Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

Bihar Board Class 11 Biology तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

प्रश्न 1.
निम्नलिखित संरचनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए –
(अ) मस्तिष्क
(ब) नेत्र
(स) कर्ण।
उत्तर:
(अ) मानव मस्तिष्क की रचना (Structure of Human Brain):
मनुष्य में मस्तिष्क कपाल या ऊनियम (cranium) के भीतर सुरक्षित रहता है। मस्तिष्क तीन आवरणों से ढका रहता है जिन्हें मस्तिष्कावरण (meninges) कहते हैं। ये मस्तिष्कावरण है –

1. दृढ़तानिका (Duramater):
श्वेत तन्तुमय ऊतक की बनी होती है।

2. जालतानिका (Arachnoid mater):
यह मध्य की पर्त है।
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चित्र – मानव मस्तिष्क की रचना – खड़ी काट में।

3. मृदुतानिका (Piamater):
यह सबसे भीतरी आवरण है, जो मस्तिष्क के सम्पर्क में रहता है। इस पर्त में रुधिर वाहिनियों का जाल बिछा रहता है। इन झिल्लियों के बीच एक तरल भरा रहता है जिसे सेरेब्रोस्पाइनल तरल (cerebrospinal fluid) कहते हैं। यह द्रव पोषण, श्वसन तथा उत्सर्जन में सहायक है। यह बाहरी आधातों से कोमल मस्तिष्क की सुरक्षा भी करता है।

मस्तिष्क को तीन भागों में बाँटा जा सकता है –

  1. अग्रमस्तिष्क (Fore brain)
  2. मध्य-मस्तिष्क (Mid brain)
  3. पश्चमस्तिष्क (Hind brain)

1. अग्रमस्तिष्क या प्रोसेनसिफैलॉन (Fore brain or Prosencephalon):

अग्र मस्तिष्क के तीन भाग होते हैं –

  1. घ्राण भाग
  2. सेरेब्रम तथा
  3. डाइएनसिफैलॉन।

(i) मनुष्य में घ्राण भाग अवशेषी होता है तथा अग्रमस्तिष्क का मुख्य भाग सेरिब्रम होता है।

(ii) प्रमस्तिष्क या सेरेब्रम (Cerebrum):
मस्तिष्क का लगभग 2/3 भाग प्रमस्तिष्क होता है। प्रमस्तिष्क दो पालियों में बँटा होता है जिन्हें प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध (cerebral hemispheres) कहते हैं। दोनों प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध तन्त्रिका तन्तुओं की एक पट्टी द्वारा जुड़े रहते हैं जिसे कॉर्पस कैलोसम (corpus callosum) कहते हैं। प्रमस्तिष्क में तन्त्रिका कोशिकाएँ इस प्रकार स्थित होती हैं कि इनके कोशिकाकाय बाहर की ओर स्थित होते हैं।

इस भाग को प्रमस्तिष्क वल्कुट (cerebral cortex) कहते हैं भीतर की ओर तन्त्रिका कोशिकाओं पर अक्षतन्तु (axon) स्थित होते हैं। यह भाग प्रमस्तिष्क मध्यांश (cerebral medulla) कहलाता है। बाहरी भाग धूसर (ग्रे) रंग का होता है। इसे धूसर द्रव्य (grey matter) कहते हैं। भीतरी भाग श्वेत-(सफेद) रंग का होता है। इसे श्वेत द्रव्य (white matter) कहते हैं।

प्रमस्तिष्क की पृष्ठ सतह में तन्त्रिका तन्तुओं की अत्यधिक संख्या होने के कारण यह सतह अत्यधिक मोटी व वलनों वाली (folded) हो जाती है। इस सतह को नियोपैलियम (neopallium) कहते हैं। नियोपैलियम में उभरे हुए भागों को उभार या गायराई (gyri) तथा बीच के दबे भाग को खाँच या सल्काई (sulci) कहते हैं।

तीन गहरी दरारें प्रत्येक प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध को चार मुख्य पालियों में बाँट देती हैं। इन्हें फ्रन्टल पालि (frontal lobe), पैराइटल पालि (parietal lobe), टैम्पोरल पालि (temporal lobe) तथा ऑक्सीपीटल पालि (occipital lobe) कहते हैं। प्रमस्तिष्क की गुहाओं को पार्श्व मस्तिष्क गुहा या पैरासील (paracoel or lateral ventricles) कहते हैं।

(iii) अग्रमस्तिष्क ‘पश्च या डाइएनसिफैलॉन (Diencephalon):
यह अग्रमस्तिष्क का पिछला भाग है। इसका पृष्ठ भाग पतला होता है तथा अधर भाग मोटा होता है जिसे हाइपोथैलैमस (hypothalamus) कहते हैं। हाइपोथैलेमस की अधर सतह पर इन्फन्डीबुलम (infundibulum) से जुड़ी पीयूष ग्रन्थि होती है।

डाइएनसिफैलॉन की पृष्ठ सतह पर पीनियल काय (pineal body) तथा अग्र रक्त जालक, (anterior choroid plexus) पाया जाता है। डाइएनसिफैलॉन की गुहा तृतीय निलय (third ventricle) या डायोसील (diocoel) होती है, यह पार्श्व गुहाओं से मोनरो के छिद्र (foramen of Monaro) द्वारा जुड़ी रहती है।

II. मध्यमस्तिष्क या मीसेनसिफैलॉन (Mid Brain or Mesencephalon):
यह भाग स्तनियों में बहुत अधिक विकसित नहीं होता है। इसका पृष्ठ भाग चार दृक् पालियों के रूप में होता है, जिन्हें कॉर्पोरा क्याड्रिजेमिना (corpora quadrigemina) कहते हैं। मध्यमस्तिष्क के पार्श्व व अधर भाग में तन्त्रिका ऊतक की पट्टियाँ होती हैं जिन्हें क्रूरा सेरेब्राई (crura cerebri) कहते हैं। ये पश्चमस्तिष्क को अग्रमस्तिष्क से जोड़ने का कार्य करती हैं। यहाँ दृक् तन्त्रिकाएँ एक-दूसरे को क्रॉस करके, ऑप्टिक कियाज्मा (optic chiasma) बनाती है। मध्यमस्तिष्क की सँकरी गुहा को आइटर (iter) कहते हैं, जो तृतीय निलय को चतुर्थ निलय (fourth ventricle) से जोड़ती हैं।

III. पश्चमस्तिष्क या रॉम्बेनसिफैलॉन (Hind brain or Rhombencephalon):
यह मस्तिष्क का पश्च भाग है। इसे मस्तिष्क वृन्त (brain stalk) भी कहते हैं। पश्च मस्तिष्क के दो भाग होते हैं –

(i) अनुमस्तिष्क (cerebellum)
(ii) मस्तिष्क पुच्छ या मेडुला ऑब्लांगेटा (medulla oblongata)।

(i) अनुमस्तिष्क (Cerebellum):
यह प्रमस्तिष्क के पिछले भाग से सटा रहता है। अनुमस्तिष्क दो पार्श्व गोला? (lateral hemispheres) का बना होता है। अनुमस्तिष्क में बाहरी धूसर द्रव्य तथा आन्तरिक श्वेत द्रव्य होता है। श्वेत द्रव्य में स्थान-स्थान पर धूसर. द्रव्य प्रवेश करके वृक्ष की शाखाओं जैसी रचना बनाता है। इसे प्राणवृक्ष या आरबर विटी (arbor vitae) कहते हैं। अनुमस्तिष्क में गुहा अनुपस्थित होती है। अनुमस्तिष्क के अधर भाग में श्वेत द्रव्य की एक पट्टी होती है जिसे पोंस वेरोली (pons varolli) कहते हैं।

(ii) मस्तिष्क पुच्छ या मेडुला ऑब्लांगेटा (Medulla Oblongata):
यह मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग है जो आगे मेरुरज्जु के रूप में कपाल गुहा से बाहर निकलता है। मेडुला की पृष्ठ भित्ति पर पश्च रक्त जालक (posterior choroid plexus) स्थित होता है। मेडुला की गुहा को चतुर्थ निलय या मेटासील (fourth ventricle or metacoel) कहते हैं।

(ब) नेत्र की संरचना (Structure of Eye):
मनुष्य में एक जोड़ी नेत्र चेहरे पर सामने की ओर नेत्र कपाल के नेत्र कोटर (eye orbit) में स्थित होते हैं। प्रत्येक नेत्र एक तरल से भरे गोलक के रूप में होता है। नेत्र गोलक का 4/5 भाग नेत्र कोटर में और लंगभग 1/5 भाग नेत्र कोटर के बाहर स्थित होता है। नेत्र गोलक की भित्ति तीन स्तरों से बनी होती है। सबसे बाहरी दृढ़पटल (sclera), मध्य रक्तकपटल (choroid) तथा भीतरी दृष्टिपटल (retina) है।

1. दृढ़पटल या स्क्ले रोटिक (Sclera or Sclerotic):
यह तन्तुमय संयोजी ऊतक का बना सबसे बाहरी स्तर है। इसका वह भाग जो नेत्र कोटर से बाहर होता है, पारदर्शी होता है तथा इसे कॉर्निया (cornea) कहते हैं।
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चित्र – मानव नेत्र की रचना-खड़ी काट में।

2. रक्तकपटल या कोरॉइड (Choroid):
यह नेत्र गोलक की भित्ति का मध्य स्तर है। रक्तकपटल संयोजी ऊतक का बना स्तर है जिसमें रुधिर केशिकाओं का घना जाल होता है। रक्तकपटल में रंगायुक्त कोशिकाएँ होती हैं, जिस कारण नेत्र का रंग काला, भूरा, सुनहरा या नीला दिखाई देता है। रक्तकपटल का वह भाग जो कॉर्निया के नीचे होता है, थोड़ी पीछे हटकर एक पेशीय पर्दे जैसी रचना (diaphragm like) बनाता है जिसे आइरिस या उपतारा (iris) कहते हैं।

आइरिस अरीय (radial) तथा वर्तुल पेशियों (circular muscles) का बना होता है। आइरिस के मध्य में एक गोल छिद्र होता है। जिसे तारा या पुतली (pupil) कहते हैं। अरीय पेशियाँ तारे के छिद्र को बड़ा करती है; अतः इन्हें प्रसारी पेशियाँ (dilatory muscles) कहते हैं। वर्तुल पेशियाँ तारे के छिद्र को छोटा या संकुचित करती हैं; अतः इन्हें स्फिक्टर (अवरोधिनी) पेशियाँ (sphincter muscles) कहते हैं। तारा नेत्र में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को नियन्त्रित करता है।
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चित्र – आइरिस व तारे की रचना

आइरिस के आधार पर रक्तपटल अत्यधिक मोटा व पेशीयुक्त होकर सीलियरी काय (ciliary body) बनाता है।

3. दृष्टिपटल या रेटिना (Retina):
यह नेत्र भित्ति का सबसे भीतरी प्रकाश संवेदी (light sensitive) स्तर है। रेटिना में रक्तकपटल की ओर एक पतला वर्णक स्तर (pigmented layer) तथा भीतर की ओर तन्त्रिका संवेदी स्तर होता है।

तन्त्रिका संवेदी. स्तर (neurosensory layer) प्रकाश के लिए संवेदनशील होता है। यह निम्नलिखित प्रकार का पर्तों से बना होता है –

(i) दृष्टि शलाकाओं एवं शंकुओं का स्तर (Layer of Rods and Cones):
शलाकाओं में दृष्टि पर्पल (visual purple) वर्णक रोडोप्सिन (Rhodopsin) तथा शंकुओं में दृष्टि वॉयलेट (visual violet) वर्णक आयोडोप्सिन (iodopsin) पाए जाते हैं। शलाकाएँ प्रकाश व अन्धकार में भेद करती हैं, जबकि शंकु रंगों का ज्ञान कराते हैं।

(ii) ध्रुवीय न्यूरॉन का स्तर (Layer of Bipolar Neurons):
इसकी तन्त्रिका कोशिकाएँ दृष्टि शलाकाओं एवं शंकुओं के स्तर को गुच्छकीयं कोशिकाओं के स्तर से जोड़ती हैं।

(iii) गुच्छकीय कोशिकाओं का स्तर (Layer of Ganglionic Cells):
इसकी कोशिकाओं के एक्सॉन तन्तु मिलकर दृक् तन्त्रिका (optic nerve) बनाते हैं। दृक् तन्त्रिका जिस स्थान से रेटिना से निकलती है, उसे अन्ध बिन्दु (blind spot) कहते हैं, इस स्थान पर प्रतिबिम्ब का निर्माण नहीं होता है।

नेत्र की मध्य अनुलम्ब् अक्ष (optical axis) पर स्थित रेटिना के मध्य भाग को मध्य क्षेत्र (area centralis) कहते हैं। इस भाग को पीत बिन्दु (yellow spot) या मैकुला ल्यूटिया (macula lutea) भी कहते हैं। यहाँ उपस्थित एक छोटे से गड्ढे को फोविया सेन्ट्रेलिस (fovea centralis) कहते हैं। इस स्थान पर सबसे स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है।

लेन्स (lens):
यह उभयोत्तल (biconvex), पारदर्शी, रंगहीन व लचीला होता है। यह आइरिस के ठीक पीछे स्थित होता है। लेन्स साधक स्नायु (suspensory ligament) द्वारा सीलियरी काय (ciliary body) से जुड़ा होता है। तेजो वेश्म या ऐक्वस वेश्म (aqueous chamber) कॉर्निया तथा लेन्स के बीच का स्थान होता है।

इसमें जलीय तरल तेजोजल या ऐक्वस ह्यमर (aqueous humor) भरा रहता काचाभ वेश्म या विट्रियस वेश्म (vitreous chamber) रेटिना व लेन्स के बीच का स्थान है। इसमें जैली सदृश काचाभ जल यो विट्रियस हमर (vitreous humor) भरा रहता है। जलीय तेजोजल तथा जैली सदृश काचाभ जल सीलियरी काय द्वारा स्रावित होते हैं। ये नेत्र की गुहा में निश्चित दबाव बनाए रखते हैं जिससे दृष्टिपटल व अन्य नेत्रपटल यथास्थान बने रहें।

पलक (Eye Lids):
नेत्र कोटर के ऊपरी व निचले भागों में त्वचा के पेशीयुक्त भंज (folds) पलकों का निर्माण करते हैं। दोनों पलके सचल होती हैं तथा नेत्र गोलक के खुले भाग को ढक सकती हैं। पलकों की भीतरी उपचर्म (epidermis) पारदर्शी होकर कॉर्निया के साथ समेकित हो जाती है। इसे नेत्र श्लेष्मा या कन्जंक्टिवा (conjunctiva) कहते हैं। पलकों पर बरौनियाँ (eye lashes) पाई जाती है। खरगोश तथा अन्य स्तनियों में एक तीसरी पलक होती है, जिसे निमेषक पटल (nictitating membrane) कहते हैं। यह पलक नेत्रों की सुरक्षा का कार्य करती है। मनुष्य में यह अवशेषी होती है।

अश्रु ग्रन्थियाँ (Lacrimal Glands or Tear Glands):
प्रत्येक नेत्र के बाहरी ऊपरी कोने पर तीन अश्रु ग्रन्थियाँ स्थित ‘होती हैं। इनका स्राव कॉर्निया व कन्जंक्टिवा को नम तथा स्वच्छ बनाए रखता है। नेत्र के भीतरी कोण पर एक अश्रु नलिका (lachrymal duct) होती है जो फालतू स्राव को नासा वेश्म में पहुँचा देती है। जन्म के चार माह पश्चात् मानव शिशु में अश्रु ग्रन्थियाँ सक्रिय होती हैं।

मीबोमियन ग्रन्थियाँ (Meibomian glands):
ये पलकों में स्थित होती हैं तथा एक तैलीय पदार्थ का स्रावण करती हैं। यह तैलीय पदार्थ कॉर्निया पर फैलकर अश्रु ग्रन्थियों के स्रावण को पूरी कॉर्निया पर फैलाता है।

(स) कर्ण की संरचना (Structure of Ear):
कर्ण श्रवण तथा स्थैतिक सन्तुलन (hearing and equilibrium) का अंग है।
प्रत्येक कर्ण के तीन भाग होते हैं –

(i) बाह्य कर्ण
(ii) मध्य कर्ण तथा
(iii) अन्त:कर्ण।

(i) बाह्य कर्ण (External Ear):
मनुष्य में बाह्य कर्ण के दो भाग होते हैं – कर्ण पल्लव (pinna) तथा बाह्य कर्ण कुहर (external auditory canal) कर्ण पल्लव केवल स्तनियों में ही पाए जाते हैं। ये लचीली उपास्थि से बनी पंखेनुमा रचना है। कर्ण पल्लव ध्वनि तरंगों को कर्ण कुहर में भेजता है। बाह्य कर्ण कुहर एक अस्थिल नलिका है, जो मध्य कर्ण से जुड़ी रहती है। बाह्य कर्ण कुहर के अन्तिम सिरे पर एक पर्दे जैसी रचना कर्णपटह (tymapanic membrane) होती है।

(ii) मध्य कर्ण (Middle Ear):
यह करोटि की टिम्पैनिक बुल्ला (tympanic bulla) नामक अस्थि की गुहा में स्थित होता है। मध्य कर्ण कण्ठ कर्ण नलिका या यूस्टेकियन नलिका (eustachian tube) द्वारा ग्रसनी (pharynx) से जुड़ा रहता है।

मध्य कर्ण में तीन कर्ण अस्थिकाएँ(ear ossicles) होती है। इन्हें मैलियम, इन्कस तथा स्टैपीज (malleus, incus and stapes) कहते हैं। मैलियस कान के पर्दे से सटी रहती है तथा स्टैपीज अन्त:कर्ण की ओर अण्डाकार गवाक्ष या फेनेस्ट्रा ओवेलिस (fenestra ovalis) पर स्थित होती है।
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चित्र – मनुष्य का कर्ण

ये तीनों कर्ण अस्थिकाएँ ध्वनि तरंगों को बाह्य कर्ण से अन्त: कर्ण तक पहुँचाने का कार्य करती हैं।

मध्य कर्ण दो छिद्रों द्वारा अन्तःकर्ण की गुहा से जुड़ा होता है, इन्हें अण्डाकार गवाक्ष या फेनेस्ट्रा ओवेलिस (fenestra ovalis) तथा वृत्ताकार गवाक्ष या फेनेस्ट्रा रोटन्डस (fenestra rotundus) कहते हैं। इन छिद्रों के ऊपर झिल्ली उपस्थित होती है।

(iii) अन्तःकर्ण (Internal Ear):
अन्त:कर्ण करोटि की टैम्पोरल अस्थि के भीतर स्थित होता है। अन्तःकर्ण एक अर्द्धपारदर्शक झिल्ली से बनी जटिल रचना होती है, जिसे कलागहन (membranous labyrinth) कहते हैं। कलागहन अस्थि के बने कोष में स्थित रहता है जिसे अस्थीय लेबिरिन्थ (bony labyrinth) कहते हैं। अस्थीय लेबिरिन्थ में परिलसीका (perilymph) भरा रहता है, जिसमें कलागहन तैरता रहता है। कलागहन के भीतर अन्तःलसीका (endolymph) भरा रहता है।

कलागहन के दो मुख्य भाग यूट्रिकुलस (utriculus) तथा सैक्यूलस (sacculus) होते हैं। दोनों भाग एक सँकरी सैक्यूलोयूट्रिकुलर नलिका (sacculo-utricular duct) द्वारा जुड़े रहते हैं। यूट्रिकुलस से तीन अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएँ (semicircular canals) निकलकर यूट्रिकुलस में ही खुल जाती हैं।

अग्र तथा पश्च अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएँ एकसाथ सहनलिका (crus commune) के रूप में निकलती हैं। अर्द्धवृत्ताकार नलिकाओं का अन्तिम भाग तुम्बिका (ampulla) के रूप में फूला होता है। सैक्यूलस से स्प्रिंग की तरह कुण्डलित कॉक्लियर नलिका (cochlear duct) निकलती है। इसमें 2 \(\frac{2}{3}\) कुण्डलन होते हैं।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित की तुलना कीजिए –
(अ) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र और परिधीय तन्त्रिका तन्त्र
(ब) स्थिर विभवं और सक्रिय विभव
(स) कोरॉइड और रेटिना।
उत्तर:
(अ) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र तथा परिधीय तन्त्रिका तन्त्र में अन्तर (Difference between Central Nervous System and Peripheral Nervous System):
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(ब) स्थिर विभव और सक्रिय विभव में अन्तर (Difference between Resting Potential and Action Potential):
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(स) कोरॉइड और रेटिना में अन्तर (Difference between Choroid and Retina):
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिए –
(अ) तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का ध्रुवीकरण
(ब) तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का विधुवीकरण
(स) तन्त्रिका तन्तु के समांतर आवेगों का संचरण
(द) रासायनिक सिनैप्स द्वारा तन्त्रिका आवेगों का संवहन।
उत्तर:
(अ) तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का ध्रुवीकरण (Polarisation of the Membrane of a Nerve Fibre):
तन्त्रिका तन्तु के ऐक्सोप्लाज्म में Na+ की संख्या बहुत कम, परन्तु ऊतक तरल में लगभग 12 गुना अधिक होती है। ऐक्सोप्लाज्म में K+ की संख्या ऊतक तरल का अपेक्षा लगभग 30-35 गुना अधिक होती है।

विसरण अनुपात के अनुसार Na+ की ऊतक तरल से ऐक्सोप्लाज्म में और K+ के ऐक्सोप्लाज्म से ऊतक तरल में विसरित होने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन तन्त्रिकाच्छद या न्यूरीलेमा (neurilemma) Na+ के लिए कम और K+ के लिए अधिक पारगम्य होती है।

विश्राम अवस्था में ऐक्सोप्लाज्म में ऋणात्मक आयनों और ऊतक तरल में धनात्मक आयनों की अधिकता रहती है। तन्त्रिकाच्छद या न्यूरीलेमा की बाह्य सतह पर धनात्मक आयनों और भीतरी सतह पर ऋणात्मक आयनों का जमाव रहता है। तन्त्रिकाच्छद की बाह्य सतह पर धनात्मक और भीतरी सतह पर 70 mV का ऋणात्मक आवेश रहता है।

इस स्थिति में तन्त्रिकाच्छद या न्यूरीलेमा विद्युतावेशी या ध्रुवण अवस्था (polarised state) में बनी रहती है। तन्त्रिकाच्छद (neurilemma) के इधर-उधर विद्युतावेशी अन्तर (electric charge difference) के कारण न्यूरीलेमा में बहुत-सी विभव ऊर्जा संचित रहती है। इसी ऊर्जा को विश्राम कला विभव कहते हैं। प्रेरणा संचरण में इसी ऊर्जा का उपयोग होता है।
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चित्र – विश्रामकला विभव, इसकी स्थापना तथा अनुरक्षण।

(ब) तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का विध्रुवीकरण (Depolarisation of the Membrane of Nerve Fibre):
जब एक तन्त्रिका तन्तु की ऐशहोल्ड उद्दीपन (threshold stimulus) दिया जाता है तो न्यूरीलेमा (neurilemma) की पारगम्यता बदल जाती है। यह Na+ के लिए अधिक पारगम्य हो जाती है और K+ के लिए अपारगम्य हो जाती है। इसके फलस्वरूप तन्त्रिका तन्तु विश्राम कला विभव की ऊर्जा का प्रेरणा संचरण के लिए उपयोग करने में सक्षम होते हैं।

तन्त्रिका तन्तु को उद्दीपित करने पर इसके विश्राम कला विभव की ऊर्जा एक विद्युत प्रेरणा के रूप में, तन्तु के क्रियात्मक कला विभव में बदल जाती है। यह विद्युत प्रेरणा तन्त्रिकीय प्रेरणा होती है। Na+ ऐक्सीप्लाज्म में तेजी से प्रवेश करने लगते हैं, इसके फलस्वरूप तन्त्रिका तन्तु का विध्रुवीकरण होने लगता है। विध्रुवीकरण के फलस्वरूप न्यूरीलेमा की भीतरी सतह पर धनात्मक और बाह्य सतह पर ऋणात्मक विद्युत आवेश स्थापित हो जाता है। यह स्थिति विश्राम अवस्था के विपरीत होती है।

(स) तन्त्रिका तन्तु के समान्तर आवेगों का संचरण (Conduction of Nerve Impulse along a Nerve Fibre):
तन्त्रिकाच्छद (न्यूरीलेमा) के किसी स्थान पर तन्त्रिका आवेग की उत्पत्ति होती है तो उत्पत्ति स्थल ‘A’ पर तन्त्रिकाच्छद Na+ के लिए अधिक पारगम्य हो जाती है, जिसके फलस्वरूप Na+ तीव्रगति से अन्दर आने लगते हैं तो न्यूरीलेमा की भीतरी सतह पर धनात्मक और बाह्य सतह पर ऋणात्मक आवेश स्थापित हो जाता है। आवेग स्थल पर विध्रुवीकरण हो जाने को क्रियात्मक विभव कहते हैं। क्रियात्मक विभव तन्त्रिकीय प्रेरणा के रूप में स्थापित हो जाता है।

तन्त्रिकाच्छद से कुछ आगे ‘B’ स्थल पर झिल्ली की बाहरी सतह पर धनात्मक और भीतरी सतह पर ऋणात्मक आवेश होता है। परिणामस्वरूप, तन्त्रिका आवेग ‘A’ स्थल से ‘B’ स्थल की ओर आवेग का संचरण होता है। यह प्रक्रम सम्पूर्ण एक्सॉन में दोहराया जाता है। इसके प्रत्येक बिन्दु पर उद्दीपन को सम्पोषित किया जाता रहता है। उद्दीपन किसी भी स्थान पर अत्यन्त कम समय तक (0.001 से 0.005 सेकण्ड) तक ही रहता है।

जैसे-ही भीतरी सतह पर धनात्मक विद्युत आवेश + 35mv होता है, तन्त्रिकाच्छद की पारगम्यता प्रभावित होती है। यह पुन: Na+ के लिए अपारगम्य और K+ के लिए अत्यधिक पारगम्य हो जाती है। K+ तेजी से ऐक्सोप्लाज्म में ऊतक तरल से जाने लगते हैं। सोडियम-पोटैशियम पम्प पुन: सक्रिय हो जाता है जिससे तन्त्रिका तन्तु विश्राम विभव में आ जाता है। अब यह अन्य उद्दीपन के संचरण हेतु फिर तैयार हो जाता है।

(द) रासायनिक सिनैप्स द्वारा तन्त्रिका आवेगों का संवहन (Transmission of Nerve Impulse across a Chemical Synapse):
अक्षतन्तु (axon) के अन्तिम छोर पर स्थित अन्त्य बटन (terminal button) तथा अन्य तन्त्रिका कोशिका के डेन्ड्राइट के मध्य एक युग्मानुबन्ध (synapse) होता है। अतः इस स्थान पर आवेग का संचरण विशेष रासायनिक पदार्थ ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) नामक न्यूरोहॉर्मोन का संचरण विशेष रासायनिक पदार्थ ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) नामक न्यूरोहॉर्मोन (neurohormone) के द्वारा होता है।

आवेग के प्राप्त होने पर अन्त्य बटन में उपस्थित स्रावी पुटिकाएँ (secretory vesicles) ऐसीटिलकोलीन स्रावित करती हैं। यही पदार्थ दूसरी तन्त्रिका कोशिका के डेण्ड्राइट (dendrites) में कार्यात्मक विभव (action potential) को स्थापित कर देता है। अब यही विभव, आवेग के रूप में अगले तन्त्रिका तन्तु की सम्पूर्ण लम्बाई में आगे बढ़ता जाता है। इस प्रकार, ऐसीटिलकोलीन एक रासायनिक दूत (chemical transmitter) की तरह कार्य करता है। बाद में, ऐसीटिलकोलीन कोएन्जाइम-ऐसीटिलकोलीनेस्टेरेज (acetylcholinesterase) द्वारा विघटित कर दिया जाता है।
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चित्र – युग्मानुबन्ध पर आवेग का रासायनिक संवहन।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित का नामांकित चित्र बनाइए –
(अ) न्यूरॉन
(ब) मस्तिष्क
(स) नेत्र
(द) कर्ण।
उत्तर:
(अ) न्यूरॉन की संरचना (Structure of Neuron)।
(ब) मस्तिष्क की संरचना (Structure of Brain)।
(स) नेत्र की संरचना (Structure of Eye)।
(द) कर्ण की संरचना (Structure of Ear)।
इन तीनों की संरचना हेतु प्रश्न संख्या 1 का उत्तर देखें।

(अ) न्यूरॉन की संरचना:
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चित्र – एक ध्रुवीय तन्त्रिका कोशिका तथा उसके सम्पर्क

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –
(अ) तन्त्रीय समन्वयनं
(ब) अग्रमस्तिष्क
(स) मध्यमस्तिष्क
(द) पश्चमस्तिष्क
(य) रेटिना
(र) कर्ण अस्थिकाएँ
(ल) कॉक्लिया
(व) ऑर्गन ऑफ कॉरटाई
(त) सिनैप्स।
उत्तर:
(अ) तन्त्रीय समन्वयन (Nervous – Coordination):
शरीर की विभिन्न क्रियाओं का नियन्त्रण तथा नियमन सूचना प्रसारण तन्त्र (communication system) द्वारा होता है। इसके अन्तर्गत तन्त्रिका तन्त्र (nervous system) तथा अन्तःस्रावी तन्त्र (Endocrine System) आते हैं। तन्त्रिका निर्माण तन्त्रिका कोशिकाओं (nerve cells) से होता है। ये कोशिकाएँ उत्तेजनशीलता एवं संवाहकता के लिए विशिष्टीकृत होती हैं।

ये आवेगों को संवेदांगों से ग्रहण करके केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र तक और केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र द्वारा होने वाली प्रतिक्रियाओं को अपवाहक (effectors) अंगों तक पहुँचाने का कार्य करती हैं। अपवाहक अंगों के अन्तर्गत मुख्यतया पेशियाँ तथा ग्रन्थियाँ आती हैं। केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र उद्दीपनों की व्याख्या, विश्लेषण करके प्रतिक्रियाओं का निर्धारण करता है।

(ब) अग्रमस्तिष्क (Fore brain):
अग्र मस्तिष्क के तीन भाग होते हैं –

    1. घ्राण भाग
    2. सेरेब्रम तथा
    3. डाइएनसिफैलॉन।

1. घ्राण भाग: मनुष्य में घ्राण भाग अवशेषी होता है तथा अग्रमस्तिष्क का मुख्य भाग सेरिब्रम होता है।

2. प्रमस्तिष्क या सेरेब्रम (Cerebrum): मस्तिष्क का लगभग 2/3 भाग प्रमस्तिष्क होता है। प्रमस्तिष्क दो पालियों में बँटा होता है जिन्हें प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध (cerebral hemispheres) कहते हैं। दोनों प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध तन्त्रिका तन्तुओं की एक पट्टी द्वारा जुड़े रहते हैं जिसे कॉर्पस कैलोसम (corpus callosum) कहते हैं। प्रमस्तिष्क में तन्त्रिका कोशिकाएँ इस प्रकार स्थित होती हैं कि इनके कोशिकाकाय बाहर की ओर स्थित होते हैं।

इस भाग को प्रमस्तिष्क वल्कुट (cerebral cortex) कहते हैं भीतर की ओर तन्त्रिका कोशिकाओं पर अक्षतन्तु (axon) स्थित होते हैं। यह भाग प्रमस्तिष्क मध्यांश (cerebral medulla) कहलाता है। बाहरी भाग धूसर (ग्रे) रंग का होता है। इसे धूसर द्रव्य (grey matter) कहते हैं। भीतरी भाग श्वेत-(सफेद) रंग का होता है। इसे श्वेत द्रव्य (white matter) कहते हैं।

प्रमस्तिष्क की पृष्ठ सतह में तन्त्रिका तन्तुओं की अत्यधिक संख्या होने के कारण यह सतह अत्यधिक मोटी व वलनों वाली (folded) हो जाती है। इस सतह को नियोपैलियम (neopallium) कहते हैं। नियोपैलियम में उभरे हुए भागों को उभार या गायराई (gyri) तथा बीच के दबे भाग को खाँच या सल्काई (sulci) कहते हैं।

तीन गहरी दरारें प्रत्येक प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध को चार मुख्य पालियों में बाँट देती हैं। इन्हें फ्रन्टल पालि (frontal lobe), पैराइटल पालि (parietal lobe), टैम्पोरल पालि (temporal lobe) तथा ऑक्सीपीटल पालि (occipital lobe) कहते हैं। प्रमस्तिष्क की गुहाओं को पार्श्व मस्तिष्क गुहा या पैरासील (paracoel or lateral ventricles) कहते हैं।

3. अग्रमस्तिष्क ‘पश्च या डाइएनसिफैलॉन (Diencephalon): यह अग्रमस्तिष्क का पिछला भाग है। इसका पृष्ठ भाग पतला होता है तथा अधर भाग मोटा होता है जिसे हाइपोथैलैमस (hypothalamus) कहते हैं। हाइपोथैलेमस की अधर सतह पर इन्फन्डीबुलम (infundibulum) से जुड़ी पीयूष ग्रन्थि होती है।

डाइएनसिफैलॉन की पृष्ठ सतह पर पीनियल काय (pineal body) तथा अग्र रक्त जालक, (anterior choroid plexus) पाया जाता है। डाइएनसिफैलॉन की गुहा तृतीय निलय (third ventricle) या डायोसील (diocoel) होती है, यह पार्श्व गुहाओं से मोनरो के छिद्र (foramen of Monaro) द्वारा जुड़ी रहती है।

(स) मध्यमस्तिष्क (Mid brain):
यह भाग स्तनियों में बहुत अधिक विकसित नहीं होता है। इसका पृष्ठ भाग चार दृक् पालियों के रूप में होता है, जिन्हें कॉर्पोरा क्याड्रिजेमिना (corpora quadrigemina) कहते हैं। मध्यमस्तिष्क के पार्श्व व अधर भाग में तन्त्रिका ऊतक की पट्टियाँ होती हैं जिन्हें क्रूरा सेरेब्राई (crura cerebri) कहते हैं। ये पश्चमस्तिष्क को अग्रमस्तिष्क से जोड़ने का कार्य करती हैं। यहाँ दृक् तन्त्रिकाएँ एक-दूसरे को क्रॉस करके, ऑप्टिक कियाज्मा (optic chiasma) बनाती है। मध्यमस्तिष्क की सँकरी गुहा को आइटर (iter) कहते हैं, जो तृतीय निलय को चतुर्थ निलय (fourth ventricle) से जोड़ती हैं।

(द) पश्चमस्तिष्क (Hind brain):
यह मस्तिष्क का पश्च भाग है। इसे मस्तिष्क वृन्त (brain stalk) भी कहते हैं। पश्च मस्तिष्क के दो भाग होते हैं –

(i) अनुमस्तिष्क (cerebellum)
(ii) मस्तिष्क पुच्छ या मेडुला ऑब्लांगेटा (medulla oblongata)।

(i) अनुमस्तिष्क (Cerebellum):
यह प्रमस्तिष्क के पिछले भाग से सटा रहता है। अनुमस्तिष्क दो पार्श्व गोला? (lateral hemispheres) का बना होता है। अनुमस्तिष्क में बाहरी धूसर द्रव्य तथा आन्तरिक श्वेत द्रव्य होता है। श्वेत द्रव्य में स्थान-स्थान पर धूसर. द्रव्य प्रवेश करके वृक्ष की शाखाओं जैसी रचना बनाता है। इसे प्राणवृक्ष या आरबर विटी (arbor vitae) कहते हैं। अनुमस्तिष्क में गुहा अनुपस्थित होती है। अनुमस्तिष्क के अधर भाग में श्वेत द्रव्य की एक पट्टी होती है जिसे पोंस वेरोली (pons varolli) कहते हैं।

(ii) मस्तिष्क पुच्छ या मेडुला ऑब्लांगेटा (Medulla Oblongata):
यह मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग है जो आगे मेरुरज्जु के रूप में कपाल गुहा से बाहर निकलता है। मेडुला की पृष्ठ भित्ति पर पश्च रक्त जालक (posterior choroid plexus) स्थित होता है। मेडुला की गुहा को चतुर्थ निलय या मेटासील (fourth ventricle or metacoel) कहते हैं।

(य) रेटिना (Retina):
यह नेत्र गोलक की सबसे भीतरी पर्त होती है। यह प्रकाश संवेदी स्तर होता है। रेटिना का वर्णक स्तर रक्तपटल (choroid layer) से लगा होता है। रेटिना की स्थिति की भीतरी पर्त तन्त्रिका संवेदी होती है। इसका निर्माण निम्नलिखित तीन पर्तों से होता है –

(i) शलाकाओं व शंकुओं का स्तर (Layer of Rods and Cones):
शलाकाएँ (rods) तथा शंकु (cones) रूपान्तरित तन्त्रिका कोशिका होते हैं। शलाकाओं में दृष्टि पर्पल (visual purple) नामक चमकदार वर्णक होता है जिसे रोडोप्सिन (rhodopsin) कहते हैं। रोडोप्सिन का निर्माण वर्णक रेटिनीन (retinene) तथा प्रोटीन ऑप्सिन या स्कॉटोप्सिन (opsin or scotopsin) से होता है। रेटिनीन के संश्लेषण के लिए विटामिन ‘ए’ की आवश्यकता होती है।

शंकुओं में दृष्टि वायलेट (visual violet) नामक वर्णक होता है जिसे आयोडोप्सिन (iodopsin) कहते हैं। आयोडोप्सिन का निर्माण रेटिनीन तथा फोटोप्सिन (photopsin) से होता है। शंकु रंगों का ज्ञान कराते हैं। शलाकाएँ अँधेरे व प्रकाश में भेद करती हैं। ये मन्द प्रकाश में भी कार्य कर सकती हैं। मुर्गी में केवल शंकु (cones) तथा उल्लू में केवल शलाकाएँ (rods) पाई जाती हैं।

(ii) द्विध्रुवीय-न्यूरॉन का स्तर (Layer of Bipolar Neurons):
इस स्तर में द्विध्रुवीय न्यूरॉन्स की एक कतार होती हैं।

(iii) गुच्छकीय कोशिकाओं का स्तर (Layer of Ganglionic Cells):
इस स्तर में भी गुच्छकीय कोशिकाओं की एक कतार होती है। गुच्छकीय कोशिकाओं के अक्षतन्तु (axons) परस्पर मिलकर दृक् तन्त्रिका (optic nerve) का निर्माण करते हैं।
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चित्र – रेटिना की रचना का परिवर्द्धित रेखाचित्र

दृक् तन्त्रिका नेत्र गोलक के तीनों स्तरों को भेदती हुई, नेत्र कोटर में बने दृक् छिद्र (optic foramen) द्वारा होकर मस्तिष्क की ओर चली जाती है। जिस स्थान से दृक् तन्त्रिका रेटिना से निकलती हैं, वहाँ प्रतिबिम्ब निर्माण नहीं होता। इस स्थान को अन्ध बिन्दु (blind spot) कहते हैं। नेत्र की मध्य लम्ब अक्ष (optical axis) पर स्थित रेटिना के मध्य भाग को मध्य क्षेत्र (area centralis) कहते हैं। इस भाग को पीत बिन्दु (yellow spot) या मैकुला ल्यूटिया (macula lutea) भी कहते हैं। यहाँ उपस्थित एक छोटे से गर्त को फोविया सेन्ट्रैलिस (fovea centralis) कहते हैं। पीत बिन्दु क्षेत्र में सबसे स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है।

(र) कर्ण अस्थिकाएँ (Ear Ossicles):
मध्यकर्ण में तीन कर्ण अस्थिकाएँ चल सन्धियों द्वारा परस्पर जुड़ी रहती हैं। इन्हें क्रमश; मैलियस (malleus), इन्कस (incus) और स्टैपीज (stapes) कहते हैं।

(i) मैलियस (Malleus):
यह हथौड़ीनुमा होती है। इसका बाह्य सँकरा भाग कर्णपटह से तथा भीतरी चौड़ा सिरा इन्कस से जुड़ा होता है।

(ii) इन्कस (Incus):
यह निहाई (anvil) के आकार की होती है। इसका बाहरी चौड़ा सिरा मैलियस से तथा भीतरी सँकरा भाग स्टैपीज से जुड़ा होता है।

(iii) स्टैपीज (Stapes):
यह रकाब (stirrup) के आकार की होती है। इसका संकरा सिरा इन्कस से और चौड़ा सिरा फेनेस्ट्रा ओवैलिस (fenestra ovalis) से लगा होता है। कर्ण अस्थिकाएँ कर्णपटह पर होने वाले ध्वनि कम्पनों को अधिक प्रबल करके फेनेस्ट्रा ओवैलिस द्वारा अन्त:कर्ण में पहुँचाती हैं।
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चित्र – कॉक्लिया की अनुप्रस्थ काट

(ल) कॉक्लिया (Cochlea):
मनुष्य का अन्तःकर्ण या कलागहन (membranous labyrinth) दो मुख्य भागों से बना होता है। यूट्रिकुलस (utriculus) तथा सैक्यूलस (sacculus) सैक्यूलस से स्प्रिंग की तरह कुण्डलित कॉक्लिया निकलता है। यह नलिकारूपी होता है। इसमें 2\(\frac{3}{4}\) कुण्डलन होते हैं। इसके चारों ओर अस्थिल कॉक्लिया का आवरण होता है।

कॉक्लिया की नलिका अस्थिल लेबिरिन्थ की भित्ति से जुड़ी रहती है जिससे अस्थिल लेबिरिन्थ की गुहा दो वेश्मों में बँट जाती है। पृष्ठ वेश्म को स्कैला वेस्टीबुली (scala vestibuli) कहते हैं तथा अधर वेश्म को स्कैला टिम्पैनी (scala tympani) कहते हैं। इन दोनों वेश्म के मध्य कॉक्लिया का वेश्म स्कैला मीडिया (scala media) होता है।

(व) ऑर्गन ऑफ कॉरटाई (Organ of Corti):
कॉक्लिया नलिका की गुहा स्कैला मीडिया की पतली पृष्ठ भित्ति रीसनर्स कला (Reissner’s membrane) कहलाती है। अधर भित्ति मोटी होती है। इसे बेसीलर कला (basilar membrane) कहते हैं। बेसीलर कला के मध्य में कॉरटाई का अंग (organ of Corti) होता है। इसमें अवलम्ब कोशिकाओं के बीच-बीच में संवेदी कोशिकाएँ होती हैं।

प्रत्येक संवेदी कोशिका के स्वतन्त्र तल पर स्टीरियोसीलिया (stereocilia) होते हैं। कॉरटाई के अंग के ऊपर टेक्टोरियल कला (tectorial membrane) स्थित होती है। संवेदी कोशिकाओं से निकले तन्त्रिका तन्तु मिलकर श्रवण · तन्त्रिका (auditory nerve) का निर्माण करते हैं। कॉरटाई के अंग ध्वनि के उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं।
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चित्र – कॉरटाई के अंग की विस्तृत रचना

(त) सिनैप्स (Synapse):
प्रत्येक तन्त्रिका कोशिका का अक्षतन्तु (axon) अपने स्वतन्त्र छोर, पर टीलोडेन्ड्रिया (telodendria) या एक्सॉन अन्तस्थ (axon terminals) नामक शाखाओं में बँट जाता है। प्रत्येक शाखा का अन्तिम छोर घुण्डीनुमा होता है। इसे सिनैप्टिक बटन (synaptic button) कहते हैं। ये घुण्डिंया समीपवर्ती तन्त्रिका कोशिका के डेण्ड्राइट्स के साथ सन्धि बनाती हैं। इन संधियों को सिनैप्स या युग्मानुबन्ध कहते हैं।

युग्मानुबन्ध पर सूचना लाने वाली तन्त्रिका कोशिका को पूर्व सिनैष्टिक (presynaptic) तथा सूचना ले जाने वाली तन्त्रिका कोशिका को पश्च सिनैप्टिक (post synaptic) कहते हैं। इनके मध्य भौतिक सम्पर्क नहीं होता। दोनों के मध्य लगभग 20 से 40 m u का दरारनुमा सिनैप्टिक विदर होता है। इसमें ऊतक तरल भरा होता है। सिनैप्टिक विदर से उद्दीपन या प्रेरणाओं का संवहन तन्त्रिका संचारी पदार्थों; जैसे-ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) के द्वारा होता है।

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प्रश्न 6.
निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए –
(अ) सिनैप्टिक संचरण की क्रियाविधि
(ब) देखने की प्रक्रिया
(स) श्रवण की प्रक्रिया।
उत्तर:
(अ) सिनैप्टिक संचरण की क्रियाविधि (Mechanism of Synaptic Transmission):
शेरिंगटन (Sherrington) ने दो तन्त्रिका कोशिकाओं के सन्धि स्थलों को युग्मानुबन्ध (synapsis) कहा। इसका निर्माण पूर्व सिनैप्टिक तथा पश्च सिनैप्टिक तन्त्रिका तन्तुओं से होता है।

युग्मानुबन्ध में पूर्व सिनैप्टिक तन्त्रिका के एक्सॉन या अक्षतन्तु के अन्तिम छोर पर स्थित सिनैप्टिक बटन (synaptic button) तथा पश्च सिनैप्टिक तन्त्रिका कोशिका के डेन्ड्राइट्स के मध्य सन्धि होती है। दोनों के मध्य सिनैप्टिक विदर (synaptic cleft) होता है, इससे उद्दीपन विद्युत, तरंग के रूप में प्रसारित नहीं हो पाता।

सिनैप्टिक बटन या घुण्डियों में सिनैप्टिक पुटिकाएँ (synaptic vesicles) होती हैं। ये तन्त्रिका संचारी पदार्थ (neurotransmitters) से भरी होती है। उद्दीपन या प्रेरणा के क्रियात्मक विभव के कारण Ca2+ ऊतक द्रव्य से सिनैप्टिक घुण्डियों में प्रवेश करते हैं तो सिनैप्टिक घुण्डियों से तन्त्रिका संचारी पदार्थ मुक्त होता है। यह तन्त्रिका संचारी पदार्थ पश्च सिनैप्टिक, तन्त्रिका के डेन्ड्राइट पर क्रियात्मक विभव को स्थापित कर देता है, इसमें लगभग 0.5 मिली सेकण्ड का समय लगता है।

प्रेरणा प्रसारण या क्रियात्मक विभव के स्थापित हो जाने के पश्चात् एन्जाइम्स द्वारा तन्त्रिका संचारी पदार्थ का विघटन कर दिया जाता है, जिससे अन्य प्रेरणा को प्रसारित किया जा सके। सामान्यतया सिनैप्टिक पुटिकाओं से ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) नामक तन्त्रिका संचारी पदार्थ मुक्त होता है। इसका विघटन ऐसीटिलकोलीनेस्टीरेज (acetylcholinesterase) एन्जाइम द्वारा होता है।

एपिनेफ्रीन (epinephrine) डोपामीन (dopamine), हिस्टैमीन (histamine), HIHChefca (somatostatine) 3tif Taref अन्य तन्त्रिका संचारी पदार्थ हैं। ग्लाइसीन (glycine) गामा-ऐमीनोब्यूटाइरिक (gamma aminobutyric acid-GABA) आदि तन्त्रिका संचारी पदार्थ प्रेरणाओं के प्रसारण को रोक देते हैं।

(ब) देखने की प्रक्रिया (Mechanism of Vision):
नेत्र कैमरे की भाँति कार्य करते हैं। ये प्रकाश की 380 से 760 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य (wave-length) की किरणों की ऊर्जा को ग्रहण करके इसे तन्त्रिका तन्तु के क्रिया विभव (action potential) में बदल देते हैं।

नेत्र की क्रिया-विधि (Working of Eye):
जब उचित आवृत्ति की प्रकाश तरंगें कॉर्निया पर पड़ती हैं, तब कॉर्निया तथा तेजोजल प्रकाश किरणों का अपवर्तन (refraction) कर देते हैं। ये किरणें तारे से होकर लेन्स पर पड़ती हैं। लेन्स इनका पूर्ण अपवर्तन कर देता है और उल्टा प्रतिबिम्ब रेटिना पर बना देता है। आइरिस तारे को छोटा या बड़ा करके प्रकाश की मात्रा का नियन्त्रण करता है। तीव्र प्रकाश में तारा सिकुड़ जाता है तथा कम प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है। कम प्रकाश में तारा फैल जाता है और अधिक प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है।

नेत्र द्वारा समायोजन (Accommodation by Eye):
सीलियरी काय तथा निलम्बन स्नायु (suspensory ligaments) लेन्स के फोकस में अन्तर लाकर वस्तु के प्रतिबिम्ब को रेटिना पर केन्द्रित करते हैं। सामान्य अवस्था में नेत्र दूर की वस्तु देखने के लिए समायोजित रहता है। इस समय सीलियरी काय शिथिल (relaxed) रहता है तथा निलम्बन स्नायु तना रहता है। इससे लेन्स की फोकस दूरी अधिक हो जाती है और दूर की वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है।
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चित्र – नेत्र द्वारा प्रतिबिम्ब का निर्माण
पास की वस्तु देखने के लिए सीलियरी काय में संकुचन तथा निलम्बन स्नायु में शिथिलन होता है। इससे लेन्स छोटा व मोटा हो जाता है तथा इसकी फोकस दूरी कम हो जाती है। इससे पास की वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है।
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चित्र – नेत्र द्वारा समायोजन

प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन (Photo – chemical Changes):
जब विशिष्ट तरंगदैर्ध्य वाली प्रकाश की किरणें रेटिना पर पड़ती हैं, तब वे शलाकाओं तथा शंकुओं में उपस्थित रसायनों में परिवर्तन करती हैं।
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चित्र – शलाका में प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन जब प्रकाश की किरणें शलाकाओं के रोडोप्सिन पर पड़ती है, तब यह रेटिनीन (retinene) तथा ऑप्सिन (opsin) में टूट जाता है। अन्धकार में शलाकाओं में एन्जाइम्स की सहायता से रेटिनीन तथा ऑप्सिन रोडोप्सिन का संश्लेषण करते हैं। यही कारण है कि जब हम तीव्र प्रकाश से अन्धकार में जाते हैं, तब एकदम कुछ दिखाई नहीं देता किन्तु धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगता है।

शंकुओं में आयोडोप्सिन उपस्थित होता है। इसका वर्णक घटक रेटिनीन तथा प्रोटीन घटक फोटोप्सिन होता है। शंकु तीन प्रारम्भिक रंगों को ग्रहण करते हैं, जो लाल, नीला व हरा होते हैं। इन्हीं तीन प्रकार के शंकुओं द्वारा विभिन्न मात्रा में उद्दीपन ग्रहण से अन्य रंगों का ज्ञान होता है। मनुष्य व दूसरे प्राइमेट्स में दोनों नेत्रों द्वारा एक ही प्रतिबिम्ब बनता है। ऐसी दृष्टि को द्विनेत्री दृष्टि (binocular vision) कहते हैं।

(स) श्रवण की प्रक्रिया (Mechanism of Hearing):
कर्ण के निम्नलिखित प्रमुख दो कार्य होते हैं –

(i) कर्ण का प्राथमिक कार्य शरीर का स्थैतिक तथा गतिक सन्तुलन बनाए रखना तथा
(ii) ध्वनि ग्रहण करना अर्थात् श्रवण करना।

अन्त:कर्ण के कलागहन के कॉक्लिया में स्थित कॉरटाई का अंग ध्वनि के उद्दीपनों को ग्रहण करने के लिए उत्तरदायी है। श्रवण क्रिया में कर्ण द्वारा एक विशेष आवृत्ति की ध्वनि कम्पनों को ग्रहण करके कॉरटाई के अंग में स्थित संवेदी कोशिकाओं तक भेजा जाता है।

संवेदी कोशिकाएँ इन तरंगों को तन्त्रिका के क्रिया विभव में परिवर्तित कर देती है। मस्तिष्क के ध्वनि वल्कुट (auditory cortex) सुनने का कार्य करता है। मनुष्य का कर्ण 16 से 20,000 साइकिल प्रति सेकण्ड की ध्वनि तरंगों को ग्रहण कर सकता है। बाह्य कर्ण पल्लव ध्वनि तरंगों को कर्ण कुहर में भेज देता है। ध्वनि तरंगें कर्णपटह में कम्पन्न उत्पन्न करती हैं।

मध्य कर्ण की कर्ण अस्थिकाओं द्वारा कर्ण पटह से कम्पन्न अण्डाकार गवाक्ष के ऊपर मढ़ी झिल्ली पर पहुंचते हैं। इसके फलस्वरूप अन्त:कर्ण के स्कैला वेस्टीबुली (scala vestibuli) के परिलसिका में कम्पन्न होने लगता है। यहाँ के कम्पन्न स्कैला टिम्पैनी (scala tympani) के परिलसीका में पहुंचते हैं। रीसनर्स कला तथा बेसीलर कला में कम्पन्न होने से स्कैला मीडिया (scala media) के अन्त:लसीका में कम्पन्न होने लगता है जिससे कॉरटाई के अंग के संवेदी रोमों में कम्पन्न होने लगता है।

संवेदी रोमों के कम्पन्न टेक्टोरियल कला में कम्पन्न उत्पन्न करके ध्वनि संवेदना की प्रेरणा उत्पन्न कर देते हैं। श्रवण तन्त्रिका द्वारा ध्वनि संवेदना मस्तिष्क के ध्वनि वल्कुट (auditory cortex) तक पहुँच जाती है। ध्वनि की तीव्रता संवेदी रोमों के कम्पन की तीव्रता से ज्ञात होती है। ध्वनि तरंगों के कम्पन वृत्ताकार गवाक्ष की झिल्ली से टकराकर समाप्त हो जाते हैं।
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चित्र – कर्ण में ध्वनि तरंगों का मार्ग

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प्रश्न 7.
(अ) आप किस प्रकार किसी वस्तु के रंग का पता लगाते हैं?
(ब) हमारे शरीर का कौन-सा भाग शरीर का सन्तुलन बनाए रखने में मदद करता है?
(स) नेत्र किस प्रकार रेटिना पर पड़ने वाले प्रकाश का नियमन करते हैं?
उत्तर:
(अ) नेत्र गोलक की रेटिना तन्त्रिका संवेदी (neurosensory) होती है। इसमें दृष्टि शलाकाएँ (rods) तथा दृष्टि शंकु (cones) पाए जाते हैं। शंकुओं में आयोडोप्सिन (iodopsin) दृष्टि वर्णक पाया जाता है। तीव्र प्रकाश में शंकु विभिन्न रंगों को ग्रहण करते हैं। शंकु तीन प्राथमिक रंगों लाल, हरे व नीले से सम्बन्धित भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। ये इन प्राथमिक रंगों को ग्रहण करते हैं। इन प्राथमिक रंगों के मिश्रण से विभिन्न रंगों का ज्ञान होता है।

(ब) अन्त:कर्ण की अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं के तुम्बिका (ampulla), सैक्यूलस तथा यूट्रिकुलस शरीर का सन्तुलन बनाने का कार्य करती है। यूट्रिकुलस तथा सैक्टूलस के मैकुला तथा अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं के तुम्बिका में स्थित संवेदी कूटों द्वारा गतिक सन्तुलन (dynamic equilibrium) नियन्त्रित होता है।

जब शरीर एक ओर को झुक जाता है, तब ऑटोकोनिया उसी ओर चले जाते हैं जहाँ वे संवेदी कूटों को उद्दीपन प्रदान करते हैं। इससे तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होता है और मस्तिष्क में शरीर के झुकने.की सूचना पहुँच जाती है। मस्तिष्क प्रेरक तन्त्रिकाओं द्वारा सम्बन्धित पेशियों को सूचना भेजकर शरीर का सन्तुलन बनाता हैं।

(स) रेटिना (retina) पर पड़ने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन उपतारा (iris) द्वारा किया जाता है। यह एक मुद्राकार, चपटा, मिलैनिन वर्णकयुक्त तन्तुपट (diaphragm) के रूप में होता है। इसके गोल छिद्र को तारा या पुतली (pupil) कहते हैं। उपतारा (iris) में अरेखित अरीय प्रसारी पेशियाँ (radial dilatory muscles) तथा अरेखित वर्तुल अवरोधिनी पेशियाँ (circular sphincter muscles) होती है।

अरीय पेशियों के संकुचन से पुतली का व्यास बढ़ जाता है और वर्तुल पेशियों के संकुचन से पुतली का व्यास घट जाता है। इस प्रकार ये पेशियाँ क्रमश: मन्द प्रकाश और तीव्र प्रकाश में संकुचित होकर रेटिना पर पड़ने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन करती हैं।
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चित्र – उपतारा (iris) में पेशियों का विन्यास

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प्रश्न 8.
(अ) सक्रिय विभव उत्पन्न करने में Na+ की भूमिका का वर्णन कीजिए।
(ब) सिनैप्स पर न्यूरोट्रान्समीटर मुक्त करने में Ca++ की भूमिका का वर्णन कीजिए।
(स) रेटिना पर प्रकाश द्वारा आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
(द) अन्तःकर्ण में ध्वनि द्वारा तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(अ) सक्रिय विभव उत्पन्न करने में Na+ की भूमिका (Role of Na+ in the generation of Action Potential):
उद्दीपन के फलस्वरूप तन्त्रिकाच्छद या न्यूरीलेमा की Na+ के लिए पारगम्यता बढ़ जाने से Na+ ऊतक तरल से ऐक्सोप्लाज्म में तेजी से पहुँचने लगते हैं। इसके फलस्वरूप तन्त्रिका तन्तु का विध्रुवीकरण हो जाता है और तन्त्रिका तन्तु का विश्राम कला विभव क्रियात्मक कला विभव में बदलकर प्रेरणा प्रसारण में सहायता करता है।

(ब) सिनैप्स पर न्यूरोट्रान्समीटर मुक्त करने में Ca++ की भूमिक (Role of Ca++ to release Neurotransmitters of Synapsis):
जब कोई तन्त्रिकीय प्रेरणा क्रियात्मक विभव के रूप में सिनैप्टिक घुण्डी पर पहुँचती है तो Ca++ ऊतक तरल से सिनैप्टिक घुण्डी में प्रवेश कर जाते हैं। इनके प्रभाव से सिनैप्टिक घुण्डी की सिनैप्टिक पुटिकाएँ इसकी कला से जुड़ जाती हैं।

इससे सिनैप्टिक पुटिकाओं से तन्त्रिका संचारी पदार्थ (न्यूरोट्रान्समीटर) मुक्त होकर सिनैप्टिक विदर के ऊतक तरल में पहुँच जाता है और पश्च सिनैप्टिक तन्त्रिका कोशिका के ड्रेन्ड्राइट्स पर रासायनिक उद्दीपन द्वारा क्रियात्मक विभव को स्थापित कर देता है।

(स) रेटिना पर प्रकाश द्वारा आवेग उत्पन्न होने की fatenfalfa (Mechanism of generation of Light Impulse in the Retina) – प्रश्न 6 ‘ब’ के अन्तर्गत प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन (photo-chemical changes) का विवरण देखिए।

(द) अन्तःकर्ण में ध्वनि द्वारा तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि (Mechanism through which a Sound produces a Nerve Impulse in the Internal Ear) – प्रश्न 6 ‘स’ के अन्तर्गत देखिए।

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प्रश्न 9.
निम्न के बीच में अन्तर बताइए –
(अ) आच्छादित और अनाच्छादित तंत्रिकाक्ष
(ब) द्रुमाक्ष्य और तन्त्रिकाक्ष
(स) शलाका और शंकु
(द) थैलेमस तथा हाइपोथैलेमस
(य) प्रमस्तिष्क और अनुमस्तिष्क।
उत्तर:
(अ) आच्छादित और अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु (Myelinated and Non-myelinated Neuron):
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(ब) द्रुमाक्ष्य या गुमाश्म या वृक्षाभ और तन्त्रिकाक्ष में अन्तर (Difference between Den – drites and Axons):
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(स) शलाका और शंकु में अन्तर (Difference between Rods and Cones):
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(द) थैलेमस तथा हाइपोथैलेमस में अन्तर (Difference between Thalamus and Hypothalamus):
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(य) प्रमस्तिष्क तथा अनुमस्तिष्क में अन्तर (Difference between Cerebrum and Cerebellum):
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प्रश्न 10.
(अ) कर्ण का कौन-सा भाग ध्वनि की पिच का निर्धारण करता है?
(ब) मानव मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग कौन-सा है?
(स) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का कौन-सा भाग मास्टर क्लॉक की तरह कार्य करता है?
उत्तर:
(अ) कॉरटाई के अंग (organ of Corti) की संवेदनग्राही कोशिकाएँ ध्वनि की पिच का निर्धारण करती हैं तथा उद्दीपनों को ग्रहण करके श्रवण तन्त्रिका (auditory nerve) में प्रेषित करती हैं।
(ब) प्रमस्तिष्क (cerebrum) मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग है। यह मस्तिष्क का लगभग 80% भाग बनाता है।
(स) मस्तिष्क मास्टर क्लॉक की तरह कार्य करता है।

प्रश्न 11.
कशेरुकी के नेत्र का वह भाग जहाँ से दृक् तन्त्रिका (optic nerve) रेटिना से बाहर निकलती है, क्या कहलाता है –
(अ) फोविया (Fovea)
(ब) आइरिस (Iris)
(स) अन्ध बिन्दु (Blind spot)
(द) ऑप्टिक किएज्मा (चाक्षुष किएज्मा)।
उत्तर:
(स) अन्ध बिन्दु (Blind spot)।

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प्रश्न 12.
निम्नलिखित में भेद स्पष्ट कीजिए –
(अ) संवेदी तन्त्रिका एवं प्रेरक तन्त्रिका।
(ब) आच्छादित एवं अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु में आवेग संचरण।
(स) ऐक्विअस ह्यूमर ( नेत्रोद) एवं विट्रियस ह्यमर (काचाभ द्रव)।
(द) अन्ध बिन्दु एवं पीत बिन्दु।
(य) कपालीय तन्त्रिकाएँ एवं मेरु तन्त्रिकाएँ।
उत्तर:
(अ) संवेदी तन्त्रिका एवं प्रेरक तन्त्रिका में अन्तर (Difference between Sensory and Motor Nerve):
Bihar Board Class 11 Biology Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

(ब) आच्छादित एवं अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु में आवेग संचरण में अन्तर (Difference between Conduction of Nerve Impulse in a Myelinated and Non Myelinated Nerve Fibres):
Bihar Board Class 11 Biology Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

(स) एक्विअसामर (नेत्रोद) एवं विट्रियस ह्यमर (काचाभ द्रव) में अन्तर (Difference between Aqueous and Vitreous Humour):
Bihar Board Class 11 Biology Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

(द) अन्ध बिन्दु एवं पीत बिन्दु में अन्तर (Difference between Blind Spot and Yellow Spot):
Bihar Board Class 11 Biology Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

(य) कपालीय तन्त्रिकाओं एवं मेरु तन्त्रिकाओं में अन्तर (Difference between Cranial Nerves and Spinal Nerves):
Bihar Board Class 11 Biology Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions राजनीति शास्त्र

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BSEB Bihar Board Class 11th Political Science Book Solutions राजनीति शास्त्र

Bihar Board Class 11th Political Science Part 1: Political Theory (राजनीतिक सिद्धान्त)

Bihar Board Class 11th Political Science Part 2: Indian Constitution at Work (भारत का संविधान : सिद्धान्त और व्यवहार)

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Bihar Board Class 11th Geography Solutions भूगोल

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BSEB Bihar Board Class 11th Geography Book Solutions भूगोल

Bihar Board Class 11th Geography Part 1: Fundamentals of Physical Geography (खण्ड – 1: भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

Bihar Board Class 11th Geography Part 2: Indian Physical Environment (खण्ड – 2: भारत-भौतिक पर्यावरण)

Map Related Questions and Answers (मानचित्र संबंधी प्रश्न एवं उत्तर)

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Bihar Board Class 11th Home Science Solutions गृह विज्ञान

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Bihar Board Class 11th Chemistry Solutions रसायन विज्ञान

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions 100 & 50 Marks BSEB Pdf Download दिगंत भाग 1

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Bihar Board Class 11th Hindi 100 & 50 Marks व्याकरण एवं रचना

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Bihar Board Class 11th Psychology Solutions मनोविज्ञान

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Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 2 The Marriage of True Minds

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Bihar Board Class 11 English The Marriage of True Minds Textual Questions and Answers

[A] 1. Work in small groups and discuss these questions :

Marriage Of True Minds Meaning Bihar Board Question 1.
What is love ? Can there be different manifestations of love ?
Answer:
Love is an eternal boon which has no alternation. Love is true and permanent. There can be no different manifestations of love because love is true and eternal.

Marriage Of Two Minds Bihar Board Question 2.
You love different persons in your life : Your parents, brothers sisters, friends, wife etc. What is common about your love to each of them ?
Answer:
Love with family members, friends and neighbours is selfish love. It is common with all. I love them because they satisfy me in many ways. This is not a true love. Love has no selfishness.

The Marriage Of True Minds Bihar Board Question 3.
At times you feel drawn to opposite sex ? What is that which draw you to him/her : love or mere physical attraction ? How will you differentiate ?
Answer:
Sometimes physical attraction attracts some one. For the time being he/she looses his/her temper and wants to become one. But this love is not love. It is only bodily attraction which ruins after some time.

[B] Answer the following questions briefly :

The Marriage Of True Minds Summary Bihar Board Question 1.
What is meant by ‘the marriage of true minds ?
Answer:
‘Marriage of true minds’ means mixing up of two into one heartily for the life long. A true lover lives for his love and dies for his love. This type of love is called marriage of true minds.

The Marriage Of True Minds Meaning Bihar Board Question 2.
What is ‘an ever-fixed mark’ ?
Answer:
True love is permanent. No wordy attractions and activities have power to interfere in it. True love is eternal, so it is called ‘ever-fixed mark’.

To The Marriage Of True Minds Bihar Board Question 3.
What is meant by ‘Time’s fool’ ? Is love ‘Time’s fool ? Why or why not ?
Answer:
Time’s fool means a love for a short period. Real love is not time’s fool. Love is constant. It remains for life long.

Marriage Of The Minds Bihar Board Question 4.
What kind of love alters when it finds alterations ?
Answer:
Artificial love alters. It varies time to time. It has no existence. So when one sees or gets chance, shows affection and other time forgets. This kind of love is not love. It is only bodily satisfaction for the time being.

The Marriage Of True Minds Summary In Hindi Bihar Board Question 5.
Can external force change love ?
Answer:
No, external force has no power to change true love.

Class 11 English Poem 2 Question Answer Bihar Board Question 6.
How does Shakespeare depict permanent nature of love ?
Answer:
Shakespeare has compared love with the pole star which never changes its place and twinkles. Even in great disturbances it never shakes because it is eternal.

Question 7.
Why is love compared to a pole star ?
Answer:
A pole star is fixed at the same place always. It does not move from its permanent aboard. So like polestar love has also no alteration. True love lasts for ever. So love is compared with pole star.

Question 8.
Can you tag a price to love ? Why or why not ?
Answer:
Love is priceless. No can pay price for love. So it is never tagged as worldly materials.

Question 9.
Can time affect love ?
Answer:
No, time cannot affect love.

Question 10.
If you have to choose between worldly, pleasure and the goal of your life, what will you choose ? Why ? give two reasons. [Board Model 2009 (A)]
Answer:
(a) If I have to choose between wordly pleasure and the goal of my life I will choose the later. For, wordly pleasures will not last long. But if I mach my goal. I will attain permanent bliss. Besides, a man who indulges in worldly pleasure cannot achieve much in life. He will do nothing so that peeterity will remain by him.

Question 11.
Describe after Shakespeare the nature of true love. [Board Model 2009 (A)]
Answer:
True Love is described by Shakespeare remains unaffected by obstacles or impediments. It can with stand any tempestor trouble and be a true guide in all circumstances. It is even fixed and cannot be submitted. Even time can not fate true love.

[C] Long Answer Type Questions :

Question 1.
Attempt, after Shakespeare, a comprehensive definition of love.
Answer:
William Shakespeare in his poem “The Marriage of True Minds” has given a comprehensive definition of love. According to the poet, love means a union of two souls. To him, it is a marriage of true minds. Love is not love which changes when ever it disires to change. A love cannot be removed when a remover wants to remove it. Love does not allow hindrances and obstacles to come. So, a true lover lives for his love and dies for his love. This type of love is called marriage of true minds.

According to the poet, true love is permanent. True love is eternal. So, it is called ever-fixed mark. Real love is not for a short period. It remains for life long.

An artificial love may be changed, it has no existance. This kind of love is not love. A true love is compared to pole star. A pole star is fixed at the same place; It does not move from its permanent place. So like a pole star love has no alteration. Love is priceless. No one can pay price for love. Time can not affect love.

Question 2.
Describe, after Shakespeare, the nature of true love.
Answer:
William Shakespeare in his poem “The Marriage of True Minds” has very successfully described the nature of true love. True love is a sweet gift of nature. True love means mixing up of two true hearts and minds in one. It has got the relation with two souls. Physical attraction has no value in true love. It is nature’s greatest boon. A true lover never changes his attitude. He has no different manifestations of love. Even in great troubles a true love can not go back or forget his love. A true love is stable and permanent. It is just like a pole star which never changes its place. A true love is eternal. It is spiritual.

Question 3.
What in your opinion is love related to-spirit or physical lust ?
Answer:
In my opinion love is related to spirit. Love is spiritual not physical. It is a union of two soul’s or spirits, It has no relation with physical attraction. It is for a short time. It is not permanent. So love is eternal, permanent and for life long.

Question 4.
Narrate the gist of the poem in your own words.
Or, Give the main idea of the poem. “The Marriage of True Minds.”
Or, Summaries the poem “The Marriage of True Minds”.
Answer:
“The Marriage of True Minds” is a sonnet composed by William Shakespeare. In this poem the poet has described the nature of true love. To him, true love is sweet gift of nature. A real love means mixing up of two souls and minds in one. It is an eternal gift. Love is not mere physical attraction. There can not be different manifestations of love because love is true and enternal. A true lover loves for his love. This type of love is called marriage of true minds. True love is permanent. It is called ‘an ever fixed mark’. It is not for short period. It is constant. It remains for life long.

Artificial love alters when it finds alteration. This kind of love is not love. It is only bodily satisfaction for the time being. A true love is like a pole star that does not change its place. It is fixed at the same place. It lasts for ever. So love is compared to a pole star. Time also can not affect love.

Question 5.
Can time control love ? What can it do at its best ?
Answer:
Time can not control love. William Shakespeare in his poem, “The Marriage oi True Minds” has clearly described that time can not control love. In third stranza of the poem, the-poet has said—“Love’s not Time’s fool”. It means love is not for short period. Love cannot be changed in hour’s and weeks. It is permanent. It bears it out even to the edge of doom. Time can creates troubles, disturbances and obstacles. But love can stay beyond time. It can not be restricted by hours, weeks, months and years.

Question 6.
Comment on the treatment of the theme of Love and Time in the poem.
Answer:
The poem “Marriage of True Minds” has been composed by William Shakespeare. In this poem the poet has described the theme of love, and time. According to the poet love is the theme of his poem. The poem is a sonnet. The poet has described the nature, the definition, the importance and the duration of love throughout the poem. The whole theme of the poem revoles round the discretion of love.

To him love is a union of two souls. Love is spiritual not physical. It is permanent. It is external. It is for life long, it is not for short period. It can not be controlled by time. Physical attraction and outer disturbances can not harm love, So the poet has very successfully made clear the theme of Love and Time in his poem. “The Marriage of True Minds”.

Question 7.
How is the changelessness of love brought out in the first two quatrains ?
Answer:
In the first two stanzas of the poem “The Marriage of True Minds”, Willian Shakespeare has very successfully brought out the changelessness of love. The poet says that not one should be allowed to make hindrances to the marriage of true minds. To him, true love is the union of two pure souls and minds. According to the poet, the love that makes alterations is not love. Love is not the choice of the remover who removes (change) his love according to his convenience.

In the second stanza, the poet says that love is ‘an ever-fixed mark’. It means true love is permanent. Love is like a pole star. A pole star is fixed at a particular place. It does not move from its permanent place. So, like pole star love has also no alterations. True love lasts for ever. It can not be changed.

Question 8.
What does the speaker declare in the final couplet ? What makes him do so?
Answer:
The poet in the final (last) two lines wants to confirm what he has said about true love. He is confident that true love is eternal, unchangeable and permanent. It is a union of two hearts, not of two bodies. Love is spritual not physical.

The poet is so confident about his thought that he says that if my opinion about true love is wrong and if this is proved that ‘I am wrong it means I never wrote such poem and it is also true that no man has ever loved’ ’ It means if the poet is wrong, the story of true love, the dictum of true love is also wrong and no man in future will tell the story of true love nor no man will be ever loved.

Question 9.
How is love contrasted with Physical love ?
Answer:
According to the poet William Shakespeare, there is great contrast between spiritual love and physical love. Spiritual love is true love. It is the marriage of two souls. Spiritual love is eternal, It is permanent. It does not change with hours, weeks and months, Real love is not for short period. It is for life long. A true love is a sweet gift of nature. A real love is mixing up of two souls and minds in one. Love is an ever-fixed marks. It means true love is permanent. True love is like a pole-star. A pole star is fixed at a particular place. So, like pole-star spiritual love has also no alterations. It lasts for ever.

Unlike spiritual love, physical love is not permanent. According to the poet, the love that makes physical attractions is not real love. It is for short period. Physical love is over, the sooner physical satisfaction is fulfilled.

Question 10.
Pick out metaphors used in the poem and comment on their implied meaning.
Answer:
A metaphor is a figure speech that makes a comparison, usually implied not overtly stated, between two seemingly unlike things. In the poem “The Marriage of True Minds” the poet William Shakespeare has used metaphors. The very title of the poem” The marriage of True Minds” is a metaphor. The word ‘marriage’ is used metaphorically. Its implied meaning is ‘union’. True Minds’ is also used metaphorically. Its implied meaning is ‘true lovers’. The word “Tempests” is’also used metaphorically.Its implied meaning is ‘great disturbances’. The other metaphors are noted below :
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 2 The Marriage of True Minds 1

Question 11.
Discuss ‘The Marriage of True Minds’ as a sonnet
Answer:
A sonnet is a poem of 14 lines. It is either consisting of an octave followed by a sestet (Petrarchan sonnet) or three quatrains followed by a couplet with a special arrangement of rhymes. A sonnet consisting of three quatrains followed by a couplet is called Shakespearean sonnet. A sonnet is concentrated expression of some single though or feeding or situation. Subjectivity, spontaneity, sincerity, reflection, music and melody are some other important characteristics of a sonnet.

“The Marriage of True Minds” is a Shakespearean sonnet. The sonnet consists of three quatrains followed by a couplet with a special arrangement of rhymes. The first three stanza consists of four lines each. The last stanza consists of two lines.

The poem has expression of single though. The sonnet has described the definition and nature of love. The theme of the complete poem is one and that is the description of true love. In short, the poem “The Marriage of True Minds” has all the characteristics of a sonnet. Subjectivity, spontaneity .sincerity, reflection, music and melody are the main characteristics of this poem.

C. 3. Composition:

Question a.
Write a letter in about 150 words to your friend describing how your love for someone made you more determined to achieve something.
Answer:

Naya Tola
Patna
10 March, 2013

DearRakesh,

I am quite well here along with the member of my family and hope that you will be the same. Today I am going to disclose a secret through this letter.

You know that since school-days I wanted to be a college-teacher. You often asked me about my inspiration. Today I tell you that my father was my inspiration. He wanted me to be a college-teacher.

As I loved him too much, after his death my sole aim was to be a college- teacher one day. My love to him to fulfill his wish made me more determined to achieve my goal. I worked heart and soul to achieve my goal. Though my father’s death casually brought before me a lot of problems as to earn, to take care of a large family and to continue studies in crisis, yet my love to him worked as a guiding and an inspiring force. The more the problems came to me the more my love to my father increased and deepened and worked as an inspiring force. Thank God ! Ultimately I succeeded in achieving my goal.

With best wishes.

Yours affectionately
Anshu Singh

Question b.
Write a paragraph in about 100 words on ‘Love and Life’.
Answer:
Love and Life

It is an old saying that ‘Love is God and God is Love’. This saying has complete truth in it. Really without love life is nothing. As a child is bom, his family begins to love him. As he grows, the society begins to love him and so does he. As a youth, he loves his beloved. Later on as a husband, he begins to love his wife,children and his nation. This is a common thing. Besides it, a man loves other creatures and natural objects. The last stanza of Coleridge’s ‘The Rime of the Ancient Mariner’ is its fine example. To quote :

“He prayeth best, who loveth best
All things both great and small;
For the dear God who loveth us, .
He made and loveth all.”

Thus, we should love all the creatures of the earth. Without love life is hellish.

D. 1. Dictionary Use :

Question 1.
Look up a dictionary and write two meanings of each of the following words-the one in which it is used in the lesson and the other which is more common : marriage, admit, bark, edge
Answer:
marriage – (i) union (ii) a social custom in which a man and a woman unites together as a husband and wife
admit – (i) give leave to enter to (ii) acknowledge as true
bark – (i) ship (ii) skin of tree
edge – (i) day (ii) margin/border

D. 2. Word-meaning:

Question 1.
Match the words given in Column ‘A’ with their meanings given in Column ‘B’:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 2 The Marriage of True Minds 2
Answer:
1. (e)
2. (h)
3. (c)
4. (d)
5. (a)
6. (f)
7. (g)
8. (b)

E. GRAMMAR:

Ex 1. Mark carefully the structure of the sentence given below and make five sentences of your own on the same pattern.
Let me put my car in the garage.
Answer:
Pattern : Let + Sub (‘I’ in objective case) + Possessive Adj.+ Noun+O.W.

  1. Let me write my notes today.
  2. Let me have my dinner in the hotel tonight.
  3. Let me do my duty now.
  4. Let me have my bathe in the rive today.
  5. Let me keep my documents in your bag.

Ex. 2. Read the following lines carefully :
It is the star to every Wand’ ring bark
Love’s not Time’s fool.

Mark the use of apostrophe to the missing letter ‘e’ in ‘wandering’ and ‘i’ in ‘Love is’. The latter is the example of contraction-of. auxiliary verb; e.g. ‘I’m’ for ‘I am’ etc. Note also the use of apostrophe in ‘Time’s fool’ to show possession or ownership.

Now find out examples of apostrophe in the poem and decide why apostrophe has been used in each of them.
Answer:
Besides ‘wand’ ring, ‘Love’s’ and ‘Time’s fool’, ‘Worth’s’ and ‘Sickle’scompass’ are examples of apostrophe. In ‘Worth’s’ it has been used as the example of the contracted form of auxiliary verb (worth is) and in ‘Sickle’s compass’ it has been used to show possession.

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राष्ट्र किस प्रकार से बाकी सामूहिक सम्बद्धताओं से अलग है?
उत्तर:
मानव एक सामाजिक प्राणी है। ऐसा प्रकृति के कारण है। व्यक्ति अपना जीवन समूह में व्यतीत करता है। उसका ऐसा पहला समूह परिवार था, जब उसने अपना जीवन व्यतीत किया। परिवार से वह विभिन्न संघों और समाज के सम्पर्क में आया। संघ के पश्चात् राज्य और बाद में देश बना। राज्य सर्वाधिक अनुशासित और संगठित संस्था है। राज्य संगठित एवं अनुशासित है, क्योंकि इसके पास प्रभुसत्ता होती है, अर्थात् नागरिकों एवं विषयों के ऊपर राज्य एक उच्च शक्ति है। इन सभी समूहों में राष्ट्र का सामूहिक संगठन का आधार अन्य की तुलना में भिन्न होता है।

परिवार का आधार रक्त सम्बन्ध होता है। समाज का आधार लोगों का एक दूसरे पर आश्रित होना है और संघ का आधार निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करना है। ये सभी सामाजिक समूह लोगों के समूह हैं। राष्ट्र के संगठन का आधार राष्ट्रीयता होती है, जो समान जाति, समान इतिहास, समान संस्कृति, समान नैतिकता, समान विश्वास और समान भूगोल के लोगों का समूह होता है। राष्ट्रीयता देशभक्ति की भावना को जागृत करती है। विभिन्न तत्वों के समान राष्ट्रीयता के कारण उनके भावी स्वप्न भी समान होते हैं। इस प्रकार राष्ट्र अन्य सामाजिक समूहों से भिन्न होता है।

राष्ट्रवाद पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 2.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार से आप क्या समझते हैं? किस प्रकार यह: विचार राष्ट्र-राज्यों के निर्माण और उनको मिल रही चुनौती में परिणत होता है?
उत्तर:
आत्म-निर्णय का सिद्धान्त समाज की लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है। आत्म-निर्णय के सिद्धान्त को प्रथम विश्व युद्ध के समय संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ने प्रस्तुत किया था। आत्म-निर्णय के सिद्धान्त का तात्पर्य है कि प्रत्येक सामाजिक और सांस्कृतिक समूह या समान संस्कृति और भूगोल के लोगों.की पसन्द के कानून को चुनने का अधिकार होना चाहिए।

इसका यह भी मतलब है एक सामाजिक समूह को नियन्त्रण करने वाले कानून को सामाजिक समूहों के सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषा सम्बन्धी क्षेत्रीय और भौगोलिक आकांक्षाओं को प्रकट करना चाहिए, जिसके लिए कानून बनाया जाता है। अधिकार के द्वारा राष्ट्र अपने आपको नियन्त्रित रखते हैं और अपने भावी विकास का निर्धारण करते हैं। इस प्रकार के आवश्यकताओं के निर्माण में राष्ट्र एक स्पष्ट राजनीतिक पहचान के रूप में अपने स्तर के अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के द्वारा अपनी पहचान और स्वीकृति चाहते हैं।

इस प्रकार की अधिकांश माँगें. लोगों द्वारा हुई हैं, जो एक विशिष्ट स्थान पर लम्बे समय से एक साथ रहते हैं और जिन्होंने समान पहचान का दृष्टिकोण विकसित किया है। इस अधिकार ने एक ओर लोगों के आत्मविश्वास को राज्य के कार्यों में बढ़ाया है और उनके विकास को सुनिश्चित किया था। परन्तु इसी समय इस अधिकार ने राज्य व्यवस्था के लिए चुनौतियों को पेश की है और उससे अलगाव की प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हो रही हैं। इस प्रकार इस अधिकार ने जन-विरोधी स्थिति को उत्पन्न किया है। विशेष रूप से एकीकरण की स्थिति में मुश्किलें बढ़ जाती हैं।

संयुक्त सोवियत रूस का पतन 15 राष्ट्र राज्यों में आत्म निर्णय के अधिकार की स्वीकृति के कारण हुआ। चूँकि अधिकांश समाज बहुदलीय और विरोधी हैं। प्रत्येक राज्य अल्प राष्ट्रीयता की समस्या का समाना कर रहे हैं। उदाहरण के लिए इस सन्दर्भ में श्रीलंका का नाम लिया जा सकता है, जहाँ एल.टी.टी.ई. अलग राज्य की माँग कर रहा है। इसी प्रकार भारत में भी आतंकवादी गुटों की यही माँग है। यह राष्ट्र राज्य के रूप में जम्मू कश्मीर की है। इसका समाधान राष्ट्रीय हितों और स्थानीय, क्षेत्रीय और सामाजिक हितों के बीच समझौता और समर्थन है।

राष्ट्रवाद के प्रश्न उत्तर कक्षा 11 Bihar Board प्रश्न 3.
हम देख चुके हैं कि राष्ट्रवाद लोगों को जोड़ भी सकता है और तोड़ भी सकता है। उन्हें मुक्त कर सकता है और उनमें कटुता और संघर्ष भी पैदा कर सकता है। उदाहरणों के साथ उत्तर दीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रीयता व्यक्ति की वहं भावना है, जो राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय महत्त्व, राष्ट्रीय सम्मान और त्याग की भावना से सम्बद्ध है। राष्ट्रीय भावना से एक व्यक्ति अपने निजी, क्षेत्रीय, भाविक और अन्य हित के कार्य राष्ट्र के लिए और उसके सम्मान में करता है। राष्ट्रवाद समान राष्ट्रीयता के लोगों में उत्पन्न किया जाता है अर्थात् यह समान संस्कृति, जाति, इतिहास, रहन-सहन और भूगोल के लोगों का समूह है। यह एक व्यक्ति के राष्ट्र के प्रति महत्त्व की जागरुकता का परिणाम है। वह राष्ट्रीय इतिहास और गौरव के प्रति भी चैतन्य रहता है। आज राष्ट्रवाद देशभक्ति से जुड़ा हुआ है अर्थात् इससे देश के लिए त्याग और प्रेम की भावना उत्पन्न होती है।

राष्ट्रवाद एक संवेगात्मक और मनोवैज्ञानिक अवधारणा है, जो भूमि, झंडा और गाने को गौरवान्वित अवधारणा है, राष्ट्रभूमि को ‘माँ’ के रूप में जाना जाता है अर्थात् यह मातृभूमि है और यह माना जाता है कि माँ द्वारा प्रदत्त यहाँ सब कुछ है। इस प्रकार मातृभूमि ही देश है। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिनसे पता चलता है कि एक राष्ट्र और उनके लोग औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी ताकतों के शोषण से किस प्रकार मुक्त हुए।

19 वीं और 20 वीं शताब्दी में अनेक एशियाई और अफ्रीकी देश राष्ट्रवाद के फलस्वरूप ही आजाद हुए। सकारात्मक दृष्टिकोण से राष्ट्रवाद एक धर्म है। परन्तु जब यह चरमोत्कर्ष पर होता है, तो यह मानवता के लिए हानिकारक होता है। इसका चरमोत्कर्ष और नकारात्मक रूप को अति राष्ट्रवाद (challanism) कहा जाता है। अनेक दर्शन हैं, जिनका विकास चरमोत्कर्ष राष्ट्रवाद के आधार पर हुआ है। जर्मनी में नाजीवादी और इटली में फांसीवादी दर्शन का जन्म हुआ, जिनसे निम्नता और सर्वोच्चता की भावना का जन्म हुआ। फलस्वरूप कटुता, आतंकवाद और युद्धों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।

राजनीतिक सिद्धांत पाठ 7 के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
वंश, भाषा, धर्म या नस्ल में से कोई भी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के लिए सांझा कारण होने का दावा नहीं कर सकता। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रीयता की भावना के विकास में निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं –
1. समान विश्वास:
राष्ट्रवाद की भावना उस समय उत्पन्न होती है, जब लोगों में एक होकर रहने की भावना हो और वे एकसाथ तभी रह सकते हैं, जब उनमें आपस में विश्वास हो। जब टीम में सामूहिकता की भावना होती है, तब उनके उद्देश्य और आकांक्षाएँ समान होती हैं।

2. समान इतिहास:
जब लोगों के सुख-दुःख, विजय-पराजय, लाभ-हानि, युद्ध-शान्ति, अहिंसा-हिंसा का इतिहास समान होता है, तब एकता की भावना का विकास होता है, जो राष्ट्रवाद के लिए आवश्यक है। जब लोग अपने स्वयं का इतिहास का निर्माण करते हैं, तो उनमें राष्ट्रवादी भावना बढ़ने लगती है।

वे ऐतिहासिक साक्ष्यों का प्रयोग राष्ट्रीयता के भावना को बढ़ाने के लिए करते हैं। भारत का एक सभ्यता के रूप में लम्बा और गौरवपूर्ण इतिहास है, जो भारत का देश के रूप में आधार है और भारत में राष्ट्रीयता को बढ़ाने का साधन है। पं. जवाहर लाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत एक खोज’ (Discovery of India) में भारतीय सभ्यता का गौरवपूर्ण इतिहास प्रस्तुत किया है।

3. समान भू-भाग:
समान भू-भाग एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है, जो राष्ट्रवाद को बढ़ावा देता है। भू-भाग किसी देश की भूमि का हिस्सा होता है, जो संवेगी और आध्यात्मिक होता है, जो लोगों को एक साथ जोड़े रखता है और उनमें राष्ट्रीय भावना और राष्ट्रवाद का विकास करता है।

4. समान भावी आकांक्षाएँ:
समान भावी आकांक्षाएँ लोगों में एकता स्थापित करती हैं और राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न करती हैं। भविष्य के समान स्वप्न और सामूहिक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आकांक्षाएँ भविष्य में लोगों को एक रखती हैं। समान भावी आकांक्षाएँ देश के कार्य और राष्ट्रवाद के कार्य में सहयोग करती हैं। ये नागरिक के गुणों में वृद्धि करती हैं और इच्छा शक्ति को मजबूत करती हैं। उदाहरण के लिए पी.एल.ओ.।

5. समान संस्कृति:
राष्ट्रवाद लाने और बढ़ाने के लिए एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक समान संस्कृति है। समान संस्कृति में समान परम्पराओं, त्योहारों, इतिहास, भूगोल, भाषा आदि शामिल हैं, जो सामान्य हितों और उद्देश्यों को बढ़ावा देती हैं, जिससे राष्ट्रीयता की भावना का विकास होता है।

राष्ट्रवाद कक्षा 11 Bihar Board प्रश्न 5.
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारकों पर सोदाहरण रोशनी डालिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र एक सरकारी व्यवस्था है, जो समानता, बहुलवाद, उदारवाद और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है। राष्ट्रवाद निश्चित रूप से एक सकारात्मक भावना है। परन्तु जब राष्ट्रवाद पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है, तो यह नकारात्मक हो जाता है, तब यह समाज के लिए खतरनाक और हानिकारक हो जाता है।

चरमोत्कर्ष राष्ट्रवाद अनैच्छिक है, क्योंकि चरमोत्कर्ष राष्ट्रवादी व्यक्ति दूसरे लोगों के धर्म क्षेत्र, संस्कृति, भाषा आदि को हानि पहुँचाता है और इससे असहिष्णुता की भावना बढ़ती है। पराकाष्ठा की देशभक्ति एक नकारात्मक भावना है और किसी भी समाज के लिए अनैच्छिक और हानिकारक है। इससे दूसरे क्षेत्र, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता के लोगों में असहिष्णुता की भावना बढ़ती है। इसलिए ऐसे राष्ट्रवाद जो चरमोत्कर्ष पर और जो नकारात्मक हो, रोकने का उपाय होना चाहिए। निम्नलिखित मुख्य कारक हैं, जो अति राष्ट्रवाद को सीमित करते हैं –

1. लोकतन्त्रता:
लोकतन्त्र, समानता, न्याय, सहनशीलता और मानव मूल्यों पर आधारित होता है, जो किसी भी प्रकार के उग्रवाद पर रोक लगाता है। प्रजातन्त्र में उग्रवाद का कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार लोकतन्त्र एक बड़ा कारक है, जो राष्ट्रवाद को सीमित करता है।

2. धर्मनिरपेक्षता:
धर्म निरपेक्षता एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है, जो अनैच्छिक राष्ट्रवाद पर रोक लगाता है। धर्म निरपेक्षता विभिन्न धर्म, विश्वास और संस्कृति के लोगों को शान्ति का पाठ सिखाता है। यह सह-अस्तित्व पर भी जोर देता है।

3. बहुलवाद:
बहुलवाद वह विचारधारा है, जो विरोधी समाज को जोड़ता है। यह इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि यह राष्ट्रवाद को सीमित करता है।

4. अन्तर्राष्ट्रीयवाद:
यह विचारधारा भी अति राष्ट्रवाद को रोकता है।

कक्षा 11 राष्ट्रवाद पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 6.
आपकी राय में राष्ट्रवाद की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
प्रशासकीय व विकास की दृष्टि का होना आवश्यक है। इसमें विभिन्न संस्कृतियाँ और समुदाय हों, जिसमें सभी अल्पसंख्यक अपने आपको सुरक्षित व गौरवान्वित महसूस करें। एक राष्ट्र की सीमाएँ प्रशासन व विकास की दृष्टि से तय होनी चाहिए। राष्ट्रवाद को मानवता पर हावी नहीं होने देना चाहिए। समूहों की पहचान देने में काफी सतर्कता बरती जाती है। लेकिन इन समूहों को राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने से पहले यह देख लें कि वे समूह असहिष्णु तो नहीं हैं।

वे अमानवीय नहीं हैं और वे समूह दूसरे समूहों के साथ सहयोग करते हैं। एक राष्ट्र का अपना एक अतीत होता है, जो भविष्य को समेटे होता है। एक राष्ट्र की पहचान उसके भौगोलिक क्षेत्र, राजनीतिक आदर्श, राजनीतिक पहचान से जुड़ी हुई है। समूहों से अलग राष्ट्र अपना शासन अपने आप करने और भविष्य को तय करने का अधिकार चाहता है। लेकिन राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का अधिकार ऐसे राज्यों के निर्माण की ओर ले जा सकता है, जो आर्थिक व राजनीतिक क्षमता में काफी छोटे हों और इससे उनकी समस्याएँ और बढ़ सकती हैं। इस प्रकार से हमें सहिष्णुता और विभिन्न रूपों के साथ सहानुभूति होनी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Political Science राष्ट्रवाद Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

राजनीतिक सिद्धांत राष्ट्रवाद के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
राष्ट्रीयता के दो तत्त्वों का उल्लेख कीजिए। (Explain the two elements of nationality)
उत्तर:
राष्ट्रीयता के दो महत्त्वपूर्ण तत्त्व निम्नलिखित हैं –

1. भौगोलिक एकता:
प्रत्येक व्यक्ति अपनी मातृभूमि के प्रति जुड़ा रहता है, जहाँ वह जन्म लेता है। जिस भूखण्ड पर अन्य व्यक्तियों के साथ-साथ वह रहता है उसको अपनी मातृभूमि से लगाव हो जाता है। इजरायल बनने से पूर्व यहूदी पूरी दुनिया में बिखरे हुए थे किन्तु उनके मन में इजराइल के प्रति लगाव था।

2. प्रजातीय शुद्धता:
एक ही प्रजाति के लोग एक राष्ट्रीयता को उत्पन्न करते हैं। परन्तु आजकल प्रवास एवं अन्तर्जातीय विवाह के कारण विशुद्ध प्रजाति का मिलना आसान नहीं है।

राष्ट्रवाद पाठ के प्रश्न उत्तर क्लास 11 Bihar Board प्रश्न 2.
आर्थिक पारस्परिक निर्भरता से क्या अभिप्राय है? (What do you mean by economic inter-dependent?)
उत्तर:
आर्थिक क्षेत्र में आज राष्ट्र-राज्यों की पारस्परिक निर्भरता बढ़ रही है। अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ती हुई पारस्परिक निर्भरता ने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के सम्मुख गम्भीर चुनौतियाँ पैदा की हैं। विश्व के अधिक भागों में बढ़ती गरीबी, अप्रयुक्त मानव संसाधन, पर्यावरण के खतरों के प्रति बढ़ती जागरुकता तथा मानव जाति के अस्तित्व की समस्या जैसे मामले इसमें प्रमुख हैं। आज विश्व आर्थिक रूप में एकजुट हो गया है। सुदृढ़ भूमण्डलीय मंच स्थापित करने का अब समय आ गया है।

Rashtravad Class 11 Question Answer Bihar Board प्रश्न 3.
भारत के आर्थिक एकीकरण ने किस प्रकार राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित किया? (How did the economic integration influenced the nationalism)
उत्तर:
आर्थिक एकीकरण के कारण गाँवों का एकान्त जीवन समाप्त हो गया तथा ग्रामीण लोग शहरों में आने लगे। शहरों में कच्चा माल आने लगा। गाँव के शिल्पकार तथा अन्य लोर मजदूरी एवं रोजगार की तलाश में शहरों में आने लगे। शहरों की राष्ट्रीय चेतना गाँवों में पहुंचने लगी। इससे राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन मिला।

Rashtravad Question Answer Class 11 Bihar Board प्रश्न 4.
निम्नलिखित के बारे में बताइए कि क्या वे राज्य हैं? यदि हाँ तो कैसे और नहीं तो कैसे? (Are the following state? Why?)
(क) भारत
(ख) संयुक्त राष्ट्र
(ग) बिहार
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर:
(क) हाँ, भारत एक राज्य है, क्योंकि यह सम्प्रभु है।
(ख) नहीं, संयुक्त राष्ट्र एक राज्य नहीं है, क्योंकि यह तो सम्प्रभु राज्यों का संघ है।
(ग) बिहार भी राज्य नहीं है। यह भारतीय संघ की एक इकाई है।
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका राज्य है, क्योंकि यह सम्प्रभु है।

राष्ट्रवाद पाठ के प्रश्न उत्तर कक्षा 11 Bihar Board प्रश्न 5.
राज्य के कोई दो तत्त्व लिखिए। (Describe any two elements of a State) अथवा, राज्य के चार आवश्यक तत्त्व कौन से हैं? (What are the 4 elements of a state?)
उत्तर:
राज्य के निम्नलिखित तत्त्व होते हैं –

  1. जनसंख्या
  2. निश्चित प्रदेश
  3. सरकार
  4. सम्प्रभुता

प्रश्न 6.
राज्य और समाज के अन्तर के किन्हीं दो बिन्दुओं को बताइए। (Give two points of the difference between state and society)
उत्तर:
राज्य और समाज के बीच अन्तर –

  1. राज्य व्यक्ति के केवल बाह्य आचरण को नियन्त्रित करता है। परन्तु समाज व्यक्ति के सभी प्रकार के सामाजिक सम्बन्धों को नियन्त्रित करता है।
  2. राज्य एक अनिवार्य संगठन है, जबकि समाज ऐच्छिक है। राज्य की सदस्यता अनिवार्य है। व्यक्ति किसी न किसी राज्य का सदस्य जीवनपर्यन्त रहता है। परन्तु समाज का सदस्य बनना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर है।

प्रश्न 7.
राष्ट्र राज्य का अर्थ बताइए। (Give the meaning of the nation-state)
उत्तर:
राष्ट्र राज्य एक ऐसा राज्य होता है, जो राष्ट्रीयता से बना है। जब व्यक्ति सामान्य धर्म सामान्य भाषा अथवा सामान्य विरासत में बँधा होता है, तो वह एक राष्ट्र होता है। यदि वे एक स्वतन्त्र राज्य का स्वरूप धारण कर लेते हैं, तो वे एक राष्ट्र-राज्य का निर्माण करते हैं। एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमरीका में साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध जारी राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में आए।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्र-राज्य से क्या अभिप्राय है? इनके विकास में सहायक तत्त्वों का विवेचन कीजिए। (What do you mean by Nation-State? Discuss the helping elements of its development)
उत्तर:
राष्ट्र-राज्य:
राष्ट्र का स्वरूप शताब्दियों तक विकसित हुआ। राष्ट्र-राज्यों ने क्षेत्र राज्यों का स्थान ले लिया है। राष्ट्र-राज्य आपस में संघर्ष तथा सहयोग के द्वारा बँधे रहते हैं। राष्ट्र-राज्य प्रणाली राजनीतिक जीवन का एक ऐसा नमूना है, जिसमें जनता अलग-अलग सम्प्रभु राज्यों के रूप में संगठित होती है। राष्ट्र-राज्य का क्षेत्र उसमें निवास करने वाली जनसंख्या का है, किसी अन्य का नहीं। उस राज्य को राष्ट्र-राज्य नहीं कहा जा सकता, जो किसी अन्य राज्य की परिसीमा का उल्लंघन करके राष्ट्र-राज्य बनने का प्रयत्न करे।

राष्ट्र राज्य का विकास-आधुनिक राष्ट्र:
राज्य जिन्होंने इंग्लैण्ड, फ्रांस व अमरीका आदि में हुई औद्योगिक क्रान्तियों की विजय के पश्चात् सामंतशाही का स्थान लिया, नए पूँजीवादी वर्ग के राजनैतिक संगठन हैं। बीसवीं शताब्दी में एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमरीका में साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध जारी राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों के परिणामस्वरूप राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में आए।

राष्ट्र-राज्य प्रणाली को प्रोत्साहित करने वाले सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व इस प्रकार हैं –

  1. रोमन साम्राज्य व पवित्र रोमन साम्राज्य का विखण्डन तथा सामंतवाद का अन्त।
  2. भूक्षेत्र, जनसंख्या, प्रभुसत्ता व कानून पर आधारित राष्ट्र-राज्यों का उदय।
  3. मेकियावेली, वोदां, ग्रोशियश, हाब्स, अल्यूशियस तथा अन्य विचारकों का सैद्धान्तिक व बौद्धिक योगदान।

प्रश्न 2.
ऐसे किन्हीं पाँच कारकों की व्याख्या कीजिए, जिन्होंने भारत में राष्ट्रवाद को विदेशी आधिपत्य के विरुद्ध चुनौती के रूप में प्रोत्साहित किया? (Explain any five factors which influenced the challenges against foreign rule)
उत्तर:
भारत में राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाले पाँच कारक –
1. विदेशी प्रभुत्व के परिणाम:
भारत में राष्ट्रवाद के उदय में सर्वप्रथम विदेशी पभुत्व ने योगदान दिया। स्वयं ब्रिटिश शासन की परिस्थितयों ने भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावना विकसित करने में सहायता दी।

2. देश का प्रशासकीय और आर्थिक एकीकरण:
19 वीं और 20 वीं शताब्दी में भारत का एकीकरण हो चुका था और वह एक राष्ट्र के रूप में उभर चुका था। इसलिए भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावनाओं का विकास आसानी से हुआ।

3. पश्चिमी विचार और शिक्षा:
उन्नीसवीं सदी में आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा और विचारधाराओं के प्रसाद के फलस्वरूप बड़ी संख्या में भारतीयों ने एक आधुनिक बुद्धिसंगत, धर्मनिरपेक्ष, जनतान्त्रिक तथा राष्ट्रवादी राजनीतिक दृष्टिकोण अपनाया।

4. प्रेस तथा साहित्य की भूमिका:
वह प्रमुख साधन प्रेस था, जिसके द्वारा राष्ट्रवादी भारतीयों ने देश-भक्ती की भावनाओं का, आधुनिक, आर्थिक-सामाजिक, राजनीतिक विचारों का प्रचार किया तथा एक अखिल भारतीय चेतना जगाई।

5. सामाजिक व धार्मिक सुधार आन्दोलन:
19 वीं शताब्दी में भारत में सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध जो अनेक सुधार आन्दोलन चलाये थे, उन्होंने भारतीय जनता में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने में बड़ा योगदान दिया। इन आन्दोलनों ने लोगों को विदेशी शासन के कुप्रभावों और अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण से भी अवगत कराया।

प्रश्न 3.
राज्य तथा संघ में कोई तीन अन्तर बताइए। (Explain any three points of difference between state and association)
उत्तर:
संघ वह संगठन होता है, जिसका निर्माण मनुष्यों के द्वारा किसी विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। राज्य और संघ में निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं –

1. सदस्यता का भेद (Membership):
राज्य की सदस्यता प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य होती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्ति किसी न किसी राज्य का सदस्य होता है किन्तु संघ की सदस्यता ऐच्छिक होती है। एक व्यक्ति एक समय में केवल एक ही राज्य का सदस्य हो सकता है। परन्तु वह एक समय पर अनेक संघों का सदस्य हो सकता है।

2. प्रदेश का भेद (Territory):
राज्य प्रादेशिक रूप में संगठित संघ होता है और इसका. क्षेत्र पूर्णतया निश्चित होता है। परन्तु संघ का कोई निश्चित क्षेत्र नहीं होता। रेड-क्रास सोसायटी एक ऐसा संघ है, जिसका क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय है। दूसरी ओर अत्यन्त सीमित क्षेत्र वाले छोटे-छोटे संघ भी होते हैं।

3. अवधि का भेद (Tenure):
राज्य एक स्थायी संघ होता है। परन्तु संघ अधिकांशतः अल्पकालीन होते हैं।

प्रश्न 4.
राज्य और समाज में अन्तर समझाइए। (Explain the difference between state and society)
उत्तर:

  1. राज्य समाज का एक भाग है। समाज व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों का जाल होता है, जबकि राज्य व्यक्तियों का एक राजनीतिक संगठन है।
  2. समाज व्यक्ति के सभी प्रकार के सामाजिक आचरण को नियन्त्रित करता है। परन्तु राज्य व्यक्ति के केवल बाहरी सम्बन्धों को ही नियन्त्रित करता है।
  3. राज्य एक अनिवार्य संगठन है, जबकि समाज ऐच्छिक है।
  4. राज्य एक प्रादेशिक संगठन है, जबकि समाज किसी प्रकार की भौगोलिक सीमाओं में बँधा हुआ नहीं होता। वह स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय हो सकता है।
  5. राज्य एक कृत्रिम संगठन है। परन्तु समाज की प्रकृति स्वाभाविक होती है।
  6. राज्य के निर्धारित विधान होते हैं, जिन्हें कानून कहा जाता है। कानून के उल्लंघन पर राज्य दण्ड देता है। समाज के अपने कायदे कानून होते हैं, जिनके उल्लंघन पर सामाजिक निर्वासन का प्रावधान होता है। इसका अर्थ है कि तब व्यक्ति को समाज से बाहर कर दिया जाता है।

प्रश्न 5.
राष्ट्रवाद के प्रमुख तत्त्वों की संक्षेप में विवेचना कीजिए। (Write short note on the main elements of Nationalism)
उत्तर:
राष्ट्रवाद के तीन मुख्य तत्त्व हैं –

  1. सम्प्रभुता
  2. क्षेत्रीय अखण्डता
  3. राज्यों की वैधानिक समानता

1. सम्प्रभुता (Sovereignty):
सम्प्रभुता का अर्थ है कि आधुनिक राष्ट्र राज्य पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं। सम्प्रभु राज्य ही परस्पर दूसरे राज्यों के साथ सन्धि बनाने का अधिकार रखते हैं। सम्प्रभुता विहीन राजनीतिक इकाई को इस प्रकार संधि करने का अधिकार नहीं होता। वे अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का सदस्य भी नहीं बन सकते।

2. क्षेत्रीय अखण्डता (Territorial Integrity):
सम्प्रभु राज्यों को अपने भू-क्षेत्र के अन्तर्गत सर्वोच्च असीमित सत्ता प्राप्त होती है। इस पर कोई बाहरी नियन्त्रण नहीं होता। सम्प्रभुता विहीन राजनैतिक इकाई का अन्य राज्यों में कोई स्थान नहीं है। राष्ट्र-राज्य प्रणाली की यह विशेषता प्रथम विशेषता का तार्किक परिणाम है। राज्यों की सीमाओं की रक्षा हर दशा में होनी ही चाहिए।

3. राज्यों की वैधानिक समानता (Legal Equality):
सभी राष्ट्र-राज्य अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी के समान सदस्य हैं चाहे उनके आकार, जनसंख्या, आर्थिक संसाधन, दैनिक क्षमता आदि कितने भी असमान हों। यहाँ यह बात स्मरणीय है कि सभी स्वतन्त्र राज्यों की समानता का यह सिद्धान्त लगभग उसी समय अपनाया गया जब राष्ट्र-गान अस्तित्व में आया। 18 वीं शताब्दी के अनेक लेखकों ने भी राज्यों के समानता के सिद्धान्त का समर्थन किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राज्य तथा समाज में क्या अन्तर है? दोनों किन बिन्दुओं पर परस्पर निर्भर करते हैं?
उत्तर:
राज्य और समाज के विषय में कभी-कभी कुछ लोग भ्रमित हो जाते हैं और दोनों को एक समझने लगते हैं। वास्तव में दोनों में अन्तर है। अरस्तु ने राज्य तथा समाज के बीच भेद किया था, किन्तु एक तानाशाह के लिए दोनों में से कोई भेद नहीं होता। भौगोलिक दृष्टि में दोनों (राज्य तथा समाज) प्रायः एक ही भू-भाग में स्थित होते हैं, किन्तु दोनों की उत्पत्ति, उद्देश्यों और कार्य प्रणाली में अन्तर होता है। राज्य समाज में निम्नलिखित अन्तर होता है –

1. उत्पत्ति का भेद (Origin):
व्यक्तियों के बीच पाये जाने वाले सम्बन्धों को सामूहिक रूप से समाज कहा जाता है। ये सम्बन्ध संगठित अथवा असंगठित होते हैं। परन्तु राज्य का निर्माण राजनीतिक रूप से संगठित सम्बन्धों के आधार पर ही होता है। समाज राज्य से प्राचीन है। राज्य का अस्तित्व एक समाज में ही सम्भव है।

2. प्रदेश का अन्तर (Territory):
समाज के लिए निश्चित प्रदेश आवश्यक नहीं होता। परन्तु राज्य के लिए आवश्यक है। इसके बिना राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। परन्तु समाज के लिए निश्चित क्षेत्र या प्रदेश होना आवश्यक नहीं है। यह स्थानीय भी हो सकता है और अन्तर्राष्ट्रीय भी।

3. लक्ष्य का भेद (Aims):
लक्ष्य की दृष्टि से समाज व्यापक लक्ष्यों वाला तथा राज्य अपेक्षाकृत संकुचित लक्ष्यों वाला संगठन है। राज्य का अस्तित्व एक महान किन्तु एक ही लक्ष्य के लिए संगठित है। समाज का अस्तित्व अनेक लक्ष्यों के लिए है, जिसमें कुछ महान तथा कुछ साधारण होते हैं।

4. सम्प्रभुता का भेद (Sovereignty):
राज्य एक प्रभुत्व सम्पन्न संस्था है, जबकि समाज केवल नैतिक बल के आधार पर ही अपने आदेशों का पालन करा सकता है।

5. कार्यक्षेत्र का भेद (Scope):
कार्य क्षेत्र की दृष्टि से भी राज्य समाज की तुलना में बहुत सीमित है। सामाजिक जीवन के अनेक ऐसे पहलू हैं, जिनका न तो राज्य से कोई सम्बन्ध है और न ही जिनमें राज्य सफलतापूर्वक हस्तक्षेप कर सकता है। राज्य व्यक्तियों के केवल बाहरी कार्यों से ही सम्बन्ध रखता है और मानव जीवन के सहयोग, सहानुभूति, सेवा और प्रेम जैसे गुणों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता किन्तु समाज मानव जीवन के प्रत्येक पहलू (आन्तरिक एवं बाहरी सभी प्रकार) से सम्बन्ध रखता है।

राज्य और समाज की परस्पर निर्भरता (Inter dependence of State and Society):
राज्य और समाज में उपरोक्त भेद होते हुए भी परस्पर आन्तरिक आत्मनिर्भता होती है। सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर ही राज्य द्वारा कानूनों का निर्माण किया जाता है। सामाजिक एवं राजकीय नियमों के आधार पर ही सामाजिक आचरण को नियमित रखना सम्भव होता है। समाज और राज्य एक दूसरे पर निर्भर है। बार्कर का कहना है कि यदि ऐसा न होता तो राज्य की स्थापना ही नहीं हो सकती थी।

प्रश्न 2.
राष्ट्र की परिभाषा दीजिए। इसके मुख्य तत्त्वों का वर्णन कीजिए। (Define Nation What are its main elements)
उत्तर:
राष्ट्र (Nation) शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘नेट्स’ (Natus) शब्द से हुई जिसका अर्थ होता है ‘पैदा हुआ’। इसका तात्पर्य यह है कि राष्ट्र उन व्यक्तियों से बना है, जो किसी एक विशेष प्रजाति में पैदा हुए लोगों से बना है। परन्तु आज के युग में प्रजातियों के प्रवासीकरण तथा अन्तर्जातीय विवाहों के कारण कोई विशुद्ध प्रजाति नहीं बची है। रामजे मूर के अनुसार, “राष्ट्र व्यक्ति के शरीर की भाँति होता है, जिसमें हर अंग सौहार्द्रपूर्ण, ढंग से एक दूसरे के साथ जुड़े होते हैं तथा शरीर को मजबूत बनाते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र में रहने वाले व्यक्ति भी यदि आपसी सौहार्द्र तथा सहभागिता का त्याग कर दें, तो राष्ट्र का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।”

राष्ट्र का निर्माण राज्य और राष्ट्रीयता से होता है। बर्गेस के अनुसार, “राष्ट्र जातीय एकता के सूत्र में बंधी हुई वह जनता है, जो किसी अखण्ड भौतिक प्रदेश पर निवास करती हो।” जातीय एकता से उनका अभिप्राय ऐसी आबादी से है, जिसकी एक सामान्य भाषा और साहित्य, सामान्य परम्परा और इतिहास, सामान्य रीति-रिवाज तथा उचित और अनुचित की सामान्य चेतना हो। वास्तव में राष्ट्र ऐसे लोगों का समूह है, जो घनिष्ठता, अभिन्नता और प्रतिष्ठा की दृष्टि से संगठित है और एक मातृभूमि से सम्बन्धित है। हेज (Hayes) ने कहा है, “राष्ट्रीयता राजनीतिक एकता तथा सत्ताधारी स्वतन्त्रता को प्राप्त करके राष्ट्र बन जाती है।”

राष्ट्र के मुख्य तत्त्व:

1. प्रजातीय शुद्धता (Racial Purity):
प्रजातीय शुद्धता का अर्थ है कि एक ही समुदाय के सदस्यों की शुद्धता हो। आजकल प्रवास एवं अन्तर्जातीय विवाहों के कारण कहीं भी प्रजातीय शुद्धता प्राप्त करना आसान नहीं है।

2. भाषा समुदाय (Linguistic Association):
सामान्यतः किसी भी राष्ट्र के नागरिकों की एक आम भाषा होती है, क्योंकि इसी के माध्यम से वे अपने विचार तथा संस्कृति का परस्पर आदान-प्रदान करते हैं।

3. भौगोलिक संलग्नता (Geographical Attachment):
प्रत्येक व्यक्ति अपनी मातृभूमि से जुड़ा रहता है। इजराइल बनने से पूर्व यहूदी पूरी दुनिया में बिखरे हुए थे, किन्तु उनके मन में इजराइल के प्रति ही लगाव था।

4. धार्मिक समुदाय (Religious Association):
पहले राष्ट्र के निर्माण में धार्मिक भावनाओं की मुख्य भूमिका हुआ करती थी। उदाहरण के लिए प्रोटेस्टेंट का विरोध करने पर ब्रिटेन तथा स्पेन के बीच युद्ध छिड़ गया था। परन्तु आजकल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रों के निर्माण का बोलबाला है अर्थात् एक ही राष्ट्र में कई-कई धर्म को मानने वाले लोग रहते हैं। वे एक सशक्त राष्ट्रीयता से बंधे रहते हैं। भारत में धर्मों के विषय में विविधता में एकता पायी जाती है।

5. सामान्य राजनीतिक आकांक्षाएँ (Political Ambitious):
सामान्य राजनीतिक आकांक्षाएँ भी इसका एक तत्त्व माना जाता है। 1971 ई. के पेरिस शान्ति सम्मेलन में इसी आधार पर Self Determination के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया।

6. आर्थिक हितों की समरूपता (Economic Interest):
राष्ट्र निर्माण में अन्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व होता है आर्थिक हितों की समरूपता। मिल के अनुसार, “किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी राजनीतिक पूर्वापरता, अपना राष्ट्रीय इतिहास तथा किसी प्राचीन ऐतिहासिक घटना पर एक सामूहिक प्रतिक्रिया तथा इससे जुड़ी स्मृतियों के आधार पर निर्मित होती है।”

प्रश्न 3.
तीसरी दुनिया के देशों में राष्ट्रवाद का उदय किस प्रकार हुआ? (How did the Nationalism rise in third world countries?)
उत्तर:
बीसवीं शताब्दी में एशिया व अफ्रीका में साम्राज्यवाद के पतन के बाद भारत, चीन, बर्मा, मिस्र, नाइजीरिया, घाना, फिजी, वियतनाम, इण्डोनेशिया, लीबिया,, सीरिया तथा अन्य राज्य अस्तित्व में आए। कई मामलों में इन राज्यों की रचना राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के परिणामस्वरूप हुई। इन राष्ट्रों को सम्पूर्ण प्रभूता लम्बे संघर्षों के बाद स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद मिली।

साम्राज्वादी देशों ने इन राज्यों का खूब शोषण कर अपने को अमीर बना लिया। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध व बीसवीं शताब्दी के दौरान इन उपनिवेशों में शिक्षित शहरी वर्ग के नेतृत्व में राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन का सूत्रपात हुआ तथा ये स्वतंत्र हुए और राष्ट्रीय सम्प्रभु राज्यों के रूप में उभरे। इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् संसार के मानचित्र में अनेक नए राज्य दिखाई पड़े। वर्तमान में इन नवस्वतन्त्र राज्यों को तीसरी दुनिया के देशों के रूप में जाना जाता है क्योंकि ये अमरीकी अथवा सोवियत गुट में से किसी में शामिल नहीं हुए। उन्होनें स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण किया। इन देशों को अविकसित अथवा विकासशील देश कहा जाता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –
(Write short note on)
(क) राष्ट्र
(ख) राज्य
(ग) संघ
(घ) सरकार

  1. Nations
  2. State
  3. Association
  4. Government

उत्तर:
(क) राष्ट्र (Nation):
राष्ट्र तथा राष्ट्रीयता जिनको अंग्रेजीी में Nation तथा Nationality कहते हैं लैटिन भाषा के एक ही सामान्य शब्द ‘नेट्स’ (Natus) से निकले हैं, जिसका अर्थ ‘जन्म’ अथवा ‘जाति’ है। गार्नर के अनुसार, “राष्ट्रीयता का विकास सजातीय सामाजिक समुदाय के लोगों के सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक रूप से आपसी विचारों के आदान-प्रदान हेतु संगठित होने के कारण हुआ है।”

रामजे मूर (Ramsey Muir) के अनुसार, “राष्ट्र व्यक्ति के शरीर की भाँति होता है, जिसमें हर अंग सौहार्द्रपूर्ण ढंग से एक दूसरे के साथ जुड़े होते हैं तथा शरीर को मजबूत बनाते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र में रहने वाले व्यक्ति भी यदि आपसी सौहार्द तथा सहभागिता का त्याग कर दें, तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।” बर्गेस के अनुसार, “राष्ट्र जातीय एकता के सूत्र में बंधी हुई वह जनता है, जो किसी अखण्ड भौतिक प्रदेश पर निवास करती हो।” जिमन ने लिखा है, “राष्ट्र ऐसे लोगों का समूह है, जो घनिष्ठता, अभिन्नता और प्रतिष्ठा की दृष्टि से संगठित है और एक मातृभूमि से सम्बन्धित है।”

(ख) राज्य (State):
डॉ. गार्नर के अनुसार, “राज्य एक थोड़े या अधिक संख्या वाले संगठन का नाम है, जो कि स्थायी रूप से पृथ्वी के निश्चित भाग में रहता हो। वह बाहरी नियन्त्रण से सम्पूर्ण स्वतन्त्र या लगभग स्वतन्त्र हो और उसकी एक संगठित सरकार हो, जिसकी आज्ञा का पालन अधिकतर जनता स्वभाव से करती हो।”

गिलक्राइस्ट ने लिखा है, “राज्य उसे कहते हैं, जहाँ कुछ लोग एक निश्चित प्रदेश में एक सरकार के अधीन संगठित होते हैं। यह सरकार आन्तरिक मामलों में अपनी जनता की प्रभुसत्ता को प्रकट करती है और बाहरी मामलों में अन्य सरकारों से स्वतन्त्र होती है।” मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में ही रहना चाहता है। एक निश्चित सीमा में बिना किसी नियन्त्रण के गठित सरकार के अधीन संगठित लोगों के समुदाय को राज्य कहा जाता है।

(ग) संघ (Association):
मेकाइवर के अनुसार संघ व्यक्तियों या सदस्यों के ऐसे समूह को कहा जाता है, जो एक सामान्य लक्ष्य के लिए संगठित है। एक प्रकार के विशेष उद्देश्य रखने वाले व्यक्ति एक दूसरे के समीप आते हैं और समूह बनाकर अर्थात् संगठित होकर इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य करते हैं। यद्यपि राज्य भी मानव आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गठित एक संगठन होता है। परन्तु राज्य में चार तत्त्व होते हैं-जनसंख्या, भू-भाग, सरकार और सम्प्रभुता जबकि संघ को निश्चित भू-भाग की आवश्यकता नहीं होती। इसकी सदस्यता ऐच्छिक होती है। राज्य की तरह संघ सम्प्रभु नहीं होते।

(घ) सरकार (Government):
बहुत से लोग राज्य तथा सरकार को एक ही अर्थ में प्रयुक्त करते हैं। लुई चौदहवाँ (फ्रांस का सम्राट) कहा करता था, “मैं ही राज्य हूँ।” परन्तु सरकार तो राजा का एक तत्त्व है। सरकार सार्वजनिक नीतियों को निर्धारित करने वाली तथा सार्वजनिक हितों को लागू करने वाली एक एजेन्सी अथवा तन्त्र है। सरकार वास्तव में राज्य सत्ता की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। राज्य में सरकारें बदलती रहती है। परन्तु राज्य स्थायी तौर पर बना रहता है। सरकार के तीन अंग होते हैं –

  1. कार्यपालिका
  2. विधायिका
  3. न्यायपालिका

प्रश्न 5.
राज्य किसे कहते हैं? राज्य के प्रमुख तत्त्वों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। (What is state Explain the main elements of a state)
उत्तर:
एक निश्चित सीमा में बिना किसी बाहरी नियन्त्रण के गठित सरकार के अधीन संगठित लोगों के समुदाय को राज्य कहा जाता है। मानव स्वभाव से एक सामाजिक प्राणी है। लास्की ने कहा है कि राज्य एक भूमिगत समाज है, जो शासक और शासितों में बँटा रहता है।

अरस्तू ने कहा था कि राज्य का जन्म जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ है और आज भी आदर्श जीवन की प्राप्ति के लिए इसका अस्तित्व बना हुआ है। गार्नर के अनुसार, “राज्य बहुसंख्यक व्यक्तियों का ऐसा समुदाय है, जो किसी प्रदेश के निश्चित भाग में स्थायी रूप से रहता हो, बाहरी शक्ति के नियन्त्रण से पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से ही स्वतन्त्र हो और जिसमें ऐसी सरकार विद्यमान हो, जिसके आदेश का पालन नागरिकों के विशाल समुदाय द्वारा स्वभावतः किया जाता है।” राज्य के तत्त्व-राज्य के निम्नलिखित चार अनिवार्य तत्व होते हैं –

1. जनसंख्या (Population):
राज्य को बनाने के लिए जनसंख्या आवश्यक है। हम किसी निर्जन प्रदेश को राज्य नहीं कह सकते। किसी राज्य की जनसंख्या कितनी हो यह नहीं कहा जा सकता है। प्लूटो ने राज्य की जनसंख्या 5000 तथा रूसो ने 10,000 निश्चित की थी। परन्तु आजकल विशाल राज्य है, जिनकी जनसंख्या करोड़ों में है। भारत और चीन की जनसंख्या एक अरब से भी अधिक है। अरस्तु का यह कथन था कि राज्य की जनसंख्या इतनी हो, जिससे कि वह आत्मनिर्भर रह सके। आज भारत की अनेक समस्याओं का कारण उसकी अधिक जनसंख्या है।

2. भू-भाग (Territory):
प्रत्येक राज्य का अपना एक निश्चित भू-भाग होता है। इस निश्चित भू-भाग से प्रेम करने के कारण देशभक्ति का उदय होता है। राष्ट्रीय आन्दोलन के समय अनेक वीरों ने अपनी मातृभूमि के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया है। निश्चित भू-भाग राज्य के लिए इस कारण अनिवार्य है कि राज्य की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए दूसरे राज्यों द्वारा किए जाने वाले हस्तक्षेपों को रोका जा सके। निश्चित भू-भाग के अन्तर्गत भूमि, जल तथा वायु तीनों ही क्षेत्र आते हैं। राज्य का अधिकार अपने भू-क्षेत्र, समुद्री क्षेत्र तथा आकाश आदि सभी पर होता है। राज्य का भू-भाग रूस के समान विशाल तथा सेन्ट मरीना जितना छोटा भी हो सकता है।

3. सरकार (Government):
राज्य का एक प्रमुख तत्त्व सरकार भी है। जनता जब तक समुचित ढंग से संगठित नहीं होती, तो राज्य नहीं बन सकता। सरकार एक निर्धारित भू-भाग में रहने वाले लोगों के सामूहिक उद्देश्यों की तरफ भी ध्यान देती है। सरकारें नीति निर्धारण और उनको क्रियान्वित करने का कार्य करती है। सरकार की अनुपस्थिति में गृह युद्ध होने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सरकार के विभिन्न रूप होते हैं। लोकतन्त्र, कुलीन तन्त्र तथा अधिनायक तन्त्र की सरकारें हो सकती है। इसके आलावा संसदात्मक तथा अध्यक्षात्मक सरकारें हो सकती हैं।

4. सम्प्रभुता (Sovereignty):
सम्प्रभुता भी राज्य का एक अनिवार्य तथा महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। किसी निश्चित भू-भाग में रहने वाली जनसंख्या को एक सरकार के अधीन नियन्त्रित हो जाने मात्र से ही उसे राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं हो जाता, क्योंकि इसके लिए सम्प्रभुता का होना भी आवश्यक है। सम्प्रभुता दो प्रकार की होती है –

  • एक आन्तरिक सम्प्रभुता और
  • बाह्य सम्प्रभुता।

आन्तरिक सम्प्रभुता का अर्थ है राज्य का अपनी सीमा के भीतर एकाधिकार। इसमें किसी दूसरे राज्य का हस्तक्षेप नहीं होता। उसकी इस स्वतन्त्रता में किसी बाहरी सत्ता का हस्तक्षेप नहीं होता। 1947 ई. से पूर्व भारत में अन्य सभी तत्त्व मौजूद थे, किन्तु उसे राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं था, क्योंकि तब तक भारत सम्प्रभुता सम्पन्न नहीं था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
उग्र राष्ट्रवाद किसका समर्थन करता है?
(क) सैनिकवाद
(ख) विश्वशान्ति
(ग) अहिंसा
(घ) आतंकवाद
उत्तर:
(ग) अहिंसा

प्रश्न 2.
अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त अधिकार –
(क) भारत में निवास करने वाले सभी व्यक्तियों में उपलब्ध है।
(ख) भारत में नागरिकों को ही उपलब्ध है।
(ग) विदेशियों को भी उपलब्ध है।
(घ) इनमें से किसी को भी उपलब्ध नहीं है।
उत्तर:
(ख) भारत में नागरिकों को ही उपलब्ध है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

Bihar Board Class 11 Geography पृथ्वी की आंतरिक संरचना Text Book Questions and Answers

 

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन भूगर्भ की जानकारी का प्रत्यक्ष साधनहै ………………
(क) भूकम्पीय तरंगें’
(ख) गुरुत्वाकर्षण बल
(ग) ज्वालामुखी
(घ) पृथ्वी का चुम्बकत्व
उत्तर:
(क) भूकम्पीय तरंगें’

पृथ्वी की आंतरिक संरचना पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
दक्कन देष की शैल समूह किस प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार का परिणाम है ……………….
(क) शील्ड
(ख) मित्र
(ग) प्रवाह
(घ) कुण्ड
उत्तर:
(ग) प्रवाह

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के प्रश्न Bihar Board Class 11 प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन सा स्थलमण्डल को वर्णित करता है?
(क) ऊपरी व निचले मैटल
(ख) भूपटल व कोड
(ग) भूपटल व ऊपरी मैटल
(घ) मैटल व क्रोड
उत्तर:
(ग) भूपटल व ऊपरी मैटल

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के प्रश्न उत्तर कक्षा 11 प्रश्न 4.
निम्न में भूकम्प तरंगें चट्टानों में संकुचन व फैलाव लाती हैं ……………….
(क) ‘P’ तरंगे
(ग) धरातलीय तरंगे
(प) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ‘P’ तरंगे

पृथ्वी की आंतरिक संरचना कक्षा 11 प्रश्न 5.
पृथ्वी की क्रोड पर कौन से दो पदार्थ पाये जाते हैं।
(क) निकिल व ताँबा
(ख) तांबा व लोहा
(ग) निकिल व लोहा
(घ) लोहा व चूना
उत्तर:
(ग) निकिल व लोहा

पृथ्वी की आंतरिक संरचना Bihar Board Class 11 प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन-सा सक्रीय ज्वालामुखी है?
(क) स्ट्रांबोली
(ख) विसूवियस
(ग) बैरन आप
(घ) पोपा
उत्तर:
(क) स्ट्रांबोली

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सचित्र वर्णन करें Bihar Board Class 11 प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से किस शहर में दिन का अवधि सर्वाधिक है?
(क) मुंबई
(ख) चेन्नई
(ग) श्रीनगर
(घ) दिल्ली
उत्तर:
(ग) श्रीनगर

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सचित्र वर्णन करो Bihar Board Class 11 प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से किस राज्य की जनसंख्या सर्वाधिक है?
(क) पं० बंगाल
(ख) बिहार
(ग) उत्तर प्रदेश
(घ) आन्ध्र प्रदेश
उत्तर:
(ग) उत्तर प्रदेश

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

पृथ्वी का आंतरिक संरचना का सचित्र वर्णन करें Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
भूगर्भीय तरंगें (Body Waves) क्या हैं?
उत्तर:
भू-गर्मिक तरंगे उद्गम केन्द्र कर्जा विमोचन के दौरान पैदा होती है और पृथ्वी के अंदरुनी भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती है। इसलिए इन्हें भू-गर्मिक तरंगे कहा जाता है।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सचित्र वर्णन Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
भूगर्भ की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष साधनों के नाम बाताइए।
उत्तर:
पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में हमारी अधिकतर जानकारी परोक्ष रूप से प्राप्त अनुमानों पर आधारित है। इस जानकारी का कुछ भाग प्रत्यक्ष प्रेक्षणों पर आधारित है। पृथ्वी में सबसे असानी से उपलब्ध प्रत्यक्ष साधन ठोस पदार्थ धरातलीय चट्टानें हैं।

Prithvi Ki Aantrik Sanrachna Bihar Board Class 11 प्रश्न 3.
भूकंपीय तरंगे छाया क्षेत्र कैसे बनाती हैं?
उत्तर:
जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अभिलेखित नहीं होती। ऐसे क्षेत्र को भूकंपीय छायाक्षेत्र (Shadow Zone) कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भूकंप अधिकेन्द्र से 105° और 145 के बीच का क्षेत्र (जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अभिलेखित नहीं होती) दोनों प्रकार की तरंगों के लिए आया क्षेत्र दूसरे भूकंप के छाया क्षेत्र से भिन होता है।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

Prithvi Ki Aantrik Sanrachna Ka Varnan Bihar Board Class 11 प्रश्न 4.
भूकपीय गतिविधियों के अतिरिक्त भूगर्भ की जानकारी संबंधी अप्रत्यक्ष साधनों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
खनन क्रिया से हमें पता चलता है कि पृथ्वी के धरातल में गहराई बढ़ने के साथ-साथ तापमान एवं दबाव में वृद्धि होती है। यह भी पता चलता है कि गहराई के बढ़ने के साथ-साथ पदार्थ का घनत्व भी बढ़ता है। दूसरा अप्रत्यक्ष प्रोत उल्काएँ हैं, जो कभी-कभी धरती तक पहुँचती हैं। उल्काएँ जैसे ही पदार्थ के बने ठोस पिंड हैं, जिनसे हमारा ग्रह (पृथ्वी) बना है। अन्य अप्रत्यक्ष स्रोतों में गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकीय क्षेत्र भूकंप क्रियाएँ शामिल हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का चित्र वर्णन करें Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
भूकंपीय तरंगों के संचरण का उन चट्टानों पर प्रभाव बताएं जिनसे होकर यह तरंगे गुजरती हैं?
उत्तर:
भिन्न-भिन्न प्रकार की भूकंपीय तरंगों के संचरित होने की प्रणाली भिन्न-भिन्न होती है। जैसे ही ये संचरित होती हैं तो चट्टानों में कंपन पैदा होती है। ‘P’ तरंगों से कंपन की दिशा तरंगों की दिशा के समानांतर ही होती है। यह संचरण गति की दिशा में भी पदार्थ पर दबाव डालती है। इसके (दबाय) के फलस्वरूप पदार्थ के घनत्व में भिन्नता आती है और चट्टानों में संकुचन के फैलाव की प्रक्रिया पैदा होती है। अन्य तीन तरह की तरंगें संचरण गति के समकोण दिशा में कंपन पैदा करती है। ‘S’ तरंगें उर्ध्वाधर तल में, तरंगों की दिशा के समकोण पर कंपन पैदा करती हैं। अत: ये जिस पदार्थ से गुजरती है उसमें उभार व गर्त बनाती हैं। धरातलीय तरंगे सबसे अधिक विनाशकारी समझी जाती हैं।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

पृथ्वी की आतंरिक संरचना का सचित्र वर्णन करें Bihar Board Class 11 प्रश्न 2.
अंतर्वेधी आकृतियों से आप क्या समझते हैं? विभिन अंतर्वेधी आकृतियों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
ज्वालामुखी उद्गार से जो लावा निकलता है, उसके ठंडा होने से आग्नेय चट्टानें बनती हैं। लाया का यह जमाव या तो धरातल पर पहुँचकर होता है या धरातल के आधार पर आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण किया जाता है-)पातालीय (Plutonic) चट्टों (जब) लावा धरातल के नीचे ठंडा होकर जम जाता है)। जब लाया भूपटल के भीतर ही ठंडा हो जाता है तो कई आकृतियाँ बनती हैं। ये आकृतियाँ अंतर्वधौ आकृतियाँ (Intrusive forms) कहलाती हैं।

Bihar Board Class 11 Geography पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का चित्र हिंदी में Bihar Board Class 11 प्रश्न 1.
पृथ्वी की संरचना की जानकारी के प्रत्यक्ष साधन बताएं।
उत्तर:

  1. खाने
  2. कुएं
  3. छिद्र

प्रश्न 2.
पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तापमान वृद्धि की औसत दर क्या है?
उत्तर:
1°C प्रति 32 मिटर ।

प्रश्न 3.
पृथ्वी की संरचना की जानकारी प्रदान करने वाले परोक्ष साधन कौन-कौन रे हैं?
उत्तर:

  1. तापमान
  2. दबाव
  3. परतों का घनत्व
  4. भूकम्पीय तरंगें
  5. उल्काएँ

प्रश्न 4.
पृथ्वी की तीन परतों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. सियाल
  2. सीमा
  3. नाइफ

प्रश्न 5.
धात्विक क्रोड के दो प्रमुख पदार्थ बताएँ।
उत्तर:

  1. निकिल
  2. लोहा

प्रश्न 6.
भूकम्पीय तरंगों के प्रकार बताएँ।
उत्तर:

  1. प्राथमिक तरंगे
  2. माध्यमिक तरंगे
  3. परातलीय तरंगे

प्रश्न 7.
पच्ची के अध्यान्तर का घनत्व कितना है?
उत्तर:
13

प्रश्न 8.
अभ्यान्तर का घनत्व सबसे अधिक क्यों है?
उत्तर:
अभ्यान्तर में निकिल तथा लोई के कारण।

प्रश्न 9.
Volcano माला शब्द यूनानी भाषा के किस शब्द से बना है?
उत्तर:
यूनानी शब्द ‘Vulcan’ का अर्थ-पाताल देवता है।

प्रश्न 10.
पृण्व के अन्दर पिघले पदार्थ को क्या कहते हैं?
उत्तर:
मैग्मा।

प्रश्न 11.
जब मैग्मा पृथ्वी के धरातल से बाहर आ जाता है तो उसे क्या कहते हैं?
उत्तर:
लावा।

प्रश्न 12.
चालामुखी के मुख्य भाग लिखें।
उत्तर:

  1. हिंद्र
  2. ज्वालामुखी नली
  3. केटर।

प्रश्न 13.
ज्यालामुख विस्फोट के दो प्रकार लिखें।
उत्तर:

  1. केन्द्रीय विस्फोट
  2. दगरीय विस्कोट

प्रश्न 14.
सबसे धीमी गति वाली तरंगे कौन-सी है?
उत्तर:
घरातलीय तरंगे।

प्रश्न 15.
पृथ्वी का औसत घनत्व कितना है?
उत्तर:
5.53

प्रश्न 16.
पृथ्वी के केन्द्रीय परत को क्या कहते है?
उत्तर:
अध्यान्तर या क्रोड या गुरुमण्डल।

प्रश्न 17.
निफे (Nife) शब्द किन दो शब्दों के संयोग से बना है।
उत्तर:
निफे शब्द निकिला तथा फैरस (Ni+ Fe) के संयोग से बना है।

प्रश्न 18.
सीमा (Sima) किन दो शब्दों के संयोग से बना है?
उत्तर:
सीमा शब्द सिलिका तथा मैग्नीशियम (Si+Mg) के संयोग से बना है।

प्रश्न 19.
सियाल (Sial) किन दो शब्दों के संयोग से बना है?
उत्तर:
सियाल शब्द सिलिका तथा एल्यूमीनियम (Si+AI) के संयोग से बना है।

प्रश्न 20.
किन प्रमाणों से पता चलता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग का तापमान अधिक है।
उत्तर:

  1. ज्वालामुखी
  2. गर्म जल के झरने
  3. स्वानों से।

प्रश्न 21.
कौन-सी तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं?
उत्तर:
अनप्रस्थ तरंगे।

प्रश्न 22.
कितनी गहराई के पश्चात् ‘S’ तांगे लुप्त हो जाती है?
उत्तर:
2900 km.

प्रश्न 23.
भूकम्पीय तरंगों के अध्ययन करने वाले यन्त्र का नाम है?
उत्तर:
सीस्मोग्राफ (Seismography)

प्रश्न 24.
चालामुखी शंकु किसे कहते हैं?
उत्तर:
ज्वालामुखी के मुख से निकले पदार्थ मुख के आस-पास जमा हो जाते हैं, पोरे-धीरे ये शंकु का रूप धारण कर लेते हैं। इन ज्वालामुखी शंकु कहते हैं।

प्रश्न 25.
क्रेटर किसे कहते हैं।
उत्तर:
ज्वालामुखी के केन्द्र में कटोरे के समान था कौपाकार गर्न को केटर हैं।

प्रश्न 26.
काल्डेरा किसे कहते हैं?
उत्तर:
विशाल क्रेटर को काल्डेरा कहते हैं।

प्रश्न 27.
भूकम्प किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी का अचानक हिलना।

प्रश्न 28.
भूकम्प आने के तीन कारण लिखो।
उत्तर:

  1. ज्वालामुखी विस्फोट
  2. विवर्तनिक कारण
  3. लचक शक्ति

प्रश्न 29.
तीन महत्वपूर्ण भूकम्पों के नाम लिखो जो वर्तमान समय में हुए हों।
उत्तर:

  1. 19050 में कांगड़ा भूकम्प
  2. 1923 10 में टोकिया भूकम्प
  3. 2001 ई० में गुजरात के भूज का भूकम्प

प्रश्न 30.
उद्गम केन्द्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के अन्दर जहाँ भूकम्प डापन होता है, उसे उद्गम केन्द्र कहते है।

प्रश्न 31.
अधिकेन्द्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भूकम्प केन्द्र के ठीक ऊपर धरातल पर स्थिर बिन्दु या स्थान को अधिकेन्द्र कहते हैं।

प्रश्न 32.
विश्व के अधिकतर ज्वालामुखी किस पेटी में पाये जाते हैं?
उत्तर:
प्रशान्त महासागरीय पेटी।

प्रश्न 33.
तीन पेटियों के नाम बताएँ जहाँ पर ज्वालामुखी पाये जाते हैं?
उत्तर:

  1. प्रशान्त महासागरीय पेटी
  2. मध्य महाद्वीपीय पेटी
  3. अफ्रीका का दरार घाटी क्षेत्र।

प्रश्न 34.
किस ज्वालामुखी को कस सागर का प्रकाश स्तम्भ’ के नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
स्ट्रॉम्बोली।

प्रश्न 35.
विश्व में सबसे बड़ा सक्रिय ज्वालामुखी कौन-सा है?
उत्तर:
माओनालोआ (हवाई द्वीप)।

प्रश्न 36.
भारत में सक्रिय ज्वालामुखी का नाम बताएं।
उत्तर:
अण्डमान द्वीप के निकट बैरल डीप।

प्रश्न 37.
ज्वालामुखी के तीन प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. सक्रिय ज्वालामुखी
  2. प्रसुप्त ज्वालामुखी
  3. मृत ज्वालामुखी।

प्रश्न 38.
गहराई के साथ तापमान किस दर पर बढ़ता है?
उत्तर:
32 मीटर के लिए 1°C.

प्रश्न 39.
ज्वालामुखी विस्फोट के तीन कारण बताएं।
उत्तर:

  1. भूगर्भ में उच्च ताप
  2. भाप तथा गैसें
  3. दरारे (घंशन)

प्रश्न 40.
अधिकेन्द्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अधिकेन्द्र (Epicentre) – भूकम्प केन्द्र के ठोक अपर पावल पर स्थित बिन्दु या स्थान को अधिकेन्द्र कहते हैं। भूकम्प के झटके सब से पहले इस स्थान पर लगते हैं। भूकम्प द्वारा धरातल पर सबसे अधिक कम्पन पर होता है तथा इस केन्द्र के आस-पास सबसे अधिक तवाही होती है।

प्रश्न 41.
उद्मन केन्द्र किसे कहते हैं ? इसकी गहराई कितनी होती है?
उत्तर:
उद्गम केन्द्र (Focus) – पृथ्वी के अन्दर जहाँ भूकम्प उत्पन्न होता है उसे उद्गम केन्द्र कहते हैं। इस केन्द्र से भूकम्पीय तरंगें चारो ओर निकलती हैं। साधारणतया भूकम्पों की गहराई 50-100 कि० मी० तक होती है। पातालीय भूकम्प की गहराई 700 कि० मी० तक होती है।

प्रश्न 42.
भूकम्प की माप किस पैमाने पर की जाती है?
उत्तर:
भूकम्पों की माप-भूकम्पीय घटनाओं का मापन भूकम्पीय तीव्रता के आधार पर अथवा आघात की तीव्रता के आधार पर किया जाता है। भूकम्पीय तीव्रता को मापनी [रिक्टर स्केल’ Richter Scale] के नाम से जाना जाता है। भूकम्पीय तीव्रता भूकम्प के दौरान ऊर्जा विमोचन से सम्बन्धित है। इस मापानी के अनुसार भूकम्प की तीव्रता 0 से 10 तक होती है। तीव्रता गहनता (Intensity Scale) हानि की तीव्रता’ मापनी इटली के भूकम्प वैज्ञानिक मरकैली (Mercalli) के नाम पर है। यह मापनी झटकों से हुई प्रत्यक्ष हानि द्वारा निर्धारित की गई है। इसका गहनता का विस्तार 1 से 12 तक है।

प्रश्न 43.
हम कैसे जानते हैं कि अभ्यंतर तरल अवस्था में हैं ?
उत्तर:
विभिन्न तरंगों का वेग तथा मार्ग भूकम्पमापी यन्त्र द्वारा मापा जाता है। ये तरंगो विभिन्न परतों से टकराने के कारण परावर्तित होती रहती हैं। यह देखा गया है कि अनुप्रस्थ तरंगें द्रव माध्यम से होकर गुजर नहीं सकतीं। ये तरंगें पृथ्वी के अभ्यान्तर (Core) में अनुपस्थित होती हैं। इसलिए यह अनुमान लगाया जाता है कि अभ्यान्तर में पदार्थ द्रव स्थिति में होते हैं।

प्रश्न 44.
पृथ्वी के आन्तरिक भाग में उच्च ताप के क्या कारण हैं?
उत्तर:

  1. रसायनिक प्रक्रियाएँ
  2. रेडियो-धर्मी
  3. पदार्थ
  4. आन्तरिक शक्तियाँ
  5. उच्च मूल ताप।

प्रश्न 45.
किन प्रमाणों से पता चलता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भागों का तापमान अधिक है? आन्तरिक भागों में तापमान वृद्धि की दर क्या है?
उत्तर:
पृथ्वी के भीतरी भागों में गहराई के साथ-साथ तापमान में वृद्धि होती है। यहाँ वृद्धि दर I°C प्रति 32 मीटर है। निम्नलिखित प्रमाणों से पृथ्वी के आन्तरिक भागों में अधिक तापमान का पता चलता है –

  1. ज्वालामुखी विस्फोट
  2. गर्म जल के झरने
  3. खानों से
  4. गाईजर से
  5. गहरे कुँओं से।

प्रश्न 46.
पृथ्वी की संरचना की जानकारी के प्रत्यक्ष साधनों के नाम लिखो।
उत्तर:
प्रत्यक्ष साधन (Direct Sources) –

  • खाने
  • कुएँ
  • छिद्र

अप्रत्यक्ष साधन (Indirect Sources) –

  • तापमान
  • दबाव
  • पतरों का घनत्व
  • भूकम्पीय तरंगे
  • उल्काएँ
  • गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 47.
पृथ्वी के धरातल का विन्यास किन प्रक्रियाओं का परिणाम है ?
उत्तर:
पृथ्वी पर भू-आकृतियों का विकास बहिर्जात एवं अन्तर्जात क्रियाओं का परिणाम है। दोनों प्रक्रियाएँ निरन्तर कार्य करती हैं तथा भू-आकृतियों को जन्म देती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
गुरुमण्डल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
गुरुमण्डल (Barysphere) – पृथ्वी के केन्द्रीय भाग या आन्तरिक क्रोड को गरुमण्डल कहते हैं । इसकी औसत गहराई 4980 से 6400 मी० है । यह अत्यधिक भार युक्त खनिज पदार्थों से बना हुआ है। इसका औसत घनत्व 13 से अधिक है। इसमें लोहा तथा निकिल पदार्थों की अधिकता है। इस भाग को अभ्यान्तर (Core) भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
ज्वालामुखी किसे कहते हैं? ज्वालामुखी के विभिन्न भाग बताएँ।
उत्तर:
ज्वालामुखी (Volcano) – ज्वालामुखी क्रिया एक अन्तर्जात क्रिया है जो भू-गर्भ से सम्बन्धित है । ज्वालामुखी धरातल पर एक गहरा प्राकृतिक छिद्र है जिसके भू-गर्भ से गर्म गैसें, लावा, तरल व ठोस पदार्थ बाहर निकलते हैं। सबसे पहले एक छिद्र की रचना होती है जिसे ज्वालामुखी (Volcano) कहते हैं। इस छिद्र से निकलने वाले लावा पदार्थों के चारों ओर फैलने तथा ठण्डा होकर ठोस होने से एक उच्च भूमि का निर्माण होता है जिसे ज्वालामुखी पर्वत कहते हैं। एक लम्बे समय में कई बार निकासन, शीलतन तथा ठोसीकरण की क्रिया से ज्वालामुखी का निर्माण होता है।

ज्वालामुखी के भाग (Partsofa Volcano) –

  • ज्वालामुखी निकास – एक छेद जिस से लावा का निष्कासन होता है ज्वालामुखी निकास होता है, निकास कहलाता है।’
  • विवर – ज्वालामुखी निकास के चारों ओर एक तश्तरीनुमा गर्त को विवर कहते हैं।
  • कैल्डेरा – विस्फोट से बने खड़ी दीवारों वाले कंड को कैलडेरा कहते हैं।

प्रश्न 3.
तीन प्रकार के ज्वालामुखी कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. ज्वालामुखी के प्रकार (Types of Volcanoes) – संसार में अनेक प्रकार के ज्वालामुखी मिलते हैं। ज्वालामुखी विस्फोर्ट के आधार पर यह तीन प्रकार के होते हैं।
  2. सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcanoes) – यह वे ज्वालामुखी हैं जिनमें से लावा हमेशा निकलता रहता है। संसार में लगभग पांच सौ सक्रिय ज्वालामखी हैं। हवाई द्वीप समूह का मोनालुआ ज्वालामुखी विश्व का सबसे सक्रिय ज्वालमुखी है अन्य उदाहरण में भारत का बैरन द्वीप।
  3. प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcanoes) – यह वे ज्वालामुखी हैं जो लम्बे समय तक शान्त रहने के पश्चात् अचानक सक्रिय हो जाते हैं। जैसे इटली’ का विसुवियत ज्वालामुखी ।
  4. विलुप्त ज्वालामुखी (Extinct Voleanoes) – यह वे ज्वालामुखी है जो पूर्ण रूप से ठण्डे है, जैसे जर्मनी का ऐफिल पर्वत ।

प्रश्न 4.
उल्काएँ पृथ्वी की आन्तरिक बनावट के विषय में जानकारी देने में किस प्रकार
उत्तर:
कभी-कभी जलते हुए पदार्थ आकाश से पृथ्वी की ओर गिरते दिखाई देते हैं। इन्हें उल्का (Meteorites) कहते हैं । यह सौर मण्डल का एक भाग है । इनके अध्ययन से पता चलता है कि इनके निर्माण में लोहा निकलि की प्रधानता है। पृथ्वी की रचना उल्काओं से मिलती-जुलती है तथा पृथ्वी का आंतरिक क्रोड भी भारी पदार्थों (लोहा + निकिल) से बना हुआ है।

प्रश्न 5.
भूकम्पीय तरंगों के मुख्य प्रकार बताएँ कौन-सी तरंगे धीमी गति वाली हैं तथा कौन-सी तरंगे तेज गति वाली हैं?
उत्तर:
भूकम्पीय तरंगें तीन प्रकार की हैं –

  • प्राथमिक या अनुदैर्ध्य तरंगे।
  • गौण या अनुप्रस्थ तरंगें।
  • धरातलीय या लम्बी तरंगें।

धरातलीय तरंगे सबसे धीमी गति से चलती हैं। प्राथमिक तरंगे सबसे तेज गति से चलती हैं।

प्रश्न 6.
गुरुत्वाकर्षण तथा चुम्बकीय क्षेत्र किस प्रकार भूकम्प सम्बन्धी सूचना देते हैं?
उत्तर:
अन्य अप्रत्यक्ष स्रोतों में गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकीय क्षेत्र व भूकम्प सम्बन्धी क्रियाएँ शामिल हैं। पृथ्वी के धरातल पर भी विभिन्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकर्षण बल एक समान नहीं होता। है। यह (गुरुत्वाकर्षण बल) ध्रुवों पर अधिक एवं भूमध्यरेखा पर कम होता है। पृथ्वी के केन्द्र से दूरी के कारण गुरुत्वाकर्षण बल ध्रुवों पर कम और भूमध्य रेखा पर अधिक होता है। गुरुत्व का मान पदार्थ के द्रव्यमान के अनुसार भी बदलता है।

पृथ्वी के भीतर पदार्थों का असमान वितरण भी इस भिन्नता को प्रभावित करता है अलग-अलग स्थानों पर गुरुत्वाकर्षण की भिन्नता अनेक अन्य कारकों से भी प्रभावित होती है। इस भिन्नता को गुरुत्व विसंगति (Gravity anomaly) कहा जाता है। गुरुत्व विसंगति हमें भूपर्पटी में पदार्थों के द्रव्यमान के वितरण की जानकारी देती है। चुम्बकीय सर्वेक्षण भी भूपर्टटी में चुम्बीय पदार्थ के वितरण की जानकारी देते हैं। भूकम्पीय गतिविधियाँ भी पृथ्वी की आन्तरिक जानकारी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

प्रश्न 7.
सिस्मोग्राफ किसे कहते हैं इसका प्रयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाता है?
उत्तर:
सिस्मोग्राफ (Seismographd) – एक यन्त्र है जिसके द्वारा भूकम्पीय तरंगें तथा तीव्रता मापी जाती है। इस यन्त्र में लगी एक सूई द्वारा पेपर पर भूकम्प का उद्गम (Focus) भूकम्पीय तरंगें की गति मार्ग तथा तीव्रता का ज्ञान होता है।

प्रश्न 8.
पृथ्वी की तीन मौलिक परतों के नाम गहराई, विस्तार तथा घनत्व बताएँ।
उत्तर:
पृथ्व का निर्माण करने वाली तीन मूल परतें हैं जिनका रचना भिन्न घनत्व वाले पदार्थों

  1. भृ – पृष्ठ (Crust)
  2. मैण्टल (Mantle)
  3. क्रोड (Core)

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प्रश्न 9.
निफे (Nife) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
यह पृथ्वी की सबसे निचली तथा केन्द्रीय परत है। सबसे भारी परत है जिसका घनत्व 13 है। इसमें निकिल तथा फेरस (लोहा) धातुएँ अधिक हैं। इसलिए इसे (Nife = Nickle + Ferrous) कहा जाता है। इस परत की मोटाई 3500 km. है।

प्रश्न 10.
सीमा (Sima) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सियारा से निचली परत को सीमा कहा जाता है । इस परत से सिलिका तथा मग्नीशिम धातुएँ अधिक मात्रा में मिलती हैं। इसलिए इस परत को सीमा (Sima= Silica+magnesium) कहा जाता है। इस परत की मोटाई 2800 km है। इसका औसत घनत्व 4.75 है। महासागरीय तल इसी परत से बना हुआ है।

प्रश्न 11.
सियाल (Sail) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत है। इसमें सिलिका तथा एल्यूमीनियम के अंश अधिक मात्रा में है। इन दोनों धातुओं के संयोग के कारण इस परत को सियाल (Sail = Silica Aluminimum) कहते हैं। इस परत की औसत गहराई 60 km है। इस परत का घनत्व 2.75 है। इस परत से महाद्वीपों का निर्माण हुआ है।

प्रश्न 12.
दुर्बलता मण्डल क्या है?
उत्तर:
दुर्बलता मण्डल (Asthenosphere) ऊपरी मैंटल परत का एक भाग है। यह 650 कि० मी० गहरा है। यह परत ठोस तथा लचीला गुन रखती है। इस परत का अनुमान प्रसिद्ध भूकम्प वैज्ञानिक गुट्नबर्ग ने लगाया था। यहाँ भूकंपीय लहरों की गति कम होती Asthenosphere का अर्थ है दुर्बलता।

प्रश्न 13.
अनुदैर्ध्य तथा अनुप्रस्थ तरंगों में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
अनुदैर्ध्य तथा अनुप्रस्थ तरंगों में अन्तर
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प्रश्न 14.
भूकम्पों के विभिन्न प्रकार बताएँ?
उत्तर:
उत्पत्ति के आधार पर भूकम्प निम्नलिखित प्रकार के हैं

  1. विवर्तनिक भूकम्प – सामान्यतः विवर्तनिक (Tectonic) भूकम्प ही अधिक आते हैं। ये भूकम्प भ्रंश तल के किनारे चट्टानों के सरक जाने के कारण उत्पन्न होते हैं।
  2. ज्वालामुखी भूकम्प – एक विशिष्ट वर्ग के विवर्तनिक भूकम्प को ही ज्वालामुखीजन्य (Volcanic) भूकम्प समझा जाता है। ये भूकम्प अधिकांशतः सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्रों तक ही सीमित रहते हैं।
  3. नियत भूकम्प – खनन क्षेत्रों में कभी-कभी अत्यधिक खनन कार्य से भूमिगत खानों की छत ढह जाती है। जिससे हलके झटके महसूस किये जाते हैं। इन्हें नियात (Collapse) भूकम्प कहा जाता है।
  4. विस्फोट भूकम्प – कभी-कभी परमाणु व रसायनिक विस्फोट से भी भूमि में कम्पन होती है। इस तरह के झटकों को विस्फोट (Explosion) भूकम्प कहते हैं।
  5. बाँध जनित भूकम्प – जो भूकम्प बड़े बाँध वाले क्षेत्रों में आते हैं, उन्हें बाँध जनित (Reservior induced) भूकम्प कहा जाता है।

प्रश्न 15.
प्रशान्त महासागरीय पेटी को ‘अग्नि वलय’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
प्रशान्त महासागर के चारों ओर तटीय भागों में बहुत से सक्रिय ज्वालामुखी पाए जाते हैं। संसार क कुल 552 सक्रिय ज्वालामुखियों में से 403 ज्वालामुखी इस क्षेत्र में स्थित हैं। ये ज्वालामुखी प्रशान्त महासागर के चारों ओर एक वृत्त की भांति स्थित हैं। इनसे समय-समय पर उद्गार उत्पन्न होता रहता है। इस क्षेत्र के वृत्ताकार तथा सक्रिय ज्वालामुखियों के कारण इसे अग्नि वल (Ringe of Fire) भी कहा जाता है।

प्रश्न 16.
सुनामी किसे कहते हैं ? इनके विनाशकारी प्रभाव का एक उदाहरण दो ।
उतर:
सुनामी (Tsunami)-कई बार भूकम्प के कारण सागरीय लहरें बहुत ऊँची उठ जाती हैं। जापान में इन्हें सुनामी कहते है। यह तूफानी लहरें तटीय प्रदेशों में जान-मान की हानि करती हैं। सन् 1883 में क्राकटोआ विस्फोट से जो भूकम्प आया जिससे 15 मीटर ऊँची लहरें उठी तथा पश्चिमी जावा में 3600 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। 26 दिसम्बर, 2004 को इण्डोनेशिया के निकट केन्द्रित भूकम्प से हिन्दमहासागर में 30 मीटर ऊँची सुनामी लहरें जिससे लगभग 3 लाख व्यक्तियों की जानें गई। इण्डोनेशिया थाइलैंड, अण्डमान द्वीप तमिलनाडु तट तथा श्रीलंका के तटीय भागों में प्रलय समान तबाही हुई।

प्रश्न 17.
मैग्मा तथा लावा में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
मैग्मा तथा लावा में अन्तर –
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प्रश्न 18.
सक्रिय ज्वालामुखी तथा प्रसुप्त ज्वालामुखी में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
सक्रिय ज्वालामुखी तथा प्रसुप्त ज्वालामुखी में अन्तर –
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प्रश्न 19.
भू-पृष्ठ तथा अभ्यान्तर में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भू-पृष्ठ और अभ्यान्तर में अन्तर –
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प्रश्न 20.
प्रसुप्त तथा मृत ज्वालामुखी में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रसुप्त तथा मृत ज्वालामुखी में अन्तर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भूकम्पीय तरंगें कौन-कौन सी हैं? इनकी विशेषताओं का वर्णन करो। ये पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की विभिन्नताओं की जानकारी कैसे देती हैं?
उत्तर:
पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की जानकारी का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत भूकम्पीय तरंगे हैं। भूकम्प के कारण पृथ्वी के धरातल के ऊपर तथा नीचे तरंगे उत्पन्न होती हैं। इन्हें भूकम्पीय तरंगें कहते हैं।
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ये तरंगे पृथ्वी के भीतर जिस स्थान से उत्पन्न होती है उसे उद्गम केन्द्र (Focus) कहते हैं। इस केन्द्र के ऊपर धरातल पर स्थित स्थान को अभिकेन्द्र (Epicentre) कहते हैं। जहां भूकम्पमापी यन्त्र (Seismography) द्वारा इन तरंगों का आलेखन किया जाता है । भूकम्पीय तरंगे तीन प्रकार की होती हैं –

1. अनुदैर्ध्य तरंगें (Longitudinal Waves) – ये ध्वनि तरंगें (Sound Waves) की भान्ति होती है। ये तरल गैस ठोस तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं। ये तरंगे आगे-पीछे एक-समान गति से चलती हैं। इन्हें प्राथमिक तरंगे (Primary waves) या केवल P-waves भी कहा जाता है।
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2. अनुप्रस्थ तरंगे (Transverse Waves) – ये तरंगे दोलन की दिशा पर समकोण बनाती हुई चलती हैं। इनकी गति धीमी होती हैं। ये तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं। इन्हें साधरणत: माध्यमिक तरंगे (Secondary waves) या (S-waves) भी कहा जाता है।

3. धरातलीय तरंगें (Surface Waves) – ये तरंगें धरातल पर अधिक प्रभावकारी होती हैं। गहराई के साथ-साथ इनकी तीव्रता कम हो जाती है। ये एक लम्बे समय में पृथ्वी के भीतरी भागों तक पहुँच पाती हैं। ये तरंगें ठोस, तरल एवं गैसीय माध्यमों की सीमाओं से गुजरती हैं। इन्हें रैले तरंगें (Rayliegh waves) या (R-waves) भी कहा जाता है।
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इन भूकम्पीय तरंगों के वेग तथा संचरण मार्ग द्वारा पृथ्वी के आन्तरिक भागों में विभिन्न परतों के भौतिक गुणों का पता चलता है। इन तरंगों के वेग से विभिन्न परतों के घनत्व का पता चलता है। इन तरंगों के अध्ययन से निम्नलिखित तत्त्वों का पता चलता है –

  • भू-पृष्ठ विभिन्न प्रकार की चट्टानों का बना हुआ है।
  • पृथ्वी तीन परतों में विभाजित किया जा सकता है, जैसे-भू-पृष्ठ, मैण्टल तथा क्रोड।
  • भू-पृष्ठ, सबसे हल्की पस्त है जिसका औसत घनत्व 2.7 है।
  • क्रोड सबसे भारी परत है जिसका घनत्व 17.2 है।
  • 2900 किलोमीटर की गहराई तक तरंगों की निरन्तर गति से पता चलता है कि यह क्षेत्र ठोस पदार्थों से बना है।
  • पृथ्वी के अभ्यान्तर की मोटाई 3500 किमी है।
  • विभिन्न परतों में अन्तराल पाए जाते हैं जिनके कारण भूकम्पीय तरंगें अपना मार्ग बदल देती हैं।
  • क्रोड में अनुप्रस्थ तरंगों का न होना इस बात का सूचक है कि क्रोड के पदार्थ द्रव स्थिति में हैं।

प्रश्न 2.
भूकम्प किसे कहते हैं ? यह कैसे उत्पन्न होता है?
उत्तर:
भूकम्प (Earthquake) – भूपृष्ठ के किसी भी भाग के अचानक हिल जाने को भूकम्प कहते हैं । (Anearthquake isa sudden movement on the crust of the earth) इस प्रकार भूकम्प धरातल का कम्पन तथा दोलन है जिसके द्वारा चट्टानें ऊपर नीचे सरकती हैं। यह एक आकस्मिक एवं अस्थायी गति है। भूकम्प अपने केन्द्र से चारों ओर तरंगों के माध्यमों से आगे बढ़ता है।

भूकम्प के कारण – प्राचीन काल में लोग भूकम्प को भगवान् का कोप मानते थे, परन्तु वैज्ञानिकों के अनुसार भूकम्प के निम्नलिखित कारण हैं:
1. ज्वालामुखी उद्गार (Volcanic Fruption) – ज्वालामुखी विस्फोट में शक्ति होती है जिससे निकट स्थान के समीपवर्ती क्षेत्र काँप उठते हैं । सन् 1883 में क्राकटोआ विस्फोट से

2. दूर-दूर तक भूकम्प अनुभव किए गए।
विवर्तनिक कारण (TectonicCauses) – पृथ्वी की भौतरी हलचलों के कारण धरातल पर चट्टानों में मोड़ तथा दरारें पड़ जाती हैं। दरारों के सहारे हलचल होती है और भूकम्प आते हैं।

3. पृथ्वी का सिकुड़ना (Contraction of Earth) – तापमान कम होने से पृथ्वी सिकुड़ती है तथा चट्टानों में हलचल के कारण भूकम्प आते हैं।

4. लचक शक्ति (Elasticity of Rocks) – जब किसी चट्टान पर दबाव पड़ता तो वह चट्टान उस दबाव को वापस धकेलती है।

प्रश्न 3.
पृथ्वी की आंतरिक संरचना की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी की आंतरिक संरचना – आस्ट्रिया भू-वैज्ञानिक स्बेस (Suess) के अनुसार महादेशों की तलछटी चट्टानों के नीचे पृथ्वी की तीन मुख्य परतें हैं-ऊपरी परत, मध्यवर्ती परत और केन्द्रीय पिंक जिनको उन्होंने क्रमशः सियाल, सीमा तथा नीफे कहा है।

1. ऊपरी परत – महादेशों की तलछटी चट्टानों के ठीक नीचे एक ऐसी चट्टानों की परत है जो ग्रेनाइट से बहुत मिलती-जुलती है । इस परत का नाम स्वेस ने सियल दिया है कि क्योंकि इस परत की चट्टानों के ही मुख्य तत्त्व सिलिकन तथा एल्युमिनियम है। इस परत का घनत्व 2.75 से 2.90 तक है। Sial का अर्थ है – Sial = Silicon + Aluminium है, इस परत की औसत गहराई 60 संख्या है।

2. मध्यवर्ती परत – सियाल के नीचे भारी चट्टानों की एक मोटी परत है। इसमें आग्नेय चट्टानों जैसे बेसाल्ट और ग्रैबो की प्रधानता है। इस परत का नाम सीमा (Sima) है क्योंकि इसके दो मुख्य तत्त्व सिलिकन तथा मैग्नेशियम है। इस परत का घनत्व 2.90 से 4.75 तक है।

केन्द्रीय पिण्ड – पृथ्वी की तीसरी परत भूगर्भ का केन्द्रीय भाग है। इसमें मुख्यतः निकेल तथा लोहा जैसे भारी धातुओं का बाहुल्य है। इस परत का नाम निफे (Nife) दिया गया है। जिसका औसत घनत्व 12 से कुछ कम होता है। और Nife का अर्थ Nife = Nickle + Ferrous है जिसकी मुटाई 3500 Km. लगभग है।