में, पूर्ति की लोच वस्तु की कीमत में हुए प्रतिशत परिवर्तन के फलस्वरूप पूर्ति में होनेवाले प्रतिशत परिवर्तन को व्यक्त करता है।

पूर्ति की कीमत लोच को मापने की दो मुख्य विधियाँ हैं-प्रतिशत प्रणाली और ज्यामितिक प्रणाली। प्रतिशत अथवा आनुपातिक प्रणाली में पूर्ति की लोच को मापने का सूत्र इस प्रकार है-
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 6

इस सूत्र को बीजगणितीय रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जाता है-
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 7
जहाँ, Δq पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन, १ प्रारंभिक पूर्ति, D कीमत में परिवर्तन तथा p प्रारंभिक कीमत को प्रदर्शित करता है।

यदि सत्र es = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p}{q}\) का परिणाम 1 अर्थात इकाई हो तो किसी वस्तु की पूर्ति समलोचदार है, यदि परिणाम इकाई से अधिक है तो पूर्ति अधिक लोचदार है और यदि परिणाम इकाई से कम है तो पूर्ति कम लोचदार है।

प्रश्न 14.
कुल लागत से आप क्या समझते हैं ? कुल स्थिर लागत वक्र का आकार क्या होता है ?
उत्तर:
किसी वस्तु के उत्पादन में प्रयुक्त समस्त आगतों पर होने वाला व्यय कुल लागत कहलाता है। यह कुल स्थिर आगतों (जैसे-भूमि, मशीन, उपकरण आदि) पर व्यय तथा कुल परिवर्ती आगतों (जैसे–कच्चा माल, श्रम, बिजली आदि) पर किए जाने वाले व्यय का योगफल होता है।
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 8
कुल स्थिर लागतें स्थायी साधन-आगतों का प्रयोग करने के लिए वहन की जाती हैं। उत्पादन अर्थात् निर्यात की मात्रा में परिवर्तन होने पर भी इन लागतों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। उदाहरण के लिए, एक चीनी मिल प्रायः वर्ष में 3-4 महीने बंद रहती है। फिर भी इसके स्वामी को कारखाने का किराया, ऋणों का ब्याज तथा स्थायी कर्मचारियों के वेतन आदि का भुगतान करना होता है। स्पष्ट है कि फर्म को इस प्रकार की लागतें प्रत्येक अवस्था में वहन करनी होती हैं। इसे नीचे के रेखाचित्र में दर्शाया गया है।

उपरोक्त रेखाचित्र से यह स्पष्ट है कि कुल स्थिर लागत (TFC) वक्र X-अक्ष के समानांतर होती है। इसका अभिप्राय यह है कि निर्गत के प्रत्येक स्तर पर कुल स्थिर लागतें एक समान रहती हैं।

प्रश्न 15.
उपभोग की औसत तथा सीमांत प्रवृत्ति से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
उपभोग की प्रवृत्ति आय एवं उपभोग के कार्यात्मक संबंध को व्यक्त करता है। उपभोग प्रवृत्ति. की व्याख्या करने के लिए केन्स ने उपभोग की औसत तथा सीमांत प्रवृत्ति की धारणाओं का प्रयोग किया है। उपभोग की औसत प्रवृत्ति (APC) कुल उपभोग तथा कुल आय का अनुपात है। यह एक विशेष समय पर कुल आय एवं कुल उपभोग के पारस्परिक संबंध को व्यक्त करता है। उपभोग की औसत प्रवृत्ति कुल उपभोग में कुल आय से भाग देकर निकाली जा सकती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति का कुल वास्तविक आय 1,000 रुपये है जिसमें से वह 800 रुपये उपभोग पर खर्च करता है तब उपभोग की औसत प्रवृत्ति (APC) 800/1,000 अथवा 0.80 होयी। यदि हम कुल आय को Y तथा कुल उपभोग को C से व्यक्त करें तो उपभोग की औसत प्रवृत्ति का सूत्र इस प्रकार होगा-

APC = \(\frac{\mathrm{c}}{\mathrm{y}}\)

उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति (MPC) आय में होनेवाले परिवर्तनों के फलस्वरूप उपभोग में होनेवाले परिवर्तन के अनुपात को बताता है। दूसरे शब्दों में, उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति कुल आय में इकाई परिवर्तन के फलस्वरूप उपभोग में हुए परिवर्तन का अनुपात है। इससे इस बात का भी पता चलता है कि आय में होनेवाली अतिरिक्त वृद्धि को उपभोग एवं बचत के बीच किस प्रकार विभक्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, मान लें कि जब कुल आय 1,000 रुपये से बढ़कर 1,010 रुपये हो जाती है तब उपभोग की मात्रा 800 रुपये से बढ़कर 806 रुपये हो जाती है। इस अवस्था में आय में अतिरिक्त वृद्धि 10 रुपये तथा उपभोग में 6 रुपये है। अतः उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति (MPC) 6/10 अर्थात 0.60 होगी। यदि हम परिवर्तन को Δ (डेल्टा) चिह्न से व्यक्त करें तो उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति का निम्नांकित सूत्र होगा-
MPC = \(\frac{\Delta \mathrm{c}}{\Delta \mathrm{y}}\)

प्रश्न 16.
व्यापार संतुलन एवं भुगतान संतुलन में अंतर कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में प्रत्येक देश विदेशों से कुछ वस्तुओं और सेवाओं का आयात तथा निर्यात करता है। व्यापार एवं भुगतान-संतुलन का संबंध दो देशों के बीच इनके लेन-देन से है। परंतु, व्यापार एवं भुगतान-संतुलन एक ही नहीं हैं, वरन् इन दोनों में थोड़ा अंतर है। व्यापार-संतुलन से हमारा अभिप्राय आयात और निर्यात के बीच अंतर से है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रत्येक देश कुछ वस्तुओं का आयात तथा कुछ का निर्यात करता है। आयात तथा निर्यात की यह मात्रा हमेशा बराबर नहीं होती। आयात तथा निर्यात के इस अंतर को ही ‘व्यापार-संतुलन’ कहते हैं।

व्यापार- संतुलन की अपेक्षा भुगतान-संतुलन की धारणा अधिक विस्तृत एवं व्यापक है। इन दोनों के अंतर को समझने के लिए दृश्य एवं अदृश्य व्यापार के अंतर को स्पष्ट करना आवश्यक है। जब देश से निधि सहित वस्तुएँ किसी अन्य देश को निर्यात की जाती हैं अथवा बाहरी देशों से उनका आयात होता है, तो बंदरगाहों पर इनका लेखा कर लिया जाता है। इस प्रकार की मदों को विदेशी व्यापार की दृश्य मदें कहते हैं। परंतु, विभिन्न देशों के बीच आयात-निर्यात की ऐसी मदें, जिनका लेखा बंदरगाहों पर नहीं होता, विदेशी व्यापार की अदृश्य मदें कहलाती हैं। भुगतान-संतुलन में विदेशी व्यापार की दृश्य तथा अदृश्य दोनों प्रकार की मदें आती हैं, जबकि व्यापार-संतुलन में केवल विदेशी व्यापार की दृश्य मदों को शामिल किया जाता है। इस प्रकार, भुगतान-संतुलन का क्षेत्र व्यापार-संतुलन से अधिक विस्तृत होता है।

प्रश्न 17.
सीमान्त उपयोगिता की परिभाषा दीजिए तथा सीमान्त उपयोगिता एवं कुल उपयोगिता के संबंध को बतलाइए।
उत्तर:
किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से जो अतिरिक्त उपयोगिता मिलती है, उसे सीमान्त उपयोगिता कहते हैं।

सीमान्त उपयोगिताn = कुल उपयोगताn – कुल उपयोगिताn-1
MUn = TUn – TUn-1
प्रो० बोल्डिंग के अनुसार, किसी वस्तु को दी हुई मात्रा को सीमांत उपयोगिता कुल उपयोगिता होनेवाली वह वृद्धि है, जो उसके उपभोग में एक इकाई के बढ़ने के परिणामस्वरूप होती हैं। कुल उपयोगिता (TLY) उपभोग की विभिन्न इकाइयों से प्राप्त सीमांत उपयोगिता का योग है।

सीमांत उपयोगिता एवं कुल उपयोगिता से संबंध :
MU एवं TU में संबंध को निम्न तालिका एवं चित्र द्वारा निरुपित किया जा सकता है-
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 9
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 3, 10

उपरोक्त तालिका एवं चित्र से MU एवं TU के निम्न संबंध को बतलाया जा सकता है-
(क) प्रारंभ में कुल उपयोगिता एवं सीमांत उपयोगिता दोनों घनात्मक होती है।
(ख) जब सीमांत उपयोगिता घनात्मक है चाहे वह घट रही हो, तब तक कुल उपयोगिता बढ़ती है। तालिका में इकाई 1 से 4 चित्र में A से E बिन्दु की स्थिति।
(ग) जब सीमांत उपयोगिता शन्यू हो जाती है, तब कुल उपयोगिता अधिकतम होती है। तालिका में पाँचवीं शकई पर MUO एवं TU अधिकतम 100 है। चित्र में E तथा B बिन्दुओं की स्थिति। बिन्दु E उच्चतम तथा बिन्दु E पर उपभोक्ता शून्य उपयोगिता के कारण पूर्ण तृप्त है।
(घ) जब सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक होती है (इकाई 6 एवं 7) तब कुल उपयोगिता घटने लगती है। चित्र में TU में E से F तक की स्थिति एवं MU में B बिन्दु से G बिन्दु की स्थिति।

प्रश्न 18.
पूर्ति के कीमत लोच को परिभाषित कीजिए। इसके निर्धारक तत्व कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
पूर्ति की कीमत लोच किसी वस्तु की कीमत में होनेवाले परिवर्तन के परिणामस्परूप उसके पूर्ति में होनेवाले परिवर्तन की साथ है।

मार्शल के अनुसार ”पूर्ति की लोच से अभिप्राय कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप पूर्ति की मात्रा में होनेवाले परिवर्तन से है।”

पूर्ति के लोच के निर्धारक तत्व निम्नलिखित हैं-
(क) वस्तु की प्रकृति- टिकाऊ वस्तु की पूर्ति लोच अपेक्षाकृत लोचदार होती है एवं शीघ्र नाशवान वस्तुओं की पूर्ति अपेक्षाकृत बेलोचदार होती है।

(ख) उत्पादन लागत- यदि उत्पादन बढ़ने पर औसत लागत में तेजी से वृद्धि होती है तो पूर्ति की लोच कम होगी। यदि उत्पादन बढ़ने पर औसत लागत धीमी गति से बढ़ती है तो पूर्ति की लोच अधिक होगी।

(ग) भावी कीमतों में परिवर्तन- भविष्य में कीमत बढ़ने की आशा रहने पर उत्पादक वर्तमान पूर्ति कम करेंगे एवं पूर्ति बेलोचदार हो जाएगी। इसके विपरीत भविष्य में कीमत कम होने की आशा रहने पर पूर्ति अधिक होगी।

(घ) प्राकृतिक कारण- प्राकृतिक कारणों से कई वस्तुओं की पूर्ति नहीं बढ़ाई जा सकती। जैसे-लकड़ी।

(ङ) उत्पादन की तकनीक-उत्पादन तकनीक जटिल होने पर पूर्ति बेलोचदार होगी एवं उत्पादन तकनीक सरल होने पर पूर्ति लोचदार होगी।

(च) समय तत्व-समय तत्व को तीन भागों में बाँटा जाता है-

  • अति अल्पकाल में पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार होती है क्योंकि अल्पकाल में पूर्ति में परिवर्तन नहीं हो सकता।
  • अल्पकाल में संयंत्र स्थिर रहता है इसलिए पूर्ति कम लोचदार होती है।
  • दीर्घकाल में वस्तु की पूर्ति को आसानी से घटाया-बढ़ाया जा सकता है जिससे पूर्ति लोचदार होती है।

Bihar Board 12th Philosophy Objective Important Questions Part 7

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Bihar Board 12th Philosophy Objective Important Questions Part 7

प्रश्न 1.
क्या वस्तुवाद का आधार, सामान्य ज्ञान है?
(a) हाँ
(b) नहीं
(c) हाँ और नहीं दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) नहीं

प्रश्न 2.
अनासक्त कर्म को कहा जाता है
(a) निष्काम कर्म
(b) काम्य कर्म
(c) निषिद्ध कर्म
(d) आसक्त कर्म
उत्तर:
(a) निष्काम कर्म

प्रश्न 3.
ज्ञान के साधन को क्या कहा जाता है?
(a) प्रमाता
(b) प्रमेय
(c) प्रमाण.
(d) प्रमा
उत्तर:
(d) प्रमा

प्रश्न 4.
गीता का उपदेश किसने दिया है?
(a) श्रीकृष्ण ने
(b) अर्जुन ने
(c) द्रोण ने
(d) विदुर ने
उत्तर:
(a) श्रीकृष्ण ने

प्रश्न 5.
गीता में कुल कितने अध्याय है?
(a) पाँच
(b) दस
(c) पंद्रह
(d) अट्ठारह
उत्तर:
(b) दस

प्रश्न 6.
क्या शंकर के अनुसार आत्मा और ब्रह्मा तादात्म्य है?
(a) हाँ
(b) नहीं
(c) पृथक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) हाँ

प्रश्न 7.
क्या शंकर के अनुसार जगत पूर्णतः असत्य है?
(a) हाँ
(b) नहीं
(c) संदेहपूर्ण
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) हाँ

प्रश्न 8.
नीतिशास्त्र का अंग्रेजी अनुवाद क्या है?
(a) इथोस
(b) मोरेस
(c) एथिक्स
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) एथिक्स

प्रश्न 9.
मूर समर्थक हैं
(a) वस्तुवाद के
(b) प्रत्ययवाद के
(c) अस्तित्ववाद के
(d) सारतत्ववाद के
उत्तर:
(d) सारतत्ववाद के

प्रश्न 10.
पदार्थ की अवधारणा सम्बन्धित है।
(a) न्याय से
(b) वैशेषिक से
(c) सांख्य से
(d) योग से
उत्तर:
(b) वैशेषिक से

प्रश्न 11.
क्या ऋत् एक वैदिक सम्प्रत्यय है?
(a) हाँ
(b) नहीं
(c) हाँ और नहीं दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) हाँ

प्रश्न 12.
‘दर्शन’ शब्द का अंग्रेजी रूपान्तरण है
(a) मेटाफिजिक्स
(b) एपीस्टेमोलॉजी
(c) फिलॉसफी
(d) एथिक्स।
उत्तर:
(c) फिलॉसफी

प्रश्न 13.
बुद्धिवाद के समर्थक कौन हैं?
(a) देकार्त
(b) स्पिनोजा
(c) लाइबनीज
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(a) देकार्त

प्रश्न 14.
बौद्ध दर्शन के द्वारा स्वीकृत प्रमाणों की संख्या है
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर:
(d) चार

प्रश्न 15.
पुरुषार्थ के कितने प्रकार विवेचित हैं?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पाँच
उत्तर:
(c) चार

प्रश्न 16.
कारण के गुणात्मक लक्षण हैं
(a) पूर्ववर्ती
(b) नियत
(c) अनोपाधिक
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(a) पूर्ववर्ती

प्रश्न 17.
आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद के समर्थक कौन हैं?
(a) लॉक
(b) बर्कले
(c) ह्यूम
(d) काण्ट
उत्तर:
(c) ह्यूम

प्रश्न 18.
मन-शरीर सम्बन्ध की व्याख्या होती है
(a) अन्तक्रियावाद के द्वारा
(b) सामानान्तरवाद के द्वारा
(c) पूर्व-स्थापित सामंजस्य के द्वारा
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(a) अन्तक्रियावाद के द्वारा

प्रश्न 19.
लोकसंग्रह का सम्प्रत्यय सम्बन्धित है
(a) गीता से
(b) उपनिषद् से
(c) पुराण से
(d) वेद’ से
उत्तर:
(a) गीता से

प्रश्न 20.
“कारण भावात्मक तथा अभावात्मक दोनों उपाधियों का योग है।” यह कथन है (a) मिल का
(b) ह्यूम का
(c) अरस्तू का
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) ह्यूम का

प्रश्न 21.
सांख्य के अनुसार प्रकृति के निर्वाचक तत्व कितने हैं?
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर:
(d) चार

प्रश्न 22.
न्यायसूत्र के लेखक कौन हैं?
(a) गौतम
(b) कणाद
(c) कपिल
(d) जैमिनी
उत्तर:
(c) कपिल

प्रश्न 23.
सत्तामूलक प्रमाण को पूर्ण स्पष्टता के साथ व्यक्त किया है
(a) संत एनसेल्म ने
(b) संत थॉमस एक्वीनस ने
(c) काण्ट ने
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) काण्ट ने

प्रश्न 24.
इनमें से कौन एक दर्शनशास्त्र की शाखा है?
(a) शिक्षा दर्शन
(b) भारत दर्शन
(c) बिहार दर्शन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) शिक्षा दर्शन

प्रश्न 25.
“दुश्यते अनन इति दर्शनम्” परिभाषा है
(a) अर्थशास्त्र की
(b) तर्कशास्त्र की
(c) दर्शनशास्त्र की
(d) भूगर्भशास्त्र की
उत्तर:
(c) दर्शनशास्त्र की

प्रश्न 26.
रामानुज का दर्शन क्या कहलाता है?
(a) विशिष्टाद्वैत
(b) अद्वैत
(c) द्वैताद्वैत
(d) द्वैतवाद
उत्तर:
(d) द्वैतवाद

प्रश्न 27.
‘वस्तुएँ ज्ञात होने के लिए ज्ञाता पर पूर्णतः आश्रित हैं।’ यह कथन है
(a) प्रत्ययवाद का
(b) वस्तुवाद का
(c) समीक्षावाद का
(d) बुद्धिवाद का
उत्तर:
(a) प्रत्ययवाद का

प्रश्न 28.
गीता का केन्द्रीय उपदेश क्या है?
(a) कर्मयोग
(b) ज्ञानयोग
(c) भक्तियोग
(d) राजयोग
उत्तर:
(b) ज्ञानयोग

प्रश्न 29.
“दृश्यते इति वर्तते’ उक्ति किसने दी हैं?
(a) लॉक
(b) बर्कले
(c) धूम
(d) काण्ट
उत्तर:
(d) काण्ट

प्रश्न 30.
लाइबनीज स्वीकार करता है
(a) समानान्तरवाद
(b) पूर्व-स्थापित सामंजस्य
(c) अन्तर्कियावाद
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) समानान्तरवाद

प्रश्न 31.
जैन-दर्शन के अनुसार नय है-
(a) किसी वस्तु को पूर्ण रूप से समझना
(b) किसी वस्तु को नहीं समझना
(c) किसी वस्तु को पूर्ण रूप से नहीं समझकर उसके अंश समझना
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) किसी वस्तु को पूर्ण रूप से नहीं समझकर उसके अंश समझना

प्रश्न 32.
जैन-दर्शन में मोक्ष मार्ग को कहा गया है-
(a) चतुर्रत्न
(b) त्रिरत्न
(c) अष्टांग मार्ग
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) त्रिरत्न

प्रश्न 33.
जैन के दर्शन का स्याद्वाद सिद्धान्त का आधार है-
(a) द्रव्य विचार
(b) नय सिद्धान्त
(c) अनेकान्तवाद
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) नय सिद्धान्त

प्रश्न 34.
किस प्रत्यक्ष में वस्तु का निश्चित और स्पष्ट ज्ञान होता है?
(a) सविकल्पक में
(b) निर्विकल्पक प्रत्यक्ष में
(c) (a) और (b) दोनों में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) सविकल्पक में

प्रश्न 35.
‘Carito ergo sum’ किसने कहाँ?
(a) देकार्त
(b) काण्ट
(c) बर्कले
(d) लॉक
उत्तर:
(a) देकार्त

प्रश्न 36.
हीनयान तथा महायान सम्प्रदाय है
(a) शंकर वेदान्त
(b) बुद्ध दर्शन
(c) न्याय
(d) भगवद्गीता
उत्तर:
(b) बुद्ध दर्शन

प्रश्न 37.
‘ईश्वर के विषय में ज्ञान मात्र से उनका अस्तित्व सिद्ध होता है’ यह संबंधित है-
(a) विश्व संबंधी युक्ति
(b) तात्विक युक्ति
(c) प्रयोजनात्मक युक्ति
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) तात्विक युक्ति

प्रश्न 38.
‘Cause is qualitatively, the immediate, unconditional, invariable antecedent to the effect.’ इस परिभाषा को किसने कहा?
(a) मिल
(b) कार्वेथरीड
(c) हेगेल
(d) गाँधीजी
उत्तर:
(a) मिल

प्रश्न 39.
कर्मसिद्धांत कारणतावाद है
(a) तार्किक
(b) न्यायिक
(c) नैतिक
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(c) नैतिक

प्रश्न 40.
कर्मयोग में दो शब्द हैं
(a) धर्म और योग
(b) योग और त्याग
(c) कर्म और योग
(d) कर्म और धर्म
उत्तर:
(c) कर्म और योग

प्रश्न 41.
लोक संग्रह सिद्धांत है
(a) पूर्णतावाद
(b) सुखवाद
(c) सर्वकल्याणवाद
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(a) पूर्णतावाद

प्रश्न 42.
शंकर के अनुसार सत-चित्त आनन्द कौन है?
(a) ईश्वर
(b) माया या
(c) ब्रह्म
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) ब्रह्म

प्रश्न 43.
जैन दर्शन में ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत क्या है?
(a) स्वाद्वाद
(b) अनेकान्तवाद
(c) अख्यातिवाद
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) अख्यातिवाद

प्रश्न 44.
दो होने का अर्थ है
(a) बराबर
(b) विभाजन की
(c) जोड़
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(c) जोड़

प्रश्न 45.
वैशेषिक दर्शन के द्वारा कितने प्रकार के गुण माने गए हैं?
(a) अठारह
(b) चौबीस
(c) तेईस
(d) अठाइस
उत्तर:
(b) चौबीस

प्रश्न 46.
“एक तर्कसंगत प्रयास है प्रमाण को उसकी समग्रता में एक पूरे के रूप से सम्मिलित करने का”-यह परिभाषा है
(a) मानवशास्त्र
(b) धर्मशास्त्र
(c) दर्शनशास्त्र
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) दर्शनशास्त्र

प्रश्न 47.
संशयवाद के संस्थापक कौन हैं?
(a) डब्ल्यू. टी. स्टेस .
(b) राम
(c) काण्ट
(d) स्पिनोजा
उत्तर:
(b) राम

Bihar Board 12th Philosophy Objective Important Questions Part 6

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Bihar Board 12th Philosophy Objective Important Questions Part 6

प्रश्न 1.
स्यावाद सिद्धान्त है
(a) ज्ञानशास्त्रीय
(b) तत्वशास्त्रीय
(c) नीति मीमांसीय
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) नीति मीमांसीय

प्रश्न 2.
महात्मा गाँधी ने गीता को कहा है
(a) माता
(b) पिता
(c) बाइबिल
(d) कुरान
उत्तर:
(a) माता

प्रश्न 3.
बुद्ध ने कितने आर्य सत्य बतलाये हैं?
(a) चार
(b) दो
(c) आठ
(d) छः
उत्तर:
(a) चार

प्रश्न 4.
जैन दर्शन में आत्मा को कहा जाता है
(a) पुरुष
(b) जीव
(c) ईश्वर
(d) अजीव
उत्तर:
(b) जीव

प्रश्न 5.
भारतीय प्रमाण शास्त्र में यथार्थ ज्ञान कहलाता है
(a) प्रमाण
(b) प्रमा
(c) अप्रमा
(d) प्रमेय
उत्तर:
(b) प्रमा

प्रश्न 6.
मीमांसा दर्शन के प्रवर्तक हैं.
(a) कपिल
(b) कणाद
(c) पतंजलि
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 7.
‘ज्ञान की प्राप्ति आगमनात्मक विधि से होती है’ किस ज्ञान सिद्धान्त के अनुसार?
(a) समीक्षावाद
(b) बुद्धिवाद
(c) अनुभववाद
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) बुद्धिवाद

प्रश्न 8.
नीतिशास्त्र विज्ञान है
(a) सत्ता का
(b) नैतिकता का
(c) ज्ञान का
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) ज्ञान का

प्रश्न 9.
‘एन इन्ट्रोडक्शन टू इथिक्स’ के लेखन कौन हैं?
(a) मैकेन्जी
(b) मिल
(c) बेन्थम
(d) इनमें से कोई
उत्तर:
(b) मिल

प्रश्न 10.
अनुप्रयुक्त नीतिशास्त्र के प्रणेता कौन हैं?
(a) मिल
(b) काण्ट
(c) पीटर सिंगर
(d) मूर
उत्तर:
(d) मूर

प्रश्न 11.
अनुभववाद के समर्थक हैं
(a) काण्ट
(b) स्पीनोजा.
(c) देकार्त
(d) लॉक
उत्तर:
(d) लॉक

प्रश्न 12.
लाइबनीज ने स्वीकारा है
(a) अन्तरक्रियावाद
(b) समानान्तरवाद
(c) पूर्वस्थापित सामंजस्यवाद को
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) समानान्तरवाद

प्रश्न 13.
कारण होता है
(a) अनौपाधिक
(b) पूर्ववर्ती :
(c) नियत
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 14.
प्रत्ययवाद के अनुसार परमसत्ता है
(a) गड़
(b) तटस्थ
(c) परमाणु
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) तटस्थ

प्रश्न 15.
निरपेक्ष प्रत्ययवाद के प्रवर्तक हैं।
(a) हीगेल
(b) बर्कले
(c) प्लेटो
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) प्लेटो

प्रश्न 16.
अरस्तू ने कारण की संख्या बतलायी है
(a) चार
(b) पाँच
(c) छः
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) चार

प्रश्न 17.
ईश्वर के अस्तित्व सम्बन्धी प्रमाण हैं
(a) प्रयोजनात्मक युक्ति
(b) नैतिक युक्ति
(c) सत्तामूलक युक्ति
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(c) सत्तामूलक युक्ति

प्रश्न 18.
किस दर्शन में ‘सम्यक समाधि’ का वर्णन हैं?
(a) जैन दर्शन
(b) बौद्ध दर्शन
(c) योग
(d) मीमांसा
उत्तर:
(c) योग

प्रश्न 19.
निम्न में से कौन पुरुषार्थ नहीं है?
(a) अर्थ
(b) धर्म
(c) ईश्वर
(d) काम
उत्तर:
(c) ईश्वर

प्रश्न 20.
सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं
(a) पुरुष के
(b) प्रकृति के
(c) ईश्वर के
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) पुरुष के

प्रश्न 21.
गीता के अनुसार योग है
(a) त्याग
(b) समाधि
(c) ईयवर से मिलन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) ईयवर से मिलन

प्रश्न 22.
बौद्ध दर्शन और जैन दर्शन हैं
(a) अर्वाचीन
(b) समकालीन
(c) वैदिक काल
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) समकालीन

प्रश्न 23.
अनुमान का तार्किक आधार है
(a) हेतु
(b) व्याप्ति
(c) पक्ष
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) हेतु

प्रश्न 24.
सत्कार्यवाद के रूप हैं
(a) असत्कार्यवाद
(b) आरम्भवाद
(c) परिणामवाद
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) परिणामवाद

प्रश्न 25.
कौन अनुभववादी है?
(a) देकार्त
(b) लाइबनीज
(c) ह्यूम
(d) स्पीनोजा
उत्तर:
(b) लाइबनीज

प्रश्न 26.
निम्नलिखित में से किस एक में बुद्ध के उपदेश संग्रहित हैं?
(a) बुद्ध के उपदेश में
(b) ज्ञान की पुस्तक में
(c) त्रिपिटक में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) त्रिपिटक में

प्रश्न 27.
न्याय, वैशेषिक, सांख्य एवं योग निम्न में से किस दार्शनिक सम्प्रदाय से आते हैं?
(a) नास्तिक
(b) आस्तिक
(c) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) आस्तिक

प्रश्न 28.
पदार्थ सिद्धान्त संबंधित है
(a) न्याय दर्शन
(b) सांख्य दर्शन
(c) बौद्ध दर्शन
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(a) न्याय दर्शन

प्रश्न 29.
अनुमान को प्रमाण के रूप में स्वीकार किया है
(a) न्याय दर्शन
(b) सांख्य दर्शन
(c) बौद्ध दर्शन
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(a) न्याय दर्शन

प्रश्न 30.
योग दर्शन के अनुसार योग का अर्थ है
(a) मिलन
(b) चित्रवृत्ति निरोध
(c) यम
(d) नियम
उत्तर:
(b) चित्रवृत्ति निरोध

प्रश्न 31.
किसके अनुसार यथार्थ ज्ञान को सार्वभौम एवं अनिवार्य होना चाहिए?
(a) काण्ट
(b) ह्यूम
(c) देकार्त
(d) इनमें से कोई नहीं .
उत्तर:
(b) ह्यूम

प्रश्न 32.
सांख्य दर्शन में आत्मा को कहा जाता है
(a) जीव
(b) पुरुष
(c) ब्रह्म
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) जीव

प्रश्न 33.
राम के ज्ञान-विचार को कहते हैं
(a) अनुभववाद
(b) समीक्षावाद
(c) बुद्धिवाद
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(c) बुद्धिवाद

प्रश्न 34.
संकल्प-स्वातंत्रय का अर्थ क्या है?
(a) आत्म नियंत्रण
(b) बाह्य नियंत्रण
(c) दैवी नियंत्रण
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) आत्म नियंत्रण

प्रश्न 35.
बौद्धधर्म के संस्थापक कौन हैं?
(a) भगवान बुद्ध
(b) असंग
(c) वसुबन्धु
(d) नागार्जुन
उत्तर:
(a) भगवान बुद्ध

प्रश्न 36.
वस्तुवाद का सार निहित है
(a) वस्तुएँ ज्ञाता से स्वतंत्र होती हैं
(b) वस्तुएँ ज्ञाता से स्वतंत्र नहीं होती हैं
(c) वस्तुएँ और ज्ञाता एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) वस्तुएँ और ज्ञाता एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं

प्रश्न 37.
भारतीय दर्शन की मूल प्रकृति है
(a) मनोवैज्ञानिक
(b) प्राकृतिक
(c) आध्यात्मिक
(d) सामाजिक
उत्तर:
(c) आध्यात्मिक

प्रश्न 38.
‘सर्वम् दुःखम्’ कहा गया है
(a) बुद्ध द्वारा
(b) महावीर द्वारा
(c) शंकर द्वारा
(d) चार्वाक द्वारा
उत्तर:
(b) महावीर द्वारा

प्रश्न 39.
अरस्तु के अनुसार कारणों की संख्या कितनी स्वीकृत है?
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर:
(b) दो

प्रश्न 40.
सांख्य दर्शन में आत्मा को कहा जाता है
(a) जीव
(b) पुरुष
(c) ब्रह्म
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) ब्रह्म

प्रश्न 41.
कारण-कार्य सम्बन्ध की अनिवार्यता का निषेध करता है
(a) ह्यूम
(b) मिल
(c) बेन्थम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) ह्यूम

प्रश्न 42.
क्या लॉक संगत अनुभववादी है?
(a) हाँ
(b) नहीं
(c) हाँ और नहीं दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) नहीं

प्रश्न 43.
क्या ह्युम संदेहवादी है?
(a) हाँ
(b) नहीं
(c) न तो हाँ और न नहीं
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) न तो हाँ और न नहीं

प्रश्न 44.
क्या जड़ तत्व परम तत्व के रूप में भौतिकवाद को स्वीकृत है?
(a) हाँ
(b) नहीं
(c) संशयपूर्ण
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) हाँ

प्रश्न 45.
योग का अर्थ है
(a) मिलन
(b) पृथक्करण
(c) नियंत्रण
(d) दमन
उत्तर:
(c) नियंत्रण

प्रश्न 46.
काण्ट के ज्ञान-सिद्धान्त को कहा जाता है?
(a) बुद्धिवाद
(b) अनुभववाद
(c) समीक्षावाद
(d) वस्तुवाद
उत्तर:
(b) अनुभववाद

प्रश्न 47.
जैन दर्शन के चौबीसवें तीर्थंकर कौन हैं?
(a) पाश्र्वनाथ
(b) ऋषभदेव
(c) महावीर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) पाश्र्वनाथ

प्रश्न 48.
अद्वैत वेदान्त के अनुसार ज्ञान मुक्ति की ओर ले जाता है
(a) सत्य
(b) असत्य
(c) सत्य और असत्य दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 49.
“ईश्वर सबकुछ है और सबकुछ ईश्वर है” यह कथन किसका है?
(a) स्पिनोजा
(b) लाइबनीज
(c) देकार्त
(d) लॉक
उत्तर:
(a) स्पिनोजा

Bihar Board 12th Philosophy Objective Important Questions Part 5

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प्रश्न 1.
निरपेक्ष प्रत्ययवाद के प्रवर्तक हैं
(a) प्लेटो
(b) बर्कले
(c) हिगेल
(d) अरस्तु
उत्तर:
(c) हिगेल

प्रश्न 2.
देकार्त है
(a) बुद्धिवादी
(b) अनुभववादी
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 3.
रामानुज का सिद्धांत से
(a) विशिष्टाद्वैत
(b) निरपेक्षवाद
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) विशिष्टाद्वैत

प्रश्न 4.
कौन अंतिम तीर्थकर हैं?
(a) पार्श्वनाथ
(b) महावीर
(c) आदिनाथ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) महावीर

प्रश्न 5.
शंकर के अनुसार ‘स्वप्न’ है
(a) प्रतिभाष
(b) व्यवहार
(c) परमार्थ
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(a) प्रतिभाष

प्रश्न 6.
‘त्रिपिटक’ संबंधित है
(a) बौद्ध दर्शन से
(b) सांख्य दर्शन से
(c) जैन दर्शन से
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) बौद्ध दर्शन से

प्रश्न 7.
मीमांसा दर्शन से संबंधित है
(a) शंकर
(b) रामानुज
(c) प्रभाकर
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(a) शंकर

प्रश्न 8.
कौन वस्तुवादी है?
(a) न्याय
(b) देकार्त
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) देकार्त

प्रश्न 9.
न्याय के अनुसार प्रमाण हैं
(a) दो
(b) छः
(c) चार
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) चार

प्रश्न 10.
दर्शन शब्द व्युत्पन्न है
(a) दृशधातु से
(b) कृ धातु
(c) तम धातु से
(d) उपरोक्त कोई नहीं
उत्तर:
(a) दृशधातु से

प्रश्न 11.
कर्मसिद्धांत कारणतावाद है
(a) तार्किक
(b) न्यायिक
(c) नैतिक
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(c) नैतिक

प्रश्न 12.
कर्मयोग में दो शब्द हैं
(a) धर्म और योग
(b) योग और त्याग
(c) कर्म और योग
(d) कर्म और धर्म
उत्तर:
(c) कर्म और योग

प्रश्न 13.
लोक संग्रह सिद्धांत है
(a) पूर्णतावाद
(b) सुखवाद
(c) सर्वकल्याणवाद
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(a) पूर्णतावाद

प्रश्न 14.
जैन दर्शन में ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत क्या है?
(a) स्याद्वाद
(b) अनेकान्तवाद
(c) अख्यातिवाद
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) अख्यातिवाद

प्रश्न 15.
अनुमिति के कारण को क्या कहते हैं?
(a) शब्द
(b) उपमान
(c) अनुमान
(d) प्रत्यक्ष
उत्तर:
(c) अनुमान

प्रश्न 16.
अष्टांगिक योग को यह भी कहा जाता है
(a) अष्टांगमार्ग
(b) अष्टांगिक सम्यक
(c) अष्टांगिक साधन
(d) अष्टांगिक धारणा
उत्तर:
(a) अष्टांगमार्ग

प्रश्न 17.
त्रिगुण होते हैं
(a) तम
(b) रज
(c) गुण
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(b) रज

प्रश्न 18.
द्रव्य क्या है?
(a) क्रिया की प्रतिक्रिया
(b) क्रिया की शक्ति
(c) क्रिया का आश्रय
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(c) क्रिया का आश्रय

प्रश्न 19.
ब्रह्म का लक्षण हैं
(a) तटस्थ
(b) निष्क्रिय
(c) स्वरूप
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(c) स्वरूप

प्रश्न 20.
ब्रह्म शब्द की उत्पत्ति हुई है
(a) बृ
(b) र
(c) धृ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) बृ

प्रश्न 21.
उपनिषद को कहा जाता है
(a) योग विद्या
(b) ब्रह्म विद्या
(c) ज्ञान विद्या
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(a) योग विद्या

प्रश्न 22.
अध्यात्मवाद है
(a) प्रयोजनवादी
(b) यंत्रवादी
(c) प्रकृतिवादी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) प्रकृतिवादी

प्रश्न 23.
रामानुज का अध्यात्मवाद उदाहरण है
(a) आत्मनिष्ठ आध्यात्मवाद
(b) वस्तुनिष्ठ आध्यात्मवाद
(c) निरपेक्ष आध्यात्मवाद
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) वस्तुनिष्ठ आध्यात्मवाद

प्रश्न 24.
दर्शन तथा धर्म हैं
(a) एक-दूसरे के विरोधी
(b) एक-दूसरे से बिल्कुल संबंधित नहीं
(c) एक-दूसरे के बहुत निकट
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(c) एक-दूसरे के बहुत निकट

प्रश्न 25.
बुद्धिवाद के अनुसार ज्ञान को होना चाहिए
(a) सिर्फ सार्वभौम
(b) सिर्फ अनिवार्य
(c) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) दोनों

प्रश्न 26.
जैन दर्शन विश्वास करता है।
(a) एक द्रव्य में
(b) दो द्रव्य में
(c) तीन द्रव्य में
(d) अनेकों द्रव्य में
उत्तर:
(d) अनेकों द्रव्य में

प्रश्न 27.
निम्न में कौन तटस्थ ईश्वरवादी है?
(a) स्पीनोजा
(b) रामानुज
(c) शंकर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) रामानुज

प्रश्न 28.
निम्न में कौन सर्वेश्वरवादी हैं?
(a) देकार्त
(b) स्पीनोजा
(c) शंकर
(d) लाइबनिज
उत्तर:
(c) शंकर

प्रश्न 29.
वस्तुएँ ज्ञाता से स्वतंत्र होती हैं, यह है
(a) बुद्धिवाद
(b) प्रत्ययवाद
(c) वस्तुवाद
(d) समीक्षावाद
उत्तर:
(a) बुद्धिवाद

प्रश्न 30.
अनुमान को प्रमाण के रूप में स्वीकार किया गया है
(a) सांख्य
(b) न्याय
(c) बौद्ध दर्शन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) बौद्ध दर्शन

प्रश्न 31.
पर्यावरण के प्रकार हैं
(a) भौतिक
(b) सांस्कृतिक
(c) मानसिक
(d) आध्यात्मिक
उत्तर:
(a) भौतिक

प्रश्न 32.
मीमांसा दर्शन है
(a) कर्म प्रधान
(b) आत्म प्रधान
(c) धर्म प्रधान
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) कर्म प्रधान

प्रश्न 33.
वेदान्त दर्शन के प्रवर्तक हैं
(a) शंकर
(b) वादरायण
(c) रामानुज
(d) गौड़पाद
उत्तर:
(b) वादरायण

प्रश्न 34.
ग्रीक दर्शन के जनक हैं
(a) सुकरात
(b) थेलीज
(c) अरस्तु
(d) प्लेटो
उत्तर:
(b) थेलीज

प्रश्न 35.
चिकित्सकीय क्षेत्र की प्रमुख समस्या है
(a) आत्म हत्या
(b) भ्रूण हत्या
(c) हिंसा
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 36.
निर्वाण के मार्ग है
(a) अष्टांग मार्ग
(b) दो मार्ग
(c) सम्यक् वाक्
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(a) अष्टांग मार्ग

प्रश्न 37.
न्याय के प्रमाण हैं
(a) प्रत्यक्ष
(b) अनुमान
(c) उपमान
(d) शब्द
उत्तर:
(a) प्रत्यक्ष

प्रश्न 38.
कारण कार्य नियम है
(a) वैज्ञानिक
(b) सामाजिक
(c) दार्शनिक
(d) सामान्य
उत्तर:
(b) सामाजिक

प्रश्न 39.
दो होने का अर्थ है
(a) बराबर
(b) विभाजन
(c) जोड़
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(c) जोड़

प्रश्न 40.
वैशेषिक दर्शन के द्वारा कितने प्रकार के गुण माने गए हैं?
(a) अठारह
(b) चौबीस
(c) तेईस
(d) अठाइस
उत्तर:
(b) चौबीस

प्रश्न 41.
“एक तर्कसंगत प्रयास है प्रमाण को उसकी समग्रता में एक पूरे के रूप से सम्मिलित करने का”-यह परिभापा है
(a) मानवशास्त्र
(b) धर्मशास्त्र
(c) दर्शनशास्त्र
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) दर्शनशास्त्र

प्रश्न 42.
अग्रमा है
(a) अयथार्थ ज्ञान
(b) यथार्थ ज्ञान
(c) संदेहात्मक ज्ञान
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) अयथार्थ ज्ञान

प्रश्न 43.
“तत्पूर्वकम् अनुमानम्’ अनुमान की परिभाषा दी गई है
(a) न्याय द्वारा
(b) वैशेषिक द्वारा
(c) सांख्य द्वारा
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) वैशेषिक द्वारा

प्रश्न 44.
न्याय के द्वारा कितने प्रमाणों को स्वीकार किया गया है?
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर:
(b) दो

प्रश्न 45.
वेद कितने हैं?
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर:
(d) चार

प्रश्न 46.
‘त्रिरत्न’ की अवधारणा किस दर्शन की है?
(a) बौद्ध दर्शन
(b) जैन दर्शन
(c) न्याय दर्शन
d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) जैन दर्शन

प्रश्न 47.
‘चित्तवृत्तिनिरोध’ को कहते हैं।
(a) प्राणायाम
(b) योग
(c) समाधि
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) योग

प्रश्न 48.
आस्तिक दर्शन की संख्या है
(a) तीन
(b) पाँच
(c) छः
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) छः

प्रश्न 49.
निम्न में कौन नास्तिक दर्शन है?
(a) बौद्ध दर्शन
(b) जैन दर्शन
(c) चार्वाक दर्शन
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

Bihar Board 12th Business Economics Objective Important Questions Part 6 in Hindi

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Bihar Board 12th Business Economics Objective Important Questions Part 6 in Hindi

प्रश्न 1.
किस बाजार में AR = MR होता है ?
(a) एकाधिकार
(b) एकाधिकारी प्रतियोगिता
(c) (a) तथा (b) दोनों
(d) पूर्ण प्रतियोगिता
उत्तर:
(d) पूर्ण प्रतियोगिता

प्रश्न 2.
पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की निम्न में से कौन-सी विशेषताएँ हैं ?
(a) क्रेता और विक्रेता की अधिक संख्या
(b) वस्तु की समरूप इकाइयाँ
(c) बाजार दशाओं का पूर्ण ज्ञान
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 3.
फर्म के संतुलन की दशा में
(a) MR वक्र MR को ऊपर से काटता है
(b) MR वक्र MR को नीचे से काटता है
(c) MR वक्र MR का समानान्तर होता है
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) MR वक्र MR को नीचे से काटता है

प्रश्न 4.
एकाधिकार के लिए निम्न में से कौन-सा कथन सही है ?
अथवा, एकाधिकार की निम्न में कौन-सी विशेषताएँ हैं ?
(a) फर्म कीमत निर्धारक होती है
(b) माँग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला होता है
(c) कीमत विभेद की संभावना हो सकती है
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
एकाधिकार की स्थिति में प्रतियोगिता
(a) पूर्ण होती है
(b) सीमित होती है
(c) शून्य होती है
(d) नगण्य होती है
उत्तर:
(c) शून्य होती है

प्रश्न 6.
बाजार का वह स्वरूप जिसमें एक ही विक्रेता होता है, उसे क्या कहते हैं ?
(a) एकाधिकार
(b) पूर्ण प्रतियोगिता
(c) अल्पाधिकार
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) एकाधिकार

प्रश्न 7.
पूर्ण प्रतियोगिता में क्या स्थिर रहता है ?
(a) AR
(b) MR
(c) AR और MR दोनों
(d) कोई भी नहीं
उत्तर:
(c) AR और MR दोनों

प्रश्न 8.
एकाधिकारी प्रतियोगिता की निम्न में कौन-सी विशेषताएँ हैं ?
(a) विभेदीकृत उत्पादन
(b) बाजार का अपूर्ण ज्ञान
(c) विक्रय लागत
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 9.
पूर्ण प्रतियोगिता में फर्मे कीमत को
(a) निर्धारित करती हैं या
(b) ग्रहण करती हैं
(c) (a) तथा (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) ग्रहण करती हैं

प्रश्न 10.
निम्न में कौन-सा कथन सही है ?
(a) y = c +I
(b) C+ S = C + I
(c) y = O = N (जहाँ y = आय, O = उत्पादन और N = रोजगार का संतुलन स्तर है)
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 11.
उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ कुल लागत तथा कुल स्थिर लागत का अंतर
(a) स्थिर रहता है
(b) बढ़ता जाता है
(c) घटता जाता है
(d) घटता-बढ़ता रहता है
उत्तर:
(b) बढ़ता जाता है

प्रश्न 12.
प्रवाह के अंतर्गत निम्न में कौन शामिल है ?
(a) उपभोग
(b) निवेश
(c) आय
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
कीमत उस बिन्दु पर निर्धारित होता है, जहाँ
(a) वस्तु की माँग अधिक हो
(b) वस्तु की पूर्ति अधिक हो
(c) वस्तु की माँग और वस्तु की पूर्ति अधिक हो
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) वस्तु की माँग और वस्तु की पूर्ति अधिक हो

प्रश्न 14.
माँग के निर्धारक तत्त्व हैं
(a) वस्तु की कीमत
(b) वस्तु के स्थानापन्न वस्तु की कीमत
(c) उपभोक्ता की आय
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 15.
पूर्ण तथा बेलोचदार माँग वक्र होता है
(a) क्षैतिज
(b) ऊर्ध्वाधर
(c) ऊपर से नीचे दायीं ओर गिरता हुआ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) ऊर्ध्वाधर

प्रश्न 16.
निम्न में से कौन माँग की लोच को प्रभावित करता है ?
(a) वस्तु की प्रकृति
(b) वस्तु का विविध उपयोग
(c) समय तत्व
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 17.
निम्न में से कौन आर्थिक मंदी की स्थिति का लक्षण है ?
(a) रोजगार के स्तर में कमी
(b) औसत मूल्य स्तर में कमी
(c) उत्पादन में गिरावट
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 18.
किस वर्ष विश्व में महामंदी हुई थी ?
(a) 1919 में
(b) 1909 में
(c) 1929 में
(d) 1939 में
उत्तर:
(c) 1929 में

प्रश्न 19.
अवसर लागत का दूसरा नाम है
(a) आर्थिक लागत
(b) संतुलन शून्य
(c) सीमांत लागत
(d) औसत लागत
उत्तर:
(a) आर्थिक लागत

प्रश्न 20.
इनमें से कौन स्थिर लागत नहीं है ?
(a) इन्श्योरेन्स
(b) ब्याज
(c) कच्चा माल की लागत
(d) भूमि का लगान
उत्तर:
(c) कच्चा माल की लागत

प्रश्न 21.
पेट्रोल के मूल्य में वृद्धि से कार की माँग में
(a) वृद्धि
(b) कमी
(c) स्थिर
(d) अप्रभावित
उत्तर:
(b) कमी

प्रश्न 22.
गिफिन वस्तुएँ किस प्रकार की होती है ?
(a) विशिष्ट
(b) श्रेष्ठ
(c) सामान्य
(d) निकृष्ट
उत्तर:
(d) निकृष्ट

प्रश्न 23.
उदासीनता-वक्र विश्लेषण के प्रतिपादक हैं
(a) डेविड रिकार्डो
(b) एफ० वाई० एजवर्थ
(c) मार्शल
(d) हिक्स तथा ऐलन
उत्तर:
(d) हिक्स तथा ऐलन

प्रश्न 24.
बैंकिंग लोकपाल बिल योजना की घोषणा किस वर्ष की गई ?
(a) 1990
(b) 1995
(c) 1997
(d) 2000
उत्तर:
(b) 1995

प्रश्न 25.
कौन-सा कथन सत्य है ?
(a) MPC + MPS = 0
(b) MPC + MPS <1
(c) MPC + MPS = 1
(d) MPC + MPS >1
उत्तर:
(c) MPC + MPS = 1

प्रश्न 26.
Traited Economic Politique नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं ?
(a) पीगू
(b) जे० बी० रो
(c) जे० एम० कीन्स
(d) रिकार्डो
उत्तर:
(b) जे० बी० रो

प्रश्न 27.
जनता का बैंक कौन-सा है ?
(a) व्यापारिक बैंक
(b) केन्द्रीय बैंक
(c) (a) और (b) दोनों
(d) कोई नहीं
उत्तर:
(a) व्यापारिक बैंक

प्रश्न 28.
प्राथमिक क्षेत्र में सम्मिलित होता है
(a) कृषि
(b) खुदरा व्यापार
(c) लघु उद्योग
(d) सभी
उत्तर:
(a) कृषि

प्रश्न 29.
किस वर्ष भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना हुयी ?
(a) 1947
(b) 1935
(c) 1937
(d) 1945
उत्तर:
(b) 1935

प्रश्न 30.
उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन किया जाता है
(a) सूक्ष्म अर्थशास्त्र में
(b) आय विश्लेषण में
(c) समष्टि अर्थशास्त्र में
(d) कोई नहीं
उत्तर:
(a) सूक्ष्म अर्थशास्त्र में

प्रश्न 31.
व्यष्टि अर्थशास्त्र के अन्तर्गत निम्न में से किसका अध्ययन किया जाता है ?
(a) व्यक्तिगत इकाई
(b) आर्थिक समग्र
(c) राष्ट्रीय आय
(d) कोई नहीं
उत्तर:
(a) व्यक्तिगत इकाई

प्रश्न 32.
आय बढ़ने पर उपभोक्ता किन वस्तुओं की माँग घटा देता है ?
(a) निम्न कोटि की वस्तुएँ
(b) सामान्य वस्तुएँ
(c) गिफिन वस्तुएँ
(d) ‘a’ और ‘b’ दोनों
उत्तर:
(b) सामान्य वस्तुएँ

प्रश्न 33.
माँग वक्र की सामान्यतः ढाल होती है
(a) बाएँ से दाएँ ऊपर की ओर
(b) बाएँ से दाएँ नीचे की ओर
(c) X-अक्ष से समानान्तर
(d) कोई नहीं
उत्तर:
(b) बाएँ से दाएँ नीचे की ओर

प्रश्न 34.
पूँजी बटज शामिल करता है
(a) राजस्व प्राप्तियाँ तथा राजस्व व्यय
(b) पूँजीगत प्राप्तियाँ तथा पूँजीगत व्यय
(c) प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(b) पूँजीगत प्राप्तियाँ तथा पूँजीगत व्यय

प्रश्न 35.
प्राथमिक घाटा होता है
(a) वित्तीय घाटा – ब्याज भुगतान
(b) वित्तीय घाटा + ब्याज भुगतान
(c) (a) और (b) दोनों
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 36.
विनिमय दर के कौन-सा प्रकार हैं ?
(a) स्थिर विनिमय दर
(b) लोचपूर्ण विनिमय दर
(c) (a) और (b) दोनों
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 37.
ब्रेटन वुड्स प्रणाली के समय अधिकांश देशों में था
(a) स्थिर विनिमय दर
(b) अधिकीलित विनिमय दर
(c) (a) और (b) दोनों
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 38.
स्थिर विनिमय दर के कौन-सा गुण हैं ?
(a) पूँजी की गतिशीलता को बढ़ावा
(b) पूँजी को बाहर जाने से रोकना
(c) सट्टेबाजी को रोकना
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 39.
1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के द्वारा स्थापना हुई
(a) अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष
(b) विश्व बैंक
(c) (a) और (b) दोनों
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 40.
लोचपूर्ण विनिमय दर के दोष हैं
(a) अस्थिरता तथा अनिश्चितता
(b) सट्टेबाजी का प्रोत्साहन
(c) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा निवेश को निरुत्साहन
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 41.
व्यापार शेष = ?
(a) दृश्य मदों का निर्यात – दृश्य मदों का आयात
(b) दृश्य तथा अदृश्य मदों का निर्यात – दृश्य तथा अदृश्य मदों का आयात
(c) दृश्य मदों का आयात – दृश्य मदों का निर्यात
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) दृश्य मदों का निर्यात – दृश्य मदों का आयात

प्रश्न 42.
भुगतान शेष के घटक है
(a) चालू खाता
(b) पूँजी खाता
(c) (a) और (b) दोनों
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

Bihar Board 12th Philosophy Objective Important Questions Part 4

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Bihar Board 12th Philosophy Objective Important Questions Part 4

प्रश्न 1.
जैन दर्शन में ‘विद्रोह मुक्ति’ को कहा जाता है
(a) बोधिसत्व
(b) कैवल्य
(c) निर्वाण
(d) परिनिर्वाण
उत्तर:
(b) कैवल्य

प्रश्न 2.
प्रकृति के गुण हैं
(a) सत्व, रज, तम
(b) सत्व, रज, अर्थ
(c) सत्व, रज, धर्म
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(a) सत्व, रज, तम

प्रश्न 3.
सांख्य दर्शन में आत्मा को कहा जाता है
(a) ब्रह्म
(b) पुरुष
(c) ईश्वर
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(b) पुरुष

प्रश्न 4.
दर्शन का अर्थ है
(a) प्रत्यय की खोज
(b) ज्ञान के प्रति प्रेम
(c) अमरत्व की आकांक्षा
(d) नियमों का आविष्कार
उत्तर:
(a) प्रत्यय की खोज

प्रश्न 5.
कौन आस्तिक दर्शन है?
(a) जैन दर्शन
(b) बौद्ध दर्शन
(c) चार्वाक
(d) न्याय
उत्तर:
(d) न्याय

प्रश्न 6.
निम्न में से कौन अनुभववादी नहीं है?
(a) लॉक
(b) बर्कले
(c) ह्यूम
(d) काण्ट
उत्तर:
(c) ह्यूम

प्रश्न 7.
अद्वैत दर्शन के प्रर्वतक हैं
(a) रामानुज
(b) बल्लभ
(c) शंकर
(d) कपिल
उत्तर:
(c) शंकर

प्रश्न 8.
योग है
(a) त्याग
(b) समाधि
(c) ईश्वर के साथ साक्षात्कार
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) ईश्वर के साथ साक्षात्कार

प्रश्न 9.
जीव का रूप क्या है?
(a) नित्य
(b) शरीर में निवासित
(c) प्रकाशवान
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 10.
गौतम के पुस्तक का नाम है
(a) रामायण
(b) योगासन
(c) न्याय सूत्र
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) योगासन

प्रश्न 11.
जो ज्ञान प्राप्त करता है, कहलाता है
(a) प्रमाण
(b) प्रमाता
(c) प्रमा
(d) अप्रमा
उत्तर:
(a) प्रमाण

प्रश्न 12.
विश्वसनीय व्यक्ति को कहते हैं
(a) आप्त पुरुष
(b) परम पुरुष
(c) सामान्य
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) आप्त पुरुष

प्रश्न 13.
कारण होता है
(a) पूर्ववर्ती
(b) अनौपाधिक
(c) नियत
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 14.
बर्कले समर्थक हैं
(a) आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद का
(b) वस्तुनिष्ठ प्रत्ययवाद का
(c) निरपेक्ष प्रत्ययवाद का
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद का

प्रश्न 15.
ग्रीक दर्शन के जनक हैं
(a) सुकरात
(b) थेल्स
(c) अरस्तु
(d) प्लेटो
उत्तर:
(a) सुकरात

प्रश्न 16.
‘व्यक्ति बनो’ यह वक्तव्य है
(a) ब्रेडले का
(b) सोरोकीन का
(c) हिगेल का
(d) कांट का
उत्तर:
(a) ब्रेडले का

प्रश्न 17.
अयथार्थ ज्ञान कहलाता है
(a) अप्रमा
(b) प्रमा
(c) प्रमाण
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) प्रमा

प्रश्न 18.
भगवद्गीता को कर्मशास्त्र किसने कहा?
(a) भगवानदास
(b) बालगंगाधर तिलक
(c) गाँधीजी
(d) नेहरू
उत्तर:
(b) बालगंगाधर तिलक

प्रश्न 19.
गीता का उपदेश है
(a) निष्काम कर्म
(b) सकाम कर्म
(c) कर्म संन्यास
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) निष्काम कर्म

प्रश्न 20.
अनुमान का दूसरा नाम क्या है?
(a) अनुवीक्षा
(b) परवीक्षा
(c) अनुमिति
(d) अनुपालक
उत्तर:
(d) अनुपालक

प्रश्न 21.
“ दुःख है” इसकी चर्चा बुद्ध अपने किस आर्य सत्य में करते हैं?
(a) प्रथम आर्य सत्य
(b) द्वितीय आर्य सत्य
(c) तृतीय आर्य सत्य
(d) चतुर्थ आर्य सत्य
उत्तर:
(c) तृतीय आर्य सत्य

प्रश्न 22.
बुद्ध के किस आर्य सत्य में निर्वाण मार्ग वर्णित है?
(a) प्रथम
(b) द्वितीय
(c) तृतीय
(d) चतुर्थ
उत्तर:
(b) द्वितीय

प्रश्न 23.
मोक्ष के दो प्रकार हैं
(a) भाव एवं द्रव्य
(b) द्रव्य एवं निर्जरा
(c) भाव एवं जीव
(d) जीव एवं अजीव
उत्तर:
(d) जीव एवं अजीव

प्रश्न 24.
उपनिषद् को कहा जाता है
(a) योग विद्या
(b) ब्रह्म विद्या
(c) ज्ञान विद्या
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) योग विद्या

प्रश्न 25.
निरपेक्ष प्रत्ययवाद के प्रवर्तक हैं
(a) प्लेटो
(b) बर्कले
(c) हिगेल
(d) अरस्तु
उत्तर:
(c) हिगेल

प्रश्न 26.
अद्वैत का अर्थ होता है
(a) दो नहीं
(b) एक नहीं
(c) चार नहीं
(d) तीन नहीं
उत्तर:
(a) दो नहीं

प्रश्न 27.
प्रागनुभविक ज्ञान सम्बंधित है
(a) अनुभव से
(b) बुद्धि से
(c) (a) और (b) दोनों से
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों से

प्रश्न 28.
शंकर के अनुसार सत्-चित् आनन्द कौन है?
(a) ईश्वर
(b) माया
(c) ब्रह्म
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) माया

प्रश्न 29.
दण्ड की अवधारणा है
(a) सामाजिक
(b) दार्शनिक
(c) नैतिक
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(c) नैतिक

प्रश्न 30.
कारण योग है
(a) भावात्मक
(b) असमान
(c) निषेधात्मक
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 31.
व्यापार ……… व्यवसाय है।
(a) अनैतिक
(b) क्रूर
(c) लाभोन्मुखी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) लाभोन्मुखी

प्रश्न 32.
नैतिक दर्शन किस पद से जाना जाता है?
(a) इथोस
(b) इथिकोस
(c) इथिक्स
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) इथिक्स

प्रश्न 33.
‘पर्यावरण’ शब्द किससे बना है?
(a) इन्विरानर
(b) इन्वनार
(c) इन्वरानरर
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(c) इन्वरानरर

प्रश्न 34.
मीमांस दर्शन है
(a) कर्मप्रधान
(b) आत्म प्रधान
(c) धर्म प्रधान
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) कर्मप्रधान

प्रश्न 35.
परम तत्व के अनुसार परम् सत्ता है
(a) प्रत्यय
(b) जड़
(c) तटस्थ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) तटस्थ

प्रश्न 36.
भारतीय दर्शन के सम्प्रदाय है
(a) आस्तिक
(b) भौतिकवादी
(c) नास्तिक
(d) प्राकृतिक
उत्तर:
(a) आस्तिक

प्रश्न 37.
यथार्थ ज्ञान कहलाता है
(a) प्रमा
(b) अप्रमा
(c) प्रमाण
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) प्रमा

प्रश्न 38.
अद्वैत के अनुसार आत्मा है
(a) निरपेक्ष
(b) ज्ञान
(c) आनन्द
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(b) ज्ञान

प्रश्न 39.
किसके अन्तिम भाग को उपनिषद कहते हैं?
(a) पुराण
(b) ज्ञान
(c) वेद
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) वेद

प्रश्न 40.
त्रिगुण होते हैं
(a) तम
(b) रज
(c) गुण
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) गुण

प्रश्न 41.
सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं
(a) गौतम
(b) कपिल
(c) महावीर
(d) मागसेन प्रत्यक्ष है
उत्तर:
(b) कपिल

प्रश्न 42.
प्रत्यक्ष है
(a) अन्वीक्षा
(b) अनुमिति
(c) सविकल्पलक एवं निर्विकल्पक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) सविकल्पलक एवं निर्विकल्पक

प्रश्न 43.
शंकर अद्वैत को कहते हैं।
(a) शरीर
(b) ईश्वर
(c) ब्रह्म
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(c) ब्रह्म

प्रश्न 44.
‘व्यक्ति बनो’ वह वक्तव्य है
(a) ब्रेडले
(b) सोरोकिन
(c) हिगेल
(d) काण्ट
उत्तर:
(a) ब्रेडले

प्रश्न 45.
निम्न में से कौन समीक्षावादी है?
(a) लॉक
(b) बर्कले
(c) ह्यूम
(d) काण्ट
उत्तर:
(d) काण्ट

प्रश्न 46.
“दुःख है’ इसकी चर्चा बुद्ध अपने किस आर्य सत्य में करते हैं?
(a) प्रथम
(b) द्वितीय
(c) तृतीय
(d) चतुर्थ
उत्तर:
(a) प्रथम

प्रश्न 47.
गौतम के पुस्तक का नाम है
(a) रामायण
(b) योगासन
(c) न्याय सूत्र
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) रामायण

प्रश्न 48.
विश्वसनीय व्यक्ति कहलाते हैं
(a) आप्त पुरुष
(b) परम पुरुष
(c) सामान्य
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(b) परम पुरुष

प्रश्न 49.
कार्य-कारण नियम है
(a) वैज्ञानिक
(b) सामाजिक
(c) दार्शनिक
(d) सामान्य
उत्तर:
(a) वैज्ञानिक

Bihar Board 12th Business Economics Objective Important Questions Part 5 in Hindi

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Bihar Board 12th Business Economics Objective Important Questions Part 5 in Hindi

प्रश्न 1.
उदासीन वक्र विश्लेषण का प्रतिमादन किसके द्वारा किया गया है ?
(a) गोसेन
(b) हिक्स एवं एलेन
(c) हिक्स
(d) सेम्यूअलसन
उत्तर:
(b) हिक्स एवं एलेन

प्रश्न 2.
उदासीन वक्र की ढाल होती है
(a) दायें से बायें
(b) बायें से दायें
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) बायें से दायें

प्रश्न 3.
ह्रासमान प्रतिफल नियम का संचालन के मुख्य कारण हैं
(a) सीमित साधन
(b) साधनों का अपूर्ण प्रतिस्थापन्न
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 4.
उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ कुल लागत एवं कुल स्थिर लागत का अंतर
(a) बढ़ता है
(b) स्थिर रहता है
(c) घटता है
(d) घटता-बढ़ता रहता है
उत्तर:
(a) बढ़ता है

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से राजकोषीय नीति में किसे शामिल किया जाता है ?
(a) सार्वजनिक ऋण
(b) करारोपण
(c) सार्वजनिक व्यय
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 6.
सरकार के राजस्व के अंतर्गत कौन-सा कर शामिल है ?
(a) आय कर
(b) निगम कर
(c) सीमा शुल्क
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 7.
उपयोगिता का गणनावाचक सिद्धान्त निम्न में से किसने प्रस्तुत किया ?
(a) मार्शल
(b) पीगू
(c) हिक्स
(d) सैम्युलसन
उत्तर:
(a) मार्शल

प्रश्न 8.
प्राचीन विचारधारा निम्न में से किन तथ्यों पर आधारित है ?
(a) कीन्स का रोजगार सिद्धान्त
(b) पीगू का मजदूरी सिद्धान्त
(c) से का बाजार नियम
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 9.
कीमत या बजट रेखा की ढाल होती है
Bihar Board 12th Business Economics Objective Important Questions Part 5, 1
उत्तर:
(a) \(-\frac{P_{x}}{P_{y}}\)

प्रश्न 10.
उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होने का मुख्य कारण कौन-सा है ?
(a) साधनों की सीमितता
(b) साधनों का अपूर्ण स्थानापन्न होना
(c) (a) एवं (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) एवं (b) दोनों

प्रश्न 11.
एकाधिकार एवं एकाधिकारी प्रतियोगिता में होता है
(a) AR > MR
(b) AR = MR
(c) AR < MR
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(a) AR > MR

प्रश्न 12.
पूर्ति लोच की माप निम्न में किस सूत्र से ज्ञात की जाती है ?
Bihar Board 12th Business Economics Objective Important Questions Part 5, 2
उत्तर:
Bihar Board 12th Business Economics Objective Important Questions Part 5, 3

प्रश्न 13.
आय की चार क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के चक्रीय प्रवाह में संतुलन के लिए निम्न में से कौन-सी शर्त है ?
(a) C + I + G + (X – M)
(b) C + I + G
(c) C + I
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a)

प्रश्न 14.
NNPMP बराबर होता है
(a) GNPMP – घिसावट
(b) GNPMP + अप्रत्यक्ष कर
(c) GNPMP + घिसावट
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) GNPMP – घिसावट

प्रश्न 15.
लाभ का निम्न में कौन-सा घटक है ?
(a) लाभांश
(b) अवितरित लाभ
(c) निगम लाभ कर
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 16.
किसने कहा, “मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करती है” ?
(a) हाटे
(b) किन्स
(c) हार्टले विदर्स
(d) राबर्टसन
उत्तर:
(c) हार्टले विदर्स

प्रश्न 17.
मुद्रा के प्राथमिक कार्य के अंतर्गत निम्न में से किसे शामिल किया जाता है ?
(a) विनिमय का माध्यम
(b) मूल्य का मापक
(c) (a) और (b) दोनों
(d) मूल्य का संचय
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 18.
मुद्रा का प्राथमिक कार्य है
(a) मूल्य का संचय
(b) विलंबित भुगतान का मान
(c) मूल्य का हस्तांतरण
(d) विनिमय का माध्यम
उत्तर:
(d) विनिमय का माध्यम

प्रश्न 19.
निम्नांकित में विधि ग्राह्य मुद्रा कौन है ?
(a) करेंसी नोट और सिक्के
(b) चेक
(c) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) करेंसी नोट और सिक्के

प्रश्न 20.
सामान्य आदमी का बैंक कौन-सा है ?
(a) व्यापारिक बैंक
(b) केन्द्रीय बैंक
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) व्यापारिक बैंक

प्रश्न 21.
साख गुणक होता है
(a) \(\frac{1}{\mathrm{CRR}}\)
(b) नगद × \(\frac{1}{\mathrm{CRR}}\)
(c) नगद × CRR
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) नगद × CRR

प्रश्न 22.
केन्द्रीय बैंक के निम्न में कौन-से कार्य हैं ?
(a) नोट निगमन का अधिकार
(b) सरकार का बैंकर
(c) विदेशी विनिमय कोषों का संरक्षक
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 23.
देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा कौन-सी मुद्रा जारी की जाती है ?
(a) चलन मुद्रा
(b) साख मुद्रा
(c) सिक्के
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(a) चलन मुद्रा

प्रश्न 24.
एक खुली अर्थव्यवस्था में सामूहिक माँग के संघटक कौन हैं ?
(a) उपभोग
(b) निवेश
(c) उपभोग + सरकारी व्यय
(d) उपभोग + निवेश + सरकारी व्यय + शुद्ध निर्यात
उत्तर:
(d) उपभोग + निवेश + सरकारी व्यय + शुद्ध निर्यात

प्रश्न 25.
अत्यधिक माँग होने के निम्न में कौन-से कारण हैं ?
(a) सार्वजनिक व्यय में वृद्धि
(b) मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि
(c) करों में कमी
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 26.
प्रत्यक्ष कर के अन्तर्गत निम्न में से किसे शामिल किया जाता है ?
(a) आय कर
(b) उपहार कर
(c) (a) और (b) दोनों
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 27.
भारत में एक रुपया का नोट कौन जारी करता है ?
(a) भारतीय रिजर्व बैंक
(b) भारत सरकार का वित्त मंत्रालय
(c) भारतीय स्टेट बैंक
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(b) भारत सरकार का वित्त मंत्रालय

प्रश्न 28.
एक आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा के अंतर्गत शामिल किया जाता है
(a) करेंसी नोट
(b) सिक्के
(c) माँग जमा
(d) इनमें सभी
उत्तर:
(d) इनमें सभी

प्रश्न 29.
मुद्रा स्फीति का प्रमुख कारण है
(a) मौद्रिक आय में कमी
(b) मौद्रिक आय में वृद्धि
(c) उत्पादन में वृद्धि
(d) निर्यात में वृद्धि
उत्तर:
(b) मौद्रिक आय में वृद्धि

प्रश्न 30.
साख मुद्रा का विस्तार होता है जब CRR
(a) घटता है
(b) बढ़ता है
(c) (a) और (b) दोनों संभव
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(a) घटता है

प्रश्न 31.
स्फीतिक अंतराल को ठीक करने के लिए प्रमुख मौद्रिक उपाय कौन-से हैं ?
(a) बैंक दर में वृद्धि
(b) खुले बाजार में प्रतिभूतियाँ बेचना
(c) नकद कोष अनुपात में वृद्धि
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 32.
अवस्फीतिक अंतराल (Deffationary gap) किसकी माप बताता है ?
(a) न्यून माँग की
(b) आधिक्य माँग की
(c) पूर्ण संतुलन की
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) न्यून माँग की

प्रश्न 33.
उत्पादन के निम्न में कौन-से साधन हैं ?
(a) भूमि
(b) श्रम एवं पूँजी
(c) व्यवस्था
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 34.
आर्थिक प्रणालियों के निम्न में कौन-से रूप हैं ?
(a) पूँजीवाद
(b) समाजवाद
(c) मिश्रित अर्थव्यवस्था
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 35.
पूँजीवादी अर्थव्यवस्म में अस्तित्व होता है
(a) निजी स्वामित्व का
(b) मुनाफा कमाने का
(c) दोनों का
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) दोनों का

प्रश्न 36.
एक समाजवादी अर्थव्यवस्था का मुख्य उद्देश्य होता है
(a) अधिकाधिक उत्पादन
(b) आर्थिक स्वतंत्रता
(c) मुनाफा कमाना
(d) अधिकतम लोक कल्याण का
उत्तर:
(d) अधिकतम लोक कल्याण का

प्रश्न 37.
APC = APS = ?
(a) 0
(b) 1
(c) a या अनंत
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(b) 1

प्रश्न 38.
यदि MPC = 0.5 तो (k) गुणक क्या होगा ?
(a) \(\frac{1}{2}\)
(b) 1
(c) 2
(d) 0
उत्तर:
(c) 2

प्रश्न 39.
विनिमय दर के निम्न में कौन-से रूप हैं ?
(a) स्थिर विनिमय दर
(b) लोचपूर्ण विनिमय दर
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

प्रश्न 40.
उत्पादन संभावना वक्र व्यक्त करता है
(a) वस्तुओं एवं सेवाओं के विभिन्न संयोगों को
(b) रोजगार के स्तर को
(c) मूल्य स्तर को
(d) उपर्युक्त सभी को
उत्तर:
(a) वस्तुओं एवं सेवाओं के विभिन्न संयोगों को

प्रश्न 41.
ऐसी वस्तुएँ जिनका एक-दूसरे के बदले प्रयोग किया जाता है, कहलाती है
(a) पूरक वस्तुएँ
(b) स्थानापन्न वस्तुएँ
(c) आरामदायक वस्तुएँ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) स्थानापन्न वस्तुएँ

प्रश्न 42.
यदि किसी वस्तु की कीमत में 40% की वृद्धि हो, परन्तु पूर्ति में केवल 15% की वृद्धि हो ऐसी वस्तु की पूर्ति होगी
(a) अत्यधिक लोचदार
(b) लोचदार
(c) बेलोचदार
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) बेलोचदार

प्रश्न 43.
पूर्ति के नियम को निम्न में कौन-सा फलन प्रदर्शित करता है ?
(a) S = f (P)
(b) S = f \(\left(\frac{1}{p}\right)\)
(c) S = f (Q)
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) S = f (P)

Bihar Board 12th Psychology Important Questions Long Answer Type Part 4

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Bihar Board 12th Psychology Important Questions Long Answer Type Part 4

प्रश्न 1.
समूह के मुख्य प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
समूह का वर्गीकरण विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से किया है। सभी मनोवैज्ञानिकों के विभाजन के आधार अलग-अलग है। समूह के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित है-
1. प्राथमिक और द्वितीयक समूह (Primary and Secondary group)-कूले (Cooley) ने सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्धों के आधार पर समूह को दो भागों में विभाजित किया है।

A. प्राथमिक समूह (Primary group)-प्राथमिक समूह में सदस्यों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। जैसे-परिवार कार्य समूह आदि प्राथमिक समूह के उदाहरण हैं। इसमें व्यक्ति के साथ आमनेसामने का सम्बन्ध होता है। लिण्डग्रेन ने कहा है, “प्राथमिक समूह का तात्पर्य ऐसे समूह से है, जिसमें पारस्परिक सम्बन्ध और बारम्बारता एक साथ घटित होते हैं।”

प्राथमिक समूह के सदस्यों के बीच ‘हम’ की भावना अधिक रहती है। इसमें मतैक्य की दृढ़ता होती है। इस प्रकार के समूह के सदस्यों के मनोवैज्ञानिक पहलुओं, जैसे-मनोवृतियों, आदतों, कार्य-व्यवहारों आदि में दृढ़ता पाई जाती है। इसका आकार छोटा होता है। ये एक-दूसरे के सुख-दुःख से प्रभावित होते हैं। ऐसा समूह स्थायी होती है।

B. द्वितीयक समूह (Secondary group)-द्वितीयक समूह के सदस्यों के बीच औपचारिक सम्बन्ध अधिक होगा। इसमें आपसी सम्बन्ध के आधार, धार्मिक-निष्ठा, राजनैतिक दल की सदस्यता, वर्गनिष्ठा आदि होते हैं। इनके सदस्य एक जगह एकत्रित नहीं होते, बल्कि किसी माध्यम से आपस में जुड़े होते हैं। जैसे-सामाजिक संगठन, राजनैतिक दल, शैक्षिक संस्थान आदि इसके उदाहरण हैं। इस संबंध में लिण्डर्ग्रन ने लिखा है, “द्वितीयक समूह अधिक अवैयक्तिक होते हैं तथा सदस्यों के बीच औपचारिक तथा संवेदात्मक सम्बन्ध होते हैं।”

2. स्थायी और अस्थायी समूह (Permanent and temporary group)-कुछ मनोवैज्ञानिकों ने स्थायित्व के आधार पर स्थायी तथा अस्थायी दो प्रकार के समूहों की चर्चा की है। स्थायी समूह ऐसे समूह को कहते हैं, जिसका अस्तित्व हमेशा बना रहता है। उसके सदस्य एक लक्ष्य की पूर्ति के बाद दूसरे लक्ष्य की पूर्ति के लिए पुनः प्रयत्नशील हो जाते हैं। जैसे-कर्मचारी संघ, शिक्षक संघ आदि। परन्तु, दूसरी ओर कुछ ऐसे समूह होते है जो क्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनते हैं और आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही समाप्त हो जाती है। जैसे-दंगा पीड़ितों की सहायता के लिए जो समूह बनाया जाता है वह उद्देश्य की पूर्ति के साथ ही समाप्त हो जाता है। ऐसे समूह को अस्थायी समूह कहा जाता है।

3. स्व-समूह तथा पर समूह (In group and out group)-समान अभिरुचि तथा समान उद्देश्य के लोग जो समूह बनाते हैं, उसे स्व-समूह ‘हम’ समूह कहा जाता है। इसके सदस्यगण आपस में मिलकर शांतिपूर्वक रहते हैं तथा समूह के आदर्शों का पालन करते हैं। ऐसे समूह में सहयोग की भावना अधिक पायी जाती है। लेकिन पर-समूह इसके ठीक विपरीत होता है। इसमें सदस्यों के बीच अभियोजन का अभाव होता है। इसमें जाति, भाषा तथा अभिरूचि का बन्धन नहीं होता है। जैसे-उत्तर भारत के लोगों के व्यवहार को देखकर दक्षिण भारत के लोग आश्चर्य करते हैं। इनकी भाषा, लिपि, खान-पान सभी विचित्र मालूम पड़ते हैं।

4. खुला तथा बन्द समूह (Open and closed group)-एडवर्ड्स ने खुला एवं बन्द, दो प्रकार के समूह की चर्चा की है। उनके अनुसार खुला समूह उस समूह को कहते हैं, जिनमें आसानी से कोई भी यक्ति सदस्यता ग्रहण कर सकता है। जैसे-कोई राजनैतिक दल। इस प्रकार के समूह में सदस्यों की संख्या बहुत अधिक होती है। परन्तु, बाद समूह ऐसा समूह है जिसका सदस्य सभी व्यक्ति नहीं हो सकते हैं। उनमें तरह-तरह की छानबीन कर लेने के बाद ही किसी व्यक्ति को उसका सदस्य बनाया जाता है। जैसे-किसी प्रतिष्ठित क्लब का सदस्य बनना बहुत कठिन होता है। ऐसे समूह को बन्द समूह को संज्ञा देते हैं।

5. संगठित एवं असंगठित समूह (Organised and Unorganised group)-संगठन के आधार पर भी समूह को दो भागों में बांटा जा सकता है। इस प्रकार के समूह को संगठित तथा असंगठित समूह में विभाजित कर सकते हैं। किसी नियम, आदर्श, सहयोग तथा परस्पर एकता के आधार पर जो समूह निर्भर होता है उसे संगठित समूह कहते हैं। इसके सदस्य समूह के आदर्शों से बंधे होते हैं। इस प्रकार के सदस्यों का मनोबल बहुत ऊंचा होता है। वे लोग आपस में एक-दूसरे को बहुत अधिक सहयोग देते हैं। इसके सदस्यों में ‘हम’ की भावना पायी जाती है। इसके ठीक विपरीत असंगठित समूह के सदस्यों में आपस में सहयोग की भावना कम होती है। वे एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करते हैं। सदस्यों का मनोबल बहुत अधिक गिरा हुआ होता है।

6. लम्बीय तथा समतल समूह (Vertical and horizontal group)-इस प्रकार का विभाजन हरबर्ट मीलर (Herbert Millar) ने प्रस्तुत किया है। लम्बीय समूह के सदस्यों के बीच सामाजिक दूरी अधिक होती है जबकि समतल समूह में सदस्य आपस में मिल-जुलकर बराबर रूप से रहते हैं। इसके अन्तर्गत कवि, संगीतकार आदि का समूह आता है। एक ही व्यक्ति कवि और संगीतकार दोनों हो सकता है। इस प्रकार एक ही व्यक्ति कई समूहों का सदस्य हो सकता है। लेकिन कुछ समूह ऐसे होते हैं जिसमें एक ही व्यक्ति कई समूह के सदस्य नहीं हो सकते हैं। जैसे एक ही व्यक्ति स्त्रियों और पुरुषों के समूह का सदस्य नहीं हो सकता, धनी और निर्धन समूह सदस्य एक ही व्यक्ति नहीं हो सकता है। इसमें सामाजिक दूरी अधिक होती है।

7. आकस्मिक तथा प्रयोजनात्मक समूह (Accidental and purposive group)-प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैकडुगल (McDougal) ने समूह की उत्पत्ति के आधार पर आकस्मिक तथा प्रयोजनात्मक दो प्रकार के समूहों की चर्चा की है। आकस्मिक समूह एकाएक किसी स्थान पर बन जाता है। जैसे-रेल यात्रियों का समूह एकाएक बनता है, इसे आकस्मिक समूह कहेंगे। परन्तु दूसरी ओर, कुछ ऐसे समूह होते हैं जो सोच-समझकर खास उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बनाये जाते हैं। जैसे-राजनैतिक पार्टी आदि।

8. उदार तथा कठोर समूह (Liberal and hostile group)-कुछ समूह समाज कल्याण एवं जनता की भलाई के लिए बनाये जाते हैं जैसे-राजनीतिक पार्टी, धार्मिक संस्था आदि। परन्तु इसके ठीक विपरीत कुछ ऐसे समूह होते हैं जो समाज को हानि पहुँचाते हैं। जैसे आतंकवादियों का समूह। इसका काम है देश या जनता को तबाह करना।

9. राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय समूह (National and International group)-राष्ट्रीय समूह उसे कहेंगे जो सिर्फ एक राष्ट्र तक सीमित रहते हैं, जैसे-कांग्रेस पार्टी। लेकिन कुछ ऐसे भी समूह हैं जो कई देश मिलकर बनाते हैं। जैसे सार्क, U.N.OI

10. भ्रमणकारी एवं स्थिर समूह (Mobile and immobile group)-कुछ समूह ऐसे होते हैं जो एक जगह पर स्थिर नहीं रहते, बल्कि भ्रमण करते हैं, जैसे-खानाबदोश का समूह। इसके विपरीत अधिकांश समूह ऐसे होते हैं जो स्थिर होते हैं। वे एक जगह रहकर अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। जैसे-पुस्तक व्यावसायियों का समूह।

11. समूह का आधुनिक वर्गीकरण (Recent classification of group)-समूह का विभाजन आधुनिक मनोवैज्ञानिक द्वारा भी किया गया है। जो इस प्रकार A घनिष्ठ समूह B, प्राथमिक समूह C. मध्य समूह D, सहकारी समूह।. घनिष्ठ समूह में ऐसे लोग आते हैं जो आपस में घनिष्ठ रूप से संबंधित होते हैं। जैसे-परिवार। प्राथमिक समूह के अन्तर्गत छोटे समूह को रखा जा सकता है जैसे-खिलाड़ियों का समूह। इसी प्रकार मध्य समूह तथा सहकारी समूह के अन्तर्गत राजनैतिक पार्टियाँ आदि बनते हैं।

प्रश्न 2.
चिंता विकृति के लक्षण कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
चिन्ता मनः स्नायुविकृति एक ऐसा मानसिक रोग है, जिसमें रोगी हमेशा अज्ञात कारणों से चिन्तित रहा करता है। सामान्य चिन्ता एक सामान्य, स्वाभाविक और सर्वसाधारण मानसिक अवस्था है। जीवन में जटिल परिस्थितियों में यह अनिवार्य रूप से होता है। वर्तमान भयावह परिस्थिति से डरना या चिन्तित होना सामान्य अनुभव है। इसके लिए व्यक्ति डर की प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। जैसे-बाघ को सामने आता देखकर व्यक्ति सामान्य चिंता के फलस्वरूप भयभीत होने या भागने की क्रिया करता है। व्यक्ति में ऐसी भयावह परिस्थिति की अवगति रहती है। उसी के संतुलन के लिए वह किसी प्रकार की प्रतिक्रिया करता है। सामान्य चिन्ता का संबंध वर्तमान भयावह परिस्थितियों से रहता है। लेकिन सामान्य चिन्ता से असामान्य चिन्ता पूर्णतः भिन्न है।

इसमें व्यक्ति चिन्तित या भयभीत रहता है, लेकिन सामान्य चिन्ता के समाने उसकी चिन्ता का विषय नहीं रहता। उसकी अपनी चिन्ता का कारण ज्ञात नहीं रहता। उसकी चिन्ता पदार्थहीन होती है। अत: अपने विभिन्न शारीरिक उपद्रवों को व्यक्त करता है। वस्तुतः उसे अपने मानसिक उपद्रव का ज्ञान नहीं रहता। इसके अतिरिक्त उसकी चिन्ता का संबंध हमेशा भविष्य से रहता है, वर्तमान से नहीं। इसलिए उसमें निराकरणात्मक सामान्य चिन्ता की तरह प्रतिक्रिया देखने में नहीं आती है, अतः हम कह सकते हैं कि सामान्य चिन्ता भयावह परिस्थितियों की प्रतिक्रिया है। सामान्य चिन्ता के संबंध में असामान्य चिन्ता आन्तरिक भयावह परिस्थितियों की प्रतिक्रिया है।

सामान्य चिन्ता के संबंध में फिशर (Fisher) ने कहा-“सामान्य चिन्ता उन उलझी हुई कठिनाइयों की प्रतिक्रिया है जिसका परित्याग करने में व्यक्ति अयोग्य रहता है।”(Normal anxiety is a reaction to an unapprochable difficults which the individual is unable to avoid.) जबकि असामान्य चिन्ता के संबंध में उनका विचार है कि ‘असामान्य चिन्ता उन आन्तरिक या व्यक्तिगत उलझी हुई कठिनाइयों की प्रतिक्रिया है, जिसका ज्ञान व्यक्ति को नहीं रहता।” (Neurotic anxiety is a reaction to an unapproachable inner or subjective difficult of which the individual has no idea.)

चिन्ता मनःस्नायु विकृति (Symptoms of anxiety neurosis)-चिन्ता मन:स्नायु विकृति में शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के लक्षण देखे जाते हैं। मानसिक लक्षण में भय और आशंका की प्रधानता रहती है, जबकि शारीरिक लक्षण में हृदय गति, रक्तचाप, श्वास गति, पाचन-क्रिया आदि में परिवर्तन देखे जाते हैं। उनका वर्णन निम्नलिखित हैं-

1. मानसिक लक्षण (Mental symptoms)-मानसिक लक्षणों में अतिरंजित भय और शंका की प्रधानता रहती है। यह अनिश्चित और विस्तृत होता है। इसका रोगी तर्कयुक्त प्रमाण नहीं कर सकता, किन्तु पूरे विश्वास के साथ जानता है कि उसका सोचना सही है। उसकी शंका किसी दुर्घटना से संबंध होती है। घर में आग लगने, महामारी फैलने, गाड़ी उलटने, दंगा होने या इसी प्रकार की अन्य घटनाओं के प्रति वह चिंतित रहता है। वह हमेशा अनभव करता है कि बहत जल्द ही कछ होनेवाला है। इस संबंध में अनेक काल्पनिक विचार उसके मन में आते रहते हैं। वह दिन-रात इसी विचार से परेशान रहता है उसमें उत्साह की कमी हो जाती है और मानसिक अंतर्द्वन्द्व बहुत अधिक हो जाता है। चिन्ता से या तो वह अनिद्रा का शिकार हो जाता है या नींद लगने पर तुरन्त जाग जाता है। ऐसे रोगियों में मृत्यु, अपमान आदि भयावह स्वप्नों की प्रधानता रहती है, उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। इसका रोगी कभी-कभी आत्महत्या का भी प्रयास करता है।

2. शारारिक लक्षण (Physical symptoms)-चिन्ता मनःस्नायु विकृति के रोगियों में शारीरिक लक्षण भी बड़ी उग्र होते हैं। रोगी के हृदय की गति, रक्तचाप, पाचन-क्रिया आदि में परिवर्तन हो जाते हैं। पूरे शरीर में दर्द का अनुभव करता है। कभी-कभी चक्कर भी आता है। रोगी के शरीर से बहुत अधिक पसीना निकलता है। वह बोलने में हलकाता है तथा बार-बार पेशाब करता है, उसे शारीरिक वजन घटना हुआ मालूम पड़ता है। यौन भाव की कमी हो जाती है। इसके रोगी तरह-तरह की आवाजें सुनते हैं। कुछ लोगों को शिश्न छोआ होने का भय बना रहता है।

इस प्रकार के रोगियों में दो प्रकार की चिन्ता देखी जाती है-तात्कालिक चिन्ता तथा दीर्घकालिक चिन्ता। तात्कालिक चिन्ता रोगी में बहुत तीव्र तथा उग्र होती है। यह चिन्ता तुरन्त को होती है। इसमें रोगी चिल्लाता है तथा पछाड़ खाकर गिरता है। दीर्घकालिक चिन्ता पुरानी होती है। रोगी अज्ञात भावी दुर्घटनाओं के प्रति चिन्तित रहता है। वह निरंतर इस चिन्ता से बेचैन रहता है और त्रस्त रहता है। इस रोग का लक्षण के आधार पर ही विद्वानों ने दा भागों में विभाजित किया है-मुक्तिचारी चिन्ता तथा निश्चित चिन्ता। चिन्ता के कारण का अभाव नहीं रहने पर भी जब रोगी बराबर बेचैन रहता है तो उसे free floating anxiety कहते हैं, लेकिन जब रोगी किसी परिस्थिति विशेष से अपनी चिन्ता का संबंध . स्थापित कर लेता है तो उसे bound anxiety कहा गया है प्रारंभ में रोगी में मुक्तिचारी चिन्ता ही रहता है, लेकिन क्रमशः स्थायी रूप धारण कर लेने पर उसे निश्चित चिन्ता बन जाती है।

चिन्ता मनःस्नायु विकृति के कारण (Etiology)-अन्य मानसिक रोगों की तरह चिन्ता मन:स्नायु विकृति के कारणों को लेकर भी मनोवैज्ञानिकों में एकमत का अभाव है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा जो कारण बताये गये हैं, उनमें कुछ मुख्य निम्न हैं-
1.लगिक वासना का दमन (Repressionafsexualdesire)-सप्रसिद्ध मनोविश्लेषक फ्रायड ने लैंगिक इच्छाओं के दमन को इस मानसिक रोग का क ग माना है। व्यक्ति में लैंगिक आवेग उत्पन्न दोता है और यदि वह आवेग की पूर्ति में असफल हो जाता ७, उसमें चिन्ता उत्पन्न होती है। यही इस रोग के लक्षणों को विकसित करती है। अत:सावित लैंगिक शक्ति को इस रोग का करण माना जा सकता है। किसी पति की यौन सामर्थता या स्त्री में यौन उत्तेजना होने पर चलनात्मक स्राव नहीं होने से वह इस रोग से पीड़ित हो जाता है। इसी प्रकार पुरुष अपनी असमर्थता या स्त्री दोषी होने के कारण इस रोग से पीड़ित हो सकता है।

फ्रायड के उपर्युक्त मत से मनोवैज्ञानिक सहमत नहीं है। इस संबंध में गार्डेन का विचार है कि कामेच्छा का दमन और उसका प्रतिबंध ही इस [ग का कारण नहीं, बल्कि दो संवेगों के संघर्ष के फलस्वरूपू इस रोग के लक्षण विकसित होते हैं। इस बात का मैकडूवल ने भी समर्थन किया है।

2. हान भावना (Inferioritvcomplex)-इस संबंध के फ्रायड के शिष्य एडलर ने भी अपना विचार व्यक्त किया है। उनका कहना है कि मनुष्य में आत्म प्रतिष्ठा का भावना प्रबल होती है, किन्तु बचपन में आश्वासन की शिथिलता के कारण जब व्यक्ति के Ego का समुचित रूप से विकास नहीं हो पाता है, तो वह हीनता की भावना से पीड़ित रहने लगता है। उसमें आत्म प्रतिष्ठा की भावना का दमन हा जाता है और व्यक्ति चिन्ता मनःस्नाय विकृति से पीड़ित हो जाता है।

3. मानसिक संघर्ष एव निराशा (Mental conflict and frustration) का का ऐसा मानना है कि इस रोग का कारण मानसिक संघर्ष एवं कुंठा है। इस संबंध में और भी मनोवैज्ञानिकों ने अपना अध्ययन किया है और ओकेली के मत का समर्थन किया है।
इस तरह हम देखते हैं कि चिन्ता मन:स्नायु विकृति के कारणों को लेकर सभी मनोवैज्ञानिक एक मत नहीं है। इस रोग के कारण के रूप में मुख्य रूप से लैंगिक वासना का दमन, हीनभावना तथा – मानसिक संघर्ष एवं निराशा को माना जा सकता है।

प्रश्न 3.
असामान्य मनोविज्ञान की परिभाषा दें तथा उसकी विषय-वस्तु का वर्णन करें।
उत्तर:
मनोविज्ञान की कई शाखाएँ हैं, उनमें असामान्य मनोविज्ञान भी एक है। असामान्य मनोविज्ञान में व्यक्ति के असामान्य व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है, अथात् व्यक्ति का वेसा व्यवहार जो सामान्य से अलग होता ह, उन व्यवहारों का अध्ययन असामान्य मनोविज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। असामान्य मनोविज्ञान अंग्रेजी शब्द Abnormal Psychology का हिन्दी रूपान्तर है। Abnormal शब्द की उत्पत्ति Anomelols से हुई है, जो दो शब्दों Ano ओर Moles का मल से बना है। Ano का अर्थ है ‘नहीं’ और Moies का अर्थ नियमित हाना है। इस अर्थ में अनियमित व्यवहारों (irregular benaviour) का अध्ययन करने वाला मनोविज्ञान असामान्य मनोविज्ञान है।

कुछ मनोवैज्ञानिकों ने Abnormal की व्याख्या कुछ दूसरे ढंग से की है। उन लोगों की राय में Abnormal Ab और Normal दा शब्दां के मेल से बना है। Ab का अर्थ है away, इस अर्थ में Abnormal का अर्थ, Away from normal, अर्थात् सामान्य से दूर मानते हैं। . वास्तव में देखा जाये तो दोनों विचारों से असामान्य भनोविज्ञान की विषय वस्तु स्पष्ट नहीं होतो है। मिला-जुलाकर ऊपरी दोनों परिभाषाएँ लगभग समान हैं। कोई आधुनिक मनोवैज्ञानिक ने असामान्य मनोविज्ञान का परिभाषित करने का प्रयास किया है। किस्कर (Kisker) ने इसकी परिभाषा देते हुए कहा है “मानव के वे व्यवहार और अनुभूतियाँ जो साधारण: अनोखी, असाधारण या पृथक हैं, असामान्य : समझी जाती हैं।”

जेम्स ड्रेवर के अनुसार “असामान्य मनोविज्ञान की वह शाखा है, जिससे व्यवहार या मानसिक घटना की विषमता का अध्ययन किया जाता है।”

कोलमैन (Coleman) की परिभाषा से असामान्य मनोविज्ञान का स्वरूप बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है। उन्होंने कहा है, “असामान्य मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का वह क्षेत्र है, जिसमें विशेष रूप से मनोविज्ञान के नियमों के समन्वय और विकास का अध्ययन असामान्य व्यवहार को समझने के लिए किया जाता है। · उपर्युक्त परिभाषा पर गौर किया जाए तो निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं-

  1. असामान्य मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की एक शाखा है।
  2. असामान्य मनोविज्ञान से व्यक्ति के असामान्य व्यवहारों को समझने का प्रयास किया जाता है।
  3. व्यक्ति के असामान्य व्यवहार को समझने के लिए मनोवैज्ञानिक नियमों या सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है।
  4. व्यक्ति के असामान्य व्यवहार के लक्षणों को दूर करने के लिए मनोवैज्ञानिक चिकित्सा-विधियों का सहारा लिया जाता है।

असामान्य मनोविज्ञान के क्षेत्र-असामान्य मनोविज्ञान की परिभाषा में कहा गया है कि इसमें व्यक्ति की असामान्य अनुभूतियों और व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है, लेकिन इतना कह देने से इसका क्षेत्र स्पष्ट नहीं होता। असामान्य मनोविज्ञान में असामान्य से संबंधित जिन विषयों का अध्ययन किया जाता है, उनका संक्षिप्त विवरण निम्नांकित प्रकार है-

1. असामान्य अनुभूति और व्यवहारों का अध्ययन-व्यक्ति के असामान्य व्यवहारों को समझने के लिए असामान्य मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है। जो व्यक्ति असामान्य होगा उसका व्यवहार भी आवश्यक रूप से असामान्य होगा, अतः ऐसे व्यक्ति के लक्षण, कारण तथा उपचार का अध्ययन असामान्य मनोविज्ञान के अंतर्गत किया जाता है।

2. अचेतन का अध्ययन-आधुनिक मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों के माध्यम से यह बात साबित हो चुकी है कि व्यक्ति के समस्त असामान्य व्यवहारों को उसका अचेतन गम्भीर रूप से प्रभावित करता है। बहुत-से असामान्य व्यवहारों के कारणों को ज्ञात करने तथा उनका उपचार करने के लिए अचेतन का विश्लेषण करना आवश्यक होता है, इसलिए असामान्य मनोविज्ञान में अचेतन का अध्ययन अति आवश्यक है। फ्रायड ने असामान्य व्यवहारों को समझने के लिए अचेतन के अध्ययन पर बहुत अधिक बल दिया है।

3. मानसिक विकृतियों का अध्ययन- असामान्य मनोविज्ञान में मानसिक विकृतियों का अध्ययन किया जाता है, क्योंकि असामान्य व्यवहारों का मूल कारण मानसिक विकृतियाँ ही हैं। मानसिक विकृतियों को उसकी जटिलता के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है, मनःस्नायु विकृति तथा मनोविकृति। इन विकृतियों के कारण लक्षण एवं इन्हें दूर करने के उपयों का अध्ययन करना असामान्य मनोविज्ञान का क्षेत्र है।

4. स्वप्न का अध्ययन- स्वप्न सभी व्यक्ति देखते हैं, लेकिन उसका अर्थ नहीं समझते। वास्तव में स्वप्न अचेतन इच्छाओं की अभिव्यक्ति है। इसके माध्यम से अचेतन को जाना जा.सकता है जो सभी असामान्य व्यवहारों का मूल है। इसके अन्तर्गत सभी प्रकार के स्वप्नों की व्याख्या एवं स्वप्न सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाता है।

5. प्रेरणा एवं अभियोजन का अध्ययन- किसी भी व्यक्ति के जीवन में प्रेरणा का विशेष महत्व है। समुचित प्रेरणा में भी व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो जाता है, जिससे वातावरण में अभियोजन की क्षमता समाप्त हो जाती है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए असामान्य मनोविज्ञान में प्रेरणा के स्वरूप, भूमिका एवं प्रभाव आदि के साथ-साथ अभियोजन की प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।

6. मनोरचनाओं का अध्ययन- मनोरचना एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति को संवेगात्मक तनावों से छुटकारा मिलता है। मनोरचनाओं के कारण व्यक्ति में असामान्य व्यवहार के लक्षण विकसित होते हैं। अतः असामान्य मनोविज्ञान के अन्तर्गत मनोरचनाओं का भी अध्ययन किया जाता है। इन मनोरचनाओं में प्रतिगमन युक्ताभास, प्रक्षेपण, आत्मीकरण प्रतिक्रिया निर्माण, रूपान्तरण आदि प्रमुख हैं।

7. असामान्य व्यवहार के कारणों का अध्ययन- असामान्य मनोविज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति के . असामान्य व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है। अत: यह ज्ञात करना आवश्यक है कि व्यक्ति के
असामान्य व्यवहारों के क्या कारण हैं। बिना कारण जाने असामान्य व्यवहारों को दूर नहीं किया जा सकता है, इसीलिए असामान्य का क्षेत्र असामान्य के कारणों का अध्ययन करना भी है।

8. मनोलैंगिक विकास का अध्ययन- मनोलैंगिक विकास के तथ्य को सर्वप्रथम फ्रायड ने बतलाया है। उन्होंने कहा कि व्यक्तित्व के निर्माण में मनोलैंगिक विकास की प्रमुख भूमिका होती है। इस तथ्य को अधिकांश मनोवैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है। अतः, स्पष्ट है कि व्यक्ति के असामान्य व्यवहारों के पीछे मनोवैज्ञानिक विकास की अहम भूमिका होती है। इसे ध्यान में रखते हुए असामान्य मनोविज्ञान के अन्तर्गत विकास की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है।

9. मनःस्नायु विकृति एवं मनोविकृति का अध्ययन- मनःस्नायु विकृति एवं मनोविकृति मानसिक रोग है। इस मानसिक रोगों के कारण व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो जाता है, अत: उन असामान्य व्यवहारों को समझने के लिए मनःस्नायु विकृति एवं मनोविकृति जैसी मानसिक बीमारियों का अध्ययन किया जाता है। उसके बाद उन मानसिक बीमारियों के लक्षणों एवं कारणों को जानकर उसकी चिकित्सा करते हैं। मनःस्नायु विकृति के अन्तर्गत हिस्टीरिया, झक-बाध्यता, मन:स्नायु, विकृति, चिन्ता, मन:स्नायु विकृति आदि सामान्य मानसिक रोग आते हैं, जबकि मनोविकृति के अन्तर्गत मनोविदलता, उत्साह-विषाद मनोविकृति, परानोइया आदि आते हैं। इन रोगों के लक्षण, कारण एवं उपचार इसके क्षेत्र में आते हैं।

10. यौन विकृतियों का अध्ययन- कुछ व्यक्तियों में यौन विकृतियाँ देखी जाती हैं, अर्थात् वे गलत ढंग से यौन इच्छाओं की पूर्ति करते हैं। ऐसे व्यक्तियों के व्यवहारों को भी असामान्य कहा जाता है। जैसे-हस्तमैथुन, गुदामैथुन आदि। व्यक्ति के इन असामान्य व्यवहारों का अध्ययन करना भी असामान्य मनोविज्ञान के क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं।

11. मानसिक दुर्बलता-जो व्यक्ति मानसिक रूप से दुर्बल होते हैं, उनका व्यवहार भी असामान्य हो जाता है। अत: मानसिक दुर्बलता के कारण एवं लक्षण तथा निदान का अध्ययन भी असामान्य मनोविज्ञान के अन्तर्गत ही होता है।

12. मनोचिकित्सा का अध्ययन- असामान्य मनोविज्ञान एक व्यावहारिक विज्ञान है, अतः इसमें विभिन्न बीमारियों के कारणों का अध्ययन करने के पश्चात् उसकी चिकित्सा का उपाय करना भी है, अतः इसके अन्तर्गत कई मनोचिकित्सा प्रविधियों का अध्ययन किया जाता है। जैसे-समूह चिकित्सा, व्यवहार चिकित्सा, सम्मोहन आदि।

13. अपराध एवं बाल अपराध का अध्ययन-इस मनोविज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति के अपराध एवं बाल अपराध का अध्ययन भी किया जाता है। व्यक्ति के वैसे व्यवहार जो समाजविरोधी होते हैं, उन व्यवहारों, का अध्ययन एवं उसे दूर करने के उपाय का अध्ययन भी असामान्य ही करता है।

प्रश्न 4.
What is Psychoanalysis Therapy? Discuss the main stages of Psychoanalysis therapy and its disadvantages.
(मनोविश्लेषण चिकित्सा विधि क्या है? इसकी विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन करते हुए मनोविश्लेषण विधि के दोषों का वर्णन करें।)
उत्तर:
मनोचिकित्सा के क्षेत्र में मनोविश्लेषण विधि का अपना अलग महत्त्व है। इस विधि के माध्यम से मानसिक रोगियों खासकर मन:स्नायु विकृति से पीड़ित रोगियों की चिकित्सा में बहुत सहयोग मिलता है । इस प्रविधि का प्रारंभ सुप्रसिद्ध मनोविश्लेषक फ्रायड ने किया था। उन्होंने एक महिला रोगी की चिकित्सा के सिलसिले में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इस विधि के माध्यम से रोगी के अचेतन में दबी हुई भावनाओं को जानने और उसे चेतन में लाने का प्रयास किया जाता है।

मानसिक विकृतियों के सम्बन्ध में फ्रायड (Freud) का विचार है कि परिस्थिति की संगीनियों से जब व्यक्ति का अभियोजन नहीं हो पाता है, तो उसमें मानसिक संघर्ष होता है। अन्तर्द्वन्द्व के क्रम में वे सारी अनैतिक एवं असामाजिक इच्छाएँ अचेतन में दब जाती हैं। धीरे-धीरे वह वास्तविकता से दूर होता जाता है। उसके चेतन पर अचेतन हाबी हो जाता है। इस प्रकार व्यक्ति असामान्यता का शिकार हो जाता है। इस अवस्था में यदि उसे सहयोग दिया जाय, तो अचेतन के विचारों को वह समझ सकता है। उसे वास्तविकता का अभास हो सकता है और तब उसकी असामान्यता में भी कमी आ सकती है।

मनोविश्लेषण में रोगी से पूछकर उसके अचेतन तत्वों को पता लगाते हैं। शान्त, स् सज्जित कमरे में चिकित्सक और रोगी बैठते हैं और रोगी अपने अभिव्यक्ति का अवसर देते हैं। उन अपनी बात कहने के लिए उत्तेजित करते हैं। रोगी अपने ढंग से बेतरतीब बोल सकता है। वह अन्यमनस्क और निष्क्रिय हो सकता है। चिकित्सक हर प्रकार से अपनी तकनीकी विधाओं के सहारे उसके अचेतन को उभारने का प्रयास करता है। अचेतन को उभारने पर रोगी अपनी भावनाओं को व्यक्त करने लगता है। चिकित्सक उसकी भावनाओं को नोट करता जाता है। इससे रोगी का पूरा इतिहास तैयार हो जाता है।

मनोविश्लेषण की अवस्थाएँ (Stages of Psychoanalysis)
(i) आरंभिक अवस्था- आरंभिक अवस्था में सबसे पहले चिकित्सक रोगी का चयन करता है और यह देखता है कि इस विधि का लाभ उसे मिल सकता है या नहीं। इसके लिए उसका Interview लिया जाता है। साक्षात्कार में इस बात की भी जानकारी प्राप्त करते हैं कि रोगी अपनी चिकित्सक को सहयोग कर सकता है या नहीं।

इस विधि से चिकित्सा करने के लिए रोगी को सुसज्जित कमरे में कुर्सी पर बैठाया जात है तथा सिरहाने में मनोचिकित्सक स्वयं बैठ जाता है तथा उसे बिना संकोच के कुछ कहने का निर्देश दिया जाता है। रोगी से इन बातों को रगलवाने के लिए उसके साथ आत्मीयता स्थापित करना आवश्यक है। इस प्रकार चिकित्सक उसकी गतिविधियों का निरीक्षण करता रहता है।

(ii) अवरोध की अवस्था-इस अवस्था में चिकित्सव को बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है। क्योंकि एक ऐसी अवस्था आती है जब रोगी चुप हो जाता है या अनाप-शनाप बकने लगता है। यहाँ चिकित्सक धैर्यपूर्वक तरह-तरह का पलोभन देकर उसके साथ आत्मीय सम्बन्ध स्थापित कर पुनः इस अवस्था में लाता है कि वह रन बातों को भी नि:संकोर बताए जो वर नहीं बोल ॥रा है।

(iii) स्थानान्तरण-यह मनोविश्लेषण का एक महन्तपूर्ण एवं नाजुक अवस्था है। स्थानान्तरण में दो बातें देखी जाती हैं। पहली बात तो यह कि रोगी चिकित्सक से कुछ बातों को छिपाना चाहता है और चिकित्सक उन बातों को उससे उगलवाना चाहता है। इस स्थिति में रोगी चिकित्सक पर शक करने लगता है, यहाँ चिकित्सक को काफी धैर्य की आवश्यकता होती है। हो सकता है कि रोगी चिकित्सक के पास आना छोड़ द या फिर झगड़े की नौबत आ जाय। यहाँ चिकित्सक घबड़ाता नहीं है, बल्कि उसके साथ स्नेहपूर्वक व्यवहार करके उसका विश्वासपात्र बनने का प्रयास करता है।

यही प्रतिरोध की अवस्था है। इस प्रतिरोध का नकारात्मक पक्ष कहा जाता है। रोगी का विश्वास जब चिकित्सक पर जम जाता है तो वहाँ से प्रतिरोध का भावात्मक पक्ष प्रारम्भ हो जाता है। ऐसी अवस्था में रोगी जो कुछ भी चिकित्सक को बतलाता है उसका सीधा सम्बन्ध रोग से होता है। इन बातों को वह नोट करता जाता है तथा विश्लेषण करके उसके गंग के कारणों को समझने का प्रयास करता है। इस प्रकार चिकित्सक रोगी को वास्तविकता का ज्ञान कराता है और धीरे-धीरे रोग के लक्षणों को समाप्त करने में सहयोग प्रदान करता है। इस प्रकार रोगी के लक्षण धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं।

(iv) सम्बन्ध विच्छेद-यह अवस्था भी बहुत नाजुक है, क्योंकि चिकित्सक के साथ रोगी ‘ का जिस प्रकार का सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उसे एकाएक तोड़ने पर पुनः दूसरे लक्षण प्रकट होने की संभावना रहती है। इसलिए रोगी को अपने से अलग करने में कभी-कभी काफी समय लग जाता है। इस अवस्था में रोगी के व्यक्तित्व का पुनर्निमाण होता है और रोगी पूरी तरह से सामान्य हो जाता है।

मनोचिकित्सा विधि के दोष-मनोविश्लेषण चिकित्सा विधि मानसिक रोगियों को रोगों से छुटकारा दिलाने की एक अच्छी विधि है, परन्तु अन्य विधियों की तरह इस विधि में भी कई दोष हैं, जिससे रोगियों और चिकित्सकों को परेशानी उठानी पड़ती है और रोगी चंगा भी नहीं हो पाता है, मनोचिकित्सा विधि के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं-
1. सीमित कार्यक्षेत्र-मनोविश्लेषण-चिकित्सा प्रविधि का क्षेत्र बहुत ही सीमित है। इसके माध्यम से मनोविकृति, जैसे-मनोविदलता आदि रोगों की चिकित्सा संभव नहीं है। हाँ, इस विधि से मनःस्नायु विकृति जैसे-हिस्टीरिया आदि रोगों की चिकित्सा संभव है।

2. महँगी विधि-मनोविश्लेषण से मानसिक रोगियों को कुछ लाभ तो होता है, परन्तु इसके माध्यम से चिकित्सा करवाने में बहुत अधिक खर्च एवं समय लगता है। इसके माध्यम से चिकित्सा करने के लिए पूर्ण प्रशिक्षित चिकित्सक की आवश्यकता होती है तथा एक वर्ष में दो-चार रोगियों को ही अच्छा किया जा सकता है, अत: बहुत अधिक खर्च पड़ता है, जो केवल बहुत धनी लोगों के लिए संभव रहता है।

3. अधिक समय लगना-इस प्रविधि के माध्यम से बहुत अधिक समय लगता है। प्रत्येक माको एक घंटा रोज समय देना होता है तथा यह समय अठारह माह से ऊपर लगता है। इस फार लम्बी अवधि के कारण बहुत कम रोगियों की चिकित्सा हो पाती है।

4. मन्दबुद्धि के रोगी की चिकित्सा संभव नहीं-इस विधि से केवल मानसिक रोगियों की चिकित्सा संभव है, क्योंकि इसके रोगी में नैतिकता को बढ़ाया नहीं जा सकता है।

5. हानिकारक विधि-कुछ ऐसे भी मानसिक रोग हैं, जिसकी इस विधि से चिकित्सा करने पर लाभ की जगह हानि उठानी पड़ सकती है। खासकर स्थानान्तरण की अवधि में रोगी में कुछ अन्य विकृतियों के बढ़ने की संभावना रहती है। इसीलिए शेफर एवं लेजारस ने कहा है कि . ऐसी मानसिक चिकित्सा में मनोविश्लेषक को चाहिए कि स्थानान्तरण की अवधि बहुत कम रखे।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि यह प्रविधि बहुत अधिक दोषपूर्ण है, परन्तु अन्य विधियों को यदि पूरक के रूप में रखकर चिकित्सा को जाय तो, इससे रोगी को विशेष लाभ मिल , सकता है।

प्रश्न 5.
What is hypnosis therapy? Discuss the advantages and disadvantages of hypnosis therapy.
(सम्मोहन चिकित्सा से आप क्या समझते हैं ? सम्मोहन चिकित्सा के गुण एवं दोषों का वर्णन करें।)
उत्तर:
मनोचिकित्सा के क्षेत्र में सम्मोहन का एक आकर्षक इतिहास है। सर्वप्रथम सम्मोहन (hypnosis) का प्रयोग 1833 ई. में Braid ने किया था। Braid ने Suggestion द्वारा उत्पन्न एक Senseless अवस्था के लिए किया था। Braid ने इसे Neurohypnotims कहना पसंद किया था। बाद में अन्य विचारकों ने इसके लिए Hypnosis शब्द का प्रयोग किया। 1877 ई. मेंशाकों (Charcot) ने बतलाया कि सम्मोहन हिस्टीरिया के समान ही एक पैथोलॉजिकल अवस्था (Pathological Stage) है। फिर 1884 ई. में बर्नहिम (Bernhim) ने सम्मोहन की व्याख्या सुझाव (Suggestion) के सिलसिले में की। सच पूछा जाय, तो सम्मोहन का अर्थ कृत्रिम निद्रा है। यह निद्रा एक व्यक्ति में कृत्रिम ढंग से उत्पन्न करके दूसरे व्यक्ति को अचेतन अवस्था में ला देता है। अचेतन अवस्था में आने पर व्यक्ति सम्मोहित करने वाले व्यक्ति के सुझाव के अनुसार सभी क्रियाओं को करता है।

सम्मोहन की क्रिया सम्मोहन के Rapport पर निर्भर करती है। इस विधि के द्वारा मानसिक रोगियों को सम्मोहित करके अपने अचेतन मन में दमित इच्छाओं, अनुभवों आदि को अभिव्यक्त करने का Suggestion दिया जाता है। फलस्वरूप मानसिक रोगियों का उपचार आसान हो जाता है।

सम्मोहन उत्पन्न करने की अनेक विधियाँ हैं। सभी विधियों में Relaxation पर विशेष बल दिया जाता है। कुछ परिस्थितियों में चिकित्सक Relaxation में मदद पहुँचाने के लिए औषधि का सहारा लेता है। सम्मोहन में चिकित्सक Relaxation में मदद पहुँचाने के लिए औषधि का सहारा लेता है। सम्मोहन में रोगी को एक कुर्सी पर आराम से लिटाकर पास की किसी वस्तु पर ध्यान केन्द्रित करने का निर्देश दिया जाता है। रोगी को नींद लाने के लिए कई बार दवा भी दी जाती है।

जब रोगी आराम से सो जाता है तो उसे कई प्रकार के सुझाव दिये जाते हैं। जैसे-“Relax, let yourself go listen only my voice-Relax and go to sleep-your eyes are feeling heavyRelax and go to sleep-Close your cyes and go to sleep-you are drawsy and tried-go to sleep-go to sleep-निद्रा की अवस्था में आने पर परीक्षणों द्वारा यह जांच की जाती है कि रोगी सम्मोहित हुआ या नहीं। सम्मोहक उसे यह सुझाव देता है कि वह आँखें खोले, पर साथ-ही-साथ यह भी कहा जाता है कि वह अपनी आँखों को खोल नहीं सकेगा। इसी प्रकार रोगी को यह कहा जा सकता है कि वह किसी तकलीफ का अनुभव होता है या नहीं, इस प्रकार रोगी का निर्देश दिये जाते हैं और यदि रोगी उसके अनुसार काम करता है तो यह समझ जाते हैं कि व्यक्ति पूरी तरह से सम्मोहित हो चुका है। सम्मोहित की अवस्था में रोगी को सामान्य अवस्था में लाने के लिए सिर्फ संकेत मात्र देता है और व्यक्ति तरोताजा होकर अलग जाग उठता है।

सम्मोहित अवस्था की एक विशेषता यह भी है कि यदि व्यक्ति को इस अवस्था में निर्देश दिया जाता है, तो वह सामान्य अवस्था में आने पर उसके निर्देश के अनुसार कार्य सम्पन्न करता है। मनोविश्लेषण के क्षेत्र में इस क्रिया को Posthypnosis कहा जाता है।

मूल्यांकन (Values of hypnosis)-मनोचिकित्सा के रूप में Hysteria के रोगी को, विशेषकर Amnesia से पीड़ित रोगियों को सम्मोहन से काफी लाभ पहुंचाता है। सम्मोहन की अवस्था में रोगी अपने अचेतन मन में दमित इच्छाओं, अनुभवों और भावों को याद कर लेता है जिसे वह चेतन अवस्था में आने पर भी नहीं भूलता। साक्षात सुझाव के आधार पर Hypnosis के लक्षणों को दूर किया जा सकता है। Insomania के इलाज में नींद नहीं आती है। Insomania की चिकित्सा में Tension को कम करने में Neurotic habit से और भय से मुक्ति पाने में Hypnosis की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है।

सम्मोहन की सीमाएँ (Limitations of hypnosis)-यद्यपि चिकित्सा विधि के रूप में सम्मोहन से काफी लाभ पहुँचता है, फिर भी यह विधि सीमाओं से रहित नहीं है। निम्नलिखित आधार पर इस विधि की आलोचनाएँ की जा सकती हैं-

  • सम्मोहन के द्वारा कुछ ही प्रकार के रोगियों की चिकित्सा की जाती है। प्रत्येक व्यक्ति को सम्मोहित करना संभव नहीं है। प्रयोगों के आधार पर यह भी देखा गया है कि किसी को इच्छा के विरुद्ध सम्मोहित नहीं किया जा सकता है। सम्मोहन के लिए रोगी का सहयोग लेना । आवश्यक है।
  • सम्मोहन के विरुद्ध यह आलोचना की जाती है कि यह Superficial form of therapy है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस विधि के द्वारा रोग के सिर्फ बाहरी लक्षणों को दूर किया जा सकता है। स्थायी चिकित्सा सम्मोहन द्वारा संभव नहीं है।
  • सम्मोहन का प्रभाव अस्थायी होता है। इसके द्वारा रोगी को जो Suggestion दिया जाता है वह काफी दिनों तक लाभदायक सिद्ध नहीं होता। रोग के लक्षण थोड़े दिनों के लिए ही दूर हो पाता है। पुनः कुछ दिनों के बाद रोग के लक्षण विकसित हो जाते हैं। अत: इसका प्रभाव अस्थायी होता है।
  • सम्मोहन का प्रयोग काफी कठिन है। सभी मनोचिकित्सक इसका उपयोग नहीं कर सकते। इसके लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, अतः यह विधि कुछ खास मनोचिकित्सकों तक ही सीमित है।

प्रश्न 6.
मानव व्यवहार पर पड़ने वाले से संचार साधनों का वर्णन करें।
उत्तर:
इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज विश्व जगत में नयी हलचल हुई है। इस नयी हलचल का वैश्विक परिदृश्य स्वतः ही उभरकर आया है जिसे हमारे और आपके सामने मीडिया अर्थात अखबार, पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टी.वी. चैनल आदि ने परोसा है। आज जिस प्रकार पूरे विश्व में अनेक सामाजिक मुद्दों को उठाया जा रहा है वे न केवल मानव मूल्यों पर कुठाराघात कर रहे हैं वरन मानव की क्षमता, कुशलता एवं विवेक का समूल नाश कर रहे हैं। उन सब का दोष मिडिया को दिया जाए तो उसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। बच्चों को टी. वी. के माध्यम से हत्या, बलात्कार, आतंकवाद, चोरी आदि जैसी तथ्यों की जानकारी स्वतः ही मिल जाती है जिससे उसके मनोवृति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

टी. वी. के अश्लील चित्रों को देखकर उनके मन में सेक्स के प्रति रूझान बढ़ता है जो उनके मनोदशा को प्रभावित करता है। आज टी.वी. के माध्यम से पाश्चात्य संस्कृति को परोसा जा रहा है जिससे मानव मूल्यों में ह्रास की प्रवृति दृष्टिगोचर हुई है। बच्चे टी. वी. देखने में अधिक समय व्यतीत करते हैं। उसके कारण पढ़ने-लिखने की आदत तथा घर के बाहर की गतिविधियों जैसे खेलने, घूमने-फिरने में कमी आती है।

टेलीविजन देखने से बच्चों का ध्यान अपने लक्ष्य से हट सकता है। उनके समझने की शक्ति तथा उनकी सामाजिक अन्तक्रियाएँ भी प्रभावित हो सकती है। किंतु इसके विपरीत कुछ श्रेष्ठ कार्यक्रमों के द्वारा सकारात्मक अभिवृत्तियों तथा उपयोगी तथ्यात्मक सूचनाएँ मीडिया से प्राप्त होती है। जो बच्चों को अभिकल्पित तथा निर्मित करने में सहायता करती हैं। वयस्कों और बच्चों के संबंध में यह कहा जाता है कि उनमें एक उपभोक्तावादी प्रवृत्ति विकसित हो रही है। क्योंकि मीडिया के माध्यम से बहुत से उत्पादों के विज्ञापन प्रचारित किए जाते हैं तथा किसी व्यक्ति के लिए उनके प्रभाव में आ जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इन परिणामों से यही निष्कर्ष निकलता है कि संचार के साधनों के माध्यम से मानव व्यवहार पर एक ओर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो दूसरी ओर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है।

प्रश्न 7.
व्यक्तित्व की परिभाषा दें। व्यक्तित्व के प्रमुख गुणों की विवेचना करें।
उत्तर:
व्यक्तित्व एक सामान्य शब्द है जिसका प्रयोग अक्सर लोग शारीरिक बनावट एवं बाह्य वेशभूषा के संबंध में करते हैं। परन्तु, वास्तव में यह व्यक्तित्व नहीं है। व्यक्तित्व अंग्रेजी शब्द Personality का हिन्दी रूपांतर है। Personality का संबंध लैटिन भाषा के Personality शब्द से है जिसका अर्थ होता, नकली चेहरा। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसकी परिभाषाएँ दी हैं, परंतु अधिकांश लोगों द्वारा दी गई परिभाषाएँ अधूरी तथा एकांगी हैं।

वाटसन (Watson) ने इसकी परिभाषा देते हुए कहा है, “व्यक्तित्व उन क्रियाओं का योगफल है जिसे लम्बे समय तक निरीक्षण में विश्वसनीय सूचनाएँ प्राप्त की जाती है।” (Personality is the sum total of activities that can be observed a long period of time to give reliable information) शरमैन ने इस संबंध में कहा है, “व्यक्ति का विशिष्ट व्यवहार की व्यक्तित्व है।” (Personality is the characteristic behaviour of an individual.)

उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट होता है कि कुछ मनोवैज्ञानिकों ने बाह्य रूप या स्थायी गुणों के आधार पर व्यक्तित्व को समझने का प्रयास किया है। वास्तव में इन मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व को समझने में भूल की है। सभी मनोवैज्ञानिकों ने इसे अपने ढंग से परिभाषित किया है।

आल्पोर्ट (G.W.Allport) ने इस प्रकार की पच्चीस परिभाषाओं की एक सूची बनायी और इसके पर्याप्त अध्ययन के पश्चात् एक उपयुक्त परिभाषा दिया है। उनके अनुसार, “व्यक्तित्व व्यक्ति के अन्तर्गत उन मनोदैहिक गुणों का गत्यात्मक संगठन है जिन पर उसके वातावरण के प्रति होनेवाले विशिष्ट अभियोजन को निर्धारित करता है।” (Personality is the dynamic organization within the individual of those psychophysical system that determine his unique adjustment to his environment.)

इस प्रकार आल्र्पोट ने व्यक्तित्व को मनोवैज्ञानिक एवं शारीरिक गुणों का ऐसा संगठन माना है जो व्यक्ति को अपने वातावरण के साथ-साथ सामंजस्य को निर्धारित करता है। अपने परिभाषा में उन्होंने व्यक्तित्व को समय के अनुसार परिवर्तनशील माना है। अर्थात्, व्यक्तित्व रूका हुआ नहीं रहता, बल्कि परिवर्तित होता रहता है।

किम्बल यंग ने व्यक्तित्व की परिभाषा अलग ढंग से दी है। उनके अनुसार “हम व्यक्तित्व को एक व्यक्ति के अधिक या कम आदतों, गुणों, मनोवृत्तियों और विचारों के प्रमाणित संग्रह के रूप में परिभाषित कर सकते हैं, जो एक प्रकार से बाह्य रूप से कार्य एवं स्थितियों में संगठित रहते हैं तथा आंतरिक रूप से प्रेरणाओं, उद्देश्यों, और आत्मगत के तथ्यों से संबंधित रहते हैं। इस प्रकार व्यक्तित्व के दो कार्य एवं स्थितियाँ हैं जिनका तात्पर्य दूसरों को प्रभावित करने के लिए आचरण करने और जीवन संगठन या आत्मा, आन्तरिक प्रेरणाओं, उद्देश्यों से संबंधित स्वयं तथा अन्य के व्यवहार पर दृष्टिपात करने से है। संक्षेप में, यह प्रकट क्रियाओं एवं अर्थो से संबंधित है।” किम्बल युंग की परिभाषा से स्पष्ट होता है कि उन्होंने व्यक्तित्व को बाह्य एवं आंतरिक दो प्रकार के तत्वों का संगठन माना है।

एन० एल० मन ने इस संबंध में कहा है, “व्यक्तित्व की परिभाषा एवं व्यक्ति का संरचना, व्यवहार के प्रतिमान, रुचियों, मनोवृत्तियों, क्षमताओं, योग्यताओं और अभिरुचियों के अत्यधिक विशिष्ट संगठन के रूप में की जाती है।”

व्यक्तित्व के निम्नलिखित प्रमुख शीलगुण हैं-
(i) सामाजिक Sociability)-जिन व्यक्तियों में सामाजिक के शीलगुण होते हैं उनमें सामाजिक कार्यों में सक्रियता देखी जाती है। ऐसा व्यक्ति हमेशा दूसरों की भलाई के लिए कार्य करता है। वह अधिक-से-अधिक व्यक्तियों से मिलना पसन्द करता है। वे स्वभाव से हँसमुख एवं मिलनसार होते हैं। ऐसे शीलगुण वाले व्यक्ति समाज में सफल नेता होते हैं। इस संबंध में गिलफोर्ड एवं जिमरमैन ने अध्ययन किया है और इस शीलगुण को काफी महत्वपूर्ण बताया है तथा इसे अपने परीक्षण गिरफोर्ड- जिसरमैन टेम्परामेंट सर्वे में शामिल किया है। जिन व्यक्तियों में ये गुण नहीं होते वे अनुयायी होते हैं।

(ii) प्रभत्व (Ascendence)-कुछ व्यक्तियों में प्रभुत्व का गुण पाया जाता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा दूसरों पर अपना आधिपत्य तथा प्रभाव जमाने की कोशिश करता है। वह किसी कार्य में दूसरों को निर्देश देता है। इस प्रकार के शीलगुण वाले व्यक्ति अधिक क्रियाशील एवं झगड़ालू होते हैं। ऐसा व्यक्ति खेल का कप्तान, कॉलेज का प्रिंसिपल या सत्तावादी नेता होता है। इसके विपरीत जिन व्यक्तियों में इस गुण का अभाव होता है, वे निष्क्रिय एवं दूसरे के निर्देशों पर चलना अधिक पसंद करते हैं। वं हमेशा चाहते हैं कि कोई उनका मार्गदर्शन करा सके। ऐसे व्यक्तियों में अधीनता का गुण पाया जाता है।

(iii) आक्रमणशीलता-जिस व्यक्ति में आक्रमणशीलता का गुण पाया जाता है, वह आक्रमणकारी व्यवहार करता है। ऐसे व्यक्ति समाज में आतंक फैलाते हैं। इनमें सहनशीलता की कमी होती है। ये बात-बात में उग्र धारण कर लेते हैं। दंगा आदि फैलाने में इनका बहुत बड़ा हाथ होता है। ऐसे व्यक्तियों , में आधिपत्य भाव देखा जाता है।

(iv) ईमानदारी(Honesty)-जिन व्यक्तियों में ईमानदारी का गुण होता है वे सदैव ईमानदार होते हैं। ऐसे व्यक्ति न्याय करने में दूध का दूध पानी का पानी कर देते हैं।

(v) विनम्रता(Kindness)-ऐसे व्यक्तित्व वाला व्यक्ति विनम्र होते हैं। यह शीलगुण आधिपत्य के ठीक विपरीत होता है। इस प्रकार के व्यक्ति आज्ञाकारी होते हैं। ये किसी व्यक्ति को दुःख-तकलीफ · नहीं दे सकते हैं तथा समाज में सौहाद्र बनाए रखते हैं।

(vi) लज्जा(Shyness)-कुछ व्यक्ति बहुत ज्यादा लजालू होते हैं, वे लोगों के सामने आने पर लजाते हैं। ऐसे व्यक्ति सामाजिक नहीं होते, ये एकांत में रहना पसंद करते हैं तथा अपने विचारों में खोए रहते हैं। ये जितना अधिक लज्जा को छिपाने का प्रयास करते हैं उतना ही अधिक लजाते हैं।
हठ(Persistence)-ऐसे व्यक्ति जिनमें हठ का गुण होता है वे कठिन परिस्थितियों में भी अपने हठ पर अडिग रहते हैं, लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लगातार प्रयास करते रहते हैं।

(viii) प्रतियोगिता(Competition)-प्रतियोगिता का शीलगुण अधिकांश व्यक्तियों में पाया जाता है, परन्तु किसी व्यक्ति में यह गुण ज्यादा होता है। इस प्रकार का गुणवाला व्यक्ति हमेशा दूसरों से आगे बढ़ने का प्रयास करता रहता है। आगे बढ़ने के लिए दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि कठिन परिश्रम करता है।

(xi) संवेगात्मक अस्थिरता(Emotional instability)-जिन व्यक्ति में संवेगात्मक अस्थिरता का गुण होता है, उसकी मनोदशा में प्राय: उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति बिना कारण ही खुशी की मनोदशा से दुःख की मनोदशा में आ जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने संवेग की अभिव्यक्ति बिना हिचकिचाहट के करते हैं तथा.काफी जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं। ये दिवास्वप्न अधिक देखते है तथा भविष्य में संभावित बुरे विचारों के बारे में सोच-सोच कर घबराते हैं। इसके विपरीत कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनमें संवेगात्मक स्थिरता का गुण होता है।

(x) डाह-इस प्रकार के गुणवाला व्यक्ति दूसरों को नुकसान पहुँचाकर अपना लाभ चाहता है। ऐसे व्यक्ति लगभग सभी समाज में कुछ-न-कुछ होते हैं। ऐसा व्यक्ति दूसरे को नीचा दिखाने की ताक में रहता है। ये स्वभाव से बहुत खतरनाक होते हैं।

(xi) तंत्रिका ताप (Neuroticism)-आइजेंक ने तंत्रिका ताप को व्यक्तित्व का एक प्रमुख शीलगुण माना है। तंत्रिका ताप एक प्रकार की साधारण मानसिक विकृति है।

प्रश्न 8.
बुद्धि के बहु-बुद्धि सिद्धान्त का वर्णन करें।
उत्तर:
बहुबुद्धि सिद्धान्त प्रतिपादन होवार्ड गार्डनर (Howard Gardner, 1993, 1999) द्वारा किया गया। सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि कोई एकाकी क्षमता नहीं होती है बल्कि इसमें विभिन्न प्रकार की सामान्य क्षमताएँ सम्मिलित होती हैं। इन क्षमताओं को गार्डनर ने अलग-अलग बुद्धि प्रकार कहा है। ऐसे प्रकार के बुद्धि की चर्चा उन्होंने अपने सिद्धान्त में किया है और कहा है कि ये सभी प्रकार एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं। परंतु ये बुद्धि के सभी प्रकार आपस में अंतर्किया (interaction) करते हैं और किस समस्या के समाधान में एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। उन सभी नौ प्रकार के बुद्धि का वर्णन इस प्रकार है:

(i) भाषाई बुद्धि(Linguistic intelligence)-इससे तात्पर्य भाषा के उत्तम उपयोग एवं उत्पादन की क्षमता से होता है। इस क्षमता के पर्याप्त होने पर व्यक्ति भाषा का उपयोग प्रवाही (fluently) एवं लचील (flexible) ढंग से कर पाता है। जिन व्यक्तियों में यह बुद्धि अधिक होती है, वे शब्दों में विभिन्न एवं उसका उपयोग के पति काफी संवेदनशील होते हैं और अपने मन में एक उत्तम भाषाई प्रति (linguistic image) उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं।

(ii) तार्किक-गणितीय बुद्धि (Logical-Mathematical intelligence)-इससे तात्पर्य समस्या समाधान (Problem solving) एवं वैज्ञानिक चिंतन करने की क्षमता से होता है। जिन व्यक्तियों में ऐसी बुद्धि अधिकता होती है, वे किसी समस्या पर तार्किक रूप से तथा आलोचनात्मक ढंग से चिंतन करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोगों में अमूर्त चिन्तन करने की क्षमता अधिक होती है तथा गणितीय समस्याओं समाधान में उत्तम ढंग से विभिन्न तरह के गणितीय संकेतों एवं चिन्हों (Signs) का उपयोग करते है।

(iii) संगीतिय बुद्धि (Mosical intelligence)-इससे तात्पर्य संगीतिय-लय (Rhythms) तथा पैटर्न (Patterns) के बोध एवं उसके प्रति संवेदनशीलता से होती है। इस तरह की बुद्धि पर व्यक्ति उत्तम ढंग से संगीतिय पैटर्न को निर्मित कर पाता है। वैसे लोग जिनमें इस तरह की बुद्धि की अधिकता होती है ते आवाजों के पैटर्न, कंपन उतार-चढ़ात आदि के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं और नए-नए उत्पन्न करने में भी सक्षम होते हैं।

(iv) स्थानिक बुद्धि (Spatial intelligence)-इससे तात्पर्य विशेष दृष्टि प्रतिमा तथा पैटर्न को सार्थक ढंग से निर्माण करने की क्षमता से होता है। इसमें व्यक्ति को अपनी मानसिक प्रतिमाओं को उत्तम से उपयोग करने तथा परिस्थितियों की मांग के अनुरूप उपयोग करने की पर्याप्त क्षमता होती है। जिन व्यक्तियों में इस तरह की बुद्धि अधिक होती है, वे आसानी से अपने मन में स्थानिक वातावरण उपस्थित कर सकने में सक्षम हो पाते हैं। सर्जन, पेंटर, हवाईजहाज चालक, आंतरिक सजावट कर्ता (interior decorator) आदि में इस तरह की बुद्धि अधिक होती है।

(v)शारीरिक गतिबोधक बुद्धि (Bodily dinesthetic intelligence)-इस तरह की बुद्धि में व्यक्ति अपने पूरे शरीर या किसी अंग विशेष में आवश्यकतानुसार सर्जनात्मक (Greative) एवं लचीले (Flexible) ढंग से उपयोग कर पाता है। नर्तकी, अभिनेता, खिलाड़ी, सर्जन तथा व्यायामी (gymnast) आदि में इस तरह की बुद्धि अधिक होती है।

(vi) अंतर्वैयक्तिक बुद्धि (Interpersonal intelligence)-इस तरह की बुद्धि होने पर दूसरों के व्यवहार एवं अभिप्रेरक के सूक्ष्म पहलुओं को समझने की क्षमता व्यक्ति में अधिक होती है। ऐसे व्यक्ति दूसरों के व्यवहारों, अभिप्रेरणाओं एवं भावों को उत्तम ढंग से समझकर उनके साथ एक घनिष्ट संबंध बनाने में सक्षम हो पाते हैं। ऐसे बुद्धि मनोवैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं धार्मिक नेताओं में अधिक होती है।

(vii) अंतवैयक्तिक बुद्धि (Intrapersonal intelligence)-इस तरह की बुद्धि में व्यक्ति अपने भावों, अभिप्रेरकों तथा इच्छाओं को समझता है। इसमें व्यक्ति अपनी आंतरिक शक्तियों एवं सीमाओं का उचित मूल्यांकन की क्षमता विकसित कर लेता है और इसका उपयोग वह अन्य लोगों के साथ उत्तम संबंध बनाने में सफलतापूर्वक उपयोग करता है। दार्शनिकों (Philosophers) तथा धार्मिक साधु-संतों में इस तरह की बुद्धि अधिक होती है।’

(viii) स्वाभाविक बुद्धि (Naturalistic intelligence)-इससे तात्पर्य स्वाभाविक या प्राकृतिक वातावरण की विशेषताओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाने की क्षमता से होती है। इस तरह की बुद्धि की अधिकता होने पर व्यक्ति प्रकृति के विभिन्न प्राणियों, वनस्पतियों एवं अन्य संबद्ध चीजों के बीच सूक्ष्म विभेदन कर पाता है तथा उनकी विशेषताओं की प्रशंसा कर पाता है। इस तरह की बुद्धि किसानों, भिखारियों, पर्यटकों (tourist) तथा वनस्पतियों (botanists) में अधिक पायी जाती है।

(ix) अस्तित्ववादी बुद्धि (Naturalist intelligence)-इससे तात्पर्य मानव अस्तित्व, जिंदगी, मौत आदि से संबंधित वास्तविक तथ्यों की खोज की क्षमता से होता है। इस तरह की बुद्धि दार्शनिक चिंतकों (Philosopher thinkers) में काफी होता है। स्पष्ट हुआ है कि गार्डनर के बहुबुद्धि सिद्धान्त में कुल नौ तरह के बुद्धि की व्याख्या की गयी है, जिसपर मनोवैज्ञानिक का शोध अभी जारी है।

प्रश्न 9.
बुद्धि परीक्षण के प्रकार का वर्णन करें।
उत्तर:
बुद्धि की मात्रा सभी व्यक्तियों में एक समान नहीं होती है। किसी व्यक्ति की बुद्धि अधिक होती है तो किसी व्यक्ति की कम। बुद्धि मापन के लिए बनाये गये परीक्षणों के माध्यम से किसी व्यक्ति के वास्तविक बुद्धि का पता लगाया जा सकता है।

बुद्धिः मापन की दिशा में सर्वप्रथम सफल प्रयास बिने ने किया है। उन्होंने फ्रांस में साइमन की सहायता से तीन से पन्द्रह वर्ष के बच्चों की बुद्धि मापने के लिए एक परीक्षण का निर्माण किया, जिसे बिने-साइमन टेस्ट के नाम से जानते हैं। उनके टेस्ट में तीस समस्याएं थीं जो क्रमिक रूप से कठिनाई स्तर के अनुसार रखी गयी थीं। बिने-साइमन के टेस्ट में कुछ कमी महसूस की गयी थी, अत: बाद में चलकर कई बार संशोधन किया गया है। उसके बाद अन्य कई मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि-परीक्षण के लिए तरह-तरह के टेस्ट का निर्माण किया। अब तक जितने बुद्धि परीक्षणों का निर्माण किया जा चुका है उसे निम्नलिखित चार भागों में रखा गया है-

1. वाचिक या शाब्दिक बुद्धि परीक्षण : वाचिक बुद्धि परीक्षण वैसे परीक्षण को कहा जाता है जिसमें भाषा की आवश्यकता होती है। इसके लिए प्रयोज्य को भाषा का ज्ञान आवश्यक है। इसमें कुछ प्रश्न लिखे होते हैं जिनका उत्तर प्रयोज्य को देना होता है। इन्हीं उत्तरों के आधार पर प्रयोज्य की बुद्धि का मापन होता है। इसके अंतर्गत बिने-साइमन टेस्ट, स्टर्नफोर्ड-बिने स्केल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। वाचिक परीक्षण के अधिकांश परीक्षण सामूहिक होते हैं अर्थात् इनके माध्यम से अनेक व्यक्तियों के बुद्धि का मापन एक साथ किया जा सकता है। जैसे-नौसेना, सामान्य वर्गीकरण परीक्षण, थलसेना सामान्य वर्गीकरण आदि। बिहार में भी इस प्रकार का परीक्षण डॉ. मोहसिन ने किया है।

शाब्दिक बुद्धि परीक्षण में कुछ ऐसे गुण हैं जिससे बुद्धि के मापन में इसका सर्वाधिक प्रयोग होता है। इसका सबसे पहला गुण है कि इससे वैयक्तिक परीक्षण द्वारा किसी व्यक्ति की बुद्धि का सही तौर पर मापन संभव होता है। इसका प्रमुख गुण है कि इस प्रकार के परीक्षण से कम-से-कम समय में अधिक व्यक्तियों की बुद्धि मापी जाती है। शाब्दिक परीक्षण की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि इसके माध्यम से अमूर्त बुद्धि का मापन भी होता है। वाचिक बुद्धि परीक्षण में जहाँ एक ओर गुण हैं वहीं दूसरी ओर दोष भी हैं। इस परीक्षण के माध्यम से अनपढ़ व्यक्तियों की बुद्धि का मापन संभव नहीं है तथा इसके माध्यम से व्यक्ति की मूर्तबुद्धि का भी मापन नहीं हो सकता है।

2. क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण : क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण वैसे परीक्षण को कहते हैं जिसमें भाषा की आवश्यकता नहीं होती है, सिर्फ कुछ वस्तुओं को इधर-उधर घुमाकर समस्याओं का समाधान करना होता है। इसके माध्यम से अनपढ़ व्यक्तियों की भी बुद्धि मापी जा सकती है। वाचिक परीक्षण की तरह इसमें भी कठिनाई स्तर क्रमशः बढ़ता जाता है। पहली समस्या सरल होती है। दूसरी उससे कठिन, तीसरी दूसरी से कठिन, इसी प्रकार समस्या की कठिनाई बढ़ती जाती है। प्रयोज्य जितनी समस्याओं को हल करता है उसी के आधार पर बुद्धिलब्धि निकाला जाता है। क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण को अशाब्दिक परीक्षण भी कहा जाता है। इसके अंतर्गत ब्लॉक डिजाइन टेस्ट, पास-एलांग टेस्ट, क्यूब कंस्ट्रक्शन टेस्ट आदि प्रमुख हैं।

ब्लॉक डिजाइन का निर्माण कोह ने किया था इसमें दस डिजाइन होते हैं जिसे लकड़ी के ब्लॉक के माध्यम से बनाया जाता है। जो व्यक्ति जितने कम समय में समस्याओं का समाधान करता है उसे उतना ही अधिक अंक प्रदान किया जाता है। उसी प्राप्तांक के आधार पर बुद्धिलब्धि निकालते हैं।

धन रचना परीक्षण का निर्माण गांव से किया था। इसमें तीन उप-परीक्षण होते हैं। तीन काष्ठ के मॉडल होते हैं, जिन्हें देखकर गोटियों की सहायता से मॉडल बनाना होता है। मॉडल को बनाने में लगने वाले समय एवं अशुद्धियों के आधार पर प्राप्तांक दिये जाते हैं तथा बुद्धिलब्धि निकालते हैं।

पास-एलांग टेस्ट का निर्माण अलेक्जेंडर ने किया था। इसमें नौ पत्रक होते हैं, जिस पर अलग-अलग डिजाइन बने होते हैं। इस टेस्ट में चार ट्रे होता है, जिसका एक किनारा लाल तथा दूसरा नीला होता है। इसमें गोटियों को बिना ट्रेसे उठाये लाल किनारे की तरफ से नीले किनारे की तरफ करना होता है। उसी में लगे समय के आधार पर अंक देते हैं तथा बुद्धिलब्धि निकालते हैं।

क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण में कुछ दोष भी हैं। इसके माध्यम से अमूर्त बुद्धि का समुचित मापन संभव नहीं है। इस प्रकार के परीक्षण से एक समय में एक ही व्यक्ति की बुद्धि का मापन होता है, अतः इसमें समय एवं श्रम अधिक लगता है।

3. वैयक्तिक बुद्धि-परीक्षण : वैयक्तिक बुद्धि-परीक्षण उसे कहते हैं जिसका प्रयोग एक समय में केवल एक ही व्यक्ति पर किया जा सकता है। इस प्रकार के परीक्षण का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसके माध्यम से बुद्धि की सही-सही जांच हो पाती है। परन्तु, इसमें समय एवं श्रम अधिक लगता
है। इसके अंतर्गत वाचिक एवं क्रियात्मक बुद्धि-परीक्षण आते हैं। जैसे बिने-साइमन टेस्ट, वेश्लर-वैलव्य _स्केल, पास-एलांग टेस्ट, क्यूब कंस्ट्रक्शन टेस्ट, ब्लॉक-डिजाइन टेस्ट आदि वैयक्तिक बुद्धि-परीक्षण के अंतर्गत आते हैं।

4. सामूहिक बुद्धि-परीक्षण : सामूहिक बुद्धि-परीक्षण के माध्यम से एक समय में अनेक व्यक्तियों की बुद्धि मापी जा सकती है। इसके अंतर्गत आर्मी अल्फा, टेस्ट, आर्मी बीटा टेस्ट, मोहसिन सामान्य बुद्धि-परीक्षण, जलोटा सामूहिक बुद्धि-परीक्षण आदि आते हैं। सामूहिक बुद्धि-परीक्षण का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसके माध्यम से एक साथ कई प्रयोज्य की बुद्धि मापी जा सकती है। अतः इससे समय एवं श्रम की बचत होती है। इसका उपयोग व्यावसायिक चयन, शैक्षिक निर्देशन आदि में सफलतापूर्वक किया जाता है।

सामूहिक बुद्धि-परीक्षण में गुण के साथ-साथ दोष भी हैं। जब कई व्यक्तियों की बुद्धि को एक साथ मापा जाता है तो परीक्षक एक साथ सभी पर ध्यान नहीं दे पाता है, जिससे बुद्धि की सही जानकारी प्राप्त नहीं होती। छोटे बच्चों की बुद्धि का मापन इसके माध्यम से संभव नहीं है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अभी तक जितनी भी परीक्षणों का निर्माण हुआ है उनमें एक ओर गुण है तो दूसरी ओर दोष भी है। अत: किसी एक परीक्षण के माध्यम से बुद्धि की सही जानकारी प्राप्त नहीं होती है। इसलिए एक साथ कई परीक्षणों का प्रयोग कर बुद्धि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 10.
फ्रायड द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व के प्राथमिक संरचनात्मक तत्व का वर्णन करें।
उत्तर:
व्यक्तित्व के संरचना की दिशा में अनेक मनोवैज्ञानिकों ने अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया है। परन्तु फ्रायड की अवधारणा उन मनोवैज्ञानिकों से अलग हटकर है। सुप्रसिद्ध मनोविश्लेषणवादी मनोवैज्ञानिक सिंगमण्ड फ्रायड ने व्यक्तित्व संरचना के संबंध में एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उन्होंने व्यक्तित्व की संरचना का वर्णन दो मॉडलों के आधार पर किया है। जिसे आकारात्मक मॉडल तथा गत्यात्मक मॉडल कहते हैं। दोनों मॉडलों का वर्णन निम्नलिखित है।

आकारात्मक मॉडल-आकारात्मक मॉडल में फ्रॉयड ने मन के तीन स्तरों की चर्चा की है। चेतन, अर्द्धचेतन तथा अचेतन। चेतन स्तर के अन्तर्गत वे चिंतन भावनाएँ और क्रियाएँ आती हैं जिसके प्रति लोग जागरूक रहते हैं! अर्द्धचेतन क अन्तर्गत वैसी मानसिक क्रियाएं आती हैं जिसके प्रति लोक उस समय जागरूक होते हैं जब व उस पर सावधानीपूर्वक ध्यान केन्द्रित करते हैं। तोसरा स्तर जिसे अचेतन कहते हैं उसमें ऐसी मानसिक क्रियाएँ आती हैं जिसके प्रति लोग जागरूक नहीं होते हैं।

अचेतन के संबंध में फ्रायड कहते हैं कि यह मूल प्रवत्ति या पाश्विक अंतर्नोद का भंडार होता है। इसके अंतर्गत ऐसी घटनाएँ या विचार संग्रहित रहते हैं जो चेतन रूप स जागरूक स्थिति से छिपे होने हैं और मनोवैज्ञानिक द्वन्द्वों को उत्पन्न करते हैं। अचेतन में दलित इच्छाएँ कामुक स्वरूप ही होता है जिसे प्रकट रूप में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता ह इसीलिए उसका दमन हो जाता है। व्यक्ति अपने अचेतन में दमित इच्छाओं को सामाजिक रूप से स्वीकार्य तरीकों से अभिव्यक्त करने के लिए निरंतर संघर्ष करते रहता है। यदि द्वन्द्वों के निर्माण में असफल हो जाता है।

तो उसमं असामान्यता के लक्षण विकसित हो जाते हैं और उसका व्यवहार कुसमायोजित हो जाता है। व्यक्ति के अचेतन को स्वप्न विश्लेषण, दैनिक जीवन की भूलें, विस्मरण आदि के आधार पर जाना जा सकता है। फ्रायड ने एक चिकित्सा पद्धति को विकसित किया जिसे मनोविश्लेषण के नाम से जाना जाता है। मनोविश्लेषण चिकित्सा पद्धति के माध्यम से अचेतन में दमित विचारों को चेतन स्तर पर लाया जाता है और रोगी को आत्मा जागरुक बनाकर समाज में अभियोजन के लायक बनाया जाता है।

व्यक्ति की संरचना के संबंध में फ्रायड ने मन के गत्यात्मक पहलू की चर्चा की है उन्होंने बताया है कि यह अचेतन की ऊर्जा के रूप में होते हैं। इसके तीन तत्व-इड, इगो तथा सुपर इगो के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है। ये तीन तत्व सम्प्रत्यय है न कि वास्तविक भौतिक संरचना। तीनों नत्वों का विवरण निम्नलिखित है-
इड-व्यक्ति के मूल प्रवृत्ति कर्जा का सोत ड्ड होता है जो इसकी आदिम इच्छाआ, कामेच्छाओं और आकामक आवेगों की तात्कालिक संतुष्टि चाहता है। यह सुख के सिद्धान्त से संचालित होता है। फ्रायड ने बताया है कि व्यक्ति की अधिकांश मूल प्रवृत्तिक ऊर्जा का मूल स्वाभाविक होती है और कुछ ऊर्जा आक्रामक होती है।
इड को नैतिक-अनैतिक को परवाह नहीं होता है।

इगा-यह मन के गत्यात्मक पहलू का दूसरा भाग है। इसका विकास इड से होता है और यह मूल पवृत्तिक आवश्यकताओं को संतुष्टि वास्तविकता के घटात्मक पर करता है। यह वास्तविक सिद्धांत से मंचालित होता है। यह व्यवहार के रपयक्त तरीकों की तलाश करता है और इच्छाओं की संतुष्टि में सहयोग करता है। इस प्रकार यह व्यक्ति को व्यवहार कुशल बनाता है।

सुपर इगो-यह मन के गत्यात्मक पहलू का सबसे अन्तिम भाग है जिसका संबंध नैतिकता से होता है। सुपर इगो को समझने का और इसकी विशेषता बताने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसको मानसिक प्रकार्यों की नैतिक शाखा के रूप में जाना जाए। सुपर इगो इड और इगा को बताता है कि किसी विशिष्ट अवसर पर इच्छा विशेष की संतुष्टि नैतिक है अथवा नहीं: – इस प्रकार स्पष्ट है कि फ़ायड ने व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में एक नया आयाम दिया है जो गरी तरह से सन पर आधारित है। इसके क्रिया-प्रतिक्रिया के फलस्वरूप व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

प्रश्न 11.
What is intelligence test? Explain its utility. (बुद्धि परीक्षण क्या है ? इसकी उपयोगिता का वर्णन करें।)
उत्तर:
पत्येक बालक में कुछ जन्म ज्ञात योग्यताएँ होती हैं। यह सभी बालकों में एक समान नहीं वरन् भिन्न-भिन्न होती है। बालक को इन जन्मजात योग्यताओं को पता लगाने की विधि को बुद्धि परीक्षण कहते हैं। इसके द्वारा व्यक्ति के मानसिक विकास के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता है अथवा मापा जा सकता है।

आधुनिक काल में बुद्धि-परीक्षा परम उपयोगी सिद्ध हुई है। यह देखा गया है कि जीवन में सफलता और असफलता तथा नई परिस्थितियों के समायोजन एवं नई समस्याओं के हल करने में बुद्धि का बहुत बड़ा हाथ रहता है। यही नहीं मानव-जीवन के प्रत्येक कार्य-क्षेत्र में बुद्धि की बहुत अधिक महत्ता और उपयोगिता है। चूंकि बुद्धि परीक्षा द्वारा ही बुद्धि मापी जाती है, इसलिए उसकी भी बहुत उपयोगिता है। हम इसके कुछ उपयोगों का वर्णन नीचे करेंगे-

1.मंद बद्धि के बालकों का पता लगाना (Diagnosing Feeble-minded Children)-बुद्धि परीक्षा के द्वारा अध्यापक सरलतापूर्वक एक ही कक्षा में पढ़ने वालो में से मन्द बुद्धि और प्रखर बुद्धि के बालकों को छाँट सकता है। उनकी बुद्धि लब्धि के आधार पर वर्गीकरण कर उनके समान बुद्धि-लब्धि वाले बालकों के साथ उन्हें शिक्षा देकर उनका समुचित विकास कर सकता है। बुद्धि परीक्षा से मन्द बुद्धि, सामान्य और प्रतिभाशाली सभी प्रकार के बालकों की जानकारी आसानी से की जा सकती है। उनमें आपस में अन्तर किया जा सकता है। एक बालक जिसकी बुद्धिलब्धि 70 है वह मन्द-बुद्धि माना जाता है, जिसे विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। उसे प्रखर मेधावी छात्रों के साथ जिनकी बुद्धि-लब्धि 129 से ऊपर होती है, नहीं पढ़ाया जा सकता है।

2..बाल अपराधियों से व्यवहार (Dealing with Delinquency)–प्राय: यह देखा गया है कि अधिकतर बाल-अपराधी निम्न बौद्धिक धरातल के होते हैं। उच्च मानसिक स्तर के बालअपराधी बहुत कम मिलते हैं। बुद्धि परीक्षण हमें इन बाल-अपराधियों के उपयुक्त व्यवहार करने में सहायता पहुँचाती है क्योंकि बुद्धि परीक्षण द्वारा बाल-अपराधी की बुद्धि-लब्धि निकाली जाती है, फिर उन बहुत से कारणों को समझा जाता है जिनसे बालक अपराधी बन जाता है या विद्रोही। अतः इस प्रकार बुद्धि-परीक्षण बाल-अपराधियों के कारणों को खोजने में, उनके समुचित व्यवहार करने में सहायता पहुँचाती है।

3. शिक्षा में उपयोगी (Use in Educational System)-बुद्धि परीक्षण का सबसे अधिक उपयोग विद्यालयों में होता है। बुद्धि-परीक्षण के आधार पर बालकों का वर्गीकरण सामान्य मन्द और प्रतिभाशाली अथवा मेधावी के रूप में किया जाता है। शैक्षिक कार्यक्रमों की सफलता के लिए आवश्यक है कि मन्द बुद्धि और मेधावी बालकों में अन्तर किया जाय। उन्हें भिन्न प्रकार की शिक्षा दो जाये, अत: निम्नलिखित कारणों से बुद्धि परीक्षण परमोपयोगी सिद्ध हुई है।

  • बुद्धि-परीक्षण हम यह बताती है कि पाठशाला में बालक की उन्नति में कमी का कारण उसकी मानसिक योग्यता का कमी है अथवा अन्य कोई कारण।
  • बुद्धि-परीक्षण कम बुद्धि वाले बालकों को तुरन्त बता देती है।
  • बुद्धि-परीक्षण उत्कृष्ट बालक को छाँटकर बता देती है। उसकी उपयुक्त शिक्षा दीक्षा के लिए तथा उसके सम्यक विकास के लिए उचित अवसर प्रदान करने पर बल देती है।
  • अध्यापक के आगे आने वाली समस्याओं के हल में सहायता पहुँचाती है तथा विद्यालय में बाल-अपराधियों को पहचानने में मदद देती है।
  • बुद्धि-परीक्षण बालकों को मानसिक योग्यता का सम्यक आकलन कर उन्हें उचित मार्ग प्रदर्शन करती है।
  • वह बुद्धि लब्धि के आधार पर किसी बालक के लिए स्पष्ट संकेत करती है कि वह कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय के उच्च अध्ययन के योग्य है अथवा नहीं।
  • बुद्धि-परीक्षा अध्यापकों और विशेषज्ञों को बालक के लिए व्यावहारिक चुनाव में बहुत मदद देती है और उचित मार्ग प्रदर्शन करती है।

4. विशिष्ट वर्गों के अध्ययन के लिए उपयोगी (Usc of Special Group)-बुद्धि-परीक्षण व्यक्तियों के विशिष्ट वर्गों के लिए परमोपयोगी है। यह विशिष्ट वगा, जैसे-गूंगे, बहरे और जातीय समुदायों का सर्वेक्षण करती है।

5. उद्योगों में उपयोगिता (Use in the industires)-उद्योगों में अधिकारियों, कर्मचारियों और विशेषज्ञों के चुनाव में बुद्धि-परीक्षा बहुत सहायता देती है। चुनाव को अन्य विधियो जैसे साक्षात एवं उम्मीदवार के आवेदन पत्र जिसमें उसके पूर्व अनुभवों, शैक्षिक और सामाजिक, एवं विशिष्ट योग्यताओं का लेखा-जोखा होता है के साथ बुद्धि परीक्षा भी परम उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रश्न 12.
Write short note on mental age and I. Q: (मानसिक उम्र तथा बुद्धिलब्धि पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।)
उत्तर:
मानसिक उम्र (Mental age)-विभिन्न बुद्धि परीक्षणों के माध्यम से बुद्धिलब्धि (I.Q.) निकालने के लिए मानसिक उम्र की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। अब प्रश्न उठता है कि मानसिक उम्र क्या है ? इस संबंध में मानसिक उम्र की एक समुचित परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है-“मानसिक उम्र किसी व्यक्ति के द्वारा विकास की वह अभिव्यक्ति है जो उसके कार्यों द्वारा जानी जाती है तथा किसी आयुविशेष में उसकी अपेक्षा की जाती है।” (The mental age is an expression of the extent of development achieved by the individual stated in terms of the performance expected at any given age.)

परिभाषा से स्पष्ट होता है कि विभिन्न उम्र स्तर में व्यक्ति विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियाँ करता है। इससे तात्पर्य यह है कि जिस बालक की मानसिक आयु दस वर्ष बतायी जाती है, वह परीक्षा के अनुसार अपनी दस वर्ष की उम्र में ही सामान्य बालकों के समान व्यवहार करने में सफल हो जाता है।

बुद्धि-परीक्षक किसी बालक की बुद्धि-परीक्षण के लिए वस्तुओं का संकलन करता है जिसे वह परीक्षण में शामिल करना चाहता है तथा उनको एक विशिष्ट क्रम में सजाता है। फिर, विभिन्न उम्र स्तर के बच्चों को समस्या हल करने के लिए देता है। यह सब प्रकार से आयोजित किया जाता है जिससे बच्चों के विभिन्न उम्र की सामान्य उपलब्धियों का ठीक-ठीक पता लग सके। परीक्षण में विभिन्न उम्र के प्रतिनिधि बच्चों ने कार्यों में किस सीमा पर सफलता प्राप्त की तथा एक की उम्र के अधिकांश बच्चों ने जिस कार्य को सफलतापूर्वक किया वही उस विशिष्ट उम्र की मानसिक उम्र निश्चित कर ली जाती है।

उदाहरण के लिए, आठ वर्ष की उम्र के सामान्य बच्चों की औसत उपलब्धि ही उसकी आठ वर्ष की मानसिक उम्र का प्रतीक होगा। कोई भी आठ वर्ष ? का बच्चा ऐसे कार्यों को कर लेता है जो नौ वर्ष का सामान्य बच्चा कर सकेगा तो उसकी मानसिक आयु नौ वर्ष कहलायेगी। परन्तु, आठ वर्ष का बच्चा ऐसे कार्यों को करने में सक्षम होता है जो सात वर्ष का सामान्य बच्चा कर सकता है तो उस बच्चे की मानसिक आयु सात वर्ष ही मानी जायगी जबकि उसकी वास्तविक आयु आठ वर्ष की होगी।

इस प्रकार अपने से अधिक उम्र वाले कार्यों को करने वाले बच्चों को श्रेष्ठ तथा अपने से कम उम्र के कार्यों तक ही करनेवाले बच्चों को हीन मानते हैं।

मानसिक आयु किसी-किसी विशिष्ट उम्र में बालक की मानसिक परिपक्वता को बताती है कि बालक उस वास्तविक आयु पर मानसिक दृष्टि से कितना प्रौढ़ हुआ है। यही प्रौढ़ता एवं परिपक्वता की मात्रा मानसिक आयु है। बच्चे की उम्र में वृद्धि के साथ-साथ उसकी मानसिक परिपक्वता बढ़ती जाती है। बिने टेस्ट बच्चे की सामान्य योग्यता को मापती है, जिसका विकास थोड़े बहुत अंतर से प्रौढ़ता तक एक रूप से होता है।

बुद्धिलब्धि (Intelligence Quotient)-बुद्धिलब्धि (I.Q.) से तात्पर्य व्यक्ति के बुद्धि की मात्रा से है। किसी भी व्यक्ति को जो प्रतिभा प्राप्त होती है उसकी मात्रा को बताने वाली संख्या को I.Q. कहते हैं। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति के पास बुद्धि की कितनी मात्रा है इसकी माप अथवा उसके द्वारा उपलब्ध बुद्धि ही बुद्धिलब्धि है।

बुद्धिलब्धि के विचार को सर्वप्रथम टरमैन (Terman) ने प्रस्तुत किया। इससे संबंधित विचार पहले स्टर्न (Sterm) ने भी बताया था। स्टर्न ने मानसिक लब्धि (M.Q.) प्रस्तुत किया। इसके लिए मानसिक उम्र को वास्तविक उम्र से विभाजित किया। पहले बुद्धि की मात्रा का सही .ही ज्ञान प्राप्त करना कठिन था। केवल इस बात की जानकारी होती थी कि कौन अधिक बुद्धि का है तथा कौन कम बुद्धि का। परन्तु I.Q. से बुद्धि का मात्रात्मक मापन होने लगा। इसके आध. पर इस बात की जानकारी की जाती है कि किस बच्चे को कितनी बुद्धि है तथा एक बच्चा कितना अधिक या कम बुद्धि वाला है। I.Q. निकालने के लिए एक सूत्र का प्रतिपादन किया जो इस प्रकार है-
Bihar Board 12th Psychology Important Questions Short Answer Type Part 4 1

टरमैन द्वारा दिया गया सूत्र आज भी बहुत उपयोगी है। इस सूत्र के अनुसार यदि मानसिक उम्र और वास्तविक उम्र दोनों बराबर होगा तो I.Q. एक सौ (100) होगा जो सामान्य कहलायगा। यदि मानसिक उम्र अधिक और वास्तविक उम्र अधिक होगा तो वह तीव्र बुद्धि का माना जायगा। इसी प्रकार यदि मानसिक उम्र कम और वास्तविक उम्र अधिक होगा तो वह मंद बुद्धि का माना जायेगा। नब्बे (90) से एक सौ दस (110) तक I.Q. वाले व्यक्ति को सामान्य बुद्धि माना जाता है। मानसिक उम्र को वास्तविक उम्र से विभाजित करने के बाद 100 से गुणा करने का तात्पर्य है स्कोर को फैलना एवं दशमलव को समाप्त करना। इसे एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-मान लिया कि किसी बच्चे की वास्तविक उम्र दस वर्ष और ब्लॉक डिजाइन टेस्ट (Block design test) के आधार पर उसकी मानसिक उम्र बारह वर्ष प्राप्त होती है तो उसकी बुद्धिलब्धि इस प्रकार प्राप्त होगी-
I.Q = \(\begin{array}{l}
\text { M.A. } \\
\text { C.A. }
\end{array}\) × 100 = \(\frac{12}{10}\) × 100 = 120 (औसत बुद्धि)
एटकिंसन एण्ड एटकिंसन तथा हिलगार्ड (Atkinson and Atkinson and Hilgard) ने अपने अध्ययनों के आधार पर एक तालिका प्रस्तुत की है, जिसमें बुद्धिलब्धि और प्रतिभा की मात्रा का संबंध दर्शाया गया है-

I.Q.वर्गीकरणप्रतिशत
140 एवं अधिकअति प्रखर1
120 से 139प्रखर11
110 से 119उच्च औसत18
90 से 109औसत46
80 से 89निम्न औसत15
70 से 79सीमा रेखा6
70 से नीचेमानसिक दुर्बल3

प्रश्न 13.
What do you understand by aptitude test? Discuss the different type of aptitude test. .. (अभिक्षमता परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन करें।)
उत्तर:
अभिक्षमता परीक्षण के माध्यम से व्यक्ति के कौशल या प्रवीणता ग्रहण करने की क्षमता का मापन किया जाता है। यह मनोविज्ञान का एक प्रमुख परीक्षण है। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ ऐसी क्षमताएँ होती है, जो विशिष्ट होती है। उस क्षेत्र में यदि उसे आगे बढ़ने का अवसर दिया जाय तो वह बहुत अधिक ऊँचाई को हासिल कर सकता है। इसी विशिष्ट क्षमता को मापने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने परीक्षण का निर्माण किया है। इस दिशा में काफी पहले से ही मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रयास जारी है। इन्हीं परीक्षणों को अभिक्षमता परीक्षण के नाम से जाना जाता है। इसके अंतर्गत कई प्रकार की विशिष्ट क्षमताएँ जैसे यात्रिक क्षमता, गणितीय क्षमता, लिपिक क्षमता, संगीत क्षमता आदि का मापन किया जाता है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अभिक्षमता के स्वरूप को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। फ्रीमैन के अनुसार, “अभिक्षमता परीक्षण से तात्पर्य उस परीक्षण से है, जिसके माध्यम से किसी विशिष्ट क्षेत्र में विशिष्ट कार्य को पूरा करने में व्यक्ति में अन्तर्निहित क्षमता का मापन किया जाता है।”

अभिक्षमता परीक्षण के प्रकार (Type of aptitude test) :
विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा अभिक्षमता परीक्षण के क्षेत्र में बहुत अधिक शोध किये गए हैं और परीक्षणों का निर्माण किया गया है। इन परीक्षणों के मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-एक कारक अभिक्षमता परीक्षण तथा बहुकारक अभिक्षमता परीक्षण।

1. एक कारक अभिक्षमता परीक्षण (Unifactor aptitude test)-एक कारक अभिक्षमता परीक्षण वैसे परीक्षण को कहते हैं, जिससे व्यक्ति के किसी एक प्रकार की अभिक्षमता का मापन होता है। इस प्रकार के परीक्षण की खास विशेषता यह होती है कि इसके माध्यम से व्यक्ति में निहित एक ही क्षमता का सही ढंग से और सूक्ष्म मापन से होता है। अतः इस प्रकार के परीक्षण को विश्वसनीयता एवं वैधता की मात्रा बहुत अधिक होती है। इस प्रकार के परीक्षणों में मेनिसोटा यांत्रिक अभिक्षमता परीक्षण, संगीत अभिक्षमता परीक्षण, सामान्य लिपिक अभिक्षमता परीक्षण आदि आते हैं। इस दिशा में बिहार में भी कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य किए गए हैं, जिसमें ए० के. पी. सिन्हा तथा एल. एल. के. सिन्हा द्वारा निर्मित वैज्ञानिक अभिक्षमता प्रमुख है। यह परीक्षण कॉलेज के छात्रों में निहित वैज्ञानिक क्षमता का मापन के क्षेत्र में बहुत अधिक लोकप्रिय हुआ है।

2. बहकारक अभिक्षमता परीक्षण (Multifactor aptitude test)-इसके अंतर्गत ऐसे परीक्षण आते हैं, जिसके माध्यम से व्यक्ति में निहित अनेक प्रकार की क्षमताओं का मापन एक ही जाँच के माध्यम से करते हैं। ज्यादातर अभिक्षमता परीक्षण बहुकारक के अंतर्गत आते हैं। इस प्रकार के परीक्षणों में Different aptitude test, General aptitude battery, teaching aptitude test battery, scientific aptitude battery आदि आते हैं।

उपरोक्त परीक्षणों में Differential aptitude test (DAT) सर्वाधिक लोकप्रिय परीक्षण है, जिसका निर्माण सबसे पहले 1947 में अमेरिकन मनोवैज्ञानिक कारपोरेशन द्वारा किया गया है।

DAT का उपयोग आठवें वर्ग से लेकर बारहवें वर्ग के छात्रों के लिए किया जाता है। दूसरा संशोधन 1952 तथा 1963 ई. में किया गया। इस परीक्षण से निम्नलिखित आठ प्रकार की क्षमताओं का मापन किया जाता है।

1. शाब्दिक चिंतन परीक्षण(Verbal Reasoning test)-इसके माध्यम से शब्दों में निहित संप्रत्ययों को समझने की क्षमता का मापन किया जाता है। इससे रचनात्मक क्षमता का भी मापन किया जाता है।

2. संख्यात्मक अभिक्षमता परीक्षण (Numerical ability test)-इस जाँच के माध्यम से विद्यार्थियों में निहित संख्या या संख्याओं के आपसी संबंधों को समझने, संख्याओं की गणना एवं उसके बारे में चिंतन की क्षमता का मापन होता है। . .3. अमूर्त चिंतन परीक्षण (Abstract Reasoning test)-कुछ व्यक्तियों में अमूर्त चिंतन की योग्यता अधिक होती है। इन क्षमताओं का मापन अमूर्त चिंतन परीक्षण से किया जाता है।

4. दैशिक संबंध परीक्षण (Space Relation test)- दैशिक संबंध परीक्षण के माध्यम से व्यक्ति में निहित उस क्षमता का मापन होता है जिसके द्वारा वह यह बता सकता है कि किसी दिए हुए डायग्राम से किस प्रकार का चित्र बनेगा या कोई एक ही वस्तु को विभिन्न दिशाओं में घुमाया जाय तो किस प्रकार का दिखायी देगा। इस क्षमता की आवश्यकता ड्रेस डिजायनर तथा डेकोरेटर आदि में विशेष रूप से होती है।

5. यांत्रिक चिंतन परीक्षण (Mechanical Reasoning test)-यांत्रिक चिंतन परीक्षण के माध्यम से व्यक्ति में निहित यांत्रिक क्षमताओं का पता चलता है, जिसकी आवश्यकता उद्योगों में सर्वाधिक है। इस प्रकार की क्षमता वाले लोग सफल इंजीनियर या कुशल उद्योगपति हो सकते हैं।

6. लिपिक गति और परिशुद्धता परीक्षण (Clerical speed and accuracy test)-यह . एक ऐसी जाँच है जिसके माध्यम से व्यक्ति किसी शब्द था चित्र का प्रत्यक्षीकरण करने के पश्चात् होनेवाली सही अनुक्रिया का मापन करता है। इस प्रकार के क्षमता की आवश्यकता लिपिक कार्य या स्टेनोग्राफी आदि में सर्वाधिक होती है।

7. हिज्जे परीक्षण (Spelling test)–भाषा उपयोग परीक्षण के दो उप-परीक्षण है जिसमें हिज्जे परीक्षण पहला उप-भाग है, जिसके माध्यम से व्यक्ति में निहित शब्दों का सही-सही हिज्जे की क्षमता की माप की जाती है।

8. भाषा-वाक्य परीक्षण (Language-sentence test)–इस परीक्षण के माध्यम से भाषा का सही-सही उपयोग तथा वाक्यों का सही वैयाकरणिक अनुप्रयोग आदि की क्षमता का मापन किया जाता है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि DAT के माध्यम से आठ विभिन्न प्रकार की अभिक्षमता का मापन किया जाता है, जिसके क्रियान्वयन से कुल मिलाकर तीन घण्टे छः मिनट का समय लगता है। इसका उपयोग सामूहिक एवं वैयक्तिक परीक्षण के रूप में किया जा सकता है।

प्रश्न 14.
पर्यावरण के प्रति जागरूकता तथा अनुकूल व्यवहार को बढ़ाने की प्रविधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
पर्यावरण के प्रति जागरूकता तथा अनुकूल व्यवहार को बढ़ाने के लिए केवल भविष्यवाणी पर्याप्त नहीं है। बल्कि इसके विद्वेशक परिणामों के सम्बन्ध में जानकारी देकर विपरीत प्रभाव को नियंत्रण करने का प्रयास किया जा सकता है जो निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा की जा सकती है।-

(a) चेतावनी- समयानुरूप आने वाले विषम परिस्थितियों की जानकारी देकर लोगों को चेतना वृद्धि किया जा सकता है जिससे लोग अवगत होकर उसके समाधान के प्रति तत्पर हो सके। यह कार्य विज्ञापन के द्वारा लोगों तक पहुँचाया जाता है। प्राकृतिक विपदाओं से सम्बन्धित घटनाओं को तूफान एवं भविष्य में आने वाले समुद्री ज्वार तथा भूकम्प से बचने तथा निर्धारित क्षेत्र में न जाने की सुझाव दी जाती है।

(b) सुरक्षा उपाय-प्राकृतिक विपदाओं में कुछ ऐसे भी हैं जिनका संकेत दिये जाने पर इतना शीघ्रतापूर्वक आगमन होता है कि उनका नियंत्रण कर पाना संभव नहीं होता इसलिए इसके लिए चेतावनी देकर उन्हें मानसिक रूप से तैयार करने का कार्य किया जाता है इससे संबंधित सुझाव द्वारा समयानुरूप समायोजन में सहायता प्राप्त हो जाता है।

(c) मनोवैज्ञानिक विकारों का उपचार-मनावैज्ञानिक विकारों के उपचार में स्वावलंबन उपचार तथा व्यावसायिक उपचार दोनों उपस्थित होते हैं। लोगों में मुख्यतः भौतिक सहयोग जैसे-शरण आश्रय, भोजन, एवं वस्त्र वितीय सहायता प्राप्त करना अनिवार्य होता है जिसके लिए अनुभव एवं प्रोत्साहन होना आवश्यक होता है। प्रभाव स्वरूप इससे उसके सांवेगिक अवस्था का निवारण हो पाता है।

(d) आत्म सक्षमता- इसमें प्राणी को आत्मा विश्वास दृढ़ होता है वे स्वयं को बाहरी परिवेश में समर्थ मानते हैं परन्तु इन दशाओं की पूर्ति न हो सकने से तीव्र दबाव परिलक्षित हो जाता है और उन्हें मनोरोग उपचार की आवश्यकता पड़ती है प्रभाव स्वरूप लाभ अर्जन से सामुदायिक जीवन में समायोजन के गण विकसित होता है।

प्रश्न 15.
एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक के लिए सामान्य कौशलों का वर्णन करें।
उत्तर:
भनोविज्ञान का अध्ययन करने वाले कुछ छात्रों का उद्देश्य होता है एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनकर समाज एवं देश को सेवा प्रदान करना। कुशल मनोवैज्ञानिक बनने के लिए जो क्षेत्र आते हैं जिसकी शिक्षा और प्रशिक्षण करने के बाद व्यवसाय में आने के पहले जानना आवश्यक है। वे शिक्षकों, अभ्यास करने वाले या शोध करने वाले सभी के लिए जरूरी है जो छात्रों से, व्यापार से, उद्योगों से और बृहत्तर समुदायों के साथ परामर्श की भूमिकाओं में होते हैं। यह माना जाता है कि मनोविज्ञान में
सक्षमताओं को विकसित करना, उनको अमल में लाना और उनका मापन करना कठिन है, क्योंकि विशिष्ट पहचान और मूल्यांकन की कसौटियों पर आम सहमति नहीं बन पाई है।

मनोवैज्ञानिकों द्वारा पहचानी गयी आधारभूत कौशल या सक्षमता जो एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए आवश्यक है उसे तीन श्रेणियों में बाँटा गया है-

  1. सामान्य कौशल
  2. प्रेक्षण कौशल तथा
  3. विशिष्ट कौशल।

सामान्य कौशल मूलतः सामान्य स्वरूप के होते हैं। जिसकी आवश्यकता सभी प्रकार के मनोवैज्ञानिकों को होती है चाहे वे किसी भी क्षेत्र के विशेष क्यों नहीं। खासकर सभी प्रकार के व्यवसायी मनोवैज्ञानिक जैसे-नैदानिक, स्वास्थ्य मनोविज्ञान, औद्योगिक, सामाजिक, पर्यावरणीय सलाहकार की भूमिका में रहने वालों के लिए यह कौशल आवश्यक है।

प्रेक्षण कौशल से तात्पर्य सूचनाओं को देखकर समझने से है। कोई मनोवैज्ञानिक चाहे वह शोध कर रहा हो या क्षेत्र में व्यवसाय कर रहा हो वह ज्यादातर समय सावधानीपूर्वक सुनने, ध्यान देने और प्रेक्षण करने का कार्य करता है। वह अपनी समस्त संवेदनाओं का उपयोग देखने, सुनने स्वाद लेने, स्पर्श करने या सूंघने में करता है।

विशिष्ट कौशल मनोविज्ञान के किसी क्षेत्र में विशेषता से है जैसे-नैदानिक स्थितियों में कार्य करने वाले मनोवैज्ञानिकों के लिए यह आवश्यक है कि वह चिकित्सापरक तकनीकों, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन एवं परामर्श में प्रशिक्षण प्राप्त करें। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए उपरोक्त तीनों कौशल में प्रवीण होना आवश्यक है। तभी वे सेवार्थी को अधिक-से-अधिक लाभ दे सकता हैं।

Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 2

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Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 2

प्रश्न 1.
माँग की कीमत लोच से आप क्या समझते हैं ? माँग की कीमत लोच की विभिन्न श्रेणियाँ क्या हैं ?
अथवा, माँग की कीमत लोच के प्रकारों की व्याख्या करें।
उत्तर:
माँग की लोच की धारणा यह बताती है कि कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप किसी वस्तु की माँग में किस गति या दर से परिवर्तन होता है। यह वस्तु की कीमत में परिवर्तन के प्रति माँग की प्रतिकिया या संवेदनशीलता को दर्शाती है।

माँग की कीमत लोच कीमत में होने वाले आनुपातिक परिवर्तन तथा माँग में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात है।
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माँग की कीमत लोच को निम्न श्रेणियों में बांटा जा सकता है-
1. पूर्णतया बेलोचदार माँग (Pesteetly inelastic Demand)- जब कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप माँग में कोई परिवर्तन नहीं होता तो इसे पूर्णतया बेलोचदार माँग कहते हैं। ऐसा माँग वक्र X-अक्ष पर लम्बवत् होता है। अर्थात् ed = 0
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2. इकाई से कम लोचदार माँग (Less than unitary Elastic Demand)- माँग की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें कीमत में होने वाले एक निश्चित प्रतिशत परिवर्तन के कारण माँग में अपेक्षाकृत कम प्रतिशत परिवर्तन होता है। अर्थात् ed < 1
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3. इकाई से अधिक लोचदार माँग (Greater than unitary Elastic Demand)- माँग की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें कीमत में होने वाले एक निश्चित प्रतिशत परिवर्तन के परिणामस्वरूप माँग में अपेक्षाकृत अधिक प्रतिशत परिवर्तन होता है। अर्थात् ed > 1
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4. इकाई लोचदार माँग (Unitary Elastic Demand)- माँग की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन के बराबर माँग में प्रतिशत परिवर्तन होता है। जब माँग वक्र Rectangular Hyperbola होता है तब माँग वक्र के सभी बिन्दुओं पर माँग की लोच इकाई के बराबर होती है। अर्थात् ed = 1
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5. पूर्णतया लोचदार माँग (Perfectly Elastic Demand)- पूर्णतया लोचदार माँग उसे कहते हैं जिसमें कीमत में थोड़ा-सा परिवर्तन होने पर माँग में अनन्त परिवर्तन हो जाता है। ऐसा माँग वक्र X-अक्ष के समानान्तर होता है। अर्थात् ed = a
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प्रश्न 2.
माँग के नियम का कथन उद्धृत कीजिए। माँग वक्र का ढलान क्यों नीचे की ओर होता है ?
अथवा, माँग का नियम क्या है ? माँग वक्र का ढलान क्यों नीचे की ओर होता है ?
उत्तर:
माँग का नियम यह बताता है कि अन्य बातें समान रहने पर वस्तु की कीमत एवं वस्तु की मात्रा में विपरीत संबंध पाया जाता है। दूसरे शब्दों में, अन्य बातें समान रहने की दशा में किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि के कारण उसकी माँग में कमी हो जाती है तथा इसके विपरीत कीमत में कमी होने पर वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है।

जब माँग-तालिका को एक रेखाचित्र द्वारा व्यक्त किया जाता है तो इसे माँग वक्र कहते हैं। माँग वक्र का ढाल ऋणात्मक होता है, अर्थात् यह वक्र बायें से दायें नीचे गिरता है। इसका अर्थ है कि कीमत कम होने पर अधिक वस्तुएँ खरीदी जाती है और कीमत अधिक होने पर कम वस्तुएँ खरीदी जाती है। माँग वक्र की ढलान ऋणात्मक होने के निम्नलिखित कारण हैं-

  1. घटती सीमान्त उपयोगिता का नियम- उपभोक्ता वस्तु की सीमान्त उपयोगिता को दिये गये मूल्य के बराबर करने के लिए कम कीमत होने पर अधिक क्रय करता है। P = Mu
  2. प्रतिस्थापन्न प्रभाव- मूल्य कम होने पर उपभोक्ता अपेक्षाकृत महँगी वस्तु के स्थान पर सस्ती वस्तु का प्रतिस्थापन्न करता है।
  3. आय प्रभाव- मूल्य में कमी के फलस्वरूप उपभोक्ता आय वृद्धि की स्थिति को महसूस करता है और क्रय बढ़ा देता है।
  4. नये उपभोक्ताओं का उदय।

प्रश्न 3.
केन्द्रीय बैंक और व्यावसायिक बैंक में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
केन्द्रीय बैंक तथा व्यावसायिक बैंक में निम्नलिखित अंतर है-
केन्द्रीय बैंक:

  1. देश में इसकी संख्या एक होती है।
  2. इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता है।
  3. यह नोट निर्गमन करता है।
  4. इस पर सरकार का स्वामित्व होता है।
  5. व्यापारिक बैंकों से इसकी कोई प्रतियोगिता नहीं होती है।
  6. यह अंतिम ऋणदाता है।
  7. यह सरकार के बैंकर के रूप में सरकार की ओर से लेन-देन करता है।
  8. यह जनता के साथ व्यवसाय नहीं करता है।
  9. यह देश का सर्वोच्च बैंक है।

व्यावसायिक बैंक:

  1. देश में इसकी संख्या कई होती है।
  2. इसका उद्देश्य लाभ कमाना होता है।
  3. इसे यह अधिकार नहीं है।
  4. इसका स्वामित्व सरकारी और गैर-सरकारी हो सकता है।
  5. इनमें आपस में प्रतियोगिता होती है।
  6. यह केन्द्रीय बैंक के ग्राहक होता है।
  7. यह जनता का बैंकर है।
  8. यह जनता से व्यवसाय करता है।
  9. यह केन्द्रीय बैंक के नियंत्रण में कार्य करता है।

प्रश्न 4.
स्फीतिक अंतराल क्या है ? अतिरेक माँग के कारणों को बताइए।
उत्तर:
वह स्थिति जिसमें अर्थव्यवस्था में उत्पादन में वृद्धि नहीं होती, केवल कीमतों में वृद्धि होती है तो उसे स्फीति अंतराल कहा जाता है स्फीतिक अंतराल अतिरेक माँग की माप है। स्फीतिक दबाव तथा अत्यधिक माँग में आनुपातिक संबंध पाया जाता है। अत्यधिक माँग जितनी अधिक होती है, स्फीतिक दबाव भी उतना ही अधिक होता है।

निम्नलिखित कारणों के कारण किसी देश में अतिरेक माँग की स्थिति उत्पन्न होती है-

  • सार्वजनिक व्यय में बढ़ोतरी के वजह से सरकार द्वारा की जाने वाली वस्तुओं तथा सेवाओं की माँग में वृद्धि।
  • कर में कमी के कारण व्यय योग्य आय एवं उपभोग माँग में वृद्धि।
  • विनियोग माँग में वृद्धि।
  • निर्यात हेतु वस्तुओं की माँग में वृद्धि।
  • घाटा प्रबंधन के कारण मुद्रा पूर्ति में वृद्धि।
  • साख विस्तार से माँग में वृद्धि।

प्रश्न 5.
विदेशी विनिमय दर को परिभाषित करें। स्थिर और लोचपूर्ण विनिमय दर में अंतर करें।
उत्तर:
वह दर जिस पर एक देश की एक मुद्रा इकाई का दूसरे देश की मुद्रा में विनिमय किया जाता है, विदेशी विनिमय दर कहलाता है। इस प्रकार विनिमय दर घरेलू मुद्रा के रूप में दी जाने वाली वह कीमत है जो विदेशी मुद्रा की एक इकाई के बदले दी जाती है।

स्थिर एवं लोचपूर्ण विनिमय दरों में निम्नलिखित अंतर पाया जाता है-
स्थिर विनिमय दर:

  1. यह सरकार द्वारा घोषित की जाती है और इसे स्थिर रखा जाता है।
  2. इसके अंतर्गत विदेशी केन्द्रीय बैंक अपनी मुद्राओं को एक निश्चित कीमत पर खरीदने और बेचने के लिए तत्पर रहता है।
  3. इसमें परिवर्तन नहीं आते हैं।

लोचपूर्ण विनिमय दर:

  1. माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में निर्धारित होती है।
  2. इसमें केन्द्रीय बैंक का हस्तक्षेप नहीं होता है।
  3. इसमें हमेशा परिवर्तन आते रहते हैं।

प्रश्न 6.
सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम की व्याख्या करें। इस नियम के लागू होने की आवश्यक शर्ते कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर:
सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम इस तथ्य की विवेचना करता है कि जैसे-जैसे उपभोक्ता किसी वस्तु की अगली इकाई का उपभोग करता है अन्य बातें समान रहने पर उससे प्राप्त होने वाली सीमान्त उपयोगिता क्रमशः घटती जाती है। एक बिन्दु पर पहुँचने पर यह शून्य हो जाती है। यदि उपभोक्ता इसके पश्चात् भी वस्तु का सेवन जारी रखता है तो यह ऋणात्मक हो जाती है। निम्न उदाहरण से भी यह इस बात का स्पष्टीकरण हो जाता है-

वस्तु की मात्राप्राप्त सीमान्त उपयोगिता
110
28
36
44
50
6-4

इस उदाहरण से यह स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की मात्रा एक से बढ़कर 6 तक पहुँच जाती है वैसे-वैसे उससे प्राप्त सीमान्त उपयोगिता भी 10 से घटते-घटते शून्य और ऋणात्मक यानी-4 तक हो जाती है। अतः स्पष्ट है कि वस्तु की मात्रा में वृद्धि होते रहने से उससे मिलने वाली सीमांत उपयोगिता घटती जाती है।

सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम की निम्नलिखित शर्ते या मान्यताएँ हैं-

  1. उपभोग की वस्तुएँ समरूप होने चाहिए।
  2. उपभोग की क्रिया लगातार होनी चाहिए।
  3. उपभोक्ता की मानसिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
  4. उपभोग निश्चित इकाई में किया जाना चाहिए।
  5. आय, आदत, रुचि, फैशन आदि में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 7.
सामूहिक माँग की अवधारणा को उचित चित्र द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामूहिक माँग (Aggregate Demand)- एक अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की सम्पूर्ण माँग को ही सामूहिक माँग कहा जाता है और यह अर्थव्यवस्था के कुल व्यय के रूप में व्यक्त की जाती है। इस प्रकार, एक अर्थव्यवस्था में वस्तुओं एवं सेवाओं पर किये गये कुल व्यय के संदर्भ में सामूहिक माँग की माप की जाती है।

दूसरे शब्दों में, सामूहिक माँग, उस कुल व्यय को बताती है जिसे एक देश के निवासी, आय के दिए हुए स्तर पर, वस्तुओं तथा सेवाओं को खरीदने के लिए खर्च करने को तैयार हैं।
सामूहिक मॉग = उपभोग व्यय + निवेश व्यय
AD = C + I
उपभोग अनुसूची एवं निवेश अनुसूची का योग करके सामूहिक माँग अनुसूची का निर्माण किया जाता है।
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 2, 7
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 2, 8
उपर्युक्त तालिका बताती है कि

‘शून्य आय स्तर पर भी उपभोग माँग शून्य न होकर एक न्यूनतम स्तर पर बनी रहती है’ क्योंकि व्यक्ति को जीवित रहने के लिए अनिवार्य वस्तुओं (भोजन आदि) के लिए उपभोग करना आवश्यक होता है-यह व्यय व्यक्ति या तो अपनी पूर्व बचतों से करता है या फिर दूसरों से उधार लेता है।

उपर्युक्त तालिका के आधार पर प्राप्त होने वाला सामूहिक माँग वक्र चित्र में प्रदर्शित किया गया है।

प्रश्न 8.
परिवर्तनशील अनुपात के नियम की व्याख्या करें।
उत्तर:
घटते-बढ़ते अनुपात के नियम के अनुसार जब एक या एक से अधिक साधनों को स्थिर रखा जाता है तो उत्पादक के परिवर्तनशील साधनों के अनुपात में वृद्धि करने से उत्पादन पहले बढ़ते हुए अनुपात में बढ़ता है, फिर समान अनुपात में तथा इसके बाद घटते हुए अनुपात में बढ़ता है। श्रीमती जॉन रॉबिन्सन के अनुसार, “उत्पत्ति ह्रास नियम यह बताता है कि यदि किसी एक उत्पत्ति के साधन की मात्रा को स्थिर रखा जाय तथा अन्य साधनों की मात्रा में उत्तरोत्तर वृद्धि की जाय तो एक निश्चित बिन्दु के बाद उत्पादन में घटती दर से वृद्धि होती है।”

इस नियम के अनुसार उत्पादन की तीन अवस्थाएँ हैं-
पहली अवस्था- सीमान्त उत्पादन अधिकतम होने के बाद घटना आरम्भ हो जाता है। औसत उणदन अधिकतम हो जाता है तथा कुल उत्पादन बढ़ता है।

दूसरी अवस्था- औसत उत्पादन घटने लगता है और कुल उत्पादन घटती दर से बढ़ता है तथा अधिकतम बिन्दु पर पहुँचता है तब सीमान्त उत्पादन शून्य हो जाता है।

तीसरी अवस्था- औसत उत्पादन घटना जारी रहता है तथा कुल उत्पादन कम होने लगता है तब सीमान्त उत्पादन ऋणात्मक हो जाता है।

प्रश्न 9.
कृषि के संदर्भ में उत्पत्ति ह्रास नियम की व्याख्या करें।
उत्तर:
उत्पत्ति ह्रास नियम हमारे साधारण जीवन के अनुभवों पर आधारित है। सर्वप्रथम इस प्रवृत्ति का अनुभव स्कॉटलैण्ड के एक किसान ने किया था, किन्तु वैज्ञानिक रूप में इसके प्रतिपादन का श्रेय टरगोट को है। यह नियम मुख्यतः कृषि में ही क्रियाशील होता है। कृषि के क्षेत्र में इस नियम की व्याख्या इस प्रकार से की जा सकती है-

जब उपज बढ़ाने के लिए भूमि के एक निश्चित टुकड़े पर कोई किसान पूँजी एवं श्रम की मात्रा को बढ़ाता है तो प्रायः यह देखा जाता है कि उपज में उससे कम ही अनुपात में वृद्धि होती है। अर्थशास्त्र में इसी प्रवृत्ति को क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम कहते हैं। प्रत्येक किसान अनुभव के आधार पर इस बात को जानता है कि एक सीमा के बाद भूमि की एक निश्चित मात्रा पर अधिक श्रम एवं पूँजी लगाने से उपज घटते हुए अनुपात में बढ़ती है। यदि ऐसा नहीं होता तो आज विश्व में खाद्यान्न के अभाव की समस्या ही उपस्थित नहीं होती तथा एक हेक्टर भूमि में खेती करके ही सम्पूर्ण विश्व को सुगमतापूर्वक खिलाया जा सकता था। किन्तु बात ऐसी नहीं है। इस प्रकार प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री उत्पत्ति ह्रास नियम को कृषि से संबंधित करते थे। इन लोगों के अनुसार भूमि की पूर्ति सीमित है। अतः जनसंख्या में वृद्धि के कारण एक सीमित भूमि पर अधिक लोगों के काम करने से उपज में घटती हुई दर से वृद्धि होगी।

मार्शल ने कृषि के संबंध में इस नियम की व्याख्या इस प्रकार से की है, “यदि कृषि कला में साथ-ही-साथ कोई उत्पत्ति नहीं हो, तो भूमि पर उपयोग की जाने वाली पूँजी एवं श्रम की मात्रा में वृद्धि से कुल उपज में साधारणतया अनुपात से कम ही वृद्धि होती है।” इस प्रकार मार्शल के अनुसार एक निश्चित भूमि के टुकड़े पर ज्यों-ज्यों श्रम एवं पूँजी की इकाइयों में वृद्धि की जाती है, त्यों-त्यों उपज घटते हुए अनुपात में बढ़ती है, यानी सीमान्त उपज में क्रमशः ह्रास होते जाता है। इसे निम्न तालिका द्वारा भी दर्शाया जा सकता है-
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 2, 9
इस तालिका से स्पष्ट होता है कि श्रम एवं पूँजी की पहली इकाई लगाने से उस भूमि पर 20 क्विंटल उपज होती है, दूसरी इकाई के प्रयोग से कुल उपज 35 क्विंटल होती है लेकिन सीमान्त उपज 15 क्विंटल होती है। तीसरी इकाई के प्रयोग से कुल उपज 45 क्विंटल होती है तथा सीमान्त उपज 10 क्विंटल होती है। चौथी इकाई के प्रयोग से कुल उपज 50 क्विंटल तथा सीमान्त उपज 5 क्विंटल होती है। अतः स्पष्ट है कि किसान ज्यों-ज्यों एक निश्चित भूमि के टुकड़े पर श्रम एवं पूँजी की इकाइयों को बढ़ाता है, त्यों-त्यों कुल उपज में वृद्धि अवश्य होती है, किन्तु उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात में श्रम एवं पूँजी में वृद्धि की जाती है। दूसरे शब्दों में, श्रम एवं पूँजी की अतिरिक्त इकाइयों के प्रयोग के परिणामस्वरूप उपज में घटते हुए अनुपात में वृद्धि होती है।

प्रश्न 10.
केन्द्रीय बैंक के मुख्य कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर:
रिजर्व बैंक के कार्य (Functions of R.B.I.)- रिजर्व बैंक के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 2, 10

(i) नोट निर्गमन का एकाधिकार- भारत में एक रुपये के नोट और सिक्कों के अलावा सभी करेन्सी नोटों को छापने का एकाधिकार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को है। नोटों की डिजाइन केन्द्रीय सरकार द्वारा तय तथा स्वीकृत की जाती है। 115 करोड़ रुपये का सोना और 85 करोड़ रुपये की विदेशी प्रतिभूतियाँ रखकर रिजर्व बैंक आवश्यकतानुसार नोटों का निर्गमन कर सकता है।

(ii) सरकार का बैंकर- रिजर्व बैंक जम्मू तथा कश्मीर को छोड़कर शेष सभी राज्यों और केन्द्रीय सरकार के बैंकर के रूप में कार्य करता है। यह सार्वजनिक ऋणों का प्रबंध करता है तथा नये ऋणों को जारी करता है। सरकार के ट्रेजरी बिलों की बिक्री करता है। सरकार को आर्थिक मामलों में सलाह देने का कार्य करता है।

(iii) बैंकों का बैंक- रिजर्व बैंक को व्यापार, उद्योग, वाणिज्य और कृषि की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयुक्त बैंकिंग प्रणाली का विकास करना पड़ता है। रिजर्व बैंक को वाणिज्य बैंकों और सरकारी बैंकों के निरीक्षण की शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। संकट के समय रिजर्व बैंक व्यापारिक बैंकों को सहायता करता है।

(iv) विदेशी विनिमय कोषों का रक्षक- रिजर्व बैंक का एक महत्त्वपूर्ण कार्य रुपये के बाहरी मूल्य को कायम रखना है। देश में आर्थिक स्थिरता को बनाये रखने के लिए उचित मौद्रिक नीति को अपनाता है।

(v) साख का नियंत्रण-रिजर्व बैंक साख- नियंत्रण के परिमाणात्मक और चयनात्मक उपाय अपनाकर देश में साख की पूर्ति को नियंत्रित करता है, जिससे वाणिज्य, कृषि, उद्योग और व्यापार की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।

(vi) विकासात्मक कार्य- रिजर्व बैंक ने भारत में बैंकिंग व्यवस्था का विकास करने, बचत और निवेश को प्रोत्साहित करने और औद्योगिक विकास के लिए विभिन्न संस्थाओं की स्थापना करने का कार्य किया है। पूँजी बाजार को विकसित करने तथा सरकारी आन्दोलन को मजबूत बनाने का कार्य रिजर्व बैंक द्वारा ही किया गया है।

प्रश्न 11.
व्यावसायिक बैंक की परिभाषा दीजिए और इसके प्रमुख कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर:
व्यापारिक बैंक वे बैंक है, जो लाभ कमाने के उद्देश्य से बैंकिंग का कार्य करते हैं। कलर्वस्टन के अनुसार व्यापारिक बैंक वे संस्थाएँ हैं जो व्यापार को अल्पकाल के लिए ऋण देती हैं तथा इस प्रक्रिया में मुद्रा का निर्माण करती हैं।

व्यावसायिक बैंक के प्रमुख कार्य निम्नांकित हैं जिन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया गया है-

  • मुख्य कार्य
  • गौण कार्य
  • विकासात्मक कार्य।

मुख्य कार्य- बैंक के तीन प्रमुख कार्य हैं-

  • जमा स्वीकार करना- एक व्यापारिक बैंक जनता के धन को जमा करता है।
  • ऋण देना- बैंक के अपने पास जो रुपया जमा के रूप में आता है उसमें से एक निश्चित राशि नगद कोष में रखकर बाकी रुपया बैंक द्वारा उधार दे दिया जाता है।
  • विनिमय पत्रों की कटौती करना- इसके अंतर्गत बैंक अपने ग्राहकों को उनके विनिमय पत्रों के आधार पर रुपया उधार देता है। भुगतान के बांकी समय की ब्याज की कटौती करके बैंक तत्काल भुगतान कर देता है।

गौण कार्य- बैंक अपने ग्राहकों के लिए विभिन्न तरीकों के एजेंट का कार्य करता है।

  • चेक, ड्राफ्ट आदि का एकत्रीकरण और भुगतान।
  • प्रतिभूतियों की खरीद तथा बिक्री।
  • बैंक अपने ग्राहकों के आदेश पर उनकी सम्पत्ति के ट्रस्टी तथा प्रबंधक का कार्य भी करते हैं। साथ ही बैंक लॉकर की सुविधा यात्री चेक तथा साख प्रमाण पत्र, मर्चेन्ट बैंकिंग और वस्तुओं के वहन में सहायक प्रदान करता है।

विकासात्मक कार्य- आर्थिक विकास तथा सामाजिक कल्याण के लिए निम्नांकित कार्य करते हैं-
लोगों की निष्क्रीय बचतों को इकट्ठा करके उन्हें उत्पादकीय कार्यों में निवेश करके पूँजी निर्माण को बढ़ाने में सहायक होते हैं। बैंक उद्यमियों को साख प्रदान करके जब प्रवर्तक को प्रोत्साहित करता है, साथ ही केन्द्रीय बैंक की मौद्रिक नीति को प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करने में सहायक करते हैं।

प्रश्न 12.
भुगतान शेष में असंतुलन के कारण कौन-कौन हैं ?
उत्तर:
भुगतान शेष में असंतुलन उत्पन्न होने के कारण निम्नलिखित हैं-

  • प्राकृतिक प्रकोप- प्राकृतिक प्रकोप (अंकाल, बाढ़, भूकम्प आदि) के कारण भुगतान शेष में असंतुलन उत्पन्न होता है, क्योंकि इन दश’ में अर्थव्यवस्था आयतों पर आश्रित हो जाती है।
  • विकास व्यय- विकास व्यय अधिक होने से भुगतान संतुलन में घाटा उत्पन्न हो जाता है।
  • व्यापार चक्र- व्यावसायिक क्रियाओं में होने वाले उतार-चढ़ाव का प्रतिकूल प्रभाव निर्यात पर पड़ता है। फलतः भुगतान संतुलन असंतुलित हो जाता है।
  • बढ़ती कीमतें- कीमतों में वृद्धि के कारण भी भुगतान संतुलन में घाटा उत्पन्न होता है।
  • आयात प्रतिस्थापन्न- इसके चलते आयातों में कमी होती है। अतः भुगतान संतुलन में घाटा कम हो जाता है।
  • अधिक सुरक्षा व्यय- देश की सुरक्षा का व्यय अधिक होने पर भुगतान संतुलन असंतुलित हो जाता है।
  • राजनीतिक अस्थिरता- देश में जब राजनीतिक अस्थिरता रहती है तो इसका भुगतान संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध- देश का अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध कैसा है इस पर भुगतान संतुलन निर्भर करता है। यदि अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध तनावपूर्ण होता है या युद्धमय होता है तो भुगतान संतुलन असंतुलित रहता है।
  • दूतावासों का विस्तार- दूतावासों के विस्तार और उसके रख-रखाव पर जब अधिक खर्च होता है तो भुगतान संतुलन असंतुलित हो जाता है।
  • रुचि, फैशन तथा स्वभाव में परिवर्तन- जब व्यक्तियों की रुचि फैशन तथा स्वभाव परिवर्तित होता है तो यह भुगतान संतुलन को असंतुलित करता है।

प्रश्न 13.
व्यावसायिक बैंक से आप क्या समझते हैं ? इसके साख निर्माण की सीमाएँ क्या हैं ?
उत्तर:
व्यावसायिक बैंक से अभिप्राय उस बैंक से है जो लाभ कमाने के उद्देश्य से बैंकिंग कार्य करता है, व्यापारिक जमाएँ स्वीकार करता है तथा जनता को उधार देकर साख का सृजन करता है।

सीमाएँ- व्यावसायिक बैंक द्वारा किये जाने वाले साख निर्माण की सीमाएँ निम्नलिखित हैं-

  • देश में मुद्रा की मात्रा- देश में नकद मुद्रा की मात्रा जितनी अधिक होगी, बैंकों के पास नकद जमाएँ उतनी ही अधिक होगी और बैंक उतनी ही अधिक मात्रा में साख निर्माण कर सकेगा।
  • मुद्रा की तरलता पसंदगी- व्यक्ति जब अपने पास अधिक नकदी रखता है तो बैंक में जमाएँ घटती हैं और साख निर्माण का आकार घट जाता है।
  • बैंकिंग आदतें- व्यक्ति में बैंकिंग आदत जितनी अधिक होती है, बैंकों की साख निर्माण शक्ति उतनी ही अधिक होती है। इसके विपरीत स्थिति में साख का निर्माण कम होगा।
  • जमाओं पर नकद कोष अनुपात- यदि नकद कोष अनुपात अधिक है तो कम साख का निर्माण होगा और यदि नकद कोष अनुपात कम है तो अधिक साख का निर्माण होगा।
  • ब्याज दर- ब्याज दर ऊँची रहने पर साख की मात्रा कम हो जाती है और कम ब्याज दर साख की माँग को प्रोत्साहित करती है।
  • रक्षित कोष- यदि रक्षित कोष अधिक होता है तो बैंक के नकद साधन कम हो जाते हैं और वह कम साख निर्माण करता है। इसके विपरीत रक्षित कोष कम होने पर उसकी साख निर्माण की शक्ति बढ़ जाती है।
  • केन्द्रीय बैंक की साख सम्बन्धी नीति- केन्द्रीय बैंक की साख नीति पर भी साख निर्माण की मात्रा निर्भर करती है। कारण यह है कि केन्द्रीय बैंक के पास देश में मुद्रा की मात्रा को प्रभावित करने की शक्ति होती है और वह बैंकों की साख के संकुचन और विस्तार की शक्ति को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित कर सकता है।

प्रश्न 14.
केन्द्रीय बैंक के मौद्रिक उपाय से आप क्या समझते हैं ? न्यून माँग को ठीक करने के लिए मौद्रिक उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:
रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया भारत का केन्द्रीय बैंक है। देश की आर्थिक व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए तथा उस पर नियंत्रण करने के लिए इसे निम्नलिखित अधिकार प्राप्त है-

1. मुद्रा निर्गमन का अधिकार- केवल रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया को ही भारत में मुद्रा जारी करने का अधिकार है। एक रुपये का नोट सिर्फ भारत सरकार जारी करती है। शेष सभी प्रकार के नोटों को जारी करने तथा सिक्कों की ढलाई का काम रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया का है।

2. सरकार का बैंकर- यह केन्द्र एवं सभी राज्य सरकारों का बैंकर है। सभी सरकारी चालू खाते का नकद कोष इसी के पास जमा होता है।

3. बैंकों का बैंक तथा पर्यवेक्षक- यह बैंकों का बैंक है। सभी बैंकों के नकद कोषों के एक अंश को अपने पास सुरक्षित रखता है। साथ ही यह सभी बैंकों का पर्यवेक्षक भी है।

4. मुद्रा की आपूर्ति तथा साख का नियंत्रण- यह देश में मुद्रा की आपूर्ति और साख की आपूर्ति को नियंत्रित करता है। इसके लिए यह मौद्रिक नीति की रचना करता है।

न्यून माँग को ठीक करने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया निम्नलिखित मौद्रिक उपायों का सहारा लेता है-

  • बैंक दर नीति- बैंक को उधार देने के लिए ब्याज पर नियंत्रण करना। इसके द्वारा न्यून माँग को संतुलित करने का प्रयास करता है। इसके लिए समुचित मौद्रिक उपायों को लागू करता है।
  • खुले बाजार की क्रियाएँ – सरकारी प्रतिभूतियों को व्यापारिक बैंक के साथ क्रय-विक्रय करने का कार्य संपादित करता है। इस प्रकार यह व्यापार असंतुलन को नियंत्रित करता है।
  • सुरक्षित कोष अनुपात में परिवर्तन- सुरक्षित कोष अनुपात दो प्रकार के होते हैं-नकद जमा अनुपात तथा संवैधानिक तरलता अनुपात। रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया न्यून माँग को ठीक करने के लिए नकद जमा अनुपात तथा संवैधानिक तरलता अनुपात पर निरंतर निगरानी रखता है और तदनुसार नियमित रूप से समुचित परिवर्तन करता रहता है।

प्रश्न 15.
पूर्ण प्रतियोगिता में मूल्य निर्धारण कैसे होता है ?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु का मूल्य निर्धारण माँग द्वारा होता है या पूर्ति द्वारा, इस प्रश्न को लेकर प्राचीन अर्थशास्त्रियों में विवाद था। इस विवाद का समाधान प्रो० मार्शल ने किया। प्रो. मार्शल के अनुसार, “वस्तु का मूल्य माँग एवं पूर्ति दोनों के द्वारा निर्धारित होता है।” अपने विचार के समर्थन में मार्शल ने कैंची का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, जिस प्रकार कैंची के दोनों फलक कागज को काटने के लिए आवश्यक हैं उसी प्रकार वस्तु की कीमत निर्धारित करने के लिए माँग पक्ष एवं पूर्ति पक्ष दोनों आवश्यक है। इस प्रकार संतुलित की मत वहाँ निर्धारित होती है जहाँ माँग = पूर्ति।

निम्न उदाहरण से भी यह ज्ञात हो जाता है-
Bihar Board 12th Economics Important Questions Long Answer Type Part 2, 11

उपर्युक्त उदाहरण से यह स्पष्ट है कि जब मूल्य 15 रु० प्रति इकाई है तो माँग एवं पूर्ति दोनों 30 के बराबर है। अतः यहीं पर मूल्य का निर्धारण होगा और मूल्य 15 रु० प्रति इकाई होगा। बगल के रेखाचित्र से भी यह ज्ञात हो जाता है।

इस रेखाचित्र में P बिन्दु पर माँग एवं पूर्ति की रेखा एक-दूसरे को काटती है। अत: यही बिन्दु साम्य बिन्दु तथा OM कीमत साम्य कीमत कहा जायेगा। साथ ही, इस OM कीमत पर OR मात्रा वस्तुओं का उत्पादन। इस तरह पूर्ण प्रतियोगिता माँग एवं पूर्ति की मात्रा में माँग एवं पूर्ति द्वारा मूल्य निर्धारण होता है।
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प्रश्न 16.
सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम इस तथ्य की विवेचना करता है कि जैसे-जैसे उपभोक्ता किसी वस्तु की अगली इकाई का उपभोग करता है अन्य बातें समान रहने पर उसे प्राप्त होने वाली सीमान्त उपयोगिता क्रमशः घटती जाती है। एक बिन्दु पर पहुँचने पर यह शून्य हो जाती है। यदि उपभोक्ता इसके पश्चात भी वस्तु का सेवन जारी रखता है तो यह ऋणात्मक हो जाती है। निम्न उदाहरण से भी इस बात का स्पष्टीकरण हो जाता है-

वस्तु की मात्राप्राप्त सीमान्त उपयोगिता
110
28
36
44
50
6-4

इस उदाहरण से यह स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की मात्रा एक से बढ़कर 6 तक पहुँच जाती है। वैसे-वैसे उससे प्राप्त सीमान्त उपयोगिता भी 10 से घटते-घटते शून्य और ऋणात्मक यानी-4 तक हो जाती है। अतः स्पष्ट है कि वस्तु की मात्रा में वृद्धि होते रहने से उससे मिलने वाली सीमान्त उपयोगिता घटती जाती है।

आलोचकों के इस नियम के अपवादों का भी उल्लेख किया है जो निम्नलिखित हैं-

  • मादक एवं नशीली वस्तुओं के सेवन में यह नियम लागू नहीं होता है, क्योंकि इसका लोग अधिकाधिक मात्रा में सेवन करने लगते हैं।
  • अर्थलिप्या एवं प्रदर्शन प्रियता की इच्छा भी बढ़ती जाती है जहाँ यह नियम लागू नहीं होता है।
  • अच्छी कविता या संगीत के साथ यह नियम लागू नहीं होता है, क्योंकि इनके सुनने की इच्छा बढ़ती जाती है।
  • पूरक वस्तुएँ भी इसके अपवाद हैं, क्योंकि एक वस्तु की उपयोगिता पूरक वस्तुओं के चलते बढ़ जाती है।
  • विचित्र एवं दुर्लभ वस्तुओं के संग्रह के साथ भी यह लागू नहीं होता है, क्योंकि लोग अधिकाधिक मात्रा में इनका संग्रह करने लग जाते हैं।

प्रश्न 17.
सरकारी बजट क्या है ? इसके उद्देश्यों की चर्चा करें।
उत्तर:
आगामी आर्थिक वर्ष के लिए सरकार के सभी प्रत्याशित राजस्व और व्यय का अनुमानित वार्षिक विवरण बजट कहलाता है। सरकार कई प्रकार की नीतियाँ बनाती है। इन नीतियों को लागू करने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। सरकार आय और व्यय के बारे में पहले से ही अनुमान लगाती है। अतः बजट आय और व्यय का अनुमान है। सरकारी नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है।

बजट के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  • सरकार को अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए वित्तीय व्यवस्था करनी पड़ती है।
  • सरकार सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक सहायता, सार्वजनिक निर्माण कार्यों पर व्यय करके अर्थव्यवस्था में धन और आय के पुनर्वितरण की व्यवस्था करती है।
  • बजट के माध्यम से सरकार कीमतों में उतार-चढ़ाव को रोकने का प्रयास करती है। रोजगार के अधिक अवसर उत्पन्न करने और कीमत स्थिरता के लिए प्रयत्न करने में बजट महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • सरकार महत्त्वपूर्णउद्यमों का संचालन सार्वजनिक क्षेत्र में करती है। विद्युत उत्पादन, रेलवे आदि ऐसे ही उद्यम है। यदि इन्हें अनियंत्रित रखा जाय तो ये एकाधिकारी उद्यम में परिवर्तित हो सकते हैं। अधिकतम लाभ की आशा में उत्पादन में कमी कर सकते हैं, इससे सामाजिक कल्याण में कमी आ सकती है।
  • बजट अर्थव्यवस्था में राजकोषीय अनुशासन उत्पन्न करता है। व्यय के ऊपर पर्याप्त नियंत्रण करता है। संसाधनों को सामाजिक प्राथमिकताओं के अनुसार उपयोग में लाने में सहायता मिलती है। साथ ही सेवाओं की उपलब्धता प्रभावपूर्ण और कुशल तरीके से उपलब्ध कराने में बजट महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 18.
सरकारी बजट किसे कहते हैं ? इसकी क्या-क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर:
आगामी आर्थिक वर्ष के लिए सरकार के सभी प्रत्याशित राजस्व और व्यय का अनुमानित वार्षिक विवरण बजट कहलाता है। सरकार कई प्रकार की नीतियाँ बनाती है। इन नीतियों को लागू करने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। सरकार आय और व्यय के बारे में पहले से ही अनुमान लगाती है। अतः बजट आय और व्यय का अनुमान है। सरकारी नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है।

बजट की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  • एक नियोजित अर्थव्यवस्था में बजट राष्ट्रीय नियोजन के वृहत उद्देश्यों पर आधारित होता है।
  • नियोजन के आरंभिक काल में देश के आर्थिक विकास को ध्यान में रखकर प्रायः घाटे का बजट बनाया जाता है तथा बाद में बजट को धीरे-धीरे संतुलित करने का प्रयास किया जाता है।
  • नियोजित अर्थव्यवस्था में बजट का निर्माण इस तरह किया जाता है कि बजट का प्रभाव अधिकाधिक न्यायपूर्ण हो। इसके लिए प्रगतिशील की नीति अपनायी जाती है।
  • देश के आर्थिक क्रियाओं के निष्पादन में बजट की भूमिका सकारात्मक होती है।

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प्रश्न 1.
बाजार मूल्यं क्या है ?
उत्तर:
किसी समय विशेष पर वस्तु का बाजार में प्रचलित मूल्य की बाजार मूल्य कहलाता है। इसका निर्धारण माँग एवं पूर्ति की शक्तियों के बीच अस्थायी साम्य द्वारा होता है। बाजार मूल्य को अति अल्पकालीन मूल्य भी कहा जाता है। यह मूल्य न केवल दिन-प्रतिदिन मूल्य बदलता है बल्कि एक ही दिन में कई बार भी बदल सकता है।

प्रश्न 2.
उत्पादन फलन क्या है ?
उत्तर:
उत्पादन की आगतों तथा अंतिम उत्पाद के बीच तकनीकी फलनात्मक संबंध को उत्पादन फलन कहते हैं। उत्पादन फलन यह बताता है कि एक निश्चित समय में आगतों में परिवर्तन से उत्पादन में कितना परिवर्तन होता है। यह आगतों तथा उत्पादन के भौतिक मात्रात्मक संबंध को बताता है। इसमें मल्य शामिल नहीं होता है।

उत्पादन फलन Q = f (LK)
L= उत्पत्ति के साधन (श्रम)
K = उत्पत्ति के साधन (पूँजी)
Q= उत्पादन की भौतिक मात्रा

प्रश्न 3.
माँग की कीमत लोच की परिभाषा दें।
उत्तर:
माँग की लोच की धारणा यह बताती है कि कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप किसी वस्तु की माँग में किस गति या दर से परिवर्तन होता है। यह वस्तु की कीमत में परिवर्तन के प्रति माँग की प्रतिक्रिया या संवेदनशीलता को दर्शाती है।

माँग की कीमत लोच कीमत होने वाले आनुपातिक परिवर्तन तथा माँग में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात है।
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प्रश्न 4.
पूरक वस्तु और स्थानापन्न वस्तु में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
पूरक वस्तु तथा स्थानापन्न वस्तु में निम्नलिखित अंतर हैं-
पूरक वस्तु:

  1. पूरक वस्तुएँ वे वस्तु हैं जिनका प्रयोग किसी आवश्यकता विशेष को संतुष्ट करने के लिए एक साथ किया जाता है। कार और पेट्रोल पूरक वस्तुएँ हैं।
  2. पूरक वस्तुओं की स्थिति में एक वस्तु की कीमत में वृद्धि होने से दूसरी वस्तु (पूरक वस्तु) की माँग कम हो जाती है और एक वस्तु की कीमत में कमी होने से पूरक वस्तु की माँग बढ़ जाती है।

स्थानापन्न वस्तु:

  1. स्थानापन्न वस्तुएँ वे वस्तुएँ हैं जिनका एक दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। चाय और कॉफी स्थानापन्न वस्तुएँ हैं।
  2. स्थानापन्न वस्तुओं की स्थिति एवं वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर दूसरी वस्तु (स्थानापन्न वस्तु) की माँग बढ़ जाती है। इसके विपरीत एक वस्तु कीमत में कमी से प्रतिस्थानापन्न .. वस्तु की माँग कम हो जाती है।

प्रश्न 5.
सरकारी बजट के किन्हीं दो उद्देश्यों को समझाइए।
उत्तर:

  1. बजट के माध्यम से सरकार कीमतों में उतार-चढ़ाव को रोकने का प्रयास करती है। रोजगार के अधिक अवसर उत्पन्न करने और कीमत स्थिरता के लिए प्रयत्न करने में बजट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  2. सरकार सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक सहायता, सार्वजनिक निर्माण कार्यों पर व्यय करके अर्थव्यवस्था में धन और आय के पुनर्वितरण की व्यवस्था करती है।

प्रश्न 6.
सीमान्त उपयोगिता और कुल उपयोगिता से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
सीमान्त उपयोगिता- किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग करने से कुल उपयोगिता में जो वृद्धि होती है उसे सीमान्त उपयोगिता कहते हैं। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि किसी वस्तु की अन्तिम इकाई से प्राप्त होने वाली उपयोगिता सीमान्त उपयोगिता कहलाती है।

कुल उपयोगिता- किसी निश्चित समय में कुल इकाइयों के उपभोग से प्राप्त उपयोगिता कुल उपयोगिता होती है। कुल उपयोगिता की गणना करने के लिए सीमान्त उपयोगिताओं को जोड़ा जाता है।

प्रश्न 7.
घाटे का बजट क्या है ?
उत्तर:
घाटे का बजट उस बजट को कहा जाता है जिसमें देश का अनुमानित आय अनुमानित व्यय से कम होता है।

प्रश्न 8.
मुद्रा के प्राथमिक कार्य समझाइए।
उत्तर:
मुद्रा के मुख्य कार्य निम्नलिखित है-

  1. यह विनिमय का माध्यम है। सभी वस्तुएँ और सेवाएँ मुद्रा के माध्यम से खरीदी और बेची जाती है।
  2. यह सभी वस्तुओं और सेवाओं का मूल्यांकन करता है।
  3. इसके प्रयोग द्वारा मूल्य संचय का कार्य सरल और सुविधा पूर्ण हो गया है।
  4. यह क्रयशक्ति के हस्तांतरण का सर्वोत्तम साधन है।

प्रश्न 9.
ऐच्छिक एवं अनैच्छिक बेरोजगारी में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बेरोजगारी की वह दशा, जब प्रचलित वेतन दर पर कार्य करने को व्यक्ति तैयार नहीं होते, ऐच्छिक बेरोजगारी कहलाती है।

बेरोजगारी की वह दशा, जब प्रचलित दर पर कार्य करने के लिए तैयार व्यक्तियों को कार्य नहीं मिलता, अनैच्छिक बेरोजगारी कहलाती है।

प्रश्न 10.
माँग वक्र नीचे क्यों गिरता है ?
उत्तर:
माँग वक्र का ढाल ऋणात्मक होता है, अर्थात् यह वक्र बायें से दायें नीचे गिरता है। इसका अर्थ है कि कीमत कम होने पर अधिक वस्तुएँ खरीदी जाती है और कीमत अधिक होने पर कम वस्तुएँ खरीदी जाती है। माँग वक्र की ढलान ऋणात्मक होने के निम्नलिखित कारण हैं-

  1. घटती सीमांत उपयोगिता का नियम- उपभोक्ता वस्तु की सीमांत उपयोगिता को दिये गये मूल्य के बराबर करने के लिए कम कीमत होने पर अधिक क्रय करता है। P= mu
  2. प्रतिस्थापन्न प्रभाव- मूल्य कम होने पर उपभोक्ता अपेक्षाकृत महँगी वस्तु के स्थान पर सस्ती वस्तु का प्रतिस्थापन्न करता है।
  3. आय प्रभाव- मूल्य में कमी के फलस्वरूप उपभोक आय वृद्धि की स्थिति को महसूस करता है और क्रय बढ़ा देता है।
  4. नये उपभोक्ताओं का उदय।

प्रश्न 11.
भुगतान शेष के संघटकों को बताइए।
उत्तर:
भुगतान शेष के चार संघटक हैं-

  • व्यापार शेष = निर्यात – आयात
  • चालू खाते का शेष = व्यापार शेष + निवल अदृश्य मदें
  • पूँजी खाते का शेष या पूँजी खाते का योग = विदेशी निवेश (निवल + विदेशी ऋण (निवल) + बैंकिंग (निवल) + रुपये ऋण सेवा + अन्य पूँजी (निवल) + भूल-चूक
  • समग्र शेष = चालू खाता – शेष + पूँजी खाता – शेष

प्रश्न 12.
स्फीतिक अंतराल और अवस्फीतिक अंतराल में क्या अंतर है ?
उत्तर:
वह स्थिति जिसमें अर्थव्यवस्था में उत्पादन में वृद्धि नहीं होती केवल कीमतों में वृद्धि होती है तो उसे स्फीतिक अंतराल कहा जाता है। इसके विपरीत अवस्फीतिक अंतराल वह स्थिति है जब कुल पूर्ति कुल मान से अधिक होती है। इसमें उत्पादन और रोजगार घटने लगता है तथा जनता की क्रय शक्ति घट जाती है।

प्रश्न 13.
अल्पकालीन औसत लागत ‘U’ आकार का क्यों होता है ?
उत्तर:
अल्पकाल में परिवर्तनशील अनुपात का नियम लागू होता है। आरंभ में बढ़ते प्रतिफल के कारण लागत घटती है, फिर स्थिर प्रतिफल की दशा में लागत स्थिर रहती है तथा क्रम में घटते प्रतिफल मिलने पर लागत बढ़ती है। इसी कारण उत्पादन का आकार बढ़ने पर पहले लागत घटती है फिर न्यूनतम होकर स्थिर होती है और अंत में बढ़ती है। इसी क्रम के कारण औसत लागत वक्र U आकार का हो जाता है।

प्रश्न 14.
पूर्ण प्रतियोगिता में किसी फर्म के माँग वक्र की प्रकृति क्या होगी ?
अथवा, पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत रेखा की क्या प्रकृति होती है ?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत रेखा क्षैतिज अर्थात् X-अक्ष के समांतर होती है। पूर्ण प्रतियोगिता में उद्योग कीमत का निर्धारण करता है। फर्म उस कीमत को स्वीकार करती है। दी हुई कीमत पर एक फर्म एक वस्तु की जितनी भी मात्रा बेचना चाहती है, बेच सकती है। पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत रेखा न केवल OX-अक्ष के समांतर होती है। अपितु औसत आगम तथा सीमांत आगम वक्र को भी ढकती है। कीमत रेखा को पूर्ण प्रतियोगिता फर्म का माँग वक्र भी कहा जाता है।

प्रश्न 15.
बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNPMP) और साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNPFC) में क्या अंतर है ?
उत्तर:
बाजार कीमतों पर शद्ध राष्ट्रीय उत्पाद- एक वित्तीय वर्ष में एक देश की घरेल सीमा में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग में से स्थायी पूँजी का उपभोग घटाने पर प्राप्त बाजार कीमतों को शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं।

साधन लागत पर शद्ध राष्टीय उत्पाद- एक वित्तीय वर्ष में एक देश की घरेलु सीमा में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग में शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाने पर प्राप्त साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं। अथवा साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद = बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय – शुद्ध अप्रत्यक्ष कर।

प्रश्न 16.
फर्म के अधिकतम लाभ की शर्ते क्या हैं ?
उत्तर:
फर्म के अधिकतम लाभ की शर्ते निम्नलिखित हैं-

  • सीमांत आगम तथा सीमांत लागत का संतुलन बिंदु पर आपस में बराबर होना चाहिए यानि MR = MC
  • सीमांत लागत बक्र सीमांत’ आगम रेखा को संतुलन बिंदु पर नीचे काटे।

प्रश्न 17.
व्यक्तिक आय क्या है ?
उत्तर:
व्यक्तिक आय उन समस्त आयों का योग होती है, जो किसी दिये हुए वर्ष के भीतर व्यक्तियों और परिवारों को वास्तविक रूप में प्राप्त होती है।

व्यक्तिक आय = राष्ट्रीय आय – सामाजिक सुरक्षा अंशदान – निगम आय कर – अवितरित निगम लाभ + हस्तांतरण भुगतान।
इससे हमें किसी देश में व्यक्तियों और परिवारों को सम्भाव्य क्रय शक्ति का आभास हो जाता है।

प्रश्न 18.
सकल राष्ट्रीय उत्पाद क्या है ?
उत्तर:
किसी देश के अंतर्गत एक वर्ष में जितनी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता है, उनके मौद्रिक मूल्य को कुल राष्ट्रीय उत्पाद कहा जाता है। इसे इस रूप में व्यक्त किया जाता है-

कुल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) = कुल घरेलू उत्पाद (GDP) + देशवासियों द्वारा विदेशों में अर्जित आय – विदेशियों द्वारा देश में अर्जित आय।

लेकिन कुल राष्ट्रीय उत्पाद में से घिसावट का व्यय घटा देने पर जो शेष बचता है उसे शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद कहा जाता है। इस प्रकार कुल राष्ट्रीय उत्पाद की धारणा एक विस्तृत धारणा है, जिसके अंतर्गत शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद आ जाता है।

प्रश्न 19.
‘पूर्ति अनुसूची’ एवं ‘पूर्ति वक्र’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
एक निश्चित अवधि में बाजार में विभिन्न कीमतों पर किसी वस्तु की विभिन्न मात्राएँ बेची जाती हैं। इसे यदि तालिका द्वारा दर्शाया जाता है तो उसे पूर्ति अनुसूची कहा जाता है।

परंतु जब विभिन्न कीमतों तथा उनपर बेची जाने वाली वस्तु की मात्रा को जब रेखाचित्र द्वारा दर्शाया जाता है तो उसे पूर्ति वक्र कहा जाता है।

प्रश्न 20.
पूर्ण प्रतियोगिता तथा एकाधिकार में किन्हीं दो अंतरों को लिखिए।
उत्तर:

  • पूर्ण प्रतियोगिता में फर्मों का प्रवेश तथा बहिर्गमन आसान होता है लेकिन एकाधिकार में फर्मों के प्रवेश पर प्रतिबंध होता है।
  • पूर्ण प्रतियोगिता में क्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान होता है लेकिन एकाधिकार में क्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है।

प्रश्न 21.
आय का चक्रीय प्रवाह क्या है ?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था के अनेक आर्थिक क्रियाकलाप होते हैं जिनमें उत्पादन, विनिमय और उपभोग मुख्य हैं। इन आर्थिक क्रियाकलापों के दौरान अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के बीच आदान-प्रदान होते रहता है जिसके कारण आय और व्यय चक्रीय रूप से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र के बीच प्रवाहित होते हैं। अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के बीच आय के चक्रीय रूप से प्रवाहित होने को ही आय का चक्रीय प्रवाह कहा जाता है।

प्रश्न 22.
व्यावसायिक बैंक की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
व्यावसायिक बैंक के निम्नलिखित विशेषताएं हैं-

  • व्यावसायिक बैंक लेन-देन मुद्रा के रूप में करता है।
  • यह जनता से जमा स्वीकार करता है।
  • लाभ अर्जन इसका उद्देश्य है।
  • साख निर्माण करने की योग्यता इसमें होती है।
  • इसकी प्रकृति पूर्ण रूप से व्यावसायिक होती है।
  • यह माँग जमा पैदा करती है और ये जमाएँ विनिमय माध्यम के रूप में प्रयोग की जाती है।

प्रश्न 23.
माँग की लोच से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
माँग की लोच की धारणा हमें मूल्य तथा माँग के परिवर्तन के निश्चित सम्बन्ध को बताती है। मेयर्स के अनुसार, “मूल्य में होने वाले किसी सापेक्षिक परिवर्तन से खरीदी जाने वाली मात्रा में जो सापेक्षिक परिवर्तन होता है, उसका माप ही माँग की लोच है।” अतः माँग की लोच वह दर है जिस पर मूल्य में परिवर्तन होने से माँग की मात्रा में परिवर्तन होता है।

प्रश्न 24.
एकाधिकार की परिभाषा दें।
उत्तर:
एकाधिकार बाजार की वह स्थिति है जिसमें किसी वस्तु का केवल एक ही विक्रेता होता है तथा उस वस्तु की कोई निकटतम प्रतिस्थापन्न वस्तु नहीं होती। इसलिए एकाधिकारी फर्म का वस्तु के उत्पादन और बिक्री पर पूरा नियंत्रण होता है तथा उसको किसी विक्रेता से प्रतियोगिता का सामना करना नहीं पड़ता।

प्रश्न 25.
बाजार को परिभाषित करें।
उत्तर:
अर्थशास्त्री बाजार का अर्थ किसी स्थान विशेष नहीं लगाते जहाँ वस्तुएँ खरीदी तथा बेची जाती हैं, बल्कि बाजार शब्द से उन सारे क्षेत्रों का बोध होता है, जिसमें क्रेता और विक्रेता का इस प्रकार का प्रतियोगितापूर्ण तथा स्वतंत्र सम्बन्ध होता है कि इस क्षेत्र में किसी वस्तु के मूल्य का ‘आसानी तथा शीघ्रता से समान होने की प्रवृत्ति पायी जाती है।

प्रश्न 26.
एकाधिकारिक प्रतियोगिता की परिभाषा दें।
उत्तर:
एकाधिकारिक प्रतियोगिता वह बाजार स्थिति है जिसमें वस्तु विशेष के अनेक विक्रेता होते हैं लेकिन प्रत्येक विक्रेता की वस्तु किसी भी अन्य विक्रेता की वस्तु से उपभोक्ता की दृष्टि में किसी-न-किसी प्रकार से भिन्न होती है।

प्रश्न 27.
आर्थिक क्रिया से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
आर्थिक क्रिया वह क्रिया है जिसका सम्बन्ध आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए सीमित साधनों के उपयोग से है। सभी आर्थिक क्रियाएँ अनिवार्य रूप से आय का सृजन नहीं करती हैं।

प्रश्न 28.
क्या उपयोगिता मापनीय है ?
उत्तर:
हाँ, उपयोगिता मापनीय है। इसका मापन उपभोग की संतुष्टि है। उदाहरणार्थ, एक प्यासे व्यक्ति को पहले ग्लास पानी की उपयोगिता अन्तिम ग्लास पानी की तुलना में अधिक होती है।

प्रश्न 29.
घटिया वस्तु के उदाहरण के साथ परिभाषित करें।
उत्तर:
घटिया वस्तुएँ वे हैं जिनकी माँग आय बढ़ने के साथ घट जाती है और आय घटने के साथ माँग बढ़ जाती है। घटिया वस्तुओं का आय प्रभाव ऋणात्मक होता है। मोटा अनाज, मोटा कपड़ा आदि घटिया वस्तुओं के उदाहरण हैं।

प्रश्न 30.
आय प्रभाव क्या है ?
उत्तर:
मौद्रिक आय समान रहने पर वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने से वास्तविक आय विपरीत दिशा में घटती या बढ़ती है। उदाहरण के लिए, कीमत में कमी से दी गई आय से अधिक मात्रा में वस्तु प्राप्त होती है। इसके विपरीत कीमत में वृद्धि से दी गई आय से कम मात्रा में वस्तु प्राप्त होती है। वास्तविक आय में इस परिवर्तन को आय प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 31.
प्रतिस्थापन प्रभाव किसे कहते हैं ?
उत्तर:
वस्तु की कीमत में परिवर्तन से इसके प्रतिस्थापन्न वस्तुओं के मुकाबले सस्ते या महँगे होने के कारण जो इसकी माँग में परिवर्तन आते हैं उसे प्रतिस्थापन प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 32.
समउत्पाद वक्र को समझावें।
उत्तर:
परिवर्तन साधन की एक अतिरिक्त इकाई उत्पादन के एक स्थिर साधन पर लगाने से कुल उत्पादन में जो वृद्धि होती है उसे सम उत्पाद कहा जाता है। सम उत्पाद वक्र धनात्मक होता है जो उत्पादन में वृद्धि को दर्शाता है।

प्रश्न 33.
सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति क्या है ?
उत्तर:
सीमान्त उपभोग की अवधारणा से यह ज्ञात होता है कि लोग अपनी बढ़ी हुई आय का कितना भाग उपभोग पर व्यय करते हैं। यह कुल उपभोग में परिवर्तन तथा कुल आय में परिवर्तन का अनुपात है। इसे निम्न सूत्र से ज्ञात किया जा सकता है-
\(\frac{\Delta \mathrm{C}}{\Delta y}\) यहाँ ΔC = उपभोग में परिवर्तन, Δy = आय में परिवर्तन

प्रश्न 34.
सरकारी बजट के महत्व की विवेचना करें।
उत्तर:
सरकारी बजट का महत्त्व निम्नलिखित बातों से स्पष्ट होता है-

  • आर्थिक विकास की गति को करना सरकार का महत्वपूर्ण कार्य है। इसके लिए अतिरिक्त साधनों की आवश्यकता होती है। अतिरिक्त संसाधनों की व्यवस्था बजट के माध्यम से की जाती है।
  • सरकार को प्रशासन चलाने हेत अनेक प्रकार की सामाजिक, आर्थिक तथा सामान्य सेवाओं की व्यवस्था करनी पड़ती है। इस पर भारी मात्रा में व्यय होता है, जिसकी व्यवस्था बजट द्वारा की जाती है।
  • आर्थिक पुनरुत्थान हेतु सरकार को अनेक राजकोषीय उपाय करने पड़ते हैं। जैसे-नये कर लगाना, सार्वजनिक एवं निजी निवेश बढ़ाना आदि। यह कार्य बजट में व्यवस्था कर की जाती है।
  • स्फीतिक एवं अवस्फीतिक दबाव से निपटने के लिए बजटीय उपायों का सहारा लेना पड़ता है।
  • यह धन और आय के वितरण में विषमता को कम करता है ताकि सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिल सके।

प्रश्न 35.
उपभोक्ता की बचत से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
उपभोक्ता की बचत की धारणा का श्रेय प्रो. ड्यूपिट को दिया गया है। परन्तु इसका वैज्ञानिक वर्णन प्रो० मार्शल ने किया है। इनके अनुसार, “देने को तैयार मूल्य में से वास्तव में दिये गये मूल्य को घटा देने पर जो शेष बचता है, वही उपभोक्ता की बचत कही जाती है।”

प्रश्न 36.
उपभोक्ता की बचत की मान्यताओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
उपभोक्ता की बचत निम्न मान्यताओं पर आधारित है-

  • उपयोगिता मापनीय है।
  • वस्तु विशेष का स्वतंत्र महत्व होता है।
  • मुद्रा की सीमान्त उपयोगिता स्थिर रहती है।
  • पूर्ण प्रतियोगिता एवं उपयोगिता ह्रास नियम का लागू होना।
  • स्थानापन्न वस्तुओं का अभाव पाया जाना।

प्रश्न 37.
व्यष्टि अर्थशास्त्र की अवधारणा को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध विशिष्ट या व्यक्तिगत आर्थिक चरों से है। दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र की इस शाखा से विशिष्ट आर्थिक इकाइयों या व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।

अर्थशास्त्र की व्यष्टि शाखा में उपभोक्ता सन्तुलन, उत्पादक सन्तुलन, साम्य कीमत निर्धारण, एक वस्तु की माँग, एक वस्तु की पूर्ति आदि विषयों का अध्ययन किया जाता है।

आर्थिक महामंदी से पूर्व अर्थशास्त्र के रूप में केवल व्यष्टि अर्थशास्त्र का ही अध्ययन किया जाता था। व्यष्टि अर्थशास्त्र को कीमत-सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 38.
व्यष्टि अर्थव्यवस्था की तीन विशेषताएँ बतलाइए।
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • व्यष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक समस्या का अध्ययन किया जाता है।
  • व्यष्टि अर्थशास्त्र में आर्थिक समस्याओं के निदान में कीमत संयंत्र अर्थात् माँग एवं पूर्ति बलों की क्रिया निर्णायक होती हैं।
  • व्यष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्ति एवं व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन होता है।

प्रश्न 39.
व्यष्टि अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र की परस्पर निर्भरता स्पष्ट करें।
उत्तर:
व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र की दो अलग-अलग शाखाएँ हैं। ये दोनों शाखाएँ परस्पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए एक वस्तु की कीमत निर्धारण व्यष्टि विश्लेषण के आधार पर किया जाता है और सामान्य कीमत का निर्धारण समष्टि विश्लेषण के द्वारा होता है। उद्योग में मजदूरी दर निर्धारण व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुद्रा है। सामान्य मजदूरी दर का निर्धारण समष्टि अर्थशास्त्र का विषय है। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र एक-दूसरे पर निर्भर शाखाएँ हैं।

प्रश्न 40.
व्यष्टि तथा समष्टि अर्थशास्त्र में अंतर स्पष्ट करें। अथवा, सूक्ष्म एवं वृहत अर्थशास्त्र में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
व्यष्टि तथा समष्टि अर्थशास्त्र में निम्नलिखित अंतर हैं-
व्यष्टि अर्थशास्त्र:

  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र के अन्तर्गत व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन किया जाता है।
  2. इसका विश्लेषण अपेक्षाकृत सरल होता है।
  3. इसका संबंध मूलत: कीमत विश्लेषण से है।
  4. इसके नियम मूलतः सीमान्त विश्लेषण पर आधारित होते हैं।

समष्टि अर्थशास्त्र:

  1. समष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का समग्र रूप से अध्ययन किया जाता है।
  2. इसका विश्लेषण बहुत ही कठिन होता है।
  3. इसका संबंध आय विश्लेषण से होता है।
  4. इसके नियम किसी एक पर आधारित न होकर अनेकों पर आधारित हैं।

प्रश्न 41.
समष्टि अर्थशास्त्र से आप क्या समझते हैं ? समष्टि अर्थशास्त्र के क्षेत्र का वर्णन करें। अथवा, समष्टि अर्थशास्त्र की अवधारणा संक्षेप में स्पष्ट करें।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र का संबंध सामूहिक या समराष्ट्रीय आर्थिक चरों से है। दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र की इस शाखा में सामूहिक या समष्टि आर्थिक चरों का अध्ययन किया जाता है।

अर्थशास्त्र की समष्टि शाखा में आय एवं रोजगार निर्धारण, पूँजी निर्माण, सार्वजनिक व्यय, सरकारी व्यय, सरकारी बजट, विदेशी व्यापार आदि विषयों का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र की इस शाखा का उदय आर्थिक महामंदी के बाद हुआ है। इस शाखा को आय एवं रोजगार सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न 42.
एक अर्थव्यवस्था की केन्द्रीय समस्यायें क्या हैं ?
अथवा, एक अर्थव्यवस्था की केन्द्रीय समस्याओं के नाम लिखें। ये समस्याएँ क्यों उत्पन्न होती हैं ?
उत्तर:
एक अर्थव्यवस्था की केन्द्रीय समस्याएँ (Central problems of an economy)-

  • क्या उत्पन्न किया जाए ?
  • कैसे उत्पन्न किया जाए और
  • किसके लिये उत्पन्न किया जाए।

केन्द्रीय समस्याओं के उत्पन्न होने के कारण (Causes of arising of economic problems)-

  • मनुष्य की आवश्यकताओं का असीमित होना।
  • असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सीमित साधनों का होना।
  • सीमित साधनों के वैकल्पिक प्रयोग होना।