Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

Bihar Board Class 11 History औद्योगिक क्रांति Textbook Questions and Answers

 

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

औद्योगिक क्रांति के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 History प्रश्न 1.
ब्रिटेन (इग्लैंड)1793 से 1815 तक कई युद्धों में लिप्त रहा। इसका ब्रिटेन के उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1793 से 1815 तक ब्रिटेन का फाँस के साथ लंबे समय तक युद्ध चलता रहा। इसके परिणामस्वरूप इंग्लैंड और यूरोप के बीच चलने वाला व्यापार छिन्न-भिन्न हो गया। विवश होकर इंग्लैंड को अपनी फैक्ट्रियों को बंद करना पड़ा। इससे बेरोजगारी बढ़ गई और रोटी, मांस जैसे आवश्यक खाद्य पदार्थों की कीमतें आकाश को छूने लगीं।

औधोगिक क्रांति के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 History प्रश्न 2.
नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्षिक लाभ क्या-क्या हैं?
उत्तर:
नहरों द्वारा भारी परिमाण वाले भार को ढोना सरल तथा सस्ता होता है। परंतु इसमें समय अधिक लगता है। माल को देश के भीतरी भागों में भी नहीं ले जाया जा सकता। इसके विपरीत रेल परिवहन द्वारा माल ढोने में कम समय लगता है। माल को देश के भीतरी भागों तक भी पहुँचाया जा सकता है।

औद्योगिक क्रांति प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 History प्रश्न 3.
इस अवधि में किए गए आविष्कारों की दिलचस्प विशेषताएँ क्या थी?
उत्तर:
इस अवधि के अधिकतर आविष्कार वैज्ञानिक ज्ञान के अनुप्रयोग की बजाय दृढ़ता, रूचि, जिज्ञासा तथा भाग्य के बल पर हुए।

  • कपास उद्योग क्षेत्र में जान के तथा जेम्स हारग्रीब्ज जैसे कुछ आविष्कारक बुनाई और बढ़ईगिरी से परिचित थे। परंतु रिचर्ड आर्कराइट एक नाई था और बालों की विग बनता था।
  • सैम्युअल क्रांपटन तकनीकी दृष्टि से कुशल नहीं था।
  • एडमंड कार्टराइट ने साहित्य; आयुर्विज्ञान और कृषि का अध्ययन किया था। प्रारंभ में उसकी इच्छा पादरी बनने की थी। वह यांत्रिकी के बारे में बहुत कम जानता था।
  • दूसरी ओर भाप के इंजनों के क्षेत्र में थॉमस सेवरी एक सैन्य अधिकारी था। इन सबमें अपने-अपने आविष्कार के प्रति कुछ संगत ज्ञान अवश्य था।

परंतु सड़क निर्माता जान मैकऐडम; जिसने व्यक्तिगत रूप से सड़कों की सतों का सर्वेक्षण किया था और उनके बारे में योजना बनाई थी; अंधा था। नहर-निर्माता जेम्स विंडले लगभग निरक्षर था। शब्दों की वर्तनी के बारे में उनका ज्ञान इतना कमजोर था कि वह ‘नौ चालन’ (Navigation) शब्द की सही वर्तनी कभी न बता सका। परन्तु उसमें गजब की स्मरण शक्ति और एकाग्रता थी।

औद्योगिक क्रांति के प्रश्न उत्तर Class 11 Bihar Board History प्रश्न 4.
बताइए कि ब्रिटेन के औद्योगीकरण पर कच्चे माल की आपूर्ति का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
आरंभ में ब्रिटेन के लोग ऊन और लिनन बनाने के लिए सन से कपड़ा बुना करते थे। सत्रहवीं शताब्दी से इंग्लैंड भारत से भारी मात्रा में सूती कपड़े का आयात करने लगा परंतु जब भारत के अधिकतर भागों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो गया.तब इंग्लैंड ने कपड़े के साथ-साथ कच्चे माल के रूप में कपास का आयात करना भी आरंभ कर दिया। इंग्लैंड पहुँचने पर इसकी कताई की जाती थी और उससे कपड़ा बुना जाता था।

अठारहवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में कताई का काम बहुत ही धीमी था। इसलिए कातने वाले दिन भर कताई के काम में लगे रहते थे, क्षेत्र में अनेक आविष्कार हो जाने के बाद कपास से धागा कातने और उससे कपड़ा बनाने की गति एकाएक बढ़ गई इस कार्य में और अधिक कुशतला लाने के लिए उत्पादन का काम घरों से हटकर फैक्ट्रियों अर्थात् कारखानों में चला गया।

Audyogik Kranti Ke Question Answer Bihar Board Class 11 History प्रश्न 5.
ब्रिटेन में स्त्रियों के भिन्न-भिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रांति का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति से स्त्रियों के जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े –
1. निर्धन वर्ग की स्त्रियाँ कारखानों में काम करने लगीं। उनसे 15-15 घंटे तक काम लिया रंत उन्हें मजदरी बहत ही कम दी जाती थी। कारखानों का वातावरण बहत ही दुषित तथा जोखिम भरा था। इसका स्त्रियों के स्वास्थय पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। उनकी मृत्यु बहुत ही कम आयु में हो जाती थी। अधिकांश बच्चे बीमार पैदा होते थे और पैदा होते ही मर जाते थे या फिर पाँच वर्ष की आयु तक ही पहुँच पाते थे।

2. मध्यम तथा धनी वर्ग की स्त्रियों को औद्योगिक क्रांति से लाभ पहुँच। उन्हें नई-नई उपभोक्ता वस्तुएँ तथा भोजन सामग्री मिलने लगी। परिवहन तथा संचार के साधनों में हुए आविष्कारों ने उनकी जीवन-शैली को ही बदल दिया। जीवन-स्तर दिन-प्रतिदिन ऊँचा होने लगा।

Audyogik Kranti Class 11 Question Answer Bihar Board History प्रश्न 6.
विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में रेलवे आ जाने से वहाँ के जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? तुलनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर:
रेलवे के आ जाने से औद्योगिक तथा साम्राज्यवादी देशों को लाभ पहुँच। अब वे अपने उपनिवेशों के भीतरी भगों तक जा कर वहाँ के संसाधनों का शोषण कर सकते थे और अपने उद्योगों का विस्तार कर सकते थे। इसके विपरीत उपनिवेशों के उद्योग धंधे नष्ट हो गए और उन्हें घोर निर्धनता का सामना करना पड़ा। आफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका के देश दास व्यापार का शिकार भी हुए।

Bihar Board Class 11 History औद्योगिक क्रांति Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

औद्योगिक क्रांति के कारणों की विवेचना कीजिए Bihar Board Class 11 History प्रश्न 1.
कृषि क्रांति की परिभाषा लिखों?
उत्तर:
18वीं शताब्दी में कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक तरीकों तथा नई-नई मशीनों के प्रयोग से अत्यधिक उन्नति हुई और उत्पादन बहुत अधिक बढ़ गया। इस प्रक्रिया को कृषि क्रांति का नाम दिया जाता है।

औद्योगिक क्रांति पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 History प्रश्न 2.
18वीं शताब्दी में कृषि क्रांति के दो कारण लिखो।
उत्तर:

  • कृषि के क्षेत्र में नई वैज्ञानिक खोजें हुई।
  • नई-नई मशीनों के प्रयोग से खेत जोतने तथा फसल काटने में कम समय लगने लगा। इससे कृषि उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई।

प्रश्न 3.
दो प्रमुख वैज्ञानिकों के नाम बताओं जिन्होंने कृषि क्रांति लाने में अपना योगदान दिया।
उत्तर:

  • जीथरो – टुल की वीट ड्रिल-इसने एक मशीन बनाई जिससे एक ही समय में बीज बोने तथा मिट्टी ढंकने का काम होता था।
  • राबर्ट वैस्टनर के कट क्राप सिस्टम से पशुओं के लिए चारा तथा खेतों के लिए खाद अधिक मात्रा में उपलब्ध होने लगी।

प्रश्न 4.
कृषि क्रांति के दो अच्छे प्रभाव बताओ।
उत्तर:

  • कृषि क्रांति के परिणामस्वरूप लोग बहुत धनी हो गये और उनका जीवन स्तर ऊंचा हो गया।
  • अब छोटे-छोटे किसानों का अंत हो गया और उनका स्थान बड़े-बडे किसानों ने ले लिया।

प्रश्न 5.
कृषि क्रांति के दो बुरे परिणाम बताओ।
उत्तर:

  • बड़े-बड़े जमींदार भूमिहीन किसानों का शोषण करने लगे। अतः खेतों में काम करने वाले मजदूरों की दशा बिगड़ गई।
  • घरेलू उद्योग धंधे नष्ट हो गये।

प्रश्न 6.
औद्योगिक क्रांति के दो सामाजिक प्रभाव बताएँ।
उत्तर:

  • औद्योगिक क्रांति के कारण समाज में दो वर्गों का उदय हुआ-पूंजीपति तथा मजदूर वर्ग।
  • अपने स्वार्थ के कारण पूंजीपति मजदूरों का शोषण करने लगे।

प्रश्न 7.
औद्योगिक क्रांति के दो आर्थिक प्रभाव बताएँ।
उत्तर:

  • औद्योगिक क्रांति के कारण बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो गई क्योंकि मनुष्य का काम अब मशीनें करने लगीं।
  • मजदूर वर्ग की आर्थिक दशा बिगड़ गई।

प्रश्न 8.
औद्योगिक क्रांति के पश्चात् मजदूरों की दशा सुधारने के लिये क्या पग उठाये गये? किन्ही दों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • फैक्टरी कानून पास किये गये तथा मजदूरों के काम करने का समय निश्चित किया गया।
  • निश्चित आयु से कम आयु के बच्चों को कारखानों में काम से रोक दिया गया।

प्रश्न 9.
किन्हीं दो महत्वपूर्ण कारणों का विवेचन कीजिए जिनके फलस्वरूप इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति हुई।
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति निम्नलिखित दो कारणों से सर्वप्रथम इंग्लैंड में ही हुई –
1. पूंजी की अधिकता – इंगलैंड में उद्योगपति तथा व्यापारी स्वतंत्र थे। वहाँ व्यापार-व्यवसाय पर कोई प्रतिबंध नहीं था। अत: उद्योगपति तथा व्यापारी काफी धनी थे और उनके पास नये कल-कारखाने लगाने के लिए काफी पुंजी थी।

2. प्राकृतिक संसाधन – इंग्लैंड प्राकृतिक संसाधनों में धनी था। कोयला तथा लोहा पर्याप्ता मात्रा में उपलब्ध थे और उनकी खाने पास-पास थीं।

प्रश्न 10.
भाप के इंजन ने उद्योग तथा यातायात के क्षेत्र में किस प्रकार क्रांतिकारी परिवर्तन किए?
उत्तर:
भाप के इंजन का आविष्कार 1769 ई. में जेम्स वाट ने किये। इसकी सहायता से वस्तुओं का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा और मशीनों की मांग बढ़ गई। भाप की शक्ति से चलने वाली मशीनें कई आदमियों का काम एक साथ करने लगीं। भाप के इंजन के कारण ही लोहा-इस्पात उद्योग का विकास हो सका।

1814 ई. में रेल द्वारा खानों से कोयला लाने के लिए भाप के इंजन का प्रयोग किया गया। तत्पश्चात् बड़े पैमाने पर रेल लाइनें बिछाइ जाने लगीं। ये लाइनें उद्योग के विकास में सहायक बनीं। अत: स्पष्ट है कि भाप इंजन से उद्योग तथा यातायात के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए।

प्रश्न 11.
औद्योगिक क्रांति का इंग्लैंड के श्रमिकों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति का इंग्लैंड के श्रमिकों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। स्त्रियों तथा बच्चों से भी काम लिया जाने लगा और उन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती थी। श्रमिकों को 15 से 18 घंटे तक काम करना पड़ता था। थकावट होने पर भी उन्हें आराम करने की अनुमति नहीं थी। उनके काम करने का स्थान भी बहुत गंदा होता था और उनकी सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं था। मजदूरों के रहने के मकान बहुत खराब थे। दुर्घटनाएँ, गेग महामारियाँ उनके दैनिक जीवन का अंग बन गयीं थी।

प्रश्न 12.
कारखाना पद्धति से आपका क्या अभिप्राय है? इस पद्धति के कारण जिस आर्थिक व्यवस्था का विकास हुआ, उसकी किन्ही दो विशेषताओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
‘कारखाना पद्धति’ से हमारा अभिप्राय उस पद्धति से है जिसके अंतर्गत साधारण औजारों, पशुओं तथा हाथ की शक्ति के स्थान पर नई मशीनों तथा भाप की शक्ति का अधिक – से – अधिक प्रयोग किया जाने लगा। उतपादन कार्य घरों की बजाए कारखानों में होने लगा। इस पद्धति से एक नवीन आर्थिक व्यवस्था का जन्म हुआ जिसकी दो विशेषताएँ निम्नलिखित थी –

1. करखानों के स्वामी (पूंजीपति) के पास काफी पूंजी होती थी और वह उन सब वस्तुओं का प्रबंध करता था जिनकी आवश्यकता मजदूरों को उत्पादन के लिए पड़ती थी। कारखाने की प्रत्येक वस्तु तथा निर्मित माल पर उसका पूर्ण अधिकार होता था।

2. मजदूर काम के बदले मजदूरी लेते थे। ये वे भूमिहीन किसान थे जो काम करने के लिए नगरों में आकर बस गए थे।

प्रश्न 13.
समाजवाद की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समाजवाद का नारा पूंजीवाद के विरुद्ध मजदूरों ने लगाया था। समाजवाद का उद्देश्य यह है कि समाज में धन का बँटवारा न्यायपूर्ण हो तथा निर्धनों और पूंजीपतियों में कोई भेदभाव न हो। कोई भी भूखा न रहे तथा प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताएँ पूरी हा सकें। समाजवाद का जन्म भी औद्योगिक क्रांति के कारण हुआ था।

प्रश्न 14.
औद्योगिक क्रांति ने साम्राज्यवाद को किस प्रकार जन्म दिया?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति के कारण इंग्लैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों को अपने उद्योग के लिए कच्चे माल तथा मॉडयों की आवश्कता थी। अतः इन देशों ने तैयार माल की खपत के लिए एशिया तथा अफौका में मंडियों की खोज आरंभ कर दी। वे कम उन्नत देशों में व्यापारियों के रूप में गए और समय पाकर वहाँ के शासक बन बैठे। उन्होंने खाली स्थनों पर बस्तियां बसाई और दूसरे क्षेत्रों में अपने अधिकार-क्षेत्र को बढ़ाया। शक्तिशाली देशों के ऐसे प्रयत्नों को ही साम्राज्यवाद कहते हैं।

प्रश्न 15.
मजदूर आंदोलन पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति के कारण समाज दो श्रेणियों में बँट गया। एक वर्ग पूंजीपतियों का था तथा दूसरा वर्ग निर्धन मजदूरों का। सरकार पर पूंजीपतियों का प्रभाव था। उन्होने मजदूर वर्ग की भलाई के लिए कोई विशेष सुविधाएँ न देने दौं। परंतु मजदूरों में चेतना आने लगी और वे काम करने की दशा में सुधार की माँग करने लगे। अपने संघर्ष को शक्तिशाली बनाने के लिए उन्होंने अपनी-अपनी यूनियनें (Unions) बनाई। इंग्लैंड में 1893 ई. में लेबर पार्टी की स्थापना की गई। धीरे-धीरे अन्य देशों में भी लेबर पार्टियों की स्थापना हो गई।

प्रश्न 16.
इंग्लैंड में होने वाली औद्योगिक क्रांति का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
इंग्लैंड में बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना से उत्पादन में वृद्धि हुई। शीघ्र ही इंग्लैंड समृद्धि देश बन गया। परंतु इंग्लैंड की यह समद्धि भारत के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप सिद्ध हुई। ज्यों-ज्यों इंग्लैण्ड के कारखानों में उत्पादन बढ़ने लगा त्यों-त्यों अंग्रेजों ने भारत का बुरी तरह आर्थिक शोषण करना आरंभ कर दिया। भारत के उद्योग नष्ट होते गए और बेकारी की समस्या बढ़ती गई। अंग्रजों ने भारत में नये उद्योगों की ओर कोई ध्यान न दिया। इसके अतिरीक्त उन्होंने भारत में तैयार होने वाले माल पर भारी कर लगा दिए। परिणामस्वरूप भारतीय योग पिछड़ गए।

प्रश्न 17.
अंग्रेजों की भारत पर विजय ने इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति की प्रगति में किस प्रकार सहायता प्रदान की?
उत्तर:
अंग्रेजों की भारत विजय ने इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति की प्रगति को महत्व पूर्ण सहायता पहुँचाई। निम्नलिखित तथ्य से यह बात स्पष्ट हो जाएगी

  1. भारतीय मंडियां अंग्रेजों द्वारा तैयार माल की सबसे बड़ी उपभोक्ता थीं।
  2. भारतीय धन निरंतर इंग्लैंड जाने लगा जिससे इंग्लैंड में और अधिक करखाने लगाए जाने लगे।
  3. भारत के माल की माँग कम हो गई, इसका लाभ भी अंग्रेजों को पहुंचा।
  4. भारत कच्चे माल की पूर्ति की दृष्टि से अंग्रेजी उद्योगों के लिए बड़ा साधन बन गया।
  5. आयत की अधिकता तथा निर्यात की कमी से भारतीयों के हितों को बहुत हानि पहुँची।

प्रश्न 18.
औद्योगिक क्रांति से उत्पन्न उन बुराइयों का वर्णन कीजिए। जिन्होंने आजकल की भांति नये तनाव और समस्याओ को जन्म दिया।
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति से निम्नलिखित बुराईयाँ उत्पन्न हुई –

  1. इससे उपनिवेशीकरण को बढ़ावा मिला और लोगों का शोषण हुआ।
  2. एशिया और अफ्रीका के लिए साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न हो गई। फलस्वरूप सामाज्यवादी शक्तियों में तनाव उत्पन्न हो गया।
  3. शहरों में जनसंख्या वृद्धि से स्वास्थ्य, सफाई और आवास संबंधी समस्याएँ जटिल होने लगी।

प्रश्न 19.
पूर्व औद्योगिक और औद्योगिक क्रांति के बाद उत्पादन के तरीकों की तुलना करें।
उत्तर:
पूर्व औद्योगिक क्रांति के काल में वस्तुओं का उत्पादन घरों में किया जाता था। इन वस्तुओं के निमार्ण के लिए पुराने ढंग के औजारों का प्रयोग किया जाता था। इनमें पंप, चरखा, कुदाल आदि प्रमुख थे। वस्तुओं का उत्पादन केवल घेरलू तथा स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही किया जाता था। औद्योगिक क्रांति के बाद वस्तुओं का निर्माण कारखानों में होने लगा। इसके अतिरिक्त वस्तुओं का निर्माण बड़े पैमाने पर किया जाने लगा। वस्तुओं का निर्माण करने के लिए मशीनों का प्रयोग किया जाने लगा।

प्रश्न 20.
18वीं शताब्दी में हुए मुख्य आविष्कारों को उनके आविष्कारकों के नाम सहित लिखों।
उत्तर:
18वीं शताब्दी में बहुत-से महत्वपूर्ण आविष्कार हुए। इनके आविष्कारों तथा तिथियों का वर्णन इस प्रकार है –
Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 21.
प्रथम औद्योगिक क्रांति से क्या अभिप्राय है।
उत्तर:
1780 के दशक और 1850 के दशक के बीच ब्रिटेन में उद्योगों और अर्थव्यवस्था – का जो रूपातंरण हुआ उसे ‘प्रथम औद्योगिक क्रांति के नाम से पुकारा जाता है । इस क्रान्ति के ब्रिटेन पर दूरगामी प्रभाव पड़े।

प्रश्न 22.
‘औद्योगिक क्रांति’ शब्द का प्रचलन कैसे हआ?
उत्तर:
‘औद्योगिक क्रांति’ शब्द का प्रयोग यूरोपीय विद्वानों द्वारा किया। गया। इनमें फ्रांस के जर्जिस मिशले और जर्मनी के फ्रॉइड्रिक एंजेल्स शामिल थे। अंग्रेजी में इस शब्द का प्रयोग। सर्वप्रथम दर्शनिक एवं अर्थशास्त्री ऑरनॉल्ड टॉयनबी द्वारा उन परिवर्तनों के लिए किया गया जो ब्रिटेन के औद्योगिक विकास में 1760 और 1820 के बीच हुए थे।

प्रश्न 23.
दूसरी औद्योगिक क्रांति क्या थी?
उत्तर:
दूसरी औद्योगिक क्रांति लगभग 1850 के बाद आई। इस क्रांति द्वारा रसायन तथा बिजली जैसे नए औद्योगिक क्षेत्रों का विस्तार हुआ। इस दौरान, ब्रिटेन जो पहले विश्व में औद्योगिक शक्ति के क्षेत्र में अग्रणी था, पिछड़ गया। अब जर्मनी तथा संयुक्त राज्य अमेरिका उससे आगे निकल गए।

प्रश्न 24.
1750 से 1800 ई. के बीच यूरोप की जनसंख्या का मुख्य पहलू क्या था?
उत्तर:
1750 से 1800 के बीच यूरोप के उन्नीस शहरों की जनसंख्या दोगुनी हो गई थी। इसमें से ग्यारह शहर ब्रिटेन में थे। इन ग्यारह शहरों में लंदन सबसे बड़ा था। शेष बड़े-बड़े शहर भी लंदन के आस-पास ही स्थित थे।

प्रश्न 25.
इंग्लैंड में मशीनीकरण तथा उद्योग के काम आने वाले कौन कौन से खनिज उपलब्ध थे?
उत्तर:
इंग्लैंड में मशीनीकरण के लिए आवश्यक कोयला और लौह-अयस्क पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थे। इसके अतिक्ति वहाँ उद्योग में काम आने वाले अन्य खनिज जैसे-सीसा, ताँबा और. राँगा (टिन) भी खूब मिलते थे।

प्रश्न 26.
लोहा-प्रगलन के लिए काठकोयले के प्रयोग की क्या समस्याएँ थीं?
उत्तर:
लोहा-प्रगलन के लिए काठकोयले के प्रयोग की निम्नलिखित समस्याएँ थीं –

  1. काठकोयला लंबी दूरी तक ले जाते समय टूट जाता था।
  2. इसकी अशुद्धियों के कारण घटिया किस्म के लोहे का ही उत्पादन होता था।
  3. यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं था क्योंकि लकड़ी के लिए वन काट लिए गए थे।
  4. यह उच्च तापमान भी उत्पन्न नहीं कर सकता था।

प्रश्न 27.
जॉन विल्किसन ने लोहे का उपयोग किस-किस काम के लिए किया?
उत्तर:

  1. उसने सर्वप्रथम लोहे की कुर्सियाँ तथा शराब की भट्टियों के लिए टकियों बनाई।
  2. उसने भिन्न-भिन्न आकार की पाइपें भी बनाई। उसके द्वारा ढलवां लोहे से बनाई गई एक पाइप 40 मील लंबी थी जिसके द्वारा पेरिस को पानी की आपूर्ति की जाती थी।

प्रश्न 28.
ब्रिटेन के औद्योगीकरण में भाप की शक्ति का क्या महत्व था?
उत्तर:

  1. भाप की शक्ति उच्च तापमान पर दबाव उत्पन्न करती है जिससे अनेक प्रकार की मशीनें चलाई जा सकती थी।
  2. भाप की शक्ति ऊर्जा का ऐसा स्रोत थी जो भरोसे मंद और कम खर्चीली थी।

प्रश्न 29.
थॉमस न्यूकॉमेन ने भाप का इंजन कब बनाया? इसमें क्या कमी थी?
उत्तर:
थॉमस न्यूकॉमेन ने भाप का इंजन 1712 में बनाया। इसमें सबसे बड़ी कमी यह थी कि संघनन बेलन (कंडेसिंग सिलिंडर) के लगातार ठंडा होते रहने से इसकी ऊर्जा समाप्त होती रहती थी।

प्रश्न 30.
कपड़े के उद्योग में आधुनिक युग के आरंभ में किस तरह से क्रांति आई? किन्ही दो मशीनों के नाम लिखो।
उत्तर:
आधुनिक युग के आरंभ में कई आविष्कार हुए जिन्होंने कपड़े की कताई तथा बुनाई के काम को सरल बना दिया। इससे कपड़ा उद्योग में क्रांति आई।

मशीनें – कपड़ा उद्योग में क्रांति लाने वाली दो मशीनें थीं।

  • उड़न शटल (Flying Shuttle)
  • पावर लूम।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ब्रिटेन के लिए कपास उद्योग का क्या महत्व था?
उत्तर:
ब्रिटेन में कपास का उत्पादन नही होता था। फिर भी 1780 के दशक से कपास उद्योग ब्रिटिश औद्योगिकरण का प्रतिक बन गया। इस उद्योग की दो प्रमुख विशेषताएँ थीं जो अन्य उद्योग में भी दिखाई देती थीं

  • कच्चे माल के रूप में आवश्यक समस्त कपास का आयात करना पड़ता था।
  • तैयार कपड़े का अधिकांश भाग निर्यात किया जाता था।

इस संपूर्ण प्रक्रिया के लिए इंग्लैंड के पास अपने उपनिवेश का होना आवश्यक था ताकि इन उपनिवेशों से भरपर मात्रा में कपास मंगाई जा सके और फिर इंग्लैंड में उससे कपड़ा बनाकर उन्हीं उपनिवेशों के बाजारों में बेचा जा सके। इस प्रक्रिया ने सम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। यह उद्योग मुख्य रूप से कारखानों में काम करने वाली स्त्रियों तथा बच्चों पर निर्भर था।

प्रश्न 2.
18वीं शताब्दी तक ब्रिटेन में प्रयोग में लाने योग्य लोह की क्या समस्या थी? धमनभट्टी के आविष्कार ने इस समस्या का समाधान कैसे किया?
उत्तर:
18वीं शताब्दी तक ब्रिटेन में प्रयोग में लाने योग्य लोहे की कमी थी। लोहा-प्रगलन (smelting) की प्रक्रिया द्वारा किया जाता था। इस प्रक्रिया के लिए काठ कोयले (चारकोल) का प्रयोग किया जाता था। इसके कारण अच्छा लोहा प्राप्त नहीं था क्योंकि काठकोयला उच्च तापमान उत्पन्न नहीं कर पाता था।

धमनभट्टी के आविष्कार ने धातुकर्म उद्योग में क्रांति ला दी। इसका आविष्कार 1709 में प्रथम अब्राह डवी ने किया। इसमें सर्वप्रथम ‘कोक का इस्तेमाल किया गया। कोक में ताप उत्पन्न करने की शक्ति थी। इसे पत्थर के कोयले से गंध तथा अपद्रव्य निकालकर तैयार किया जाता था। इस आविष्कार के बाद भट्ठियों को काठकोयले पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। इन भट्ठियों से निकालने वाले पिघले लोहे से पहले की अपेक्षा अधिक बढिया और लंबी ढलाई की जा सकती थी।

प्रश्न 3.
1830 ई. तक ब्रिटेन में नहरों के विकास का विवरण दीजिए।
उत्तर:
प्रारंभ में नहरें कोयले को शहरों तक ले जाने के लिए बनाई गईं। इसका कारण यह था कि कोयले को उसके परिमाण और भार के कारण सड़क मार्ग से ले जाने में बहुत अधि क समय लगता था और उस पर खर्च भी अधिक आता था। इसके विपरीत उसे बजारों में भरकर नहरों के द्वारा ले जाने में समय ओर खर्च दोनों की बचत होती थी। औद्योगिक ऊर्जा और घरेलू रूपयोग के लिए कोयले की माँग निरंतर बढ़ती जा रही थी।

इंग्लैंड में पहली नहर ‘वर्सली कैनाल’ 1761 में जेम्स, ब्रिडली द्वारा बनाई गई। इसका उद्देश्य वर्सले (मैनचेस्टर के पास) के कोयला भंडारों से शहरों तक कोयले ले जाना था। इस नहर के बन जाने के बाद कोयले का मूल्य घटकर आधा रह गया क्योंकि उसकी ढुलाई का खर्च बहुत कम हा गया था।

नहरें प्राय: बड़े-बड़े जमींदारों द्वारा अपनी जमीनों पर स्थित खानों, खदानों या जंगलों का मूल्य बढ़ाने के लिए बनाई जाती थीं। नहरों के आपस में जुड़ जाने से नए-नए शहरों में बजार-केंद्र स्थापित हो गए। उदाहरण के लिए बर्मिघम शहर का विकास केवल इसीलिए तेजी से हुआ क्योंकि वह लंदन, ब्रिस्टल चैनल और मरसी तथा हंबर नदियों के साथ जुड़ी नहर प्रणाली के मध्य में स्थित था।

प्रश्न 4.
1842 के सर्वेक्षण से ब्रिटेन में लोगों की जीवन-अवधि तथा मौतों के बारे में क्या नए तथ्य सामने आये?
उत्तर:
1842 में किए गए एक सिर्वेक्षण से पता चला कि कारखानों में काम करने वाले वेतन भोगी मजदूरों के जीवन की औसतन अवधि शहरों में रहने वाले सामाजिक समूहों के जीवनकाल से कम है। बर्मिघम में यह केवल 15 वर्ष, मैनचेस्टर में 17 वर्ष तथा डी में 21 वर्ष थी। नए औद्योगिक नगरों में गाँव से आकर रहने वाले लोग ग्रामीण लोगों की तुलना में काफी छोटी आयु में मर जाते थे। वहाँ पैदा होने वाले बच्चों में से आधे बच्चे पाँच साल की आयु प्राप्त करने से पहले ही चल बसते थे। शहरों की जनसंख्या में वृद्धि नए पैदा हुए बच्चों से नहीं, बल्कि बाहर से आकर बसने वाले नए लोगों से ही होती थी।

मौतें प्रायः जल प्रदूषण तथा वायु प्रदूषण से पैदा होने वाली महामारियों के कारण होती थीं। उदाहरण के लिए 1832 में हैजे का भीषण प्रकोप हुआ। इसमें 31,000 से भी अधिक लोग मौत का शिकार हो गए। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों तक स्थिति यह थी कि नगर-प्राधिकारी जीवन की इन भंयकर परिस्थितियों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे। चिकित्सकों या अधिकारियों को इन बीमारीयों के निदान और उपचार के बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी।

प्रश्न 5.
क्या औद्योगिक क्रांति को ‘क्रांति’ कहना उचित है? तर्क दीजिए।
उत्तर:
औद्योगीकरण की क्रिया इनती धीमी गति से होती रही कि इसे ‘क्रांति’ कहना ठीक नहीं होगा। इसके द्वारा पहले से ही विद्यमान प्रक्रियाओं को ही आगे बढ़ाया गया। इस प्रकार फैक्ट्रियों में श्रमिकों का जमावड़ा पहले की अपेक्षा अधिक हो गया और धन का प्रयोग भी पहले से अधिक व्यापक रूप से होने।

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ होने के काफी समय बाद तक भी इंग्लैंड के बड़े-बड़े क्षेत्रों में कोई फैक्टरी या खान नहीं थी। इंग्लैंड में परिवर्तन भी क्षेत्रीय तरीके से हुआ। यह मुख्य रूप से लंदन, मैनचेस्टर, बर्मिघम या न्यूकासल नगरों के चारों ओर ही था, न कि संपूर्ण देश में। इसलिए ‘क्रांति’ शब्दों को अनुपयुक्त माना गया।

प्रश्न 6.
औद्योगिक क्रांति से क्या अर्थ है? इसके मुख्य लक्षणों की चर्चा करें।
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति का अर्थ उन परिवर्तनों से है, जिनके कारण इंग्लैंड की उत्पादन प्रणाली का रूप बिल्कुल बदल गया। इस क्रांति के मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित थे – 1760 तथा 1820 ई. के बीच इंग्लैंड की प्रत्येक औद्योगिक शाखा में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए। बड़े-बड़े कारखानों में मशीनों की शक्ति के साथ बहुत अधिक संख्या में वस्तुएँ तैयार होने लगीं। इससे पहले घरेलू उद्योग धंधो के ढंग से ही घरों में हाथों से बहुत थोड़ी संख्या में सामान तैयार किया जाता था। .

प्रश्न 7.
औद्योगिक क्रांति ने मजदूरों पर क्या प्रभाव डाला? कोई चार-बातें बताएँ।
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति का मजदूरों की दशा पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।

  1. उन्हें प्रतिदिन 15 से 18 घंटे काम करना पड़ता था। थकावट होने पर भी उन्हें आराम करने की आज्ञा नहीं थी।
  2. उनके काम करने का स्थान भी बहुत गंदा होता था और उनकी सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं था।
  3. मजदूरों के रहने के मकान बहुत खराब थे। दुर्घटनाएं, रोग और महामारियाँ उनके दैनिक जीवन का अंग बन गई थीं।
  4. स्त्रियों तथा बच्चों से भी काम लिया जाता था और उन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती थी।

प्रश्न 8.
औद्योगिक क्रांति के सामाजिक परिणाम बताएँ। इस क्रांति ने किन-किन सामाजिक समस्याओं को जन्म दिया?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति से इंग्लैंड विश्व का सबसे धनी देश बन गया। उसकी राष्ट्रीय आय में विदेशी व्यापार से काफी वृद्धि हुई। बड़े-बड़े नगर मानचैस्टर, लंकाशायर, शैफील्ड इसी क्रांति की देन हैं। कृषि प्रणाली में नवीन वैज्ञानिक औजार, प्रयोग किए जाने लगे। इस क्रांति के बुरे प्रभाव पड़े, और कुटीर उद्योग नष्ट हो गए और देश में बेकारी बढ़ गई। इसके अतिरिक्त मजदूर और पूंजीपति वर्ग में संघर्ष आरंभ हुआ।

क्रांति के कारण छोटे-छोटे किसान गाँवों को छोड़ कर नगरों में मजदूरी के लिए जाने लगे। फलस्वरूप आवास, स्वास्थ और सफाई की जटिल समस्याएँ सामने आई। करखानों में स्त्रियों तथ बच्चों से काम लिया जाने लगा जिसके फलस्वरूप मनुष्य में नैतिक पतन और शारीरिक एवं मानसिक विकास में बाधा पड़ी।

प्रश्न 9.
आवागमन के साधनों में हुए नये आविष्कारों की जानकारी दें।
उत्तर:
1750 से 1903 ई. तक आवागमन के क्षेत्र में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए। इन परिवर्तनों का श्रेय नये अविष्कारों तथा उनके आविष्कारकों को जाता है। इन आविष्कारों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –

  1. सड़के – स्काटलैंड के इंजीनियर जान मैकऐडम ने छोटे पत्थरों की सहायता से मजबूत सड़के बनाई। इंग्लैंड में ऐसी : नेक सड़कों का निमार्ण हुआ।
  2. लहरें – ‘जेम्स ब्रिडले’ (james Brindley) ने बहुत सी नहीरों का निमार्ण करवाया। अब बर्मिघम, लंदन, लिवरपूल ओर मानचैस्टर के नगर नहरों द्वारा एक दूसरे से जुड़ गए।
  3. रेल इंजन – 1802 ई. ‘ट्रेवीथिक’ (Trevithick) ने प्रथम लोकोमोटिव इंजन की खोज की। 1814 ई. में जॉर्ज स्टीफैन्सन ने राकेट नाम के स्टीम इंजन का आविष्कार किया। 1825 – ई. में पहली रेलगाड़ी चली।
  4. स्टीम शिप्स – अमेरिका वैज्ञानिक ‘राबर्ट फुलटोन’ (Robert Fulton) ने 1807 ई. में एक ‘भाप वाली बोट’ की खोज की। 1825 ई. में प्रथम स्टीमशिप ‘ग्लोसगो’ से ‘लिवरपूल’ तक गया। 1833 ई. ग्रेट वैस्टर्न नामक जहाज ने 15 दिन में अटलांटिक सागर को पार किया।
  5. मोटर – कार-19वीं शताब्दी के अंत में एक जर्मन इंजीनियर ने पेट्रॉल से चलने वाली मोटर-कार का आविष्कार किया।

प्रश्न 10.
उन पाँच महत्वपूर्ण कारणों का वर्णन करें जिनके कारण इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति आरंभ हुई।
उत्तर:
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के आरंभ होने के पाँच मुख्य कारण इस प्रकार हैं –

  1. पूंजी की अधिकता – इंग्लैंड ने विदेशी व्यापार द्वारा भारी मात्रा में पूंजी जमा कर ली थी। इंग्लैंड के व्यापारी काफी धनी थे और अपनी पुंजी अद्योगों में लगा सकते थे।
  2. कच्चे माल की सुलभता – इंग्लैंड को अपने उपनिवेशों से कारखानों के लिए कच्चा माल आसानी से मिल जाता था।
  3. भूमिहीन बेरोजगारी – कृषि क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड में भूमिहीन बेरोजगार लोगों की संख्या काफी बढ़ गई थी। ये लोग कम मजदूरी पर कारखानों में काम करने को तैयार थे।
  4. लोहे तथा कोयले के भंडार – इंग्लैंड में पर्याप्त मात्रा में लोहे और कोयले के भंडार उपलब्ध थे। ये भंडार पास-पास मिलते थे जिससे उद्योग स्थापित करने में आसानी हो गई।
  5. नवीन आविष्कार – इसी समय इंग्लैंड में अनेक तकनीकि आविष्कार हुए। भाप से चलने वाली रेलें, भाप के इंजन तथा भाप के जहाजों का निर्माण होने से उद्योगों में तीव्र परिवर्तन होने लगे।

प्रश्न 11.
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैंड में औद्योगिक क्षेत्र में तीव्र परिवर्तन हुए। इसे इतिहास में औद्योगिक क्रांति का नाम दिया गया है। इस क्रांति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  1. औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैंड में आई। इंग्लैंड के पास कच्चा माल भी था और तैयार माल को बेचने के लिए मंडियाँ भी थीं। ये सभी तत्व यूरोप के किसी अन्य देश में एक साथ विद्यमान नहीं थे।
  2. घरेलू व्यवस्था का स्थान कारखाना प्रणाली ने ले लिया। बड़े-बड़े नगर बस गए और करखाने स्थापित हुए। नगरो में काम मशीनों से होने लगा।
  3. क्रांति का आधार वे मशीनें थीं जिनके कारण कपड़ा उद्योग के उत्पाद में आश्चर्यजनक उन्नति हुई। हारग्रीब्ज और आकराइट की मशीनों ने क्रांति पैदा कर दी। यातायात के साधनों का विकास हुआ और खानों के काम में सुधार किया गया।
  4. इंग्लैंड की अर्थ-व्यवस्था कृषि पर आधारित न रहकर उद्योगों पर निर्भर हो गई। कृषक कारखाना मजदूर बन गए।
  5. आगागिक क्रांति के परिणामस्वरूप मजदूरो की दशा बड़ी शोचनीय हो गई। उन 15 से 18 घंटे तक काम लिया जाने लगा।
  6. उनकी बस्तियाँ प्रायः रोगों और महामारियों का शिकार बनी रहती थीं।

प्रश्न 12.
औद्योगिक क्रांति के मुख्य परिणामों का उल्लेख करो।
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति के बड़े महत्वपूर्ण परिणाम निकले जिनका वर्णन इस प्रकार है –

  1. औद्योगिक क्रांति के कारण उद्योग, घरों के स्थान पर, करखानों में चलने लगे। फलस्वरूप वे लोग जो घरों में छोटे-छोटे उद्योग चलाते थे, उन्हें अपने उद्योग बंद कर करखानों में मजदूरी करनी पड़ी।
  2. औद्योगिक क्रांति से पूर्व गाँवों की अधिकांश जनता कृषि पर निर्भर थीं। लोगों की प्रायः सभी आवश्यकताएँ गाँवों में ही पूरी हो जाती थी। परंतु अब नगर आर्थिक जीवन के केन्द्र बन गए और गाँवों के किसान गाँव छोड़कर नगरों में जा बसे। इस प्रकार अधिकांश जनता का भूमि से कोई संबंध न रहा।
  3. नगरों में जनसंख्या की वृद्धि हो जाने से आवास, स्वास्थ और सफाई की समस्याएँ उत्पन्न हो गई।
  4. औद्योगिक क्रांति से उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि हुई। फलस्वरूप वस्तुएँ सस्ती हो गई।
  5. कारखानों में श्रमिकों को दूषित वातावरण में रहकर कई-कई घंटो तक लगातार काम करना पड़ता था। परंतु उनके वेतन बहुत ही कम थे। परिणामस्वरूप श्रमिकों की दशा अत्यंत शोचनीय हो गई।
  6. औद्योगिक क्रांति के कारण लगभग सारा लाभ पूंजीपतियों अथवा उद्योगपतियों की जेब में जाने लगा। फलस्वरूप पूंजीवाद की भावना को बल मिला।
  7. औद्योगिक क्रांति के कारण ही बाद में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और सामजवाद का उदय हुआ।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित का अर्थ समझाएँ औद्योगिक क्रांति, पूंजीवाद, सम्राजवाद, संरक्षी आयात कर, अहस्तक्षेप का सिद्धांत।
उत्तर:
1. औद्योगिक क्रांति – विषय-परिचय में पढ़े।

2. पंजी – पूंजी से हमारा अभिप्राय उस धनराशि से है जिसकी सहायता से कारखाने स्थापित किये जाते हैं तथा मशीनें, औजार और कच्चा माल खरीदा जाता है और तैयार माल को बेचने का प्रबंध किया जाता है।

3. पूंजीवाद – अर्थ-व्यवस्था में कारखानों, मशीनों तथा उत्पादन के साधनों पर पुंजीपतियों का अधिकार होता है, उसे पूंजीवाद कहते हैं। इसमें उत्पादन मुनाफा कमाने के लिए होक्त है।

4. समाजवाद – जिस व्यवस्था में मशीनों, कारखानों तथा उत्पादन के साधनों पर पूंजीपतियों का अधिकार होने की बजाय समाज या सरकार का अधिकार होता है उसे समाजवाद कहा जाता है। समाजवाद में वस्तुओं का उत्पादन पूरे समाज की भलाई के लिए किया जाता है।

5. संरक्षी आयात कर – जो कर विदेश से आने वाली वस्तुओं पर लगाया जाता है, उसे संरक्षी आयात कर कहते हैं। इस कर का उद्देश्य देश के उद्योगों को संरक्षण प्रदान करना होता है।

6. हस्तक्षेप का सिद्धांत – देश की सरक’ द्वारा व्यापार तथा उद्योगों में हस्तक्षेप। करने की निति का अहस्तक्षेप का सिद्धांत कहते हैं। इसी सिद्धांत का प्रतिपादन 1762 ई. में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ (Adam Smith) ने किया था।

प्रश्न 14.
औद्योगिकीकरण के लिए कौन सी परिस्थितियाँ बहुत अनुकूल हैं?
उत्तर:
औद्योगिकीकरण के लिए प्रायः ‘म’ अथवा M का होना आवश्यक है। ये हैं – मुद्रा (Money), माल (Material), मशीन (Machine), मंडी (Market), मनुष्य (Man)| कारखाने लगाने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। मशीनें पैसे से ही खरीदी जा सकती हैं। कच्चे माल की समीपता भी औद्योगिकरण के लिए बड़ी सहायक सिद्ध होती है। यदि माल दूर से लाना पड़ेगा, तो निर्मित वस्तुएँ महंगी पड़ेगी। तैयार माल की खपत के लिए मंडियों का होना बड़ा आवश्यक है और इन सबसे आवश्यक है-मनुष्य, जो माल तैयार करने और उसे खपाने में बड़ा सहायक सिद्ध होता है।

प्रश्न 15.
औद्योगिक क्रांति के कारण कच्चे मालों और बाजार की आवश्यकता हुई। इस प्रकार राष्ट्र एक दूसरे पर काफी निर्भर हो गये।” इस कथन के पुष्टी मे उदाहरण दो।
उत्तर:
कारखानों में मशीनों को चलाने के लिए कच्चे माल की आवश्यकता होती है। इसके साथ-साथ तैयार माल को बेचने के लिए मंडिया भी होनी चाहिए। अत: कच्चे माल खरीदने तथा तैयार माल बेचने के लिए राष्ट्र को एक दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के लिए इंग्लैंड अपने कारखाने चलाने के लिए भारत से रूई मंगवाता था और फिर तैयार माल दूसरे देशों के बाजारों में भेजता था। इसी प्रकार भारत पटसन के कारखानों के लिए आज बंग्ला देश से पटसन मंगवाता है और तैयार माल अन्य देशों में भेजता है।

प्रश्न 16.
जब औद्योगिक क्रांति फैली तब औद्योगिक नगरों और कारखानों की जो दशा थी, उसका वर्णन करें।
उत्तर:
औद्योगिक नगरों की दशा-इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति आने के कारण नगरों की दशा बड़ी शोचनीय हो गई। इन नगरों में कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की एक बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई जिसके परिणामस्वरूप वहाँ पर आवास, स्वास्थ्य आदि की समस्याएँ जटिल हो गई। नगरों में मजदूर गंदी बस्तियों में रहते थे। इन बस्तियों में गंदे पानी को निकालने की कोई व्यवस्था नहीं थी। अत: इनमें प्रायः मलेरिया तथा हैजा फूट पड़ता था जसके कारण कितने ही मजदूरों की मृत्यु हो जाती थी।

कारखानों की दशा-कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं था। वहाँ पर मशीनों के चारों ओर जंगले न होने के कारण कई मजदूर दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते थे। कारखानों में ताजी हवा तथा रोशनी का भी कोई विशेष प्रबंध नहीं था जिसके कारण मजदूरों का स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ जाता था। इसके अतिरिक्त मजदूरों को लगभग 16 घंटे प्रतिदिन काम करना पड़ता था। बच्चों तथा स्त्रियों को सस्ती मजदूरी पर रख लिया जाता था और उनसे बहुत कठोर व्यवहार किया जाता था।

प्रश्न 17.
मजदूर संघों का विकास अहस्तक्षेप की नीति को समाप्त करने में किस प्रकार सहायक सिद्ध हुआ।?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति के साथ-साथ यह धारणा भी जोर पकड़ने लगी कि सरकार को व्यापार तथा उद्योगों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस सिद्धांत का प्रतिपादन ‘वैल्थ आफ नेशंस’ नामक पुस्तक में किया गया था। इस पुस्तक के लेखक एडम स्मिथ की सरकार ने इस सिद्धांत को स्वीकार करके व्यापार तथा उद्योगों में हस्तक्षेप करना बंद कर दिया।

सरकार की अहस्तक्षेप की इस नीति का मजदूरों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। उद्योगपति मजदूरों को वेतन तो कम देते थे, परंतु उनसे काम अधिक लेते थे। मजदूर सरकार से किसी प्रकार की सहायता प्राप्त नहीं कर सकते थे। विवश होकर उन्होंने अपनी दशा स्वयं सुधारने का निश्चय किया। उन्होंने अपने संघों का निर्माण किया और उचित वेतन तथा काम के उचित घंटों के लिए संघर्ष आरम्भ कर दिया। परंतु जब उद्योगपतियों ने मजदूरों की माँग की ओर ध्यान न दिया तो अनेक स्थनों पर खून-खराबा हुआ। विवश होकर सरकार को उद्योगपतियों और मजदूरों के झगड़ों में हस्तक्षेप करना पड़ा। सरकार ने मजदूरों के भलाई के लिए कानून पास किये। इस प्रकार मजदूर संघों के कारण सरकार को अहस्तक्षेप की नीति को छोड़ना पड़ा।

भूमध्यसागरीय पत्तनों (बंदरगाह) से हटकर हालैंड और ब्रिटेन के अटलांटिक पत्तनों पर पहुँच गया। इसके बाद तो लंदन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए ऋण प्राप्ति का प्रावधान स्रोत बन गया। साथ ही यह इंग्लैंड, अफ्रीका और वेस्टइंडीज के बीच स्थापित त्रिकोणीय व्यापार का केन्द्र भी बन गया। अमेरिका और एशिया में व्यापार करने वाली कंपनियों के कार्यालय लंदन में ही थे। इंग्लैंड में विभिन्न बाजारों के बीच माल की आवाजाही मुख्य रूप से नदी मार्गों तथा सुरक्षित खाड़ियों द्वारा होती थी।

इंग्लैंड की वित्तीय प्रणाली का केन्द्र बैंक ऑफ इंग्लैंड (1694 में स्थापित) था। 1820 के दशक तक प्रांतों में 600 से अधिक बैंक थे। इनमें से 100 से भी अधिक बैंक अकेले लंदन में ही थे। बड़े-बड़े औद्योगिक उद्यम स्थापित करने और चलाने के लिए आवश्यक वित्तीय साध न इन्हीं बैंकों द्वारा उपलब्ध कराए जाते थे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ब्रिटेन में 1850 ई. तक रेलवे के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
1814 में भाप से चलने वाला पहला रेल का इंजन (स्टीफेनसन का रॉकेट) बना । अब रेलगाड़ियाँ परिवहन का महत्त्वपूर्ण साधन बन गई। ये वर्षभर उपलब्ध रहती थीं, सस्ती और तेज थीं और माल तथा यात्री दोनों को ढो सकती थीं। इस साधन में एक साथ दो आविष्कार सम्मिलित थे-लोहे की पटरी जिसने 1760 के दशक में लकड़ी की पटरी का स्थान ले लिया और भाप इंजन द्वारा लोहे की पटरी पर रेल के डिब्बों को खींचना।

पकिंग डेविल-रेलवे के आविष्कार के साथ औद्योगीकरण की प्रक्रिया ने दूसरे चरण में प्रवेश किया। 1801 में रिचर्ड ट्रेविथिक ने एक इंजन बनाया जिसे ‘पकिंग डेविल’ अर्थात् … “फुफकारने वाला दानव” कहते थे। यह इंजन ट्रकों को कॉर्नवाल में उस खान के चारों ओर खींचकर ले जाता था जहाँ रिचर्ड काम करता था।

ब्लचर-1814 में एक रेलवे इंजीनियर जॉर्ज स्टीफेनसन ने एक और रेल इंजन बनाया जिसे ‘बलचर’ (The Blutcher) कहा जाता था। यह इंजन 30 टन भार 4 मील प्रति घंटे की गति से एक पहाड़ी पर ले जा सकता था। रेलवे का विस्तार-सर्वप्रथम 1825 में स्टॉकटन और डार्लिंगटन शहरों के बीच रेल द्वारा 9 मील की दूरी 15 मील प्रति घंटा की गति से तय की गयी। इसके बाद 1830 में लिवरपूल और मैनचेस्टर को आपस में रेलमार्ग से जोड़ दिया गया। 20 वर्षों के भीतर ही रेल की गति 30 से 50 मील प्रति घंटा तक पहुंच गई ।

1830 के दशक में नहरी परिवहन में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गई –

  • नहरों के कुछ हिस्सों में जलपोतों की भीड़भाड़ के कारण परिवहन की गति धीमी पड़ गई।
  • पाले, बाद, या सूखे के कारण नहरों के प्रयोग का समय भी सीमित हो गया।

अतः अब रेलमार्ग की परिवहन का सुविधाजनक विकल्प दिखाई देने लगा। 1830 से 1850 के बीच ब्रिटेन में रेल मार्ग 6000 मील लंबा हो गया। 1833-37 के ‘छोटे रेलोन्माद’ के दौरान 1400 मील लंबी रेल लाइन बनाने की मंजूरी दी गई। इस कार्य में कोयले और लोहे का भारी मात्रा में उपयोग किया गया और बड़ी संख्या में लोगों को काम पर लगाया गया। 1850 तक अधिकांश इंग्लैंड रेलमार्ग से जुड़ गया।

प्रश्न 2.
ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के कारण औरतों तथा बच्चों के काम करने के तरीकों में क्या परिवर्तन आए?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति के कारण औरतों और बच्चों के काम करने के तरीकों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए । ग्रामीण गरीबों के बच्चे सदा घर या खेत में अपने माता-पिता या संबंधियों की निगरानी में तरह-तरह के काम करते थे। उनके काम समय, दिन या मौसम के अनुसार बदलते रहते थे। इसी प्रकार गाँवों की औरतों भी खेती के काम में सक्रिय रूप से हिस्सा लेती थीं। वे पशुओं की देख-रेख करती थी, लकड़ियों इकट्ठी करती थीं और अपने घरों में चरखे चलाकर सूत काटती थीं।

कारखानों में काम-औद्योगिक क्रांति के बाद औरतें तथा बच्चे कारखानों में काम करने लगे । कारखानों में काम करना घरेलु कामों से बिल्कुल अलग था। वहाँ लगातार कई घंटों तक कठोर एवं खतरनाक परिस्थितियों में एक ही तरह का काम कराया जाता था।

पुरुषों की मजदूरी मामूली होती थी। इससे घर का खर्च नहीं चल सकता था। इसे पूरा करने के लिए औरतों और बच्चों को भी कुछ कमाना पड़ता था। ज्यों-ज्यों मशीनों का प्रयोग बढ़ता गया, काम, पूरा करने के लिए मजदूरों की जरूरत कम होती गई। उद्योगपति पुरुषों की बजाय औरतों ओर बच्चों को अपने यहाँ काम पर लगाना अधिक पसंद करते थे। इसके दो कारण थे-एक तो इन्हें कम मजदूरी देनी पड़ती थी। दुसरे वे अपने काम की घटिया परिस्थितियों के बारे में कम ही शिकायत करते थे।

स्त्रियों और बच्चों को लंकाशायर यॉर्कशायर नगरों के सूती कपड़ा उद्योग में बड़ी संख्या में लगाया जाता था। रेशम, फौते बनाने और बुनने के उद्योग-धंधों में और बर्मिघम के धात उद्योग मे अधिकतर बच्चों तथा औरतों को ही नौकरी दी जाती थी। कपास काटने की जेनी जैसे अनेक मशीने तो कुछ इस तरह की बनाई गई थी कि उनमें बच्चे ही अपनी फुर्तीली उंगलियों और छोटी सी कद-काठी के कारण आसानी से काम कर सकते थे। बच्चों को कपड़ा मिलों में इसलिए भी रख जाता था क्योंकि वहाँ पास-पास रखी गई मशीनों के बीच से छोटे बच्चे आसानी से आ-जा सकते थे। बच्चों से कई घंटों तक काम लिया जाता था।

यहाँ तक कि उन्हें रविवार को भी मशीनें साफ करने के लिए काम पर आना पडता था। परिणामस्वरूप उन्हें ताजी हर खाने या व्यायाम करने का समय नहीं मिलता था। कई बार तो बच्चों के बाल, मशीनों में फंस जाते थे या उनके हाथ कुचल जाते थे। बच्चे काम करते-करते इतने थक जाते थे कि उन्हें नींद की झपकी आ जाती था और वे मशीनों में गिरकर मौत के शिकार हो जाते थे। कोयला खानों में काम-कोयले की खाने भी काम की दृष्टि से बहुत खतरनाक होती थीं।

कई बार खानों की छते फँस जाती थी अथवा उनमें विस्फोट हो जाता था। चोटें लगाना तो वहाँ आम बात थी। कोयला खानों के गहरे अंतिम छोरों को देखने के लिए रास्ता, वयस्कों के लिए बहुत संकरा होता था। इसलिए वहाँ बच्चों को ही भेजा जाता था। छोटे बच्चों को कोयला खानों में ‘ट्रैपर’ का काम भी करना पड़ता था। कोयला खानों में जब कोयले से भरे डिब्बे इधर-उधर ले जाये जाते थे, तो बच्चे आवश्यकतानुसार दरवाजों को खोलते और बंद करते थे। यहाँ तक कि वे ‘कोल बियरर्स’ के रूप में अपनी पीठ पर कोयले का भारी वजन भी ढोते थे।

प्रश्न 3.
इंग्लैंड के श्रमिकों में बढ़ते हुए विरोध के प्रति सरकार से क्या नीति अपनाई?
उत्तर:
इंग्लैंड की फैक्ट्रियों में काम करने की कठोर परिस्थितियों के विरुद्ध राजनीतिक विरोधता बढ़ता जा रहा था। श्रमिक मताधिकार प्राप्त करने के लिए भी आंदोलन कर रहे थे। इसके प्रति सरकार ने दमनकारी नीति अपनायी और कानून बनाकर, लोगों से विरोध-प्रदर्शन का अधिकार छीन लिया।

जुड़वाँ अधिनियम – 1795 में ब्रिटेन की संसद ने दो जुड़वाँ अधिनियम पारित किए। इनके अनुसार भाषण अथवा लेखन द्वारा सम्राट् संविधान या सरकार के विरुद्ध घृणा फैलाना अवैध घोषित कर दिया गया। 50 से अधिक लोगों द्वारा अनाधिकृत रूप से सार्वजनिक बैठक करने पर रोक लगा दी गई। परंतु पुराने भ्रष्टाचार (Old Corruption) के विरुद्ध आंदोलन चलता रहा।

‘पुराना भ्रष्टाचार’ शब्द का प्रयोग राजतंत्र और संसद् के संबंध में किया जाता था। संसद् के सदस्य जिनमें भू-स्वामी, उत्पादक तथा व्यवसायी लोग शामिल थे, श्रमिकों को वोट का अधिकार दिए जाने के विरुद्ध थे। उन्होंने कार्न लॉज (अनाज के कानून) का समर्थन किया। इस कानून के अंतर्गत विदेश से ससं अनाज के आयात पर तब तक रो लगा दी गई थी जब तक कि ब्रिटेन में इन अनाजों की कीमत में निश्चित स्तर पर तक वृद्धि न हो जाए।

ग्रैड के लिए दंगे – जैसे-जैसे शहरों और कारखानों में श्रमिक की संख्या बढ़ी, वे अपने क्रोध को हर तरह के विरोध में प्रकट करने लगा। 1790 के दशक से पूरे देश में ब्रैड अथवा भोजन के लिए दंगे होने लगे। गरीबों का मुख्य आहार ब्रैड ही था और इसके मूल्य पर ही उनके रहन-सहन का स्तर निर्भर करता था। उन्होंने ब्रैड के भंडारों पर कब्जा कर लिया और उसे मुनाफाखोरों द्वारा लगाई गई कीमतों से काफी कम मूल्य पर बेचा जाने लगा। इस बात का ध्यान रखा गया कि कीमतें नैतिक दृष्टि से सही हों। ऐसे दंगे 1795 ई. में युद्ध के दौरान बार-बार हुए और ये 1840 के दशक तक चलते रहे।

चकबंदी का मजदूर परिवारों पर प्रभाव – चकबंदी अथवा बाड़ा पद्धति भी परेशानी का कारण थी। इसके द्वारा 1770 के दशक से छोटे-छोटे सैकड़ों खेत धनी जमींदारों के बड़े फार्मों में मिला दिए गए थे। इस पद्धति से कई गरीब परिवार बुरी तरह प्रभावित हुए। उन्होंने औद्योगिक काम देने की मांग की।

न्यनतम वैध मजदूरी की माँग – कपड़ा उद्योग में मशीनों के प्रचलन से भी हजारों की संख्या में हथकरघा बुनकर बेरोजगार हो गए थे। वे गरीबी की मार झेलने को विवश थे, क्योंकि वे मशीनों का मुकाबला नहीं कर सकते थे। 1790 के दशक से ये बुनकर अपने अपने लिए न्यूनतम वैध मजदूरी की मांग करने लगे। परंतु संसद् ने इस मांग को ठकरा दिया। हडताल करने पर उन्हें तितर-बितर कर दिया गया।

हताशा होकर सूती कपड़े के बुनकरों ने लंकाशायर में पावरलूमों को नष्ट कर दिया, क्योंकि वे समझते थे कि बिजल. के इन्हीं करधों ने ही उनकी रोजी-रोट छीनी है। नॉटिंघम में ऊनी कपड़ा उद्योग में भी मशीनों के चलन का विरोध किया गया। इस तरह लैस्टरशायर (Leicesterhire) और डर्बीशायर (Derbvshire) में भी विरोध प्रदर्शन हुए। यार्कशायर (Yorkshire) में ऊन काटने वालों ने ऊन काटने के ढाँचों (शीयरिंग फ्रेम) को नष्ट कर दिया।

ये लोग अपने हाथों से भेड़ों के बालों की कटाई करते थे। 1830 के दंगों में फर्मों में काम करने वाले श्रमिकों को भी अपना धंधा चौपट होता दिखाई दिया, क्योंकि भूसी से दाना अलग करने के लिए नयी श्रेशिंग मशीन का प्रयोग शुरू हो गया था। दंगाइयों ने इन मशीनों तोड डाला। परिणामस्वरूप नौ दंगाइयों को फांसी का दंड दिया गया और 450 लोगों को कैदियों के रूप में ऑस्ट्रेलिया भेज दिया गया।

लुडिज्य आंदोलन – जनरल नेद्र वुड के नेतृत्व में लुडिज्म (1811-17) नामक एक आंदोलन चलाया गया। लुडिज्म के अनुयायी केवल मशीनों में ही विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि उनकी कई अन्य माँगे भी थीं। ये माँगें थीं-न्यूनतम मजदूरी नारी एवं बाल श्रम पर नियंत्रण मशीनों के प्रयोग से बेरोजगार हुए लोगों के काम और कानूनी तौर पर अपनी माँगें पेश करने के लिए मजदूर संघ बनाने का अधिकार।

सेंट पीटर्स के मैदान में प्रदर्शन – औद्योगिक के प्रारंभिक चरण में श्रमिकों के पास अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए न तो वोट देने का अधिकार था और न ही कोई कानूनी ढंग। अगस्त, 1819 में 80,000 श्रमिक अपने लिए लोकतांत्रिक अधिकारों अर्थात् राजनीतिक संगठन बनाने, सार्वजनिक सभाएं करने और प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार की माँग करने के लिए मैनचेस्टर के सेंट पीटर्स (St Peter’s Field) मैदान में शांतिपूर्ण एकत्रित हुए।

परंतु उनका बर्बरतापूर्वक दमन कर दिया गया। इसे पीटर लू नरसंहार कहा जाता था। इससे कुछ लाभ भी हुए। पीटर लू के बाद उदारवादी राजनीतिक दलों द्वारा ब्रिटिश संसद् के निचले सदन ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में प्रतिनिधित्व बढ़ाए जाने की आवश्यकता अनुभव की गई। 1824-25 में जुड़वां अधिनियमों को भी रद्द कर दिया गया।

प्रश्न 4.
ब्रिटेन की सरकार द्वारा श्रमिकों की दशा सुधारने के लिए कौन-कौन से कानूनी पग उठाये गये?
उत्तर:
19वीं शताब्दी के आरंभ में इंग्लैंड में श्रमिकों की दशा सुधारने के लिए कुछ कानून बनाए गए।
1. 1819 का कानून – 1819 के कानून के अनुसार नौ वर्ष से कम आयु वाले बच्चों से फैक्ट्रियों में काम करवाने पर रोक लगा दी गई। नौ से सोहल वर्ष की आयु वाले बच्चों से काम कराने का समय 12 घंटे तक सीमित कर दिया गया। परंतु इस कानून में इसका पालन कराने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था नहीं की गई थी। अतः संपूर्ण उत्तरी इंग्लैंड में श्रमिकों द्वारा इस का भारी विरोध किया गया।

2. 1833 का अधिनियम – 1833 में एक अन्य अधिनियम पारित किया गया। इसके अंतर्गत नौ वर्ष से कम आयु वाले बच्चों को केवल रेशम की फैक्ट्रियों में काम पर लगाने की अनुमति दी गई। बड़े बच्चों के लिए काम के घंटे सीमित कर दिए, गए। कुछ फैक्टरी निरीक्षकों की भी व्यवस्था की गई, ताकि अधिनियम के पालन को सुनिश्चित किया जा सके

3. ‘दस घंटा विधेयक’ – 1817 ई. में ‘दस घंटा विधेयक पारित किया गया। इस कानून ने स्त्रियों और युवकों के लिए काम के घंटे सीमित कर दिए। पुरुष श्रमिकों के लिए 10 घंटे का दिन निश्चित कर दिया। ये अधिनियम कपड़ा उद्योगों पर ही लागू होते थे, खनन उद्योग पर नहीं। सरकार द्वारा स्थापित 1842 के खान आयोग ने यह बताया कि 1833 का अधिनियम लागू होने से खानों में
काम करने की परिस्थितियाँ और अधिक खराब हो गई हैं। इससे बच्चों को पहले से कहीं अधिक . संख्या में कोयला खानों में काम पर लगाया जाने लगा था। अत: इस दिशा में भी कुछ पग उठाये
गए।

4. खान और कोयला खान अधिनियम – यह अधिनियम 1842 में पारित हुआ। इसके अनुसार दर वर्ष से कम आयु के बच्चों और स्त्रियों से खानों में काम लेने पर रोक लगा दी गई।

5. फील्डर्स फैक्टूरी अधिनियम – यह अधिनियम 1847 में पारित हुआ। इसमें कहा गया कि अठारह साल से कम आयु के बच्चों और स्त्रियों से खानों में काम लेने पर रोक लगा दी गई।

इन कानूनों का पालन फैक्ट्री निरीक्षकों द्वारा करवाया जाना था। परंतु यह एक कठिन काम था। निरीक्षकों का वेतन बहुत कम था। प्रायः प्रबंधक उन्हें रिश्वत देकर आसानी से उनका मुँह बंद कर देते थे। दूसरी ओर माता-पिता भी अपने बच्चों की आयु के बारे में झूठ बोलकर उन्हें काम पर लगवा देते थे, ताकि उनकी मजदूरी से घर का खर्च चलाया जा सके।

प्रश्न 5.
क्या कपास या लोहा उद्योगों में अथवा विदेशी व्यापार में 1780 के दशक से 1820 के दशक तक हुए विकास को ‘क्रांतिकारी’ कहा जा सकता है?
उत्तर:
नयी मशीनों के प्रयोग से सूती कपड़ा उद्योग में जो संवृद्धि हुई वह ऐसे कच्चे माल (कपास) पर आधारित थी जो ब्रिटेन में बाहर से मंगवाया जाता था। इसका कारण यह था कि इंग्लैंड में कपास नहीं उगाई जाती थी। तैयार माल भी दूसरे देशों में (विशेषतः भारत में) बेचा जाता था। धातु से बनी मशीनें और भाप की शक्ति तो उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक दुर्लभ रही। ब्रिटेन के आयात और निर्यात में 1780 के दशक से होने वाली तीव्र वृद्धि का कारण यह था कि अमेरिका स्वतंत्रता संग्राम के परिणामस्वरूप उत्तरी अमेरिका के साथ रुका व्यापार फिर से शुरू हो गया था। इस वृद्धि को इसलिए तीव्र कहा गया क्योंकि जिस बिंदु से इसका प्रारंभ हुआ था वह काफी नीचे था।

आर्थिक परिवर्तन के सूचकांक से पता चलता है कि सतत् औद्योगीकरण 1815-20 से पहले की बजाय बाद में हुआ था। 1793 के बाद के दशकों में फ्रांसीसी क्रांति और नेपोलियन के युद्धों के विघटनकारी प्रभावों को अनुभव किया गया था। वास्तव में औद्योगिकरण का अर्थ निर्माण करने, आधारभूत ढाँचा तैयार करने अथवा नयी-नयी मशीनें लगाने के उद्देश्य से निवेश करने से है। इन सुविधाओं के कुशलतापूर्वक उपयोग का स्तर बढ़ाना और उत्पादकता में वृद्धि करना भी औद्योगीकरण की प्रक्रिया में शामिल है। ये बातें 1820 के बाद ही धीरे-धीरे दिखाई दी। 1840 के दशक तक कपास, लोहा और इंजीनियरिंग उद्योगों का औद्योगिक उत्पादन कुल उत्पादन के आधे से भी कम था।

तकनीकी प्रगति इन्हीं शाखाओं तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि वह कृषि संसाधन तथा मिट्टी के बर्तन बनाने (पौटरी) जैसे अन्य उद्योग धंधे में भी देखी जा सकती थी। अतः कपास, लोहा उद्योग विदेश व्यापार में 1780 से 1820 के दशकों तक हुए विकास (सम्वृद्धि) को हम क्रान्तिकारी नहीं कह सकते।

प्रश्न 6.
ब्रिटेन में औद्योगिक विकास 1815 से पहले की अपेक्षा उसके बाद अधिक तेजी से क्यों हुआ?
उत्तर:
1760 के दशक से IN15 तक ब्रिटेन ने एक साथ दो कम करने का प्रयास किया-पहला औद्योगीकरण और दूसरा यूरोप, उत्तरी अमेरिका और भारत में युद्ध लड़ना । इतिहासकारों के अनुसार वह इनमें से एक काम करने में असफल रहा। ब्रिटेन 1760 के बाद से 1820 तक की अवधि में 36 वर्ष तक लड़ाई में व्यस्त रहा। उद्योगों में निवेश के लिए उधार ली गई सारी पूंजी युद्ध लड़ने में खर्च कर दी गई। यहाँ तक कि युद्ध का 35 प्रतिशत तक खर्च लोगों पर कर लगाकर पूरा किया जाता था।

कामगारों और श्रमिकों को कारखानों तथा खेतों में से निकालकर सेना में भर्ती कर दिया जाता था। खाद्य पदार्थों की कीमतें तो इतनी तेजी से बढ़ी कि गरीबों के पास दैनिक उपयोग की सामग्री खरीदने के लिए भी बहुत कम पैसा बचता था। नेपोलियन की नाकेबन्दी की नीति, और ब्रिटेन द्वारा उसे असफल बनाने के प्रयासों ने यूरोप महाद्वीप को व्यापारिक दृष्टि से अवरुद्ध कर दिया। इससे ब्रिटेन से निर्यात होने वाले अधिकांश निर्यात स्थल ब्रिटेन के व्यापारियों की पहुंच से बाहर हो गए।

क्रिस्टल पैलेस की प्रदर्शनी – 1851 में लन्दन में विशेष रूप से निर्मित स्फटिक महल (क्रिस्टल पैलेस) में ब्रिटिश उद्योगों की उपलब्धियों को दर्शाने के लिए एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसे देखने के लिए दर्शकों का तांता लग गया। उस समय देश की आधी जनसंख्या शहरों में रहती थी। परन्तु शहरों में रहने वाले कामगारों में जितने लोग हस्तशिल्प की इकाइयों में काम करते थे, लगभग उतने ही फैक्ट्रियों या कारखानों में कार्यरत थे।

1850 के दशक से शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों का अनुपात अचानक बढ़ गया। इनमें से अधिकांश लोग उद्योगों में काम करते थे अर्थात् वे श्रमजीवी वर्ग के थे। अब ब्रिटेन के समूचे श्रमिक बल का केवल 20 प्रतिशत भाग ही ग्रामीण क्षेत्रों में रहता था। औद्योगीककरण की यह गति अन्य यूरोपीय देशों में हो रहे औद्योगीकरण की अपेक्षा बहुत अधिक तेज थी। इतिहासकार ए.ई. मस्सन ने ठीक ही कहा है, “1850 से 1914 तक की अवधि की एक ऐसा काल मानने के लिए पर्याप्त आधार है, जिसमें औद्योगिक क्रान्ति वास्तव में अत्यन्त व्यापक पैमाने पर हुई। इसने सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था और समाज की कायापलट कर दी।”

प्रश्न 7.
औद्योगिक क्रांति के अंतर्गत हुए आविष्कारों की विस्तृत जानकारी दें।
उत्तर:
17वीं, 18वीं तथा 19वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप में विज्ञान एंव तकनीकि के क्षेत्र में बड़ा, विकास हुआ जसके फलस्वरूप इन देशों में नए-नए आविष्कार हुए। इन आविष्कारों का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है –
1. फ्लाइंग शटल – फ्लाइंग शटल का आविष्कार “जॉन के’ (John kay) ने 1733 ई. में किया। इसकी सहायता से कपड़ा शीघ्रता से बुना जाने लगा। इस कपड़े की चौड़ाई पहले से दुगनी थी।

2. स्पिनिंग जैनी – स्पिनिंग जैनी नामक मशीन का आविष्कार हारग्रीब्ज (Hargreaves) ने 1765 ई. किया। इस मशीन में आठ तकुओं की व्यवस्था थी। इस प्रकार आठ मजदूरों का काम एक मशीन करने लगी। इसकी सहायता से काता गया सूत बारीक होता था, परंतु वह मजबूत नहीं होता था।

3. वाटर फ्रेम – वाटर फ्रेम का आविष्कार आर्कराइट नामक एक नाई ने 1769 ई. में किया। यह मशीन भी पनशक्ति से चलती थी। इसकी सहायता से मजबूत कपड़ा बुना जा सकता था। इस प्रकार वाटर फ्रेम के आविष्कार ने कपड़ा उद्योग में एक क्रांति पैदा कर दी। एक विशेष बात यह थी कि इस मशीन को घर में नहीं लगाया जा सकता था। अतः इंग्लैंड में कारखानों का जन्म हुआ।

4. मूल्य – मूल्य का आविष्कार सैमुअल क्रांपटन (Sammuel Crompton) ने 1779 ई. में किया। इस मशीन में हारग्रीब्ज को स्पिनिंग जैनी तथा आर्कराइट के वाटर फ्रेम के सभी गुण विद्यमान थे। यह मशीन भी शक्ति से चलाई जाती थी। इसकी सहायता से काटा गया धागा बारीक तथा पक्का होता था। इसके अतिरिक्त इसमें कई धागे एक साथ काते जा सकते थे।

5. पावरलूम – पावलूम का आविष्कार कार्टराइट ने सन् 1787 ई. में किया। यह मशीन भाप की शक्ति से चलती थी। इसके आविष्कार से उद्योगों में एक क्रांति आ गई। अब कपड़ा बहुत तेजी से बुना जाने लगा।

6. काटन जिन – काटन जिन नामक मशीन का आविष्कार 1793 ई. में एलीविने ने किया। इसकी सहायता से कपास से बिनौले बड़ी शीघ्रता से अगल किए जाने लगे। इस महत्वपूर्ण आविष्कार ने सूति कपड़े के उद्योग में आश्चर्यजनक क्रांति ला दी। अब कपड़ा और भी शीघ्रता से बुना जाने लगा।

7. सिलिंडर प्रिंटिंग – सिलिंडर प्रिंटिंग मशीन का आविष्कार 18 वीं शताब्दी के अंत में हुआ। इस आविष्कार से कपड़े की धुलाई व रंगाई में महान परिवर्तन आए। इससे सूती कपड़ा उद्योग बहुत उन्नत हो गया।

8. भाप का इंजन – सबसे पहले भाप इंजन का आविष्कार न्यूकोमन ने किया था। तत्पश्चात् जेम्स वॉट (James watt) ने इसमें कई सुधार किए। इसके बाद इसकी उपयोगिता ओर भी बढ़ गई। वास्तव में यदि देखा जाए तो औद्योगिक क्रांति का आरंभ ही जेम्स वॉट के भाप इंजन से हुआ।

9. लोहा तथा कोयला उद्योग में क्रांति – औद्योगिक क्रांति की प्रगति के लिए लोहे की माँग अब निरंतर बढ़ने लगी। फलतः लोहा तथा कोयला उद्योग मे बहुत-से क्रांतिकारी परिवर्तन आए। लोहे को पिघलाने के लिए अब लकड़ी के बजाए पत्थर के कोयले का प्रयोग हाने लगा। इससे लोहे का पिघलाने का काम बहुत आसान हो गया। पहले मशीनें भी लकड़ी की बनाई जाती थीं।

अब लकड़ी का स्थान लोहे ने ले लिया और लोहे की असंख्य मशीनें बनाई जाने लगी। खानों. में काम करने वाले मजदूरों के जीवन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए 1815 में सर हफ्री डैवी (Sir Humphry Davy) ने सुरक्षा लैंप (Safety Lamp) का आविष्कार किया। इस प्रकार अब खानों में काम करना भी सरल हो गया।

10. सड़कें बनाने में क्रांति – औद्योगिक प्रगति के लिए यातयात के साधनों का होना नितांत आवश्यक था। औद्योगिक क्रांति से पूर्व सड़कों की दशा अच्छी न थीं। माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता था। 18वीं शताब्दी के अंत में स्कॉटलैंड के एक अभियंता (Engineer) मैकऐडम ने सड़क बनाने के लिए छोटे-छोटे पत्थरों का प्रयोग किया। तत्पश्चात् टैलीफोर्ड तथा मैटकॉक ने अच्छी सड़कों के निर्माण में काफी योगदान दिया। पक्की सड़कों के बन जाने के कारण औद्योगिक क्रांति को प्रोत्साहित मिला।

11. नहर बनाने में क्रांति – लोहे तथा कोयले जैस भारी माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए नहरों का निर्माण आरंभ हुआ। इंग्लैंड में सबसे पहली नहर 1761 ई. में ब्रिडल नामक एक इंजीनियर की देख-रेख में बनाई गई। यह नहर बर्सेलसे मानचैस्टर तक बनाई गई। इसके बाद तो बहुत-सी नहरों का निर्माण हुआ और लंकाशायर तथा मानचेस्टर के व्यापारिक क्षेत्र आपस में मिला दिए गए।

12. रेलवे इंजन – 1884 ई. में जार्ज स्टीफेन्सन ने पहला लोको-मोटिव इंजन बनाया जो भाप की शक्ति से चलता था। 1830 में मानचेस्टर और लिवरपूल के बीच पहली रेल-लाइन बनाई गई । इस प्रकार परिवहन के साधनों के विकास में एक नया परिवर्तन आया।

प्रश्न 8.
कृषि-क्रांति के बारे में विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
18वीं शताब्दी में कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिक तरीकों के प्रयोग से कृषि के साधनों में परिवर्तन आया। नई-नई मशीनों की खोज भी हुई जिनके कारण भूमि को जोतने तथा फसल काटने के ढंग पूर्णतया बदल गए। इस प्रकार कृषि के क्षेत्र में आश्चर्यजनक उन्नति हुई। तीव्र गति से कृषि का रूप बदलने वाले इन तरीकों को कृषि क्रांति के नाम से पुकारा जाता है।

कारण – प्राचीन कृषि के ढंग परंपरागत तथा रूढ़िवादी थे। किसानों के खेत छोटे-छोटे तथा दूर-दूर स्थित थे। किसानों को अपना ध्यान उनकी ओर लगाना पड़ता था जिससे उनका बहुत सः

प्रश्न 9.
औद्योगिक क्रांति के सामाजिक तथा आर्थिक प्रभाव क्या थे? (V.Imp)
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति का इंग्लैंड के लोगों के जीवन के हर पहलू पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसने इंग्लैंड को कृषि प्रधान देश से औद्योगिक देश बना दिया औद्योगिक क्रांति के प्रमुख सामाजिक तथा आर्थिक प्रभाव निम्नलिखत थे –
1. राष्ट्रीय आय में वृद्धि – इस क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड विश्व का सबसे बड़ा औद्योगिक देश बन गया। उसके व्यापारिक संबंध विदेशों से स्थापित हुए। विदेशों में उनका माल बिकने लगा। इस प्रकार इंग्लैंड की राष्ट्रीय आय में काफी वृद्धि हो गई।

2. कुटीर उद्योग का अंत – औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप ऐसी मशीनों का आविष्कार हुआ जिन्हें घर में नहीं लगाया जा सकता था। इसलिए देश में असंख्य कारखानों की स्थापना हुई। इस प्रकार इंग्लैंड में कुटीर उद्योग लगभग समाप्त हो गए।

3. नवीन औद्योगिक नगरों की स्थापना – औद्योगिक क्रांति से पूर्व इंग्लैंड में नगरों की संख्या बहुत कम थी। परंतु औद्योगि क्रांति के फलस्वरूप बड़े-बड़े कारखाने स्थापित हुए। अत: इंग्लैंड में मानचैस्टर, लंकाशायर, बर्मिघम, शैफील्ड आदि अनेक बड़े-बड़े औद्योगिक नगर बस गए।

4. अधिक तथा सस्ता माल – मशीनों का आविष्कार हो जाने से वस्तुएँ अधिक मात्रा में तैयार की जाने लगीं। इनका मूल्य भी कम होता था। अतः लोगों को आसानी से सस्ता माल मिलने लगा।

5. बेकारी में वृद्धि – औद्योगिक क्रांति का सबसे बुरा प्रभाव यह हुआ कि इसने घरेलू दस्तकारियों (Home Industries) का अंत कर दिया। एक मशीन अब कई आदमियों का काम अकेली करने लगी। परिणामस्वरूप हाथ से काम करने वाले कारीगर बेकार हो गए।

6. नवीन वर्गों का जन्म – औद्योगिक क्रांति से मजूदर तथा पूंजीपति नामक दो नवीन वर्गों का जन्म हुआ। पूंजीपतियों ने मजदूरों से बहुत कम वेतन पर काम लेना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप निर्धन लोग और निर्धन हो गए तथा देश की समस्त पूंजी कुछ एक पूंजीपतियों की तिजोरियों में भरी जाने लगी। इस विषय में किसी ने ठीक ही कहा है, “औद्योगिक क्रांति ने घनियों को और अधिक धनी तथा निर्धनों को और भी निर्धन कर दिया।

7. भूमिहीन मजदूरों की संख्या में वृद्धि – औद्योगिक क्रांति ने छोटे-छोटे कृषकों को अपनी भूमि बेचकर कारखानों में काम करने पर बाध्य कर दिया। अतः भूमिहीन मजदूरों की संख्या में वृद्धि होने लगी।

8. छोटे कारीगरों का मजदूर बनाना – औद्योगिक क्रांति के कारण अब मशीनों द्वारा मजबूत तथा पक्का माल शीघ्रता से बनाया जाने लगा। इस प्रकार हाथ से. बुने हुए अथवा करते हुए कपड़े की मांग कम होती चली गई। अतः छोटे कारीगरों ने अपना काम छोड़कर कारखानों में मजदूरों के रूप में काम करना आरंभ कर दिया।

9. स्त्रियों तथा छोटे बच्चों का शोषण – कारखानों में स्त्रियों तथा कम आयु वाले बच्चों से भी काम लिया जाने लगा। उनसे बेगार भी ली जाने लगी। इससे उनके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। ..

10. मजदूरों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव – मजदूरों के स्वास्थ्य पर भी खुले वातावरण के अभाव के कारण बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। अब वे स्वच्छ की अपेक्षा कारखानों की दूषित वायु में काम करते थे।

प्रश्न 10.
औद्योगिक क्रांति इंग्लैंड में पहले क्यों आई? अथवा, औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम किस देश में आई और क्यों?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति से हमारा अभिप्राय उन परिवर्तनों से है जिनके कारण 18वीं शताब्दी में कारखाना पद्धति का जन्म हुआ। यह क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैंड में आई। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे –
1. जनसंख्या में वृद्धि – इंग्लैंड की जनसंख्या में काफी वृद्धि हो गई थी जिसके साथ-साथ वस्तुओं की माँग बहुत बढ़ गई थी। इसलिए इंग्लैंड के लोगों का ध्यान औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाने की ओर गया।

2. अंग्रेजों की बस्तियाँ – अंग्रेजों द्वारा स्थापित उपनिवेशों में वस्तुओं की माँग बढ़ चुकी “थी। अंग्रेज इन बस्तियों में अपना अतिरिक्त माल आसानी से खपा सकते थे।

3. कच्चे माल की प्राप्ति – अंग्रेजी साम्राज्य काफी विस्तृत हो चुका था। अतः अंग्रेज अपना माल अपने अधीन देशों में न केवल खपा सकते थे, अपितु उन्हें वहाँ सस्ते दामों पर कच्चा माल भी प्राप्त हो जाता था। यही कारण था कि औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैंड में ही आई।

4. समृद्धि – वालपोल की सफल आंतरिक तथा विदेश नीति के कारण इंग्लैंड के लोग धनी हो गए थे। ये लोग बड़ी सुगमता से उद्योगों में अपनी पूँजी लगा सकते थे।

5. बैंकों की अधिकता – धन के लेन-देन में सहायता करने के लिए देश में बहुत-से बैंक थे। अत: बैंकों की अधिकता के कारण भी औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैंड में शुरू हुई।

6. देश का शांत वातावरण – वालपोल ने अपनी विदेशी नीति द्वारा इंग्लैंड को 18वीं शताब्दी में यूरोप के युद्धों से अलग रखा। देश में शांति का वातावरण होने के कारण लोगों का ध्यान उद्योग तथा व्यापार की प्रगति की ओर आकृष्ट हुआ।

7. अनुकूल जलवायु – इंग्लैंड का लगभग प्रत्येक भाग समुद्र के निकट है। इसलिए वहाँ की जलवायु आई है जो कपड़े के उद्योग के लिए बड़ी लाभदायक होती है। यही कारण था कि सूती कपड़े का उद्योग सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में ही चमका।

8. कोयले तथा लोहे की खाने – इंग्लैंडे में लोहे तथा कोयले की खानें काफी मात्रा में थीं। ये खानें एक-दूसरे के बिल्कुल समीप थीं। इन खानों की समीपता भी इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के सर्वप्रथम आने का कारण बनी।

9. विदेशी व्यापार का विस्तार – अंग्रेज लोग अच्छे नाविक थे। उन्होंने समुद्री यात्राएँ की और नए-नए देश खोजकर उनसे व्यापारिक संबंध स्थापित हुए। इस प्रकार बढ़ते हुए व्यापार ने भी औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया।

10. समुद्री बेड़ा – अंग्रेजों के पास बहुत अच्छा समुद्री बेड़ा था। इसमें उन्हें माल को लाने और ले जाने में काफी सुविधा रहती थी। अच्छे समुद्री बेड़ें के होने से भी औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैंड में ही आई।

11. विचारों की स्वतंत्रता – इंग्लैंड के लोगों को विचारों की पूर्ण स्वतंत्रता थी। उन पर सरकार की ओर से कोई प्रतिबंध न थे। अत: लोगों ने नई खोजें की जो औद्योगिक क्रांति का मुख्य कारण बनीं।

प्रश्न 11.
यूरोप तथा अमेरिका के औद्योगिक क्रांति के प्रसार का वर्णन करें। एशिया में सर्वप्रथम किस देश में यह क्रांति आई?
उत्तर:
1. इंग्लैंड (England) – मशीनी युग आरंभ होने के बाद 50 वर्षों के अंदर ही इंग्लैंड विश्व का सबसे बड़ा औद्योगिक राष्ट्र बन गया। उदाहरण के लिए 1813 ई. में इंग्लैंड भारत को केवल 50 हजार किलोग्राम सुती कपडा भेजता था, परंतु 1815ई. में यह मात्रा बढ़कर 25 लाख किलोग्राम हो गई। इंग्लैंड के खनिज उत्पादन में भी अत्यधिक वृद्धि हुई। यहाँ तक कि इंग्लैंड कोयले का निर्यात भी करने लगा। इस प्रकार इंग्लैंड एक महान् औद्योगिक राष्ट्र बन गया। परंतु यूरोप के अन्य औद्योगिक देशों में प्रगति नेपोलियन के पतनके पश्चात् ही आरंभ हुई।

2. फ्रांस, जर्मनी आदि (France,Germany etc.) – नेपोलियन के पतन के पश्चात् फ्राँस, बेल्ज्यिम, स्विट्जरलैंड तथा जर्मनी में मशीनों का प्रयोग आरंभ हुआ। परंतु इन देशों में उद्योगों का पूर्ण विकास काफी लंबे समय के बाद हुआ। इसका कारण यह था कि इनमें से कुछ देशों में राजनीतिक अस्थिरता फैली हुई थी। फ्रांस में सर्वप्रथम 1850 ई. में लोहा उद्योग स्थापित किया गया। 1865 ई. में जर्मनी का इस्पात उत्पादन काफी बढ़ गया फिर भी वह इंग्लैंड से पीर रहा। 1870 ई. में जर्मनी एकीकरण के पश्चात् इस राष्ट्र में आश्चर्यजनक औद्योगिक प्रगति हुई कुछ ही वर्षों में जर्मनी इंग्लैंड का ओद्योगिक प्रतिद्वंद्वी बन गया।

3. संयुक्त राज्य अमेरिका (The United States) – संयुक्त राज्य अमेरिका में या मशीनों का प्रयोग इंग्लैंड से स्वतंत्रता मिलने के पश्चात ही आरंभ हो गया तथापि वहाँ भी उद्योग का विकास 1870 ई. के पश्चात् ही हो पाया। 1860 ई. में इस देश में सूती कपड़ा इस्पात तः जूता उद्योग अवश्य स्थापित हो चुके थे, परंतु इनके उत्पादन में वृद्धि 1870 ई. के पश्चात् ही हुई

4. रूस (Russia) – रूस यूरोप का ऐसा देश है जहाँ सबसे बाद में औद्योगिक क्रांति आ. वहाँ खनिज पदार्थों को तो कोई कमी नहीं थी, परंतु पूंजी तथा स्वतंत्र श्रमिकों के अभाव के का वहाँ काफी समय तक औद्योगिक विकास संभव न हो सका। रूस ने 1861 ई. में कृषि दा को स्वतंत्र कर दिया। उसे विदेशों से पूंजी भी मिल गई। फलस्वरूप रूप ने अपने औद्योगि विकास की ओर ध्यान दिया। वहाँ उद्योगों का आरंभ हो गया, परंतु इनका पूर्ण विकस 19. ई. की क्रांति के पश्चात् ही संभव हो सका। एशियाई देशों में सर्वप्रथम जापान में औद्यागिक विकास हुआ। 19वीं शताब्दी के ऑ वर्षों में जापान में इस्पात, मशीनों रासायनिक पदार्थों तथा धातु की वस्तुओं का बहुत अपि उत्पादन होने लगा। यहाँ तक कि जापान इन वस्तुओं को निर्यात भी करने लगा।

प्रश्न 12.
ब्रिटेन में सूती वस्त्र उद्योग के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
आरंभ में ब्रिटेन के लोग उन और लिनन बनाने के लिए सन से कपड़ा बुना क थे। सत्रहवीं शताब्दी में इग्लैंड भारत से भारी मात्रा मे सूती कपड़े का आयात करने लगा। प जब भारत के अधिकतर भागों में पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो ग तब इंग्लैंड ने कपड़ के साथ-साथ कच्चे माल के रूप में कपास का आयात करना भी आरं कर दिया। इंग्लैंड पहुँचने पर इसकी कताई की जाती थी और उससे कपड़ा बुना जाता था।

अठारहवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में कताई का काम बहुत ही धीमा था। इसलिए कातने वाले दिनभर कताई के काम में लगे रहते थे, जबकि बुनकर बुनाई के लिए धागे के इंतजार में समय नष्ट करते रहते थे। परंतु प्रौद्यागिकी के क्षेत्र में अनेक आविष्कार हो जाने के बाद कपास से घागा कातने और उससे कपड़ा बनाने की गति एकाएक बढ़ गई। इस कार्य में और अधिक कुशलता लाने के लिए उत्पादन का काम घरों से हटकर फैक्ट्रियों अर्थात् कारखानों में चला गया।

एक के बाद एक नई मशीनों के आविष्कार हुए जिन्होंने कपड़ा उद्योग में क्रांति ला दी इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण मशीनें निम्नलिखित –
1. फ्लाईंग शट्ल – फ्लाईंग शटल का आविष्कार जॉन के (John kay) ने 1773 ई. में किया। इसकी सहायता से अब कपड़ा शीघ्रता से बुना जाने लगा। इस कपड़े की चौड़ाई भी पहले से दुगुनी होती थी।

2. स्पिनिंग – स्पिनिंग जैनी नामक मशीन का आविष्कार हारग्रीब्ज (Hargreaves) ने 1785 ई. में किया। इस मशीन में आठ तकलों की व्यवस्था थी। इस प्रकार आठ मजदूरों का काम एक मशीन करने लगी। इसकी सहायता से काता गया सूत बारीक होता था परंतु यह मजबूत नहीं होता था।

3. वाटर फ्रेम – वाटर फ्रेम का आविष्कार रिचर्ड आर्कराइट नामक एक नाई ने 1769 ई. में किया। यह मशीन पन-शक्ति से चलती थी। इसकी सहायता से मजबूत कपड़ा बुना जा सकता. था। इस प्रकार वाटर फ्रेम के आविष्कार ने उद्योगों में एक क्रांति पैदा कर दी। इसकी एक विशेष। बात यह थी कि इस मशीन को घर में नहीं लगाया जा सकता था। अतः कारखानों का जन्म हुआ।

4. म्यूल – म्यूल का आविष्कार सेम्यूअल क्रॉम्पट ने 1779 ई. में किया। इस मशीन में हारग्रीब्ज की स्पिनिंग जैनी तथा आहाइट के वाटर फ्रेम के सभी गुण विद्यमान थे। यह मशीन भी पन-शक्ति से चलाई जाती थी। इसकी सहायता से काता हुआ धागा बारीक तथा पक्का होता था। इसके अतिरिक्त कई धागे एक साथ काते जा सकते थे।

5. पावरलूम – पावरलूम का आविष्कार 1787 में एडमंड कार्टराइट ने किया। पावरलूम को चलाना बहुत आसान था। जब भी धागा टूटता मशीन अपने आप काम करना बंद कर देती थी। इससे किसी तरह के धागे से बुनाई की जा सकती थी। 1830 के दशक से कपड़ा उद्योग में नयी-नयी मशीनें बनाने की बजाय श्रमिकों की। उत्पादकता बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा।

प्रश्न 13.
ब्रिटेन में धातुकर्म उद्योग का विकास कैसे हुआ? (V.Imp.)
उत्तर:
ब्रिटेन में धमनभट्टी के आविष्कार ने धातुकर्म उद्योग में क्रांति ला दी। इसका आविष्कार 1709 में प्रथम अब्राहम डबी ने किया। इसमें सर्वप्रथम ‘कोक’ का प्रयोग किया गया । कोक में उच्चताप उत्पादन करने की शक्ति थी। इसे पत्थर के कोयले से गंध तथा अपद्रव्य निकालकर तैयार किया जाता था। इस आविष्कार के बाद भट्ठियों को काठकोयले पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। इन भट्ठियों से निकलने वाले पिघले लोहे से पहले की अपेक्षा अधिक बढ़िया ओर लंबी ढलाई की जा सकती थी।

हलवा लोहे (pig-iron) से पटिवा लोहे (wrought-iron) का विकास किया गया जो कम भंगुर था। हेनरी कोर्ट ने आलोड़न भट्ठी (puddling furmance) और बेलन मिल (रोलिंग मिल) का आविष्कार किया। बेलन मिल में परिशोधित लोहे से छड़ें तैयार करने के लिए भाप की शक्ति का प्रयोग किया जाता था। अब लोहे से अनेक उत्पादन बनाना संभव हो गया क्योंकि लोहे में टिकाऊपन अधिक था, इसलिए इसे मशीनें और रोजमर्रा की चीजें बनाने के लिए लकड़ी

से बेहतर सामग्री माना जाने लगा। लकड़ी तो जल या कट-फट सकती थी, परंतु लोहे के भौतिक तथा रसायनिक गुणों को नियंत्रित किया जा सकता था। 1770 के दशक में जोन विल्किनसन ने सर्वप्रथम लोहे से कुर्सियाँ, शराब डर्बी ने कोलबूकडेल में सेवन नदी पर विश्व में पहला लोहे का पुल बनाया। विल्किनसन ने पहली बार ढलवाँ लोहे से पानी की पाइपें बनाई।

इसके बाद लोहा उद्योग कुछ विशेष क्षेत्रों में कोयला खनन तथा लोहा प्रगलन की सामूहिक इकाइयों के रूप में केन्द्रित हो गया । यह ब्रिटेन का सौभाग्य था कि वहाँ उत्तम कोटि का कोकिंग कोयला और उच्च-स्तर का लौह खनिज साथ-साथ पाया जाता था। इसके प्राप्ति क्षेत्र पत्तनों के पास ही थे।

वहाँ ऐसे पाँच तटीय कोयला-क्षेत्र थे जो अपने उत्पादों को लगभग सीधे ही जहाजों – में लदवा सकते थे। कोयला क्षेत्र समुद्र तट के पास ही स्थित होने के कारण जहाज निर्माण का उद्योग और नौपरिवहन के व्यापार का बहुत अधिक विस्तार हुआ। 1800 से 1830 के दौरान ब्रिटेन के लौह उद्योग का उत्पादन लगभग चौगुना हो गया। उसका उत्पादन पूरे यूरोप में सबसे संस्ता भी था।

प्रश्न 14.
भाप की शक्ति ने ब्रिटेन के औद्योगिक में किस प्रकार सहायता पहुँचाई?
उत्तर:
भाप अत्यधिक शक्ति उत्पन्न कर सकती है। अतः यह बड़े पैमाने पर औद्योगिक के लिए सहायक सिद्ध हई। द्रवचालित शक्ति के रूप में जल सदियों से ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बना रहा था। परंतु इसका उपयोग भाप के रूप में किया जाने लगा। भाप की शक्ति उच्च तापमान पर दबाव उत्पन्न करती है जिससे अनेक प्रकार की मशीनें चलाई जा सकती हैं। पाप की शक्ति ऊर्जा का ऐसा स्रोत था जो भरोसेमंद और कम खर्चीला था।

खनन उद्योग तथा भाप, की शक्ति-भाप की शक्ति का प्रयोग सर्वप्रथम खान उद्योग में किया गया। इसके प्रयोग से कोयले तथा अन्य धातुओं की माँग बढ़ने पर उन्हें और अधिक गहरी खानों में से निकालने के काम में तेजी आई। खानों में अचानक पानी भर जाना भी एक गंभीर समस्या थी।

1698 में थॉमस सेवरी ने खानों से पानी बाहर निकालने के लिए माइनर्स फ्रेंड (खनन-मित्र) नामक एक भाप इंजन का मॉडल बनाया। परंतु ये इंजन छिछली गहराइयों में धीरे-धीरे काम करते थे और दबाव बढ़ जाने पर उनका बॉयलर फट जाता था।

भाप का एक और इंजन 1712 में थॉमस न्यूकॉमेन ने बनाया। इसमें सबसे बड़ी कमी यह थी कि संघनन बेलन (कंडेंसिंग सिलिंडर) के लगातार ठंडा होते रहने से इसकी ऊर्जा समाप्त होती रही थी। कारखानों में भाप की शक्ति का प्रयोग-1769 तक भाप के इंजन का प्रयोग केवल कोयले की खानों में होता रहा। तभी जेम्सवाट ने इसका एक अन्य प्रयोग खोज निकाला।

बाट ने एक ऐसी मशीन विकसित को जिससे भाप का इंजन केवल एक साधारण पंप की बजाय एक ‘प्राइस मूवर’ के रूप में काम देने लगा। इससे कारखानों में शक्ति चलित मशीनों को कर्जा मिलने लगी। एक धनी निर्माता मैथ्य बॉल्टन की सहायता से वॉट ने 1775 में बर्मिघम में ‘साहो फाउंडरी’ स्थापित की। इस फाउंडरी में वॉट के स्टीम इंजन बड़ी संख्या में बनने लगे।

1800 के बाद भाप इंजन की प्रोद्योगिकी और अधिक विकसित हो गई। इसमें तीन बातों ने सहायता पहुँचाई –

  • अधिक हल्की मजबूत धातुओं का प्रयोग
  • अधिक सटीक मशीनी औजारों का निर्माण तथा
  • वैज्ञानिक जानकारी का व्यापक प्रसार

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
औद्योगिक क्रांति के परिणामों में कौन-सा सही है?
(a) औद्योगिक नगरों का विकास
(b) मजदूरों की समृद्धि
(c) देशी कारीगरों का विनाश
(d) वर्ग भेद का उदय
उत्तर:
(a) औद्योगिक नगरों का विकास

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रांति ने समाज में निम्न में से कौन से एक नये वर्ग को जन्म दिया?
(a) वेतनभोगी श्रमिक वर्ग
(b) बेगार करने वाले श्रमिक
(c) संगठित श्रमिक वर्ग
(d) सुस्त श्रमिक वर्ग
उत्तर:
(a) वेतनभोगी श्रमिक वर्ग

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन इंगलैंड में औद्योगिक शहर नहीं है?
(a) डबलिन
(b) न्यूकासल
(c) लंदन
(d) मैनचेस्टर
उत्तर:
(a) डबलिन

प्रश्न 4.
यूरोपीय लोग मुद्रण प्रणाली के ज्ञान हेतु किसके ऋणी रहे?
(a) चीनी
(b) मंगोल
(c) चीनियों तथा मंगोल शासक
(d) चीन एवं भारत
उत्तर:
(c) चीनियों तथा मंगोल शासक

प्रश्न 5.
औद्योगिक क्रांति किस सदी में हुई थी?
(a) 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध
(b) 19वीं सदी में
(c) 17वीं सदी में
(d) 21वीं सदी में
उत्तर:
(a) 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध

प्रश्न 6.
स्पिनिंग जैनी का आविष्कार किया ………………..
(a) हारग्रीब्ज ने
(b) जेम्सवाट
(c) कार्टराइट ने
(d) एडमंड ने
उत्तर:
(a) हारग्रीब्ज ने

प्रश्न 7.
तार का आविष्कार किस वर्ष हुआ?
(a) 1835
(b) 1836
(c) 1837
(d) 1839
उत्तर:
(a) 1835

प्रश्न 8.
टेलिफोन का आविष्कार किस वर्ष हुआ?
(a) 1876
(b) 1877
(c) 1878
(d) 1979
उत्तर:
(a) 1876

प्रश्न 9.
‘दास कैपिटल’ के रचनाकार हैं ……………..
(a) मार्क्स
(b) गैटेक
(c) अरस्तू
(d) कार्ल एईस
उत्तर:
(a) मार्क्स

प्रश्न 10.
दूसरी औद्योगिक क्रांति कब आई?
(a) 1850 के बाद
(b) 1950
(c) 1833
(d) 1834
उत्तर:
(a) 1850 के बाद

प्रश्न 11.
भाप के इंजन का आविष्कार किया ……………….
(a) जेम्स वाट ने
(b) काईट ने
(c) रोस्टर ने
(d) जैनी ने
उत्तर:
(a) जेम्स वाट ने

प्रश्न 12.
म्यूल का आविष्कार किसने किया?
(a) डॉम्पटन ने
(b) कार्टराइट ने
(c) सैम्युअल क्रॉम्टन ने
(d) जैनी ने
उत्तर:
(c) सैम्युअल क्रॉम्टन ने

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 2 Nalanda : Ancient Seat of Learning

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Bihar Board Class 11 English Nalanda : Ancient Seat of Learning Textual Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions Orally :

Nalanda Ancient Seat Of Learning Question Answer Bihar Board Question 1.
Who was Dr. Rajendra Prasad ?
Answer:
He was the first President of the Republic of India.

Nalanda Ancient Seat Of Learning Bihar Board Question 2.
When and where was he born ?
Answer:
He was born in 1884 in Zeradei, Bihar.

Ancient Seat Of Learning Bihar Board Question 3.
What is his contribution to the nation ?
Answer:
He had a moderating influence on political thinking. It was through his efforts that Magadh Research Institute was set up.

Class 11 English Chapter 2 Question Answers Bihar Board Question 4.
Where is Nalanda ? What was it famous for in the past ?
Answer:
Nalanda is in Bihar. It was famous for its University in the past.

B. 1. Answer the following questions briefly :

Class 11 English Chapter 2 Bihar Board Question 1.
Why had people gathered in Nalanda ?
Answer:
People had gathered in Nalanda because Dr. Rajendra Prasad was going to lay the foundation stone of Magach Research Institute there to revive the ancient glory of Nalanda.

Ancient Seat Of Learning Meaning In Hindi Bihar Board Question 2.
What does Nalanda symbolise ?
Answer:
Nalanda is the symbol of the most glorious period of India’s history.

Chapter 2 English Class 11 Bihar Board Question 3.
With which great religious teacher is Nalanda associated ?
Answer:
Nalanda is associated with the great religious teacher, Lord Buddha.

Nalanda University History In English Bihar Board Question 4.
When did it emerge as a flourishing University ?
Answer:
Nalanda emerged as a flourishing University sometime in the Gupta Age.

English Chapter 2 Class 11 Question Answers Bihar Board Question 5.
How long did Lord Mahavira live in Nalanda ?
Answer:
Lord Mahavira lived for fourteen years in Nalanda.

Class 11 English Chapter 2 Question Answer Bihar Board Question 6.
Who was Lepa ? What did he do with Lord Buddha ?
Answer:
Lepa was a rich citizen of Nalanda. He welcomed Lord Buddha with his entire wealth and possessions, and became his disciple.

Lesson 2 English Class 11th Bihar Board Question 7.
Who was Fa-Hien ? When did he visit Nalanda ?
Answer:
Fa-Hien was a Chinese pilgrim. He visited Nalanda in the 4th century AD.

Chapter 2 Class 11 English Bihar Board Question 8.
When did Hieun T’sang visit India ? Why did he refer to Jataka story ?
Answer:
Hieun T’sang visited India in the seventh century AD during the reign of emperor Harshavardhan.

He refers to Jatak story to say that the name Nalanda was derived from Na- alam-da, the peace of mind which Lord Buddha could not achieve in his previous births.

Nalanda University Bihar Board Class 11 English Question 9.
How was Nalanda University born ?
Answer:
Nalanda University was bom with the help of charity and public donations. It was founded with an endowment created by 500 traders who purchased the land and offered it to Lord Buddha.

Class 11 English Ch 2 Question Answer Bihar Board Question 10.
How many Viharas did Nalanda have ?
Answer:
Nalanda has six large Viharas.

Question 11.
What arrangements were made to meet the recurring expenditure of the University ?
Answer:
The revenue of 100 villages was set apart to meet the recurring expenditure of the university. Later it rose to 200 villages.

Question 12.
Name the states that contributed to the maintenance of the Nalanda University.
Answer:
Three states – Uttar Pradesh, Bihar and Bengal contributed to the maintenance of the Nalanda University.

B. 2. Answer the following questions briefly :

Question 1.
How many students and teachers were at Nalanda University when Hieun T’sang visited ?
Answer:
There are 10,000 students and 1,500 teachers.

Question 2.
How was the pupil-teacher ratio significant ?
Answer:
This ratio was significant because teachers could pay individual attention to the education and training of their students.

Question 3.
Name the countries from where the scholars came to study and collect Buddhist literature.
Answer:
Scholars came from China, Korea, Tibet, Turkistan and Mongolia to study and collect Buddhist literature.

Question 4.
What kind of library did Nalanda possess ?
Answer:
Nalanda had the biggest library in Asia.

Question 5.
When was it destroyed ?
Answer:
It was destroyed in the 12th century.

Question 6.
What kind of library is there in your school/college ?
Answer:
Our school library has textbooks, reference books, literary and scientific books:

Question 7.
How did several manuscripts survive ?
Answer:
The citizens had ensured the preservation of many rare manuscripts by getting their copies. Several of them reached Nepal and Tibet, and are still there.

Question 8.
How many lectures were delivered daily at Nalanda ?
Answer:
One hundred lectures were delivered daily at Nalanda.

Question 9.
What was so unique about the academic attitude at Nalanda ? How does it compare with the academic attitude at your school/college ?
Answer:
The academic attitude at Nalanda was free from any prejudice whatsoever. It was exposed to the religion and philosophy of all mankind.

The academic attitude in our school is also free from any prejudice. It is secular and no religious education is imparted.

Question 10.
How many subjects were made compulsory ?
Answer:
Five subjects – grammar, logic, medical science, handicrafts and religious and philosophy were made compulsory.

Question 11.
What appeal does Dr. Rajendra Prasad make to the people ?
Answer:
Dr. Rajendra Prasad appealed to the people to revive the educational system of a bygone era, and re-establish Nalanda as a centre of art, literature, philosophy, religion and science.

C. 1. Long Answer Questions :

Question 1.
Describe, after Dr. Rajendra Prasad, the academic activities at Nalanda. Assess the activities at your school/college in the light of the academic activities at Nalanda.
Answer:
According to Dr. Rajendra Prasad, Nalanda was a centre of higher education. There were about 10,000 students and 1,500 teachers. Obviously, a teacher had only six students to train. This was good from academic point of view because there was a close relationship between the guru and the shishya. Every student could get an individual attention. There were five compulsory subjects. The subjects were useful for all-round development of the students and made them capable to live healthily and usefully. The library was the biggest in Asia.

It was an honour to be a student at Nalanda. Scholoars from far off countries of Asia came there to study and collect Buddhist literature. About one hundred lectures were delivered everyday. The academic atmosphere was open, and without prejudice. Besides studies in Buddhist literature and philosophy, Vedic and allied literature was also taught. In fact, philosophy and religion of mankind was taught there.

Our school is very small and the teachers can hardly pay individual attention to their students. We have to study English and Hindi, which are useful in modern times. Besides these languages we study mathematics, science, social studies, economics, disaster management and computer. We are more worried about passing our examinations than acquiring knowledge.

Question 2.
‘The syllabus of Nalanda University was drawn with great wisdom,’ Explain.
Answer:
The syllabus of Nalanda University was drawn to serve two purposes. It aimed at the all-round development of a student’s personality as well as to make him financially independent and useful member of society.

Students were taught grammar which helped them to master the language. They were taught logic which helped them to understand and judge everything rationally. They were taught medical science. It helped them to live physically healthy and help others to live healthily. They were also taught a handicraft so that they could earn a living usefully and respectably. They were also taught religion and philosophy of their choice. This helped them to develop mentally and spiritually.

Question 3.
Why were the students of Nalanda University increasingly successful in their daily life ? How did the syllabus of Nalanda University help its students ? Do you find your syllabus helpful to you ? Evaluate your own syllabus in the light of the syllabus of Nalanda University.
Answer:
The root cause of the gradual increasingly success of the students of Nalanda University in their daily life were (i) the skilful preparation of the syllabus, and (ii) frequent interaction and individual care of the teachers on students. The syllabus of Nalanda University had been prepared keeping in view the practical problems which come on the way of success. The teachers used to guide the students properly. They watched their day to day activities and discipline. They took special care and precaution in building up the career of the student.

The preparation of syllabus of the university was in such a way that it could look after all round development of the student. It provided perfect knowledge to them. It included all important subjects such as Medical Science, Grammar, Languages, Logic, Crafts (Arts), architecture etc. as compulsory subjects. There were other subjects like philosophy and religion. It depended on the students to select either of them as optional subject. Thus they syllabus helped the students in carrying out their studies smoothly and building up their career.

Our syllabus has also been framed according to the need of present time. It also includes several subjects of science, arts and commerce. All the subjects of science, arts and commerce. All the subjects of the syllabus have been grouped into four faculties—Humanities, Science, Commerce and Social Science. This provision has been made according to the demand of time. Each subject provides specific and exaustive knowledge of the subject. The present syllabus has been constituted keeping in mind the present problem of employment. It provides the latest knowledge of all the subjects. It makes us aware with the knowledge of latest scientific researches and inventions, the world wide knowledge of trade and commerce.

Despite all there things the syllabus of present days cannot give the composite and moralful knowledge which the syllabus of Nalanda University provided. The purpose of the syllabus of Nalanda University was to provide the students the perfect knowledge of humanity and religion. It made the students aware with the purpose of life. The purpose of the present syllabus is to provide us knowledge to get a suitable job to lead a comfortable life.

Question 4.
What do the copper plates tell about the international relation maintained by Nalanda ? Describe in details.
Answer:
Many copper plates have been found at Nalanda in the course of archeological excavations. A few of them are the records of the visit of Maharaja Dharampal Deva and Devapal Deva of Bengal as the inscription over them show. Statues of those kings were also found at Nalanda. One of the the copper plates shows the international relationship maintained by Nalanda. The Emperor of Swarma-Dwip (now a part of Indonesia), Shri Balputra Deva had sent his envoy to Devpal Deva, the then ruler of Magadh with a request to make a gift of five villages to Nalanda on his behalf.

As the inscription of his copper plate shows Balputra, the Emperor of Java, being deeply impressed by the achievement of Nalanda, had a large Vihar constructed here to give visible expression of his devotion to Lord Buddha. This is but an example that has survived by sheer chance and which gives us an indelible impression of the glory which Nalanda enjoyed the world over.

Question 5.
How did the scholars of Nalanda carry the torch of knowledge to foreign countries ? Give details.
Answer:
Nalanda was considered a great centre of learning and knowledge in the world. Scholars from different countries used to visit Nalanda to study religion and philosophy. Nalanda was also a great centre of research. Scholars used to visit Nalanda to research on Buddhism. Thonim Sambhot, a Tibetan scholar was sent to Nalanda by Chang Gampo, the Emperor of Tibet to learn Sanskrit. He introduced and popularised Sanskrit and Indian knowledge in his country. He also studied Buddhistic and Brahmanical Literature under the guidance of Acharya Deva Vidya Sinh.

In the 8th century A.D. Acharya Shanti Rakchit, the chancellor of Nalanda University travelled to Tibet on the invitation from the Emperor. After sometime Acharya Kamal Shila, the chief authority on “Tantra Vidya” also visited Tibet. The scholars of Nalanda also learnt the Tibetan language. They translated Budhhist and Sanskrit words in Tibetan. By presenting the entire thing in new way in Tibet, they gradually converted its Rakshit of Nalanda for the first time in 749 A.D. in Tibet. It is also believed that the Korean Scholars came to study the Vinay and Abhidharma at Nalanda.

Question 6.
“Nalanda is the symbol of the most glorious period of our history.” How ? Explain.
Answer:
Nalanda was known for the greatest centre of learning and research in the world. The scholars from different countries used to visit Nalanda University to study religion and philosophy, to learn Buddhism. It bound together the various parts of Asia with links of knowledge at that time. There was no national and racial distinction of knowledge at Nalanda. The history of Nalanda dates back to the age of Lord Buddha and Lord Mahavira. According to Jain records, Lord Mahavira met Acharya Maukhila at Nalanda. He had lived here for 14 years.

Lepa, a rich citizen of Nalanda welcomed Lord Budha and offered his entire wealth and possessions and became his disciple. It is mentioned in the book “Sutra Kritanga”. The learned historian of Tibet “Lama Taranath” had written in his book that Nalanda was the birth place of ‘Sariputra’, a prominant person of the time. Emperor Ashoka had built a temple on his samabhi. Nalanda emerged as a flourishing university in the Gupta Age. Bhikshu Nagarjuna and Arya Deva were associated with Nalanda University. Chinese pilgrims Fa-Hien and Hieun T’sang had visited Nalanda and they found it at the height of its glory.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs:

Question a.
There are no national and racial distinctions in the realm of knowledge.
Answer:
Knowledge does not see caste, creed and nationalism. Whoever labours hard to acquire it, it goes with him. It requires regular studies and connection with the electronic media i.e. internet etc.

Question b.
Education is must for a fruitful life.
Answer:
Education makes a man perfect. It teaches us the manner of better living. It removes the negative desire of a man. It teaches us to lead a systematic life. It also leads us to all round development. A fruitful life can’t be imagined without education.

C. 3. Composition :

Question a.
Write a letter in about 150 words to a Japanese pen friend describing the centres of learning in ancient and medieval India.
Answer:
23, J. P. Narain Enclave
Patna
7th December 20
Dear Hanna,

I have just received your letter and I am glad to read that you are interested in knowing about the centre of learning in ancient and medieval India. I am sure you must have heard about Nalanda and Taksheela, These were two great centres of learning known all over Asia. Thfy were centres of Buddhist learning t it other aspects of Indian philosophy and knowledge of Brahmanical literature were also imported there. These two universities had large libraries but unfortunately they were destroyed by foreign invaders. The aim of education at these universities was not to make monks. They emphasised on the all round development of the personality of the student.

They not only imparted academic knowledge, but taught logic, grammar and even some handicrafts so that the students might earn a living respectably and settle down as householders. Indeed such was the reputation of these two centres of learning that scholars from your country, and from Korea, China, Sri Lanka and Indonesia came to study here and carried back the torch of knowledge to their native lands.

If you visit India, I will show you the remains of Nalanda, and you will nave an idea of the grandeur, this place used to be.

With best wishes.
Yours Sincerely
Anmol

Question b.
Prepare a speech on the importance of library in about 200 words to be delivered at the annual function of your school/college.
Answer:
Dear friends, today I am going to speak about the importance of library.

A library is a must for every institute. We are fortunate to have a good library with about 3.(XX) books.

A library has hooks on various subjects besides encyclopaedias, dictionaries, atlases, and other reference books. These books are very useful. We can find information on any place, person, building, animal, etc. We can also learn about events and discoveries. There are books on science and geography that tell us about problems like global warming and pollution. We can also’ find out about our body and how our organs work. We can leant about space and space missions.

Besides, reference books, dear friends, we can have books by great writers in Hindi and English in literature sections. If you like stories, we have a lot of them there. There are novels and plays and essays by men of letters. If you like books on adventure, you can choose any from that section. Fortunately, we have a good librarian. She is ever willing to guide us and help us to choose a book of our liking. Besides, our principal, as you know, has introduced an open-shelf system. We are free to visit the library and browse a book there. We can also borrow two books for a fortnight. But we must remember, dear friends, library books are for all of us. So, we must not spoil them, and we must return them by the due date because someone else might be in need of them. I am sure you will make a judicious use of library for your projects and for extra reading.

Thanking you.

D. Word-Study
D. 1. Dictionary use :

Ex. 1. Look up a dictionary and find out how these words are different from one another:
charity donation endowment

Ex. 2. Use the words given in’Ex. 1’in sentences of your own.
Answer:
Ex. 1. charity – something that is given by an organization for helping people in need.

donation – something that is given to an organization such as charity, in order to help them.
endowment – money given to a school or a college or another institution to provide it with an income.

Ex. 2. We organized a charity show to collect money for flood-relief. We have donated blood to blood-bank in the hospital.

The elites of the society have started a helping club and have endowed it with money.

D. 2. Word-meaning :

Ex. 1. Write the synonyms of the words given below: disciple
Disciple – resolve – pursue
inscription – inspire – attitude

Ex. 2. Write the antonyms of the following words:
Revive – glory – consiousness
various – liberalism – prejudice

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 2 Nalanda Ancient Seat of Learning 1

E. Grammar

Study the following sentences from the lesson:
(a) Lepa, a rich citizen of Nalanda, welcomed Lord Buddha.
(b) The message of Nalanda was heard across the mountains and the ocean of the Asian main-land.

The first sentence given above is in active voice, the passive equivalent of which would be:

Lord Buddha was welcomed by Lepa, a rich citizen of Nalanda. The second sentence is in the pasive voice, its active equivalent would be:

They heard the message of Nalanda across the mountains and the ocean of the Asian main-land.

Ex. 1. Now change the voice of the following sentences:

  1. Emperor Ashoka enlarged the Samadhi of Sariputra.
  2. Acharya Dingnag visited Nalanda.
  3. The revenue of 100 villages had been set apart to meet the recurring expenses.
  4. Copper-plates have been found at Nalanda.
  5. The syllabus of Nalanda University was drawn up with grer. wisdom.

Answer:

  1. The Samadhi of Sariputra was enlarged by Emperor Ashoka.
  2. Nalanda was visited by Acharya Dingnag.
  3. The recurring expenses had been met by the revenue of 100 villages
  4. Nalanda has been found copper-plates.
  5. Nalanda University drawn up the syllabus with great wisdom.

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Bihar Board Class 11 English Three Years She Grew Textual Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions :

Nature is all around you. You see its different manifestations in plants, birds, animals, rivers, lakes etc :

Three Years She Grew Question And Answer Bihar Board Question 1.
Have you ever observed nature closely ?
Answer:
Yes, I have observed nature closely many times. Once I went to Rajgir with my parents. There was solar eclipse that day. We took bath in ‘Surya Kund’, the was hot. Afterwards we went to see the ‘stupas’ and temples of Lord Buddha. We again took bath after eclipse was over in ‘Brahm Kunda’. The important and the most attractive thing which I observed that no body knows from where the water in those ‘Kundas’ came and why the water was so hot.

The second thing was that the ‘kundas’ and small market of there were surrounded by mountains. The sight was so much beautiful that I wanted to settle there Perhaps the water of ‘kundas’ also coming from the mountains, and the reason of it being hot sulpher through which water has to pass.

The Education Of Nature Questions And Answers Bihar Board Question 2.
How do you feel when you see any of these manifestation ?
Answer:
We feel very delighted when we see any of the manifestation of nature. We forget all the anxieties and problems to see the beauty of nature.

Three Years She Grew Question And Answer Pdf Bihar Board Question 3.
Do you learn anything from them ?
Answer:
We learn from the manifestations of nature that nature has provided us a huge treasure in which all the things of our joy can be found. We should have only the love and sensibility for the nature. We learn to be selfless and to do welfare for all as the nature spreads beauty and pleasure for all without any interest and selfish motive.

B. 1. Answer these questions briefly :

Education Of Nature Poem Questions And Answers Bihar Board Question 1.
Who is ‘she’ in the first line ? Where and how long did she grow ?
Answer:
She is Lucy. She grew in sun and shower for three years.

Three Years She Grew Line By Line Explanation Bihar Board Question 2.
What is meant by ‘A lovelier flower on earth was never sown’ ?
Answer:
This means that Lucy was the loveliest child ever born on earth. The poet compares Lucy to a flower.

Three Years She Grew Bihar Board Question 3.
Who decided to take care of the girl ?
Answer:
Nature decided to take care of the girl.

Three Years She Grew In Sun And Shower Bihar Board Question 4.
What is meant by ‘law and impulses’ in line 8 ?
Answer:
Law means check and control, impulse means a sudden inclination to act. Nature will teach Lucy what to do and when to restrain herself.

Three Years She Grew Poem Bihar Board Question 5.
Where will Nature take the girl ?
Answer:
Nature will take the girl in the hills and the open plains, in glades and bowers.

Three Years She Grew Summary Bihar Board Question 6.
What is meant by ‘overseeing power’ in line 11 ? Who will feel it ?
Answer:
‘Overseeing power’ means divine spirit that will keep a watchful eye on Lucy. Lucy will feel its presence everywhere.

Three Years She Grew Is A Poem By Bihar Board Question 7.
What will the girl learn from the ‘fawn’ ?
Answer:
From the fawn Lucy will learn to be cheerful and to be playful. She will leap and run among the hills and across the lawns.

Question 8.
What will the floating cloud lend to her ?
Answer:
The floating cloud will lend her its stateliness—grace and dignity.

Question 9.
Who did she learn grace from ?
Answer:
She learnt grace from the motion of storms.

Question 10.
What shall mould the Maiden’s form ? How ?
Answer:
The silent influence of nature, the grace and flexibility of the willow, the movement of clouds, and even the storms will mould her figure.

B. 2. Answer the following questions :

Question 1.
What will be dear to the girl ?
Answer:
The glittering, twinkling stars in the midnight sky will be dear to her.

Question 2.
Where will she lean her ear ?
Answer:
She will listen to the sounds of flowing rivers in lonely places.

Question 3.
Where will rivulets dance ?
Answer:
Rivulets dance among hills as they flow in and out in a zigzag way.

Question 4.
What will pass into her face ?
Answer:
The beauty bom of murmuring sound will pass into her face.

Question 5.
What effect will the ‘vital feelings of delight’ have on the girl ?
Answer:
The vital feelings of delight will help her to grow tall, and fill her innocent heart with joy.

Question 6.
What does the phrase ‘such thoughts’ mean in line 34 ?
Answer:
‘Such thoughts’ mean vital feelings of delight as are necessary for the growth and development of human body and mind.

Question 7.
Who will give such thoughts and when ?
Answer:
Nature will give such thoughts to Lucy when they live together in the happy valley.

Question 8.
Who is the speaker of the poem ?
Answer:
The poet is the speaker of the poem.

Question 9.
Explain the line ‘How soon my Lucy’s race was run’ ?
Answer:
The poet is grieved to say that Lucy died very young.

C. 1. Long Answer Questions :

Question 1.
What does Nature decide about Lucy ? Give details.
Answer:
Nature decides to adopt Lucy as her own child and make her a lady of her own. She decides to educate Lucy in her own way. She will teach her how to restrain herself from evil deeds, and prompt her to do good and noble things. She will grow tall and beautiful. She will be sportive like the fawn.

Question 2.
Describe the process by which Nature intends to mould Lucy’s character and her outward form ?
Answer:
Nature herself will be Lucy’s teacher. Floating clouds will teach Lucy majesty of movement. The willow will teach her to bend. This will teach Lucy to be humble. Her body will become flexible. Even the motion of storms will teach her to be graceful. Lucy’s education will not be a passive process. Lucy will be an active participant in her education. She will look at the midnight stars, and will learn to appreciate beauties of Nature. She will listen to the music of flowing streams. This will give her delight, and her face will become beautiful. All these activities and feelings will mould her character as well as her physical form. She will grow to be a cheerful, tall and beautiful young woman.

Question 3.
What are the ideas contained in the poem ?
Answer:
The poem contains William Wordsworth’s ideas about education. He believed that Nature has an immense influence on the development and growth of human body and mind. Lucy is presented as a flower that blossoms into to its natural form under sun and shower.

Question 4.
What did Lucy leave to the speaker ?
Answer:
Lucy died young. She left behind her memory and the calm and quiet heath.

Question 5.
Give critical estimate of the poem ‘Three Years She Grew’.
Answer:
The poem is one of Wordsworth’s Lucy poems that appear in his Lyrical Ballads. Wordsworth was influenced by Rousseau’s philosophy of education. He believes that Nature is the best teacher. School education is artificial.

Through Lucy, he describes how Nature wants to mould her form and character. He describes the process by which Nature will achieve her objective. The process consists of taking up opposing polarities and reconciling them. Lucy will learn ‘law and impulse’. She will play in ‘rock and plain’ and ‘glade and bower’. She will learn from the floating clouds, bending willow, sportive fawn, dancing streams and insensate things.

The poem is divided into seven stanzas of six lines each. The rhyme scheme is a a a b c c b.

Question 6.
Find out instances of simile in the poem.
Answer:
Following are the instances of simile sportive as the fawn.

Question 7.
Find out instances of metaphor in the poem.
Answer:
Following are the instances of metaphor.
‘A lovelier flower on earth was never sown.
Lucy is looked upon as a flower.

Question 8.
Can you find instances of personification in the poem ?
Answer:
The instances of personification are :
The Nature said – Nature is personified.
The floating clouds their state shall lend.
For her the willow bend. rivulets dance their wayward round.
And vital feelings of delight/shall rear her form.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs.

Question a.
Nature is our best teacher.
Answer:
There is no doubt that all our knowledge and experiences have come from Nature. For a long time man lived entirely in natural environment. Even today all our scientific knowledge comes from the study of natural objects and their functions. But Nature does not want passive pupils. You have to participate actively in the teaching-learning process. We observe natural phenomena and draw inferences. If we just watched nature like other animals our knowledge would have remained limited.

Question b.
Nature has many things to offer.
Answer:
There is variety in Nature. There is no monotony. If animals consume oxygen and give out carbon dioxide, plants do quite the opposite. Then there are animals that will be drowned in water, but there are animals that can breathe only in water. Some animals can live both in water and land. Then all animals and plants have a variety of behaviour. Then there is the boundless sky with huge stars, plants and galaxies. Life is Nature’s greatest secret.

Nature has so much to offer that we cannot even name them.

C. 3. Composition :

Write a paragraph in about 100 words on the following:

Question a.
Nature as the storehouse of learning
Answer:
Since early times man has been fascinated by the mysteries of Nature. Today all our knowledge and sciences are based on the study of Nature. Nature is a storehouse of learning, our physics, chemistry, biology, zoology, geography, geology, astronomy, etc. are nothing but our little effort to learn from Nature. Even a great scientist like Newton felt that he could only gather a pebble here and there on the seashore of knowledge. The sea of knowledge remained unfathomed by him. Indeed Nature is a storehouse of learning. That’s why we must preserve nature because there is so much to learn.

Question b.
Bliss of solitude.
Answer:
Man is a social being. We live together in big cities. Yet we get tired of the noise of crowded cities. We seek solitude because only in solitude we can be in communion with our soul and with God. Our saints and sages sought solitude in forests and mountains. There they could meditate and experience the bliss of solitude. In our times solitude is hard to find. But we all do seek it. Nature is the best place for solitude, and only there we can find peace of mind.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs:
(a) Nature is our best teacher.
(b) Nature has many things to offer.
Answer:
(a) Nature teaches us to spread selfless love. It is very beautiful because it knows only to give. It is so much beautiful because it only gives. It never takes anything from anybody. It gives to all. It never descriminates between good and bad.
(b) Nature has a huge treasure to give us. It gives us air to breath, water to drink, fruits and cerials to eat. It provides shelter and light. Everything which we require for our life is provided by nature.

D. Word study:

D. 1. Dictionary Use

Ex. 1. Look up a dictionary and write two meanings to each of the following words-the one in which it is used in the lesson and the other which is more common:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 6 Three Years She Grew 1
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 6 Three Years She Grew 2

E. Grammar :

Ex. 1. Read the sentences picked up from the poem. Some of them are in the active voice and other in die passive one. Change the voice of the sentences given below and note the change in effect after the change in voice.

  1. A lovelier flower on earth was never sown.
  2. She shall be mine.
  3. She will feel an overseeing power.
  4. Vital feelings of delight shall rear her form.
  5. I will give such thoughts to Lucy.
  6. The work was done.
  7. How soon my Lucy’s race was run!

Answer:

  1. Nobody every sowed a lovelier flower on earth. (Agent in prominent) –
  2. I shall own her. (Agent prominent)
  3. An overseeing power will be felt by her. (object prominent)
  4. Her form shall be reared by vital feelings of delight, (object prominent)
  5. Lucy will be given such thoughts by me. (object prominent)
  6. Some one did the work. (Agent prominent)
  7. How somebody ran my Lucy’s race ! (Agent prominent)

Ex. 2. Read the lines from the poem carefully and mark the different cases of the personal pronoun ‘I’:
This child I to myself will take;
She shall be mine, and / will make
A Lady of my own.
…………. and with me.
The Girl …………. shall feel an overseeing power.
Specify the instances of different cases –

Subjective, objective, possessive, and reflexive – in the lines above and write the different cases for other personal pronouns – we, you, he, she, it, they.
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 6 Three Years She Grew 3

F. Activities

Ex. 1. Gather five stories / fables / tales / poems from any language that tell about the benign influence of nature.
Answer:
1. The Daffodils – Wordsworth.
2. The world is Too Much With Us – Wordsworth
3. She Walks In Beauty, Like The Night – Byron
4. Break, Break, Break – Tennyson
5. The Education of Nature – Wordsworth.

Ex. 2. Find out rhyme scheme of the poem.
Answer:
a a b c c b
d d e f f e
g g h i i h
j j k l l k
m m n o o n p p
q r r q s s t u u t.

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Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

Bihar Board Class 11 Political Science धर्मनिरपेक्षता Textbook Questions and Answers

धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
निम्न में से कौन-सी बातें धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत है? कारण सहित बताइए।
(क) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना।
(ख) किसी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में मान्यता देना।
(ग) सभी धर्मों को राज्य का समान आश्रय होना।
(घ) विद्यालयों में अनिवार्य प्रार्थना होना।
(ड) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक शैक्षित संस्थान बनाने की अनुमति होना।
(च) सरकार द्वारा धार्मिक संस्थाओं की प्रबन्धन समितियों की नियुक्ति करना।
(छ) किसी मंदिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेप।
उत्तर:
निम्नलिखित कथन धर्मनिरपेक्षवाद के अनुकूल हैं –

(क) एक धार्मिक समूह द्वारा प्रभावित की अनुपस्थित:
धर्मनिरपेक्षवाद की प्रथम एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शर्त राज्य और धर्म का अलग-अलग होना है परन्तु धर्मनिरपेक्षवाद के लिए यह भी आवश्श्यक है कि अन्तर या अंतः धार्मिक प्रभावित नहीं होनी चाहिए क्योंकि धर्मनिरपेक्षता में समानता स्वतंत्रता में समानता स्वतंत्रता, भेदभाव एवं शोषण का अभाव भी शामिल है।

(ङ) किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय को अलग शिक्षा संस्थाओं को बनाने की अनुमति देना:
धर्मनिरपेक्षता किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा शैक्षिक संस्थाओं को खोलने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाता भारत में अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित कोई संस्था (शैक्षिक) समानता के आधार पर सरकारी सहायता प्राप्त कर सकती है। शिक्षा का उद्देश्य पथ प्रदर्शन है।

धर्मनिरपेक्षता पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी और भारतीय मॉडल की कुछ विशेषताओं का आपस में घालमेल हो गया है। उन्हें अलग करें और एक नई सूची बनाएँ।
धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11

धर्मनिरपेक्षता पाठ के प्रश्न उत्तर कक्षा 11 Bihar Board प्रश्न 3.
धर्म निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से की जा सकती है।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षवाद का तात्पर्य धर्म के मामले में राज्य का उदासीन होना है। इसका तात्पर्य यह कि किसी धर्म के मामले में रुचि नहीं रखनी चाहिए। राज्य को न तो किसी धर्म को आश्रय देना चाहिए और न ही किसी धर्म के विरुद्ध भेदभाव करना चाहिए। लोगों को धर्म के मामले में स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए, यह सोचते हुए कि यह उनका व्यक्तिगत मामला है।

धर्मनिरपेक्षवाद केवल इस बात से संबंधित नहीं है कि राज्य और धर्म को अलग होना चाहिए बल्कि उसे सामाजिक व्यवस्था पर आधारित समानता की स्थापना पर भी जोर देना चाहिए और इसका उद्देश्य अंतः धार्मिक प्रभुता और शोषण को समाप्त करने को होना चाहिए। धर्म निरपेक्षवाद द्वारा धर्म के अंदर स्वतंत्रता और समानता को भी बढ़ावा देना चाहिए। धर्मनिरपेक्षवाद एक विचार है। इसकी धर्म से समानता नहीं स्थापित की जा सकती। यह धर्मनिरपेक्ष का पहलू है।

धर्मनिरपेक्षता के क्वेश्चन आंसर Bihar Board Class 11 प्रश्न 4.
क्या आप नीचे दिए गए कथनों से सहमत हैं? उनके समर्थन या विरोध के कारण भी दीजिए।
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है।
उत्तर:
नहीं, हम इस कथन से सहमत नहीं हैं कि धर्मनिरपेक्षवाद का सम्बन्ध धार्मिक पहचान से नहीं है। हम इसका समर्थन नहीं करते। धर्मनिरपेक्षवाद धार्मिक पहचान में कोई बाधा नहीं डालता। धर्मनिरपेक्षवाद धर्म व्यक्ति का निजी मामला है और यह राज्य और धर्म को अलग-अलग मानता है। व्यक्ति अपने मनपसंद धार्मिक पहचान को कायम रख सकता है।

(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अंदर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच असमानता के खिलाफ है।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षवाद एक धार्मिक समूह या विभिन्न सामाजिक समूह में असमानता के विरुद्ध है, सही है।

धर्मनिरपेक्षवाद का केवल यही अर्थ नहीं है कि धर्म और राजनीति एक दूसरे से अलग हैं बल्कि यह भी है कि एक धार्मिक समुदाय में यह समानता पर भी जोर देता है। यह बात विभिन्न धार्मिक समूहों में भी देखने को मिलती है। यह सभी धार्मिक समूहों में भेदभाव के सभी रूपों को समाप्त करना चाहता है। एक ऐसा राज्य जो धर्मनिरपेक्ष माना जाता है उसको सिद्धान्तों ओर उद्देश्यों के प्रति समर्पित होना चाहिए जो कम से कम गैर-धार्मिक स्रोतों से लिया गया है। उसके अंत में शांति, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और भेदभाव से स्वतंत्रता शामिल होनी चाहिए।

(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षवाद की उत्पत्ति पश्चिमी ईसाइयत से हुई है। यह भारत के अनुकूल नहीं है-सही है। यह सर्वथा सही है कि धर्मनिरपेक्षवाद की उत्पत्ति पश्चिम से विशेष रूप में अमरीका में उत्पन्न हुई है जिसमें राज्य और राजनीति का स्पष्ट रूप से पृथकता है। राज्य धर्म के मामले में न तो हस्तक्षेप करेगा और न ही धर्म राज्य के मामले में हस्तक्षेप करेगा। दोनों का स्वतंत्र क्षेत्र में अपनी सीमा है। उसी प्रकार राज्य किसी धार्मिक संस्था की सहायता नहीं कर सकता।

यह किसी शैक्षिक संस्था, जो धार्मिक समुदाय द्वारा संचालित हो, उसकी वित्तीय सहायता नहीं कर सकता। धर्म सर्वथा, व्यक्तिगत मामला है और कानून की या राज्य नीति का मामला नहीं है। इस विचार के लिए कोई स्थान नहीं है कि एक समुदाय अपनी मनपसंद का कार्य करने को स्वतंत्र है। समुदाय पर अधिकार या अल्पसंख्यक अधिकार का थोड़ा क्षेत्र इसमें अवश्य है।

भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद की हू-ब-हू अनुकृति नहीं है। केवल समान अवधारणा यह है कि राज्य और धर्म दोनों अलग हैं और राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता दोनों में पर्याप्त असमानता है। राज्य को सभी धर्मों का आदर करने का अधिकार है परन्तु भेदभाव करने का कोई अधिकार नहीं है। भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद अल्पसंख्यक अधिकार समर्थक है और धार्मिक संस्थाओं द्वारा संचालित शैक्षिक संस्थाओं की आर्थिक मदद भी करता है।

धर्मनिरपेक्षता के पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 5.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का जोर धर्म और राज्य के अलगाव पर नहीं वरन् उससे अधिक किन्ही और बातों पर है। इस कथन को समझाइए।
उत्तर:
अनेक पश्चिमी और अमरीकी देशों के समान भारतीय धर्म निरपेक्षवाद राज्य और धर्म के अलगाव पर जोर देता है। परन्तु यह न केवल शर्त है बल्कि भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद का लक्षण है। यह निश्चित रूप से इससे कहीं अधिक है। इसका उद्देश्य विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच भेदभाव को समाप्त करना है। यह अंतर और अंतर्धार्मिक समुदायों में समानता और न्याय की स्थापना करता है। भारत में शोषण के अनेक मामले मिलते हैं। ये न केवल अंतर्धार्मिक समूहों में होते हैं बल्कि उसी धार्मिक समुदायों में भी होते हैं।

भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद उसे समाप्त करता है। भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद का दूसरा पहलू यह है कि सामाजिक सुधार लाने के लिए यह धार्मिक मामले में हस्तक्षेप कर सकता है। पं. नेहरू ने स्वयं भेदभव समाप्त करने संबन्धी और गलत सामाजिक बुराइयां जैसे-दहेज प्रथा, सती प्रथा के विरुद्ध कानून निर्माण में अहम् भूमिका निभाई। उन्होंने महिलाओं के अधिकार में वृद्धि और सामाजिक स्वतंत्रता के लिए भी महत्त्वपूर्ण कार्य किए। नेहरू के लिए धर्मनिरपेक्षवाद का तात्पर्य साम्प्रदायिकता का पूर्ण विरोध था।

धर्मनिरपेक्षता Class 11 Question Answer Bihar Board प्रश्न 6.
सैद्धान्तिक दूरी क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता का भारतीय दृष्टिकोण और पश्चिमी दृष्टिकोण का समान महत्त्वपूर्ण लक्षण है-राज्य और धर्म का अलगाव। राज्य को न तो सैद्धान्तिक होना चाहिए और न धर्म की स्थापना करनी चाहिए। इसलिए धर्मनिरपेक्षवाद का यह सुनिश्चित सिद्धान्त है कि राज्य धार्मिक कार्यों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। इसी प्रकार धर्म भी राज्य के किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेगा। राज्य का अपना कोई निजी धर्म नहीं होना चाहिए और धर्म को व्यक्तिगत मामले के रूप में छोड़ देना चाहिए। राज्य और धर्म दोनों का अपना स्वतंत्र क्षेत्र होना चाहिए।

Bihar Board Class 11 Political Science धर्मनिरपेक्षता Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

कक्षा 11 धर्मनिरपेक्षता पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए। (Define the secular state)
उत्तर:
एच. बी. कामथ के अनुसार “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर रहित राज्य है, न ही वह अधर्मी राज्य है न ही धर्म-विरोधी है। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का यह अर्थ है कि इसमें ईश्वर के अस्तित्व को नहीं माना जाता है।”

Dharmnirpekshta Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
पंथ निरपेक्ष अथवा धर्मनिरपेक्षता से क्या आशय है? (Define the term Secular)
उत्तर:
पंथ या धर्मनिरपेक्ष शब्द का अर्थ (Meaning of the word Secular):
धर्म या पंथ निरपेक्ष शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर (Secular) शब्द का हिन्दी पर्याय है। सेक्युलर शब्द लैटिन भाषा के सरकुलम (Surculam) शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है- ‘संसार या युग’।

धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न उत्तर कक्षा 11 Bihar Board प्रश्न 3.
पंथ निरपेक्ष राज्य धर्मों के प्रति सहिष्णु किस प्रकार है? (A Secular state is tolerate towards all the religions How?)
उत्तर:
पंथ निरपेक्ष राज्य इस बात का प्रतिपादन करता है कि सभी धर्म आधारभूत रूप में एक है। अतः धर्म के आधार पर एक दूसरे के प्रति असहनशीलता का व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। हम चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों, हमारे द्वारा यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि एकमात्र हमारा धर्म ही सत्य का प्रतिपादन करता है। हमारे द्वारा अन्य सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए।

धर्मनिरपेक्षता प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
“धर्मनिरपेक्षता विश्व राज्य की आदर्श पूर्ति में सहायक है” व्याख्या कीजिए। (Explain the Secularism is helpful in making a idealistic globally state)
उत्तर:
विश्व राज्य एक अत्याधिक उदार और भव्य आदर्श है, जिसकी प्राप्ति धीरे-धीरे ही की जा सकती है। पंथ निरपेक्ष राज्य मानवीय स्वतन्त्रता और समानता पर आधरित होता है। इसके द्वारा प्रेम, दया, सहिष्णुता, सहयोग और मानवीय सद्भावना के गुणों पर जोर दिया जाता है। इस बात का भी प्रयत्न किया जाता है कि सभी व्यक्ति धर्म, जाति और अन्य भेदों पर विचार किए बिना परस्पर बन्धुत्व के विचार को अपना लें। पंथ निरपेक्षता के विचार की उदार व्याख्या है कि मानव-मानव है और उसके संदर्भ में जाति, धर्म, राष्ट्रीयता और अन्य किसी भेद को महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। विश्व राज्य का आदर्श भी यही कहता है और इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता विश्व राज्य के आदर्श की पूर्ति में सहायक है।

Dharmnirpekshta Class 11 Question Answer Bihar Board प्रश्न 5.
पंथ निरपेक्ष राज्य की शासन प्रणाली का आधार क्या होता है? (What is the base of the government in a Secular state?)
उत्तर:
पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म से पृथकता पर आधारित होने के कारण आवश्यक रूप से भौतिक होता है और इसके अन्तर्गत मनुष्यों के नैतिक एवं आध्यात्मिक हितों की साधना नहीं हो सकती। प्रो. पुन्ताम्बेकर ने इस विषय में कहा है “इसके अन्तर्गत किसी धर्म या नैतिकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। पंथनिरपेक्ष राज्य गाँधीवादी राज्य हो ही नहीं सकता न तो वह प्राचीन धार्मिक विचारधाराओं पर और न सांस्कृतिक विचारों पर चल सकता है।”

धर्मनिरपेक्षता Class 11 Bihar Board प्रश्न 6.
धर्मनिरपेक्षता का मूल आधार क्या है? (What is main base of Secularism?)
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता का मूल आधार निम्नलिखित हैं –

  1. पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता।
  2. सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता।
  3. धार्मिक कट्टरता को निरूत्साहित करना।
  4. सर्वाधिकार का विरोध।
  5. सभी नागरिकों को समान अधिकार।
  6. शासन द्वारा धार्मिक शिक्षा का निषेध।
  7. व्यक्तियों को अन्य धर्मों में दखल देने का अधिकार नहीं।
  8. नैतिकता के नियमों को अस्वीकार नहीं करना।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

Dharmnirpekshta Ke Question Answer Bihar Board प्रश्न 1.
भारतीय संविधान में पंथ-निरपेक्षता के कौन-से आदर्श पाए जाते हैं? (What ideals of Secularism is to be given in Indian constitution?)
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता के आदर्श-भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता या पंथ-निरपेक्षता सम्बन्धी निम्नलिखित चार आदर्श दृष्टिगत होते हैं –
(क) राज्य अपने को किसी धर्म विशेष से सम्बद्ध नहीं करेगा, न ही किसी धर्म विशेष के अधीन रहेगा।
(ख) राज्य जब किसी व्यक्ति को धार्मिक मान्यता, आचरण एवं प्रचार-प्रसार सम्बन्धी स्वतंत्रता प्रदान करेगा, तो वह किसी व्यक्ति विशेष को अपेक्षाकृत (Preferential) सुविधा नहीं देगा।
(ग) किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध धर्म अथवा धार्मिक विचार के आधार पर राज्य कोई भेदभाव नहीं करेगा।
(घ) राज्य के अधीन किसी पद को प्राप्त करने हेतु सभी के धर्मावलम्बियों को समान अवसर प्राप्त होंगे।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्ष राज्य की प्रमुख परिभाषाएँ लिखिए। (Write the definitions of a Secular state)
उत्तर:
धर्मनिरपेक्ष राज्य की कुछ परिभाषाएँ निम्नांकित हैं –
(क) जॉर्ज ऑसलर के शब्दों में “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है तथा जो धार्मिक या द्वैतवादी विचारों से बन्धा हुआ न हो।” इस दृष्टि से धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से होता है जो संसारिक, लौकिक और ऐच्छिक है तथा जिसका अपना कोई धर्म नहीं। ऐसा राज्य धर्म के नाम पर व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करता।

यह राज्य धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत और आन्तरिक वस्तु मानते हुए धर्म को राजनीति से पृथक रखने में विश्वास रखता है। इस प्रकार का राज्य किसी धर्म विशेष का प्रचार-प्रसार नहीं करता, बल्कि यह सभी धर्मों को समान मानते हुए धार्मिक सहिष्णुता का पोषण करता है।”

(ख) एच.बी.कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर. रहित राज्य है, न ही वह अधर्मी राज्य है और न ही धर्म-विरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का यह अर्थ है कि इसमें ईश्वर के अस्तित्व को नहीं माना जाता है।”

(ग) डोनाल्ड स्मिथ के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य, वह राज्य है जिसके अंतर्गत-विषयक, व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है, जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय धर्म को बीच में नहीं लाता, जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म से सम्बन्धित नहीं है और न किसी धर्म की उन्नति का प्रयत्न करता है और न ही किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप करता है।”

(घ) लक्ष्मीकान्त मैत्र के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य से मेरा अभिप्राय यह है कि ऐसा राज्य धर्म या जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई भेद-भाव नहीं करता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य की ओर से किसी विशिष्ट धर्म को मान्यता प्राप्त नहीं होगी।”

प्रश्न 3.
पंथ निरपेक्ष राज्य मानव-धर्म पर आधारित होता है। स्पष्ट कीजिए। (The Secular State is based on Humanism Clarify)
उत्तर:
पंथ निरपेक्ष राज्य किसी धर्म विशेष पर आधारित नहीं होता है और इसके द्वारा किसी प्रकार की धार्मिक क्रियाओं का सम्पादन भी नहीं किया जाता है किन्तु धर्म से पृथ्कता का तात्पर्य यह नहीं है कि पंथ निरपेक्ष राज्य पूर्ण रूप से भौतिक या अनाध्यात्मिक हो। इस प्रकार के राज्य को अधर्मी, विधर्मी, धर्म-विरोधी, अनाचारी या अधार्मिक नहीं कहा जा सकता है।

इसका कारण यह है कि किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित न होने पर भी इस प्रकार का राज्य सत्य, अहिंसा, प्रेम और विश्व-बन्धुत्व आदि सर्वमान्य सिद्धान्तों के प्रति आस्था रखता है और इसका धर्म और नैतिकता से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित नहीं होता, वरन् सभी धर्मों का सार मानव-धर्म पर आधारित होता है।

प्रश्न 4.
पंथ निरपेक्षता की आलोचना के कोई तीन बिन्दु लिखिए। (Write three points of criticis of Secularism)
उत्तर:
(क) प्रासन-प्रणाली का आधार भौतिक:
आलोचकों के अनुसार पंथ निरपेक्ष राज्य, राज्य की धर्म से पृथकता पर आधारित होने के कारण आवश्यक रूप से भौतिक होता है और इसके अन्तर्गत मनुष्यों के नैतिक एवं आध्यात्मिक हितों की साधना नहीं हो सकती। प्रो. पुन्ताम्बेकर ने इस सम्बन्ध में कहा है, “इसके अन्तर्गत किसी धर्म-या नैतिकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। पंथ निरपेक्ष राज्य गाँधीवादी राज्य हो ही नहीं सकता न तो वह प्राचीन धार्मिक विचारधाराओं पर और न सांस्कृतिक विचारों पर चल सकता है।”

(ख) राज्य का छिन्न हो जाना सम्भव:
आलोचकों का कथन है कि राज्य में एक धर्म विशेष को मान्यता देने से धार्मिक एकता के आधार पर एक ऐसी राजनीतिक एकता स्थापित हो जाती है, जो राज्य को स्थायित्व प्रदान करती है। किन्तु धर्म से पृथक होने के कारण पंथ निरपेक्ष राज्य में इस प्रकार की धार्मिक एकता नहीं होती है और इस प्रकार की धार्मिक एकता के अभाव में राज्य के छिन्न-भिन्न हो जाने की आशंका बनी रहती हैं आलोचकों के अनुसार एक पंथ निरपेक्ष राज्य में विभिन्न धर्मों के जो अनुयायी होते हैं, उनके द्वारा धार्मिक भेदों के कारण परस्पर निरन्तर लड़ाई-झगड़े राज्य की एकता को नष्ट कर देते हैं।

(ग) लोककल्याणकारी नहीं हो सकता:
लोककल्याणकारी राज्य जनहित और सामाजिक कल्याण पर आधारित होता है और लोककल्याण की यह भावना नैतिक आदशों और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ही उत्पन्न हो सकती है लेकिन पंथ निरपेक्ष सत्य धर्म और नैतिकता के प्रति उदासीन होता है और इस कारण यह कभी सच्चा लोककल्याणकारी राज्य नहीं हो सकता। आलोचकों के अनुसार, राज्य में लोककल्याण की भावनाओं का पतन हो जाता है और इसमें उन स्वार्थपूर्ण तत्त्वों को बढ़ावा मिलता है, जो लोककल्याण के विरुद्ध होते हैं।

प्रश्न 5.
पंथ निरपेक्षता के पक्ष में तीन तर्क दीजिए। (Give three arguments in favour of the Secularism)
उत्तर:
1. पंथ निरपेक्ष राज्य की आलोचनाएँ मिथ्या धारणा पर आधारित हैं:
पंथ निरपेक्ष राज्य की आलोचना करते हुए जो विभिन्न बातें कही जाती है।, वे सभी इस मिथ्या धारणा पर आधारित है कि पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म-विरोधी राज्य होती है, जबकि वस्तुस्थिति इसके नितान्त विपरीत है। पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म-विरोधी राज्य नहीं होता वरन् सभी धर्मों के सार मानव धर्म’ पर आधारित वास्तविक आध्यत्मिक राज्य होता है। इस प्रकार का राज्य, उसके कानून और सत्ता, सब कुछ नैतिकता पर आधारित होते हैं। न्यायमूर्ति रामास्वामी के शब्दों में “पंथ निरपेक्ष राज्य का तात्पर्य यह नहीं है कि कानून नैतिक आचार-विचार में पृथक हों।”

2. राष्ट्रीय एकता की प्राप्ति पंथ निरपेक्ष राज्य में ही सम्भव:
एक राज्य जिसके अन्तर्गत विविध धर्मों के अनुयायी रहते हैं, यदि किसी एक विशेष धर्म को अन्य धर्म के अनुयायी राज्य के प्रति उदासीनता का भाव अपना लेते हैं और बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक वर्ग में सदैव ही संघर्ष की स्थिति बनी रहती है लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य के अन्तर्गत सभी धर्मों के अनुयायियों को समान समझा जाता है और स्वतन्त्रता तथा समानता पर आधारित यह मातृभाव राष्ट्रीय एकता के लक्ष्य की प्राप्ति में बहुत अधिक सहायक होता है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि अकबर की पंथ निरपेक्षता ने मुगल साम्राज्य को एकता और सुदृढ़ता प्रदान की, लेकिन औरंगजब की धार्मिक पक्षपात की नीति ने मुगल साम्राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया। भारतीय संविधान सभा के सदस्यों का भी यही विचार था कि पंथ निरपेक्षता ही राज्य की एकता को बनाए रख सकती है और इसलिए उन्होंने भारत के लिए पंथ निरपेक्षता के आदर्श की अपनाया।

3. पंथ निरपेक्षता लोकतंत्र के आदर्श की पूरक:
पंथ निरपेक्षता का आदर्श लोकतंत्र के विचार का भी पूरक है। लोकतंत्र का आदर्श मूल रूप से समानता और स्वतंत्रता की धारणा पर आधारित है और पंथ निरपेक्ष राज्य में इन दोनों ही आदर्शों को उचित महत्त्व प्रदान किया जाता है। पंथ निरपेक्ष राज्य सभी धर्मों को समान समझाता है ओर पंथ निरपेक्षता की धारण धार्मिक क्षेत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी आधारित है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पंथ निरपेक्षता का विचार मूल रूप से लोकतन्त्रात्मक ही है।

आलोचक कहते हैं कि पंथ निरपेक्ष राज्य विकृत होकर तानाशाही का रूप ग्रहण कर लेता है, किन्तु वास्तव में इस प्रकार की आशंका पंथ निरपेक्ष राज्य की अपेक्षा धर्माचार्य राज्य में ही अधिक है। धर्माचार्य राज्य में शासन अपने आपको ईश्वर का प्रतिनिधि बतलाकर जनता पर मनमाने अत्याचार करते हैं। भूतकाल में इन धर्माचार्य राज्य में धर्म के नाम पर दूसरे धर्मों के अनुयायियों पर जिस प्रकार के अत्याचार किए गए, उनकी कल्पना ही भयावह है। पंथ निरपेक्ष राज्य तो सर्वाधिकारवाद की धारणा का विरोधी होने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा समानता पर आधारित होने के कारण अधिनायकवाद का विरोधी और प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था का पूरक है।

प्रश्न 6.
पंथ निरपेक्षता के कोई तीन मूल आधार लिखिए। (Write Three Tenets of Secularism)
उत्तर:
पंथ निरपेक्षता के मूल आधार-पंथ निरपेक्ष राज्य को सही रूप में समझने के लिए पंथ निरपेक्ष राज्य की विशेषताओं का अध्ययन उपयोगी है। पंथ निरपेक्ष राज्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं –

1. धर्म समाज का सामूहिक कार्य न होकर व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य है:
प्राचीन और मध्य युग में धर्म को सामान्यतया समाज का सामूहिक कार्य माना जाता था और राजा तथा प्रजा सभी के द्वारा राजा के नेतृत्व में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा की जाती थी लेकिन धार्मिक जीवन के दो अंग (विश्वास और आडम्बर) होते हैं, उनमें पंथ निरपेक्ष राज्य विश्वास को ही महत्त्वपूर्ण मानता है। उसकी मान्यता है कि धर्म आन्तरिक विश्वास की वस्तु है। अतः धर्म को समाज का सामूहित कार्य न माना जाकर व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य माना जाना चाहिए और सभी व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

2. पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता:
धर्म और राज्य के पारस्परिक सम्बन्ध की दृष्टि से दो प्रकार के राज्य होते हैं – पंथ निरपेक्ष राज्य और धर्माचार्य राज्य। धर्माचार्य राज्य का अपना एक विशेष धर्म होता है और उसके द्वारा इस धर्म की वृद्धि के लिए विशेष प्रयत्न किए जाते हैं। पाकिस्तान इस्लामी राज्य के रूप में धर्माचार्य राज्य का एक उदाहरण है लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता। यह सभी धर्मों को समान समझता है और इसके द्वारा किसी विशेष धर्म के प्रभाव को बढ़ाने या कम करने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाता।

3. धर्म विशेष पर आधारित न होते हुए भी अधार्मिक नहीं:
पंथ निरपेक्ष राज्य किसी धर्म विशेष पर आधारित नहीं होता है और इसके द्वारा किसी प्रकार की धार्मिक क्रियाओं का सम्पादन भी नहीं किया. जाता है किन्तु धर्म से पृथकता का तात्पर्य यह नहीं है कि पंथ निरपेक्ष राज्य पूर्ण रूप से भौतिक या अनाध्यात्मिक हो। इस प्रकार के राज्य को अधर्मी, विधर्मी, धर्मविरोधी, अनाचारी या अधार्मिक नहीं कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित न होने पर भी इस प्रकार का राज्य सत्य, अहिंसा, प्रेम और विश्व-बन्धुत्व आदि सर्वमान्य सिद्धान्तों के प्रति आस्था रखता है और इसका धर्म एवं नैतिकता से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित नहीं होता, वरन् सभी धर्मों का सार ‘मानव धर्म’ पर आधारित होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत में पंथ निरपेक्षता की विस्तृत विवेचना कीजिए। (Discuss in detail the Secularism in India) अथवा, भारत में पंथ निरपेक्षता पर एक निबन्ध लिखिए। (Explain the Secular Character of Indian Democracy) अथवा, भारत में पंथ निरपेक्षता पर एक निबन्ध लिखिए। (Write an essay on Secularism in India)
उत्तर:
भारत में पंथ निरपेक्षता-भारत में सदैव से ही धर्म का जीवन के अन्तर्गत विशेष महत्त्व रहा है किन्तु कालांतर में धर्म के संकुचित रूप का प्रचलन हो गया, उसके आडम्बरमय रूप को ही सब कुछ समझ लिया गया और इससे भारत की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक प्रगति को गहरा आघात पहुँचा। भारतीय समाज में धर्म के नाम पर इतने अधिक रूपान्तर प्रचलित हो गए कि इससे समाज विभिन्न टुकड़ों में विभक्त हो गया और राष्ट्रीय एकता को भीषण आघात पहुँचा।

सदियों तक परतन्त्रता इन परिस्थितियों का स्वाभाविक परिणाम हुआ धार्मिक मत-मतान्तरों के इन दुष्परिणामों को देखते हुए भारतीय संविधान के निर्माताओं द्वारा पंथ निरपेक्षता के आदर्श को अपनाया गया लेकिन संविधान सभा के अनेक प्रमुख सदस्यों द्वारा यह बात नितान्त स्पष्ट कर दी गयी कि पंथ निरपेक्षता का आशय धर्म-विरोध से नहीं है और भारत राज्य एक धर्म-विरोधी राज्य न होकर नैतिकता, आध्यात्मिक और मानव धर्म पर आधारित एक वास्तविक धार्मिक राज्य होगा। पंथ निरपेक्षता, के आदर्श को प्राप्त करने के लिए भारतीय संविधान के अन्तर्गत निम्न व्यवस्थाएँ की गयी हैं –

1. अस्पृश्यता का अन्त:
पंथ निरपेक्षता का उदार आदर्श इस बात पर बल देता है कि सामाजिक जीवन में भी जाति या अन्य किसी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। इस दृष्टि से संविधान की धारा 17 के द्वारा अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिया गया है। इस प्रकार धर्म की आड़ में भारतीय समाज के अन्तर्गत मनुष्य, मनुष्य पर जो अत्याचार करते रहे, उसे इस व्यवस्था के आधार पर समाप्त कर दिया गया है।

2. धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं:
संविधान के द्वारा नागरिकों को यह विश्वास दिलाया गया है कि धर्म के आधार पर उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। संविधान की धारा 15 (ii) के अनुसार किसी भी व्यक्ति को धर्म के आधार पर किसी सार्वजनिक स्थान में प्रवेश से नहीं रोका जाएगा। धारा 16 (i) के अनुसार सार्वाजनिक पदों पर नियुक्तियाँ करने में धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

3. धार्मिक स्वतंत्रता:
भारतीय संविधान के द्वारा प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गयी है और संविधान की धारा 25 के द्वारा प्रत्येक नागरिक को यह मौलिक अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी धर्म में विश्वास और उसके अनुसार आचरण करे। इसका अभिप्राय यह है कि किसी भी नागरिक को किसी धर्म विशेष का पालन करने या न करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

4. धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और धर्म-प्रचार की स्वतंत्रता:
संविधान के द्वारा धर्म को सामूहिक स्वतंत्रता भी प्रदान की गयी है। संविधान की धारा 26 में कहा गया है कि प्रत्येक सम्प्रदाय को धार्मिक तथा परोपकारी उद्देश्यों के लिए संस्थाएँ स्थापित करने और उन्हें चलाने, धार्मिक मामलों का प्रबंध करने, चल तथा अचल सम्पत्ति रखने और प्राप्त करने और ऐसी सम्पत्ति को कानून के अनुसार प्रबंध करने का अधिकार है। संविधान के द्वारा नागरिकों को धर्म के प्रचार और प्रसार की स्वतंत्रता दी गयी है किन्तु उनके द्वारा उस सम्बन्ध में लोभ, लालच और अन्य साधनों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।

5. धार्मिक कार्यों के लिए किया जाने वाला व्यय कर-मुक्त:
भारतीय संविधान अपने नागरिकों को न केवल धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की स्वतंत्रता प्रदान करता है, वरन् इस सम्बन्ध में संविधान के अनुच्छेद 27 में कहा गया है कि “धार्मिक या परोपकारी कार्यों के लिए खर्च की जाने वाली सम्पत्ति पर कोई कर नहीं लगाया जाएगा”। संविधान की इस व्यवस्था से यह नितान्त स्पष्ट है कि भारत राज्य एक धर्मविरोधी राज्य नहीं, वरन् विशुद्ध धर्म को प्रोत्साहित करने वाला राज्य है।

6. धार्मिक शिक्षा का निषेध:
पंथ निरपेक्षता की परम्परा के अनुरूप संविधान की धारा 28 में कहा गया है कि किसी सरकारी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती तथा गैर-सरकारी, किन्तु सरकार से आर्थिक सहायता या मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में किसी को धार्मिक शिक्षा या उपासना में भाग लेने को बाध्य नहीं किया जा सकता। इस सभी उपबन्धों से यह नितान्त स्पष्ट है कि भारत एक पंथ निरपेक्ष राज्य है, धर्म-विरोधी राज्य नहीं।

इस. पथ सिंपेक्ष राज्य के अन्तर्गत उच्च धार्मिक पदाधिकारी पद ग्रहण के समय ईश्वर के नाम पर शपथ ले सकते हैं। भारत राज्य के सर्वोच्च पदाधिकारी धार्मिक उपासना आदि में भाग ले सकते हैं। मार्मिक और परोपकारी कार्यों के लिए किए जाने वाले व्यय पर कर-मुक्ति की व्यवस्था की गयी है और शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा प्रारम्भ करने पर भी विचार किया जा रहा है। भारतीय इतिहास और संविधान में प्रतिपादित लोकतंत्र एवं लोककल्याण के आदर्श को दृष्टि में रखते हुए कहा जा सकता है कि भारत के लिए पंथ निरपेक्षता का यह आदर्श ही नितान्त औचित्यपूर्ण है –

भारत के सम्बन्ध में स्थिति यह है कि भारत देश ‘विविधता में एकता’ का आदर्श उदाहरण रहा है और हमारे संविधान-निर्माता ‘सर्वधर्म समभाव’ के प्रति निष्ठा रखते थे। अत: उनके द्वारा पंथ निरपेक्षता के आदर्श को अपनाया गया लेकिन एक पंथ निरपेक्ष राज्य की स्थिति को पूर्ण अंशों में ‘पंथ निरपेक्ष समाष (Secular Society) में ही प्राप्त किया जा सकता है और भारतीय जीवन का चिन्ताजनक तथ्य यह है कि हम इक्कीसवीं सदी तक भी पंथ निरपेक्ष समाज की स्थिति को प्राप्त नहीं कर सके हैं। अभी हाल ही के वर्षों में तो भारतीय समाज में धर्म पर आधारित भेदों ने अधिक तीव्र रूप धारण कर लिया है। इस स्थिति का समाधान केवल यही है भारतीय नागरिक ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘सभी धर्मों के प्रति सद्भाव एवं सम्मान’ की स्थिति को अपने मन, मस्तिष्क और हृदय में सदैव के लिए संजो लें।

न केवल भारत, वरन् विश्व के अन्य प्रगतिशील राज्यों द्वारा भी पंथ निरपेक्षता के मार्ग को अपनाया गया है वर्तमान समय में पाकिस्तान, लीबिया, युगाण्डा, सउदी, अरब, बंग्लादेश और मध्य-पूर्व के अन्य कुछ राज्य ही धर्माचार्य राज्य के उदाहरण हैं। वर्तमान युग पंथ निरपेक्षता का ही युग है तथा अब तो रूस और पूर्वी यूरोप के अन्य राज्यों ने भी ‘धर्म-विरोध’ की स्थिति का त्याग कर यथार्थ रूप में पंथ निरपेक्षता की स्थिति को अपना लिया है।

प्रश्न 2.
पंथ या धर्मनिरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? पंथ निरपेक्षता के मूल सिद्धान्तों का परीक्षण कीजिए। (What do you mean by Secularism? Examine the fundamental principles of Secularism)
उत्तर:
पंथ या धर्मनिरपेक्ष शब्द का अर्थ (Meaning of the Word Secular):
धर्म या पंथ-निरपेक्ष शब्द ‘अंग्रेजी’ भाषा के ‘सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी पर्याय है। सेक्युलर (Seculare) शब्द, लैटिन भाषा के ‘सरकुलम’ (Surculam) शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है-संसार अथवा युग। धर्मनिरपेक्ष राज्यों की कुछ परिभाषाएँ निम्नंकित हैं –

1. जार्ज ऑसलर के शब्दों में “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है तथा जो धार्मिक या द्वैतवादी से बंधा हुआ न हो।” इस दृष्टि से धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से होता है जो सांसारिक, लौकिक और ऐच्छिक है तथा जिसका अपना कोई धर्म नहीं। ऐसा राज्य धर्म के नाम पर व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करता। यह राज्य धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत और आन्तरिक वस्तु मानते हुए धर्म को राजनीति से पृथक रखने में विश्वास रखता है। इस प्रकार का राज्य किसी धर्म विशेष का प्रचार-प्रसार नहीं करता, बल्कि यह सभी धर्मों को समान मानते हुए धार्मिक सहिष्णुता का पोषण करता है।

2. एच.बी.कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर रहित राज्य है, न ही यह अधर्मी राज्य है और न ही धर्म-विरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का यह अर्थ है कि इसमें ईश्वर के अस्तित्व को नहीं माना जाता है।”

3. डोनाल्ड स्मिथ के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य, वह राज्य है जिसके अन्तर्गत धर्म-विषयक, व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है, जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय धर्म को बीच में नहीं लाता, जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म से सम्बन्धित नहीं है और न किसी धर्म की उन्नति का प्रयत्न करता है और न ही किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप करता है।”

4. लक्ष्मीकान्त मिश्र के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य से मेरा अभिप्राय यह है कि ऐसा राज्य धर्म या जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई भेद-भाव नहीं करता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य की ओर से किसी विशिष्ट धर्म को मान्यता प्राप्त नहीं होगी।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से है जिसका कोई अपना धर्म नहीं होता और जो धर्म के आधार पर व्यक्तियों में कोई भेद-भाव नहीं करता। इसका अर्थ एक धर्म-विरोधी, अधार्मिक या ईश्वर रहित राज्य से नहीं बल्कि एक ऐसे राज्य से है जो धार्मिक मामलों में पूर्णतया तटस्थ रहता है क्योंकि यह धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत वस्तु मानता है। पंथ निरपेक्षता के मूल आधार-पंथ निरपेक्ष राज्य को सही रूप में समझने के लिए पंथ निरपेक्ष राज्य की विशेषताओं का अध्ययन उपयोगी होगा। पंथ निरपेक्ष राज्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्न इस प्रकार हैं –

1. धर्म समाज का सामूहिक कार्य न होकर व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य है:
प्राचीन और मध्य युग में धर्म को सामान्यता समाज का सामूहिक कार्य माना जाता था और राजा तथा प्रजा सभी के द्वारा राजा के नेतृत्व में प्राकृतिक शक्तिओं की पूजा की जाती थी लेकिन धार्मिक जीवन के दो अंग (विश्वास और आडम्बर) होते हैं, उनमें पंथ निरपेक्ष राज्य विश्वास को ही महत्त्वपूर्ण मानना है। उसकी मान्यता है कि धर्म आन्तरिक विश्वास की वस्तु है, अतः धर्म को समाज का सामूहिक कार्य न माना जाकर व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य माना जाना चाहिए और सभी व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करने की स्वतंत्रता चाहिए।

2. पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता:
धर्म और राज्य के पारस्परिक सम्बन्ध की दृष्टि से दो प्रकार के राज्य होते हैं-पंथ निरपेक्ष राज्य और धर्माचार्य राज्य। धर्माचार्य राज्य का अपना एक विशेष धर्म होता है और उसके द्वारा इस धर्म की वृद्धि के लिए विशेष प्रयत्न किए जाते हैं। पाकिस्तान इस्लामी राज्य के रूप में धर्माचार्य राज्य का एक उदाहरण है। लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता। यह सभी धर्मों को समान समझता है और इसके द्वारा किसी विशेष धर्म के प्रभाव को बढ़ाने या कम करने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाता।

3. धर्म विशेष पर आधारित न होते हुए भी अधार्मिक नहीं:
पंथ निरपेक्ष राज्य किसी धर्म विशेष पर आधारित नहीं होता है और इसके द्वारा किसी प्रकार के धार्मिक क्रियाओं का सम्पादन भी नहीं किया जाता है किन्तु धर्म से पृथ्कता का तात्पर्य यह नहीं है कि पंथ निरपेक्ष राज्य पूर्ण रूप से भौतिक या अनाध्यात्मिक हो। इस प्रकार के राज्य सत्य, अहिंसा, प्रेम और विश्व-बन्धुत्व आदि सर्वमान्य सिद्धान्तों के प्रति आस्था रखता है और इसका धर्म एवं नैतिकता से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित नहीं होता, वरन् सभी धर्मों के सार ‘मानव धर्म’ पर आधारित होता है।

4. सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता:
पंथ निरपेक्ष राज्य इस बात का प्रतिपादन करता है कि सभी धर्म आधारभूत रूप से एक है। अतः धर्म के आधार पर एक-दूसरे के प्रति असहनशीलता का बर्ताव नहीं किया जाना चाहिए। हम चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों, हमारे द्वारा यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि एकमात्र हमारा धर्म ही सत्य का प्रतिपादन करता है। हमारे द्वारा अन्य सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए।

5. धार्मिक कट्टरता (Bigotry) को निरुत्साहित करना:
पंथ निरपेक्ष राज्य धार्मिक उदारवाद का प्रशंसक और धार्मिक कट्टरता का विरोधी होता है। इसके द्वारा राष्ट्रीय एकता और शक्ति के हित में ऐसा प्रगातिशील संस्थओं को प्रोत्साहित किया जाता है जो धार्मिक कट्टरता और कठमुल्लापन के प्रभाव को कम करने के लिए कार्य करती हैं।

6. सर्वाधिकार का विरोध:
सर्वाधिकार का तात्पर्य यह है कि राज्य व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन पर नियत्रंण रखे लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य की मान्यता यह है कि धर्म व्यक्ति के आन्तरिक विश्वास और व्यक्तिगत जीवन की वस्तु है और इसलिए राज्य के द्वारा उस समय तक व्यक्ति के धार्मिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि व्यक्ति का धार्मिक जीवन सार्वजनिक हित में बाधक न हो। इस प्रकार पंथ निरपेक्षता का आदर्श इस विचार पर आधारित है कि राज्य का अधिकार व कार्यक्षेत्र सर्वव्यापी न होकर प्रतिबन्धित और सीमित होना चाहिए।

7. सभी नागरिकों को समान अधिकार:
पंथ निरपेक्ष राज्य अपने सभी नागरिकों को किसी भी वर्ग के साथ बिना कोई पक्षपात किए सामाजिक और राजनीतिक अधिकार प्रदान करता है। सरकारी सेवाओं या जीवन के अन्य क्षेत्रों में धर्म, जाति, वर्ग या अन्य किसी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता।

8. पंथ निरपेक्ष राज्य मौलिक रूप से लोकतन्त्रात्मक:
लोकतन्त्र का विचार मूल रूप से समानता और स्वतंत्रता की धारणा पर आधारित है और पंथ निरेपक्ष राज्य में इन दोनों ही विचारों को उचित महत्त्व प्रदान किया गया है। पंथ निरपेक्ष राज्य सभी धर्मों को समान समझता है।

9. पंथ निरपेक्ष राज्य का सर्वोच्च कर्त्तव्य लोककल्याण:
धर्म के दो पक्ष होते हैं लौकिक और पारलौकिक। पक्ष का तात्पर्य है ईश्वर की सेवा, पूजा आराधना कर आगे आने वाले जीवन को सुधारना और लौकिक पक्ष का तात्पर्य है मानव जाति की सेवा कर स्वयं अपने और अन्य व्यक्तियों के इसी जीवन को सुधारना। पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म के लौकिक रूप में विश्वास करता है और इसके द्वारा सामूहिक रूप से अपने सभी नागरिकों के कल्याण का कार्य करता है।

10. शासन द्वारा धार्मिक शिक्षा का निषेध-पंथ निरपेक्ष राज्य स्वयं धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं करता और सामान्यतया उसके द्वारा ऐसी संस्थाओं को आर्थिक सहायता भी प्रदान नहीं की जाती, जिनके पाठ्यक्रम में धार्मिक शिक्षा के लिए निश्चित और महत्त्वपूर्ण स्थान होता है।

11. नैतिकता के नियमों को अस्वीकार नहीं करता:
पंथ निरपेक्ष राज्य में धार्मिक शिक्षा के निषेध का तात्पर्य यह नहीं लिया जाना चाहिए कि राज्य नैतिकता के नियमों को स्वीकार नहीं करता। नैतिकता पंथ निरपेक्ष राज्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आधार है और संस्कृतियों से सम्बन्धित व्यक्ति सामूहिक रूप से राज्य के कल्याण हेतु कार्य करता है। इस प्रकार से विभिन्न हितों और धार्मिक मतों के बीच सहयोग उनमे निहित सामान्य नैतिक भावना के आधार पर ही सम्भव होता है। इस प्रकार एक सच्चा पंथ निरपेक्ष राज्य नैतिकता को अस्वीकार नहीं करता और न ही उसके द्वारा ऐसा किया जाना चाहिए।

12. व्यक्तियों को अन्य धर्मों का अधिकार नहीं:
पंथ निरपेक्ष राज्य में सभी नागरिकों को अपनी इच्छानुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करने का तो अधिकार होता है, किन्तु उन्हें अन्य धर्मों के विरोध का अधिकार नहीं होता। उनके द्वारा ऐसा कोई भी कार्य नहीं किया जा सकता है जिससे अन्य धर्मों के अनुयायियों की धार्मिक भावना को आघात पहुँचे।

13. कोई भी पंथ निरपेक्ष राज्य के कानूनों से मुक्त नहीं:
पंथ निरपेक्ष राज्य के अन्तर्गत कोई भी धर्म या उस धर्म से सम्बन्धित पुरोहित वर्ग राज्य के कानूनों से मुक्त नहीं होता। यदि धर्म या उसके सिद्धान्त, उसके अनुयायियों या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक हैं, तो राज्य कानून द्वारा ऐसे हानिकारक सिद्धान्तों व धार्मिक व्यवहारों की मनाही कर सकता है।

प्रश्न 3.
पंथ निरपेक्षता की धारणा की आलोचना कीजिए। (Criticism the Concept of Secularism)
उत्तर:
प्राचीन और मध्य युग में धर्म और राजनीति का गठबन्धन था, लेकिन इस प्रकार के गठबन्धन के परिणामस्वरूप धर्म और राजनीति दोनों, का ही स्वरूप विकृत हो गया। इसलिए इस प्रकार से धर्माचार राज्य के विरुद्ध प्रतिक्रिया प्रारम्भ हुई और धर्म या राजनीति के पृथक्करण पर आधारित पंथ निरपेक्षता के विचार का उद्य हुआ किन्तु पंथ निरपेक्षता के विचार या पंथ निरपेक्षता की भी आलोचना की जाती है। इस प्रकार की आलोचना के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

1. शासन-प्रणाली का आधार भौतिक:
आलोचना के अनुसार पंथ निरपेक्ष राज्य, राज्य की धर्म से पृथकता पर आधारित होने के कारण आवश्यक रूप से भौतिक होता है इसके अन्तर्गत मनुष्यों के नैतिक एवं आध्यात्मिक हितों की साधना नहीं हो सकती। प्रो. पुन्ताम्बेकर ने इस सम्बन्ध में कहा है, “इसके अन्तर्गत किसी धर्म या नैतिकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। पंथ निरपेक्ष राज्य गाँधीवादी राज्य हो ही नहीं सकता …… न तो वह प्राचीन धार्मिक विचारधाराओं पर और न सांस्कृतिक विचारों पर चल सकता है।”

2. राज्य का छिन्न-भिन्न हो जाना सम्भव:
आलोचकों का कथन है कि राज्य में एक धर्म विशेष को मान्यता देने से धार्मिक एकता के आधार पर एक ऐसी राजनीतिक एकता स्थापित हो जाती है, जो राज्य में इस प्रकार की धार्मिक एकता नहीं रहने देती है और इस प्रकार की धार्मिक एकता के अभाव में राज्य के छिन्न-भिन्न हो जाने की आशंका बनी रहती है। आलोचकों के अनुसार एक पंथ निरपेक्ष राज्य में विभिन्न धर्मों के जो अनुयायी होते हैं, उनके द्वारा धार्मिक भेदों के कारण परस्पर एवं निरन्तर लड़ाई-झगड़े राज्य की एकता को नष्ट कर देते हैं।

3. लोककल्याणकारी राज्य नहीं हो सकती:
लोककल्याणकारी राज्य जनहित और सामाजिक कल्याण पर आधारित होता है और लोककल्याण की यह भावना नैतिक आदर्शों और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ही उत्पन्न हो सकती है लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य धर्म और नैतिकता के प्रति उदासीन होता है और इस कारण यह कभी सच्चा लोककल्याणकारी राज्य नहीं हो सकता। आलोचकों के अनुसार, राज्य में लोककल्याण की भावनाओं का पतन हो जाता है और इसमें उन स्वार्थपूर्ण तत्त्वों को बढ़ावा मिलता है, जो लोककल्याण के विरुद्ध होते हैं।

4. सरलता से विकृत हो सकता है:
आलोचकों का यह भी कथन है कि पंथ निरपेक्ष राज्य में शासन का कोई नैतिक आधार नहीं होता, इसलिए इस प्रकार का राज्य सरलतापूर्वक विकृत हो सकता है और तानाशाही का रूप ग्रहण कर सकता है। राज्य में धार्मिक तथा नैतिक भावनाओं का पोषण न होने के कारण इस बात की आशंका रहती है कि कोई व्यक्ति शासन-शक्ति हथिया कर तानाशाही की स्थापना न कर ले जैसा कि मुसोलिनी ने 1922 ई. में और हिटलर ने 1933 ई. में किया।

5. धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था न होने के दुष्परिणाम:
राज्य के अन्तर्गत शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों को किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाती है। इस प्रकार की धार्मिक शिक्षा के अभाव में विद्यार्थी पूर्ण भौतिकता के वातावरण में पलकर बड़े होते है और नैतिक-अनैतिक मार्ग से भौतिक साधनों की प्राप्ति ही उनके द्वारा अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया जाता है। जिस देश की युवा पीढ़ी नैतिक और धार्मिक आचरण से हटकर इस प्रकार का कलुषित मार्ग अपना लेती है। उस देश का भविष्य अन्धकारमय ही कहा जा सकता है।

6. बहुसंख्यक धार्मिक वर्ग की भावनाओं को आघात:
एक राज्य के अन्तर्गत धर्म की दृष्टि से जो वर्ग बहुमत में है, सदैव ही यह चाहता हैं कि उसे राज्य के अन्तर्गत अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त होना चाहिए। धर्म की दृष्टि से बहुमत वर्ग को विशेष स्थिति प्राप्त होने या धर्माचार्य राज्य होने पर इस बहुमत वर्ग के द्वारा राज्य के प्रति धर्म मिश्रित देशभक्ति का दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है और वे राज्य के कल्याण को अपना विशेष कर्तव्य समझते हैं लेकिन पंथ निरपेक्ष राज्य में जब बहुमत और अल्पमत वर्ग को समान स्थिति प्राप्त होती है तो बहुमत वर्ग को अल्पमत वर्ग के लिए अपनी भावनाओं और हितों पर अंकुश रखना होता है। इससे बहुमत वर्ग की भावनाओं पर आघात पहुँचता है और वे राज्य के प्रति उस श्रद्धा-भक्ति का परिचय नहीं दे पाते, जिसका परिचय वे दे सकते थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
इनमें से कौन धर्म निरपेक्ष राज्य नहीं है –
(क) नेपाल
(ख) अमेरिका
(ग) भारत
(घ) पाकिस्तान
उत्तर:
(घ) पाकिस्तान

प्रश्न 2.
‘धर्म से जीवन के विभिन्न कार्यों में संगति आती हैं और इससे उसको दिशा प्राप्त होती है।’ धर्म निरपेक्षता के सम्बन्ध में यह कथन किस महापुरुष का है?
(क) शंकराचार्य
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) डॉ. राधाकृष्णन
(घ) विनोबा भावे
उत्तर:
(ग) डॉ. राधाकृष्णन

प्रश्न 3.
‘अस्पृश्यता का अन्त’ का वर्णन किस अनुच्छेद में किया गया है?
(क) अनुच्छेद – 14
(ख) अनुच्छेद – 17
(ग) अनुच्छेद – 23
(घ) अनुच्छेद – 12
उत्तर:
(ख) अनुच्छेद – 17

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 3 आँखों देखा गदर

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 3 आँखों देखा गदर (विष्णुभट्ट गोडसे वरसईकर)

 

आँखों देखा गदर पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

Aankhon Dekha Gadar Bihar Board Class 11th प्रश्न 1.
अंग्रेजों को किले को समझने में कितने दिन लगे? फिर उन्होंने क्या किया?
उत्तर-
झाँसी का किला बड़ा मजबूत और सुरिक्षत था। बाहरी लोगों के लिए उस पर कब्जा जमाना मुश्किल था। अंग्रेजों ने जब उस पर चढ़ाई की तो वे मोर्चा बाँधने में पहले दो दिन विफल रहे और तीसरे दिन वे मौके समझ गये। जब अंग्रेजों को झाँसी के किले पर चढ़ाई हेतु मौके समझ आ गये तब उन्होंने रात होने पर सभी ठिकाने साधकर साधारण मोर्चे बाँधे और चार घड़ी रात रहते ही किले के पश्चिमी बाजू पर गरनाली तोपों से वार करने लगे।

Class 11 Hindi Book Bihar Board प्रश्न 2.
लक्ष्मीबाई को पहली बार निराशा कब हुई?
उत्तर-
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का एक अद्भुत वीरांगना थी। वे बड़े साहस और धैर्यपूर्वक किले पर कब्जा जमाने आये अंग्रेजों के मोर्चों को विफल कर रही थी। लेकिन जब उन्होंने देखा कि अंग्रेज रात में ही मोर्चे बाँधकर शहर पर गरनाली तोपों से गोले बरसाने शुरू : कर दिये है, तब उन्हें पहले-पहल निराशा हुई।

Digant Hindi Book Class 11 Pdf Download Bihar Board प्रश्न 3.
शहर में गोले पड़ने से आम जनता को क्या-क्या कष्ट होने लगें?
उत्तर-
जब अंग्रेजों की ओर से झाँसी शहर में गोले पड़ने लगे, तब वहाँ की जनता को भयंकर परेशानियाँ हाने लगी। गोला जहाँ भी गिरता, वहाँ सौ-पचास आदमियों को घायल कर देता और दस पाँच को तो मौत के मुंह में सुला ही देता। गोला यदि घर पर गिरता तो वह घर जलकर राख हो जाता तथा उसके धक्के से आस-पास के छोटे-छोटे घर भी गिर जाते। गोलों . के गिरने से जहाँ-तहाँ आग लग जाती थी। इस प्रकार सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई। कोई कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा था।

Digant Hindi Book Class 11 Bihar Board प्रश्न 4.
सातवें दिन सूर्यास्त के बाद क्या हुआ? रात के समय तो क्यों चालू की गई?
उत्तर-
लड़ाई के दौरान सातवें दिन सूर्यास्त के बाद झाँसी की तरफ से पश्चिमी मोर्चे की तोप बंद हो गई, क्योंकि शत्रुओं के बार के आगे वहाँ कोई गोलंदाज टिक नहीं पाया। इस प्रकार शत्रुओं द्वारा जब झाँसी के किले का वह मोर्चा भी तोड़ डाला गया तो उसके प्रतिकार और अपने बचाव में रातों-रात कुशल कारीगरों द्वारा बूर्ज पर मोर्चा बाँधकर तोपें चालू कर दी गई, ताकि असावधान अंग्रेज सैनिकों को मार भगाया जा सके।

Bihar Board Class 11th Hindi Book प्रश्न 5.
सिपाहियों को जब लगा कि झाँसी अंग्रेजों के हाथ लग जाएगी तो उन्होंने क्या किया?
उत्तर-
हिन्दुस्तानी सिपाहियों ने यह जानते-समझते हुए भी कि अब हमारी हार होने वाली है और झाँसी अंग्रेजों को हाथ लग जाएगी, अपनी हिम्मत न हारी। वे सच्चे शूर-वीर की तरह
और भी दूने-चौगुने उत्साह एवं वेग से उनका मुकाबला करने को तैयार हुए।

Bihar Board Hindi Book Class 11 Pdf Download प्रश्न 6.
बाई साहब ने सरदारों से क्या कहा? बाई साहब के कहने का सरदारों पर क्या असर पड़ा?
उत्तर-
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी पर आये संकट और अपनी हार देख सब सरदारों को इकट्ठा कर उनका मनोबल बढ़ाया। उन्होने स्पष्ट कहा कि अब तक झाँसी अपने ही बल पर लड़ी है और आगे भी लड़ेगी। इसे पेशवा अथवा किसी दूसरे के बल की कोई दरकार नहीं। बाई साहब के ऐसा कहने का सभी सरदारों पर अनुकूल असर पड़ा। वे सभी ओज एवं तेज से भर गये और मोर्चे बंदी के लिए कठिनतम परिश्रम करने लगे।

Class 11th Hindi Book Bihar Board प्रश्न 7.
दसवें दिन की लड़ाई का क्या महत्त्व था? दसवें दिन की लड़ाई का वर्णन संक्षेप में करें।
उत्तर-
झाँसी के किलों को जीतने के लिए अंग्रेजों और झांसी के बीच जारी युद्ध का दसवाँ दिन बेहद महत्त्वपूर्ण था। इस युद्ध पर झाँसी का भविष्य निर्धारित होने वाला था। क्योंकि, इधर झाँसी की मदद हेतु तात्या टोपे पंद्रह हजार फौजें लेकर पहुंच चुके थे और उधर कप्तान साहब भी अंग्रजी फौजों के साथ आ धमका था। इस प्रकार उस दिन की लड़ाई एक तरह से निर्णायक लड़ाई समझी जा रही थी।

उस दिन बड़ा भीषण युद्ध हुआ। दोनों ओर के सिपाही जी-जान लगाकर लड़ रहे थे। . आमने-सामने की लड़ाई हो रही थी। बिगुल, नरसिंघों, तोपों इत्यादि से सारा वातावरण थर्रा रहा था। चारों तरफ मार-काट और चीख-पुकार मची थी। किन्तु इस लड़ाई में धीरे-धीरे तात्यां-टोपे एवं एवं झाँसी की रानी पिछड़ने लगी और अंग्रेज फौज भारी पड़ी।

Bihar Board 11th Hindi Book Pdf प्रश्न 8.
भेदिए ने लक्ष्मीबाई को आकर क्या खबर दी? लक्ष्मीबाई पर इस खबर का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में झाँसी अंग्रेजों से बड़ी बहादुरी से लगातार पिछले ग्यारह दिनों से लड़ रही थी। उस रात जब बाई साबह रात को रोजाना की तरह ही शहर के और किले पर गश्त लगाकर जब बंदोबस्त कर रही थी तो एक भेदिए ने आकर यह खबर दी कि अंग्रेजी फौजी को इतनी मशक्कत के बाद भी अपनी जय मिलती नहीं दिखाई दे रही है और उनका गोला-बारूद भी अब समाप्तप्रायः हो गया। इसलिए कल पहर भर लड़ने के बाद उनका लश्कर. उठ जाएगा।’

भेदिए की उक्त खबर सुनकर बाई साहब को बहुत राहत मिली और असीम आनंद मिला। उनका चेहरा खुशी से खिल उठा तथा उनमें नई शक्ति और साहस का संचार हुआ।

Bihar Board Class 11 Hindi Book Solution प्रश्न 9.
विलायती बहादुर कौन थे? पाठ में वर्णित उनकी भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर-
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के यहाँ जो पंद्रह सौ मुसलमान बहुत दिनों से नौकर थे, उन्हें ही विलायती बहादर कहा गया है। अंग्रेजों के साथ युद्ध में उनकी भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण रही थी। वे सब के सब विलायती बहादुर सचमुच बड़े बहादुर थे। जब-जब झाँसी पर विपत्ति आयी, इन विलायती बहादुरों ने अपनी जान की बाजी लगाई और लक्ष्मीबाई को तरफ से ब्रिटिश फौजों को छुट्टी का दूध याद कराया। शत्रुओं से घिरी झाँसी से लक्ष्मीबाई को बाहर निकालने में उनकी भूमिका सर्वथा सराहनीय रही।

Bihar Board Hindi Book Class 11 Pdf प्रश्न 10.
लम्मीबाई को वृद्ध सरदार ने किन-किन अवसरों पर सलाह दी, इसके क्या परिणाम हुए?
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ ‘आँखें देखी गदर’ में वृद्ध सरदार दो अवसरों पर लक्ष्मीबाई को सलाह देता है और दोनों ही बार उसके अच्छे परिणाम निकले हैं। जब पचहत्तर वर्ष का वह वृद्ध सरदार देखता है कि गोरे लोग विलायती बहादुरों की मार से घबराकर भाग गये हैं तथा छुप-छुपकर वार करने लगे है और बाई साहब बढ़ती ही जा रही है तो उसने समझाया कि इस समय आगे जाकर गोलियों का शिकार होना बेकार है। सैकड़ों गोरे अंदर घुस गये है और इमारतों की आड़ से गोलियाँ चला रहे है।

इसलिए इस समय मुफ्त में जान गँवाने से अच्छा है कि आप किले में जाकर दरवाजा बंद करके पहले सुरक्षित हो जाएँ और फिर कोई उपाय सोचे। बाई साहब उसकी बात मानकर वापस आ गई। दूसरी बार जब बाई साहब अंग्रेजी फौजों के वार से झाँसी की बर्बादी और लोगों की त्रासदी को देखते हुए जब अत्यंत खिन्न एवं उदास मन से लोगों की महल के बाहर चले जाने और स्वयं को महल में गोला-बारूद भरकर आग लगा कर जल-मरने की बात कहती हैं तो वही अनुभवी वृद्ध सरदार बड़ी समयोचित सलाह सुझाता है।

वह स्पष्ट समझाता है कि महारानी आपको इस तरह निराश नहीं होना चाहिए। आत्महत्या करना बड़ा पाप है। इससे तो बहुत अच्छा है कि आदमी युद्ध करता हुआ स्वर्ग जीतने का उद्यम करे। इसलिए आपको इस समय धैर्य एवं गंभीरतापूर्वक इस कठिन स्थिति से उबरने का रास्ता निकालना चाहिए। उस वृद्ध सरदार के प्रबोधन क बाद रानी लक्ष्मीबाई को बहुत कुछ धीरज बँधा और वे स्वस्थ हुई। उनकी निराशा दूर हुई तथा उनमें तथा उनमें आशा एवं ओज का संचार हुआ।

Bihar Board Class 11 Hindi Book प्रश्न 11.
शहर की दीवार पर चढ़ने के लिए अंग्रेजों ने कौन-सी युक्ति सोची?।
उत्तर-
झाँसी के शहर की दीवार पर चढ़ने के लिए अंग्रेजों ने यह उपाय किया कि हजारों मजदूरों के सिर पर घास के हजारों गट्ठर रखे दीवार के पास चले आये। वहाँ मजदूरों ने घास के गट्ठरों को एक पर एक रखकर उनकी सीढ़ि बना दी। इस प्रकार घास के गट्ठरों की बनी सीढ़ी के सहारे अंग्रेज शहर की दीवार पर चढ़कर उस पार से इस पार चले आये।

Class 11 Bihar Board Hindi Book प्रश्न 12.
गोरे लोगा झाँसी में घुसकर क्या करने लगे? अपने बचाने के लिए लोगों ने क्या किया?
उत्तर-
गोरे लोग झाँसी में घुसते ही कहर ढाने लगे। वे बच्चे बूढ़े और जवान किसी को भी न बख्शते थे। जो भी सामने पड़ता उसे गोली से उड़ा देते या तलवार के वार से काट देते। इसके अतिरिक्त वे लूट-पाट भी करने लगे।

गोरे सिपाहियों के इस आतंक से सबके प्राण काँपने लगे। अतः जान बचाने के लिए जिसे जो उपाय सूझता, वही करता। सभी लोग इधर-उधर भागने लगे। कोई इधर गली में भागा तो कोई घर के तहखाने में दुबका तो कोई खेतो में जा छिपा।

11th Hindi Book Bihar Board प्रश्न 13.
“मैं महल में गोला-बारूद भर कर इसी में आग लगाकर मर जाऊँगी, लोग रात होते ही किले को छोड़कर चल जाएँ और अपने प्रणों की रक्षा के लिए उपाय करें।” लक्ष्मीबाई ने ऐसा क्यों कहा? इस कथन से उनके व्यक्तित्व का कौन-सा पहलू उभरता है? अपने शब्दों मे लिखें।।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियों को विद्वान लेखक विष्णुभट गोडसे बरसईकर ने लिखा है कि-जब लक्ष्मीबाई ने देखा कि गोरे सिपाही लोग शहर में उपद्रव मचा रहे हैं और निरीहप्रजा बैमौत मारी जा रही है, उसका सर्वस्व बड़ी निर्ममता से लूटा जा रहा है और वह इस दर्द और दुःख से बेहाल और असहाय बनी है तो उनके मन में करुण और दुख भर गया। उन्हें ऐसा लगा कि प्रजा की इस दारुण दशा का जिम्मेदार मै ही हूँ और शोक की इसी अतिशयता में उन्होंने अत्यंत निराश होकर कहा कि लोग रात होते ही किले से बाहर चल जाएँ और अपनी जान बचाएँ। मै इस महल में गोला-बारूद भरकर आग लगा दूंगी और उसी में जलकर भस्म हो जाऊँगी।

उपर्युक्त कथन से रानी लक्ष्मीबाई के चरित्र की स्त्री सुलभ कोमलता, परदुःखकातरता और करुणार्द्रता आदि विशेषताएँ प्रकट होती हैं। साथ ही साथ इससे उनके व्यक्तित्व का यह वीरता से भरा महत्त्वपूर्ण पक्ष भी ध्वनित होता है कि वे शत्रुओं के हाथ पड़ने की अपेक्षा स्वयं मरण को वरण करना अच्छा समझती थी।

Bihar Board 11th Hindi Book Pdf Download प्रश्न 14.
“यहाँ आत्महत्या करके पाप संचय करने की अपेक्षा युद्ध में स्वर्ग जीतना है।” वृद्ध सरदार के इस कथन का लक्ष्मीबाई पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ में लेखक ने देखा कि जब झाँसी में अंग्रेजी द्वारा प्रजा का सर्वस्व बड़ी निर्ममता से लूटा जा रहा था, तब बाई ने महल में गोला-बारुद भरकर आग लगाकर आत्म हत्या की बात कही तो वृद्ध सरदार ने यह कहा कि आत्म हत्या करके पाप संचय करने की अपेक्षा युद्ध में स्वर्ग जीतना उत्तम है, रानी लक्ष्मीबाई के मन में व्याप्त निराशा और दुःख की काली घटा छंट जाता है और उनमें पुनः आशा, ओज एवं वीरत्व का प्रकाश भर जाता है।

Bihar Board Class 11 Hindi Book Name प्रश्न 15.
“मै आध सेर चावल की हकदार, मेरी ऐसी रांडमुड़ को विधवा धर्म छोड़कर यह सब उद्योग करने की कुछ जरूरत नहीं थी, परन्तु धर्म की रक्षा के लिए जब इस कर्म में प्रवृत्त हुई हूँ तो उसके लिए ऐश्वर्य, सुख, मान, प्राण सबकी आशा छोड़ बैठी हूँ।” लक्ष्मीबाई के इस कथन की सप्रसंग व्याख्या करें।
उत्तर-
सप्रसंग व्याख्या प्रस्तुत सारगर्भित व्याख्येय गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत, भाग-1’ में संकलित ‘आँखों देखा गदर’ पाठ से अवतरित है, जिसके मूल मराठी लेखक पं. विष्णुभट गोडसे वरसईकर तथा हिन्दी अनुवाद अमृतलाल नागर है। जब रानी लक्ष्मीबाई अंग्रजों के सैन्य-व्यूह को वीरतापूर्वक भेदती हुई झाँसी के छोड़ चली तो लेखक भी वहाँ से अन्य लोगों के साथ निकल चले। रास्ते में कालपी से करीब छ: कोस पहले एक जगह उन्होने रात्रि-विश्राम किया। वहीं शोर में एकाएक हल्ला सुन उनकी नींद टूट गई। पहले तो वे बहुत घबराये पर पीछे यह जानकर निश्चित हुए कि ये फौजी दस्ते अंग्रेजी के नहीं, अपितु लक्ष्मीबाई के हैं। बाद में दोनों की पहचान होती है और रानी लक्ष्मीबाई बड़ी निराश मन-स्थिति में यह उद्गार प्रकट करती हैं।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बड़ी वीरतापूर्वक कई दिनों से अंग्रेजों के साथ लड़ाई करती चली आ रही थीं। पर, दुर्भाग्वया दिन पर दिन विजयश्री उनसे दूर ही होती जा रही थी, अत: उनके अंदर निराशा और अवसाद घर कर चुके थे। उसी मनःस्थिति में वे यह हृदयोद्गार व्यक्त करती है कि मुझे किसी भोग-विलास की कोई इच्छा नहीं। मै तो सिर्फ आध सेर चावल की हकदार थी और वह मुझे आसानी से मिल जाता, इसलिए मुझे अपने विधवा-धर्म को परित्याग कर युद्ध-कर्म में प्रवृत्त होने की कोई जरूरत न थी।

किन्तु मै निश्चिंतता का जीवन छोड़ प्रजा एवं धर्म की रक्षा के विचार से युद्ध में कूद पड़ी हूँ और अब, जबकि मैं युद्ध छेड़ चुकी हूँ तो मुझे अपने लिए, सुख ऐश्वर्य मान या प्राण का कोई महत्त्व नहीं। मुझे इनमें से किसी की परवाह नहीं, मैं सबकी आशा छोड़ चुकी हूँ। रानी लक्ष्मीबाई के उपर्युक्त कथन में उनके हृदय की निराशा, प्रजावत्सलता एवं धर्म परायणता का भाव सहज रूप तें अभिव्यक्त है। किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि उन्हें अपने किये पर कुछ अफसोस था, बल्कि यह तो युद्ध के दौरान विपक्षी की बढ़ती शक्ति और अपनी पराजय स्थिति से उत्पन्न वीरांगना की सहज, अकृत्रिम प्रतिक्रिया है।

Bihar Board Class 11 Hindi Book Pdf प्रश्न 16.
“आप विद्वान हैं। अत: मेरे लिए पानी न खींचे।” लक्ष्मीबाई के इस कथन से उनके व्यक्तित्व का कौन-सा पहलू उभरता है?
उत्तर-
जब युद्ध करते-करते पूरी तरह थक चुकी झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को प्यास से परेशान देख लेकख पं. विष्णुट वरसईकर ने मटके से पानी निकालकर उन्हें पानी पिलाना चाहा तभी लक्ष्मीबाई ने कहा कि आप विद्वान व्यक्ति है, इसलिए मेरे लिए पानी न खीचे। मै खुद पी लेती हूँ लक्ष्मीबाई के इस कथन से यह पता चलता है कि उनके दिल में गुणियों-विद्वानों के लिए बड़ा आदर मान-सम्मान का भाव था। वे गुणी जनों से काम कराना अधर्म समझती थीं।

प्रश्न 17.
कालपी की लड़ाई का वर्णन लेखक ने किस तरह किया है? कालपी के युद्ध के तीसरे दिन सिपाहियों ने क्या किया?
उत्तर-
‘आँखों देख गदर’ पाठ के अंतर्गत लेखक ने कालपी की लड़ाई का बड़ा यथार्थपरक वर्णन किया है। कालपी में लगातार तीन दिन लड़ाई चली 1 पेशवा की फौज पहले ही बेकार हो चुकी थी। दिल्ली, लखनऊ, झाँसी वगैरह में भी अंग्रेजी की फतह हो चुकी थी, जिससे गदरवाले निराश हो चुके थे। बहुत-से पुराने अनुभवी सैनिक डर से पलटने छोड़कर चले गये थे। उनके स्थान पर नये लोग भर्ती किये गये। इन नये लोगों में सिपाहियों के साथ चोर, लुच्चे, लुटेरे भी शामिल थे। जिनका लक्ष्य लड़ाई न होकर लूट-पाट करना था।

कालपी में युद्ध के तीसरे दिन जब सिपाहियों को लगा कि अंग्रेजी फौजों से पार पाना मुश्किल है और जीत उन्हीं की होगी, तो उनमें से सैकड़ों लोग युद्ध का मैदान छोड़ शहर में घुसकर दंगा, लूट और स्त्रियों की दुर्दशा करने लगे। इतने में जब अंग्रेजों फौज भी आ गई तो वे सिपाही वहा से भाग चले।

प्रश्न 18.
लक्ष्मीबाई की मृत्यु किस तरह हुई? उनकी वीरता का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर-
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई एक अदभूत और अप्रतिम वीरांगना थी। यदि उन्हें शक्ति एवं साहस की देवी दुर्गा का अवतार कहा जाए, तो कदाचित अनुचित न होगा। झाँसी पर संकट का बादल मंडराया देख साहस की पुतली-सी स्वाभिमानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने की बजाय उनसे लोहा लेने के उपाय में लग गई। वे बड़ी कठिन परिश्रम करतीं, रात-रात भर जागकर रणनीति बनातीं और युद्ध के समय स्वयं दौड़-दौड़ कर सैनिकों को मनोबल और उत्साहवर्द्धन करती थीं। फिर भी, जब कालचक्र विपरीत रहा और झाँसी के दुर्ग में अंग्रेज प्रवेश कर गये तो उन्होंने न तो हिम्मत हारी और न ही आत्मसमर्पण किया, बल्कि एक वीर क्षत्राणी की भाँति अपने बहादुर जवानों को साथ लिये शत्रु-सेना को छिन्न-भिन्न करती हुई रणनीति के तहत कालपी पहुँची।

फिर जब मुरार पर अंग्रेजों का हमला हुआ तो तात्या टोपे और राव साहब कि साथ लक्ष्मीबाई ने भी वहाँ भीषण युद्ध किया। मुरार के भीषण संग्राम में ही उन्हें गोली लगी। फिर भी वीरता की प्रतिमूर्ति लक्ष्मीबाई आगे बढ़-बढ़ कर दुश्मनों का सफाया करती रहीं। इसी बीच उनकी जाँघ पर तलवार का करारा प्रहार हुआ और वे घोड़े से गिरने लगीं। यह देख तात्या टोपे ने उन्हें संभाला और घोड़े को आगे बढ़ा दिया। इस प्रकार झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने लड़ाई में कभी भी शत्रुओं को पीठ नहीं दिखाई और युद्ध क्षेत्र में ही वीरगति को प्राप्त हुई। वस्तुतः उनकी वीरता अनुपम थी, जो सदैव वीरों को प्रेरित और अनुप्रमाणित करती रहेगी।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित वाक्यों की सप्रसंग व्याख्या करें :

(क) परन्तु निराशा की शक्ति भी कुछ विलक्षण ही होती है।
सप्रसंग व्याख्या-
प्रस्तुत सारगार्मिक पंक्ति पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत, भाग -1’ के ‘आँखों देखा गदर’ पाठ से उद्धत है। इसके लेखक पं. विष्णुभट गोडसे वरसईकर हैं। इसमें 1857 ई. के प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के आँखों देखा हाल का वर्णन किया गया है। झाँसी पर अंग्रेजी फौज हमला बोल चुकी है। झाँसी की मदद को तात्या टोपे भी पहुंचे हुए है। अंग्रेज और झाँसी के बीच भीषण संग्राम छिड़ा है, पर धीरे-धीरे झांसी की फौज पस्त होने लगती है और अंग्रेजों का हौसला बढ़ता जा रहा है। यह पंक्ति उसी संदर्भ में कथित है।

ऐसे तो अंग्रेजों की विजय देख झाँसी में हाहाकार मचा हुआ है, पर यह सच्चे शूर-वीरों की धरती है, जो अपनी आन की रक्षा में जान देना जानते हैं। जिनके लिए दुश्मन के आगे घुटने और यादहयों को यह ठित होने कापक्ति में निरी टेकने की बजाय उन्हें मारते हुए शहीद हो जाना, लाख गुना अच्छा है। सच्चे वीर कभी निराश नहीं होते और यदि कभी निराशा पास फटकती है तो उसी से वे विलक्षण शक्ति-स्फोट कराते है। झाँसी के सिपाहियों को यह जानकर कि निर्मम और निर्दय अंग्रेज ही जीतेंगे और झाँसी उन्हीं के हाथ लगेगी, साहस और शौर्य कुंठित होने की बजाय और बढ़ जाता है। वे और उत्साह एवं मनोबल के साथ युद्ध में जुट जाते हैं। प्रस्तुत पंक्ति में निराशा की विलक्षण शक्ति का संकेत किया गया है।

(ख) भेड़िए जब भेड़ों के झुंड पर झपटते हैं, तब भेड़ों के प्राण की जो दशा होती है वही इस समय लोगों की थी।
सप्रसंग व्याख्या-
प्रस्तुत सारगर्भित पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत, भाग-1’ में संकलित ‘आँखों देखा गदर’ पाठ से ली गई है। इसके लेखक मराठी के सुप्रसिद्ध विद्वान पं. विष्णुभट गोडसे वरसईकर है। इस पंक्ति के माध्यम से लेखक ने गदर के दौरान झाँसी में अंग्रेजी फौजों के आत्याचार-उत्पात और उससे प्रभावित-भयातुर नागरिकों की असहायावस्था का बड़ा मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी वर्णन किया है।

अंग्रेजी फौज झाँसी शहर में घुस चुकी थी और जनता पर बेंइतहा जुल्म ढा रही थी। बच्चा या बूढा जिसे भी सामने पाती; मौत के घाट उतार देती इतना ही नहीं, इन वहशियों ने शहर के एक भाग में आग भी लगा दी, जिससे सर्वत्र हाहाकार मच गया। उस समय निरीह नागरिकों को प्राण बचाने का कोई उपाय न सूझता था। इसी भीषण और करुण दृश्य का वर्णन करते हुए भेड़ों पर भेड़ियों के आक्रमण का उदाहरण दिया गया है। भेड़े अत्यंत निरीह और दुर्बल जीव होती हैं। भेड़िए के सामने उनका कोई वश नहीं चलता। जब भेडिये आक्रमण करते है तो भेड़ों की दशा अत्यंत करुण हो जाती है, उनके प्राण नशों में समा जाते हैं। वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती, अपनी जान भी नहीं बचा सकती। यही हाल उस गोरे सिपाहियों के आतंक और जुल्म के सामने झाँसी के निरीह एवं निहत्थी जनता की थी। इस पंक्ति के क्रूर सिपाहियों के लिए भेड़िए और निरीह जनता के लिए भेड़ों की उपमा बड़ी सटीक बैठती है।

(ग) आत्महत्या करना बड़ा पाप है, दुःख में धैर्य धारण करके गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए कि उससे बचने के लिए आगे कोई रास्ता निकल सकता है या नहीं।
सप्रसंग व्याख्या-
प्रस्तुत सारगर्भित व्याख्येय पंक्तियों हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत, भाग-1 में संकलित ‘आँखें देखा गदर’ पाठसे अवतरित है। इसके लेखक पं. विष्णुभट गोडसे वरसईकर हैं। इन पंक्तियों में लेखक ने जब लक्ष्मीबाई अंग्रजों की विजय और अपनी पराजय के साथ प्रजाजनों की असहायावस्था को देखती हैं तो वे अत्यंत चिन्तित, निराश और उदास-हताश हो जाती हैं।वे कहती है कि प्रजालोग रात में ही भाग कर सुरक्षित स्थान पर चले जाएँ और मै इस महल में गोला बारूद भरकर आग लगाकर जल मरूँगी। उनके इसी कथन पर उनके वृद्ध सरदार का यह सारगर्भित कथन उल्लिखित है।

झाँसी का वह वृद्ध सरदार रानी लक्ष्मीबाई को प्रबोध देता हुआ कहता है कि आप जैसी वीर नारी के लिए ऐसा करना कदापि उचित नहीं। वीर कभी पलायनवादी नहीं होते, वे तो हँसकर संकटों का सामना करते हैं। वास्तव में आत्म हत्या की बात करना कायस्व. यह वीरों का धर्म नहीं। विपत्ति आने पर धैर्य से काम लिया जाना चाहिए और गंभीरतापूर्वक सोचकर आगे के लिए बचाव का रास्ता निकालना चाहिए। इस प्रकार यहाँ वृद्ध सरदार श्रांत-क्लांत तथा निराश-हताश एवं पीड़ित झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को समयोचित सही सलाह देता है। रान पर इसका तदनुकूल प्रभाव पड़ता है और वे पुनः अपने पुण्य-कर्म में सन्नद्ध होती है। विपत्ति में धैर्य धारण करने की सीख तथा आत्महत्या जैसे कृत्य की निन्दा की बात सर्वथा उचित लगता है।

भाषा की बात।

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों से विशेषण चुनें
(i) दूरबीन से बेचूक निशाना साधकर तोप में पलीता लगाया और तीसरे धमाके में ही अंग्रेजों के उत्तम गोलंदाज को ठंडा कर दिया।
(ii) ये लाल भड़के गोले रात्रि के अंधकार में गेंद की तरह इधर-उधर आसमान में उड़ते हुए बड़े विचित्र लगते थे।
(iii) उस दिन महलों पर ही अंग्रेजी तोपों की शनि दृष्टि थी।
(iv) बहुत-से पुराने तजुर्बेकार पलटनी लोग अपने प्रणों के भय से पलटने छोड़कर चले गए थे।
(v) राव साहब ने कहा कि शत्रु का कहर है; महलों में बड़े धोख होंगे।
(vi) इस तरह बड़ी राजी-खुशी से श्रीमंत राव साहब ने वहाँ अठारह दिन बिताए।
(vii) शहर का प्रबंध बहुत अच्छा कर रखा था।
(viii) कारीगर भी बड़े ही चतुर और काम में निपुण थे।
उत्तर-
इन पंक्तियों में निम्नलिखित विशेषण है-
(i) बेचूक, तीसरे, उत्तम, ठंडा।
(ii) लाल, भडके, बड़े, विचित्र।
(iii) अंग्रेजी, शनि।
(iv) बहुत, पुराने, तजुर्बेकार, पलटनी, अपने।
(v) बड़े।
(vi) बड़ी।
(vii) अच्छा।
(viii) चतुर, निपुण।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों से वाक्य बनाएँ हलचल, हौलदिली, नाकाबंदी, जर्जर, बुर्ज, भाग्य, दूरबीन, मंजिल, भिक्षुक, किला, धूल
उत्तर-
हलचल-(स्त्रीलिंग)-पुलिस के आते ही चारों ओर हलचल मच गई। हौलदिली-(स्त्रीलिंग)-बम की मौजूदगी की अफवाह से रेलयात्रियों में हौलदिली फैल गई। नाकाबंदी-(स्त्रीलिंग)-विद्रोहियों ने गाँव की नाकाबंदी कर रखी है। जर्जर-(पुल्लिंग)-बरसात से सड़क जर्जर हो गया है। बुर्ज-(पुल्लिंग)-संध्या समय लोग किले के बुर्ज पर चढ़ गये। भाग्य-(पुल्लिंग)-सभी का अपना-अपना भाग्य होता है।

दूरबीन-(स्त्रीलिंग)-यह दूरबीन पुरानी है। मंजिल-(पुल्लिंग)-हमें अपनी मंजिल पर पहुँचना है। भिक्षुक-(स्त्रीलिंग)-भिक्षुक को देख किसे दया नहीं आती। किला-(पुल्लिंग)-झाँसी का किला बड़ा मजबूत था। धूल-(पुल्लिंग)-आपके चरणों के धूल भी पावन हैं।

प्रश्न 3.
उत्पत्ति की दृष्टि से निम्नलिखित शब्दों की प्रकृति बताएँ चैत, ग्रीष्म, नागरिक, पल्टन, वायव्य, बहादुर, शहर, बंबों, तंबू, नाकाबंदी, परकोटा, फौज, दालान, किला, खबर, गली, तहखाना, प्राण, ब्रह्मवर्त
उत्तर-

  • चैत – तद्भव
  • ग्रीष्म – तत्सम
  • नागरिक – तत्सम
  • पल्टन – विदेशज
  • वायव्य – तत्सम
  • बहादुर – विदेशज
  • गहर – विदेशज
  • बंबों – अनुकरणात्मक
  • तंबू – देशज
  • नाकाबंदी – संकर (नाका-हिन्दी, बंदी-फारसी)
  • परकोटा – तद्भव
  • फौज – विदेशज
  • दालान – विदेशज
  • किला – विदेशज
  • खबर – विदेशज
  • गली – तद्भव
  • तहखाना – विदेशज
  • प्राण – तत्सम
  • ब्रह्मवर्त – तत्सम।

उत्पत्ति की दृष्टि से शब्द मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं-तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज।

प्रश्न 4.
‘सारी हकीकत सनकर सबके पेट में पानी हो गया और हमारे प्राण भीतर ही भीतर घुटने लगे।’ यहाँ ‘पेट में पानी होना’ और ‘प्राण घुटना’ का क्या अर्थ है? इन मुहावरों के प्रयोग के बिना इस वाक्य को इस तरह लिखे कि अर्थ परिवर्तित न हो।
उत्तर-
पेट में पानी-स्तब्ध रह जाना, प्राण घुटना-भयाक्रांत होना, वाक्य-सारी हकीकत सुनकर सब के सब स्तब्ध रह गये और भयाक्रांत हो गये।

प्रश्न 5.
‘सर कर लिया’ मुहावरा का क्या अर्थ है? पाठ से अलग वाक्य में प्रयोग करें।
उत्तर-
‘सर कर लिया’ मुहावरे का अर्थ है- ‘जीत लिया’ वाक्यगत प्रयोग- 1962 ई. के आक्रमण में चीन ने भारतीय भू-भाग को सर कर लिया।

प्रश्न 6.
‘सीग समाना’ का क्या अर्थ है? वाक्य में प्रयोग करें।
उत्तर-
‘सींग समाना’ का अर्थ है- ‘गुजाइश होना’। दंगे के दौरान जहाँ सींग समाय भाग जाना चाहिए।

प्रश्न 7.
इस पाठ में प्रयुक्त मुहावरों का सावधानी के साथ चयन करें और पाठ के आधार पर उनका अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर।

आँखों देखा गदर लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के महत्व का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर-
हमारे देश में स्वतंत्रता संग्राम की सबसे पहली लड़ाई 1857 ई. में हुई थी। इसमें अन्य सभी देशी राजाओं और रानियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। इसमें झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है। उनहोंने 1857 के गदर में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया था। जब अंग्रेजों ने झासी पर आक्रमण किया तो लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया और उनसे लोहा लिया। उन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध वीरतापूर्वक युद्ध किया। लक्ष्मीबाई अंग्रेजों के बीच घमासान युद्ध हुआ। बहुत-से अंग्रेज सैनिक इस युद्ध में मारे गए। दूसरी झाँसी की रानी अंतिम साँस तक युद्ध करती रही और अंत में वीरगति को प्राप्त हुयी। वास्तव में, भारतीय स्वंतत्रता संग्राम में लक्ष्मीबाई का महत्वपूर्ण योगदान था। वे देश को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराना चाहती थीं।

आँखों देखा गदर अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आँखों देखा गदर नाम पाठ के लेखक कौन हैं।
उत्तर-
आँखों देखा गदर नामक पाठ के लेखक विष्णुभट गोडसे वरसईकर हैं।

प्रश्न 2.
आँखों देखा गदर किस प्रकार की रचना है?
उत्तर-
आँखों देखा गदर एक संस्मरण है।

प्रश्न 3.
1857 ई. का गदर किस कारण हुआ?
उत्तर-
चर्बी वाली कारतूस के कारण 1857 ई. का गदर प्रारंभ हुआ।

प्रश्न 4.
1857 ई. के गदर में किन-किन देशी राजाओं ने भाग लिया?
उत्तर-
1857 ई. के गदर में बहादुरशाह जफर, तात्या टोपे, वीर कुंवर सिंह तथा झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई इत्यादि ने भाग लिया।

आँखों देखा गदर वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर।

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग, या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
‘आँखें देखा गदर’ के लेखक हैं
(क) रामचन्द्र शुल्क
(ख) हरिशंकर परसाई
(ग) विष्णुभट्ट
(घ) गोडसे बरसईकर
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 2.
‘आँखो देखा गदर’ कहाँ से लिया गया है?
(क) चिन्तामणि
(ख) माझा प्रवास
(ग) झाँसी की रानी
(घ) इसमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 3.
झाँसी की रानी की मृत्यु किस युद्ध में हुई?
(क) मुरार के युद्ध में
(ख) कालपी के युद्ध में
(ग) कानपुर के युद्ध में
(घ) ग्यालियर के युद्ध में
उत्तर-
(क)

प्रश्न 4.
‘माझा प्रवास’ का भाषांतर किसने किया था?
(क) चिन्तामणि विनायक वैद्य
(ख) जैनेन्द्र
(ग) अमृतलाल नागर
(घ) नामवर सिंह
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 5.
अंग्रेजों को किले समझने में कितने दिन लगे?
(क) तीन दिन
(ख) चार
(ग) पाँच दिन
(घ) आठ दिन
उत्तर-
(क)

प्रश्न 6.
सातवें दिन सूर्यास्त के बाद क्या हुआ?
(क) भयंकर तूफान आया
(ख) मोर्चे की तोप बन्द हो गई
(ग) अंग्रेज सैनिक भाग गए
(घ) इनमें से कुछ नहीं
उत्तर-
(ख)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न.
1. शहर पर तोप के गोले शुरू होने से ……………. को बड़ा त्रास हुआ।
2. रात में शहर और किले पर …………. पड़ते थे।
3. परंतु …………… की शक्ति भी कुछ विलक्षण होती है।
4. दुख में धैर्य धारण करके गंभीरता पर्वक ……………… चाहिए।
5. आप विद्वान हैं, अतः मेरे लिए ……………… न खींचे।
उत्तर-
1. रैयत
2. गोले
3. निराशा
4. सोचना
5. पानी।

आँखों देखा गदर लेखक परिचय विष्णुभट्ट गोडसे वरसईकर (1828)

भारम के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 के गदर का आँखों देखा विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने वाले श्री विष्णुभट गोडसे वरसईकर का जन्म 1828 ई. में महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ जिले के ‘वरसई’ ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. बालकृष्ण भट था। विष्णुभटजी ने स्वाध्याय द्वारा परंपरागत रूप में संस्कृत, मराठी आदि का गहन ज्ञान अर्जित किया था। उनका व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावशाली था। गौरवर्ण के ऊँचे और भव्य शरीर वाले विष्णुभटजी विद्वान एवं तेजस्वी पुरूष थे।

पं. विष्णुभट गोडसे वरसईकर कोई पेशेवर लेखक नहीं, अपितु आजीविका से कर्मकांडी और पुरोहित थे। उनकी थोड़ी-बहुत खेती थी, परन्तु अपर्याप्त। परिवार को ऋण मुक्त करने तथा उसके समुचित निर्वाह के लिए धनार्जन हेतु वे उत्तर भारत की ओर आये थे, किन्तु सन् 1857 के गदन में फंस गये। मार्च 1857 में बैलगाड़ी से वे पुणे पहुँचे और वहाँ से इंदौर, अहमदनगर, धुलिया, सतपुड़ा होते हुए मध्यप्रदेश में महू पहुँचे जहाँ उन्हें सिपाहियों से क्रांति की खबरें पहले-पहल मिलीं। सिपाहियों की मनाही के बावजूद वे आगे बढ़ते हुए उज्जैन, धारा होते हुए ग्वालियर पहुँचे।

इस बीच उन्होंने गदर की घटनाओं को बड़ी नजदीक से देखा-सुना था पुनः वे झाँसी आकर फंस गये। वहाँ वे इतिहासप्रसिद्ध वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के प्रत्यक्ष संपर्क में आये और उनका आश्रय तथा विश्वास प्राप्त कर काफी दिनों तक उनके साथ किले में रहे। उन्होंने अनेक कष्ट सहकर उत्तर भारत के कई तीर्थो की यात्रा की और करीब ढाई साल बाद अपने गाँव वरसई वापस लौटे। वहीं उन्होंने अपने प्रिय यजमान श्री चिन्तामणि विनायक वैद्य के अनुरोध पर अपनी यात्रा का आँखों देखा हाल स्मरण के आधार पर लिखा-‘माझाा प्रवास’।

पं. विष्णुभट गोडसे वरसईकर की एक ही रचना है-माझा प्रवास (मेरा प्रवास), जो मूल रूप से मराठी में लिखित है। इस कृति में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से संबंधित उनके संस्मरण प्रमाणिक रूप में प्रस्तुत हुए है। इसका हिन्दी अनुवाद सुप्रसिद्ध कथाकार और लेखक अमृतलाल नागर ने ‘आँखों देखा गदर’ नाम से बीसवी सदी के चौथे दशक में प्रस्तुत किया। इस प्रकार यह एक उत्कृष्ट यात्रा-संस्मरण है, जिसमें विद्वान लेखक विष्णुभट द्वारा यात्राओं के दौरान देखी-सुनी बातों का बड़ा यथार्थ, जीवंत और चित्ताकर्षक वर्णन हुआ है।

आँखों देखा गदर पाठ का सारांश

भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 के गदर का आँखों देखा विस्तृत विवरण प्रस्तुत करनेवाले भारतीय विष्णुभट गोडसे की उत्कृष्ट स्मृति ‘माझा प्रवास’ का प्रमाणिक भाषांतर ‘आँखों देखा गदर’ झाँसी प्रवास और लक्ष्मीबाई से जुड़े संस्मरण में अविकल रूप में प्रस्तुत है।

वसंत की विदाई और ग्रीष्म ऋतु के राज्य में एक दिन झांसी शहर के दक्षिणी मैदान में गोरे पलटनों ने तम्बू झाँसी को अपने-अपने खूनी पंजों में गाड़ चुका था। दूसरे दिन गोरे पलटनों ने मोर्चा बाँधकर युद्ध का शंखनाद कर दिया। झाँसी के सैनिकों ने भी अंग्रेजी आक्रान्ताओं को खदेड़ने के लिए रणभेड़ी की दुर्दभि बजा दिया। तीसरे दिन अंग्रेजी पलटनों को शहर या किले के मोर्चा का पता चल गया और उनकी गरनाली तोपें चलने लगीं।

शहर में तोप के गोले की अन्धाधुन्ध बारिस ने रैयतों को भयाक्रान्त कर दिया और छोटे घर खंडहर बनकर गिरने लगे। बाई साहब ने भी अंग्रेजों को ‘ईट का जनाब पत्थर’ से देने के लिए जबरदस्त नाकेबन्दी की। चौथे दिन अंग्रेजों के आक्रमक प्रहार ने किले के दक्षिण बुर्ज को बन्द कराकर हौलदिली फैला दी। दिन-रात लगातार युद्ध होने से शहर जर्जर हो गया। पाँचवें और छठे दिन भी युद्ध अनवरत जारी रहा। सातवें दिन सूर्यास्त के बाद शत्रुओं की तोपों ने बाई साहब के पश्चिमी मोर्चे को तोड़ डाला।

कारीगर की चतुरता से पुनः मोर्चा बन्दी कर तोपों का मुँह खोल देने से अंग्रेज बहुत हताहत हुए। आठवें दिन बड़ा प्रलय मचा तथा घनघोर युद्ध हुआ। इस विकट घड़ी में पेशवा की तरफ से मदद न मिलने से बाई साहब किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। दसवें दिन कालपी से तात्यां टोपें पन्द्रह हजार फौजों को लेकर झाँसी पहुँचे। परन्तु तात्या टोपी की अकुशलता या हिन्दी सिपहियों को अशूरता ने उन्हें टूटकर भागने पर मजबूर कर दिया।

इस प्रकार युद्ध की विभीषिका लगातार ग्यारह दिनों तक कायम रही। रानी लक्ष्मीबाई स्वयं अपने नेतृत्व में युद्ध का संचालन कुशलतापूर्वक की। परन्तु गोरी पलटनों ने घास की सीढ़ी बनाकर किले में घुस गए और भारी रक्तपात किया। बाई साहब ने भी पन्द्रह सौ विलायती बहादुरों की फौज का नेतृत्व कर अंग्रेजी पलटनों पर कहर ढा दिया। अंग्रेजी पलटनों की भीषण रक्तपात निरापराध प्राणियों की निर्मम हत्या ने बाई साहब को हिलाकर रख दिया। वह निरापराध प्राणियों की हत्या का पापी खुद को समझकर आत्महत्या के लिए उद्धत हो गई। परन्तु एक वृद्ध द्वारा आत्महत्या को महापाप करार देने तथा “आत्महत्या के पाप को संचय करने की अपेक्षा युद्ध में स्वर्ग जितना उत्तम है।” इन शब्दों से प्रभावित होकर वह मर्दाना पोशाक धारण कर अपने फौजों की जत्था के साथ कालपी के रास्ते चल दी।

कालपी के रास्ते में लेखक से उनकी मुलाकात हुई। प्यास से व्याकुल बाई साहब को पानी के लिए तैयार लेखक को मना कर दिया कि ‘आप विद्वान है’। उन्हें खुद कुएँ से पानी खींचकर पीया जिससे उनकी महानता के प्रति उनका सर श्रद्ध से झुक गया। कालपी में युद्ध तीन दिनों तक चला। सैकड़ों की हत्या हुई। युद्ध में हार का अभास मिलते ही बाई साहब, तात्या टोपे और राव साहब जंगलों के लिए निकल गए। ग्वालियर में शिंदे की बहुत पलटनियों ने पेशवा पर मुरार नदी पर गोली चलाने से इंकार कर दिया।

मुरार के घमासान युद्ध में झाँसीबाई को गोली लगी फिर तलवार का करार चोट खाकर महारानी घोड़े से गिरने लगीं। तात्यां टोपे ने उन्हें संभालकर घोड़ा आगे बढ़ा दिया। बाई साहब की नश्वर शरीर को एक जगह लोगों ने चिता पर रखकर तेज को तेज में विलीन कर दिया। रणाणण में क्रान्ति के दूत, मनुजता की पुजारी देवी स्वरूपिणी वीरांगना ने मृत्यु पाकर स्वर्ण जीता। इस प्रकार स्वतंत्रता संग्राम के देदीप्यमान सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया। जब तक सृष्टि है, सूर्य और चन्द्रमा, धरती और जगत का अस्तित्व कायम है; उत्साह और शूरता से चमकनेवाली अनुजता के प्रेमाधिकारी, कालदधि का महास्तंभ आत्मा के नभ के तुंग केतू तथा मानवता के मर्मी सुजान, कालजयी, कालोदधि महास्तम्भ महारानी लक्ष्मीबाई का यशोगान इतिहास गाता रहेगा।

आँखों देखा गदर कठिन शब्दों का अर्थ।

बंदोबस्त-प्रबंध। गोलंदाज-गोला दागने वाला। रैय्यत-प्रजा। त्रास-भय। बंबा-पानी वाला बड़ा कनस्तर। नाकाबंदी-घेराबंदी। वायव्य-उत्तर-पश्चिम। बुर्ज-किले का सबसे ऊपरी गोलाकार हिस्सा। हौलदिली-भय, आतंक की मनोदशा। बुरुज-बुर्ज, गुंबद। अप्रतिम-फीका, चमकविहीन। जर्जर-कमजोर, पुराना। पलटन-सेना। नसेनी-सीढ़ी। ग्रास-निवाला। किंकर्तव्यविमूढ़-यह मनोदशा जिसमें कोई उपाय न सूझे। नरसिंहा-एक प्रकार का वाद्ययंत्र जो युद्ध में बजाया जाता है। बिगुल–एक प्रकार का वाद्ययंत्र जो युद्ध में बजाया जाता है। गाफिल-लापरवाह। परकोटा-किले की सुरक्षा दीवार। नादान- भोला।

रिसाला-घुड़सवार। भेदिया-जासूस, भेद बताने वाला। बख्शीश-इनाम। शनि दृष्टि-बुरी नजर। भंबक-बड़ा छेद। गश्त लगाना-पहरा देना। बाजू-बाँह और सहस्त्र हजार। विजन-निर्जन, जनशून्य। दीवानखाना-मुख्य हॉल। शोक विह्वल-दुःख से व्याकुल। आर्तनाद-दुःख से भरी पुकार। जुगत-उपाय, युक्ति। माल-असबाब-समान। चिंताक्रांत-चिंता से घिरा हुआ। महापातकी-महानीय, महापापी। शूर-वीर। खास महल-महल का भीतरी हिस्सा जिसमें राजा-रानी रहते हैं। लश्कर-सेना का पड़ाव। हकीकत-वास्तविकता। सर कर लेना-जीत लेना। आब-आभा, चमक।

युक्ति-उपाय। निरूपाय-लाचार। दत्तक पुत्र-गोद लिया पुत्र। खेड़ा-निर्जन मैदान। किंचित-थोड़ा। आरक्त-लाल। म्लान-मुरझाया हुआ। दैवगति-भाग्य का लिखा। संचय-जमा, इकट्ठा। अर्थ-धन। प्रत्यूष बेला-भोर का समय। लिलार-ललाट, भाग्य। दक्षिणी-दक्षिण में रहनेवाला। ब्रह्मावर्त-पुष्कर के आस-पास का इलाका। तजुर्बेकार-अनुभवी। जाहिरनामा-विज्ञप्ति, प्रकाशित सूची। नौसिखिए-अनुभवहीन। कवायद-परेड। मास-युद्ध में बजाया जाने वाला वाद्य। कारकुन-कर्मचारी। ताकीद-विदित, . चेतावनी, सावधान।

महत्त्वपूर्ण पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या

1. मुसर में घमासान युद्ध छिड़ गया। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को गाली लगी, लेकिन वे लड़ती रहीं, अंग्रेजों की तलवार का करारा हाथ उनकी जाँघ पर लगा और वे वीरगति की प्राप्ति हुयीं।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ विष्णुभट गोडसे वरसईकर द्वारा रचित आँखें देखा गदर नमक संस्मरण से ली गयी हैं। इन पंक्तियों से यह स्पष्ट होता है कि अंग्रेजों और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के बीच मुरार में निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में लक्ष्मीबाई ने बड़ी वीरता से युद्ध किया और अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिए। युद्ध करते ही उन्हें गोली लगी और उनकी जाँघ पर तलवार से वार हुआ। जिसके कारण वे वीरगति को प्राप्त हुयी। इन पंक्तियों से उनके अदम्य उत्साह और वीरता की झलक दिखलायी पड़ती है। इसलिए झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप

Bihar Board Class 11 Economics केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Textbook Questions and Answers

केंद्रीय प्रवृत्ति की माप के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
निम्नलिखित स्थितियों में कौन-सा औसत उपयुक्त होगा?
(क) तैयार वस्त्रों के औसत आकार।
(ख) एक कक्षा में छात्रों की औसत बौद्धिक प्रतिभा।
(ग) एक कारखाने में प्रति पाली औसत उत्पादन।
(घ) एक कारखाने में औसत मजदूरी।
(ङ) जब औसत से निरपेक्ष विचलनों का योग न्यूनतम हो।
(च) जब चरों की मात्रा अनुपात में हो।
(छ) मुक्तांत बारम्बारता बंटन के मामले में।
उत्तर:
(क) बहुलक
(ख) मध्यिका
(ग) बहुलक या समांतर माध्य
(घ) बहुलक समांतर माध्य
(ङ) समांतर माध्य
(च) माध्यिका
(छ) मध्यिका

केंद्रीय प्रवृत्ति की विशेषताएं Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
प्रत्येक प्रश्न के सामने दिए गए बहु विकल्पों में से सर्वाधिक उचित विकल्प को चिह्नित करें –

1. गुणात्मक मापन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त औसत (Average) है।
(क) समांतर माध्य
(ख) माध्यिका
(ग) बहुलक
(घ) ज्यामितीय माध्य
(ङ) उपर्युक्त में से कोई नहीं

2. चरम पदों की उपस्थिति से कौन-सा सर्वाधिक प्रभावित होता है –
(क) माध्किा
(ख) बहुलक
(ग) समांतर माध्य
(घ) ज्यामितीय माध्य
(ङ) हरात्मक माध्य

3. समांतर माध्य से मूत्यों के किसी समुच्चय में विचलन का बीजगणितीय योग है।
(क) द
(ख) 0
(ग) उपर्युक्त कोई भी नहीं
उत्तर:

  1. (ग)

माध्यिका की चार विशेषताएं लिखिए Bihar Board Class 11 प्रश्न 3.
बताइए कि निम्नलिखित कथन सही है या गलत –
(क) माध्यिका से मदों के विचलनों का योग शून्य होता है।
(ख) शृंखलाओं की तुलना के लिए मात्र औसत ही पर्याप्त नहीं है।
(ग) समांतर माध्य एक स्थैतिक मूल्य है।
(घ) उच्च चतुर्थक शीर्ष 25 प्रतिशत मदों का निम्नतम मान है।
(ङ) माध्यिका चमर प्रेक्षणों द्वारा अनुचित रूप से प्रभावित होती है।
उत्तर:
(क) गलत
(ख) सही
(ग) गलत
(घ) सही
(ङ) गलत

Kendriya Pravritti Ki Map Bihar Board Class 11 प्रश्न 4.
यदि नीचे दिए गए आंकड़ों का समांतर माध्य (Arithmetic mean) 28 है, तो –
(क) लुप्त आवृत्ति का पता करें और
(ख) श्रृंखला की माध्यिका ज्ञात करें।
केंद्रीय प्रवृत्ति की माप के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11
उत्तर:
लुप्त आवृत्ति –
केंद्रीय प्रवृत्ति की विशेषताएं Bihar Board Class 11
AM = 35
\(\bar { x } \) = AM + \(\frac { Σfd’ }{ Σf } \) × C = 35 + \(\frac{-70}{n+80}\) × 10 = 35 + \(\frac{700}{n+80}\)
अतः 35 – \(\frac{700}{n+80}\) = 28 (दिया हुआ है)
अथवा, \(\frac{-700}{n+80}\) = \(\frac{28-35}{1}\) = \(\frac{-7}{1}\); अथवा, \(\frac{100}{n+80}\) = 1
अथवा, n + 80 = 100 अथवा n = 100 – 80 = 20
अतः, आवृत्ति 20 है।

माध्यिका की चार विशेषताएं लिखिए Bihar Board Class 11
M माध्यका = \(\frac{N}{2}\) का मूल्य = \(\frac{100}{2}\) = 50 वें मद का मूल्य। यह मूल्य 20-30 वर्गान्तर में आता है।
माध्यिका = \(l_{1}+\frac{\frac{N}{2}-c f}{f} \times 1\) = 20 + \(\frac{50-30}{27}\) × 10
= 20 + \(\frac{200}{7}\) 20 + 7.41 = 27.41

Kendriya Pravarti Ki Visheshtaen Bihar Board Class 11  प्रश्न 5.
निम्नलिखित सारणी में एक कारखाने के 10 मजदूरों की दैनिक आय दी गई है। इनका समांतर माध्य ज्ञात कीजिए?
Kendriya Pravritti Ki Map Bihar Board Class 11
उत्तर:
\(\bar { X } \) = \(\frac { X_{ 1 }+X_{ 2 }+X_{ 3 }+…..X_{ N } }{ N } \)
\(\bar { X } \) = \(\frac{120+150+180+200+300+220+350+370+260}{10}\)
= \(\frac{2400}{10}\) = 240 रुपए

केंद्रीय प्रवृत्ति की माप का अर्थ लिखिए Bihar Board Class 11 प्रश्न 6.
निम्नलिखित सूचना 150 परिवारों की दैनिक आय से संबद्ध है। समांतर माध्य का परिकलन कीजिए।
Kendriya Pravarti Ki Visheshtaen Bihar Board Class 11
उत्तर:
पहले से अधिक संचयी बारम्बारता की वर्ग आवृत्तियाँ ज्ञात करें।
केंद्रीय प्रवृत्ति की माप का अर्थ लिखिए Bihar Board Class 11
\(\bar { X } \) = A + \(\frac { Σfd’ }{ N } \) × C = 100 + \(\frac{245}{150}\) × 10
= 100 + 16.33
= 116.33

Kendriya Pravritti Ki Visheshtaen Bihar Board Class 11 प्रश्न 7.
नीचे एक गाँव के 380 परिवारों की जोतों का आकार दिया गया है। जोत का माध्यिका ज्ञात कीजिए।
Kendriya Pravritti Ki Visheshtaen Bihar Board Class 11
उत्तर:
जोत के माध्यिका आकार को गणना (Calculation Meidan Size of Holding)
Kendriya Pravarti Ki Visheshtaen Bataiye Bihar Board Class 11
मध्यिका =\(\frac{N}{2}\) मद का मूल्य = \(\frac{65}{2}\) = 190 मद का मूल्य
अतः मद का मूल्य 200 – 300 वर्गान्तर में स्थित है।
मध्यिका = \(l_{1}+\frac{\frac{N}{2}-c f}{f} \times n\)
= 200 + \(\frac{190-129}{148}\) × 100
= 200 + \(\frac{61}{148}\) × 100
= 200 + \(\frac{6100}{148}\) = 200 + 41.21
= 241.21 एकड़

Kendriya Pravarti Ki Visheshtaen Bataiye Bihar Board Class 11 प्रश्न 8.
निम्न श्रृंखला किसी कंपनी में नियोजित मजदूरों की दैनिक आय से सम्बद्ध है। अभिकलन कीजिए –
(क) निम्नतम 50 प्रतिशत मजदूरों की उच्चतम आय
(ख) शीर्ष 25 प्रतिशत मजदूरों द्वारा अर्जित न्यूनतम आय और
(ग) निम्नतम 25 प्रतिशत मजदूरों द्वारा अधिकतम आय।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 9
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 10
माध्यिका = \(\frac{N}{2}\) मद का मूल्य = \(\frac{65}{2}\) = 325 मद का मूल्य
32.5 मद का मूल्य 24.5 – 29.5 में निहित है।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 11
16.25 माध का मूल्य  19.5 – 24.5 वर्गान्तर में निहित है
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 81
तृतीय चतुर्यक (Q3) = (\(\frac{3N}{4}\)) मद का मूल्य
48.75 मद का मूल्य 24.5 – 29.5 वर्गान्तर में है।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 82

केंद्रीय प्रवृत्ति की विशेषताएं बताइए Bihar Board Class 11 प्रश्न 9.
निम्न सारणी में किसी गाँव के 150 खेतों में गेहूँ की प्रति हेक्टेयर पैदावार की गई है। उत्पादित फसलों का समांतर माध्य, माध्यिका तथा बहूलक परिकल्पित कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 12
उत्तर:
माध्य तथा माध्यिका की गणना
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 13
A.M. = 63.5
C = 3
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 14
बहुलक की गणना – विद्यादर्धि स्वयं ज्ञात करें।
उत्तर:
63.29 की ग्राम प्रति हेक्टयर।

Bihar Board Class 11 Economics केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

केंद्रीय प्रवृत्ति Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
एक कक्षा में 6 विद्यार्थियों के किसी विषय में प्राप्तांक प्रमशः 10, 35, 35, 40, 35, 50 हैं तो बहुलक (Mode) मूल्य क्या होगा?
उत्तर:
बहुलक मूल्य (Z) = 35

प्रश्न 2.
दस संख्याओं की समान्तर माध्य (Arithmetic mean) 18 है। यदि 3 को प्रत्येक संख्या में जोड़ दिया जाए तो नई सामन्तर माध्य क्या होगा?
उत्तर:
नई समान्तर माध्य = 21

प्रश्न 3.
खुले सिरे के वितरण में कौन-सी सांख्यिकी माध्य (Mean) की गणना करना आसान है?
उत्तर:

  1. सांख्यिकी
  2. बहुलक।

प्रश्न 4.
समान्तर माध्य (Average Mean), माध्यिका (Median) तथा बहुलक (Mode) के संबंध को व्यक्त करने वाला सूत्र लिखिए।
उत्तर:
Z = 3m = 2x

प्रश्न 5.
एक सामान्य रूप से असमानिक बंटन में समान्तर माध्य (X) = 10 माध्यिका (M) = 10 है तो बहुलक (Z) क्या होगा?
उत्तर:
Z = 30 – 20 = 10

प्रश्न 6.
चतुर्थक (Quartiles) किसे कहते हैं?
उत्तर:
चतुर्थक वे मूल्य होते हैं जो क्रमबद्ध आंकड़ों को चार बराबर भागों में बाँटते हैं।

प्रश्न 7.
एक व्यक्तिगत समंकमाला में समान्तर माध्य (Arithmetic mean) की गणना कैसे की जाती है?
उत्तर:
\(\bar{X}=\frac{\sum X}{N}\)

प्रश्न 8.
दूसरे चतुर्थक (Q2) का मूल्य किसी सांख्यिकीय माध्य के बराबर होता है?
उत्तर:
दूसरा चतुर्थक = माध्यिका।

प्रश्न 9.
बहुलक (Mode) का बिन्दुरेखीय माप किसके द्वारा किया जाता है?
उत्तर:
आवृत्ति आयत द्वारा।

प्रश्न 10.
माध्यिका (Median) की बिन्दुरेखीय गणना किसके द्वारा की जाती है?
उत्तर:
संचयी आवृत्ति वक्र (ओजाइव) द्वारा।

प्रश्न 11.
सामूहिक माध्य क्या है?
उत्तर:
जब दो मदों से अधिक श्रेणियों के माध्य की गणना एक साथ की जाती है तो इसे सामूहिक माध्य कहा जाता है।

प्रश्न 12.
बहुलक का एक लाभ लिखें।
उत्तर:
वह चरम मूल्यों से प्रभावित नहीं होता।

प्रश्न 13.
बहुलक को ज्ञात करते समय प्रयोग में आने वाली सारणियों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. समूहीकरण सारणी, तथा
  2. विश्लेषण सारणी।

प्रश्न 14.
ओजाइब वक्र की सहायता से माध्यिका को कैसे निकाला जाता है?
उत्तर:
जिस बिन्दु पर ‘से कम’ ओजाइब वक्र तथा ‘से अधिक’ ओजाइव वक्र एक दूसरे को काटते हैं, वहीं माध्यिका का निर्धारण होता है।

प्रश्न 15.
केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप का अन्य नाम क्या है?
उत्तर:
सांख्यिकी माध्य।

प्रश्न 16.
केन्द्रीय प्रवृत्ति के किन्हीं तीन प्रचलित मापों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. माध्य
  2. माध्यिका
  3. बहुलक

प्रश्न 17.
समान्तर माध्य क्या है?
उत्तर:
समान्तर माध्य वह मूल्य है जो किसी श्रृंखला के सभी मदों के मूल्यों के जोड़ को उनकी कुल संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है।

प्रश्न 18.
समान्तर माध्य की गणना का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
\(\bar{X}=\frac{\sum X}{N}\)

प्रश्न 19.
‘बहुलक’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह मूल्य जो समंकमाला में सबसे अधिक बार आता है, बहुलक कहलाता है।

प्रश्न 20.
‘माध्यिका’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
माध्यिका वह मूल्य है जो क्रमबद्ध समंकमाला को दो बराबर भागों में बाँटता है।

प्रश्न 21.
पाँच विद्यार्थियों के किसी विषय में प्राप्तांक 11, 12, 13, 14 तथा 15 हैं तो उनकी माध्यिका (median) क्या होगी?
उत्तर:
M (माध्यिका) = 13

प्रश्न 22.
माध्यिका ज्ञात करें यदि समान्तर माध्य 40 व बहुलक 36 हो।
उत्तर:
बहुलक = 3 माध्यिका – 2 माध्य
36 = 3 माध्यिका – 2 × 4
36 + 80 = 33 माध्यिका
माध्यिका = 116 + 3 = 38.67

प्रश्न 23.
केन्द्रीय प्रवृत्ति का औसत के तीन सर्वाधिक सांख्यिकीय माप लिखें।
उत्तर:

  1. समांतर माध्य
  2. माध्यिका, तथा
  3. बहुलक

प्रश्न 24.
समांतर माध्य, माध्यिका एवं बहुलक की सापेक्षिक स्थिति लिखें।
उत्तर:
समांतर माध्य, माध्यिका एवं बहुलक की सापेक्षिक स्थिति निम्नलिखित है –
समांतर माध्य > माध्यिका > बहुलक
बहुलक > माध्यिका अथवा समांतर माध्य
माध्यिका हमेशा समांतर माध्य और बहुलक के बीच में होती है।

प्रश्न 25.
क्या माध्यिका का निर्धारण रेखाचित्र के द्वारा किया जा सकता है? यदि हाँ, तो रेखाचित्र का नाम बताएं।
उत्तर:
हाँ, ओजाइव वक्र।

प्रश्न 26.
अखंडित श्रेणी में बहुलक ज्ञात करने का सूत्र लिखें।
उत्तर:
\(Z=l_{1} \frac{f_{1}-f_{2}}{2 f_{1}-f_{0}-f_{2}} \times 1\)

प्रश्न 27.
किस प्रकार के आवृत्ति वितरण में बहुलक का मूल्य समान्तर माध्य से अधिक होता है?
उत्तर:
ऋणात्मक विषमता वाले आवृत्ति वितरण में।

प्रश्न 28.
लघु विध और पद विचलन विधि में क्या अंतर है?
उत्तर:
लघु विधि में उभयनिष्ठ गुणक (Common factor) का प्रयोग नहीं किया जाता जबकि पद-विचलन विधि में उभयनिष्ठ गुणक (Common factor) के द्वारा विचलनों को विभाजित किया जाता है।

प्रश्न 29.
यदि किसी श्रेणी में पदों की संख्या 100 है और उसका समान्तर माध्य 4 है तो श्रेणी के सभी मूल्यों का योग कितना होगा?
उत्तर:
ΣX = 100 × 4 = 400

प्रश्न 30.
निम्न श्रेणी में माध्यिका का मूल्य ज्ञात कीजिए –
2, 8, 7, 3, 9, 10 तथा 6
उत्तर:
7

प्रश्न 31.
बहुलक ज्ञात करने के लिए समूहीकरण सारणी में कॉलमों की संख्या कितनी होती है?
उत्तर:
6

प्रश्न 32.
विभाजन मूल्य से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
यह वह मूल्य है जो समंक श्रेणी को दो या दो से अधिक भागों में विभाजित करता है।

प्रश्न 33.
किन्हीं चार विभाजन मूल्यों के नाम बताओ।
उत्तर:

  1. चतुर्थक
  2. दशमक
  3. शतमत
  4. माध्यिका

प्रश्न 34.
निम्न समंकों से निम्न चतुर्थक ज्ञात करें।
उत्तर:
= \(\frac{N+1}{4}\) = \(\frac{7+1}{4}\) = दूसरी मद = 7

प्रश्न 35.
प्रथम और तृतीय चतुर्थक के वैकल्पिक नाम लिखें।
उत्तर:
%Q1 तथा Q2

प्रश्न 36.
यदि \(\bar { X } \) = 25, M = 26 तो बहुलक ज्ञात करें।
उत्तर:
बहुलक = 3 माध्यिका – 2 माध्य
बहुलक = 3 × 26 – 2 × 25 = 78 – 50 = 28

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यदि किसी श्रृंखला की माध्यिका 20 सेंटीमीटर तथा माध्य 16 सेंटीमीटर हो तो भूयिष्ठक ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
भूयिष्ठक = 3 माध्यिका – 2 माध्य
या 2 = 3M – 2\(\bar { X } \)
यहाँ M = 20 सेमी
अतएव z = 3 × 20 – 2 × 16
z = 60 – 32 = 28 सेमी

प्रश्न 2.
निम्नलिखित तालिका की माध्यिका ज्ञात करें
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 15
उत्तर:
माध्यिका = \(\frac{N+1}{2}\) मद का मूल्य
= \(\frac{9+1}{2}\) = 5 वें मद का मूल्य = 6

प्रश्न 3.
माध्यिका के गुण लिखें।
उत्तर:
माध्यिका के गुण (Merits of Median):

  1. इसकी गणना बहुत सरल होती है।
  2. इसका मूल्य निश्चित होता है।
  3. माध्यिका मूल्य चरम सीमाओं से प्रभावित नहीं होता।
  4. गुणात्मक तथ्य जैसे-योग्यता, सुंदरता आदि के माप में अधिक सहायता होता है।
  5. यदि श्रेणी के कुछ मूल्य न भी ज्ञात हों तो माध्यिका ज्ञात की जा सकती है।
  6. माध्यिका की गणना बिन्दु विधि द्वारा की जा सकती है।

प्रश्न 4.
माध्यिका के दोष लिखें।
उत्तर
माध्यिका के दोष (Demerits of Median):

  1. यदि श्रेणी के विभिन्न मूल्यों का वितरण अनियमित हो तो माध्यिका समूह का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करती।
  2. इसमें श्रेणी के सभी मूल्यों को एक समान महत्त्व दिया जाता है।
  3. इसका समान्तर माध्य की भाँति बीजगणितीय प्रयोग संभव नहीं है।
  4. माध्यिका ज्ञात करने के लिए आंकड़ों को आरोही क्रम में क्रमबद्ध करना आवश्यक है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित तालिका में रिक्त स्थानों की पूर्ति और तालिका के बाद दिये गये प्रश्नों के उत्तर दें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 16

  1. क्या चरम सीमा से माध्यिका प्रभावित होती है?
  2. क्या माध्यिका समांतर माध्य से श्रेष्ठ विधि है?

Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 17

  1. माध्यिका चरम सीमा से प्रभावित नहीं होती।
  2. हाँ, माध्यिका समांतर माध्य से श्रेष्ठ विधि है।

प्रश्न 6.
एक श्रेणी का बहुलक ज्ञात करें जिसके समांतर माध्य तथा माध्यिका क्रमशः 16 सेमी० तथा 20 सेमी० हैं।
उत्तर:
बहुलक = 3 माध्यिका – 2 समांतर माध्य
= (3 × 20) – 1 (2 × 16)
= 60 – 32 = 28 सेमी०

प्रश्न 7.
आठ परिवारों की दैनिक आय निम्नलिखित है –
170, 500, 250, 700, 400, 200, 350
परिवार की औसत दैनिक आय (Average daily income) निकालिए।
उत्तर:
समान्तर माध्य की गणना (Calculation of Arithmetic Mean):
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 18
X = \(\frac{ΣX}{N}\) = \(\frac{2870}{8}\) = 358.75

प्रश्न 8.
एक कक्षा के 50 छात्रों की औसत 61 इंच है तथा दूसरी कक्षा के 70 छात्रों की औसत ऊँचाई 58 इंच है। दोनों कक्षाओं के सभी छात्रों की सामूहिक ऊँचाई ज्ञात करें।
उत्तर:
दिया है n1 = 50, \(\bar { X } \)1 = 61, n2 = 70, \(\bar { X } \) = 58
X12 = \(\frac{50×61+70×58}{50+70}\) = \(\frac{3050+4060}{120}\) = \(\frac{7110}{120}\) = 59.25 इंच

प्रश्न 9.
एक छात्र के सीनियर सेकंडरी परीक्षा में अंग्रेजी में 60%, हिन्दी में 75% तथा गति में 63% अंक हैं। यदि इन विषयों का भार क्रमश 1, 1 तथा 2 है तो भारित समान्तर माध्य (WeightArithmetic Mean) निकालें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 19
∴ \(\bar { X } _{ \omega }\) = \(\frac{261}{4}\) = 65.25
अतः भारित समान्तर माध्य = 65.25 अंक।

प्रश्न 10.
सिद्ध करें कि मध्यमान तथा चरों की संख्या का गुणनफल चरों के मूल्य के योग के बराबर होता है।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 20
5 मदों का योगफल = 25
मध्यमान = \(\frac{25}{5}\) = 5
मध्यमान X मदों की संख्या 5 × 5 = 25
अतः सिद्ध हुआ कि मदों का योग = मध्यमान तथा मदों के संख्या के गुणनफल के बराबर होता है।

प्रश्न 11.
किन-किन परिस्थितियों में माध्यिका तथा बहुलक प्रवृत्ति के मापों के रूप में सबसे अधिक उपयोगी है?
उत्तर:

  1. खुले सिरे वाली श्रृंखला में माध्यिका तथा बहुलक की गणना आसानी से की जा सकती है जबकि समानान्तर माध्य की गणना करना कठिन है; क्योंकि ऐसे वर्गों का मध्य मूल्य निकालना संभव नहीं होता।
  2. माध्यिका तथा बहुलक श्रेणी के चरम मूल्यों से प्रभावित नहीं होते जबकि समानान्तर माध्य पर चरम मूल्यों का प्रभाव पड़ता है।
  3. माध्यिका तथा बहुलक का मूल्य आरेखीय विधियों जैसे-ओजाइव आवृत्ति आयत द्वारा ज्ञात किया जा सकता है जबकि समानान्तर माध्य ज्ञात करने की कोई आरेखीय विधि नहीं है।

प्रश्न 12.
समान्तर माध्य प्रवृत्ति का सबसे अधिक प्रचलित माप क्यों है? कोई तीन कारण दीजिए।
उत्तर:
समान्तर माध्य केन्द्रीय प्रवृत्ति का सबसे प्रचलित माप है, क्योंकि –

  1. इसकी गणना करना आसान है तथा इसे समझना आसान है।
  2. यह श्रेणी के सभी मूल्यों पर आधारित है।
  3. यह प्रतिचयन के उच्चावनों के द्वारा बहुत कम प्रभावित होता है।

प्रश्न 13.
समान्तर माध्य की कोई दो सीमाएं लिखिए।
उत्तर:
समान्तर माध्य की मुख्य सीमाएँ निम्न हैं –

  1. चरम मूल्यों द्वारा प्रभावित होती है। कोई भी बड़ा मूल्य या छोटा मूल्य इसे बढ़ा सकता है अथवा कम कर सकता है।
  2. खुले सिरे के वर्गों में इसकी गणना करना संभव नहीं, क्योंकि खुले सिरे के वर्ग में मध्य मूल्य को निकालना कठिन है।

प्रश्न 14.
माध्यिका तथा बहुलक में अन्तर के दो आधार बताइए।
उत्तर:

  1. माध्यिका निश्चित होती है जबकि बहुलक प्रायः अस्पष्ट और अनिश्चित होता है। कभी-कभी श्रेणी में दो या अधिक पद बहुलक हो जाते हैं।
  2. माध्यिका उन समस्याओं का अध्ययन करने के लिए उपयोगी है जो परिणाम में व्यक्त नहीं की जा सकी हैं जैसे-स्वास्थ्य, बुद्धिमानी आदि; जबकि बहुलक विभिन्न वस्तुओं जैसे-जूते, सिले कपड़े, हैट आदि के अध्ययन के लिए उपयोगी है।

प्रश्न 15.
समांतर माध्य की बीजगणितीय विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
समान्तर माध्य की कुछ बीजगणितीय विशेषताएँ निम्न हैं –
1. किसी श्रेणी के विभिन्न पद मूल्यों के समानान्तर माध्य में निकाले गए विचलनों का प्रयोग शून्य होता है अर्थात् Σ(X – \(\bar { X } \)) = 0

2. किसी श्रेणी के समानान्तर माध्य से निकाले गए विचलनों के वर्गों का योग न्यूनतम होता है।
Σ (X – \((\bar { X } )^{ 2 }\)) = न्यूनतम

3. किसी श्रेणी के दो अथवा अधिक भागों के पद मूल्यों की संख्या तथा समानान्तर माध्य ज्ञात होने पर समानान्तर माध्य ज्ञात हो जा सकती है, अर्थात्
\(\bar{X}_{12}=\frac{\bar{X}_{1} N_{1}+\bar{X}_{2} N_{2}}{N_{1}+N_{2}}\)

प्रश्न 16.
यदि बहुलक 30 और माध्यिका 25 है तो समांतर माध्य ज्ञात करें।
उत्तर:
बहुलक = 3 माध्यिका – 2 समांतर माध्य
30 = 3 × 25 – 2 समांतर माध्य
समांतर माध्य = \(\frac{45}{2}\) = 22.5

प्रश्न 17.
निम्न आँकड़ों की सहायता से माध्यिका (Median) ज्ञात कीजिए –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 21
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 22

प्रश्न 18.
पाँच परिवारों की मासिक आय नीचे दी गई है –
6550, 7550, 9550, 4550 तथा 8000 लघु विधि से माध्य की गणना करें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 23

प्रश्न 19.
प्रत्यक्ष विधि से निम्नलिखित वितरण का समान्तर (Arithmetic mean) ज्ञात करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 24
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 25

प्रश्न 20.
गलत मूल्य लिखने के कारण अशुद्ध समान्तर माध्य से शुद्ध समान्तर माध्य की गणना कैसे करेंगे?
उत्तर:
गलत मूल्य लिखने के कारण अशुद्ध समान्तर माध्य से शुद्ध समांतर माध्य की गणना में निहित चरण (Steps involved in calculationg correct A.M. from incorrect A.M. due to writing incorrect value):

  1. अशुद्ध समांतर माध्य को संख्या (N) से गुणा करें अर्थात् X × N
  2. \(\bar { X } \) × N से गलत मूल्य को घटाएँ और सही मूल्य को जोड़ें।
  3. जोड़ को N से भाग करें और शुद्ध समांतर माध्य प्राप्त करें।

प्रश्न 21.
100 विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त औसत अंक 50 के बाद स्थान में यह ज्ञात हुआ कि एक विद्यार्थी के अंक 63 के स्थान पर 93 पढ़े गए, तो शुद्ध औसत अंत वया होंगे?
उत्तर:
दिया गया \(\bar { X } \) = 50N = 100
\(\bar { X } \) = \(\frac{ΣX}{N}\)
50 = \(\frac{ΣX}{100}\); ΣX = 5000
अशुद्ध अंक (93) को निकाल कर और शुद्ध अंक (63) को जमा करके
ΣX = 5800 – 91 + 63 = 5970
∴ शुद्ध \(\bar { X } \) = \(\frac{4970}{100}\) = 49.70

प्रश्न 22.
किसी कक्षा के 100 विद्यार्थियों के माध्य अंक 48 हैं। जाँच करने के बाद पता चला कि सिकी एक विद्यार्थी के अंक 53 के स्थान पर 73 जोड़ लिए गए हैं। सही समान्तर माध्य ज्ञात करें।
उत्तर:
अशुद्ध ΣX = N × \(\bar { X } \) = 100 × 48 = 4800
शुद्ध ΣX = 4800 – 73 + 53 = 4780
अतः शुद्ध समांतर माध्य (\(\bar { X } \)) = \(\frac{ΣX}{N}\) = \(\frac{4780}{100}\) =47.8 अंक

प्रश्न 23.
मदों का समांतर माध्य 7 है, किंन्तु जाँच करने पर मालूम हुआ की दो मदें और के स्थान पर 5 और 9 ले ली गइ सही समांतर माध्य ज्ञात करें।
उत्तर:
अशुद्ध ΣX = 7 × 5 = 35
शुद्ध ΣX = 35 – 4 – 8 + 5 + 9 = 37
समांतर माध्य \(\bar { X } \) = \(\frac{ΣX}{N}\) = \(\frac{37}{5}\) = 7.4

प्रश्न 24.
समांतर माध्य को चरों के मूल्यों के वितरण का गुरुत्वाकर्षण केन्द्र क्यों कहा गया है? समझाएँ।
उत्तर:
समांतर माध्य की गणना करने के लिए हम सभी चरों के मूल्यों को लेते हैं। उनके जोड़ को चरों की संख्या से विभाजित करते हैं। समांतर माध्य से धनात्मक विचलनों का योगफल ऋणात्मक विचलनों के जोड़ के बराबर होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि धनात्मक तथा ऋणात्मक विचलन एक दूसरे को संतुलित करते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि समांतर माध्य चरों के मूल्यों के वितरण का गुरुत्वाकर्षण केन्द्र है।

प्रश्न 25.
मान लो माध्यिका का मूल्य 26 है और समांतर माध्य का मूल्य 25 है तो ऐसी अवस्था में बहुलक का मूल्य क्या होगा?
उत्तर:
बहुलक = 3 माध्यिका – 2 समांतर माध्य = 3 × 26 – 2 × 25
= 78 – 50 = 28

प्रश्न 26.
समांतर माध्य की एक विशेषता यह है कि यह बहुत बड़े या बहुत छोटे मूल्य से प्रभावित होता है। उदाहरण की सहायता से यह प्रमाणित करें।
उत्तर:
उदाहरण के लिए हम नीचे 5 श्रमिकों की दैनिक मजदूरी लेते हैं –
45, 55, 55, 65, 70 रुपए
इनका समांतर माध्य (x) = \(\frac{ΣX}{N}\) = \(\frac{290}{50}\) = 58 रुपए
अब हम मान लेते हैं कि एक ओर श्रमिकों की दैनिक मजदूरी 100 रु० है तो ऐसी अवस्था में समातर माध्य \(\bar { X } \) = \(\frac{480}{5}\) = 80 रुपए
उदाहरण से यह सिद्ध होता है कि एक बड़ी संख्या लेने से समांतर माध्यं काफी प्रभावित हुआ। (पहले यह 58 रुपये था अब यह 80 रुपए है।)

प्रश्न 27.
निम्नलिखित तालिका से भारित माध्य ज्ञात करें –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 26
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 27

प्रश्न 28.
मान लो 5 मदों की एक श्रेणी का समांतर माध्य है। उनमें चार मदों का मूल्य क्रमशः 10, 15, 30 और 35 है। श्रेणी के 5वें मद का लुप्त मूल्य ज्ञात करें।
उत्तर:
\(\bar { X } \) = \(\frac { 10+30+15+35+X_{ 5 } }{ N_{ 5 } } \)
\(\frac { 90+X_{ 5 } }{ 5 } \)
30 = \(\frac { 90+X_{ 5 } }{ 5 } \)
अर्थात् 90 + X5 = 150; X5 = 150 – 90 = 60
अत: लुप्त मद का मूल्य = 60 है।

प्रश्न 29.
एक विद्यार्थी के अंग्रेजी में 60 अंक, हिन्दी में 75, गणित में 63, अर्थशास्त्र में 59 तथा सांख्यिकी में 55 अंक आए। अंकों का भारित औसत ज्ञात करें यदि भारित औसत क्रमशः 2, 1, 5, 5 तथा 3 हो।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 28

प्रश्न 30.
निम्न तालिका की सहायता से सामूहिक समान्तर माध्य ज्ञात करें –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 29
उत्तर:
सामूहिक समांतर माध्य = \(\frac{(75×50)+(60×60)+(55+60)}{50+60+50}\)
= \(\frac{3750+3600}{160}\) = \(\frac{10.100}{160}\) = \(\frac{10.100}{160}\) = 63.125 अंक

प्रश्न 31.
एक कार्यस्थल पर 50 आदमी, 20 औरतें और 10 बच्चे कार्य करते हैं। उनकी मजदूरी 8 रुपए, 6 रुपए और 4 रुपए प्रति घंटा है। उनकी प्रति घंटा दे की गणना करें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 30
XW = \(\frac{ΣWX}{ΣW}\) = \(\frac{560}{80}\) = 7 प्रति घंटा

प्रश्न 32.
उदाहरण से सिद्ध करें कि माध्यिका से विचलनों का योगफल (± चिह्न) ध्यान में रखते हुए दूसरे बिन्दू के विचलनों को जोड़ से कम होता है।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 31
माध्यिका = \(\frac{N+1}{2}\) मद का मूल्य = \(\frac{5+2}{2}\) = तीसरे मद का मूल्य = 12
अन्य बिन्दु (माना) = 10
यहाँ पर मध्यिका से विचलनों का जोड़ (Σd) = 60 और अन्य बिन्दु (10) से विचलनों का जोड़ 10 है।
अतः सिद्ध हुआ कि माध्यिका से विचलनों का योगफल अन्य बिन्दु से विचलनों के योगफल से कम है।

प्रश्न 33.
उदाहरण से सिद्ध करें कि भारित समांतर माध्य साधारण समांतर माध्य से कम होगा तब कम मूल्य वाली मदों को अधिक भार दिया जाता है और अधिक मूल्य वाले मदों को कम।
उत्तर:
प्रश्न में दिए गए कथन को सिद्ध करने के लिए हम निम्न तालिका लेते हैं –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 32

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
केन्द्रीय प्रवृत्ति से आप क्या समझते हैं? सांख्यिकीय माध्य के उद्देश्य तथा कार्य क्या हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय प्रवृत्ति का आशय (Meaning of Central Tendency):
एक समंकमाला की केन्द्रीय प्रवृत्ति का आशय उस समंकमाला के अधिकांश मूल्यों की किसी एक मूल्य के आस-पास केन्द्रित होने की प्रवृत्ति से है। किसी समंकमाला या आवृत्ति वितरण में शीर्ष मूल्य तो कम ही होते हैं, अधिकांश मूल्य पदमाला के मध्य में ही केन्द्रित रहते हैं। उदाहरणत: यदि किसी कक्षा में सांख्यिकी अध्ययन करने वाले विधार्थियों की कोई परीक्षा ली जाए तो परीक्षार्थियों में बहुत अच्छे और बहुत कम अंक प्राप्त करने वाले छात्र तो कम होंगे, अधिकांश छात्रों के प्राप्तांक पूर्णांकों को 50% के आस-पास रहेंगे।

स्वाभाविक है कि यह केन्द्रीयकरण लगभग बीच के मूल्यों में ही निहित होता है। ये केन्द्रीय मूल्य ही केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप अथवा माध्य कहे जाते हैं, इस प्रकार माध्य सम्पूर्ण समंकमाला का एक प्रतिनिधि मूल्य होता है और इसलिए इसका स्थान सामान्यता श्रेणी के मध्य में ही होता है। क्रॉक्स्टन एवं काउडेन (Croxtpm & Cowden) के शब्दों में, “माध्य समंकों के विस्तार के अंतर्गत स्थित एक ऐसा मूल्य है जिसका प्रयोग श्रेणी के सभी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है। समंकमाला के विस्तार के मध्य में स्थिति होने के कारण ही माध्य को केन्द्रीय मूल्य माप भी कहा जाता है।”

(“An average is a single value within the range of the date that is used to represent all of the values in the series. Since an average is somewhere within in the range of date, it is sometimes called a measure of central value.”)

इसी प्रकार ए० आई० वॉघ (Waugh) के शब्दों में, एक माध्य मूल्यों के एक समूह से चुना गया वह मूल्य है जो उसका किसी रूप में प्रतिनिधित्व करता है-एक ऐसा मूल्य है जो पूर्ण समूह के मूल्यों के प्रतिरूप में है जिसका वह एक अंश है।” (An average is a single value selected from a group of Values to present them in some way a value which is supposed to spot for whole group of which it is part or thpical of all the values in the group)

सांख्यिकीय माध्यों के उद्देश्य एवं कार्य (Objects and Functions of Statistical Averages) सांख्यिकीय माध्यों के मुख्य उद्देश्य व कार्य निम्नलिखित हैं –

1. समंकों का संक्षिप्त चित्र प्रस्तुत करना (To present a brief picture of the entire data):
माध्यों द्वारा जटिल और अव्यवस्थित समंकों की मुख्य विशेषताओं का सरल, स्पष्ट एवं संक्षिप्त चित्र प्रस्तुत किया जाता है। इससे उन समंकों को समझना व याद रखना बहुत सुगम हो जाता है। उदाहरणार्थ, 102 करोड़ भारतवासियों की अलग-अलग आयु को याद रखना एक असंभव-सी बात है, परन्तु औसत वायु प्रत्येक व्यक्ति याद रख सकता है।

इसी प्रकार 102 करोड़ व्यक्तियों की आयु के समंक याद रखना असंभव है, लेकिन औसत आयु सुगमता से याद रखी जा सकती है। अत: माध्य समंकों का विहंगम दृश्य (Bird’s eye view) प्रस्तुत करते हैं। मोरोन (Moroney) ने ठीक ही कहा है, “माध्य का उद्देश्य व्यक्तिगत मूल्यों के समूह का सरल और संक्षिप्त रूप से प्रतिनिधित्व करना है जिससे कि मस्तिष्क समूह की इकाइयों के सामान्य आकार को शीघ्रता से ग्रहण कर सके।”

(The purpose of average is to represent a group of individual values in a simple and concise manner so that the mind can get a quick understanding .. the general size of the individual in the group.”)

2. तुलना में सहायक होना (To facilitate comparison):
माध्य समंकों की समस्त राशि को संक्षिप्त व सरल करके तुलना योग्य बनाते हैं। समंक की तुलना से बहुत महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाल जा सकते हैं। उदाहरण के लिए विभिन्न देशों की औसत आयु की तुलना से ज्ञात किया जा सकता है कि कौन-सा देश सबसे अधिक समृद्धिशाली है तथा कौन-सा सबसे कम।

3. उपयुक्त नीतियों के निर्धारण में सहायक होना (To help in the formulation of suitable policies):
माध्य उपयुक्त नीतियों के निर्धारण में बहुत अधिक सहायक होते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी विद्यालय में बी०ए० के तृतीय वर्ष की चार कक्षाओं के ‘क’ ‘ख’, ‘ग’, एवं ‘घ’, के विद्यार्थियों के किसी विषय में औसत नंबर इस प्रकार हैं – 60, 58, 40 एवं 55 तो इससे यह निष्कर्ष निकलेगा कि कक्षा ‘ग’ के विद्यार्थी इस विषय में बहुत कमजोर हैं और उनकी कमी को दूर करने के लिए विशेष प्रबंध करना आवश्यक है।

4. सांख्यिकीय विश्लेषण का आधार (Basis of Statistical Analysis):
सांख्यिकीय विश्लेषण की अनेक क्रियाएँ माध्यों पर आधारित हैं।

प्रश्न 2.
आदर्श माध्य के आवश्यक गुण लिखें।
उत्तर:
आदर्श माध्य के आवश्यक गुण (Requirements of a model average):
एक आदर्श माध्य के निम्नलिखित गुण होने चाहिए –

1. समझने में सरल (Easy to Understand):
सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग समंकों को संक्षिप्त तथा सरल बनाने के लिए किया जाता है। अत: माध्य ऐसा होना चाहिए जो आसानी से समझा जा सके, अन्यथा इसका प्रयोग बहुत ही सीमित होगा।

2. समझने में सरल (Easy to Compute):
माध्य की गणना-क्रिया सरल होनी चाहिए ताकि इसका प्रयोग व्यापक रूप से हो सके। यद्यपि माध्य का निर्धारण जहाँ तक हो सके सरल होना चाहिए तथापि विशेष परिस्थितियों में परिणाम की शुद्धता के लिए अधिक कठिन माध्यों का प्रयोग भी किया जा सकता है।

3. श्रेणी के सभी मूल्यों पर आधारित (Based on all the items of the series):
माध्य श्रेणी के सभी मूल्यों पर आधारित होना चाहिए एक या अधिक मूल्यों में परिवर्तन होने से माध्य में परिवर्तन हो सके। यदि माध्य श्रेणी के सभी मूल्यों पर आधारित नहीं है तो वह पूरे समूह का प्रतिनिधित्व ठीक प्रकार से नहीं कर सकता।

4. न्यूनतम तथा अधिकतम मूल्यों पर अनुचित प्रभाव से बचाव (Should not be unduly affected by Extreme items):
यद्यपि माध्य सभी मूल्यों पर आधारित होना चाहिए तथापि किसी विशेष मूल्य पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए अन्यथा माध्य समंकों का सही रूप व्यक्त नहीं करेगा।

5. स्पष्ट व स्थिर (Rigidly defined):
माध्य की परिभाषा स्पष्ट शब्दों में व्यक्त होनी चाहिए ताकि जो भी व्यक्ति दिए हुए समंकों से माध्य निकाले वह एक निष्कर्ष पर पहुँचे। इसके लिए यह आवश्यक है कि माध्य गणितीय सूत्र के रूप में दिया जाए। यदि माध्य की गणना में व्यक्तिगत प्रवृत्तियों का प्रभाव पड़ा तो फल भ्रामक तथा अशुद्ध होंगे।

6. बीजगणितीय विवेचना संभव (Capable of algebrate treatment):
एक अच्छे माध्य की बीजगणितीय विवेचन संभव होना चाहिए। उदाहण के लिए यदि दो कारखानों में मजदूरों की संख्या तथा उनकी औसत आय से संबंधित समंक दिए गए हों तो दोनों कारखानों के मजदूरों की आय का सामूहिक माध्य निकालना संभव होना चाहिए।

7. न्यादर्शों की भिन्नता का कम से कम प्रभाव (Least effects of flucuations of sampling):
यदि एक ही समग्र में से उचित रीति द्वारा विभिन्न न्यादर्श लेकर माध्य निकाले जाएं तो उन माध्यों में बहुत अधिक अंतर नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि एक विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को 10 भागों में बाँट कर 10 न्यादर्श लिए गए हैं तो उनके परिणामों में बहुत अधिक असमानता नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न 3.
माध्य या औसत क्या है? इसके उद्देश्य (कार्य) क्या है?
उत्तर:
श्रेणी की केन्द्रीय प्रवृत्तियों की माप को माध्य या माप औसत कहते हैं। माध्य एक श्रेणी का प्रतिनिधि अंक होता है। यह अंकगणितीय विधि है जिसके द्वारा परिणाम संक्षेप में व्यक्त किया जाता है और वह परिणाम पूरी श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है। केन्द्रीय प्रवृत्तियों के माप या माध्यों का आर्थिक विश्लेषण में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ तक की सांख्यिकी औसतों को विज्ञान कहकर परिभाषित किया जाता है।
माध्य या औसत निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं –

  1. समांतर माध्य (Arithmetic Mean)
  2. मध्यिका (Median)
  3. उभयष्ठिक या बहुलक (Mode)

औसतों या माध्यमों के उद्देश्य (कार्य):

1. सरलीकरण तथा संक्षिप्तीकरण (Simplication):
माध्यों की सहायता से विशाल आँकड़ों को सरल एवं संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। उदाहरणार्थ देश के प्रत्येक व्यक्ति की आय को याद रखना संभव नहीं है, परन्तु प्रति व्यक्ति आय को याद रखना और समझना आसान है। इसी प्रकार औसत आयु, औसत अंक, औसत वेतन जैसे जटिल आँकड़ों को संक्षिप्त और सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।

2. तुलना में सहायक (Helpful in comparison):
माध्यकों की सहायता से दो तथ्यों की तुलना करना आसान हो जाता है। उदाहरणार्थ दो देशों की औसत आयु की तुलना करके उनकी आर्थिक दशा का पता लगाया जा सकता है।

3. भावी योजनाओं में सहायक (Helpful in future planning):
व्यापारी, अर्थशास्त्री आदि माध्यों के आधार पर महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते हैं और इस प्रकार से ये उनकी भावी योजनाओं के निर्माण में सहायक होते हैं।

4. माध्यों द्वारा व्यक्तिगत व बिखरे तथ्यों को आसानी से समझा जा सकता है।

प्रश्न 4.
समान्तर माध्य किसे कहते हैं? इनकी विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
समान्तर माध्य (Arithmetic mean):
समान्तर माध्य से अभिप्राय उस मूल्य से है जो किसी श्रेणी के समस्त मूल्यों के योग को उनकी इकाइयों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है। समान्तर माध्य केन्द्रीय प्रवृत्ति का सबसे उत्तम माप माना जाता है। यह सबसे अधिक प्रचलित माप है। उदाहरण के लिए 2, 4, 8, 14 का समान्तर माध्य = \(\frac{2+4+8+14}{4}\) = 7 हैं।

समान्तर माध्य की विशेषताएँ (Special features of Arithmetic Mean):
समांतर माध्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. समान्तर माध्य से लिए गए विचलनों का योग शून्य होता है। समीकरण में,
Σ(X – c) = 0

2. मान लें कुछ परिवारों की मासिक आय के बारे में चिन्तन कर रहे हैं। यदि कुल आय का वितरण समान है तो समान्तर माध्य हमें यह आय देगा जो प्रत्येक परिवार प्राप्त करेगा।
मान लो कुल आय = 40,000 रुपए
परिवारों की संख्या = 8
समान्तर माध्य = 40,000 + 8 = 5,000
अतः प्रत्येक परिवार की आय 5000 रुपए होगी यदि आय का वितरण समान है।

3. समान्तर माध्य को अंकगणितीय विशेषता निकालना सरल है।

4. समान्तर माध्य की गणना करने के लिए हम सभी चरों के मूल्य को लेते हैं। किसी चर के मूल्य को नहीं छोड़ते।

5. समान्तर माध्य बहुत बड़े या बहुत छोटे मूल्य से प्रभावित होते हैं। उदाहण के लिये एक मुहल्ले के 5 परिवारों का दैनिक व्यय 25, 28, 32, 27 तथा 33 रुपए है। ऐसी अवस्था में समान्तर माध्य 29 रुपए होगा। मान लो उस मुहल्ले में एक धनी परिवार आकर बस जाता है। उस परिवार का दैनिक व्यय 125 रुपए है। यदि हम दोबारा समान्तर माध्य की गणना करें। समान्तर माध्य 45 आएगा। इस तरह समान्तर माध्य एक बड़े मूल्य से काफी प्रभावित हुआ और समान्तर माध्य 29 रुपए से बढ़कर 45 रुपए हो गया।

6. यदि श्रेणी के प्रत्येक मूल्य को समान्तर माध्यक में परिवर्तित कर दिया जाता है तो उसका योगफल श्रेणी के सभी मूल्यों के योगफल के बरबार होता है। समीकरण में \(\bar { X } \)N = ΣX इसे निम्न उदाहरण की सहायता से समझाया जा सकता है –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 33
\(\bar { X } \) = \(\frac{25}{5}\) = 5
इस प्रकार यदि हमें श्रेणी का समान्तर माध्य तथा पद मूल्यों की संख्या ज्ञात है तो समूह का EX प्राप्त कर सकते हैं।

7. समान्तर माध्य से लिये गये विचलनों के वर्गों का योग अन्य किसी मूल्य से निकाले गये विचलनों के वर्गों के योग से कम होता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित सूचना के आधार पर प्रत्यक्ष विधि (Direct Method) पद विचलन विधि (Step Deviation Method) तथा कल्पित माध्य विधि (Assumed Mean Method) से समान्तर माध्य ज्ञात करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 34
उत्तर:
1. प्रत्यक्ष विधि से मध्यमान की गणना (Calculation of Arithment mean by Direct Method)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 35
\(\bar { X } \) = \(\bar { X } \) = \(\frac{3713}{60}\) = 6188 एकड़

2. कल्पित माध्य विधि से समान्तर माध्य की गणना (Calculation of Arithmetic Mean by Assumed Mean)
प्रत्येक विधि से समान्तर माध्य 61.88 एकड़ है। अतः हम प्रश्न विधि से निकालने के लिए कल्पित समान्तर माध्य 62 लेते हैं।
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\(\bar { X } \) = A.M + \(\frac{fd}{N}\) = 62 – \(\frac{7}{60}\)

प्रश्न 6.
समान्तर माध्य के गुण तथा दोष लिखिए।
उत्तर:

  1. समांतर माध्य की गणना सरल है।
  2. इसमें बीजगणित का प्रयोग किया जाता है।
  3. इसकी गणना में सभी मदों का प्रयोग किया जाता है।
  4. यह आर्थिक विश्लेषण में सबसे अधिक प्रचलित है।
  5. यह तुलना के लिए एक अच्छा आधार है।
  6. इसका निर्धारण उस समय भी संभव है जब केवल श्रेणी के मूल्यों और उनकी योग. मालूम हो।
  7. इसका मूल्य सदैव निश्चित होता है।
  8. यह अधिक विश्वसनीय माप है।
  9. इसकी गणना करने के लिए आंकड़ों को व्यवस्थित करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

समान्तर माध्य के दोष (Demerits of Arithmetic Mean):
समान्तर माध्य के दोष निम्नलिखित हैं –

  1. समान्तर माध्य चरम सीमाओं अर्थात् अधिकतम व न्यूनतम मूल्यों से प्रभावित होता है।
  2. गुणात्मक श्रेणी के लिए इसका प्रयोग नहीं किया जाता।
  3. किसी मद के अनुपस्थित होने पर इसकी गणना अशुद्ध होगी।
  4. समान्तर माध्य का निर्धारण केवल अवलोकनों द्वारा नहीं किया जाता।
  5. यह श्रेणी का एक सच्चा प्रतिनिधित्व नहीं है।
  6. समान्तर माध्य की गणना रेखाचित्र से नहीं की जा सकती।
  7. खुले सिरे वाली समंक श्रेणियों में समान्तर माध्य ज्ञात नहीं किया जा सकता।
  8. समान्तर माध्य से श्रेणी की रचना के बारे में कुछ पता नहीं चलता।
  9. अनुपात दर प्रतिशत आदि का अध्ययन करने के लिए यह माध्य सर्वथा अनुपयुक्त है।
  10. कई बार समान्तर माध्य से आश्चर्यजनक व अनुचित निष्कर्ष निकलते हैं। जैसे एक अस्पताल में दाखिल हुए मरीजों की संख्या 18.7 प्रतिदिन।

प्रश्न 7.
माध्यिका से क्या अभिप्राय है? जब अविच्छन्न श्रेणी दी गई हो तो माध्यिका की गणना किस प्रकार की जाती है?
उत्तर:
माध्यिका (Median):
माध्यिका तथ्यों के समूह का वह चर मूल्य है जो समूह को दो बार बराबर भागों में इस प्रकार बाँटता है कि एक भाग में सारे मूल्य माध्यिका से अधिक और दूसरे भाग में सारे मूल्य उससे कम हों। डॉ. बाउले के अनुसार, “यदि एक समूह के पदों को उनके मूल्यों के अनुसार क्रमबद्ध किया जाए तो लगभग बीच के पद के मूल्य को माध्यिका कहा जाता है।” मान लें 5 छात्रों के अंक 20, 22, 25, 30 और 32 हैं तो माध्यिका 30 होगी। माध्यिका एक स्थिति वाला माप है।

माध्यिका की गणना (Calculating of Median):
माध्यिका की गणना में निम्नलिखित चरण निहित हैं –

  1. अंकों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाता है।
  2. उसके बाद संचयी आवृत्ति ज्ञात की जाती है।
  3. उसके बाद निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करके केन्द्रीय पद ज्ञात किया जाता है।
  4. M = आकार (\(\frac{N}{2}\)) वीं मद
  5. इसके बाद उस वर्ग को निर्धारित किया जाता है जिसमें मध्यिका स्थित है।
  6. मध्यिका वर्ग ज्ञात हो जाने पर माध्यिका का मूल्य ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –
    M = L + \(\frac{N/2-c.f.}{F}\) × C

प्रश्न 8.
माध्यिका के गुण तथा दोष लिखिए।
उत्तर:
माध्यिका के गुण (Merits of median):
माध्यिका के गुण निम्नलिखित हैं –

  1. इसको समझना तथा मूल्य ज्ञात करना सरल है।
  2. कुछ अज्ञात मूल्यों की अवस्था में भी माध्यिका का मूल्य ज्ञात किया जा सकता है।
  3. इसे कठोरता से वर्णित किया जाता है।
  4. खुले सिर वाले वर्ग के वितरण में भी यह विशेष उपयोगिता है, क्योंकि इसमें कोई कल्पना नहीं करना पड़ती।
  5. इसका मूल्य रेखा विधि द्वारा भी ज्ञात किया जा सकता है।
  6. गुणात्मक तथ्यों जैसे-बुद्धिमता, कार्य-कुशलता, ईमानदारी, दरिद्रता आदि को ज्ञात करने के लिए माध्यिका को सर्वोत्तम माना जाता है।
  7. यह अपिकिरण तथा विषमता के मापन में भी लाभदायक है।
  8. यह स्थिति माप है।
  9. यह श्रेणी के माध्य मूल्य की व्याख्या करता है।

दोष (Demerits):
माध्यिका के निम्नलिखित दोष हैं –

  1. यह सभी मदों पर आधारित नहीं है।
  2. इसका बीजगणितीय प्रयोग नहीं हो सकता।
  3. यह निदर्शन में परिवर्तन से प्रभावित होता है अर्थात्
    M × N ≠ ΣX1 × X2 × X3 + ……… Xn
  4. यह ठीक है कि यह चरम मूल्यों से प्रभावित नहीं होता, परन्तु जहाँ इन मूल्यों का महत्त्व देना होता है वहाँ माध्य अनुपयुक्त है।
  5. यदि एक श्रेणी में मदों का मूल्य समान नहीं है तो भी माध्यिका को ज्ञात नहीं किया जा सकता।
  6. यदि मदों का मूल्य बहुत कम या अधिक हो तो माध्यिका को ज्ञात करना कठिन हो जाता है।
  7. अखण्डित श्रेणी में माध्यिका ज्ञात करने के लिये सूत्र द्वारा मध्यिका वर्ग का निर्धारण करना पड़ता है। अतः यहाँ तक कल्पना की जाती है कि आवृत्तियाँ अपने से सम्बन्धित वर्ग में समान रूप से वितरित हैं, परन्तु ऐसा मानन गलत है।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित दशाओं की गणना कैसे की जाती है?

  1. जब समावेश श्रेणी हो।
  2. जब वर्गान्तर असमान हो।
  3. जब बिन्दु रेखीय विधि अपनानी हो।

उत्तर:
1. पहली स्थिति (First Case):

  • जब माध्यिका मूल्य ज्ञात करने के लिए समावेशी आवृत्ति वितरण दिया हुआ है तो उसे सर्वप्रथम अपवर्जी श्रेणी में परिवर्तित किया जाता है।
  • फिर संचयी आवृत्ति ज्ञात की जाती हैं।
  • उसके बाद निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करके केन्द्रीय पद ज्ञात किया जाता है।
  • M = size of \(\frac{N}{2}\) the item
  •  इसके बाद उस वर्ग को निर्धारित करते हैं जिसमें माध्यिका स्थित है।
  • माध्यिका वर्ग ज्ञात हो जाने पर निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –
    M = l + \(\frac { \frac { N_{ 2 } }{ 2 } -C }{ f } \) × C

2. दूसरी स्थिति (Second Case):
यदि समंक श्रेणी में वर्ग असमान है तो उसे समान वर्गान्तर बनाने की आवश्यकता नहीं। ऐसी अवस्था में माध्यिका मूल्य ज्ञात करने के लिए समान। सूत्र का प्रयोग किया जा सकता है। यदि आवृत्तियों को समायोजित किया जाता है तब भी माध्यिका में कोई अन्तर नहीं आयेगा।

3. तृतीय स्थिति (Third Case):
इसमें निम्नलिखित चरण निहित हैं –

  • सर्वप्रथम बिन्दु रेखीय पत्र (Graph paper) पर ‘से कम’ तथा ‘से अधिक’ संचयी ओजाइव वक्र खींचे।
  • जहाँ ये दोनों वक्र आपस में काटें उस बिन्दु से भुजाक्ष पर लम्ब डालिए।
  • लम्ब भुजाक्ष को जिस बिन्दु पर छुए वही माध्यिका मूल्य होगा। जैसे नीचे चित्र में दिखाया गया है –
    Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 37

प्रश्न 10.
बहुलक किसे कहते हैं? उसके गुणा और दोष बताइए।
उत्तर:
बहुलक एक विशेष प्रकार का माध्य (Average) है। श्रेणी में जिस मद की सबसे अधिक आवृत्ति हो उसे बहुलक (Mode) कहा जाता है। उदाहरण लेकर हम बहुलक अवधारणा का स्पष्टीकरण करते हैं। नीचे श्रमिकों का मासिक वेतन दिया है। इसमें 1600 रुपए मासिक वेतन पाने वाले श्रमिकों की संख्या 26 अर्थात् सबसे अधिक है। अत: बहुलक 1600 रुपये है।
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यदि किसी श्रेणी में दो भूयिष्ठक पाए जाएँ तो उसे Bi-Modal Series कहते हैं। भूयिष्ट को जोड़ से सम्बोधित किया जाता है।

बहुलक के गुण (Merits of Mode):

  1. यह समझने में सरल है और अधिकांश श्रेणियों में इसका ज्ञात निरीक्षण द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
  2. इसका प्रयोग मुख्यतः उत्पादन और बिक्री के क्षेत्र में किया जाता है।
  3. इस पर चरम सीमा मूल्यों का प्रभाव नहीं पड़ता।
  4. इसकी गणना बिन्दुरेखीय विधि से भी की जा सकती है।

बहुलक के दोष (Demerits of Mode):

  1. यह श्रेणी के सभी पदों पर आधारित होता है।
  2. यह अनश्चित और अस्पष्ट होता है।
  3. जब श्रेणी में एक से अधिक भूयिष्ठक होते हैं तो गणना में कठिनाई होती है।

प्रश्न 11.
निम्न बारम्बारता वितरण से समान्तर माध्य, माध्यिका तथा भूयिष्ठक ज्ञात करें।
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उत्तर:
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अतः मध्यिका 6.75 माध्य तथा भूयिष्ठक के बीच में है।

प्रश्न 12.
45 और 55 का कल्पित माध्य लेते हुए ज्ञात कीजिए और पुष्टि कीजिए कि दोनों स्थितियों में परिणाम एक ही है।
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उत्तर:
45 कल्पित माध्य लेते हुए माध्य की गणना (Calculation of mean taking 45 as assumed meadn) –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 43
कल्पित माध्य (AM) = 45
\(\bar { X } \) = \(\frac{Σfd’}{N}\) × 10 = 43 + 13.5 = 58.5

प्रश्न 13.
कल्पत माध्य लेते हुए माध्य की गणना
उत्तर:
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कल्पित माध्य (AM) = 55
\(\bar { X } \) = AM + \(\frac{Σfd’}{N}\) × 10 = 55 +\(\frac{35}{100}\) × 10 = 55 + 3.5 = 58.5

प्रश्न 14.
20 विद्यार्थियों के औसत अंक 50 हैं जिसका विवरण निम्न प्रकार से है। स्याही के फैल जाने से एक अंक पढ़ा नहीं जा सकता। इसे ज्ञात कीजिए।
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उत्तर:
हम मान लेते हैं कि अज्ञात अंक x है।
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प्रश्न 15.
25.000, 31.40, 28,00, 24.00, 26.50, 34.00, 35.00, 23.70, 30.25, 33.00, 38.60, 28,00, 28.00, 30.00, 30.50, 34.00, 29.00, 23.00, 27.20, 22.50, 32.20.
ऊपर दिए गए अंकों की सहायता से सिद्ध करें कि मध्यिका का मूल्य समान्तर माथ्य तथा भूयिष्ठक के बीच में है।
उत्तर:
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  1. \(\bar { X } \) = \(\frac{Σx}{n}\) = \(\frac{583.85}{20}\) = 29.1925
  2. मध्यिका = \(\frac{n+1}{2}\) वीं मद = \(\frac{20+1}{2}\) = 10.5 मद = \(\frac{20.00+29.00}{2}\) = 2850
  3. भूयिष्ठक = 25 (28 की बारम्बारता सबसे अधिक है।)

अत: माध्यिका मूल्य (28.5), समान्तर माध्य (29.125), तथा भूयिष्ठक (28) के बीच में है।

प्रश्न 16.
भारित माध्य क्या है? एक उदाहरण देकर भारित माध्य की गणना समझाइए।
उत्तर:
भारित माध्य (Weighted Mean):
सरल समान्तर माध्य की गणना करते समय सभी पदों को एक समान महत्त्व दिया जाता है, जबकि वास्तविक जीवन में सभी मदों का महत्त्व एक समान नहीं होता। साधारण समान्तर माध्य के इस दोष को दूर करने के लिए भारित माध्य का प्रयोग किया जाता है।

इसके अनुसार विभिन्न मदों को उनके महत्त्व या शक्ति के अनुसार भार दे दिया जाता है। भारित समान्तर माध्य सूचकांक बनाने में तथा दो वांडों या विश्वविद्यालयों के परिणामों की तुलना करने में प्रयोग किया जाता है। इसका सूत्र निम्नलिखित है –
\(\bar { X } \)W = \(\frac{ΣWX}{ΣW}\)
जहाँ \(\bar { X } \)W = भारित माध्य (Weighted Mean)
ΣWX = चारों ओर भारों के गुणनफल का योग
ΣX = भारों का योग
उदाहरण –
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प्रश्न 17.
केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापक के रूप में समान्तर माध्य, माध्यिका और भूयिष्ठक के भेद करें।
उत्तर:
समान्तर माध्य माध्यिका और भूयिष्ठक में तुलना (Comparison among Arithmetic mean, Median and mode):
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 49

प्रश्न 18.
कुछ परिवारों का दैनिक व्यय रुपयों में दिया गया है –
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  1. माध्य, माध्यिका तथा बहुलक ज्ञात करें।
  2. उच्चतम चतुर्थक तथा निम्नतम चतुर्थक ज्ञात करें।

उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 51
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प्रश्न 19.
निम्नलिखित आवृत्ति वितरण से समान्तर माध्य (Arithmetic Mean) तथा मध्यिका (Median) ज्ञात कीजिए –
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उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 54

प्रश्न 20.
50 विद्यार्थियों के औसत अंक 44.8 हैं, जिनका विवरण नीचे दिया गया है –
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उत्तर:
1. अज्ञात मूल्य का निर्धारण (Location of Unknown Value):
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 56

2. अज्ञात आवृत्ति का निर्धारण (Location of Unknown Value):
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प्रश्न 21.
निम्नलिखित आँकड़ों से बिन्दु रेखीय विधि (से कम ओजाइब) से माध्यिका मूल्य ज्ञात करें –
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उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 59

  1. माध्यिका की गणन करने के लिए बिन्दु रेखीय पत्र (Graph Paper) पर क्रम से संचयी ओजाइब वक्र खींचें।
  2. \(\frac{N}{2}\) की गणना करने के लिए 50 को 2 से भाग करें। भजनफल 25 आएगा। y अथा पर 25 अंकित करेंगे।
  3. इसके बाद अकित बिन्दु से ओजाइव वक्र पर लम्ब गिराएंगे। यह लम्ब मुजाक्ष पर जिस मूल्य पर दूता है, वहीं माध्य का मूल्य होगा। नीचे चित्र से पता चलता है कि लम्ब भुजाक्ष पर 20 पर छूता है। अतः माध्यिका 20 होगी।
    Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 60

प्रश्न 22.
एक उदाहरण से सिद्ध करें कि यदि –

  1. एक श्रेणी के विभिन्न मदों में 2 जोड़े जाएँ तो समान्तर माध्य में 2 की वृद्धि हो जाएगी।
  2. एक श्रेणी के विभिन्न मदों में 2 घटाये जाएँ तो समान्तर माध्य 2 कम होगा।
  3. एक श्रेणी के विभिन्न मदों को दो से गुणा किया जाए तो समान्तर माध्य दोगुना होगा।
  4. एक श्रेणी के विभिन्न मदों को दो से विभाजित किया जाए तो समांतर माध्य आधा हो जाएगा।

उत्तर:
निम्न उदाहरण से प्रश्नों में दिए गए कथनों की पुष्टि होती है।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 61

प्रश्न 23.
निम्न वितरण में लुप्त आवृत्तियों को बताएँ यदि विद्यार्थियों की संख्या 100 तथा माध्यिका 30 हो।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 62
उत्तर:
मान लें एक लुप्त आवृत्ति = f1 दूसरी लुप्त आवृत्ति = f2
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 63
हम जानते हैं कि अंतिम वर्गान्तर का संचयी आवृत्ति के योगफल के बराबर होती है।
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प्रश्न 24.
निम्न श्रेणी से माध्यिका ज्ञात करें –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 65
उत्तर:
सर्वप्रथम हम संचयी आवृत्तियों को साधारण वितरण में परिवर्तित करेंगे तब माध्यिका की गणना करेंगे।
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प्रश्न 25.
निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से माध्यिका ज्ञात करें –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 68
उत्तर:
प्रश्न में दी गई श्रेणी को परिवर्तित करेंगे और माध्यिका की गणना करेंगे।
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प्रश्न 26.
निम्नलिखित तालिका से ग्राफ की सहायता से बहुलक ज्ञात करें तथा गणित सूत्र की सहायता से परिणाम की जाँच करें।
उत्तर:
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प्रश्न 27.
निम्नलिखित तालिका से बहुलक की गणना करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 72
उत्तर:
प्रश्न में संचयी बारम्बारता वितरण है। बहुलक को गणना करने के लिए हमें इसे अपवर्ती श्रृंखला में बदलना होगा। प्रश्न में श्रृंखला अवरोही क्रम में निरीक्षण करने पर हमें पता चलता है। कि बहुलक का मान 25-30 वर्गान्तर है। अब हम समूह सारणी तथा विश्लेषण सारणी बनाएँगे।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 73
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 74

प्रश्न 28.
उदाहरण देकर सिद्ध करें कि यदि समंक श्रेणी में वर्ग अंतराल असमान है तब वर्गान्तर बनाए बिना भी मध्यिका एक जैसी आएगी।
उत्तर:
यह सिद्ध करने के लिए कि समंक श्रेणी में समंक श्रेणी में वर्ग अन्तराल को। समायोजित करें या न करें, तब भी माध्यिका एक जैसी आयेगी। हम नीचे एक काल्पनिक तालिका लेते हैं।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 75
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 76
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 76

प्रश्न 29.
रेखाचित्र द्वारा निम्नलिखित आवृत्ति वितरण में भूयिष्ठक का मूल्य ज्ञात कीजिए और गणितीय विधि से मूल्य की जाँच कीजिए –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 78
उत्तर:
पहले हमें श्रृंखला से आवृत्ति आयत चित्र (Histogram) बनाना होगा। फिर नीचे प्रदर्शित उदाहण के भौति सबसे बड़े आयत के बिन्दुओं को आस-पास के आयत बिन्दुओं से मिलाकर भूयिष्ठक ज्ञात कर लिया जाएगा।
बीजगणितीय विधि द्वारा मूल्य की जाँच:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 79

प्रश्न 30.
एक परीक्षा में 100 अभ्यार्थी थे, जिनमें 21 अनुत्तीर्ण हुए, 6 को विशिष्टता प्राप्त हुई,43 तृतीय श्रेणी में तथा 18 द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। विशिष्टता प्राप्त करने के लिए 75% अंक चाहिए, कम-से-कम 40% उत्तीर्णता के लिए, द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण के लिए कम-से-कम 50% तथा प्रथम श्रेणी के लिये कम-से-कम 60% अंक चाहिये। अंकों के वितरण के लिए माध्यिका की गणना करें।
उत्तर:

  1. अनुत्तीर्ण छात्र = 21
  2. अनुत्तीर्ण छात्र = 21
  3. उत्तीर्ण = 100 – 21 = 19
  4. विशिष्टता प्राप्त करने वाले अभ्यार्थी = 6
  5. तृतीय श्रेणी में पास होने वाले अभ्यार्थी = 43
  6. द्वितीय श्रेणी में पास होने वाले अभ्यार्थी = 6
  7. 60% से अधिक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यार्थी = 79 – (43 + 43) = 79 – 61 = 18
  8. विशिष्टता प्राप्त करने वाले अभ्यार्थी = 6
  9. 60 से ऊपर तथा 75 से कम अंक प्राप्त करने वाले अभ्यार्थी = 18 – 6 = 12 इन आँकड़ों को हम निम्न आवृत्ति वितरण में दिखा सकते हैं –

Bihar Board Class 11 Economics Chapter 5 केंद्रीय प्रवृत्ति की माप Part - 2 img 80

प्रश्न 31.
आपको 5 मदों के मूल्य दिए गए हैं -4, 6, 8, 10 तथा 12.

  1. यदि उनका माध्य 2 से बढ़ा दिया जाए तो व्यक्तिगत मदों में क्या परिवर्तन होगा। यदि सभी मद समान रूप से प्रभावित होते हैं।
  2. यदि पहले तीन मदों के मूल्य में दो की वृद्धि होती है, तब बाद के दो मदों का मान क्या होना चाहिए ताकि माध्य पूर्ववत् बना रहे।
  3. यदि मान 12 के स्थान पर 96 का प्रयोग करें तब समान्तर माध्य क्या होगा?

उत्तर:
1. माध्य = \(\frac{4+6+8+10+12}{5}\) = \(\frac{40}{5}\) = 8
नया नाम = 8 + 2 = 10
मान लो प्रत्येक मद में बढ़ोतरी = X
नई मदों का मूल्य = 4 + x + 6 + x + 8 + x + 10 + x + 12 + x
= 40 + 5x
अतः 40 + 5x = 10 × 5
5x = 50 – 40 = 10
x = 2
अतः बाद के दो मदों में 2 की वृद्धि होगी।

2. तीन मदों के मूल्य में कुल वृद्धि = 3 × 26
अत: बाद के दो मदों के मूल्य में कमी = 6
औसत वृद्धि = \(\frac{6}{2}\) = 3
अतः बाद के दो मदों में 3, 3 की वृद्धि होगी।
पुष्टिकरण (Verirication): 5 मदों के मूल्य का माध्य = 8
मदों के परिवर्तन के पश्चात् मदों के मूल्य का माध्य
= (4 + 2 + 6 + 2 + 8 + 2 10 – 3 + 12 – 3) + 5
= \(\frac{6+8+10+7+9}{5}\) = \(\frac{40}{5}\) = 8

3. पाँचवें मद के मूल्य में काफी परिवर्तन आएगा। इससे स्पष्ट होता है कि समान्तर माध्य चरम सीमा से काफी प्रभावित होता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक श्रृंखला के सभी मदों को जोड़कर योग को संख्या से भाग करने पर प्राप्त होता –
(a) समांतर माध्य
(b) मध्यिका
(c) बहुलक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) समांतर माध्य

प्रश्न 2.
समांतर माध्य की गणना पद विचलन विधि अथवा प्रत्यक्ष विधि से करने पर उत्तर प्राप्त होना चाहिए –
(a) समान
(b) असमान
उत्तर:
(a) समान

प्रश्न 3.
एक क्रमबद्ध श्रृंखला को केन्द्रीय प्रवृत्ति का कौन-सा माप दो समान भागों में बाँटता है –
(a) समांतर माध्य
(b) मध्यिका
(c) बहुलक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) मध्यिका

प्रश्न 4.
‘से कम’ तथा ‘से अधिक’ तोरण जिस बिन्दु पर काटते हैं उस बिन्दु से x – अक्ष पर खींचा गया लम्ब किसकी माप होता है –
(a) (i) निम्न चतुर्थक
(b) उच्च चतुर्थक
(c) मध्यिका
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) मध्यिका

प्रश्न 5.
ज्यामितीय विधि से ज्ञात नहीं किया जा सकता है –
(a) समांतर माध्य
(b) बहुलक
(c) माध्यिका
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) समांतर माध्य

प्रश्न 6.
समांतर माध्य से विचलनों का योग होता है –
(a) ऋणात्मक
(b) धनात्मक
(c) शून्य
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) शून्य

प्रश्न 7.
एक क्रमबद्ध श्रृंखला को चार भागों में विभक्त करने वाला केन्द्रीय प्रवृत्ति माप है –
(a) चतुर्थक
(b) मध्यिका
(c) बहुलक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) चतुर्थक

प्रश्न 8.
श्रृंखला में सबसे अधिक बार आने वाला मद होता है –
(a) मध्यिका
(b) चतुर्थक
(c) बहुलक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) बहुलक

प्रश्न 9.
सामान्यतः चतुर्थकों की गणना की जाती है –
(a) Q1
(b) Q2
(c) Q3
(d) Q4
(e) Q1 तथा Q3
उत्तर:
(e) Q1 तथा Q3

प्रश्न 10.
निम्न में कौन सभी मदों पर आधारित होता है –
(a) समांतर माध्य
(c) मध्यिका
(c) बहुलक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) समांतर माध्य

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

Bihar Board Class 11 Political Science संविधान का राजनीतिक दर्शन Textbook Questions and Answers

संविधान का राजनीतिक दर्शन के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
नीचे कुछ कानून दिए गए हैं। क्या इनका संबंध किसी मूल्य से है? यदि हाँ, तो वह अंतर्निहित मूल्य क्या है? कारण बताएँ।
(क) पुत्र और पुत्री दोनों का परिवार की संपत्ति में हिस्सा होगा।
(ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री-कर का सीमांकन अलग-अलग होगा।
(ग) किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जायगी।
(घ) ‘बेगार’ अथवा बंधुआ मजदूरी नहीं कराई जा सकती।
उत्तर:
(क) परिवार की नियुक्ति में पुत्री एवं पुत्र दोनों का बराबर हिस्सा होना सामाजिक मूल्य से सम्बन्धित है। ऐसा इसलिए है क्योंकि संविधान में स्त्री और पुरुष दोनों को समान अधिकार प्रदान किया गया है। यह एक लिंग-न्याय कहा जाएगा। सामाजिक न्याय का अर्थ है कि लिंग, जाति, नस्ल, धर्म अथवा क्षेत्र आदि के आधार पर कोई भेदभाव न हो। अतः पुत्री और पुत्र दोनों को समान हिस्सा दिया जाना सामाजिक न्याय के अन्तर्गत या लिंग न्याय की श्रेणी में रखा जायगा।
(ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं पर बिक्रीकर का सीमांकन अलग-अलग करना आर्थिक न्याय का उदाहरण है।
(ग) सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा न दिया जाना, धर्म निरपेक्षता के मूल्य पर आधारित है।
(घ) किसी से बेगार न लेना और बन्धुआ मजदूरी का निषेध करना यह भी सामाजिक न्याय के मूल्य पर आधारित है। समाज में किसी भी वर्ग का शोषण नहीं किया जाना चाहिए।

संविधान का राजनीतिक दर्शन प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 2.
नीचे कुछ विकल्प दिए जा रहे हैं। बताएँ कि इसमें किसका इस्तेमाल निम्नलिखित कथन को पूरा करने में नहीं किया जा सकता? लोकतांत्रिक देश को संविधान की जरूरत …..
(क) सरकार की शक्तियों पर अंकुश रखने के लिए होती है।
(ख) अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से सुरक्षा देने के लिए होती है।
(ग) औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है।
(घ) यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि क्षणिक आवेग में दूरगामी के लक्ष्यों से कहीं विचलित न हो जाएँ।
(ङ) शांतिपूर्ण ढंग से सामाजिक बदलाव लाने के लिए होती है।
उत्तर:
इस वाक्य को पूरा करने में तीसरा विकल्प  –
(ग) का प्रयोग नहीं किया जा सकता अर्थात् औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है, का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

संविधान का राजनीतिक दर्शन पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 3.
संविधान सभा की बहसों को पढ़ने और समझने के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं –

  1. इनमें से कौन-सा कथन इस बात की दलील है कि संविधान सभा की बहसें आज भी प्रासंगिक हैं? कौन-सा कथन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं हैं?
  2. इनमें से किस पक्ष का आप समर्थन करेंगे और क्यों?

(क) आम जनता अपनी जीविका कमाने और जीवन की विभिन्न परेशानियों के निपटाने में व्यस्त होती हैं। आम जनता इन बहसों की कानूनी भाषा को नहीं समझ सकती।

(ख) आज की स्थितियाँ और चुनौतियाँ संविधान बनाने के वक्त की चुनौतियों और स्थितियों से अलग हैं। संविधान निर्माताओं के विचारों को पढ़ना और अपने नये जमाने में इस्तेमाल करना दरअसल अतीत को वर्तमान में खींच लाना है।

(ग) संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझाने की हमारी दृष्टि पूर्णतया नहीं बदली है। संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तर्क मिल सकते हैं कि कुछ संवैधानिक व्यवहार क्यों महत्त्वपूर्ण हैं एक ऐसे समय में जब संवैधानिक व्यवहारों को चुनौती दी जा रही है, इन तर्कों को न जानना संवैधानिक-व्यवहारों को नष्ट कर सकता है।
उत्तर:
1.
(क) जब आम जनता अपने जीविकोपार्जन में व्यस्त रहती है तो यह कथन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं हैं।
(ख) आज की स्थितियाँ और चुनौतियाँ संविधान बनाने के वक्त की चुनौतियों और स्थितियों से अलग हैं। यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं है।
(ग) यह कथन प्रस्तुत करता है कि बहसें प्रासंगिक हैं क्योंकि संसार और वर्तमान चुनौतियाँ पूर्णतया नहीं बदली हैं।

2.
(क) मैं इस बात से सहमत हूँ कि आम जनता अपनी जीविका कमाने में व्यस्त है।
(ख) मैं इस बात से सहमत हूँ क्योंकि आज की स्थितियाँ उस समय से अलग हैं। पिछले लगभग 56 वर्षों में 93 के लगभग संशोधन हो चुके हैं।
(ग) क्योंकि समस्त चुनौतियाँ और यह संसार पूर्णतया नहीं बदले अतः मैं इस बात से सहमत हूँ कि बहसें प्रासंगिक हैं।

संविधान का राजनीतिक दर्शन Class 11 प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रसंगों के आलोक में भारतीय संविधान और पश्चिमी अवधारणा में अंतर स्पष्ट करें –
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ
(ख) अनुच्छेद 370 और 371
(ग) सकारात्मक कार्य-योजना या अफरमेटिव एक्शन
(घ) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
उत्तर:
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ:
धर्म निरपेक्षता के मामले में भारतीय संविधान पश्चिमी अवधारणा से बिल्कुल भिन्न है। पश्चिमी अवधारणा में धर्म व्यक्ति की अपनी निजी धारणा है। राज्य उसमें किसी प्रकार का योगदान या हस्तक्षेप नहीं करता, परंतु भारतीय संविधान में सभी धर्मों को समान आदर दिया गया है।

(ख) अनुच्छेद 370 और 371:
अनुच्छेद 370 जम्मू और कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में अस्थायी या संक्रमणकालीन व्यवस्था ही करता है। अनुच्छेद 371 उत्तर-पूर्व के राज्यों के लिए है। भारतीय संविधान और पाश्चात्य अवधारणा में यह अंतर है कि पाश्चात्य देशों में राज्यों के अपने अलग संविधान होते हैं परंतु भारतीय संविधान में राज्यों के अलग संविधान नहीं हैं, परंतु जम्मू और कश्मीर का 26 जनवरी, 1957 से अपना अलग संविधान भी है जिसमें जम्मू-कश्मीर राज्य के विशेष उपबंध हैं।

371 (a) नागालैण्ड राज्य के सम्बन्ध में विशेष उपबंध हैं
371 (b) असम के, 371
(c) मणिपुर, 371
(d) आन्ध्र प्रदेश, 371
(e) आन्ध्र प्रदेश में केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के
371 (f) सिक्किम राज्य के सम्बन्ध में विशेष उपबंध हैं 371
(g) मिजोरम, 371
(h) अरुणाचल प्रदेश

1. गोवा के सम्बन्ध में विशेष उपबंध हैं। इन राज्यों को छोड़कर पाश्चात्य धारणा और भारतीय संविधान में अंतर है परंतु 370 और 371 अनुच्छेदों वाले राज्यों पर केन्द्र का सीधा-नियंत्रण अथांत् उन राज्यों की सहमति के आधार पर संसद के नियमों को लागू कराया जा सकता है। एक सीमा तक ये प्रदेश स्वायत्तता का उपयोग कर सकते हैं जैसा कि पाश्चात्य धारणा में तो राज्यों की स्वायत्तता होती ही है।

(ग) सकारात्मक कार्ययोजना:
भारतीय संविधान और पाश्चात्य धारणा में सकारात्मक कार्ययोजना के सम्बन्ध में बड़ा अंतर है जैसा कि अमेरिका के संविधान में जहाँ संविधान 18 वीं शताब्दी में लिखा गया था उस समय के मूल्य और प्रतिमान आज इक्कीसवीं सदी में लागू करना भद्दा होगा परंतु भारतीय संविधान में निर्माताओं ने सकारात्मक कार्ययोजना हमारे मूल्यों, आदशौँ तथा विचारधारा के साथ संविधान का निर्माण किया।

भारतीय राजनीतिक दर्शन उदारवाद, लोकतंत्र समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और संघात्मकता तथा अन्य सभी धारणाओं जो भारतीय संस्कृति को प्रकट करती है, वसुधैव कुटुम्बकम अर्थात् सबको एक समान मानते हुए अल्पसंख्यकों का आदर करते हुए एक राष्ट्रीय पहचान बनाए रखते हुए भारतीय संविधान में रखा गया है परंतु पाश्चात्य विचारधारा में ऐसा नहीं होता।

(घ) सार्वभौम वयस्क मताधिकार:
पाश्चात्य अवधारणा में स्त्रियों को मताधिकार अभी हाल में दिया गया है जबकि संविधान निर्माण के समय नहीं दिया गया था परंतु भारतीय संविधान में सार्वभौम वयस्क मताधिकार (सभी स्त्री, पुरुष व नपुंसक को) दिया गया है।

संविधान का राजनीतिक दर्शन Class 11 Question Answer Bihar Board प्रश्न 5.
निम्नलिखित में धर्मनिरपेक्षता का कौन-सा सिद्धांत भारत के संविधान में अपनाया गया है?
(क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
(ख) राज्य का धर्म से नजदीकी रिश्ता है।
(ग) राज्य धर्मों के बीच भेदभाव कर सकता है।
(घ) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा।
(ङ) राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होंगी।
उत्तर:
भारतीय संविधान में धर्म-निरपेक्षता के निम्नलिखित सिद्धांत अपनाए गए हैं –
(क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
(ख) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा।

संविधान का राजनीतिक दर्शन पाठ के प्रश्न उत्तर कक्षा 11 Bihar Board प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों को सुमेलित करें –
(क) विधवाओं के साथ किए जाने वाले बरताव की आलोचना की आजादी।
(ख) संविधान-सभा में फैसलों का स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जाना।
(ग) व्यक्ति के जीवन से समुदाय के महत्त्व को स्वीकार करना।
(घ) अनुच्छेद 370 और 371
(ङ) महिलाओं और बच्चों को परिवार की संपत्ति में असमान

अधिकार:

  1. आधारभूत महत्त्व की उपलब्धि
  2. प्रक्रियागत उपलब्धि
  3. लैंगिक-न्याय की उपेक्षा
  4. उदारवादी व्यक्तिवाद
  5. धर्म-विशेष की जरूरतों के प्रति ध्यान देना

उत्तर:
(क) विधवाओं के साथ किए जाने वाले बरताव की आलोचना की आजादी।
(ख) संविधान सभा में फैसलों का स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्क बुद्धि के आधार पर लिया जाना
(ग) व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्त्व को स्वीकार करना
(घ) अनुच्छेद 370 और 371
(ङ) महिलाओं और बच्चों के परिवार की संपत्ति में असमान

अधिकार:

  1. प्रक्रियागत उपलब्धि
  2. आधारभूत महत्त्व की उपलब्धि
  3. उदारवादी व्यक्तिवाद
  4. धर्म-विशेष की जरूरतों के प्रति ध्यान देना
  5. लैंगिक न्याय की उपेक्षा
  6. नीति

Samvidhan Ka Rajnitik Darshan Question Answer Bihar Board प्रश्न 7.
यह चर्चा एक कक्षा में चल रही थी। विभिन्न तर्कों को पढ़ें और बताएं कि आप इनमें किस से सहमत हैं और क्यों?

जयेश:
मैं अब भी मानता हूँ कि हमारा संविधान एक उधार का दस्तावेज है।

सबा:
क्या तुम यह कहना चाहते हो कि इसमें भारतीय कहने जैसा कुछ है ही नहीं? क्या मूल्यों और विचारों पर हम ‘भारतीय’ अथवा ‘पश्चिमी’ जैसा लेबल चिपका सकते हैं? महिलाओं और पुरुषों की समानता का ही मामला लो। इसमें पश्चिमी’ कहने जैसा क्या है? और, अगर ऐसा है भी तो क्या हम इसे सहज पश्चिमी. होने के कारण खारिज कर दें?

जयेश:
मेरे कहने का मतलब यह है कि अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ने के बाद क्या हमने उनकी संसदीय-शासन की व्यवस्था नहीं अपनाई?

नेहा:
तुम यह भूल जाते हो कि जब हम अंग्रेजों से लड़ रहे थे तो हम सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ थे। अब इस बात का, शासन की जो व्यवस्था हम चाहते थे उसको अपनाने से कोई लेना-देना नहीं, चाहे यह जहाँ से भी आई हो।
उत्तर:
इस चर्चा में जयेश का विचार; कि ‘हमारा संविधान केवल उधार का थैला है। यहाँ. पर आलोचना का विषय है कि भारतीय संविधान मौलिक नहीं है, बहुत से अनुच्छेद तो भारतीय शासन अधिनियम, 1935 से शब्दशः लिए गए हैं। बहुत से अनुच्छेद विदेशों के संविधानों से लिए गए हैं। इसमें अपना देशी कुछ भी नहीं है। इसमें हिन्दुकाल की सभा या समिति का कुछ भी वर्णन नहीं है। इसमें मध्यकालीन भारत का भी कुछ नहीं है परंतु सब का कहना है कि कोई मूल्य या आदर्श भारतीय या पाश्चात्य नहीं हुआ करते, मूल्य तो मूल्य हैं, आदर्श तो आदर्श होते हैं।

जब हम कहते हैं कि स्त्री और पुरुष में कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए तो यह बात पाश्चात्य और भारतीय दोनों दृष्टिकोण से ही ठीक है। हमें कोई बात इस कारण से नकारनी नहीं चाहिए कि वह पाश्चात्य अवधारणा से ली गई है परंतु नेहा का कथन है कि हम ब्रिटिश के खिलाफ अपनी आजादी के लिए लड़े थे तो हम ब्रिटिश के विरुद्ध नहीं बल्कि औपनिवेशिक पीतियों के खिलाफ लड़े थे।

हमें कोई भी बात जो हमारे लिए उपयोगी है उसमें यह नहीं देखना कि यह कहाँ से ली गई है। इस प्रकार दूसरे देशों से ली गयी बातें गलत हों, यह कहना सही नहीं हो सकता वरन् मानव की अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप जो बात जिस देश के संविधान से ली जाए उसमें कुछ भी गलत नहीं है। इसके विपरीत यदि हम पुरातन भारतीय, राजनीतिक संस्थाओं को लेना चाहें तो आधुनिक युग में यह जरूरी नहीं कि वे फिट बैठ सकें।

आलोचक भारतीय संविधान की आलोचना करते हुए जिन विशेषणों का प्रयोग करते हैं, उनमें प्रमुख हैं ‘मौलिकता का अभाव’ ‘उधार का थैला’ और ‘भानुमति का पिटारा’ आदि। आलोचकों का कहना है कि संविधान में ‘भारतीयता का पुट’ नहीं है परंतु उपर्युक्त आलोचना न्यासंगत नहीं है। विशेष बात यह है कि विदेशी संविधानों से सोच-विचारकर ही ग्रहण किया गया है और जो कुछ ग्रहण किया गया है उसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाल लिया गया है।

ग्रेनविल आस्टिन के अनुसार भारतीय संविधान के निर्माण में परिवर्तन के साथ चयन की कला को अपनाया गया है। इसे भारतीय संविधान का गुण कहा जा सकता है। वास्तव में संविधान के मौलिक विचारों पर किसी का स्वात्वाधिकार नहीं होता। संविधान निर्माताओं ने अन्य देशों के संविधानों और उनके व्यावहारिक अनुभवों से लाभ उठाकर कोई गलती नहीं की वरन् दूरदर्शिता का ही कार्य किया है।

Samvidhan Ki Raajnitik Darshan Question Answer Bihar Board प्रश्न 8.
ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय संविधान को बनाने की प्रक्रिया प्रतिनिधिमूलक नहीं थी? क्या इस कारण हमारा संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं रह जाता? अपने उत्तर के कारण बताएँ।
उत्तर:
भारत के संविधान की एक आलोचना यह कहकर की जाती है कि यह प्रतिनिध्यात्मक नहीं है। भारतीय संविधान का निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया था जिसका गठन नवम्बर 1946 में किया गया था। इसके सदस्य प्रान्तीय विधानमण्डलों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए थे। संविधान सभा में 389 सदस्य थे जिनमें से 292 ब्रिटिश प्रान्तों से तथा 93 देशी रियासतों से थे। चार सदस्य चीफ कमिश्नर वाले क्षेत्रों से थे।

3 जून, 1947 के माउन्टबेटन योजना के तहत भारत का विभाजन हुआ और संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई जिसमें 284 सदस्यों ने 26 नवम्बर, 1949 को संविधान पर हस्ताक्षर किए यद्यपि कुछ संविधान विशेषज्ञ संविधान सभा को संप्रभु नहीं मानते थे क्योंकि यह ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित की गई थी। अगस्त, 1947 में भारत के आजाद होने के बाद इस संविधान सभा ने पूर्ण संप्रभु होकर कार्य किया। इस सभा के सदस्यों का चुनाव क्योंकि सार्वभौम वयस्क मताधिकार द्वारा नहीं हुआ था अतः कुछ विद्वान इसे प्रतिनिधि मूलक नहीं मानते परंतु यदि हम संविधान सभा के डिवेट (वाद-विवाद) का अध्ययन करें तो पता चलता है कि विभिन्न विचारों के आदान-प्रदान के बाद ही इसके प्रावधान बनाए गए।

कुछ लोगों का यह कथन भी ठीक नहीं प्रतीत होता कि संविधान सभा वास्तव में प्रतिनिधि संस्था नहीं थी इस कारण वह भारतीयों के लिए संविधान बनाने की अधिकारिणी नहीं थी। इसके अनुसार न तो सभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से हुआ और न ही जनमत संग्रह द्वारा ही संविधान को जनता द्वारा अनुसमर्थित कराया गया, इसलिए यह कहा जा सकता है कि संविधान को लोकप्रिय स्वीकृति प्राप्त नहीं थी परंतु इस आलोचना में भी कोई सार नहीं है। 1946 में जिन परिस्थितियों में संविधान सभा का निर्माण हुआ, उनमें वयस्क मताधिकार के आधार पर इस प्रकार की सभा का निर्माण सम्भव नहीं था।

यदि संविधान का गठन प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर होता अथवा यदि इस संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान के प्रारूप पर जनमत संग्रह करवाया जाता, तब भी संविधान का स्वरूप कम या अधिक रूप में ऐसा ही होता। इस विचार को बल देने वाला तथ्य यह है कि 1952 के प्रथम आम चुनाव जो नई सरकार के गठन के साथ-साथ संविधान के स्वरूप के आधार पर लड़े गए थे, में संविधान सभा के अधिकांश सदस्यों ने चुनाव – लड़ा और काफी अच्छे बहुमत से विजय प्राप्त की। इन सबके अतिरिक्त यह भी तथ्य है कि तत्कालीन भारत के सबसे प्रमुख संगठन ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ ने संविधान सभा को अधिकाधिक प्रतिनिधि स्वरूप प्रदान करने की प्रत्येक सम्भव और अधिकांश अंशों में सफल चेष्टा की थी।

संविधान का राजनीतिक दर्शन के प्रश्न उत्तर बताइए Bihar Board प्रश्न 9.
भारतीय संविधान की एक सीमा यह है कि इसमें लैंगिक-न्याय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। आप इस आरोप की पुष्टि में कौन-से प्रमाण देंगे? यदि आज आप संविधान लिख रहे होते, तो इस कमी को दूर करने के लिए उपाय के रूप में किन प्रावधानों की सिफारिश करते?
उत्तर:
भारतीय संविधान की कुछ सीमाएँ भी हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि यह एक सम्पूर्ण तथा दोष रहित प्रलेख है। इनमें से एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लैंगिक न्याय विशेषतया परिवार की संपत्ति के अन्तर्गत ऐसा है। परिवार की संपत्ति में स्त्रियों और बच्चों को समान अधिकार नहीं दिए गए। बेटे और बेटी में अंतर किया जाता है। मूल सामाजिक-आर्थिक अधिकार राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों में शामिल किए गए हैं जबकि उन्हें मौलिक अधिकारों में शामिल किया जाना चाहिए था।

राज्य नीति निर्देशक तत्त्वों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। समान कार्य के लिए स्त्री तथा पुरुष दोनों को समान वेतन राज्य के द्वारा संरक्षित किया गया है। यह नीति निर्देशक तत्त्वों में शामिल किया गया है। यह भी मौलिक अधिकार का भाग होना चाहिए था क्योंकि राज्य पूरी तरह से तभी समान कार्य के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को समान वेतन दिला सकता है। नीति निर्देशक तत्वों के लिए राज्य केवल प्रयास करेगा। हमारी संविधान की सीमाओं में से एक यह भी है कि आज तक स्त्रियों को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण संसद व राज्य विधानमंडल में नहीं दिलवाया जा सका।

हमारे संविधान की सीमाएँ मुख्यतः निम्नलिखित हैं –

  1. भारत का संविधान राष्ट्रीय एकता का केन्द्रीयकृत विचार रखता है।
  2. यह कुछ प्रमुख लैंगिक न्याय के विषयों विशेष तौर पर परिवार के अंदर व्याख्या किए हुए है।
  3. यह स्पष्ट नहीं हो सका कि क्योंकि एक निर्धन विकासशील देश में कुछ निश्चित मूल सामाजिक-आर्थिक अधिकार मूल अधिकारों की श्रेणी में न रखकर राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों में शामिल किया गया है।

संविधान का राजनीतिक दर्शन के पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 10.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं-कि ‘एक गरीब और विकासशील देश में कुछ एक बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकार मौलिक अधिकारों की केन्द्रीय विशेषता के रूप में दर्ज करने के बजाए राज्य की नीति-निर्देशक तत्त्वों वाले खंड में क्यों रख दिए गए-यह स्पष्ट नहीं है। आपके जानते सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को नीति-निर्देशक तत्त्व वाले खंड में रखने के क्या कारण रहे होंगे?
उत्तर:
हमारे संविधान की एक विशेषता नीति निर्देशक तत्त्व हैं। विश्व के अन्य संविधानों में केवल आयरलैंड के संविधान को छोड़कर अन्य किसी देश के संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्त्व नहीं हैं। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने संविधान में केवल. राज्य के संगठन की व्यवस्था एवं अधिकार पत्र का वर्णन नहीं किया है वरन् वह दिशा भी निश्चित किया है जिसकी ओर बढ़ने का प्रयत्न भविष्य में भारत राज्य को करना है।

संविधान निर्माताओं का लक्ष्य भारत में लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना था और इसलिए उन्होंने नीति निर्देशक तत्त्वों में से ऐसी बातों का समावेश किया, जिन्हें कार्य रूप में परिणत किए जाने पर एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना सम्भव हो सकती है। निर्देशक तत्त्व हमारे राज्य के सम्मुख कुछ आदर्श उपस्थित करते हैं जिनके द्वारा देश के नागरिकों का सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक उत्थान हो सकता है।

इन तत्त्वों की प्रकृति के सम्बन्ध में संविधान की 37 वीं धारा में कहा गया है कि “इस भाग में दिए गए उपबंधों को किसी भी न्यायालय द्वारा बाध्यता नहीं दी जा सकेगी, किन्तु फिर भी इसमें दिए हुए तत्त्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि निर्माण में इन तत्त्वों का प्रयोग करना राज्य का कर्तव्य होगा।” इस अनुच्छेद (37) से यह बात स्पष्ट है कि निर्देशक तत्त्व को मौलिक अधिकारों के समान वैधानिक शक्ति प्रदान नहीं की गयी है।

इसका अर्थ है कि निर्देशक तत्त्वों की क्रियान्विनी के लिए न्यायालय के द्वारा किसी भी प्रकार के आदेश जारी नहीं किए जा सकते हैं। वैधानिक महत्त्व प्राप्त न होने पर भी ये तत्त्व राज्य शासन के संचालन के आधारभूत सिद्धांत हैं और राज्य का यह नैतिक कर्तव्य है कि व्यवहार में सदैव ही इन तत्त्वों का पालन करे। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि इतने महत्त्वपूर्ण एवं मौलिक अधिकारों से किसी भी प्रकार कम महत्त्व न रखते हुए भी इन निर्देशक तत्त्वों को राज्य सरकारों की कृपा पर क्या छोड़ा गया।

इसके नजर में यही कहा जा सकता है कि भारत उस समय पराधीनता के चंगुल से छुटा था। उसकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि इनका (निर्देश तत्त्वों का) पालन करने की बाध्यता होने से आर्थिक संकट उभर सकना था और उसके कारण समय-समय पर अनेक समस्यायें उठ सकती थीं। अत: राज्य को निर्देश दिया गया तथा नागरिकों को यह अधिकार भी नहीं दिया गया कि वे इन निर्देशक तत्त्वों को पूरा कराने के लिए राज्य के विरुद्ध न्यायालय में जा सकें। इसी कारण राज्य को इन नीति निर्देशक तत्त्वों को पूरा करने का प्रयास भर करने के लिए कहा गया ताकि अपनी सामर्थ्य के अनुकूल शासन इनको पूरा ६. 11 + रुचि ले सके।

Bihar Board Class 11 Political Science संविधान का राजनीतिक दर्शन Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

संविधान का राजनीतिक दर्शन प्रश्नोत्तरी Bihar Board प्रश्न 1.
‘संविध’ के दर्शन’ का क्या आशय है?
उत्तर:
‘संविधान, दर्शन’ से अभिप्राय है कि संविधान के अंतर्गत दिए गए कानूनों में यद्यपि नैतिक तत्त्वों का होना आवश्यक नहीं है किन्तु बहुत से कानून हमारे भीतर गहराई से बैठे मूल्यों से जुड़े रहते हैं। इन मूल्यों के आधार पर ही संविधान का निर्माण किया जाता है। संविधान के प्रति राजनीतिक-दर्शन का दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। हमारी राष्ट्रीय विचारधारा ही हमारे संविधान में प्रतीत होती है। समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व की भावना, राष्ट्रीय एकता और अखण्डता, समाजवाद और धर्म निरपेक्षता आदि आदर्शों का हमारे संविधान में समावेश है। यही हमारा राजनीतिक दर्शन है। हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय मूल्यों का प्रतीक हमारा संविधान होता है।

संविधान का राजनीतिक दर्शन पाठ के क्वेश्चन आंसर Bihar Board प्रश्न 2.
‘धर्म निरपेक्षता’ क्या अभिप्राय है? क्या भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है?
उत्तर:
भारतीय संविधान में भारत को एक ‘धर्मनिरपेक्ष राज्य’ घोषित किया गया है। राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और न ही राज्य नागरिकों को कोई धर्म विशेष अपनाने की प्रेरणा देता है। राज्य न धर्मी है, न अधर्मी और न धर्म-विरोधी। नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान की गई है और सब व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार अपने इष्ट-देव की पूजा करने का अधिकार है।

संविधान का राजनीतिक दर्शन पाठ 10 के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 3.
भारतीय संविधान की चार प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की अनेक विशेषताएँ हैं, जिनमें चार प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारतीय संविधान के अनुसार भारत एक संप्रभु समाजवादी लोकतंत्रात्मक गणराज्य है।
  2. भ तीय संविधान के द्वारा भारत को ‘धर्मनिरपेक्ष’ राज्य घोषित किया गया है।
  3. भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।
  4. भारत के संविधान में संसदात्मक शासन प्रणाली को अपनाया गया है।

Samvidhan Ka Rajnitik Darshan Ke Question Answer Bihar Board प्रश्न 4.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में दिए गए किन्हीं चार प्रमुख आदर्शों को बताइए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में दिए गए प्रमुख आदर्श निम्नलिखित हैं –

  1. न्याय: प्रत्येक भारतीय नागरिक को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय प्राप्त होगा।
  2. स्वतंत्रता: प्रत्येक भारतीय नागरिक को स्वतंत्रता प्राप्त होगी-सोचने की अभिव्यक्ति की, विश्वास की, उपासना की।
  3. समानता: भारत के प्रत्यके नागरिक को अवसर एवं प्रतिष्ठा को समानता प्रदान – की जायगी।
  4. बंधुत्व: समस्त भारतीय नागरिकों को उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का आश्वासन तथा राष्ट्र की एकता व अखंडता को बढ़ावा देने की भावना पैदा की जायगी।

संविधान का राजनीतिक दर्शन Class 11 Bihar Board प्रश्न 5.
भारत के संविधान की आलोचना के चार बिन्दु लिखिए।
उत्तर:
भारत के संविधान की आलोचना के चार बिन्दु निम्नलिखित है –

  1. संविधान निर्मात्री सभा प्रभुत्व सम्पन्न संस्था नहीं थी।
  2. संविधान सभा के अधिकांश सदस्य समाज के उच्च वर्ग से थे।
  3. भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेज है। एक उधार का थैला है। अनेक दूसरे देशों से संविधान की अनेक बातों को लिया गया है।
  4. संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान को लोकप्रिय अनुज्ञप्ति प्राप्त नहीं थी।

संविधान का राजनीतिक दर्शन पाठ Bihar Board प्रश्न 6.
संविधान की आवश्यकता और महत्त्व के क्या कारण हैं?
उत्तर:
ब्रिटिश शासन से आजादी प्राप्त करने के बाद राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने संविधान को अंगीकार करने की आवश्यकता अनुभव की। उन्होंने स्वयं को और आने वाली पीढ़ियों को संविधान से अनुशासित करने का फैसला किया। इसके निम्न कारण थे –

  1. संविधान एक ऐसा प्रारूप पैदा करता है, एक ऐसा ढाँचा खड़ा करता है जिसके अनुसार सरकार को कार्य करना होता है।
  2. यह सरकार द्वारा सत्ता के दुरुपयोग पर अंकुश लगाता है।
  3. यह सरकार के विभिन्न अंगों के बीच समन्वय स्थापित करता है।
  4. यह नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान की अद्वितीय विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भारत के संविधान की अद्वितीय विशेषताएँ –

  1. भारत का संविधान एकात्मक और संघात्मक दोनों का मिश्रण है।
  2. भारत के संविधान में यद्यपि शासन को अपनाया गया है, परंतु इसमें अध्यक्षात्मक शासन के भी कुछ तत्त्व पाये जाते हैं।
  3. भारत एक संघात्मक राज्य है परंतु यहाँ इकहरी नागरिकता है।
  4. भारत के संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार एवं मूल स्वतंत्रताएँ प्रदान की गई हैं परंतु राष्ट्रीय हित में उन पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। आपातस्थिति में उन्हें राष्ट्रपति द्वारा निलम्बित किया जा सकता है।
  5. भारत का संविधान भारतीय जनता द्वारा निर्मित है। एक संविधान सभा का निर्माण किया गया जो प्रान्तीय विधान सभाओं द्वारा परोक्ष रूप से निर्वाचित की गयी।
  6. देश की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित है।
  7. भारत को एक गणराज्य घोषित किया गया है।
  8. संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्त्व दिए गए।
  9. संघीय तथा राज्य विधानमण्डलों के अधिनियमों और कार्यपालिका के क्रियाकलापों की न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था है।

प्रश्न 2.
राज्यों के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग पर विचार कीजिए।
उत्तर:
1. राज्यों द्वारा अधिक स्वायत्तता की माँग:
भारत में संघीय व्यवस्था है और संघ तथा राज्यों की शक्तियाँ व अधिकार क्षेत्र बंटे हुए हैं। 1967 तक इन सम्बन्धों के बारे में कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ क्योंकि राज्यों की कांग्रेसी सरकारें केन्द्र की कांग्रेस सरकार के नियंत्रण में रहती थी और चुपचाप केन्द्र के आदेशों का पालन करती थी।

2. राज्यों के लिए अधिक स्वायत्तता की माँग का आरम्भ:
1967 के चुनाव में बहुत से राज्यों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला और गैर-कांग्रेसी सरकारें भी अधिक दिन तक नहीं चल सकी। यह महसूस किया गया कि जब तक केन्द्र सरकार अधिक शक्तिशाली है वह किसी अन्य दल की सरकार को राज्य में सहन नहीं कर सकेगी।

इसलिए केन्द्र-राज्य सम्बन्धों पर पुनर्विचार और राज्यों की अधिक स्वायत्तता की माँग शुरू हुई। इसी संदर्भ में कुछ ऐसी माँगें उभर कर आई जो राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए खतरा बन सकती है। 1976 में तमिलनाडु में द्रमुक पार्टी सत्ता में आई तो उसने संघीय व्यवस्था के पुनरावलोकन के लिए उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश पी.वी. राजमन्नार की अध्यक्षता में एक, समिति का गठन किया। 1973 में पंजाब में अकाली दल ने इस संबंध में आनन्दपुर साहब प्रस्ताव पास किया।

1977 में भारत के साम्यवादी दल ने पश्चिम बंगाल की सरकार से केन्द्र-राज्य सम्बन्धों पर एक माँगपत्र पेश किया। 1983 में कर्नाटक सरकार ने इस विषय पर एक श्वेतपत्र जारी किया और आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पांडिचेरी के मुख्यमंत्रियों ने बंगलौर सम्मेलन में उस पर विचार किया। इसी वर्ष श्रीनगर में 16 गैर कांग्रेसी दलों की बैठक हुई जिसमें इस विषय का 31 सूत्री प्रस्ताव पास किया गया। इन सभी बातों को देखते हुए 1985 में सरकारिया आयोग की नियुक्ति की गई। 1988 में इसकी रिपोर्ट आई। यह बात सत्य है कि केन्द्र को शक्तिशाली होना चाहिए परंतु राज्यों को स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मूल कर्तव्यों से क्या अभिप्राय है? भारतीय नागरिकों के मूल कर्त्तव्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1950 में लागू किए गए भारतीय संविधान में नागरिकों के केवल अधिकारों का ही उल्लेख किया गया था परंतु 42 वें संविधान संशोधन 1976 में संविधान के भाग 4 के बाद भाग 4 (क) जोड़ा गया जिसमें दस मूल कर्त्तव्यों की व्यवस्था की गई। सन् 2002 में अभिभावकों के लिए 6 से 14 वर्ष के अपने बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करने का कर्तव्य जोड़ा गया तो अब नागरिकों के निम्नलिखित 11 कर्त्तव्य हैं –

  1. संविधान का पालन तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान अर्थात् प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदशों, संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करे।
  2. राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों का हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे।
  3. वह भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण बनाए रखे।
  4. देश की रक्षा करे और आह्वान पर राष्ट्र की सेवा करे।
  5. भारत के सभी भागों में समरसता और समान भाईचारे की भावना का विकास करे। ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हों।
  6. हमारी समन्वित संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्त्व समझे और संरक्षण करे।
  7. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखे व हिंसा से दूर रहे।
  8. व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत् प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रगति और उपलब्धि की नवीन ऊँचाइयों को छू सके।
  9. प्राकृतिक पर्यावरण जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव भी हैं, की रक्षा करे और उनका संवर्धन करे तथा प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव रखे।
  10. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे।
  11. 86 वें संशोधन (2002) द्वारा अनुच्छेद 51 (क) में संशोधन करके खण्ड (न) के बाद खंण्ड (ट) जोड़ा गया जिसके अनुसार प्रारम्भिक शिक्षा को सर्वव्यापी बनाने के उद्देश्य से अभिभावकों के लिए भी यह कर्तव्य निर्धारित किया गया कि 6 से 14 वर्ष के अपने बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करे।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान में दिए गए राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों की समालोचना कीजिए। संवैधानिक दृष्टिकोण से उनका महत्त्व बताइए।
उत्तर:
भारत के संविधान में अनुच्छेद 38 से 51 तक राज्य के नीति निर्देशक तत्त्व दिए गए हैं। इनमें आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी निर्देशक तत्त्व, सामाजिक हित सम्बन्धी निर्देशक तत्त्व, न्याय शिक्षा और प्रजातंत्र सम्बन्धी निर्देशक तत्त्व, सामाजिक स्मारकों की सुरक्षा सम्बन्धी तत्त्व तथा अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा सम्बन्धी तत्त्व दिए गए हैं।

अनुच्छेद 38:
राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा।

अनुच्छेद 39:
समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता।

अनुच्छेद 40:
ग्राम पंचायतों का गठन।

अनुच्छेद 41:
कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार।

अनुच्छेद 42:
काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता का उपलब्ध।

अनुच्छेद 43:
कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी।

अनुच्छेद 44:
नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता।

अनुच्छेद 45:
बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध।

अनुच्छेद 46:
अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी हितों की अभिवृद्धि।

अनुच्छेद 47:
पोषाहार स्तर और जीवनस्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार का गठन।

अनुच्छेद 48:
कृषि और पशुपालन का संगठन।

अनुच्छेद 48:
(क) यवःण का संरक्षण।

अनुच्छेद 49:
राष्ट्रीय महत्त्व के स्मरकों का संरक्षण।

अनुच्छेद 50:
कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण

अनुच्छेद 51:
अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि।

जिस समय संविधान का निर्माण हो रहा था तो निर्देशक तत्त्वों की बड़ी आलोचना हुई। अनेक विद्वानों ने इनकी आलोचना इस प्रकार से की –

  1. संविधान ने एक ओर तो राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों को देश के शासन में मूलभूत माना है, किन्तु साथ ही वे वैधानिक शक्ति प्राप्त या न्याय योग्य नहीं हैं अर्थात् न्यायालय इनको लागू नहीं करा सकते।
  2. निर्देशक तत्त्व काल्पनिक आदर्श हैं। इन्हें क्रियान्वित कराना बहुत दूर की बात है।
  3. एक सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य में इस प्रकार के आदेशों का कोई औचित्य नहीं।
  4. संवैधानिक विधिवेत्ताओं ने आशंका व्यक्त की है कि ये तत्त्व संवैधानिक द्वन्द्व और गतिरोध के कारण भी बन सकते हैं।
  5. नीति निर्देशक तत्त्व किसी निर्धारित या संगतिपूर्ण दर्शन पर आधारित नहीं हैं।

नीति निर्देशक तत्त्वों का महत्त्व-यद्यपि नीति निर्देशक तत्त्वों की आलोचना की गयी है परंतु इसका तात्पर्य यह नहीं कि ये महत्त्वहीन हैं। वास्तव में राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों का बड़ा महत्त्व है –

  1. नीति निर्देशक तत्त्वों के पीछे जनमत की शक्ति होती है। जनता के प्रति उत्तरदायी सरकार इन तत्त्वों की उपेक्षा नहीं कर सकती।
  2. यदि निर्देशक तत्त्वों को केवल नैतिक धारणाएँ ही मान लिया जाए तो इस रूप में भी इनका अपार महत्त्व है जैसे कि ब्रिटेन में मैगनाकार्टा, फ्रांस में मानवीय तथा मानसिक अधिकारों की घोषणा तथा अमरीकी संविधान की प्रस्तावना को कोई वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है, फिर भी इन देशों के इतिहास पर इनका प्रभाव पड़ा है।
  3. इसी प्रकार उचित रूप में यह आशा की जा सकती है कि ये निर्देशक तत्त्व भारतीय शासन की नीति” की निर्देशित और प्रभावित करेंगे।
  4. नीति निर्देशक तत्त्वों द्वारा जनता को शासन की सफलता और असफलता की जाँच करने का मापदण्ड भी प्रदान किया जाता है।
  5. नीति निर्देशक तत्त्व देश के सामाजिक व आर्थिक क्रांति के साधन भी हैं।
  6. एम. सी. सीतलबाड़ के शब्दों में “राज्य नीति के इन मूलभूत सिद्धांतों का वैधानिक दर्जा प्राप्त न होते हुए भी उनके द्वारा न्यायालयों के लिए उपयोगी प्रकाश स्तम्भ का कार्य किया जाता है।”
  7. निर्देशक तत्त्व इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं कि इनमें गाँधीवाद के आदर्शों को स्थान दिया गया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वैधानिक शक्ति न होते हुए भी राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों का अपना महत्त्व और उपयोगिता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ‘मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता” घोषणा को कब स्वीकार किया गया?
(क) 10 दिसम्बर, 1950 को
(ख) 10 दिसम्बर, 1948 को
(ग) 10 दिसम्बर, 1947 को
(घ) 10 दिसम्बर, 1951
उत्तर:
(ख) 10 दिसम्बर, 1948 को

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना कब हुई?
(क) 24 अक्टूबर, 1946 में
(ख) 24 अक्टूबर, 1945 में
(ग) 30 अक्टूबर, 1945 में
(घ) 30 अक्टूबर, 1948 में
उत्तर:
(ख) 24 अक्टूबर, 1945 में

प्रश्न 3.
राज्यपाल को वर्तमान में वेतन दिया जाता है –
(क) 80,000 रुपये प्रतिमाह
(ख) 90,000 रुपये प्रतिमाह
(ग) 1,100,00 रुपये प्रतिमाह
(घ) 85,000 रुपये प्रतिमाह
उत्तर:
(ग) 1,100,00 रुपये प्रतिमाह

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 2 कविता की परख

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 2 कविता की परख (रामचंद्र शुक्ल)

 

कविता की परख पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

Kavita Ki Parakh Question Answer Bihar Board प्रश्न 1.
कविता के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर-
लेखक के अनुसार कविता का उद्देश्य पाठक के हृदय को प्रभावित करना होता है। इससे उसके भीतर दया, प्रेम, करुणा, आनंद, आश्चर्य आदि मानवीय भावों का संचार होता है। जिस रचना में प्रभावोत्पादकता न हो, वह और चाहे कुछ भी हो, कविता नहीं हो सकती।

Kavita Ki Parakh Bihar Board प्रश्न 2.
कल्पना किसे कहते हैं? एक कवि के लिए कल्पना का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
जिस मानसिक शक्ति के सहारे कवि कविता में भावोदपीन हेतु तत्संबंधी रूप एवं व्यापार का योजना करते हैं तथा पाठक उसे अपने मन में ग्रहण करते हैं, उसे’ कल्पना कहते हैं। एक कवि के लिए कल्पना का अत्याधिक महत्त्व है। बिना कल्पना शक्ति के कोई व्यक्ति कवि नहीं हो सकता। क्योंकि कल्पना के बल पर ही कवि रूप व्यापारादि की चित्रवत् योजना करता है। इसके अभाव में कविता में प्रभावोत्पादकता नहीं आ सकती, जो कवि का लक्ष्य होता है। अतएव, एक कवि के लिए कल्पना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

Bihar Board Class 11th Hindi Book  प्रश्न 3.
उपमा क्या है? कविता में उपमा का प्रयोग क्यों किया जाता है। पाठ के आधार पर उत्तर दें।
उत्तर-
उपमा का अर्थ होता है-उप अर्थात समीप और मा अर्थात् मापन। तात्पर्य यह कि दो भिन्न पदार्थों में समता दिखाना ही उपमा है। यह समता रूप, गुण अथवा प्रभाव के आधार पर दिखायी जाती है। जैसे-मुख चाँद के समान सुंदन है; शिवाजी शेर की तरह वीर थे इत्यादि।

काव्यशास्त्र में ‘उपमा’ एक अर्थालंकार है, जो अलंकारों में शिरोल माना जाता है।

कविता में उपमा का प्रयोग वर्ण्य-विषय से संबंधित भावना को तीव्र करने के लिए किया जाता है। जैसे-मुख सौदर्य की भावना उत्पन्न करने के लिए मुख के साथ एक अन्य सुंदर पदार्थ चाँद को रख देने से सौंदर्य की भावना उदीप्त, जागृत एवं अत्यधिक तीव्र हो जाती है।

कविता की परख Bihar Board प्रश्न 4.
आँख के लिए मीन, खंजन और कमल की उपमाएँ दी जाती हैं। इनमें क्या-क्या समानताएँ हैं?
उत्तर-
आँख के लिए कवियों द्वारा प्राय: मीन, खंजन और कमल की उपमाएँ दी जाती हैं। इनमें परस्पर लघुता, सुंदरता, मोहकता, चंचलता, कोमलता, प्रभावोत्पादकता आदि की समानताएँ हैं।

Class 11 Hindi Book Bihar Board प्रश्न 5.
‘मानों ऊँट की पीठ पर घंटा रखा है’-इस उक्ति के द्वारा लेखक ने क्या कहना चाहा है?
उत्तर-
‘कविता की परख’ शीर्षक निबंध में काव्यमर्मज्ञ आचार्य शुक्ल ने कविता में उपमा-नियोजन के औचित्य, महत्त्व तथा उसकी उपयुक्तता-अनुपयुक्ता पर बड़े सुविचारित रूप में प्रकाश डाला है। प्रश्नोद्धृत वाक्य इसी प्रसंग में उल्लिखित है।

लेखक के मतानुसार, उपमा की सार्थकता वर्ण्य-वस्तु के अनुरूप भावनाओं को तीव्रता प्रदान करने में है। इसके लिए कवियों को आकर-प्रकार की अपेक्षा प्रभाव-साम्य पर अधिक ध्यान देना चाहिए। ऐसी उपमाएँ, जिनसे कवि-अभिप्रेत भावनाएँ उदीप्त एवं तीव्र नहीं होतीं, उपेक्षणीय हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘उठे हुए बादलों के ऊपर होते हुए पूर्ण चंद्रमा’ जैसे रमणीय दृश्य के लिए ‘मानो ऊँट की पीठ पर घंटा रखा है’ जैसे अनुचित उपमा का उदाहरण देकर इसकी व्यर्थता बताई है। अतः कवि को इस प्रकार की केवल कुतूहलवर्द्धक उपमा-योजना से बचते हुए वास्तव में भावनाओं की उद्दीप्ति में सहायक उपयुक्त उपमा देनी चाहिए।

कविता क्या है-निबंध का सारांश Bihar Board प्रश्न 6.
“जो जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता वचन मनतेउँ नहिं ओहू।। -इस उदाहरण के द्वारा लेखक ने क्या कहना चाहा है?
उत्तर-
हिन्दी के पृष्ठ समीक्षक आचार्य रामचंद्र शुक्ल का स्पष्ट मत है कि एक सच्चा कवि मानव-मन का पारखी होता है। उसे यह पूरा अनुभव रहा है कि स्थिति विशेष में मनुष्य कैसा कथन करता है। इसी संदर्भ में उन्होंने अपने आदर्श कवि गोस्वामी तुलसीदास की उपर्युक्त चौपाई को उदाहृत किया है। यह वस्तुतः लक्ष्मण को शक्तिबाण लगने पर राम के शोकसंतप्त हृदय का सहज उद्गार है, जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करनी चाहिए। इसके विपरीत पितृ-वचन के परिप्रेक्ष्य में राम के चरित्र में दोषारोपण करना दरअसल अपीन हृदयहीनता और भावनाशून्यता प्रदर्शित करना है।

Bihar Board Hindi Book Class 11 Pdf Download प्रश्न 7.
‘वाणी के द्वारा मनुष्य के हृदय के भावों की पूर्ण रूप से व्यंजना हो जाती है।’ इस कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर-
उपयुक्त कथन हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘दिगंत, भाग-1 में संकलित ‘कविता की परख’ शीर्षक निबंध से उद्धृत है। इसके लेखक हिन्दी के महान् विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं।

लेखक के उपर्युक्त कथन का आशय यह है कि वाणे ही वह साधन है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने हृदयगत भावों की पूर्णरूपेण व्यंजना करता है। वास्तव में वाणी की शक्ति के कारण मनुष्य अन्य प्राणियों से भिन्न और विशिष्ट है। जिन भावों अथवा विचारों की अभिव्यक्ति में अन्य साधनं, तथा यथा-संकेत, आगिकभाषा आदि असमर्थ रहते हैं, वे भी वाणी के माध्यम से सहजतापूर्वक पूरी स्पष्टता के साथ व्यक्त हो जाते हैं। कदाचित् इसी से कविगण अपनी कविताओं में प्रत्यक्ष-कथन के अतिरिक्त पात्र-कथन का प्रयोग करते हैं। इस रूप में पात्र विशेष के हृदय गतं भावों अथवा विचारों के प्रकटीकरण में पूर्णता और स्पष्टता आ जाती है।

कविता की परख भाषा की बात

Bihar Board 11th Hindi Book Pdf प्रश्न 1.
निम्नलिखति विशेष्यों के लिए उपयुक्त विशेषण दें:
उत्तर-
Bihar Board 11th Hindi Book Pdf

Bihar Board Class 11 Hindi Book Solution प्रश्न 2.
‘ता’ प्रत्यय से इस पाठ में कई शब्द हैं, जेसे-निपुणता, गंभीरता आदि। ऐसे शब्दों को चुनकर लिखें।
उत्तर-
‘ता’ प्रत्यय युक्त शब्दों के उदाहरण-सुन्दरता, कोमलता, मधुरता, उग्रता, कठोरता, भीषणता, वीरता, समानता, मनोहरता, प्रफुल्लता, स्वच्छता इत्यादि।

Bihar Board Class 11 Hindi Book प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों से ‘इक’ प्रत्यय लगाकर शब्द बनाएँ
उत्तर-
Bihar Board Class 11 Hindi Book

कविता क्या है निबंध का सारांश Bihar Board प्रश्न 4.
पाठ से द्वंद्व समास के उदाहरण चुनें।
उत्तर-
द्वंद्व समास-जिस समास में दोनों पद प्रधान रहते हैं, उसे द्वन्द्व समास कहते हैं। जैसे राधाकृष्ण, माता-पिता, भाई-बहन, वस्तु-व्यापर, बड़ा-छोटा, लोटा-डोरी, रात-दिन सर्दी-गमी, नून-तेल, राजा-रानी इत्यादि।

Class 11th Hindi Book Bihar Board प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों से विशेषण बनाएँ :
उत्तर-
Class 11th Hindi Book Bihar Board

Bihar Board Hindi Book Class 11 Pdf प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द लिखें:
उत्तर-
Bihar Board Hindi Book Class 11 Pdf

बिहार बोर्ड हिंदी बुक Class 11  प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों के संज्ञा रूप लिखें:
उत्तर-
बिहार बोर्ड हिंदी बुक Class 11

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

कविता की परख लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित निबंध ‘कविता की परख’ का संक्षेप में परिचय दीजिए।
उत्तर-
‘कविता की परख’ हिन्दी साहित्य के आलोचक, इतिहासकार, निबंधकार और लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचनात्मक निबंध है। हिन्दी साहित्य चिंतक आचार्य शुक्ल ने कविता को परखने की बुनियादी शिक्षा देते हुए कहा है कि कविता वह साधना हे जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध की रक्षा और निर्वाह होता है।

कविता के द्वारा हम संसार के सुख-दु:ख, आनन्द और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव करने में अभ्यस्त होते हैं जिससे हृदय की स्तब्धता हटती है और मनुष्यता आती है। कविता सृष्टि-सौन्दर्य का अनुभव कराती है और मनुष्य को सुन्दर वस्तुओं में अनुरक्त और कुत्सित वस्तुओं से विरक्त कराती है।

आचार्य शुक्ल का प्रस्तुत निबंध किताबों से उठकर हमारे जीवन में आश्रय और सहभागिता चाहता है। यह निबंध कविता के सम्बन्ध में लेखक के सारगर्भित ज्ञान का दुर्लभ ज्ञान का दुर्लभ उदाहरण है।

प्रश्न 2.
‘कविता की परख’ की कथावस्तु को संक्षेप में लिखें।
उत्तर-
हिन्दी साहित्य चिंतक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कविता को परखने की बुनियादी शिक्षा देते हुए कहा है कि कविता वह साधना है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध की रक्षा और निर्वाह होता है। कविता के द्वारा हम संसार के सुख-दुःख, आनन्द और क्लेश आदि का यथार्थ रूप से अनुभव करने में अभ्यस्त होते हैं जिससे हृदय की स्तब्ध ता हटती है और मनुष्यता आती है।

कविता-सृष्टि सौन्दर्य का अनुभव कराती है और मनुष्य को सुन्दर वस्तुओं के अनुरक्त और कुत्सित वस्तुओं से विरक्त कराती है। कविता वह साधना है जिसके भीतर प्रेम, हास्य सुख-दुःख, आनन्द और क्लेश आदि यथार्थ रूप में चित्रित होता है। जिस कविता में प्रेम, आनन्द, करुणा आदि भावों का समावेश न हो, वह कविता नहीं कहला सकती। कविता के लिए रूप और व्यापार हमारे मन में साक्षात करता है, जो योजना हम मन में धारण करते हैं, कल्पना कहलाती है। कल्पना शक्ति के बिना कविता अधूरी होती है। कविता में सौन्दर्य, शृंगार, दारूण दृश्य आदि भाव जगाना आवश्यक है। राम के वन-गमन का वर्णन अथवा श्रीकृष्ण के अंग-प्रत्यंग के वर्णन में करुणा और सौन्दर्य का भाव परिलक्षित होता है।

कविता के लिए कवि उपमा अलंकार का भी सहारा लिया करते हैं। जैसे-मुख को चन्द्रमा या कमल के समान, नेत्रों को मीन, खंजन, कमल आदि के समान प्रतापी या तेजस्वी की तुलना सूर्य के समान; कायर को श्रृगाल के समान, वीर और पराक्रमी की सिंह से तुलना करते हैं। वास्तव में इसका उद्देश्य वर्णित वस्तु की सुंदरता, कोमलता, मधुरता या उग्रता, कठोरता, भीषणता, वीरता, कायरता इत्यादि की भावना को तीव्र करना है न कि किसी वस्तु का परिज्ञान कराना। जैसे-जिसने हारमोनियम न देखा है। उसने कहना “वह सन्दूक के समान होता है।” ऐसी समानता उपमा के अन्तर्गत नहीं आती है। उपमा सुन्दर ओर सटीक हो इसके लिए यह आवश्यक है कि वर्णित वस्तु के सम्बन्ध में वही भावना अधिक परिमाण में हो। भद्दी उपमा से सौन्दर्य की भावना नही जगती। जैसे कोई कवि आँख की उपमा बादाम या आम की फाँक से करता है तो सौन्दर्य की भावना नहीं जगती, लेकिन ठीक इसके विलोम आँख की उपमा कमल-दल से करने पर मनोहरता, प्रफुल्लता, कोमलता आदि की भावना स्वतः परिलक्षित होती है।।

कविता, में प्रेम, शोक, करुण, आश्चर्य, भय, उत्साह इत्यादि भावों को कवि पात्रों के माध्यम से कहलवाते है ताकि भावों की पूर्ण रूप से व्यंजना हो सके। वाणी द्वारा मनुष्य के क्रोध आश्चर्य और उत्साह के भावों की कवियों को गहरी परख होती है।

कवि की निपुणता पात्र के मुख से भाव की व्यंजना कराने से ही परिलक्षित होता है। रामचरित मानस में भी राम लक्ष्मण दोनों क्रोध प्रकट करते हैं। राम संयम और गंभीरता के भाव जबकि लक्ष्मण अधीरता और उग्रता के साथ। उत्साह आदि भावों में यही बात समाहित है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का प्रस्तुत निबंध पुस्तकों से उठकर हमारे जीवन में आश्रय और सहभागिता चाहता है।

कविता की परख अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कविता की परख किस प्रकार निबंध है?
उत्तर-
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित कविता की परख विचारात्मक निबंध है।

प्रश्न 2.
कविता की परख में किन बातों का विवेचन हुआ है?
उत्तर-
कविता की परख नामक निबंध में इन बातों का विवेचन हुआ है-
(क) कविता का उद्देश्य
(ख) कल्पना का महत्त्व
(ग) भाव की अभिव्यक्ति संबंधी तत्व इत्यादि।

प्रश्न 3.
उपयुक्त उपमान का प्रयोग करना क्यों अनिवार्य होता है?
उत्तर-
उपयुक्त उपमान का प्रयोग करना विभिन्न करणों से अनिवार्य होता है-
(क) कविता के उद्देश्य की अनुरूपता को दर्शाना
(ख) कविता के प्रभाव की समानता को दर्शाना इत्यादि।

प्रश्न 4.
उपमा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
किसी व्यक्ति या वस्तु जिसका वर्णन करना हो उसकी सुन्दरता, कोमलता, मधुरता, उग्रता, कठोरता, वीरता तथा कायरता इत्यादि की भावना की तुलना उस वस्तु के समान कुछ अन्य वस्तुओं से करना ही उपमा कहलाता है।

प्रश्न 5.
कल्पना क्या है?
उत्तर-
आनन्द, करुण, हास्य, आश्चर्य तथा प्रेम इत्यादि अनेक भावों का संचार करने वाले रूप और व्यवहार का सजीव चित्रण काल्पनिक रूप से करना ही कल्पना कहलाता है।

प्रश्न 6.
कविता की परख नामक निबंध के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
कविता की परख नामक निबंध के लेखक आचार्य रामचन्द्र शुल्क है।

कविता की परख वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग, या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
‘कविता का परख’ के लेखक हैं
(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ग) सत्यजीत राय
(घ) कुमार गन्धर्व
उत्तर-
(क)

प्रश्न 2.
‘भ्रमरगीत सार’ किसकी रचना है?
(क) सत्यजीत राय
(ख) सूरदास
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) कृष्ण कुमार
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 3.
‘कविता की परख’ का सम्पादन किसने किया?
(क) हरिशंकर परसाई
(ख) नामवर सिंह
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) इनमें से काई
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 4.
कविता का उद्देश्य क्या होता है?
(क) हृदय पर प्रभाव डालना
(ख) मन को उद्विग्न करना
(ग) घृणा उत्पन्न करना
(घ) इनमें से कोई
उत्तर-
(क)

प्रश्न 5.
‘उपमा’ क्या है?
(क) जिससे उपमा दी जाय
(ख) एक प्रकार की मिठाई
(ग) दो भिन्न पदार्थों में सादृश्य की स्थापना
(घ) इसमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 6.
‘कविता की परख’ किसके लिए लिखा गया है?
(क) प्रेमियों के लिए
(ख) कवियों के लिए
(ग) हाई स्कूल के छात्र के लिए
(घ) काव्यालोचकों के लिए।
उत्तर-
(ग)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।
1……………. ने श्रीकृष्ण के अंग-प्रत्यंग का वर्णन किया।
2. किन्तु सुन्दर वस्तु को देखकर हम …………. हो जाते हैं
3. तुलसीदासजी की गीतावली में …………….. का सुन्दर वर्णन।
4. वाणी के द्वारा मनुष्य के हृदय के भावों की पूर्ण रूप से …………….. हो जाती है।
5.शोक के वेग में मनुष्य थोड़ी देर के लिए ……… और …………… भूल जाता है।
उत्तर-
1. सूरदासजी
2. प्रफुल्ल
3. चित्रकूट
4. व्यंजना
5. बुद्धि, विवेक।

कविता की परख लेखक परिचय रामचन्द्र शुक्ल (1884-1941)

पं. रामचंद्र शुक्ल का जन्म 1884 ई. को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिलान्तर्गत ‘अगोना’ नामक ग्राम में हुआ था। 1888 ई. में वे अपने पिता पं. चंद्रबली शुक्ल के साथ राठ जिला हमीरपुर गये तथा वहीं पर विद्याध्ययन प्रारंभ किया। सन् 1892 ई. में उनके पिता की नियुक्ति मिर्जापुर में सदर कानूनगो के रूप में हुई और वे पिता के साथ मिर्जापुर आ गये। 1901 ई. में लंदन मिशन स्कूल, मिर्जापुर में स्कूल फाइनल की परीक्षोत्तीर्णता के पश्चात् कायस्थ पाठशाला, प्रयाग में इंटर में उनका नामांकन हुआ, पर पढ़ाई अधूरी रही। फिर भी उन्होंने स्वाध्याय द्वारा प्रभूत ज्ञान अर्जित किया, जिसका उपयोग वे आगे चलकर अपने लेखन में जमकर कर सके।

आरंभ में शुक्लजी मिर्जापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग टीचर रहें। फिर 1908 ई. में ‘काशी नगरी प्रचारिणी सभा’ की परियोजना-‘हिन्दी शब्द सागर’ के सहायक संपादक बने। कुछ दिनों तक ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का संपादन करने के बाद वे हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी में हिन्दी के अध्यापक हुए। 1937 ई. में वे वहाँ के हिन्दी विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए तथा उसी पद पर रहते हुए सन् 1941 में उनकी मृत्यु हो गयी।

आचार्य शुक्ल का रचना-संसार अत्यंत विस्तृत एवं व्यापक है। हिन्दी का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जिस पर उन्होंने न लिखा हो। उनकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं-मधुस्रोत (कविता संग्रह), गोस्वामी तुलसीदास, जायसी ग्रंथावली की भूमिका, भ्रमरगीतसार, रसमीमांसा, त्रिवेणी (पाठालोचन और आलोचना), हिन्दी साहित्य का इतिहास (साहित्येतिहास), श्रीराधाकृष्णदास की जीवनी (जीवनी), चिन्तामणि, भाग 1, 2 एवं 3 (निबंध-संग्रह) का विश्वप्रपंच (लबी भूमिका के साथ अनुवाद) कल्पना का आनंद, शशांक, बुद्धचरित (अनुवाद) इत्यादि।

इन रचनाओं के आधार पर शुक्लजी एक श्रेष्ठ एवं समर्थ साहित्यकार के रूप में स्थापित होते हैं। उनकी भाषा-शैली सजीव, प्रौढ़ एवं भावनात्मक है। संस्कृत की तत्सम शब्दावली के साथ-साथ अंग्रजी, अरबी, फारसी आदि के शब्दों के लोक-प्रचलित मुहावरों के प्रयोग से उनकी भाषा में विशेष प्रवाह और प्रभाव का संगम हुआ। वस्तुत: उनकी शैली में उनका समग्र व्यक्तित्व प्रतिविबित हुआ है।

स्पष्टतया आचार्य शुक्ल ने यद्यपि हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में, रचनाएँ की और उनमें अपनी विलक्षण प्रतिभा, मौलिक चिन्तन एवं नवीन उद्भावना शक्ति दिखायी है, तथापि उनका विशेष महत्त्व साहित्येतिहासकार, निबंधकार और आलोचक के रूप में है। वस्तुतः इन क्षेत्रों में उनका अवदान युगप्रवर्तक का है, अप्रतिम एवं अप्रतिस्पर्धी। अतएव देवीशंकर अवस्थी का यह कथन सर्वथा समीचीन है कि “साहित्यिक इतिहास लेखक के रूप में उनका स्थान हिन्दी में अत्यंत गौरवपूर्ण है, निबंधकार के रूप में वे किसी भी भाषा के लिए गर्व के विषय हो सकते हैं तथा समीक्षक के रूप में तो वे हिन्दी में अभी तक अप्रतिम हैं।”

कविता की परख पाठ का सारांश

हिन्दी के स्वनामधन्य समालोचक, सर्वश्रेष्ठ साहित्येतिहासकार एवं अप्रतिम निबधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल विरचित ‘कविता की परख’ एक उत्तम निबंध है। इसमें विद्वान लेखक के द्वारा कविता की परख अर्थात् पहचान अथवा जाँच से संबंधित प्रायः सभी प्रमुख साधनों की चर्चा अत्यंत परिष्कृत एवं परिमार्जित भाषा में की गई है। इस प्रकार यह एक विचारप्रधान निबंध है, जिससे कविता को देखने, समझने एवं परखने की एक नवीन दृष्टि विकसित होती है।

प्रस्तुत निबंध में लेखक ने सर्वप्रथम कविता के उद्देश्य पर प्रकाश डालत हुए यह स्थापना की है कि उनका उद्देश्य मनुष्य के हृदय पर प्रभाव डालना होता है, ताकि उसके भीतर दया, करुणा, प्रेम, आनंद, आश्चर्य, वीरता आदि मानवीय भावों का संचार हो सके। इसी आधार पर ज्ञान के अन्य विषयों से कविता की पृथक् सत्ता प्रमाणित होती है। इसी क्रम में लेखक ने कहा है कि प्रभाव पैदा करने के लिए कविगण विभिन्न भावों से संबंधित रूप और व्यापार की योजना करते है। ऐसा योजना के कल्पना-शक्ति के सहारे करते हैं। अतः काव्य में कल्पना का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है।

कवि जिस प्रकार का भाव पाठक के मन में जगाना चाहते है, उसी के रूप और व्यापार का वर्णन करते हैं। इस क्रम कवि लोग उपमादि अलंकारों की सहायता लेते हैं। उपमा में दो भिन्न पदार्थों के बीच रूप, गुण अथवा प्रभाव की समानता दिखाई जाती है, किन्तु इसमें प्रभाव-साम्य ही उत्तम होताहै। इसी से कवि की निरीक्षण-क्षमता का पता चलता है। पुनः कवि लोग अपने काव्यों में प्रेम, शोक, घृणा, उत्साह इत्यादि विविध भावों को पात्रों के कथन के माध्यम से भी प्रकट करते हैं। इसके लिए लेखक के अनुसार कवि में पात्रगत एवं पिरस्थितिगत निपुणता आवश्यक है।

इस प्रकार इस विचार-प्रधान निबंध में आचार्य शुक्ल ने कविता को परखने के आधारभूत साधनों का विवेचन किया है। इस गंभीर विवेचन को भी उन्होंने उदाहरणों के द्वारा सरल एवं सुबोध बना दिया है। उसके द्वारा व्यक्त विचार प्रायः सर्वस्वीकार्य हैं और इसी से उनका महत्त्व कभी भी न्यून होने वाला नहीं है।

कविता की परख कठिन शब्दों का अर्थ

उत्साह-खुशी, उमंग। आर्द्र-भीगा हुआ। करुणा-दया, वेदना। रमणीय-सुंदर। व्यापार-क्रिया, गतिविधि। समक्ष-सामने। दारुण-असहनीय। विकराल-भयानक। आह्लादित-प्रसन्न। शृगाल-सियार। प्रतापी-प्रभावशाली, पराक्रमी। कांति-चमक। निपुणता-दक्षता। व्यंजना-व्यक्त या प्रकट करना। उग्र-उत्तेजित। खंजन-चंचल आँखों वाला विशिष्ट पक्षी। अधीरत-बेचैनी। कुतूहल-अचरज, विस्मय। परिज्ञान-विशिष्ट ज्ञान। दूषण-दोष, कलंक। बोध-समझ। परिमाण-मात्रा। प्रफुल्ल-प्रसन्न।

महत्त्वपूर्ण पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या

1. किसी सुंदर वस्तु को देखकर हम प्रफुल्ल हो जाते हैं, किसी अद्भूत वस्तु को देखकर आश्चर्यमग्न हो जाते हैं, किसी दुख के दारुण दृश्य को देखकर करुण से भर जाते हैं। यही बात कविता में होती है।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा कविता की परख से ली गयी है। इन पंक्तियों में लेखक ने यह बतलाया है कि जब हम किसी सुंदर वस्तु को देखकर प्रसन्न हो जाते हैं और किसी अद्भूत वस्तु को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते है तथा किसी दुख के दृश्य को देखकर करुणा से भर जाते हैं। ये सभी बाते कविता को पढ़ने में भी पाठक को आभास होती हैं। कविता में इन बातों का सुन्दर विवेचन किया जाता है।

2. वाणी के द्वारा मनुष्य के हृदय के भावों की पूर्ण रूप से व्यंजना हो सकती है।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्ति आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित कविता की परख नामक पाठ से ली गयी है.। इस पंक्ति में लेखक ने यह बतलाया है कि मनुष्य की बोली से उसके दिल के गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट भावों की जानकारी प्राप्त होती है। यही कारण है कि मनुष्य के मुँह से प्रेम करुणा में मधुर वचन निकलते है, जबकि क्रोध, शोक में अच्छे वचन नहीं निकलते हैं। कवि को मनुष्य की बोली का अनुभव पूर्ण रूप से रहता है। यही कारण है कि कवि जिस प्रकार की कविता की रचना करता है उसी से संबंधित शब्दों का सटीक प्रयोग करता है।

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 3 A Snake in the Grass

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Bihar Board Class 11 English A Snake in the Grass Textual Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions :

A Snake In The Grass Questions Answers Bihar Board Class 11 Question 1.
Have you ever seen a snake in your house/village ?
Answer:
Yes, I have seen a snake in our village

A Snake In The Grass Question Answers Bihar Board Class 11 Question 2.
What was your reaction when you saw it ?
Answer:
I was scared.

A Snake In The Grass Answers Bihar Board Class 11 Question 3.
How did other people of your family or village react to it ?
Answer:
Some of them stood still. Others said that it must be killed.

A Snake In The Grass Story Question Answer Bihar Board Class 11 Question 4.
Did you kill the snake ? Why ?
Answer:
I did not kill it But another mt n killed it. He said it was dangerous and might bite someone.

B. 1. Answer the following questions briefly :

A Snake In The Grass Story Question Answer Pdf Bihar Board Class 11 Question 1.
Why did the cyclist ring the bell ?
Answer:
The cyclist had seen a cobra getting into a bungalow. He rang the bell to warn the inmates to be careful.

Class 11 English Chapter 3 Question Answer Bihar Board Question 2.
Why did Dasa say, ‘There is no cobra’ ?
Answer:
Dasa said there was no snake because he did not like to be disturbed in his sleep. .

A Snake In The Grass Meaning Bihar Board Class 11 Question 3.
What happens when someone wakes you up and asks you to do something ?
Answer:
I feel irritated.

English Chapter 3 Class 11 Question Answers Bihar Board Question 4.
What fault did the people find with Dasa ?
Answer:
People said that Dasa was the laziest servant. He did not keep the surroundings tidy.

A Snake In The Grass Story Bihar Board Class 11 Question 5.
Do you find fault with the person who refuses to do what you want him to do ?
Answer:
Yes, I do.

Class 11 English Chapter 3 Bihar Board Question 6.
What was Dasa’s defence ?
Answer:
Dasa said he had been asking for a grasscutter for months but he did not get any. So he could not cut the grass.

A Snake Charmer’s Story Question Answer Bihar Board Question 7.
What does ‘with cynical air’ mean ?
Answer:
Here this means that Dasa was not convinced that there was a cobra in the grass.

A Snake In The Grass Text Book Questions And Answers Bihar Board Question 8.
Why did the college-boy quote statistics ?
Answer:
He wanted to give an authentic proof that the cobra was deadly and it could bite and kill.

A Snake In The Grass Meaning In Hindi Bihar Board Question 9.
What made the mother nearly scream ?
Answer:
The mother was terrified. She was afraid that the cobra was sure to bite someone of her family.

B. 2. Answer the fdllowingquestions briefly :

Question 1.
What made the old beggar happy ?
Answer:
The old beggar was happy because she considered the snake as God Subramanya. She said the householders were fortunate.

Question 2.
What did the beggar woman say ?
Answer:
She asked the householders not to kill the snake. She promised to c send a snake-charmer to catch it.

Question 3.
Why did the snake-charmer look helplessly about ?
Answer:
The snake-charmer looked helplessly about because there was no snake in sight. He said he could catch the snake only if they showed it to him.

Question 4.
Why did they cut down all the plants and grass in the garden ?
Answer:
They cut down all the grass and plans in the garden so that the cobra had no place to hide itself.

Question 5.
Cite instances from the lesson which show the old mother’s superstitious nature ?
Answer:
The mother agreed with the old beggar that the cobra was God Subramanya. She was repentent that she had forgotten all about the promised Abhishekam. She gave a coin to the beggar to get God’s blessings. She also wished she had put some milk in a pot for the Cobra as a religious duty.

Question 6.
Did Dasa, in your opinion, really catch the cobra ?
Answer:
I don’t think Dasa caught the cobra. He just pretended that the snake was in the pot. The cobra was seen coming out of a hole soon after Dasa had left with the pot.

Question 7.
What impression of Dasa do you get from this episode ?
Answer:
Dasa was an easy-going person. He shirked work. But he was quite clever at inventing stories and making excuses.

C. 1. Long Answer Questions :

Question 1.
The neighbours who assembled to hear of cobra talk about several things. Make a list of the issues they touch upon. What does the conversation suggest about the people’s reaction when danger strikes ?
Answer:
They talk about the laziness of Dasa.
They talk of scarcity of things during the war.
They talk about black-marketing.
The talk about the danger of snake-bite in the world.

The conversation suggests that when danger strikes, people like to blame someone. They think if Dasa had cut the grass, the cobra would not have come into the garden. Dasa tries to defend himself because he has not been given a grasscutter. Then the discussion shifts to war. They try to defend themselves by saying that they could not buy anything made of iron on account of war.

They then say how some people try to exploit the situation. The blame the merchants for indulging in black marketing and profiteering during scarcity of things. The college-boy gives statistics about number of deaths caused by snake-bite. He makes the danger appear really threatening. The conversation suggests that when danger strikes, people try to blame others. They look for scapegoats.

Question 2.
How do you react when your parents chide you for neglecting your duties?
Answer:
When my parents chide me for neglecting my duty, I feel very bad. I don’t confess that is way fault. Instead, I try to blame it on circumstances or some obstacles that hindered me from doing my duty. I try to blame someone or something.

Question 3.
Read carefully the following utterances of Dasa:
‘There is no cobra’.
‘Where is the snake ?’
‘I have caught him in this.’
‘Don’t call me an idler hereafter.’
What do these utterances tell about Dasa’s character ?
Answer:
These utterances of Dasa show that he was a leisurely man who would not be provoked into doing something. He refused to believe that there was a snake, and when no snake was found, he said triumphantly, “Where is the snake ?” Still he felt that the immates of the house were still afraid that the snake was there. So he thought of a clever plan. He pretended to have caught the snake in a pot. He won the admiration of all. He asserted that he was not an idler.

He proved that he was an intelligent man and could achieve singlehandedly what they all together could not do. His plan had almost succeeded. But the cobra was seen, and luckily it went out of the gate and disappeared. Dasa must have asserted that he had actually caught a snake, and there must have been a couple of them in the garden.

Question 4.
Does the story throw any light on how people faced with sudden danger behave ?
Answer:
It is quite natural to be frightened if any sudden danger falls unexpectedly. This was the situation with the people who were present there. They became panick. In the situation of turmoil they began to charge over the servant dasa. They even made allegations on one-another for their being responsible in inviting danger. They suggested a number of opinions in connection with the danger. The mother became frightened and began to cry in a loud voice. Dasa was not showing any reaction. Inmates with the help of the neighbours cut grass and creepers with sharp knifes and other weapons. They were jointly making effort to clean the compound where the cobra was hidden.

An old beggar woman appeared at the gate of the bungalow who asked for alms. On this the inmates told her to go away as they were busy in searching the cobra. .She advised them not to kill the cobra, as it was God Subramanya. The mother was convinced with the beggar woman’s advise. The beggar promised to send a snake charmer. A snake charmer came to the place but he showed his inability because the cobra disappeared. He told them to inform him when the cobra appeared. Finally the cobra was seen coming out of the hole of compound wall.

Thus the behaviour of the people to see the sudden danger has been traced.

Question 5.
Narrate in brief the people attempt to catch the cobra.
Answer:
Hearing the news of the cobra neighbours gathered on the gate of the bungalow. They began to think any way to catch the cobra. The members of the family were worried. They shook the body of the servant Dasa, who was sleeping in a shed. Feeling disturbed he was annoyed and told that there was no cobra in the compound. The mother of the family child him and told him to catch the cobra before the evening. Everybody began to chide him for his slackness. The neighbours aiso charged him for not keeping the compound clean. He defended himself by saying that he had been asking to buy a grass cutter for a long time.

The inmates and neighbours began to talk about the grass-cutter. They told that the price of grass cutter was very high due to war at that time. The inmates with the help of the neighbours cleaned the grass and bushes with sharp knife and other weapons. They youngest son was a college boy who presented a data of casuality due to snake-bite which was 30,000 every year that means one person in every twenty minutes. The land lady cried out of fear. Meanwhile Dasa appeared there with a sealed water-pot. He put the pot down and told them that he had caught the cobra in the water I pot.

He put the water pot down and narrated the strategy he had employed to catch it. The land lady thanked him for his brave work. He told her that he was I going to hand over the cobra to a snake-charmer who was living nearby. Then the land lady poured some milk in the pot. Dasa walked off with the water pot to hand over it to the snake-charmer. Five minutes after the deprrture of Dasa the youngest son was a cobra coming out a hole in the compound. The cobra moved under the gate and disappeared along a drain.

Thus the story flashes light on the truth how the people made attempt to catch cobra.

Question 6.
Narrate in brief what the snake charmer tells about catching a snake.
Answer:
Hearing the news of cobra people gathered in the compound of the bunglow. They were very much fearful and talking about the way how the cobra would come out. Suddenly a snake charmer appeared. All the people gathered around him they began to request him to catch the cobra. He narrated so many stories of his bravery how he had caught the snake in adventurous way. The people gathered there pointed out the direction where cobra had gone. But the snake charmer showed his inability to catch the snake because the snake had been disappeared. He advised them to inform him and when the cobra appeared. Then only it could be possible to catch the snake.

C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs:

Question a.
Giving milk to snake is a religious duty. Do you agree ? Give reasons in favour of your argument
Answer:
Many people in India consider the cobra as a holy creature. It is associated with Lord Shiva. It is always garlanded around his neck. Some people consider it a pious duty to give milk to a cobra. But I think it is no religious duty. Those very people who worship the cobra are likely to be frightened when they come across one in their homes or in a jungle. Many will think of killing it. In our country and elsewhere snakes are killed at first sight, Of course, some of the snakes are poisonous and can kill a human in no time. Still, we can do a religious duty to them. No doubt we should protect ourselves from snake, but we should not kill them. They a:c part of our ecology and hold an important position in food-chain. They eat rats and frogs. Milk is not their natural food.

Question b.
For every danger or calamity we tend to find a scapegoat. Do you subscribe to this view ? Give examples from the life around you.
Answer:
Answer:
I fully subscribe to the view that for every trouble we tend to find a scapegoat. Whenever something goes wrong and harms us all, we are likely to blame someone weak and defenceless. There have been a number of railway accidents.In most cases it was ascribed to human failure. And the man who failed to do his duty was a poor signal man. In such a big whose failure causes accidents ? But someone has to be blamed to let other go scot-free. If it is not a human being, it is some natural or abstract thing. It may be darkness, sudden rains and storms, or God Himself who is the scapegoat. We are often heard to say, “It was bad luck that caused it,” or “it was an act of God”.

Few have the courage to say, “I am responsible for it.”

(c) Story telling is an effective way of teaching.
Answer:
From time immemorial people have been telling and listening stories. Stories are fascinating, entertaining and informative. Every culture has its own folktales that have come down from generation to generation. Our great teachers realised that teaching something becomes far easier through stories. That is why our purans are full of stories. We know how panchatantra came . into being. A king’s sons were so mischievous that no teacher could teach them. Then a great teacher, Vishnu Dutta, invented a new technique. He told them stories that contained great wisdom. Those stories are still read and enjoyed. One can seldom forget an interesting story and is sure to learn the wisdom contained in it. A good teacher makes his teaching more effective and more interesting by telling stories.

C. 3. Composition :

Question a.
Write an essay in not more than 200 words on how superstitions influences lives in our society.
Answer:
Superstitions Influence our Lives

No matter Which part of the world you tour, you will find the natives nurturing certain beliefs and superstitions and India is no exception in this case. Though the Indian society is fast progressing, there are many people who are still superstitious and have a strong faith in the local beliefs. While some of them are quite hilarious, few are really interesting, as many aspects of life are linked to them.

The standard viewpoint is that most of the Indian beliefs and values have sprung with an objective to protect from evil spirits, but some were based on scientific reasoning. With the passage of time, the reasoning part behind the origin of these cultural beliefs and superstitions got eroded. That is exactly why most of these beliefs appear unsubstantiated and false. However, in reality, there are many such beliefs in the Indians culture which are absolutely absurd and have no logic behind them.

Superstitions are deemed as pertinent in India because these, generally, hint at future occurrences and can be either good or bad. Thus, anything from the call of a bird to the falling of utensils is considered on omen in India.

Similarly, other auspicious signs could be cawing of a black crow in one’s house, as it forecast the arrival of guests. Seeing a peacock on a journey is also considered lucky, but hearing its shrill sound is bad. Indians feels happy if a sparrow builds a nest in new house because it signals good fortune. A very old belief is that if you kill a cat, you have to offer one in gold to a priest. This belief or superstition was concocted by the priests to protect the cats which are useful in killings the rats in people’s houses.

Indians often consult astrological charts to fix an auspicious time for things. Even the daily life of Indians is governed by beliefs and superstitions. For example, Monday is not an auspicious day for shaving and Thursday is a bad day for washing one’s hair.

Question b.
Write a paragraph in about 100 words on the art of snake-charming,
Answer:
Snake charming

Snake-charming is the practice of apparently hypnotising a snake by . simple playing an instrument. A typical performance may also include handling the snake or performing other seemingly dangerous acts, as well as other street performance staples, like juggling and sleight of hand. The practice ‘ is most common in India, though it is also prevalent in other Asian nations. Many snake-charmers live a wandering existence, visiting towns and villages on market days and during festival. With a few rare exceptions, however, they typically sit out of biting range, and his animal is sluggish and not inclined to attack anyway.

More drastic means of protection include removing the creature’s fangs or venom glands, or even sewing the snake’s mouth shut. The most popular species are house natives to the snake-charmer’s home region, typically various kinds of cobras, though vipers and other types are also used.

D. Word-Study :
D. 1. Dictionary Use :

Ex. 1. Correct the spelling of the following words:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 3 A Snake in the Grass 1
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 3 A Snake in the Grass 2

Ex. 2. Look up a dictionary and write two meanings of each of the following words—the one in which it is used in the lesson and the other which is more common:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 3 A Snake in the Grass 3
Answer:
Swear: (i) (Here) force to follow a certain course of action.
(ii) a Promise

Chant: (i) (Here) spoke in a sing-song way
(ii) to spell

Glare: (i) bright light
(ii) stare in an angry way

Cover: (i) to extend over
(ii) to overlay

Measure : (i) means to end
(ii) size, limit, unit of capacity

Repair: (i) (Here) to go
(ii) to mend

Knock: (i) to strike with a blow
(ii) collide with

Watch: (i) look at attentively
(ii) a small time-piece

D. 2. Word-formation :

Look at the following examples :

The inner walls brightened with the unobstructed glare.

The snake disappeared along the drain.

You see that in the first exammle prefix ‘un’ is added with ‘obstructed’ which is Past Participle but is used there as an Adjective. In the second example, prefix ‘dis’ is added to a verb. In both the cases we get the opposite meaning.

Ex. 1. Use un’—and ‘dis’ suitably before each of the following words and use them in sentences of your own. The first one is done for you.

liked – disliked – Naghaz disliked getting up early.
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 3 A Snake in the Grass 4

Answer:
obeyed – disobeyed – He disobeyed his parent.
crowned – uncrowned – The Prince remained uncrowned.
solved – dissolved – The Governor dissolved the assembly.
believed – disbelieved – She disbelieved the incident.
changed – unchanged – Our programme is still unchanged.
connected – disconnected – The wireman disconnected the line.
decided – undecided – The programme is still undecided.
announced – unannounced – The date of examination is unannounced
agreed – disagreed – They disagreed with us.
noticed – unnoticed – The snake remained unnoticed
qualified – unqualified – He was unqualified person.

D. 3. Word-meaning :

Ex. 1. Match the words given in Coiumn-A with their meanings given in Column-B:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 3 A Snake in the Grass 5
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 3 A Snake in the Grass 6

D. 4. Phrases :

Ex. 1. Read the lessons carefully and find out the sentences in which the following phrases have been used. Then use them in sentences of your own:
swear at – drop in – beat about the brush
ask for – send for – butt in
Answer:
Sentences from the lesson:
They swore at him and forced him to take an interest in the cobra.
Some neighbours dropped in.
I have been asking for a grass-cutter for months.
The fellow is beating about the bush, someone cried aptly.
At this point the college-boy of the house butted in with ……….

The moment you see it again, send for me.
Sentences with the use of the said phrases:

I swore at the worker and forced him to complete the work soon.
When I was ready to go out, some guests dropped in.
We have been asking for increment for months.
They were beating about the bush to find out the snake.
We were discussing the topic when the teacher butted in.
If you need any help, send for me.

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Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

Bihar Board Class 11 History मूल निवासियों का विस्थापन Textbook Questions and Answers

 

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

मूल निवासियों का विस्थापन के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 History प्रश्न 1.
दक्षिणी और उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों के बीच के फों (अन्तर) से सम्बन्धित किसी भी बिन्दु पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासियों के विपरीत उत्तरी अमेरिका के मूल निवासी बड़ी पैमाने पर खेती नहीं करते थे। वे अपने आवश्यकता से अधिक अत्पादन करते थे। इसलिए वे दक्षिणी अमेरिका की तरह राज्य और सम्राज्य स्थापित न कर सके।

मूल निवासियों का विस्थापन प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 History प्रश्न 2.
आप उन्नीसवीं सदी के संयुक्त राज्य अमेरिका में अंग्रेजी के उपयोग के अतिरिक्त अंग्रेजों के आर्थिक और सामाजिक जीवन की कौन-सी विशेषताएं देखते हैं?
उत्तर:
यूरोपीय लोगों (मुख्यतः अंग्रेजों) के संयुक्त राज्य अमेरिका में आकर बसने तथा अपना विस्तार करने के कारण राज्य में अंग्रेजी भाषा का प्रचलन काफी बढ़ गया। इसके अतिरिक्त वहाँ बसे अंग्रेजों के आर्थिक और सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

1. जमीन के प्रति यूरोपीय लोगों का विचार मूल निवासियों से अलग था। ब्रिटेन और फ्रांस से आए कुछ प्रवासी ऐसे थे जो अपने पिता का बड़ा पुत्र न होने के कारण पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी नहीं बन सकते थे। अत: वे अमेरिका में भूमि के स्वामी बनना चाहते थे।

2. जर्मनी, स्वीडन और इटली जैसे देशों से ऐसे अप्रवासी आए जिनकी जमीनें बड़े किसानों के हाथों में चली गई थीं। वे ऐसी जमीन चाहते थे, जिसे वे अपना कह सकें।

3. पोलैंड से आए लोगों को प्रेयरी चरागाहों में काम करना अच्छा लगता था, जो उन्हें। अपने देश के स्टेपीज की याद दिलाती थी।

4. अमेरिका में बहुत कम कीमत पर बड़ी सम्पत्तियाँ खरीद पाना आसान था। अत: अंग्रजों ने बड़े-बड़े भूखंड खरीद लिए। उन्होंने जमीन की सफाई की और खेती का विकास किया। उन्होंने मुख्य रूप से कपास और धान जैसी पसलें उगाईं। इसका कारण यह था कि ये फसलें यूरोप में नहीं उगाई जा सकती थीं। इसीलिए वहाँ ऊंचे मुनाफे पर बेचा जा सकता था।

5. अपने विस्तृत खेतों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए अन्होंने शिकार द्वारा उनका सफाया कर दिया। 1873 में कंटीले तारों की खोज के बाद खेत पूरी तरह सुरक्षित हो गए।

6. अंग्रेजों ने संयुक्त राज्य अमेरिका में अपनी बस्तियों के विस्तार के लिए खरीदी गई जमीन से वहाँ के मूल निवासियों को हटा दिया। उनके साथ अपनी जमीनें बेच देने की संधियाँ की गई और उन्हें जमीन की बहुत कम कीमतें दी गई। ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं कि अमेरिकियों (संयुक्त राज्य अमेरिका में रहने वाले अंग्रेज) ने धोखे से उनसे अधिक भूमि हथिया ली या पैसा देने के मामले में हेराफरी की।

7. उच्च उधिकारी भी मूल निवासियों की बेदखली को गलत नहीं मानते थे। जॉर्जिया इसका उदाहरण है। जॉर्जिया संयुक्त राज्य अमेरिका का एक राज्य है। यहाँ के अधिकारियों का तर्क था कि वहाँ के चिरोकी कबीले पर राज्य के कानून तो लागू होते हैं, परन्तु वे नागरिक अधिकारों का उपयोग भी कर सकते हैं।

मूल निवासियों का विस्थापन पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 History प्रश्न 3.
अमेरिकियों के लिए ‘फ्रंटियर’ के क्या मायने (अर्थ) थे?
उत्तर:
यूरोपियों द्वारा जीती गई भूमि तथा खरीदी गई भूमि के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका का विस्तार होता रहता था। इससे अमेरिका को पश्चिमी सीमा खिसकती रहती थी। इसके साथ मूल अमेरिकियों को भी पीछे हटना पड़ता था। वे राज्य की जिस सीमा तक पहुँच जाते थे उसे ‘टियर कहा जाता है।

प्रश्न 4.
इतिहास की किताबों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को शासित क्यों नहीं किया गया था?
उत्तर:
यूरोपीय इतिहासकारों ने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के प्रति भेदभाव की नीति अपनाई। उन्होंने अपनी पुस्तकों में केवल ऑस्ट्रेलिया में आकर बसे यूरोपीयों की ही उपलब्धियों का वर्णन किया और यह दिखाने का प्रयास किया कि वहाँ के मूल निवासियों की न तो कोई परम्परा है और न ही कोई इतिहास। इसी कारण इतिहास की पुस्तकों में उनकी उपेक्षा की गई।

प्रश्न 5.
लोगों की संस्कृति को समझाने में संग्रहालय की गैलरी में प्रदर्शित चीजें कितनी कामयाब रहती हैं? किसी संग्रहालय को देखने के अपने अनुभव के आधार पर सोदाहरण विचार करिए।
उत्तर:
लोगों की संस्कृति को समझने में संग्रहालय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वहाँ प्रदर्शित वस्तुओं के आधार पर मूली बिसरी अथवा उपेक्षित संस्कृतियों को भी फिर से जीवित किया जा सकता है। ऑस्ट्रेलिया की आदि संस्कृतियाँ इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 6.
कैलिफोर्निया में चार लोगों के बीच 1880 में हुई किसी मुलाकात की कल्पना करिए । ये चार लोग हैं : एक अफ्रीकी गुलाम, एक चीनी मजदूर, गोल्ड रश के चक्कर में आया हुआ एक जर्मन और होपी कबीले का एक मूल निवासी। उनकी बातचीत का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कैलिफोर्निया उत्तर अमेरिका का एक प्रसिद्ध शहर है। यहाँ ये चारों मिलकर अपनी आवश्यक्ता पूरा करने के लिए बातचीत करते हैं। इसमें सबसे शक्तिशाली गोल्ड रश के चक्कर में आया हुआ जर्मन है। वह अफ्रीकी गुलाम को अपने पास रखना चाहता है। वह उससे अपने यहाँ रहने के लिए कहता है। वह चीनी मजदूर से अपने काम करने के लिए पृण है। चीनी मजदूर टूटी फूटी भाषा में जवाब देता है। जमन निवासी होपी कबीले के मूल निवासी को जमीन देने के लिए कहता है ताकि वह यहाँ अपना व्यापार जमा सके। चारों टूटी अंग्रेजी में बातचीत करते हैं।

Bihar Board Class 11 History मूल निवासियों का विस्थापन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चिरोकी कौन थे? उनके साथ क्या अन्याय हो रहा था?
उत्तर:
चिरोकी संयुक्त राज्य अमेरिका के एक राज्य जार्जिया के मूल निवासी थे। वहाँ के मूल निवासियों में चिरोकी ही ऐसे थे जिन्होंने अंग्रेजी सीखने और अंग्रेजों की जीवन-शैली समझने का सबसे अधिक प्रयास किया था। उन पर राज्य के कानून तो लागू होते थे, परन्तु उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित होना पड़ता था।

प्रश्न 2.
अमेरिका में मूल निवासियों से जमीनें प्राप्त करने वाले लोग किस आधार पर अपने आप को उचित ठहराते थे?
उत्तर:
मूल निवासियों से जमीनें प्राप्त करने वाले लोग इस आधार पर अपने आप को उचित ठहराते थे कि मूल निवासी जमीन का अधिकतम प्रयोग करना नहीं जानते । इसलिए वह उनके पास रहनी ही नहीं चाहिए। वे यह कह कर भी मूल निवासियों की आलोचना करते कि आलसी : हैं। इसलिए वे बाजार के लिए उत्पादन करने में अपने शिल्प-कौशल का प्रयोग नहीं करते हैं। अंग्रेजी सीखने और ढंग के कपड़े पहनने में भी उनकी कोई रुचि नहीं है।

प्रश्न 3.
उत्तरी अमेरिका के सन्दर्भ में ‘रिजर्वेशंस’ (आरक्षण) क्या थे?
उत्तर:
उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों को छोटे-छोटे प्रदेशों में सीमित कर दिया गया था। यह प्रायः ऐसी जमीन होती थी, जिनके साथ उनका पहले से कोई नाता नहीं होता था। इन्हीं जमीनों को रिजर्वेशन अथवा आरक्षण. कहा जाता था।

प्रश्न 4.
अमेरिका के मूल निवासियों ने अपनी जमीनें संघर्ष करने के बाद ही छोड़ी थीं। इसके पक्ष में उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
अमेरिका के मूल निवासियों ने वास्तव में अपनी जमीनों के लिए संघर्ष किया था। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि संयुक्त राज्य की सेना को 1865 से 1890 ई. के बीच मूल निवासियों के विद्रोहों की एक पूरी श्रृंखला का दमन करना पड़ा था। इसी प्रकार 1869-1885 ई. के बीच कनाडा में मेटिसों (यूरोपीय मूल निवासियों के वंशज) के विद्रोह
हुए थे।

प्रश्न 5.
उत्तरी अमेरिका में 1840 के दशक में मानवशास्त्र विषय का आरम्भ क्यों हुआ?
उत्तर:
1840 के दशक में उत्तरी अमेरिका में मानवाशास्त्र विषय का आरम्भ स्थानीय ‘आदिम’ समुदायों तथा युरोप के ‘समुदायों के बीच अन्तर को जानने के लिए हुआ। कुछ मानवशास्वियों ने यह स्थापित किया कि जिस प्रकार यूरोप में ‘आदिम’ लोग नहीं पाये जाते, उसी : प्रकार अमेरिका के मूल निवासी भी नहीं रहेंगे।

प्रश्न 6.
‘गोल्ड रश’ को किस बात ने जन्म दिया? यह क्या था?
उत्तर:
यूरोपीय लोगों को इस बात की आशा थी कि उत्तरी अमेरिका में धरती के नीचे सोना है। 1840 में संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलीफोर्निया में सोने के कुछ चिह्न मिले । इसने ‘गोल्ड रश’ को जन्म दिया। ‘गोल्ड रश’ उस आपाधापी का नाम है, जिसमें हजारों की संख्या में यूरोपीय लोग सोना पाने की आशा में अमेरिका जा पहुंचे।

प्रश्न 7.
अमेरिका महाद्वीप के लिए गोल्ड रश किस प्रकार वरदान सिद्ध हुआ?
उत्तर:
गोल्ड रश को देखते हुए पूरे महाद्वीप में रेलवे-लाइनों का निर्माण किया गया। इसके लिए हजारों चीनी श्रमिकों की नियुक्ति हुई। 1870 में संयुक्त राज्य अमेरिका में तथा 1885 में कनाडा में रेलवे का काम पूरा हो गया। स्कॉटलैंड से आने वाले अप्रवासी एंड्रिड कानेगी ने कहा था, “पुराने राष्ट्र घोंघे की चाल से सरकते हैं। नया गणराज्य किसी एक्सप्रेस की गति से दौड़

प्रश्न 8.
उत्तरी अमेरिका में उद्योगों के विकास के कौन-से दो मुख्य उद्देश्य थे?
उत्तर:
उत्तरी अमेरिका में उद्योगों के विकास के निम्नलिखित उद्देश्य थे –

विकसित रेलवे के साज-समान बनाना, ताकि दूर-दूर के स्थानों को तीव्र परिवहन द्वारा जोड़ा जा सके।
ऐसे यन्त्रों का निर्माण करना, जिनसे बड़े पैमाने पर खेती की जा सके।

प्रश्न 9.
1934 में संयुक्त राज्य अमेरिका में एक युगान्तकारी कानून पारित हुआ। यह क्या था?
उत्तर:
यह कानून था 1934 का इंडियन रीऑर्गनाईजेशन एक्ट । इसके अनुसार रिजर्वेशंज में मूल निवासियों का जमीन खरीदने और ऋण लेने का अधिकार दिया गया।

प्रश्न 10.
मूल निवासियों ने किस दस्तावेज द्वारा तथा किस शर्त पर संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिकता स्वीकार की?
उत्तर:
मूल निवासियों ने 1954 में अपने द्वारा तैयार किए गए ‘डिक्लेरेशन ऑफ इंडियन राइट्स’ नामक दस्तावेज द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिकता स्वीकार की। उनकी शर्त यह थी कि उनके रिजर्वेशंज वापिस नहीं लिए जाएंगे और उनकी परम्पराओं में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

प्रश्न 11.
ऑस्ट्रेलिया में ‘ऐबॉरिजिनीज’ नामक आदिम कब आने शुरू हुए ? वहाँ के मूल निवासियों का इस विषय में क्या कहना है?
उत्तर:
माना जाता है कि ऑस्ट्रेलिया में ‘ऐबॉरिजिनीज’ नामक आदिम मानव आज से लगभग 40,000 साल पहले आने शुरू हुए। परन्तु वहाँ के निवासी इसका विरोध करते हैं। उनकी परम्पराओं के अनुसार वे कहीं बाहर से नहीं आए थे, बल्कि आरम्भ से ही वहीं रह रहे थे।

प्रश्न 12.
ऑस्ट्रेलिया के टॉरस स्ट्रेट टापूवासियों की संक्षिप्त जानकारी दीजिए। इनके लिए ‘ऐबॉरिजिनीज’ शब्द का प्रयोग क्यों नहीं होता?
उत्तर:
ऑस्ट्रेलिया के देसी लोगों का एक विशाल समूह उत्तर में रहता है। इन्हें टॉरस स्ट्रेट टापूवासी कहते हैं। 2005 ई. में वे ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या का 2.4 प्रतिशत भाग थे । इनके लिए ऐबॉरिजिनी शब्द प्रयोग नहीं होता क्योंकि यह माना जाता है कि वे कहीं और से आए हैं और एक अलग नस्ल के हैं।

प्रश्न 13.
ऑस्ट्रेलिया की अधिकतर जनसंख्या कहाँ बसी हुई है और क्यों?
उत्तर:
ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या बहुत ही विरल है। वहाँ की अधिकतर जनसंख्या समुद्रतट के साथ-साथ बसी हुई है। इसका कारण यह है कि देश का भीतरी भाग शुष्क मरुभूमि है।

प्रश्न 14.
ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के व्यवहार के प्रति ब्रिटिशों का क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर:
ब्रिटिश नाविक कैप्टन कुक और उसके चालक दलन के आरम्भिक ब्योरों में मूल निवासियों के व्यवहार को मैत्रीपूर्ण बताया गया है। परन्तु जब एक मूल निवासी ने हवाई में कुक की हत्या कर दी तो ब्रिटिशों का दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल गया । अब उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि वहाँ के मूल निवासी व्यवहार में हिंसक हैं।

प्रश्न 15.
‘सेटलर’ (आबादकर) शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:’
सेटलर’ शब्द से अभिप्राय किसी स्थान पर बाहर से आकर बसे लोगों से है। इस शब्द का प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में डचों के लिए, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, तथा ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटिश लोगों के लिए और अमेरिका में यूरोपीय लोगों के लिए किया जाता है।

प्रश्न 16.
दक्षिण अफ्रीका तथा अमेरिका में यूरोप उपनिवेशों की राजभाषा कौन-सी थी?
उत्तर:
कनाडा को छोड़कर इन सभी उपनिवेशों की राजभाषा अंग्रेजी थी। कनाडा में अंग्रेजी के साथ-साथ फ्रांसीसी भी एक राजभाषा थी।

प्रश्न 17.
‘नेटिव’ (मूल निवासी) शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘नेटिव’ शब्द उस व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है जो अपने वर्तमान निवास स्थान पर ही पैदा हुआ हो । 20वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में यह शब्द यूरोपीय लोगों द्वारा अपने उपनिवेशों के मूल निवासियों के लिए किया जाता था।

प्रश्न 18.
‘अमेरिका की पूर्व संध्या’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अमेरिका की पूर्व संध्या’ से अभिप्राय उस समय से है जब यूरोपीय लोग अमेरिका में आए और उन्होंने इस महाद्वीप को अमेरिका का नाम दिया।

प्रश्न 19.
उत्तरी अमेरिका के आरम्भिक निवासियों की जीवन शैली की कोई तीन विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:
उत्तरी अमेरिका के आरम्भिक निवासी नदी घाटी के साथ-साथ बने गाँवों में समूह बना कर रहते थे।
वे मछली और मांस खाते थे और सब्जियाँ तथा मक्का उगाते थे।
वे प्रायः मांस की तलाश में लम्बी यात्राएँ करते थे। मूख्य रूप से उन्हें ‘बाइर्सन’ अर्थात् उन जंगली भैंसों की तलाश रहती थी, जो घास के मैदानों में घूमते रहते थे।

प्रश्न 20.
वेमपुम (Wampum) बेल्ट क्या थी?
उत्तर:
वेमपुम बेल्ट रंगीन सीपियों को आपस में सिलकर बनाई जाती थी। किसी समझौते के बाद अमरिका के स्थानीय कबीलों के बीच इसका आदान-प्रदान होता था।

प्रश्न 21.
उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों की परम्परा की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता बताइए।
उत्तर:
औपचारिक सम्बन्ध स्थपित करना, मित्रता करना, तथा उपहारों का आदान-प्रदान करना।

प्रश्न 22.
यूरोपीय लोगों को उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों पर किस बात ने अपनी शर्ते थोपने में सक्षम बनाया?
उत्तर:
उत्तरी अमेरिका के मूल निवासी शराब से परिचित नहीं थे। परन्तु यूरोपियों ने उन्हें शराब देकर शराब पीने का आदी बना दिया। शराब उनकी कमजोरी बन गई। उनकी कमजोरी ने यूरोगय लोगों को उन पर अपनी शत थोने में सक्षम बनाया।

प्रश्न 23.
पश्चिमी यूरोप के लोगों को अमेरिका के मूल निवासी असभ्य क्यों प्रतीत हुए?
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप के लोग ‘सभ्य’ मनुष्य की पहचान साक्षरता, संगठित धर्म शहरीपन के आधार पर करते थे। इसी दृष्टि से उन्हें अमेरिका के मूल निवासी ‘असभ्य’ प्रतीत हुए।

प्रश्न 24.
विभिन्न उपहारों के आदान-प्रदान के प्रति उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों तथा यूरोपीयों के दृष्टिकोण में क्या अन्तर था?
उत्तर:
उत्तरी अमेरिका के मूल निवासी यूरोपीय लोगों के साथ जिन चीजों का आदान-प्रदान करते थे, वे उन्हें मैत्री में मिले उपहार मानते थे। दूसरी ओर अमीरी का सपना देखने वाले यूरोपीय लोगों के लिए मछली और रोएँदार खालें मुनाफा कमाने के लिए बेची जाने वाली वस्तुएँ था।

प्रश्न 25.
यूरोपीय लोगों ने अमेरिका में अपनी जमीनों पर मुख्य रूप से कौन-सी फसलें उगाईं और क्यों?
उत्तर:
यूरोपीय लोगों ने अमेरिका में अपने खेतों पर धान और कपास आदि फसलें उगाई सका कारण यह था कि ये फसलें यूरोप में नहीं उगाई जा सकती थीं। इसीलिए यूरोप में इन्हें ऊँचे लाभ पर बेचा जा सकता था।

प्रश्न 26.
यूरोपीय बागान मालिक लोग दक्षिण अमेरिका में दासों से काम क्यों लेना चाहते थे? इस सम्बन्ध में उन्हें क्या समस्या आई?
उत्तर:
यूरोपीय लोगों के लिए अमेरिका के दक्षिणी प्रदेश की जलवायु काफी गर्म थी। ऐसी – जलवायु में उनके लिए घर से बाहर.(खेतों पर अथवा बागानों में) काम कर पाना कठिन थी। इसलिए वे दासों से काम लेना चाहते थे।

प्रश्न 27.
अमेरिका में यूरोपीय लोगों को अफ्रीका से दास क्यों खरीदने पड़े ? क्या इन दासों को दासता से मुक्ति मिली?
उत्तर:
यूरोपीय लोगों को अपने खेतों पर काम करने के लिए दासों की जरूरत थी। परन्तु दक्षिणी अमरिकी उपनिवेशों से दास बना कर लाए गए मल निवासी बहत बडी संख्या में मौत का शिकार हो गए थे। इसीलिए बागान मालिकों को अफ्रीका से दास खरीदने पड़े। समय बीतने पर दासों के व्यापार पर तो रोक लग गई। परन्तु अफ्रीकी दासों को दासता से मुक्ति न मिली। – वे और उनके बच्चे दास ही बने रहे।

प्रश्नी 28.
संयुक्त राज्य अमेरिका में दास प्रथा का अन्त किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी राज्यों का अर्थतन्त्र बागानों पर आधारित न होने के कारण दास प्रथा पर आधारित नहीं था। अत: वहाँ दास प्रथा को समाप्त करने के पक्ष में आवाज उठने लगी और उसे एक अमानवीय प्रथा बताया गया। 1861-65 में दास प्रथा के समर्थक तथा उसके विरोधी राज्यों के बीच युद्ध हुआ। इसमें दासता विरोधियों की जीत हुई और दास प्रथा समाप्त कर दी गई।

प्रश्न 29.
कनाडा की ब्रिटिश सरकार के सामने फ्रांसीसियों के सम्बन्ध में क्या समस्या थी? इसे किस प्रकार सुलझाया गया?
उत्तर:
कनाडा की ब्रिटिश सरकार के सामने एक समस्या थी, जो लम्बे समय तक हल नहीं हो पाई थी। 1763 में ब्रिटेन ने फ्रांस के साथ हुई लड़ाई में कनाडा को जीत लिया था। वहाँ बसे फ्रांसीसी लगातार स्वायत्त राजनीतिक दर्जे की माँग कर रहे थे। अन्ततः 1867 में कनाडा को स्वायत्त राज्यों के एक महासंघ के रूप में संगाठित करके इस समस्या को हल किया गया।

प्रश्न 30.
ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश आरम्भिक आबादकार कौन थे? उन्हें किस शर्त पर ऑस्ट्रेलिया में स्वतन्त्र जीवन जीने की अनुमति दी गई थी?
उत्तर:
ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश आरम्भिक आबादकार ब्रिटिश कैदी थे जो इंग्लैंड से निर्वासित होकर आए थे। उनके कारावास की अवधि पूरी होने पर उन्हें इस शर्त पर ऑस्ट्रेलिया में ही स्वतन्त्र जीवन जीने की अनुमति दे दी गई कि वे ब्रिटेन वापस नहीं लौटेंगे। अपने जीवनयापन के लिए उन्होंने खेती के लिए ली गई जमीन से मूल निवासियों को निकाल बाहर किया।

प्रश्न 31.
ऑस्ट्रेलिया की गोरी सरकार ऑस्ट्रेलिया की भूमि को ‘टेरा न्यूलियस’ (terra nullius) क्यों कहती रहती है?
उत्तर:
टेरा न्यूलियस का अर्थ है-किसी को नहीं । सरकार का मानना था कि वहाँ की भूमि किसी को नहीं । ऐसा वहाँ पर यूरोपियों द्वारा किए भूमि अधिग्रहण को औपचारिक बनाने के लिए कहा जाता रहा है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका अपने वर्तमान क्षेत्रफल तक किस तरह पहुँचे?’
उत्तर:
कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका 18वीं शताब्दी के अन्त में अस्तित्व में आए थे। उस समय उनके पास अपने वर्तमान क्षेत्रफल का एक छोटा-सा ही भाग था। वर्तमान आकार तक पहुँचने के लिए अगले सौ सालों में उन्होंने अपने नियन्त्रण वाले प्रदेश में काफी वृद्धि की। संयुक्त राज्य अमेरिका ने विस्तृत क्षेत्रों की खरीद की। उसने दक्षिण में फ्रॉस (लइसियाना परचेज) और रूस (अलास्का) से जमीन खरीदी। उसने युद्ध में भी जमीन जीती।

दक्षिण संयुक्त राज्य अमेरिका का अधिकतर भाग मेक्सिको से ही जीता गया था । किसी ने यह बात नहीं सोची कि उन प्रदेशों में रहने बाने मूल निवासियों की भी राय ली जाए। संयक्त राज्य अमेरिका की पश्चिमी सीमा खिसकती रहती थी। जैसे-जैसे सीमा खिसकती, वहाँ के निवासियों को भी पीछे खिसकने के लिए बाध्य कर दिया जाता था। \

प्रश्न 2.
19वीं शताब्दी में अमेरिका के भूदृश्य में होने वाले परिवर्तनों का वर्णन किजिए। ये परिवर्तन क्यों हुए?
उत्तर:
19वीं सदी में अमेरिका के भूदृश्य में अत्यधिक परिवर्तन आए।
कारण – जमीन के प्रति युरोपीय लोगों का रुख मूल निवासियों से अलग था। ब्रिटेन और फ्रांस से आए कुछ प्रवासी ऐसे थे जो अपने पिता का बड़ा पुत्र न होने के कारण पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी नहीं बन सकते थे। अत: वे अमेरिका में जमीन का स्वामी बनना चाहते थे। बाद में जर्मनी, स्वीडन और इटली जैसे देश में ऐसे अप्रवासी आ गए जिनकी जमीनें बड़े किसानों के हाथ में चली गई थीं वे ऐसी जमीन चाहते थे, जिसे अपना कह सकें। पोलैंड से आए लोगों को प्रयरी (prairie) चरागाहों में काम करना अच्छा लगता था, जो उन्हें अपने देश के स्टेपोज (घास के मैदानों) की याद दिलाती थीं। अमेरिका में बहुत कम मूल्य पर बड़ी सम्पत्तियाँ खरी: पाना आसान था।

परिवर्तन – यूरोपीय लोगों ने खरीदी गई जमीन की सफाई की और खेती का विकास किया। उन्होंने धान और कपास आदि फसलें उगाईं। ये फसलें युरोप में नहीं उगाई जा सकती थीं। इसीलिए युरोप में उन्हें ऊँचे लाभ पर बेचा जा सकता था। अपने विस्तृत खेतों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए उन्होंने शिकार द्वारा उनका सफाया कर दिया। 1873 में कंटीले तारों की खोज के बाद खेत पूरी तरह सुरक्षित हो गए।

प्रश्न 3.
संयुक्त राज्य अमेरिका में दास प्रथा के प्रचलन तथा समाप्ति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी प्रदेश की जलवायु यूरोपीय लोगों के लिए काफी गर्म थी। इसलिए उनके लिए वहाँ घर से बाहर काम कर पाना कठिन था। अतः वे दासों से काम लेना चाहते थे। परन्तु दक्षिण अमेरिकी उपनिवेशों में दास बनाए गए मूल निवासी बहुत बड़ी संख्या में मौत का शिकार हो गए थे। इसीलिए बागान मालिकों ने अफ्रीका से दास खरीदे। समय बीतने पर दास प्रथा विरोधी समूहों के विरोध के कारण दासों के व्यापार पर रोक लग गई। परन्तु जो अफ्रीकी दास संयुक्त राज्य अमेरिका में थे, वे और उनके बच्चे दास ही बने रहे।

दास प्रथा की समाप्ति-संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी राज्यों का अर्थतन्त्र बागानों पर आधारित न होने के कारण दास-प्रथा पर आधारित नहीं था। अत: वहाँ दास प्रथा को समाप्त करने के पक्ष में आवाज उठने लगी और उसे एक अमानवीय प्रथा बनाया गया। 1861-65 में दास प्रथा के समर्थक तथा विरोधी राज्यों के बीच युद्ध हुआ। इसमें दासता के विरोधियों की जीत हुई और दास प्रथा समाप्त कर दी गई।

प्रश्न 4.
ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय लोगों के आगमन के प्रति वहाँ के मूल निवासियों की क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर:
ऑस्ट्रेलिया की खोज 1770 ई. में अंग्रेज नाविक कैप्टन कुक ने की थी। वहाँ के मूल निवासियों ने कुक तथा उसके चालक दल का स्वागत किया। इसलिए ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के साथ हुई भेंट को लेकर कैप्टन कुक और उसके चालक दल के आरम्भिक ब्योरे मूल निवासियों के मैत्रीपूर्ण व्यवहार से भरे पड़े हैं। परन्तु बाद में एक मूल निवासी ने हवाई में कक की हत्या कर दी। इस कारण ब्रिटिशों को उनके प्रति दृष्टिकोण पुरी तरह से बदल गया। अब उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि वहाँ के मुल निवासी व्यवहार में हिंसक हैं।

यूरोपीय लोगों के आगमन को सभी मूल निवासियों ने खतरा नहीं माना । इसका कारण यह था कि उनमें दूर की सोच की कमी थी। वे यह अनुमान नहीं लगा पाए कि 19वीं और 20वीं सदी के बीच कीटाणुओं के प्रभाव से अपनी जमीनें छिन जाने से तथा आबादकारों के साथ होने वाली लड़ाइयों में लगभग 90 प्रतिशत मूल निवासियों को अपने प्राण गवाने पडेंगे।

प्रश्न 5.
ऑस्ट्रेलिया में मानव निवास के इतिहास का वर्णन करते हुए वहाँ के मूल निवासियों के समुदायों की जानकारी दीजिए।
उत्तर:
ऑस्ट्रेलिया में मानव निवास का इतिहास काफी लम्बा है। आरम्भिक मनुष्य या आदिमानव जिन्हें ‘ऐबॉरिजिनीज’ कहते हैं ऑस्टेलिया में लगभग 40,000 साल पहले आने शुरू हए थे। वे न्यूगिनी से आए थे जो ऑस्ट्रेलिया के साथ एक भूमि सेतु द्वारा जुड़ा हुआ था। इसके विपरीत मूल निवासियों की अपनी परम्पराओं के अनुसार वे ऑस्ट्रेलिया में बाहर से नहीं आये थे। बल्कि आरम्भ ही वहीं रह रहे थे।

मूल निवासियों के समुदाय – 18वीं सदी के अन्तिम चरण में ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासियों के लगभग 350 से 750 तक समूदाय रहते थे। इनमें से प्रत्येक समुदाय की अपनी भाषा थी। देसी लोगों का एक अन्य विशाल समूह उत्तर में रहता है। 2005 ई. में वे ऑस्ट्रेलिया की कुछ जनसंख्या का 2.4 प्रतिशत भाग थे। इन्हें टॉरस स्ट्रेट टापूवासी कहते हैं। इनके लिए ‘ऐबॉरिजिनी’ शब्द प्रयोग नहीं होता क्योंकि यह माना जाता है कि वे कहीं और से आए हैं और एक अलग नस्ल के हैं।

प्रश्न 6.
मानव अधिकारों ने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को न्याय दिलाने का मार्ग किस सीमा तक प्रशस्त किया है?
उत्तर:
1973 के दशक से संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सियों की बैठकों में मानवाधिकारों पर बल दिया जाने लगा। इससे ऑस्ट्रेलियाई जनता को यह आभास हुआ कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और न्यूजीलैंड के विपरित ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय लोगों द्वारा किए गए भूमि अधिग्रहण को औपचारिक बनाने के लिए मूल निवासियों के साथ कोई समझौता नहीं किया गया है। सरकार सदा से ऑस्ट्रेलिया की जमीन को टेरा न्यूलियस (terra nullius) कहती आई थी। इसका अर्थ था, “जो किसी की नहीं है।” इसके अतिरिक्त वहाँ यूरोपवासियों द्वारा अपने आदिवासी रिश्तेदारों से जबरदस्ती छीने गए मिश्रित रक्त वाले बच्चों का भी एक लम्बा और यन्त्रणापूर्ण इतिहास था।

अन्ततः दो महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए गए –
इस बात को मान्यता देना कि मूल निवासियों का जमीन के साथ, जोकि उनके लिए पवित्र है, मजबूत ऐतिहासिक सम्बन्ध रहा। अतः इसका आदर किया जाना चाहिए।
‘श्वेत’ तथा ‘अश्वेत’ लोगों को अलग-अलग रखने के प्रयास में बच्चों के साथ जो अन्याय हुआ है, उसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी जानी चाहिए।

प्रश्न 7.
उपनिवेशीकरण को प्रेरित करने वाला मुख्य कारक कौन-सा था? उपनिवेशीकरण की प्रकृति में पाई जाने वाली विविधताओं के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
उपनिवेशीकरण को प्रेरित करने वाला प्रमुख कारक मुनाफा था। परन्तु उपनिवेशीकरण की प्रकृति में कुछ महत्त्वपूर्ण विविधताएँ थीं, जिसके निम्नलिखित उदाहरण है-
1. दक्षिण एशिया में व्यापारिक कम्पनियों ने अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित की। उन्होंने स्थानीय शासकों को हराकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उन्होंने नयी प्रशासनिक व्यवस्था. स्थापित करने की बजाय पुरानी सुविकसित प्रशासकीय व्यवस्था को ही अपनाया और भस्वामियों से कर वसूला। बाद में उन्होंने अपने व्यापार को सुगम बनाने के लिए रेलवे का निर्माण किया, खानें खुदवाई और बड़े-बड़े बागान स्थापित किए।

2. दक्षिणी अफ्रीका को छोड़कर शेष पूरे अफ्रीका में युरोपीय लोग लम्बे समय तक समुद्र तटों पर ही व्यापार करते रहे। 19वीं सदी के आखिरी चरण में ही वे अफ्रीका के भीतरी भागों में जाने का साहस कर सके। बाद में कुछ यूरोपीय देशों ने अपने उपनिवेशों के रूप में अफ्रीका का बँटवारा करने का समझौता कर लिया।

प्रश्न 8.
उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के विस्तार, भूमध्य तथा संसाधनों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उत्तरी अमेरिका महाद्वीप उत्तर ध्रुवीय वृत्त से लेकर कर्क रेखा तक फ्राला हुआ है। दूसरी ओर इसका विस्तार प्रशान्त महासागर से अटलांटिक महासागर तक है।पिचरीले, पर्वतों की श्रृंखला के पश्चिम में अरिजोना और नेवाडा की मरुभूमि है। थोड़ा और पश्चिम सिएरा नेवाडा पर्वत है। पूर्व में ग्रेट (विस्तृत) मैदानी प्रदेश, महान् (विस्तृत) झीलें, मिसीसिपी तथा ओहियो और अप्लेशियन पर्वतों की घाटियाँ हैं। दक्षिण दिशा में मेक्सिको है। कनाडा का 40 प्रतिशत प्रदेश वनों से ढंका है। कई क्षेत्रों में तेल, गैस और खनिज संसाधन पाए जाते हैं। इनके आधार पर संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में कई बड़े उद्योग स्थापित हैं। आजकल कनाडा में गेहूँ, मक्का और फल बड़े पैमाने पर पैदा किए जाते हैं।

प्रश्न 9.
यूरोपीय व्यापारी उत्तरी अमेरिका में सर्वप्रथम कब और कहाँ पहुँचे? वहाँ के स्थानीय लोगों के प्रति उनके व्यवहार तथा दृष्टिकोण की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
17वीं शताब्दी में यूरोपीय व्यापारी उत्तरी अमेरिका के उत्तरी तट पर पहुंचे। ये लोग मछली और रोएँदार खाल के व्यापार के लिए आए थे। इस काम में कुशल स्थानीय लोगों ने उनकी सहायता की। वे उनके मैत्रीपूर्ण व्यवहार से बहुत प्रसन्न हुए। स्थानीय उत्पादों के बदले में यूरोपीय लोग वहाँ के लोगों को कम्बल, लोहे के बर्तन, बंदुकें और शराब देते थे। इससे पहले वहाँ के लोग शराब से परिचित नहीं थे। शीघ्र ही वे इसकी आदत का शिकार हो गए।

यूरोपीय लोगों के लिए उनकी यह आदत अच्छी बात सिद्ध हुई। इसने उन्हें व्यापार के लिए अपनी शर्ते थोपने में सक्षम बनाया। यूरोपीय लोगों ने भी उन मूल निवासियों से तम्बाकू की आदत ग्रहण की। पश्चिमी यूरोप के लोग ‘सभ्य’ मनुष्य की पहचान साक्षरता, संगठित धर्म और शहरीपन के आधार पर करते थे। इस दृष्टि से उन्हें अमेरिका के मूल निवासी ‘असभ्य’ प्रतीत हुए।

प्रश्न 10.
उत्तरी अमेरिका के मूल निवासी यूरोपीय लोगों के व्यवहार को देखकर दुःखी क्यो होते थे?
उत्तर:
उत्तरी अमेरिका के मूल निवासी यूरोपीय लोगों के साथ जिन चीजों का आदान-प्रदान करते थे, वे उन्हें मैत्री में मिले उपहार मानते थे। दूसरी ओर अमीरी का सपना देखने वाले युरोपीय लोगों के लिए मछली और रोएँदार खाल मुनाफा कमाने के लिए बेची जाने वाली वस्तुएँ थीं। इन बेची जाने वाली वस्तुओं के मूल्य इनकी पूर्ति के आधार पर हर साल बदलते रहते थे। मूल निवासी इस बात को समझ नहीं सकते थे, क्योंकि उन्हें सुदूर यूरोप में स्थित ‘बाजार’ का जरा भी बोध नहीं था।

उनके लिए तो यह सब पहेली की तरह था कि यूरोपीय व्यापारी उनकी चीजों के बदले में कभी तो बहुत सा सामान दे देते थे और कभी बहुत कम। वे यूरोपीय लोगों के लालच को देखकर भी दुःखी होते थे। प्रचुर मात्रा में रोएँदार खाल प्राप्त करने के लिए उन्होंने सैकड़ों कदबिलावों को मार डाला था। मूल निवासी इससे काफी विचलित थे। उन्हें डर था कि जानवर उनसे इस विध्वंस का बदला लेंगे।

प्रश्न 11.
यूरोपीय व्यापारियों के बाद यूरोपीय लोग अमेरिका बसने के लिए क्यों आये? उन्होंने वहाँ के वनों के प्रति क्या नीति अपनाई?
उत्तर:
व्यापारी के रूप में आने वाले यूरोपीय लोगों के पीछे-पीछे अमेरिका में ‘बसने’ के लिए भी यूरोपीय आए। इनमें से अधिकतर लोग धार्मिक उत्पीड़न के शिकार थे। इन लोगों में कैथेलिक प्रभुत्व वाले देशों में रहने वाले प्रोटेस्टेन्ट अथवा प्रोटेस्टेन्टवाद को राजधर्म का दर्जा देने वाले देशों के कैथोलिक सम्मिलित थे। जब तक उनके बसने के लिए वहाँ खाली जमीनें थीं, कोई समस्या नहीं आई। परन्तु धीरे-धीरे वे महाद्वीप के आन्तरिक भागों में मूल निवासियों के गाँवों की ओर बढ़ने लगे। उन्होंने अपने लोहे के औजारों द्वारा जंगलों को साफ किया, ताकि खेती की जा सके।

उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों तथा यूरोपीय लोगों का वहाँ के वनों के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण था। मूल निवासियों को वन ऐसे मार्ग जुटाते थे, जो यूरोपीय :गों की पहुंच से बाहर थे। दूसरी ओर यूरोपीय लोगों की कल्पना में जंगलों के स्थान पर मक्कं के खेत उभरते थे। . अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति जैफर्सन का सपना एक ऐसे देश का था, जो छोटे-छोटे खेतों वाले । यूरोपीय लोगों से आबाद था। मूल निवासी उसके इस दृष्टिकोण को समझने में असमर्थ थे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संयुक्त राज्य अमेरिका में मूल निवासियों के अधिकारों एवं हितों के लिए क्या किया गया? अब उनकी क्या स्थिति है?
उत्तर:
1920 के दशाक तक संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के मूल निवासियों की भलाई के लिए कुछ नहीं किया गया था। उन्हें न तो स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाएँ प्राप्त थीं और न ही शिक्षा सम्बन्धी।

1934 का ‘इंडियन रिआर्गनाइजेशन एक्ट’-अन्ततः गोरे अमेरिकियों के मन में उन मूल निवासियों के प्रति सहानुभूति जागी, जिन्हें अपनी संस्कृति का पालन करने से रोका गया था और जिन्हें नागरिकता के लाभों से भी वंचित रखा गया था। इस बात ने संयुक्त राज्य अमेरिका में एक युगान्तकारी कानून को जन्म दिया। यह कानून था-1934 का इंडियन रीऑर्गनाईजेशन एक्ट। इसके अनुसार रिजर्वेशन्स में मूल निवासियों को जमीन खरीदने और ऋण लेने का अधिकार दिया गया।

1950 तथा 1960 के दशकों में सरकारी नीति-1950 और 1960 के दशकों में संयुक्त राज्य और कनाडा की सरकारों ने मूल निवासियों के लिए किए गए प्रावधनों को समाप्त करने पर विचार किया। उन्हें आशा थी कि इससे वे ‘मुख्य धारा में शमिल’ होंगे अर्थात् वे यूरोपीय संस्कृति को अपना लेंगे । परन्तु मूल निवासी ऐसा नहीं चाहते थे। 1954 में अनेक मूल निवासियों ने अपने द्वारा तैयार किए गए ‘डिक्लेरेशन आफ इंडियन राइट्स’ में इस शर्त के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिकता स्वीकार की कि उनके रिजर्वेशन्स वापस नहीं लिए जाएंगे और उनकी परम्पराओं में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। कुछ ऐसी ही चीजें कनाडा में भी हुई।

1969 में सरकारी नीति-1969 में सरकार ने घोषणा की कि वह “आदिवासी अधिकारों को मान्यता नहीं देगी।” मूल निवासियों ने इसका डटकर विरोध किया। उन्होंने जोरदार प्रदर्शन किए तथा धरने दिए। 1982 में एक संवैधानिक धारा के अनुसार मूल निवासियों के वर्तमान आदिवासी अधिकारों तथा समझौता-आधारित अधिकारों को स्वीकृति मिलने पर ही इस समस्या का समाधान हो सका । परन्तु इन अधिकारों की बारीकियों के बारे में अभी भी बहुत से निर्णय बाकी हैं। भले ही अब दोनों देश के मूल निवासियों कि संख्या 18वीं शताब्दी की तुलना में बहुत कम हो गई है तो भी उन्होंने अपने सांस्कृतिक अधिकारों की जबरदस्त दावेदारी की है।

प्रश्न 2.
ब्रिटेन ने ऑस्ट्रेलिया में किस प्रकार अपने कैदियों को स्थायी रूप से बसा दिया? यूरोपीय बस्ती के रूप में ऑस्ट्रेलिया के आर्थिक विकास पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश आम्भिक आबादकार इंगलैंड के कैदी थे जो वहाँ निर्वासित होकर आए थे। उनके कारावास की अवधि पूरी होने पर ब्रिटेन वापस न लौटने की शर्त पर उन्हें ऑस्ट्रेलिया में ही स्वतन्त्र जीवन जीने की अनुमति दे दी गई। अपने जीवनयापन के लिए उन्होंने खेती के लिए ली गई जमीन से मूल निवासियों को निकाल बाहर किया।

ऑस्ट्रेलिया का आर्थिक विकास-यूरोपीय बस्ती के रूप में ऑस्ट्रेलिया के आर्थिक विकास में अमेरिका जैसी विविधता नहीं थी। वहाँ एक लम्बे समय के बाद ही भेड़ों के विशाल फार्मों, खानों, मदिरा बनाने के लिए अंगूर के बागों और गेहूँ की खेती का विकास हो सका, जिसमें काफी श्रम लगा। ये ऑस्ट्रेलिया की सम्पन्नता का आधर बने। जब राज्यों को आपस में मिलाया गया और 1911 में ऑस्ट्रेलिया की एक नई राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया, तब इस राजधानी का नाम ‘चूलव्हीटगोल्ड’ (Woolwheat gold) रखने का सुझाव दिया गया था। परन्तु ‘अन्त में उसका नाम कैनबरा रखा गया जो एक स्थानीय शब्द कैमबरा (kamberra) से बना है जिसका अर्थ है ‘सभा-स्थल’।

ऑस्ट्रेलिया के कुछ मूल निवासियों को खेतों में काम पर लगाया गया था। वे दासों जैसी कठोर परिस्थितियों में काम करते थे। बाद में चीनी अप्रवासियों ने सस्ता श्रम जुटाया; जैसे कि कैलिफोर्निया में हुआ था। परन्तु गैर-गोरों पर बढ़ती हुई निर्भरता से उत्पन्न घबराहट के कारण चीनी अप्रवासियों को प्रतिबन्धित कर दिया गया। 1974 तक लोगों के मन में, यह भय घर कर गया था कि दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के ‘काले’ लोग बड़ी संख्या में ऑस्ट्रेलिया आ सकते हैं। अत: ‘गैर-गोरों’ को बाहर रखने के लिए सरकार ने एक विशेष नीति अपनाई।

प्रश्न 3.
‘दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस क्या थी? इसने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की संस्कृति तथा परम्पराओं को पुनर्जीवित करने में कैसे सहायता पहुँचाई?
उत्तर:
1963 में एक मानवशास्त्री डब्ल्यु. ई. एच. स्टैनर के एक व्याख्यान से लोगों में बिजली की तरंग सी दौड़ गई। व्याख्यान का शीर्षक था-‘दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस’ (महान् ऑस्ट्रेलियाई चुप्पी)। यह चुप्पी इतिहासकारों की मूल निवासियों के बारे में चुप्पी थी। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के इतिहास तथा संस्कृति के प्रति पूरी तरह चुप्पी साध ली थी। 1970 के दशक में उत्तरी अमेरिका की तरह यहाँ भी मूल निवासियों को एक नए रूप में समझने की चाहत उत्पन्न हो गई।

उन्हें विशिष्ट संस्कृतियों वाले समुदायों तथा प्रकृति एवं जलवायु को समझने में सहायक विशिष्ट पद्धतियों का रूप माना गया। अब उन्हें ऐसे समुदायों के रूप में समझा जाना था, जिनके पास अपनी कथाओं, कपड़ासाजी, चित्रकारी तथा हस्तशिल्प के कौशल का विशाल भंडार था। उनका यह भंडार सराहना; सम्मान तथा अभिलेखन के योग्य था। इन सबकी तह में एक जरूरी प्रश्न भी था। यह प्रश्न आगे चलकर हेनरी रेनॉल्डस ने अपनी प्रभावशाली पुस्तक, ‘व्हाइ वरंट वी टोल्ड?’ में सामने रखा । इस पुस्तक में ऑस्ट्रेलियाई इतिहास लेखन की उस प्रथा की भर्त्सना की गई थी, जिसमें वहाँ के इतिहास का आरम्भ कैप्टन कुक की खोज से माना जाता था।

ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की संस्कृतियों का अध्ययन – तब से मूल निवासियों की संस्कृतियों का अध्ययन करने के लिए विश्वविद्यालयों में विशेष विभागों की स्थापना की गई है। आर्ट गैलरीज में देसी कलाओं की गैलरीज शामिल की गई हैं। संग्रहालयों में देसी संस्कृति को समझाने वाले कल्पनाशील तरीके से बनाए गए कमरों को स्थान दिया गया है। अब मूल निवासियों ने स्वयं भी अपने जीवन-इतिहास को लिखना आरम्भ कर दिया है। यह सब एक अद्भुत प्रयास है। यह प्रयास समय रहतें शुरू हो गया है। यदि मूल निवासियों की संस्कृतियों की अनदेखी होती रहती तो इस समय तक उनका बहुत कुछ भुला दिया गया होता।

1974 से ऑस्ट्रेलिया की राजकीय नीति बहुसंस्कृतिवादी रही है। इस नीति के अनुसार ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की संस्कृतियों और यूरोप तथा एशिया के अप्रवासियों को संस्कृतियों को समान आदर दिया गया है। नयी दुनिया के देशों को यूरोपवासियों द्वारा दिए गए नाम।

‘अमेरिका’ – यह नाम पहली बार अमेरिगो वेसपुकी (1451-1512) का यात्रा-वृत्तांत छपने के बाद प्रयोग में आया।
‘कनाडा’ – कनाडा में निकला शब्द (1535 में खोजी जाक कार्टियर को मिली जानकारी के अनुसार, यूरों-इरोक्यूइम की भाषा में कनाटा का अर्थ था, ‘गाँव’).
‘ऑस्ट्रेलिया’ – महान् दक्षिणी महासागर में स्थित भूमि के लिए सोलहवीं सदी में प्रयुक्त नाम।
‘न्यूजीलैंड’ – हॉलैंड के तासमान द्वारा दिया गया नाम, जिसने सबसे पहले 1642 में इन टापुओं को देखा था। डच भाषा में ‘समुद्र’ को ‘जी’ कहते हैं।

प्रश्न 4.
उत्तरी अमेरिका में मानव के आगमन तथा उपनिवेशीकरण से पूर्व उनकी जीवन-शैली की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
मानव का आगमन – उत्तरी अमेरिका के सबसे पहले निवासी 30,000 साल पहले बेरिंग स्टेट्स के आर-पार फैले भूमि-सेतु के मार्ग से एशिया से आए थे। लगभग 10,000 साल – पहले वे आगे दक्षिण की ओर बढ़े। अमेरिका में मिलने वाली सबसे पुरानी मानव कृति-एक तीर की नोक है, जो 11,000 साल पुरानी है। लगभग 5000 साल पहले जलवायु में स्थिरता आयी और उत्तरी अमेरिका की जनसंख्या बढ़ने लगी।

जीवन – शैली-यहाँ के लोग नदी घाटी के साथ-साथ बने गाँवों में समूह बनाकर रहते थे। वे मछली और मांस खाते थे और सब्जियाँ तथा मक्का उगाते थे। वे प्रायः मांस की तलाश में लम्बी यात्राएँ करते थे। मुख्य रूप से उन्हें ‘बाइसन’ अर्थात् उन जंगली भैंसों की तलाश रहती थी, जो घास के मैदानों में घूमते रहते थे। परन्तु वे उतने ही जानवर मारते थे, जितने उन्हें भोजन के लिए आवश्यक होते थे।

ये लोग लोभी नहीं थे। वे बड़े पैमाने पर खेती नहीं करते थे। न ही वे अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन करते थे। इसलिए वे केन्द्रीय तथा दक्षिणी अमेरिकी की तरह राज्य और साम्राज्य स्थापित न कर सके। उन्हें भूमि पर नियन्त्रण की कोई चिन्ता नहीं थी क्योंकि वे उससे मिलने वाले भोजन और आश्रय से ही सन्तुष्ट रहते थे। इसलिए भूमि को लेकर कबीलों के बीच बहुत कम ही झगड़े होते थे। औपचारिक सम्बन्ध स्थापित करना, मित्रता करना तथा उपहारों का आदान-प्रदान करना उनकी परम्परा थी।

उत्तरी अमेरिका में अनेक भाषाएँ बोली जाती थौं । लोगों का विश्वास था कि समय की गति चक्रीय है। प्रत्येक कबीले के पास अपनी उत्पत्ति और इतिहास के बारे में ब्योरे थे, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते रहते थे। वे कुशल कारीगर थे और खूबसूरत कपड़े बुनते थे। उन्हें भूदृश्यों तथा जलवायु की भी पूरी जानकारी थी।

प्रश्न 5.
संयुक्त राज्य अमेरिका के मूल निवासियों की अपनी जमीनों से बेदखली की समस्या की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए। चिरोकी कबीले का विशेष रूप से उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका में यूरोपियों ने अपनी बस्तियों के विस्तार के लिए खरीदी गई जमीन से वहाँ के मूल निवासियों को हटा दिया। उनके साथ अपनी जमीनें बेच देने की संधियाँ की गई और उन्हें जमीन की बहुत कम कीमतें दी गईं। ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं कि अमेरिकियों ने धोखे से उनसे अधिक भूमि हथिया ली या फिर पैसा देने के मामले में हेराफेरी की।

चिरोकियों के प्रति अन्याय-उच्च अधिकारी भी मूल निवासियों की बेदखली को गलत नहीं मानते थे। जॉर्जिया इसका उदाहरण है। जॉर्जिया संयुक्त राज्य अमेरिका का एक राज्य है। यहाँ के अधिकारियों का तर्क था कि वहां के चिरोकी कबीले पर राज्य के कान तो लागू होते हैं, परन्तु वे नागरिक अधिकारों का उपभोग नहीं कर सकते।

1832 में संयुक्त राज्य के मुख्य न्यायाधीश, जॉन मार्शल ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय सुनाया। उन्होंने कहा कि चिरोकी कबीला “एक विशिष्ट समुदाय” है और उसके स्वत्वाधिकार वाले क्षेत्र में जॉर्जिया का कानून लागू नहीं होता । वे कुछ मामलों में संप्रभुसत्ता सम्पन्न हैं। परन्तु संयुक्त राज्य के राष्ट्रपति एंड्रिड जैकसन ने मुख्य न्यायाधीश की इस बात को मानने से इन्कार कर दिया और सेना के बल पर चिरोकियों को अपनी जमीन से मार भगाया। इनकी संख्या लगभग 15000 थी। उनमें से एक चौथाई अपने ‘आंसुओं की राह’ (Trail of Tears) के सफर में ही मर-खप गए। अर्थात् अपनी जमीन खो देने के दु:ख ने ही उनके प्राण ले लिए।

मूल निवासियों की जमीनें प्राप्त करने वाले लोग इस आधार पर अपने को उचित ठहराते थे कि मूल निवासी जमीन का अधिकतम प्रयोग करना नहीं जानते। इसलिए वह उनके पास रहनी ही नहीं चाहिए। वे यह कहकर भी मूल निवासियों की आलोचना करते थे कि वे आलसी हैं। इसलिए वे बाजार के लिए उत्पादन करने में अपने शिल्प-कौशल का प्रयोग नहीं करते हैं। अंग्रेजी सीखने और ‘ढंग के’ कपड़े पहनने में भी उनकी कोई रुचि नहीं है। कुल मिलाकर उनका कहना था कि वे ‘मर-खप जाने’ के ही अधिकारी हैं। खेती के लिए जमीन प्राप्त करने के लिए प्रेयरीज को साफ किया गया और जंगली भैंसों को मार डाला गया। एक फ्रांसीसी आगंतुक ने लिखा, “आदिम जानवरों के साथ-साथ आदिम मनुष्य भी लुप्त हो जाएगा।”

मूल निवासियों के रिजर्जेशंज – इसी बीच मूल निवासियों को पश्चिम की ओर खदेड़ दिया गया था। उन्हें ‘स्थायी रूप से अपनी भूमि तो दे दी गई थी, परन्तु उनकी जमीन में सीसा, सोना या तेल जैसे खनिज होने का पता चलने पर उन्हें वहाँ से भी खदेड़ दिया जाता था। प्रायः कई-कई समूहों को मूलतः किसी एक समूह के नियन्त्रण वाली जमीन में ही साझा करने के लिए बाध्य किया जाता था, जिससे उनके बीच झगड़े हो जाते थे।

मूल निवासी छोटे-छोटे प्रदेशों में ही सीमित कर दिए गए थे, जिन्हें ‘रिजर्वशंज’ (आरक्षण) कहा जाता था। ये प्रायः ऐसी जमीन होती थी, जिसके साथ उनका पहले से कोई नाता नहीं होता था। ऐसा नहीं है कि उन्होंने अपनी जमीनें बिना : किसी संघर्ष के ही छोड़ दी हों। संयुक्त राज्य की सेना को 1865 से 1890 के बीच मूल निवासियों के विद्रोहों की एक लम्बी श्रृंखला का दमन करना पड़ा था । कनाडा में 1869 से 1885 के बीच मेटिसों (यूरोपीय मूल निवासियों के वंशज) के सशस्त्र विद्रोह हुए थे। परन्तु इन लड़ाईयों के बाद उन्होंने हार मान ली थी।

प्रश्न 6.
‘गोल्ड रश’ से क्या अभिप्राय है? इसने संयुक्त राज्य अमेरिका में रेलवे के निर्माण, उद्योगों के विकास तथा खेती के विस्तार में किस प्रकार सहायता पहुँचाई?
अथवा
गोल्ड रश की अमेरिका के आर्थिक तथा राजनीतिक विस्तार में क्या भूमिका रही?
उत्तर:
यूरोपीय लोगों को इस बात की आशा थी कि उत्तरी अमेरिका में धरती के नीचे सोना है। 1840 में संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलीफोर्निया में सोने के कुछ चिह्न मिले । इसने गोल्ड रश को जन्म दिया। गोल्ड रश उस आपाधापी का नाम है, जिसमें हजारों की संख्या में यूरोपीय लोग सोना पाने की आशा में अमेरिका जा पहुंचे।

रेलवे का निर्माण – गोल्ड रश को देखते हुए पूरे महाद्वीप में रेलवे-लाइनों का निर्माण किया गया। इसके लिए हजारों चीनी श्रमिकों की नियुक्ति की गई। संयुक्त राज्य अमेरिका में रेलवे का काम 1870 में और कनाडा की रेल्वे का काम 1885 में पूरा हुआ। स्कः सैंड से आने वाले एक अप्रवासी एंड्रिड कानेगी ने कहा था-“पुराने राष्ट्र घोंघे की चाल से सरकते हैं। नया गणराज्य किसी एक्सप्रेस की गति से दौड़ रहा है।

उद्योगों का विकास-गोल्ड रश ने केवल संयुक्त राज्य अमेरिका में ही नहीं अपितु पूरे उत्तरी अमेरिका में उद्योगों के विकास में सहायता पहुँचाई । उत्तरी अमेरिका में उद्योगों के विकसित होने के दो मुख्य उद्देश्य थे।

विकसित रेलवे का साज-सामान बनाना, ताकि दूर-दूर के स्थानों को तीव्र परिवहन द्वारा जोड़ा जा सके।
ऐसे यन्त्रों का उत्पादन करना, जिनसे बड़े पैमाने पर खेती की जा सके।

संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा दोनों जगहों पर औद्योगिक नगरों का विकास हुआ और कारखानों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई।- 1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका का अर्थतन्त्र अविकसित अवस्था में था। परन्तु 1890 तक यह संसार की अग्रणी औद्योगिक शक्ति बन चुका था।

खेती का विस्तार – बड़े पैमाने की खेती का भी विस्तार हुआ। बड़े-बड़े इलाके साफ किए गए और उन्हें खेतों में बदल दिया गया। 1890 तक जंगली भैंसों का लगभग पूरी तरह सफाया कर दिया गया। इस प्रकार शिकार वाली जीवनचर्या भी समाप्त हो गई। 1892 में संयुक्त राजनीतिक विस्तार राज्य अमेरिका का महाद्वीपीय विस्तार पूरा हो गया। तब तक प्रशान्त महासागर और अटलांटिक महासागर के बीच का क्षेत्र विभिन्न राज्यों में विभाजित किया जा चुका था।

अब कोई ‘फ्रॉटयर’ नहीं रहा था, जो कई दशकों तक यूरोपीय आबादकारों को पश्चिम की ओर खींचता रहा था। अब संयुक्त राज्य अमेरिका हवाई और फिलिपींस में अपने उपनिवेश बसा रहा था। इस प्रकार वह एक साम्राज्यवादी शक्ति बन चुका था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कनाडाई राज्यों के महासंघ का निर्माण कब हुआ?
(क) 1667
(ख) 1767
(ग) 1867
(घ) 1967
उत्तर:
(ग) 1867

प्रश्न 2.
नश्तत्वशास्त्र का विकास कहाँ हुआ था?
(क) इंग्लैंड में
(ख) जर्मनी में
(ग) फ्रांस में
(घ) पोलैंड में
उत्तर:
(ग) फ्रांस में

प्रश्न 3.
जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने अमेरिकी फ्रन्टियर किस रूप में देखा है?
(क) पूँजीवादी यूरोपिया
(ख) समाजवादी यूरोपिया
(ग) जमाखोर
(घ) दानी
उत्तर:
(क) पूँजीवादी यूरोपिया

प्रश्न 4.
सिडनी कहाँ स्थित है?
(क) उत्तरी अमेरिका में
(ख) दक्षिण अमेरिका में
(ग) पुर्तगाल में
(घ) आस्ट्रेलिया में
उत्तर:
(घ) आस्ट्रेलिया में

प्रश्न 5.
आस्ट्रेलिया के मूल निवासी कहाँ से आये थे?
(क) न्यूगिनी
(ख) तस्मानिया
(ग) सिडनी
(घ) न्यु साउथवेल्स
उत्तर:
(क) न्यूगिनी

प्रश्न 6.
आस्ट्रेलिया को किस यूरोपीय देश ने अपना उपनिवेश बनाया?
(क) फ्रांस
(ख) पुर्तगाल
(ग) इंगलैंड
(घ) स्पेन
उत्तर:
(ग) इंगलैंड

प्रश्न 7.
उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों ने अपना इतिहास लिखना कब आरम्भ किया?
(क) 1840
(ख) 1860
(ग) 1740
(घ) 1960
उत्तर:
(ग) 1740

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में किसके लिए सेटलर शब्द का प्रयोग नहीं हुआ?
(क) डच
(ख) पुर्तगाली
(ग) ब्रिटिश
(घ) यूरोपीय
उत्तर:
(ख) पुर्तगाली

प्रश्न 9.
कनाडा का एक महत्त्वपूर्ण उद्योग क्या है?
(क) मत्स्य उद्योग
(ख) फर्न उद्योग
(ग) लौह उद्योग
(घ) टीन उद्योग
उत्तर:
(क) मत्स्य उद्योग

प्रश्न 10.
किसी स्थान का बाशिंदा कौन है?
(क) जहाँ उसे वोट देने का अधिकार हो
(ख) जहाँ से उसे जीविका मिले
(ग) जहाँ उसके माता पिता रहते हो
(घ) जहाँ वह पैदा हुआ हो
उत्तर:
(घ) जहाँ वह पैदा हुआ हो

प्रश्न 11.
चिरोकी उत्तरी अमेरिका एक्ट कब बना?
(क) हवाई जहाज
(ख) जीप
(ग) काक
(घ) बाल कटाई
उत्तर:
(ख) जीप

प्रश्न 12.
यूरोपीय उत्तरी अमेरिका से क्या खरीदना चाहते थे?
(क) गेहूँ
(ख) सुअर
(ग) मछली और रोएदार खाल
(घ) मक्खन
उत्तर:
(ग) मछली और रोएदार खाल

प्रश्न 13.
कनाडा इन्डियन्स एक्ट कब बना?
(क) 1691
(ख) 1791
(ग) 1876
(घ) 1991
उत्तर:
(ग) 1876

प्रश्न 14.
संयुक्त राज्य अमेरिका की कौन-सी सरहद (फ्रंटियर) खिसकती रहती थी?
(क) पूर्वी
(ख) पश्चिमी
(ग) उत्तरी
(घ) दक्षिणी
उत्तर:
(ख) पश्चिमी

प्रश्न 15.
प्रेयरी चरागाह कहाँ था?
(क) उत्तरी अमेरिका में
(ख) दक्षिणी अमेरिका में
(ग) आस्ट्रेलिया में
(घ) इंगलैंड में
उत्तर:
(क) उत्तरी अमेरिका में

प्रश्न 16.
उत्तरी अमेरिका के आबादकार (सेटलर) कहाँ से दास खरीदते थे?
(क) दक्षिणी अमेरिका से
(ख) अफ्रिका से
(ग) पुर्तगाल में
(घ) दक्षिणी एशिया से
उत्तर:
(ख) अफ्रिका से

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 8 बहुत दिनों के बाद

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 8 बहुत दिनों के बाद (नागार्जन)

 

बहुत दिनों के बाद पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

बहुत दिनों के बाद कविता का सारांश Bihar Board Class 11th प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद कवि ने क्या देखा और क्या सुना?
उत्तर-
‘बहुत दिनों के बाद’ घुमक्कड़ कवि की देशज प्रकृति और घरेलू संवेदना का एक दुलर्भ साक्ष्य प्रस्तुत करती है। घुमक्कड़ प्रवृत्ति का होने के कारण बहुत दिनों के बाद कवि अपने ग्रामीण वातावरण में आकर पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान देखकर आह्वादित हो जाता है। का धान कूटती किशोरियों की कोकिल-कंठी तान सुनकर मंत्र-मुग्ध हो जाता है। उसका जन अ। . उल्लसित हो जाता है।

बहुत दिनों के बाद कविता का भावार्थ Bihar Board Class 11th प्रश्न 2.
कवि ने अपने गाँव की धूल को क्या कहा है? और क्यों?
उत्तर-
कवि नागार्जुन ने अपने गाँव की धूल को चन्दनवर्णी कहा है। ऐसा कहने के पीछे कवि का आशय है कि जिस तरह चन्दन स्निग्धता, सुगंध और शीतलता देता है। ठीक उसी तरह कवि के गाँव की धूल जिसका रंग चंदन की तरह ही है, जिससे ऐसी सोंधी महक आ रही है, उसका स्पर्श चन्दवत्, स्निग्ध और शीतलता प्रदान कर रहा है।

बहुत दिनों के बाद कविता की व्याख्या Bihar Board Class 11th प्रश्न 3.
कविता में ‘बहुत दिनों के बाद’ पंक्ति बार-बार आयी है। इसका क्या औचित्य है? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर-
घुमक्कड़ी प्रवृत्ति का होने के कारण कवि ‘बहुत दिनों के बाद’ अपने गाँव का उल्लासपूर्ण वातावरण देखकर मंत्र-मुग्ध है। प्राकृतिक विपदाओं से त्रस्त मिथिलांचल में हरियाली देखकर कवि का हृदय कल्पना को ऊँची उड़ान भरने लगता है। बहुत दिनों के बाद कवि को पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान तथा धान कूटती नवयौवनाओं की सुरीली तान सुनने को मिलता है। मौलसिरी के ताजे-टटके फूल के सुवास कवि के नासारन्ध्रों में समाती है। प्रकृति की मेहरबानी से गन्ने, ताल-मखाना की हरी-भरी फसलें लहलहाते हुए देखकर कवि ताल-मखाना खाता है और गन्ना चूसता है।

प्राकृतिक विपदाओं से त्रस्त मिथिलांचल प्राय: उजार-बियावान-सा दिखाई पड़ता था। प्रकृति की असीम कृपा से बहुत दिनों के बाद कवि को गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ भोगने का अवसर प्राप्त हुआ है। कवि कहना चाहता है कि उजड़े उपवन में फिर से हरियाली छा गई है, प्रायः बाढ़ के प्रकोप से आच्छादित भूमि को स्पर्श करने का अवसर भी उसे बहुत दिनों के बाद मिलता है। लंबी इन्तजारी के बाद मिलने वाली ग्रामीण परिवेश का सच्चा सुख मिलना ‘सुख’ के महत्व में चार-चाँद लगा दिया है।

बहुत दिनों के बाद कविता Bihar Board Class 11th प्रश्न 4.
पूरी कविता में कवि उल्लसित है। इसका क्या कारण है?
उत्तर-
‘बहुत दिनों के बाद’ शीर्षक कविता घुमक्कड़ कवि नागार्जुन की देशज प्रकृति और घरेलू संवेदनाओं का एक दुर्लभ साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कवि बहुत दिनों के बाद पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान जी-भर देखता है। धान के उपज की प्रचुरता से कोकिल कंठी नवयौवन द्वारा धान कूटते हुए मधुर संगीत फिजाँ में फैला हुआ है जिसे सुनकर कवि मंत्र-मुग्ध हो जाता है। मौलसिरी के ताजे-टटके फूल भी सूंघने को मिलती है।

साथ-ही-साथ चंदनवर्णी धूल को भी अपने तिलक के रूप में माथे पर लगाने का अवसर प्राप्त होता है। कवि का हृदय गाँव की खुशहाली से आह्वादित है। वह जी-भर ताल-मखाना खाता है और गन्ने भी जी-भर चूसता है। कवि को गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब अपनी जन्मभूमि पर साथ-साथ प्राप्त हो जाता है। इस मनोहर तथा मन को आह्वादित करने वाले प्रकृति के मनोरम दृश्य को देखकर कवि भवविभोर हो जाता है। उसका हृदय उल्लास से भर जाता है।

Bahut Dino Ke Baad Kavita Question Answer Bihar Board Class 11th प्रश्न 5.
“अब की मैंने जी-भर भोगे गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भू पर” इन पंक्तियों का गर्भ उद्घाटित करें।
उत्तर-
प्रतिबद्ध मार्क्सवादी, सहृदय साहित्यसेवी कवि नागार्जुन रचित कविता “बहुत दिनों के बाद” से ली गयी इन पंक्तियाँ में तृप्ति का आख्यान हुआ है। मानव जीवन मृग मरीचिका में व्यतीत हो रहा है। सुख की वांछा में व्यक्ति अपनी जड़ों से कट कर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ सारा कुछ मानव निर्मित, कृत्रिम होता है। चाँदनी होती है, चाँद नहीं होता। खूशबू आती है, फूल कागजी होते हैं, रूप मोहित करता है लेकिन मेकअप की मोटी परत चुपड़ी हुई है। भेद खुलने पर, छले जाने पर काफी दुःख होता है, क्लेष होता है और मानव मन अपनी जड़ की ओर लौटता है।

जीवन शहरों और महानगरों जैसे अजगर के गुंजलक में किस स्थिति में है, सभी जानते हैं। उगता सूरज, डूबता सूरज के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। भागमभाग लगा रहता है। इसी भागमभाग से ऊबकर, भाग कर या निजात पाकर कवि अपने प्राकृतिक परिवेश में लौटा जहाँ मौलसिरी, हर शृंगार, रातरानी, रजनीगंधा जैसे सुगंध बिखेरने वाले फूलों का सान्निध्य मिला, हृदय तृप्त हुए। प्रकृति के विभिन्न अंगों के प्रकृत रूप देखकर धूल धूसरित बालक को देखकर, धान रोपती, काटती, कूटती किशोरियों को गीत गाते देखकर मन को तृप्ति मिली।

पकी फसल की झूमती बालियों को छूने का सुख मिला। खेत-खलिहान से उठने वाली महक। भरते मंजर और चू रहे महुए की सुगंध से मन प्राण तृप्त हुए। लगा जैसे सदियों बीत गयी हो, इन सब का भोग किये हुए। पता नहीं, फिर जीवन के संघर्ष से मुक्ति मिले न मिले। इसलिए कवि ने इन सबका पान, भोग जी भर कर किया।

बहुत दिनो के बाद कविता Bihar Board Class 11th प्रश्न 6.
इस कविता में ग्रामीण परिवेश का कैसा चित्र उभरता है?
उत्तर-
मार्क्सवादी विचार के कवि नागार्जुन द्वारा रचित कविता “बहुत दिनों के बाद” शीर्षक कविता में ग्रामीण परिवेश अपनी पूर्ण वस्तुवाचकता और गुणवाचकता के साथ उपस्थित है। उत्तर बिहार के नेपाल से सटे मिथिलांचल जिसे ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, में ही बाबा नागार्जुन का गाँव है, जवार है, अपना परिवेश है। यहाँ धान की पकी सुनहली फसल से भरे खेत हैं। धान से चावल निकलाने के लिए श्रमसाध्य उद्योग है और इसी से जुड़ा है श्रम परिहार हेतु “धान कूटनी” का गीत।

वस्तुतः अकृत्रिम अकृत्रिम ग्रामीण परिवेश का हर उपक्रम हर गतिविधि गीत, संगीत से आबद्ध है। शहरों में फूल या तो बिकते हैं, नकली होते हैं बासी होते हैं। यहाँ मौलसिरी, हर शृंगार, रजनीगंधा, रातरानी सब ताजा टटके रूप में प्राप्त होते हैं। इन्हें तोड़ने सजाने की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है, इनके रूप-गंध में स्वयं को निमज्जित करने की। गाँवों की पक्की सड़कें हो भी तो जो मजा पगडंडियों पर स्वयं को साधते हुए चलने का, उससे उड़ती चंदन जैसी धूल में सराबोर होने का है, उसका कहना ही क्या?

शुद्ध देशी घी में भुना हुआ कुरकुराता ताल मखाना खाने का और खेत से ताजे गन्ने तोड़कर अपने दाँतों-जबड़ों से उसे चीर चूस कर आस्वाद लेने का आनंद तो गाँव में ही मिलेगा। जहाँ सब कुछ उपलब्ध है बिना पैसे के, केवल प्यार के दो मीठे बोल खर्च करने पड़ते हैं। ऐसा ही है नागार्जुन का ग्रामीण परिवेश।

बहुत दिनों के बाद नागार्जुन Bihar Board Class 11th प्रश्न 7.
“धान कूटनी किशोरियों की कोकिल-कंठी तान” में जो सौन्दर्य चेतना दिखलाई पड़ती है, उसे स्पष्ट करें।
उत्तर-
अपने गाँव से गहरे जुड़े सरोकर रखनेवालं वैताली कवि नागार्जुन ग्रामीण सौंदर्य के सूक्ष्म द्रष्टा, पारखी और प्रस्तोता हैं।

धान कूटने के लिए ओखल-मूसल या फिर ढेकुली का प्रयोग होता है। ओखल धान रखकर बार-बार मूसल को बीच से पकड़ते हुए हाथ को शिर के ऊपर तक उठाना फिर कुछ झुकतं हुए धान पर प्रहार करना। चूड़ियों की खनखन, आपस में चूहल करती किशोरियों, नारियों और उनके गले से निकले ग्राम्य गीत के बोल, लगे जैसे किसी अमराई में कोयल पंचम का आलाप ले रही हो। यह सारा वातावरण ऐन्द्रिक, चाक्षुष और घ्राण बिम्बों को कोलाज़, प्रस्तुत करता है। कवि का कथन संक्षिप्त है किन्तु उसका सौन्दर्य अति सचेत, चेतनायुक्त और प्रभावी है।

Bahut Dinon Ke Bad Bihar Board Class 11th प्रश्न 8.
कविता में जिन क्रियाओं का उल्लेख है वे सभी सकर्मक हैं। सकर्मक क्रियाओं का सुनियोजित प्रयोग कवि ने क्यों किया है?
उत्तर-
देशज प्रकृति और घरेलू संवेदना के ध्वजावाहक प्रकृतिप्रेमी कविवर नागार्जुन ने चिंतन रचना, आचरण के धरातल पर बैठकर जनहित से संबंधित विषयों को कविता के माध्यम से उद्घाटित किया है। कवि के अनुसार शहरी जीवन के सीलन-भरी जिन्दगी की अपेक्षा प्रकृति की उन्मुक्त वातावरण, ग्रामीण परिवेश, सहज, सरस तथा आनन्ददायक होता है। इसकी बोधगम्यता ‘सकर्मक क्रिया’ के सुनियोजित प्रयोग करने में सहज और स्वाभाविक द्रष्टव्य होती है। पात्रों के कार्यों में जीवंतता प्रदान करने के लिए सार्थक क्रियाओं का प्रयोग करना कवि की कल्पना को। यथार्थ से दृढ़तापूर्वक संवेदित करता है।

बहुत दिनों के बाद Bihar Board Class 11th प्रश्न 9.
कविता के हर बंद में एक-एक ऐन्द्रिय अनुभव का जिक्र है और अंतिम बंद में उन सबका सारा-समवेत कथन है। कैसे? इसे रेखांकित करें।
उत्तर-
“बहुत दिनों के बाद” शीर्षक कविता के हर बंद में एक ऐंद्रिय अनुभव है। हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं, जिनके माध्यम से सृष्टि का वस्तुमय साक्षात्कर होता है।

प्रथमबंद में पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान देखने का, दूसरे बंद में धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान सुनने का, तीसरे बंद में मौलसिरी के ताजे टटके फूल सूंघने का, चौथे बंद में गवई पगडंडी के चन्दनवर्णी धूल का स्पर्श करने का, पाँचवें बंद में ताल मखाना खाने और गन्ना चूसने का ऐन्द्रिय अनुभव वर्णित है और अंतिम बंद में भोगने शब्द कार प्रयोग करते हुए कवि ने समवेत ढंग से ऊपर के ही ऐन्द्रिय अनुभवों को सान्द्रित रूप से प्रस्तुत किया है। गंध का संबंध नाक से, रूप का आँख से, रस का जीभ से, शब्द का कान से, स्पर्श का त्वचा से, अनुभव का भोग होता है। अतः अंतिम बंद ऐन्द्रिय अनुभवों का सारांश ही है।

बहुत दिनों के बाद भाषा की बात

Bahut Dino Ke Baad Poem In Hindi Question Answer प्रश्न 1.
कोकिलकंठी, चंदनवी में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर-
कोकिलकंठी और चंदनवर्णी में रूपक और उदाहरण अलंकार प्रयोग भेद से उपस्थित है।

Bahut Dino Ke Baad Kavita Bihar Board Class 11th प्रश्न 2.
‘मैंने’ सर्वनाम के किस भेद के अंतर्गत है?
उत्तर-‘
मैंने’ सर्वनाम पुरुषवाचक सर्वनाम के अन्तर्गत उत्तम पुरुष के अंतर्गत आता है जिसका कारक ‘कर्ता’ है। मैंने का प्रयोग भूतकाल के निम्न भेदों में आते हैं।

सामान्य भूत-मैंने पुस्तक पढ़ी।
आसन्न भूत-मैंने पुस्तक पढ़ी है।
पूर्ण भूत-मैंने पुस्तक पढ़ी थी।

वैसे पंजाब-हरियाणा में मैंने का प्रयोग वर्तमान काल में होता है, जहाँ इसका अर्थ मुझे, मुझको लिया जाता है।

मैंने खाना है (मुझे खाना है)।

Bahut Dino Ke Baad Poem In Hindi Bihar Board Class 11th प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों को तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज समूहों में विभक्त करें
पगडंडी, तालमखाना, गंध, मौलसिरी, टटका, फूल, मुसकान, फसल, स्पर्श, गवई, गन्ना
उत्तर-

  • तत्सम-गंध, स्पर्श
  • तद्भव-फूल, पगडंडी, मौलसिरी।
  • देशज-तालमखाना, टटका, गवई, गन्ना।
  • विदेशज-मुस्कान, फसल।।

Bahut Dinon Ke Bad Kavita Bihar Board Class 11th प्रश्न 4.
सकर्मक और अकर्मक क्रिया में क्या अंतर है? सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर-
सकर्मक क्रिया उसे कहते हैं, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की संभावना हो अर्थात् जिस क्रिया के व्यापार का संचालन तो कर्त्ता से हो, पर जिसका फल या प्रभाव किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु पर अर्थात् कर्म पर पड़े। जैसे-राम आम खाता है। जिन क्रियाओं पर व्यापार और फल कर्ता पर हो, वे अकर्मक क्रिया कहलाती है। जैसे-राम सोता है।

Bahut Din Ke Bad Bihar Board Class 11th प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के लिए प्रयुक्त विशेष्य बताइए
(i) कोकिल-कंठी,
(ii) पकी सुनहली,
(iii) गँवई,
(iv) चंदनवर्णी,
(v) ताजे-टटकी,
(vi) धान कूटती।
उत्तर-
(i) तान,
(i) फसलों,
(iii) पगडंडी,
(iv) धूल,
(v) फूल,
(vi) किशोरियाँ।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुत दिनों के बाद लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता का परिचय दीजिए।
उत्तर-
नागार्जुन की यह कविता मिथिला की धरती तरौनी जो कवि की जन्मभूमि रही है, की सुरभि से सुरभित है। कवि यथार्थ का शिल्पी और रागात्मक संवेदनाओं का अमर गायक रहा है। अपने गाँव-जवार की प्रति कवि के मन में प्रगाढ़ स्नेह एवं दुलार है। ग्रामीण परिवेश की टटकी छवियों का चित्रांकन ‘बहुत दिनों के बाद’ कविता में सफलतापूर्वक किया गया है। पठित कविता में कवि की सहृदयता, सौन्दर्यानुभूति एवं विशिष्ट रागात्मक संवेदना उकेरी गई है। कवि की संवेदना मानव-जीवन के चित्रण में शहर की अपेक्षा गाँवों के प्रति अधिक उभरी है।

कवि जब रोजी-रोटी की तलाश में देश-देशान्तर की खाक छान रहा था, तब उसे अपने ग्राम ‘तरउनी’ की याद सताने लगती है। यह कविता घुमक्कड़ कवि की ग्रामीण प्रकृति और घरेलू संवेदना का दुर्लभ अहसास कराती है। ‘तरउनी’ मिथिला का एक अदना-सा गाँव है, इस गाँव का अदना कवि यहाँ की मिट्टी से इतना प्रभावित है कि उसे वह गाँव स्वर्ग-तुल्य लगता है। यह कविता उनकी ‘सतरंगे पंखों वाली’ काव्यकृति में संकलित है। कृति का प्रकाशन 1950 ई. में हुआ था।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद कवि ने किस वस्तु को देखकर आँखों का सुख प्राप्त किया? .
उत्तर-
पकी सुनहली फसलों की मुस्कान को देखकर।

प्रश्न 2.
बहुत दिनों के बाद कवि को क्या सुनने का सुख प्राप्त हुआ?
उत्तर-
गाँव में धान कूटती हुई किशोरियों के कोकिल कंठ से निकली तान सुनकर।

प्रश्न 3.
बहुत दिनों के बाद कवि ने किस वस्तु की गन्ध का सुख प्राप्त किया?
उत्तर-
मौलश्री के ढेर सारे टटके फूलों की गन्ध का।

प्रश्न 4.
बहुत दिनों के बाद कवि ने कहाँ की धूल का स्पर्श-सुख प्राप्त किया?
उत्तर-
अपने गाँव की चन्दनवर्णी धूल को स्पर्श करने का सुख प्राप्त किया।

प्रश्न 5.
बहुत दिनों के बाद कवि ने किस वस्तु का स्वाद प्राप्त किया?
उत्तर-
ताल मखाने को खाने और गन्ने को चूसने का।

प्रश्न 6.
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में किस बात की अभिव्यक्ति हुयी है?
उत्तर-
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में सौंदर्य चेतना की अभिव्यक्ति हुयी है।

प्रश्न 7.
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में कहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन हुआ है?
उत्तर-
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में कवि नागार्जुन ने गाँव की प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किया है।

प्रश्न 8.
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कण्ठी तान में कौन-सा बिंब दिखाई पड़ता है?
उत्तर-
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कण्ठी तान में स्राय बिंब दिखाई पड़ता है।

बहुत दिनों के बाद वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद कविता के कवि हैं?
(क) नरेश सक्सेना
(ख) दिनकर
(ग) अरुण कमल
(घ) नागार्जुन
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 2.
नागार्जुन का जन्म कब हुआ था?
(क) 1911 ई०
(ख) 1813 ई०
(ग) 1907 ई०
(घ) 1905 ई०
उत्तर-
(क)

प्रश्न 3.
‘नागार्जुन’ का जन्म स्थान था
(क) बेगूसराय
(ख) मुजफ्फरपुर
(ग) दरभंगा
(घ) मोतिहारी
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 4.
‘नागार्जुन’ की कविता का नाम था
(क) बहुत दिनों के बाद
(ख) भस्मांकर
(ग) प्यासी पथराई आँखें
(घ) चंदना
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 5.
‘नागार्जुन’ का मूल नाम था
(क) वैद्यनाथ मिश्र
(ख) गोवर्धन मिश्र
(ग) सकलदेव मिश्र
(घ) जगदंबी मिश्र
उत्तर-
(क)

प्रश्न 6.
‘नागार्जुन’ की शिक्षा हुई थी
(क) बंगला में
(ख) हिन्दी में
(ग) संस्कृत में
(घ) उर्दू में
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 7.
कवि ‘नागार्जुन’ को कौन-सा जीवन पसंद था?
(क) सधुक्कड़ी
(ख) धुमक्कड़ी
(ग) शहरी
(घ) ग्रामीण
उत्तर-
(ख)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
कवि ने गाँव की धूल को ……………… कहा है।
उत्तर-
चन्दवर्णी।

प्रश्न 2.
कवि की कविता में ग्रामीण परिवेश का …………….. उभरता है।
उत्तर-
मार्मिक चित्र।

प्रश्न 3.
नागार्जुन को आधुनिक ……. कहा जाता है।
उत्तर-
कबीर।

प्रश्न 4.
नागार्जुन ने अपनी कविता में मिथिलांचल की …………….. का वर्णन किया है।
उत्तर-
अनुपम छटा।

प्रश्न 5.
बहुत दिनों के बाद कवि गाँव की पक्की सुनहली फसल को देखकर …………….. हो जाता है।
उत्तर-
आह्वादित।

प्रश्न 6.
प्राकृतिक विपदाओं से त्रस्त मिथिलांचल प्रायः …………….. दिखाई पड़ता था।
उत्तर-
उजार-वियावान।

प्रश्न 7.
लंबी इंतजारी के बाद ग्रामीण परिवेश का सच्चा सुख मिलना सुख के महत्व में ……………… लगा दिया है।
उत्तर-
चार चाँद।

प्रश्न 8.
कवि की कविता देशज प्रकृति और घेरलू संवेदनाओं का …………….. प्रस्तुत करती है।
उत्तर-
दुर्लभ साक्ष्य

प्रश्न 9.
ऐन्द्रिय आधार और स्थायी मन-मिजाज का यह कविता एक दुर्लभ और ……………… है।
उत्तर-
अद्वितीय उदाहरण।

बहुत दिनों के बाद कवि परिचय – नागार्जुन (1911-1998)

जीवन-परिचय-
नागार्जुन का जन्म 1911 ई. में बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा गाँव (उनके ननिहाल) में हुआ था। वे तरौनी के निवासी थे एवं उनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में हुई। 1936 ई. में श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म में दीक्षित जेल की यात्रा भी करनी पड़ी।

1935 में उन्होंने ‘दीपक’ (हिंदी मासिक) तथा 1942-43 में ‘विश्वबंधु’ (साप्ताहिक) पत्रिका का संपादन किया। मैथिली काव्य-संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित किए गए। 1998 ई. में उनका देहावसान हो गया।

रचनाएँ-बाबा नागार्जुन की प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं-युगधारा, प्यासी पथराई आँखें, सतरंगे पंखों वाली, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने, रत्नगर्भा, ऐसे भी हम क्या, ऐसे भी तुम क्या, पका है कटहल, मैं मिलिटरी का बूढ़ा घोड़ा, भस्मांकुर (खंडकाव्य)। मैथिली में उनकी कविताओं के दो संकलन हैं-चित्रा, पत्रहीन नग्नगाछ। बलचनमा, रतिनाथ की चाची, कुंभी पाक, उग्रतारा, जुमनिया का बाबा, वरुण के बेटे (हिंदी), पारो, नवतुरिया, बलचनमा (मैथिली) जैसे उनके उपन्यास विशेष महत्त्व के हैं।

भाषा-शैली-नागार्जुन का हिंदी और मैथिली के साथ संस्कृत पर भी समान अधिकार होने के कारण उनकी काव्य भाषा में हाँ एक ओर संस्कृत काव्य परंपरा की प्रतिध्वनि मिलती है, वहीं दूसरी ओर बोलचाल की भाषा की सहजता भी दिखाई देती हैं। उनके काव्य में तत्सम शब्दों के प्रयोग के साथ ही ग्राम्यांचल शब्दों का भी समुचित प्रयोग हुआ है। उन्होंने मुहावरों का भी समावेश अपनी कविताओं में किया है। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण शैली का सफल प्रयोग सामाजिक-विसंगतियों के चित्रण में किया है।

साहित्यिक विशेषताएँ-नागार्जुन प्रगतिवादी विचारधारा के कवि हैं। वे जनसामान्य, श्रम तथा धरती से जुड़े लोगों की बात अपनी कविताओं में कहते हैं। वे जन भावनाओं और समाज की पीड़ा को व्यक्त करते हैं। उन्होंने समाज में व्याप्त विषमताओं को देखा है, समझा है, अतः उनका वर्णन स्वाभाविक है। विषय की जितनी विराटता और प्रस्तुति की जितनी सहजता नागार्जुन के रचना संचार में है, उतनी शायद ही कहीं और हो। लोक जीवन और प्रकृति उनकी रचनाओं की नस-नस में रची-बसी है। छायावादोत्तर काल के वे अकेले कवि हैं, जिनकी कविताओं का ग्रामीण चौपाल से लेकर विद्वानों तक में समान रूप से आदर प्राप्त है। जटिल से जटिल विषय पर लिखी गई उनकी कविताएँ इतनी सहज, संप्रेषणीय और प्रभावशाली होती हैं कि वे पाठक के मानस-लोक में बस जाती हैं।

बाबा नागार्जुन कभी मार्क्सवाद की वकालत करते हैं, कभी समाज में व्याप्त शोषण का वर्णन करते हैं और कभी प्रकृति का मनोहारी वर्णन करते हैं। उनकी कविताओं में शिष्टगंभीर हास्य और सूक्ष्म चुटीले व्यंग्यों की अधिकता है।

कवि के मन में श्रम के प्रति सम्मान का भाव है। प्रकृति से भी नागार्जुन को बहुत लगाव है। बादल कवि को मृग रूप में दिखाई देता है। उसने रूपक के माध्यम से बादलों को चौकड़ी करते देखा है।

नागार्जुन संस्कृत भाषा का गंभीर ज्ञान रखते थे। अतः उनकी भाषा संस्कृत शब्दावली से युक्त है। उनकी काव्यभाषा में संस्कृत काव्य परंपरा की प्रतिध्वनि मिलती। वे प्रगतिवादी विचारध रा के कवि हैं, अतः उन्होंने बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग किया है। उनकी भाषा में सरता है, स्वाभाविकता है। उन्होंने खड़ी बोली के लोक प्रचलित रूप को अपनाया है। उनकी अभिव्यक्ति एकदम स्पष्ट, यथार्थ और ठोस है। व्यंग्य का बाहुल्य है। लोकमंगल उनकी कविता की मुख्य विशेषता है, इस कारण व्यावहारिक धरातल भी दिखाई देती है। उन्होंने विभिन्न छंदों में काव्य रचना की है और मुक्त छंद में भी। अलंकारों का आकर्षण उनमें नहीं है। आधुनिक कवियों में नागार्जुन का विशेष स्थान है।

बहुत दिनों के बाद कविता का सारांश

वर्तमान के वैताली प्रतिबद्ध मार्क्सवादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी और जनकवि बाबा नागार्जुन रचित कविता शुद्ध प्रकृति प्रेम की कविता है। जो स्वयं को खोजना चाहता है, स्वयं को परिपूर्ण ऊर्जावान और अर्थवान बनाना चाहता है। वह प्रकृति की गोद में जाता है। प्रकृति से प्रकृत रूप में मिलन की कविता है, बहुत दिनों के बाद।

आधुनिक युग संत्रास, विषाद असंतोष का पर्याय है। जीवन-यापन के लिए आपा-धापी लगी हुई गला काट प्रतियोगिता जारी है। निजता की स्थापना में निजता का छिजन, क्षरण होता जा रहा है। अपने अस्तित्व को पुनः पाने रस पूर्ण, गंध पूर्ण करने के लिए कवि कार्तिक माह में अपने मिथिलांचल स्थिति “तरौनी” गाँव आए। और उसे दूर से धान की सुनहली पकी बालियाँ झूमती मुस्कराती नजर आयीं। इन्हें देखकर कवि का मन प्रसन्न हो गया। ऐन्द्रिय भोग का एक साधन नेत्र है। जो दूर से दृश्य दिखाकर भी तृप्ति प्रदान करती है।

कवि नागार्जुन जब अपने गाँव में प्रविष्ट हुआ तो ओखल में मूसल की मार, ढेंकी की चोट के साथ कोयल-सी मधुर आवाज में गाँव की किशोरियों के गले से गाँव के गीत सुनने को मिले, कानों को भी तृप्ति प्राप्त हुई।

आगे बढ़ा तो मौलसिरी अपनी मादकता अपने अगणित फूलों के माध्यम से बिखेर रही थी। “अंजुली-अंजुली” उठाकर इन फूलों को कवि ने सूंधे, नाक की प्यास भी बूझी। गाँव की पगडंडियों पर खाली पाँव चलते हुए गाँव की मिट्टी धूल का स्पर्श सुख चंदन सुवासित सुख सम प्रतीत हुआ।

अब बारी आई षट्स की पहचान करने वाली जिह्वा की। मिथिला के ताल मखाने में और ईखों (गन्नों) में जो स्वाद है, वह ‘फाइव स्टार’ या काटिनेंटल डिसेज में कहाँ है। जिह्वा के माध्यम से पेट भी भर गया। ऐसी तृप्ति कवि को बहुत दिनों के बाद हुई। यदि वह लगातार इसी परिवेश में रहता तो शायद तब यह कविता नहीं रची जाती।

वियोग, विछोह, असंतुष्टि के कारण प्रकृति के इन उपादानों को देखने, सुनने, सुंघने, छूने और खाने का अवसर मिला। सब कुछ मुफ्त, निःशुल्क शुद्ध, सात्विक और पवित्र अवस्था में। कवि अतिम बंद में ‘भोगे’ शब्द का उपयोग करता है। कहा भी गया है “वीर भोग्य वसुन्धरा धरती” भू का प्रत्येक अवयव, घटक भोग्य है। उपयोगी है। आवश्यकता है प्रकृति के इस योगदान को स्वीकार करने का। आवश्कता है कृत्रिमता का केचुल उतारकर प्रकृत रूप में हम रहें।

‘बहुत दिनों के बाद’ कविता प्रकृति प्रेम की अपने प्रकार की अनूठी कविता है। इसमें उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकार भी सहज चले आये हैं। सम्पूर्ण कविता उल्लास का सृजन करती है। प्रकृति की ओर लौटने का आह्वान करती है।

वास्तव मे, बहुत दिनों के बाद मिथिला के घुमक्कड़ नागार्जुन की देशज प्रकृति और घरेलू संवेदना एक दुर्लभ साक्ष्य को दर्शाती है।

बहुत दिनों के बाद कठिन शब्दों का अर्थ

जी-भर-मन भर, इच्छा भर। किशोरी-नयी उम्र की लड़की। कोकिलकंठी-कोयल जैसे मीठे स्वर वाली। गवई-गाँव की। चंदनवर्णी-चंदन के रंग की। मोलसिरी (मोलिश्री)-एक बड़ा सदाबहार पेड़ जिसमें छोटे-छोटे सुगंधित फूल लगते हैं, बकुल। तालमखाना-एक मेवा जो मिथिला की ताल-तलैया में विशेष रूप से उपजाया जाता है। गन्ना-ईख। पगडंडो-कच्चा-पतला-इकहरा रास्ता। भू-पृथ्वी।

बहुत दिनों के बाद काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. बहुत दिनों के बाद ………………. साथ-साथ इस भू पर। .
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रगतिवादी कवि नागार्जुन की कविता “बहुत दिनों के बाद” से ली गयी है। कवि ने इस कविता में बहुत दिनों के बाद गाँव में रहकर विविध वस्तुओं का सुख भोगने की स्थिति का वर्णन किया है।

कवि कहता है कि बहुत दिनों के बाद इस बार गाँव में रहकर रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श का भरपूर सुख लिया। कवि ने कविता के प्रथम छन्द में पकी सुनहली फसल की मुस्कान का सुख भोगने की बात कही है जो नये सुख के अन्तर्गत आता है। अतः रूप है। दूसरे छन्द में गाँव की किशोरियों द्वारा धान कूटने के समय कोकिल कंठ से गीत गाने या मधुर वार्तालाप करने का वर्णन किया है जो श्रवण सुख का विषय है। यही शब्द है। तीसरे छन्द में मौलश्री के ताजा पुष्पों की गंध सूंघने का वर्णन है जो घ्राण सुख का विषय है अतः गन्ध है।

चौथे छन्द में गाँव की चन्दनी-माटी छूने का वर्णन है जो स्पर्श का विषय है। पाँचवें छन्द में तालमखाना खाने और गन्ने का रस चूसने का उल्लेख है जो रस के अन्तर्गत है। यह स्वाद संवेदना का विषय है। इस तरह इस छन्द में पूर्व के पाँच छन्दों में वर्णित विषयों का समाहार हो गया है। पूर्व के पाँच छन्दों में क्रमशः रूप, शब्द, गन्ध, स्पर्श और रस की व्याख्या है और इस छन्द में इन पाँचों – को सूत्र रूप में पिरो कर कहा गया है। इस तरह सूत्र शैली तथ्य-कथन के कारण ये पतियों महत्त्वपूर्ण है। कथावस्तु के आलोक में यह तत्त्व प्रकाश में आया है।