Bihar Board 12th Geography Important Questions Short Answer Type Part 2

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Bihar Board 12th Geography Important Questions Short Answer Type Part 2

प्रश्न 1.
जमशेदपुर एवं पुणे शहर के महत्त्व का उल्लेख करें।
उत्तर:
जमशेदपुर-जमशेदपुर झारखण्ड राज्य में स्वर्ण रेखा नदी के किनारे स्थित है। यहाँ भारत का सबसे बड़ा लौह-इस्पात का कारखाना है। यह कोयले की अपेक्षा लोहे की खान के निकट है। यह देश का निजी क्षेत्र का एकमात्र कारखाना है जिसे 1907 ई० में जमशेदजी टाटा द्वारा स्थापित किया गया था। यहाँ लोहे गुरुमहिसानी एवं नोआमंडी से प्राप्त होता है। कोयला झरिया के खानों से प्राप्त होता है।

पुणे-पुणे महाराष्ट्र राज्य में स्थित है। यहाँ सूती वस्त्र उद्योग काफी विकसित है। यह मुम्बई, शोलापुर औद्योगिक प्रदेश में स्थित है। यहाँ सूती वस्त्र के अलावे अनेक प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधन, खाद, दवाइयाँ, रसायन, साबुन, वनस्पति तेल, इंजीनियरिंग सामान, विद्युत उपकरण, मोटरगाड़ी, टी० वी० फ्रिज तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने का कारखाना है।

प्रश्न 2.
कोको के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
कोको के पौधा बीजों से तैयार होता है। प्रायः समतल भाग में केले के साथ ही इसकी खेती की जाती है। पौधे की कटाई-छंटाई नहीं करनी पड़ती केवल साल में दो बार छीमी तोड़नी पड़ती है। चाकू से छिलका हटाकर एक सप्ताह किण्वन करके कड़वापन दूर किया जाता है। फिर, इन्हें धूप में सुखाया जाता है। दोनों को पूँजकर ऊपर से फिर छिलका उतारकर पीसा जाता है। चाकलेट बनाने के लिए इस पाउडर को और बारीक किया जाता है। इसके अतिरिक्त इससे मक्खन निकाला जाता है जिससे दवाइयाँ और सौंदर्य प्रसाधन बनते हैं।

प्रश्न 3.
हरित रासायनिकी क्या है ?
उत्तर:
हरित रासायनिकी का मूल मंत्र है, ‘दुर्घटना से बचाव की अपेक्षा दुर्घटना की संभावना को कम करना श्रेयस्कर है।’ निरंतर विकास और प्रगति को रोकना असंभव है। जनसंख्या वृद्धि और अन्य क्रियाकलापों के विकास के साथ प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती चली जाएगी, जैसे भारत में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए विभिन्न उर्वरकों और कीटनाशकों का आँख मूंदकर प्रयोग किया गया, फलस्वरूप भूमि की उर्वरा शक्ति कम होती चली गई। अतः हरित रासायनिकी का अर्थ है, ‘उद्योगों और रासायनिक क्रियाओं का ऐसा समायोजन जिससे हानिकारक पदार्थों की उत्पत्ति न्यूनतम हो या हो ही नहीं।

प्रश्न 4.
पत्तन एवं पोताश्रय के बीच अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
पत्तन समद्री तट पर जहाजों के ठहरने के स्थान होते हैं। यहाँ पर सामान लादने उतारने की सुविधाएँ होती हैं। जबकि पोताश्रय समुद्र में जहाजों के ठहरने का प्राकृतिक स्थान है। यहाँ जहाज लहरों तथा तूफान से सुरक्षा प्राप्त करते हैं। प्राकृतिक पोताश्रय मुंबई में कृत्रिम पोताश्रय चेन्नई में है।

प्रश्न 5.
सतत पोषणीय विकास क्या है ?
उत्तर:
1960 के दशक के अंत में पश्चिमी दुनिया में पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर बढ़ती जागरूकता की सामान्य वृद्धि के कारण सतत् पोषणीय धारणा का विकास हुआ। इससे पर्यावरण पर औद्योगिक विकास के अनापेक्षित प्रभावों के विषयों में लोगों की चिंता प्रकट होती थी। 1968 में प्रकाशित एहरलिव की पुस्तक ‘द पापुलेशन बम’ और 1972 में मीकोस और अन्य द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘द लिमिट टू ग्रोथ’ के प्रकाशन ने इस विषय पर लोगों और विशेषकर पर्यावरणविदों की चिंता और भी गहरी कर दी। उस घटना के परिप्रेक्ष्य में विकास के एक नए मॉडल जिसे सतत् पोषणीय विकास कहे जाने की शुरूआत हुई।

प्रश्न 6.
भारत में घटते जल संसाधन के लिए उत्तरदायी दो कारकों का उल्लेख करें।
उत्तर:
भारत में जल संसाधन के घटने का दो प्रमुख कारण निम्नलिखित है-
(i) जल प्रदूषण – देश में उपलब्ध जल संसाधनों का तेजी से निम्नीकरण हो रहा है। देश के नदी जल में नालों के माध्यम से कृषिगत, घरेलू और औद्योगिक बहि:स्राव मिल जाते हैं, जिससे नदी जल प्रदूषित हो जाती है। इससे जल में कमी होती है।

(ii) जल के पन:चक्रण में कमी – नगरीय क्षेत्रों में पक्के मकानों एवं सड़कों के बन जाने से वर्षा जल का जमीन के अंदर रिसाव नहीं हो पाता है जिस कारण शहरी क्षेत्रों में भूमिगत जल का स्तर काफी नीचे चला गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि के विस्तार एवं औद्योगीकरण के कारण वनों का तेजी से विनाश हुआ है जिससे वर्षा का जल तेजी से बहकर नदी में चला जाता है और भूमि उसका अवशोषण नहीं कर पाता है। जिससे जल का पुनः चक्रण प्रभावित हो रहा है।

प्रश्न 7.
बारानी या वर्षा आधारित कृषि से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
बारानी या वर्षा आधारित कृषि-इसे वर्षा पर निर्भर कृषि कहते हैं। इसके अंतर्गत फसलों को केवल वर्षा का जल ही प्राप्त होता है। पश्चिम बंगाल, असोम, ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तथा अधिकांश पूर्वोत्तर राज्यों में इसी प्रकार की कृषि की जाती है। बारानी कृषि को दो भागों में बाँटा गया है-

  • शक कृषि – जहाँ वर्षा की मात्रा 75 सेमी० से कम होती है वहाँ शुष्क कृषि की जाती है। इन क्षेत्रों में शुष्कता सहन करने वाली फसल उगाई जाती है जैसे राई, बाजरा, मूंग, चना, ज्वार आदि।
  • आई कषि – जहाँ 75 सेमी० से अधिक वर्षा होती है उन क्षेत्रों में की जाने वाली कृषि आर्द्र कृषि कहते हैं। इन क्षेत्रों में अधिक पानी चाहने वाली फसल बोई जाती है, जैसे-चावल, गन्ना, जूट आदि।

प्रश्न 8.
नगरों, महानगरों एवं मेगा नगरों को परिभाषित करें।
उत्तर:
नगर – जहाँ की जनसंख्या 5,000 से अधिक हो, उसकी 25 प्रतिशत या इससे भी कम आबादी की मुख्य आजीविका कृषि न हो और अधिकांश जनसंख्या की आजीविका द्वितीय या तृतीय क्रियाकलाप हों, उसे नगर कहते हैं।

महानगर – 10 लाख से 50 लाख तक की जनसंख्या जिन नगरों में पाई जाती है उन्हें महानगर कहा जाता है। जैसे-पटना, लखनऊ, वाराणसी आदि।

मेगानगर – जिन नगरों की जनसंख्या 50 लाख से अधिक होती है उनहें विराट या मेगा नगर कहा जाता है। हमारे देश में मुम्बई और दिल्ली मेगानगर है।

प्रश्न 9.
गुच्छित एवं बिखरी बस्तियों के बीच अंतर करें।
उत्तर:
गच्छित बस्तियाँ – गुच्छित बस्तियाँ उन क्षेत्रों में मिलती है जहाँ मनुष्य सामाजिक दष्टि से अपने परे समाज के साथ मिलकर रहना पसंद करता है। उपजाऊ मिट्टी, समतल मैदानी भाग तथा पर्याप्त जलापूर्ति वाले क्षेत्र गुच्छित बस्तियों के बसाव के आदर्श क्षेत्र होते हैं। इन्हें सघन बस्तियाँ भी कहा जाता है।

बिखरी बस्तियाँ बिखरी बस्तियों में मकान एक-दूसरे से दूर-दूर बसे होते हैं, जिनका पारस्परिक संबंध कच्ची सड़कों या पगडंडियों से होता है। ऐसी बस्तियाँ सामान्यतः पहाड़ी क्षेत्रों में हैं जहाँ कृषि के लिए उपयुक्त धरातलीय अवस्थाएँ नहीं पायी जाती है।

प्रश्न 10.
बहुपक्षीय व्यापार क्या है ?
उत्तर:
बहुपक्षीय व्यापार विश्व के कई देशों के साथ वस्तु एवं सेवाओं का विनिमय है। व्यापार का प्रमुख उद्देश्य ऐसी वस्तुओं को खरीदना या बेचना होता है जिनकी आवश्यकता होती है। यदि किसी उत्पाद की माँग विदेशों में है और अपने यहाँ वह अधिक है तो निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है। व्यापार का एक पहलू यह भी है कि इससे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में प्रगाढ़ता आती है।

प्रश्न 11.
पर्यटन के कोई दो लाभों का उल्लेख करें।
उत्तर:
पर्यटन के दो लाभ निम्नलिखित हैं
(i) रोजगार – पर्यटन में लोग एक स्थान से दूसरे स्थान या एक देश से दूसरे देश में जाते हैं। इससे देश के जनसंख्या को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रोजगार के अवसर मिलते हैं। राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से भी इसका महत्त्व अधिक है।

(ii) विदेशी मुद्रा की प्राप्ति – भारतीय कलाकृतियों को विश्व में बहुत मान्यता प्राप्त है। विदेशी पर्यटकों के आकर्षण के प्रमुख स्थल गोवा, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, दक्षिण भारत के मंदिर, आगरा का ताजमहल इत्यादि हैं। यहाँ विदेशी पर्यटक घूमने आते हैं और अपने साथ यहाँ की कलाकृतियों को खरीदकर ले जाते हैं, जिससे विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।

प्रश्न 12.
लिंग संरचना से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
लिंग संरचना को लिंग पिरामिड द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। अधिकांश विकासशील देशों में लिंग पिरामिड का आधार चौड़ा तथा शीर्ष पतला होता है। इसका अभिप्राय यह है कि उच्च जन्म दर के कारण निम्न आयु वर्ग में विशाल जनसंख्या पायी जाती है। विकसित देशों में पिरामिड के आधार तथा मध्य की मोटाई लगभग एक जैसी होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जन्म दर कम होने के कारण बच्चों एवं मध्य आयु वर्ग के लोगों की संख्या लगभग समान है। पिरामिड का संकीर्ण आधार और शुंडाकार शीर्ष निम्न जन्म और मृत्यु दरों को दर्शाता है। इन देशों में जनसंख्या वृद्धि शून्य अथवा ऋणात्मक होती है।

प्रश्न 13.
कृषि घनत्व क्या है ?
उत्तर:
कृषि घनत्व का अर्थ एक ही खेत में एक कृषि वर्ष में उगाई गई फसलों की संख्या बोए गए शुद्ध क्षेत्र के प्रतिशत के रूप में सकल फसलगत क्षेत्र में शस्य गहनता की माप को प्रकट करता है। कृषि घनत्व को ज्ञात करने का सूत्र है सकल फसलगत क्षेत्र
Bihar Board 12th Geography Important Questions Short Answer Type Part 2, 1
कृषि घनत्व मिजोरम की 100 प्रतिशत से लेकर पंजाब की 189 प्रतिशत के मध्य बदलती रहती है। सिंचाई कृषि घनत्व का प्रमुख निर्धारक तत्व है। जनसंख्या घनत्व का दबाव भी शस्य घनत्व को प्रभावित करता है।

प्रश्न 14.
जीवन निर्वाहक कृषि क्या है ?
उत्तर:
अधिक जनसंख्या वाले भागों की कृषि होने के कारण इस प्रकार की कृषि के अंतर्गत ऐसी उपज पैदा की जाती है जिसमें अधिक-से-अधिक श्रम का उपयोग हो सके और अधिक उत्पादन हो सके जिससे खाद्य समस्या का समाधान हो सके। इन प्रदेशों में चावल के अतिरिक्त गेहूँ, गन्ना, जूट आदि उपज पैदा की जाती है।

इन कृषि प्रदेशों में कृषि मुख्यतः पशुओं की सहायता से की जाती है। कृषि प्राचीन काल से रूढ़िवादी क्रिया से की जाती है।
इन प्रदेशों में खेती प्राचीन ढंग से की जाती है जिस कारण इतना अधिक उत्पादन नहीं हो पाता कि उनका निर्यात किया जा सके।

प्रश्न 15.
खनिज आधारित उद्योगों से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
खनिज आधारित उद्योग वैसे उद्योग को कहा जाता है जिसका कच्चा माल भूमि के अंदर से खनिज के रूप में प्राप्त होता है। जैसे-लोहा-इस्पात उद्योग, एल्युमीनियम उद्योग इत्यादि।

प्रश्न 16.
चिकित्सा पर्यटन को परिभाषित करें।
उत्तर:
जब चिकित्सा उपचार को अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन गतिविधि से सम्बद्ध कर दिया जाता है तो इसे सामान्यतः चिकित्सा पर्यटन कहा जाता है।

प्रश्न 17.
मानव विकास से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
लोगों के विकल्पों को बढ़ाना तथा जन कल्याण के स्तर को ऊँचा उठाना ही मानव विकास है। आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास जन-कल्याण के प्रमुख पक्ष हैं। जनकल्याण से तात्पर्य मानव की चाहते जैसे-दीर्घ और स्वस्थ जीवन, शिक्षा द्वारा ज्ञान प्राप्ति तथा रहन-सहन के उच्च स्तर हैं।

प्रश्न 18.
उत्तरी भारत में सिंचाई के मुख्य साधन क्या हैं ?
उत्तर:
उत्तरी भारत में सिंचाई के प्रमुख साधन हैं-

  • नहरें
  • नलकूप
  • कुएँ और
  • तालाब

प्रश्न 19.
शुष्क कृषि किसे कहते हैं ?
उत्तर:
शुष्क कृषि सिंचाई किये बिना ही कृषि करने की तकनीक है। यह उन क्षेत्रों के लिये । उपयोगी है, जहाँ बहुत कम वर्षा होती है। इसके अंतर्गत उपलब्ध सीमित नमी को संचित करके बिना सिंचाई के ही फसलें उगायी जाती हैं। वर्षा की कमी के कारण मिट्टी की नमी को बनाये रखने तथा उसे बढ़ाने का निरन्तर प्रयास किया जाता है। इसके लिए गहरी जुताई की जाती है और वाष्पीकरण को रोकने का प्रयत्न किया जाता है। इसके अंतर्गत अल्प नमी में तथा कम समय में उत्पन्न होने वाली फसलें उत्पन्न की जाती हैं। इस प्रकार की खेती विशेष रूप से भूमध्य सागरीय प्रदेशों, अमेरिका के कोलम्बिया पठार तथा भारत में पश्चिमी राजस्थान, गुजरात और हरियाणा में की जाती है।

प्रश्न 20.
ऊर्जा के नवीनीकृत तथा अनवीनीकृत साधनों में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
नवीनीकृत साधन – यह ऊर्जा का स्रोत बार-बार काम में लाये जा सकते हैं या समाप्त नहीं होते हैं। जैसे-जल शक्ति, वायु शक्ति, सौर शक्ति या ज्वारीय शक्ति इत्यादि।

अनंवीनीकृत साधन – यह ऊर्जा का ऐसा स्रोत है जिसे एक बार ही काम में लाये जा सकते हैं अर्थात् वे क्षय (नष्ट) हो जाते हैं। जैसे-कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस इत्यादि।

प्रश्न 21.
संचार, परिवहन तथा व्यापार में क्या अंतर हैं ?
उत्तर:
संचार (Communication) – संचार के साधन एक स्थान से दूसरे स्थान को सूचना भेजते हैं और प्राप्त करते हैं। डाक सेवाओं, टेलीफोन, फैक्स, इंटरनेट, समाचारपत्रों, टेलीग्राम आदि द्वारा सूचनायें भेजी और प्राप्त की जाती हैं।

परिवहन (Transport) – परिवहन से अभिप्राय मनुष्य तथा आवश्यक उपयोगी वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने-ले जाने की प्रक्रिया है। परिवहन स्थल, जल और वायु द्वारा विभिन्न प्रकार के वाहनों द्वारा किया जाता है। कभी-कभी परिवहन के रूप में पशुओं और स्वयं मानव का उपयोग भी होता है।

व्यापार (Trade) – व्यापार बाजार के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान है। वस्तुओं के मूल्य में अंतर अथवा माँग और आपूर्ति व्यापार के लिए उत्तरदायी हैं। इस प्रकार व्यापार से अभिप्राय दो स्थानों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का प्रवाह है।

प्रश्न 22.
समुद्री जल यातायात के क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
सामुद्रिक जलमार्ग के निम्नलिखित लाभ हैं-

  • जल परिवहन एक देश से दूसरे देश के लिए भारी माल की ढुलाई का सस्ता और सरल साधन है।
  • महासागर सभी महाद्वीपों को एक-दूसरे से मिलाते हैं।
  • समुद्री परिवहन द्वारा जितना सामान एक साथ जलयानों द्वारा ढोया जा सकता है वह किसी अन्य साधन द्वारा संभव नहीं।
  • विशाल जलयानों में प्रशीतित कक्ष के बन जाने से शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं को ले जाना संभव हो गया है।
  • खनिज तेल अथवा गैस आदि को ढोने के लिए विशाल टैंकरों का उपयोग किया जा सकता है।
  • पत्तनों पर कंटेनरों के प्रयोग से सामान को उतारना या चढ़ाना आसान है।
  • आधुनिक जहाज रडार, वायरलेस आदि से सुसज्जित होते हैं। इसलिए खराब मौसम में भी रुकावट नहीं आतो!

प्रश्न 23.
बस्ती किसे कहते हैं ? यह सामान्यतया कितने प्रकार की होती है ?
अथवा, आप बस्ती को कैसे परिभाषित करेंगे ?
उत्तर:
बस्ती से अभिप्राय उस मानव अधिवास से है जिसमें एक से अधिक मकान होते हैं और जहाँ लोग सारा कार्य एक निर्मित क्षेत्र के भीतर ही करते हैं। ये सामान्यतया दो प्रकार की होती हैं-ग्रामीण तथा नगरीय बस्तियाँ।

प्रश्न 24.
स्थान एवं स्थिति के मध्य अंतर बताएँ।
उत्तर:
बस्तियों के स्थल (Settlement site)-

  1. बस्ती के स्थल से तात्पर्य उस वास्तविक भूमि से है जिस पर बस्ती विकसित हुई है।
  2. बस्ती का स्थल कोई मैदानी भाग, पहाड़ी क्षेत्र, नदी का किनारा अथवा एक तालाब या झीत हो सकता है।
  3. बस्ती का स्थल यह निर्धारित करता है कि वहाँ जल की उपलब्धता किस प्रकार होगी।

बस्तियों की स्थिति (Settlement situation)-

  1. बस्ती की स्थिति से तात्पर्य उस बस्ती के आस-पास के गाँवों के संबंध में उसकी स्थिति बताना होता है।
  2. बस्ती की स्थिति का अध्ययन प्राकृतिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक विरासत के संदर्भ में किया जा सकता है।
  3. किसी बस्ती का प्रतिरूप किसी प्रदेश विशेष के प्राकृतिक पर्यावरण का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रश्न 25.
बस्तियों के वर्गीकरण के क्या आधार हैं ?
उत्तर:
बस्तियों को विभाजित करने के आधार निम्नलिखित हैं-

  • जनसंख्या का आकार तथा
  • प्रकार्य अथवा आर्थिक आधार।

इन दो आधारों के अनुसार बस्तियाँ दो प्रकार की होती हैं-

  • ग्रामीण बस्तियाँ,
  • नगरीय बस्तियाँ।

जनसंख्या के आकार के अनुसार विश्व के सभी देशों में ग्राम और नगर को विभाजित करने का आधार अलग-अलग है। कनाडा में 1000 से कम जनसंख्या वाली बस्ती को ग्राम कहते हैं जबकि भारत में 5000 से कम जनसंख्या वाली बस्ती को ग्राम कहते हैं।

प्रकार्य के आधार पर बस्तियों की पहचान आर्थिक संरचना है। ग्रामीण बस्ती में अधिकांश जनसंख्या प्राथमिक कार्यों जैसे कृषि, मत्स्य, पशुपालन आदि में संलग्न रहती है जबकि नगरीय बस्ती की अधिकांश जनसंख्या द्वितीयक और तृतीयक व्यवसायों में संलग्न रहती है।

प्रश्न 26.
मानव भूगोल में मानव बस्तियों के अध्ययन का औचित्य बताएँ।
उत्तर:
मानव बस्तियों का अध्ययन मानव भूगोल का आधार है इसलिये मानव भूगोल में बस्तियों का अध्ययन आवश्यक हो जाता है, क्योंकि किसी विशेष प्रदेश में बस्तियों का प्रारूप मनुष्य और पर्यावरण के संबंधों को प्रदर्शित करता है। मानव बस्तियाँ वह स्थान है जहाँ मनुष्य स्थायी रूप से रहता है।

प्रश्न 27.
सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का एक कार्य के रूप में वर्तमान एवं नवीन बस्तियों के विकास पर क्या प्रभाव होगा ?
उत्तर:
अब तक नगर प्रशासन, व्यापार उद्योग, रक्षा और धार्मिक केन्द्र रहे हैं। लेकिन अब नगर सूचना संचार और तकनीक के केन्द्र बन गए हैं। इनमें से कुछ के कार्यों को नगरों की आवश्यकता नहीं है। इस तकनीक से इन नगरों का विकास होगा। अन्य कार्यों के केन्द्र बन जाएँगे। सूचना प्रौद्योगिक के कारण ये अन्य नगर तथा देशों से जुड़ जाएँगे।

प्रश्न 28.
ग्रामीण बस्तियाँ क्या हैं ?
उत्तर:
वे बस्तियाँ जो भूमि से सीधे तथा काफी नजदीकी से जुड़ी होती हैं, ग्रामीण बस्तियाँ कहलाती हैं। ग्राम किसान तथा खेतिहर मजदूरों की अधिकता वाले क्षेत्रों में विकसित होते हैं।

ग्रामीण बस्तियों में जनसंख्या नगरों की अपेक्षा कम होती है।
ग्रामीण घर अधिकतर स्थानीय सामग्री से बने होते हैं। ग्राम की अधिकतर जनसंख्या कृषि तथा पशपालन आदि कार्यों में लगी रहती है।

प्रश्न 29.
मलिन बस्तियों में क्या अभिप्राय है ? इनके कुछ उदाहरण दें।
उत्तर:
मलिन बस्ती से अभिप्राय एक ऐसे घने बसे आवासीय क्षेत्र से है, जिसमें अस्वच्छ घर होते हैं जिनमें समाज के कमजोर वर्गों के लोग रहते हैं तथा जिनमें सामाजिक विघटन की प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं। उदाहरण के लिए रांचो (वेनेजुएला), फावेला (ब्राजील) तथा बस्ती अथवा झुग्गी-झोंपड़ी (भारत)।

प्रश्न 30.
मानव स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
मानव स्वास्थ्य पर वायु-प्रदूषण का प्रभाव कई तरह से पड़ता है-

  1. वायु प्रदूषण को धूल, धुआँ, गैसों और दुर्गन्ध जैसे विषैले पदार्थों का वायु में वृद्धि के रूप में लिया जाता है।
  2. यह मानव शरीर के त्वचा को भी प्रभावित करती है।
  3. इससे स्नायुत्र, हृदय, फेफड़ा, परिसंचरण तंत्र आदि से संबंधित भी रोग होते हैं।
  4. इससे ओजोन परत भी प्रभावित हुआ है, जिससे पराबैगनी किरण पृथ्वी पर पहुंच कर मानव स्वास्थ्य को प्रभावित किया है।

प्रश्न 31.
जल-संभर प्रबंधन क्या है ?
उत्तर:
जल संभर प्रबंधन से तात्पर्य मुख्य रूप से धरातलीय अथवा भूमिगत जल संसाधनों का कुशल प्रबंधन करना है। इसके अंतर्गत बहते जल को रोकना और विभिन्न विधियों, जैसे-तालाब, अंतःस्रवण, कुओं, द्वारा भूमिगत जल को वृद्धि करना है। इस प्रबंध का मुख्य उद्देश्य वर्षा जल का संचयन करना तथा भूमिगत जल का विवेकपूर्ण प्रयोग है।

प्रश्न 32.
प्रवास के प्रतिकर्ष और अपकर्ष कारणों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रवास के प्रतिकर्ष कारक बेरोजगारी, रहन-सहन की निम्न दशाएँ, राजनीतिक उद्रिव, प्रतिकूल जलवायु, प्राकृतिक विपदाएँ, महामारियाँ तथा सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन जैसे कारण उद्गम स्थान को कम आकर्षित बनाते हैं।

प्रवास के अपकर्ष कारक काम के बेहतर अवसर और रहन-सहन की अच्छी दशाएँ, शांति व स्थायित्व, जीवन व संपति की सुरक्षा तथा अनुकूल जलवायु जैसे कारण गंतव्य स्थान को उद्गम स्थान की अपेक्षा अधिक आकर्षित करते हैं।

प्रश्न 33.
पारमहाद्वीपीय रेलमार्ग क्या होता है ?
उत्तर:
पारमहाद्वीपीय रेलमार्ग पूरे महाद्वीप से गुजरते हुए इसके दोनों छोरों को जोड़ते हैं। इनका निर्माण आर्थिक और राजनैतिक कारणों से विभिन्न दिशाओं में लम्बी यात्राओं की सुविधा प्रदान करने के लिए किया गया था।

प्रश्न 34.
सहकारी कृषि से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
जब कृषकों को एक समूह अपनी कृषि से अधिक लाभ कमाने के लिए स्वेच्छा से एक सहकारी संस्था बनाकर कृषि-कार्य सम्पन्न करे उसे सहकारी कृषि कहते हैं। इसके अंतर्गत सहकारी संस्था द्वारा सभी प्रकार के कृषि सहायता कृषकों को पहुंचाया जाता है।

प्रश्न 35.
प्रकृति का मानवीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समय परिवर्तन के साथ मानव अपने पर्यावरण और प्राकृतिक बलों को समझने लगता है। अपने सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के साथ मानव बेहतर और अधिक सक्षम प्रौद्योगिकी का विकास करते हैं। पर्यावरण से प्राप्त संसाधनों के द्वारा वे संभावनाओं को जन्म देते हैं। मानव अपने विवेक, बुद्धि व कुशल तकनीक के द्वारा पर्यावरण के विभिन्न उपागमों पर विजय प्राप्त करता जा रहा है तथा पर्यावरण की समस्याओं का सामना करते हुए अपने को ढाल रहा है। ये क्रियाएँ प्रकृति के मानवीकरण के अंतर्गत सम्मिलित होती हैं।

प्रश्न 36.
उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में जनसंख्या का वितरण कम है, क्यों ?
उत्तर:
उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में जनसंख्या का वितरण कम है। उत्तर भारत में जनसंख्या अधिक मिलने का प्रमुख कारण समतल मैदानी क्षेत्रों का विस्तार, सड़क परिवहन, रेलमार्ग का विकास, जल की उपलब्धता इत्यादि है। जबकि दक्षिण भारत मूलतः पठारी क्षेत्र है, जहाँ कृषि हेतु समतल भू-भाग का अभाव पाया जाता है। साथ ही सिंचाई सुविधा व सड़क एवं रेलमार्ग जैसे यातायात साधनों का भी विकास कम हो पाया है।

प्रश्न 37.
अंकीय विभाजन क्या है ?
उत्तर:
सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित विकास से मिलने वाले अवसरों का वितरण पूरे ग्लोब पर असमान रूप से वितरित है। देशों में विस्तृत आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक भिन्नता पाई जाती है। कोई देश कितनी शीघ्रता से अपने नागरिकों को सूचना और संचार प्रौद्योगिकी तक पहुंचाकर और उसके लाभ उपलब्ध करा सकता है। इसी को अंकीय विभाजक कहा जाता है।

प्रश्न 38.
भारत में ज्वारीय ऊर्जा की संभावनाओं को लिखिए।
उत्तर:
महासागरीय धाराओं एवं तरंगों द्वारा प्राप्त ऊर्जा ज्वारीय ऊर्जा कहलाता है। भारत के पश्चिमी तट पर वृहत ज्वारीय तरंग उत्पन्न होती है, वहीं पूर्वी तटीय क्षेत्रों में भी इस प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती हैं। भारत के अविकसित तकनीक के कारण वर्तमान समय में इससे ऊर्जा की प्राप्ति नहीं हो रही है। लेकिन भविष्य में इससे ऊर्जा की प्राप्ति की संभावना है।

प्रश्न 39.
सार्क देशों के नाम बताइये।
उत्तर:
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव सात दक्षिण एशि ई देशों ने मिलकर दक्षिण एशिया प्रादेशिक सहयोग संगठन का गठन किया है।

प्रश्न 40.
धात्विक एवं अधात्विक खनिजों में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
धात्विक एवं अधात्विक खनिज में निम्न अंतर है-

धात्विक खनिजअधात्विक खनिज
1. जिन खनिजों को पिघलाने से धातुएँ बनती हैं। जैसे –1. जिन खनिजों एवं धातुएँ नहीं होती हैं उसे  अधात्विक खनिज लोहा, तांबा आदि। कहते हैं। कोयला, नमक आदि।
2. इसकी अपनी चमक होती है।2. ये ठोस, तरलता गैसीय होते हैं।
3. ये आग्नेय और कायान्तरित शैलों में पाई जाती है।3. ये अवसादी शैल में होते हैं।
4. इनका औद्योगिक महत्व अधिक है।4. चूना-पत्थर, कोयला इसके उदाहरण हैं।
5. इनकी तार एवं चादरें बनाई जाती है।5. इनकी तार एवं छड़ें नहीं बनाई जा सकती है।

प्रश्न 41.
ट्रॉन्स साइबेरियन रेलमार्ग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
ट्रांससाइबेरियन रेलमार्ग विश्व का सबसे लम्बा रेलमार्ग है। इसकी कुछ लम्बाई 9332 है। यह पश्चिम में लेनिनग्राद को पूर्व में प्रशान्त महासागर तट पर स्थित नगर बमाड़ी बोस्टक से जोड़ता है। इस रेलमार्ग के प्रमुख स्टेशन मास्को, रयाजान, सिजराज, कुइबाईसेब, चेलियाबिसक, ओमस्क, नोवा सीबीरिक है। इसका निर्माण साइबेरिया के सामाजिक तथा आर्थिक विकास के उद्देश्य से किया गया है।

प्रश्न 42.
भारत में जनांकिकीय इतिहास को चार अवस्थाओं में बांटे।
उत्तर:
भारत के जनाकिकीय इतिहास को निम्नलिखित चार अवस्थाओं में बांटा गया है-

  1. रुद्ध अथवा स्थिर अवस्था : इसकी अवधि 1901 से 1921 ई० के बीच रही है। इस अवस्था में जनसंख्या वृद्धि अत्यन्त ही निम्न थी। अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, खाद्यान्न समस्या प्रमुख थी।
  2. स्थिर वृद्धि की अवस्था : इसकी अवधि 1921 से 1951 ई० के बीच रही है। स्वास्थ्य सुविधा में सुधार, स्वच्छता, परिवहन एवं संचार के कारण मृत्यु दर को नीचे लाया गया।
  3. विस्फोटक अवस्था : इसकी अवधि 1951 से 1981 ई० के बीच रही है। इसके अंतर्गत मृत्यु दर में तीव्र कमी तथा जन्म दर में तीव्र वृद्धि सम्मिलित है।
  4. अधोमुखी अवस्था : इसकी अवधि 1981 ई० से वर्तमान समय तक की है। इस अवस्था में जीवन की गुणवत्ता को सुधार कर जनसंख्या नियंत्रण को अपनाया गया है।

प्रश्न 43.
सांस्कृतिक नगर क्या है ?
उत्तर:
सांस्कृतिक नगर : वैसे नगर जिसका उद्भव ऐतिहासिक, धार्मिक दृष्टिकोणों से हुआ है, सांस्कृतिक नगर कहलाते हैं। जैसे-वाराणसी, हरिद्वार, मक्का, मदीना, जेरूसलम।

Bihar Board 12th History Important Questions Short Answer Type Part 2

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Bihar Board 12th History Important Questions Short Answer Type Part 2

प्रश्न 1.
‘सन्निधाता’ शब्द का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर:
मौर्यों के समय में कर निर्धारण करने वाले अधिकारी को समाहर्ता कहा जाता था, जबकि कर वसूली और संग्रह करने वाले अधिकारी को सन्निधाता कहा जाता था।

प्रश्न 2.
मौर्य साम्राज्य के चार प्रांतों और उनकी राजधानियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला।
  • प्राच्य की राजधानी पाटलिपुत्र।
  • दक्षिणापथ की राजधानी सुवर्णगिरी।
  • अति की राजधानी उज्जियनी या उज्जैन नगरी।

प्रश्न 3.
मौर्यों के राजनैतिक इतिहास के मुख्य स्रोत क्या-क्या हैं ?
उत्तर:

  • मेगास्थनीज की इंडिका(Indica of Magasthaneze) – मौर्यकालीन भारत के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिये मेगास्थनीज द्वारा रचित ‘इण्डिका’ (Indica) एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें तत्कालीन शासन व्यवस्था, समाज, राजनैतिक व आर्थिक अवस्था पर महत्वपूर्ण विवरण मिलता है।
  • कौटिल्य का अर्थशास्त्र (Kautilya’s Arthshastra) – कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी तत्कालीन भारत के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालता है जिससे मौर्यों के बारे में पता चलता है।
  • विशाखदत्त मद्राराक्षस (Vishakhdutta’s Mudraraksha) – इस प्रमुख ग्रंथ में नन्द वंश का चन्द्रगुप्त द्वारा नाश का वर्णन है।
  • जैन और बौद्ध साहित्य (Jains and Buddhists Literature)-जैन और बौद्ध दोनों धर्मों के साहित्य में तत्कालीन समाज, राजनीति आदि की जानकारी प्राप्त होती है।
  • अशोक के शिलालेख (Inscription of Ashoka) – स्थान-स्थान पर लगे अशोक के शिलालेख से भी मौर्यकालीन प्रशासन, धर्म, समाज अर्थव्यवस्था आदि पर प्रकाश पड़ता है।

प्रश्न 4.
मौर्य प्रशासन की जानकारी दें।
उत्तर:
मौर्य प्रशासन अत्यंत ही उच्च कोटि का था। राजा सर्वोपरि था। राजा का मंत्री आमात्य कहलाता था। मौर्य शासकों ने कठोर दंड का प्रावधान कर समाज को भय मुक्त प्रशासन प्रदान किया।

प्रश्न 5.
मौर्य शासकों द्वारा किये गये आर्थिक प्रयासों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • कौटिल्य ने कृषकों, शिल्पियों और व्यापारियों से वसूल किये बहुत से करों का उल्लेख किया है।
  • संभवतः कर निर्धारण का कार्य सर्वोच्च अधिकारी द्वारा होता था। सन्निघाता राजकीय कोषागार एवं भण्डार का संरक्षण होता था।
  • वास्तव में कर-निर्धारण का विशाल संगठन पहली बार मौर्य काल में देखने में आया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में करों की सूची इतनी लंबी है कि यदि वास्तव में सभी कर राजा के लिये जाते होंगे, तो प्रजा के पास अपने भरण-पोषण के लिये नाममात्र का ही बचता होगा।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में राजकीय भण्डारघर होते थे। इससे स्पष्ट होता है कि कर अनाज के रूप में वसूल किया जाता था। अकाल, सूखा तथा अन्य प्राकृतिक विपदा में इन्हीं अन्न-भण्डारों से स्थानीय लोगों को अन्न दिया जाता था।
  • मयूर, पर्वत और अर्धचंद्र के छाप वाली रजत मुद्राएँ मौर्य-साम्राज्य की मान्य मुद्राएँ थीं। ये मुद्राएँ कर वसूली एवं कर्मचारियों के वेतन के भुगतान में सुविधाजनक रहीं होंगी। बाजार में लेन-देन भी इन्हीं से होता था।

प्रश्न 6.
अशोक के अभिलेखों का संक्षेप में महत्त्व बताइए।
उत्तर:
यद्यपि मौर्यों के इतिहास को जानने के लिए मौर्यकालीन पुरातात्विक प्रमाण जैसे मूर्ति कलाकृतियाँ, चाणक्य का अर्थशास्त्र, मेगास्थनीज की इंडिका, जैन और बौद्ध साहित्य व पौराणिक ग्रंथ आदि बड़े उपयोगी हैं लेकिन पत्थरों और स्तंभों पर मिले अशोक के अभिलेख प्रायः सबसे मूल्यवान स्रोत माने जाते हैं।

अशोक वह पहला सम्राट था, जिसने अपने अधिकारियों और प्रजा के लिए संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किये हुए स्तंभों पर लिखवाये थे। अशोक ने अपने अभिलेखों के माध्यम से धम्म का प्रचार किया। इनमें बड़ों के प्रति आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार तथा दूसरे के धर्मों और परंपराओं का आदर शामिल है।

प्रश्न 7.
धर्म प्रवर्त्तिका का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
धर्म प्रवर्त्तिका का अर्थ है-धर्म फैलाने वाला अथवा धर्म का प्रचार करने वाला। कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। इस धर्म के प्रचार के लिये उसने अपना पूरा समय तथा तन-मन-धन लगा दिया। इस प्रकार वह ‘धर्म प्रवर्त्तिका’ के रूप में जाना गया।

प्रश्न 8.
मौर्योत्तर युग में भारत से किन-किन वस्तुओं का निर्यात होता था ?
उत्तर:
मौर्योत्तर युग में भारत से मसाले रोम को भेजे जाते थे। इसके अलावा मलमल, मोती, रत्न, हाथी दाँत, माणिक्य भी विदेशों में भेजे जाते थे। लोहे की वस्तुएँ, बर्तन, आदि रोम साम्राज्य को भेजे जाते थे।

प्रश्न 9.
मौर्य साम्राज्य का उदय कब और किसके द्वारा हुआ? इसमें एक प्रमुख स्थान किसके द्वारा जोड़ा गया ?
उत्तर:
मगध के विकास के साथ-साथ मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई० पू०) का शासन पश्चिमोत्तर में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था। उनके पौत्र अशोक ने जिन्हें आरंभिक भारत का सर्वप्रसिद्ध शासक माना जा सकता हैकलिंग (आधुनिक उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 10.
मौर्य साम्राज्य के विस्तार का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
मौर्यों के साम्राज्य में मध्य एशिया लाघमन (Laghman) से लेकर चोल तथा चेर साम्राज्य की सीमाओं (केरल पुत्र) सिद्ध पुत्र तक फैला हुआ है। पश्चिम में इसका विस्तार स्वार्षट से लेकर उत्तर पूर्व में बंगाल और बिहार तक फैला हुआ था। पाटलिपुत्र इनकी राजधानी थी। इन साम्राज्य के संबंध अनेक राज्यों से है। तक्षशिला, टोपरा, इंद्रप्रस्थ, कलिंग (उड़ीसा) आदि।

प्रश्न 11.
सेल्यूकस के साथ चंद्रगुप्त मौर्य के संघर्ष के क्या दो परिणाम हुए ?
उत्तर:
सेल्यूकस का चंद्रगुप्त के साथ संघर्ष 305 ई० पू० में हुआ जब उसने भारत पर आक्रमण किया था। इस संघर्ष के दो प्रमुख परिणाम अनलिखित थे-

  • सेल्यूकस की हार जिसके परिणामस्वरूप उसे चंद्रगुप्त मौर्य को वर्तमान हेरात, काबुल, कंधार और बिलोचिस्तान के चार प्रांत सौंपने पड़े।
  • चंद्रगुप्त मौर्य ने उसके बदले में सेल्यूकस को 500 हाथी भेंट किये।

प्रश्न 12.
चंद्रगुप्त मौर्य की चार सफल विजय कौन-कौन सी थी ?
उत्तर:

  1. पंजाब विजय (Victory of the Punjab) – चंद्रगुप्त मौर्य ने सिकंदर की मृत्यु के पश्चात् पंजाब को जीत लिया।
  2. मगध की विजय (Victory of Magadh) – चंद्रगुप्त मौर्य ने कौटिल्य (चाणक्य) की सहायता से मगध के अंतिम राजा घनानंद की हत्या करके मगध को जीत लिया।
  3. बंगाल विजय (Victory of Bengal) – चन्द्रगुप्त मौर्य ने पूर्वी भारत में बंगाल को जीत कर अपने अधिकार में कर लिया।
  4. दक्षिणी भारत पर विजय (Victory of South) – जैन साहित्य के अनुसार आधुनिक कर्नाटक तक उसने अपनी विजय-पताका फहराई थी।

प्रश्न 13.
अशोक के अभिलेख किन-किन भाषाओं व लिपियों में लिखे जाते थे ? उनके विषय क्या थे ?
उत्तर:

  • अशोक के अभिलेख जनता की पालि और प्राकृत भाषाओं में लिखे हुए होते थे। इनमें ब्रह्मा-खरोष्ठी लिपियों का प्रयोग हुआ था। इन अभिलेखों में अशोक का जीवन-वृत्त, उसकी आंतरिक तथा बाहरी नीति एवं उसके राज्य के विस्तार संबंधी जानकारी हैं।
  • इन अभिलेखों में सम्राट अशोक के आदेश अंकित होते थे।

प्रश्न 14.
अशोक के धम्म पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
‘धम्म’ संस्कृत के धर्म शब्द का प्राकृत स्वरूप है। अशोक ने इसका प्रयोग विस्तृत अर्थ में किया है। इस विषय पर विद्वानों के बीच काफी मतभेद है। बहुत-से विद्वान धम्म और बौद्ध धर्म में कोई फर्क नहीं मानते। अतः प्रारंभ में ही यह कह देना आवश्यक है कि धम्म और बौद्धध म दोनों अलग-अलग बातें हैं। बौद्धधर्म अशोक का व्यक्तिगत धर्म था। लेकिन उसने जिस धम्म की चर्चा अपने अभिलेखों में की है वह उसका सार्वजनिक धर्म था तथा विभिन्न धर्मों का सार था। यह अलग बात है कि बौद्धधर्म की कई विशेषताएँ भी उसमें मौजूद थीं।

अशोक ने अपने अभिलेखों में कई स्थान पर धम्म (धर्म) शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु भाबरु अभिलेख को छोड़कर (जहाँ उसे बुद्ध, धम्म और संघ में अपना विश्वास प्रकट किया है। उसने कहीं भी धम्म का प्रयोग बौद्धध र्म के लिए नहीं किया है। बौद्ध धर्म के लिए ‘सर्द्धम’ या ‘संघ’ शब्द का प्रयोग किया है। इस तरह हम कह सकते हैं कि अशोक का धम्म बौद्ध धर्म नहीं था क्योंकि इसमें चार आर्य सत्यों, अष्टांगिक मार्ग तथा निर्वाण की चर्चा नहीं मिलती है।

प्रश्न 15.
‘छठी से चौथी शताब्दी ई. पू. में मगध का एक शक्तिशाली राज्य के रूप में विकास हुआ।’ इस कथन की लगभग 100 से 150 शब्दों में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
छठी से चौथी शताब्दी ई. पू. में मगध (आधुनिक बिहार) सबसे शक्तिशाली महाजनपद बन गया। आधुनिक इतिहासकार इसके कई कारण बताते हैं

  • एक यह कि मगध क्षेत्र में खेती की उपज खास तौर पर अच्छी होती थी।
  • दूसरे यह कि लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड में) भी आसानी से उपलब्ध थीं जिससे उपकरण और हथियार बनाना सरल होता था।
  • जंगली क्षेत्रों में हाथी उपलब्ध थे, जो सेना के एक महत्वपूर्ण अंग थे। साथ ही गंगा और इसकी उपनदियों से आवागमन सस्ता व सुलभ होता था।
  • आरंभिक जैन और बौद्ध लेखकों ने मगध की महत्ता का कारण विभिन्न शासकों की नीतियों को बताया है। इन लेखकों के अनुसार बिम्बिसार अजातशत्रु और महापदम-नन्द जैसे प्रसिद्ध अत्यंत महत्वाकांक्षी शासक थे और इनके मंत्री उनकी नीतियाँ लागू करते थे।
  • प्रारंभ में, राजगाह (आधुनिक बिहार के राजगीर का प्राकृत नाम) मगध की राजधानी थी। यह रोचक बात है कि इस शब्द का अर्थ है ‘राजाओं का घर।’ पहाड़ियों के बीच बसा राजगाह एक किलेबंद शहर था। बाद में चौथी शताब्दी ई० पू० में पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया गया, जिसे अब पटना कहा जाता है जिसकी गंगा के रास्ते आवागमन के मार्ग पर महत्वपूर्ण अवस्थिति थी।

प्रश्न 16.
दिगम्बर एवं श्वेताम्बर कौन थे?
उत्तर:
जैन धर्म दो सम्प्रदाय बन गए। एक दिगम्बर और दूसरा श्वेताम्बर। दिगम्बर वस्त्र नहीं धारण करते हैं जबकि श्वेताम्बर उजले वस्त्र धारण करते हैं। दिगम्बर जैन आचरण पालन में कठोर होते है, जबकि श्वेतताम्बर जैन उदार होते है। श्वेताम्बर 11 अंगों का प्रमुख धर्म मानते है और दिगम्बर अपने 24 पुराणों को। दिगम्बर सम्प्रदाय यह मानता है कि स्त्री शरीर से कैवल्य ज्ञान संभव नहीं है और कैवल्य ज्ञान प्राप्त होने पर साधकों को भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती। किन्तु श्वेताम्बर सम्प्रदाय ऐसा नहीं मानते। श्वेताम्बर सम्प्रदाय के अनुसार महावीर का निर्वाण के 609 वर्ष बाद (ई सन् 83) रथविलुर में भवभूति द्वारा बौद्धिक मत दिगम्बर की स्थापना हुई थी।

प्रश्न 17.
इलाहाबाद स्तंभ के ऐतिहासिक महत्त्व का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
इलाहाबाद का स्तंभ (Allahabad’s inscription) – इलाहाबाद के स्तंभ लेख से गुप्त काल के विषय में जानकारी प्राप्त होती है इसमें समुदाय की विजयों और चरित्र अंकित है। हरिषेण नामक कवि ने संस्कृत में इसे लिखा। उस काल की राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक अवस्था, भाषा व साहित्य की उन्नति एवं उसकी नौ विजयों का वर्णन है।

प्रश्न 18.
ऐहोल अभिलेख का ऐतिहासिक महत्त्व क्या है ?
उत्तर:
इस अभिलेख में चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रति कीर्ति ने संस्कृत में उसके पराक्रम का विवरण लिखा है जिसके अनुसार गुजरात के लाट, मैसूर के गंगा आदि राजाओं को हराया गया था। दक्षिणा के चेर, चोल और पांड्य शासकों को भी हराया गया था। सन् 620 में उसने हर्ष को नर्मदा नदी के तट पर हराया। जब पुलकेशिन द्वितीय ने पल्लव शासक नरसिंह वर्मन से टक्कर ली, तो फिर उसके पश्चात् 642 ई० में लड़ता हुआ युद्ध क्षेत्र में उसके हाथों मारा गया।

प्रश्न 19.
दिल्ली के लौह स्तंभ अभिलेख का क्या महत्व है ?
उत्तर:
दिल्ली में कुतुब मीनार के पास लौह स्तंभ पर किसी चंद्र नामक राजा का अभिलेख खुदा हुआ मिला है। यह अभिलेख चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से अब जोड़ा जाता है। इस अभिलेख से पता चलता है कि चंद्र ने पश्चिमोत्तर दिशा में और बंगाल में निरंतर विजय प्राप्त की और अपने वंश की कीर्ति को चार चाँद लगा दिये।

प्रश्न 20.
जूनागढ़ शिलालेख के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जूनागढ़ का शिलालेख, गुजरात में जूनागढ़ के समीप मिला था। उस समय की प्रचलित लिपि ब्राह्मी थी। इसी लिपि में वह शिलालेख लिखा हुआ था। इस शिलालेख में अशोक के धर्म, नैतिक नियमों एवं शासन सम्बन्धी नियमों का विवरण मिला है। लोगों की जानकारी के लिए इस शिलालेख को जनसाधारण की भाषा पालि में खुदवाया था।

प्रश्न 21.
पेरीप्लस और एर्थियन पदों के अर्थ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पेरिप्लस एक यूनानी शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है-समुद्री रास्ता और एर्थियन भी एक यूनानी नाम है जिसका प्रयोग यूनानी लाल सागर के लिए करते थे।

प्रश्न 22.
कुषाण कौन थे ?
उत्तर:
चीन की मूगनू नामक जाति से हारकर यूची जाति दक्षिण की ओर स्थान की खोज में निकल पड़ी। वह आकर आमू नदी के तट पर बस गई। यूची जाति के पाँच कबीलों में से कुषाण नामक कबीला कैडफिसेज प्रथम के नेतृत्व में शक्तिशाली बन गया। उसने मध्य एशिया से लेकर सिंधु नदी के तट तक अपना साम्राज्य फैला दिया। उसने उस क्षेत्र के पार्थियन शासकों का नामोनिशन मिटा दिया।

प्रश्न 23.
सातवाहन कौन थे?
उत्तर:
मौर्य के साम्राज्य के बिखराव के बाद सातवाहनों ने दक्कन में एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया। इस वंश का सबसे अच्छा शासक दोनों ही सर्वोच्च वंशों का दावा करता है। एक तरफ वह स्वयं को एक ब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति मानता है और दूसरी ओर वह स्वयं को क्षत्रिय लोगों को नाश करने वाला बताता है। वह इस बात का भी दावा करता है कि चारों वर्गों के मध्य अंतर वर्णीय विवाह नहीं होते थे लेकिन कुछ समय बाद ये साक्ष्यों द्वारा प्रमाणित हो जाता है कि सातवाहनों ने शक राजा रुद्रदमन से वैवाहिक संबंध जोड़े थे। सातवाहन समाज में संभवत: मातरीगोत्र का अधिक सम्मान था। इस समाज में स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र को माना जाता था। सातवाहनों के कई अभिलेख इतिहासकारों को प्राप्त हुए जिन पर उनके पारिवारिक और वैवाहिक रिश्तों का खाका तैयार किया है।

प्रश्न 24.
शक कौन थे ?
उत्तर:
शक मध्य एशिया के मूल निवासी थे जो उपमहाद्वीप में उत्तर पश्चिमी हिस्सों से सर्वप्रथम आये और धीरे-धीरे यहीं स्थायी रूप से बस गये। ये लोग प्रारंभ में ब्राह्मणों द्वारा म्लेच्छ (असभ्य अथवा विदेशी से आने वाले आक्रमणकारी) समझ गये। धीरे-धीरे इन्होंने भारत में उत्पन्न हुए धर्मों जैसे बौद्ध धर्म या वैष्णव मत को अपना लिया। स्थानीय लोगों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किये और उत्तर पश्चिम के साथ-साथ पश्चिमी भारत के कुछ क्षेत्रों में शासन किया।

प्रश्न 25.
हर्ष चरित पर दो वाक्य लिखिए।
उत्तर:
हर्ष चरित संस्कृति में लिखी गई कन्नौज के शासक हर्षवर्द्धन की जीवनी है, इसके लेखक बाणभट्ट (लगभग सातवीं शताब्दी ई०) हर्षवर्धन के राज कवि थे।

प्रश्न 26.
बौद्ध संगीतियाँ क्यों बुलाई गई ? चतुर्थ बौद्ध संगति का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् समय-समय पर बौद्ध धर्म की व्याख्या हेतु अनेक बौद्ध सभाओं का आयोजन किया गया जिन्हें संगीति के नाम से जाना जाता है।

चतुर्थ बौद्ध संगीति :
समय – प्रथम शताब्दी
स्थान – कुंडलवन (कश्मीर)
शासक – कनिष्क (कुषाण वंश)

आध्यक्षा – वसुमित्र, संगीति के उपाध्यक्ष अश्वघोष थे। महत्त्व-इस संगीति का आयोजन इस आशय से किया गया था कि बौद्धों के मतभेदों को दूर किया जा सके। इस संगीति में महासाधिकों को बोलबाला रहा। त्रिपिटक पर प्रमाणिक भास्य ‘विभाषा शास्त्र’ की रचना इसी संगीति में हुई। इस. संगीत के पश्चात् ही बौद्ध अनुयायी हीनयान तथा महायान दो समुदायों में विभाजित हो गये।

प्रश्न 27.
गौतम बुद्ध के जीवन एवं उपदेशों का वर्णन करें।
उत्तर:
गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे। उनका जन्म 563 ई० पू० में शाक्य नामक क्षत्रिय कुल में कपिलवस्तु के निकट नेपाल की तराई में अवस्थित लुम्बिनी में हुआ था। उनके पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के निर्वाचित राजा और गणतांत्रिक शाक्यों के प्रधान थे। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था।

बचपन से ही गौतम चिन्तनशील व्यक्ति थे। इनका मन सांसारिक भोग विलास में नहीं लगता था। इनका विवाह यशोधरा से हुआ था तथा इनको एक पुत्र भी था, जिसका नाम राहुल था। एक बार इन्होंने एक वृद्ध, एक रोगी एवं एक मृत व्यक्ति को देखा। इन दृश्यों ने इनके मन में वैराग्य उत्पन्न कर दिया। 29 वर्ष की उम्र में इन्होंने घर छोड़ दिया, जिसे महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। ये ज्ञान की प्राप्ति के लिए जगह-जगह भटकते रहे। अन्त में 35 वर्ष की उम्र में बोधगया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। तब से वे बुद्ध अर्थात् प्राज्ञावान कहलाने लगे। उन्होंने अपना पहला धार्मिक प्रवचन वाराणसी के निकट सारनाथ में दिया जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहते हैं। वे लगभग 45 वर्षों तक अपने धर्म का प्रचार करते रहे एवं समकालीन सभी वर्ग के लोग उनके शिष्य बने। 483 ई० पू० में पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुशीनगर नामक स्थान पर उनकी मृत्यु हुई। इस घटना को महापरिनिर्वाण कहते हैं।

गौतम बुद्ध व्यावहारिक सुधारक थे। वे आत्मा एवं परमात्मा से सम्बन्धित निरर्थक वाद-विवादों से दूर रहे तथा उन्होंने दोनों के अस्तित्व से इनकार किया। उन्होंने कहा कि संसार दुःखमय है और इस दुःख के कारण तृष्णा है। यदि काम, लालसा, इच्छा एवं तृष्णा पर विजय प्राप्त कर ली जाये तो निर्वाण प्राप्त हो जायेगा, जिसका अर्थ है कि जन्म एवं मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जायेगी।

गौतम बुद्ध ने निर्वाण की प्राप्ति का साधन अष्टांगिक मार्ग को माना है। ये आठ साधन हैं-सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। उन्होंने कहा कि न तो अत्यधिक विलाप करना चाहिए और न अत्यधिक संयम ही बरतना चाहिए। वे मध्यम मार्ग के प्रशंसक थे। उन्होंने सामाजिक आचरण के कुछ नियम निर्धारित किये थे जैसे-पराये धन का लोभ नहीं करना चाहिए, हिंसा नहीं करनी चाहिए, नशे का सेवन नहीं करना चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए तथा दुराचार से दूर रहना चाहिए।

प्रश्न 28.
महावीर के उपदेशों का वर्णन करें।
उत्तर:
महावीर के उपदेश निम्नलिखित हैं

  • सत्य-सत्य बोलना, झूठ न बोलना।
  • अहिंसा-हिंसा न करना।
  • अस्तेय-चोरी न करना।
  • अपरिग्रह-सम्पत्ति का संग्रह न करना।
  • ब्रह्मचर्य-इन्द्रियों को वश में करना।

महावीर ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे परंतु आत्मा, कर्मफल तथा पुनर्जन्म को मानते थे।

प्रश्न 29.
जैनधर्म के प्रमुख सिद्धान्त कौन-से हैं ?
उत्तर:
जैन-धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान महावीर (540 ई० पू० 468 ई०पू०) के समय जैन धर्म के सिद्धान्तों को पूर्णता प्राप्त हुई। यह धर्म मानता है कि संसार की सभी वस्तुओं में जीव है। अहिंसा का सिद्धान्त इस धर्म का मूल आधार है। मनुष्य अपने कर्मों के कारण जन्म, मृत्यु एवं पुनर्जन्म के चक्र में बंधा है। संन्यास एवं तपस्या के द्वारा मनुष्य कर्म के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। जैनियों का विश्वास है कि शरीर को कष्ट पहुँचाकर ही निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है। इस धर्म के पाँच सिद्धान्त हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, (चोरी नहीं करना), असंग्रह (सम्पत्ति जमा नहीं करना) तथा ब्रह्मचर्य। इन्हें पंच महाव्रत कहा जाता है।

प्रश्न 30.
पिटक कितने हैं ? उनके नाम और विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
पिटक तीन हैं-सुत्तपिटक, विनयपिटक एवं अभिधम्मपिटक । इससे इन्हें त्रिपिटिक के नाम से पुकारा जाता है। गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद इनकी रचना की गई । सुत्तपिटक में बुद्ध के उपदेश संकलित किए गए हैं। विनयपिटक में बौद्ध संघ के नियमों का उल्लेख है। अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन का विवेचन है।

प्रश्न 31.
बौद्ध धर्म और जैन धर्म की शिक्षाओं में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बौद्ध धर्म और जैन धर्म की शिक्षाओं में निम्न अंतर हैं-

बौद्ध धर्मजैन धर्म
1. बौद्ध धर्म ईश्वर के अस्तित्व के विषय में मौन है।1. जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्व को बिल्कुल नहीं मानता।
2. पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन, कर्म के समक्ष व्यर्थ है।2. प्रार्थना कुछ भी नहीं है, तप और व्रत ही मोक्ष प्राप्ति के साधन हैं।
3. अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। यज्ञ आदि में इनका विश्वास न हैं।3. अहिंसा पर अत्यधिक बल देते हैं, जड़ पदार्थों में जीवन का आभास।
4. मोक्ष प्राप्ति के लिए अच्छे कर्म और पवित्र जीवन पर बल देता है।4. मोक्ष प्राप्ति के लिए त्रिरत्ल पर बल देता है।

(क) सम्यक ज्ञान, (ख) सम्यक कर्म तथा, (ग) अहिंसा।

5. संघ को धर्म का प्रचार माध्यम बनाता है, मठों में अध्ययन-अध्यापन का कार्य होता है।5. इनके संघ नहीं होते, परन्तु धर्म-प्रचार के लिए प्रचारक होते हैं।
6. बौद्ध धर्म का विस्तार देश-विदेश दोनों स्थानों पर हुआ। एशिया के कई देश इसकी छाया में आ गये थे।6. जैन धर्म केवल भारत में ही फूला-फला, विदेशों में नहीं।

प्रश्न 32.
आप ‘जातक’ के सम्बन्ध में क्या जानते हैं ?
उत्तर:
जातक कथाओं में महात्मा गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ संकलित हैं। ये कथाएँ पालि भाषा में हैं। इनमें तत्कालीन धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक चित्रण मिलते हैं। जातकों का बौद्ध साहित्य में विशेष महत्व है। इन कहानियों से हमें पता चलता है कि महात्मा बुद्ध जाति प्रथा एवं ब्राह्मणों को उच्च स्थान दिये जाने के विरुद्ध थे और क्षत्रियों को ब्राह्मणों से अच्छा मानते थे। काशी, कौशल तथा मगध राज्यों की प्रसिद्ध घटनाओं का विवरण भी जातक कथाओं में मिलता है। जातक कथाएँ अपना धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व रखती हैं।

प्रश्न 33.
कृष्ण देवराय की मुख्य उपलब्धियों के बारे में बताएँ।
उत्तर:

  • कृष्ण देवराय बीजापुर और गोलकुंडा के शासकों को पराजित करने में सफल रहा।
  • उसने उड़ीसा पर भी आक्रमण किया तथा वहाँ के शासक को भी हराया।
  • उसने न केवल रायचूर दोआब पर विजय प्राप्त की बल्कि अपनी सेनाओं के साथ बहमनी राज्य के अंदर भी प्रवेश कर गया।
  • पश्चिमी समुद्र तट पर सभी स्थानीय राज्यों के साथ उसका व्यवहार बहुत ही अच्छा और मैत्रीपर्ण था। अपने इन स्थानीय राज्यों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध बनाकर अपने राज्य को समृद्ध बनाया।
  • वह एक कुशल प्रशासक भी था। उसने अपने राज्य के उत्थान के लिए कई काम किये। उसने सिंचाई के लिए बाँध बनवाये, जिससे राज्य की कृषि-दशा में सुधार आया।
  • उसने नये मंदिरों का निर्माण करवाया और पुराने मंदिर की मरम्मत करवाई। उसने अपने दरबार में विद्वानों और गुणी लोगों को प्रश्रय दे रखा था।

प्रश्न 34.
आयंगर व्यवस्था के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
विजयनगर राज्य ने प्रचलित स्थानीय प्रशासन में परिवर्तन कर आयंगर व्यवस्था आरंभ की प्रत्येक ग्राम को स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई के रूप में गठित कर प्रशासन 12 व्यक्तियों के समूह को दिया गया। यह समूह आयगार कहलाता था। ये व्यक्ति राजकीय अधिकारी थे इनका पद आनुवंशिक था। वेतन के रूप में लगान और कर मुक्त भूमि दी जाती थी। आयगार ग्राम प्रशासन की देखभाल करते एवं शांति-व्यवस्था बनाए रखते थे।

प्रश्न 35.
पानीपत की पहली लड़ाई (1526) भारत के इतिहास में एक निर्णायक लड़ाई समझी जाती है, विवेचन कीजिए।
उत्तर:

  • इस लड़ाई में लोदियों की कमर टूट गई। दिल्ली और आगरा तक का सारा प्रदेश बाबर के अधीन हो गया।
  • इब्राहीम लोदी द्वारा आगरा में एकत्र खजाना अधिकार में आ जाने से बाहर की सारी आर्थिक कठिनाइयाँ दूर हो गईं।
  • जौनपुर तक का समृद्ध क्षेत्र भी बाबर के सामने प्रशस्त था। . 4. पानीपत की लड़ाई ने उत्तर भारत का आधिपत्य के लिए संघर्ष के एक नये युग का सूत्रपात किया।

प्रश्न 36.
बाबर के बाबरनामा पर नोट लिखें।
उत्तर:
बाबर एक वीर योद्धा ही नहीं, अपितु एक विद्वान साहित्यकार भी था। उसकी रचनाओं में सबसे उत्तम उसकी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ या ‘तुज्क-ए-बाबरी’ है। श्रीमती बैबरिज के अनुसार, “बाबर की आत्मकथा एक ऐसा अमूल्य भण्डार है जिसे सेंट अगस्टॉइ तथा रूसो के स्वीकृति वचन और गिब्बन तथा न्यूटन की आत्म कथाओं के समकक्ष रखा जा सकता है।” बाबर ने अपनी आत्मकथा को अपनी मातृ-भाषा तुर्की में लिखा था। फारसी में इसका अनुवाद गुलबदन ने किया। अंग्रेजी में श्रीमती बैवरिज तथा हिन्दी में केशव कुमार ठाकुर के अनुवाद बहुत प्रसिद्ध हैं।

विषय – बाबरनामा में बाबर के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन है। इसमें फरगान, समरकन्द, बाबर की काबुल विजय, भारत के उत्तर-पश्चिम प्रदेश तथा पानीपत, खनवाह, चन्देरी और घाघरा आदि के प्रसिद्ध भारतीय युद्धों का भी वर्णन है। बाबर के जीवन में स्थिरता का अभाव था। अतः बाबर की आत्मकथा में केवल 18 वर्ष की घटनायें ही मिलती हैं।

भाषा-शैली – बाबरनामा की भाषा तुर्की है। इसमें अरबी-फारसी के शब्दों की अधिकता है। बाबर की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा प्रवाहमयी है। उसकी वर्णन-शैली भी साधारण और स्पष्ट है। उसे जब अधिक समय मिला तो उसने विस्तार में लिखा है और जब कम समय मिला तो संक्षेप में वर्णन किया है।

विशेषताएँ-1. बाबर ने सरल और स्पष्ट वर्णन किया है। उसने अपनी भूलों और कमजोरियों को भी नहीं छुपाया। 2. बाबर को प्रकृति से बड़ा अनुराग था। बाबरनामा में प्राकृतिक दृश्यों का सुन्दर.वर्णन किया गया है। 3. बाबरनामा के वर्णन सजीव और रोचक हैं। 4. बाबरनामा में तत्कालीन भारत का प्रामाणिक इतिहास है।

महत्त्व – बाबरनामा साहित्यिक तथा ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में मध्य एशियाई राजनीति, तैमूरों के इतिहास, मंगोलों और चुगताइयों के आपसी सम्बन्ध, बाबर की तत्कालीन कठिनाइयाँ, ईरानी, उजबेग शक्ति के उत्थान और संघर्ष तथा बाबर के संघर्षमय जीवन की जानकारी मिलती है। इसी प्रकार यह ग्रन्थ तत्कालीन भारत और मध्य एशिया की सांस्कृतिक और राजनैतिक जानकारी के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

प्रश्न 37.
अकबर की धार्मिक नीति की समीक्षा करें।
उत्तर:
अकबर की धार्मिक नीति की विवेचना निम्नलिखित है-

  • आरम्भ में अकबर एक कट्टरपंथी मुसलमान था परंतु बैरम खाँ, अब्दुल रहीम खानखाना, फैजी, अबुल फजल, बीरबल जैसे उदार विचारों वाले लोगों के सम्पर्क से उसका दृष्टिकोण बदल गया। हिंदू रानियों का भी उस पर प्रभाव पड़ा। अब वह अन्य धर्मों के प्रति उदार हो गया था।
  • 1575 ई० में उसने इबादतखाना बनवाया, जिसमें विभिन्न धर्मों के विद्वानों को अपने-अपने विचार प्रकट करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। अक्सर बहस करते समय मौलवी गाली-गलौच पर उतर जाते थे। अत: अकबर को इस्लाम धर्म में रुचि कम हो गई।
  • वह स्वयं तिलक लगाने लगा और गौ की पूजा करने लगा। अत: कट्टरपंथी मुसलमान उसे काफिर कहने लगे थे।
  • 1579 ई० में उसने अपने नाम का खुतवा पढ़वा कर अपने आप को धर्म का प्रमुख घोषित कर दिया। इससे उलेमाओं का प्रभाव कम हो गया।
  • अंत में उसने सभी धर्मों का सार लेकर नया धर्म चलाया, जिसे दीन-ए-इलाही के नाम से जाना जाता है। अपने धर्म को उसने किसी पर थोपने का प्रयास नहीं किया।
  • उसने रामायण, महाभारत आदि कई हिन्दु ग्रंथों का भी फारसी में अनुवाद करवाया। वह धर्म को राजनीतिक से दूर रखता था।
  • फतेहपुर सीकरी में एक महल, जोधाबाई का महल में भारतीय संस्कृति की स्पष्ट झलक देखते हैं।

प्रश्न 38.
अकबर को ‘राष्ट्रीय शासक’ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
अनेक विद्वान और व्यक्ति जलालुद्दीन अकबर (1556-1605) को मुगल बादशाहों में महानतम मानते हैं क्योंकि उसने न केवल अपने साम्राज्य का विस्तार ही किया बल्कि इसे अपने समय का विशालतम, दृढ़तम और सबसे समृद्ध राज्य बनाकर सुदृढ़ भी किया। अकबर हिंदुकुश पर्वत तक अपने साम्राज्य की सीमाओं के विस्तार में सफल हुआ और इसने ईरान के सफानियों और तूरान (मध्य एशिया) के उजबेकों की विस्तारवादी योजनाओं पर लगाम लगाए रखी। अकबर के बाद जहाँगीर (1605-27) शाहजहाँ (1628-58) और औरंगजेब (1658-1707) के रूप में भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व वाले तीन बहुत योग्य उत्तराधिकारी हुए। इनके अधीन क्षेत्रीय विस्तार जारी रहा यद्यपि इसकी गति काफी धीमी रही। तीन शासकों ने शासन के विविध यंत्रों को बनाए रखा और उन्हें सुदृढ़ किया। अतः अकबर राष्ट्रीय शासक था।

प्रश्न 39.
मुगलकालीन केन्द्रीय प्रशासन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
मुगलकालीन केन्द्रीय प्रशासन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित प्रकार थी-

  • वकील – इसे बजीर भी कहा जाता था। यह केन्द्रीय सरकार के समस्त विभागों का अध्यक्ष था। अकबर ने बैरम खाँ के पश्चात् इस पद का अंत कर दिया।
  • दीवान या वित्तमंत्री – आर्थिक विषयों में यह बादशाह का प्रतिनिधि था।
  • मीरबख्शी – यह सेना संबंधी सभी कार्य देखता था। यह सेना, मनसबदार एवं घोडों संबंधी व्यवस्था देखता था।
  • प्रधान काजी – यह प्रांत, जिला एवं नगर के काजियों की नियुक्ति करता था। फौजदारी मुकदमों को देखता था।
  • प्रांतीय शासन – सुबेदार प्रांत अथवा सूबे का प्रमुख होता था। दीवान सूबे में वित्त व्यवस्था देखता था। कोतवाल सूबे की आंतरिक सुरक्षा देखता था।
  • जिला शासन – प्रत्येक प्रांत जिलों में विभक्त था। फौजदार जिले का प्रमुख अधिकारी था।

प्रश्न 40.
शेरशाह सूरी के भू-राजस्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • शेरशाह ने भूमि पर लगान की दर निश्चित करने के लिए कृषि योग्य भूमि को तीन भागों में बाँटा। अच्छी, खराब और साधारण स्तर की भूमि। तीनों प्रकार की भूमि की उपज निश्चित करके उनके औसत पर लगान निश्चित किया जाता था।
  • लगान उपज के अनुसार निश्चित किया जाता था। साधारण उपज वाली भूमि की उपज का एक-तिहाई भाग लगान के रूप में देना होता था। लगान अनाज या धन के रूप में तथा नकद. सरकारी कोष में जमा किया जा सकता था।
  • फसल नष्ट होने पर किसानों का लगान माफ कर दिया जाता था। उन्हें राजकोष से आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। सैनिकों को आदेश था कि वे कूच के समय फसल न खराब करें। यदि अनिवार्य परिस्थितियों के कारण सैनिकों द्वारा खड़ी फसल को नुकसान पहुंचता था तो राज्य उसकी क्षतिपूर्ति करता था।
  • सरकार और किसानों के बीच पट्टे होते थे। इन पट्टों पर भूमि का क्षेत्रफल, भूमि की श्रेणी तथा लगान की दर लिखी होती थी। किसान उस पर हस्ताक्षर करता था। इस पट्टे से किसान के अधिकार सुरक्षित हो जाते थे।

Bihar Board 12th Geography Objective Important Questions Part 3

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Bihar Board 12th Geography Objective Important Questions Part 3

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है ?
(a) महाराष्ट्र
(b) पंजाब
(c) उत्तर प्रदेश
(d) तमिलनाडु
उत्तर:
(c) उत्तर प्रदेश

प्रश्न 2.
भारत द्वारा भेजा गया पहला मानवरहित अंतरिक्ष यान कौन था ?
(a) आर्यभट्ट
(b) भास्कर
(c) रोहिणी
(d) एसएलवी
उत्तर:
(a) आर्यभट्ट

प्रश्न 3.
शुष्क कृषि में निम्न में से कौन-सी फसल नहीं बोई जाती?
(a) रागी
(b) ज्वार
(c) मूंगफली
(d) गन्ना
उत्तर:
(d) गन्ना

प्रश्न 4.
बोकारो इस्पात केन्द्र किस राज्य में स्थित है ?
(a) मध्य प्रदेश
(b) छत्तीसगढ़
(c) झारखण्ड
(d) ओडिशा
उत्तर:
(c) झारखण्ड

प्रश्न 5.
भारत में विश्व की कुल जनसंख्या के कितने प्रतिशत लोग बसते हैं ?
(a) 15%
(b) 16%
(c) 25%
(d) 26%
उत्तर:
(b) 16%

प्रश्न 6.
झरिया कोयला क्षेत्र किस राज्य में स्थित है ?
(a) ओडिशा
(b) आंध्र प्रदेश
(c) बिहार
(d) झारखण्ड
उत्तर:
(d) झारखण्ड

प्रश्न 7.
तेलंगाना राज्य की राजधानी है।
(a) विजयवाड़ा
(b) हैदराबाद
(c) विशाखापत्तनम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) हैदराबाद

प्रश्न 8.
2011 जनगणना के अनुसार किस राज्य का जनघनत्व सबसे अधिक है ?
(a) कर्नाटक
(b) उत्तर प्रदेश
(c) बिहार
(d) केरल
उत्तर:
(c) बिहार

प्रश्न 9.
सुन्दरवन किस राज्य में स्थित है ?
(a) गोवा
(b) पश्चिम बंगाल
(c) पंजाब
(d) केरल
उत्तर:
(b) पश्चिम बंगाल

प्रश्न 10.
जमशेदपुर किस प्रकार का नगर है ?
(a) औद्योगिक
(b) खनन
(c) पर्यटन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) औद्योगिक

प्रश्न 11.
हरित क्रांति संबंधित है
(a) खाद्यान्न उत्पादन से
(b) दूध के उत्पादन से
(c) दाल के उत्पादन से
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) खाद्यान्न उत्पादन से

प्रश्न 12.
कौन राज्य चीन की सीमा पर स्थित है ?
(a) असम
(b) गुजरात
(c) नगालैण्ड
(d) अरुणाचल प्रदेश
उत्तर:
(d) अरुणाचल प्रदेश

प्रश्न 13.
केन्द्र सरकार द्वारा चलाई गई ‘हरियाली प्रोजेक्ट’ संबंधित है
(a) वायु संरक्षण से
(b) जल संरक्षण से
(c) दोनों से
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) दोनों से

प्रश्न 14.
एन्नौर पत्तन किस राज्य में स्थित है ?
(a) तमिलनाडु
(b) कर्नाटक
(c) केरल
(d) आंध्र प्रदेश
उत्तर:
(d) आंध्र प्रदेश

प्रश्न 15.
अम्लीय वर्षा का कारण कौन है ?
(a) भूमि प्रदूषण
(b) वायु प्रदूषण
(c) जल प्रदूषण
(d) ध्वनि प्रदूषण
उत्तर:
(b) वायु प्रदूषण

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से कौन पेय फसल है ?
(a) चाय
(b) कॉफी
(c) दोनों (a) और (b)
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) दोनों (a) और (b)

प्रश्न 17.
भारत में पूर्ण जनगणना पहली बार कब हुई थी ?
(a) 1881
(b) 1981
(c) 1781
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 1881

प्रश्न 18.
2011 की जनगणना के अनुसार भारत का जनघनत्व है
(a) 282 व्यक्ति/वर्ग किमी०
(b) 382 व्यक्ति/वर्ग किमी०
(c) 482 व्यक्ति/वर्ग किमी०
(d) 400 व्यक्ति/वर्ग किमी०
उत्तर:
(b) 382 व्यक्ति/वर्ग किमी०

प्रश्न 19.
किस राज्य में साक्षरता दर सबसे अधिक है ?
(a) केरल
(b) बिहार
(c) गोवा
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) केरल

प्रश्न 20.
उत्तर अटलांटिक मार्ग जोड़ता है।
(a) उत्तर अमेरिका को यूरोप से
(b) उत्तर अमेरिका को अफ्रीका से
(c) यूरोप को एशिया से
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) उत्तर अमेरिका को यूरोप से

प्रश्न 21.
भारत में नगरीय आबादी है
(a) 31%
(b) 41%
(c) 51%
(d) 619
उत्तर:
(a) 31%

प्रश्न 22.
‘सम्भववाद’ अवधारणा में किस घटक को महत्त्वपूर्ण माना गया है ?
(a) प्राकृतिक घटक
(b) मानवीय घटक
(c) दोनों (a) और (b)
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) दोनों (a) और (b)

प्रश्न 23.
वाल्मीकिनगर टाईगर रिजर्व कहाँ स्थित है ?
(a) बिहार
(b) मध्य प्रदेश
(c) पंजाब
(d) केरल
उत्तर:
(a) बिहार

प्रश्न 24.
उत्तर भारत में सिंचाई का मुख्य स्रोत क्या है ?
(a) तालाब
(b) नहर
(c) नलकूप
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) नहर

प्रश्न 25.
धारावी मलिन बस्ती किस नगर में स्थित है ?
(a) कोलकाता
(b) मुम्बई
(c) दिल्ली
(d) हैदराबाद
उत्तर:
(b) मुम्बई

प्रश्न 26.
निम्न में से कौन परम्परागत ऊर्जा का स्रोत है ?
(a) कोयला
(b) पेट्रोलियम
(c) प्राकृतिक गैस
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 27.
‘बीटल’ नामक कीड़ा किस फसल के बागान में लगता है ?
(a) रबड़
(b) कपास
(c) गन्ना
(d) कहवा
उत्तर:
(d) कहवा

प्रश्न 28.
भारत का जावा किस क्षेत्र को कहा जाता है ?
(a) रुड़की
(b) गोरखपुर
(c) शाहजहाँपुर
(d) बरेली
उत्तर:
(b) गोरखपुर

प्रश्न 29.
संसार के अधिकांश महान पत्तन किस प्रकार वर्गीकृत किए गए हैं :
(a) नौसेना पत्तन
(b) विस्तृत पत्तन
(c) तैल पत्तन
(d) औद्योगिक पत्तन
उत्तर:
(a) नौसेना पत्तन

प्रश्न 30.
निम्नलिखित महाद्वीपों में से किस एक से विश्व व्यापार का सर्वाधिक प्रवाह होता है ?
(a) एशिया
(b) यूरोप
(c) उत्तरी अमेरिका
(d) अफ्रीका
उत्तर:
(b) यूरोप

प्रश्न 31.
दक्षिण अमरीकी राष्ट्रों में से कौन ओपेक का सदस्य है ?
(a) ब्राजील
(b) वेनेजुएला
(c) चिली
(d) पेरू
उत्तर:
(c) चिली

प्रश्न 32.
निम्न व्यापार समूहों में से भारत किसका एक सहसदस्य है ?
(a) साफ्टा (SAFTA)
(b) आसियान (ASEAN)
(c) ओइसीडी (OECD)
(d) ओपेक (OPEC)
उत्तर:
(a) साफ्टा (SAFTA)

प्रश्न 33.
कोलम्बिया और ब्राजील में किस फसल का उत्पादन सबसे अधिक होता है ?
(a) गेहूँ
(b) मक्का
(c) कहवां
(d) चावल
उत्तर:
(c) कहवां

प्रश्न 34.
संयुक्त राज्य अमेरिका में निम्नलिखित फसलों में से किस फसल का उत्पादन सबसे अधिक होता है ?
(a) मक्का
(b) गेहूँ
(c) चाय
(d) कहवा
उत्तर:
(a) मक्का

प्रश्न 35.
दो देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान को क्या कहते हैं ?
(a) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार
(b) क्षेत्रीय व्यापार
(c) व्यापार
(d) व्यापार की संरचना
उत्तर:
(a) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 36.
व्यापार संघों की सदस्यता पर किन तीन बातों का प्रभाव पड़ता है ?
(a) दूरी, उपनिवेशी सम्बन्धों की परम्परा, भू-राजनैतिक सहयोग
(b) संसाधनों की उपलब्धता, आवश्यक पूँजी, प्रौद्योगिकी की दक्षता
(c) व्यापार की मात्रा, व्यापार की संरचना तथा व्यापार की दिशा
(d) व्यापार की मात्रा, व्यापार मूल्य तथा व्यापार की संरचना
उत्तर:
(a) दूरी, उपनिवेशी सम्बन्धों की परम्परा, भू-राजनैतिक सहयोग

प्रश्न 37.
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कितने प्रकार का होता है ?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पांच
उत्तर:
(a) दो

प्रश्न 38.
आयात एवं निर्यात के बीच मूल्यों के अन्तर को क्या कहते हैं ?
(a) असंतुलित व्यापार
(b) विलोम व्यापार
(c) व्यापार संतुलन
(d) अनुकूल व्यापार
उत्तर:
(c) व्यापार संतुलन

प्रश्न 39.
पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संघटन ओपेक का गठन कब हुआ और निम्नलिखित में से कितने देश इसके सदस्य हैं ?
(a) 1950-12 सदस्य
(b) 1960-13 सदस्य
(c) 1970-15 सदस्य
(d) 1980-13 सदस्य
उत्तर:
(b) 1960-13 सदस्य

प्रश्न 40.
1996 में कुल विश्व निर्यात का कितना प्रतिशत भाग सेवाओं का था ?
(a) 50%
(b) 25%
(c) 35%
(d) 5%
उत्तर:
(b) 25%

प्रश्न 41.
निम्नलिखित में से किस राज्य में प्रमुख तेल क्षेत्र स्थित है ?
(a) असम
(b) बिहार
(c) राजस्थान
(d) तमिलनाडु
उत्तर:
(a) असम

प्रश्न 42.
समुद्र तट से दूर स्थल खंड के पत्तन को क्या कहते हैं ?
(a) आन्तरिक पत्तन
(b) नेवी पत्तन
(c) आन्त्रेपो पत्तन
(d) तेल पत्तन
उत्तर:
(a) आन्तरिक पत्तन

प्रश्न 43.
चाय उत्पादन के लिए कितने तापमान की आवश्यकता होती है ?
(a) 25°C से 30°C
(b) 30°C से 40°C
(c) 50°C से 60°C
(d) 5°C से 15°C
उत्तर:
(a) 25°C से 30°C

प्रश्न 44.
निम्नलिखित में कौन-सा खनिज ‘भूरा हीरा’ के नाम से जाना जाता है ?
(a) लौह
(b) लिगनाइट
(c) मैंगनीज
(d) अभ्रक
उत्तर:
(c) मैंगनीज

प्रश्न 45.
निम्नलिखित में कौन-सा ऊर्जा का अनवीकरणीय स्त्रोत हैं ?
(a) जल
(b) सौर
(c) ताप
(d) पवन
उत्तर:
(c) ताप

प्रश्न 46.
किस धातु का प्रयोग बिजली की तारें आदि बनाने में किया जाता है ?
(a) लोहा
(b) अभ्रक
(c) जिंक
(d) ताँबा
उत्तर:
(d) ताँबा

प्रश्न 47.
उड़ीसा के मयूरभंज, क्योंझर तथा बोनाई क्षेत्रों में कौन सी धातु मिलती है ?
(a) ताँबा
(b) मैंगनीज
(c) लोहा
(d) अभ्रक
उत्तर:
(c) लोहा

Bihar Board 12th History Important Questions Long Answer Type Part 2

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Bihar Board 12th History Important Questions Long Answer Type Part 2

प्रश्न 1.
महाभारत कालीन भारतीय सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताओं पर एक निबंध लिखें।
उत्तर:
भारत का सामाजिक जीवन (Social Life of India) – मोटे तौर पर महाभारत का काल हम उत्तर वैदिक के अंत से लेकर बुद्ध काल के काल को मानते हैं। इस काल में भी समाज का आधार पारिवारिक जीवन था।

संयुक्त परिवार (Joint Family) – इस काल में कुल या परिवार में सभी सदस्य एक साथ रहते थे। कुल का प्रमुख कुलपति कहलाता था। कुलपति या तो पिता होता था या सबसे बड़ा भाई होता था। महाभारत से संदर्भ मिलते हैं प्रायः परिवार में प्रेम होता था। आयु में छोटे सदस्य बड़े परिवारजनों का सम्मान करते थे और कुलपति सभी के कल्याण की चिंता करते हुए उनके साथ व्यवहार करता था। नि:संतान दंपत्ति लड़का या लड़की गोद ले सकते थे। इस काल में प्राय: छोटे भाई बहनों की शादी आयु में बड़े भाई-बहनों से पहले करना बुरा माना जाता था। पिता की मृत्यु के बाद सबसे बड़ा भाई अपने छोटे भाई-बहनों का दायित्व निभाता था।

चार आश्रम (The four Ashrams) – इस काल में प्रत्येक व्यक्ति का जीवन व्यवस्था पर आधारित था। जीवन को चार आश्रमों में बाँटा गया था।
ब्रह्मचर्य – वह काल जब विद्यार्थी अध्यापन में धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करता था।
गृहस्थ – वह काल जब व्यक्ति विवाहित जीवन बिताता था।
वानप्रस्थ – वह काल जब व्यक्ति त्याग का जीवन बिताता और गृहस्थी के बंधनों से मुक्त होने का प्रयत्न करता था।

संन्यास – वह काल जब मनुष्य अपने परिवार और समाज को छोड़कर तपस्वी के रूप में पूर्ण आत्मसंयम का जीवन बिताता था। पर आश्रम-व्यवस्था निम्न वर्ग पर लागू नहीं की जाती थी क्योंकि उन्हें धार्मिक ग्रंथ पढ़ने का अधिकार न था। अन्य सबके लिए यह जीवन का नियम था किन्तु यह कहना कठिन है कि कितने मनुष्य इस व्यवस्था का पालन करते थे।

यह आश्रम विकसित तो अवश्य हुए थे। परन्तु इसमें जटिलता नहीं थी। इनका प्रभाव जनता के सामाजिक जीवन पर बहुत था। इसके कारण ही लोगों का नैतिक उत्थान हुआ।

जाति प्रथा (Caste System) – जाति प्रथा ने प्राचीन भारतीय समाज को स्थयित्व प्रदान किया। उसने देशी और विदेशी-दोनों तत्वों का समावेश प्राचीन भारतीय समाज में आसानी से कर दिया क्योंकि उनके लिए यहाँ के जाति अधिक्रम में स्थान था। यह उल्लेखनीय है कि अनेक प्राचीन समाजों में जो नग्न शोषण उन दिनों चल रहा था, जैसे कि गुलामी की प्रथा, वह प्राचीन भारत में नहीं था।

स्त्रियों की स्थिति (Position of Women) – स्त्रियाँ पैतृक संपत्ति की स्वामी नहीं हो सकती थीं। वैसे बहुत सी बातों में पूर्ण स्वतंत्रता थी। विधवा को पुनर्विवाह करने का अधिकार था। साधारणतया वह देवर के साथ विवाह कर सकती थी। कुछ बातों में स्त्रियों का स्तर बाद में, शूद्रों के समान हो गया। परिवार में पुत्रियों की अपेक्षा पुत्रों का अधिक मान होने लगा।

विवाह प्रणालियाँ (Types of Marriage) – महाभारत काल में भारत में शादी की अनेक प्रणालियाँ प्रचलित थीं जिनमें प्रमुख थी : ब्रह्म विवाह, प्रजापति विवाह, प्रेम विवाह, असुर विवाह, देव विवाह, गंदर्व विवाह, राक्षस विवाह, पिशाच विवाह।

शिक्षा (Education) – महाभारत काल में शिक्षा विकसित हो गई थी। उपनयन संस्कार द्वारा जब बच्चों को ब्रह्मचर्य आश्रम में भेजते थे तो गुरु के आश्रम में रहकर सारी विद्या प्राप्त करता था। गुरु की सेवा करनी होती थी। हवन के लिए जंगल से लकड़ियाँ तोड़कर लाना, चुल्हा जलाना, भिक्षा माँगना, आदि कार्य विद्यार्थी करते थे। विद्यार्थी बिना कोष शुल्क के पढ़ते थे। भाषा, व्याकरण, सामान्य गणित के साथ-साथ नैतिक शिक्षा और राज परिवार के सदस्यों को अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा गुरु ही दिया करते थे।

खान-पान (Food and Drink) – गेहँ, चावल, मक्खन, घी के साथ-साथ फल और कुछ लोग माँस-मछली आदि का भी उपभोग करते थे। प्रायः लोग बकरे को काटते थे। गो हत्या को सामाजि दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता था। घोड़े का माँस भी खाते थे जैसा कि अश्व-मेघ की परम्परा से पता चलता है कि मदिरा पान किया जाता था लेकिन अनेक लोग इसे अच्छा नहीं समझते थे।

मनोरंजन (Entertainment) – घरेलू और मैदानी खेल, पासा, जुआ बहुत प्रचलित था। मैदानी खेलों में रथों की दौड़ बहुत लोकप्रिय था। लोग नृत्य और वाद्यवृन्द में भी रुचि लेते थे। स्त्रियाँ प्रायः नृत्य और गाना सीखती थीं। बाँसूरी, बीणा, ढोल, इत्यादि प्रसिद्ध थे।

चरित्रहीनता (Degeneration of Character) – महाभारत महाकाव्य से अनेक उद्धरण मिलते हैं कि लोगों का जीवन नैतिक दृष्टि से गिर गया था। राजा और धनी लोग एक से ज्यादा स्त्रियों से विवाह करते थे। कहीं-कहीं एक ही महिला से कई भाई शारीरिक संबंध रखते थे। शत्रुओं को धोखे से मारने में कोई बुराई नहीं समझी जाती थी। वैश्या गमन, जुआ खेलना, गाना बजाना और शराब पीना उच्च वर्ग के लोगों में आम बात थी।

वस्त्र तथा आभूषण (Dress and Ornaments) – इस काल में सूती वस्त्र के साथ-साथ रेशमी और ऊनी वस्त्र भी पहने जाते हैं। पगड़ी स्त्री तथा पुरुष दोनों ही प्रयोग करते थे। कढ़ाई किए वस्त्रों को विशेष रूप से प्रयोग में लाया जाता था। केसरिया रंग विशेष रूप से पुरुषों के लिए पसंद किया जाता था। स्त्री, पुरुष विभिन्न धातुओं के आभूषण पहनते थे।

प्रश्न 2.
महावीर की जीवनी एवं उनके उपदेशों का उल्लेख करें।
उत्तर:
छठी शताब्दी ई० पू० भारत में धार्मिक क्रांति हुई, उसके फलस्वरूप दो नये धर्मों का उदय हुआ-जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म। पहले के संस्थापक महावीर तथा दूसरे के गौतम बुद्ध थे। इन धर्मों ने वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध आवाज उठाई तथा मानव कल्याण के लिए सीधा रास्ता बतलाया।

जैनधर्म के प्रमुख प्रवर्तक महावीर थे। उनके बचपन का नाम वर्द्धमान था। उनका जन्म बिहार के वैशाली के निकट कुण्डिग्राम में हुआ था। उनके पिता क्षत्रिय थे और मातृक कुल के सरदार थे। इनका नाम सिद्धार्थ था। इनका विवाह लिच्छवि सरदार की बहन त्रिसला से हुआ था। इनका जन्म पार्श्वनाथ की मृत्यु के 250 वर्षों के बाद 540 ई० पू० में हुआ था। प्रारंभ में वर्द्धमान का जीवन राजकीय समृद्धि और विलासिता के साथ व्यतीत हुआ। उन्हें हरेक प्रकार की राज्योचित विद्याओं की शिक्षा दी गई। युवा होने पर उनका विवाह यशोदा नामक सुन्दर राजकुमारी से कर दिया गया। इस विवाह से उन्हें प्रियदर्शना नाम की पुत्री भी पैदा हुई।

प्रारंभ में ही महावीर चिन्तनशील प्रवृत्ति के युवक थे। 30 वर्ष की अवस्था में उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता की मृत्यु के पश्चात् उनकी निवृत्तिमार्गी प्रवृत्ति और भी बढ़ गयी। उन्हें राज-पाट से कोई सम्बन्ध नहीं रहा। अपने बड़े भाई की आज्ञा से उन्होंने एक दिन अपना घर-द्वार छोड़ दिया और संन्यासी बनकर सत्य की खोज में निकल पड़े। कल्पसूत्र के अनुसार घर छोड़ने के 11 मास बाद उन्होंने वस्त्र पहनना छोड दिया और नग्न भ्रमण करने लगे। 12 वर्षों तक उन्होंने घोर तपस्या की। भोजन और शरीर का ध्यान न रखने से शरीर जीर्ण-शीर्ण हो गया। उनके नग्न शरीर पर कीट-कीटाणु चढ़ने लगे और उन्हें काटने लगे, परन्तु उन्हें इनकी जरा भी परवाह नहीं थी। उनके पीछे दुष्ट लड़कों के झुण्ड घूमते थे और उन्हें डण्डों से पीटते थे, परन्तु वर्द्धमान इन कठिनाइयों से जरा भी नहीं घबराये।

इस प्रकार 12 वर्षों तक वे कठिन तपस्या करते रहे। 42 वर्ष की आयु में जुम्मिका ग्राम के निकट राजुपलिका नदी के तट पर वर्द्धमान को एक शाल वृक्ष के निकट कैवल्य अथवा ‘पूर्ण ज्ञान’ की प्राप्ति हुई। उन्होंने अपनी इन्द्रियों पर विजय भी प्राप्त कर ली थी, अतः वे ‘जिन’ भी कहलाये। अतुल पराक्रम दिखलाने के चलते वे महावीर भी कहलाये। बौद्ध ग्रंथों में उन्हें निगण्ठ नाटपुत्र भी कहा गया।

कैवल्य प्राप्ति के बाद महावीर विभिन्न जगहों पर घूम-घूम कर अपने धर्म का प्रचार करने लगे। वे वर्ष के आठ महीने धर्म का प्रचार करते थे तथा बरसात के दिनों में किसी नगर में विश्राम करते थे। चम्पा, वैशाली, राजगृह, मिथिला आदि जगहों का दौरा कर अपने धर्म का प्रचार लोगों में करते रहे। उनके अनुयायी जैन कहलाने लगे। इस प्रकार अपने धर्म का प्रचार करते हुए 72 वर्ष की आयु में (463 ई० पू०) उन्हें राजगीर के समीप पावापुरी में निर्वाण प्राप्त हुआ।

महावीर ने किसी धर्म की स्थापना नहीं की। उन्होंने पार्श्वनाथ के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया तथा उसे स्थायित्व प्रदान किया। जैनियों के अनुसार इनके पहले तीर्थंकर ऋषभदेव थे। उनसे लेकर पार्श्वनाथ तक अन्य कई तीर्थंकर हुए। पार्श्वनाथ जैनियों के 23वें तीर्थंकर थे तथा महावीर 24वें। महावीर ने पार्श्वनाथ के मूल सिद्धांतों सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह (सम्पत्ति का त्याग और उसका संग्रह नहीं करना) तथा अस्तेय (चोरी नहीं करना) को तो बनाये रखा ही साथ-साथ इसमें ब्रह्मचर्य का सिद्धांत भी जोड़ दिया।

जैनदर्शन हिन्दू सांख्यदर्शन के बहुत निकट है। ईश्वर में विश्वास, संसार दुखमय है, मनुष्य को कर्म के अनुसार फल प्राप्त होता है और जीव के आवागमन का सिद्धांत जैनदर्शन में प्रमुख स्थान रखते हैं। जैनदर्शन का विश्वास द्वैतवादी तत्त्वज्ञान में है। उनके अनुसार प्रकृति और आत्मा दो तत्त्व हैं। मनुष्य का व्यक्तित्व इन तत्त्वों से मिलकर बना है जिसमें प्रथम तत्त्व नाशवान है तथा दूसरा तत्त्व अनन्त और विकासशील है। द्वितीय तत्त्व की प्रगति करने से अन्त में मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर सकता है।

जैनदर्शन के सात तत्त्व अर्थात् सत्य हैं-

  1. कोई ऐसी चीज है जिसे जीवन या आत्मा कहते हैं।
  2. कोई ऐसी चीज है जिसे अजीव, प्रकृत या पुद्रल कहते हैं।
  3. जीव और अजीव का मिलन होता है।
  4. इन दोनों के मिलने से कुछ शक्तियों का निर्माण होता है।
  5. इन दोनों के मिलन को रोका जा सकता है।
  6. संचित शक्तियों को नष्ट किया जा सकता है।
  7. निर्वाण या मोक्ष प्राप्ति संभव है।

इन सात तत्त्वों के आधार पर जैनदर्शन बतलाता है कि पहले मनुष्य को बुरे कर्मों से बचना चाहिए। उसके बाद कर्म बन्द कर देना चाहिए। इसके लिए उपर्युक्त वर्णित जैन धर्म के 5 सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। निर्वाण प्राप्ति के लिए उसे तीन रत्नों-सत्य, विश्वास या श्रद्धा, सत्य ज्ञान और सत्य कर्म करना चाहिए। इनका पालन करने से ही मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है. तथा मनुष्य के कष्टों का अंत हो सकता है।

जैनधर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल दिया गया है। जैन पशु-पक्षी, वनस्पति आदि ही नहीं, बल्कि जल, पहाड़ आदि में भी जीवन मानते हैं। फलतः आखेट, कृषि एवं युद्ध पर पाबन्दी लगा दी गई। महावीर को यह विश्वास था कि गृहस्थाश्रम में रहकर मोक्ष प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसके लिए संन्यासी का जीवन जीना आवश्यक था। जैन संन्यासियों को इन्द्रिय दमन हेतु कठोर नियमों का पालन आवश्यक था। जैसे-वस्त्र नहीं पहनना, सिर के बालों को जड़ से उखाड़ देना, अपना कोई निश्चित आवास नहीं रखना, सिर्फ दिन में ही यात्रा करना, जीव हत्या से बचना, अपनी प्रशंसा एवं दूसरे की बुराई नहीं करना तथा स्त्रियों के संसर्ग से बचना आदि। इन कठोर नियमों द्वारा जैनियों के कर्मों को नियंत्रित करने का प्रयत्न किया गया।

जैनधर्म के ब्राह्मण धर्म के वेदवाद, यज्ञ, बलि एवं कर्मकाण्ड का विरोध किया। निर्वाण की प्राप्ति श्रद्धा, ज्ञान एवं कर्म से ही हो सकती है। इसके लिए पुरोहितों एवं यज्ञों को आवश्यकता नहीं थी। जैनधर्म के देवताओं के अस्तित्व को तो स्वीकार किया, परन्तु यह जिन से बड़ा नहीं है। जैनधर्म ने जाति-व्यवस्था पर भी बहुत कठोर प्रहार नहीं किया, बल्कि बाद में उससे समझौता नहीं कर लिया। महावीर के अनुसार पूर्व जन्म में किये गये कर्मों के आधार पर ही उच्च जाति या निम्न वर्ग में जन्म होता है। शुद्ध एवं सदाचारी जीवन व्यतीत करने से निम्न जाति के मनुष्य भी मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। प्रारंभ में जैन धर्म में मूर्त्ति-पूजा भी आ गयी, जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा की जाने लगीं। मनुष्य की साधारण दिनचर्या में भी जैन धर्म में परिवर्तन नहीं किया। जन्म, विवाह, मृत्यु आदि के विभिन्न संस्कारों जैनियों में हिन्दुओं की भाँति होते रहे। इसी प्रकार जैन धर्म हिन्दू धर्म से अपने-आपको बहुत दूर नहीं ले जा सका। इसी कारण न तो इस धर्म का पूर्ण प्रसार हो सका और न ही यह पूर्णतया नष्ट हो सका।

महावीर ने न सिर्फ जैनधर्म की स्थापना की, बल्कि इसके प्रचार-प्रसार के लिए भी कदम उठाये। ये स्वयं विभिन्न नगरों में घूम-घूमकर इस धर्म का प्रचार करते थे। इसके प्रचार के लिए जैन संघ की स्थापना की। उनके धर्म को वैश्यों, व्यापारियों एवं राजकुलों का समर्थन प्राप्त हुआ। धीरे-धीरे कौशल, मगध, विदेह, अवन्ति आदि राज्यों में इनका प्रचार हो गया। इस धर्म के अनुयायियों की संख्या 14,000 बतलाई जाती है। महावीर की मृत्यु के बाद ये दो भागों में बँट गया-एक सम्प्रदाय श्वेताम्बर और दूसरा दिगम्बर सम्प्रदाय कहलाया। चन्द्रगुप्त मौर्य ने इसका दक्षिण भारत में प्रचार किया। कलिंग अथवा उड़ीसा में इसका प्रचार वहाँ के प्रसिद्ध शासक खारवेल ने किया। फिर भी बौद्ध धर्म की तरह जैन धर्म को न तो उतना राज्याश्रय ही प्राप्त हो सका और न ही जनता का समर्थन मिल सका।

इसके बावजूद जैनधर्म का भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के विकास में अद्भुत योगदान है। अहिंसा पर कठोर प्रतिबन्ध लगाकर इसने पशधन के संरक्षण में सहायता प्रदान की तथा आर्थिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान किया। जैनियों ने लोक-भाषा प्राकत के विकास में भी मदद की। इसी भाषा में जैनियों के इतिहास लिखे गये। इसने भारतीय दर्शन एवं कला को भी आने वाले समय में प्रभावित किया।

प्रश्न 3.
जैन धर्म के मुख्य उपदेशों (शिक्षाओं) का वर्णन करें। भारतीय समाज (जीवन) पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
जैन धर्म के संस्थापक वर्द्धमान महावीर थे। जैन धर्म की शिक्षाएँ निम्नलिखित थीं-
(i) आत्म निग्रह से आत्मज्ञान होता है। इसे प्राप्त करने के लिए सम्यक् विश्वास, सम्यक् ज्ञान तथा सम्यक् कर्म पर बल दिया गया।
(ii) अहिंसा पर बहुत बल दिया जाता था। उनका कथन था कि निर्जीव वस्तुओं में भी अनुभूति होती है।
(iii) जैन धर्म का पालन करने के लिए पाँच महाव्रत थे-

  • अहिंसा
  • सत्य
  • चोरी न करना
  • ब्रह्मचर्य
  • अपरिग्रह।

भारतीय समाज पर जैन धर्म के प्रभाव (Effects of Jain Religion on Indian Society) – भारतीय समाज पर जैन धर्म के निम्नलिखित प्रभाव थे-
(a) जाति-पॉति का खंडन (Opposition of Caste System) – जैन धर्म में जातीय बन्धनों पर कड़ा प्रहार किया गया। उन्होंने भ्रातृभाव तथा सद्भावना को बढ़ावा दिया। इससे लोगों में दया, ममता, त्याग आदि भावनाएँ उत्पन्न हुईं।

(b) हिन्दू धर्म की कट्टरता पर प्रहार (Attack on the Rigidity of Hindus religion) – ब्राह्मणों द्वारा अनेक कर्मकाण्डों-यज्ञ, बलि अथवा खर्चीले अनुष्ठानों से जनसाधारण परेशान था। जैन धर्म बिना आडम्बर के सीधा-साधा धर्म था। इसने लोगों (हिन्दुओं) के मन पर प्रभाव डाला।

(c) राजनैतिक दुर्बलता (Political Weakness) – जैन धर्म की ‘अहिंसा परमो धर्म’ की नीति से प्रभावित होकर लोगों ने युद्ध में रुचि लेना छोड़ दिया। इसके परिणामस्वरूप कालान्तर में विदेशी शक्तियों ने आकर भारत पर अपना अधिकार जमा लिया।

(d) खान-पान में परिवर्तन (Changes Eating Habits) – अहिंसा की भावना से प्रेरित होकर लोगों ने मांस खाना छोड़ दिया। इससे जीव हत्या तो रुकी ही, साथ ही पशु धन में वृद्धि भी हुई।

(e) भारतीय कला, स्थापत्य कला और साहित्य पर प्रभाव (Effects of Indian Art, Architecture and Literature) – दिलवाड़े के जैन मन्दिर, माउण्ट आबू का जैन मन्दिर, खजूराहो के जैन मन्दिर एवं अजन्ता-एलोरा की गुफाएँ स्थापत्य कला के सुन्दर नमूने हैं। जैन धर्म के ‘अंग’ ग्रन्थ ऐतिहासिक महत्त्व के हैं।

प्रश्न 4.
जैनधर्म की सफलता के कारणों को दर्शायें।
उत्तर:
महावीर के जीवनकाल में ही और उनकी मृत्यु के पश्चात् भी जैनधर्म का भारत में प्रचार-प्रसार हुआ। जैनधर्म की सफलता या विकास में अनेक कारणों ने योगदान किया-

तत्कालीन राजवंशों का समर्थन – जैनधर्म की सफलता के लिए कुछ सीमा तक स्वयं . महावीर का एक राजपरिवार से सम्बद्ध होना था। महावीर के उपदेशों और उनके आभिजात्य कुल में उत्पन्न होने से प्रभावित होकर क्षत्रिय राजाओं ने उनके उपदेशों को उत्साहपूर्वक ग्रहण किया और उनके समर्थक बन गए। जैनग्रंथ आवश्यकचूर्णि से ज्ञात होता है कि वज्जिसंघ के प्रधान चेटक एवं अवन्ती का राजा प्रद्योत अपनी आठ रानियों के साथ महावीर का अनुयायी बन बैठा। अन्य जैनग्रंथों (उत्तराध्ययनसूत्र, औपपादिकसूत्र इत्यादि) से भी पता चलता है कि बिम्बिसार, अजातशत्रु जैसे मगध के शक्तिशाली शासकों, कौशाम्बी नरेश की रानी मुगावती, सिन्धु-सौवीर के राजा उदयन, पावा के मल्ल इत्यादि भी महावीर के समर्थक थे। बाद में चन्द्रगुप्त मौर्य ने दक्षिण में और चेदिवंशीय शासक खारवेल ने उड़ीसा में इसका प्रचार किया। शासकों द्वारा जैनधर्म को मान्यता देने के परिणामस्वरूप उन राज्यों की जनता और आभिजात्य वर्ग के बीच भी नए धर्म की लोकप्रियता बढ़ी।

वैश्यों का समर्थन – नए धर्म को लोकप्रिय और सफल बनाने में वैश्यवर्ग का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। जैनधर्म ने वस्तुत: नवीन आर्थिक व्यवस्था के अनुरूप ही अपने को ढाला था। हिंसा पर प्रतिबंध लगाने से नवीन कृषि प्रणाली को लाभ पहुँचा। पशुधन का हनन रुक गया, कृषि का उत्पादन बढ़ा। परिणामस्वरूप व्यापार-वाणिज्य, नगरों का उदय, सिक्कों का प्रचलन, कर्ज और सूद की प्रथा और नागरीय जीवन का विकास संभव हो सका। इन नए आर्थिक परिवर्तनों से सबसे अधिक लाभ कृषकों, कारीगरों और व्यापारियों (वैश्यों) को ही था। अतः, इस वर्ग ने नए धर्म की अभिवृद्धि में गहरी रुचि ली एवं आर्थिक सहायता भी प्रदान की। यही बात बौद्धधर्म के साथ भी लागू होती है।

सरल प्रचार माध्यम – जैनधर्म की सफलता इस बात पर भी निर्भर थी कि महावीर और अन्य जैन उपदेशकों ने अपने विचारों को जनता के समक्ष सरल और सुबोध भाषा में रखा। अपने उपदेशों से जनसाधारण को अवगत कराने के लिए संस्कृत जैसी गूढ़ और कठिन भाषा का प्रयोग न कर प्राकृत भाषा को, जो जनसाधारण की भाषा थी, इन लोगों ने माध्यम बनाया। जैनों ने कुछ ग्रंथ बाद में यद्यपि संस्कृत में भी लिखे गए, परंतु आरम्भ में वे अर्द्धमागधी में ही लिखे गए। इसके कारण जनता की रुचि इस धर्म में बढ़ी।

भेदभाव की नीति का परित्याग – जैनधर्म की सफलता का एक प्रधान कारण यह था कि इसने ब्राह्मणधर्म की विभेदपूर्ण नीति का त्याग किया और सभी वर्गों और वर्णों को एक समान धरातल पर ला खड़ा कर दिया। महावीर के धर्म में सभी व्यक्ति समान थे; न कोई ऊँचा था न नीचा। सभी जीवों में समान आत्मा का निवास रहता था। अपने सत्कर्मों द्वारा सभी निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं। यहाँ तक कि स्त्रियों और पुरुषों में भी विभेद नहीं किया गया। महावीर ने अपने संघ के द्वार सबके लिए समान रूप से खोल दिए। फलतः, ब्राह्मणवाद से त्रस्त जनता नए धर्म की तरफ आकृष्ट हुई।

जैनधर्म का व्यावहारिक स्वरूप – महावीर का धर्म ब्राह्मणधर्म (वैदिक धर्म) की तरह आडम्बरपूर्ण नहीं था। इस धर्म में आस्था रखना बिलकुल ही सरल था। निर्वाण की प्राप्ति के लिए न तो पुरोहितों के माध्यम की जरूरत थी, न ही यज्ञ या बलि की। बिना किसी विशेष झंझट के पाँच महाव्रतों एवं त्रिरत्नों का पालन कर मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर सकता था। यद्यपि जैन भिक्षुओं के लिए धर्म के नियम कड़े थे, तथापि जनसाधारण के लिए ये नियम कठिन नहीं थे। अतः, जनता ने नए धर्म का स्वागत किया।

जैनसंघ का योगदान – जैनधर्म के प्रचार में जैनसंघ की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। यद्यपि संघ की स्थापना महावीर के पूर्व ही हो चुकी थी, परंतु महावीर ने नए ढंग से संगठित कर इस संघ को प्रचार का माध्यम बनाया। संघ के द्वार सभी के लिए खुले हुए थे, इसमें किसी का प्रवेश वर्जित नहीं था। यहाँ तक कि ब्राह्मणों को भी इसमें शामिल किया गया। इसके सदस्य संयम और नियमपूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए धर्म का प्रचार करते थे। इससे नए धर्म की लोकप्रियता बढ़ी।

आरम्भ में यद्यपि जैनधर्म का तेजी से प्रचार हुआ, तथापि यह बौद्धधर्म जैसी स्थिति प्राप्त नहीं कर सका। बाद में इसका पतन होने लगा और यह क्षेत्र-विशेष में ही सिमटकर रह गया। गंगाघाटी में इसका प्रभाव बौद्धधर्म की अपेक्षा कम रहा। अनेक कारणों से जैनधर्म का पतन हुआ।

प्रश्न 5.
जैनधर्म के पतन के कारणों को बतावें।
उत्तर:
जैनधर्म बौद्धधर्म की तरह लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सका। इसके लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी माने जा सकते हैं-

ब्राह्मणधर्म से सम्बन्ध बनाए रखना – जैनधर्म की असफलता का एक मुख्य कारण यह था कि यह अपने-आपको पूर्णतः ब्राह्मणधर्म से अलग नहीं कर सका। महावीर ने वैदिक दर्शन का पूर्ण परित्याग नहीं किया, बल्कि उसे एक दार्शनिक दर्जा प्रदान कर दिया। इस धर्म के कोई विशेष सामाजिक धर्मोपदेश नहीं थे, बल्कि वे वैदिक धर्म से ही मिलते-जुलते थे। जैनों के पारिवारिक संस्कार वैदिक संस्कारों के ही समान थे। ब्राह्मणधर्म की ही तरह भक्तिवाद, देवताओं का अस्तित्व इत्यादि था। वस्तुतः जैनधर्म ने ब्राह्मणधर्म से अपने को अलग करने का प्रयास नहीं किया। फलस्वरूप, जनता को इस धर्म में कोई ऐसी नई बात नहीं दिखी, जिससे प्रभावित होकर वे इसकी तरफ आकृष्ट हों।

नियमों की कठोरता – जैनधर्म ने कठिन तपस्या और आत्मपीड़न पर अत्यधिक बल प्रदान किया। संघ और धर्म के नियम इतने कठोर थे कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनका पालन संभव नहीं था। वस्त्र नहीं पहनना, भूखा रहना, धूप में शरीर को तपाना, बाल उखड़वाना इत्यादि ऐसे नियम थे, जिनका पालन सबके लिए संभव नहीं था। इसलिए, यह धर्म कभी लोकप्रिय नहीं हो सका।

अहिंसा पर अत्यधिक बल प्रदान करना – जैनधर्म ने अहिंसा की नीति को इतना अधिक महत्त्वपर्ण बना दिया कि वह अव्यावहारिक बन गया। आरम्भ में क्षत्रिय और कषक भी इस धर्म की तरफ आकृष्ट हुए, परंतु बाद में वे इससे विमुख होने लगे। क्षत्रिय के लिए युद्ध करना और कृषक के लिए खेती करना, इस धर्म का पालन करते हुए संभव नहीं था। इसी प्रकार जनसाधारण के लिए भी यह संभव नहीं था कि वह सदैव रास्ता साफ करते हुए चले, जल छानकर पीए या मुख पर वस्त्र डालकर श्वास ले, जिससे किसी जीवाणु की हत्या न हो जाए। जैन अहिंसा का दर्शन अव्यावहारिक सिद्ध हुआ और अपनी महत्ता खो बैठा। गृहस्थों के लिए इसका पालन अत्यन्त ही कठिन कार्य था।

जातिप्रथा के दर्शन को बनाए रखना – जैनधर्म जाति व्यवस्था से भी अपने-आपको पूर्णतः अलग नहीं कर सका। महावीर भी मानते थे कि कर्मफल के अनुसार ही मनुष्य का जन्म उच्च या निम्नवर्ग में होता है। संघ में व्यावहारिक रूप से उच्चवर्ण के व्यक्ति ही ज्यादा सम्मिलित हुए। जाति प्रथा की कमजोरी ने इस धर्म को सर्वमान्य नहीं बनने दिया।

उचित राज्याश्रय का अभाव – जैनधर्म की विफलता का एक अन्य कारण यह था कि इस धर्म को उचित राज्याश्रय नहीं मिल सका। यद्यपि लिच्छवियों, मगध के शासक बिम्बिसार और अजातशत्रु ने इस धर्म को स्वीकार किया, तथापि इसे वे अपना पूरा समर्थन नहीं दे पाए। इन लोगों ने बाद में बौद्धधर्म को ज्यादा महत्त्व प्रदान किया। इसी प्रकार, चन्द्रगुप्त मौर्य और खारवेल को छोड़कर अन्य किसी महत्त्वपूर्ण शासक ने इस धर्म को प्रश्रय नहीं दिया। बौद्धधर्म की तरह जैनधर्म को किसी अशोक या कनिष्क जैसे धार्मिक उत्साह से परिपूर्ण शासक का समर्थन नहीं मिल सका। फलतः, जैनधर्म कभी भी राजधर्म नहीं बन सका। इसलिए भी जनसमुदाय का समर्थन जैनधर्म को नहीं मिल सका।

अन्य कारण – अन्य कारणों के चलते भी जैनधर्म का बहुत अधिक प्रचार नहीं हो सका। जैनधर्म के विकास में सबसे बड़ी बाधा बौद्धधर्म के उदय ने कर दी। बौद्ध धर्म जैनधर्म से ज्यादा सरल और ग्राह्य था। इसलिए, धीरे-धीरे बौद्धधर्म का प्रभाव बढ़ता गया और जैनधर्मावलम्बियों की संख्या घटने लगी। इसी प्रकार, ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान ने भी इस धर्म के विकास को आघात पहुँचाया। जैनधर्म का विभाजन भी इसकी प्रगति में बाधक बना। जैनों का संगठन और प्रचार माध्यम भी कमजोर था, संघात्मक संगठन की कमजोरी के कारण धर्म प्रचारकों का भी अभाव था। अतः, जैनधर्म बौद्धधर्म जैसी सफलता नहीं प्राप्त कर सका।

प्रश्न 6.
गौतम बुद्ध के जीवन और उपदेशों का वर्णन करें।
उत्तर:
गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे। उनका जन्म 563 ई० पू० में शाक्य नामक क्षत्रिय कुल में कपिलवस्तु के निकट नेपाल की तराई में अवस्थित लुम्बिनी में हुआ था। उनके पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के निर्वाचित राजा और गणतांत्रिक शाक्यों के प्रधान थे। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था।

बचपन से ही गौतम चिन्तनशील व्यक्ति थे। इनका मन सांसारिक भोग विलास में नहीं लगता था। इनका विवाह यशोधरा से हुआ था तथा इनको एक पुत्र भी था, जिसका नाम राहुल था। एक बार इन्होंने एक वृद्ध, एक रोगी एवं एक मृत व्यक्ति को देखा। इन दृश्यों ने इनके मन में वैराग्य उत्पन्न कर दिया। 29 वर्ष की उम्र में इन्होंने घर छोड़ दिया, जिसे महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। ये ज्ञान की प्राप्ति के लिए जगह-जगह भटकते रहे। अन्त में 35 वर्ष की उम्र में बोधगया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। तब से वे बुद्ध अर्थात् प्राज्ञावान कहलाने लगे। उन्होंने अपना पहला धार्मिक प्रवचन वाराणसी के निकट सारनाथ में दिया जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहते हैं। वे लगभग 45 वर्षों तक अपने धर्म का प्रचार करते रहे एवं समकालीन सभी वर्ग के लोग उनके शिष्य बने। 483 ई० पू० में पूर्वी उत्तरप्रदेश में कुशीनगर नामक स्थान पर उनकी मृत्यु हुई। इस घटना को महापरिनिर्वाण कहते हैं।

गौतम बुद्ध व्यावहारिक सुधारक थे। वे आत्मा एवं परमात्मा से सम्बन्धित निरर्थक वाद-विवादों से दूर रहे तथा उन्होंने दोनों के अस्तित्व से इनकार किया। उन्होंने कहा कि संसार दुःखमय है और इस दु:ख के कारण तृष्णा है। यदि काम, लालसा, इच्छा एवं तृष्णा पर विजय प्राप्त कर ली जाये तो निर्वाण प्राप्त हो जायेगा, जिसका अर्थ है कि जन्म एवं मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जायेगी।

गौतम बुद्ध ने निर्वाण की प्राप्ति का साधन अष्टांगिक मार्ग को माना है। ये आठ साधन हैं-सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। उन्होंने कहा कि न तो अत्यधिक विलाप करना चाहिए और न अत्यधिक संयम ही बरतना चाहिए। वे मध्यम मार्ग के प्रशंसक थे। उन्होंने सामाजिक आचरण के कुछ नियम निर्धारित किये थे जैसे-पराये धन का लोभ नहीं करना चाहिए, हिंसा नहीं करनी चाहिए, नशे का सेवन नहीं करना चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए तथा दुराचार से दूर रहना चाहिए।

प्रश्न 7.
बौद्ध धर्म के पतन के कारणों को लिखिए।
उत्तर:
बौद्ध धर्म के पतन के निम्नलिखित कारण थे-
(i) हिन्दू धर्म में सुधार (Reforms in Hinduism) – हिन्दू धर्म के असंख्य देवी-देवता हैं। अतः उन्होंने गौतम बुद्ध को भी अवतार मानकर उसकी भी पूजा अर्चना शुरू कर दी। इनके कुछ सिद्धान्तों जैसे सत्य और अहिंसा को ग्रहण कर लिया। ब्राह्मणों एवं हिन्दू विद्वानों के समय पर चेत जाने के कारण हिन्दू धर्म का विघटन रुक गया। जो लोग हिन्दू धर्म छोड़कर चले गये थे उसे उन्होंने पुनः स्वीकार कर लिया।

(ii) बौद्ध धर्म का विभाजन (Split in Buddhism) – कनिष्क के काल में बौद्ध धर्म का विभाजन हीनयान और महायान के रूप में हो गया था। महायान शाखा को मूर्तिपूजा की छूट दी गई जिसके फलस्वरूप कई लोगों ने फिर से इस धर्म में प्रवेश पा लिया, जो पहले. इसे छोड़ चुके थे।

(iii) बौद्ध मठों में भ्रष्टाचार (Corruption in the Buddhist Sanghas) – मठों में सुख-सुविधाओं के मिल जाने तथा स्त्रियों को भिक्षुणी बनाने की छूट दिये जाने के कारण मठों में भ्रष्टाचार फैल गया। भिक्षु तथा भिक्षुणियाँ धार्मिक कार्यों की आड़ में विषय-वासनाओं में लग गये। उनका चरित्र भ्रष्ट हो गया। उनके सब त्याग, तपस्या व आदर्श मिट्टी में मिल गये। गौतम बुद्ध के उपदेशों को भलकर वे वासनाओं में लिप्त हो गये जिससे समाज पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।

(iv) राजकीय सहायता का न मिलना (Loss of Royal Patronage) – कनिष्क की मृत्यु के पचात बौद्धों को राजकीय सहायता मिलनी बन्द हो गई। गप्त साम्राज्य के आ जाने के कारण हिन्दू धर्म का बढ़ावा मिलना प्रारम्भ हो गया। उधर बौद्ध धर्म धनाभाव के कारण अधिक दिनों तक नहीं चल सका।

(v) बौद्ध धर्म में जटिलता आना (Arrival of Complexity in the Buddhism) – बौद्धों ने हिन्दुओं के कई सिद्धान्त ग्रहण कर लिये थे। जन-साधारण की भाषा को छोड़कर वे संस्कृत में साहित्य रचना करने लगे थे। अतः यह धर्स जनता की समझ से बाहर होने लगा था।

(vi) हिन्दु उपदेशकों का आना (Coming of the Hindu Missionaries) – कुमरिल भट्ट और शंकराचार्य जैसे हिन्दू विद्वानों के मैदानों में आ जाने से बौद्ध विद्वानों की दाल गलनी बंद हो गई थी। वे इन सिद्धान्तों के तर्कों के सामने नहीं ठहर पाते थे।

(vii) राजपूत शक्ति का विस्तार (Rise of Rajpoot Power) – सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक सारे उत्तरी भारत में राजपूतों की सत्ता छा गई। राजपूत शक्ति के उपासक थे। वे अहिंसा को कायरता मानते थे। उनका मत था कि बौद्ध मत में अहिंसा का अर्थ मृत्यु को बुलावा देना होता है, अत: अहिंसा आदि सिद्धान्त ताक पर रख दिये गये। इससे बौद्ध धर्म का प्रचार कार्य बन्द होने लगा और वे विदेशों में जाने लगे।

(viii) मुसलमानों के आक्रमण (The Muslim Invasions) – बारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी और अन्य आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किये। बौद्धों में उनके आक्रमण का मुकाबला करने का साहस न था। अतः वे या तो मारे गये, या निकटवर्ती क्षेत्रों जैसे नेपाल, तिब्बत, बर्मा, श्रीलंका आदि में चले गये।

(ix) हूणों का आक्रमण (Invasions of the Hunas) – बौद्धों की अधिकतम हानि हूणों द्वारा हुई। उन्होंने हजारों भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया। उनके मठों को खण्डहर बना दिया गया। तक्षशिला आदि विश्वविद्यालयों को आग लगा दी तथा बौद्ध साहित्य को जला दिया गया। इस प्रकार से पंजाब, राजपूताना एवं उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त से बौद्धों का सफाया हो गया था।

प्रश्न 8.
छठी शताब्दी ई. पू. में भारत की राजनीतिक दशा का वर्णन करें।
अथवा, बुद्धकालीन सोलह महाजनपदों का परिचय दें।
उत्तर:
छठी शताब्दी ई० पू० में उत्तरी भारत की राजनीतिक अवस्था में उत्तरोत्तर उन्नति हो रही थी। वैदिककाल में कबीलों या जनों का महत्व था। उत्तर वैदिककाल में प्रादेशिक राज्यों की स्थापना का काम हुआ था और ई० पूर्व छठी शताब्दी में कई महाजनपदों की स्थापना हुई । इसका वर्णन हमें बौद्ध और जैन धर्मग्रन्थों में मिलता है। बौद्ध धर्म ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय में अंग, मगध, काशी, कोशल, बज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अस्मक, अति, गांधार और कंबोज का वर्णन मिलता है। जैन धर्मग्रन्थ भगवती सूत्र में अंग, बंग, मगध, मलय, मालव, अच्छ, वच्छ. कच्छ पाध, लाध, वज्जि, मोलि, काशी, कोशल, अवाह और सम्मतर का वर्णन मिलता है। इन दोनों सूचियों में अंग, मगध, वत्स, बज्जि, काशी और कोशल का नाम समान रूप से मिलता है। इस संदर्भ में अंगुत्तर निकाय द्वारा प्रदत्त सूची को ही ज्यादा प्रामाणिक माना गया है, क्योंकि इसमें समकालीनता की झलक अधिक है। बौद्ध साहित्य में दस गणराज्यों का भी उल्लेख मिलता है। ये गणराज्य थे-कपिलवस्तु के शाक्य, रामग्राम के कोलिय, पावा के मल्ल, कुशीनारा के मल्ल, मिथिला के विदेह, पिप्पलीवन के मोरिय, सुंसुमार पर्वत के भग्ग, अल्कप्प के बुलि से सुपुत्र के कलाम और वैशाली के लिच्छवि। कहने का तात्पर्य यह है कि उत्तरी भारत कई महाजनपदों और गणराज्यों में विभाजित था।

सोलह महाजनपद

1. अंग – अंग मगध के पूर्व में स्थित था। इसकी राजधानी चंपानगरी में थी, जो सभ्यता और संस्कृति का केंद्र था। चम्पानगरी एक व्यापारिक नगर के रूप में मशहूर था। विधुर पंडित जातक के अनुसार राजगृह भी अंग का ही नगर था। अंग का मगध से बराबर संघर्ष होता रहता था। बाद में मगध की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शिकार होकर उसे अपनी स्वतंत्रता खोनी पड़ी।

2. मगध – छठी शताब्दी ई० पूर्व में मगध एक शक्तिशाली राज्य था। इसकी राजधानी राजगृह में थी। वृहद्रथ और जरासंध यहाँ के प्रमुख राजा हो चुके थे। ये प्राग्बुद्ध काल के शासक थे। मगध साम्राज्यवादी नीति में विश्वास रखता था। इसने अंग पर अधिकार भी कर लिया था।

3. काशी – काशी की राजधानी वाराणसी थी। यह वरुणा और असी नदियों के संगम पर बसा हुआ था। बारह योजनों में फैला यह नगर भारत के सर्वश्रेष्ठ नगरों में से था। महाबग्ग में इसके वैभव का उल्लेख सुंदर ढंग से किया गया है। कोशल के साथ राजनीतिक प्रभुता के लिए इसकी लड़ाई होती रहती थी।

4. कोशल – यह राज्य काशी के उत्तर में स्थित था। इसके विस्तार का क्षेत्र उत्तर प्रदेश का मध्य भाग था। इसकी राजधानी श्रावस्ती में थी। इस समय तक इसकी पहली राजधानी अयोध्या का महत्व कम हो चुका था। इसका काशी के साथ बराबर संघर्ष होता रहता था। इसने काशी को जीतकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। आगे चलकर मगध के शासक अजातशत्रु ने कोशल को जीतकर मगध में मिला लिया।

5. बज्जि – बृज्जि आठ राज्यों का संघ था जिसमें लिच्छवि, विदेह और ज्ञात्रिक विशेष महत्वपूर्ण थे। यहाँ गणतंत्रीय शासन पद्धति थी। इसकी राजधानी वैशाली में थी। वैशाली सभ्यता और संस्कृति का केन्द्र था। इस संघ की स्वतंत्रता पर भी मगध ने ही आघात पहुँचाया था।

6. मल्ल – मल्ल भी एक महत्वपूर्ण गणराज्य था। यह वृज्जि के पश्चिम और कोशल के पूर्व में स्थित था। यह दो शाखाओं में विभक्त था। एक पावा के मल्ल के नाम से जाने जाते थे, दूसरा कुशीनगर के मल्ल के नाम से जाने जाते थे। इनका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है।

7. चेदि – चेदि नामक राज्य यमुना के दक्षिण में स्थित था तथा इसकी राजधानी शक्तिमती थी। शिशुपाल चेदि का ही राजा था।

8. वत्स – वत्स नामक राज्य यमुना के उत्तर में तथा काशी से पश्चिम स्थित था। इसकी राजधानी कौशाम्बी में थी। व्यापारिक मार्ग पर स्थित होने की वजह से इसका काफी महत्व था।

9. कुरु – आधुनिक दिल्ली और मेरठ के समीप कुरु नामक महाजनपद स्थित था। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ में थी। प्रारंभ में यहाँ राजतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था थी, किन्तु बाद में यहाँ गणतंत्र की स्थापना हुई। एक जातक के अनुसार, इसमें 300 के लगभग संघ थे। जातकों में यहाँ के राजाओं का विवरण मिलता है। इसमें सुतसोम, कौरव एवं धनंजय का नाम उल्लेखनीय है।

10. पांचाल – पांचाल महाजनपद कुरु के पूर्व और दक्षिण में स्थित था। गंगा नदी के द्वारा यह दो भागों में बाँट दिया गया था। उत्तरी पांचाल की राजधानी अहिछत्र और दक्षिण पांचाल की राजधानी काम्पिल्य नगर में थी। यहाँ भी कुरु की तरह ही राजतंत्र और बाद में गणतंत्र की स्थापना हुई थीं। चुलानी ब्रह्मदत्त पांचालों का एक महान शासक था।

11. मत्स्य – मत्स्य नामक महाजनपद द्विषद्वती नदी के दक्षिण में स्थित था। इसकी राजधानी विराटनगरी थी। इस पर पहले चेदियों ने और बाद में मगध ने अधिकार कर लिया था।

12. शूरसन – शूरसेन का राज्य कुरु के दक्षिण और यमुना के किनारे था। इसकी राजधानी मथुरा थी। यहाँ पहले गणतंत्र, फिर राजतंत्र की स्थापना हुई थी। यहाँ यादवों का शासन था।

13. अस्मक – यह जनपद गोदावरी नदी के दक्षिण में स्थित था तथा इसकी राजधानी पोतन थी। इक्ष्वाकु वंश के राजाओं का यहाँ शासन था। अवन्ति के साथ संघर्ष में इसने अपनी स्वतंत्रता गँवा दी।

14. अवन्ति – विन्ध्य पर्वत के उत्तर में यह एक शक्तिशाली राज्य था जो उत्तर और दक्षिण भारत के बीच कड़ी का काम करता था। यह भी दो भागों उत्तरी और दक्षिणी अवन्ति में बँटा हुआ था। उत्तरी अवन्ति की राजधानी उज्जयनी और दक्षिणी अवन्ति की राजधानी महिष्मती थी । इसका विस्तार क्षेत्र आधुनिक मालवा प्रांत था।

15. गाधार – गांधार नामक जनपद आधुनिक अफगानिस्तान में सिंधु नदी के किनारे स्थित था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी। इसका अवन्ति और मगध से शत्रुतापूर्ण संबंध था। इसकी प्रसिद्धि का कारण तक्षशिला स्थित विश्वविद्यालय था।

16. कंबोज – गांधार के उत्तर-पश्चिम में कंबोज नामक महाजनपद स्थित था। इसकी राजधानी हाटक या राजपुर थी। संभवतः द्वारका भी इसी राज्य के अंतर्गत स्थित था।

अन्य छोटे राज्य

अंगुत्तर निकाय में वर्णित इन महाजनपदों के अलावा केकय, भद्रक, त्रिगर्त, यौधेय, शिवि, अम्बष्ठ, सौबीर आदि राज्य भी थे, लेकिन ये बहुत छोटे थे और साम्राज्यवादी ताकतों के बीच महत्वहीन थे।

दस गणराज्य : सोलह महाजनपदों के अलावा पालि ग्रंथों में दस गणराज्यों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। इनमें से कुछ का उल्लेख तो सोलह महाजनपदों के अंतर्गत भी है। इन राज्यों में वंश-परम्परा के अनुसार कोई राजा नहीं होता था, बल्कि प्रजा द्वारा निर्वाचित व्यक्ति शासन का प्रमुख होता था। इन दसों गणराज्यों का विवरण नीचे प्रस्तुत है-

  1. कपिलवस्तु के शाक्य – यह नेपाल की तराई में स्थित था। यहाँ के शासन के प्रधान शुद्धोधन थे जो बुद्ध के पिता थे। उनका शासन 500 सदस्यों वाली परिषद् की सहायता से चलता था।
  2. रामग्राम के कोलिय – कपिलवस्तु के पूर्व में कोलिय लोगों का राज्य था। इनका शाक्यों से बराबर संघर्ष होता रहता था।
  3. पावा के मल्ल – यह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के समीप स्थित था। इसकी राजधानी पावा में थी। यहीं संभवतः महावीर का देहांत हुआ था।
  4. कुशीनारा के मल्ल – यह भी उत्तर प्रदेश में ही था और बुद्ध का परिनिर्वाण संभवतः यहीं हुआ था।
  5. मिथिला के विदेह – विदेहों का राज्य एक अराजक गणराज्य था। जहाँ जनक जैसे ख्याति प्राप्त राजा हुए थे।
  6. पिप्पलीवन के मोरिय – यहाँ शक्तियों की ही एक शाखा राज्य करती थी। मोरों की अधिकता के कारण यहाँ के लोगों को मोरिय के नाम से जाना जाता था।
  7. सुमेर पर्वत के भग्ग – यहाँ ब्राह्मणों का शासन था। इनका राज्य उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के नजदीक था। इनका उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में भी मिलता है।
  8. अलकप्प के बुलि – बुलि लोगों का राज्य बिहार के आधुनिक मुजफ्फरपुर और शाहाबाद के नजदीक कहीं था।
  9. केसपुत्र के कलाम – इसका वर्णन हमें शतपथ ब्राह्मण और जातक ग्रंथों में मिलता है। बुद्ध के गुरु आलार कलाम यहीं के रहनेवाले थे।
  10. वैशाली के लिच्छवि-लिच्छवियों का यह गणराज्य था और इसकी राजधानी वैशाली में थी। वैशाली एक वैभवशाली नगर था। अजातशत्रु के समय में मगध के द्वारा इसकी स्वतंत्रता छीन ली गयी थी। आम्रपाली यहाँ की नगरवधू एवं नर्तकी थी जो बाद में बुद्ध के सम्पर्क में आकर भिक्षुणी बन गयी थी।

राजनीतिक प्रवृत्तियाँ

उपरोक्त बातों को देखने से हमें उस समय की विभिन्न राजनीतिक प्रवृत्तियों का पता चलता है, जो निम्नलिखित हैं-
1. विकेन्द्रीकरण की भावना – ई० पूर्व छठी शताब्दी में संपूर्ण भारत कई भागों में विभाजित था। बौद्ध और जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार भारत सोलह महाजनपदों में विभाजित था। इसके अलावा भी कुछ छोटे-छोटे राज्यों का पता हमें अन्य स्रोतों से चलता है, जिनमें केकय, मुद्रक, त्रिगर्त, यौधेय आदि प्रमुख थे। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत में विकेन्द्रीकरण की भावना काम कर रही थी।

2. शासन की पद्धतियाँ – उपरोक्त राज्यों के अध्ययन से पता चलता है कि इस काल में दो तरह की शासन-पद्धतियाँ प्रचलित थीं। कोशल, मगध, वत्स एवं अवन्ति उस समय के प्रमुख राजतन्त्र थे। बृज्जि, मल्ल, कपिलवस्तु, मिथिला आदि में गणतंत्रीय पद्धति का बोलबाला था। लेकिन राजतंत्रीय एवं गणतंत्रीय दोनों ही शासन-पद्धतियाँ प्रचलित थीं।

3. परिवर्तनशील शासन-पद्धति – इस संदर्भ में एक बात और प्रकाश में आती है। वह यह कि समय के अंतराल में किसी-किसी महाजनपद में शासन-पद्धति में परिवर्तन भी होता रहता था। उदाहरणस्वरूप कुरु और पांचाल में राजतंत्रीय व्यवस्था के बाद गणतंत्र की स्थापना हुई थी, जबकि शूरसेन में गणतंत्र की कब्र पर राजतंत्र की स्थापना हुई। यह समय के मुताबिक राजाओं की मानसिकता में होनेवाले परिवर्तनों को बतलाया है।

4. साम्राज्यवादी भावना का विकास – उपरोक्त विवरणों से यह भी पता चलता है कि छठी शताब्दी ई० पू० राजनीतिक दृष्टिकोण से उथल-पुथल का समय था। एक जनपद दूसरे जनपद के साथ संघर्ष करता था। विजय और विस्तार की लालसा में महाजनपदों के बीच होनेवाला यह संघर्ष उस समय के राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी। कहने का तात्पर्य यह है कि साम्राज्यवाद की भावना का विकास हो रहा है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि ई० पूर्व छठी शताब्दी में भारत कई महाजनपदों में विभक्त था जिनमें अलग-अलग शासन-पद्धतियों की स्थापना हुई थी।

प्रश्न 9.
मगध साम्राज्य के उत्थान के क्या कारण थे ?
उत्तर:
छठी शताब्दी ई० पूर्व के महाजनपदों में अंतत: मगध एक साम्राज्यवादी ताकत के रूप में उभरा। विम्बिसार, अजातशत्रु और महापद्मनंद जैसे पराक्रमी राजाओं ने मगध के उत्कर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 321 ई० पूर्व तक इसने एक विशाल साम्राज्य का रूप धारण कर लिया।

मगध साम्राज्य के उत्थान के कारण

(i) लोहे का भंडार – मगध की आरंभिक राजधानी राजगृह के नजदीक लोहे का भंडार था। लोहे के औजारों से मगध के लोगों ने जंगलों को साफ किया और इसका अनुकूल असर कृषि के विकास पर पड़ा। कृषि के क्षेत्र में विकास से मगध की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई और उसके राजनीतिक उत्कर्ष में इसने सहायक की भूमिका निभायी। लोहे से शस्त्रास्त्रों का भी निर्माण हुआ। इससे भी वहाँ के लोगों को अन्य जनपदों को जीतने में आसानी हई। कहने का तात्पर्य यह है कि लोहा के भंडार की उपलब्धि उनके लिए दोहरे लाभ की बात सिद्ध हुई। इसने न केवल इन्हें सुदृढ़ आर्थिक आधार प्रदान किया बल्कि उनके राजनीतिक उत्कर्ष में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

सामरिक इष्टिकोण से महत्वपर्ण स्थलों पर राजधानी – मगध की दोनों राजधानियाँ सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण स्थानों पर थीं। राजगृह पाँच पहाड़ियों से घिरा हुआ था और पाटलिपुत्र गंगा, गंडक तथा सोन के संगम पर स्थित था। इसके अलावा यह चारों ओर से नदियों से घिरा था। नदियों के किनारे बसे होने से संचार की काफी सुविधा थी। राजगृह एक अभेद्य दुर्ग था तथा पाटलिपुत्र एक जलदुर्ग की तरह था। पाटलिपुत्र के उत्तर और पश्चिम में गंगा तथा सोन नदी बहती थी और दक्षिण से पुनपुन नदी घेरे हुई थी। मगध का सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण स्थान पर होना भी उसके राजनीतिक उत्कर्ष का एक कारण था।

(iii) हाथी के उपयोग की खास सुविधा – मगध को देश के पूर्वी भाग से हाथी मिलते थे। उन्होंने अपनी सेना में हाथियों से युक्त सेना को भी स्थान दिया तथा अपने पड़ोसियों के विरुद्ध इसका उपयोग किया। हाथियों के सहारे वे दुर्गों को भेदने और यातायात की सुविधा से रहित स्थानों पर पहुँचने का काम करते थे। हाथियों के उपयोग की इस खास सुविधा ने मगध के उत्कर्ष में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। ऐसा इसलिए कि भारत के विभिन्न राज्य घोड़े और रथ का उपयोगते थे, लेकिन मगध ही पहला राज्य था जिसने हाथियों का बडे पैमाने पर इस्तेमाल किया।

(iv) व्यापारिक मार्ग से जुड़ा होना – मगध व्यापारिक मार्ग पर स्थित था। वह स्थल और जल-मार्ग से देश के विभिन्न भागों से जडा हआ था। अतः यहाँ व्यापार और वाणिज्य तथा नगरों का उदय हआ था। व्यापार और वाणिज्य से कर के रूप में प्राप्त होनेवाली आमदनी से मगध के राजा आर्थिक दृष्टि से काफी ठोस हो गये थे और उनकी इस आर्थिक सुदृढ़ता ने राजनीतिक महत्व प्रदान करने में काफी मदद की थी।

(v) प्रतापी राजाओं का योगदान – मगध के उत्कर्ष का एक कारण वहाँ के प्रतापी राजा भी थे। बिंबिसार, अजातशत्रु और महापद्मनंद जैसे कई साहसी और महत्त्वाकांक्षी राजा मगध में हुए। इन्होंने सभी उपलब्ध साधनों-ईमानदारी तथा बेईमानी से अपने राज्य का विस्तार किया और उसे मजबूत बनाया। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर उपरोक्त वर्णित राजाओं की तरह मगध में राजा नहीं हुए होते तो मगध का उत्कर्ष संभव नहीं होता।

प्रश्न 10.
चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी एवं उपलब्धियों का वर्णन करें।
उत्तर:
चन्द्रगुप्त का जन्म 345 ई० पू० में भोरिय वंश के क्षत्रिय कुल में हुआ था जो सूर्य वंशी शाल्यों की एक शाखा थी और जो नेपाल की तराई में पिप्पलिबिन के प्रजातन्त्र राज्य में शासन करते थे। चन्द्रगुप्त का पिता इन्हीं भोरियों का प्रधान था। दुर्भाग्यवश एक शक्तिशाली राजा ने उनकी हत्या करवा दी और राज्य भी छीन लिया। चन्द्रगुप्त की माता उन दिनों गर्भवती थी। इस आपत्ति काल में वह अपने सम्बन्धियों के साथ भाग गई और अज्ञात रूप से पाटलिपुत्र में निवास करने लगी। यहाँ पर अपनी जीविका चलाने तथा अपने राजवंश को गुप्त रखने के लिए यह लोग मयूर-पालकों का कार्य करने लगे इस प्रकार चन्द्रगुप्त का प्रारम्भिक जीवन मयूर-पालकों के मध्य व्यतीत था।

जब चन्द्रगुप्त बड़ा हुआ तब उसने मगध के राजा के यहाँ नौकरी कर ली और उनकी सेना में भर्ती हो गया। चन्द्रगुप्त बड़ा ही योग्य तथा प्रतिभावान व्यक्ति था। अपनी योग्यता के बल से यह मगध की सेना का सेनापति बन गया। परन्तु कुछ कारणों से मगध का राजा अप्रसन्न हो गया और उसे मृत्यु-दण्ड की आज्ञा दे दी। इन दिनों मगध में नन्द वंश शासन कर रहा था अपने प्राण की रक्षा करने के लिए चन्द्रगुप्त मगध राज्य से भाग गया और उसने नन्द को विनष्ट करने का संकल्प कर लिया।

यद्यपि चन्द्रगुप्त ने नन्दवंश को उन्मूलित करने का संकल्प कर लिया था परन्तु अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसके पास साधन नहीं थे अतएव साधन की खोज में वह पंजाब की ओर चला गया और इधर-उधर भटकता हुआ तक्षशिला पहुँचा, जहाँ विष्णुशुद्र नामक ब्राह्मण से उसकी भेंट हो गई। विष्णुशुद्र को चाणक्य भी कहते हैं, क्योंकि उसके पितामह (बाबा) का नाम चाणक्य था। उसे कौटिल्य भी कहते हैं, क्योंकि उसके पिता का कुटल था। चाणक्य बहुत बड़ा विद्वान् तथा राजनीति का प्रकाण्ड पण्डित था। वह भारत के पश्चिमोत्तर भागों की राजनीतिक दुर्बलता से परिचित था और उसे वह आशंका लगी रहती थी कि वह प्रदेश कभी भी विदेशी आक्रमणकारियों का शिकार बन सकता है।

अतएव वह इस भू-भाग के छोटे-छोटे राज्यों को समाप्त कर यहाँ एक प्रबल केन्द्रीय शासन स्थापित करना चाहता था जिसमें विदेशी आक्रमणकारियों से देश की रक्षा हो सके। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह मगध नरेश की सहायता प्राप्त करने के लिए पाटलिपुत्र गया परन्तु सहायता प्राप्त करने के स्थान पर वह धार्मिक अनुष्ठान में नन्द-राज द्वारा अपमानित किया गया। चाणक्य बड़ा ही क्रोधी तथा उग्र प्रकृति का व्यक्ति था। उसने नन्द वंश को विनिष्ट करने का संकल्प कर लिया। परन्तु नन्द वंश के विशाल साम्राज्य को उन्मूलित करने के साधन उसके पास भी न थे अतएव वह इस साधन की खोज में संलग्न था। इसी समय चन्द्रगुप्त से उसकी भेंट हो गई।

चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त दोनों के उद्देश्य एक ही थे। यह दोनों व्यक्ति नन्द वंश का विनाश करना चाहते थे परन्तु दोनों ही के पास साधन का आभावं था। संयोगवश इन दोनों ने एक दूसरे की आवश्यकता की पूर्ति कर दी। चाणक्य को एक वीर साहसी तथा महत्वाकांक्षी नवयुवक की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति चन्द्रगुप्त ने कर दी और चन्द्रगुप्त को एक विद्वान अनुभवी कुटनीतिज्ञ की तथा सेना एकत्रित करने के लिए धन की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति चाणक्य ने कर दी। फलतः इन दोनों में मैत्री तथा गठ-बन्धन हो गया।

अब अपने उद्देश्य की पूर्ति की तैयारी करने के लिए दोनों मित्र विन्ध्यांचल के वनों की ओर चले गये। चाणक्य ने अपना सारा धन चन्द्रगुप्त को दे दिया। इस धन की सहायता से अपने भाड़े की एक सेना तैयार की और इस सेना की सहायता से मगध पर आक्रमण कर दिया परन्तु नन्दों की शक्तिशाली सेना ने उन्हें परास्त कर दिया और मगध से भाग खड़े हुए। अब इन दोनों मित्रों ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए फिर पंजाब की ओर प्रस्थान कर दिया। अब इन लोगों ने इस बात का अनुभव किया कि मगध राज्य के केन्द्र पर प्रहार कर उन्होंने बहुत बड़ी भूल की थी। वास्तव में उन्हें इस राज्य के एक किनारे पर उसके सुदूरस्थ प्रदेश पर आक्रमण करना चाहिए था, जहाँ केन्द्रीय सरकार का प्रभाव कम और उसके विरुद्ध असन्तोष अधिक रहता था। इन दिनों यूनानी विजेता सिकन्दर महान पंजाब में ही था और वहाँ के छोटे-छोटे राज्यों को समाप्त कर रहा था। चन्द्रगुप्त ने नन्दों के विरुद्ध सिकन्दर की सहायता लेने का विचार किया अतएव वह सिकन्दर से मिला और कुछ दिनों तक उसके शिविर में रहा। परन्तु चन्द्रगुप्त के स्वतंत्र विचारों के कारण सिकन्दर अप्रसन्न हो गया और उसको वधकर देने की आज्ञा प्रदान की। चन्द्रगुप्त अपने प्राण बचाकर भाग खड़ा हुआ। अब उसने मगध राज्य के विनाश के साथ-साथ यूनानियों को भी अपने देश से मार भगाने का निश्चय कर लिया और अपने मित्र चाणक्य की सहायता से अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए योजनाएँ बनाने लगा।

चन्द्रगुप्त की विजय-सिकन्दर के भारत से चले जाने के उपरान्त भारतियों ने यूनानियों के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ कर दिया। चन्द्रगुप्त के लिए यह स्वर्ण अवसर था और इससे उसने पूरा लाभ उठाने का प्रयल किया। उसके क्रांतिकारियों का नेतृत्व ग्रहण किया और यूनानियों को पंजाब से भगाना आरम्भ किया। यूनानी सरदार युडेमान अन्य यूनानियों के साथ भारत छोड़कर भाग गया और जो यूनानी सैनिक भारत में रह गए थे वे तलवार के घाट उतार दिए गए। इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने सम्पूर्ण पंजाब पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर दिया।

पंजाब पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेने के उपरान्त चन्द्रगुप्त ने मगध राज्य पर आक्रमण करने के लिए पूर्व की ओर प्रस्थान कर दिया। वह अपनी विशाल सेना के साथ मगध-साम्राज्य की पश्चिमी सीमा पर टूट पड़ा। मगध नरेश के चन्द्रगुप्त की सेना की प्रगति को रोकने के सभी प्रयत्न निष्फल सिद्ध हुए। चन्द्रगुप्त की सेना आगे बढ़ती गई और मगध राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र के सन्निकट पहुँच गई और उसका घेरा डाल दिया। अन्त में नन्द राजा घनानन्द की पराजय हुई और अपने परिवार के साथ बह युद्ध में मारा गया। अब चन्द्रगुप्त पाटलिपुत्र में सिंहासन पर बैठ गया और चाणक्य ने 302 ई० पू० में उसका राज्याभिषेक कर दिया।

उत्तर भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेने के उपरान्त चन्द्रगुप्त ने दक्षिण भारत पर भी अपनी विजय पताका फहराने का निश्चय किया। सर्वप्रथम उसने सौराष्ट्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। उसके बाद लगभग 303 ई० पू० में उसने मालवा पर अधिकार स्थापित कर लिया और पुष्यगुप्त वंश को वहाँ का प्रबन्ध करने के लिए नियुक्त कर दिया जिसने सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था। इस प्रकार काठियावाड़ तथा मालवा पर चन्द्रगुप्त का प्रभुत्व स्थापित हो गया। इतिहासकारों की धारणा है कि सम्भवतः मैसर की सीमा तक चन्द्रगप्त का साम्राज्य फैला था।

चन्द्रगुप्त का अन्तिम संघर्ष सिकन्दर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर के साथ हुआ। सिकन्दर की मृत्यु के उपरान्त सेल्यूकस उसके साम्राज्य के पूर्वी भाग का अधिकारी बना था। उसने 305 ई० पू० में भारत पर आक्रमण कर दिया। चन्द्रगुप्त ने पश्चिमोत्तर प्रदेश की सुरक्षा की व्यवस्था पहले से ही कर ली थी। उसकी सेना ने सिन्धु नदी के उस पार ही सेल्यूकस के सेना का सामना किया। युद्ध में सेल्यूकस की पराजय हो गई और विवश होकर उसे चन्द्रगुप्त के साथ सन्धि करनी पड़ी। सेल्यूकस ने अपनी कन्या का विवाह चन्द्रगुप्त के साथ कर दिया और वर्तमान अफगानिस्तान तथा दिलीचिस्तान के सम्पूर्ण प्रदेश चन्द्रगुप्त को दे दिया। उसने मेगास्थनीज नामक एक राजदूत भी चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलिपुत्र में भेजा चन्द्रगुप्त ने भी 500 हाथी सेल्यूकस को भेंट किए। चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस के संघर्ष के सम्बन्ध में डॉ० राय चौधरी ने अपनी पुस्तक प्राचीन भारत की राजनीतिक में लिखा है, यह देखा जाएगा कि प्राचीन लेखकों से हमें सेल्यूकस और चन्द्रगुप्त के वास्तविक संघर्ष का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता है। वे केवल परिणामों को बतलाते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि आक्रमणकारी अधिक आगे बढ़ सका और एक सन्धि कर ली जो वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा सुदृढ़ बना दी गई।

उपर्युक्त विजयों के फलस्वरूप चन्द्रगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत से पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय पर्वत से दक्षिण में कृष्णा नदी तक फैल गया। परन्तु कश्मीर, कलिंग तथा दक्षिण के कुछ भाग में उनके साम्राज्य के अन्दर न थे। इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने अपने बाहुबल तथा अपने मंत्री चाणक्य के बुद्धि बल से भारत की राजनीतिक एकता सम्पन्न की।

चन्द्रगुप्त न केवल एक महान विजेता वरन एक कुशल शासक भी था। जिस शासन व्यवस्था का उसने निर्माण किया वह इतनी उत्तम सिद्ध हुई कि भावी शासकों के लिए वह आदर्श बन गई और थोड़े बहुत आवश्यक परिवर्तन के साथ निरन्तर चलती रही।

प्रश्न 11.
चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन प्रबन्ध विस्तार से लिखें।
अथवा, मौर्य साम्राज्य की शासन पद्धति का वर्णन करें।
अथवा, मौर्यों के नागरिक प्रबन्ध के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन प्रबन्ध के विषय में विस्तृत जानकारी कौटिल्य के अर्थशास्त्र और मेगास्थनीज की इण्डिका से मिलती है। V.A.Smith के अनुसार, “The Mauryan state was organised and carefully graded officials with well defined duties”.

चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन प्रबन्ध का वर्णन निम्न प्रकार है-
1. केन्द्रीय शासन (Central Administration) – चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन एकतंत्रात्मक था। वह स्वयं राज्य का सर्वोच्च अधिकारी था। सम्राट तीन कार्य मुख्य रूप से करता था-
(a) सम्राट स्वयं अधिकारियों की नियुक्ति करता था। वह विभिन्न विभागों के कार्यों का निरीक्षण करता था। वह विदेशी मामलों की देख-रेख करता था, आवश्यक आदेश निकालता था। गुप्तचरों द्वारा देश के आन्तरिक स्थिति की जानकारी प्राप्त करता था और देश में शान्ति व्यवस्था बनाये रखता था। बाहरी आक्रमणों से भी देश की रक्षा करता था।
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(b) न्यायाधीश के रूप में वह अपने प्रजा की शिकायतें सुनता था और स्वयं निर्णय कर दोषी को दंड भी देता था।

(c) सैन्य संगठनकर्ता के रूप में राजा ने देश को आन्तरिक विद्रोहों एवं बाहरी आक्रमणों से बचाने का भार भी अपने कन्धों पर ले रखा था। (ए० वी० स्मिथ (A. V. Smith) ने एक स्थान पर लिखा है-“The known facts of Chandra Gupta’s administration prove that he was sternde spot.”)

मन्त्रिपरिषद् (Council of Minister) – राजा को शासन कार्य में परामर्श देने के लिए एक मंत्री परिषद् का गठन किया जाता था, यद्यपि सम्राट उसकी सलाह मानने के लिए बाध्य न था, परन्तु व्यवहार में वह इसका पालन करता था। कौटिल्य ने अपने ‘अर्थशास्त्र’ में लिखा है कि राज्य सत्ता बिना सहायता के सम्भव नहीं होती। अतः सम्राट को मंत्री परिषद् बनानी पड़ती है और राज-काज में उसकी सलाह लेनी पड़ती है।

2. प्रान्तीय शासन (Provincial Government) – चन्द्रगुप्त ने साम्राज्य की विशालता को देखते हुए उसे कई प्रान्तों में बाँट दिया था जिससे उसे शासन कार्य में सुविधा हो गई थी। प्रत्येक प्रान्त का शासन ‘कुमार’ (राजकीय परिवार के सदस्य) के अधिकार में होता था। कुमार के साथ महामात्र भी शासन कार्य में उसकी मदद करता था। सम्राट इन पर परा नियंत्रण रखता था। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी प्रान्त थे, जो आन्तरिक नीति में पूर्ण स्वतंत्र थे। वे सम्राट को केवल कर (Tax) देते थे एवं विदेश नीति में उसके अधीन रहते थे।

3. स्थानीय शासन (Local Administration)
(i) नगर प्रशासन (Town Administration) – मेगास्थनीज ने अपने भारत वर्णन में पाटलिपुत्र (पटना) नगर के विषय में लिखा है कि वह एक भव्य नगर था। यह सौ मील लम्बा और दो मील चौड़ा था। इसके चारों ओर लकड़ी की एक विशाल दीवार थी, जिसमें 64 दरवाजे और 570 बुर्ज थे। इस नगर का प्रबन्ध 30 सदस्यों के एक आयोग द्वारा किया जाता था जिसमें 5-5 सदस्यों की छः समितियाँ थीं। प्रत्येक समिति के कार्य अलग-अलग थे। पहली समिति नगर के कला-कौशल की देखभाल करती थी। दूसरी समिति विदेशियों के निवास एवं भोजन का प्रबन्ध करती थी। तीसरी समिति जन्म एवं मृत्यु का लेखा-जोखा रखती थी। चौथी समिति का कार्य माप-तौल से सम्बन्धित कारोबार करने वालों की देखभाल करना था। पाँचवीं समिति वस्तुओं के निर्माण एवं उनकी गुणवत्ता की जाँच-पड़ताल करती थी और छठी समिति का कार्य बिक्री वसूल करना था।

(ii) ग्राम प्रशासन (Village Administration) – शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ‘ग्रामिणी’ नामक अधिकारी इसका प्रबन्ध करता था। ग्रामिणी की सहायता के लिये एक सभा होती थी जो ग्राम हित के लिये सड़कें, पुल, तालाब एवं अतिथिशालाओं का प्रबन्ध करती थी। यह समिति मेलों तथा उत्सवों का भी प्रबन्ध करती थी। ग्रामिणी के ऊपर ‘गोप’ और ‘स्थानिक’ आदि अधिकारी होते थे।

4. सेना का प्रबन्ध (Military Administration) – चन्द्रगुप्त के पास अपने विशाल साम्राज्य की रक्षा के लिये एक सुसंगठित और सुदृढ़ सेना थी जिसमें 6 लाख पैदल, 30 हजार घुड़सवार, 9000 हाथी और 8000 रथ थे। सेना के प्रबन्ध के लिए 30 सदस्यों की समिति थी जो 6 समितियों में विभाजित थी। सेना में निम्नलिखित विभाग थे-(i) पैदल (ii) घुड़सवार (iii) समुद्री बेड़ा (iv) रथ (v) हाथी (vi) अस्त्र-शस्त्र विभाग (vii) रसद विभाग। सैनिकों को राजकोष से वेतन दिया जाता था।

5. न्याय (Justice) – न्याय सम्बन्धी कार्यों का सर्वोच्च अधिकारी राजा स्वयं होता था। नगरों (छोटे नगरों अथवा कस्बों) और गाँवों का न्याय ‘महामात्र’ करते थे। दण्ड व्यवस्था बहुत कठोर थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार 18 प्रकार के दंड दिये जाते थे। कभी-कभी एक ही अपराधी को प्रतिदिन एक नये (अलग-अलग) प्रकार का दंड दिया जाता था। कठोर दंडों के कारण अपराध बहुत कम थे। यदि छोटे न्यायालयों के निर्णय में कोई कमी रह जाती थी तो सम्राट स्वयं निर्णय करता था।

6. भूमिकर (Land Revenue) – कृषकों से उनकी पैदावार का 1/6 भाग भूराजस्व के रूप में लिया जाता था परन्त आपात काल में इसे बढा भी दिया जाता था। भूमि, वन एवं खानों पर राज्य का अधिकार था। उपज से प्राप्त धन राज्यहित तथा सैन्य संगठन में लगा दिया जाता था।

7. सिंचाई (Irrigation) – चन्द्रगुप्त के शासन काल में सिंचाई नहरों, कुँओं और तालाबों से होती थी। सिंचाई विभाग में विभिन्न अधिकारी होते थे। नहरों से प्राप्त जल के बदले में किसान सरकार को कर देते थे।

8. सड़कें (Roads) – सड़कों के प्रबन्ध तथा व्यवस्था के लिये एक अलग विभाग था जिसके अधिकारी इसके निर्माण, सुधार एवं विस्तार का कार्य करते थे। सड़कों के किनारे दूरी बताने के लिए मील के पत्थर लगे होते थे। एक विशाल सड़क तक्षशिला से पाटलिपुत्र तक जाती थी। इसके अतिरिक्त अन्य सड़कें भी थीं, जो राज्य के प्रमुख नगरों को आपस में मिलाती थीं। सड़कों के किनारे वृक्ष, पानी पीने के लिए कुएँ और धर्मशालाओं का निर्माण कराया गया था। सड़कों की अच्छी दशा के कारण व्यापार में उन्नति होती थी।

9. गुप्तचर विभाग (Institution of Spies) – चन्द्रगुप्त के शासन काल में गुप्तचर विभाग बहुत सुदृढ़ था। साधु, भिक्षु और भिक्षुणी आदि कई रूपों में घूमते थे। राजा को मंत्री, सैनिक, ‘अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों आदि की गतिविधियों की जानकारी शीघ्र पहुँचा देते थे। महलों में कई गुप्तचर होते थे जिससे राजा के विरुद्ध कोई षडयंत्र न रचा जा सके। प्रान्तीय शासकों के पीछे भी गुप्तचर होते थे जिससे उनकी विद्रोह की प्रवृत्ति पर दृष्टि रखी जा सके। दूसरे राज्यों में भी गुप्तचर भेजे जाते थे, जिसके कारण सम्राट के विरुद्ध गतिविधियों का अनुमान लगाया जा सके।

10. अन्य हितकारी कार्य (Other Welfare Works) – चन्द्रगुप्त ने अपनी प्रजा के अच्छे स्वास्थ्य के लिए औषधालय बनवाए। नगरों व गाँवों की सफाई का प्रबन्ध कराया। खाने-पीने की चीजों की सफाई की देख-रेख की जाती थी। शिक्षा का भी विशेष प्रबन्ध था। मन्दिरों के निर्माण के लिए दान दिया जाता था। प्राकृतिक रूप से यदि कृषि उपज की कोई हानि होती थी तो कृषकों से उदारतापूर्ण व्यवहार किया जाता था। (V.A. Smith के अनुसार – “The Mauryan government in short was highly organised and thoroughly efficient autocracy capable of controlling an empire more extensive than Akbar. It anticipated in many respects, the institutions of Modern times.”)

Bihar Board 12th Geography Objective Important Questions Part 2

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Bihar Board 12th Geography Objective Important Questions Part 2

प्रश्न 1.
कालाहारी मरुस्थल में कौन-सी जनजाति निवास करती है ?
(a) बुशमैन
(b) माओरी
(c) पिग्मी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) बुशमैन

प्रश्न 2.
नव-निश्चयवाद के प्रवर्तक कौन हैं ?
(a) टेलर
(b) हम्बोल्ट
(c) रैटजेल
(d) ब्लाश
उत्तर:
(a) टेलर

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन सबसे महत्त्वपूर्ण जूट उत्पादक क्षेत्र है ?
(a) कृष्णा डेल्टा
(b) नर्मदा डेल्टा
(c) गंगा डेल्टा
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) गंगा डेल्टा

प्रश्न 4.
मेगा नगर की जनसंख्या कितनी है ?
(a) 10 लाख
(b) 50 लाख से अधिक
(c) 50 लाख से कम
(d) 1 लाख
उत्तर:
(b) 50 लाख से अधिक

प्रश्न 5.
फरीदाबाद किस राज्य का एक शहर है ?
(a) उत्तर प्रदेश
(b) पंजाब
(c) राजस्थान
(d) हरियाणा
उत्तर:
(a) उत्तर प्रदेश

प्रश्न 6.
गेहूँ की खेती के लिए आदर्श तापमान कितना होना चाहिए?
(a) 5°C-10°C
(b) 10°C-20°C
(c) 20°C-30°C
(d) 30°C-40°C
उत्तर:
(b) 10°C-20°C

प्रश्न 7.
सरदार सरोवर परियोजना किस नदी पर है ?
(a) नर्मदा नदी
(b) गंगा नदी
(c) कोसी नदी
(d) दामोदर नदी
उत्तर:
(a) नर्मदा नदी

प्रश्न 8.
बाबाबूदन पहाड़ी है
(a) कर्नाटक में
(b) गोवा में
(c) झारखंड में
(d) ओडिशा में
उत्तर:
(a) कर्नाटक में

प्रश्न 9.
कौन-सा शहर ‘तमिलनाडु का मैनचेस्टर’ कहलाता है ?
(a) कोयंबटूर
(b) चेन्नई
(c) सलेम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) कोयंबटूर

प्रश्न 10.
एसेन कहाँ है ?
(a) जापान में
(b) रूस में
(c) जर्मनी में
(d) भारत में
उत्तर:
(b) रूस में

प्रश्न 11.
चावल/धान की खेती संबंधित है।
(a) रोपण कृषि से
(b) ट्रक कृषि से
(c) भूमध्यसागरीय कृषि से
(d) गहन निर्वाहन कृषि से
उत्तर:
(a) रोपण कृषि से

प्रश्न 12.
किस पर्वत पर ऊटी पर्यटक केन्द्र अवस्थित है ?
(a) अरावली
(b) नीलगिरि
(c) सतपुड़ा
(d) विंध्य
उत्तर:
(d) विंध्य

प्रश्न 13.
किस नगरीय क्षेत्र में प्रवासी जनसंख्या का अंश सर्वाधिक है ?
(a) मुंबई
(b) दिल्ली
(c) चेन्नई
(d) कोलकाता
उत्तर:
(a) मुंबई

प्रश्न 14.
जल अभाव वाले क्षेत्रों में किस प्रकार की बस्तियाँ पाई जाती हैं ?
(a) पल्ली
(b) प्रकीर्ण
(c) गुच्छित
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) प्रकीर्ण

प्रश्न 15.
खरीफ फसल की कृषि ऋतु क्या है ?
(a) अक्टूबर से मार्च
(b) अप्रैल से जून
(c) सितंबर से जनवरी
(d) जून से सितंबर
उत्तर:
(c) सितंबर से जनवरी

प्रश्न 16.
बिस्कुट उद्योग किस प्रकार के उद्योग से संबंधित है ?
(a) कुटीर
(b) उपभोक्ता
(c) वृहत
(d) प्राथमिक
उत्तर:
(b) उपभोक्ता

प्रश्न 17.
बाह्य स्रोतीकरण सहायक है।
(a) दक्षता सुधारने में
(b) कीमतों को घटाने में
(c) विकासशील देशों में रोजगार बढ़ाने में
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 18.
बालाघाट मैंगनीज क्षेत्र किस राज्य में स्थित है ?
(a) मध्य प्रदेश
(b) छत्तीसगढ़
(c) उड़ीसा
(d) झारखंड
उत्तर:
(b) छत्तीसगढ़

प्रश्न 19.
मणिपाल सॉफ्टवेयर तकनीकी पार्क कहाँ है ?
(a) सिक्किम में
(b) कर्नाटक में
(c) आंध्र प्रदेश में
(d) तमिलनाडु में
उत्तर:
(a) सिक्किम में

प्रश्न 20.
निम्नलिखित में कौन-सा एक तृतीयक क्रियाकलाप है ?
(a) आखेट
(b) मछली पकड़ना
(c) कृषि
(d) व्यापार
उत्तर:
(d) व्यापार

प्रश्न 21.
निम्नलिखित में से कौन एक महाद्वीप में जनसंख्या वृद्धि सर्वाधिक है ?
(a) एशिया
(b) अकृीका
(c) दक्षिण अमेरीका
(d) उत्तरी अमेरीका
उत्तर:
(a) एशिया

प्रश्न 22.
निम्नलिखित में वह कौन-सा एक सबसे सस्ता परिवहन साधन है जो भारी सामान और लम्बी दूरी के लिए उपयुक्त है ?
(a) सड़क परिवहन
(b) रेल परिवहन
(c) जल परिवहन
(d) वायु परिवहन
उत्तर:
(c) जल परिवहन

प्रश्न 23.
मानव भूगोल का जनक किसे कहा जाता है ?
(a) स्ट्राबो
(b) टॉलमी
(c) हैकेल
(d) रैटजेल
उत्तर:
(b) टॉलमी

प्रश्न 24.
निम्नलिखित में से कौन-सा एक लौह अयस्क नहीं है ?
(a) ऐन्ट्रासाइट
(b) हेमाटाइट
(c) लिमोनाइट
(d) मैग्नेटाइट
उत्तर:
(d) मैग्नेटाइट

प्रश्न 25.
अधिवास की लघुतम इकाई है।
(a) कस्बा
(b) पल्ली
(c) ग्राम
(d) नगर
उत्तर:
(a) कस्बा

प्रश्न 26.
निम्नलिखित में से कौन-सा भारत में पुरुष प्रवास का मुख्य कारण है ?
(a) विवाह
(b) शिक्षा
(c) काम और रोजगार
(d) व्यवसाय
उत्तर:
(c) काम और रोजगार

प्रश्न 27.
मानव विकास सूचकांक में भारत के निम्नलिखित राज्यों में से किस एक की कोटि उच्चतम है ?
(a) केरल
(b) तमिलनाडु
(c) पंजाब
(d) हरियाणा
उत्तर:
(c) पंजाब

प्रश्न 28.
निम्नलिखित में से सर्वाधिक प्रदूषित नदी कौन-सी है ?
(a) गोदावरी
(b) ब्रह्मपुत्र
(c) यमुना
(d) सतलुज
उत्तर:
(c) यमुना

प्रश्न 29.
निम्न में से कौन सबसे महत्त्वपूर्ण जूट उत्पादक क्षेत्र है ?
(a) कृष्णा डेल्टा
(b) गंगा डेल्टा
(c) नर्मदा डेल्टा
(d) कावेरी डेल्टा
उत्तर:
(b) गंगा डेल्टा

प्रश्न 30.
रबी की फसल पैदा होती है
(a) शीत ऋतु में
(b) वर्षा ऋतु में
(c) ग्रीष्म ऋतु में
(d) सभी ऋतु में
उत्तर:
(a) शीत ऋतु में

प्रश्न 31.
निम्नलिखित में से कौन एक ऊर्जा का गैर-परम्परागत स्रोत है ?
(a) कोयला
(b) खनिज तेल
(c) जलविद्युत
(d) सौर ऊर्जा
उत्तर:
(d) सौर ऊर्जा

प्रश्न 32.
निम्नलिखित में से कौन-सा नगर नदी तट पर अवस्थित नहीं है ?
(a) पटना
(b) आगरा
(c) भोपाल
(d) कोलकाता
उत्तर:
(d) कोलकाता

प्रश्न 33.
निम्नलिखित में से कौन-सा राज्य नरोरा नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र से संबंधित है ?
(a) तमिलनाडु
(b) उत्तर प्रदेश
(c) महाराष्ट्र
(d) केरल
उत्तर:
(b) उत्तर प्रदेश

प्रश्न 34.
विश्व का सबसे लंबा झील जलमार्ग कौन है ?
(a) स्वेज जलमार्ग
(b) डेन्यूब जलमार्ग
(c) वोल्गा जलमार्ग
(d) ग्रेट लेक्स-सेंट लारेंस जलमार्ग
उत्तर:
(d) ग्रेट लेक्स-सेंट लारेंस जलमार्ग

प्रश्न 35.
चॉकलेट में कौन-सा पदार्थ उपयोग होता है ?
(a) कहवा
(b) कोको
(c) गन्ना
(d) चुकन्दर
उत्तर:
(b) कोको

प्रश्न 36.
किस वर्ष भारत को इंटरनेट की सुविधा प्राप्त हुई थी?
(a) 2000
(b) 1998
(c) 1988
(d) 1978
उत्तर:
(c) 1988

प्रश्न 37.
विजयनगर इस्पात केंद्र किस राज्य में अवस्थित है ?
(a) कर्नाटक
(b) तमिलनाडु
(c) केरल
(d) आंध्र प्रदेश
उत्तर:
(a) कर्नाटक

प्रश्न 38.
दुर्ग लौह-अयस्क उत्पादक क्षेत्र है
(a) झारखंड में
(b) ओडिशा में
(c) मध्य प्रदेश में
(d) छत्तीसगढ़ में
उत्तर:
(d) छत्तीसगढ़ में

प्रश्न 39.
भारत की कुल जनसंख्या का कितना प्रतिशत उत्तरी मैदान में बसता है ?
(a) 2/3
(b) 1/4
(c) 1/3
(d) 1/2
उत्तर:
(c) 1/3

प्रश्न 40.
मसाई क्या है?
(a) एक कृषि उपज
(b) एक जनजाति
(c) एक चिकित्सक
(d) एक मरुभूमि
उत्तर:
(b) एक जनजाति

प्रश्न 41.
निम्नलिखित में से किस प्रकार की बस्तियाँ सड़क, नदी या नहर के किनारे होती है?
(a) रेखीय
(b) वृत्ताकार
(c) वर्गाकार
(d) चौक पट्टी
उत्तर:
(a) रेखीय

प्रश्न 42.
निम्न में से कौन एक जनसंख्या परिवर्तन के कारक नहीं है ?
(a) प्रवास
(b) आवास
(c) जन्म
(d) मृत्यु
उत्तर:
(b) आवास

प्रश्न 43.
निम्न में से कौन प्राचीन नगर है?
(a) भोपाल
(b) गंगानगर
(c) पटना
(d) जमशेदपुर
उत्तर:
(c) पटना

प्रश्न 44.
निम्नलिखित में कौन-सा एक चतुर्थ क्रियाकलाप है ?
(a) विनिर्माण
(b) पुस्तकों का मुद्रण
(c) कागज निर्माण उद्योग
(d) विश्वविद्यालयी अध्यापन
उत्तर:
(d) विश्वविद्यालयी अध्यापन

प्रश्न 45.
प्रतिकर्ष और अपकर्ष कारक उत्तरदायी है।
(a) प्रवास के लिए
(b) भू-निम्नीकरण के लिए
(c) वायु प्रदूषण के लिए
(d) गंदी बस्तियों के लिए
उत्तर:
(a) प्रवास के लिए

प्रश्न 46.
वर्ष 2010-11 में निम्नलिखित में से कौन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था?
(a) यूनाइटेड अरब अमीरात
(b) संयुक्त राज्य अमेरिका
(c) चीन
(d) जर्मनी
उत्तर:
(b) संयुक्त राज्य अमेरिका

प्रश्न 47.
निम्नलिखित में से किस वर्ष में पहला रेडियो कार्यक्रम प्रसारित हुआ था ?
(a) 1911
(b) 1923
(c) 1927
(d) 1936
उत्तर:
(b) 1923

Bihar Board 12th Geography Important Questions Short Answer Type Part 1

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Bihar Board 12th Geography Important Questions Short Answer Type Part 1

प्रश्न 1.
व्यापार संतुलन से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
किसी समयावधि के अंतर्गत किसी देश के निर्यात और आयात के अन्तर को व्यापार का संतुलन कहते हैं। यदि कोई देश वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात आयात की अपेक्षा अधिक करता है तो व्यापार संतुलन को अनुकूल या धनात्मक कहते हैं। यदि आयात निर्यात से अधिक होता है तो व्यापार संतुलन को प्रतिकूल अथवा ऋणात्मक कहते हैं।

प्रश्न 2.
नगरीय बस्तियाँ किन रूपों में मिलती हैं ?
उत्तर:
नगरीय बस्तियाँ ग्रामीण बस्तियों से अपने कार्यों एवं स्वरूपों में भिन्न होती है। ग्रामीण बस्तियों का मुख्य आधार कृषि होता है, जबकि नगरीय बस्तियों का आधार व्यवसाय या उद्योग अर्थात् आर्थिक क्रियाकलाप प्रधान रूप में होता है। नगरीय बस्तियों में रहने वाले लोगों को अपने भोजन और वस्त्रों के लिए, अनाज और रेशे उत्पन्न करने की आवश्यकता नहीं होती। ये लोग इन वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए माल तैयार करने, इनके खरीदने-बेचने और अन्य लोगों को लिखाने-पढ़ाने, राज-काज चलाने और इसी तरह के अन्य कार्यों में लगे रहते हैं।

प्रश्न 3.
भारत में ग्रामीण बस्तियों के प्रकार को निर्धारित करनेवाले कारकों को लिखिए।
उत्तर:
ग्रामीण बस्तियाँ वे होती हैं जिनके अधिकांश लोग कृषि, लकड़ी काटने वाले, पशुचारक, खान खोदने वाले, शिकारी जंगली व पर्वतों पर निवास करने वाले होते हैं।

ग्रामीण बस्तियों के प्रकार –

  • सघन बस्तियाँ,
  • प्रकीर्ण बस्तियाँ,
  • एकाकी बस्तियाँ,
  • अखण्डित बस्तियाँ।

प्रश्न 4.
मानव भूगोल के कुछ उपक्षेत्रों के नाम लिखें।
उत्तर:
मानव भूगोल के उपक्षेत्र हैं –

  • व्यवहार विचारधारा,
  • मानव कल्याण का भूगोल,
  • सांस्कृतिक भूगोल,
  • ऐतिहासिक भूगोल,
  • संसाधनों का भूगोल,
  • कृषि भूगोल,
  • उद्योगों का भूगोल आदि।

प्रश्न 5.
जनसंख्या संघटन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
जनसंख्या संघटन या जनांकिकी संरचना जनसंख्या की उन विशेषताओं को कहा जाता है जिनकी माप की जा सकै तथा जिनकी मदद से दो भिन्न प्रकार के व्यक्तियों के समूहों में अंतर स्पष्ट किया जा सके। आयु, लिंग, क्षरता, शिक्षा, व्यवसाय, जीवन-प्रत्याशा, निवास स्थान (ग्रामीण, नगरीय) इत्यादि ऐसे महत्वपूर्ण घटक हैं, जो जनसंख्या के संघटन को प्रदर्शित करते हैं। किसी देश के भावी विकास की योजनाओं को बनाने में जनसंख्या संघटन का महत्वपूर्ण योगदान है।

प्रश्न 6.
भारत में पवन ऊर्जा की संभावनाओं को लिखें।
उत्तर:
पवन ऊर्जा पूर्णरूपेण प्रदूषण मुक्त और ऊर्जा का असमाप्त्य स्रोत है। पवन को गतिज ऊर्जा को टरबाइन के माध्यम से विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है। भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन की संभावित क्षमता 50000 मेगावाट की है जिसमें से एक चौथाई ऊर्जा को आसानी से काम में लाया जा सकता है। पवन ऊर्जा के लिए राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान है। गुजरात के कच्छ में लाम्बा का पवन ऊर्जा संयंत्र एशिया का सबसे बड़ा संयंत्र है। पवन ऊर्ग का एक और संयंत्र तमिलनाडु के तुतीकोरिन में स्थित है।

प्रश्न 7.
तृतीय क्रियाकलापों का वर्णन करें।
उत्तर:
तृतीय क्रियाकलापों में उत्पादन और विनिमय दोनों सम्मिलित होते हैं। उत्पादन में सेवाओं की उपलब्धता शामिल होती है, जिनका उपभोग किया जाता है। उत्पादन का परोक्षरूप से पारिश्रमिक और वेतन के रूप में मापा जाता है। विनिमय के अंतर्गत व्यापार, परिवहन और संचार सुविधाएँ सम्मिलित होती है। एक समाज, बिजली मिस्त्री, डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, धोबी, नाई, दुकानदार आदि की सेवाएँ इनके सामान्य उदाहरण हैं।

प्रश्न 8.
भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। वर्तमान समय में भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याएँ निम्न हैं-

  • अनियमित मानसून पर निर्भरता
  • निम्न उत्पादकता
  • वित्तीय संसाधनों की बाध्यताएँ एवं ऋणग्रस्तता
  • भूमि सुधारों की कमी
  • छोटे खेत तथा विखंडित जोत
  • वाणिज्यीकरण का अभाव
  • मृदा अपरदन।

प्रश्न 9.
भारत द्वारा आयात किये जाने वाले प्रमुख सामानों का उल्लेख करें।
उत्तर:
वर्तमान समय में भारत के आयात में प्रमुख वस्तुओं में मोती तथा उपरत्नों, स्वर्ण एवं चाँदी, धातुमय अयस्क तथा धातु छीजन एवं इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ इत्यादि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 10.
प्रशासनिक नगर क्या है ? उपयुक्त उदाहरण दें।
उत्तर:
राष्ट्र की राजधानियाँ जहाँ पर केन्द्रीय सरकार के प्रशासनिक कार्यालय होते हैं, उन्हें प्रशासनिक नगर कहा जाता है। जैसे-नई दिल्ली, कैनबेरा, लंदन, वाशिंगटन डी० सी०।

प्रश्न 11.
उपभोक्ता वस्तु उद्योग को उदाहरण सहित परिभाषित करें।
उत्तर:
वैसे उद्योग, जिनके द्वारा मानव उपभोग की वस्तुएँ निर्मित हों उपभोक्ता वस्तु उद्योग कहलाते हैं। जैसे-चीनी, बिस्कुट उद्योग।

प्रश्न 12.
‘ऊष्मा द्वीप’ क्या है ? वर्णन करें।
उत्तर:
नगरों का तापमान आस-पास के क्षेत्रों की तुलना में अधिक होता है। यहाँ पक्के मकानों, सड़कों आदि की अधिकता एवं वनस्पतियों के अभाव के कारण ऐसी स्थिति मिलती है। इन अपेक्षाकृत अधिक ताप वाले नगरों को ऊष्मा द्वीप (Heat Island) कहते हैं। वैश्विक तापन के चलते धरती आज ऊष्मा द्वीप बन गयी है। यहाँ प्रदूषण से वायुमंडल की गर्मी अंतरिक्ष में विलीन, उतनी नहीं हो पा रही जितनी होनी चाहिए।

प्रश्न 13.
पूर्व-पश्चिम एवं उत्तर-दक्षिण गलियारा के बारे में संक्षेप में लिखें।
उत्तर:
पूर्व-पश्चिम एवं उत्तर-दक्षिण गलियारा – यह गलियारा स्वर्णिम चतुर्भुज (चतुष्कोण) महामार्ग के अंतर्गत पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण चार महानगरों दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता तथा चेन्नई को जोड़ता है।

प्रश्न 14.
अनुदान क्या होता है ?
उत्तर:
वस्तुओं के बिक्री एवं सेवाओं पर सरकार द्वारा प्राप्त छूट अनुदान कहलाता है। जैसे-पेट्रोल, एवं LPG पर सरकार अनुदान देती है।

प्रश्न 15.
बेंगलुरु भारत का सिलिकन सिटी है। क्यों ?
उत्तर:
बंगलुरु में सूचना प्रौद्योगिकी पार्क विकसित हुए हैं। माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक, कंप्यूटिंग, दूरसंचार, ब्रॉडकॉस्टिंग एवं ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स में रूपांतरण का मुख्य कारक सिलिकन होता है। अतः इसे सिलिकन सिटी कहा जाता है।

प्रश्न 16.
कृषि कार्य को प्रभावित करने वाले दो कारकों का उल्लेख करें।
उत्तर:
भारत कृषि प्रधान देश है फिर भी यहाँ कृषि की दशा दयनीय है। यहाँ की कृषि को प्रभावित करने वाले दो प्रमुख कारक निम्नांकित हैं-

  • वर्षा की अनियमितता तथा मौनसून पर निर्भरता।
  • परंपरागत कृषि के तरीके, उन्नत बीज तथा खाद का अभाव।

प्रश्न 17.
प्रवास से संबंधित किन्हीं तीन प्रतिकर्ष कारकों का उल्लेख करें।
उत्तर:
एक स्थान से दूसरे स्थान को, लम्बे समय के निवास के लिए प्रस्थान करना प्रवास कहलाता है। भारत में प्रवास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं-
(i) अच्छे आर्थिक अवसरों की खोज, नौकरी तथा रहने की बेहतर सुविधाएँ (Better opportunities for service and housing facilities) – बहुत से पिछड़े हुए ग्रामीण क्षेत्रों से लोग नगरों की ओर नौकरी या बेहतर सुविधाओं के लिए स्थानान्तरण करते हैं क्योंकि शहरी क्षेत्रों में लोगों को रोजगार, चिकित्सा, शिक्षा एवं आमोद-प्रमोद संबंधी सुविधाएँ मिलती हैं। इसलिए पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार से मजदूर वर्ग दिल्ली, पंजाब तथा नोएडा में आ रहे हैं।

(ii) विवाह (Marriage) – विवाह के कारण भी प्रवास होता है। शहरों से गाँवों में अथवा गाँवों से शहरों तथा शहरों से शहरों में अथवा गाँवों से गाँवों में प्रवास होता है। यह प्रवास महिलाओं में अधिक होता है।

(iii) सामाजिक असुरक्षा (Social Insecurity) – जिन क्षेत्रों में सामाजिक असुरक्षा होती है, वहाँ से लोग सुरक्षित स्थानों की ओर प्रवास करते हैं। जैसे-पंजाब तथा कश्मीर में ‘आतंकवाद के कारण बहुत से लोग दिल्ली में प्रवास कर रहे हैं।

(iv) राजनैतिक गड़बड़ी (Political disturbance) – जब किसी क्षेत्र में राजनैतिक अव्यवस्था हो जाती है तो वहाँ से भी लोग सुरक्षित क्षेत्रों की ओर प्रस्थान करने लगते हैं।

(v) अंतर्जातीय विवाह (Intercaste disputes) – जब किसी क्षेत्र में राजनैतिक गड़बड़ी हो जाती है तो बहुत-सी पिछड़ी जातियाँ अंतर्जातीय लड़ाईयों के कारण दूसरे सुरक्षित स्थानों की ओर चली जाती हैं।

प्रश्न 18.
जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए चार महत्त्वपूर्ण सुझाव दें।
उत्तर:
जल प्रदूषण की रोकथाम के चार महत्वपूर्ण सुझाव निम्नलिखित हैं-

  • नदियों में कल-कारखानों के दूषित जल की साफ-सफाई कर छोड़ना।
  • नदियों में स्नान, धुलाई एवं शवदाह पर पूर्णतया रोक।
  • चिमनियों से उत्सर्जित धूलकणों एवं धूम्र (धुआँ) को छानना।
  • जल की गुणवत्ता के लिए सदैव तत्पर रहना।।

प्रश्न 19.
सुरक्षा नगर को दो उपयुक्त उदाहरणों के साथ परिभाषित करें।
उत्तर:
आक्रमणकारियों के भय ने मानव को सदैव ही सुरक्षित स्थानों की ओर आकर्षित करने में बड़ा सहयोग दिया है। जहाँ सुरक्षा का अभाव रहता है, मानवीय बस्तियाँ अपने स्थानों से हट जाती हैं। ऐसे असुरक्षित स्थानों पर सामान्य अवस्थाओं में मनुष्य रहना पसंद नहीं करते हैं। वह असुरक्षित स्थानों पर बसने की अपेक्षा दुर्गम स्थानों को ढूंढते हैं।

उत्तरी भारत में जब विदेशी आक्रमणकारी खैबर के दर्रे द्वारा बार-बार भारत पर आक्रमण करते रहे तो 10वीं से 14वीं शताब्दी तक पंजाब, राजस्थान और गुजरात के असंख्य लोग अरावली, विन्ध्याचल व सतपुड़ा की पहाड़ियों, हिमालय की घाटियों में तथा ऊँचे भागों में जा बसे थे। जम्मू, हिमाचल प्रदेश, गढ़वाल, कुमायूँ, नेपाल आदि में इन्हीं लोगों द्वारा अनेक छोटी बस्तियाँ सुरक्षा की दृष्टि से स्थापित की गयीं।

यमुना और गंगा के मैदानों में इलाहाबाद और वाराणसी तक बस्तियाँ अधिक फैली हुई मिलती हैं किन्तु उत्तर-पश्चिम के सीमावर्ती क्षेत्रों और आक्रमणों के मार्गों के निकट गाँव विशेष सुरक्षित स्थानों पर चारदीवारी में बनाये जाते हैं।

प्रश्न 20.
निश्चयवाद क्या है ?
उत्तर:
निश्चयवाद के समर्थक निराशावादी तथा भाग्यवादी हैं परंतु आधुनिक युग में मानव की सफलताओं के समक्ष यह विचारधारा अधिक नहीं टिक सकी है। किसी सीमा तक वातावरण के प्रभाव की उपेक्षा करके मानव प्रगतिशील नहीं हो सकता है। वातावरण का प्रतिबिम्ब उसके अनेक कार्यों एवं गतिविधियों में दृष्टिगोचर होता है, किन्तु मानव पूर्णतः उसके प्रभाव के नियंत्रण में नहीं है।

ग्रिफिथ टेलर के अनुसार मनुष्य न तो प्रकृति का दास है और न ही उसका स्थामी और न ही मानव के कार्य करने की क्षमता असीमित है। उन्होंने इसे रुको और जाओ निश्चयवाद (Stop & Go Determinism) की संज्ञा दी है। उन्होंने मानव को वातावरण का स्वामी नहीं माना है, परंतु उसकी तुलना बड़े नगर में चौराहे पर खड़े एक सिपाही से की है जो सड़क पर वाहनों के चलने की गति को मंद या तीव्र कर सकता है, किन्तु उनकी दिशा को परिवर्तित नहीं कर सकता।

प्रश्न 21.
गन्ना की खेती के लिए आदर्श परिस्थितियाँ क्या होनी चाहिए ?
उत्तर:
भारत विश्व में गन्ना उत्पादन में सबसे अग्रणी देश है। यहाँ चीनी निर्माण का आधार है। इसके लिए लम्बे वर्धनकाल की आवश्यकता है। यह उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु का पौधा है। इसके लिए 25-27°C तापमान की आवश्यकता होती है। 100 सेमी० से अधिक वर्षा होनी चाहिए। अच्छी जल आपूर्ति के लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है। अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ मिट्टी में इसकी उपज अधिक होती है।

प्रश्न 22.
भारत में जनसंख्या के असमान वितरण के लिए जिम्मेवार दो कारकों को लिखें।
उत्तर:
भारत में जनसंख्या असमान वितरण के निम्नलिखित दो कारण हैं-

  • समतल मैदान – भारत की सबसे अधिक जनसंख्या गंगा और गोदावरी के समतल मैदान में अधिक है क्योंकि यह आवागमन के लिए सड़कें बनाना एवं खेती करना पठारी एवं पर्वतीय भाग की तुलना में आसान है। इसलिए मैदानी भाग की जनसंख्या अधिक है।
  • जलवाय – भारत के मध्य एवं दक्षिणी भाग की जलवायु समशीतोष्ण है जिससे इस भाग में अधिक जनसंख्या निवास करती है।

प्रश्न 23.
नोएडा एवं बरौनी के महत्त्व का उल्लेख करें। .
उत्तर:
नोएडा – भारत में दिल्ली से सटा एक उपनगरीय क्षेत्र है जो उत्तर प्रदेश में स्थित है। इसका पूरा नाम ‘न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट ऑथोरिटी’ के संक्षिप्तीकरण से बना है। इसका आधिकारिक नाम गौतम बुद्ध नगर है। ये विभिन्न सेक्टरों में बँटा हुआ है। नोएडा का औद्योगीकरण के क्षेत्र में भी काफी महत्त्व है।

बरौनी – बिहार राज्य के बेगुसराय जिला के अंतर्गत स्थित है। यह गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। यह एक औद्योगीकरण क्षेत्र है। इसमें इण्डियन ऑयल रिफाइनरी, बरौनी थर्मल पॉवर, हिन्दुस्तान फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन, बरौनी डेयरी आदि अनेक प्रकार के उद्योग विकसित होने के कारण काफी महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 24.
अंतरिक्ष प्रयोगशाला के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
अंतरिक्ष प्रयोगशाला एक पुनः प्रयोज्य प्रयोगशाला थी जिसे स्पेस शटल द्वारा लाया गया कुछ निश्चित अंतरिक्ष उड़ानों पर इस्तेमाल किया गया था। प्रयोगशाला में कई घटक शामिल थे, जिसमें एक दबाव वाले मॉड्यूल शामिल थे, शटल के कार्गो खाड़ी में स्थित एक अप्रतिबंधित वाहक और अन्य संबंधित हार्डवेयर। प्रत्येक अंतरिक्ष उड़ान की जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न विन्यास में घटकों का आयोजन किया गया था। Spacelab घटकों ने कुल 32 शटल मिशनों पर उड़ान भरी। Spacelab ने वैज्ञानिकों को पृथ्वी की कक्षा में माइक्रोग्राविटी में प्रयोग करने की अनुमति दी थी।

Spacelab से जुड़े हार्डवेयर की एक किस्म थी, इसलिए Spacelab कार्यक्रम के मिशन के बीच प्रमुख Spacelab कार्यक्रम मिशनों के बीच अंतर किया जा सकता है, साथ ही यूरोपीय वैज्ञानिकों ने Spacelab में रहने योग्य मॉड्यूल में मिशन को चलाया है, अन्य Spacelab हार्डवेयर प्रयोगों को चलाने वाले मिशनों और अन्य एसटीएस मिशन जो स्पैकेलेब के कुछ घटक का उपयोग करते हैं।

प्रश्न 25.
नगरीय जनसंख्या क्या होती है ?
उत्तर:
नगरीय जनसंख्या (Urban population) – नगरीय जनसंख्या का अर्थ एक ऐसे जनसंख्या से होता है जहाँ पर जनसंख्या घनत्व और मानवीय क्रियाकलाप उस स्थान के आस-पास के लोगों से अधिक होता है। नगरीय जनसंख्या आम तौर पर नगरों, कस्बों या उपनगरीय विस्तारों को सम्मिलित किया जाता है लेकिन इसमें ग्रामीण जनसंख्या को सम्मिलित नहीं किया जाता।

भारत में जनसंख्या वृद्धि एवं आर्थिक प्रगति में सुधार के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में भी वृद्धि होती रही है। यहाँ 1991 में कुल नगरीय जनसंख्या 21.71 करोड़ थी जो कुल जनसंख्या की 25.72 प्रतिशत थी। 2001 की जनगणना के अनुसार यहाँ 28.54 करोड़ व्यक्ति नगरों में निवास कर रहे हैं जो कुल जनसंख्या का 27.78 प्रतिशत है। 1901 में नगरीय जनसंख्या 2.59 करोड़ थी। इस प्रकार 100 वर्षों में देश में नगरीय जनसंख्या में 9 गुने से अधिक की वृद्धि हो गयी है। 1901 में नगरों की संख्या 1,827 थी जो बढ़कर 2001 में 5,161 हो गयी है।

प्रश्न 26.
प्रौद्योगिकी पार्क क्या है ? संक्षेप में लिखें।
उत्तर:
प्रौद्योगिकी पार्क एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे नवाचार को बढ़ावा देने के लिए डिजाइन किया गया है। यह एक ऐसा भौतिक स्थान है, जो उच्च प्रौद्योगिकी आर्थिक विकास और ज्ञान को आगे बढ़ाने के इरादे से विश्वविद्यालय उद्योग और सरकारी सहयोग का समर्थन करता है। यूनिवर्सिटी रिसर्च पार्क, साइंस पार्क या टेक्नोलॉजी पार्क, टेक्नोपोलिस और बायोपार्क के लिए लगभग समानार्थक शब्द हैं। उपयुक्त शब्द आमतौर पर उच्च शिक्षा और अनुसंधान की एक संस्था के साथ पार्कों की संबद्धता के प्रकार पर निर्भर करता है और शायद यह भी ऐसा विज्ञान और अनुसंधान होता है जिसमें पार्क की संस्थाएँ व्यस्त होती हैं।

इन पार्कों में उस विश्वविद्यालय के अनुसंधान पार्कों और विज्ञान और तकनीक पार्कों के विशिष्ट उच्च प्रौद्योगिकी वाले व्यापारिक जिलों से भिन्न होते हैं और इसे व्यवस्थित, नियोजित और प्रबंधित किया जाता है। वे विज्ञान केंद्रों से भिन्न होते हैं, क्योंकि वे ऐसे स्थान हैं जहाँ अनुसंधान का व्यावसायीकरण किया गया है। आमतौर पर पार्कों में कारोबार और संगठन उत्पाद उन्नति और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जो कि औद्योगिक पार्कों के विरोध में होता है, जो विनिर्माण और व्यवसाय पार्कों पर केंद्रित होता है जो प्रशासन पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

प्रश्न 27.
पर्यावरणीय निश्चयवाद की अवधारणा को लिखें।
उत्तर:
प्राकृतिक पर्यावरण के विभिन्न तत्व एवं संसाधन भूतल के जैविक समुदाय के लिए ही बने हैं, लेकिन मनुष्य की संसाधनों के अधिकाधिक संग्रहण एवं द्रुतगति से सम्पन्न बने की प्रवृत्ति एवं एक मानव समाज द्वारा दूसरे मानव समाज से आगे बढ़ने की ललक से प्राकृतिक पर्यावरण का असंतुलित शोषण एवं दुरुपयोग हो रहा है। प्रौद्योगिकी विकास होने से भौतिक संसाधनों में निरंतर क्षति हो रही है और अनेक ऐसे रासायनिक जैविक एवं विध्वंसक हथियारों के निर्माण एवं उनके प्रयोग से पर्यावरण की गुणवत्ता निरंतर समाप्त हो रही है।

व्यापारिक उद्देश्य से वनों की कटाई ने वनों का सर्वनाश किया है। तकनीकी विकास ने वन प्रदेशों को उजाड़ दिया है। नवीन तकनीक के कारण नहरें बनाने, बाँध बनाने, खनिज खोदने में अनेकानेक पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

प्रश्न 28.
सेवाओं के किन्हीं दो वर्गीकरण का उल्लेख करें। उपर्युक्त उदाहरण दें।
उत्तर:
सेवाओं का क्षेत्र व्यापक होता है क्योंकि इनकी आवश्यकता वहाँ भी पड़ती है जहाँ लोग द्वितीयक व्यवसायों में संलग्न होते हैं। विनिर्माण उद्योगों में भी विभिन्न प्रकार की सेवाओं की आवश्यकता होती है। इनमें प्रशासन तंत्र की आवश्यकता होती है जो विभिन्न क्षेत्रों में देखभाल कर सकें।

ततीयक क्रियाओं – में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएँ सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। तृतीयक क्रियाओं के अंतर्गत समाज को सेवाएँ विभिन्न रूपों में प्रदान की जाती हैं। इन सेवाओं में रेल, सड़क, वायुयान सेवाएँ, डाक-तार सेवाएँ, रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएँ, जनसम्पर्क एवं परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएँ, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस-सेना एवं अन्य जन सेवाएँ तथा गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएँ उल्लेखनीय हैं।

चतर्थक क्रियाएँ – वर्तमान समय में मानव की आर्थिक क्रियाएँ दिनोंदिन बहुत ही विशिष्ट एवं जटिल होती जा रही हैं जिनमें क्रियाओं का एक नवीन रूप चतुर्थक क्रियाओं के रूप में सामने आया है। मानव की कानन, वित्त, शिक्षा, शोध और संचार से जुड़ी उन आर्थिक गतिविधियों को, जो सूचना के साधन और सूचना के प्रसारण से संबंधित हैं, चतुर्थक क्रियाओं के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है।

प्रश्न 29.
जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले जलवायु कारकों को लिखें।
उत्तर:
जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को प्रभावित करने वाले तीन कारणों का विवरण निम्न है-
(i) भ-आकति – किसी देश की भू-आकृति जनसंख्या वितरण एवं घनत्व को प्रभावित करते हैं। जहाँ मैदानी क्षेत्रों का विस्तार सर्वाधिक पाया जाता है वहां कृषि हेतु उपजाऊ भूमि तथा नदियों में जल की सतत उपलब्धता रहती है, जिसके कारण जनसंख्या घनत्व अधिक पाई जाती है तथा पठारी एवं पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि भूमि का अभाव, परिवहन सुविधाओं की कमी के कारण जनसंख्या घनत्व कम पाई जाती है। जैसे-गंगा के मैदानी क्षेत्र में अधिक जनसंख्या घनत्व पाई जाती है वहीं प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्रों में कम पाई जाती है।

(ii) नगरीकरण – जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को प्रभावित करने वाले कारणों में नगरीकरण प्रमुख है। इस क्षेत्र में रोजगार की उपलब्धता, जनसंचार की सुविधा, परिवहन मार्गों की उपलब्धता इत्यादि के कारण जनसंख्या का संकेन्द्रण अधिक पाया जाता है। जैसे-दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता।

(iii) औद्योगीकरण – औद्योगीकरण के फलस्वरूप लोगों को रोजगार, परिवहन, जनसंचार, बाजार इत्यादि उपलब्ध हो पाते हैं जिसके कारण जनसंख्या घनत्व अधिक पायी जाती है। जैसे-जमशेदपुर, बोकारो, दुर्गापुर।

प्रश्न 30.
ग्रामीण अधिवासों की विशेषताओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
ग्रामीण अधिवासों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) भारतीय गाँव बहुत पुराने हैं। ये भारतीय संस्कृति के मूल आधार माने जाते हैं। महात्मा गाँधी के शब्दों में, “यदि गाँव की प्राचीन सभ्यता नष्ट हो गयी तो देश भी अंततः नष्ट हो जायेगा।” इनका मुख्य उद्यम खेती करना है।
(ii) गाँवों के निर्माण में स्थानीय रूप से मिलने वाली सामग्री का ही उपयोग किया जाता है। प्रायः मिट्टी, ईंटों और घास-फूस के बने होते हैं। पत्थर के गाँव भी अनेक क्षेत्रों में मिलते हैं। अब विकास के साथ-साथ चूना, सीमेंट, लकड़ी एवं लोहे का भी उपयोग बढ़ता जा रहा है।
(iii) भारतीय गाँव प्रायः चारों ओर से वृक्षों के कुन्जों से घिरे होते हैं। समुद्रतटीय क्षेत्रों में घरों के निकट नारियल, सुपारी, केले और फलों के वृक्ष तथा अन्यत्र पीपल, नीम, शीशम आदि के वृक्ष मिलते हैं।
(iv) सार्वजनिक उपयोग के लिए कुएँ, तालाब, मंदिर, सराय या पंचायत घर होता है जहाँ गाँव संबंधी सभी कार्यों का निर्णय लिया जाता है।
(v) भारतीय गाँवों में श्रम विभाजन स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। वैश्य, ब्राह्मण, नाई, धोबी, कुम्हार, लुहार एवं अन्य अनुसूचित जाति के लोग सभी अपना कार्य करते हैं।

प्रश्न 31.
कृषि ऋण प्रदान करनेवाली चार संस्थाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
कृषि ऋण प्रदान करने वाली चार संस्थाओं के नाम निम्नलिखित हैं-

  • सहकारी बैंक
  • वाणिज्यिक बैंक
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक
  • राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण बैंक (नाबार्ड)।

प्रश्न 32.
परमाणु ऊर्जा कैसे पैदा की जाती है ?
उत्तर:
यूरेनियम और थोरियम प्रमुख परमाणु खनिज है जिससे परमाणु ऊर्जा पैदा की जाती है। ये भारत में पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। इनके नियमित विखण्डन से प्राप्त ऊर्जा को परमाणु ऊर्जा, अणु ऊर्जा एवं नाभिकीय ऊर्जा के नामों से जाना जाता है। भारत में यूरेनियम झारखण्ड, राजस्थान, तमिलनाडु में पाया जाता है। थोरियम छोटानागपुर पठार तथा केरल की समुद्र तटीय बालू में प्राप्त होता है। भारत विश्व के छः देशों में से एक है जो परमाणु ऊर्जा प्राप्त करने की तकनीक विकसित कर चुके हैं।

प्रश्न 33.
वायु प्रदूषण क्या है ?
उत्तर:
वायु प्रदूषण उन परिस्थितियों तक सीमित रहता है जहाँ बाहरी परिवेशी वायुमण्डल में दूषित पदार्थों की सान्द्रता मनुष्य एवं पर्यावरण को हानि पहुँचाने की सीमा तक बढ़ जाती है। वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें पायी जाती हैं, वाष्प एवं धूल के कण विद्यमान रहते हैं। जब किन्हीं कारणों से वायुमण्डलीय गैसों का अनुपात बदलने लगता है और कुछ कणीय पदार्थ वायु में मिल जाते हैं तो उसका भौतिक संतुलन बिगड़ जाता है इस स्थिति को वायु प्रदूषण कहा जाता है।

प्रश्न 34.
उदारीकरण के लाभों को लिखें।
उत्तर:
उदारीकरण या आर्थिक सुधार एक वृहद अर्थ वाला शब्द है। प्रायः इसका उपयोग अल्पतर सरकारी नियंत्रण, अल्पतर सरकारी निषेध, निजी कम्पनियों की अधिक भागीदारी, करों की अल्पतर आदि के संदर्भ में किया जाता है। उदारीकरण के पल में मुख्य तर्क यह दिया जाता है कि इससे दक्षता आती है और हरेक को अधिक प्राप्त होता है। उदारीकरण के लाभ निम्न क्षेत्र में है-

  • पूँजीवाद,
  • मुक्त बाजार,
  • वैश्वीकरण,
  • निजीकरण

प्रश्न 35.
स्मॉग क्या होता है ?
उत्तर:
वायुमंडल की निचली परतों में एकत्रित धूलकण, धुएँ के कण एवं संघनित जलपिंडों को स्मॉग कहते हैं। ओसांक से नीचे वायु का तापमान कम होने पर कोहरे का निर्माण होता है। इसमें दृश्यता एक किमी. से भी कम होती है।

प्रश्न 36.
पृष्ठप्रदेश क्या है ?
उत्तर:
किसी भी पत्तन या बंदरगाह के आस-पास के वे राज्य जिनका आयात एवं निर्यात एक ही पत्तन से होता है। उसे उस पत्तन की पृष्ठ प्रदेश कहा जाता है।

प्रश्न 37.
भारतीय रेलवे की किन्हीं दो मुख्य समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय रेल की दो मुख्य समस्याएँ हैं-

  • समय से परिचालन का अभाव-भारतीय रेल कभी भी समय पर अपने गंतव्य स्थान पर नहीं पहुँचती है। हमेशा लेट चलती है। पर्व-त्योहारों पर तो इसमें आदमियों को जानवरों की भाँति यात्रा करना पड़ता है, फिर भी रेलवे हमेशा घाटा में चलती है।
  • पठारी भूमि पर रेल लाइन बिछाना ज्यादा कठिन है क्योंकि यहाँ की जमीन समतल नहीं रहती है जिसके कारण रेलमार्ग 1° से 3° तक ढाल होती है।

प्रश्न 38.
योजना आयोग का गठन कब हुआ था? इसके दो कार्यों को लिखें।
उत्तर:
योजना आयोग का गठन 15 मार्च, 1950 ई० को किया गया था। इसके कार्य निम्नलिखित हैं-

  • योजना आयोग का कार्य देश की प्राकृतिक तथा मानवीय संसाधनों का आकलन करना है।
  • राष्ट्र के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना तैयार करना। योजना आयोग की भूमिका एक सलाहकार के रूप में अधिक है।

प्रश्न 39.
फुटकर व्यापार सेवा से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
फुटकर व्यापार सेवा वह व्यापारिक क्रियाकलाप हैं जो उपभोक्ताओं को वस्तुओं के प्रत्यक्ष विक्रय से संबंधित है। अधिकांश फुटकर व्यापार केवल विक्रय से नियत प्रतिष्ठानों और भंडारों में सम्पन्न होता है। फेरी, रेहड़ी, ट्रक, द्वार से द्वार, डाक आदेश, दूरभाष, स्वचालित निजी मशीनें तथा इंटरनेट फुटकर बिक्री के भंडार इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 40.
आधारभूत उद्योग क्या हैं ? उदाहरण दें।
उत्तर:
आधारभूत उद्योगों के उत्पादों का उपयोग बहुधा अन्य उद्योगों में कच्चे माल के रूप में होता है, अर्थात् ये उद्योग अन्य उद्योगों के संचालन के लिए आधार तैयार करते हैं, अतः इन्हें आधारभूत उद्योग कहते हैं। जैसे-लौह अयस्क के कच्चे लोहे या पिग आयरण का उत्पादन आधारभूत उद्योग है।

प्रश्न 41.
जन्म दर एवं मृत्यु दर के बीच अंतर करें।
उत्तर:
प्रति एक वर्ष में 1000 व्यक्तियों पर जीवित जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या को जन्म दर कहा जाता है तथा प्रति एक वर्ष में 1000 व्यक्तियों पर मृतकों की संख्या को मृत्यु दर कहा जाता है। भारत में 2001 की जनगणना के अनुसार जन्म दर 26.1 प्रतिशत तथा मृत्यु दर 8.7 प्रतिशत थी।

प्रश्न 42.
सामूहिक कृषि का वर्णन करें।
उत्तर:
सामूहिक कृषि में विभिन्न क्षेत्रों में खेती की प्रबंध समितियाँ होती है। उनका मुखिया प्रबंधक सरकार के प्रति उत्तरदायी होता है। इसमें वस्तुतः दो प्रकार के फॉर्म बनाए गए। कृषि भूमि के किसानों, पशुओं या मेहनतकशों के छोटे-छोटे समूहों को मिलाकर सामूहिक फार्म बनाए गए हैं। सैद्धांतिक रूप से इनके प्रबंधक और मालिक किसान नहीं हैं, परंतु व्यापार, योजना या नीति निर्धारण पर सरकार का नियंत्रण है। इसमें वैज्ञानिक विधियों से भूमि सुधार करके नगदी खेती की जाती है। साथ ही गेहूँ, जौ, मक्का, राई, आलू भी उत्पादित होते हैं। यहाँ तक कि वनरोपण और पशुपालन का कार्य भी होता है।

प्रश्न 43.
पारिस्थितिकीय असंतुलन को प्रभावित करनेवाले दो कारकों का उल्लेख करें।
उत्तर:
प्रकृति में जीवों के रहने के लिए एक संतुलित पारिस्थितिक तंत्र अति आवश्यक है। यदि प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता पारिस्थितिक तंत्र में न हों तो ऐसा भी संभव है कि कुछ समय बाद हरे पौधे अतिवृद्धि एवं अतिसंकुलता के कारण स्वयं नष्ट हो जाएं। इसी प्रकार द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ताओं का भविष्य प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता एवं उत्पादकों से बहुत निकट रूप से संबंधित है। इसी प्रकार यदि किसी क्षेत्र में साँपों की संख्या अधिक बढ़ जाए तो चूहों की संख्या समाप्त हो जाएगी। इसके कारण साँपों की संख्या पर भी खतरा मंडरा सकता है।

Bihar Board 12th Geography Objective Important Questions Part 1

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Bihar Board 12th Geography Objective Important Questions Part 1

प्रश्न 1.
सेलम संबंधित है
(a) लोहा-इस्पात उत्पादन से
(b) ताँबा उत्पादन से
(c) पेट्रोलियम उत्पादन से
(d) सोना उत्पादन से
उत्तर:
(a) लोहा-इस्पात उत्पादन से

प्रश्न 2.
हुबली किस राज्य में है ?
(a) आंध्र प्रदेश
(b) कर्नाटक
(c) गुजरात
(d) तमिलनाडु
उत्तर:
(b) कर्नाटक

प्रश्न 3.
उदयपुर किस राज्य में है ?
(a) राजस्थान
(b) गुजरात
(c) पंजाब
(d) हरियाणा
उत्तर:
(a) राजस्थान

प्रश्न 4.
सिंगरेनी किस चीज के लिए प्रसिद्ध है ?
(a) कोयला
(b) लोहा
(c) ताँबा
(d) हीरा
उत्तर:
(a) कोयला

प्रश्न 5.
नोएडा किस राज्य में स्थित है ?
(a) दिल्ली
(b) उत्तर प्रदेश
(c) हरियाणा
(d) पंजाब
उत्तर:
(b) उत्तर प्रदेश

प्रश्न 6.
भारत में सर्वाधिक सोना किस राज्य में पाया जाता है ?
(a) झारखंड
(b) केरल
(c) कर्नाटक
(d) तमिलनाडु
उत्तर:
(d) तमिलनाडु

प्रश्न 7.
किस प्रदूषण द्वारा सर्वाधिक बीमारियाँ होती हैं ?
(a) ध्वनि
(b) जल
(c) मृदा
(d) वायु
उत्तर:
(b) जल

प्रश्न 8.
नागपुर योजना किस परिवहन से संबंधित है ?
(a) जल
(b) सड़क
(c) वायु
(d) पाइपलाईन
उत्तर:
(b) सड़क

प्रश्न 9.
जनांकिकी संक्रमण सिद्धांत किसने दिया ?
(a) मार्शल
(b) अमर्त्य सेन
(c) नोएस्टीन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) नोएस्टीन

प्रश्न 10.
किस राज्य में गोण्डवाना कोयला पाया जाता है ?
(a) जम्मू-कश्मीर
(b) मेघालय
(c) झारखंड
(d) त्रिपुरा
उत्तर:
(c) झारखंड

प्रश्न 11.
चाय का सबसे बड़ा उत्पादन देश कौन है ?
(a) श्रीलंका
(b) भारत
(c) चीन
(d) म्याँमार
उत्तर:
(b) भारत

प्रश्न 12.
मध्य-पूर्व रेलवे का मुख्यालय कहाँ है ?
(a) कोलकाता
(b) इलाहाबाद
(c) गुवाहाटी
(d) हाजीपुर
उत्तर:
(d) हाजीपुर

प्रश्न 13.
पर्वतीय भागों में किस प्रकार की बस्तियाँ पायी जाती है ?
(a) आयताकार
(b) सीढ़ीनुमा
(c) पंखा प्रतिरूपी
(d) तारा प्रतिरूपी
उत्तर:
(a) आयताकार

प्रश्न 14.
निम्न में से कौन सघन जनसंख्या वाला क्षेत्र है ?
(a) भूमध्यरेखीय प्रदेश
(b) ध्रुवीय प्रदेश
(c) मरुस्थलीय क्षेत्र
(d) दक्षिण-पूर्वी एशिया क्षेत्र
उत्तर:
(d) दक्षिण-पूर्वी एशिया क्षेत्र

प्रश्न 15.
स्वेज नहर निम्न में से किसे जोड़ती है ?
(a) हिन्द महासागर एवं अरब सागर
(b) अटलांटिक महासागर एवं प्रशांत महासागर
(c) भूमध्यसागर एवं लाल सागर
(d) हिन्द महासागर एवं प्रशांत महासागर
उत्तर:
(c) भूमध्यसागर एवं लाल सागर

प्रश्न 16.
विश्व व्यापार संघटन का मुख्यालय कहाँ है ?
(a) न्यूयार्क्
(b) वियना
(c) वाशिंगटन
(d) जेनेवा
उत्तर:
(d) जेनेवा

प्रश्न 17.
क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत का सबसे बड़ा राज्य कौन है ?
(a) मध्य प्रदेश
(b) उत्तर प्रदेश
(c) राजस्थान
(d) महाराष्ट्र
उत्तर:
(c) राजस्थान

प्रश्न 18.
भारत में केन्द्र शासित प्रदेशों की संख्या कितनी है ?
(a) 7
(b) 9
(c) 28
(d) 10
उत्तर:
(a) 7

प्रश्न 19.
रबड़ किस प्रकार की कृषि का उपज है ?
(a) रोपण कृषि
(b) भूमध्यसागरीय कृषि
(c) प्राराभक स्थाया कृषि
(d) मिश्रित कृषि
उत्तर:
(a) रोपण कृषि

प्रश्न 20.
किस महाद्वीप की जनसंख्या वृद्धि सर्वाधिक है ?
(a) एशिया
(b) अकृीका
(c) उत्तरी अमेरिका
(d) दक्षिणी अमेरिका
उत्तर:
(a) एशिया

प्रश्न 21.
शोलापुर किस उद्योग के लिए जाना जाता है ?
(a) लोहा-इस्पात
(b) एल्युमीनियम
(c) सीमेंट
(d) सूती वस्त्र
उत्तर:
(d) सूती वस्त्र

प्रश्न 22.
जूट का सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र है
(a) कावेरी डेल्टा
(b) गंगा डेल्टा
(c) गोदावरी
(d) कृष्णा डेल्टा
उत्तर:
(c) गोदावरी

प्रश्न 23.
पाराद्वीप बंदरगाह किस राज्य में है ?
(a) तमिलनाडु
(b) उड़ीसा
(c) केरल
(d) गुजरात
उत्तर:
(b) उड़ीसा

प्रश्न 24.
“मानव भूगोल क्रियाशीलं मानव और अस्थायी पृथ्वी के परिवर्तनशील संबंधों का अध्ययन है।” ये किसने कहा ?
(a) रीटर
(b) रैटजेल
(c) कुमारी सैम्पल
(d) टेलर
उत्तर:
(c) कुमारी सैम्पल

प्रश्न 25.
जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों में सबसे महत्वपूर्ण कारक कौन-सा है ?
(a) स्थलाकृति
(b) मिट्टी
(c) प्राकृतिक वनस्पति
(d) जलवायु
उत्तर:
(d) जलवायु

प्रश्न 26.
मैसाबी श्रेणी का संबंध निम्न में से किससे है ?
(a) लौह-अयस्क
(b) कोयला
(c) ताँबा
(d) सोना
उत्तर:
(a) लौह-अयस्क

प्रश्न 27.
पनामा नहर जोड़ती
(a) कैरेबियन सागर-मैक्सिको की खाड़ी
(b) प्रशान्त महासागर-अटलांटिक महासागर
(c) प्रशांत महासागर-हिन्द महासागर
(d) अटलांटिक महासागर-हिन्द महासागर
उत्तर:
(b) प्रशान्त महासागर-अटलांटिक महासागर

प्रश्न 28.
किसी झील के चारों ओर वसा गाँव किस प्रतिरूप में आयेगा?
(a) अरीय
(b) निहारिकीय
(c) नाभिकीय
(d) तारा
उत्तर:
(b) निहारिकीय

प्रश्न 29.
औद्योगिकीकरण में कौन-सा प्रदूषण होता है ?
(a) जल प्रदूषण
(b) वायु प्रदूषण
(c) ध्वनि प्रदूषण
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(d) इनमें से सभी

प्रश्न 30.
निम्नलिखित में से कौन-सा एक मानव भूगोल का उपागम नहीं है ?
(a) मात्रात्मक क्रांति
(b) क्षेत्रीय विभिन्नता
(c) स्थानिक संगठन
(d) अन्वेषण और वर्णन
उत्तर:
(a) मात्रात्मक क्रांति

प्रश्न 31.
आई० टी० डी० पी० निम्नलिखित में से किस संदर्भ में वर्णित है ?
(a) समन्वित पर्यटन विकास कार्यक्रम
(b) समन्वित यात्रा विकास कार्यक्रम
(c) समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम
(d) समन्वित व्यापार विकास कार्यक्रम
उत्तर:
(a) समन्वित पर्यटन विकास कार्यक्रम

प्रश्न 32.
निम्नलिखित में से भारत के किस राज्य में जनसंख्या घनत्व निम्नतम है ?
(a) पश्चिम बंगाल
(b) अरुणाचल प्रदेश
(c) असम
(d) बिहार
उत्तर:
(b) अरुणाचल प्रदेश

प्रश्न 33.
निम्नलिखित में से किस स्थान भारत का पहला परमाणु ऊर्जा स्टेशन स्थापित किया गया था?
(a) बोकारो
(b) तारापुर
(c) चेन्नई
(d) नरौरा
उत्तर:
(b) तारापुर

प्रश्न 34.
पर्वतों एवं ऊँचे पठारों पर किस प्रकार की बस्ती पाई जाती है ?
(a) वृत्ताकार
(b) रैखिक
(c) सीढ़ीनुमा
(d) आयताकार
उत्तर:
(c) सीढ़ीनुमा

प्रश्न 35.
भारत के किस राज्य में बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली प्रसिद्ध है ?
(a) तमिलनाडु
(b) मेघालय
(c) बिहार
(d) पंजाब
उत्तर:
(b) मेघालय

प्रश्न 36.
किस महादेश में सबसे अधिक संख्या में अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक आते हैं ?
(a) यूरोप
(b) आस्ट्रेलिया
(c) अफ्रीका
(d) उत्तरी अमेरिका
उत्तर:
(d) उत्तरी अमेरिका

प्रश्न 37.
भारत के चार महानगरों को जोड़ने वाली सड़क है
(a) सीमांत सड़क
(b) ट्रांस-मेट्रो सड़क
(c) एक्सप्रेस-वे
(d) स्वर्णिम चतुर्भुज मार्ग
उत्तर:
(d) स्वर्णिम चतुर्भुज मार्ग

प्रश्न 38.
लॉरेन-सार क्षेत्र प्रसिद्ध है
(a) लौह-अयस्क के लिए
(b) सोना के लिए
(c) कोयला के लिए
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) कोयला के लिए

प्रश्न 39.
अंगूर की खेती कहलाती है
(a) सेरीकल्चर
(b) विटीकल्चर
(c) पिसीकल्चर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) विटीकल्चर

प्रश्न 40.
‘ज्योग्राफिया जेनेरालिस’ के लेखक कौन हैं ?
(a) सेंपुल
(b) वारेनियस
(c) रैटजेल
(d) डार्विन
उत्तर:
(b) वारेनियस

प्रश्न 41.
बिहार के लोग किस भाषा परिवार समूह से संबंधित हैं ?
(a) आस्ट्रिक
(b) द्रविडियन
(c) यूरोपियन
(d) चीनी
उत्तर:
(b) द्रविडियन

प्रश्न 42.
अंकलेश्वर क्षेत्र है
(a) असम में
(b) राजस्थान में
(c) आंध्र प्रदेश में
(d) गुजरात में
उत्तर:
(d) गुजरात में

प्रश्न 43.
किस पंचवर्षीय योजना की अवधि 2007-2012 है ?
(a) 9वीं
(b) 10वीं
(c) 11वीं
(d) 12वीं
उत्तर:
(c) 11वीं

प्रश्न 44.
रावतभाटा परमाणु ऊर्जा संयंत्र किस राज्य में अवस्थित है ?
(a) उत्तर प्रदेश
(b) आंध्र प्रदेश
(c) राजस्थान
(d) कर्नाटक
उत्तर:
(c) राजस्थान

प्रश्न 45.
निम्नलिखित में कौन एक रेशेदार फसल नहीं है ?
(a) कपास
(b) कॉफी
(c) मेस्टा
(d) जूट
उत्तर:
(c) मेस्टा

प्रश्न 46.
किस वर्ष विश्व की मानव जनसंख्या 6 अरब हुई ?
(a) 1750
(b) 1975
(c) 1830
(d) 1999
उत्तर:
(d) 1999

प्रश्न 47.
निम्न में से कौन एक उत्तर-पूर्वी भारत के दक्षिणतम राज्य है ?
(a) तमिलनाडु
(b) त्रिपुरा
(c) मणिपुर
(d) असम
उत्तर:
(c) मणिपुर

Bihar Board 12th History Important Questions Long Answer Type Part 6

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Bihar Board 12th History Important Questions Long Answer Type Part 6

प्रश्न 1.
असहयोग आन्दोलन के क्या-क्या कारण थे ? यह स्थगित क्यों हुआ ?
उत्तर:
असहयोग आन्दोलन की पृष्ठभूमि में अनेक कारण थे जिनका वर्णन निम्नलिखित तथ्य बिन्दुओं के अंतर्गत किया जा सकता है-
1. युद्ध के बाद भारतीयों में असंतोष – प्रथम विश्वयुद्ध के समय में भारत ने ब्रिटिश सरकार को पूर्ण सहयोग दिया था। ब्रिटेन ने यह युद्ध स्वतंत्रता और प्रजातंत्र की रक्षा के नाम पर लड़ा था। ब्रिटिश विजय में भारतीयों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, जिसे स्वयं अंग्रेजों ने स्वीकार किया था। भारतवासियों को यह विश्वास था कि युद्ध की समाप्ति पर ब्रिटेन संसार को दिये गए अपने वचनों का पालन करेगा। भारत के अधिकाशं जागरूक व्यक्ति यह आशा करने लगे कि उन्हें “स्व-शासन” अब मिलने ही वाला है परन्तु स्वायत्त शासन के नाम पर भारत को माण्टफोर्ड सुधार दिये गए जिससे कि भारतीयों में असंतोष फैला जो कि असहयोग आन्दोलन का एक कारण बना।

2. भारतीय अर्थव्यवस्था पर युद्ध का प्रभाव – प्रथम विश्वयुद्ध का आर्थिक परिणाम भी बड़ा बुरा हुआ। सभी आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो गया। इस अभाव के कारण वस्तुओं का मूल्य बढ़ गया था।, चोर बाजारी बढ़ गयी थी। विभिन्न उपायों द्वारा सरकार ने जनता से युद्ध के लिए धन एकत्र किया था। करों में भी वृद्धि कर दी गयी थी। इन कारणों से जनता को भयंकर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था। युद्ध के बाद देश में प्लेग, इन्फ्लुएंजा आदि महामारियों का प्रकोप हुआ। इसी समय देश को भयंकर अकाल का भी सामना करना पड़ा। फलतः जनता की आर्थिक स्थिति बहुत ही सोचनीय हो गई। इस आर्थिक असंतोष के कारण कई जगहों पर बलवे हुए, हड़तालें हुई और भूखी जनता ने लूट-पाट भी की। अतः हम कह सकते हैं कि आर्थिक असंतोष ने लोगों में अंग्रेजों के प्रति घृणा पैदा कर दी। फलतः सभी लोग असहयोग के लिए तैयार हो गए।

3. सेना संबंधी नीति – युद्ध के दौरान लोगों को सेना में भर्ती होने के लिए बाध्य कर दिया गया। लेकिन युद्ध की समाप्ति के बाद बहुत से सैनिकों को नौकरी से अलग कर दिया गया। फलतः लोगों में असंतोष फैला जो कि असहयोग आन्दोलन का एक कारण बना।

4. सरकार की दमनकारी नीति – असहयोग आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण कारण सरकार की दमनकारी नीति भी थी। शासन के द्वारा एक ओर तो युद्ध में सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न किया जा रहा था, दूसरी ओर वह निर्ममता पूर्वक दमन चक्र का प्रयोग कर रही थी। राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचलने के लिए शासन द्वारा प्रेस अधिनियम और द्रोहात्मक अधिनियम का सहारा लिया गया। बंगाल और पंजाब में इस दमन चक्र का खुलकर प्रयोग किया जा रहा था और सरकार के इन दमन कार्यों ने क्रांतिकारियों के दृढ़ संगठन को जन्म दिया।

5. रॉलेट ऐक्ट – युद्ध के दौरान भारत में क्रांतिकारी सक्रिय रहे। उन्हें दबाने के लिये अंग्रेजों ने विशिष्ट अधिकारों के अंतर्गत अपना दमन-चक्र चलाया। युद्ध के बाद इस दमनचक्र की कोई आवश्यकता नहीं थी। परन्तु शासन क्रांतिकारियों के भय से आतंकित था। उसने अपना दमन चक्र बन्द नहीं किया, बल्कि इसको विधिवत रूप देने के लिए उसने एक आयोग स्थापित किया। आयोग की अध्यक्षता सर सिडनी रॉलेट ने की। अप्रैल 1918 में रॉलेट महोदय ने अपनी रिपोर्ट दी, जिसके आधार पर रॉलेट अधिनियम पास किया गया। इस अधिनियम के अनुसार शासन को किसी भी व्यक्ति को संदिग्ध घोषित कर, बिना दोषी सिद्ध किये, जेल में बंद करने का अधिकार दिया गया।

महात्मा गाँधी ने घोषणा की कि वे इस काले कानून के विरोध में आंदोलन चलायेंगे। अतः उन्होंने घोषणा की कि 6 अप्रैल को सारे भारत में रॉलेट अधिनियम को ‘मातम दिवस’ मनाया जाय। उनकी पुकार पर भारत के अनेक नगरों में हड़तालें और प्रदर्शन हुए। इस आन्दोलन की तीव्रता को देखकर शासन ने गाँधीजी को गिरफ्तार कर लिया। परन्तु गाँधीजी की गिरफ्तारी ने आग में घी का काम किया। यद्यपि गाँधीजी तो छोड़ दिये गए लेकिन अंग्रेजों की पाशविकता बढ़ गई। जिसके फलस्वरूप पंजाब में जालियाँवाला बाग काण्ड हुआ।

6. जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड (1919) – जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने आग में घी का काम किया। 10 अप्रैल 1919 को पंजाब के प्रसिद्ध नेता डॉ० सत्यपाल तथा किचलू को गिरफ्तार करके किसी अज्ञात स्थान में भेज दिया गया। उसी के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को वैशाखी के दिन अमृतसर के जालियाँवाला बाग में एक सभा की गई। हालांकि जनरल डायर ने इस सभा को अवैध घोषित किया था, लेकिन जनता को बाग में एकत्रित होने दिया। जब उसमें हजारों व्यक्ति एकत्रित हो गये तो जनरल डायर 100 भारतीय तथा 50 अंग्रेज सैनिकों को लेकर जालियाँवाला बाग में घुस गया और बिना कोई चेतावनी दिए अपने सिपाहियों को निहत्थी और शांतिमयी सभा पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। हजारों स्त्री, पुरुष और बच्चे इस सभा में एकत्रित हए थे। बाग से निकलने के लिए एक ही मार्ग था। उसको भी जनरल डायर ने रोक लिया था। परिणामस्वरूप लोग भागने में असमर्थ रहे। फलस्वरूप सरकारी आँकडे के अनसार 379 लोग मारे गये और लगभग 200 घायल हुए, जबकि सेवा समिति के अनुसार मारे जाने वालों की संख्या 500 तथा पंजाब चैम्बर कॉमर्स के अध्यक्ष प्रत्यक्षदर्शी लाला गिरधारी लाल के अनुसार उनकी संख्या 1000 थी।

अमृतसर के अतिरिक्त लाहौर, कसूर एवं गुजरनवाला में भी हिंसा भड़की तथा पंजाब के पाँच जिलों में मार्शल लॉ लगा दिया गया। अमृतसर के जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड का भारतीय जनता के हृदयों पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा जिसकी प्रतिक्रिया हमें असहयोग आंदोलन के रूप में देखने को मिला।

7. हंटर कमिटी की रिपोर्ट – इस घटना से गाँधीजी को बड़ा क्षोभ हुआ और उन्होंने अंग्रेजी सरकार से मांग की कि भारत के वायसराय को वापस बुला लिया जाय तथा इस हत्याकाण्ड के लिए उत्तरदायी अधिकारियों के विरुद्ध उचित कार्यवाही की जाय। जाँच के लिये नियुक्त हंटर समिति की रिपोर्ट के द्वारा अधिकारियों के कुकृत्य को न्यायपूर्ण ही ठहराया गया। ब्रिटेन की लॉर्डसभा ने जनरल डायर को ब्रिटिश साम्राज्य का शेर कहा तो ब्रिटिश इण्डियन प्रेस ने उसे ब्रिटिश राज्य का रक्षक माना। ऐसी दशा में पंजाब की घटनाओं तथा सरकारी नीति के कारण एक ऐसे वातावरण का निर्माण हुआ, जिसमें क्षुब्धता एवं विरोध की लहर सी दौड़ गयी जिसका परिणाम हमें असहयोग आन्दोलन के रूप में मिला।

8. खिलाफत आन्दोलन – महासमर में तुर्की मित्र राष्ट्र के विरोध में लड़ा था। मुसलमान उसे अपना धर्म गुरु समझते थे। मित्रराष्ट्रों की ओर होना भारतीय मुसलमानों के लिए अपनी धर्म गुरु का विरोध करना था। भारतीय मुसलमानों की ओर से तुर्की के खलीफा की खिलाफत की रक्षा के लिए आन्दोलन चलाया गया। खिलाफत कमिटी ने गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित होने का निश्चय किया। परिणामस्वरूप हिन्दुओं तथा मुसलमानों में एक प्रकार की मैत्री स्थापित हो गयी और इस प्रकार खिलाफत आन्दोलन देशव्यापी बना।

इन्हीं सब कारणों के चलते काँग्रेस ने 1920 ई० के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन चलाने का प्रस्ताव स्वीकार किया और गाँधीजी को नेतृत्व करने को कहा। इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में एक नये अध्याय की शुरुआत हुई। पटाभिसितारमैया ने लिखा है कि “नागपुर काँग्रेस से वास्तव में एक नवीन युग का प्रादुर्भाव होता है। निर्बल, क्रोध और आग्रह भारत के इतिहास में पूर्ण प्रार्थनाओं का स्थान उत्तरदायित्व के एक नवीन भाव तथा स्वावलम्बन की एक नवीन भावना ने ले लिया।

असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम – असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम इस प्रकार निर्धारित किया गया-

  • सरकारी उपाधियाँ पद व अवैतनिक पद त्याग दिए जाएँ।
  • स्थानीय संस्थाओं के नामजद सदस्य अपना त्याग पत्र दे दें।
  • सरकारी दरबारी, उत्सवों और स्वागत समारोहों का पूर्ण बहिष्कार।
  • सरकारी अथवा सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों एवं कॉलेजों का बहिष्कार।
  • सरकारी अदालतों के वकीलों का मुवक्किलों द्वारा बहिष्कार।
  • विदेशी माल का बहिष्कार किया जाय।
  • 1919 के अधिनियम द्वारा निर्मित विधान मण्डलों के निर्वाचनों में खडे उम्मीदवारों को बैठाना और मतदाताओं को खड़े हुए उम्मीदवार को वोट न देने देना।

उपर्युक्त ध्वंसात्मक (Destructive) कार्यक्रम के अलावा असहयोग आन्दोलन के निम्नलिखित रचनात्मक कार्यक्रम भी था-

  • स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग किया जाय।
  • प्रत्येक घर में चरखे और कताई-बुनाई का प्रचार किया जाय।
  • राष्ट्रीय विद्यालय स्थापित किये जाएँ।
  • सरकारी अदालतों के स्थान पर पंचायती अदालतों की स्थापना की जाए।
  • हिन्दू मुस्लिम एकता को मजबूत किया जाय।
  • अस्पृश्यता का निवारण किया जाय।

गाँधीजी ने कहा कि यदि जनता ने उपर्युक्त कार्यक्रम का पालन किया तो एक वर्ष में स्वराज्य प्राप्त हो जायेगा। उन्होंने आगे कहा कि आन्दोलन में अहिंसा का कड़े रूप में पालन किया जाय।

असहयोग आन्दोलन की प्रगति – गाँधीजी का असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम बहुत ही लोकप्रिय हुआ। सर्वप्रथम गाँधीजी ने स्वयं अपना ‘कैसरे हिन्द’ पदक त्याग दिया। फिर सैकड़ों लोगों ने अपनी पदवियों का परित्याग कर दिया। सुप्रसिद्ध वकील पं० मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि ने अदालतों का बहिष्कार किया। विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल एवं कॉलेज छोड़ दिये।

विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। अनेक स्थानों पर विदेशी कपड़ों की होलियाँ जलाई गयी। स्वदेशी वस्तुओं का खुब प्रचार बढ़ा। इस समय अजीब हिन्दू मुस्लिम एकता देखी गई। आन्दोलन में अनेक प्रमुख मुसलमान नेताओं ने भाग लिया। खिलाफत समिति ने मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरी ‘हराम’ बताई। इस अवसर पर लगभग 40 लाख स्वयं सेवक बने। इस प्रकार आन्दोलन अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया।

सरकार द्वारा दमन चक्र – नवम्बर 1921 में सम्राट जार्ज पंचम के ज्येष्ठ पुत्र प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आने वाले थे। काँग्रेस ने उनके बहिष्कार का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप सरकार ने आन्दोलन को कुचलने के लिए दमनपूर्ण कानूनों का सहारा लिया। अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। उनपर कोड़े लगवाये गए। सितम्बर 1921 में अली बन्धुओं के जोशीले भाषण के कारण उनको गिरफ्तार कर लिया गया। परन्तु इस घोर दमन और अत्याचार के बाद भी जनता का साहस कम नहीं हुआ।

चौरी-चौरा काण्ड और आन्दोलन का स्थगन – चौरी-चौरा काण्ड के फलस्वरूप गाँधीजी ने अपना असहयोग आन्दोलन एकदम स्थगित कर दिया। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर 5 फरवरी 1922 को एक उत्तेजित भीड़ ने एक पुलिस चौकी में आग लगा दी। पुलिस चौकी में एक सब-इंस्पेक्टर और 21 सिपाहियों को जिन्दा जला दिया गया। इस हिंसात्मक घटना के कारण गाँधीजी की एक बैठक बुलाई जिसमें चौरी-चौरा घटना के कारण सामुहिक सत्याग्रह एवं असहयोग आन्दोलन स्थगित करने का प्रस्ताव कराया। इसी समिति के निर्णय के आधार पर असहयोग आन्दोलन स्थगित हो गया।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि भारतीय मुक्ति संग्राम के इतिहास में असहयोग आन्दोलन का काफी महत्त्वपूर्ण स्थान है। असहयोग आन्दोलन का सूत्रपात एकाएक नहीं हुआ था बल्कि इसकी पृष्ठभूमि में अनेक कारण थे जैसे युद्ध के बाद भारतीयों में असंतोष, भारतीय अर्थव्यवस्था पर युद्ध का प्रभाव, सेना संबंधी नीति, सरकार की दमनकारी नीति, रॉलेट ऐक्ट, जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड, खिलाफत आंदोलन इत्यादि। असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम भी काफी महत्त्वपूर्ण थे जिसके चलते असहयोग आन्दोलन काफी लोकप्रिय साबित हुआ। इसी बीच चौरी-चौरा काण्ड हुआ। परिणामस्वरूप गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन को बन्द कर दिया।

प्रश्न 2.
सविनय अवज्ञा आंदोलन पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
1929 ई० में काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन में गाँधीजी के नेतृत्व में पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ करने का निर्णय लिया गया।

कार्यक्रम – सविनय अवज्ञा आंदोलन के निम्नलिखित कार्यक्रम थे-

  • प्रत्येक गाँव में नमक कानून तोड़कर नमकं बनाया जाए।
  • शराब और विदेशी कपड़ों की दूकानों पर धरना (विशेषकर महिलाओं द्वारा) दिया जाए।
  • विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाएँ।
  • हिन्दु छुआछूत को पूर्णतया छोड़ दें।
  • विद्यार्थियों को सरकारी स्कूल व कॉलेजों में पढ़ना बंद कर देना चाहिए।
  • सरकारी कर्मचारियों को सरकारी नौकरियाँ छोड़ देनी चाहिए।

(क) आंदोलन का प्रथम चरण-

  • डांडी यात्रा-12 मार्च, 1930 को गाँधीजी ने डांडी यात्रा आरम्भ की तथा डांडी के तट पर पहुँचकर समुद्र के जल से नमक बनाकर नमक कानून को भंग किया।
  • आंदोलन में तीव्रता-सारे देश में सरकारी कानूनों का उल्लंघन शुरू हो गया। लोगों ने कर देना बंद कर दिया। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया।
  • सरकार की दमन-नीति-सरकार की दमन नीति शुरू हुई। गाँधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया। 1931 ई० के आरंभ में लगभग 90,000 व्यक्ति जेलों में थे।
  • प्रथम गोलमेज सम्मेलन-पेशावर में भारतीय सिपाहियों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। स्थिति खराब होते देखकर लंदन में 1930 ई० में गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया गया किन्तु, काँग्रेस ने इसका बहिष्कार किया।
  • गाँधी-इरविन समझौता-जनवरी 1931 में गाँधीजी एवं दूसरे अन्य नेता रिहा कर दिए गए। मार्च 1931 में गाँधी-इरविन समझौता हो गया। सभी राजनैतिक बंदियों के मुकदमें वापस ले लिए गए और गाँधीजी द्वारा आंदोलन स्थगित कर दिया गया।

(ख)आंदोलन का दूसरा चरण-

  • भारत के लिए नया संविधान बनाने हेतु द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में गाँधीजी ने भाग लिया। लेकिन कोई खास नतीजा न निकला। गाँधीजी निराश होकर भारत लौटे।
  • पुनः आंदोलन प्रारंभ-गाँधीजी ने पुनः सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर दिया। यह आंदोलन दो वर्षों तक चला।
  • दमनचक्र इस बार सरकार का दमनचक्र पहले से भी भयानक था। गाँधीजी सहित लगभग एक लाख बीस हजार व्यक्तियों को जेलों में बंद कर दिया गया।

प्रश्न 3.
गोलमेज सम्मेलन क्यों आयोजित किये गये? इनके कार्यों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
प्रथम गोलमेज सम्मेलन का आयोजन 12 नवम्बर, 1930 को हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने की थी। इस सम्मेलन में 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें ब्रिटेन के तीनों दलों का प्रतिनिधिमंडल करने वाले 16 ब्रिटिश संसद सदस्य, ब्रिटिश भारत के 57 प्रतिनिधि जिन्हें वायसराय ने मनोनीत किया था तथा देशी रियासतों के 16 सदस्य सम्मिलित थे। काँग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया था। काँग्रेस की अनुपस्थिति पर ब्रेल्सफोर्ड ने कहा, “सेन्ट जेम्स महल में भारतीय नरेश, हरिजन, सिक्ख, मुसलमान, हिन्दू, ईसाई और जमींदारों, मजदूर संघों और वाणिज्य संघों सभी के प्रतिनिधि इसमें सम्मिलित हुये पर भारत माता वहाँ उपस्थित नहीं थी।

गाँधी-इरविन समझौता-प्रथम गोलमेज सम्मेलन असफल रहा। 19 जनवरी, 1931 को बिना किसी निर्णय के यह समाप्त कर दिया गया। यह स्पष्ट हो गया कि काँग्रेस के बिना कोई संवैधानिक निर्णय नहीं लिया जा सकता है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड तथा इरविन दोनों को ज्ञात हो गया कि काँग्रेस के बिना किसी संविधान का निर्माण नहीं किया जा सकता है। देश में उचित वातावरण बनाने के लिए इरविन ने काँग्रेस से प्रतिबंध हटा दिया तथा गाँधीजी तथा अन्य नेताओं को छोड़ दिया। अंततः 5 मार्च, 1931 को गाँधी तथा इरविन में समझौता हो गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस हो गया व द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में काँग्रेस ने भाग लेना स्वीकार कर लिया।

दूसरा गोलमेज सम्मेलन-गाँधी-इरविन समझौता के तहत दूसरे गोलमेज सम्मेलन में काँग्रेस को भाग लेना था। काँग्रेस की ओर से एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में महात्मा गाँधी ने भाग लिया। मुस्लिम लीग ने मुहम्मद अली जिन्ना ने भाग लिया। 7 सितम्बर, 1931 ई० को दूसरा गोलमेज सम्मेलन आरंभ हुआ। गाँधीजी 12 सितम्बर को लंदन पहुँचे। विभिन्न दल व वर्ग अपना-अपना हित देख रहे थे। गाँधीजी ने कहा, “अन्य सभी दल साम्प्रदायिक हैं। काँग्रेस ही केवल सारे भारत और सब हितों के प्रतिनिधित्व का दावा कर सकती है।”

तीसरा गोलमेज सम्मेलन-भारत मंत्री ने तीसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया। यह सम्मेलन 17 नवम्बर, 1932 ई० से 24 दिसम्बर, 1932 ई० तक चला। काँग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया क्योंकि सभी नेता जेल में बंद थे।

प्रश्न 4.
माउंटबेटन योजना क्या थी ? इसके प्रमुख प्रावधान क्या थे ?
अथवा, माउंटबेटन योजना क्या थी ? इसके प्रमुख परिणामों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

  • 3 जून, 1947 को लार्ड माउंटबेटन ने भारत विभाजन योजना रखी। इसमें संविधान सभा का कार्य जारी रखने को कहा गया। यह भी कहा गया कि यह संविधान उन पर लागू नहीं होगा।
  • पंजाब व बंगाल का विधानमंडल मुस्लिम और गैर-मुस्लिम जिलों के अनुसार बाँटा जायेगा।
  • ब्लूचिस्तान के लोगों को आत्म-निर्णय लेने का अधिकार होगा।
  • पंजाब, बंगाल सिलहट में संविधान सभा के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव होगा और भारतीय राजाओं को संप्रभुसत्ता लौटा दी जायेगी।

प्रावधान (Provisions)-

  • इसमें कहा गया कि ब्रिटिश सरकार 15 अगस्त, 1947 को भारत की सत्ता ऐसी सरकार को सौंपेगी जिसका निर्माण जनता की इच्छा के अनुसार हुआ हो।
  • वर्तमान संविधान सभा में सरकार किसी प्रकार की बाधा नहीं डालेगी।
  • संविधान को उन भागों में लागू किया जायेगा जो उसे लागू करना चाहेंगे।
  • इस योजना के अनुसार भारत को दो अधिराज्यों में बाँट दिया जायेगा; भारत और पाकिस्तान दोनों को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दे दी जायेगी।
  • यह तय किया गया कि बंगाल और पंजाब में विधान सभाओं के अधिवेशन दो भागों में किए जाएंगे। एक भाग में मुस्लिम बहुमत जिलों के प्रतिनिधि होंगे और दूसरे भाग में हिंदू बहुमत जिले के। प्रत्येक भाग बहुमत के आधार पर फैसला करेगा कि वह उस भाग का विधान चाहते हैं या नहीं।
  • सिंध का विधान-सभा तय करे कि वह भारत की संविधान सभा में मिलना चाहती है या नहीं।
  • असम के मुस्लिम बहुल प्रांत सिलहट जिले में इस बात का निर्णय जनमत संग्रह द्वारा लिया जायेगा कि वहाँ की जनता समय में या पूर्वी बंगाल (बंगला देश) में रहना चाहती है।
  • बलूचिस्तान भी तय करे कि वह भारत में रहेगा या अलग।
  • उत्तर-पश्चिम प्रांत में जनमत द्वारा निर्णय होगा।
  • यदि बंगाल, पंजाब और असम के द्वारा भारत का विभजन मान लिया जाए तो भारत और पाकिस्तान की सीमाएँ तय करने के लिए गवर्नर जनरल एक कमीशन बनाएगा।
  • भारत और पाकिस्तान राज्यों के बीच लेन-देन विभाजन के लिए भी समझौता होगा।
  • देशी रियासतों को भी भारत या पाकिस्तान में अपनी इच्छानुसार मिलने की छूट होगी।
  • भारत और पाकिस्तान को राष्ट्रमंडल की सदस्यता रखने या छोड़ने का अधिकार होगा।

प्रश्न 5.
1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की मुख्य विशेषताओं पर विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (India IndependenceAct, 1947) – माउंटबेटन योजना को 18 जुलाई को ब्रिटिश सम्राट ने विधिवत् स्वीकृति दे दी। इस अधिनियम में कुल 20 धारायें थीं। इनमें से कुछ प्रमुख धाराओं को नीचे बतलाया गया है-

  • 15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान नामक दो हिस्से बना दिये जायेंगे और ब्रिटिश सरकार उन्हें सत्ता सौंप देगी।
  • दोनों अधिराज्यों का वर्णन किया गया और यह भी बतलाया गया कि बंगाल और पंजाब की विभाजन रेखा निश्चित करने के लिए एक सीमा आयोग होगा।’
  • दोनों अधिराज्यों की संविधान सभाओं को शासन की सत्ता सौंपी जायेगी। इन्हें अपना संविधान बनाने का पूर्ण अधिकार होगा।
  • इन दोनों अधिराज्यों को अधिकार होगा कि वे ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के सदस्य रहें या उसे त्याग दें।
  • दोनों के लिए अलग-अलग एक गवर्नर जनरल होगा जिसकी नियुक्ति उनके मंत्रिमंडल की सलाह से होगी।
  • इन हिस्सों के विधानमंडल को कानून बनाने का अधिकार होगा। 15 अगस्त, 1947 के बाद ब्रिटिश सरकार का इन पर कोई अधिकार न होगा, न ही उसका कोई कानून लागू होगा।
  • भारत मंत्री का पद समाप्त कर दिया जायेगा।
  • जब तक दोनों संविधानों का निर्माण हो तब तक दोनों हिस्सों और प्रांतों का शासन 1935 के भारत शासन अधिनियम के अनुसार चलेगा, परंतु इन पर गर्वनर जनरल, प्रांतीय गवर्नर का कोई विशेषाधिकार न रहेगा।
  • जब तक नए विधान के अनुसार चुनाव होंगे, वर्तमान प्रांतीय विधानमंडल कार्य करेंगे।
  • 15 अगस्त, 1947 से ब्रिटिश सरकार की देशी रियासतों पर सर्वोच्चता को समाप्त कर दिया जायेगा। इसके पश्चात् देशी रियासतें नवीन अधिराज्यों से अपने राजनीतिक संबंध स्थापित करने में स्वतंत्र होंगी। अब वे इच्छानुसार भारत और पाकिस्तान में चाहे मिल सकती हैं अथवा स्वतंत्र रह सकती हैं।
  • भारतीय नागरिक सेवाओं के सदस्य अधिकारों को बनाए रखा जाए।

प्रश्न 6.
भारत का विभाजन क्यों हुआ ?
अथवा, 1947 में भारत के विभाजन के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कई नेताओं के न चाहने पर भी भारत विभाजन को रोका नहीं जा सका। इसके लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी थे-

  • सन् 1909 के कानून में मुसलमानों के लिए निर्वाचन का अधिकार देकर अंग्रेजों ने उन्हें हिन्दओं से अलग करने का प्रयास किया। ‘फट डालो और शासन करो’ की नीति से मस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग भी और तेजी से बढ़ती गई।
  • काँग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ सदा समझौता करने की नीति अपनाई। इससे मुस्लिम लीग को यह आशा हो गई कि यदि वह अपनी माँग पर डटी रही, तो एक न एक दिन पाकिस्तान की माँग मान ली जाएगी।
  • मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना की हठधर्मिता के कारण हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे, अतः विवश होकर भारत का विभाजन स्वीकार कर लिया गया।
  • साम्प्रदायिक दंगों ने स्थान-स्थान पर नेताओं और जनता को अत्याचार बंद करने को लाचार कर दिया था, अन्यथा पूरा देश रक्त के सागर में डूब जाता।
  • सन् 1946 में अंतरिम सरकार में शामिल होने पर मुस्लिम लीग ने काँग्रेस की योजनाओं में रुकावट डालनी प्रारम्भ कर दी। काँग्रेस के नेताओं को भी लगने लगा कि वे मुस्लिम लीग पार्टी के साथ मिलकर सरकार नहीं चला पाएँगे।
  • लार्ड माउंटबेटन भारत में राजनैतिक समस्याओं को सुलझाने के लिए यहाँ का वायसराय बनकर आया था। उसने अपने प्रभाव से काँग्रेस पार्टी को विभाजन के लिए तैयार कर लिया था।

प्रश्न 7.
भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी के योगदान का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गाँधी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में इनका स्थान सर्वोच्च है। भारत की स्वाधीनता उन्हीं की भूमिका का फल है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में एक नये युग का निर्माण किया और जीवन के अंतिम क्षण तक देश सेवा तथा राष्ट्रीय आंदोलन का पथ-प्रदर्शन करते रहे। इसी कारण उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ कहा जाता था। वे शांति के दूत थे। सत्य और अहिंसा उनके हथियार थे। उनका आंदोलन इसी पर आधारित था।

वैसे तो 1914 ई० में उन्होंने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया था लेकिन 1919 ई० में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से राष्ट्रीय आंदोलन को प्रभावित करना शुरू किया और अन्त तक राष्ट्रीय आंदोलन के प्राण बने रहे। 1920 ई० से 1947 ई० तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की बागडोर उन्हीं के हाथों में रही। इस अवधि में राष्ट्रीय संग्राम के सर्वोच्च नेता के रूप में भारतीय राजनीति का उन्होंने मार्ग दर्शन किया, उसने साधन दिये, उसको नया दर्शन दिया और उसे सक्रिय बनाया। इसी कारण इस अवधि को ‘गाँधी युग’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने असहयोग आन्दोलन करते हुए भारत को स्वतंत्रता दिलाई। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन का रूप दिया।

1919 ई० में उन्होंने ‘रॉलेट ऐक्ट’ के विरोध स्वरूप देश व्यापी आंदोलन छेड़ा। जालियाँवाला बाग कांड के बाद आंदोलन को और तीव्र रूप दिया। उन्होंने खिलाफत आंदोलन में भाग लेकर मुसलमानों का दिल जीत लिया। वे हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य और अस्पृश्यता के पक्के विरोधी थे। वे क्रांतिकारी तथा आतंकवादी आंदोलन के भी विरोधी थे।

1 अगस्त, 1920 ई० को अंग्रेजी राज्य का अंत करने के लिए ‘असहयोग आंदोलन’ छेड़ा जिसके तहत विद्यार्थियों ने स्कूल, कॉलेज छोड़ा, वकीलों ने वकालत छोड़ी तथा कई लोग नौकरियाँ छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े। वे अहिंसा के इतने बड़े पोषक थे कि जब 1922 ई० में चौरा-चौरी काँड में थाने में आग लगाकर 22 सिपाहियों की हत्या कर दी गई तो दुखित होकर उन्होंने आंदोलन को स्थगित कर दिया । गाँधीजी को कैद कर जेल भेज दिया गया। बाद में अस्वस्थता के आधार पर 1924 ई० में उन्हें जेल से रिहा किया गया।

1927 ई० में जब साइमन कमीशन (जिसके सभी सदस्य अंग्रेज थे) भारत की राजनीतिक स्थिति का जायजा लेने भारत आया तो गाँधीजी के नेतृत्व में समूचे देश में इसका बहिष्कार किया गया। 1930 ई० में अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ शुरू किया गया। मार्च 1930 ई० में ‘दांडी यात्रा’ कर नमक कानून को तोड़ा और उस कानून में संशोधन के लिए सरकार को बाध्य किया। दिसम्बर 1931 ई० में गाँधीजी गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने इंगलैंड गये। इसकी असफलता पर इंगलैंड से लौटकर 1932 ई० में पुनः सविनय अवज्ञा आन्दोलन चालू कर दिया।

8 अगस्त 1932 ई० को ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘साम्प्रदायिक निर्णय’ की घोषणा के विरुद्ध गाँधीजी ने 20 सितम्बर 1932 ई० में आमरण अनशन शुरू कर दिया। गाँधीजी का जीवन बचाने के लिए गणमान्य नेताओं ने बैठकर एक समझौता किया (जिसमें हरिजन नेता डॉ० अम्बेदकर भी थे), जिसे ‘पूना समझौता’ कहा जाता है। 26 सितम्बर 1932 ई० को इसपर गाँधीजी की मुहर लग गई और तब गाँधीजी ने अपना अनशन तोड़ा।

उसके बाद उन्होंने सारा ध्यान सक्रिय राजनीति से हटाकर हरिजनों की सेवा और उनके उत्थान में लगाया। उन्होंने 1934 ई० के बम्बई अधिवेशन में काँग्रेस से त्याग-पत्र दे दिया लेकिन 1935 ई० से वे पुनः सक्रिय राजनीति में दिलचस्पी लेने लगे। 1940 ई० में गाँधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया। द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने के समय अंग्रेजों ने सत्ता हस्तांतरण का प्रलोभन देकर भारतीयों का सहयोग प्राप्त किया था लेकिन जब अंग्रेज अपने वादे से मुकरने लगे तो 7 अगस्त, 1942 ई० को गाँधीजी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया और आंदोलन शुरू कर दिया। 8 अगस्त, 1942 ई० को गाँधीजी सहित कई नेताओं को कैद कर लिया गया। उसी समय उनकी पत्नी कस्तूरबा बाई का देहान्त हो गया। मई 1944 ई० में अस्वस्थता के कारण उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।

1946 में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की माँग दुहराई। कई जगह साम्प्रदायिक दंगे हुए। पूर्वी बंगाल में यह दंगा भीषण रूप धारण कर लिया। गाँधीजी ने घूम-घूमकर साम्प्रदायिक एकता बनाये रखने की अपील की। नवम्बर 1946 ई० से फरवरी 1947 ई० तक गाँधीजी ने बंगाल के नोखाअली जिले में गाँव-गाँव घूमकर दंगा पीड़ितों की सेवा की और सहायता कर साम्प्रदायिक अग्नि को शांत करने की कोशिश की। मार्च 1947 ई० से मई 1947 तक बिहार के दंगा पीड़ित क्षेत्रों का दौरा किया। जब वे कलकत्ता में दंगा की आग बुझा रहे थे उसी समय ‘माउन्टबेटन योजना’ के अन्तर्गत 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत को आजाद कर दिया गया। 30 जनवरी 1948 ई० को बिड़ला भवन में नाथूराम गोडसे नामक एक युवक ने प्रार्थना सभा में उन्हें गोलियों का शिकार बना दिया। इस घटना से सम्पूर्ण विश्व मर्माहत हो गया।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में गाँधीजी की भूमिका अत्यंत ही महत्वपूर्ण रही जिसे देश कभी भुला नहीं सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक बनाया तथा जन-आंदोलन का रूप दिया। उन्होंने शांति, सत्य तथा अहिंसा को आधार बनाकर आंदोलन को एक नया रूप दिया। उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने के लिए असहयोग, सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे सकारात्मक कार्यक्रमों को अपनाया। उन्होंने स्वतंत्रता का बिगुल बजाकर जनता में जागृति पैदा कर उसमें नई जान फूंक दी और लोग मुक्ति हेतु उद्यत हो गये। उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के मार्ग में आये संकटों तथा गतिरोधों को दूर कर आंदोलन की दिशा प्रदान की। इस प्रकार उनकी देन सर्वोपरि एवं अमूल्य है। देश को आजादी दिलाने में उनका सर्वोपरि स्थान है। माउन्टबेटन ने कहा था ‘जिस कार्य को पचास हजार हथियारबन्द सिपाही नहीं कर सके, उसको गाँधीजी ने कर दिखाया, उन्होंने वहाँ शान्ति की स्थापना की। वे अकेला हजारों के समान हैं।”

प्रश्न 8.
आधुनिक भारत के निर्माण में डॉ० बी० आर० अम्बेडकर की देनों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
डॉ० भीमराव अंबेडकर उस तेजपुंज का नाम है जो प्रकाश ही प्रकाश देता है, लेकिन जलाता नहीं। जीवन को समरसता से ग्रहण करते एवं विसंगतियों से संघर्ष करते हुए अपनी निन्दा एवं स्तुति से आत्मशोध की यात्रा में सदा अग्रसर होने वाले महान सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतक बाबा साहब अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 ई० में महाराष्ट्र के महू नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम रामजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था। ये अपने माता-पिता के चौदहवीं संतान थे। ये महार जाति के थे और उस समय महार को अछूत समझा जाता था। अम्बेडकर ने बचपन से ही अछूत होने की पीड़ा को भोगा था और उनका बाल-मन उसी काल से इस दुर्व्यवस्था से आक्रांत हुआ था। मानवमात्र की सेवा में अपने को समर्पित करने वाला व्यक्तित्व दलितों, दुखियों, शोषितों एवं पीड़ितों की दर्दभरी मूक भाषा को अमर स्वर प्रदान करने वाला महामानव समाज में कभी-कभी ही आविर्भूत होता है और वह जन-जन के मन में परमेश्वर की तरह आराध्य बन जाता है। अम्बेडकर उन्हीं प्रतिभाओं में से एक थे।

बचपन से ही ये मेधावी और गहन चिंतक छात्र थे। चौदह वर्ष की उम्र में ही इनका विघाह रामाबाई से हो गया। इसके बाद वे पिता के साथ 1905 ई० में मुम्बई आ गए और 1907 ई० में मैट्रिक की परीक्षा पास की। 1912 ई० में इन्होंने बी० ए० की परीक्षा पास की। ये उच्च शिक्षा के लिए लालायित थे पर आर्थिक कठिनाई रास्ते में रूकावट बनी हुई थी। बड़ौदा नरेश ने मेधावी छात्र की प्रतिभा को कुंठित होते हुए देखा, तो उन्होंने आर्थिक सहायता देना स्वीकार किया। 1913 ई० में अम्बेडकर बड़ौदा नरेश की सहायता से अमेरिका चले गये। 1915 में इन्होंने वहाँ एम० ए० की डिग्री प्राप्त की और 1916 ई० में इन्हें पी० एच० डी० की डिग्री से सम्मानित किया गया। इसके बाद वे इंगलैण्ड और जर्मनी भी गए जहाँ उन्होंने डी० एस. और ‘बारर एट लॉ’ की डिग्री प्राप्त की। यहीं पर अम्बेडकर ने संसदात्मक प्रजातंत्र उदारवादी प्रजातंत्र पर गहन अध्ययन किया। इसी अध्ययन-क्रम में वे संसारभर के देशों के संविधानों से परिचित हुए।

अपने देश लौटने पर इन्होंने 1920 ई० में कोल्हापुर के महाराजा की सहायता से ‘मूक नन्ह’ नामक पत्रिका का सम्पादन आरंभ किया, जिसमें सामाजिक विकृतियों पर करारा प्रहार किया। सन् 1923 से 1931 तक का समय अम्बेडकर के लिए कठोर संघर्ष और अभ्युदय का था। इसी बीच वे दलितों के नेता एवं प्रवक्ता के रूप में उभरकर सामने आए। इन्होंने गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया और अंग्रेज शासक से दलितों की गई माँग भारतीय दलितों को इन्होंने कहा-शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित रहो।

1935 ई० में इनकी धर्मपनी का देहांत हो गया। इसी साल इन्होंने धर्म परिवर्तन की घोषणा की। इन्होंने बहिष्कृत हितकारी सभा, सिद्धांत महाविद्यालय एवं स्वतंत्र मजदूर की स्थापना की। 1946 ई० तक अम्बेडकर की ख्याति देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैल गयी थी। 1947 ई० में नेहरूजी के मंत्रिमंडल में इन्हें कानून मंत्री बनाया गया। 21 अगस्त, 1950 ई० को इन्होंने भारत का संविधान राष्ट्र को समर्पित कर दिया। इसी साल वे कोलम्बो गए और दिल्ली में अम्बेडकर भवन का शिलान्यास किया। 1956 ई० में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और 6 दिसम्बर, 1956 ई० को ही इस महामानव का महापरिनिर्वाण हुआ।

वे अछूतों और दलितों के मसीहा, उद्धारकर्ता और पथ-प्रदर्शक थे। 1990-91 ई० में इनकी जन्म-शताब्दी धूम-धाम से मनायी गयी और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। दलितों को समान अधिकार देना और उनका यथोचित उत्थान करना ही बाबा साहब की सच्ची श्रद्धांजलि 155 होगी। भारत के दलितों एवं पीड़ितों को उन्होंने जो जीवन-संदेश दिया था-‘उठकर आगे बढ़ो’ आज उससे सबों के हृदयतंत्र झंकृत हो रहे हैं और उनमें से मधुर संगीत का स्वर फुट रहा है।

प्रश्न 9.
संविधान सभा का गठन कैसे हुआ? संविधान सभा में उठाये गये महत्वपूर्ण मुद्दों का उल्लेख करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान (Indian Constitution) – भारतीय संविधान का निर्माण 26 नवम्बर, 1949 ई० को हुआ। इसका निर्माण एक संविधान सभा ने किया जिसका निर्वाचन 1946 ई. की कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत हुआ था। संविधान सभा के कुल 296 सदस्यों में से 211 काँग्रेस के तथा 73 मुस्लिम लीग के थे। संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 ई० को डॉ० सच्चिदानन्द सिन्हा की अध्यक्षता में हुई। 11 दिसम्बर, 1946 ई० को स्थायी अध्यक्ष चुने गये। इसके बाद एक संविधान प्रारूप समिति बनायी गयी जिसके अध्यक्ष डॉ० भीमराव अम्बेडकर थे। 26 नवम्बर, 1949 ई० को 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ और इसे 26 जनवरी, 1950 ई० को लागू किया गया।

संविधान का स्वरूप तैयार करने वाली ऐतिहासिक ताकतें – (i) संविधान का स्वरूप तय करने वाली प्रथम ऐतिहासिक ताकत भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस थी जिसने देश के संविधान को लोकतांत्रिक गणराज्य, धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने में भूमिका अदा की थी।

(ii) मुस्लिम लीग ने देश के विभाजन को बढ़ावा दिया परंतु उदारवादी मुसलमान और वे मुस्लिम जो भारत विभाजन के विरोधी थे और विभाजन के बाद भी विभिन्न दबाव समूहों या राजनैतिक दलों से जुड़े रहे, उन्होंने भी भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने तथा सभी नागरिकों कॊ अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने में संविधान के माध्यम से आश्वस्त किया।

(iii) दलित या तथाकथित दलित और हरिजनों के समर्थक नेताओं ने संविधान को कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समानता और न्याय दिलाने वाला आरक्षण की व्यवस्था करने वाला, छुआछूत का उन्मूलन करने वाला स्वरूप प्रदान करने में योगदान दिया।

(iv) समाजवादी विचारधारा या वामपंथी विचारधारा वाले लोगों ने संविधान में समाजवादी ढाँचे की सरकार बनाने, भारत को कल्याणकारी राज्य बनाने और धीरे-धीरे समान काम के लिए समान वेतन, बंधुआ मजदूरी समाप्त करने, जमींदारी उन्मूलन आदि की व्यवस्थायें करने के लिए वातावरण या संवैधानिक व्यवस्थायें तय करने में योगदान दिया।

(v) एन० जी० रांगा और जयपाल सिंह जैसे आदिवासी नेताओं ने संविधान का स्वरूप तय करते समय इस बात की ओर ध्यान देने के लिए जोर दिया कि उनके समाज का गैर मूलवासियों द्वारा शोषण हुआ है। इसलिए आदिवासियों की सुरक्षा तथा उन्हें आम आदमियों की दशा में लाने के लिए संविधान में आवश्यक परिस्थितियाँ बनाने की आवश्यकता है।

प्रश्न 10.
संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकाला?
उत्तर:
भाषा के विवाद को हल करने के उपाय (Methods or Measures to solve the Language Problem)-
(i) भारत प्रारंभ से ही एक बहुत भाषा-भाषी देश है। देश के विभिन्न प्रांतों और हिस्सों में लोग अलग-अलग भाषाओं का प्रयोग करते हैं, बोलियाँ बोलते हैं। जिस समय संविधान सभा के समक्ष राष्ट्र की भाषा का मामला आया तो इस मुद्दे पर अनेक महीनों तक गरमा-गर्म बहस हुई, कई बार काफी तनाव पैदा हुए।

(ii) आजादी से पूर्व 1930 के दशक तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह स्वीकार कर लिया था कि हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का मानना था कि प्रत्येक भारतीय को एक ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें। हिंदी और उर्दू के मेल से बनी हिंदुस्तानी भारतीय जनता की बहुत बड़े हिस्से की भाषा थी और अनेक संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई एक साझी भाषा थी।

(iii) जैसे-जैसे समय बीता, हिंदुस्तानी भाषा ने अनेक प्रकार के स्रोतों से नए-नए शब्द अपने में समा लिए और उसे आजादी के आने तक बहुत सारे लोग समझने लगे। गाँधीजी को ऐसा लगता था कि यही भाषा देश के समुदायों के बीच आचार-विमर्श का माध्यम बन सकती है। हिंदू और मुस्लमानों को एकजूट कर सकती है।

(iv) दुर्भाग्यवश हिंदी और उर्दू पर साम्प्रदायिकता, साम्प्रदायिक दंगों और साम्प्रदायिकता से प्रेरित राजनीति और धार्मिक संकीर्णता का कुप्रभाव पड़ने लगा। हिंदी और उर्दू परस्पर दूर होती जा रही थी। मुसलमान फारसी और उर्दू से ज्यादा से ज्यादा शब्द हिंदी से मिला रहे थे तो अनेक हिंदू भी संस्कृतनिष्ठ शब्दों को ज्यादा से ज्यादा हिंदी में ले रहे थे। परिणाम यह हुआ कि भाषा भी धार्मिक पहचान का राजनतिक हिस्सा बन गई। लेकिन महात्मा गाँधी जैसे महान नेताओं के हिंदुस्तानी (भाषा) के साझे चरित्र में आस्था कम नहीं हुई।

(v) संयुक्त प्रांत के एक कांग्रेसी सदस्य आर० वी० धुलेकर ने आवाज उठाई थी, हिंदी को संविधान बनाने की भाषा के रूप में प्रयोग किया जाए। धुलकर ने उन लोगों का विरोध किया जिन्होंने यह तर्क दिया कि संविधान सभा के सभी सदस्य हिंदुस्तानी भाषा नहीं समझते।।

आर० वी० धुलेकर ने कहा था, “इस सदन में जो लोग भारत का संविधान रचने बैठे हैं और हिंदुस्तानी नहीं जानते वे इस सभा की सदस्यता के पात्र नहीं हैं। उन्हें चले जाना चाहिए।”

(vi) धुलकर की टिप्पणियों से संविधान सभा में हंगामा खड़ा हो गया। अंत में जवाहरलाल के हस्तक्षेप से संविधान सभा में शांति स्थापित हुई। लगभग तीन वर्षों के बाद 12 सितम्बर, 1947 को राष्ट्र की भाषा के प्रश्न पर आर. वी. धुलेकर के भाषण ने एक बार फिर तूफान खड़ा कर दिया। तब तक संविधान सभा की भाषा समिति अपनी रिपोर्ट पेश कर चुकी थी। समिति ने राष्ट्रीय भाषा के सवाल पर हिंदी के समर्थकों और विरोधियों के बीच पैदा हो गए गतिरोध को तोड़ने के लिए फार्मूला विकसित कर लिया था। समिति ने सुझाव दिया कि देवनागरी लिपि में लिखी हिर्दै भारत की राजकीय भाषा होगी परंतु इस फार्मूले को समिति ने घोषित नहीं किया था।

(vii) भाषा संबंधी समिति का यह विचार था कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के मामले में हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए।

(viii) कुछ लोगों का विचार था कि संविधान लागू होने के बाद लगभग पंद्रह वर्षों के बाद तक ब्रिटिश काल की तरह सरकारी कामकाज में अंग्रेजी को जारी रखा जाए। हर प्रांत को अपने कार्यों के लिए कोई एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार होगा। संविधान सभा की समिति ने हिंदी को राष्ट्रभाषा की बजाय राज भाषा कहकर विभिन्न पक्षों की भावना को शांत करने और सर्वस्वीकृत समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया था।

(ix) आर० बी० धुलेकर ने उन लोगों का मजाक उड़ाया जो गाँधी का नाम लेकर हिंदी की बजाय हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा बनाना चाहते थे। मद्रास के सदस्य श्रीमती दुर्गाबाई ने आर० बी० धुलेकर के वक्तव्य पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि, “अध्यक्ष महोदय, गैर हिंदी भाषायी क्षेत्रों के लोगों को यह महसूस कराया जा रहा है कि भाषा संबंधी झगड़ा या हिंदी भाषा क्षेत्रों का यह दृष्टिकोण वस्तुतः एक राष्ट्र की सांझी संस्कृति पर भारत की दूसरी उन्नत भाषाओं के स्वाभाविक प्रभाव को रोकने की लड़ाई बनाई जा रही है।” उन्होंने आगे कहा हिंदी के लिए हो रहा यह प्रचार प्रांतीय भाषाओं की जड़ें खोदने के प्रयास के तुल्य हैं।”

अंततः कुछ सदस्यों ने दक्षिण भारत से जिनमें महाराष्ट्र, मद्रास आदि के सदस्यों के प्रयासों से सम्पूर्ण सदस्यों को यह अहसास करा दिया कि हिंदी के लिए जो भी किया जाए, बड़ी सावधानी से किया जाए तभी इस भाषा का भला हो जाएगा। सभी सदस्यों ने हिंदी की हिमायत को स्वीकार किया लेकिन इनके वर्चस्व को अस्वीकार कर दिया।

कालांतर में देश की सभी क्षेत्रीय भाषाओं को सूचीबद्ध किया गया। शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रभाषा बनाए जाने के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी को वर्षों तक सरकारी कामकाज की भाषा बनाया गया। हिंदी अधिकांश राज्यों की प्रमुख भाषा है लेकिन इसका प्रचार अब लोकतांत्रिक ढंग से स्वयं होता जा रहा है। जनसंचार माध्यम, दूरदर्शन, रेडियो, प्रेस, साहित्य, फिल्में इसके प्रचार-प्रसार में प्रशंसनीय योगदान दे रहे हैं।

Bihar Board 12th Geography Important Questions Short Answer Type Part 4

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Bihar Board 12th Geography Important Questions Short Answer Type Part 4

प्रश्न 1.
लोहा-इस्पात उद्योग किसी देश के औद्योगिक विकास का आधार है, ऐसा क्यों ?
उत्तर:
लोहा इस्पात उद्योग के विकास ने भारत में औद्योगीकरण के द्वार खोल दिये हैं। लगभग सभी क्षेत्र लोहा इस्पात उद्योग पर निर्भर करता है। लोहा इस्पात उद्योग में अन्य उद्योगों के लिये मशीनरी उपकरण आदि तैयार होते हैं। इसके विभिन्न उत्पाद अन्य उद्योगों के लिये कच्चा माल है। जीवन का हर क्षेत्र लोहे से प्रभावित है। इसलिये यह उद्योग किसी देश के औद्योगिक विकास का आधार है।

प्रश्न 2.
सूती वस्त्र उद्योग के दो सेक्टरों के नाम बताइए। वे किस प्रकार भिन्न हैं ?
उत्तर:
सूती वस्त्र उद्योग के दो सेक्टर हैं-

  • हथकरघा सेक्टर तथा
  • शक्ति करघा सेक्टर।

हथकरघा क्षेत्र में वस्त्र हाथ से बनाये जाते हैं जबकि शक्ति करघा क्षेत्र में मशीनों से वस्त्र निर्माण होता है। शक्ति करघा क्षेत्र में 59% वस्त्र का निर्माण होता है।

प्रश्न 3.
भारत में सूचना प्रौद्योगिकी क्रान्ति के प्रमुख प्रभाव क्या हैं ?
उत्तर:
सूचना प्रौद्योगिकी का भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इस उद्योग ने देश में आर्थिक और सामाजिक विकास की नई संभावनायें खोल दी हैं। इसने व्यापार प्रक्रिया को बाह्य स्रोत सम्बन्धी बना दिया है।

भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग देश की अर्थव्यवस्था में तेजी से उभरकर आया है जिसके द्वारा व्यापार तथा अन्य क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ है।

प्रश्न 4.
उद्योग की स्थापना के लिए कौन-कौन से चार मुख्य कारक सहायक होते हैं ? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर:
उद्योगों की स्थापना के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं-
1. कच्चे माल की निकटता (Nearness of the Raw Materials) – भारी उद्योग के लिए कच्चा माल निकट और सस्ता मिलना चाहिए। इसलिये इस प्रकार के उद्योग कच्चे माल के समीप लगाये जाते हैं। जैसे-लोहा तथा इस्पात उद्योग के लिये लोहा समीप मिलना चाहिए।

2. शक्ति के साधन (Means of Power) – उद्योगों के लिये शक्ति के साधन जैसे कोयला, बिजली आदि आवश्यक है। कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस आदि के बिना आधुनिक उद्योग का विकास संभव नहीं है। नांगल (पंजाब) में उर्वरक का कारखाना आपूर्ति के ही समीप है।

3. परिवहन की सुविधा (Transport Facilities) – उद्योगों के लिए कच्चा माल लाने और तैयार माल ले जाने के लिए परिवहन के अच्छे साधनों का होना आवश्यक है। कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई बंदरगाह अपने पृष्ठ प्रदेशों से रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग से जुड़े हैं।

4. कुशल एवं सस्ते श्रमिक (Skilled and Cheap Labour) – उद्योगों को चलाने के लिए पर्याप्त संख्या में सस्ते श्रमिक आवश्यक हैं। कुछ उद्योग तो श्रमप्रधान ही होते हैं। इन्हें विशेष दक्षता वाले श्रमिकों की आवश्यकता होती है। मुरादाबाद का बर्तन उद्योग, फिरोजाबाद का चूड़ी उद्योग, बनारस का साड़ी उद्योग ऐसे ही उद्योग हैं।

5. बाजार की निकटता (Nearness of Market) – उद्योगों के तैयार माल के लिये बाजार का समीप होना आवश्यक है, विशेषकर भारी वस्तुओं को बेचने के लिए बाजार की निकटता प्रभावी कारक हैं।

6. जल की आपूर्ति (Water Supply) – कुछ उद्योगों के लिए भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। जैसे लोहा तथा इस्पात उद्योग, वस्त्र उद्योग, जूट उद्योग आदि जल के स्रोत के निकट ही लगाये जाते हैं।

प्रश्न 5.
सॉफ्टवेयर पार्कों से किस प्रकार के उद्योग सम्बन्धित हैं ? आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटक राज्यों में स्थित एक-एक सॉफ्टवेयर पार्क का नाम बताएँ।
उत्तर:
सॉफ्टवेयर पार्क से सूचना और प्रौद्योगिकी उद्योग सम्बन्धित है। ये केन्द्र सॉफ्टवेयर विशेषज्ञों के लिए सूचना प्रदान करते हैं।
कनार्टक राज्य में बंगलौर तथा आन्ध्र प्रदेश में हैदराबाद प्रमुख सॉफ्टवेयर पार्क हैं।

प्रश्न 6.
हुगली औद्योगिक प्रदेश के विकास के लिये उत्तरदायी कारकों का वर्णन करें।
उत्तर:
हुगली औद्योगिक प्रदेश के विकास के लिए उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं-

  1. ऐतिहासिक कारक – इसका विकास 17वीं शताब्दी के अन्तिम चरणों में हुआ। 1855 में रिसरा नामक स्थान पर पहली जूट मिल खुली।
  2. छोटानागपुर पठारी क्षेत्र में उपलब्ध खनिज पदार्थों ने इस प्रदेश के विकास में योगदान दिया है।
  3. इस प्रदेश का आन्तरिक भाग रेलमार्गों और सड़क मार्गों से जुड़ा है जिससे औद्योगिक पट्टी के विकसित होने में मददं मिली।
  4. कोलकाता बंदरगाह का विकास इसकी स्थापना का एक अन्य कारक था ।

प्रश्न 7.
इन्दिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र का सिंचाई पर क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
नहर निकलने से सिंचाई द्वारा प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में दृष्टिगोचर परिवर्तन हुआ है। क्षेत्र में मृदा आर्द्रता बढ़ी है। कृषि सिंचाई से कृषि योग्य क्षेत्र में वृद्धि हुई है। पारम्परिक फसलें बाजरा, गुआर, चना के स्थान पर गेहूँ का उत्पादन किया जाने लगा है। इसके साथ कपास, मूंगफली और चावल की कृषि की जाने लगी है। यह गहन कृषि सिंचाई का परिणाम है।

प्रश्न 8.
किसी देश के विकास के लिये नियोजन क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:

  1. भारत जैसे विकासशील देश में यह टिकाऊ विकास का महत्त्वपूर्ण भाग है। इसका उद्देश्य बहुमुखी विकास है जिसमें कृषि, उद्योग, परिवहन, जनस्वास्थ्य, शिक्षा आदि की उन्नति का विशेष महत्व है।
  2. नियोजन का उद्देश्य संविधान में घोषित सामाजिक दायित्वों के उद्देश्यों की क्रमिक रूप में कुछ अवस्थाओं के रूप में संकल्पना की जाती है।
  3. नियोजन की आवश्यकता प्रादेशिक तथा सामाजिक विषमताओं और असन्तुलन को घटाने के उद्देश्य से होती है। नियोजन क्रमिक अवस्थाओं में सीमित संसाधनों तथा प्रौद्योगिकी के साथ किए जाने वाला प्रयास है जिससे देश का क्रमिक रूप में आर्थिक विकास होता है।

प्रश्न 9.
भारत में रोजगार की क्या स्थिति है ?
उत्तर:
रोजगार-जनन भी नियोजन की आवश्यकताओं में से एक रहा है। 1983 में भारत में रोजगार की कुल संख्या लगभग 3.03 करोड़ आँकी गई थी जो 2000 में बढ़कर 3.97 करोड़ हो गई। इससे स्पष्ट है कि रोजगार के अवसरों में लगातार वृद्धि तो हुई परन्तु जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना में यह धीमी गति से बढ़ी। 1972-78 की अवधि में रोजगार की औसत वार्षिक वृद्धि दर 2.72% थी जो 1983-88 में घटकर 1.54% और 1993-2000 की अवधि में 1.03% रह गई।

वर्तमान समय में शिक्षित बेरोजगारों की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। 1996-97 में रोजगार की तलाश में युवकों की संख्या: 3.7 करोड़ तक बढ़ गई।

प्रश्न 10.
परिवहन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
लोगों के आवागमन और सामान की ढुलाई को सुविधाजनक बनाने के लिए परिवहन की आवश्यकता होती है। यह यात्रियों और माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने का साधन है। परिवहन तंत्र देश की जीवन रेखा होता है। परिवहन तंत्र स्थानीय बाजारों को एक-दूसरे से तथा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार से जोड़ता है। किसी देश का परिवहन जाल जितना अधिक विकसित होगा, उतनी ही सुदृढ़ वहाँ की अर्थव्यवस्था होती है।

प्रश्न 11.
सड़क परिवहन के क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
सड़क परिवहन के निम्नलिखित लाभ हैं-

  • सड़क परिवहन सीधा उपभोक्ता के घर तक ले जाता है।
  • पहाड़ी, उबड़-खाबड़ और मरुस्थलों में भी सड़क बनाना संभव है।
  • बस, ट्रक आदि कहीं भी रुककर माल अथवा सवारी उतार सकते हैं और ले जा सकते हैं।
  • शीघ्र नाशवान वस्तुओं जैसे-दूध, फल, सब्जियों को शीघ्र सड़क परिवहन द्वारा पहुँचाना संभव है।
  • निर्माण और मरम्मत व्यय रेलों की तुलना में कम है।
  • छोटी दूरियों के लिये सड़क मार्ग ही उपयुक्त रहते हैं।
  • सूखा और बाढ़ की स्थिति में सड़क के द्वारा रेलों की तुलना में पीड़ित क्षेत्रों तक पहुँचना अधिक संभव है।
  • सुरक्षा को सड़क सुदृढ़ बनाती है।
  • जनसम्पर्क सुविधा-सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सम्पर्कों के लिये सड़कें अधिक – उपयोगी होती हैं।

प्रश्न 12.
चार राष्ट्रीय महामार्गों के नाम उनके टर्मिनल सहित बताएँ।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय महामार्ग नं०-1 (National Highway No.-1) – इसे शेरशाह सूरी मार्ग भी कहते हैं। यह दिल्ली और अमृतसर को जोड़ता है।
  • राष्ट्रीय महामार्ग नं०-2 (National Highway No.-2) – यह दिल्ली और कोलकाता को जोड़ता है।
  • राष्ट्रीय महामार्ग नं०-3 (National Highway No.-3) – यह ग्वालियर और मुम्बई को जोड़ता है।
  • राष्ट्रीय महामार्ग नं०-4 (National Highway No.-4) – यह चेन्नई और थाणे को जोडता है।
  • राष्ट्रीय महामार्ग नं०-5 (National Highway No.-5) – यह पूर्वी तट के साथ बहरा घोरा और चेन्नई के बीच है।
  • राष्ट्रीय महामार्ग नं०-6 (National Highway No.-6) – यह देश का दूसरा सबसे लम्बा (1949 किमी) महामार्ग है। यह महामार्ग कोलकाता से संबलपुर, नागपुर होते हुए धुले तक जाता है।
  • राष्ट्रीय महामार्ग नं०-7 (National Highway No.-7) – देश का सबसे लम्बा (2369 किमी) महामार्ग है जो वाराणसी से कन्याकुमारी तक जाता है।

प्रश्न 13.
जनसंख्या परिवर्तन के तीन निर्धारक घटक कौन-से हैं?
उत्तर:
जनसंख्या परिवर्तन के तीन घटक हैं-जन्म-दर, मृत्यु-दर और प्रवास। एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्ति पर जन्म और मृत्यु की संख्या को क्रमशः अशोधित जन्म-दर और अशोधित मृत्यु-दर कहते हैं। जन्म और मृत्यु की संख्या में अंतर द्वारा होने वाले परिवर्तन को प्राकृतिक वृद्धि या ह्रास कहते हैं। तीसरा घटक प्रवास है, जिसमें आप्रवास अंतः प्रवास और उत्प्रवास, बाह्य प्रवास शामिल हैं। आप्रावास अंतः प्रवास से जनसंख्या बढ़ती है और उत्प्रवास। बाह्य प्रवास से जनसंख्या कम होती है। आप्रवास और उत्प्रवास शब्द का प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय प्रवास के लिए होता है और अंतःप्रवास और बाह्य प्रवास का अंतर्देशीय प्रवास के लिए। जन्म-दर, मृत्यु-दर और प्रवास तीनों के फलस्वरूप जनसंख्या में होने वाले परिवर्तन का वास्तविक परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 14.
भारत के प्रमुख पत्तनों की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। किन्हीं दो राज्यों के नाम लिखिए जहाँ दो प्रमुख पत्तन हैं।
उत्तर:
भारत में 12 प्रमुख पत्तन हैं – जिनमें मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, तूतीकोरन, विशाखापटनम और कांडला आदि मुख्य हैं।
भारत के प्रमुख पत्तनों की विशेषताएँ-

  • ये बन्दरगाह प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों हैं।
  • ये सभी औद्योगिक प्रदेशों से जुड़े हैं।

मुम्बई तथा न्हावा शेवा महाराष्ट्र के दो बन्दरगाह हैं। तमिलनाडु में चेन्नई तथा तूतीकोरन दो बन्दरगाह हैं।

प्रश्न 15.
अंतर्राष्ट्रीय एवं अंतर्राज्यीय प्रवास में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अंतर्राज्यीय प्रवास का अर्थ – जब कोई व्यक्ति राज्य के एक शहर से दूसरे शहर में जाकर निवास करता है तो इसे अंतर्राज्यीय प्रवास कहते हैं। इसके लिए किसी प्रकार की सरकारी आदेश की कोई जरूरत नहीं है। जबकि अंतर्राष्ट्रीय प्रवास में कोई व्यक्ति एक देश के किसी शहर से दूसरे देश के किसी शहर में आवास या निवास करता है इसके लिए उसे सरकारी नियमों का संवैधानिक पालन करना पड़ता है।

प्रश्न 16.
पश्चिम बंगाल में जूट की कृषि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत में कुल जूट उत्पादन का 50 प्रतिशत इस राज्य में उत्पन्न किया जाता है। (पश्चिम बंगाल) दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, वर्द्धमान, हुगली, हावड़ा, मेदिनीपुर, मुर्शिदाबाद, चौबीस परगना प्रदेश के प्रमुख जूट उत्पादक जिले हैं। इन जिलों की 85 प्रतिशत भूमि पर जूट बोया जाता है।

प्रश्न 17.
उपग्रह संचार क्या है ? उपग्रह संचार के तीन लाभ बताइए।
उत्तर:
संचार मानव जीवन के लिए आवश्यक है। वर्तमान समय में कोई भी व्यक्ति एक दूसरे से बातचीत किये बिना नहीं रहा सकता है। अब अधिकतर लोग संचार माध्यमों का उपयोग करते हैं।

कृत्रिम उपग्रहों के आविष्कार ने सार्वभौमिक संचार के इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात किया है।

उपग्रह संचार के तीन लाभ-

  1. संचार उपग्रह-अंतरिक्ष में तीव्र क्षमता वाले प्रसारण का कार्य करते हैं।
  2. इससे दुनिया में अलग-अलग भागों में दूर-दूर स्थित केन्द्र भी माइक्रोवेव सम्पर्क के द्वारा एक-दूसरे से जोड़े जा सकते हैं।
  3. पृथ्वी के किसी भी स्थान से देखने पर इनकी स्थिति स्थिर बनी रहती है।

प्रश्न 18.
मेट्रो रेलवे क्या है ?
उत्तर:
मेट्रो रेलवे भूमि के अंदर कोलकाता एवं दिल्ली जैसे महानगरों में प्रदूषण मुक्त, अत्याधुनिक, स्वचालित गाड़ी नियंत्रण प्रणाली एवं यात्री नियंत्रण प्रणाली से लैस होकर विद्युत चालित रेलगाड़ियों का परिचालन है।

प्रश्न 19.
भारत में सिंचाई के कौन-कौन से साधन हैं ?
उत्तर:
भारत में सिंचाई के निम्नलिखित साधन हैं-

  • कुआँ
  • नहर
  • नदी
  • ट्यूबबेला

प्रश्न 20.
बहुउद्देशीय योजना का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
भारत में नियोजित आर्थिक विकास का शुभारंभ 1951 में प्रथम योजना के प्रारंभ से हुआ लेकिन नियोजन के लिए सैद्धांतिक प्रयास स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही प्रारंभ हो गये थे। बहुउद्देशीय योजना का अर्थ सरकार द्वारा एक साथ अनेक उद्देश्य को साथ में लेकर चलना होता है अर्थात् इस योजना के अंतर्गत बहुत-सी योजना सम्मिलित होती है।

प्रश्न 21.
आधुनिक निर्माण उद्योग की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
आधुनिक निर्माण उद्योग प्रशासकीय अधिकारी वर्ग के अंतर्गत एक जटिल तकनीकी तंत्र के तहत कार्य करता है, जिसमें अधिक पूँजी की सहायता से विशिष्टीकरण एवं श्रम विभाजन के द्वारा कम समय एवं कम लागत में अधिक माल का उत्पादन किया जाता है।

प्रश्न 22.
विश्व जनसंख्या वितरण की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
विश्व जनसंख्या वितरण के अंतर्गत स्थल भाग में मात्र 10 प्रतिशत क्षेत्र पर विश्व की लगभग 90 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इनमें भी विश्व की 60 प्रतिशत जनसंख्या 10 सर्वाधिक आबादी देशों में रहती है। इन 10 देशों से 6 एशिया महादेश में हैं।

प्रश्न 23.
जल विद्युत शक्ति का विकास उत्तर भारत में अधिक क्यों हुआ? कोई तीन कारण लिखिए।
उत्तर:
जल विद्युत शक्ति का विकास उत्तर भारत में अधिक हुआ है। इसके तीन प्रमुख कारण हैं-

  • उत्तर भारत की नदियाँ सदावाहिनी हैं जो गहरी, संकरी घाटियों से होकर गुजरती हैं।
  • इन पर बाँध बनाना एवं विद्युत उत्पादन करना सुगम है।
  • उपजाऊ मैदान एवं कई महत्त्वपूर्ण औद्योगिक प्रदेशों से होकर बहने के कारण बिजली की माँग यहाँ अधिक है।

प्रश्न 24.
वृद्धि एवं विकास के मध्य क्या अंतर हैं ?
उत्तर:
वद्धि एवं विकास दोनों समय आधारित है। वद्धि मात्रात्मक यानि धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों तथा मूल्य निरपेक्ष होता है। जबकि विकास का संबंध गुणात्मक परिवर्तन से है। यह तब होता है जब गणवत्ता में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

प्रश्न 25.
देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि क्षेत्र का हिस्सा कम होने की संभावना क्यों है ?
उत्तर:
कृषि क्षेत्र में सतह जल का 89% और भूमिगत जल का 92% उपयोग होता है। इसके विपरीत औद्योगिक क्षेत्र में सतह जल केवल 2% और भूमिगत जल का 5% ही उपयोग होता है। कुल जल उपयोग में कृषि क्षेत्र का भाग अन्य क्षेत्र से अधिक है। अन्य क्षेत्रों का भाग बढ़ाने के लिये कृषि क्षेत्र का जल उपयोग कम करना आवश्यक है।

प्रश्न 26.
इंटरनेट क्या है ? इसकी विशेषतायें बताइए।
उत्तर:
इंटरनेट कम्प्यूटर प्रणाली दूर संचार के लिए एक सशक्त माध्यम है। यह सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए प्रयोग की जानेवाली संसार की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली है। यह लगभग 100 देशों के 1 अरब से भी अधिक लोगों को आपस में जोड़ता है।

इन्टरनेट की सुविधाजनक सम्पर्क प्रणाली द्वारा कोई प्रयोगकर्ता माइक्रो कम्प्यूटर और मोडम के माध्यम से साइबर स्पेस से जुड़ सकता है। इस प्रकार वह विश्व के किसी केन्द्र से जुड़कर जानकारी प्राप्त कर सकता है। साइबर स्पेस एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटरीकृत क्षेत्रका संसार है जो इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब की प्रौद्योगिकी से संचालित होता है।

आज लाखों ग्राहक इंटरनेट से जुड़े रहते हैं। सूचना संसार के आकार, प्रयोग तथा महत्त्व में वृद्धि हो रही है। इंटरनेट के अंतर्गत ई-मेल त इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य (ई-कॉमर्स/ई-मेल) भी शामिल हैं।

प्रश्न 27.
भारत के विशाल मैदान भौम जल संसाधनों में संपन्न क्यों हैं ?
उत्तर:
भारत में वर्षा से प्राप्त जल की कुल मात्रा का लगभग 22% भाग जल भूमि द्वारा सोख लिया जाता है। इसका 60% भाग मिट्टी की ऊपरी सतह तक ही पहुँचता है। यही जल कृषि उत्पादन के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है। देश के कुल भौम जल भंडारण का लगभग 42% भाग भारत के विशाल मैदानों में पाया जाता है। इसके कारण निम्नलिखित हैं-

  • विशाल मैदानों में जलोढ़ मृदा पाई जाती है जिसमें जल आसानी से रिस जाता है।
  • इन मैदानों में बहने वाली नदियाँ सदानीरा हैं। इसमें वर्ष भर जल प्रवाह उच्च रहता है।
  • इन मैदानों में पर्याप्त गहराई तक अवसादी शैल पाई जाती है जिसमें जल की मात्रा का अधिक संग्रहण होता है।
  • इन मैदानों में मानसून वर्षा भी पर्याप्त होती है जो जल का एक स्रोत है और इस वर्षा त्ला जल रिसकर भौम जल बनाता है।

प्रश्न 28.
भारत के संभावित पृष्ठीय जल संसाधनों के वितरण का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में संभावित पृष्ठीय जल नदियों, तालाबों, झीलों में पाया जाता है। भारत में हिमालयी नदी तंत्रों का भरपूर जल संसाधन उपलब्ध है। के० एल० राव के अनुसार भारत में कुल नदियों (धाराओं) की संख्या 10,360 है।

भारत की समस्त नदियों का औसत वार्षिक प्रवाह 1869 अरब घन मीटर है लेकिन इनका केवल 32% जल ही उपयोग के लिए उपलब्ध है। कुल पृष्ठीय जल का 60% भाग सिन्धु-गंगा -ब्रह्मपुत्र में से होकर आता है।

भारत में सिन्धु और उसकी सहायक नदियों का औसत वार्षिक प्रवाह लगभग 73 अरब घन मीटर है। गंगा-ब्रह्मपत्र नदियों का जल उनकी सहायक नदियों सहित क्रमशः 501 तथा 537 अरब घन मीटर है। गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियाँ संसार की सबसे बड़ी नदियों में से हैं। भारत की सभी नदियों का वार्षिक जल प्रवाह विश्व की सभी नदियों के कुल वार्षिक जल प्रवाह के 6% के लगभग है।

प्रश्न 29.
बस्ती से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
अभिन्यास (प्लान) वाले मकानों और झोपड़ियों के समूह को बस्ती कहते हैं। एक बस्ती का निर्माण घरों के समूह से होता है। एक बस्ती 10 या 12 झोपड़ियों का समूह होता है अथवा यह सैकड़ों मकानों का समूह भी हो सकता है। बस्ती में रहने के लिए मकान, पशुओं के लिए बाड़े (घेर) और औजारों व उपकरणों तथा उत्पादित वस्तुओं को रखने के लिए भंडार गृह शामिल है।

प्रश्न 30.
बसावट किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी क्षेत्र या प्रदेश पर लोग मकान या ढाँचे खड़े कर लेते हैं। उस क्षेत्र पर बसने की प्रक्रिया अथवा परिघटना को बसावट कहते हैं। कुछ लोग भरण-पोषण के लिए आर्थिक क्रिया करने के उद्देश्य से बसने के आसपास के क्षेत्र पर अधिकार कर लेते हैं।

बसावट धीरे-धीरे वंशानुगत प्रक्रम में बस्ती के रूप में परिवर्तित होती है।

प्रश्न 31.
भारत के अधिकतर लोग किस आकार के गाँवों में रहते हैं ?
उत्तर:
भारत की अधिकतर जनसंख्या औसत से कम दूरी वाले गाँवों में अधिक बसती है।

प्रश्न 32.
500 से कम जनसंख्या वाले गाँवों का क्या अनुपात है ?
उत्तर:
500 से कम जनसंख्या वाले गाँवों का अनुपात 24.31 प्रतिशत है तथा ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत 70.8 है।

प्रश्न 33.
गुच्छित बस्ती किसे कहते हैं ?
उत्तर:
पास-पास बने घरों वाली ग्रामीण बस्तियों को गुच्छित या संहत बस्ती कहते हैं। इस प्रकार की बस्तियाँ अत्यन्त उपजाऊ मैदानों और घाटियों में पाई जाती हैं।

प्रश्न 34.
सेवाओं के प्रमुख घटक क्या हैं ?
उत्तर:
सेवाओं के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं-

  • वाणिज्यिक सेवायें – विज्ञापन, कानूनी सेवायें, जनसम्पर्क और परामर्श।
  • अचल सम्पत्ति की क्रय – विक्रय सम्बन्धी सेवायें, जो वित्त, बीमा, वाणिज्यिक और आवासीय भूमि व भवनों से सम्बन्धित हैं।
  • उत्पादक एवं उपभोक्ता को जोड़ने वाले थोक और फुटकर व्यापार तथा रख-रखव व मरम्मत के लिए कार्य जैसी सेवायें।
  • परिवहन और संचार – रेल, सड़क, जलयान व वायुयान सेवायें तथा डाक-तार सेवायें।
  • मनोरंजन-दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म और साहित्य।
  • प्रशासन – स्थानीय, राज्य तथा राष्ट्रीय प्रशासन, अधिकारी वर्ग, पुलिस सेवा तथा अन्य जन सेवायें।
  • गैर-सरकारी संगठन – शिशु चिकित्सा, पर्यावरण, ग्रामीण विकास आदि लाभरहित सामाजिक क्रियाकलापों से जुड़े व्यक्तिगत या सामूहिक परोपकारी संगठन।

प्रश्न 35.
महामार्ग क्या है ?
उत्तर:
किसी देश के मुख्य नगरों को जोड़ने वाली पक्की सड़कें महामार्ग कहलाती हैं। उदाहरण के लिए भारत में शेरशाह सूरी मार्ग 1 महामार्ग की सड़कों की चौड़ाई 60 मीटर तक हो सकती है। यातायात के सुचारू रूप से प्रवाह के लिए महामार्गों पर पथ लेन, पुल, फ्लाईओवर तथा सड़कों के किनारे पुशते आदि बने होते हैं।

प्रश्न 36.
संसार में वायुमार्गों के अति सघन वाले तीन मुख्य प्रदेश कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
संसार में सघन वायुमार्ग वाले क्षेत्र हैं-

  • पश्चिमी यूरोप
  • पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका
  • दक्षिण-पूर्वी एशिया।

प्रश्न 37.
उत्तर अमेरिका में एक अनोखा अन्तःस्थलीय जलमार्ग कौन-सा है ? इस अन्तः स्थलीय जलमार्ग की दो मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
उत्तरी अमेरिका का यह अनोखा जलमार्ग ग्रेट लेक्स-सेंट लारेंस जलमार्ग है

विशेषताएँ-

  1. इस जलमार्ग पर स्थित सभी पत्तनों का विकास सभी सुविधायुक्त पत्तनों की भांति ही हुआ है।
  2. यह जलमार्ग अटलांटिक महासागर से बड़ी झीलों को जोड़ता है।

प्रश्न 38.
अन्तःस्थलीय जलमार्ग का क्या अर्थ है ? संसार में अन्तः स्थलीय जल मार्गों के विकास के लिए दो उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
नदियों, नहरों, झीलों के मार्ग से नावों तथा स्टीमरों द्वारा माल के साथ-साथ यात्रियों को ढोया जाता है, ये मार्ग अन्तः स्थलीय जल मार्ग कहलाते हैं।

अनेक कमियों के बाद भी संसार के अनेक भागों में जल परिवहन का विकास हुआ हैं अनेक नदियों की नाव्यता को बढ़ाने के लिए बहुत से सुधार किए गए हैं।

  • जल के प्रवाह की निरंतरता बनाए रखने के लिए बाँधों तथा बैराजों का निर्माण किया गया है।
  • नदियों में पानी की एक निश्चित गहराई बनाए रखने के लिए तल मार्जन का काम किया जाता है। नदी धाराओं में परिवर्तन की समस्या का समाधान तटबंध बनाकर किया गया है।
  • जल प्रवाह की निरन्तरता बनाए रखने के लिए नई परिवहन प्रौद्योगिकी का विकास करना।

प्रश्न 39.
सतही खनन तथा भूमिगत खनन में अन्तर बताइए।
उत्तर:
सतही खनन तथा भूमिगत खनन में निम्नलिखित अन्तर है-
सतही खनन (Open cost mining):

  1. इस प्रकार के खनन को खुले गर्त वाली खान से उत्खनन करना अथवा खदान से खनिज खोदना कहा जाता है।
  2. खनन का यह प्रकार बहुत सरल होता है तथा खनिजों का निष्कासन सस्ता होता है।
  3. इस समय विश्व में सभी प्रकार के खनिजों के खनन की कुल खानों में 90% सतही खानें हैं।
  4. अत्यधिक खनिजों के लिए 99% खानों से सतही खनन होता है।
  5. सतही खनन में अयस्कों के जमीन में पाए जाने के ढंग तथा उनकी प्रकृति के आधार पर खनन विधि अपनाई जाती है। जैसे खुली खान अथवा खुले गर्त वाली खान।

भूमिगत खनन (Shatt mining):

  1. इस प्रकार का खनन कार्य सतही खनन विधि की तुलना में अधिक कठिन तथा जोखिम भरा होता है।
  2. इस प्रकार की विधि में खनन प्रक्रिया गहरी ऊर्ध्वाधर खानों से अथवा तिरछे खनिकूप बनाकर की जाती है।
  3. गहरी भूमिगत सुरंगें बनाई जाती हैं जो एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं।
  4. खोदे गए खनिजों को लिफ्ट द्वारा ऊपर लाया जाता है।
  5. इस प्रकार के खनन में खनिकों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध किए जाते हैं। गहरी खानों में हवा के लिए पंखों तथा प्रकाश आदि का प्रबंध होता है।

प्रश्न 40.
स्वेज नहर पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:

  • स्वेज नहर मार्ग भूमध्यसागर तथा लाल सागर को मिलाता है। यह मार्ग पुरानी दुनिया के मध्य में से होकर जाता है। अतः इसका विश्व के अधिकतर भागों से संपर्क है। इससे विश्व का लगभग 15% व्यापार होता है।
  • यह नहर यूरोप के औद्योगिक तथा एशिया के विकाशील देशों के मध्य संपर्क स्थापित करती है।
  • इस नहर के निर्माण से पहले यूरोप से एशिया आने वाले जहाजों को दक्षिणी केप ऑफ गुड होप से होकर गुजरना पड़ता था, परंतु इस मार्ग के बन जाने पर उत्तर-पश्चिमी यूरोप और एशिया के बीच की दूरी 8000 मी. कम हो गई है।
  • इस नहर का सबसे अधिक लाभ ग्रेट ब्रिटेन को हुआ है क्योंकि इसके निर्माण से ग्रेट ब्रिटेन का संबंध भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड आदि से सुविधाजनक हो गया है।

प्रश्न 41.
जनसंख्या की वद्धि से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
दो समय बिन्दुओं के बीच जनसंख्या में होने वाले परिवर्तन को जनसंख्या वृद्धि कहते हैं। जनसंख्या में होने वाले इस परिवर्तन को प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।

प्रश्न 42.
भारत की जनांकिकी के चार चरण लिखिए।
उत्तर:
भारतीय जनांकिकी के चार चरण हैं-

  • प्रथम चरण – 1921 से पूर्व का समाय है। इस अवस्था में जनसंख्या में बहुत धीमी वृद्धि हुई।
  • दूसरा चरण – 1921 से 1951 के बीच का समय है। इस समय जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हुई।
  • तृतीय चरण – यह 1951 से 1981 के मध्य का समय है। इस अवस्था में जनसंख्या में बहुत तीव्रता से वृद्धि हुई क्योंकि मृत्यु दर तेजी से गिरी।
  • चतुर्थ चरण – यह 1981 के बाद का समय है। इस अवस्था में जनसंख्या में वृद्धि में कुछ गिरावट आई। वृद्धि दर का क्रमिक ह्रास हुआ।

प्रश्न 43.
प्रत्येक उत्तरोत्तर जनगणना में जनसंख्या का घनत्व क्यों बढ़ रहा है ?
उत्तर:
प्रत्येक उत्तरोतर जनगणना में जनसंख्या में वृद्धि हुई है लेकिन क्षेत्रफल में कोई अन्तर नहीं होता है। जनसंख्या घनत्व किसी देश की एक निश्चित समय में कुल जनसंख्या तथा उस देश के कुल क्षेत्रफल के बीच अनुपात होता है। उदाहरण के लिए 1991 की जनगणना के अनसार भारत की कल जनसंख्या 84.65 करोड थी तथा क्षेत्रफल 32.87 लाख वर्ग किमी। अतः जनसंख्या घनत्व 274 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी० था। लेकिन 2001 में जनसंख्या 102.72 करोड़ थी। क्षेत्रफल में कोई वृद्धि नहीं हुई इसलिए जन घनत्व 324 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी० हो गया।

Bihar Board 12th History Important Questions Long Answer Type Part 1

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Bihar Board 12th History Important Questions Long Answer Type Part 1

प्रश्न 1.
प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन के विभिन्न स्रोतों का वर्णन करें।
उत्तर:
सुविधा के दृष्टिकोण से प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के साधनों को दो विस्तृत वर्गों में विभक्त किया जा सकता है, यथा-साहित्यिक सामग्री एवं पुरातात्विक अवशेष। जहाँ पर साहित्य हमारी मदद नहीं करते वहाँ हमें पुरातात्विक सामग्री का सहारा लेना पड़ता है। वैसे तो साहित्यिक साधनों का इतिहास-लेखन में अपना महत्त्व है ही, परन्तु तुलनात्मक दृष्टि से पुरातात्विक सामग्री इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह साहित्य में उपलब्ध विवरणों की पुष्टि करने में सहायक सिद्ध होती है।

साहित्यिक स्रोत

देशी साहित्य – साहित्यिक साधनों में सबसे प्रमुख देशी साहित्य हैं। इनकी भी दो श्रेणियाँ हैं-धार्मिक ग्रन्थ और ऐतिहासिक, अर्द्ध ऐतिहासिक एवं अन्य प्रकार की समकालीन रचनाएँ जो भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है। सबसे पहले हम धर्मग्रन्थों को लें।

ब्राह्मण धर्मग्रन्थ-वेद – धर्मग्रन्थों की श्रेणी में सबसे प्रमुख वैदिक साहित्य है। यह आर्यों के आगमन, उनके निवास, उनके प्रसार, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर यथेष्ट प्रकाश डालता है। इन ग्रन्थों में श्रेष्ठतम एवं प्राचीनतम स्थान चार वेदों-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का है। इनमें सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण ऋग्वेद है। इसकी रचना संभवतः आर्य भारत-आगमन के पहले ही कर चुके थे। यह ग्रन्थ आर्यों के प्रारंभिक जीवन के विषय में विस्तृत जानकारी देता है। अन्य वेदों से भी आर्यों के जीवन, उनके क्रियाकलाप, उनके धार्मिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।

ब्राह्मण – वेदों के बाद ब्राह्मण ग्रन्थों का स्थान आता है। ये पद्य में विरचित वेदों की टीका है और मुख्यतया यज्ञों एवं धार्मिक अनुष्ठानों का विवरण प्रस्तुत करते हैं, परन्तु अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर भी इनसे प्रकाश पड़ता है। इनमें सबसे प्रमुख शतपथ ब्राह्मण है। उदाहरणस्वरूप शतपथ ब्राह्मण में राजसूय यज्ञ का जो वर्णन है उससे उत्तर-वैदिककाल में आर्यों की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति की भी झाँकी मिलती है।

आरण्यक और उपनिषद् – आरण्यक और उपनिषद् भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। यद्यपि मूलतः ये भी धार्मिक ग्रन्थ ही हैं, परन्तु इनमें एक नयी बात देखने को मिलती है। ये ग्रन्थ दार्शनिक प्रश्नों, यथा-ईश्वर एवं आत्मा के अस्तित्व पर भी विचार करते हैं। आरण्यक प्रारम्भिक ग्रन्थ हैं जो दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण आरण्यक हैं-ऐतरीय, तैतरीय, मैत्रायणी इत्यादि। इन्हें संहिता भी कहा जाता है।

स्मृति – स्मृति साहित्य भी हमारे लिए काफी महत्त्वपूर्ण है। ये ग्रन्थ विभिन्न विषयों पर प्रकाश डालते हैं। इनमें राजा के अधिकारों एवं कर्त्तव्यों से लेकर जन-साधारण के सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक विधानों की चर्चा है। यह सत्य है कि ये सभी ग्रन्थ राजनीतिक इतिहास की जानकारी के दृष्टिकोण से बहत लाभदायक नहीं हैं। परन्त अन्य विषयों पर इनसे यथेष्ट मदद मिलती है। वस्तुतः स्मृति ने आगे आनेवाले समयों में न्यायिक साहित्य का रूप ले लिया। स्मृतियों में सबसे प्रमुख मनुस्मृति है। याज्ञवल्क्य, विष्णु, वृहस्पति एवं नारद स्मृति भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

बौद्ध एवं जैन धर्मग्रन्थ – ब्राह्मण धर्मग्रन्थों के अतिरिक्त बौद्ध एवं जैन धर्मग्रन्थ भी तत्कालीन इतिहास, सभ्यता एवं संस्कृति पर यथेष्ट प्रकाश डालते हैं। छठी शताब्दी ई० पू० में इन धर्मों के उदय तथा उसके बाद के समय में इनके प्रसार के चलते बौद्ध एवं जैन धर्मग्रन्थों की रचना बड़े पैमाने पर हुई। ये ग्रन्थ भी ब्राह्मण धर्मग्रन्थों की तरह ही मुख्यतः धर्म प्रधान नहीं हैं।

महाकाव्य – महाकाव्यों में सबसे प्रमुख महाकाव्य हैं-रामायण और महाभारत। वाल्मीकि कृत रामायण में एक आदर्श राजा एवं राज्य का विवरण है। इस ग्रन्थ से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रामायण का उतना महत्त्व नहीं है जितना कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से। इसके निश्चितकाल के विषय में विद्वानों में मतभेद है, परन्तु यह भी माना जाता है कि इसका अन्तिम संकलन गुप्तकाल में हुआ होगा।

पुराण – महाकाव्यों के अतिरिक्त पुराणों से भी इतिहास की यथेष्ट जानकारी मिलती है। इनका राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक अवस्था तथा इतिहास के लिए काफी महत्त्व है। प्राचीन राजवंशों के इतिहास के विषय में इनसे जानकारी मिलती है। उदाहरणस्वरूप, शिशुनागवंश, नन्दवंश, मौर्यवंश से लेकर गुप्तवंश तक के राजनीतिक इतिहास की झाँकी इनमें मिलती है। सांस्कृतिक महत्त्व के प्रश्नों पर तो पुराणों में काफी महत्त्वपूर्ण सामग्री भरी पड़ी है। इनकी भी रचना गुप्तकाल में और उसके बाद के समय में हुई है। इनसे तिथि के विषय में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती है।

अर्थशास्त्र – पुराणों के बाद हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र को रख सकते हैं। यह ग्रन्थ धार्मिक दृष्टिकोण से परे होकर नीतिशास्त्र पर बहुत अच्छी सामग्री प्रस्तुत करता है। अनुश्रुतियों के अनुसार इसके लेखक मौर्यवंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के महामन्त्री चाणक्य, कौटिल्य या विष्णुगुप्त थे। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इसकी रचना मौर्यकाल में ही हुई होगी, यद्यपि कुछ आधुनिक विद्यानों का विचार है कि इसमें मौर्योत्तरकालीन समाज एवं राजनीति की भी चर्चा है। इस ग्रन्थ में राजतन्त्र, प्रशासन, समाज और आर्थिक व्यवस्था से सम्बन्धित अनेक तत्त्वों का सुन्दर संकलन है। यूनानी राजदूत मेगास्थनीज द्वारा दिये गये विवरणों से काफी अंश में इनमें समानता है। इनमें शक नहीं कि मौर्य एवं मौर्योत्तर काल के लिए कौटिल्य का अर्थशास्त्र काफी महत्वपूर्ण है। इसका महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है कि यह सम्भवतः नीतिशास्त्र पर प्राचीनतम ग्रन्थ है।

विदेशी साहित्य एवं यात्रा-विवरण – सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के समय बहुत-सारे इतिहासकार और यात्री भारत आये। उनलोगों ने तत्कालीन व्यवस्था का अच्छा वर्णन किया है। उनके मूल लेख अभी उपलब्ध नहीं है। बाद के ग्रीक एवं लैटिन ग्रन्थों में उनका जिक्र मिलता है। इस कोटि में आरिस्टीहलत, निआर्कस चारस, यूमेनीरस आदि प्रमुख है। सिकन्दर के बाद भी यूनानी यात्रियों का भारत में आगमन जारी रहा। मेगास्थनीज, जो यूनानी शासक सेल्यूकस का राजदूत था, चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में पाटलिपुत्र आया था। उसने अपनी पुस्तक इंडिका में उस काल के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है। मेगास्थनीज के इंडिका और कौटिल्य के अर्थशास्त्र के विवरणों में खासकर पाटलिपुत्र का वर्णन और इसके प्रशासन के विषय में समानता देखने को मिलती है।

चीनी विवरण – ग्रीक और रोमन यात्रियों के विवरणों के अतिरिक्त चीनी यात्रियों के विवरण भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। इनके विवरण का महत्त्व इसलिए अधिक हो जाता है कि ये स्वयं भारत के विभिन्न भागों में बौद्ध ग्रन्थों की खोज में घूमे और उस समय की अवस्थाओं का विवरण दिया। चीनी लेखकों में सर्वप्रथम शुमाचीन का स्थान आता है। इसके लेखों में भारतीय इतिहास की झलक मिलती है। फाहियान जो गुप्तकाल में भारत आया था, उसके विवरण से तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक अवस्था पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। ह्वेनसांग (युवानच्चांग) सातवीं शताब्दी में भारत आया था और हर्षवर्द्धन के समय की अवस्था का जिक्र करता है। हालाँकि इन लेखकों के विवरणों में भी धार्मिक पक्षपात की भावना देखने को मिलती है, फिर भी उनके महत्त्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। चीनी यात्री इत्सिग और तिब्बती लामा तारानाथ के विवरण भी हमारी प्रचुर सहायता करते हैं।

अरबी एवं मुसलमानी विवरण – इस्लाम धर्म के उदय और प्रसार होने से बहुत से अरब और मुसलमान यात्री भी भारत आए और यहाँ की अवस्था का वर्णन अपने ग्रन्थों में किया। ऐसे लेखकों में अबिलादुरी, सुलेमान मिनहाजुद्दीन, अलम मसूदी आदि प्रसिद्ध हैं, परन्तु मुसलमान लेखकों में सबसे महत्त्वपूर्ण कृति अलबरुनी की तहकीके हिन्द है। महमूद गजनवी के भारत आक्रमण के समय की दशा का इसमें अच्छा वर्णन है। इन सभी विवरणों के आधार पर प्राचीन भारतीय इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

पुरातात्विक स्रोत

उत्खनन – पुरातात्विक सामग्री की कोटि में सबसे प्रमुख हैं-उत्खनन द्वारा प्राप्त वस्तुएँ। ये वस्तुएँ विभिन्न प्रकार की होती हैं, जैसे-प्राचीन भवनों के स्मारक, मृण् मूर्तियाँ, मिट्टी के बर्तन, मिट्टी के खिलौने, सिक्के, हथियार इत्यादि। ये किसी काल और जातियों द्वारा प्रयुक्त वस्तुओं की वास्तविक जानकारी देकर उस काल की सभ्यता एवं संस्कृति की जानकारी प्राप्त करने में सहायता देते हैं। आज हड़प्पा या सिंधुघाटी सभ्यता के विषय में हमारी जानकारी पूर्णत: पुरातात्विक सामग्री पर ही आधारित है। प्रागैतिहासिक काल, उसके पहले और बाद के काल के इतिहास के लिए भी उत्खननों द्वारा महत्त्वपूर्ण सामग्रियाँ प्रकाश में लायी गयी हैं और उनसे इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है।

अभिलेख – पुरातात्विक सामग्री की कोटि में दूसरा प्रमुख स्थान अभिलेखों का आता है। ये अभिलेख विभिन्न प्रकार के होते हैं, जैसे-गुफालेख, शिलालेख, स्तम्भलेख, ताम्रपत्र, मुहरों पर अभिलेख इत्यादि। ये विभिन्न विषयों पर प्रकाश डालते हैं। सबसे प्राचीन अभिलेख सिन्धु घाटी की मुहरों पर मिले हैं परन्तु इनको अभी तक ठीक ढंग से पढ़ा नहीं जा सका है। यद्यपि इस दिशा में निरन्तर प्रयास जारी है। ऐतिहासिक काल में सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण अशोक के अभिलेख हैं। इनमें उस काल की महत्त्वपूर्ण घटनाओं-कलिंगयुद्ध सम्राट की नीति में परिवर्तन, प्रशासनिक सुधार, आर्थिक व्यवस्था आदि के विवरण प्राप्त होते हैं। उत्तर मौर्यकालीन अभिलेखों में कलिंग के शासक खारवेल का हाथीगुफा अभिलेख, रुद्रदमन का जूनागढ़ अभिलेखों आदि प्रमुख हैं।

सिक्के – अभिलेख के बाद सिक्कों का स्थान आता है। वैसे तो सिक्के आर्थिक इतिहास की जानकारी के मुख्य साधन हैं, परन्तु इन पर उत्कीर्ण लेखों से प्रशासनिक बातों पर भी प्रकाश पड़ता है। तिथि निर्धारण में भी इनसे सहायता मिलती है।

प्राचीन स्मारक – इन पुरातात्विक सामग्रियों के अतिरिक्त प्राचीन भवन, मंदिर, गुफा, मूर्तियों आदि के अध्ययन से तत्कालीन इतिहास की जानकारी मिलती है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, तक्षशिला, कौशाम्बी आदि से प्राप्त भवनों के अवशेष उस समय की नगर-निर्माण योजना पर प्रकाश डालते हैं। गान्धार कला का ज्ञान तक्षशिला और उसके आसपास से प्राप्त मूर्तियों के आधार पर होता है। इसी प्रकार मथुरा की मूर्तियाँ भी मथुरा कला के विषय में जानकारी देती है। साँची, भरहुत, मथुरा के स्तूप तथा उनपर चित्रित मूर्तियों से बुद्ध के जीवन की झाँकी मिलती है। अजन्ता, एलोरा, एलीफैन्टा की गुफाएँ भी तत्कालीन कला एवं शिल्प का ज्ञान कराती हैं। विदेशों में भी भारतीय कला के अवशेष स्थित है जो भारत का उन देशों से घनिष्ठ सम्बन्ध बतलाते हैं जैसे-बामियान (अफगानिस्तान) की विशाल बुद्ध की प्रतिमा, कम्बोडिया के अंकोरवाट तथा जावा के बोरोबुदुर के मन्दिर एवं अन्य अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। मध्य एशिया और रोमन साम्राज्य हिस्सों से प्राप्त विभिन्न भारतीय मूल की वस्तुएँ, जैसे-पौम्पेई से प्राप्त लक्ष्मी की हाथीदाँत की मूर्ति तथा भारत में विदेशों की बनी वस्तुएँ, जैसे-रोमन शासकों के सिक्के, शराब रखने के बर्तन आदि को देखने से भारत का इन देशों के साथ सम्बन्ध पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।

इस प्रकार प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के अनेक साधन हैं। हरेक का अपना अलग महत्त्व है। जितना महत्त्व साहित्यिक सामग्री का है उतना ही महत्त्व पुरातात्विक सामग्री का भी है परन्तु तुलनात्मक दृष्टि से पुरातात्विक सामग्री ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। फिर भी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और बिना दोनों साधनों के उचित प्रयोग के प्राचीन भारतीय इतिहास की सही जानकारी नहीं हो सकती है।

प्रश्न 2.
हड़प्पा सभ्यता के नमर-निर्माण की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
हड़प्पा संस्कृति में कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जिनको सामने रखकर कुछ इतिहासकार अब यह मानने लगे हैं कि अवश्य ही यह सभ्यता, अन्य सभ्यताओं से श्रेष्ठ है और इसकी संसार को बड़ी देन हैं। निम्नलिखित क्षेत्रों में सिन्धु घाटी के लोगों की उन्नति उनकी श्रेष्ठ सभ्यता का स्पष्ट प्रमाण है-

1. श्रेष्ठतम तथा सनियोजित नगर (Best and well planned city) – हड़प्पा के नगरों की स्थापना ऐसे मनोवैज्ञानिक एवं सुनियोजित ढंग से की गई थी जिसका उदाहरण प्राचीन संसार में कहीं नहीं मिलता। आज की भाँति आवश्यकतानुसार सड़कें व गलियाँ छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की बनाई गई थीं। डॉ. मैके जैसे लोग भी इन नगरों की प्रशंसा किये बिना न रह सके। उनके कथनानुसार गलियाँ एवं बाजार इस प्रकार के बनाये गये थे कि वायु अपने आप ही उनको साफ कर दे।

2. श्रेष्ठतम, सनियोजित एवं सव्यवस्थित निकास व्यवस्था (Best and well planned drainage) – सफाई काँ जितना ध्यान यहाँ के लोग रखते थे, उतना शायद ही किसी दूसरे देश के लोग रखते हों। इतनी पक्की और छोटी-छोटी नालियाँ आजकल भी हमें आश्चर्य में डाले बिना नहीं रहती।

3. श्रेष्ठतम व निपण नागरिक प्रबंध (Bestand the most efficient civil organization) – नगर प्रबंध भी सर्वोत्तम ढंग का था। ऐसा संसार के किसी दूसरे प्राचीन देश में देखने में नहीं आता। स्थान-स्थान पर पीने के पानी का विशेष प्रबंध था। गलियों में प्रकाश का भी प्रबंध था। यात्रियों के लिए सराएँ और धर्मशालाएँ बनी हुई थीं और नगर की गंदगी को बाहर ले जाकर खाइयों में डलवा दिया जाता था। वे लोग आधुनिक युग की भाँति स्वास्थ्य के नियमों से अच्छी तरह परिचित थे। इसलिये तो उन्होंने बर्तन बनाने की भट्टी को भी नगर के अंदर नहीं बनने दिया था।

4. सन्दर और उपयोगी कला (Art both with beauty and utility) – यहाँ की कला में दो विशेष गुण थे, जो अन्य देशों की कला. में एक साथ देखने को कम मिलते हैं-(i) इस सभ्यता में बनावटीपन लेशमात्र को भी न था। इसके घरों अथवा भवनों का निर्माण लोगों की उपयोगिता या आराम को ध्यान में रखते हुए हुआ था। (ii) उपयोगिता के साथ-साथ मकानों में सुन्दरता भी थी। मेसोपोटामिया के मकान चाहे अधिक सुंदर व अच्छे हों, परंतु उनमें कृत्रिमता अधिक थी और वे इतने उपयोगी भी नहीं थे। उधर, मिस्र में भवन तो अनेक थे परंतु उनमें कला का अभाव है।

प्रश्न 3.
Who were the author of the Harappan culture ? Discuss the salient features of this culture.
(हड़प्पा संस्कृति के निर्माता कौन थे ? इस संस्कृति की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख करें।)
उत्तर:
एक लम्बी अवधि तक इतिहासकारों का मत था कि भारतवर्ष में सभ्यता का प्रारंभ आर्यों के आगमन के बाद हुआ और वैदिक सभ्यता को ही भारत की प्राचीनतम सभ्यता माना जाता था, किन्तु सिन्धु प्रान्त में स्थित हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से जो अवशेष प्राप्त हुए वे एक नयी सभ्यता पर प्रकाश डालते हैं। उत्खनन से वस्तुओं के अवशेषों से पता चलता है कि आर्यों के आगमन के पहले ही सिन्धुघाटी में एक उच्च कोटि की सभ्यता विकसित हो चुकी थी, जो मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता की समकालीन थी। इस सभ्यता के नगर योजना के अनुसार बनाये गये थे। यहाँ का समाज मातृसत्तात्मक था। लोग बहुदेववादी थे। कृषि, पशुपालन, व्यापार और उद्योग-धन्धे जीविका के प्रमुख साधन थे। सामान्यतः 1500 ई० पूर्व में बाढ़, अग्निकाण्ड और बाह्य आक्रमण के कारण इस सभ्यता का अंत हो गया।

सिन्धघाटी सभ्यता का क्षेत्र – सिन्धुघाटी सभ्यता का प्रसार-क्षेत्र आधुनिक खोजों के आधार पर काफी विस्तृत हो गया है। पश्चिमी पंजाब और सिन्ध में यह सभ्यता समान रूप से फैली हुई थी। इस सभ्यता का प्रभाव गंगा, यमुना, नर्मदा और ताप्ती नदियों की घाटियों तक था। उत्तर-पूर्व में रोपड़ तक इसका प्रभाव था। गंगा की घाटी में भी इस सभ्यता के अवशेष मिले हैं। पूर्व में काठियावाड़ से पश्चिम में मकरान तक यह सभ्यता फैली हुई थी। राजस्थान की कालीबंगा और गुजरात की लोथल नामक जगह एवं उसके आगे तक भी इस सभ्यता के अवशेष पाये गये हैं। इसके एक मुख्य केन्द्र हड़प्पा के नाम के आधार पर इसे ‘हड़प्पा की सभ्यता’ भी कहा जाता है।

सिन्धघाटी सभ्यता का समय – प्राचीन इतिहास में समय-निर्धारण एक जटिल प्रश्न है। सिन्धु घाटी सभ्यता के साथ भी यही बात है। इस सभ्यता की उत्पत्ति कब हुई, इस संबंध में विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किये हैं। सर जॉन मार्शल ने इस सभ्यता का काल 3250 ई० पू० से 2750 ई० तक माना है। कुछ अन्य लोगों का विचार है कि यह सभ्यता 2200 ई० पू० से 1500 ई० पू० तक फलती-फूलती रही। गार्डन चाइल्ड के अनुसार ई० पू० 3000 के आरम्भ में यह सभ्यता विकसित हुई होगी। कुछ लोग इसे मिन और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं का समकालीन मानते हैं, लेकिन अब तिथि-निर्धारण के नये तरीके निकाले गये हैं जिनके अनुसार इस सभ्यता का काल 2350 ई० पू० से 1750 ई० पू० तक माना जाता है।

सिन्धु सभ्यता के निर्माता – अब इस बात पर भी विचार कर लेना आवश्यक है कि इस सभ्यता के निर्माता कौन थे ? इस सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता वही आर्य थे जिन्होंने वैदिक सभ्यता का निर्माण किया था, परन्तु यह मत ठीक नहीं लगता, क्योंकि सिन्धु सभ्यता तथा वैदिक सभ्यता में इतना बड़ा अन्तर है कि एक ही लोग इन दोनों के निर्माता नहीं हो सकते। कुछ विद्वानों के विचार में सिन्धु सभ्यता के निर्माता सुमेरियन जाति के थे। एक विद्वान के विचार में सिन्धु सभ्यता के निर्माता वही असुर थे, जिनका वर्णन वेदों में मिलता है। डॉ. राखालदास बनर्जी के विचार में सिन्धु सभ्यता के निर्माता द्रविड़ लोग थे चूँकि दक्षिण भारत में द्रविड़ों के मिट्टी और पत्थर के बर्तन तथा उसके आभूषण सिन्धुघाटी के लोगों के बर्तनों तथा आभूषणों से मिलते-जुलते हैं, अतएव यह मत अधिक प्रतीत होता है, परन्तु खुदाई में जो हड्डियाँ मिली हैं, वे किसी एक जाति की नहीं हैं, वरन् वे विभिन्न जातियों की हैं। अतएव, कुछ विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता मिश्रित जाति के थे। यही मत सबसे अधिक ठीक लगता है।

सिन्धु सभ्यता का स्वरूप – यह सभ्यता प्रस्तर-धातुयुगीन सभ्यता थी, क्योंकि उत्खनन से दोनों के अवशेष मिले हैं। खुदाई में साम्राज्य, युद्ध और सैन्य संगठन संबंधी कोई वस्तु नहीं मिली है। अस्त्र-शस्त्र का सर्वथा अभाव है। यहाँ तक कि राजाओं के नाम भी नहीं मिलते हैं। इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह सभ्यता शातिमूलक थी। यह सभ्यता व्यापार-प्रधान और शहरी थी। लोग नागरिक जीवन व्यतीत करते थे और प्रत्येक वस्तु को उपयोगिता की दृष्टि से देखते थे। बड़े-बड़े नगरों की स्थापना की गयी थी और विदेशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किया गया था। विशाल भवन और स्नानागार उस समय के लोगों के सामूहिक जीवन के द्योतक हैं, अतएव कुछ लोगों का मत है कि यह सभ्यता लोकतंत्रात्मक थी, क्योंकि राजाओं के अस्तित्व का पता नहीं चलता है, परन्तु वहाँ के निवासियों की शांतिमूलकता एवं अपरिवर्तनवादी स्वभाव से इस बात का संकेत मिलता है कि धर्म का प्रभाव राजनीति पर भी था।

सिन्धु सभ्यता की विशेषताएँ-
(i) कांस्य सभ्यता – सिन्धु घाटी की सभ्यता को ‘ताम्रयुगीन सभ्यता’ कहते हैं, क्योंकि ताँबे के हथियारों एवं अन्य वस्तुओं की बहुतायत थी। पत्थर से भी अस्त्र-शस्त्र बनाये जाते थे। बाद में बहुत पैमाने पर काँसे के औजारों और अन्य वस्तुओं का निर्माण होने लगा। काँसे की प्रधानता रहने के कारण ही इस सभ्यता को कांस्यकालीन सभ्यता कहते हैं।

(ii) नागरिक सभ्यता – सिन्धु सभ्यता के निवासियों का आर्थिक जीवन औद्योगिक विशिष्टीकरण और स्थानीयकरण पर आधारित था। प्रत्येक व्यवसायी एक ही प्रकार का व्यवसाय करता था और समान व्यवसायवाले एक ही मुहल्ले में रहते थे। यह सभ्यता व्यापार प्रधान सभ्यता थी। बड़े-बड़े नगरों की स्थापना की गयी थी और विदेशों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किया गया था।

यह सभ्यता नागरिक भी थी, क्योंकि विशाल नगर, पक्के भवन, सुव्यवस्थित नालियाँ, सड़क एवं सार्वजनिक स्नानागार का निर्माण, सुदृढ़ शासन व्यवस्था-ये प्रमाणित करते हैं कि साधारण नागरिकों की सुख सुविधा पर भी ध्यान दिया जाता था। संभवतः समकालीन अन्य सभ्यताओं में नागरिकों की सुख-सुविधा पर इतना अधिक ध्यान कहीं नहीं दिया गया था।

(iii) जनतांत्रिक सभ्यता – उत्खनन से प्राप्त विशाल सभाभवन और स्नानागार सिन्धुवासियों के सामूहिक जीवन के प्रतीक हैं। सिन्धु प्रदेश में राजा, राजप्रासाद और शाही खजाने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। शासन के दो प्रधान केन्द्र थे-हड़प्पा और मोहनजोदड़ो। उत्तरी भाग का शासन हड़प्पा और दक्षिणी भाग का शासन मोहनजोदड़ो से संचालित होता है। इस प्रकार लोकतांत्रिक होते हुए भी शासन व्यवस्था नियंत्रित थी।

(iv) औद्योगिक सभ्यता – सिन्धु सभ्यता के निवासियों के आर्थिक जीवन का आधार व्यापार और उद्योग-धन्धा था। उनका व्यापार दूर-दूर देशों से होता था। अनेक प्रकार के उद्योग-धन्धों का भी विकास हुआ था। आर्थिक जीवन उद्योगीकरण और स्थानीकरण पर आधारित था। ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्धु-सभ्यता में श्रम-विभाजन और संगठन की भी व्यवस्था थी। एक व्यक्ति एक ही व्यवसाय करता था और एक प्रकार के व्यवसाय करने वाले लोग एक ही क्षेत्र में निवास करते थे।

(v) शांतिमूलक सभ्यता – सिन्धु सभ्यता के निवासी शांतिप्रिय थे। कवच ढाल, शिरस्त्राण आदि युद्ध में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों का अभाव है। उत्खनन से प्राप्त भाला, कुल्हाड़ी, धनुष-बाण उनकी सामाजिक प्रवृत्ति के द्योतक नहीं हैं। इन उपकरणों का प्रयोग आखेट युग में होता था।

प्रश्न 4.
सिन्धु घाटी सभ्यता की नगर योजना की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में जिन प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष मूरत इस समय उपलब्ध है उसे हम सिन्धुघाटी की सभ्यता कहते हैं सिन्धु हमारे देश की एक नदी का नाम है जो हिमालय पर्वत से निकलती ‘ है और पंजाब तथा सिन्धु के प्रदेश से होती हुई अरब सागर में मिलती है। घाटी उस प्रदेश को कहते हैं जो किसी नदी के दोनों ओर स्थित रहता है और उस नदी के पानी से सींचा जाता है। अतएव सिन्धु-घाटी का तात्पर्य उस प्रदेश से है जो सिन्धु नदी के दोनों ओर स्थित है। और सिन्धु नदी के जल से सींचा जाता है।

किसी प्रदेश की सभ्यता का यह तात्पर्य होता है कि वहाँ के लोगों का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक जीवन किस प्रकार का है अतएव सिन्धुघाटी की सभ्यता का यह तात्पर्य हुआ, कि सिन्धुघाटी सिन्धु नदी के दोनों किनारों के प्रदेश में निवास करने वालों की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक सांस्कृतिक तथा राजनीतिक दशा कैसी थी, चूँकि इस बात का अभी ठीक-ठीक निश्चय नहीं हो पाया है कि इस प्रदेश के निवासी कौन थे अतएव इसे किसी जाति-विशेष की सभ्यता न कह कर सिन्धुघाटी की सभ्यता के नाम से पुकारा गया है। कुछ विद्वानों ने इसे ‘हड़प्पा तथा मोहन जोदड़ों की सभ्यता के नाम से पुकारा गया है। हड़प्पा पश्चिमी पंजाब के मान्टगोमरी जिले में और मोहन जोदड़ो सिन्धु के लरकाना जिले में स्थित है। 1922 ई० में श्री रांखल दास बनर्जी की अध्यक्षता में इन दोनों स्थानों में खुदाइयाँ हुई हैं।

आगे इसी स्थान पर जान मार्शल के नेतृत्व में खुदाइयों में जो वस्तुएँ मिली हैं उनके अध्ययन से भारत की एक ऐसी सभ्यता का पता लगा है जो ईसा से लगभग चार हजार वर्ष पहले की है। अर्थात् वैदिक कालीन सभ्यता से भी कहीं अधिक पुरानी सिन्धु की घाटी के प्रदेश में तथा कुछ अन्य स्थानों में भी खुदाइयाँ हुई हैं जिनमें वही चीजें मिली हैं। जो हड़प्पा तथा मोहन जोदड़ो में मिली थी। इससे यह अनुमान लगाया गया है कि सिन्धुघाटी के सम्पूर्ण प्रदेश की सभ्यता एक सी थी। इसी से सिन्धुघाटी की सभ्यता को हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो की सभ्यता के नाम से भी पुकारा गया है। परन्तु अधिकांश विद्वानों ने इसे सिन्धु-घाटी की सभ्यता के नाम से ही सम्बोधित किया है। उपर्युक्त विवरण से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सिन्धु-घाटी की सभ्यता का तात्पर्य उन लोगों की सभ्यता से है जो सिन्धुघाटी नदी की घाटी में ईसा से लगभग चार हजार वर्ष पहले निवास करते थे अर्थात् उन लोगों का सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, संस्कृति तथा राजनीतिक जीवन किस प्रकार का था।

नगर-योजना : खुदाइयों से पता लगा है कि हड़प्पा तथा मोहन जोदडो दोनों ही विशाल नगर थे। इन नगरों का निर्माण एक निश्चित योजना के अनुसार किया गया था। नगरों की सड़कें उत्तर से दक्षिण को अथवा पूर्व से पश्चिम को एक दूसरे को सीधे समकोण पर काटती हुई जाती थीं। इस प्रकार नगर इन सड़कों द्वारा कई वर्गाकार अथवा आयताकार भागों में विभक्त हो जाता था। यह सड़कें बड़ी चौड़ी थीं। नगर की प्रमुख सड़कें तैंतीस फीट तक चौड़ी पाई गई है जिससे स्पष्ट है कि सड़कों पर एक साथ कई गाड़ियाँ आ जा सकती थीं। बड़ी-बड़ी सड़कों को मिलाने वाली गलियाँ कम से कम चौड़ी होती थी उनकी भी चौड़ाई चार फीट की पाई गई है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि यह सड़कें कच्ची है और इन्हें पक्की बनाने का प्रयत्न नहीं किया गया।

भवन-निर्माण : सड़कों के दोनों किनारों पर मकान होते थे जो पक्की ईटों के बने होते थे। यह ईटें लकड़ी से पकाई जाती थीं। अधिकांश मकान दो मंजिलों के होते थे परन्तु दीवारों की मोटाई से पता लगता है कि दो से भी अधिक मंजिलों के मकान बनते थे। नीचे के मंजिल से ऊपर की मंजिल में जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी होती थी। अधिकांश सीढ़ियाँ संकीर्ण मिली हैं, परन्तु कुछ काफी चौड़ी तथा सुविधाजनक सीढ़ियाँ भी मिली है। बड़े-बड़े मकानों के दरवाजे बड़े चौड़े होते थे। कुछ मकानों के दरवाजे तो इतने चौड़े मिले हैं कि उनमें रथ तथा बैलगाड़ियाँ भी आ जा सकती थी। कमरों में दीवारों के साथ आलमारियाँ भी लगी होती थीं। हड्डियों तथा शंख की बनी हुई कुछ ऐसी चीजें मिली है जिनसे पता लगता है, कि कमरों में खूटियाँ भी लगी होती थीं। दरवाजों तथा मकानों में खिड़कियों का पूरा प्रबन्ध रहता था जिससे हवा, प्रकाश की कमी न हो। इन दरवाजों तथा खिड़कियों की एक बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि यह सभी भीतर की दीवारों में बने होते थे। जो दीवारें सार्वजनिक सड़कों की ओर होती थीं उनमें दरवाजे तथा खिड़कियाँ नहीं होती थीं। मकान के बीच में एक आँगन होता था जिसके एक कोने में रसोईघर बना होता था। रसोईघर के चूल्हें ईटों के बने होते थे। प्रत्येक मकान में एक स्नानागार का होना आवश्यक था। इन स्नानागारों में मिट्टी के बर्तन में पानी रखा रहता था। इन स्नानागारों का फर्श पक्की ईटों का बना होता था और उसकी सफाई का बड़ा ध्यान रखा जाता था। बहुत से स्नानागारों के समीप शौचालय भी मिले हैं।

नालियों का प्रबन्ध : नगर के मैले जल को बाहर ले जाने के लिए नालियों का प्रबन्ध किया गया था। सब नालियाँ पक्की ईटों की बनी होती थीं। ईटों को जोड़ने के लिए मिट्टी मिले चूने का प्रयोग किया जाता था कुछ चौड़ी नालियाँ ईटों से और अधिक चौड़ी नालियाँ पत्थर के टुकड़ों से ढंकी जाती थी। ऊपर की मंजिल का गन्दा पानी नीचे लाने के लिए मिट्टी के पाइपों को प्रयोग किया जाता था।

कओं का प्रबन्ध : आसानी से जल प्राप्त करने के लिए सिन्धु-घाटी के लोगों ने कुआँ का प्रबन्ध किया था। खुदाई में ऐसे कुएँ मिले हैं जिनकी चौड़ाई दो फीट से सात फीट हैं। सार्वजनिक कुओं के अतिरिक्त जो जनता के लिए बने होते थे लोग अपने घरों में अपने व्यक्तिगत प्रयोग के लिए भी कुएँ बनवाते थे।

जलाशय तथा स्नानागार : मोहनजोदड़ो की खुदाई में एक बहुत बड़ा जलाशय भी मिला है। यह जलाशय 39 फीट लम्बा 33 फीट चौड़ा और 8 फीट गहरा है। यह पक्की ईटों का बना हुआ है और इसकी दीवारें बड़ी मजबूत हैं। इस जलाशय के चारों ओर एक बारादरी बनी है। जिसकी चौड़ाई 15 फीट है। जल-कुण्ड के दक्षिण-पश्चिम की ओर आठ स्नानागार बने हुए हैं। इस स्नानागारों के ऊपर कमरे बने थे जिनमें पुजारी लोग रहा करते थे। जलाशय के निकट एक कुआँ भी मिला है। सम्भवतः इसी कुएँ के पानी से जलाशय को भरा जाता था। जलाशय को भरने तथा खाली करने के लिए नल बने होते थे। जलाशय के निकट ही एक भवन मिला है जो सम्भवतः हम्माम था और जिसमें जल के गर्म करने का प्रबन्ध था।

नगर की सरक्षा का प्रबन्ध : अपने नगरों को शत्रुओं से सुरक्षित रहने के लिए यह लोग नगर रों आरे खाई तथा दीवार का भी प्रबन्ध करते थे। यह चहारदीवारी सम्भवतः दुर्ग का भी काम देती थी।

प्रश्न 5.
हड़प्पा सभ्यता के पतन के प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के पतन के मुख्य कारणों की चर्चा निम्नलिखित रूप से की जा सकती है-

  • बाढ – इस मत के अनुसार हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख नगर नदियों के ही किनारे थे। अतः बाढ़ द्वारा इनका पतन हुआ होगा। खुदाई में मिली बालू की मोटी परतें इस मत की पुष्टि करती है।
  • अग्निकांड-खुदाई में जली हुई मोटे स्तरों की प्राप्ति से कुछ विद्वान अग्निकांड से इस सभ्यता के पतन की बात करते हैं।
  • बाह्य (आर्य) आक्रमण – खुदाई से प्राप्त नरकंकालों, वेदों में दस्युओं दुर्गों के विनाश का वर्णन के आधार पर बाह्य आक्रमण द्वारा पतन के विचार को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
  • लगातार गेहूँ उत्पादन से भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी से भी इस सभ्यता के पतन के विचार को बल मिलता है।

इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन, नदियों द्वारा मार्ग बदलने, जलप्लावन के सिद्धान्त भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न 6.
सिन्धु घाटी सभ्यता के पतन के कारणों को बतावें।
उत्तर:
सिन्धु सभ्यता करीब 600 वर्षों तक चलती रही (2300-1750 ई० पू०)। 1700 ई० पू० के आस-पास इस सभ्यता का पतन प्रारंभ हुआ। इसके दो प्रमुख केन्द्र हड़प्पा और मोहनजोदड़ो इस समय तक नष्ट हो चुके थे। इन जगहों पर नगर-निर्माण की व्यवस्था ढीली पड़ चुकी थी, मकान बिना किसी योजना के बनाए जाने लगे। पुराने बड़े मकान खंडहर बन चुके थे। सड़कों एवं नालियों की व्यवस्था नष्ट हो चुकी थी। नए प्रकार के मृद्भांड व्यवहार में आने लगे थे। इनसे स्पष्ट हो जाता है कि यह सभ्यता अब पतन के मार्ग पर बढ़ चली थी। अन्य केन्द्रों पर यह सभ्यता पतनोन्मुख स्वरूप में कुछ और अधिक दिनों तक चली, परंतु इसकी प्राचीन गरिमा नष्ट हो चुकी थी।

कुछ विद्वानों की धारणा है कि आर्यों के आक्रमण या विदेशी आक्रमण ने इस सभ्यता को नष्ट कर दिया। मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों पर तेज हथियारों के घाव के निशान हैं, जो बाह्य आक्रमण की धारणा की पुष्टि करते हैं। परंतु ये आक्रमणकारी आर्य थे या अन्य कोई बर्बर जाति वाले, यह निश्चित करना कठिन है। इनके आक्रमण से शान्तिमय सिन्धु सभ्यता को क्षति तो पहुँची, लेकिन सिर्फ इसी के कारण यह सभ्यता नष्ट नहीं हुई। इस सभ्यता के विनाश के लिए अन्य आंतरिक एवं भौगोलिक कारण भी उत्तरदायी थे। आधुनिक अनुसंधानों से यह बात अब स्पष्ट होती जा रही है कि बाह्य आक्रमण के पूर्व ही आंतरिक कारणों से कुछ नगरों का पतन प्रारम्भ हो चुका था। इसके लिए बहुत अंश तक अग्नि को उत्तरदायी माना जाता है। 1700 ई० पू० के आस-पास उत्तरी बलूचिस्तान के अनेक स्थलों से भीषण अग्निकांड के प्रमाण मिलते हैं। संभवतः सिन्धुक्षेत्र में भी ऐसा अग्निकांड हुआ हो। दूसरी संभावना भीषण बाढ़ की है।

मोहनजोदड़ो की खुदाइयों में बाढ़ द्वारा लाई गई बलुही मिट्टी की परतें मिली हैं। चूँकि इस समय के नगर नदियों के निकट बसे हुए थे, इसलिए बाढ़ से उनके नष्ट होने की संभावना है। कुछ विद्वानों का विचार है कि किसी बड़ी महामारी (प्लेग या मलेरिया) के प्रकोप से भी बहुत अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हो गई और इससे सभ्यता को आघात पहुँचा। इनके अतिरिक्त, नदियों की धारा में परिवर्तन, उनके नगरों से दूर हट जाने के कारण आर्थिक व्यवस्था को क्षति पहुँची होगी। इसी प्रकार राजपूताना रेगिस्तान के बढ़ते प्रभाव ने सिन्धघाटी की उर्वरा-शक्ति को कम कर दिया. जिसके कारण कषि एवं आर्थिक आधार को गहरा धक्का लगा। ऐसा भी अनुमान है कि मोहनजोदड़ो के पास हुए विवर्तनिक हलचलों (Tectonic disturbances) ने जल का स्तर काफी ऊँचा उठा दिया एवं समस्त सिन्धु प्रदेश जलाप्लावित हो गयी।

इन भौगोलिक कारणों के अतिरिक्त आर्थिक कारण भी इस सभ्यता के पतन के लिए जिम्मेदार थे। सिन्धु सभ्यता का जिन देशों के साथ व्यापारिक संबंध था, वहाँ की राजनीतिक स्थिति 17वीं-16वीं शताब्दी ई. पू. में अस्थिर थीं। ऐसी स्थिति में व्यापार को धक्का लगा, जिसने सिन्धु सभ्यता के आर्थिक आधार को कमजोर कर दिया। जनसंख्या में वृद्धि, प्राकृतिक साधनों में कमी तथा आर्थिक अस्थिरता भी इस सभ्यता के पतन के लिए उत्तरदायी थीं। कुछ विद्वानों का विचार है कि हड़प्पा संस्कृति के मूलभूत तत्त्वों में परिवर्तन, इस सभ्यता का बर्बर स्वरूप हो जाना, इसके पतन का एक प्रमुख कारण था। इन अनेक कारणों ने सिन्धु सभ्यता को नष्ट कर दिया; परंतु यह सभ्यता विलुप्त नहीं हो गई।

प्रश्न 7.
गणतंत्र और वर्ण में संबंध स्थापित करें।
उत्तर:
प्राचीन भारत में सैद्धांतिक रूप से राजतंत्र और वर्ण में गहरा संबंध था। अर्थशास्त्र पर धर्मसूत्रों में इस बात पर बल दिया गया है कि राजा को क्षत्रिय वर्ण का होना चाहिए। शास्त्रों में वर्णित यह व्यवस्था सदैव कारगर नहीं होती थी। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ क्षत्रियों को राज्य करते हुए दिखलाया गया है। उदाहरण के लिए नंदवंशी शूद्र थे, मौर्यों को शूद्र, क्षत्रिय अथवा निम्न कुलोत्पन्न माना गया है। शुंग, सातवाहन ब्राह्मण थे। भारत आने वाले मध्य एशियाई राजाओं को यवन या मलेच्छ माना गया है। अनेक विद्वान गुप्त शासकों को यवन मानते हैं। इस प्रकार सैद्धांतिक रूप से क्षत्रिय को ही आदर्श राजा के रूप में मान्यता थी। परंतु व्यावहारिक रूप से किसी भी वर्ग का व्यक्ति शक्ति संसाधन सम्पन्न होकर राजा बन जा सकता है।

प्रश्न 8.
वैदिक काल से आप क्या समझते हैं ? उस काल की सभ्यता का वर्णन करें।
अथवा, वैदिक काल के सामाजिक, आर्थिक. धार्मिक और राजनीतिक जीवन का वर्णन करें
अथवा, वैदिक काल के समाज और धर्म पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
वेद आर्यों के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें ऋग्वेद सबसे प्राचीन है। आर्यों की सभ्यता की पूर्ण जानकारी उनके वेदों से होती है। उस काल में आर्यों के प्रचलित सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन बहुत ही उन्नत अवस्था में थे। आर्यों के उस काल के इतिहास को वैदिककाल कहा जाता है। उनके उन्नत जीवन का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है-

सामाजिक जीवन – आर्यों का सामाजिक संगठन मुख्यतः वर्ण व्यवस्था पर आधारित था। वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति श्रम विभाजन के आधार पर हुई। पर उस समय मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक कार्यों के लिए ब्राह्मण, युद्ध और राजनीतिक कार्यों के लिए क्षत्रिय; आर्थिक कार्यों के लिए वैश्य और समाजसेवा के लिए शूद्र थे। एक वर्ण से दूसरे वर्ण में परिवर्तित होना संभव था। वंश परंपरा से इसका कोई संबंध नहीं था। इसमें पारस्परिक खान-पान, आदान-प्रदान और शादी-विवाह आदि होता रहता था। इसमें धीरे-धीरे जटिलता आने लगी। इससे सामाजिक विकास में बाधाएँ उत्पन्न होने लगीं।

सखी पारिवारिक जीवन – आर्यों के सामाजिक संगठन का आधार परिवार था। परिवार का स्वामी परिवार का सबसे वृद्ध पुरुष होता था। उसे गृहपति कहा जाता था। परिवार के सभी सदस्यों को गृहपति की आज्ञा माननी पड़ती थी। वह भी अपने परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता थी। बच्चों के ऊपर पिता का कठोर नियंत्रण रहता था। उस समय संयुक्त परिवार की प्रथा प्रचलित थी।

समाज में नारी का स्थान – आर्यों के सामाजिक जीवन में नारियों को उच्च स्थान प्राप्त था। वे अपने पति के साथ धार्मिक कार्यों में भाग लेती थीं। उन्हें उच्चतम शिक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता थी। घोषा, लोपामुद्रा, विश्ववारा अपाला आदि महिलाओं की गणना ऋषियों के रूप में होती थी। पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा आदि कुप्रथाओं का प्रचलन नहीं था। विवाह एक पवित्र बंधन समझा जाता था। विवाह के समय देवताओं को साक्षी करके वर-कन्या दोनों जीवनभर के साथी बनने को परस्पर प्रतिज्ञा करते थे। इस तरह पारिवारिक जीवन सखमय था। समाज में स्त्रियों को उच्च स्थान प्राप्त था। समाज में तलाक की प्रथा प्रचलित नहीं थी।

भोजन और वस्त्र – आर्य शाकाहारी और मांसाहारी दोनों थे। उनका आहार दूध, घी, फल, मक्खन जैसे पौष्टिक पदार्थ थे। गेहूँ और जौ की रोटी तथा शाकभाजी को वे लोग दैनिक भोजन में प्रयोग करते थे। वे मांस खाते थे तथा सोम और सुरा उनके पेय पदार्थ थे।

वे लोग ऊनी, सूती और रेशमी तीनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। वे लोग भड़कीले वस्त्रों का प्रयोग करते थे। धनी लोगों के वस्त्र सोने के तारों से बढ़े होते थे। आभूषणों का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों करते थे।

आर्थिक जीवन : आर्यों के आर्थिक जीवन निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित थे-
कृषि – आर्यों का आर्थिक जीवन कृषि पर आधारित था। खेती की सभी प्रक्रियाएँ जुताई, बुआई, सिंचाई और कटाई जानते थे। इस समय की प्रमुख उपज गेहूँ और जौ थी। वे लोग हल और बैलों की सहायता से खेती करते थे। भूमि को उर्वरक बनाने के लिए खाद और सिंचाई का भी प्रयोग करते थे।

पशपालन – कृषि के साथ पशुपालन उनका महत्त्वपूर्ण रोजगार था। वे लोग गाय को गोधन कहते थे और उनका विशेष महत्त्व रखते थे। वे गाय, बैल, घोड़े, गधे, खच्चर, भेड़, बकरियाँ आदि पशु पालते थे। वे जंगली पशुओं, जैसे–हाथी, सूअर, बारहसिंगा आदि का शिकार भी करते थे।

व्यवसाय – आर्य लोग व्यापारियों को ‘पणि’ कहते थे। उनका समाज में एक वर्ग होता था। जल-थल दोनों मार्गों से वे व्यापार करते थे। इस काल में इसका प्रचलन कम था और गाय विनिमय का माध्यम थी। धीरे-धीरे लोग ‘निष्क’ नामक स्वर्ण के आभूषणों को विनिमय के लिए व्यवहत करने लगे। व्यापारिक संबंध ईरान और बेबीलोनिया से था। भारत से ही पश्चिम एशिया वालों ने कपास की खेती करना सीखा था।

गृह उद्योग – आर्य लोग रथ, हल, गाड़ियाँ आदि बनाते थे। औद्योगिक कलाकारों में बढ़ई का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान था। धातुओं की वस्तुओं का विशेष प्रचलन होने के कारण लोहार और सोनार को भी सम्मानित स्थान प्राप्त था। वस्त्र बुनने के लिए जुलाहे और बुने हुए वस्त्र को रँगने के लिए रंगरेज भी थे। स्त्रियाँ चटाई आदि बुना करती थीं। चमार चमड़े की वस्तुएँ तैयार करता था।

धार्मिक जीवन – आर्यों के धार्मिक जीवन में निम्नलिखित बातों का प्रचलन था-
बहुदेववाद की प्रथा – आर्य अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे। ऋग्वेद में 33 कोटि देवताओं का उल्लेख है। सौरमण्डल में सूर्य उनके सबसे मूर्तिमान देवता थे। उनकी उपासना वे कई रूपों में करते थे। इनके अतिरिक्त वृष्टि के देवता इन्द्र, न्याय के देवता वरुण और अग्नि देवता का विशेष महत्त्व था।

यज्ञ की प्रधानता – आर्यों के जीवन में यज्ञ की प्रधानता थी। वे वर्षा होने और महामारी रोकने के लिए यज्ञ करते थे। वास्तव में उनका जीवन यज्ञमय था। यज्ञ की व्यापकता के कारण उस समय के भारतीय समाज में पुरोहितों और ब्राह्मणों का महत्त्व अधिक बढ़ गया था। यज्ञों की विधियों को निर्धारित करने के लिए जो ग्रन्थ बने, उनका नाम ही उनकी जाति के नाम पर ब्राह्मण पड़ा।

नैतिकता पर जोर – वैदिक आर्यों के धार्मिक विचारों पर नैतिकता की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है। उनके देवता वरुण नैतिक व्यवस्था द्वारा संसार को चलाते थे। वरुण की प्रशंसा में अनेक ग्रंथ लिखे गये। वरुण प्रत्येक व्यक्ति के पाप-पुण्य को देखते थे और अपराधियों को दण्ड देते थे। परंतु उनमें क्षमाशीलता भी बहुत थी। वे शुद्ध हृदय से प्रार्थना करने पर अपराधों को शीघ्र ही माफ कर देते थे ऐसा विश्वास लोगों का था।

राजनैतिक जीवन : राजतंत्र – उस समय शासन व्यवस्था राजतांत्रिक थी। परंतु एक तरह से सीमित राजतंत्र की प्रथा थी। उस पर धर्म का नियंत्रण रहता था। युद्ध के समय राजा नेतृत्व के कार्य और शांति के समय न्याय संबंधी कार्य करता था।

नियंत्रण समिति – उस समय राजा की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए सभा और समिति नामक संस्था थी। इसके सदस्य अविभाजित वर्ग के लोग होते थे। ‘सभा’ और ‘समिति’ के वास्तविक स्वरूप के विषय में विद्वानों की धारणाएँ भिन्न-भिन्न हैं, क्योंकि ऋग्वेद में कहीं भी सभा और समिति का निरूपण नहीं किया गया है।

राज कर्मचारी – शासन कार्य में राजा को सहायता प्रदान करने के लिए अनेक राजकर्मचारी होते थे। राजकर्मचारियों में ‘पुरोहित’ ‘सेनानी’ और ‘ग्रामणी’ प्रमुख होते थे। पुरोहितों को शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। वह राजा के धार्मिक कर्त्तव्यों का पालन करता था और अपनी बहुमूल्य सम्पत्तियों द्वारा उसकी सहायता करता था। सेनानी सेना का प्रधान अधिकारी होता था। इसे राजा स्वयं चुनता था। इनके अतिरिक्त राजकर्मचारी होते थे।

सेना – उस समय तक स्थायी सेना की आवश्यकता का अनुभव नहीं हो पाया था। सेना का नेतृत्व स्वयं राजा करता था। राजा के बाद सेनानी का स्थान था। पैदल और रथ, सेना के मुख्य अंग थे। भाला, धनुष, तलवार और कुल्हाड़ी उस समय के मुख्य शस्त्र थे। युद्ध के लिए सेना के प्रयाण करते समय दुन्दुभि बजाई जाती थी। सेना की व्यवस्था मुख्य रूप से युद्ध के समय की जाती थी।

न्याय व्यवस्था – वैदिक आर्यों की न्याय-व्यवस्था सरल थी। राजा न्याय का सर्वोच्च अधिकारी था। दण्ड-विधान सरल था। मृत्यु-दण्ड अज्ञात था और हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए भी मृत्यु दण्ड नहीं दिया जाता था।

प्रश्न 9.
वैदिककालीन के दर्शन, साहित्य, विज्ञान और कला का वर्णन कीजिए। भारत में आर्य सभ्यता की क्या देन है ?
उत्तर:
पूर्व और उत्तर वैदिक काल के जीवन में बहुत अंतर हो गया। उत्तर वैदिककाल में धार्मिक सरलता समाप्त हो गई और धर्म का रूप यांत्रिक हो गया। इसी तरह जीवन के अनेक क्षेत्रों में पूर्व वैदिककाल की अपेक्षा उत्तर वैदिककाल में काफी परिवर्तन आया। इनका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है-

षड्दर्शन – पूर्व वैदिक काल की अपेक्षा उत्तर वैदिक काल में भारतीय दर्शन का काफी विकास हुआ। इस काल में अनेक ऐसे दार्शनिक हुए जिन्होंने प्रकृति और परमात्मा संबंधी रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया। फलतः दो प्रकार के दर्शनों का विकास हुआ – (i) आस्तिक दर्शन, जो वेदों को स्वीकार करता है और (ii) नास्तिक दर्शन, जो वेदों में विश्वास नहीं करता है। न्याय, सांख्य, योग, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत आस्तिक दर्शन के छः रूप हैं।

साहित्य और विज्ञान – पूर्व वैदिक काल की अपेक्षा उत्तर वैदिक काल में मूल्यवान ग्रंथों की रचना की गई। इसी युग में अन्य तीन वेदों-सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद नामक तीन वेदों की रचना हुई तथा श्रुति, स्मृति, ब्राह्मणग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद, वेदांग, उपवेद, सूत्र आदि लिखे गये। विज्ञान के क्षेत्र में भी उत्तर वैदिक काल में आर्यों ने गणित, खगोल विद्या, ज्यामिति, ज्योतिषशास्त्र, शरीर विज्ञान इत्यादि के क्षेत्र में काफी प्रगति की। वैदिक साहित्य का काफी महत्त्व है। वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ हैं। इससे स्पष्ट है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति विश्व में सबसे अधिक प्राचीन है। वैदिक साहित्य आर्यों के शारीरिक शक्ति, मानसिक प्रतिभा और आध्यात्मिक चिंतन का द्योतक है। हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांत वैदिक ग्रंथों में ही वर्णित है।

कला – वैदिक काल में लेखनकला का विकास नहीं हो पाया था। अतः शिक्षा का स्वरूप मौखिक था। पाँच वर्ष की आयु में उपनयन-संस्कार के बाद बच्चे गुरुकुल भेज दिए जाते थे। वहाँ वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्याध्ययन करते थे। वे गुरु की सेवा करते थे और भिक्षाटन कर पेट भरते थे। उन्हें वेद, उपनिषद्, इतिहास, पुराण, व्याकरण, दर्शन, गणित, नक्षत्रविज्ञान, धनुर्विद्या, अस्त्र संचालन इत्यादि की शिक्षा दी जाती थी। चरित्र-निर्माण पर उस समय अधिक जोर दिया जाता था।

भारत में आर्य सभ्यता की देन – आर्यों ने उच्चकोटि की सभ्यता और संस्कृति का निर्माण किया, जो भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति की रीढ़ है। वैदिक सभ्यता ग्रामीण और कृषि प्रधान थी। वैदिक ग्रंथों में जिन आदर्शों और सिद्धांतों का निरूपण किया गया है, वे भारतीय जीवन के पथ-प्रदर्शक हैं। संस्कृति की हजारों वर्षों की अविच्छिन्न परम्परा का बीजारोपण ऋग्वैदिक काल में ही हुआ। इस युग में ऋग्वैदिक काल में ही हुआ। उन्होंने वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और वेदांगों की रचना की। मानव इतिहास में उनका महत्वपूर्ण स्थान है।

इस तरह आर्यों ने जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में प्रगति की। हिन्दू-धर्म के सभी आधारभूत ग्रंथों की रचना उसी काल में हुई। आज भी वे हमारे सर्वांगीण विकास के आधार हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि आधुनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वैदिक सभ्यता की अमिट छाप है।

मैक्समूलर ने ठीक ही कहा है-“वे दार्शनिक रचनाएँ विश्व साहित्य में अमर रहेंगी और मस्तिष्क की अत्यन्त आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ कही जाएँगी।” आर्यों की मनुस्मृति आज भी हिन्दू कानून की आधारशिला है। वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, पारिवारिक परम्परा, विवाह पद्धति, अध्यात्मवाद, एकेश्वरवाद आदि आर्यों की महत्वपूर्ण देन हैं जो हमारे समाज में प्रचलित है। वास्तव में हम आर्य हैं और हमारी रग-रग में उसकी अमिट छाप है।

प्रश्न 10.
उत्तरवैदिक काल के लोगों की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा आर्थिक स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर:
सामाजिक स्थिति-उत्तर वैदिक काल के लोगों के सामाजिक जीवन में स्थिरता आयी। उनका जीवन अपेक्षाकृत जटिल हो गया। इस काल में समाज में 4 वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र का विकास हुआ। वर्गों का निर्धारण वंश के आधार पर होने लगा। प्रत्येक वर्गों के लिए अलग-अलग नियम बनाये गये। श्रम का विभाजन हो गया। जिसके कारण पेशेवर जातियाँ बनती गई। ब्राह्मणों का स्थान सर्वश्रेष्ठ हो गया। शूद्रों को हेय की दृष्टि से देखा जाने लगा। वैश्य तथा शूद्रों का शोषण होने लगा। केवल ब्राह्मण तथा क्षत्रिय को विशेषाधिकार दिये गये। जाति-प्रथा के बंधन कठोर होते गये। धीरे-धीरे कई जातियाँ बन गई। छुआछूत की प्रथा का विकास हुआ। दास वर्ग की उत्पत्ति हुई।

इस काल में वर्णाश्रम व्यवस्था की उत्पत्ति हुई। इसके अनुसार मनुष्य को 4 भागों में बाँट दिया गया। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम। मनुष्य के जीवन को 100 वर्षों का मानकर प्रथम 25 वर्ष ब्रह्मचर्य के रूप में बिताना था जिसमें मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन कर विद्याध्ययन करता था। द्वितीय 25 वर्ष में लोग अपना घर बसाकर संतानोत्पत्ति, यज्ञ, दान आदि करता था। तीसरे 25 वर्ष में तपस्या में लीन रहता था तथा अंतिम के 25 वर्ष विरक्ति का जीवन व्यतीत करता था।

उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की दशा में गिरावट आयी, बहुविवाह की प्रथा बढ़ गई। इस कारण उसका जीवन कलहपूर्ण हो गया। स्त्रियों के कई अधिकार छीन लिये गये। उन्हें केवल भोग-विलास की चीज समझी जाने लगी। पुत्री का जन्म अशुभ माना जाने लगा। कन्याओं का क्रय-विक्रय भी होने लगा। वेश्यावृति का भी प्रचलन हुआ फिर भी उसकी स्थिति संतोषजनक थी। माता, बहन, पत्नी आदि के रूपों में स्त्रियों का परिवार में सम्मान था। नारी शिक्षा पूर्ववत् लोकप्रिय रही। नृत्य एवं संगीत में वे निपुण होती थी तथा वाद-विवादों और शस्त्रार्थों में भाग लिया करती थी।

इस काल में भी लोग पहले की तरह दूध, घी, फल, सब्जी, दाल आदि का प्रयोग करते थे। धनी लोग गेहूँ तथा गरीब लोग बाजरे की रोटी का प्रयोग करते थे। सोमरस का प्रयोग भी किया जाता था यद्यपि मदिरा पान अच्छा नहीं समझा जाता था फिर भी लोग इसका प्रयोग करते थे।

वेश-भूषा में उनका स्तर ऊँचा उठा। इस समय लोग रेशमी तथा केशर से रंगे वस्त्रों का प्रयोग करने लगे। सिर पर पगड़ी पहनने की प्रथा शुरू हुई। स्त्रियाँ किनारेदार साड़ियाँ पहनने लगी तथा नये-नये सुंदर और सुडौल आभूषणों का प्रयोग करने लगी। सौन्दर्य निखार के लिए आँखों में काजल, विभिन्न तरह के सुगंधित तेलों का व्यवहार करने लगे। मनोरंजन के लिए नाटक का प्रचलन शुरू हुआ। इसके अलावे कुश्ती, तलवारबाजी, संगीत, नृत्य, चौपड़, धूत-क्रीड़ा का अधिक प्रचार हो गया था।

राजनीतिक स्थिति – उत्तर वैदिक काल में लोगों की राजनीतिक स्थिति में पहले से काफी परिवर्तन हुए। इस. काल में बड़े एवं शक्तिशाली राज्यों की स्थापना हुई जिनमें प्रभुत्व हेतु आपसी संघर्ष शुरू हुए। यह प्राचीन भारत के साम्राज्यवाद का प्रथम युग था। वे अपना प्रभाव और कीर्ति बढ़ाने के लिए राजसूय तथा अश्वमेघ यज्ञ किया करते थे। इस युग में सामंतवादी प्रवृतियों का भी विकास होने लगा। एक तरफ राजतंत्र तो दूसरी तरफ प्रजातांत्रिक भावनाएँ विकसित हो रही थी।

इस काल में राजा की शक्ति में काफी वृद्धि हुई। वह राजा, सार्वभौम, सम्राट, अधिराज आदि उपाधियाँ ग्रहण करने लगा। वह अपनी इच्छानुसार शासन करता था लेकिन उसपर पुरोहित का नियंत्रण रहता था। यह धर्म के नियमों का पालन करता था। उसका प्रमुख कर्त्तव्य राज्य के नियमों तथा ब्राह्मणों की रक्षा करना था। धर्म विरुद्ध काम करने पर उसे गद्दी से उतार दिया जाता था। उस समय राजा न्यायकर्ता, सेनापति तथा प्रजापालक सभी कुछ होता था। शासन संबंधी मामलों में परामर्श हेतु पूर्व वैदिक काल की तरह सभा और समिति नामक दो संस्थाएँ थी, यद्यपि उसका महत्त्व कम गया था। इस प्रकार राजा निरंकुश नहीं होता था।

उस समय बड़े-बड़े राज्य स्थापित होने के कारण राजपदाधिकारियों की संख्या तथा अधिकारों में काफी वृद्धि हुई। शासन प्रणाली लगभग स्थिर हो गई थी। ऊँचे अधिकारियों की ‘रलिन’ कहा जाता था इनमें प्रमुख थे–मंत्री (पुरोहित), संग्रहात्री (कोषाध्यक्ष), ग्रामिणी (न्यायालय का सभापति), सेनानी (सेनापति), सूत (सारथी) आदि। साधारण अधिकारियों में पालपति (सौ गाँवों का अफसर) स्थपति (सीमांत शासक) आदि थे। ‘उग्र’ एवं ‘जीवग्रह’ नामक पुलिस अधिकारी भी होते थे।

न्याय के क्षेत्र में राजा सर्वोच्च पदाधिकारी था। छोटे-छोटे मामलों की सुनवाई अधीनस्थ के अधिकारी करते थे। जटिल मामलों का निर्णय राजा करता था जो अंतिम एवं सर्वमान्य होता था। राजद्रोह के लिए प्राणदंड की व्यवस्था थी। ब्राह्मणों को प्राणदंड नहीं दिया जाता था।

धार्मिक स्थिति – उत्तर वैदिक काल में धर्म के मूल रूप में परिवर्तन आया। धार्मिक जीवन जटिल हो गया। इन्द्र तथा वरुण देवता का महत्त्व कम हो गया तथा विष्णु और रुद्र का महत्त्व बढ़ गया। धर्म का रूप याज्ञिक हो गया। यज्ञों की संख्या में वृद्धि हुई जिनमें राजसुय यज्ञ तथा अश्वमेघ यज्ञ प्रसिद्ध थे। यज्ञ इतने खर्चीले बना दिये गये कि वह साधारण व्यक्ति के सामर्थ से परे की चीज हो गई। ब्राह्मणों ने संसार से मुक्ति हेतु यज्ञ आवश्यक करार दिया था। अतः यज्ञ सबों के लिए आवश्यक था।

धर्म के क्षेत्र में ब्राह्मणों का महत्त्व काफी बढ़ गया उन्हें भू-सूर, भू-दइव आदि नामों से पुकारा जाने लगा। उनके बिना यज्ञ संभव नहीं था। यज्ञों में पशुबलि भी प्रारंभ हुआ। ऐसा समझा जाता था कि पशुबलि से पूर्वज तथा देवता दोनों खुश होते हैं। धर्म में बाह्याडम्बरों तथा अंधविश्वास लगा कि यज्ञों तथा मंत्रों से न केवल देवताओं को वश में किया जा सकता है, बल्कि उन्हें समाप्त भी किया जा सकता है। तप का महत्त्व काफी बढ़ गया। तप को ब्रह्म स्वीकारा गया। ऐसा समझा जाता था कि तप के बिना ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता है।

इसी काल में लोगों ने अपनी समस्याओं के लिए गहन मनन करना शुरू किया। फलतः आरण्यकों, उपनिषदों, दर्शनशास्त्रों की रचना हुई। पुनर्जन्म के सिद्धांत का अनुमोदन इसी काल में किया गया।

आर्थिक स्थिति-उत्तर वैदिक काल में आर्यों का आर्थिक संगठन और सुव्यवस्थित हुआ ‘ तथा आर्थिक जीवन अधिक समुन्नत हुआ। कृषि, व्यापार, उद्योग-धंधे आदि सभी क्षेत्रों में प्रगति हुई।

कृषि में उस समय बड़े-बड़े हलों का प्रयोग किया जाने लगा। खाद, सिंचाई तथा फसल बोने में अदला-बदली द्वारा पैदावार बढ़ाने का प्रयास किया गया। तरह-तरह की दलहन, कपास तथा सिंचाई के प्रबंध से जमीन उपजाऊ हुई तथा एक साल में तीन फसलें पैदाकर उत्पादन में वृद्धि की गई।

कृषि के अतिरिक्त पशुपालन भी किया जाता था। किसानों के पास गाय, बैल, भेड़, बकरी आदि काफी संख्या में रहते थे। गाय को श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता था। पशुओं के लिए चारागाह होते थे। दूध, घी की कमी नहीं थी। लोग हाथी भी पालने लगे थे।

उस समय उद्योग – धंधों का भी काफी विकास हुआ था। धातु संबंधी ज्ञान की वृद्धि हुई। अतः नये-नये पेशों का उदय हुआ, जैसे-जौहरी, नट, गायक, वैद्य, ज्योतिषी, धोबी, सुनार, जुलाहे आदि। स्त्रियाँ चटाई, टोकरी आदि बनाने तथा कपड़े सीने का काम करती थी। शीशे का प्रयोग बटखरे के रूप में होने लगा। चरखों तथा करघों का प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगा।

इस काल में वाणिज्य व्यापार में काफी वृद्धि हुई। व्यापारियों का अलग आनुवंशिक वर्ग बन प्रथा भली-भाँति शुरू हो गयी। जल तथा स्थल मार्गों से विदेशों से व्यापारिक संपर्क बढ़ा। वस्त्र, कम्बल, बकरी की खाल आदि मुख्य व्यापारिक वस्तुयें थी। निष्क, शतमान तथा कृष्णत नामक सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ। व्यावसायिक संघों की स्थापना हुई।

प्रश्न 11.
वैदिक धर्म की प्रमख विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
वैदिक साहित्य विशेषकर चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद जिस संस्कृत भाषा में लिखे (या रचे) गए थे वह वैदिक संस्कृति कहलाती है। यह संस्कृत उस संस्कृत से कुछ कठिन एवं भिन्न थी जिसका प्रयोग हम आजकल करते हैं। वस्तुत: वेदों को ईश्वरीय ज्ञान के तुल्य माना जाता था तथा यह शुरू में मौखिक रूप में ही ब्राह्मण परिवारों से जुड़े लोगों तथा कुछ अन्य विशिष्ट परिवारजनों को ही पढ़ाया-सुनाया जाता था। महाकाव्य काल में रामायण तथा महाभारत की रचना के लिए जिन संस्कृत का प्रयोग किया गया वह वैदिक संस्कृत से अधिक सरल थी। इसलिए, वह संस्कृत और अधिक लोगों में लोकप्रिय हुई थी।

आर्यों ने सूर्य, अग्नि, वायु, जल आदि प्राकृतिक शक्तियों को अपने मन में उन्हें दैहिक (शरीर) रूप में उच्च प्राणियों के रूप में माना। उनमें मानव एवं अच्छे (लाभदायक) अणुओं के गुण आरोपित किये। ऋग्वेद में सबसे प्रतापी देवता इन्द्र को माना गया। उसे वर्षा और युद्ध के देवताओं के रूप में माना जाता था। दूसरा देवता अग्नि को माना गया। अग्नि और मानव और देवताओं का मध्यस्थ माना गया। अग्नि में दी गई आहुतियाँ धुंआ बनकर आकाश में जाकर देवताओं तक पहुँच जाती हैं, ऐसी आर्यों की मान्यता थी। तीसरा देवता वरुण है, जो जल और समुद्र का देवता है। उसे प्राकृतिक संतुलन के रूप में माना जाता है।

इसी प्रकार सोम, मारुन, अदिति, ऊषा आदि अन्य देवी-देवता हैं। देवियों की संख्या देवताओं से कम है। उपासना विधि है-स्तुति, पात, यथाहुति, समवेत स्वरों में गान आदि।

Bihar Board 12th Geography Objective Important Questions Part 7

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Bihar Board 12th Geography Objective Important Questions Part 7

प्रश्न 1.
लोगों के परिवर्धन की प्रक्रिया और जनकल्याण के स्तर को ऊँचा उठाना क्या कहलाता है ?
(a) मानव विकास
(b) राजनीतिक विकास
(c) सांस्कृतिक विकास
(d) आर्थिक विकास
उत्तर:
(a) मानव विकास

प्रश्न 2.
पर्यावरण विश्लेषण के लिए किस सूत्र का प्रयोग किया जाता है ?
(a) I = PAT
(b) I = PET
(c) P = IAT
(d) T = IPA
उत्तर:
(a) I = PAT

प्रश्न 3.
मानव विकास का मापन किस प्रकार किया जाता है ?
(a) गणना द्वारा
(b) मानव सूचकांक द्वारा
(c) जनसंख्या की गणना द्वारा
(d) शिक्षा स्तर द्वारा
उत्तर:
(b) मानव सूचकांक द्वारा

प्रश्न 4.
मानव विकास सूचकांक में प्रथम स्थान पर है-
(a) अमेरिका
(b) जर्मनी
(c) जापान
(d) नार्वे
उत्तर:
(d) नार्वे

प्रश्न 5.
निम्नलिखित क्रियाकलापों में से कौन-सा एक द्वितीयक सेक्टर का क्रियाकलापनहीं है ?
(a) इस्पात प्रगलन
(b) वस्त्र निर्माण
(c) मछली पकड़ना
(d) टोकरी बुनना
उत्तर:
(c) मछली पकड़ना

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा एक सेक्टर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में सर्वाधिक रोजगार प्रदान करता है ?
(a) प्राथमिक
(b) द्वितीयक
(c) पर्यटन
(d) सेवा
उत्तर:
(d) सेवा

प्रश्न 7.
वे काम जिनमें उच्च परिमाण और स्तर वाले अन्वेषण सम्मिलित होते हैं, कहलाते हैं
(a) द्वितीयक क्रियाकलाप
(b) पंचम क्रियाकलाप
(c) चतुर्थ क्रियाकलाप
(d) प्राथमिक क्रियाकलाप
उत्तर:
(b) पंचम क्रियाकलाप

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन-सा क्रियाकलाप चतुर्थ सेक्टर से संबंधित है ?
(a) संगणक विनिर्माण
(b) विश्वविद्यालयी अध्यापन
(c) कागज और कच्ची लुगदी निर्माण
(d) पुस्तकों का मुद्रण
उत्तर:
(c) कागज और कच्ची लुगदी निर्माण

प्रश्न 9.
निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक सत्य नहीं है ?
(a) बाह्यस्रोतन दक्षता को बढ़ाता है और लागतों को घटाता है
(b) कभी-कभार अभियांत्रिकी और विनिर्माण कार्यों को भी बाह्यस्रोतन किया जा सकता है
(c) बी० पी० आज के पास के पी० ओज की तुलना में बेहतर व्यावसायिक अवसर होते हैं
(d) कामों का बाह्यस्रोतन करने वाले देशों में काम की तलाश करने वालों में असंतोष पाया जाता है
उत्तर:
(d) कामों का बाह्यस्रोतन करने वाले देशों में काम की तलाश करने वालों में असंतोष पाया जाता है

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन-से देश इंटरनेट से अच्छी तरह जुड़े हैं ?
(a) कनाडा और ऑस्ट्रेलिया
(b) लंदन और न्यूयॉर्क
(c) टोकियो और पेरिस
(d) नई दिल्ली और न्यूयॉर्क
उत्तर:
(a) कनाडा और ऑस्ट्रेलिया

प्रश्न 11.
संसार के प्रसिद्ध वैश्विक नगर निम्नलिखित में से कौन-कौन से हैं ?
(a) दिल्ली-लन्दन-हांगकांग
(b) लन्दन-न्यूयार्क-मुंबई
(c) लंदन-न्यूयार्क-टोकियो
(d) कोलकाता-पेरिस-टोरंटो
उत्तर:
(c) लंदन-न्यूयार्क-टोकियो

प्रश्न 12.
एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका के अधिकतर लोग इंटरनेट का
(a) बहुत अधिक उपयोग करते हैं
(b) बहुत कम या बिल्कुल उपयोग नहीं करते
(c) 30% लोग उपयोग करते हैं
(d) 60% लोग उपयोग करते हैं
उत्तर:
(b) बहुत कम या बिल्कुल उपयोग नहीं करते

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से किन दो औद्योगिक संकुलों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी पार्क कहा जाता है ?
(a) संयुक्त राज्य अमेरिका के बोस्टन और कैलीफोर्निया को
(b) जापान के टोकियो और हीरोशिमा को
(c) ब्रिटेन के लंदन और ओल्ड ट्रैकर्ड को
(d) चीन के हांगकांग और सेन्जेन को
उत्तर:
(b) जापान के टोकियो और हीरोशिमा को

प्रश्न 14.
विश्व स्तर पर सेवाओं का निम्नलिखित में से कितना प्रतिशत योगदान है ?
(a) 10%
(b) 50%
(c) 20%
(d) 100%
उत्तर:
(c) 20%

प्रश्न 15.
सेवाओं के क्रियाकलाप के संसाधन के प्रादेशिक केन्द्र एशिया में किन-किन शहरों में स्थापित हो गए हैं ?
(a) मुम्बई, बैंकाक और शंघाई
(b) सिओल, मास्को और नई दिल्ली
(c) बंगलोर, हैदराबाद और दिल्ली
(d) टोकियो, नई दिल्ली और मुम्बई
उत्तर:
(a) मुम्बई, बैंकाक और शंघाई

प्रश्न 16.
लंदन में पुनः कितनी कम्पनियों के मुख्यालयों को स्थापित किया गया है ?
(a) 200
(b) 198
(c) 225
(d) 300
उत्तर:
(b) 198

प्रश्न 17.
निम्न में से कौन-सा भू-उपयोग संवर्ग नहीं हैं ?
(a) परती भूमि
(b) सीमांत भूमि
(c) निवल बोया क्षेत्र
(d) कृषि योग्य व्यर्थ भूमि
उत्तर:
(d) कृषि योग्य व्यर्थ भूमि

प्रश्न 18.
निम्न में से कौन-सा सिंचित क्षेत्रों में भू-निम्नीकरण का मुख्य प्रकार है ?
(a) अवनलिका अपरदन
(b) वायु अपरदन
(c) मृदा लवणता
(d) भमि पर सिल्ट का जमाव
उत्तर:
(a) अवनलिका अपरदन

प्रश्न 19.
पिछले 20 वर्षों में वनों का अनुपात बढ़ने का निम्न में से कौन-सा कारण है ?
(a) वनीकरण के विस्तृत व सक्षम प्रयास
(b) सामुदायिक वनों के अधीन क्षेत्र में वृद्धि
(c) वन बढ़ोतरी हेतु निर्धारित अधिसूचित क्षेत्र में वृद्धि
(d) वन क्षेत्र प्रबंधन में लोगों की बेहतर भागीदारी
उत्तर:
(a) वनीकरण के विस्तृत व सक्षम प्रयास

प्रश्न 20.
शुष्क कृषि में निम्न में से कौन-सी फसल नहीं बोई जाती है ?
(a) रागी
(b) ज्वार
(c) मूंगफली
(d) गन्ना
उत्तर:
(d) गन्ना

प्रश्न 21.
निम्न में से कौन-से देशों में गेहूँ व चावल की अधिक उत्पादकता की किस्में विकसित की गई थीं?
(a) जापान तथा आस्ट्रेलिया
(b) संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान
(c) मैक्सिको और फिलीपींस
(d) मैक्सिको और सिंगापुर
उत्तर:
(c) मैक्सिको और फिलीपींस

प्रश्न 22.
फसल गहनता का सबसे कम प्रतिशत कौन-सा है ?
(a) 100%
(b) 300%
(c) 0%
(d) 99%
उत्तर:
(a) 100%

प्रश्न 23.
भारतीय कृषि अधिकतर किस पर निर्भर करती है ?
(a) तापमान
(b) वर्षा
(c) मिट्टी
(d) उद्योग
उत्तर:
(b) वर्षा

प्रश्न 24.
वर्षा ऋतु के पश्चात् शीतकाल में बोई जाने वाली फसलों को क्या कहते हैं ?
(a) रबी की फसल
(b) खरीफ की फसल
(c) जायद की फसल
(d) कोई भी नहीं
उत्तर:
(a) रबी की फसल

प्रश्न 25.
9.50 सेमी० से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में या जल सिंचाई रहित प्रदेशों में किस प्रकार की कृषि की जाती है ?
(a) नम कृषि
(b) शुष्क कृषि
(c) आधुनिक कृषि
(d) पारंपरिक कृषि
उत्तर:
(b) शुष्क कृषि

प्रश्न 26.
उत्तर प्रदेश की प्रमुख फसल है
(a) कहवा
(b) रेशम
(c) गेहूँ
(d) चावल
उत्तर:
(c) गेहूँ

प्रश्न 27.
किस देश में रेलमार्गों के जाल का सघनतम घनत्व पाया जाता है ?
(a) ब्राजील
(b) कनाडा
(c) संयुक्त राज्य अमेरिका
(d) रूस
उत्तर:
(b) कनाडा

प्रश्न 28.
वृहद ढूंक मार्ग होकर जाता है
(a) भूमध्यसागर हिंद महासागर से होकर
(b) उत्तर अटलांटिक महासागर से होकर
(c) दक्षिण अटलांटिक महासागर से होकर
(d) उत्तर प्रशांत महासागर से होकर
उत्तर:
(a) भूमध्यसागर हिंद महासागर से होकर

प्रश्न 29.
‘बिग इंच’ पाइप लाइन के द्वारा परिवहन किया जाता है
(a) दूध
(b) जल
(c) तरल पेट्रोलियम गैस (LPG)
(d) पेट्रोलियम
उत्तर:
(d) पेट्रोलियम

प्रश्न 30.
चैनल टनल जोड़ता है
(a) लंदन-बर्लिन
(b) बर्लिन-पेरिस
(c) पेरिस-लंदन
(d) बार्सिलोना-बर्लिन
उत्तर:
(b) बर्लिन-पेरिस

प्रश्न 31.
छोटी दूरियों की यात्रा के लिए सबसे सरल माध्यम है
(a) सड़क परिवहन
(b) रेलमार्ग
(c) वायुमार्ग
(d) तीनों
उत्तर:
(a) सड़क परिवहन

प्रश्न 32.
भारत में रेलमार्ग की कुल लंबाई है
(a) 63000 किमी०
(b) 60,000 किमी०
(c) 65,000 किमी०
(d) 6,000 किमी०
उत्तर:
(a) 63000 किमी०

प्रश्न 33.
एक स्थान से दूसरे स्थान तक वस्तुओं और यात्रियों का लाना ले जाना कहलाता है ?
(a) परिवहन
(b) आवागमन
(c) संसाधन
(d) उत्पादन
उत्तर:
(a) परिवहन

प्रश्न 34.
विश्व का सबसे लंबा रेलमार्ग है। यह मार्ग समुद्र तल से कितनी ऊँचाई से होकर एंडीज पर्वत श्रेणी को पार करता है ?
(a) पैन अमेरिकी
(b) कनाडियन पैसेफिक
(c) आस्ट्रेलियन अंतर्महाद्वीपीय
(d) ट्रांस-साइबेरियन
उत्तर:
(a) पैन अमेरिकी

प्रश्न 35.
संसार की सबसे लंबी पाइप लाइन की लम्बाई कितनी है ?
(a) 4,800 किमी०
(b) 4,500 किमी०
(c) 480 किमी०
(d) 48,000 किमी०
उत्तर:
(a) 4,800 किमी०

प्रश्न 36.
निम्नलिखित में से किसका प्रयोग जल और पेट्रोलियम जैसे तरल पदार्थों के परिवहन के लिए किया जाता है ?
(a) पाइपलाइनों का
(b) सड़कों का
(c) टैंकरों का
(d) जलमार्ग का
उत्तर:
(a) पाइपलाइनों का

प्रश्न 37.
परिवहन का सबसे तीव्र किन्तु सर्वाधिक महँगा साधन है
(a) वायुयान
(b) जलयान
(c) कार
(d) मैट्रो रेल
उत्तर:
(a) वायुयान

प्रश्न 38.
विश्व में सघनतम रेल जाल किस महाद्वीप में है ?
(a) यूरोप
(b) अफ्रीका
(c) एशिया
(d) अमेरिका
उत्तर:
(a) यूरोप

प्रश्न 39.
भारतीय रेलवे विश्व की बड़ी रेलवे है
(a) पहली
(b) दूसरी
(c) तीसरी
(d) चौथी
उत्तर:
(a) पहली

प्रश्न 40.
निम्नलिखित में से किसने संयुक्त अरब अमीरात के लिंग अनुपात को निम्न किया है ?
(a) पुरुष कार्यशील जनसंख्या का चयनित प्रवास
(b) पुरुषों की उच्च जन्म दर
(c) स्त्रियों की निम्न जन्म दर
(d) स्त्रियों का उच्च उत्प्रवास
उत्तर:
(a) पुरुष कार्यशील जनसंख्या का चयनित प्रवास

प्रश्न 41.
निम्नलिखित में से कौन-सी संख्या जनसंख्या के कार्यशील आयु वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है ?
(a) 15 से 65 वर्ष
(b) 15 से 66 वर्ष
(c) 15 से 64 वर्ष
(d) 15 से 59 वर्ष
उत्तर:
(d) 15 से 59 वर्ष

प्रश्न 42.
निम्नलिखित में से किस देश का लिंग अनुपात विश्व में सर्वाधिक है ?
(a) लैटविया
(b) जापान
(c) संयुक्त अरब अमीरात
(d) फ्रांस
उत्तर:
(a) लैटविया

प्रश्न 43.
आयु पिरामिड के लिए सामान्यतया प्रयोग किया जाता है
(a) 5 से 10 वर्ष वाला आयु वर्ग
(b) 10 से 20 वर्ष वाला आयु वर्ग
(c) 0 से 5 वर्ष वाली आयु वर्ग
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 5 से 10 वर्ष वाला आयु वर्ग

प्रश्न 44.
पिरामिड का चौड़ा आधार तथा तेजी से पतला होता शीर्ष संकेत करता है ?
(a) बढ़ती जन्म दर तथा उच्च मृत्यु दर
(b) घटती जन्म दर तथा निम्न मृत्यु दर
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) बढ़ती जन्म दर तथा उच्च मृत्यु दर

प्रश्न 45.
एक खेत में एक कृषि वर्ष में उगाई जाने वाली अनेक फसलों को क्या कहते हैं ?
(a) शस्य गहनता
(b) फसल चक्रण
(c) शस्यावर्तन
(d) कुछ भी नहीं
उत्तर:
(a) शस्य गहनता

प्रश्न 46.
भारत में 1999-2000 में कुल खाद्यान्न उत्पादन कितना था ?
(a) 1084 टन
(b) 2000 टन
(c) 1760 टन
(d) 820 टन
उत्तर:
(b) 2000 टन

प्रश्न 47.
भारत में चावल के उत्पादन में 1950-1951 से 1993-94 की अवधि में कितनी आनुपातिक वृद्धि हुई ?
(a) 383%
(b) 283%
(c) 285%
(d) 380%
उत्तर:
(b) 283%