Bihar Board 12th Hindi 100 Marks Objective Answers गद्य Chapter 7 ओ सदानीरा

Bihar Board 12th Hindi Objective Questions and Answers

Bihar Board 12th Hindi 100 Marks Objective Answers गद्य Chapter 7 ओ सदानीरा

O Sadanira Ka Objective Bihar Board 12th Hindi प्रश्न 1.
जगदीशचन्द्र माथुर का जन्म कब हुआ था ?
(A) 16 जुलाई 1917 को
(B) 16 जुलाई 1918 को
(C) 17 अगस्त 1919 को
(D) 20 सितम्बर 1917 को
उत्तर:
(A) 16 जुलाई 1917 को

ओ सदानीरा Objective Bihar Board 12th Hindi प्रश्न 2.
वैशाली महोत्सव का बीजारोपण किया
(A) अज्ञेय’ ने
(B) जगदीशचन्द्र माथुर ने
(C) श्री कृष्ण सिंह ने
(D) अशोक वाजपेयी ने
उत्तर:
(B) जगदीशचन्द्र माथुर ने

ओ सदानीरा Bihar Board 12th Hindi प्रश्न 3.
कौन-सी कृति माथुरजी की नहीं है ?
(A) मेरी बाँसुरी
(B) बंदी
(C) रेशमी टाई
(D) कोणार्क
उत्तर:
(C) रेशमी टाई

ओ सदानीरा जगदीश चंद्र माथुर Bihar Board 12th Hindi प्रश्न 4.
कौन-सी कृति माथुरजी की है ?
(A) जानवर और जानवर
(B) कहानी : नई कहानी
(C) यायावर रहेगा याद
(D) भोर का तारा
उत्तर:
(D) भोर का तारा

प्रश्न 5.
बराज कहाँ बन रहा था ?
(A) बेलगाँव में
(B) भितिहरवा में
(C) अमोलवा में
(D) भैंसालोटन में |
उत्तर:
(D) भैंसालोटन में |

प्रश्न 6.
आम्रपाली (अंबपाली) ने तथागत को क्या सौंपा था ?
(A) कदलीवन
(B) आम्रवन
(C) दस हजार स्वर्ण मुद्राएँ
(D) अपना भवन
उत्तर:
(B) आम्रवन

प्रश्न 7.
मेरठ के महंत ने गाँधीजी को कहाँ शरण दी?
(A) एक जामुन के पेड़ के नीचे
(B) अपने मठ में
(C) एक झोपड़ी में
(D) एक महुए के पेड़ के नीचे
उत्तर:
(D) एक महुए के पेड़ के नीचे

प्रश्न 8.
‘ओ सदानीरा’ के लेखक हैं
(A) जगदीशचन्द्र माथुर
(B) लक्ष्मीनारायण लाल
(C) लक्ष्मीनारायण मिश्र
(D) जयशंकर प्रसाद
उत्तर:
(A) जगदीशचन्द्र माथुर

प्रश्न 9.
‘कोणार्क’ के नाटककार कौन हैं?
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) जगदीशचन्द्र माथुर
(C) हरेकृष्ण प्रेमी
(D) मैथिलीशरण गुप्त
उत्तर:
(B) जगदीशचन्द्र माथुर

प्रश्न 10.
‘दस तस्वीरें’ के रचनाकार कौन हैं ?
(A) रामवृक्ष बेनीपुरी
(B) जगदीशचन्द्र माथुर
(C) देवेन्द्र सत्यार्थी
(D) महादेवी वर्मा
उत्तर:
(B) जगदीशचन्द्र माथुर

प्रश्न 11.
‘सदानीरा’ किसको निमित्त बनाकर लिखा गया है ?
(A) कोसी को
(B) गंगा को
(C) गंडक को
(D) महानंदा को
उत्तर:
(C) गंडक को

प्रश्न 12.
बिहार के सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक उत्सव ‘वैशाली महोत्सव’ का बीजारोपण किसने किया?
(A) जॉर्ज ग्रियर्सन ने
(B) सच्चिदानन्द सिन्हा ने
(C) जगदीशचन्द्र माथुर ने
(D) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने
उत्तर:
(C) जगदीशचन्द्र माथुर ने

प्रश्न 13.
‘ओ मेरे सपने’ क्या है?
(A) उपन्यास
(B) कहानी
(C) खंडकाव्य
(D) नाटक
उत्तर:
(D) नाटक

प्रश्न 14.
गौतम बुद्ध का आविर्भाव कब हुआ था ?
(A) दो हजार वर्ष पहले
(B) ढाई हजार वर्ष पहले
(C) तीन हजार वर्ष पहले
(D) पाँच सौ वर्ष पहले
उत्तर:
(B) ढाई हजार वर्ष पहले

प्रश्न 15.
राजा हरिसिंह देव को किसका मुकाबला करना पड़ा था ?
(A) गयासुद्दीन तुगलक का
(B) नादिरशाह का
(C) अहमदशाह का
(D) बाबर का
उत्तर:
(B) नादिरशाह का

प्रश्न 16.
‘बोलते क्षण’ किस साहित्यिक विधा की कृति है ?
(A) निबंध
(B) कहानी
(C) संस्मरण
(D) आलोचना
उत्तर:
(A) निबंध

प्रश्न 17.
‘ओ सदानीरा’ किसको निमित्त बनाकर लिखा गया है ?
(A) गंगा
(B) गंडक
(C) यमुना
(D) महानदी
उत्तर:
(B) गंडक

प्रश्न 18.
‘थारन’ शब्द किस शब्द से विकसित है?
(A) थल
(B) थार
(C) स्थल
(D) स्थान
उत्तर:
(B) थार

प्रश्न 19.
कर्णाट वंश के राजा हरिसिंह को किसका मुकाबला करना पड़ा?
(A) गयासुद्दीन तुगलक
(B) नादिरशाह
(C) अलाउद्दीन खिलजी
(D) कुतुबुद्दीन ऐबक
उत्तर:
(A) गयासुद्दीन तुगलक

प्रश्न 20.
चंपारण में थाँगड़ कहाँ से आए ?
(A) राँची
(B) जमशेदपुर
(C) छोटानागपुर
(D) आंध्र प्रदेश
उत्तर:
(C) छोटानागपुर

प्रश्न 21.
गाँधीजी चंपारण में कब आए ?
(A) अप्रैल 1918 में
(B) अप्रैल, 1920 में
(C) 20 जून, 1917 में
(D) अप्रैल, 1917 में
उत्तर:
(D) अप्रैल, 1917 में

प्रश्न 22.
तीनकठिया प्रथा का संबंध है1
(A) ईख से
(B) तम्बाकू से
(C) मसाला से
(D) नील से
उत्तर:
(D) नील से

प्रश्न 23.
पंडई नदी कहाँ तक जाती है ?
(A) भिखनाथोरी
(B) वगहा
(C) रामनगर
(D) भितिहवा
उत्तर:
(A) भिखनाथोरी

प्रश्न 24.
निम्नलिखित में कौन-सी रचना जगदीशचन्द्र माथुर की है?
(A) सिपाही की माँ
(B) जूठन
(C) ओ सदानीरा
(D) तिरिछ
उत्तर:
(C) ओ सदानीरा

प्रश्न 25.
‘ओ सदानीरा’ शीर्षक पाठ किस विद्या के अन्तर्गत आता है?
(A) निबन्ध
(B) कहानी
(C) कविता
(D) नाटक
उत्तर:
(A) निबन्ध

प्रश्न 26.
जगदीशचन्द्र माथुर मूलतः क्या थे?
(A) निबन्धकार
(B) कहानीकार
(C) नाटककार
(D) उपन्यासकार
उत्तर:
(C) नाटककार

प्रश्न 27.
‘ओ सदानीरा’ निबन्ध बिहार के किस क्षेत्र की संस्कृति पर लिखी गयी है?
(A) सारण
(B) तिरहुत
(C) मिथिला
(D) चंपारण
उत्तर:
(D) चंपारण

प्रश्न 28.
चम्पारण क्षेत्र में बाढ़ का मुख्य कारण क्या है?
(A) जंगलों का कटना
(B) नदियों की अधिकता
(C) नदियों की तीव्रधारा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) जंगलों का कटना

प्रश्न 29.
माथुर जी किस राज्य के शिक्षा सचिव नियुक्त हुए?
(A) मध्य प्रदेश
(B) आन्ध्रप्रदेश
(C) बिहार
(D) उत्तर प्रदेश
उत्तर:
(A) मध्य प्रदेश

प्रश्न 30.
बारहवीं सदी के लगभग तीन सौ वर्ष तक किस वंश का शासन था?
(A) मौर्य वंश
(B) चालुक्य वंश
(C) गुप्त वंश
(D) कर्णाट वंश
उत्तर:
(D) कर्णाट वंश

प्रश्न 31.
अंग्रेज ठेकेदारों ने किस चीज की खेती का विस्तार किया?
(A) दलहन
(B) भील.
(C) गेहूँ
(D) तिलहन
उत्तर:
(B) भील.

प्रश्न 32.
राजा हरिसिंह देव को गयासुद्दीन तुगलक का सामना कब करना पड़ा?
(A) 1225 ई. में
(B) 1250 ई० में
(C) 1325 ई० में ।
(D) 1350 ई० में
उत्तर:
(C) 1325 ई० में ।

प्रश्न 33.
धाँगड़ों को नील की खेती के सिलसिले में कब लाया गया?
(A) 18वीं शताब्दी के अन्त में
(B) 17वीं शताब्दी के अन्त में
(C) 19वीं शताब्दी के अन्त में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) 18वीं शताब्दी के अन्त में

प्रश्न 35.
पुंडलीक जी कौन थे?
(A) गाँव का मुखिया
(B) शिक्षक
(C) चिकित्सक
(D) राजनीतिक नेता
उत्तर:
(B) शिक्षक

प्रश्न 36.
निम्नलिखित में से कौन-सा नाटक जगदीशचन्द्र माथुर रचित है?
(A) दीपक
(B) आधे-अधूरे
(C) कोणार्क
(D) ओ मेरे मन
उत्तर:
(C) कोणार्क

प्रश्न 37.
निम्नलिखित में से कौन-सी उपाधि माथुर जी को मिली?
(A) विद्या प्रदक्षिणा
(B) विद्या वारिधि
(C) विद्या कामिनी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) विद्या वारिधि

प्रश्न 38.
माथुर जी को भितिहरवा पहुंचने पर कौन मिले?
(A) गाँधी जी
(B) गोखले जी
(C) पुंडलीक जी
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(C) पुंडलीक जी

प्रश्न 39.
पुंडलीक जी ने निर्भिकता किससे सीखी?
(A) गोखले जी से
(B) गाँधी जी से
(C) कृपलानी जी से
(D) इनमें किसी से नहीं
उत्तर:
(B) गाँधी जी से

प्रश्न 40.
कर्णाट वंश के राजा हरिसिंह को किसका मुकाबला करना पड़ा?
(A) गयासुद्दीन तुगलक
(B) नादिरशाह
(C) अलाउद्दीन खिलजी
(D) कुतुबुद्दीन ऐबक
उत्तर:
(A) गयासुद्दीन तुगलक

प्रश्न 41.
चंपारन में धाँगड़ कहाँ से आए?
(A) राँची
(B) जमशेदपुर
(C) छोटानागपुर
(D) आंध्र प्रदेश
उत्तर:
(C) छोटानागपुर

प्रश्न 42.
गाँधीजी चंपारन में कब आए?
(A) अप्रैल 1918 में
(B) अप्रैल 1920 में
(C) 20 जून 1917 में
(D) अप्रैल 1917 में
उत्तर:
(D) अप्रैल 1917 में

प्रश्न 43.
‘तीनकठिया’ प्रथा का संबंध है
(A) ईख से
(B) तम्बाकू से
(C) मसाला से
(D) नील से
उत्तर:
(D) नील से

प्रश्न 44.
पंडई नदी कहाँ तक जाती है?
(A) भिखनाथोरी
(B) बगहा
(C) रामनगर
(D) भितिहरवा
उत्तर:
(A) भिखनाथोरी

प्रश्न 45.
बराज कहाँ बन रहा था?
(A) बेलगाँव
(B) भितिहरवा में
(C) अमोलवा में
(D) भैसालोटन में
उत्तर:
(D) भैसालोटन में

प्रश्न 46.
आम्रपाली (अंबपाली) ने तथागत को क्या सौंपा था?
(A) कदलीवन
(B) आम्रवन
(C) दस हजार स्वर्णमुद्राएँ
(D) अपना भवन
उत्तर:
(B) आम्रवन

प्रश्न 47.
मठ के महंत ने गाँधीजी को कहाँ शरण दी?
(A) एक जामुन के पेड़ के नीचे
(B) अपने मठ में
(C) एक झोपड़ी में
(D) एक महुए के पेड़ के नीचे
उत्तर:
(D) एक महुए के पेड़ के नीचे

प्रश्न 48.
जगदीशचंद्र माथुर का जन्म हुआ था
(A) 16 जुलाई 1917 को
(B) 16 जुलाई 1918 को
(C) 17 अगस्त 1917 को
(D) 20 सितंबर 1917 को
उत्तर:
(A) 16 जुलाई 1917 को

प्रश्न 49.
वैशाली महोत्सव का बीजारोपण किया
(A) ‘अज्ञेय’ ने
(B) जगदीशचंद्र माथुर ने
(D) अशोक वाजपेयी ने
उत्तर:
(B) जगदीशचंद्र माथुर ने

प्रश्न 50.
कौन-सी कृति माथरजी की नहीं है।
(A) मेरी बाँसुरी
(B) बंदी
(C) रेशमी-टाई
(D) कोणार्क
उत्तर:
(C) रेशमी-टाई

प्रश्न 51.
कौन-सी कृति माथुरजी की है?
(A) जानवर और जानवर
(B) कहानी : नई कहानी’
(C) यायावर रहेगा याद
(D) भोर का तारा
उत्तर:
(D) भोर का तारा

प्रश्न 52.
‘बोलते क्षण’ किस साहित्यिक विधा की कृति है?
(A) निबंध
(B) कहानी
(C) संस्मरण
(D) आलोचना
उत्तर:
(A) निबंध

प्रश्न 53.
‘ओ सदानीरा’ किसको निमित बनाकर लिखा गया है?
(A) गंगा
(B) गंडक
(C) यमुना
(D) महानदी
उत्तर:
(B) गंडक

प्रश्न 54.
‘थारन’ शब्द किस शब्द से विकसित है?
(A) थल
(B) थार
(C) स्थल
(D) स्थान
उत्तर:
(B) थार

प्रश्न 55.
बिहार के सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक उत्सव ‘वैशाली महोत्सव’ का बीजारोपण किसने किया?
(A) जॉर्ज ग्रियर्सन ने
(B) सच्चिदानंद सिन्हा ने
(C) जगदीशचंद्र माथुर ने
(D) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने
उत्तर:
(C) जगदीशचंद्र माथुर ने

प्रश्न 56.
‘ओ मेरे सपने’ क्या है?
(A) उपन्यास
(B) कहानी
(C) खंडकाव्य
(B) जगदीशचंद्र माथुर
उत्तर:
(B) जगदीशचंद्र माथुर

प्रश्न 57.
गौतम बुद्ध का आविर्भाव कब हुआ था?
(A) दो हजार वर्ष पहले
(B) ढाई हजार वर्ष पहले
(C) तीन हजार वर्ष पहले
(D) पाँच सौ वर्ष पहले
उत्तर:
(B) ढाई हजार वर्ष पहले

प्रश्न 58.
राजा हरिसिंह देव को किसका मुकाबला करना पड़ा था?
(A) गयासुद्दीन तुगलक का
(B) नादिरशाह का
(C) अहमदशाह का
(D) बाबर का
उत्तर:
(A) गयासुद्दीन तुगलक का

प्रश्न 59.
‘ओ सदानीरा’ के लेखक है
(A) जगदीशचंद्र माथुर
(B) लक्ष्मीनारायण लाल
(C) लक्ष्मीनारायण मिश्र
(D) जयशंकर प्रसाद
उत्तर:
(A) जगदीशचंद्र माथुर

प्रश्न 60.
‘कोर्णाक’ के नाटककार कौन है?
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) जगदीशचंद्र माथुर
(C) हरेकृष्ण प्रेमी
(D) मैथिलीशरण गुप्त
उत्तर:
(B) जगदीशचंद्र माथुर

प्रश्न 61.
‘दस तस्वीरे’ के रचनाकार कौन है?
(A) रामवृक्ष बेनीपुरी
(B) जगदीशचंद्र माथुर
(C) देवेंद्र सत्यार्थी
(D) महादेवी वर्मा
उत्तर:
(B) जगदीशचंद्र माथुर

Bihar Board Class 9 Hindi अपठित गद्यांश

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Bihar Board Class 9 Hindi अपठित गद्यांश Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi अपठित गद्यांश

Bihar Board Class 9 Hindi अपठित गद्यांश Questions and Answers

 

साहित्यिक गद्यांश [12 अंक]

1. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

बड़ी चीजें बड़े संकटों में विकास पाती हैं, बड़ी हस्तियाँ बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्जा करती हैं। अकबर ने तेरह साल की उम्र में अपने बाप के दुश्मन को परास्त कर दिया था जिसका एकमात्र कारण यह था कि अकबर का जन्म रेगिस्तान में हुआ था और वह भी उस समय, जब उसके बाप के पास एक कस्तूरी को छोड़कर और कोई दौलत नहीं थी।

महाभारत में देश के प्रायः अधिकांश वीर कौरवों के पक्ष में थे। मगर फिर भी जीत पांडवों की हुई, क्योंकि उन्होंने लाक्षागृह की मुसीबत झेली थी, क्योंकि उन्होंने वनवास के जोखिम को पार किया था।

श्री विंस्टन चर्चिल ने कहा है कि जिन्दगी की सबसे बड़ी सिफ़त हिम्मत है। आदमी के और सारे गुण उसके हिम्मती होने से ही पैदा होते हैं।

जिन्दगी की दो सरतें हैं। एक तो यह कि आदमी बड़े से बडे मकसद के लिए कोशिश करे, जगमगाती हुई जीत पर पंजा डालने के लिए हाथ बढ़ाए और अगर असफलताएँ कदम-कदम पर जोश की रोशनी के साथ अँधियाली का जाल बुन रही हों, तब भी वह पीछे को पाँव न हटाए।

दूसरी सूरत यह है कि उन गरीब आत्माओं का हमजोली बन जाए जो न तो बहत अधिक सुख पाती हैं और न जिन्हें बहत अधिक दुख पाने का ही संयोग है, याकि वे आत्माएँ ऐसी गोधूलि में बसती हैं जहाँ न तो जीत हँसती है और न कभी हार के रोने की आवाज सुनाई पड़ती है। इस गोधूलि वाली दुनिया के लोग बँधे हुए घाट का पानी पीते हैं, वे जिन्दगी के साथ जुआ नहीं खेल सकते। और कौन कहता है कि पूरी जिन्दगी को दाँव पर लगा देने में कोई आनन्द नहीं है?

अगर रास्ता आगे ही आगे निकल रहा हो तो फिर असली मज़ा तो पाँव बढ़ाते जाने में ही है।

साहस की जिन्दगी सबसे बडी जिन्दगी होती है। ऐसी जिन्दगी की सबसे बडी पहचान यह है कि वह बिल्कुल निडर, बिल्कुल बेखौफ़ होती है। साहसी मनुष्य की पहली पहचान यह है कि वह इस बात की चिंता नहीं करता कि तमाशा देखने वाले लोंग उसके बारे में क्या सोच रहे हैं। जनमत की उपेक्षा करके जीने वाला आदमी दुनिया की असली ताकत होता है और मनुष्यता को प्रकाश भी उसी आदमी से मिलता है। अड़ोस-पड़ोस को देखकर चलना, यह साधारण जीव का काम है। क्रांति करने वाले लोग अपने उद्देश्य की तुलना न तो पड़ोसी के उद्देश्य से करते हैं और न अपनी चाल को ही पड़ोसी की चाल देखकर मद्धिम बनाते हैं।

साहसी मनुष्य उन सपनों में भी रस लेता है जिन सपनों का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं है।

साहसी मनुष्य सपने उधार नहीं लेता, वह अपने विचारों में रमा हुआ अपनी ही किताब पढ़ता है। झुंड में चलना और झुंड में चरना, यह भैंस और भेड़ का काम है। सिंह तो बिल्कुल अकेला होने पर भी मग्न रहता है।

प्रश्न
1. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
2. लेखक के अनुसार, पांडवों की जीत क्यों हुई?
3. ‘गोधूलि’ जीवन की किस स्थिति का प्रतीक है?
4. बँधे घाट का पानी पीने का अर्थ बताइए।
5. जिन्दगी के साथ जुआ खेलने का क्या आशय है?
6. दुनिया की असली ताकत किस मनुष्य को कहा गया है?
7. क्रांतिकारियों के क्या लक्षण हैं?
8. साधारण जीव कैसा जीवन जीते हैं?
9. ‘साहसी मनुष्य सपने उधार नहीं लेता’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
10. भैंस और भेड़ कैसे जनों के प्रतीक हैं?
11. “हिम्मत’ के लिए किस पर्यायवाची शब्द का प्रयोग हुआ है?
12. ‘भाग खड़े होना’ का विलोम लिखिए।
उत्तर
(1) शीर्षक : “संकट तथा साहस”
(2) पांडवों की जीत इसलिए हुई क्योंकि उन्होनें लाक्षागृह का कष्ट झेला था और बनवास के खतरा को पार करने में सफल हुए थे।
(3) गोधूलि जीवन की उस स्थिति का प्रतीक है जहाँ न तो जीत हँसती है और न कभी हार के रोने की आवाज सुनाई पड़ती है।
(4) व्यक्ति द्वारा अपनी गतिविधियों को एक संकुचित क्षेत्र तक बाँध (सीमित) लेने का अर्थ बँधे घाट का पानी पीना है।
(5) बड़े उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, सफलता-असफलता की परवाह किए बिना अपनी जिन्दगी को दाँव पर लगा देने का अर्थ जिन्दगी के साथ जुआ खेलना है।
(6) जनमत की उपेक्षा करके जीने वाला व्यक्ति दुनिया की असली ताकत होता है।
(7) क्रांतिकारी अपने उद्देश्य की तुलना न तो पड़ोसी के उद्देश्य से करते हैं और न अपनी चाल को ही पड़ोसी की चाल देखकर मद्धिम करते हैं, यही उनका लक्षण होता है।
(8) साधारण जीव सुखी जीवन नहीं जी सकता। उसका जीवन कष्टमय एवं निराशापूर्ण होता है।
(9) अपने विचारों में मग्न जो व्यक्ति अकेले ही अपनी मंजिल तय करता है तथा झुंड में भेड़ों की तरह नहीं चलता, ऐसे मनुष्य से ही तात्पर्य है, “साहसी मनुष्य सपने उधार नहीं लेता।”
(10) भैंस और भेड़ ऐसे लोगों के प्रतीक हैं जो स्व-विवेक से काम नहीं लेते एवं दूसरे लोगों की नकल करते हैं वे उनके पीछे झुंड लगाकर चलते हैं।
(11) “साहंस”
(12) निडर होना, बेखौफ होना।

2. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

वर्ष 1956 की बात है डॉ. हरिवंश राय बच्चन अब तक हिंदी के कवियों में सबसे अगली पंक्ति में आ खड़े हुए थे। वे यह ठान बैठे कि वे प्रयाग विश्वविद्यालय के अंग्रेजी प्रोफेसर का गरिमा-भरा पद छोड़कर दिल्ली चले जाएँगे-विदेश मंत्रालय में अंडर सेक्रेटरी का नाचीज़ पद सँभालने। इलाहाबाद प्रतिभा-पूर्ण शहर है, लेकिन प्रतिभाओं को समुचित आदर देने में कुछ-कुछ कृपण। “कुछ-कुछ नहीं बहुत कृपण”। बच्चन जी ने मेरी भाषा सुधारते हुए मुझसे कहा था। वर्ष 1984 और बच्चन जी उन दिनों ‘दशद्वार से सोपान तक’ पुस्तक पर काम कर रहे थे। उन्होंने कहा भी है कि किस तरह उनके विरुद्ध बहुत कुछ कहा ही नहीं गया, लिखा भी गया और छापे में भी आया। उनकी ‘मधुशाला’ पर ‘अभ्युदय’ पत्रिका में लेख छपा, जिसमें बच्चन के हिन्दी के उमर खैयाम बनने के स्वप्न पर कटु व्यंग्य करते हुए लेख का शीर्षक दिया गया था- ‘घूरन के लता कनातन से ब्योत बाँधे’ (घुरे की हिंदी चली है कनात से अपनी गाँठ बाँधने)। ‘मधुशाला’ तो पाठकों की सच्ची सराहना पाकर साहित्य के सर्वोच्च सोपान पर जा बैठी और अभ्युदय का लेख रह गया वहीं घूरे पर पड़ा हुआ।

बच्चन जी ने बहुत कष्ट देखे थे। बहुत संघर्ष किया था और महाकवि निराला की ही तरह आँसुओं को भीतर ही भीतर पीकर उनकी ऊर्जा और सौंदर्य में अपनी कविता को सोना बनाया था। स्पष्ट है इस कष्टसाध्य प्रक्रिया से वही कलाकार गुजर सकता है जिसके भीतर दुर्घर्ष जिजीविषा हो। दिल्ली आकर विदेश मंत्रालय में बड़े अधिकारी के ठंडे और हिंदी-विरोधी तेवरों ने उन्हें खिन्न तो किया, लेकिन बच्चन जी ने फिर कविता का आश्रय लिया। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है ‘भला-बुरा जो भी मेरे सामने आया है, उसके लिए मैंने अपने को ही उत्तरदायी समझा है। गीता पढ़ते हुए मैं दो जगहों पर रुका। एक तो जब भगवान अर्जुन से कहते है- अर्जुन, आत्मवान बनो अर्थात् अपने सहज रूप से विकसित गुण-स्वभाव-व्यक्तित्व पर टिको। दूसरी जगह जब वे कहते हैं कि गुण स्वभाव-प्रकृति को मत छोड़ो। बच्चन जी, तुम भी आत्मवान बनो। बच्चन द्वारा उमर खैयाम की मधुशाला का अनुवाद एक बड़े कवि द्वारा दूसरे बड़े कवि की कविता की आत्मा से साक्षात्कार करना और अपने साहित्यिक व्यक्तित्व के अनुसार उसे अपनी भाषा में अपनी तरह से अभिव्यक्त करना है।

हर बड़ा साहित्यकार साहित्य और विशेषकर शब्द की गरिमा और मर्यादा पर लड़ मरने को तैयार रहता है। बच्चन जी के साथ भी कुछ ऐसा ही है। उन्होंने जितना आदर अपने साहित्य का किया, उतना ही भारत तथा विदेशों के साहित्य का भी और इसलिए समय-समय पर अनुवाद संबंधी नीति बनाते हुए उन्होंने भाषा की गरिमा बनाए रखने पर बहुत बल दिया। विदेश मंत्रालय में उन दिनों भी कठिन अंग्रेजी का अनुवाद हाट-बाजार वाली हिंदी में करने के बारे में एक आग्रह था। इस पर बच्चन जी बहुत बिगड़ते थे। उनका कहना था कि अंग्रेजी का अनुवाद बाजार स्तर की हिंदी में माँगना हिंदी के साथ अन्याय करना है। जब-जब हिंदी अंग्रेजी के स्तर तक उठने की कोशिश करती है तो उस पर तुरंत दोष लगाया जाता है कि वह कठिन और क्लिष्ट है और जब वह उससे घबराकर अति सरलता की ओर जाती है तो उसे अपरिपक्व कह दिया जाता है। बच्चन जी ने अपने गद्य और पद्य दोनों में ही एक सुंदर, सुगठित और सरल हिंदी का प्रयोग करके यह सिद्ध कर दिया कि आवश्यकता के अनुसार संस्कृत की ओर झुकती हिंदी भी लोकप्रिय और लोकरंजक हो सकती है।

लेखक हेनरी जेम्स ने कहा है कि हर बड़ा लेखक अपने जीवन और लेखन में जितना भी जझारू हो. अंतत: उसके भीतर मानव-जीवन के प्रति एक गहरी आ होती है। यह गहरी आस्था बच्चन जी के पूरे लेखन में व्याप्त है। ‘दशद्वार से सोपान तक’ के अंत में वह कहते है ‘जनार्दन के समक्ष जब प्रस्तुत होना होगा, वो होगा पर मैं जानता हूँ कि जनता जनार्दन के सामने मेरी सृजनशील लेखनी ने मेरी । संपूर्ण अपूर्णताओं के साथ मुझे प्रस्तुत कर दिया है।

प्रश्न
1. उचित शीर्षक दीजिए।
2. ‘अगली पंक्ति में आ खड़े होने’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
3. बच्चन जी ने हिंदी को कैसा रूपाकार दिया?
4. हरिवंशराय इलाहाबाद से किस कारण खिन्न थे?
5. अभ्युदय के संपादक ने कवि बच्चन की किसलिए निंदा की थी?
6. महाकवि निराला और बच्चन के जीवन में कौन-सी समानता थी?
7. “दुर्घर्ष जिजीविषा’ का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए।
8. ‘ठंडे तेवर’ से क्या आशय है?
9. बच्चन जी ने गीता के संदेश से कौन-सा गण सीखा?
10. ‘अपर्णता’ तथा ‘जझारू’ के पर्यायवाची शब्द लिखिए।
11. अंग्रेजी का हिंदी अनुवाद करते हुए उन्हें कौन-सी बात दुख देती थी।
12. ‘काम’ का तत्सम शब्द लिखिए।
उत्तर
(1) शीर्षक : बच्चन की हिन्दी सेवा
(2) ‘अगली पंक्ति में आ खड़े होना’ का अर्थ है विशिष्ट स्थान प्राप्त करना। अपनी प्रतिभा, संकल्प, लगन तथा परिश्रम से सफलता के उत्कर्ष पर पहुँचने के अर्थ में इसे प्रयुक्त किया जा सकता है।
(3) बच्चन जी ने अपने गद्य और पद्य दोनों में ही एक सुन्दर, सुगठित और सरल हिन्दी का प्रयोग करके सिद्ध कर दिया कि आवश्यकता के अनुसार संस्कृत की ओर झुकती हिन्दी भी लोकप्रिय और लोकरंजक हो सकती है।
(4) इलाहाबाद में प्रतिभाओं को समुचित आदर नहीं दिया जाता था।
(5) कवि “बच्चन’- के काव्य “मधुशाला’ लिखने पर, उनपर हिन्दी के उमर खैयाम बनने की व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए ‘अम्युदय’ पत्रिका के सम्पादक ने कटु निंदा (आलोचना) की थी।
(6) ‘बच्चन’ जी ने महाकवि ‘निराला’ की भाँति ही कष्ट झेले, संघर्ष किया तथा आँसुओं को पीकर उनकी ऊर्जा और सौंदर्य द्वारा अपनी कविता को सोना बनाया था।
(7) ‘दुर्घर्ष जिजीविषा’ का तात्पर्य संघर्ष करने की असीम क्षमता एवं आकांक्षा है।
(8) ठंडे तेवर का आशय- नरम (निस्तेज) तथा उपेक्षापूर्ण रुख।
(9) बच्चन जी ने गीता के संदेश द्वारा आत्मवान बनने तथा अपने गुण, स्वभाव-प्रकृति पर टिके रहना तथा उसे नहीं छोड़ने का गुण सीखा।
(10) (1) अपूर्णता- अधूरापन, अपर्याप्त।
(2) जुझारू- संघर्षशील
(11) अंग्रेजी का हिन्दी में अनवाद करने के बारे में उनका एक स्पष्ट आग्रह था। वह हाट बाजार वाली स्तरहीन हिन्दी में अनुवाद के प्रबल विरोधी थे। हिन्दी के साथ इस प्रकार का दुर्व्यवहार उन्हें दुख देता था।
(12) काम का तत्सम् शब्द – कार्य।

3. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

भारतवर्ष सदा कानून को धर्म के रूप में देखता आ रहा है। आज एकाएक कानून और धर्म में अंतर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, कानन को दिया जा सकता। यही कारण है कि जो लोग धर्मभीरू हैं, वे कानून की त्रुटियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते।

इस बात के पर्याप्त प्रमाण खोजे जा सकते हैं कि समाज के ऊपरी वर्ग में चाहे जो भी होता रहा हो, भीतर-भीतर भारतवर्ष अब भी यह अनुभव कर रहा है कि धर्म कानून से बड़ी चीज है। अब भी सेवा, ईमानदारी, सच्चाई और आध्यात्मिकता के मूल्य बने हुए हैं। वे दब अवश्य गए हैं, लेकिन नष्ट नहीं हुए। आज भी वह मनष्य से प्रेम करता है. महिलाओं का सम्मान करता है. झट और चोरी को गलत समझता है, दूसरों को पीड़ा पहुँचाने को पाप समझता है। हर आदमी अपने व्यक्तिगत जीवन में इस बात का अनुभव करता है।

समाचार पत्रों में जो भ्रष्टाचार के प्रति इतना आक्रोश है, वह यही साबित करता है कि हम ऐसी चीजों को गलत समझते हैं और समाज से उन तत्त्वों की प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं जो गलत तरीके से धन या मान संग्रह करते हैं।

दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है। बुराई यह मालूम होती है कि किसी आचरण के गलत पक्ष को उदघाटित करते समय उसमें रस लिया जाता है और दोषोद्घाटन को एकमात्र कर्तव्य मान लिया जाता है। बुराई में रस लेना बुरी बात है, अच्छाई को उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है। सैकड़ों घटनाएँ ऐसी घटती हैं जिन्हें उजागर करने से लोकचित में अच्छाई के प्रति अच्छी भावना जगती है।

एक बार रेलवे स्टेशन पर टिकट लेते हुए गलती से मैंने दस के बजाय सौ ‘रुपये का नोट दिया और मैं जल्दी-जल्दी गाड़ी में आकर बैठ गया। थोड़ी देर में टिकट बाबू उन दिनों के सैकेंड-क्लास के डिब्बे में हर आदमी का चेहरा पहचानता हुआ उपस्थित हुआ। उसने मुझे पहचान लिया और बड़ी विनम्रता के साथ मेरे हाथ में नब्बे रुपये रख दिए और बोला, “यह बहुत बड़ी गलती हो गई थी। आपने भी नहीं देखा, मैंने भी नहीं देखा।” उसके चेहरे पर विचित्र संतोष की गरिमा थी। मैं चकित रह गया।

ठगा भी गया हूँ धोखा भी खाया है, परन्तु बहुत कम स्थलों पर विश्वासघात नाम की चीज मिलती है। केवल उन्हीं बातों का हिसाब रखो, जिनमें धोखा खाया है तो जीवन कष्टकर हो जाएगा, परन्तु ऐसी घटनाएँ भी बहुत कम नहीं हैं जब लोगों ने अकारण सहायता की है, निराश मन को ढाँढ्स दिया है और हिम्मत बँधाई है। कविवर रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने एक प्रार्थना गीत में भगवान से प्रार्थना की थी कि संसार में केवल नुकसान ही उठाना पड़े, धोखा ही खाना पड़े, तो ऐसे अवसरों पर भी हैं प्रभ! मझे ऐसी शक्ति दो कि में तुम्हार.ऊपर सदह न करू।

मनुष्य की बनाई विधियाँ गलत नतीजे तक पहुँच रही हैं तो इन्हें बदलना होगा। वस्तुतः आए दिन इन्हें बदला ही जा रहा है। लेकिन अब भी आशा की ज्योति बुझी नहीं है। महान भारतवर्ष को पाने की संभावना बनी हुई है, बनी रहेगी। मेरे मन! निराश होने की जरूरत नहीं है।

प्रश्न
1. इस गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
2. व्यक्ति-चित्त की विशेषता बताइए।
3. ‘दकियानूसी’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
4. उन्नति के साथ-साथ कौन-से विकार बढ़ते चले गए?
5. धर्म और कानून में क्या अंतर कर दिया गया है?
6. ‘धर्मभीरू’ से क्या आशय है?
7. धर्मभीरू लोग कानून के साथ कैसा व्यवहार करते हैं?
8. भ्रष्टाचार के समाचार क्या सिद्ध करते हैं?
9. दोषों का पर्दाफाश करने मे बुराई कब आती है?
10. पर्दाफाश और दोषोद्घाटन के अर्थ बताइए।
11. बराई और अच्छाई के प्रदर्शन में कौन-सी बात बरी है?
12. टिकट बाबू के चेहरे पर संतोष की गरिमा क्यों थी?
उत्तर
(1) शीर्षक : “धर्म और कानून”
(2) व्यक्ति चित्त की विशेषता यह है कि वह ऐसी चीजों को गलत समझता है जिसके द्वारा गलत तरीके से धन या मान संग्रह किया जाता है।
(3) ‘दकियानूसी’ का अर्थ होता है, निरर्थक पुरानी परम्पराओं को ढोना। यदि मनुष्य द्वारा पूर्व में बनाई विधियाँ गलत नतीजे तक पहुँच रही हैं और हम उसका अंधानुकरण करते हैं तो इसे ‘दकियानूसी’ आचरण कहा जाएगा।
(4) राष्ट्र तथा समाज की उन्नति और विकास के साथ भ्रष्टाचार, छल-प्रपंच एवं अनाचार जैसे विकारों में वृद्धि हुई है।
(5) कानून को धर्म से अलग कर दिया गया है जिसके कारण अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं धर्म द्वारा सेवा, ईमानदारी, सच्चाई और आध्यात्मिकता की भावना आज के कानून में गौण हो गई है। कानून अपराध के लिए सजा का प्रावधान करता है। अपराध मिटा नहीं सकता जबकि धर्म सच्चरित्रता के माध्यम से अपराध करने से रोकता है।
(6) ‘धर्मभीरूं’ का शाब्दिक अर्थ है- धर्म अर्थात् सत्कर्म के प्रति आस्था एवं भीरू होना अर्थात् डरना (आचरण करना)। अतः धर्मभीरू से तात्पर्य है- धर्माचरण।
(7) धर्मभीरू लोग कानून की बेटियों से लाभ उठाने का प्रयास करते हैं।
(8) समाचार-पत्रों में भ्रष्टाचार के समाचारों से यह प्रमाणित होता है कि लोगों में भ्रष्टाचार के प्रति जर्बदस्त आक्रोश है तथा वे ऐसी वस्तुओं को गलत समझते हैं जो अनैतिक ढंग से धन या मान अर्जित कर समाज तथा देश को कलंकित करती
(9) दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है। लेकिन बुराई तब आती है जब किसी के आचरण के गलत पक्ष को जोर-शोर से उद्घाटित किया जाय तथा उसमें गहरी रुचि ली जाए।
(10) ‘पर्दाफाश करना’ का अर्थ रहस्य पर से पर्दा उठाना है, दोषी व्यक्ति के दोष को उजागर करना है। दोषोद्घाटन से तात्पर्य है दोषी व्यक्ति के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करना एवं उसकी बुराई में रस लेना है।
(11) बुराई और अच्छाई के प्रदर्शन में बुरी बात यह है कि कि इसके द्वारा गलत पक्ष का तो रहस्योद्घाटन किया जाता है, लेकिन उसके उन्मूलन का सार्थक प्रयास नहीं किया जाता है साथ ही अच्छाई को उतनी ही उत्सुकता से उजागर नहीं किया जाता है, जिन्हें प्रचारित करने में लोकचित में अच्छाई के प्रति अच्छी भावना जगती है।
(12) रेलवे स्टेशन का टिकट बाबू लेखक द्वारा टिकट के लिए दिए गए सौ रुपए की शेष राशि नब्बे रुपए देना भूल गया था। लेखक भी जल्दी बाजी में गाड़ी में आकर बैठ गया। टिकट बाबू उसे खोजते हुए सेकेंड क्लास के उस डिब्बे में जा पहुँचा जहाँ लेखक बैठा था। टिकट बाबू ने क्षमा माँगते हुए उक्त राशि उसे (लेखक) दे दी। इसी खुशी में टिकट बाबू के चेहरे पर संतोष का भाव (गरिमा) झलक रहा था।

4. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखए :

कर्म के मार्ग पर आनंदपूर्वक चलता हुआ उत्साही मनुष्य यदि अंतिम फल तक न पहुँचे तो भी उसकी दशा कर्म न करने वाले की अपेक्षा अधिकतर अवस्थाओं में अच्छी रहेगी, क्योंकि एक तो कर्मकाल में उसका जीवन बीता, वह संतोष या आनंद में बीता, उसके उपरांत फल की अप्राप्ति पर भी उसे यह पछतावा न रहा कि मैंने प्रयत्न नहीं किया। फल पहले से कोई बना-बनाया पदार्थ नहीं होता। अनुकूलन प्रयत्न-कर्म के अनुसार, उसके एक-एक अंग की योजना होती है। बुद्धि द्वारा पूर्ण रूप से निश्चित की हुई व्यापार परंपरा का नाम ही प्रयत्न है। किसी मनुष्य के घर का कोई प्राणी बीमार है। वह वैद्यों के यहाँ से जब तक औषधि ला ला कर रोगी को देता जाता है और इधर-उधर दौड धप करता जाता है तब तक उसके चित्त में जो संतोष रहता है- प्रत्येक नये उपचार के साथ जो आनन्द का उन्मेष होता रहता है यह उसे कदापि न प्राप्त होता, यदि वह रोता हुआ बैठा रहता। प्रयत्न की अवस्था में उसके जीवन का जितना अंश संतोष, आशा और उत्साह में बीता, अप्रयत्न की दशा में उतना ही अंश केवल शोक और दुःख में कटता। इसके अतिरिक्त रोगी के न अच्छे होने की दशा में भी वह आत्मग्लानि के उस कठोर दुःख से बचा रहेगा जो उसे जीवन भर यह सोच-सोचकर होता कि मैंने पूरा प्रयत्न नहीं किया।

कर्म में आनंद अनुभव करने वालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनंद भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फलस्वरूप लगते हैं। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और पुष्टि होती है वही लोकोपकारी कर्म-वीर का सच्चा सुख है। उसके लिए सुख तब तक के लिए रुका नहीं रहता जब तक कि फल प्राप्त न हो जाये, बल्कि उसी समय से थोड़ा-थोड़ा करके मिलने लगता है जब से वह कर्म की ओर हाथ बढ़ाता है।

कभी-कभी आनंद का मूल विषय तो कुछ और रहता है, पर उस आनंद के कारण एक ऐसी स्फूर्ति उत्पन्न होती है। जो बहुत से कामों की ओर हर्ष के साथ अग्रसर रहती है। इसी प्रसन्नता और तत्परता को देख लोग कहते हैं कि वे अपना काम बड़े उत्साह से किए जा रहे हैं। यदि किसी मनुष्य को बहुत-सा लाभ हो जाता है या उसकी कोई बड़ी भारी कामना पूर्ण हो जाती है तो जो काम उसके सामने आते हैं उन सबको वह बड़े हर्ष और तत्परता के साथ करता है। उसके इस हर्प और तत्परता को भी लोग उत्साह ही कहते हैं। इसी प्रकार किसी उत्तम फल या सख-प्राप्ति को आशा या निश्चय से उत्पन्न आनंद, फलोन्मुख प्रयत्नों के अतिरिक्त और दूसरे व्यापारों के साथ संलग्न होकर, उत्साह के रूप में दिखाई पड़ता है। यदि हम किसी ऐसे उद्योग में लगे हैं जिससे आगे चलकर हमें बहुत लाभ या सुख की । आशा है तो हम उस उद्योग को तो उत्साह के साथ करते ही हैं, अन्य कार्यों में भी प्रायः अपना उत्साह दिखा देते हैं।

यह बात उत्साह में नहीं अन्य मनोविकारों में भी बराबर पाई जाती है। यदि हम किसी बात पर क्रुद्ध बैठे हैं और इसी बीच में कोई दूसरा आकर हमसे कोई बात सीधी तरह भी पूछता है, तो भी हम उस पर झुझला उठते हैं। इस झुंझलाहट का न तो कोई निर्दिष्ट कारण होता है, न उद्देश्य। यह केवल क्रोध की स्थिति के _व्याघात को रोकने की क्रिया है, क्रोध की रक्षा का प्रयत्न है। इस झुंझलाहट द्वारा हम यह प्रकट करते हैं कि हम क्रोध में है और क्रोध में ही रहना चाहते हैं। क्रोध को बनाये रखने के लिए हम उन बातों में भी क्रोध ही संचित करते हैं जिनसे दूसरी अवस्था में हम विपरीत भाव प्राप्त करते इसी प्रकार यदि हमारा चित्त किसी विषय में उत्साहित रहता है तो हम अन्य विषय में भी अपना उत्साह दिखा देते हैं।

प्रश्न
(i) अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
(ii) फल क्या है?
(iii)कर्मण्य किसे कहते हैं?
(iv) मनुष्य को कौन कर्म की ओर अग्रसर कराती है?
(v) हम प्रायः उत्साह कब प्रकट करते हैं?
(vi) उत्साह में झुंझलाहट क्या है?
(vii) उत्साही मनष्य किस मार्ग पर चलता है?
(viii) किसी फल की प्राप्ति के लिए किसी योजना की जाती है?
(ix) प्रयत्न क्या है?
(x) अप्रयत्न की दशा में जीवन कैसे कटता है?
(xi) दिव्य आनंद किस में भरा रहता है?
(xii) क्रोध क्या है?
उत्तर
(i) शीर्षक : “कर्मवीर” ।
(ii) अनुकूलन प्रयत्न-कर्म के अनुसार, उसके एक-एक अंग की योजना होती है। यही फल का आधार होती है।
(iii) कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों का ही नाम कर्मण्य है।
(iv) ‘स्फूर्ति’ मनुष्य को कर्म की ओर अग्रसर कराती है।
(v) हमारे अन्दर जब आनन्द के कारण स्फूर्ति उत्पन्न होती है तो हम अपना कार्य प्रसन्नता और तत्परता से करते हैं। इसमें हमारा उत्साह प्रकट होता है।
(vi) जिस प्रकार उत्साह एक मनोदशा है उसी प्रकार झुंझलाहट भी एक मनोदशा ही है।
(vii) उत्साही मनुष्य उस मार्ग पर चलता है जिस पर उसे लाभ हो। हर्ष और तत्परता से वह उस मार्ग का अनुसरण करता है।
(viii) फल की प्राप्ति के लिए प्रत्येक योजना अनुकूलन प्रयत्न-कर्म के एक-एक अंग के अनसार की जाती है।
(ix) कर्म के मार्ग पर आनन्दपूर्वकं चलना ही प्रयत्न कहलाता है।
(x) अप्रयत्न की दशा में जीवन शोक और दुःख में कटता है।
(xi) धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही दिव्य आनन्द भरा रहता है।
(xii) क्रोध एक प्रकार का मनोविकार है।

5. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

जातियाँ इस देश में अनेक आई हैं। लड़ती-झगड़ती भी रही हैं, फिर प्रेमपूर्वक बस भी गई हैं। सभ्यता की नाना सीढ़ियों पर खड़ी और नाना ओर मुख करके चलने वाली इन जातियों के लिए एक सामान्य धर्म खोज निकालना कोई सहज बात नहीं थी। भारतवर्ष के ऋषियों ने अनेक प्रकार से इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की थी। पर एक बात उन्होंने लक्ष्य की थी। समस्त वर्णों और समस्त जातियों का एक सामान्य आदर्श भी है। वह है अपने ही बंधनों से अपने को बांधना। मनुष्य पशु से किस बात में भिन्न है? आहार-निद्रा आदि पशु-सुलभ स्वभाव उसके ठीक वैसे ही हैं, जैसे अन्य प्राणियों के लेकिन वह फिर भी पशु से भिन्न है। उसमें संयम है, दूसरे के सुख-दुख के प्रति समवेदना है, श्रद्धा है, तप है, त्याग है। यह मनुष्य के स्वयं के उदभावित बंधन हैं। इसीलिए मनष्य झगडे-टंटे को अपना आदर्श नहीं मानता, गुस्से में आकर चढ़ दौड़ने वाले अविवेकी को बुरा समझता है और वचन, मन और शरीर से किए गए असत्याचरण को गलत आचरण मानता है। यह किसी खास जाति या वर्ण या समुदाय का धर्म नहीं है। वह मनुष्य-मात्र का धर्म है। महाभारत में इसीलिए निर्वेर भाव, सत्य और अक्रोध को वर्णो का सामान्य धर्म कहा है

एतद्धि त्रितयं श्रेष्ठं सर्वभूतेषु भारत।
निर्वेरत महाराज सत्यमक्रोध एव च।

अन्यत्र इसमें निरंतर दानशीलता को भी गिनाया गया है। (अनुशासन 12010)। गौतम ने ठीक ही कहा था कि मनुष्य की मनुष्यता यही है कि सबके दुःख-सुख को सहानुभूति के साथ देखता है। यह आत्म-निर्मित बंधन ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है। अहिंसा, सत्य और अक्रोधमूलक धर्म का मूल उत्स यही है मुझे आश्चर्य होता है कि अनजाने में भी हमारी भाषा से यह भाव कैसे रह गया है। लेकिन मुझे नाखून के बढने पर आश्चर्य हुआ था अज्ञान सर्वत्र आदमी को पछाड़ता है। और आदमी है कि सदा उससे लोहा लेने को कमर कसे है।

मनुष्य को सुख कैसे मिलेगा? बड़े बड़े नेता कहते हैं, वस्तुओं की कमी है, और मशीन बैठाओं, और उत्पादन बढ़ाओ, और धन की वृद्धि करो और बाह्य उपकरणों की ताकत बढ़ाओ। एक बूढ़ा था। उसने कहा था- बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो। हिंसा को मन से दूर करो, मिथ्या को हटाओ, क्रोध और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्ट सहो। आराम की बात मत सोचो, प्रेम की बात सोचो, आत्म-पोषण की बात सोचो, काम करने की बात सोचो। उसने कहा- प्रेम ही बड़ी चीज है, क्योंकि वह हमारे भीतर है। उच्छृखलता पशु की प्रवृत्ति है, ‘स्व’ का बंधन मनुष्य का स्वभाव है। बूढ़े की बात अच्छी लगी या नहीं, पता नहीं। उसे गोली मार दी गई। आदमी के नाखून बढ़ने की प्रवृत्ति ही हावी हुई। मैं हैरान होकर सोचता हूँ-बूढ़े ने कितनी गहराई में पैठ कर मनुष्य की वास्तविक चरितार्थता का पता लगाया था।

प्रश्न
(i) अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
(ii) ऋषियों ने क्या किया था?
(iii)मनुष्य में पशु से भिन्न क्या है? .
(iv) मनुष्य किसे गलत आचरण मानता है?
(v) मनुष्य की मनुष्यता क्या है?
(vi) पशु की मूल प्रवृत्ति क्या है?
(vii) विभिन्न जातियाँ पहले क्या कर रही थीं?
(viii) तरह-तरह की जातियों के लिए क्या खोजना कठिन था?
(ix) सभी वर्गों और सभी जातियों का सामान्य आदर्श क्या है?
(x) मनुष्य किसे अपना आदर्श नहीं मानता?
(xi) महाभारत में सब वर्गों का सामान्य धर्म किसे माना गया है?
(xii) ‘स्व’ का बंधन किसका स्वभाव है?
उत्तर
(i) शीर्षक : मानव जीवन का उद्देश्य अथवा मनुष्यता तथा पशुता
(ii) देश में रहनेवाली विभिन्न जातियों के लिए एक सामान्य धर्म खोज निकालना एक कठिन कार्य था। भारतवर्ष के ऋषियों ने इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की थी।
(iii) मनुष्य में आहार-निद्रा जैसे पशु-सुलभ स्वभाव के बावजूद भी उसमें पशु से भिन्न गुण हैं। मनुष्य में संयम है, दूसरे के सुख-दुख के प्रति संवेदना है, श्रद्धा है, तप तथा त्याग है।
(iv) मनुष्य वचन, मन और शरीर से किए गए असत्याचरण को गलत आचरण मानता है।
(v) मनुष्य की मनुष्यता यही है कि सबके सुख-दुख को सहानुभूति के साथ देखता है।
(vi) उच्छृखलता पशु की मूल प्रवृत्ति है।
(vii) विभिन्न जातियाँ पहले आपस में लड़ती-झगड़ती रहती थीं।
(viii) विभिन्न जातियों के लिए एक सामान्य धर्म खोज निकालना कठिन कार्य था।
(ix) सभी वर्गों और सभी जातियों का सामान्य आदर्श अपने ही बंधनों से अपने (स्वयं) को बाँधना था।
(x) मनुष्य झगड़े-टंटे को अपना आदर्श नहीं मानता।
(xi) महाभारत में निर्वैर भाव, सत्य तथा अक्रोध (क्रोध रहित गुण) सब वर्गों का सामान्य धर्म कहा गया है।
(xii) ‘स्व’ का बंधन मनुष्य का स्वभाव है।

6. निम्नलिखित अनुच्छेद को सावधानीपूर्वक पढ़कर उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर अति संक्षेप में लिखिए।

1. देश-प्रेम है क्या? प्रेम ही तो है। इस प्रेम का आलंबन क्या है? सारा देश अर्थात् मनुष्य, पशु, पक्षी, नदी, नाले, वन, पर्वत सहित सारी भूमि। यह प्रेम किस प्रकार का है? यह साहचर्यगत प्रेम है। जिनके बीच हम रहते हैं, जिन्हें बराबर आँखों से देखते हैं, जिनकी बातें बराबर सुनते रहते हैं, जिनका हमारा हर घड़ी का साथ रहता है। सारांश यह है कि जिनके सान्निध्य का हमे अभ्यास पड़ जाता है, उनके प्रति लोभ या राग हो सकता है। देश-प्रेम यदि वास्तव में यह अंत:करण का कोई भाव है तो यही हो सकता है। यदि यह नहीं है तो वह कोरी बकवाद या किसी और भाव के संकेत के लिए गढ़ा हुआ शब्द है।

यदि किसी को अपने देश से सचमुच प्रेम है तो उसे अपने देश के मनुष्य, पशु, पक्षी, लता, गुल्म, पेड़, पत्ते, वन, पर्वत, नदी, निर्झर आदि सबसे प्रेम होगा, वह सबको चाहभरी दृष्टि से देखेगा, वह सबकी सुध करके विदेश में आँसू बहाएगा। जो यह भी नहीं जानते कि कोयल किस चिड़िया का नाम है, जो यह भी नहीं सुनते है कि चातक कहाँ चिल्लाता है, जो यह भी आँख भर नहीं देखते कि आम प्रणय-सौरभपूर्ण मंजरियों से कैसे लदे हुए हैं, जो यह भी नहीं झाँकते कि किसानों के झोपड़ों के भीतर क्या हो रहा है, ये यदि दस बने-ठने मित्रों के बीच प्रत्येक भारतवासी की औसत आमदनी का पता बताकर देश-प्रेम का दावा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि भाइयो! बिना रूप-परिचय का यह प्रेम कैसा? जिनके दुःख-सुख के तुम कभी साथी नहीं हुए, उन्हें तुम सुखी देखना चहते हो, यह कैसे समझें। उनसे कोसों दूर बैठे-बैठे, पड़े-पड़े या खड़े-खड़े तुम विलायती बोली में ‘अर्थशास्त्र की दुहाई दिया करो, पर प्रेम का नाम उसके साथ न घसीटो।’ प्रेम हिसाब-किताब नहीं है। हिसाब-किताब करने वाले भाड़े पर भी मिल सकते हैं, पर प्रेम करने वाले नहीं।

हिसाब-किताब से देश की दशा का ज्ञान मात्र हो सकता है। हित चिंतन और हितासाधन की प्रवृत्ति कोरे ज्ञान से भिन्न है। वह मन के वेग या ‘भाव’ पर अवलंबित है, उसका संबंध लोभ या प्रेम से है, जिसके बिना अन्य पक्ष में आवश्यक त्याग का उत्साह हो नहीं सकता।

पशु और बालक भी जिनके साथ अधिक रहते हैं, उनसे परच जाते हैं। यह परचना परिचय ही है। परिचय प्रेम का प्रवर्तक है। बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता। यदि देश-प्रेम के लिए हृदय में जगह करनी है तो देश के स्वरूप से परिचित और अभ्यस्त हो जाइए। बाहर निकलिए तो आँख खोलकर देखिए कि खेत कैसे लहलहा रहे हैं, नाले झाड़ियों के बीच कैसे बह रहे हैं, टेसू के फूलों से वनस्थली कैसी लाल हो रही है, कछारों में चौपायों के झुंड इधर-उधर चरते हैं, चरवाहे तान लड़ा रहे हैं, अमराइयों के बीच गाँव झाँक रहे हैं; उनमें घुसिए, देखिए तो क्या हो रहा है। जो मिले उनसे दो-दो बाते कीजिए, उनके साथ किसी पेड़ की छाया के नीचे घड़ी-आध-घड़ी बैठ जाइए और समझिए कि ये सब हमारे देश के हैं। इस प्रकार जब देश का रूप आपकी आँखों में समा जाएगा, आप उसके अंग-प्रत्यंग से परिचित हो जाएंगे, तब आपके अंत:करण में इस इच्छा का सचमुच उदय होगा कि वह कभी न छूटे, वह सदा हरा-भरा और फला-फूला रहे, उसके धनधान्य की वृद्धि हो, उसके सब प्राणी सुखी रहे।

पर आजकल इस प्रकार का परिचय बाबुओं की लज्जा का एक विषय हो रहा है। वे देश के स्वरूप से अनजान रहने या बनने में अपनी बड़ी शान समझते हैं। मैं अपने एक लखनवी दोस्त के साथ साँची का स्तूप देखने गया। वह स्तूप एक बहुत सुंदर छोटी-सी पहाड़ी के ऊपर है। नीचे छोटा-मोटा जंगल है, जिसमें महुए के पेड़ भी बहुत से हैं। संयोग से उन दिनों वहाँ पुरातत्व विभाग का कैंप पड़ा हुआ था। रात हो जाने से उस दिन हम लोग स्तूप नहीं देख सके, सवेरे देखने का विचार करके नीचे उतर रहे थे। वसंत का समय था। महुए चारों ओर टपक रहे थे। मेरे मुँह से निकला- “महुओं की कैसी महक आ रही है।” इस पर लखनवी महाशय ने चट मुझे रोककर कहा- “यहाँ महुए-सहुए का नाम न लीजिए, लोग देहाती समझेंगे।” मैं चुप हो रहा, समझ गया कि महुए का नाम जानने से बाबूपन में बड़ा भारी बट्टा लगता है। पीछे ध्यान आया कि वह वही लखनऊ है जहाँ कभी यह पूछने वाले भी थे कि गेहूँ का पेड़ आम के पेड़ से छोटा है या बड़ा।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का शीर्षक दीजिए।
(ख) ‘साहचर्यगत प्रेम’ से क्या आशय है
साथियों का प्रेम
साथ-साथ रहने के कारण उत्पन्न प्रेम
देश-प्रेम
इनमें से कोई नहीं।
(ग) अंत:करण का एक पर्यायवाची लिखिए।
(घ) ‘आँख भर देखना’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ङ) ‘प्रेम हिसाब-किताब नहीं है’ में क्या व्यंग्य है?
(च) देश-प्रेम का संबंध किससे है

  • हिसाब-किताब से
  • ज्ञान से
  • मन के वेग से
  • हितचिंतन से।

(छ) “परिचय प्रेम का प्रवर्तक है’- का क्या आशय है?
(ज) देश-प्रेम के लिए पहली आवश्यकता क्या है?
(झ) लेखक ने किन बाबुओं पर व्यंग्य किया है?
(ञ) लखनवी दोस्त ने लेखक को महुओं का नाम लेने से क्यों रोका?
(ट) लखनऊ के लोगों पर क्या कटाक्ष किया गया है?
(ठ) “विलायती बोली’ के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
(ड) लेखक की नजरों में रसखान देशप्रेमी क्यों हैं?
(ढ) पुरातत्व विभाग का क्या काम होता है?
(ण) ‘वन’ का पर्यायवाची ढूंढ़िए।
(त) हानि पहुँचना’ के लिए किस मुहावरे का प्रयोग हुआ है?
उत्तर
(क) देश-प्रेम और स्वदेश-परिचय।
(ख) साथ-साथ रहने के कारण उत्पन्न प्रेम।
(ग) हृदय।
(घ) तृप्त होकर देखना, जी भरकर देखना।
(ङ) देश का हिसाब-किताब रखना अर्थात् आर्थिक उन्नति के बारे में सोचना देश-प्रेम की पहचान नहींहै।
(च) मन के वेग से।।
(छ) परिचय से ही प्रेम का आरंभ होता है।
(ज) देशप्रेम के लिए पहली आवश्यकता है-देश को पूरी तरह जानना।
(झ) लेखक ने उन शहरी बाबुओं पर व्यंग्य किया है जिन्हें देश के देशी फूल-पत्तों का नाम सुनकर अपने देहाती होने का अपमान अनुभव होता है।
((ञ)) लखनवी दोस्त महुओं की सुगंध में देहातीपन महसूस करते थे। इसलिए उन्होंने लेखक को महुओं का नाम लेने से रोका।
(ट) लेखक ने लखनऊ के लोगों के अज्ञान पर कटाक्ष किया है। वहाँ के कुछ लोग गाँव, खेती और कृषि से बिल्कुल अनजान थे।
(ठ) अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग अंग्रेजी बोलकर देशहित की कितनी ही बातें करें, किंतु वे सच्चे देशप्रेमी नहीं हो सकते।
(ड) लेखक की नजरों में रसखान को देश की ब्रजभूमि से असीम प्रेम है। इसलिए वे सच्चे देशप्रेमी हैं।
(ढ) पुरातत्व विभाग का काम देश की पुरानी धरोहरों को सुरक्षित रखना होता है।
(ण) जंगल
(त) बट्टा लगना।

7. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर संबंधित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दीजिए।

एक आदमी को व्यर्थ बक-बक करने की आदत है। यदि वह अपनी आदत को छोड़ता है, तो वह अपने व्यर्थ बोलने के अवगुण को छोड़ता है। किंतु साथ ही। अनायास ही वह मितभाषी होने के सदगण को अपनाता चला जाता है। यह तो हुआ ‘हाँ’ पक्ष का उत्तर। किंतु एक दूसरे आदमी को सिगरेट पीने का अभ्यास है। वह सिगरेट पीना छोड़ता है और उसके बजाय दूध से प्रेम करना सीखता है, तो सिगरेट पीना छोड़ना एक अवगुण को छोड़ना है और दूध से प्रेम जोड़ना एक सद्गुण को अपनाना है। दोनों ही भिन्न वस्तुएँ हैं- पृथक-पृथक।

अवगुण को दूर करने और सद्गुण को अपनाने के प्रयत्न में, मैं समझता हूँ कि अवगणों को दर करने के प्रयत्नों की अपेक्षा सदगणों को अपनाने का ही महत्त्व अधिक है। किसी कमरे में गंदी हवा और स्वच्छ वायु एक साथ रह ही नहीं सकती। कमरे में हवा रहे ही नहीं, यह तो हो ही नहीं सकता। गंदी हवा को निकालने का सबसे अच्छा उपाय एक ही है-सभी दरवाजे और खिड़कियाँ खोलकर स्वच्छ वायु को अंदर आने देना।

अवगुणों को भगाने का सबसे अच्छा उपाय है, सद्गुणों को अपनाना। ऐसी बातें पढ-सनकर हर आदमी वह बात कहता सनाई देता है जो किसी समय बेचारे दुर्योधन के मुँह से निकली थी-

“धर्म जानता हूँ, उसमें प्रवृत्ति नहीं।
अधर्म जानता हूँ, उससे निवृत्ति नहीं।”

एक आदमी को कोई कुटेव पड़ गई- सिगरेट पीने की ही सही। अत्यधिक सिनेमा देखने की ही सही। बेचारा बहुत संकल्प करता है, बहुत कसमें खाता है कि अब सिगरेट न पीऊँगा, अब सिनेमा देखने न जाऊँगा, किंतु समय आने पर जैसे आप ही आप उसके हाथ सिगरेट तक पहुँच जाते हैं और सिगरेट उसके मुँह तक। बेचारे के पाँव सिनेमा की ओर जैसे आप-ही-आप बढ़े चले जाते हैं।

क्या सिगरेट न पीने का और सिनेमा न देखने का उसका संकल्प सच्चा नहीं? क्या उसने झूठी कसम खाई है? क्या उसके संकल्प की दृढ़ता में कमी है? नहीं, उसका संकल्प तो उतना ही दृढ़ है जितना किसी का हो सकता है। तब उसे बार-बार असफलता क्यों होती है?

इस असफलता का कारण और सफलता का रहस्य कदाचित इस एक ही उदाहरण से समझ में आ जाए।
जमीन पर एक छ: इंच या एक फुट लंबा-चौड़ा लकड़ी का तख्ता रखा है। यदि आपसे उस पर चलने के लिए कहा जाए तो आप चल सकेंगे?

कोई पूछे क्यों? आप इसके अनेक कारण बताएँगे। सच्चा कारण एक ही है। आप नहीं चल सकते, क्योंकि आप समझते है आप नहीं चल सकते। यदि आप विश्वास कर लें कि आप चल सकते हैं, और उसी लकड़ी के तख्ते को थोड़ा-थोड़ा जमीन से ऊपर उठाते हुए उसी पर चलने का अभ्यास करें तो आप उस पर बड़े आराम से चल सकेंगे। सरकस वाले पतले-पतले तारों पर कैसे चल लेते हैं? वे विश्वास करते हैं कि वे चल सकते हैं, तदनुसार अभ्यास करते हैं और वे चल ही लेते हैं।

यदि आप किसी अवगुण को दूर करना चाहते हैं, तो उससे दूर रहने के दृढ़ संकल्प करना छोड़िए, क्योंकि जब आप उससे दूर-दूर रहने की कसमें खाते हैं, तब भी आप उसी का चिंतन करते हैं। चोरी न करने का संकल्प भी चोरी का ही संकल्प है। पक्ष में न सही, विपक्ष में सही। है तो चोरी के ही बारे में। चोरी न करने की इच्छा रखने वाले को चोरी के संबंध में कोई संकल्प-विकल्प नहीं करना चाहिए।

हम यदि अपने संकल्प-विकल्पों द्वारा अपने अवगुणों को बलवान न बनाएँ तो हमारे अवगुण अपनी मौत आप मर जाएँगे।
आपकी प्रकृति चंचल है, आप अपने ‘गंभीर स्वरूप’ की भावना करें। यथावकाश अपने मनमें ‘गंभीर स्वरूप’ का चित्र देखें। अचिरकाल से ही आपकी प्रकृति बदल जाएगी।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) ‘अनायास’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
(ग) मितभाषी का विपरीतार्थक लिखिए।
(घ) “पृथक्’ और ‘अभ्यास’ के कौन-कौन से पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त हुए
(ङ) गंदी हवा को दूर करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है?
(च) अवगुण को दूर करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है?
(छ) ‘धर्म जानता हूँ, उसमें प्रवृत्ति नहीं’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ज) ‘अधर्म जानता हूँ, उसमें निवृत्ति नहीं’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(झ) लेखक अवगुणों को छोड़ने का संकल्प क्यों नहीं करना चाहता?
(ञ) अवगुण कब अपनी मौत मर जाते हैं?
(ट) ‘तुरंत’ या ‘शीघ्र’ के लिए किस नए शब्द का प्रयोग किया गया है।
(ठ) चंचल स्वभाव को छोड़ने के लिए क्या करना चाहिए?
(ड) ‘अनायास’ का संधिविच्छेद कीजिए।
उत्तर
(क) सद्गणों को अपनाने के उपाय।
(ख) बिना प्रयास किए।
(ग) अतिभाषी, वाचाल।
(घ) पृथक् – भिन्न
अभ्यास – आदत।
(ङ) गंदी हवा को दूर करने का सर्वोत्तम उपाय है- स्वच्छ हवा को आने देना।
(च) अवगुण को दूर करने का सर्वोत्तम उपाय है- सद्गुणों को अपनाना।
(छ) इसका आशय है- मैं धर्म के सारे लक्षण तो जानता हूँ किंतु उस ओर मेरा रुझान नहीं है। मैं धर्म को अपनाने में रुचि नहीं ले पाता।
(ज) इसका आशय है- मैं अधर्म के लक्षण जानता हूँ किंतु जानते हुए भी उनसे बच नहीं पाता। मैं अधर्म के कार्यों में फंस जाता हूँ।
(झ) लेखक अवगुणों को छोड़ने का संकल्प इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि उससे अवगुण और पक्के होते हैं। उससे अवगुण चिंतन के केंद्र में आ जाते हैं।
(ञ) अवगुणों के बारे में कोई निश्चय-अनिश्चय न किया जाए तो वे अपनी मौत स्वयं पर जाते हैं, अर्थात् अपने-आप नष्ट हो जाते हैं।
(ट) अचिरकाल
(ठ) चंचल स्वभाव को छोड़ने के लिए अपने सामने अपने गंभीर रूप की भावना करनी चाहिए।
(ड) अन +आयास।

8. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

भारत वर्ष बहुत पुराना देश है। उसकी सभ्यता और संस्कृति भी बहुत पुरानी है। भारतवासियों को अपनी सभ्यता और संस्कृति पर बड़ा गर्व है। वैज्ञानिक आविष्कारों द्वारा प्राप्त नए साधनों को अपनाते हुए भी जब अनेक अन्य देशवासी अपने पुराने रहन-सहन और रीति-रिवाज को बदलकर नए तरीके से जीवन बिताने लगे तब भी भारतवासी अपनी पुरानी सभ्यता और संस्कृति पर डटे रहे और बहुत काल तक यह देश ऋषि मुनियों का देश ही कहलाता रहा। विश्व के मानव-जीवन के उस नए दौर का असर पूर्ण रूप से भारतवासियों पर पड़ा नहीं।

हवाई जहाज की सैर की सुविधा के मिलने के बाद भी पैदल की जाने वाली तीर्थ यात्राएँ होती ही रहीं। पाँच नक्षत्रवाले होटलों में ‘शावरबाथ’ की सुविधाओं के होते हुए भी गंगा-स्नान और संध्या-वंदन का दौर चलता ही रहा। कारण यह है कि जब जीवन में उन्नति के लिए अन्य देशवासी नए आविष्कारों और उनके द्वारा प्रदान की गई सुविधाओं के पीछे भाग रहे थे, तब भी भारतवासियों का अपने रीति-रिवाज और रहन-सहन पर पूरा विश्वास था और संपूर्ण रूप से नए आविष्कारों का शिकार होना नहीं चाहते थे। इसका कारण यह भी था कि विज्ञान के आविष्कारों के नाम से जीवन को आसान बनवाने वाली सुविधाओं को अपने देहाती ढंग से प्राप्त करके जीने का तरीका प्राचीन काल से भारतवासी जानते थे।

इसी भाँति छोटी क्षेत्रफल वाली जमीन को जोतने की बात तो अलग है। पर आज ट्रैक्टरों का इस्तेमाल करके विशाल क्षेत्रफल वाली भूमि को भी थोड़ी ही देर में आसानी से जोत डालने की सुविधा तो है। इसका मतलब यह नहीं था कि हमारे पूर्वज इस प्रकार की सुविधाओं के अभाव से विशाल क्षेत्रफल वाली भूमि को जोतते ही नहीं थे। उस जमाने में भी उस समय पर प्राप्त सामग्रियों का इस्तेमाल करके विशाल से विशाल भूमि को भी जोत डालते ही थे। ऐसी विशाल जमीन के चारों ओर सबसे पहले एक छोटे से द्वार मात्र को छोड़कर आट लगाते थे। पूरी जमीन पर जंगली पौधे अपने आप उग लेंगे ही। फिर सिर्फ एक रात्रि मात्र के लिए जमीन पर जंगली सूअरों को भगाकर द्वार बंद कर देते थे। पौधों की जड़ को खाने के उत्साह से जंगली सूअर जमीन खोदने लगेंगे। सुबह देखने पर पूरी जमीन जोतने के बराबर हो जाएगी। बाद में सूअरों को भगाकर जमीन समतल कर लेते थे। और खेती बारी करते थे।

उस कार्य के पीछे विज्ञान का नाम मात्र न था। यह कहना अत्युक्ति न होगी कि ट्रेक्टर नाम के इस नए आविष्कार के प्रेरक तो जंगली सूअर ही थे। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक साधनों का पूरा फायदा उठाना हमारे पूर्वज खूब जानते थे। बाद में वैज्ञानिकों ने जो सुविधाएँ प्रदान की थी, उनमें से अधिकांश को पूर्वकाल में ही प्रकृति पर निर्भर होकर हमारे पूर्वजों ने पा लिया था। यही कारण था कि नए आविष्कारों पर उन्हें इतना विस्मय न था जिनता अन्य देशवासियों को था। यही कारण था कि हम अपनी पुरानी सभ्यता और संस्कृति पर डटे रहे।

चिकित्सा और औषधियों के मामलों पर भी बात यही थी। रोगों से छुटकारा पाने के लिए जो काम आज दवा की गोलियाँ किया करती हैं, उसे जंगली बूटियाँ करती थीं। मृत व्यक्ति को जीवित कराने के लिए भी बूटियाँ उपलब्ध थीं। श्रीमद् रामायण में संजीवनी बूटी का जो उल्लेख हुआ है, वह इस बात का साक्षी है। प्राचीनकाल के सिद्ध जो थे, वे तपश्चर्या करने के साथ-साथ वैद्य का काम भी किया करते थे। पहाड़ियों में विचरण करना और विशिष्ट प्रकार की दवा बूटियों को ढूँढ लेना भी उनका काम था। विभिन्न प्रकार के रोगों के निवारण के लिए तरह-तरह की बूटियों को खोज रखा था उन्होंने। आज भी भारत के पहाड़ी इलाकों में बसे घने जंगलों में विभिन्न प्रकार के रोगों के लिए बूटियों का होना वैज्ञानिकों द्वारा मान लिया गया है।

प्रश्न
(क) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखें।
(ख) आज तीर्थ-यात्राएँ किस प्रकार संपन्न की जाती हैं?
(ग) पाँच. नक्षत्र वाले होटल से क्या तात्पर्य है?
(घ) शावरबाथ और संध्या-वंदन शब्दों का अर्थ स्पष्ट करें।
(ङ) ट्रैक्टर से आविष्कार की प्रेरणा किस से मिली?
(च) रामायण में संजीवनी बूटी का प्रयोग किस पात्र पर किया गया?
(छ) अत्युक्ति का क्या आशय है?
(ज) साक्षी व तपश्चर्या शब्दों का अर्थ बताओ।
(झ) आट लगाना का क्या अर्थ है?
(ञ) भारतीय जन अपनी प्राचीन रीतियों को क्यो अपनाते चले आ रहे हैं?
(ट) ट्रैक्टर के आने से पहले भारतीय लोग अपनी विशाल धरती को किनकी सहायता से जोतते थे?
(ठ) प्राचीन भारत में दवा की गोलियों की बजाय किससे काम लिया जाता था?
(ड) संजीवनी बूटी किसे कहा जाता था?
(ढ) ‘भारतवासी’ का विग्रह करके समास का नाम लिखिए।
(ण) ‘रहन-सहन’ में कौन-सा समास है?
उत्तर
(क) महान भारतीय संस्कृति।
(ख) पैदल चलकर।
(ग) पाँच सितारा होटल। (Five Star Hotel)
(घ) शावरबाथ – फव्वारे द्वारा किया गया. स्नान संध्या-वंदन – सायंकाल होने वाली पूजा-अर्चना।
(ङ) ट्रैक्टर के आविष्कार के प्रेरक जंगली सूअर थे।
(च) संजीवनी बूटी का प्रयोग लक्ष्मण पर किया गया।
(छ) अत्युक्ति अर्थात् अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा कर कहना।
(ज) साथी – गवाह तपश्चर्या – तप करने की क्रिया, तपस्या करना।
(झ) आट लगाना अर्थात् बाड़ लगाना, घेराबंदी करना।
(ञ) भारतीय जन अपनी रीतियों पर आस्था रखने के कारण ही उन्हें आज तक अपनाते चले आ रहे हैं।
(ट) ट्रैक्टर के आने से पहले भारतीय लोग अपनी विशाल धरती को सूअरों की सहायता से जोत डालते थे।।
(ठ) जड़ी-बूटियों और प्रभावकारी वनस्पतियों से।
(ड) वह बूटी, जिसे खाकर मरा हुआ मनुष्य भी जीवित हो उठता है।
(ढ) भारत का वासी; तत्पुरुष समास।
(ण) द्वंद्व समास।

9. नीचे दिये गये गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए:

शास्त्री जी की एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे एक सामान्य परिवार में पैदा हुए थे, सामान्य परिवार में ही उनकी परवरिश हुई और जब वे देश के प्रधानमंत्री जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर पहुंचे, तब भी वह सामान्य ही बने रहे।’ विनम्रता, सादगी और सरलता उनके व्यक्तित्व में एक विचित्र प्रकार का आकर्षण पैदा करती थी। इस दृष्टि से शास्त्री जी का व्यक्तित्व बापू के अधिक करीब था और कहना न होगा कि बापू से प्रभावित होकर ही सन् 1921 ई० में उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ी थी। शास्त्री जी पर भारतीय चिन्तकों, डॉ. भगवानदास तथा बापू का कुछ ऐसा प्रभाव रहा कि वह जीवन-भर उन्हीं के आदर्शों पर चलते रहे और औरों को इसके लिए प्रेरित करते रहे। शास्त्री जी के संबंध में मुझे बाइबिल की वह उक्ति बिल्कुल सही जान पड़ती है कि विनम्र ही पृथ्वी के वारिस होंगे।

शास्त्री जी ने हमारे देश के स्वतंत्रता-संग्राम में तब प्रवेश किया था, जब वे एक स्कूल के विद्यार्थी थे और उस समय उनकी उम्र 17 वर्ष की थी। गाँधीजी के आह्ववान पर वे स्कूल छोड़कर बाहर आ गये थे। इसके बाद काशी विद्यापीठ में उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। उनका मन हमेशा देश की आजादी और सामाजिक कार्यों की ओर लगा रहा। परिणाम यह हुआ कि सन् 1926 ई. में वे ‘लोक सेवा मंडल’ में शामिल हो गए, जिसके वे जीवन-भर सदस्य रहे। इसमें शामिल होने के बाद से शास्त्री जी ने गाँधी जी के विचारों के अनुरूप अछूतोद्वार के काम में अपने आपको लगाया। यहाँ से शास्त्री जी के जीवन का नया अध्याय प्रारंभ हो गया। सन् 1930 ई० में जब ‘नमक कानून तोड़ों आंदोलन’ शुरू हुआ, तो शास्त्रीजी ने उसमें भाग लिया जिसके परिणामस्वरूप उनहें जेल जाना पड़ा। यहाँ से शास्त्री जी की जेल-यात्रा की जो शुरूआत हुई तो वह सन् 1942 ई. में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन तक निरंतर चलती रही। इन 12 वर्षों के दौरान वे सात बार जेल गये। इसी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनके अंदर देश की आजादी के लिए कितनी बड़ी ललक थी। दूसरी जेल-यात्रा उन्हें सन् 1932 ई. में किसान आंदोलन में भाग लेने के लिए करनी पडी। सन् 1942 ई. की उनकी जेल-यात्रा 3 वर्ष की था, जा सबस लंबी जेल-यात्रा थी।

इस दौरान शास्त्री जी जहाँ तक एक ओर गाँधीजी द्वारा बताये गये रचनात्मक कार्यों में लगे हुए थे, वहीं दूसरी ओर पदाधिकारी के रूप में जनसेवा के कार्यों में भी लगे रहे। इसके बाद के 6 वर्षों तक वे इलाहाबद की नगरपालिका से किसी न किसी रूप से जुड़े रहे। लोकतंत्र की इस आधारभूत इकाई में कार्य करने के कारण वे देश की छोटी-छोटी समस्याओं और उनके निराकरण की व्यावहारिक प्रक्रिया से अच्छी तरह परिचित हो गये थे। कार्य के प्रति निष्ठा और मेहनत करने की अदम्य क्षमता के कारण सन् 1937 ई० में वे संयुक्त प्रांतीय व्यवस्थापिका सभा के लिए निर्वाचित हुए। सही मायने में यहीं से शास्त्री जी के संसदीय जीवन की शुरुआत हुई, जिसका समापन, देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने में हुआ।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) शास्त्री जी के व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने वाले गुण कौन-कौन से थे?
(ग) किस गुण के कारण शास्त्री जी का जीवन गाँधी जी के करीब था?
(घ) ‘विनम्र ही पृथ्वी के वारिस होंगे’ का क्या आशय है?
(ङ) शास्त्री जी ने स्वतंत्रता-आंदोलन में भाग लेने की शुरूआत कब से की?
(च) शास्त्री जी सन् 1942 ई० में किस सिलसिले में जेल गए?
(छ) बारह वर्षों के दौरान शास्त्री जी कितनी बार जेल गये?
(ज) शास्त्री जी ने जनसेवक के रूप में किस नगर की सेवा की?
(झ) किस ई० में शास्त्री जी संयुक्त प्रांतीय व्यवस्थापिका सभा के लिए निर्वाचित हुए?
(ञ) ‘अछूतोद्वार’ का सविग्रह समास बताएँ।
(ट) “ललक’ के दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
(ठ) इस गद्यांश से उर्दू के दो शब्द छाँटकर लिखिए।
उत्तर
(क) कर्मयोगी लाल बहादुर शास्त्री।
(ख) विनम्रता, सादगी और सरलता।
(ग) सादगी, सरलता और कर्मनिष्ठा के कारण।
(घ) प्रलयोपरांत विनम्र लोग ही बचेंगे जो धरती के सब सुख को भोग सकेंगे।
(ङ) 17 वर्ष की उम्र में विद्यार्थी जीवन से।
(च) भारत छोड़ो आंदोलन के सिलसिले में।
(छ) सात बार।
(ज) इलाहाबाद नगरपालिका की
(झ) 1932 ई.
(ञ) अछूतों का उद्वार-तत्पुरूष समास
(ट) ललक-उत्सुकता, व्यग्रतम।
(ठ) वारिस, परवरिश।

10. नीचे दिये गये गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

हँसी भीतरी आनन्द का बाहरी चिन्ह है। जीवन की सबसे प्यारी और उत्तम से-उत्तम वस्तु एक बार हँस लेना तथा शरीर को अच्छा रखने की अच्छी-से-अच्छी दवा एक बार खिलखिला उठना है। पुराने लोग कह गये हैं कि हँसो और पेट फुलाओ। हँसी कितने ही कला-कौशलों से भली है। जितना ही अधिक आनंद से हँसोगे उतनी ही आयु बढ़ेगी। एक यनानी विद्वान कहता है कि सदा अपने कर्मों खींझने वाला हेरीक्लेस बहुत कम जिया. पर प्रसन्न मन डेमोक्रीटस 109 वर्ष तक जिया। हँसी-खुशी ही का नाम जोवन है। जो रोते हैं, उनका जीवन व्यर्थ है। कवि कहता है ‘जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है. मर्दादिल खाक जिया करते हैं।

मनुष्य के शरीर के वर्णन पर एक विलायती विद्वान ने एक पुस्तक लिखी है। उसमें वह कहता है कि उत्तम सुअवसर की हँसी उदास-से-उदास मनुष्य के चित्त को प्रफुल्लित कर देती है। आनन्द एक ऐसा प्रबल इंजन है कि उससे शोक और दुःख की दीवारों को ढा सकते हैं। प्राण-रक्षा के लिए सदा सब देशों में उत्तम-से-उत्तम मनुष्य के चित्त को प्रसन्न रखना है। सुयोग्य वैद्य अपने रोगी के कानों में आनंदरूपी मंत्र सुनाता है।

एक अँगरेज डॉक्टर कहता है कि किसी नगर में दवाई लदे हुए बीस गधे ले जाने से एक हँसोड़ आदमी को ले जाना अधिक लाभकारी है। डॉक्टर हस्फलेंड ने एक पुस्तक में आयु बढ़ाने का उपाय लिखा है। वह लिखता है कि हँसी बहुत उत्तम चीज है। यह पाचन के लिए है। इससे अच्छी औषधि और नहीं है। एक रोगी ही नहीं, सबके लिए हँसी बहुत काम की वस्तु है। हँसी शरीर के स्वास्थ्य का शुभ संवाद देने वाली है। वह एक साथ ही शरीर और मन को प्रसन्न करती है। पाचन-शक्ति बढ़ाती है, रक्त को चलाती और अधिक पसीना लाती है।

हँसी एक शक्तिशाली दवा है। एक डॉक्टर कहता है कि वह जीवन की. मीठी मदिरा है। डॉक्टर यूंड कहता है कि आनन्द से बढ़कर बहुमूल्य वस्तु मनुष्य के पास और नहीं है। कारलाइस एक राजकुमार था। वह संसार त्यागी हो गया था। वह कहता है कि जो जी से हँसता है, वह कभी बुरा नहीं होता। जी से हँसो, तुम्हें अच्छा लगेगा। अपने मित्र को हँसाओ, वह अधिक प्रसन्न होगा। शत्रु को हँसाओ, तुमसे कम घृणा करेगा। एक अनजान को हँसाओ, तुम पर भरोसा करेगा। उदास को हँसाओ, उसका दु:ख घटेगा। निराश को हँसाओ, उसकी आयु बढ़ेगी। एक बालक को हँसाओ, उसके स्वास्थ्य में वृद्धि होगी। वह प्रसन्न और प्यारा बालक बनेगा। पर हमारे जीवन का उद्देश्य केवल हँसी ही नहीं, हमको बहुत काम करने हैं, तथापि उन कामों में, कष्टों में और चिन्ताओं में एक सुन्दर आन्तरिक हँसी बड़ी प्यारी वस्तु भगवान ने दी है।

प्रश्न
(क) हँसी भीतरी आनन्द को कैसे प्रकट करती है?
(ख) पुराने समय में लोगों ने हँसी को महत्त्व क्यों दिया?
(ग) हँसी को एक शक्तिशाली इंजन की तरह क्यों माना गया है?
(घ) हेरीक्लेस और डेमोक्रीटस के उदाहरण से लेखक क्या स्पष्ट करना चाहते हैं?
(ङ) एक अँगरेज डॉक्टर ने क्या कहा है?
(च) डॉक्टर हस्फलेंड ने एक पुस्तक में आयु बढ़ाने का क्या उपाय लिखा है?
(छ) हँसी किस प्रकार एक शक्तिशाली दवा है?
(ज) इस गद्यांश में हँसी का क्या महत्त्व बताया गया है?
(झ) हँसी सभी के लिए उपयोगी किस प्रकार है?
(ञ) मित्र मंडली’ का सविग्रह समास बनायें।
(ट) ‘प्रफुल्लित’ शब्द में प्रयुक्त प्रत्यय अलग कीजिए।
(ठ) ‘तथापि’ का संधि-विच्छेद कीजिए।
उत्तर
(क) हँसी भीतरी आनन्द का बाहरी चिन्ह है। हँसी जीवन में उल्लास, उमंग और प्रसन्नता का संचार करती है।
(ख) पुराने समय में लोगों ने हँसी को महत्त्व इसीलिए दिया कि हँसी अनेक कला-कौशलों से अच्छी है। .
(ग) हँसी को एक शक्तिशाली इंजन की तरह इसीलिए माना गया है क्योंकि उससे शोक और दुःख की दीवारों को ढाया जा सकता है।
(घ) लेखक यही स्पष्ट करना चाहते हैं कि प्रसन्नता आय को बढाती है।
(ङ) एक अँगरेज डॉक्टर ने कहा है कि किसी नगर में दवाई लदे हुए बीस गधे ले जाने से एक हँसोड़ आदमी को ले जाना अधिक लाभकारी है।
(च) उसने लिखा है कि हँसी बहुत उत्तम चीज है। वह पाचन के लिए है। इससे अच्छी औषधि और नहीं है।
(छ) हँसी पाचन-शक्ति बढ़ाती है, रक्त को चलाती है और अधिक पसीना लाती है।
(ज) हँसी सर्वोत्तम औषधि है। हँसी प्राणदायक तथा आयु-वर्द्धक है।
(झ) सचमुच हँसी सभी के लिए उपयोगी है। यह उदास और निराश व्यक्ति में प्रसन्नता और आशा का संचार करती है।
(ञ) मित्र-मंडली = मित्रों की मंडली-तत्पुरुष समास।
(ट) इत (प्रत्यय)।
(ठ) तथा + अपि।

प्रश्न 11.
नीचे दिये गये गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए।

तुम्हें क्या करना चाहिए, इसका ठीक-ठीक उत्तर तुम्हीं को देना होगा, दूसरा कोई नहीं दे सकता। कैसा भी विश्वास-पात्र मित्र हो, तुम्हारे इस काम को वह अपने नहीं दे सकता। कैसा भी विश्वास-पात्र मित्र हो, तुम्हारे इस काम को वह अपने ऊपर नहीं ले सकता। हम अनुभवी लोगों की बातों को आदर के साथ सुने, बुद्धिमानों की सलाह को कृतज्ञतापूर्वक मानें, पर इस बात को निश्चित समझकर कि हमारे कामों से ही हमारी रक्षा व हमारा पतन होगा, हमें अपने विचार और निर्णय की स्वतंत्रता को दृढ़तापूर्वक बनाये रखना चाहिए। जिस पुरूष की दृष्टि सदा नीची रहती है, उसका सिर कभी ऊपर न होगा। नीची दृष्टि रखने से यद्यपि रास्ते पर रहेंगे, पर इस बात को न देखेंगे कि यह रास्ता कहाँ ले जाता है। चित्त की स्वतंत्रता का मतलब चेष्टी की कठोरता या प्रकृति की उग्रता नहीं है। अपने व्यवहार में कोमल रहो और अपने उद्देश्यों को उच्च रखो. इस प्रकार नम्र और उच्चाशय दोनों बनो। अपने मन को कभी मरा हुआ न रखों। जो मनुष्य अपना लक्ष्य जितना ही ऊपर रखता है, उतना ही उसका तीर ऊपर जाता है।

संसार में ऐसे-ऐसे दृढ़ चित्त मनुष्य हो गये हैं जिन्होंने मरते दम तक सत्य की टेक नहीं छोड़ी, अपनी आत्मा के विरूद्ध कोई काम नहीं किया। राजा हरिश्चंद्र के ऊपर इतनी-इतनी विपत्तियाँ आयीं, पर उन्होंने अपना सत्य नहीं छोड़ा। उनकी प्रतिज्ञा यही रही-

“चंद्र टरै, सूरज टरै, टरै जंगत व्यवहार।
पै दृढ़ श्री हरिश्चंद्र कौ, टरै न सत्य विचार।।”

महाराणा प्रताप सिंह जंगल-जंगल मारे-मारे फिरते थे, अपनी स्त्री और बच्चों को भूख से तड़पते देखते थे, परंतु उन्होंने उन लोगों की बात न मानी जिन्होंने उन्हें अधीनतापूर्वकं जीते रहने की सम्मति दी, क्योंकि वे जानते थे कि अपनी मर्यादा की चिंता जितनी अपने को हो सकती है उतनी दूसरे को नहीं। एक इतिहासकार कहता है-“प्रत्येक मनुष्य का भाग्य उसके हाथ में है। प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन-निर्वाह श्रेष्ठ रीति से कर सकता है। यही मैंने किया है और यदि अवसर मिले तो यही करूँ। इसे चाहे स्वतंत्रता कहो ‘चाहे आत्मा-निर्भरता कहो’ चाहे स्वावलंबन कहो, जो कुछ कहो वही भाव है जिससे मनुष्य और दास में भेद जान पड़ता है, यह वही भाव है जिसकी प्रेरणा से राम-लक्ष्मण ने घर से निकल बड़े-बड़े पराक्रमी वीरों पर विजय प्राप्त की यह वही भाव है जिसकी प्रेरणा से कोलंबस ने अमेरिका समान बडा महाद्वीप ढूंढ निकाला। चित्त की इसी वृत्ति के बल पर कुंभनदास ने अकबर के बुलाने पर फतेहपुर सीकरी जाने से इनकार किया और कहा था-

‘मोको कहा सीकरी सो काम।’ ।
इस चित्त वृत्ति के बल पर मनुष्य इसीलिए परिश्रम के साथ दिन काटता है और दरिद्रता के दु:ख को झेलता है। इसी चित्त-वृत्ति के प्रभाव से हम प्रलोभनों का निवारण करके उन्हें सदा पद-दलित करते हैं। कुमंत्रणाओं का निस्तार करते हैं और शुद्ध चरित्र के लोगों से प्रेम और उनकी रक्षा करते हैं।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) लेखक नीची दृष्टि न रखने की सलाह क्यों देते हैं?
(ग) मन को मरा हुआ रखने का क्या आशय है?
(घ) किसका तीर ऊपर जाता है और क्यों?
(ङ) महाराणा प्रताप ने गुलामी स्वीकार करने की सलाह क्यों नहीं मानी?
(च) कोलंबस और हनुमान ने किस गुण के बल पर महान कार्य किये?
(छ) मनुष्य किस आधार पर प्रलोभनों को पद-दलित कर पाते हैं?
(ज) टेक का पर्यायवाची इसी गद्यांश से ढूँढ़कर लिखिए।
(झ) विश्वासपात्र और पतन का विलोम शब्द ढूँढ़कर लिखिए।
(ञ) सम्मति का उपसर्ग अलग कीजिए।
(ट) आत्मनिर्भरता का पर्यायवाची लिखिए।
(ठ) श्रेष्ठ, उत्तम, दृढ और उच्च में से अलग अर्थ वाले शब्द को चुनकर लिखिए।
उत्तर
(क) आत्मनिर्भरता का महत्त्व।
(ख) नीची दृष्टि रखने से मनुष्य को उन्नति पाने में बाधा होती है।
(ग) मन को उत्साहहीन, निराश, उदास और पराजित बनाये रखना।
(घ) जिसका लक्ष्य जितना ऊँचा होता है, उसका तीर उतना ही ऊपर जाता है क्योंकि लक्ष्य ऊँचा रखने से ही प्रयत्न का अवसर प्राप्त हो पाता है।
(ङ) महाराणा प्रताप जानते थे कि व्यक्ति को अपनी मर्यादा अपने कर्म से बनानी होती है। इसीलिए उन्होंने गुलामी स्वीकार करने की सलाह नहीं मानी।
(च) आत्मनिर्भरता के बल पर।
(छ) स्वावलंबन के आधार पर।
(ज) टेक = प्रतिज्ञा, संकल्प आन।
(झ) विश्वासपात्र = विश्वासघाती। पतन = उत्थान।
(ञ) सम्
(ट) आत्मनिर्भरता = स्वावलंबन, स्वतंत्रता।

12. नीचे दिये गये गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए

सालों पहले कुशीनगर गया था। वहाँ बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा के पास खड़े होकर एक अलग किस्म का अनुभव हुआ था। उस वक्त तो ठीक-ठीक नहीं समझ पाया था लेकिन बाद में मुझे महसूस हुआ कि वहाँ एक अलग तरह की शांति मिली थी। अब किसी भी बुद्ध प्रतिमा को देखता हूँ तो असीम शांति का अहसास होता है। वहाँ खड़े होकर आपको महसूस होता है कि उन्हें करुण का महासागर क्यों कहा जाता है?

अक्सर सोचता हूँ कि असीम शांति कैसे हासिल हो सकती है? क्या दुख को साधे बिना उसे पाया जा सकता है? आखिर बुद्ध ने जब दुख को साधा तभी तो वह असीम शांति का अनुभव कर सके।

शायद बुद्ध के वजह से ही बौद्ध धर्म या दर्शन ने दुख या मानवीय पीड़ा पर इतना विचार किया। दरअसल, बौद्ध या दर्शन तो पीड़ा और दुख से ही निकल कर. आया था। बुद्ध का पूरा जीवन ही उस दुख और पीड़ा से जूझने में बीता।

बुद्ध ने अपने पूर्वजों की तरह दुख को नकारा नहीं था। जीवन में दुख को स्वीकार करने की वजह से ही वह अपने पार पाने की सोच सके। और उस दुख से पार पाने के लिए तथागत ने किसी चमत्कार या करिश्मे का सहारा नहीं लिया।

सचमुच बुद्ध ने कोई चमत्कार नहीं किया। आमतौर पर धर्म और अध्यात्म की दुनिया तो चमत्कार को एक जरूरी चीज के तौर पर मानती रही है। हाल का उदाहरण मदर टेरेसा का है। मदर को ही कैथोलिक चर्च ने चमत्कार के बिना संत कहाँ माना था?

बुद्ध ही अपने बेटे को खो चुकी और चमत्कार की आस में आयी माँ से कह सकते थे कि जाओ गाँव में किसी घर से एक मुट्ठी चावल ले आओ जहाँ कोई मौत न हुई हो।

अपने बेटे को खो चुकी माँ के लिए उन्होंने कोई चमत्कार नहीं किया था। महज एक उदाहरण से समझा दिया था कि मौत या दुख एक सच्चाई है। उसे कोई चमत्कार बदल नहीं सकते साथ जीने की कोशिश करनी होती है।

इसलिए बुद्ध ही कह सकते थे कि जीवन है तो दुख है। यानी आप दुख से बच ही नहीं सकते। लेकिन यह भी बुद्ध ही कह सकते थे कि जीवन है तो दुख है लेकिन उससे पार पाना ही जीवन है।

उस दुख से पार पाने के लिए बुद्ध किसी भी शरण में जाने को नहीं कहते हैं। वह तो ‘अप्प दीपो भव’ यानी अपने दीपक खुद बनों का मंत्र देते हैं।
मतलब, दुख को भी अपनी निगाहों से देखो। दुख अगर अंधेरा है तो अपने दीपक से उस अंधेरे को हटाओ। किसी और दीपक की रोशनी में न तो अपने दुखों को देखो न ही अपने दुखों को हटाने के लिए दूसरी रोशनी को बाट जोहो। आज बुद्ध पूर्णिमा है। क्या हमें अपने दीपक और उसकी रोशनी में जिंदगी को देखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए?
(ख) लेखक को बुद्ध की प्रतिमा के सामने कैसा अनुभव हुआ?
(ग) बुद्ध असीम शांति का अनुभव कब कर सके?
(घ) बद्ध ने अपना परा जीवन किससे जझने में व्यतीत कर दिया?
(ङ) दुख से पार पाने के लिए बुद्ध ने क्या किया?
(च) अपने मरे हुए बेटे को चमत्कार की आशा में आयी माँ को बुद्ध ने क्या कहा?
(छ) बुद्ध ने जीवन किसे माना है?
(ज) इस गद्यांश में दुख से पार पाने का क्या उपाय बताया गया है?
(झ) ‘अप्प दीप्पो भव’ का अर्थ है?.
(ञ) ‘बाट जोहना’ मुहाबरे का वाक्य-प्रयोग द्वारा अर्थ स्पष्ट कीजिए।
(ट) ‘मौत’ के दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
(ठ) ‘चमत्कार’ का संधि-विच्छेद कीजिए।
उत्तर
(क) जीवन में दुख।
(ख) असीम शांति का अनुभव।
(ग) जब से दुख को साधने में सफल हुए।
(घ) दुख और पीड़ा से।।
(ङ) उन्होंने दुख को नकारने की अपेक्षा उसे स्वीकार किया और घोर तपस्या की।
(च) उन्होंने कहा कि जाओ गाँव में किसी घर में एक मुट्ठी चावल ले आओ, जहाँ कोई मौत न हुई हो।
(छ) बुद्ध ने दुख से पार पाने को ही जीवन माना है।
(ज) दुख से पार पाने के लिए दीपक स्वयं बनने का उपाय बताया गया है। (झ) अपना दीपक स्वयं बनों।
(ञ) बाट जोहना (प्रतीक्षा करना) = गोपियाँ निरन्तर कृष्ण आगमन की बाट जोहती रहती थीं।
(ट) मौत = मृत्यु, देयत, देहावसान, निधन, स्वर्गवास।
(ठ) चमत् + कार (व्यंजन संधि)।

2. वर्णनात्मक गद्यांश [8 अंक]

1. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

कहने को चाहे भारत में स्वशासन हो और भारतीयकरण का नाम हो, किंतु वास्तविकता में सब ओर आस्थाहीनता बढ़ती जा रही है। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों या चर्च में बढ़ती भीड़ और प्रचार माध्यमों द्वारा मेलों और पर्वो के व्यापक कवरेज से आस्था के संदर्भ में कोई भ्रम मत पालिए, क्योंकि यह सब उसी प्रकार भ्रामक है जैसे लगे रहो मुन्ना भाई की गाँधीगीरी।

वास्तविक जीवन में जिस आचरण की अपेक्षा व्यक्ति या समूह से की जाती है उसकी झलक तक पाना मुश्किल हो गया है। यही कारण है कि गाँधीगीरी की काल्पनिक अवधारणा से महत्त्व पाने के लिए कुछ लोगों की नौटंकी की वाहवाही । प्रचार माध्यमों ने जमकर की, लेकिन अब गाँधी जयंती बीतने के बाद न तो कोई । गुलाब का फूल भेंट करता दिखाई देता है और न ही कोई छूट वाले काउंटरों से गद्यांश (8 अंक) गाँधी टोपी ही खरीदता नजर आता है।

गाँधी को ‘गौरी’ के रूप में आँकने के सिनेमाई कथानक का कोई स्थायी प्रभाव हो भी नहीं सकता। फिल्म उत्तरी और प्रभाव चला गया। गाँधी को बाह्य आवरण से समझने के कारण वर्षों से हम दो अक्टूबर और तीस जनवरी को कुछ आडंबर अवश्य करते चले आ रहे हैं, लेकिन जिन जीवन-मल्यों के प्रति आस्थावान होने की हम सौगंध खाते हैं और उन्हें आचरण में उतारने का संकल्प व्यक्त करते हैं उसका लेशमात्र प्रभाव भी हमारे आस-पास के जीवन में प्रतीत नहीं होता। जिसे हमने स्वतंत्रता के लिए संग्राम की संज्ञा दी थी उस संपूर्ण प्रयास को गाँधीजी ने स्वराज्य के लिए अभियान की संज्ञा प्रदान की थी।

स्वतंत्रता के लिए संघर्ष और स्वराज्य के लिए अभियान का अंतर अतीत का संज्ञान रखने वाले ही समझ सकते हैं। विदेशियों के सत्ता में रहने के बावजद हम स्वतंत्र थे, क्योकि हमारी आस्था ‘स्व’ में निरंतर प्रगाढ़ होती जा रही थी। ‘स्व’ में आस्था की प्रगाढ़ता के लिए निरंतर प्रयास होते रहे। इसीलिए गाँधी जी का अभियान स्वराज्य का था. बतंत्रता का नहीं। उसके स्वराज्य की भी एक निश्चित अवधारणा थी। सर्वसाधारण को वह अवधारणा समझ में आ सके, इसलिए उन्होंने कहा था कि हमारा स्वराज्य रामराज्य होगा। ।

जिस सादे जीवन और उच्च विचार को आधार बनाकर वे भारत को आध्यात्मिक गुरु के रूप में विश्व के समक्ष खड़ा करना चाहते थे उस भारत की ‘स्व शासन’ व्यवस्था ने भौतिक भूख की आग को इतना अधिक प्रज्ज्वलित कर दिया है कि अब हमने येन-केन-प्रकारेण सफलता हासिल करने के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में अपने स्थापित मूल्यों को तिलांजलि दे दी है।

1. इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक दीजिए।
2. किस बात को नौटंकी कहा गया है और क्यों?
3. दो अक्टूबर और तीस जनवरी किसलिए विशेष है?
4. स्वराज्य और स्वतंत्रता में क्या अंतर है?
5. गाँधी जी कैसा स्वराज्य चाहते थे?
6. स्वशासन व्यवस्था ने. कौन-सी विसंगति दी है?
7. ‘संग्राम’ के लिए किस पर्यायवादी शब्द का प्रयोग हुआ है? “तिलांजलि देना’ मुहावरे का वाक्य में प्रयोग कीजिए। .
उत्तर
(1) शीर्षक : गाँधीगीरी की काल्पनिक अवधारणा अथवा उपेक्षित गाँधी
(2) गाँधीगीरी की काल्पनिक अवधारणा से महत्त्व पाने के लिए कुछ लोगों द्वारा किए गए प्रयास को नौटंकी कहा गया है।
(3) दो अक्टूबर को गाँधी जी के जन्म दिन पर गाँधी जयन्ती मनाई जाती है, तीस जनवरी को उनकी हत्या कर दिए जाने की स्मृति में निर्वाण दिवस मनाया जाता है।
(4) ‘स्वराज्य’ का अर्थ है रामराज्य के आधार पर स्वार्थ एवं अनाचार रहित आदर्श राज्य-व्यवस्था जबकि स्वतन्त्र का अर्थ है अन्य शासन व्यवस्था से मुक्ति, ‘स्व’ अर्थात् स्वयं को, “तन्त्र” अर्थात् शासन-व्यवस्था (प्रणाली) से विमुक्त होना।
(5) गाँधी जी रामराज्य के समान आदर्श स्वराज्य चाहते थे क्योंकि उन्होंने ‘स्वराज्य’ को अभियान की संज्ञा दी थी।
(6) स्वशासन-व्यवस्था ने भौतिक भूख की आग को इतना अधिक प्रज्जवलित कर दिया है कि अब हमने किसी भी प्रकार से सफलता हासिल करने __के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में अपने स्थापित मूल्यों को तिलांजलि दे दी है।
(7) ‘संघर्ष’
(8) क्षणिक सुख की प्राप्ति के लिए हमें नैतिक-मूल्यों को तिलांजलि नहीं देना चाहिए।

2. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

जिसने अपनी परी जिंदगी देश सेवा में अर्पित कर दी हो. उसके आदर्शों का मूल्यांकन करना आसान है क्या? आप मिलें तो मालूम होगा कि इस वृद्धा की आत्मा समाज को कुछ देने के लिए आज भी कितनी बेचैन है। यही बेचैनी भाभी की जिंदगी है और पागलपन भी। कभी देश के लिए इसी तरह पागल होकर उन्होंने अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया था।

शिव दा बताते हैं कि जब दुर्गा भाभी के पति भगवतीचरण . बोहरा 1930 में रावी तट पर बम विस्फोट में शहीद हो गए, तो भाभी ने डबडबाई आँखों को चुपचाप पोंछ डाला था। उस दिन भैया चंद्रशेखर आजाद ने धैर्य बँधाते हुए कहा था- “भाभी, तुमने देश के लिए अपना सर्वस्व दे दिया है। तुम्हारे प्रति हम अपने कर्तव्य को कभी नहीं भूलेंगे।” भैया आजाद का स्वर सुनकर भाभी के होंठों पर दृढ़ संकल्प की एक रेखा खींच गई थी उस दिन। वे उठ बैठीं। बोली- “पति नहीं रहे, लेकिन दल का काम चलेगा, रुकेगा नहीं। मैं करूँगी।” और भाभी दूने वेग से क्रांति की राह पर चल पड़ी। उनका पुत्र शची तब तीन वर्ष का था, पर उन्होंने उसकी परवाह नहीं की। वे बढ़ती गई, जिस राह पर जाना था उन्हें। रास्ते में दो पल बैठकर कभी सुस्ताया नहीं। दाँव देखकर कहीं ठहरी नहीं। चलती रहीं- निरंतर। जैसे चलना ही उनके लिए जीवन का ध्येय बन गया हो। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को जेल से छुड़ाने के लिए आजाद और उनके साथी जब चले, तो भाभी ने आज़ाद से आग्रह किया-“संघर्ष में मुझे भी चलने दीजिए। यह हक सर्वप्रथम मेरा है।”

आजाद ने इसकी स्वीकृति नहीं दी। यह योजना कामयाब भी नहीं हो पाई। कहा जाता है कि भगत सिंह ने स्वयं इसके लिए मना कर दिया था। भाभी जेल में भगतसिंह से मिलीं। फिर लाहौर से दिल्ली पहुंची। गाँधी जी वहीं .. थे। यह करांची कांग्रेस से पहले की बात है। भगतसिंह की रिहाई के सवाल को लेकर

भाभी गाँधी जी के पास गईं। रात थी कोई साढ़े ग्यारह का वक्त था। बैठक चल रही थी। नेहरू जी वहीं घूम रहे थे। वे सुशीला दीदी और भाभी को लेकर अंदर गए। गाँधी जी ने देखा तो कहा “तुम आ गई हो। अपने को पुलिस को दे दो। मैं छुड़ा लूँगा।” ___गाँधी जी समझे कि वे संकट से मुक्ति पाने आई हैं। भाभी तुरंत बोली-“मैं इसलिए नहीं आई दरअसल, मैं चाहती हूँ कि जहाँ आप अन्य राजनीतिक कैदियों को छुड़ाने की बात कर रहे हैं, वहाँ भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को छुड़ाने की शर्त वाइसराय के सामने रखें।”

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) भाभी के जीवन की बैचेनी क्या है?
(ग) सर्वस्व दाँव पर लगाने का आशय स्पष्ट कीजिए।
(घ) भाभी गाँधी जी से किसलिए मिलीं?
(ङ) आजाद ने भाभी को किस बात की स्वीकृति नहीं दी?
(च) भाभी कभी ढीली नहीं पड़ी- इसके लिए कौन-सा वाक्य प्रयोग किया गया है?
(छ) ‘रिहाई’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ज) ‘कामयाब’ के लिए संस्कृत शब्द लिखिए।
उत्तर
(क) शीर्षक : देश सेवा |
(ख) भाभी समाज को कुछ देने के लिए बेचैन हैं।
(ग) दुर्गा भाभी के पति श्री भगवती चरण बोहरा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बम-विस्फोट में शहीद हो गए, अत्यन्त संघर्षमय जीवन का सामना भाभी ने किया किन्तु निराश नहीं हुईं, हार नहीं मानी। सर्वस्व दाँव पर लगाने का आशय यही है।
(घ) भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु जेल की सजा काट रहे थे। भाभी गाँधी जी से इसलिए मिलने गईं कि वे उन तीनों को छुड़ाने का प्रयास करें।
(ङ) भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को जेल से छुड़ाने के लिए चन्द्रशेखर आज़ाद एवं उनके साथी जब जाने लगे तो भाभी ने भी साथ चलने का आग्रह किया, किन्तु आजाद ने इसकी स्वीकृति नहीं दी।
(च) ‘वे चलती गई, जिस राह पर जाना था उन्हें।’ इस संदर्भ में अन्य वाक्य है,रास्ते में दो पल बैठकर सुस्ताया नहीं, दाँव देखकर कभी ठहरी नहीं, चलती रही- निरंतर!
(छ) रिहाई का आशय है जेल से ‘मुक्त’ होना या ‘मुक्त कराना’ (छुड़ाना)।
(ज) सफल

3. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए

शिक्षा का लक्ष्य है संस्कार देना। मनुष्य के शारीरिक, मानसिक तथा भावात्मक विकास में योगदान देना शिक्षा का मुख्य कार्य है। शिक्षित व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहता है। स्वच्छता को जीवन में महत्व देता है और उन सब बुराइयों से दूर रहता है जिनसे स्वास्थ्य को हानि पहुँचती है। रुग्न शरीर के कारण शिक्षा में बाधा पड़ती है।

शिक्षा हमारे ज्ञान का विस्तार करती है। ज्ञान का प्रकाश जिन खिड़कियों से प्रवेश करता है उन्हीं से अज्ञान और रूढ़िवादिता का अंधकार निकल भागता है। शिक्षा के द्वारा मनुष्य अपने परिवेश को पहचानने और समझने में सक्षम होता है। विश्व में ज्ञान का जो विशाल भंडार है उसे शिक्षा के माध्यम से ही हम प्राप्त कर सकते हैं। सृष्टि के रहस्यों को खोलने की कुंजी शिक्षा ही है। अशिक्षित व्यक्तियों, रूढ़ियों, अंधविश्वासों एवं कुरीतियों का शिकार हो सकता है। शिक्षा हमारी भावनाओं का संस्कार भी करती है। साहित्य और कलाओं में हमारी संवेदनशीलता तीव्र होती है। शिक्षा हमारे दृष्टिकोण को उदार बनाती है। समाज मानवीय संबंधों का ताना-बाना है। व्यक्ति और समाज का संबंध अत्यंत गहरा है। व्यक्ति के अभाव में समाज का अस्तित्व ही संभव नहीं और समाज के अभाव में सभ्य मनुष्य की कल्पना कर सकना भी असंभव है। जो संबंध रेत के कणों और रेत के ढेर में होता है वही संबंध व्यक्ति और समाज में होता है।

रेत के कण अपना अलग-अलग अस्तित्व रखते हुए भी रेत के ऐर का निर्माण करते हैं। प्यासा आदमी कुंए के पास जाता है, यह बात निर्विवाद है। परंतु सत्संगति के लिए यह आवश्यक नहीं है कि आप सज्जनों के पास जाएं और उनकी संगति प्राप्त करें। घर बैठे-बैठे भी आप सत्संगति का आनंद लूट सकते हैं। यह बात पुस्तकों द्वारा संभव है। हर कलाकार और लेखक को जन-साधारण से एक विशेष बुद्धि मिली है। इस बुद्धि का नाम प्रतिभा है। पुस्तक निर्माता अपनी प्रतिभा के बल से जीवन भर से संचित ज्ञान को पुस्तक के रूप में उंडेल देता है। जब हम घर की चारदीवारी में बैठकर किसी पुस्तक का अध्ययन करते हैं तब हम एक अनुभवी और ज्ञानी सज्जन की संगति में बैठकर ज्ञान प्राप्त करते हैं। नित्य नई पुस्तक का अध्ययन हमें नित्य नए सज्जन की संगति दिलाता है। इसलिए विद्वानों ने स्वाध्याय को विशेष महत्व दिया है। घर बैठे-बैठे सत्सगति दिलाना पुस्तकों की सर्वश्रेष्ठ उपयोगिता है।

प्रश्न
(i) घर बैठे-बैठे सत्संगति का लाभ किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है?
(ii) हर पुस्तक में संचित ज्ञान अलग-अलग प्रकार का क्यों होता है?
(iii)पुस्तकों की सर्वश्रेष्ठ उपयोगिता क्या है?
(iv) उचित शीर्षक लिखिए।
(v) लेखक पुस्तकों को उपयोगी कैसे बनाते हैं?
(vi) शिक्षा का लक्ष्य क्या है?
(vii) शिक्षा में बाधा किससे पड़ती है?.
(viii) रूढ़िवादिता कैसे दूर हो सकती है?
उत्तर
(i) घर बैठे-बैठे हम सत्संगति का लाभ पुस्तकों द्वारा प्राप्त कर सकते है।
(ii) हर पुस्तक में संचित ज्ञान अलग-अलग प्रकार का होता है। इसका कारण हर लेखक को जनसाधारण से एक विशेष बुद्धि प्राप्त होती है। वह अपने जीवन के संचित ज्ञान को अपने ढंग से पुस्तक द्वारा प्रकट करता है।
(iii) पुस्तकों की सर्वश्रेष्ठ उपयोगिता सत्संगति का लाभ उपलब्ध कराना है।
(iv) शीर्षक :”शिक्षा का लक्ष्य”
(v) लेखक अपनी विद्वता द्वारा अपने संचित अनुभवों को पुस्तकों के माध्यम से जन-साधारण के लिए उपयोगी बनाते हैं।
(vi) शिक्षा का लक्ष्य शारीरिक, मानसिक तथा भावात्मक विकास द्वारा जनसाधारण में संस्कार का निर्माण (सृष्टि) करना होता है।
(vii) रुग्न शरीर के कारण शिक्षा में बाधा पड़ती है।
(viii) शिक्षा हमारे ज्ञान का विकास तथा विस्तार करती है जिसके द्वारा रुढ़िवादिता दूर हो सकती है।

4. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

वर्तमान समाज में सर्वत्र. अव्यवस्था का साम्राज्य फैला हुआ है। विद्यार्थी, राजनेता, सरकारी कर्मचारी, श्रमिक आदि सभी स्वयं को स्वतंत्र भारत का नागरिक मानकर मनमानी कर रहे हैं। शासन में व्याप्त अस्थिरता समाज के अनुशासन को भी प्रभावित कर रही है। यदि किसी को अनुशासन में रहने के लिए कहा जाये तो वह ‘शासन का अनुसरण’ करने की बात कह कर अपनी अनुशासनहीनता पर पर्दा डालने का प्रयास करता है। वास्तव में अनुशासन शब्द का शाब्दिक अर्थ शासन अर्थात् गुरुजनों द्वारा दिखाए गए मार्ग पर नियमबद्ध रूप से चलना है। विद्यार्थी-जीवन में विद्यार्थियों की बुद्धि अपरिष्कृत होती है। अबोधावस्था के कारण उन्हें भले-बुरे की पहचान नहीं होती। ऐसी स्थिति में थोड़ी-सी असावधानी उन्हें अहंकारी बना देती है।

आजकल विद्यार्थियों की पढ़ाई में रुचि नहीं है। वे आधुनिक शिक्षा पद्धति को बेकारों की सेना तैयार करने वाली नीति मानकर इसके प्रति उदासीन हो गए हैं तथा फैशन, सुख-सुविधापूर्ण जीवन जीने के लिए गलत रास्तों पर चलने लगे हैं। वर्तमान जीवन में व्याप्त राजनीतिक दलबंदी भी विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता को प्रोत्साहित करती हैं। राजनीतिक नेता अपने स्वार्थों के लिए विद्यार्थियों को भड़का देते हैं तथा विद्यार्थी वर्ग बुरे-भले की चिंता किए बिना तोड़-फोड़ में लग जाता है। इससे विद्यार्थी का अहंकार आवश्यकता से अधिक बढ़ता जा रहा है और दूसरा उसका ध्यान अधिकार पाने में है, अपना कर्त्तव्य पूरा करने में नहीं।

अहं बुरी चीज कही जा सकती है। यह सब में होता है और एक सीमा तक आवश्यक भी है। किंतु आज के विद्यार्थियों में यह इतना बढ़ गया है कि विनय के गुण उनमें नाम मात्र के नहीं रह गए हैं। सदगुरुजनों या बड़ों की बात का विरोध करना उनके जीवन का अंग बन गया है। इन्हीं बातों के कारण विद्यार्थी अपने अधिकारों के बहुत अधिकारी नहीं हैं। उसे भी वह अपना समझने लगे हैं। अधिकार और कर्त्तव्य दोनों एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। स्वस्थ स्थिति वही कही जा सकती है जब दोनों का संतुलन हो। आज का विद्यार्थी अधिकार के प्रति सजग है परंतु वह अपने कर्तव्यों की ओर से विमुख हो गया है। एक सीमा की अति का दूसरे पर भी असर पड़ता है।

प्रश्न
(i) आधुनिक विद्यार्थियों में नम्रता की कमी क्यों होती जा रही है?
(ii) विद्यार्थी प्रायः किसका विरोध करते हैं?
(iii)विद्यार्थी में किसके प्रति सजगता अधिक है?
(iv) उचित शीर्षक दीजिए।
(v) अधिकार और कर्त्तव्य में क्या संबंध है?
(vi) शासन में व्याप्त अस्थिरता किसे प्रभावित कर रही है?
(vii) आधुनिक शिक्षा पद्धति क्या कर रही है?
(viii) नेता किसे और किसलिए भड़काते हैं?
उत्तर
(i) आधुनिक विद्यार्थियों में नम्रता की कमी होने का कारण (1) आवश्यकता से अधिक अहंकार का बढ़ना तथा (2) अधिकार पाने की लालसा का होना है। अपना कर्तव्य पूरा करने के प्रति उनका ध्यान नहीं रहता है।
(ii) विद्यार्थी अपने गुरुजनों या बड़ों की बात का विरोध करते हैं।
(iii) विद्यार्थी अपने अधिकार के प्रति सर्वाधिक सजग है।
(iv) शीर्षक : “आधुनिक शिक्षा का स्वरूप” .
(v) अधिकार और कर्तव्य एक दूसरे से जुड़े रहते हैं; दोनों में संतुलन को ही स्वस्थ स्थिति कहा जा सकता है।
(vi) शासन में व्याप्त अस्थिरता समाज के अनुशासन को प्रभावित कर रही है।
(vii) आधुनिक शिक्षा पद्धति बेकारों की सेना तैयार कर रही है।
(viii) राजनीतिक नेता अपने स्वार्थों के लिए विद्यार्थियों को भड़का देते हैं।

5. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

ताजमहल भारत का ही नहीं, संसार भर का लोकप्रिय आकर्षण केन्द्र है। कला-संस्कृति के अखंड प्रेमी शाहजहाँ ने इस भवन को अपनी प्रिय बेगम मुमताज की याद में बनवाया था। इसका निर्माण संगमरमर के श्वेत पत्थरों से किया गया।

ताजमहल के निर्माण में जो जन-धन-श्रम लगा, उसके आँकड़े चौंका देने वाले हैं। इसका निर्माण सत्रह वर्ष की अवधि में हआ था बीस हजार श्रमिक कारीगर्ग ने अपने जी-तोड़ परिश्रम से इसे बनाया। इसके अद्वितीय शिल्प तथा तकनीक के लिए विदेश के भी कई इंजीनियरों को आमंत्रित किया गया। संगमरमर के श्वेत पत्थरों तथा संगमूसा के काले पत्थरों से निर्मित इस महल पर उस समय सात करोड़ रुपये खर्च हुए थे।

ताजमहल यमुना के किनारे पर स्थित है इसकी वास्तुकला संसार-भर में बेजोड़ है। इसका प्रवेश-द्वार लाल पत्थर का बना हुआ है, जिस पर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं। यमुना के किनारे की एक तरफ को छोड़कर शेष तीनों दिशाओं में सुंदर, व्यवस्थित उपवन है जिन पर बैठकर दर्शक ताजमहल की सुंदरता को नयन भरकर निहारते हैं। महल के प्रवेश-द्वार से आगे चलकर मार्ग में दोनों ओर वृक्षों की कतारें हैं और जल के फव्वारे हैं, जो सहज ही अपनी झीनी-झीनी फुहारों से पर्यटकों को आनंदित कर देते हैं। वहीं निर्मल जल के सरोवर हैं, जिनमें सुंदर सुवर्णमय मछलियाँ तैरती रहती हैं उन्हीं सरोवरों के सामने सीमेंट के बड़े-बड़े बैंच हैं, जिनपर बैठकर सरोवर और महल दोनो के अनुपम सौंदर्य को निहारा जा सकता है।

ताजहमल का संपूर्ण भवन जिस धरती पर अवस्थित है, उसके नीचे संगमरमर का विशाल चबूतरा है, जिसके चारों कोनों पर श्वेत पत्थरों की ऊँची-ऊँची चार मीनारें है। इन मीनारें के ठीक मध्य ताजमहल का गुंबद है, जिसकी ऊँचाई लगभग 280 फुट है। यह गुंबद विश्व का सबसे ऊँचा और भव्य गुंबद है। इसके चारों ओर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं। मीनारों पर भी पच्चीकारी का महीन काम हुआ है।

मुख्य गुंबद के नीचे शाहजहाँ और मुमताज की प्रतीक-समाधियाँ हैं। वास्तविक समाधियाँ नीचे के तहखाने में हैं, जहाँ घोर अंधकार छाया रहता है। दर्शक मोमबत्ती या माचिस की तीली की सहायता से उनके दर्शन कर पाते हैं। सुनते हैं कि प्रथम वर्षा जब होती है, तो पानी की कुछ बूंदें समाधि के ठीक ऊपर गिरती हैं, मानों वर्षा उनके अखंड प्रेम को श्रद्धांजलि प्रस्तुत कर रही हो। चंद्रमा की श्वेत चाँदनी में ताजमहल का गौर-सौंदर्य और निरख उठता है। इस प्रकार ताजमहल जहाँ अखंड प्रेम का प्रतीक है, वहाँ मुगलीय कला का उत्कृष्ट नमूना भी है।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
(ख) ताजमहल किस पत्थर से निर्मित हुआ है?
(ग) शाहजहाँ के लिए किस विशेषण का प्रयोग किया गया है?
(घ) ताजमहल के निर्माण में कितना समय और धन गया?
(ङ) सुवर्णमय शब्द का अर्थ लिखें।
(च) गुंबद का आशय क्या है?
(छ) “मीनारों पर पच्चीकारी का महीन काम हुआ है।’ इस वाक्य से क्या अर्थ निकालेंगे।
(ज) “प्रतीक-समाधियाँ’ से क्या तात्पर्य है?
(झ) ‘ताजमहल अखंड प्रेम का प्रतीक है’-से आप क्या समझते हैं?
(ञ) ‘अनुपम’ में कौन-सा समास है?
उत्तर
(क) अखंड प्रेम का प्रतीक-ताजमहल।
(ख) ताजमहल सुंदर सफेद संगमरमर के पत्थरों से बनाया गया है।
(ग) कला-संस्कृति का अखंड प्रेमी।
(घ) ताजमहल के निर्माण में सत्रह वर्ष का समय और सात करोड़ रुपये लगे।
(ड) सोने के रंग का; सोने में ढला हुआ।
(च) गोलाकार छत वाली इमारत।
(छ) ताजमहल के बड़े-बड़े खंभों पर बहुत छोटे-छोटे और साफ-सुथरे फूल पत्ते उकेरे गए हैं। ..
(ज) समाधियों की स्मृति दिलाने के लिए बनाई गई अवास्तविक समाधियाँ।
(झ) ताजमहल शाहजहाँ और उनकी पत्नी मुमताज के अमर प्रेम की याद दिलाता है।
(ञ) नव-तत्पुरुष।

6. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

वर्षा ऋतु का नाम आते ही मन-मयूर नाच उठता है। भयंकर गर्मी से राहत . मिलती है। ठंडी फुहारों से स्वर्गिक आनंद की अनुभूति होती है। सभी ऋतुओं में मनमोहक वर्षा ऋतु है। गर्मी की तपन के बाद वर्षा के फुहारों का आगमन बड़ा आनंददायी होता है। पशु-पक्षी और मानव ही नहीं, पेड़-पौधों पर भी इस ऋतु का प्रभाव पड़ता हैं ऐसा लगता है मानो वीरान व बंजर जमीन पर रंग बिरंगे फूल खिले उठे हो।

वैशाख और ज्येष्ठ मास के भयंकर आगमन के बाद आषाढ़ मास में मोरों की कूक से अहसास होता है कि बरसात की ऋतु आने वाली है। तब तक गर्मी से मन व्यथित हो चुका होता है। वर्षा शुरू होते ही खेत-खलिहानों में हरियाली शुरू हो जाती है। लोग धान की बुआई में व्यस्त हो जाते हैं। मोर जी भरकर नृत्य करते हैं। कोयल की कूक बड़ी सुहानी लगती है। बच्चे उत्साह से भर जाते हैं। नंगे बदन वर्षा में भींगते हुए इधर-उधर भागना बड़ा अच्छा लगता है।

अच्छी बरसात हो तो नर-नारियाँ झूठ उठते हैं। खेतों में लबालब भरे पानी में धान की बुआई, खेतों की जुताई। किसानों का मन मुदित हो उठता है। ऐसा लगता है सारी प्रकृति एक नए अवतार में प्रकट हुई है। सब कुछ वर्षा में धुलकर नया-नया सा लगता है। अच्छी बरसात से धरती में पानी का स्तर बढ़ जाता है। सूखे कुएँ दोबारा पानी से भर जाते हैं। तालाबों और जोहड़ों में बतख और पशु नहाते नज़र आते हैं।

एक तरफ वर्षा ऋत प्रसन्नतादायी अनभति देती है। दूसरी तरफ इस ऋत में कुछ समस्याएँ भी खड़ी हो जाती हैं। महानगरों में सीवर जाम हो जाते हैं, जिसके कारण सड़कों पर नदी का-सा दृश्य दिखाई देता है। यातायात-व्यवस्था चौपट हो जाती है। नदियों में बाढ आ जाती है, जिससे गाँव के गाँव बरबाद हो जाते हैं। जान-माल की बहुत हानि होती है। रास्ते बंद हो जाते हैं अत्यंत परेशानी पैदा होती है। गरीबों में तो वर्षा कहर बनकर आती है। जीवन नारकीय हो जाता है। चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़ मकानों की छतें गिर जाती है। झोंपड़ियों की हालत ऐसी हो जाती है मानों वर्षों से वीरान पड़ी हों।

वर्षा ऋतु के जाने के बाद भी हालात सहज नहीं हो पाते एक अजीब-सी बदबू चारों तरफ फैल जाती है। मच्छरों की भरमार हो जाती है। इस प्रकार वर्षा ऋतु खुशियों के साथ गमों का साया भी लेकर आती है।

प्रश्न
( क ) इस गद्यांश का उचित शीर्षक दें।
(ख) मन-मयूर क्यों नाच उठता है?
(ग) स्वर्गिक आनंद की अनुभूति का क्या अर्थ है?
(घ) वर्षा ऋतु किन-किन महीनों में आती है?
(ङ) मन मुदित हो उठना से क्या तात्पर्य है?
(च) वर्षा के बाद प्रकृति का नया रूप कैसे प्रकट होता है?
(छ) अनुभूति शब्द का अर्थ स्पष्ट करें।
(ज) यातायात-व्यवस्था कैसे चौपट हो जाती है?
(झ) गमों का साया से क्या तात्पर्य है?
(ञ) “मन-मयूर’ का विग्रह करके समास का नाम लिखिए।
(ट) ‘मोर’ का तत्सम् शब्द लिखिए।
उत्तर
(क) वर्षा ऋतु का जन-जीवन पर प्रभाव।
(ख) भयंकर गर्मों के बाद जब वर्षा की फुहारें पड़ती हैं तो तन-मन को प्रसन्न कर देती हैं। ठंडी-ठंडी हवाओं से मन नाच उठता है।।
(ग) स्वर्गिक आनंद की अति से अर्थ है-स्वर्ग का आनंद अनुभव होना। अत्यंत खुशी का अनुभव करना।
(घ) वर्षा ऋतु के मुख्य महीने – आषाढ़, श्रावण और भादो।
(ङ) मन मुदित से तात्पर्य है कि मन में अत्यंत खुशी का अनुभव होना। जब मनचाहो बात होती है तो स्वाभाविक रूप से मन प्रसन्न हो उठता है।
(च) वर्षा के बाद प्रकृति का वातावरण बड़ा सुहावना हो जाता है। वर्षा के कारण सब कुछ धुला-धुला सा लगता है। ऐसा लगता है प्रकृति ने वर्षा के माध्यम से हर वस्तु की सफाई कर दी हो। .
(छ) अनुभूति शब्द का अर्थ है- अनुभव होगा, महसूस होना।
(ज) वर्षा के कारण सीवर-व्यवस्था जाम हो जाती है। सब ओर पानी भर जाता है। यातायात व्यवस्था चौपट हो जाती है।
(झ) ‘गमों का साया- से तात्पर्य है-‘दुःख भरा समय आना’।
(ट) मन रूपी मयूर : कर्मधारय समास

7. निम्नलिखित. गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

मनुष्य की पूरी जाति, मनुष्य का पूरा जीवन, मनुष्य की पूरी सभ्यता और संस्कृति अधूरी है क्योंकि नारो ने उस संस्कृति के निर्माण में कोई भी दान, कोई भी कंट्रीब्यूशन नहीं किया। नारी कर भी नहीं सकती थी। पुरुष ने उसे करने का कोई मौका भी नहीं किया। हजारों वर्षों तक स्त्री पुरुष से नीचे और छोटी और हीन समझी जाती रही है। कुछ तो देश ऐसे थे जैसे चीन में हजारों वर्ष तक यह माना जाता रहा कि स्त्रियों के भीतर कोई आत्मा नहीं होती। इतना ही नहीं, स्त्रियों की गिनती जड़ पदार्थों के साथ की जाती थी। आज से सौ बरस पहले चीन में अपनी पत्नी की हत्या पर किसी पुरुष को, किसी पति को कोद भी दंड नहीं दिया जाता था क्योंकि पत्नी अपनी संपदा थी। वह उसे जीवित रखे या मार डाले, इससे कानून का और राज्य का कोई संबंध नहीं।

भारत में भी स्त्री को पुरुषों की समानता में कोई अवसर और जीने का मौका नहीं मिला। पश्चिम में भी वही बात थी। चूँकि सारे शास्त्र और सारी सभ्यता और सारी शिक्षा पुरुषों ने निर्मित की है इसलिए पुरुषों ने अपने आप को बिना किसी से पूछे श्रेष्ठ मान लिया है, स्त्री को श्रेष्ठता देने का कोई कारण नहीं। स्वभावतः इसके घातक परिणाम हुए।

सबसे बड़ा घातक परिणाम तो यह हुआ कि स्त्रियों के जो भी गुण थे वे संभ्यता के विकास में सहयोगी न हो सके। सभ्यता अकेले पुरुषों ने विकसित की। अकेले पुरुष के हाथ से जो सभ्यता विकसित होगी उसका अंतिम परिणाम युद्ध के सिवाय और कुछ भी नहीं हो सकता। अकंले पुरुष के गुणों पर जो जीवन निर्मित होगा वह जीवन हिंसा के अतिरिक्त और कहीं नहीं ले जा सकता। पुरुषों की प्रवृत्ति में, पुरुष के चित्त में ही हिंसा का, क्रोध का, युद्ध का कोई अनिवार्य हिस्सा है।

नीत्से ने आज से कुछ ही वर्षों पहले यह घोषणा की कि बुद्ध और क्राइस्ट स्त्रैण रहे होंगे, क्योंकि उन्होंने करुणा और प्रेम की इतनी बातें कहीं हैं, वे बाते पुरुषों के गुण नहीं हैं। नीत्से ने क्राइस्ट को और बुद्ध को स्त्रैण, स्त्रियों जैसा कहा है। एक अर्थ में शायद उसने ठीक ही बात कही है। वह इस अर्थ में कि जीवन में जो भी कोमल गुण हैं, जीवन के जो भी माधुर्य से भरे सौंदर्य, शिव की कल्पना और भावना है वह स्त्री का अनिवार्य स्वभाव है। मनुष्य की सभ्यता माधुर्य और प्रेम और सौंदर्य से नहीं भर सकी, क्रूर और परुष हो गई, कठोर और हिंसक हो गई और अंतिम परिणामों में केवल युद्ध लाती रही।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) लेखक ने मनुष्य की सभ्यता और संस्कृति को अधूरा क्यों कहा है?
(ग) नारी ने संस्कृति के निर्माण में अपना योगदान क्यों नहीं दिया?
(घ) चीन में नारी के प्रति कैसी दृष्टि थी?
(ङ) भारत में पुरुषों को नारी से श्रेष्ठ क्यों मान लिया गया?
(च) पुरुष-प्रधान समाज का क्या कुपरिणाम हुआ?
(छ) पुरुषों द्वारा विकसित समाज युद्धों की ओर क्यों ले जाता है?
(ज) क्राइस्ट और बुद्ध को स्त्रैण क्यों कहा गया?
(झ) स्त्रियों में कौन-से गुण प्रमुख होते हैं?
(ञ) इस पाठ से संस्कृत, उर्दू तथा अंग्रेजी के दो-दो शब्द छाँटिए।
(ट) इस पाठ से एक सरल, संयुक्त तथा मिश्र वाक्य छाँटिए।
(ठ) विशेषण-विशेष्य के चार युग्म इस पाठ में से छाँटिए।
(ड) मनुष्य, समानता तथा चित्त के दो-दो पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर
(क) पुरुष द्वारा निर्मित अधूरी संस्कृति।
(ख) लेखक ने मनुष्य की सभ्यता और संस्कृति को अधूरा इसलिए कहा है क्योंकि यह केवल परुषों द्वारा निर्मित है। इसके निर्माण में स्त्रियों ने अपना योगदान नहीं दिय
(ग) नारी ने संस्कृति के निर्माण में अपना योगदान इसलिए नहीं दिया क्योंकि उसे पुरुषों ने मौका नहीं दिया। कहीं उसे हीन समझा गया तो कहीं जड़ पदार्थ समझा गया। उसे पुरुष के समान नहीं माना गया।
(घ) चीन में हजारों वर्षों तक नारी की गिनती जड़ पदार्थों में होती रही। पुरुष मानता था कि उसमें आत्मा नहीं होती। इसलिए वह पत्नी को अपनी संपत्ति मानता था। यदि वह उसे मार डालता था तो भी डित नहीं होता था।
(ड़) भारत में भी सारी संस्कृति और सभ्यता का निर्माण पुरुषों ने अपने हाथों से किया, इसलिए उसने पुरुषों को ही अधिक महत्व दिया। नारी को नीच माना गया।
(च) .पुरुष-प्रधान समाज होने का सीधा दुष्परिणाम यह हुआ कि समाज में एक-पर-एक अनेक युद्ध हुए। सारी सभ्यता क्रोध और हिंसा से भर गई।
(छ) पुरुषों के व्यक्तित्व में हिंसा, क्रोध और युद्ध का अनिवार्य तत्त्व है। इसलिए उनके द्वारा निर्मित् संस्कृति युद्धमय ही होगी।
(ज) क्राइस्ट और बुद्ध- दोनों ने अहिंसा, करुणा, सेवा और प्रेम के कोमल भावों को बहुत अधिक महत्व दिया। ये भाव नारी-स्वभाव के गुण हैं। इसलिए नीत्से ने उन्हें स्त्रैण अर्थात् स्त्रियों जैसा. ठीक ही कहा है।
(झ) स्त्रियों में प्रेम, सौंदर्य और मधुरता जैसे कोमल गुण होते हैं। (ब) संस्कृत-परिणाम, सभ्यता। उर्दू- मौका, सिवाय। अंग्रेजी- कंट्रीब्यूशन, क्राइस्ट। (ट) सरल-पुरुष ने उसे करने का कोई मौका भी नहीं दिया। संयुक्त वाक्य?
मिश्र- चूँकि सारे शास्त्र और सारी सभ्यता पुरुषों ने निर्मित की है इसलिए पुरुषों ने अपने आप को बिना किसी से पूछे श्रेष्ठ मान लिया है।
(ठ) 1. घातक परिणाम
2. जड़ पदार्थ
3. कोमल गुण
4. अनिवार्य स्वभाव
(ड) मनुष्य – मानव, मनुज।
समानता- एकता, समता।
चित्त- हृदय, दिल, मन।

8. नीचे दिये गये गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए:

जुलूस शहर की मुख्य सड़कों से गुजरता हुआ चला जा रहा था। दोनों ओर छतों पर, छज्जों पर, जंगलों पर, वृक्षों पर दर्शकों की दीवारें-सी खड़ी थीं। बीरबल सिंह को आज उनके चेहरों पर एक नयी स्फूर्ति एक नया उत्साह, एक नया गर्व झलकता हुआ मालूम होता था। स्फूर्ति थी वृद्धों के चहरों पर, उत्साह युवकों के और गर्व रमणियों के। यह स्वराज के पथ पर चलने का उत्साह था। अब उनकी यात्रा का लक्ष्य अज्ञात न था, पथभ्रष्टों की भांति इधर-उधर भटकना न था, दलितों की भांति सिर झुका कर रोना न था। स्वाधीनता का सुनहरा शिखर सुदूर दलितों की भाति सिर झुका कर रोना न था। स्वाधीनता का सुनहरा शिखर सुदूर आकाश में चमक रहा था। ऐसा जान पड़ता था कि लोगों के बीच के नालों और जंगलों की परवाह नहीं है। सब उस सुनहले लक्ष्य पर पहुँचने के लिए उत्सुक हो रहे हैं।

ग्यारह बजते-बजते जलस नदी के किनारे जा पहुँचा. जनाजा उतारा गया और लोग शव को गंगा-स्नान कराने के लिए ले चले। उनके शीतल, शांत, पीले मस्तक पर लाठी की चोट साफ नजर आ रही थी। रक्त जमकर काला हो गया था। सिर के बड़े-बड़े बाल खून जम जाने से किसी चित्रकार की तूलिका की भांति चिमट गये थे। कई हजार आदमी इस शहीद के अंतिम दर्शनों के लिए खड़े थे लाठी की चोट उनहें भी नजर आयी। उनकी आत्मा ने जोर से धिक्कारा। वह शव की ओर न ताक सके। मुँह फेर लिया। जिस मनुष्य के दर्शन के लिए, जिसके चरणों की रज मस्तक पर लगाने के लिए लाखों आदमी विकल हो रहे हैं, उसका मैंने इतना अपमान किया। उनकी आत्मा इस समय स्वीकार कर रही थी कि उस निर्दय प्रहार में कर्तव्य के भाव का लेश भी न था, केवल स्वार्थ करने की लिप्सा थी। हजारों आँखें क्रोध से भरी हुई उनकी ओर देख रही थी, पर वह सामने ताकने का साहस न कर सकते थे।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) जुलूस में उत्साह क्यों था?
(ग) बीरबल सिंह चोट के निशान की ओर ताक क्यों नहीं पा रहे थे?
(घ) बीरबल सिंह को किस बात का पश्चाताप हो रहा था?
(ङ) “लिप्सा’ का अर्थ लिखिए।
(च) ‘पथभ्रष्ट’ का सविग्रह समास बनाएँ।
(छ) ‘पथभ्रष्ट’ का सविग्रह समास बनाएँ।
(ज) मदद और खून के लिए तत्सम शब्द लिखिए।
उत्तर
(क) जुलूस या बीरबल सिंह का हृदय-परिवर्तन।
(ख) स्वराज के लिए गौरवमय बलिदान के कारण जलस में उत्साह था।
(ग) बीरबल सिंह ने ही चोट मारी थी। इसी अपराध बोध के कारण वे उधर ताक नहीं पा रहे थे।
(घ) बीरबल सिंह ने ही शहीद को लाठी से मारा था, जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गयी थी। इसी अपराध बोध का पश्चाताप उसे हो रहा था।
(ङ) लिप्सा = लोभ, लालच।
(च) कारनामा करना, अपने पद और शक्ति का प्रभाव दिखाना।
(छ) पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट-तत्पुरुष समास।
(ज) मदद = सहायता। खून = रक्त।

9. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए:

आज के युग में कम्प्यूटर का आविष्कार एक वरदान की तरह हुआ है। कम्प्यूटर दुनिया के जटिल से जटिल और श्रमसाध्य कार्यों को चुटकी बजाते ही हल कर देता है। कम्प्यूटर भविष्यवाणी तक कर सकता है, मनोरंजन करा सकता है, आदमी के शरीर का विश्लेषण और अध्ययन कर सकता है तथा दुनिया की किसी भी जानकारी को पकड़ सकता है। कम्न्यूटर सूचनाओं को ही संचार के क्षेत्र में आयीन्न का वास्तविक कारण माना जा सकता है। यह एक ऐसा इलेक्टानिक उपकरण है, जिसमें सूचनाओं का चुम्बकीय टेप भरा जाता है। इसमें चिप पर कार्यक्रम तैयार किये जाते हैं। चिप आदमी के नाखूनों के बराबर होते हैं। इस पर पैकेज तैयार होते हैं, जिसके माध्यम से कम्प्यूटर कार्य करता है।

कम्प्यूटर में टेलीविजन की तरह ही एक स्क्रीन होती है उससे जुड़ा हार्डवेयर होता है और उसी से जडा टाइपराइटर की तरह ही अंकित अक्षरों वाला एक उपकरण होता है जिसे ‘की बोर्ड’ कहते हैं। कम्प्यूटर में मेमोरी अर्थात स्मृति की व्यवस्था होती है। कम्प्यूटर की मेमोरी में सूचनाओं को सुरक्षित रखा जाता है। इसमें एक प्रिंटर भी होता है, जिसके द्वारा सूचनाएँ मुद्रित की जाती हैं।

किसी भी सूचना को की बोर्ड के माध्यम से स्क्रीन पर देखकर अंकित किया जाता है तथा हार्डवेयर द्वारा फ्लापी पर उसे सुरक्षित किया जाता है। फ्लापी पोस्टकार्ड से भी छोटी एक वस्तु है जिसपर सूचनाएँ अंकित हो जाती है, उसी तरह फ्लापी में सूचनाएँ टेप हो जाती है। उस फ्लापी में अंकित सूचनाओं को कभी भी विश्लेषित किया जा सकता है। कम्प्यूटर से जुड़े प्रिंटर के द्वारा उसे प्रिंट किया जा सकता है।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ख) कम्प्यूटर आज के युग में वरदान है। कैसे?
(ग) कम्प्यूटर क्या-क्या कार्य कर सकता है?
(घ) कम्प्यूटर कैसे कार्य करता है?
(ङ) कम्प्यूटर में सूचनाएँ कैसे भरी जाती है?
(च) फ्लापी क्या होती हैं?
(छ) चिप क्या है?
(ज) ‘श्रमसाध्य’ का अर्थ लिखिए।
उत्तर
(क) कम्प्यू टर।
(ख) कम्प्यूटर कठिन-से-कठिन और श्रमसाध्य कार्यो को अत्यन्त सरलता से कुछ ही क्षणों में संपन्न कर देता है।
(ग) कम्प्यूटर हर तरह का कार्य कर सकता है। जैसे- भविष्यवाणी, छपाई, गणित के कठिन प्रश्न, जासूसी, वैज्ञानिक अनुसंधानों में सहायता, मनारंजन आदि।
(घ) कम्प्यूटर में चुंबकीय टेप भरा जाता है, जिसमें चिप पर कार्यक्रम तैयार किये जाते हैं। इस पर पैकेज तैयार होते हैं, जिसके माध्यम से कम्प्यूटर कार्य करता है।
(ङ) कम्प्यूटर में एक स्क्रीन होता है जो एक हार्डवेयर से जुड़ा होता है और उसी से एक की बोर्ड जुड़ा होता है जिस पर अक्षर अंकित होते हैं। इसी की-बोर्ड की सहायता से इसकी स्मृति में सूचनाएँ भरी जाती हैं।
(च) फ्लापी पोस्टकार्ड से भी छोटी एक वस्तु है जिस पर सूचनाओं को कभी भी विश्लेषित किया जा सकता है।
(छ) चिप आदमी के नाखूनों के बराबर होते हैं जिन पर पैकेज तैयार होते हैं। इसी के माध्यम से कम्प्यूटर कार्य करता है।
(ज) श्रमसाध्य = कठिन परिश्रम।

10. नीचे दिये गये गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए

एक समय था जब पानी सब जगह मिल जाता था। इसीलिए इसे कोई महत्त्व नहीं दिया जाता था। लेकिन तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या और जीवन शैली में आये परिवर्तन के कारण जल अब दर्लभ हो गया है। इसी दर्लभता के कारण जल का आर्थिक मूल्य बहुत बढ़ गया है। अब तक जल की प्रमुख माँग फसलों की सिंचाई के लिए होती थी। लेकिन अब उद्योगों और घरेलू उपयोग के लिए भी जल की बहुत आवश्यकता है। इसीलिए जल अब एक बहुमूल्य संसाधन बन गया है। नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी की मांग बिल्कल अलग-अलग तरह की होती है। आइए, सबसे पहले नगरीय क्षेत्रों में जल की समस्या का अध्ययन करें।

नगरीय क्षेत्रों में सामान्यतः जल का एक ही स्रोत होता है और उसी से सभी की आवश्यकताएं पूरी होती हैं। नगरीय क्षेत्रों में जल, झीलों या कृत्रिम जलाशयों या नदियों के तल में गहरे खोदे गये कुओं या नलकूपों से लाकर इकट्ठा किया जाता है। कभी-कभी जल के लिए इन सभी स्रोतों का उपयोग किया जाता है। इस स्रोतों को लेकर पहले उसमें क्लोरीन जैसे रसायन मिलाकर उसे स्वच्छ किया जाता है। इसके बाद वह पीने के लिए सुरक्षित बन जाता है। ऐसा सुरक्षित जल नगर की सम्पूर्ण जनसंख्या को अनेक बीमारियों से बचाता है। नगरों में जल की भारी मात्रा में आवश्यकता होती है क्योंकि जल को पीने के साथ-साथ सभी घरेलू कामों में उपयोग होता है। बहुत सारा जल तो सीवर में जल-मल बहाने में लग जाता है। जैसे-जैसे नगरों की जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे वहाँ पानी की कमी के कारण झुग्गी-झोपड़ियों के निवासियों को प्रायः बिना साफ किया हुआ गंदा पानी ही पीना पड़ता है। इसी कारण वहाँ प्रायः बिना साफ किया हुआ गंदा पानी ही पीना पड़ता है। इसी कारण वहाँ प्रायः महामारियाँ फैल जाती है। नगरों में उद्योग के लिए भी जल की भारी मात्रा में आवश्यकता होती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी की आपूर्ति में कई दोष पाये जाते हैं। वहाँ पीने के सुरक्षित पानी का कोई स्रोत नहीं होता है। प्रायः जल के एक स्रोत का ही अनेक उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है। उसी में बरतन साफ होते हैं, आदमी और जानवर एक साथ नहाते हैं, कपड़े धोये जाते हैं और गंदगी भी. बहायी जाती है। इसके अतिरिक्त भूमिगत जल कभी खारा होता है और कभी उसका रासायनिक संघटन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इस पानी को स्वच्छ करके मानवीय उपयोग के लायक बनाने की कोई व्यवस्था भी नहीं होती।

प्रश्न
(क) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) पहले सब जगह सुलभ जल अब दुर्लभ क्यों हो गया है?
(ग) जल एक बहुमूल्य संसाधन क्यों बन गया है?
(घ) नगरों में पेयजल की व्यवस्था किस प्रकार की जाती है?
(ङ) नगरों की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में बीमारी का क्या कारण है?
(च) ग्रामीण क्षेत्र में पीने के पानी का अभाव क्यों है?
(छ) दुर्लभ और स्वच्छ का विलोम शब्द बनाएँ?
(ज) नगरीय और मानवीय शब्दों से प्रत्यय अलग कीजिए?
उत्तर-
(क) पेय जल की माँग या पेय जल की आवश्यकता।
(ख) तीव्रगति से बढ़ती जनसंख्या और जीवन शैली में बदलाव के कारण।
(ग) घरेलू उपयोग के साथ-साथ उद्योगों के लिए जल एक बहुमूल्य संसाधन बन गया है।
(घ) नगरों में विभिन्न जलाशयों में एकत्रित जल को जल संयंत्रों से इकट्ठा करके उसमें अनेक पदार्थों को डालकर उसे स्वच्छ किया जाता है।
(ङ) नगरों की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में बीमारी का प्रमुख कारण है-स्वच्छ जल नहीं मिल पाना।
(च) ग्रामीण क्षेत्रों में जल का प्रायः एक ही स्रोत होता है, उसी में गंदगी साफ करना, पशु नहलाना, कपड़ा धोना तथा पीना सब होता है।
(छ) दुर्लभ = सुलभ। स्वच्छ = अस्वच्छ।
(ज) नगरीय = ईय। मानवीय = ईय।

Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 11 कबीर के दोहे

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 2 Chapter 11 कबीर के दोहे Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 11 कबीर के दोहे

Bihar Board Class 7 Hindi कबीर के दोहे Text Book Questions and Answers

पाठ से –

Kabir Ke Dohe Class 7 Bihar Board प्रश्न 1.
पठित पाठ के आधार पर निम्नांकित कथनों पर सही (✓) या गलत (☓) का निशान लगाइए।

प्रश्नोत्तर –
(क) प्रेम की भाषा बोलने वाला ही पंडित होता है। (✓)
(ख) निन्दा करने वालों को दूर रखना चाहिए। (☓)
(ग) कोई भी बात सोच-समझकर बोलनी चाहिए। (✓)
(घ) सज्जन व्यक्ति टूटता-जुड़ता रहता है जबकि दुर्जन व्यक्ति टूटता तो है जुड़ता नहीं। (✓)

Kabir Ke Dohe With Meaning In Hindi Class 7 Bihar Board प्रश्न 2.
पठित पाठ में कौन-सा दोहा आपको सबसे अच्छा लगा और क्यों?
उत्तर:
“कबीर के दोहे” पाठ में हमको सबसे अच्छा दोहा –
काल्ह करे सो आज कर आज करे सो अब।
पल में परलै होयगी बहुरि करेगा कब ॥

क्योंकि इस दोहा में समय की महत्ता बताते हुए कहा गया है कि जो करना. है वह अभी कर ही लो।
ना जाने भविष्य में क्या आफत आयेगा जिसमें तुम्हारा कार्य होगा ही। नहीं।

Kabir Ke Dohe In Hindi Class 7 Bihar Board प्रश्न 3.
हमें काम को कल के भरोसे क्यों नहीं टालना चाहिए?
उत्तर:
हमें किसी भी काम को कल के भरोसे नहीं टालना चाहिए । हो सकता है भविष्य के कल में हम पर कोई विपत्ति आ जाय और हम काम को कर ही न सकें।

Kabir Ke Dohe 7th Class Bihar Board प्रश्न 4.
कबीर के उस दोहे का उल्लेख कीजिए, जिसमें सज्जन । साधुजन और सोने की तुलना एक ही संदर्भ में की गई है।
उत्तर:
निम्नलिखित दोहे में कबीर ने सज्जन और साधजन की तुलना सोने से की है।
सोना, सज्जन, साधुजन टुटे जुरै सौ बार।
दुर्जन, कुंभ-कुम्हार कै, एकै धका दरार ।।

पाठ से आगे –

Kabir Das Ke Dohe Class 7 Bihar Board प्रश्न 1.
“कबीर के दोहे जीवनोपयोगी एवं व्यवहारिक शिक्षाओं से भरे पड़े हैं।” पाठ के आधार पर इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कबीर अपने दोहे के माध्यम से जीवनोपयोगी एवं व्यवहारिक शिक्षा का ज्ञान दिया है जैसे –
काल्ह करे सो आज कर आज करे सो अब।
पल में परलै होयगी बहुरि करेगा कब ॥
निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय। बिन साबुन पानी बिना, निरमल करे सुभाय ॥ इत्यादि।

7th Class Hindi Kabir Ke Dohe Bihar Board प्रश्न 2.
कबीर के दोहे का अध्ययन करने के पश्चात् उनके व्यक्तित्व के बारे में कल्पना कीजिए एवं लिखिए।
उत्तर:
कबीर के दोहे का अध्ययन करने से ऐसी कल्पना की जा सकती है कि कबीर समय की उपयोगिता को महत्व देते थे। आवश्यकता के अनुकूल न कराने की अपेक्षा रखते थे। निंदा करने वालों के प्रति भी उदार रहते थे। जाति नहीं ज्ञान का महत्व देते थे। दुष्टों से अलग रहने की प्रवृत्ति उनमें थी। वे प्रेम की भाषा बोलते थे । उनको किसी में बुराई नहीं दिखती थी। बल्कि स्वयं को अधिक बुरा मानते थे। इत्यादि।

व्याकरण

Class 7 Kabir Ke Dohe Bihar Board प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची लिखिए –
उत्तर:
(क) परले = प्रलय, भूचाल
(ख) नियरे = समीप, निकट
(ग) बहुरि = दोबारा
(घ) आखर = अक्षर, वर्ण।

Kabir Ke Dohe 7th Class Hindi Bihar Board प्रश्न 2.
कुछ ऐसे शब्दों का संग्रह कीजिए, जिसमें “जन” लगा हो। जैसे-दुर्जन, जनतंत्र।
उत्तर:
सज्जन, साधुजन, सुजन, जनता, जनलोक, जनसेवा, जनोपयोगी, जनमन, जनाधिकार इत्यादि।

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solution प्रश्न 3.
दोहे की दी हुई पंक्तियों को नीचे दिये गये उदाहरण के अनुसार बदलकर लिखिए.
उदाहरण-जाति न पूछो साधु की। साधु की जाति न पूछो ।

(क) मोल करो तलवार का
उत्तर:
तलवार का मोल करो।

(ख) बुरा जो देखन मैं चला।
उत्तर:
मैं जो बुरा देखने चला।

कुछ करने को –

रहिमन मन की व्यथा मन ही राखो गोय।
सुन अठिलहैं लोग सब बाँट न लिहैं कोय ॥

कबीर के दोहे Summary in Hindi

काल्ह करे सो आज कर आज करे सो अब।
पल में परलै होयगी बहुरि करेगा कब ॥

अर्थ – जिस काम को कल करना है उसे आज कर लो, आज करना है उसे अभी कर लों क्योंकि क्षणभर में प्रलय हो जायेगा तो फिर तुम अपना काम दुबारा कब कर सकते हो।

साई इतना दीजिए जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय ॥

अर्थ – हे ईश्वर ! आप मुझे उतना ही धन दीजिए जिससे मैं अपने परिवार और सगे-सम्बन्धियों की आवश्यकता को पूरा कर सकूँ तथा मैं भी भूखा न रहूँ और मेरे द्वार पर आये अतिथि या साधु भी भूखे न लौट सके ।

निंदक निवरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन साबुन पानी बिना, निरमल करे सुभाय ॥

अर्थ – जो आपकी निंदा करता है उसे भी आप मिलाकर रखें, उसका आप सम्मान करें चाहे उसके लिए आपको परेशानी क्यों न उठानी पड़े। क्योंकि आपकी निकटता को पाकर स्वयं उसके स्वभाव में परिवर्तन हो जायेगा अर्थात् बिना पानी और साबुन के उसके मन:स्थित मैल दूर हो जाएंगे।

जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान ॥
अर्थ – सज्जन ज्ञानी व्यक्ति के जाति जानने का प्रयास मत करो। अगर जानना हो तो उसके ज्ञान को जानो (ज्ञान को प्राप्त करो), मूल्यांकन तलवार का करो म्यान का नहीं।

सोना, सज्जन, साधुजन टूटे जुरै सौ बार ।
दुर्जन, कुंभ-कुम्हार.कै, एकै धूका दरार ॥

अर्थ – सज्जन और साधुजन सोना की भाँति सैकड़ों बार टूट-जुड़ सकते हैं। लेकिन दुर्जन व्यक्ति कुम्हार के घड़े की भांति एक ही धक्के में दरार पैदा कर लेते हैं। जो प्रयल से भी नहीं जुड़ते ।

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ॥
अर्थ – पोथी पढ़ते-पढ़ते लोग मर गये, लेकिन पंडित कोई नहीं हुए जो व्यक्ति मात्र ढाई अक्षर के प्रेम शब्द का ज्ञान प्राप्त कर लिया वही पंडित हो गया।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय।
जो दिल खोजा आपनो, मुझ सा बुरा न कोय ।

अर्थ – रहीम कवि कहते हैं – जब मैं अन्यों में बुराई खोजने निकला तो बुरा कोई नहीं मिला । जब हमने अपने अन्दर की बुराई को झाँकने का प्रयत्न किया तो लगा कि-मुझसे बुरा कोई नहीं है।

Bihar Board Class 10 Economics Solutions Chapter 2 राज्य एवं राष्ट्र की आय

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Economics अर्थशास्त्र : हमारी अर्थव्यवस्था भाग 2 Chapter 2 राज्य एवं राष्ट्र की आय Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Economics Solutions Chapter 2 राज्य एवं राष्ट्र की आय

Bihar Board Class 10 Economics राज्य एवं राष्ट्र की आय Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही विकल्प चुनें।

राज्य एवं राष्ट्र की आय Bihar Board प्रश्न 1.
सन् 2008-09 के अनुसार भारत की औसत प्रति व्यक्ति आय है
(क) 22,553 रुपये
(ख) 25,494 रुपये
(ग) 6,610 रुपये
(घ) 54,850 रुपये
उत्तर-
(ख) 25,494 रुपये

Bihar Board Solution Class 10 Social Science प्रश्न 2.
भारत में वित्तीय वर्ष कहा जाता है-
(क) 1 जनवरी से 31 दिसम्बर तक
(ख) 1 जुलाई से 30 जून तक।
(ग) 21 अप्रैल से 31 मार्च तक
(घ) 1 दिसम्बर से 31 अगस्त तक
उत्तर-
(ग) 21 अप्रैल से 31 मार्च तक

Bihar Board Class 10 History Notes In Hindi प्रश्न 3.
भारत में किस राज्य का प्रति व्यक्ति आय सर्वाधिक है ?
(क) बिहार
(ख) पंजाब
(ग) हरियाणा
(घ) गोवा
उत्तर-
(घ) गोवा

Bihar Board Class 10 Geography Solutions प्रश्न 4.
बिहार के किस जिले का प्रति-व्यक्ति आय सर्वाधिक है ?
(क) पटना
(ख) गया
(ग) शिवहर
(घ) नालंदा
उत्तर-
(क) पटना

राष्ट्र राज्य क्या है Class 10 Bihar Board प्रश्न 5.
उत्पादन एवं आय गणना विधि आर्थिक दृष्टिकोण से है
(क) सहज
(ख) वैज्ञानिक
(ग) व्यावहारिक
(घ) उपर्युक्त तीनों
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त तीनों

II. रिक्त स्थानों को भरें:

Bihar Board Class 10 Economics Solution प्रश्न 1.
बिहार की………………..प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करती है।
उत्तर-
41.4

Bihar Board Class 10 Economics प्रश्न 2.
उत्पादन, आय एवं…………..एक चक्रीय समूह का निर्माण करते हैं।
उत्तर-
व्यय

Bihar Board Class 10 Social Science Solution प्रश्न 3.
राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने से प्रति-व्यक्ति आय में………… होती है।
उत्तर-
वद्धि

Bihar Board Class 10th Social Science Solution प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आय एवं प्रति-व्यक्ति आय में वृद्धि होने से………….”की क्रिया पूरी होती है।
उत्तर-
विकास

Bihar Board Class 10 Sst Solution प्रश्न 5.
बिहार में वर्ष 2008-09 के बीच कुल घरेलू उत्पाद……………प्रतिशत हो गया।
उत्तर-
11.03

III. सही एवं गलत कथन की पहचान करें।

1. राष्ट्रीय आय एक दिन हुए समय का किसी अर्थव्यवस्था की उत्पादन शक्ति को मापती है।
2. उत्पादन आय एवं व्यय एक चक्रीय समूह का निर्माण नहीं करती है।
3. भारत की प्रति-व्यक्ति आय अमेरिका के प्रति व्यक्ति आय से अधिक है।
4. दादा भाई नैरोजी के अनुसार सन् 1968 में भारत की प्रति-व्यक्ति आय 20 रुपये थी।
5. बिहार के प्रति व्यक्ति आय में कृषि क्षेत्र का योगदान सर्वाधिक है।
उत्तर-
1. सही,
2. गलत,
3. गलत,
4. सही,
5. सही।

IV. संक्षिप्त रूप को पूरा करें।

(i)G.D.P.
उत्तर-
Gross Domestic Product

(ii)P.C.L.
उत्तर-
Per capita Income.

(iii) N.S.S.o.
उतर-
National Sample Survey Organisation.

(iV) C.S.O.
उत्तर-
Central Statistical Organisation.

(v) G.N.P.
उत्तर-
Gross National Product

(vi) N.N.P.
उत्तर-
Net National Product.

(vii) N.I
उत्तर-
National Income.

(viii) E.D.I.
उत्तर-
Economic Development of India.

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

Class 10 Economics Chapter 2 Solutions प्रश्न 1.
आय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
जब कोई व्यक्ति किसी प्रकार का शारीरिक अथवा मानसिक कार्य करता है और उस व्यक्ति को उसके कार्यों के बदले जो पारिश्रमिक मिलता है उसे उस व्यक्ति की आय कहते हैं।

Bihar Board 10th Social Science Solution प्रश्न 2.
सकल घरेलू उत्पाद से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
एक देश की सीमा के अन्दर किसी भी दी गई समयावधि, प्रायः एक वर्ष में उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं तथा सेवाओं का कुल बाजार या मौद्रिक मूल्य, उस देश का सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है।

Bihar Board Class 10 Social Science प्रश्न 3.
प्रतिव्यक्ति आय क्या है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय आय में देश की कुल जनसंख्या से भाग देने पर जो भागफल आता है उसे प्रति व्यक्ति आय कहते हैं।
प्रति व्यक्ति आय का आंकलन निम्न फार्मूले द्वारा किया जाता है।
Bihar Board Class 10 Economics Solutions Chapter 2 राज्य एवं राष्ट्र की आय - 1

Bihar Board Class 10 Social Science Notes प्रश्न 4.
भारत में सर्वप्रथम राष्ट्रीय आय की गणना कब और किनके द्वारा की गई थी?
उत्तर-
भारत में सर्वप्रथम राष्ट्रीय आय 1868 ई. में दादा भाई नौरोजी द्वारा की गई थी।

प्रश्न 5.
भारत में राष्ट्रीय आय की गणना किस संस्था के द्वारा होती है ?
उत्तर-
भारत में राष्ट्रीय आय की गणना केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (Central Statistical Organisation) द्वारा होती है।

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय आय की गणना में होनेवाली कठिनाइयों का वर्णन करें।
उत्तर-
राष्ट्रीय आय की गणना में निम्नलिखित कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं (i) आंकड़ों को एकत्र करने में कठिनाई (Difficulty in collecting data) (ii) दोहरी गणना की सम्भावना (Possibilities of double counting) (iii) मूल्य के मापने में कठिनाई (Difficulty in measuring the value)

प्रश्न 7.
आय का गरीबी के साथ संबंध स्थापित करें।
उत्तर-
गरीबी का प्रति व्यक्ति आय पर प्रभाव पड़ता है। गरीबी के कारण बचत का स्तर निम्न होता है। कम बचत के कारण पूँजी निर्माण दर कम होती है, जिससे विनियोग भी कम होता है जिसकी परिणाम स्वरूप प्रति व्यक्ति आय पुनः निम्न स्तर कर कायम रहती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार ने कब और किस उद्देश्य से राष्ट्रीय आय समिति का गठन किया ?
उत्तर-
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार ने अगस्त 1949 ई. में प्रो. पी. सी. महालनोबिस (P.C. Mahalanobise) की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय आय समिति का गठन किया था; जिसका उद्देश्य भारत की राष्ट्रीय आय के संबंध में अनुमान लगाना था। इस समिति ने अप्रैल
1951 में अपनी प्रथम रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसमें सन् 1948-49 के लिए देश की कुल राष्ट्रीय आय 8,650 करोड़ रुपये बताई गई तथा प्रति व्यक्ति आय 246.9 रुपये बताई गई। सन् 1954 के बाद राष्ट्रीय आय के आँकड़ों का संकलन करने के लिए सरकार ने केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (Central Satatistical Organisation) की स्थापना की। यह संस्था नियमित रूप से राष्ट्रीय आय के आँकड़े प्रकाशित करती है। राष्ट्रीय आय के सृजन में अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रों का विशेष योगदान होता है।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय आय की परिभाषा दें। इसकी गणना की प्रमुख विधि कौन-कौन सी है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय आय का मतलब किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य से लगाया जाता है। दूसरे शब्दों में वर्ष भर में किसी देश में अर्जित आय की कुल मात्रा को राष्ट्रीय आय (National Income) कहा जाता है।
राष्ट्रीय आय को स्पष्ट करने के लिए कुछ प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों की परिभाषा निम्नलिखित है

प्रो. अलफ्रेड मार्शल के अनुसार “किसी देश की श्रम एवं पूंजी का उसके प्राकृतिक साधनों पर प्रयोग करने से प्रतिवर्ष भौतिक तथा अभौतिक वस्तुओं पर विभिन्न प्रकार की सेवाओं का जो शुद्ध समूह उत्पन्न होता है। उसे राष्ट्रीय आय कहते हैं। प्रो. पीगू के शब्दों में “राष्ट्रीय लाभांश किसी समाज की वस्तुनिष्ठ अथवा भौतिक आय वह भाग है, जिसमें विदेशों से प्राप्त आय भी सम्मिलित होती है और जिसकी मुद्रा के रूप में माप हो सकती है।”

एक अन्य प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. फिशर ने राष्ट्रीय आय की परिभाषा देते हुए कहा है कि “वास्तविक राष्ट्रीय आय वार्षिक शुद्ध उत्पादन का वह भाग है, जिसका उस वर्ष के अन्तर्गत प्रत्यक्ष रूप से उपयोग किया जाता है।”

राष्ट्रीय आय की गणना की प्रमुख विधि-राष्ट्रीय आय की गणना अनेक प्रकार से की जाती है। चूंकि राष्ट्र के व्यक्तियों की आय उत्पादन के माध्यम से अथवा मौद्रिक आयं के माध्यम से प्राप्त होती है। इसलिए इसकी गणना जब उत्पादन के योग के द्वारा किया जाता है तो उसे उत्पादन गणना विधि कहते हैं। जब राष्ट्रों के व्यक्तियों की आय के आधार पर राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है तो उस गणना विधि को आय गणना विधि कहा जाता है। प्राप्त की गई आय व्यक्ति के अपने उपभोग के लिए व्यय के माप से किया जाता है, राष्ट्रीय आय की मापने की इस क्रिया को व्यय गणना विधि कहते हैं। हम देखते हैं कि उत्पादित की हुई वस्तुओं का मूल्य विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्तियों के द्वारा किए गए प्रयोग से बढ़ जाता है, ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय ‘आय की गणना को मूल्य योग विधि कहते हैं। अंत में व्यावहारिक संरचना के आधार पर राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है। व्यावसायिक आधार पर की गई गणना को व्यावसायिक गणना विधि कहते हैं।

प्रश्न 3.
प्रति-व्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रति व्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय में अंतर निम्नलिखित है-
राष्ट्रीय आय में देश की कुल जनसंख्या से भाग देने पर जो भागफल आता है उसे प्रति-क्ति आय कहते हैं। जबकि राष्ट्रीय आय का मतलब किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य से लगाया जाता है। दूसरे शब्दों में वर्ष भर में किसी देश में अर्जित आय की कुल मात्रा को राष्ट्रीय आय कहा जाता है।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आय में वृद्धि भारतीय विकास के लिए किस तरह से लाभप्रद है ? वर्णन करें।
उत्तर-
किसी भी राष्ट्र की आर्थिक स्थिति के आंकलन का सर्वाधिक विश्वसनीय मापदण्ड है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने से ही प्रति-व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। भारत के विकास के लिए जो प्रयास किए जाते हैं वह उस राष्ट्र की सीमा क्षेत्र के अन्दर रहनेवाले लोगों की उत्पादकता अथवा उनकी आय को बढ़ाने के माध्यम से की जाती है। वर्तमान युग में प्रत्येक देश अपने-अपने तरीके से विकास की योजना बनाता है, जिसका लक्ष्य राष्ट्र के उत्पादक साधनों की क्षमता को – बढ़ाकर अधिक आय प्राप्त करना होता है। इसी तरह शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूँजी विनियोग के द्वारा रोजगार का सृजन किया जाता है, जिससे लोगों को आय में वृद्धि होती है।

आर्थिक विकास करने के लिए मुख्य रूप से उत्पादन तथा आय में वृद्धि की जाती है। वस्तुओं का अधिक उत्पादन तथा व्यक्तियों की आय अधिकतम होने पर ही हम राष्ट्र में उच्चतम आर्थिक विकास की स्थिति पा सकते हैं। अतः हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्रीय आय और प्रतिव्यक्ति आय ही राष्ट्र के आर्थिक विकास का. सही मापदण्ड है। बिना उत्पाद को बढ़ाए लोगों की आय  में वृद्धि नहीं हो सकती है और न ही आर्थिक विकास हो सकता है।

वास्तव में राष्ट्रीय आय में वृद्धि से भारत का समुचित विकास होगा। साथ ही हम विकसित देश की श्रेणी में आ सकेंगे।

प्रश्न 5.
विकास में प्रति-व्यक्ति आय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें
उत्तर-
किसी भी राष्ट्र की सम्पन्नता एवं विपन्नता वहाँ के लोगों की प्रति-व्यक्ति आय से  भी जानी जाती है। यदि प्रति-व्यक्ति आय निम्न होगी तो राष्ट्र विपन्न होगा जबकि प्रति-व्यक्ति आय अधिक होगी तो राष्ट्र सम्पन्न होगा। प्रति-व्यक्ति आय के समग्र रूप को ही राष्ट्रीय आय कहा जाता है। प्रति-व्यक्ति आय में बढ़ोतरी होने से उत्पादन की मांग में बढ़ोत्तरी होगी। इस मांग को पूरा करने के लिए उत्पाद का अधिकतम उत्पादन करना होगा जिससे आर्थिक विकास की प्रक्रिया तेज होगी, रोजगार के अवसर बढ़े रहेंगे, पूंजी का विनियोग होगा एवं बेहतर शिक्षा लोग पा सकेंगे जिसके कारण राष्ट्र आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ेगा। बिना उत्पाद को बढ़ाए प्रति-व्यक्ति आय में वृद्धि नहीं हो सकती। हर हाल में प्रति व्यक्ति आय को उच्च रखना होगा। फलतः उपरोक्त कथन के अनुसार कह सकते हैं कि आर्थिक विकास में प्रति व्यक्ति आय अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 6.
क्या प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि राष्ट्रीय आय को प्रभावित करती है ? वर्णन करें।
उत्तर-
प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि से राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है क्योंकि प्रति-व्यक्ति आय संयुक्त रूप से सभी व्यक्तियों की आय के योग को राष्ट्रीय आय कहा जाता है।

राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में परिवर्तन होने से इसका प्रभाव लोगों के जीवन स्तर पर पड़ता है। राष्ट्रीय आय वास्तव में देश के अंदर पूरे वर्ष भर में उत्पादित शुद्ध उत्पत्ति को कहते हैं। लेकिन उत्पत्ति में वृद्धि तभी होगी जब उत्पादन में अधिक श्रमिकों को लगाया जाए। इस प्रकार जैसे-जैसे बेरोजगार लोगों को अधिक रोजगार मिलेगा, श्रमिकों का वेतन बढ़ेगा, उनकी आय बढ़ेगी तथा उनका जीवन स्तर पूर्व की अपेक्षा बेहतर होगा। इस प्रकार प्रति-व्यक्ति आय में वृद्धि होने से व्यक्तियों का विकास संभव हो सकेगा। यदि इस प्रकार राष्ट्रीय आय के सूचकांक में वृद्धि होती है तो इससे लोगों के आर्थिक विकास में अवश्य ही वृद्धि होगी।

वास्तव में संयुक्त रूप से सभी व्यक्ति की आय के योग को राष्ट्रीय आय कहते हैं तथा प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि होने से राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है। प्रति-व्यक्ति आय में वृद्धि होने में से समाज के आर्थिक विकास में वृद्धि होती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रति-व्यक्ति आय ‘ में वृद्धि राष्ट्रीय आय को प्रभावित करती है।

परियोजना कार्य

प्रश्न 1.
छात्र चार्ट के माध्यम से अपने परिवार के आय के स्रोतों का वर्णन करें।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
कक्षा के छात्रों को दो समूहों में विभाजित करते हुए राष्ट्रीय आय एवं प्रति-व्यक्ति आय के बारे में अपनी कक्षा में एक वाद-विवाद आयोजित करें।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 3.
छात्र अपने-अपने परिवार की कुल मासिक आय एवं उस आय पर आश्रितों (परिवार के कुल सदस्यों) पर होने वाले खर्चों की एक सारणी बनाएँ।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

Bihar Board Class 10 Economics राज्य एवं राष्ट्र की आय Additional Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिहार की आय में सर्वाधिक योगदान किसका होता है ?
(क) कृषि क्षेत्र
(ख) औद्योगिक क्षेत्र
(ग) सेवा क्षेत्र
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ग) सेवा क्षेत्र

प्रश्न 2.
बिहार की अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र का मुख्य अंग है।
(क) विनिर्माण
(ख) कृषि
(ग) परिवहन
(घ) व्यापार
उत्तर-
(ख) कृषि

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय आय का अर्थ है
(क) सरकार की आय
(ख) पारिवारिक आय
(ग) सार्वजनिक उपक्रमों की आय
(घ) उत्पादन के साधनों की आय
उत्तर-
(घ) उत्पादन के साधनों की आय

प्रश्न 4.
भारत में वित्तीय वर्ष कहा जाता है ?
(क) 1 जनवरी, से 31 दिसम्बर, तक
(ख) 1 जुलाई, से 30 जून, तक
(ग) 1 अप्रैल, से 31 मार्च तक
(घ) 1 सितम्बर, से 31 अगस्त तक
उत्तर-
(ग) 1 अप्रैल, से 31 मार्च तक

प्रश्न 5.
“वास्तविक राष्ट्रीय आय वार्षिक शुद्ध उत्पादन का वह भाग है जिसका उस वर्ष में प्रत्यक्ष रूप से उपभोग किया जाता है।”-राष्ट्रीय आय की यह परिभाषा किसने दी है?
(क) मार्शल ने
(ख) फिशर ने
(ग) पीगू ने
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ख) फिशर ने

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
देश के मानक को कौन-सी संस्था निर्धारित करती है ?
उत्तर-
डायरेक्टोरेट ऑफ इकोनॉमिक्स एंड स्टेटिस्टिक्स।

प्रश्न 2.
शरत की प्रतिव्यक्ति आय अमेरिकी प्रतिव्यक्ति आय का कौन-सा हिस्सा है ?
उत्तर-
1/48 वाँ।

प्रश्न 3.
बिहार राज्य के घरेलु उत्पाद में किस क्षेत्र का सर्वाधिक योगदान होता है ?
उत्तर-
तृतीयक अथवा सेवा क्षेत्र का।

प्रश्न 4.
बिहार राज्य की वर्तमान विकास दर क्या है ?
उत्तर-
प्रतिशत।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय आय क्या है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय आय किसी देश के अंदर एक निश्चित अवधि में उत्पादित समस्त वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है। जिसमें विदेशों से प्राप्त होनेवाली आय भी सम्मिलित है।

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय आय का सृजन किस प्रकार होता है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय आय का सृजन अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की उत्पादन प्रक्रिया के अंतर्गत होती है।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय आय को साधन लागत पर राष्ट्रीय आय क्यों कहते हैं ?
उत्तर-
राष्ट्रीय आय का उत्पादन के साधनों पर वितरण होने के कारण इसे साधन लागत पर राष्ट्रीय आय कहा जाता है।

प्रश्न 8.
भारत में राष्ट्रीय आय की गणना किस संस्था द्वारा की जाती है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय आय की गणना केंद्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा की जाती है।

प्रश्न 9.
प्रतिव्यक्ति आय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर
किसी देश की कुल आय में कुल जनसंख्या से भाग देने पर जो भागफल आता है वह उस देश की औसत या प्रतिव्यक्ति आय कहलाती है।

प्रश्न 10.
बिहार की प्रतिव्यक्ति आय कम होने के क्या कारण है ?
उत्तर-
जनसंख्या वृद्धि, आंचलिक विषमता तथा कमजोर प्रशासन बिहार की प्रतिव्यक्ति आय कम होने के कारण है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राज्य घरेलु उत्पाद से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
एक लेखा वर्ष में राज्य में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं को जो बाजार मूल्य
के बराबर होता है राज्य घरेलु उत्पाद कहे जातवे हैं। इसमें राज्य के विभिन्न क्षेत्रों, कृषि, पशुपालन, उद्योग आदि के द्वारा कुल उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य सम्मिलित रहता है।

प्रश्न 2.
सकल राज्य घरेलू उत्पाद और शुद्ध राज्य घरेलु उत्पाद में अंतर कीजिए।
उत्तर-
सकल राज्य घरेलु उत्पाद राज्य की सीमाओं के अंदर एक लेखा वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है। इसमें सभी क्षेत्रों द्वारा, उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य सम्मिलित रहता है। ” शुद्ध राज्य घरेलु उत्पाद सकल राज्य घरेलु उत्पाद में से व्यय के मदों को घटाने के बाद प्राप्त किया जाता है। इसपर राज्य का प्रतिव्यक्ति आय तथा उनका जीवन स्तर निर्भर करता है।

प्रश्न 3.
हम स्थिर मूल्यों पर भी राज्य घरेलु उत्पाद का आकलन क्यों करते हैं?
उत्तर-
किसी राज्य के वास्तविक उत्पादन में बढ़ोतरी या कमी हुई है यह ज्ञात करने के लिए हम स्थिर मूल्यों पर राज्य घरेलु उत्पाद का आकलन करते हैं। स्थिर मूल्यों पर तुलना से राज्य के आर्थिक विकास एवं प्रगति की सही जानकारी मिलती है।

प्रश्न 4.
कुल घरेलु उत्पाद क्या है ?
उत्तर-
किसी देश की भौगोलिक सीमाओं के अंदर एक लेखा वर्ष में उत्पादित. अंतिम वस्तुओं
और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य कुल घरेलु उत्पाद है। यह धारणा बंद अर्थव्यवस्था से संबद्ध है।
इसमें कुल घरेलु उत्पादन और कुल राष्ट्रीय उत्पादन दोनों एक दूसरे के बराबर होते हैं।

प्रश्न 5.
कुल राष्ट्रीय उत्पादन तथा शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन में अंतर कीजिए।
उत्तर-
किसी भी देश में एक वर्ष के अंतर्गत जिन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन तथा विनिमय होता है उनके बाजार मूल्य को कुल राष्ट्रीय उत्पादन कहते हैं। कुल राष्ट्रीय उत्पादन में चालू वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य ही शामिल रहता है।
परंतु शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन में घिसावट आदि का खर्च निकाल देने के बाद जो कुल राष्ट्रीय उत्पादन में शेष बचता है, वह शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन है। शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन को बाजार मूल्य के रूप में राष्ट्रीय आय भी कहते हैं।

प्रश्न 6.
भारत की राष्ट्रीय आय का अनुमान बताइए। क्या योजना-काल में हमारी राष्ट्रीय आय में वृद्धि हुई है ?
उत्तर-
सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने 1868 में भारत की राष्ट्रीय आय 340 करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार ने राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाने के लिए 1949 में प्रो० पी० सी० महालनोविस की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय आय समिति नियुक्त किया। 1951-52 से केंद्रीय सांख्यिकी संगठन नियमित रूप से राष्ट्रीय आय और उससे संबंधित तथ्यों का अनुमान लगाती है।
योजनाकाल में भारत की राष्ट्रीय आय में सामान्यता वृद्धि हुई है। 1951 से 2003 के बीच राष्ट्रीय आय एवं कुल उत्पादन में 8 गुणा से भी अधिक वृद्धि हुई है।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय आय क्या है तथा इसका सृजन किस प्रकार होता है ?
उत्तर-
यदि किसी देश के प्राकृतिक साधनों पर श्रम और पूँजी लगाकर उनका उपयोग किया जाता है तो उससे प्रत्येक वर्श एक निश्चित मात्रा में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता है। सरल शब्दों में, यह देश की राष्ट्रीय आय है। इस प्रकार, राष्ट्रीय आय एक निश्चित अवधि में देश के कुल उत्पादन का मौद्रिक मूल्य है तथा वस्तुओं और सेवाओं की उत्पादन प्रक्रिया में ही इसका सृजन होता है। आय एक प्रवाह.है तथा कुल उत्पादन का प्रवाह ही कुल राष्ट्रीय आय का प्रवाह उत्पन्न करता है। अतः, कुल राष्ट्रीय आय और कुल राष्ट्रीय उत्पादन दोनों एक-दूसरे के बराबर होते हैं।

प्रश्न 8.
प्रतिव्यक्ति आय क्या है ? प्रतिव्यक्ति आय और राष्टीय आय में क्या संबंध है?
उत्तर-
प्रतिव्यक्ति आय किसी देश के नागरिकों की औसत आय है। कुल राष्ट्रीय आय में .
कुल जनसंख्या से भाग देने पर जो भागफल आता है उसे प्रतिव्यक्ति आय कहते हैं। इस प्रकार, प्रतिव्यक्ति आय की धारणा राष्ट्रीय आय से जुड़ी हुई है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने पर प्रतिव्यक्ति आय में भी वृद्धि होती है। लेकिन, राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने पर प्रतिव्यक्ति आय में प्रत्येक अवस्था में वृद्धि नहीं होगी। यदि आय में होनेवाली वृद्धि के साथ ही किसी देश की जनसंख्या भी उसी अनुपात में बढ़ जाती है तो प्रतिव्यक्ति आय नहीं बढ़ेगी और लोगों के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं होगा। इसी प्रकार, यदि राष्ट्रीय आय की तुलना में जनसंख्या की वृद्धि-दर अधिक है तो प्रतिव्यक्ति आय घट जाएगी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय आय के मापन में आनेवाली विभिन्न कठिनाईयों का वर्णन करें। उत्तर- राष्ट्रीय आय को मापने में निम्नलिखित कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं-

  • पर्याप्त एवं विश्वस्त आंकड़ों की कमी-राष्ट्रीय आय की गणना की अच्छी से अच्छी प्रणाली भी अपनाने पर पर्याप्त एवं विश्वसनीय आँकड़ों की कमी रहती है। पिछड़े देशों की अर्थव्यवस्था के साथ.यह समस्या अधिक है।
  • दोहरी गणना की संभावना_राष्ट्रीय आय की गणना करते समय कई बार एक ही आय को दुबारा दूसरे के आय में गिन लिया जाता है। उदाहरण के लिए एक व्यापारी और उसके कर्मचारी की आय को अलग-अलग जोड़ना दोहरी गणना की संभावना हा
  • मौद्रिक विनिमय प्रणाली का अभाव किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादित बहुत-सी वस्तुओं का मुद्रा के द्वारा विनिमय नहीं होता हैं। उत्पादक कुछ वस्तुओं का स्वयं उपभोग कर लेते हैं। या उनका अन्य वस्तुओं से दूसरे उत्पादक से अदल-बदल कर लेते हैं। इस प्रकार ऐसी वस्तुओं का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाए यह समस्या राष्ट्रीय आय को मापने में आती है।

प्रश्न 2.
कुल राष्ट्रीय आय की धारणा कुल राष्ट्रीय उत्पादन की धारणा पर आधारित है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
कुल राष्ट्रीय उत्पादन एक वर्ष के अंतर्गत जिन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता है उनके मौद्रिक मूल्य को कहते हैं। कुल राष्ट्रीय उत्पादन में केवल चालू वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य ही शामिल रहता है।
कुल राष्ट्रीय आय की धारणा कुल राष्ट्रीय उत्पादन की धारणा, पर आधारित है। क्योंकि हम जानते हैं कि अर्थव्यवस्था में उत्पादन प्रवाह के द्वारा आय के प्रवाह का निर्माण होता है। कुल राष्ट्रीय उत्पादन का प्रवाह ही कुल राष्ट्रीय आय का प्रवाह उत्पन्न करता है।
इसलिए उत्पादन के साधनों द्वारा अर्जित आय राष्ट्रीय उत्पादन की सृष्टि करते हैं जो कुल राष्ट्रीय आय के बराबर होता है। इस प्रकार, कुल राष्ट्रीय आय और कुल राष्ट्रीय उत्पादन दोनों समान होते हैं। तथा इनमें कोई मौलिक अंतर नहीं है।
इस तरह कुल राष्ट्रीय की धारणा कुल राष्ट्रीय उत्पादन की धारणा पर आधारित है।

प्रश्न 3.
किसी देश के आर्थिक विकास में राजकीय, राष्ट्रीय एवं प्रतिव्यक्ति आय का क्या योगदान होता है?
उत्तर-
राजकीय आय का अभिप्राय राज्य अथवा सरकार को प्राप्त होनेवाली समस्त आय से है। आधुनिक सरकारों का उद्देश्य देश में लोककल्याणकारी कार्यों को कर आर्थिक विकास करना है। स्पष्ट है कि राजकीय आय अधिक होने पर ही सरकार विकास कार्यों में अधिक योगदान कर सकती है। अर्द्धविकसित एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सरकार के सहयोग से ही सुदृढ़ आर्थिक संरचना का निर्माण किया जा सकता है।

आर्थिक विकास का राष्ट्रीय आय से घनिष्ठ संबंध है। देश के आर्थिक विकास के लिए राष्ट्रीय आय में वृद्धि आवश्यक है। सामान्यता राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने पर देशवासियों की प्रतिव्यक्ति आय भी बढ़ती है। इस प्रकार राष्ट्रीय एवं प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि होने पर देशवासियों के जीवन स्तर में सुधार होता है जो देश के आर्थिक विकास का सूचक है।

इस प्रकार किसी भी देश के आर्थिक विकास में राजकीय, राष्ट्रीय एवं प्रतिव्यक्ति आय का महत्वपूर्ण योगदान होता है। ये तीनों ही हमारे आर्थिक जीवन रहन-सहन के स्तर और विकास को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में आय के चक्रीय प्रवाह की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
आधुनिक समय में राष्ट्रीय आय की धारणा को प्रायः उत्पादन के साधनों की आय के रूप में व्यक्त किया जाता है तथा इसकी उत्पत्ति अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की उत्पादन प्रक्रिया में होती है।

राष्ट्रीय आय की अवधारणा का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त करने के लिए अर्थव्यवस्था में आय के चक्रीय प्रवाह को समझना अत्यंत आवश्यक है। आय एक प्रवाह है तथा इसका सृजन उत्पादक क्रियाओं द्वारा होता है। यद्यपि सभी प्रकार की आर्थिक क्रियाओं का अंतिम उद्देश्य उपभोग द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि है, लेकिन उत्पादन के बिना उपभोग संभव नहीं होगा। वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन, उत्पादन के चार साधनों-भूमि, श्रम, पूँजी एवं उद्यम के सहयोग से होता है। उत्पादन के ये साधन एक निश्चित अवधि में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करते हैं। यह उत्पादन प्रक्रिया का एक पक्ष है।

परंतु, इसका एक दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष भी है जिसका संबंध उत्पादन के उन साधनों की आय या पारिश्रमिक से है जिन्होंने इन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया है। इस प्रकार, उत्पादन प्रक्रिया के द्वारा अर्थव्यवस्था में जहाँ एक ओर वस्तुओं और सेवाओं का निरंतर एक प्रवाह जारी रहता है वहाँ एक दूसरा प्रवाह उत्पादन के साधनों की आय के रूप में होता है। यदि हम किसी देश की अर्थव्यवस्था को उत्पादक उद्योगों एवं उपभोक्ता परिवारों के दो क्षेत्र में विभक्त कर दें तो हम देखेंगे कि इनके बीच उत्पादन, आय एवं व्यय का निरंतर एक प्रवाह चल रहा है। उत्पादक या उद्यमी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। इसके लिए उन्हें उत्पादन के साधनों की सेवाओं की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, उत्पादन के क्रम में साधनों की आय का सर्जन होता है। उत्पादक उत्पादन के साधनों को उत्पादन क्रिया में भाग लेने के लिए उन्हें जो भुगतान करता है वह उनकी आय कहलाती है।

परंतु, किसी भी उत्पादक को उत्पादन के साधनों के पारिश्रमिक का भुगतान करने के लिए आवश्यक साधन कहाँ से प्राप्त होते हैं ? वह अपनी उत्पादित वस्तुओं को उपभोक्ता परिवारों के हाथ बेचता है जिससे उसे आय प्राप्त होती है। इसी आय से वह इन साधनों का पारिश्रमिक चुकाता है। विभिन्न उपभोक्ता परिवार ही उत्पादन के साधनों के स्वामी होते हैं तथा उत्पादन के साधन के रूप में उनहें लगान, मजदूरी, ब्याज एवं लाभ प्राप्त होता है। यह उनकी आय होती है। इस – आय को वे पुनः वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करते हैं। इस प्रकार, हम देखते हैं कि अर्थव्यवस्था में उत्पादकों से साधन आय के रूप में आय का चक्रीय प्रवाह उपभोक्ता परिवारों के पास पहुँचता है और पुनः इन परिवारों द्वारा वस्तुओं और सेवाओं पर किए जानेवाले व्यय के माध्यम से उत्पादकों के पास आ जाता है। आय का यह प्रवाह निरंतर जारी रहता है तथा इसे आय का चक्रीय प्रवाह (circular flow of income) कहते हैं।

Bihar Board Class 10 Economics राज्य एवं राष्ट्र की आय Notes

  • किसी देश या राज्य की आय का मुख्य स्रोत उसकी उत्पादक क्रियाएँ होती है।
  • बिहार राज्य की आय पूरे देश में सबसे कम है।
  • भारत के सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में चंडीगढ का प्रतिव्यक्ति आय सर्वाधिक है।
  • किसी राज्य में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के बाजार मूल्य एक लेखा वर्ष में राज्य घरेलु उत्पाद कहलाता है। .
  • विगत वर्षों के अन्तर्गत कृषि क्षेत्र में बिहार में गिरावट आई है।
  • वर्तमान में बिहार के राज्य घरेलु उत्पाद में तृतीयक अथवा सेवा क्षेत्र का अंशदान, सर्वाधिक अधिक है।
  • वर्तमान समय में राष्ट्रीय आय को प्रायः साधन आय के योग के रूप में व्यक्त किया जाता है।
  • किसी देश का कुल घरेलु उत्पाद उस देश की भौगोलिक सीमाओं के अंदर एक लेखा वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है।
  •  देश में एक लेखा वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के बाजार मूल्य कुल राष्ट्रीय उत्पादन है।
  • कुल राष्ट्रीय उत्पादन में से घिसावट आदि का खर्च निकाल देने के बाद जो शेष बचता है, वह शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन है।
  • कुल राष्ट्रीय आय और कुल राष्ट्रीय उत्पादन दोनों समान होते हैं।
  • सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने 1868 में भारत की राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाया था।
  • पंचवर्षीय योजनाओं में भारत की आर्थिक विकास दर लगभग 4 प्रतिशत रही है।
  • भारत की प्रतिव्यक्ति आय कम होने का एक प्रधान कारण राष्ट्रीय आय एवं संपत्ति का असमान वितरण है।
  • केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन द्वारा राष्ट्रीय आय का संकलन किया जाता है।
  • बिहार की 41.4% जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रही है।
  • गरीबी के कुचक्र की धारणा का विकास रैगनर नर्क्स ने किया है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (National Council of Economic Research) ने सर्वप्रथम कुल राष्ट्रीय उत्पादन, शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन तथा ‘राष्ट्रीय आय की धारणाओं को विकसित किया।
  • उत्पत्ति-गणना पद्धति का सर्वप्रथम प्रयोग 1907 में ब्रिटेन में किया गया था।
  • 2005-06 में बिहार की प्रतिव्यक्ति आय 7,875 रुपये थी।
  • वर्तमान मूल्यों पर 2005-06 में भारत की प्रतिव्यक्ति आय 25,716 रुपये थी।
  • केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CentraiStatisticalOrganisation) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 2004-09 के बीच बिहार की विकास-दर 11.03 प्रतिशत रही है।

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 2 Nalanda : Ancient Seat of Learning

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Bihar Board Class 11 English Nalanda : Ancient Seat of Learning Textual Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions Orally :

Nalanda Ancient Seat Of Learning Question Answer Bihar Board Question 1.
Who was Dr. Rajendra Prasad ?
Answer:
He was the first President of the Republic of India.

Nalanda Ancient Seat Of Learning Bihar Board Question 2.
When and where was he born ?
Answer:
He was born in 1884 in Zeradei, Bihar.

Ancient Seat Of Learning Bihar Board Question 3.
What is his contribution to the nation ?
Answer:
He had a moderating influence on political thinking. It was through his efforts that Magadh Research Institute was set up.

Class 11 English Chapter 2 Question Answers Bihar Board Question 4.
Where is Nalanda ? What was it famous for in the past ?
Answer:
Nalanda is in Bihar. It was famous for its University in the past.

B. 1. Answer the following questions briefly :

Class 11 English Chapter 2 Bihar Board Question 1.
Why had people gathered in Nalanda ?
Answer:
People had gathered in Nalanda because Dr. Rajendra Prasad was going to lay the foundation stone of Magach Research Institute there to revive the ancient glory of Nalanda.

Ancient Seat Of Learning Meaning In Hindi Bihar Board Question 2.
What does Nalanda symbolise ?
Answer:
Nalanda is the symbol of the most glorious period of India’s history.

Chapter 2 English Class 11 Bihar Board Question 3.
With which great religious teacher is Nalanda associated ?
Answer:
Nalanda is associated with the great religious teacher, Lord Buddha.

Nalanda University History In English Bihar Board Question 4.
When did it emerge as a flourishing University ?
Answer:
Nalanda emerged as a flourishing University sometime in the Gupta Age.

English Chapter 2 Class 11 Question Answers Bihar Board Question 5.
How long did Lord Mahavira live in Nalanda ?
Answer:
Lord Mahavira lived for fourteen years in Nalanda.

Class 11 English Chapter 2 Question Answer Bihar Board Question 6.
Who was Lepa ? What did he do with Lord Buddha ?
Answer:
Lepa was a rich citizen of Nalanda. He welcomed Lord Buddha with his entire wealth and possessions, and became his disciple.

Lesson 2 English Class 11th Bihar Board Question 7.
Who was Fa-Hien ? When did he visit Nalanda ?
Answer:
Fa-Hien was a Chinese pilgrim. He visited Nalanda in the 4th century AD.

Chapter 2 Class 11 English Bihar Board Question 8.
When did Hieun T’sang visit India ? Why did he refer to Jataka story ?
Answer:
Hieun T’sang visited India in the seventh century AD during the reign of emperor Harshavardhan.

He refers to Jatak story to say that the name Nalanda was derived from Na- alam-da, the peace of mind which Lord Buddha could not achieve in his previous births.

Nalanda University Bihar Board Class 11 English Question 9.
How was Nalanda University born ?
Answer:
Nalanda University was bom with the help of charity and public donations. It was founded with an endowment created by 500 traders who purchased the land and offered it to Lord Buddha.

Class 11 English Ch 2 Question Answer Bihar Board Question 10.
How many Viharas did Nalanda have ?
Answer:
Nalanda has six large Viharas.

Question 11.
What arrangements were made to meet the recurring expenditure of the University ?
Answer:
The revenue of 100 villages was set apart to meet the recurring expenditure of the university. Later it rose to 200 villages.

Question 12.
Name the states that contributed to the maintenance of the Nalanda University.
Answer:
Three states – Uttar Pradesh, Bihar and Bengal contributed to the maintenance of the Nalanda University.

B. 2. Answer the following questions briefly :

Question 1.
How many students and teachers were at Nalanda University when Hieun T’sang visited ?
Answer:
There are 10,000 students and 1,500 teachers.

Question 2.
How was the pupil-teacher ratio significant ?
Answer:
This ratio was significant because teachers could pay individual attention to the education and training of their students.

Question 3.
Name the countries from where the scholars came to study and collect Buddhist literature.
Answer:
Scholars came from China, Korea, Tibet, Turkistan and Mongolia to study and collect Buddhist literature.

Question 4.
What kind of library did Nalanda possess ?
Answer:
Nalanda had the biggest library in Asia.

Question 5.
When was it destroyed ?
Answer:
It was destroyed in the 12th century.

Question 6.
What kind of library is there in your school/college ?
Answer:
Our school library has textbooks, reference books, literary and scientific books:

Question 7.
How did several manuscripts survive ?
Answer:
The citizens had ensured the preservation of many rare manuscripts by getting their copies. Several of them reached Nepal and Tibet, and are still there.

Question 8.
How many lectures were delivered daily at Nalanda ?
Answer:
One hundred lectures were delivered daily at Nalanda.

Question 9.
What was so unique about the academic attitude at Nalanda ? How does it compare with the academic attitude at your school/college ?
Answer:
The academic attitude at Nalanda was free from any prejudice whatsoever. It was exposed to the religion and philosophy of all mankind.

The academic attitude in our school is also free from any prejudice. It is secular and no religious education is imparted.

Question 10.
How many subjects were made compulsory ?
Answer:
Five subjects – grammar, logic, medical science, handicrafts and religious and philosophy were made compulsory.

Question 11.
What appeal does Dr. Rajendra Prasad make to the people ?
Answer:
Dr. Rajendra Prasad appealed to the people to revive the educational system of a bygone era, and re-establish Nalanda as a centre of art, literature, philosophy, religion and science.

C. 1. Long Answer Questions :

Question 1.
Describe, after Dr. Rajendra Prasad, the academic activities at Nalanda. Assess the activities at your school/college in the light of the academic activities at Nalanda.
Answer:
According to Dr. Rajendra Prasad, Nalanda was a centre of higher education. There were about 10,000 students and 1,500 teachers. Obviously, a teacher had only six students to train. This was good from academic point of view because there was a close relationship between the guru and the shishya. Every student could get an individual attention. There were five compulsory subjects. The subjects were useful for all-round development of the students and made them capable to live healthily and usefully. The library was the biggest in Asia.

It was an honour to be a student at Nalanda. Scholoars from far off countries of Asia came there to study and collect Buddhist literature. About one hundred lectures were delivered everyday. The academic atmosphere was open, and without prejudice. Besides studies in Buddhist literature and philosophy, Vedic and allied literature was also taught. In fact, philosophy and religion of mankind was taught there.

Our school is very small and the teachers can hardly pay individual attention to their students. We have to study English and Hindi, which are useful in modern times. Besides these languages we study mathematics, science, social studies, economics, disaster management and computer. We are more worried about passing our examinations than acquiring knowledge.

Question 2.
‘The syllabus of Nalanda University was drawn with great wisdom,’ Explain.
Answer:
The syllabus of Nalanda University was drawn to serve two purposes. It aimed at the all-round development of a student’s personality as well as to make him financially independent and useful member of society.

Students were taught grammar which helped them to master the language. They were taught logic which helped them to understand and judge everything rationally. They were taught medical science. It helped them to live physically healthy and help others to live healthily. They were also taught a handicraft so that they could earn a living usefully and respectably. They were also taught religion and philosophy of their choice. This helped them to develop mentally and spiritually.

Question 3.
Why were the students of Nalanda University increasingly successful in their daily life ? How did the syllabus of Nalanda University help its students ? Do you find your syllabus helpful to you ? Evaluate your own syllabus in the light of the syllabus of Nalanda University.
Answer:
The root cause of the gradual increasingly success of the students of Nalanda University in their daily life were (i) the skilful preparation of the syllabus, and (ii) frequent interaction and individual care of the teachers on students. The syllabus of Nalanda University had been prepared keeping in view the practical problems which come on the way of success. The teachers used to guide the students properly. They watched their day to day activities and discipline. They took special care and precaution in building up the career of the student.

The preparation of syllabus of the university was in such a way that it could look after all round development of the student. It provided perfect knowledge to them. It included all important subjects such as Medical Science, Grammar, Languages, Logic, Crafts (Arts), architecture etc. as compulsory subjects. There were other subjects like philosophy and religion. It depended on the students to select either of them as optional subject. Thus they syllabus helped the students in carrying out their studies smoothly and building up their career.

Our syllabus has also been framed according to the need of present time. It also includes several subjects of science, arts and commerce. All the subjects of science, arts and commerce. All the subjects of the syllabus have been grouped into four faculties—Humanities, Science, Commerce and Social Science. This provision has been made according to the demand of time. Each subject provides specific and exaustive knowledge of the subject. The present syllabus has been constituted keeping in mind the present problem of employment. It provides the latest knowledge of all the subjects. It makes us aware with the knowledge of latest scientific researches and inventions, the world wide knowledge of trade and commerce.

Despite all there things the syllabus of present days cannot give the composite and moralful knowledge which the syllabus of Nalanda University provided. The purpose of the syllabus of Nalanda University was to provide the students the perfect knowledge of humanity and religion. It made the students aware with the purpose of life. The purpose of the present syllabus is to provide us knowledge to get a suitable job to lead a comfortable life.

Question 4.
What do the copper plates tell about the international relation maintained by Nalanda ? Describe in details.
Answer:
Many copper plates have been found at Nalanda in the course of archeological excavations. A few of them are the records of the visit of Maharaja Dharampal Deva and Devapal Deva of Bengal as the inscription over them show. Statues of those kings were also found at Nalanda. One of the the copper plates shows the international relationship maintained by Nalanda. The Emperor of Swarma-Dwip (now a part of Indonesia), Shri Balputra Deva had sent his envoy to Devpal Deva, the then ruler of Magadh with a request to make a gift of five villages to Nalanda on his behalf.

As the inscription of his copper plate shows Balputra, the Emperor of Java, being deeply impressed by the achievement of Nalanda, had a large Vihar constructed here to give visible expression of his devotion to Lord Buddha. This is but an example that has survived by sheer chance and which gives us an indelible impression of the glory which Nalanda enjoyed the world over.

Question 5.
How did the scholars of Nalanda carry the torch of knowledge to foreign countries ? Give details.
Answer:
Nalanda was considered a great centre of learning and knowledge in the world. Scholars from different countries used to visit Nalanda to study religion and philosophy. Nalanda was also a great centre of research. Scholars used to visit Nalanda to research on Buddhism. Thonim Sambhot, a Tibetan scholar was sent to Nalanda by Chang Gampo, the Emperor of Tibet to learn Sanskrit. He introduced and popularised Sanskrit and Indian knowledge in his country. He also studied Buddhistic and Brahmanical Literature under the guidance of Acharya Deva Vidya Sinh.

In the 8th century A.D. Acharya Shanti Rakchit, the chancellor of Nalanda University travelled to Tibet on the invitation from the Emperor. After sometime Acharya Kamal Shila, the chief authority on “Tantra Vidya” also visited Tibet. The scholars of Nalanda also learnt the Tibetan language. They translated Budhhist and Sanskrit words in Tibetan. By presenting the entire thing in new way in Tibet, they gradually converted its Rakshit of Nalanda for the first time in 749 A.D. in Tibet. It is also believed that the Korean Scholars came to study the Vinay and Abhidharma at Nalanda.

Question 6.
“Nalanda is the symbol of the most glorious period of our history.” How ? Explain.
Answer:
Nalanda was known for the greatest centre of learning and research in the world. The scholars from different countries used to visit Nalanda University to study religion and philosophy, to learn Buddhism. It bound together the various parts of Asia with links of knowledge at that time. There was no national and racial distinction of knowledge at Nalanda. The history of Nalanda dates back to the age of Lord Buddha and Lord Mahavira. According to Jain records, Lord Mahavira met Acharya Maukhila at Nalanda. He had lived here for 14 years.

Lepa, a rich citizen of Nalanda welcomed Lord Budha and offered his entire wealth and possessions and became his disciple. It is mentioned in the book “Sutra Kritanga”. The learned historian of Tibet “Lama Taranath” had written in his book that Nalanda was the birth place of ‘Sariputra’, a prominant person of the time. Emperor Ashoka had built a temple on his samabhi. Nalanda emerged as a flourishing university in the Gupta Age. Bhikshu Nagarjuna and Arya Deva were associated with Nalanda University. Chinese pilgrims Fa-Hien and Hieun T’sang had visited Nalanda and they found it at the height of its glory.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs:

Question a.
There are no national and racial distinctions in the realm of knowledge.
Answer:
Knowledge does not see caste, creed and nationalism. Whoever labours hard to acquire it, it goes with him. It requires regular studies and connection with the electronic media i.e. internet etc.

Question b.
Education is must for a fruitful life.
Answer:
Education makes a man perfect. It teaches us the manner of better living. It removes the negative desire of a man. It teaches us to lead a systematic life. It also leads us to all round development. A fruitful life can’t be imagined without education.

C. 3. Composition :

Question a.
Write a letter in about 150 words to a Japanese pen friend describing the centres of learning in ancient and medieval India.
Answer:
23, J. P. Narain Enclave
Patna
7th December 20
Dear Hanna,

I have just received your letter and I am glad to read that you are interested in knowing about the centre of learning in ancient and medieval India. I am sure you must have heard about Nalanda and Taksheela, These were two great centres of learning known all over Asia. Thfy were centres of Buddhist learning t it other aspects of Indian philosophy and knowledge of Brahmanical literature were also imported there. These two universities had large libraries but unfortunately they were destroyed by foreign invaders. The aim of education at these universities was not to make monks. They emphasised on the all round development of the personality of the student.

They not only imparted academic knowledge, but taught logic, grammar and even some handicrafts so that the students might earn a living respectably and settle down as householders. Indeed such was the reputation of these two centres of learning that scholars from your country, and from Korea, China, Sri Lanka and Indonesia came to study here and carried back the torch of knowledge to their native lands.

If you visit India, I will show you the remains of Nalanda, and you will nave an idea of the grandeur, this place used to be.

With best wishes.
Yours Sincerely
Anmol

Question b.
Prepare a speech on the importance of library in about 200 words to be delivered at the annual function of your school/college.
Answer:
Dear friends, today I am going to speak about the importance of library.

A library is a must for every institute. We are fortunate to have a good library with about 3.(XX) books.

A library has hooks on various subjects besides encyclopaedias, dictionaries, atlases, and other reference books. These books are very useful. We can find information on any place, person, building, animal, etc. We can also learn about events and discoveries. There are books on science and geography that tell us about problems like global warming and pollution. We can also’ find out about our body and how our organs work. We can leant about space and space missions.

Besides, reference books, dear friends, we can have books by great writers in Hindi and English in literature sections. If you like stories, we have a lot of them there. There are novels and plays and essays by men of letters. If you like books on adventure, you can choose any from that section. Fortunately, we have a good librarian. She is ever willing to guide us and help us to choose a book of our liking. Besides, our principal, as you know, has introduced an open-shelf system. We are free to visit the library and browse a book there. We can also borrow two books for a fortnight. But we must remember, dear friends, library books are for all of us. So, we must not spoil them, and we must return them by the due date because someone else might be in need of them. I am sure you will make a judicious use of library for your projects and for extra reading.

Thanking you.

D. Word-Study
D. 1. Dictionary use :

Ex. 1. Look up a dictionary and find out how these words are different from one another:
charity donation endowment

Ex. 2. Use the words given in’Ex. 1’in sentences of your own.
Answer:
Ex. 1. charity – something that is given by an organization for helping people in need.

donation – something that is given to an organization such as charity, in order to help them.
endowment – money given to a school or a college or another institution to provide it with an income.

Ex. 2. We organized a charity show to collect money for flood-relief. We have donated blood to blood-bank in the hospital.

The elites of the society have started a helping club and have endowed it with money.

D. 2. Word-meaning :

Ex. 1. Write the synonyms of the words given below: disciple
Disciple – resolve – pursue
inscription – inspire – attitude

Ex. 2. Write the antonyms of the following words:
Revive – glory – consiousness
various – liberalism – prejudice

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 2 Nalanda Ancient Seat of Learning 1

E. Grammar

Study the following sentences from the lesson:
(a) Lepa, a rich citizen of Nalanda, welcomed Lord Buddha.
(b) The message of Nalanda was heard across the mountains and the ocean of the Asian main-land.

The first sentence given above is in active voice, the passive equivalent of which would be:

Lord Buddha was welcomed by Lepa, a rich citizen of Nalanda. The second sentence is in the pasive voice, its active equivalent would be:

They heard the message of Nalanda across the mountains and the ocean of the Asian main-land.

Ex. 1. Now change the voice of the following sentences:

  1. Emperor Ashoka enlarged the Samadhi of Sariputra.
  2. Acharya Dingnag visited Nalanda.
  3. The revenue of 100 villages had been set apart to meet the recurring expenses.
  4. Copper-plates have been found at Nalanda.
  5. The syllabus of Nalanda University was drawn up with grer. wisdom.

Answer:

  1. The Samadhi of Sariputra was enlarged by Emperor Ashoka.
  2. Nalanda was visited by Acharya Dingnag.
  3. The recurring expenses had been met by the revenue of 100 villages
  4. Nalanda has been found copper-plates.
  5. Nalanda University drawn up the syllabus with great wisdom.

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Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 3 अपवाह स्वरूप

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : भूमि एवं लोग Chapter 3 अपवाह स्वरूप Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Geography Solutions Chapter 3 अपवाह स्वरूप

Bihar Board Class 9 Geography अपवाह स्वरूप Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

Bihar Board Class 9 Geography Solutions प्रश्न 1.
लक्ष्मीसागर झील किस राज्य में स्थित है ?
(क) मध्यप्रदेश
(ख) उतर प्रदेश
(ग) बिहार
(घ) झारखंड
उत्तर-
(ग) बिहार

Bihar Board Class 9 Geography Book Solution प्रश्न 2.
निम्न में से कौन लवणीय झील है ?
(क) वूलर
(ख) डल
(ग) सांभर
(घ) गोविन्दसागर
उत्तर-
(ग) सांभर

कक्षा 9 भूगोल अध्याय 3 Question And Answer Bihar Board प्रश्न 3.
गंगा नदी पर गांधी सेतु किस शहर के निकट अवस्थित है ?
(क) भागलपुर
(ख) कटिहार
(ग) पटना
(घ) गया
उत्तर-
(ग) पटना

Bihar Board Class 9th History Solution प्रश्न 4.
कौन-सी नदी भ्रंश घाटी से होकर बहती है ?
(क) महानदी
(ख) कृष्णा
(ग) तापी
(घ) तुंगभ्रदा
उत्तर-
(ग) तापी

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 5.
कौन-सी नदी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लम्बी नदी है ?
(क) नर्मदा
(ख) गोदावरी
(ग) कृष्णा
(घ) महानदी
उत्तर-
(ख) गोदावरी

Bihar Board Class 9th Geography Solution प्रश्न 6.
सिंधु जल समझौता कब हुआ था ?’
(क) 1950 ई० में
(ख) 1955 ई० में
(ग) 1960 ई० में
(घ) 1965 ई० में
उत्तर-
(ग) 1960 ई० में

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 7.
‘शांग-पो’ किस नदी का उपनाम है
(क) गंगा
(ख) ब्रह्ममपुत्र
(ग) सतलुज
(घ) गोदावरी
उत्तर-
(ख) ब्रह्ममपुत्र

Bihar Board Class 9 Sst Solution प्रश्न 8.
इनमें से गर्म जल का जल प्रपात कौन है ?
(क) ककोलत
(ख) गरसोप्पा
(ग) ब्रह्मकुंड
(घ) शिवसमुद्रम
उत्तर-
(ग) ब्रह्मकुंड

Bihar Board Class 9 Geography Solution प्रश्न 9.
कोसी नदी का उद्गम स्थल है ?
(क) गंगोत्री
(ख) मानसरोवर
(ग) गोसाईंथान
(घ) सतपुड़ा श्रेणी
उत्तर-
(ग) गोसाईंथान

लघु उत्तरीय प्रश्न

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 1.
जल विभाजक का क्या कार्य है ? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
जब कोई ऊँचा.क्षेत्र, जैसे पर्वत या उच्चभूमि दो निकटवर्ती अपवाह श्रेणियों को एक-दूसरे से अलग करती है तब ऐसी उच्च भूमि जल विभाजक कहलाती है। जैसे-दिल्ली की उच्चभूमि सतलज बेसिन और गंगा बेसिन को अलग करने के कारण जल विमाजका का उदाहरण है।

Bihar Board Class 9 Economics Solution प्रश्न 2.
भारत में सबसे विशाल नदी द्रोणी कौन-सी है?
उत्तर-
भारत की सबसे विशाल नदी द्रोणी गंगा है। इसकी लम्बाई 2525 किमी० है।

Bihar Board 9th Class Social Science Book Pdf प्रश्न 3.
सिंध एवं गंगा नदियाँ कहाँ से निकलती हैं ?
उत्तर-
सिंधु नदी तिब्बत के निकट मानसरोवर झील से निकलती है जबकि गंगा हिमालय की गंगोत्री नामक हिमानी से निकलती है ।

Bihar Board Solution Class 9 History प्रश्न 4.
गंगा की दो प्रारंभिक धाराओं के नाम लिखिए ? ये कहाँ पर एक-दूसरे से मिलकर गंगा नदी का निर्माण करती हैं ?
उत्तर-गंगा की दो मुख्य धाराएँ अलकनंदा और भागीरथी हैं । ये देव प्रयाग नामक स्थान पर मिलकर गंगा नदी का निर्माण करती हैं।

Class 9 History Bihar Board प्रश्न 5.
लम्बी धारा होने के बावजूद तिब्बत के क्षेत्रों में ब्रह्मपुत्र में कम गाद(सिल्ट) क्यों है ?
उत्तर-
तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी का मार्ग काफी लम्बा है । परन्तु इस मार्ग में इसे वर्षा अथवा अन्य साधनो से कम जल प्राप्त होता है । कम जल के कारण इसकी अपरदन शक्ति कम होती है । इसी कारण इसमें गाद (सिल्ट) की मात्रा कम होती है ।

Bihar Board Class 9th Social Science Solution प्रश्न 6.
कौन-सी दो प्रायद्वीपीय नदियाँ धासान घाटी से होकर बहती हैं ? समुद्र में प्रवेश करने के पहले वे किस प्रकार की आकृतियों का निर्माण करती हैं ?
उत्तर-
नर्मदा एंव तापी दो प्रायाद्वीप में प्रवेश करने के पहले ज्वारनदमुख (estury) का निर्माण करती हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

Bihar Board Class 9 Civics Solution प्रश्न 1.
हिमालय तथा प्रायद्वीपीय भारत की नदियों की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारत की नदियों के दो वर्ग हैं –

(1) हिमालय की नदियाँ तथा (2) प्रायद्वीपीय नदियाँ अलग-अलग भौगोलिक प्रदेशों में इनकी उत्पत्ति होने के कारण नदियाँ एक दूसरे से । भिन्न हैं । इनकी भिन्नता के कारन ही इनकी खास विशेषता हो गई हैं

(i) हिमालय की अधिकांश नदियाँ बारहमासी अथवा स्थायी हैं । इन्हें वर्षा के जल के अतिरिक्त पर्वत की चोटियों पर जमे हिम के पिघलने से सलो भर जलापूर्ति होती रहती है।

(ii) सिंधु एंव ब्रह्मपुत्र जैसी भारत की प्रमुख नदियाँ हिमालय से निकलती हैं । इन नदियों ने प्रवाह के क्रम में पर्वतों को काटकर गार्ज का निर्माण किया है । जसै-ब्रह्मपुत्र नदी हिमालय के नामचा बरवा शिखर के पास अंग्रेजी के ‘U’ आकार का मोड़ बनाकर अरुणाचल प्रदेश में गार्ज का निर्माण करती है ।

(iii) हिमालय जनित नदियाँ उद्गम स्थल से समुद्र तक यात्रा के दौरान अनेक प्रकार के क्रिया-कलाप को अंजाम देती हैं।

(iv) ये नदियाँ अपने मार्ग के ऊपरी भाग में तीव्र अपरदन करती है और सिल्ट (गाद) बालू, मिट्टी जैसे-अपरदित पदार्थो को ढोते चलती है। नदियाँ ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती है, अबसाद की मात्रा बढ़ती जाती है । इसे मध्य एंव निचले मार्ग में जहाँ भूमि की ढाल की हो जाती है, नदियों का संवहन करने में कठिनाई होती है ।

(v) परिणामतः नदियाँ उसे जमा करती है, जिससे गोखर झील, बाढ़ का मैदान और डेल्टा जैसे अनेक आकृतियों का निर्माण करती हैं ।

प्रायद्वीपीय नदियाँ : इनकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  • यहाँ की अधिकांश नदियाँ मौसमी हैं, जिनका स्रोत मुख्यतः वर्षा का जल है ।
  • ग्रीष्म काल में जब वर्षा नहीं होती है तो नदियाँ सिकुड़ कर पतली हो जाती हैं और छोटी धाराओं में बहने लगती है ।
  • नर्मदा तथा तापी नदियाँ अरब सागर में गिरती हैं पठारी भाग से ही निकलती हैं। सागर में गिरने के पहले ज्वारनदमुख का निर्माण करती है।
  • कृष्णा, कावेरी, महानदी, गोदावरी पश्चिमी घाटी से निकलकर

पूरब में बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं और अपने मुहाने पर डेल्टा का निर्माण करती हैं।

प्रश्न 2.
प्रायद्वीपीय पठार के पूर्व एवं पश्चिम की ओर प्रवाहित होने वाली नदियों की तुलना कीजिए।
उत्तर-
प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियाँ अनुगामी या अनुवर्ती नदी-प्रणाली कहलाती हैं। यहाँ पूर्व में बहने वाली मुख्य नदियाँ-महानदी, गोदावरी, तथा कृष्णा और कावेरी है तथा पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों में नर्मदा और ताप्ती है। दोनों की तुलना इस प्रकार हैं

पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ –

  • पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।
  • गोदावरी को दक्षिण की गंगा कहा जाता है।
  • मुहाने के निकट इन नदियों की गति बहुत मंद पड़ जाती है। ये नदियाँ अपने मुहाने पर डेल्टा बनाती हैं।
  • कुछ नदियों में शिवनाथ, हंस देव, मांद, जोंक, तेल, दूध गंगा, पंचगंगा, तुंगभद्रा, कोयना, घाटप्रभा, मालप्रभा, वैतरणी एवं सुवर्णरेखा

पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ –

  • ये नदियाँ अरब सागर में गिरती हैं।
  • मुहाने के निकट इन नदियों की गति बहुत तेज हो जाती है।
  • ये नदियाँ अपने मुहाने पर ज्वारनदमुख अथ्वा एस्चुअरी का निर्माण करती हैं।
  • कुछ नदियों में गोवा का मांडवी और जुआरी, कर्नाटक की कालिन्दी, गंगावली, शर्वती तथा नेत्रवती, केरल की पेरियार, पम्बा तथा मनिमाला हैं जो अरब सागर में गिरती हैं। ये सभी तीव्रगामी नदियाँ हैं।

प्रश्न 3.
भारत की अर्थव्यवस्था में नदियों के महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
भारत की अर्थव्यवस्था में नदियों का महत्वपूर्ण सहयोग रहा है। –

  • इन नदियों के प्रवाह से ही कृषि भूमि का आज 40% प्रतिशत भूभाग जलोढ़ मिट्टी से ढका हुआ है जो नदी घाटी, डेल्टा और तटीय मैदानी भागों में फैले हुए हैं ।
  • गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र के डेल्टा एवं मैदानी भाग में जलोढ़ की प्रचुरता हैं जो अत्यंत ही उपजाऊ है।
  • ये यातायात के साधन भी रही हैं। आज भी ब्रह्ममपुत्र, गंगा और यमुना में दूर-दूर तक स्टीमरें चलती हैं।
  • ये जल विद्युत उत्पन्न कर रही हैं और जलशक्ति का भंडार भी है।
  • ये नदियाँ मछलियाँ प्राप्त के साधन हैं । पूर्वी भारत के कितने ही लोगों के आहार में मछली की प्रमुखयता है। अतः मछली उद्योग – बहुतों की अजीबिका है।
  • नदियाँ उद्योग केन्द्र और नगरों की स्थापना और विकास में मदद पहुँचाती हैं । जैसे स्वर्णरेखा का जमशेदपुर के विकास में, हुगली का कोलकाता के विकास में, गंगा का वाराणसी और कानपुर के विकास में ।
  • नदियाँ पर्यटन के आकर्षक केन्द्र भी हैं।
  • अनेक परियोजनाओं के द्वारा इसे और भी महत्वपूर्ण बनाया जा रहा है।

प्रश्न 4.
भारत में झीलों के प्रकार का वर्णन उदाहरण सहित कीजिए।
उत्तर-
निर्माण की दृष्टि से झीलों के निम्नलिखित प्रकार हैं

  • धंसान घाटी झील-धंसान घाटी में जब जल जमाव होता है तो इस प्रकार की झील का निर्माण होता है । जैसे-अफ्रीका में विक्टोरिया, रूडोल्फा, न्यासा । भारत में तिलैया बाँध द्वारा कृत्रिम झील बनाया गया
  • गोखुर झील-नदियों में जब अवसाद की मात्रा बढ़ जाती है या – भूमि का जल कम जाता हैं । तब उसके मार्ग में विसर्पण कम जाता है। विसर्पण भाग कटकर मुख्यधारा से अलग हो जाता है, जिसका आकार गाय के ‘खुर’ के समान होता है । इसे गोखुर या परिव्यक्त झील भी कहा जाता है । जैसे- बिहार के बेतिया का ‘सरैयामान’ बेगूसराय का ‘कांवर झील’ इनके उदाहरण है।
  • लैगून झील-ऐसी झीलें समुद्र तट पर मिलती हैं । जहाँ समुद्र का जल बंदी बन कर रह जाता है । पूर्वी समुद्र तट पर चिलका तथा पुलीकट झीलें हैं।
  • अवरोधक झील-पर्वतीय प्रदेशों में भू-स्खलन के कारण चट्टाने गिरकर नदियों के प्रवाह को रोक देते हैं, जिसके कारण झील बन जाती है । इसे अवरोधक झील कहते हैं। जैसे-हिमालय क्षेत्र में गोहना झील ।
  • क्रेटर झील-पुराने ज्वालामुखी के मुँह पर बने झील को क्रेटर झील कहते हैं । जैसे- महाराष्ट्र का नोलार झील ।
  •  हिमानी झील-हिमालय क्षेत्र में हिमानी द्वारा निर्मित झीलों में नैनीताल, भीमताल, सातताल आदि हिमानी झीलें हैं।
  • भूगर्भीय क्रिया से निर्मित झील-जम्मू-कश्मीर में ‘वूलर झील’ मीठे पानी का झील है । यह मीठे पानी की भारत में सबसे बड़ी झील है।

मानचित्र कौशल

(क) भारत के मानचित्र पर निम्नलिखित नदियों को चिह्नित कीजिए
तथा उनके नाम लिखिए-
(i) गंगा, (ii) सतलुज, (iii) दामादर, (iv) कृष्णा , (v) नर्मदा, (vi) तापी, (vii) महानदी ।

(ख) भारत के रेखा मानचित्र पर निम्नलिखित झीलों को चिह्नित
कीजिए –
(a) चिल्का, (b) सांभर, (c) वूलर, (d) पुलीकट, (e) कोलेरू ।
उत्तर-
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 3 अपवाह स्वरूप - 1

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Bihar Board Class 11 English Three Years She Grew Textual Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions :

Nature is all around you. You see its different manifestations in plants, birds, animals, rivers, lakes etc :

Three Years She Grew Question And Answer Bihar Board Question 1.
Have you ever observed nature closely ?
Answer:
Yes, I have observed nature closely many times. Once I went to Rajgir with my parents. There was solar eclipse that day. We took bath in ‘Surya Kund’, the was hot. Afterwards we went to see the ‘stupas’ and temples of Lord Buddha. We again took bath after eclipse was over in ‘Brahm Kunda’. The important and the most attractive thing which I observed that no body knows from where the water in those ‘Kundas’ came and why the water was so hot.

The second thing was that the ‘kundas’ and small market of there were surrounded by mountains. The sight was so much beautiful that I wanted to settle there Perhaps the water of ‘kundas’ also coming from the mountains, and the reason of it being hot sulpher through which water has to pass.

The Education Of Nature Questions And Answers Bihar Board Question 2.
How do you feel when you see any of these manifestation ?
Answer:
We feel very delighted when we see any of the manifestation of nature. We forget all the anxieties and problems to see the beauty of nature.

Three Years She Grew Question And Answer Pdf Bihar Board Question 3.
Do you learn anything from them ?
Answer:
We learn from the manifestations of nature that nature has provided us a huge treasure in which all the things of our joy can be found. We should have only the love and sensibility for the nature. We learn to be selfless and to do welfare for all as the nature spreads beauty and pleasure for all without any interest and selfish motive.

B. 1. Answer these questions briefly :

Education Of Nature Poem Questions And Answers Bihar Board Question 1.
Who is ‘she’ in the first line ? Where and how long did she grow ?
Answer:
She is Lucy. She grew in sun and shower for three years.

Three Years She Grew Line By Line Explanation Bihar Board Question 2.
What is meant by ‘A lovelier flower on earth was never sown’ ?
Answer:
This means that Lucy was the loveliest child ever born on earth. The poet compares Lucy to a flower.

Three Years She Grew Bihar Board Question 3.
Who decided to take care of the girl ?
Answer:
Nature decided to take care of the girl.

Three Years She Grew In Sun And Shower Bihar Board Question 4.
What is meant by ‘law and impulses’ in line 8 ?
Answer:
Law means check and control, impulse means a sudden inclination to act. Nature will teach Lucy what to do and when to restrain herself.

Three Years She Grew Poem Bihar Board Question 5.
Where will Nature take the girl ?
Answer:
Nature will take the girl in the hills and the open plains, in glades and bowers.

Three Years She Grew Summary Bihar Board Question 6.
What is meant by ‘overseeing power’ in line 11 ? Who will feel it ?
Answer:
‘Overseeing power’ means divine spirit that will keep a watchful eye on Lucy. Lucy will feel its presence everywhere.

Three Years She Grew Is A Poem By Bihar Board Question 7.
What will the girl learn from the ‘fawn’ ?
Answer:
From the fawn Lucy will learn to be cheerful and to be playful. She will leap and run among the hills and across the lawns.

Question 8.
What will the floating cloud lend to her ?
Answer:
The floating cloud will lend her its stateliness—grace and dignity.

Question 9.
Who did she learn grace from ?
Answer:
She learnt grace from the motion of storms.

Question 10.
What shall mould the Maiden’s form ? How ?
Answer:
The silent influence of nature, the grace and flexibility of the willow, the movement of clouds, and even the storms will mould her figure.

B. 2. Answer the following questions :

Question 1.
What will be dear to the girl ?
Answer:
The glittering, twinkling stars in the midnight sky will be dear to her.

Question 2.
Where will she lean her ear ?
Answer:
She will listen to the sounds of flowing rivers in lonely places.

Question 3.
Where will rivulets dance ?
Answer:
Rivulets dance among hills as they flow in and out in a zigzag way.

Question 4.
What will pass into her face ?
Answer:
The beauty bom of murmuring sound will pass into her face.

Question 5.
What effect will the ‘vital feelings of delight’ have on the girl ?
Answer:
The vital feelings of delight will help her to grow tall, and fill her innocent heart with joy.

Question 6.
What does the phrase ‘such thoughts’ mean in line 34 ?
Answer:
‘Such thoughts’ mean vital feelings of delight as are necessary for the growth and development of human body and mind.

Question 7.
Who will give such thoughts and when ?
Answer:
Nature will give such thoughts to Lucy when they live together in the happy valley.

Question 8.
Who is the speaker of the poem ?
Answer:
The poet is the speaker of the poem.

Question 9.
Explain the line ‘How soon my Lucy’s race was run’ ?
Answer:
The poet is grieved to say that Lucy died very young.

C. 1. Long Answer Questions :

Question 1.
What does Nature decide about Lucy ? Give details.
Answer:
Nature decides to adopt Lucy as her own child and make her a lady of her own. She decides to educate Lucy in her own way. She will teach her how to restrain herself from evil deeds, and prompt her to do good and noble things. She will grow tall and beautiful. She will be sportive like the fawn.

Question 2.
Describe the process by which Nature intends to mould Lucy’s character and her outward form ?
Answer:
Nature herself will be Lucy’s teacher. Floating clouds will teach Lucy majesty of movement. The willow will teach her to bend. This will teach Lucy to be humble. Her body will become flexible. Even the motion of storms will teach her to be graceful. Lucy’s education will not be a passive process. Lucy will be an active participant in her education. She will look at the midnight stars, and will learn to appreciate beauties of Nature. She will listen to the music of flowing streams. This will give her delight, and her face will become beautiful. All these activities and feelings will mould her character as well as her physical form. She will grow to be a cheerful, tall and beautiful young woman.

Question 3.
What are the ideas contained in the poem ?
Answer:
The poem contains William Wordsworth’s ideas about education. He believed that Nature has an immense influence on the development and growth of human body and mind. Lucy is presented as a flower that blossoms into to its natural form under sun and shower.

Question 4.
What did Lucy leave to the speaker ?
Answer:
Lucy died young. She left behind her memory and the calm and quiet heath.

Question 5.
Give critical estimate of the poem ‘Three Years She Grew’.
Answer:
The poem is one of Wordsworth’s Lucy poems that appear in his Lyrical Ballads. Wordsworth was influenced by Rousseau’s philosophy of education. He believes that Nature is the best teacher. School education is artificial.

Through Lucy, he describes how Nature wants to mould her form and character. He describes the process by which Nature will achieve her objective. The process consists of taking up opposing polarities and reconciling them. Lucy will learn ‘law and impulse’. She will play in ‘rock and plain’ and ‘glade and bower’. She will learn from the floating clouds, bending willow, sportive fawn, dancing streams and insensate things.

The poem is divided into seven stanzas of six lines each. The rhyme scheme is a a a b c c b.

Question 6.
Find out instances of simile in the poem.
Answer:
Following are the instances of simile sportive as the fawn.

Question 7.
Find out instances of metaphor in the poem.
Answer:
Following are the instances of metaphor.
‘A lovelier flower on earth was never sown.
Lucy is looked upon as a flower.

Question 8.
Can you find instances of personification in the poem ?
Answer:
The instances of personification are :
The Nature said – Nature is personified.
The floating clouds their state shall lend.
For her the willow bend. rivulets dance their wayward round.
And vital feelings of delight/shall rear her form.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs.

Question a.
Nature is our best teacher.
Answer:
There is no doubt that all our knowledge and experiences have come from Nature. For a long time man lived entirely in natural environment. Even today all our scientific knowledge comes from the study of natural objects and their functions. But Nature does not want passive pupils. You have to participate actively in the teaching-learning process. We observe natural phenomena and draw inferences. If we just watched nature like other animals our knowledge would have remained limited.

Question b.
Nature has many things to offer.
Answer:
There is variety in Nature. There is no monotony. If animals consume oxygen and give out carbon dioxide, plants do quite the opposite. Then there are animals that will be drowned in water, but there are animals that can breathe only in water. Some animals can live both in water and land. Then all animals and plants have a variety of behaviour. Then there is the boundless sky with huge stars, plants and galaxies. Life is Nature’s greatest secret.

Nature has so much to offer that we cannot even name them.

C. 3. Composition :

Write a paragraph in about 100 words on the following:

Question a.
Nature as the storehouse of learning
Answer:
Since early times man has been fascinated by the mysteries of Nature. Today all our knowledge and sciences are based on the study of Nature. Nature is a storehouse of learning, our physics, chemistry, biology, zoology, geography, geology, astronomy, etc. are nothing but our little effort to learn from Nature. Even a great scientist like Newton felt that he could only gather a pebble here and there on the seashore of knowledge. The sea of knowledge remained unfathomed by him. Indeed Nature is a storehouse of learning. That’s why we must preserve nature because there is so much to learn.

Question b.
Bliss of solitude.
Answer:
Man is a social being. We live together in big cities. Yet we get tired of the noise of crowded cities. We seek solitude because only in solitude we can be in communion with our soul and with God. Our saints and sages sought solitude in forests and mountains. There they could meditate and experience the bliss of solitude. In our times solitude is hard to find. But we all do seek it. Nature is the best place for solitude, and only there we can find peace of mind.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs:
(a) Nature is our best teacher.
(b) Nature has many things to offer.
Answer:
(a) Nature teaches us to spread selfless love. It is very beautiful because it knows only to give. It is so much beautiful because it only gives. It never takes anything from anybody. It gives to all. It never descriminates between good and bad.
(b) Nature has a huge treasure to give us. It gives us air to breath, water to drink, fruits and cerials to eat. It provides shelter and light. Everything which we require for our life is provided by nature.

D. Word study:

D. 1. Dictionary Use

Ex. 1. Look up a dictionary and write two meanings to each of the following words-the one in which it is used in the lesson and the other which is more common:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 6 Three Years She Grew 1
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 6 Three Years She Grew 2

E. Grammar :

Ex. 1. Read the sentences picked up from the poem. Some of them are in the active voice and other in die passive one. Change the voice of the sentences given below and note the change in effect after the change in voice.

  1. A lovelier flower on earth was never sown.
  2. She shall be mine.
  3. She will feel an overseeing power.
  4. Vital feelings of delight shall rear her form.
  5. I will give such thoughts to Lucy.
  6. The work was done.
  7. How soon my Lucy’s race was run!

Answer:

  1. Nobody every sowed a lovelier flower on earth. (Agent in prominent) –
  2. I shall own her. (Agent prominent)
  3. An overseeing power will be felt by her. (object prominent)
  4. Her form shall be reared by vital feelings of delight, (object prominent)
  5. Lucy will be given such thoughts by me. (object prominent)
  6. Some one did the work. (Agent prominent)
  7. How somebody ran my Lucy’s race ! (Agent prominent)

Ex. 2. Read the lines from the poem carefully and mark the different cases of the personal pronoun ‘I’:
This child I to myself will take;
She shall be mine, and / will make
A Lady of my own.
…………. and with me.
The Girl …………. shall feel an overseeing power.
Specify the instances of different cases –

Subjective, objective, possessive, and reflexive – in the lines above and write the different cases for other personal pronouns – we, you, he, she, it, they.
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 6 Three Years She Grew 3

F. Activities

Ex. 1. Gather five stories / fables / tales / poems from any language that tell about the benign influence of nature.
Answer:
1. The Daffodils – Wordsworth.
2. The world is Too Much With Us – Wordsworth
3. She Walks In Beauty, Like The Night – Byron
4. Break, Break, Break – Tennyson
5. The Education of Nature – Wordsworth.

Ex. 2. Find out rhyme scheme of the poem.
Answer:
a a b c c b
d d e f f e
g g h i i h
j j k l l k
m m n o o n p p
q r r q s s t u u t.

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Bihar Board Class 10 Political Science Solutions Chapter 3 लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Political Science राजनीति विज्ञान : लोकतांत्रिक राजनीति भाग 2 Chapter 3 लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Political Science Solutions Chapter 3 लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष

Bihar Board Class 10 Political Science लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही विकल्प चुनें।

प्रश्न 1.
वर्ष 1975 ई. भारतीय राजनीति में किसलिए जाना जाता है ?
(क) इस वर्ष आम चुनाव हुए थे
(ख) श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनी थी
(ग) देश के अंदर आपातकाल लागू हुआ था
(घ) जनता पार्टी की सरकार बनी थी
उत्तर-
(ग) देश के अंदर आपातकाल लागू हुआ था

प्रश्न 2.
भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के विरुद्ध जन आक्रोश किस दशक से प्रारंभ हुआ ?
(क) 1960 के दशक से
(ख) 1970 के दशक से
(ग). 1980 के दशक से
(घ) 1990 के दशक से
उत्तर-
(ख) 1970 के दशक से

प्रश्न 3.
बिहार में सम्पूर्ण क्रांति का नेतृत्व निम्नलिखित में से किसने किया?
(क) मोरारजी देसाई
(ख) नीतीश कुमार
(ग) इंदिरा गाँधी
(घ) जयप्रकाश नारायण
उत्तर-
(घ) जयप्रकाश नारायण

प्रश्न 4.
भारत में हुए 1977 ई. के आम चुनाव में किस पार्टी को बहुमत मिला था?
(क) काँग्रेस पार्टी को
(ख) जनता पार्टी को
(ग) कम्युनिस्ट पार्टी को
(घ) किसी पार्टी को भी नहीं
उत्तर-
(ख) जनता पार्टी को

प्रश्न 5.
‘चिपको आन्दोलन’ निम्नलिखित में से किससे संबंधित नहीं है ?
(क) अंगूर के पेड़ काटने की अनुमति से
(ख) आर्थिक शोषण से मुक्ति से
(ग) शराबखोरी के विरुद्ध आवाज से
(घ) कांग्रेस पार्टी के विरोध से ..
उत्तर-
(क) अंगूर के पेड़ काटने की अनुमति से

प्रश्न 6.
‘दलित पैंथर्स’ के कार्यक्रम में निम्नलिखित में कौन संबंधित नहीं हैं ?
(क) जाति प्रथा का उन्मूलन
(ख) दलित सेना का गठन
(ग) भूमिहीन गरीब किसान की उन्नति
(घ) औद्योगिक मजदूरों का शोषण से मुक्ति
उत्तर-
(ख) दलित सेना का गठन

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन ‘भारतीय किसान यूनियन’ के प्रमुख नेता थे?
(क) मोरारजी देसाई
(ख) जैयप्रकाश नारायण
(ग) महेन्द्र सिंह टिकैत
(घ) चौधरी चरण सिंह
उत्तर-
(ग) महेन्द्र सिंह टिकैत

प्रश्न 8.
‘ताड़ी-विरोधी आंदोलन’ निम्नलखित में से किस प्रांत में शुरू किया गया?
(क) बिहार
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) आंध्र प्रदेश
(घ) तमलनाडु
उत्तर-
(ग) आंध्र प्रदेश

प्रश्न 9.
‘नर्मदा घाटी परियोजना’ किन राज्यों से संबंधित है ?
(क) बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश
(ख) तमिलनाडु, करेल, कर्नाटक
(ग) पं. बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब
(घ) गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश
उत्तर-
(घ) गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश

प्रश्न 10.
“सूचना के अधिकार आंदोलन’ की शुरूआत कहाँ से हुई ?
(क) राजस्थान
(ख) दिल्ली
(ग) तमिलनाडु
(घ) बिहार
उत्तर-
(क) राजस्थान

प्रश्न 11.
‘सूचना का अधिकार’ संबंधी कानून कब बना?
(क) 2004 ई. में
(ख) 2005 ई. में
(ग) 2006 ई० में
(घ) 2007 ई. में
उत्तर-
(ख) 2005 ई. में

प्रश्न 12.
नेपाल में सप्तदलीय गठबंधन का मुख्य उद्देश्य क्या है ?
(क) राजा को देश छोड़ने पर मजबूर करना
(ख) लोकतंत्र की स्थापना करना
(ग) भारत-नेपाल के बीच संबंधों को और बेहतर बनाना
(घ) सर्वदलीय सरकार की स्थापना करना
उत्तर-
(ख) लोकतंत्र की स्थापना करना

प्रश्न 13.
बोलिविया में जनसंघर्ष का मुख्य कारण था
(क) पानी की कीमत में वृद्धि
(ख) खाद्यान्न की कीमत में वृद्धि
(ग) पेट्रोल की कीमत में वृद्धि ।
(घ) जीवन रक्षक दवाओं की कीमत में वृद्धि :
उत्तर-
(क) पानी की कीमत में वृद्धि

प्रश्न 14.
श्रीलंका कब आजाद हुआ ?
(क) 1947 में
(ख) 1948 में
(ग) 1949 में
(घ) 1950 में
उत्तर-
(क) 1947 में

प्रश्न 15.
राजनीतिक दल का आशय है
(क) अफसरों के समूह से
(ख) सेनाओं के समूह से
(ग) व्यक्तियों के समूह से
(घ) किसानों के समूह से
उत्तर-
(ग) व्यक्तियों के समूह से

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से कौन-सा प्रमुख उद्देश्य प्रायः सभी राजनीतिक दलों का होता है ?
(क) सत्ता प्राप्त करना
(ख) सरकारी पदा का प्राप्त करना
(ग) चुनाव लड़ना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) सत्ता प्राप्त करना

प्रश्न 17.
राजनीतिक दलों की नींव सर्वप्रथम किस देश में पड़ी ?
(क) ब्रिटेन
(ख) भारत में
(ग) फ्रांस में
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका में ।
उत्तर-
(क) ब्रिटेन

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में किसे लोकतंत्र का प्राण माना जाता है ?
(क) सरकार को
(ख) न्यायपालिका को
(ग) संविधान को
(घ) राजनीतिक दल को
उत्तर-
(घ) राजनीतिक दल को

प्रश्न 19.
निम्नलिखित में कौन-सा कार्य राजनीतिक दल नहीं करता है?
(क) चुनाव लड़ना
(ख) सरकार की आलोचना करना
(ग) प्राकृतिक आपदा में राहत से
(घ) अफसरों की बहाली संबंधित
उत्तर-
(घ) अफसरों की बहाली संबंधित

प्रश्न 20.
निम्नलिखित में कौन-सा विचार लोकतंत्र में राजनीतिक दलों से मेल नहीं खाता है ?
(क) राजनीतिक दल लोगों की भावनाओं एवं विचारों को जोड़कर सरकार के सामने रखता
(ख) राजनीतिक दल देश में एकता और अखंडता स्थापित करने का साधन है।
(ग) देश के विकास के लिए सरकारी नीतियों में राजनीतिक दल बाधा उत्पन्न करता है।
(घ) राजनीतिक दल विभिन्न वर्गों, जातियों, धर्मों की समस्याएं सरकार तक पहुंचाता है।
उत्तर-
(ग) देश के विकास के लिए सरकारी नीतियों में राजनीतिक दल बाधा उत्पन्न करता है।

प्रश्न 21.
किस देश में बहुदलीय व्यवस्था नहीं है ?
(क) पाकिस्तान
(ख) भारत
(ग) बांग्लादेश
(घ) ब्रिटेन
उत्तर-
(घ) ब्रिटेन

प्रश्न 22.
गठबंधन की सरकार बनाने की संभावना किस प्रकार की दलीय व्यवस्था में रहती है ?
(क) एकदलीय व्यवस्था
(ख) द्विदलीय व्यवस्था
(ग) बहुदलीय व्यवस्था
(घ) उपर्युक्त में किसी से भी नहीं
उत्तर-
(ग) बहुदलीय व्यवस्था

प्रश्न 23.
किसी भी देश में राजनीतिक स्थायित्व के लिए निम्नलिखित में क्या नहीं आवश्यक
(क) सभी दलों द्वारा सरकार को रचनात्मक सहयोग देना
(ख) किसी भी ढंग से सरकार को अपदस्थ करना
(ग) निर्णय-प्रक्रिया में सरकार द्वारा सबकी सहमति लेना
(घ) सरकार द्वारा विरोधी दलों में नजरबंद करना
उत्तर-
(ख) किसी भी ढंग से सरकार को अपदस्थ करना

प्रश्न 24.
निम्नलिखित में कौन-सी चुनौती राजनीतिक दलों को नहीं है ?
(क) राजनीतिक दलों के भीतर समय पर सांगठनिक चुनाव नहीं होना
(ख) राजनीतिक दलों में युवाओं और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलना
(ग) राजनीतिक दलों द्वारा जनता की समस्याओं को सरकार के पास रखना
(घ) विपरीत सिद्धांत रखनेवाले राजनीतिक दलों से गठबंधन करना
उत्तर-
(ख) राजनीतिक दलों में युवाओं और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलना

प्रश्न 25.
दल-बदल कानून निम्नलिखित में से किस पर लागू होता है ?
(क) सांसदों एवं विधायकों पर
(ख) राष्ट्रपति पर
(ग) उपराष्ट्रपति पर
(घ) उपर्युक्त में सभी पर
उत्तर-
(क) सांसदों एवं विधायकों पर

प्रश्न 26.
राजनीतिक दलों की मान्यता और उसका चिह्न किसके द्वारा प्रदान किया जाता है ?
(क) राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा
(ख) प्रधानमंत्री सचिवालय द्वारा
(ग) निर्वाचन आयोग द्वारा
(घ) संसद द्वारा
उत्तर-
(ग) निर्वाचन आयोग द्वारा

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में कौन राष्ट्रीय दल नहीं है ?
(क) राष्ट्रीय जनता दल
(ख) बहुजन समाज पार्टी
(ग) लोक जनशक्ति पार्टी
(घ) भारतीय जनता पार्टी
उत्तर-
(ग) लोक जनशक्ति पार्टी

प्रश्न 28.
जनता दल (यूनाइटेड) पार्टी का गठन कब हुआ?
(क) 1992 में
(ख) 1999 में
(ग) 2000 में
(घ) 2004 में
उत्तर-
(ख) 1999 में

II. (i) मिलान करें-
Bihar Board Class 10 Political Science Solutions Chapter 3 लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष - 1
उत्तर-
1. साइकिल
2. लालटेन
3. बंगला
4. तीर।

(ii) मिलान करें-
Bihar Board Class 10 Political Science Solutions Chapter 3 लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष - 2
उत्तर-
1. य. पी. ए.
2. एनडीए.
3. राष्ट्रीय दल
4. क्षेत्रीय पार्टी।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिहार में हए ‘छात्र आंदोलन’ के प्रमख कारण थे?
उत्तर-
बेरोजगारी और भ्रष्टाचार एवं खाद्यान्न की कमी और कीमतों में हुई अप्रत्याशित वृद्धि के चलते बिहार में छात्रों ने सरकार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया।

प्रश्न 2.
‘चिपको आंदोलन के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर-
चिपको आंदोलन के मुख्य उद्देश्यों में जंगल की कटाई पर रोक तथा पेड़ को नहीं काटने , देना था। इस आंदोलन में स्थानीय भूमिहीन वन्य कर्मचारियों के आर्थिक मुद्दा को उठाकर उनके लिए न्यूनतम मजदूरी की गारंटी की मांग की गयी। महिलाओं ने इस आंदोलन का दायरा और विस्तृत कर दिया। महिलाओं ने शराबखोरी की लत के विरुद्ध आवाज उठायी। अन्य सामाजिक मसले भी इस आंदोलन से जुड़ गए।

प्रश्न 3.
स्वतंत्र राजनीतिक संगठन कौन होता है ?
उत्तर-
स्वतंत्र राजनीतिक संगठन वैसा संगठन होता है जो प्रत्यख रूप से राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं होता है। अपितु राजनीतिक दल द्वारा समर्थित होता है जैसे अखिल भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान यूनियन आदि।

प्रश्न 4.
भारतीय किसान यूनियन की मुख्य मांगें क्या थीं?
उत्तर-
भारतीय किसान यनियन ने,गन्ने और गेहूँ के सरकारी खरीद मल्य में बढोत्तरी करने, कृषि से संबंधित उत्पादों के अंतरराज्यीय आवाजाही पर लगी पाबंदियों को समाप्त करने, समुचित दर पर गारंटी युक्त बिजली आपूर्ति करने, किसानों के बकाये कर्ज माफ करने तथा किसानों के लिए पेंशन योजना का प्रावधान करने की मांग की।

प्रश्न 5.
सूचना के अधिकार आंदोलन के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर-
सूचना का अधिकार का मुख्य उद्देश्य लोगों तक समस्त सूचनाओं का आदान-प्रदान होना था जिसमें सरकारी तथा गैरसरकारी प्रश्न शामिल हैं। इसके अन्तर्गत लोगों को यह अधिकार होता है कि सरकार द्वारा बनाए सूचना सेल से हम अपनी समस्त जानकारी मुहैया कर सकें जिसके अन्तर्गत सरकारी दफ्तरों के विभिन्न कामकाज, कार्य-विधि, सरकार की नीति, सरकार की भावी योजना इत्यादि इसमें शामिल हैं।

प्रश्न 6.
राजनीतिक दल की परिभाषा दें।
उत्तर-
राजनीतिक दल का अर्थ ऐसे व्यक्तियों के किसी भी समूह से है जो एक समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कार्य करता है। यदि उस दल का उद्देश्य राजनीतिक कार्य-कलापों से संबंधित होता है तो उसे हम राजनीतिक दल कहते हैं। किसी भी राजनीतिक दल में व्यक्ति एक समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एकजुट होते हैं, जैसे मतदान करना, चुनाव लड़ना, नीतियाँ एवं कार्यक्रम तैयार करना आदि।

प्रश्न 7.
किस आधार पर आप कह सकते हैं कि राजनीतिक दल जनता एवं सरकारों के बीच कड़ी का काम करता है ?
उत्तर-
राजनीतिक दल जनता की समस्याओं और आवश्यकताओं को सरकार के सामने प्रस्तुत करते हैं और सरकार की कल्याणकारी योजना और कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचाते हैं इस प्रकार राजनीतिक दल जनता एवं सरकार के बीच कड़ी का काम करता है।

प्रश्न 8.
दल-बदल कानून क्या है ?
उत्तर-
दल-बदल कौनून विधायकों और सांसदों के एक दल से दूसरे दल में पलायन को रोकने के लिए संविधान में संशोधन कर कानून बनाया गया है। इसे ही दल-बदल कानून कहते हैं।

प्रश्न 9.
राष्ट्रीय राजनीतिक दल किसे कहते हैं?
उत्तर-
राष्ट्रीय राजनीतिक दल वैसे सामाजिक दल हैं जिनका अस्तित्व पूरे देश में होता है उनके कार्यक्रम एवं नीतियाँ राष्ट्रीय स्तर के होते हैं। इनकी इकाइयाँ राज्य स्तर पर भी होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जनसंघर्ष से भी लोकतंत्र मजबूत होता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ? अपने पक्ष में उत्तर दें।
उत्तर-
हाँ, मैं इस कथन से सहमत हूँ कि जनसंघर्ष से भी लोकतंत्र मजबूत होता है। अपने इस कथन से सहमति के लिए निम्नलिखित पक्ष या तर्क हैं पूरे विश्व में लोकतंत्र का विकास प्रतिस्पर्धा और जनसंघर्ष के चलते हुआ है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जनसंघर्ष के माध्यम से ही लोकतंत्र का विकास हुआ है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने एवं उसे और सुदृढ़ करने में जनसंघर्ष की अहम भूमिका होती है। लोकतंत्र जनसंघर्ष के द्वारा विकसित होता है। लोकतंत्र में फैसले आम सहमति से लिए जाते हैं। यदि सरकार फैसले लेने में जनसाधारण के विचारों की अनदेखी करती है तो ऐसे फैसलों के खिलाफ जनसंघर्ष होता है और सरकार पर दबाव बनाकर आम सहमति से फैसले लेने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे विकास में आनेवाली बाधाएं दूर हो जाती हैं।

लोकतंत्र में संघर्ष होना आम बात होती है। इन संघर्षों का समाधान जनता व्यापक एकजुटता  के माध्यम से करती है। कभी-कभी इस तरह के संघर्षों का समाधान संसद या न्यायपालिका जैसी संस्थाओं द्वारा भी होता है। सरकार को हमेशा जनसंघर्ष का खतरा बना रहता है और सरकार तानाशाह होने एवं मनमाना निर्णय लेने से बचती है। जनसंघर्ष से राजनीतिक संगठनों आदि का विकास होता है। राजनीतिक संगठन लोकतंत्र के लिए प्राण होते हैं। यह राजनीतिक संगठन जन भागीदारी के द्वारा समस्याओं को सुलझाने में सहायक होते हैं।

वास्तव में उपर्युक्त कथन का अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र जनसंघर्ष से ही मजबूत होता है।

प्रश्न 2.
किस आधार पर आप कह सकते हैं कि बिहार से शुरू हुआ ‘छात्र आंदोलन’ का स्वरूप राष्ट्रीय हो गया? ।
उत्तर-
बिहार में ‘छात्र आंदोलन’ बेरोजगारी और भ्रष्टाचार एवं खाद्यान्न की कमी और कीमतों में बेतहासा वृद्धि के चलते सरकार के विरुद्ध हुआ। इस आंदोलन का नेतृत्व जय प्रकाश नारायण ने किया। इनके आह्वान पर जीवन के हर क्षेत्र से संबंधित लोग आंदोलन में कूद पड़ें। उन्होंने बिहार की कांग्रेस सरकार को बरखास्त करने की मांग कर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में सम्पूर्ण क्रांति का आहवान किया। जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रांति का उद्देश्य भारत में सरल लोकतंत्र की स्थापना करना था। जयप्रकाश की इच्छा थी कि बिहार का यह आंदोलन अन्य प्रांतों में भी फैले। उसी समय रेलवे कर्मचारी ने भी केन्द्र सरकार के विरुद्ध एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। उस हड़ताल का व्यापक प्रभाव पड़ा। जयप्रकाश नारायण 1975 में दिल्ली में आयोजित संसद मार्च का नेतृत्व किया। इससे पहले राजधानी दिल्ली में अब तक इतनी बड़ी रैली कभी नहीं हुई थी।

जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने इंदिरा गाँधी के इस्तीफे के लिए प्रभाव डालना शुरू किया। दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल जन प्रदर्शन कर जय प्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग करते हुए राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा की। उन्होंने अपने आह्वान में सेना और पुलिस तथा सरकारी कर्मचारी को भी सरकार का आदेश नहीं मानने के लिए निवेदन किया। इंदिरा गांधी ने इस आंदोलन को अपने विरुद्ध एक षड्यंत्र मानते हुए 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा करते हुए जयप्रकाश नारायण सहित सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को जेल में डाल दिया। आपातकाल के बाद 1977 की लोकसभा चुनाव के जनता पार्टी ने कांग्रेस से सत्ता छीन ली और मोरारजी देसाई जनता पार्टी के सरकार में प्रधान मंत्री बने।

वास्तव में बिहार का ‘छात्र आंदोलन’ कालांतर में राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन का स्वरूप ले चुका था। जिसकी परिणति 1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी की हार और जनता पार्टी की जीत से हुई। अत: हम उपर्युक्त कथनों के आधार पर यह कह सकते हैं कि बिहार से शुरू हुआ ‘छात्र आंदोलन’ का स्वरूप राष्ट्रीय हो गया।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वक्तव्यों को पढ़ें और अपने पक्ष में उत्तर दें
(क) क्षेत्रीय भावना लोकतंत्र को मजबूत करती है।
(ख) दबाव समूह स्थायी तत्वों का समूह है। इसलिए इसे समाप्त कर देना चाहिए।
(ग) जनसंघर्ष लोकतंत्र का विरोधी है।
(घ) भारत के लोकतंत्र के लिए हुए आंदोलन में महिलाओं की भूमिका नगण्य है।
उत्तर-
(क) क्षेत्रीय भावना उग्र होने पर क्षेत्रवाद की स्थिति पैदा होती है जिससे देश की अखंडता खतरे में पड़ जाती है। अतः क्षेत्रीय भावना कुछ हद तक लोकतंत्र के लिए अभिशाप । बन सकती है।
(ख) वास्तव में दबाव समूह ऐसे संगठन होते हैं जो सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। अत: यह कहना कि दबावं समूह स्वार्थी तत्वों का समूह है, बिल्कुल ही निराधार है। इसे समाप्त करने का कोई औचित्य नहीं है।
(ग) जनसंघर्ष से ही लोकतंत्र का विकास होता है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने एवं इसे और सुदृढ़ करने में जनसंघर्ष की अहम भूमिका होती है। अतः लोकतंत्र जब संघर्ष के द्वारा विकसित होता है यह लोकतंत्र का विरोधी नहीं बल्कि लोकतंत्र के लक्ष्य को प्राप्त करने का एक माध्यम होता है।
(घ) यह कहना कि लोकतंत्र के लिए हुए आंदोलन में महिलाओं की भूमिका नगण्य है, सरासर गलत है। ज्ञातव्य हो कि चिपको आंदोलन एवं ताड़ी विरोधी आंदोलन में महिलाओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। इसके अतिरिक्त नर्मदा बचाव आंदोलन की मुखिया मेधा ने इस आंदोलन
को राष्ट्रव्यापी बना दिया। अतः समय-समय पर लोकतंत्र के लिए हुए आंदोलन में महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

प्रश्न 4.
राजनीतिक दल को लोकतंत्र का प्राण क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक दल का होना आवश्यक है। बिना राजनीतिक दल के लोकतंत्र की परिकल्पना करना बेईमानी है। लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दल जीवन का एक अंग बन चुके हैं। इसलिए उन्हें लोकतंत्र का प्रांण कहा जाता है।

प्रश्न 5.
राजनीतिक दल राष्ट्रीय विकास में किस प्रकार योगदान करते हैं ?
उत्तर-
किसी भी देश का विकास वहाँ के राजनीतिक दलों की स्थिति पर निर्भर करता है। जिस देश में राजनीतिक दलों के विचार, सिद्धांत एवं दृष्टिकोण ज्यादा व्यापक होंगे उस देश का राष्ट्रीय विकास उतना ही ज्यादा होगा। इसलिए कहा जाता है कि किसी भी देश के राष्ट्रीय विकास में राजनीतिक दलों की मुख्य भूमिका होती है। दरअसल राष्ट्रीय विकास के लिए जनता को जागरूक, समाज एवं राज्य में एकता एवं राजनीतिक स्थायित्व का होना आवश्यक है। इन सभी कार्यों में राजनीतिक दल ही मुख्य भूमिका निभाते हैं। लोकतांत्रिक देशों में साधारणत: यह देखने को मिलता है कि सामान्य नागरिक को जिस कार्य के बदले जितना मिलता है उसी में वह संतुष्ट रहता है। उसे ज्यादा पाने की इच्छा उसमें कम रहती है। इसका मुख्य कारण जनजागरुकता का अभाव रहता है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक दल ही नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने के लिए प्रेरित करते हैं।

राष्ट्रीय विकास के लिए राज्य एवं समाज में एकता स्थापित होना आवश्यक है। इसके लिए राजनीतिक दल एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में काम करता है। राजनीतिक दलों में विभिन्न जातियों धर्मों, वर्गों एवं लिंगों के सदस्य होते हैं। ये सभी अपने-अपने जाति, धर्म, एवं लिंग का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। राजनीतिक दल ही किसी देश में राजनीतिक स्थायित्व ला सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि राजनीतिक दल सरकार के विरोध की जगह उसकी रचनात्मक आलोचना करें।

राष्ट्रीय विकास के लिए यह भी आवश्यक है कि शासन के निर्णयों में सबकी सहमति और सभी लोगों की भागीदारी हो। इस प्रकार के काम को राजनीतिक दल ही करते हैं। राजनीतिक दल संकट के समय रचनात्मक कार्य भी करते हैं, जैसे प्राकृतिक आपदा के दौरान राहत का कार्य आदि। राष्ट्रीय विकास के लिए सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की नीतियाँ एवं कार्यक्रम तैयार किये जाते हैं। लोकतांत्रिक देशों में इस तरह की नीतियों एवं कार्यक्रम को विधानमण्डल से पास होना आवश्यक होता है। सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के सहयोग से विधानमण्डल ऐसे नीतियों एवं कार्यक्रम पास कराने में सहयोग करते हैं। इन्हीं सब बातों के आधार पर हम समझ सकते हैं कि राजनीतिक दल राष्ट्रीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः राष्ट्रीय विकास में राजनीतिक दल बहुत ही व्यापक रूप से योगदान करते हैं।

प्रश्न 6.
राजनीतिक दलों के प्रमुख कार्य बताएँ।
उत्तर-
राजनीतिक दलों के निम्नलिखित प्रमुख कार्य हैं-
1. नीतियाँ एवं कार्यक्रम तय करना- राजनीतिक दल जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए नीतियाँ एवं कार्यक्रम तैयार करते हैं। इन्हीं नीतियों और कार्यक्रमों के आधार पर ये चुनाव भी लड़ते हैं। राजनीतिक दल भाषण, टेलीविजन, रेडियो, समाचार-पत्र आदि के माध्यम से अपनी नीतियाँ एवं कार्यक्रम जनता के सामने रखते हैं और मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करते हैं। मतदाता भी उसी राजनीतिक दल को अपना समर्थन देते हैं जिसकी नीतियाँ एवं कार्यक्रम जनता के कल्याण के लिए एवं राष्ट्रीय हित को मजबूत करने वाले होते हैं।

2. लोकतंत्र का निर्माण –लोकतंत्र में जनता की सहमति या समर्थन से ही सत्ता प्राप्त होती है। इसके लिए शासन की नीतियों पर लोकमत प्राप्त करना होता है और इस तरह के लोकमत का निर्माण राजनीतिक दल के द्वारा ही हो सकता है। राजनीतिक दल लोकमत निर्माण करने के लिए जनसभाएँ, रैलियों, समाचार-पत्र, रेडियो, टेलीविजन आदि का सहारा लेते हैं।

3. राजनीतिक प्रशिक्षण राजनीतिक दल मतदाताओं को राजनीतिक प्रशिक्षण देने का भी काम करता है। राजनीतिक दल खासकर चुनावों के समय अपने समर्थकों को राजनैतिक कार्य, जैसे मतदान करना, चुनाव लड़ना, सरकार की नीतियों की आलोचना करना या समर्थन करना आदि बताते हैं। इसके अलावा, सभी राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक एवं शैक्षिक गतिविधियाँ तेज कर उदासीन मतदाताओं को अपने से जोड़ने का भी काम करते हैं जिससे लोगों में राजनीतिक चेतना की जागृति होती है।

4. दलीय कार्य-प्रत्येक राजनीतिक दल कुछ दल-संबंधी कार्य भी करते हैं, जैसे अधिक-से-अधिक मतदाताओं को अपने दल का सदस्य बनाना, अपनी नीतियाँ एवं कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार करना तथा दल के लिए चंदा इक्कट्ठा करना आदि।

5.चुनावों का संचालन-जिस प्रकार लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में राजनीतिक दलों का होना भी आवश्यक है, उसी प्रकार दलीय व्यवस्था में चुनाव का होना भी आवश्यक है। हमें पहले से यह जानकारी प्राप्त है कि सभी राजनीतिक दल अपनी विचार-धाराओं और सिद्धांतों के अनुसार कार्यक्रमों एवं नीतियाँ तय करते हैं। यही कार्य एवं नीतियाँ चुनाव के दौरान जनता के पास रखते हैं जिसे चुनाव घोषणा-पत्र कहते हैं। राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों को खड़ा करने और कई तरीके से उन्हें चुनाव जिताने का प्रयत्न करते हैं। इसीलिए राजनीतिक दल का एक प्रमुख कार्य चुनाव का संचालन है।

6.शासन का संचालन राजनीतिक दल चुनावों में बहुमत प्राप्त करके सरकार का निर्माण करते हैं। जिस राजनीतिक दल को बहुमत प्राप्त नहीं होता है वे विपक्ष में बैठते हैं जिन्हें विपक्षी दल कहा जाता है। जहाँ एक ओर सत्ता पक्ष शासन का संचालन करता है वहीं विपक्षी दल सरकार पर नियंत्रण रखता है और सरकार को गड़बड़ियाँ करने से रोकता है।

.7.सरकार एवं जनता के बीच मध्यस्थता का कार्य राजनीतिक दल का एक प्रमुख कार्य जनता और सरकार के बीच मध्यस्थता करना। राजनीतिक दल ही जनता की समस्याओं और आवश्यकताओं को सरकार के सामने रखते हैं और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचाते हैं। इस तरह राजनीतिक दल सरकार एवं जनता के बीच पुननिर्माण का कार्य करते हैं।

8. गैर-राजनीतिक कार्य राजनीतिक दल न केवल राजनैतिक कार्य करते हैं बल्कि गैर-राजनैतिक कार्य भी करते हैं, जैसे प्राकृतिक आपदाओं-बाढ़, सुखाड़, भूकम्प आदि के दौरान राहत संबंधी कार्य आदि। अत: उपयुक्त प्रमुख कार्य राजनीतिक दलों के लिए आवश्यक हैं। तभी वे लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में अपनी साख बचा सकते हैं।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को मान्यता कौन प्रदान करते हैं और इसके मापदंड क्या हैं ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय राजनीतिक दल को मान्यता चुनाव आयोग प्रदान करते हैं।
राष्ट्रीय राजनीतिक दल की मान्यता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दलों को लोकसभा या विधानसभा के चुनाव में 4 या अधिक राज्यों द्वारा कुल डाले गए वैध मतों का 6 प्रतिशत प्राप्त करने के साथ किसी राज्य या राज्य से लोकसभा की कम-से-कम 4 सीटों पर विजयी होना आवश्यक है या लोक सभा में कम-से-कम 4 सीटों पर विजयी होना आवश्यक है। या लोकसभा में कम-से-कम 2 प्रतिशत सीटें अर्थात् 11 सीटें जीतना आवश्यक है जो कम-से-कम तीन राज्यों से होनी चाहिए। इसी तरह राज्य स्तरीय राजनीतिक दल को मान्यता प्राप्त करने के लिए उस दल को लोकसभा या विधान सभा के चुनावों में डाले गएं वैध मतों का कम-से-कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त करने के साथ-साथ राज्य विधानसभा की कम-स-कम 3 प्रतिशत सीटें या 3 सीटें जीतना आवश्यक है।

Bihar Board Class 10 History लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष Additional Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बोलिविया में जनसंघर्ष का मुख्य कारण क्या था ?
(क) पीजी की कीमत में वृद्धि
(ख) खाद्यान की कीमत में वृद्धि
(ग) पेट्रोल की कीमत में वृद्धि
(घ) जीवन रक्षक दवाओं की कीमत में वृद्धि
उत्तर-
(क) पीजी की कीमत में वृद्धि

प्रश्न 2.
किसी विशेष वर्ग या समूहों के हितों को बढ़ावा देनेवाले संगठन को किस नाम से पुकारा जाता है ?
(क) राजनीतिक दल
(ख) आंदोलन
(ग) हित समूह
(घ) लोककल्याणकारी राज्य
उत्तर-
(ग) हित समूह

प्रश्न 3.
राजनीतिक दल और हित समूह में मुख्य अंतर क्या है ?
(क) राजनीतिक दल का संबंध सिर्फ राजनीतिक पक्ष से है जबकि हित समूह का संबंध सिर्फ राजनीतिक पक्ष से है।
(ख), हितसमूह का उद्देश्य सीमित लोगों के लिए काम करना है, परंतु राजनीतिक दल को सभी लोगों के लिए काम करना पड़ता है।
(ग) हित समूह का उद्देश्य सत्ता पर आधिपत्य करना नहीं होता जबकि राजनीतिक दल का मुख्य उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना होता है।
(घ) हित-समूह लोगों की लामबंदी में विश्वास नहीं रखते, परंतु राजनीतिक दल रखते हैं।
उत्तर-
(ग) हित समूह का उद्देश्य सत्ता पर आधिपत्य करना नहीं होता जबकि राजनीतिक दल का मुख्य उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना होता है।

प्रश्न 4.
राजनीतिक दल का संबंध किससे है।
(क) किसी वर्ग विशेष या समूह के हितों को बढ़ावा देने से
(ख) जनसामान्य के कल्याण से
(ग) सिर्फ सामाजिक समस्या के समाधान से
(घ) राजनीतिक सत्ता पाने के लिए लोगों को लाभबंद करने से
उत्तर-
(घ) राजनीतिक सत्ता पाने के लिए लोगों को लाभबंद करने से

प्रश्न 7.
नेपाल में लोकतंत्र की वापसी कब हुई ?
(क) 2002 में
(ख) 2003 में
(ग) 2004 में
(घ) 2006 में
उत्तर-
(घ) 2006 में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लोकतंत्र की बहाली के लिए किस देश में सप्तदलीय गठबंधन तैयार किया गया था?
उत्तर-
नेपाल में।

प्रश्न 2.
सूचना के अधिकार के लिए सर्वप्रथम कहाँ और कब आवाज उठाई गई थी?
उत्तर-
राजस्थान के भीम तहशील में, 1990 में।

प्रश्न 3.
दलित पैंथर्स नामक संगठन कहाँ स्थापित किया गया था?
उत्तर-
महाराष्ट्र में।

प्रश्न 4.
जनसंघर्ष के रूप में राजनीतिक आंदोलन के उदाहरण दें। ..
उत्तर-
जनसंघर्ष के रूप में राजनीतिक आंदोलन के उदाहरण हैं-चिली में सैनिक तानाशाही के विरुद्ध राजनीतिक आंदोलन, नेपाल में राजशाही के विरुद्ध आंदोलन, पोलैंड में एकल दल की तानाशाही के विरुद्ध जनसंघर्ष तथा म्यांमार में सैनिक शासन के विरुद्ध चल रहा जनसंघर्ष इत्यादि।

प्रश्न 5.
जन संघर्ष के रूप में सुधारवादी आंदोलन के उदाहरण प्रस्तुत करें।
उत्तर-
जनसंघर्ष के रूप में सुधारवादी आंदोलन के उदाहरण हैं- महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स का आंदोलन, भारतीय किसान यूनियन का आंदोलन, आंध्र प्रदेश में महिलाओं द्वारा चलाया गया ताड़ी विरोधी आंदोलन।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
दबाव समूह किसे कहते हैं ? इसके उदाहरण दें।
उत्तर-
दबाव समूह का लक्ष्य सत्ता पर प्रत्यक्ष नियंत्रण करने अथवा सत्ता में भागीदारी करने से नहीं होता। जब कभी जनसंघर्ष या आंदोलन होता है तब राजनीतिक दलों के साथ-साथ दबाव-समूह भी उसमें सम्मिलित हो जाते हैं और वे संघर्षकारी समूह बन जाते हैं। दबाव समूह किसी आंदोलन का समर्थन किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए करते हैं। उद्देश्य की पूर्ति के बाद उनका सत्ता से कोई लेना-देना नहीं होता। दबाव समूह के उदाहरणों में 1974 की संपूर्ण क्रांति नेपाल में सात राजनीतिक दल, किसान, मजदूर व्यवसायियों शिक्षक अभियंता के समूह , बोलिविया में फोडेकोर इत्यादि दबाव समूह के उदाहरण हैं।

प्रश्न 2.
दबाव समूह तथा राजनीतिक दल में मुख्य अंतर बताएँ।
उत्तर-
राजनीतिक दल एवं दबाव समूह में सबसे बड़ा अंतर यह है कि राजनीतिक दल का – उद्देश्य सत्ता में परिवर्तन लाकर उसपर आधिपत्य करना होता है, वहीं दबाव समूह का लक्ष्य सत्ता पर प्रत्यक्ष नियंत्रण करने अथवा सत्ता में भागीदारी नहीं होता। दबाव समूह किसी आंदोलन का समर्थन किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए करते हैं। उद्देश्य की पूर्ति के बाद उनका सत्ता से कोई लेना-देना नहीं होता। इसके विपरीत राजनीतिक दल उद्देश्य की पूर्ति के बाद सत्ता पर नियंत्रण भी करना चाहते हैं।

प्रश्न 3.
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में हित समूहों की उपयोगिता पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में हित समूहों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। दबाव समूह या हित समूहों की निम्नलिखित मुख्य उपयोगिताएँ हैं

  • सरकार को सजग बनाए रखना दबाव समूह विभिन्न तरीकों से सरकार का ध्यान जनता की उचित माँगों की ओर दिलाकर एक सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इसके लिए हित समूह जनता का समर्थन और सहानुभूति भी प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
  • आंदोलन को सफल बनाना- लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में कई तरह के जनआंदोलन चलते रहते हैं हित समूह या दबाव समूह ऐसे आंदोलनों को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
  • दबाव समूह और उनके द्वारा चलाए गए आंदोलनों से लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत
    हुई हैं। लोकतंत्र की सफलता के मार्ग में हित समूह बाधक नहीं है, बल्कि सहायक होती हैं।

प्रश्न 4.
हित समूह या दबाव समूह राजनीतिक दलों पर किस प्रकार प्रभाव डालते हैं।
उत्तर-
दबाव समूह सक्रिय राजनीति में हिस्सा नहीं लेते, परंतु अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए राजनीतिक दलों पर भी प्रभाव डालते हैं। प्रत्येक आंदोलन का राजनीतिक पक्ष अवश्य होता है जिसके कारण दबाव समूह एवं राजनीतिक दलों के बीच प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंध अवश्य स्थापित हो जाता है। कभी-कभी राजनीतिक दल ही सरकार को प्रभावित करने के उद्देश्य से दबाव समूहों का गठन कर डालते हैं। ऐसे समूहों का नेतृत्व भी राजनीतिक दल ही.करने लगते हैं। ऐसे. दबाव समूह उस राजनीतिक दल की एक शाखा के रूप में काम करने लगते हैं।

प्रश्न 5.
जन संघर्ष का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर-
जन संघर्ष का अर्थ जनता द्वारा कुछ निश्चित बातों या वस्तुओं से संतुष्ट नहीं रहने पर सत्ता के विरुद्ध किया जानेवाला संघर्ष है। जनसंघर्ष अथवा जन आंदोलन का अर्थ “वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध अपनी असंतुष्टि तथा असहमति को अभिव्यक्त करना है।” यह जनसंघर्ष का नकारात्मक अर्थ है। लेकिन साकारात्मक अर्थ में सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के उद्देश्य से जो जन संघर्ष अथवा आंदोलन होते हैं उसे जन संघर्ष का सकारात्मक पक्ष कहा जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लोकतंत्र में जनसंघर्ष की उपयोगिता पर प्रकाश डालें
उत्तर-
विभिन्न देशों में जनसंघर्ष की विवेचना से यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र में इसकी अनेक उपयोगिताएँ हैं जिनमें कुछ निम्नलिखित महत्वपूर्ण उपयोगिता हैं-

  • लोकतंत्र के विस्तार में सहायक-जनसंघर्ष की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि यह लोकतंत्र की स्थापना और उसकी वापसी में तो सहायक होता ही है, लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में लोकतंत्र के विस्तार में भी सहायक होता है। जनसंघर्ष के माध्यम से लोकतंत्र ये भागीदारी प्राप्त करनेवालों को भी सफलता मिलती है। इससे लोकतंत्र का विस्तार होता है तथा लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होती हैं।
  • लामबंदी और संगठन को बल-जनसंघर्ष लोगों की लामबंदी और उन्हें संगठित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जनसंघर्ष की सफलता इसीपर निर्भर करती है।
  • विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों को सक्रिय करने में सहायक- जनसंघर्ष होने पर विभिन्न संगठनों तथा राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ जाती है। अनेक दबाव एवं हित समूह इसमें सम्मिलित होकर जनसंघर्ष को सफल बना देते हैं।

प्रश्न 2.
नेपाल में लोकतंत्र की वापसी का सविस्तार वर्णन करें।
उत्तर-
नेपाल में लोकतंत्र की वापसी के लिए व्यापक जनसंघर्ष हुआ। नेपाल में इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्व ही लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी थी। नेपाल के पूर्ववर्ती राजा वीरेन्द्र विक्रम सिंह ने नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना के मार्ग प्रशस्त कर दिया था और स्वयं को औपचारिक रूप . से राज्य का प्रधान बनाए रखा। परंतु दुर्भाग्यवश उनकी हत्या कर दी गई। ज्ञानेन्द्र नेपाल के नए राजा बने जिनका लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में विश्वास नहीं था। उन्होंने 2002 में संसद को भंगकर पूर्ण राजशाही की घोषणा कर दी। 2005 में राजा ज्ञानेंद्र ने जनता के द्वारा निर्वाचितं सरकार को भंग करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री शेखबहादुर देउबा को अपदस्थ कर दिया। देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। इतना ही नहीं अपने अधीन नए मंत्रिमंडल का गठन करते हुए तीन वर्ष तक सभी अधिकार अपने हाथ में लेने की भी घोषणा कर दी।

राजा ज्ञानेन्द्र के इस फैसले के खिलाफ नेपाल में लोकतंत्र की वापसी के लिए देश के प्रमुख राजनीतिक दलों ने आपस में समझौता कर सात दलों के गठबंधन की स्थापना कर ली। आगे चलकर माओवादी आंदोलनकारी जो राजशाही के विरुद्ध पहले से सक्रिय थे इस गठबंधन में शामिल हो गए। नेपाल में लोकतंत्र की वहाली के लिए राजनीतिक शक्तियों के एकजुट हो जाने . से जनता के बीच एक नया संदेश गया। जनता खुलकर लोकतंत्र की वापसी के लिए आंदोलन जो 6 अप्रैल 2006 से सात राजनीतिक दलों के गठबंधन द्वारा चलाया गया था के साथ जुड़ गई। इस प्रकार यह आंदोलन जनसंघर्ष में बदल गया। राजशाही के विरुद्ध जनता के आक्रोश के जनसैलाब के आगे सजशाही को झुकना पड़ा। 24 अप्रैल, 2006 के दिन नेपाल नरेश ज्ञानेन्द्र नेnसंसद को बहाल कर सत्ता सात राजनीतिक दलों के गठबंधन को सौंपने की घोषणा कर दी। इस . प्रकार नेपाल में लोकतंत्र की वापसी के साथ जनसंघर्ष का अंत हो गया।

प्रश्न 3.
भारत में 1974 के संघर्ष का वर्णन करें।
उत्तर-
जनसंघर्ष सिर्फ लोकतंत्र की स्थापना अथवा वापसी के लिए ही नहीं होता है, बल्कि एक लोकतांत्रिक और निर्वाचित सरकार को जनता की मांग मानने के लिए बाध्य करने के उद्देश्य से भी होता है। कुछ जनसंघर्ष ऐसे भी हैं जो एक निर्वाचित सरकार को बदलने के उद्देश्य से भी होते हैं। भारत में 1974 का जनसंघर्ष इसका ज्वलंत उदाहरण है। 1974 के जनसंघर्ष की पृष्ठभूमि बिहार में तत्कालीन सरकार के विरुद्ध छात्र आंदोलन से तैयार हुई। उसके बाद केन्द्र की काँग्रेसी सरकार की गलत नीतियों के कारण विभिन्न राजनीतिक दलों ने विकल्प की तलाश शुरू कर दी। 14 अप्रैल 1974 को दिल्ली में तत्काल काँग्रेस के बीजू पटनायक के निवास स्थान पर भारतीय क्रांति दल के चौधरी चरण सिंह की अध्यक्षता में आठ गैर-काँग्रेसी राजनीतिक दलों के विलय का निर्णय लिया गया। इसके ठीक एक दिन पहले 13 अप्रैल को दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान में ‘जनतंत्र समाज’ का गठन किया गया जिसमें जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी की सक्रियता अधिक देखी गयी।

धीरे-धीरे तत्कालीन काँग्रेसी सरकार के विरुद्ध लोग संगठित होते गए और संपूर्ण देश में आंदोलन प्रारंभ हो गया। यह आंदोलन जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इस आंदोलन को जनता का अपार समर्थन मिला। इस प्रकार इसने जनसंघर्ष का रूप धारण कर लिया। जनता पार्टी का गठन हुआ। आंदोलन को दबाने का भरसक प्रयास किया गया, परंतु यह जनसंघर्ष दबने की जगह उग्र रूप लेता गया। सरकार को राष्ट्रीय आपात की घोषणा करनी पड़ी। 1977 में देश में आम निर्वाचन हुआ तो जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और केन्द्र में पहली बार मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में गैर-काँग्रेसी सरकार का गठन हुआ।

प्रश्न 4.
जनसंघर्ष में राजनीतिक दलों एवं दबाव-समूहों की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर-
लोकतंत्र में जनसंघर्ष तभी सफल होता है जब इसका संचालन किसी संगठन द्वारा किया जाता है। नेपाल में सांत राजनीतिक दलों के गठबंधन तथा माओवादियों के सहयोग से जनसंघर्ष सफल हुआ। म्यांमार में नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी नामक राजनीतिक दल की नेत्री आंग सान सूची के नेतृत्व में लोकतंत्र की वापसी का जनसंघर्ष जारी है। बोलिविया में फेडेकोर (FEDECOR) नामक संगठन के नेतृत्व में जनसंघर्ष चला जिसे किसानों, मजदूरों छात्र संघों और सोशलिस्ट पार्टी नामक राजनीतिक दल का भी समर्थन प्राप्त था। भारत में भी 1974 के जयप्रकाश’ । नारायण के जन आंदोलन को छात्रों, वकीलों, शिक्षकों इत्यादि के संघों के समर्थन के साथ-साथ जनतंत्र समाज जैसी गैर-राजनीतिक संस्था एवं विभिन्न राजनीतिक दलों का भी समर्थन प्राप्त था। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न संगठनों अथवा विभिन्न वर्गों के संघों के माध्यम से आंदोलन करके सरकार को अपनी मांग मानने के लिए बाध्य किया जाता है। इसे दबाव-समूह के नाम से जाना जाता है। इन दबाव समूहों से जनसंघर्ष को तो सफल बनाया ही जाता है, नागरिकों की भी सत्ता में भागीदारी बढ़ जाती है।

दबाव समूहों की भूमिका भी जनसंघर्ष में काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। दबाव समूहों द्वारा ही सरकार की नीतियों को प्रभावित किया जाता है और जनता की मांगों को सरकार से मानने के लिए भी दबाव डाला जाता है। विभिन्न पेशे में लगे लोग जैसे वकील शिक्षक, डॉक्टर, अभियंता, सरकारी कर्मचारी अपने-अपने.हितों की रक्षा के लिए जब संघ बनाते हैं तो उसे हित-समूह कहा जाता है। जब ऐसे समूह द्वारा अपने पक्ष में सरकार को निर्णय करने के लिए बाह्य किया जाता है तब हित समूह दबाव समूह के रूप में कार्य करने लगते हैं। आधुनिक युग में राजनीतिक दल विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो जाते हैं। अतः राजनीतिक दलों के साथ-साथ अनेक हित-समूहों का भी विकास हो जाता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि जनसंघर्ष में राजनीतिक दलों के साथ-साथ दबाव-समूहों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है।

Bihar Board Class 10 History  लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष Notes

  • जब जनता वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट हो जाती है तब जनसंघर्ष और आंदोलनों का शुरू करती है।
  • जनसंघर्ष एवं आंदोलन का अर्थ जनता द्वारा कुछ निश्चित बातों या वस्तुओं से संतुष्ट नहीं रहने पर सत्ता के विरुद्ध किया जानेवाला संघर्ष है।
  • भारत में 1974 में सरकार के विरुद्ध असंतोष की ज्वाला फूट पड़ी और जनसंघर्ष प्रारंभ हो गया। इसे संपूर्ण क्रांति की संज्ञा दी गयी।
  • नकारात्मक अर्थ में जनसंघर्ष अथवा आंदोलन का अर्थ वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध अपनी असंतुष्टि तथा असहमति को अभिव्यक्त करना है।
  • साकारात्मक दृष्टि से सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में उत्पन्न विभूतियों को दूर करने की दृष्टि से जनसंघर्ष और आंदोलन होते हैं।
  • लोकतंत्र की बहाली के लिए नेपाल, चिली तथा म्यांमार में काफी आंदोलन एवं जनसंघर्ष हुए।
  • चिली में सैनिक तानाशाही के विरुद्ध, नेपाल में राजशाही के विरुद्ध पोलैंड में एक दल की तानाशाही के विरुद्ध जनसंघर्ष हुआ। म्यांमार में सैनिक शासन के विरुद्ध जनसंघर्ष चल रहा है।
  • लोकतंत्र की स्थापना हेतु नेपाल में देश के प्रमुख राजनीतिक दलों ने आपस में समझौता कर सात दलों के गठबंधन की स्थापना कर ली।
  • 24 अप्रैल, 2006 को नेपाल के राजा ज्ञानेन्द्र ने संसद को बहाल कर सत्ता सात राजनीतिक दलों के गठबंधन को सौंपने की घोषणा कर दी।
  • चिली में सैनिक शासन स्थापित हो गया जब आगस्तो पिनोशे ने सत्ता हथिया ली। लेकिन .
    2006 में लोकतंत्र की स्थापना हुई और मिशेवल बैशेले चिली की प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुई।
  • म्यांमार में सैनिक शासन के विरुद्ध जनसंघर्ष जारी है। आंगसान सूची के नेतृत्व वाली नेशनल लीग फॉरडेमोक्रेसी पार्टी को बहुमत प्राप्त हुआ था लेकिन सैनिक शासक ने उस निर्वाचन को अस्वीकार कर दिया।
  • लैटिन अमेरिकी देश बोलिविया में सरकार ने जलापूर्ति के निजीकरण का निर्णय लिया उसके विरूद्ध जनता ने एक सफल जनसंघर्ष किया।
  • 1974 के जनसंघर्ष की पृष्ठभूमि बिहार में तत्कालीन सरकार के विरुद्ध छात्र आंदोलन से  तैयार हुई। जयप्रकाश नारायण संपूर्ण क्रांति के प्रणेता थे। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की सरकार बनी। केन्द्र में पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ।
  • 1970 के दशक में उत्तरप्रदेश (वर्तमान उत्तराखंड) में सरकार द्वारा जंगलों की कटाई की अनुमति के विरुद्ध चिपको आंदोलन शुरू हुआ।
  • 1972 में महाराष्ट्र में दलित युवकों का एक संगठन बना जो “दलित पैंथर्स” के नाम से जाना गया।
  • दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में महिलाओं द्वारा ताड़ी-विरोधी आंदोलन चलाया गया।
  • 1990 के प्रारंभ में मध्य भारत के नर्मदा नदी पर सरकार द्वारा बाँधों के निर्माण का निर्णय के विरुद्ध नर्मदा बचाओ आंदोलन शुरू किया गया।
  • अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के अनुसार जम्मू कश्मीको विशेष सुविधा प्रदान की गयी।
  • 2005 में केंद्र सरकार ने सूचना का अधिकार अधिनियम बनाया।
  • बोलिविया में फेडेकोर (FEDECORमक संगठन के नेतत्व में जनसंघर्ष चला जिसे मनटों टान संघों और सोशलिस्ट पार्टी नामक राजनीतिक दलका भी समर्थन प्राप्त था।
  • हित समूह व्यक्तियों के वैसे समूहको कहा जाता है जो किसी विशेष लाभ के लिए आपस में बंधे होते हैं।
  • कभी-कभी किसी उद्देश्य से गठित दबाव समूह ही राजनीतिक दल का रूप धारण कर लेते हैं। बाट मति मोर्चा असम गण परिषद डी. एम. के. अन्ना. डी. एम. कादि इसके उदाहरण हैं।
  • लोकतंत्र की सफलता में दबाव समूह बाधक नहीं, बल्कि सहायक होते हैं। इस कारण दबाव समूह को ‘अदृश्य सरकार की संज्ञा दी जाती है।

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

Bihar Board Class 11 Political Science धर्मनिरपेक्षता Textbook Questions and Answers

धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
निम्न में से कौन-सी बातें धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत है? कारण सहित बताइए।
(क) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना।
(ख) किसी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में मान्यता देना।
(ग) सभी धर्मों को राज्य का समान आश्रय होना।
(घ) विद्यालयों में अनिवार्य प्रार्थना होना।
(ड) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक शैक्षित संस्थान बनाने की अनुमति होना।
(च) सरकार द्वारा धार्मिक संस्थाओं की प्रबन्धन समितियों की नियुक्ति करना।
(छ) किसी मंदिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेप।
उत्तर:
निम्नलिखित कथन धर्मनिरपेक्षवाद के अनुकूल हैं –

(क) एक धार्मिक समूह द्वारा प्रभावित की अनुपस्थित:
धर्मनिरपेक्षवाद की प्रथम एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शर्त राज्य और धर्म का अलग-अलग होना है परन्तु धर्मनिरपेक्षवाद के लिए यह भी आवश्श्यक है कि अन्तर या अंतः धार्मिक प्रभावित नहीं होनी चाहिए क्योंकि धर्मनिरपेक्षता में समानता स्वतंत्रता में समानता स्वतंत्रता, भेदभाव एवं शोषण का अभाव भी शामिल है।

(ङ) किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय को अलग शिक्षा संस्थाओं को बनाने की अनुमति देना:
धर्मनिरपेक्षता किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा शैक्षिक संस्थाओं को खोलने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाता भारत में अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित कोई संस्था (शैक्षिक) समानता के आधार पर सरकारी सहायता प्राप्त कर सकती है। शिक्षा का उद्देश्य पथ प्रदर्शन है।

धर्मनिरपेक्षता पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी और भारतीय मॉडल की कुछ विशेषताओं का आपस में घालमेल हो गया है। उन्हें अलग करें और एक नई सूची बनाएँ।
धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11

धर्मनिरपेक्षता पाठ के प्रश्न उत्तर कक्षा 11 Bihar Board प्रश्न 3.
धर्म निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से की जा सकती है।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षवाद का तात्पर्य धर्म के मामले में राज्य का उदासीन होना है। इसका तात्पर्य यह कि किसी धर्म के मामले में रुचि नहीं रखनी चाहिए। राज्य को न तो किसी धर्म को आश्रय देना चाहिए और न ही किसी धर्म के विरुद्ध भेदभाव करना चाहिए। लोगों को धर्म के मामले में स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए, यह सोचते हुए कि यह उनका व्यक्तिगत मामला है।

धर्मनिरपेक्षवाद केवल इस बात से संबंधित नहीं है कि राज्य और धर्म को अलग होना चाहिए बल्कि उसे सामाजिक व्यवस्था पर आधारित समानता की स्थापना पर भी जोर देना चाहिए और इसका उद्देश्य अंतः धार्मिक प्रभुता और शोषण को समाप्त करने को होना चाहिए। धर्म निरपेक्षवाद द्वारा धर्म के अंदर स्वतंत्रता और समानता को भी बढ़ावा देना चाहिए। धर्मनिरपेक्षवाद एक विचार है। इसकी धर्म से समानता नहीं स्थापित की जा सकती। यह धर्मनिरपेक्ष का पहलू है।

धर्मनिरपेक्षता के क्वेश्चन आंसर Bihar Board Class 11 प्रश्न 4.
क्या आप नीचे दिए गए कथनों से सहमत हैं? उनके समर्थन या विरोध के कारण भी दीजिए।
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है।
उत्तर:
नहीं, हम इस कथन से सहमत नहीं हैं कि धर्मनिरपेक्षवाद का सम्बन्ध धार्मिक पहचान से नहीं है। हम इसका समर्थन नहीं करते। धर्मनिरपेक्षवाद धार्मिक पहचान में कोई बाधा नहीं डालता। धर्मनिरपेक्षवाद धर्म व्यक्ति का निजी मामला है और यह राज्य और धर्म को अलग-अलग मानता है। व्यक्ति अपने मनपसंद धार्मिक पहचान को कायम रख सकता है।

(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अंदर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच असमानता के खिलाफ है।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षवाद एक धार्मिक समूह या विभिन्न सामाजिक समूह में असमानता के विरुद्ध है, सही है।

धर्मनिरपेक्षवाद का केवल यही अर्थ नहीं है कि धर्म और राजनीति एक दूसरे से अलग हैं बल्कि यह भी है कि एक धार्मिक समुदाय में यह समानता पर भी जोर देता है। यह बात विभिन्न धार्मिक समूहों में भी देखने को मिलती है। यह सभी धार्मिक समूहों में भेदभाव के सभी रूपों को समाप्त करना चाहता है। एक ऐसा राज्य जो धर्मनिरपेक्ष माना जाता है उसको सिद्धान्तों ओर उद्देश्यों के प्रति समर्पित होना चाहिए जो कम से कम गैर-धार्मिक स्रोतों से लिया गया है। उसके अंत में शांति, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और भेदभाव से स्वतंत्रता शामिल होनी चाहिए।

(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षवाद की उत्पत्ति पश्चिमी ईसाइयत से हुई है। यह भारत के अनुकूल नहीं है-सही है। यह सर्वथा सही है कि धर्मनिरपेक्षवाद की उत्पत्ति पश्चिम से विशेष रूप में अमरीका में उत्पन्न हुई है जिसमें राज्य और राजनीति का स्पष्ट रूप से पृथकता है। राज्य धर्म के मामले में न तो हस्तक्षेप करेगा और न ही धर्म राज्य के मामले में हस्तक्षेप करेगा। दोनों का स्वतंत्र क्षेत्र में अपनी सीमा है। उसी प्रकार राज्य किसी धार्मिक संस्था की सहायता नहीं कर सकता।

यह किसी शैक्षिक संस्था, जो धार्मिक समुदाय द्वारा संचालित हो, उसकी वित्तीय सहायता नहीं कर सकता। धर्म सर्वथा, व्यक्तिगत मामला है और कानून की या राज्य नीति का मामला नहीं है। इस विचार के लिए कोई स्थान नहीं है कि एक समुदाय अपनी मनपसंद का कार्य करने को स्वतंत्र है। समुदाय पर अधिकार या अल्पसंख्यक अधिकार का थोड़ा क्षेत्र इसमें अवश्य है।

भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद की हू-ब-हू अनुकृति नहीं है। केवल समान अवधारणा यह है कि राज्य और धर्म दोनों अलग हैं और राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता दोनों में पर्याप्त असमानता है। राज्य को सभी धर्मों का आदर करने का अधिकार है परन्तु भेदभाव करने का कोई अधिकार नहीं है। भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद अल्पसंख्यक अधिकार समर्थक है और धार्मिक संस्थाओं द्वारा संचालित शैक्षिक संस्थाओं की आर्थिक मदद भी करता है।

धर्मनिरपेक्षता के पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 5.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का जोर धर्म और राज्य के अलगाव पर नहीं वरन् उससे अधिक किन्ही और बातों पर है। इस कथन को समझाइए।
उत्तर:
अनेक पश्चिमी और अमरीकी देशों के समान भारतीय धर्म निरपेक्षवाद राज्य और धर्म के अलगाव पर जोर देता है। परन्तु यह न केवल शर्त है बल्कि भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद का लक्षण है। यह निश्चित रूप से इससे कहीं अधिक है। इसका उद्देश्य विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच भेदभाव को समाप्त करना है। यह अंतर और अंतर्धार्मिक समुदायों में समानता और न्याय की स्थापना करता है। भारत में शोषण के अनेक मामले मिलते हैं। ये न केवल अंतर्धार्मिक समूहों में होते हैं बल्कि उसी धार्मिक समुदायों में भी होते हैं।

भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद उसे समाप्त करता है। भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद का दूसरा पहलू यह है कि सामाजिक सुधार लाने के लिए यह धार्मिक मामले में हस्तक्षेप कर सकता है। पं. नेहरू ने स्वयं भेदभव समाप्त करने संबन्धी और गलत सामाजिक बुराइयां जैसे-दहेज प्रथा, सती प्रथा के विरुद्ध कानून निर्माण में अहम् भूमिका निभाई। उन्होंने महिलाओं के अधिकार में वृद्धि और सामाजिक स्वतंत्रता के लिए भी महत्त्वपूर्ण कार्य किए। नेहरू के लिए धर्मनिरपेक्षवाद का तात्पर्य साम्प्रदायिकता का पूर्ण विरोध था।

धर्मनिरपेक्षता Class 11 Question Answer Bihar Board प्रश्न 6.
सैद्धान्तिक दूरी क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता का भारतीय दृष्टिकोण और पश्चिमी दृष्टिकोण का समान महत्त्वपूर्ण लक्षण है-राज्य और धर्म का अलगाव। राज्य को न तो सैद्धान्तिक होना चाहिए और न धर्म की स्थापना करनी चाहिए। इसलिए धर्मनिरपेक्षवाद का यह सुनिश्चित सिद्धान्त है कि राज्य धार्मिक कार्यों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। इसी प्रकार धर्म भी राज्य के किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेगा। राज्य का अपना कोई निजी धर्म नहीं होना चाहिए और धर्म को व्यक्तिगत मामले के रूप में छोड़ देना चाहिए। राज्य और धर्म दोनों का अपना स्वतंत्र क्षेत्र होना चाहिए।

Bihar Board Class 11 Political Science धर्मनिरपेक्षता Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

कक्षा 11 धर्मनिरपेक्षता पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए। (Define the secular state)
उत्तर:
एच. बी. कामथ के अनुसार “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर रहित राज्य है, न ही वह अधर्मी राज्य है न ही धर्म-विरोधी है। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का यह अर्थ है कि इसमें ईश्वर के अस्तित्व को नहीं माना जाता है।”

Dharmnirpekshta Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
पंथ निरपेक्ष अथवा धर्मनिरपेक्षता से क्या आशय है? (Define the term Secular)
उत्तर:
पंथ या धर्मनिरपेक्ष शब्द का अर्थ (Meaning of the word Secular):
धर्म या पंथ निरपेक्ष शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर (Secular) शब्द का हिन्दी पर्याय है। सेक्युलर शब्द लैटिन भाषा के सरकुलम (Surculam) शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है- ‘संसार या युग’।

धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न उत्तर कक्षा 11 Bihar Board प्रश्न 3.
पंथ निरपेक्ष राज्य धर्मों के प्रति सहिष्णु किस प्रकार है? (A Secular state is tolerate towards all the religions How?)
उत्तर:
पंथ निरपेक्ष राज्य इस बात का प्रतिपादन करता है कि सभी धर्म आधारभूत रूप में एक है। अतः धर्म के आधार पर एक दूसरे के प्रति असहनशीलता का व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। हम चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों, हमारे द्वारा यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि एकमात्र हमारा धर्म ही सत्य का प्रतिपादन करता है। हमारे द्वारा अन्य सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए।

धर्मनिरपेक्षता प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
“धर्मनिरपेक्षता विश्व राज्य की आदर्श पूर्ति में सहायक है” व्याख्या कीजिए। (Explain the Secularism is helpful in making a idealistic globally state)
उत्तर:
विश्व राज्य एक अत्याधिक उदार और भव्य आदर्श है, जिसकी प्राप्ति धीरे-धीरे ही की जा सकती है। पंथ निरपेक्ष राज्य मानवीय स्वतन्त्रता और समानता पर आधरित होता है। इसके द्वारा प्रेम, दया, सहिष्णुता, सहयोग और मानवीय सद्भावना के गुणों पर जोर दिया जाता है। इस बात का भी प्रयत्न किया जाता है कि सभी व्यक्ति धर्म, जाति और अन्य भेदों पर विचार किए बिना परस्पर बन्धुत्व के विचार को अपना लें। पंथ निरपेक्षता के विचार की उदार व्याख्या है कि मानव-मानव है और उसके संदर्भ में जाति, धर्म, राष्ट्रीयता और अन्य किसी भेद को महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। विश्व राज्य का आदर्श भी यही कहता है और इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता विश्व राज्य के आदर्श की पूर्ति में सहायक है।

Dharmnirpekshta Class 11 Question Answer Bihar Board प्रश्न 5.
पंथ निरपेक्ष राज्य की शासन प्रणाली का आधार क्या होता है? (What is the base of the government in a Secular state?)
उत्तर:
पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म से पृथकता पर आधारित होने के कारण आवश्यक रूप से भौतिक होता है और इसके अन्तर्गत मनुष्यों के नैतिक एवं आध्यात्मिक हितों की साधना नहीं हो सकती। प्रो. पुन्ताम्बेकर ने इस विषय में कहा है “इसके अन्तर्गत किसी धर्म या नैतिकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। पंथनिरपेक्ष राज्य गाँधीवादी राज्य हो ही नहीं सकता न तो वह प्राचीन धार्मिक विचारधाराओं पर और न सांस्कृतिक विचारों पर चल सकता है।”

धर्मनिरपेक्षता Class 11 Bihar Board प्रश्न 6.
धर्मनिरपेक्षता का मूल आधार क्या है? (What is main base of Secularism?)
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता का मूल आधार निम्नलिखित हैं –

  1. पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता।
  2. सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता।
  3. धार्मिक कट्टरता को निरूत्साहित करना।
  4. सर्वाधिकार का विरोध।
  5. सभी नागरिकों को समान अधिकार।
  6. शासन द्वारा धार्मिक शिक्षा का निषेध।
  7. व्यक्तियों को अन्य धर्मों में दखल देने का अधिकार नहीं।
  8. नैतिकता के नियमों को अस्वीकार नहीं करना।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

Dharmnirpekshta Ke Question Answer Bihar Board प्रश्न 1.
भारतीय संविधान में पंथ-निरपेक्षता के कौन-से आदर्श पाए जाते हैं? (What ideals of Secularism is to be given in Indian constitution?)
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता के आदर्श-भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता या पंथ-निरपेक्षता सम्बन्धी निम्नलिखित चार आदर्श दृष्टिगत होते हैं –
(क) राज्य अपने को किसी धर्म विशेष से सम्बद्ध नहीं करेगा, न ही किसी धर्म विशेष के अधीन रहेगा।
(ख) राज्य जब किसी व्यक्ति को धार्मिक मान्यता, आचरण एवं प्रचार-प्रसार सम्बन्धी स्वतंत्रता प्रदान करेगा, तो वह किसी व्यक्ति विशेष को अपेक्षाकृत (Preferential) सुविधा नहीं देगा।
(ग) किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध धर्म अथवा धार्मिक विचार के आधार पर राज्य कोई भेदभाव नहीं करेगा।
(घ) राज्य के अधीन किसी पद को प्राप्त करने हेतु सभी के धर्मावलम्बियों को समान अवसर प्राप्त होंगे।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्ष राज्य की प्रमुख परिभाषाएँ लिखिए। (Write the definitions of a Secular state)
उत्तर:
धर्मनिरपेक्ष राज्य की कुछ परिभाषाएँ निम्नांकित हैं –
(क) जॉर्ज ऑसलर के शब्दों में “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है तथा जो धार्मिक या द्वैतवादी विचारों से बन्धा हुआ न हो।” इस दृष्टि से धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से होता है जो संसारिक, लौकिक और ऐच्छिक है तथा जिसका अपना कोई धर्म नहीं। ऐसा राज्य धर्म के नाम पर व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करता।

यह राज्य धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत और आन्तरिक वस्तु मानते हुए धर्म को राजनीति से पृथक रखने में विश्वास रखता है। इस प्रकार का राज्य किसी धर्म विशेष का प्रचार-प्रसार नहीं करता, बल्कि यह सभी धर्मों को समान मानते हुए धार्मिक सहिष्णुता का पोषण करता है।”

(ख) एच.बी.कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर. रहित राज्य है, न ही वह अधर्मी राज्य है और न ही धर्म-विरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का यह अर्थ है कि इसमें ईश्वर के अस्तित्व को नहीं माना जाता है।”

(ग) डोनाल्ड स्मिथ के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य, वह राज्य है जिसके अंतर्गत-विषयक, व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है, जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय धर्म को बीच में नहीं लाता, जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म से सम्बन्धित नहीं है और न किसी धर्म की उन्नति का प्रयत्न करता है और न ही किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप करता है।”

(घ) लक्ष्मीकान्त मैत्र के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य से मेरा अभिप्राय यह है कि ऐसा राज्य धर्म या जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई भेद-भाव नहीं करता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य की ओर से किसी विशिष्ट धर्म को मान्यता प्राप्त नहीं होगी।”

प्रश्न 3.
पंथ निरपेक्ष राज्य मानव-धर्म पर आधारित होता है। स्पष्ट कीजिए। (The Secular State is based on Humanism Clarify)
उत्तर:
पंथ निरपेक्ष राज्य किसी धर्म विशेष पर आधारित नहीं होता है और इसके द्वारा किसी प्रकार की धार्मिक क्रियाओं का सम्पादन भी नहीं किया जाता है किन्तु धर्म से पृथ्कता का तात्पर्य यह नहीं है कि पंथ निरपेक्ष राज्य पूर्ण रूप से भौतिक या अनाध्यात्मिक हो। इस प्रकार के राज्य को अधर्मी, विधर्मी, धर्म-विरोधी, अनाचारी या अधार्मिक नहीं कहा जा सकता है।

इसका कारण यह है कि किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित न होने पर भी इस प्रकार का राज्य सत्य, अहिंसा, प्रेम और विश्व-बन्धुत्व आदि सर्वमान्य सिद्धान्तों के प्रति आस्था रखता है और इसका धर्म और नैतिकता से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित नहीं होता, वरन् सभी धर्मों का सार मानव-धर्म पर आधारित होता है।

प्रश्न 4.
पंथ निरपेक्षता की आलोचना के कोई तीन बिन्दु लिखिए। (Write three points of criticis of Secularism)
उत्तर:
(क) प्रासन-प्रणाली का आधार भौतिक:
आलोचकों के अनुसार पंथ निरपेक्ष राज्य, राज्य की धर्म से पृथकता पर आधारित होने के कारण आवश्यक रूप से भौतिक होता है और इसके अन्तर्गत मनुष्यों के नैतिक एवं आध्यात्मिक हितों की साधना नहीं हो सकती। प्रो. पुन्ताम्बेकर ने इस सम्बन्ध में कहा है, “इसके अन्तर्गत किसी धर्म-या नैतिकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। पंथ निरपेक्ष राज्य गाँधीवादी राज्य हो ही नहीं सकता न तो वह प्राचीन धार्मिक विचारधाराओं पर और न सांस्कृतिक विचारों पर चल सकता है।”

(ख) राज्य का छिन्न हो जाना सम्भव:
आलोचकों का कथन है कि राज्य में एक धर्म विशेष को मान्यता देने से धार्मिक एकता के आधार पर एक ऐसी राजनीतिक एकता स्थापित हो जाती है, जो राज्य को स्थायित्व प्रदान करती है। किन्तु धर्म से पृथक होने के कारण पंथ निरपेक्ष राज्य में इस प्रकार की धार्मिक एकता नहीं होती है और इस प्रकार की धार्मिक एकता के अभाव में राज्य के छिन्न-भिन्न हो जाने की आशंका बनी रहती हैं आलोचकों के अनुसार एक पंथ निरपेक्ष राज्य में विभिन्न धर्मों के जो अनुयायी होते हैं, उनके द्वारा धार्मिक भेदों के कारण परस्पर निरन्तर लड़ाई-झगड़े राज्य की एकता को नष्ट कर देते हैं।

(ग) लोककल्याणकारी नहीं हो सकता:
लोककल्याणकारी राज्य जनहित और सामाजिक कल्याण पर आधारित होता है और लोककल्याण की यह भावना नैतिक आदशों और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ही उत्पन्न हो सकती है लेकिन पंथ निरपेक्ष सत्य धर्म और नैतिकता के प्रति उदासीन होता है और इस कारण यह कभी सच्चा लोककल्याणकारी राज्य नहीं हो सकता। आलोचकों के अनुसार, राज्य में लोककल्याण की भावनाओं का पतन हो जाता है और इसमें उन स्वार्थपूर्ण तत्त्वों को बढ़ावा मिलता है, जो लोककल्याण के विरुद्ध होते हैं।

प्रश्न 5.
पंथ निरपेक्षता के पक्ष में तीन तर्क दीजिए। (Give three arguments in favour of the Secularism)
उत्तर:
1. पंथ निरपेक्ष राज्य की आलोचनाएँ मिथ्या धारणा पर आधारित हैं:
पंथ निरपेक्ष राज्य की आलोचना करते हुए जो विभिन्न बातें कही जाती है।, वे सभी इस मिथ्या धारणा पर आधारित है कि पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म-विरोधी राज्य होती है, जबकि वस्तुस्थिति इसके नितान्त विपरीत है। पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म-विरोधी राज्य नहीं होता वरन् सभी धर्मों के सार मानव धर्म’ पर आधारित वास्तविक आध्यत्मिक राज्य होता है। इस प्रकार का राज्य, उसके कानून और सत्ता, सब कुछ नैतिकता पर आधारित होते हैं। न्यायमूर्ति रामास्वामी के शब्दों में “पंथ निरपेक्ष राज्य का तात्पर्य यह नहीं है कि कानून नैतिक आचार-विचार में पृथक हों।”

2. राष्ट्रीय एकता की प्राप्ति पंथ निरपेक्ष राज्य में ही सम्भव:
एक राज्य जिसके अन्तर्गत विविध धर्मों के अनुयायी रहते हैं, यदि किसी एक विशेष धर्म को अन्य धर्म के अनुयायी राज्य के प्रति उदासीनता का भाव अपना लेते हैं और बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक वर्ग में सदैव ही संघर्ष की स्थिति बनी रहती है लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य के अन्तर्गत सभी धर्मों के अनुयायियों को समान समझा जाता है और स्वतन्त्रता तथा समानता पर आधारित यह मातृभाव राष्ट्रीय एकता के लक्ष्य की प्राप्ति में बहुत अधिक सहायक होता है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि अकबर की पंथ निरपेक्षता ने मुगल साम्राज्य को एकता और सुदृढ़ता प्रदान की, लेकिन औरंगजब की धार्मिक पक्षपात की नीति ने मुगल साम्राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया। भारतीय संविधान सभा के सदस्यों का भी यही विचार था कि पंथ निरपेक्षता ही राज्य की एकता को बनाए रख सकती है और इसलिए उन्होंने भारत के लिए पंथ निरपेक्षता के आदर्श की अपनाया।

3. पंथ निरपेक्षता लोकतंत्र के आदर्श की पूरक:
पंथ निरपेक्षता का आदर्श लोकतंत्र के विचार का भी पूरक है। लोकतंत्र का आदर्श मूल रूप से समानता और स्वतंत्रता की धारणा पर आधारित है और पंथ निरपेक्ष राज्य में इन दोनों ही आदर्शों को उचित महत्त्व प्रदान किया जाता है। पंथ निरपेक्ष राज्य सभी धर्मों को समान समझाता है ओर पंथ निरपेक्षता की धारण धार्मिक क्षेत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी आधारित है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पंथ निरपेक्षता का विचार मूल रूप से लोकतन्त्रात्मक ही है।

आलोचक कहते हैं कि पंथ निरपेक्ष राज्य विकृत होकर तानाशाही का रूप ग्रहण कर लेता है, किन्तु वास्तव में इस प्रकार की आशंका पंथ निरपेक्ष राज्य की अपेक्षा धर्माचार्य राज्य में ही अधिक है। धर्माचार्य राज्य में शासन अपने आपको ईश्वर का प्रतिनिधि बतलाकर जनता पर मनमाने अत्याचार करते हैं। भूतकाल में इन धर्माचार्य राज्य में धर्म के नाम पर दूसरे धर्मों के अनुयायियों पर जिस प्रकार के अत्याचार किए गए, उनकी कल्पना ही भयावह है। पंथ निरपेक्ष राज्य तो सर्वाधिकारवाद की धारणा का विरोधी होने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा समानता पर आधारित होने के कारण अधिनायकवाद का विरोधी और प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था का पूरक है।

प्रश्न 6.
पंथ निरपेक्षता के कोई तीन मूल आधार लिखिए। (Write Three Tenets of Secularism)
उत्तर:
पंथ निरपेक्षता के मूल आधार-पंथ निरपेक्ष राज्य को सही रूप में समझने के लिए पंथ निरपेक्ष राज्य की विशेषताओं का अध्ययन उपयोगी है। पंथ निरपेक्ष राज्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं –

1. धर्म समाज का सामूहिक कार्य न होकर व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य है:
प्राचीन और मध्य युग में धर्म को सामान्यतया समाज का सामूहिक कार्य माना जाता था और राजा तथा प्रजा सभी के द्वारा राजा के नेतृत्व में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा की जाती थी लेकिन धार्मिक जीवन के दो अंग (विश्वास और आडम्बर) होते हैं, उनमें पंथ निरपेक्ष राज्य विश्वास को ही महत्त्वपूर्ण मानता है। उसकी मान्यता है कि धर्म आन्तरिक विश्वास की वस्तु है। अतः धर्म को समाज का सामूहित कार्य न माना जाकर व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य माना जाना चाहिए और सभी व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

2. पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता:
धर्म और राज्य के पारस्परिक सम्बन्ध की दृष्टि से दो प्रकार के राज्य होते हैं – पंथ निरपेक्ष राज्य और धर्माचार्य राज्य। धर्माचार्य राज्य का अपना एक विशेष धर्म होता है और उसके द्वारा इस धर्म की वृद्धि के लिए विशेष प्रयत्न किए जाते हैं। पाकिस्तान इस्लामी राज्य के रूप में धर्माचार्य राज्य का एक उदाहरण है लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता। यह सभी धर्मों को समान समझता है और इसके द्वारा किसी विशेष धर्म के प्रभाव को बढ़ाने या कम करने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाता।

3. धर्म विशेष पर आधारित न होते हुए भी अधार्मिक नहीं:
पंथ निरपेक्ष राज्य किसी धर्म विशेष पर आधारित नहीं होता है और इसके द्वारा किसी प्रकार की धार्मिक क्रियाओं का सम्पादन भी नहीं किया. जाता है किन्तु धर्म से पृथकता का तात्पर्य यह नहीं है कि पंथ निरपेक्ष राज्य पूर्ण रूप से भौतिक या अनाध्यात्मिक हो। इस प्रकार के राज्य को अधर्मी, विधर्मी, धर्मविरोधी, अनाचारी या अधार्मिक नहीं कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित न होने पर भी इस प्रकार का राज्य सत्य, अहिंसा, प्रेम और विश्व-बन्धुत्व आदि सर्वमान्य सिद्धान्तों के प्रति आस्था रखता है और इसका धर्म एवं नैतिकता से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित नहीं होता, वरन् सभी धर्मों का सार ‘मानव धर्म’ पर आधारित होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत में पंथ निरपेक्षता की विस्तृत विवेचना कीजिए। (Discuss in detail the Secularism in India) अथवा, भारत में पंथ निरपेक्षता पर एक निबन्ध लिखिए। (Explain the Secular Character of Indian Democracy) अथवा, भारत में पंथ निरपेक्षता पर एक निबन्ध लिखिए। (Write an essay on Secularism in India)
उत्तर:
भारत में पंथ निरपेक्षता-भारत में सदैव से ही धर्म का जीवन के अन्तर्गत विशेष महत्त्व रहा है किन्तु कालांतर में धर्म के संकुचित रूप का प्रचलन हो गया, उसके आडम्बरमय रूप को ही सब कुछ समझ लिया गया और इससे भारत की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक प्रगति को गहरा आघात पहुँचा। भारतीय समाज में धर्म के नाम पर इतने अधिक रूपान्तर प्रचलित हो गए कि इससे समाज विभिन्न टुकड़ों में विभक्त हो गया और राष्ट्रीय एकता को भीषण आघात पहुँचा।

सदियों तक परतन्त्रता इन परिस्थितियों का स्वाभाविक परिणाम हुआ धार्मिक मत-मतान्तरों के इन दुष्परिणामों को देखते हुए भारतीय संविधान के निर्माताओं द्वारा पंथ निरपेक्षता के आदर्श को अपनाया गया लेकिन संविधान सभा के अनेक प्रमुख सदस्यों द्वारा यह बात नितान्त स्पष्ट कर दी गयी कि पंथ निरपेक्षता का आशय धर्म-विरोध से नहीं है और भारत राज्य एक धर्म-विरोधी राज्य न होकर नैतिकता, आध्यात्मिक और मानव धर्म पर आधारित एक वास्तविक धार्मिक राज्य होगा। पंथ निरपेक्षता, के आदर्श को प्राप्त करने के लिए भारतीय संविधान के अन्तर्गत निम्न व्यवस्थाएँ की गयी हैं –

1. अस्पृश्यता का अन्त:
पंथ निरपेक्षता का उदार आदर्श इस बात पर बल देता है कि सामाजिक जीवन में भी जाति या अन्य किसी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। इस दृष्टि से संविधान की धारा 17 के द्वारा अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिया गया है। इस प्रकार धर्म की आड़ में भारतीय समाज के अन्तर्गत मनुष्य, मनुष्य पर जो अत्याचार करते रहे, उसे इस व्यवस्था के आधार पर समाप्त कर दिया गया है।

2. धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं:
संविधान के द्वारा नागरिकों को यह विश्वास दिलाया गया है कि धर्म के आधार पर उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। संविधान की धारा 15 (ii) के अनुसार किसी भी व्यक्ति को धर्म के आधार पर किसी सार्वजनिक स्थान में प्रवेश से नहीं रोका जाएगा। धारा 16 (i) के अनुसार सार्वाजनिक पदों पर नियुक्तियाँ करने में धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

3. धार्मिक स्वतंत्रता:
भारतीय संविधान के द्वारा प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गयी है और संविधान की धारा 25 के द्वारा प्रत्येक नागरिक को यह मौलिक अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी धर्म में विश्वास और उसके अनुसार आचरण करे। इसका अभिप्राय यह है कि किसी भी नागरिक को किसी धर्म विशेष का पालन करने या न करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

4. धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और धर्म-प्रचार की स्वतंत्रता:
संविधान के द्वारा धर्म को सामूहिक स्वतंत्रता भी प्रदान की गयी है। संविधान की धारा 26 में कहा गया है कि प्रत्येक सम्प्रदाय को धार्मिक तथा परोपकारी उद्देश्यों के लिए संस्थाएँ स्थापित करने और उन्हें चलाने, धार्मिक मामलों का प्रबंध करने, चल तथा अचल सम्पत्ति रखने और प्राप्त करने और ऐसी सम्पत्ति को कानून के अनुसार प्रबंध करने का अधिकार है। संविधान के द्वारा नागरिकों को धर्म के प्रचार और प्रसार की स्वतंत्रता दी गयी है किन्तु उनके द्वारा उस सम्बन्ध में लोभ, लालच और अन्य साधनों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।

5. धार्मिक कार्यों के लिए किया जाने वाला व्यय कर-मुक्त:
भारतीय संविधान अपने नागरिकों को न केवल धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की स्वतंत्रता प्रदान करता है, वरन् इस सम्बन्ध में संविधान के अनुच्छेद 27 में कहा गया है कि “धार्मिक या परोपकारी कार्यों के लिए खर्च की जाने वाली सम्पत्ति पर कोई कर नहीं लगाया जाएगा”। संविधान की इस व्यवस्था से यह नितान्त स्पष्ट है कि भारत राज्य एक धर्मविरोधी राज्य नहीं, वरन् विशुद्ध धर्म को प्रोत्साहित करने वाला राज्य है।

6. धार्मिक शिक्षा का निषेध:
पंथ निरपेक्षता की परम्परा के अनुरूप संविधान की धारा 28 में कहा गया है कि किसी सरकारी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती तथा गैर-सरकारी, किन्तु सरकार से आर्थिक सहायता या मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में किसी को धार्मिक शिक्षा या उपासना में भाग लेने को बाध्य नहीं किया जा सकता। इस सभी उपबन्धों से यह नितान्त स्पष्ट है कि भारत एक पंथ निरपेक्ष राज्य है, धर्म-विरोधी राज्य नहीं।

इस. पथ सिंपेक्ष राज्य के अन्तर्गत उच्च धार्मिक पदाधिकारी पद ग्रहण के समय ईश्वर के नाम पर शपथ ले सकते हैं। भारत राज्य के सर्वोच्च पदाधिकारी धार्मिक उपासना आदि में भाग ले सकते हैं। मार्मिक और परोपकारी कार्यों के लिए किए जाने वाले व्यय पर कर-मुक्ति की व्यवस्था की गयी है और शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा प्रारम्भ करने पर भी विचार किया जा रहा है। भारतीय इतिहास और संविधान में प्रतिपादित लोकतंत्र एवं लोककल्याण के आदर्श को दृष्टि में रखते हुए कहा जा सकता है कि भारत के लिए पंथ निरपेक्षता का यह आदर्श ही नितान्त औचित्यपूर्ण है –

भारत के सम्बन्ध में स्थिति यह है कि भारत देश ‘विविधता में एकता’ का आदर्श उदाहरण रहा है और हमारे संविधान-निर्माता ‘सर्वधर्म समभाव’ के प्रति निष्ठा रखते थे। अत: उनके द्वारा पंथ निरपेक्षता के आदर्श को अपनाया गया लेकिन एक पंथ निरपेक्ष राज्य की स्थिति को पूर्ण अंशों में ‘पंथ निरपेक्ष समाष (Secular Society) में ही प्राप्त किया जा सकता है और भारतीय जीवन का चिन्ताजनक तथ्य यह है कि हम इक्कीसवीं सदी तक भी पंथ निरपेक्ष समाज की स्थिति को प्राप्त नहीं कर सके हैं। अभी हाल ही के वर्षों में तो भारतीय समाज में धर्म पर आधारित भेदों ने अधिक तीव्र रूप धारण कर लिया है। इस स्थिति का समाधान केवल यही है भारतीय नागरिक ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘सभी धर्मों के प्रति सद्भाव एवं सम्मान’ की स्थिति को अपने मन, मस्तिष्क और हृदय में सदैव के लिए संजो लें।

न केवल भारत, वरन् विश्व के अन्य प्रगतिशील राज्यों द्वारा भी पंथ निरपेक्षता के मार्ग को अपनाया गया है वर्तमान समय में पाकिस्तान, लीबिया, युगाण्डा, सउदी, अरब, बंग्लादेश और मध्य-पूर्व के अन्य कुछ राज्य ही धर्माचार्य राज्य के उदाहरण हैं। वर्तमान युग पंथ निरपेक्षता का ही युग है तथा अब तो रूस और पूर्वी यूरोप के अन्य राज्यों ने भी ‘धर्म-विरोध’ की स्थिति का त्याग कर यथार्थ रूप में पंथ निरपेक्षता की स्थिति को अपना लिया है।

प्रश्न 2.
पंथ या धर्मनिरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? पंथ निरपेक्षता के मूल सिद्धान्तों का परीक्षण कीजिए। (What do you mean by Secularism? Examine the fundamental principles of Secularism)
उत्तर:
पंथ या धर्मनिरपेक्ष शब्द का अर्थ (Meaning of the Word Secular):
धर्म या पंथ-निरपेक्ष शब्द ‘अंग्रेजी’ भाषा के ‘सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी पर्याय है। सेक्युलर (Seculare) शब्द, लैटिन भाषा के ‘सरकुलम’ (Surculam) शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है-संसार अथवा युग। धर्मनिरपेक्ष राज्यों की कुछ परिभाषाएँ निम्नंकित हैं –

1. जार्ज ऑसलर के शब्दों में “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है तथा जो धार्मिक या द्वैतवादी से बंधा हुआ न हो।” इस दृष्टि से धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से होता है जो सांसारिक, लौकिक और ऐच्छिक है तथा जिसका अपना कोई धर्म नहीं। ऐसा राज्य धर्म के नाम पर व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करता। यह राज्य धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत और आन्तरिक वस्तु मानते हुए धर्म को राजनीति से पृथक रखने में विश्वास रखता है। इस प्रकार का राज्य किसी धर्म विशेष का प्रचार-प्रसार नहीं करता, बल्कि यह सभी धर्मों को समान मानते हुए धार्मिक सहिष्णुता का पोषण करता है।

2. एच.बी.कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर रहित राज्य है, न ही यह अधर्मी राज्य है और न ही धर्म-विरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का यह अर्थ है कि इसमें ईश्वर के अस्तित्व को नहीं माना जाता है।”

3. डोनाल्ड स्मिथ के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य, वह राज्य है जिसके अन्तर्गत धर्म-विषयक, व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है, जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय धर्म को बीच में नहीं लाता, जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म से सम्बन्धित नहीं है और न किसी धर्म की उन्नति का प्रयत्न करता है और न ही किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप करता है।”

4. लक्ष्मीकान्त मिश्र के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य से मेरा अभिप्राय यह है कि ऐसा राज्य धर्म या जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई भेद-भाव नहीं करता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य की ओर से किसी विशिष्ट धर्म को मान्यता प्राप्त नहीं होगी।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से है जिसका कोई अपना धर्म नहीं होता और जो धर्म के आधार पर व्यक्तियों में कोई भेद-भाव नहीं करता। इसका अर्थ एक धर्म-विरोधी, अधार्मिक या ईश्वर रहित राज्य से नहीं बल्कि एक ऐसे राज्य से है जो धार्मिक मामलों में पूर्णतया तटस्थ रहता है क्योंकि यह धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत वस्तु मानता है। पंथ निरपेक्षता के मूल आधार-पंथ निरपेक्ष राज्य को सही रूप में समझने के लिए पंथ निरपेक्ष राज्य की विशेषताओं का अध्ययन उपयोगी होगा। पंथ निरपेक्ष राज्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्न इस प्रकार हैं –

1. धर्म समाज का सामूहिक कार्य न होकर व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य है:
प्राचीन और मध्य युग में धर्म को सामान्यता समाज का सामूहिक कार्य माना जाता था और राजा तथा प्रजा सभी के द्वारा राजा के नेतृत्व में प्राकृतिक शक्तिओं की पूजा की जाती थी लेकिन धार्मिक जीवन के दो अंग (विश्वास और आडम्बर) होते हैं, उनमें पंथ निरपेक्ष राज्य विश्वास को ही महत्त्वपूर्ण मानना है। उसकी मान्यता है कि धर्म आन्तरिक विश्वास की वस्तु है, अतः धर्म को समाज का सामूहिक कार्य न माना जाकर व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य माना जाना चाहिए और सभी व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करने की स्वतंत्रता चाहिए।

2. पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता:
धर्म और राज्य के पारस्परिक सम्बन्ध की दृष्टि से दो प्रकार के राज्य होते हैं-पंथ निरपेक्ष राज्य और धर्माचार्य राज्य। धर्माचार्य राज्य का अपना एक विशेष धर्म होता है और उसके द्वारा इस धर्म की वृद्धि के लिए विशेष प्रयत्न किए जाते हैं। पाकिस्तान इस्लामी राज्य के रूप में धर्माचार्य राज्य का एक उदाहरण है। लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता। यह सभी धर्मों को समान समझता है और इसके द्वारा किसी विशेष धर्म के प्रभाव को बढ़ाने या कम करने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाता।

3. धर्म विशेष पर आधारित न होते हुए भी अधार्मिक नहीं:
पंथ निरपेक्ष राज्य किसी धर्म विशेष पर आधारित नहीं होता है और इसके द्वारा किसी प्रकार के धार्मिक क्रियाओं का सम्पादन भी नहीं किया जाता है किन्तु धर्म से पृथ्कता का तात्पर्य यह नहीं है कि पंथ निरपेक्ष राज्य पूर्ण रूप से भौतिक या अनाध्यात्मिक हो। इस प्रकार के राज्य सत्य, अहिंसा, प्रेम और विश्व-बन्धुत्व आदि सर्वमान्य सिद्धान्तों के प्रति आस्था रखता है और इसका धर्म एवं नैतिकता से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित नहीं होता, वरन् सभी धर्मों के सार ‘मानव धर्म’ पर आधारित होता है।

4. सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता:
पंथ निरपेक्ष राज्य इस बात का प्रतिपादन करता है कि सभी धर्म आधारभूत रूप से एक है। अतः धर्म के आधार पर एक-दूसरे के प्रति असहनशीलता का बर्ताव नहीं किया जाना चाहिए। हम चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों, हमारे द्वारा यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि एकमात्र हमारा धर्म ही सत्य का प्रतिपादन करता है। हमारे द्वारा अन्य सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए।

5. धार्मिक कट्टरता (Bigotry) को निरुत्साहित करना:
पंथ निरपेक्ष राज्य धार्मिक उदारवाद का प्रशंसक और धार्मिक कट्टरता का विरोधी होता है। इसके द्वारा राष्ट्रीय एकता और शक्ति के हित में ऐसा प्रगातिशील संस्थओं को प्रोत्साहित किया जाता है जो धार्मिक कट्टरता और कठमुल्लापन के प्रभाव को कम करने के लिए कार्य करती हैं।

6. सर्वाधिकार का विरोध:
सर्वाधिकार का तात्पर्य यह है कि राज्य व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन पर नियत्रंण रखे लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य की मान्यता यह है कि धर्म व्यक्ति के आन्तरिक विश्वास और व्यक्तिगत जीवन की वस्तु है और इसलिए राज्य के द्वारा उस समय तक व्यक्ति के धार्मिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि व्यक्ति का धार्मिक जीवन सार्वजनिक हित में बाधक न हो। इस प्रकार पंथ निरपेक्षता का आदर्श इस विचार पर आधारित है कि राज्य का अधिकार व कार्यक्षेत्र सर्वव्यापी न होकर प्रतिबन्धित और सीमित होना चाहिए।

7. सभी नागरिकों को समान अधिकार:
पंथ निरपेक्ष राज्य अपने सभी नागरिकों को किसी भी वर्ग के साथ बिना कोई पक्षपात किए सामाजिक और राजनीतिक अधिकार प्रदान करता है। सरकारी सेवाओं या जीवन के अन्य क्षेत्रों में धर्म, जाति, वर्ग या अन्य किसी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता।

8. पंथ निरपेक्ष राज्य मौलिक रूप से लोकतन्त्रात्मक:
लोकतन्त्र का विचार मूल रूप से समानता और स्वतंत्रता की धारणा पर आधारित है और पंथ निरेपक्ष राज्य में इन दोनों ही विचारों को उचित महत्त्व प्रदान किया गया है। पंथ निरपेक्ष राज्य सभी धर्मों को समान समझता है।

9. पंथ निरपेक्ष राज्य का सर्वोच्च कर्त्तव्य लोककल्याण:
धर्म के दो पक्ष होते हैं लौकिक और पारलौकिक। पक्ष का तात्पर्य है ईश्वर की सेवा, पूजा आराधना कर आगे आने वाले जीवन को सुधारना और लौकिक पक्ष का तात्पर्य है मानव जाति की सेवा कर स्वयं अपने और अन्य व्यक्तियों के इसी जीवन को सुधारना। पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म के लौकिक रूप में विश्वास करता है और इसके द्वारा सामूहिक रूप से अपने सभी नागरिकों के कल्याण का कार्य करता है।

10. शासन द्वारा धार्मिक शिक्षा का निषेध-पंथ निरपेक्ष राज्य स्वयं धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं करता और सामान्यतया उसके द्वारा ऐसी संस्थाओं को आर्थिक सहायता भी प्रदान नहीं की जाती, जिनके पाठ्यक्रम में धार्मिक शिक्षा के लिए निश्चित और महत्त्वपूर्ण स्थान होता है।

11. नैतिकता के नियमों को अस्वीकार नहीं करता:
पंथ निरपेक्ष राज्य में धार्मिक शिक्षा के निषेध का तात्पर्य यह नहीं लिया जाना चाहिए कि राज्य नैतिकता के नियमों को स्वीकार नहीं करता। नैतिकता पंथ निरपेक्ष राज्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आधार है और संस्कृतियों से सम्बन्धित व्यक्ति सामूहिक रूप से राज्य के कल्याण हेतु कार्य करता है। इस प्रकार से विभिन्न हितों और धार्मिक मतों के बीच सहयोग उनमे निहित सामान्य नैतिक भावना के आधार पर ही सम्भव होता है। इस प्रकार एक सच्चा पंथ निरपेक्ष राज्य नैतिकता को अस्वीकार नहीं करता और न ही उसके द्वारा ऐसा किया जाना चाहिए।

12. व्यक्तियों को अन्य धर्मों का अधिकार नहीं:
पंथ निरपेक्ष राज्य में सभी नागरिकों को अपनी इच्छानुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करने का तो अधिकार होता है, किन्तु उन्हें अन्य धर्मों के विरोध का अधिकार नहीं होता। उनके द्वारा ऐसा कोई भी कार्य नहीं किया जा सकता है जिससे अन्य धर्मों के अनुयायियों की धार्मिक भावना को आघात पहुँचे।

13. कोई भी पंथ निरपेक्ष राज्य के कानूनों से मुक्त नहीं:
पंथ निरपेक्ष राज्य के अन्तर्गत कोई भी धर्म या उस धर्म से सम्बन्धित पुरोहित वर्ग राज्य के कानूनों से मुक्त नहीं होता। यदि धर्म या उसके सिद्धान्त, उसके अनुयायियों या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक हैं, तो राज्य कानून द्वारा ऐसे हानिकारक सिद्धान्तों व धार्मिक व्यवहारों की मनाही कर सकता है।

प्रश्न 3.
पंथ निरपेक्षता की धारणा की आलोचना कीजिए। (Criticism the Concept of Secularism)
उत्तर:
प्राचीन और मध्य युग में धर्म और राजनीति का गठबन्धन था, लेकिन इस प्रकार के गठबन्धन के परिणामस्वरूप धर्म और राजनीति दोनों, का ही स्वरूप विकृत हो गया। इसलिए इस प्रकार से धर्माचार राज्य के विरुद्ध प्रतिक्रिया प्रारम्भ हुई और धर्म या राजनीति के पृथक्करण पर आधारित पंथ निरपेक्षता के विचार का उद्य हुआ किन्तु पंथ निरपेक्षता के विचार या पंथ निरपेक्षता की भी आलोचना की जाती है। इस प्रकार की आलोचना के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

1. शासन-प्रणाली का आधार भौतिक:
आलोचना के अनुसार पंथ निरपेक्ष राज्य, राज्य की धर्म से पृथकता पर आधारित होने के कारण आवश्यक रूप से भौतिक होता है इसके अन्तर्गत मनुष्यों के नैतिक एवं आध्यात्मिक हितों की साधना नहीं हो सकती। प्रो. पुन्ताम्बेकर ने इस सम्बन्ध में कहा है, “इसके अन्तर्गत किसी धर्म या नैतिकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। पंथ निरपेक्ष राज्य गाँधीवादी राज्य हो ही नहीं सकता …… न तो वह प्राचीन धार्मिक विचारधाराओं पर और न सांस्कृतिक विचारों पर चल सकता है।”

2. राज्य का छिन्न-भिन्न हो जाना सम्भव:
आलोचकों का कथन है कि राज्य में एक धर्म विशेष को मान्यता देने से धार्मिक एकता के आधार पर एक ऐसी राजनीतिक एकता स्थापित हो जाती है, जो राज्य में इस प्रकार की धार्मिक एकता नहीं रहने देती है और इस प्रकार की धार्मिक एकता के अभाव में राज्य के छिन्न-भिन्न हो जाने की आशंका बनी रहती है। आलोचकों के अनुसार एक पंथ निरपेक्ष राज्य में विभिन्न धर्मों के जो अनुयायी होते हैं, उनके द्वारा धार्मिक भेदों के कारण परस्पर एवं निरन्तर लड़ाई-झगड़े राज्य की एकता को नष्ट कर देते हैं।

3. लोककल्याणकारी राज्य नहीं हो सकती:
लोककल्याणकारी राज्य जनहित और सामाजिक कल्याण पर आधारित होता है और लोककल्याण की यह भावना नैतिक आदर्शों और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ही उत्पन्न हो सकती है लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म और नैतिकता के प्रति उदासीन होता है और इस कारण यह कभी सच्चा लोककल्याणकारी राज्य नहीं हो सकता। आलोचकों के अनुसार, राज्य में लोककल्याण की भावनाओं का पतन हो जाता है और इसमें उन स्वार्थपूर्ण तत्त्वों को बढ़ावा मिलता है, जो लोककल्याण के विरुद्ध होते हैं।

4. सरलता से विकृत हो सकता है:
आलोचकों का यह भी कथन है कि पंथ निरपेक्ष राज्य में शासन का कोई नैतिक आधार नहीं होता, इसलिए इस प्रकार का राज्य सरलतापूर्वक विकृत हो सकता है और तानाशाही का रूप ग्रहण कर सकता है। राज्य में धार्मिक तथा नैतिक भावनाओं का पोषण न होने के कारण इस बात की आशंका रहती है कि कोई व्यक्ति शासन-शक्ति हथिया कर तानाशाही की स्थापना न कर ले जैसा कि मुसोलिनी ने 1922 ई. में और हिटलर ने 1933 ई. में किया।

5. धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था न होने के दुष्परिणाम:
राज्य के अन्तर्गत शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों को किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाती है। इस प्रकार की धार्मिक शिक्षा के अभाव में विद्यार्थी पूर्ण भौतिकता के वातावरण में पलकर बड़े होते है और नैतिक-अनैतिक मार्ग से भौतिक साधनों की प्राप्ति ही उनके द्वारा अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया जाता है। जिस देश की युवा पीढ़ी नैतिक और धार्मिक आचरण से हटकर इस प्रकार का कलुषित मार्ग अपना लेती है। उस देश का भविष्य अन्धकारमय ही कहा जा सकता है।

6. बहुसंख्यक धार्मिक वर्ग की भावनाओं को आघात:
एक राज्य के अन्तर्गत धर्म की दृष्टि से जो वर्ग बहुमत में है, सदैव ही यह चाहता हैं कि उसे राज्य के अन्तर्गत अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त होना चाहिए। धर्म की दृष्टि से बहुमत वर्ग को विशेष स्थिति प्राप्त होने या धर्माचार्य राज्य होने पर इस बहुमत वर्ग के द्वारा राज्य के प्रति धर्म मिश्रित देशभक्ति का दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है और वे राज्य के कल्याण को अपना विशेष कर्तव्य समझते हैं लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य में जब बहुमत और अल्पमत वर्ग को समान स्थिति प्राप्त होती है तो बहुमत वर्ग को अल्पमत वर्ग के लिए अपनी भावनाओं और हितों पर अंकुश रखना होता है। इससे बहुमत वर्ग की भावनाओं पर आघात पहुँचता है और वे राज्य के प्रति उस श्रद्धा-भक्ति का परिचय नहीं दे पाते, जिसका परिचय वे दे सकते थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
इनमें से कौन धर्म निरपेक्ष राज्य नहीं है –
(क) नेपाल
(ख) अमेरिका
(ग) भारत
(घ) पाकिस्तान
उत्तर:
(घ) पाकिस्तान

प्रश्न 2.
‘धर्म से जीवन के विभिन्न कार्यों में संगति आती हैं और इससे उसको दिशा प्राप्त होती है।’ धर्म निरपेक्षता के सम्बन्ध में यह कथन किस महापुरुष का है?
(क) शंकराचार्य
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) डॉ. राधाकृष्णन
(घ) विनोबा भावे
उत्तर:
(ग) डॉ. राधाकृष्णन

प्रश्न 3.
‘अस्पृश्यता का अन्त’ का वर्णन किस अनुच्छेद में किया गया है?
(क) अनुच्छेद – 14
(ख) अनुच्छेद – 17
(ग) अनुच्छेद – 23
(घ) अनुच्छेद – 12
उत्तर:
(ख) अनुच्छेद – 17

Bihar Board Class 10 English Book Solutions Poem 6 Koel

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Panorama English Book Class 10 Solutions Poem 6 Koel (The Black Cuckoo)

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B.1.1: Write ‘T’ for true and ‘F’ for false statement:

(1) Koel is called the black cuckoo.
(2) Koel sings in the apple-leaves.
(3) The song of the cuckoo brings a thousand memories.
(4) The poet does not become restless to hear its voice.
(5) “Thy wings” means “your wings”.
Answer:
(1) – T
(2) – F
(3) – T
(4) – F
(5) – T.

B.2. Answer the following questions very briefly:

Koel Poem Bihar Board Class 10 English Question 1.
Who wrote the poem, Koel?
Answer:
Puran Singh wrote the poem, Koel.

Koyal In English Bihar Board Class 10 Question 2.
What do you write for “thy” and “art” in prose?
Answer:
I write you for thy and are for art in prose.

Koel Poem In English Bihar Board Class 10 Question 3.
What makes thousand memories in heart?
Answer:
The high-pitched strains of Koel (Cuckoo) makes thousand memories in the poet’s heart.

Koyal Poem In Hindi Bihar Board Class 10 English Question 4.
What happens with the shades of mangoes?
Answer:
The shades of mangoes burn.

10th Class English Poem Bihar Board Question 5.
“O little Bird !” Why capital ‘B’ has been used here?
Answer:
Capital ‘B’ has been used in “O Little Bird” because the poet has used it for a particular cuckoo (Koel).

B.1. Answer the following questions very briefly:

Class 10th English Poem Bihar Board Question 1.
What charred the wings of Koel?
Answer:
The fire of love charred the wings of Koel.

कोयल In English Bihar Board Class 10 Question 2.
Why is Koel restless?
Answer:
Koel is restless for her ‘Beloved’.

10th Standard Poem Bihar Board English Question 3.
What fires the Koel?
Answer:
The sight of mango blossoms fires the Koel.

Koyal Hindi Poem Bihar Board Class 10 English Question 4.
What burns her heart?
Answer:
The bright greenness of the garden burns her (Koel’s) heart.

Question 5.
What does the flaming soul of the Koel ask?
Answer:
The flaming-soul of the Koel asks about her Beloved.

C. 1. Long Answer Questions:

Question 1.
In response to the speaker’s question.” What singed thy wings?”
The Koel replies, “The fire of love has charred my wings.” What does the Koel’s answer suggest? Can love burn like fire? Is this burning a positive thing on a negative one? Explain.
Answer:
The Koel’s answer suggests the separation from his beloved is unbearable. His heart is always at his beloved. His mind was rapt in the feeling of love.

No, love can not burn like fire, but its effect on a lover is great. His feeling make him hot. Regarding burning it is a negative one. Because it is fire which burns everything good or bad.

Question 2.
Why does the poet call the Koel “a rain of spark” Explain?
Answer:
“The Koel’s strains likes a rain of spark” means as raindrops cover a vast area So is the spark. In spark tinny glowing fit is thrown off from a burning substance, and fire the others. So do the Koel’s voice. So the poet has compared Koel’s voice to the rain of spark.

Question 3.
Why is the Koel restless? Is she able to win over his restlessness? If no, why?
Answer:
The Koel is restless because he is far from his beloved, that is why his song is shedding a sad song which seems to be setting on fire.

Question 4.
Why is a Koel praised? How do you feel when you hear its voice?
Answer:
A Koel is praised for his/her song. The bird is praised and welcomed as the darling bird of spring. It is a sweet singing bird which sing in spring. It is the darling of the spring. I have been hearing his song in the spring ever since my school-boy days. The Koel’s song reminds him of his memories. The Koel’s song echoes through out the valley and seems to pass hill to hill.

Question 5.
Do you think that the Koel symbolises true love?
Answer:
No, the Koel does not symbolise true love. The koels do not build their own nest and so he koel and she koel do not live together. They are wandering birds. Their lives are separate They are seen only in Spring and his/. her voice is heard. They do not live togather like other birds.

C.2. Group Discussion

Discuss the following in a group or pairs:

Question 1.
Nature always soothes our aggrieved soul.
Answer:
Nature exercises a positive influence on man. The great poet of nature william Wordsworth Says’ “Man bring the child of nature all the qualities and appearances of Nature find their counterpart in him.” In fact, this imaginative fusion of Nature and man was so complete with Wordsworth that he found a close affinity between the law of Nature and the highest moral laws. So by keeping close contact with Nature man can absorb politeness that soothes our aggrieve.

Question 2.
We always look forward to meeting whom we love.
Answer:
The man who loves any lady, runs after him. His mind is rapt in the feeling of love. His eyes are fixed on meeting time. It is an experience of love that gives him strange emotions of love. He wants to meet his beloved. He thinks that his beloved grows lovelier every day. Daily she looks more and more fresh like a rose in June. that is why there is always emotion in his bosom, who looks forward to meet his or her love.

C. 3. Composition

Question 1.
Write a paragraph in about 100 words on each of the following:
(i) A caged bird finds it difficult to sing.
Answer:
(i) A caged bird finds it difficult to Sing.
A caged bird does not find natural environment. It is not free. It does not get natural surroundings. For it, even spring is useless. It can’t see and observe the beauty of spring with budding flowers and new leaves. it forgets the beauty of running water’ and fresh air. So it becomes emotionless. It does not find its way of singing. The birds are the best free creatures on earth. They know to fly in the sky freely and singing, but when they are caged they do not find emotion to sing and enjoy.

(II)                                                        The Cuckoo’s Voice
The most remarkable thing about the cuckoo is its sweet voice. Its two fold notes has made it the favorite of poets, who have described it as an ‘ethereal minstrel can embodiment of melody and song.’ The poet have describe it as the ‘herald of spring the messenger of cupid; Its sweet voice makes us forget for a time the cares and anxieties of the world and carries us off to a dreamland of poetry and romance.

Question 2.
Write a letter to your friend describing how a koel though black in appearance stands for the sweetness of the soul.
Answer:

G.B.Road
Gaya
May 5, 2012

My dear Anita,
I was exceedingly glad to learn about your zeal and passion for studies. It is highly admirable.

In this letter. I shall give you a brief account about a Koel. The Koel though black in appearance stands for the sweetness of the soul. It is black and ugly to look at. It is so called from its two fold note coo-coo. We Judge things or persons by their outward look. Appearance cheat us. Persons or things are not always what they look like. We must look much below the surface and know its real worth. The Koel is the symbol of the same thing. Its heart is clear so it sings sweetly.
With all good wishes.

Yours affectionately
Reena

D. 3. Write the synonyms of the following words:

Keep little speak
conceal freedom sight

Answer:

Words Synonyms
Keep hold
Conceal secret
Little liny
Freedom liberty
Speak utter
Sight glance

F. Translation

Translate unit-I of Koel (text before the questions inbox) in Hindi or any other language that you know.
Answer:
कोयल! क्या बिजली पड़ी? तुम्हारे पंख कैसे जलकर काले हो गए?
आम की पत्तियों में छिप कर तुम गीत गाते हो।
तुम्हारे ऊंचे स्वर के गीत हमारी सोई हुई आत्मा को जगाते हैं।
हजारों स्मृतियों के साथ।
तुम उतना अधीर क्यों हो कि तुम्हारे गीत अग्नि प्रज्वलित करते हैं ?
देखो! गुलाब भी अंगार बन गए हैं, जो वायु और जल ग्रहण करते हैं।
आम के वृक्षों की छाया भी जलती है।
तुमने कैसी अग्नि की वर्षा की, ओ छोटी चिड़िया।
कोयल! क्या बिजली गिरी? तुम्हारे पंख कैसे जलकर काले हो गए।

Comprehensive Based Questions with Answers

1. Koel ! What lightning fell ? What singed thy wings?
What keeps thee fresh, yet charred?
Concealed in the mango-leaves, thou singest!
Thy high-pitched strains wake in my soul a
thousand memories!
Questions :
(i) Who is the speaker? How do you recognise him?
(ii) Name the poem.
(iii) Why does the poet call “the roses are on fire”?
(iv) Find words from the passage which mean :
(a) set on fire
(b) hid
Answers:
(i) The speaker of the poem is the poet, Puran Singh, himself. He goes on asking and telling about the Koel. The line, ‘Thy high pitched strains wake in my soul a thousand memories.” Here ‘in my soul’ refers to the poet.
(ii) The name of the poem is’Koel’ (The Black Cuckoo).
(iii) The poet’s mind is full of love, in the absence of his beloved. Everything of nature has become fire for him. It seems they are to …. hurt the poet. So the beautiful flowers seem him burning on fire.
(iv) (a) Kindling
(B) Concealed.

हिन्दी रूपान्तर :

  • कोयल! कैसी बिजली गिरी? तुम्हारे पंख क्या गाते हैं?
  • शरीर जल जाने पर भी तुम तरोताजा किस प्रकार हो?
  • आम की पत्तियों में छिपकर तुम गाती हो!
  • तुम्हारे द्वारा उच्च स्वर में रट लगाने से मेरी आत्मा में जागृति हुई है।
  • हजारों स्मृतियाँ ।

2. Why so restless that they spark-shedding notes go forth kindling fire?
Lo! The roses are on fire which winds and waters catch!
The shades of mangoes burn!
What a rain of sparks art thou, O Little Bird!
Koel! What lightning fell? What singed thy wings?
Questions:
(i) Who is restless?
(ii) Whose beloved has been described here?
(iii) Is a Koel the symbol of love?
(iv) Find word from the passage which means : ‘Sing’.
Answers :
(i) The Koel is restless.
(ii) the Koel’s beloved has been described here.
(iii) No, Koel is not the symbol of true love.

हिन्दी रूपान्तर :

  • इतनी बेचैन क्यों, जिस कारण तुम्हारी चिनगारी से युक्त रट
  • आग प्रज्वलित करती है ? ..
  • देखो कि किस प्रकार गुलाब जल रहे हैं जिसे तेज पवन तथा
  • जल पकड़ते हैं।
  • आम की छाया जलती है
  • ऐ छोटी चिड़िया ! तुम कैसी चिनगारी की वर्षा करती हो। ….
  • ऐ कोयल ! यह कैसी बिजली गिरी? तुम्हारे पेखों ने क्या गाया?

Third Stanza:
The Fire of Love has charred my wings and made me a new
I am restless ! Where is my Beloved?
The sight of mango-blossoms fires me all the more!
The greener the garden, the brighter burns my heart!
My flaming soul asks, “Where! where is my Beloved ?”
“Speak ! speak ! why are thy leaves so still ?”

हिन्दी रूपान्तर:

  • प्रेमाग्नि ने मेरे पखों को जलाकर काला कर दिया है और
  • मुझे नया बना दिया है (अर्थात् मेरा नया रूप बना दिया है।).
  • मैं अशान्त हूँ। कहाँ है मेरी प्रेमिका?
  • आम (के वृक्ष) पर विकसित मंजर मुझे अत्यधिक दग्ध करता (जलाता) है।
  • भेरी अग्नि की लपटों के समान प्रज्वलित अत्मा पूछती है, “कहाँ ? कहाँ है ?
  • मेरी प्रेमिका?”
  • “बोलो ! बोलो ! क्यों हैं ये पत्तियाँ इस प्रकार स्थिर?”

सरलार्थ:
अपनी प्रेमिका के मिलन के लिए आकुर कोयल अपने कष्टों का वर्णन करते हुए कहती है कि विरहाग्नि ने उसके पंखों को जलाकर काला कर दिया है तथा यह नया रूप प्रदान किया है। आम्र-वृक्ष के मंजर उसे शीतलता प्रदापन न कर उसे दग्ध’ (जला) रहे हैं । हरा-भरा उद्यान भी उसके हृदय को शान्ति प्रदान नहीं कर रहे । वृक्ष की पत्तियों से पूछती है कि उसकी प्रेमिका कहाँ है । उनसे कोई उत्तर न पाकर तथा उन पत्तियों को स्थिर देखकर वह विस्मित है।

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Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 8 मंत्र

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 1 Chapter 8 मंत्र Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 8 मंत्र

Bihar Board Class 6 Hindi मंत्र Text Book Questions and Answers

प्रश्न-अभ्यास

पाठ से –

मंत्र कहानी के प्रश्न उत्तर Class 8 Bihar Board प्रश्न 1.
डाक्टर के लड़के कैलाश ने साँप को पाल रखा था फिर . भी साँप ने उसे क्यों काटा?
उत्तर:
साँप को लगा कि कैलाश उसपर आक्रमण करना चाहता है। अतः आत्मरक्षा में उतरे कैलाश पर आक्रमण कर अंगुली को काट खाया। साँप की – यह प्रकृति होती है कि वह तबतक आक्रमण नहीं करता जबतक उसे यह न लगे कि यह व्यक्ति उसे मारना या चोट पहुँचाना चाहता है।

मंत्र’ कहानी के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 2.
डा. चड्ढा बूढ़े व्यक्ति को क्यों खोज रहा था?
उत्तर:
डा. चड्ढा उस बूढ़े व्यक्ति के उपकार का बदला चुकाना चाहता । था तथा पूर्व में अपने व्यवहार के लिये उस बूढ़े से क्षमा मांगना चाहता था।

Mantra Chapter Question Answer Bihar Board प्रश्न 3.
डाक्टर के लड़के कैलाश को साँघ ने काट लिया। इस खबर को सुनकर बूढ़े व्यक्ति को नींद क्यों नहीं आ रही थी?
उत्तर:
मानवता का तकाजा और कर्त्तव्य की पुकार के कारण बुड्ढा चाहकर भी नहीं सो पा रहा था। अस्सी वर्ष के उसके जीवन में यह पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पाकर भी वह दौड़कर न गया हो। इसका अन्तर्मन उसे अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक कर रहा था।

पाठ से आगे –

Mantra By Premchand Questions And Answers Bihar Board प्रश्न 1.
डाक्टर द्वारा बूढ़े के लड़के को देखने से इन्कार करने पर । बूढ़ा व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा होगा? अपने शब्दों में लिखिये।
उत्तर:
बूढ़ा डाक्टर के इन्कार करने पर हतप्रभ हो गया। उसके मन को . ठेस लगी। वह मन ही मन समझ गया कि उसके जीवन की आखिरी निशानी थी अब नहीं बचेगी। वह अन्दर से टूट गया पर कोई उपाय नहीं देख डोली उठवा ली और अपने घर को लौट गया।

Mantra Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
समाज में गरीबों का जीवन-स्तर सुधारने के लिये आप क्या करना चाहेंगे?
उत्तर:
उसके लिये समाज में शिक्षा का प्रचार-प्रसार आवश्यक है।’ शिक्षा से जागरूकता आयेगी -समाज में सबको आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा और प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।

Bihar Board Class 6 Hindi Book प्रश्न 3.
इस पाठ में आपको किसका चरित्र सबसे अच्छा लगा और क्यों?
उत्तर:
इस पाठ में सबसे अच्छा चरित्र उस बूढ़े का है जिसने मानव-मूल्यों की रक्षा की और डाक्टर चड्ढा के बेटे की जान बचाने के लिये आधी रात .. को उसके घर पहुँच गया। डाक्टर चडढा से बदला लेने की भावना उसके मन में आयी पर बूढ़े ने उस पर नियन्त्रण करते हुये डाक्टर चड्ढा के यहाँ जाने का निर्णय लिया। डाक्टर चड्ढा से इनाम या पारिश्रमिक पाने की अपेक्षा किये बिना वह घर वापस आ गया। इस प्रकार बूढ़े ने इन्सानियत का उच्च उदाहरण प्रस्तुत किया।

मंत्र कहानी के प्रश्न उत्तर Class 6 Bihar Board प्रश्न 4.
इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
उत्तर:
यह कहानी हमें शिक्षा देती है कि मानव मूल्य सर्वोपरि है –
जो तोको काँटा बोये, ताही बोउते तुम फूल
तोहे फूल का फूल है, ताको है त्रिशूल।।
मानवता की रक्षा के लिये ही ईश्वर ने मानव को इस धरती पर जन्म दिया है।

व्याकरण

Mantra By Premchand Questions And Answers In Hindi प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए –

(क) चैन न आना
उत्तर:
चिंता के कारण बूढ़े को चैन नहीं आ रहा था।

(ख) हवा देना
उत्तर:
राम ने आंदोलन को और हवा दी।

(ग) पगड़ी उतारकर रखना
उत्तर:
निर्धन पिता ने दहेज नहीं देने के कारण अपनी पगड़ी उतार कर पैर पर रख दी।

(घ) भूत सवार होना
उत्तर:
उसे पैसा कमाने का भूत सवार है।

(ङ) कलेजा ठण्डा होना
उत्तर:
पाकिस्तान की हार से भारत का कलेजा ठंडा हो गया।

(च) सीधा मुँह बात न करना
उत्तर:
वह इतना घमंडी है कि सीधा मुँह बात भी नहीं करता।

Bihar Board Solution Class 6 Hindi प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों में अ उपसर्ग लगाकर विलोम बनाइए।
उत्तर:
(क) धर्म = अधर्म ।
(ख) ज्ञान = अज्ञान ।
(ग) भाव = अभाव
(घ) सहमत = असहमत
(ङ) सावधानी = असावधानी ।

मंत्र Summary in Hindi

पाठ का सार-संक्षेप

कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचन्द लिखित अनेक कहानियों से चुनी गयी यह कहानी मानव-मूल्यों की स्थापना.का सन्देश देती है। मनुष्य अहंकार भाव को प्रधानता देते हुये किस प्रकार इन्सानियत की अपेक्षा करता है और फिर. मानव-मूल्यों की बलि देता है, इसकी स्थापना इस कहानी का मूल उद्देश्य है। इस कहानी के दो मुख्य पात्र हैं – एक डाक्टर चड्ढा और दूसरा एक बूढ़ा जो सांप के विष को झाड़ने का मन्त्र जानता है और पास के एक गाँव में अपनी पत्नी के साथ रहता है।

बूढे के सात बच्चों में से छ: की मौत एक -एक कर हो चुकी है। यह सातवाँ भी गम्भीर रूप से बीमार हो गया है और अपने बीमार बेटे को डोली में सुलाकर वह बूढ़ा डाक्टर चड्ढा की डिस्पेन्सरी (औषधालय) पर पहुँचता है। उस समय सन्ध्या हो चुकी थी और डाक्टर चड्ढा नित्य की तरह टेनिस खेलने के लिये जाने की तैयारों में लगे थे। बूढ़ा घर के सामने डोली पर बीमार – बच्चे को छोड़कर, डॉक्टर साहब के घर के दरवाजे पर लगी चिक (परदा) उठाकर झांकता है।

उसको अन्दर प्रवेश करने की हिम्मत नहीं होती है- कहीं कोई डाँट न दे? अन्दर से डॉक्टर साहब की कड़क आवाज आती है- कौन . है? क्या चाहता है? बूढ़ा गिड़गिड़ाता हुआ विनती करता है “हूजूर! बड़ा गरीब आदमी हूँ, मेरा लड़का कई दिन से बीमार है।” डॉक्टर साहब घर के अन्दर ” से उत्तर देते हैं “कल सवेरे आओ, कल सवेरे। हम इस वक्त मरीजों को नहीं -देखते।”

बूढ़ा कहता है – “दुहाई है सरकार की, लड़का मर जायेगा, हुजूर! चार दिन से आँखें नहीं खोली हैं।”

डाक्टर साहब घड़ी देखते हैं-कुल दस मिनट का समय बाकी है। उन्होंने फिर कहा – “कल सवेरे आओ। यह हमारे खेलने का समय है।”

बूढ़ा ने अपनी पगड़ी उतारकर चौखट पर रख दी और रोते हुये कहा-“हुजूर एक निगाह देख लें। बस, एक निगाह! लड़का मर जायेगा, हुजूर! सात – लड़कों में से यही एक बच रहा है। हम रो-रोकर ही मर जायेंगे।”

डाक्टर साहब ने बूढ़े की बात अनसुनी कर दी। उन्होंने चिक उठायी और बाहर निकलकर अपनी मोटर की ओर बढ़ गये। बढे ने अन्तिम प्रयास किया दया कीजिये हुजूर, इस लड़के को छोड़कर इस संसार में मेरा कोई नहीं है।” डाक्टर साहब ने मुँह फेर लिया और अपनी गाड़ी पर बैठकर बोले – “कल आना”

डोली जिधर से आयी थी. उधर चली गयी और फिर उसी रात उसका हँसता-खेलता लड़का, इस संसार से विदा हो गया।

कई साल बीत गये। डाक्टर चड्ढा की प्रैक्टिस दिन दुनी रात चौगनी बढ़ती गयी। उन्होंने यश भी कमाया और धन भी। डाक्टर चड्ढा की दो संतान थी – एक लड़का और एक लड़की। लड़की का विवाह डाक्टर साहब ने कर दिया था। लड़का अभी कॉलेज में पढ़ता था। उसका नाम था कैलाश। कैलाश को सांप पालने-खिलाने और नचाने का शौक था। आज कैलाश की बीसवीं सालगिरह का समारोह डाक्टर चड्ढा मना रहे थे। इस समारोह में कैलाश के सहपाठी और खास मित्र बुलाये गये थे, जिनमें मृणालिनी भी थी। मृणालिनी, कैलाश से प्यार करती थी। मृणालिनी आज जिद कर बैठी कि वह सांप देखेगी। -कैलाश इस भीड़ में सांपों को नहीं निकालने का बहाना करता रहा, पर मृणालिनी की जिद् के आगे झुकना ही पड़ा। वह मृणालिनी और अन्य मित्रों को लेकर सांपों के रखने की जगह पर गया और बीन बजाने लगा। वह – एक-एक सांप निकालता और उनके करतब दिखाता। उन्हें अपने गले में डाल लेता था फिर बीन बजाकर उन्हें नचाता। एक मित्र ने व्यंग्य किया – इन सांपों के दाँत नहीं होंगे अन्यथा ये अभी तक काट लिये होते। (कैलाश ने हँसकर – कहा – दाँत तोड़ना तो मदारियों का काम है। इनके दाँत सही सलामत हैं –

कहो तो दिखा दूँ। इनके काटे की कोई दवा नहीं है। यह अत्यन्त जहरीला है। कैलाश को जोश आ गया। उसने उस सांप की गर्दन दबायी और मुँह खोलकर . उसके दाँत सबको दिखा दिये। सांप को उसके पालने वालों का आज का

व्यवहार ठीक नहीं लगा क्योंकि सांप क्षणभर में क्रोध से पागल हो गया। – कैलाश ने उसकी गर्दन ढीली कर दी। सांप ने आत्मरक्षा में अपने फन फैला दिये और कैलाश की अंगुली में अपने दाँत गड़ा दिये। कैलाश की अंगुली से खून टपकने लगा। सांप छुटते ही वहाँ से भाग निकला। कैलाश ने अंगुली . दबा ली। एक जड़ी पीसकर लगायी गयी पर उसका कोई फायदा नहीं निकला। कैलाश की आँखें झपकने लगीं और होठों पर नीलापन दौड़ने लगा। कैलाश की हालत खराब होने लगी। मेहमान कमरे में इकट्ठा हो गये। एक सपेरे को बुलाया गया जो विप झाड़ने का काम करता था। वह आया पर कैलाश की सूरत देख कर बोला-“अब क्या हो सकता है सरकार! जो कुछ होना था सो हो चुका।” घर में कोहराम मच गया। सभी रोने लगे।।

शहर से कुछ दूर एक झोपड़ी में एक बूढा और एक बढिया अंगीठी के सामने बैठे जाड़े की रात काट रहे थे। घर में न चारपाई थी और न कोई विछावन। एक छोटी-सी ढिवरी ताक पर जल रही थी। किसी ने द्वार पर आकर आवाज दी “भगत, भगत! क्या सो गये? जरा किवाड़ खोलो।” भगत ने दरवाजा खोल दिया। एक आदमी अन्दर आकर बोला – “कुछ सुना. डाक्टर चड्ढा के लड़के को सांप काट लिया। तुम चले जाओ, आदमी बन जाओगे। खूब पैसा मिलेगा।

बूढ़े न इन्कार करते हुये कहा – “मैं नहीं जाता। मेरी बला से मरे। मेरा लड़का अन्तिम सांसें गिन रहा था। मैं बेटा को लेकर उन्हीं के पास गया था। मैं पैरों पर गिर पड़ा कि एक नजर देख लीजिये। मगर उसने सीधे मुँह बात तक नहीं की। अब पता चलेगा कि बेटे का गम क्या होता है। उन्हें तनिक भी – दया नहीं आयी थी।”

भगत अपनी बातों पर अटल रहा और वह आदमी लौट गया। भगत ने किवाड़ बन्द कर लिया और चिलम पीने लगा। बुढ़िया ने कहा- “इतनी रात गये जाड़े में कौन जायेगा?”

“अरे, दोपहर ही होती तो भी मैं नहीं जाता। सवारी दरवाजे पर लेने आती तो भी न जाता। भूला थोड़े ही हूँ। मेरे बेटे को निर्दयी ने एक नजर देखा भी न था” – बूढ़े ने कहा। बूढ़े के जीवन में यह पहला अवसर था कि सांप काटे की खबर पाकर भी वह नहीं गया। मौसम कैसा भी हो, लेन-देन का विचार कभी मन में आया ही नहीं।

बुढ़िया सो गयी थी। बूढ़े का मन भारी हो रहा था। उसके मन को चैन नहीं आ रहा था। उसने अपनी लकड़ी उठायी और धीरे से किवाड़ खोले। बुढ़िया की नींद टूट गयी – पृछा “कहाँ जाते हो?” बूढ़े ने बहाना कर दिया-देख रहा था कि कितनी रात है? बुढ़िया ने कहा – ” अभी बहुत रात है, सो जाओ।” “नींद नहीं आती” – बूढ़े ने उत्तर दिया। ” नींद काहे को आयेगी? मन तो चड्ढा के घर लगा हुआ है। बुढ़िया ने व्यंग्य-वाण छोड़े।” चड्ढा ने हमारे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहाँ जाऊँ” बूढ़े ने कहा। बुढ़िया फिर सो गयी। भगत ने धीरे से किवाड़ खोला ताकि बुढ़िया जग न जाय। उसके पैर अपने आप आगे बढ़ गये। वह लपका चला जा रहा था। उसके मन ने उसे कई बार पीछे खींचा। पर उसका अंतर्मन उसे आगे की ओर ठेलता गया।

इसने में दो आदमी आता दिखायी दिया। वे आपस में बातें करते चले आ रहे थे। -“चड्ढा बाबू का घर उजड़ गया। वही तो एक लड़का था।” भगत के कानों में ये शब्द पड़े और उसकी चाल तेज हो गयी। अपनी उम्र में इतना तेज वह कभी नहीं चला था। चड्ढ़ा साहब के घर बूढ़ा पहुँच गया। रात के दो बज चुके थे। मेहमान सांत्वना देकर विदा हो गये थे। भगत ने द्वार पर पहुँचकर आवाज दी। डाक्टर साहब बाहर आये। देखा, एक बूढ़ा आदमी खड़ा है- कमर झुकी हुयी, पोपला मुँह, भौंहे तक सफेद हो गयी हैं। लकड़ी के सहारे कांप रहा है।

बूढ़ा ने कहा- “भैया कहाँ है? जरा मुझे दिखा दीजिये” चड्ढा ने कहा “चलो, देख लो, मगर तीन-चार घंटे हो गये – जो कुछ होना था सो हो चुका। बहुतेरे झाड़ने-फूंकने वाले देखकर चले गये।”

डाक्टर चड्ढा, भगत को अन्दर ले गये। उसने कैलाश की हालत एक मिनट तक देखी, फिर मुस्कुरा कर कहा – “अभी कुछ नहीं बिगड़ा है, बाबूजी! आप पानी का इन्तजाम करवाइये।”

लोगों ने कैलाश को नहलाना शुरू किया और बूढ़ा भगत खड़ा मुस्कुराकर मंत्र पढ़ता जाता। मंत्र की समाप्ति पर एक जड़ी कैलाश को सुंघा देता। यह क्रम सुबह तक चलता रहा। सुबह होते-होते कैलाश ने लाल-लाल आँखें खाली, अंगडाई ली और पीने को पानी मांगा। भगत का काम पूरा हो चुका था। वह घर की तरफ भागा। भगत बढिया के जागने के पहले अपने घर पहुँच जाना चाहता था। यहाँ चारो तरफ भगत की खोज होने लगी।

जब सब चले गये तो डाक्टर साहब ने अपनी पत्नी से कहा – “बुड्ढा न जाने कहाँ चला गया? एक चिलम, तम्बाकू का भी हकदार नहीं हुआ।” पत्नी (नारायणी) ने कृतज्ञतापूर्वक कहा – “मैंने तो सोचा था इसे कोई बड़ी रकम दूँगी।

चड्ढा ने कहा – “रात को तो मैंने नहीं पहचाना, पर जरा साफ होने पर गहचान गया। एक बार यह एक मरीज को लेकर आया था। मैं खेलने के लिये जा रहा था। मैंने मरीज को देखने से इन्कार कर दिया था। आज मुझे जितनी ग्लानि हो रही है, उसे प्रकट नहीं कर सकता। मैं अब उसे खोज निकालूँगा और उसके पैरों पर गिरकर अपना अपराध क्षमा कराऊँगा। वह कुछ लेगा नहीं, यह जानता हूँ। उसका जन्म यश की वर्षा ही के लिये हुआ है। उसकी सज्जनता ने मुझे ऐसा आदर्श दिखा दिया है जो अब से जोवनपर्यन्त मेरे सामने रहेगा।”