Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य

Bihar Board Class 11 History तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य Textbook Questions and Answers

 

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यदि आप रोम साम्राज्य में रहे होते तो कहाँ रहना पसंद करते-नगरों में या ग्रामीण क्षेत्र में? कारण बताइये।
उत्तर:
यदि मैं रोम साम्राज्य में रह रहा होता तो मैं नगरों में रहना पसंद करता। इसके तीन कारण हैं –

  1. नगरों में अनाज की कोई कमी नहीं थी।
  2. अकाल के दिनों में भी ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में नगरों में बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध थीं।
  3. नगरों में लोगों को उच्च मनोरंजन के साधन प्राप्त थे।

प्रश्न 2.
इस अध्याय में उल्लिखित कुछ छोटे शहरों, बड़े नगरों, समुद्रों और प्रान्तों की सूची बनाइए और उन्हें नक्शों पर खोजने की कोशिश किजिए ? क्या आप अपचे द्वारा बनायी गई सूची में संकलित किन्हीं तीन विषयों के बार में कुछ कह सकते हैं?
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 3.
कल्पना कीजिए कि आप रोम की एक गृहिणी हैं जो घर की जरूरत की वस्तुओं की खरीददारी की सूची बना रही हैं। अपनी सूची में आप कौन-सी वस्तुएँ शामिल करेंगी?
उत्तर:
गेहूँ, जौ, सेम, मसूर, दालें, जैतून का तेल, शराब आदि

प्रश्न 4.
आपको क्या लगता है कि रोमन सरकार ने चाँदी में मुद्रा को ढालना क्यों बंद किया होगा और वह सिक्कों के उत्पादन के लिए कौन-सी धातु का उपयोग करने लगे?
उत्तर:
चाँदी के सिक्के बनाने के लिए चाँदी स्पेन की गगनों से प्राप्त की जाती थी। परंतु ये खानें समाप्त हो चुकी थीं और सरकार के पास इसका भंडार खाली हो गया। इसलिए रोमन सरकार ने चाँदी के स्थान पर सोने के सिक्के चलाए।

प्रश्न 5.
अगर सम्राट् त्राजान भारत पर विजय प्राप्त करने में वास्तव में सफल रहे होते और रोमवासियों का इस देश पर अनेक सदियों तक कब्जा रहा होता, तो आप क्या सोचते हैं कि भारत वर्तमान समय के देश से किस प्रकार भिन्न होता?
उत्तर:
यदि भारत अनेक सदियों तक रोमवासियों के अधीन रहा होता, तो भारत वर्तमान समय के देश से निम्नलिखित दृष्टियों से भिन्न होता –

  1. भारत में लोकतंत्र के स्थान पर राजतंत्र होता।
  2. भारत में सोने के सिक्के प्रचलित होते।
  3. ग्रामीण क्षेत्र नगरों द्वारा शासित होता।
  4. ग्रामीण क्षेत्र राज्य के राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत होता।
  5. ईसाई धर्म देश का राजधर्म होत।
  6. मनोरंजन के मुख्य साधन सर्कस, थियेटर के तमाशे तथा जानवरों एवं तलवारबाजों की लड़ाइयाँ होती।
  7. देश में दास प्रथा प्रचलित होती।
  8. भारत का व्यापार देश के पक्ष में होता।

प्रश्न 6.
अध्याय को ध्यानपूर्वक पढ़कर उसमें से रोमन समाज और अर्थव्यवस्था को आपकी दृष्टि में आधुनिक दर्शाने वाले आधारभूत अभिलक्षण चुनिए।
उत्तर:
समाज –

  • देश में स्वर्ण मुद्राएँ प्रचलित थीं।
  • द्वितीय श्रेणी के परिवारों की वार्षिक आय 1000-1500 पाउंड सोना थी।
  • सम्राट् अपनी मनमानी नहीं कर सकते थे।
  • नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानून का सक्रिय रूप से प्रयोग किया जाता था।
  • समाज में एकल परिवार की व्यापक रूप से चलन थी।

अर्थव्यवस्था –

  • साम्राज्य में बंदरगाहों, खानों, खादानों, ईंट-भट्ठों आदि की संख्या बहुत अधिक थी, परिणामस्वरूप देश का आर्थिक ढाँचा काफी मजबूत था।
  • रोमन साम्राज्य का व्यापार काफी विकसित था।
  • गैलिली में गहन खेती की जाती थी।
  • उत्पादकता का स्तर बहुत अधिक ऊँचा था।
  • जल-शक्ति से मिलें चलाने की प्रौद्योगिकी उन्नत थी।
  • साम्राज्य में सुगठित वाणिज्यिक तथा बैंकिंग व्यवस्था थी और धन का व्यापक रूप से प्रयोग होता था।

Bihar Board Class 11 History तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रोम के सम्राट ऑगस्ट्स का शासनकाल किस बात के लिए जाना जाता था?
उत्तर:
रोम के सम्राट् ऑगस्ट्स का शासनकाल शांति के लिए जाना जाता था। इसका कारण यह था कि राज्य में शांति लंबे अतिरिक संघर्ष तथा सैनिक विजयों के बाद आई थी।

प्रश्न 2.
रोम के निकटवर्ती पूर्व से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निकटवर्ती पूर्व से अभिप्राय भूमध्य के बिल्कुल पूर्व प्रदेश से है। इनमें सीरिया, फिलिस्तीन, अरब आदि प्रदेश शामिल थे।

प्रश्न 3.
दीनारियस क्या था? हेरॉड के राज्य से रोम को कितने दीनारियस की आय होती थी?
उत्तर:
दीनारियस रोम का एक चाँदी का सिक्का था जिसमें लगभग 4.5 ग्राम शुद्ध चाँदी होती थी। हेरॉड के राज्य से रोम को प्रति वर्ष 54 लाख दीनारियस की आय होती थी।

प्रश्न 4.
रोम की साम्राज्यिक प्रणाली में बड़े-बड़े शहरों का क्या महत्व था? रोम के तीन सबसे बड़े शहरों के नाम भी बताएँ।
उत्तर:
बड़े-बड़े शहर रोम की सामाजिक प्रणाली के मूल आधार थे। इन्हीं शहरों के माध्यम से सरकार ग्रामीण क्षेत्रों पर कर लगाती थी और वसूल करती थी। रोम के तीन बड़े शहर कार्थेन, सिकरिया तथा एटि36 थे।

प्रश्न 5.
सम्राट गैलीनस ने सत्ता को सैनेटरों के हाथ में जाने से रोकने के लिए क्या पग उठाए?
उत्तर:

  • गैलीनस ने नवोदित प्रांतीय शासक वर्ग को सुदृढ़ बनाया।
  • उसने सैनेटरों को सेना की कमान से हटा दिया और उनके द्वारा सेना में सेवा करने पर रोक लगा दी।

प्रश्न 6.
तीसरी शताब्दी के रोम में प्रांतीय सैनेटरों के बहुसंख्यक होने से क्या दो निष्कर्ष – निकाले जा सकते हैं?
उत्तर:

  • साम्राज्य में आर्थिक तथा राजनीतिक दृष्टि से इटली का पतन हो रहा था।
  • भूमध्य सागर के अधिक समृद्ध तथा शहरीकृत भागों में नये संभ्रांत वर्गों का उदय हो रहा था।

अर्थव्यवस्था –

  • साम्राज्य में बंदरगाहों, खानों, खादानों, ईंट-भट्ठों आदि की संख्या बहुत अधिक थी, परिणामस्वरूप देश का आर्थिक ढाँचा काफी मजबूत था।
  • रोमन साम्राज्य का व्यापार काफी विकसित था।
  • गैलिली में गहन खेती की जाती थी।
  • उत्पादकता का स्तर बहुत अधिक ऊँचा था।
  • जल-शक्ति से मिलें चलाने की प्रौद्योगिकी उन्नत थी।
  • साम्राज्य में सुगठित वाणिज्यिक तथा बैंकिंग व्यवस्था थी और धन का व्यापक रूप से प्रयोग होता था।

प्रश्न 7.
रोम साम्राज्य में कौन-कौन से प्रदेश शामिल थे?
उत्तर:
यूरोप का अधिकांश भाग, पश्चिमी एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका का एक बहुत बड़ा भाग।

प्रश्न 8.
रोम के इतिहास की स्रोत-सामग्री को कौन-कौन से तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है?
उत्तर:

  • पाठ्य सामग्री।
  • प्रलेख अथवा दस्तावेज
  • भौतिक अवशेष

प्रश्न 9.
रोम तथा ईरान के साम्राज्यों को क्या चीज अलग करती थी?
उत्तर:
भूमि की एक संकरी पट्टी जिसके किनारे फरात नदी बहती थी। दोनों साम्राज्यों को अलग करती थी।

प्रश्न 10.
रोम तथा ईरान के साम्राज्यों के बीच कैसे संबंध थे?
उत्तर:
रोम तथा ईरान के लोग आपस में प्रतिद्वंदी थे। अपने इतिहास के अधिकांश काल में वे आपस में लड़ते रहे।

प्रश्न 11.
किस सागर को रोम साम्राज्य का हृदय माना जाता था? यह कहाँ से कहाँ तक फैला हुआ था?
उत्तर:
भूमध्यसागर को रोम साम्राज्य का हृदय माना जाता था। यह पश्चिम से पूरब तक स्पेन से लेकर सीरिया तक फैला हुआ था।

प्रश्न 12.
रोम साम्राज्य की उत्तरी दक्षिणी सीमाएँ क्या-क्या चीजें बनाती थीं?
उत्तर:
रोम साम्राज्य को उत्तरी सीमा राइन तथा डैन्यूब नदियाँ बनाती थीं। इसकी दक्षिणी सीमा सहारा नामक रेगिस्तान से बनती थी।

प्रश्न 13.
रोम साम्राज्य के प्रशासन के लिए किन दो भाषाओं का प्रयोग किया जाता था?
उत्तर:
लातिनी तथा यूनानी।

प्रश्न 14.
रोम साम्राज्य के संबंध में प्रिंसिपेट क्या था?
उत्तर:
प्रिंसिपेट वह राज्य था जो रोम के. प्रथम सम्राट् ऑगस्ट्स ने 27 ई. पू. में स्थापित किया था।

प्रश्न 15.
रोम के सम्राट ऑगस्ट्स को ‘प्रमुख नागरिक’ क्यों माना जाता था?
उत्तर:
रोम के सम्राट् ऑगस्ट्स को यह दर्शाने के लिए कि वह निरंकुश सम्राट् नहीं है, प्रमुख नागरिक माना जाता था। ऐसा सैनेट को सम्मान प्रदान करने के लिए किया जाता था।

प्रश्न 16.
किस साम्राज्य की सधेना बलात् भर्ती वाली थी? इससे क्या अभिप्राय था?
उत्तर:
फारस के राज्य की सेनाएँ बलात् भर्ती वाली थी। इसका अर्थ यह है कि राज्य के कुछ वयस्क पुरुषों को अनिवार्य रूप से सैनिक सेवा करनी पड़ती थी।

प्रश्न 17.
रोम साम्राज्य की सेना की कोई दो विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:

  • रोम की सेना एक व्यावसायिक सेना थी, जिसमें प्रत्येक सैनिक को वेतन दिया जाता था।
  • प्रत्येक सैनिक को कम-से-कम 25 वर्ष तक सेवा करनी पड़ती थी।

प्रश्न 18.
(i) रोम के राजनीतिक इतिहास के प्रमुख खिलाड़ी कौन-कौन थे?
उत्तर:
राजा, अभिजात वर्ग और सेना।

(ii) रोम में सैनेट की सदस्यता का आधार क्या था?
उत्तर:
रोम में सैनेट की सदस्यता का आधार धन तथा पद प्रतिष्ठा थी।

प्रश्न 19.
गृह-युद्ध क्या होता है?
उत्तर:
गृह-युद्ध देश के भीतर दो गुटों में सशस्त्र संघर्ष होता है, जिसका उद्देश्य सत्ता हथियाना होता है।

प्रश्न 20.
सॉलिडस (Solidus) क्या था?
उत्तर:
सॉलिडस सम्राट् कॉस्टैनटाइन द्वारा चलाया गया कि सिक्का था। यह 4.5 ग्राम शुद्ध सोने का बना हुआ था।

प्रश्न 21.
रोमनवासियों की धार्मिक संस्कृति बहुदेववादी थी? कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • रोमनवासी अनेक पंथों तथा उपासना पद्धतियों में विश्वास रखते थे।
  • उन्होंने हजारों मंदिर, मठ तथा देवालय बना रखे थे।

प्रश्न 22.
‘ईसाईकरण’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जिस प्रक्रिया द्वारा भिन्न-भिन्न जनसमूहों के बीच ईसाई धर्म को फैलाया गया, उसे ईसाईकरण कहते हैं। इस प्रक्रिया से ईसाई धर्म रोम का प्रमुख धर्म बन गया।

प्रश्न 23.
रोमोत्तर राज्य (Post Roman) क्या थे?
उत्तर:
540 के दशक में जर्मन मूल के समूहों ने पश्चिमी रोमन साम्राज्य के बड़े-बड़े प्रांतों पर अपना अधिकार कर लिया। इन प्रांतों में उन्होंने अपने राज्य स्थापित कर लिये। इसे रोमोत्तर राज्य कहा जाता है।

प्रश्न 24.
तीन सबसे महत्वपूर्ण रोमोत्तर राज्य कौन-कौन से थे?
उत्तर:

  • स्पेन में विसिगोथों का राज्य
  • गॉल में फ्रैंकों का राज्य
  • इटली में लोवाडौँ का राज्य

प्रश्न 25.
जस्टीनियन द्वारा इटली पर पुनः अधिकार का क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
जस्टीनियन द्वारा इटली पर पुनः अधिकार से देश छिन्न-भिन्न हो गया। इस प्रकार लाहों के आक्रमण के लिए मार्ग तैयः हो गया।

प्रश्न 26.
किस घटना को ‘प्राचीन विश्व इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक क्रांति’ कहा जाता है?
उत्तर:
अरब प्रदेश से शुरू होने वाले इस्लाम के विस्तार को।

प्रश्न 27.
सेंट ऑगस्टीन (354-430 ई.) कौन थे?
उत्तर:
सेंट ऑगस्टीन 396 ई. से अफ्रीका के हिप्पो नामक नगर के विषय थे। उन्हें चर्च – के बौद्धिक इतिहास में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।

प्रश्न 28.
दास-प्रजनन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
रोम में दास दंपतियों को अधिक-से-अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। इसे दास प्रजनन कहा जाता है। इनके बच्चे भी बड़े होकर दास ही बनते थे।

प्रश्न 29.
वेतनभोगी श्रमिकों की तुलना में दास-श्रम महंगा क्यों पड़ता था?
उत्तर:
वेतनभोगी श्रमिकों को काम न होने पर हटाया जा सकता था। परंतु दास श्रमिकों को वर्ष भर रखना पड़ता था और उनका खर्च उठाना पड़ता था। इसीलिए दास श्रम महंगा पड़ता था।’

प्रश्न 30.
फ्रैंकिसेस अथवा सुगंधित राल (Resin) किस काम आती थी और कैसे प्राप्त की जाती थी?
उत्तर:
फ्रेंकिंसेस अधवा सुगंधित राल से धूप-अगरबती तथा इत्र बनाया जाता था। इसे बोसवेलिया के पेड़ से प्राप्त किया जाता था। इस पेड़ से रस लेकर उसे सुखा लिया जाता था और राल तैयार हो जाती थी।

प्रश्न 31.
सबसे उत्कृष्ट किस्म की राल कहाँ से आती थी?
उत्तर:
अरब प्रायद्वीप से।

प्रश्न 32.
ऐसे दो तरीकों का वर्णन कीजिए जिनकी सहायता से रोम के लोग अपने श्रमिकों पर नियंत्रण रखते थे?
उत्तर:
श्रमिक मुख्यतः दास होते थे। उन पर नियंत्रण रखने के लिए –

  • उन्हें जंजीरों में डाल कर रखा जाता था।
  • उन्हें दागा जाता था ताकि भागने अथवा छिपने पर उन्हें पहचाना जा सके।

प्रश्न 33.
रोमन सैनेटरों तथा नाइट वर्ग में एक समानता तथा एक असमानता बताइए।
उत्तर:
रोम सैनेटरों की तरह अधिकतर नाइट जमींदार होते थे। सैनेटरों के विपरीत कई नाइट जहाजों के स्वामी, व्यापारी तथा साहूकार भी होते थे।

प्रश्न 34.
रोमन साम्राज्य में ‘परवर्ती पुराकाल’ में होने वाले कोई दो धार्मिक परिवर्तन लिखिए।
उत्तर:

  • चौथी शताब्दी में सम्राट कॉस्टैनटाइन ने ईसाई धर्म को राजधर्म बना लिया।
  • सातवीं शताब्दी में इस्लाम धर्म का उदय हुआ।

प्रश्न 35.
रोमन साम्राज्य में जल-शक्ति का बड़े पैमाने पर प्रयोग किस क्षेत्र में और किन कामों के लिए किया जाता था?
उत्तर:
जल शक्ति से सोने और चांदी की खानों की खुदाई की जाती हैं और मिलें चलाई जाती थीं। इसका भूमध्य सागर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रयोग होता था।

प्रश्न 36.
सम्राट डायोक्लीशियन ने रोमन साम्राज्य के विस्तार को कम क्यों किया?
उत्तर:
सम्राट् डायोक्लीशियन ने अनुभव किया कि साम्राज्य के अनेक प्रदेशों का सामरिक अथवा आर्थिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं है। इसलिए उसने इन प्रदेशों को छोड़ दिया।

प्रश्न 37.
सम्राट् डायोक्लीशियन द्वारा किए गए कोई चार प्रशासनिक सुधार लिखिए।
उत्तर:

  • डायोक्लीशियन ने साम्राज्य की सीमाओं पर किले बनवाए।
  • उसने प्रांतों का पुनर्गठन किया।
  • उसने सैनिक तथा असैनिक कार्यों को अलग-अलग कर दिया।
  • उसने सेनापतियों को अधिक स्वायत्तता प्रदान की।

प्रश्न 38.
पूर्ववर्ती रोमन साम्राज्य के किन्हीं चार सामाजिक वर्गों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  • सैनेटर
  • अश्वारोही अथवा नाइट वर्ग
  • जनता का सम्मानीय वर्ग
  • दास

प्रश्न 39.
इतिहासकार टैसिटस के अनुसार रोमन समाज के कमीनकारू (प्लेब्स सोर्डिंडा) वर्ग में कौन लोग शामिल थे?
उत्तर:
इस वर्ग में फूहड़ तथा निम्नतर लोग शामिल थे जो सर्कस तथा थियेटर तमाशे देखने के आदी थे।

प्रश्न 40.
रोम साम्राज्य के संदर्भ में ‘नगर’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘नगर’ एक ऐसा शहरी केंद्र था जिसमे ‘अपने मेजिस्ट्रेट, नगर परिषद् तथा एक निश्चित राज्य क्षेत्र होता था। इसके अधिकार क्षेत्र में कई गाँव आते थे।

प्रश्न 41.
ईरान में सार्वजनिक-स्नान का विरोध क्यों हुआ?
उत्तर:
ईरान के पुरोहित वर्ग का मानना था कि सार्वजनिक स्नान से जल अपवित्र होता है। इसलिए उन्होंने इसका विरोध किया।

प्रश्न 42.
रोम साम्राज्य में शहरी लोगों को उच्च-स्तर के मनोरंजन उपलब्ध थे। एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
रोम के कैलेंडर से पता चलता है कि एक वर्ष में कम-से-कम 176 दिन थे जब वहाँ कोई न कोई मनोरंजन कार्यक्रम अवश्य होता था।

प्रश्न 43.
तीसरी शताब्दी में ईरान के किस वंश के शासकों तथा जर्मन मूल की किन जनजातियों ने रोम साम्राज्य आक्रमण किया?
उत्तर:
तीसरी शताब्दी में ईरान के सेसानी वंश के शासकों तथा जर्मन मूल की एलमन्नाइ और फ्रैंक जनजातियों ने रोम।

प्रश्न 44.
रोमन साम्राज्य की स्त्रियाँ कहाँ तक आत्मनिर्भर थीं?
उत्तर:

  1. रोम साम्राज्य की स्त्रियों को संपत्ति के स्वामित्व तथा संचालन में व्यापक कानूनी अधिकार प्राप्त थे।
  2. विवाहित महिला ही अपने पिता की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति की स्वतंत्र मालिक बन जाती थीं।
  3. तलाक लेना-देना सरल था।

प्रश्न 45.
‘ऍम्फोरा’ क्या थे? ये किस क्षेत्र में बनाए जाते थे?
उत्तर:
एम्फोरा एक प्रकार के मटके एवं कंटेनर होते थे। इनमें शराब, जैतून के तेल तथा अन्य तरल पदार्थों की धुलाई होती थी। ये भूमध्य सागरीय क्षेत्र में बनाए जाते थे।

प्रश्न 46.
रोमन साम्राज्य के चार घनी आबादी वाले प्रदेशों के नाम बताएँ। दो इटली के तथा दो मिस्र के लें।
उत्तर:

  • इटली में कैंपेनिया तथा सिसिली।
  • मिस्र में फैटयूम तथा गैलिली।

प्रश्न 47.
रोम में सबसे बढ़िया अंगूरी शराब तथा गेहूँ कहाँ-कहाँ से आता था?
उत्तर:
सबसे बढ़िया अंगूरी शराब कैंपेनिया (इटली) से तथा गेहूँ सिसिली (इटली) और बाइजैकियम (ट्यूनीशिया) से आता था।

प्रश्न 48.
ऋतु-प्रवास का क्या अर्थ है?
उत्तर:
चरावाहे ऋतुओं के अनुसार चरागाहों की खोज में अपने पशुओं का तथा अपना स्थान बदलते रहते हैं। इसे ऋतु-प्रवास कहते हैं।

प्रश्न 49.
मेरे तीन लेखकों के नाम बताओ जिनकी रचनाओं का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि रोम के लोग अपने कामगारों के साथ कैसा बर्ताव करते थे।
उत्तर:
कोलुमेल्ला, वरिष्ठ प्लिनी तथा ऑगस्टीन।

प्रश्न 50.
रोमन साम्राज्य में साक्षरता की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के भिन्न भागों में साक्षरता दर भिन्न-भिन्न थी। सैनिकों, सैनिक अधिकारियों तथा संपदा प्रबंधकों में साक्षरता की दर अपेक्षाकृत अधिक थी।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रोम साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास के तीन मुख्य खिलाड़ी कौन-कौन थे? प्रत्येक के बारे में दो पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर:
रोम के राजनीतिक इतिहास के तीन मुख्य खिलाड़ी थे-सम्राट्, अभिजात वर्ग तथा सेना।
1. सम्राट – सम्राट् साम्राज्य का एकछत्र शासक था। परंतु उसे प्रमुख नागरिक कहा जाता था। ऐसा अभिजात वर्ग अथवा सैनेट के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए किया गया था। इसका उद्देश्य यह दर्शाना भी था कि सम्राट् निरंकुश शासक नहीं है।

2. अभिजात वर्ग – अभिजात वर्ग से अभिप्राय सैनेट से है। इसमें कुलीन तथा धनी परिवारों के सदस्य शामिल थे। गणतंत्र-काल में सत्ता पर इसी संस्था का नियंत्रण था। सम्राटों की परख उसके सैनेट के प्रति व्यवहार से की जाती थी। सैनेट के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने वाले सम्राट् को बुरा सम्राट् माना जाता था।

3. सेना – सम्राट् तथा सैनेट के पश्चात् सेना का स्थान था। यह एक व्यावसायिक सेना थी। इसमें प्रत्येक सैनिक को वेतन दिया जाता था। सेना में सम्राट् का भाग्य निर्धारित करने की शक्ति थी।

प्रश्न 2.
प्रांतों के बीच सत्ता का आकस्मिक अंतरण रोम के राजनीतिक इतिहास का एक अत्यंत रोचक पहलू रहा है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
दूसरी और तीसरी शताब्दियों के दौरान अधिकतर प्रशासक तथा सैनिक अधिकारी प्रांतीय वर्गों में से होते थे। उनका एक नया संभ्रांत वर्ग बन गया था। ग्रह वर्ग सैनेट के सदस्यों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली था क्योंकि इसे सम्राटों का समथन प्राप्त था। ज्यों-ज्यों यह नया समूह उभर कर सामने आया, सम्राट् गैलीनस (253-268) ने सैनेटरों को सैनिक, कमान से हटा कर इस नए वर्ग को सुदृढ़ बनाया। ऐसा कहा जाता है कि गैलीनस ने सैनेटरों को सेना में सेवा करने अथवा उस तक पहुँच रखने पर रोक लगा दी थी ताकि साम्राज्य का नियंत्रण उनके हाथों में चला जाए।

संक्षेप में, पहली शतादी के अंतिम चरण से तीसरी शताब्दी के प्रारंभिक चरण तथा सेना तक प्रशासन में अधिक से अधिक लोग प्रांतों से लिए जाने लगे क्योंकि उन क्षेत्रों के लोगों को भी नागरिकता मिल चुकी थी जो पहले इटली तक ही सीमित थे। परंतु सैनेट पर लगभग तीसरी शताब्दी तक इतालवी मूल के लोगों का ही प्रभुत्व बना रहा। इसके बाद प्रांतों से लिए गए सैनेटर बहुसंख्यक हो गए।

प्रश्न 3.
रोमन साम्राज्य में व्यापक सांस्कृतिक विविधता पाई जाती थी। कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
यह बात बिल्कुल सत्य है कि रोमन साम्राज्य में व्यापक सांस्कृतिक विविधता पाई जाती थी।

  • देश में धार्मिक संप्रदायों तथा स्थानीय देवी-देवाताओं में भरपूर विविधता थी।
  • बोलचाल की अनेक भाषाएँ प्रचलित थीं।
  • वेशभूषा की विविध शैलियाँ अपनाई जाती थीं।
  • लोग तरह-तरह के भोजन खाते थे।
  • सामाजिक संगठनों के रूप भिन्न-भिन्न थे।
  • उनकी बस्तियों के भी अनेक रूप थे।

प्रश्न 4.
परवर्ती काल में रोमन साम्राज्य की नौकरशाही के उच्च तथा मध्य वर्गों की आर्थिक दशा कैसी थी और क्यों?
उत्तर:
परवर्ती काल में रोम साम्राज्य की नौकरशाही के उच्च तथा मध्य वर्ग अपेक्षाकृत बहुत धनी थे। इसका मुख्य कारण यह था कि उन्हें अपना वेतन सोने के रूप में मिलता था। वे अपनी आय का बहुत बड़ा भाग जमीन आदि खरीदने में लगाते थे। इसके अतिरिक्त साम्राज्य में भ्रष्टाचार भी बहुत अधिक फैला हुआ था।

विशेष रूप से न्याय प्रणाली और सैन्य आपूर्ति के प्रशासन में। उच्च अधिकारी और गवर्नर लूट-खसोट और रिश्वत से खूब धन जुटाते थे। सरकार ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बारंबार हस्तक्षेप किया। इस संबंध में सरकार ने अनेक कानून बनाए, परंतु भ्रष्टाचार न रुक सका।

प्रश्न 5.
रोम के सम्राटों की तानाशाही पर किस प्रकार अंकुश लगा?
उत्तर:
रोमन राज्य तानशाही पर आधारित था। सम्राट तथा प्रशासन असहमति या आलोचना को सहन नहीं करता था। प्रायः सरकार विरोध का उत्तर हिंसा एवं दमन से देती। परंतु चौथी शताब्दी तक रोमन कानून की एक प्रबल परंपरा का उद्भव हो चुका था। इससे सर्वाधिक तानाशाह सम्राटों पर भी अंकुश लग गया था।

अब सम्राट अपनी मनमानी नहीं कर सकते थे। नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानून का सक्रिय रूप से प्रयोग किया जाता था। प्रभावशाली कानूनों के कारण चौथी शताब्दी के अंतिम दशकों में शक्तिशाली विशपों के लिए यह संभव हो गया कि यदि सम्राट् जन साधारण क प्रति कठोर या दमनकारी नीति अपनाए तो वे भी पूरी शक्ति से उनका सामना कर सकें।

प्रश्न 6.
रोम के संदर्भ में ‘नगर’ क्या था? वहाँ के नागरिक अथवा शहरी जीवन की कुछ विशेषताएँ भी बताएँ।
उत्तर:
रोम के संदर्भ में ‘नगर’ एक ऐसा शहरी केंद्र था, जिसके अपने मजिस्ट्रेट, नगर परिषद् और एक निश्चित राज्य-क्षेत्र होता था। उसके अधिकार क्षेत्र में गाँव आते थे। परंतु किसी भी नगर के अधिकार क्षेत्र में कोई दूसरा नगर नहीं हो सकता था। किसी नगर या गाँव दर्जा शाह की इच्छा पर निर्भर करता था। सम्राट् अपनी इच्छा से किसी गाँव का दर्जा बढ़ाकर उसे नगर का दर्जा दे सकता था। इसी प्रकार वह किसी नगर का दर्जा घटाकर उसे किसी गाँव का दर्जा भी दे सकता था।

शहरी जीवन की विशेषताएँ –

  • शहरों में खाने की कमी नहीं होती थीं।
  • अकाल के दिनों में भी नगर में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बेहतर सुविधाएँ प्राप्त होने की संभावना रहती थी।
  • शहरी लोगों को उच्च-स्तर के मनोरंजन उपलब्ध थे। उदाहरण के लिए कैलेंडर से हमें पता चलता है कि एक वर्ष में कम-से-कम 176
  • दिन वहाँ कोई-न-कोई मनोरंजक कार्यक्रम अथवा प्रदर्शन अवश्य होते थे।

प्रश्न 7.
उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए कि तीसरी शताब्दी में रोम साम्राज्य को काफी तनाव का सामना करना पड़ा।
उत्तर:
तीसरी शताब्दी में रोम साम्राज्य को काफी तनाव का सामना करना पड़ा। यह बात निम्नलिखित उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगी –
1. 225 ई. में ईरान में एक अत्यधिक आक्रामक वंश उभर कर सामने आया। इस वंश के लोग स्वयं को ‘ससानी’ कहते थे। केवल 15 वर्षों के भीतर ही वह तेजी से फरात की दिशा में फैल गया। एक प्रसिद्ध शिलालेख से पता चलता है कि इस वंश के शासक शापुर प्रथम ने 60,000 रोमन सेना का सफाया कर दिया था। उसने रोम साम्राज्य की पूर्वी राजधानी एटिऑक पर भी अधिकार कर लिया।

2. इसी बीच जर्मन मूल की कई जनजातियों ने राइन तथा डैन्यूब नदी की सीमाओं की ओर बढ़ना आरंभ कर दिया। 233 से 280 ई. के दौरान काला सागर से लेकर आल्पस और दक्षिणी जर्मनी तक फैले प्रांतों की पूरी सीमा पर बार-बार आक्रमण हुए। अतः रोमवासियों को डैन्यूब से आगे का क्षेत्र छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा।

प्रश्न 8.
यूनान और रोमवासियों की पारंपरिक धार्मिक संस्कृति बहुदेववादी थी। उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • ये लोग भिन्न – भिन्न पंथों तथा उपासना पद्धतियों में विश्वास रखते थे।
  • जूपिटर, जूनो, मिनवां और मॉर्स जैसे रोमन इतालवी देवों की पूजा करते थे। इनके अतिरिक्त उनमें यूनानी तथा पूर्वी देवी-देवताओं की पूजा भी प्रचलित थी।
  • उन्होंने साम्राज्य भर में हजारों मंदिर, मठ और देवालय बनाए हुए थे। ये बहुदेवोवादी स्वयं को किसी एक नाम से नहीं पुकारते थे।
  • रोमन साम्राज्य का एक अन्य बड़ा धर्म बददी धर्म था।
  • परवर्ती पुराकाल में इस धर्म में भी अनेक विविधताएँ पाई जाती थीं।
  • इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि यूनान और रोमवासियों की पारंपिकर धार्मिक संस्कृति बहुदेववादी थी।

प्रश्न 9.
रोम साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
रोम साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया पश्चिम से आरंभ हुई। साम्राज्य का पश्चिमी भाग बाहरी आक्रमणों के कारण विखंडित हो गया। वे आक्रमण उत्तर की ओर से जर्मन मूल के समूहों ने किए थे। उन्होंने साम्राज्य के सभी बड़े प्रांतों को अपने अधिकार में ले लिया और अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण राज्य थे-स्पेन में विसिगोधों का राज्य, गॉल में फ्रैंकों का राज्य तथा इटली में लोंबार्डो का राज्य।

शहरी जीवन की विशेषताएँ –

  • शहरों में खाने की कमी नहीं होती थीं।
  • अकाल के दिनों में भी नगर में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बेहतर सुविधाएँ प्राप्त होने की संभावना रहती थी।
  • शहरी लोगों को उच्च-स्तर के मनोरंजन उपलब्ध थे। उदाहरण के लिए कैलेंडर से हमें पता चलता है कि एक वर्ष में कम-से-कम 176 दिन वहाँ कोई-न-कोई मनोरंजक कार्यक्रम अथवा प्रदर्शन अवश्य होते थे।

533 ई. में सम्राट जस्टीनियन ने अफ्रीका को बैंडलों के अधिकार से मुक्त करवा लिया। उसने इटली को भी मुक्त करा कर उस पर फिर से अधिकार कर लिया। परंतु इटली पर पुनः अधिकार से देश को क्षति पहुँची क्योंकि इससे देश छिन्न-भिन्न हो गया और लॉबाडों के आक्रमणों का मार्ग प्रशस्त हो गया।

सातवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों तक रोम और ईरान के बीच भी फिर से लड़ाई छिड़ गई। ईरान के ससानी शासकों ने मिस्त्र सहित सभी विशाल पूर्वी प्रांतों पर आक्रमण किए। भले ही बाईजेंटियस (रोम साम्राज्य का तत्कालीन शासक) ने 620 के दशक में इन प्रांतों को फिर से अधिकार में ले लिया। तो भी कुछ ही वर्ष बाद साम्राज्य को दक्षिण-पूर्व की ओर से एक बहुत ही जोरदार धक्का लगा जो साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुआ। पूर्वी रोमन और ससानी दोनों राज्यों के बड़े-बड़े भाग भीषण युद्ध के बाद अरबों के अधिकार में आ गए । इस प्रकार रोम साम्राज्य का पूरी तरह पतन हो गया।

प्रश्न 10.
रोम के इतिहास के मुख्य स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोम के इतिहास के स्रोतों को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है –

  • पाठ्य सामग्री
  • प्रलेख या दस्तावेज
  • भौतिक अवशेष

1. पाठ्य सामग्री – इसमें समकालीन व्यक्तियों द्वारा लिखा गया उस काल का इतिहास, पत्र, व्याख्यान, प्रवचन, कानून आदि शामिल हैं। समकालीन व्यक्तियों द्वारा लिखे गए इतिहास को वर्ष वृत्तांत कहा जाता है, क्योंकि यह प्रति वर्ष लिखा जाता था।

2. प्रलेख या दस्तावेज – दस्तावेजों में मुख्य रूप से उत्कीर्ण अभिलेख, पैपाइरस तथा पत्तों आदि पर लिखी गई पांडुलिपियाँ शामिल हैं। उत्कीर्ण अभिलेख प्रायः पत्थर की शिलाओं पर खोदे जाते थे। इसलिए वे नष्ट नहीं हुए और बहुत बड़ी संख्या में यूनानी तथा लातिनी भाषाओं में पाए गए हैं।

3. भौतिक अवशेष – भौतिक अवशेषों में अनेक प्रकार की वस्तुएँ शामिल हैं। इन्हें पुरातत्वविदों ने खुदाई तथा क्षेत्र सर्वेक्षण द्वारा खोजा है। इनमें इमारतें, स्मारक, मिट्टी के बर्तन, सिक्क, पच्चीकारी का सामान तथा भू-दृश्य सम्मिलित हैं। इनमें से प्रत्येक स्रोत हमें रोम के अतीत के बारे में एक विशेष जानकारी देतक हैं।

प्रश्न 11.
रोमन साम्राज्य सांस्कृतिक दृष्टि से ईरान की तुलना में कहीं अधिक विविधतापूर्ण था। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ईरान पर पहले पार्थियाई तथा बाद में ससानी राजवंशों ने शासन किया। उनके द्वारा शासित लोग मुख्यतः ईरानी थे। इसके विपरीत रोमन साम्राज्य ऐसे क्षेत्रों तथा संस्कृतियों का एक मिलाजुला रूप था जो सरकार की एक साझी प्रणाली द्वारा एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई थी। साम्राज्य में अनेक भाषाएँ बोली जाती थी परंतु प्रशासन के लिए लातिनी तथा यूनानी भाषाओं का ही प्रयोग होता था। पूर्वी भाग के उच्चतर वर्ग यूनानी भाषा और पश्चिमी भाग के लोग लातिनी भाषा का प्रयोग करते थे। जो लोग साम्राज्य में रहते थे वे सभी एकमात्र शासक अर्थात् सम्राट् की प्रजा कहलाते थे, चाहे वे कहीं भी रहते हों और कोई भी भाषा बोलते हों। इसे स्पष्ट है कि रोमन साम्राज्य सांस्कृतिक दृष्टि से ईरान की तुलना में कहीं अधिक विविधतापूर्ण था।

प्रश्न 12.
रोमन साम्राज्य की गणतंत्र शासन-प्रणाली की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य में ‘गणतंत्र’ (रिपब्लिक) एक ऐसी शासन व्यवस्था थी जिसमें वास्तविक सत्ता ‘सैनेट’ नामक संस्था में निहित थी। सैनेट की सदस्यता जीवन भर चलती थी। इसके लिए धन और पद-प्रतिष्ठा को अधिक महत्व दिया जाता था। अत: सैनेट में धनी परिवारों के एक समूह का ही बोलबाला था जिन्हें अभिजात कहा जाता था। व्यावहारिक रूप में गणतंत्र अभिजात वर्ग की सरकार थी जिसका शासन सैनेट नामक संस्था के माध्यम से चलता था। गणतंत्र का शासन 509 ई. पू. से 27 ई. पू. तक चला। 27 ई. पू. में जूलियस सीजर के दत्तक पत्र तथा उत्तराधिकारी ऑक्टेवियन ने इसका तख्ता पलट दिया और सत्ता अपने हाथ में ले ली। वह ऑगस्ट्स नाम से रोम का सम्राट बन बैठा ।

प्रश्न 13.
रोम राज्य के संदर्भ में “प्रिंसिपेट’ से क्या अभिप्राय है? इसमें सम्राट तथा ‘सैनेट’ की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
प्रथम रोमन सम्राट् ऑगस्टस ने 27 ई.पू. में जो राज्य स्थापित किया था उसे ‘प्रिंसिपेट कहा जाता था। ऑगस्टस राज्य का एकछत्र शासक और सत्ता का वास्तविक स्रोत था। तो भी इस कल्पना को जीवित रखा गया कि वह केवल एक प्रमुख नागरिक’ है, न कि निरंकुश शासक। ऐसा ‘सैनेट’ को सम्मान देने के लिए किया गया था। सैनेट वह संस्था थी जिसका रोम के गणतंत्र शासनकाल में सत्ता पर नियंत्रण था। इस संस्था का अस्तित्व कई शताब्दियों तक बना रहा था।

इस संस्था में कुलीन तथा अभिजात वर्गों अर्थात् रोम के धनी परिवारों का प्रतिनिधित्व था। परंतु बाद में इसमें इतालवी मूल के जमींदारों को भी शामिल कर लिया गया था। सम्राटों की परख इस बात से की जाती थी कि वे सैनेट के प्रति किस प्रकार का व्यवहार करते हैं। सैनेट के सदस्यों के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने वाले सम्राटों को सबसे बुरा सम्राट माना जाता था। कई सैनेटर गणतंत्र-यग में लौटने के लिए तरसते थे। परंतु अधिकतर सैनेटरों को यह आभास हो गया था कि अब यह असंभव है।

प्रश्न 14.
रोम तथा ईरान के साम्राज्यों के विस्तार की जानकारी दीजिए।
उत्तर:
630 के दशक तक अधिकांश यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के विशाल क्षेत्र में दो शक्तिशाली साम्राज्यों का शासन था। ये साम्राज्य रोम और ईरान के थे। उनके साम्राज्य एक-दूसरे के बिल्कुल पास थे। उन्हें भूमि की एक संकरी पट्टी अलग करती थी जिसके किनारे फरात नदी बहती थी। रोम साम्राज्य का विस्तार-रोम साम्राज्य का भूमध्यसागर और उसके आस-पास उत्तर तथा दक्षिण में स्थित सभी प्रदेशों पर प्रभुत्व था। उत्तर में साम्राज्य की सीमा दो महान् नदियाँ राइन तथा डन्यूब बनाती थीं। साम्राज्य की दक्षिणी सीमा सहारा नामक एक विस्तृत रेगिस्तान से बनती थी। इस प्रकार रोम साम्राज्य एक विशाल क्षेत्र में फैला हुआ था।

ईरान साम्राज्य का विस्तार-इस साम्राज्य में कैस्पियन सागर के दक्षिण से लेकर पूर्वी अरब तक का समस्त प्रदेश और कभी-कभी अफगानिस्तान के कुछ भाग भी शामिल थे। इन दो महान शक्तियों ने दुनिया के उस अधिकांश भाग को आपस में बांट रखा था। जिसे चीनी लोग ता-चिन अथवा (वृहत्तर चीन या पश्चिम) कहते थे।

प्रश्न 15.
पूर्ववर्ती रोम साम्राज्य में सेना की भूमिका का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोम में सम्राट और सैनेट के बाद सेना शासन की एक प्रमुख संस्था थी। रोम की सेना एक व्यावसायिक सेना थी। इसके प्रत्येक सैनिक को वेतन दिया जाता था। उसे कम-से-कम 25 वर्ष तक सेवा करनी पड़ती थी। सेना साम्राज्य में सबसे बड़ी एकल संगठित संस्था थी।

चौथी शताब्दी तक इसमें 6,00,000 सैनिक थे। सेना के पास निश्चित रूप से सम्राटों का भाग्य निर्धारित करने की शक्ति थी। सैनिक अधिक वेतन और अच्छी सेवा-शा के लिए लगातार आंदोलन करते रहते थे। कभी-कभी ये आंदोलन सैनिक विद्रोहों का रूप भी ले लेते थे। सैनेट सेना से घृणा करती थी और उससे डरती थी। इसका कारण यह था कि सेना हिंसा का स्रोत थी। सम्राटों की सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि वे सेना पर कितना नियंत्रण रख पाते थे। जब सेनाएं विभाजित हो जाती थीं तो इसका परिणाम सामान्यतः गृहयुद्ध होता था।

प्रश्न 16.
प्रथम दो शताब्दियों में साम्राज्य के और अधिक विस्तार के प्रति रोमन सम्राटों की क्या नीति रही?
उत्तर:
प्रथम दो शताब्दियों में साम्राज्य का विस्तार और अधिक करने के प्रयत्न कम ही हुए। ऑगस्टस से टिवरियस को मिला साम्राज्य पहले ही इतना लंबा-चौड़ा था कि इसमें और अधिक विस्तार करना अनावश्यक लगता था। उसने पहले ऑगस्टस का शासन काल शांति के लिए याद किया जाता है क्योंकि इस शांति का आगमन दशकों तक चले आंतरिक संघर्ष और सदियों की सैनिक विजयों के पश्चात् हुआ था।

साम्राज्य के प्रारंभिक विस्तार के लिए पहला अभियान सम्राट त्राजान ने 113-117 ईस्वी में चलाया। उसने फरात नदी के पार के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार रोम साम्राज्य स्कॉटलैंड से आमिनिया तक तथा सहारा से फरात नदी के पार तक फैल गया। परंतु त्राजान के उत्तराधिकारियों को यह विस्तार निरर्थक लगा। अतः उन्होंने इन क्षेत्रों को छोड़ दिया।

प्रश्न 17.
पूर्ववर्ती रोमन साम्राज्य के प्रांतीय तथा स्थानीय शासन का क्या महत्व था?
उत्तर:
प्रांतीय शासन – पूर्ववर्ती रोमन साम्राज्य की एक विशेष उपलब्धि यह थी कि रोमन साम्राज्य के प्रत्यक्ष शासन का क्रमिक रूप से काफी विस्तार हुआ। इसके लिए अनेक आश्रित राज्यों को रोम के प्रांतीय राज्य क्षेत्र में शामिल कर लिया गया। निकटवर्ती पूर्व ऐसे राज्यों से भरा पड़ा था। दूसरी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक फरात नदी के पश्चिम में स्थित राज्यों को भी रोम द्वारा हड़प लिया गया ये अत्यंत समृद्ध थे! वास्तव में, इटली को छोड़कर साम्राज्य के सभी क्षेत्र प्रांतों में बंटे हुए थे और उनसे कर वसूला जाता था।

स्थानीय शासन – संपूर्ण साम्राज्य में दूर-दूर तक अनेक नगर स्थापित किए गए थे। इनके माध्यम से समस्त साम्राज्य पर नियंत्रण रखा जाता था। भूमध्यसागर के तटों पर स्थित बड़े शहरी केंद्र साम्राज्यिक प्रणाली के मूल आधार थे। इन्हीं शहरों के माध्यम – ‘सरकार’ प्रांतीय ग्रामीण क्षेत्रों पर कर लगाती थी और उसे वसूल करती थी। ये कर साम्राज्य की धन संपदा का मुख्य स्रोत थे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
परवर्ती पुराकाल से क्या अभिप्राय है? इस अवधि में रोमन साम्राज्य में कौन-कौन से धार्मिक तथा प्रशासनिक परिवर्तन हुए?
उत्तर:
‘परवर्ती पुराकाल’ शब्द का प्रयोग रोम साम्राज्य के लिए तथा चौथी से सातवीं शताब्दी के इतिहास के लिए किया जाता था। यह अवधि अनेक सांस्कृतिक और आर्थिक हलचलों से परिपूर्ण थी। इस काल में रोमन साम्राज्य में निम्नलिखित धार्मिक तथा प्रशासनिक परिवर्तन हुए –

(a) धार्मिक परिवर्तन –

  • चौथी शताब्दी में सम्राट् कॉन्स्टैनटाइन ने ईसाई धर्म को राज धर्म बना दिया इसके बाद राज्य का तेजी से ईसाईकरण होने लगा।
  • सातवीं शताब्दी में इस्लाम का उदय हुआ। यह धर्म भी बड़ी तेजी से लोकप्रिय हुआ।

(b) प्रशासनिक परिवर्तन-राज्य के प्रशासनिक ढाँचे में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। ये परिवर्तन सम्राट् डायोक्लीशियन (284-305) के समय से प्रारंभ हुए और कॉन्स्टैनटाइन तथा उसके बाद के काल तक जारी रहे। ये परिवर्तन निम्नलिखित थे

डायोक्लीशियन के समय के परिवर्तन –

  • साम्राज्य का विस्तार बहुत अधिक हो चुका था। उसके अनेक प्रदेशों का सामरिक या आर्थिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं था। इसलिए
  • सम्राट् डायोक्लीशियन ने महत्वहीन प्रदेशों को 4 छोड़कर साम्राज्य को थोड़ा छोटा बना लिया।
  • उसने साम्राज्य की सीमाओं पर किले बनवाए।
  • उसने प्रांतों का पुनर्गठन किया।
  • उसने असैनिक और सैनिक कार्यों को अलग-अलग कर दिया तथा सेनापतियों को अधिक स्वायत्तता प्रदान की। इससे सैन्य अधिकारी अधिक शक्तिशाली हो गए।

कॉन्स्टैनटाइन के समय के परिवर्तन –

  • कान्स्टैनटाइन ने कुस्तुनतुनिया का निर्माण करवाया और इसे साम्राज्य की दूसरी राजधानी बनवाया। यह राजधानी तीन ओर से समुद्र से घिरी हुई थी।
  • नयी राजधानी के लिए नयी सैनेट की आवश्यकता थी, इसलिए चौथी शताब्दी में शासक वर्गों का बड़ी तेजी से विस्तार हुआ।

प्रश्न 2.
रोम में परवर्ती पुराकाल में होने वाले आर्थिक विकास की जानकारी दीजिए। इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
रोम में परवर्ती पुराकाल में असाधारण आर्थिक विकास हुआ जिसके मुख्य पहलू निम्नलिखित थे –

सम्राट् कॉन्स्टैनटाइन ने सॉलिडस नामक का एक नया सिक्का चलाया। यह 4.5 ग्राम शुद्ध सोने का बना हुआ था। ये सिक्के बहुत बड़े पैमाने पर ढाले जाते थे और लाखों करोड़ों की संख्या में चलन में थे।
मौद्रि। स्थायित्व और बढ़ती हुई जनसंख्या। कारण आर्थिक विकास में तेजी औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा ग्रामीण उद्योग-धंधों के विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में पूँजी लगाई गई। इनमें तेल की मिलें और शीशे के कारखाने तथा तरह-तरह की पानी की मिलें शामिल थीं।
लंबी दूरी के व्यापार में भी बहुत अधिक पूँजी निवेश किया गया। फलस्वरूप इस : व्यापार का पुनरुत्थान हुआ।

परिणाम – ऊपर दिए गए आर्थिक परिवर्तनों के फलस्वरूप शहरी संपदा एवं समृद्धि में अत्यधिक वृद्धि हुई। स्थापत्य कला के नए-नए रूप विकसित हुए और भोग-विलास के साधनों में भरपूर तेजी आई। शासन करने वाले कुलौन पहले से कहीं अधिक धन-संपन्न और शक्तिशाली हो गए। दस्तावेजों से पता चलता है कि तत्कालीन समाज अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध था, जहाँ मुद्रा का व्यापक रूप से प्रयोग होता था। ग्रामीण संपदाएँ भारी मात्रा में सोने के रूप में लाभ कमाती थीं। उदाहरण के लिए छठी शताब्दी के दौरान जस्टीनियन के शासनकाल में अकेला मिस्र प्रतिवर्ष 25 लाख सॉलिडस (लगभग 35,000 पाउंड सोना) से अधिक धनराशि करों के रूप में देता था। देखा जाए तो रोम साम्राज्य के पश्चिमी एशिया के बड़े-बड़े ग्रामीण इलाके पाँचवीं और छठी शताब्दी में आज की तुलना में भी अधिक विकसित थे।

प्रश्न 3.
रोमन समाज में पारिवारिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ बताएँ। स्त्रियों की स्थिति का भी उल्लेख करें।
उत्तर:
रोमन समाज में परिवार की विशेषताओं तथा स्त्रियों का वर्णन इस प्रकार है –

एकल परिवार – रोमन समाज में एकल परिवार की व्यापक रूप से चलन थी। वयस्क पुत्र अपने पिता के परिवार के साथ नहीं रहते थे। वयस्क भाई भी बहुत कम साझे परिवार में रहते थे। दूसरी ओर, दासों को परिवार का अंग माना जाता था क्योंकि रोमवासियों के लिए परिवार को यही अवधारणा थी।

विवाह – प्रथम शताब्दी ई.पू. तक विवाह का स्वरूप ऐसा होता था कि पत्नी अपने पति को अपनी संपत्ति हस्तांतरित नहीं करती थी। महिला का दहेज वैवाहिक अवधि के दौरान उसके पति के पास अवश्य चला जाता था। विवाह के बाद भी महिला अपने पिता की उत्तराधिकारी बनी रहती थी। अपने पिता की मृत्यु होने पर वह उसकी संपत्ति की स्वामी बन जाती थी। इस प्रकार रोम की महिलाओं को संपत्ति के स्वामित्व व संचालन में व्यापक कानूनी अधिकार प्राप्त थे।

तलाक देना अपेक्षाकृत आसान था। इसके लिए पति अथवा पत्नी द्वारा केवल अपनी इच्छा की सूचना देना ही काफी था। पुरुष प्रायः 28-32 की आयु में विवाह करते थे, जबकि लड़कियों का विवाह 16 से 23 वर्ष की आयु में किया जाता था। इसलिए पति और पत्नी के बीच आयु का अंतराल बना रहता था। विवाह प्रायः परिवार द्वारा निश्चित किए जाते थे।

पुरुष – प्रधान परिवार-परिवार पुरुष-प्रधान थे। पारिवारिक जीवन की दृष्टि से महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी । प्रायः महिलाओं पर उनके पति हावी रहते थे। अपनी पत्नियों को बुरी तरह पीटते थे। इसके अतिरिक्त पिता का अपने बच्चों पर अत्यधिक कानूनी नियंत्रण होता था; कभी-कभी तो दिल दहलाने वाली सीमा तक। उदाहरण के लिए अवांछित बच्चों के मामले में पिता को उन्हें जीवित रखने या मार डालने तक का कानूनी अधिकार प्राप्त था। शिशु को मारने के लिए कभी-कभी पिता उसे ठंड में छोड़ देते थे।

प्रश्न 4.
रोम साम्राज्य के आर्थिक विस्तार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
गम में विभिन्न आर्थिक गतिविधियाँ प्रचलित थीं। फलस्वरूप रोम का बड़ी तेजी से आर्थिक विस्तार हुआ। इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है
1. रोमन साम्राज्यों में बंदरगाहों, खानों, खदानों, ईंट-भट्ठों, जैतून के तेल की फैक्टरियों आदि की संख्या बहुत अधिक थी। परिणामस्वरूप साम्राज्य का आधारभूत आर्थिक ढाँचा काफी मजबूत था। गेहूँ, अंगूरी शराब तथा जैतून का तेल मुख्य व्यापारिक मदें थीं। इनका बहुत अधिक मात्रा में प्रयोग होता था। ये मुख्यतः स्पेन, गैलिक प्रांतों, उत्तरी अफ्रीका, मिस्र तथा इटली से आते थे क्योंकि वहाँ इन फसलों के लिए स्थितियाँ अनुकूल थीं। शराब, जैतून का तेल तथा अन्य तरल पदार्थों की दुलाई एक प्रकार के मटकों या कंटेनरों में होती थी जिन्हें “एम्फोरा” कहते थे।

2. स्पेन में जैतून का तेल निकालने का उद्योग 140-160 ई. के दौरान अपने चरमोत्कर्ष पर था। उन दिनों स्पेन में उत्पादित जैतून का तेल मुख्य रूप से ऐसे कंटेनरों में ले जाया जाता था जिन्हें ड्रेसल-20 कहते थे । इसका यह नाम पुरातत्वविद हेनरिक ड्रेसल के नाम पर रखा गय है। साम्राज्य के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के जमींदार तथा उत्पादक अलग-अलग वस्तुओं का बाजार हथियाने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करते रहते थे। परिणामस्वरूप जैतून के तेल के व्यापार पर प्रभुत्व भी बदलता रहा।

3. साम्रज्य के अंतर्गत ऐसे बहुत-से क्षेत्र आते थे जो अपनी असाधारण उर्वरता के लिए प्रसिद्ध थे। इनमें इटली के कैंपेनिया तथा सिसिली और मिस्र के फैय्यूम, गैलिली, बाइजैकियम, दक्षिणी गॉल तथा बाएटिका के प्रदेश शामिल थे। ये प्रदेश साम्राज्य के घनी आबादी वाले सबसे धनी प्रदेशों में से थे।

4. सबसे बढ़िया किस्म की अंगूरी शराब कैंपेनिया से आती थी। सिसिली और बाइजैकियम रोम को भारी मात्रा में गेहूँ का निर्यात करते थे। गैलिनी में गहन खेती की जाती थी।

5. रोम क्षेत्र के अनेक बड़े-बड़े भाग बहुत उन्नत अवस्था में थे। उदाहरण के लिए नुमीडिया (आधुनिक अल्जीरिया) में देहाती क्षेत्रों में ऋतु-प्रवास व्यापक पैमाने पर होता था। चरवाहा तथा अर्ध-खानाबदोश अपने साथ झोपिड़याँ (मैपालिया) उठाए अपनी भेड़-बकरियों के साथ इधर-उधर घूमते रहते थे। परंतु उत्तरी-अफ्रीका में रोमन जागीरों का विस्तार होने पर वहाँ चरागाहों की संख्या में भारी कमी आई और खानाबदोश चरवाहों का आवागमन नियंत्रित हो गया।

6. स्पेन में भी उत्तरी क्षेत्र बहुत कम विकसित था। यहाँ के किसान पहाड़ियों की चोटियों पर बसे गाँवों में रहते थे। इन गाँवों को कैस्टेला कहा जाता था। सच तो यह कि रोम आर्थिक दृष्टि से बहुत ही धनी साम्राज्य था। देश में बहुत बड़ी संख्या में सोने के सिक्के प्रचलित थे।

प्रश्न 5.
रोमन साम्राज्य की सामाजिक श्रेणियों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोम का समाज विविधताओं से भरा था। इसमें पूर्ववर्ती काल में अलग-अलग सामाजिक श्रेणियाँ पाई जाती थीं।

पूर्ववर्ती काल – इतिहासकार टैसिटस के अनुसार पूर्ववती रोमन साम्राज्य के प्रमुख सामाजिक समूह थे –

  • सैनेटर-तीसरी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में सैनेट की सदस्य संख्या लगभग 1000 थी। कुल सैनेटरों में लगभग आधे सैनेटर इतालवी परिवारों के थे।
  • अश्वारोही या नाइट वर्ग।
  • सम्माननीय जनता का नर्ग जिनका संबंध महान् घरानों से था।
  • फूहड़ निम्नतर वर्ग अथवा कमीनकारू (प्लेबस सोर्डिंडा) तथा दास।

परवर्ती काल – परवर्ती काल के मुख्य सामाजिक वर्ग निम्नलिखित थे –
1. अभिजात वर्ग – इस काल में सैनेटर और नाइट एकीकृत होकर एक विस्तृत अभिजात वर्ग बन चुके थे। इनके कुल परिवारों में से कम-से-कम आधे परिवार अफ़्रीकी अथवा पूर्वी मूल के थे। अभिजात वर्ग अत्यधिक धनी था। परंतु कई तरीकों से यह विशुद्ध सैनिक संघांत वर्ग से कम शक्तिशाली था।

2. मध्यवर्ग – मध्य वर्ग में अब नौकरशाही और सेना की सेवा से जुड़े साधारण लोग शामिल थे। इसमें अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध सौदागर और किसान भी सम्मिलित थे। रैसिटस के अनुसार इन मध्यमवर्गीय परिवारों का भरण-पोषण मुख्य रूप से सरकारी सेवा और राज्य पर निर्भरता द्वारा होता था।

3. निम्न वर्ग – इसके नीचे निम्न वर्ग का एक विशाल समूह था। सामूहिक रूप से इसे यूमिलिओरिस कहा जाता था। इनमें शामिल वर्ग थे

  • ग्रामीण श्रामिक – ये लोग मुख्यतः स्थायी रूप से बड़ी जागीरों पर काम करते थे।
  • औद्योगिक और खनन प्रतिष्ठानों के कामगार।
  • प्रवासी – कामगार – ये अनाज तथा जैतून की फसल की कटाई और निर्माण उद्योग में अधिकांश श्रम की पूर्ति करते थे।
  • स्व-नियोजित शिल्पकार – मजदूरी पाने वाले श्रमिकों की तुलना में ये बेहतर खाते-पीते थे।
  • अस्थायी अथवा कभी – कभी काम करने वाले श्रमिक।
  • दास – ये विशेष रूप से पूरे पश्चिमी साम्राज्य में पाए जाते थे।

प्रश्न 6.
रोम की अर्थव्यवस्था में दासों तथा वेतनभोगी मजदूरों की क्या भूमिका थी?
उत्तर:
भूमध्यसागर और पश्चिमी एशिया दोनों ही क्षेत्रों में दासता की जड़ें बहुत गहरी थीं। ऑगस्टस के शासनकाल में इटली की कुल 75 लाख की आबादी में 30 लाख दास थे। चौथी शताब्दी में ईसाई धर्म के राज्य-धर्म बनने के बाद भी दास प्रथा जारी रही। दास को पूंजी निवेश की दृष्टि से देखा जाता था।

दासों तथा वेतनभोगी की भूमिका-पहली शताब्दी में भांति स्थापित होने के साथ जब लड़ाई-झगड़े कम हो गए तो दासों की आपूर्ति में कमी आने लगी। इसलिए दास श्रम का प्रयोग करने वालों को दास-प्रजनन अथवा वेनतभोगी मजदूरों जैसे विकल्पों का सहारा लेना पड़ा। वेतनभोगी मजदूर दासों से सस्ते पड़ते थे क्योंकि उन्हें आसानी से छोड़ा और रखा जा सकता था। इसके विपरीत दास श्रमिकों को वर्ष भर रखना पड़ता था और पूरे वर्ष उन्हें भोजन देना पड़ता था तथा उनके अन्य खर्च उठाने पड़ते थे।

फलस्वरूप दास श्रमिकों को रखने की लागत बढ़ जाती थी। इसलिए बाद की अवधि में कृषि-क्षेत्र में अधिक संख्या में दास मजदूर नहीं रहे। अब इन दासों और मुक्त हुए दासों को व्यापार-प्रबंधक के रूप से नियुक्त किया जाने लगा। मालिक प्रायः उन्हें अपनी ओर से व्यापार चलाने के लिए पंजी देते थे। कभी-कभी वे अपना पूरा कारोबार उन्हें सौंप देते थे।

सच तो यह है कि समय बीतने के साथ-साथ वेतनभोगी मजदरों की संख्या बढ़ने लगी। पाँचवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में सम्राट् ऐनस्टैसियस ने ऊँची मन रियाँ देकर श्रमिकों को आकर्षित किया था और तीन सप्ताह से भी कम समय में दारा शहर का निर्माण किया था। छठी शताब्दी तक भूमध्य-सागर क्षेत्र के भाग में वेतनभोगी श्रमिक बहुत अधिक फैल गए थे।

प्रश्न 7.
रोमन साम्राज्य में श्रम-प्रबंध तथा श्रमिकों पर नियंत्रण रखने के तरीकों की जानकारी दीजिए।
उत्तर:
रोम में श्रम-प्रबंधन तथा मजदूरों को अपने नियंत्रण में रखने पर विशेष महत्त्व दिया जाता था। इस संबंध में विशेष पग उठाए जाते थे। इसका उद्देश्य श्रमिकों से अधिक-से-अधिक काम लिया जा सके होता था। श्रम-प्रबंधन-रोमन कृषि-विषयक लेखकों ने श्रम प्रबंधन की ओर बहुत ध्यान दिया । एक लेखक कोलमेल्ला ने सिफारिश की थी कि जमींदारों को अपनी जरूरत से दुगुनी संख्या में उपकरणों तथा औजारों का सुरक्षित भंडार रखना चाहिए ताकि उत्पादन लगातार होता रहे।

निरीक्षण को भी विशेष महत्त्व दिया गया क्योंकि नियोक्ताओं की यह आम धारणा थी कि निरीक्षण के बिना कभी भी कोई काम ठीक से नहीं करवाया जा सकता। निरीक्षण को सरल बनाने के लिए कामगारों को कभी कभी छोटे दलों में विभाजित कर दिया जाता था। श्रमिकों पर नियंत्रण के तरीके-कोलूमेल्ला ने दस-दस श्रमिकों के समूह बनाने की सिफारिश की थी। उसने यह दावा किया था कि छोटे समूहों में यह बताना अपेक्षाकृत आसान होता है कि उनमें से कौन काम कर रहा है और कौन कामचोरी। इससे पता चलता है कि उन दिनों श्रम-प्रबंधन पर विस्तार से विचार किया जाता था।

1. अलग – अलग समूह में काम करने वाले दासों को प्रायः पैरों में जंजीर डालकर एक-साथ रखा जाता था।

2. रोमन साम्राज्य में कुछ औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने तो इससे भी अधिक कड़े नियंत्रण लागू कर रखे थे। सुगंधित राल की फैक्टरियो में कामगारो के ऐप्रनों पर एक सील लगा दी जाती थी। उन्हें अपने सिर पर एक गहरी जाली वाला मास्क या नेट भी पहनना पड़ता था। उन्हें फैक्टरी से बाहर जाने के लिए अपने सभी कपड़े उतारने पड़ते थे। संभवत: यह बात अधिकांश फैक्ट्रियों और कारखानों पर लागू होती थी।

3. 398 ई. के एक कानून में कहा गया है कि कामगारों को दागा जाता था ताकि यदि वे भागने और छिपने का प्रयत्न करें तो उन्हें पहचाना जा सके।

4. कई निजी उद्यमी, कामगारों के साथ ऋण-संविदा के रूप में अनुबंध कर लेते थे, ताकि यह दावा कर सकें कि उनके कर्मचारी उनके कर्जदार हैं। इस प्रकार नियोक्ता अपने कामगारों पर कड़ा नियंत्रण रखते थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ऑगस्ट्स का पहला नाम था ………………
(क) जूलियस सीजर
(ख) ब्रूटस
(ग) ऑक्टावियन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) ऑक्टावियन

प्रश्न 2.
गृहयुद्ध का तात्पर्य है ………………..
(क) सशस्त्र विद्रोह
(ख) शस्त्रविहीन संघर्ष
(ग) मात्र-अहिंसक आंदोलन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सशस्त्र विद्रोह

प्रश्न 3.
किस सागर को रोमन साम्राज्य का हृदय माना जाता है?
(क) काला सागर
(ख) लाल सागर
(ग) भूमध्य सागर
(घ) कैस्पियन सागर
उत्तर:
(ग) भूमध्य सागर

प्रश्न 4.
रोम का प्रथम सम्राट कौन था?
(क) आगस्टस
(ख) नीरो
(ग) डेरियस प्रथम
(घ) कोन्स्टैनटाइन
उत्तर:
(क) आगस्टस

प्रश्न 5.
रोमन साम्राज्य में ‘सॉलिडस’ क्या था?
(क) चाँदी का सिक्का
(ख) सोने का सिक्का
(ग) ताँबे का सिक्का
(घ) चाँदी और ताँबे का मिश्रित सिक्का
उत्तर:
(ख) सोने का सिक्का

प्रश्न 6.
रोमन लोगों के पूज्य देवी/देवता कौन नहीं थे?
(क) डैगन
(ख) मॉर्स
(ग) जूनो
(घ) जूपिटर
उत्तर:
(क) डैगन

प्रश्न 7.
किस रोमन शासक के शासनकाल में दासों ने जबरदस्त विद्रोह किया?
(क) ऑगस्टस
(ख) ऐनस्टैसियस
(ग) टाइबेरियस
(घ) नीरो
उत्तर:
(घ) नीरो

प्रश्न 8.
निम्न में किस शासक का संबंध पवित्र रोमन साम्राज्य से था?
(क) जुलियस सीजर
(ख) शार्लमेन
(ग) लुई-XIV
(घ) पीटर महान
उत्तर:
(ख) शार्लमेन

प्रश्न 9.
वह कौन-सा प्राचीन साम्राज्य था जो तीन महाद्वीपों में फैल हुआ था?
(क) रोम साम्राज्य
(ख) ब्रिटिश साम्राज्य
(ग) रूसी साम्राज्य
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) रोम साम्राज्य

प्रश्न 10.
रोम साम्राज्य की प्रमुख भाषा थी:
(क) संस्कृत
(ख) लैटिन
(ग) अंग्रेजी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) लैटिन

प्रश्न 11.
सम्राट कांस्टैन्टाइन किस सदी ई. में ईसाई बना?
(क) तीसरी
(ख) पहली
(ग) चौथी
(घ) पाँचवीं
उत्तर:
(ग) चौथी

प्रश्न 12.
रोमन साम्राज्य को पूर्वी पश्चिमी भागों में किस सदी ई. में बाँटा गया?
(क) चौथी
(ख) दूसरी
(ग) तीसरी
(घ) सातवीं
उत्तर:
(क) चौथी

प्रश्न 13.
रोम साम्राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में कौन-सी जनजातियाँ थीं?
(क) गोथ
(ख) विसिगोथ
(ग) वैथल
(घ) इनमें सभी
उत्तर:
(घ) इनमें सभी

प्रश्न 14.
मुहम्मद पैगम्बर द्वारा इस्लाम धर्म की स्थापना की गई?
(क) पाँचवीं सदी में
(ख) छठी सदी में
(ग) सातवीं सदी में
(घ) आठवीं सदी में
उत्तर:
(ग) सातवीं सदी में

प्रश्न 15.
रोम में गणतंत्र कायम रहा ……………….
(क) 509 ई.पू. से 27 ई.पू. तक
(ख) 500 ई.पू. से 25 ई.पू. तक
(ग) 300 ई.पू. से 28 ई.पू. तक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) 509 ई.पू. से 27 ई.पू. तक

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

Bihar Board Class 11 History लेखन कला और शहरी जीवन Textbook Questions and Answers

 

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

लेखन कला और शहरी जीवन पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे?
उत्तर:
यह बात निःसंकोच कही जा सकती है कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे। इस बात के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

  • प्राकृतिक उर्वरता उन्नत खेती का आधार बनी।
  • प्राकृतिक उर्वरता के कारण घास-भूमियाँ अस्तित्व में आईं जिससे पशुपालन करने को बल मिला।
  • खेती तथा पशुपालन से मनुष्य का जीवन स्थायी बना क्योंकि अब यह खाद्य-उत्पादक बन गया था। अब उसे भोजन की तलाश में स्थान-स्थान घूमने की जरूरत नहीं थी।
  • जीवन के स्थायी बनने पर कृषक समुदाय अस्तित्व में आए जो झोपड़ियाँ बनाकर साथ-साथ रहने लगे। इस प्रकार गाँव अस्तित्व में आए।
  • खाद्य उत्पादन बढ़ने पर वस्तु-विनिमय की प्रक्रिया आरंभ हो गई। परिणामस्वरूप गाँवों का आकार बढ़ने लगा।
  • नये-नये व्यवसाय भी आरंभ हो गए जो शहरीकरण के प्रतीक थे।

लेखन कला और शहरी जीवन Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
आपके विचार से निम्नलिखित में से कौन-सी आवश्यक दशाएँ थीं जिनकी वजह से प्रारम्भ में शहरीकरण हुआ था और निम्नलिखित में से कौन-कौन सी बातें शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न हई?

  1. अत्यंत उत्पादक खेती
  2. जल-परिवहन
  3. धातु और पत्थर की कमी
  4. श्रम विभाजन
  5. मुद्राओं का प्रयोग
  6. राजाओं के सैन्य-शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया।

उत्तर:
शहरीकरण के लिए आवश्यक दशाएँ –

  • अत्यंत उत्पादक खेती
  • जल परिवहन
  • श्रम विभाजन।

शहरों के विकास के फलस्वरूप विकसित दशाएँ –

  • धातु और पत्थर की कमी
  • मुद्राओं का प्रयोग
  • राजाओं की सैन्य शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बनाया।

प्रश्न 3.
यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए खतरा थे?
उत्तर:
खानाबदोश पशुचारक निम्नलिखित कारणों से शहरी जीवन के लिए खतरा थे –

1. ये लोग कई बार अपनी भेड़ – बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोये हुए खेतों में से होते हए ले जाते थे। इससे खेती को क्षति पहुँचती थी और उत्पादन कम हो जाता था। कभी-कभी ये किसानों के गाँवों पर हमला कर देते थे और उनका माल लूट ले जाते थे। यह अव्यवस्था शहरी जीवन में बाधक थी।

2. दूसरी ओर कभी – कभी बस्तियों में रहने वाले लोग भी इनका रास्ता रोक देते थे और उन्हें अपने पशुओं को नदी या नहर तक नहीं ले जाने देते थे। इस प्रकार भी झगड़े होते थे। खानबदोश समुदायों के पशुओं के अतिचारण से बहुत सी उपजाऊ भूमि बंजर हो जाती थी।

प्रश्न 4.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे?
उत्तर:
कुछ पुराने मंदिर साधारण घरों से अलग किस्म के नहीं होते थे क्योंकि मंदिर भी किसी देवता का घर होता था। परंतु मंदिरों की बाहरी दीवारें विशेष अंतरालों के बाद भीतर और बाहर की ओर मुड़ी होती थी। यही मंदिरों की मुख्य विशेषता थी। सामान्य घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं।

प्रश्न 5.
शहरी जीवन शुरू होने के बाद कौन-कौन-सी नयी संस्थाएँ अस्तित्व में आई? आपके विचार से उनमें से कौन-सी संस्थाएँ राजा के पहल पर निर्भर थीं ?
उत्तर:
शहरी जीवन आरंभ होने के बाद कई नई संस्थाएँ अस्तित्व में आईं। इनमें से मुख्य थीं –

  • मंदिर
  • विद्यालय
  • लिपिक अथवा पट्टिका लेखक
  • व्यापार केंद्र
  • स्थायी सेना
  • शिल्पकार
  • वस्तुविद्
  • मूर्तिकार इत्यादि। इन संस्थानों में से मंदिर, व्यापार और लेखन राजा के पहल पर निर्भर थे।

प्रश्न 6.
किन पुरानी कहानियों से हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती है?
उत्तर:
मेसोपोटामिया यूनानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है-दो नदियों के बीच का प्रदेश। इराक में दजला और फरात नाम की दो नदियाँ बहती हैं। इनके मध्य में स्थित घाटी को मेसोपोटामिया कहकर पुकारा जाता है। प्राचीन काल में यहाँ एक-एक करके तीन सभ्यताएँ फली-फूलीं। ये सभ्यताएँ थीं-सुमेरिया की सभ्यता, बेबीलोनिया की सभ्यता और असीरिया की सभ्यता। इन तीनों का सामूहिक नाम मेसोपोटामिया की सभ्यता है। इस सभ्यता के सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन का वर्णन इस प्रकार हैं –

1. सामाजिक जीवन-मेसोपोटामिया का समाज तीन वर्गों में बाँटा हुआ था। पहले दो वर्गों में उच्च लोग शामिल थे। इन वर्गों के लोग अच्छे मकानों में रहते थे, अच्छे वस्त्र पहनते थे और उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। तीसरे वर्ग के लोग दास थे और वे झोपड़ियों में रहते थे। मेसोपोटामिया के समाज में स्त्रियों का निम्न स्थान था।

2. आर्थिक जीवन-मेसोपोटामिया के लोगों का आर्थिक जीवन भी काफी उन्नत था। वे लोग कृषि करते थे। कृषि उन्नत थी। उन्होंने सिंचाई के लिए नदियों पर बाँध बनाए थे। वे टीन, ताँबे तथा काँसे के प्रयोग से परिचित थे। वे अच्छे शिल्पी भी थे। उन्हें कपड़ा बुनना, भवन, आभूषण तथा अन्य अनेक चीजें बनानी आती थी। वे अपने पड़ोसी देशों के साथ व्यापार भी करते थे।

3. धार्मिक जीवन-मेसोपोटामिया के लोग धर्मपरायण भी थे। मंदिर ईटों से बनाए जाते थे तथा समय के साथ बड़े होते गए। एक प्रकार को. मीनार नुमा मंदिर “जिगुरात” नगर के पवित्र क्षेत्र में ऊँची पहाड़ी पर ईंटों से बनाए जाते थे। उनके प्रमुख देवता समय (सूर्य), सिन (चंद्रमा), अनु (आकाश देव), एकलिन (वायु देव) आदि थे। उनके देवताओं की संख्या हजारों में थी। बाबली लोगों का मुख्य देवता मरदुक और प्रमुख देवी इस्तर थी। असीरी लोगों के मुख्य देवता का नाम आसुर था। समाज में पुजारियों का बड़ा प्रभाव था।

Bihar Board Class 11 History लेखन कला और शहरी जीवन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मेसोपोटामिया का क्या अर्थ है?
उत्तर:
मेसोपोटामिया यूनानी भाषा के दो शब्दों ‘मेसोस’ (Mesos) तथा ‘पोटैमोस’ (Potamos) से बना है। मेसोस का अर्थ है मध्य तथा पोटैमोस का अर्थ है नदी । इस प्रकार मेसोपोटामिया का अर्थ नदियों के मध्य स्थित प्रदेश है।

प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया के दो स्थानों के नाम बताएँ जहाँ लंबे समय तक उत्खनन कार्य चला?
उत्तर:
उरूक तथा मारी। प्रश्न 3. मेसोपोटामिया के इतिहास के कौन-कौन से स्रोत उपलब्ध हैं? उत्तर:इमारतें, मूर्तियाँ, आभूषण, औजार, करें, मुद्राएँ, लिखित दस्तावेज आदि।

प्रश्न 4.
मेसोपोटोमिया के प्राचीनतम नगरों का निर्माण कब शुरू हुआ?
उत्तर:
कांस्य युग अर्थात लगभग 3000 ई.पू. में मेसोपोटामिया के प्राचीनतम् नगरों का निर्माण शुरू हुआ।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया के लोग अपने लिए आवश्यक धातुएँ तथा अन्य पदार्थ कहाँ से मंगवाते थे। इसके बदले में वे क्या निर्यात करते थे?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के लोग अपने लिए आवश्यक धातुएँ तथा अन्य पदार्थ तुर्की और ईरान अथवा खाड़ी पार के देशों से मंगवाते थे। इसके बदले में वे कपड़ा तथा कृषि उत्पाद, निर्यात करते थे।

प्रश्न 6.
मेसोपोटामिया के लोग लिखने के लिए कागज के रूप में किस चीज का प्रयोग करते थे?
उत्तर:
मिट्टी की पट्टिकाओं का

प्रश्न 7.
मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा कौन-सी थी?
उत्तर:
सुमेरियन

प्रश्न 8.
मेसोपोटामिया में साक्षरता कम क्यों थी?
उत्तर:
मेसोपाटामिया की लिपि में चिह्नों की संख्या सैकड़ों में थी। इसके अतिरिक्त ये चिह्न बहुत ही जटिल थे। इसी कारण मेसोपोटामिया में साक्षरता दर कम थी।

प्रश्न 9.
मेसोपोटामिया की विचारधारा के अनुसार व्यापार और लेखन की व्यवस्था सर्वप्रथम किसने की?
उत्तर:
राजा एनमर्कर ने

प्रश्न 10.
मेसोपोटामिया के दो देवी-देवताओं का नाम बताओ।
उत्तर:
चन्द्र देवता उर तथा प्रेम एवं युद्ध की देवी इन्नाना।

प्रश्न 11.
मेसोपोटामिया के पुराने मंदिरों तथा घरों में एक अंतर बताइए।
उत्तर:
मंदिरों की बाहरी दीवारें एक विशेष अवधि के बाद भीतर की ओर तथा फिर बाहर की ओर मुड़ी होती थी। साधारण घरों की दीवारों में यह विशेषता नहीं थी।

प्रश्न 12.
मेसोपोटामिया में खेतों, मत्स्य क्षेत्रों तथा लोगों के पशुधन का स्वामी किसे माना जाता था?
उत्तर:
आराध्य देव को

प्रश्न 13.
मेसोपोटामिया के लोगों के धर्म की कोई दो विशेषताएँ बताओ।
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया के समुदायों का अपना-अपना इष्ट देव होता था।
  • लोग देवी देवताओं को अन्न, दही तथा मछली अर्पित करते थे।

प्रश्न 14.
शहरी जीवन की शुरूआत कहाँ से हुई थी ? यह प्रदेश किन दो नदियों के मध्य स्थित है?
उत्तर:
शहरी जीवन की शुरूआत मेसोपोटामिया से हुई। यह प्रदेश इराक गणराज्य की फरात तथा दजला नदियों के मध्य स्थित है।

प्रश्न 15.
मेसोपोटामिया की सभ्यता अपनी किन विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है?
उत्तर:
अपनी संपन्नता, शहरी जीवन, विशाल एवं समृद्ध साहित्य, गणित तथा खगोलविद्या के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 16.
मेसोपोटामिया में पुरातत्वीय खोजों की शुरूआत कब हुई?
उत्तर:
1840 के दशक में हुई।

प्रश्न 17.
यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया क्यों महत्वपूर्ण था?
उत्तर:
यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि बाईबल के प्रथम भाग ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में मेसोपाटोमिया का कई संदों में उल्लेख किया गया है।

प्रश्न 18.
शहर अथवा कस्बे किस प्रकार अस्तित्व में आते हैं?
उत्तर:
जब किसी अर्थव्यवस्था में खाद्य उत्पादन के अतिरिक्त अन्य आर्थिक गतिविधियाँ विकसित होने लगी हैं तब किसी एक स्थान पर जनसंख्या का घनत्व बढ़ जाता है फलस्वरूप कस्बे अस्तित्व में आते हैं।

प्रश्न 19.
वार्का शीर्ष नामक मूर्तिकला का प्रसिद्ध नमूना मेसोपोटामिया के किस नगर से मिला है? इसे किस चीज से बनाया जाता था ?
उत्तर:
वार्का शीर्ष नाम मूर्तिकला का प्रसिद्ध नमूना मेसोपोटामिया के उरूक नगर में मिला है। इसे सफेद संगमरमर को तराश कर बनाया गया था।

प्रश्न 20.
कांसा कौन-सी दो धातुओं के मिश्रण से बनाया जाता है?
उत्तर:
ताँबा तथा राँगा (टिन) धातुओं के मिश्रण से

प्रश्न 21.
लेखन या लिपि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
लेखन या लिपि से अभिप्राय उन ध्वनियों से है जो संकेतों या चिह्नों के रूप में लिखी जाती हैं।

प्रश्न 22.
मेसोपोटामिया के लोगों के लिपि कैसी थी?
उत्तर:
कोलाकार अथवा क्यूनीफार्।

प्रश्न 23.
एकल परिवार क्या होता है?
उत्तर:
एकल परिवार में एक पुरुष, उसकी पत्नी और उनके बच्चे शामिल होते थे।

प्रश्न 24.
इस तथ्य की पुष्टि किस बात से होती है कि मेसोपोटामिया (उर) के समाज में धन-दौलत का अधिकतर भाग एक छोटे से वर्ग में केन्द्रित था?
उत्तर:
अधिकतर बहुमूल्य वस्तुएँ राजाओं तथा रानियों की कब्रों तथा समाधियों में दबी हुई मिली हैं। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि मेसोपोटामिया के समाज में धन-दौलत का अधिकतर भाग एक छोटे-से वर्ग में केंद्रित था।

प्रश्न 25.
शहरी अर्थव्यवस्था के लिए कुम्हार के चाक का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
कुम्हार द्वारा चाक के प्रयोग से बर्तन बनाने के काम ने एक कार्यशाला का रूप ले लिया। अब एक जैसे कई बर्तन एक साथ बनाए जाने लगे।

प्रश्न 26.
बेबीलोनिया को उच्च संस्कृति का केंद्र क्यों माना जाता था?
उत्तर:
बेबीलोनिया को उच्च संस्कृति का केंद्र इसलिए माना जाता था क्योंकि यहाँ के कई नगर पट्टिकाओं के विशाल संग्रह के लिए विख्यात थे।

प्रश्न 27.
बेबीलोनिया को असीरियाई आधिपत्य से कब और किसने मुक्त कराया?
उत्तर:
दक्षिणी कछार के एक शूरवीर नैबोपोलास्सर ने 625 ई.पू. में मुक्त कराया।

प्रश्न 28.
स्वतंत्र बेबीलोन का अंतिम शासक कौन थे ? उसका एक कार्य बताओ।
उत्तर:
स्वतंत्र बेबीलोन का अंतम शासक नैबोनिडस था। उसने अक्कद के राजा सारगोन (Sargon) की खंडित मूर्ति की मरम्मत करवाई।

प्रश्न 29.
बेबीलोन नगर की कोई दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • बेबीलोन नगर का क्षेत्रफल 850 हैक्टेयर से अधिक था
  • इसमें बड़े-बड़े राजमहल और मंदिर स्थित थे।

प्रश्न 30.
हौज क्या होता है?
उत्तर:
हौज जमीन में ढका हुआ एक गड्ढा होता है। इसमें पानी तथा मल जाता है।

प्रश्न 31.
उर नगरों में शवों का अंतिम संस्कार कैसे किया जाता था?
उत्तर:
शवों को भूमि के नीचे दफनाया जाता था। प्रश्न 32. मारी के राजाओं ने वहाँ किस देवता के लिए मंदिर बनवाया ? उत्तर:स्टेपी क्षेत्र के देवता डैगन (Dagan) के लिए।

प्रश्न 33.
मारी स्थित-जिमरीलिम का राजमहल बहुत ही विशाल था। कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • यह राजमहल 2.4 हैक्टेयर के क्षेत्र में फैला था।
  • इसमें 260 कक्ष बने हुए थे।

प्रश्न 34.
गिल्गेमिश महाकाव्य क्या है। यह किस बात के महत्व को दर्शाता है?
उत्तर:
गिल्गेमिश महाकाव्य 12 पट्टिकाओं परं लिखा एक महाकाव्य है। यह मेसोपोटामिया के नगरों के महत्त्व को दर्शाता है। इससे पता चलता है कि मेसोपोटामिया के लोगों को अपने नगरों पर बहुत अधिक गर्व था।

प्रश्न 35.
असुरबनिपात कौन था? उसकी दो उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:
असुरबनिपाल असीरियाई अंतिम राजा था। उपलब्धियाँ –

  • उसने अपनी राजधानी निनवै में एक पुस्तकालय की स्थापना की।
  • उसने इतिहास, महाकाव्य, साहित्य, ज्योतिष आदि की पट्टिकाओं को इकट्ठा करवाया।

प्रश्न 36.
दक्षिणी मेसोपोटामिया में विकसित शहर कौन-कौन से तीन प्रकार के थे?
उत्तर:

  • मंदिरों के चारों ओर विकसित हुए शहर।
  • व्यापार केन्द्रों के रूप में विकसित हुए शहर।
  • शाही शहर।

प्रश्न 37.
क्यूनीफार्म शब्द कैसे बना है?
उत्तर:
क्यूनीफार्म शब्द लैटिन भाषा के दो शब्दों क्यनियस तथा फोर्मा से मिलकर बना है। क्यूनियस का अर्थ है बूंटी तथा फोर्मा का अर्थ है ‘आकार’।

प्रश्न 38.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे।
उत्तर:
क्योंकि मंदिर भी किसी देवता का घर ही होता है। इसीलिए पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे।

प्रश्न 39.
संसार को मेसोपोटामिया की सबसे बड़ी देन क्या है?
उत्तर:
उसकी कालगणना तथा गणित की विद्वतापूर्ण परंपरा।

प्रश्न 40.
मेसोपोटामिया के लोगों ने समय का विभाजन किस प्रकार किया हुआ था?
उत्तर:
उनका समय विभाजन चंद्रमा को पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा पर आधारित था। इसके अनुसार एक वर्ष को 12 महीनों, एक महीने को 4 हफ्तों, एक दिन को 24 घंटों तथा । घंटा को 60 मिनट में बाँटा गया था।

प्रश्न 41.
सुमेर के व्यापार की पहली घटना को किस व्यक्ति से जोड़ा जाता है?
उत्तर:
उरूक शहर के एक प्राचीन शासक एनमर्कर (Enmerkar) से।

प्रश्न 42.
2400 ई.पू. के बाद सुमेरियन भाषा का स्थान किस भाषा ने ले लिया?
उत्तर:
अक्कदी भाषा ने।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शहरी अर्थव्यवस्था में एक सामाजिक संगठन होना क्यों जरूरी है?
उत्तर:
शहरी अर्थव्यवस्था में एक सामाजिक संगठन का होना भी जरूरी है। इसके निम्नलिखित कारण हैं –

  1. शहरी विनिर्माताओं के लिए ईंधन, धातु, विभिन्न प्रकार के पत्थर, लकड़ी आदि जरूरी चीजें भिन्न-भिन्न जगहों से आती हैं। इसके लिए संगठित व्यापार और भंडारण की आवश्यकता होती है।
  2. शहरों में अनाज और अन्य खाद्य-पदार्थ गाँवों से आते हैं। नगरो में उनके संग्रह तथा वितरण के लिए व्यवस्था करनी होती है।
  3. इसके अतिरिक्त और भी अनेक प्रकार के क्रियाकलापों में तालमेल बैठाना पड़ता है। उदाहरण के लिए मुद्रा काटने वालों को केवल पत्थर ही नहीं, उन्हें तराशने के लिए औजार तथा बर्तन भी चाहिए।
  4. शहरी अर्थव्यवस्था को अपना हिसाब-किताब भी लिखित में रखना होता है। ये सभी कार्य आदेश और आदेश पालन द्वारा पूरे होते हैं। यही निश्चित सामाजिक संगठन की विशेषता है।

प्रश्न 2.
शहरी जीवन में श्रम-विभाजन का क्या महत्व है?
अथवा
श्रम-विभाजन शहरी जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता है। उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
श्रम – विभाजन का अर्थ है – अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति एक-दूसरे के उत्पादन अथवा सेवाओं द्वारा करना। शहरी जीवन में श्रम-विभाजन का होना बहुत ही आवश्यक है। इसका कारण यह है कि शहरी अर्थव्यवस्था में खाद्य उत्पादन के अतिरिक्त व्यापार तथा तरह-तरह की सेवाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परंतु नगर के लोग आत्मनिर्भर नहीं होते । वह गाँवों या नगर के अन्य लोगों द्वारा उत्पन्न वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए उन पर आश्रित होते हैं। उनमें आपस में बराबर लेन-देन होता रहता है। उदाहरण के लिए एक पत्थर की मुद्रा बनाने वाले को पत्थर उकेरने के लिए काँसे के औजारों की आवश्यकता पड़ती है। वह स्वयं ऐसे औजार नहीं बना सकता।

वह यह भी नहीं जानता कि वह मुद्राओं के लिए आवश्यक रंगीन पत्थर कहाँ से प्राप्त करे। उसकी विशेषज्ञता तो केवल उकेरने तक ही सीमित होती है। वह व्यापार करना नहीं जानता। काँसे के औजार बनाने वाला भी ताँबा या राँगा (टिन) लाने के लिए स्वयं बाहर नहीं जाता। ये सभी कार्य एक-दूसरे की सहायता से ही पूरे होते हैं।

प्रश्न 3.
मेसोपोटामिया के दक्षिणी रेगिस्तानी भाग का क्या महत्व था?
उत्तर:
मेसोपोटामिया का दक्षिणी भाग रेगिस्तानी है। इस रेगिस्तान में फरात और दजला नदियाँ बहती हैं। ये नदियाँ पहाड़ों से निकलकर अपने साथ उपजाऊ बारीक मिट्टी लाती रही हैं। जब इन नदियों में बाढ़ आती है अथवा जब इनके पानी को सिंचाई के लिए खेतों में ले जाया जाता है तब इनके द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी खेतों में जमा हो जाती है। फरात नदी रेगिस्तान में प्रवेश करने के बाद कई धाराओं में बँट जाती है। कभी-कभी इन धाराओं में बढ़ आ जाती है। प्राचीन काल में ये धाराएँ सिंचाई की नहरों का काम देती थीं। इनसे आवश्यकता पड़ने पर गेहूँ, जौ और मटर या मसूर के खेतों की सिंचाई की जाती थी, इसलिए वर्षा की कमी के बावजूद सभी पुरानी व्यवस्थाओं में दक्षिणी मेसोपोटामिया की खेती सबसे अधिक उपज देती थी।

प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया के आयात-निर्यात पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
मेसोपोटामिया खाद्य-संसाधनों में अवश्य समृद्ध था, परंतु वहाँ खनिज संसाधनों का अभाव था। दक्षिण के अधिकांश भागों में औजार, मोहरें (मद्राएँ) और आभूषण बनाने के लिए पत्थर की कमी थी। इराकी खजूर और पोपलार के पेड़ों की लकड़ी गाड़ियाँ, गाड़ियों के लिए पहिए या नावें बनाने के लिए अच्छी नहीं थी। औजार, पात्र या गहने बनाने के लिए कोई धातु उपलब्ध नहीं थी। इसलिए प्राचीन काल में मेसोपोटामिया के निवासी संभवत: लकड़ी, ताँबा, राँगा, चाँदी, सोना, सीपी और विभिन्न प्रकार के पत्थर तुर्की तथा ईरान अथवा खाड़ी-पार के देशों से मंगवाते थे।

इन देशों के पास खनिज संसाधन की कोई कमी नहीं थी, परंतु वहाँ खेती करने की संभावना कम थी। अत: मेसोपोटामिया आने वाली वस्तुओं के बदले इन देशों को कपड़ा तथा कृषि उत्पाद भेजे जाते थे। वस्तुओं का नियमित रूप से आदान-प्रदान तभी संभव था जब इसके लिए कोई सामाजिक संगठन होता । दक्षिणी मेसोपाटामिया के लोगों ने ऐसे संगठन स्थापित करने की शु की।

प्रश्न 5.
बाईबल में उल्लखित जलप्लावन की कहानी क्या बताती है?
उत्तर:
बाईबल के अनुसार प्राचीन काल में पृथ्वी पर संपूर्ण जीवन को नष्ट करने वाला जलप्लावन हुआ था। इस महान् बाढ़ भी कहा जाता है। परंतु परमश्वर पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने नोआ (Naoh) नाम के एक व्यक्ति को चुना नोआ ने एक बहुत ही बड़ी नाव बनाई और उसमें सभी जीव-जंतुओं का एक-एक जोड़ा रख लिया। जलप्लावन होने पर नाव में रखे सभी जोड़े सुरक्षित बच गए, जबकि शेष सब कुछ नष्ट हो गया।

प्रश्न 6.
इराक भौगोलिक विविधता का देश है। उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इराक वास्तव में भौगोलिक विविधता वाला देश है। इसके पूर्वोत्तर भाग में हरे-भरे, ऊँचे-नीचे मैदान हैं। ये मैदान धीरे-धीरे वृक्षाच्छादित पर्वत-श्रृंखला के रूप में फैलते जाते हैं। यहाँ स्वच्छ झरने तथा जंगली फूल भी उगाये जाते हैं। यहाँ अच्छी फसल के लिए पर्याप्त वर्षा हो जाती है। उत्तर में ऊँची भूमि है जहाँ ‘स्टेपी’ घास के मैदान हैं। यहाँ पशुपालन आजीविका का मुख्य साधन है। सर्दियों की वर्षा के बाद भेड़-बकरियाँ यहाँ उगने वाली छोटी-छोटी झाड़ियों और घास से अपना भरण-पोषण करती हैं। पूर्व में दजला की सहायक नदियाँ परिवहन का अच्छा साधन हैं। देश का दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है।

प्रश्न 7.
2600 ई. पू. से इसवी सन् की पहली शताब्दी तक मेसोपोटामिया के लेखन और भाषा में क्या-क्या परिवर्तन आये?
उत्तर:
1. 2600 ई. पू. के आसपास मेसोपोटामिया में लिपि कीलाकार हो गई । लेखन की भाषा सुमेरियन थी। मेसोपोटामिया की कीलाकार लिपि का चिह किसी एक व्यंजन या स्वर को व्यक्त नहीं करता था, बल्कि यह किसी अक्षर समूह की ध्वनि का प्रतीक होता था। इसलिए मेसोपोटामिया के लिपिक को सैकड़ों चिह सीखने पड़ते थे, और उसे गीली पट्टी पर सूखने से पहले ही लिखना होता था । लेखन कार्य के लिए विशेष कुशलता की आवश्यकता भी होती थी।

2. अब लेखन का प्रयोग केवल हिसाब-किताब रखने के लिए नहीं, बल्कि शब्द-कोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता प्रदान करने, राजाओं के कार्यों का वर्णन करने तथा कानून में उन परिवर्तनों को उद्घोषित करने के लिए किय जाने लगा जो देश की आम जनता के लिए बनाए जाते थे।

3. 2400 ई. पू. के बाद सुमेरियन भाषा का स्थान धीरे-धीरे अक्कदी भाषा ने ले लिया । अक्कदी भाषा में कीलाकार लेखन कार्य ईसवी सन् की पहली शताब्दी तक अर्थात् 2000 से भी अधिक वर्षों तक चलता रहा।

प्रश्न 8.
दक्षिणी मेसोपोटामिया में कृषि कई बार संकटों से घिर जाती थी ? इसके लिए कौन-कौन से कारक उत्तरदायी थे?
उत्तर:
भूमि में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद दक्षिणी मेसोपोटामिया में कृषि कई बार संकटों से घिर जाती थी। इसके लिए प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित दोनों प्रकार के कारक उत्तरदायी थे

प्राकृतिक कारक –

  • फरात नदी का प्राकृतिक धाराओं में किसी वर्ष तो बहुत अधिक पानी बह आता था और फसलों को डुबा देता था।
  • कभी-कभी नदी की धाराएँ अपना रास्ता बदल लेती थीं, जिससे खेत सूखे रह जाते थे।

मानव निर्मित कारक –

  • फरात नदी की धाराओं के ऊपरी प्रदेश में रहने वाले लोग अपने पास की जलधारा से इतना अधिक पानी ले लेते थे कि धारा के नीचे की ओर बसे हुए गाँवों को पानी ही नहीं मिल पाता था।
  • धारा के ऊपरी भाग में रहने वाले लोग अपने हिस्से की सारणी में से गाद (मिट्टी) भी नहीं निकालते थे। परिणामस्वरूप धारा का बहाव रूक जाता था और नीचे वालों का पानी नहीं मिलता था।

प्रश्न 9.
शहरी अर्थव्यवस्था के लिए कुशल परिवहन व्यवस्था की क्या भूमिका होती है? मेसोपोटामिया का उदाहरण दें।
उत्तर:
कुशल परिवहन व्यवस्था शहरी विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अनाज या काठ कोयला भारवाही पशुओं की पीठ पर रखकर या बैलगाड़ी में डालकर शहरों में लाना ले जाना बहुत कठिन होता है। इसका कारण यह है कि इसमें बहुत अधिक समय लगता है और पशुओं के चारे आदि पर भी काफी खर्चा आता है। शहरी अर्थ-व्यवस्था इसका बोझ उठाने के लिए सक्षम नहीं होती। शहरी अर्थ-व्यवस्था के लिए परिवहन का सबसे सस्ता साधन जलमार्ग ही होता है। अनाज के बोरों से लदी हुई नावें की धारा की गति अथवा हवा के वेग से चलती हैं, जिस पर कोई खर्चा नहीं आता।

प्राचीन मेसोपोटामिया की नहरें तथा प्राकृतिक जलधाराएँ छोटी बड़ी बस्तियों के बीच माल के परिवहन का अच्छा मार्ग थीं। फरात नदी उन दिनों व्यापार के लिए ‘विश्व-मार्ग’ के रूप में जानी जाती थी। इस परिवहन व्यवस्था ने मेसोपोटामिया के शहरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 10.
उरूक नगर में होने वाली तकनीकी प्रगति के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर:
शासक के आदेश से साधारण लोग पत्थर खोदने, धातु-खनिज लाने, मिट्टी से ईंटें बना कर मंदिर में लगाने तथा सुदूर देशों से मंदिर के लिए तरह-तरह का सामान लाने जैसे कामों में जुटे रहते थे।

इसके परिणामस्वरूप 3000 ई. प. के आसपास उरूक नगर में खूब तकनीकी प्रगति हुई।

  1. अनेक शिल्पों में काँसे के औजारों का प्रयोग होने लगा।
  2. वस्तुविदों ने ईंटों के स्तंभ बनाना सीख लिया क्योंकि अच्छी लकड़ी न मिल पाने के . कारण बड़े-बड़े कमरों की छतों के बोझ को संभालने के लिए मजबूत शहतीर नहीं बनाए जा सकते थे।
  3. सैकड़ों लोगों को चिकनी मिट्टी के शंकु (कोन) बनाने और पकाने के काम में लगाया गया था। शंकु को भिन्न-भिन्न रंगों में रंगकर मंदिरों की दीवारों में लगाया जाता था। इससे दीवारों पर विभिन्न रंग निखर उठते थे।
  4. मूर्तिकला के क्षेत्र में भी अत्यधिक उन्नति हुई। मूर्तियाँ मुख्यतः आयातित पत्थरों से बनाई जाती थीं।
  5. प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक युगांतकारी परिवर्तन आया। वह था-कुम्हार के चाक के निर्माण से। कुम्हार की कार्यशाला में एक साथ बड़े पैमाने पर दर्जनों एक जैसे बर्तन बनाए जाने लगे।

प्रश्न 11.
मेसोपोटामिया में मुद्राओं के निर्माण और उनके महत्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मेसोपोटामिया में 1000 ई. पू. के अंत तक पत्थर की बेलनाकार मुद्राएँ बनाई जाने लगी थीं। इनके बीजों-बीच एक छेद होता था। इस छेद में एक तीली लगाकर मुद्रा को गीली मिट्टी पर घुमाया जाता था। इस प्रकार उनसे लगातार चित्र बनाया जाता था। मुद्राएँ अत्यंत कुशल कारीगरों द्वारा उकेरी जाती थीं। कभी-कभी उनमें ऐसे लेख होते थे जैसे-स्वामी का नाम. उसके. इष्ट देव का नाम और उसकी अपनी पदीय स्थिति आदि।

मोहर को किसी कपड़े की गठरी या बर्तन के मुँह को चिकनी मिट्टी से लीप-पांतकर उस पर घुमाया जा सकता था। इस प्रकार उसमें अंकित लिखावट मिट्टी की सतह पर छप जाती थी। मोहर लगी गठरी या बर्तन में रखी वस्तुओं को सुरक्षित रखा जा सकता था। जब इस मोहर को मिट्टी से बनी किसी पट्टिका पर लिखे पत्र पर घुमाया जाता था तो वह मोहर उस पत्र की प्रामाणिकता की प्रतीक बन जाती थी।

प्रश्न 12.
मारी नगर में पशुचारकों पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
2000 ई. पू. के बाद मारी नगर शाही राजधानी के रूप में खूब फला-फूला। यह फरात नदी की उर्ध्वधारा पर स्थित है। इसके ऊपरी क्षेत्र में खेती और पशुपालन साथ-साथ चलते थे। फिर भी इस प्रवेश का अधिकांश भाग पेड़-बकरी चराने के लिए ही काम में लाया जाता था।

पशुचारकों को जब अनाज, धातु के औजारों आदि की जरूरत पड़ती थी तो वे अपने पशुओं, पनीर, चमड़ा तथा मांस आदि के बदले में चीजें प्राप्त करते थे। बाड़े में रखे जाने वाले पशुओं के गोबर से बनी खाद भी किसानों के लिए बहुत उपयोगी होती थी। फिर भी किसानों तथा गड़ेरियों के बीच कई बार झगड़े हो जाते थे।

प्रश्न 13.
मेसोपोटामिया का समाज और संस्कृति विभिन्न समुदायों के लोगों एवं संस्कृतियों का मिश्रण थी। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मेसोपोटामिया के समृद्ध कृषि प्रदेश में खानाबदोश समुदायों के झंड के झंड पश्चिमी मरूस्थल से आते रहते थे। ये गड़ेरिये गर्मियों में अपने साथ अपनी भेड़-बकरियाँ ले आते थे। वे फसल काटने वाले मजदूरों अथवा भाड़े के सैनिकों के रूप में आते थे और समृद्ध होकर यहीं बस जाते थे। उनमें से कुछ ने तो यहाँ अपना शासन स्थापित करने की शक्ति भी प्राप्त कर ली थी। ये लोग अक्कदी, एमोराइट, असीरियाई, आर्मीनियन जाति के थे।

मारी के राजा एमोराईट समुदाय के थे। उनकी पोशाक वहाँ के मूल निवासियों से भिन्न होती थी। उन्होंने मेसोपोटामिया के देवी-देवताओं को सम्मान देने के साथ-साथ मारी नगर में स्टेपी क्षेत्र के देवता डैगन के लिए एक मंदिर भी बनवाया । इस प्रकार मेसोपोटामिया का समाज और संस्कृति भिन्न-भिन्न समुदायों के लोगों और संस्कृतियों का मिश्रण थी जिसने वहाँ की सभ्यता में जीवन-शक्ति उत्पन्न की।

प्रश्न 14.
जिमरीलिम के मारी स्थित राजमहल का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
मारी का राजमहल 2.4 हेक्टेयर के क्षेत्र में स्थित एक अत्यंत विशाल भवन था। इसमें 260 कक्ष बने हुए थे। वहाँ के शाही परिवार का निवास स्थान होने के साथ-साथ प्रशासन तथा कीमती धातुओं, आभूषण बनाने का मुख्य केंद्र भी था। अपने समय में यह इतना अधिक प्रसिद्ध था कि उसे देखने के लिए उत्तरी सीरिया का एक छोटा राजा आया था। राजा के भोजन की मेज पर प्रतिदिन भारी मात्रा में खाद्य पदार्थ रोटी, मांस, मछली, फल, मदिरा और बीयर शामिल होता था।

वह संभवतः अपने साथियों के साथ बड़े आँगन में बै भोजन करता था। राजमहल का केवल एक ही प्रवेश द्वारा था जो उत्तर की ओर स्थित था। महल में विशाल खुले प्रांगण सुन्दर पत्थरों से जड़े हुए थे। राजा विदेशी अतिथियों और अपने प्रमुख लोगों से उस कमरे में मिलता था जहाँ भित्ति चित्र बने हुए थे।

प्रश्न 15.
मेसोपोटामिया में लेखन कला का विकास कैसे हुआ?
उत्तर:
बोली जाने वाली ध्वनियों को लिखने के लिए जो संकेत या चिह्न निश्चित किए जाते हैं उसे लिपि कहा जाता है। मेसोपोटामिया के लोगों के पास भी अपनी लिपि थी। उन्होंने तब लिखना आरंभ किया जब समाज को अपने लेन-देन का स्थायी हिसाब रखने की जरूरत पड़ी क्योंकि शहरी जीवन में लेन-देन अलग-अलग समय पर होते थे और करने वाले कई लोग होते थे। सौदा भी कई प्रकार के माल का होता था।

मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखते थे। मेसोपोटामियों में जो पहली पट्टिकाएँ (Tablets) मिली हैं वे लगभग 3200 ई. पू. की है। उनमें चित्र जैसे चिह्न और संख्याएँ दी गई हैं। वहाँ बैलों, मछलियों और रोटियों आदि की लगभग 5000 सूचियाँ मिली हैं। ये सूचियाँ संभवतः वहाँ के दक्षिणी शहर उरुक के मंदिरों में आने वाली तथा वहाँ से बाहर जाने वाली चीजों की है।

प्रश्न 16.
मेसोपोटामिया के लोग लेखन कार्य किस प्रकार करते थे?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के लोग अपना हिसाब-किताब रखने के लिए मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा करते थे। पट्टिका तैयार करने के लिए लिपिक चिकनी मिट्टी को गीला करके गूंध लेते थे। फिर उसे थापकर एक ऐसी पट्टी का रूप देते थे जिसे वह आसानी से अपने एक हाथ में पकड़ सके। वह उसकी सतहों को चिकना बना कर सरकंडे को तीली की तीखी नोक से उसकी नम चिकनी सतह पर कौलाकार चिह्न (cuneiform) बना देता था।

लिखने के बाद पट्टिका को धूप में सुखाया जाता था। सूखने पर पट्टिका पक्की हो जाती थी और मिट्टी के बर्तनों जैसी मजबूत हो जाती थी। उस पर कोई नया चिह या अक्षर नहीं लिखा जा सकता था। इस प्रकार प्रत्येक सौदे के लिए चाहे वह कितना ही छोटा हो, एक अलग पट्टिका की जरूरत होती थी। जब उस पर लिखा हुआ कोई हिसाब गैर-जरूरी हो जाता था तो उस पट्टिका को फेंक दिया जाता था।

प्रश्न 17.
मारी नगर व्यापार तथा समृद्धि की दृष्टि से अद्वितीय था। उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
मारी नगर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थल था। जहाँ से होकर लकड़ी, ताँबा, राँगा, तेल, मदिरा और अन्य सामान नावों द्वारा फरात नदी के मार्ग से दक्षिण और तुर्की, सीरिया तथा लेबनान के उच्च प्रदेशों के बीच लाया तथा ले जाया जाता था। मारी नगर की समृद्धि का आधार यही व्यापार था। दक्षिणी नगरों में घिसाई-पिसाई के पत्थर चक्कियाँ, लकड़ी, शराब तथा तेल ले जाने वाले जलपोत मारी में रूका करते थे।

मारी के अधिकारी लदे हुए सामान की जाँच करते थे और उसमें लदे माल के मूल्य का लगभग 10 प्रतिशत प्रभार वसूल करते थे जो विशेष किस्म की लौकाओं में आता था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ पट्टिकाओं में साइप्रस के द्वीप ‘अलाशिया’ से आने वाले ताँबे का उल्लेख मिला हैं । यह द्वीप उन दिनों ताँबे तथा टिन , के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। इस प्रकार मारी नगर व्यापार तथा समृद्धि की दृष्टि से अद्वितीय था।

प्रश्न 18.
बेबीलोन नगर की मुख्य विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:
331 ई. पू. में सिंकदर से पराजित ह्येने तक बेबीलोन विश्व का एक प्रमुख नगर बना रहा। इस नगर की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  • इसका क्षेत्रफल 850 हैक्टेयर से अधिक था।
  • इसकी चहारदीवारी तिहरी थी।

प्रश्न 19.
गिल्गेमिश का महाकाव्य किस बात पर प्रकाश डालता है। इसमें वर्णित घटना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मेसोपोटामिया के लोगों को अपने नगरों पर बहुत अधिक गर्व था। गिल्गेमिश का महाकाव्य इसी बात पर प्रकाश डालता है। यह काव्य 12 पट्टिकाओं पर लिखा गया था। ऐसा कहा जाता कि गिल्गेमिश ने एनमर्कर के कुछ समय पश्चात् उरुक नगर पर शासन किया था। वह एक महान् योद्धा था। उसने दूर-दूर तक के प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया था। परंतु उसे उस समय गहरा आघात पहुंचा जब उसका एक वीर मित्र अचानक मर गया । दु:खी होकर वह अमरत्व की खोज में निकल पड़ा। उसने संसार भर का चक्कर लगाया। परंतु उसे अपने साहसिक कार्य में सफलता नहीं मिली।

हारकर वह अपने नगर उरूक लौट आया। एक दिन जब अपने आपको सांत्वना देने के लिए शहर की चहारदीवारी के पास चहलकदमी कर रहा था तो उसकी नजर उन पकी ईंटों पर पड़ी जिनसे दीवार की नींव डाली गई थी। वह भावविभोर हो उठा । यहाँ पर ही महाकाव्य की लंबी साहस भरी कथा का अंत हो जाता है। इस प्रकार गिल्गेमिश को अपने नगर में ही सांत्वना मिलती है जिसे उसकी प्रजा ने बनाया था।

प्रश्न 20.
विश्व को मेसोपोटामिया की क्या देन है?
उत्तर:
विश्व को मेसोपोटामिया की सबसे बड़ी देन उसकी कालगणना और गणिक की विद्वतापूर्ण परंपरा है।

  1. 1800 ई. पू. के आसपास की कुछ पट्टिकाएं मिली हैं। इनमें गुणा और भाग की तालिकाएँ, वर्ग तथा वर्गमूल और चक्रवृद्धि ब्याज को सारणियाँ दी गई हैं।
  2. उनमें 2 का वर्गमूल का जो मान दिया गया है वह 2 के वर्गमूल के वास्तविक मान से थोड़ा सा ही भिन्न है।
  3. पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमा के अनुसार एक वर्ष का 12 महीनों में विभाजन, एक महीने का 4 हफ्तों में विभाजन, दिन का 24 घंटों में और एक घंटे का 60 मिनट में विभाजन, यह सब कुछ मेसोपोटामिया से ही हमें मिला है।
  4. मेसोपोटामिया के लोग सूर्य और चंद्र ग्रहण घटित होने का भी हिसाब रखते थे।
  5. वे रात के समय आकाश में तारों और-तारामंडल की स्थिति पर बराबर नजर रखते ये और उनका लेखा-जोखा रखते थे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1
मेसोपोटामिया में राजा के पद का विकास किस प्रकार हुआ ? राजा ने अपना प्रभाव और नियंत्रण बढ़ाने के लिए क्या-क्या पग उठाए?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के तत्कालीन गाँवों में भूमि और पानी के लिए बार-बार झगड़े हुआ करते थे। जब किसी क्षेत्र में दो समुदायों के बीच लंबे समय तक लड़ाई चलती थी तो जीतने वाले मुखिया अपने साथियों एवं अनुयायियों के बीच लूट का माल बाँटकर उन्हें खुश कर देते थे और हारे हुए समूहों के लोगों को बंदी बनाकर अपने साथ ले जाते थे। वे उन्हें अपने चौकीदार या नौकर बना लेते थे। इस प्रकार वे अपना प्रभाव और अनुयायियों की संख्या बढ़ा लेते थे। परंतु युद्ध में विजयी होने वाले ये नेता स्थायी रूप से समुदाय के मुखिया नहीं बने रहते थे। समुदाय का नेतृत्व बदलता रहता था। यही मुखिया आगे चलकर राजा कहलाए।

राजा ने अपना प्रभाव और नियंत्रण बढ़ाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए –

1. राजा के प्रभाव और नियंत्रण में वृद्धि – समुदाय के कल्याण पर अधिक ध्यान देना आरंभ कर दिया । फलस्वरूप नयी-नयी संस्थाएँ और परिपाटियाँ स्थापित हो गई।

2. मंदिरों की शोभा बढ़ाना – विजेता मुखियाओं ने देवताओं को भी बहुमूल्य भेटें अर्पित करनी आरंभ कर दिया। इससे समुदाय के मंदिरों की सुदरंता बढ़ी। उन्होंने लोगों को उत्कृष्ट पत्थर और धातुएँ लाने के लिए दूर-दूर भेजा ताकि मंदिर की शोभा को और अधिक बढ़ाया जा सके। मंदिर की धन-संपदा तथा मंदिरों में आने-जाने वाली वस्तुओं का हिसाब-किताब भी रखा जाने लगा। इस व्यवस्था ने राजा को ऊँचा स्थान दिलाया और समुदाय पर उसका पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।

3. समुदाय की सुरक्षा – प्रभावशाली राजाओं ने ग्रामीणों को अपने पास बसने के लिए भी प्रोत्साहित किया। आसपास अथवा साथ-साथ रहने से लोग स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करने लगे।

4. काम के बदले अनाज-युद्धबंदियों और स्थानीय लोगों के लिए मंदिर तथा शासक का काम करना अनिवार्य था। उन्हें इस काम के बदले अनाज दिया जाता था। सैकड़ों ऐसी राशन-सूचियाँ मिली हैं जिनमें काम करने वाले लोगों के नामों के आगे उन्हें दिए जाने वाले अनाज, कपड़े और तेल आदि की मात्रा लिखी गई है।

प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया के लोगों ने कला, शिल्प तथा ज्ञान में जो सफलताएँ प्राप्त की उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. कला तथा शिल्प – मेसोपोटामिया के लोगों ने कला के क्षेत्र में काफी उन्नति की हुई थी। वे बड़ी सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे और इनसे अपने मंदिरों को सुशोभित करते थे। इसके अतिरिक्त वे सोने-चाँदी के बर्तन तथा आभूषण बनाने में भी बड़े निपुण थे। मेसोपोटामिया के लोग लकड़ी की सुंदर पच्चीकारी वाला फर्नीचर बनाते थे। उनकी मिट्टी तथा ताँबे के बर्तन बनाने की कला भी काफी उन्नत थी।।

2. ज्ञान के क्षेत्र में सफलताएँ – ज्ञान के क्षेत्र में मेसोपोटामिया के लोगों की सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है –

  • मेसोपोटामिया के लोगों ने अंकगणित तथा रेखागणित में बहुत उन्नति कर ली थी। उन्होंने 1, 10 और 60 के लिए विशेष चिह्न बनाए हुए थे।
  • उन्होंने एक घंटे को 60 मिनट और 1 मिनट को 60 सेकेंड में बाँटा हुआ था।
  • रेखागणित में उन्होंने पाइथागोरस के सिद्धांत को जान लिया था।
  • खगोल विद्या अथवा ज्योतिषशास्त्र में भी उनका ज्ञान काफी अधिक था। वे सूर्य निकलने तथा अस्त होने का ठीक समय बता सकते थे। उन्हें सूर्य तथा चंद्र ग्रहण का भी ज्ञान था।
  • उन्होंने चंद्रमा पर आधारित एक पंचांग का आविष्कार किया था।

प्रश्न 3.
दक्षिणी मेसोपोटामिया के शहरीकरण की जानकारी देते हुए वहाँ मंदिरों के निर्माण एवं उनके बढ़ते हुए महत्व पर प्रकाश डालिए।
उतर:
शहरीकरण की शुरूआत-दक्षिणी मेसोपोटामिया में 5000 ई. पू. से बस्तियों का विकास होने लगा था । इन बस्तियों में से कुछ ने प्राचीन शहरों का रूप ले लिया। ये शहर तीन प्रकार के थे –

  • वे शहर जो मंदिरों के चारों और विकसित हुए
  • वे शहर जो व्यापार के केंद्रों के रूप में विकसित हुए तथा
  • शेष शाही शहर

1. मंदिरों का निर्माण और उनका बढ़ता हुआ महत्व – मेसोपोटामिया के दक्षिणी भाग में – बाहर से आकर बसने वाले लोगों ने अपने गाँवों में कुछ चुने हुए स्थानों पर मंदिर बनाने या उनका पुनर्निर्माण करने का काम शुरू किया। सबसे पहला ज्ञात मंदिर एक छोटा सा देवालय था जो कच्ची ईंटों का बना हुआ था। मंदिर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं के निवास स्थान थे। साधारण घरों की दीवारों में यह विशेषता नहीं पाई जाती थी। ‘उर’ चंद्र देवता था और इन्नाना प्रेम व युद्ध की देवी थी। – मंदिर का स्वरूप-मंदिर ईंटों से बनाए जाते थे। समय के साथ इनका आकार बढ़ता गया, क्योंकि उनके खुले आँगन के चारों ओर कई कमरे बने होते थे। कुछ प्रारंभिक मंदिर साधारण घरों जैसे ही होते थे। परंतु मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ विशेष अंतरालों के बाद भीतर और बाहर ही ओर मुड़ी हुई होती थीं। साधारण घरों की दीवारों में यह विशेषता नहीं पाई जाती थी।

देवता पूजा का केंद्र-बिंदु होता था। लोग देवी-देवताओं को अन्न, दही, मछली अर्पित करते थे। आराध्य देव सैद्धांतिक रूप से खेतों, मत्स्य क्षेत्रों और स्थानीय लोगों के पशुधन का स्वामी जाता था।

2. मंदिरों के बढ़ते क्रियाकलाप – समय बीतने पर मंदिर ने अपने क्रियाकलाप बढ़ा लिए।

  • अब उपज को उत्पादित वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया मंदिरों में की जाने लगी।
  • यह व्यापारियों को नियुक्त करने लगा।
  • यह अन्न, हल जोतने वाले पशुओं, रोटी, जौ की शराब, मछली आदि के आवंटन और वितरण का लिखित अभिलेख रखने लगा।
  • यह परिवार से ऊपरी स्तर के उत्पादन का केंद्र बन गया । इस प्रकार इसने मुख्य शहरी संस्था का रूप ले लिया।

प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया के उर नगर की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
उर नगर उन नगरों में से एक था जहाँ सबसे पहले खुदाई की गई थी। वहाँ साधारण घरों की खुदाई 1930 के दशक में सुव्यवस्थित ढंग से की गई। इस नगर की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थी –
1. टेढ़ी-मेढ़ी तथा संकरी गलियाँ – नगर में टेढ़ी-मेढ़ी तथा संकरी गलियाँ पाई गई हैं। इससे यह पता चलता है कि वहाँ के अनेक घरों तक पहिए वाली गाड़ी नहीं पहुंच सकती थी। अनाज के बोरे और ईंधन के गट्टे संभवत: गधों पर लादकर घरों तक लाए जाते थे। पतली व घुमावदार गलियों तथा घरों के भू-खंडों का एक जैसा आकार न होने से यह निष्कर्ष निकलता है कि नगर नियोजन की पद्धति का अभाव था।

2. जल निकासी – जल-निकासी की नालियाँ और मिट्टी की नलिकाएँ उर नगर के घर के भीतरी आँगन में पाई गई हैं। इससे यह पता चलता है कि घरों की छतों का ढलान भीत की ओर होता था और वर्षा का पानी निकास नालियों के माध्यम से भीतरी आँगन में बने हु हौज में ले जाया जाता था। यह संभवत इसलिए किया गया होगा कि तेज वर्षा आने पर छ के बाहर की कच्ची गलियाँ बुरी तरह कीचड़ से न भर जायें।

3. घरों की सफाई – लोग अपने घरों की सफाई के बाद सारा कूड़ा-कचरा गलियों में डा. देते थे। यह आने-जाने वाले लोगों के पैरों के नीचे आता रहता था। बाहर कूड़ा डालते रह से गलियों की सतहें ऊँची उठ जाती थौं । अतः कुछ समय बाद घरों की दहलीजों को भी ऊँ उठाना पड़ता था ताकि वर्षा के बाद गली का कीचड़ बह कर घरों के भीतरी न आ जाए।

4. खिड़कियों का अभाव – कमरों में खिड़कियों नहीं होती थीं। प्रकाश आँगन में खुल. वाले दरवाजों से होकर कमरे में आता था। इससे घरों के परिवारों में गोपनीयता भी बरहती थी।

5. घरों के बारे में अंधविश्वास – घरों के बार में कई तरह के अंधविश्वास प्रचलित है, जो पट्टिकाओं पर लिखे मिले हैं। इनमें से कुछ ये हैं –

  • यदि घर की दहलीज ऊँची हुई हो, तो वह धन-दौलत लाती है।
  • यदि सामने का दरवाजा किसी दूसरे के घर की ओर न खुले तो सौभाग्य लाता है।
  • यदि घर का लकड़ी का मुख्य दरवाजा बाहर की ओर खुले तो पत्नी अपने पति के लिए यंत्रणा का कारण बनती है।
  • शवों का दफन – उर में नगरवासियों के लिए एक कब्रिस्तान था, जिसमें शासकों तथा जन-साधारण की समाधियाँ पाई गई हैं। परंतु कुछ लोग घरों के फर्शों के नीचे भी दफनाए जाते थे।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया के नगरों की सामाजिक व्यवस्था से सम्बन्धित निम्नलिखित बातों की जानकारी दीजिए
(क) उच्च वर्ग की स्थिति
(ख) परिवार का स्वरूप
(ग) विवाह-प्रणाली।
उत्तर:
(क) उच्च वर्ग की स्थिति-मेसोपोटामिया के नगरों की सामाजिक व्यवस्था में एक उच्च या संभ्रांत वर्ग का प्रादुर्भाव हो चुका था। धन-दौलत का अधिकतर भाग समाज के इसी वर्ग में केंद्रित था। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि बहुमूल्य वस्तुएँ विशाल उर में राजा रानियों की कुछ कब्रों या समाधियों में उनके साथ दफनाई गई मिली हैं। इन वस्तुओं में आभूषण, सोने के पात्र, सफेद सीपियाँ और लाजवर्द जड़े हुए लकड़ी के वाद्य यंत्र, सोने के सजावटी खंजर आदि शामिल हैं।

(ख) परिवार का स्वरूप-विवहा, उत्तराधिकार आदि के मामलों से संबंधित कानूनी दस्तावेजों से पता चलता है कि मेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार को आदर्श माना जाता था। फिर भी विवाहित पुत्र और उसका परिवार अपने माता-पिता के साथ ही रहा करता था। पिता परिवार का मुखिया होता था।

(ग) विवाह प्रणाली-विवाह करने की इच्छा के बारे में घोषणा की जाती थी। वधू के माता-पिता उसके विवाह के लिए अपनी सहमति देते थे। उसके बाद वर पक्ष के लोग वधू को कुछ उपहार देते थे। विवाह की रस्म पूरी हो जाने पर दोनों पक्ष उपहारों का आदान-प्रदान करते थे। वे एक साथ बैठकर भोजन करते थे और मंदिर में जाकर भेंट चढ़ाते। जब नव वधू को उसकी सास लेने आती थी, तब वधू को उसके पिता द्वारा उसके उत्तराधिकार का हिस्सा दे दिया जाता था। परंतु पिता का घर, पशुधन, खेत आदि उसके पुत्रों को ही मिलते थे।

प्रश्न 6.
मेसोपोटामिया के भूगोल की विशेषताएँ बताइए।।
उत्तर:
मेसोपोटामिया के भूगोल को समझने के लिए आज के इराक की भौगोलिक विशेषताओं को जान लेना चाहिए । इराक एक भौगोलिक विविधता वाला देश है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. इसके पूर्वोत्तर भाग में हरे-भरे, ऊँचे-नीचे मैदान हैं। ये मैदान धीरे-धीरे वृक्षाच्छादित पर्वत श्रृंखला के रूप में फैलते जाते हैं साथ ही यहाँ स्वच्छ झरने तथा जंगली फूल भी पाये जाते हैं।
यहाँ अच्छी फसल के लिए पर्याप्त वर्षा हो जाती है।

2. उत्तर में ऊँची भूमि है जहाँ ‘स्टेपी’ घास के मैदान हैं। इस प्रदेश में पशुपालन आजीविका का मुख्य साधन है। सर्दियों की वर्षा के बाद भेड़-बकरियाँ यहाँ उगने वाली छोटी-छोटी झाड़ियों और घास से अपना भरण-पोषण करती हैं।
पूर्व में दजला की सहायक नदियाँ परिवहन का अच्छा साधन हैं।

3. देश का दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है। इस रेगिस्तान में फरात और दजला नदियाँ बहती हैं। ये नदियाँ पहाड़ों से निकलकर अपने साथ उपजाऊ बारीक मिट्टी लाती रही हैं। जब इन नदियों में बाद आती है अथवा जब इनके पानी को सिंचाई के लिए खेतों में लाया जाता है तब इनके द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी खेतों में जमा हो जाती है।

4. फरात नदी रेगिस्तान में प्रवेश करने के बाद कई धाराओं में बंट जाती है। कभी-कभी इन धाराओं में बाढ़ आ जाती है। प्राचीन काल में ये धाराएं सिंचाई की नहरों का काम देती थीं। ‘ इनसे आवश्यकता पड़ने पर गेहूँ, जौ और मटर या मसूर के खेतों की सिंचाई की जाती थी। इसलिए वर्षा की कमी के बावजूद दक्षिणी मेसोपोटामिया की खेती प्राचीन विश्व में सबसे अधिक उपज देने वाली थी।

5. खेती के अतिरिक्त स्टेपी घास के मैदानों, पूर्वोत्तरी मैदानों और पहाड़ों की ढालों पर भेड़-बकरियाँ पाली जाती थीं। इनसे भारी मात्रा में मांस, दूध और ऊन प्राप्त होता था। यहाँ की नदियों में मछलियों की भरमार थी। गर्मियों में खजूर के पेड़ खूब फल देते थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मेसोपोटामिया के उर देवता थे ………………………
(क) सूर्य
(ख) चंद्र
(ग) जल
(घ) पवन
उत्तर:
(ख) चंद्र

प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया की देवी इन्नाना का संबंध था ………………………….
(क) प्रेम और युद्ध
(ख) करुणा
(ग) अहिंसा
(घ) विद्या एवं धन
उत्तर:
(क) प्रेम और युद्ध

प्रश्न 3.
असुरबनिपाल कहाँ का शासक था?
(क) असीरिया
(ख) क्रीट
(ग) रोम
(घ) चीन
उत्तर:
(क) असीरिया

प्रश्न 4.
बेबीलोनिया के किस शासक ने अपनी पुत्री को महिला पुरोहित के रूप में प्रतिष्ठित किया?
(क) असुरबनीपाल
(ख) नैवोपोलासार
(ग) नैबोनिडस
(घ) गिल्गेमिश
उत्तर:
(ग) नैबोनिडस

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया किन दो नदियों के बीच स्थित है?
(क) हाबुर और दजला नदी
(ख) बालिख और फरात नदी
(ग) दजला और फरात नदी
(घ) हाबुर और बालिख नदी
उत्तर:
(ग) दजला और फरात नदी

प्रश्न 6.
मेसोपोटामिया के लिपि किस प्रकार की थी?
(क) चित्रलिपि
(ख) कीलाक्षर लिपी
(ग) ज्यामितीय लिपी
(ब) काजी लिपि
उत्तर:
(ख) कीलाक्षर लिपी

प्रश्न 7.
मेसोपोटामिया में परिवार किस प्रकार के थे?
(क) एकल परिवार
(ख) संयुक्त परिवार
(ग) सामुदायिक परिवार
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) एकल परिवार

प्रश्न 8.
मेसोपोटामिया के किस भाग में सबसे पहले नगरों एवं लेखन प्रणाली का प्रादुर्भाव हुआ?
(क) उत्तर के स्टेपी घास के मैदान में
(ख) दक्षिणी रेगिस्तानी भाग में
(ग) पूर्व के दजला की घाटी में
(घ) पश्चिमी भाग में
उत्तर:
(ख) दक्षिणी रेगिस्तानी भाग में

प्रश्न 9.
गिलगेमिश महाकाव्य का संबंध किस प्राचीन सभ्यता से है?
(क) मिस्र
(खं) मेसोपोटामिया
(ग) ईरान
(घ) यूनान
उत्तर:
(खं) मेसोपोटामिया

प्रश्न 10.
मेसोपोटामिया के लोग लिखने के लिये किस चीज का प्रयोग करते थे?
(क) ताम्र पत्रों का
(ख) कागज का
(ग) मिट्टी की पट्टिकाओं का
(घ) ताड़पत्रों का
उत्तर:
(ग) मिट्टी की पट्टिकाओं का

प्रश्न 11.
मेसोपोटामिया शब्द की उत्पत्ति हुई ………………………..
(क) यूनानी भाषा से
(ख) लैटिन भाषा से
(ग) यूनानी तथा लैटिन भाषा से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) यूनानी भाषा से

प्रश्न 12.
मेसोपोटामिया फरात तथा दजला नदियों के बीच का हिस्सा है ………………………..
(क) ईरान का
(ख) इराक का
(ग) सीरिया का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) इराक का

प्रश्न 13.
मेसोपोटामिया की सभ्यता जानी जाती है ……………………….
(क) समृद्धि तथा शहरी जीवन के लिए
(ख) विशाल तथा समृद्ध साहित्य के लिए
(ग) गणित तथा खगोल विद्या के लिए
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 14.
बेबीलोन मेसोपोटामिया का महत्वपूर्ण शहर बन गया ………………………..
(क) 5000 ई.पू. के बाद
(ख) 2000 ई.पू. के बाद
(ग) 100 ईस्वी में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) 2000 ई.पू. के बाद

प्रश्न 15.
1400 ई.पू. अरामाइक भाषा मिलती-जुलती थी ………………………
(क) सुमेरी भाषा से
(ख) अक्कदी भाषा से
(ग) हिब्रु भाषा से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) हिब्रु भाषा से

प्रश्न 16.
मेसोपोटामिया में पुरातत्वीय खोजों का प्रारंभ हुआ।
(क) 1840 के दशक में
(ख) 1000 ई.पू. में
(ग) 5000 ई.पू. में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) 1840 के दशक में

प्रश्न 17.
मेसोपोटामिया में खेती शुरू हुई …………………….
(क) 5000 से 4000 ई.पू.
(ख) 10,000 से 9,000 ई.पू.
(ग) 7000 से 6000 ई.पू.
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) 7000 से 6000 ई.पू.

प्रश्न 18.
मेसोपोटामिया के प्राचीनतम नगरों का निर्माण काँस्य युग अर्थात् ……………………….
(क) लगभग 3000 ई.पू. हुआ
(ख) लगभग 2000 ई.पू. में हुआ
(ग) लगभग 1000 ई.पू. में हुआ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) लगभग 3000 ई.पू. हुआ

प्रश्न 19.
यूरोप के लोगों के लिए मेसोपोटामिया महत्वपूर्ण था क्योंकि बाइबिल के प्रथम भाग ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में इसका उल्लेख किया गया है। ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ की किस पुस्तक में शिमार अर्थात् सुमेर के विषय में कहा गया है?
(क) ओरिजिन ऑफ स्पीसीज
(ख) बुक ऑफ जेनेसिस
(ग) ऑन द डिगनिटी ऑफ मैन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) बुक ऑफ जेनेसिस

प्रश्न 20.
श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण विशेषताएँ हैं ………………………
(क) ग्रामीण जीवन की
(ख) प्राचीन काल की
(ग) शहरी जीवन की
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(ग) शहरी जीवन की

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 7 तोड़ती पत्थर

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 7 तोड़ती पत्थर (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)

 

तोड़ती पत्थर पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

Todti Patthar Poem Questions And Answers Bihar Board Class 11th प्रश्न 1.
पत्थर तोड़नेवाली स्त्री का परिचय कवि ने किस तरह किया है?
उत्तर-
तोड़ती पत्थर वाली मजदूरिन एक साँवली कसे बदन वाली युवती है। वह चिलचिलाती गर्मी की धूप में हथौड़े से इलाहाबाद की सड़क के किनार एक छायाहीन वृक्ष के नीच पत्थर तोड़ रही है। उसके माथे से पसीने की बूंदे दुलक रही हैं। मजदूरिन अपने श्रम-साध्य काम में पूर्ण तन्मयता से व्यस्त है।

Todti Patthar Question Answers Bihar Board Class 11th प्रश्न 2.
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन’
निराला ने पत्थर तोड़ने वाली स्त्री का ऐसा अंकन क्यों किया है? आपके विचार से ऐसा लिखने की क्या सार्थकता है?
उत्तर-
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपनी ‘तोड़ती पत्थर’ शीर्षक कविता में एक मजदूरनी के रूप एवं कार्य का चित्रण किया है, जो साँवली और जवान है तथा आँखे नीचे झुकाए पूर्ण तन्मयता एवं निष्ठा से अपने कार्य में व्यस्त है।

कवि ने उक्त पत्थर वाली स्त्री के विषय में इस प्रकार चित्र इसलिए प्रस्तुत किया है कि पत्थर तोड़ने जैसे कठिन र्का को सम्पादित करने के लिए सुगठित स्वस्थ शरीर को होना नितान्त आवश्यक है तथा सुगठित शरीर ही श्रमसाध्य कार्य हेतु सक्षम होता है। साथ ही तीक्ष्ण धूप में शरीर का साँवला होना स्वाभाविक है। कवि ने कार्य में उसकी पूर्ण तन्मयता का भी सुन्दर चित्रण किया है। मेरे विचार से ऐसा लिखना सर्वथा उचित है।

Todti Patthar Hindi Poem Question Answers Bihar Board Class 11th प्रश्न 3.
स्त्री अपने गुरू हथौड़े से किस पर प्रहार कर रही है।
उत्तर-
स्त्री (मजदूरिन) अपने बड़े हथौड़े से समाज की आर्थिक विषमता पर प्रहार कर रही है। वह धूप की झुलसाने वाली भीषण गर्मी के कष्टदायक परिवेश मे पत्थर तोड़ने का कार्य कर रही है। उसके सामने ही अमीरों को सुख-सुविधा प्रदान करने वाली विशाल अट्टालिकाएँ खड़ी हैं जो उसकी गरीबी पर व्यंग्य करती प्रतीत होती हैं। एक ओर उस स्त्री के मार्मिक तथा कठोर संघर्ष की व्यथा-कथा है, दूसरी ओर अमीरों की विशाल अट्टालिकाओं एवं सुखसुविधाओं का चित्रण है।

इस प्रकार प्रस्तुत पंक्ति देश की आर्थिक विषमता का सजीव चित्रण है। इसके साथ ही इस विषमता पर एक चुभता व्यंग्य भी है।

Torti Pathar Question Answer Bihar Board Class 11th प्रश्न 4.
कवि को अपनी ओर देखते हुए देखकर स्त्री सामने खड़े भवन की ओर देखने लगती है, ऐसा क्यों?
उत्तर-
कवि को अपनी ओर देखते हुए देखकर स्त्री सामने खड़े भवन की ओर देखने लगती है। वह पत्थर तोड़ना बंद कर देती है। वह सामने खड़े विशाल भवन की ओर देखने लगती है। ऐसा कर वह समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता की ओर संकेत करती है। कवि उसके भाव को समझ जाता है।

प्रश्न 5.
‘छिन्नतार’ का क्या अर्थ है? कविता के संदर्भ में स्पष्ट करें।
उत्तर-
कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने ‘तोड़ती पत्थर’ शीर्षक कविता में पत्थर तोड़ने वाली गरीब मजदूरनी की मार्मिक एवं दारुण स्थिति का यथार्थ वर्णन प्रस्तुत किया है। कवि पत्थर तोड़ती मजदूरनी को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से देखता है। वह भी कवि को एक क्षण के लिए देखती है। वह सामने के भव्य भवन को भी देख लेती है और फिर अपने कार्य में लग जाती है। उसकी विवशता ऐसी है मानों कोई व्यक्ति मार खाकर भी न रोए। वह चाहकर भी अपनी व्यथा और विवशता कवि की हृदय-वीणा के तार को छिन्न-भिन्न कर देती है।

प्रश्न 6.
‘देखकर कोई नहीं
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
इन पंक्तियों का मर्म उद्घाटित करें।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ महाप्राण “निराला’ रचित ‘तोड़ती पत्थर’ कविता से उद्धत हैं। इन पंक्तियों में कवि ने शोषण और दमन पर पलती व्यवस्था के अन्याय और वंचनापूर्ण व्यूहों में पिसती हुई पत्थर तोड़ने वाली गरीब मजदूरनी का मार्मिक स्थिति को वर्णन किया है। कवि पत्थर तोड़ती मजदूरनी पर सहानुभूति पूर्ण नजर डालता है। वह भी एक क्षणिक दृष्टि से कवि की ओर देखकर अपने काम में इस प्रकार मग्न हो जाती है जैसे उसने कवि को देखा ही नहीं।

वह सामने विशाल अट्टालिका पर भी नजर डालकर समाज में व्याप्त अमीरी-गरीबी की खाई से भी कवि को रू-बरू कराती है। उसकी नजरों में संघर्षपूर्ण दीन-हीन जीवन का अक्स सहज ही दृष्टि गोचर होता है। उसकी विवशता ऐसी है मानो कोई मार खाकर भी न रोए। सामाजिक विषमता का दंश मूक होकर सहने को गरीब मजदूरनी अभिशप्त है।

प्रश्न 7.
सजा सहज सितार सुनी मैंने वह नही जो थी सुनी झंकार’ यहाँ किस सितार की ओर संकेत है? इन पंक्तियों का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ कविवर ‘निराला’ रचित ‘तोड़ती पत्थर’ कविता की हैं। कवि इलाहाबाद के जनपथ पर भीषण गर्मी में पत्थर तोड़ती मजदूरनी को देखता है। वह भी विवश दृष्टि से कवि को एक क्षण के लिए चुपचाप देख लेती है। फिर, अपने कार्य में लग जाती है। वह कुछ बोलती नहीं, फिर भी कवि उसके हृदय सितार से झंकृत वेदना की मार्मिकता को समझ ही लेता है।

कवि मजदूरनी के हृदय सितार से झंकृत वेदना जो सामाजिक विषमता की कहानी कहती हुई प्रतीत होती है, को दर्शाना चाहता है। कवि सहज अपने हृदय के वीणा के तारों से उस शोषण की प्रतिमूर्ति मजदूरनी के हृदय के तारों से जोड़कर उसके दारूण-व्यथा की अनुभूति कर लेता है।

प्रश्न 8.
एक क्षण के बाद वह काँपी सुधार, [Board Model 2009(A)]
दुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों, कहा
‘मैं तोड़ती पत्थर।’
इन पंक्तियां की सप्रसंग व्याख्या करें।
उत्तर-
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्तियाँ हिन्दी के मुक्तछंद के प्रथम प्रयोक्ता, छायावाद के उन्नायक कवि शिरोमणि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला रचित ‘तोड़ती पत्थर’ शीर्षक कविता से उद्धत हैं। इस कविता में कवि ने शोषण और दमन पर पलती व्यवस्था के अन्याय और वंचनापूर्ण व्यूहों में पिसती ‘ मानवता का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है।

कवि इलाहाबाद के जनपथ पर भीषण गर्मी में पत्थर तोड़ती मजदूरनी को देखता है। वह बिना छायावाले एक पेड़ के नीचे पत्थर तोड़ने का कार्य कर रही थी। उसके सामने वृक्षों के समूह और विशाल अट्टालिकाएँ और प्राचीर थे। तेज और तीखी धूप से धरती रूई की तरह जल रही थी। कवि पत्थर तोड़ती मजदूरनी को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से देखता है। वह भी कवि पर एक नजर डालकर सामने के भव्य भावना को भी देख लेती है। वह मजदूरनी एक क्षण के लिए सिहर उठती है। उसके माथे से पसीने की बूंदे गिर पड़ती हैं। वह फिर अपने कार्य में चुपचाप लग जाती है और मौन होकर भी यह बता देती है कि वह पत्थर तोड़ रही है।

प्रश्न 9.
कविता की अंतिम पंक्ति है- ‘मौ तोड़ती पत्थर’ उससे पूर्व तीन बार ‘वह तोड़ती पत्थर’ का प्रयोग हुआ है। इस अंतिम पंक्ति का वैशिष्ट्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
कवि शिरामणि निराला ने अपनी बहुचर्चित कविता ‘तोड़ती पत्थर’ में एक गरीब मजदूरनी की विवश वेदना और व्यथा का चित्रण किया है। कवि ने इलाहाबाद के जनपथ पर गर्मी की झुलसती लू और धूप में वह मजदूरनी हथौड़े पत्थर से तोड़ती रहती है। कवि उसे सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से देखता है। वह मजदूरनी कवि को एक क्षण के लिए देखकर भी नहीं देखती और पसीने से लथपथ होकर पत्थर तोड़ती रहती है।

गरीब मजदूरनी अंतिम पंक्ति में मौन होकर भी यह बता देती है कि वह पत्थर तोड़ रही है। उसने परोक्ष रूप से हमारी शोषणपूर्ण तथा घोर विषम अर्थव्यवस्था पर व्यंग की करारी चोट भी की है और हमें यह संदेश दिया है कि इस आर्थिक विषमताजन्य स्थिति और परिस्थिति को समाप्त करने की दिशा में सही सोच का परिचय दें। सही सोच से ही समतामूलक अर्थव्यवस्था पर आधारित समाज प्रगति के सोपान पर निरन्तर अग्रसर हो सकता है। मजदूरनी की वे सांकेतिक वैचारिक बिन्दु सचमुच बिन्दु सचमुच सराहनीय है।

प्रश्न 10.
कविता का भावार्थ अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
‘तोड़ती पत्थर’ कविवर निराला रचित एक यथार्थवादी कविता है। इस कविता में कवि ने एक गरीब मजदूरिन की विवशता और कठोर श्रम-साधना का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है। कवि एक दिन इलाहाबाद के एक राजपथ पर एक पेड़ के नीचे एक दीन-हीन संघर्षरत मजदूरिन को पत्थर तोड़ते देखता है। वह जिस पेड़ के नीचे बैठी है वह छायादार नहीं है। गर्मी के ताप-भरे दिन है। चढ़ती धूप काफी तेज है। दिन का स्वरूप गर्मी से तमतमाया लगता है। लू की झुलसानेवाली लपटे काफी गर्म हैं। भीषण गर्मी में जमीन रूई की तरह जल रही है।

इस कष्टदायक परिवेश में वह बेचारी पत्थर तोड़ने का श्रमसाध्य कार्य कर रही है। वह मजदूरिन श्यामवर्ण युवती है। वह चुपचाप नतनयन हो पत्थर तोड़ने का कार्य कर रही है। उसके सामने ही अमीरों को सुख-सुविधा प्रदान करनेवाली विशाल अट्टालिकाएँ खड़ी हैं जो उसकी गरीबी पर व्यंग्य करती प्रतीत होती हैं। कवि उस मजदूरिन को सहानुभूति भरी दृष्टि से देखता है। वह मजदूरिन भी एक क्षण के लिए उस सहज मूक दृष्टि से देख लेती है। .

कवि को लगता है कि उसने देखकर भी उसे न देखा हो। कवि उसके टूटे दिल की वीणा की झंकार को सुन लेता है। वह क्षण भर के लिए कांप-सी उठती है। श्रम-लथ उस मजदूरिन के माथे से पसीने की बूंद टपक पड़ती हैं। पसीने की वे बूंदे उसे कठोर श्रम और संघर्ष साधना का परिचय देती है और यह बताती है कि उस गरीब मजदूरिन का यह संघर्ष कितना मार्मिक और कितना कठोर है। संपूर्ण कतिवा हमारे देश की आर्थिक विषमता पर एक चूमता हुआ व्यंग्य है।

तोड़ती पत्थर भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची लिखें पथ, पेड़, दिवा, भू, पत्थर, गर्द, सुधार
उत्तर-
पथ-मार्ग, पेड़-वृक्ष, दिवा-दिन भू-पृथ्वी, पत्थर-शिला, गदै-मैला, सुधार-सुरम्य।

प्रश्न 2.
‘देखा मुझे उस दृष्टि से यहाँ ‘दृष्टि’ संज्ञा है या विशेषण।
उत्तर-
संज्ञा।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों से विशेष्य, विशेषण अलग करे श्याम तन, नत नयन, गम हथौड़ा, सहज सितार
उत्तर-

  • विशेष्य – विशेषण
  • तन – श्याम
  • नयन – नत
  • हथौड़ा – गुरू
  • सितार – सहज

प्रश्न 4.
कविता से सर्वनाम पदों को चुनकर लिखें।
उत्तर-
जिन पदों का संज्ञा के स्थान पर होता है उन्हें सर्वनाम कहते हैं। ‘तोड़ती पत्थर’ शीर्षक कविता में निम्नलिखित सर्वनाम आये हैं- वह, उसे, मैंने, जिसके, कोई, मुझे, उस और जो।

प्रश्न 5.
‘एक क्षण के बाद वह कॉपी सुधर’ यहाँ सुघर क्या है?
उत्तर-
यहाँ इस पंक्ति में प्रयुक्त सुधर, जिसका अर्थ सुगठित, चतुर, होशियार, सुन्दर, संडोल आदि है। यहाँ प्रयुक्त सुघर शब्द, पत्थर तोड़ती स्त्री के ‘विशेषण’ के रूप में प्रयुक्त हुआ है।

प्रश्न 6.
कविता से अनुप्रास, रूपक और उपमा और अलंकारों के उदाहरण चुनकर लिखें।
उत्तर-

  • तोड़ती पत्थर – अनुप्रास
  • श्याम तन – रूपक, उपमा (दोनो)
  • तरु मालिका अट्टालिका प्राकार – अनुप्रास
  • लू-रूई ज्यों – उपमा
  • सजा सहज सितार – अनुप्रास

प्रश्न 7.
कविता एक प्रगीत है। गीत और प्रगीत में क्या अन्तर है?
उत्तर-
शास्त्रीय दृष्टिकोण से गेय पद गीत कहलाते हैं। इनमें शब्द-योजना संगीत के स्वर विधान के अनुरूप होती है। गीतों में मसृण भावों की अभिव्यक्ति होती है। आधुनिक काल में निरालाजी की कृपा से छंदबन्ध टूटने के बाद गीत लिखने का प्रचलन बढ़ गया किन्तु गेयता शून्य हो गयी। प्रगीत गीत की अपेक्षा कुछ विशिष्टता लिये होता है। इसमें किसी समस्या को, विचार को, सशक्त ढंग से संकेतो के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।

गीत और प्रगीत दोनों में तुक का आग्रह होता है। क्योंकि बिना तुक के गेयता संभव नहीं है। गीत जहाँ हृदय को राहत पहुँचाते हैं। प्रगीत हृदय को उद्वेलित करते हैं। मनकों मथ डालते हैं।

गीतों और प्रगीतों के कलेवर की लम्बाई वर्णित विषय की गम्भीरता पर निर्भर है।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

तोड़ती पत्थर लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तोड़ती पत्थर में प्रकृति या ग्रीष्म का रूप बतायें।
उत्तर-
‘तोड़ती पत्थर’ कविता में प्रकृति वर्णन की दृष्टि से ग्रीष्म का वर्णन है। मजदूरनी पत्थर तोड़ती है। धीरे-धीरे दोपहरी हो आती है। प्रचण्ड धूप के कारण दिन का रूप क्रोध में तमतमाये व्यक्ति के समान अनुभव होता है। झुलसाने वाली लू चलने लगती है। धरती रूई की तरह जलती प्रतीत होती है। हवा की झोंकों के कारण उड़ने वाली धूप आग की चिनगारी की तरह तप्त हो जाती है। ऐसी दोपहरी में भी बेचारी मजदूरनी पत्थर तोड़ती रहती है।

प्रश्न 2.
तोड़ती पत्थर शीर्षक कविता में किस बात का चित्रण हुआ है?
उत्तर-
प्रस्तुत कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित प्रगतिवादी कविता है। इस कविता के द्वारा कवि ने शोषित वर्ग का मर्मस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही साथ आर्थिक वर्ग-वैषम्य का भी हृदयग्राही चित्र खींचा है। समाज की अर्थव्यवस्था के आधार पर दो वर्ग हुए हैं-शोषित और शोषक। यहाँ दोनों वर्गों का बड़ा सजीव चित्र निराला ने खींचा है। निराला ने निरीह शोषित वर्ग के प्रति अपनी सारी सहानुभूति उड़ेल दी है। मजदूरिन को प्रचंड गर्मी में पत्थर तोड़ते देख कवि मौन नहीं रह पाता। वह अपनी सारी करुणा और संवेदना प्रस्तुत कविता में प्रकट कर देता है।

तोड़ती पत्थर अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निराला जी ने पत्थर तोड़ने वाली को कहाँ देखा था?
उत्तर-
इलाहाबाद के किसी पथ पर।

प्रश्न 2.
मजदूरनी की शारीरिक बनावट कैसी थी?

प्रश्न 3.
मजदूरनी को कवि ने कब देखा था?
उत्तर-
निराला जी मजदूरनी को ग्रीष्म ऋतु की दोपहर में (झुलसाने वाली लू के समय) देखा था।

प्रश्न 4.
मजदूरनी पत्थर तोड़ने का काम क्यों करती थी।
उत्तर-
पेट की भूख मिटाने के लिए मजदूरनी पत्थर तोड़ने का काम कर रही थी।

प्रश्न 5.
मजदूरनी जहाँ पत्थर तोड़ रही थी वहा कवि ने और क्या देखा?
उत्तर-
कविता ने वहाँ एक विशाल भवन को देखा। इस समय कवि ने देश की खराब आर्थिक स्थिति का अनुभव किया। वह देश की जनता की निर्धनता की प्रति बहुत चिंतित हुआ।

प्रश्न 6.
तोड़ती पत्थर शीर्षक कविता में किस बात की अभिव्यक्ति हुयी है?
उत्तर-
तोड़ती पत्थर शीर्षक कविता में प्रगतिवादी चेतना को अभिव्यक्ति हुयी है।

प्रश्न 7.
तोड़ती पत्थर शीर्षक कविता में वर्णित मजदूरिन पत्थर कहाँ तोड़ती है?
उत्तर-
कविता में वर्णित मजदूरिन इलाहाबाद की सड़क पर पत्थर तोड़ती है।

प्रश्न 8.
मजदूरिन के जीवन यथार्थ के चित्रण के माध्यम से कविता में किस बात पर प्रकाश डाला गया है?
उत्तर-
तोड़ती पत्थर शीर्षक कविता में मजदूरिन के जीवन यथार्थ के चित्रण के माध्यम से अर्थजन्य सामाजिक विषमता और आर्थिक बदहाली पर प्रकाश डाला गया है।

तोड़ती पत्थर वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

प्रश्न 1.
तोड़ती पत्थर के कवि हैं?
(क) त्रिलोच
(ख) दिनकर
(ग) सुमित्रानन्दन पंत
(घ) निराला
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 2.
‘निराला’ का जन्म कब हुआ था?
(क) 1897 ई.
(ख) 1890 ई.
(ग) 1880 ई.
(घ) 1885 ई.
उत्तर-
(क)

प्रश्न 3.
‘निराला’ का जन्मस्थान था?
(क) बंगाल
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) मध्यप्रदेश
(घ) दिल्ली
उत्तर-
(क)

प्रश्न 4.
‘निराला के पिता का नाम था
(क) रामानुज त्रिपाठी
(ख) केदारनाथ त्रिपाठी
(ग) पं० रामसहाय त्रिपाठी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 5.
‘निराला’ की विशेष अभिरुचि थी
(क) संगीत में
(ख) कुश्ती में
(ग) सितारवादक में
(घ) तबला बादन में
उत्तर-
(क और ख)

प्रश्न 6.
“निराला’ की पहली कविता है?
(क) जूही की कली
(ख) तोड़ती पत्थर
(ग) सड़क पर मौत
(घ) कोई नहीं
उत्तर-
(क)

प्रश्न 7.
पत्थर तोड़ती मजदूरनी को कवि ने कहाँ देखा था?
(क) इलाहाबाद के पथ पर
(ख) इलाजाबाद की अट्टालिकाओं में
(ग) इलाहाबाद की सड़कों पर
(घ) इलाहाबाद की गलियों में
उत्तर-
(क)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न 1.
निराला रचनावली ………….. दिल्ली से आठ खंडों में प्रकाशित है।
उत्तर-
राजकमल प्रकाशन।

प्रश्न 2.
कवि निराल की तोड़ती पत्थर एक गरीब मजदूरनी की …………. का दर्पण है।
उत्तर-
व्यथा-कथा

प्रश्न 3.
मजदूरीन अपने ……………. काम में पूर्णतन्मयता से व्यस्त है।
उत्तर-
श्रम-साध्य।

प्रश्न 4.
कवि ने तोड़ती पत्थर में मजदूरीन का सुन्दर …………….. प्रस्तुत किया है।
उत्तर-
चित्रण।

प्रश्न 5.
तोड़ती पत्थर में …………… का सजीव चित्रण है।
उत्तर-
आर्थिक विषमता।

प्रश्न 6.
निराला मुख्यतः ……………. के कवि हैं।
उत्तर-
छायावाद।

प्रश्न 7.
निराला ने शोषकों के अत्याचार को ……………….. किया है।
उत्तर-
उजागर।

प्रश्न 8.
तोड़ती पत्थर में मजदूरिन की ……………… का वर्णन किया गया है।
उत्तर-
मार्मिक स्थिति।

प्रश्न 9.
सामाजिक विषमता का दंश मूक होकर रहने को गरीब मजदूरिन ……………. है।
उत्तर-
अभिशप्त।

तोड़ती पत्थर कवि परिचय – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ (1897-1961)

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 1899 ई. में बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल राज्य में हुआ था। इनके पिता पं. रामसहाय त्रिपाठी महिषादल राज्य के कर्मचारी थे। तीन वर्ष की आयु में ही निराला जी की माता का देहांत हो गया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बंगाल में हुई। बंगाल में रहते हुए ही उन्होंने संस्कृत, बंगला, संगीत और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया। 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह मनोहरा देवी से हुआ, किंतु उनका पारिवारिक जीवन सुखमय नहीं रहा।

1918 ई. में उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया और उसके बाद पिता, चाचा और चचेरे भाई भी एक-एक करके उन्हें छोड़कर इस दुनिया से चल बसे। उनकी प्रिय पुत्री सरोज की मृत्यु ने तो उनके हृदय के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। इस प्रकार निराला जीवन-भर क्रूर परिस्थितियों से संघर्ष करते रहे। 15 अक्टूबर, 1961 ई. को इनका स्वर्गवास हो गया – रचनाएँ-निराला का रचना संसार बहुत विस्तृत है। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों ही विधओं में लिखा है। उनकी रचनाएँ निराला रचनावली के आठ खंडों में प्रकाशित हैं। निराला अपनी कुछ कविताओं के कारण बहुत प्रसिद्धि प्राप्त कवि हो गए हैं।

‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘तुलसीदास’ उनकी प्रबंधात्मक कविताएँ हैं, जिनका साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है। ‘सरोज-स्मृति’ हिन्दी की अकेली कविता है जो किसी पिता ने अपनी पुत्री की मृत्यु पर लिखी है। निराला की प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं-अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना, गीतगुंज। इन ग्रन्थों में अनेक ऐसी कविताएँ हैं जो निराला को जन कवि बना देती हैं। जिनकी लोगों ने अपने कंठ में स्थान दिया है। यथा-जूही की कली, तोड़ती पत्थर, कुकुरमुत्ता, भिक्षुक, मै अकेला, बादल-राग आदि।

भाषा-शैली-काव्य की पुरानी परम्पराओं को त्याग कर काव्य-शिल्प के स्तर पर भी विद्राही। तेवर अपनाते हुए निराला जी ने काव्य-शैली को नई दिशा प्रदान की। उनके.काव्य में भाषा का कसाव, शब्दों की मितव्ययिता एवं अर्थ की प्रधानता है। संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों के साथ ही संधि-सामसयुक्त शब्दों का भी प्रयोग निराला जी ने किया है।

काव्यगत विशेषताएँ-निराला छायावाद के महत्त्वपूर्ण चार कवियों में से एक हैं। उनकी छायावादी कविताओं में प्रेम, प्रकृति-चित्रण तथा रहस्यवाद जैसी प्रवृत्तियों को मिलती हैं। बाद में निराला प्रगतिवाद की ओर झुक गए थे ! प्रगतिवादी विचारधारा के अनुसार उन्होंने शोषकों के विरोध और शोषितों के पक्ष में अनेक कविताएँ लिखी हैं, जिनमें, ‘विधवा’, “भिक्षुक’ और ‘तोड़ती पत्थर’ जैसी कविताओं में शोषितों के प्रति सहानुभूति है, तो ‘जागो फिर एक बार’ जैसी कविताओं में कवि दबे-कुचलों को जगाने का आह्मन करता है-

जागो फिर एक बार।
सिंह की गोद से
दीनता रे शिशु कौन?
मौन भी क्या रहती वह
रहते प्राण? रे अंजान।
एक मेषमाता ही
रहती है निर्निमेष
दुर्बल वह

इन पंक्तियों से कवि राष्ट्रीयता को भी अभिव्यक्त करता है। ‘तोड़ती पत्थर’ कविता के पत्थर तोड़ने वाली की कार्य करने की परिस्थिति को देखकर किसका हृदय-द्रवीभूत नहीं हो जाएगा।

निराला की प्रकृति संबंधी कविताएँ भी प्रकृति के मनोरम रूप प्रस्तुत करती हैं। उनकी ‘संध्या-सुंदरी’ कविता प्रकृति के मनोहर रूप प्रस्तुत करती है। बादल राग में भी प्रकृति का स्वाभाविक वर्णन करता है।

‘खुला आसमान’ कविता में प्रकृति की बहुत सरल भाषा में ऐसा वर्णन है, मानो दृश्यावली की रील चल रही हो।

सब मिलाकर निराला भारतीय संस्कृति के गायक हैं, किंतु वे रूढ़ियों के विरोधी हैं और समय के साथ चलने में विश्वास रखते हैं।

तोड़ती पत्थर कविता का सारांश

मार्क्सवादी चेतना का संस्पर्श लिये प्रगतिवाद की प्रतिनिधि रचना है “वह तोड़ती पत्थर”, जिसके रचनाकार हैं सचमुच के भावुक कवि महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’।

कविता ‘वह’ से आरम्भ होती है और ‘मै’ से समाप्त होती है पर से स्व की यात्रा ही यह रचना है। जिस देश में “नारी की पूजा होती है वहाँ बसते हैं देव” जैसी महत् भावना कभी वास्तविकता थी। उसी देश में एक गरीब मजदूर स्त्री जेठ मास की चिलचिलाती धूप में बिना किसी छाया के पत्थर तोड़ रही है। यह दृश्य भले ही कवि को इलाहाबाद (प्रयाग) के पथ पर कहीं देखने को मिला किन्तु आज देश का हर कोना इस मामले में इलाहाबाद ही है। अमीरी गरीबी के बीच बड़ी चौड़ी अपाट्य खायी है।

इसे कवि ने पत्थर तोड़ती कर्मरत वयस्क नारी के माध्यम से व्यक्त किया है। नियति विरुद्ध है। वरन् नारी के कोमल हाथों में भारी हथौड़ा क्यों होता जो बार-बार उठता है और गिरकर पत्थर को चकनाचूर करता है। उसके ठीक सामने पेड़ों की कतार है, ऊँचे-ऊँचे भवन हैं, बड़ी-बड़ी दीवारी है अर्थात् सुख-वैभव वहाँ संरक्षित है, यह साँवली भरे बदन वाली युवती आँखें नीची किये अपने इसी पत्थर तोड़ने के प्रिय कर्म में मनोयोग से लगी है।

देखते-देखते दोपहर हुई। सूर्य प्रचंडती हुए। देह को झुलसा देने वाली लू चलने लगी धूल के बवंडर उठे धरती रूई की तरह जल रही है। किन्तु इस विषम परिस्थिति में भी उसका पत्थर तोड़ना जारी रहा। जब उसने देखा कि मैं (कवि) उसे देख रहा हूँ तो उसने पहले सामने मानचुम्बी भवन को देखा फिर एक अजब दृष्टि से जिसमें, व्यंग्य, निराश, कटाक्ष, आक्रोश, नियतिवाद, जैसे भाव एक साथ समाजित थे, मुझे देखा। मुझे ऐसा लगता जैसे किसी को मार पड़ी हो किन्तु किसी विवशतावश वह रो नहीं पाया हो, वह भाव आँखों से व्यक्त हो रहा था।

इसके बाद कवि जाग्रत स्वप्नावस्था में चला गया। उसने देखा कि एक सितार साधा जा चुका है और उसके तारों से एक अनसुनी झंकार निकल रही है। स्वप्न टूटा, एक क्षण के लिए मरत स्त्री काँप गयी। गर्मी की अतिशयता से माथे से पसीने की बुन्दें दुलक पड़ी। उसे अपनी पति स्वीकार है, वह पुनः कर्म में लीन हो गयी। कवि को सुनाई पड़ा जैसे उसने कहा हो-मैं तोड़ती पत्थर। वास्तव में इस कविता में कवि ने सड़क के किनारे पत्थर तोड़ने वाली एक गरीब जिदरिन का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है।

तोड़ती पत्थर कठिन शब्दों का अर्थ

पथ-रास्ता। श्याम तन-साँवला शरीर। नत नयन-झुकी आँखें। कर्म-रत-मन-काम में लीन मन। गुरू-बड़ा। तरु मालिका-पेड़ों की पंक्ति। अट्टालिका-ऊँचा बहुमंजिला भवन। . प्रकार-चहारदीवारी, परकोटा। दिवा-दिन। भू-धरती। गर्द-धूल। चिनगी-चिनगारी। सुघर-सुगठित। सीकर-पसीना। छिन्नतार-टूटी निरंतरता।

तोड़ती पत्थर काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. श्याम तन ……………. कर्म-रत मन।
व्याख्या-
निराला रचित कविता ‘तोड़ती पत्थर’ से गृहीत प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने उस पत्थर तोड़नेवाली मजदूरनी के रूप-रंग का वर्णन किया है जिसे उसने इलाहाबाद के पथ पर देखा था। कवि के अनुसार उसका शरीर साँवला है। वह युवती है। उसका शरीर भरा हुआ तथा बँधा हुआ है अर्थात् वह गठीले शरीर वाली है और शरीर मांसल है। अर्थात् उसमें यौवन अपनी पूर्णता में विकसित है। वह आँख नीचे किये अपने काम में तल्लीन है।

प्रिय कर्मरत मन कहकर कवि यह बताना चाहता है कि उसने मजदूरी को अपनी जीविका का अनिवार्य माध्यम मान लिया है। उसका मन अपने काम में लगता है। अर्थात् वह मन लगाकर प्रेम से काम कर रही है। पत्थर तोड़ने का कार्य उसके लिए न तो बेगारी है और न अनिच्छा से थोपा हुआ कार्य। इस कथन से उसकी कर्मप्रियता और कर्मनिष्ठा दोनों व्यक्त हो रही है।

समग्रतः वह मजदूरनी भरे हुए यौवन वाली साँवली युवती है और वह मन लगाकर तल्लीन होकर काम कर रही है। कदाचित् इसी तत्लीनता के कारण वह धूप के कड़ेपन का अनुभव नही कर पा रही है।

2. गुरू हथोड़ा हाथ ………….. अट्टालिका, प्राकार।
व्याख्या-
‘तोड़ती पत्थर’ महाकवि निराला रचित एक प्रगतिवादी कविता है। इस कविता के व्याख्येय पंक्तियों में कवि ने प्रतीक के सहारे प्रगतिवाद की मूल चेतना “सर्वहारा बनाम पूँजीपति” के संघर्ष को व्यजित किया है।

इलाहाबाद के पथ पर कवि ने जिस मजदूरनी को पत्थर तोड़ते देखा है वह पूरी तल्लीनता . के साथ लगातार पत्थर पर भारी हथौड़े से प्रहार कर रही है। सामने वृक्ष-समूह की माला से घिरी हुई एक अट्टालिका यानी हवेली है। वह हवेली प्रकार अर्थात् चहारदीवारी से घिरी है। कवि को अनुभव होता है कि मजदूरनी पत्थर पर नहीं सामने वाले भव्य भवन पर हथौड़े से प्रहार कर रही है।

हम जानते हैं कि हँसिया हथौड़ा मार्क्सवादी पार्टी का चिह्न है। पार्टी मार्क्स के सिद्धातों पर चलती है। मार्क्स के अनुसार समाज में दो ही वर्ग है।
(i) शोषित या सर्वहारा जिसमें किसान-मजदूर आते हैं।
(ii) पूँजीपति, जिनके पास सम्पत्ति है, ऊँचे महल है और सुख-सुविधा के समान है।

सर्वहारा को संगठित कर पूँजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उनका खात्मा और किसान -मजदूर राज की स्थानापना का मार्क्स का दर्शन है।

उपर्युक्त पंक्तियों में हथौड़ा मजदूर का प्रतीक है और चहारदीवारी से घिरी वृक्ष-समूहों : शीतल छाया में खड़ा विशाल भवन पूँजीपति का प्रतीक है। मजदूरनी मानों पत्थर पर हथोड़, चलाकर इसकी चोट का प्रभाव महल की दीवारों पर अंकित करना चाहती है।

3. दिवा का तमतमाया रूप ……………………. वह तोड़ती पत्थर।
व्याख्या-
‘तोड़ती पत्थर’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में निराला जी ने पत्थर तोड़ने वाली के कार्य-परिवेश का वर्णन किया है। इसी के अन्तर्गत मौसम का उल्लेख है। मौसम ग्रीष्म का है। जैसे-जैसे दिन चढ़ता जाता है गर्मी बढ़ती जाती है। कवि कल्पना करता है कि इस अत्यधिक गर्मी के माध्यम से मानो दिन का क्रोधित तमतमाया हुआ रूप व्यक्त हो रहा है।

दिन के तमतमाने का मतलब है अत्यधिक गर्मी। इसके परिणामस्वरूप लू चलने लगी है जो तन को झुलसा रही है। धरती इस तरह जल रही है मानो रूई जल रही हो। हवा के थपेड़ो के कारण चारो तरफ गर्द-गुब्बार का साम्राज्य है। तप्त हवा के कारण यह धूल शरीर से लगती है तब लगता है कि आग की चिनगारी उड़ कर शरीर में लग रही है।

ऐसे विषम और गर्म मौसम में भी बेचारी मजदूरनी छायाविहीन स्थान पर पत्थर तोड़ रही है और दोपहरी के प्रचण्ड ताप में झुलस कर भी काम कर रही है। इन पंक्तियों में ‘रूई ज्यों . जलती’ उपमा अलंकार है और पूरे कथन में उत्प्रेक्षा अलंकार की ध्वनि है।

4. देखते देखा मुझे ……………. मार खा रोई नहीं।
व्याख्या-
निराला रचित ‘तोड़ती पत्थर’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में कवि पत्थर तोड़ने वाली मजदूरनी के साथ आत्मीय सम्बन्ध स्थापना की चेष्टा करता है। इससे कविता तटस्थ वर्णन के क्षेत्र में निकालकर आत्मीयता की परिधि में आ जाती है।

कवि को अपनी ओर देखते देखकर वह मजदूरनी भी उसकी ओर मुखाबित होती है। फिर वह एक बार उस विशाल भवन की ओर देखती है। मगर वहाँ उसे जोड़ने वाला कोई तार नहीं दिखता। अर्थात् वहाँ उसकी ओर किसी भी दृष्टि से देखने वाला कोई नहीं है। अतः प्रहार से तार छिन्न हो जाता है, टूट जाता है। कवि ‘छिन्नतार’ शब्द के प्रयोग द्वारा यह कहना चाहता है कि एक मजदूर और एक महल वाले के बीच जोड़ने वाला कोई तार नहीं होता।

लिहाजा अट्टालिका की ओर से दृष्टि घुमाकर मजदूरनी कवि की ओर देखती है। उसकी दृष्टि में वेदना है जो मार खाकर भी न रोने वाले बच्चे की आँखों में होती है। ऐसी दृष्टि बेहद करुण होती है। यहाँ कवि की दृष्टिमें सहानुभूति है तो मजदूरनी की दृष्टि में विवशता भरी करुणा जो किसी की सहानुभूति पाकर उमड़ पड़ती है।

5. सजा सहज सितार ………………. मैं तोड़ती पत्थर।
व्याख्या-
‘तोड़ती पत्थर’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में निराला जी ने अपनी भावना और मजदूरनी की यथार्थ स्थिति को मिला दिया है। मजदूरनी जिस “मार खा रोई नहीं” दृष्टि से कवि को देखती है उससे कवि से हृदय रूपी सितार के तार बज उठते हैं। उसमें वे करुणापूर्ण ममत्व की रागिनी झंकृत होने लगती है। ‘सजा सहज सितार’ के द्वारा कवि हृदय में मजदूरनी के प्रति सहानुभूति उत्पन्न होने की बात कहना चाहता है। उसे वेदना की ऐसी अनुभूति पहले कभी नहीं हुई थी। इसीलिए वह कहता है-“सुनी मैने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।”

इसके बाद कवि पुनः यथार्थ के बाह्य जगत में लौट आता है। वह देखता है कि एक क्षण के बाद मजदूरनी के शरीर में कम्पन हुआ और उसके माथे पर झलक आयी पसीने की बूंदे लुढ़क पड़ती हैं। वह पुनः कर्म में लीन हो गयी। मानो कह रही हो-मैं तोड़ती पत्थर। इन क्तयों से स्पष्ट है कि मजदूरनी की कातर दृष्टि तथा मौसम की कठोर स्थिति की विषमता ने कवि के मन को उदवेलित किया। उसकी भावना के तार करुण से झंकृत हुए और उसी की परिणति इस कविता की रचना के रूप में हुई। ये पंक्तियाँ इस कविता को प्रेरणा– भूमि समझने की कुंजी ज्ञात होती है।

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 6 तीन वर्ग

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 6 तीन वर्ग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 6 तीन वर्ग

Bihar Board Class 11 History तीन वर्ग Textbook Questions and Answers

 

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
फ्रांस में प्रारम्भिक सामंती समाज के दो लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • सामंती समाज से कृषक अपने खेतों के साथ-साथ सामंत के खेतों पर कार्य करते थे।
  • लार्ड किसानों को सैनिक सरक्षा प्रदान करता था।

प्रश्न 2.
जनसंख्या के स्तर में होने वाले लंबी अवधि के परिवर्तनों ने किस प्रकार यूरोप की अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित किया?
उत्तर:
यूरोप की जनसंख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी। 1000 ई. में लगभग 420 लाख थी, बढ़कर 1200 में लगभग 620 लाख और 1300 ई. में 730 लाख हो गयी। इसका समाज और अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा –

  • अधिक जनसंख्या बढ़ने से कृषि का विस्तार हुआ और कृषकों के पास आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न होता था।
  • लोगों को नगर चौक, चर्च, सड़कें, बाजार आदि की आवश्यकता महसूस हुई। फलस्वरूप नगरों का विकास किया गया।

प्रश्न 3.
नाइट एक अलग वर्ग क्यों बने और उनका पतन कब हुआ?
उत्तर:

  • नोवी शताब्दी में नाइट एक अलग वर्ग बना जो कुशल अश्वसेना की आवश्यकता की पूर्ति कर सके।
  • 14 – 15 वीं शताब्दी में नगरों के उत्थान के साथ इनका पतन शुरू हो गया।

प्रश्न 4.
मध्यकालीन मठों का क्या कार्य था?
उत्तर:
मध्यकालीन मठों का निम्नलिखित कार्य था –

  • मठ धार्मिक समुदाय के निवास थे। वहाँ भिक्षु प्रार्थना करता था, अध्ययन करता था और कृषि जैसे शारीरिक श्रम भी करते थे।
  • इन मठों ने कला के विकास में थी योगदान दिया। उदाहरण के लिए हेडेलगार्ड ने चर्च की प्रार्थनाओं में सामुदायिक गायन को प्रथा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 5.
मध्यकालीन फ्रांस के नगर में एक शिल्पकार के एक दिन के जीवन की कल्पना कीजिए और इसका वर्णन करिए।
उत्तर:
मध्यकालीन फ्रांस के नगर में एक शिल्पकार के एक दिन का जीवन-मध्यकालीन फ्रांस में शिल्प का विकास हो गया और मूर्तिकार, कसीदाकारी करने वाले, पत्थर पर डिजाइन बनाने वाले कहीं भी देखे जा सकते थे। पत्थर पर काम करने वाले शिल्पकार की ही कल्पना करते हैं। वह पत्थर को अपने सामने लाता है। उसको इधर-उधर देखकर उचित ढंग से रखता है। फिर वह अपने औजार का बक्स खोलता है। वह एक-एक करके उन्हें निकालता जाता है

और साफ करता है। पत्थर को तोड़ने के लिए हाथ में हथौड़ी लेता है। उसे ढोकता है और उसके हत्थे को ठीक करता है। फिर छेनी को पत्थर पर घिसकर तेज करता है। घिसते समय बार-बार देखता है कि वह काम लायक है या नहीं। ठीक हो जाने पर पत्थर का काम करने के लिए तैयार हो जाता है।

पत्थर पर डिजाइन सांचे की सहायता से चाक से बना लेता है। फिर पच्चीकारी के कार्य में जुट जाता है हथौड़ी से छेनी को कभी धीमे कभी तेज मारता है। पत्थर से कभी छोटा टुकड़ा निकल ग कभी बड़ा टुकड़ा निकलता है। तर यह कार्य बड़े मनोयोग से करता है। बीच-बीच में मनारजन के लिए गाना गुनगुनाता रहता है या सिगार पी लेता है। दोपहर के समय काम बंद कर देता है और खाने के लिए चला जाता है। थोड़ा आराम करने के बाद फिर काम में लग जाता है। मैंने देखा शाम होने जा रही है परंतु शिल्पकार कंवल पत्थर के एक छाट भाग को ही है खूबसूरत डिजाइन का रूप दे पाया है। वह दिन भर खून पसीना बहाता रहा । वह काम बंद कर देता है, सामान को उचित जगह पर रखकर प्रसन्न होकर घर चला जाता है।

प्रश्न 6.
फ्रांस के सर्फ और रोम के दास जीवन की दशा की तुलना कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस के सर्फ और रोम के दास जीवन की दशा की तुलना –

  • फ्रांस का सर्फ या कृषि दास को अपने लार्ड के जागीर पर काम करना होता था परंतु काम करने के दिन निश्चित होते थे।
  • वह इन दिनों में सभी प्रकार का कार्य करता था उस कार्य विशेष रूप से कृषि एवं गृह कार्य से सम्बद्ध होता था।
  • रोम का दास अपने मालिक के दास खूटे में बंधा हुआ था। उससे कभी भी कोई भी कार्य कराया जा सकता था। उसका पूरा समय स्वामी के साथ जुड़ा हुआ था।
  • स्वामी के कार्य के बदले दोनों को स्वामी से कोई मजदूरी नहीं मिलती थी।
  • सर्फ प्रायः अपने परिवार के लार्ड के यहाँ कार्य करते थे परंतु रोम के दासों के साथ ऐसा नहीं था। उनका पार्टनार प्रायः उनके साथ नहीं होता था।
  • कृषिदास के पास गुजारे के लिए लार्ड का एक भूखंड होता था। इसके अधिकांश उपज लार्ड को देनी पडती थी। रोम के दास के पास इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं थी।
  • फ्रांस के कृषि दास और रोम के दास दोनों स्वामी की आज्ञा के बिना कहीं नहीं जा सकते थे।
  • सर्फ लार्ड की आज्ञा से ही विवाह कर सकता था परंतु रोम का दास तो विवाह ही नहीं कर सकता था।
  • रोम का दास खरीदा या बेचा जा सकता था परंतु सर्फ के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता था।

Bihar Board Class 11 History तीन वर्ग Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘सामंतवाद’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामंतवाद (Fuedalism) शब्द जर्मन शब्द ‘फ्यूड’ से बना है। फ्यूड का अर्थ है-भूमि का टुकड़ा। अतः ऐसी प्रणाली को सामंतवाद कहा जाता है जिसमें भूमि के बदले सेवाएँ प्राप्त की जाती हैं। सामंती समाज का उदय मध्यकालीन यूरोप में हुआ।

प्रश्न 2.
रोमन साम्राज्य का कौन-सा प्रांत आगे चलकर फ्रांस बना और कैसे?
उत्तर:
रोमन साम्राज्य का गॉल (Gaul) प्रांत आगे चलकर फ्रांस बना। इसे जर्मनी की फ्रंक (Franks) नामक एक जनजाति ने अपना नाम देकर फ्रांस बना दिया।

प्रश्न 3.
फ्रांस का समाज किस आधार पर तीन वर्गों में बँटा था?
उत्तर:
फ्रांसीसी पादरियों को विश्वास था कि प्रत्येक व्यक्ति कार्य के आधार पर तीन वर्गों में से किसी एक वर्ग सदस्य होता है। एक बिशप ने कहा, “वर्ग क्रम में, कुछ प्रार्थना करते हैं, दूसरे लड़ते हैं और शेष अन्य कार्य करते हैं।” फ्रांस का समाज इसी आधार पर तीन वर्गों अर्थात् पादरी, अभिजात और कृषक वर्ग में बँटा था।

प्रश्न 4.
फ्रांस के अभिजात वर्ग को प्राप्त कोई दो विशेषाधिकार बताएँ।
उत्तर:

  • उनका अपनी संपदा पर स्थायी रूप से पूर्ण नियंत्रण होता था।
  • वे अपना स्वयं का न्यायालय लगा सकते थे। यहाँ तक कि वे अपनी मुद्रा भी जारी कर सकते थे।

प्रश्न 5.
मेनर क्या था?
उत्तर:
उपजाऊ भूमि को ‘मेनर’ कहते थे। मेनर के मध्य लार्ड अथवा सामंत का महल होता था। मेनर में रहने वाले लोग की भूमि पर ही निर्वाह करते थे। किसान का जीवन बड़ा कष्टमय था। मेनर का स्वामी अथवा सामंत बहुत भोग-विलास का जीवन व्यतीत करता था।

प्रश्न 6.
मध्यकालीन यूरोप में वर्गों का विकास नहीं हुआ? 13वीं शताब्दी में इनका आकार क्यों बढ़ाया जाने लगा?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में वर्गों का विकास सामंत प्रथा के अंतर्गत राजनीतिक प्रशंसा तथा सैनिक शक्ति के केन्द्रों के रूप में हुआ। 13वीं शताब्दी में इनका आकार इसलिए बढ़ाया जाने लगा ताकि ये नाईट तथा उसके परिवार का निवास स्थान बन सकें।

प्रश्न 7.
सामंती प्रथा के अंतर्गत ‘फीफ’ क्या थी?
उत्तर:
लार्ड नाइट को भूमि का एक भाग देता था। इसी भू-भाग को ‘फीफ’ कहते थे। नाइट फीफ के बदले लार्ड को एक निश्चित धनराशि देता था और युद्ध में उसकी ओर से लड़ने का वचन देता था।

प्रश्न 8.
बारहवीं शताब्दी में फ्रांस में घुमक्कड़ चारण क्या भूमिका निभाते थे?
उत्तर:
घुमक्कड़ चारण गायक थे। वे फ्रांस के मेनरों में वीर राजाओं तथा नाइट्स की वीरता भरी कहानियाँ गीतों के रूप में गाते हुए घूमते रहते थे। इस प्रकार वे योद्धाओं का उत्साह बढ़ाते थे।

प्रश्न 9.
कैथोलिक चर्च एक शक्तिशाली संस्था थी। कैसे?
उत्तर:
कैथोलिक चर्च एक स्वतंत्र संस्था थी जिसके अपने नियम थे। उसके पास राजा द्वारा दी गई भूमि होती थी जिससे वह कर उगाता था। इसलिए चर्च एक शक्तिशाली संस्था थी।

प्रश्न 10.
‘टीथ’ (Tithe) क्या था?
उत्तर:
चर्च ते कृषक से एक वर्ष में उसकी उपज का दसवाँ भाग लेने का अधिकार था। इसे टीथ कहा जा था।

प्रश्न 11.
तीन वर्गों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
तीन गौ से अभिप्राय 9वीं से 16वीं शताब्दी के बीच यूरोप की तीन सामाजिक श्रेणियों से है।

वर्ग थे –

  • ईसाई पादरी
  • भूमिधारक अभिजात वर्ग तथा
  • कृषक

प्रश्न 12.
96 से 11वीं शताब्दी के बीच पश्चिमी यूरोप के ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाला कोई एक परिवर्तन बताएँ। एक उदाहरण भी दें।
उत्तर:
इस कार में चर्च तथा शाही शासन ने वहाँ के कबीलों के प्रचलित नियमों और संस्थाओं में तालमेल स्थापित करने में सहायता की। इसका सबसे अच्छा उदाहरण पश्चिमी और मध्य यूरोप में शालर्मन का साम्राज्य था।

प्रश्न 13.
वाइकिंग लोग कौन थे?
उत्तर:
वाइकिंग स्कैंडीनेविया अर्थात् नार्वे, स्वीडेन डेनमार्क तथा आइसलैंड के थे जो 8वीं से वीं शताब्दी के बीच उत्तर पश्चिमी रोप पर आक्रमण करने के बाद वहीं बस गए। इनमें से अधिकांश लोग समुद्री लुटेरे तथा व्यापारी थे।

प्रश्न 14.
9वीं से 16वीं शताब्दी तक पश्चिमी यूरोप के इतिहास की जानकारी किस प्रकार मिल सकी? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • चर्चा में मिलने वाले जन्म, मृत्यु तथा विवाह के अभिलेखों की सहायता से परिवारों और जनसंख्या की संरचना को समझा जा सका।
  • चर्चा से प्राप्त अभिलेखों से व्यापारिक संस्थाओं की जानकारी मिली।
  • गीत व कहानियों द्वारा हमें त्योहारों और सामुदायिक गतिविधियों के बारे में बोध हुआ।

प्रश्न 15.
कैथोलिक चर्च की आय के दो स्रोत बताइए।
उत्तर:

  • किसानों से मिलने वाली टीथ।
  • धनी लोगों द्वारा अपने कल्याण तथा मरणोपरांत अपने रिश्तेदारों के कल्याण के लिए दिया जाने वाला दान।

प्रश्न 16.
चर्च के औपचारिक रीति-रिवाज की कुछ महत्त्वपूर्ण रस्में, सामंती कुलीनों की नकल थीं। इसके दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • प्रार्थना करते समय हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर घुटनों के बल झुकना नाइट द्वारा अपने वरिष्ठ लॉर्ड के प्रति वफादारी की शपथ लेते समय अपनाए गए तरीके जैसा था।
  • इसका एक अन्य उदाहरण था-ईश्वर के लिए ‘लॉर्ड’ शब्द का प्रयोग।

प्रश्न 17.
यूरोप के दो सबसे प्रसिद्ध मठ कौन-कौन से थे?
उत्तर:

  • 529 ई. में इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट (St. Benedict) का मठ।
  • 910 ई. में बरगंडी में स्थापित क्लूनी (Clunny) का मठ।

प्रश्न 18.
फ्रायर (Friars) किन्हें कहा जाता था?
उत्तर:
तेरहवीं शताब्दी में भिक्षुओं के कुछ समूहों ने मठों में न रहने का निर्णय लिया। वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देते थे और दान से अपनी जीविका चलाते थे। इन्हें फ्रायर (Friars) कहा जाता था।

प्रश्न 19.
टैली (Taille) क्या था? कौन लोग इससे मुक्त थे?
उत्तर:
टैली एक प्रकार का प्रत्यक्ष कर था जो राजा कृषकों पर लगाते थे। पादरी तथा अभिजात वर्ग इस कर से मुक्त थे।

प्रश्न 20.
विलियम प्रथम कौन था? उसने इंग्लैंड का शासन कैसे प्राप्त किया ?
उत्तर:
विलियम प्रथम नारमैंडी का ड्यूक था। 11वीं शताब्दी में उसने एक सेना लेकर इंग्लिश चैनल को पार किया तथा इंग्लंड के सैक्सन राजा को हराकर इंग्लैंड पर अपना अधिकार कर लिया।

प्रश्न 21.
मध्यकाल में इग्लैंड की कृषि से जुड़ी कोई दो समस्याएँ बताओ।
उत्तर:

  • हल लकड़ी का था जिसे बैल खींचते थे। यह हल केवल भूमि की सतह को ही खुरच सकता था। यह भूमि की प्राकृतिक उत्पादकता को पूरी तरह से बाहर निकाल पाने में असमर्थ था।
  • फसल-रक में भी एक प्रभावहीन तरीके का उपयोग हो रहा था।

प्रश्न 22.
कृषिदास नगरों में भाग जान का प्रयास क्यों करते थे?
उत्तर:
पदाम अपने लाडों से छिर्ग के लिए नगरों में भाग जाने का प्रयास करते थे। यदि वे अपने भाई से एक वर्ष और एक दिन तक छिपे रहने में सफल हो जाते थे, तो वे स्वतंत्र नागरिक या जाते थे।

प्रश्न 23.
इंग्लैंड में नयी कृषि प्रौद्योगिकी के प्रचलन से कृषि क्षेत्र में हुए कोई दो परिवर्तन लाएँ।
उत्तर:

  • लकड़ी से बने हल के स्थान पर लोहे की भारी नोक वाले हल तथा साँचे दर पट्टे (Mould-hoards) का उपयोग होने लगा। ऐसे हल भूमि को अधिक गहरा खोद सकते थे।
  • पशुओं को हल में जोतने के तरीकों में सुधार हुआ। अब जुआ गले (Neck harmess) के स्थान पर कधे पर रखा जाने लगा। इससे पशुओं के काम करने की क्षमता बढ़ गई।

प्रश्न 24.
मध्ययुग में नगरों के विकास के कोई दो कारणों का वर्णन करो।
उत्तर:

  • मध्ययुग में वाणिज्य-व्यापार की उन्नति के कारण नगरों का महत्त्व काफी अधिक बढ़ गया। अत: बहुत-से व्यापारी नगरों में बस गए।
  • नगर सामंती नियंत्रण से मुक्त हो गए थे। नगरों में रहने वाले लोगों के आने-जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं था। फलतः नगरों का विकास हुआ।

प्रश्न 25.
मध्ययुगीन यूरोप की शिल्पी श्रेणियों की दो मुख्य विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

  • ये श्रेणियाँ वेतन, मूल्यों तथा काम की अवधि का निर्धारण करती थीं।
  • ये अपने शिल्प संघ के उच्च स्तर को बनाए रखने का प्रयत्न करती थीं और इस उद्देश्य से विशेष नियम निश्चित करती थीं।

प्रश्न 26.
मध्यकालीन यूरोप में मठों के जीवन की दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • मठों का जीवन पूरी तरह व्यवस्थित था। इनमें रहने वाले भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों को कठोर अनुशासन में रहना पड़ता था।
  • भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों को संपत्ति रखने तथा विवाह करने की अनुमति नहीं थी।

प्रश्न 27.
फ्रांस के कैथीइल नगर क्या थे?
उत्तर:
फ्रांस में बड़े-बड़े चर्चा का निर्माण हुआ जिन्हें कैथील कहते थे। समय बीतने पर इन चर्चा के चारों ओर नगरों का विकास हुआ। इन्हीं नगरों को कैथील नगर कहा जाता है।

प्रश्न 28.
14वीं शताब्दी में यूरोप में किसान विद्रोह क्यों हुए?
उत्तर:
14वीं शताब्दी में लाडौँ ने अपने धन संबंधी अनुबंधों को तोड़ कर फिर से पुरानी मजदूरी सेवाओं को लागू कर दिया। किसानों ने इसका विरोध किया और विद्रोह करना आरंभ कर दिया।

प्रश्न 29.
15वीं तथा 16वीं शताब्दी के यूरोपीय शासकों को ‘नये शासक’ क्यों कहा गया?
उत्तर:
15वीं तथा 16वीं शताब्दी में यूरोप के शासकों ने अपनी सैनिक तथा वित्तीय शक्ति में वृद्धि की । इस प्रकार उन्होंने शक्तिशाली राज्य स्थापित किए जो आर्थिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण थे। इसी कारण इतिहासकारों ने उन्हें ‘नये शासक’ कहा।

प्रश्न 30.
फ्रांस में स्टेट्स जनरल (परामर्शदात्री सभा) का अधिवेशन कब और किस शामक द्वारा बुलाया गया ? इसके बाद 1789 तक इसे क्यों नहीं बुलाया गया ?
उत्तर:
फ्रांस में स्टेट्स जनरल का अधिवेशन 1614 ई. में लुई 13वें द्वारा बुलाया गया । इसके तीन सदन थे जो समाज के तीन वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे। इसके पश्चात् 1789 ई. तक इसे फिर नहीं बुलाया गया क्योंकि राजा तीन वर्गों के साथ अपनी शक्ति बाँटना चाहता था।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामंतवाद के समय यदि आप निम्नलिखित में से किसी एक वर्ग में होते, तो लिखें कि अपना समय किस प्रकार बिताते? नाइट, सर्फ, मेनर का स्वामी, स्वतंत्र किसान, मठवासी।
उत्तर:
1. यदि मैं नाइट होता तो सामंत या बैरन मेरे स्वामी होते। मैं उनका बहुत आदर करता तथा पूर्ण रूप से उनका स्वामिभक्त रहता। मैं उन्हें सैनिक सेवाएँ प्रदान करता। अपने अधीनस्थ किसानों से मैं कर के अतिरिक्त उनकी उपज का कुछ भाग वसूल करता। सर्फ लोगों से मैं अनेक प्रकार के घरेलू काम लेता। इस प्रकार मैं सुख तथा आनंद का जीवन व्यतीत करता।

2. यदि मैं सर्फ होता तो मेरी दशा बड़ी शोचनीय होती। मुझे नाइट की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना पड़ता। हर समय कोड़े पड़ने का भय रहता। कभी मुझे मकान की मरम्मत करनी पड़ती तो कभी सड़क बनाने का काम करना पड़ता। इसके अतिरिक्त नाइट के खेत पर बेगार के रूप में भी कार्य करना पड़ता।

3. यदि मैं किसी मेनर का स्वामी होता तो मेरा जीवन भोग-विलास में व्यतीत होता। मैं पत्थर के बने हुए एक सुंदर तथा विशाल मकान में रहता जिसमें जीवन यापन की सभी सुविधाएँ प्राप्त होतीं। अपने मकान के चारों ओर मैं एक खाई खुदवाता ताकि कोई शत्रु अंदर न आ सके। संकट के समय मैं अपनी प्रजा को अपने मकान में शरण देता। मैं सभी आवश्यक वस्तुओं का मेनर में ही उत्पादन करता ताकि मेनर में रहने वालों को दूसरे लोगों पर निर्भर न रहना पड़े।

4. यदि मैं एक स्वतंत्र किसान होता तो मैं खेतों में कठिन परिश्रम करता ताकि कृषि की उपज बढ़ सके। कारण यह है कि मुझे अपनी उपज का कोई भी भाग अपने स्वामी को नहीं देना पड़ता। मुझे तो केवल एक निश्चित राशि ही कर के रूप में अपने स्वामी को देनी पड़ती। मैं भोग-विलास का जीवन तो व्यतीत नहीं कर पाता परंतु मेरा जीवन अन्य किसानों से काफी उन्नत होता।

5. यदि मैं मठवासी होता तो मेरा जीवन बड़ा सादा होता। मैं ईश्वर की उपासना करता और प्रतिदिन चर्च में जाता। मैं मठ के नियमों का पूरी तरह पालन करता और मठ में बने अस्पताल की देखभाल करता। चर्च की पाठशाला में मैं एक शिक्षक के रूप में कार्य करता और विद्यार्थियों के जीवन को सुधारने का प्रयत्न करता। इसके अतिरिक्त मैं लोगों में धर्म-प्रचार करके नैतिक जीवन को उन्नत करता ।

प्रश्न 2.
आजकल किसी भी देश के समाज के जीवन-क्रम को सामंतवादी कहना क्यों बुरा समझा जाता है?
उत्तर:
आजकल किसी भी देश के समाज के जीवन क्रम को सामंतवादी कहना निम्नलिखित कारणों से बुरा समझा जाता है –
1. सामंतवादी प्रथा में कई बड़े दोष थे। जहाँ भी यह प्रथा प्रचलित रही वहाँ अशांति का बोलबाला रहा। परंतु आजकल किसी भी देश में शांति तथा व्यवस्था का बना रहना बहुत आवश्यक समझा जाता है। इसका कारण यह है कि शांति के बिना देश की प्रगति रूक जाती है, सांस्कृतिक विकास क जाता है और व्यापार ठप्प पड़ जा है। इसीलिए किसी भी देश के समाज के जीवन-क्रम को सामंतवादी कहना बुरा समझा जाता है।

2. सामंतवादी समाज में किसानों की दशा बड़ी ही शोचनीय थी। कठोर परिश्रम करने पर भी उन्हें पेट भर रोटी नहीं मिलती थी। अत: सामंतवाद जैसी व्यवस्था को कौन अच्छा कह सकता है।

3. सामंतवादी समाज में ऊँच-नीच की विचारधारा पर बड़ा बल दिया जाता था। बड़े-बड़े सामंतों को सभी अधिकार प्राप्त थे। परंतु निर्धन किसानों को सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था।

4. सामंतवादी समाज में किसानों का शोषण किया जाता था। सर्फ लोगों से बेगार ली जाती थी जो आज के युग में एक अपराध माना जाता है। इन्हीं सभी कारणों से किसी भी समाज को सामंतवादी कहना बुरा समझा जाता है।

प्रश्न 3.
मध्यकालीन यूरोप के समाज में कौन-कौन से मुख्य वर्ग थे? उनमें से किसी एक की दशा का वर्णन करों।
अथवा
सामंतवाद के अंतर्गत यूरोप में किसानों की दशा का वर्णन करें।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप का समाज मुख्य रूप से दो वर्गों में बंटा हुआ था –

  • बड़े-बड़े सामंत तथा सरदार
  • कृषक

कृषकों की दशा – मध्यकाल में सामंतवादी जीवन कृषि पर आधारित था परंतु दास कृषक बड़ा कठोर जीवन व्यतीत करते थे। वे मिट्टी तथा घास के बने हुए मकानों में रहते थे। उन्हें अपने स्वामी की निजी भूमि पर काम करना पड़ता था। इसके लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं दी जाती थीं। किसानों की पत्नियाँ तथा लड़कियाँ सामंत के घर में कताई, बुनाई आदि का काम करती थीं।

सामंत के तंदूर से रोटियाँ बनाना तथा उनकी चक्की में आटा पिसवाना उनके लिए आवश्यक था। इसके लिए उन्हें पैसे देने पड़ते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि मध्यकालीन यूरोप -के समाज में किसानों की दशा बहुत खराब थी।

प्रश्न 4.
यूरोपीय सामंत व्यवस्था के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सामंती व्यवस्था के कारण यूरोपीय समाज में शांति और सुरक्षा का समावेश हुआ। सामाजिक और आर्थिक जन-जीवन बिना किसी बाधा के चलता रहा। शक्तियों का विकेंद्रीकरण हुआ। इनका विभाजन राजा और सामंतों के बीच हुआ। इसी राजनीति के कारण ही इंग्लैंड में ससंद की स्थापना हुई। सामंती व्यवस्था अभिशाप भी सिद्ध हुई।

इससे समाज में नये वर्गों का उदय हुआ। मनुष्य-मनुष्य और वर्ग-वर्ग में भेद समझा जाने लगा। इस प्रकार इस काल में राजनीतिक एकता की स्थापना न हो सकी। साधारण मनुष्य को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। शक्तिशाली सामंतों में अपने अपने स्वार्थों के लिए लड़ाइयाँ होने लगी और राजा मूक दर्शक बना रहा।

प्रश्न 5.
मध्य युग में नगरों के विकास के कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
मध्य युग में नगरों के विकास के निम्नलिखित कारण थे –

  • मध्य युग में वाणिज्य-व्यापार की उन्नति के कारण नगरों का महत्त्व काफी अधिक बढ़ गया। अत: बहुत-से व्यापारी नगरों में बस गये।
  • नगर सामंती नियंत्रण से मुक्त हो गये थे। नगरों में रहने वाले लोगों के आने-जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं था। नगरों की इस स्वतंत्रता के कारण भी नगरों का विकास हुआ।
  • नगर में र। वाले लोग व्यापार से काफी धन क…ने लगे और वे काफी धनवान हो गये। नगरों में धन की अधिकता के कारण भी नगरों के विकास में बड़ी सहायता मिली।

प्रश्न 6.
मध्य युग में नगरों के विकास तथा संगठन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्य युग में वाणिज्य-व्यापार की उन्नति, धन में वृद्धि और सामंती जीवन से मुक्ति के कारण नगरों का विकास हुआ। विभिन्न शिल्पों के विकास ने भी नगरों के उदय में सहायता पहुँचाई। इन नगरों में रहने वाले व्यापारियों तथा शिल्पियों ने धीरे-धीरे अपने संघ बना लिये। ये संघ अपने-अपने संगठन के सदस्यों के हितों का पूरा ध्यान रखते थे।

नगरों में शिल्पियों के संगठन का महत्त्व बहुत अधिक था और इनके नियम भी काफी कठोर थे। किसी नए शिल्पी को तब तक संगठन में शामिल नहीं किया जाता था जब तक कि वह किसी योग्य शिल्पी से काम सीख कर उसमें पूरी तरह निपुण न हो जाए।

प्रश्न 7.
5वीं से 11वीं शताब्दी तक यूरोप के पर्यावरण का वहाँ की कृषि पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
पाँचवीं से दसवीं शताब्दी तक यूरोप का अधिक भाग विस्तृत वनों से ढंका हुआ था। अतः कृषि के लिए उपलब्ध भूमि सीमित थी। उस समय यूरोप में तीव्र ठंड का दौर चल रहा था। इससे सर्दियाँ प्रचंड हो गई और उनकी अवधि लंबी हो गई। फलस्वरूप फसलों का वर्धनकाल छोटा हो गया, जिससे कृषि की पैदावार में कमी आई।

परंतु ग्यारहवीं शताब्दी से यूरोप के पर्यावरण में एकाएक परिवर्तन हुआ। वहाँ औसत तापमान बढ़ गया जिसका कृषि पर अच्छा प्रभाव पड़ा । कृषकों को कृषि के लिए अब लंबी अवधि मिलने लगी। मिट्री पर पाले का प्रभाव कम हो जाने से खेती करना सरल हो गया। फलस्वरूप यूरोप के अनेक भागों के वन क्षेत्रों में कमी हुई और कृषि भूमि का विस्तार हुआ।

प्रश्न 8.
यूरोप में व्यापार एवं वाणिज्य में किस प्रकार वृद्धि हुई और इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
ग्यारहवीं शताब्दी में यूरोप तथा पश्चिम एशिया के बीच नवीन व्यापार-मार्ग विकसित होने लगे। स्कैंडीनेविया के व्यापारी वस्त्र के बदले में फर तथा शिकारी बाज लेने के लिए उत्तरी सागर से दक्षिण की समुद्री यात्रा करते थे। अंग्रेज व्यापारी राँगा बेचने के लिए आते थे। बारहवीं शताब्दी तक फ्रांस में भी वाणिज्य और शिल्प विकसित होने लगे थे। पहले दस्तकारों को एक मेनर से दूसरे मेनर में जाना पड़ता था।

परंतु अब उन्हें एक स्थान पर टिक कर रहना अधिक सुविधाजनक लगा। वे यहीं पर वस्तुओं का उत्पादन कर सकते थे और अपनी आजीविका के लिए उनका व्यापार कर सकते थे। परिणाम-जैसे-जैसे नगरों की संख्या बढ़ती गई और व्यापार का विस्तार होता गया, नगर व्यापारी अधिक धनी तथा शक्तिशाली होते गए। उनमें अभिजात वर्ग में शामिल होने के लिए प्रतिस्पर्धा भी आरंभ हो गई।

प्रश्न 9.
यूरोप के नगरों में आर्थिक संस्था का आधार क्या था और इसका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
यूरोप में आर्थिक संस्था का आधार ‘श्रेणी’ (गिल्ड) था। प्रत्येक शिल्प या उदयोग एक ‘श्रेणी’ के रूप में संगठित था। श्रेणी एक ऐसी संस्था थी जो उत्पाद की गुणवत्ता, उसके मूल्य और बिक्री पर नियंत्रण रखती थी। श्रेणी सभागार’ प्रत्येक नगर का आवश्यक अंग होता था। इस सभागार में आनुष्ठानिक समारोह होते थे और गिल्डों के प्रधान आपस में मिलते थे। पहरेदार नगर के चारों ओर गश्त लगाकर पहरा देते थे। संगीतकारों की प्रातिभोजों तथा नागरिक जुलूसों में अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए बुलाया जाता था। सराय वाले यात्रियों की देखभाल करते थे।

प्रश्न 10.
यूरोप में समाज का चौथा वर्ग किस प्रकार अस्तित्व में आया?
उत्तर:
‘नगर की हवा स्वतंत्र बनाती है’ एक लोकप्रिय कहावत थी। अत: स्वतंत्र होने की इच्छा रखने वाले कृषि दास भाग कर नगर में छिप जाते थे। यदि कोई कृषि दास अपने लॉर्ड की नजरों से एक वर्ष एक दिन तक छिपे रहने में सफल था तो वह स्वतंत्र नागरिक बन जाता था। गरों में रहने वाले अधिकतर व्यक्ति या तो स्वतंत्र कृषक थे या भगोड़े कूषक। कार्य की दृष्टि वे अकुशल श्रमिक होते थे। नगरों में अनेक दुकानदार और व्यापारी भी रहते थे। आगे चलर विशिष्ट कौशल वाले व्यक्तियों जैसे साहूकार तथा वकील आदि की आवश्यकता अनुभव हुई। बड़े नगरों की जनसंख्या लगभग तीस हजार होती थी। नगरों में रहने वाले इन्हीं लोगों ने समाज का चौथा वर्ग बनाया।

प्रश्न 11.
11वीं शताब्दी में यूरोप में सामंतवादी संबंधों में क्या परिवर्तन आया और इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
ग्यारहवीं सदी से व्यक्तिगत संबंध जो सामंतवाद के आधार थे, कमजोर पड़ने लगे। इसका कारण यह था कि अब अधिकांश लेन-देन मुद्रा द्वारा होने लगी थी। लॉर्ड भी कृषकों से लगान सेवाओं की बजाय नकदी में वसूल करने लगे। कृषकों ने भी वस्तु-विनिमय को छोड़ अपनी फसल को व्यापारियों को मुद्रा में (नकदी में) बेचना शुरू कर दिया। व्यापारी उन वस्तुओं को शहर में बेंचकर मुद्रा कमाते थे। धन के बढ़ते उपयोग का प्रभाव कीमतों पर पड़ा जो खराब फसल के समय बहुत अधिक बढ़ जाती थीं। उदाहरण के लिए 1270 ई. से 1320 ई. के बीच इंग्लैंड में कृषि भूमि के मूल्य दुगुने हो गए थे।

प्रश्न 12.
सामंतवाद क्या था? इसकी आर्थिक विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:
‘सामंतवाद’ (Fuedalism) शब्द जर्मन फ्यूड’ से बना है जिसका अर्थ भूमी का एक टुकड़ा है। इस प्रकार सामंतवाद भूमि से जुड़ी एक प्रणाली थी। यह एक ऐसे समाज की ओर संकेत करता है जो मध्य फ्रॉस और बाद में इग्लैंड तथा दक्षिण इटली में विकसित हुआ।

आर्थिक दृष्टि से सामंतवाद एक प्रकार के कृषि उत्पादन को व्यक्त करता है जो सामंत (लार्ड) और कृषकों के संबंधों पर आधारित था। कृषक अपने खेतों के साथ-साथ लार्ड के खेतों पर काम करते थे। लार्ड कृषकों को उनकी श्रम-सेवा के बदले में सैनिक सुरक्षा देते थे। लार्ड के कृषकों पर व्यापक न्यायिक अधिकार भी थे। इसलिए सामंतवाद ने जीवन के न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं पर भी प्रभाव डाला।

प्रश्न 13.
गॉल किस प्रकार फ्राँस बना? 11वीं शताब्दी तक फ्रांस की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
गॉल रोमन साम्राज्य का एक प्रांत था। इसमें दो विस्तृत तट रेखाएँ, पर्वत श्रेणियाँ, लंबी-लंबी नदियाँ, वन और कृषि योग्य विस्तृत मैदान स्थित थे। जर्मनी की एक फ्रंक नामक जनजाति ने गॉल को अपना नाम देकर उसे फ्राँस बना दिया। छठी शताब्दी में इस प्रदेश पर किश अथवा फ्रांस के ईसाई राजा शासन करते थे। फ्रांसीसियों के चर्च के साथ गहरे संबंध थे। ये संबंध पोप द्वारा राजा शार्लमेन को पवित्र रोमन सम्राट की उपाधि दिए जाने पर और अधिक मजबूत हो गए।

ग्यारहवीं सदी में फ्रांस के प्रांत नरमंडी के राजकुमार ने एक संकर जलमार्ग के पार स्थित इंग्लैंड-स्कॉटलैंड द्वीपों को जी ‘लया था।

प्रश्न 14.
खर्चीले प्रौद्योगिकी परिवर्तनों की समस्या से कैसे निपटा गया?
उत्तर:
कुछ प्रौद्योगिकी परिवर्तन अत्यधिक खर्चीले थे। उदाहरण के लिए कृषकों के पास पनचक्की और पवन चक्की लगाने के लिए पर्याप्त धन नहीं था। इसलिए इस मामले में लॉडों द्वारा पहल की गई। परंतु कुछ क्षेत्रों में कृषक भी पहल करने में सक्षम रहे। उन्होंने खेती योग्य भूमि का विस्तार किया। फसलों की तीन-चक्रीय व्यवस्था को अपनाया और गाँवों में लोहार की दुकानें तथा भट्ठियाँ स्थापित की। यहाँ पर कम लागत में लोहे की नोंक वाले हल और घोड़े की नाल बनाने और उनकी मरम्मत करने का काम किया जाने लगा।

प्रश्न 15.
फ्रांस के सर्फ और रोम के दास के जीवन की दशा की तुलना कीजिए।
उत्तर:
रोम के दास-रोम के दासों का जीवन बहुत ही कठोर था। उनसे कई-कई घंटे तक लगातार काम लिया जाता था। उन्हें समूहों में बेडियों में जकड कर रखा जाता था. ताकि वे भाग न जाएँ । सोते समय भी उनकी बेड़ियाँ नहीं खोली जाती थीं। उन्हें अधिक-से-अधिक बच्चे पैदा करने के लिए उत्साहित किया जाता था, क्योंकि उनके बच्चे भी बड़े होकर दास बनते थे। कुछ स्वतंत्र दास भी थे। उनका जीवन बेहतर था।

फ्रांस के सर्फ-फ्रांस में सर्फ अर्थात् कृषि-दास लाडों की भूमि पर कृषि करते थे। इसलिए उनकी अधिकतर उपज भी लॉर्ड को मिलती थी। उनसे वेगार भी ली जाती थी। वे लॉर्ड की आज्ञा के बिना जागीर नहीं छोड़ सकते थे। सर्फ केवल अपने लार्ड की चक्की में ही आटा पीस सकते थे, उनके तंदूर में ही रोटी सेंक सकते थे और उनकी मदिरा संपीडक में ही मदिरा और बीयर तैयार कर सकते थे। लॉर्ड को उनका विवाह तय करने का अधिकार था।

प्रश्न 16.
लॉर्ड तथा नाइट के आपसी संबंधों की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
नाइट लॉर्ड से उसी प्रकार जुड़े थे जिस प्रकार लॉर्ड राजा के संबद्ध थे। लॉर्ड नाइट को भूमि का एक भाग देता था और उसकी रक्षा करने का वचन देता था। इस भू-भाग के फीफ (Fiel) कहते थे। फीफ को उत्तराधिकार में भी प्राप्त किया सकता था। यह 1000-2000 एकड़ या इससे अधिक क्षेत्र में फैली हुई हो सकती थी। इसमें नाइट और उसके परिवार के लिए एक पनचक्की और मदिरा संपीडक के अतिरिक्त उनका घर, चर्च और उस पर निर्भर व्यक्तियों के रहने का स्थान होता था।

सामंत मैनर की तरह फीफ की भूमि को भी कृषक जोतते थे। फीफ के बदले में नाइट अपने लॉर्ड को एक निश्चित धनराशि देता था और युद्ध में उसकी ओर से लड़ने का वचन देता था। अपनी सैन्य कुशलता को बनाए रखने के लिए नाइट प्रतिदिन कुछ समय के लिए पुतलों से लड़ने तथा अपने बचाव का अभ्यास करते थे। नाइट अपनी सेवाएँ अन्य लॉडाँ को भी दे सकता था। परंतु उसकी सर्वप्रथम निष्ठा अपने लॉर्ड के प्रति ही होती थी।

प्रश्न 17.
मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप का प्रथम वर्ग कौन-सा था? कैथोलिक चर्च में उसकी भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप का प्रथम वर्ग पादरी वर्ग था। इसमें पोप, विशप तथा पादरी शामिल थे। कैथोलिक चर्च में उन्हें महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। पोप पश्चिमी चर्च के अध्यक्ष थे। वे रोम में रहते थे। यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन बिशप तथा पादरी करते थे। अधिकतर गाँवों के अपने चर्च होते थे। यहाँ प्रत्येक रविवार को लोग पादरी के धर्मोपदेश सुनने तथा सामूहिक प्रार्थना करने के लिए इकट्ठे होते थे।
चर्च के अपने नियम थे। इनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति पादरी नहीं हो सकता था।

कृषि-दास, शारीरिक रूप में बाधित व्यक्ति तथा स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकती थीं। पादरी बनने वाले पम्प विवाह नहीं कर सकते थे। धर्म के क्षेत्र में बिशप अभिजात (उच्च वर्ग के) माने जाते थे। बिशपों के पास भी लॉर्ड की तरह विस्तृत जागीरें थीं। वे शानदार महलों में रहते थे। चर्च को कृषक से एक वर्ष में उसकी उपज का दसवाँ भाग लेने का अधिकार था। इसे ‘टीथ’ (Tithe) कहते थे। धनी लोगों द्वारा अपने कल्याण तथा मरणोपरांत अपने रिश्तेदारों के कल्याण के लिए दिया जाने वाला दान भी चर्च की आय का एक स्रोत था।

प्रश्न 18.
इंग्लैंड में सामंतवाद का विकास कैसे हुआ?
उत्तर:
इंग्लैंड में सामंतवार का विकास ग्यारहवीं शताब्दी से हुआ। छठी शताब्दी में मध्य यूरोप से एंजिल (Angles) और सैक्सन (Saxons) लोग इंग्लैंड में आकर बस गए। इंग्लैंड देश का नाम ‘एंजिल लैंड’ का रूपांतरण है । ग्यारहवीं शताब्दी में नोरमंडी (Normandy) के इयूक विलियम प्रथम ने एक सेना के साथ इंग्लिश चैनल (English Channel) को पार करके इंग्लैंड के सैक्सन राजा को हरा दिया और इंग्लैंड पर अपना अधिकार कर लिया। उसने देश की भूमि नपवाई, उसके नक्शे बनवाए और उसे अपने साथ आए 180 नॉरमन अभिजातों में बाँट दिया। ये लॉर्ड राजा के प्रमुख काश्तकार बन गए।

इनसे राजा सैन्य-सहायता प्राप्त करता था। वे राजा को कुछ नाइट देने के लिए भी बाध्य थे। इसलिए लॉर्ड नाइटों को कुछ भूमि उपहार में देने लगे। बदले में वे उनसे उसी प्रकार सेवा की आशा रखते थे जैसी वे राजा की करते थे। परंतु वे अपने निजी युद्धों के लिए नाइटों का उपयोग नहीं कर सकते थे। एंग्लो-सैक्सन कृषक विभिन्न स्तरों के भू-स्वामियों के काश्तकार बन गए। इस प्रकार इंग्लैंड में सामंतवादी व्यवस्था अस्तित्व में आई।

प्रश्न 19.
सामंतवाद के समय यूरोपीय समाज में जो वर्ग थे, उनका वर्णन करें। पध्यकाल के अंतिम वर्षों में किस नए वर्ग का विकास हुआ और क्यों?
उत्तर:
सामंती प्रथा के अंतर्गत सामाजिक संगठन के दो वर्ग थे-शासक वर्ग तथा शासित वर्ग । शासक वर्ग में बड़े-बड़े सामंत (अलं) थे, जिन्हें राजा की ओर से भूमि मिली हुई थी। इस भूमि को उन्होंने नाइटों में बाँट रखा था। इस प्रकार सामंत तथा नाइट शासक वर्ग में थे। कृषक शासित वर्ग में आते थे।

दास कृषक भूमि पर काम करते थे और सामंत वर्ग उनके परिश्रम की कमाई को भोग-विलास तथा आपसी लड़ाईयों में खर्च कर देते थे। परिश्रमी कृषकों के जीवन के कल्याण की ओर ध्यान नहीं दिया जाता था।

नया वर्ग-मध्य काल के अंतिम वर्षों में व्यापार ने बहुत उन्नति की। इसका एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि इस युग में नए वर्ग का जन्म हुआ जिसे व्यापारी वर्ग के नाम से जाना जाता है। इस नए वर्ग के विकास के निम्नलिखित कारण थे

धर्म युद्ध के कारण यूरोप में भोग-विलास की वस्तुओं की मांग बढ़ गयी। इसके कारण बहुत से लोग इन वस्तुओं का व्यापार करने लगे। इससे व्यापारी वर्ग का विकास हुआ।

कृषि के विकास के कारण किसान कृषि की वस्तुओं का गैर कृषि-वस्तुओं के साथ विनिमय करने लगे। इससे भी व्यापारी वर्ग के विकास को काफी प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 20.
मध्य युग में पश्चिमी यूरोप की राजनीतिक दशा का विवेचन करें।
उत्तर:
मध्य युग में यूरोप की राजनीतिक दशा अच्छी नहीं थी। पश्चिमी यूरोप अनेक छोटे-छोटे राज्यों में बाँट हुआ था। पूर्वी भाग में बिजेंटाइन साम्राज्य स्थापित था जिसकी राजधनी कुस्तनतुनिया थी। पश्चिमी भाग में समय-समय पर कुछ विजेताओं ने छोटे राज्यों को मिलाकर बड़े राज्यों की स्थापना का प्रयास किया। 800 ई. में लगभग यहाँ शार्लेमेन ने एक बड़ा राज्य स्थापित किया। 1000 ई. के लगभग यहाँ पवित्र रामन साम्राज्य की स्थापना हुई। 1453 ई. में बिजेंटाइन साम्राज्य के प्रदेशों को तुर्की ने जीत लिया और इस तरह रोमन साम्राज्य का पतन हो गया।

प्रश्न 21.
फ्रांस के कथील नगर किस प्रकार अस्तित्व में आए?
उत्तर:
धनी व्यापारी चों को बहुत अधिक दान देते थे। अत: फ्रांस में बड़ी चर्चा का निर्माण होने लगा। इन्हें कधील कहा जाता था। यू तो चर्च मठों की संपत्ति थे फिर भी लोगों के विभिन्न समूहों ने अपने श्रम, वस्तुओं तथा धन से उनके निर्माण में सहयोग दिया । कथील पत्थर के बने होते थे और उन्हें पूरा करने में कई-कई वर्ष लग जाते थे। उनके निर्माण के दौरान कथोड्रल के आसपास का क्षेत्र और अधिक बस गया और उनका निर्माण कार्य पूरा होने पर वे तीर्थ-स्थल बन गए। इस प्रकार उनके चारों ओर छोटे-छोटे नगर उभर आए। यही कथील नगर थे।

प्रश्न 22.
कथील किस प्रकार बनाए जाते थे?
उत्तर:
कथील इस प्रकार बनाए गए थे कि पादरी की आवाज लोगों के जमा होने वाले सभागार में साफ सुनाई दे सके और भिक्षुओं का गायन भी अधिक मधुर सुनाई पड़े। इसके अतिरिक्त लोगों को प्रार्थना के लिए बुलाने वाली घंटियाँ भी दूर तक सुनाई दें। खिड़कियों के लिए अभिजित काँच का प्रयोग होता था। दिन के समय सूर्य का प्रकाश उन्हें कथील के अंदर विद्यमान व्यक्तियों के लिए चमकदार बना देता था। सूयार्यस्त के पश्चात् मोमबत्तियों का प्रकाश उन्हें बाहर के व्यक्तियों के लिए चमक प्रदान करता था। अभिरंजित कांच की खिड़कियों पर बाईबल की कथाओं से संबंधित चित्र बने होते थे जिन्हें अनपढ़ व्यक्ति भी पढ़ सकते थे।

प्रश्न 23.
14वीं शताब्दी के आर्थिक संकट ने कृषकों में किस प्रकार सामाजिक असंतोष को जन्म दिया? यह किस बात का संकेत था?
उत्तर:
14वीं शताब्दी के संकट से लॉर्डों की आय बुरी तरह प्रभावित हुई। मजदूरी की दरें बढ़ने तथा कृषि संबंधी मूल्यों की गिरावट ने उनकी आय को घटा दिया। निराशा में उन्होंने अपने धन संबंधी अनुबंधों को तोड़ दिया और फिर से पुरानी मजदूरी सेवाओं को लागू कर दिया। कृषकों, विशेषकर पढ़े-लिखे और समृद्ध कृषकों ने इसका विरोध किया। उन्होंने 1323 ई. में फ्लैंडर्स (Flanders) में, 1358 ई. में फ्रांस में और 1381 ई. में इंग्लैंड में विद्रोह किए।

यद्यपि इन विद्रोहों का क्रूरतापूर्वक दमन कर दिया गया, परंतु महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि सबसे हिंसक विद्रोह उन स्थानों पर हुए जहाँ आर्थिक विस्तार के कारण समृद्धि आई थी। यह इस बात का संकेत था कि कृषक पिछली सदियों में मिले लाभों को खोना नहीं चाहते थे। तीव्र दमन के बावजूद इन विद्रोहों की तीव्रता ने सुनिश्चित कर दिया कि कृषकों पर पुराने सामंती रिश्तों को फिर से नहीं लादा जा
सकता। इससे यह भी सुनिश्चित हो गया कि कृषि दासता के पुराने दिन फिर नहीं लौटेंगे।

प्रश्न 24.
मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान का जन-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान का जन-जीवन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। नगरों के उत्थान के कारण यूरोप के सामाजिक जीवन में अनेक परिवर्तन आए । इससे सामंत प्रधान समाज का ढाँचा शिथिल पड़ गया। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्त्व काफी बढ़ गया। नगरों के कारण ही शिक्षा का प्रसार हुआ और समाज तथा धर्म-सुधार आंदोलनों को बल मिला। सच तो यह है कि नगरों के उत्थान ने जन-जीवन को प्रगति के पथ पर जा खड़ा कर दिया।

प्रश्न 25.
यूरोप में मध्यकाल के अंतिम वर्षों में किस नए सामाजिक वर्ग का विकास हुआ और क्यों?
उत्तर:
मध्यकाल के अंतिम वर्षों में व्यापार ने बहुत उन्नति की। इसका एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि इस युग में नए वर्ग का जन्म हुआ जिसे व्यापारी वर्ग के नाम से जाना जाता है। इस वर्ग के विकास के निम्नलिखित कारण थे

  • धर्म-युद्धों के कारण यूरोप में भोग-विलास की वस्तुओं की मांग बढ़ गयी। इसके कारण बहुत-से लोग इन वस्तुओं का व्यापार करने लगे। इस प्रकार व्यापारी वर्ग का काफी विकास हुआ।
  • कृषि के विकास के कारण किसान कृषिगत वस्तुओं का गैर-कृषिगत वस्तुओं के साथ विनिमय करने लगे। इससे भी व्यापारी वर्ग के विकास को काफी प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 26.
मध्यकालीन यूरोप के मठों में ईसाई भिक्षु कैसा जीवन बिताते थे?
उत्तर:
मध्यकालीन चर्च और इसके ईसाई नेता अपने अनुयायियों को यह उपदेश देते थे कि उन्हें संन्यासियों जैसा जीवन व्यतीत करना चाहिए। उनके इस उपदेश से प्रभावित होकर बहुत-से ईसाईयों ने सांसारिक जीवन छोड़ दिया और संन्यासी हो गये। संन्यासी पुरुषों को भिक्षु तथा स्त्रियों को भिक्षुणियाँ कहा जाता था।

ये सभी बहुत सादा जीवन व्यतीत करते थे। इन्हें अनुशासन के कठोर नियमों का पालन करना पड़ता था। इन्हें विवाह करने और संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था। नियमों को उल्लंघन करने पर इन्हें कठोर दंड दिया जाता था। मठों में रहने वाले लोग ईश्वर की उपासना करते थे। ये लोगों को नैतिक शिक्षा देते थे तथा रोगियों की सेवा करते थे।

प्रश्न 27.
यूरोप में मध्ययुगीन मठों के दो-दो गुण तथा दोषों की सूची बनाओ।
उत्तर:
मध्ययुगीन मठ प्रणाली यूरोप के लिए वरदान भी थी और अभिशाप भी। इसके दो गुणों और दो दोषों का वर्णन इस प्रकार है

गुण –

  • इन मठों ने शिक्षा केंद्रों के रूप में कार्य किया। इस प्रकार यूरोप में ज्ञान का प्रसार हुआ।
  • मध्यकालीन चर्च के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए प्रशिक्षित भिक्षुओं ने संन्यासी जीवन की पवित्रता, नैतिकता, तप, त्याग, अनुशासन के आदर्शों को प्रोत्साहन दिया।

दोष –

  • मठों ने विस्तृत भूमि और अत्यधिक धन अपने पास एकत्रित कर लिया।
  • भिक्षु एवं भिक्षुणियों के साथ-साथ रहने के कारण भ्रष्टाचार फैल गया। वे तप और त्याग के जीवन को छोड़ कर भ्रष्ट एवं विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे।

प्रश्न 28.
राष्ट्र राज्यों के विकास में किन तत्त्वों ने सहायता पहुँचाई ? इन राज्यों में विकसित राजनीतिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्र-राज्यों के विकास में निम्नलिखित तथ्यों ने सहायता पहुँचाई –

  • सामंतवाद का पतन-सामंतवाद के पतन के कारण सामंतों की शक्ति कमजोर हो गई। इसके कारण शक्तिशाली शासकों ने पूर्ण सत्ता अपने हाथ में ले ली।
  • मध्यम वर्ग का शक्तिशाली होना-वाणिज्य और व्यापार की उन्नति के कारण मध्यम वर्ग की शक्ति बढ़ गई। मध्यम वर्ग ने राष्ट्र-राज्यों के उदय तथा विकास में महत्त्वपूर्ण भाग लिया।
  • राष्ट्रीय भाषाएँ और साहित्य-राष्ट्रीय भाषाओं और उनमें लिखे गए साहित्य ने भी राष्ट्र-राज्यों के विकास में बन सहायता की।
  • नए राष्ट्र-राज्यों का शासन शक्तिशली निरंकुश राजाओं के हाथ में था। इन शासकों ने अपीलों के लिए न्यायालय स्थापित किए। देश में
  • ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना हुई जिससे अराजकता का अंत हो गया। इसके अतिरिक्त कृषि दासता की प्रथा को सदा के लिए समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 29.
मार्टिन लूथर कौन थे?
उत्तर:
मार्टिन लूथर एक जर्मन युवा भिक्षु थे, जिन्होंने 1517 ई. में कैथोलिक चर्च के रूढ़िवाद एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ा था। लूथर के आंदोलन को प्रोटेस्टेंट सुधारवाद का नाम दिया गया। उन्होंने सादगी से पूर्ण जीवन एवं ईश्वर में असीम आस्था को अपनाने पर बल दिया था। प्रोटेस्टेंट आंदोलन के आचार संहिता का भी निर्माण लूथर ने किया, जिनमें आंदोलन संबंधी 95 प्रावधान रखे गये थे।

प्रश्न 30.
मध्यकालीन यूरोप में मठों का क्या कार्य था?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप के विशेष श्रद्धालु ईसाई धार्मिक समुदायों में रहते थे, जिन्हें मठ कहा जाता था। ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में मठों ने अपनी अहम् भूमिका निभायी है। पुरुष ईसाई भिक्षुओं को “मोक” एवं महिलाओं को ‘नन’ कहा जाता था। मठों ने सामाजिक और शैक्षणिक विकास के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रश्न 31.
राष्ट्र-राज्यों की तीन उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:
राष्ट्र-राज्यों की तीन उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं –

  • समाज में सर्फ वर्ग की समाप्ति कर दी गई। इसके अतिरिक्त सामतवाद का अंत करके कृषि, उद्योग तथा व्यापार की उन्नति से लोगों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाया गया ।
  • सीमा विवादों को समाप्त करके राज्यों को सुरक्षित सीमाएं प्रदान की गई।
  • राष्ट्र-राज्यों में एक ही भाषा बोलने वाले और समान संस्कृति से संबंधित लोगों में एकता स्थापित हुयी।

प्रश्न 32.
मध्यकालीन यूरोप में सामंतवाद के विभिन्न वर्गों में जो संबंध था, उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सामंतवाद में विभिन्न वर्ग थे-ड्यूक या अर्ल, बैरन या नाइट । इन सामंतों के अतिरिक्त किसानों की श्रेणी भी थी। किसानों के दो वर्ग थे-पहले वर्ग में स्वतंत्र किसान आते थे और दूसरे वर्ग में कृषक दासों की गणना होती थी। प्रत्येक सामंत अधिपति समझा जाता था। सामंत का कोई भी स्वामी नहीं था।

वह अपने अधिपति की ओर से उस भूमि का प्रबंध करता था। युद्ध के समय में राजा इयूकों तथा अलों से, अर्ल बैरनों से और बैरन नाइटों से सैनिक सहायता लेते थे। राजा भी सीधा बैरन या नाइट से संपर्क स्थापित नहीं कर सकता था । स्वतंत्र किसान केवल कर देते थे, परंतु दस किसानों से बेगार ली जाती थी।

प्रश्न 33.
यूरोपीय सामंतवाद की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
सामंतवाद का अर्थ है-भूमि का एक भाग जिसका प्रयोग सामंत सेवा करने की शर्तों के बदले करते थे। राजा अपनी जागीरों को लॉर्ड्स में बाँट देते थे। लॉर्ड्स इस भूमि का वितरण सामंतों में कर देते थे। प्रत्येक सामंत अपने अधिपति के प्रति निष्ठा रखता था और उसे सैनिक सहायता तथा उपहार देता था।

सामंत सरदार को अपने अधिपति से औपचारिक अधिकार मिल जाते थे। कृषक सामंती अधिक्रम में किसानों का सबसे निम्न वर्ग था। ये दो प्रकार के थे-स्वतंत्र किसान तथा दास कृषक (सर्फ)। किसान अपने स्वामी को मिलने वाली भूमि पर बंधुआ मजदूर के रूप में कार्य कर थे। इस प्रकार सामंतवाद में सत्ता व विकेंद्रीकरण किया गया । परंतु राजा का सामान्य व्यक्ति से कोई संपर्क न रहा।

प्रश्न 34.
सामंतवाद के राजनीतिक और आर्थिक महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में सामंतवाद के कारण समाज में राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर बहुत परिवर्तन हुए। राजनीतिक रूप में सामंतवाद के कारण एक नवीन शासन पद्धति का विकास हुआ। केंद्रीय सत्ता का अभाव हो गया और वास्तविक शक्ति का प्रयोग सामंती लॉर्ड करने लगे। इस व्यवस्था में कानून तथा न्याय का कोई आदर नहीं था। आर्थिक रूप से लोग का जीवन बड़ा पिछड़ गया।

इस युग में दास कृषकों का शोषण किया जाता था। नगरों के अभाव के कारण इस युग में व्यापार ठप्प हो गया। वास्तव में सामंती ढाँचे में जीवन मुख्यतः ग्रामीण गा। काम किसान करते थे और उनके उत्पादन का एक कहत बड़ा भाग सामंतों के हाथों में चला जाता था।

प्रश्न 35.
सामंतवाद में मेनर पर आश्रित जीवन का विवरण दीजिए।
उत्तर:
गाँव के समीप उपजाऊ भूमि को ‘मेनर’ कहते थे। मेनर के मध्य सामंत का महल होता था। वहाँ एक चरागाह भी होता था। मेनर में रहने वाले लोग मेनर की भूमि पर ही निर्वाह करते थे। इनकी भूमि पट्टियों में बँटी हुई थी। प्रत्येक किसान को खेतों के लिए कुछ पट्टियाँ दे दी जाती थीं। किसान का जीवन बड़ा कष्टमय था। मेनर का स्वामी उनके सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन में भी हस्तक्षेप कर सकता था। सामंत भोग-विलासी जीवन व्यतीत करता था।

प्रश्न 36.
मध्यकालीन यूरोप की सामंती व्यवस्था की आर्थिक और राजनैतिक विशेषताओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
1. आर्थिक विशेषताएँ – सामंती व्यवस्था के आर्थिक जीवन का आधार कृषि थी। गाँव की कृषि भूमि मेनर कहलाती थी। मेनर में एक चरागाह होता था, जहाँ पर पशु चराए जाते थे। प्रत्येक मेनर में कारखानों की भी व्यवस्था थी जो मेनर की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। उद्यम और व्यक्तिगत पहल का सर्वथा अभाव था। नये तौर-तरीकों की खोज को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता था।

2. राजनीतिक विशेषताएँ – सामंतवाद के कारण राजा की सत्ता का विकेंद्रीकरण हो गया और शक्तियाँ राजा और सामंतों के बीच बँट गयो। राजा का साधारण जनता से कोई संपर्क नहीं था। सामंत जनता के कल्याण की कोई चिंता नहीं करते थे। वे आपसी युद्धों में उलझे रहते थे जिसके कारण राजनीतिक एकता नष्ट हो गयी।

प्रश्न 37.
प्रारंभ में यूरोप में कृषि संबंधी क्या समस्याएँ थीं? इसका जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1. प्रारंभ में यूरोप में कृषि प्रौद्योगिकी बहुत ही प्राचीन थी। कृषक का एकमात्र कृषि उपकरण बैलों की जोड़ी से चलने वाला लकड़ी का हल था। यह हल केवल पृथ्वी की सतह को ही खुरच सकता था। यह भूमि की प्राकृतिक उत्पादकता को पूरी तरह से बाहर निकाल पाने में असमर्थ था। इसलिए कृषि में अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता था। भूमि को प्राय: चार वर्ष में एक बार हाथ से खोदा जाता था जिसके लिए अत्यधिक मानव श्रम की आवश्यकता होती थी।

2. फसल – चक्र का भी एक प्रभावहीन तरीके से उपयोग हो रहा था। भूमि को दो भागों में बाँट दिया जाता था। एक भाग में सर्दियों में गेहूँ बाया जाता था, जबकि दूसरी भूमि को परती या खाली रखा जाता था। अगले वर्ष परती भूमि पर राई बोई जाती थी जबकि दूसरा आधा भाग खाली रखा जाता था।

प्रभाव – इस व्यवस्था से मिट्टी की उर्वरता का ह्रास होने लगा और बार-बार अकाल पड़न लगा। कुपोषण और विनाशकारी अकालों ने गरीबों के जीवन को अत्यंत दुष्कर बना दिया।

प्रश्न 38.
कृषि संबंधी समस्याओं ने लार्डी तथा कृषकों के बीच किस प्रकार विरोधी भावनाएं उत्पन्न की?
उत्तर:
कृषि संबंधी कठिनाइयों के बावजूद लार्ड अपनी आय बढ़ाने के लिए उत्सुक रहते थे। क्योंकि कृषि उत्पादन को बढ़ाना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने कृषकों को मेनरों की जागीर की समस्त भूमि को कृषि के अधीन लाने के लिए बाध्य किया। यही कार्य करने के लिए उन्हें निधारित समय से अधिक समय काम करना पड़ता था।

कृषक इस अत्याचार को सहन नहीं कर सकते थे। वे खुलकर विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध का सहारा वे अपने खेतों पर कृषि करने में अधिक समय लगाने लगे और उस श्रम से किए गए उत्पादन का अधिकतर भाग अपने पास रखने लगे।

वे बेगार करने से बचने लगे। चरागाहों तथा वन-भूमि के कारण भी उनका अपने के साथ विवाद होने लगा। लॉर्ड इस भूमि को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति समझते थे जबकि कृषक इसे संपूर्ण समुदाय की साझी संपदा मानते थे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यूरोप में चौदहवीं शताब्दी का संकट क्या था ? इसके लिए कौन-कौन से कारक उत्तरदायी थे? इस संकट के क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप का आर्थिक विस्तार धीमा पड़ा गया। इस संकट के लिए मुख्य रूप निम्नलिखित कारक उत्तरदायी थे –
1. मौसम में परिवर्तन-तेरहवीं शताब्दी के अंत तक उत्तरी यूरोप में पिछले तीन सौ वर्षों की तेज ग्रीष्म ऋतु का स्थान अत्यधिक ठंडी ग्रीष्म ऋत ने ले लिया । फलस्वरूप फसल उगाने वाले मौसम छोटे हो गए। ऊँची भूमि पर तो फसल उगाना और भी कठिन हो गया। तूफानों और सागरीय बादों ने अनेक कृषि फार्मों को नष्ट कर दिया। परिणामस्वरूप सरकार को करों द्वारा मिलनी वाली आय कम हो गई।

2. गहन जुताई और जनसंख्या में वृद्धि-तेरहवीं शताब्दी से पहले की अनुकूल जलवायु ने अनेक जंगलों तथा चरागाहों को कृषि भूमि में बदल दिया था। परंतु गहन जुताई ने तीन क्षेत्रीय फसल-चक्र व्यवस्था के बावजूद भूमि को कमजोर बना दिया। ऐसा उचित भू-संरक्षण के अभाव में हुआ था। चरगाहों की कमी हो गई जिसके कारण पशुओं की संख्या में कमी आ गई। जनसंख्या वद्धि इतनी तेजी से हुई कि उपलब्ध संसाधन कम पड़ गए और अकाल पड़ने लगे। 1315 ई. और 1317 ई. के बीच यूरोप में कई भयंकर अकाल पड़े । इसके पश्चात् 1320 ई. के दशक में अनगिनत पशु मौत का शिकार हो गए।

3. चाँदी के उत्पादन में कमी-ऑस्ट्रिया और सर्बिया की चाँदी की खानों के उत्पादन में कमी आ गई जिसके कारण धातु-मुद्रा का अभाव हो गया। इससे व्यापार प्रभाव हुआ। अतः सरकारी मुद्रा में चाँदी की शुद्धता घटानी पड़ी। अब मुद्रा में सस्ती धातुओं का मिश्रण किया जाने लगा।

4. महामारियाँ-बारहवीं तथा तेरहवीं शताब्दी में वाणिज्य में विस्तार के परिणामस्वरूप दूर देशों में व्यापार करने वाले पोत यूरोपीय तटों पर आने लगे। पोतों के साथ-साथ बड़ी संख्या .3471. से 1350 ई. के बीच पश्चिमी यूरोप महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुआ। आधुनिक भाकलन के आधार पर यूरोप की जनसंख्या का लगभग 20 % भाग महामारी का शिकार हो गया। कुछ स्थानों पर तो मरनों पर तो मरने वालों की संख्या वहाँ की जनसख्या का 40% थी।

व्यापार केंद्र होने के कारण नगरों पर महामारी का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। मठों तथा कानवेंटों में जब एक व्यक्ति प्लेग की चपेट में आ जाता था तो वहाँ रहने वाले सभी लोग उसकी चपेट में आ जाते थे। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग मौत का शिकार हो जाते थे। प्लेग का युवाओं तथा बुजुर्गों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता था। 1350 ई. और 1370 ई. के करण पश्चात् 1360 ई. में भी प्लेग की छोटी-छोटी अनेक घटनाएँ हई। परिणामस्वरूप यूरोप की जनसंख्या 730 लाख से घटकर 1400 ई. में 450 लाख रह गई।

परिणाम –

  • इस विनाशलीला के साथ आर्थिक मंदी के जुड़ने से व्यापक सामाजिक विस्थापन हुआ।
  • जनसंख्या में कमी के कारण मजदूरों की संख्या में भारी कमी आई। अतः कृषि और उत्पादन के बिच गंभीर असंतुलन उत्पन्न हो गया।
    खरीदारों की जनसंख्या में कमी आने से कृषि उत्पादन के मूल्य एकाएक गिर गए।
  • प्लेग के बाद इंग्लैंड में मजदूरों: विशेषकर कृषि मजदूरों की मांग बढ़ गई जससे मजदूरी की दरों में 250 प्रतिशत तक वृद्धि हो गई।
  • इसका कारण यह था कि बचा हुआ श्रमिक बल अब अपनी पुरानी दरों से दुगुनी मजदूरी की माँग करने लगा था।

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोप में शक्तिशाली राज्यों (राष्ट्र राज्यों ) का उदय किस प्रकार हुआ? क्या अभिजात वर्ग द्वारा इसका विरोध हुआ?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में सामाजिक प्रक्रियाओं के साथ-साथ राजनीतिक क्षेत्रों में भी परिवर्तन आए। पंद्रहवी और सोलहवीं सदियों में यूरोपीय शासकों ने अपनी सैनिक तथा वित्तीय शक्ति में वृद्धि की। उनके द्वारा स्थापित नए शक्तिशाली राज्य उस समय होने वाले आर्थिक परिवर्तनों के समान ही महत्त्वपूर्ण थे। फ्रांस में लुई, ग्यारहवें, ऑस्ट्रिया में मैक्यमिलन, इंगलैंड में हेनरी सप्तम और स्पेन में ईसावला और फर्जीनेंड निरंकुश शासक थे। उन्होंने राष्ट्रीय स्थायी सेनाओं तथा स्थायी नौकरशाही की व्यवस्था को तथा कर प्रणाली स्थापित की । स्पेन तथा पुर्तगाल ने समुद्र पर यूरोप के विस्तार में भूमिका निभाई।

सहायक तत्व-राष्ट्र राज्यों के उदय में निम्नलिखित तत्त्वों ने सहायता पहुँचाई –
1. इन राजतंत्रों की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण कारण बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में होने वाली सामाजिक परिवर्तन था। जागीरदारी (Vassalage) और सामंताशाही (lordship) वाली सामंत प्रथा के विलय और आर्थिक विकास की धीमी गति ने इन शासकों को प्रभावशाली बनया और जनसाधारण पर अपना नियंत्रण बढ़ाने का अवसर प्रदान किया। नए शासकों में सामंतों से अपनी सेना के लिए कर लेना बंद कर दिया।

इसके स्थान पर उन्होंने बंदूकों और बड़ी तोपों से सुसज्जित प्रशिक्षित सेना तैयार की जो पूर्ण रूप से उनके अधीन थी। इस प्रकार राजा इतने शक्तिशाली हो गए कि अभिजात वर्ग उनका विरोध करने का साहसे नहीं जुटा पाता था।

2. कों में वृद्धि से शासकों को पर्याप्त राजस्व प्राप्त होने लगा। इससे उन्हें पहले से बड़ी सेनाएँ रखने में सहायता मिली। सेनाओं की सहायता से उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा की और उनकी विस्तार किया। सेना के बल पर उनके लिए राजसत्ता के प्रति होने वाले आंतरिक प्रतिरोधों को दबाना भी सरल हो गया। विरोध-इसका अर्थ यह नहीं था कि अभिजात वर्ग कॅन्द्रीय सत्ता का विरोध नहीं किया। अब कर प्रणाली के प्रश्न पर विद्रोह हुए । इंग्लैंड में इस विद्रोह का 1497 ई., 1536 ई., 1547 ई. , 1549 ई. और 1533 ई. में दमन कर दिया गया। फाँस में लुई xi (1461-83 ई.) को ड्यूकों तथा राजकुमारों के विरोद्ध एक लंबा संघर्ष करना पड़ा। छोटे सरदारों और अधिकांश स्थनीय सभाओं के सदस्यों ने भी अपनी शक्ति के जबरदस्ती हड़पे जाने का विद्रोह किया। सोलहवीं शताब्दी में फ्रांस में होने वाले ‘धर्म युद्ध’ कुछ सीमा तक शाही सुविधाओं और क्षेत्रीय स्वतंत्रता के बीच संघर्ष थे।

प्रश्न 3.
यूरोप के शक्तिशाली राज्यों में अपनी शक्ति को बनाए रखने के लिए अभिजात वर्ग ने क्या नीति अपनाई? क्या वे इसमें सफल रहे?
उत्तर:
अभिजात वर्ग ने अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए एक चाल चली। उन्होंने नई शासन-व्यवस्था का विरोधी होने की बजाय राजभक्त होने का दिखावा किया। इसी कारण निरंकुशता का सुधारा हुआ रूप माना जाता है। वास्तव में लॉर्ड, जो सामती प्रथा में शासक थे, राजनीतिक परिदृश्य पर अभी भी छाए हए थे। उन्हें प्रशासनिक सेवाओं में स्थायी स्थान दिए गए थे। फिर भी नई शासन व्यवस्था कई महत्वपूर्ण तरीकों से सामंती प्रथा से अलग थी।

शासक अब उस पिरामिड के शिखर पर नहीं था जहाँ राजभक्ति आपसी विश्वास और आपसी निर्भरता पर टिकी थी। अब वह एक व्यापक दरबारी समाज तंत्र का कंद्र-बिंदु था। वह अपने अनुयायियों को आश्रय भी देता था। सभी राजतंत्र चाहे वे कमजोर थे या शक्तिशाली सत्ता में भाग लेने वाले व्यकितयों का सहयोग चाहते थे। राजा द्वारा दिया गया संरक्षण अथवा आश्रय इस सहयोग को सुनिश्चित करने का साधन था। संरक्षण धन के माध्यम से दिया या प्राप्त किया जा सकता था। इसलिए धन, व्यापारियों और साहूकारों जैसे गैर-अभिजात वर्गों के लिए दरबर में प्रवेश पाने का, एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया। वे राजाओं को धन उधार देते थे जो इसका उपयोग सैनिकों को वेतन देने के लिए करते थे। इस प्रकार राज्य व्यवस्था में गैर सामांती तत्वों को भी स्थान मिल गया।

1614ई. में शासक लुई xiii के शासनकाल में फ्रांस की परामर्शदात्री सभा, एस्टेट्स जनरल का एक अधिवेशन हुआ। इसके तीन सदन थे जो समाज के तीन वर्गा का प्रतिनिधित्व करते थे। इसके पश्चात् 1789 ई. तक इसे फिर नहीं बुलाया गया क्योंकि राजा तीन वर्गों के साथ अपनी शक्ति नहीं बाँटना चाहते थे। इंग्लैंड में नॉरमन विजय से भी पहले एंग्लो सैक्सन लोगों की एक महान् परिषद् होती थी। कोई भी कर लगाने से पहले राजा को इसे परिषद् की सलाह लेनी पड़ती थी। इसने आगे चलकर दो सदनों वाली पालिर्यामेंट का रूप धारण कर लिया।

ये सदन थे-हाऊस ऑफ लॉड्स तथा हाऊस ऑफ कामन्स। हाऊस हॉफ लॉड्स क सदस्य लॉर्ड तथा पादरी थे। हाऊस ऑफ कामन्स नगरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता था। राजा चार्ल्स प्रथम (1629-40 ई.) ने पालिमेंट को बिना बुलाए ग्यारह वर्षों तक शासन किया। एक बार धन की आवश्यकता पड़ने पर ही उसने पालिर्यामेंट को बुलाने का निर्णय किया। परंतु पार्लियामेंट के एक भाग ने उसके विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। बाद में उसे प्राणदंड देकर गणतंत्र की स्थापना कर दी गई। यह व्यवस्था भी अधिक समय तक नहीं चल पाई और राजतंत्र की पुनः स्थापना हुई। यह निर्णय हुआ कि अब पार्लियामेंट नियमित रूप से बुलाई जाएगी। इससे स्पष्ट है कि अभिजात वर्ग शक्तिशाली राज्यों में भी अपनी शक्ति बनाये रखने में सफल रहा।

प्रश्न 4.
यूरोप में मध्यकाल में नगरों का विकास किन कारणों से हुआ?
उत्तर:
यूरोप में मध्य वर्ग के जन्म के साथ दो – घटित हुई। एक तो बड़े नगर अस्तिव में आए और दूसरे सामंतवादी ढाँचे की नीवं हिल गई। नगरों के उत्थान से मेनर में बसने वाले लोगों ने नगरों में रहना आरंभ कर दिया। नगर में उद्योग थे, धन था तथ ऐश्वर्य भरा जीवन था। एक ऐसा समय आय जब स्वयं सामंत भी जा कर इन नगरों में रहने लगे। मध्यकालीन इन नगरों के इर्द-गिर्द पत्थर की चारदीवारी होती थी। चारदीवारी के बाहर खाई और उसके ऊपर बड़े-बड़े बुर्ज होते थे। नगर में एक बड़ा बाजार और कुछ तंग गलियाँ होती थीं। इन नगरों के विकाश के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. सामंतो का आश्रय – नगरों का आरंभ मध्य वर्ग के उदय होने के कारण हुआ। मध्य वर्ग का उदय वीं शताब्दी क अंत में हुआ। इसका आरंभ शिल्पकारों से हुआ। शिल्पकारों अपने उद्योग वहीं उन्नत कर सकते थे, जहाँ उन्हे रक्षा की आशा थी। ऐसी स्थान सामंतों की गढियाँ थीं। आरंभ में उन्होंने गढ़ियाँ के समीप आश्रय लिया। वे सामत से रक्षा की आशा करते थे। वे उसकों रक्षक मानते थे और उसका पूर्ण आदर करते थे। गढ़ी के समीप रहने वाली वसितयाँ 11वीं तथा 12वीं शताब्दी में विस्तृत रूप धारण करने लगीं। अंततः ये नगर बन गए।

2. धर्मयुद्ध – धर्मयुद्ध ने भी नगरों के विकास में विशेष भूमिका निभाई। ये धर्म युद्ध ईसाईयों और मुसलमानों के बीच हुए। वे ग्यारहवीं शताब्दी के अंत से लेकर तेरहवीं शताब्दी के अंत तक चलते रहे। इन युद्धों के फलस्वरूप यरोप और एशिया के देशों का व्यापार कई गना बढ़ गया। व्यापार से नगरों में स्थित मंडियों की रौनक बढ़ी। लोगों की संख्या बढ़ने लगी जिसके कारण नगरों का आकर बढ़ा। कुछ लोग नगर छोड़ कर दूर जा कर बसने लगे। इस प्रकार नवीन नगर अस्तित्व में आए।

3. सिक्के की वृद्धि – स्किके की वृद्धि के कारण नगरों का विकाश हुआ। जब व्यापारियों की वस्तुओं की मांग बढ़ी तो उन्होंने अधिक मात्रा में वस्तुएँ बनानी आरंभ कर दी। माल विदेशों में भी भेजा जाता था। विदेशी व्यापारियों से सोना-चाँदी में मूल्य लिया जाता था। इससे मुद्रा या सिक्कों में वृद्धि हुई। आंतरिक मंडियों में व्यापार में आरंभ में, वस्तुओं के आदान-प्रदान से होता रहा. परंतु धीरे-धीरे यहाँ भी सिक्कों का प्रयोग किया जाने लगा। इस प्रकार मुद्रा के प्रसार ने व्यापारिक वृद्धि में बड़ा योगदान दिया और व्यापार के कारण नगरों का विकास हुआ।

4. नगरों का स्वतंत्र जीवन – समय बीतने के साथ-साथ नगर सामंतो से स्वतंत्र हो गये। उन्होंने व्यापारियों से धन लेकर नगर व्यापारियों को सौंप दिये। इन व्यापारियों ने गिल्ड प्रणाली द्वारा नगरों के जीवन को नया रूप दिया। नगरों के स्वतंत्र जीवन का प्रभाव प्राकृतिक रूप से आस-पास के क्षेत्रों पर भी पड़ा। सामांती के दास और काम करने वाले पर इसका बहुत प्रभाव पड़ा। उनमें से कई लोग सामंतो के अत्याचारों से तंग आकर समीप के नगरों में शरण लेने लगे। नगर में कुछ समय रहने के बाद वे स्वतंत्र समझे जाते थे। समयानुसार सामंतों ने भी अपनी गढ़ियाँ खाली कर दी तथ नागरिक जीवन के सुख प्राप्त करने के लिए नगरों में आकर रहने लगे।

5. नगरों का प्रतिनिधित्व – तेरहवीं शताब्दी में नगरों की शक्ति बहुत बढ़ गई। सम्राटों को इनके प्रतिनिधियों कों विधानमंडलों में लेना पड़ा। इससे नगरों का महत्व बड़ा और उनके विकास में योगदान मिला। सच तो, हे कि नगरों के विकास ने सामाजिर उन्नति के द्वार खोल दिये। इसके करण सामंत-प्रधान समाज की नींब हिल गई । व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बल मिला तथा व्यापार और उद्योग स्थापित हुए। इस प्रकार पूरे समाज का ही रूप बदल गया।

प्रश्न 5.
मध्यकालीन फ्रांस का दूसरा सामाजिक वर्ग कौन-सा था? समाज में इसकी क्या भूमिका थी?
उत्तर:
मध्यकालीन फ्रांस का दूसरा सामाजिक वर्ग अभिजात वर्ग था। पहले स्थान पर पादरी थे। वास्तव में सामाजिक प्रक्रिया में अभिजात वर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इसका कारण था भूमि पर उनका नियंत्रण। यह नियंत्रण वैसलेज नामक एक प्रथा के विकास का परिणाम था।

समाज में अभिजात वर्ग की भूमिका – फ्रांस के शासक अपनी प्रजा से जुड़े हुए थे। इसी कारण वैसलेज प्रथा जर्मन मूल के लोगों, जिनमें फ्रैंक लोग भी शामिल थे, में समान रूप से प्रचलित थी।
1. भू-स्वामी और अभिजात वर्ग राजा के अधीन होते थे, जबकि कृषक भू-स्वामियों के अधीन होते थे। अभिजात वर्ग राजा को अपना स्वामी (Seigneur अथवा Senior) मान लेता था और वे आपस में वचनबद्ध होते थे। सेनयोर अथवा लॉर्ड दास (vassal) की रक्षा करता था। बदले में दास लॉर्ड के प्रति निष्ठावान रहता था। इन संबंधों के व्यापक रीति-रिवाज तथा शपथें जुड़ी थीं। यह शपथ चर्च में बाईबल की शपथ लेकर ली जाती थीं। इस समारोह में दास को लॉर्ड द्वारा दी गई भूमि के प्रतीक के रूप में एक लिखित अधिकार पत्र अथवा एक छड़ी (Staff) या कंवल मिट्टी का एक डला दिया जाता था।

2. अभिजात वर्ग को एक विशेष स्थान प्राप्त था। उनका अपनी संपदा पर स्थायी रूप से पूर्ण नियंत्रण होता था। वे अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा सकते थे। उनकी सेना सामंती सेना कहलाती थी। वे अपना स्वयं का न्यायालय लगा सकते थे। यहाँ तक कि वे अपनी मुद्रा भी जारी कर सकते थे।

3. लॉर्ड अपनी भूमि पर बसे सभी लोगों का स्वामी होता था। उसके पास विस्तृत भू-क्षेत्र होता था। इसमें उसके घर, उसके निजी खेत एवं चरागाह और उनके कृषकों के घर तथा खेत होते थे। लॉर्ड का घर ‘मेनर’ कहलाता था। उनकी व्यक्तिगत भूमि कृषकों द्वारा जोती जाती थी। इन कृषकों को अपने खेतों पर काम करने के साथ-साथ आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के समय सैनिक के रूप में भी कार्य करना पड़ता था।

प्रश्न 6.
मेनर की जागीर क्या थी? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
मध्यकालीन लॉर्ड का अपना मेनर-भवन होता था। वह गाँवों पर नियंत्रण रखता था-कुछ लॉर्ड अनेक गाँवों के स्वामी थे। किसी छोटे मेनर की जागीर में दर्जन भर तथा बड़ी जागीर में 50-60 परिवार हो सकते थे। मेनर की जागीर की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. दैनिक उपयोग की प्रत्येक वस्तु जागीर पर ही मिलती थी। अनाज खेतों में उगाये जाते थे। लोहार तथा बढ़ई लॉर्ड के औजारों की देखभाल एवं मरम्मत करते थे। राजमिस्त्री उनकी इमारतों की देखभाल करते थे। औरतें सूत कातती एवं बुनती थीं । बच्चे लॉर्ड की मदिरा संपीडक में काम करते थे। जागीरों में विस्तृत अरण्य भूमि और वन होते थे जहाँ लॉर्ड शिकार करते थे। मेनर पर चरागाह भी होते थे जहाँ उनके पशु और क रते थे। मेनर पर एक चर्च और सुरक्षा के लिए एक दुर्ग भी होता था।

2. तेरहवीं शताब्दी में कुछ दुर्गों को बड़ा बनाया जाने लगा ताकि वे नाइट (Knight) तथा उसके परिवार का निवास स्थान बन सकें। वास्तव में, इंग्लैंड में नॉरमन विजय से पहले दुर्गों की कोई जानकारी / थी। इनका विकास सामंत प्रथा के अंतर्गत राजनीतिक प्रशासन और सैनिक शक्ति के केंद्रों के रूप में हुआ था।

3. मेनर कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो सकते थे क्योंकि उन्हें नमक, चक्की का पाट और धातु के बर्तन बाहर से मंगवाने पड़ते थे। विलासी जीवन बिताने के इच्छुक लॉडॉ को भी महंगी वस्तुएँ, वाद्य यंत्र और आभूषण आदि दूसरे स्थानों से मंगवाने पड़ते थे।

4. बारहवीं शताब्दी से फ्रांस के मेनरों में गायक वीर राजाओं तथा नाइट्स की वीरता की कहानियाँ गीतों के रूप में सुनाते हुए घूमते रहते थे। उस काल में जब पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बहुत कम थी और पांडुलिपियाँ भी अधिक नहीं थी, ये घुमक्कड़ चारण बहुत प्रसिद्ध थे। अनेक मेनर भवनों के मुख्य कक्ष के ऊपर एक संकरा छज्जा होता था जहाँ मेनर लोग भोजन करते थे। यह वास्तव में एक गायक दीर्घा होती थी। यहीं पर गायक अभिजात वर्ग के लोगों को भोजन के समय मनोरंजन प्रदान करते थे।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन यूरोप के भिक्षुओं के जीवन तथा मठवाद का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भिक्षु, विशेष श्रद्धालु ईसाइयों की एक श्रेणी थी। ये अत्यधिक धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। ये लोग नगरों और गाँवों में नहीं रहते थे, बल्कि एकांत जीवन जीना पसंद करते थे। वे धार्मिक समुदायों में रहते थे जिन्हें ऐबी (Abbeys) या मोनैस्ट्री अथवा मठ कहते थे। मध्यकालीन यूरोप के दो सबसे अधिक प्रसिद्ध मठों में एक मठ 529 ई. में इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट (St. Benedict) मठ था। दूसरा मठ 910 ई. में बरगंडी (Burgundy) में स्थापित क्लूनी (Clunny) का मठ था। भिक्षु अपना सारा जीवन ऐबी में रहने और अपना समय प्रार्थना करने तथा अध्ययन एवं कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाने का व्रत लेता था। भिक्षु जीवन पुरुष

और स्त्रियाँ दोनों ही अपना सकते थे। ऐसे पुरुषों को मोंक (Monk) तथा स्त्रियों को नन (Nun) कहा जाता था। पुरुषों और महिलाओं के लिए प्रायः अलग-अलग ऐबी थे। पादरियों की तरह भिक्षु और भिक्षुणियों को भी विवाह करने की अनुमति नहीं थी। धीरे-धीरे मठों का आकार बढ़ने लगा और भिक्षुओं की संख्या सैकड़ों तक पहुंच गईं।

भिक्षु तथा भिक्षुणियों के लिए नियम-बेनेडिक्टीन (Benedictine) मठों में भिक्षुओं के लिए एक हस्तलिखित पुस्तक होती थी इसमें नियमों के 73 अध्याय थे। भिक्षुओं द्वारा इनका पालन कई सदियों तक किया जाता रहा । इनमें से कुछ नियम इस प्रकार हैं –

भिक्षुओं को बोलने की अनुमति कभी-कभी ही दी जानी चाहिए।
विनम्रता का अर्थ है-आज्ञा का पालन।
किसी भी भिक्षु को निजी संपत्ति नहीं रखना चाहिए।
आलस्य आत्मा का शत्रु है। इसलिए भिक्षु-भिक्षुणियों को निश्चित समय पर शारीरिक श्रम और निश्चित घंटों में पवित्र पाठ करना चाहिए।
मठ इस प्रकार बनाने चाहिए कि आवश्यकता की सभी वस्तुएँ-जल, चक्की, उद्यान, कार्यशाला आदि सब कुछ उसकी सीमा के अंदर हों।

चौदहवीं सदी तक मठवाद के महत्त्व और उद्देश्य के बारे में कुछ शंकाएँ उभरने लगीं। इंग्लैंड में लैंग्लैंड की कविता पियर्स-द-प्लाउमैन (1360-1370 ई.) में कुछ भिक्षुओं के आरामदायक एवं विलासितापूर्ण जीवन की तुलना साधारण कृषकों, गड़ेरियों और गरीब मजदूरों के ‘विशुद्ध विश्वास’ से की गई है। इंग्लैंड में चौसर ने भी कैंटरबरी टेल्स लिखी जिसमें भिक्षुणी, भिक्ष और फ्रायर का हास्यास्पद चित्रण किया गया है।

प्रश्न 8.
मध्यकालीन यूरोप के समाज पर चर्च के प्रभाव की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
यूरोपवासी ईसाई तो बन गए थे परंतु उने अभी तक चमत्कार और रीति-रिवाजों से जुड़े अपने पुराने विश्वासों को पूरी तरह नहीं छोड़ा था। क्रिसमस और ईस्टर चौथी शताब्दी में ही कैलेंडर की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ बन गए थे। क्रिसमस अथवा ईसा मसीह के जन्मदिन ने एक पुराने पूर्व-रोमन त्योहार का स्थान ले लिया। इस तिथि की गणना सौर-पंचांग (Solar Calendar) के आधार पर की गई थी। ईस्टर-ईस्टर ईस के शूलारोपण और उनके पुनर्जीवित होने का प्रतीक था।

परंतु इसकी तिथि निश्चित नहीं थी क्योंकि इसने चंद्र-पंचाग (Lunar Calendar) पर आधारित एक प्राचीन त्योहार का स्थान लिया था। यह प्राचीन त्योहार लंबी सदी के पश्चात् वसंत के आगमन का स्वागत करने के लिए मनाया जाता था। एक परंपरा के अनुसार उस दिन प्रत्येक गाँव के व्यक्ति अपने गाँव की भूमि का दौरा करते थे। ईसाई धर्म अपनाने पर भी उन्होंने इसे जारी रखा। परंतु अब वे उसे ग्राम के स्थान पर ‘पैरिश’ कहने लगे।

त्योहारों का महत्त्व-काम से दबे कृषक इन पवित्र दिनों अथवा छुट्टियों (Holidays) का स्वागत इसलिए करते थे क्योंकि इन दिनों उन्हें कोई काम नहीं करना पड़ता था। वैसे तो यह दिन प्रार्थना करने के लिए था परंतु लोग सामान्यतः इसका उपयोग मनोरंजन करने और दावत करने में करते थे। तीर्थयात्रा-तीर्थयात्रा, ईसाइयों के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण भाग था। बहुत-से लोग शहीदों की समाधियों या बड़े गिरिजाघरों की लंबी यात्राओं पर जाते थे।

प्रश्न 9.
मध्यकालीन यूरोप के तीसरे सामाजिक वर्ग अर्थात् किसानों के जनजीवन की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
किसान अथवा काश्तकार प्रथम तथा द्वितीय वर्ग का भरण-पोषण करते थे। काश्तकार दो प्रकार के होते थे-स्वतंत्र किसान और सर्फ अथवा कृषि दास। सर्फ अंग्रेजी की क्रिया टू सर्व (To serve) से बना है। स्वतंत्र किसान-स्वतंत्र कृषक अपनी भूमि को लॉर्ड के काश्तकार के रूप में देखते थे। कृषकों के लिए वर्ष में कम-से-कम चालीस दिन सैनिक सेवा में योगदान आवश्यक होता था। कृषक परिवारों को लॉर्ड की जागीरों पर जाकर काम करना पड़ता था।

इस श्रम से होने वाला उत्पादन जिसे ‘श्रम-अधिशेष’ (Labour-rent) कहते थे, सीधे लॉर्ड के पास जाता था। इसके अतिरिक्त उनसे गड्ढे खोदना, जलाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करना, खेतों के लिए बाड़ बनाना और सड़कों एवं इमारतों की मरम्मत करने जैसे कुछ अन्य कार्य करने की भी आशा की जाती थी। इसके लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी। स्त्रियों व बच्चों को खेतों में सहायता करने के अतिरिक्त कई अन्य कार्य भी करने पड़ते थे। वे सूत कातते, कपड़ा बुनते, मोमबत्ती बनाते और लॉर्ड के लिए अंगूरों से रस निकाल कर मदिरा तैयार करते थे। इसके साथ ही राजा कृषकों पर एक प्रत्यक्ष कर भी लगाता था जिसे टैली (Taille) कहते थे। पादरी और अभिजात वर्ग इस कर से मुक्त थे।

कृषिदास अथवा सर्फ-कृषिदास अपने गुजारे के लिए जिन भूखंडों पर कृषि करते थे, वे लॉर्ड से संबंधित थे । इसलिए उनकी अधिकतर उपज भी लॉर्ड को ही मिलती थी। वे उस भूमि पर भी कृषि करते थे जो केवल लॉर्ड के स्वामित्व में थी। इसके लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं दी जाती थी। चे लॉर्ड की आज्ञा के बिना जागीर नहीं छोड़ सकते थे। सर्फ केवल अपने लॉर्ड की चक्की में ही आटा पीस सकते थे. उनके तंदूर में ही. रोटी सेंक सकते थे और उनकी मदिरा संपीडक में ही मदिरा और बीयर तैयार कर सकते थे। लॉर्ड को कृषिदास का विवाह तय करने का भी अधिकार था। वह कृषिदास की पसंद को भी अपना आशीर्वाद दे सकता था। परंतु इसके लिए वह शुल्क लेता था।

प्रश्न 10.
ग्यारहवीं शताब्दी में यूरोप में होने वाले नए प्रौद्योगिकी परिवर्तनों की विवेचना कीजिए। इनके क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
ग्यारहवीं शताब्दी तक यूरोप में विभिन्न प्रौद्योगिकियों में परिवर्तन आने लगे। इन परिवर्तनों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –
1. अब लकड़ी के हल के स्थान पर लोहे की भारी नोंक वाले हल तथा साँचेदार पटरे (Mould board) का उपयोग होने लगा। ऐसे हल भूमि को अधिक गहरा खोद सकते थे साँचेदार पटरे उपरी मृदा को सही ढंग से उलट-पुलट सकते थे। फलस्वरूप भूमि में विद्यमान पौष्टिक तत्त्वों का बेहतर उपयोग होने लगा।

2. पशुओं को हल में जोतने के तरीकों में सुधार हुआ। अब जुआ पशु के गले (Neck harmess) के स्थान पर कंधे पर बाँधा जाने लगा। इससे पशुओं के काम करने की क्षमता बढ़ गई।

3. घोड़े के खुरों पर अब लोहे की नाल लगाई जाने लगी जिससे उनके खुर सुरक्षित हो गए।

4. कृषि के लिए पवन-ऊर्जा और जल शक्ति का उपयोग बढ़ गया।

5. अन्न को पीसने और अंगूरों को निचोड़ने के काम भी जलशक्ति और वायुशक्ति से चलने वाले कारखानों में किए जाने लगे।

6. भूमि के उपयोग के तरीके में भी बदलाव आया। सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन था-दो खेतों वाली व्यवस्था का तीन खेतों वाली व्यवस्था में बदलना। इस व्यवस्था में कृषक तीन वर्षों में दो वर्ष अपने खेत का उपयोग कर सकता था।

उसे करना यह था कि वह एक फसल शरद् ऋतु में गेहूँ या राई बो सकते थे दूसरे में वसंत ऋतु में मटर, सेम और मसूर बायो जा सकता था तथा घोड़ों के लिए जौ तथा बाजरा उपागया जा सकता था। तीसरा खेत परती अर्थात् खाली रखा जाता था। प्रत्येक वर्ष वे तीनों खेतों का प्रयोग बदल-बदल कर, कर सकते थे।

परिणाम अथवा प्रभाव –

  • इन सुधारों से भूमि के प्रति इकाई उत्पादन क्षमता में तेजी से वृद्धि हुई। फलस्वरूप भोजन की उपलब्ध दुगुनी हो गई।
  • आहार में मटर और से का अधिक उपयोग अधिक प्रोटीन का स्रोत बन गया।
  • पशुओं को भी पौष्टिक चारा मिलने लगा।
  • किसान अब कम भूमि पर अधिक भोजन का उत्पादन कर सकते थे।
  • तेरहवीं शताब्दी तक एक कृषक के खेत का औसत आकार सौ एकड़ से घटकर बीस से तीस एकड़ तक रहा गया। इन छोटी जोतों
  • पर अधिक कुशलता से कृषि की जा सकती थी और उसमें कम श्रम की आवश्यकता थी। फलस्वरूप समय की बचत हुई जिसका
  • उपयोग कृषक अन्य कार्यों के लिए कर सकते थे।

प्रश्न 11.
मध्यकालीन यूरोप में कृषि के विस्तार के क्या परिणाम निकलें?
उत्तर:
कृषि में विस्तार के परिणामस्वरूप उससे संबंधित तीन क्षेत्रों अर्थात् जनसंख्या, व्यापार और नगरों का विस्तार हुआ। यूरोप की जनसंख्या जो 1000 ई. में लगभग 420 लाख थी बढ़कर 1300 ई. में 730 लाख हो गई। बेहतर आहार से जीवन-अवधि लंबी हो गई। तेरहवीं शताब्दी तक एक औसत यूरोपीय आठवीं सदी की तुलना में दस वर्ष अधिक जी सकता था। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों तथा बालिकाओं की जीवन-अवधि छोटी थी। इसका कारण यह था कि उन्हें पुरूषों बेहतर भोजन नहीं मिल पाता था।

रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् उसके नगर वीरान हो गए थे। परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी से नगर फिर से बढ़ने लगे। जिन कृषकों के पास अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न होता था, उन्हें एक ऐसे स्थान की आवयश्कता महसूस हुई जहाँ वे अपना बिक्री केन्द्र स्थापित कर सकें और अपने उपकरण और कपड़े खरीद सकें। इस आवश्यकता ने मियादी हाट-मेलों को बढ़ावा दिया। इससे छोटे विपणन केंद्रों का विकास भी हुआ। ये केंद्र धीरे-धीरे नगरों का रूप धारण करने लगे। इन नगरों के लक्षण थे-एक नगर नौक, चर्च, सड़क, घर और दुकानें। एक कार्यलय भी होता था जहाँ नगर पर शासन करने वाल व्यक्ति आपस में मिलते थे। अन्य स्थानों पर नगरों का विकास:-विशाल दुर्गा, बिशपों की जागीरों तथा बड़े-बड़े चर्चा के चारों ओर होने लगा।

नगरों में लोग उन लॉडों को जिनकी भूमि पर नगर बसे थे, सेवा के स्थान पर कर देन लगे। नगरों ने कृषक परिवारो के युवा लोगों के लिए वैतनिक कार्य करने तथा लॉर्ड के नियंत्रण से मुक्ति दिलाने की संभावनाओं में भी वृद्धि को।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
माइक्रोस्कोप की खोज किस वर्ष हुई?
(क) 1590 में
(ख) 1560 में
(ग) 1570 में
(घ) 1561 में
उत्तर:
(क) 1590 में

प्रश्न 2.
सौर-परिवार सिद्धांत किसने प्रस्तुत किया?
(क) कोपरनिकस
(ख) गैलीलियो
(ग) जचारियास
(घ) जेन्सन
उत्तर:
(क) कोपरनिकस

प्रश्न 3.
चीन में मिंग राजवंश कब स्थापित हुआ?
(क) 1368 में
(ख) 1373 में
(ग) 1378 में
(घ) 1383 में
उत्तर:
(क) 1368 में

प्रश्न 4.
रूस में आधुनिकीकरण किसने किया?
(क) पीटर महान् ने
(ख) सनयात् सेन ने
(ग) च्यांग काई शेक ने
(घ) अल्हम्वा ने
उत्तर:
(क) पीटर महान् ने

प्रश्न 5.
कॉफी का यूरोप में पहली गर प्रयोग किस वर्ष हुआ?
(क) 1517 में
(ख) 1520 में
(ग) 1521 मं
(घ) 1570 में
उत्तर:
(क) 1517 में

प्रश्न 6.
1325 में प्लेग किस देश में फैला?
(क) मिस्र
(ख) रूस
(ग) पुर्तगाल
(घ) भारत
उत्तर:
(क) मिस्र

प्रश्न 7.
इंग्लैण्ड में ट्युडर वंश की स्थापना कब हुई?
(क) 1485 में
(ख) 1487 में
(ग) 1473 में
(घ) 1486 में
उत्तर:
(क) 1485 में

प्रश्न 8.
केन्टवरी टेल्स की रचना किसने की?
(क) जेफ्री चाँसर
(ख) यार्थीपोलो
(ग) ऐडी रोडो
(घ) विची
उत्तर:
(ख) यार्थीपोलो

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार लगभग 570 – 1200 ई

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार लगभग 570 – 1200 ई Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार लगभग 570 – 1200 ई

Bihar Board Class 11 History इस्लाम का उदय और विस्तार लगभग 570 – 1200 ई Textbook Questions and Answers

 

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

इस्लाम का उदय और विस्तार प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
सातवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में बेदुहनों के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर:
सातवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में बेदुइने खजूर आदि खाद्य पदार्थों तथा अपने ऊँटों के लिए चारे की तलाश में घूमते रहते थे। ये प्रायः मरुस्थल के सूखे क्षेत्रों से हरे-भरे क्षेत्रों की ओर जाते रहते थे।

इस्लाम का उदय और विस्तार के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
‘अब्बासी क्रांति’ से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
उमय्यदों के विरुद्ध ‘दावा’ नामक एक सुसंगठित आंदोलन हुआ। फलस्वरूप उनका पतन हो गया। सन् 1750 में उनके स्थान पर मक्काई मूल के अन्य परिवार, अब्बसिदों को स्थापित कर दिया गया। वस्तुतः अब्बासिदों ने उमय्यद शासन की जमकर आलोचना की और पैगम्बर द्वारा स्थापित मूल इस्लाम को फिर से बहाल करने का वायदा किया। इस क्रांति से राजवंश में परिवर्तन के साथ राजनीतिक ढाँचे और इस्लाम की ढाँचे में भारी परिवर्तन हुए।

इस्लाम का उदय और विस्तार पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 3.
अरबों, इरानियों व तुर्कों द्वारा स्थापित राज्यों की बहुसंस्कृतियों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • अरब साम्राज्यों में मुस्लिम, ईसाई तथा यहूदी संस्कृतियों के लोग रहते थे।
  • ईरानी साम्राज्यों में मुस्लिम तथा एशियाई संस्कृतियों का विकास हुआ।
  • तुर्की साम्राज्य में मिस्री, ईरानी, सीरियाई तथा भारतीय संस्कृतियों का विकास हुआ।

इस्लाम का उदय और विस्तार लगभग 570 से 1200 ईसवी Bihar Board Class 11 प्रश्न 4.
यूरोप व एशिया पर धर्मयूद्धों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
क्रूसेड या धर्मयुद्ध का यूरोप और एशिया पर गहरा प्रभाव पड़ा जो निम्नलिखित है –

  • मुस्लिम राज्यों ने अपने ईसाई प्रजाजनों के प्रति कठोर व्यवहार अपनाया। विशेष रूप से यह स्थिति लड़ाड़ियों में देखी गयी।
  • फलस्वरूप ईसाइयों ने अपने आबादी वाले क्षेत्रों की सुरक्षा का प्रबन्ध किया।
  • मुस्लिम सत्ता की बहाली के बाद भी पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार में इटली के व्यापारिक समुदायों (पीसा, जेनेवा और वीनस का अधिक प्रभाव था)।

Islam Ka Uday Aur Vistar In Hindi Class 11 Bihar Board प्रश्न 5.
रोमन साम्राज्य के वास्तुकलात्मक रूपों से इस्लामी वास्तुकलात्मक रूप कैसे भिन्न थे?
उत्तर:
रोमन वास्तुकला-रोम के निवासी कुशल निर्माता थे। उन्होंने वास्तुकला में डाट और गुंबद बनाकर दो महत्वपूर्ण सुधर किए। उनके भवन दो-तीन मंजिलों वाले होते थे। इनमें डाटों को एक के ऊपर बनाया जाता था। उनकी डार्ट गोल होती थीं। ये डाटें नगर के द्वारों, पुलों, बड़े भवनों तथा विजय स्मारक बनाने में प्रयोग की जाती थीं । डाटों का प्रयोग कोलेजियम बनाने में किया गया। यहाँ ग्लेडिएटरों की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती थीं। ये डाटें नहर बनाने में भी काम में लाई जाती थीं।

इस्लामी वास्तुकला-इस्लामी वास्तुकला पर ईरानी कला का प्रभाव था। परंतु अरब निवासियों ने अलंकरण के मौलिक नमूने निकाल लिए । उनके भवनों में गोल गुबंद, छोटी मीनारें, घोड़ों के खुर के आकार के महराब तथा मरोड़दार स्तंभ होते थे। इस्लामी वास्तुकला की विशेषताएँ अरबों की मस्जिदों, पुस्तकलयों, महलों, चिकित्सालयों और विद्यालयों में देखी जा सकती हैं।

इस्लाम का उदय और विस्तार के प्रश्न-उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 6.
रास्ते पर पड़ने वाले नगरों का उल्लेख करते हुए समरकंद से दमिश्क तक की यात्रा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समरंकद इस्लामी राज्य के उत्तर:पूर्व में स्थित था, जबकि दमिश्क (सीरिया) मध्य में स्थित था। समरकंद से दमिश्क जोन के लिए यात्री को मर्व, निशापुर समारा आदि नगरों से गुजरना पड़ता था।

Bihar Board Class 11 History इस्लाम का उदय और विस्तार लगभग 570 – 1200 ई Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

इस्लाम का उदय और विस्तार प्रश्न-उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
‘कुरान’ शब्द किससे बना है?
उत्तर:
‘कुरान’ शब्द ‘इकरा’ से बना है जिसका अर्थ हैं-पाठ करो। ‘इकरा’ शब्द सबसे पहले महादृव जिवरील ने पुकारा था। वह पैगम्बर मोहम्द के लिए संदेश लाया करते थे।

इस्लाम के उदय और विस्तार की विवेचना कीजिए Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
मक्का शहर क्यों विख्यात था?
उत्तर:

  • मक्का शहर अपनी पवित्र स्थान ‘काबा’ के लिए विख्यात था।
  • यह यमना और सोरिया के बीच व्यापार-मार्गी एक चौराहे पर स्थित था। इसलिए भी इसे महत्त्वपूर्ण माना जाता था।

Islam Ka Uday Aur Vistar Question Answer Bihar Board Class 11 प्रश्न 3.
पैगंबर मुहम्मद ने अपने आपको खुदा का संदेशवाहक कब घोषित किया? उन्होंने लोगों को कौन-सी दो बातें बनाई?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद ने लगभग 612 ई० में अपने आपको खुदा का संदेशावाहक घोषित किया। उन्होंने लोगों को निम्नलिखित दो बातें बताई –

  • केवल अल्लाह की ही पूजा की जानी चाहिए।
  • उन्हें एक ऐसे समाज की स्थापना करनी है जिसमें अल्लाह के बंदे सामान्य धार्मिक विश्वासों द्वारा आपस में जुड़े हो।

इस्लाम का उदय और विस्तार लगभग 570 1200 Bihar Board Class 11 प्रश्न 4.
पैगंबर मुहम्मद के धर्म-सिद्धांत को स्वीकार करने वाले लोग क्या कहलाए? उन्हें किन दो बातों का आश्वासन दिया जाता था?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद के धर्म-सिद्धांत को स्वीकार करने वाले लोग मुसलमान कहलाए। उन्हें कयामत के दिन मुक्ति और धरती पर रहते हुए समाज के संसाधनों में हिस्सा देने का आवश्वासन दिया जाता था।

प्रश्न 5.
मक्का में मुसलमानों को किन लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा और क्यों?
उत्तर:
मुसलकानों को समृद्ध लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें अपने देवी-देवताओं का ठुकराया जाना बुरा लगा था। इसके अतिरिक्त वे नए धर्म को मक्का की प्रतिष्ठा और समृद्धि के लिए खतरा मानते थे।

प्रश्न 6.
‘हिजरा’ से क्या अभिप्राय है? इस्लाम के इतिहास में इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
मक्का में समृद्ध लोगों के विरोध के कारण 522 ई० में पैगंबर मुहम्मद की अपने अनुयायियों के साथ मक्का छोड़कर मदीना जाना पड़ा । मुहम्मद साहिब की इस यात्रा को हिजरा कहते है। वह जिस वर्ष मदीना पहुँचे उसी वर्ष से हिजरी सन् (मुस्लिम कैलेंडर) की शुरुआत हुई।

प्रश्न 7.
किसी धर्म के जीवित रहने के लिए क्या शर्ते होती हैं?
उत्तर:
किसी धर्म का जीवित रहना उस पर विश्वास करने वाले लोगों के जीवित रहने पर निर्भर करता है। इस लोगों को आंतरिक रूप से मजबूत बनाना था उन्हें बाहरी खतरों से बचाना भी आवश्यक होता हैं। इसके लिए राज्य और सरकार जैसी संस्थाओं की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 8.
खिलाफत की संस्था का का निर्माण कैसे हुआ?
उत्तर:
632 ई० में मुहम्मद साहिब के देहांत के बाद उनका कोई वैध उत्तराधिकारी नहीं रहा था। उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम भी नहीं था। इस्लामी राजसत्ता उम्मा को सौंप दी गई। इस प्रकार खिलाफत की संस्था का निर्माण हुआ ।

प्रश्न 9.
इस्लामी क्षेत्रों में 600-1200 ई० के इतिहास के कोई चार स्रोत बताइए।
उत्तर:

  • इतिवृत
  • पैगंबर के कथनों के अभिलेख
  • कुरान की टीकाएँ
  • जीवन चरित्र

प्रश्न 10.
पैगंबर मुहम्मद कौन थे?
उत्तर:
पैगंबर एक सौदागर थे जिनका संबंध मक्का (अरब) में रहने वाले कुरैशा कबीले से था। उन्होंने इस्लाम धर्म की स्थापना की थी।

प्रश्न 11.
अरब कबीले के संगठन की जानकारी दीजिए।
उत्तर:
अरब कबील वंशों से बना होता था अथवा बड़े परिवार का एक समूह होता था। प्रत्येक कबीले का नेतृत्व एक शेख द्वारा किया जाता था जिसका चुनाव मुख्यतः व्यक्तिगत साहस, बुद्धिमता तथा उदारता के आवास पर किया जाता था।

प्रश्न 12.
खलीफाओं ने नये शहरों की स्थापना किस उद्देश्य से की? उनके द्वारा स्थापित चार फौजी शहरों के नाम बताइए।
उत्तर:
खलीफाओं ने नये शहरों की स्थापना मुख्य रूप से उन अरब सैनिकों को बसाने के लिए की जो स्थानीय प्रशासन की रीढ़ थे। उनके द्वारा स्थापित चार फौजी शहर थे-(i) इराक में कुफा तथा बसरा और मिस्र में फुस्तात तथा काहिरा।

प्रश्न 13.
इस्लाम धर्म का मूल क्या है?
उत्तर:
एक ही ईश्वर अर्थात् अल्लाह की पूजा करना।

प्रश्न 14.
‘काबा’ क्या था।
उत्तर:
‘काबा’ मक्का में स्थित एक घनाकार ढाँचा था। यह मक्का का मुख्य पवित्र स्थल था। मक्का के बाहर के कबीले भी काबा का पवित्र मानते थे और हर वर्ष यहाँ की धार्मिक यात्रा (हज) करते थे।

प्रश्न 15.
उमर-खय्याम कौन था?
उत्तर:
उमर खय्याम एक कवि, गणितज्ञ तथा खगोलशास्त्री था। उसने रूबाई को लोकप्रिय बनाया।

प्रश्न 16.
अब्बासी कौन थे? उन्होंने अपने सत्ता प्राप्ति के प्रयास को किस प्रकार वैध ठहराया?
उत्तर:
अब्बासी मुहम्मद के चाचा अब्बास के वंशज थे। उन्होंने विभिन्न अरब समूहों को यह आवश्वासन दिया कि पैगंबर के परिवार का कोई मसीहा उन्हें उमय्यद वंश के दमनकारी शासन से मुक्ति दिलवाएगा। इसी आवश्वासन द्वारा ही उन्होंने अपने सत्ता प्राप्ति के प्रयास का वैध ठहराया।

प्रश्न 17.
अब्बासी ने उमय्यन वंश की किन दो परम्पराओं को बनाए रखा?
उत्तर:

  • उन्होंने सरकार और साम्राज्य के केंद्रीय स्वरूप को बनाए रखा।
  • उन्होंने उमय्यदों की शाही वास्तुकला तथा राजदरबार के व्यापक समारोहों की परंपरा को भी जारी रखा।

प्रश्न 18.
नौवीं शताब्दी में अब्बासी राज्य के कमजोर हो जाने के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:

  • दूर के प्रांतों पर बगदाद का नियंत्रण कम हो गया था।
  • सेना तथा नौकरशाही में अरब समर्थक तथा ईरान समर्थक गुटों के बीच झगड़ा हो गया था।

प्रश्न 19.
बगदाद के बुवाही शासकों के दो कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • बुवाही शासकों ने विभिन्न उपाधियाँ धारण की इनमें से एक उपाधि ‘शहंशाह’ की थी।
  • उन्होंने शिया प्रशासकों, कवियों तथा विद्वानों को आश्रय प्रदान किया।

प्रश्न 20.
फातिमी कौन थे? वे स्वयं को इस्लाम का एकमात्र न्यायसंगत शासक क्यों मानते थे?
उत्तर:
फातिमी का संबंध शिया संप्रदाय के एक उपसंप्रदाय इस्लामी से था। उनका दावा था कि वे पैगंबर की बेटी फातिमा के वंशज है। इसलिए वे इस्लाम के एकमात्र न्याय-संगत शासक हैं।

प्रश्न 21.
उपय्यद वंश के अब्द-अल मलिक द्वारा अरब-इस्लामी पहचान के विकास के लिए किए गए कोई दो कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • अब्द-अल-मलिक ने इस्लामिक सिक्के चलाए जिन पर अरबी भाषा में लिखा गया।
  • उसने जेरूसलम में ‘डीम ऑफ रॉक’ बनवाकर भी अरब-इस्लामी पहचान के विकास में योगदान दिया।

प्रश्न 22.
तुर्क कौन थे? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
तर्क लोग तुर्किस्तान के मध्य एशियाई घास के मैदानों के खानाबदेश कबाइली थे। वे कशल सवार तथा योद्धा थे। वे गुलामों तथा सैनिकों के रूप में अब्बासी ससानी तथा बवाही शासकों के अधीन कार्य करने लगे। अपनी सैनिक योग्यता तथा वफदारी के बल पर उन्नति करके वें उच्च पदों पर पहुंच गए।

प्रश्न 23.
खिलाफत संस्था के दो मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
खिलाफत संस्था के दो मुख्य उद्देश्य थे –

  • उम्मा के कबीलों पर नियंत्रण बनाए रखना।
  • राज्य के लिए संसाधन जुटाना।

प्रश्न 24.
बाइजेंटाइन तथा ससानी साम्राज्यों के विरुद्ध अरबों की सफलता में योग देने वाले कारक कौन-कौन से थे ?
उत्तर:

  • अरबों की सामरिक नीति।
  • अरबों का धार्मिक जोश
  • विरोधियों की कमजोरियाँ।

प्रश्न 25.
तीसरे खलीफा उथमान की हत्या क्यों की गई?
उत्तर:
खलीफा उथमान एक कुरैश था। सत्ता पर अपना नियंत्रण बढ़ाने के लिए उसने प्रशासन में कुरैश कबीले के लोगों को ही भर दिया इसलिए अन्य कबीले उसके विरुद्ध हो गए। और उसकी हत्या कर दी गई।

प्रश्न 26.
चौथे खलीफा ने कौन-कौन से दो युद्ध लड़े और उनका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:

  • अली ने पहला युद्ध मुहम्मद की पत्नी आयशा की सेना के विरुद्ध लड़ा। इसे ऊँट की लड़ाई’ कहा जाता है। इस युद्ध में आयशा पराजित हुई।
  • अली का दूसरा युद्ध उत्तरी मेसोपोटामिया में सिफ्फिन में हुआ था। यह संधि के रूप में समाप्त हुआ था।

प्रश्न 27.
इस्लाम का दो मुख्य संप्रदायों में विभाजन क्यों हुआ? ये संप्रदाय कौन-कौन से थे?
उत्तर:
खलीफा अली ने अपने शासनकाल में मक्का के अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व करने पाले लोगों के विरुद्ध दो युद्ध लड़े। इससे मुसलमानों के बीच में दरार पड़ गई और इस्लाम दो संप्रदायों में विभाजित हो गया। ये संप्रदाय थे-सुन्नी और शिया।

प्रश्न 28.
खलीफा अली की हत्या कहाँ और किसने किया?
उत्तर:
खलीफा अली की हत्या एक खरजी ने कुफा की एक मस्जिद में की।

प्रश्न 29.
उमय्यद वंश की स्थापना कब और किसने की? यह वंश कब तक चलता रहा?
उत्तर:
उमय्यद वंश की स्थापना 661 ई. में मुआविया ने की। यह वंश 750 ई. तक चलता रहा।

प्रश्न 30.
जेरूसलम में डोम ऑफ रॉक किसने बनाया? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
जेरूसलम में डोम ऑफ रॉक अब्द अल-मलिक ने बनवाया । यह इस्लामी वास्तुकला का पहला बड़ा नमूना है। इसका एक रहस्यमय महत्त्व भी है। वह यह कि यह स्मारक पैगंबर मुहम्मद की स्वर्ग की ओर रात्रि यात्रा से जुड़ा है।

प्रश्न 31.
चौथी शताब्दी में किन दो कारणों से लाल सागर मार्ग का महत्व बढ़ा?
उत्तर:

  • काहिरा का व्यापार शक्ति के रूप में उभरना।
  • इटली के व्यापारिक शहरों से पूर्वी वस्तुओं की बढ़ती हुई माँग।

प्रश्न 32.
समरकंद में कागज के निर्माण में किस घटना ने सहायता पहुँचाई?
उत्तर:
751 ई. में समरकंद के मुस्लिम प्रशासक ने 20,000 चीनी आक्रमणकारियों को बंदी बना लिया। इनमें से कुछ आक्रमणकारी कागज बनाने में बहुत निपुण थे और इसी घटना ने समरकंद में कागज के निर्माण में सहायता पहुँचाई।

प्रश्न 33.
वाणिज्यिक पत्रों के उपयोग से व्यापारियों को क्या लाभ पहुँचा?
उत्तर:

  • वाणिज्यिक पत्रों के उपयोग से व्यापारियों को हर स्थान पर नकद धन ले जाने से मुक्ति मिल गई।
  • इससे उनकी यात्राएँ अधिक सुरक्षित हो गई।

प्रश्न 34.
औपचारिक व्यापार प्रबंध ‘मुजार्बा’ क्या था?
उत्तर:
इस व्यापार प्रबंध में निष्क्रिय साझेदार कारोबार के लिए अपनी पूँजी देश-विदेश में जाने वाले सक्रिय साझेदारों को सौंप देते थे। वे लाभ या हानि को किए गए निर्णय के अनुसार आपस में बाँट लेते थे।

प्रश्न 35.
इस्लाम में धन कमाने से जुड़े ब्याज संबंधी निषेध नियम बताएँ। लोग इसका अनुचित लाभ कैसे उठाते थे?
उत्तर:
इस्लाम के अनुसार ब्याज की कमाई खाना मना है। परंतु लोग एक विशेष प्रकार के सिक्कों में उधार लेकर उधार को अन्य प्रकार के सिक्कों में चुकाते थे। वे मुद्रा विनिमय पर भी कमीशन खाते थे। ये बातें ब्याज का ही रूप थीं।

प्रश्न 36.
अरब जगत् में 8वीं तथा 9वीं शताब्दी में कानून की चार शाखाएँ कौन-सी थीं? इनमें से कौन-सी शाखा सबसे अधिक रूढ़िवादी थी?
उत्तर:
8वीं तथा 9वीं शताब्दी में अरब जगत् में कानून की चार शाखाएँ थीं-मलिकी, हनफी, शफीई और इनबली। इनमें से इनबली सबसे अधिक रूढ़िवादी थी।

प्रश्न 37.
सूफी मत के दो सिद्धांत लिखिए।
उत्तर:

  • संसार का त्याग करना।
  • केवल खुदा पर ही भरोसा।

प्रश्न 38.
सूफी मत के सर्वेश्वरवाद का क्या अर्थ हैं।
उत्तर:
सूफी मत का सर्वेश्वरवाद ईश्वर तथा उसकी सृष्टि से एक होने का विचार है। इससे अभिप्राय यह है कि मनुष्य की आत्मा को परमात्मा से मिलाना चाहिए।

प्रश्न 39.
इनसिना (980-1037) कौन था?
उत्तर:
इनसिना एक चिकित्सक तथा दार्शनिक था। वह इस बात पर विश्वास नहीं रखता था कि कयामत के दिन व्यक्ति फिर से जिंदा हो जाता है।

प्रश्न 40.
सलजुक तुर्कों की पहली राजधानी निशापुर का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
निशापुर शिक्षा का एक महत्वपूर्ण फारसी-इस्लामी केंद्र था। इसके अतिरिक्त यह उमर खय्याम का जन्म स्थान था।

प्रश्न 41.
तुगरिल बेग कौन था?
उत्तर:
तुगरिल बेग एक सलजुक तुर्क था। अपने भाई के साथ 1037 ई. में खुरासान को जीत लिया और निशापुर को अपनी पहली राजधानी बनाया। 1055 ई. में उन्होंने बगदाद पर भी अधिकार कर लिया।

प्रश्न 42.
धर्म-युद्ध क्या थे?
उत्तर:
पश्चिमी यूरोप के ईसाइयों ने मुसलमानों से अपने धर्म स्थल मुक्त कराने के लिए उनके साथ अनेक युद्ध किए। इन युद्धों को धर्म-युद्ध का नाम दिया गया है।

प्रश्न 43.
प्रथम धर्म-युद्ध की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
प्रथम धर्म – युद्ध (1098-1099) में फ्रांस तथा इटली के सैनिकों ने एंटीओक तथा जेरूसलतम पर अधिकार कर लिया। इस विजय के लिए उन्होंने मुसलमानों तथा यहूदियों की निर्मम हत्या कौं।

प्रश्न 44.
मध्यकाल में इस्लामी समाज का ईसाइयों के प्रति क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर:
मध्यकाल में इस्लामी समाज ईसाइयों को पुस्तक वाले लोग कहते थे, क्योंकि उनके पास अपना धर्म ग्रंथ ‘इंजील’ (न्यू टेस्टामेंट) होता था। वे मुस्लिम राज्यों में आने वाले ईसाइयों को रक्षा प्रदान करते थे।

प्रश्न 45.
धर्म-युद्धों ने ईसाई-मुस्लिम संबंध पर क्या प्रभाव डाला? अथवा, यूरोप व एशिया पर धर्म-युद्धों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:

  • मुस्लिम राज्यों ने अपनी ईसाई प्रजा के प्रति कठोर नीति अपनानी आरंभ कर दी।
  • पूर्व तथा पश्चिम के बीच होने वाले व्यापार में इटली के व्यापारिक समुदायों का प्रभाव बढ़ गया।

प्रश्न 46.
फ्रैंक कौन थे? उनका अपने अधीन किए गए मुसलमानों के प्रति कैसा व्यवहार था?
उत्तर:
फ्रैंक धर्म-युद्धों में विजय पाने वाले पश्चिमी देशों के नागरिक थे। इनमें से कुछ सीरिया तथा फिलिस्तीन में बस गए थे। ये लोग मुसलमानों के प्रति सहनशील थे।

प्रश्न 47.
खलीफाओं ने धर्मांतरण के कारण राजस्व में आई कमी को पूरा करने के लिए क्या दो कदम उठाए?
उत्तर:

  • उन्होंने धर्म-परिवर्तन को निरुत्साहित किया।
  • बाद में उन्होंने कर लगाने की एक समान नीति अपनाई।

प्रश्न 48.
रूबाई क्या होती है?
उत्तर:
रूबाई चार पंक्तियों वाला छंद होता है। इसमें पहली दो पंक्तियाँ भूमिका बाँधती हैं। तीसरी पंक्ति बढ़िया तरीके से सधी होती है। चौथी पंक्ति मुख्य बात को प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 49.
उमय्यद शासकों द्वारा बनवाए गए मरुस्थलीय महल किस काम आते थे?
उत्तर:
ये महल विलासपूर्ण निवास स्थानों के काम आते थे। इसके अतिरिक्त इनका प्रयोग शिकार तथा मनोरंजन के लिए विश्राम स्थलों के रूप में किया जाता था।

प्रश्न 50.
किसी मस्जिद के बड़े कमरे की दो महत्वपूर्ण विशेषताएं कौन-कौन सी होती हैं?
उत्तर:

  • दीवार में एक मेहराब जो मक्का की दिशा का संकेत देती है।
  • एक मंच जहाँ से शुक्रवार को दोपहर की नवाज के समय प्रवचन दिए जाते हैं।

प्रश्न 51.
महमूद गजनबी के दरबारी कवि फिरदौसी द्वारा रचित ‘शाहनामा’ की दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
फिरदौसी द्वारा रचित शाहनामा इस्लामी साहित्य की एक श्रेष्ठ कृति मानी जती है।

  • इस पुस्तक में 50,000 पद हैं।
  • यह पुस्तक परंपराओं तथा आख्यानों का संग्रह है। इनमें से सबसे लोकप्रिय आख्यान रूस्तम को है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
950 से 1200 ई. के बीच इस्लामी समाज की एकजुटता में किन तत्वों का योगदान था?
उत्तर:
सन् 950 से 1200 के बीच इस्लामी समाज सामान्य आर्थिक और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के कारण एकजुट बना रहा।

  • इस एकता को बनाए रखने के लिए राज्य को समाज से अलग माना गया।
  • उच्च इस्लामी संस्कृति की भाषा के रूप में फारसी का विकास किया गया।
  • इस एकता के निर्माण में बौद्धिक परंपराओं के बीच संवाद की परपिक्वता का भी योगदान था।

विद्वान, कलाकार और व्यापारी इस्लामी दुनिया के भीतर स्वतंत्र रूप से आते जाते रहते थे। इस प्रकार इस्लामी समाज के बीच विचारों तथा तौर-तरीकों का आदान-प्रदान होता रहता था। परिणामस्वरूप मुसलमानों की जनसंख्या जो उमय्यद काल और प्रारंभिक अब्बासी काल में 10 प्रतिशत से भी कम थी, आगे चलकर बहुत अधिक बढ़ गई। इस्लाम ने एक अलग धर्म और सांस्कृतिक प्रणाली का रूप ले लिया।

प्रश्न 2.
सलजुक तुर्क कौन थे? उन्होंने तुर्की सत्ता की स्थापना तथा विस्तार किस प्रकार किया?
उत्तर:
सलजुक तुर्क सुदूर-पूर्व के गैर-मुस्लिम थे। ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में उन्होंने तूरान में समानियों तथा काराखानियों के सैनिकों के रूप में प्रवेश किया। बाद में उन्होंने दो भाइयों तुगरिल और छागरी बेग के नेतृत्व में एक शक्तिशाली समूह का रूप धारण कर लिया। गजनी के महमूद की मृत्यु के बाद फैली अव्यवस्था का लाभ उठा कर सलजुकों ने 1037 में खुरासान को जीत लिया। उन्होंने निशापुर को अपनी पहली राजधानी बनाया।

इसके बाद उन्होंने अपना ध्यान पश्चिमी फारस की ओर लगाया। 1055 में उन्होंने बगदाद को पुनः सुन्नी शासन के अधीन कर दिया । प्रसन्न होकर खलीफा अल-कायम ने तुगरिल बेग को सुलतान की उपाधि प्रदान की। सलजुक भाइयों ने परिवार द्वारा शासन चलाने की कबाइली धारणा के अनुसार मिल कर शासन चलाया। तुगरिल बेग के बाद उसका भतीजा अल्प अरसलन उसका उत्तराधिकारी बना। अल्प अरसलन’ के शासनकाल में सलजुक साम्राज्य का विस्तार अनातोलिया (आधुनिक तुर्की) तक हो गया।

प्रश्न 3.
चौथै खलीफा अली के शासनकाल पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
खलीफा अली ने (656-61) मक्का के अभिजात तंत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों के विरुद्ध दो युद्ध लड़े। फलस्वरूप मुसलमानों में दरार और अधिक गहरी हो गई। अली के समर्थकों और शत्रुओं ने बाद में इस्लाम के दो मुख्य संप्रदाय शिया और सुन्नी बना लिए। अली ने अपने आपकों गुफा में स्थापित कर लिया। उसने मुहम्मद की पत्नी, आयशा के नेतृत्व वाली सेना को ‘ऊँट की लड़ाई’ (657) में पराजित कर दिया।

परंतु, वह उथमान के नातेदार और सीरिया के गवर्नर मुआविया के गुट का दमन न कर सका। उसके साथ अली का युद्ध सिफिन (उत्तरी मेसोपोटामिया) में हुआ था। यह संधि के रूप में समाप्त हुआ। इस युद्ध ने उसके अनुयायियों को दो धड़ों में बाँट दिया, कुछ उसके वफादार बने रहे, जबकि अन्य लोगों ने उसका साथ छोड़ दिया, उसका साथ छोड़ने वाले लोग खरजी कहलाने लगे। इसके शीघ्र, बाद एक खरजी ने गुफा की एक मस्जिद में अली की हत्या कर दी।

प्रश्न 4.
उमय्यद वंश की स्थापना किन परिस्थितियों में हुई? पहले उमय्यद शासक मुआविया के शासनकाल पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
बड़े-बड़े क्षेत्रों पर विजय प्राप्त होने से मदीना में स्थापित खिलाफत नष्ट हो गई और उसका स्थान राजतंत्र ने ले लिया। 661 ई. में मुआविया ने स्वयं को अलग खलीफा घोषित कर दिया और उमय्यद वंश की स्थापना की। उमय्यदों ने ऐसे अनेक राजनीतिक कदम उठाए जिनसे उम्मा के भीतर उनका नेतृत्व सुदृढ़ हो गया।

पहले उमय्यद खलीफा मुआविया ने दमिश्क को अपनी राजधानी बना लिया। उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी परंपराओं तथा प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाया। उसने वंशगत उत्तराधिकार की परंपरा भी प्रारम्भ की और प्रमुख मुसलमानों को इस बात पर राजी कर लिया कि उसके बाद वे उसके पुत्र को उसका उत्तराधिकारी स्वीकार करें। उसके बाद आने वाले खलीफाओं ने भी ये नवीन परिवर्तन अपना लिए। फलस्वरूप उमय्यद 90 वर्ष तक सत्ता में बना रहा।

सिद्धांत नहीं था। अतः इस्लामी राजसत्ता उम्मा को सौंप दी गई। इससे नयी प्रक्रियाओं के लिए अवसर उत्पन्न हुए, परंतु इससे मुसलमानों में गहरे मतभदे भी पैदा हो गए। सबसे बड़ा नव-परिवर्तन यह हुआ कि खिलाफत की संस्था का निर्माण हुआ। इसमें समुदाय का नेता ‘अमीर अल-मोमिनिनि; पैगंबर का प्रतिनिधि बन गया। वह खलीफा कहलाया। पहले चार खलीफाओं (632-661) ने पैगबर के साथ अपने गहरे नजदीकी संबंधों के आधार पर अपनी शक्तियों का औचित्य स्थापित किया। उन्होंने पैगंबर द्वारा दिए दिशा-निर्देशों के अनुसार उनके कार्य को आगे बढ़ाया। खिलाफत के दो प्रमुख उद्देश्य थे

  • उम्मा का कबीलों पर नियंत्रण स्थापित करना।
  • राज्य के लिए संसाधन जुटाना।

प्रश्न 5.
आरंभिक खलीफाओं के अधीन अरब साम्राज्य के प्रशासनिक ढाँचे की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
खलीफाओं ने जीते गए सभी प्रांतों में नया प्रशासनिक ढाँचा लागू किया। इसके अंतर्गत प्रांतों के अध्यक्ष गवर्नर (अमीर) और कबीलों के मुखिया (अशरफ) थे। केंद्रीय सत्ता में राजस्व के दो मुख्य स्रोत थे-मुसलमानों द्वारा अदा किए जाने वाले कर तथा धावों से मिलने वाली लूट में से प्राप्त हिस्सा। खलीफा के सैनिक रेगिस्तान के किनारों पर बसे शहरों कुफा और बसरा में शिविरों में रहते थे ताकि वे अपने प्राकृतिक आवास स्थलों के निकट और खलीफा की ‘कमान के अंतर्गत बने रहें।

शासक वर्ग और सैनिकों को लूट में हिस्सा मिलता था और मासिक राशियाँ (अत्तता) प्राप्त होती थीं। गैर मुस्लिम लोग ‘स्वराज और जजिया’ नामक कर देते थे। इससे उनका संपत्ति का तथा धार्मिक कार्यों को संपन्न करने का अधिकार बना रहता था। यहूदी तथा ईसाई लोगों को राज्य के संरक्षित लोग घोषित किया गया था। उन्हें अपने सामुदायिक कार्य करने के लिए बहुत अधिक स्वायत्तता प्राप्त थी।

प्रश्न 6.
तीसरे खलीफा उथमान की हत्या के लिए कौन-सी परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं?
उत्तर:
अरब कबीलों ने अपना राजनीतिक विस्तार और एकीकरण का कार्य सरलता से कर लिया था। राजक्षेत्र के विस्तार से राज्य के संसाधनों और प्रशासनिक पदों के वितरण पर झगडे उत्पन्न हो गए। ये झगड़े उम्मा की एकता के लिए खतरा बन गए। वास्तव में प्रारंभिक इस्लामी राज्य के शासन में मक्का के कुरैश लोगों का ही बोलबाला था। तीसरा खलीफा उथमान (64456) भी एक कुरैश था।

उसने सत्ता पर अपना नियंत्रण बढ़ाने के लिए प्रशासन में अपने ही आदमी भर दिए। परिणामस्वरूप अन्य कबीलों में रोष फैल गया। इराक और मिस्र में पहले ही शासन का विरोध हो रहा था, अब मदीना में भी विरोध उत्पन्न हो जाने से उथमान की हत्या कर दी गई। उथमान की मृत्यु के बाद अली को चौथा खलीफा नियुक्त किया गया।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन इस्लामी जगत में इस्लाम के धार्मिक विद्वानों ने कुरान की टीका लिखने तथा शरीआ तैयार करने की ओर ध्यान क्यों दिया।
उत्तर:
इस्लाम के धार्मिक विद्वानों (उलमा) के लिए करान से प्राप्त (इल्म) और पैगंबर का आदर्श व्यवहार (सुन्ना) ईश्वर की इच्छा को जानने तथा संसार का मार्गदर्शन करने का एकमात्र तरीका था। अत: मध्यकाल में उलेमा अपना समय कुरान पर टीका (तफसीर) लिखने और मुहम्मद की प्रामाणिक उक्तियों और कार्यों को लेखबद्ध (हदीथ) करने में लगाते थे। कुछ उलमा ने कर्मकांडों (इबादत) द्वारा ईश्वर के साथ और सामाजिक कार्यों (मुआमलात) द्वारा अन्य लोगों के साथ मुसलमानों के संबंधों को नियंत्रित करने के लिए कानून अथवा शरीआ तैयार करने का काम किया।

इस्लामी कानून तैयार करने के लिए विधिवेत्ताओं ने तर्क और अनुमान (कियास) का प्रयोग भी किया क्योंकि कुरान एवं हदीथ में प्रत्येक बात प्रत्यक्ष नहीं थी। स्रोतों के अर्थ-निर्णय और विधिशास्त्र के तरीकों के बारे में मतभेदों के कारण आठवीं और नौवीं शताब्दी में कानून की चार शाखाएँ (मजहब) बन गई। ये थीं-मलिकी, हनफी, शफीई और इनबली । शरीओ न सुन्नी समाज का सभी संभव कानूनी मुद्दों के बारे में मार्गदर्शन किया।

प्रश्न 8.
मध्यकालीन व्यापार-व्यवस्था में साख-पत्रों इंडियों (वाणिज्यिक पत्रों) का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मध्यकालीन आर्थिक जीवन में मुस्लिम जगत् का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने अदायगी और व्यापार व्यवस्था के बढ़िया तरीकों का विकास किया। व्यापारियों तथा साहूकारों द्वारा धन को एक जगह से दूसरी जगह और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए साख-पत्रों और हुडियों (बिल ऑफ एक्सेंचज) धन का इस्तेमाल किया जाता था। वाणिज्यिक पत्रों के व्यापक उपयोग से व्यापारियों को हर स्थान पर अपने साथ ले जाने से मुक्ति मिल गई । इससे उनकी यात्राएँ भी अधिक सुरक्षित हो गई । खलीफा भी वेतन देने अथवा कवियों और चरणों को इनाम देने के लिए साख पत्रों
का प्रयोग करते थे।

प्रश्न 9.
अरब साम्राज्य में कृषि की समृद्धि के लिए क्या-क्या पग उठाए गए?
उत्तर:
अरब साम्राज्य में राजनीतिक स्थिरता के आने के साथ-साथ कृषि में समृद्धि आई। इसके लिए कई कदम उठाए गए।

  • नील घाटी सहित कई क्षेत्रों में सिंचाई प्रणाली का विकास किया गया। इसके लिए बाँध बनाए गए तथा नहरें एवं कुएँ खोदे गए।
  • अपनी भूमि पर पहली बार खेती करने वाले लोगों को कर में छूट दी गई । खेती योग्य भूमि का विस्तार किया गया। इन सब कार्यों के परिणामस्वरूप उत्पादकता में वृद्धि हुई।
  • कुछ नयी फसलें भी उगाई जाने लगी। इनमें कपास, संतरा, केला, तरबूज, पालक, बैगन आदि की फसलें शामिल थीं। इनमें से कुछ फसलों का यूरोप को निर्यात भी किया गया ।

प्रश्न 10.
तुर्क कौन थे? गजनी में तुर्की सत्ता किस प्रकार स्थापित हुई और मजबूत बनी?
उत्तर:
तुर्क लोग तुर्किस्तान के मध्य एशियाई घास के मैदानों के खानाबदोश कबाइली थे। उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था। वे कुशल घुड़सवार एवं योद्धा थे। वे गुलामों तथा सैनिका के रूप में अब्बासी, ससानी तथा बुवाही शासकों के अधीन कार्य करने लगे अपनी वफादारी तथा। सैनिक योग्यताओं के बल पर उन्नति करके उच्च पदों पर पहुंच गए।

961 ई. में अल्पकालीन नामक तुर्क ने गजनी सल्तनत की स्थापना की। इसे गजनी के महमूद (998-1030) ने मजबूत किया। बुवाहियों की तरह गजनवी भी एक सैनिक वंश था। उनके पास तुकों और भारतीयों जैसी पेशेवर सेना थी। परंतु उनकी सत्ता एवं शक्ति का केंद्र खुरासान और अफगानिस्तान में था।

अब्बासी खलीफे सत्ता वैधता के स्रोत थे। एक दास का पुत्र होने के कारण महमूद खलीफा से सुलतान की उपाधि प्राप्त करना चाहता था। दूसरी ओर खलीफा भी शिया सत्ता के मुकाबले गजनवी को सुन्नी सत्ता का समर्थन देने के लिए तैयार हो गया । अतः अब्बासी खलीफे गजनी में तुर्की सत्ता की वैधता के स्रोत बन गए।

प्रश्न 11.
अरबों द्वारा विजित क्षेत्रों में कृषि-भूमि का स्वामित्व की दृष्टि से वितरण कैसा था?
उत्तर:
अरबों द्वारा नए जीते हुए क्षेत्रों में लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। इस्लामी राज्य ने इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया। कृषि भूमि के स्वामी छोटे बड़े किसान थे। कहीं-कहीं भूमि पर राज्य का स्वामित्व था। ईरान में जमीन बड़ी-बड़ी इकाइयों में बंटी हुई थी जिस पर किसान खेती करते थे। ससानी और इस्लामी कालों में भूमि के स्वामी राज्य की ओर से कर एकत्र करते थे। उन प्रदेशों में पशुचारण की अवस्था से स्थिर कृषि की अवस्था तक पहुँच गए थे। भूमि गाँव की साझी संपत्ति थी। इस्लामी विजय के बाद मालिकों द्वारा छोड़ी गई भू-संपदाओं को राज्य ने अपने हाथ में ले लिया था। इसे साम्राज्य के विशिष्ट वर्ग के मुसलमानों को दे दिया गया था-विशेष रूप से खलीफा के परिवार के सदस्यों को।

प्रश्न 12.
अरब साम्राज्य में भू-राजस्व की क्या व्यवस्था थी?
उत्तर:
अरब साम्राज्य में कृषि भूमि का सर्वोपरि नियंत्रण राज्य के हाथों में था। वह अपनी अधिकांश आय भू-राजस्व से प्राप्त करता था। अरबों द्वारा जीती गई भमि पर. जो अब भी उन मालिकों के हाथों में थी, खराज नामक करा लगता था। यह कर खेती की स्थिति के अनुसार उत्पादन के आधे भाग से लेकर पांचवें हिस्से के बराबर होता था। उस भूमि पर जिसके स्वामी मुसलमान थे अथवा जिस पर उनके द्वारा खेती की जाती थी उपज के दसवें भाग के बराबर कर वसूल किया जाता था।

अत: कई गैर-मुसलमान कम कर देने के उद्देश्य से मुसलमान बनने लगे। इससे राज्य की आय कम हो गई। इस समस्या से निपटने के लिए खलीफाओं ने पहले तो धर्म-परिवर्तन को निरुत्साहित किया और बाद में कर वसूलने की एक समान, नीति अपनाई। 10वीं शताब्दी से प्रशासनिक अधिकारियों को उनका वेतन राजस्व में से दिया जाने लगा। इसे इक्ता कहा जाता था जिसका अर्थ है-भू-राजस्व का भाग।

प्रश्न 13.
गजनी साम्राज्य में फारसी साहित्य के विकास की जानकारी दीजिए। अथवा, फारसी साहित्य में फिरदौसी का क्या योगदान रहा?
उत्तर:
ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में गजनी फारसी साहित्य का एक कॅन्द्र बन गया था। कवि स्वाभाविक रूप से शाही दरबार की चमक-दमक से आकर्षित होते थे। शासकों ने भी अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए कलाकारों और विद्वानों को संरक्षण देना आरंभ कर दिया था। महमूद गजनवी के काल में अनेक कवियों ने काव्य-संग्रहों (दीवानों) और महाकाव्यों (मथनवी) की रचना की। सबसे अधिक प्रसिद्ध कवि फिरदौ था। उसने ‘शाहनामा’ नामक काम, थ की रचना की थी।

इसे पूरा करने से उसे 30 वर्ष लगे थे। इस पुस्तक में 50,000 पद हैं और यह इस्लामी साहित्य की एक श्रेष्ठ कृति मानी जाती है। शाहनामा परंपराओं और आख्यानों का संग्रह है। इनमें सबसे लोकप्रिय आख्यान रूस्तम का है। पुस्तक में प्रारंभ से लेकर अरबों की विजय तक ईरान का चित्रण काव्यात्मक शैली में किया गया है।

प्रश्न 14.
इस्लामी जगत में नई फारसी का विकास कब हुआ? इस भाषा ने काव्य के विकास में क्या योगदान दिया?
उत्तर:
नई फारसी का विकास अरबों की ईरान विजय के पश्चात् ईरानी भाषा पहलवी का एक अन्य रूप था। इसमें अरबी भाषा के शब्दों की भरमार थी। खुरासान और तुरान सल्तनतों की स्थापना से नई फारसी सांस्कृतिक ऊंचाइयों पर पहुंच गई। ससानी राजदरबार में कवि रुदकी को नई फारसी कविता का जनक माना जाता है। इस कविता में गजल और रुबाई जैसे नए रूप शामिल थे।

रुबाई चार पंक्तियों वाला छंद होता है। इसमें पहली दो पंक्तियाँ भूमिका बाँधती हैं। तीसरी पंक्ति बढ़िया तरीके से सधी होती है और चौथी पंक्ति मुख्य बात को प्रस्तुत करती है। इसका प्रयोग प्रियतम अथवा प्रेयसी के सौंदर्य का बखान करने, संरक्षण की प्रशंसा करने अथवा दार्शनिक के विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए किया जा सकता है। रुबाई उमर खय्याम (1048-1131) के हाथों अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई।

प्रश्न 15.
मध्यकालीन इस्लामी समाज में भाषा के विकास की संक्षिप्त चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन इस्लामी समाज में बढ़िया भाषा और रचनात्मक कल्पना को व्यक्ति का सराहनीय गुण माना जाता था। ये गुण किसी भी व्यक्ति की विचार-अभिव्यक्ति को ‘अदब’ के स्तर तक ऊँचा उठा देते थे। अदब रूपी अभिव्यक्तियों में पद्य (कविता) और गद्य (बिखरे हुए शब्द) शामिल थे। इस्लाम-पूर्व काल की सबसे अधिक लोकप्रिय पद्य रचना संबोधन गीत (कसीदा) थी। इस विधा का विकास अब्बासी काल के कवियों ने अपने आश्रयदाताओं की उपलब्धियों का गुणगान करने के लिए किया।

फारस मूल के कवियों ने अरबी कविता का पुनः आविष्कार किया और उसमें नई जान फूंकी। फारसी मूल के एक कवि अबुनवास ने इस्लाम में वर्जित होने के बावजूद आनंद मनाने के लिए शराब और पुरुष-प्रेम जैसे विषयों पर उत्कृष्ट कविताओं की रचना की। अबुनवास के बाद के कवियों ने अपने अनुराग के पात्र को पुरुष के रूप में संबोधित किया, भले ही वह स्त्री हो। इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए सूफियों ने रहस्थवादी प्रेम की मदिरा द्वारा उत्पन्न मस्ती का गुणगान किया।

प्रश्न 16.
प्रारंभिक इस्लाम के इतिहास के स्रोतों के रूप में कुरान के उपयोग ने क्या समस्याएँ उत्पन्न की हैं?
उत्तर:
प्रारंभिक इस्लाम के इतिहास के लिए स्रोत के रूप में कुरान के उपयोग ने मुख्य रूप से दो समस्याएँ प्रस्तुत की हैं। पहली यह कि यह एक धर्मग्रंथ है और एक ऐसा मूल-पाठ है जिसमें धार्मिक सत्ता निहित है। मुसलमानों का मानना है कि खुदा की वाणी (कलाम अल्लाह) होने के कारण कुरान के एक-एक शब्द को समझा जाना चाहिए।

परंतु बुद्धिवादी धर्म विज्ञानी रूढ़िवादी नहीं थे। उन्होनें कुरान की व्याख्या अधिक उदारता से की। 833 ई. में अब्बासी खलीफा अल-मामून ने यह मत लागू किया कि कुरान खुदा की वाणी न होकर उसकी अपनी रचना है। दूसरी समस्या यह है कि कुरानं प्रायः रूपकों में बात करता है। ओल्ड टेस्टामेंट के विपरीत यह घटनाओं का कंवल उल्लेख करता है, उनका वर्णन नहीं करता। अतः कुरान को पढ़ने-समझने के लिए कई हदीथ लिखे गए।

प्रश्न 17.
सूफी कौन थे और उनके धार्मिक विश्वास क्या थे?
उत्तर:
मध्यकालीन इस्लाम के उदार धार्मिक विचारों वाले लोगों के एक समूह को सूफी कहा जाता है। –
धार्मिक विश्वास – सूफी लोग तपश्चर्या (रहबनिया) और रहस्यवाद द्वारा खुदा के बारे में गुढ ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे। समाज जितना अधिक पदार्थों और सुखों की ओर झकता था, सूफी लोग उतना ही अधिक संसार का त्याग (जुहद) करना चाहते थे। वे केवल खुदा पर भरोस (तवक्कुल) करना चाहते थे। आठवीं और नौवीं शताब्दी में तपश्चर्या एवं वैराग्य की इन प्रवृत्तियं ने सर्वेश्वरवाद एवं प्रेम के विचारों द्वारा रहस्यवाद (तसव्वुफ) का रूप धारण कर लिया।

सर्वेश्वरवाद ईश्वर और उसकी सृष्टि के एक हो जाने का विचार है। इससे अभिप्राय यह है कि मनुष्य की आत्मा को परमात्मा के साथ मिलना चाहिए। यह ईश्वर से मिलने के साथ गहरे प्रेम (इश्क) द्वारा हो सकता है। सूफी लोग आनंद की अवस्था में पहुँचने तथा प्रेम को उद्दीप्त करने के लिए संगीत (समा) का सहारा लेते थे। सूफीवाद का द्वार सभी के लिए खुला है, चाहे वह किसी भी धर्म, पद अथवा लिंग का हो। सूफीवाद ने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की और अपनी उदारता से रूढ़िवादी इस्लाम के सामने चुनौती पेश की।

प्रश्न 18.
विज्ञान संबंधी नये विषयों के अध्ययन का इस्लाम जगत् के बौद्धिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
इनसिना कौन था? उसकी सबसे प्रभावशाली पुस्तक का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
नये विषयों के अध्ययन ने आलोचनात्मक दृष्टिकोणों को बढ़ावा दिया। इसका इस्लाम के बौद्धिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वैज्ञानिक प्रवृत्ति वाले धार्मिक विद्वानों ने इस्लामी विश्वासों की रक्षा के लिए यूनानी तर्क एवं विवेचना (कलाम) का प्रयोग किया। दार्शनिक (फलसिका) ने व्यापक प्रश्न किए और उनके उत्तर प्रस्तुत किए। उदाहरण के लिए एक वैज्ञानिक एंव चिकित्सक इनसिना इस बात को नहीं मानता था कि कयामत के दिन व्यक्ति फिर से जिंदा हो जाता है।

उसके चिकित्सा संबंधी लेख व्यापक रूप से पढ़े जाते थे। उसकी सबसे प्रभावशाली पुस्तक ‘चिकित्सा के सिद्धांत’ (अल-कानून फिल तिब) है। यह दस लाख शब्दों वाली पांडुलिपि है। इनमें उस समय के औषधिशास्त्रियों द्वारा बेची जाने वाली 760 औषधियों का उल्लेख है। पुस्तक में इनसिना के किए गए प्रयोगों तथा अनुभवों की जानकारी भी दी गई है। इस पुस्तक में आहार-विज्ञान के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। यह बताया गया है कि जलवायु और पर्यावरण का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त कुछ रोगों के संक्रामक स्वरूप की जानकारी दी गई है।

प्रश्न 19.
इस्लामी धार्मिक कला में प्राणियों के चित्रण की मनाही से कला के किन दो – रूपों को बढ़ावा मिला?
उत्तर:
इस्लाम धर्म में प्राणियों के चित्रण की मनाही थी। इससे कला के जिन दो रूपों को बढ़ावा मिला, वे थे-खुशनवीसी अर्थात् सुंदर लिखने की कला और अरबेस्क अर्थात् ज्यामितीय तथा वनस्पति कं डिजाइनों संबंधी कला। इमारतों को मनाने के लिए प्रायः धार्मिक उद्धरणों का छोटे-बड़े शिलालख में उपयोग किया जाता था। कुरान की आठवीं तथा नौवौं शताब्दियों की पांडुलिपियों में खुशनवीसी की कला को सुरक्षित रखा गया है।

‘किताब अल-अघानी’ (गीत पुस्तक) ‘कलिका व दिमना’ और ‘हरिरी की मकामात’ आदि साहित्यिक कृतियों को लघुचित्रों से सजाया गया था। इसके अतिरिक्त पुस्तक के सौंदर्य को बढ़ाने के लिए चित्रावली की अनेक किस्मे आरंभ की गई। इमारतों और पुस्तकों के चित्रण में पौधों तथा फूलों के नमूनों का उपयोग किया जाता था।

प्रश्न 20.
अब्बासी शासन की क्या विशेषताएँ रहीं? क्या अब्बासी शासक राजतंत्र को समाप्त कर सके?
उत्तर:
अब्बासी शासन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  • अब्बासी शासन के अंतर्गत अरबों के प्रभाव में गिरावट आई। इसके विपरीत ईरानी संस्कृति का महत्त्व बढ़ गया।
  • अब्बासियों ने अपनी राजधानी बगदाद में स्थापित की।
  • प्रशासन में इराक और खुरासान की धार्मिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सेना तथा नौकरशाही का गैर-कबीलाई आधार पर पुनर्गठन किया गया।
  • अब्बासी शासकों ने खिलाफत की धार्मिक स्थिति तथा कार्यों को मजबूत बनाया और इस्लामी संस्थाओं एवं विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया।
  • अब्बासी शासक और राजतंत्र-अब्बासी शासकों के अधीन सरकार और साम्राज्य का केंद्रीय स्वरूप बना रहा, क्योंकि समय की यही माँग थी।
  • उन्होंने उमय्यदों की शाही वास्तुकला और राजदरबार के व्यापक समारोहों की परंपरा को भी बनाये रखा। इस प्रकार राजतंत्र को समाप्त करने वाले अब्बासी शासकों को फिर से राजतंत्र स्थापित करने लिए विवश होना पड़ा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
खलीफाओं के अधीन इस्लामी सत्ता का विस्तार किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद के देहांत के बाद बहुत-से कबीले इस्लामी राज्य से टूटकर अलग हो गए। कुछ कबीलों ने तो उम्मा की तरह अपने अलग समाजों की स्थापना करने के लिए स्वयं के पैगंबर बना लिए।

  • पहले खलीफा अबूबकर ने अनेक अभियानों द्वारा इन विद्रोहों का दमन किया।
  • दूसरे खलीफा उमर ने उम्मा की सत्ता के विस्तार की नीति अपनाई।

खलीफा जानता था कि उम्मा को व्यापार और करों से होने वाली थोड़ी-सी आय के बल पर नहीं चलाया जा सकता। इसके लिए बहुत बड़ी धनराशि की जरूरत होगी। इसलिए खलीफा और उसके सेनापतियों ने पश्चिम में बाइजेंटाइन साम्राज्य तथा पूर्व में ससानी साम्राज्य प्रदेशों को जीतने के लिए अपने कबीलों को सक्रिय किया। बाइजेंटाइन और ससानी दोनों साम्राज्यों के पास विशाल संसाधन थे। बाईजेंटाइन साम्राज्य ईसाई मत को बढ़ावा देता था और ससानी साम्राज्य ईरान के प्राचीन धर्म, जरतुश्त धर्म को संरक्षण प्रदान करता था।

अरबों के समय से साम्राज्य धार्मिक संघर्षों तथा अभिजात वर्गों के विद्रोहों के कारण कमजोर हो गए थे। परिणामस्वरूप युद्धों और संधियों द्वारा उन्हें अपने अधीन लाना आसान हो गया। अरबों के तीन सफल अभियानों (637-642) में सीरिया, इराक और मिन पर मदीना का नियंत्रण स्थापित हो गया। अरबों की सफलता में सामरिक नाति, धार्मिक जोश और विरोधियों में गंगदान दिया।

तीसरे खलीफा उथमान ने अपना नियंत्रण मध्य एशिया तक बढ़ाने के लिए और अभियान चलाए। इस प्रकार पैगंबर मुहम्मद को मृत्यु के केवल एक दशक के अंदर, अरब-इस्लामी राज्य ने नील और ऑक्सस के बीच के विशाल क्षेत्र को अपने नियंत्रण में ले लिया। ये प्रदेश आज तक मुस्लिम शासन के अंतर्गत हैं।

प्रश्न 2.
अरब साम्राज्य में खिलाफत का विघटन किस प्रकार हुआ? बुवाही शासकों ने खिलाफत के विघटन के बाद भी खलीफा के पद को प्रतीकात्मक रूप से क्यों बनाए रखा?
उत्तर:
नौवीं शताब्दी में अब्बासी राज्य कमजोर होता गया। इसके दो मुख्य कारण थे –

  • दूर क प्रांतों पर बगदाद का नियंत्रण कम हो गया था।
  • सेना और नौकरशाही में अरब-समर्थक और ईरान-समर्थक गुट के बीच झगड़ा हो गया था।

गृह युद्ध तथा नये राजवंश का उदय-810 में खलीफा हारून अल-रशीद के पुत्रों अमीन और मामुन के समर्थकों के बीच गृह युद्ध छिड़ गया। इससे प्रशासन में गुटबंदी और अधिक बढ़ गई तथा तुर्की गुलाम अधिकारियों (मामलुक) का एक नया शक्ति गुट बन गया। दूसरी ओर शियाओं ने एक बार फिर सुन्नी रूढ़िवादिता के साथ सत्ता के लिए संघर्ष आरंभ कर दिया। फलस्वरूप अनेक छोटे राजवंश उत्पन्न हो गए। इनमें खुरासान और ट्रांसोक्सियाना वाले प्रदेश के ताहिरी एवं ससानी वंश और मिन तथा सीरिया में तुलुनी वंश शामिल थे। शीघ्र ही अब्बासियों की सत्ता मध्य ईराक और पश्चिमी ईरान तक सीमित रह गई।

बुवाहियों द्वारा अब्बासी सत्ता का अंत-945 में ईरान के कैस्पियन क्षेत्र के बुवाही नामक शिया वंश ने बगदाद पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार अब्बासियों के शासन का पूरी तरह अंत हो गया। बुवाही शासकों ने विभिन्न उपाधियाँ धारण कीं। इनमें एक प्राचीन ईरानी उपाधि ‘शहंशाह’ अर्थात् राजाओं का राजा भी शामिल थी। उन्होंने स्वयं खलीफा की पदवी धारण नहीं की, बल्कि अब्बासी खलीफा को अपनी सुन्नी प्रजा का प्रतीकात्मक मुखिया का स्थान दिया। इस प्रकार खिलाफत का विघटन हो गया, भले ही खलीफा का पद प्रतीकात्मक रूप से बना रहा।

बुवाही शासकों की खलीफा के पद के प्रति नीति-बुवाही शासकों द्वारा खलीफा के पद को प्रतीकात्मक रूप को बनाए रखने का निर्णय बहुत से चतुराईपूर्ण था। इसका कारण यह था कि ‘फातिमी’ नामक एक अन्य शिया राजवंश इस्लामी जगत पर शासन करने की योजना बना रहा था। फातिमी का संबंध शिया संप्रदाय के एक उप-संप्रदाय इस्माइली से था। उनका दावा था कि वे पैगंबर की बेटी फातिमा के वंशज हैं। इसलिए वे इस्लाम के एकमात्र न्यायसंगत शासक हैं। 969 ई. में उन्होंने मिस्र को जीत लिया और फातिमी खिलाफत की स्थापना की। उन्होंने मिस्र की पुरानी राजधानी फुस्तात की बजाय काहिरा को अपनी राजधानी बनाया।

प्रश्न 3.
धर्म युद्ध किस-किस के बीच हुए? इनके लिए कौन-कौन सी परिस्थितियाँ उत्तरदायी थी?
उत्तर:
धर्म युद्ध यूरोप के ईसाइयों तथा अरबों के बीच हुए। इनके लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं –
1. ईसाइयों के लिए फिलिस्तीन ‘पवित्र भूमि’ थी। इसका कारण था कि उनके अधिकतर धार्मिक स्थल यही स्थित थे। यहाँ स्थित जेरूसलतम को ईसा के क्रूसीकरण तथा पुनः जीवित होने का स्थान माना जाता थ। इस स्थान को 638 ई. में अरबों ने जीत लिया था। इसलिए यरोपीय ईसाइयों तथा मुस्लिम जगत के बीच शत्रुता थी।

2. ग्यारहवीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप के सामाजिक तथा आर्थिक संगठनों में भी परिवर्तन हो गया था। इससे ईसाई जगत् और इस्लामी जगत् के बीच शत्रुता और अधिक बढ़ गई।

3. पादरी और योद्धा वर्ग राजनीतिक स्थिरता के लिए प्रयत्नशील थे।

4. ईश्वरीय शांति आंदोलन ने सामंती राज्यों के बीच सैनिक मुठभेड़ की संभावनाओं को समाप्त कर दिया था। अब सामंती समाज की आक्रमणकारी प्रवृत्तियों का रुख ‘ईश्वर के शत्रुओं’ अर्थात् अरबों की ओर हो गया था। इससे एक ऐसा वातावरण तैयार हुआ जिसमें विधर्मियों के विरुद्ध लड़ाई न केवल उचित अपितु प्रशंसनीय मानी जाने लगी।

5. 1092 में बगदाद के सलजुक सुलतान मलिक शाह की मृत्यु के पश्चात् उसके साम्राज्य का विघटन हो गया। इससे बाइजेंटाइन सम्राट् एलेक्सियस प्रथम को एशिया माइनर और उत्तरी सीरिया को फिर से हथियाने का अवसर मिल गया। 1095 में पोप अर्बन द्वितीय ने बाइजेंटाइन सम्राट् के साथ मिलकर पवित्रभूमि (होली लैंड) को मुक्त कराने के लिए ईश्वर के नाम पर युद्ध का आह्वान किया।

अतः 1095 और 1291 के बीच पश्चिमी यूरोप के ईसाइयों ने पूर्वी भूमध्य सागर के तटवर्ती मैदानों में मुस्लिम शहरों के विरुद्ध युद्धों की योजना बनाई। परिणामस्वरूप लगातार अनेक युद्ध लड़े गए । इन युद्धों को बाद में ‘धर्मयुद्ध’ का नाम दिया गया।

प्रश्न 4.
प्रथम तीन धर्मयुद्धों की जानकारी दीजिए और उनके प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
धर्मयुद्ध 1095 से 1291 ई. में ईसाइयों तथा मुसलमानों के बीच हुए। इन युद्धों तथा उनके प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –
1. प्रथम युद्ध – धर्मयुद्ध (1098-1099) में फ्रांस और इटली के सैनिकों ने सीरिया में एंटीओक तथा जेरूसलम पर अधिकार कर लिया। जेरूसलम में मुसलमानों और यहूदियों की निर्मम हत्याएँ की गई। शीघ्र ही उन्होंने सीरिया-फिलिस्तीन के क्षेत्र में धर्मयुद्ध द्वारा जीते गए चार राज्य स्थापित कर लिए। इन क्षेत्रों को सामूहिक रूप से ‘आउटरैमर’ कहा जाता था। बाद के धर्मयुद्ध इसकी रक्षा और विस्तार के लिए लड़े गए।

2. दूसरा धर्मयुद्ध – आउटरैमर प्रदेश कुछ समय तक सुरक्षित रहा। परंतु 1144 में तुर्को ने एडेस्सा पर अधिकार कर लिया। अत: पोप में ईसाई लाडों से एक अन्य धर्मयुद्ध (11451149) के लिए अपील की। एक जर्मन आर फ्रांसीसी सेना ने दमिश्क पर अधिकार करने का प्रयास किया। परंतु उसे पराजय का मुँह देखना पड़ा। इसके बाद ‘आउटरैमर’ की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होता गई और ईसाईयों में धर्मयुद्ध का जोश अब समाप्त हो गया। अब ईसाई शासकों ने विलासिता से जीना और नए-नए प्रदेशों के लिए लड़ाई करना शुरू कर दिया।

इस बीच सलाह अल-दीन ने एक मिनी-सीरियाई साम्राज्य स्थापित किया और ईसाइयों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। 1187 में ईसाई पराजित हुए। जेरूसलम पर फिर से मुसलमानों का अधिकार हो गया। परंतु ईसाई लोगों के साथ सलाह अल-दीन ने दयापूर्ण व्यवहार किया और द चर्च ऑफ दि होली सेपलकरे की अभिरक्षा का काम ईसाईयों को सौंप दिया । फिर भी बहुत-से गिरजाघरों को मस्जिदों में बदल दिया गया। इस प्रकार जेरुसलम एक बार फिर मुस्लिम शहर बन गया।

3. तीसरा धर्मयुद्ध – जेरूसलम के छिन जाने से 1189 ने तीसरे धर्मयुद्ध को जन्म दिया परंतु धर्मयुद्ध करने वाले फिलिस्तीन में कुछ तटवर्ती शहरों तथा ईसाई तीर्थ-यात्रियों के लिए जेरूसलम में स्वतंत्र प्रवेश के अतिरिक्त कुछ प्राप्त नहीं कर सके। अंतत: 1291 में मिस्र के मामलूक शासकों ने धर्मयुद्ध करने वाले सभी ईसाईयों को समूचे फिलिस्तीन से बाहर निकाल दिया।

प्रभाव – इन युद्धों ने ईसाई-मुस्लिम संबंधों के दो पहलुओं पर स्थायी प्रभाव छोड़ा।

  • प्रथम मुस्लिम राज्यों ने अपनी ईसाई प्रजा के प्रति कठोर नीति अपनानी आरंभ कर दी।
  • दूसरे, पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार में इटली के व्यापारिक समुदायों का प्रभाव बढ़ गया।

प्रश्न 5.
मध्यकालीन इस्लामी जगत् में शहरीकरण की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
मध्यकालीन इस्लामी जगत् में शहरों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप इस्लामी सभ्यता फली फूली। अनेक नए शहरों की स्थापना की गई। इनका उद्देश्य मुख्य रूप से अरब सैनिकों (जुड) को बसाना था। इस श्रेणी के फौजी शहरों में इराक में कूफा और बसरा, मिस्र में फुस्तात तथा काहिरा थे। इन शहरों के अतिरिक्त बगदाद, दमिश्क, इस्फहान और समरकंद जैसे कुछ पुराने शहर थे। इन शहरों को भी नया जीवन मिला। बगदाद की जनसंख्या में तो बड़ी तेजी से वृद्धि हुई।

शहरों के विकास एवं विस्तार के लिए खाद्यान्नों और चीनी के उत्पादन में वृद्धि की गई। उद्योगों के लिए कच्चे माल का उत्पादन भी बढ़ाया गया। इससे शहरों के आकार और जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई। फलस्वरूप संपूर्ण क्षेत्र में शहरों का एक विशाल जाल विकसित हो गया। एक शहर दूसरे शहर से जुड़ गया और उनमें परस्पर संपर्क एवं कारोबार बढ़ गया।

दो भवन – समूह-शहर के केंद्र में दो भवन-समूह होते थे, जहाँ से सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति का संचालन होता था।

मस्जिद – एक भवन-समूह मस्जिद (मस्जिद अल-जामी) होती थी। इसमें सामूहिक नमाज पढ़ी जाती थी। यह इतनी बड़ी होती थी कि दूर से दिखाई देती थी।

केंद्रीय मंडी – दूसरा भवन-समूह केंद्रीय मंडी (सुक्र) था। इसमें दुकानों की कतारें, व्यापारियों के आवास (फंदुक) और शर्राफ का कार्यालय होता था। इसके अतिरिक्त इस भाग में शहर के प्रशासकों और विद्वानों एवं व्यापारियों (तुज्जर) के घर होते थे जो केंद्र के निकट बने होत थे। सामान्य नागरिकों और सैनिकों के आवास शहर के बाहरी घेरे में होते थे। मंडी की प्रत्येक इकाई की अपनी मस्जिद, अथवा सिनेगोग (यहूदी प्रार्थनाघर), छोटी मंडी, सार्वजनिक स्नानघर (हमाम) तथा एक महत्वपूर्ण सभा-स्थल होता था।

शहर के बाहरी इलाकों में शहरी गरीबों के मकान, हरी सब्जियों और फलों के बाजार, काफिलों के ठिकानों, चमड़ा साफ करने या रंगने की दुकानें और कसाई की दुकानें होती थीं। शहर की चारदीवारी के बाहर कब्रिस्तान और सराय होते थे। सराय में लोग उस समय आराम कर सकते थे जब शहर के दरवाजे बंद कर दिये जाते थे। शहरों के नक्शे-परिदृश्य, राजनीतिक परंपराओं और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर अलग-अलग होते थे।

प्रश्न 6.
मध्यकालीन इस्लामी जगत् में वास्तुकला के विकास का विवरण दीजिए।
उत्तर:
(a) दसवीं शताब्दी तक इस्लामी जगत् ने एक ऐगा रूप धारण कर लिया जिसने अपनी वास्तुकला द्वारा अपनी स्पष्ट पहचान बना ली थी। इस काल में अरब जगत् में अनेक मस्जिद, महल तथा मकबरे बनाए गए। इनकी विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है –

1. मस्जिद – इस दुनिया की सबसे बड़ी बाहरी धार्मिक प्रतीक इमारत मस्जिद थी। स्पेन से लेकर मध्य एशिया तक फैली मस्जिदों, इबादतगाहों और मकबरे का मूल रूप एक जैसा ही था। इनकी मुख्य विशेषताएँ थीं-मेहराबें, गुबंद, मीनार और खुले सहन (प्रांगण)। ये इमारतें मुसलमानों की धार्मिक तथा व्यावहारिक आवश्यकताओं को पूरा करती थीं। इस्लाम की पहली शताब्दी में मस्जिद ने एक विशेष वास्तुशिल्प का रूप धारण कर लिया था।

2. मस्जिद में एक खुला प्रांगण होता था। इस प्रांगण में एक फव्वारा अथवा जलाशय बनाया जाता था। यह प्रांगण एक बड़े कमरे की ओर खुलता था जिसमें प्रार्थना करने वाले लोगों तथा प्रार्थना (नमाज) का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति (इमाम) के लिए पर्याप्त स्थान होता था।

3. बड़े कमरे की दो विशेषताएँ थीं – दीवार में एक मेहराब जो मक्का (काबा) की दिशा का संकेत देती थी तथा एक मंच जहाँ से शुक्रवार को दोपहर की नमाज के समय प्रवचन दिए जाते थे। इमारत में एक मीनार जुड़ी होती थी। इसका प्रयोग नियत समय पर नमाज के लिए लोगों को बुलाने के लिए किया जाता था। मीनार नए धर्म के अस्तित्व का प्रतीक थी। शहरों और गाँवों में लोग समय का अनुमान पाँच दैनिक नमाजों की सहायता से लगाते थे। मस्जिद की ये विशेषताएँ आज भी विद्यमान हैं।

4. मस्जिद के केंद्रीय प्रांगण के चारों ओर बनी इमारतों के निर्माण का स्वरूप न केवल मकबरों में बल्कि सरायों, अस्पतालों और महलों में भी पाया जाता था।

(b) महल –
1. उमय्यदों ने नखलिस्तानों में ‘मरुस्थली महल’ बनाए । इनमे फिलिस्तीन में खिरवत अलफजर और जोर्डन में कुसाईर अमरा शामिल थे। ये महल विलासपूर्ण निवास स्थान और शिकार एवं मनोरंजन के लिए विश्राम स्थल का काम देते थे। महलों को चित्रों, प्रतिमाओं और भव्य पच्चीकारी से सजाया जाता था।

2. अब्बासियों ने समरा में बागों और बहते हुए पानी के बीच एक नया शाही शहर बनाया। इसका उल्लेख खलीफा हारून-अल-रशीद से जुड़ी कहानियों और आख्यानों में मिलता है।

3. अब्बासियों ने बगदाद में तथा फातिमियों ने काहिरा में भी महल बनवाए। परंतु ये महल लुप्त हो गए हैं।

प्रश्न 7.
इस्लाम धर्म की स्थापना कब हुई? इसका अरब समाज पर क्या प्रभाव पड़ा? अथवा, इस्लाम धर्म के धार्मिक विश्वास क्या थे?
उत्तर:
इस्लाम धर्म की स्थापना लगभग 612 ई. में पैगंबर मुहम्मद ने की। इस वर्ष में उन्होंने स्वयं को खुदा का संदेशवाहक (रसूल) घोषित किया। उन्होंने एक नये धर्म सिद्धात का प्रचार किया। इस सिद्धांत को स्वीकार करने वाले लोग मुसलमान अथवा मुस्लिम कहलाए। ये सभी लोग एक ऐसे समाज का अंग थे जिसे उम्मा कहा जाता है।

इस्लाम धर्म के धार्मिक विश्वास-इस्लाम धर्म के धार्मिक विश्वास उनकी पवित्र पुस्तक ‘कुरान शरीफ’ में दिये गए हैं। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –

  1. केवल अल्लाह की ही पूजा की जानी चाहिए।
  2. मनुष्य को कयामत के दिन (मृत्यु के समय) अपने कर्मों का फल अवश्य मिलेगा।
  3. प्रत्येक मुसलमान को इन पाँच सिद्धांत का पालन करना चाहिए –
    (i) अल्लाह ही एकमात्र ईश्वर है और मुहम्मद उसका पैगंबर है।
    (ii) उसे प्रतिदिन पाँच बार नमाज पढ़नी चाहिए।
    (iii) उसे निर्धनों को दान देना चाहिए।
    (iv) उसे रमजान के महीने में रोजे रखने चाहिए।
    (v) उसे जीवन में एक बार मक्का की यात्रा अवश्य करनी चाहिए।
  4. किसी मुसलमान को मूर्ति-पूजा नहीं करनी चाहिए।
  5. उसे ब्याज की कमाई नहीं खानी चाहिए और चोरी नहीं करनी चाहिए।
  6. उसे विवाह और तलाक के निर्धारित नियमों का पालन करना चाहिए।
  7. उसे मनुष्य मात्र की समानता में विश्वास रखना चाहिए।
  8. उसे उदार तथा सद्गुणों से परिपूर्ण होना चाहिए।
  9. उसे कुरान को पवित्र ग्रंथ मानना चाहिए।

प्रश्न 8.
पैगंबर मुहम्मद के अधीन इस्लामी राज्य तथा समाज के मुख्य पहलुओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद ने मदीना में एक राजनैतिक व्यवस्था की स्थापना की थी जिसने उनके अनुयायियों को सुरक्षा प्रदान की। उन्होंने शहर में चल रही कलह को भी सुलझाया। उम्मा को एक बड़े समुदायों के रूप में बदला गया, ताकि मदीना के बहुदेववादियों और यहदियों को पैगंबर मुहम्मद के राजनैतिक नेतृत्व के अधीन लाया जा सके। पैगंबर ने कर्मकांडों (उपवास आदि) तथा नैतिक सिद्धांत में वृद्धि की और उन्हें परिष्कृत किया। इस प्रकार उन्होंने धर्म को अपने अनुयायियों के लिए मजबूत बनाया।

इस्लामी राज्य का विस्तार-आरंभ में मुस्लिम कृषि एवं व्यापार से प्राप्त होने वाले राजस्व तथा खैरात-कर (जकात) पर जीवित रहा। इसके अतिरिक्त मुसलमान मक्का के काफिलों और निकट के नखलिस्तानों पर छापे भी मारते थे। कुछ समय बाद मक्का पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। इसके फलस्वरूप एक धार्मिक प्रचारक तथा राजनैतिक नेता के रूप में पैगंबर मुहम्मद की प्रतिष्ठा दूर-दूर तक फैल गई। पैगंबर मुहम्मद की उपलब्धियों से प्रभावित होकर, बहुत-से कबीलों, मुख्य रूप से बहुओं ने अपना धर्म बदलकर इस्लाम को अपना लिया और मुस्लिम समाज में शामिल हो गए।

इस प्रकार पैगंबर मुहम्मद द्वारा बनाए गए गठजोड़ का प्रसार समूचे अरब देश में हो गया । मदीना उभरते हुए इस्लामी राज्य की प्रशासनिक राजधानी बना और मक्का उसका धार्मिक केंद्र बन गया । काबा से बुतों को हटा दिया गया था। मुस्लिमों के लिए यह जरूरी था कि वे काबा की ओर मुंह करके प्रार्थना करें। मुहम्मद साहिब थोड़े ही समय में अरब प्रदेश के बहुत बड़े भाग को एक नए धर्म, समुदाय एवं राज्य के अंतर्गत लाने में सफल रहे। उनके द्वारा स्थापित इस्लामी राज्य व्यवस्था काफी लंबे समय तक अरब कबीलों और कलों का राज्य संघ बनी रही।

प्रश्न 9.
‘अब्बासी क्रांति’ से क्या अभिप्राय है? उमय्यद वंश के पतन तथा अब्बसी वंश की स्थापना के संदर्भ में इसकी जानकारी दीजिए।
उत्तर:
उमय्यद वंश को मुस्लिम राजनैतिक व्यवस्था के केंद्रीयकरण के लिए भारी मूल्य चूकाना पड़ा। ‘दवा’ नामक एक सुनियोजित आंदोलन के उमय्यद वंश को उखाड़ फेंका। 750 में उमय्यद वंश का स्थान अब्बासी वंश ने ले लिया। इसे अब्बासी क्रांति का नाम दिया जाता है अब्बासियों ने उमय्यद शासन को दुष्ट बताया और यह दावा किया कि वे पैगबर मुहम्मद के मूल इस्लाम की फिर से स्थापना करेंगे।

अब्बासी विद्रोह तथा उमय्यद का पतन-अब्बासियों का विद्रोह पूर्वी ईरान में स्थित खुरासान में प्रारंभ हुआ। यहाँ पर अरब-ईरानियों की मिली-जुली संस्कृति थी। यहाँ पर अरब सैनिक मुख्यतः इराक से आए थे। उन्हें सीरियाई लोगों का प्रभुत्व पसंद नहीं था। खुरासान के अरब नागरिक भी उमय्यद शासन में घृणा करते थे। इसका कारण यह कि उमय्यदों ने करों में छूट देने और विशेषाधिकार देने के जो वायदे किए थे, वे पूरे नहीं किए थे।

दूसरी ओर वहाँ के ईरानी मुसलमानों को जातीय चेतना से ग्रस्त अरबों के तिरस्कार का शिकार होना पड़ा था। अत: उमय्यदों को बाहर निकालने के वे किसी भी अभियान में शामिल होने के लिए तैयार थे। अब्बासी क्रांति की सफलता-अब्बासी पैगंबर के चाचा अब्बास के वंशज थे।

उन्होंने विभिन्न अरब समूहों को यह आश्वासन दिया कि पैगंबर के परिवार का कोई मसीहा (महदी) उन्हें उमय्यदों के दमनकारी शासन से मुक्त कराएगा। इस प्रकार उन्होंने सत्ता प्राप्त करने के अपने प्रयास को वैध ठहराया। उसकी सेना का नेतृत्व एक ईरानी दास अबू मुस्लिम ने किया। उसने अंतिम उमय्यद खलीफा मारवान को ‘जब’ नदी पर हुई लड़ाई में हराया। इस प्रकार उमय्यद वंश का अंत हो गया और अब्बासी क्रांति सफल रही।

प्रश्न 10.
मध्यकालीन मुस्लिम साम्राज्य के व्यापार एवं वाणिज्य की जानकारी देते हुए यह बताइए कि इसका मुद्रा के प्रसार पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
मध्यकालीन मुस्लिम साम्राज्य का विस्तार हिंद महासागर और भूमध्यसागर के व्यापारियों क्षेत्रों के बीच था। पाँच शताब्दियों तक चीन, भारत और यूरोप के समुद्री व्यापार पर अरब तथा ईरानी व्यापारियों का एकाधिकार रहा। व्यापार मार्ग-व्यापार दो मुख्य मार्गों लाल सागर और फारस की खाड़ी से होता था। लंबी दूरी के व्यापार के लिए मसालों, कपड़े, चीनी मिट्टी की चीजों तथा बारूद को भारत और चीन से लाल सागर (अदन और ऐधाब तक) तथा फारस की खाड़ी के पत्तनों (सिराफ और बसरा) तक जहाजों द्वारा लाया जाता था।

यहाँ से माल को ऊँटों के काफिलों द्वारा बगदाद दमिश्क और लेप्पो के भंडारगृहों तक स्थानीय खपत अथवा आगे भेजने के लिए भेजा जाता था। हज की यात्रा के समय मक्का के रास्ते से गुजरने वाले काफिलों का आकार बड़ा हो जाता था। व्यापारिक मार्गों के भूमध्य सागर के सिरे पर सिकंदरिया के पत्तन से यूरोप को किए जाने वाला निर्यात यहूदी व्यापारियों के हाथ में था। उनमें से कुछ भारत के साथ सीधे व्यापार करते थे। चौथी शताब्दी में व्यापार एवं शक्ति के केंद्र के रूप में काहिरा के उभरने तथा इटली के व्यापारिक शहरों में पूर्वी सिरे पर माल की बढ़ती हुई माँग के कारण लाल सागर के मार्ग का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया।

पूर्वी सिरे पर ईरानी व्यापारी मध्य एशियाई और चीनी वस्तुएँ लाने के लिए बगदाद से बुखारा तथा समरकंद (तूरान) होते हुए रेशम मार्ग से चीन जाते थे। तूरान भी वाणिज्यिक तंत्र में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी था। यह तंत्र फर और स्लाब गुलामों के व्यापार के लिए उत्तर में रूस और स्केंडीनेविया तक फैला हुआ था। यहाँ के बाजारों में खलीफाओं और सुल्तानों के दरबार के लिए दास-दासियाँ खरीदी जाती थीं।

मुद्रा का प्रसार-राजकोषीय प्रणाली और बाजार के लेन-देन से इस्लामी देशों में धन के महत्त्व में वृद्धि के फलस्वरूप मुद्रा का प्रसार बढ़ गया। सोने, चाँदी और ताँबे (फुलस) के सिक्के बड़ी संख्या में बनाए जाने लगे। वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य चुकाने के लिए इन्हें प्राय: सर्राफों द्वारा सीलबंद थैलों में भेजा जाता था। सोना अफ्रीका (सूदान) से और चाँदी मध्य एशिया से आती थी।

बहुमूल्य धातुएँ और सिक्के पूर्वी व्यापार की वस्तुओं के बदले यूरोप से भी आते थे। धन की बढ़ती हुई माँग से लोगों के सचित भंडारों और बेकार संपत्ति का भी उपयोग होने लगा। उधार का कारोबार भी मुद्राओं के साथ जुड़ गया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पैगम्बर मुहम्मद ने प्रथम सार्वजनिक उपदेश कब दिये?
(क) 610
(ख) 612
(ग) 622
(घ) 627
उत्तर:
(ख) 612

प्रश्न 2.
उम्मयद खिलाफत वंश की स्थापना किसने की?
(क) मुआविया
(ख) याजीद
(ग) उस्मान
(घ) वालीद
उत्तर:
(क) मुआविया

प्रश्न 3.
मुस्लिम कानून के किस शाखा को सर्वाधिक रूढ़िवादी माना गया है?
(क) मलिकी
(ख) हनफी
(ग) शफीई
(घ) हनबली
उत्तर:
(घ) हनबली

प्रश्न 4.
किस सूफी संत ने फना के सिद्धांत दिये?
(क) वयाजिद विस्तामी
(ख) रबिया
(ग) बहाउद्दीन जकारिया
(घ) सलीम चिश्ती
उत्तर:
(क) वयाजिद विस्तामी

प्रश्न 5.
मुरुज अल-धाहाब की रचना किसने की?
(क) मसूदी
(ख) ताबरी
(ग) अलबेरूनी
(घ) बालाधुरी
उत्तर:
(क) मसूदी

प्रश्न 6.
इरान में इल-खानी राज्य की स्थापना किसने की?
(क) कुबलई खाँ
(ख) हजनू खाँ
(ग) मौके खान
(घ) चगताई खाँ
उत्तर:
(ख) हजनू खाँ

प्रश्न 7.
1095 से 1291 तक के धर्मयुद्ध (क्रुसेड) किन दो संप्रदायों के मध्य हुए?
(क) ईसाई एवं यहूदी
(ख) यहूदी एवं अरब
(ग) ईसाई एवं मुसलमान
(घ) मुसलमान एवं मंगाले
उत्तर:
(ग) ईसाई एवं मुसलमान

प्रश्न 8.
समानी वंश का संबंध किस देश से था?
(क) इरान
(ख) तुर्की
(ग) रूस
(घ) इटली
उत्तर:
(क) इरान

प्रश्न 9.
‘डोम ऑफ द रॉक’ नामक मस्जिद कहाँ पर स्थित है?
(क) बसरा
(ख) दमिश्क
(ग) जेरूसलम
(घ) समरकंद
उत्तर:
(ग) जेरूसलम

प्रश्न 10.
अब्बासी क्रांति कब हुई?
(क) 712 ई.
(ख) 750 ई.
(ग) 786 ई.
(घ) 802 ई.
उत्तर:
(ख) 750 ई.

प्रश्न 11.
पैगम्बर का प्रतिनिधि क्या कहलाता था?
(क) ताजा
(ख) उम्मा
(ग) अमीर
(घ) खलीफा
उत्तर:
(घ) खलीफा

प्रश्न 12.
दास प्रजनन क्या है?
(क) गुलामों की संख्या बढ़ाने की प्रथा
(ख) वेतनभोगी दासों की श्रेणी
(ग) दासता से स्वतंत्र होने की प्रथा
(घ) अभिजात्य वर्ग द्वारा दासों की स्त्रियों
उत्तर:
(क) गुलामों की संख्या बढ़ाने की प्रथा

प्रश्न 13.
मुसलमानों का प्रथम खलीफा कौन था?
(क) उमर
(ख) अब्बासी
(ग) अबू बकर
(घ) अक्त-महदी
उत्तर:
(ग) अबू बकर

प्रश्न 14.
मामलूक किसे कहा जाता था?
(क) खलीफा
(ख) तुर्क शासक
(ग) तुर्की गुलाम अधिकारी
(घ) ईरानी मुसलमान
उत्तर:
(ग) तुर्की गुलाम अधिकारी

प्रश्न 15.
शर्लमेन कौन था?
(क) फ्रांस का शासक
(ख) इंगलैंड का शासक
(ग) इटली का शासक
(घ) स्पेन का शासक
उत्तर:
(क) फ्रांस का शासक

प्रश्न 16.
इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मुहम्मद साहब का जन्म कब हुआ था?
(क) 570 ई.
(ख) 622 ई.
(ग) 612 ई.
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) 570 ई.

प्रश्न 17.
पैगम्बर मुहम्मद साहब का जन्म किस स्थान पर हुआ था?
(क) मदीना
(ख) मक्का
(ग) बगदाद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) मक्का

प्रश्न 18.
पैगम्बर मुहम्मद साहब को ‘सत्य के दिव्य दर्शन’ किस आयु में हुए थे?
(क) 30 वर्ष की आयु में
(ख) 35 वर्ष की आयु में
(ग) 40 वर्ष की आयु में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) 40 वर्ष की आयु में

प्रश्न 19.
मक्का से मदीना को पैगम्बर साहब का प्रस्थान क्या कहलाता है?
(क) हिजरा
(ख) आवागमन
(ग) तीर्थयात्रा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) हिजरा

प्रश्न 20.
मुस्लिम पंचांग का प्रथम वर्ष माना जाता है …………………..
(क) सन् 612 ई.
(ख) सन् 570 ई.
(ग) सन् 622 ई.
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) सन् 622 ई.

प्रश्न 21.
मुसलमानों का पवित्र धर्म ग्रंथ कहलाता है ………………….
(क) कुरान
(ख) उपदेश
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) कुरान

प्रश्न 22.
पैमगम्बर मुहम्मद साहब की मृत्यु हुई ………………….
(क) 620 ई.
(ख) 632 ई.
(ग) 640 ई.
(घ) 650 ई.
उत्तर:
(ख) 632 ई.

प्रश्न 23.
इस्लामिक कॉलेज (अल-अजहर) कहाँ स्थित था?
(क) मक्का में
(ख) मदीना में
(ग) काहिरा में
(घ) बसरा में
उत्तर:
(ग) काहिरा में

प्रश्न 24.
पहले खलीफा कौन थे?
(क) अबू बकर
(ख) उथमान
(ग) अली
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) अबू बकर

प्रश्न 25.
द्वितीय खलीफा कौन थे?
(क) अली
(ख) उमर
(ग) खलीफा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) उमर

प्रश्न 26.
तीसरे खलीफा कौन थे?
(क) उथमान
(ख) उम्मयद
(ग) अब्बसिद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) उथमान

प्रश्न 27.
चौथे खलीफा कौन थे?
(क) अमीर
(ख) अली
(ग) अशरफ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) अली

प्रश्न 28.
657 ई. की प्रसिद्ध ऊँट की लड़ाई में अली ने किसे परास्त किया?
(क) उस्मान
(ख) मुआविया
(ग) आयशा
(घ) याजीद
उत्तर:
(ग) आयशा

प्रश्न 29.
जजिया किनसे लिया जाता था?
(क) हिन्दू
(ख) गैरमुसलमान
(ग) मुसलमान
(घ) यहूदी
उत्तर:
(ख) गैरमुसलमान

प्रश्न 30.
प्रसिद्ध सूफी महिला संत रबिया कहाँ की रहने वाली थी?
(क) दमिश्क
(ख) मक्का
(ग) वसरा
(घ) इस्तांबुल
उत्तर:
(ग) वसरा

प्रश्न 31.
नई फारसी कविता का जनक किसे कहा जाता है?
(क) अबुनुनास
(ख) उमर खैय्याम
(ग) फिरदौसी
(घ) रूदकी
उत्तर:
(घ) रूदकी

Bihar Board Class 11th Physics Solutions भौतिक विज्ञान

Bihar Board Class 11th Physics Solutions भौतिक विज्ञान

Top academic experts at BiharBoardSolutions.com have designed BSTBPC BSEB Bihar Board Class 11 Physics Book Solutions भौतिक विज्ञान PDF Free Download in Hindi Medium and English Medium are part of Bihar Board Class 11th Solutions based on the latest NCERT syllabus.

Here we have updated the detailed SCERT Bihar Board 11th Class Physics Book Solutions Bhautik Vigyan of BTBC Book Class 11 Physics Solutions Answers Guide, Bihar Text Book Class 11 Physics Questions and Answers, Chapter Wise Notes Pdf, Model Question Papers, Study Material to help students in understanding the concepts behind each question in a simpler and detailed way.

BSEB Bihar Board Class 11th Physics Book Solutions भौतिक विज्ञान

We hope that BSTBPC BSEB Bihar Board Class 11th Intermediate Physics Book Solutions भौतिक विज्ञान PDF Free Download in Hindi Medium and English Medium of BTBC Book Class 11 Physics Solutions Answers Guide, Bihar Text Book Class 11 Physics Questions and Answers, Chapter Wise Notes Pdf, Model Question Papers, Study Material will help students can prepare all the concepts covered in the syllabus.

If you face any issues concerning SCERT Bihar Board Class 11th Physics Text Book Solutions Bhautik Vigyan, you can ask in the comment section below, we will surely help you out.

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

Bihar Board Class 11 History बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Textbook Questions and Answers

 

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएं प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्वों को पुनर्जीवित किया गया?
उत्तर:

  • 14-15 वीं शताब्दी में यूनानी और रोम सभ्यता की प्राचीनता को पुनर्जीवित किया गया।
  • प्राचीन लेखकों की रचनाओं का अध्ययन किया गया।
  • उन्होंने मानवतावाद के अध्ययन पर जोर दिया।
  • कला और चित्रकला को पुनर्जीवित किया गया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएं Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
इस काल की इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला की विशिष्टाओं की तुलना कीजिए?
उत्तर:

  • इस काल में इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला दोनों का प्रयत्न नगरों को सजाने में किया गया।
  • इटली में रोम के अवशेषों के आधार पर एक नवीन वास्तुकला की शैली अपनाई गई जिसको ‘क्लासिकी शैली’ कहा गया। इस्लामी कला में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं किया।
  • इटली में भवनों के चित्र बनाये गये, मूर्तियों का निर्माण किया और विभिन्न प्रकार की आकतियां उकेरी गई। इस्लामी वास्तुकला में इतनी सजावट पर जोर नहीं दिया गया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपरा के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 3.
मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ?
उत्तर:
रोम तथा यूनानी विद्वानों ने कई क्लासिक ग्रंथ लिखे थे। परंतु शिक्षा के प्रसार के अभाव में इन गूढ ग्रंथों को पढ़ना संभव नहीं था। परंतु तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में इटली में शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ इन ग्रंथों का अनुवाद भी हुआ। इन्हीं ग्रंथों तथा इन पर लिखी गई टिप्पणियों ने इटली के लोगों को मानवतावादी विचारों से परिचित करवाया।

इटली में ही सर्वप्रथम विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में मानवतावादी विषय भी पढ़ाए जाने लगे। इन विषयों में प्राकतिक विज्ञान, मानव शरीर रचना विज्ञान, खगोल शास्त्र औषधि विज्ञान, गणित आदि विषय शामिल थे। इन विषयों ने लोगों की सोंच को मानव और उसकी भौतिक सुख-सुविधाओं पर केंद्रित किया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपरा पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए?
उत्तर:

  • वेनिस के धर्माधिकारी और सामन्त वर्ग राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे परन्तु फ्रांस में ये शक्तिशाली थे।
  • वेनिस में नगर के धनी व्यापारी और महाजन लोग नगर के शासन में सक्रियता से भाग लेते थे। फ्रांस में ऐसा नहीं था।

Badalti Hui Sanskritik Parampara Question Answer प्रश्न 5.
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर:
मानवतावादी विचारधारा की विशिष्टायें –

  • मानतावादी विचारधारा के अंतर्गत मानव के विभिन्न कल्याणकारी कार्यों पर ध्यान दिया जाता था।
  • इसमें मानव के सभी पक्षों की ओर आकर्षित किया जाता है इसलिए सभी विषयों-व्याकरण, भूगोल, इतिहास, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्र, कविता और नीति दर्शन के अध्ययन पर जोर दिया जाता है।
  • मानव के कल्याण के लिए सभी को आपस में वाद-विवाद और विचार-विमर्श करना चाहिए । डेला मिरेनडोला के अनुसार ऐसा करना दिमाग को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है।
  • मानवतावादी विचारों को कला के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। इसमें मानव रुचियों का विशेष ध्यान रखा गया । इसी के फलस्वरूप विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्री और कलाकार हुए।
  • मानव के रूप को यथार्थ रूप देने का प्रयास किया गया वैज्ञानिकों से भी इस कार्य में सहयोग दिया।
  • मानवतावाद के अंतर्गत मानव को विशेष महत्व दिया जाने लगा और उसकी प्रशंसा में अनेक कव्य लिखे गये।
  • 15 वीं शताब्दी में अनेक पुस्तकें मुद्रित हुई जिनका मूल विषय मानव ही था।
  • मानवतावाद के महिलाओं की विकृत स्थिति को सुधारने का प्रयास किया गया।

Badalti Hui Sanskritik Parampara Ke Question Answer प्रश्न 6.
सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपियों को विश्व किस प्रकार भिन्न लगा? उसका एक सुचिंतित विवरण दीजिए।
उत्तर:
17वीं शताब्दी में विश्व आधुनिक युग में प्रवेश कर चुका था। अतः इसने एक नया रूप धारण कर लिया था जो पूर्ववर्ती विश्व से निम्नलिखित बातों में भिन्न था –

  • यूरोप के अनेक देशों में नगरों की संख्या बढ़ रही थी।
  • अब एक विशेष प्रकार की ‘नगरीय-संस्कृति’ विकसित हो रही थी। नगर के लोग यह सोचने लगे थे कि वे गाँव के लोगों से अधिक ‘सभ्य’ हैं।
  • फ्लोरेंस, वेनिस और रोम जैसे नगर कला और विद्या के केंद्र बन गए थे। नगरों को राजाओं और चर्च से थोड़ी बहुत स्वायत्तता (autonomy) मिली थी।
  • धनी और अभिजात वर्ग के लोग कलाकारों तथा लेखकों के आश्रयदाता थे।
  • मुद्रण के आविष्कार से अनेक लोगों को छपी हुई पुस्तकों उपलब्ध होने लगीं।
  • यूरोप में इतिहास की समझ विकसित होने लगी थी। लोग अपने ‘आधुनिक विश्व’ की तुलना यूनान तथा रोम की प्राचीन दुनिया से करने लगे थे।
  • अब यह माना जाने लगा था कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार अपना धर्म चुन सकता है।
  • चर्च के, पृथ्वी के केंद्र संबंधी विश्वासों को वैज्ञानिकों ने गलत सिद्ध कर दिया था । वे अब सौर-मंडल को समझने लगे थे। उन्होंने सौर-मंडल के सूर्य-केंद्रित सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
  • नवीन भौगोलिक ज्ञान ने इस विचार को उलट दिया कि भूमध्यसागर विश्व का केंद्र है। इस विचार के पीछे यह मान्यता रही थी कि यूरोप विश्व का केंद्र है।

Bihar Board Class 11 History बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Notes Bihar Board प्रश्न 1.
‘मानववाद’ से आप क्या समझते हैं? पुनर्जागरण काल की कला और साहित्य में मानववाद के उदाहरण दें।
उत्तर:
मानववाद से अभिप्राय उस दृष्टिकोण से है जिसमें वर्तमान समस्याओं को महत्त्व दिया जाता है। पुनरिण काल के साहित्यकारों तथा कलाकारों ने मानव के वर्तमान में विशेष रुचि ली। इसीलिए उस साहित्य को ‘मानविकी’ कहा जाता है।

Badalti Hui Sanskriti Parampara Ke Question Answer प्रश्न 2.
पुनर्जागरण को आधुनिक युग का प्रारंभ क्यों समझा जाता है? दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • आधुनिक युग का आरंभ पुनर्जागरण से हुआ। इस युग में पुरानी और मध्यकालीन रूढ़िवादी मान्यताएं समाप्त होने लगी। मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन हुए।
  • अनेक नवीन वैज्ञानिक आविष्कार हुए। कला तथा साहित्य के क्षेत्र में नवीन विचाराधाराओं का उदय हुआ।

Badalti Hui Sanskriti Parampara Question Answer प्रश्न 3.
आधुनिक युग कब आरंभ हुआ? इस युग को लाने में किन बातों ने सहायता की?
उत्तर:
सामंती व्यवस्था के विघटन के साथ ही आधुनिक युग का आरंभ हुआ। चार बातों ने आधुनिक युग लाने में सहायता दी-व्यापार का विकास, नगरों का जन्म, समाज में मध्यम वर्ग का उदय तथा रिनसा (पुनर्जागरण) । भौगोलिक खोजों ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परम्परा Class 11 Bihar Board प्रश्न 4.
रिनसां अथवा पुनर्जाकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पंद्रहवीं शताब्दी में इटली में पुनर्जागरण आया, जिसे रिनैसा कहते हैं। यूरोप में अज्ञान के लंबे अंधकार युग के बाद ज्ञान का एक नया आंदोलन आरंभ हुआ। यूरोप के लोगों के मन में यूरोप की प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के प्रति फिर से रुचि उत्पन्न हुई।

बदलती हुई सांस्कृतिक परम्परा Pdf Bihar Board प्रश्न 5.
यूरोप में हुए पुनर्जागरण के कोई दो प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
पुनर्जागरण के कारण लोगों के जीवन में निम्नलिखित परिवर्तन हुए –

  • नवीन विचारों भावनाओं तथा मान्यताओं के उदय से अंधविश्वासों का अंत हुआ।
  • लोगों में मानवतावाद का प्रसार हुआ। फलस्वरूप मनुष्य साहित्यिक रचनाओं और कला-कृतियों का मुख्य विषय बन गया।

Badalti Hui Sanskriti Parampara Project In Hindi प्रश्न 6.
छापेखाने का आविष्कारक किनको समझा जाता है? यूरोप में पहली छपी हुई पुस्तक कौन-सी थी?
उत्तर:
छापेखाने का आविष्कारक गुटेनबर्ग तथा कैस्टर नामक दो व्यक्तियों को माना जाता है। उन्होंने पंद्रहवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में छापेखाने का आविष्कार किया। इस आविष्कार से साहित्य तथा ज्ञान के प्रसार में बड़ी सहायता मिली। यूरोप में छापने वाली सबसे पहली पुस्तक पंभवतः गुटेनबर्ग की बाइबिल थी।

प्रश्न 7.
धर्म-सुधार आंदोलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
धर्म-सुधार आंदोलन से हमारा अभिप्राय उस आंदोलन से है जिसे मार्टिन लूथर ने रोमन चर्च में प्रचलित अनुचित रीति-रिवाजों के विरोध में चलाया। इस आंदोलन के समर्थकों ने प्रष्ट परंपराओं को समाप्त करके सुधरी हुई परंपरा स्थापित करने का प्रयत्न किया।

प्रश्न 8.
धर्म सुधार लहर अथवा प्रोटेस्टेंट लहर के कोई दो परिणाम लिखो।
उत्तर:

  • ईसाई धर्म दो भागों में बँट गया और लोगों का धर्म संबंधी दृष्टिकोण बदल गया।
  • स्वयं पोप को भी अपनी बेटियों का पता चला और उसने काऊटर रिफॉर्मेशन द्वारा अपनी स्थिति बचा ली।

प्रश्न 9.
चौदहवीं शताब्दी में यूरोपीय इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोत क्या हैं?
उत्तर:
चौदहवीं शताब्दी में यूरोपीय इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोत यूरोप तथा अमेरिका के अभिलेखागारों तथा संग्रहालयों आदि में दस्तावेज, मुद्रित पुस्तकें, मूर्तियाँ, वस्र आदि हैं। कई भवन भी हमें इस समय के इतिहास की जानकारी देते हैं।

प्रश्न 10.
बहार्ट ने 14वीं से 17वीं शताब्दी तक इटली में पनप रही ‘मानवतावादी’ संस्कृति के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
बहार्ट ने लिखा है कि इटली में पनप रही ‘मानवतावादी संस्कृति’ इस नए विश्वास पर आधारित थी कि व्यक्ति अपने बारे में स्वयं निर्णय लेने और अपनी दक्षता को आगे बढ़ाने में समर्थ है। ऐसा व्यक्ति ‘आधुनिक’ था जबकि ‘मध्यकालीन मानव’ पर चर्च का नियंत्रण था ।

प्रश्न 11.
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् इटली की राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दशा कैसी थी?
उत्तर:
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् इटली के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक केंद्रों का विनाश हो गया था। वहाँ कोई एकीकृत सरकार नहीं थी। रोम का पोप केवल अपने ही राज्य में सार्वभौम था। समस्त यूरोप की राजनीति में वह इतना मजबूत नहीं था।

प्रश्न 12.
इटली के वेनिस तथा जिनेवा नगर यूरोप के अन्य क्षेत्रों से किस प्रकार भिन्न थे? कोई दो बिंदु लिखिए।
उत्तर:
इटली के वेनिस तथा जिनेवा नगर यूरोप के अन्य क्षेत्रों से निम्नलिखित बातों में भिन्न थे –

  • यहाँ पर धर्माधिकारी तथा सामंत वर्ग राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे
  • धनी व्यापारी तथा महाजन नगर के शासन में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। इससे नागरिकता की भावना पनपने लगी।

प्रश्न 13.
पादुआ और बोलोनिया विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन के केंद्र थे। क्यों?
उत्तर:
पादुआ और बालोनिया के नगरों के मुख्य क्रियाक ” व्यापार और वाणिज्य संबंधी थे। इसलिए यहाँ वकीलों और नोटरी की बहुत अधिक आवश्यकता होती थी। इसी कारण यहाँ के विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन का केंद्र बन गए।

प्रश्न 14.
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्वों को पुनर्जीवित किया गया?
उत्तर:
14वीं और 15वीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के धार्मिक, साहित्यिक – तथा कलात्मक तत्त्वों को पुनर्जीवित किया गया।

प्रश्न 15.
15वीं शताब्दी के आरंभ में किन लोगों को ‘मानवतावदा’ कहा जाता है?
उत्तर:
15वीं शताब्दी के आरंभ में उन अध्यापकों को ‘मानवतावादी’ कहा जाता था जो व्याकरण, अलंकारशास्त्र, कविता, इतिहास तथा नीतिदर्शन आदि विषय पढ़ाते थे।

प्रश्न 16.
प्राचीन रोमन तथा यूनानी लेखकों की रचनाओं के गहन अध्ययन पर क्यों बल दिया गया?
उत्तर:
प्राचीन रोमन एवं यूनानी सभ्यता को एक विशिष्ट सभ्यता माना गया। इन्हें बारीकी से समझने के लिए प्राचीन रोमन तथा यूनानी लेखकों की रचनाओं के गहन अध्ययन पर बल दिया गया। पेट्रार्क जैसे दार्शनिकों का मत था कि केवल धार्मिक शिक्षा से कुछ विशेष नहीं सीखा जा सकता।

प्रश्न 17.
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को ‘नये युग’ अथवा आधुनिक युग का नाम क्यों दिया?
उत्तर:
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को मध्यकाल से अलग करने के लिए ‘नये युग’ का नाम दिया। उनका यह तर्क था कि ‘मध्ययुग’ में चर्च ने लोगों की सोच को बुरी तरह जकड़ रखा था इसलिए यूनान और रोमवासियों का समस्त ज्ञान उनके दिमाग से निकल चुका था। परंतु 15वीं शताब्दी के आरंभ में यह ज्ञान फिर से जीवित हो उठा।

प्रश्न 18.
टॉलेमी की रचना ‘अलमजेस्ट’ की विषय-वस्तु की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
टॉलेमी रचित ‘अलमजेस्ट’ नामक ग्रंथ खगोल विज्ञान से संबंधित था जो यूनानी भाषा में लिखा गया था। बाद में इसका अनुवाद अरबी भाषा में भी हुआ। इस ग्रंथ में अरबी भाषा के विशेष अवतरण ‘अल’ का उल्लेख है जो यूनानी और अरबी भाषा के बीच रहे संबंधों को दर्शाता है।

प्रश्न 19.
स्पेन के दार्शनिक इन रूश्द का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
स्पेन का दार्शनिक इन रूश्द एक अरबी दार्शनिक था। उसने दार्शनिक ज्ञान (फैलसुफ) तथा धार्मिक विश्वासों के बीच चल रहे तनावों को सुलझाने की चेष्टा की। उसकी पद्धति को ईसाई चिंतकों ने अपनाया ।

प्रश्न 20.
लोगों तक मानवतावादी विचारों को पहुंचाने में किन बातों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
उत्तर:

  • स्कूलों तथा विश्वविद्यालायों में मानवतावादी विषय पढ़ाए जाने लगे।
  • कला, वास्तु कला तथा साहित्य ने भी मानतावादी विचारों के प्रसार में प्रभावी भूमिका निभाई।

प्रश्न 21.
आडीयस वेसेलियस (Andreas Vesalius) कौन थे?
उत्तर:
आंड्रीयस वेसेलियस (1514-64 ई.) पादुआ विश्वविद्यालय में आयुर्विज्ञान के प्राध्यापक थे। वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ (dissection) की। इससे आधुनिक शरीर-क्रिया विज्ञान (Physiology) का प्रारंभ हुआ।

प्रश्न 22.
‘यथार्थवाद’ क्या था?
उत्तर:
शरीर विज्ञान, रेखागणित, भौतिकी तथा सौंदर्य की उत्कृष्ट भावना ने इतालवी कला को नया रूप प्रदान किया। इसी को बाद में ‘यथार्थवाद’ (realism) का नाम दिया गया। यथार्थवाद की यह परंपरा उन्नसीवीं शताब्दी तक चलती रही।

प्रश्न 23.
माईकील एंजिलो बुआनारोती (Michael Angelo Buonarotti) कौन था? इटली की कला के क्षेत्र में उसका क्या योगदान था?
उत्तर:
माईकल एंजिलो बुआनारोती (1475-1564 ई.) एक कुशल चित्रकार, मूर्तिकार तथा वास्तुकार था। उसने पोप के सिस्टीन चैपल की भीतरी छत पर चित्रकारी की और ‘दि पाइटा’ नाम से मूर्ति बनाई। उसने सेंट पीटर गिरजाघर के गुबंद का डिजाइन भी तैयार किया। ये सभी कलाकृतियाँ रोम में ही हैं।

प्रश्न 24.
समुद्री खोजों के पीछे वास्तविक प्रेरक तत्त्व क्या थे?
उत्तर:

  • नए स्थानों की खोज करके लोगों को दास बनाना और दास व्यापार से भारी मुनाफा कमाना।
  • व्यापार वृद्धि तथा धन कमाने की प्रबल इच्छा का उत्पन्न होना।
  • मसाले और सोना प्राप्त करके यश कमाना।

प्रश्न 25.
नए देशों की खोजों से कौन-कौन से महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले?
उत्तर:

  • नए मार्गों का पता लगने के बाद यूरोपीय लोगों ने अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में व्यापार करना आरंभ कर दिया।
    दासों का क्रय-विक्रय होने लगा।
  • पादरियों ने इन उपनिवेशों में ईसाई धर्म का प्रचार शुरू किया जिसके फलस्वरूप यह धर्म विश्व का सबसे महान् धर्म बन गया।

प्रश्न 26.
यूरोपीय लोगों के जीवन पर धर्म-युद्धों के दो अच्छे प्रभाव बताएँ।
उत्तर:

  • इन युद्धों से भौगोलिक खोजों के ज्ञान का विस्तार हुआ।
  • यूरोपवासी इस्लामी जगत् के संपर्क में आए। उन्होंने इस्लामिक जगत् की कला एवं विज्ञान संबंधी ज्ञान को अपनाया।

प्रश्न 27.
‘कॉस्टैनटाइन के अनुदान’ नामक दस्तावेज के प्रति मानवतावादियों की क्या प्रतिक्रिया थी? इससे उन राजाओं को क्यों खुशी हुई, जो चर्च के हस्तक्षेप से दुःखी थे?
उत्तर:
मानवतावादियों ने लोगों को बताया कि चर्च को उसकी न्यायिक और वित्तीय शक्तियाँ ‘कांस्टैनटाइन के अनुदान’ नामक दस्तावेज के अनुसार मिली थी। उन्होंने कहा कि यह दस्तावेज जालसाजी से तैयार करवाया गया। इस बात ने चर्च के अधिकारों के औचित्य को चुनौती दी जिससे राजाओं को खशी हुई।

प्रश्न 28.
पाप स्वीकारोक्ति (indulgences) नामक दस्तावेज क्या था?
उत्तर:
पाप स्वीकारोक्ति दस्तावेज चर्च द्वारा जारी एक दस्तावेज था। चर्च कहता था कि यह दस्तावेज व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति दिला सकता है। चर्च इस दस्तावेज को बेचकर खूब धन बटोर रहा था।

प्रश्न 29.
मानवतावादी युग में व्यापारी परिवारों में महिलाओं की स्थिति कैसी थी?
उत्तर:
इस युग में व्यापारी परिवारों में महिलाओं की स्थिति कुछ अच्छी थी। वे दुकान चलाने में अपने पति की सहायता करती थीं । जब उनके पति लंबे समय के लिए व्यापार के लिए कहीं दूर जाते थे, तो वे उनका कारोबार संभालती थीं। किसी व्यापारी की कम आयु में मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी परिवार का बोझ संभालती थी।

प्रश्न 30.
माचिसा ईसाबेला दि इस्ते (Isabellad’ Este) कौन थी?
उत्तर:
मार्चिसा ईसाबेला दि इस्ते (1474-1539 ई.) मंदुआ राज्य की एक प्रतिभाशाली महिला थी। उसने अपने पति की अनुपस्थिति में अपने राज्य पर शासन किया था।

प्रश्न 31.
दो मानवतावादी लेखकों के नाम बताएँ। यह भी बताएं कि उन्होंने क्या विचार व्यक्त किए? एक-एक बिंदु लिखिए।
उत्तर:
दो मानवतावादी लेखक थे-फ्रेनसेस्को बरबारी (Francesco Barbaro) तथा लोरेंजो वल्ला (Lorenzo’ Valla) –

  • फ्रेनसेस्को बरबारो (1390-1454 ई.) ने अपनी एक पुस्तक में संपत्ति अधिग्रहण करने को एक विशेष गुण कहकर उसका समर्थन किया।
  • लोरेंजो वल्ला (1406-1457 ई.) ने अपनी पुस्तक ऑनप्लेजर में ईसाई धर्म द्वारा भोग-विलास पर लगाई गई पाबंदी की आलोचना की।

प्रश्न 32.
मानवतावादी संस्कृति का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ? कोई दो बिंदु लिखिए।
उत्तर:

  • मानवतावादी संस्कृति से मानव जीवन पर धर्म का नियंत्रण कमजोर हो गया।
  • इटली के निवासी भौतिक संपत्ति, शक्ति तथा गौरव की ओर आकृष्ट हुए।

प्रश्न 33.
15वीं शताब्दी में यूरोप में विचारों का प्रसार व्यापक रूप से तेजी से क्यों होने लगा?
उत्तर:
15वीं शताब्दी में यूरोप में बड़ी संख्या में पुस्तके छपने लगीं। इनका क्रय-विक्रय भी होने लगा। अतः अब विद्यार्थियों को केवल अध्यापकों के व्याख्यानों के नोट्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था। वे बाजार से पुस्तकें खरीद कर पढ़ सकते थे। इससे विचारों के व्यापक और तीव्र प्रसार में सहायता मिली।

प्रश्न 34.
वाणिज्य और व्यापार की वृद्धि के क्या परिणाम निकले?
उत्तर:

  • वाणिज्य और व्यापार वृद्धि के कारण यूरोप के लोग समृद्ध बने।
  • यूरोप के देशों ने खोजे गए प्रदेशों में उपनिवेश बसाए जिनको उन्होंने मंडियों के रूप। में प्रयुक्त किया।

प्रश्न 35.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए।
उत्तर:
वंनिस इटली का नगर था। यह गणराज्य था। यह चर्च तथा सामंतो के प्रभाव से लगभग मुक्त था। नगर के धनी व्यापारी तथा महाजन सरकार में सक्रिय भूमिका निभाते थे। नगर में नागरिकता के विचारों का तेजी से प्रसार हो रहा था। इसके विपरीत फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र स्थापित था, जहाँ जनसाधारण नागरिक अधिकारों से वंचित थे।

प्रश्न 36.
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर:
मानवतावादा विचारों के मुख्य अभिलक्षण निम्नलिखित थे –

  1. मानव जीवन की धर्म के नियंत्रण से मुक्ति।
  2. मानव का भौतिक सुख-सुविधाओं पर बल।
  3. मानव द्वारा संपत्ति तथा शक्ति का अधिग्रहण।
  4. मानव की गरिमा का बढ़ावा।
  5. मानव का आदर्श जीवन।

प्रश्न 37.
इस काल (पुनर्जागरण काल) की इटली की वास्तुकला और इस्लाम वास्तुकला की विशिष्टताओं की तुलना कीजिए।
उत्तर:
इटली तथा इस्लामी वास्तुकला दोनों में ही भव्य भवनों का निर्माण हुआ। इस्लामी वास्तुकला में विशाल मस्जिदें बनी, तो इटली में भव्य कुथीडूल तथा मठ बनाए गए। इन भवनों की सजावट की ओर विशेष ध्यान दिया गया। मेहराब तथा स्तंभ इन भवनों की मुख्य विशेषताएँ थीं।

प्रश्न 38.
16वीं शताब्दी में यूरोप में होने वाली मुद्रण प्रौद्योगिकी के विकास के लिए यूरोपवासी किसके ऋीण थे और क्यों?
उत्तर:
सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में क्रांतिकारी मुद्रण प्रौद्योगिकी का विकास हुआ। इसके लिए यूरोपीय लोग चीनियों तथा मंगोल शासकों के ऋणी थे। इसका कारण यह था कि यूरोप के व्यापारी और राजनयिक मंगोल शासकों के राज-दरबार में अपनी यात्राओं के दौरान इस तकनीक से परिचित हुए थे।

प्रश्न 39.
वाद-विवाद को प्लेटो और अरस्तु ने किस प्रकार महत्त्व दिया?
उत्तर:
उनका कहना था कि जहाँ तक हो सके हमें विचारगोष्ठियों में जाना चाहिए और वाद-विवाद करना चाहिए। जिस प्रकार शरीर को मजबूत बनाने के लिए व्यायाम जरूरी है उसी प्रकार दिमाग की ताकत को बढ़ाने के लिए शब्दों के दंगल में उतरना जरूरी है इससे दिमागी ताकत बढ़ने के साथ-साथ बुद्धि और अधिक ओजस्वी होती है।

प्रश्न 40.
फ़्लोरेंस की प्रसिद्धि में किन दो व्यक्तियों का सबसे अधिक योगदान था?
उत्तर:
फ्लोरेंस की प्रसिद्धि में दाँते अलिगहियरी (Dante Alighieri) तथा कलाकार जोटो (Giotto) का सबसे अधिक योगदान था। अलिगहियरी ने धार्मिक विषयों पर लिखा। जोटो ने जीते-जागते रूपचित्र बनाए जिसने फ्लोरेंस को कलात्मक कृतियों के सृजन का केंद्र बना दिया।

प्रश्न 41.
‘रेनेसा व्यक्ति’ से क्या अभिप्राय है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
‘रेनेसा व्यक्ति’ शब्द का प्रयोग प्राय: उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हों और जो अनेक कलाओं में कुशल हों। पुनर्जागरण काल में ऐसे अनेक महान् लोग हुए जो अनेक रुचियाँ रखते थे और कई कलाओं में कुशल थे। उदाहरण के लिए, एक ही व्यक्ति विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्र और कलाकार हो सकता था।

प्रश्न 42.
पुनर्जागरण की तीन मुख्य विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:
पुनर्जागरण के मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  1. इटली के नगर पुनर्जागरण के प्रथम केंद्र थे।
  2. नवीन कला शैली का जन्म हुआ।
  3. वास्तुकला एवं साहित्य का विकास हुआ।

प्रश्न 43.
पुनर्जागरण यूरोप के किस देश में सबसे पहले आरंभ हुआ और क्यों?
उत्तर:
पुनर्जागरण का आरंभ सबसे पहल इटली में हुआ। इसके निम्नलिखित कारण थे –

  1. इटली के अनेक नगर (रोम, मिलान, फ्लारस) वाणिज्य तथा व्यापारिक केंद्र होने के कारण समृद्धशाली थे।
  2. इटली के नगर सामंती नियंत्रण से मुक्त थे। इसलिए इन नगरों के स्वतंत्र वातावरण से पुनर्जागरण को प्रोत्साहन मिला।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पुनर्जागरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
पुनर्जागरण को इतिहास में पुनर्जन्म, पुनर्जागृति, बौद्धिक चेतना तथा सांस्कृतिक विकास आदि नामों से पुकारा जाता है। 13वीं शताब्दी के पश्चात् ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हुई जिनके कारण मनुष्य चेतनायुक्त बना। इसी चेतना को पुनर्जागरण का नाम दिया गया है। पुनर्जागरण को अंग्रजी भाषा में ‘रिनेसा’ कहते हैं जो मूलतः फ्रांसीसी भाषा का एक शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है-फिर से जागना। यूरोपीय इतिहास के विश्लेषण के संदर्भ में पुनर्जागरण का अपना अलग काल है।

यह काल साधारणत: 14वीं शताब्दी (1350 से 1550 ई०) के बीच माना जाता है। वास्तव में आधुनिक यूरोप का आरंभ पुनर्जागरण से ही स्वीकार किया जाता है। यूरोप प्राचीनकाल में सभ्यता के उत्कर्ष पर पहुँचा हुआ था। यह उत्कर्ष यूनान तथा रोम में देखा गया। मध्यकाल में यूनानी तथा रोमन सभ्यता लगभग लुप्त हो गई। पुनर्जागरण काल में यह एक बार फिर संजीव हो उठी। एक बार फिर लौकिक जगत् के प्रति आस्था दिखाई गई। मानवता का महत्त्व बढ़ा। रुढ़िवादिता का स्थान तर्क ने ले लिया। प्राकृतिक सौंदर्य की फिर से पूजा होने लगी। इन सब बातों का मध्यकाल में कोई स्थान नहीं रहा था। परंतु पुनर्जागरण काल में ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हुई जिन्होंने प्राचीन मूल्यों को फिर से स्थापित किया।

प्रश्न 2.
‘पुनर्जागरण’ से एक नए युग का आरंभ हुआ, ऐसा क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
‘पुनर्जागरण’ से निःसंदेह एक नए युग का आरंभ हुआ। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे –

  1. पुनर्जागरण के कारण प्राचीन और मध्यकालीन समाज की रूढ़िवादी मान्यताएं समाप्त होने लगीं। अब लोग अपनी समस्याओं पर विचार करने लगे।
  2. इसके कारण सामंतवादी व्यवस्था के बंधन टूटने लगे और राष्ट्र-राज्यों की स्थापना हुई।
  3. पुनर्जागरण से पूर्व लोगों का चर्च के सिद्धांतों में अंधविश्वास था। परंतु अब लोग उन सिद्धांतों की सच्चाई में संदेह करने लगे और प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कसने लगे। फलस्वरूप वैज्ञानिक चिंतन का युग आरंभ हुआ।
  4. पुनर्जागरण के कारण कला और साहित्य के क्षेत्र में अनेक नवीन विचारधाराओं का उदय हुआ। अनेक साहित्यकारों के व्यंग्यात्मक लेख और चित्रकारों ने अपने चित्रों में दूषित समाज और राजनीति पर प्रहार किया। ये सभी बातें आधुनिक युग की ही सूचक थीं।

प्रश्न 3.
यूरोप में पुनर्जागरण के उदय के क्या कारण थे?
उत्तर:
यूरोप में पुनर्जागरण के उदय ने निम्नलिखित तत्त्वों ने सहायता पहुँचाई –
1. धर्म युद्ध – नवीन ज्ञान का मार्ग दिखाने में मध्यकाल में लड़े गए धर्म युद्धों ने विशेष भूमिका निभाई। ये धर्म युद्ध (Crusades) तुर्कों से यरुशलम को स्वतंत्र कराने के लिए ईसाइयों ने लई । ये वीं शताब्दी के अंत से 13वीं शताब्दी तक जारी रहे। धर्म युद्धों के कारण यूरोप के सामाजिक, आर्थिक तथा बौद्धिक पक्षों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

2. धर्म सुधार आंदोलन – धर्म सुधार आंदोलन की लहर में अनेक विद्वानों ने चर्च के अधिकारों को चुनौती दी। जनसाधारण पहली बार यह सोचने लगा कि चर्च के नियम अंतिम नहीं हैं। इस नवीन दृष्टिकोण से मनुष्य के विचारों में जागृति आई।

3. भौगोलिक खोजें – भौगोलिक खोजों के कारण भी मनुष्य के विचारों में क्रांति आई। मार्को पोलो के दिशा-सूचक (Compass) के अविष्कार के कारण समुद्री यात्रा करने में सुविधा मिली । इटली के वैज्ञानिक गैलीलियों ने दूरबीन का आविष्कार किया। न्यूटन के ब्रांड के विषय ने वैज्ञानिक अनुमानों को सूत्रबद्ध किया। कोपरनिक्स ने अपनी खोजों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि पृथ्वी स्थिर नहीं है बल्कि यह सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। इन नवीन खोजों के कारण नवीन विचारों का जन्म हुआ।

प्रश्न 4.
विज्ञान और दर्शन में अरबों के योगदान का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पूरे मध्यकाल में ईसाइ गिरजाघरों और मठों के विद्वान यूनान और रोम के विद्वानों की रचनाओं से परिचित थे। परंतु उन्होंने इन रचनाओं का प्रचार-प्रसार नहीं किया। चौदहवीं शताब्दी में अनेक विद्वानों ने प्लेटो और अरस्तु के ग्रंथों के अनुवाद पढ़े। ये अनुवाद अरब के अनुवादकों की देन थे जिन्होंने अतीत की पांडुलिपियों को सावधानीपूर्वक संरक्षण और अनुवाद किया था।

जिस समय यूरोप के विद्वान यूनानी ग्रंथों के अरबी अनुवादों का अध्ययन कर रहे थे, उस समय यूनानी विद्वान अरबी तथा फारसी विद्वानों की कृतियों का अनुवाद कर रहे थे, ताकि उनका यूरोप के लोगों के बीच प्रसार किया जा सके। ये ग्रंथ प्राकृतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान (astronomy) औषधि विज्ञान तथा रसायन विज्ञान से संबंधित थे। टालेमी ने अपनी रचना ‘अलमजेस्ट’ में अरबी भाषा के विशेष अवतरण ‘अल’ का उल्लेख किया है जो यूनानी और अरबी भाषा के बीच रहे संबंधों को दर्शाता है।

मुसलमान लेखकों में अरब के हकीम तथा बुखारा (मध्य एशिया) के दार्शनिक इन-सिना (Ibn-Sina) और आयुर्विज्ञान विश्वकोष के लेखक अल-राजी (रेजेस) शामिल थे। इन्हें इतालवी जगत में ज्ञानी माना जाता था। स्पेन के एक अरब दार्शनिक इब्न-रूश्दी ने दार्शनिक ज्ञान (फैलसुफ) तथा धार्मिक विश्वासों के बीच रहे तनावों को सुलझाने की चेष्टा की। इस पद्धति को ईसाई चिंतकों ने अपनाया।

प्रश्न 5.
पुनर्जागरण काल में व्यापार में वृद्धि तथा नगरों के उदय का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में व्यापार के विकास तथा नगरों के उदय के कारण कई प्राचीन प्रथाएँ भंग हुई और नवीन बातें आरंभ हुई। वास्वत में यूरोप को अंधकार युग से निकाल कर आधुनिक युग में लाने का पूरा श्रेय व्यापारियों तथा नगरों को ही है। यह बात हम इस प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं –

(क) व्यापार में वृद्धि का प्रभाव-व्यापार में विकास का निम्नलिखित प्रभाव हुआ:
1. मध्य श्रेणी का उदय-व्यापार में वृद्धि के कारण समाज में एक नवीन श्रेणी का जन्म हुआ। यह श्रेणी थी मध्य श्रेणी जो सामंतों या कृषकों से बिल्कुल अलग थी। इस श्रेणी के पास धन था और धन की सहायता से यह कुछ भी कर सकती थी।

2. राजा का सबल बनाना-व्यापार को उन्नति से पूर्व राजा सामंतों के हा कठपुतली मात्र था। उसे सामंतों से धन मिलता था और वह उनकी सभी बातें स्वीकार करता था। वे यदि अपनी जनता पर अत्याचार भी करते थे तो राजा चुपचाप सहन करता था। परंतु व्यापार का वृद्धि से व्यापारी वर्ग का विकास हुआ जो राजा का सहयोगी था। इस वर्ग से धन प्राप्त करके राजा अपनी सैनिक शक्ति में वृद्धि कर सकता था। सेना के सबल होते ही सामंतवाद का अंत हुआ और राष्ट्रीय राज्यों का उदय हुआ।

3. चर्च और सामंतों की शक्ति का हास – तृतीय श्रेणी को सुरक्षा चाहिए थी। यह सुरक्षा उन्हें केवल एक क्षेत्र में नहीं बल्कि सारे राज्य में चाहिए थी। उनका व्यापार दूर-दूर के क्षेत्रों में होता था। इसलिए इस वर्ग ने जी-जान से राजा की सहायता की। राजा सबल हो गया । सबल राजा ने चर्च और सामंतों की स्वेच्छाचारिता पर प्रहार किया और वह उनके बंधन से मुक्त हो गया। यदि ऐसा नहीं होता तो आधुनिक युग के आने में भी सैकड़ों वर्ष लग जाते ।

(ख) नगरों के उदय का महत्त्व-नगरों के उदय का महत्त्व इस प्रकार जाना जा सकता है –
1. सामंतों की दासता से मुक्ति – नगरों के उदय से सामंतों द्वारा लगाये गये बंधन ढीले पड़ गये। नगरों में धनी व्यापारी वर्ग रहता था। उन्होंने धन देकर नगरों को स्वतंत्र कराया। इन नगरों पर अब सामंतों या राजाओं का कोई प्रभाव न रहा।

2. स्वतंत्र वातावरण-इन नगरों में नागरिकों को पूरी स्वतंत्रता मिली। वे स्वतंत्रतापूर्वक सोच सकते थे और अपनी इच्छा अनुसार कोई भी कार्य कर सकते थे। इन स्वतंत्र विचारों ने अंधकार युग को समाप्त किया और आधुनिक युग लाने में सहयोग दिया।

प्रश्न 6.
धर्म-सुधारकों ने पद्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी में रोमन कैथोलिक चर्च और पादरियों की किन रीतियों और प्रथाओं के विरुद्ध आपत्ति की।
अथवा
यूरोपीय धर्म-सुधार आंदोलन (प्रोटेस्टेंट लहर) के उत्थान के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रोटेस्टेंट ‘धर्म सुधार’ से अभिप्राय ईसाई धर्म की उस शाखा से है, जो रोमन कैथोलिक चर्च के रीति-रिवाजों के विरोध में आरंभ हुई। इसका जन्मदाता मार्टिन लूथर था। इस धर्म-सुधार आंदोलन के उत्थान के निम्नलिखित कारण थे –

1. चर्च ने बहुत अधिक धन – संपत्ति इक्ट्ठी कर ली थी। पोप और उच्च पदों पर नियुक्त पादरी लोग भोग-विलास का जीवन व्यतीत करने लगे थे। इस कारण बहुत-से व्यक्ति इनसे घृणा करने लगे थे। यही बात धर्म-सुधार आंदोलन के उत्थान का एक प्रमुख कारण बनी।

2. चर्च में पादरियों के पदों को बेचा जाने लगा था। इसके परिणामस्वरूप लोग चर्च के विरुद्ध हो गए।

3. पोप तथा पादरी माफीनामे (दंडोमुक्तियाँ) बेंचते थे। लोगों को यह बात पसंद न थी। अतः उन्होंने चर्च के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई।

4. पोप जनता से अनेक प्रकार के कर तथा शुल्क वसूल करता था और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता था। इससे लोग चर्च के विरुद्ध हो गए।

प्रश्न 7.
लियोनार्दो-द-विंची की प्रतिभा पर नोट लिखिए।
उत्तर:
इटली का लियोनार्दो-द-विंची पुनर्जागरण काल की एक महानतम विभूति था। उसका जन्म 1452 ई० में हुआ। वह एक चित्रकार, मूर्तिकार, इंजीनियर, वैज्ञानिक, दार्शनिक, कवि एवं गायक सभी कुछ था। यद्यपि उसके चित्र थोड़े हैं, किंतु सभी अनुपम हैं। इन चित्रों में से ‘दि वर्जिन ऑफ दि रॉक्स’ तथा ‘मोनालिसा’ अद्वितीय कृतियाँ हैं। मिलान के गिा घर में चित्रित ‘दि लास्ट सपर’ विश्व के कलात्मक आश्चर्यों में गिना जाता है। उसने एक उड़न मशीन का चित्र बनाया जिसके आधार पर वह ऐसी मशीनें बनाना चाहता था। जिसके द्वारा आकाश में उड़ना संभव हो। ऐसी बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति संभवतः अभी तक पैदा नहीं हुआ।

प्रश्न 8.
मानवतावाद से तुम क्या समझते हो? पुनर्जागरण काल की कला और साहित्य में मानवतावाद के उदाहरण दो।
उत्तर:
पुनर्जागरण से पूर्व दार्शनिक मृत्यु के बाद के परिणामों पर सोच-विचार किया करते थे और वर्तमान जीवन को परलोक की तैयारी समझते थे। पुनर्जागरण से यह दृष्टिकोण बदल गया। अब विचारक मानव की वर्तमान समस्याओं पर विचार करने लगे। मानव के इस दृष्टिकोण को ‘मानवतावाद’ कहा जाता है। इतिहासकार पेट्रार्क को मानवतावाद का पिता स्वीकार किया आता है। मानवतावाद के लेखकों ने मानव को केंद्र-बिंदु माना और उसे ही दर्शाने का प्रयत्न किया।

मानवतावाद तथा पुनर्जागरण काल की कला-मानवतावाद का पुनर्जागरण की कला-कृतियों पर विशेष प्रभाव पड़ा । रेफल तथा माइकेल एंजिलो ने जो चित्र बनाए, वे भले ही धन से संबंधित थे, परंतु उनका आधार मानव था। उन्होंने अपनी मूर्तियों में जीसस को मानव शिशु के रूप में दिखाया। उन्होंने उनकी माता को वात्सल्यमयी मां के रूप में दर्शाया । इस काल की अन्य मानवतावादी रचनाओं में मोनालिसा, मेडोना आदि विश्व-विख्यात रचनाएँ सम्मिलित हैं।

मानवतावाद तथा पुनर्जागरण काल का साहित्य-मानवतावाद ने पुनर्जागरण काल के साहित्य को भी खूब प्रभावित किया । सेक्सपीयर, दाँते आदि साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का विषय ईश्वर को नहीं बल्कि मानव को बनाया । उन्होंने मानव की भावानाओं, शक्तियों तथा त्रुटियों की पूर्ण विवेचना की। इस काल की प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाओं में यूटोपिया, हैमलेट, डिवाइन कॉमेडी के नाम लिए जा सकते हैं।

प्रश्न 9.
मानवतावादियों ने मध्ययुग तथा आधुनिक युग के बीच किस प्रकार अंतर किया?
उत्तर:
मानवतावादी समझते थे कि वे अंधकार की कई शताब्दियों के बाद सभ्यता को नया जीवन दे रहे हैं। उनका मानना था कि रोमन साम्राज्य के टूटने के बाद ‘अंधकार युग’ शुरू हो गया था। मानवतावादियों की भाँति बाद के विद्वानों ने भी बिना कोई प्रश्न उठाए यह मान लिया कि यूरोप में चौदहवीं शताब्दी के बाद ‘नये युग’ का उदय हुआ। ‘मध्यकाल’ का प्रयोग रोम साम्राज्य के पतन के बाद एक हजार वर्ष की समयावधि के लिए किया गया। उनका यह तर्क था कि ‘मध्ययुग’ में चर्च ने लोगों की सोंच को बुरी तरह जकड़ रखा था। इसलिए यूनान और रोमनवासियों का समस्त ज्ञान उनके दिमाग से निकल चुका था। मानवतावादियों ने ‘आधुनिक’ शब्द का प्रयोग पंद्रहवीं शताब्दी से आरंभ होने वाले के लिए किया।

मानवतावादियों और बाद के विद्वानों द्वारा प्रयुक्त काल क्रम (Periodisation) इस प्रकार था –
Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 10.
रिनेसा अथवा पुनर्जागरण से क्या अभिप्राय है? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
पुनर्जागरण ‘रिनेसा’ का हिंदी रूपांतर है। इसका अर्थ अथवा पुनर्जागृति है। पुनर्जागरण वास्तव में एक ऐसा आंदोलन था जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी राष्ट्र मध्य युग के अंधकार से निकल कर आधुनिक युग के प्रकाश में साँस लेने लगे। वे आधुनिक युग के विचारों और शैलियों से प्रभावित हुए । मानव ने स्वतंत्र रूप से विचार करना आरंभ किया जिससे साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन कीर्तिमान स्थापित हो गए।

विशेषताएँ-पुनर्जागरण की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  • इटली के नगर-राज्य पुनर्जागरण के प्रथम केंद्र बन गये।
  • नवीन कला शैली का जन्म हुआ।
  • वास्तुकला एवं साहित्य का विकास हुआ।
  • प्राचीन विधियों तथा ज्ञान को नया जीवन मिला।
  • अनेक नवीन नगरों का उदय हुआ।
  • मानव में स्वतंत्र चिंतन और मानवता का विकास हुआ।

प्रश्न 11.
पुनर्जागरण के दो प्रमुख कारण तथा तीन परिणाम लिखिए।
उत्तर:
कारण-पुनर्जागरण के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

  • मध्यकाल के अंत में नगरों का विकास हुआ। यहाँ का वातावरण स्वतंत्र था तथा लोग संपन्न थे। अतः इस वातावरण ने पुनर्जागरण के विचारों को प्रोत्साहित किया।
  • कुस्तुनतुनिया पर तुकों का अधिकार हो गया। अत: विद्वान इटली आ गए। इधर छापेखाने का आविष्कार हुआ। इससे पुनर्जागरण को बल मिला।

परिणाम –

  • पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप कला तथा साहित्य की कृतियों में मानवतावाद को प्राथमिकता दी गई।
  • विज्ञान के क्षेत्र में दिशासूचक यंत्र, सूक्ष्मदर्शी यंत्र, दूरबीन तथा अन्य खोजें हुई।
  • भूगोल के क्षेत्र में नवीन खोजें हुई। अमेरिका, भारत तथा कई अन्य देशों की खोज की गई।

प्रश्न 12.
कोपरनिकस तथा उसके ब्रह्मांड संबंधी विचारों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
ईसाइयों की यह धारणा थी कि मनुष्य पापी है। इस बात पर वैज्ञानिकों ने एक अलग दृष्टिकोण द्वारा आपत्ति की। यूरोपीय विज्ञान के क्षेत्र में एक युगांतकारी परिवर्तन कोपरनिकस (1473-1543 ई.) के विचारों से आया। ईसाइयों को यह विश्वास था कि पृथ्वी पापों से भरी हुई है और इस कारण वह स्थिर है। यह ब्रह्मांड (Universe) का केंद्र है जिसके चारों ओर खगोलीय ग्रह (Celestial Planets) घूम रहे हैं। परंतु कोपरनिकस ने यह घोषणा की कि पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।

कोपरनिकस एक निष्ठावान ईसाई था। वह इस बात से भयभीत था कि उसकी इस नयी खोज के प्रति परम्परावादी ईसाई धर्माधिकारियों की घोर प्रतिक्रिया हो सकती है। यही कारण था कि वह अपनी पांडुलिपि ‘डि रिवल्यूशनिबस’ (De revolutionibus-परिभ्रमण) को प्रकाशित नहीं कराना चाहता था। जब वह अपनी मृत्यु-शैय्या पर पड़ा था तब उसने यह पांडुलिपि अपने अनुयायी जोशिम रिटिकस (Joachim Rheticus) को सौंप दी। परंतु उसके विचारों को ग्रहण करने में लोगों को थोड़ा समय लगा।।

प्रश्न 13.
कोपरनिकस के सौरमंडलीय विचारा को आगे बढ़ाने में किन-किन वैज्ञानिकों का योगदान रहा ओर क्या?
उत्तर:
कोपरनिकस के सौरमंडलीय विचारों को आगे बढ़ाने में कई वैज्ञानिकों का योगदान रहा –
1. खगोलशास्त्री जोहानेस कैप्लर (Johannes Kepler, 1571-1630 ई.) ने अपने ग्रंथ कॉस्मोग्राफिकल मिस्ट्री (Cosmographical Mystery-खगोलीय रहस्य) में सौरमंडल के सूर्य-केंद्रित सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया। इससे यह सिद्ध हुआ कि सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्ताकार पथ पर नहीं बल्कि दीर्घ वृत्ताकार (ellipses) पथ पर परिक्रमा करते हैं।

2. गैलिलियो गैलिली (1564-1642 ई.) ने अपने ग्रंथ ‘दि मोशन (The Motion, गति) में गतिशील विश्व के सिद्धांतों की पुष्टि की।

3. न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से विज्ञान को एक नई दिशा मिली।

प्रश्न 14.
‘वैज्ञानिक क्रांति’ क्या थी? इसका लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
विचारकों (वैज्ञानिकों) ने हमें बताया कि ज्ञान का आधार विश्वास न होकर अन्वेषण एवं प्रयोग है। जैसे-जैसे इन वैज्ञानिकों ने ज्ञान की खोज का मार्ग दिखाया वैसे-वैसे भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान के क्षेत्र में अनेक प्रयोग अन्वेषण कार्य होने लगे। इतिहासकारों ने मनुष्य और प्रकृति के ज्ञान के इस नए दृष्टिकोण को वैज्ञानिक क्रांति का नाम दिया। परिणामस्वरूप संदेहवादियों और आस्तिकों के मन में सृष्टि की रचना के स्रोत के रूप में ईश्वर का स्थान प्रकृति लेने लगी। यहाँ तक कि जिन्होंने ईश्वर में अपना विश्वास बनाए रखा वे भी एक दूरस्थ ईश्वर की बात करने लगे।

उनमें यह विश्वास पनपने लगा कि ईश्वर भौतिक संसार में जीवन को प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित नहीं करता है। इस प्रकार के विचारों को वैज्ञानिक संस्थाओं ने लोकप्रिय बनाया। फलस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र में एक नयी वैज्ञानिक संस्कृति की स्थापना हुई। 1670ई० में बनी पेरिस अकादमी तथा 1662 ई. में लंदन में गठित रॉयल सोसाइटी ने वैज्ञानिक संस्कृति के प्रसार में महत्त्वपूर्ण निभाई।

प्रश्न 15.
विगली पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विगली का जन्म 1484 ई० में स्विट्जरलैंड में हुआ था। उसने धर्म ग्रंथों का गहन अध्ययन किया था। लूथर की तरह वह भी क्षमा पत्रों का विरोधी था। उसने ज्यूरिख को अपना केंद्र बनाया और धर्म को नए ढंग से परिभाषित करना आरंभ किया। 1525 ई. में उसने रोम से संबंध तोड़कर एक रिफाई चर्च (Reformed Church) की स्थापना की। उसने बाइबिल को धर्म का एक मात्र स्रोत बताया और पादरियों द्वारा विवाह न करने का डटकर विरोध किया।

अनेक लोग कट्टर कैथोलिक बने रहे। विगली ने इन लोगों को बलात् प्रोटेस्टेंट बनाने का प्रयास किया जिसके कारण स्विट्जरलैंड में गृह युद्ध छिड़ गया। अंत में एक समझौता हुआ जिसके अनुसार धर्म के संबंध में अंतिम अधिकार स्थानीय सरकारों को मिल गया । इस प्रकार आज भी जर्मनी की भांति स्विट्जरलैंड में भी कैथोलिक एवं प्रोटेस्टैंट दोनों ही हैं।

प्रश्न 16.
मानवतावादी संस्कृति ने मनुष्य की एक संकल्पना प्रस्तुत की। वह क्या थी?
उत्तर:
मानवतावादी संस्कति से मानव जीवन पर धर्म का नियंत्रण कमजोर हआ। इटली के निवासी अब भौतिक संपत्ति, शक्ति और गौरव से बहुत अधिक आकृष्ट हुए। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वे अधार्मिक बन गए। वेनिस के मानवतावादी फ्रेनचेस्को बरबारो (Francesco Barbaro) ने अपनी एक पुस्तिका में संपत्ति अधिग्रहण करने को एक विशेष गुण कहकर उसका समर्थन किया। लोरेंजो वल्ला (I renzo Valla) जिसका वह विश्वाः था कि इतिहास का अध्ययन मनुष्य को पराकाष्ठा का जीवन व्यतोत करने के लिए प्रेरित करता है, ने अपनी पुस्तक ‘आनप्लेजर’ में ईसाई धर्म की भोग-विलास पर लगाई गई रोक की आलोचना की।

इस समय लोग शिष्टाचार का भी पूरा ध्यान रखते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति को विनम्रता से बोलना चाहिए, ठीक ढंग से कपड़े पहनने चाहिए और सभ्य व्यवहार करना चाहिए। मानवतावादी के अनुसार व्यक्ति कई माध्यमों से अपने जीवन को आदर्श बना सकता है। इसके लिए शक्ति और संपत्ति का होना आवश्यक नहीं है।

प्रश्न 17.
मानवतावाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
पुनर्जागरण की एक मूल विशेषता मानवतावाद थी। मानवतावाद का अर्थ है-मनुष्यों में रुचि लेना तथा उसका आदर करना । मानवतावाद मनुष्य की समस्याओं का अध्ययन करता है, मानव जीवन के महत्त्व को स्वीकार करता है तथा उसके जीवन को सुधारने एवं समृद्ध बनाने का प्रयास करता है। पुनर्जागरण काल में परलोक की अपेक्षा इहलोक को महत्व दिया गया जिसमें हम रहते हैं, और यही मानवतावाद है। मानवतावाद के समर्थक मानवतावादी कहलाए।

पैट्रार्क अग्रणी मानवतावादी था। उसने अंधविश्वासों तथा धर्माधिकारियों की जीवन प्रणाली की आलोचना की। उसने परलोक चिंतन की अपेक्षा लौकिक जीवन को आनंदपूर्वक व्यतीत करने पर बल दिया। इटली के नागरिकों ने मानवतावाद का समर्थन इसलिए किया क्योंकि वे धार्मिक बंधनों के परिणामस्वरूप अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को विकसित करने में असमर्थ थे। वास्तव में धर्म-निरपेक्षता की भावना मानवतावाद की मुख्य विचारधारा थी।

प्रश्न 18.
पश्चिमी रोम साम्राज्य के पतन के पश्चात् किन परिवर्तनों ने इतालवी संस्कृति के पुनरुत्थान में सहायता पहुंचाई?
उत्तर:
पश्चिमी रोम साम्राज्य के पतन के बाद इटली के राजनैतिक तथा सांस्कृतिक केंद्रों का विनाश हो गया। इस समय कोई भी एकीकृत सरकार नहीं थी। रोम का पोप अपने राज्य में अवश्यक सार्वभौम था, परंतु पूरे यूरोप की राजनीति में वह इतना मजबूत नहीं था। काफी समय से पश्चिमी यूरोप के क्षेत्र सामंती संबंधों के कारण नया रूप ले रहे थे और लातीनी चर्च के नेतृत्व में उनका एकीकरण हो रहा था।

पूर्वी यूरोप में बाइजेंटाइन साम्राज्य के शासन के अधीन बदलाव आ रहे थे। उधर कुछ और पश्चिम में इस्लाम एक साझी सभ्यता का निर्माण कर रहा था। इटली कमजोर देश था। यह अनेक टुकड़ों में बँटा हुआ था। इन्हीं परिवर्तनों ने इतालवी संस्कृति के पुनरुत्थान में सहायता पहुँचाई।

प्रश्न 19.
इटली के नगरों को नया जीवन किस प्रकार मिला?
उत्तर:
बाइजेंटाइन साम्राज्य और इस्लामी देशों के बीच व्यापार की वृद्धि से इटली के तटवर्ती बंदरगाह फिर से जीवित हो उठे । बारहवीं शताब्दी में जब मंगोलों ने चीन के साथ ‘रेशम मार्ग’ द्वारा व्यापार आरंभ किया तो पश्चिमी यूरोप के देशों के व्यापार को बढ़ावा मिला । इसमें इटली के नगरों ने मुख्य भूमिका निभाई। ये नगर स्वयं को स्वतंत्र नगर राज्यों का एक समूह मानते थे। वेनिस और जनेवा इटली के दो सबसे महत्त्वपूर्ण नगर थे।

वे यूरोप के अन्य क्षेत्रों से इस दृष्टि में अलग थे कि यहाँ पर धर्माधिकारी तथा सामंत वर्ग राजनीति में शक्तिशाली नहीं थे। धनी व्यापारी तथा महाजन नगर के शासन में सक्रिय भाग लेते थे। इससे नागरिकता की भावना पनपने लगी। यहाँ तक कि जब नइ नगरों का शासन सैनिक तानाशाहों के हाथ में था, तब भी इन नगरों के निवासी अपने आ को यहाँ का नागरिक कहने में गर्व अनुभव करते थे।

प्रश्न 20.
पुनर्जागरण काल में चित्रकला के विकास पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में जिस कला का सर्वाधिक विकास हुआ वह थी चित्रकला यह धार्मिक प्रभावों से मुक्त हुई और चित्रकारों ने विषयों का चुनाव सीधे जीवन से किया। इस चित्रकला का सर्वाधिक विकास इटली में हुआ। पलास्टर और लकड़ी के स्थान पर कैनवास का प्रयोग होने लगा। इस समय के महान चित्रकारों में:-गियोयो में से कियो, माइकल एन्जेलो एवं लियोनार्डो द विंची प्रमुख था। माईकल ऐन्जेलो ने ‘दि पाइटा’ नामक चित्र में मां की वात्सल्यता को उभारा तो विंची ने मोनालिसा एवं ‘लास्ट सपर’ जैसे चित्रों की जीवंत चित्रकारी के लिये रेखा ज्ञान, नरकंकालों एवं शरीर क्रिया विज्ञान का अध्ययन किया।

प्रश्न 21.
कॉपरनिकस की खोज का महत्व बतावें।
उत्तर:
कॉपरनिकस (1473-1543) ने घोषणा की कि पृथ्वी समेत सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। यह एक क्रांतिकारी विचारधारा थी जो पूर्व की मान्यताओं के विपरीत थी। ईसाईयों का यह विश्वास था कि पृथ्वी स्थिर है, जिसके चारों ओर खगोलीय ग्रह घूमते हैं। कॉपरनिकस के सिद्धान्त के पश्चात् केपलर (1571-1630 ई०) और गैलिलियो ने भी इस सिद्धान्त के तथ्यों को सिद्ध किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानवतावाद के उदय तथा विकास में विश्वविद्यालयों के योगदान की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
यूरोप में विश्वविद्यालय सर्वप्रथम इटली के शहरों में स्थापित हुए। ग्याहरवीं शताब्दी में पादुआ और बोलोना (Bologna) विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र थे। इसका कारण यह था कि इन नगरों के मुख्य क्रियाकलाप व्यापार वाणिज्य संबंधी थे। इसलिए वकीलों और नोटरी की बहुत अधिक आवश्यकता होती थी। ये लोग नियमों को लिखते थे, व्याख्या करते थे और समझौते तैयार करते थे। इनके बिना बड़े पैमाने पर व्यापार करना संभव नहीं था।

परिणामस्वरूप कानून को रोमन संस्कृति के संदर्भ में पड़ा जाने लगा। फाचेस्को पेट्रार्क (3041348 ई.) इस परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है। पेट्रार्क के लिए पुराकाल एक विशिष्ट सभ्यता थी जिसे प्राचीन यूनानियों और रोमानों के वास्तविक शब्दों के माध्यम से ही अच्छी तरह समझा जा सकता था। अतः उसने इस बात पर बल दिया कि इन प्राचीन लेखकों की रचनाओं का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए।

नया शिक्षा कार्यक्रम इस बात पर आधारित था कि अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। यह सब हम केवल धार्मिक शिक्षा से नहीं सीख सकते । इस नयी संस्कृति को उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने ‘मानवतावाद’ का नाम दिया । पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ में मानवतावादी शब्द उन अध्यापकों के लिए प्रयुक्त होता था जो व्याकरण, अलंकार शास्त्र, कविता, इतिहास, नीति दर्शन आदि विषय पढ़ाते थे। मानवतावाद को अंग्रेजी में ‘यूमेनिटिज्म’ कहते हैं ‘ह्यूमेनिटिज’ शब्द लातीनी शब्द ‘ह्यूमैनिटास’ से बना है। कई शताब्दियों पहले रोम के वकील एवं निबंधकार सिसरो (Cicero, 106-43 ई० पू०) ने इसे ‘संस्कृति’ के अर्थ में लिया था। इस प्रकार मानवता पद को ‘मानवतावादी संस्कृति’ कहा गया।

इन क्रांतिकारी विचारों ने अनेक विश्वविद्यालयों का ध्यान आकर्षित किया। इनमें एक नव स्थापित विश्वविद्यालय फ्लोरेंस भी था जो पेट्रार्क का स्थायी नगर-निवास था। इस नगर ने तेरहवीं शताब्दी के अंत तक व्यापार या शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेष उन्नति नहीं की थी। परंतु पंद्रहवीं शताब्दी में सब कुछ बदल गया।

किसी भी नगर की पहचान उसके महान् नागरिकों तथा उसकी संपन्नता से बनती है। फ्लोरेंस की प्रसिद्धि में दो लोगों का बड़ा हाथ था। ये व्यक्ति थे-दाँते अलिगहियरी (Dante Alighieri) तथा कालकार जोटो (Giotto)। दाँते ने धार्मिक विषयों पर। लिखा और जोटो ने जीते-जागते रूपचित्र (Portrait) बनाए। उनके द्वारा बनाए रूपचित्र काफी सजीव थे। इसके बाद फ्लोरेंस कलात्मक कृतियों का सृजन केंद्र बन गया और यह इटली के सबसे बौद्धिक नगर के रूप में जाना जाने लगा।

‘रिसा व्यक्ति’ शब्द का प्रयोग, प्रायः उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हों और वह अनेक कलाओं में कुशल हो। पुनर्जागरण काल में अनेक महान् लोग हुए जो अनेक रुचियाँ रखते थे और कई कलाओं में कुशल थे। उदाहरण के लिए एक ही व्यक्ति विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्रज्ञ और कलाकार हो सकता था।

प्रश्न 2.
पुनर्जागरण से क्या तात्पर्य है? इसकी मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जागरण ‘रिनेसा’ का हिंदी रूपांतर है। इसका अर्थ पुनर्जन्म है। पुनर्जागरण वास्तव में एक ऐसा आंदोलन था जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी राष्ट्र मध्य युग के अंधकार से निकलकर आधुनिक युग के प्रकाश में सांस लेने लगे। वे आधुनिक युग के विचारों और शैलियों से प्रभावित हुए। मानव ने स्वतंत्र रूप से विचार करना आरंभ किया जिससे साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन कीर्तिमान स्थापित हुए।

पुनर्जागरण की विशेषताएँ –
1. तर्क की प्रधानता – पुनर्जागरण ने मध्यकालीन धर्म तथा परमपराओं में बंधे समाज को मुक्त किया और तर्क को बढ़ावा दिया। इस दिशा में अरस्तु के तर्कशास्त्र ने मार्गदर्शन किया। पेरिस, बोलोने, ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज आदि विश्वविद्यालयों ने तर्क की विचारधारा का महत्त्व बढ़ाया। अब उसी बात को सही स्वीकार किया जाने लगा जो तर्क की कसौटी पर सही प्रमाणित हो।

2. प्रयोग का महत्त्व – रोजर बेकर (1214-1294 ई.) के अनुसार हम ज्ञान को दो प्रकार से प्राप्त करते हैं-वाद-विवादों द्वारा तथा प्रयोग द्वारा। परंतु वाद-विवाद से प्रश्न का अंत हो जाता है और हम भी इस पर विचार करना बंद कर देते हैं। इससे न तो संदेह समाप्त होता है और न ही मस्तिष्क को संतुष्टि प्राप्त होती है। यह बात तब-तक नहीं होती जब-तक कि अनुभव एवं प्रयोग द्वारा सत्य की प्राप्ति नहीं हो पाती । रोजर बेकर के इन विचारों ने प्रयोग एवं प्रेक्षण को बढ़ावा दिया।

3. मानववाद – पुनर्जागरण की एक मूल विशेषता मानववाद थी। मानववाद का अर्थ है-मनुष्य में रुचि लेना तथा इसका आदर करना। मानववाद मनुष्य की समस्याओं का अध्ययन करता है, मानव जीवन के महत्त्व को स्वीकार करता है तथा उसके जीवन को सुधारने एवं समृद्ध बनाने का प्रयास करता है। पुनर्जागरण काल में परलोक की अपेक्षा इहलोक को महत्त्व दिया गया जिसमें हम रहते हैं और यही मानववाद है।

4. सौंदर्य की उपासना – पुनर्जागरण की एक अन्य विशेषता थी-सौंदर्य की उपासना। कलाकारों ने अपनी कतियों में मनष्य की मोहिनी 7.1 प्रस्तुत करने का प्रयास किया। मालसा की मुग्ध करने वाली मुस्कान इस बात का बहुत बड़ा उदाहरण है।

प्रश्न 3.
पुनर्जागरण का जन्म सर्वप्रथम इटली में ही क्यों हुआ?
उत्तर:
पुनर्जागरण का उदय एवं प्रसार 1350 ई० से 1550 ई० के बीच इटली में हुआ। यहाँ से इसका प्रसार जर्मनी, इंग्लैंड, फ्राँस तथा यूरोपीय राष्ट्रों में हुआ। इटली में पुनर्जागरण के उदय के मुख्य कारण इस प्रकार थे –

(क) इटली एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र था। इटली के इस बढ़ते व्यापार तथा इसकी समृद्धि ने पुनर्जागरण की प्रवृत्तियों को बल प्रदान किया।
1. देश में मिलान, नेपल्स, फ्लोरेंस, वेनिस आदि नगरों की स्थापना हुई। इन नगरों के व्यापारी बाल्कन प्रायद्वीप, पश्चिमी एशिया, बिजेंटाइन तथा मिस्र की यात्रा करते थे। यहाँ उनकी भेंट ईरानी व्यापारियों से होती रहती थी। इस संपर्क और विचार-विनिमय से एक-दूसरे के विचारों को अपनाने की क्षमता :त्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त अधिकांश संग्रहालय, सार्वजनिक पुस्तकालय और नाट्यशालाएँ नगरों में ही स्थापित की गईं, गाँवों में नहीं। इससे इटली के सांस्कृतिक जीवन को नवीन दिशा मिली।

2. इटली की समृद्धि ने धनी व्यापारिक मध्यम वर्ग को जन्म दिया। इस वर्ग ने सामंतों तथा पोप की परवाह करना बंद कर दिया और इसने मध्यकालीन मान्यताओं का उल्लंघन किया । इससे इटली में पुनर्जागरण की भावना को बल मिला।

3. अनेक व्यापारियों ने सम्राटों, साहित्याकारों तथा कलाकारों को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप साहित्यकारों तथा कलाकारों को स्वतंत्र रूप से अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। अकेले फ्लोरेंस नगर ने ही असंख्य कलाकारों और साहित्यकारों को आश्रय दिया। दाँते, पेट्रार्क, बुकासियों, एंजेली, लियोनादी, जिबर्टी, मैक्यावली आदि लेखक एवं कलाकार सभी इसी नगर में उभरे थे। अतः स्पष्ट है कि धन की वृद्धि ने कला तथा कलाकारों की शिक्षा को पुनर्जागरण की ओर प्रवाहित कर दिया।

(ख) इटली में पुनर्जाकरण के पनपने का एक अन्य कारण यह था कि यह प्राचीन रोमन सभ्यता का जन्म स्थान रहा था। इटली के नगरों में विद्यमान प्राचीन रोमन सभ्यता के अनेक स्मारक आज भी लोगों को पुनर्जागरण की याद मिलाते हैं। वे इटली को प्राचीन रोम की भांति महान् देखना चाहते थे। इस तरह प्राचीन रोमन संस्कृति पुनर्जागरण के लिए प्रेरणा का स्रोत सिद्ध

(ग) रोम सारे पश्चिमी यूरोपीय ईसाई जगत् का केंद्र था। पोप यहीं निवास करता था। कुछ पोप पुना॥रण की भावना से प्रेरित होकर विद्वानों को रोम लाए और उनसे यूनानी पांडुलिपियों का लातीनी भाषा में अनुवाद करवाया। पोप निकोलस पंचम ने वैटिकन पुस्तकालय की स्थापना की। उसने सेंट पीटर्स का गिरजाघर भी बनवाया। इन कार्यों का प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ना स्वाभाविक था।

(घ) रानीतिक दृष्टि से इटली पुनर्जागरण के लिए उपयुक्त था। पवित्र रोम साम्राज्य के पतन के साथ-साथ उत्तरी इटली में अनेक स्वतंत्र नगर-राज्यों का उदय हो रहा था। इसके अतिरिक्त इटली में सामंती प्रथा अधिक दृढ़ नहीं थी। परिणामस्वरूप इन नगर-राज्यों के स्वतंत्र एवं स्वछंद वातावरण ने वहाँ क नागरिकों में नवीन विचारों को विकसित किया।

(ङ) मध्यकालीन यूरोप में शिक्षा पर धर्म का प्रभाव था, परंतु इटली में व्यापार के विकास के कारण शिक्षा धर्म के बन्धनों में मुक्त थी। यहाँ पाठ्यक्रम में व्यावसायिक ज्ञान, भौगोलिक ज्ञान आदि को उपयुक्त स्थान प्राप्त था। परिणामस्वरूप विज्ञान तथा तर्क को बल मिला।

(च) 1453 ई० में तुर्को ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया। वहाँ के अधिकांश यूनानी विद्वान, कलाकार और व्यापारी भाग कर सबसे पहले इटली के नगरों में आए और यहीं पर बस गए। ये विद्वान अपने साथ प्राचीन साहित्य को अनेक अनमोल पांडुलिपियाँ भी लाये । कुछ विद्वानों ‘ने इटली के विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य करके नवीन चेतना जागृत की।

प्रश्न 4.
पुनर्जागरण की अग्रणी विभूतियाँ कौन थीं? कला, साहित्य तथा विज्ञान के क्षेत्रों में पुनर्जागकरण को विभिन्न उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जाकरण के काल में अनेक महान् विभूतियों का जन्म हुआ। उन्होंने अपनी प्रतिभा तथा आविष्कारों से, साहित्य तथा विज्ञान को नये आयाम प्रदान किए। इनमें से प्रमुख विभूतियों तथा उनकी सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है –

1. पेटॉर्क – पेट्रॉर्क इटली का एक महान् लेखक तथा कवित था। उसे रोम के सम्राट ने 1341 ई० में राजकवि की उपाधि से विभूषित किया। उसे मानववाद का प्रतीक स्वीकार किया जाता है। उसने तत्कालीन समाज की आलोचना की और प्रचलित शिक्षा-प्रणाली पर तीखे प्रहार किए।

2. माइकल एंजिलो – यह पुनर्जागरण काल का एक महान् कलाकार था। यह चित्रकार तथा उच्च कोटि का मूर्तिकार था। उसकी चित्रकला की सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ रोम के गिरजाघर सिस्तीन की छत में दिखाई देती हैं। उसका एक चित्र ‘दि फॉल ऑफ मैन’ विश्वविख्यात है। उसे मानवतावाद का दूत स्वीकार किया जाता है।

3. रफेल – इटली का यह महान् चित्रकार, माइकेल एंजिली तथा लियोनार्दो-द-विंची का समकालीन था। उसकी सर्वप्रथम कृति ईसा की माता मेंडोना का चित्र है जो आज भी रोम की शोभा है। उसने ईसाई धर्म से संबंधित विषयों पर अनेक चित्र बनाए और गिरजाघरों तथा महलों की दीवारों को उपदेशात्मक विषयों से सुसज्जित किया।

4. टॉमस मोर – टॉमस मोर का जन्म लंदन में हआ था। वह इंग्लैंड का चांसलर भी रहा। उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में एक आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत किया। टॉमस मोर पर इंग्लैंड की सरकार ने मुकदमा चलाया था और 1535 ई० में उसे फाँसी दे दी गई थी।

5. मेकियावली – इटली के नगर फ्लोरेंस के इन निवासी को आधुनिक राजनीति दर्शन का पिता माना जाता है। उसने अपनी विश्वविख्यात पुस्तक ‘दि प्रिंस (The Prince) में राज्य की नई कल्पना का चित्र प्रस्तुत किया है। इसमें उसने शासन करने की कला का वर्णन भी किया है। उसके अनुसार धर्म और राजनीति का कोई संबंध नहीं है। उसके विचारों का आधुनिक शासन-प्रणाली पर गहरा प्रभाव पड़ा।

6. लियोनार्दो-द-विंची – इटली का यह महापुरुष बहुमुखी प्रतिभा का स्वामी था। वह चित्रकार, मूर्तिकार, इंजीनियर, वैज्ञानिक, दार्शनिक, कवि और भी सभी कुछ था। उसने हवाई जहाज बनाने का भी प्रयत्न किया। उसके चित्रों में ‘दि लास्ट सपर’ चित्र बहुत प्रसिद्ध है।

7. गुटेनबर्ग – वह जर्मनी के मेंज नगर का निवासी था। प्रारंभ में वह हीरे और दर्पणों पर पॉलिश किया करता था। उसने मुद्रण के लिए आवश्यक वस्तुओं तथा कल पुर्जा का आविष्कार किया। वह प्रथम व्यक्ति था जिसने 1450 ई० के लगभग छापाखाना तैयार किया।

8. मार्टिन लूथर – मार्टिन लूथर जर्मनी का निवासी था। 1517 ई० में उसने रोम की धार्मिक यात्रा की। यहाँ उसने पोप और चर्च की बुराइयाँ देखीं। वापस आकर उसने इन बुराइयों के विरुद्ध सुधार आंदोलन आरंभ किया। इसे आंदोलन के परिणामस्वरूप ईसाई धर्म की प्रोटेस्टेंट शाखा का प्रचलन हुआ। उसने जर्मन भाषा में बाईबिल का अनुवाद किया। चर्च के विरुद्ध लिखे गए ग्रंथ में उसकी पुस्तक
‘टेबल टॉक’ अति प्रसिद्ध है। उसने मुक्ति पत्रों का घोर विरोध किया।

9. जॉन वाइक्लिफ – वह इंग्लैड का रहने वाला था। ‘सुधार आंदोलन’ का ‘प्रभात का सितारा’ कहा जाता है, क्योंकि उराने लूथर से पूर्व ईसाई धर्म में सुधार के प्रयत्न किए। उसने अपने विद्यार्थियों की सहायता से इ. बेल का अनुवाद अपनी मातृभाषा में किया। चर्च ने उसे ‘नास्तिक’ घोषित किया और उसकी कई रचनाएँ जला दी गई।

10. गैलीलियों – गैलीलियो का जन्म इटली के नगर पीसा में हुआ। वह एक उच्च कोटि का गणितज्ञ था। 1609 ई० में उसने दूरबीन का आविष्कार किया जिसके परिणामस्वरूप सामुद्रिक यात्राएँ सरल बन
गई। वह उन पहले व्यक्तियों में से था जिन्होंने घोषणा की कि पृथ्वी एक ग्रह है जो सूर्य के चारों ओर घूमती है।

11. कोपरनिकस – यह पोलैंड का निवासी था। वह नक्षत्र विद्या का ज्ञाता था। उसका मुख्य योगदान आकाश के विभिन्न ग्रहों की गतियों की जानकारी देना था। उसने यह बताया कि पृथ्वी तथा अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं।

12. दाँते – यह इटली का महानतम् कवि था। उसे इतिहास में ‘दस नीरव शताब्दियों की वाणी’ कहा जाता है। उसने सेना में भी कार्य किया था। वह न्यायाधीश भी रहा। उसने जीवन में बहुत कष्ट झेला। उन्हीं यातनाओं ने उसे श्रेष्ठ कवि बना दिया। ‘डिवाइन कॉमेडी’ उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है। इसमें दाँते ने स्वर्ग और नरक की काल्पनिक यात्रा का वर्णन किया है।

13. जॉन हस – वह प्राग विश्वविद्यालय में प्राध्यापक था। उसने चर्च की कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई। परिणामस्वरूप उसे पोप के आदेशानुसार जीवित जला दिया गया।

14. फ्रांसिस बेकिन – फ्रांसिस बेकिन अंग्रेजी राजनीतिज्ञ तथा साहित्यकार था। वह अपने ‘श्रेष्ठ निबंधों के लिए विश्वविख्यात है।

15. हार्वे – हार्वे इंग्लैंड का इंग्लैंड का रहने वाला था। उसने 1610 ई० में इस बात का वर्णन किया कि रक्त किस प्रकार दिल से शरीर के सब भागों में जाता है और फिर लौलकर दिल में आता है।

16. वेसिलियस – यह बेज्लियम का रहने वाला था। उसने पहली बार मानवीय शरीर का पूर्ण अपनी पुस्तक में किया । पुस्तक का नाम था-De Humani Corporis Fabrica.

17. सर्वेतम – सर्वेतस स्पेन का रहने वाला था। वह एक महान् योद्धा और सफल लेखक था। उसकी रचित Don Quixote विश्व की महानतम् रचनाओं में गिनी जाती है और इसका लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस पुस्तक में मध्यकालीन सामंतों की वीर गाथाओं का वर्णन है।

प्रश्न 5.
16वीं तथा 17वीं शताब्दी के दौरान हुए धर्म-सुधार (प्रोटेस्टेंट) आंदोलन के कारणों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
धर्म – सुधार आंदोलन से हमारा अभिप्राय उस आंदोलन से है जिसे जर्मनी के मार्टिन लूथर ने रोमन चर्च में प्रचलित अनुचित रीति-रिवाजों के विरोध में चलाया। इस आंदोलन के समर्थकों ने प्रष्ट परंपराओं को समाप्त करके सुधरी हुई परंपरा स्थापित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने रोमन चर्च से पृथक होकर एक नए प्रोटेस्टेंट चर्च की स्थापना की। इस प्रकार ईसाई धर्म के अनुयायी दो गुटों में विभाजित हो गए-कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट। धर्म सुधार आंदोलन पर्पनी से यूरोप के अन्य देशों में भी फैल गया । इसे स्विट्जरलैंड में विगली तथा फ्रांस में काल्विन ने आ गे बढ़ाया।

कारण – धर्म सुधार आंदोलन के निम्नलिखित कारण थे –
1. मध्यकाल में रोमन कैथोलिक चर्च पश्चिमी यूरोप में अपना प्रभुत्व जमाए हुए था। इसमें सर्वोच्च स्थान पोप का था। वह यूरोप की समस्त ईसाई जनता का नेतृत्व करता था। चर्च की आपर शक्ति के कारण इसमें कई दोष आ गए थे। पुनर्जागरण के फलस्वयप सामान्य ज्ञान और विवेक के आधार पर जनता का चर्च में विश्वास कम होने लगा। लोग पूजा-पाठ का चर्च के संगठन की आलोचना करने लगे।

2. पोप की शक्ति असीम थी। वह विभिन्न देशों में पादरियों की नियुक्ति करता था। चर्च की अपनी अलग अदालत थी। चर्च के पदाधिकारी राज्य के नियमों से मुक्त थे। पोप राज-कार्यों में हस्तक्षेप किया करता था। इसलिए राजा पोप से मुक्त होने के लिए किसी अवसर की खोज में थे।

3. राष्ट्रीय राज्यों के उदय के साथ राजाओं की शक्ति बढ़ी। वे पोप के अंतर्राष्ट्रीय अधिकारों पर अंकुश चाहते थे। इसलिए राजाओं ने धर्म सुधार आंदोलन को गति दी।

4. व्यापारी वर्ग भी चर्च के विरुद्ध था। वे चर्च की विपुल संपत्ति का लाभ उठाना चाहते थे। अतः उन्होंने चर्च के विरुद्ध राजाओं का समर्थन किया।

5. पादरी नैतिक रूप से पतन की ओर अग्रसर थे। अत: चर्च में जनता की आस्था कम होने लगी थी। चर्च जन-साधारण से अनेक प्रकार के कर और शुल्क वसूल करता था। यह धन देश के बाहर जाता था। सबसे अधिक भूमि का स्वामी चर्च ही था। चर्च को कर देना पाप समझा जाता था। पश्चिम यूरोप में चर्च की जागीरों में उनके कर्मचारी आतंक मचाते थे। अतः जनता भी कॅथोलिक चर्च के विरुद्ध आवाज उठाने लगी।

6. धर्म सुधार आंदोलन का मूल कारण जनता में पुनर्जागरण का प्रसार ही था। इस युग में प्रचलित मान्याताओं तथा विश्वासों का तर्क की कसौटी पर परीक्षण किया गया। तर्क की कसौटी पर पोष तथा पादरियों के अधिकार तथा व्यवहार खरे नहीं उतरे। अतः धार्मिक दोषों का विरोध होना स्वाभाविक ही था।

प्रश्न 6.
धर्म सुधार आंदोलन के क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
धर्म सुधार आंदोलन के निम्नलिखित परिणाम निकले –
1. सामाजिक परिणाम – इस आंदोलन के कारण अंधविश्वासों और आडंबरों का अंत हुआ। साधारण नागरिक को बाइबिल का अध्ययन करने की सुविधा प्राप्त हो गई। वैज्ञानिकों को भी अपने मध्यकाल में स्वतंत्रता मिली। चर्च की संपत्ति का किसानों तथा मध्य वर्ग में वितरण होने लगा और लोग चर्च के कर-भार से मुक्त हो गए।

2. कैथोलिक धर्म में सुधार आंदोलन – कैथोलिक धर्म में अनेक सुधार हुए। कैथोलिक चर्च में सुधार के लिए ट्रेंट में एक परिषद् बुलाई गई। इसकी बैठकें अठारह साल तक चली। पोप की प्रधानता और उसके चर्च तथा धर्म ग्रथों की व्याख्या के अधिकार स्वीकार किए गए। इबिल का लेटिन में अनुवाद भी प्रामाणिक माना गया। चर्च ने क्षमा-पत्र बेचना बंद कर दिया। चर्च के अधिकारियों के प्रशिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाया गया।

3. गजनीतिक परिणाम – राजनीतिक जीवन में चर्च का प्रभाव कम हुआ। ग तरह राजाआ का शक्ति बढ़ी। पोप का बाहय हस्तक्षेप समाप्त हो गया। इस प्रकार राष्ट्रीय राज्यों के निर्माण में बड़ा योगदान मिला।

4. वाणिज्य तथा व्यापार को प्रोत्साहन – पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप सामंतवादी व्यवस्था का अंत हो गया तथा व्यापार की प्रगति हुई। व्यापार की प्रगति के कारण एक समृद्ध मध्यम वर्ग का उदय हुआ।

5. राष्ट्रीय भाषा तथा साहित्य का प्रसार – धर्म सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप लोक भाषाओं तथा साहित्य का विकास हुआ। मार्टिन लूथर ने बाइबिल का अनुवाद जर्मन भाषा में किया। धर्म संबंधी लेख उसने जर्मन भाषा में प्रकाशित कराए। अन्य देशों में भी धर्म का प्रचार वहाँ की लोकभाषा में ही किया गया। जो प्रतिष्ठा कभी लैटिन भाषा को प्राप्त थी, वह अब लोक भाषाओं को मिलने लगी।

प्रश्न 7.
प्रति सुधार आंदोलन से क्या तात्पर्य है? वह कैथोलिक चर्च में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में कहाँ तक सफल रहा?
उत्तर:
चर्च तथा पोप की असीमित शक्ति और पोप तथा पादरियों के आडंबरपूर्ण कार्यों के विरुद्ध धर्म सुधार आंदोलन चला था। फलस्वरूप एक नए सुधारवादी धर्म (प्रोटेस्टेंट) का उदय हुआ। आरंभ में पोप तथा चर्च सुधारवादी आंदोलन के प्रति उदासीन रहे। परंतु जब इस आंदोलन ने जोर पकड़ा तो पोप को अपनी बेटियों का अनुभव हुआ। उसने अपने चर्च में सुधार लाने के लिए अपनी ओर से एक आंदोलन चलाया । इस आंदोलन को प्रति सुधार आंदोलन अथवा काउंटर रिफॉर्मेशन कहा जाता है। कैथोलिक चर्च की बुराइयों को दूर करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए

1. प्रति सुधार आंदोलन ने कैथोलिक चर्च की सर्वोच्च सत्ता को पुनः स्थापित करने के लिए तीन तरफा प्रयास किया। 1545 ई० में पोप पाल तृतीय ने ट्रेंट की परिषद् (Council of Trent) बुलाई। प्रोटेस्टेंटवाद से निपटने के तरीकों पर विचार किया गया। इस उद्देश्य से प्रोटेस्टेंटवादियों तथा कैथोलिक के बीच सैद्धांतिक झगड़ों को समाप्त करने के निर्णय लिया गया। इस परिषद् ने चर्द की प्रशासनिक बुराइयों को समाप्त करने तथा अनैतिक कार्यों पर रोक लगाने का निर्णय भी लिया। इसके अतिरिक्त इस परिषद् ने कुछ पुस्तकों की एक सूची तैयार करवाई। कैथोलिकों को इन पुस्तकों को पढ़ाने के लिए मना कर दिया गया।

2. धर्म प्रचारकों की एक संस्था स्थापित की गई। ये धर्म प्रचारक जेसुइट कहलाए। इस संगठन का नेता लोयोला (Loyola) नामक एक स्पेनिश था।

3. कैथोलिक चर्च ने अपनी इंकविजिशन (चर्च की अदालत) नामक संस्था की पुनः स्थापना की। इन प्रयत्नों के परिणामस्वरूप भले ही समस्त यूरोप को पोप की सत्ता के अधीन नहीं लाया जा सका, तो भी ये प्रयास प्रोटेस्टेंटवाद के और अधिक प्रसार को रोकने में सफल रहे।

प्रश्न 8.
मानवतावादी विचारों का प्रचार किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
मानवतावादी अपनी बात लोगों तक तरह-तरह से पहँचाते थे। यद्यपि विश्वविद्यालय में मुख्य रूप से कानून, आयुर्विज्ञान और धर्मशास्त्र ही पढ़ाए जाते थे फिर भी धीरे-धीरे मानवतावादी विषय भी स्कूलों में पढ़ाये जाने लगे। ऐसा केवल इटली में ही नहीं, बल्कि यूरोप के अन्य देशों में भी हुआ। पुनर्जागरण काल में मानवतावादी विचारों के प्रसार में केवल औपचारिक शिक्षा ने ही योगदान नहीं दिया। इसमें कला, वास्तुकला और साहित्य ने भी प्रभावी भूमि निभाई।

नए कलाकारों को पहले के कलाकारों द्वारा बनाए गए चित्रों से प्रेरणा मिली। रोमन संस्कृति के भौतिक अवशेषों की उतनी ही उत्कंठा के साथ खोज की गई जितनी कि प्राचीन ग्रंथों की। रोम साम्राज्य के पतन के एक हजार वर्षों बाद भी प्राचीन राम और उसके वीरान नगरों के खंडहरों से कलात्मक वस्तुएँ प्राप्त हुई। शताब्दियों पहले बनी पुरुषों एवं नियों की संतुलित मूर्तियों ने इतालवी वास्तुविदों को उस परंपरा को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। 1416 ई. में दोनातल्लो (Donatello, 1386-1466) ने सजीव मूर्तियाँ बनाकर एक नयी परंपरा स्थापित की।

प्रश्न 9.
चित्रकारों ने इतालवी कला को यथार्थवादी रूप कैसे प्रदान किया?
उत्तर:
कालकारों को मूल आकृति जैसी सटीक मूर्तियाँ बनाने की चाह को वैज्ञानिकों के कार्यों ने और अधिक प्रेरित किया। नर-कंकालों का अध्ययन करने के लिए कलाकार आयुर्विज्ञान कालेजों की प्रयोगशाला में गए। बेल्जियम मूल के आंडीयस बेसेलियम (1514-64 ई.) पादुआ

प्रश्न 10.
ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद कैसे उत्पन्न हुआ? अथवा, धर्म-सुधार आंदोलन की भूमिका कैसे तैयार हुई?
उत्तर:
यात्रा, व्यापार, सैनिक विजय तथा कूटनीतिक संपर्कों के कारण इटली के नगरों तथा राजदरबारों का दूर-दूर के देशों से संपर्क स्थापित हुआ। यहाँ के शिक्षित एवं समृद्ध लोगों ने ‘ इटली की नयी संस्कृति को प्रसन्नतापूर्वक अपना लिया। परंतु नए विचार आम आदमी तक न पहुंच सके, क्योंकि वे साक्षर नहीं थे। नये विचारों का प्रसार-पंद्रहवीं और आरंभिक सोलहवीं शताब्दी में उत्तरी यूरोप के विश्वविद्यालयों के अनेक विद्वान मानवतावादी विचारों की ओर आकर्षित हुए।

इटली के विद्वानों की भांति उन्होंने भी यूनान तथा रोम के क्लासिकी ग्रंथों और ईसाई धर्मग्रंथों के अध्ययन पर अधिक ध्यान दिया। परंतु इटली के विपरीत यूरोप में मानवतावाद ने ईसाई चर्च के अनेक सदस्यों को अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने ईसाइयों को अपने प्राचीन धर्मग्रंथों में बताए गए तरीकों से धर्म का पालन करने को कहा। उन्होंने अनावश्यक कर्मकांडों को त्यागने की बात भी की और कहा कि उन्हें धर्म में बाद में जोड़ा गया है। मानव के बारे में उनका दृष्टिकोण बिल्कुल नया था। वे उसे एक मुक्त एवं विवेकपूर्ण कर्ता समझते थे। बाद के दार्शनिक बार-बार इसी बात को दोहराते रहे । वे एक दूरवर्ती ईश्वर में विश्वास रखते थे और मानते थे कि मनुष्य को उसी ने बनाया है।

वे यह भी मानते थे कि मनुष्य को अपनी खुशी इसी विश्व में वर्तमान में ही ढूँढ़नी चाहिए। चर्च पर प्रहार-इंग्लैंड के टॉकस मोर (Thomas More 1478-1535 ई.) और हालैंड के इरेस्मस (Erasmus 1466-1536 ई.) का यह मानन था कि चर्च एक लालची संस्था बन गई है जो मनचाहे ढंग से साधारण लोगों से पैसा बटोर रही है। पादरियों द्वारा लोगों से धन ठगने का सबसे सरल तरीका ‘पाप-स्वीकारोक्ति’ (indulgences) नामक दस्तावेज का विक्रय था जो व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए सभी पापों से छुटकारा दिला सकता था। ईसाइयों को बाईबिल के स्थानीय भाषाओं में छपे अनुवाद से यह पता चल गया कि उनका धर्म ऐसी प्रथाओं की आज्ञा नहीं देता।

किसान तथा राजाओं में चर्च के प्रति असंतोष-यूरोप के लगभग प्रत्येक भाग में किसानों ने चर्च द्वारा लगाए गए विभिन्न करों का विरोध किया। इसके साथ-साथ राजा भी राज-काज में चर्च के हस्तक्षेप से दु:खी थे। परंतु मानवतावादियों ने उन्हें यह बताया कि चर्च की न्यायिक और वित्तीय शक्तियों का आधार कॉस्टैनआइन का अनुदान नामक एक दस्तावेज है। यह दस्तावेज असली नहीं था बल्कि जालसाजी से तैयार किया गया था। यह जानकारी पाकर राजाओं में खुशी की लहर दौड़ गई। इसी घटनाक्रम ने ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद को जन्म दिया और धर्म-सुधार आंदोलन की भूमिका तैयार की।

प्रश्न 11.
यूरोप के (इटली के) साहित्य पर पुनर्जागरण के क्या प्रभाव पड़े।
उत्ता:
पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप मानव रोवन के प्रत्येक पक्ष में नवीनता आई। साहित्य में भी इस नवीनता के दर्शन हुए। पुनर्जागरण काल में लातीनी तथा यूनानी भाषाओं की अपेक्षा देशी अर्थात् मातृभाषाओं में साहित्य का सृजन किया जाने लगा। इस तरह इस काल में इतालवो, फ्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगाली, जर्मन, अंग्रेजी, डच, स्वीडिश आदि बोलचाल की भाषाएँ विकसित हुई। पॉडत नेहरू भी लिखते हैं कि ‘इस प्रकार यूरोप की भाषाओं ने प्रगति की और वे इतनी संपन्न एवं शक्तिशाली हो गई कि उन्होंने आज की सुंदर भाषाओं का रूप धारण कर लिया।

इन्हीं सुंदर भाषाओं में साहित्य की रचना हुई। और तो और बाइबिल का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ। पुनर्जागरण काल में केवल भाषाई परिवर्तन ही नहीं हुआ, बल्कि विषय-वस्तु संबंधी परिवर्तन भी हुए। मध्यकालीन साहित्य का मुख्य विषय धर्म था। परंतु इस युग के साहित्य में धार्मिक विषयों के स्थान पर मनुष्य जीवन और समस्याओं को महत्व दिया गया। अब साहित्य आलोचना प्रधान, मानववादी और व्यक्तिवादी हो गया।

इतालवी साहित्य-पुनर्जागरण काल में इटली के साहित्याकारों ने अपनी रचनाओं द्वारा यूरोप के विद्वानों के लिए नवीन दिशाएँ प्रस्तुत की। इन साहित्याकारों में दाँते (1265-1321 ई.), फ्रांचेस्को पैट्रार्क (1304-1374 ई.), ज्योवानी बुकासियो (1313-1375) प्रमुख थे। इन तीनों ने क्रमशः अपनी कविताओं, जीवनियों और कथाओं से इटली के साहित्य को समृद्ध बनाने का प्रयत्न किया।

1. दाँते (Dante) – दाँते एक महान् कवि था। प्रायः उसकी तुलना विद्वान होमर के साथ की जाती है। उसकी रचना ‘डिवाइन कॉमेडी’ (Divine Comedy) विश्वविख्यात है। यह एक काल्पनिक कथा है। इसमें एक यात्रा का चित्र प्रस्तुत किया गया है। दाँते इस काल्पनिक यात्रा में नरक तथा स्वर्ग की यात्रा करता है। हम सबसे पहले नरक की यातनाओं और पीड़ाओं का दृश्य देखते हैं। इसके पश्चात् हम पापमोचन स्थल देखते हैं जहाँ संयम और कठोर जीवन से आत्मशुद्धि होती है और अंत आत्मिक सुख से होता है।

दाँते ने इसीलिए इसे ‘कॉमेडी’ (सुखांत) कहा है। इस पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य मनुष्य को नैतिक तथा संयमी जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देना है। उसने लोगों को मानव प्रेम, देश-प्रेम तथा प्रकृति प्रेम की शिक्षा दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विषय-वस्तु मध्यकालीन और आध्यात्मिक है, फिर भी इसमें साहित्यिक श्रेष्ठता से युका आध्यात्मिक विषय का एक सरस चित्रण है। ‘दाँते को इतालवी कविता का पिता’ कहा जाता है।

2. पेदा (Patrare) – पेट्रार्क को ‘मानववाद का पिता’ कहा जाता है। मानवतावाद के प्रतिनिधि के रूप में उसे पुनर्जागरण का भी प्रथम व्यक्ति स्वीकार किया जाता है। अनेक इतिहासकार उसे दाँते से उच्च स्थान प्रदान करते हैं। उनका कहना है कि दति की ‘डिवाइन कॉमेडी’ में मध्यकाल की झलक है, जबकि पेट्रार्क की कविता नवीनता लिए हुए है। पेट्राक ने लोगों का ध्यान शिक्षा और साहित्य के स्थान पर यूनानी तथा रोमन साहित्य की विशिष्टता की ओर आकर्षित किया। उसकी कविताओं में प्रकृति और मनुष्य के हर्ष तथा विषाद का मार्मिक वर्णन मिलता है। उसने यूनानी और लातीनी भाषा के पुराने हस्तलिखित ग्रंथों को खोजने और उनका संग्रह करने में बड़ा उत्साह दिखाया।

उसने अनेक पस्तकालय खोले और लोगों में पस्तकों के लिए रुचि पैदा की। कविता के अतिरिक्त उसने होमर, सिसरो, लिवी आदि प्राचीन लेखकों की रचनाओं में गहन रुचि दिखाई । उसने इनके साथ काल्पनिक पत्राचार किया। ये पत्र उसकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुए। इन पत्रों से पता चलता है कि उसका प्राचीन सभ्यात के प्रति बडा लगाव था। उसका सबसे बड़ा योगदान है कि उसने देशवासियों में प्राचीन यूनानी एवं रोमन साहित्य में अभिरुचि पैदा की।

3. बुकासियों (Bocacio) – बुकासियो पेट्रार्क का शिष्य था। उसने पुनर्जागरण का पूर्ण प्रतिनिधित्व किया। कहानीकार के रूप में उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति ‘डैकेमैरोन’ (Deccacmeron) है। इस हास्य प्रधान रचना में कुल एक सौ कहानियाँ हैं जिनमें एक नवीन शैली का विकास किया गया है। इनमें इटली के तत्कालीन संपन्न समाज में फैले नैतिक भ्रष्टाचार का वर्णन है। दाँते, पेट्रार्क तथा बुकासियो के अतिरिक्त एरिआस्ट्रो, दासो, सैल्यूतानी आदि ने अपने-अपने ढंग से इतालवी साहित्य को समृद्ध बनाया।

प्रश्न 12.
पुनर्जागरण काल से विज्ञान के क्षेत्र में क्या प्रगति हुई?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण उन्नति हुई। इसके प्रमुख कारण थे –

  • धर्म-सुधार आंदोलर ने लोगों को चर्च के नियंत्रण से मुक्ति दिलाई। अब उन्हें स्वतंत्र रूप से विचार करने का अवसर प्राप्त हुआ।
    मानववाद के विकास से बौद्धिक विकास को बढ़ावा मिला।
  • दार्शनिकों की विचार-प्रणाली में अंतर आया। अब वे भविष्य के विषय में भी सोचने लगे। उनका यह दूरदर्शी दृष्टिकोण नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों का आधार बना।
  • राष्ट्रीय राज्यों के उदय तथा नवीन सामाजिक व्यवस्था के विकास से भी वैज्ञानिक विचारधारा को प्रोत्साहन मिला।
  • नए देशों की खोज से लागों की जिज्ञासा बढ़ी। परिणामस्वरूप उनके दृष्टिकोण में भी परिवर्तन हुआ।
  • पुनर्जागरण काल के विद्वान परंपरागत विचारों को अंधाधुंध स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

वे प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कसना चाहते थे। अंग्रेज विद्वान फ्रांसिस बेकन ने लोगों के सम्मुख ये विचार प्रस्तुत किए-“ज्ञान की प्राप्ति केवल प्रेक्षण और प्रयोग करने से ही हो सकती है। जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे पहले अपने चारों ओर घटित होने वाली घटनाओं का अध्ययन करना चाहिए। फिर उसे स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि इन घटनाओं के पीछे क्या कारण हैं। जब वह किसी घटना के संभावित कारण के विषय में कोई धारणा बना ले, तो उसकी प्रयोगात्मक ढंगे से जाँच करे।” इस तार्किक दृष्टिकोण ने वैज्ञानिक प्रगति को संभव बनाया। इस काल में हुई वैज्ञानिक प्रगति का वर्णन इस प्रकार है

1. दूसरी शताब्दी में यूनानी खगोल शास्त्री टॉलमी ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था कि पृथ्वी विश्व के केंद्र में स्थित है। परंतु 16वीं शताब्दी में पोलैंड के वैज्ञानिक कोपरनिकस (1473-1543 ई.) ने इस सिद्धांत को असत्य सिद्ध कर दिखाया। उसने बताया कि पृथ्वी एक ग्रह है और यह सूर्य के चारों ओर घूमती है। उसने यह निष्कर्ष गणना एवं प्रेक्षण के पश्चात् ही निकाला था। परंतु उसके द्वारा प्रतिपादित इस नवीन सिद्धांत का घोर विरोध हुआ, क्योंकि यह बाइबिल के प्रतिकूल था।

अत: पोप के आदेश पर उसे अपने नए विचारों का प्रसार बंद करना पड़ा। तत्पश्चात् इटली के वैज्ञानिक जाइडिनी ब्रूनो (1548-1600 ई.) ने कोपरनिकस के सिद्धांत का समर्थन किया और इसे फिर से प्रचलित करने का प्रयास किया। परंतु रोम के धर्माधिकारियों के आदेश से उसे जीवित जला दिया गया।

फिर भी तर्क पर आधारित सिद्धांत को काटा नहीं जा सका । जर्मन खगोलशास्त्री जॉन केपलर (1571-1630 ई.) ने भी प्रमाणों द्वारा इस सिद्धांत की पुष्टि की। उसने यह भी बताया कि पृथ्वी की भांति अन्य ग्रह भी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। उनका मार्ग वृत्तीय नहीं, अपितु दीर्घवृत्ताकार (अंडाकार) है। इटली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक गैलीलियो (1564-1642 ई.) ने स्वयं एक दूरबीन बनाई और उसकी सहायता से सूर्य, तारों तथा ग्रहों को देखा। उसने भी घोषणा की कि कोपरनिकम के विचार सत्य हैं। परंतु चर्च ने फिर से अपनी टांगे अड़ाई और उसे यह बात स्वीकार करने र विवश कर दिया कि उसने जो कहा है, वह असत्य है।

2. गैलीलियो ने अरस्तु की इस बात को भी प्रयोग द्वारा गलत सिद्ध किया कि गिरते हुए पिंडों की गति उनके भार पर निर्भर करती है। उसने बताया कि यह भार पर नहीं, अपितु दूरी पर निर्भर करती है।

3. उसी युग में इंग्लैंड के महान् वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ आइजक न्यूटन (1642-17271) ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिससे खगोल विज्ञान को एक नई दिशा मिली। उसने सिद्ध किया की पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति के कारण प्रत्येक वस्तु को ऊपर से नीचे खींचती है। न्यूटन के इस अन्वेषण का व्यापक प्रभाव पड़ा । लोग यह सोचने पर विवश हो गये कि विश्व कोई दैव योग (दैवी शक्ति) नहीं चला रहा । यह प्रकृति के सुव्यवस्थित नियमों के अनुसार चल रहा है।

4. पुनर्जागरण काल में खगोल विज्ञान के अतिरिक्त चिकित्सा, रसायन, भौतिक एवं गणितशास्त्र के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व उन्नति हुई। नीदरलैंड के वेसेलियस (1514-64 ई.) ने औषधि तथा शल्य प्रणाली का गहन अध्ययन करने के पश्चात् ‘मानव शरीर की संरचना (The Structure of Human Body) नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उसने मानव शरीर के विभिन्न अंगों का समुचित विवरण प्रस्तुत किया। इंग्लैंडवासी विलियम हार्वे (15781657 ई.) ने पशुओं पर विभिन्न प्रयोग करके रक्त प्रवाह के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इन सिद्धांतों से स्वास्थ्य तथा रोग की समस्याओं का अध्ययन नये ढंग से आरंभ हुआ।

प्रश्न 13.
पुनर्जागरण का लोगों के साधारण जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? इसका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
पुनर्जागरण के प्रभाव का वर्णन इस प्रकार है –
1. सामाजिक जीवन पर प्रभाव-पुनर्जागरण का यूरोप के समाज पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इससे पूर्व राजा, सामंत और पादरी के अतिरिक्त किसी को समाज में सम्मान प्राप्त नहीं था। पुनर्जागरण के साथ-साथ नागरिक जीवन का महत्त्व बढ़ने लगा। नगरों में रहने वाले मध्य वर्ग के लोगों को सम्मान पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। मध्यकाल तक सामाजिक जीवन अपेक्षाकृत सरल ही था। समाज में मुख्यत: सामंत और चर्च ही प्रधान समझे जाते थे।

साधारण लोग भाग्यवादी थे और अंधविश्वासों की बेड़ियों में जकडे हए थे। वे इहलोक से ज्यादा परलोक करते थे। यही कारण था कि पादरी राज्य के अधिकारियों से भी अधिक सशक्त थे। पुनर्जागरण के कारण समाज में व्यवसाय और उद्योगों की भी उन्नति हुई। गाँवों और खेती का महत्त्व घटने लगा। धन के उत्पादन से साधनों में वृद्धि हुई। व्यवसायी, बैंकर, उद्योगपति, बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक समाज
में सम्मान प्राप्त करने लगे। सच तो यह है कि पनर्जागरण के साथ सामाजिक संतुलन बिगड़ने लगा और समाज में तनाव बढ़ने लगा।

2. धार्मिक जीवन पर प्रभाव-पुनर्जागरण का धार्मिक स्वरूप, धर्म सुधार आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ। मध्य युग में धर्म समाज की धुरी था। पश्चिमी यूरोप की जनता कैथोलिक चर्च और पूर्वी यूरोप के लोग ग्रीक आर्थोडाक्स चर्च की छत्रछाया में जीवन व्यतीत करते थे। चर्च धर्म के स्वरूप में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं करना चाहता था।

चर्च की शक्ति बहुत बढ़ चुकी थी। उसकी शक्ति का प्रमाण इस बात से मिलता है कि जब ग्यारहवीं शताब्दी में पवित्र रोमन सम्राट हेनरी ने पोप ग्रेगोरी के हस्तक्षेप को मानने से इन्कार किया तो उन में उसे सर्दी के दिनों में नंगे पाँव आल्पस पर्वत पार करके पोप से क्षमा माँगने जाना पड़ा था। जब इंग्लैंड में वपाइक्लिफ और हंगरी के हंस ने चर्च में कछ सुधार करने की कोशिश की तो उन्हें अपनी जान गवानी पड़ी।

चर्च के लिए पोपों का सेवाभाव समाप्त हो चुका था। विभिन्न संतों के अनुयायी होते हुए भी वे स्वयं को कैथोलिक चर्च के अधीन मानते थे। मध्ययुग में प्राचीन धर्म में कोई परिवर्तन न किया गया। परिणामस्वरूप चर्च में अंधविश्वासों और भ्रष्टाचार का बोलबाला होने लगा। राजा और सामंत तो इसके हिस्सेदार बन जाते थे इसका सारा दबाव समाज पर पड़ता था। पुनर्जागरण के कारण जब व्यक्तिवाद की स्थापना हुई तो सबसे पहले धार्मिक स्थिति की आलोचना आरम्भ हुई।

दाँते, एरासमस, टॉमस मोर से वाल्तेयर के समय तक चर्च में परिवर्तन की मांग बढ़ गई। अपने भ्रष्ट स्वरूप और आर्थिक शोषण के कारण चर्च को भी परिवर्तन अनिवार्य लगने लगा। सोलहवीं शताब्दी में चर्च का विरोध करने वालों ने प्रोटेस्टेंट चर्चा की परंपरा आरंभ की। अतः चर्च का एकाधिकार समाप्त होने लगा। मानव किसी भी सिद्धांत को अपनाने से पूर्व उसे विवेक और कसौटी पर परखने लगा।

3. आर्थिक जीवन पर प्रभाव-मध्ययुग में आर्थिक जीवन अपेक्षाकृत सरल और व्यवस्थित था। आर्थिक जीवन मुख्यतः कृषि पर आधारित था। आर्थिक संबंधों की नियोजक संस्थाएँ कम थौं। श्रमिकों और कारीगरों को निर्देशित करने वाली मुख्य संस्था ‘गिल्ड’ थी। इनके संचालक अनुयायियों के हितों की अपेक्षा निजी हितों को अधिक महत्त्व देते थे। परिणामस्वरूप विभिन्न गिल्डों में प्रतिस्पर्धा होती थी। यहाँ तक कि एक ही गिल्ड के सदस्यों में भी परस्पर शत्रुता उत्पन्न होने लगी। ये संस्थाएँ बोझ बन गई और आर्थिक प्रगति में बाधा बनने लगीं। धीरे-धीरे भौगोलिक यात्राएँ आरंभ हुई।

लोगों के व्यवसाय बढ़े और आर्थिक जीवन जटिल होने लगा। 15वीं शताब्दी आते-आते उत्पादन के साधनों में परिवर्तन आने लगा और व्यापार का क्षेत्र बढ़ा । मंडियों की खोज आरंभ हुई। बाजारों की खपत के लिए उत्पादन में वृद्धि हई। लोग गाँव छोड़ नगरों में आ कर बसने लगे। धन संचय हुआ। बैंकों तथा स्टॉक कंपनियों का श्रीगणेश हुआ। पूंजीवाद का जन्म हुआ। अब सब कुछ सरल नहीं था। व्यवस्था के लिए कानून की आवश्यकता पड़ी।

अतः सरकारी हस्तक्षेप आरंभ हुआ। पूंजीपति और सरकार निकट आई। श्रमिक लघु उत्पादन को बेचने के लिए उपनिवेशों का महत्त्व बढ़ा। इससे उपनिवेशवाद को तथा साम्राज्यवाद को बढ़ावा मिला। सच तो यह है कि आर्थिक जीवन जटिल हो गया । धन की वृद्धि अवश्य हुई परंतु आर्थिक विषमता बढी जिससे असंतोष फैला।

4. राजनैतिक जीवन-पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप राजनीतिक जीवन भी अछूता नहीं रहा। पुनर्जागरण से पूर्व यूरोपीय समाज में सामंतों का बोलबाला था। परंतु अब मध्य वर्ग के पास धन था। उन्होंने राजाओं की धन से सहायता की। इससे राजाओं की शक्ति बढ़ी। शीघ्र ही राष्ट्रीय राजतंत्रों का विकास आरंभ हुआ। फ्रांस में फ्रांसिस प्रथम तथा हेनरी चतुर्थ के शासन काल में राष्ट्रीयता के आधार पर केंद्रीय सत्ता दुढ़ और सारे राष्ट्र की शक्ति को राजा में केंद्रित माना जाने लगा।

राष्ट्रीय राजतंत्र के विकास से पोप की सत्ता में कमी आई। राष्ट्रीय भाषाओं अर्थात् अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश के विकास से राष्ट्रों के आंतरिक संगठन मजबूत हुए और उनकी शक्ति बढ़ी। राजाओं की शक्ति के बढ़ने के साथ-साथ शासन में मध्य वर्ग में साझेदारी की वृद्धि हुई। सामंत अकेले पड़ गये। राजा और मध्य वर्ग पहले साथ-साथ चले और फिर मध्य वर्ग ने राजा की सत्ता को भी चुनौती दे दी। फ्रांसीसी क्रांति इस संघर्ष का उज्जवल उदाहरण है।

पुनर्जागरण ने केवल यूरोप की ही नहीं बल्कि विश्व के राजनीतिक जीवन में नवीन परिभाषाएँ जुटाई। राज्य को नवीन परिभाषाएँ दी गई। व्यक्ति तथा राज्य के सम्बन्ध को नये सिरे से प्रस्तुत किया गया। आधुनिक राज्य की नींव डाली गई। सच तो यह है कि जितने नये आधार खोजे गये वे उन मूल्यों से ओत-प्रोत थे जिनका पोषण पुनर्जागरण ने किया।

प्रश्न 14.
मार्टिन लूथर के जीवन तथा सफलताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
जर्मनी में प्रोटेस्टेंट लहर (धर्म-सुधार आंदोलन) का प्रवर्तक मार्टिन लूथर था। उसका जन्म 1483.ई० में जर्मनी के एक किसान परिवार में हुआ था। अत: उसमें किसानों जैसी सादगी भी थी और शक्ति भी। उसके पिता चाहते थे कि वह बड़ा होकर वकील बने और घर की प्रतिष्ठा को बढ़ाये। इसी उद्देश्य से विद्यालय भेजा गया। परंतु उसने कानून के साथ-साथ धर्मशास्त्र का अध्ययन भी आरंभ कर दिया। कानून और धर्म-शास्त्र में डिग्री प्राप्त करने के बाद वह ब्रिटेनवर्ग विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुआ। वहाँ उसे धर्मशास्त्र के गहन अध्ययन का अवसर मिला। 1505 ई० में वह अगस्टीनियम भिक्षुओं में शामिल हो गया।

धर्म के संबंध में उसके मन में अनेक प्रश्न एवं शंकाए थीं और वह इनके समाधान की जिज्ञासा रखता था। फिर भी उसकी आस्था अडिग थी। उसका इस बात में पूरा विश्वास था कि केवल आस्था और विश्वास से ही मुक्ति मिल सकती है। 1511 ई० में लूथर ने अपनी शंकाओं के समाधान के लिए रोम की यात्रा की । अभी तक इस पवित्र नगर के प्रति उसकी पूरी श्रद्धा थी। इसलिए रोम पहुँचते ही वह भावुक हो उठा और उसने ये शब्द कहे : “पवित्र रोम तुम्हें शहीदों के खून ने पवित्र बनाया है। मेरा शत-शत प्रणाम स्वीकार करो।” शीघ्र ही रोम में फैले भ्रष्टाचार को देखकर उसका मोहभंग हो गया।

इसी बीच एक ऐतिहासिक घटना घटी जिसने लूथर को पोप एवं कैथोलिक चर्च का विरोधी बना दिया। पोप को सेंट पीटर गिरजाघर के लिए धन की आवश्यकता थी। यह धन उसने क्षमा-पत्रों की बिक्री द्वारा एकत्रित करने का निर्णय किया। 1517 ई० में उसका एक प्रतिनिधि क्षमापत्रों की बिक्री करता हुआ ब्रिटेनवर्ग पहुँचा। वह लोगों से यह शब्द कह रहा था, “जैसे ही क्षमा-पत्रों के लिए दिए गए सिक्कों की खनक गूंजती है, उस आदमी की आत्मा, जिसके लिए धन दिया गया है सीधी स्वर्ग में प्रवेश कर जाती है।

यह भोली-भाली जनता के साथ एक बहुत बड़ा मजाक था। लोगों को धर्म के नाम पर मूर्ख बनाया जा रहा था और उनका शोषण किया जा रहा था। लथर ने जनता के साथ हो रहे इस मजाक और शोषण का विरोध किया। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि क्षमा-पत्रों की बिक्री धर्म के मूल्य सिद्धांत की अवहेलना है। इतना ही नहीं, उसने 95 सिद्धांतों (थीसिस) की एक सूची तैयार की जिन पर वह पोप का विरोधी था। यह सूची उसने एक गिरजाघर के द्वार पर चिपका दी। लोगों में तहलका मच गया। लूथर के इस कार्य ने तो उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। “जो प्रायश्चित कर लेता है उसे तो ईश्वर पहले ही क्षमा कर देता है।

उसे क्षमा-पत्र की क्या आवश्यकता है।” यह तर्क इतना ठोस था कि बहुत बड़ी संख्या में लोग लूथर के समर्थ बन गए । लूथर ने पहले अपने सिद्धांत लैटिन भाषा में लिखे थे। परंतु शीघ्र ही उनका अनुवाद जर्मन भाषा में किया गया । परिणामस्वरूप इन सिद्धांतों पर समस्त जर्मनी में तर्क-वितर्क होने लगा।

लूथर मन से तो पोप तथा कैथोलिक चर्च का विरोधी बन चुका था, परंतु उसने अभी तक चर्च के अधिकार को खुली चुनौती नहीं दी थी। पोप ने भी उसके विरोध को अधिक महत्त्व नहीं दिया। उसने इसे ‘भिक्षुओं के बीच तू-तू मैं-मैं’ (Squable among monks) कह कर टाल दिया । परंतु 1519 ई० में स्थिति स्पष्ट हो गई। लथर ने जॉन नामक एक धर्मशास्त्र से साफ-साफ कह दिया कि वह इस बात को नहीं मानता कि पोप या चर्च कोई गलती नहीं कर सकता। यह बात चर्च की निरंकुश सत्ता पर सीधा प्रहार थी। इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते थे।

इसी बीच लूथर ने तीन लघु पुस्तिकाएँ (पैंफलेट) प्रकाशित की। इन पुस्तिकाओं में उसने उन मूलभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जो आगे चलकर प्रोटेस्टेंटवाद के नाम से विख्यात हुए। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चर्च में पवित्रता नाम की कोई चीज नहीं है ‘ईश्वर के चर्च की कैद’ (On the Babilonian Captivity of the Church of God) नामक पुस्तिका में उसने पोप एवं उसकी व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया। अपनी दूसरी पुस्तिका ‘जर्मन सामंत वर्ग को संबोधन’ (An Address to the Nobility to German Nation) में उसने चर्च की अपार संपत्ति का वर्णन करते हुए जर्मन शासकों को विदेशी प्रभाव से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया। तीसरी पुस्तिका ‘मनुष्य की मुक्ति’ (On the Freedom of Clinstian Man) में उसने अपनी मुक्ति के सिद्धांतों का उल्लेख किया। इनके अनुसार मुक्ति के लिए मनुष्य का ईश्वर में अटूट विश्वास होना चाहिए।

लूथर की गतिविधियों से क्षुब्ध होकर पोप ने उसे धर्म से निष्कासित करने का आदेश दे दिया। परंतु लूथर ने पोप के आदेश को एक सार्वजनिक सभा में जला कर विद्रोह का झंडा फहरा दिया। 1521 ई० में उसे जर्मन राज्यों की सभा में सम्राट् के सामने प्रस्तुत होने के लिए कहा गया। उसके मित्रों ने उसे समझाया कि वह न जाये, क्योंकि उसे प्राणदंड भी दिया जा सकता है। परंतु उसने बड़े साहसपूर्ण ढंग से उत्तर दिया-“मैं अवश्य जाऊँगा, भले ही वहाँ मेरे इतने शत्रु क्यों न हों जितनी कि सामने के घर में खपरैलें।” आखिर वह गया। उसे कहा गया कि वह अपनी बातें वापस लें। परंतु उसने उत्तर दिया कि वह ऐसा तभी कर सकता है जब उसकी बातें तर्क द्वारा गलत सिद्ध कर दी जाएँ।

अंत में उसने ये शब्द कहे-“मुझे यही कहना था। मैं इसके विपरीत नहीं जा सकता। ईश्वर मेरी रक्षा करें।” (Here I stand; I can’t do otherwise : God help me.”) लूथर के इन शब्दों से समस्त जर्मनी में कौतूहल फैल गया। उसके मित्र घबरा गये। उन्होंने उसे एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जहाँ वह कई वर्षों तक अध्ययन करता रहा। इसी बीच उसने बाइबिल का अनुवाद जर्मन भाषा में किया। उसका यह अनुवाद इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि इसे आज भी जर्मन भाषा एवं साहित्य की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है।

मार्टिन लूथर के विचार एवं उनका प्रसार (The Ideas of Martin Luther and their spread) –

मार्टिन लूथर के मुख्य विचार निम्नलिखित थे –

  • उसने ईसा तथा बाइबिल की सत्ता को स्वीकार किया, परंतु चर्च की सार्वभौमिकता एवं निरंकुशता को नकार दिया।
  • उसने इस बात का प्रचार किया कि चर्च द्वारा निर्धारित कर्मों से मुक्ति नहीं मिल सकती।
  • इसके लिए ईश्वर में अटूट आस्था रखना आवश्यक है।
  • उसने पूर्व प्रचलित सात संस्कारों में से केवल तीन को ही मान्यता दी। ये थेनामकरण, प्रायश्चित तथा प्रसाद।
  • किसी भी व्यक्ति को न्याय से ऊपर न समझा जाए।
    चर्च के चमत्कार व्यर्थ हैं।
  • चर्च में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए पादरियों को विवाह करके सभ्य नागरिकों की तरह रहने की अनुमति दी जाए।
  • उसने घोषणा की कि उसका धर्म-ग्रंथ सबके लिए है और सभी उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

आगामी कुछ वर्षों में नवीन जागृति आई और वे अधिक-से-अधिक संख्या में लूथर द्वारा चलाए गए चर्च विरोधी आंदोलन में भाग लेने लगे। उन्होंने न तो पोप की कोई परवाह की और न ही सम्राट् की। उन्होंने चर्च की संपत्ति छीन ली तथा कैथोलिक पूजा-उपासना का परित्याग कर दिया। कैथोलिक मठ नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए। पोप की राजनीतिक, धार्मिक तथा आर्थिक सत्ता को अमान्य घोषित कर दिया गया। 1524 ई० तक समस्त जर्मनी में लूथरवादी शिक्षाएँ अनिवार्य लगने लगा।

सोलहवीं शताब्दी में चर्च का विरोध करने वालों ने प्रोटेस्टेंट चर्चा की परंपरा आरंभ की। अतः चर्च का एकाधिकार समाप्त होने लगा। मानव किसी भी सिद्धांत को अपनाने से पूर्व उसे विवेक और कसौटी पर परखने लगा। प्रचलित हो गईं। परंतु इसी समय कुछ ऐसी घटनाएं हुई जिनके परिणामस्वरूप लूथरवादी आंदोलन काफी सीमित हो गया। केवल उत्तरी जर्मन राज्यों में ही उसका प्रभाव बना रहा।

प्रोटेस्टेंट चर्च का जन्म (Establishment of Protestant Church) – 1526 ई० में स्पीयर में पवित्र रोमन साम्राज्य की स्थापना की सभा हुई जिसका उद्देश्य धर्म सुधार आंदोलन की समस्या को हल करना था। परंतु इस समय तक क्योंकि जर्मनी के शासकगण लूथरवाद व कैथोलिक दलों में विभक्त हो चुके थे, अतः यह सभा धर्म-सुधार आंदोलन का कोई स्थायी समाधान न कर सकी। इस सभा ने धार्मिक समस्या के समाधान या धर्म संबंधी निश्चय का उत्तरदायित्व स्थानीय शासकों पर छोड़ दिया। यह निश्चित किया गया कि प्रत्येक राजा धर्म के विषय में ऐसा मार्ग अपनायेगा कि वह अपने आचरण के लिए ईश्वर और सम्राट के पति उत्तरदायी होगा।

1529 ई० में स्पीयर में ही एक अन्य सभा हुई। परंतु इस सभा ने भी सुधार आंदोलन को मान्यता प्रदान न की तथा नये सुधार आंदोलन के विरुद्ध कई कठोर निर्देश पारित कर दिये। सभा के एक पक्षीय निर्णय का लूथरवादी शासकों तथा समर्थकों ने तीव्र विरोध किया । इसी विरोध या प्रतिवाद (प्रोटेस्ट) के कारण इस सुधार आंदोलन का नाम ‘प्रोटेस्टेंट’ पड़ा । औपचारिक रूप से विरोध 19 अप्रैल, 1529 ई० को हुआ। अत: ऐतिहासिक दृष्टि से ‘प्रोटेस्टेंट’ शब्द का उदय इसी तिथि से माना जाता है। 1530 ई० में प्रोटेस्टेट धर्म का सैद्धांतिक रूप निरूपित किया गया जिसमें मार्टिन लूथर के सिद्धांतों को मान्यता मिली। इस प्रकार जर्मनी में चर्च दो भागों में बँट गया-प्रॉटेस्टेट तथा कैथोलिक चर्च।

आंग्सबर्ग की संधि (Augs Burg Treaty) – जर्मन सम्राट् चार्ल्स पंचम लूथरवाद को दबाना चाहता था। परंतु अन्य समस्याओं में उलझा होने के कारण वह ऐसा न कर सका । इसके लिए उसे 1530 ई. के बाद ही समय मिल सका। उसने आग्सबर्ग में एक सभा बुलाव और वहाँ प्रोटेस्टेंट लोगों को आदेश दिया कि वे अपने सिद्धांत सभा के सामने प्रस्तुत करें। अत: प्रोटेस्टेंटों ने एक दस्तावेज के रूप में अपने सिद्धांत सभा में रखे। इस दस्तावेज को ‘आग्सबर्ग की स्वीकृति’ कहते है परंतु चार्ल्स पंचम ने ‘आग्सबर्ग की स्वीकृति’ को अमान्य घोषित कर दिया।

फिर भी लूथरवादियों के प्रभाव तथा तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए उसने 1532 ई० में विराम संधि की जो 1546 ई० तक चली। तत्पश्चात् वह पुन: प्रोटेस्टेंटो का समूल नाश करने पर उतर आया। परिणामस्वरूप जर्मनी में 1546 ई० से 1555 ई० तक गृह युद्ध चलता रहा। जर्मनी के लिए इस गृह युद्ध के भयंकर परिणाम निकले। अत: विवश होकर सम्राट् फडीनेंड ने जर्मनी के प्रोस्टेंटों के साथ 15555 में आग्सबर्ग की संधि कर ली।

इस धि के अनुसार –

  • प्रत्येक शासक को (जनता को नहीं) अपना और प्रजा का धर्म चुनने की स्वतंत्रता दे दी गई।
  • 1552 ई० से पहले प्रोटेस्टेंट लोगों ने चर्च की जो संपत्ति अपने अधिकार में ले ली थी; वह उनकी मान ली गई।
    लूथर के अतिरिक्त अन्य किसी को मान्यता नहीं दी गई।
  • यह कहा गया कि कैथोलिक क्षेत्रों में बसने वाले लूथरवादियों को धर्म परिवर्तन के लिए विवश नहीं किया जाएगा।
  • धार्मिक आरक्षण के सिद्धांत के अनुसार यदि कोई कैथोलिक धर्म परिवर्तन करता है तो उसे अपने पद से संबंधित सभी अधिकारों का परित्याग करना होगा।

आग्सबर्ग संधि में धार्मिक संघर्ष की समस्या कुछ सीमा तक सुलझ तो गई, परंतु बहुत त्रुटिपूर्ण ढंग से । संधि में व्यक्ति को नहीं शासक को धार्मिक स्वतंत्रता दी गई थी जो बहुत दिनों तक मान्य नहीं हो सकती थी। इस संधि द्वारा केवल लूथरवाद को ही वैध मान्यता दी गई। अन्य प्रोटेस्टेंट संप्रादायों (जैसे विग्लीवाद, काल्विनवाद) को कोई मान्यता नहीं मिली। यह संधि धार्मिक कलह का स्थायी निवारण न कर सकी और इस समस्या का समाधान लगभग एक सौ वर्षों के पश्चात् वैस्टफेलिया की संधि द्वारा ही किया जा सका।

प्रश्न 15.
काल्विनवाद की संक्षिप्त जानकारी दीजिए?
उत्तर:
यह सत्य है कि धर्म सुधार आंदोलन का प्रवर्तक लूथर को माना जाता है। परंतु धर्म-सुधार के क्षेत्र में काल्विन को लूथर से भी अधिक सफलता मिली । वह पहला सुधारक था जिसने एक ऐसे पवित्र संप्रदाय की स्थापना करने का प्रयास किया जिसका प्रभाव किसी एक देश में ही सीमित न रह कर पूरे विश्व में हो।

काल्विन का जन्म 1509 में फ्रांस में हुआ था। उसके माता-पिता उसे पादरी बनाना चाहते थे। उसने चर्च की छात्रवृत्ति पर पेरिस में धर्म एवं साहित्य का गहन अध्ययन किया। परंतु बाद में स्थिति को देखते हुए उसके पिता ने उसे वकील बनने का परामर्श दिया। परिणामस्वरूप वह कानून के अध्ययन में जूट गया। एक दिन उसमे एक नई प्रवृत्ति जागृत हुई। उसे अनुभव हुआ कि वह कैथोलिक चर्च में सुधार करने के लिए नहीं, अपितु उससे हटकर एक नवीन एवं पवित्र संप्रदाय की स्थापना के लिए पृथ्वी पर आया है।

उसके लिए उसे कैथोलिक चर्च में सुधार करने के लिए उसे कैथोलिक चर्च का सफल विरोध करना था। उसका दृढ़ विश्वास था कि वह अपने अकाट्य तों से ही अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है। उसने कैथोलिक चर्च से अपना संबंध तोड़ लिया और में अपने विचारों का प्रचार करने लगा। फलस्वरूप उसके प्रशंसकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखते हुए फ्रांस के शासक फ्रांसिस ने उस पर प्रतिबंध लगाना चाहा। अतः वह फ्राँस छोड़ कर स्विटजरलैंड चला गया।

स्विट्जरलैंड में काल्विन ज्विग्ली के संपर्क में आया । वहाँ उसने ईसाई धर्म के आधारभूत सिद्धांत (Institute of Christian Religion) नामक पुस्तक लिखी जिसमें उसने प्रोटेस्टेंट चर्च के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। यह पुस्तक सम्राट् फ्राँसिस को समर्पित थी। काल्चिन चाहता था कि वह फ्राँस वापस जाकर सम्राट् को अपनी पुस्तक भेंट करे और उसे अपने तर्कों से प्रभावित करे। यदि वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाता, तो पूरा फ्रांस उसका अनुयायी बन जाता। परंतु ऐसा न हो सका। संभवतः फ्राँसिस ने उसको पुस्तक को पढ़ा ही नहीं।

फिर भी एक बात निर्विवाद कही जा सकती है कि यह पुस्तक उस समय तक लिखी गई सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक थी। उसमें काल्विन, विगली तथा लूथर के विचार अवश्य लिये गए थे। परंतु उनकी व्याख्या उसमें सर्वथा अपने ढंग से की थी। पुस्तक में कैथोलिक तथा सुधारवादी चचों की तुलना बड़ी ही प्रभावशाली ढंग से की गई थी। इस पुस्तक ने लोगों पर जादू सा प्रभाव किया और २७ ही नर्च के विरोधी संगठित होने लगे।

1536 ई० में काल्विन जेनेवा गया। वहाँ राजनीतिक तथा धार्मिक आंदोलन पहले से ही चल रहा था। उसने अपनी अद्भुत संगठन शक्ति के बल पर जेनेवावासियों को संगठित किया और उन्हें राजनीतिक तथा धार्मिक स्वतंत्रता दिलाई। शीघ्र ही जेनवा एक धर्म-प्रधान नगर राज्य बन गया जिसका सर्वोच्च नेता काल्विन बना। उसने नगर में एक विशुद्ध नैतिकवादी व्यवस्था का सूत्रपात किया। यदि कोई व्यक्ति अनैतिकता का प्रदर्शन करता, तो उसे कठोर दंड दिया जाता था।

काल्विन स्वयं भी सादा जीवन व्यतीत करता था और नैतिक नियमों का कठोरता से पालन करता था। शीघ्र ही उसकी ख्याति समस्त यूरोप में फैलने लगी और दूर-दूर से आकर लोग उसके विष्य बनने लगे। उसने बाईबिल का अनुवाद फ्रांसीसी भाषा में करवाया, कई स्कूल खुलवायें तथा जेनेवा विश्वविद्यालय को शिक्षा का महान् केंद्र बनाया। परिणामस्वरूप लोगों में उसकी धाक् उसी प्रकार बैठ गई जैसी कि पोप की थी। अतः अब उसे ‘प्रोटेस्टेट पोप’ कहा जाने लगा।

काल्विन को इतनी अधिक सफलता उसके तर्कपूर्ण सिद्धांतों के कारण मिली जो इस प्रकार थे –

मनुष्य की मुक्ति न तो कर्म से हो सकती है और न ही आस्था से। मुक्ति केवल ईश्वर की असीम कृपा से ही मिल सकती है।
मुक्ति का एकमात्र साधन बाइबिल है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति और ईश्वर के अतिरिक्त कोई माध्यम नहीं।
मनुष्य को जीवन में पवित्र आचरण का पालन करना चाहिए।

काल्विन द्वारा प्रतिपादित विचारधारा ‘काल्विनवाद’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसे मध्यम वर्ग में विशेष लोकप्रियता मिली। धीरे-धीरे फ्रांस में भी इस विचारधारा का प्रभाव बढ़ने लगा। वहाँ काल्विन के अनुयायी ‘यूनानो’ कहलाये। जर्मनी में जहाँ केवल लूथरवाद को ही मान्यता मिली थी, अब ‘काल्विनवाद’ को भी मान्यता दे दी गई। इस प्रकार यह विचारधारा धीरे-धीरे यूरोप के सभी देशों में फैल गई।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कोलम्बस अमेरिका पहुँचा ………………….
(क) 1492
(ख) 1497
(ग) 1495
(घ) 1473
उत्तर:
(क) 1492

प्रश्न 2.
1861-65 ई० तक दास प्रथा को लेकर गृहयुद्ध किस देश में हुआ?
(क) कनाडा
(ख) आस्ट्रेलिया
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका
(घ) इंगलैंड
उत्तर:
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका

प्रश्न 3.
ऑन दि ओरिजिन ऑफ स्पीशीज पुस्तक किसने लिखी?
(क) चार्ल्स डार्विन
(ख) ग्रेगरी मेंडल
(ग) हरगोविन्द खुराना
(घ) न्यूटन
उत्तर:
(क) चार्ल्स डार्विन

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सी सामंतों की एक श्रेणी नहीं थी?
(क) बैरन
(ख) नाइट
(ग) डयूक
(घ) सर्प
उत्तर:
(क) बैरन

प्रश्न 5.
चर्च को प्रतिवर्ष कृषकों से उसकी उपज का कान-सा भाग लेने का अधिकार था?
(क) उपज का एक तिहाई भाग
(ख) उपज का दसवाँ भाग
(ग) उपज का एक चौथाई भाग
(घ) उपज का छठा भाग
उत्तर:
(ख) उपज का दसवाँ भाग

प्रश्न 6.
अभिजात्य सत्ताधारी वर्ग में प्रवेश के लिये प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन कहाँ होता था?
(क) जापान
(ख) वर्मा
(ग) भारत
(घ) चीन
उत्तर:
(घ) चीन

प्रश्न 7.
सोने और चाँदी के देश के विषय में किसने सुना था?
(क) कैनालल
(ख) वास्कोडिगामा
(ग) पिजारो
(घ) कोलम्बस
उत्तर:
(ग) पिजारो

प्रश्न 8.
हेलनीज किस देश के निवासियों को कहा जाता था?
(क) रोम
(ख) यूनान
(ग) मिस्र
(घ) चीन
उत्तर:
(ख) यूनान

प्रश्न 9.
ओलंपिक खेल किस प्राचीन सभ्यता की देन है?
(क) रोम
(ख) मिश्र
(ग) यूनान
(घ) चीन
उत्तर:
(ग) यूनान

प्रश्न 10.
यूरोप में सर्वप्रथम विश्वविद्यालय कहाँ स्थापित हुए?
(क) इटली
(ख) जापान
(ग) रूस
(घ) मिस्र
उत्तर:
(क) इटली

प्रश्न 11.
एक चर्चित कलाकार ………………..
(क) कोपरनिकस
(ख) लियानार्डो द विंची
(ग) लूथर
(घ) मार्टिन
उत्तर:
(ख) लियानार्डो द विंची

प्रश्न 12.
लास्ट सपर चित्र का निर्माण वर्ष …………………
(क) 1495
(ख) 1946
(ग) 1947
(ग) 1467
उत्तर:
(क) 1495

प्रश्न 13.
ग्रेगोरिन कलैंडर का आरंभ …………………..
(क) 1582
(ख) 1587
(ग) 1560
(घ) 1547
उत्तर:
(क) 1582

प्रश्न 14.
नाईन्टी फाईव थिसेस की रचना …………………
(क) 1517
(ख) 1518
(ग) 1516
(घ) 1520
उत्तर:
(क) 1517

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 1 Animals in Prison

Bihar Board Solutions for Class 11 English aids you to prepare all the topics in it effectively. You need not worry about the accuracy of the Bihar Board Solutions for Class 11 Prose Chapter 1 Animals in Prison Questions and Answers as they are given adhering to the latest exam pattern and syllabus guidelines. Enhance your subject knowledge by preparing from the Chapter wise Bihar Board Class 11th English Book Solutions and clarify your doubts on the corresponding topics.

Rainbow English Book Class 11 Solutions Chapter 1 Animals in Prison

Kick start your preparation by using our online resource Bihar Board Class 11 English Solutions. You can even download the Bihar Board Board Solutions for Class 11 Chapter 1 Animals Questions and Answers in Prison free of cost through the direct links available on our page. Clear your queries and understand the concept behind them in a simple manner. Simply tap on the concept you wish to prepare in the chapter and go through it.

Bihar Board Class 11 English Animals in Prison Text Book Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions :

Animals In Prison Question Answer Bihar Board Class 11 Question 1.
Make a list of the birds whose songs are sweet. Do you hear them often ? When and where do you hear them ?
Answer:
Bulbul and Koel are some of the singing birds. I don’t hear them often. But sometimes I hear one of the birds singing when I go out for a walk in the afternoon.

Animal In Prison Question Answer Bihar Board Class 11 Question 2.
What is the relation between birds and trees ? Can you imagine birds without trees ?
Answer:
There is an intimate relation between birds and trees. Most birds make their nests in trees to lay eggs. They eat fruit of trees and find shelter from heat and cold in their leaves. They protect themselves from their predators by flying from tree to tree. Indeed I can hardly think of birds without trees.

Animals In Prison Class 11 Question Answer Bihar Board  Question 3.
Do you love animals How do you show your love to them ?
Answer:
Yes, I love animals. I never harm them. I feed animals and try to protect them whenever I can. I believe God has made them, and so they have a purpose to serve.

B. 1.1 Read the following sentences and write T for true and F for false statement :

  1. Nehru disliked the little cell.
  2. Nehru lived with other prisoners in his cell.
  3. Nehru was allowed to go out and walk up and down in front of the gate.
  4. Nehru was imprisoned in the European Lock-up.
  5. Nehru loved the sight of the Himalayas.
  6. Spring in Dehra Dun is longer than that in the plains.
  7. The change from bud to leaf is sudden.

Answer:

  1. F
  2. F
  3. F
  4. F
  5. T
  6. T
  7. T

B. 1. 2. Answer the following questions briefly :

Animals In Prison Ka Question Answer Bihar Board Class 11 Question 1.
How long did Nehru live in his little cell in Dehra Dun Jail ?
Answer:
Nehru lived for fourteen and a half months in his little cell in Dehra Dun jail.

Animals In Prison Class 11 In Hindi Bihar Board  Question 2.
Whom did Nehru treat as his old friends ? Can you make friends with them ?
Answer:
Nehru treated tufts of grass and bits of stones in the little yard outside his cell as his old friends.

I cannot make friends with them.

Animals In Prison In Hindi Bihar Board Class 11 Question 3.
Who were the other occupants of the little cell ? Did Nehru like them ?
Answer:
Lizards, wasps and hornets were the other occupants of the cell. Nehru liked them.

Animals In Prison Pdf Bihar Board Class 11  Question 4.
‘………. but in Dehra Dun I had one privilege. ‘What is the privilege Nehru is referring to ? Was it Nehru’s special privilege ?
Answer:
Nehru had the privilege to walk every morning and evening up and down in front of the gate (but not outside the gate).

It was not Nehru’s special privilege. All A and B class prisoners had this privilege.

Animal In Prison Summary Bihar Board Class 11 Question 5.
What was European Lock-up meant for ? How was it different from the other jail ?
Answer:
The European Lock-up was meant for European convicts. It was different from the jail because it had no enclosing wall. A person inside his cell could have a fine view of the mountains and life outside.

Animals In Prison Class 11 Bihar Board Question 6.
‘Only a prisoner who has been confined for long behind high walls can appreciate the extraordinary psychological value of these outside walks and open views.’ What does Nehru mean by this ? Explain.
Answer:
In prison, Nehru greatly admired the mountains and enjoyed the traffic on the public highways outside the prison gate. But the people outside would not find much to admire them. We appreciate the value of a thing when we aie deprived of it. We value freedom when we are confined. Only a thirsty man in a desert knows the value of a drop of water.

Animals In Prison By Jawaharlal Nehru Bihar Board Class 11 Question 7.
How did the sight of the towering Himalaya move his heart ? What lesson did he derive from the mountains ?
Ans.
Nehru found a great comfort being in the proximity of the mountains. There was secret intimacy between Nehru and the mountains.

Nehru learned to be calm when he was depressed, sad or lonely.

Animal In Prison In Hindi Bihar Board Class 11 Question 8.
Which sight does Nehru call ‘gay’ and ‘cheering’ ? How does he describe it ?
Answer:
Nehru calls the budding of bare peepal trees ‘gay’ and ‘cheerful’. He describes it a wonderful sight to see green buds all over the naked tree. Then suddenly the buds turned into leaves. It is a mystery. It appears that some secret operations’ had been going on behind the scenes.

He says,”……….. very rapidly the leaves would come out in their millions and glisten in the sunlight about the breeze.”

B. 2.1. Complete the following sentences on the basis of the lesson :

  1. The monsoon rains were always welcome because
  2. One longed for decent habitation, because of
  3. The prisoners became more observant of nature’s way because
  4. Nehru wanted to exterminates wasps because

Answer:

  1. The monsoon rains were always welcome because they ended the summer heat.
  2. One longed for decent habitation, because of a hail
  3. The prisoners became more observant of nature’s way because the watched the various animals and insects that came their way.
  4. Nehru wanted to exterminates wasps because they had stung him.

B. 2. 2. Answer the following questions briefly :

Animal In Prison Pdf Bihar Board Class 11 Question 1.
What is the colour of fresh mango leaves ? When do they become green ?
Answer:
The colour of the fresh mango leaves are of reddish-brown & chocolate (coffee) colour. But they soon change their colour and become green.

Question 2.
What made Nehru cooped up ?
Answer:
Within the first five or six weeks of the monsoon-break, there had been heavy rain, about fifty to sixty inches and so it was not pleasant for Nehru to sit in a small place.

Question 3.
What made noise like an artillery bombardment ?
Answer:
In Autumn or in winter some times it rained with thunder. Occassionally there would be hailstorm with hailstones bigger than marble coming down on the corrugated iron roofs and making a tremendous noise, something like an artillery bombardment.

Question 4.
Why does Nehru remember 24th of December 1932 ? How does it throw light on Nehru’s Love for Nature ?
Answer:
There was a thunder storm and rain all day, on 24th December, 1932 and it was bitterly cold : Nehru realised it as one of the most miserable days from the bodily point of view that he had spent in the prison. It was shivering cold that day. But in the evening there came a sudden change and his misery ended as the weather cleared up shortly. The next day—Christmas day was lovely and clear with a beautiful view of snow-covered mountains. As such Nehru remembers that day very much.

Question 5.
“I realized that while I complained of loneliness, that yard, which seemed empty and deserted, was teeming with life”. Which life is being referred to here ?
Answer:
During his confinement Nehru was prevented from indulging in normal activities, he felt loneliness. But soon he observed that he is not alone there. All sorts of insects were living in his cell and the open outer spaces. Those small creatures (insects) had removed the monotony. There presence had brought life in the cell. Nehru had referred the presence of creeping, cranling or flying insects there. It had brought life in the cell and the yard.

Question 6.
How was the problem of feeding the lost baby squirrels solved ? What was ingenious about it ?
Answer:
Nehru solved the problem of feeding the lost baby squirrels, with the help of a fountainpen filler. A little cotton wool had attached to it and made it an efficient feeding bottle.

Question 7.
What behaviour of the parrots does Nehru describe here ? Does it have any resemblance to human behaviour ?
Answer:
While Nehru was in Naini Jail, thousands of parrots were there and many of them lived in the cracked portion of the barrack walls. Sometimes there was fierce quarrels between the two male parrots over a lady parrot, to show their superiority and than sit calmly to see the reaction of the female parrot, as to whom she agreed to marry with.

Such type of tendency is also found in human behaviour. They also have the same Psychological activities and reaction to this effect.

B. 3.1. Complete the following sentences on the basis of the lesson :

  1. Nehru could not see most of the birds, he could only hear them because …………………
  2. In Alipore Jail Nehru woke in the middle of night because …………………
  3. Long term convicts often keep animal pets because …………………
  4. The bitch used to come to Nehru for food because …………………
  5. The puppy survived because …………………
  6. Nehru could not look after his pet dogs properly because …………………

Answer:

  1. Nehru could not see most of the birds, he could only hear the because of the fact that there were no trees in his little yard in the prison.
  2. In Alipore Jail Nehru woke in the middle of night because he f T something crawling over his feet.
  3. Long term convicts often keep animal pets because they often seek some emotional satisfaction by keeping them.
  4. The bitch used to come to Nehru for food because he began to feed her regularly.
  5. The puppy survived because Nehru nursed her with care, even to get up a dozen times during the night to look after her.
  6. Nehru could not look after his pet dogs properly because other matters claimed his attention.

B. 3.2. Answer the following questions briefly :

Question 1.
‘Dehra Dun had a variety of birds’. Make a list of the birds that make this variety.
Answer:
Dehra Dun had a variety of birds and there was a regular jumble of singing and lively chattering and twittering. They include the Koel’s plaintive call.

Various kinds of birds in Dehra Dun Jail whom Nehru happened to see or hear were

  1. Koels
  2. Brain fever birds
  3. Eagles
  4. Kites and
  5. Wild ducks.

Question 2.
Why was “Bird-Fever” named so ?
Answer:
The brain fever bird was so named because it wonderfully went on repeatin the same notes continuously, in day time and at night, in sunshine days and in pouring rain.

Question 3.
How did the little monkey rescued ?
Answer:
The parent (presumably) of the little monkey saw from the top of the high wall that a bit of string was tied round the neck of him (the baby monkey). A huge monkey suddenly jumped down into the crowd which surrounded the baby monkey. The crowd fled terrified and thus the little monkey was rescued.

Question 4.
We often had animal visitors that were not welcome. Name the animals Nehru is referring to.
Answer:
Neliru is his reference is talking of those animals who were frequently found in his cells. After thunder storms scorpions were often visible there. Snakes were also found. Once a centiped had also visited his cell and was found on his bed in the middle of night. These were the animals frequently visling his cells, who were disliked by Nehru.

Question 5.
“As as matter of fact I welcomed the diversion.” Which diversion is Nehru talking about ?
Answer:
Actually prison life is dull enough, and everything that breaks through the montony is appreciated. Sometimes the most unimportant and undesireous creatures remove monotony and brings happy change. Nehru was leading a dull and isolated life in the prison. In support of his views he described his meeting with snakes, scorpions and centipades. He was neither horrified nor disliked them, rather he found them his best companion during his rough and monotonous prison life.

Question 6.
What made Nehru vault clear out of the bed ?
Answer:
In Alipore Jail in Calcutta one night Nehru felt something moving slowly over his feet. With the help of a torch he saw a centipede on his bed. He jumped out of his bed immediately with wonderful swiftness and almost touched the cell wall.

Question 7.
How did Nehru get tied to some dogs ?
Answer:
At Dehra Dun Jail dogs were not allowed. But Nehru got tied up with some dogs incidentally there. A jail official had brought a bitch. He left her at Dehra Dun Jail, when he was transferred to some other jail. She became homeless living in a covered drain and picked up bit of uneaten foods from the warders. She used to come to Nehru also for the needful. He (Nehru) began to feed her regularly.

Question 8.
What did Nehru do when the puppy fell ill ? Do you have a similar experience of your own ?
Answer:
One of the puppies, given birth by a bitch, in a covered drain of Dehra-Dun Jail fell ill with a violent distemper (a disease of dogs). She gave a shock of Nehru. He nursed her with great care and sometimes he would get up a dozen times in the night to look after her. She became all right and Nehru was happy to see his efforts become fruitful. It was the greatest pleasure for him.

I remember, similar incident had happened in my life few years back. There was a street dog in my neighbourhood. He was regularly visiting my house. I used to wait his coming at my residence and provide him with some bread or other cooked meal. One day he did not turn up. The day following I inquired about him and came to know of his illness. He was lying in an open space under a tree. I arranged to bring him at my residence and nursed him. He became cured within a couple of days. It was the matter of great pleasure for me.

C. 1. Long Answer Questions :

Question 1.
Pick out instances that show Nehru’s love for small animals.
Answer:
While in prison Nehru derives pleasure from watching different animals and gives respect even to the tiniest animals. His love for small animals comes true with his expression and action. He spent his lonely time in association with wasps, hornets, and Lizards. According to Nehru, Creeping, crawling and flying insects living there were removing his monotony of life. A pair of ‘Mainas’ had got great intimacy with him.

He developed intimacy with a bitch and her puppies. At Lucknow Jail, squirrels were his best friends. Alrnora jail witnessed his intimacy with a pair of ‘mainas’. In Naini jil there were thousands of parrots. In Bareilly Jail Nehru met with a large number of monkeys. In Alipore jail he saw a centipede on his bed at night. It was crawling his feet which compelled him to come out of the bed immediately. Some uncalled for visitors like snakes and scorpions were also frequently found in his cell or outside the yard.

The above noted instances shows Nehru’s intimacy and love for small animals.

Question 2.
How did the parent monkey rescue its baby ? Why does Nehru call its courage “reckless” ?
Answer:
Nehru narrates his experience relating to the efforts of parent monkey to the rescue of its baby. There was a large colony of monkeys in Bareilly jail. Nehru had referred to a particular incident. A baby monkey managed to come down into the barrack of the jail compound but he could not climb up the wall again.

The warder and some convict overseers with some other prisoners caught hold of him and tied a bit sting round his neck. The parent, as presumed, of the monkey baby saw it with anger from the top of the wall. Thenafter a huge monkey jumped down into the crowd surrounded the monkey baby. His reckless and abrupt act terrified the crowd and the little monkey was rescued.

Nehru was highly impressed to see this extra ordinary brave act of the monkey.

Question 3.
Does the parent monkey’s behaviour in saving its baby tell anything about the human nature ?
Answer:
The incident which took place in Bareilly jail shows that we are not kind to the animals. It very well throw light on human nature. At Bareilly jail, there was a large colony of monkeys. Monkeys used to jump and climb hither and thither, creating an interesting scene. In one occassion a baby monkey came down into the barrack enclosure but he could not mount up the high wall. The warder and other prisoners caught hold of him and tied a bit of sting round the neck. The parents monkeys watched it with angers. Suddenly a huge monkey jumped down fearlessly and get the baby monkey freed as the terriffied crowd of men fled. Thus the baby monkey was rescued.

Therefore it shows the inhuman behaviour and nature of human beings and their merciless deeds. Had the parent monkey did not freed him the warder and other prisoners might have penalised him.

Question 4.
What are the advantages and the disadvantages of the monsoon ? How did it effect Nehru’s life in jail ?
Answer:
Monsoon rains are most pleasant. When after the scorching heat of the summer season we get the comfortable showers we become happy. Trees, plants, bushes and creepers, they all become green and gives a nice look. But there is another aspect. The torrential rain creates a number of discomforts and trouble. Heavy rainfall creates inconvenience and disrupt the days work.

Nehru had an immense love for nature. He used to feel pleasure in watching the nature. Monsoon was highly soothing and pleasant for him. The rain drops of the monsoon was the gift of pleasant atmosphere for Nehru. The earth covered with green grassy sheets. But the heavy rainfall was disliked by Nehru. Torrential rain compelled him to confine in the jail’s cell. It had caused much discomfort to him as the rain water was dripping from the ceiling.

Question 5.
Why does Nehru say that worship and kindness do not always go together ? How does he show it ?
Answer:
Nehru says that Indians believe in non-violence and look upon all life as sacred. But they are indifferent to them. He shows this by the example of cows. Many Hindus worship cows. But they are indifferent and unkind to them. We can see hundreds of stray cows. But no one cares to look after them. Indeed worship and kindness do not always go together.

Question 6.
What does Nehru say about people and their patron animals ?
Answer:
Nehru says that different countries have adopted different animals as their patrons. Those animals are the symbols of their ambition or character. Eagle is the patron animal of the United States and that of Germany. Bull dog is the symbol of and Germany have adopted the eagle as the symbol of their countries. The lions and bull dog are of England, the fighting cock is of France.

The bear is of old Russia. These patron animals mould national character. Most of them are aggressive, fighting animals, beasts of prey. It is not surprising that the people who grow up with these examples before them should mould themselves consciously after them and strike up aggressive attitudes, and roar, and prey on others. Nor it is surprising that the Hindu should be mild and non-violent for his patron animal, the cow.

Question 7.
‘We would not see most of these birds; we could only hear them as a rule, as there were no trees in our little yards.’ What light does it throw on the relation between the birds and plants ?
Answer:
Nehru wants to point out the close relationship between birds and trees. He could hear the chirp of birds in the jail of Dehra Dun but he could not see them as there were no trees in the yard. He used to watch the flying eagles and kites gliding gracefully high up in the air. Sometimes they were swooping down and then carried up themselves by a current of air.

A hord of wild duck used to frequently fly over his head. There was variety of birds in Dehra Dun. Nehru could only hear their singing, chattering and twittering. He could hear the koel’s plantive call. During the monsoon the Brain-fever bird used to visit the jail. But he could not see most of the birds because there was no tree. They build up their nests on the tree. They rest in the night in their nests so they could be seen at least in the morning and in the evening. The birds are also attracted towards the fruits which the trees bear.

They make their abode to the trees in rains and storms. They lay eggs in the nests which they build on the trees. So there is a close relationship between birds and trees. This is what Nehru wants to say through his statement.

Question 8.
All animals, howsoever small they might be, deserve respect. Pick out instances from the lesson in favour of this statement
Answer:
The following instances in different jails tell us that Nehru’s point of view was in favour of the animals, however small they may be.

In the jail of Dehra Dun there were wasps, hornets and lizards in his cell. In the campus he could see mainas, koels and brain fever birds. He considered them the source of entertainment and to break the monotony in the jail life. He took special care of puppies and their mother bitch when she was left wamderer by a jail official. He looked after her puppies day and night when they fell ill. At Lucknow jail there were a number of squirrels which were 4 friendly to him. In Naini Jail there were thousands of parrots. In Bareilly jail he enjoyed the funny actions of monkeys. At Alipore jail he met with scoipions and snakes and did not have disliking for these uncalled visitors. He had similar sympathy and affection for all these animals.

Question 9.
A good autobiography is honest In what ways do you think Pandit Nehru is honest in writing about his life in jail ? Use specific references from the lesson as examples.
Answer:
Nehru has given a true account of his life in jail. He has neither exaggerated nor has tried to win undue sympathy of his readers. He has honestly expressed his feelings and emotions, his joys and his actions.

He has described how lonely and depressed he was when there were no interviews. He would sit quitely and look at the distant mountains. He describes how he watched plants, trees and animals. He has even faithfully described a few events like the rescue of the baby monkey by its parent in the face of danger to his life.

Nehru has very honestly described his feelings about animals. He tells us how he got angry when a wasp stung him, and he tried to destroy their nest. He also honestly tells us about his feeling of repulsion about centipedes. One night he jumped out of his bed because he found a centipede there. He was panicked. He does not’try to hide the fact that he was not very brave. He has given a true account of his strength and weakness.

Question 10.
A good autobiography is also very self aware. How self aware do you think the author has been in the personal statements contained in the work ? Use examples from the work to support your opinion.
Answer:
As autobiography is the description of true incidents drawn from one’s life in his own language. It is also self-awarded. The person expresses about all that he thought and felt in his life. It is important that what he writes should be based on self-awareness. Nehru has also maintained all these in his autobiography. He has described the true facts of his life in his autobiography. He is very much particular in describing the real facts and circumstances of his life.

In this piece he has described his activities and reactions while he was in different jails. He broke his monotony enjoying the natural sights from the jail campus especially in Dehra Dun Jail. Different birds and small animals were his friends and companions to break up his monotony. It is also a point to be noted how he expressed his pity and sympathy for them. How he was judicious to them. He developed intimacy and love for mainas, parrots, pigeons, squirrels, puppies etc.

He was even judicious for wasps, hornets, lizards and other creeping, crawling and flying insects. He had also love for nature. He was impressed with the beauty of the spring and explained, “It was a gay and beautiful sight. How wonderful is the sudden change from bud to leaf.” Further he adds’, “The monsoon rains were always welcome.” His compassion for small creatures reflects from these line, “One of the puppies fell ill with a violent distemper and gave me a great deal of trouble. I nursed her with care. She survived her normal.” Thus Nehru’s autobiography is the best example of his self awareness.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs.

Question a.
The company of nature is most soothing.
Answer:
Nature is our mother. As a child finds comfort in the lap of his mother, so does man find peace in natural surroundings. Green trees, flowing rivers, flowers, floating clouds, towering mountain peaks, multi-coloured birds, and animals and insects all are wonderful, objects of nature. Whenever man is sick of noise and pollution, haste and tension, he goes for a holiday on a hill station or a coastal place on the sea. There he forgets his worries and finds comfort and peace. Our rishis and saints liked to live in the lap of nature because they felt close to God there. Great poets and philosophers loved nature and expressed the joy they felt there.

Question b.
Life would be dull if there was no variety of life on the earth.
Answer:
They say that variety is the spice of life. If there is no variety, there is monotony. A person gets sick of seeing the same thing, however beautiful, all the time. Nehru was a great admirer of mountains. But he confesses that he got wearied of it too. Monsoon is welcome after a long spell of summer. But we soon get tired of it also. One may love sweets, but one cannot eat too much of it. One craves for salt. We find abundance of variety in nature-animals, plants, insects and birds. Each has its own beauty, and its own ways. This variety brings us joy.

Question c.
Live and let live.
Answer:
Nehru’s foreign policy was based on the principle ‘Live and let live’. He called it peaceful co-existence. There are a number of philosophies and several religions. Every man is peculiar. No two humans are alike. We cannot change everyone to our point of view. Shall we kill all those who do not agree with us ? No. If a man like Hitler wanted it, he too could not do it. The best way is to live and let others live. Only then there can be peace, and peace leads to progress and happiness.

C. 3. Composition :

Write a paragraph of about 100 words on the following :

Question a.
Ecological balance
Answer:
Ecology includes all living things, men, animals, plants, and non¬* living things like water, soil and air, and their inter-relationship. Our earth is not a lifeless rock. It is a living thing with a variety of animals and plant life. When air, water and soil are not polluted, when all living things live the way they have lived for centuries there is ecological balance. But when there is pollution, when things are over-used, and misused, the balance is disturbed. Today we are worried about global warming, pollution, ozone hole, extinction | of species, contamination of water and air. Man is blamed for creating this mess. We must know that we are part of this ecology. If it goes out of balance, I we may not live.

Question b.
The need and importance of plantation drives.
Answer:
Only a hundred years ago, we had vast forests in our country. Those forests provided us with medicines, wood, timber, fruit and cosmetics. They were full of wild animals. Now most of them have been driving. Besides other I things, it has resulted in greenhouse effect because trees take up carbon dioxide and give us oxygen. It has resulted in less rain and erosion of the soil. We are deprived of natural beauty too.

Now we must plant more trees to restore the balance between oxygen and carbon dioxide. Trees will cool the atmosphere and check erosion of the soil. But planting trees is not enough. We must protect them also, so that they grow up into tall and sturdy trees.

D. Word-Study :
D. 1. Dictionary Use :

Ex. 1. Correct the spelling of the following words :

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 1 Animals in Prison 1

Ex. 2. Look up a dictionary and write two meaning of each of the following words – the one in which it is used in the lesson and the other which is more common:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 1 Animals in Prison 2
Answer:
Cell:
(i) a room for one or more prisoners in prison.
(ii) the smallest unit of living matter that can exist on its own

Prey:
(i) a bird that is hunted and eaten by officials (in the jail).
(ii) a person who is harmed or tricked by somebody.

Privillege:
(i) a special advantage that prisoner of classes A and B had
(ii) something that you are proud and lucky to have the opportunity to do

Convict:
(i) prisoners
(ii) to decide and state officially in court that somebody is guilty of a crime

Tint:
(i) hue, colour
(ii) an artificial colour used to change the colour of hair

Gaunt:
(i) thin
(ii) not attractive and without any decoration

Intimacy:
(i) closeness
(ii) the state of having a close personal relationship with somebody.

D. 2. Word-formation :

Look at the following example:

I knew every mark and dent on the whitewashed walls and on the uneven floor and the ceiling with its moth-eaten rafters.

You see that in the above sentence ‘whitewashed’ is made of two words ‘while’ (adj) and ‘washed’ (verb) and ‘moth-eaten’ of’moth’ (n) and ‘eaten’ (verb). You also see that ‘uneven’ is derived from ‘even’ by adding prefix ‘un’ to it.

Ex. 1. Pick out from the lesson the compound words and tell, as illustrated above, which words have been combined together to make a compound word.
Ex. 2. Pick out from the lesson the words which have been derived by adding a ‘prefix’ or ‘suffix’ to it.
Answer:
Ex. 1.
‘Ankle-deep’ – It is made of two words – ‘Ankle’ (n) and ‘deep’ (adj).
‘Sunlight’ – It is made of two words – ‘Sun’ (n) and ‘light’ (adj)
‘Snow covered’ – It is made of two words – ‘Snow’ (n) and ‘covered’ (v)
‘Love-making’ – It is made of two words – ‘Love’ (n) and ‘making’ (v)
‘Brain-fever’ – It is made of two words – ‘Brain’ (n) and ‘fever’ (n)
‘Long-term’ – It is made of two words – ‘Long’ (v) and ‘term’ (n)
‘Bed-bugs’ – It is made of two words – ‘Bed’ (adj) and ‘bug’ (n)

Ex. 2. Uneven, enclosing, denuded, remarkably, lovely, inadvertently, impatient, distemper, outside.

D. 3. Word-meaning :

Ex. 1. Match the words given in Column-A with their meanings given in Column-B:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 1 Animals in Prison 3
(b) Occasionally there would be a hailstorm
(c) In Lucknow gaol I used to sit reading almost without moving

You see that used to /would in the above sentences are followed by an infinitive and they suggest habitual action in past.

Ex. 1. Pick out from the lesson sentences with ‘used to’ and ‘would’.
Answer:
I would have welcomed the outing in my place, …. (Para-3) and I would be startled to find little bits of green peeping out all over them. (Para-5)
Occasionally there would be a hailstorm …. (Para-8)
I used to watch the ants and the white ants ….. (Para-12)
They would become very venturesome ….. (Para-13)
In Lucknow Gaol I used to sit reading almost without moving ….. (Para-13)
And then it would look into my eyes and realize… (Para-13)
………… and then it would scamper away. (Para-13)
A pair of them nested over over my cell-door in Dehra Dun, and I used to feed them. (Para-14)
But, I used to watch the eagles and the kites ……. (Para-16)
for I would come across them in the most unlikely places on my bed ….. (Para-14)
But there would be no feeling of repulsion ……. (Para-19)
………. and sometimes I would get up a dozen times in the course of the night to look after her. (Para-21)

We believe the information shared regarding Bihar Board Solutions for Class 11 English Chapter 1 Animals Questions and Answers as far as our knowledge is concerned is true and reliable. In case of any queries or suggestions do leave us your feedback and our team will guide you at the soonest possibility. Bookmark our site to avail latest updates on several state board Solutions at your fingertips.

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 1 पूस की रात

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 1 पूस की रात (प्रेमचंद)

 

पूस की रात पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

पूस की रात प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11th Hindi प्रश्न 1.
हल्कू कंबल के पैसे सहना को देने के लिए क्यों तैयार हो जाता है?
उत्तर-
हल्कू कथासम्राट प्रेमचंद विरचित ‘पूस की रात’ शीर्षक कहानी का सर्वप्रमुख पात्र है। वह एक अत्यंत निर्धन किसान है। उसने किसी तरह काट-कपट कर कंबल के लिए तीन रुपये जमा कर रखे हैं। किंतु, जब उसके पास महाजन सहना रुपये लेने के लिए आता है तो वह न चाहते हुए भी उस जमा पूँजी को परिस्थितिवश दे देने को तैयार हो जाता है। क्योंकि, वह . भली-भाँति जानता है कि सहना बिना रुपये लिये नहीं मानेगा, तो फिर वह व्यर्थ क्यों हुज्जत करे-कराये। यही सब सोचकर हल्कू सहना को रुपये देने के लिए राजी हो जाता है।

Poos Ki Raat In Hindi Questions And Answers Bihar Board प्रश्न 2.
मुन्नी की नजर में खेती और मजूरी में क्या अंतर है? वह हल्कू से खेती छोड़ देने के लिए क्यों कहती है?
उत्तर-
मुन्नी कथानायक हल्कू की पत्नी है। उसकी नजर में खेती और मजूरी में बड़ा अंतर है। वह जानती है कि खेत का मालिक अपने खेत में जो कृषि-कार्य करता है, वह खेती है, जबकि बिना खेत-बधार का आदमी जहाँ-तहाँ काम करता है, वह मजूरी है।

मुन्नी को लगता है कि जब खेती अपनी है, तभी तो लगान अथवा मालगुजारी देनी पड़ती है और उसके लिए कर्ज लेना पड़ता है, जिससे उबरना मुश्किल होता है। मजूरी करने पर यह सब झंझट नहीं है। इसीलिए वह हल्कू से खेती छोड़ देने के लिए कहती है।

पूस की रात कहानी के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11th Hindi प्रश्न 3.
हल्कू खेत पर कहाँ और कैसे रात बिता रहा था?
उत्तर-
पूस की रात में हल्कू अपने खेत के किनारे बनी ईख के पत्तों की एक छतरी के नीचे रात बिता रहा था। वह बाँस के खटोले पर था और उसके पास कड़ाके की ठंड से बचने के लिए पुराने गाढ़े की चादर के सिवाय और कुछ नहीं था। उसकी खाट के नीचे उसका कुत्ता जबरा था। दोनों ठंड से थर्र-थर काँप रहे थे।

Push Ki Raat Question Answer Bihar Board प्रश्न 4.
हल्कू ने जबरा को आगे की ठंड काटने के लिए क्या आश्वासन दिया?
उत्तर-
हल्कू और जबरा दोनों पूस की रात में खेत पर ठंड से काँप रहे थे; उन्हें तनिक भी नींद नहीं आ रही थी। तब अंत में हल्कू पूस की ठंड काटने के लिए जबरा को यह आश्वासन देता है कि आज भर किसी तरह जाड़ा बर्दाश्त कर लो। कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूंगा। तुम उसी में घुसकर बैठना, तब तुम्हे इतना जाड़ा न लगेगा।

Poos Ki Raat Question Answer Bihar Board प्रश्न 5.
हल्कू की आत्मा का एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था। इसके पीछे क्या कारण था?
उत्तर-
हल्कू और जबरा-दोनों ही भीषण जाड़े का सामना कर रहे थे। किन्तु, जब हल्कू से न रहा गया तो उसने जबरा को अपनी गोद में सुला लिया। जबरा उसकी गोद में ऐसा निश्चिन्त लेटा था मानो उसे चरम सुख मिल रहा हो। उसके इस आत्मीय भाव को समझकर ही हल्कू की आत्मा का एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था अर्थात् वह सारे संकटों को भूलकर असीम आनंद की अनुभूति कर रहा था।

पूस की रात प्रश्न उत्तर Pdf Bihar Board Class 11th Hindi Bihar Board प्रश्न 6.
हल्कू और जबरा की मैत्री को लेखक ने अनोखा क्यों कहा है?
उत्तर-
मैत्री की बात बहुधा एक समान दो प्रणियों के बीच कही-सुनी जाती है। परंतु, ‘पूस की रात’ कहानी में हल्कू (मनुष्य) और जबरा (कुत्ता) के बीच मैत्री-भाव प्रदर्शित है। लेकिन, उन दोनों के बीच मित्रता का जो संबंध है, वह सच्चे मित्र के समान है। उनमें परस्पर एक-दूसरे के भावों, विचारों और सुख-दुःख को समझने की संवेदना है। अतः दोनों की मैत्री को अनोखी कहा गया है।

Push Ki Raat Kahani Ka Question Answer Bihar Board प्रश्न 7.
हल्कू कैसे जान सका कि रात अभी पहर भर बाकी है?
उत्तर-
हल्कू से पूस की कड़ाके की ठंड भरी रात जब काटे नहीं कट नही थी, तब उसने आकाश की तरफ झाँका। वह देखता है कि सप्तर्षि (सात तारों का समूह) अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े हैं। अतः वह समझ जाता है कि रात अभी पहर भर बाकी है।

Poos Ki Raat Questions And Answers Pdf Bihar Board प्रश्न 8.
जब ठंड बर्दाशत के बाहर हो जाती है तो हल्कू उसका सामना कैसे करता
उत्तर-
लाख कोशिशें करने के बावजूद जब हल्कू ठंड से बचकर सो नहीं पाता है, तो वह वहाँ से कोई एक गोले के टप्पे पर लगे आम के बगीचे में चला जाता है। उसने अरहर के पौधों की झाडू बनाई और उसी झाडू से नीचे बिखरी ढेर सारी पत्तियों को बटोरकर जमा कर लेता है। जब बहुत सारी सूखी पत्तियाँ जमा हो जाती हैं तो वह उसमें आग लगाता है और उसी अलाव की आँच में तपकर अपना तन-बदन गर्म करता है। इय प्रकार वह ठंड का सामना करता है।

Poos Ki Raat Questions And Answers Bihar Board प्रश्न 9.
लेखक ने पवन को निर्दय क्यों कहा है? निर्दय पवन द्वारा पत्तियों का कुचलना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
इस पाठ में एक जगह लेखक ने पवन को निर्दय कहा है। निर्दय का तात्पर्य होता है, वह व्यक्ति जिसमें दया न हो। पूस की रात में एक ऐसे ही असहनीय जाड़ा पड़ रहा था, उसमें भी हवाओं का बहना तो एकदम कहर ढा रहा था। अभिप्राय यह कि हवा चलने पर ठंड और भी बढ़ जा रही थी। पवन द्वारा पत्तियों को कुचले जाने से मतलब यह है कि जैसे कोई समर्थ आदमी कमजोर को कुछ नहीं समझता, वेसे ही निष्ठुर पवन बेजान पत्तियों पर से गुजर रहा था।

Push Ki Raat Ke Question Answer Bihar Board प्रश्न 10.
आग तापते हुए हल्क कैसे क्रीड़ा करता है? अपने शब्दों में वर्णन करें।
उत्तर-
जब अलाव की आग के कारण सर्द पड़े हल्कू को ठंड से राहत मिलती है और उसके शरीर में थोड़ी गर्मी आती है तो उसकी विनोद-वृत्ति जागृत हो जाती हो जाती है। वह छलाँग लगाकर अलाव के इस पार से उस पार फाँद जाता है और ऐसा ही करने को जबरा से भी कहता है।

पूस की रात कहानी का चरित्र चित्रण Pdf Bihar Board प्रश्न 11.
हल्कू और मुन्नी दोनों के चरित्र की विशेषताएँ बताएँ। आपकों इन दोनों में अधिक महत्त्वपूर्ण कौन लगा?
उत्तर-
‘पूस की रात’ कहानी में दो ही प्रमुख पात्र हैं—हल्कू और उसका पत्नी मुन्नी। दोनों के चरित्र में यद्यपि बहुत कुछ समानताएँ हैं, तथापि उनमें भिन्नताएँ भी हैं। हल्कू एक औसत भारतीय किसान की भाँति हर हाल में परिस्थितियों से समझौता करने के लिए तैयार रहता है तथा अपना दर्द भरी जिंदगी को भाग्य की विडम्बना मानता है। किन्तु; मुन्नी के चरित्र में ऐसी बात नहीं है। उसके स्वभाव में अन्याय के प्रति विद्रोह का भाव है। हल्कू के लिए खेती में यदि मान-सम्मान है, तो मुन्नी के लिए वैसा मान-सम्मान कोई मायने नहीं रखता, जिसमें तन ढंकने को वस्त्र और पेट भरने के लिए रोटी भी नसीब न हो।

हल्कू की समझौतापरस्ती एवं भाग्यवादी विचारों की बाजाय मुन्नी का विद्रोही स्वभाव एवं आलोचानात्मक दृष्टिकोण हमें अधिक महत्त्वपूर्ण लगता है।

Class 11 Hindi Book Bihar Board  प्रश्न 12.
यह कहानी भारतीय किसान के मजदूर बनने की त्रासदी की ओर संकेत करती है। कहानी के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर-
‘पूस की रात’ कहानी की कथावस्तु से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें एक भारतीय किसान के मजदूर बनने की त्रासदी का मार्मिक वर्णन है। हल्कू, जो एक अत्यंत गरीब किसान है, खेती में जी-तोड़ परिश्रम करता है। फिर भी उसे भरपेट भोजन तक नहीं मिल पाता। जिस किसी तरह वह जाड़े की ठंड से बचने के लिए कंबल खरीदने हेतु कुल तीन रुपये जुगाकर रखे रहता है। किन्तु, वह बदनसीब किसान एक कंबल भी नहीं खरीद पाता, क्योंकि वह रुपये महाजन. सहना को दे देना पड़ता है। इस प्रकार मानसिक अवसाद इतना बढ़ जाता है कि उसे खेती अर्थात् किसानी की अपेक्षा मजदूरी ही अच्छी लगने लगती है। कहानी के अंत में उसके कथन कि “रात की ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा” से यह बात एकदम स्पष्ट हो जाती है।

प्रश्न 13.
‘पूस की रात’ कहानी में ‘जबरा’ एक प्रमुख पात्र है। कहानी में उसका क्या महत्त्व?
उत्तर-
‘पूस की रात’ कथासम्राट प्रेमचंद की एक बहुचर्चित, बहुप्रशंसित कहानी है। इसमें हल्कू और मुन्नी के अतिरिक्त एक प्रमुख मानवेतर पात्र है-कुत्ता जबरा। वह हल्कू का अत्यंत आत्मीय है। कहना चाहिए कि वह उसके परिवार का एक अभिन्न सदस्य है। इस कहानी में वह बड़ा महत्त्व रखता है। रात में खेत पर हल्कू के साथ एकमात्र उसका प्यारा, संगी जबरा ही होता है। उसके माध्यम से हल्कू के चारित्रिक वैशिष्ट्यों, मनोगत भावों को उभारने में लेखक को बड़ी मदद मिली है।

यदि जबरा के चरित्र का कहानी में सन्निवेश न होता तो शायद हल्कू के चरित्र के कुछ पहलू अनछुए और अनुद्घाटित रह जाते, वे उस सहजता से व्यक्त न हो पाते। पुनः उन दोनों पात्रों के मध्य जो संवाद-योजना है, वह अत्यंत स्वाभाविक, रोचक, मर्मस्पर्शी एवं कथावस्तु के सर्वथा अनुकूल है। इससे कृषक-प्रकृति पर अच्छा प्रकाश पड़ा है। अत: कहा जा सकता है कि जबरा जैसे, मानवेतर पात्र का नियोजन ‘पूस की रात’ कहानी के कथ्य को पूर्ण बनाने में सहायक है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित वाक्यों की सप्रसंग व्याख्या करें : (क) बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जन्म हुआ है।
उत्तर-
प्रसंग-प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत, भाग-1 प्रथम पाठ ‘पूस की रात’ शीर्षक कहानी से अवतरित है। इसके लेखक हिन्दी के सुप्रसिद्ध कथाकार प्रेमचंद हैं। कहानी में यह कथन हल्कू की पत्नी मुन्नी का है।

व्याख्या-
मुन्नी के इस कथन के माध्यम से भारतीय किसानों की दयनीय दशा का पता चलता है। हल्कू रात-दिन एक करके किसी तरह जाड़े से बचाव हेतु एक कंबल खरीदने के लिए तीन रुपये बचाकर रखा है। किन्तु जब वह द्वार पर सहना को देखता है तो समझ जाता है कि अब इससे पिंड छुड़ाना मुश्किल है। अत: वह उसे रुपये देकर छुटकारा पाने के विचार से मुन्नी से वे रुपये माँगता है, जो उसकी कुल जमा पूँजी है।

मुन्नी का हृदय उपर्युक्त प्रस्ताव पर टूट-टूटकर विदीर्ण हो जाता है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से उसके जीवन की नग्न वास्तविकता प्रकट होती है कि वह चाहे कुछ भी करे, कितनी ही कतर-ब्योंत क्यों न कर ले, लेकिन महाजनों के कर्ज से मुक्त होना उसके लिए नामुमकिन है। लगता है कि जैसे उसका जन्म ही बाकी चुकाते रहने के लिए हुआ हो। यदि एक बार कर्ज ले लो फिर उससे उबार नहीं। इस प्रकार सारा जीवन लगान भरने एवं कर्ज चुकाने में ही चुक जाता है, उनके लिए कुछ नहीं बचता।

विशेष-

  • विवेच्य पंक्ति के द्वारा भारतीय किसान की गरीबी से भरी जिन्दगी की करुण कहानी स्पष्ट होती है।
  • मुन्नी के इस कथन में उसके हृदय की सारी पीड़ा व्यक्त है।
  • वाक्य सरल होते हुए भी अत्यंत मार्मिक, व्यंग्यपूर्ण एवं अर्थगर्मित है।
  • उक्ति कहानी की भावी परिणति का संकेत करती है।

(ख) हल्कू ने रुपये लिये और इस तरह बाहर चला मानो हृदय निकालकर देने जा रहा हो।
उत्तर-
प्रसंग-प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक “दिगंत, भाग-1′ के प्रथम पाठ’ पूस की रात’ शीर्षक कहानी से अवतरित है। इस कहानी के लेखक प्रेमचंद हैं।

व्याख्या-
हल्कू के द्वारा पर महाजन सहना अपनी बकाया राशि वसूलने आया हुआ है। गरीब हल्कू के पास खाने-पीने को भी कुछ नहीं है। उसके घर में जमा-पुंजी के नाम पर सिर्फ तीन रुपये हैं, जिसे उसने बड़े यत्न से संभालकर रखा है। उसके साथ उसकी उम्मीदें बंधी हैं। किन्तु, निष्ठुर सहना को हल्कू की इन मजबूरियों से भला क्या लेना-देना। वह तो रुपये लेकर ही वहाँ से हटेगा। अतः इन परिस्थितियों से वाकिफ बेचारा हल्कू अपना कुल जमा धन भी उसे देने को तैयार होता है। क्योंकि, वह जानता है कि इसके अतिरिक्त सहना से बचने का और कोई उपाय नहीं है। अत: वह मुन्नी से तीनों रुपये लेकर सहना को देने के लिए घर से बाहर चलता है। उस समय सचमुच ऐसा लगता है कि हल्कू सहना को रुपये नहीं, बल्कि कलेजा निकालकर देने जा रहा है।

विशेष-

  • प्रस्तुत वाक्य में गरीब भारतीय किसान की दयनीय दशा व्यजित है।
  • पंक्ति में चित्रात्मकता है, गरीब की दीन-हीन दशा साकार हो उठी है।
  • गरीब किसानों के प्रति पाठक की सहानुभूति जगाने में पंक्ति सफल है।

(ग) अंधकार के उस अनंत सागर में यह प्रकाश एक नौका समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था।
उत्तर-
प्रसंग-प्रस्तुत वाक्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत, भाग-1’ में संकलित ‘पूस की रात’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है। इसके लेखक स्वनामधन्य कहानीकार प्रेमचंद हैं। कथानायक हल्कू भीषण सर्दी से बचने के लिए खेत छोड़ आम के बगीचे में जाता है। वहाँ वह रात्रि के घने अंधकार में ढेर सारी सूखी पत्तियों को बटोर लेता है और उसमें आग जलाता है। यह वाक्य वहीं का है।

व्याख्या-
पूस की रात में चारों तरफ घुप्प अँधेरा छाया है। कड़ाके की ठंड पड़ रही है। ठंड से पीड़ित और परेशान हल्कू अलाव जलाकर ताप रहा है। अलाव से निकलती आँच उस समय हल्कू के लिए अंधकार के अथाह सागर में एकमात्र सहारा नाव के समान प्रतीत हो रही है। चूँकि वह उसी के सहारे अंधकार पर विजय पा रहा है, ठंड से अपना बचाव कर रहा है।

विशेष-

  • प्रस्तुत पंक्ति से हल्कू की मानसिक अवस्था का पता चलता है।
  • कथन चमत्कारपूर्ण है।
  • हल्कू की निस्सहायता के बीच आशा की किरण दिखलाई गई है।
  • पंक्ति के द्वारा पूस की रात में बगीचे में अलाव तापते किसान का चित्र साकार हुआ है।

(घ) तकदीर का खूबी है। मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें।
उत्तर-
प्रसंग- यह उक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत,, भाग-1 में संकलित ‘पूस की रात’ शीर्षक कहानी से ली गयी है। इसके कहानीकार प्रेमचंद हैं। कंबल के लिए जुगाकर रखे गये तीन रुपये सहना (महाजन) को चुकाने के बाद पूस की ठंडी रात में केवल फटी-पुरानी एक चादर के सहारे हल्कू को खेत की रखवाली करनी है। खेत पर बैठे-बैठे हल्कू के मन में कई विचार उठते हैं।

व्याख्या-
यह छोटी-सी उक्ति किसान के जीवन की विडम्बना को पूरी तरह व्यक्त करती है। किसान और मजदूर रात-दिन परिश्रम करते हैं। उनकी मेहनत से समाज की जरूरतें पूरी होती हैं। लेकिन, अपनी मेहनत का वह लाभ नहीं उठा पाता। जो कुछ भी हासिल करता है, वह कर्ज चुकाने में निकल जाता है। महाजन गरीबों की मेहनत की कमाई लूटते रहते हैं। उनके रुपये का ब्याज बढ़ता रहता है और किसान कभी कर्ज नहीं चुका पाता। इस प्रकार वह गरीबी और अभावों में ही फंसा रहता है, जबकि उनकी मेहनत की कमाई को लूटनेवाले, जो किसी तरह की मेहनत भी नहीं करते, मौज-मस्ती से जिन्दगी गुजारते हैं।

विशेष-

  • यह छोटी-सी उक्ति हमारे समाज के मुख्य अंतर्विरोध को बहुत ही तल्खी से व्यक्त कर देती है।
  • प्रेमचंद ने इतनी महत्त्वपूर्ण बात को बहुत ही सहज रूप से प्रस्तुत किया है। यह उनकी लेखकीय क्षमता का प्रमाण है।

प्रश्न 15.
‘कर्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति उछल रहा था। इस कथन के आलोक में कहानी में जबरा की भूमिका का मूल्यांकन करें।
उत्तर-
‘पूसी की रात’ शीर्षक कहानी में हल्कू और मुन्नी के अतिरिक्त एक मानवेतर पात्र है-जबरा। कहानी में उसकी भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। हल्कू के साथ खेत पर रात में वही रहता है। दोनों में मैत्रीपूर्ण संबंध इस कहानी में दिग्दर्शित है। दोनों एक-दूसरे के मनोभावों को भली-भाँति समझते हैं। यही कारण है कि यदि एक ओर हल्कू उसे अपनी गोद में सुलाता है तो दूसरी ओर प्रत्युपकार की भावना से जबरा भी अपने स्वामी की हित-रक्षा हेतु सदैव सजग और तत्पर रहता है। उस रात जब जबरा को किसी जानवर की आहट सुनाई पड़ती है तो वह ठंड की परवाह न कर छतरी के बाहर आकर दूंकने लगा।

जबरा के जीते-जी हल्कू का कुछ बिगड़े, यह संभव नहीं। इस संदर्भ में कहानीकार ने ठीक ही कहा है कि “कर्त्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति उछल रहा था।” यही बात कहानी के अंतिम भाग में भी दिखायी देती है। जब हल्कू ठंड के कारण अलाव को छोड़ खेत पर नहीं जा पाता, जबकि जबरा खेत पर पहुंचकर नीलगायों को भगाने के लिए जी-जान लगा देता है। इस प्रकार हम देखते है कि जबरा अपनी स्वामिभक्ति एवं कर्त्तव्यपरायणता के कारण कहानी में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

प्रश्न 16.
‘दोनों खेत की दशा देख रहे थे। मुन्नी के मुख पर उदासी छाई हुई थी। पर हल्कू प्रसन्न था।’ ऐसा क्यों? मुन्नी की उदासी और हल्कू की प्रसन्नता का क्या कारण है?
उत्तर-
‘पूस की रात’ कहानी में हम देखते हैं कि इधर हल्कू आम के बगीचे में आग तापता रह जाता है और उधर उसके हरे-भरे खेत नीलगयों द्वारा रौंद दिये गये। जबरा बेचारा फसलों को नहीं बचा सका। जब सुबह-सुबह मुन्नी आकर हल्कू को जगाती है तो दोनों खेत पर जाते हैं। सारी फसल बर्बाद हो चुकी है।

फसलों की बर्बादी देख मुन्नी और हल्कू के भाव अलग-अलग है। मुन्नी वहा यह सोचकर दुखी और उदास है कि अब तो मालगुजारी भरने के लिए मजूरी ही करनी पड़ेगी, वहीं हल्कू इस कारण प्रसन्नता व्यक्त करता है कि चलो फसल नष्ट हुई तो हुई, मजूरी करनी पड़ेगी तो करेंगे, पर अब कड़ाके की ऐसी रात में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।

पूस की रात भाषा की बात

प्रश्न 1.
वाक्य-प्रयोग द्वारा इन मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करें
उत्तर-

  • गला छूटना (संकट से छुटकारा पाना)- चाहे जैसे भी हो, ले-देकर इस बदमाश से अपना गला छुड़ा लो।
  • बला टलना (मुश्किल टलना)-उसका काम कर मैंने बहुत बड़ी बला टाली।
  • हंडा हो जाना (मृत्यु को प्राप्त करना)-ऐसी ठंड में मत नहाओं, नहीं तो ठंडे हो जाओगे।
  • आँख तरेरना (गुस्सा दिखाना)-चुपचाप चले जाओ, आँखें तरेरने से यहाँ कोई डरनेवाला नहीं।
  • बाज आना (तंग होना, मान लेना)-मैं तुमसे बाज आ गया।
  • भौहें ढीली पड़ना (नरम पड़ना)-पहले तो वह खूब गर्म हुआ पर हकीकत जानते ही उसकी भौंहे. ढीली पड़ गयीं।
  • आहट मिलना (आभास होना)-खेत में जानवरों की आहट मिलते ही जबरा भौंकने लगा।

प्रश्न 2.
‘गला छूटना’, ‘आँख ततेरना’ की तरह शरीर के अनय अंगों की सहायता से दस मुहावरों को अर्थसहित लिखें एवं उनका वाक्यों में प्रयोग करें।
उत्तर-

  • कान देना (ध्यान देना)-अच्छे बच्चे बड़ों की बातों पर कान देते हैं।
  • नाक का बाल होना (अत्यंत प्यारा होना)-मेधावी छात्र शिक्षक की नाक के बाल होते हैं।
  • कमर टूटना (बेसहारा होना)-अपने जवान इकलौते बेटे की मृत्यु से बूढ़े बाप की कमर टूट गई।
  • आँखें चार होना (प्यार होना)-जनकजी के बाग में राम और सीता की आँखें चार . हुई थीं।
  • सिर खाना (परेशान करना)-तुम एक घंटे से मेरा सिर खा रहे हो, पर मैं अब तक तुम्हारा अभिप्राय न समझ सका।
  • नाक में दम करना (परेशान कर देना)-रोज-रोज की वर्षा ने सबकी नाक में दम कर दिया है।
  • दाँत खट्टे करना (पराजित करना)-कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने घुसपैठियों के दाँत खट्टे कर दिये।
  • आँखें दिखाना (डराना)-तुम मुझे क्यों आँखे दिखा रहे हो? मैं डरनेवाला नहीं हूँ। (ix) कमर कसना (तैयार होना)-अब हमें परीक्षा के लिए कमर कस लेनी चाहिए।
  • सिर ओखली में देना (मुसीबत मोल लेना)-उस बदमाश को चुनौती देकर तुमने अपना सिर ओखली में दे दिया है।

प्रश्न 3.
‘उठ बैठ’ संयुक्त क्रिया का उदाहरण है। ऐसे पांच अन्य उदाहरण दें।
उत्तर-
संयुक्त क्रिया के पाँच उदाहरण-दौड़ पड़ा, चल दिया, पहुँच गया, मार डाला, गिर गया। :

प्रश्न 4.
निम्नलिखित विशेषणों से भाववाचक संज्ञा बनाएँ : ढीली, दीर्घ, विशेष, गर्म, प्रसन्न
उत्तर-
ढीली-ढिलाई, दीर्घ-दीर्घती, विशेष-विशेषता, गर्म-गर्मी, प्रसन्नन–प्रसन्नता।

प्रश्न 5.
‘पेट में ऐसा दर्द हुआ कि मैं ही जानता हूँ’-यहाँ ‘मै ही जानता हूँ’ संज्ञा उपवाक्य है। ‘मै नहीं जानता कि वह कहाँ है’ में ‘वह कहाँ है’ संज्ञा उपवाक्य है। इसी तरह निम्नलिखित वाक्यों से संज्ञा उपवाक्य छाँटें

(क) चिलम पीकर हल्कू लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे जो कुछ भी हो अबकी सो जाऊँगा।
उत्तर-
चाहे जो कुछ भी हो अबकी सो जाऊँगा।

(ख) हल्कू को ऐसा मालूम हुआ जानवरों का झुंड उसके खेत में आया है।
उत्तर-
जानवरों का एक झुंड उसके खेत में आया है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यों में मिश्र और संयुक्त वाक्य चुनकर उन्हें सरल वाक्य में बदलें:

(क) हल्कू ने आग जमीन पर रख दी और पत्तियाँ बटोरने लगा। (संयुक्त वाक्य)
उत्तर-
हल्कू आग को जमीन पर रखकर पत्तियाँ बटोरने लगा। (सरल वाक्य)

(ख) राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाकी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग उठती थी। (मिश्र वाक्य)
उत्तर-
राख के नीच की बाकी बची आग हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग उठती थी। (सरल वाक्य)

(ग) पेट में ऐसा दरद हुआ कि मैं ही जानता हूँ। (मिश्र वाक्य)
उत्तर-
पेट में हुआ दरद को तो मै ही जानता हूँ। (सरल वाक्य)

(घ) यह कहता हुआ वह उछला और अलाव के ऊपर से साफ निकल गया। (संयुक्त वाक्य)
उत्तर-
यह कहता हुआ वह उछलकर के ऊपर से साफ निकल गया। (सरल वाक्य)

(ङ) मै मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी है। (मिश्र वाक्य)
उत्तर-
मै मरने से बचा, तुझे खेत की पड़ी है। (सरल वाक्य)

प्रश्न 7.
हल्कू और लेखक की भाषा में फर्क है। आप बताएँ कि यह फर्क क्यों है? इसके कुछ उदाहरण पाठ से चुनकर लिखें।
उत्तर-
‘पूस की रात’ शीर्षक कहानी में यह बात स्पष्ट रूप से दिखाई देती है कि हल्कू और लेखक (प्रेमचंद) की भाषा में फर्क है। यह फर्क लेखक द्वारा कहानी की भाषा को पात्रोचित बनाने के प्रयास के कारण है। बहुधा लेखकगण कहानियों, उपन्यासों अथवा नाटकों में ऐसा प्रयास करते हैं। वे पात्रों के स्तर को ध्यान में रखकर उनके उपयुक्त भाषा-प्रयोग करते हैं। प्रस्तुत कहानी के साथ भी यही बात है। इसके कुछेक उदाहरण इस प्रकार हैं . हल्कू-अब तो नहीं रहा जाता जबरू ! चलों, बगीचे में पत्तियाँ बटोरकर तापें। टाँठे हो जाएंगे तो फिर सोएँगे।

लेखक-बगीचे में घुप अँधेरा हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था।

हल्कू-पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता है, हाँ, जरा मन बहल जाता है। लेखक-जाड़ा किसी पिशाच की भाँति उसी छाती को दबाए हुए था।

प्रश्न 8.
वाक्य प्रयोग द्वारा लिंग-निर्णय कीजिए :
उत्तर-

  • ढेर (पुलिंग) – वहाँ पत्तियों का ढेर लग गया।
  • अलाव (पुलिंग) – अलाव जल उठा।
  • लौ (स्त्रीलिंग) – लौ निकल रही है।
  • दोहर (स्रीलिंग) – इसी फटी-पुरानी दोहर से जाड़ा नहीं जाता।
  • जी (पुलिंग) – खाते-खाते मेरा जी भर गया।
  • गर्व (पुलिंग) – हमें अपने देश पर गर्व होना चाहिए।
  • ठंड (स्त्रीलिंग) – उसे ठंड लग रही है।
  • पूँछ (स्रीलिंग) – उसकी पूँछ लम्बी है।
  • चादर (स्त्रीलिंग) – उसने अपनी चादर फैला दी।
  • राख (स्त्रीलिंग) – वहाँ अब सिर्फ राख बची है।
  • शीत (पुलिंग) – जाड़े में बहुत शीत पड़ता है।
  • झुंड (पुलिंग) – हथियों का झुंड निकल गया।
  • सत्यानाश (पुलिंग) – तूने मेरा सत्यानाश कर दिया।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

पूस की रात लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. हल्क का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर-
हल्कू छोटा किसान है। खेती से काम नहीं चलने पर मजदूरी भी करता है। फिर भी कर्ज से लदा है। उसका शरीर भारी-भरकम और बलिष्ठ है। फिर भी गरीबी के कारण वह अपने को दीन अनुभव करता है। वह पत्नी की तीखी बातों पर तनने के बदले खुशामद करता है। फसल चर जाने कीह स्थिति में उसके नाराज होने और भला बुरा कहने से बचने के लिए झूठ बोलता है। वह अपनी दशा से खिन्न है और वह भी अनुभव करता है कि जिस खेती से पेट न भरे उसे निभाये चलना बेकार है। इसी की प्रतिक्रिया में वह फसल की रक्षा करने में ढीला पड़ जाता है। इसमें ठंड से ज्यादा प्रबल कारण खेती के प्रति क्षोभ है जो दीनता, कर्ज और अभाव की प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न 2.
‘पूस की रात’ के केन्द्रीय भाव का प्रकाश डालिए।।
उत्तर-
कृषक जीवन की त्रासदी का वर्णन करना पूस की रात कहानी की समस्या है। निम्न वर्गीय किसान की दुर्दशा का वर्णन इस कहानी का केन्द्रीय तत्त्व है। खेती इतनी कम है कि हल्कू को मजदूरी करनी पड़ती है। इतना ही नहीं मजदूरी में से काट-कपट कर जो पैसा कम्बल के लिए जमा करना है वह भी कर्ज सधाने में हाथ से निकल जाता है। किसान इतने दुर्दशाग्रस्त हैं कि उनके पास जाड़े से निबटने के लिए पर्याप्त कपड़े तक नहीं हैं। ऐसी स्थिति से प्रेमचन्द क्षुब्ध है। उनका क्षोभ हल्कू और मुन्नी दोनों के माध्यम से व्यक्त होता है। वे खेती से विद्रोह करने हेतु प्रेरित करते हैं। हल्कू द्वारा अपनी फसल को बर्बाद होने से न रोकना इसी विद्रोह और क्षोभ को परिणाम है।

प्रश्न 3.
हल्कू ने अपनी स्त्री से रुपये क्यों माँगे?
उत्तर-
हल्कू एक गरीब किसान है। बड़ी कठिनाई से उसकी स्त्री ने तीन रुपये बचाकर रखे थे। उसने सोचा था कि इन रुपयों से एक कम्बल खरीदकर माघ-पूस की ठण्डी रात के कष्ट से बचेंगे लेकिन हल्कू ने वे रुपये अपनी स्त्री से इसलिए माँग लिए क्योंकि उसे उन रुपयों को सहना को देकर उसके कर्ज से मुक्ति पानी थी। रुपये नहीं देने पर सहना का दुर्व्यवहार सामने जो था।

प्रश्न 4.
हल्कू खेत उजड़ने से क्यों प्रसन्न है?
उत्तर-
कर्ज चुकाने में कम्बल का पैसा खर्च हो जाने से हल्कू व्यथित है। वह अब कम्बल नहीं खरीद सकेगा। ऐसी स्थिति में मात्र एक दोहर चादर के सहारे पूस की रात में कड़ाके की ठंढ में रखवाली असंभव है। एक ही रात को दुर्गति इसका प्रभाव है। अतः हल्कू प्रसन्न है कि अब खेत की रखवाली से उसका पिंड छूट गया है। उसे अब खेत की रखवाली नहीं करनी पड़ेगी।

पूस की रात अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुन्नी पैसे क्यों नहीं देना चाहती है?
उत्तर-
हल्कू ने मजदूरी में से कटौती करके कम्बल खरीदने के लिए पैसे बचाये हैं। वे तीन रुपये सहना को दे देने पर कम्बल नहीं खरीदा जा सकेगा। तब न जाड़ा कटेगा और न फसल की रखवाली होगी। कम्बल खरीदने के लिए कोई विकल्प नहीं है। इसलिए मुन्नी पैसे नहीं देना चाहती है।

प्रश्न 2.
खेत उजड़ने पर मुन्नी क्यों दुःखी होती है?।
उत्तर-
खेत उजड़ जाने पर खाने के लिए अन्न नहीं होगा। दूसरे, खेत की मालगुजारी भरने के लिए मजदूरी से होने वाली आय में से कटौती करनी पड़ेगी।

प्रश्न 3.
पूस की रात किस प्रकार की कहानी है?
उत्तर-
उपन्यास सम्राट प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी पूस की रात यथार्थवादी कहानी है।

प्रश्न 4.
पूस की रात कहानी का नायक फसल के चर जाने के बाद क्यों खुश होता है?
उत्तर-
पूस की रात नामक कहानी का नायक फसल के चर जाने के बाद इसलिए खुश होता है क्योंकि उसे खेत की रखवाली करने से छुट्टी मिल गयी है। उसे अब खेत की रखवाली नहीं करनी पड़ेगी।

प्रश्न 5.
पूस की रात कहानी में किन बातों का चित्रण हुआ है?
उत्तर-
पूस की रात नामक कहानी में इन बातों का चित्रण हुआ है-
(क) कृषक श्रमिक का अभावग्रस्त जीवन
(ख) कृषक श्रमिक का स्वाभामान
(ग) सामाजिक विषमता इत्यादि

प्रश्न 6.
क्या इस कहानी का नाम पूस की रात सार्थक है?
उत्तर-
हाँ, क्योंकि इस कहानी का आधार घोर ठंढक की स्थिति है जो हमें पूस माह में प्राप्त होती है। साथ ही पूरी घटना रात में घटित होती है। कहानी का विषय पूस महीने में रात्रि के समय फसल की रखवाली से सम्बन्धित है। यह कार्य ठंड की अतिशयता के कारण नहीं सम्पन्न होता है।

प्रश्न 7.
पूस की रात नामक कहानी के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
पूस की रात नामक कहानी के लेखक प्रेमचंद है।

पूस की रात वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग, या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
‘पूस की रात’ शीर्षक पाठ में किसका वर्णन किया गया है?
(क) जाड़े की ऋतु का
(ख) एक गरीब किसान की व्यथा का
(ग) बड़े लोगों के शोषण का
(घ) ग्रामीण समस्याओं का
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 2.
प्रेमचंद की कहानियाँ किस भावना से प्रेरित हैं?
(क) नवक्रांति की भावना से
(ख) धार्मिक भावना से
(ग) समाज-सुधार की भावना से
(घ) नारी-कल्याण की भावना से
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 3.
हल्कू ने तीन रुपए किसके लिए बचाए थे?
(क) खेतों के बीज के लिए
(ख) बच्चे की दवा के लिए
(ग) तीर्थयात्रा के व्यय के लिए
(घ) कंबल के लिए
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 4.
खेतों में फसल की रक्षा में हल्कू का संगी कौन था?
(क) उसका बड़ा लड़का
(ख) उसका कुत्ता जबरा
(ग) उसकी पत्नी मुन्नी
(घ) उसका एक पड़ोसी
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 5.
हल्कू ने खेत की फसल को रात में किसने बर्बाद किया?
(क) जंगली जानवरों ने
(ख) जमींदार के गुंडों ने
(ग) हल्कू के दुश्मनों ने
(घ) नीलगायों ने
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 6.
सहना हल्कू के पास क्यों आया था?
(क) घुड़कियाँ जमाने
(ख) उसे पकड़कर ले जाने
(ग) उससे रुपए माँगने
(घ) उसे नेक सलाह देने
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 7.
हल्कू ने रुपये लिए और इस तरह बाहर चला मानो
(क) अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो
(ख) अपने घर की लक्ष्मी को विदा कर रहा हो
(ग) गुलामी की यातना भगत रहा हो
(घ) बहादुरी से जवाब देने जा रहा हो
उत्तर-
(क)

प्रश्न 8.
हल्क ने अपनी पत्नी से किस स्वर में रुपये की मांग की?
(क) खुशामद में स्वर में
(ख) क्रोध के स्वर में
(ग) धमकी के स्वर में
(घ) प्रतिशोध के स्वर में
उत्तर-
(क)

प्रश्न 9.
हल्कू किससे आहत था?
(क) अपनी दीनता से
(ख) पत्नी के व्यवहार से
(ग) जबरे कुत्ते की अनोखी मैत्री से।
(घ) खेत-मालिकों के व्यवहार से।
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 10.
प्रेमचंद किस रूप में विशेष प्रसिद्ध हैं?
(क) विचारक के रूप में
(ख) गाँधीवादी चिंतक के रूप में
(ग) समाजवादी प्रवक्ता के रूप में
(घ) उपन्यासकार के रूप में
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 11.
हल्कू ने पूस की रात की ठंढी का सामना किससे किया?
(क) पत्तियों की आग से
(ख) मोटे कपड़ों से
(ग) पुआल की गर्मी से
(घ) मचान की ओट से
उत्तर-
(क)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।
1. हल्कू एक ……………… खरीदने के लिए तीन रुपये बचाकर रखना चाहता था।
2. हल्कू की फसल को ………… का झुंड बार्बाद करने आया था।
3. प्रेमचंद की आदर्शोन्मुखी …………… वादी कथाकार कहा जाता है।
4. पूस की रात एक ………………. वादी कहानी है।
5. हल्कू ने अपनी पत्नी से …………….. दर्द का बहाना बनाया।
उत्तर-
1. कंबल
2. नीलगायों
3. यथार्थ
4. यथार्थ
5. पेट।

पूस की रात लेखक परिचय – प्रेमचंद (1880-1936)

प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, सन् 1880 ई. को वाराणसी जिले के लमही नामक ग्राम में हुआ था। उनका वास्तविक नाम धनपत राय था। आरम्भ में वे नवाबराय के नाम से उर्दू में लिखते थे। युग के प्रभाव ने उनको हिन्दी की ओर आकृष्ट किया। प्रेमचंदजी ने कुछ पत्रों का सम्पादन भी किया। उन्होंने सरस्वती प्रेम के नाम से अपनी प्रकाश संस्था भी स्थापित की।

प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के प्रथम कथाकार हैं जिन्होंने साहित्य का नाता जन-जीवन से जोड़ा। उन्होंने अपने कथा-साहित्य को जन-जीवन के चित्रण द्वारा सजीव बना दिया है। वे जीवन भर आर्थिक अभाव की विषम चक्की में पिसते रहे। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त आर्थिक एवं सामाजिक वैषम्य को बड़ी निकटता से देखा था। यही कारण है कि जीवन की यथार्थ अभिव्यक्ति का सजीव चिंत्रण उनके उपन्यासों एवं कहानियों में उपलब्ध होता है।

जीवन में निरन्तर विकट परिस्थितियों का सामना करने के कारण प्रेमचंदजी का शरीर जर्जर हो रहा था। देशभक्ति के पथ पर चलने के कारण उनके ऊपर सरकार का आतंक भी छाया रहता था, पर प्रेमचंदजी एक साहसी सैनिक के समान अपने पथ पर बढ़ते रहे। उन्होंने वही लिखा जो उनकी आत्मा ने कहा। वे बम्बई (मुम्बई) में पटकथा लेखक के रूप में अधिक समय तक कार्य नहीं कर सके, क्योंकि वहाँ उन्हें फिल्म निर्माताओं के निर्देश के अनुसार लिखना पड़ता था। उन्हें स्वतन्त्र लेखन ही रुचिकर था। निरन्तर साहित्य साधना करते हुए 2 अक्टूबर, 1936 को उनका स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक विशेषताएं-प्रेमचंदजी प्रमुख रूप से कथाकार थे। उन्होंने जो कुछ भी लिखा वह जन-जीवन का मुँह बोलता चित्र है। वे आदर्शोन्मुखी-यथार्थवादी कलाकार थे। उन्होंने समाज के सभी वर्गों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया पर निर्धन, पीड़ित एवं पिछड़े हुए वर्ग के प्रति उनकी विशेष सहानुभूति थी। उन्होंने शोषक एवं शोषित दोनों वर्गों का बड़ा विशद् चित्रण किया है। ग्राम्य-जीवन के चित्रण में तो प्रेमचंदजी ने कमाल ही कर दिया है। उनकी कपन, गोदान, पूस की रात आदि रचनाएँ शोषण के विरुद्ध मूक विद्रोह की आवाज उठाती है।

उपन्यास-वरदान, सेवा सदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, काया कल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन, कर्मभूमि, गोदान एवं मंगल सूत्र (अपूर्ण)।

कहानी संग्रह-प्रेमचंदजी ने लगभग 400 कहानियों की रचना की। उनकी प्रसिद्ध कहानियाँ मानसरोवर के आठ भागों में संकलित हैं।

  • नाटक-कर्बला, संग्राम और प्रेम की वेदी।
  • निबंध संग्रह-कुछ विचार।

भाषा-प्रेमचंदजी का सम्पूर्ण साहित्य समाज-सुधार एवं राष्ट्रीय भावना से प्रेरित है। उनकी भाषा सरल एवं मुहावरेदार है। उर्दू शब्दों की स्वच्छता तथा सस्कृत की भावमयी स्निग्ध पदावली ने भाषा को आकर्षक, सरल एवं प्रभावशाली बना दिया है। यही कारण है कि आम जनता और रुचि-सम्पन्न साहित्यकारों-दोनों ने उनके साहित्य का स्वागत किया।

पूस की रात पाठ का सारांश

सहना हल्कू से अपने उधार के पैसे माँगने आया है। हल्कू अपनी पत्नी से रुपये देने के लिए कहता है। उनकी पत्नी यह कहकर मना करती है, घर में केवल तीन रुपये हैं, उनका कम्बल खरीदना है। ठंड की रात में बिना कंबल के खेतों की रखवाली कैसे होगी। वह कहने लगा उसकों पैसा देकर पीछा छुड़ाओं, कंबल के लिए कोई और इंतजार कर लेंगे। मुन्नी (उसकी पत्नी) कहती है कि कहाँ से इंतजाम करोगे, क्या कोई तुम्हे दान देकर जाएगा, हल्कू उसके पैसे देकर अपना पिंड छुड़ाना चाहता है। मुन्नी ने पैसे लाकर हल्कू को दे दिया और कहा कि छोड़ दो ये खेती,

मजदूरी करके अपना गुजार कर लेंगे; किस की धौंस तो नहीं सहनी पड़ेगी। हल्कू ने एक-एक पैसा करके इकट्ठे किए गए रुपये लाकर उसे दे दिया, उसे ऐसा लगा मानो अपना हृदय निकालकर दे दिया हो।

पूस की रात में हल्कू अपने खेत पर ईख के पत्तों की छाटी-सी झोपड़ी बनाकर उसमें एक खटोला डालकर, रखवाली कर रहा था। सर्दी के कारण उसको नींद नहीं आ रही थी। उसका कुत्ता जबरा भी वहीं लेटा सर्दी के कारण कूँ-कूँ कर रहा था। हल्कू अपने सिर को घुटनों में दिए अपने कुत्ते से कहता कि क्या तुझे जाड़ा लग रहा है? तू घर में पुआल पर लेटा रहता, तू ही तो यहाँ आया था, अब ले, ले मजा। कुत्ता कुँ-कुँ करके फिर लेट गया कहीं मालिक को मेरे कारण नींद नहीं आ रही हो।

हल्कू एक-एक कर आठ चिलम पी चुका परंतु उसकों नींद नहीं आ रही थी। वह सोच रहा था कि मेहनत हम करते हैं, मजा दूसरे लोग लूटते हैं। वे अपने घरों में आराम से गरम-गरम गद्दों पर सोते हैं।

हल्कू अपने कुत्ते से बातें करता रहा। कुत्ता मानो कूँ-कू करके हल्कू की बात का जवाब दे रहा हो। जबरा ने अपने पंजे हल्कू के घुटनों के पास रखे, तो उसके उसे गरम-गरम साँस का अनुभव हुआ।

चिलम पीकर हल्कू फिर सोने का प्रयत्न करने लगा परंतु नींद आने का नाम ही न लेती थी। हल्कू ने जबरा का सिर उठाकर अपनी गोद में रख लिया और थपकी देकर उसे सुलाने लगा। हल्कू को इस प्रकार करते एक सुख का अनुभव हो रहा था। जबरा शायद इस सुख को स्वर्ग से भी बढ़कर समझ रहा था। हल्कू की आत्मा में कुत्ते के प्रति कोई घृण का भाव नहीं था। वह इतना तल्लीन होकर शायद अपने आत्मीय को भी गले न लगाता जिस प्रकार उसने जबरा को गले गला रखा था। हल्कू की आत्मा मानो अंदर से प्रकाशित हो गई हो।

तभी जबरा को किसी जानवर की आहट मालूम पड़ी। जबरा बाहर आकर भौंकने लगा। ह के बुलाने पर भी वह नहीं आया। उसका कर्तव्य उसको भौंकन के लिए प्रेरित कर रहा १ाफी रात गुजर जाने के बाद हवा और तेज हो गई, अब तो ऐसा लगता था कि सर्दी मानों हो ले लेगी। हल्कू ने आकाश की ओर देखकर रात कितनी बाकी है यह अंदाज लगाया।

हल्कू के खेत से थोड़ी दूर पर आमों का एक बाग है। पतझड़ शुरू होने के कारण पेड़ों रोचे काफी पत्ते पड़े हुए थे। हल्कू एक साथ में सुलगता हुआ उपला लेकर अरहर के पौधों। झाडू बनाकर पेड़ के नीचे से आम के पत्तों को इकट्ठा करने लगा। उसने थोड़ी देर में ही ..का ढेर लगा दिया। जबरा जमीन पर पड़ी किसी हड्डी को चिचोड़ने लगा।

पत्तियाँ इकट्ठी करके हल्कू ने अलाव जला दिया। वह आज सर्दी को जलाकर भस्म कर देना चाहता था। हल्कू अलाव के सामने ही बैठकर तापने लगा फिर उसने अपनी टाँगें फैला लीं। गोल्डेन सीरिज पासपोट वह सोचने लगा इतना इंतजाम पहले कर लेते तो ठंड में तो न मरना पड़ता। अलाव शांत हो चुका था परंतु उसमें गरमी बाकी थी। हल्कू चादर ओढ़कर गरम राख के पास बैठकर गीत गुनगुनाने लगा। उसको आलस्य ने घेर लिया।

जबरा भौंकता हुआ खेत की ओर दौड़ा। हल्कू को ऐसा लगा जैसे खेत में जानवरों का झुंड आया हो, उनकी आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी, शायद यह नील गायों का झुंड था। हल्कू को उनके खेत चरने की आवाज भी सुनाई दे रही थी, उसने अपने दिल को तसल्ली दी कि जबरा के होते हुए कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। मुझे भ्रम हो रहा है, वह अपने आपको झूठी तसल्ली देने लगा।

हल्कू को ऐसा लगा कि यह भ्रम नहीं है क्योकि खेत चरने की आवाज स्पष्ट आ रही थी और जबरा भी जोर-जोर से भौक रहा था परंतु हल्कू को अकर्मण्यता ने घेर लिया था, वह लेट गया। सबेरे उसी नींद तब खुली जब धूप चारों ओर खिल गई थी। उसकी पत्नी ने आकर उसको जगाया कि तुम्हारी रखवाली का क्या फायदा हुआ, खेत तो सारी चौपट हो गई। हल्कू ने बहाना बनाया तुम्हें खेत की पड़ी है। मै दर्द के कारण मरते-मरते बचा हूँ। वे दोनों अपने खेत के पास आए, देखा नील गायों ने खेत को पूरी तरह चर लिया था। यह देखकर मुन्नी उदास हो गई। रंतु हल्कू प्रसन्न था कि मजदूरी करके अपना गुजारा कर लेंगे, यहाँ ठंड में खेत की रखवाली हो नहीं करनी पड़ेगी।

पूस की रात कठिन शब्दों का अर्थ

घुड़कियाँ-फटकार, धमकियाँ। स्फूर्ति-फुर्ती। मजूरी-मजदूरी। अकर्मण्य-काम न करने वाला, आलसी। खैरात-मुफ्त। दंदाया-गरमाया। तत्परता- शीघ्रता। कम्मल-कंबल। अरमान-अभिलाषा। हार-खेत-बधार। धधकाना-भड़काना। भारी-भरकम-वजनदार। टाँठे-करारा, दृढ़। डील-आकार। अलाव-जहाँ आग तापी जाती है। पछुआ-पश्चिमी हवा जो जाड़ों में बहुत ठण्डी होती है। मालगुजारी-उपज पर दिया जाने वाला कर। भीषण-भयानक। दोहर-दुहरी चादर। दीर्घ-बड़ा। असूझ-बेवकूफी। श्वान-कुत्ता। मडैया-झोपड़ी।

महत्त्वपूर्ण पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या

1. यह खेती का मजा है और एक-एक भाग्यवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा जाय तो गर्मी से घबराकर भागे ! मोटे-मोटे गद्दे, लिहाफ। मजाल है कि जाड़े की गुजर हो जाय। तकदीर की खूबी है। मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटे!
व्याख्या-
प्रस्तुत गद्यांश मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पूस की रात’ शीर्षक कहानी के अन्तर्गत कथा नायक हल्कू द्वारा जबरा के प्रति किया गया कथन है। पूस की एक रात में कड़ाके की ठंड का सामना करते हुए हल्कू अपने खेत में लगी फसल की रखवाली कर रहा है। वह गरीब किसान है, इतना गरीब की जाड़े से बचने के लिए एक कम्बल तक नही खरीद सकता। रखवाली करते समय वह अकेला ही है सिर्फ एक और प्राणी उसके पास है और वह है उसका प्रिय कुत्ता जबरा। एकान्त में हल्कू को जाड़े के कारण जब नींद नहीं आती तो वह कुत्ते से बातें करने लगता है, मानो वह भी मनुष्य की भाँति सारी बाते सुनता, समझता है। जबरे को भी जाड़ा लग रहा था अतः हल्कू जबरे को कल से खेत में नही आने को कहता है। फिर जाड़े के कारण चिलम पीना चाहता है और इसके पूर्व आठ चिलम पी चुका है। किसी तरह उसे रात काटनी है। यह खेती करने की सजा है। लेकिन कुछ लोग समझते है कि खेती करने में मजा-ही-मजा है। वैसे लोगों पर हल्कू व्यंग्य करता है, जो परम्परानुसार समझते है कि

“उत्तम खेती मध्यम बान। निसिद्ध चाकरी. भीख निदान ॥”

किन्तु बात बिल्कुल उलटी है। खेत में अन्न पैदा करने वाला जो कंगाल बना रहता है जबकि वाणिज्य तथा चाकरी करने वाले मौज में रहते हैं। उन्हें जाड़ों में मोटे गद्दों, लिहाफ, कम्बल आदि की कोई कमी नहीं रहती। उनके पास गर्मी इतनी रहती है कि जाड़ा डर से ही भागता रहता है। किसान और मजदूर उत्पादन करते और उसका उपयोग धनी वर्ग करता है। अपना-अपना भाग्य
है। स्पष्ट है कि सामान्य किसानों की भांति हल्क भी भाग्यवादी है।

2. वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा में पहुँचा दिया ! नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिये थे और उसका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था।
व्याख्या-
प्रेमचन्द कथा सम्राट के रूप में मान्य हैं। अपनी प्रस्तुत कहानी के माध्यम से उन्होंने तत्कालीन जीवन की आलोचना की है। भारतीय ग्रामीणों की दरिद्रता ही इस कहानी का विषय है। पूस की रात तो ऐसे ही ठंडी होती है और ठंडी हवा के समय खेतों में सोने का नाम भर लेने से बदन सिहर जाता है, वह भी एक चादर के सहारे। बेचारे हल्कू के पास एक गाढ़े की चादर के अलावा ओढ़ने के लिए कुछ भी नहीं था और उसे खेतों की निगरानी करनी थी। हल्कू को नींद आ रही थी वह ठंड से काँप रहा था। वह चिलम पीने लगता है और दृढ़ निश्चिय करता है कि इस बार वह विछावन पर से नहीं उठेगा।

वह कुत्ते को गोद मैं चिपकाए सो जाने की कोशिश करता है। हल्कू की गरीबी आज यहाँ तक पहुँच गयी है कि वह जानवर के साथ जानवर की तरह लेटने में भी सुख का अनुभव करता है। वही हल्कू है जो पेट काट-काट कर कम्बल के लिए जमा किए गए पैसे सहना के बकाये देने को मजबूर हो जाता है। उसकी पूँजी खेत में लगी फसल है, जिसकी वह निगरानी नहीं कर पाता। इस प्रकार हम देखते हैं कि मनुष्य के अत्याचार से हारा हुआ मनुष्य प्रकृति से भी हार मान लेता है।

3. उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थे मानो उस अथाह अन्धकार को अपने सिरों पर संभाले हुए हों। अन्धकार के उस अनन्त सागर में यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता मचलता हुआ जान पड़ता था।
व्याख्या-
‘पूस की रात’ कहानी में हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कथाकार प्रेमचन्द ने वातावरण की सृष्टि सशक्त बिम्बों के द्वारा की है। कहानी का नायक हल्कू जाड़े की रात में खेत अगोडता है किन्तु पर्याप्त वस्त्रों के अभाव में जाड़े को सहन नहीं कर पाता और बगल के आम के बगीचे में पत्तियाँ जलाकर तापने के उद्देश्य से आता है। अरहर के पौधे की झाड़ बनाकर वह पत्तियाँ बटोरता है और उपले की आग से अलाव जलाता है। अत्यन्त ही अंधकारपूर्ण वातावरण है तथा शीत का आधिक्य इतना है कि वृक्षों के पत्तों के ओस की बँदें धरती पर टप-टप टपक रही हैं। अलाव में अपने टिठुरते हुए हाथ सेंककर हल्कू ठंढ को दूर भगाना चाहता है। जाड़ा किसी पिचाश की भांति उसकी छाती को दबाये हुए था और वह सारी रात अन्धेरे के इसी दानव से संघर्ष करता रहा। अलाव जल गया तो अन्धकार रूपी दानव पर मानो उसने विजय प्राप्त कर ली। जलते हुए अलाव की लपटें वृक्ष की पत्तियों को छूने लगी और उस प्रकाश में पेड़ इस तरह लगते थे. जैसे अन्धकार का बोझ अपने सिर पर सम्भाले हुए हों। चारों ओर अन्धेरा था, मानों अन्धकार को काई विशाल समुद्र लहरा रहा हो। उसमें अलाव की रोशनी इस प्रकार लग रही थीं मानो उस विशाल समुद्र में छोटी नावे हिचकोले ले रही हों।

इसे एक प्रतीक के रूप में लिया जाय तो लगेगा कि यह अंधकार गरीबी का प्रतीक है और अलाव की आग हल्कू का। हल्कू अकेले अलाव की रोशनी की भाँति विशाल अन्धकार से संघर्ष करता है और जिस तरह अलाव अन्ततः बुझ जाता है उसी तरह वह भी पराजित होता है। वह अपनी गरीबी से परेशान होकर थक जाता है।

4. “न जाने कितनी बाकी है जो किसी तरह चुकने ही नहीं आती। मैं कहती हूँ तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर कर काम करो उपज हो तो बाकी दे दो चलो छुट्टी हुयी।” इसकी सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
व्याख्या-
ये पंक्तियाँ प्रेमचन्द रचित चर्चित कहानी ‘पूस की रात’ से ली गयी है। इन पंक्तियों में कहानीकार प्रेमचंद ने ग्रामीण जीवन में व्याप्त गरीबी की विकराल समस्या के साए में पल रही कर्जखोरी, सूदखोरी तथा महाजनी शोषण की सामान्य समस्याओं को साकेतिक किया है। हल्कू .. ने सहना से तीन रुपये कर्ज लिए है, जिसकी वसूली के लिए उसपर बार-बार दबाव पड़ता रहा है। दबाव की वह पीड़ा उसकी पत्नी के लिए असत्य है। वह अपने पति से यह पूछती है कि थोड़ी-सी की जा रही खेती के लिए ही तो कर्ज लेना पड़ता है। अतः वह पति को खीझ भरे स्वर में खेती छोड़ देने के लिए कहती है। खेत में मर-मरकर काम करने से यदि कुछ फसल हाथ भी लगती है तो महाजन उसे देखकर कर्ज की बाकी राशि के लिए टूटते हैं। लगता है उसका जन्म कर्ज चुकाने के लिए ही हुआ है। वह खीझकर कर्ज न चुकाने का निश्चय व्यक्त करती है।

Bihar Board Class 11 English Grammar Reported Speech

Bihar Board Solutions for Class 11 English aids you to prepare all the topics in it effectively. You need not worry about the accuracy of the Bihar Board Solutions for Class 11 Book 50 Marks Solutions Grammar Reported Speech Questions and Answers as they are given adhering to the latest exam pattern and syllabus guidelines. Enhance your subject knowledge by preparing from the Chapter wise Bihar Board Class 11th English Book Solutions and clarify your doubts on the corresponding topics.

Bihar Board Class 11 English Grammar Reported Speech

Direct and Indirect Speech

Narration का अर्थ है कथन । इसे अंग्रेजी में इस प्रकार कह सकते हैं –
Narration means to narrate something said by someone.

अर्थात् किसी की कही गई बातों का वर्णन करना ही Narration कहलाता है।

अंग्रेजी में किसी के कथन को व्यक्त करने के दो तरीके हैं –

  1. वक्ता के कथन को हू-ब-हू उसी रूप में व्यक्त करना
  2. वक्ता के कथन को अपने शब्दों में व्यक्त करना ।

जब हम वक्ता के कथन को उसी के शब्दों में व्यक्त करते हैं तो Direct Narration या Speech कहते हैं। जब हम उसे अपने शब्दों में न व्यक्त करते हैं तो उसे Indirect Narration कहते हैं।

इन वाक्यों को पढ़े और देखें कि इनमें क्या अन्तर है –
Ramesh said, “I am going home.”… (Direct speech)
Ramesh said that he was going home. (Indirect speech)

यहाँ पहले वाक्य में Inverted Commas (“”) के भीतर वक्ता के कथन को ज्यों-का-त्यों उसी के शब्दों में रखा गया है। इसलिए यह Direct Narration में है। दूसरे वाक्य में वक्ता के कथन को उसके शब्दों में नहीं व्यक्त कर हमने अपने शब्दों में व्यक्त किया है, अतः यह Indirect Narration में है।

Direct Narration वाले वाक्य के दो हिस्से होते हैं। जो भाग Inverted commas के भीतर होता है उसे Reported speech तथा जो भाग बाहर होता है उसे Reporting verb कहा जाता है। लेकिन, Inverted commas के बाहर का सब हिस्सा verb नहीं है सिर्फ said ही . verb है।

Direct Speech से Indirect Speech में बदलने के नियम –

Rule (i) यदि Reporting verb Present या Future tense में हो तो Reported speech के tense में कोई परिवर्तन नहीं होता है; जैसे –

(a) He says, ” I want to play in the morning.”
He says that he wants to play in the morning.

(b) He will say, “I am listening to radio.”
He will say that he is listening to radio.

Rule (ii) यदि Reporting verb Past tense में है और Reported speech का Present या Future tense उसी form में Past tense में बदल जाता है ; जैसे –

(a) He said to me, “I am going home.”
He told me that he was going home.

(b) He said to me, “I shall help you”.
He told me that he would help me.

(c) The boy said to me, “I have come just now”.
The boy told me that he had come just then.

(d) He said, “I have been talking for two hours”.
He said that he had been talking for two hours.

(e) I said to him, “I am glad to see you here”.
I told him that I was glad to see him there.”

Rule (iii) यदि Reporting verb Past tense में हो और Reported speech में कोई Universal truth (शश्वत सत्य) हो तो Indirect Narration में उसका tense नहीं बदलता जैसे –

(a) He said, “The earth is round.”
He said that the earth is round.

(b) He said, “Man is mortal.”
He said that man is mortal.

ऊपर के दोनों वाक्यों में हम देखते हैं कि Indirect Narration में बदलने के बाद भी tense में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

Rule (iv) यदि Reporting verb Past tense में हो तथा Reported speech भी Past tense में हो तो Reported speech का Past indefinite Past perfect में बदल जाता है। Past continuous, Past perfect continuous में बदल जाता है । अर्थात् पहला form तीसरे form में चला जाता है और दूसरा form चौथे form में Past perfect और Past perfect continuous में कोई परिवर्तन नहीं होता; जैसे –

He said, “I went home yesterday.”
He said that he had gone home the previous day.
He said, “I saw him going to cinema yesterday.”
He said that he had seen him going to cinema the previous day.
He said to me, “I was playing cricket in the morning.”
He told me that he had been playing cricket in the morning.
I said to him, “I was listening to radio.”
I told him that I had been listening to radio.

Past perfect और Past perfect continuous Reported speech में रहने पर कोई परिवर्तन tense में नहीं होता है; जैसे –

He said, “I had met him long ago.”
He said that he had met him long ago.
He said, “I had been living in Patna for four years.”
He said that he had been living in Patna for four years.

जब Reporting verb Past tense में रहता है तब Reported speech में केवल verb का tense ही नहीं बदलता वरन् Reported speech में जिगने भी निकटतासूचक Verbs, Adjectives और Adverbs रहते हैं, उन्हें दूरीसूचक शब्दों में बदल दिया जाता है; जैसे –
Bihar Board Class 11 English Grammar Reported Speech 1
Bihar Board Class 11 English Grammar Reported Speech 2

Examples:
He said, “I will go tomorrow.”
He said that he vould go next day.
He said, “I have been living here since last night.”
He said that he had been living there since the previous night.

Special Rules

Special Rules : भिन्न-भिन्न प्रकार के वाक्यों के लिए भिन्न-भिन्न हैं।

Sentence कई तरह के होते हैं, जैसे-Assertive, Interrogative, Imperative, Optative और Exclamatory हैं Interrogative sentence को Indirect speech में नेम्नलिखित ढंग से बदला जाएगा :

Interrogative sentence में दो तरह से प्रश्न किए जाते हैं। कुछ प्रश्नों के आरम्भ में Auxiliary verbs रहते हैं और कुछ प्रश्नों में Question words रहते हैं।

1. सबसे पहले Auxiliary verbs.से आरम्भ होनेवाले प्रश्नवाचक वाक्यों को Indirect speech में बदलने के नियम –

Auxiliaries से शुरू होनेवाले Questions को Direct से Indirect speech में बदलते समय General rules के अनुसार Verb का tense तथा Pronoun का person आदि बदलने के बाद कछ और नियमों का पालन किया जाता है।
(i) Said को asked में बदल जाता है।
(ii)Reported speech को that से शुरू नहीं किया जाता है, बल्कि if या whether से शुरू किया जताा है।
(iii) If या whether के बाद subject और तब verb रखा जाता है अर्थात् Indirect Narration में Interrogative वाक्य Assertive हो जाता है।
(iv) प्रश्नवाचक चिह्न (Mark of Interrogation) को हटा दिया जाता है और प्रश्न के चिह्न की जगह Full stop दिया जाता है; जैसे –

He said to me, “Are you going away today?”
He asked me if I was going away that day.
He said to me, “Can you do the work ?”
He asked me if I could do the work.
He said to his friend, “Are you well today?”
He asked his friend if he was well that day.

Interrogrative sentences beginning with question words in reported speech –

कुछ Questions who, which, why, how, where, what से शुरू होते हैं ऐसे वाक्यों को Indirect speech में बदलने में if या whether नहीं लगता परन्तु said को asked में बदलना पड़ता है एक Conjunction की जगह उसी प्रश्न सूचक शब्द का प्रयोग होता है; जैसे –

He said, to me, “What are you doing?
He asked me what I was doing.
He said to his friend, “Where are you going ?”
He asked his friend where he was going.

ऊपर के वाक्यों को ध्यानपूर्वक देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इन वाक्यों में Inverted Commas का लोप तो हो गया है लेकिन That का प्रयोग नहीं किया गया है । Said को asked में बदल दिया गया है। यदि say रहे तो Present tense में ask या asks में बदल देते हैं।

2. Imperative Sentence को IndirectNarration में बदलने के नियम Imperative sentence से आदेश, प्रार्थना, विनती, सुझाव, सलाह, मनाही का भाव व्यक्त होता है।

Imperative sentence में व्यक्त भाव के अनुसार Reporting verb को order, request, ask, advise, forbid (मना करना) इत्यादि में बदल देते हैं।

Imperative verb को Infinitive verb में बदल देते हैं अर्थात् verb के Present form के पहले to लगा देते हैं। इसलिए इसमें that का प्रयोग नहीं होता है; जैसे –

He said to his servant, “Go away at once.”
He ordered his servant to go away at once.
He said to his friend, “Please lend me your pen.”
He requested his friend to lend him his pen.
The doctor said to the patient. “Take exercise daily.”
The doctor advised the patient to take exercise daily.
The father said to his son. “Do not live in bad compnay.”
The father forbade his son to live in bad company.
The teacher said to the boys. “Keep quiet.”
The teacher asked the boys to keep quiet.

3.Optative sentence को Indirect Narration में बदलने के नियम –

Optative sentence इच्छासूचक वाक्य May से शुरू होते हैं । इनसे कोई इच्छा (wish), आशीर्वाद (blessing), अभिशाप (curse), प्रार्थना (prayer) का भाव व्यक्त होता है। ऐसे वाक्यों में Reported speech में व्यक्त भाव के अनुसार Reporting verb को wish, curse, bless, pray इत्यादि में निम्नांकित तरीके से बदला जाता है। इसमें that का प्रयोग होता है; जैसे –

He said to me, “May you be happy !”
He wished that I might be happy.
He said to me, “May God bless you !”
He prayed that God might bless me.
He said to me, “May you live long !”
He wished that I might live long,
He said to him, “May you go to hell !”
He cursed him that he might go to hell.

4. Exclamatory Sentence को Indirect.Narration के बदलने के नियम –

Exclamatory sentence में किसी प्रबल आवेग (strong emotion) को अभिव्यक्ति होती है। यह आवेग हर्ष (joy), विषाद (sorrow), आश्चर्य (surprise), तिरस्कार (contempt), घृणा (hatred), प्रशंसा (applause) आदि का हो सकता है। ऐसे वाक्यों को Indirect speech में निम्नांकित ढंग से बदला जाता है –

(i) Said को Exclaimed में बदल देते हैं। Exclamatory sentence में व्यक्त भाव के अनुसार Exclaimed with joy, with sorrow, with wonder इत्यादि का प्रयोग करते हैं।
(ii) इसमें that का प्रयोग होता है
(iii) Exclamatory words जैसे – Ah, Hurrah, Alas, Fie को हटा देते हैं ।
(iv) Exclamation का चिह्न भी हटा देते है और Exclamatory sentence Assertive में बदल जाता है जैसे –

He said, “Hurrah ! we are going home.”
He exclaimed with joy that they were going home.
She said, “Alas ! I am ruined.”
She exclaimed with sorrow that she was ruined.
The teacher said to the boys, “Well done !”
The teacher exclaimed with 2dmiration that the boys had done well.
He said, “What a beautiful flower it is !”
He exclaimed with wonder that it was a very beautiful flower.

Good morning! Good evening ! Good bye ! Good night ! रहने पर said को bade में बदल देते हैं; जैसे –

He said to me, “Good morning !”
He bade me good morning.
He said, “Good bye my friends !”
He bade good bye to his friends.
He said to me, “Good night !”
He bade me good night.

Indirect speech में कभी Thank you! रहता है। ऐसी स्थिति में thank को Past tense में बदल देते हैं जैसे –

I said, “Thank you !”
I thanked him.

Sentences beginning with Let

Let से आरम्भ होनेवाले sentences से दो तरह के भाव व्यक्त होते हैं-प्रस्ताव का भाव और अनुमति का भाव । कहीं-कहीं इससे Command का भाव भी व्यक्त होता है।

जहाँ प्रस्ताव का भाव व्यक्त रहता है वहाँ said को proposed में बदल देते हैं और जहाँ अनुमति का भाव व्यक्त रहता है वहाँ said को requested में बदल देते हैं; यदि इससे command का भाव व्यक्त होता हो तो said को ordered में बदल देते हैं।

कुछ उदाहरणों को देखें –

Direct-He said to his friends. “Let us go home.”
Indirect—He proposed to his friends that they should go home. यहाँ प्रस्ताव है।
Direct-He said to the teacher, “Let me go home.”
Indirect-He requested the teacher to allow him to go home. इसमें अनुमति मांगी गई है।

नीचे command का भाव व्यक्त करनेवाले एक उदाहरण को देखें –
Direct-He said to his servant, “Let the boy go home.”
Indirect – He ordered his servant to let the boy go home.
कहीं-कहीं इससे Speaker की इच्छा का भी बोध होता है; जैसे –
Direct – He said, “Let her rest in peace.”
Indirect -He wished that she should rest in peace.
Direct – He said to me, “Let me help you.”
Indirect – He wished that he should help me.

Important Questions Solved

(A) Assertive Sentences

Rewrite the following into indirect form of speech :

  1. He said to her, “You were absent yesterday.” – He told her that she was absent previous day.
  2. He said, “It was nine days wonder.” – He said that it had been nine days wonder.
  3. The boy said to me. “You are my best friend.”- The boy told me that I was his (boy) best friend.
  4. The teacher said in the class, “India is an independent country.” – The teacher said in the class that India is an independent country.
  5. The teacher said, “The Ganga is a beautiful river.” – The teacher said that the Ganga is a beautiful river.
  6. The old man said. “The sun rises in the east.” – The old man said that the sun rise in the east.
  7. The teacher said, “The earth is round.” – The teacher said that the earth is round.
  8. The teacher said, “When the cat is away, the mice will play.” – The teacher said that when the cat is away mice will play.
  9. “I loved my father well” said the son. – The son said that he had loved his father well.
  10. The teacher said, “Honesty pays in the long run.” – The teacher said that honesty pays in the long run.
  11. Hermia siad, “I am going to leave Athens.” – Hermia said that she was going to to leave Athens.
  12. The sage told me, “No one can steal your knowledge.” – The sage told me that no one can steal my knowledge.

(B) Imperative Sentences

Change the following sentences into indirect speech :

  1. He said to me, ”Please give me a book. – He requested me to give him a book.
  2. She said to me. “Do not sit here.” – She forbade me to sit there.
  3. The teacher said to Gopal, “Bring a glass of water.” – The teacher asked Gopal to bring a glass of water.
  4. The mother said to her daughter, “Go to the market.” – The mother asked her daugher to go the market.
  5. He said to me, “go home.” – He asked me to go home.
  6. The student said to the teacher, “Please help me.” – The student requested the teacher to help him.
  7. The teacher said, “Sit down. boy.” – The teacher ordered the boy to sit down.
  8. The student said to the teacher, “Please allow me leave for two day.” – The student requested the teacher to allow him leave for two days.

(C) Interrogative Sentences

Change the following sentences into indirect speech :

  1. The poet said to the little girl, “Where are your brothers and sisters?” – The poet asked the little girls where her brothers and sisters were.
  2. The beggar said to me, “Will you lead me to the station ?” – The beggar asked me if I would lead him to the station.
  3. Ravi said to me, “Are you going to the market now?” – Ravi asked me if I was going to the market then.
  4. “Whom do you want”, He said to me. – He asked me as to whom I wanted.
  5. He said to me, “What do you want ?” – He asked me what I wanted.
  6. He said to us, “Do you know me ?” – He asked us if we knew him

(D) Optative Sentences

Change the following sentences into indirect speech :

1.(a)He said to me, “May you succeed?” – He wished that I might succeed.
(b) He said to me, “May you live long?” – He wished that I might live long.
(c) The father said to his son, “May God help you !” – The father prayed that God might help his son.
(d) He said, “May God pardon this sinner!” – He prayed that God would pardon that sinner.

2(a) The priest said to me, you live long !” – “May The priest wished that I might live long.
(b) He said to me, “May God Bless you !” – He prayed that God might bless me.
(c) He said to me, “May you be happy !” – He wished that I might be happy.
(d) I said to him, “May you be blessed with a son !” – I wished that he might be, blessed with a son.
(e) The saint said, “May God grant him a long life! – The saint prayed that God might grant him a long life.

(E) Exclamatory Sentences

Change the following sentences into indirect speech :

1.(a) The Poet said, “How beautiful is the moon !” – The poet exclaimed with aplarn that the moon was very beautiful.
(b) He said to Ram, “What a man he is !” – He exclaimed with surprise that he was a strange man.
(c) The players said, “Hurrah ! we have a great victory.” – The players exclaimed with joy that they had a great victory.
(d) He said to me, he is !” – “What a man He exclaimed that he was a wonderful man ?
(e) The farmer said, “What a loss !” – The farmer exclaimed with sorrow that it was a great loss.
(f) “What a clever disguise !” said the princess. – The princess exclaimed with wonder that it was a very clever dis guise

2.(a)The Principal said, “Well done, boys !” – The Principal admired the boys and exclaimed that they had done well.
(b) Sonu said, “What a beautiful sight it is!” – Sonu exclaimed with joy that it was a very beautiful sight.
(c) He said, “Good morning!” – He wished me good morning.
(d) He said, “How dark the night is !” – He exclaimed with surprise that the night was very dark.

3.(a) The girl said, “What a fine morning!” – The girl exclaimed that it was a very fine morning.
(b) He said, “What a fine place it is ?” – He exclaimed with wonder that it was fine morning.
(c) She said, “What a fool I am !” – She exclaimed with regret that she was a great fool.
(d) He said, “How clever I am!” – He exclaimed that he was very clever.

Miscellaneous Exercises Solved

Question 1.
Turn the following into Indirect Narration :-[Model Paper 2009 (A)]

  1. He says, “Ram will come tomorrow”
  2. He said to me, “You have never helped me”.
  3. They will say, “We are happy at the turn of events”

Answer:

  1. He says that Ram will come tomorrow.
  2. He told me that I had never helped him.
  3. They will say that they are happy at the turn of events.

Question 2.
Turn the following into Indirect Narration :-[Model Paper 2009 (A)]

  1. Ram said to me, “can you sing this song” ?
  2. The king said to the soldier, “Kill the enemy”.
  3. He said to Nehru, “May you like long”.

Answer:

  1. Ram asked me if I could sing that song.
  2. The king ordered the soldier to kill the enemy.
  3. He wished Nehru that he might live long.

Question 3.
Turn the following into Reported speech :- [Model Paper 2009 (A)]

  1. The teacher said, “The Earth moves round the sun.”
  2. She said to me, “I like music.”
  3. The examinar asked, “Have you read the text-book ?”

Answer:

  1. The teacher said that the Earth moves round the sun.
  2. She told me that she liked music.
  3. The examiner asked if they had read the text-book.

Question 4.
Change the following in Reported speech :- [Model Paper 2009 (A)]

  1. They said, “We are going to Rajgir on New Year’s Day.”
  2. The child said, “Two and two makes four.”
  3. I said to Moti, “When will the college reopen ?”

Answer:

  1. They said that they were going to Rajgir on New Year’s Day.
  2. The child said that two and two makes four.
  3. I asked Moti when the college would reopen.

Question 5.
Turn the following into Indirect speech :- [Model Paper 2009 (A)]

  1. He said, “Well, Ram, you did very well.”
  2. He said to me, “What are you doing these days ?”
  3. Radha said to me, “Do this work at once.”

Answer:

  1. He told Ram that he had done very well.
  2. He asked me what I was doing those days.
  3. Radha told me to do that work at once.

Question 6.
Turn the following in Indirect speech : [Board Exam. 2009 (Sc. & Com.]

  1. He said, “Let me sleep well tonight.”
  2. “What am I to do, sir?” said Rupesh.
  3. He said, “I shall go as soon as it is possible.

Answer:

  1. He wished that he should sleep well that night.
  2. Rupesh asked as to what he had to do.
  3. He told me that he would go as soon as it was possible.

We believe the information shared regarding Bihar Board Solutions for Class 11 English Poem Grammar Reported Speech Questions and Answers as far as our knowledge is concerned is true and reliable. In case of any queries or suggestions do leave us your feedback and our team will guide you at the soonest possibility. Bookmark our site to avail latest updates on several state board Solutions at your fingertips.

Bihar Board Class 11 English Grammar Combination of Sentences

Bihar Board Solutions for Class 11 English aids you to prepare all the topics in it effectively. You need not worry about the accuracy of the Bihar Board Solutions for Class 11 Book 50 Marks Solutions Grammar Combination of Sentences Questions and Answers as they are given adhering to the latest exam pattern and syllabus guidelines. Enhance your subject knowledge by preparing from the Chapter wise Bihar Board Class 11th English Book Solutions and clarify your doubts on the corresponding topics.

Bihar Board Class 11 English Grammar Combination of Sentences

(Conversion of Sentences)

एक Sentence (वाक्य) या Clause को तथा दूसरे sentence या clause को दूसरे वाक्य में बदलने की क्रिया को conversion of sentence कहते हैं।

Sentence और Clause में अन्तर

Sentence : A sentence is a group of words put together according to the rules of Grammar. A sentence has a subject and a finite verb.

शब्दों के किसी ऐसे समूह को वाक्य कहा जाता है जो अर्थ को पूर्ण रूप से स्पष्ट करता हो। वाक्य में एक कर्ता और एक क्रिया अवश्य रहती है।

जैसे – He went home yesterday.

Clause : A Clause is part of a sentence. एस शब्द समूह को clause (उपवाक्य __ या पद्) कहा जाता है जो किसी पूर्ण वाक्य का अंश हो तथा जिसका अपना अलग subject और predicate हो । जैसे – He is the man who is honest.

इसमें वाक्य (Sentence) में He is the man. एक clause हुआ और who is honest भी एक clause हुआ। दोनों clause मिलने पर एक वाक्य बना।

Kinds of Sentence –

Sentence के मुख्यतः चार भाग होते हैं –
(1) Simple Sentence
(2) Compound Sentence
(3) Complex Sentence
(4) Mixed Sentence

(1) Simple Sentence: जिस वाक्य का केवल एक ही Clause हो उसे Simple Sentence कहा जाता है, जैसे –
1. The boy broke his leg.
2. She washed her clothes.

(2) Compound Sentence: जिस वाक्य में दो या दो से अंधिक अनाश्रित उपवाक्य (Clauses) हों, उसे Compound Sentence कहा जाता है, उदाहरण के रूप में –
1. Sita saw Ram and she became happy.
2. You must work hard or you will fail.
3. Many were called, but few were chosen.
Compound Sentence के प्रत्येक Clause को Co-ordinate clause कहा जाता है।

(3) Complex Sentence (मिश्रित वाक्य): जिस वाक्य में एक मुख्य-वाक्य (Principal Clause) हो तथा एक या एक से अधिक आश्रित वाक्य (Subordinate Clauses) हों,

उसे Complex Sentence कहा जाता है। Principal Clause को Mair Clause भी कहा जाता है।

Sub-ordinate Clause को Dependent Clause भी कहा जाता है।

जैसे-The company that supplied goods has failed. यह complex sentence है ।

(4) Mixed Sentence: Mixed Sentence में कम-से-कम दो Principal Clause रहते हैं और कम-से-कम एक Subordinate Clause. इन नियमों का सदा ध्यान रखें –

  1. Simple Sentence – One Principal Clause.
  2. Compound Sentence – At least two Principal Clause.
  3. Complex Sentence – Principal Clause + Subordinate Clauses.
  4. Mixec Sentence – Compound + Subordinate Clause.

तो, इससे यह स्पष्ट है कि Simple Sentence को एक Mixed Sentence बनाने के लिए __ आपको उन्हीं नियमों की सहायता लेनी पड़ेगी जो Compound और Complex Sentence के सम्बन्धों में बताये गये हैं। आप Co-ordinating और Subordinating Conjunctions के द्वारा यह काम आसानी से कर सकते हैं, जिसकी चर्चा पहले ही हो गयी है।

Exercise

Combine each set of Simple Sentence into a Compound Sentence :

  1. He is rich. He leads an unhappy life.
  2. The train is about to leave. We should get into the train.
  3. He works in a college. He manages his farm.
  4. My marriage will take place in April. If it does not, it will take place in October.
  5. You must help him in his studies. If you don’t, he will fail.
  6. Kapil Dev is a good bowler. Kapil Dev is a good batsman.
  7. I will not go to Srinagar. I will not go to Bangalore.
  8. The day dawned. The birds began to chirp.
  9. Keep quiet. I shall turn you out of the room.
  10. We do not borrow money. We do not lend money.

Answers:

  1. He is rich but he leads an unhappy life.
  2. The train is about to leave, therefore, we should get into it.
  3. He both works in a college and manages his farm.
    Or,
    He not only works in a college but also manages his farm.
  4. My marriage will take place either in April or in October.
  5. You must help him in his studies, or otherwise) he will fail.
  6. Kapil Dev is both a good bowler and a good batsman.
    Or,
    Kapil Dev is not only a good bowler but also a good batsman.
  7. I will go neither too Srinagar nor to Bangalore.
  8. The day dawned and the birds began to chirp.
  9. Keep quiet, (or, otherwise) I shall turn you out of the room.
  10. We neither borrow nor lend money.

Simple Sentences into a Complex Senence

आप जानते हैं कि Complex Sentence में केवल एक ही Principal Clause होता है __ और उसमें कम-से-कम एक Subordinate Clause भी रहता है। इसलिए Simple Sentence को जोड़कर उन्हें एक Complex Sentence बनाते समय उसमें एक ही Principal Clause रखें और अन्य वाक्यों को Subordinate Clause का रूप दे दें।

Subordinate Clause तीन प्रकार के होते हैं –

  1. Noun Clause
  2. Adjective Clause
  3. Adverb Clause

ये तीनों प्रकार के Subordinate Clauses Relative Pronouns/Relative Adverbs/Subordinating Conjunctions से आरम्भ होते हैं जिनमें से मुख्य हैं –

that, who, which, what, because, since, so that, in order, that, as, as if, as soon as, though, before, after, if, when, where, till, until.

किस Subordinating Conjunction का प्रयोग कहाँ और कब होता है या (दूसरे शब्दों में) कब और कहाँ Noun Clause या Adjective Clause या AdverbClause का प्रयोग करके वाक्यों को Complex Sentence बनाया जाता है, यह वाक्यों के अर्थ पर ही निर्भर करता है। यह काम इन नियमों की सहायता से आसानी से कर ले सकते हैं –

How to Use Adverb Clause

Rule I. यदि वाक्यों से मालूम हो कि उनके बीच cause (कारण), condition (शर्त), – constrast (विरोध), compariso (तुलना), time (समय) या place (स्थान) का सम्बन्ध है, तो Adverb Clause के द्वारा वाक्यों को जोड़ना चाहिए इन्हें देखे –

1. He succeeded. He laboured hard.
Combined : He succeeded because he laboured hard.

2. He has been very unfortunate. He is always cheerful.
Combined : Though he has been very unfortunate, he is always cheerful.

3. He is a clever boy. No other boy in the class is more clever.
Combined : No other boy in the class is cleverer than he is.

4. You must sign your name. He will then agree to your terms.
Combined : He will agree to your terms, if you sign your name.

5. Men may sow much or little. They will reap accordingly.
Combined : Men will reap according as they sow much or little.

इन वाक्यों को Adverb Clauses के द्वारा जोड़कर Complex Sentence बनाये गये हैं। पहले दो वाक्यों में cause का सम्बन्ध है। इसलिए इन्हें because के द्वारा जोड़ा गया है। दूसरे दो वाक्यों के बीच contrast का सम्बन्ध है और तीसरे दो वाक्यों के बीच comparision का । अतः दूसरं दो वाक्यों को though के द्वारा और तीसरे दो वाक्यों को than के द्वारा जोड़ा गया है। चौथं दो वाक्यों से condition का बांध होता है। इसलिए इन्हें if के द्वारा जोड़ा गया है। . पाँचवें वाक्य सं manner बतलाया गया है। इसलिए इस according as के द्वारा जोड़ा गया है ।

Rule II. समय (time) का बोध करानेवाले वाक्यों को इनकी सहायता से जोड़ा जाता है-after, before, until.

इन वाक्यों को लें

1. He finished the work. Than he went out.
Answer:
He went out after he had finished the work

2. I wrote a letter. Then I read the newspaper.
Answer:
I read the newspaper after I had written a letter. Or, I had written a letter before I read the newspaper.

3. I finished the book. Then I went to bed.
Answer:
I went to bed after I had finished the book. Or, I had finished the book before I went to bed.

4. The bus stopped. Then I got off.
Answer:
I did not get off the bus until it stopped.

5. She finished the work. Then she went out.
Answer:
She did not go out until she finished the work.

इन नियमों का ध्यान रखें –

  1. पहले समाप्त होनेवाले कार्य के साथ before का प्रयोग होता है, पर बाद में समाप्त होनेवाले कार्य के साथ after आता है।
  2. Until से आरम्भ होनेवाले clause में not नहीं आता, पर Principal Clause में not का प्रयोग होता है।

How to Use Adjective Clause

1. Adjective Clause के द्वारा भी Simple Sentences को जोड़कर एक Complex Sentence बना जाता है। यदि वाक्य में किसी व्यक्ति या वस्तु की चर्चा हो जाए और अन्य वाक्यों में उसी के गुणों पर प्रकाश डाला जाय, तो Adjective Clause बनाने के लिए who, which, that, when या where का प्रयोग होता है; जैसे –

I suffered anxiety. The anxiety was extreme.
Combind : The anxiety that I suffered was extreme.

यहाँ पहले वाक्य में anxiety के विषय में बताया गया है और दूसरे में उसी पर और प्रकाश डाला गया है। इसलिए उन्हें Adjective Clause के द्वारा जोड़ा गया है। एक और उदाहरण लें –

A small house stood at the foot of the hill. We stayed there for the night.

Combined : We stayed for the night at a small house which stood at the foot of the hill.

यहाँ पहले वाक्य में house की चर्चा हुई है और दूसरे में उसी पर प्रकाश डाला गया है। (We stayed there for the night.)। इसलिए इन्हें भी Adjective Clause के द्वारा जोड़ा गया है।

इन वाक्यों को ध्यान से देखें –

1. He had received a good education. This raised him above many men.
Combined : The good education that he had received raised him above many men.

2. That is the house. He was born there.
Combined : That is the house where he was born.

3. This is the book. I wanted to buy it
This is the book that I wanted to buy.

4. Daniel came alive out of the den. In that den lion were kept.
Combined : Daniel came alive out of the den in which lions were kept.

Note : Who/Which/That के द्वारा जब Adjective Clause बनाया जाता है, तब इनका अर्थ हिन्दी में कोई भी ऐसे शब्द से होता है जो ‘ज’ से आरम्भ होता है; जैसे-‘जो’ ‘जिस’ आदि । विशेष जानकारी के लिए Analysis के अध्याय को देखें।

How to Use Noun Clause

Rule I. जब तक Simple Sentence के कथन (fact, opinion, belief, hope आदि) को दूसरे में स्वीकार (affirm) या अस्वीकार (deny) किया जाता है, तब ये that के द्वारा जोड़े जाते हैं। ऐसा that + clause होता है; Noun Clause और यह वाक्य हो जाता है Complex; जैसे –

(1) Better luck may be in store for us. We hope so.
Combined : We hope that better luck may be in store for us.

(2) He is honest. I know this.
Combined : I know that he is honest.

इन वाक्यों को ध्यान से देखें –

(1) He is honest. I do not doubt it.
Combined: I do not doubt that he is honest.

(2) He will come today. I am sure of it.
Combined: I am sure that he will come today.

(3) You have acted wrongly. I believe so.
Combined : I believe that you have acted wrongly.

(4) A lazy man injures no one but himself. This is not ture.
Combined : It is not true that a lazy man injures no one but himself.

(5) Someone has been making a great noise. I should like to know the person.

Combined : I should like to know who has been making a great noise.

Note :- ऐसे वाक्यों को जोड़ने पर it/this/that/so का लोप हो जाता है।

Rull II. Simple Sentence को इन शब्दों की सहायता से जोड़ा जाता है –

who, which, whom, whose, what, when, where, why, how, if, whether,

इन्हें जोड़ने पर who + clause/which +clause आदि Noun clasue होते हैं और पूरा वाक्य complex बन जाता है।

Assertive + Interrogative = Assertive + Assertive; जैसे –
1. I don’t know. Who is she? = I don’t know who she is.
2. I can’t say. Is he ill ? = I can’t say if/whether he is ill.

Imperative + Interrogative = Imperative + Assertive; जैसे –
1. Tell me, Where is he? = Tell me where he is.
2. Inform me. When will he come ? = Inform me when he will come.

Interorogative + Interrogative = Interrogative + Assertive;

1. Do you know? Why is she sad ?
= Do you know why she is sad ?

2. Can you tell me ? How have you come ?
= Can you tell me how you have come ?

Assertive + Exclamatory = Assertive + Assertive; जैसे –
1. How well he plays ! Nobody can believe.
= Nobody can believe how well he plays.

2. No one can imagine. What a great man he is!
= No one can imagine what a great man he is.

Assertive + Assertive = Assertive + Assertive; जैसे –

1. Somebody called me. I don’t know who.
= I don’t know who called me.

2. He will come. I can’t say when.
= I can’t say when he will come.

Rull III. जब एक Simple Sentence से प्रबल इच्छा का बोध होता है और दूसरे से इच्छापूर्ति का अभाव व्यक्त किया जाता है, तब इन्हें इस प्रकार जोड़ा जाता है –

Simple Sentence + [‘that’ understood] + Subject + Were + Other Words
Simple Sentence + [‘that’ understood) + Subject + Verb (Past Tense) + Other Words

Example

1. I wish to be a king. I am not a king.
Combined: I wish I were a king.

2. I wish to know him. I don’t know him.
Combined: I wish I knew him.

3. I wished to know him. I didn’t know him.
Combined : I wished I had known him.

Simple Sentence into Mixed Sentence

Mixed sentence में कम से कम दो Principle clause एवं एक या एक से अधिक sub-ordinate clauses होता है । जैसे –

We heard the sad news. We immediately started for the afficted house. There we found the mourners.

Combined : We heard the sad news and we immediately started for the afflicted house, where we found the mourners.- Mixed sentence.

Miscellaneous Exercised Solved

Question.
Combine the following sentences into a complex or Mixed Sentence :

1. He behaved prudently under the circumstances. Few men would have acted so prudently.
Combined : Few persons would have acted so prudently as he did under the circumstances.

2. His difficulties become greater and greater. He shows more and more energy
Combined : The greater his difficulties, the more energy he shows.

3. I will visit your house in June next. You have frequently asked me to do so. I will not disappoint you any longer.
Combined : I will visit your house in June next, as you have frequently asked me to do; and I will not disappoint you any longer.

4. The supply of pasture often runs short. The nomads of Tartary then shift their abode. They search for new pasture elsewhere.
Combined : When the supply of pasture runs short, the nomads of Tartary shift their abode in search of new pasture elsewhere.

5. We heard the sad news. We immediately started for the afficted house. There we found the moumers.
Combined : On hearning the sad news, we immediately started for the afficted house, where we found the mourners.

6. They spoke in defence of their absent friend. They could not have spoken better.
Combined : They could not have spoken better than they did in defence of their absent friend.

7. Combine the following sentences :- (Model Paper 2009 (A)]
(a) I am going to Kolkata. I am going by the evening train. The train leaves at 7:30 P.M.
Answer:
I am goin to Kolkata by the evening train leaving at 7:30 P.M.

8. Combine the following sentences : (Model Paper 2009 (A)]
(a) I went home. I talked to my parents.
(b) I missed the bus. I was late.
(c) You can take tea. You can take coffee.
Answer:
(a) I went home and talked to my parents.
(b) I missed the bus as I was late.
(c) You can take either tea or coffee.

9. Combine the following sentences into one : (Board Exam. 2009 (Arts))
He finished his work. He went to catch the train. He had to go to Mumbai.
Answer:
He finished his work and went to catch the train to go to Mumbai.

10. Identify the following sentences whether they are simple, compound or compler. [ Board Exam. 2009 ]
(a) You must work hard or you will fail.
(b) The company that supplied goods has failed.
(c) She washed her cloth.
Answer:
(a) Compound sentence
(b) Complex sentence
(c) Simple sentence.

11. Combin the following simple sentences into one complex sentence each : [ Model Paper 2009 (A) ]
(a) Where is the museum ? Can you tell me ?
(b) Dhoni will play to his potential. I know this.
(c) How to deal with the situation ? Can you tell me ?
Answer:
(a) Can you tell me where the museum is ?
(b) I know that Dhoni will play to his potential.
(c) Can you tell me how to deal with the situation ?

We believe the information shared regarding Bihar Board Solutions for Class 11 English Poem Grammar Combination of Sentences Questions and Answers as far as our knowledge is concerned is true and reliable. In case of any queries or suggestions do leave us your feedback and our team will guide you at the soonest possibility. Bookmark our site to avail latest updates on several state board Solutions at your fingertips.